<?xml version="1.0"?>
<feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xml:lang="en">
	<id>https://editor.nepalikitab.org/api.php?action=feedcontributions&amp;feedformat=atom&amp;user=Nepalikitab8848</id>
	<title>नेपाली किताब सम्पादन (Nepali Book Editor) - User contributions [en]</title>
	<link rel="self" type="application/atom+xml" href="https://editor.nepalikitab.org/api.php?action=feedcontributions&amp;feedformat=atom&amp;user=Nepalikitab8848"/>
	<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php/Special:Contributions/Nepalikitab8848"/>
	<updated>2026-04-18T01:41:28Z</updated>
	<subtitle>User contributions</subtitle>
	<generator>MediaWiki 1.41.5</generator>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=Main_Page&amp;diff=105</id>
		<title>Main Page</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=Main_Page&amp;diff=105"/>
		<updated>2024-06-14T14:21:36Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: /* Step 1:  Scan and OCR */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;strong&amp;gt;Welcome to Nepali Kitab Editing Team.&amp;lt;/strong&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
This website is a sub-website of nepalikitab.org. Here we convert old books into Unicode text format. It is a collective effort by volunteers around the world. If you are also interested, please join the team.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
We keep here the books generated after scanning and extracting texts with OCR. It contains many errors. Our goal is to remove the errors.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==How to edit==&lt;br /&gt;
[[File:Editor-timeline.png|thumb]]&lt;br /&gt;
1. Make an account or log in.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2. Select the book of your interest.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. Click edit&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
4. Edit and clean up the errors and book format. If you are familiar with wiki syntax, you can edit the source too.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
5. Save time to time while editing&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
For details about formatting text, refer to: https://www.mediawiki.org/wiki/Help:Formatting&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 1:  Scan and OCR ==&lt;br /&gt;
*[[रामायण]] भानुभक्त आचार्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* [[तरुण तपसी (नव्यकाव्य)]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[आदिकवि भानुभक्त (पटकथा)]] यादब खरेल&lt;br /&gt;
* [[इतिश्री (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[केही धार्मिक तथा साँस्कृतिक सम्पदाहरू (केही नमुना कलाकृतिहरू)]] सत्यमोहन जोशी&lt;br /&gt;
* [[रमाइला गाउँखाने कथा]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[दसैँ, पिङ र हात्ती (बालकथा-सङ्ग्रह)]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[८० दिनमा विश्‍व भ्रमण]] जुल्स वर्न,गोरखबहादुर सिंह&lt;br /&gt;
* [[बालभाका - १ (बालकविता सङ्ग्रह)]] उद्धवप्रसाद प्याकुरेल&lt;br /&gt;
* [[ताल (उपन्यास)]] यासुनारी कावाबाता&lt;br /&gt;
* [[चतुरेको चर्तिकला (कथा सङ्ग्रह)]] गोरखबहादुर सिंह&lt;br /&gt;
* [[ठूलो फुल (A Big Egg)]] Roma Pradhan, Shanta Das Manandhar&lt;br /&gt;
* [[आखिरमा टोम्मीको टोलीले जिती छाड्यो]] क्रिस्टिन स्टोन,शान्तदास मानन्धर&lt;br /&gt;
* [[जय भुँडी (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[मुकुन्द इन्दिरा (नाटक)]] बालकृष्ण सम&lt;br /&gt;
* [[खाल्डामा परेको भकुन्डो]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[जे छोए पनि सुन]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[अन्तिम निम्तो]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[भीमसेन थापा (ऐतिहासिक खण्डकाव्य)]] सिद्धिचरण श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[ऋतुविचार (खण्‍डकाव्य)]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[छन्दका १०१ कविता]] (सङ्कलन) कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[गणित प्राविधिक शब्दकोश]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[उज्यालोको खोजीमा (उपन्यास)]] हरिहर खनाल&lt;br /&gt;
* [[सपनाको देशमा]] चन्द्रकान्त आचार्य&lt;br /&gt;
* [[महिला लक्षित शिक्षक सेवा आयोग तयारी अध्ययन सामग्री]] विष्णुप्रसाद अधिकारी&lt;br /&gt;
* [[शिक्षक पेसागत विकास तालिम (तालिम पाठ्यक्रम)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[हाम्रा लोकबाजाहरू (बालबोध - ५१)]] रामप्रसाद कँडेल&lt;br /&gt;
* [[पर्दा, समय र मान्छेहरू (कथासङ्‍ग्रह)]] झमक घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[काउकुती (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* &amp;lt;nowiki&amp;gt;[[विदुर नीति Vidura Niti (Sanskrit-English)]]&amp;lt;/nowiki&amp;gt; (Extracted From) Mahabharata [महाभारत]&lt;br /&gt;
* [[जंगबहादुरको बेलाइती कापी]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[कति वटा रोटी]] शिल्पी प्रधान&lt;br /&gt;
* [[विश्वका प्रमुख सभ्यता तथा संस्कृति (बाल ज्ञानकोश - ३)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अस्माकम् संस्कृतम् - कक्षा १]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[प्रारम्भिक संस्कृत व्याकरण र रचना]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[गोरक्ष-साह-वंश (ऐतिहासिकं महाकाव्यम्)]] हरिप्रसाद शर्मा&lt;br /&gt;
* [[२०२ ओटा ठट्टा]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[धुमधामको घुमघाम (भक्तप्रसाद भ्यागुताको नेपालयात्रा)]] कनकमणि दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[महिलाका लागि डाक्टर नभएमा]] -&lt;br /&gt;
* [[दस औतार (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[A Perfect Match]] Ramendra Kumar&lt;br /&gt;
* [[मधुपर्क (वर्ष ४७, अंक ४, २०७१ भदौ)]] -&lt;br /&gt;
* [[सौगात (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[एक घर एक रोजगार (प्रयागदत्त तेवारीको कृषिकथा)]] मिलन बगाले&lt;br /&gt;
* [[रवीन्द्रनाथका नाटकहरू]] -&lt;br /&gt;
* [[पेसा, व्यवसाय र प्रविधि]] -&lt;br /&gt;
* [[मामा माइजु]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[म को हुँ]] पेमा डोल्मा लामा&lt;br /&gt;
* [[चनाचटपटे (बालकविता-सङ्ग्रह)]] बूँद राना&lt;br /&gt;
* [[आवाज (सामाजिक उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[स्पष्टीकरण (कथासङ्ग्रह)]] हरिभक्त कटुवाल&lt;br /&gt;
* [[दशैँको दक्षिणा (बालउपन्यास)]] गङ्गा पौडेल&lt;br /&gt;
* [[चार आर्य-सत्य (बुद्ध-शिक्षाका चार स्तम्भ)]] दोलेन्द्ररत्न शाक्य&lt;br /&gt;
* [[विजय चालिसेका बालकथाहरू]] विजय चालिसे&lt;br /&gt;
* [[सिर्जनशील विद्यालय]] अर्जुन श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[अभिभावकको सहयोगमा बालबालिकालाई घरमा नै गराउन सकिने सिकाइ क्रियाकलापहरू (कक्षा १)]] -&lt;br /&gt;
* [[दर्शन परिचय (विश्वका दर्शन र कला साहित्यिक बादहरू)]] परशुराम कोइराला&lt;br /&gt;
* [[खोज (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[अनिवार्य सामाजिक अध्ययन (१२३) - माध्यमिक शिक्षा परिक्षाको प्रश्न तथा उत्तरकुञ्जिका २०७५]] -&lt;br /&gt;
* [[बिहानीको घामसँग]] तारा पुन, शान्तदास मानन्धर&lt;br /&gt;
* [[एकादेशमा (बालकथाहरूको सँगालो)]] उषा दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[इतिहासका विम्बहरू]] पूर्णचन्द्र घिमिरे, रमेशचन्द्र घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[पन्ध्रौं योजना (२०७६७७-२०८०८१)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[नेपालको शाह तथा राणा वंशावली]] विष्णु प्रसाद श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[Aaloo-Maaloo-Kaaloo]] Vinita Krishna&lt;br /&gt;
* [[परित्याग (उपन्यास)]] माधव खनाल&lt;br /&gt;
* [[अमेरिका (उपन्यास)]] गंगा लिगल&lt;br /&gt;
* [[उखान मिलेन !]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[राष्ट्रकवि माधव घिमिरे (जीवनी, व्यक्तित्व र कृतित्वको सङ्‍क्षिप्त रेखाङ्‍कन)]] शैलेन्दुप्रकाश नेपाल&lt;br /&gt;
* [[केहि गुणकारी बोटबिरूवाहरू (बालबोध - ४१)]] डा. हरिप्रसाद&lt;br /&gt;
* [[दिवास्वप्न]] गिजुभाई, शरच्चन्द्र वस्ती&lt;br /&gt;
* [[संस्कृत, प्राकृत र नेपालीका सन्धिनियम]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[शिक्षाका ती दिन]] पुष्पराज पौडेल&lt;br /&gt;
* [[मपाईं (निबन्ध)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[Autobiography of a YOGI]] Paramhansa Yogananda&lt;br /&gt;
* [[ताराबाजी लै! लै!!]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[विश्वास (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[Akbar and Birbal Moral Stories]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[बुद्धवादका तीन आयाम]] पशुपति घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[करेसाबारीका जडिबुटीहरू]] केदार श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[काठमाडौं उपत्यका खुलास्थलहरू सम्बन्धी मानचित्र पुस्तक २०७१]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अन्ताक्षरी खेल]] ध्रुव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[साइबर बालकथा]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[कलेजी थाल]] ध्रुव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[कत्ति धुनु गधाहरूलाई (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] लक्ष्मण गाम्नागे&lt;br /&gt;
* [[गौरी (शोककाव्य)]] माधव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[आमाको माया]] रमेश चन्द्र अधिकारी&lt;br /&gt;
* [[Natural Treasures of Nepal]] Nepal Tourism Board&lt;br /&gt;
* [[नारीस्वर (महाकवि देवकोटा विशेष) - २०६६ असोज]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[चार गजलकारका उत्कृष्ट गजल (गजलसङ्ग्रह)]] मनु ब्राजाकी&lt;br /&gt;
* [[स्यालको जुक्ती]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[स्थानीय पाठ्यक्रम विकास तथा कार्यान्वयन मार्गदर्शन (मातृभाषा सहित) २०७६]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[बाँदर बन्ने रहर (बालकथा सङ्ग्रह)]] गोपीकृष्ण ढुङ्गाना&lt;br /&gt;
* [[डाढो (हास्यव्यङ्ग्यहरू)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[मध्यचन्द्रिका (नेपाली भाषाको मझौला व्याकरण)]] सोमनाथ शर्मा&lt;br /&gt;
* [[नेपाली क्रान्ति-कथा]] फणीश्वरनाथ रेणु&lt;br /&gt;
* [[डायना (महाकाव्य)]] शैलेन्दुप्रकाश नेपाल&lt;br /&gt;
* [[शङ्खे र फट्याङ्ग्रो]] अनन्तप्रसाद वाग्ले&lt;br /&gt;
* [[मोहिनीले खोसेको अमृतकलश]] अमर निराकार राई&lt;br /&gt;
* [[हिन्दू-धर्म के हो]] महात्मा गाँधी&lt;br /&gt;
* [[बालबालिकामा पढ्ने बानीको विकास]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[The Last Page of My Poem (मेरो कविताको अन्तिम पृष्ठ)]] Rajeshwor Karki&lt;br /&gt;
* [[जय भोलि !]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[संस्कृत व्याकरणको रूपरेखा]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[घरबारी बगैंचा]] बोल बहादुर थापा&lt;br /&gt;
* [[नबिर्सने यात्रा (यात्रा-कथा)]] समीर नेपाल&lt;br /&gt;
* [[समाज परिवर्तनमा संस्कृतिकर्मी]] विजय सुब्बा&lt;br /&gt;
* [[मेवालाल (बालकथा सङ्ग्रह)]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[A Helping Hand]] Payal Dhar&lt;br /&gt;
* [[आमा (कविता सङ्ग्रह)]] भक्ति दाहाल &#039;विष्फोट&#039;&lt;br /&gt;
* [[विज्ञान तथा वातावरण - कक्षा ८ (पुरानो संस्करण)]] गोपीचन्द्र पौडेल&lt;br /&gt;
* [[चप्पल]] अर्हन्त श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[मात्राहरू]] हरिहर लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[दोस्रो भाषाको रूपमा नेपाली भाषा]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अब्राहम लिंकन (१८०९-१८६५)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[घरभेटी भाउजू (कथासङ्ग्रह)]] कृष्णादेवी शर्मा&lt;br /&gt;
* [[Agreeing and Disagreeing - English Grade 10]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[शकुन्तला नाटक]] शम्भुप्रसाद ढुंग्याल&lt;br /&gt;
* [[Chunu and Munu Read]] Shanta Das Manandhar, Stephanie Wei&lt;br /&gt;
* [[अब खेल खेल्ने!]] शिल्पी प्रधान&lt;br /&gt;
* [[जनावरहरूको सभा]] ज्ञाननिष्ठ ज्ञवाली&lt;br /&gt;
* [[विश्वप्रसिद्ध पैंतिस साहित्यकार]] प्रभात सापकोटा&lt;br /&gt;
* [[कसिङ्गर (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[पंचतन्त्र कथासंग्रह]] &lt;br /&gt;
* [[अक्षर (बालकथा)]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 2: Title and heading corrections completed ==&lt;br /&gt;
* [[९७ साल]] आनन्ददेव भट्ट&lt;br /&gt;
* [[गलबन्दी (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 2&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 3: Text correction completed ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 3&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
==Step 4: Proof reading completed==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 4&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[अनौठो फल]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==Step 5: Finished books==&lt;br /&gt;
पुरा भएका किताब&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 5&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%AD%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%B8%E0%A5%87%E0%A4%A8_%E0%A4%A5%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A4%BE_(%E0%A4%90%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%96%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF)&amp;diff=104</id>
		<title>भीमसेन थापा (ऐतिहासिक खण्डकाव्य)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%AD%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%B8%E0%A5%87%E0%A4%A8_%E0%A4%A5%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A4%BE_(%E0%A4%90%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%96%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF)&amp;diff=104"/>
		<updated>2024-06-14T14:20:23Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: Created page with &amp;quot;सिद्धिचरण श्रेष्ठ  नेपाल राजकीय प्रज्ञा-प्रतिष्ठान  ॥.4 हा क) 4 ॥ई हक&amp;quot; लर) .242- ।;  णश्॥2७० 80:  ७१०,१७साझा शिक्षा ई-पाटी६ ऐर  ५/४४४४,१11510101090.018५४४५४४४.०।61121201.010  गीमसेन थापा  (ऐतिहासिक खण्डकाव्य)  सिद्...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;सिद्धिचरण श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपाल राजकीय प्रज्ञा-प्रतिष्ठान&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
॥.4 हा क) 4 ॥ई हक&amp;quot; लर) .242- ।;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
णश्॥2७० 80:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७१०,१७साझा शिक्षा ई-पाटी६ ऐर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
५/४४४४,१11510101090.018५४४५४४४.०।61121201.010&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गीमसेन थापा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(ऐतिहासिक खण्डकाव्य)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिद्धिचरण श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
0&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपाल राजकीय एल्ला -प्रतिष्तानकमलाढी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ग्रन्य - भीमसैन थापा (ऐतिहासिक खण्डकाव्य)रचयिता - सिद्धिचरण श्रेष्ठप्रकाशक ना नेपाल राजकीय प्रज्ञा-प्रतिष्ठानकमलादी, काठमाडौंप्रकाशन वर्ष - वि.सं. २०६०प्रथम सस्करण - ११०० प्रतिसर्वाधिकार - प्रकाशकमा सुरक्षितआवरण न. कैँ. के. कर्माचार्यकम्प्यूटर - भरत श्रेष्द्ध ।इजि कम्प्यूटर सर्भिस)मूल्य - रु, बडालमुत्रक न. प्रज्ञा-मुद्रणालयकमलादी, काठमाडौँ ।15द 190. न 99933-50-650-5छाता त8 हा 11/020&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(% डोज लाडाउाटछ। हा?८ रिण्छा))०४ 5400010190/81 51709119&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपकुलपतिको मन्तव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपाल अधिराज्य भनेको बिभिन्न बर्ण, जातजातिसमूहको साझाफूलबारी भएर रहेको छ। यहाँ विभिन्न रङ्गका मनोहारी फलहरूढकमक्क भएर फुलेभौं गरी काव्य, साहित्य, संस्कृति, कलाकापनि बिभिन्न आवधारा, विभिन्न वैचारिक, दार्शनिक चिन्तनघारा बोकेकाचिन्तकहरूले कलाका, सुन्दर फूलहरू फुलाएका छन्‌ । यिनै विभिन्नभावधारा र चिन्तनधारा लिएर काव्यसाहित्यसाधनामा लागेका कबिसाहित्यकारहरूले आफ्ना-आफ्ना ठाउँबाट आफ्नै शैली, आफ्नैअभिव्यक्तिको सुवास फैलाएर अनेकतामा पनि एकताको रङ्ग घोलेर नेपालीकाव्य-साहित्य-कलाका रसिक पाठकलाई यथेष्ट परितृप्ति दिनै प्रयासगरिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपाल राजकीय प्रज्ञा-प्रतिष्ठानको मूल उद्देश्य यस्तै विभिन्न रङ्गर रूपका सांस्कृतिक एकता र बास्ना लिएर फुलेका राष्ट्रभाषा नेपाली रअरू राष्ट्रिय भाषाका काव्य-क्लाकसुमलाई चुनेर यसको रस बास्नादेशभित्र र बाहिर फैलाउँदै देशको साहित्य, कला, संस्कृतिको भण्डारलाईसमृद्ध तुल्याउनु हो। साथै यसैमार्फत साहित्यका प्रबुद्ध र रसिकपाठकहरूलाई परितृप्त पनि तुल्याउनु रहेको छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्तमान प्रजातान्त्रिक अभ्यासका परिप्रेक्ष्यमा राष्ट्रका विविधकला, संस्कृति र साहित्यलाई राष्ट्रको अक्षुण्णता राखी अखण्ड, सुदृठ,शान्त र सुन्दर नेपालका रूपमा यहाँका विविध सामाजिक परम्परा रसंस्कृति मात्र होइन चिन्तनधारालाई पनि निष्पक्षरूपमा एक सूत्रमा गाँस्नेप्रयत्न गर्नु पनि यसको कर्तव्यक्षेत्रभित्र पर्न आउँछ । यिनै उद्देश्यहरूकोपरिपूर्ति गर्ने कममा प्रतिष्ठानले आजपर्यन्त नेपाली वाङ्मयलाई आफ्नोक्षमताले भेटेसम्म प्रकाशित गर्दै आएको छ र अब पनि अक्षुण्ण बढावादिँदै जानेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नर्द्र्नच्य्क्&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोहन कोइरालाउपकुलपतिनेपाल राजकीय प्ज्ञा-प्रतिष्ठान&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रकाशकीय&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिमालयको सुन्दर, शान्त र शीतल काखमा रहेको नेपाल हिमालीसभ्यता र संस्कृतिको केन्द्र हो र बहुजातीय एवं बहुभाषिक राष्ट्र हो।यसमा निवास गर्नै जातजातिका आ-आफ्नै भाषा, आ-आफ्नै कलाकौशल,आ-आफ्नै गीत-सङ्गीत, आ-आफ्नै नृत्य, नाट्य, आ-आफ्नै संस्कृति तथाआ-आफ्नै धार्मिक-दार्शनिक अबधारणा छन्‌ तापनि ती सबै राष्ट्रियएकताका अदूट सूत्रमा गाँसिएका छन्‌, आ-आफ्ना परम्परा जोगाउँदैसहिष्णुता र सहअस्तित्वका सिद्धान्तमा बाँचेका छन्‌ र समयसापेक्ष रूपमाआधुनिकीकरणका दिशामा क्रमश: अघि बढ्दै पनि छन्‌ । यसैले नेपालविश्वसमुदायका बीच शान्तिप्रिय बहुलबादी आधुनिक समाजको अनुपमआवर्श उपस्थित गर्ने देशका रूपमा आफ्नो पहिचान प्रस्तुत गर्न सक्षमरहिआएको छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनेकतामा एकताको यसै आदर्शअनुरूप नेपाल राजकीय प्रज्ञा-प्रतिष्ठानले नेपाललाई यसको आफ्नो समग्रतामा परिचित गराउने हेतुलेनेपालको राष्ट्रभाषा नेपालीका साथै नेपालका राष्ट्रिय भाषा तथा&#039;कलाकौशल, सङ्गीत, नृत्य, नाट्य, संस्कृति र समाजशास्त्रसम्बन्धी विषयकोअध्ययन-अनुसन्धान एवं मौलिक सृजन तथा अनुवादका माध्यमबाटउपयोगी गहन कृति तयार गरी गराई प्रकाशमा ल्याउने अनि बिभिन्न क्षेत्रर विध्यामा कार्यरत चिन्तक, अनुसन्धायक तथा सृजनशील प्रतिभाहरूलाईसक्तो प्रेरणा र प्रोत्साहन दिँदै विभिन्न विषय एवं भाषा र साहित्यकोबिकास र समृद्धिमा सक्तो योगदान दिने उद्देश्य राखेर काम गर्दै आएको छर यो सबैमा बिदितै छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यसै बहुमुखी उद्देश्यअन्तर्गत नेपालका ख्यातिप्राप्त युगकवि श्रीसिडिचरण श्रेष्ठद्वारा रचित भीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य प्रकाशितहुँदै छ । नेपाली-काव्यजगत्‌मा आफ्नो विशिष्ट स्यान स्थापित गरिसकेकाअग्रणी क्रान्तिकारी कवि सिद्धिचरणका अन्य विभिन्न कृतिहरू जस्तैनेपालको राजनीतिक इतिहासमा लामो समयसम्म हाली मुहाली चलाएकाभीमसेन थापाको करुण कथा र व्यवालाई लिएर रचिएको प्रस्तुत काव्यपनि नेपाली-कविताका पाठकहरूबीच लोकप्रिय हुनेछ भन्ने विश्वास गर्नसकिन्छ। यो ग्रन्थ प्रकाशित गर्न पाएकोमा हामी अत्यन्त हर्षित छौँ ।छ? लागि हामी कविवरका सुपुत्र श्री रविचरण श्रेष्ठप्रति आभार व्यक्तगर्दछौं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपाल राजकीय प्रज्ञा-प्रतिष्ठान&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समर्पण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपालको राजनीतिक इतिहासमा लामोसमयसम्म पदमा रही देशको हालीमुहाली चलाएकाभीमसेन थापाको करुण कथा र व्यथालाई मैलेआजभन्दा दुई दशक पहिलेदेखि नै शब्दमा उतार्नथालेको हुँ । सेरिएपछि जीवन र मृत्युको दोसांधमा नौदिनसम्म विष्णुमतीको किनारमा फ्याँकिएका रछट्पटाइरहेका भीमसेन थापाको पहिलो दिनदेखि नौदिनसम्मको कारुणिक मनोदशालाई चित्रण गरी योऐतिहासिक खण्डकाव्य आदरणीय पाठकवर्गप्रति समर्पणगरेको छु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२०४२ वैशाख १२ सिद्धिचरण श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन थापा काव्यको ऐतिहासिक पृष्ठभूमि :प्राककथनको रूपमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चित्तरञ्जन नेपाली&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डस्वीको उन्नाइसौं शताब्दीको शुरुआतमा नेपालको राजनैतिकअस्थिरताबाट एक यस्तो व्यक्तिको प्रादुर्भाव हुन गयो, जसले एकतीसवर्षसम्म नेपालको राजनैतिक आकाशमा चम्केर आफ्नो बुद्धि, वर्कत,राजनैतिक कुशलता एवं इमान्दारीबाट त्यसबखत सारा संसारमा आफ्नोसाम्राज्य फैलाउन संसारका कैँयौँ राष्ट्रहरूलाई निल्दै अगाडि बढेकोअङ्ग्रेजी साम्राज्यवादी शक्तिबाट नेपालको सार्वभौमसत्तालाई बचाएकाथिए, जसले शासन-व्यवस्थाको विविध पक्ष - सैनिक तथानिजामतीतर्फ अनेक सुधार गरी केही दशकअगाडि मात्र एक सूत्रमाआबद्ध नेपाल अधिराज्यको राष्ट्रिय एकतालाई अझ सुदृढ गर्न सहयोगगरेका थिए; अनि जसको अन्त पनि यस्ता आकस्मिक तथा नाटकीयढब्बबाट भयो कि त्यो एउटा “एसियाकी इतिहासले प्रस्तुत गरेको ।सबभन्दा) दुःखद्‌ अवसान थियो” तथा “ग्रीकको कुनै वियोगान्तनाटकले पनि उनको अन्तजतिको भयानक नाटकीय बरवादीलाई प्रस्तुतगर्न सकेको छैन ।”” ती हुन्‌ जनरल भीमसेन थापा ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१ पि लायन्डन-नेपाल-भाग एक, पृष्ठ ९१र छ, ऐ. पूर्वोक्त, पृष्ठ ५२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आन्तरिक राजनैतिक कलहको कारण राजगही परित्याग गरीआफ्ना नाबालिग छोरा तत्कालीन महाराजाधिराज श्री ५ गीर्वाणयुद्धविक्रम शाहको मुख्तियार भई कार्य गरिरहने श्री ५ रणबहादुर शाहकोसंवत्‌ १५६३ वैशाख सुदी ७ का दिन उनैका बिमातृ भाइ शेरबहादुरशाहले हत्या गरेपछि त्यसबखत काजी पदमा बहाल रहेका भीमसेनयापा मुख्नियार भए । उनले त्यस बेलादेखि संवत्‌ १८९४ सालआषाढसम्म नेपालको मुख्नियार (वर्तमान शब्दावलिअनुसार प्रधानमन्त्री)भई शासन सञ्चालन गरे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संवत्‌ १८६३ देखि संवत्‌ १५९४ सालसम्म एकतीस वर्षसम्मनेपालको मुख्तियार भई कार्य गर्दा भीमसेन थापाले सदैव देशकोहितलाई ध्यानमा राखेर गरेका थिए । त्यसबखत उनको सामु सबभन्दाठूलो चुनौती भनेकै सम्पूर्ण भारतवर्षलाई उपनिबैश बनाउन सक्रियरहेको अङ्ग्रेजी शक्तिबाट नेपालको स्वतन्त्रताको सुरक्षा गर्नु थियो । श्री५ बडामहाराजाधिराज पृथ्वीनारायण शाहले राष्ट्रिय एकताकोअभियानको शुरुआत गरेदेखि नै भारतस्थित ब्रिटिश इष्ट इन्डियाकम्पनी सरकारले अनेक बहाना गरी नेपालमाथि हस्तक्षेप गर्ने प्रयासगर्दै आएको थियो - कहिले धर्मप्रचार, कहिले युद्ध (सिन्धुलीमा।, कहिलेव्यापार आदि अनेक उपायद्वारा । तर पनि नेपाली शासकहरूको राष्ट्रियस्वाभिमानले गर्दा ब्रिटिश भारत-सरकार आफ्नो प्रयासमा सफल हुनसकेको थिएन र भीमसेन थापा मुक््तियार हुन्जेलसम्ममा परिस्थितिलेयस्तो रूप लियो कि अन्तमा यी दुई राष्ट्रवीच युद्ध अवश्यम्भावी हुनगयो । तर राजनेताहरूको राष्ट्रभक्ति, कूटनीतिक कुशलता एवं नेपालीसेनाको अतुलनीय बहादुरी तथा त्यागको फलस्वरूप युद्ध गरेर पनिअङ्ग्रेजी शक्तिले नेपाललाई उपनिवेश बनाउन सकेन र नेपालकोस्वतन्त्रता सदा-सर्वदाको लागि अन्नुण्ण रह्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बास्तवमा भीमसेन थापा नै एकमात्र यस्ता राजनेता थिए जसलेभारतीय राज्यहरूलाई हडप्नको निम्ति तत्कालीन ब्रिटिश गवर्चर जनरललर्ड वेलेज्लीले लागु गरेको &#039;संरक्षण-नीति&#039; को अर्व बुझेका थिएयसर्थ उनले यी सबैबाट सजग भएर कूटनीति एवं वीरता दुबै तरीकाप्रयोग गरी अङ्ग्रेजी शक्तिको सामना गरेर नेपालको स्वतन्त्रताकोसुरक्षा गरे भने संवत्‌ १५४९ सालमा नेपाल-चीनपुद्ध समाप्त भएपछि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३ चित्तरञ्जन नैपाली- जनरल भीमसैन थापा- पृष्ठ १३४ विश्लियम हन्टर- लाइफ अफ ब्रेन हाडसन- पुष्ठ ९९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पनि नेपाल र चीन-तिव्वतको सम्बन्धमा रहिरहेको सुस्तीपनालाई तिनलेमैत्रीपूर्ण व्यवहारबाट गतिशीलता प्रदान गरे। यो नै उनको सफलविदेशनीति थियो; कारण - &amp;quot;उनको निम्ति आफ्नौ देशको स्वतन्त्रता-भन्दा प्यारौ र नजिकको वस्तु अरू केही छैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन थापालै आफ्नो एकतीस वर्षको शासनकालमा देशकोआन्तरिक व्सवस्थातर्फ पनि निकँ सुधार गरेका थिए । नैपालको सैनिकसंगठनलाई आधुनिकीकरण गरी सुसंगठित गर्ने पहिलो सेनापति त उनीछँदैथिए, साथै उनले प्रशासन (निज्ञामती। व्यवस्था, न्यायव्यवस्था एवंव्यापार-व्यवसायतर्फ पनि बिभिन्न सुधार गरेर नेपालको प्रशासनिकएवम्‌ आर्थिक जगलाई मजबूत बनाए । यसरी नै उनले बिभिन्नकिसिमको सामाजिक सुधार गरेका थिए भने घरहरा, सुनधारा,वागमतीको पुललगायत विभिन्न निर्माणकार्य सम्पन्न गराएका थिए ।यसरी नै ठाउँठाउँमा बाग-वगैचाहरू लगाउनुको साथै बजार-बस्तीहरूपनि बसाएका थिए । यसरी उनले &amp;quot;अध्यवसाय एवं दृढताद्वारा आफ्नोसारा समय र योग्यता राज्यको सेवा गर्नमा लगाएका थिए ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन थापा यसरी देशको सुरक्षा एब सुव्यवस्थामा व्यस्तरहेको वेला उनको शासनकालको उत्तराद्वैतिर राजदरबारभित्र उनकोबिरुद्ध पडयन्त्र हुन याल्यो । बिशेष गरेर संवत्‌ १८५५ चैतमा नायबबडामहारानी ललितत्रिपुरासुन्दरीदैबीको मृत्युपश्चात्‌ तत्कालीनमहाराजाधिराज श्री ५ राजेन्द्रबिक्षम शाहका महारानीहरूले राज्यकोप्रशासनमा हात हाल्ने इच्छा गरेपछि भीमसेन थापाको विरोधमाषड््यन्त्रले गति लिन थाल्यो ।” यस कार्यमा मुख्यतया तीन शक्तिसक्रिय थिए - जैदा वडामहारानी साम्राज्यलक्ष्मीदैवी, रणजङ्ग पाँडे(तथा पाँड्रेसमूह) एवं ब्रिटिश रेजिडेन्ट । यो समूह श्री ५ राजेन्द्रविक्रमशाहलाई पनि आफ्नो पक्षमा ल्याउन सफल भएपछि भीमसेन थापाकीदिन सीमित हुन थाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
५ हृतरी ओल्डफिल- स्केजस फ्रम नेपाल- भाग १, पृष्ठ २९९५ छ ऐ.,- स्केज्स फ्रम नैपाल- भाग १, पृष्ठ ३०२ चित्तरञ्जत नेपाली- जतरल भ्ीमसैन थापा- पृष्ठ ३१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“भीमसेन थापालाई कनै अपराधमा फसाई तिनको राजनैतिकपतन गराउन उपयुक्त वहानाको खोजी हुँदै थियो ।” संवत्‌ १५९४सालमा आएर तिनका विरोधीहरूले बहाना भेट्टाए । केही दिनदेखिबिरामी भएका वडामहारानी साम्राज्यलक्ष्मीदेबी शाहका ६ महीनाकाकान्छा छोरा देवेन्द्रविक्रम शाहको संवत्‌ १८९४ साल श्रावण वदी ७का दिन मृत्यु भयो । अधिराजकुमारको यही मृत्युबाट षड्यन्त्रकारीहरूलेराजनैतिक फाइदा लिने दाउ रचे । भीमसेन थापाको सल्लाहमा औषधिगर्नै वैद्यहरूले विषयुक्त औषधि प्रयोग गरेकोले अधिराजकुमारको मृत्युभएको हो भन्ने आरोप लगाएर बैद्यहरूसँगै भीमसेन थापा र उनकाभाइ-भतिजाहरूसमेतलाई नेल ठोकी बन्दी बनाए । यसरी एकतीसवर्षसम्म इमान्दारीपूर्वक देश र नरेशको येवा गर्ने भीमसेन थापाकोअबसान षड्यन्त्रपूर्ण ढङ्बबाट एकाएक हुन गयौ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्री ५ महाराजाधिराजको सामु विषमुद्दा शुरू भयो। वूढोभीमसेन थापाले इन्कारीपूर्वक प्रतिरोध गरे - &amp;quot;सरकारले मैरो पोल्टामाहगिवक्सेको गुहुको दाग अझसम्म गएको छैन । मैले माने चाहेको भएउसैवेला सरकारलाई नै मार्ने सक्यैँ । यस्ता थाङ्नै भुसुने बालकलाईमारेर मलाई के फाइदा :”. हुन पनि श्री ५ राजेन्द्रको जन्म हुँदाभीमसेन थापा मुख्नियार नै थिए” भने नाबालक देबेन्द्रविक्रम शाहगह्टीका उत्तराधिकारी पनि थिएनन्‌ । आठ महिनापछि भीमसैन थापानिरपराञ्ल ठहरी बन्धनबाट मुक्त भए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन थापाको बन्धनमुक्तिबाट उनका विरोधीहरू सतर्क भए ।तिनीहरूले तिनलाई सधैँको निम्ति पन्छाउने विचार गरी संबत्‌ १८९६सालमा पुरानो विषमुद्दा उल्टाएर पुनः बन्दी बनाए । साथै अरू पनिमुद्दा लगाए । प्रमाणको निम्ति झूठो कल्पित कागजात तयार गरियो ।भीमसेन वापाले फेरि पनि कडा विरोध गरे । उनका विरोधीहरूलेउनलाई दोषी ठहराउने साहस गर्न सकैका थिएनन्‌ भने उनलाईबन्धनबाट मुक्त पनि गरेका थिएनन्‌ । तिनीहरूले भीमसेन थापालाईदिइने सजाय भनेर अनेक हल्ला चलाएर उनको कानमा पुग्याएर उनकोआत्मबल टुटाउने प्रयास गरे । यस कार्यमा उनीहरूले नैतिकताको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ बाबुराम आचार्य- अब यस्तो कहिल्दै नहोस्‌- पृष्ठ ५६&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
९ चित्तरञ्जन नेपाली- जनरल भीमसेन यापा- पृष्ठ ४४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१० श्री १ राजेन्द्रको जन्म सन्‌ १5१३ डिसम्बर ।तद्नुसार संवत्‌ १८६९) मा भएकोथियो - हेनौंस्‌ एड्एन सैभर- नैपाल अण्डर राणाज्‌- पृष्ठ ४७२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सीमासमैत नाघेर भीमसेन थापाको कानमा यस्तोसम्म हल्ला पुच्साए -“उनकी पत्नी ।भक्तिकुमारी) लाई बस्व्रहीन तुल्याई शहरमा डुलाइनेभएको छ र उनले यो दृश्य गुहुमा गाडिएर हेर्नुपर्नेछ ।&amp;quot;१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिभिन्न किसिमको हल्लाबाट त्यसबेलासम्म किञ्चित विर्चलितनभएका भीमसेन थापालाई यस हल्लाले ठूलो आघात पुग्यायो, उनकोधैर्य दुट्यो र यस्तो अमानुषिक दृश्य हेर्नु नपरोस्‌ भनी बन्दीकोठाकोभ्यालको ऐना फोडेर त्यसैको टुक्राले घाँटी सेरी आत्महत्या गर्ने प्रयासगरे ॥२ यो घटना संवत्‌ १८९६ साल श्रावण ८ गते भएको थियो । एकैपटकमा उनको गला छिनिएन । त्यसवेला उनलाई औषधिमूलो गरेकोभए शायद बाँच्ने थिए होलान्‌, तर औषधि गर्ने त कुरै छोडौं त्यस्तोगर्नु न बाँच्नुको अवस्थामा परी छटपटाइरहेका एबं रगतले लतपतभएका अर्धचेत भीमसेन थापालाई विष्णुमती नदीको किनारामा बेवारिसअवस्थामा फ्याँक्न पठाइयो र त्यहीँ ९ दिनसम्म छटपटाएर आखिरश्रावण १६ गतै उनले प्राणत्याग गरे । उनको दाहसंस्कारसम्म गर्नेदिइएन र पालो-पहरा राखेर उनको लाशलाई स्याल, कुकुर रगिद्धहरूलाई खुवाइयो ।१ यसप्रकार एक महान्‌ देशभक्तको अमानुषिकढङ्गबाट दुःखदायी अन्त हुन गयौँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यिनै मुख्तियार भीमसेन थापाको अन्तिम ९ दिनको दारुणअबस्था नै सिद्धिचरण श्रेष्ठको प्रस्तुत काव्य भीमसेन यापाको आधारभूमिहो । एक महान्‌ राजनेताको अमानुषिक दुर्दशाबाट प्रभावित भएर नैउनले यस काव्यको रचना गरेका हुन्‌ । कविकै शब्दमा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“नेपालको राजनैतिक इतिहासमा लामौ समयसम्म मुख्तियारपदमा रही देशको हाली-मुहाली चलाएका भीमसेन थापाको करुण कथार व्यधालाई मैले आजभन्दा दुई दशक पहिलेदेखि नै शब्दमा उतार्नथालेको हुँ। सेरिएर जीवन र मृत्युको दोसाँधमा नौ दिनसम्मविष्णुमतीको किनारमा फर्याँकएका र छटपटाइरहेका भीमसेन थापाकोपहिलो दिनदेखि नौ दिनसम्मको कारुणिक मनोदशालाई चित्रण गरी योऐतिहासिक खण्डकाव्य आदरणीय पाठकवर्गप्रति समर्पण गरैको छु ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1१ विलियम हन्टर- लाइफ अफ बि. हाङसत- पृष्ठ १७६१२ कसैकसैको भनाइ भुत्ते खुकुरीले भन्नै छ।१३ बाबुराम आचार्य- अग्र यस्तो कहिल्यै नहोस्‌- पृष्ठ ७०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपाली-काव्यक्षेत्रमा युगकवि सिद्धिचरण श्रेष्ठको देनबारे यहाँकोट्याइरहनु केही आवश्यक छैन । असङ्ख्य फुटकर कविताहरूका धनीसिद्धिचरण श्रेष्ठका लामा कविताका रूपमा कतिपय खण्डकाव्यहरू पनिप्रकाशित भइसकेका छन्‌ । नेपालीभाषा र नेपालभाषामा समैत गरैरअहिलेसम्म प्रकाशित उनका केही खण्डकाव्यहरू यसप्रकार छन्‌ -उर्वशी, मंगलमान, आँशु, लुभुनी, तष्णा, उत्तराविलाप, जुनकिरी,शावरी, आत्मचिलौना, ज्यानमाराशैल, नेपाल ।एवं विश्वव्यथाका विभिन्नअंशहरू। । उनका यी काव्यहरूमध्ये कुनै पौराणिक बा अलौकिकमिथकमा आधारित छन्‌ भने कुनै अत्यन्त आत्मीय व्यक्त ।अझ भनुँछोरा) को मृत्युबाट विह्वल भई लेखिएको थियो । अनि मंगलमानचाहिँसमकालीन राजनैतिक विषमता, अन्याय र शोषणको विरौधमा आधारितथियौ । यस प्रसङ्गमा हेर्दा प्रस्तुत शोककाव्य भीमसैन थापाको निर्माणभिन्नै परिवेशमा हुन गएको छ भन्न सकिन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जस्तौसुकै जटिल एवं दुबांध बिषयलाई पनि अत्यन्त सरल एवंबौधगम्य तरीकालै प्रस्तुत गर्न सक्नु नै सिद्धिचरण श्रेष्ठको आफ्नोविशेषता हो । उनले यही गरेका छन्‌ विश्वव्यथा, आँस्‌ र मंगलमानमा ।अनि भीमसेन थापामा पनि उनको यही शैली, यही तरीका उजागरभएको छ । यस्तो दारुण कथालाई पनि उनले सहज र सरल तरीकालेप्रस्तुत गरैका छन्‌, तर अत्यन्त मार्मिक ढङ्गले । सिद्धिचरण श्रेष्ठ अत्यन्तसंबेदनशील कवि हुनुको साथै एक राष्ट्रवादी व्यक्ति पनि भएबाटभीमसेन थापाको त्यस्तो दारुण दुर्देशाबाट उनी द्रवित हुनु अस्वाभाविकथिएन, त्यो पनि त्यतिका वर्षसम्म शासन सम्हाल्ने राष्ट्रभक्तमुख्तियारको अमानवीय दुर्देशाबाट । यसर्थ कविको तीव्र संवदेनाले गर्दायस काव्यमा पत्रतत्र सत्र शोक र करुणा व्याप्त छ भने उनकोराष्ट्रभक्तिले गर्दा बीचबीचमा राष्ट्रप्रेम पनि छचल्केको छ। अनिनेपाली-काव्यजगत्‌मा एकमात्र अग्रणी क्रान्तिकारी एवं बिद्रोही कविकोरूपमा परिचित सिद्धिचरण श्रेष्ठबाट यस काव्यमा अन्याय रअत्याचारको विरोधमा बिद्रोह व्यक्त हुनु पनि स्वाभाविकै भयो । यसरीयी तीनोटै भावनाहरू शोक, राष्ट्रभक्ति एवं विद्रोहको सम्मश्चण बन्तपुगोको छ- भीमसेन थापा काव्य ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के भो आज छ टक्क कान्तिपुर नै चाञ्चल्य सुस्ताउँदोसारा कालिगढी सुकेर यसको लाव्रण्य अस्ताउँदो,कै सिङ्गार-पटारले रहित भै आयो उदासीनताचा जान्छे कि सती समस्त नगरी ली काखमा दीनता ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यसरी अमरावती कान्तिपुरीको लाबण्य अस्ताएको अवस्थाबाटशुरु भएको यो शोककाव्य शुरुदेखि अन्तसम्म करुषै-करुणाले व्याप्त छ,शोक र व्यवाले सन्तप्त छ । सारा नगरको अवस्था नै अस्वाभाविक छ ।यसैले भीमसेन थापाका यी कीर्तिहरूमा पनि कवि त्यस दिनस्वाभाविकता पाउँदैनन्‌ -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लागी लाज नुहीनुही धरहरा कैँ लुक्त पो खोज्छ कि !सुन्धारा पनि आज लौ विकल भै रोईरहेको छ कि !पानी होइन आँसुको भल यहाँ &#039;फारीरहेको छ कि !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कति सरल, तर मार्मिक अभिव्यक्ति ! लुक्नै खोजे पनि कहाँलुकोस्‌ बिचरा धरहरा - भीमसैन थापाको राष्ट्रिय अभियानको प्रतीक !अनि जस्तै बुःख भए पनि कसरी आँसु झार्न सकोस्‌ विचरा सुन्धारा -प्यासी जनताको प्यास मेट्न अविरल बगिरहन विवश धारा !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब हेरौं तलका यी पड्क्तिहरूमा - सेरिएर मनु न बाँच्नुकोदोसाँधमा परेका रक्ताम्य भीमसेन थापाको अवस्थाप्रति वन्दीगृहमा पालोबस्नै बिचरा पहरेदारको मार्मिक अभिव्यक्ति -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धारा रक्त छुटेर उफ्‌ दलिनमै रातो थियो सारमाहेर्थे पस्तु हुँदैनथ्यो तर अहो ! ताला थियो द्वारमाताल्चा खोल्न परन्तु क्वै जनहरू आउन्तथै त्यो घडीताल्चा थ्यो मुखमा निकाल्न नहुने उच्छवास कस्तो हरि !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कस्तो दुर्देशा ! भित्र कोठामा रक्ताम्य भएर छटपटाएर मृत्युकोदोसाँधमा छ मान्छे, तर ताल्चा छ ढोकामा, खोल्न कोही आउँदैन । अनित्यो अवस्था देखेर पनि बिचरा पाले बोल्न कराउन त के सस्केरासम्मपनि हाल्न सत्तैन; कारण उसको मुखमा पनि ताल्चा छ, भोटै ताल्चा ।यसकारण बिचरा पाले बोल्दै नबोली, सुस्केरासम्म पति हाल्त नसकीटुलुटुलु हेर्न विवश छ यसरी -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ढोकाबाहिर रक्तधार बहँदै आईरहेको थियोजे होस्‌ किन्तु चुइँक्कसम्म नगरी हेर्नै परेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बोल्न नपाए पनि उसको मनले यतिसम्म चाहिँ भन्दोरहेछ -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मूढी भ्रैकन हेर्छु त्यो दुलुटुलू हा ! के भयो लौ न नि,वैरीले पनि देख्नु सुन्नु नपरोस्‌ यस्तो त काहीँ पनि ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ढोका त खुल्छ कोठाको, तर औषधिमूलो गर्न होइन, बरु तीअधमरा व्यक्तलाई घिच्याउँदै लगी विष्णुमती नदीको किनारामा फ्यांग्न,ताकि त्यो त्यहीँ छटपटाएर मरोस्‌ -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भुत्ल्याएर चरो कठै ! अधमरो ल्याई नदीको तटफ्याँकेको सरि आज विष्णुमतिमा मान्छै कुनै छट्पटबेहोशी अनि होशको विचमहाँ झुण्डीरहेको छ त्योसेरी मर्न भनेर मन नसकी तडपीरहेको छ त्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन थापाको आत्महत्याको सम्बन्धमा कुनै इतिहासकारकोभनाइ छ-“आत्महत्याको प्रयास गर्नु भीमसेन थापाको मानसिककमजौरीसिबाय अरू कही हैन ।”&amp;quot; तर त्यसरी षद्यन्त्रपर्ण ढंगबाटबन्दी बनाइएका भीमसेन थापाले आफ्नी पत्नीको यस्तो दुर्दशा हुनेसुनेपछि आत्महत्या नगरी यस्तो दृश्य टुलुटुलु हेरिरहन्‌ बहादुरी होलात ? किनभने यस्तै किसिमको अमानुषिक तरीकाबाट वैद्य भाजुमानकोहत्या गरिएको थियो ॥“ हेर्नोस्‌, भीमसेन थापाको आत्महत्याकोसम्बन्धमा कब्रिको कै भनाइ रहेको छ -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठुलो पाप भनिन्छ शास्त्रहरूमा हो आत्महत्याकन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के लाग्यो तर भीमबाट नभई निर्घात आफ्नो बध&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बौँलष्टी त्यस कालको खटनमा आफ्नी पियारीकन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाङ्गै फौजमहाँ घुमाउन सुनी को ज्यून सक्थ्यो भन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यस्तै -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वीरात्मा कसरी सहन्छ यतिको निष्ठूर बेइज्जतीमान्छन्‌ लाख गुना सधैँ असल हो सेरेर मर्नु बरु१५ बाबुराम आचार्य - अब यस्तो कहिल्यै नहोस्‌- पृष्ठ ७११५ हु, हे. पूर्वोक्त पुष्ट ६६&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यौटा देहनिमित्त दुगति सही कं वीरले ज्यूँदछ :आफ्नो मान र शान राख्त उसले मृत्यु स्वयं रोज्दछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एउटा देशभक्त, राजभक्त राजनेता जसले आफ्नो सारा जीवनदेश र नरेशको कल्याणमा बिताए त्यस्ता व्यक्तिको त्यस्तो किसिमबाटअवसान भएकोमा राष्ट्रबादी कवि सिद्धिचरणको मनमस्तिष्क रन्थनाउँछभने त्यो अस्वाभाविक हैन । यसर्थ उनी भन्छन्‌ -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफ्नो शक्ति तमामले मुलुकको सेवा गरी सर्वदा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मान्छे भैकन क जियो मुलुकको रक्षा र सम्मानमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा रैयतनिम्ति रैयत सधैँ राजानिमित्तै भनी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जसको जीवनले प्रभावित गप्यो, त्यसकै फुट्यो जीवनी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साथै,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो कस्तो जडता विदीर्ण दिलको यो प्राणघाती व्यथा-यो देख्ता पनि चूपचाप रहने यो मर्मघाती कथा-साँच्चै घोर अनथं पो हुन गयो कै देख्नु यस्तो पस्योभाँच्‌ँ लाग्छ मलाई यो कलम नै के लेख्नु यस्तो पन्यो !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यत्तिकैमा कवि चुप हुँदैनन्‌ । विद्रोही कवि सिद्धिचरण श्रेष्ठकोलेखनी अन्यायको विरौध नगरी कसरी मौन रहन सक्छ : यसर्थ उनीअन्यायको बिरोध गर्न आह्वान्‌ गर्छन्‌-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपाली जन चृप छौ तिमीहरू अन्याय यस्तो सही&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बोल्दैनौ किन न्यायका दुई कुरा हा ! प्राण लुछ्दा पनि ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साथै,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
थुकला है इतिहासले यदि यही लिन्छौ भनै भीरुता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुर्दाको चकमन्नता पनि यहाँ लज्जाउने मौनता ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कविको यो आक्रोश केवल जनतामा मात्र सीमित हुँदैन ।उनलाई याहा थियो - भीमचेन थापा देशभक्तको साथै अनन्य राजभक्त&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पनि थिए । यसैले उनी राजाको अहित हुने कुनै पनि काय गर्न सक्तैनन्‌,न त नावालक अधिराजकुमारको हत्या नै गर्ने सक्छन्‌ । यसै क्रालाईलिएर कवि आफ्नो भावना यसरी पोख्छन्‌ भीमसेन थापाको वाणीभएर -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हत्या राजकुमारको किन गरुँ के स्वार्थ यस्तो गरी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्तो नीच कुकर्म गर्छ यसले भन्नै कुरामा परी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा ! आज मलाई सेरिनु समेत्‌ पर्ने अवस्था दियौ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरौ जीवनको तमाम रचना च्यातेर फालीदियौ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यसरी अरूहरूको अर्थात्‌ षडयन्त्रकारी भारादारहरूको कुरा सुनेरभीमसेन वापामाथि राजाले गरेको अन्यायपूर्ण कार्यको विरोधमा कविआफ्नो आक्रोश यसरी व्यक्त गर्दछन्‌ -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा कत्ति नसोचने र अरुकै हाहा करैमा परी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्तो निष्दुर लाञ्छना पनि ममा थौपर्दियौ बेसरी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा भैकन यात्ति दुर्बल भई के काम चल्ला हरे !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो नेपाल बनाउने क्रम यहां जारी कसोरी हुने ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यसर्थ राजाले बिबेक-बिचार पुच्साएर का्यं गर्नुपदै्छ न किअरूको हाहामा मात्र लागेर । किनभने -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नासौ हौ बुझ राज्य भन्नु जनको माग्छन्‌ त फिताँ पनीराजाले दिनुपर्छ हर्षमतले कर्तव्य आफ्नो भनीनासोलाई समात्न सक्षम भई बन्नू प्रजावत्सलजस्तै पार्दछ मेघले हरघडी बाली सपाने जल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यसप्रकार युगकवि सिढिचरण श्रेष्ठको प्रस्तुत काव्य भीमसेनथापा करुणाप्रधान काव्य भए तापनि यसमा राष्ट्रप्रेम र अन्यायविरोधीआक्रोश पनि सम्मिश्चित छ। उनका अधिकांश अन्य काव्य वाकबिताहरूमा पनि यस्तै भावनाहरू विद्यमान रहेको हामी पाउँछौँ ।निश्चय पनि सिद्धिचरण श्रेष्ठले भीमसैन थापा काव्यको रचना गरेरनेपाली काव्यजगत्‌मा एक अर्को अमूल्य दैन दिएका छन्‌ । अस्तु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के भो ! आज छ टक्क कान्तिपुर नै चाञ्चल्य सुस्ताउँदोसारा कालिगडी सुकैर यसको लावण्य अस्ताउँदो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के सिङ्गारपटारले रहित भै आयो उदासीनता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वा जान्छे कि सती समस्त नगरी ली काखमा दीनता” ॥१॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यामै श्रावणको छ किन्तु अहिले बाधा परेको कुन ?गोज्याङ्ग्रो सरी हाँस्न थाल्छु कहिले शोकाश्रु झारी रुनमान्छे छन्‌ सब च्‌पचाप कसरी सातो उडेको छ कि !चौतर्फी जब शैलराजहरू छन्‌ नैराश्य ढिक्कासरि ॥२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खोई कान्ति कता छ ! कान्तिपुरको हिस्सी, छटा जग्जगी ?लागी लाज नुहीनुही धरहरा कैँ लुक्न पो खोज्छ कि !सुन्धारा पनि आज लौ विकल भै रोईरहेको छ कि !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पानी होइन आँसुको भल यहाँ झारीरहेको छ कि ! ॥श॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आीमसेल यापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य १&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कस्तो भार गरौं परेर दिलमा मान्छै उदासीन छ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कै भौ आज यहाँ स्वयम्‌ प्रकृति नै रोयो कि झैँ लाग्दछकस्तो साबिक थ्यो परन्तु अहिल्यै यो हाल कस्तो भयोध्वाँसो टम्म दलेर कान्तिपुर नै बेतालको देखियो ॥४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खाएको सरि नून कान्तिपुर यो झोक्रीरहेको किन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के भो भीषण पीर त्यो कुन पन्यो नैराश्य यस्तो किन ?&amp;quot; राम्रो औ शुभको कुनै पनि यहाँ भेटिन्न क्यै लक्षणचारैतर्फ समस्त कान्ति अहिले रोईरहेको किन ? ॥५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्काभेट छ बल्ल मित्र दुइटा गुम्सेर धैरै दिन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के भो आपस स्नेहको भल कुनै उर्लन्न छाती छुनमानौं आज निषेध हिँड्त ममता नेपालको मार्गमायद्‌वा मानवता बिरोध दिनको हो यो कुनै योजना ॥६॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शद्धा, भक्तिनिमित्त आज छ ठुलो एकादशीको दिन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूजा, स्नान र पाठले मल घुने पारौँ हिया पावनशरद्धार्थीहरू तीर्थ-तीर्थहरूमा जान्छन्‌ बिहानै उठी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के भो किन्तु विरक्त देख्छु सब ता मानौं मलामी सरि ॥७॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२८भ्रीमसैन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गर्दै धर्म र कर्ममा रत भई एकान्तमा गै बसी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पार्ने निर्मल चित्त नै छ सबको हो आज एकादशी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के भो के स्थिर चित्त नै नरहने आगो बलेकोमहाँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बस्दाको सरि आज देख्छु सबको कस्तो अवस्था यहाँ ! ॥८॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साराको मनभित्र शान्ति नरही ऐले कता गो कताकालो घोर अशान्तिको भल बगी डुब्दैछ सारा छटारुन्छन्‌ बालक-बालिकाहरू उसै आफै पिरोलेसरि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यो अज्ञात, अदृश्य हैतु कुन हो बुभनै नसक्ने पनि ॥२९॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पानी आज परेर झम्‌झम यहाँ केही न होश छ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घोई घाउ सफा गरेर उसमा को सान्त्वना छर्दछ ?मानौं कष्ट अधाहको प्रकृतिले छर्केर पानी सुधा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उस्को घाउ निको बनाउन भनी तम्सीरहेकी यहाँ ॥१०॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आई राजमतीहरू जलघडा बोकेर हिँड्छन्‌ कतिचिप्लन्छन्‌ तर भग्न आशक कुनै सौन्दर्य हिस्सी लुटीज्युँदो पार्ननिमित्त त्यो छिन कुनै कोर्दैन गाना किन ?भावावेग कतै नतिस्कन दिने हेक्का रह्यो छिन्‌छिन्‌ ॥११॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य ,&#039; रै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के को रास छ व्याप्त आज यसरी कस्तो नराम्रो घडीउड्छन्‌ काग र गिद्ध व्योमभरमा नाना कशङ्गा छरी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के बेसाइत सूचना दिन गयो आपत्‌ कुनै भीषण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लागेको छ कि खुल्नखुल्न अहिले बिच्छी दिई दर्शन ॥१२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पर्दा आपत देशमाथि जसले रक्षा गरी सर्वदा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाम्रो इज्जत शान राख्न चतुरा ती वृद्ध मन्त्री कता ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घोडा कटकट टापको पवनको सन्तान होला सरि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चढ्दै वाहिर निस्कंदैन किन क विश्वास, आशा छरी ? ॥१३॥।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निस्कन्नन्‌ किन भीमसेन अहिल्यै छैनन्‌ कि यो देशमा ?यो वेला उनलाई देख्न पनि ता हुन्थ्यो अरै सान्त्वनाजाडोको दिन घाम तुल्य उनको अस्तित्त्र हुन्थ्यो यहाँघुम्छन्‌ लायक वीरको मुखमहाँ आपत्ति टार्ने छटा ॥१४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो निश्चेष्ट शरीरभित्र कसरी आँधी, हरी यत्तिको ?केही हल्चल छैन किन्तु मनमा बीभत्स ज्वाला अहो !यो जाबो तन तीन हात यसको सेरो र फेरोनहोओगटने सब वेदना जगतको आलोक यो चेत हो ॥१५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४ /भीमसेत थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ए ! के भो नहुने कुरा हुन गयो बित्यास-बित्यास भोरक्तस्तान गरेर भीम मुखिया भैंमा ढलेको छ त्योभित्तामा पनि रक्तधार कसरी लागिरहेको अहो !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देख्ता हुन्छ छियाछिया हृदय यो सास्दै नराम्रो भयो ॥१॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छातीमा कृत पीर बञ्जन गई यो काण्ड यहाँ भयो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मन्त्री भीम प्रबुद्धले किन हरे ! यो आत्महत्या गत्योसारा सन्न भई सुनी खबर यो विश्वास नै हुन्नथ्योकालो, क्रूर, कठोर वास्तविकता जिब्रा निकालीरह्यो ॥२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ली कानेखुस मार्ग जत्ति फिँजियो कालो समाचार योमान्छै होशविहीन तुल्य हुन गै केबल सुनी नै रह्यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो कानेखुस साँप देशभर नै घुम्दै छ पोख्तै विष&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कस्तो सन्सन यो प्रभाव जसको मान्छे हुने निश्चल ॥३॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
औमसैन थापा एतिहासिक खण्डकाव्य ५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो संसारमहाँ हुनै र नहुने को सक्छ खुट्टयाउन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के दोषी हुनु भीम, गर्नु उनले हत्या छ के सम्भव ?उल्टो सृष्टि चल्यो र भग्न दिलमा निर्घात भूकम्प भोआस्था, शक्ति र भक्ति, मुक्तिहरूको विश्वास नै हल्लियो ॥४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ए भुत्ते खुकुरी ! सहायक बनी यो काण्ड तैँले रचिस्‌फोरी उज्ज्वल देशको मुटु चिरी सारा अँध्यारो गरिस्‌केवल्‌ साधन मात्र नै तँ त नहोस्‌ के दोष तेरो भनूँयस्तो निर्मम वबाध्यताकन यहाँ धिक्कार हो ल्याउनु ॥५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दौषी भन्दछ भीमसेनकन को ? सक्दैन यस्तो हुनढुङ्गामा बरु प्च फुल्दछ भने विश्वास गर्नेछु म&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मार्ने बालकलाई भीम कहिले षड्यन्त्रकारी हुनसक्दैनन्‌ भनि देशका सबजना सक्छन्‌ सही लाउन ॥६॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठूलो पाप भनिन्छ शास्त्रहरूमा हो आत्महत्याकनकै लाग्यौ तर भीमबाट नभई निर्घात आफ्नो बधबौलड्डी त्यस कालको खटनमा आफ्नी पियारीकननाङ्गै फौजमहाँ घुमाउन सुनी को ज्यून सक्थ्यो भन ? ॥७॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६ भीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वबीरात्मा कसरी सहन्छ यतिको निष्ठूर बेइज्जतीमान्छन्‌ लाख गुणा सधैँ असल हो सेरेर मर्नू बरुयौटा देहनिमित्त दुर्गति सही के वीरले ज्युँदछ ?आफ्नो मान र शान राख्न उसले मृत्यु स्वयं रोज्दछ ॥८॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फोस्रो बात गरेर दोष त्यसको थुप्नेर आफूमहाँनडग्याई अझ पर्सिएर अहिले छाड्ने भनी फौजमासुन्दा भीम भएर क्षुब्ध दिलको अत्यन्त मर्माहतआफैमाथि प्रहार गर्न उसले मान्यो वरु इज्जत ॥९॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चेष्टा निष्फल मर्नुको हुन गई छ श्वास चल्दो अझमाछो झैँ कति छट्पटी हुन गई तातो कराई बिचयस्तो त हुनु हुन्नथ्यो तर भयो दुश्चक्र हो कालकोगाह्रो पर्छ न मर्नु, घिदघिट भई उम्काइदै प्राण यो ॥१०॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाले जो त्यस कालमा जति थिए भन्थे डराई बराकस्तो काल कठोर पस्न नहुने ताल्चा थियो द्वारमाढौका प्वाल चियाइ भित्र जब यो देखेँ कराएँ पनिआएँ धेर परन्तु शक्ति नभई हेरेर फर्कै अनि ॥११॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन यापा ऐतिहासिक खण्डकाब्य /७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नर्माया यतिसम्म देशभरिमा मैले कतै देखिनँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यो वेला पनि कत्ति औषधिमुलो त्यो ठाउँमा पाइनँयौटा वस्त्र लिएरसम्म पनि क्वै पुछ्दैनथ्यो घाउमाभन्थै पाप फुटेर दुर्गति भयो, पाँडेहरू गाउँमा ॥१२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देखेँ आज नदेख्नु थ्यो जुन कुरो बीभत्स दृश्यावलीकालीमन्दिर-वेदीमा बलि बनी राँगो ढलेको सरि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के संभझूँ अति नारकीय घटनालाई मरेको भनी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैरीले पनि देख्न, सुन्न नपरोस्‌ यस्तो त काहीँ पनि ॥१३॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टण्टा, आर सबै बिसाउन भनी यो आत्महत्या गन्योरोजेको उसले प्रयत्न नपुगी सङ्गष्टमा क पन्योआलो घाउ छ हेर रक्त बहने क्या वेदना खप्दछकैले खुल्दछ होश कहिले बेहोश भै ढल्दछ ॥१४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
८८ भीमसेत थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भुत्ल्याएर चरो कठै ! अधमरो ल्याई नदीको तट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फ्याँकेको सरि आज विष्णुमतिमा मान्छे कुनै छटपटबेहोशी अनि होशको बिचमहाँ &#039;झुण्डिरहेको छ त्योसेरी मर्न भनेर मर्ने नसकी तडपीरहेको छ त्यो ॥१॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चिन्ता दारुणबाट मुक्त हुनको चेष्टा गरी सेरिया&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के भो प्राण परन्तु छुदन नसकी अड्की तनैमा रह्योआलो घाउ अझै छ भन्भल गरी निस्कीरहेको रगत्‌मायाले तर छैन क्वै पुछिदिने कस्तो अँध्यारो बखत्‌ ! ॥२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कोही छैन परन्तु साथ उसको दर्भाग्यमा क पन्यौयस्तोमा पनि एक साथ नहुने के पाप उस्ले गस्यो ?वैरीलै पनि देख्नु, सुन्नु नपरोस्‌ यस्तो त काहीँ पनि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्तो हालत लेख्न सक्तिनँ म ता थामू कि यो लेखनी ॥३॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य / ९,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यौटा लास छ किन्तु श्वास उसको चल्दै छ ऐलेतकबेवास्ता अवहेलनाबिच परी पीडा छ मर्मान्तक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो नै व्यक्ति थियो प्रशस्त जसको यो देशमा हैकमऐले हेर सहीरहेछ कसरी यौ यातना निर्मम ॥४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रद्धा, भक्ति अनन्त काल जसलै यो देशभित्रै भन्योसम्झी केवल देशनिम्ति जसले कर्तव्य धेरै गन्यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केही मान नपाई प्रेम ममता सुक्दै छ डढ्दै यहाँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्तो निष्ठुरता कहीँ जगतमा होला र सम्भावना ? ॥५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
थोपा आँसु चुहाइ आज उसको क्वै छैन रोईदिनेलाएको उसले अनेक गुणको क्यै मोल सम्झीदिनेऐले हा ! जलबिन्दुसम्म मुखमा पार्ने भएनन्‌ कुनैके लाग्यो उसको भएपछि हरे ! बैरी स्वयं दैव नै ॥६॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कस्तो जीवन थ्यो कसो हुन गयो हा कालको चक्र योयौटा सानु चरो उडी गरुड भौँ आकाश ढाक्ने भयोभझोक्का एक परेर किन्तु अहिले यो दुर्दशामा पस्यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जाबो जीवन्त निर्घिन एक तुच्छ भुसुना जस्तै भई त्यो मन्यो ॥७॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१० भीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपाली जन चूप छौ तिमीहरू अन्याय यस्तो सहीबोल्दैनौ किन न्यायका दुइ कुरा हा ! प्राण लुछदा पनिके भो आज म सोच्न सम्दिनँ हरे ! निस्तब्ध सारा जनकस्तो घोर कलङ्ग देशबिचमा लाईरहेछँँ भन ? ॥८॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुर्खाको गरिमा कतातिर डुब्यो नेपालको शानमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ध्वाँसो घोर लगाउँदै जिउनु छ्या ! हे देशका कालिमातिम्रै देश न हो यहाँ यदि कुनै बेइज्जती हुन्छ त&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिम्रो नाक यहाँ रहन्छ कसरी ठाडो भई लौ भन ? ॥९॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्तो ता हुनुहुन्न हुन्न यसले बिग्रन्छ देशै पनि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भावी सन्ततिमाथि छाप यसको पर्ला बडो बैगुनी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिम्रो न्याय मरीरहेछ कसरी यो देशका पक्षमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केको आड लिएर फेरि जिउने यौ घोर सङ्घर्षमा ? ॥१०॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुन्छन्‌ निश्छल वीरकर्महरूको आधार यो लोक नै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यो नै लोक कृतघ्न भौँ भद्ददिए के अर्थ सत्कर्मकै ?तिम्रो नै हकको निमित्त उभिने त्यो उच्च खम्बा ढल्योबोल्दैनौ किन किन्तु हा ! चुइक नै नैराश्य कस्तो लियौ ? ॥११॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य /११&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
थुक्ला है इतिहासले यदि यही लिन्छौ भने भीरुतामुर्दाको चकमन्नता पनि यहाँ लज्जाउने मौनताधिवकार्ने छ भविष्यले जतिसुकै टाढा पुगे तापनितेर्सी यो घटना सधैँ छ रहने पीडा र बेथा बनी ॥१२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफ्नो चीज महान्‌ समाल्न नसकी फ्यांकीरहेछौ भनेतिम्रो निम्ति मरेर फेरि कसले गर्ने भलाई हुने ?नेपालीहरू बिम्झ-बिम्झ जनको कल्याणमा दिन्‌दिनयौटा वीर मरीरहेछ कसरी हा ! तडपँदै छिन्‌छिन ॥१३॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कैल्यै घटन दिएन मान उसले यो देशको उज्ज्वल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कैल्यै घट्न दिएन शान उसले यो देशको निर्मल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कैल्यै लाग्न दिएन दाग उसले नेपालको भालमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कैल्यै मेट्न दिएन कात्त उसले सीमा कुनै कालमा ॥१४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफ्नो शक्ति तमामले मुलुकको सेवा गरी सर्वदा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मान्छे भैकन क जियो मुलुकको रक्षा र सम्मानमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा रैयतनिम्ति रैयत सधैँ राजानिमित्तै भनी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जस्को जीवनले प्रभावित गन्यो, त्यस्कै फुट्यो जीवनी ॥१५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१२८ भ्रीमसेन मापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो कस्तो जडता विदीर्ण दिलको यो प्राणघाती व्यथा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो देख्ता पनि च्‌पचाप रहने यो मर्मघाती कथा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साँच्चै घोर अनर्थ पो हुन गयौ के देख्नु यस्तो पस्यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भाँच्‌ँ लाग्छ मलाई यो कलम नै के लेख्नु यस्तो पन्यो ! ॥१६॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य /१ ३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
र ! शङ्खध्वनि बज्छ जागरणको आह्वान यो होइनघण्टा बज्दछ टिन्न मन्दिरमहाँ यो अर्चना होइन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घण्टा, ढोलक, शङ्ख आज सव नै यौटै कुरा भन्दछन्‌कालैको पनि निल्न आँट नहुने यो भीम मूर्छा किन : ॥१॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मीठो कण्ठ अजस्च गीत-गठरी खोल्दै धरामा चरामानौं भन्छ कतै अपार दिलभौँ लौ भीमलाई बच्चाघन्क्यो गीत &#039;बचा-बचा&#039; ध्वनित भै आकाशमा गुञ्जनपोत्छन्‌ साबिक भझौँ घुमेर घरमा लक्ष्मीहरू आँगन ॥२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खुल्छन्‌ खुल्न त द्वार ती घरघरै कर्तव्यधारा छुनकिङकर्तव्यविमूढ भैकन सबै छन्‌ घाइते नै तर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हत्या भीम अमात्यको हुन गई हत्या स्वयंको सरिनेपाली जन आज आहत भई ज्युँछन्‌ यहाँ के गरी ! ॥॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१४, भीमसैन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वास्तीमानिस यन्त्रभैँ जलघडा च्यापेर काखीबिच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पानी भर्न हिजो र अस्ति सरि नै जान्छन्‌ पंधेरातिरपानी भर्न परन्तु झट्ट नसकी आफैँ विचार्छन्‌ पनिपानीको बदला यहाँ रुधिर पो बग्दै रहेको कि क्या ! ॥४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीडाभित्र असैह्य आज हुन गै रेट्दा गला भूमिलेआएको सरि रक्तधार बहँदै झर्नाहरू हुन्‌ कि के!तातो नै छ अझै प्रवाह त्यसको यो आत्महत्या दिनयस्तो नै छ तमाम देशभरिमा जानी नजानीकन ॥५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गाई पनि दूधधार रगतै निस्कैसरी लाग्दछ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मान्छेको सब कर्मको गतिमहाँ रोक्का उसै आउँछ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सारा गडबड नै छ आज मनमा अन्योल-अन्योल छज्वालाभित्र छ किन्तु बाहिर भने सुन्सान-सुन्सान छ ॥श्ता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भौली आउँछ छोप्नखातिर हिजो जस्तो हिजोअस्तिको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लागी राश अतीत बन्छ गहिरो छोपेर छौपिन्न त्यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कालो दुर्घटना हिजो जुन भयो त्यो आज झन्‌ चर्कियोबाक्लो दूर भविष्यसम्म पनि क्यै छोपिन्न, ढाकिन्न त्यो ॥७॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाठण १४५.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बोल्दैनौ किन च्‌प छौ तिमीहरू हे बजञ्जठिन्गाहरू !मान्छेको किन भेष ? बाँच पशु झौँ खाएर घाँसै बरुकेवल भार बढाइ पृथ्वीतलको के जन्म याहाँ लियौ ?कस्ता घोर कलङ्गको बिउ छरी नेपाल कालो गप्यौ ? ॥«॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो पीढीकन लाख-लाख धरिको धिक्कार-धिक्कार छ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफ्नो मानिसलाई चिन्न नसकी तड्पाई जो मार्दछ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यस्तो पो कुन बाध्यता हुन गयो आरोप झुट्टा लिने ?आफ्नो मानिस भीम भन्न नसकी कै के भयो देशमा ? ॥९॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हे मेरा प्रिय देशका जनहरू सोझा र सीधा सब !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्तो घोर अनर्थको निच समेत्‌ बोल्दै नबोल्ने किन ?तिम्रो मानिसलाई आज यसरी हत्या गरायौ भने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिम्रो ज्यान यहाँ सुरक्षित भनी को भन्न सक्ने हरे । ॥१०॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिम्रा ती प्रहरी अनेक लहरी छन्‌ उलँदै तेत्रमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टाढा देश कुताकुनातक भिजी छाईरहन्धै जुन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सेनाको पनि उच्चता शिखरको चाहन्छ रे पल्टन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039; पल्टन्छ त देशको कुन दशा जाओ उठाओ अब ॥११॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१६८ भीमतैन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिश्ो थुत्छ भनेर काँधर बनी छोपेर साँचो कुरा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्तो निर्घिन, बाध्यताकन लिई बस्दै छ मान्छे यहाँअन्यायीहरू देशमा बिउ समेत्‌ राख्तै नराखौँ भनीउर्लेको दिल एकसम्म पनि के नेपालमा छैन कि ? ॥१२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बोकी देश चलाउने रथमहाँ पाङ्ग्रा थियो जो अघिथर्कन्थ्यौ मुटुसम्म शत्रुहरूको यो भीम नामै सुनी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐले यो छ यहाँ कठै ! अधमरो बोकेर पीडाव्यथा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के यो देशमहाँ छ दुर्लभ हरे ! मर्दा समेत्‌ सान्त्वना : ॥१३॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठूलो भेलसमान जीवन छ यो उर्लेर चाँडै गयो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यौ जो उर्लनु कालमा जति भयो यस्को निशाना रह्यौयस्तो भेल बुझेर जीवन यहाँ क्यै काम आजै गरभोलीको जनजीवनै बिच हुने साँचो सुबिस्ता छर ॥१४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उस्को निम्ति त प्यार छैन यसमा आशा कसैको न तत्यो वेला पनि छैन औषधमुलो त्यै देशको घातक !साङ्ढै कष्ट छ हाय ! आज उसको प्रस्थानवेला छ योसाह्रै दर्व र दुःखको विरहले तडपेर मर्ने भयो ॥१५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य १७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उस्ले देशनिमित्त जौजति गन्यौ फुस्सा भए ती सब !के उस्को शुभ कर्म ती फजुलका देखावटी मात्र त ?उस्को देशनिमित्त घातक सबै दुष्कर्म उस्का भए ?उस्का ती जनवर्ग नत्र यसरी हुन्थे बिराना कित ? ॥१६॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१५ भीमतेत बापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो हो लौ कुन ठाउँ ए ! किन यहाँ आईरहेको म छुअड्केको किन प्राण आज यसरी ? बेहाल यो जान्दछुछैनन्‌ मानिस भन्नु कोही पनि यहाँ कस्तो हरे दुर्दशा !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो हो लौ कुन कालको कदिन हो, या हो कि कालो निशा ! ॥१॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफूमाथि भरै प्रहार गरिने त्यो शस्त्रमा पाइन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले खूब दिएँ बडो जतनले जम्मै लगाई बल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐले शस्त्र त्यही ममाथि यसरी गर्दै छ आघात यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खै के भन्नु यहाँ जतिजति भयो मेरै त कर्तूत हो ! ॥२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठान्थिस्‌ भीम तँ बुद्धिमान युगको कल्ले गिरायो तल ?तेरो बुद्धि र जोश, होश नपुगी भोगिस्‌ नराम्रो फलगर्छन्‌ ईश्वर ता सधैँ असल नै बुभ्नेहरू छन्‌ कति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैरो दुर्गेतिले यहाँ जति भयो के भो त मेरो क्षति ? ॥३॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य १९.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफ्नो सत्य स्वरूप झट्ट नछुटी मेरो दशा यो भयोछाडँ छाड्न सकिन्न झन्झन फसेँ बेहाल मेरो भयोबिन्तीभाउ गरेँ, परेँ चरणमा आएन कालै पनि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो बिन्ती किन हो सुनेन उसले गर्दा निहोरा पनि ॥४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कस्तो निष्ठुर चालढाल उसको आएन आएन रपश्चात्ताप प्रचण्ड अग्निबिचमा तड्पेर ज्यूँदै छुम&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छाती वज्जकठोर यौ किन भयो ? प्राणै उडी जान्न योमैरो चेतन चुर्ण हुन्न किन यो ? के हेतु कष्टै दियो ? ॥५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोक्दामा पनि पथ्य औषधि दिई हेरचाह शाही गरीलान्थ्यो टप्प टिपेर प्राण सबको लाँदैन मेरो हरी !आफै पुग्न तिमीकहाँ यस घडी तिम्रो निहोरा गरेँमेरो प्राण रुचेन किन्तु किन हो यो यातनामा परेँ ॥६॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केको पाप फलेर पूर्वजूनिको वैरी बने मृत्युको ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केको पाप फलेर पूर्व दिनको यौ खप्न मैलै पन्यौ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो संसार असह्य भार हुन गो लेक मुसारी अबकस्तो दण्ड मलाई पर्छ दिनु त्यो देक मलाई सब ॥७॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२० भीमसैन यापा ऐतिहासिक खण्डकाय्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मिध्यो हो जगतै भने म पनि यो मिथ्या नमानूँ किन ?साथी स्वप्न हुँ जे म पुग्न त्यसमा यस्तो ढिलाई किन !कोल्टो पल्टन खोज्छ रात अब यो बेहान देखा पच्योवासेको कुखुरा उठेर सुनियो धारा व्यथाको खुल्यो ॥८॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चिन्ताको भरमार भार सहँदै तड्पी रहेको म छु&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्तो घोर विपत्‌ मलाइ किन भो प्रारब्ध के भोग्दछु ?भो भौ यो अपमानको दह भयौँ धिक्का यो जीवनकस्तो निष्ठुर भुक्तमान अहिले भो पाप मेरो कुन ? ॥२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सक्छस्‌ जे जति यातना अझ तँ थप्‌ के भो मलाई यहाँतेरो बन्धनमा म पर्दिनँ बुझिस्‌ अस्तित्व तेरो कहाँ ?आनन्दी सुख रूप निर्मल म हुँ आलोकको यो घर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो नै पारख, ज्ञानको उदयमा जाज्वल्य केको डर ! ॥१०॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छाती चूर्ण भएर जान्न किन हो ? यौ वञ्ज पर्दा पनि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हत्या यो नरुचाउने किन भयौ ? कस्तो ममा दुश्मनी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डस्नै निष्ठुर सम्झना तँ हटिदे बिसूँ म सारा कुरा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्मै विस्मृत नै न हो पछि हुने आआ चला त्यो छुरा ॥११॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य / २१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो देह सुकेर जान्छ मफतमा काढिन्न छाला किन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मानौं जीवित नै छ यो अझ भनी जाने नखाईकन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आई गिद्ध मलाइ हेर्दछ फगत्‌ दुँदैन यो देहमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्तो कारण के पच्यो मरणले अस्तित्व यो छोड्नमा ? ॥१२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आई स्याल बथान भोजन मिठो पायौँ कि भन्ने भईफर्कन्छन्‌ तर ती अभक्षक बनी आएर नैराश्य लीकस्ता स्याल र गिद्ध ती कुकुर हुन्‌ ? मेरा भएनन्‌ कुनैअल्झी सास घिटीघिटी हुन गई यो यातनामा परेँ ॥१३॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कस्तो पाप लिएर पूर्व जुनिको मेरो यहाँ जन्म भो ?यस्तो दारुण यातना पनि सही, के भोग्नु मैले पन्यौ ?धिकधिक्‌ भीम तँलाई ! मर्ने नसकी बाँची रहेछस्‌ अझफेरी श्वास परन्तु मन्द॒ गतिले ती भीम बोल्छन्‌ अझ ! ॥१४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐले निश्चित पाउँ यो मरणको दरबार पस्नै दिनमैले पाइनँ किन्तु पस्न जसमा ज्यूँदै छ यो चेतन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जे होला पछि यो सहन्छु सब नै यो चेत छोपूँ भनीटुक््याईकन हाय हाय ! मकनै जल्दो भएँ दन्दनी ॥१५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२२, शीमसेल पापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हा हा हा सब हाल बिग्रन गयो मेरो भयो दुर्गति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कोही छैन सहाय आज मकनै यस्तो भयो ज्यादति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आ आ आ अब छोपिदे मरण हे ! यो श्वास भट्टै चुँडाल्‌आ आ काल छिटो मलाई करुणा छर्केर चाँडै अँगाल्‌ ॥१६॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो यो प्रतिश्वासमा युग बनी मेरो भयो हेलना&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सातै भार भयो मलाइ जिउनै पाएर यो ताडना&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आ आ मृत्यु छ लाख-लाख विनती अस्तित्व मेरो सुकायौटा शुष्क तलाउ भझौँ अति रुखो यो जिन्दगानी बना ॥१७॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हा हा मृत्यु समेत दुश्मन हुने मैले कुरा के गरेँ ?मैलो त्यो अपराध फाल्न नसकी यस्तो विपतमा परेँभो भो सक्दिनँ आज खप्न सहजै हे ! मृत्यु लैजा अबमेरा सञ्चित पुण्य छ केही यदि अए लैजा मलाई अब ॥१८॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन यापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य / २३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिन्ती ! श्वास तुरुन्त नै चुँडिगए हुन्थेँ म जे जे हुनेपाई दु:ख यातना कति यहाँ सङ्कष्टमा झुण्डिने ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो निम्ति बन्यो हरेक छिन नै हा ! दुःखदायी यहाँजानै पर्दछ जान्छु-जान्छु अब लौ नेपाल ! देक बिदा ॥१॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चाँडो मर्छु म मर्छु आज यसमै बाटो यही आखिर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गाँठा छन्‌ सबतर्फ जत्ति म गरुँ फुस्कन्न तेतातिरपोल्टामा लिइ भीम दारुण कथा हे काल ! वित्दै तँ जाझस्को यो मुटुको भई ढुकढुकी वर्षौं बनी जा तँ जा ॥२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपाली जनको विकास-पथमा भै सावधानै तँ जाआफ्नो देश बनाउने दगुरमा एँडी भई जा तँजाआफ्नो लक्ष्य स्वधाम पुग्न त अभै टाढा पन्यो झन्झफनकस्तो आज धरापभित्र म परेँ थाहै नपाईकन ॥३॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२४ भीमसेन यापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चल्दो श्वास परन्तु मन्द गतिले त्यान्द्रो बनी निर्बलझुण्डेको छ परन्तु आज कसरी सुन्खा रुबखैको फल ?त्यो त्यान्द्रो नचुँडी अझै अडिरत्यो धस्ने छुरा सम्झनापश्चात्ताप र दुःख, कष्टहरूको बोकी गरुङ्गोपना ॥४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हे नेपाल ! रहू रही रहू अनन्त युग सम्मै जाँदै छु - जाँदै छुमजानैपर्छ अवश्य एकदिन ता कोही नगै हुन्छ र ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिम्रौ मान र शाननिम्ति यसले केही गरेको भए&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यो नै काममहाँ म जीवित हुने वैकण्ठवासी हुने ॥५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाना कैयन रक्तरञ्जित गरी यो जिन्दगानी बन्योआफैँ नै अब रक्तरञ्जित भई ऐले किनारा पुग्यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रक्तै हो सब खेलबाड दुनिया रक्तैविना छैन क्यैरत्तैको सब खेलबाड दुनिया सम्पूर्ण भो रक्त नै । ॥६॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रातो रङ्ग छ रक्तको र भनियो रातो छ राम्रो भनीरातोको महिमा त वर्णन: गरी सिद्धिन्न कैल्यै पनिरातोको छ अपार उच्च महिमा साद्रा महाभारतभीष्म, द्रोण र कर्ण, अर्जुनहरू छन्‌ रक्तले रञ्जित ॥७।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन पापा एतिहासिक खण्डकाव्य / २२,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लागेँ छोडन हिमाल, बादल तथा आकाश, धर्ती सबखोजे तापनि पूर्ण विश्वभरि नै म्वै छैने मेरो अबजानैपर्छ समस्त एकदिन ता मै मात्र कै बस्छुर !धेरै दुःख र कष्ट भग गरियो नेपालको खातिर ॥«॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जानाजान त देशको अहितमा मैले कुनै सोचिनँपर्दा देशमहाँ विपत्ति सहियो मस्ती कुनै ओगिनँराजालाइ सधैँ लिएर शिरमा काखै प्रजा राख्तथैँकै गर्दा छ त देश उन्नत हुनै सोची सघैँ चल्दथैँ ॥९॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुन्‌ जङ्गी र निजामती दुईवटा पाङ्ग्राहरू राष्ट्रकायौटा दुर्बल हुन्छ ता मुलुक नै भत्कन्छ, बिग्रन्छ हा !बन्दोबस्त निजामतीतिर गरी बन्देज नाना गरेँस्रेस्तातर्फ हुने छिटो र छरितो ऐनासरी पार्दिएँ ॥१०॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यो बेला जब शक्ति, तागत सबै मेरै तुनामा थियो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो नेपाल सबै बनाउनमहाँ काफी इशारा थियो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो, त्योको वशमा परेर कसरी मध्यस्थ बाटो लिएँ?सम्झौता पछि शत्रुलाइ पनि लौ त्यो उठ्न मौका दिएँ ॥११॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२६/भीमसैन यापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सारा दुश्मन ! उद्नसम्म नदिई नेपाल निर्माणकोबाटो पक्रतमा म अल्मल हुँदा चाह बमौजीमकोयो नेपाल सकेन बन्न कहिल्यै यै खौप ली आखिरऐले जान परीरहेछ यसरी अज्ञात ठाकतिर ॥१२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केही गर्न अशक्त भै मरणको ठाडो मुख्यान्जी छुम&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पर्दा जीवनको गिरेर अहिले जाँदै छु - जाँदै छुम&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आएथैँ म हुरीसमान जगमा जाँदै छु फुस्सा बनी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मानैँ यो जुन आज जत्ति गरियो यस्तै छ यो जीवनी ॥१३।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाएको अधिकारलाइ कसरी मैलै गरेँ पालना&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्तो निर्ममता समुद्वतहमा बग्दै छु निर्घातमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो नेपालमहाँ समस्त मुटुमा मै नै थिएँ व्यापक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐले जानुपन्यो हरे ! म कसरी दोषी बनी पातक ॥१४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्तै हुन्छ यहाँ सबै जनदशा अन्याय के न्याय के&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आई किन्तु भविष्यले सब कुरा खुट्टयघाउला सत्य के&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यै विश्वास लिई परन्तु अहिले जाँदै छु अज्ञातमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो छैन कसूर यो मुलुकको कल्याणमा व्यस्त म ॥१५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
औमसेल थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य / २७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यौ नेपाल डुबै समस्त जनको बेइज्जती हुन्न र ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो नेपाल उठे समस्त जनको सम्मान के हुन्न र ?सोची नित्य यही कुरा मनमहाँ मेरो वित्यो जीवन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कैल्बै बाँचिनै सत्य ! एक पल नै नेपाल बाहैक म । ॥१६॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो दुर्गति आज जे-जति भयो आतिथ्य नै मान्दछुमेरो पीर, व्यथा र कष्टहरूमा नेपालमै हेर्दछु&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चल्थ्यो एकबखत्‌ समस्त मुलुकै मेरो इशारामहाँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐले किन्तु म फ्याकिएँ बगरमा आएन कोही यहाँ ॥१७॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाँडा, फाँट समस्त देशभरमा आवाज उच्चा थियोसिङ्गै देश यता-उता गरिदिने काफी इशारा थियौ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
को बोल्नै यसको अगाडि मुलुकै हाँकेर यो हिँड्दथ्योबन्दी आज छ भीमसेन यसरी क्यै गर्न सक्तैन यो ॥१%॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कस्तो भाग्य-विडम्बना छ विधिको कोसी सुकी बुँद भोमात्रै नाम छ भीमसेन यसको सामर्थ्य सारा सुक्यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भित्ता छन्‌ सब चूप औ दलिन्‌ छन्‌ तेर्सीरहेका घना&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ढोका बन्द, कडा खडा छ पहरा आएछ यो लाञ्छना ॥१९॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२८ /भीमसेत यापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पर्दा देश, नरेशलाइ कहिल्यै सुस्ताउनै जानिनँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छाडी देश, नरेश क्यै जगतमा आफ्नो भनी मानिनँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐले देश, नरेश ती पनि सबै थुम्छन्‌ मलाई किन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पर्दा आज मलाई, मौन सब छन्‌ बोल्दैन कोही किन ? ॥२०॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केही छैन म मारिङँ बरु छिटै ज्यूज्यान सरकारकँयस्तो यो अपमान किन्तु नसहँ धिक्कारधिक्कार भैमेरो ज्यान त नित्य अर्पण छ यो को मात्रै मर्दैन र ?मेरो देशमहाँ अनन्त यसले लाग्नैछ धब्बा तर ॥२१॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;अमसेत थापा ऐतिहासिक खफडकाव्य / २९,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सात&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केही छैन म जान्छु, बित्छु खुशीले रोजँ जहाँ जानमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो शारीरिक कष्टको पर पुगी पस्ने विश्वान्तिमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यो विश्वान्ति जहाँ कुनै किसिमको सन्ताप दन्कन्त रे !सारा कर्म, कुकर्म राशहरूको फर्स्योट त्यो ठाउँ रे ! ॥१॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुस्केरा अति आँसुले रतिभरै त्यो ठाउँ छोइन्त रे !लागेको सुख-शान्ति छाप गहिरो त्यो ठाउँ धोइन्न रे !पश्चात्ताप बढेर तप्प दिलमा त्यो ठाउँ उठ्दैन रे !चुक्ली, चापलुसीहरू जति गरुन्‌ त्यो ठाउँ डग्दैन रे ! ॥२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जे भो भो अब फेरि सक्दिनँ यहाँ केही म सच्याउनयस्तोमा सब लोकले गरिदिउन्‌ पुर्पक्ष यो जीवन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीखा कण्टकधारको बिच बसी मैले गरेँ जे जति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो सन्तुष्ट म छैनँ किन्तु कसरी मानूँ सबै दुष्कृति ! ॥३॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३०८ श्ीमसेत यापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पारावार अपार त्यो समयमा यथोपासरी जिन्दगी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्तोमा पनि शौक-दुःखहरूको हर्दम्‌ हुने जग्जगी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चोला मानिसको छ दुलंभ अहो ! साक्षात्‌ हुने ईश्वरसाक्षात्‌ ईश्वर भन्नु खास जनता यै हो कुरा आखिर ॥४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्सै जीवन फुङ्ग मात्र नउडी क्यै रङ्ग गाडा भरोस्‌आएका पछिका समेत जसमा उक्लेर केही गुनोस्‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भन्ने आशयले बडो जतनले सोच्दै थिएँ ज्यून म&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के भो किन्तु समाजमा नचिनिँदै यो जिन्दगी नै गुम्यो ॥५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो, ऐले म छु मेटिँदै, तर छ जो विश्वास यो आँतमाखोस्ने तागत छैन शत्रृहरूको यो क्रूर संसारमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो मान्छे जनकार्यमा रत भई सत्कर्ममा व्यस्त छत्यो मान्छु जनतामहाँ अमरता ओढी सधैँ बाँच्दछ ॥६॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हावा, घाम सहेर फूल जसरी निस्कन्छ काँडाबिचबारीको जसले थपेर गरिमा बास्ना समेत्‌ छर्दछमान्छैले पनि कष्ट-विध्नहरूमा सत्कर्म जन्माउँछदेशै धन्य गरी भविष्यतकमा कल्याण बर्साउँछ ॥७॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य :&#039; ३१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो जीवन अन्त हुन्छ यसरी केही म त्यो मान्दिनँजानाजान परन्तु कत्ति कृभलो नेपालको सोचिनँगर्नै काम अनेक गर्न नसकी रोई रहेको छुम&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हर्दम देश, नरेशको हितमहाँ लागी रहेको छु म ॥८॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो दारुण दुर्देशाबिच खुशी मानेर हाँस्नेहरू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
च्यापी हालत यो मलाइ अब ता पाइस्‌ तँ भन्नेहरूमैरो जीवित औ सबै मृतक ती सारा पियाराहरू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो देशनिमित्त नै सब गस्यो यो भीमले जे गच्यो ॥९॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो दारुण अन्तको, विरहको पीडा मलाई रति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केही छैन तुष्ट नै छु यसमा संसारकै यै गति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो छाला अनि हाडपिञ्जरमहाँ आबद्ध जैलेतक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो देह रहन्छ दुःख-सुखमा को खोस्छ बाँच्ने हक ? ॥१०॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो काया जब काँचुलीसरि गरी फेर्नेछु मैले यहाँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो अज्ञात सबै भए पनि म ता ज्यूनेछ साँच्ची यहाँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाम्रो काम सबै हुनेछ जहिले त्यै कालमा केवल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले जति यहाँ गरे पनि अझै झिक्नै छ क्यै अक्कल ॥११॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३२ भीमसेन थापा एतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले देशनिमित्त नै सब गरेँ मारे मराएँ पनि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पर्थ्यो गर्नु गरेँ मलाइ यसमा के दोष व्यथैं दिनेसाँच्चै देशनिमित्त मर्न सकिए त्यो मर्नु राम्रो भयोजम्मै लक्ष्य सदैव पावन भए सम्पूर्ण हाम्रो भयो ॥१२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो देश बने म बन्छु सहजै विग्रे म बिग्रिन्छ नै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो साथ भविष्य-सन्तति सबै छन्‌ &#039;झुण्डिएका सधैँमेरो मूल भबिष्यको पथमहाँ रोडा भई राख्दछ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
औ सत्कर्म भविष्यको पथमहाँ पाङ्ग्रा भई गुड्दछ ॥१३॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा, देश शरीरको मुटु बने मानेर सर्वोपरि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजाकै बल, शक्ति बढ्न दिनमा झिक्थेँ सबै चातुरीगर्थे काम कुरा म शुद्ध मनले सम्पूर्ण सामर्थ्यले&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केही आँच त्यहाँ नआउन दिई आलस्य मात्सर्यले ॥१४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यौटा होइन लाख-लाख दसि छन्‌ बिश्वास मेरा प्रतिराजाको गरिमा उचाल्न सकिने मै काम गर्थे कति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्तो काम हुँदाहुँदै किन यहाँ यस्तो अविश्वासकोहत्यारा शिशुको भनी ठहरिएँ के हेतु यस्तो पन्यो ? ॥१५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन थापा ऐँतिहासिक खण्डकाव्य / ३३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुर्काएँ जसलाई काँध-शिरमा राखी- चढाईकन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुर्काएँ जसमाथि भक्ति, ममता सारा खन्याईकन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सेवामा जसको समर्पित गरेँ सम्पूर्ण यो जीवन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा आज मदेखि छन्‌ बिमुख रे ! यस्ता भएको किन ? ॥१६।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हत्या राजकुमारको किन गरुँ के स्वार्थ यस्तो गरीयस्तो नीच कुकर्म गर्छ यसले भन्ने कुरामा परी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा ! आज मलाइ सेरिनु समेत्‌ पर्ने अवस्था दियौमेरो जीवनका तमाम रचना च्यातेर फाली दियौ ॥१७॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा कत्ति नसौचने र अरूकै हाहा-करैमा परी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्तो निष्ठुर लाञ्छना पनि ममा थोपार्दियौ बेसरीराजा भैकन यत्ति दुर्बल भई के काम चल्ला हरे !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो नेपाल बनाउने क्रम यहाँ जारी कसोरी हुने ? ॥१८॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा ईश्वर हो भनेर कसरी श्रद्दा प्रजाले गरुन्‌ !राजामाथि अनन्त भक्ति कसरी मान्छेहरूले गरुन्‌ !सानो बालकबाट सम्म नहुने यो भूल कस्तो गन्यौ ?चुक्ली, जाल, फरेबको बस परी गर्ने-नगर्ने गप्यौ ॥१९॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३४ /श्षीमसैन थापा ऐतिहासिक खण्डकार्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यौटा ज्यान लिएर यो बखतमा नेपाल सप्रन्छ त ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राज्ञा नै यतिसम्म दुर्बल भए यो देश बिद्रन्न र ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
है मेरा प्रिय भारदारहरू ! हो छोपेर साँचो क्रा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजाको कति गर्दछौ अहित यो ! जालो बुनी माकुरा ॥२०॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जे होस्‌ सत्य अगाडि राख्नु नृपमा कैल्यै नमानी डर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो है निश्चय भारदारहरूको कर्तव्य यो सुन्दर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोची वाहिर-भित्र बोलिदिनु नै सल्लाह-सल्लाह हो,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफ्नौ स्वाथं निमित्त बौल्नु त फगत्‌ औँधान अन्याय हो ॥२१॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजामाथि अपार भक्ति हुनु नै यो दोष मेरो भयोहो ज्यादा हुनु हुन्न क्यै पनि यहाँ भन्नै कुरा सत्य भोराजामा पनि दोष औं गुणहरू हुन्छन्‌ अवश्यै पनिदोषै-दोष तथा गुणै-गुणहरू हुन्नन्‌ कसैमा पनि ॥२२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा बन्नु कठीन कर्म छ सधैँ यो कण्टकाकीर्ण छआफ्नो भूलमहाँ समस्त जनको सौभाग्य नै निभ्दछबोले बोल्दछ औ समस्त जनता, रोए सबै देश नैराजाले यदि भूल गर्दछ भने त्यो भूल हो देशकै ॥२३।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाब्य,&#039; ३५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा नै कमजोर मूखं छ भने के हुन्छ लौ देशको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा नै उसलै नबन्नु बढिया कच्चा भए बुद्धिको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा छन्‌ त विबेकशून्य मतिका यो देश नै बिग्रियो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा छन्‌ यदि बृद्ध, शिक्षित भने, यौ देश नै सप्रिगौ ॥२४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिग्रन्छन्‌ तर बुद्धिवन्त पनि ती पापी हुँदा सङ्गतनेपाली प्रिय भारदारहरूको कस्तो लियौ हुर्मत ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो ज्यान लियौ म भन्दिनँ यहाँ खै देशको इज्जत ?यस्तो चाल चले रहन्छ कसरी नेपालको हुर्मत ? ॥२५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो शारीरिक कष्टबाट म मस क्यै लिन्न फिक्री मत&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो नेपाल परन्तु बढ्छ कसरी फिक्री यही लिन्छुम तमेरो तागत छैन क्यै अब यहाँ जाँदै छु अज्ञातमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिम्मा देश बचाउने सब तिमी, तिम्रै छ यी हातमा ॥२६॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नासो हो बुझ राज्य भन्नु जनको माग्छन्‌ त फर्ता पनिराजाले दिनुपर्छ हर्ष मनले कर्तव्य आफ्नो भनीनासोलाइ समाल्न सक्षम भई बन्नू प्रजावत्सल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जस्तै पार्दछ मेघले हरघडी, बाली सपार्ने जल ॥२७॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३६८ भीमसेन यापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आठ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिग्रे देश सबै जनाहरू तिमी बन्छौ यहाँ दानव&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सप्रे देश सबै जनाहरू तिमी बन्छौ यहाँ मानव&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बन्ने मानिस, या त दानब हुने, तिम्रो छ के सम्मत ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो नेपाल नबिग्रियोस्‌ तर कहीँ यै माग्छु भिक्षा म त ॥१॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफ्नौ देश-प्रजा भनेपछि सबै हुन्छन्‌ हुरुक्कै जनआफ्नौ देश बनाउने व्रतमहाँ होम्ने सबै जीवनसाराको सुख-शान्तिको पट खुलोस्‌ नेपालमा अन्तत:साराको अधिकार प्राप्त हुन गै सारा बनुन्‌ उन्नत ॥२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आओस्‌ यो दिन झट्ट देशहितमा लाग्नेहरूको जयआफ्नौ सैवक हो भनेर जनलेै बुभ्ने र जान्नै भएत्यस्तो मानिसलाइ इज्जत तथा सम्मान बर्साउँदैदेका ! आज बिदाइमा अलिकता क्गै आँसु बर्साउँदै ॥३॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन यापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य / ३७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साँच्चै मानिस बन्नु दोष, गुणको दोभानमा बस्नु होदोषै-दोष तथा गुणै-गुण भए मान्छे कुनै हुन्न त्यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यस्तै मानिस भीमसेन पनि हुन्‌ निर्दोष हुन्थे किन ?साँच्चै घाम र अन्धकार नमिले के बन्छ यौटा दिन ? ॥४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुर्खाको जुन शान-मान अघिको शस्त्रास्त्र नाना सिकीढुङ्गालाइ बचाउनै समयमा ज्यादै चनाखो बनीबाढी भै अति बेगले रिपुहरू उर्ली रहेका यहाँयो वेला किन चूपचाप नगरूँ सेना तयारी यहाँ ? ॥५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घुम्छन्‌ बाजसमान माथि तभमा साम्राज्यवादीहरू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निर्धो भारतमाथि झम्टन पुगी के के गरेनन्‌ अरू ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाम्रो देशमहाँ सरापसरिका ब्याधाहरू यी सब&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खोज्छन्‌ पस्त, त नौजवानहरूको आधार चाहिन्न र ? ॥६॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सेना नै नभए कहाँ मुलुकको स्वाधीनता ज्यूँदछ ?आली छैन त खैतको बिचमहाँ पानी कहाँ अड्दछ ?सेना लायक छैन ता मुलकमा स्वातन्त्य जोगिन्छ त ?योद्धा वीर जवान नै मुलुकमा ऐले छ आवश्यक ॥७॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३८ भीमसेन यापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सेना हो परखाल तुल्य, सहने आपत्ति नाना थरी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोक्ने शत्रु सबै स्वयं सजग भै सारा सुरक्षा गरीसेनालाइ बलिष्ठ पार्नु युगको आह्वान हो आजकोसेना बन्छ जवान बीरहरूको कर्तव्यमा व्यस्त जो ॥८॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यस्ता सैनिकलाई इज्जत दिँदै सेवामहाँ तत्पर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राखेँ सैनिक, भारदार बढिया राम्रो गरै सकभर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाम्लो डाम लगाइ हिँड्न नपरोस्‌ यो देशका कम्पुलेपाउन्‌ जीवन यो बिताउन यहाँ केही खुशी चैनले ॥९॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भन्दै कम्पुहरूनिमित्त जहिले बन्देज नाना गरेँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पारेँ सज्जित कम्पुवर्गहरू ती ब्यारेक पोशाकले&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाना सैनिक वबाद्य-वादकहरू नेपालमा देखिए&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाई बेश अनेक तालिम नयाँ जङ्गी उज्याला भए ॥१०॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाना बन्दुक, तोपले रिपुहरू थर्काउने सैनिकनेपालीपनभित्र फेरि भरिए थाम्नै महागौरव&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राखी काख प्रजा, शिरै उपरमा राजा लिई हिँड्दथें&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जस्तै सन्मुख कष्ट होस्‌ निमकको सोझो गरी बढ्दथेँ ॥११॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य / ३२,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा ईश्वरतुल्य मान्य सबको संस्कार बन्दै गयोराजाबाट हुँदैन दोष कहिल्यै, विश्वास जम्दै गयोमान्छेको दिन जान्छ आज र भरे, भोली र पर्सी गरीलाएको गुन ता रहन्छ तर त्यो कैल्यै नमेदने गरी ॥१२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो नेपालमहाँ डुलेर म बढेँ पाएर यो जीवन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैरा ती सुख-दुःख अङ्गित हुने छायाहरू छन्‌ जुनयस्तो देश मलाइ छाड्न अहिले गाह्रो त पर्ने भयोक्यार किन्तु सबै नछाडि नहुने हो रीत संसारको ॥१३॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ती अग्ला हिउँ टाक्रा, हिमनदी, पाखा घना जङ्गलसोभा वीर परिश्रमी जनहरू गर्ने सधैँ मङ्गल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो अन्तिम यो घडी छ सबले माफी मलाई दिनूसक्थैँ जे जति गर्न, गर्न नसकी यौ बाध्यतामा परेँ ॥१४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हे ! मेरा शिब, सत्य, सुन्दरहरू ! मेरो सजाक पथ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरा ज्ञान, विवेक प्राप्तिहरूहो ! ल्याओ मलाई रथ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
है मेरा तप, योग, ज्ञानहरूहो आलोक मेरो बन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो यात्रा सुख, शान्तिदायक बनोस्‌ पक्री नयाँ जीवन ॥१५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४०, भीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाय्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के के हुन्छ मनुष्यलाइ कहिले को भन्न सक्ने यहाँमान्छेको मन हो घुमाउँछ उही आकाश, पातालमाफाली पाउँ निमेषमा प्रलय भौँ भारी छ यो बोझिलोआँखाभित्र पटक्क निद नपसी छर्लङ्ग रातै बित्यो ॥१॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चोटैचोट परेर मानिस जसै लाखौँ छिया बन्दछचोटैलाइ गरेर प्यार उसले पीडामहाँ रम्दछ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्तै आज छ भीमसेन अहिले पीडा, व्यथाको परकोहीमाथि अलग्गको फल सरी आफैमहाँ निर्भर ॥२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माने दुःख दुखी रहन्छ जगतमा यौ मान्नु नै हो सबभट्टा, तुच्छ फरेबलाई कहिल्यै साँचो नमानौँ अबकेको दुःख र कष्ट हुन्छ जगमा मैले नमाने भने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले मान्नु-नमान्नुमा सब यहाँ हैनन्‌ कुनै वास्तव ॥३॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकारुय / ४१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माछो तप्त कराइको जब गई आगोमहाँ पर्दछ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संसारै अति कष्टको बिच परी सन्तापमा मर्दछ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छोड्छौ सोच्न जसै यहाँ दुःख कुनै आउन्न हाम्रो भनीडेरा हो सब दुःख कष्ट पनि यौ रहन्न स्थायी बनी ॥४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्तो अन्तर यो सब जान्न मात्र सकिए पीडा व्ययाकेछर?सारा शान्तिमयी विशाल भवमा सर्वत्र आनन्द छ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माछो तप्त कराइको जब कठै ! आगोमहाँ गै पच्यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हा, हा ! प्राण छुटैन किन्तु उसको वेचैनमा क पन्यो ॥«॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चिन्ता खान्छ सजीवलाई जसरी आगो बली दाउरापाए मात्र चिता त खान्छ हसुरी निर्जीव खोजी बराचिन्तालाई तसर्थ भन्दछ चिता, पीडा बडो तत्समचिन्ताबाट निकै मनुष्य जिउँदै हुन्छन्‌ मरेकै सम ॥६॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चिन्ताको भरमार भार सहँदै, भोग्दै छ जो दुर्दशासाँच्चै गर्न सकिन्न वर्णन कसै त्यो दुःखदायी निशाआई भैल कठोर पूर्व दिनको हा ! भीम बग्दै गयो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाई ठक्कर लाख लाख टुकुरा आक्रान्त छाती भयो ॥७॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२४ २८ भीमसेन यापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कस्तो भीषण पाप पूर्वजुनिको आईरहेको यहाँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कस्तो दारुण यत्तको फल फली तडपीरहेको यहाँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कस्तो हालत हीन दिन उसको हा ! सम्झताको फणाजस्तो गोमन सर्प डस्छ अहिले कस्तो अहो ! यातना ॥८॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जाजाजा इतिहास बन्द भइदै यस्तो नउक्सा कराकूलो मानिस भीमसेन कहिल्यै जन्मेन भन्ने गरायस्तो मानवता-कलङ्गित कथा भोभो म यो लेख्तिनँसुस्केरा अनि आँसुको दहमहाँ चुर्लम्म भै डुब्दिनँ ॥९॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आधा रात छ सुनसान अहिले ताराहरू मन्द छन्‌बारम्बार कराउने कुकुरले निस्तब्धता चिर्दछन्‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केही श्वास प्रश्वास चल्दछ अझै बेहोशमा भीम छन्‌छाया एक कुनै पसैछ नजिकै, त्यो सामुमा देख्तछन्‌ ॥१०॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आएको किन ? को तिमी ? नजिकमा मान्छेसरी लाग्दछछायारूप मनुष्यको जब भयो यस्तो क्रा बोल्दछ-छाप्रो त्यै नजिकै छ सुत्छु त्यसमै बारी मकैको कुरीआएको छु तपाइँको मुखमहाँ पानी बनी लाँकुरी ॥११॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य / ४३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैरो निम्ति यहाँ निषेध ममता, यस्तो कहर्‌ कालमाआएका हरिलाई स्वागत छ हे ! के भन्नु बेहालमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो निम्ति निषेध आज ममता आयो, उदायो कता ?छायो यो ममता समस्त करुणा फारेर निस्तब्धता ॥१२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देखेमा अरूले म दण्डित हुने जाओस्‌ छिटो संशयआओस्‌ सृजन औ दया र करुणा आलोक ज्यौतिर्मय !मैरौ अन्तिम कालको बल बनी लड्ने झिकोस्‌ अक्कलमेटी प्यास मलाई पार्छ यसले आनन्द औ शीतल ॥१३॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चिन्ता लाखनले डसेर तनमा अड्नै नसक्दा कहीँफालहालेँ अति अन्ध कुञ्जबिचमा नै जे हुन्छ होओस्‌ भनीअड्की किन्तु त्रिशङ्कु झैँ हुन गएँ यस्तो अहो ! दुर्देशामेरो निम्ति नआउने किन हरे ! निष्पट्ट कालो निशा ॥१४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इर्ष्या, द्रेषहरू अनेक खनिँदा पारेँ हरिया यो छियाखोजेँ मृत्यु अगाल्नलाई बललै सेरैर आफ्नै गलाचाहेनन्‌ तर मृत्युले पनि हरे ! मेरो अँगालो लिनमेरो निम्ति परन्तु आज हुन गो कालै समेत्‌ दुश्मन ॥१५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४ ४ / भीमसेन मापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छोपेको छ समस्त विश्व तमले छोपिन्न चिन्ता तर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिच्छी भैकन डस्दछन्‌ छिनछिनै पीडा दिई लस्कर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
थोत्रो पिञ्जरभित्र-भित्र यसरी दुःखान्त बोकी कथा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो त्यो कुन पापले अझ यहाँ भोग्दै छु यस्तो व्यथा ? ॥१६॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य / ४५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दश&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पापी होश खुल्यो, खुले हृदयमा अस्तित्व भट्टाभटहाहाकार छ घोर क्रन्दन तथा चीत्कार चिच्याहटमाछो तप्त कराइको सरि भई लागेँ यहाँ तइपिनचिन्ता, पीर अनेक लस्कर लिई लागे अहो ! बैरिन ॥१॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाक्लो भीषण अन्धकार बिचमा ! गोता म खाँदो भएँझिल्का छैन प्रकाशको रति यहाँ अत्तो न पत्तो भएँघुस्सा लात सहैँ अनेक थरिका साउ्है बिचल्ली भयो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हा ! गैठहो दहमाथि प्राण चिडिया चुर्लुम्म डुब्दै गयो ॥२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बेला यो छ महत्त्वपूर्ण अघिको आफ्नो थलो पुग्दछुहात्ती भार लिई सियो मसिनमा आँखा पसूँ भन्दछुतुष्णा, राग र द्वेष ली मनभरी यो जिन्दगानी गयोचौरासी घनघोर चक्रविचमा ! फाल्ने मलाई भयो ॥३॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४६,भीमसैन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो जो अस्थिरता छ भित्र मनको लागेर थान्को बसयस्ता कष्ट, विपत्‌ हजारन परुन्‌ भग्नेछु मै कर्कशजानेँ अस्थिरता रहेछ अखडा सङ्कष्ट सन्तापको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफैँमा स्थिर हुन्छ ता सकल हो श्वृङ्गार आरामको ॥४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पालो भर्खर भीमको महलको बदलेर साथीसित&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फर्केको घरमा बिदीर्ण दिलको दुःखी कुनै सैनिकखोल्छन्‌ लीकन रुद्रकण्ठ बिचमा आफन्त साथीकनयद्‌वा पट्ट फुटेर तप्त दिल त्यो लाग्यो उसै निस्कन ॥५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पारी बास्तव आज गुप्चुप भई आएछ शंका बढीबिस्तारै जब फैलियो खबर यो कानेखुसीमा चढीराँगो झैँ बलिवेदिमा रगतको धारा छुटेको थियोभैँमा वज्ज परेर ढल्छ जसरी उभ्भीरहेको थियो ॥६॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धारा रक्त छुटेर उफ्‌ ! दलिन नै रातो थियो सारमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हेर्थे पस्न हुँदैनथ्यो तर अहो ! ताला थियो द्वारमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ताल्चा खोल्न परन्तु म्बै जनहरू आउन्नथे त्यो घडीताल्चा थ्यो मुखमा निकाल्न नहुने उच्छ्बास कस्तो हरि ! ॥७9॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य, ४७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ढोका बाहिर रक्तघार बहँदै आईरहेको थियो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जे होस्‌ किन्तु चुइँक्कसम्म नगरी हेर्नैपरेको थियोमान्छेको यतिसम्म दुर्गति हुने विश्वास नै हुन्न है&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यो प्रत्यक्ष भयो भनेर कसरी व्यक्त्याउने हो कठै ! ॥«॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुढी भैकन हेर्छु त्यो टुलुटुलू हा कै भयो लौ न नि!वैरीले पनि देख्न, सुन्न नपरोस्‌ यस्तो त काहीँ पनिआफैँमाथि प्रहार गर्न कसरी हा भीमले त्यो सक्यो !कस्तो त्यो कुन पीर हाय ! उसको घाँटी छिया देखियो ॥९॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;यस्तो दुःख खपीरहेछु अहिले हाँ भीम&#039;ले भन्दछ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले हेर्नुपन्यो हरे ! जुत कुरा को हेर्न त्यो सक्दछ !कस्तै पत्थर नै भए पनि त्यसै पानी भई गल्दछ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मान्छे भैकन किन्तु हाय कसरी त्यो हेर्न मैले सकेँ&#039; ॥१०॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्ता घौर कृतघ्नता किन लियौ, कै यो मनुष्योचित ?राख्दैनौ भनि खोज्दछौ कि उसको काहीँ निशानैतक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
होला यो कसरी ? असम्भव छ यो नेपाल छनौञ्जेल ताझुटो हो इतिहास नै, अमर भै यो भीम टाँगिन्न ता ॥११॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४८ / भीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अप्ख्यारो युगमा अनेक धरीका बाधाहरूमा पतिआफ्नो साहस, युक्ति, बुद्धिबलले सम्पूर्ण राजा भनीहा ज्यूज्यान दिई सधैँ मुलुकको सेवा र रक्षा गन्योऐले भैकन देश घातक उही सब्कष्टमा उ पन्यो ॥१२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य ,&#039; ४९,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एघार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गाङ्हो पर्नु अवश्य जीवन महाँ स्वाभाविकै हो कुरागाःहोबाट उठैर नै सफलता सारा हुने हुन्‌ पुरागाञ्रोलाई अँगाल्न, छाम्न नसकी हच्कन्छ जो मानिसत्यो पुग्दैन कदापि उच्च तहमा जाकिन्छ हर्दम्‌ तल ॥१॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिम्रो याद मलाई कोर्छ, अति नै भक्त ! हे सुन्दरी !आफ्नो दुर्बल हातले कसुम त्यो तोडेर फ्याँकेसरिउक्लन्थ्यौ कति शैलमा सरसरी भर्थे ओरालो म तलोभी हात बढाइ किन्तु उभिएँ छेकेर तिम्रो प॒थ ॥२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्झी दौलत मात्र नै सब कुरा थुप्याउँदै दौलत&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खोज्थेँ दुर्बलता म छोप्न त्यसले स्वार्थान्धता दूषित&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केको मेल रहन्छ किन्तु जगमा बल्ने र निभ्ने बिच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफ्नो भन्नु नराख्न क्यै पनि कुरा लाग्यौ तिमी मैसित ॥३॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
५० भीमसैन थापा ऐतिहासिक खण्डकाख्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मानी धर्म र कर्म उच्च महिमा होमीदियौ जीवन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफ्नो प्राण, शरीर मैसित अहो ! हो धन्य तिम्रो मन !तिम्रो लायक हैन नित्य म त यो के लोभ तृष्णा थियो ?आई किन्तु ममा समर्पित गच्यौ जे जत्ति तिम्रो थियो ॥४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाँकी जीवनको लिएर कसरी लम्कीरहेकी थियौ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छर्दै मोहकता सबैतिर तिमी सौन्दर्य भर्दै थियौ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
थोत्रो पात्र थियो परन्तु म गई थापेँ म पाकँ भनीआफ्ना लाख मुराद ती सब थुनी मैरै बन्यौ भक्तिनी ॥५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐले हर्दम कष्टभित्र पिरिँदै तिम्रो ढल्यो जीबन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कस्तो थ्यो तर के भयो शिव हरे ! सोच्नै म ता सक्दिनँयौटी तुच्छ भिखारिनीसरि भई डाँडा र काँडा डुली&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीता ती अपमान लाख सहँदै बित्ने छ त्यो जीवनी । ॥६॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पश्चात्ताप मलाई हुन्छ अहिले कस्तो नगर्ने गरेँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो जो हक नै थिएन जसमा ढिप्पी गरी लोभिएँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गाउहो छाड्न जगत्‌ मलाई जति भो त्यै पापको हो फलत्यो नै पाप बनेर डस्छ कसरी निर्घात मैरौ दिल ! ॥७।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसैन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य / ५१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लामो मार्ग कडा मरुस्थल भई ज्यादै गलेको थिएँयौटा सुन्दर बाग किन्तु पथमा देखी म त्यहीँ पुगेँपारी ध्वस्त उजाड त्यो वन सबै जाँदै छु दागी बनीमात्रै वास बसी घुमेर त्यसमा थाकैछ यो जीवनी ॥८॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कस्तो त्यो अपराधवले ग्रसित भै जे जो छ मेरो यहाँबाँधी चौखुर हाँ ! तँ जा अब भनी तारे सरी सिन्धुमामेरो साथ तिमी यहाँ पनि डुव्यौ बेस्वादको कालमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो नै पीर अपारको भइदियो संसार छाड्दा ममा ॥९॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरा छन्‌ यतिका क्रिया-प्रतिक्रिया छोडेर पूँजी सब&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो यो प्रिय देशबाट छुटिई जाँदै छु टाढा अब&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हे नेपाल ! म मिल्छु आज खुशले तिम्रै हवा-पानीमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिम्रै हुँ म त फेरि मिल्नु छ यहीँ अस्तित्व मेरो जहाँ ॥१०॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
है अग्ला चुचुरा हिमालयहरू ! देऔआ मलाई बिदा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हे मेरा प्रिय देशका मुकुटहो ! देओ मलाई बिदा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हे भित्ता बहुमूल्य रत्न मणिका ! देक मलाई बिदा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरा सोत विशाल गौरव महान्‌ ! देक मलाई बिदा ॥११॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
५२/भीमलेत थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाँडा, पर्वत शैल फोर्न चतुरा कल्लोल ! देक बिदापार्ने फाँट हराभरा नदनदी ! देक मलाई बिदा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुट्ठा हार समान उच्च छहरा ! देक मलाई बिदा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हे मेरा प्रिय देशका हिमनदी ! देक मलाई बिदा ॥१२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुन्धारा, धररा ! दुबै मिलिजुली देक मलाई बिदाओढ्ने पत्थर दान कालिगढहो ! देक मलाई बिदाचोखो देश अनेक लोकहरूको ! देक मलाई बिदामेरो स्वप्न पवित्र दान जसको ! देक मलाई विदा ॥१३॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठाडो नाक समस्त कान्तिपुरको है उच्चता कृतिम !ज्यामी लाख थियौ पबित्र पसिना हे मेघको आश्रम !सेतो स्तम्भ सुकीर्तिको धरहरा ! दैक मलाई विदा !हे अग्लो प्रहरी सरी नगरको ! देक मलाई बिदा ॥१४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो शान्त मयूर माथि सुरिलो गाना उज्यालो जडीभोरैमा कति उच्च - उच्चतममा डाक्ने जुरेली चरी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पस्दा काल अनन्त गुञ्जन सुने जो गीत आनन्दले&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो अन्तिम कालको बल बन्यो त्यैँ जान्छु आनन्दले ॥१५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य /&#039; ५३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उफ ऐया ! कति कष्टदायक अहो ! यो घाउ मेरो यहाँसाह्है हुन्छ शरीरमा असजिलो यो प्राण उड्दैन हा !बढ्दै श्बास-प्रश्वास मात्र अडियो पीडा भयो झन्झनरोक्दैनौ मुटुको व्यथा किन अझै लम्ब्याउँदै लौ भन ॥१६॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कै मैले अझ छैन उड्न यसरी साँच्चै पुगेको यहाँलैजा है यस भीमको स्मृति सबै हे घाउ ! हे पाहुना !निम्त्याएँ यस घाउलाई तर यै मेरो बनी बस्दछ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो प्राण निभाउने बखतमा पानी थपी ज्युँदछ ॥१७।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो जीवन यो कथा अब टुट्यो जाँदैछ यो चेतना&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भावी सन्ततिको कतै हृदयमा बन्दै कुनै सम्झना&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ढिक्का आँसु खसाल्नु के सँगसँगै विश्वासको भल्भलआफ्नो देश निमित्त मर्नु जनको क्यै हुन्न है निष्फल ॥१%॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो यो दृढ धारण छ जनले बिर्सेर बिर्सिन्न त्यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफ्नो देश, नरेश खातिरमहाँ हाँस्दै मरेको छ जो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मर्नै कालमहाँ जसै मनुजको विश्वास मुस्काउँछ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो नेपाल अवश्य बन्छ जसको विश्वासको आँट छ ॥१९॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
५४ / श्रीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लामो जीवनका सुखान्त घटना बत्तीसरी रातका&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्रन्छन्‌ अहिले समस्त स्मृतिमा बन्दै कुरा सारका&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुन्छन्‌ निश्चय लाल लाख घटना यो जिन्दगीको बिचहुन्छन्‌ सार्थक त्यो रहन्छ जसमा सम्बन्ध रागात्मक ॥२०॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धोका, ढाँट र जालझेल र ठगी षडयन्त्र ईर्ष्या दगाडरलाग्दा प्रतिरूप धारण गरी ऐले यहाँ छन्‌ खडानिस्की मात्र शरीरबाट अब लौ तेरो हुने के गति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भन्छन्‌ कर्कश क्र्रको वचनले निम्तिन्छ रे दुमति ॥२१॥कस्ता दुर्मुख हेन नै नसकिने क्रोधान्धता छन्‌ यहाँदाउ्हा कर्रे किटीकिटी कति बसे पापी कुकर्मी यहाँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हा ! पक्राउ परेर तुच्छ कसरी जाँदै छु यिन्‌का सँगैकस्तो दुर्गतिको शिकार हुन गै जाँदै छु हा पिल्सँदै ॥२२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घाटी सुक्न गएर माग्दछ जसै आई कुनै निष्युर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तातो झोल, फलामले डसिदिने यो ठाउँको दस्तुर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लाग्यो भक भनेर माग्दछ जसै तातो खरानी दिने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लौ त्यस्तो पनि खान खोज्दछ भने आई हुरी पोख्दिने ॥२३।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसैन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य / ५ ५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हा कामार्त भएर खोज्दछ भने सम्भोगमा आतुर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लोहा स्तम्भ अँगाल्न लाउँछ हरे ! कस्तो यहाँ दस्तुरलैजान्छन्‌ कति कष्टपूर्ण पथमा घौक्रचाइ पाता कसीआँधी चल्दछ हल्लिँदै रुखहरू पात्रादि झार्छन्‌ असी ॥२४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विष्टा, राल, सिँगान, पीपहरूका खोला बडो भीषणझमटा मस्तिर बाज, गिद्धहरूको टोक्ने किरा मुन्तिर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केही होश-हवास किन्तृ नभई भोगीरहेका सब&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्तोमा कसरी म मान्न सकुँला यो मृत्युको उत्सव ॥२५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चाहीमाम छ भीम पुग्छ कसरी पत्ता सरी वृक्षको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो दुर्गति के हुने अब भनी सातो उड्यो भीमकोलीला ईश्वरकै अपार जगमा क्यै हुन्न थाहा रती&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाम्रा कर्महरू बमोजिम सदा प्राप्तै हुने हुन्‌ गति ॥२६॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बोकी पत्थर धर्मको पिठिउँमा ठाडो उकालो चढ्यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वाँस्वाँ भैकन बल्ल तल्ल दु:खले भन्ज्याङनेरै पुग्यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्यै सुस्ताउन खोज्छ माथ तर हा ! मुन्ट्याउँदै गुदमुटीफेदीको तल खस्न थाल्छ बिचरो ! संक्कष्ट गाह्रो परी ॥२७॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
9.६ / भीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भुत्ल्याएर चरा बरा ! अधमरा पारेर छाडेसरि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐले विष्णुमती किनार बिचमा प्राणै बस्यो झुन्डिई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आई मृत्यु लगे हुने किन हरे ! आउन्न चाँडै अहो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के मज्जा विधिलाई भीमकन यो तडपाउँदैमा भयो ? ॥२८॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य / ५७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बान्ह&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ती पूर्वस्मृति आउँछन्‌ कति यहाँ राम्रा नराम्रा पनिमान्छे भन्नु न हो सबै स्मृतिहरू हुर्की रहेका अनिपारावार अपार कष्ट दुःखको यो क्र्र संसार हो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फोस्सा नै पनि आज होइन यहाँ भोगिरहेको छु जो ॥१॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले आज मनुष्यको जुनि लिई तिनै छ बाँकी धन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो फर्स्यौट हुँदै गएर यसमा गर्ने कुरा कैयन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्तैमा यमको कठोर भरिया आईरहेको अब&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जानै पर्दछ जान्छु-जान्छु अबता टन्टा छुटाई सब ॥२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टन्टा कैयनको कठोर रटना भोग्नै छ बाँकी जतिभोग्नै पर्दछ ओग्छु-भोग्छु सब ती जोडेँ कुरा जै जतिवेला अन्तिमको जे जति भयो सच्च्याउनै सक्दिनँपश्चाताप र दुःख, कष्टहरूमा बाँच यहाँ भन्दिनँ ॥३॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
५८ / भीमसेन यापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कस्तो घोर छ अन्धकार अहिले देखिन्न केही रतिघोप्ट्याएसरि चक आज छ यहाँ कालो निशाको गतिमात्रै शब्द सुनिन्छ तीब्रगतिले खोला बगेको फगत्‌आई खोज्छ कि निल्नभझैँ प्रलयले संपूर्ण मेरो जगत्‌ ॥४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छोपे ता पनि आज बस्तु सब नै छोपिन्छ मेरो जति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भै जाज्वल्य रहन्छ यो हृदयमा बोकेर नाना स्मृति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्तै कारणले उखान हुन गो &amp;lt;nowiki&amp;gt;&#039;जस्तो मती सो. गति&#039;&#039;&amp;lt;/nowiki&amp;gt;फुन्डेको छ अलग्ग सास तर खै छैनन्‌ कनै ओखती ॥५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हौँ सन्तान अभावका सबजना हाम्रा पिता हुन्‌ उनैहाम्रा रक्षक, नाथ, बालक उनै जो सारा संसारकै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐया ! दुःख र कष्टले बल गरी सार्है मलाई दबा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो श्वास निखार्नलाइ सहजै लौ जोड सारा लगा ॥६॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीडा घोर असाध्य स्वागत छ आ विश्वान्ति केही नदै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साह्रै क्रोध जितेर कत्ति म उपर माया, निगाहा नदे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो अज्ञात समुद्रमा म त पुगँँ फालहाल्न लागौँ अब&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के को फेरि विलम्ब उड्छु यसमा आफन्त त्यागी सब ॥७॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य / ५९,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीडा, कष्ट म माग्छु चोट गहिरो आ आ मलाई पछारमेरो जीवनमाथि बास्तविकता ढुङ्गा उठाई बजार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीडा, कष्ट तँ छस्‌ कहाँ र कसरी मैले नमानी दिएँयो जानीकन आज भट्ट मितिको पर्दा गिराई तँ दे ॥क॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छुद्ने आज भयो भनी म सितको सम्बन्ध तेरो सब&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो गर्छस्‌ कि ढिलाइ आज मनमा आउँ नआफँ बिचजे भो जत्ति गरेँ-गरेँ सब गरेँ बेला विचारी अनि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यो सच्च्याउन आज सक्तिन कुनै भूलै भए तापनि ॥२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दौचै-दौष तथा गुणै-गुण भई बन्दैन मान्छै कुनै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो दौष भए म माग्दछु क्षमा गर्नु सबै ईश्वरै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धोका, धाक, रवाफ नक्कल छली, चोरी-चकारी सबऐले मूर्त भएर आज कसरी मेरा मुखेन्जी खडा ? ॥१०॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डन्डा, अंकुश, पाश छन्‌ करमहाँ क्रोधान्धता दुर्मुखआएका लिनलाई आज म कनै देख्दै छु ती संमुख&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिर्को मृत्यु समस्त दुःख जगको आधार मानीवरि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिर्को हाल्न कुनै म उन्मुख भएँ यो आत्माहत्य गरी ॥११॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६०, भीमसेन यापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भन्छन्‌ भन्न त आत्मघात सरिको संसारमा पाप के ?मैले किन्तु यही नरोज्नु सरिको संसारमा पाप के ?रोजेँ किन्तु ढिलो गरेर त्यसले अन्याय सास्है गरेँअड्काईकन प्राण देह तरुमा तापाग्ति दण्डै दिएँ ॥१२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो चिन्तानल दन्क-दन्क सहने सामर्थ्य मेरो छ यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देखैको छु अनेक दृश्य पटमा पीडा तिरस्कारको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो संसार बिलाउँदै छ कसरी डुब्दै महाशून्यमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घुम्दै जीवन आज यो फनफनी चौरासि त्यो चक्रमा ॥१३॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आउ मृत्यु अँगाल झट्ट मकनै बेहाल मेरो भयो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीडा, कष्ट खपेर देह तरुमै यो ज्यान अड्की रह्योत्यान्द्रोमा कति झुन्डिएर नफझरी यो यातना दी रह्यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो जस्तो हुनुको समुन्द्र बिच हाम्फाल्न गाह्रो पत्यो ॥१४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बेहोशी मन यो उडेर कहिल्यै होशै नखुल्ने भए&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुन्थ्यो किन्तु हरै ! बराबर खुली पीडा मलाई दिने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जन्मै मृत्यु समान हुन्छ सबको वेदान्तमा भन्दछन्‌जन्म्यो फेरि मप्यौ यसै फनफनी पाङग्रा सरी घुम्दछन्‌ ॥१५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य &#039; ६१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो देह बिसाउने क्षण तिमी मेरो मुखेन्जी खडा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो चुम्बन गर्न निम्ति अहिले डाक्छौ मलाई कता :&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाना झन्झट पीर दुःखहरूको माटो जमेको जुन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यस्तो देश बिसाउने क्षण समैत्‌ गाह्रो मलाई किन : ॥१६॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जस्तो जे अनिवार्य हुन्छ त्यसको गर्दै छु मै सामनायो बेला पनि दुःख, पीरहरूको के व्यर्थको शासनायस्तो दुष्कर दुर्दशासित जुधी यो प्राण अडकाउँदैमेरो देह भनेर भन्दछु कठै ! अज्ञान कस्तो अझै ॥१७॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो होईन देह यो जति भनौ मान्दै नमान्ने किन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐया उफ ! बिच हाय छट्पट हुने यस्तो व्यथा यो किन ?केवल छन्‌ पटमा परन्तु यसका लामा बनी वेदना&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुन्छन्‌ हाय ! अनन्त झौँ किन हरे ! कस्तो कडा शासना ॥१८॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो बुद्धि विवेकमा अब परोस्‌ आलो ज्योतिर्मय&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिन्ती ! अन्तिम आज मर्न म सकौं भै मुक्त औं निर्भयफुस्सा बात गरेर मानिस यहाँ फुस्सामहाँ नै मिल्यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साँच्चै जीवन भन्नु नै यति रह्यो बाँकी करा कै रह्यो ॥१९॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६२/भीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फुस्सामै म गएर मिल्छु अब ता फुस्सा प्रतापी अतिफुस्साले सब खेल गर्दछ यहाँ हुन्छन्‌ कुरा जे जतिफुस्साको महिमा अपार जगमा गर्ने कुरा जे पनि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पृथ्वी, तेज, हावा, अकास रहने फुस्सामहाँ झुन्डिई ॥२०॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फुस्सा भन्नु न हो यहाँ सब कुरा फुस्सा बिना केछर!यो ब्रह्माण्ड समस्त नै बुझ यहाँ फुस्सामहाँ निर्भर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो जीवनको कथा त अहिले यसै गरी टुङ्गियो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के होला पछिको निमित्त यसले थाती भएरै रह्यो ॥२१॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भावी सन्ततिको निमित्त यसको पूर्पक्ष जिम्मा रह्योयो नेपाल अगाडि बढ्न जति नै मेरो निशाना भयोझिल्का एक उडेर शून्य बिचमा सून्सानमै अल्झियोसाँच्चै जीवन भन्नु हो नि यति नै, बाँकी कूरा के रह्यो ? ॥२२।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फुस्साकै कारबार दुनिया, फुस्सा सबै आखिर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फुस्साको छ बुझी नसक्नु महिमा यो सत्य भो सुन्दरयो नै पूर्ण रहन्छ नित्य सबमा घदने नबढ्ने कतै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यै आनन्द स्वरूप सत्य, शिव हो डग्दै नडग्ने कतै ॥२३॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य ,&#039; ६३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाँकी नै रहँदैन जान्न अरू ता त्यै बन्छ ज्ञानी पुरा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भेटे, सक्कल चाहियो किन यहाँ भो व्यर्थको नक्कलयस्तो नक्कल च्यात्नु पर्छ सबले च्यातिन्छताकेछर।!सारी नक्कल लाख-लाख कसरी भौँतारिँदै नै रहे ॥२४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पार्ने अल्मल अन्धकार बिच नै गोता अनेकौँ सहेँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोजै पक्रन मृत्युलाई सहजै यो कण्ठ सेदौ भएँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐया दुख्छ कटक्क लौन नि ! मरेँ, फेरिन्न थोत्रा लुगायस्तो पिञ्जर भित्र बस्नु कसरी फुत्कन्न पापी सुगा ॥२५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्तो सम्म कृतघ्न मानिस हुने विश्वास गर्नै पन्योपानीसम्म नपाई राख्न मुखमा तडपेर मर्नै पन्यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफू भित्र बसेर हाय घर यो खोजे छु भत्काउन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ईटा, काठ, निदाल औ झिटिमिटी बाधा बने फुत्कन ॥२६॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भूलै कत्ति भएन जीवनमहाँ मैले कसोरी भनूँ !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धेरै भूल भए परन्तु अहिले सोचेर नै के गरुँ !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्तो ठाउँमहाँ पुगेँ म अब ता के सक्छु सच्च्याउन !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जे जस्तो परिणाम हुन्छ नसही भन्नै कहाँ सक्छु र ! ॥२७॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६४ /भीमसैत थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्तो ता हुन्‌ हुन्नथ्यो हुन गयो कै लाग्छ यस्तै भयोभित्तासम्म पुग्याइ दारुण वाधा कालो कथा लेखियोहा ! संसार छ भन्न नै नसकिने प्रत्यक्ष कै के भयोदुक्खैको अखडा रहेछ जगतै भन्ने कुरा सिद्ध भो ॥२८॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माने दुःख छ दुःख नै जगतमा आपत्ति हत्या घनामानेमा सुख हुन्छ पूर्ण यसमा आपत्‌ विपत्‌ छन्‌ कहाँ ?हाम्रै हो प्रतिविम्ब भित्र मनको जे जे भयौँ औ हुनेपल्टे तापनि सृष्टि नै मन दह्रो पारी रहे हुन्न क्यै ॥२९॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकातर्फ छ घोर दुवख जगको काहालिने सम्झिँदाअर्कोतर्फ छ शान्ति - हर्ष सुख नै क्यै छैन अर्को क्रा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्तै द्वन्द्वरमहाँ छ भीम अहिले अत्तो न पत्तोसित&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
झुन्डी आस-निरासको भुवनमा काद्दो छ फन्का नि त ॥३०॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कैल्यै लग्छ कता कता, विरहको धारामहाँ उ परी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कैले होइन दुःख क्यै पनि भनी उ जान्छ खोला तरीबोकी भार गरौँ कडा बगरमा क हिँड्छ औ गिर्दछकैले भार बिसाइ दूर पथमै फुबका हुने गर्दछ ॥३१॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसैन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य “६५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बास्नाको अति सृक्ष्मता रज खुली बेह्दी, कसी तान्दछसारा उच्च सफा विचार उसको ऐयामहाँ पर्दछ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफ्ना जीवनका सबै विगतका राम्रा नराम्रा कुरा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐलै पो झनझन्‌ खुली &#039;फलफझली आए सयौँ आँक्रा ॥३२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर्सन्छन्‌ सब फेरि ढाडस कतै आनन्द तस्यां कतै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
झिल्का सुक्ख र शान्तिको पनि कतै, धक्का र मुक्का कतैठेगाना नपुगी थलो नजिक नै भत्की रहेको कतै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐले प्राण छ भीमको सकसमा काँचो विकल्‌ वायु झैँ ॥३३॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क ज्यूँदो छ त भन्नु मात्र अहिले के शक्तिले बोल्दछसारा इन्द्रिय बन्द छन्‌ धुकधुकी मात्रै कतै चल्दछहाम्रो भन्नु शरीर होइन यहाँ अर्कै छ साँचो क्रायस्तो देह अनेक लीकन कहीँ यात्रा हुने हो पुरा ॥३४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चोला यो नरको छ साधन फगत यात्रा पुरा गर्नकोराम्रो साधनको प्रयोग नगरे पुग्दैन बैकुण्ठ त्यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
झल्क्यो झल्झल भीमको हृदयमा जे जे गरेका थिएआई जीवनका समस्त घटना ऐले सिनेमा बने ॥२५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६६ ,/भीमसैन यापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हत्या श्री रणको हुँदा जति भयो एकएक देखा पप्यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जालै जाल रची अनेक जनको सर्वस्व भो ज्यानको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पर्थ्यो गर्नु गरे सबै मुकुटको जिम्मा दिएको थियो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मान्छे हो यदि भुल हुन्छ त भने दोषी कसोरी भयो ? ॥३६॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीडा, क्रन्दन सुन्त, हेर्न पनि हो यो राज्यभारा लिनकाँढा, सिस्नु छिमल्नु पर्दछ यहाँ यो राज्य हुर्काउनहत्याकाण्ड अनेकको जडमहाँ अड्ने यहाँ शासनहत्याको नपरे त चोट कसरी यो देश बिग्रन्छ त ? ॥३७॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भन्छन्‌ साम र दाम, भेदहरू नै साम्राज्यको शासनहत्या-काण्ड अनेकको जड भए गद्दीमहाँ शासन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर्के लोचन लाल-लाल कसरी क्रोधान्ध दामोदरसल्काइ दिन खोज्दछन्‌ मनमनै पारै खरानी सब ॥३८॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हत्या निर्मम शेरको घरमहाँ बाँकी नराखी शिशु&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मै सम्झन्छु म फेरि कैयन यहाँ यस्तै उदण्डीहरू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देखेँ तत्पर मर्न राजमहिषी राजेश्वरी स्वामिनी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जस्तै पस्न सुहागरात बिचमा खोपी खसमकौ पनि ॥३९॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेत थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य “५७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुन्धेँ सोह्रजना किशोर ललना आगोमहाँ फालिँदानिस्केको स्वर कडङ्क्ला अहह त्यो दृश्यावली कष्टदाजिम्मा यी सबको म होइन भनी मैले कसोरी भनूँ !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो गर्ने र गराउने त अरू नै भन्दै कसोरी बचुँ ! ॥४०॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्लेका भल झैँ फिरङ्गीहरूले ढाक्दै थिए एसियामान्छेका अधिकारका हननको फैलाउँदै दुष्क्रियाआफ्नो शक्ति तथा परिस्थितिहरू हेरी बिचारीकनमैले राय दिएं सबैसँग चुझी सन्धी सुगौली हुन ॥४१॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हत्याकाण्ड चुकूल ठोक्न नसकी हेरेर वेलाबखत्‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गुड्नै मुश्किल हुन्छ राज्यरथ यो पल्टन्छ सारा तखत्‌यो जानीकन राजनीति गरियो मारैं मराएँ पनि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो नै दोष भए त दौषमय भो सम्पूर्ण यो जीवनी ॥४२।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६ भीमस्तेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेग्ह&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जाजा धेर भयो सहुँ म कसरी यस्तो कडा लाञ्छना ?मान्छेको दिलभित्र अडछ कसरी यस्तो अगुन्टौ घृणा ?मान्छे यी कतिसम्म नीच मतिका डाहा र ईर्ष्या कति ?वैरी साँध्न निमित्त आज म भएँ पापी अचानो हरे ! ॥१॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बल्दो जोवनको प्रवाह कसरी बोकी ममा होमियौ ?मेरो जीर्ण शरीरको दश कुना जाज्चल्य पारिदियौबिम्झाई सब गुप्त-सुप्त सपना उत्साह नौलो भन्यौ ।बाँच्ने जीवनको मिठो रहरमा संगीत नौलो भन्यौ ॥२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लोभी हात बढाउँदै जब बढेँ लावण्य तिम्रो लिन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैरा हातहरू फतक्क भुइँमा गल्दै &#039;झरेनन्‌ किन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यौटा निर्मल प्राणलाड्इ कसरी छोई बिगारेँ अहो !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गोली लाग्दछ &#039;झैँ छ आज दिलमा सम्झी महापाप त्यो । ॥३॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आीमसैन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य / ६९,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काढी देह छियाछिया गरिगरी यो प्राण मेरो लुछोस्‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जे होस्‌ जत्ति हवस्‌, सहन्छु सब ती मैमा परोस्‌ जे परोस्‌दोषी हुँ त म नै छु हो अलिकता ती भक्तिले के गरिन्‌ ?नब्चयाईकन फौजबीच बिचरा लाने घिसारी अरे ॥४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कस्तो यो बदला ममाथि अहिले कस्तो कडा यातनायौटाको अपराधबाट अरूमा यस्तो दिने शासना&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छोपी छोप्न सकिन्न अगिन कहिल्यै दन्किन्छ दन्किन्छ त्योतोडी तोड्न सकिन्न अगिनि कहिल्यै जोडिन्छ जोडिन्छ त्यो ॥५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिम्रो आँट, अठोटले मुलुकमा पस्नेछ अर्कै युगसन्ध्या सुन्दर न्याय, शान्ति, सुखको सारा हँसाई मुखत्यो वेलाकन ल्याउने क्रममहाँ सङ्घर्ष ज्वाला बनीजाङ दुःख सही तपी विरहिणी मेरी प्रिया सँगिनी ॥६॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीडा, कष्ट व्यथा मलाई नसता सम्बन्ध हाम्रो छुटाजे होस्‌-होस्‌ किन देह नै यदि यहाँ तोडेर जाँदैछु तातिम्रो पीर लिएर दुर्बल हुँदै सानो बनूँ के कतिनेपालीजनलाइइ सोच, सबको यस्तै यहाँ दुर्गति ॥७॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७0 / भीमसैन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्प&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उल्याजँ सब दुःख-दर्द जगको भन्ने इरादा लिईजस्तै कष्ट, विपत्‌ परै पनि सही सङ्घर्ष गर्दै जिईयो नेपाल नयाँ बनाउनमहाँ जन्मँ यहीँ फौरि मयो इच्छा परिपूर्ण पार प्रभू ! हाँसेर जाँदै छु म ॥८॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लागेको छ दनन्न अग्नि घरमा अन्याय दन्कीकन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जन्मी क्रान्ति महान्‌ यसै मुलुकमा फर्कुन्‌ सबैका दिनहाम्रा पाप र भूलका तिरिदिउन्‌ तिनै नसक्ने क्रण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो नै माग र भीख ती सुजनमा हो भीमको अन्तिम ॥९॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के सुन्दै छु म सुन्न नै नसकिने यस्तो समाचार यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नारी &#039;भक्ति&#039; लगेर फौजबीचमा छोडीदिने रे अहां !जेजस्तो दिनुपर्दथ्यो र कर त्यो मेरो उपर्मानभैनङ्गयाईकन भक्ति&amp;quot; फौजबिच नै छाडीदिने रे कठै ! ॥१०॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चिन्ताको घनघोर भित्र मनमा आँधी, हुरी चल्दछअड्ने ठाउँ कतै नपाइ मन यो हुत्तिन्छ औ गिर्दछगञ्जागोल छ शान्ति छैन रति क्यै कस्तो अहो दुर्दशाउर्लेको दुःखले असैह्य मनमा खाँदै छ गोता यहाँ ॥११॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य / ७१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
थाहा छैन मलाई अझै पनि लौ के के हुने हो अहो !जाने जीवन भन्नुपर्ने सब नै यौ जिन्दगानी अहां ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो को मानिस कर्म गर्दछ यहाँ यस्तो तमाशा किन !घोक्स्याई यसलाई काम नलिई मिल्दैन सच्चा सुख ॥१२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गर्ने फेरि गराउने सब उही मार्ने र मर्ने पनि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लीला गर्छ समस्त ईश्वर बनी आफै करणी औं धनीमान्छेमा कन रोग पस्छ कसरी के युक्तिले हट्छ नि !यो नै चिन्तन एकदेवकन थ्यो बस्दा र उठ्दा पनि ॥१३॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जालैजालमहाँ परेर उनको ज्यानै गुम्यो व्यर्थमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सास्ती घोर मिल्यो कठोर किन यो सास्ती कठै व्यर्थमा !हत्या राजकुमारको गर्न उनको हो हात रे ! मानियोआयुर्वेदमहाँ प्रवीण विचरां सोझो गुणी वैद्य थ्यो ॥१४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छोपी नाक त भाजुमान अहिले क्या धापमा भासियोसोझो ज्यान त चक्रको बिच परी झुन्ड्याइयो मारियोमेरा मित्रहरू ! तिमीहरू कहाँ आईरहेको छु म&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जारी घोर कृतघ्न यौ जगतको देखीरहेको छु म ॥१५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७२ भीमसेन थापा एतिहासिक खण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हालेको पनि गाँस खान यमले लौ छाड भन्लासरिआयुर्वेद-प्रवीण ती अनुभवी नेपाली धन्मन्तरी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चोखा पण्डित एकदेव पनि हा ! बेप्वाँकमा मारियो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो षड्यन्त्रमहाँ अमोघ मणिथ्यो हा ! काँच भौ फ्याँकियो ॥१६॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हत्यारा भनि भाजुमानकन ता केही नराखी अहम्‌सास्ती घोर दिएर अन्त गरियो कस्तो करा त्यो अधम्‌भीमैमाथि दगा थियो त किन ती बेफ्घाँकमा नै गएयस्तो जाल&#039; रचेर शान्ति जनको बेहाल नै गर्दिए ॥१७॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लाग्छन्‌ घाम अवश्य बादल बढी ढाकीदिए तापनि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यस्तै सत्य रहन्न गायब सधैँ मिथ्या अँध्यारोमनि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मात्रै जाल फरेब हो मप्रतिको यो लाञ्छना &#039;फूट हो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हत्या राजकुमारको किन गरुँ कस्तो कुरा यो अहो ! ॥१८॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्ली विस्मृतिको महाजलघिले ढाक्नेछ सम्पूर्ण यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केही भाग रहन्न केवल यहाँ अड्ने कुरा शून्य हो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो नै पूर्ण विराद्‌ शरणमा अर्पिन्छ यो जीवन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यै मात्रै तलमाथि हुन्न त्यसमा घुम्दै छ त्यो फन्फन ॥२०॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्य ,&#039; ७३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जस्तो जे हुनुपर्छ हुन्छ त भने टारेर टर्दैन त्यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केको शोक लिने यहाँ फजुलमा जे हो हुने हुन्छ त्योनाना जाल र झेल छन्‌ जति यहाँ धोका हुने लोककोकेही छैन म लिन्न ता दुःख यहाँ झिल्का म आलोकको ॥२१॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हे आलोक ! तिमी चमक्क चमकी मेरो खुलाक पथमायाको बशमा परेर यसरी धेरै नटाँसँँ भ्रम&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खोई दुःख कहाँ छ आज सब यैँ सम्पूर्णमा व्याप्त छकेही होइन ज्यूनु-मर्नु क्रम हो संसारमा चल्दछ ॥२२॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चिन्ताबाट उछिट्टिएर पर गै निश्चिन्त हो भनी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोजेँ यो पथ किन्तु झन्झन यहाँ चिन्ता घुम्यो फन्फनीआई ती अघिका अनेक घटना बिच्छी भई डस्दछन्‌मैले गर्नु नगर्नु त्यो जति गरेँ धावा ममा बोल्दछन्‌ ॥२३।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कोही भीम गयो कथा करुण यो भन्छन्‌ त नेपालमामै हुँ भन्नु समान झूटहरू के यो घोर जञ्जालमाकस्तो थ्यो कसरी कसो हुन गयो प्रत्यक्ष नै देखियोदुःखैको अखडा रहेछ बुझियो निःसार संसार यो ॥२४॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७४ /भ्रीमसैन थापा ऐतिहासिक खण्डकाव्व&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भन्छन्‌ भीम भएर शान्त यसरी यो कष्ट के हो गुनीहो सङ्कट उनाउ केवल यहाँ अस्तित्वको निर्धनी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्रष्टा मात्र रहुँ म ता समयको भोक्ता हुँदै होइनपीडा-सङ्घटबाट भिन्न म छु है ! मेरो हुँदै होइन ॥२५॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ज्ञाजा व्योम अनन्तमा गरुड भझौँ उड्उड तँ आत्मा चरासास्है कष्ट भयो मलाइ अहिले सम्झेर के के कुरा !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हे धारा स्मृतिको तँ बन्द भइदै पाखा मलाई लगाभकभक तप्त कराइमा भुटिभुटी दिन्छस्‌ कडा वेदना ॥२६॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खस्‌खस्‌ विस्मृतिको महाप्रलयका पर्दा सबै छोपिदे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चिन्ता दुःख र कष्टको जलन यो सारा बिलाई तँ दे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो कस्तो विकराल काल अहिले भोगीरहेको छु म&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनै सक्छु न ज्यून सक्छु अहिले कस्तो दशा निर्मम ! ॥२७।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो होइन सत्य होइन, यहाँ भोग्दै छ मैले तर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टाँस्सी मैसित आउने किन हरे ! कस्तो अँध्यारो छर !जानेको छु म मुक्त हँ तर पनि कस्तो कडा बेदनाजाजाजा चुँडिएर जा अब यहाँ मैमा मलाई मिला ॥२%॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमसेन यापा ऐतिहासिक खण्डकाब्य ,&#039; ७५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वास्ता छैन ममा कुनै विकलता मेरो पिछामा नआयस्तो तप्त कराइमा भुटिभुटी के भो तँलाई मजा ?पीडा भो घनघोर जोड नलगा अस्तित्व पोल्दै जलाफाँडी झन्झट जाल छन्‌ जति यहाँ प्रस्थान बाटो खुला ॥२९॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो भाग शून्यको तट पुग्यो नैराश्यको माझमापर्दा अन्तिम गिर्न-गिर्ने अहिले लाग्दै छ यो साँझमाघण्टी बज्छ समाप्तिको टिनिटिनी थन्किन्छ मर्मान्तकयी सारा प्रतिघात-घातहरूको टुङ्गिन्छ है नाटक ॥३०॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
॥इति॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७६ /भ्रीससेन थापा ऐतिहासिक बाण्डकाव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिद्धिचरणका कृति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिसिमिली जूनकीरी ।बालकविता) नयुद्ध र शान्ति (खण्डकाव्य) तकान्तिमती नवक हाम्या&#039;5 ५ हाञ्ट डाटा हत ए0डा15 जै रा.प्रइठका हाम्लाई ला जाल छ 1 न&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपालीभाषामा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१ कोपिला ।कविता-सङ्ग्रह) नेराप्र२. मेरो प्रतिविम्ब (कविता-सङ्गराह) छ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३. उवंशी (खण्डकाव्य) साझा४. कुहिरो र घाम ।कविता-सङ्ग्रह) साझा१ तिरमिरै तारा (याललकविता) नेराप्र६. बाँचिरहेको आवाज (कबिता-सङ्ग्रह) साझा७ सिद्धिचरणका प्रतिनिधि कविता नेराप्रद्र मक्गलमान (खण्डकाव्य) नन१. ज्यानमारा शैल ।खण्डकाव्य। न१०. आँसु (खण्डकाव्य) साझा११. बालिवध ।पच्चनाटक) न१२. (खण्डकाव्य) साझा१३. पु थापा नेराप्र१४. शबरी न१५. आत्मबिलौना न१६. सिद्धिचरणका जैल-संस्मरण नेरा.प्र१७.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१८.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सीस्वाँ ने.फ्स्वां&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्वशी (खण्डकाव्य)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ग्वग्‌स्वां&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लुभुनी (खण्डकाव्य)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तृष्णा (खण्डकाव्य)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिडिचरणया निबन्ध&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घःमा ०उत्तरा-विलाप पिमदनिगु१०. बाखं व निबन्ध ७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११. भूमिकामुता नैरा.प्र.१२. मूस्वां ।कवितामुता)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1111 ॥ यवब्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुन (4 27 2८ नद ३० लन ला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हन्ट ५ 1888 190. 99933-50-60-5&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%AE_%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8B&amp;diff=103</id>
		<title>अन्तिम निम्तो</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%AE_%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8B&amp;diff=103"/>
		<updated>2024-06-14T14:19:23Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: Created page with &amp;quot;फडाँ॥7€60 87:  ७०,ने७साझा शिक्षा ई-पाटीताइ बरा  ४//४४/.[१1॥51916919%90.018१५४४///.०।616|0901.018  लेखिकागिता केशरी  |  सेभ दि चिल्ड्रेन यू.एस.महाराजगन्ज, काठमाडौंनेपाल ।  बब प्रकाशक :पुस्तकलेखिका  प्रथम संस्कर...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;फडाँ॥7€60 87:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७०,ने७साझा शिक्षा ई-पाटीताइ बरा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४//४४/.[१1॥51916919%90.018१५४४///.०।616|0901.018&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेखिकागिता केशरी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सेभ दि चिल्ड्रेन यू.एस.महाराजगन्ज, काठमाडौंनेपाल ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बब प्रकाशक :पुस्तकलेखिका&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रथम संस्करणसर्वाधिकार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सेभ द चिल्ड्रेन (यू.एस)- अन्तिम निम्तो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- गिता केशरी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- वि.सं. २०५१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- प्रकाशकमा सुरक्षित&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन्‌ १९८१ को जुरुतिर अमेरीकामा एउटा यस्तो गोग देखा पत्यार जन गोग लागेमामानिस बाच्न । यो रोगको नामाकरण एड्स भनेर गारियो । आहिले एडम गोंगविश्वका घौँ जसो ठाउहशुमा प॒गिसकेको छ । वैज्ञानिकहरु, विशिष्ट अनुमन्धानक्ताहरुयस रोगको उपचारको औषधी तथा खोप चनाउनमा तल्लीन छन्‌ तर आजसम्म त्योसफलता उनीहरुलाई प्राप्त भै सकेको छैन । विकसित राष्ट्रहरुमा भन्दा किकासोन्मखराष्ट्रहहमा यो रोग बढ्दो गतिमा फैलदो छ । यसको प्रमख कारण नी राष्ट्रहरुकाजनतामा शिक्षा र ज्ञानको कमी नै ह्वो । एड्स, एच.आइ.भी. रोग अन्य रोग जस्तोस्वास प्रस्वास, पानी तथा सामान्य ब्यवहारबाट सर्दैन । समयमै यसबारे जानकारी दिइसवै मानिसलाई आफूनो व्यवहारमा सतर्कता तथा होसियारी अपनाउन सके यो रोगफैलने सम्भावना घेरै कम हुनेछ । त्यसैले रोग लागिहालेमा उपचार नै हन नसक्ने यसरोगबाट आफु बच्नु र अरुलाई वाँच्नको लागि जनचेतना जगाउनु प्रतेक सचेतनागरिकको कर्तब्य हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाम्रो देश नेपालमा सन १९८८ देखि एड्स रोग देखा परेको छ । औपचारिक रूपमाएच.आइ.भी. एड्सका रोगीहरुको संख्या त्यतिसाह्ै डरलाग्दो अनुपातमा तदेखिएना गनब्यबहारिक रुपमा हेर्दा यो रोगका जिबाणुबाट घेरै मानिस आर्कामट भएको र वत वारेब्यापक जनचेतना जगाउन नसके नराम्रोसग यो रोग फैलने सम्भावना छ । गर्ने करालाडंमनन गरेर श्रीमती गीता केशरीले साहित्यको माध्यमवाट हाम्रा गाउ घरको स्थिति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सहन हाम्रा ब्यवहार वारे प्रकासपारी एड्स रोगले हामीलाई कसरी आकमणगर्ने सक्छ रयसबाट बच्न कस्तो सतर्कता अपनाउन पर्छ भन्ने कुराका ज्ञान दिन यो उपन्याम लेख्नभएकोमा उहांलाई हार्दिक धन्यवाद दिनै पर्छ ।. एच.आइ.भी एड्खख र्‌ यौन गोगवारजनचेतना जगाउने यो उहांको पहिलो प्रयास हो । उहाका कशल हस्ताक्षर र सबलविचारहरुले आउंदा दिनहरुमा पनि जनचेतना जगाउने प्रयास गर्नुका मानव साथै जीवतकोमुल्यलाई बफाउन सकुन भन्ने हामी कामना गर्छौं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्तमा यस पुस्तकको अध्ययन गर्ने सम्पूर्ण पाठकले आफुले प्राप्त गर्न भएको ज्जानआफूनो परिवार, साधी छर छिमेकी नातेदार तथा गाउँ समाजलाई जानकारी दिइ एड्स&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राग रोकथाम वारै प्रचार प्रसार गर्नमा सहयोग गर्न हुनेछ भन्ने पूर्ण विस्वास लिएका॥ |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेभ द चिन्डन &#039;युण्समहाराजगजकाठमाडौ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भूमिका&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जनसन्देश वोकेको यो प्रस्तुत “अन्तिम निम्तो” यौन तथा एड्स रोगबारेको जानकारी सवै समक्ष पुन्याई यसलाई फैलिनबाट रोक थामको उपायहरूअपनाइ कसरी समसामाजिक जीवन सुचारू रूपले चलाउदै जान सकिन्छ भन्नेचेतना जागरण गराउन तैयार पारिएको हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाम्रो देशभित्रको कुना कुनामा यो सन्देश पुर्न सकोस्‌ भन्ने अभिलाषाराखेर यसलाई नाटकको रूपमा लेखेर चैत्र १६ गते २०५० देखि शुरू गरीवैशाख १६ गते सम्ममा दश भागमा क्रमिक रूपले रेडियो नेपालबाट प्रसारणगरिसकेको छ । सायद सुन्नु भएकै पनि होला ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाम्रो यहाँको रहन सहन चलन चल्ति व्यवहार संस्कृति र गाउँघरकोस्थितिको परिवेशमा रहि व्यतीत गरिने जन जीवनमा व्यवहारिक कठीनाइकोसाथमा कसरी अन्जानमा नै एड्स जस्तो भयंकर रोग निम्त्याइ रहेका हुन्छौँ, योरोग के कस्तो हुन्छ, कस्ता व्यक्तिहरूलाई छिटै सर्न सक्छ, रोग सर्न सक्नेकारणहरू के कस्ता छन्‌, यस रोगले छोएको छ या छैन भन्ने जानकारी &#039;के गरीलिन सकिन्छ, कस्ता कस्ता कर्ममा लागेका व्यक्तिहरूले कस्तो कस्तो स्वास्थ्यकोअवस्था हुन जाँदा सतर्क रहनु आवश्यक छ, रोगले आफुलाई आक्रमण गरेकोथाहा पाएपछि घर समाजका अरू सदस्यहरूलाई वताउनु उपयुक्त हुन्छ या हुदैन,एड्सको विरामीको मनोभाव कस्तो हुन्छ उसलाई परिवार या समाजमाहेलमेलको साथ रहन दिन सकिन्छ या सक्दिन र त्यस्तै दैनिक मानव जीवनमासाथै वस्दा घट्न सक्ने कुन कुन कर्मबाट यो रोग सर्दैन र यस रोगकोनियन्त्रण गर्न रोगीले होशियार हुन सके मात्र यसलाई हामीले नियन्त्रण गर्नसक्छौँ भन्ने तथ्य कथानक शैलीबाट एउटा समस्यापूर्ण अशान्त दैनिक जीवनबिभिन्न व्यक्तिको सिर्जना गरी यसमा वर्णात्मक रूपबाट देखाइएको छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस कथामा विस्तार गर्न गाउको जीवन छानिएको भए तापनि यो रोगशहर वासिहरूलाई लाग्दैन या सरेको हुदैन भन्ने छैन । यो सर्ने कारण फैलिनेकारण र होस्‌ पुग्याउन पर्ने कारण सवै, सवैका लागि एकै हुन्‌ । यस रोगलाईहामी आफैले आफ्नो शरीरमा निम्त्याएका हुन्छौँ र यसको जीवाणुले शरीरमाभित्रिएर रोग लाग्नबाट सुरक्षा गर्ने शरीरको प्रतिरोध प्रणालीलाई नष्ट गर्छ ।रोगीको शरीरबाट निस्केको यी जीवाणु आलो रगतसँग मिसिएर या पुरूषको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शुक्रकिटबाट या स्त्रीको अंगरसबाट निस्किएर एक अर्काको शरीर भित्र प्रवेशगरेको हुन्छ । यसैले यौन क्रिया नैसर्गिक भए तापनि यसैबाट रोग सर्न सक्नेसम्भावना रहन गएकोले सावधान रहेर नै सम्पर्कमा आउन्‌ गति आवश्यक छ ।एड्स रोगको रोकथामको लागि उठाइएका प्रत्येक कदममा सहयोगी वनौ । रोगफैलिनुको कारण रोगीसँग साथै वसेर होइन रोग सर्न सक्ने सम्भावित विषयमाहेलचक्राइ गर्नाले हो । रोगको आक्रमणबाट व्चौ र बचाऔं, जीवन सवैको लागिअमूल्य छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेखिकागीता केशरी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्तिम तिम्तो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुनै पनि चित्रकारले आफ्नो चित्रपटमा नेपालको प्राकृतिक सौन्दर्यउत्तार्न चाहन्छ भने उसले सर्व प्रथम कोर्न थाल्छ एक छेउ देखि अर्को छेउसम्मपसारिएको पहाड, जसको पछाडीबाट देखाइएको हुन्छ हिम शिखरहरू, अनितिनैको खोचबाट वेगले भर्दैको हुन्छ एउटा छहरा । यही छहराको पानीलेखोल्चा काट्दै तल तल बगिरहेको हुन्छ भने किनाराको पाटाहरूमा खडागरिएका हुन्छन्‌ साना साना नेपालीपना झल्काउने रातो माटोले पोतेका परालेघरहरू जसको सौन्दर्यलाई अरू रम्य पार्न फुलाइएका हुन्छन्‌ गुराँस यालालुपाते ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठीक यस्तै सौन्दर्यमय परिवेशमा फूलदेवीको सानो पराले घर छ जहाँउ बहिनीको दुई छोरीहरूलाई साथमा लिएर वसेकी छे । त्यस घर भित्रबितिरहेका यिनीहरूको जीवन पनि के यत्तिकै मनमोहक होलान ? हिड्नोस्‌ हामीएक फेर त्यहाँ गएर पनि चिहाएर हेरौं । यी मध्ये कान्छी छोरी हुने भर्खरशहरबाट आएकी छ । उ अलि अस्वस्थ्य पनि छे । सानै उमेर देखि शहरमाबसेकी हुनाले उ दिदी चन्द्री भन्दा केही जान्ने सुन्ने र हक्की पनि छे । छ्प रशहरिया लबाइ, बोलीचालीले गर्दा चद्रीपट्टि भन्दा उ तर्फ ज्यादा चाहना सबैलेराखेका छन्‌ । तर उ आफुलाई अरूको चाहना पुरा गर्न सुम्पन्त चाहन्न ! उरिसाउछे पन्छन खोज्छे । त्यहा कलह मच्चिरहेको हुन्छ । फूलदेवी भन्छे, “योआएर के गर्नु झन वाधा भएकी छ” ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्कि छोरी चन्द्री फूलदेवीको हातको कठपुतली भएर बाँची रहेकी छ ।उ केही जान्दिन र लाचारी वस सम्भझेकी हुन्छे स्वास्नी मान्छैले योव्यावसायभन्दा अर्को के नै गर्न सक्दा रहेछन्‌ र ? यस्तै सोच लिएकी चन्द्रीआफुलाई रातोदिन लुटाइ रहेकी हुन्छे । उसैको अज्ञानता लाचारी र नग्नताकोफाइदा लिदै ढल्दो उमेरमा पुगेर पनि बिभिन्न अभिलाषा राखेर फूलदेवी वसेकीछ। उ थुप्रै पैसा छिटो छिटो कमाउन चाहन्छे र भन्ने गर्छै अर्को वर्ष यो परालेछानो बदल्नु परेकोछ, यताको कुनामा एउटा पाको इटको गाउ्हो लगाई कोठानिकाल्नु छ । छोरीहरूलाई भन्छे, उमेरलाई यसै खेर नफाल । बुदढ्यौलीमा केगर्छौं भन्ने छ ? सानो तिनो रोगले शरीर भएपछि नछुने हुदैन तर यसलाई यसैमिचि दिन सक्ने हुनुपर्छ, बुझ्यौ के ? उ आफैं पनि रक्सि बनाउछे मासु माछापकाइ शहर तर्फ लाग्ने यात्रु र गाडी चालकको लागि बिहानैदेखि खाना पकाइ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुरेर बसेकी हुन्छे । उसको प्रयास सँधै तिनीहरूलाई आफै कहाँ वास वसाउनेरहेको हुन्छ । त्यो गर्न छोरीहरूलाई अगाडि पार्ने, मीठा रमाउने कुरा आफैनिकाल्ने र जुन बेला भन्यो कुखुरा काटेर खाना तैयार पार्न उ तम्सि रहेकी हुन्छेउसमा प्रशस्त जाँगर छ, पैसा बटुल्न । उसलाई छक्काउन हतपत कसैले पनिसक्दैनन्‌ । उ असुल उपर जुनसुकै तरिकाले पनि गरी छोडछे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यस घरमा आति जाति गर्नेहरूको ताँती कहिल्यै छुटेको हुदैन ।तिनीहरूलाई देख्दा याद आउछ ती पुतलीहरूको जो वत्तिको प्रकाशले के आकर्षितपारेको हुन्छ त्यसै झूमिदै आउछन्‌ र आफै जलेर खाक हुन्छन्‌ कस्तो शक्ति छत्यो ज्योतीमा,जसले मृत्यु बिर्साइ दिएकोछ, आफ्नो मृत्युको कारण ती आफै बनेरखोज्दै झुम्मीन आइ रहेका हुन्छन्‌ । के यसलाई कालले पठाएको अन्तिम निम्तोनमान्ने ? त्यस्तैछ फूलदेवीको भट्टि पनि जुन रफतारले चलि रहेकोछ । ग्राहककोसंख्या दिनहूँ वढ्दो छ । फूल देवीको दाउ छोरीहरूलाई अगाडि सार्नु भन्दा बढीरक्सि र मासु वेच्नमा भट्टिमा आउने ग्राहकहरू भन्छन्‌ “अव पुग्यो मासुसत कुनै पनि थप्नु । खुवै मीठो वनाइछौँ, आमै । अव कामको कुरोगरौं ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलदेवी तैपनि मासु रम्सिनै थप्नमा जोड गर्दै भन्छे, “मीठो बनाइछौंचाहि भन्छौ थप्नु भन्ने छैन लौ यति त अरू खाओ” भनेर रिकापीमा हालि दिन्छैर किच्च हाँस्छै । उ सोच्छे मैले त्यसरी यिनलाई छोप्नु पर्छ । छ्याम्वा लाई हुनसम्म झोक चल्दैन । उ कराउन थाल्छ &amp;quot; कै भएकी हँ तिमीत ? पुग्यो भन्दा पनि के को यत्रो जोड यही खुवाउनमा गर्छौ ? यहाँ यही मात्रखान र तिम्रा ती थोते दाँत मुजा परेका अनुहार हेर्न भनेर हामी आएका होइनौ,खुरूक्क कान्छीलाई नै यता बोला ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलदेवी पनि कम वाठी छैन जवाफ दिइ हाल्छे, “के लुकाएर मैलेराखेकी छु र कान्छी आएर तिमीहरूलाई तृप्त पारेर ख्वाइ पठाउछे । पकाएकाखानाहरू यी यिनै हुन ? सन्ते भन्छ “के आमै सद्याउन लागेकी त होइन, ?कुरो पट्ै नबुझ्ने हुन लागिन, कि नबुझेको बहाना गर्दे छौँ, ए ? यही खाना मात्रहो भने यहाँसम्म धाएर किन आउनु पर्छ घरैमा खाइ नखाइ छ नी । वरू हाम्रोसाथ आउछौँ भने आउ तिम्रा पेट चर्कने गरी ख्वाएर पठाइ दिन्छौ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलदेवी भन्छे, “त्यसो भए के खोजेका हौं त ? खुलाएर भनन, किन मसंग जड्डन्छौं, व्यधैं ? छ्याम्वालाई प्रशस्त रक्सि लागि सकेको हुन्छ । उलरबराएको स्वरमा भन्छ “ खै कान्छी अझै आइन सन्ते ? वोलान भनेको वोला1 के चाहिन्छ त्यसलाई यो छ्याम्वाले दिन्छ, दिन सक्छ ... अझै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलदेवी वल्ल खुल्दै भन्छे, “के भनेर अहिले नै कान्छीलाई वोलाउछु ।तिमीहरू जस्ता लुच्चालाई मैले विर्सेकी छु र ? अस्ति खुरूक्क आई कान्छी चन्द्रीदुवै संग मन परि हाँस खेल गरेर लुरूक गयौ । म भने मासु चिउरा रक्सि ठीकपारेर कहिले भन्लान र लैजाउला भनेर कुरिरहेकी । चन्द्रीलै पो आएर भनि“कसलाई ठीक पारेर कुरेर वसेकी आमा, तिनीहरू त गए, अव सप्पै तिमी नैखाउ” भन्दापो म झसङ्ग भए । अव त निश्चय गरेकी छु पहिले खाने पिउनेनगराइकन छोड्दै छोडदिन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन्ते हाँस्दै भन्छ “ए, कुरो त यस्तो परेको रहेछ र पो यौ आमैले त्यसदिनको घाटा पनि आनै उठाउने कोशिश गरेकी रहिछन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलदेवी:- हो त तिमीहरू जस्ता छट्टुलाई यस्तै गर्नु त पर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छ्याम्बा फूर्ति देखाउदै भन्छ, “लौ भन कति नोक्सानी तेरो भयो त्यो सप्पै आजैतिरेर जान्छु भएन अव ! कान्छीलाई एक फेर वोलाइ दे आमै तिमीलाई मवक्सिस्‌ पनि दिएर जान्छु । म को, कसको छोरा, तिमीले राम्ररी चिनेकी छौत्यति पैसा तीर्न नसकेर भाग्ने म होइन, बुझ्यौ के ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलदेबीः पैसा नभएकाहरूलाई त यहाँ कसले छिर्न दिन्छ र ! पैसावाला होस्‌ यागरीव त्यो जाच्ने हाम्रो काम होइन । लौ नोक्सान वेहोछौं भनि हाल्यौ यसपटकलाई वोलाइ दिन्छु, हेरू तिम्रा इमान कति सम्मका रहेछन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन्तेः बोलाएर त हेर अनि चिनौली हाम्रो वोली कति पक्का रहेछ ।फूलदेवी; तैले मात्र भनेको भए म के पत्याउथे, तँ यो छ्याम्वाको पछ्नुटे त होस्‌ती?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलदेवी यति भनेर हाँस्दै वोलाउन थाल्छे .... कान्छी ... ए कान्छी छिटो ठीक्कपरेर तल आइज त । यहाँ वावुहरू आएका छन्‌ । तँलाई नै खोजदै छन्‌ ।कान्छीको कुनै उत्तर नसुनेपछि फूलदेवी फेरि फतफताउन थाल्छे र कराउदैवोलाउछे, “ किन बोल्दैन ? कत्ति सुति राख्न मात्र सक्छे यो केटी ता । कस्तोनिन्द्रा पाएकी हो यसले । साँझ पनि सुत्छ्ले । विहान पनि सृति मात्र राख्छै ? अनिके राखूत शाहरियाले यस्ती काम चोरलाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन्तेः आ यो आमा त कति छोरीहरूलाई गाली गर्छौ ? आफ्नो घर फर्केकी छकामकाजबाट फूसर्त पाएको वेलामा त सुत्न देउ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलदेवी: यी यस्तै छन्‌ । यसै छोडी दियो भने ओछ्ठ्यानबाट उठ्ने नामै लिदैनन्‌ ।फूर्सत त मलाई पौ अव यो वुढ्यौलीमा चाहिन्छ यिनलाई किन ? ए चन्द्री ...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ड&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्री .... तँ पनि त्यहाँ के गर्दैछस्‌ ? कति माथि मात्र वस्न पल्केकी हो । दिदीभएर वहिनीको पछि लाग्छे । कान्छीलाई तल लगारेर पठाइ दे त ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्री कान्छीलाई उठाउँदै भन्छे, तल जा रे आमाले वोलाएको वोलाएकैछ । तल को को तलाई भेट्न आएका छन्‌ रे, जा छिटो नत्र फेरि लुछनन आइपुग्छे।कान्छी निद्राको को आलस्यमा नै भन्छे, “आ मत जान्न । एकछिन पनि सुत्ननपाउनु । दिदी, तिमी गड देउन तल । विन्ती छ के । यस पटक मात्र भए पनिगइ देउन त्यस पछि सत्ते भन्दिन के ? अहिलेलाई नाइ नभन है ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्री: जान्न म, तै जा । तेरो के थाहा हुन्छ र । भोली पनि यसरी नै फकाउनथालि हाल्छेस्‌ । तेरो वानी मलाई थाहा छैन र ? लौ भन कतिवाजी मलाई यसैगरी फसाइ सकिस ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीः सांची भोलीदेखि तिमीलाई जाउ भन्दिन आज मलाई सन्चो छैन के !वहिनीलाई के तिमी दिदी भएर पनि माया गर्दिनौ ? यो बुढीले त गरिन गरिन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्री: तँ जेसुकै भन आजलाई भने म पनि जान्न । हिजोसम्म मलाई भनेर मरीमेट्ने यी गुण्डाहरू आजभोली तँ आएको थाहा पाएपछि स्वाद फेर्न खोजदैछन्‌ । मकेही पनि भइन यिनका लागि ? कान्छी, कान्छीको रट लगाएर वसेका छन्‌ । केम तेरो सट्वा भनेर तिनका जाउ ? म त आजलाई तैले जत्ति भने पनि जानेहोइन । तँ गए जा नगए नजा मैले कुटाइ खाने पनि होइन न त तिता कूरा मैलेसुन्नु पर्छ । मलाई माया यहाँ कसले गच्यो ? १३१४ वर्षको उमेर देखिन यसैमाडुवेर बाँच्नु परेको छ । हाम्रो कर्म नै यस्तै हो ? मलाई हेरेर तैले मन बुझाउनुपर्छ भने मैले तलाई हेरेर ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलदेवी तलबाट फेरि कराउछे, &#039;के को त्यहाँ गल्फत्ति हो । मै आएरदुबैलाई खङ्जार्नु पत्यो कि कसो ? कस्ता अटेरा हुदै छन्‌ , हँ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीको स्वर सुनिन्छ । उ भन्दै हुन्छे, “म त आउन्न, आमा दिदी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आउछे ।” दिदीलाई भन्छे, “ गइ देउन भन्या छिटो, त्यो बुढी माथि उक्लि भने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मार्छ फेरि अव त तिमीलाई पनि वोलाइ हाले, जान के अप्ठ्यारो पन्यो । वरू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यो मेरो लाली पौडर तिमीलाई नै लगाउन दिन्छु । नयाँ छ, हेर त ? एक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छिनको सन्नाटा पछि कान्छी आत्तिएरभन्छे, “लौ न दिदी त्यो उक्लिन थालि जस्तै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तक चन्द्री धर्म संकटमा परेर भन्छे, एकै छिनमा आउछौं हामीलाई ठीक पर्नस्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलदेवी तलैबाट प्रफुल्ल भएर भन्छे, तल भर्दा सुकुमेल ल्वाङ के के राखेकी छु&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शु&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यो वार्लिको वट्टामा, त्यो पनि ल्याए है । यी बावुहरूलाई चखाइ दिउ, चन्द्री तलझर्छ र त्यो बट्टा फूलदेवीलाई दिदै भन्छे, &amp;quot; लौ समात तिम्रो वट्टा । के के अरूपनि राखेकी रब सबै ल्याइ दिएकी छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलदेवी खै खै हेरू के के राखेकी रहेछु, मेरो त सुद्धि पनि हराइसंकेको छ भन्दै बट्टा समात्छे । सन्ते पनि फूलदेवीको साथै हेर्न थाल्छु रभन्छ,“यो चाहि पानवहार हो, ज्यादै मीठो हुन्छ । कहाँबाट के के ल्याएर राख्छौए, आमै ? फूलदेवी खुसी हुदै चन्द्रीलाई भन्छे, लौ वाबुहरूलाई तै दे के केखान्छन्‌ आफै छानेर खाउन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्री उनीहरूको अगाडि बढेर वट्टा तेसारी दिन्छे ती केटाहरू चन्द्रीकोअनुहार हेर्दै मरी मरी हाँस्दै भन्छन्‌, “ए चन्द्री तैले यो कस्तो अनुहार वनाएरआइस्‌ गएर एकफेर आफ्नो अनुहार राम्ररी ऐनामा हेर त ? लाली पाउडर पनिनरम वान्कीला ओठमा, गालामा दल्दामात्र मिल्छ नत्र हेर ल कस्तो निलो भइदोरहेछ जा धोएर आइज । तँ त यसै राम्री हामीलाई लागेकै छसनी फेरि किनयसमा रङ्ग थप्नु पर्छ ।” फेरि हाँसो छुदछ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्री टुलु टुलु तिनीहरूलाई विस्मयको साथ हेरि रहन्छ । उनीहरूहाँसोरोकेर भन्छन्‌, “ आउदा वरू कान्छीलाई पनि फकाएर ल्याए । किन त्योआइरहेकी छैन । सुन, आउन्न भनेर फेरि भनि भने सुनाइ दे हामी नै माथिआउछौ अनि के गर्दि रहिछ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलदेवी: त्यो कान्छको वानी यस्तै छ । त्यसको जिड्ीको अगाडी कसैको केहीलाग्दैन त्यसलाई झुकाउनै सकिदैन । के भयो त हाम्री चन्द्री आइ हाली ।आजलाई कान्छीलाई बिर्सि देओ । त्यसलाई वानी बसाइ सकिएको छैन । पछितत्यो पनि तिमीहरूकै त हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छुयाम्बामा अहम उठ्न घाल्छ उ भन्छ, त्यसलाई आज यहाँ वोलाएरल्याउन सकिन भने म यस गाउको मर्दनै होइन । त्यसले मैले बोलाएको भन्नेचाहा नपाएकी पनि हुन सक्छ, पर्ख अव म वोलाउछु त्यस पछि पनि त्योआउछेकी आउदिन । उ ठुलो स्वर निकालेर बोलाउन थाल्छ “कान्छी ए कान्छीतल आइज हामी आएका हौं अरू होइन । तल आउदिनस भने हेर हमी नै माथिउक्लन्छौँ तेरी आमाले नरोक्ने भइसकी ।&amp;quot; कान्छी दिक्क हुन्छे र मन मनै सोच्छे,यिनले हामीमा के देखेका हुन्छन्‌ कुन्नि घरमा आफ्नो स्वास्नीलाई छोडेर पैसाखनाउदै हामीलाई खोज्दै हिड्छन । यी असत्तिहरूलाई तलनै गएर तह लगाउनुपर्छु क्या रे । उ सुन्ने गरेर भन्छे, “तिमीहरूले मलाई उठाइ छोड्नेभर्यौ होइन,लौ म तै आउछु ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छ्याम्वा दङ्ग पर्दै आफ्नो जितको घोषणा गर्दै भन्छ “आखिर तल ओर्लाइछाडे ।” यता आफुलाई तिरस्कार गरेको संझेर चन्द्री आमालाई सुनाउछे, “योआमैले व्यधैं मलाई वोलाउनु भएको रहेछ । यिनीहरूले कान्छीलाई मात्र खोजेकारहेछन्‌ । मलाई यसै लाजको मर्नु पारिदिनु भयो, लौ म त गए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यतिकैमा कान्छी आइ पुग्छे र जान खोज्दैकी चन्द्रीलाई रोक्दै भन्छे“भलाई एक्लै छोडेर कता जान्छौ, दिदी । हामी दुबै वसौन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन्ते चन्द्रीलाई भन्छ, “छ्याम्वा कान्छीसंग वस्छ अनि मलाई तँ यसैछोडेर जान्छेस्‌, लौ हिड तँ र म उ त्यता गएर एक्लै वात मारौ । तँ त मलाईसबै भन्दा राम्री चन्द्रमा जस्तै उज्याली हँसिली लाग्छ पो । त्यही छयाम्वा हो,आए देखि कान्छी कान्छी भनेर घोक्रो फुलाएर कराइरहेको । तँलाई उल्लाउनेपनि त्यही हो । आइज, जाउ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्री लुरू लुरू सन्तेको पछि लाग्छे । फूलदेवी लाखा पाखा लागेकाछोरीहरूलाई देखेर त्यही भित्तामा आड लिएर सुस्ताउछे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जन सन्देश :&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बेलैमा शिक्षा आर्जन गर्न यिनले नत पाए नत कुनै व्यवसायी तालीमप्राप्त गरी काममा लाग्न नै सके । आर्थिक भारले थिचिन गइ जीउने तरिकामानै अल्मलिन पुगेका त्यस्ता नारहिरूसंग भेट भए तिनलाई आफूले जानेको उपायकेही छन्‌ भने सिकाऔ र देह व्यापारलाई वहिस्कार गर्दै यिनलाई सहयोग गरौंएक मानबले अर्को मानवको आँसु पुछि दिऔ, आजको धर्म मानव धर्म हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डिठ्ठा बाजेको नामले प्रख्यात विष्णु शर्मा त्यस गाउघरमा कर्मकाण्डकाम गरेर आफ्नो जीविका चलाई रहेको ब्राम्हण हुन । उनको मनमा केही कुराअङ्दैन । जे देख्यो जे सुन्यो त्यो सवैलाई सुनाउदै जाने उनको स्वभाव छ । सत्यके हो भन्ने पत्ता लगाएर मात्र बोल्ने उनलाई फुर्सतै छैन । हेत्‌ बाजे तपाईलेपनि यसो भन्ने हो भनेर कसैले भन्यो भने सजिलैले भन्छन, “हेर वावु सत्यबोल्नु सबैको धर्म हो । अव कसैले झुठो बोल्छ, पाप गर्छ भने त्यसको फल पनित्यही बोल्नेले भोग्छ थोडै सुनाउने मैले भोग्नु पर्छ ? मैले कथेर भनेको होइनक्या रे । सुनेकोले नै बोलेको हुँ ।” यस्ता सफाइ दिने यिनलाई कसले के भन्ने ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डिठ्ठा वाजे घरमा वस्दै वस्दैनन्‌ । कामै केही पनि छैन भने पनि गफैहाँक्न, गाउमा अर्तिवुद्धि दिन पनि घुमि रहन्छन्‌ । एक साँझ उनको भेट लाहुरे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काइँलासंग भट्टीभित्र पस्ने ढोकामा हुन्छ । डिठ्ठा वाजेले प्वाक्क बोलि हाल्छन्‌ क्याहो लाहुरे तिम्रा चाला त राम्रो छैन है, वेलैमा आफुलाई नियन्त्रण गरि हाले ?नत्र सर्वनाश गरौला ? यो चाला राम्रो होइन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लाहुरे: त्यस्तो केही होइन बाजे, आमै संग भेट गर्नु थियो र आएको ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डिठ्ठा वाजेः किन ढाँद्न खोज्छौ सोझै कुरा गरन । जवान छु मन थाम्त सकिनर आए भनेर त्यति सानो सानो कुरामा &#039;झुठो वोली हाल्नु हुदैन । हेर काइँलाहाम्रो बताइ दिने धर्म हो, मान्नु नमान्नु तिम्रो कुरा ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यतिका बर्ष मुङलाङ्ग पसेर जिउ ज्यान केही नभनेर कमाएर ल्याएकोपैसा यस्तोमा उडाउनु कति औचित्य छ ? तिम्रो स्वास्नी तिम्रा घर परिवारलेरक्तको आँसु बगाएर दु:ख सहदै तिमीलाई कहिले फर्कौला भनेर आश गर्दै पर्खिरहेका हुन्थे । अहिले आयौ अव तिन्कै आशा पुरा गर्न पट्टि लाग । त्यसैमातिमीलाई सुख होला । यी .. यी त पैसा छ भने आज तिम्रा हुन्छन्‌ नत्र कस्कोकसको ? देश विदेश घुमेर अरूले के के सिकेर आउछन्‌, तिमीले भने यस्तो केसिकेर आयौ ? आउ हिड, साथै कुरा गर्दै माथि लागौ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लाहुरे: तपाइले त मेरो कुरै नसुनेर आफै मात्र वोल्दै जानुभयो । म त्यस्तो केगैर्थे ? हेल्थपोष्टमा विरामी जाँच्ने टाइम कुन बेला रहेछ बुझि दिए है भ्रनेकालेत्यही खवर मात्र दिन आएको हुँ । म त यिनीहरूलाई यो पेशा राम्रो होइन छोडभनेर सम्झाएको सम्झाएकै छु । के गरून यिनले पनि, भित्र मनै देखि यिनीहरूकोपनि यस्तो बन्ने इच्छा हुँदो रहेन छ । कुनै न कुनै मजवूरीले यिनलाई गराइछोडेको हुदोरहेछ । यो पेशा घिन लाग्दो मात्र होइन, बाजे त्यतिकै डरलाग्दोपनि छ । नाना थरीका रोग यसैबाट सरेको हुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डिठ्ा वाजेः यत्तिकैमा आफुलाई राखी राख्न सक्यौ भने ठीक छ । आफ्नो मनलाईचञ्चल हुन नदिए यस्तैहरूबाट रोग सर्छ भन्ने हो भने यिनीहरू मध्यै कोबिरामी छ त्यो पनि पत्ता लगाए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लाहुरे: खै त्यो त मलाई भन्दै भन्दैनन्‌ । हेर्दा दुवै दिदी वहिनी ठिकै जस्ता छन्‌ ।ख्वाक ख्वाक खोक्ने त त्यही बुढी आमै छिन्‌ । उही विरामी होलिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डिठ्ठा बाजे: ख्याल भने राख्दै जानु पर्छ । के कस्तो विरामी हो । गाउँनै सोतरहुने हो कि ? नत्र गाउका ठिटा मिटाहरूलाई रोक्नु पनि पर्छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लाहुरे: त्यसो हो भने हिंडनोस हामी दुवै भित्र पसौं र यसो. विचार गरौं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यहाँको तमासा पनि हेरौला । भट्टिमा के हुन्छ कहिल्यै पस्नु भएको छैन भनेआज त्यही के के हुन्छ हेर्नु होला । ती केटीहरू कस्ता छन्‌ । त्यो पनि थाहापाउनु हुनेछ । वेश्या तिनलाई हामीले बनाएका हुन्छौ । उनीहरू स्वइच्छालेभएका हुदैनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डिट्ठा बाजे: भो वावु म त यसबेला पस्दिन । सन्ध्याको नित्य गर्नु पर्ने वेलामाकहाँ त्यस्तो ठाउँमा पसौं भन्छौं । अहिले तिमी नै जाउ पछि पछिलाई विचारगरूला लौ राम राम । यति भनेर विष्णु शर्मा त्यहाँबाट जान्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माथिबाट तल भझर्दैको वोलकुमारलाई देखेर कौडे कान्छा सोध्छ, “कताहो दाजु लुकि लुकि, आफै मात्र तलतिर भर्दै छौ नि?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चोलकुमार: लुकि लुकी हिंडेको भए तैले कसरी देख्थिस र कराउन पाउंथिस्‌, तँकता तिर जान लागेको नी?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौडै कान्छा: म पनि तलैतिर जान लागेको हुँ । एक छिन पर्खित दुवै साथैझरौला तँ संग कुरा पनि नगरी भएको छैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वोलकुमार कौडे कान्छालाई पर्खन्छ र उ आइ पुगेपछि सोध्छ, &#039; के पप्यो त्यस्तोमैसंग नै गर्नु पर्ने कुरा ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौडे कान्छा: तैले सुनेको छस्‌ कि छैनस्‌ कुन्नि त्यो शहर गएकी कान्छी फर्केरयही भट्टीमा आएकी छ रे । पुतली जस्ती चिटिक्क परेकी गोजी भित्रै लिएर हिंडुजस्ति छ । म त त्यसलाई देखे पछि हेरेको हेरै भए, सत्ते नहोला ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वोलकुमार हाँस्दै भन्छ, &amp;quot; तँलाई कुन केटी त्यस्तो लाग्दैन पहिले त्यो भन न ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौडेकान्छा: होइन, यो त वयान गरि नसक्नु कि छ । त्यसका गालाको पाटा रओठ त झन कति हिस्सी परेको हो कत्ति ? लुगा कस्तो चिटिक्क पारेर लगाएकीहुन्छे । जाने होइन त नजिकैबाट हेर्न, मौका मिले, छोएर पनि हेरौला ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बोलकुमार: त्यहाँ यसै छिर्न सकिन्छ ? खै पैसा ! कि तँ संग छ र जाउँभन्दैछस्‌ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौडे कान्छाले, सुइको पाइसकेको छ वोलकुमारसंग अहिले पैसा छ भन्ने कुरा र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसैले भन्छ “दाइ पनि, के हामीले केही थाहा नै नपाएको जस्तो गरी कुरा गर्नुहुन्छ । अस्ति मात्र भाउजुले वाख्रा कुखुरा वेचेर तिमीलाई पैसा दिएकी छिन्‌ भन्ने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुनेको छु । खै खै यता आउ त तिम्रो गोजी छामु । अहिले नै थाहा हुन्छ पैसाकोसंग छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वोलकुमार कौडेकान्छालाई पन्छाउदै भन्छ, “छोड, यो पैसा पनि कहाँ त्यहाँ गएरमास्ने कुरो भझिक्छ, यो त ? यो त छोरीलाई शहरबाट ल्याउन खर्च जुटाएरदिएकी हा । पहिले दिएकी खर्च तिमीहरूकै लै लै मा लागेर सिद्धाइयो । अव योतके खर्च गर्न दिन्छु । स्वर्गकी अप्सरा नै धर्तिमा आएकी छ लौ हिड जाउ भने पनिगए के ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौडे कान्छा: आ यो दाइ त, कस्तो आँदै नभएको जस्तो क्रा गर्छौं । वेला आउछपर्खदैन, मौका छोप्न नसके पछ्नुताइन्छ भनेको सुनेका छैनौ ? सुन्दै छु कान्छीछिटै शहरै फर्कदै छे रे । तिम्रो छोरीको किन चिन्ता लिन्द्ठी । एक त राम्रौठाउँमा राखेको छु भन्छौ अर्को पैसाले नै गाञ्हौ साङग्रो परि हाल्यो भने के त्योमेरो पनि भतिजी हैन र ? पैसा म ल्याउला भएन अब ? अहिलेलाई हिंड जाउँ :&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वोलकुमारः त्यसो भएफरक पर्दैन होइन, के ! नत्र त मेरौ जहानले वस्त टिक्नदिन्न ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौडै कान्छा: हेत्तेरी दाइ, विश्वास गरेर त हेर । के यो गाउँमा आजै मात्र वस्नुछ र इमान छोडुँ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वोलकुमार: पक्कै ल्याउछस्‌ भने हिड त्यतैतिर लागौ । त्यसलाई मैले पनिएकफेर झुलुक्क देखेको थिएँ । त्यसको हिंडाइ त झन के भनु, यस्तै लाडिएर टाँङफट्टाउदै हिड्दी रहिछ्ल आजभोली गाउँघरमा जता जाउ त्यसैको कुरा सुनिन्छ ।त्यो लाहुरे काइँलाको त झन वासै त्यही रहन्छ रे भन्दा रहेछन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यत्तिकैमा खितितित्त स्वास्नी मान्छेहरू हाँसेको आवाज सुनिन्छ । कौडेकान्छा र बोलकुमार सतर्क हुन्छन्‌ र यता उती हेर्न थाल्छन्‌ । चमेली र सुन्तलीआइ रहेका देख्छन्‌ । चमेली उनीहरूलाई देखेर भन्छे, “दाइहरू कतातिर हो,सन्चै त हुनुहुन्छ !” जबाफ उनीहरूले दिन पाएका हृदैनन्‌ सुन्तलीले भन्छे, “नअल्मलाई देन दाइहरूलाई तल सम्म पुग्नु पर्छ क्यारे साँझले छोपी सक्यो ।”फेरि खितितित्त हाँस्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौडे कान्छाः उत्ताउलीहरू- किन त्यसरी हाँस्छौं ए ? कि तिमीहरूलाई डाहलाग्यो ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चमेली: त्यस्ता संग पनि हामीलाई के को डाह लाग्नु । बजारमा बस्न गए पछि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
%&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जस्तो सुकै होस्‌ गुण्डाहरूको ताँती लागि हाल्छ, होइन त सुन्तली ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बोलकुमार भन्छन्‌ “साँझ परिसकेर पनि तिमीहरू यही किन अल्मलि रहेका हँ ?घरतिर छिटो लाग । आमाहरू कति सुर्ताइ रहेका होलान्‌ यहाँ तिमीहरूलाई भनेगिजिइनु पर्छ ।” &amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुन्तली: यिनीहरूलाई हामीले रोकेको मन नपरेको थाहा पाइस्‌ । कस्तो असलबनेर कुरा गर्छन्‌ ? वहा भने ०७३५ लाई भनि दिन्छौँ कि भनेर यसै डराएकाछन्‌ । छोडी दे यिनलाई अहिले जाउन । भरे घर फर्के पछि यिनको मेखमर्छ । भाउजुलाई मात्र हैन आमालाई पनि भनिदिन्छु । उनीहरू आफ्नो बाटोलागे पछि कौडे कान्छा भन्छ, “कहाँबाट यसवेला पनि टुप्लुक्क आइ पुगे । घरमाकुरो पुग्ने भयो अब । काम केही छैन यिनका, कम्मरमा एउटा गाग्रो वोकेकाछ्न्‌ रह भने कता पुग्छन कता । औँ त्यो लाहुरेको कुन दिन म त्यसका खुट्टादुइ ठुड्डे हुने गरि भाँचि दिन्छु । अनि वल्ल घरमा ऐया ऐया भनेर वस्ला । गाउकाचेलीवेटीहरूलाई पनेरा वन कतै गाएको चाल पाएकी वाटोमा ढुकेर वस्दो रहेछ ।अनि कुनै ठिटाहरूले कुरा गरि हाले भने भन्छ रे यस्तासंग विश्वास नगर्नु नानीहो । यिनले तिमीहरूलाई कता पुस्याइ दिन्छ कता । सज्जन र राम्रो उ मात्र छभने जस्तो गरी कुरा गर्छ ए ! सवैले उसलाई मात्र मानुन र आफू के के न छुभन्ने घमण्ड छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वोलकुमार: यस्ता केटीहरूको कुरा सुनेर मात्र लाहुरेलाई यसै केही भनि हाल्नमिल्दैन । गिल्लिएर यसै म के के नकि छु भनेर हिड्ने केटी यहाँ छ्याप छ्याप्तिछुन्‌ । पहाड, तराई, काठमाडौं जोड्ने बसहरू रातो दिन यही नजिकेबाटगुडिरहेको हुन्छ । मोटर विग्ने, ड्राइभर खलासी देखि ल्याएर यात्रुहरू वास खोज्दैयिनै गाउँमा छिरेका हुन्छन्‌ । त्यस्ता एकराते बासले त हाम्रो गाउँका केटीहरूधेरैलाई खलास पारि सकेका छन्‌ लौ भन त कति चेलीबेटी यो गाउका हराइसके ? कहाँ कसले पुस्यायो होला !?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डिठ्ठा बाजे तलबाट उक्लदै आइ पुग्छन्‌ र सोध्छन्‌, “को खलास भइसके भन्दैयसवेला हिडदैछ्लै ए ? घर फर्कने वेलामा झन तल तल भर्दै छौँ कता पुग्नेविचार छ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौडे कान्छा: अहो डिठुा वाजे पो उक्लदै हुनु हुदो रहेछ ? कता पुगेर आउदैहो?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बोलकुमार: तपाईं जस्तो वाजे पनि तलबाट यसवेला उक्लनु अचम्मै भयो है ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कतै त्यसै कहाँ पुगेर फर्कदै त होइन. ? उनी पनि खिजाउने हाँसो हाँस्छन्‌ ।डिठ्रा बाजे स्वाँ फां ..... स्वां फां गर्दै उक्लदै हुन्छन्‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौडे कान्छाले फेरि कुरा थप्छन्‌ “पुजा पाती केही लगाएछन र पुगेरआउनुभयो ? भरखरै एउटी छोरी धेरै वर्ष पछि घर फर्केकी छे रे भन्ने सुनेकाथियौ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डिठ्ठा वाजेले उकालो चढी सक्छन्‌ र कम्मरमा हात राख्दै भन्छन्‌, “अं ... मलाइपनि आफु जस्तै उल्लीएका ठान्न थाल्यौं कि कसो ? भन जे जति मुखमा आउँछभन्दै जाओ, तिमीहरूले आनन्द लिन जानेकोनै अर्कालाई उल्लाउनुमा कि भट्टीमासमर्पण हुनबाट मात्र छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्ता रिष्टपुष्ट शरीरको शक्ति यतिकैमा नाश पार्दै छौँ भन्ने कुराको कुनै अत्तोपत्तो छैन । एउटी केटी शहरबाट के गाउँ फर्केकी छ यहाँ केटाहरूको जात्रालागेको छ । त्यही झूत्तिएका छन्‌ झूत्तिएका छन्‌ । हेर्दा हेर्दै यो गाउँ कसरीभाँडिइ सक्यो । ठिटाहरूको रमाइलो भन्नु नै मासु रक्सि र स्वास्नी मान्छे .....छि । अर्कालाई उल्लाउनुभन्दा आफ्नो बानी सपार्न पट्टि लागौ वरू । सक्छौ भने,साँझको वेला सवै जम्मा भएर हारमोनियम तवला बजाएर हरिकृतन गरौ ।भक्ति रसको मडस के कम हुन्छ भन्ने ठानेका छौँ ? त्यसमा नत पैसा खर्च हुन्छनत डर नत चिन्ता नै । धनको कदर गर्न सकेनौ&#039; भने लक्ष्मी टिंक्दिनन्‌ अनि के,रोएर वस्छौ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौडे कान्छा : लक्ष्मी खुशी पार्ने र भजन गरेर मजा लिने काम हामी तपाईलाईनै छोडि दिन्छौ । सक्नु हुन्छ भने तपाईले कमाउनु भएको धर्म अलिकतिहामीलाई पनि राखी दिनु होला । अहिले रात पर्नै आँद्यो हामी तल लागिहाल्छौ । यति भन्दै उनीहरू तल लाग्छन्‌ डिठ्ठा बाजे तैपनि सम्झाउदैभन्छन्‌, “ए केटा हो तिमीहरू त्यतै जान कस्सिए कै हौ भने रोगबाट वच्ने उपायपनि साथै लिएर जाओ । लडाइमा जाँदा चोटबाट वच्न ढाल लिएर जानु परे झैत्यस्ता ठाउँमा रइस गर्न जाँदा रोगबाट वच्न कण्डम लिएर जान नविर्स । त्योपनि रोगबाट बच्न ढालै जस्तो हो । नत्र ती तिम्रा चिम्सा आँखा पर्लक्क खुलेपनि ती चोथाले मुख ऐया .... भन्दैमा थाक्लान है ? विचार गरेँ । सुन्छु त्योभट्टिमा कुन चाहि हो विरामी पन्ति भएका छन्‌ रे ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डिठा बाजेको कुरा सुनेर वोल कुमार कान्छासंग भन्छन्‌, “सुनिस यसचतुरै बाजेको कुरा ? आफू त्यही आउदैछन्‌, रोगका कुरा पनि गर्दैछन्‌,त्यस्ता रोग यिनलाई नसल्कने रे तिनै कहाँ हामी जान लाग्यौ भने हामीले रोगनिम्त्याउछौ रे ? यिनको क्कुरा गराइ अनुसार रोग पनि हामीलाई नै कुरेर वस्ने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रहेछ ? यी बाजे जव जव कुरा गर्छन्‌ हामीलाई भेडा नै बनाउन खोज्छन्‌ । यसैलेमलाई यिनी पट्टै मन पर्दैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डिठ्गा बाजे यिनीहरूको सोचाइ सुनेर दिक्क हुदै फतफताउछन्‌,“भालुलाई पुराण सुनाउन जाने म आफैँ पो भेडो, तिमीहरू कहाँ हौ र ? यसैयसै उन्मक्त भएका यिनलाई अर्ति बुद्धि केहीले पनि छुँदैन । त्यसको उल्टै अर्थलाग्छ । जाओ जाओ जता जता मन लाग्छ जाओ यस्तै काममा तिमीहरूलाईस्वतन्त्रता चाहिएको रहेछ । रोक्न खोज्ने हामीले यस्तै सुन्नु पर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बोलकुमार र कौडे कान्छा भट्टिको नजिकै पुग्दा त्यहाँ स्वास्नी मान्छेकोहाँसोको साथमा कुनै मर्दले बोलेको पनि सुनिन्छ । केटीले भन्दै हुन्छे, भेना जस्तैपरे पनि तपाई त आउन नछोडनोस्‌ है । हामी तपाईलाई पर्खेर वसी रहन्छौं ।मर्दको स्वर सुनिन्छ, “आइ हाल्छु नी, मेरो प्रयास नै तिमीहरूलाई खुशीपार्नेछ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वोलकुमार ती कुराकानी सुनेर भन्छ, “उ सुनिस्‌ नौलो केटीको स्वर ।त्यो कान्छी नै बोलेकी हुनु पर्छ ? उफ । आज पनि अरू नै पहिले भइ हालेछन्‌ । वाटोमा अल्मलाई दिए नत्र वुझिस्‌ हामी नै पहिले पुग्थ्यौं ।”कौडै कान्छा: यहाँ जुनबेला पनि आएर वस्ने अरू यो गाउँमा कसलाई परेको छ,त्यही लाहुरे होला । पैसा यिनैका कहाँ राखु गरी कमाएर ल्याएका छन्‌ । यीकेटीहरूलाई चाहिने पनि यस्तै रवाफी मान्छे हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वोलकुमार त्यतै तिर हेरिरहेका हुन्छ र कौडे कान्छालाई देखाउदै भन्छ,“उ हेर हेर, निस्केर गयो, के त्यो लाहुरे नै त होइन ?”कौडे कान्छा: ए हो त, त्यही त रहेछ नी ? मेरो अडकल कहाँ कुठाउँमा पर्छ,लवाइ हेर्न त्यसको, धोक्रे सुरूवाल लगाएको छ रातो रूमाल घाँटीमा बाँधेको छराम्रो त्यतिले नै भइ हाले भन्ने सोचेर हिड्छ । हाम्रो यो सुरूवाल र कमिज केकमछ?वोलकुमार: चुप लाग यतैतिर आउँदै छ । लाहुरेलाई जङ्ग चलाउनु हुँदैन कुनसडको कुन सडको खुक्री झिकेर छप्काइ हाल्छ भन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लाहुरे तिनीहरूको छेवैबाट अगाडि बढ्छ । वोलकुमार र कौडे कान्छालेकर्के आँखा लगाएर हेर्छन्‌ र त्यसपछि आफ्नो रजाइ हुने भयो भन्ने सोच्दै भट्टिकोदैलोमा पुग्छन्‌ । त्यहाँ फूलदेवी दैलोको संगारमा वसेकी हुन्छे । :&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौडे कान्छा: ए आमै के गरी यसरी वसेकी, हामीलाई छिर्नै नदिन बाटो रोकेर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वसेकी पो हो कि ? हामी त आफ्नै गाउँका चिर परिचित हौ । यसो गर्न तपाइन्न है ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलदेवी: किन रोक्थे तिमीहरूलाई । मेरो लागि सवै एकैहुन । भित्र वस्दा वस्दैकस्तो उकुस मुकुस भएर आएकोले यहाँ आएर यसो वसेकी नाइ । तिमीहरू भित्रैजाओ, लौ यताबाट गए भै हाल्छ नी भन्दै वाटो आधी छोडी दि्छे । कान्छीउनीहरूलाई देखेर दिक्क हुन्छे र आमालाई सुनाउछै, &amp;quot;ए आमै रक्सि मासु सवैसिद्धाइ सकेर पनि के नै खुवाउँला भनेर यिनलाई छिरायौ ? अव के दिन्छौ आएरतिमी नै देउ । कौडे कान्छा र वोलकुमार पट्टि फर्केर भन्छै “हेर्नोस्‌ न, आज छिटैसवै परिकार बेची सकेर पनि तपाईंहरूलाई यसैभित्र आउन दिइन । पस्नु भन्दापहिले नै वताइ दिनु पर्दैन भट्टि वन्द भइ सक्यो भनेर अनि, दाईहरू कताबाटनी?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्री आइ पुग्छ । उनीहरूलाई देखेर भन्छे, “कुन टाढाका दाइहरू हुन्‌रयी ? त्यही माथि त यिनका घर छन्‌ । आउनु होस्‌ यता वसौ । भित्र के केवाँकी छ आमालाई हेर्न लगाउँछु र ल्याइ दिन्छु । यतिका दिनपछि फेरि वाटोबिराएर आउनु भएको छ । रातै परे पनि परि राखोस्‌ होइन त, दाजु ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौडे कान्छा चन्द्रीको व्यवहार देखेर दङ्ग पर्छ र कुरा थपि दिन्छ, “होत, घर फर्कित्त नसकिने भइएछ भने यही भुकलुक्क लडी दिउला, कत्रो ठुलो कुराभयो र ? तिमीहरू छँदै छौ । खास भनु भने आज हामी कान्छीको लागि वै भनेरआएका हौं । जस्को लागि भनेर त्यसेले हामीलाई चिन्न सकिन झण्डैलगारेर पठाउने दाउ गर्दै थिइ । आफ्नो कला ए चन्द्री यसलाई पनि अलिकतीसिकाइ दे (यति भनेर खुव हाँस्छन्‌) ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलदेवी यसै बीच आइ पुग्छे र उनीहरूलाई सोध्छे, “अलिकति हाडखुड मात्र बाँकि रहेछ अरू सबै सिद्धाइ हाले छन्‌ । अर्को कुखुरा काटेर वनाउभने पनि आजै सबै निखारे । त्यही भए पनि ल्याउंकी, कसो ? रक्सि भने जतिखाए पनि दिन सक्छु ।कौडे कान्छा: त्यही भए पनि खाने, होइन त, दाइ ? कान्छीले माया गरेर त्यस्तै९ भने पनि हामी तृप्त हुन्छौ । खानै भनेर मात्र पनि हामी आएका कहाँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
|)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलदेवी: फेरि भनौला बुढीले हाडै हाड खुवाएर ठगी । हाम्रो त वावु व्यापारचलाउनु पर्छ त्यसैले पहिले नै वताइ दिएकी हुँ । लौ खान्छौ ले भन्छौ भने ल्याइदिन्छु । भाउ भने हाड्ै हाडको भनेर घटाउन पाउदैनौ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौडे कान्छा: के भन्छौँ तिमी त ? लाग्दो मोल दिइ हल्छौ नी ? अवेर गरेरआउने हामी नै रोजी रोजी खोजेर कही केही पाइन्छ र ? त्यो कुरा हामी पनिबुझ्छौं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलदेवी मासु कचौरामा ल्याउछे र कान्छीलाई दिदै भन्छे, लौ, समात यो रवाबुहरूलाई दे, कान्छी त्यसै गर्दै भन्छे, “यो खादै गर्नोस्‌ रे रक्सि एकै छिनमाआमाले ल्याउछिन्‌ उसको हातबाट कचौरा समात्दै वोलकुमार कौडे कान्छालाईभन्छ, यसको हात छाम त कस्तो नरम, कति कमलो हो । के दल्छैस्‌ हँ? यीहातले त जसलाई छोए पनि मुग्ध हुन्छन्‌ । कौडै कान्छाले कान्छीको हातसमातेर आफूतिर तान्दै भन्छ, “यता आएर हामीसंग पो वस्नु पर्छ त्यसै त्यसैतर्केर हुन्छ ? तिम्रै हातले लौ मासु खुबाउ त ? यो यसै मीठो भइ हाल्छ नी ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐया तपाईहरू त कस्तो मान्छे हुनु हुदो रहेछ । हेर चुरानै सवै फुटालीदिएका म त तपाईहरूसंग वरिदना, माथि जान्छु । यस्ता जङ्गलीपना म त सहनसक्दिन । फूलदेवी रक्सि लिएर आफ्नै धुनमा शक 2 र रम्सिको गिलास दिदैभन्छे, चाख त कस्तो छ, यो पहिलो पानीको हो । कान्छा कान्छीको वोलीलेरिसाएको हुन्छ । फूलदेवीको कुराको जवाफै नदिएर झोकिदै भन्छ, “तँलाई त्योलाहुरेसंग ठट्टा गरेर पनि वस्नु भयो । हामीले भने यसो छुन पनि नहुने ?फटयाङ्ग्रो जस्तो गरी उफ्रेर भागि हाल्नु पर्छ ? हामीलाई के ठानिस तैले ? हामी॥८ १ पनि भयौ ? के गन्यौं तँलाई तेरा त्यति चुरा फुटे होइन, वजारमा वस्नआउने, हामीलाई जङ्गली भन्ने ? फूलदेवी तिनीहरू कुर्लेको देखेर साम्य पार्नखोज्दै भन्छे, “यस्तरी रिसाइ हाल्नु हुदैन बाबु जस्तो मान्छेले । यो सर्वनाशी यस्तैछे । यसले नमानेर सुख पाउँछे । म ठीक गरि हाल्छु नी । लौ चुप लागेररक्सिखादै गरो । म यसलाई माफ माग्न लगाउँछु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौडै कान्छा रक्सिको चुस्कि लिदै भन्छ, “कति पैसा त्यसले दिएर गयो !? त्यसलेदिएको भन्दा बढी हामी पनि दिन सक्छौ । लौ उठा कति पैसा तँलाई चाहिन्छभनेर पैसा भूइँमा छरि दिन्छ । यकान्छीले पनि अव आफूलाई कावबुबाट वाहिर पारि सकेकी छ । उ फेरिउनीहरूको सामुन्ने आएर भन्छे पैसा छरेर हामीलाई किन फूर्ति देखाउछौँ ? तीछरिएका पैसा आफै टिपेर घर लैजाउ र रोएर बसेकी स्वास्नी छोरा छोरीकोपोल्टोमा राखि देउ । के गरेर पैसा ल्याएका होलान वहा भने धन फ्याकेर ठुलाबन्न खोज्छन्‌ । यही हो तिमीहरूको जङ्गली स्वाभव भनेको, बुझ्यौ के ? डोकोभित्र कुखुरीलाई छोपे जस्तो हामीलाई गर्न खोज्छौ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलदेवी कान्छीलाई गाली गर्दे भन्छे, “यता मुन्टी चोथाले । तँलाई के हुदैछ यस्तो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
? यस्तै चाला निकालिस्‌ भने के कति कमाउलिस्‌ र के खाीलस्‌ । तेरा यस्तैधुतुनो चलेको हेर्न यिनीहरू आइरहन्छन्‌ ? लौ जा खुरूक्क र माफी माग । केके न छु भन्ठान्छे । शिक्षा दिने काम गर्ने हो भने पाठशालाहरूमा जा यहाँ तयीयस्तै हुन्छन्‌ । अझ अटेरी भएर वसिरहन्छे ए । आएर खुर्पे ठ्याक ख्वाएर लगार्नुपस्यो किकसो ?” फूलदेवीको गाली सुनेर कान्छी रखूदै भित्र पस्छ । उसको रूवाइ,आमाको कडकाइ र उनीहरूको प्रतिक्षा देखेर चन्द्री वहिनीलाई सम्झाउदै भन्छे,“नरो कान्छी नरो । के भयौ त, तँ नै भनेर गाउँ नै झत्तेर यहाँ आउदैछन्‌ ।उनीहरूको सक्दो चाहना पुग्याइ दे न त ? निक्लेर जानु पन्यो भने कहाँ कहाँजान्छैस्‌ । रोएर यहाँ केही हुदैन । आफुलाई समाल ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी रूदै भन्छे, “तिमी पनि मलाई कर नगरन, दिदी । म विरामी छुभनेको कस्तो कसैले पत्याउदैनन्‌ । विश्वास लाग्दैन भने यता आएर कासमा छामत । यी डल्ला कस्ता छन्‌ । हिड्नु पर्दा पनि यसले कति असजिलो पार्छ ।तिमीहरू भने मेरो दु:ख मेरो मर्का नै वुझ्दैनौ ? मैले यिनीहरूसंग सहवास गर्नैहुन्न र सक्दिन पनि ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्री: खै खै छामी हालु कस्तो डल्लो रहेछ । उ छाम्दै भन्छे, “आमैनी नभन्दैकत्रो डल्लो रहेछ । कहिले देखि आयो यत्रो बढेमाको डल्लो ? दुख्छ पनि कि ?भन्नु पर्देन ? मलाई समेत भनेकी थिइनस्‌, अनि हामी कसरी जानौ । नंत्र ....जा केटाहरू कहाँभनेर म किन भन्थे । बुढीले पिट्नै आएकी भए पनि म आफ्नोआङ्गले छोपी दिन्थे । कति दुख्दो हो यो, छाम्दा त यत्रो छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी, दिदीले देखाएको माया दयाले गर्दा वोल्न सक्ने हुन्छे र भन्छे, यसै त योदुख्दैन । दिदी हिड्दा मात्र असजिलो भइ टाङ फट्याएर हिड्नु पर्छ र गान्होज्यादा पिसाव फेर्दा भत भती पोलेर आउँछ । भित्र घाउ छ कि जस्तो गरी खुवैचहराउछ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्री, वहिनीलाई हेरि रहन्छे । कान्छी केही भन्न सक्दिन । चन्द्री आफैँकुरा बुझेर ग्राहक कहाँ जान्छे र रक्सि थप्दै, भन्छे, “त्यस्ती छुच्चीको पछि किनलाग्नु हुन्छ, म छदै छु नी विर्सि दिनोस्‌ त्यसले भनेकी कुरा ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बन सन्देश&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भन्छन्‌ संसार ऐना जस्तो छ । त्यसैले यस गाउँमा लाहरे काइँला रइठा बाजे जस्तालाई पनि लुच्चो भनेर दोष लगाउन छोडदैनन्‌ । उनीहरूको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्ति र बुद्धिलाई व्यङ्घात्मक तरिकाले हाँसोमा उडाइएका हुन्छन्‌ तर हामी यस्तातथ्यलाई जानेर पनि निरूत्साही नहोउ । जीवन पथलाई साफ राख्नु भनेको नैहोशियारीको साथ अज्ञानता हटाउनु हो लाहुरे काइँला र डिठ्ठा वाजेका यीअर्तिहरू &amp;quot;छिटै कसै माथि पनि विश्वास गरी आफुलाई नसुम्पौ र लड्न भिड्न&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छ भने वाच्ने र वच्ने उपाय पहिले सोचेर मात्र (ढाल लिएर) कार्य तर्फलागी भन्ने कहिल्यै नबिर्सौ । असमर्थता सवैको बुझ्ने कोशिश गरौं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
|हुरि बतासको सूइ ... इ य को साथमा पानी परेको स्यारारार आवाजमिसिदा रात निकै डरलाग्दो लाग्छ । झ्याल ढोकाको खापा वतासले ढाङ दुइगरेर ठोक्न थाल्छ । ठूली तमाङनी झ्याल वन्द गर्दै फत फताउन थाल्छिन्‌ “योवोम्सीको सास पनि कति चल्न सकेको ; के के नाश गर्ने हो यसले ? उ हेरछानो पनि उडाउन थाल्यो क्या रे ? लौ अव वास पनि जाने भयो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वोलकुमार वाहिर देखिनै रक्सिको नशामा झूल्दै गाना गाउँदै आइरहेकोहुन्छ । जति जति उ नजिकै हुदै जान्छ । उति उति उसले गाएको प्रष्ट सुनिदैजान्छ । उसको गाना छ, छोरी भन्दा आमा तरूनी लिपष्टिक पौडरले, कान्छीभन्दा ठुली तरूनी .....मेरै मायाले ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुलीलाई वोलकुमार त्यो छपमा आएको सुनेर खिन्न हुदै भन्छे, “यी,लोरने आए अव, केही सहयोग होला कि भनु भने यो गतिमा आएको छ। मेरो तकर्मै के हो के ? फतफताउदैकी ठुलीलाई देखेर बोलकमारले सोध्छन्‌” के नाशभयो भनेर कराउछेस्‌ ? आफ्नो कर्मलाई किन गाली गर्छस, म जस्तो लोग्ने पाउनेपनि त्यही कर्म हो । कर्मलाई दोष नदे तेरो चिन्ता जति थाम्नै तेरो साथ मछदैछु । कि छैन भन्ठानेकी हो ? यति भन्दै उ झ्याल थुन्दैको दुलीलाईपछाडीबाट समात्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठुलीलाई वोलक्‌मारको यो चिप्लो भाषा मन पर्दैन र भन्छे, “छोड्‌ यीच्रेप्राई । यस्ता जड्याहा माथि कतिन्जेल के क्रामा भरोसा राखु । छोरीलाई कतापुग्याइ सक्यौ कता ? एक फेर भेटु ल्याउ भनेर खर्च भइ नभइ जोडजाम गरेरपठायो बेलुकी यी यस्तो गतिछाडा भएर घरैमा टुप्लुम्क आउछौ । त्यस्तोकामलाई दिएको खर्च समेत रक्सि र छद्यौलीमा उडाउन सक्ने तिमी माथि कतिभरोसा राखू लौ आफै भन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वोलकृमार एक छिन वोल्न सक्दैनन्‌ । ठुलीले ठीकै भनेकी थिइन्‌ । कुराबनाउदै लाज छोप्न भन्छन्‌ “आजको दिन कस्तो कालो निलो भएर आएको थियोदेखिनस्‌ । अझ तीन चार दिन पख तेरी छोरीलाई ल्याइ दिने भए, चित्त बुझ्योअब । छोरी माथिको माया तेरै मात्र छ हाम्रो छैन ? घर भित्र के छिन्यो, यसको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१६&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कच कच कहिले थामिदैन । ठुली पनि जवाफ दिनमा कम छैनन्‌ न-बोल्दै जान्छे,“यसरी कच कच गर्दा त वानी बेहोर यस्तो छ, चुप लागेर वसे भने के होलाउ ?दिन भरी छोरी आउछे भेट होला भनेर वस्यो राती आएर यी यसरी चकनाचुर र्‌पारी दिन्छौँ । दिन नराम्रो तिमीलाई नै हुन्छ । साइत नपर्ने पनि तिमीलाईहुन्छ । लौ सम्झेर नढाटी भन त तिमीले यसरी दिन टार्दै गएको कति भयो ?अब त खर्च जोड्नलाई वेच्न सकिने पनिकेही छैन । वोलकुमार, अलि भझोकिदै रमर्दको अहम देखाउदै भन्छन्‌, “छैन भने छैन, तैले दिनु पनि पर्दैन । म म आफैखर्च जोडेर जान सक्छु, के भन्ठानिस्‌ तैले हँ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म भिजेर निश्ुक्क भएर आएको छु अह ... मेरो वास्ता छैन । यस्ती पनिस्वास्नी ? आएदेखि छोरी मेरी छोरी भनेर रटेंकी रटेकी नै छे। म भन्दा प्यारीतेरै छोरी तँलाई रहेछ । सोचेर हेर आखिर शरण कसको लिनु पर्छ, मेरै होइन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठुली पनि भन्न छोडदिनन्‌ &amp;quot; केगर्न पस्यो मैले तिमीलाई ! गर्ने जतिमाया तिनैले गरेर पठाए होलान्‌ नी ? तिमीले पनि मलाई नै मात्र मेरी होस्‌भन्ठानेको भए म मा पनि त्यस्तै माया वस्दै जान्थ्यो । तिमीले सोच्यौ, अधिनमापरिसकेकी यो अव फुत्केर कतै जान सक्दिन, मैले जे जसो गरे पनि हुन्छ आफ्नैसम्पत्ति हो । मैले पनि त्यसपछि मान्नै पस्यो तिमी एउटा पाल्ने पोस्ने र घर भरीसन्तान जन्माउन लगाउँने एउटा लोग्ने मान्छे हौ । तिम्रो माया वजारमा गयो रमैरौ माया आफ्नै सन्तानमा । फरक के भयो र कराउदछ्लौं कराउने नै हो भनेहामीले पनि कराउन जानेकोछौं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बोलकुमार ठुली संग हार खान्छन्‌ र सानीलाई वोलाउछन्‌ । सानीतआउन्जेलसम्म फतफत फत फत गर्छन “यो चोथाले संग को कराइ राखोस्‌आफू ढाडीइ सकेँ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठुली उसको फतफत सुनेर भन्छै, “भिजेर आएपछि खुरूक्क लुगा फेरेर सिरकमाघुस्ने भइ हाल्थ्यो नी, फेरि किन सुति सकेकी छोरीलाई वोलाउनु परेको हो ?लुगा त्यही किल्लामा झुण्डिएको छ । कस्तो दु:ख दिन मन लागेको हो सानोछोरीलाई । यतिकैमा सानी आँखा मिच्दै आउंछे । बोलकुमारले तल गएर आगोबनाउन अन्हाउदै ठुलीलाई भन्छन्‌, “ त्यो सानीलाई के नानी वावा वनाएर राख्नेदाउछ ? म भने त्यसलाई पनि यसै वर्ष शहरमा पुच्याउछु भन्ने शुरमा छु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठुली: हेर कति सजिलोले शहरमा ) ७ (५५ शुरमा छु भन्न सकेको ? जेठीको तअत्तो पत्तो छैन अव सानीलाई पनि रे ? थाहा छ, गजुरेको छोरी शहरबाटकस्ती ख्याक जस्ति भएर फेर्ककी छ ? त्यसलाई देखेकी मेरो मन कस्तो भरङ्गहुन्छु । डर लाग्छ कही हाम्री छोरी पनि त्यस्तै भएर फर्कने त होइन ? ती&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मालिक भनाउदाको के विश्वास काम लिन सके सम्म कामैमा घोट्ने नसक्ने भएपछि जाओ भनेर तिनैको घरमा पठाइ दिदा रहेछन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वोलकुमार आफुले गरेको काममा फुर्ति गर्दै भन्छन्‌ “जस्तो पाए त्यस्तैघरमा छोरी छोड्न लागेपछि त्यस्तो नभए अरू कस्तोहुन्छ ? त्यसकी छोरीलेदु:ख पाइ भनेर हाम्रीले पनि दु:खै पाउली भन्ने छ ? हाम्री छोरी वसेकी घरकोदुवै मालिक मालिक्नी असल छन्‌ तँलाई सारी र मलाई कोट छोरी छोडेर आएकैदिन दिएका होइनन्‌ ? त्यसबाट पनि तिनीहरूको मन थाहा हुन्छ । ठुलीलाईवोलकुमारको कुराले चित्त बुझ्दैन र भन्छिन्‌ “फकाउनलाई पुरानो टालो यसोदिए होलान्‌ । गजुरेको छोरीको मालिकले धनलाई दसघर घुमाइ सकेको रहेछ ।यता घरमा केही पत्तो नै छैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसरी घरलाई पहिरोले र खेतलाई खोलाले एकैसाथ नाश पारेपछिमात्र आपतमा गर्ज टार्न छोरीलाई शहरमा काम गर्न राखेका हुन नत्रछोरीको कमाइ के भनेर खान्छु भन्दै कति काम गर्ने खोज्दै आएकालाई यसैपठाएका थिए । अहिले यस्तो दूरगति हेर्न पर्ने रहेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वोलकुमारलाई गजुरेप्रति साहनुभूति राख्दै उसले छोरीलाई काममालगाउनु परेको कारणलाई पुष्टि दिदै ठुलीले समर्थन गरैकी मन पर्दैन र भन्छन्‌“त्यो गजुरेले छोरी शहरमा पठाएकोमा तँलाई अवस्थाले गराएको भनेर ठीकलाग्ने, मैले छोरीलाई पढ्छे पनि र काम पनि गर्छे भनेर शहरमा काममा लगाएरआए भनेर छोरी माथि ठुलो अत्याचार गरेर आय जस्तो गर्छैस्‌ । मैले जे गरे पनितँलाई त्यो राम्रो लाग्दैन, आखिर किन ? रक्सि पिउछ्नु भनेर हेला गरेकी, हो ?हेर, यो पिउने छुट हाम्रो जातले, समाजले दिएको छ । घट घटी पिउछु । त्योपनि तेरो वावुको सम्पत्ति मासेर खाएको छैन । आफ्नो बाबुलाई झगडामाल्याएर भनेको ठुली सहन सक्दिनन्‌ र च्वाट्ट जवाफ दिन्छिन्‌ “मेरो वावुकोचैसामा हात गाड्न पाए पो झिक्थ्यौ ? यी आफ्नै छोरीको कमाइ रक्सि रवैश्यामा फुक्न पल्केका छौ ? त्यो पनि एकले नभ्र्याएर अर्किलाई पनि घिच्याउनेशुरमा छौ । के यसो गर्न पनि तिम्रा जात र समाजले दिएको छ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बोलकुमार अव सहन सक्दैनन्‌ र भ्वाङ भ्वाङ लातले दिदै भन्छन्‌ “लौवर्ता वौल तैले खोजेकी यही हाइन ! स्वाद खाइस्‌ अव !?” ठुली रूदै फलाक्नथाल्छिन्‌ “ती तलका असत्तिहरूले हाम्रो घर नाशै पारि सके ? पैसा गुटमुटाउनपल्केकी त्यो बुढीको सास मर्ने बेलामा यही पैसाको मोहले अठ्याओस्‌ । हामीसवै स्वास्नी हुनेहरूको आँसु त्यसै खेर किन जान्छ ? स्वीस्नीमान्छै भएर प्निस्वास्नीमान्छेलाई दु:ख दिने ती असत्तिहरूको कहिल्यै भलो नहोस्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वृद्&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सानी “आगो तल दन्की सक्यो आउनु होस्‌” भनेर बोलाउन आउदाबाबु आमाको त्यस्तो चर्का चर्की परिसकेको देखेर स्तम्भित हुन्छे । वोलकुमारठुलीको जगल्टा समातेर लछादै भन्छन्‌ “लौ हिड्‌ तल तेरा यी चेथालो त्यहीआगोले पोली दिन्छु । हिडछेस्‌ कि भन्याङबाट खड्डारी दिउ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जवाफ दिन गाउँ नै कहलाएकी ठुली यत्तै के समर्पित हुन्छिन्‌ जत्तिसुकैरडाको मच्चे पनि बोल्न छोडदिनन्‌ । भन्दै जान्छिन्‌ “तेरो बाबुको शक्ति समेतछ भने खसालेर देखा । पेट भित्रको तेरो वच्चा पनि मच्यो भने बरू सुख पाउला। छोरी जन्मे शहर पस्नु पर्छु छोरा भए यसै गरी बाबुको विडो थाम्ने भएरहुर्कन्छ । तेरो घरको चलन चल्ति नै यही त हो ? तेरो बाबुले तेरो आमालाईयसै गरी सिद्धाएको हामीलाई थाहा छैन र” ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वोलकुमार झन उत्तेजित हुन्छन्‌ र च्याट्टीदै भन्छन्‌ “आज कि यो रहिनकि म रहदिन, बार पार गरेर नै छोड्छु । लात लातले गोद्न थाल्छ । सानी,बाबुलाई आमालाई पिटन छोड्नोस्‌ भन्दै पछाडिबाट लवेदा समातेर वल लगाएरतान्छे र आमालाई भन्छे “आमा ! तिमी पनि भागन, किन पिटाड्क थापेर बस्छौ,तिमी मौ के ? तलै जाउ भन्या । वोलकुमार सानीलाई भन्छन्‌, “छोड छोडपछाडिबाट नतान भन्या यसले त ल...ल लडाउने भइ छोड भनेको किनटेर्दिनस्‌ ? उनी धरमराउन थाल्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सानी जोडले अझ तान्दै भन्छ “नाइ, छोडदिन आमालाई तँपाई पिटनछोडनु अनि मात्र म छोड्छु । “यतिकैमा बोलकुमार उत्तानो परेर लड्छ र सानीडरले भाग्छे । वोलकुमार, ऐया ऐया आखिर लडाएर नै छाडी । कहाँ भागी त्यो ?त्यसलाई पनि कहाँ छोडछु अव ? घरभरी मेरै विरोधी सबैलाई बनाएकी छ ।टाउको छाम्दै भन्छ, हेर यो अम्खराले टुटिल्को नै पारेछ । कहाँ ल्याएर राखेकाहुन्‌ यस्ता सामान पनि ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जत सन्देश:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लोग्ने स्वास्नी बीचको समझदारी घरको शान्ति हो, सन्तानको स्वभावघरको वातावरणले वन्छ । सम्झदारी तवै मात्र आउछ जव एकले अर्कालाई दु:खसुखको जीवन भरको साथी मान्छ । स्वार्थपन र अहमले जीवन नष्ट पार्छ, कलहनिम्ताउछ । वेश्यालयमा जानु घरको स्वास्नीलाई हेला गर्नु हो, एक नारीको अर्कोनारीको अगाडि व्यइजत गर्नु हो । त्यो व्यइजत घरको कलह हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[ ओछ्यानमा कान्छी छटपटाइ रहेकी हुन्छे । “ऐया ऐया आज कस्तो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गान्हो भएको हो ? केही गरे पनि नत पोल्न छोड्छ नत पिसाव नै सललल्लवगेर हलुका पार्छु । ए दिदी चौलानी पानी छ भने देउ त ? त्यसले ठण्डा पार्छकि?]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
_ चन्द्री बहिनीको अवस्था देखेर सोध्छै, “के भएको छ तंलाई ? शहरबाटआए देखिन कहिले के कहिले के ले छोडेको हैन ? नजिकै गएर निधार छाम्दैभन्छे ज्वरो पनि आएको पो हो की कति तातो निधार ? पख म चौलानी लिएरआइ हाल्छु धेरै कराएर वल यसै नफयाक ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकै छिनमा चौलानी ल्याइ कान्छीलाई उठाएर पिउन दिन्छे । ओड्नेपन्छाएर कान्छीले चौलानी पिउन वस्दा ठस ठस गनाउछेै । चन्द्रीलाई त्योहस्कोले उकुस मुक्‌स पार्छ र भन्छे, “छि ..... यहाँ के कुहिएको जस्तो हस्कोआएको झ्याल पनि थुनिछेस्‌, खोली दिउ ? ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले दिदीलाई के गन्हाएको हो त्यो थाहा पाउछै र भन्छे, “तिमीलाई मैरोशरीर गन्हाएको होला, दिदी । फतक्क हुन लागि सके । अझै पनि यस्तो शरीरमाथि मोह गर्दै झुम्मिन आउछन्‌ । मलाई त साँच्चै भन्छौ भने बाँच्न पनि मनलाग्दैन सत्ते, दिदी ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रीले सम्झाउदै भन्छे, “हेत्‌ त्यस्तो पनि भन्ने हो ? अहिले नै मतलाई जस्तो सुकै काम आइ परे पनि छोडेर त्यो तल वसेको स्वास्थ्य क्याम्पमालिएर जान्छु । स्त्री रोग विशेष पनि आएका छन्‌ रे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यतिकैमा फूलदेवी अति प्रफूल्ल भएर माथि आउछै र चन्द्रीलाईझ्यालबाट देखाउदै भन्छे, “ए चन्द्री ... हेर त ती परबाट आएका हुल यतैतिरआउन लागेका जस्तो छन्‌ । कहिल्यै नदेखेका नचिनेका मान्छेहरू पनि अव तमेरै भट्टि खोज्दै आउन थालेका छन्‌ ।चन्द्री झर्को मान्दै भन्छे, “होलन्‌ नी आएका ? कही वस बिग्रियो होला खानापाइन्छ कि भनेर आएका होलान्‌ ।”फूलदेवी त्यहाँ कान्छी अझै सुति रहेकी र चन्द्रिले कोरीबाटी केही नगरेकी देखेरकराउदै भन्न थाल्छे, “तिमीहरूको यो के चाला हो ? राक्षस्नीको जस्तो जगल्टावनाएर वसेको वसै छौँ । यता भने ग्राहकहरू आउन थालिसके । वेलैमा कोरीबाटी गरेर वस्त सक्दैनौ ? लौ छिटो ठीक परेर आऔँ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनुरोधको भाव लिएर चन्द्रीले फूलदेवीलाई भन्छै, “आजलाई आमामलाई अल्मलाउने काम नगर्नोस । म कान्छीलाई तल वसेको क्याम्पमा जचाँउनलिएर जान्छु । देख्नु हुन्न त्यो मर्ने अवस्थामा पुगि सकेकी छ !? यस्तो उपचार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गर्ने मौका पनि बार वार पाइदैन । तिनीहरूलाई भात पकाएर खुवाई पठाइदिनोस्‌ । त्यति त तिमी एक्लैले पनि गर्न सक्छौ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलदेबीलाई तिनीहरू दिनैमा सवैले देख्ने गरी स्वास्थ्य म्याम्पमाजचाउन जान लागेको पट्टै मन पर्दैन र रोक्न खोज्दै भन्छे, “कहाँ, यस वेलानैहल्ला फैलाउदै त्यहाँ जाने ? रातमा त्यो डाक्टरलाई नै यहाँ बोलाउला रजँचाउला ? वरू मासु रक्सि भने थिम यु बाई दिउला ? ए .... कान्छी के तँरात परून्जेल सम्म पर्खन सक्दिनस्‌ र जानु पर्छु ? यसो हेर्दा केही भएजस्तिहैनन्‌ । तेरा ती अल्छि गर्ने वानी अलि सपारै यसै ठीक हुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रीलाई आमाको यस्तो व्यवहार देखेर दिक्क हुदै भन्छे, “के भन्नुभएको त्यस्तो ? कान्छीलाई हेर्दा हेर्दै कस्तीबाट के भइसकी अझै टार्ने कोशिशगर्न छोड्नु हुन्न । रोगले फुर्सत छैन भनेर पर्खेर बसिरहन्छ कि क्या हो ?आजलाई त म कान्छीलाई त्यहाँ नलगेर छोड्दै छोड्दिन तपाई जे जस्तोभन्नोस्‌ । कान्छीलाई सम्बोधन गर्दै सोध्छे, &amp;quot;ए कान्छी वरू तँ हिडेर त्यहाँसम्मजान त सक्छेस्‌ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तलबाट ग्राहकहरू घरभित्र पसेको आवाज आउछ । ती मध्ये एकलेवोलाउछन्‌, “&amp;quot;ए आमै कता गएकी हौ ? हामी तिमी कहाँ के खान दिन्छौ भनेरआएका छौं, सक्दिन नभन है ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिनीहरूले वोलाउन थालेको सुनेर चन्द्री फूलदेवीलाई भन्छे, “छिटो तलजाउन आमा । तिमीलाई खोजेको बहाना गर्दै यही आउन पनि वेर लगाउदैन ।यिनलाई कुनै कुरामा पनि अप्ठ्यारो लाग्दैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलदेवीलाई पनि चन्द्रीको कुराले झस्काइ दिन्छ र एकै स्वासमा भन्छे,“यही छु वावु, तिमीहरू त्यही बसी राखे म आइ हाल्छु ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलदेवीलाई तल पठाएपछि चन्द्री आफ्नो सफलतामा दङ्ग पर्छु रकान्छीलाई फेरि उही कुरा दोहस्याएर सोध्छे, “लौ भन, हिडेर नै जान तैयार हुनेहो या वोकाएर लैजान डोकोको बन्दोवस्त गर्न जाउ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी पनि हाँस्दै भन्छे, “डोकैमा चढेर जानु पर्ने अवस्थाकी अझैभइसकेकी छैन । विस्तारै बिस्तारै तिमीलाई समातेर त्यतिसम्म हिड्न सक्छुजस्तो लाग्छ । तिम्रो कुरा गराइले त छिनैमा डोली पनि ल्याउन तैयार हुन्छौंजस्ती पोछौए?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भन्याङ ओर्लिदैकी फूलदेवीको गन गन सुनिन्छ । उ भन्दै हुन्छे, “दिनमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नजाओ भनेको मान्ने नै होइन । गाउले कहाँ यो हल्ला पुग्यो भने भोली देखिकोही पनि यहाँ आउँदैनन्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलदेबीको बढ्दो स्वार्थपना देखेर चन्द्री पनि अव शुरी हुदैछै र भन्छ,“नआए नआओस््‌त, यो आमा पनि कति कराइ रहनु हुन्छु । हामी के कहिल्यैपनि बिरामी नै नहुनु भन्ने छ ? यिनैको डरलै डाक्टर कहाँ पनि जाननपाउनु ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुबै दिदी बहिनी स्वास्थ्य क्याम्पमा पुग्छन्‌ । त्यहाँ बिरामीहरू नामलेखाएर लाम लागेर बसेका हुनाले कान्छीले पनि नाम लेखाई प्रतिक्षा गरेरबसिरहन्छै । बिरामीहरू जचाउदै निस्कदै भइरहन्छ । झण्डै एक घण्टा जतिकुरेपछि कान्छीको पालो आउछ । कान्छीको साथ चन्द्री पनि डाक्टर कहाँ जानतैयार हुन्छे । नाम बोलाउने व्यक्तिले चन्द्रीलाई भित्र पस्न रोक्दै भन्छ, “ए दिदीतपाई किन पछि लाग्दै जान खोज्नु हुन्छ । तपाईलाई बोलाएको छ र जानु हुन्छ? यहाँ आएर थपक्क वस्नोस्‌ ।” चन्द्री पनि के मान्थी त्यस व्यक्तिलाई भन्छे, “मगएर के भयो त ? म यसको दिदी हुँ । उ आफै बिरामी छे राम्ररी वताउन सम्छैकि सक्दिन । म डाक्टर साहेवलाई सवै वताइ दिन्छु भनेर जान लागेकी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्ता कतिलाई रोक्दै आएको त्यसले चन्द्रीलाई किन जान दिन्थ्यो, भन्न ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चाल्छ, “रोगीलाई कहाँ के भएको छ भन्ने थाहा हुन्छ कि देख्ने तपाईलाई ? ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्कालाई के रोग लागेको छ त्यो जान्ने अधिकार तपाईंलाई छैन वुझ्नुभयो के ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्री उसको कुरा बुझदिन र भन्छिन्‌, “यो दाई पनि के के भन्छन्‌ केके? के भनेको त्यो अधिकार छैन भनेर ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यता दुइ बीच गल्फत्ति चलिरहन्छ उता कान्छीलाई डाक्टरले सोध्छिन्‌,“के के भएको छ तपाईलाई भन्नोस्‌ त ? कान्छी बताउन लाज मान्दै निहुरीरहन्छे । डाक्टर संझाउदै भन्छिन्‌, &amp;quot;आफ्नो स्वास्थ्य ठीक नभएपछि हामीलाईवताउन पनि लाज मानेर हुन्छ : हेर्नोस्‌, हामीहरू तपाइहरूको स्वास्थ्य के कस्तोछ भनेर जाँच्नै आएका हौं । तपाईले आफूलाई के कस्तो भएको छ कहाँ रोगलेआक्रमण गरेको छ त्यो खुलस्त वताउनु भएन भने हामीले के गर्न सक्छौ !?रोगलाई लाज मानेर लुकाएर हुद्दैन । वेलैमा औषधी पाउन सक्यो भने कति रोगयसै निको हुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी अड्की अड्की वताउन थाल्छे, &amp;quot;यहाँ काँखमा डल्लो आएको छ ।हिड्दा असजिलो हुन्छ । पिसाव खुलस्त हुन नसकेर घरी घरी जाइ राख्नु पर्छ ।अनि फेरि चुप लाग्छे । डाक्टर सौध्छिन, “अनि अनि के हुन्छ भन्दै जानोस्‌त?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी अप्ख्र्यारो मान्दै भन्छे, “खै अरूकेकेहोकेके?डाक्टरले सोध्छिन्‌ : घाउ खटिरा पनि छन्‌ कि छैनन्‌ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी लाज मानेर निहरिदै भन्छिन्‌, “छ्न हजुर । त्यही त चराउने पोल्ने गर्छपिसाव गर्दा भुतुक्कै हुन्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टर भन्छिन्‌, “उ त्यहाँ गएर पल्टनोस्‌ त ? तपाइको शरीर सवै जाँच्नु पर्छ। कान्छी त्यसै गर्छे । डाक्टरले उसको गुप्ताङ्ग जाँच्छिन्‌ र रक्त चाँप पनिलिन्छिन्‌ अनि औँ गरेर मुख देखाउन लगाउदै भन्छिन्‌ “मुख भित्र पनि खटिरा हुनसक्छ ।” सानो टर्च घुमाएर हेर्दै सोध्छिन्‌, “यस्तो हुन थालेको कति भयो ? लोग्नेपनि साथमा आएका छन्‌ कि छैनन्‌ ? उसको पनि जाँच गर्नु पर्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी लाजले फेरि भुतुक्क हुदै भन्छे, “मेरो विवाह भएकै छैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यति सुनेपछि डाक्टरले अड्कल काटि हाल्छिन्‌ र भन्छिन्‌, “जो पायो त्यो संगशारीरिक सम्पर्क राख्यो भने यस्तो सरूवा रोग लाग्न जान्छ । कनै यस्ता रोगलेत ज्यानै समेत लिन सक्छ । तँपाईलाई थाहा हुनुपर्ने हो को बाट यो रोगतपाईलाई सल्कन गएको हो । त्यसको पनि उपचार गर्नु जरूरी छ भेट भएमारगत जचाउन भन्नु होला । तँपाईको पनि रगत जचाउनु पर्छु । वाहिर अर्कोकोठामा गइ आफ्नो रगतको परीक्षा गर्न दिनु होला र पर्सि यसको रिपोर्ट लिनआउनु होला ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यस व्यक्तिलाई संझदा कान्छी घृणाले जल्छ र भन्छे, “त्यसलाई योसरूवा रोग हो भन्ने थाहा छ र औषधी गर्नुपर्छ भन्ने पनि थाहा छ । त्यसैले त्योआफ्नो स्वास्नीलाई माया गरेर त्यो संग संभोग नगरी हामीलाई यस्तो रोगसारेको । यस्ता पापीलाई पनि .... ? अनि डाक्टर साहव मलाई के रोग लागेकोरहेछ ? यो रोग निको त हुन्छ ? टाउको फन न....न घुमाउदा त मरिनै हाल्छुकि जस्तोलाग्छ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टर गंभीर भएर भन्छिन्‌ “यस्तै छ नारीको जीवन । आफैँले आफुलाई वचाउदैंजानु पर्छ । होशियार हुनु निकै आवश्यक छ । अहिले सम्म देखा परेको रोगकोलक्षण हेर्दा यसले मुटु र मगजलाई छोइ“नसकेकोले निको भै हाल्छ कि ? तरतपाईको -रगतको रिपोर्टले के बताउछ ? कही रगतमा अर्कै जीवाणु पसिसकेकोरहेछ भने ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी मलाई लागेको रोग के हौ ? अर्को जीवाणु भन्नु भएको केहो: मतयसै आत्ति सके ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
र३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टर भन्छिन्‌, “अहिले तपाईलाई लागेको रोग भिरिङ्के हो । यो रोगले छोएकोव्यक्तिलाई वेलैमा औषधी पाउन सक्यो भने ठीक पनि हुन्छ तर यस्ता रोगलागेका विरामीहरूको रगतमा एच.आइ.भी. भन्ने जीवाणु पसिसकेको रहेछ यायो जीवाणु पसिसकेपछि यो रोग देखा परेको हो भने यो निकी हुन सक्दैन । त्योरोगीलाई एड्सको विरामी पनि भनिन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी : अनि एड्स भएको नभएको कसरी थाहा हुन्छ ? भिरिङ्के हुनेलाई एड्सभ्रै हाल्छ भन्नु भएको ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टर : भिरिङ्गेको रोगीलाई एड्स भएकै हुनुपर्छ भन्ने छैन तर यस्तारोगीहरूलाई छिटो एड्सको जीवाणु सर्न सक्छ र एड्स लागैको नलागेको थाहापाउने उपाय रगत जचाएर मात्र हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी : अनि यो एड्सको रोगीलाई औषधीले निको पार्न सक्दैन ? केउ यो रोगलागे पछि मरि नै हाल्छ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टर : यस रोगको औषधी अझै निस्केको छैन । आजभोली जता ततै यसरोगले हाहाकार नै मचाएको छ । यसले छौयो कि कालले निम्त्यायो भन्के सोचेहुन्छ । यसैले यो तपाईलाई लागेको भिरिङ्गे मात्र रहेछ भने पनि राम्ररी निकोपार्नु पर्छु नत्र एड्सको संक्रमण हुने डर रहन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी साङ्है डराउछै र एड्स बारे जान्न खोज्दै सोध्छे, “यो एड्स रोग कसरी रके बाट सर्छ ? कस्तो ज्यानमारा रोग रहेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टर कान्छीलाई संझाउदै भन्छिन्‌, “यो रोग तीन प्रकारले सर्न सक्छ । पहिलोएच. आइ. भी जीवाणु रगतमा भइसकेको या एड्स रोगीसंग विना सुरक्षित यौनसम्पर्क राख्यो भने, दोश्रो एच.आइ.भी जीवाणु रगतमा भएको या एड्स रोगीकोरगत कुनै न कुनै प्रकारले जस्तो छाला छेड्ने औजारबाट, काटेको घाउबाटनिस्केको आलो रगत सद्दे अर्को व्यक्तिमा छिर्न गयो भने या यस्ता रोगीकोएच.आइ.भी. भएको रगत अर्को व्यक्तिलाई रगतको खाँचो शरीरमा भएको बेलाझिकेर दिइसकेको रहेछ या दियो भने एच.आइ,भी. जीवाणु अर्को व्यक्तिकोशरीरमा सर्न सक्छ र तेश्रो यस्तै जीवाणु रगतमा बोकेको या एड्स रोगीमहिलाको गर्भाशयमा रहेको बच्चालाई एच.आइ.भी. जीवाणु सर्न सक्छ। योवच्चा गर्भमा नै यस्तो दुषित रगत लिएर वढेर जन्मन पनि सक्छ या जन्मनेक्रममा या जन्मिए पछि एड्सको रोगी हुन सक्छ । यसैले यो रोग बारे सवैलेजान्नु पर्छ र साथै सतर्क रहेर यसलाई बढ्न दिनु हुदैन । यसरी सिकाउदै जनचेतना बढाएर यो रोग नफैलियोस्‌ भनेर हामी यस्तो क्याम्पीङ गर्दै हिडेका छौं ।कान्छी अरू जिज्ञासु भएर सोध्छे, “यस्तो रोगीलाई कसरी चिनिन्छ ? केरेत्यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रगतमा एच.आइ.भी, भए नभएको पनि यसै थाहा . हुदैन होलाअनि कसरी वच्न सक्छौं ? डाक्टर भन्छिन्‌, “रगतमा एच.आइ.भी. छ छैन त्योकुराको पत्ता त रगतको परीक्षा गरेर मात्र थाहा हुन्छ र यी जीवाणुहरूशरीरभित्र प्रवेश गरेर पनि दुइ तीन महिना सम्म त रगत जँचाउदा पनि तीदेखिएका हुदैनन्‌ र एड्सको रोगमा देखा पर्न ४५ देखि दस वर्ष समेत पनि लाग्नसक्छ । तर जे जसो भए पनि यो जीवाणु एक पटक शरीरमा पसे पछि त्योव्यक्तिलाई मृत्युको काखमा नसुताइ निको भने हुदैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी : पस्तो रोग लागेको वेला के कस्तो लक्षण देखा पर्छ त ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टर : यो रोगको कुनै आफ्नै यस्तो हो भन्नै लक्षण हुदैन । यी एच.आइ.भी.जीवाणुले शरीरलाई सुरक्षा गर्ने रक्त कोषलाई मारि दिन्छ त्यस पछि त्यो कम्जोरभएको व्यक्तिलाई जुन रोगले छुन्छ त्यही रौगा एड्स रोग हुन्छ । मामुलीरूघाखोकी मात्र लाग्यो भने पनि त्यसै रोगले ढाली दिन्छु । यसैले यौन रोगलागेका व्यक्तिहरूले, वेश्यालयतिर लाग्नेहरूले र धेरै व्यक्तिसंग यौन सम्पर्कराख्नेहरूले आफ्नो रगत जचाइ रहने गरेमा एच.आइ.भी. रगतमा भए नभएकोथाहा हुन्छ । यसै अर्थले हो मैले त्यो व्यक्ति जसबाट तपाईलाई यो रोग सर्न प॒योत्यसलाई जचाउनु पर्छ भनेकी । यदि त्यसलाई एड्स भइसकेको रहेछ भने त्यसलेअरूलाई नसारोस्‌ भनेर सतर्क हुनुपर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हेर्नोस, तपाइले आफूलाई लागेको रोग नलुकाएर वेलैमा जचाउन आउनुभएकोले कति राम्रो गर्नु भएको छ । यो कृहिएर नाश हुन पाएन भने रगतजचाएर यो भयानक रोगले आक्रमण गरेको छ कि छैन त्यो पनि जाँच्न पाउनुहुदैछ । आफूबाट अरूलाई यस्तो रोग सर्न नदिनुमा पनि त कत्रो धर्म छ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी : छ हजुर छ । आफूले दु:ख पाए भनेर अर्कोलाई त्यस्तै दुःख भोगाउछुभन्नु राम्रो कुरै हाइन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टर : अहिले म तँपाईलाई केही दुखेको थाहा नुहुने औषधी दिन्छु त्यो लिएरजानोस्‌ र एउटा चक्की अहिल्यै पनि खाए हुन्छ र ती घाउ खटिरालाई धोइपख्राली गरी सफा राख्ने गर्नोस्‌ रगतको रिपोर्ट लिए पछि तपाइको उपचार शुरूगरौला । याद गर्नु भएकै होला रतिक्रिडा गर्दा के के मा होस्‌ पुस्याउनु पर्छ रअर्कालाई रोग नसरोस्‌ भनेर आफै तर्कदै जानु राम्रो हुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जन सन्देश :मानिसको शरीरमा रोग नलाग्ने हुँदैन । रोग लागेको छनक पाउनासाथ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रेश&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टर जचाइ औषधी उपचार गरी हाल्नोस्‌ । रोग संग लाज र डर मान्नुहुदैन । सानोमा सानो साधारण रोगले पनि भयंकर रोगलाई निम्त्याउन सक्छ ।सकेसम्म रोग हामीलाई लाग्दै नलागोस्‌ भनेर होस्‌ पुच्याउनु पर्छ । एड्स जस्तोरोग निको नभए पनि यसको रोकथाम गर्न सकिन्छ । यस रोगलाई फैलिन नदिनेउपायहरू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गरौं । याद गर्नोस्‌ यस एच.आइ.भी. का जीवाणुहरूलाई ननिम्त्याइ आफैँआउदैनन्‌ । यसैले यी शरीरमा छिर्न सक्ने संभावनाप्रति संचेत हौ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कबाटोमा हिडुँदै दिदी बहिनी डाक्टर कहाँ भएको कुरा र आफ्नो वित्दैकोजीवन वारे कुरा गर्दै आफ्नो दु:ख पोख्छन्‌ । कान्छी भन्छे, “हेर त दिदी म यहाँआउन ढीलो मात्र गरेकी भए के हुन्थे के ? मलाई भिरिङ्गे भएको रहेछ । अझै मबाँच्ने नवाँच्नेको ठेगाना लागेको छैन ? रगत जचाँउन दिएर आएकी छु त्यसकोरिपोर्ट आए पछि मात्र यो कुराको निधो लाग्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्री पनि यस रोग बारे सुनेकी कुरा भन्न थाल्छे, “भिरिङ्गे लाग्दैमाकहाँ मरि हाल्छेस्‌ ? यो रोग अत्ति नराम्रो हो र सरूवा पनि हो तर ज्यानै खानेभने होइन । अव औषधी उपचार राम्ररी गर्नु पर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी : भिरिङ्गे मात्र भए तिमीलै भनेकी जस्तै गरी औषधी गरेर बाँच्छु । तर योएड्स रोग भइसकेको रहेछ र मेरो रगतमा एच.आइ.भी. “यु फे म वाँच्दिन,दिदी त्यस्तो रोगको महामारी चलेको छ रे यसको औषधीनै छैन रे! थाह छदिदी, यो एड्स पनि सर्ने रोग रहेछ र धेरै संग यौन क्रिडा गर्नेहरूलाई सर्छ रे? अव के गर्ने दिदी यो बुढीले हामीलाई त्यस्तै काममा लगाएकी छ । हामी चाढैउमेर रहदा नै मर्ने पो हौ कि?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्री : अव हामीले यस्तो शरीर बेचेर खाने काम आमाले मानोस्‌ या नमानोस्‌छोड्नै पर्छ । यो शरीरले परिश्रम गरेर पनि त कमाउन सक्ला ? सँच्चै डराएरकसबाट के रोग सर्छ या कसलाई रोग सर्ने हो भनेर वसेर पनि हुन्छ ? होइन,तँलाई यो रोग कसले साव्यो ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी : आ तँपाई पनि उही कुरा कोट्याउनु हुन्छ । म आए देखि झ्याउरेकीथिए भने पछि यो भिरिङ्गे त्यहीबाट सारेर आए भन्ने थाहा पाउन । यसैले त मयहाँका गाउले केटाहरू म संग अनुरक्त भइ मरिमेद्न आउदा पनि म पन्छदैतिमीलाई जाउ भन्ने गरेकी हुँ । तिनीहरू वोलेको जथाभावी क्रा र आमाकोथलो पर्ने पिटाइ पनि सहिरहे तर उनीहरूलाई वचाइ रहे । दिदी यो भिरिङ्गे रोगसर्नाको कारण पनि धेरै जनासंग सहबास गर्नाले नै हुँदोरहेछ र यो रोगलेछोएको रोगीलाई एड्स सर्ने सम्भावना घेरै हुन्छ रे :&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२६&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्री : ए त्यसो पो डाक्टरले भनिछन्‌ । मैले सुनेको त भिरिङ्गे रोग रोगीकोतातो पिसाबबाट पनि अर्कोलाई सर्छ रे । त्यो वसेको तातोमा वस्यो भने पनिसर्छ पो भन्थे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी : खै डाक्टर साहवले त यस्ता कुरा केही पनि भन्नु भएन । सर्ने कारणमैधुन हो भनिन्‌ । तर यो जे जसो भए पनि अव म तिमीलाई मसँग सृत्त रटाँसिएर वस्न भने दिन्न के थाहा, केही भइ हाल्यो भने म पापीनी हुन्छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्री : नकरा जा । डाक्टरले नै भनिन्‌ भने, यस्ता कुराहरू अड्कल काटेकोपनि हुन सक्छ वरू एड्स रोगबाट वच्ने उपाय हामीले जान्नै पर्छ र त्यस्तै गर्नुपर्छ । यस्तो औषधी नै नभएको रोग बारे सुनको मैले अहिले पहिलो पल्ट नै हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बुझिस्‌ के, हामीले आमासँग विरोध गरेर भए पनि यो धन्दा छोड्नैपर्छु । एक झुम्ो लगाउन र एक मुठ्ठी खान पुग्ने सम्म कमाउन सक्यौ भने पुगिहाल्छ । आखिर पैसा भनेकोनै के पो रहेछ र ? रोग लागे तिनै धन खर्च गरीज्यान जोगाउनु पर्ने रहेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी : हो हामीले यस्तै गर्नु पर्छ । अव त भन्न पनि पायौ, यो रोग सल्किएछभनेर । जव ज्यानै नरहने हुन आँद्यो भने धन मात्र थुपारेर के गर्नु ? हाम्री यीआमा त धन भने पछि यसै यसै लोभिन्छिन्‌ । यो उमेरमा पुग्दा पनि कसैलेआइज भन्यो भने नाइ भन्दिनन्‌ जस्ती छिन्‌ । आइज भन्न कोही आउदैनन्‌ र पो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुवै खुवसँग हाँस्छन्‌ । त्यस पछि हाँसोले भिजेका आँखा पुछ्दै चन्द्रीभन्छे, “यी अहिलेको धन्दा जुन हामीले समातेका छौ त्यो त जवानी रहुन्जेलसम्मलाई मात्र हो त्यस पछि कि यिनी जस्तो भइ अर्कालाई सताएर वस्न सक्नेहुनुपर्छ कि अल्पत्र परेर घृणा सहेर वाँच्नु पर्छ । यी आमैले हामीलाईयसकामबाट छुट्कारा नदिएकी कारण पनि यही हो । भोली देखि के गर्नै, कहाँजाने, समाजबाट घृणित भइ, सकौं भन्ने छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माया लाग्दी भएर कान्छीलाई भन्छे, “ के गर्नु दिदी, यो हाम्रो आफ्नै आमानभएकीले पनि यतिसम्म कि निठुरी भएकी छ । छोरा छोरीको लागि आमाकोकत्रो जरूरत पर्दो रहेछ । कसैको पनि आमा बाबु सानौ हुँदा काललेननिम्त्याओस्‌ है ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्री : चाहेको, भनेको जस्तो यहाँ के हुदोरहेछ र ? लेखेर ल्याएको देखेर हुन्नभन्छन्‌ । हाम्रो इच्छा र गति त्यस्तै भएका छन्‌ । जस्तै परै पनि मनलाई बुझाउनुपर्ने नै रहेछ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी : यी केटाहरू हामीलाई अपनाउनु पाए के के न होला भनेर पैसा बोक्दै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्ण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खोज्दै आउछन्‌ र भन्छन्‌, “म तिम्रो लागि ज्यानै समेत दिन तैयार छु । तरत्यसरी ज्यानै दिन तैयार हुनेहरूले पनि लौ हिड्‌ म तँ सँग जीवन विताउछु भनेरविबाह गरेर लैजान तैयार भने हुदैनन । तिनीहरूको माया, पैसा खनाउने हिम्मतबुझि नसक्नुको छ । के यसैलाई पिरती भनिन्छ या हामीले प्रेम भनेको पाउनैसक्दैनौ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्री आफुलाई कान्छी भन्दा बाढी मान्दै भन्छे, “के भनेर हामीलाई घर वसाउनलैजान्छन्‌ । त्यसमा त उनीहरूको इज्जत जान्छ । लुकेर खुरूबक हामी कहाँआउन मात्र यिनलाई हुन्छ । घरको स्वास्नी हुन त राम्री सोझी चोखी कुमारीकेटी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चाहिन्छ । आफु भाँड भए पनि घर भित्रकी स्वास्नी पवित्रनै हुनु पर्छ भन्ने योसमाजको सवैको धारणा छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ए.... लौ हेर हामी त कुरा गर्दा गर्दे यहाँ सम्म आइ पुरो छौं । तँ पनिअहिले त फटाफट हिड्दैछस्‌ । डाक्टरले छुँदैमा निको भइ हाल्यो कि कसो ?कान्छी : आउदा अव म मर्छु कि भनेर डराएकी थिए । खुट्टा अगाडि सर्दै सर्दैनथियो । अहिले बाँच्न सक्ने सम्भावना छ भन्ने आशले डोन्याइएकी छु । डक्टरलेदिएका औषधी त हेर यी यिनै त हुन ? एउटा चक्की खाए हुन्छ भन्थिन्‌ तर मैलेखाइन । दुखेको थाहा नपाउने मात्र हो भने पछि के खाने ? पर्सि देखि रगतकोरिपोट हेरि औषधी गर्छु भने कै छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यतिकैमा लाहुरे आइपुग्छन्‌ र सोध्छन्‌, “कता पुगेर आयौ, दुवै साथै छौआमालाई घर सुम्पेर एक्लै पाम्यौ कि कसो ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रीले फ्याट्ट जवाफ दिन्छिन्‌, “कत्ति तिनकै अगि पछि परी रहनु त ?एक्लै वस्न पनि सिक्नु पर्छ । &amp;quot;कान्छीले लाहुरे काँड्लाको प्रश्नको जवाफ पुरा दिन्छे, “तल स्वास्थ्य क्याम्पमासम्म पुगेर आएका हौँ । दाइ कता तीर जाँदै, हातमा झोला छ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लाहुरे : म त शहर जान लागेको । तिमीहरूमा को विरामी पप्यौ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्री जिस्कदै भन्छे, “ बाटो लाग्दैको मान्छेलाई के को चासो ? कान्छी विरामीछ भन्यौ भने शहर नगइ वस्नु हुन्छ के ? वरू शहरबाट फर्कदा हाम्रो लागिकाम खोजेर आउनु होला, हामी यो धन्दा छोड्ने भएका छौं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लाहुरे : वल्ल तिमीहरूको वृद्धि आउन लागेछ । डाक्टर साहेवले केही भनेकीकसो ? के काम गर्ने शुरछ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रद&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्री : यहीबाट यो काम गर्छु भनेर पाइन्छ र ? अहिलेको धन्दा छोडेर जुनसुकैकाम गर्न पनि तैयार छौ । तपाइलेनै विचार गरेर कुन काम गरेमा ठीक होलाभन्नु हुन्छ हामी त्यही गर्छौं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चार कान्छीसँग सोध्छन्‌ “भरखर शहरबाट फर्केकी तिमी फेरि शहरै जान तैयार?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी : गाउँमा आएर के गर्छु भन्ठानेकी थिए यस बुढीले के गराउन खोज्दै छे,अव पनि यहाँ के वस्ने ? यो गाउँको पनि छाडापन अति नै वढीसकेछ । म तवरू शहरै फर्कन्छु भन्ने सोच्दै छु । त्यहाँ जीवन निर्वाहको लागि थुप्रै काम तपाइन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्री कान्छीलाई उछिन्दै भन्छे, “हामीले यस्तो काम गर्ने गरेको तपाईलाई पनित मन परेको थिएन । सँच्चै हामीलाई यो काम छोड म तिमीहरूलाई वाँच्न मद्दतगर्छु भन्नु हुन्थ्यो । अहिले त्यो वेला आएको छ भेना, हामीहरूको उद्धार गरीदिनोस्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लाहुरे : हुन्छ, म तिमीहरूको लागि काम खोजेर नै आउँला । यो काम छोड्नलागेकोमा ज्यादै खुसी लागेको छ । यसले त आफु पनि विगिन्छौं र अरूलाई पनिबिगाछौं । शहरमा कुनै काम पाइएन भने गाउँमानै पनि कुनै राम्रो अरू नै कामशुरू गरौँला, अव पिर नगरेर वसे । हातको घडी हेर्छन्‌ । अवैर हुन लागेकोलेआम्मै अव मलाई जान देओ भन्दै हतारिएर मोटरको वाटो लाग्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्री र कान्छी एकै साथ भन्छन्‌, “नमस्ते दाई .... नमस्ते ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीलाई खेतको पाटो देखाउदै सोध्छे, “तिमी सम्झन्छौँ त्यो खेतको पाटो ? हेरत, त्यहाँ अहिले रोपाइ भइरहेको जस्तो छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी त्यतैतिर हेर्दै भन्छे, “ए .... त्यो खेत देखाउनु भएको ? त्योजम्दार वा को होइन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्री : त्यसैको हो । त्यस्ता दुष्टलाई के वा भन्नु, जम्दार मात्र भने पनि हुन्छ ।तिनै खेत त हो, जहाँ हामीहरू खेल्ने गर्थ्यौं । त्यसको छोरा बलभद्र भन्ने एउटाथियो त्यप्तको याद आउछ, तँलाई ? हो, त्यो वलभद्रले यसपाली खुवै रहर लाग्नेगरी विवाह गरेर गयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी आश्चर्य मान्दै, “गयो रे .... ? अचानक के भयो त्यस्तो ..... कठै ?चन्द्री हाँस्दै भन्छे, “गयो भनेको माथि गयो भनेकी हाइन । काम गर्न कलकत्ताफर्कियो भनेकी । तँ त कस्तरी छक्क परेकी । त्यसको स्वास्नी विबाह हुना साथ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विधवा भइ बिचरी भन्ठानेकि होलीस्‌ ? पिर लिनु पर्दैन लोग्ने साथमा नभए पनिउनको श्रृङ्खार गएको छैन । यो गाउँमा स्वास्नी धन्काएर आफु विदेशमा पसेकापनि प्रशस्त छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी : अनि तिमीले त्यस्तै, पाराले भन्यौ त, म के सम्झू ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्री वलभद्रलाई सम्झदै भन्छै, “त्यो फर्केर कलकत्तानै गएको हो । उ त्यहाँ कुनैफ्याक्ट्रीमा काम गर्छ क्या रे । विवाह भएकी केटी पनि त्यही कि हो भन्ये। मतबिवाहमा पनि गइन । के जानु त्यहाँ पाहुना भएर” ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी पनि सही थाप्दै भन्छे हो दिदी, म पनि कसैको विवाह हेर्नै सक्दिन ।लाग्न थाल्छ, हामीले त्यस्ती दुलही हुन पाउने कहिल्यै हुदैनौ क्या र । साल्हैजीवन देखि खिन्त हुन थाल्छ । अर्काको सुख मात्र हेरि कति कल्पेर हामीलाईबस्नु पर्ने हो ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्री भन्छे, “मलाई त बिवाह मात्र होइन ती जम्दार जम्दार्नीलि छोराले खुवकमाइ गरैको छ भनेर फूर्कदै गाउँमा हिडेको पनि मन पर्दैन । नयाँ लुगालगाएको देखाउँदै भन्छन्‌ रै “यो पनि वलुले, वाबुले न्यानो भएर वसोस्‌ भन्नेसोचेर पठाएको, ज्यादै हाम्रो ख्याल गर्छ ।” जम्दार्नी उता कानको मुन्द्री हल्लाउदैभन्छे रे, “छोराले कलकत्ताबाट नै वनाएर पठाइ दिएको म लगाउँन्न म बुढीलाईकिन चाहियो, तेरै स्वास्नी आएपछि देलास्‌ भन्दा पनि मान्दैन । छोराको मनराख्न मात्र लगाएर हिडेकी हुँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मलाई भने तिनका यस्ता कुरा सुन्दा कम्ता रिस उठदैन । वलभद्रलेमसंग विवाह गर्छु भनेर वावु आमालाई यति भनेनन्‌ । गाउँले पनि के भयो तसम्म भन्न थालि सकेका थिए । तर यी बुढाबुढीले छोरालाई नै गाउँबाट घपाइदिए विवाह गराउन पट्टै मानेनन्‌ । मेरो वलभद्रसंग त्यसवेला विवाह भइ दिएकोभए मैले यसरी बस्नु पर्थ्यो ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी सोध्छे, “त्यसरी नमान्ताको कारण पनि त होलान । के तिमीत्यसबेलासम्म चोखी नै थियौ होइन र” ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्री: म चोखी भएर मात्र यिनीहरूलाई भएन रे । एक त जातमा फरक पच्यीअर्को हाम्री आमाको मति कहाँ राम्रो थियो र ? सबै गाउँका त्यसबेलाका ठिटाबटुलेर आफै रासलीला गरेर वस्थी । बिर्सिस्‌, त्यसवेला मासु चिउरा तीगुण्डाहरू कहाँ पुन्याउने हामी हुन्थ्यौ । &amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिनीहरू हामीलाई हेरेर के भन्थे, छि ... ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी “के भन्थे हँ मैले त पट्टै विर्से भन त सुनौ” ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्री: भन्थे नी, तिम्रा दुवै छोरी कति राम्रा छन्‌ । वहिनी ज्बाइ वितेकोततिमीलाई पो खुदो पल्टिए छ । यी शब्दको अर्थ त्यसवेला मैले राम्ररी बुझेकीथिइन तर तिनीहरूले बारवार यही कूरा निकाल्ने हुँदा अझसम्म पनि विर्सेकीछैन । अहिले त मतलव पनि बुझ्दै आए के विर्सन सक्थे ? ती आमालाई देख्दाकस्तो भित्र भित्रै फोक चल्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोते रोपाइमा जान लागेको हुन्छ । वाटोमा पिनीहरूसंग भेट हुन्छ र सोध्छ“अहो, आज त वहिनीहरू संग बाटैमा भेट भयो नी, कता पुगेर आयौ ? वाहिरपनि आफै जान थाल्यौ कि कसो ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्री: के लाग्छ हाम्रो, तिमीहरू जस्ता पातिएकाले जता आइज भन्छौ त्यतै जानुपरि हाल्दो रहेछ । तिमीहरूको चित्त वुझ्न हामीनै नभइ नहुने भएछ ? सोतेभन्छ, “ए त्यसो भए हामीले जता हिड भने पनि त्यतै लाग्छौ होइन त ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लौ हिड, जम्दारवाको खेतमा । हिलो छेप्दै त्यही मज्जा गरौला जान्छौ के ?चन्द्रीलाई त झन पुरानो सम्झाना आउला, खेतवरी त्यही हुन्‌ ।खिजाएर हाँस्छ)चन्द्री रिसाउछे र भन्छे, “अव धेरै बर्ता भएर नवोल है । यही ढुङ्गा टिपेर हानीदिन्छु, वजियालाई । तँ नै जा त्यहाँ ती तेरा बावु हो कि वराजु हो, हाम्रा तकोही पनि होइनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोते हाँस्दै अगाडि वढ्छ ।ज्ञन सन्देश:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भयड्डर रोगलाई निम्त्याउन र फैलिन नदिन हामी सवै सचेत हौ । यहाँजीवन घान्ने थुप्रै उपायहरू छन्‌ । हामी त्यो उपाय मात्र छानौ जसले हाम्रोआहुति दिदैन । सक्छौ भने हामी मिलेर त्यो रीति रिवाज र चलनलाई तोडौजसले नारीलाई वेश्या वन्न वाध्य तुल्याएकोछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छजम्दारको खेतमा गाउँनै उल्टेर रोपाइ गर्न लागेका छन्‌ । कोहीगोरूलाई हो-हो-गर्दै खेत जोत्दै छन्‌ भने कोही हिलो फाड्दै बौसे गर्दैछन्‌ । हाँसोठ्ट्रा मस्करी सबै हुँदैछ । च्यान्टेलाई अझै त्यो बतावरण रमाइलो लागेको छैन रभन्छ, &amp;quot;खै आज कसैले पनि मादल ल्याउन सम्झेनन्‌ ? रोपइमा त मादल पोड्याम्म ड्याम्म ठोक्नु पर्छ । त्यसको घिन्तिङ घिन्तिङमा बौसे गर्न कति मजाआउँछ । हिजो डिठ्ठा वाजे कहाँ मादलको साथ नाच गान हुँदा समय वितेको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पत्तोनै पाएनौ । त्यत्रा खेत कति छिटो रोपेर सिद्धाएका थियौ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चमेली भन्छे, “अहिले पनि के भएको छ र ? तिमी घोक्रो फुलाएरगाउँन थाल अनि हामी नाची हाल्छौ नी&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
च्यान्टेः मादलै नभए म त गाउन सक्तिन, तिमीहरू पनि कुन तालमा नाच्छौं !जम्दार बालाई ल्याउनै लगाउनु पर्छ । खेतको धनी भएर पनि यसै भाग्नपाइन्छ । उ हेर उनी त घर भित्रै लस्याङ, लुरूङ गर्दैछन्‌ । ए डल्ले तँ नजिकैछस्‌ कराएर जम्दारवालाई मादल ल्याउनु होस्‌ भन्‌त ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डल्लेले पनि त्यसमा अरू कुरा थपिदिदै भन्छ “ए जम्दार वा तँपाइलेमादल ल्याउनु भएन भने रोपाइ आज सिद्धीने छाँट म देख्दिन है । च्यान्टेलाईमादल नभइ भएन रे ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार पनि ठूलो स्वरले कराउछन्‌, सुनाइ दे, डल्ले, मादल ठोक्न मआफै भनेर । अहिले खाजा के खान्छौ, भोकै परौला भनेर त्यसकोसम्दीबस पछ 1 च्यान्टेले जम्दारको स्वर सुनेर भन्छ, “ए, बुढा त लौ मादलआफैले पो ठोक्ने भए हेर । चमेली नाच्छु भनेर त तम्सिदैछेस्‌ तर वीचैमा तालभने छोड्न पाउन्नस्‌ । म पनि तैले त्यसो गर्न थालिस भने सत्ते गाए । तेरो वानी,सबैले तँलाई नाच नाच भनेर फकाउन भनि नाच्दा नच्दै टवाक्क रोकिने छ ।यसपालि पनि त्यसै गर्लिस्‌ ख्याल राखे ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबै रोपाहा हाँस्दै भन्छन्‌ “हो-हो-यो त्यस्तै भनुन भन्ने खोज्छे ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चमेली : म एउटीले त्यसो गरेछु भने पनि तिमीहरूको गाना खेर जादैन, सुन्तलीछे, अमला छे,, जाइ छे। सवैले नाच्न जानि हालेकाछन्‌ । तिमी राम्ररी सूरनिकालेर गाउ, अनि हामी आफै नाच्न तत्पर मै हाल्छौ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुन्तली: लौ हेर जम्दार वा त परै देखिन मादल ठोक्दै आउन थाले । यहाँ आइपुगे पछि आफैँ नाच्नपो थाल्ने हुन कि?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
च्यान्टे, जम्दार वा आए तर्फ नै हेर्दै भन्छ, “उमेर ढल्के पनि यिनको रहर ताजैछ । जवानीमा यी कस्ता पो होलान्‌ ? सुन्तली, तैले नाच्ने साथी पाउने भइस्‌ ।तिमीहरूले नाच्न थाले पछि यी मिस्सिन गइ हाल्छन्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुन्तली: छि यौ दाइ त ? के म त्यो बुढासंग नाचेर वसि राखुला ?जम्दार नजिकै आएर मादलको साथ आफैँ गाना गाउन थाल्छन्‌,सरर सरर पानी पस्यो झरर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिम्रो माया आयो लरर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गाइ देउ, नाची देउ, आए म त मादल ठोकेर ।जम्दारको गाना सुनेर सबै दङ्क पर्दै भन्छन्‌, “अहो ! जम्दारबा त गाना पनि कतिराम्रो गाउनु हुंदो रहेछ, नाच्नु पनि हुन्छ कि&amp;quot; ?चमेली खिजाउने पराले सोध्छे, “गाना पनि आफैले, अहिले नै वनाउनु भए जस्तोछुनी”?जम्दार सत्य बोल्छन्‌, “नानीहरूलाई रत्याउनै भनेर टुक्रा मिलाएर गाइ दिएकोहुँ। कस्तो मानौ त ? गाना दोहस्याउछन्‌, “गाइ देउ नाची देउ आए म त मादलठोकेर,” सुन्तली पनि कम कि छैन । जम्दारलाई उल्लाउन भन्छे, “कस्तो राम्रोगाना गाउनु हुदोरहेछ, तै तै नाचेर पनि देखाइ दिनु हुन्छ कि ?”जम्दार: तिमीहरू पनि मेरो साथ दिन्छौ भनि कस्सिने हौ भने म तिमीहरूलाईथकाउने गरी नाची दिन्छु । यो जम्दारले रात रातभर गाएर, नाचेर बिताएको छबुझ्याँ, के ? बुढो भए भनेर गली सकेके छैन ।च्यान्टे, जम्दारको हाँकको साथ दिदै अन्छ, &amp;quot;लो वा म गाना तान्न थाल्छु तपाईमादल ठोक्दै यिनका साथ नाचेर यिनीहरूलाई थकाइ दिनोस्‌ । जवाती आएरआफू के के न हुँ भन्ने ठान्छन्‌ । बाघ बुढो र स्याल तन्नेरी छ भने पनिबाघलाई स्यालले निल्न सक्दैन ? सवै हाँस्छन्‌ । चमेली र सुन्तली पनि फूर्तिकासाध भन्छन्‌, “हामीलाई थकाउने रे ? लौ थकाएको हेरौत ? हामीले पनि त्यस्तारात कति वितायौ कति । जम्दार च्यान्टेलाई भन्छन्‌ “लौ गाना तानि हालत, ममादल ठोकी हाल्छु यिनीहरूले ज्यादै फूर्ति पो गरे ।च्यान्टे गाउँन थाल्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रातो फूल क्या राम्रो फुलेको तल वेसिमा तल वेसिमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरी माया क्या राम्रो खुलेकी धानको खेतमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घानको खेतमा वहिनी धानको खेतमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फनक्क घुमि दैउ, हिले माटोमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिले माटोमा वहिनी हिले माटोमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कम्मरै भाँची देउ, नाचको तालमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाचको तालमा वहिनी नाचको तालमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फनक्क घुमि देउ, हिले माटोमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डड&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सवै रमाउदै, गाउँदै नाच्दै रोपाइ गरी रहेका हुन्छन्‌ टुप्लुक्कै डिठ्रा बाजेआइ पुग्छुन र सोध्छन, “क्या हो ए जम्दार, मादल ठोक्दै नानीहरूसंग आफैंनाच्न थाले छौ ? यस पाली धानको भकारी थप्ने विचार छ कि कसो ? रोपाइमारमाइलो धेरै गन्यो भने वाली राम्रो हुन्छ भन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार खुसी हुदै भन्छन्‌, “सन्तानको संख्या बढन थाले पछि भकारी पनिबढाउननु पर्छ र खेतका पाटा पनि थप्नु पर्छ । लौ डल्ले अव मादल तँ वजा मडिठ्ठा बाजे संग कुरा गर्छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चमेली जम्दारलाई जिस्काउदै भन्छे, “हार्नु भएर भारने बहना बनाउनु भएको तहोइन” जम्दार हाँस्दै जवाफ दिन्छन्‌ “तिमीहरू भरखरका संग पनि म जित्नकसरी सक्छु र ? नाचमा हारे भनेको होइन नी फेरि” ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चमेली सोध्छे, त्यसो भए केमा हारेर भाग्नु भएको ठानौ त ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार जवाफ दिन्छन्‌ “क्रा गर्नमा” । उनको जवाफ सुनेर सबै हाँस्छन्‌ ।जम्दारले डिठ्राबाजेलाई लिएर छुट्टै डिलमा वसेर कुरा गर्न जान्छन्‌ । डिठ्ठा वाजेजिज्ञासु भएर जम्दारलाई सोध्छन्‌, “तिम्रा कुरा सुन्दा त पोल्टामा नाती, आउनलाग्यो जस्तो लाग्छ हो के?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार दङ्ग पर्दै भन्छन्‌, “हो वाजे, म पनि हजुरवा हदैछु । विवाह हुन मात्रसमय लाग्छ वच्चा जन्माउन दसै महिनाको कुरा हो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डिठ्ठा बाजे हाँस्दै भन्छन्‌, “लौ त्यो दस महिना पनि नलाग्ने भइनै सक्यो ! त्योतलको झल्लुले विवाह गरेको पाँचै महिनाभित्र यत्रो घुतुमुने नाती वुढी आमाकोकाखमा राखी दियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार आफूलाई डिठ्ठा भन्दा चलाक सम्झदै भन्छन्‌, तपाई पनि के कुरा गर्नुहुन्छ त्यो कच्चा के पाँच्चै महिनामात्र गर्भमा रहयो होला ? यस्तो भए प्रकृतिकनियम नै झुठो हुन्छ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डिठ्ठा वाजे हाँस्दै भन्छन्‌, “मलाई अरू क्रा थाहा छैन, विवाह गरि दिएको पाँचैमहिनामा वच्चाको न्वाहारन पनि मैले नै गरी दिएको हुँ ।” आफ्नै हो भने पछिहामीलाई के को चासो ? समय अनुसार चल्नु नै पर्दोरहेछ । छेउ छाउका सबैकेटी हुलेर वच्चा जन्माइ मलाई न्वाहारन गर्न बोलाए भने पनि मैले भन्ने “देउशान्ति ही” मात्र हो । भोग्नु पर्ने समस्या तिनले नै हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार पनि भन्छन्‌, &amp;quot;चासो लिएको मैले पनि होइन । हाँसोमा हाँसो मात्र गरेको। आफ्ना सन्तान त्यसरी कहिल्यै पात्तिएर हिड्ेनन्‌, अर्काले जेसुकै गरून । हाम्रो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समाजमा यो नौलो भयो र यसो वोली दिएको ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डिठ्ा बाजे भन्छन्‌, “तिम्रा सन्तान र तिम्रो त के कुरा गर्नु खै ? अलिहे ततिमीले ढुङ्गै छोए पनि सुन वन्छ जस्तो छ । त्यत्रा सम्पत्ति आफ्नै हुँदा हुदै पनिबुहारीको दाइजो समेत समालि नसक्नुको भित्राउन पाइ हाल्यौ । छोराले धनकमाएर ओहिरो लगाएको लगाएकै छ । अव नाती पनि आउने भइ हाले छ?तिम्रो यो जगजगी सधै यत्तिकै रहोस्‌ । कसैको आँखा नलागोस्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार मन मनै खुशी हुदै भन्छन्‌, “सम्पत्ति भनेको हातको मैला मात्र हो । तरबुहारी भने मैले नपाइ सम्नुको भित्राएको रहेल्नु । त्यत्रो शहरबाट आएकी भएपनि चारैतिरको काम भ्याउन सक्छे लौ । सासुको स्याहार गर्नु गाइवस्तुकोहेरचाह गर्नु देखि ल्याएर गाउँका केटा केटीलाई समेत पढाउन तयार हुनसम्छै । अव त म यिनलाई जिम्मा दिएर आफू र बुढी काशीतिर पो लाग्नु पस्योकि?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डिठ्मा वाजे सम्झाउदै भन्छन्‌, “ केकुरा गछौं तिमी ? के अहिलेनै हाम्रो उमेरकाशी पस्ने भइसकेके छ्‌ ? वरू घरमा वसेर छोरा बुहारीलाई उनीहरूले उन्नतिगरून भनि सहयोग गर्छु भवन । वुहारी पनि तिमीले पढे लेखेको पाएका रहेछौ ।(गाढा हेर्दै) ए, उ त्यो आउने को ? हेर त, मलाई बलभद्र जस्तो लाग्यो नी हो ?हामीले त्यसको कुरा पनि गर्नु त्यो पनि टुप्लुक्क आउनु कत्रो लामो आप्रु तिम्रोख्रोराले पाएको रहेछ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार छोरा आएको पत्यार नगर्दै भन्छन्‌, &amp;quot; के आउँथ्यो त्यो ? गएको तीनमहिना पनि भयो भएन ? काम भने पछि आफ्नो ज्यान दिन्छ । वढो इमान्दारछ्॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चमेलीले पनि आइ रहेको वलभद्रलाई चिन्छे र भन्छे, “ए जम्दार वा उ हाम्रोबलभद्र दाई पनि आउनु भएछ । आज तपाइको दिन यस्तै रमाइलोले बिताउनपाउने हुनु भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार, चमेलीले पनि वलभद्र आउदै छ भनेको सुनेर आश्चर्य पर्दै भन्छन्‌,”होइन, यो पनि वल आयो भन्छे, चिनिस्‌ तैले&amp;quot; ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चमेली आफ्नो आँखाले धोका खान सक्दैन भन्ने देखाउदै भन्छै, “नचिनेर हामीभन्छौ र ! आफ्नै अगाडि छोरा ठिङरिङ्क उभिए पछि अनि हो रहेछ भन्नु होला ।”डिठ्ठावाजे जम्दारलाई भन्छन्‌, के भनु तिमीलाई वाठा कि लटा ? आफ्नो बेलायसै विर्सिसके छौं । भर्खर विवाह गरेर तखूनी स्वास्नी यहाँ छोडेर उ त्यहाँ वस्नसक्छ ? काम होस्‌ कि माम होस्‌ स्वास्नी प्रतिको डमान पनि त उसले राख्नै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पछी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोपाहाहरूलाई डिठठा बाजेको क्रा सुनेर घत लाग्छ र हाँस्छन्‌ । बलभद्रवावु नजिक आइ पाउ लागि गर्छन्‌ । डिठ्ठा बाजे संग टाउको थाप्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जन सन्देश&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवनका सवै क्षणहरू यतिकै रमाइला कहाँ हुन्छन्‌ र ? सुखको साथमदुःख आइनै रहेको हुन्छ । सुखी त्यो हुन सक्छ जसले दु:ख आइ लाग्छ कि भनेःपहिल्यै सतर्क वन्ने प्रयासमा रहि रहन्छ । यस्तै दुरदर्शितानै जीबनको सफलताहो । जम्दार हुक्का गुड गुडाउदै स्वास्नीसंग सोध्छ, “खै वलभद्र ? सुत्न गइसक्योकि कसो ? त्यहाँ पनि केही वोलेन, यहाँ पनि आउदैन” ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्नी भन्छे, “खुवै थाकेको छु भन्थ्यो, सुत्न गयो होला नी” ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार: अँ त्यो अलि झ्याउरेको जस्तो पनि लाग्यो । केही आपत विपत पप्योकि ? यति छिटो फेर्केर आएको तँलाई कहिले थाहा छ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्नी: खै, हामीलाई केही भन्दैनन्‌ के जान्नु । अव भौली सौध्नु होला । अहिलेतपाइ पनि खुरूक्क सुत्नोस । दिनभर खेतमा रूमलेर पनि कस्तो निन्द्रानआएको ! द्वार .... ठ्वार हुक्का तानेको छ, तानेको छ । मलाई पनि निद्रालागि सक्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार जम्दार्नीलाई भन्छन्‌ “ए, सुन त बुहारी रोएकी हो किक्या हो?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्नीः ससुरा भइसकेर पनि पक हुन ढालाई लाज छैन । छोरा बुहारीको कोठामाकान थापेर बस्छन । तिनीहरू गरून, तपाईलाई किन चासो लागेको !रून्छन्‌ पनि एकै छिनमा हाँस्छन्‌ पनि । फेरि किन हाँसे सुन सुन पनि भन्नुहोला । के म त्यसै गर्दै जाउ ? सुत्नोस र मलाई पनि सुत्न दिनोस्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उता कोठाबाट सुक्क सुक्क रोएको आवाज आउछ । वलभद्रले सम्झाइरहेको पनि सुनिन्छ । वलभद्वको वोली सुनिन्छ, “रोएर तिमी गर्नै के सक्छौ ? हुनेकुरा भइसकेको छ । अब हामीले धैर्य लिन सन्ने हुनुपर्छ र अर्को गल्ति फेरियसमा दोहन्याउन थाल्नु हुदैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार जम्दार्नीलाई घचघचाउदै सोध्छन्‌, “ के तैले आज पनिबुहारीलाई” पढाउन पठाइनस्‌ ? त्यसले पढाउन गएकी तेरो कम्पारा तातीहाल्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्नी अलि झर्कदै भन्छिन्‌, “त्यसैले बुहारी रोएकी भन्ने ठान्नु भएकोहोला होइन ? मलाई त्यस्ती मापाकी मान्नु पर्दैन । मैले ए बुहारी अव यत्रो पेटहुन्छु कति पेट हल्लाउँदै कहाँ कहाँ पढाउन जान्छेस्‌, पर्दैन जान भन्ना साथउतैले हुन्छ अब देखि जान्न भनेर भनिसकेकी छ । अव ज्यादा माया देखाउननलाग्नु होस्‌ । लोग्ने मान्छै भएर पनि कति चासो लिनु परेको ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उता श्यामली र बलभद्र वीच कुरा चलिरहन्छ । कति सुनिने गरी बोलीचर्को हुन्छु भने कति खुस खुस मात्र हुन्छ । बुढा जम्दारले के हो, के आपत आइलाग्यो केही वुझ्न सक्दैनन्‌ । हि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र श्यामलीलाई भन्दै हुन्छन्‌, “बैवाहिक जीवन कस्तो गरीविताउला भन्ने के मलाई मात्र थिएन र ? वावु हुने भएख्नु भन्ने सुनेर म कतिखुसी हुने थिए तर म अहिले वाध्य भएर भन्दैछु । “यस गर्भलाई तुहयाइ देउ,यसलाई माया गरेर अर्को गल्ति नदोहस्याउ । यसलाई नु यसैलाई श्राप दिनुजस्तो हुन्छ र हामी यो रोग फैलाउने ज्यानमारा हुन्छौ । यसलाई यहीअवस्थामा अन्त्य गरी रोग फैलिनबाट हामीले रोक्नु पर्छ । श्यामली दैनिय स्वरनिकालेर भन्छिन्‌, “म आमा भएर गर्भमा आएको पहिलो सन्तानको नै हत्याकसरी गरू । गर्भमा राम्ररी छटपटाउनै नपाएको बच्चालाई पनि नाश पार्ने योरोग कस्तो रहेछनी ? एड्स रोगको परिणती सुन्दा सुन्दै डरले भागेर ज्यानबचाउन शहर छोडेर गाउँमा आए । यहाँ झन यस्तो आफैमा पर्न जानु म कस्तीअभागी रहेछु । लौ न वरू सोधपुछ गरौ, कुनै उपायले यस गर्भलाई मात्र भएपनि वचाउन सकिन्छ की ? कहिले देखि तपाईलाई एड्सले गाँजेछ त्यो थाहापाउनु भएको छ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : डाक्टरलाईनै यस वारे मैले सोधेको थिए । तर बहाले भन्नु भयोकिटानको साथ यो वेला देखि यो रोग लागेको हो भनेर भन्नै सक्दैन रे । योरोगले छोइ सके पछि पनि दुइ तीन महिनासम्म त रगतमा समेत यसको जिवाणुदेखिदैनरे र यसले छुनासाथ रोगग्रस्त भएर ढाली पनि हाल्दैन रे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली: त्यसो भए तपाइले कसरी शंका लागेर रगत जचाउन जानु भयो ?शरीरमा केही रोगको संकेत भए पछि पो मान्छेहरू रगत जचाउन जान्छन्‌ ।कस्तो ठाउँमा गएर जचाउनु भएको हो कुन्नी ठीक संग जाँचेर भनेका हुन्‌ किहोइनन्‌ ? मैले सुनेको त यस्तो रोग कोठी भट्टीहरूमा छिल्लीन जानेहरूलाईलाग्छ । तपाइ त कोठीको नाम सुन्नासाथ वुर्लुक्क उफ्रनु हुन्थ्यो । साथीहरूलाईपनि सम्झाउनु हुन्थ्यो, फेरि यस्तो कसरी भयो ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र - मानिसको स्वभाव वेला परिस्थिति हेरेर वदलिदौ रहेछ । साथीहरूको लै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लैमा लागेर मैले पनि त्यस्ता ठाउमा जान शुरू गरेको थिए । यस्तै भइ हाल्लाभन्ने के ज्ञान भयो र ? एक दिन हामी साथीहरू सवैले पढ्न पुग्यौ, “कोठीभट्टिमा चाहार्ने रसिकहरूले आफ्नो रगत बेलैमा जचाइ एड्स रोगबाट बचाउनसहयोग गर्नोस्‌” भनेर ठाउँ ठाउँमा लेखेर टाँसेको । त्यसपछि हामी सबैले नैगएर आफ्नो आफ्नो रगत जचायौ । नभन्दै हामीहरू मध्ये दुई व्यक्तिहरूलाईएड्सले छोइ सकेको रहेछ । त्यसपछि म झल्यास्स्‌ भए आतिए । डक्टरले सवैकुराको बिस्तार गर्नु भयो र कसरी हामी वचेर वस्नु पर्छ भन्ने पनि सम्झाउनुभयो । अनि मलाई आफ्नो भन्दा बढी चिन्ता तिम्रो लाग्यो र नोकरीनै छोडेर मघर फर्केको छु । तिमीलाई थाहा छ, डाक्टरले के भन्यो ? तिम्रो रगत पनिजचाउनु पर्छ रे । श्यामली भो भो अव म सुन्न पनि नसक्ने भइसके । मलाईथाहा छ यो रोगको औषधी नै छैन र यसले छोए पछि ..... । फेरि रून्छिनर भन्छिन्‌ “म मरे पनि केही थिएन तर यो वच्चालाई स्वस्थ जन्माउन सकेहुन्थ्यो । आखिर हामी दुवै नभए पनि यो वच्चाले त हाम्रो परिचय दिइ रहन्थ्यो ।तपाईंलाई पनि कत्ति छिल्लीनु परेको नी ? यस्तो रोग सार्नु रहेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : म तिमीलाई यसको के जवाफ दिउ खै ? प्रकृतिले ल्याएको उन्मादलाईहामीले रोक्न नसक्नु हाम्रो गल्ति हो भनु या नभनु ? बेहोसी हुनु भनेको हाम्रोभूल हो ।श्यामली : गल्ति हो भन्ने नी किन दोधारे कुरा गर्ने ? प्रकृतिसंग परेमा लडेरबच्न सक्ने हुनु पर्छु भनेर नै पाँच ज्ञानेन्द्रिय पनि लिएर हामी जन्मेका छौं ।नीति शास्त्र सामाजिक मर्यादा सबैलाई कुल्चेर हिड्न थाल्यौ भने के के हुन्छके के । परस्त्रीमा आँखा नलगाउँनु कोठी भट्टि नचार्नु भन्ने अर्ति सम्झेको भए२... ? एक छिन चुप लागेपछि फेरि भन्छिन्‌, “छोड्नोस्‌ अव यो विषयमा केक्रा गर्ने हामीले के नै जनेका छौं र ? बरू एक फेर काठमाण्डू गएर राम्ररीदुवैले जचाएर यो बच्चा वचाउन सकिन्छ कि सकिदैन त्यो कुराको निदो गरौँ ।मलाई किन किन वच्चलाई त केही पनि नहुनु पर्ने हो जस्तो लागि रहेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : हुन्छ त्यसै गरौं । प्रयास गरेर हेर्नै पर्छु । तर मलाई डाक्टर साहवलेबताए अनुसार हामी एड्स रोगीले जन्माउने बच्चाले जन्मदा नै भयानक रोगकोकिटाणु आफ्नो रगतमा लिएर जन्मेको हुन्छ रे त्यसलाई तुहयाइ दिनु पर्छभन्थे ? ,श्यामलीः त्यो कुराको निधो पनि आफ्नै देशको भरपर्दो डक्टरलाई हामी दुवैलेसाथै जचाएर गसैला र के भन्छन्‌ त्यसै गरौला । अझै मलाई त तपाईलाई योरोग लागेको छ भन्ने कुरामा विश्वास लागेको छैन । एड्स भन्दा भन्दै झुक्किएरतपाईलाई पनि त्यही रोग लागेको भनेकी जस्तो पनि कता कता लाग्छ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र :पहिलो पल्ट सुन्दा मलाई पनि त्यस्तै लागेको थियो ? यो भाबना त्रासलेल्याएको हो । हाम्रो दिमागले हतपत्ति मान्न नखोजेको मात्र हो, डक्टरले गल्तिगर्दैनन्‌ । त्या पनि यस्तो ज्यान जाने जस्तो क्रामा किन त्यसै भन्थे । लौ,एक फेरफेरि जचाएर मनलाई शान्ति पारौलौँ । तिम्रो बारे पनि थाहा हुन्छ । डक्टरलेभन्दै थियो यो रोग तिमीबाट पनि मलाइ सरेको हुन सक्छ रे ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शयामली : छि के भन्नु भएको त्यस्तो ? मलाई कसबाट सरेको हुन सक्छ ? केम त्यस्तो थिए भन्ने सोच्नु भएको छ ? म, सँग त्यसो भए किन बिवाह गर्नुभ्रएको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : यो रोग चरित्रहिनलाई मात्र लाग्नै होइन रे । एड्सको विरामीकोरगतसंग लसपस भयो भने पनि सर्न सक्छ रे !? त्यसैले नरिसाउ । रगत जाँचेपछि पत्तो लागि हाल्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोली पल्ट विहान जम्दार गाइको गोठमा पुगिसकेको हुन्छन्‌ । गाइहरूआफ्नो मालिकको स्पर्श पाएर वाँ ..... बाँ गरी कराइ रहेका हुन्छन । वलभद्रत्यही पुग्छन्‌ र वाबुलाई भन्छन्‌, “अहिले हामी दुवै काठमाण्डू जान लागेका छौं,त्यहाँबाट केही ल्याउनु छ कि ? हिजो मात्र आएको छोराको एक्कासी काठमाडौंजाने तरखर सुनेर जमदारले हिजो राती छोरा बुहारीको ब्रीच चलेको गुनगुन रसाक्क सुक्क सम्झन्छन्‌ र आश्चर्य व्यक्त गर्दै भन्छन्‌, “हिजै मात्र आइस, केपरयो त्यस्तो र आज विहानै काठमाडौं तर्फ लाग्न तैयार भइस्‌ ? कुनै आपतबिपत आई परेकोछ भने भन नत्र एक दुई दिन सुस्ताएर गए पनि त हुन्छ ।”बलभद्र कुरा लुकाउदै भन्छन्‌, “त्यस्तो केही परेको छैन? वा पनि ..... ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामलीलाई यसो काठमाण्डू घुमाएर ल्याउकि भनेर मात्र हो । मेरो एउटासाधीको विहे पनि छ त्यो पनि साधै मनाउन जान लागेको ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : त्यसो हो भने जाओ । वेलैमा घुमफिर गरी हाल्नु पर्छ । अनि फर्कनेकहिले नी ? अर्को हप्ता तेरी आमाले सत्यनारायणको पुजा लगाउदै छे । त्यतिबेलासम्म त फर्कौला ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्नी, भित्रबाटै छोरा बुहारी शहर जान लागेको कुरा सुनेर कराउदै आउछिन्‌र भन्छिन्‌, “होइन, यो वले के भन्छ ? व्याउने भएकी स्वास्तीलाई पनि कहाँ कहाँडुलाउन तम्सिए को हो ? पर्दैन लैजान । जाने भए तँ एक्लै जा । कतै केही भयोभने ? लामो मोटरको सफर हुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : किन त्यसै डराउनु हुन्छ, आमा ? तपाइको बुहारीलाई केही हुदैन । एकहप्ता पनि बित्दा नबित्दै हामी फर्केर आइ हाल्छौं । काठमाण्डूको महगीमा टिक्नै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कति सकिएला र?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुरा चल्दा चल्दै श्यामली पनि जानलाई ठीक परेर आइ पुगिन्‌ । उनलाई देखेरजम्दार्नी भन्छिन्‌, “हेर, यो पनि जानलाई तमतयार भएर आएकी ? कस्तोकाठमाण्डू हेर्ने रहर लागेको ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दारनीलाई संझाउदै जम्दार भन्छन्‌, “यिनीहरूलाई पनि थाहा छ के गर्न हुन्छरके गर्न हुन्न भन्ने ? जानै चाहन्छन्‌ भने केही दिन घुमेरनै आउन । उमेर छँदानैनघुमेको फेरि कहिले घुम्न पाउँछन्‌ । पछि त यी तँ र म जस्तै एकले अर्कालाईदेखेकी झ्यार झ्यार गरेर वस्ने भइ हाल्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दारको कुरा सुनेर जम्दारनी भन्छिन्‌, “कुराले कति ठीक पार्न जानेकाछन्‌ । आफुलाई एक फेर पशुपतिको दर्शन गर्न लगि दिनोस्‌ भनेर त्यतिका पल्टकराउदा पनि आजसम्म ती दिन आउन सकेको छैन वहा भने उमेरमा रहरमेद्नु पर्छु भनेर अर्तिवृद्धि छोरालाई दिनु हुन्छ । के हाम्रो उमेरै नआइ वुढावुढीभयौं होला त ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : किन यत्रो कुरा गर्छस्‌ ? जिउदो छंदा नसके पनि मरे पछि भए पनिआर्यघाट पुग्याइ दिउला भएन के ? उ त्यता पनि हेर, छोरा बुहारी विदा लिनपर्खेर वसेका वसैछन्‌ तँ भने म सँग कचकच गरेर वसिरहेन्छेस्‌ । खुरूकक आएरआशिर्वाद दिएर पठाइ दे । वस छुट्ने वेला भइ सक्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दारको त्यति संकेत पाए पछि छोरा बुहारी दुबैले बाआमालाईढोक्छन्‌ । उनीहरूले पनि साथै छोरा बुहारीलाई आशिर्वाद दिएर विदा गर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घरबाट विदा लिएर दुवै ओरालो झर्न थाल्छन्‌ । वाटामा जति भेटिन्छन्‌सवैले सोध्ने प्रश्न एकै प्रकारका हुन्छन्‌ । जवाफ दिंदा दिदै दिक्क वलभद्र भएकाछन्‌ भने भारी मन पारेर हिड्दैकी श्यामलीलाई झर्को लाग्छ र भन्छिन्‌, “कतिचासो राख्नु पर्छु यिनीहरूलाई ? आफुलाई भने कोही पनि नवोली दियोस्‌ जस्तोलागि रहेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वलभद्र : झर्को यसरी मान्न हुन्न । यो त रिवाज हो । यस्तै रिति रिवाजकोसाथमा अत्मियता गाँसेर त हामी बाँचेका छों । भोली यही भएन भने हामी नैफेरि अबहेलित भएको मान्न थाल्छ । तिमी त त्यत्रो शहरमा वसेकी पढेलेखेकीले यति कुरा त बुझ्नु पर्ने हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली : म अहिले केही पनि सोच्न सक्ने स्थितिमा छैन । मेरो दिमागमा केवलएड्स एड्स भन्ने मात्र घुमिरहेछ । मेरो मामा पनि यही एड्स रोगले मर्नु, भएकोहो । त्यसबेला हामी पी कुरा बुझ्न नसक्ने उमेरका भएकोले यतिमात्र भनेको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हठ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
थाहा छ कि उनको कोठामा कोही वस्नै सक्दैन थिए रे, कुहिएर गन्हाउनु भएकोथियो रे । वहाको वानी पनि वेश्यालय घाहार्ने हुनाले यस्तो रोग लागेकीवेश्यासँग सहवास गर्न पुगेका हुनाले यो रोग सरेको भन्थे । यति भनि श्यामलीचुप लाग्छिन्‌ । बलभद्र उनको मुखमा पुलुक्क हेर्दै हाँस्दै भन्छन्‌ “अनि त्यस्तैगन्हाउने म पनि हुन्छु भन्ठानेर पिर गरेकी ? तिम्रो मामालाई पहिले भिरिङ्केगनोरिया क्लुमिडिया स्यान्क्रोइडहरपिस जस्ता यौन रोग लागेको हुनुपर्छ रत्यसपछि वेश्यालय जाँदा एड्सको जीवाणु एच.आइ.भी. सारे होलान्‌ । यस्तारोगले ग्रस्त भएकाहरूलाई एड्स रोग छिटै सर्न सक्छ रे । एड्स रोगका विरामीसवै यौन रोगको लक्षण मात्र देखाएर गन्हाइ मर्दैनन्‌ । एड्सको रोग भनेकोत्यस्ता अंगमा मात्र लाग्ने होइन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली : यस्ता सरूवा यौन रोग पनि एड्स जस्तै निकै नहुने हुन्छन्‌ यायसलाई औषधी गरी निको पार्न सकिन्छ ? हाम्रो मामालाई पहिले त्यस्तो रोगकेही थिएन पछि त्यस्तो ठाउमा जाने आउने गर्न थालेपछि सरेको भन्थे । तपाइलेभने पहिले नै ती के के रोग हुन्‌ लागेको हुनु पर्छ भन्नु हुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : हेर, यो दुवै हुन सक्छन्‌ । पहिले नै यौन रोग लागेर पनि औषधीउपचार नगरी निको पार्नमा हेलत्चक्राइ गर्दे वेश्यालयमा गएर एच.आइ.भी.सारेको या त्यहाँ जाँदा एड्सको जीवाणु भएकी संग मैथुन गरी त्यसबाट त्योजीवाणु सारेर अर्कि कुनै यौन रोग लाररेकीसंग पनि सम्वन्ध भइ त्यो रोग पनिनिम्त्याएको । एक पटक एच.आइ.भी. रगतमा पसे पछि त्यस्ता व्यक्तिलाई छिटैअरू रोगले पनि समात्न सक्छ रे र त्यसमा पनि यौन रोग त ज्यादै खतरनाकसरूवा रोग भएकोले छिटै त्यो सल्किन गएको पनि हुन सक्छ । तर अरूकिसिमका यौन रोग लागेको विरामीलाई यदि एड्सको जीवाणु उसमा प्रवेशगरेको छैन भने र ती यौन रोगको असर मगज र मुटुमा देखा पर्न पुग्नु भन्दापहिले नै औषधी उपचार गस्यो भने त्यस्ता रोग निको हुनु सक्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली : छि .... पी रोग जुन सुने पनि त्यस्तै डरलाग्दा हुदा रहेछन्‌ । स्वास्थ्यभएर बाँच्न पनि कति गाउ्हो पर्ने भइसकेको छ !? होइन, यो एड्स वालक बुढोजवान जुनसुकैलाई पनि रगतबाट सर्न सक्छ भन्नु हुन्छ फेरि भन्नु हुन्छवेश्यावृत्तिमा लागेकाहरूलाई छिटै सर्न सक्छ । के हो यो ? के कारणबाटशारीरिक सम्वन्ध यौनको माध्यमबाट राख्नेहरूलाई छिटो सर्न सक्छ भन्नुभएको ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : यो एड्सको जीवाणु सर्न सक्ने मुख्य तीन कारणहरू छन्‌ भनेर डाक्टरसाहेवले मलाई वताउनु भएको छ । यी मध्ये धेरै जसो छिटो फैलिने कारण जुनपायो त्यो संग यौन सम्वन्ध राख्दै जानाले एड्स भएको संग रहन गएमा र अरू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुई कारण वेवस्ता गर्नाले हुन जान्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एड्सको जीवाणु वोकेको कुनै पनि व्यक्तिको रगत कुनै पनि तरिकाबाटजस्तो चोट लागेर निस्किएको या काटिएर बगेको रोगीको आलो रगतमा अर्कोस्वच्छ व्यक्तिको चोट या घाउ लागेको कुनै पनि अंगको सोभै सम्पर्क हुन गएकोछ भने या एच.आइ.भी. याने एड्सका जीवाणु भएको रगत कतैलाई रगतकोशरीरमा खाँचो पर्दा दिइएको छ भने यी एड्सका जीवाणुहरू अर्को व्यक्तिकोशरीरभित्र यसैबाट घुस्न गइ त्यो व्यक्तिको रगतलाई पनि एच.आइ.भी. पक्का(पोजेटिभ) वनाइ दिन्छ जसको नतिजा जुनसुकै रोगले छोयो भने पनि ढालेर नैछोड्छ । अस्पतालमा या कुनै औषधी उपचार गर्ने ठाउमा समैत यदि हेलचक्राइकसैले गरेर एक विरामीलाई प्रयोग गरेको सूइ या उपकरण अर्को रोगीमाशुद्धिकरण नगरी या नवदलि प्रयोग गरियो भने पनि एड्स रोगीको रगतमारहेको एच.आइ.भी. जीवाणु अर्को बिरामीमा सर्न सक्छ । तेश्रो त थाहा पाइहाल्यौ एड्सको जीवाणु रगतमा वोकेकी आमाबाट जन्मने केही बच्चालाई योरोग गर्भ अवस्थामा रहदा या जन्मदा या जन्मेपछि पनि छिटै यी जीवाणु सर्नसक्छ । यसैले यो कुनै पनि उमेरका कुनै पनि व्यक्तिलाई सर्न सक्छ भनेको हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली : यसको मतलव रगत र सुक्रकीट (वीर्य) मा यसको किटाणु हुन्छन्‌ रजो कामुक्ता वस्‌ धेरै स्वास्नी मान्छेहरूसंग साँटो गाँठो गास्ने गुण्डाको डरलेलोग्ने मान्छे संग लुकि लुकि सम्वन्ध राख्ने गर्छन्‌ त्यस्ताहरूलाई यस रोगलेपक्रन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : यी जीवाणुहरू बच्चा बन्ने सुक्रकिटमा मात्र होइन यसलाई ग्रहण गर्नेआइमाइको अंग रस (योनी रस) मा पनि हुन्छ रे । यसैले हो लोग्ने मान्छेबाटस्वास्नी मान्छे र स्वास्नी मान्छेबाट लोग्ने मान्छैमा यो रोग सर्न सक्ने भएको ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली ; मलाई त लाग्दैछ एड्सको किटाणु कसरी सर्छ भन्ने कुराको पुरा ज्ञाननभएको हुनाले नै एच.आइ.भी, रगतमा पाउना साथ उनीहरू यस तथ्यलाईलुकाउन थाल्छन्‌ । पहिले त यो जीवाणु सर्नाको एउटै मात्र कारण शारीरिकसम्वन्ध गाँस्नाले हो भन्ने ठानेर समाजमा लाजले व्यइज्जत हुने डरले लुकाउछन्‌क्यारे ? तर यसका अरू पनि कारणहरू छन्‌ जसमा होस्‌ पुग्याउन नसकेमावालक देखि ल्याएर बुढा वुढीहरूलाई समेत सर्न सक्छ भन्ने ज्ञान हुँदौ हो तरसमाजले पनि यो उसले आफैले मात्र निम्त्याएको नभइ अरूहरूको वेहोसी रहेलचक्राइले पनि सर्न गएको हुन सक्छ भन्ने बुझि दिएमा त्यस्ता रोगीहरूलेहेला, डर र तिरस्कार जस्ता विज्ने व्यवहार सहन नपर्ने भइ रोगलाई लुकाउदैनथिए होलान्‌ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलेभद्र : ठीक भन्यौ तिमीले । यो रोग सर्न र फैलिनलाई यदि सबैले सतर्क भइदिन सके, यो नियन्त्रणमा आउन सम्ध्यो र यो समस्याको रूपमा देखा पर्दैनथ्यो ।तर धेरैलाई यस बारे थाहा नभब्इ दिनाले नै रोगलाई लुकाउदै हिड्न थालेकाहुन्‌ । के गर्नु, कस्तो छिल्लीएका रहेछन्‌ खायो स्वाद प्वाक्क भन्न पनि बेरलगाउदैनन्‌ । ली हामी लोरने मान्छेलाई त छिल्लीएको भनून या गुण्डा त्यसमात्यतिको फरक पर्दैन समाजले नै बहु स्त्री गमन गर्न छुट दिएको छ तर स्वास्नीमान्छेले के गरून ? नलुकाइ भयो र ? यही समाजले त्यस्ता कुरामा सम्मिलितआइमाइलाई हेला गर्छन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्को लुकाउनाको वाध्यता घरका सबै परिवारलाई चिन्ता हुन्छ रसमाजमा जहाँ जाउ त्यहाँ काल आएको जस्तो गरी डराएर भारने त होइन भन्नेसोचेर, बरू म आफै होशियार भएर हिड्न सके भने भै हाल्छ भनेर चुप लागेकोपनि हुन सक्छ । आखिर त्यो रोगी जसले एक पटक यही समाजमा हेलमेल राख्दैबाँचेर आएको छ त्यसले के गरी चट्टै समाजदेखि पर रहेर वस्न सक्छ ? अर्कोकुरा, यस्ता रोगी भएका घरमा छोरा छोरीको विवाह पनि नहुन सक्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली : डाक्टरले तपाईलाई जाँचेर यो जीवाणु तपाईलाई तपाइको स्वास्तीबाटपनि सरेको हुन सक्छ भन्यो भनेर मलाई सुनाउदा म कति दिकदार भएकी थिए ।मलाई चरित्रहीन संझेछ त्यस डाक्टरले भन्ने सोचेको थिए । अहिले तपाइले यीयस्ता कारणहरूबाट पनि एड्स रोग सर्न सक्छ भनेर अर्थाइ दिनु भयो र पोमसाम्य भएकि हुँ । यो कुरा सबैले जान्नु आवश्यक रहेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अँ रोगीलाई औषधी उपचारबाट निको पार्न नसकेपनि फैलिनबाट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोकथाम गर्न सकिन्छ भन्नु भएको कसरी सक्छौ त्यो पनि बताइ हाल्नोस्‌ त ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाफ मरेर जानु परे पनि सामाजिक मनुष्यको नाताले अरूलाई त आनन्दले बच्न।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : जसरी रोग सर्तमा आफ्नै वानी वेहोरा र वेहोसी ताल मुख्य छन्‌ ।त्यस्तो वानीमा सुधार ल्याएर वेहोसीपनमा सर्तकता ल्याएर गर्न सकिन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली : तर के सबै रोगीले सतर्क रहेर वस्न सक्छन्‌ र ? पहिले त्यो रोगीआफैले यसबारे पुरा ज्ञान हासिल गरेको हनुपर्छ । यसैले मलाई त जुनसुकै अर्धलगाए पनि रोग लुकाएको त ठीक लागेन । यसो गर्नु त धोका दिनु जस्तो पनिलाग्छ । यस्तो ज्यान जाने कुरामा धोका पाउनु हजार किसिमको चिन्तामा पर्नुभन्दा ठुलो कुरो हो । यसले गर्दा रोग छिटो छिटो फैलिदै गएको पनि हुन सक्छ ।रोगी उसको परिवार र समाज सवै मिलेर सतर्क रहन सके पो रोग फैलिदैन ।यो रोगलाई यसै हाउगुजी बनाइ दिएको छ । डरलाग्दा रोग के अरू पनि छैनन्‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1001&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
र ? कुलक्रमागत रोगहरू पनि लागेपछि ज्यान सिद्धीए पछि मात्र छुट्ने हुन्‌ ।त्यसमा त होस्‌ पुग्याऔ कि जेसुकै गरौ रोग लाग्ने लागि हाल्छ । वरू योएड्रसमा नै अलि विचार पुग्याउन सके यतै सर्दो रहेनछ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : यो रोग फैलिन थालेपछि यसैले त यस बारे यो के हो, कसरी सर्छ,रोकथामको लागि के गर्नु पर्छ भनेर जताततै प्रचार प्रसार बिभिन्न संघस्थानहरूले गरीरहेका छन्‌ । रगत जँचाइ रोग पत्ता लगाउनाको अर्घ नै यसमाहोस्‌ राखी फैलिन नदिनु हो । जुन रोगको औषधी नै छैन भने त्यसमाथिनियन्त्रण गर्नु वाहेक अरू के उपाय छ र ? एच.आइ.भी. पक्का रगतमा भएकोथाहा पाए पछि त्यो जाँच्ने डाक्टरलेनै यसबारे धेरै कुरा बताइ दिदा रहेछन्‌ ।मैले यति जानेको पनि तिनै डाक्टरले बताइ दिएर न हो ? (अलि गंभीर भएर)भन्छन्‌ । साँचै भनु भने आफैँले छिल्लीएर रोग निम्त्याउनेहरूलाई किन रून्छस्‌मंगले आफ्नै ढंगले भने पनि अरू कारणबाट अर्काको बेहोसीबाट जीवाणुसरेकोहरू माथि त ज्यादै दया माया सुन्दैमा पनि लाग्ने रहेछ । म ज्यादाचिन्तित हुनाको कारण पनि आफ्नो लागि होइन तिनीहरूको लागि हो । म बाटकही अरू कतैलाई सर्छ कि भन्ने हो । अरूको वाच्ने हक मैले रोग सारेर छिन्नसक्दिन नी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली : मलाई मात्र लागेको छैन र ? म पो एच.आइ.भी. पक्का लिएर बसेकोछु कि जस्तो लाग्दैछ। तपाईलाई जाँच्ने डाक्टरले म प्रति उठाएको शंका मनासिबनै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो । हेर्नोसन हामीले त शंका लाग्नासाथ रगत जँचाई सतर्क हुन पर्छ भन्नेलागेर यी सव गर्दैछौं तर ती जसलाई यसबारे कुनै ज्ञानै छैन, रोगले छोएको छया छैन भन्ने सम्म पनि थाहा पाएका छैनन्‌ तिनीहरूले अन्जानमा नै कतिलाईयो रोगको किटाणु सारी रहेका होलान्‌ । तिनीहरू जो नत लेखेको पढ्न जानेकाहुन्छन्‌ नत रगत जचाउनु पर्छ भनेको अर्थै वुझेका हुन्छन्‌ त्यस्तालाई संझाउनेउपाय पनि गर्नु आवश्यक छ, होड्नन त ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : आवश्यक किन नहुनु । शुरूमा फाट फूट मात्र देखा परेको यो रोगलेसंसारका झण्डै सवै मुलुक जस्तोमा पुगिसकेको छ । हाम्रौ देशमा पनि कत्तिलाईयस रोगको जीवाणु सरी सकेको होला ? यसरी फैलिनको कारण अज्ञानता नै तहो?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली : होइन, यो ज्यानमारा रोग पहिले कताबाट आएछ ?बलभद्र : यो रोगको जीवाणु पहिले अमेरीकामा देखा परेको थियो रे । त्यस पछिअफ्रिका महादेशमा फैलिन गयो र अहिले एशियामा पनि जोड तोडले फैलिदै छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जन्मजात एड्सको जीवाणु भएको बच्चाहरू अफ्रिकामा निकै छन्‌ रे भन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली : कस्तो अचम्म लाग्दो छ यो । त्यो कता हो कताको देशबाट यो रोगआएर नेपालको यति सानो सानो गाउमा समेत छिरिसकेको छ । राम्रो कुरायसरी फैलिएको भए कत्रो देश विकास हुन्थ्यो होला । त्यो चाही हुदैन, यी यस्तारोप शोक मात्र भित्रिएका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्व : यस्तै छ यो । मान्छेले पहिले नराम्रै कुरा झट्ट सिक्दा रहेछन्‌ । आजसंसारभरका मान्छे एक कनाबाट अर्को कुनामा पुगि रहेका छन्‌ । मिसिएकोसंस्कृति भइसकेको छु । जसै यस्ता हेलमेल एक देशबाट अर्को देशसंग हुदै जानथाल्यो रोगका जीवाणुहरू पनि उनीहरूबाट नै भित्रिदै जान थाले । के गर्छौआजको यो विकासको युगमा एक्र देशले अर्को देशसंग सम्वन्ध नवढाई, नराखीसुखै छैन । त्यसमा पनि हाम्रो जस्तो मध्यवर्ती राष्ट्र, जसको आधार नै बैदेशिकसम्बन्ध सुदृढ राख्नमा छ र जसको धेरै जम्तो आम्दानी पर्यटकहरूबाट नै हुने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली : यस्तो हेरि ल्याए हो त हामीलाई दैनिक उपभोगको सामानजुटाउनलाई पनि तिनैमा भरपर्नु पर्छु र ती आएर मोज मस्ती गर्दा यस्ता रोगपति आउने नै भए । यो हुनमा पनि हाम्रै मजवुरी छ भन्नु पर्छ । मलाई तलाग्दैछ वेश्यावृत्ति मात्र हटाए पछि पनि अरू कतिपय कारणहरूबाट सर्न सक्नेहुँदा यसलाई निर्मूल पार्न औषधी नै ननिस्केसम्म गाउ्हो पर्न सक्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्व : निर्मूल पार्न अहिले नसके पनि रोग सर्न सक्ने अवस्था हटाउन जनचेतना बढाउन सकेमा पनि यो रोग फैलिनबाट रोक्न सकिन्छ । फैलिनबाटरोक्नु पनि रोगीको संख्या घटाउनु हुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली : हुन त हो, तर के यो सम्भव होला र भन्ने शंका लाग्छ । विरामीभएपछि अस्पताल जानै पर्छ त्यहाँ के कसो गर्छन्‌ थाहा हुदैन । त्यहाबाट पनिसर्ने सम्भावना हुन्छ भन्नु हुन्छ । घरमा समाजमा बसेपछि घाउ चोट नलाग्लाभन्ने सकिदैन । कतैबाट झुक्किएर नै पनि छवास्स भयो भने सरी हाल्दोरहेछ ।फेरि बार बार स्वास्थ्य परीक्षण गरी रोग लागेको छ कि छैन भन्ने जाँच्ने हाम्रोचलननै छैन । अनि ? हुन सक्छ अहिले हाम्रो गाउमा नै कत्तिको रगतमा योएच.आइ. भी. .&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भइरहेको । त्यो कुरा कसलाई थाहा छ : हेर्दा पत्ता पाइने यो होइन रहेछ । लौ,तपाइलाईनै यस्तो जीवाणु शरीरमा लिएर हिड्नु भएको छ भनेर कसले भन्नसक्छ, सक्छ ? केही कृहिएर गन्हाएको पनि छैन कहि केही दुखेको पनि छैन, नतकुनै विरामीको चिन्ह नै देखा परेको छ। धोखा खाने त, यो अवस्थामा हुँदा पो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
00&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रहेछ । रोगले ढालेपछि त ख्याल राख्न सबैले सक्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्व : यो रोगले ल्याएको समस्यानै यही त हो । जीवाणु शरीरमा पसेपछिपनि दुइ देखि तीन मिहिना सम्म त रगत जँचाउदा पति पत्ता नलाग्न सक्छ तरयस्तो अवस्थामा पनि सो व्यक्तिद्वारा अरूलाई जीवाणु सर्न भने सक्छ र सरीरहेको पनि हुन सक्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली : अर्को कुरा फेरि निकाल्नु भयो । अनि कसरी कहिले त्यो जीवाणुरगतमा भएको थाहा पाइन्छ त ? कति वर्ष सम्म त्यस्ता जीवाणु लिएर बाँच्नसकिन्छ । फेरि राम्ररी अन्नोस्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : डाक्टरका जाँदैछौ उसैले राम्ररी तिमीलाई पनि बताउला । एड्स भएकोरोगीको परिवारलाई पनि यदि रोगी आफैले पहिले वताइ सकेको छ भने यस्तरोगी सँग कस्तो व्यवहार गर्नु पर्छु भनेर बताइ दिदा रहेछन्‌ । मैले आफुलाईलागेको रोग तिमीलाई वताइ सकेको छु भन्यौ भने तिनीहरूले सबै कुरा बताइदिन्छन्‌ । त्यो तिमीले भनि दिनु पर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली : अहिले तपाइले जाने जति त बताइ दिनोस्‌ नत्र म लाटी जस्तोहुन्छु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : त्यासे भन्छौ भने लौ सुन । साधारण हिसावले यो जीवाणु रगतमा देखापर्न लिने समय दुइ देखि तीन महिना नै हौ । कुनै कुनै केसमा मात्र तीनमहिनासम्म पनि नदेखिन सक्छ । तर केही दिनको फरक भए पनि देखिन भनेरगतमा देखिन्छ नै । यसैले आफु पुरा बिश्वस्त नहुन्जेलसम्म शंका लागेमा रगतजचाउदै जानु पर्छ । ती जीवाणुहरू शरीरमा प्रवेश गरी हुर्केर फैलिन थाले पछिशरीरलाई विभिन्न रोग लाग्नबाट सुरक्षा गर्न सक्ने शक्तिशाली सेतारक्तकोषलाई मारेर जुनसुकै रोगले आक्रमण गरेकी ढाल्न सक्ने स्थितिमारोगीलाई पुन्याउन वढीमा दशवर्ष सम्म पनि लगाउन सक्छु । घमिराले काठ भित्रभित्रै कुटकुदु काटेको जस्तो गरी शरीरलाई खोक्रो पारेर लगे पछि जुन रोगलेछुन्छु त्यँही रोगलाई उसको निमित्त कालले पठाएको निम्तो माने हुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली : भो ... भो यही चाण्डाल रोग बारे मात्र कति कुरा गरी दुखी हुनै ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टर साहवले अव जे भन्छन्‌ हामी त्यसै गरौला भै हाल्यो । हामीले नजानेकाकुरा पनि कति छन्‌ होलान्‌ । दशवर्ष सम्म वाँचेन सकिदो रहेछ भने अरू धेरै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्ष हिफाजतमा रहे बाँच्न नसक्रिएला त ? जसरी हुन्छ बाँच्ने समय लम्बाउनसके भैहाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र हाँस्दै भन्छन्‌, “आशा गर्नाले नै हौसला पनि दिन्छ । राम्रो बाटो लिन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्ध&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लागेकी छौ, जीवनमा निराश कुनै हालतमा पनि नभए । तिमीले सहनु पर्नै धैरैकुराहरू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छन्‌ । हो, यो एड्सको जीवाणुको शिकार भएपछि कतिसम्म जीवन लम्वाउनसकिन्छ भन्ने पनि रोगी रोगी पिच्छे फरक फरक हुन्छ । कूनैं एकै वर्षमा वितेकाछन्‌ भने कुनै एक दशकसम्म पनि । त्यो रोगीको सेतो रक्तकोशमा रहेको सुरक्षाशक्तिमा भर पर्छ । रक्सी एवं अन्य लागु पदार्थको सेवन नगरेर, राम्रो पौष्टिकआहार खाएर व्यक्तिगत सरसफाइ गरेर आफ्ना दैनिक कृयाकलाप यथावत्‌ राखेरआफ्नो कुनै हानीकारक वानीहरू छन्‌ भने सुधारेर र राम्रो हेरविचार त्यस्तारोगीहरूलाई पुन्याउन सकियो भने पनि उसको आयु केही मात्रामा वढ्न सक्छभन्ने भनाइ पनि छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शयामली : हेदै जानोस्‌ तपाइको श्वेत रक्तकोशको शक्तिले संसारको रेकर्ड ब्रेकगर्नु सक्ने हुने छ । म तपाइको राम्रो हेरचाह गर्छु । यसै त्यस रोगलाई जित्नकहाँ दिन्छु र ? अफसोच मान्दै भन्छिन्‌, “हामीले आज गरेका यति कुरा पहिलेनै जान्न सकेको भए हाम्रो यो गति हुनेनै थिएन । यही त हाम्रो कमजोरी हो ।नपरिकेन ... कहिल्यै पनि तात्दैनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : यो व्यस्त संसारमा आफुलाई अल्मलाउदै कुन कुरा कुन बेला जान्नुजरूरी छ ? यो छुटाउन नसकेर त यस्तो भएको छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले यो रोग आफुलाई लागेको थाहा पाएपछि मात्र यसबारे किताव ल्याएर पढेको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टरसँग सल्लाह लिएको हुँ । मैले यदि यस्तो रोग के बाट सर्छ आफैलाई पनिसर्छ कि भनेर बिचार गरेको भए, एड्स भन्नै डरलाग्दो रोगको आजभोलीबिगविगी छ भन्ने मात्र सुनेको थिए त्यो भन्दा बढी यसबारे बुझ्ने कोशिशै पनिगरिन । म जस्तै थुप्रो अझै यहा कति छन्‌ कति । सुन्यौ, अव हामीले यो रोगबारे हाम्रो गाउमा सबैलाई जानकारी गराउन सहयोग गर्नु पर्छ । यसैको प्रचरप्रसारमा समर्पित भएर वाँचौ र अरूलाई बचाऔँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
षयामली : हुन्छ, हामी त्यसै गरौला । यसमा जस्तो ठूलो सेवा अरू के माछर्‌?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जन सन्देश :&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एड्स रोगको जीवाणु एच.आइ.भी. हो । यसले मान्छेको रगतमा रहेको सुरक्षागर्ने श्वेत कोशलाई सखाप पारेर उसको शरीरलाई असुरक्षित पारी दिन्छ अनि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
॥ 0]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जुनसुकै रोगले छोए पनि त्यो वै निको हुन नसकेर उसको मृत्युको कारण वन्नसक्छ । यस्ता जीवाणुबाट बचौ र बचाऔ । यसको औषधी नभए पनि सर्नबाटबच्न सक्ने उपायहरूछन्‌ । जीवन अति अमूल्य छ र कसैको पनि बाँच्ने अधिकारनछिन्न यस्ता जीवाणुसँग होस्‌ पुग्याइ सचेत हौ । शंका लागेमा आफ्नो रगतजचाउन पनि नविर्सियौ । यो रोगको आफ्नै कुनै लक्षण हुदैन । यसले स्वास्थगिराइ जुनसुकै रोग पनि लाग्न सक्ने अवस्थामा मान्छेको शरीरलाई पुस्याइदिन्छु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
॥ 4टेक्‌ अस्पतालमा रगतको रिपोर्ट लित दुवै कुर्दैछन्‌ । दुबै भयभित छन्‌ ।कस्तो रिपोर्ट आउने हो भनेर शशंकित भएका छन्‌ । श्यामली वलभद्रलाई भन्छिन्‌“मेरो मुटु कस्तो गरी उफ्रिरहेको छ, हे गणेश राम्रो कुरा सुनाउ । म तिमीलाईएकसय आठ लड्डु चढाउछु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : तिम्रो रगतमा मात्र केही छैन भने पुग्छ । त्यो वच्चा र तिमी दुवैबाँच्ने थियौ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली : आँ ...... नकराउनु होस्‌ तपाइ त । मैले भगवानलाई भित्री मन देखिपुकारेको छु कं थाहा ती एच.आइ.भी. जीवाणुलाई भष्म पारी पो दिन्छन्‌ कि ।भगवानको शक्तिलाई नतौलनु होस्‌ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : गंभीर भएकी श्यामलीलाई हसाँउन खोज्दै भन्छन्‌, “त्यसो भयो भने कियिनीहरूलाई नजान्ने डाक्टर भन्नु पर्छ कि त संसारको अदभूतको नम्वरमा अर्कोएक नम्बर जोड्नु पर्छ । एड्सको औषधी उपचारनै तिम्रो भगवानसँगको प्रार्थनामानेर सवै यहाँ डाक्टर जचाउन गएका भन्दा बढी संख्यामा तिमी कहाँ प्रार्थना &#039;गराउन आउथै होलान्‌ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सत्यको सामना गर्न सक्ने हामी वन्नु पर्छ । यो भावना तिमीमा आएकोभयले हो । यसरी पहिले नै डराएर पनि काम चल्छ । बलभद्र हाँस्न थाल्छन, ।श्यामलीलाई झोंक चल्छ र मुरमुरिदै चुप लागिछन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकछिन क्रेपछि श्यामलीलाई बोलाउदै डाक्टरको आदेश लिएर नर्सआइ पुग्छिन्‌ । श्यामली आफ्नो परिचय दिदै उदछिन्‌ र वलभद्वलाई पनि आफ्नोसाथ भित्र जान आग्रह गर्छिन्‌ । बलभद्र मान्दैनन्‌ र उसैलाई जान जोड गर्छन्‌श्यामली रून्चे स्वरले भन्छिन्‌, “हेर्नोस न खुट्टै काँपेर अगाडि सर्दैन म के गर्छ ?नर्सलाई त्यहाँ कुरेर वस्ने फुर्सत हुदैन र श्यामलीलाई छिटो हिड्न ताकितालगाउछिन्‌ । उनलाई लुरू लुरू नर्सको पछि लाग्दै डाक्टर कहाँ जानै पर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यहाँ डाक्टर आफु जस्तै आइमाइ भएकोले उनीमा केही साहस आउछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टरले पनि श्यामली डारएकी थाहा पाएर पहिले नै भयरहित पार्न भन्छिन्‌“श्यामली तपाइकै नाम होइन ? तँपाइकी रगतमा एच.आइ.भी. एड्सको किटाण्‌रहनेछ । यसैले ढुक्क भएर वसे हुन्छ । वच्चा हुने रहेछ त्यसमा पनि पिर लिन्‌पर्दैन । उ पनि सुरक्षित छ । केवल तीन चार महिना पछि फेरि एक पटक रगतजँचाउनु होला ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इयामली आफु र आफ्नो हुने वच्चा सुरक्षित रहेको सुनेर पनि फेरित्यसरी नै डराइ डराइ सोध्छिन्‌, &amp;quot;अनि मेरो श्रीमानको रगतमा पनि छैन ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टर : को तँपाइको श्रीमान वलभद्र ?श्यामली : हो, वहा नै मेरो श्रीमान हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टर : ए......... । बहाले तपाईलाई केही वताउनु भएको छैन ? कलकत्तामापनि रगत जचाएको थिए भन्नु हुन्थ्यो ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्यामली : भन्नु भएको छ । वहाको रगतमा यही एड्सको जीवाणु देखा परेको छरै तर मलाई विश्वास नलागेर यहाँ पनि जचाउन लगाएकी हुँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टर : हो वहाको रगतमा भने त्यस्ता जीवाणुहरू रहेको पाइको छ्‌ ।तपाईहरूले अव खूव होस्‌ पुन्याएर जीवन बिताउनु पर्छ । बलभद्रजीलाई अर्कोडाक्टर साहवले वताउदै होलान्‌ म तपाईंलाई के कसो गर्नु पर्छ वताइ दिन्छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली : त्यस्ता अर्ति बुद्धि तपाइबाट पाउन सके भने म जसो भन्नु हुन्छ त्यसैगरि हाल्छु नी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टर : तँपाइलाई थाहा छ कि छैन, यो रोगका जीवाणुहरू शरीरमा पसे पछिबिस्तारै ढाली हाल्छ र यसलाई निको पार्ने कुनै औषधि आएकै छैन । लामो समयझण्डै दशवर्ष सम्म पनि यो जीवाणु रगतमा लिएर मान्छे वाँच्न सक्छ । तसर्थयस्ता रोगीहरूलाई परिवारको साथमा घरैमा रही अरू सदस्यले जस्तै गरीसामान्य जीवन विताउन दिनुपर्छ । यस्ता रोग लागेका व्यक्तिहरू धेरै जसोभानसिक तनावमा हुन्छन्‌ । यिनीहरू आफ्नो सन्तुलन हराउन जाँदा जे जसोपनि गर्न सक्छन्‌ । त्यसैले यस्ता रौगीहरूसँग व्यबहार गर्दा उनीहरूलाई हेला गर्नुहुदैन । उसलाई एउटा बोझ जस्तो मान्नु हुदैन । उनीहरू जे जति वाँच्छन्‌तिनलाई शान्ति ले सामान्य रूपले बाँच्न दिनु पर्छ । त्यस्ता रोगीहरूसँग साथैहेलमेल गरेर रहदा जति रोगका जीवाणु सर्न सक्ने सम्भावना छन्‌ त्यस प्रतिहोशियार रहनु पर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली : कस्ता कस्ता कुरामा सर्ने सम्भावना रहेको हुन्छ, के त्यो मलाई वताइ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिनु हुन्छ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टरले तिनै कुरा दोहन्याउछिन्‌ जुन वलभद्रले उनलाई बताएका थिए । “जोपायो त्यै अपरचित व्यक्तिसँग यौन सम्बन्ध असुरक्षितरूपले राख्नाले यदि त्योव्यक्तिको रगतमा एच.आइ.भी. जीवाणु रहेछ भने सर्न सक्छ । अर्को एड्सकोजीवाणु भएको व्यक्तिको रगत कुनै प्रकारले, रगत दिएर या उसलाई प्रयोग गरेकोछाला छेड्ने प्रदूषित औजार अर्कोमा प्रयोग गरेर या रोगीको घाउचोटबाटनिस्केको आलो रगतमा अर्को स्वस्थ्य मान्छेको शरीरको कुनै पनि अंगमा घाउ याचोट छ र त्यसको सम्पर्क हुन गएमा ती जीवाणुहरू एकबाट अर्कोमा जानसक्छ । तेश्रो जीवाणु भएको गर्भवती महिलाबाट सन्तानलाई सर्ने केही सम्भावनाहुन्छ जस्तो त्यस्ता महिलाको गर्भास्थानमा रहेको अवस्थाको शिशुलाई, त्यसलाईजन्माउने वेलामा र जन्माए पछि पनि त्यस्ता सन्तानमा जीवाणु छिटै देखा पर्नसक्छ । यसैले यतिमा बिचार पुग्याउन सकेमा रोगी देखि भाग्नु पर्दैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली : रतिक्रिडाबाट यो रोग सर्छ भने म बहाँकी स्वास्नीलाई कसरी सरे नत ? मैले गर्भ धारण पनि गरी सकेको छु?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टर : यो जीवाणु तपाइको श्रीमानमा सर्नु भन्दा पहिले नै तपाइले गर्भधारणगरेको हुनुपर्छ तँपाईमा त्यो देखिने समय पुगेको छैन । यसैले तीन महिना पछिफेरि रगत जचाउनु होला भनेकी हुँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली : तपाइले त यो कुरा थाहा नै पाएको जस्तो गरी भन्नु भयो । फेरि तीनमहिना पछि मेरो रगत जचाइ रहनु पर्ला र ? विवाह भएको पन्ध दिन पछिकलकत्ता गएको मान्छे अस्ति मात्र यो खवर लिएर आउनु भयो । त्यसपछि हाम्रोकुनै सम्बन्ध भएकै छैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टर : तैपनि एकफेर जचाउनु पर्छ । यसै पनि गर्भवति महिलाले रगत जचाइनै रहनु पर्ने हुन्छ । हेर्नोस तपाइहरूले बेलैमा आफ्नो रगत जचाएर कति राम्रोगर्नु भएको छ । बच्चा बच्यो । आफु वाँच्न पाइयो । एड्स रोगको जीवाणु देखापरेको कुनै पनि व्यक्तिको घरका सदस्यहरूले आफ्नो स्वास्थ्य परीक्षा गरी रहनुउत्तम हुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तपाईहरूको भरखर विवाह भएको रहेछ । पहिलो सन्तान हुँदा नै यस्तो अवस्थाआइ पप्यो । तर डराइ हाल्नु पर्दैन । मैले भने झै होस्‌ पुस्याउन भने नछोड्नुहोला । तपाईहरू लोग्ने स्वास्नीकै रूपमा पनि रहन सक्नु हुन्छ केवल कण्डमप्रयोग गर्न मात्र नभुल्नु होला । यो रोगको जीवाणु पुरूषको शुक्रकिटमा रनारीको अंगरस (योनी रस) मा पनि रगतमा जस्तै गरी रहने हुँदा यसबाट वच्नेउपाय यही कण्डमको प्रयोग नै हो जसले एड्सको रोगी संग-या यौन रोगीसंग&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
च््ठ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खुला सम्बन्ध राखी रोग सार्नुबाट वचाउछ । अर्को आफ्नो अंगमा कही घाउचोट छ भने यस्ता रोगीको शरीरबाट निस्केको आलो रगत नछुनु जसबाट रोगसर्ने सम्भावना हुन्छ । अरू अस्पतालबाट सर्न सक्ने सम्भावना हामी हेरिहाल्छौ । त्यसमा तपाइहरूले चिन्ता लिनु पर्दैन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली : तँपाइलाई मेरो प्रश्न सुन्दा सुन्दै र जवाफ दिदा दिदै झर्को लागेकोछैन भने अस्पतालमा पनि के कसरी विचार पुन्याउने गर्छन्‌ त्यो पनि बताइ दिनुहुन्छ कि ? हाम्रो गाउमा सानो एउटा हेल्थ पोष्ट मात्र छ । त्यहाँ कसैलेहेलचक्राइ गच्यो भने हामी रोगका शिकार बन्न जाने छौं । त्यहाँ नगइ हामीलाईसुखै हुँदैन त्यसैले त्यस्ता कुरा पनि जानि राखौ भनेकी ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टर : एड्सको रोगीलाई प्रयोग गरेको औषधि उपचारका सरसामानहरूलाईरोगको किटाणुहरू मार्न कम्तिमा पन्रि २० मिनेटसम्म भक भक पानीमा उमाल्नुपर्छु र जुन समान उमाल्न नहुने खाल्का हुन्छन्‌ त्यस्तालाई जीवाणु मार्नेऔषधीमा डुवाउनु पर्छ । ल्कोरिन, हाइड्रोजन पेरोक्साइड जस्ता केमिकलहरूपाइन्छ त्यसको प्रयोगबाट शुद्धीकरण गर्न सकिन्छ । यसरी अस्पतालमाएड्सको रोगीलाई प्रयोग गरेको मात्र होइन अरू विरामीलाई प्रयोग गरेको यस्ताउपकरणहरू पनि यसरी किटाणु रहित पारेर मात्र अर्कोलाई प्रयोग गर्ने गरिन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्को क्रा कुनै पनि विरामीलाई रगतको कमी रहदा रगत दिनु पच्योभने पहिले रगत दिने व्यक्तिको रगत जाचेर त्यसलाई एड्स रोग छ कि छैन त्योनिश्चय गरेर मात्र दिनु पर्छ र त्यो हामी गर्छौं पनि । यो तपाईहरूको चिन्ताकोकुरै होइन हामीमा विश्वास गरे पुग्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बरू तपाइहरूले विरामीले प्रयोग गरका लुगाफाटा सुतेका तन्ना डस्नाघाममा वार वार सुकाउने गर्नु भएमा राम्रो हुन्छ । एड्सका जीवाणुहरू चर्कोघामा खप्न सक्दैनन्‌ र मर्छन्‌ । यी जीवाणुहरूले शरीरलाई छुने वित्तिकै जुकाजस्तो गरी टाँसिएर आफै छाला छेडेर भित्र पस्न सक्दैनन्‌ । यसैले यस्ता रोगीकोरगतलाई घाउ खटिरा नभएको अंगले केही गरी छोइएछ भने पनि सावन पानीलेराम्ररी घोइ पखाली गर्नाले आपतबाट वच्न सकिन्छ । एड्सको रोगीले प्रयोग गर्नेगरेको फ्याउरी र पन्तिले अर्को निरोगी व्यक्तिलाई दान्ही काट्न दिनु हुन्न ।यसबाट केही मात्रामा रौग सर्न सक्ने सम्भावना हुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामलीले धेरै जसो कुरा वलभद्रले भनेको मिलेको भए पनि डाक्टरबाटआफुले सोझै सुन्ने विचार राखी प्रश्न गर्दै जान्छिन्‌, “यी सबै कुरा तपाईलेबताउनु भएको त एड्स रोगी चिने पछि गर्ने सावधानी भए तर एड्स लागेकोकस्लाई छ भनेर कसरी चिन्ने ? पहिले पहिले त यो रोगको जीवाणु शरीरमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ष१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पसिसकेको पत्तै पाइदो रहेनछ । अहिले हाम्रै श्रीमानलाई हेरौं कसले बहालाई यसरोगको जीवाणु वोकेर हिडीरहेको छ भन्ने थाहा पाउन सक्छ ? डाक्टरले जवाफदिन्छिन्‌, “यस्ता रोगका जीवाणु कसैमा छ कि छैन भनि जान्ने उपाय मुख्य तयही रगत परिक्षण गरेरनै हो । त्यसैले कुनै व्यक्तिलाई धेरै दिन सम्म पखालालागि रहयो या मन्द मन्द ज्वरो आइ रहन थाल्यो या खोकी निकै नहुने भयो याशरीरको तौल १० प्रतिशत जति घट्दै जान थाल्यो या कुनै त्यस्तै यौन रोगलागेको व्यक्तिसँग शारीरिक सम्बन्ध बिना साधन प्रयोग गरी हुन गयो याकसैको वेश्यालय धाउने वानी छ या लुकिछिपी यस्तो सम्वन्ध धेरैव्यक्तिसंग या अपरिचित व्यक्तिसंग गर्ने गरेको छ भने रगत वार वार जचाइआफ्नो स्वास्थ्यको जानकारी लिने गर्नुपर्छ । मैले यसो भने भनेर फेरि यस्ताप्रकृति देखा परेका सबैलाई एड्स नै भद्दसकेको हुन्छ भन्ने पनि निश्चित छैननत अहिले भने जस्तै एड्स रोगीले सुत्ने गरैको विछ्याउना तथा ओडङ्नेहरूघाममा सुकाउने गर्नोस भन्दा त्यसमा एड्स रोगको जीवाणु एड्स रोगीकोशरीरबाट निस्केर त्यसमा रहिरहेको हुन्छ भनेको हो । यस्ता जीवाणुहरू पनिरोगीको शरीरबाट निस्केर अर्को शरीरमा तुरून्तै पस्न पाएन भने घामको चर्कोरापले मर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वच्छ मान्छेलाई एड्स रोगीसँग बच्ने उपाय गर्नु जति जरूरी छ त्यस्तैएड्सका जीबाण्‌ वोकेर वसेका व्यक्तिहरूलाई पनि अरू कुनै रोगले छुन्छकिभनेर, सतर्क रहनु जरूरी छ । त्यसैले यस्ता सरसफाइ भइरहेमा रोगले छौए पनिधेरै दिन बाँच्न सकिन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली अलि हाँस्दै भन्छिन्‌, “सतर्क रहनु पर्ने जति त सबै वताउनुभयो अब चिन्ता गर्नु नपर्ने सम्वन्ध वारे पनि वताई दिनु हुन्छ कि ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टर पनि हाँस्दै भन्छिन्‌, “एड्स रोगीसँग यस्ता सदै सामान्य- व्यवहार गर्नसकिन्छ जस्तो हात मिलाउनु, अंगालो हाल्नु, म्बाइ खानु, खोकी वा हाछ्ययू गर्नुसँगै वसेर खानु या साथै सुत्नु एउटै चर्पी प्रयोग गर्नु सँगै पौडी खेल्नु, एउटै लुगाफाटो प्रयोग गर्नु र एउटै खाने भाँडा कुँडा प्रयोग गर्दा पनि सर्दैन । यो लुतो सरीसर्ने रोग होइन । वताइ हाले यो अंकुशे जुकाले जस्तो गरी हाम्रो शरीरमाबाहिरी छालाको पत्र आफैले छेडेर पस्न सक्दैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यस्तो रगत चुस्ने किराहरू या कुनै पनि अरू किराहरूले यो रोग सार्नसक्दैन । जस्तो मेलेरिया लामखुट्टेले सार्छु त्यसै किसिमले यसले पनि सार्लानीभनेर डराउनु पर्दैन किन कि यसको सुँढमा यति धोरै रगत अटाएको हुन्छत्यसबाट हामीमा संक्रमण हुन सक्दैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
५२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शयामली : कसरी सक्दैन डाक्टर साहब / त्यसको सुँडमा जति भए पनि रगतलागेको त हुन्छत्यही पस्यो भने ? मेलेरियामा पनि त त्यति थोरै रगतले नैत्यस्तो पार्दो रहेछु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टर : एड्स ल्लामखुट्टेबाट नसर्नाको कारण यस्ता छन्‌, एक सुड वाहिरलागेको रगत यति थोरै हुन्छ जुन एकवाजी बाहिर पर्ना साथै यसको जीवाणु मर्छर दोश्रो जति रगत त्यसको शरीरभित्र घुसेको हुन्छ त्यसले औलो रोगका किटाणुलामखुट्टेको शरीरमा बसेर थुप्रै साखा सन्तान फैलाए जस्तो गरी फैलाई अर्कोव्यक्तिमा संक्रमण गर्न सक्दैन्‌ । यसबारे अनुसन्धान गरी तथ्य स्थापित विश्वस्वास्थ्य संघले गरी सकेको छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली : तपाईंले यक्तरी बताइ दिदा त मेरो डर यसै हरायो । एड्सभएकाहरूसँग साथै वसेर जीवन गुजारा गर्न पनि त्यति पहिले सोचेकी जस्तोगाउ्हो रहेन छ केवल हेलचक्राइ् नगरे हुदो रहेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टर : एड्स तुरून्त छुदैमा सर्छ कि भनेर डराइ कति मान्छेहरूले एड्सभएका रोगीहरू देखि टाढा रहन खोज्छन्‌ । आगाडि परेमा पनि कतिले छि ....छि.... दुर दुर गर्छन्‌ तर यस्ता रोगीहरूसँग यस्तो व्यवहार गर्नु राम्रो कुरा होइनकिन कि यो रोग उस्ले आफैले मात्र सारेको नभइ अरूको गल्तिले पनि सरेकोहुन सक्छु । जब यो रोगको सर्न नसक्ने उपायहरू पनि छन्‌ भने र जुनउपायहरू त्यति अव्यबहारीक पनि छैनन्‌ केवल विचार पुच्याएर सतर्क रहेर मात्रपनि पुग्छ भने हामीले त्यस्ता उपायहरू अपनाइ रोगीसँग सर्वसाधारण तरिकालेव्यवहार गर्दै जानु पर्छ । सरूवा रोग भन्दैमा जे जसो गरे पनि सरि हाल्ने पनित्यो होइन । जसको नातेदारलाई यो रोग लागेको छ त्यसले भन्छ, “रोगीलाई यसैमरोस्‌ जस्तो गरी पन्छाउनु हुदैन । उसलाई कतिसम्म बचाउन सकिन्छत्यतिसम्म वचाउने उपायहरू हामीले गर्नै पर्छु : जसलाई यस्तो परेको छैनउसले भन्छ, “आखिर त्यो जति गरे पनि बाँच्ने होइन धेरै दिन बचाएर आपतकिन मोल्नु ? त्यो सँग हेलमेल किन राख्नु ? सोचाइमा यस्तो भिन्नता आउनाकोकारण हामीले मानवलाई मानबै भएर माया गर्न नजानेर हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यसमा सोच्नु पर्ने खास कुरा रोगी प्रति नै हो । उस्ले चाहेर रोगनिम्त्याएको हुदैन । उसले पनि बाँच्न चाहेको हुन्छ । उसलाई पनि आफ्नोपरिबार समाजको माया हुन्छ उ झन धेरै मानसिक तनावमा हुन्छ र उआफुलाई के म सवैको मृत्युको कारण त बन्न जान्न भन्ने चिन्ताले सताइरहेको हुन्छ । प्रत्येक व्यक्तिको बाँच्ने अधिकार छ । यसैले यदि कुनै उपायहरूछन्‌ जसलाई अपनाउदा रोगी र अर्को स्वच्छ, दुबैलाई हानी पुन्याउदैन भनेहामीले त्यस्ता काम गर्नु पर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
५३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली : डाक्टर साहव, यो एड्स भएपछि मरिन्छु भने पनि कति वर्ष बाँच्नसकेका )॥/ ५ बचाउन सकिन्छ । मेरो श्रीमानले त भन्दै हुनुहुन्थ्यो, “यसकोऔषधि त छैन तर आफ्नो दैनिक कृयाकलाप यथावत्‌ राखेर, रक्सी चुरोट एवंअन्य लागु पदार्थ जस्ता हानीकारक वस्तुको सेवन नगरेमा असुरक्षित रूपले यौनसम्वन्ध नगरेमा र राम्रो पौष्टिक. आहार खाइ व्यक्तिगत सरसफाइमा रहन सक्योभने वाकि जीवन केही हदसम्म लम्व्याउन सकिन्छ भन्थे, के पो साँचो हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टर : हो, राम्रो हिफाजतको साथमा रहन सके केही वर्ष बढी बाँच्न सकिन्छ। अहिले सम्म वाचेैकामा १० वर्षसम्म यो रोगको जीवाणु लिएर वाचेका छन्‌ ।तर यति लामो समय सम्म बाच्ने थोरै मात्र छन्‌ । धेरै जसा दुइ तीन वर्षमा नैवित्छन्‌ । कति दिनसम्म उसको श्वेत रक्त कोशको शक्तिले उसलाई रोगबाटबचाउन सक्छ त्यति सम्म उ बाँच्न सक्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इयामली : अनि मेरो श्रीमानले भन्नु भएको, यो एड्सको जीवाणुले रगतमा हुनेयीनै सुरक्षा श्वेत रक्तकोशलाई खाइ रोगीलाई खोक्रो कम्जोर वनाइ् दिएर जुनसुकै रोग पनि सर्न सक्ने अवस्थामा पुस्याइ दिन्छ र मामुली रूवा खोकी जस्तोरोगले छुँदा पनि त्यही नै कालको अन्तिम निम्तो हुन जान्छ रे, हो त डाक्टरसाहव ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टर : हो, यसले त्यस्तै गर्छ । तपाइको श्रीमानले धेरै कुरा जानी सकेकारहेछन्‌ अव गाउमा गएर राम्ररी वस्नु होला र अरूलाई रोग सर्न जाने उपायमासतर्क रहदै आफ्नो श्रीमानलाई पनि बचाउनु होला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली : हस्‌ त डाक्टर साहब तपाईसँग धेरै वेर वसेर धेरै कुरा सिकेर जाँदैछुनहुनु पर्ने कुरा भएपछि अब बचाउने र बाँच्ने उपाय गर्नै पन्यो । अहिले मजान्छु नमस्कार भनेर त्यहाँबाट निस्कन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टर पनि नमस्कार फर्काउदै उनी गएको तर्फ हेरि रहन्छिन्‌ । उनलाई तीदुईको अव वित्ने जीवनले कस्तो रूप लिने हो भन्ने सोचेर टोलाई रहन्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाहिर निस्कदा बलभद्र त्यहाँ हदैनन्‌ । श्यामल मनमा अनेकौ कुराखेलाई उनलाई पर्खेर वसिरहेकी हुन्छिन्‌ । डाक्टर कहाँबाट बलभद्र निस्कनासाथश्यामली जुरूक्क उठ्दै हिड्नोस्‌ वाहिर निस्कौ, मेरो त टाउको फुटला जस्तोगरी चड्की रहेछ । यो अस्पतालको गन्ध सुङ्दै ढुक्ने काम पनि कहिल्यै कसैलाईनपरोस्‌ भन्छिन्‌, फेरि वलभद्र, श्यामलीलाई जिस्काइ हसाउने सोचाइले भन्छन्‌,“यस्तो त कसैलाई परोस्‌ भन्न पनि हुदैन । अस्पताल धाउनाको कारण कुनै नकुनै विरामी भएर नै हुन्छ, लौ हिड बाहिरै जाउ भनेर श्यामलीलाई लिएरनिस्कन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श््&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काठमाण्डूको लजको एउटा कोठा जहाँ बत्ति निभ्ने दिन भएकोलेअंध्यारो छ त्यहाँ यी दुई दम्पत्ति अ-आफ्नो बेदना एक अर्कोलाई खोलेर सुनाउदैछन्‌ । बलभद्र भन्छन्‌, “हाम्रो परिवार सवै डुब्ने भएन भनेर हामी त खुसी पो९८ किन तिमी फुम्रो चिन्ता मात्र लिन्छौ ? तिमी दुवैको रगत दूषित भएकोदु भनेर डाक्टरले सुनाउदा म कति खुसी भएको छु । बल्ल ढुक्क हुन पाए ।तिमीहरूलाई हेर्दै तिमीहरू कै सुखमा आफुलाई पनि रमाउदै वाचुन्जेलसम्म हाँस्नपाउने भएकोल्लु । कलकत्ताबाट फर्कदा मैले तिमीसँग बिवाह गरेर के म हत्यारात भएको छैन भन्ने चिन्ता लिएको थिए तर मलाई तिम्रो भगवानले त्यस्तोहत्यारा वन्नबाट वचाइ दिएकोरहेछ । डाक्टरले जव तिम्रो रगत बारेएच.आइ.भी. छैन भन्यो म यति खुशी भएकी के भनु त्यसलाई कूर्सीबाट जुरूक्कउठाएर त्यो सँगनै आफु फनफनी घुमिरहु जस्तो भए । ज्यादै खुशी भएपछि पनि-मान्छेलाई के गरू के गरू जस्तो हुँदोरहेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली : कत्ति सजिलोले भन्नु हुन्छ म तिमीहरूलाई रमाएको हेरेर वस्छुभनेर । अनि हामी भने के हेरेर वस्ने नी ? के हामी तमासा वन्दैनौ र ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो रोगको जीवाणुले तपाईलाई दिन प्रति दिन चपाइ रहेको छ भन्नेधाहा पाएर पनि रमाएर हामी के वस्न सकेका हुन्छौ र तँपाइ हामी रमेको हेर्नपाउनु हुन्छ भन्ने सोच्नु भएको छ ? रमाउने भन्ने कुरा त अव हाम्रो जीवनबाटगयो भन्ने सोचे वरू सुहाउला ? &amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : तिमीले नहाँसे पनि म नै हाँसेर सघै तिमीलाई देखाउला भएन अव ।नसुहाउनेलाई सुहाउने बनाउनु पो पर्छ । म नढाँटी भन्दैछु मलाई आफुबारे यत्तिपनि फिक्री छैन । यो रोगलाई अन्जानमा भए पनि मैले आफैले निम्त्याएको हुँ ।रोगलाई बोलाउनु गए पछि आउछ र त्यसले पुस्याउनु पर्ने ठाउँमा लैजान्छ पनि ।यसमा चिन्ता लिएर हुन्छ ? बरू यो रोग मबाट अरूमा सर्न नपाओस्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छोड यी कुरा । अव तिमी सुनाउ डक्टर साहवले तिमीलाई के भने, केके गर्नु भनेर सिकाइन्‌ । १&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शयामली : त्यो तपाईलाई अहिले किन भन्छु, त्यो त तपाइले मेरो व्यवहारबाट नैथाहा पाइहाल्नु हुन्छ । तर युनिट भन्दा पहिले संझाइन्‌, “विवाह भए पछिलोग्नेलाई जिस्काएका जस्तो गरी एक्लै पठाउनु हुन्थ्यो त ? उसको कान समात्नभए पनि पछाडी लागेर जानै पर्थ्यो । डाक्टरले भने पछि म. पनि झस्याङ्गै भए ।हो त, मैले कि जान दिनै हुन्नथ्यो कि मैले पनि साथ लाग्नै पर्थ्यौ । मैले आफ्नोभूल स्वीकारे । यसैले यो एड्स तपाइलाई हुनुमा “मेरो पनि भूल कता कता यसअर्थले छ । मैले जिह्दी गरेर साथै जान्छु भनेर अडेको भए तपाइले नलगेर सुखै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
५०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाउनु हुन्नथ्यो अनि यस्तो भयंकर रोग सारेर पनि फर्कनु पर्दैनथ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र नाजवाफ हुन्छन्‌ श्यामली पनि यो भन्दा बढी केही वोल्नसबिदनन्‌ । दुवैको मनल्कान्त छ । भावनाको उतार पछार भइरहन्छ । केही छिनपछि वत्ति आउछ दुवैले एक अर्काको अनुहार देख्छन्‌ । श्यामलीले त्यो मौनताभङ्ग भ? सोध्छिन्‌ “अनि तपाइले आफ्नो बारे डाक्टरले के वताउनु भयो त्यो भन्नुभएन नी?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : के बताउ, उही थाहा भएकै कुरा हो । भन्यो वरू, मैले वुद्धि पुन्याएरवेलैमा आफ्नो जहानलाई जचाउन ल्याएको राम्रो गरे रे । अव यो रोगकाजीवाणुहरू तिमीहरूमा नसरोस भनेर यी कुराहरूमा ध्यान दिनोस्‌ भनेर उहीपहिलेको डाक्टरले भनेको कुरा दोहत्यायो । त्यो त मैले तिमीलाई सुनाइ हाले ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली : मलाई पनि त्यस्तै कुराहरू सिकाइन । यी कुराहरू सुन्दा सुन्दै म तरूला रूला जस्ती भएछु अनि संझाउदै भन्नु भयो, “तपाइले आफुलाई भाग्यमानीनै सम्झनु पर्छ । लोग्नेलाई यस एड्सले छुनु भन्दा पहिले नै आमा वन्न पाउनेहुनु भएछ नत्र रोग सर्न सक्ने सबैक्रामा जति सतर्क रहि सदा झै जीवन गुजारागर्न सक्नु भए पनि आफ्नै लोग्नेबाट सन्तान जन्माउने भने कुरा नमिल्नेहुन्थ्यो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फेरि दुवै चुप लाग्छन्‌ । वलभद्रले यसपाली कुरा उठाउने काम गर्दैभन्छन्‌, “अव के भोली नै घर फर्कने, होइन त ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली : किन यहाँ यसै बसिरहने ? काम सिद्धाइ हाल्यौ अब फर्किने नी ? अँअनि घरमा गएर बाआमालाई सुनाउने कि नुसनाउने ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वलभद्र : अहिले झट्र नसुनाउने । यसबारे वहाँहरूलाई राम्ररी थाहा छैन । त्योउमेरमा पुगि सकेका बाआमा डरै डरले चिन्ता लिएर जिउदै जलेका हुन्छन्‌ ।पहिले हामीले गाउमा यो रोग के कस्तो हो वताउँदै यसको ज्ञान सबैलाई दिदैजाऔला त्यसपछि जव उनीहरूले यसलाई राम्ररी वुझि सक्छन्‌ अनि वताइदिउला । वताउन भने म वताउछु तर कति दिन सम्म चुप लागेर निर्वाह गर्नसकिन्छ त्यो हेर्दै जाउला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली : हुन त यो तपाइको विचार हो तर मलाई भने चुप लागेर वस्नेभनेको कुरामा चित्त वुझेको छैन । घरमा त म तपाइको साथ भएकीले वार वारभुक्किन थाल्नु भयो भने संझाउला तर तपाइ वाहिर भित्र नगरी वस्न सक्नेस्वभावको हुनुहुन्न त्यसवेला भूल, हुन गयो भने अर्को ठूलै आपत आइ त पर्दैन ?रोग लुकाउनु हुन्न भनेर त्यत्रो गफ गन्यौ फेरि आजै हामी यस्तो कुरा गर्दैछौ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पर्छ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मलाई त वत्ताइ दिनु नै राम्रो हो कि जस्तो पो लाग्दैन । एक फेर फेरि राम्ररी॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वलभद्र : त्यो त रोग पत्ता लगाउँनै नचाहेर भाग्नेलाई पो भनेको त ? हामीलेत्यसो त गरेका छैनौ । मेरो घनिष्ट सम्पर्कमा रहेकी तिमीलाई मैले जचाएरआफ्नो शंका निर्मूल पारेपछि वहाँहरूमा सर्न नदिन होस्‌ मात्र पुन्याए भै हाल्यो ।अहिले हामीले यो रोग मलाई लागेको छ भनेर फुक्दै हिड्यौ भने गाउँमा समेतवस्न पाउछौ या पाउन्नौ शंकै लाग्छ । यसबारे जाने सुनेका कोही छैनन्‌ ।साधारण लसपस हुँदा पनि रोग सरि हाल्छ कि भनेर डराएर भाग्न वेर लाग्दैन ।के मलाई तिमी ज्यानमारा राक्षेस वनाएर सबैको लागि &#039;हाउ&#039; भएर वाचोस्‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भन्ठान्छौं ।श्यामली : अव केही भन्न सक्दिन कुरा अप्ठ्यारो लाग्दो छ ।जन सन्देश :&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सानो सानो हेलचक्राइ र आफ्नो वेहोसीपनाले गर्दा रोग लाग्न सक्छतर रोगलाई लुकाएर समस्याको हल हुदैन ? त्यस्तै रोगदेखि डराएर पनिरोगीलाई हेला नगरौ । रोगबाट बच्न सक्ने उपायहरू अपनाइ रोगीको सेवागरौ, उसलाई हाम्रो दया मायाको जरूरत हामीलाई भन्दा वढी हुन्छ । प्रो रोगताधारण लसपसले सर्दैन शरीर भित्र यस्को जीवाणु कुनै ढोका पाएर प्रवेश गर्नुपग्यो भने मात्र सर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलदेवीले अझै भट्टिको व्यापार छोडेकी छैन । उ त्यस्तै गरी विहानदेखिबेलुकीसम्म भट्रि खोल्ने मासु चिउरा भात वेच्ने रक्सि खुवाउने र केटीको देहव्यापार गराउने काममा नै व्यस्त आफूलाई राख्दैछै । ग्राहक पनि आउनछोड्दैनन्‌ । त्यही बसेर गफ गर्दै भन्छन्‌, यस्तो त्यस्तो रोग फैलिएको छ, भट्टिमाजाने, केटीसंग लसपस गर्ने काम त खतराको रहेछ । तर त्यति थाहा पाएर पनिउनीहरू फूलदेवीलाई भन्छन्‌, “खै आमै तपाईको भट्टको चहल पहललाई कतापठाउनु भयो ? किन यस्ता उराठ लाग्दो वनाएर बस्नु हुन्छु एक दुई बरू अरूथप्नोस्‌न । यस्तरी दिन प्रति दिन ग्राहकको संख्या वढ्दै छ । त्यो चन्द्री एकलेकतिलाई भ्याओस्‌ ? हललल्ल सबै हाँस्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यहाँ रेडियोमा गाना बजिरहेकोछ, &#039;एक फूल झरेर के भयो जव साथबहार आउछ, यौवन रहि रहे त धेरैको प्यार आउछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पछ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलदेवी : जव देखि यहाँको चहल पहललाई त्यो लाहुरे छयाकेले कता पुच्यायोकता त्यहाँ देखि मलाई केही गर्नै मन लाग्दैन । कसैले आएर सुनाउछन्‌,काठमाण्डूमा फर्केर गइ राम्रो काम गरेर वसेकी छ, नसुर्ताउनु होस्‌ भन्छन्‌ । तरखै मलाई त विश्वास लाग्दैन कस्तो काम त्यसले पाइ होली अव यी योचन्द्रीको पनि उडेर जान पखेटा फट फटाउन थालि सकेकी छ । कतिलाईल्याउने, पठाउने मत थाकि सके ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौड्े कान्छा : यस्तो कुरा नसुनाउ आमा । चन्द्री पनि गइ भने त्यो चाटतिमीलाई मात्र लाग्ने होइन यो गाउँका हामी पनि दुखी हुन्छौ । नरमाइलोलागेका वेला यसो दिल बहलाउ गर्ने थलो यही छ । यो पनि रहेन भने हामीकहाँ जाने त्यो लाहुरे कुन दिन यो गाउँमा छिरेछ गर्नु नगर्नु गरि सक्यो ? त्यत्रोलडाइबाट पति कसरी वाँचेर फर्किन पायो ? स्वास्नी त्यसको पनि धन्यकि रहिछभट्रिको केटी टिपेर जाँदा पनि लोग्नेलाई च्यापेर राख्न सक्ने ? हाम्री हुँदी हो तघरैबाट निकाली सक्थि ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलदेवी : सँधै छोड्दै जाने गरेकोले लोग्ने स्वास्नी बीच माया मोह वस्नै पाएकोछैन होला । गए जाओस्‌ भनेर धन मात्र च्यापी लोग्नेप्रति निचै मारेर वसेकीछ,जस्ती छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौडे कान्छा: किन माया नवसेको हुनु ? दुइ छोरी एउटा छोरा तीन चार वर्षभित्रै पाइ सकि । दुईजनाको परेबाप्रिति छ भन्छन्‌ । अव तिमी भने माया मोहबसेकै छैन होला भन्छौ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलदेवी : के कुरा गर्छ यो ? वच्चा जन्माउन पनि माया वस्नु पर्छ के ? एकअर्काको अगाडि पछाडि पर्नै नहुने झै झगडा कुटामार हुने लोग्ने स्वास्नीले तकस्तो मौका पर्छ कस्तो, बच्चा भने जन्माएकै हुन्छन्‌ । फेरि यो लाहुरे जस्तोमुसुमुन्द्रेले कुरा ठीक्क स्वास्नीसंग नपारी छोड्यो होला र ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौडे कान्छा : के गन्यो कसो गस्यो, बल्ल बल्ल झ्याम्मिन थालेकी कान्छीलाईउडाइ हाल्यो । यो चन्द्रीलाई भने उडाउन दिनु हुन्न, म. फकाउछु । हामीलेभनेको कसो नमान्लि । मलाई माथि जान दिन्छौ कि चन्द्रीलाई “यही वोलाइदिन्छौँ । तिम्रो नियम अनुसार मासु चिउरा खाइ हाले, हेर रक्सिलै मात पनिलागि सक्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलदेवी : अव पनि जान दिइन भने मलाई नै धुलो पिठो पारी हालौ नी ? वरूजानु भन्दा पहिले उ त्यो साथमा लिएर मात्र जा । राम्ररी होस्‌ पुन्याएर लगाउनेर फुकाल्ने गरेस्‌ । नत्र मेरो मेहनत नै खेर जाला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पर्द&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौडे कान्छा : के हो त्यो भनेको ? कहाँछखै?फूलदेवी : त्यो तेरो आँखा अगाडिको के हो त्यो ? त्यति पति देखिनस्‌ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौडे कान्छा : कुन यो भन्नु भएको ? यहाँ पनि किन यो ? यो लगाउँनु फेसनसम्झौ कि कसो ! फेरी सवै हाँस्छन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलदेबी : फेसन हो कि क्या हो तिमीले त्यसको अर्थ अझै जानेका रहेन छौक्यार ? तिमीहरूलाई कति सन्तान निकाल्ने शुर छ ? सन्तान नवढोस्‌ पाल्नगाउ्हो पर्ला भनेर रेडियोले ढाललाई सुरक्षाको लागि साथ राख्नोस, भनेर फुक्दै छतिमीहरू भने जति आउछौ, के यो भनेर नै अल्मलिन्छौ । कोही यी तँ जस्तोफैसन पो यसले गर्न धालि भनेर मलाई नै उल्लाउछन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौडे कान्छा जिस्कदै भन्छ, “यहाँ पनि यस्तो चलन चलेको छ भन्ने हामी केजानौ त ? नत यी स्वास्नी हुन्‌ नत यिनीहरूबाट जन्मेका सन्तानको जिम्माहामीले लिनु पर्छ । सवै समाल्ने सिङ्गै जी आमा तिमी छदै छौ नी?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलदेवी : मूर्ख हो, यसले सन्तान बढी हुनबाट मात्र रोक्ने होइन । तिमीहरूजस्ताले कता कताबाट रोग वोकेर ल्याइ मेरो चन्द्रीलाई सारौला कि भनेररोगको वचावटको लागि राखेकी हुँ । एउटीले बुर्कुसी ठोकी हाली यसलाई रोगसंप्यौ भने के गरी जीवन चलाउने ? रबर हो गलेकोपो छ कि, कही प्वाल पोपरेकोछ कि भनेर आफैले राम्ररी जाँचेर राखेकी छु । खुरूक्क लिएर जाने भए जामाथि नत्र निस्कनलाई उ ढोका खुला छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौडे कन्छा : ए आमै यसै हामीलाई रोग सल्काउन आउने नभन है ? के रोगहामीलाई लागेको देख्यौ र त्यसो भन्छौँ वरू तिम्रै छोरीले भिरिङ्डी सारेर वरवादपार्न आटेकी थिइ भनेर सबै भन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलदेवी : त्यस्तो रोग सार्ने दोष कसैलाई पनि नलागोस्‌ भनेर नै मैले डाक्टरसाहवको अर्ति मुताबीक यस्ता कुरा राख्न थालेकी हुँ । जवानी हो भमरा त फूलखोज्दै हिडछ भने यो संसारको लीला बन्द कहाँ हुन्छ र ? फेरि मान्छेको रगतमासुको शरीरमा रोग नलाग्ला भन्ने पनि छैन । डाक्टर साहवले&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रगत सम्बन्धी भयानक रोग एड्स फैलिएको छ रे । यसबाट वच्न 0० उपायगर्नु पर्छ भनेका छन्‌ । कुबुद्धि लिएर आफ्नो र अर्काको नाश गर्व पट्टि नलाग रखुरूक्क त्यो लिएर माथितिर जा यो फेसन होइन । यो वचावट हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गजुरेको घर डाँडा माथि छ । त्यहाँबाट हेर्दा सबै गाउँघर चर्लबु देखिन्छ । योमुख्य वस्तीबाट अलि टाडा भएकोले त्यहाँ जान समय मिलाएर नै निस्कनु पर्छ ।ठुली तामाङ्गनी छौरीलाई साथमा लिएर धनलाई हेर्न भनेर त्यहाँ आइ पुगिछन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
५९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घन शहरबाट आए देखि उठ्न सकेकी छैन । दुब्लाएर ख्याक जस्ती भएकी छ ।उनको आमावावु चिन्ताले छटपटाइ कहिले कस कहाँ कहिले कसकहाँ छोरीलाईनिको पार्न सक्ने उपाय खोज्दै हिडि रहेका छन्‌ । ओछ्यानमा लडिरहेकी धनलाईठुली सोध्छिन्‌, “ए नानी आमा छैनन्‌ कि कसो ? एक्लै परि छौ” ? नजिकै गएरवस्दै सोध्छिन्‌, “तँलाई अहिले कस्तो छ, वा” ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धन : खै कस्तो छ भनु ठुली आमा । ज्वरो आउदैछ जीउमा कस्ता कस्ता गीर्खाआएका छन्‌ । यी अहिले त मुखभित्र पनि फतक्कै हुने गरी खटिरा आउन थालेकाछन्‌ के रोग लागेको हो यस्तो ? कुनै औषधीले पनि छुदैन । वा आमा मेरोबिरामीले गर्दा आतिएर चौपट्ट छ । आमा अहिले पनि मलाई अक्षेता छुवाएरजान्नेलाई देखाएर आउछु भनेर जानु भएको छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठुली : घरमा कुनै विरामी भए भने यस्तै छटपटी लागि हाल्छ । के गरू कहाँजाउ हुन थाल्छ । अनि वा कता जानु भयो नी ? यता त भान्टाङ भुन्टुङ पनिकुनै देखिदैन । दाजु भाउजु पनि छैनन्‌ कि कसो ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घन : बा त को हो सिद्ध भझाँक्रीछ रे त्यसलाई लगाएर कुन वोक्सी मलाईलागेको हो त्यसको दुरदाङ पारेर छोड्‌लु भनेर निस्कनु भएको छ । दाजु भाउजुबेसीको खेतमा जानु भएको छ । भदा भदै पर्सि मामलीमा विवाह छ भनेर गएकाछन्‌।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुली : ठीकै भएछ आज म आएको । तँलाई न्यास्रिएर वस्नु त परेन । तँ यसरीदुव्लाउन थालेकी कति भयो ? लौ हेर शरीरको छाला ठ्याम्मै गएर हाँडमाटाँसिइ सकेको रहेछ । पख, भोली नै म गोवरले तेरो आकार बनाएर टाँसीदिन्छु । त्यो जति जति सुक्दै जान्छ तँ फस्टाउदै जान्छेस्‌ । सुकेनास लागेको यसैलेठीक पार्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घन : मलाई त कता कता यही रोगले लैजान्छ कि जस्तो लाग्न थालि सक्यो ।वा आमालाई भन्छु भएका अलिकति धन पनि किन मास्नु हुन्छ । सन्तानको कमितपाईलाई छैन म एउटी नभएर के फरक पर्छ । यतिका वर्षसम्म नभए सरह नैथिए । तर के गरू ठुली आमा बहाँहरू पट्टै मान्नु हुन्न । उल्टै मलाई भन्नु हुन्छ,“विरामी मान्छेले धेरै वक वक गर्दैनन्‌” ? तपाइले पनि सम्झाई दिनोसून ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठुली : कसरी मानून त ? जति सन्तान भए पनि माया सबैसंग उत्तिकै लागिहाल्छ । आफ्नै अगाडि छोरीको यस्तो गति देखेर पनि के गरी यसै वसुन्‌ ?भन्छन्‌ जरूरत परेमा हिरा पनि फोड्नु पर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घन हाँस्दै भन्छिन्‌,“हिरा भए त फोड्नु होला नत्र के गर्नु हुन्छ ? वा आमालाई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुनाउन त नसुनाउनु होला तर बहाँहरूले मलाई पैसा कमाउने इच्छाले तकाठमाण्डूमा नोकरी गर्न राखेका हुन ? मेरो त्यसवेला के उमेर थियो र?भरखर १३ बर्ष छोएकी मात्र थिए । जान्न म भनेर जति रोइ कराइ गरे पनिसुनेनन्‌ र पठाइ छोडे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठुली : त्यस्तो नभन वा । त्यसवेला उनलाई ठूलै चोट परेको थियो र मात्रपठाएका हुन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धन : त्यसो भए त्यसबेलाको वहाँको चोट ममा पन्छाउनु भयो भन्ने मान्नुपन्यो । काठमाण्डूमा मैले कति दु:ख सहनु पन्यो त्यो वहाहरूलाई के थाहा ?त्यहाँको जाडोमा ढुक ठुक गर्दै भाडा माज्नु पर्दा हात खुट्टा सुनिएर पट पटीफुटेका हुन्थे । त्यसरी चिरिएको ठाउबाट रगत पनि निस्किन्ध्यो । म खूदै तीरगतलाई पुछ्दै घरको गाइको घिउ घरस्न पाए हुन्थ्यो भनेर कल्पन्थे । सत्तेत्यसवेला मैले वा आमालाई कति गाली मनैमन गरेकी थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठुली : कस्तो घरमा वस्न गइछस्‌ूत अलि कति घिउ पनि दल्न नपाउने ? तिनकापनि फुद्दा हुन्‌ त्यसबेला के गर्थे ? त्यस्तै निर्दयी रहेछन्‌ र पो त्यो घर छोडेकिरहिछस । वावुले राखेको घर छोडेर अन्तै गइस्‌ रे भन्ने यहाँ हल्ला आएकोथियो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घन : तपाइले सुन्नु भएको त्यो हल्ला होइन साँचो हो । वाले राखेर आउनुभएको घर छोडेर अरू कैयौ घरमा वस्दै निक्लदै गरेर १६ वर्षको उमेर आफ्नैदेशमा विताए त्यसपछि परदेशमा पुन्याइए । त्यहाँ दुई बर्ष जति गएको के भएकोथियो रोगले गाँजेर आफ्नै गाउँमा फर्कनु पर्यो । आफ्नो थला भनेको अन्तिममाचाहिनेनै रहेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठुली : किन त्यसरी घर घर चारेकी ? कसले त्यहाँ काम मिलाई दिन्थ्यो ? फेरिपने तै पिस पैसा यहाँ आउछ भन्ने पनि सुनेकी थिए । वावु यहाँबाट काठमाण्डूजादैन धे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घन : वाले मलाई काठमाण्डूमा वहाको साथीको जिम्मामा छोडेर आउनु भएकोथियो त्यसैले यी सबै काम गर्थ्यो र गराउध्यो । वा उसैको खबरमा विश्वासगरेर वस्नु हुन्थ्यो र काठमाण्डूमा मलाई भेट्न समेत आउन छोड्नु भयो ।आखिर त्यसैले मलाई विदेशमा समेत पुस्याइ वेचि नै दियो ठुली आमा । त्यसविर्दयीले मलाई वेश्या वनाएर नै छोड्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठुली : (आश्चर्य मान्दै) अनि कतिमा बेचे, बजियाले ? तेरो वालाई यो कुरायाहा छ कि छैन ? कठै कसरी यो गाउँको छोरीले वेश्याको जीवन बिताइ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
होली ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घन : वा आमासंग कुरा गर्दा वहाहरूलाई म वेचिएकी कुरा थाहा छ जस्तोलाग्दैन । मैले पनि भनेकी छैन कति पैसामा वेच्यो त्यो पनि मलाई थाहा छैन ।सुन्छु त्यो काका भन्नेले त्यही पैसाबाट मुडलिङ्गमा होटल खोलेर वसेको छरे!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठुली : हेर्दै जा त्यसको नास नभई छोड्दैन । अर्काको ज्यान बेचेर कमाएकोधनको के फाप हुन्छ ! त्यही भट्टीले त्यसलाई धोती न टोपी बनाई दिन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सानी : आमा .... आमा म त शहर जान्न है । बालाई भनिदिनोस्‌ छि ....त्यहाँ त मान्छे पनि बेच्दा रहेछन्‌, लुगा गहना जस्तो गरी । हाम्रो दिदीलाई पनिछिटै बोलाउनु होस्‌ है, आमा, नत्र वेची देलान ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठुली : तेरो बाबुले माने त वोलाउला । भुकुलीलाई ल्याइ देउ भन्दा झण्डै आँखाफोडि दिएको थियो । त जस्तो म आफ्नो छोरीलाई वनाउछ्नु । त्यहाँ काम पनिगर्छन्‌ पढ्छन्‌ पनि भन्नु हुन्छ अनि म के गर्छे ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धन : जसरी भए पनि भुकुलीलाई तपाइले वोलाउनै पर्छु । तरूनी हुदै जान थालेपछि छोरीलाई आफुबाट टाढा पार्नु हुदो रहनेछ । त्यसले त्यहाँ पढ्न पाएकी छछैन मलाई त शंकै लाग्छ । मैले त भोगेर आएकी हु । कुन्नी उ वसेकी ठाउँवेग्लै खालको राम्रो रहेछ भने पाउछे कि ? हुन त सबै घर एकै नाशका हुदारहेन छन्‌ । कुनैले त आफ्नो परिवार जस्तै माया गर्ने पनि हुन्छन्‌ । के गर्नुमलाई त्यस्तो ठाउँमा पनि त्यो पापीले वस्न दिएन । जान्न भन्दा पनि निकालीछोड्यो । बाबुले सम्झाएर आएका थिए, काकाले जुन ठाउमा राख्न लैजान्छन्‌जानु र जहाँबाट निस्कि भन्छन्‌ निस्कनु । जिड्ी गरेर नटेर्ने होइन । हामीलाईकाठमाण्डूमा को के कस्ता छन्‌ के थाहा छ र ? मैले लुरू लुरू पछि पर्नै पर्थ्योनत्र धम्काउथे “तेरो बाबुलाई खवर पठाइ दिउ” ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठुली : कस्तो संकटमा परेकी रहिछौँ । अनि यहाँ तिमीलाई शहरबाट कसलेल्याइ दियो ? आफै आयौ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घन : त्यही रण्डी कोठीको नाइकिनीले जव म रोग लागेर अशक्त भए, मेरोरगत जचाए त्यस पछि के शुर चलेछ कुन्ती त्यस्तो पैसाको लोभिनी त्यो वुढीलेपनि म माथि माया दया देखाउदै त्यहीको मान्छे लगाएर खुरूक्क विदा गरी ।अर्भै रूदै भनि,” यति पैसा लिएर जा तँलाई के के खान मन लाग्छ, लगाउनेइच्छा छ पुरा गरेँ । मलाई त्यो सुन्दा मर्नलाई पठाउन लागेकी जस्तो लागेकोथियो । मलाई लाग्दै छ सायद यो मलाई लागेको रोग खिटै निको हुनेखालको छैन । म माथि पैसा खर्च गर्नु बेकार हो । तँपाईले मेरो आमावालाई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घरे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुम्झाइ दिनै पर्छु मेरा बिन्ति छ ।-तर म वेश्या भएकी कुरा वहाहरूलाई रगाउँघरमा कसैलाई पनि नभन्नु होला । मैले तपाइसंग भेट भए पछि मन थाम्नसकिन र सबै बताइ दिए । मेरो त्यो वृत्तिवारे यहाँ सबैले थाहा पाए पनि मलाईत हुने केही छैन । वाआमाको इज्जत नजाओस्‌ । कुरा त्यति मात्र हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुली : उ त्यता हेर त तिम्री आमा आइ जस्तो छ। एक छिनपछि भन्छे, कस्तरीपसिनाले निशुक्क परेकी हँ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माहिली खत्री : ए दिदी आउनु भएको रहेछ । म भने वाहिर गएकी ? कस्तो बेलापरेको यस्तो !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन्चै त हुनुहुन्छ ! धेरै भयो भेट हुन नपाएको । उनको नजिकै गुन्द्रीमा आएरवस्दै भन्छिन्‌, “के गर्नु यो आएदेखि यसरी थलिएकीले, कतै गएर केही गर्नसकिन्छकी भनेर हामी दुब्ै दौडी रहेछौँ । अहिले पनि म तलको त्यो लामालाईअक्षेता देखाएर आएकी । यसको मुख हेर्नु भयो ? देखा त ठुली आमालाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठुली : आमै कस्तो संग खटेरा आएको ! दुख्छ पनि, नानी ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माहिली : के भनु स दिदी यसलाई पहिले ज्वरो आउथ्यो र जिउ दुख्थ्यो भन्थि ।अव त मुखै पनि कुहिएको छ । अस्ति त्यो चण्डाल्नीले आएर माया देखाउदै के केखान दिइ यसको मुखमा घाउ आइ हाल्यो । खाने यो पनि उस्तै । म र यसकोबाबु हेरेको हेरै भयौ । लौ अव के के हुने भयो भन्ने त्यसै वेला लागेको थियोआखिर यस्तो भएर छोड्यो । त्यो लामाले भनेको छ अव यसको मुखको खटिरात्यसैलाई सारी दिन्छु । म यहाँबाट आजै देखि फुक्न जान्छु धनलाई निको हुदैजान्छ त्यसलाई चेप्दै जान्छ रे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यतिकैमा गजुरे पनि आइ पुग्छन्‌ र खुसी हुँदै भन्छन्‌, “ए कौडेकीआमा,हामीले चाहेकै झाँक्री भरेनै आउने भयो । त्यो वेच्नलाई राखेको खसी कहाँ छ ?अहिले नै लगेर वेच्छु र पैसाको जोडजाम गरेर कुखुराको भाले ल्याउछु । त्यसचण्डाल्तीलाई यही थलोमा ल्याएर डोकोले थुनि सबैलाई चिनाउन सकिन भने के? मेरो त्यसले यति नोक्सान पारेकी छैन !माहिली : यसपालि त, त्यस्तालाई लाजको मर्नु पानै पर्छ । लौ म खसी ल्याइहाल्छु भनेर जान्छिन्‌ र गोठैबाट कराउँछिन्‌, “लौ त त्यो खसी पनि कौडेकान्छाले लगिसकेछ, क्यारे, यहाँ त छैन ? त्यसले पनि केही राख्ने भएन । खसीर केटीमा सबै घन उडाइ सक्यो ! अव के गर्ने लौ ? के दिएर पठाउ:?&amp;quot; ठुलीको घरमा आज निकै रमाइलो भएको छ । भुकुलीलाई वोलकमारलेशहरबाट ल्याएका छन्‌ । ठुली खुसी हुदै छोरीलाई सुम्सुमाउदै सोधन थाल्छिन्‌,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ष्दि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तँलाई त्यहाँ कस्तो गरी राखेका थिए ? धेरै दु:ख त दिदैन थिए ? तेरो वावु संगकच कच गर्दा वल्ल देख्न पाए । हामीलाई कस्ता निर्दयी भनेर गालि त गर्दिनथिस्‌ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भुकुली : तपाइले मेरो पिरै गर्नु पर्दैन । मालिक मालिकनी दुवै वेस छन्‌ । विहानवेलुकी काम गर्छु दिउसो स्कूल जान दिएका छन्‌ । पाँच क्लासमा पुगिसके आमाम त । अंग्रेजी पनि पढेकी छु । लेख्न पढ्न सवै सक्छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बोलकुमार : सुनिस्‌, छोरीलाई के मैले यसै शहरमा फालेको रहेछु ? यहाँ वसेकीभए पढन पाउथी तेरो छोरीले ? खै सानी कता गइ ? त्यसले पनि सुनोस्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठुली : वाख्रा चराउन गएकी होली वोलाउनु होस्‌ न, दिदी आएको देखेर त्यो पनिरमाउछे ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वोलकुमार सानीलाई वाहिर निस्केर कराउदै वोलाउछन्‌ “ए ... सानी वाखालिएर झट्ट आइज ? यहाँ को आएको छ हेर त!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सानी टाढाबाट नै भन्छे, “नाइ आउन्न त्यसलाई पठाइ दिनोस्‌ । म शहर जादैजान्न ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वोलकुमार : तलाई लिन कोही आएका छैनन्‌ यहाँ त आइज अनि थाहा पाउलीस्‌को आएको रहेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यता ठुली, छोरीसंग कुरा गर्दै हुन्छिन्‌ । भुकुलीलाई सोध्छिन्‌, “ए छोरीलौ भन त अंग्रेजीमा वाइ वाइ भनेर हात हल्लाएको के हो ? हाम्रो पालामा तइसारा गरेको भन्थे ? केटीलाई वोलाएको हो कि के गरेका हुन्‌” ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भुकुली आमाको कुरा सुनेर हाँस्दै भन्छिन्‌, “त्यसो होइन? म गए तिमी बस भनेरबिदा लिएको हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठुली : वोलकुमारसंग भन्छिन्‌, “सुन्नु भयो छोरीले भनेकी ? मैले अस्ती तपाईलाईवाइ ... बाइ भने भनेर कत्ति उल्लाउनु भएको थियो । कुरा नवुझै पनि ठीकैवेला पारेर वोलेकी रहेछु । आफैलाई थाहा रहेन छ र पो मलाई खिसी गरेकारहेछौ । हामीले त अरूले त्यस्तै बेलामा भनेको सुनेर तिमीलाई भनेको थिए ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वोलकुमार : तैले कहिले वेढीक भनेकी छस्‌ र ? सधै ठीक वोल्ने तै मात्र त यसघरमा छेस्‌ । अव छोरीसंग अंग्रेजी सिकेर पनि बोल्न थाल्न । त्यसमा पनि जिततेरै हुन्छ मेरो होइन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;nowiki&amp;gt;:&amp;lt;/nowiki&amp;gt; भो म तपाईसंग वोल्न पनि सकिदन । कति खिजाउन जानेको हो कुन्नी ?मात्र अंग्रेजी वोलेर भयो र ? तपाइले पनि मैले वोलेको बुझ्नु पत्यो, सक्छौ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पि ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यतिकैमा सानी आइ पुग्छ र दिदीलाई देखेर खुसी हुदै भन्छे, “कहिले आयौ दिदी ?अव फर्केर नजाउ है । त्यहाँ त मान्छे बेच्छन्‌ रे । तिमीलई पनि वेचि दिए भने ?भुकुलीले वहिनीले एक्कासी त्यसो भनेकी गा कुकतन र आमा वा को अनुहार पालोपालोसंग हेर्छ । वोलकुमार भन्छन्‌, “ दियो होला शहरमा मान्छेबेच्छन्‌ भनेर त्यसैले यसो भन्दै छे । यसको कन के वुद्धि छ र ? आज भोलीम संग पनि टाढा टाढा हुन्छे । शहर लगेर बेचि दिन्छु भनेर नै होला ? अहिलेवोलाउदा पनि आउन्न भन्थि ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भुकुलीले बहिनीलाई सम्झाउदै भन्छिन्‌, “बाले के भन्दै हुनु हुन्छ ? कही आफ्नैवावुले पनि आफ्नो छोरीलाई बेच्न सक्छ ? कसले तँलाई यस्तो नचाहिने कुरासुनायो ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सानी : किन सक्दैन र ? गजुरेवाले धन दिदीलाई साथी लगाएर बिदेशमा पठाएरबेचे रे । धन दिदी अहिले कस्तो विरामी भएर फर्कनु भएकोछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठुली : धेरै नचाहिदो कुरा नगर है । कहाँ उसको वावुले वेच्यो भनेकी छ वराले? यस्तो कुरा गजुरेले सुन्यो भने के भन्लान, के गर्लान लौ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वोलकुमार : केटाकेटीलाई साथमा राखेर नचाहिने कुरा गर्न लागे पछि त्यस्तैहुन्छ कुन दिन गजुरेले र त्यसकी स्वास्नीले मेरो छोरीलाई चुस्ने अर्को बोक्सी योपन्नि हो भनेर मुखै डामी दिन्छन्‌ अनि थाहा पाउछै तेरी आमाले । उ यो सानीपनि कस्ता कि छे ? जिरे खुर्सानी जस्ती छ । आमाको साथ लागेर मलाई के मात्रगरिन सोधी हाल त लौ लौ: भुकुली, के भन्दि रहिछ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठुली : के केर्ने यसलाई ? कम्ताका तिमी पनि छैनौ । जिन्दगीमा लाटाका खुद्य [|बाठामा के पर्न गएछ के के न गरेको छु मैले भन्ने लागेको छ । पख्नोस्‌, म स्वकुरा भुकुली संग नसोधी कहाँ विश्वास गरि हाल्छु र ? जड्याहाको कुरा कहाँपत्यार लाग्दो हुन्छ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सानी, दिदीलाई लिएर माथि चोटामा जान्छे र सोध्छु, “तिमी त काठमाण्डूबाटराम्री भएर आइछौ । शहर कस्तो हुन्छ, त्यहाँका मान्छे कस्ता हुन्छन्‌ मलाईबताउ है ? यहाँ सवै भन्छन्‌ शहर हेर्दा राम्रो हो तर मान्छे ज्यादै डरलाग्दाहुन्छन्‌ हामी गाउँलेलाई मान्छे नै गन्दैनन्‌ रै ? हो, दिदी त्यस्तै छन्‌, वाले मलाईपनि शहर लगेर छोडी दिन्छु भन्नु हुन्छ । मलाई भने जान्नै मन लागेको छैन ।सानी र भुकुली माथि लागेपछि जम्दार्नी आइ पुग्छन्‌ । उनलाई देख्ना साथठुलीउठेर स्वागत गर्दै सोध्छिन्‌, “कताबाट आज हाम्रो घरमा पनि-प्राल्नु भयो ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सवै आराम छ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दानी : घर फर्कदै थिए, तिम्री छोरी शहरबाट आएकी छे भन्ने सुनेर भेटेरनैजान्छु भनेर पसेकी । गाउँ घर कि चेलीबेटी हो माया लागि हाल्दो रहेछ ।धनलाई देखे पछि गाउ वाहिर वसेर छोरी फर्कि भनेकी डर लागि हाल्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफ्नो छोरीको अवस्था त्यस्तो छैन भन्ने सुनाउदै भन्छिन्‌, “खै त्योमात्र शहरबाट फर्केर त्यस्ती कसरी भएकी हो ! हाम्री छोरी त्यहीबाट अर्कै भएरफर्केकी छ । पढ्न पनि थालेकी रहिछ । काठमाण्डूका सवै घर त्यस्तै कहाँ हुँदारहेछन्‌ र ? आफै हेर्नोसून म भुकुलीलाई बोलाई दिन्छु भनेर कराउदैवोलाउछिन्‌ । भुकुली आउछै र नमस्ते काकी, हजुरलाई आराम छ भनेर सोध्छे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्नी खुसी हुदै भन्छिन्‌, “मलाई वेसैल्ख तँलाई कस्तो छ नी वा ? टाढाकोठाउँमा एक्लै छोरी मान्छे वसेकी थिइस्‌ । यहाँ तेरी आमा भुट भुटेर चौपट्र थिद्र ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठुली : हेर्नोस्‌ भाउजु छोरीलाई यस्तो रूपमा देख्न पाउदा त थाल भरिको भातखाए सरह भएकी छु । ए ..... भुकूली जात भित्र उ त्यो अखवारको खेस्रामाअस्ति चिनी पोको पारेर दिएका थिए यता ल्याएर के लेखेकी रहेछ भाउजुलाईपढेर सुना त ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भुकुली भित्रबाट त्यो अखवारको टुक्रा ल्याएर पढन थाल्छिन्‌, &#039;एड्सभन्ने ज्यानै लैजाने सरूवा रोग हो । यो संसारको हरेक कुना कुनामा फैलिदैछ ।यसबाट बच्न खुव होशियार हुनुपर्छ । यसमा विचार पुस्याउनु पर्ने कुरा हो, “जोसुकै लोग्ने मान्छे या स्वास्नी मान्छेसँग रतिक्रिडा गर्नु हुन्न । एसो हुँदा कुनैलाईएड्सको जीवाणुले पक्रेको छ भने त्यो अर्कोमा सर्न जान्छ । कोठी भट्टी यावेश्यालय तर्फ पस्ने बानीमा सुधार ल्याउनु होस्‌ । &#039;कुनै बाध्यतावस्‌ फसियो भनेकण्डम साथमा लैजान नभुल्नु हौला । यो रोग रोगी मान्छेको विर्य र आइमाइकोअंग रसबाट सर्ने हुँदा वचाउको लागि कन्डम प्रयोग गरेमा एकबाट अर्कोव्यक्तिमा यी जीवाणुलाई प्रवेश गर्न निषेध गरी दिन्छ । अर्को कुरा एड्स लागेकोव्यक्तिको रगत स्वच्छ अर्को व्यक्तिमा पर्न दिनु हुन्न । त्यसैले काटेको घाउछयाकुनै खटेराहरू आएको छ भने एड्स रोगीको रगत त्यस्ता ठाउँमा पर्नु हुन्न ररगतको खाँचो शरीरमा हुनेले रगत दिने व्यक्तिको रक्त परिक्षण गरेर मात्र लिनुपर्छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो एड्सको आफ्नै रोगको प्रकृति हुदैन जुन रोगले एड्सको जीवाणुवोकेको व्यक्तिलाई छुन्छ त्यो नै त्यसको प्रकृति हुन्छ र एड्सको जीवाण्‌ भएनभएको थाहा पाउने उपाय भने रगत जचाउनुनै हो । शंका लागेमा या आफ्नोपरिवारमा एड्स भएको कुनै सदस्य छन्‌ भने या आफ्नो वेश्यालय तर्फ लाग्ने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घ्ध&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वानी छ भने या लुकि छिपी अपारिचित व्यक्तिसँग संभोग गर्ने गरेको छ भनेसमय समयमा आफ्नो स्वास्थ्य परिक्षण गरी यस एड्सबाट बच्न र वचाउनसहयोग गर्नु होला । यो रोगको कुनै औषधी छैन र यसले छीयो कि काललेनिम्तो पठायो भन्ने सोच्नु पर्ने हुँदा रोग फैलिन नदिन हामी सवैले सहयोग गर्नुपर्छ । हामी सबै मिलेर मात्र यसलाई लगार्न सक्छौं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वोलकुमार : ए भाउजु मैले छोरीलाई काठमाण्डूमा काम गर्न र पढ्न भनेरराखेको राम्रो गरेको रहेन छु त ? आजसम्म होमीले संसारै ढाकी सकेको रोग केकस्तो हो भनेर यसरी पढेर सुन्न कहाँ पाएका थियौं ? एउटा चिठ्ठी आयो भनेपनि गाउमा पढ्न सक्ने को छ भनेर सोध्दै हिड्नु पर्थ्यो । अव आफ्नो घरमाछोरीले नै पढेर सुनाउन सक्ने भइ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठुली : ए छोरी त्यो फेरि एक पटक पढेर सुना त । के भट्टि कोठी जानेहरूले केगर्नु पर्छ भन्ने थियो नी, हो त्यो कुरा तेरो वावुले राम्रोसंग बुझ्ने गरी पढेर सुनात । उसको वासै त्यस्तै ठाउँमा छ । फेरि यस्तो ज्यानमारा रोग वोकेरआउलान ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बोलकमार : धेरै जान्ने वन्न खोज्दै छोरीलाई नअल्मला । अरू पनि के केलेखेको छ पढ्न दे र तँ चुपो लागेर वस । ए भाउजु तपाइले यसलाई चुपलारनसिकाइ दिनु पन्यो यो वरू लाटी भएकी भए घरमा शान्ति हुन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्नी : सुनेर वस्‌न ठुली । हेर छोरीले कस्तो राम्रोसंग शुर नछोडेर बाचेरसुनाइ रहिछ । हामीले रामायण महाभारत, भागवत गीता सुनेको जस्तो गरीयस्ता रोग व्याद के के फैलिदै छ कसरी यस्ता महामारीबाट बच्न र वचाउनसकिन्छ र के के बाट भने सर्दैन त्यस्तो कुराको ज्ञानपनि हुनु पर्दो रहेछ । लौअरू पनि पढेर सुना त, छोरी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भुकुली पढ्दै जान्छे । बोलकुमार भन्छन्‌ “मोरा जिवाणुहरू रगतमा पसेपनि चुप लागेर वसे हुन्थ्यो नी त्यसलाई हाम्रो रगतको शक्तिशाली कोष नै छानीछानी किन खाइ हाल्नु परेको ?ठुली : मलाई चुपलाग भने जस्तो गरि चुपो लागेर वस्‌ भनन । तिमीले भनेपछिडराएर मान्छ कि यति भनेर हाँस्छे ।जम्दार्नी : फेरि यिनीहरूको ठ्याक ठुक चल्न थाल्यो । तिमीहरू चुपो लागेरसुन्छौ कि म उठेर जाउ । पढन देओ त ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भुकुली पढछे, “यस्ता रोग लागेका विरामीहरू मन मस्तिष्कले दुखी हुन्छन्‌ ।उनीहरूलाई एक त आफ्नो जीवन छोटिएको थाहा भै सकेको हुन्छ भने अर्को म&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घ्छ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त सबैको मृत्युको कारण हुन सक्छु । मैले ती मसंग सम्बन्ध वढाउन चाहने रसम्बन्ध रहेका हरू देखि सचेत रहि हरेक पल पलमा आग्नु पर्छ भन्ने सोच्दै,समाजबाट व्यवहारबाट पन्छिन खोज्दै अरू दुखी भएका हुन्छन्‌ । तर यस्तारोगीहरूले यसरी पन्छि हाल्नु पर्ने आवश्यकता छैन । साधारण लस पसले योरोग सरी हाल्दैन । केबल सुक्रकीट रगत र आइमाइको अंग रस अर्को निरोगीव्यक्तिमा छिर्ने वाटो दिनु हुदैन । यिनीहरूलाई दुखी भट्इ समाज परिवारबाट भाग्नुपर्नै परिस्थिति नपारौ र रोगबाट पनि वचौ र वचाऔ । त्यसको लागि यीकुराहरूमा होस्‌ पुच्याउनु पर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्नी : लो होस्‌ पुन्याउनु पर्ने कुरा पनि लेखका रहेछन्‌ । कस्तो वुद्धि पुन्याएरछापेका रहेछन्‌ । मर्नु पर्ने रोग हो यसको औषधी पनि छैन भनेर तर्साए पनियसबाट बच्न सकिन्छ भनेर पनि लेखको रहेछन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुत तिनले सर्दैन भन्दैमा हुन्छ र ? सरी हाले गम्रङ्गै पारेर ढाल्दो रहेछ ।समैत नभएको यस्तो रोग लागेको मान्छैसंग पनि को त्यसको मन दुख्छभनेर मिलेर सदाको झै वस्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वोलकुमार : सुन्नु भयो भाउजु यसको कुरा । अर्काले वताएको त लाग्दै लाग्दैन ।तैले ट्यार ट्यार गरेको जस्तो गरी अर्काको ज्यान जाने कुरामा पनि प्याच्च यसैयिनीहरू वोल्छन्‌ र लेखन्छन्‌ भन्ठानेकी छस्‌ ? कति जाँचबुझ गरेपछि यो ठीकहो भनेर पहिले ठोकुवा गर्छन्‌ अनि मात्र लेख्छन्‌ । हामी जस्ता नजान्नेहरू शंकैशाँकामा चिन्तित भएर जीवित रहदा नै अधमरा हुन्छौ कि भनेर यी कुराहरूमाहोस्‌ पुच्याउन सके डराउनु पर्दैन भनेर ज्ञान दिएका हुन । लौ भनौ, कसैकोघरमा यस्तो रोग लागेको मान्छे आफ्नै मान्छे रहेछ भने के गर्ने ? त्यो मर्न पनिभनेको वेलामा सक्दैन । बाँचुन्जेल वस्नै पन्यो । घरमा नवसै कहाँ जाने ? अरूकसले झन राख्छन्‌ । त्यसैले यी कुराहरूमा ख्याल राखे पुग्छ भनेर वताएकाहुन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबै शान्त भएकोले भुकुलीले पढेकी प्रष्ट सुनिन्छ । उ पढ्दै भन्छे,“अस्पताल, स्वास्थ्य चौकी र अरू औषधी उपचार गर्ने ठाउँहरूबाट पनि यस्तारोग सर्न सक्ने सम्भावना भएकोले त्यहाँका कामदारहरू र अरूले पनि त्यतिकैध्याच यस्ता विरामीलाई प्रयोग गरेको सुइ र औजारहरूमा दिनु अति आवश्यकछ । यो रोगको रोकथम हामी सबै समाजका व्यक्तिहरू मिलेर नै गर्न सक्छौ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुली : ए भुकुली त्यौ फेरि पढ त ? के रे, त्यो दाम्ही काट्ने पत्ति र फ्याउरीअर्काको कहिल्यै नचलाउनु त्यसबाट पनि रोग सर्त सक्छ भनेको हो ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बोलकुमार : हो ... हो, कत्ति यो त दोन्हाइ मात्र राख भन्छे ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छ्पः&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठुली लौ यो कुरामा भने हामीले चिन्ता लिनु परेन । जातैले झ्याप्प दान्ही जुङ्गानुहने हुँदा पत्तिको त्यति जरूरत ने पर्दैन । उ त्यो ओखल्नेले भएको छास्स छुस्सओखल्छन्‌ । भै हाल्यो । यस पाली छोरीले काठमाण्डूबाट वावुलाई भनेर दान्हीकाट्ने ल्याइछ त्यो त म, हेर तिम्रा ती कौडे कान्छा सन्ते कसैलाई पनि दाउ्हीकाट्न दिन्न है । मैले पहिले नै सुनाएकी छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्नी : आज म कस्तो साइतमा यहाँ पसेछु । यस्तो कुरा यसको मुखबाट सुन्नपाए । भुक्‌ली, तैले अरू धेरै पढेस्‌ पढ्नमा मन लगाएस्‌ । पढाइसकेपछि यसरीसबैलाई सम्झाउन हाम्रौ गाउँमा फर्केर आइज है ? लौ अव म पनि जान्छु !साँझ झपक्क पर्न आँटि सकेछु । घरमा वुढा रिसाउन थाले होलान्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठुली : कस्तो: कागजमा चित्ती पोको पारेर दिएछ ? त्यसले पढन जानेको होस्‌नत्यसमा के लेखेको रहेछ भनेर वुझौस्‌ । उही जान्नेलाई श्रीखण्ड नजान्नेलाईखुर्पाको विड्‌ भने जस्तो । ल्या त्यो म सन्दुकमा जतनले राख्छु । थाहा पाए पछिअब यसै फ्याकनु कहाँ हुन्छ र, होइन त भाउजु ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्नी : हौ त राख्नु त पर्छ । ए ठुली म संग एकछिन वाहिर आइज । तँसंगजरूरी कुरा गर्नु छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठुली अलि झस्कन्छिन्‌ र भन्छिन्‌, हस्‌ भाउजु आउछु, के पस्यो त्यस्तो ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्ती ; नकरा, सुन्लान फेरि । यो वोलकुमार वावुलाई तलको भट्टरि पसलमाजान न दे । त्यो कान्छी भन्ने त फतक्क भएर काठमाण्डूमा नै कुहिएको घाउलिएर फर्कि सकि रे भन्ने सुन्छु । अर्कि त्यसकी दिदी पनि के कस्ती छ के थाहा ?बरू हेर तेरो जहानले के चाहन्छन्‌ त्यो आफैँ पुस दिए । त्यो चन्द्री पनिस्वास्नी मान्छे तिमी हामी पनि स्वास्नी मान्छे नै हौ । त्यसले सक्ने तैले हामीलेनसक्ने के छ ! घेरै झै झगडा गरेर घेरै आउन मन नलाग्ने नपारेस्‌ है ? वरूएक फेर स्वास्थ्य पोष्टमा रगत जाँच्नु पर्छ कि अरू के के जाँच्नु पर्छ पठा ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठुली : हुन्छ भाउजु म त्यसै गर्छु । आफ्नो लोग्नेलाई आफैँमा रत्याएर राख्नु पर्दोरहेछ, होइन त ? रोग वोकेर कतैबाट ल्याए भने आफै पनि सिड्धीने र हामीलाईपनि सार्ने रहेछ । पकलक्क यही उमेरमा दुच्चै जना हुनु पस्यो भने यी बच्चाहरुकोके गति होला लौ ! अझै यी वच्चा जन्मददैछ्ठ । के गर्नु यिनका वानी असलछैनन्‌ । केही भने भक्री हाल्छन्‌, टोकेर निलै पारेका हुन्छन्‌ । थाम्न गार्ैखालका छन्‌ र पो म पनि मुख छोड्न थाली हाल्छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्नी :. मैले जस्तो गर्नु पर्छ। सानो तिनो कुरामा वास्ता नगरेर सहदै जाने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसले गर्दा रातो दिनको झ्याक्‌ झ्याक्‌ हुदैन । अव यो त सहन्छे मैले जे गरेपनिहुन्छ भनेर अचकाली गर्न थाल्छन्‌ तव मेखै मारि दिनुपर्छ । यिनलाई पनि एक्लैबच्चाको च्याउ म्याउ सहेर जिविका चलाउनु पर्ने पारिस्‌ भने, “ए ठुली हिडभनेर जहाँ तिमी पुगेकी हुन्छौ आइ हाल्छन्‌ । स्वास्नी र वाहिरको केटीको फरकयिनलाई पनि थाहा हुन्छु । अर्को ल्याउ भने एक त वच्चा आउदा आउदै स्याहार्नुपर्ने हुँदा आउनै मन गर्दैनन्‌ र आइहाले भने जवान केटी र यो बुढो हुंदैको संगकुरै मिल्दैन । झन दु:ख पाउछन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठुली दङ्ग पर्दे जम्दार्नीलाई, घचद्दै भन्छिन्‌, “भो यो भाउजु त, के के सिकाउनुहुन्छकेके?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्नी : हो त, यस्तै गर्दै जानु पर्छ । यिनलाई हातबाट फुत्कन पनि दिनु हुन्नर आफू पनि केही पनि हैनौ भन्ने देखाउनु हुदैन । नत्र खुव हेप्न थाल्छन्‌ । ह्वाम्राछोरी देखि ल्याएर पनाती सम्मलाई यसरी नै दवाएर राख्छन्‌ । लौ, कुरा वुझेरलोग्नेलाई समालेस्‌ अव म हिद्धे । आम्मै कत्ति कुरा गरेछु ए लौ ठ्याम्मै रातपरि हालेछ ए ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जन सन्देश:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मिलेर सतर्क भएर हामी समाजमा वस्न सक्यौ भने यहाँ पर्ने कुनै पनिसमस्यालाई हामी राम्ररी निर्मूल पार्न सक्छौँ । एड्स जस्तो रोग भित्रीए पनि हामीखेद्न सक्छौ । रोग लाग्छ, रोगीलाई हेला नगरौ र सकेसम्म रोग लाग्नै नदिनहामी हाम्रो वानी वेहोर व्यवहारमा सुधार ल्याऔ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार, जम्दार्नी गाउ घुम्न गएकी अझसम्म नआएकोले चिन्तित हुन्छन्‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
र चनाखो भइ उनी आएको चाल पाउन कुरेर वसी रहेका छन्‌ । जम्दार्नी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घरभित्र पसेर थाकेकीले थचक्क वस्दै भन्छिन्‌, “ए बुहारी पानी ल्या त, पिउ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कस्तो प्यास लागेको मुखै प्याक प्याक पार्ने गरी । अवेर भयो, यही बुढा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रिसाउला भनेर लम्किँदै आए नाक मुख सवै सुके । दम पनि कति फुलेको नी छि[|&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : उमेर कि नै तु भन्ठानेकी छस्‌ कि कसो ? वुढयौली लागेपछि पनि वलदेखाउन लागे के हुन्छ ? गाउ चहार्ने वानी अझै गएको छैन । अझ आउना साथैमै माथि आइ लाग्छे । घर हेर्ने बुहारी पाएकी छै कुन दिन यो राती पनिआउन्न, मैले खोज्दै हिड्नु पर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्वी : कति घरभित्र मात्र वच्चिएर वसि रहुँ भन्नु हुन्छ । उता ठुली रबोलकुमारलाई धेरै कचकच नगर भनेर आए यता यी आफ्नै यस्तो छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : त्यहाँ पुगेकी रहिछ र पो यति अबेर गरेकी । ती सोझा तामाङहरूयसका कुरा सुनेर लछु परे होलान्‌ यो बोल्दा बोल्दै रातै परेको पनि विर्सि । कसोराती अंध्यारोमा कान्लाबाट गुल्टिन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्नी : एक दिन के अवेर आए कत्रो विराम गरे जस्तो गरी सुनाउनु हुन्छ ।त्यसै कहाँ जान्छु भनेर गएकी थिए र ? फर्कदा भुकुली शहरबाट आइ रे भन्नेसुने र गएकी थिए । गएको राम्रो पति गरेछु । त्यही भुकुलीले आज अनौठो कहिलेनसुनेको रोगबारे पनि पढेर सुनाइ । संसारभर फैलिएको रोगबारे पनि हामीलाईकेही थाहै रहेन छु । किन मेरो कुरा सुनेर मुन्टो फर्काउन भएको के हामीलेबोलेको सुन्नै नहुने भन्नेछ । यसै मैले कथेर सुनाउन लागेकी हैन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : के सुन्ने तेरो वक वक । ढुङ्गेधाराको पानी जस्तो अटुटसंग कराइरहन्छेस्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्नी : तपाइका ती उखान पुरानो भइसके । उ त्यो माथिको ढुङ्गेधारा सुकेरकेही झर्दैन । मैरो कुरामा त्यस्ता सुक्कापना रत्तिभर छैन । यो रोगबारे राम्ररीसुन्नोस्‌ तपाइहरू जस्तो रसिकहरूले सुन्नै पर्छ । जुङ्खा कपाल सेतै भए पनि भट्टिओरीपरि चिलले जस्तो गरी चक्कर काट्न छोड्न हुन्न |) म त तपाइ र बलभद्रदुवैलाई भोली नै रगत जँचाउन नपठाइ छोड्दिन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : हैन, के भन्छे यो ? किन म रगत जचाउन जाउ ? वौलाउन त यौवौलाइन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्नी : एड्स भन्ने रोगबारे थाहा पाएको छौं वुढा ? तपाईहरू जस्तापात्तिएकालाई लाग्दो रहेछ । रगत जचाएर मात्र यो रोग लागेको नलागेको बाहाहुदोरहेछ । कही रोग बोकेर त वसेका छैनौ ? यो ज्यानमारा रोग सरूवा रोगरहेछ । वेलैंमा होस्‌ पुस्याउन सकेनौ भने सन्तानै सखाप पार्दो रहेछ । धेरैछुचुन्द्रिएर हिड्ने होइन ? वानी सपार्नोस ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यतिकैमा वलभद्र आइ पुग्छन्‌ र भन्छन्‌, “एड्स रोगबारे यहाँ पनि कुरा सुनिनथाल्यो । हाम्रो गाउमा कसैलाई लाग्यो कि कसो ? यो छन पनि त्यस्तै डरलाग्दो,छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : तेरी आमाले ल्याएकी आजको ताजा खबर यही “एड्स” रोगबारे हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाँस्दै भन्छन्‌, “अब यसले तलाई र मलाई दुबैलाई रगत जचाउन लैजाने रे ?जान्छस के ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्नी : के हाँस्नु हुन्छ, डर लाग्दो कुरामा होस्‌ पुन्याउनै त पर्छ । सुन्नु भएनछोराले पनि हो भनेको ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : हास्दै भन्छन्‌, छन त यो डरलाग्दै छ । रगत जचाउदा यदि यो रोगमलाई नै लागि सकेको रहेछ भने के गर्नु हुन्छ आमा ? यो रोग लागेको मान्छैसितिमीति चिनिदैन भन्छन्‌ ? जम्दार्नी झोकिदै भन्छिन्‌, “ए बुहारी सुनिस्‌ तेरोलोग्नेको कुरा ? कस्तो अलक्षिणा कुरा गर्छु । यसको जे पायो त्यो वोल्ने थुतुनोयी यसरी लुख्िि दिन्छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्रे हाँस्दै भन्छन्‌, “ऐया ऐया । जस्तो पर्छु त्यस्तो सहनै पर्छ नी ? हामी गर्नैके सक्छौ ः&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : यस विषयको क्रा पन्छाउन वलभद्र संग कूरा गर्न थाल्छन्‌, “नविर्सिएरभौली हामी दुवै त्यो गजुरेको घरमा भेट गर्न जानु पर्ने भएको छ ।” त्यसलाईहुन सम्मको चोट लागेको छ ? अघि आएर निकै वेर गन्थन गरेर गएको थियो ।मैले त्यसको छोरीलाई हेर्न आउछु भनेको छु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : कस्तो चोट परेछवा?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : कस्तो भनु खै ? त्यसको चोट भनि नसक्नुको छ । दुःख परेर छोरीलाईकाठमाण्डूमा काम गर्न राखेको थियो । यहाँ आएपछि मर्णान्तक अवस्थामापुगिसकेकी छै रे । औषधिले छुद्दै छुदैन रे । फुकफाक, झाँक्री बैद्य सवै लगाइसक्यो निको भने हुदै हुदैन रे । हाँड छाला मात्रकि भएकी छ भन्थ्यो । वावु तभन्थ्यो काठमाण्डूमा राखेको भनेर तर यहाँ गाउमा गाइगुइ कुरा सुन्दा भनेहिन्दुस्थान पुच्याइएकी थिइ रे भन्छन्‌, कुरा के हो थाहा छैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वलभद्र : भारतमा नै पुगेकी हो भने त्यसको रगत जचाउनै पर्छ । त्यहाँपुग्याइएका नेपाली केटी धेरै जसो वेश्या वनाइएका हुन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्नी : नेपाली थुप्रै केटीहरू त्यहाँ बेश्या बनाइएका हुन्छन्‌ भन्ने तैले कसरीथाहा पाइस्‌ ? कि तँ पनि तिनीहरू भएतीर जाने गर्थिस्‌ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : हेर जवान छोरालाई केरेकी ? छोरा मान्छे कहाँ जान्छ कहाँ, तलाईवुहारीकै अगाडि सोध्नु पर्छ । अब यी दुइ बीच पनि झगडा पार्ने भइ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्नी : झगडा परे परि रहोस्‌ । यस्तो नराम्रो लत लाग्यो भने छुटाउनेस्वास्नीले नै हो मैले आफ्नै छोरालाई केर्दा पनि यो बुढो बीचमा छेक्न किनआउछन्‌, हँ ? यो एड्स भन्ने रोग धेरै जसो यस्तै ठाउँमा जानेलाई लाग्छ रे ।तपाइ पनि राम्ररी याद गर्नोस्‌ मैले यो छोरालाई मात्र भनेकी हैन तपाईंलाई पनि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुनाएकी हुँ, बुझनु भयो त&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार छोरालाई भन्छन्‌, “तेरो आमाको मगजलाई आज एड्स रोगले खलवलाईदिएको छ । जे भने पनि जे वोले पनि एड्स नै सरिहाल्छ कि जस्तो गर्छे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्नी : किन नडराउनु त । यहाँ घाँस काट्नु दाउरा चिर्नु सबैमा काट्ने कूरानचलाई धरै छैन । कही त्यस्ता घाउमा एड्स रोगीको रगत पर्न गयो भनेभुसुक्क पारेन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : यी हेर, आज मैले यसो दाउरा चिरी दिउ भनेर आटेको त आफ्नैखुट्टामा हान्न पुगे छु । कम्ता रगत वगेन । घरमा बुहारी मात्र थिइ । उसैलेआएर वाँध वुध गरी र पो बन्द भयो नत्र म संग तिमीहरूको भेट हुन्थ्यो,हुदैनथ्यो ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वलभद्र : वावुलाई चोट लागेको सुनेर आफूलाई एड्स लागेको छ भन्ने बिर्सन्छन्‌र भन्छन्‌, खै खै वा हेरँ कत्रो चोट लागेछ ? कस्तो कपडाले बाँधी त्यसले ? मराम्ररी बाँधी दिन्छु ल्याउनु होस्‌ त्यो खुट्टा !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामली वलभद्रले जम्दारको घाउ छुन लागेको देखेर अत्तिदै कराउछिन्‌, “ल ...ल ..... ल के गर्न तम्सिएको तँपाइ त ? जे जसो गनु पर्ने हो मैले राम्ररी गरीदिएकी छु फेरि खोल्नु पर्दैन ? आफ्नो औला काटेको पनि हेर्नोस र विचारगर्नोस्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : किन डराएकी त्यसरी ? मलाई तिम्रो सासुले भनेकी जस्तो एड्सलागेको छ र त्यो वलेलाई सर्छ भन्ने लाग्यो कि क्या हो ? वाबुलाई चोट लागेकोसुनेर पनि त्यसले दिल कसरी थामेर वसोस्‌ । तिमीले जति राम्रोसंग गरेकी भएपनि उसलाई हेर्ने मन लागि हाल्छ किन कराउछौँ ? यो बुढीले के खबर सुनाईयसलाई अत्ताइ छोडी ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्नी : त्यसरी सातै खाउला जस्तो गरी चिचाइ हाल्नु पर्छु, तँलाई ? हेर,कस्तरी तर्सेर टक्क रोकियो ? यसले नोकरी छोडेर आए पछि यसले यसै यसैसातो खान थालेकी छ । तैले हेला यसलाई गर्नु पर्दैन । हामीसंग तँ एउटीलाईपाल्ने प्रशस्त धन छ । हेर त आफ्नौ स्वभाव बदल्ने भए वदल नत्र म पनिकम्ता कि छैन । सासु बुहारी कस्ता हुन्छन्‌ भन्ने कुरा सुनेकी नै होलीस्‌ मआफ्नो पारा देखाइ दिन्छु । बलभद्र आमालाई शान्त पार्न खोज्दै भन्छन्‌, “आमाश्यामलीले कनै नराम्रो भनेकी छैन । एकको रगत अर्कोमा पर्न हुदैन भनेरतपाइनै सुनाउनु हुन्छ । श्यामलीले मलाई हैन बालाई मेरो रगत लागेर केहीहोला कि भनेर आत्तिएर कराएकी पनि हुन सक्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्नी छोरालाई भन्छिन्‌, लाज लाग्दैन तलाई हामीसंग स्वास्नीको पक्ष लिएरवोल्न उसलाई पनि हामीले त्यति पनि भन्न नहुने जस्तो गरि रोएर जानु पर्छ ।जा .... जा त्यसैको पछि लाग र फकाइ फुलाई गर । हामीले ठुलो पारि दिने हो,पारी दियौ अव के मतलव हाम्रो ? छोरी ज्वाइको भइ छोरा बुहारीको । लौ बुढाअव तपाइको म र मेरो तपाइ वाहेक अरू कोही हुने भएनन्‌ । खै हेरू, कत्रोचोट लागेको रहेछ ? फेरि भोली नै गजुरे कहाँ जाने होइन । निको नभइ म जानदिन्न, लुसुक्क छोरालाई लिएर जालौ । मनमा कुनै कुरा लागेकी तपाईलाई गरीहाल्नु पर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गहुँको बाली काट्दा काट्दै हँसियाले वलभद्रको हात काटिन्छ । उनको हातबाटरगत बगेको देखेर पत्तै नपाउने गरी छयाम्वा दौडेर आइ त्यस चोटमा आफ्नोहातले ट्याप्प समाति दिन्छन्‌ र भन्छन्‌ रगत वग्न थालेपछि यसरी च्याप्पसमाति हाल्नु पर्छ । तिमी त जान्दा रहेन छौँ झन हेर यसरी हात तल झारेकाबलभद्र, आफ्नो हात उसको हातबाट फुत्काउदै भन्छन्‌, “के गरेको यस्तो ? मेरोहातलाई छोडी दिनोस्‌ म आफै थिचुला । रगत यति बगेर केही हुदैन वरू तपाइछिटै आफ्नो हात धोई हाल्नोस्‌ । उ त्यहाँ पानी छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वलभद्रले देखाएको यस्तो व्यवहार, देखेर छ्याम्वा छक्क पर्छन्‌ र भन्छन्‌, “कस्ताहुन्‌ यी, दयामाया गर्दा पनि उल्टै आइ लाग्ने । मलाई रौगी संझिएको पो होकि ? शहरमा नोकरी गर्न वसैर यसै गरी हेला गर्न सिकेर आयौ कि कसो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : होइन दाई, त्यसो नभन्नोस्‌ न । मैले तपाईलाई रोगी भनेर हेला गरेकोछैन मेरो रगतले तपाईलाई नराम्रो गर्ला भनेर त्यसरी पन्छाउन खोजेको हुँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छूयाम्वा : तँलाई मैले चिनेकै छ्वैन भन्ठानिस्‌ कि कसो ! खुव ठुलो मान्छे भएकोछु भन्ने तँलाई घमण्ड छ, होइन ? लौ जा जेसुकै गर । माया गर्न लायकको तँछदै छैनस्‌ ? हामीले आपत विपत परेको वेलामा पनि तँलाई छुनै नहुने ?बलभद्वले उसको गालीको वास्ता नै नगरी नम्र भएर सोध्छन्‌, “तपाइको हातमाकही घाउ चोट त छैनन्‌, मलाई देखाउनु होस्‌ त?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छ्याम्बा : तँलाई मेरो वारे के मतलव ? छ भने मेरै हातमा छ । त्यसले तलाईकेही गर्न पाएको छैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र खिन्न हुदै भन्छन्‌, “तँपाइले कस्तो नबुझ्नु भएको ? मेरो दूषित रगतलेतपाइको घाउमा छोएको रहेछ भने मेरो रोग सर्ला भनेर तँपाइको हात देखाउनुहोस्‌ भनेको । तपाइको रगतले त मलाई के हुन्छ र?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छ्याम्वा तैपनि रिसाउदै आफै फत फताउदै आफ्नो वाटो लाग्छन्‌ । बलभद्र पनि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खिन्न मन पारेर घरतिर लाग्छुन्‌ । वलभद्रले रगत चुहाउदै आएको देखेरश्यामली नजिकै आउछिन्‌ र भन्छिन्‌, “जति घाउ चोट तपाईलाई नलागोस्‌ भन्योउति नै लाग्न छोड्दैन । रगत वगेको वगेकै छ । लौ अब यसले राम्ररी बाध्नोस्‌भनेर कपडा दिन्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्नी हेरि रहेकी हुन्छिन्‌ । चोट लागेर घर आएको छोरामाथिबुहारीले त्यस्तो व्यवरहार गरेको सहन सक्दिनन्‌ र करर्लिदै भन्छिन्‌, “रगतबगाउदै लोग्ने घरमा आएको छ त्यसलाई स्याहार सुसार गर्नु भनेको त छदैछन्‌त्यसमा पनि लौ चोटमा वाध्नोस्‌ भनेर कपडा फ्याकि दिन्छे ए । के त्यति आफैलेवाधि दिन पनि सम्दिनस्‌ कि क्या हो ? ज्यादा मातिएको त राम्रो हुदैन ए ? दयागर्न त तैयार हो । श्यामली सासुको वचन सुनेर गालाभारी पार्दै भन्छिन्‌,“सोध्नौस्‌ तपाइकै छोरालाई म किन दया सम्म पनि गर्न नसक्ने भएकी छु ।बलभद्र पट्टि फर्केर भन्छिन्‌, “कति सम्म तपाई मलाई यसरी नै वाँचिरहनु पर्नेपार्नु हुन्छ । मेरो टाउको नै पट्ट होला जस्तो भैसकेको छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : भो भो आमा । तपाईहरू चुप लागि दिनोस्‌ त ? मलाई यति गर्न कुनैगान्हो भएको छैन । म आफैँ पनि यति गर्न सक्छु । छूयाम्वा दाइले चोटमा थिचिदिदा त्यहाँ कटाएर आए यहाँ फेरि यो रडाको छ । मलाई कसैको सहयोगचाहिएको छैन । शान्तिले रहन दिनोस्‌ । जम्दारनी भन्छिन्‌, “लौ बस्‌ शान्तिले मैलेतेरो स्वास्नीलाई त्यति भनेको मन परेन, कुरा बुझि हाले 1&amp;quot; यति भन्दै जम्दार्नीचौटामा जान्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जन सन्देशः&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोग लुकाउने प्रयास गर्दा विभिन्न प्रकारको समस्याहरू आइ पर्छ ।अशान्ति वढ्न घाल्छ । हुन सक्छ, यस्तो अशान्तिले चिन्ता ग्रस्त हुनुको साथसाथै जटिल समस्यामा पनि अल्झाइ दिन सक्छ । रोगलाई नियन्त्रण गर्नु भन्दावढी रोग फैलाउन पनि सक्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दारको घाउ ठीक भएपछि एक विहान जम्दार र बलभद्र दुवै गजुरेकहाँ धनलाई हेर्न जान्छन्‌ । जम्दार्‌ आगतबाटै कराउछन्‌, &amp;quot;ए गजुरे, केगर्दैछस्‌ ? हामी त बिहानै समसमी आयौ है ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गजुरे जम्दारको स्वर सुनेर बाहिर आउछन्‌ र भन्छन्‌, “भाइको घरमासमसमी आउने त हो नी । यहाँ आउन पनि बिहान बुलेकी भन्नु हुन्छर? योत तपाइ कै घर हो!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : कुरा गर्न तँलाई कसले जित्न सक्छ । कस्तो छ तेरो छोरीलाई !झाँक्रीको उपचारले फाइदा गस्यो कि गरेन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गजुरे : के गर्थ्यो ? जति गरे पनि उस्ताको उस्तै । शहरबाट आउदा पनि थुप्रैऔषधी ल्याएकी थिइ त्यसले पनि छोएन । खै अव त आश पनि घट्दै जानथाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : हिड डुल गर्न सक्छे कि सक्दिन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गजुरे : कहिले गरी पनि ,हाल्छे कहिले सबिदिन ।अहिले केहि दिन देखि ओछ्र्यानैपरेकी छ । भित्र गएर हेरौन । ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भित्र पसेपछि गजुरेले धनलाई बोलाउदै भन्छन्‌, “ए धन, यता हेर त,ठुलो वा तलाई हेर्न आउनु भएको छ । नमस्कार गर । यो चाहि ठुलो दाइ हो ।गाउमा परदेशी जस्ता भझुलुक्क देखा पर्ने गर्छन्‌ । तैले के चिन्लिस्‌ र ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : अव गाउ छोडेर कतै जादैन । विदेशको नोकरी पनि छोडी दियो । यहाँआफ्नो सम्पत्ति कसले समालि दिओस्‌ जस्तो छ, त्यहाँ व्यथैं लोग्ने स्वास्नी छुट्टिएरकिन वस्नु । घरै आइज भो जागिर खानु पर्दैन भनि साथैमा राखेको छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गजुरे : हो एक दम ठीक गर्नु भयो । घरवार पनि त हेर्नै पर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनीहरू आपसी गफमा व्यस्त रहन्छन्‌ । बलभद्र धनसंग सोध्छन्‌, “तिमीयहाँ कहिले फर्कियौ ? सुन्छु भारतमा पुगेकी थियौ रे ? कहाँ काम गर्थ्यौ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धन : तीन चार महिना जति भयो होला म फर्केकी । बम्बइमा थिए । काम केगर्थे त्यो नसोध्नोस कोठीमा बेचिएकी थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : तिम्रो मुखमा खटिरा छ जस्तो छ नी ? असजिलो गरेर वोलेकी जस्तोलाग्छ । ज्वरो पनि आउछ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धन दिक्क मानेर भन्छिन्‌, “मुख भरि खटिरै त छन्‌ । सबै व्यथा लिएर वसेकीछु । ज्वरो अलि अलि बीच बीचमा आउछ । अरू के केछके के । के लाईदेखाउ खै ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : बा हामी अव बाहिरै जाउ । यहाँ विरामी धनलाई आराम गर्न दिउ ।यहाँ हामी वसि दियौ भने यिनीलाई अप्ठ्यारो पर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गजुरे : आफ्नो ठुलो बा र दाइको अगाडि पनि कै को गाङ्हो । त्यो सुति राख्छैहामी आफ्नो गफ गर्दै गरौंला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वलभद्र जिद्दि गर्दै भन्छन्‌, होइन, बाहिरै जाउं हिंड्नोस्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : बाबुले भनेको ठीक हो । हिड बाहिरै जाउ । घाम पनि छ । जिउतात्छ पनि ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीनै जना वाहिर जान्छन्‌ र बलभद्र भन्छन्‌, “काका तपाईले झाक्रीफुकफाक गर्ने वैद्यलाई वोलाइ पैसा खर्च गर्नु व्यर्थ हो । पहिले धनको रगतजचाउनु होस्‌ । धनले तपाईलाई बताइ कि बताइन उसलाई वम्वइकोवेश्यालयमा बेचेको रहेछु । वलभद्रको कुरा सुनेर गजुरै छक्क पर्छन्‌ र आश्चर्यमान्दै भन्छन्‌, “हं, त्यो त्यहाँ कसरी पुगिछ्ष ? अनि के वेश्या भइ छ ? होइन,त्यसले अझसम्म यस्ता कुरा हामीलाई लुकाएर किन राखी ? त्यसलाई त्यस्तोठाउँमा कसले पुन्यायो त्यो कुरा खुलस्त हामीलाई किन भनिन ? त्यसव्यङ्जतिलाई मैले जानेको छु । त्यसको मिति त्यही पुग्याइ दिन्छु जेलै जानु परेपनि वरू जाउला, त्यसलाई छोडदिन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : ल .... ल यो त यसै सन्केर विरामी छोरीलाई मार्छु भनेर उद्दोरहेछ ए! के त्यसलाई मारेर अरू पाप बोक्ने दाउ छ ? खुरूक्क आएर यहाँ वस्‌ । कुराराम्ररी नुझ्नु पर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : धनको यसमा के विराम छ, भन्नोस्‌ त काका ? कसैले लगेर वेचिदियो होला । त्यसरी अर्काको मुठ्ठीमा परे पछि के गर्न सक्छे ? त्यो आफैं कस्तोसंकटमा परि होली । बरू सौध्ननै ठम्सनु भएको भए सोध्नोस्‌ कसले धनलाईत्यो ठाउँमा लगेर बेचिदियो ? त्यसको पत्ता लगाइ &#039;पुलिसको जिम्मा लगाइदिनोस्‌, त्यो पो राम्रो हुन्छ । म पनि यसमा तपाईलाई मद्दत गरूला, लाहुरेकाइलाले पनि गर्छ, हाम्रो गाउँमा आजभोली चेलीबेटी हराउने झन झन वढदैछ,यस्को रोकथाम गर्नै पर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : सुन तेरी भाउजुलाई भुकुलीले के के रोगको बारे पढेर सुनाइछ भन्दैथिइ यस्ता ठाउमा जाने आउने र छनक नै त्तिमा परेकालाई एड्स भन्ने खतरनाकसरूवा रोग लाग्छ रे । त्यस्ता रोगलाई छुदै छुदैन रे र त्यसको औषधीपनि आजसम्म निस्केको छैन रे । कही यस्तै रोग तेरो छोरीमा पनि सर्न गयोकि ? यो छिटै एकबाट अर्कोमा सर्छ रै भन्थि । हुन त यो शंका मात्र हो । डराइहाल्नु पर्दैन । रगत भने जचाउनु राम्रो हुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : आमाले सुनाउनु भएकी क्रा साँचो हो । शंका लिएर कु हुदैन ।त्यसैले एड्स रोग लागि सकेको छ कि छैन भनेर थाहा पाउनलाई नै धनको“पहिले रगत जचाऔ त्यसपछि कस्तो औषधी उपचार गर्नुपर्छ अनि मात्र गरौलाभनेको हुँ । त्यसवेला निको हुने रोग लागेको रहेछ भने औषधी गर्ने पैसा छैनभन्नु पनि तपाइले पर्दैन । हामी दिन्छौं । घनलाई यो कलिलो उमेरमा नै यसै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
100. ]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मर्न दिदैनौ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गजुरे : त्यहाँबाट आउदाङ्लै रगत जचाएर पठाएका पो हुन्‌ कि ? थुप्रै औषधी रकेहि कागज लिएर आएकी थिइ । हामीले के जानौ र त्यसमा के लेखेको छ के? त्यो धनलाई छोड्न आउने मान्छे पनि नेपाली नै थियो । त्यसले केही भनेनआयो लौ तपाइको छोरी ल्याइ दिएकोछु अलि विरामी छिन्‌, डाक्टर जचाएरऔषधी किनेर लाएकोछ्नु । त्यति मात्र भनेर वास समेत नवसेर हतारिदै हिँडी पनिहाल्यो हामी विरामी छोरी पट्टि लाग्यौं अरू कुरा के सोध्ने केही हेक्कै रहेन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : हेत्तेरी आफुले नजाने पनि गाउमा कुनै पढ्न सक्ने या स्वास्थ्यचौकीमा नै गएर त्यो डाक्टरले लेखेको देखाउनु पर्दैनथ्यो ? कहाँ झाँक्री पढिदौड्न थाल्नु भएछ । लौ त्यो ल्याउनु होस्‌ त हेरू के लेखेको रहेछ । एड्सलागेको रहेछ भने धेरै कुरामा होस्‌ पुथ्याउनु पर्छ । यो रोग घरका अरूपरिवारहरूलाई पनि विचार राम्ररी पुग्याइएन भन्ने सर्न सक्छ । त्यस मान्छेलेपनि धनलाई ल्याउनु ल्याए पछि यो रोग लागेको छ याद गर्नु होला मात्र भनेरगएको भए कत्रो कल्याण हुन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गजुरे घरभित्र पस्छन्‌ र केही कागज ल्याएर वलभद्वलाई पढ्न दिँदै भन्छन्‌ “लौवावु त्यसले ल्याएकी यिनै कागज हुन्‌, पढ त के लेखेको रहेछ” ? रगत जचाउनैपर्ने रहेछ भने जचाउला पनि । कत्रो ठुलो कुरा भयो र ? त्यही सम्म पुग्नुतहो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वलभद्र पढ्न थाल्छन्‌ । दुबै उत्सुकताको साथ सुन्त पर्खि रहेका हुन्छन्‌ ।वलभद्रले खिन्न भएर भन्छन्‌, “हो त रहेछ नी त्यही एड्सले सताएको ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्तो जीवाणु सरेको थाहा पाए पछि के राख्थे तिनले, लखेटी हाले ? समातेरगोद्नु पर्ने त त्यो ज्यानमारालाई हो जसले विदेशमा पृच्याएर धनलाई वेचिदियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक छिन वातावरण शान्त हुन्छ । कोही केही वोल्न सक्दैनन्‌ ।छानाबाट एकै वाजी तल खसेका जस्ता हुन्छन्‌ । सवै एकै साथ उठेर धन कहाँजान्छन्‌ । धन उनीहरूले वाहिर गरेका क्रा सुनेर रोइरहेकी हुन्छे । गजुरे, धननजिकै गएर सोध्छन्‌, “ए छोरी यता फर्कि त ? हाम्रो कुरा सुनेर रोएकी पो होकी?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माया लाग्दो स्वर निकालेर धन भन्छे, “तँपाईहरूको कुरा खनेर नेर म किनरून्थे वा? मर्छु कि भन्ने डर त विरामी भएर लड्दा लड्दै कहिल्यै हटिसक्यो,किन मरिन भन्नै मात्र छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गजुरे : त्यसो नभन्त छोरी, यो मुटु कति चर्काउछेस्‌ ? वरू नढाँटी भन तँलाईवेश्या कोठीमा कसले पुस्यायो ? आफै शहर हेर्ने रहरले त गएकी थिइनस्‌ ?यसरी दु:ख पाउदा पनि कहिल्यै मुख खोलिनस्‌ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाबुको कुरा सुनेर दिक्क मान्दै धन भन्छै, “हरे, यो वाले पनि केसोचेर यस्तो कुरा सोध्नु भएको होला ? म आफै त्यस्तो दुःख भोग्नु पर्ने ठाउँमागए हुँला त ? तपाईले विश्वास गरेर जिम्मा लगाई फर्कनु भएको आफ्नोसाथीलाई सोध्नोस्‌ त्यसले किन मलाई लगेर त्यस्ता ठाउँमा वेच्यो ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक छिन सन्नाटा छाए पछि धन भन्छै, “तपाईलाई म त्यहाँ पुन्याइएकीकुरा थाहा छैन भनेर मैले कसरी बुझु ? आमासँग सोधेको थिए त्यस मधुरालेपैसा पठाउछ कि पठाउदैन भनेर । आजकल धेरै धेरै पैसा तीन चार तीन चारमहिनामा पठाउछ, तैले धेरै कमाउन थालिछ्ठस्‌ हगि भनेर आमाले खुशी हुदै भन्दामैले किन लाजको मर्नु पारू भनेर घाँटीसम्म आएको जवाफ पनि यसै दवाए ।मैले सम्झे मेरो नाम धन राख्नु भएर धन कमाउने वाटो पनि मलाई वैबनाउनु भएको रहेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गजुरे : पैसा पठाएको त होनी, छौरी । तर हामीले पनि के जान्नु त्यो पैसातलाई बेचेर पठाउने गरेको रहेछ भन्ने ? के हामीले आफ्नै मुखले छोरीलाईवेचेर पैसा पठा भन्यौ होला त : तैले पनि आफ्नो वा आमाप्रति यस्तो सोच्नमिल्छ ? ए दाई, म कस्तो वावु हुन गएको रहेछु आफ्नो&#039; छोरीलाई बेश्या वनाएरयौ पेट भर्ने ? त्यसवेला सोरेको त्यो पैसाले अहिले मलाई कसरी डामिरहेछ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : अहिले बिलौना गरेर के गर्छस्‌ । त्यसवेला छोरीको हालखवर वुझ्न वारबार काठमाण्डू जाने आउने गरेको भए त्यसले स्वाद्ठ धनलाई हिन्दुस्थान लैजानसक्थ्यो ? साथी हो भनेर छोरीलाई आँखा चिम्लेर सुम्पिइस्‌ अहिले “खा पाइस्‌ ?होइन, त्यो मधुरा भन्ने कहाँ को हो ? यो गाउमा त्यस्तो नाम गरेको कोहीछैन ? त्यस्तो पराइलाई छोरी सुम्पे पछि माया गर्छ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गजुरे : त्यो कहाँको भन्ने त मलाई पनि थाहा छैन । काठमाण्डूमा भारी बोक्नेकाम गर्दा साथी वनेका हौ । त्यसले मलाई आफ्नो डेरामा लगेर राख्थ्यो । दु:खसुखका क्रा एक अर्कोलाई वतासथ्यौ । भन्थ्यो, “गाउको जीवन पनि कुनै जीवनहो सन्तानले नत पढ्न पाउछन्‌ । लौ दाई त्यहाँ भएको घरखेत वेचेर यहाँ आउहामी दुवै साथै वसौला । तिमीलाई पनि राम्रो काम खोजेर लगाई दिउला ।&amp;quot; त्योलुच्चाले यस्तो काम गर्ला भनेर म के जानु ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : कसो तेरौ घर खेत समेत हात लगाएर तँलाई नै नाङ्गै पारी दिएन ।अव बिलाप गरेर के हुन्छ, वितास पारी हालेछ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दु:ख व्यक्त गर्न गजुरेलाई अभै पुगेको छैन र भन्छन्‌, “त्यस्तै गाम्होसाङ्गो नपरीकन मैले छोरीलाई काम गर्व पठाएको थिइन । नत्र छोरीलाई आफ्नोसाथबाट किँन पन्छाउथे ? मीठो नमीठो जे जस्तो भए पनि बाढेरनै खान्थ्यौहोला । सँग संगै बोलकुमारको छोरी त्यही काठमाण्डूबाट पढेर सुनाउन सक्नेभएर आइ । मेरो मात्र यस्तो के हुन लेखेको रहेछ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : यी कुरा मलाई थाहा छैनर सुनाउछस्‌ । के गर्छस्‌ तेरो छोरी वेइमानकोहातमा परी छ र विगारी दिए । धन संग जम्दारले सोध्छन्‌, “ए धन तलाई थाहाछ त्यो मधुरा कहाँ बस्छु ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धन : त्यसले मुङ्गलिङमा सानो होटल खोलेर वसेको छ रे भन्ने मात्र सुनेकोछु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : त्यसलाई खोज्ने काम लाहरे काइलालाई नै लगाउनु पर्छ । त्यसकोशरीर र लम्वाइ देख्ना साथ पहिले नै मथुराको सातोपुत्लो उड्छ । लाहुरेलेयस्ता दुष्टहरूलाई के कस्तो सजाय दिनु पर्छु त्यो राम्ररी बुझेका छन्‌ । त्यो बुढीफूलदेवीलाई त आँच्छु आँच्छु पारि दिएको थियो यसलाई किन छोड्थ्यौ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : धन्दा नमान गजुरे यसरी गाउका केटाहरूले साथ दिन कम्मर कसेपछित्यो कहाँ उम्कन पाउछ ? वरू धन वारै अव के कसौ गर्ने सोच्नु पर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हस्याङ र फस्याङ गर्दै माहिली खत्री, कै भयो घनलाई ? किन के गर्नुपन्यो भनेको, भन्दै आउछिन्‌ । !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गजुरे : त्यो फटाहा मधुराले हाम्रो धनको जीवन नष्टरै पारी दिएछ, माहिली ।एड्स भन्ने रोग सल्काएर पठाइ दिएको रहेछ । यस रोगको औषधी नै नहुँदाधनलाई कसरी बचाउन सकौला ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माहिली : के भन्नु हुन्छ तपाइ त ? त्यसो भए के आफ्नै अगाडि छोरी मरेकीहेर्नु पर्ने भयो त ? यस्तो असत्ति कुरा आफ्नो मुखबाट ननिकाल्तोस्‌ है ? औषधीनै दुनियाँभरमा नहुने पनि कुनै रोग हन्छ नचाहिने कुरा गर्नु हुदैन पो त ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : तिमीलाई के थाहा छ, यहाँ कस्ता कस्ता रोग आउदैछन्‌ । यो रोगकोऔषधी मात्र नभएको होइन, यो त भयंकरको सरूवा रोग पनि हो रे । धनलाईत यसले छोयो छोयो अव घरका अरूलाई कसरी बचाउने त्यो सोच्नु परेको छ ।यसले त गाउ गाउलाई सखाप पार्न पनि सक्छ रे, होइन वलभद्र, वताइ देनकाकीलाई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : हो काकी यो रोग यस्तै छ । हामीले राम्ररी ध्यान पुन्याउन सकेनौ भने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो रोग फैलिएर गाउ शून्य हुन सक्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : भुकुलीको आमाले यो रोगको वारे लेखेको कागज राखेकी छ रे ।त्यसमा के-गर्नु पर्छ के गर्न हुदैन सवै राम्ररी लेखेको छ रे भनेर मेरो जहानलेसुनाउथी । हामीले अव त्यही पढेर त्यसमा के सल्लाह दिएको छ, हो, त्यसै गर्नपट्टि लाग्नु पर्छ । गाउँनै खतम पार्न त दिनु भएन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माहिली : मैले त अझै केही बुझ्न सकेकी छैन । के आफ आफू मात्र कुरा गर्नुहुन्छ । ए वलभद्र लौ भनन के त्यसलाई बचाउने कुनै उपाय छैन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : के गर्नु हुन्छ काकी ? उपाय भए गर्नु हुन्थ्यो । अव हामीले गर्न सक्नेघरका र बाहिरकाहरूलाई नसारोस्‌ भनेर वचाउने उपाय मात्र सोच्नु पर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माहिली : त्यसो भए हामीले धनलाई के गर्ने र अरूलाई कसरी रोगबाटबचाउने ? अस्पतालमा पो पन्छाइ दिने हो कि ? यहाँ घरभरी यतिका परिवारछन्‌ । यस्तो डर लाग्दो रोग लिएर आइ हालिछ । अरूलाई सार्ने होकि? नसारिनै सकी ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अघिदेखि कुण सुदै वसेका डिठ्ठा बाजे भन्छन्‌ के गर्ने भन्ने अरू कुरै छैन !त्यसलाई धपाइ दिनु पर्छु । हाम्रा वाल वच्चालाई यसै मर्न कहाँ दिनुहुन्छ ! त्यो त मर्ने भइ भइ अरूलाई किन मार्ने ? माया लाग्दैमा रोगलाई काखीच्याप्न सकिन्त क्यारे ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : गाउबाट धपाउनु पर्ने . आवश्यकता म त देखिदिन । रगतकोलासलुसबाट बचे पुगि हाल्छ रे । अर्को कुरा यो रोग सर्ने रतिक्रिडाले हो रे त्यसबारे हाम्रो चिन्तै रहेन यौ कुमारी गाउकी विरामी केटी माथि कसको आँखापर्छ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डिठ्ठा वाजे : तपाइले त्यसो भनेर हुन्छ ? यहाँ यतिका गाउँमा छन्‌ को संग कुनबेला गएर के हुन्छ कसले भन्न सक्छ ! ज्यानै जाने क्रामा पनि तपाइ गाउकोठालु भएर यस्तो भन्न मिल्छ ? यसलाई यो गाउमा राख्नै हुदैन । के गर्नु पर्ने होसोचे हुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र डिठाको बाजेको कुरालाई वास्ता नै नगरेर माहिलीलाई भन्छन्‌, “धन्नलाईकहि पनि धपाउनु पर्दैन । धन यही घरमा बस्छै ? चोट घाउ लागेको बेला दुवैबिरामी र अरूले होस्‌ पुथ्याउनु पर्छु कुरा त्यति हो । यो रोग रोगीकी शरीरमाछुदा टाँसिदा, उसको स्वासबाट, दिसा पिसावबाट, जुठो खानाबाट, उसलाई मायागरेर म्बाइ खादा र अङ्गालो हाल्दा समेत सर्दैन । न त लामखुट्टेले टोकेर औलोज्वरो फैलिए जस्तो गरी फैलिन्छ । एड्स रोगीको विर्य र रगतबाट वचे पुग्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
५१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डिठ्ठा वाजेको कुरामा लाग्नु पर्दैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माहिली : लौ न नि? त्यसो भए मेरो कौडेलाई पनि यो रोग सप्यो कि क्यारेधनको हात चुलेसीले तरकारी काद्दा काटेको थियो । आफ्नो हातमा वन्चरालेलग्राएको घाउ हुँदा हँदै पनि कौडेले चपक्क धनको रगत बग्दैको हात समातेकोथियो । यस्ता केति कसकसलाई भयो होला, हेक्का राखिएन । हाम्रो परिवारमायही रोगले पहिरो ल्याउने भयो क्यारे वलभद्र, म के गरुँ ? यो के हुन लाग्यो ?उनी रून थाल्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वलभद्र रूदैकी माहिलीलाई सम्झाउदै भन्छन्‌, “यसरी आत्तिएर कराएर हुन्छकाकी ? यो समाजको समस्या हो । समाजले नै सुल्झाउनु पर्छ । बरू यस्तो रोगलागेको मान्छैंको अगाडि वसेर यसरी रोइ कराइ गर्नु हुन्न ? उनीहरू यसै दु:खीभएका हुन्छन्‌ । यही धनको कुरा गरौं, यो रोग भित्राउन उसको के दोषछ? छभने तपाइ र हाम्रो गरीवीको छ । त्यो मथुराको वेड्मानीको दोष छ, र अर्कोआफू जस्तै अर्की स्वास्नीमान्छे त्यो नाइकिनी को छ । हो, तपाइको छोरा कौडेकान्छाको पनि यदि त्यसरी घनको आलो रगत छोएको रहेछ भने एकफेर रगतजचाउनुपर्छ । यो घरमा वस्नै सबैले आफ्नो स्वास्थ्य एकफेर जचाउनु पर्छ । अनिथाहा हुन्छ कसकसलाइ सरेको रहेछ भन्ने ? यो घरमा वस्ने सबैले आफ्नो रगतजचाइ हाल्नु पर्छ ? अनि यो गाउकाहरूको नि ? तिनका रगतमा सारी सकिकी? हेर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डिठ्ठा बाजे: तिमीले यसलाई गाउमा राखे सबैलाई स्वत्राङ्ग पार्न खोज्दै छौँ भने मगाउनै उठाएर ल्याउछु । अनि कसरी धनलाई यही राख्छौ हेरौला ? माहिलीअतालिदै भन्छिन्‌, “लौ न यो डिठ्ठा वाजे त गाउ बाटै लखेट्न लगाउछु पोभन्दैछन्‌ । कहाँ पठाउ यस्तो गरी थलेकी छोरीलाई ? हरे । यो कस्तो आपत आइपरेको हो ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वलभद्रलाई डिठ्गा बाजेको फूर्ति र माहिलीको रूवाई चुनेर झोक चल्छर भन्छन्‌ । गाउ उठाएर ल्याउछु भनेर के घम्कि दिनु हुन्छ ? मैले त तपाईलाईगाउका पण्डित, विद्वान छन्‌ भन्ने सोचेको थिए तपाइ त कस्तो मुर्ख्याइको कुरापो गर्नु हुंदो रहेछ । एड्सले छोएका मान्छेहरू सवैलाई लखेद्छु भन्ने हो भनेपहिले मलाई धपाउनु होस्‌ अनि आफ्नो पनि रगत एकफेर जचाएर हेर्नोस्‌तपाईलाई पनि एड्सको जीवाणुले छोइसकेको छ कि ? कुन्नी कहिले अर्काकोरगत लिनु भएको थियो रे भन्ने सुन्छु त्यसलाई एड्सले छोइसकेको थियो भनेत्यस्ताको रगत लिने तपाइलाई पनि सरेको हुन सक्छ । आफूले वोलेको आफैलाईआइ पर्ला विचार पहिले नै गरेर मात्र वोल्ने गर्नोस्‌ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डिठ्ठा वाजे पनि जङ्डदै भन्छन्‌, &amp;quot;हामीले अरू कसैको रगत लिएका छैनौ आफ्नैछोरीको लिएको हुँ । कै भनेर हामीलाई यस्ता रोग सर्छ ? हाम्री छोरी त्यस्तीरोगी पनि छैन । पात्तिएकी पनि छैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : के छ के छैन । यसै हेरेर पत्तो पाइने यो रोगै होइन ? शरीरमाजिवाण्‌ प्रवेश गरेको दुई तीन महिनासम्म त रगतै जचाए पनि थाहा हुदैन । योरोगलाई लुकाउन पनि हुँदैन । समाजमा रहने हामी भएकाले हामी सवैले थाहापाउनु पर्ने रहेछ । रोगी आफै र समाजका सवैले यो रोग सर्न सक्ने सबैसम्भावना प्रति होशियार रहेर व्यवहार गर्न सम््यौ भने यो रोग सरी हाल्दैन ।अरू स्वा रोग जस्तो छुदैमा, साधारण लसपसबाट, किरा लाग्खुट्टेले टोक्दैमायो रोग सर्ने खालको होइन । यसको जिवाणु प्रवेश गरेको व्यक्तिको रगत अर्कोस्वच्छ मान्छेको शरीर भित्र कुनै माध्यमबाट पनि पस्न दिनु हुदैन र त्यस्तैरोगीको विर्य र योनीरस एक अर्कामा पर्न दिनु हुदैन कुरा त्यति मात्र हो । यदिहामीले ज्यादै बिरामीलाई तर्साएर हेला गर्न थाल्यौ भने र यी तपाइले भन्नुभएको जस्तो गरी गाउँबाटै लखेट्नु पर्छ भन्न थालियो भने रोगीले रोग लुकाएरवस्नाले कुनै कुरामा उसको होस्‌ पुग्न सकेन भने यो फैलन थाल्छ । मेरै मात्रकुरा गर्ने हो भने पनि मैले घरमा बाआमालाई नवताइ केवल मेरो जहान र मैलेमात्र थाहा पाएर यो रोगलाई म बाट फैलिन नदिन नियन्त्रण गर्दा घरमा कतिअशान्ति आजभोली फैलिएकोछ । गाउँमा घुम्दा पनि यति आपत विपत आइपरेको छैन । यो रोगलाई भयंकर र साधारण वनाउन हामी नै सक्छौ र यसलाईचिनौ र वच्न सक्ने उपाय गन्यौं भने यो मामुली रोग सरह पाउन सम्छौँ ।यसलाई भयंकर वनाउने अज्ञानता नै हौ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो रोगले छुना साथ मरि हाल्ने पनि होइन । १० वर्षसम्मयस्ता रोगकाकिटाणु वोकेर पनि बाँची रहन सक्छ । यत्रो लामो समय सम्म रोगीलाई कहाँलखैद्नु हुन्छ ! के के गर्न दिनुहुन्न ? रोग लाग्दैमा रोगीलाई मार्नु हुदैन र मर्नमन लाग्ने अवस्थाको सीर्जना गरेर आत्महत्या गराउन पनि हुँदैन । उसको बाँच्नेअधिकार हुन्छ । फेरि यो रोग समाजबाट फैलिएको हुँदा यसको जिम्मेवारसमाजनै छ । समाजमा हामी सबै मिलेर यसलाई लखेट्नु पर्छु । यसैले यदितपाइले छोरीको रगत नजचाई आफ्नै छोरीको हो भनेर लिनु भएको छ भने ररगत लिएको तीन महिना नाघी सकेको छ भने एक पटक आफ्नै रगत पनिजचाउन नभुल्नोस्‌ यो मैले रिसाएर भनेको होइन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डिठ्ठा बाजे एक्कासी कराउछन्‌, “ए लौ हेर ल जम्दार बालाई त्यता केभयो ? ल .... ल.......ल ढल्न पो लागे, समातो न ए, के हेरेर बसि रहन्छौ ?डिठ्ठा बाजे लम्कदै जम्दार भएतिर जाँदै, पानी खै कता छ, जाओ छिटो ल्यायो,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रड&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टाउकोमा ठोकी दिउ भन्न थाल्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाबुको त्यो अबस्था बलभद्रले टुलु टुलु हेरि रहन्छन्‌ । उनको टाउको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठोकिएर रगत आएको हुन्छ । बलभद्रले आफ्नो हातको चोट र बाबुको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टाउकोबाट बगेको रगत हेर्दै मनै मन भन्छन्‌, “हे भगवान ! तिमीले मलाई यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कस्तो अवस्थामा पुच्याइ दियौं । यस्तै होला भनेर यतिका महिनासम्म यो रोग&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लागेको सुनाइन । आज कुरा खुल्ना साथ यो के देख्नु पर्दै छ ? सत्यको सामना&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७७:५4, गाउ्हो पर्दो रहेछ । मेरो परिवारलाई यो रोग बुझ्ने र सहन सक्नेशक्ति देउ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जन सन्देशः&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोगीलाई लखेद्नु पन्छाउनु, हेला गर्नु, समस्याको हल होइन । रोगलुकाउनु र लुकाउनु पर्ने वाध्यता पार्नु समस्यालाई निम्त्याउनु हो । रोगलाईचिन्तन सके यो साधारण लाग्न सक्ने पनि हुन्छ । यसलाई भयंकर मानेरतर्सनाको कारण अज्ञानता हो । यसलाई नियन्त्रण गर्न सक्ने उपायहरू छन्‌ ।त्यसलाई अपनाउदै रोगीलाई चिनेर होस्‌ पुस्याउदै वाँचौ, वचाऔं, र वाच्न दिऔ,शान्तिले, आरामले र प्रेमले । रोगीको हामी सवै मिलेर स्याहार गरौ र सहयोगगर्न आफ्नो कर्तव्य नभुलौ । एड्स रोगको औषधी नहुनाले रोगले छोयो किमृत्युको घण्टी बजेको लाग्ने हुनाले यो भयंकर रोग मानिएको छ तर यसबाटबच्न सक्ने उपायहरू जटिल नहुनाले यसलाई नियन्त्रण गर्न सजिलैले. सकिन्छ ।यो औलो जस्तो हैजा जस्तो जुका जस्तो टिवी जस्तो र लुतो जस्तो छिटै मामुलीलसपसले संक्रमण हुने होइन । रोगीको आलो रगत, विर्य र योनीरस आफ्नोशरीरमा प्रवेश हुन नदिने उपायहरू छन्‌ ती उपायहरू अपनाऔं र यो रोगलाईफैलिन नदिन सहयोग गरौं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एड्सको जिवाणु प्रवेश भएको पाँच वर्ष पछि वलभद्र ओछ्यान परेकाछन्‌ । त्यसबेला गर्भमा रहेको उनको सन्तान पनि अहिले ५ वर्षक भइसकेकीछ। यी पाँच वर्षभित्र वलभद्रको जीवनमा र उनको गाउको चहल पहलमा ठूलोपरिवर्तन आइसकेको छ । श्यामली मानसिक सन्तुलन गुमाएर वौलाएकी छ ।गाउका धेरै जसा बासिन्दाहरू यही एड्स रोगले गर्दा सखाप भएका छन्‌ । जसकोरगत जचायो एड्सकै जिवाणु पसिसकेको पाएर गाउमा हाहाकार मच्चिएको भएआजकल धेरैले होस्‌ पुच्याउन थालेकाले गाउका केही शान्ति छ । उनीहरूलेभनेको सुनिन्छ, “यति क्रामा पहिले नै ध्यान पुग्याउन सकेको भए यो गाउँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्श्&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यसरी रित्तिनेन्ै थिएन । डराएर थाहा पाइएको विरामीलाई उल्टै घम्काउनाले रोगलुकाउन थाल्नाले&#039; गाउमा यस्तो समस्या आइ छोड्यो ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्रको घरमा बुढयौलिले ढपक्क भइसकेका ती जम्दार जम्दार्नीलाईविरामी छोरा, बौलाएकी बुहारी र सानी नातिनीलाई, समालेर वाँच्नु परेको छ ।जम्दारलाई पनि बीच बीचमा वाधको रौगले दु:ख दिइरहने हुँदा धेरै जसोघरभित्रै वसिरहन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
झलमल वाहिर घाम लागिसकेकोले आगनमा घाम ताप्न जम्दार्नीजम्दारलाई त्यहाँ आउन वोलाउछिन्‌ । जम्दारलाई घरै भित्र वसु त्यहीबाटनैवाहिर निस्कनै नपरी हराउ जस्तो सँधै लागि रहेन हुँदा भन्छन्‌, “तँ बाहिर आइजभन्छेस्‌ मलाई भने त्यहाँ आउनै मन लाग्दैन । सामुन्नेतै टड्कारै देखिनै ठाउमात्यो गजुरेको घर छ । त्यो म देख्नै सक्दिन । यो छाती त्यसै त्यसै फुट्ला जस्तोभइ भारी भएर आउछ । अस्ति पनि तेरै जिह्दीले हात खुट्टा सेकाउ भनेर आएकोसमाल्न नसकेर लोटी हालें ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्नी : हामीलाई मात्र त्यस्तो हेर्न मन लाग्छ र ? के गर्नु न्द। नै पर्दो रहेछ। हाम्रो आफ्नै घरको गति पनि कुन राम्रो छ र ? जवान, छोरा, हाम्रोअगाडि खाटमा परेको छ । वुहारी वौलाएकी छे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : पाँच ६ वर्ष मात्र पहिले त्यो कौडे कान्छाको चमकधमक कसले हेरिदेओस्‌ जस्तो थियो । त्यत्रा परिवारले भरिएको त्यो घरमा केवल हामी जस्तैअभागी गजुरे र त्यसको सानो नाति मात्र वाँकी छन्‌ । एक एक गर्दै पालोलगाएको सरह यो एड्स रोगले निम्ताउदै लगि छाड्यो । कस्तो मसान वनाइदियो त्यो गजुरेको घरलाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्नी : के गर्नु हुन्छ यो गाउलाई नै के भएको हो के ! त्यस्ता हसिला डिठ्ठावाजे पनि आफ्नै छोरीको रगत लिदा पनि मरेर नै जानु पस्यो । त्यो चन्द्री पनिमरी, सन्ते मन्यो, डिठ्ठा वाजेकोनै छोरी मरी । सबै यसरी मर्दै जादा अहिले तयस्तो गाउलेको अनुहार अध्यारो देखेकी त व्यर्थै शंका लागेर आउछन कही यसलाईपनि एड्सले त समातेन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : अव हतपति यस रोगले यो गाउमा कसैलाई पनि समात्न सक्दैन ।सबैले विचार पुग्याउन थालिसके । मत यो हाम्री बुहारीलाई पनि फल झलसम्झन थालेको छु । वललाई एड्सले छोएको हामीले धाहा नपाउदा त्यसले हुनसम्मको घोचो पेचो हाम्रो सुन्नु पन्यौ । तैले यति गाली गरेकी थिइनस्‌ । विचरीधुरू धुरू रुन्धि । सँझि त त्यसलाई कस्तो पसो पेसमा पर्नु परेको थियो होला ?सासु ससुराको कच कच, लोग्नेको त्यो हालत, आफ्‌ व्याउने भएकी, कति कष्ट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चय&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकै साथ त्यसमाथि ओइरीएको थियो । त्यसैले छोरी पनि जन्माइ आफु पनिवौलाइ हाली ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्नी : ती वितेका दिन जति संझै पनि फर्केर आउने होइन रहेछ त ? नत्रत्यस्तो दुःख लाग्दो वचन किन वोल्थ्यौं । अहिले पनि दौरा पर्दा चिच्चाउदै भनिरहेकी हुन्छे, &#039;ए त्यहाँ नछुनोस्‌ रगत छ, आलो रगत छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो घरमा शान्तिसंग को वसेको छ ? नत तपाई नत म, तत त्योओछ्ठ्यानमा परेको छोरा एकले अर्कोलाई देख्यौ भने दु:ख दवाउंदै किच्च हाँसीदिन्छौ, कुरो त्यत्ति हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भित्रबाट वलभद्रले बोलाएको आवाज आउछ । उनले आमालाईआशालाई एकफेर भित्र पठाइ दिन अनुरोध गरीरहेको हुन्छ । त्यही खेली रहेकीआशाले पनि बाबुले वोलाएको सुन्छे र दोड्दै वावु कहाँ गएर वोलाउनाको अर्थसोध्छे । वलभद्रले आशालाई आफ्नो साथमा खाटमा वस्न लगाइ सोध्छन्‌,“तँलाई मेरो माया लाग्दैन ? म कहाँ पनि आएर वस्ने गरन । यी यतापट्रिकोगालामा एउटा म्वाइ दै त।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आशा, वावुसँग खाटमा वस्दै वावुले देखाएको गालामा म्वाइ खान्छे रभन्छे, “मलाई तपाइको, आमाको, हजुरवा हजुर आमा सबैको माया लाग्छ ।अहिले म खेल्न जाउ । भरे, अस्तिको जस्तो कथा सुनाउनु होस्‌ है ? अनि फेरि मअर्को गालामा पनि म्वाइ खाइ दिन्छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वलभद्र वच्चीको स्वभाव र चन्चलता देखेर दङ्ग पर्दै भन्छन्‌, “हुन्छ, लौजाउ” आशा फर्केर फेरि खेलमा भूल्न जान्छे । बलभद्र सोच्न चाल्छन्‌ थ्योबच्चीले मेरो मन भित्रको प्रलयको वेग के सम्झन सक्थि ? यसलाई हामी माथिमाया छ तर के गरोस्‌ त्यतिकै प्यारो खेल पनि छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उता खेल्न गएकी आशालाई उसको साथीहरूले वलभद्रको विरामीलाईलिएर नाना थरी सुनाउछन्‌ । आशाले सहन सक्दिन र हजुरवालाई तानेर ल्याउनखोज्दै भन्छे, “हजुरबा त्यो भ्यान्टेलाई गाली गरि दिनोस्‌ त ? जहिले पनि मेरोवालाई मर्नु हुन्छ भन्छ । अरू पनि के के भनेर मलाई रूवाई मात्र रहन्छ ।जम्दार : त्यस्ताले भन्दैमा तेरो वा मर्छ र । विरामी को हुदैन ? त्यो संग तखेल्नै नजा ।जम्दार्ती : त्यस चण्डाललाई के के भन्न मन लागेको हो । एक बाजी तपाइले नैराम्ररी झपारी दिनोस्‌न । सानी वच्चीलाई वढ रूवाउने भएको .... ? किन यहाँआउछ्‌ ? कहि त्यसले खेल्ने ठाउ पाएन कि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कसो?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : बच्चीको अगाडि तँ पनि कति कच कच गर्छेस्‌ । कतिलाई म &#039;झपार्दैजाउ । सबैलाई थाहा छ बललाई के भएको छ। म त भित्रै छोरा कहाँ जानु पन्योक्यारे । तँसंग गल्फत्ति गर्दा गर्दै पनि झर्को लागि सक्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दारनी : कहाँ जाने अब थुपुक्क वस्नोस्‌ भनेर जान दिन्तन्‌ । आशालेहजुरआमासंग भन्छे, “हजुर आमा । त्यसले भनेको गाउका सवै यस्तै रोगले मरे ।अव तेरो वा पनि हुदैन आमा पनि वौलाईछे तेरो बाजे वजै भएनन्‌ भने के गर्छेस्‌? यो रोगको औषधी पनि छैन भन्छ, हो हजुर आमा ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्नी : अहिले सम्मलाई छैन । तर सबै विद्वानहरू कसरी यसको पनि औषधिनिकाल्न सकिन्छ भनेर खोज्न लागि रहेका छन्‌ । एक दिन यसको औषधी पनिनिकालेर नै छोडछन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आशौँ : मलाई पनि धेरै पढाएर विद्वान वनाउनु होस्‌ है, हजुर आमा । वाकोलागि औषधी म नै खोजेर ल्याउछु । आमालाई पनि निको पार्छु । अनि हामीसबै रमाइलो गर्ने है ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आशाको कुरा सुनेर जम्दार लामो स्वास तान्छन्‌ र वलभद्र कहा जान्छन्‌ ।बलभद्र आफु कहाँ आएको बाबुलाई देखेर सोध्छन्‌, “के भनेकी आशाले, वा ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : ए .... त्यो ? केटाकेटीको झगडा । यस्ताको कुरा पनि सुनेर साध्यलाग्छर ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : त्यो होइन, खुव पढ्छ र के के गर्छु भन्दै थिइ नी ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : खूव पढेर औषधी खोजेर ल्याइ तँलाई निको पार्छु आमालाई पनि सद्देपार्छु भन्छै । केटाकेटी त्यसै भन्छन्‌ । अव त्यौ कहिले ठुली हुने र औषधीनिकाल्ने ? उनी हाँस्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बलभद्र : आशाले मेरो मन भित्रको कुरा थाहा पाएर भनेकी जस्तो गरी वोलेकीछ त्यसलाई खुव पढाइ दिनोस्‌ र हाम्रो कथा नलुकाएर सुनाइ दिनोस्‌ 1 यो छोरीभए पनि हाम्रो वंशको शोष मानेर मेरो खाली हुन गएको ठाउमा रहन पाओस्‌ ।तपाइहरूको मायामा हामी दु:खी त्यसको बावु आमालाई विर्सन सक्नेहोस्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : के भन्त थालेको यस्तो ? म आशालाई यसै छोड्लार तैले यस्तो भन्नुपर्छु ? वलभद्र बाबुलाई आफु नजिकै आएर वस्न आग्रह गर्दै गला रुद्ध पारेरभन्छन्‌, “वा मलाई थाहा छ तपाइहरूले यो मेरो आशालाई आफ्नै छोराको आशा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स््छ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मानेर त्यसमा कुनै कमि रहन दिनु हुन्न । तर यो बाबुको मनले आफ्नो बेदनानपोखि वस्न सक्दो रहेनछ र भनि हाले त्यसमा माफ गर्नु होला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वा, मैरो अब धेरै दिन बाँच्नु छैन । वाचुन जेल यसरी नै तपाइहरूकोसाथ रहन पाउ । म सँग वसेर आफ्नो उपस्थितिको महसुस गराइ रहन्‌ होला ।मेरो कत्रो इच्छा थियो बुढेसकालमा वाआमाको सेवा गरूला, तिर्थस्थान घुमाउलातँपाईहरूको सहरा बनुला । तर मेरा यी सपना कसरी धुलो पिठो भइरहेछ ।उल्टै म यो आफ्नो छोरी र वौलाही स्वास्नीको जिम्मा तपाद्रहरूलाई लगाइ जादैछ्नु।जम्दारलाई पनि वोल्न भित्रै देखि गाज्हो हुदै आउछ र विस्तारै भन्छन्‌, “पिर नगरछोरा । छोराले रोएको कत्ति पनि सुहाउदैन । बु भए पनि तेरो म सहारा त छु।आफुले रोक्न नसक्ने कुरालाई लिएर मनमा धेरै कुरा खेलाउनु हुदैन । जे हुनु भैसकेको छ त्यसमा चिन्ता गरेर के गर्छस्‌ ?“हेर, म आशालाई पढाइ दिन्छु ठुलोमान्छे वनाइ दिन्छु । त्यसले तेरो हाम्रो आशा अवश्य पुरा गर्नेछे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यस रात जम्दारलाई पट्टै निन्द्रा लाग्दैन । कहिले यता कहिले उताभएर छटपटाइ रहेका हुन्छन्‌ । जम्दार्नीलाई शंका लाग्छ कही वाघले जिउदुखाएर छटपटि ल्याएको त होइन ? यसैले जम्दारलाई सोध्छिन्‌, “ के भयोतपाईलाई ? कति छटपटाउनु भएको ? कतै आँग त ज्यादै दुखेन ? हेर आशापनि खस्न लागि सक्छ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : आज मेरो मन ज्यादै रोएको छ, बुढी । छोराले आज छूदै मलाईश्यामली र यो आशाको जिम्मा लगायो । त्यसले भित्रैबाट अव म रहन्न भन्नेनिश्चय गरीसकेछ । त्यसका आँखाबाट झरेका जिल ले यी मेरा हात लपक्कैभिजाएको थियो । आँखा चिम्लन खोज्छु त्यो नै अगाडि झुलुम्क आइहाल्छ । कसरी मेरो हात ट्याप्प समातेर आफ्नो गाला मुनी राखेर आफ्नोमनको दुख सवै भन्दै थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यो गजुरेलाई सम्झन्छु त्यसले आफ्नो छोरी आफ्नै अगाडि मरी रहेकी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कसरी हेर्न सक्यो होला ? त्यसपछि छोरा बुहारी स्वास्नी नाति सवै आफन्तभटाभट भए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्ती : त्यही त त्यसलाई हुनु सम्म भएको हो । पलिहे थाहा पाएन सवैमासरि हालेछ् । हाम्रो छोराको त शुरूमा नै थाहा भएकोले त्यसरी सबैलाई ढाल्नत पाएन । यी स्वास्नी छोरी हामीहरू साथैमा छौ कसैमा पस्न सकेको छैन । होस्‌पुस्याउन सके केही नहुने कुरामा किन डराएर लुकाउछन्‌ कुन्ती ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर म पनि तपाइले भनेको झै ओछ्यानमा लडेको छोरालाई -राम्ररी हेर्नैसक्दिन । केही भनि पो हाल्छ कि भनेर अगाडिनै पर्दिन । जवान छोरा काललाईपर्खेर वसेको कसरी हुर्नु ? के गर्नु यो ज्यानले त्यो पनि हेर्न लेखेको रहेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : यस्तो रोगलाई हेलचक्राइ गरी अर्कालाई सर्ने पार्न त अपराधी नै हुन्‌ ।वेलरैमा विचार पुग्याउन सके यी केही नहुने रहेछ । यी हामी कहाँ अरू त केवच्चा जन्मि, हुर्की पनि ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दानी : थाहा पाउनेले त वच्लान र बचाउलान्‌ पनि, नजान्नेले के गरून्‌ ?जनाजानै रोग सरोस्‌ त कसैले भन्दैन । अव यी यही गजुरेको ! त्यसले छोरीलाईके भएको रहेछ त्यो पत्तो लगाउन के मात्र गरेन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार : त्यसैले लामो समय सम्म विरामी भयो भने डाक्टर देखाइ रगतजचाउनु भनेको ? झारफुक वोक्सीले त्यस्ता जिवाणु नत झार्न सक्छन्‌ नत मार्ननै ? यस्तै अज्ञानताले नै रोग फैलाई समस्या खडा गरी दिएको छ । हेर, जान्नेसुन्ने हुनु कति आवश्यक रहेछ । खानु, लगाउनु र घरमा वस्नु जीवनमा जरूरीभए जस्तै अवलाई पढ्नु पनि भएको छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्नी : हो, सचेत नहुनेले नै जताततै दुःख पाइरहेको हुन्छ । ठगिने देखिल्याएर रोग सर्ने सम्मको भोगी तिनैले हुनुपर्ने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लौ, हेर कुरा गर्दा गर्दै विहान पनि हुन लागिसकेछ । अव सृत्ने, होइननन्न दिनभर चलहल गर्नै मन लाग्दैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विहान भएपछि आफ्नो साबिकको समयमा गाइ | १ कराउन थाल्छन्‌ ।आलस्य मान्दै जम्दार्नीलाई उठ्नै पर्छ र उनी गोठ तर्फ जान्छिन्‌ । आशापनि पछि पछि लागेर त्यही पुगेकी हुन्छे । गाईलाई भुस्सा दिन जम्दार्नी व्यस्तहुन्छिन्‌ उता आशाले भुस्सा काट्ने चलाएर हात काद्छै र रगत तप तप चुहाउदैआएर रुदै भन्छे, “ए .... हजुर आमा यता हेर्नोस्‌ त, एड्सको किरा मेरोरगतमा छ कि छैन ? मलाई मर्न नदिनोस्‌ हजुर आमा भनेर डाँको छोड्दैजम्दार्तीको गलामा झुण्डिन्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्नी नातितीलाई फूलाउदै भन्छिन्‌, “कसले भन्यो तेरो रगतमाएड्सको किरा छ भनेर ? तँ मर्दिनस्‌ । चुप लाग । जम्दारनीले चोटमा कपडावान्दै भनेकी हुन्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आशा : एड्सको किरा कस्तो हुन्छ मलाई पनि देखाइ दिनोस्‌ न ?जम्दार्नीलाई आशालाई फकाउँदा के भनिन्‌ त्यो यादै हुदैन र भन्छिन्‌, “आँखाले&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
0&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हेरदैमा त्यस्तो किरा कहाँ देखिन्छ र म तँलाई देखाउ ? त्यो त डाक्टरले मात्रमिसिनबाट हेर्न सक्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आशा : वा को रगतको किरा तपाइले देखेको कि डाक्टरले हेरेको हजुरआमा ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दानी आशाको कुरा सुनेर छक्क पर्छिन्‌ र के भनु के भएर अकमकाउछिन्‌पनि । आशाले यतिकैमा फेरि त्यही प्रश्न, दोह-्याउछे । जम्दानीलि यस पटकजवाफ यसरी दिन्छिन्‌, “डाक्टरले जाचेरै भनेको हो ? लौ अव चुप लाग ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आशा : त्यसो भए मेरो रगत पनि डाक्टरलाई नै जचाउनु होस्‌ । म मर्नचाहन्न हजुर आमा ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जम्दार्नी : जहिले पनि जे हुदा पनि रगत जचाउनु पर्दैन । कुन वेला कस्तोमारगत जचाउनु पर्छु त्यो हामी गरि हाल्छौँ नी तँलाई किन डराउनु पर्छ लौ भनत?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आशाको चित्त बुझ्छु । उ रून छोड्छ । यति सानी बच्चीले समेत एड्सलागेको नलागेको जानकारी लिन खोज्छे, एड्सको किरा रगतमा हुन्छ भन्ने थाहापाइ सकेकी छ र यसबाट वचेर वाँच्न खोज्छे भने सायद अव यो रोग फैलिनकम हुन सक्छ । एउटा झीनो आशा जम्दार्नीको मनमा देखा पर्छ र उनी उज्ज्वलभविष्यको कल्पना गर्दै आफ्नो मन केही हलुको पार्छिन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जन सन्देश :&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एड्सको रोग जत्तिको डरलाग्दो छ त्यतिकै सञ्जिलो यसबाट वच्नेउपायहरू छन्‌ । यसको डरलाग्दोपन औषधी उपलव्ध नहुन्जेल सम्मलाई हो ।औषधी उपलब्ध नहुन्जेलसम्म यसलाई रोकथाम गर्ने उपायहरू हुन्‌, व्यवहारमासुधार ल्याइ रगत, वीर्य र योनी रस संग सम्पर्क रहने प्रत्येक कर्ममा सचेतरहेर मात्र सकिन्छ । जिवाणु सर्न सक्ने अवस्था कुनै पनि वेला (जिवाणु शरीरमापसिसकेको तर रगतमा देखा नपरेको, देखा परिसकेको र रगतको श्वेत सुरक्षाकोष नाश भइ जुन सुकै रोगले पनि ढाल्न सक्ने अवस्थामा शरीर पुगिसकेको)कुनै पनि एड्सको जीवाणु वोकेको व्यक्तिबाट रगत वीर्य र योनी रसकोमाध्यमबाट अर्को स्वच्छ व्यक्तिलाई सर्न सक्छ । यसैले यस्ता विषयमा सम्बन्धराख्ने कुनै पनि कर्म गर्दा होस्‌ पहिले नै पुग्याउनु पर्छु । परिक्षण गरेको रगतमात्र शरिरमा रक्तको कमी हुदा लिने, शरीर छेड्ने उपकरणहरूलाई सुद्धिकरण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
९०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गरी या वदलेर मात्र प्रयोग गर्ने, घाउ चोट लागेको अंगले कहिल्यै कसैको पनिआलो रगर्त नैछुने र असुरक्षित यौन सम्बन्ध, जो पायो त्यहीसँग र धेरै व्यक्तिसँगगर्ने वानीमा सुधार ल्याउनु अति आवश्यक छ ! आफुलाई शंका लागेको बेला यास्वास्थ्यमा कुनै किसिमको गिराबट आयो भने रगत जचाई आफ्नो स्वास्थ्य वारेजानकारी लिन नभुल्नोस्‌ । आफूबाट अरूलाई यस्ता रोग नसल्कियोस्‌ भनेरसचेत हुनु हामी सबैको कर्तव्य हो । रोग देखि डराऔ यसबाट वच्न सचेतरहौ । रोगीलाई हेला गरी नपन्छ्याऔ । उ आफै दु:खी भएको हुन्छ । उसलाईहाम्रो स्याहार र मायाको जरुरत छ । असमर्थ प्रतिको सेवा नै मानव धर्म हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सगापा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
८१&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%9C%E0%A5%87_%E0%A4%9B%E0%A5%8B%E0%A4%8F_%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A4%BF_%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%A8&amp;diff=102</id>
		<title>जे छोए पनि सुन</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%9C%E0%A5%87_%E0%A4%9B%E0%A5%8B%E0%A4%8F_%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A4%BF_%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%A8&amp;diff=102"/>
		<updated>2024-06-14T14:18:01Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: Created page with &amp;quot;बाल सन्दर्भ सामग्री - ४  सामग्री सङकलनइन्दिरा चालिसे, रत्नमान शाक्य, जयप्रसाद लम्सालयोगराज भद्टराईं, लक्ष्सीभक्त बासुकला  चित्राड्कन कर्ताअविन श्रेष्ठ  नेपाल सरकारशिक्षा मन्त्र...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;बाल सन्दर्भ सामग्री - ४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सामग्री सङकलनइन्दिरा चालिसे, रत्नमान शाक्य, जयप्रसाद लम्सालयोगराज भद्टराईं, लक्ष्सीभक्त बासुकला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चित्राड्कन कर्ताअविन श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपाल सरकारशिक्षा मन्त्रालयपाठ्यक्रम बिकास केन्द्रसानोठिमी, भक्तपुर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रकाशक : नेपाल सरकारशिक्षा मन्त्रालयपाठ्यक्रम विकास केन्द्रसानोठिमी, भक्तपुर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(6 प्रकाशकमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिमार्जित संस्करण : २०७३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अमेरिकी अन्तर्राष्ट्रिय विकास नियोग (युएसएआइडी) को सहयोगमा यो सन्दर्भ सामग्री प्रकाशनभएको हो । यसमा समाविष्ट सामग्रीको जिम्मेवारी प्रकाशकमा निहित छ । यसमा रहेका सामग्रीलेग्रुएसएआइडी र अमेरिकी सरकारको अवधारणालाई प्रतिनिधित्व गर्दैनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाम्रो भनाइ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाल बालिकाको पठन सिप बढाउन, मनोरञ्जन प्रदान गर्न, मानसिक र बौद्धिक विकासकालागि सिकाइ सम्बद्ध सन्दर्भ सामग्रीहरूको महत्त्वपूर्ण भूमिका हुन्छ । सन्दर्भ सामग्रीलेबाल बालिकालाई अध्ययनशील बनाउनका साथै पढाइ सिप विकास गरी पाठ्य पुस्तकमाभएका विषय वस्तु ग्रहण गर्नसमेत मदत गर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाठ्यक्रम विकास केन्द्रद्वारा राष्ट्रिय प्रारम्भिक कक्षा पढाइ कार्यक्रम कार्यान्वयनगर्ने क्रममा यो सन्दर्भ सामग्रीलाई अद्यावधिक गरी गुएसएआइडीको आर्थिक सहयोगमाप्रकाशनमा ल्याइएको हो । प्रस्तुत सन्दर्भ सामग्री कक्षा १ देखि ३ सम्मका विद्यार्थीहरूकालागि उपयोगी हुने गरी विकास गरिएको छ तापनि आवश्यकतानुसार जुनसुकै कक्षामा पनिप्रयोग गर्न सकिने छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रस्तुत सामग्री शिक्षकहरूले सबै बाल बालिकाहरूलाई पढ्ने मौका दिई आपसमाछलफलसमेत गराई उनीहरूको पठन सिप विकासमा सहयोग गर्नुहुने छ भन्ने अपेक्षागरिएको छ । अन्त्यमा यस सामग्रीका सम्बन्धमा प्राप्त हुने सुझाव एवम्‌ प्रतिक्रियाकालागि पाठ्यक्रम विकास केन्द्र सदैव स्वागत गर्दछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बि.सं. २०७३ पाठयक्रम विकास केन्द्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विषय स्‌ची&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्रस. कथा शीर्षक पृष्ठ सङख्या१. तिन साना बड्गुरहरू भर२. गोरुको दुध १६३. दुई बुढाबुढी र सिरो २१४. जे छोए पनि सुन २७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्र. विश्वासिलो साथी ३५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तित साना बङगुरहरू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अङ्ग्रेजी लोककथा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक समयमा कुनै ठाउँमा तिन बङगुरहरू थिए । एक दिन तिनीहरूआफनो भाग्य खोज्न घर छोडेर हिँडे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पहिलो एउटा बङ्गुर पश्चिमतिर लाग्यो । धेरै टाढा पुगिसकेपछि त्यसलेएक जना पराल बोकेको मानिसलाई भेट्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बङ्गुरले बिन्तीभाउ गर्दै त्यस मानिसलाई भन्यो, “दाइ, मलाई त्योपराल दिनुहोस्‌ न । म त्यसबाट एउटा सानो घर बनाउने छु।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
0 222 ग्रे% ॥॥छ ॥ ० (दु क्रु बी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हू पफ्रा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हद्टै |२ 64 1201) ८ ॥||॥ ॥/ | 71 १ ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मानिस पनि दयालु भएकाले त्यस बङगुरलाई पराल दियो ।बङ्गुरले राम्रो चिटिक्क परेको एउटा घर बनायो । क आरामसँगघरमा बस्त थाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक दिन एउटा ब्वाँसाले बङ्गुरको घरको ढोका ढकढक्यायो ।त्यसले बङ्गुरलाई सोध्यो, “ए, च्वाँचे भाइ म भित्र आउन सक्छु ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बङ्गुरले ब्वाँसोलाई देख्नासाथ भन्यो, “हुँदैन, हुँदैन ! तिमी यहाँ आउनपर्दैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्वाँसोले भन्यो, “यदि त्यसो हो भने म तेरो घर जोडले फुकेरढलाइदिन्छु।” यति भनेर घर नढलेसम्म ब्वाँसोले घरलाई जोडले फुक्यो ।घर ढलेपछि ब्वाँसोले बङ्गुरलाई समात्यो र खायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७/7//७।//&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त त त तरा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दोस्रो बङ्गुर पूर्व दिशाको बाटो हुँदै गएको थियो । धेरै टाढा पुगेपछित्यसले एउटा लट्ठी बोकेको मानिसलाई भेट्यो । क पनि सारै दयालुर इमानदार थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
| 11 ु पाट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१००५ ॥॥|&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क षनत्ट्रम््ट्ल्व्य्यवा|) 0 00200704&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;न ५/० वि ००५७.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
॥ (रा 024 निद्रनव्थ्न्ट्ि ॥//07/1.- १५ दु&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
000&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
//%००० र 472 ली&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
॥//०१7700000010 ७०४१&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बङ्गुरले त्यस दयालु र इमानदार मानिसलाई भन्यो, “ए दाइ,मलाई त्यो लट्ठी दिनुहोस्‌ न । म एउटा सानो घर बनाउँछु ।”यति भनेर त्यसले लट्ठी लियो र त्यस लदट्ठीबाट एउटा राम्रो घरबनाएर बस्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केही दिनपछि एउटा ठुलो ब्वाँसो आएर ढोका घचघच्यायो र भन्यो,“ए, च्वाँचे भाइ, म भित्र आउन सक्छु ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बङ्गुरले यसो झ्यालबाट बाहिर च्यायो । त्यसले ब्वाँसोलाई देख्यो ।अनि जवाफ दिन थाल्यो, “हुँदैन, हुँदैन ! तिमी यहाँ आउन पर्दैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसपछि रिसाएर ब्वाँसोले भन्यो, “म तेरो घर नढलेसम्म जोडले फुक्छुर घर ढलेपछि तँलाई मार्ने छु।” नभन्दै त्यसले जोडले फुक्यो र घरढलायो अनि सानो बड्गुरलाई खायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पौ दु तपन्भ््क्म&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2छि 2); त 2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बट ८0000 070 0129 2002 छ,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
॥ ॥/0900&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
221&amp;quot; ॥ | ।पारि १ ॥॥ ॥ ॥४/// 04&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
6७कै ९०:९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(८८०,८) १४१ “07. छु&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
|)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
|) &amp;quot;८,|) | पिनर तहक १०72-- हन&amp;quot;२&amp;quot; ७)१ /र),।| ट्व्न्व्टट कोस्लट 0002. 27127 2 ति 000 न 2“ ५110ही अनकार नद१४५ सा रफ नि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेस्रो बङ्गुर उत्तरतिरको बाटोबाट गएको थियो । धेरै टाढा पुगेपछित्यसले पनि एउटा दयालु र इमानदार भेट्यो । त्यस मानिसले इँटबोकेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बङ्गुरले दयालु र इमानदार मानिससँग बिन्तीभाउ गरी उससँग इँटमाग्यो । दयालु मानिसले पनि त्यसलाई तुरुन्तै इँट दियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2५१0010111011/014 त्‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/४ 11) रि टन 71,701&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
00 करी री७४: त “ ७७१/: ही 7 रौ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1000”0400 040777.. - ७०७१“ छ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
॥/2 7) । ५५०९, ५///09_ &#039;७04 04&amp;quot; त९००&amp;quot;, 11|49, “0, हि .&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बङ्गुरले इँटको गारो लगाई धेरै बलियो र राम्रो घर बनाएर आरामलेबस्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केही दिनपछि एउटा ठुलो ब्वाँसो आएर ढोका घचघच्याउँदै भन्न थाल्यो,“ए, च्वाँचे भाइ, म भित्र आउन सक्छु ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बङगुरले यसो भझयालबाट च्यायो । त्यसले ठुलो ब्वाँसो देख्यो ।ब्वाँसोलाई देखेर त्यसले भन्यो, “हुँदैन, हुँदैन। तिमी भित्र आउन पर्दैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
०००० १%&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“0424 बैशर ००१८ %५६५%५४//६५ 22&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
र लामा] ८५५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्वाँसोले भन्यो, “त्यसो भए म फुकेर तेरो घर ढलाइदिन्छु र तँलाईपनि खान्छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्वाँसोले घर ढाल्न जोडले फुक्यो तर घर ढलेन । त्यसको मुखै कालोनिलोभयो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यो ब्वाँसो कालोनिलो भएर रिसाउँदै यताउता गर्न थाल्यो ।हुँदाहुँदै त्यो घरको भझूयाल चढेर भान्छामा जान थाल्यो । बङ्गुरले पनित्यो सबै कुरा थाहा पाइहाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बङ्गुर पनि छिटो भान्छामा गएर पानी तताउन राखिएको भाँडाबाटढकनी खोलिदियो । ब्वाँसोको जिउभरि तातो पानी खनियो । तातोपानीले पोलेर ब्वाँसो मप्यो । ब्वाँसो मरेपछि बङ्गुर आरामसाथ बस्नथाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धेरै पहिलेको कुरो हो । भारतमा अकबर नामका बादशाह थिए ।अकबरका मन्त्रीको नाम वीरबल थियो । वीरबल असाध्यै चलाख थिए ।बीरबल अप्ठ्यारो काम पनि सजिलै गर्न सक्थे । उनी निडर थिए ।रमाइलो गर्न, ठट्टा गर्न पनि वीरबल सिपालु थिए । वीरबललाई मूर्खबनाउँछु भन्ने मान्छे आफैँ मूर्ख हुन्थ्यो । वीरबललाई ठट्टा गरेर कसैलेजित्न सक्दैनथ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक दिन अकबरले वीरबललाई मूर्ख बनाउने जुत्ति निकाले ।उनले वीरबललाई गोरुको दुध खोजेर ल्याउने हुकुम दिए ।यस पटक वीरबललाई अप्ठ्यारो पन्यो । संसारमा दुध दिने गोरु पाइँदैन ।यस पटक वीरबलले हार खानुपर्ने भयो । वीरबल अँध्यारो मुख लगाएरघर गए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वीरबलकी एउटी सानी छोरी थिई । क बाबुभन्दा पनि बाठी थिई । उसलेबाबुको अनुहार अँध्यारो भएको देखी । उसले वीरबललाई सोधी, “बाबा,तपाइँलाई केही भएको छ कि ?” वीरबलले भने, “मलाई बादशाहलेगोरुको दुध ल्याउनु भनेका छन्‌ । गोरुको दुध कहीँ पनि पाइँदैन ।अब के गर्ने ?” छोरीले भनी, “त्यति जाबो कुरामा पनि पिर गर्ने ?भोलि जे गर्नुपर्ने हो, म गरुँला । तपाईँ ढुक्कले बस्नुहोस्‌ ।” वीरबललाईआफूनी छोरी असाध्यै बाठी छे भन्ने थाहा थियो । उनी ढुक्कले सुते ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
||| ॥॥॥॥९501111111710007710/ 0&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
। [1111 ॥॥| 1, ॥॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
॥॥ 1111 | ॥ | [लट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोलि बिहान विरबलकी छोरी बादशाहको दरबारमा गई । उसलेबादशाहसँग भेट गरी । उसलाई बादशाहले किन आयौ भनेर सोधे ।वीरबलकी छोरीले भनी, “मेरो बुबा सुत्केरी हुनुभएको छ । उहाँलाईसुत्केरी बिदा दिनुपस्यो ।” बादशाहले भने, “कस्तो अचम्मको क्रागर्छ्यौं ! लोग्ने मानिस पनि कहीँ सुत्केरी हुन्छ ?” वीरबलकी छोरीलेभनी, “गोरुले दुध दिन्छ भने हाम्रो बुबा सुत्केरी हुन नहुने ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बादशाहले वीरबललाई गोरुको दुध ल्याउन भनेको कुरा सम्भे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनले वीरबललाई मूर्ख बनाउँछु भन्ने सोचेका थिए । वीरबल त&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उल्टै बिदा लिएर बस्ने पो भए । बादशाहको जुक्ति काम लागेन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनले केही गरे पनि वीरबललाई मूर्ख बनाउन नसक्ने भए । अकबरले&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वीरबलकी छोरीलाई भने, “तिम्रो बाबालाई दरबारमा पठाइदिन्‌ । गोरुको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुध ल्याउनु पर्दैन ।” बादशाहले बीरबलकी छोरीको चलाखी थाहा पाए ।बादशाहले उसलाई पुरस्कार दिएर घर पठाए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुई बुढाबुढी र सिरो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जापानी लोककथा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धेरै अगाडिको क्रा हो, जापानमा एक जोडी श्रीमान श्रीमती बस्थे ।तिनीहरूको एउटा सिरो नाम गरेको कुक्र थियो । ती दुवै बुढाबुढीभइसकेका थिए । उनीहरू आफ्‌ आफूमा धेरै माया गर्थे । उनीहरू गरिबथिए । उनीहरू आफूलाई र सिरोलाई वर्षभरिका लागि चामल किन्नचाहन्थे तर उनीहरूसँग थोरै पैसा थियो । त्यसैले अब छिटै नै चामलकिन्ने पैसा सकिन्छ भनेर उनीहरू चिन्ता गर्न थाले ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक दिन ती दुवै बुढाबुढी बारीमा काम गरिरहेका थिए । सिरो चाहिँयताउति बारीमा सुँघ्दै थियो । एक्कासि त्यस कुकुरले भुक्दै एक ठाउँमाखोख्रिन थाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“चुप लाग्‌, सिरो !” बुढाले भने तर सिरो भुकिरहयो र खोस्रिरहयो ।त्यति गर्दा पनि सिरो भुकिरहेको हुनाले बुढा त्यहाँ हेर्न गए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न“|॥)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
॥॥॥ रे|||&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसपछि उनले एउटा लट्ठी माटामा गाडे । लट्ठी केहीचिजमा ठोकिएको जस्तो लागेर उनले त्यहाँ खने । खनिएको ठाउँमा उनलेएउटा ठुलो बाकस भेट्टाए । बाकस खोलेर हेर्दा त त्यहाँ सुनका असर्फीहरूभेटिए । बुढा धेरै खुसी भए । अब त चामल किन्न चिन्ता नै गर्नुपरेन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यी सबै कुरा एक जना लोभी छिमेकीले देखिरहेको थियो ।उसलाई लोभ लाग्यो । उसले पनि सिरो कुक्रलाई लिएर गयो ।उसले सिरोले सुँघेका ठाउँमा खनेर हेन्यो तर उसले त्यहाँ केही भेटेन ।रिसको झोकमा उसले सिरोलाई मारिदियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२९१0 2,1 / / द्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४४१९)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिरो मरेको थाहा पाएर ती दुवै बुढाबुढी धेरै दुःखी भए । उनीहरूअलापविलाप गर्न लागे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक रात सपनामा सिरो आयो र उसले बुढाबुढीलाई भन्यो,“मलाई तिमीहरूले धेरै हेरचाह गरेका थियौ । त्यसैले अब मतिमीहरूको हेरचाह गर्ने छु। भोलि बगैँचाको सल्लाको रुख काट्नु रकेही सल्लाको रस भात भएको भाँडामा मिसाउनु ।” त्यति भनेर कुक्रबिलायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११११) १७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
] &amp;quot;छै! १)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोलि पल्ट उनीहरूले कुक्रले भने जस्तै गरे । भात पकाएको भाँडामासल्लाको रस पर्नासाथ बुढी चिच्चाउन थालिन्‌, “हेर्नुहोस्‌ न ..।”भातको सिता एक एक गरी असर्फपीमा परिवर्तन भएकोपाइयो । बुढाबुढीसँग धेरै पैसा भयो । तर ती बुढाबुढी आफनो आज्ञाकारीकुक्रलाई सम्झेर झन्‌ दुःखी भए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिरोले बुढाबुढीलाई आफ्‌ बाँच्दाखेरि मात्र होइन, मरेर पनि ठुलोसहयोग गस्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जे छोए पनि सुन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ग्रिसेली लोककथा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ग्रिस भन्ने एउटा देश छ । त्यहाँ धेरै पहिले मिदास नामका राजा थिए ।ती राजा धन सम्पत्तिको असाध्यै लोभ गर्थे । उनी सुन किनेर ढुकुटीमाजम्मा गर्थे । उनका ढुकुटीमा धेरै सुन जम्मा भइसकेको थियो, तैपनिराजालाई अभ धेरै सुनको लोभ लाग्दै गयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[२७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजालाई आफूसँग भएको सुनले चित्त बुझेको थिएन । उनलाई एकैपटकमा धेरै सुन पाए हुन्थ्यो भन्ने लाग्यो । उनले भगवान्‌ खुसी भए एकैपटकमा धेरै सुन पाइन्छ भन्ने ठाने । त्यसैले उनी भगवानको तपस्या गर्नलागे । भगवान्‌ खुसी पनि भएछन्‌ । भगवान्‌ उनका अगाडि देखापरे ।भगवानले राजालाई के माग्छौ भनेर सोधे । राजालाई यो ठुलो मौकाथियो । राजाले भगवानसँग भने, “मैले जे छोए पनि सुन होस्‌, प्रभु ।”राजाले जे छोए पनि सुन हुने वरदान दिएर भगवान्‌ अलप भए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
॥ नि पएाएण्म्यु। पा | र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा मिदास विभिन्न कुरा छुन थाले । जे छोए पनि सुन हुन थाल्यो ।इँटा, ढुङ्गा आदि समेत सुन भए । बारीका फुलसमेत सबै सुन भए ।राजासँग अब चाहेजति सुन हुने भयो । उनी अत्यन्तै खुसी भए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजाको खाना खाने बेला भएको रहेछ । भान्छेले राजालाई खानेक्रा ल्याइदिए । राजा खाना खान बसे । राजालाई अन्डा मनपर्थ्यो । सबभन्दा पहिले राजाले अन्डा टिपे । अन्डा त तुरुन्तै सुनपो भयो । राजा झसङ्ग भए । उनले अरू खाने कुरा टिपे ।राजाले टिपेका खाने क्रा सुन हुँदै गए । राजाले चिया खान खोजे ।चिया पनि सुनको झोल भयो । राजालाई अब के खाने, के खाने भयो ।राजा त्यस दिन भोकै सुते ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोलिपल्ट राजाकी छोरी दगुदै आई । उसले राजालाई छोई ।राजालाई छुने बित्तिकै राजाकी छोरी पनि सुनको मूर्ति भई ।छोरी मूर्ति भएकामा राजालाई ठुलो पिर पस्यो । दरबारमाराजाले छोए भने मूर्ति भइन्छ भन्ने हल्ला मच्चियो । राजाका पाले,पहरा, नोकर, चाकर दरबार छोडेर भाग्न लागे । अब त दरबारमाराजा एक्लै परे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजालाई धेरै भोक लाग्यो । राजा खाने कुरा खोज्न आफैँ दौडनलागे । खाने कुरा पाए पनि राजाले खान सकेनन्‌ । खाने क्रा मुखमानपुन्याउँदै सुन हुन्थ्यो । दरबारमा जताततै सुन देखिन थाल्यो । राजाकोपेट भने खाली नै रहयो । राजा भोकले छट्पटाउन लागे । भोकले नैउनी मर्ने भए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुके४: 111॥॥॥॥।॥[।1 ॥/ 7:1,711] ॥ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजालाई अब आफनो भूल थाहा भयो । मानिसलाई सुनभन्दा खानेकुरा नै चाहिने रहेछ । उनलाई सुन देखेर दिक्क लाग्न थाल्यो ।मर्ने अवस्था भएकाले राजाले भगवान सम्झे । त्यति नै बेलाभगवान्‌ देखा परे । भगवानूले राजालाई भने, “फेरि के माग्छौ ?”राजालाई लाज लाग्यो । उनी बोल्न पनि नसक्ने भइसकेका थिए ।उनले बिस्तारै भगवानसँग भने, “प्रभु ! मबाट ठुलो भुल भयो ।मलाई सुन चाहिँदैन । प्रभुले मलाई दिएको वरदान फिर्ता होस्‌ । सबैकुरा पहिले जस्तै होकन्‌ । मलाई भोक लागेको बेला एक पेट खानपाए पुग्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवानूले राजालाई दिएको शक्ति फिर्ता गरिदिए र अलप भए । अबराजाले छोएका कुरा सुन हुन छोडे । सुन भएका कुरा पहिले जस्तैभए । राजाकी छोरी हिँड्न थाली । राजा खुसी भएर खाने कुरा खाए।उनले धन सम्पत्तिको लोभ गर्न छाडे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विश्वासिलो साथी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय लोककथा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धेरै पहिलेको कुरा हो । एकादेशमा एक जना राजा थिए ।राजा साहसी र बुद्धिमान्‌ थिए । कसैले छलछाम गरेको मनपराउँदैनथे । त्यसैले उतको नाम जहाँतहीँ फैलिएको थियो । अनेककला भएका मानिसहरू राजालाई उपहार दिन दरबारमा आउँथे ।कोही कोही त दरबारमा आफूनो इमानदारिता देखाउन आउँयै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक दिन एक जना ठुला कलाकार दरबारमा आए । उनले साहसी,बुद्धिमान र इमानदार राजासँग भेट्ने इच्छा जाहेर गरे । राजालाईदिन उनले तिन ओटा उस्तै उस्तै राम्रा पुतली बनाएर ल्याएका थिए ।ती तिन ओटै पुतली राजाका सामु राखेर उनले बिन्ती चढाए, “यीपुतलीहरू राम्ररी हेरिबक्स्योस्‌ र तीमध्ये सबैभन्दा राम्रो पुतली, मध्यमपुतली र सबभन्दा नराम्रो चाहिँ पुतली कुन कुन हुन्‌, छुट्याइबक्स्योस्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
॥॥११1॥/१॥४::1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टु&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कलाकारको कुरा सुनेपछि राजाले तिन ओटै पुतलीहरू हातमा लिए रसबैलाई राम्ररी हेरे । पुतलीहरूको उचाइ, तौल र बनावट उस्तै उस्तैरहेछ । तिनीहरूमा कुनै पनि फरक देखिँदैनथ्यो । राजाले राम्ररी पुतलीहेर्दै जाँदा उनले सबैमा प्वाल परिरहेको देखे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
|२७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजाले सानो सिन्का लिएर तिन ओटै पुतलीको कानमा छिराए ।त्यसपछि उनले पुतली हल्लाउन थाले । हल्लाउँदा पहिलो पुतलीमाछिराएको सिन्को अर्को कानबाट निस्केको देखे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यस्तै, दोस्रो पुतलीमा छिराएको सिन्को चाहिँ मुखबाट निस्केको देखे ।त्यस्तै, तेस्रो पुतलीमा छिराएको सिन्को चाहिँ सिधै पेटमा गएको देखे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यसपछि राजाले केही बेर सोचेर भने, “तिमी साँच्चीकै कस्ता बाठाकलाकार रहेछौ । तिमीले सिकाएको साथी चिन्ने तरिका देखेर म धेरैनै खुसी छु। तिन ओटा पुतलीहरूबाट तिनै किसिमका साथीहरू निस्के ।सबै मान्छेहरू आफना साथीहरू असल होउन्‌ र गोप्य क्राहरू गोप्यराख्न सक्‌न्‌ भन्ने चाहन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ती पुतलीहरूमध्ये सबैभन्दा पहिलो पुतली नराम्रो हो । त्यस्तो साथीपायो भने उसले तिमीले भनेको क्रा एउटा कानले सुनी अर्को कानलेउडाइदिन्छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दोस्रो पुतली चाहिँ मध्यम दर्जाको साथी हो किनभने उसले तिम्रो क्रासुनेर उसले अरूलाई क्रा लगाउँछ । उसले केही क्रा पनि गोप्य राख्नसक्दैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेस्रो सबैभन्दा विश्वासिलो र असल साथी हो किनभने उसले गोप्य कुरान सुनेर उडाउँछ, न त अरूलाई भन्छ । उसले त्यो क्रा गोप्य राख्छ।कलाकार राजाको यस्तो जवाफ सुनेर धेरै खुसी भए किनभने आजसम्मकसैले नभनेको क्रा राजाले भनिदिए ।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%AD%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A5%8B&amp;diff=101</id>
		<title>खाल्डामा परेको भकुन्डो</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%AD%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A5%8B&amp;diff=101"/>
		<updated>2024-06-14T14:17:35Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: Created page with &amp;quot;खाल्डामा पप्रेको रकुन्डो  सामग्री सङकलनइन्दिरा चालिसे, रत्नमान शाक्य, जयप्रसाद लम्सालयरोगराज भट्टराई, लक्ष्मीभक्त बासुकला  चित्राड्कन कर्ताराजुबाबु शाक्य  नेपाल सरकारशिक्षा म...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;खाल्डामा पप्रेको रकुन्डो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सामग्री सङकलनइन्दिरा चालिसे, रत्नमान शाक्य, जयप्रसाद लम्सालयरोगराज भट्टराई, लक्ष्मीभक्त बासुकला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चित्राड्कन कर्ताराजुबाबु शाक्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपाल सरकारशिक्षा मन्त्रालयपाठ्यक्रम विकास केन्द्रसानोठिमी, भक्तपुर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रकाशक : नेपाल सरकारशिक्षा मन्त्रालयपाठ्यक्रम विकास केन्द्रसानोठिमी, भक्तपुर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
6 प्रकाशकमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिमार्जित संस्करण : २0७३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अमेरिकी अन्तर्राष्ट्रिय विकास नियोग (ग्रुएसएआइडी) को सहयोगमा यो सन्दर्भ सामग्री प्रकाशनभएको हो । यसमा समाविष्ट सामग्रीको जिम्मेवारी प्रकाशकमा निहित छ। यसमा रहेका सामग्रीलेगयरुएसएआइडी र अमेरिकी सरकारको अवधारणालाई प्रतिनिधित्व गर्दैनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाम्रो भनाइ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाल बालिकाको पठन सिप बढाउन, मनोरञ्जन प्रदान गर्न, मानसिक र बौद्धिक विकासकालागि सिकाइ सम्बद्ध सन्दर्भ सामग्रीहरूको महत्त्वपूर्ण भूमिका हुन्छ । सन्दर्भ सामग्रीलेबाल बालिकालाई अध्ययनशील बनाउनका साथै पढाइ सिप विकास गरी पाठ्य पुस्तकमाभएका विषय वस्तु ग्रहण गर्नसमेत मदत गर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाठ्यक्रम विकास केन्द्रद्वारा राष्ट्रिय प्रारम्भिक कक्षा पढाइ कार्यक्रम कार्यान्वयनगर्ने क्रममा यो सन्दर्भ सामग्रीलाई अद्यावधिक गरी गुएसएआइडीको आर्थिक सहयोगमाप्रकाशनमा ल्याइएको हो । प्रस्तुत सन्दर्भ सामग्री कक्षा १ देखि ३ सम्मका विद्यार्थीहरूकालागि उपयोगी हुने गरी विकास गरिएको छ तापनि आवश्यकतानुसार जुनसुकै कक्षामा पनिप्रयोग गर्न सकिने छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रस्तुत सामग्री शिक्षकहरूले सबै बाल बालिकाहरूलाई पढ्ने मौका दिई आपसमाछलफलसमेत गराई उनीहरूको पठन सिप विकासमा सहयोग गर्नुहुने छ भन्ने अपेक्षागरिएको छ । अन्त्यमा यस सामग्रीका सम्बन्धमा प्राप्त हुने सुझाव एवम्‌ प्रतिक्रियाकालागि पाठ्यक्रम विकास केन्द्र सदैव स्वागत गर्दछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बि.सं. २०७३ पाठयक्रम विकास केन्द्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विषय स्‌ची&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्र.स. पाठ शीर्षक पृष्ठ सङ्ख्या१. सिमा ग्वाङको बुद्धि प्र२. खाल्डामा परेको भकुन्डो ९३. भालु भझुक्कियो १४४. रेलले छोएन पदप्‌. हात्ती कसरी जोख्ने ? २३६. गरिब किसान र राजा ३०७. युसुफको भारी ३६&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिमा ग्वाङको बुद्धि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चीनमा धेरै पहिले सिमा ग्वाङ नाम गरेको केटो थियो । उ धेरैचलाख थियो । पढिसकेपछि सिमा ग्वाङ साथीहरूसँग खेल्थ्यो ।उनीहरू बगैँचामा खेल्थे । बगैँचाको वरिपरि ढुङ्गाको पर्खालथियो । पर्खालको एक छेउमा एउटा ठुलो माटाको घ्याम्पोथियो । त्यस घ्याम्पाभरि पानी थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक दित सिमा ग्वाङ साथीहरूसँग बगैँचामा लुकामारी खेल्दै थियो ।सिमा ग्वाडको एक जना साथी पर्खालमा चढेको रहेछ । त्योसाथी चिप्लिएर घ्याम्पाभित्र खस्यो । सबै केटाकेटी घ्याम्पो भएकोठाउँमा जम्मा भए । तिनीहरू के गर्ने, के गर्ने अलमल्लमा परे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्तो सङ्कटमा सिमा ग्वाङ झट्टै विचार गर्न सक्थ्यो । उसलेठुलो ढुङ्गो टिप्यो र घ्याम्पामा बजास्यो । घ्याम्पोमा भ्वाङपन्यो । भ्वाङबाट सबै पानी बाहिर आयो । घ्याम्पामा डुबेकोसाथी बच्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गाउँका ठुला मानिसहरूले पनि त्यो कुरा थाहा पाए । त्यसपछिठुला मानिसहरू घ्याम्पो भएका ठाउँमा आए । घ्याम्पामा डुबेकोकेटो भ्वाङबाट बाहिर निस्किसकेको थियो । बुद्धि पुन्याएर कामगरेकाले सबैले सिमा ग्वाङलाई स्याबासी दिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खाल्डामा परेको भकुन्डो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धेरै पहिले चीनको कुनै ठाउँमा वेन यान्वो नाम गरेको केटो थियो ।उससँग एउटा भकुन्डो पनि थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक दिन बेन यान्वो साथीहरूसँग भकुन्डो खेल्दै थियो । भकुन्डोगुडेर इनार नजिकैको सानो खाल्डामा पन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
॥/।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
॥/&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
॥ ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाँसको छ्डी ल्यायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भकुन्डो झिक्न खाल्डामा हात हाल्यो । उसलेत्यस छ्डीले पनि उनीहरूले भकुन्डो निकाल्त सकेनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भेट्न सकेन । अर्को साथीले ब&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक जना साथीले भ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भकुन्डो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भकुन्डो कसरी निकाल्ते होला भनेर वेत यान्वो विचार गर्न थाल्यो ।उसले एउटा जुक्ति निकाल्यो । बेन यान्वोले सबै साथीहरूलाईउसको घर लिएर गयो । घरबाट उसले एउटा बाल्टिन लियो ।बाल्टिनमा डोरी बाँधिएको थियो । त्यस बाल्टिनले बेन यान्वोकाआमाबाबु इनारबाट पानी फिक्थे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वेन यान्वोले साथीहरूसँग इनारबाट पानी निकालौँ भन्यो ।उनीहरूले बाल्टिन इनारमा खसाले । सबै मिलेर बाल्टिनको डोरीताने । बाल्टिनमा इनारको पानी आयो । उनीहरूले त्यो पानीभकुन्डो भएको खाल्डोमा हाले ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनीहरूले धेरै पटक इनारबाट पानी निकाले । त्यो पानी भकुन्डोभएको खाल्डोमा हाल्दै गए । खाल्डामा पानी बढ्दै गएपछि भकुन्डोपनि माथि आयो । अब उनीहरूले भकुन्डो भेद्त सक्ने भए । वेतयान्वोले भकुन्डो निकाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वेत यान्वो र साथीहरू रमाएर फेरि भकुन्डो खेल्त थाले ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१४|&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एउटा ठुलो वत थियो । वतको बिचमा एउटा बाटो थियो । त्यसबाटामा दुई जना केटाहरू हिँड्दै थिए । उनीहरू साथी साथीथिए । एउटा केटो अलि ठुलो थियो । अर्को केटो साथीभन्दासानो थियो । उनीहरूले हिँड्दाहिँड्दै बाटामा एउटा भालु देखे ।त्यो भालु उफ्रँदै उनीहरूतिर आइरहेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भालु देखेर ठुलो केटो झटपट एउटा रुखमा चढ्यो । सानो केटोरुख चढ्त सकेन । उसलाई आपत्‌ पन्यो, तर क आत्तिएन ।भालुले मरेको मानिस, जनावर खाँदैन भन्ने कुरो उसले सम्झयो ।उ जमिनमा लम्पसार परेर पल्टियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भालु सानो केटाको छेउमा आयो । सानो केटो लास जस्तै भएरसुतिरहयो। उसले सास पनि बन्द गस्यो । भालुले उसको नाक कानसुँध्यो, तर सानो केटो जिउँदो भन्ने थाहा पाएन । भालुले त्यसकेटोलाई केही गरेन । भालु आफूतो बाटो लाग्यो । सानो केटोबच्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भालु हिँडेपछि रुखको केटो ओर्लियो । सानो केटो पति उठ्यो ।ठुलो केटाले सानो केटोलाई भालुले खान्छ भन्ने ठानेको थियो ।भालु त्यतिकै हिँडेको देखेर ठुलो केटो छक्क पन्यो । उसले सानोकेटालाई जिस्क्याउँदै सोध्यो, “भालुले तिमीलाई कानमा के भन्यो ?”सानो केटोले जवाफ दियो, “आपत्‌मा साथीलाई एक्लै छोड्नेकोविश्वास नगर्नु भनेर भालुले भन्यो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रुसमा एउटा गाउँ थियो । त्यहाँ एउटा किसानको परिवार बस्थ्यो ।किसानका दुई ओटी छोरी थिए । ती दुवै पुतली जस्ता राम्राथिए । ठुली आठ वर्षकी थिई । सानी छ वर्षकी थिई । तिनीहरूरेलको लिकको पल्लापट्टि च्याउ टिप्त जान्थे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/) | |; दु,£%40 %%%%&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पन्ना नाति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
00 2 पाण्गु प्र. 1० हर दे 010)क्् 910100)/&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(४14 01012.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक दिन तिनीहरू च्याउ टिपेर घर फकँदै थिए । तिनीहरू रेलकोलिक नजिकै आइपुगेका थिए । रेल पनि नजिकै आइरहेकोथियो । दिदीले झटपट लिक पार गरी । बहिनी लिकको बिचमापुग्दा च्याउ पोखियो । बहिनी च्याउ टिप्न थाली । दिदी पारिबाटकराई, “च्याउ छोड्दे ! लिकबाट भाग्‌ !” बहिनीले प्रस्ट सुनित ।उसले छिटो टिप भने जस्तो सुनी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
0072) /)| 0)/0070&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
_ताललपापणााो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पारी ७5२केके&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रेलको ड्राइभरले सिट्ठी बजाइरहयो । दिदी पारिबाट “भाग्‌ बैनीभाग्‌ !&#039; भन्दै चिच्याइरही । बैनीले च्याउ टिप्न छोडिन । रेलकायात्रीहरूले भने, “कठै बिचरा, मर्ने भई !” ड्राइभरले रेल रोक्नेप्रयास गनत्यो तर रेल रोकिएन । सानीको माथिबाट रेल गयो ।दिदी डाँको छोडेर रुन थाली ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;-७----&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
८म्म्््ञ्रि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोकियो। यात्रीहरू रेलबाट ओर्लिए। उनीहरूले सानीलाई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
च्याउ टिपिरहेकै देखे । दिदी सानी भएको ठाउँमा दौडँदै आई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रौ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुगेर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रेल पर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमीलाई रेलले केही&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
। सबैले सानीलाई सोधेगरेन ?” सानीले जवाफ दिई, “छुँदै छोएन। म ओछ्यानमा जस्तै सुतँ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यात्रीहरू पति आएरेल लिकबाट गयो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सानीले च्याउ टिपिसकी । दिदी बहिनी घरतिर लागे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हात्ती कसरी जोख्ने ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- चिनियाँ बालकथा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(४०००&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पर“केडे:] ॥त्‌ पनेछ ठै/ ) सक्रि) ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धेरै पहिले चीनमा सान क्योन भन्ने मानिस थिए । उनीसँगधेरै हात्ती थिए । उनले उनको साथी कावो कावोलाई एउटाहात्ती उपहार पठाए । कावो कावोका कामदारले हात्ती देखेकाथिएनन्‌ । सबै कामदार हात्ती हेर्न जम्मा भए । कत्रो ठुलो जनावरभन्दै उनीहरू छक्क परे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२४)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कावो कावोलाई हात्तीको तौल थाहा पाउने इच्छा भयो । उनलेसबैसँग त्यो हात्ती कसरी जोख्ने भनेर सोधे । केही मानिसलेहात्ती जोख्न ठुलो तराजु बनाउनुपर्छ, भने। केही मानिसले सिङ्गोहात्ती जोख्न सकिँदैन, काटेर टुक्रा टुक्रा पारेर जोख्नुपर्छ भने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
).// कदर र्‌ हि८८17).&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कावो कावोको सात वर्षको छोरो त्यहीँ थियो । उसको नाम कावोचुङ थियो । कावो चुङ सबैको कुरो सुनिरहेको थियो । उसलाईकसैको क्रामा पनि चित्त बुझेन । कावो चुडले बाबुको अगाडिगएर भन्यो, “म यो हात्ती सजिलै जोखिदिन्छु ।” कावो चुङकोकुरो सुनेर ठुला मानिसहरू छक्क परे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नजिकै समुद्र थियो । त्यहाँ ठुला ठुला डुङ्गाहरू थिए । कावोचुङले हात्तीलाई समुद्रमा लिएर गयो । उसले हात्तीलाई एउटाडुङगामा चढायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हात्ती चढाएकाले डुङ्गाको माथिसम्म पानी आयो । कावो चुङलेडुङ्गामा पानीले डुबाएको जति वरिपरि मसीको चिनु लगायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसपछि हात्ती डुङ्गाबाट निकाल्न लगायो । अब उसले ढुङ्गातौलँदै डुङ्गामा हाल्त लगायो । मसीको चिनुमा पानी नआउन्जेलढुङ्गा हाल्दै गए । मसीको चिनु पानीले छोएपछि ढुङ्गा राख्नछोडे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हात्ती राख्दा र ढुङ्गा राख्दाको चिनु एउटै भएपछि हात्ती रढुङ्गाको तौल बराबर हुने भयो। कावो चुङले डुङ्गामा राखेजतिढुङ्गाको तौल जोडेर हात्तीको तौल सुनायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अचम्मले हात्ती तौलेकाले कावो कावोले छोरालाई स्याबासी दिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गरिब किसात र राजा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धेरै अगाडि जार इबान भन्ने व्यक्ति रुसका राजा थिए । उनीआफना जनताको दुःख बुझन अरूले नचिन्ने गरी डुल्त जान्थे ।एक दिन साँझ परेपछि उनी मास्को सहरका छेउको गाउँमापसे । घुम्दा घुम्दा थाकेर आराम गर्ने विचार गरे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजाले गाउँका मानिसहरूलाई भने, “दाइ, म सारै थाकेकोछु। मलाई बास बस्ने ठाउँ दे ।” राजाले लाएको लुगा ज्यादैसाधारण दियो । उनी राजा हुन्‌ भन्ने कुरा कसैले पनि थाहापाएनन्‌ । उनलाई पति बस्ने बास दिन मानेनन्‌ । राजालाई दुःखलाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
_2 ११, /०११५१%.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लाापारेकशापोशतीती एप नसारेरेकसरे”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा त्यहाँबाट फर्के। फर्कन लाग्दा राजाले एउटा सानो भझूप्रो देखे।त्यो झुप्रो एउटा गरिब मानिसको थियो । क ज्यादै गरिब थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजाले त्यस झुप्रोको ढोका घचघचाउन थाले । त्यो गरिबकिसानले ढोका उघारेर सोध्यो, “तपाइँले कसलाई खोज्नुभएकोराजाले जबाफ दिए, “म आज रातभरि यहाँ बास बस्तचाहन्छु ।” किसानले भन्यो, “तपाइँ कुसमयमा आइपुग्नुभयो ।अहिले मेरी श्रीमती बिरामी परेकी छिन्‌, म तपाइँलाई केही पनिखान दिन सक्दिनँ तैपनि चिसोबाट बच्नुहोस्‌ । आज रातभरियहीँ बस्नुहोस्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यति भनेर किसानले राजालाई एउटा कोठामा लग्यो । त्यहाँउसका छोराछोरीहरू सुतिरहेका थिए । तितनीहरूमध्ये कोहीनिदाएका थिए र कोही जाडोले थरथर कामिरहेका थिए ।किसानले केही रोटी राजालाई दियो । अनि सुत्तका लागिअलिकति पराल पनि ओछ्र्याइदियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोलिपल्ट उज्यालो भएपछि राजा दरबार पुगे । उनले आफनोलुगा फेरेर फेरि त्यही गरिबको झुप्रामा आइपुगे । किसानलाईबोलाएर आफ्‌ राजा भएको र हिजो यहीँ बास बसेकोकुरा बताए । किसान अचम्ममा परे । राजाले किसानलाई धेरैधन्यवाद दिए । उनी किसानदेखि धेरै खुसी भएर किसानकाछोराहरूलाई दरबारमा लगे । राजाले किसानका छोराछोरीलाईआफ्नै छोराछोरी जस्तै गरी पाले ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युसुफको भारी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- ग्रिसेली बालकथा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युतान भन्ने एउटा देश थियो । त्यहाँ युसुफ भन्ने केटो थियो ।उ बाठो थियो । उ युनानका राजाकहाँ नोकरी गर्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक दिन त्यहाँका राजा तीर्थ जाने भए । त्यस बेला मोटर,हवाईजहाज केही थिएनन्‌, हिँडेर जानुपर्थ्यो । सामान मानिसले नैबोक्नुपर्थ्यो । वन जङ्गलमा पनि बास बस्नुपर्थ्यो । तीर्थ जानकालागि खाने कुरा बोक्नुपर्ने भयो । सुत्न ओढ्ने ओछ्याउने पनिबोक्नुपर्ने भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजाका दरबारमा खाने कुरा र ओढ्ने ओछ्याउनेका भारीतयार भए । युसुफले पनि एउटा भारी बोक्नुपर्ने भयो । उसलेखाने कुराको भारी बोक्छु भनेर रोज्यो । त्यो भारी अरूभन्दागरौँ थियो । ठुला मानिस सबैले युसुफलाई अरू नै भारी बोक्नभने । युसुफले गरौँ भए पनि आफूले रोजेकै भारी बोक्ने ढिपीगस्यो । ठुला मानिसले उसलाई मुर्ख केटो ठाने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दरबारमा हिँडेको दिन युसुफ अरूसँग हिँड्न सकेन । भारी गरौँभएकाले उसलाई धेरै कष्ट भयो । क सबैको पछि पछि बिस्तारैहिँड्यो । ठुला मानिसले फेरि उसलाई अर्कै भारी बोक भने तरयुसुफले मानेन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोलिपल्ट युसुफ असरूसँगै हिँड्यो । पर्सिपल्टदेखि क अरूभन्दाअघि अघि हिँड्त थाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युसुफको भारीबाट दिनदिनै खाने कुरो निकाल्तुपर्थ्यो । त्यसैलेदिनदिनै उसको भारी घटेर गयो । अरूको भारीबाट खर्च हुनेकुरो थिएन । त्यसैले अरूको भारी घटेन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीर्थ पुग्दा युसुफको भारी आधा घटेको थियो । क कति पनिथाकेको थिएन । तीर्थमा क सबैतिर घुम्न सक्यो । अरू साथीधेरै थाकेका हुनाले घुम्न सकेनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठुला मानिसले बल्ल थाहा पाए, युसुफ मुर्ख होइन, बाठो रहेछ ।एक दुई दिन दुख गर्दा धेरै दिन सुख हुन्छ भने केही दिन दुखगर्नुपर्छ ।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6_%E0%A4%87%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%BE_(%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%9F%E0%A4%95)&amp;diff=100</id>
		<title>मुकुन्द इन्दिरा (नाटक)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6_%E0%A4%87%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%BE_(%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%9F%E0%A4%95)&amp;diff=100"/>
		<updated>2024-06-14T14:16:50Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: Created page with &amp;quot;णिड्टो।2€० 8:  साझा शिक्षा ड-पाटी0 हर  %०%४४०४,१151:01:919%90,0118५४४४५४,01211252911.01.  मुकुन्द इन्दिरा  बालकृष्ण सम  प्रकाशक : साझा प्रकाशन  संस्करण : पन्धौं (२०४८) ३१०० प्रतिसोत्हौं (सा. प्र, बाट नवौं)  संवत्‌...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;णिड्टो।2€० 8:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साझा शिक्षा ड-पाटी0 हर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
%०%४४०४,१151:01:919%90,0118५४४४५४,01211252911.01.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द इन्दिरा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बालकृष्ण सम&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रकाशक : साझा प्रकाशन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संस्करण : पन्धौं (२०४८) ३१०० प्रतिसोत्हौं (सा. प्र, बाट नवौं)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संवत्‌ : २०४९ (दश हजारप्रति)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मृत्य : छू. २०।- मात्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुद्वक : साझा प्रकाशनको छापाखाना, पुल्चोक, ललितपुर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रधम संस्करणकोप्रस्तावना&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रव्यकाव्यमा कहिले कहिले अधवा अर्काबाट सुन्दा मीठो बोली रमधुर लयको भाग आइपर्दछ, दृश्यकाव्यमा भने पात्रहरूकोउत्तरदायित्व कवि या नाटककारको भन्दा कमगाह्रो हुँदैन । दिन आउला- मेरो कमजोरकलमले कुनै हनुमान्‌ जस्ता पात्रकोहातमा परेर गदाको काम देला(यो फ्याँकिएन भने) ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
-बालकृष्ण सम&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हपनारायण श्रेष्ठभुकुन्दलाल श्रेष्ठभवदेब उपाध्यायब्रूदा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
षिमान&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनाचारमेशदास&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युसूफ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जन्दुल हुसैनमिस्टर ज्याक्सनस्क्ले-मास्टर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पात्रहरूपुरुष&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाटनका एक साहूरूपनारायणको छोरारूपतारायणको भित्रअर्को साहूरूपतारायणको नोकरभवदेवको नोकर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्दका कलकत्तेसाथीहरू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छ्ाक्रवर्ग, हात हेर्नै, नाक, रमैशदासको नेपाली नोकर,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039; झरियाहरू, ब्राह्मणहरू, डोलेहरू, कुल्लीहरू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रअरू।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घनमती देवीइन्दिरा देवीराजामती&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बखतरी ज्यानभ्ररिनीहरू इत्यादि ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्त्री&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूपनारायणकी स्वास्नीमुकुन्दलालकी स्वास्नीबूढाकी स्वास्नी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक मसहूर गायिका&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दृश्य- पाटन, काठमाडौं, कलकत्ता ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
॥श्री॥मुकुन्द इन्दिरा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रथम अङ्दृश्य १- पाटन, मध्यान्हमा । रूपनारायणको सुत्ले कछा ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भित्तामा टाँगिएका तस्वीरहरू- घ्रुवनारापण, कमला (लक्यी);सरस्बती इत्याबि र ठूलो अक्षरले पो श्लोक लेखिएकोएउटा कागतमा-राम राम रमा राम राम राम रमा रमा ॥रमा राम रमा राम रमा राम रमा रमा ॥१।अलि तल शीशीहरू राखेको सानो तखता । त्यसम्फील्र अस्ल्येनिछचौनामा भित्तामा ठडचाएको बालिस्टमा अडेस लाएर सिरकले गुदुमुदुभई आँखा-नाक-मुख मात्र देखाएर ओठले डिग्री च्यापी कपनारापणबसिरहेका ।उनको सिरानमा (ढौकातिर होइन) जपमाला र पुरानो बृहतखोघ-रत्लाकर, सिरानमनि अगिल्तिर एउटा कन्तुर, लद्‌ठी, दुई अंगुल मैक्षबाँकी रहेको सामदान, खुट्टामन्तिर करुवा र फिकडानी ।अगिल्तिर ओछ्याएको रङ्ग उडिसकेको मखमली मसैखालायिछरिएका धेरै कितापको बीचमा जेनघडी हेरी भबदेव बसिरहेका ।(एक मिनेटपछि)रूपनारायण - अँ ?भ्बदेव- पुग्यो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूप&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भबदेव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूपभन-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ख्प-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विमान-रूप&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(डिग्री भिकी हेरिसकेर भवदेवलाई दिंदै)हेर्नोस्‌, फेरि उही उनान्सय; फेरि उत्ति ।(डिग्री हेरी) मेरो आँखाले आजकाल चश्मा मागेजस्तो छ ।हो, अझ उनान्सयको धर्कालाई पनि अलिकति छोएको छैन ।(डिग्री पखालेर खोलमा राख्नै) ज्वर त रहेनछ, तपाईं उसैअतानिनह छ, ज्वरसित डराएर ज्वर झिम्नुहुन्छ ।उतान्तय ज्वरै होइन ? सहानुभूति गर्नोस्‌न ।होइन, यति त कसैको साधारण हुन्छ । यो उनान्स्य मलाईपूरा बर्ष दिन आयो; हाम्रो ग्वाँजे, चिन्नुहुन्छ, हो, उनलाईउनान्सय ठेक्का नै छ । हाम्रा साहिला बाको छोरालाई उहीउनान्सय, कति औषधि खुवाए- माछाको तेलमा त उल्लाईमाछो बनाएर दुबाए, सुवर्ण-मालती-वसन्तको त उसले फागूखेल्यो- ज्वर तेलले चिल्लो भयो, घूलोले फुस्रो भयो; तर केहीगरेर घपिएन, आखिर दुई वर्षपछि आफैं हरायो । कसैलाई तअलिकति रिस उठ्यो, अलिकति दिक्क भयो कि बस । ज्वरपनि त चाहिंदो मात्रामा चाहिन्छ, चाहिँदो मात्रामा त बिषऔषधि हुन्छ, औषधि नचाहिँदो मात्रामा विष बन्छ । हो,नातागती भयोभने, जीउ दुब्लाउँदै गयोभने अथवा विचार...(सिरक पन्छाएर फूर्तिसित उच्च स्वरमा)म दुन्लो छैन ? तपाईंको फुकालेर झुण्डघाएको लुगामा पतियत्तिको खुम्चा त किमार्थ परोइन ! हरे ! हेर्नोस्‌, मेरोभोटोको ह्वार्लाङ्गे बाहुला देखेर बूढा बा भन्थे नि सर्पकोकाँचुलीभित्र कनसुत्लो पसेजस्तो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(बिमानको प्रवेश)किन आइस्‌ ?बोलाउनुभएजस्तो लाग्यो-होइन, जा । (विमान निस्कन्छ)यसको कान अलि बाक्लो छ।त्यसैले त अरूले नसुनेको कुरा पनि सुनेको ।&#039;किमार्घ&#039; भनेको &#039;विमान&#039; सुन्यो होला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मभव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव-क््प-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूप-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त दुब्लाएर केही हुँदैन तागत भएसम्म ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तागत ? कुनै दिन मेरो नसा-नसामा तागत हुँदोहो, त्यो पनिउहिल्यै बिर्सिसकेँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तपाईंको नसाको तागत बहिरोलाई बोलाउने स्वरभित्र लुक्नपुगेछ, अहिले त्यो खुट्टामा गएको भए पनि तपाईं जुरुक्क&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उठ्नुहुन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ओहो, के भन्नुभएको !. अहिले उठेभने- जुरुक्क उठेंभने मेरोप्रतीतिमा यो शरीर घरहराजत्तिकै अग्लो हुन्छ, त्यहाँ माथिझ्यालबाट टुँडिखेल जति टाढा देखिन्छ, मेरो आँखा योभूइँलाई त्यत्तिकै टाढा देखेर कहालिन लाग्दछ अनि मानसिकभूइँचालो जान थालिहाल्दछ, त्यसैले यो ढल्ने घरहरालाईगुँडुल्केर नबसी सुखै छैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तपाईंको सिरकभित्र त काँचो आँप राखिदिए पनि एकै दिनमापाक्दछ । यसरी गुम्सी एकै ठाउँमा बसिरहेर जुदक्क उद्ता तहात्तीलाई पनि रिङटा लाग्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
होइन, होइन, तपाईंलाई ठट्टा छ, मलाई त अर्कै शंकाछ- भन्छन्‌ नि, के हो नाम पनि लिन मन त्यही-धाम्सिस्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षय हा: !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उफ्‌ । यो शूलले पनि आधा मासु पारिसक्यो, मेरो पेटकोभित्र के त छ, नत्र यसरी मानिस चलेजस्तै कैले कता कैलेकता हावा खान किन हिंड्थ्यो ! उ: पछिल्तिर ढोडनसामापुगेर पल्टनबाजी खान लाग्यो; यस्तो ०2 ७१०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नपरोस्‌ । फेरि कस्तो गजब छ- शूल रौंकादुप्पा-दुप्पासम्म पनि दुख्न पुग्दछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माफ गर्नोस्‌, त्यस बेला यहाँले काटेर, फुकालेर फालिसकेकानङ, रौं, दाँतलाई समेत शूल भइरहँदो हो, हामी पो चालपाउँदैनौं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मलाई होइन, मेरो रोगलाई गिज्याउनोस्‌, त्यो यतरी लाजमानोस्‌ कि तपाईंको नाम लिएर फुक्नेबित्तिकै जमुचण्डालको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भ्व-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भवनख््प-भ्रब-रूप&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूप-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नामले पीनासको, दोहलो भएजस्तै होस्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो सब लाछ्ली अजीर्णको प्रभाव हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यी: यसरी बस्ता-बस्तै पनि घुमाउँछ, तपाईं भने क्षयकोनाममा उजुरै सुन्नुहुन्न ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
. चैर्यको क्षय र&#039; शंकाको वृद्धि मात्र होँ । रिङटा क्षयले मात्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लाग्दैन वृद्धिले पनि लाग्दछ, जवानीको पाँच कोस रअहिलेको पाँच कदमलाई धकाइले जोष्नोस्‌, एकै-एकै हुनआउला । डर कुनै रोगको औषधि होइन, डर आफैँ रोग हो।तपाईं त्यसो भन्नुहुन्छ, हेलचेक्रचाइँबाट बचाएर पथपरहेजगर्न कर लाउने डर नै होइन र ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन, त्यो त बुद्धिचाल हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसो भ्रए डर किन लाग्छ त ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कमजोरी र पापले ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के रुद्राणी जगज्जननी कालीसित पनि नडराउँ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पापीमात्र कालीसित डराउँछ, धर्मात्मा त उनलाई भक्तियुक्तप्रेम गर्दछ, बधिनीसित डमरु जस्तै उनीसित खेल्दछ ।कालसित पति नडराउँ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किन ? काल दुश्मन हो भने उसको सामना गर्नुपर्दछ,उसलाई जित्नुपर्दछ, दार्शनिक हतियारले उसको सैन्य डरकोघ्वस्त गर्नुसिवाय उसलाई जित्ने अरू उपाय छैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साँच्ची भन्नोस्‌, के तपाईंलाई डरै लाग्दैन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लाग्दछ। :&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कोसित ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डरसित ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केको डर ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ जति नीच कर्म छन्‌, तिनको सतहमा डरको विषादिजलप लागेको हुन्छ, तसर्थ खराब वस्तु जतिसुकै लोभ्याउनेहोस्‌, तापनि भयलाई छोइएला भन्ने भयले म त्यसलाई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
।(भ्रवदेवलाई समातेर) बाजे, मैले पनि डरलाई छोएको थिएन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
॥ 1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आवररूप&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर डरले गुडिएर मलाई छुन आयो, यो छातीको छतलाईबुहारीको जवानीको डढ्दो आगोको पाङ्ग्राले छोइसक्यो,कुलको पाती मुकुन्दभने कलकत्तामा पुगेर गङ्गासागरमाबेपत्ता हुन लाग्यो । मेरो यही चिन्ताले क्षयरोगको मुकुण्डोभिरिरहेछ । अझ पनि तपाईं मेरै कमजोरी, भन्नुहुन्छभने, हो,बिहा गर्नु मेरो कमजोरी, छोरो पाउनु &#039;कमजोरी, चाँडै नातिदेह्नलाई मुकुन्दको तेह्र वर्षकै उमेरमा आठ वर्षकीइन्दिरासित बिहा गरिदिनु कमजोरी, यहाँको पढाइले नअघाएरज्यादा दुब्लाएकोले औषधिसमेत गराउन उसलाई कलकत्तामापढ्न पठाउनु कमजोरी, तर सबभन्दा कमजोरी, आफूलाईमाया नगर्ने छोराछोरीको माया गर्नु ।के अर्थ ? तपाईंलाई त्यस्तो लागे झिकाउनोस्‌्न-झिकाउने चिठी गएदेखि त उसले जवाफै दिन छोडयो ।उसलाई त्यो भालूलाई बन्दूक पड्काएजस्तै भयो । हेर्नुहुन्छ ?उसको पछिल्लो चिठी यही हो ।(बृहत्स्तोत्र-रत्नाकरको बीचबाट झुत्रो चिठी झिकी भवदेवलाईदिन्छन्‌ ।)अक्षर त छापाबराबर राम्रा रहेछन्‌ ।अझ राम्रो छ, बाच्नोस्‌न ।(पढ्छन्‌) “डिएर फादर,तपाईंको लेटर पाएँ, होममा कहिले फर्कने भनी रिप्लाईमाग्नुभएको रहेछ । आई प्रे, मेरो पढाइ कम्प्लीट हुनदिनोस्‌ । हरिदास याण्ड को.ले मनि दियो, मेरो सिग्नेचर पनितपाईंकहाँ डेलिभर भयो होला । यहाँ क्रिसम्यासको धूमधामछ।योर लभिङ्ग सन,मुकुन्द”चिठी देछ््ता मुकुन्द त क्षारसमुद्रमा सेतु बाँध्न लागेजस्तोबुझिन्छ । तीनचार वर्षअघि उहाँ मैले भेद्तासम्म यस्तोथिएन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
झवब-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अच-ङ्ह्प-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
झव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूप--&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यताबाट गएका मानिसहरूलाई समेत भेटै दिँदैन रे ।कहाँसम्मको नवाफ भइसकेछ । हिजोआज त त्यो डेरा पनिछोडेर अन्तै सन्यौ भन्ने सुन्छु ।खर्चनि?खर्च पठाउँदैछु ।पाएँ भन्ने पनि लेख्नतैन ?उही हरिदासद्वारा सहीसम्म आउँछ, त्यत्तिको&#039; घिडघिडो छ ।भला पढ्दै भए त बेसै भयो, अब कति पढिहाल्ला र ।तपाईंलाई थाहा नै छैन, बी. ए. पास भएपछि उसले पढ्नछोडिसम्यो, यो निश्चय छ । यताउता झरेको भुत्ला जस्तैहावाका भुमरीमा बरालिएर हिंडिरहेछ रे, यहाँ नफर्कने भन्छरे । त्यसो भए त्यो ग्याजुएट भएर उसका बानुआमालाई केकाम लाग्यो, इन्दिरालाई के काम, देशलाई के ? मेरो छोरालेबरु कोदालो चलाएर झिकेको पसीनाले यहाँ कान्छीऔंलाकोनङजत्रो जमीनलाई मलिलो पारेको भए पनि सुखसित आँखाचिम्लन पाउँदै !अवश्य !बाजे, दुई वर्षअघि उसको चिठीसम्म आइञ्जेल म औषधिखाँदै थिएँ, हिजोआज त औषधिको सट्टा हरेस पो खानलागेको छु । पत्याउनुभएन ? (तख्ताबाट शीशी भिकीदेखाएर) जाँच्नोस्‌, यो बिर्को नखौलेको कति भयो होला ?त के यही चिन्ता गरी घामी बसेर मुकुन्दलाई आँगनमानचाउन ल्याउने विचार छ्‌ कि कुनै खँदिलो युक्तिको गारोपनि खडा गर्दै हुनुहुन्छ ?मेरो विचार सुन्नुभयो भने तपाईंको करडे पिँजराभित्र दच्केकोडड फोक्सोरूपी पखेटा चालेर बाहिर उड्ने बल गर्नेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्तै भइरह्यो भने- यस्तै भइरह्यो भने अन आउने गृष्मक्रातुसम्ममा मैले आफैँलाई बिर्सन बेर छैन । म सीङ भएकोमानिस हुँ कि हात भएको पशु हुँ- त्यो पनि सम्झन सक्ने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आवर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव-रपअवरूप&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छैन, अरू मलाई बौलाहा भन्नेछन्‌, म अरूलाई बौलाहाभन्नेछु !तपाईं जस्तो समझदार मान्छेले यस्तो कुरा मुखमा ल्याउनैखुल्दैन, स्वार्थता छाडेर संसारका निराशहरूसित आफूलाईमनले जोड्नोस्‌, माया गरिनेमा माया गर्नेको हक हुन्छ, योकरा आफमा मनले घटाउनौस्‌ ! तपाईंलाई केही भयोभने यीजहानहरूको के दशा होला- मतले गुन्नोस्‌ ! अर्कालाईबचाउन आफू बाँच्नुपर्दख, तसर्थ उनको दु:खमा मनले भागलिनोस्‌ ! अनि सम्हालिनोस्‌ ।लौ, मलाई त छोडिदिनोस्‌, सकेसम्म म आफूलाई भत्कनदिनेछ्ैन । तर इन्दिरा मलाई एउटा - पासो नै भई । जतिविचार बढाउँछु, उति कसिन्छु; म यति कठोर छैन, यतिबलवान्‌ दछ्वैन, यति बुद्धिमान्‌ छैन कि यो मस्काइ सहन सकूँ ।मेरो अन्तस्करण मुकुन्दकोसित सट्टापट्ल गर्न पाए हुने थियो ।(एकछिनपछि)इन्दिरा कति वर्ष लागिन्‌ ?बाईस, कचाहिं सत्ताईस । यताबाट गएको एक जुग भइसक्यो ।(एकछिनपछि)तपाइँले उहिलेदेखि मेरी बुहारीलाई फेरि देख्नुभएको छैन ।शुङ्वारको जुनसुकै बस्तु होस्‌, उसको जीउ छुनेबित्तिकै जोगीदेखिन्छ- लुगाको रातो रङ्ग उसले लाउनेबित्तिकै गेरुहुन्छ । उसको निधारमा सिन्दूर विभूति देखिन्छ । उसकोघाँटीलाई बेर्नासाध मालाको मुगा स्द्राक्ष बन्दछन्‌, तरचाहिँ जोगिनीको झोलीभित्र लुकेको पचित्र श्ङ्गार जस्तैदेखिन्छ । माथि कोठामा होली, जानोस्‌न, एकचोटि भेटेर कुरागरिदिनौस्‌, म पनि आउँछु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सक्नुहुन्छ ?त्यसो त लट्ठी टेकेर अलि-अलि हिंड्छु नि ।जाउँ त हेर । (रूप लद्‌ठी टेकेर उठ्तछन्‌)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आजसम्म सांसारिक अन्ध इनारमाथि स्वर्गको कौसीबाट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसलाई झुण्डाइराखेको आसे डोरीमा एक दुई सूत थपेर अलिबलियो पारिदिनोस्‌, हिंड्नोस्‌ । (भवदेव निस्कन्छन्‌) इन्दिरा !तेरो तपस्या अझ पुगेन ? पचास वर्षको उमेरमा तेरो ससुरासय वर्षको भइसक्यो । वैद्य भन्दछ- जे जे नाकबाट रमुखबाट भित्र पस्दछन्‌, तिनमा हाम्रो आयु भर पर्दछ; तरअनुभव भन्दछ, हाम्रो बाँच्नु वा मर्नु तिनमा भर पर्दछ, जे जेकानबाट र आँखाबाट घुस्तछन्‌ । (निस्कन्छन्‌)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मखसली रूपनारायण- डर अन्तस्करण लागिन्‌ ? यिनीहरू?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(भरिनीहरू निस्कन्छन्‌) अडेस&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भावर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूप&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दृश्य २- उही(इन्दिराको सुत्नेकोठा)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुजै झूलको मुख फट्टाएर दुईतिर कसिराखेको एउटा लामौखाट । सिरानतिर सञ्झ्याल, छेउको आँखी खापा मास्तिरफर्काइराखेको त्यहीं, &amp;quot;एउटा पुस्तक र कात्ने बत्तीको ढक्की ।भित्तामा टुकी राखेको खोपावरिपरि दुई तसवीर :गङ्गावतरण र इन्दुमतीलाई अगिल्तिर राखेर अज विलापगरिरहेका । भित्तामा पोतेको सफैदा खैरो भइसकेको । एउटालामो काठको कीलामा ढाकाको खास्टो आुण्डिरहेको ।खुट्टामन्तिर एउटा मझौँला काठको सन्दूस । त्यसमाथि एउटाकरुवा र अलिकति खत्र्याकखुत्रुक । भूइँमा सतरञ्जाओछ्याएको, खाट अगिल्तिरदेखि छैउको झ्यालसम्म पुगेकोनेपाली गलैँचा । ढोकानेर सानो सुकुल । अ्यालढोका काला ।(रूपनारायण र भवदेवको प्रवेश)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खैत?(ढोकामा फर्केर) घन, इन्दिरालाई एकैछिन यहाँ पठाइदेङ ।(पुस्तक उठाएर)रामायण !(चिनु लाएको ठाउँनाट झिकेर)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उडेको यो कहाँको तसवीर नि?भो, भो, मुकुन्दको होला, त्यसै राखिदिनोस्‌ त्यही;घो चाहिं क सधैं हामीहरूसित लुकाउँछै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव-भ्व-इन्दिरा-रूप-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अग-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-भ्व-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(राखेर)केही आकारले मान्छे हो कि शंका छ, त्यत्ति हो,नत्र कागत हो खालि अधवा तसवबीर हो,पहाडको कसैले त चिन्नै पनि सकोइन ।परन्तु इन्दिरा आफ्नो मुकुन्द यसमा सफादेख्ती हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भक्तले जस्तै मूर्तिमा भक्तवत्सल ।आइन्‌ लौ इन्दिरा । [इन्दिराको प्रवेश)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कस्तो हलक्क बढिछन्‌ । चिन्यौमलाई ?कुन्नि, खै ?लौ!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ए हाम्रो बाजे, चिन्है म त-धेरै भयो त्यसैले । के मिसिएको थियो अगिमाना चामल यो आधा मुठी तिल कपालमा ?...तपाईं पित्तले पो त चाँडै फुल्नुभयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दियो उमेरमा धक्का अब चालीसले पनि ।(टहलिएजस्तो गरेर छप निस्कन्छन्‌)इन्दिरा, के तिमीलाई सञ्चै छ ?छ्‌।तिमी दिनकसरी काटदखछभौ !के र, हाहामै दिन बित्तछ ।सोझै छ सूर्यको बाटो आफूचाहिं यताउतिअनैक काममा घुम्दा ढीलो हुन्छ सधैंभरिकत्ति फूर्सद मिल्दैन ।रात !हो, रातमा भनेसधैँ फुर्सत नै जस्तो हुन्छ, हेर्छु कथाहरू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भ्रव-इन्दिरा-भव-इन्दिरा-भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कहिले कहिले, बत्ती कातेरै रात काट्तछु,निद्राले कहिले मूर्छा पर्छु यो भूइँमै पनि,कहिले सपना देख्छु, कैल्है देख्तिनँ त्यो पनि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमी के के कथा हेछ्र्चौ !चै रामायणको ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठाउँमा ?यो सबै ।धेरैजसो तैपनि ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुन्दर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काण्ड ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ए, ए, जहाँ ७०00: मैली, निन्याउरीसीता छन्‌, के त्यही , अशोक रूखका मनिबसी उनीसँगै रुन्छयौ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनि रामाश्वमेघमा,त्यहाँनेर जहाँ छोडे बीच जङ्गलमा गईहँदै लक्ष्मणले सीतालाई, सन्देश राममापठाइन्‌ उनकै हात हे राम ! करुणानिघान्‌ !&#039;भन्दै रोएर सीताले ।ए, त्यहाँ के मुकुन्दकोचिठी आउँछ ? (इन्दिरा टाउको हल्लाउँछे)के गछयौं, अझसम्म पढाइमाउनी डुबिरहेकै छन्‌, नडुबेर समुद्रमामोती मिल्दैन । संसारभरमा सर्वश्रेष्ठ जोजो छन्‌, जो जो गए ती ती सबका ज्ञातसागरउर्लन्छ पुस्तकैभित्र लिपिको लहरी बनी,त्यसैमा माथि गर्जन्छ हाँसो आकाशमा, अनिउठ्छ वैराग्यको मेघ, आँसु बर्सन्छ, नेत्रकोनाउ ढल्मल भै हिंड्छ, त्यहीं अभ्यासको हुरीज्ञान-विज्ञानको साथ जोडले चल्न थाल्दछ;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहाँ उनीहरू हाँस्छन्‌ जहाँ रुन्छन्‌ उनीहरूउही बहन्छ यो हाँसो उही बग्दछ आँसु यो;तर पुस्तकमा मोती पाइँदैन, पढाइमाजो डुब्यो जसले पायो पायो त्यो उसले, कुनैकसैको निम्ति खोजेर दिन सम्तैन । इन्दिरा,पौडी सतहमा मात्र नडुबेर समुद्रमामोती मिल्दैन । के गछयौं ज्ञानमा मात्र शान्ति छ,ज्ञान घौटी पिलाएर पिइँदैन, तसर्थले&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनी डुबिरहेकै छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा- के सधैँ डुब्नु बेस हो?मोती जस्तै सघैँ डुब्ने भए मोती लिने पनिमोती मात्र भयो खालि ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव- के गर्ने त, तिमी भन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा- पाए जान्थें उहीँ आफैँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
_ भव- के गछर्थौ र तिमी गई ?कसरी पाउँछौ पत्ता तिम्रो त्यो जलबिन्दुकोगङ्गासागरमा ? भिक्ला परदेशीहरूसितबिन्दुको कसरी माग्छयौ गल्ली गल्ली घुमी त्यहाँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वास्नीमान्छै भई ? हामी छँदैछौँ, इन्दिरा, तिमीमान्छयौभने त मै जान्छु, पत्ता लिन्छु, यहाँ अनिसँगै लिएर फर्कन्छु, साक्षी हुन्‌ परमेश्वर,म बाटो लाग्छु चाँडै नै नि:सन्दैह तिमी रह्‌ ।तिम्रो कुरा उनीलाई केही भन्ने भए भन।(इन्दिरा भूइँमा बसेर खाटमा घोप्टो परी रुन्छे)भैगो यो आँसु नै होला तिम्रो सन्देशको मसी ।(रूपनारायण र धनमतीको प्रवेश ।रूप सन्दूसमागि बस्तछन्‌ |)जाने भएँ तपाईंको छोराको खोजमा म त,त्यही यताउता होलान्‌ लिएरै आउँला यहाँमेरो भाग्य भएदेखिन्‌ गुन लाउन पाउने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घन-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूप-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अचवा खबरै भात्र लिएर घर फर्कुला ।विद्यार्थी जो पढैया छ यज्ञ गर्दा पढाइकोधूबाँले बाहघ संसार केही देख्दैन; संझना&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;बढी यती धनी हुन्छ उसको कि कुनै कुरा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संझँदैन नसंझेर आफैँले; त्यो समाधिमा,कवि झैं कल्पनाभित्र नसुतेर निदाउँछ,उसलाई न बेलाको याद हुन्छ कि आङमाघाम लागिरहेको छ अधवबा जून; एउटासंझाइरहने मान्छे वर चाहिन्छ- बीचमाजो भन्दछ- तिमी विद्यार्थी हौ, पुस्तक होइनौ,डुल, खाङ, पिक, आफू को हौ संझ, गई सुत ।यस्तै होस्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“दैवले आज हामीमाथि दया गरीतपाईंको सिधा डोरी बाटो लायो यतातिरयो पूर्वरङ्गले अवश्य पनि ल्याउला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज लच्छित छु । तर आगो निराशकोदन्केर नबढोस्‌ झन्‌ झन्‌ आसको सासमा परी !परमेश्वरले दु:ख छोरा हुरकिंसकेपछिदिने अबश्य हुन्‌ भन्ने थाहा मात्र भए पनिरसादिहरु खाएर किन दूध बढाउँचे !-रक्त सिद्धघाउँयेँ दूधै बनाई, अनि मर्दैएकै चोटि छुटाएर दूध माता दुवै ।हं किनशंका उद्योगमा आमा ? &#039;तँ चिता म पुग्याउँला&#039;महादेव यही भन्छन्‌ &#039;कि चितामा पु्याउँला&#039;केही खानुभए हुन्थ्यो, फलफूल अलीकतिउल्ले तयार पारेकी छरे ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुःख त्यसै किन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उठाउनुभयो !केको ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूप- केको दुःख र!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव- इन्दिरा,जेसुकै काम होस्‌ हामी &#039;ग्यौं&#039; भनी कराउँछौंगरेनौं वा गयौं जान्ने उही मात्र छ एउटाजस्तो जे जे पुरस्कार जब उल्ले पठाउँछअनि पो जान्दछौँ हामी गरेछौं बा गरेनछौं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(इन्दिराबाहेक अरू निस्कन्छन्‌)इन्दिरा- झ्यालमा बसी रामायणबाट मुकुन्दको तसवीर झिकेर)&#039;तपाईँलाई सञ्चै छ !?&#039; के यो सोधिपठाउने,&#039;यहाँ मलाई सञ्चै छ&#039; कि यो भनिपठाउने ?केही लेखी पठाउँ, या खालि यो मुखले कुरा,कि दुबै कि दुवै बाद, के संचार पठाउने ?एउटा नाम नै मेरो लाख सन्दैशतुल्य छ,छ यही नाममा शक्ति हिन्दूस्थान डुबाउने,नत्र छन्‌ व्यर्ष लाखोटै चिठी ?- बेला अमूल्य तीनासे बापत आगोमा पोलिनेछन्‌, छँदा पनिबौलाही भनि मान्नेछु, के संचार पठाउने ?मेरो माया तिमी गर्छौं भन्ने यो सुइँको पनिपाए मात्रभने आठै दिशाबाट तिमी जहाँछौँ उही आउँछन्‌- सारा चखेवा, काग, कोइली,चन्द्रमा, झरना, मेघ, फोहरा, लहरा, जुई,गुलाफ, हसिना, बेली, चमेली, मोतिया अनिजोडी जोडी त्यसै मेरा ती सन्दैश सुनाउँछन्‌तिमीलाई तिमी सुन्छौ, अनि त्यो जब बुझ्दछौतिमी, तार कुरा साँच्चै हुन्छन्‌ झुट्टा भए पनि;त्यसैले छैन संचार मेरो भनिपठाउनेतिम्रो संचार नै मै हुँ, मेरो संसार नै तिमी !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घनमती- ननैपथ्यमा) बुहारी, बुहारी !(इन्दिरा दौडेर निस्कन्छ)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दृश्य ३- काठमाडौं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देउरालीको मुखबाट हिमालय पर्वतका जण्डहरू देखिएका ।उकालो चढ्दै एउटा जाने तीन जना आउने भरियाको प्रबेश ।सब भारी बिताउँछन्‌ । दुई जना आउने बटुवा आएरओहर्लन्छन्‌ ॥ अर्को बटुवाको प्रवेश ।)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बढुवा- (भरियाहरूलाई) आउँदै गर है, तिमीहरू त अथक छौ, अब तओह्रालैनहो।  - (ओहर्लन्छ)जाने भरिया- अम्ले-! कासकु भारी यिनीहरू ?पहिला आउने भरिया- साह भान्छा कोहोको हो!जाने भरिया- साहार कि पाटान ?पहिला आउने भरिया- साहार जुद्ध साडाक ।दोस्रा आउने भरिया- हिन्‌ हिन्‌ कान्छा, नपर्खी ।(गाउँछ) बूढीले आँखा चिम्लेलाचीलले चल्ला लैजाला ! (भारी बोकेर दुई जना॥ ओह्वालो झर्छन्‌)तेस्रा आउनै भरिया- (भारी बोकेर गाउँछ) ८चीलले चल्ला कै लालाढुङ्गाले डोको थिचुँला,दइवा ! (एउटा ढुङ्गा देउराली माईलाईचढाएर ओह्लन्छ)(छाता ओढेर फिता बाँधी लदठी टेकेका भवदेवको र एक हातमा लदूठीअर्को हातमा लालटिन लिएर गलेबन्दीको फेटा बाँधेको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव-“भरिया-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनाचा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनाचाको प्रवेश । नादलका टाटाहरू आई बीच-ब्रीचमा घाम छेक्नाले बराबर देउरालीमाबदली भइरहन्छ, हिमालयचाहिँएकनास टल्किरहन्छ ।)लामा, अझ यहीं छस्‌, तँ गलिस्‌ ?होइन यत्तिमागले त कसरी फेदी पुग्ने ?लौ यो, त्यहाँ गईखाजा खा जा !(रिया पैसा लिएर भारी नोकरी निस्कन्छ)(आउने दुई जना भरिपाको प्रवेश)पुनाचा, हेर्‌ तिनको पसिना, तँ तआफ्नो देखाउँथिस्‌; हेर्‌न, त्यो नागदहबाट तीनागकन्याहरू निस्के जस्ता छन्‌ भर्खरै, अनपस्न लागे उही फेरि । (भ्रिनीहरू निस्कन्छन्‌)(भवदेव ढृङ्टामा अडेस लाएर बस्तछन्‌, पुनाचासानो ढुङ्गामा थ्याच्च नस्तछ)घाम लागिसक्यो यहाँज्यापू, नेपाल खाल्डा त अझ बादलमन्तिरटल्की डुबिरहेको छ भित्र त्यो नागलोक झैं,माथि हेर्‌ कुइराका ती तरङ्ग, अझ हेर्‌ उता-ढिका कमल हीराको त्यौ शीतल हिमालय !सौन्दर्यसार संसारभरका लहराउँदागौरीशङ्रको पाउ लेखी आफ्नो ललाटमाउघारी हरियो घुम्टो त्यो जङ्गन पहाडको&#039;अछ ताराहरूभन्दा म राम्री छ कि छैन त ?&#039;भन्दै ती स्वर्गका आँखा सूर्य-चन्द्र भएतिरआफ्नो श्ङ्गार पृध्वीले देखाएकी तँ हेर्‌ उहाँ ।पर्डामा चिट्कारीले जस्तै !कि चित्रमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१६&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनाचा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेख्नेको चित्रकारीले यस्टै !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो थाउँमा कटि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चोति आएँ, मलाई यो यस्टोसम्म रमाइलोलागेको कहिल्यै सट्टै ठियेन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तँ बिचार गर्‌,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाम्रो नेपाल यो सानो संसारै हो; कि लोककोकल्पवृक्ष यही नै हो, यहाँ पाइन्छ जे पनि;यहीं मदेसको धूप, यहीं ठण्डी हिमालकोमृतप्ञ्जीबनीदेखिन्‌ साघारण बुटीतकयहाँ लदाबदी छन्‌ या कति केवल छन्‌ यही,बिष फल्छ यहीं फेरि यहाँ गोमन सर्प छन्‌ ।यही छ उर्वरा भूमि नदीनाला अनेक छन्‌,लामो बगर चट्टान नाङ्गा डाँडाहरू पनि ।गैँडा, बाघ यही हुन्छन्‌ कस्तूरी चमरी पनि ।यहाँ सबै शताब्दीका मान्छे छन्‌ ,पटमूर्ख छन्‌यही, यहीं महात्मा छन्‌, सुदार्शनिक छन्‌ यही,यही साहित्य संगीत सिकर्म र डकर्म छन्‌,यही छन्‌ खुकुरी खड्ग, याण्टी एयरक्रधाफ्ट छन्‌यही गोरा पहेंला छन्‌ राता कालाहरू पनि,बग्छुन्‌ प्रकृति माताका रङ्गा र जमुना यही ।स्वतन्त्र हिन्दुको &#039; राज्य यही मात्र छ एउटा ।यही गोपाल छन्‌ फेरि यहीं गोरखनाथ छन्‌,सीता सती यहीं जन्मे, यहीं गौतम बुद्धकोभयो जन्म, यही राम कृष्णको नाम गुँज्दछ,;सशरीर पुगे स्वर्ग यतैबाट युधिष्ठिर,ज्ञानी जनक राजाको ज्चानघारा बह्यो यहीसयौं संग्रामका बीरहरू जन्मे यही, यहींपतिब्रताहरू जन्मे सती जानेहरू पनि ।नमूना भैरहेका छन्‌ अनेकौं सभ्यता यही,यहीं छूती अघ्ुती छन्‌ तन्त्र मन्त्रहछू पनि,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूजाहारी यहीं पोडे यहीं ब्राम्हण शुद्ध छन्‌,यहीं छन्‌ ज्योतिषी झाँक्री यही डाक्टर वैद्य छन्‌ ।लाखे र घाटु छन्‌ चल्ने र बोल्ने तसवीर छन्‌ ।साष्टाङ्ग दण्डवत्‌, पाउलागी, आशीष, स्यालुट,सलाम र नमस्कार, स्वस्ति यी सात दर्शनयही -छन्‌ । शिरमा क्याप शाहजादा र नाइट,यही टोपी छकल्ले छन्‌ सीलको चर्मको पनि,यहीं फेटा लबेदा छन्‌, यहीँ टोप र कोट छन्‌यही गादो छ खाँडीको, रुइदारी लुगा यहींयहीं छन्‌ चरना भोटो जङ्ग पोशाक छन्‌ यहीँयही केप यर्ही खास्टो मजेत्रो र घलेक छन्‌,यही घाँगर छन्‌ फेरि पही छन्‌ पारसी लुगासुरुवाल र धोती छन्‌, .यही छन्‌ फरिया गुन्यु,यही सुन र कल्ली छन्‌, यही तारा र यारिङ,यही छन्‌ नालुको जुत्ता, यहीं अग्लो खुरे पनिसारङ्गी छ यही बाजा बादशाही समेत छ,गलैँचा कौच कार्पेट राडी सुकुल छन्‌ यहीयही छन्‌ सुनका छाना गहीं खर परालका,यही प्राचीन सञ्झ्याल, युतानी स्तम्भ छन्‌ पहीं,यर्ही छन्‌ काठका गाडा गाडी छन्‌ रोल्सराइस,यही काँटा र चम्चा छन्‌, बोहता टपरी यहीं,यही कति भनूँ फेरि यहीं छस्‌ तँ यहीं छु म।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(आउने दुई बढुवाको प्रवेश)यहाँहरू कताबाट ?बद्वा- नयाँ मुलुकबाट,भव- के,”त्यहाँ समय बेसै छ ?बढुवा- यसपाला त बैस छ । (दुवै निस्कन्छन्‌)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव- हिंड्‌, धेरै बेर पो हामी व्यर्थमा गफमा भूुल्यौँ ।ज्यापू गर्‌ लौ नमस्कार आमालाई बिदाइको,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१८&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्म संझेर भन्‌ &#039;फेरि फर्कनेछु जहाँ बलेउही निभ्नेछु, ग्रणको सामा माटो नुझाउँला,आमा, ब्याज सकेसम्म, सकेसम्म बुझाउँला&#039;(पुनाचा नमस्कार गर्दछ)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुना, यो देश छोडेर जानेलाई त बैगुनीभन्नैपर्दछ, अर्काको क्रण खाई पचाउनेत्यही हो, कि यहाँ छोडोस्‌ माटोको देह अगिनमा,अनि त्यो चुल्बुले आत्मा स्वार्थी आत्मा गौ भईवासनाको पखेटाले उड्दै जाओस्‌ जतासुकैहुँदैन मोक्ष व्याधाको बाण लागी जहाँतक ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(निस्कन्छन्‌)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दरितीय अङ्क&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दृश्य १ कसका&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हरिसन रौड । रमेशदासको घरको भ-्याङमन्तिरको जोटा । ढोकाबाटबाहिर सडकमा मेटरको अत्ती यताउता चलिरहेको रमानिसहरूको पनि आबतजाबत भेद्रहेको देखिन्छ ।नेपश्यमा बजारिया खलबल, साइकलको घंटी,मौटरको भ्याँकम्वाँकको आवाज बराबरचलिरहन्छन्‌ । भ्रवदेब रपुनाचाको प्रबेश ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भब- भित्र धेरै आत्मा छन्‌ जस्तो छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनाचा- रेलभिट्र प्याकिस भएडेखि म ट मैरो पो भयाको छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव- हाम्रो उता बिहाको दिन सम्झी:- दमाईंका सनाई कलाँट,वस्तादका रागरागिनी मढघौलीको मङ्गलु, जन्ती ताँतीमिलाउनेको हप्की, विधिको एक एक मात्रामा औंला भाँच्नेब्राहमणहरूको स्वस्तिवाचन, दुलहीका माइतीहरूको साँकसुँक,सब एकै ठाउँमा भुटिएको शब्दको खिचडीभित्र आफूलेबोलेको आफ्नै कानले सुनिदैन, हो त्यस्तै यहाँ नित्य संझी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनाचा- अझ कोई आएन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव- अरे कोईहै?[भित्रबाट ढोका खोलेर एउटा नोकर बाहिर निस्की ढोकाफेरि बन्ब गर्दछ ।)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नोकर- हाँ बताइए । म्या आप नेपाल से पघारे है ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव- हाँ।नोकर- म पनि नेपाली हुँ।भव- त्यो भिरेको खुकुरीले त हामीले पहिल्यै कानेखुसी गरिसकेका&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
थियौं । घर कहाँ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नोकर- दार्जलिड्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव- बेसै भयो, आफ्नैसित भेट भयो । नम्बर एक तीनको कोठीभ्रनेको यही हो !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नोकर- हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव- मुकुन्दलाल भन्नेलाई तिमीले चिन्हेका छौ ? किन हाँस्यौ ?बोकर- तपाईंको?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भ्ब- म उनैको दाज्यू-भाइ, घरको एक दुई संचार लिएर आएको ।नोकर- पर्खनोस्‌ है त एक छिन यही, बेन्च छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(नोकर निस्कन्छ)आव- आइज, बसौं । (दुबै बस्तछन्‌)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अख्तरी ज्यान- निपथ्यमा गीत गाउँछे)तू मेरे कब पै आओ, मैं तुम को बैठने दुँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे रोकर जिलाओ तुम, मैँ तुम को फूल भी दुँ,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहाँ के केस लैलाका- (नेपश्र्यमा खलबल)पुनाचा- भिट्ट ट हरिभजन हुन लागे जस्टो छ।भ्रव- (टाउको हल्लाएर) अब खलबल हुन लाग्यो सुन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(भित्रको ढोका अलिकति खोलेर त्यडी सिस्टर अ्याक्सन,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यूसुफ, अन्दुल हुसेन उभिन्छन्‌ ।)मि. ञ्याक्सन- म्या टिमी मिस्टर मुकुण्डको डेख्नको वास्टे आयो ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भ्रब- त्यसै हो, हामी उनकै दाज्यू-भाइ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अख्नुल हुसे-क कोछ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भ्रब- हाम्रो इष्टमित्र ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब्नुल हुसेन- अच्छा ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भब- हामी घरको धेरै खनर बोकेर आएका छौं, पाकिसक्यौं ।(ती तीनै जना ढोका बन्द गरी भित्र पस्तछन्‌)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भला यतिकासम्म यहाँ बसेर मुकुन्दले नेपाली भाषा त&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनाचा-भ्वव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
झव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनाचा-भव&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नोकर-भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नोकर-भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनाचा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनोचा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रचार गरेछ, त्यसैले ऐले आफ्नो भाव प्रकट गर्न कत्तिकोसजिलो भयो । तर मलाई शंका लाग्छ, मुकुन्द किन अझजन्मेन ?यहाँ छैन कि ।छ छन त, तर कति धेरै छ, दैव जानोस्‌ !(युसूफ र रमेशदास फेरि ढोकामा आउँछन्‌)भोलि भेद्त सक्छ ?(कड्केर) तिमीहरूलाई आज, हामीलाई भोलि ? तिमीहरूभित्र, हामी बाहिर ? मुकुन्दलाई यहाँ पठाइदेक कि हामी भित्रआउँछौँ कि खबरको पार्सल नेपालमै फिर्ता लिएर जान्छौं ।(रमेश र पूसुफ भित्र पस्दछन्‌)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फेरि हामीलाई भिट्र लागेर छुरीले न्याते -्याते गर्ला नि?के नेर !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(नोकरको फेरि प्रवेश)एकै छिन पर्खनोस्‌ रे ।ए, यता हेर्‌ ।म चाँडै आउँछु । (भित्र पस्दछ)ज्यापू, यहाँको हावा ठीक छैन, आ ढोकैनेर बसौं । खुकुरी एकअङ्गुल जति बाहिर झिकिराख्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(नोकरको फेरि प्रवेश)होइन, ए ठिटा- (नोकर दौडेर बाहिर निस्कन्छ ।फेरि अन्दुल हृसेन, यूसृफ, अखतरी ज्यान, एउटा तबल्ची,दुई सारङ्गीबाज आएर बाहिर निस्कन्छन्‌ । नोकर बाहिरबाटफेरि दौडेर भित्र पस्तछ।)देखिस्‌ त्यो तबल्चरीले हामीतिर मुख बंग्याएर गयो ।म्रैले ट टघटा हेडैं हेरैन, नट्र म पनि नाक ठुनेर टघसकोटेनलटिर जिग्रो हल्लाइडिन्ठचो ।होइन, मुकुन्द के गर्न लागिरहेछ ।डारी खौरेर फा डल्न लागेको होला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(नोकर ढोका खोलेर फेरि भित्र जान्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मिस्टर ज्याक्सनको फेरि प्रवेश ]अनि रमेश र नोकर वुई जनाले अंग्रेनी सूट लाएको मुकुन्दका दुईहात आफ-आफ्नो काँधमा हालेर डोस्याउँदै ल्याएर बेञ्चमाराख्तछन्‌ । भवडेव, पुनाचा उठिसकेका हुन्छन्‌,मिस्टर ज्याक्सन बस्दछ ।)सि. श्याक्सन- (भ्रवदेवसँग) आज भाइले शराब बहुत खाएछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव यहाँहरूको मेहरबानी !मि. ज्याक्सन- आइसमा डुबाउन अच्छा छ।भव (अलि अगाडि बढेर) मुकुन्द !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मि. ज्याक्सन- ओह नो, नो, नो, नौ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द- (लोलाएको शब्बले) ओ माइ तभ ।१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मि. ज्याक्सन- हलो मुकुन्ड, मिस्टर नेपाउल, से वतस अगैनरे-दि फ्लावर अफ्‌ लभ इज फुल अफ फिगर्सदि ब्रेड अफ्‌ लभ इज्‌ मेड अफ्‌ टिअर्स ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्- लोलाएरै) हँ-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मि. ज्याक्सन- सरि, हि इज डेड आएज आएन इम्टि बोटल; गुड नाइट,रमेशबायु । (मुकुन्दलाई घच्घच्याएर) आएण्ड गुड नाइट टुयु पेण्टेड हिमालया ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रमेश- बाइ बाइ ।१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१. ओहो ! हुँदैन, हुँदैन, हुँदैन, हुँदैन ।२. ए मेरा प्रेमी !३. ए मुकुन्द, मिस्टर नेपाल, एकचोटि फेरि भन-प्रेमको फूल डरहरूले भरेको हुन्छ,प्रेमको घागो आँसुहरूले बनेको हुन्छ ।१४. अफसोस, त्यो रित्तो बोतल जस्तै मरेको ख, रातको सलाम रमेशबानु ।र तिमीलाई पनि रातको सलाम, रङ्गले लेखिएको हिमालय ।भू. सलाम ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रमेश-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१. सल्लाह ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुना, मुकुन्दले आफ्नो भाषा सित्तैमा दान दिएको रहेछ, भाषादिएर सस्तोमा भेष र विष किनेको रहेछ । (रमेशबाबुसित)नमस्कार, तपाईंहरू आजलाई अघाइसम्नुभएको भए यिनलाईडेरामा बौरिन जान दिनुस्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म त घेरैचोटि यिनलाई भनिसकेखु कि यसरी पिउने ठीक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्तो मित्रताको निम्ति तपाईंको घरलाई समेत साष्टाङदण्डवत्‌ छ । कति बङ्जालीहरूले मुकुन्दलाई विद्या पिलाएकाथिए, तपाईंले त्यो छदाउन लाग्नुभयो । .&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(नोकरसित) एक टघाक्सी बुलवा रे । (नोकर निस्कन्छ) सनयो मि. ज्याक्सन र यूसुफहरूको बदमाशी हो, मैले तो धेरैआएडभाइस१ दिएछु, उनीसित पुछ्न सम्छौ !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोध्नै पर्दैन, मुकुन्दले तपाईंको उपदेश मानेकैबाट हामीलेबुझ्यौ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुछ उनीसित ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द, स्मृतिको पत्र उल्टा सुल्टा पच्यो जता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कहिल्यै सपना देख्छस्‌ तँ के नेपालको पनि ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अधवा .सपनामा तँ यहाँ छस्‌ बिपनाभरि,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोएर पढ्न सम्तैनस्‌ यादले मातृभूमिको ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अषबा अरुको भाषा भिज्यो तेरो शरीरमा,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनि जन्मिस्‌ यहाँ आई आफ्नो कर्तव्यमा मरी,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बानु आमा अपूता र इन्दिरा विधवा भए ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ओहो, मित्रहरू ! हाम्रो चीसो फूल हिमालका&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चीसै रहे भला हुन्थ्यो, किन व्यर्षै तताउने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कष्ट गर्नुभयो ल्याई ? यिनलाई तताउनेतपाईंहरुभन्दा त चिताज्चनन नै बढ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाम्रो निति दयाबन्त घेरै आदरणीय छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
र्‌४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तोकर-रमैश-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(नौकरको फेरि प्रवेश)टपाम्सी ल्यायो !पुना, लौ आ, उठा ।डेरा पुगेपछिआज रेस्ट दिइराखनु, अच्छा ?अच्छा, अमूल्य योसल्लाहले यिनीलाई होला कल्याण, ईश्वरभलो गर्नन्‌ तपाईंको, अब हामी बिदा भयौँ,यो मन्दिर यहाँको हो, यसमा जगदीश तीनदुटाकन्‌ सधैँ रण्डी रक्सी रेशम राग यी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(निस्कन्छन)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दृश्य २- उही : चितपुर रोड&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्बको डेरा । उसको सुत्ने कौठा | बिहान । मुकुन्द खाटमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भबदेव-पुनाचा-भव-मुकुन्द-अव-मुखुन्द-प्रच-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकृल्ब-भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खुकुन्द-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुतिरहेको, भवदेव मेचमा सिरानतिर, पुताचा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खुद्वातिर भूइँमा बसिरहेका ।मुकुन्द कसरी फैलेको, मैले त झट्ट चिन्नै सकिनँ । जा त तँपुना, चामल-दालहरू किनैर ले, अनि म पकाउँला ।अरू?एक थोक साग-पात जे हुन्छ ले न । (पुनाचा निस्कन्छ,मुकुन्द जलमलाएको देखेर भवदेव उसको निधारमा चन्दन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पशुपतिको जलमा डुबाएर लाइदिन्छन्‌ ।)ह्बाट, केयो?पशुपतिनाथको नेत्र ।ओहो, तपाईं कित ?मुकुन्द, जसको काम चल्दैन दुई नेत्रले,तेस्रो नेत्र भविष्यत्‌को निम्तिमा टाँस्नुपर्दछ ।कताबाट तपाईं ।के सजिलै नाम छैन र ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमी भत कताबाट होला ! त्यो नेत्र खोलन ।कताबाट तिमी; तिम्रा पूज्य ती पुरखाहरूकताबाट ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जताबाट मत्स्य कुर्म बराह रसिंह आए उतैबाट आए यी नर बानर ।हामी आयौं जताबाट हाम्रा मित्रहरू पनि;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२६&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आए तारा त्यतैबाट हाम्रा शत्रुहरू पनि;एकबाट फुटी आयौं जोडिन्छौं सब एकमा,बाटो छैन कुलो छैन न छ आकाशमार्ग नैतथापि जान जान्दैनन्‌ कोही, कोही त्यतै पुगे ।ज्ञता हेसयो उतै खालि एउटै ठाउँ मात्र छ,हो यताबाट नै नाम त्यो कताबाट को पनि ।बाज्ये, अनि कताबाट ?भवदेव- कोठीबाट रमेशको,हिजै अखतरीज्यानहरूको ज्यानबाट योनङ्ग्रा र बङ्राबाट आधा ज्यान मुकुन्दकोबचेको साथमा आएँ ।मुकुन्द- हाँसेर उठी फोनोग्राफमा दम दिदै) हिजो के म समाधिमाथिएँ र ? (फोनोग्राफमा फक्ट्रट बज्दछ । नाचको चाल गर्दै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भ्वदेवतिर गएर)आउनोस्‌, सिक्नोस्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भबदेव- (उठेर रिसाई) धत्‌ के लागू अझै पनि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गएको छैन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(मुकुन्द फोनो बन्द गर्दछ)देख्तामा यत्तसाध्य थियो हिजो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कष्टसाध्य भयो आज; अहिले त असाध्य भो ।मुकुत्द- कल्लाई?भ्नव- यसरी बिगच्यो होला भन्न त रूपको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वप्नको स्वप्नको स्वप्नभित्रै पनि कहाँ थियोहोला ! के सपना देखे तिमीजस्तै भयानकउती बाँचिरहन्ये र!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुक्न्द- को निग्स्यो ? को भयानक ?जस्तो जीबनको निम्ति मृत्यु हुन्छ भयानक !त्यस्तै त्यो मृत्युको निम्ति जीवनी नै भयानक;-भन्छौं &#039;पातालको लोक उभिण्डो दुनियाँ&amp;quot; भनीहामी अमेरिकालाई, हामीलाई अमेरिका;-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भ्वदेव-सुकुन्द-भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अघ-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खरानी घस्छ जो त्यो त बिग्यो&#039; भन्दछ एउटा,अर्को भन्दछ &#039;त्यो बिग्यो जो पाउडर घस्तच्ध ।&#039;को बिस्यो ? मनमा चिन्ता जसको बरन थाल्दछ,को सप्यो? मनमा शान्ति जसको जम्न थाल्दछ !&#039;के शान्ति छ तिमीलाई ?जखूर ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर पातमाठूलो तुफानले ठोक्यो, तिमी, नेपालमा जबनफर्कने चल्यो हल्ला, त्यो जहाज जहानकोडुब्न लाग्यो दली आफैँ, समुद्र जति शान्त होस्‌हिल्दैन उसको छाती जहाज जब चिर्दछ ।तिमी यहीँ बसे रूपनारायण अबश्य नैडुब्दछन्‌ भुमरीभित्र परेर क्षयरोगको ।तिम्रो हृदयमा मिल्लान्‌ जन ती आँसुका नदीकै त तैपनि त्यो सिन्धु नचली बस्न सक्तछ ?पिता मन्यो भने पुत्र, मरे पुत्र पिता अनिको गर्न सक्छ के भन्नोस्‌ ? पितापुत्र दुवै मरे ?मर्नै स्वभाव हो हाम्रो रुनुबाहेक लोकमामर्निको निम्ति मर्नेले अरू के गर्न सक्तछ,गर्ने सक्छ रुने उत्ति नरुने जति सक्तछ,तसर्थ रुन्छ जो आफैँ रुन्छ त्यो, स्वर्गको रङकिन नीलो भयो रातो भएन भनि दौडँदैनौलाहा जसरी रुन्छ गल्लीमा ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भन के तिमी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उँदैनौ कहिल्यै ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रुन्छु, आँखा जब निझाउँछधुलोले; तर रोगी या निर्धो बालक छैन मटाउकोले र छातीले कहिल्यै सस्न, केवल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आँखाले रुन्छु ।के माया लाग्दैन !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रद&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भब-मुकुन्दे-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कसको ? कहाँ ?केको ? माया त जालो हो माक्राको, झिँगाहरूबुद्धिमान्‌ यति ७१ ती त जेलिन्तन्‌ । यो मुकुन्दकोदेश छैन, पिता ल्‌, माता छैन, न मित्र छन्‌,न बन्धु छन्‌, न स्वास्नी छ, न कतै घरबार छन्‌,मुठी बाँधी यहाँ आयो मुठी खोलेर जानु छ,न छन्‌ मुकुन्दका कोही, न कतैको मुकुन्द छ !.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रण्डी, रक्सी त होलान्‌ कि जगतै मासिए पनि !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाज्ये, म तिनमा छैन, ती ममा आइलाग्दछन्‌म ती उपाधिका धूवाँ आज नै फुक्न सक्तछु,मेरो स्वतन्त्रतालाई बाधातक पुप्याउनकोही सक्तैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सक्तैनौ पर्न के झ्यालखानमा,कि खोस्याउन सक्तैन कर्दले भूलले पनितिम्रो छाला, तिमीलाई इच्छामरण भैसक्यो !स्वतन्त्र त तिमी छैनौ, तिमी भन्छौँ स्वतन्त्र छु ।मैरो आत्मा स्वतन्त्रै छ- छाला काद्तछ कर्दले,दैडी मगजमा पुग्छ नसा रगत छकदैकुरा लाउन, यो दुख्ने कुरा हो भनिठान्दछगिदी अर्को नसालाई मुखमा त्यो पठाउँछ,&#039;अप्या&#039; भन्त, भए चोट अझ ठूलो अरू नसाआँखातिर हटाइन्छन्‌ झिक्न घाउ धुने जल,मेरो आत्मा म पन्छेर अलग्गै भित्र बस्तछुजीर्ण भ्रै अघवा ठूलो चोट पाई शरीर योमरे पनि म आत्मा हुँ मलाई नित्य मोक्ष छ ।तिम्रो आत्मा स्वतन्त्र छ यहाँ पनि उहाँ पनिभने आङ यहाँ, बिन्ती, हात जोड्छु, शरीर योतिम्रो अधीनमा छैन, यो हो नेपालको धतनाक बान्धवको, इृष्टमित्रको कान, बानुको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुसुल्-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वास, प्रश्वास आमाको, अझ-प्रत्सङ्ग देशको,सर्वस्व इन्दिराको हो उसै लान्छु म देह यो,भात्मा जतासुकै जा, चाहे आउ सँगै सँगै ।सुख दु:ख दुवै बाँड्ने प्रतिज्ञामा सरी अगिबिवाह एउटीलाई गरी ल्याएर प्रेमकोतातो जल्दो कराहीमा उसलाई भुटी सधैँयो आफू जिउँदै आग्ने हक के छ शरीरको ?इन्दिरा अझ चोखी छ छैन त्यो मूर्खले अझआफ्नो धित गुमाएकी ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शुद्ध हु त शायदहोलिन्‌, परन्तु घोखी छन्‌ वर्षा जस्तै; झलामलकरोडौं बिजुली बत्ती बनेर नदुवीहरूघुमेको ठाउँमा भन्दा उज्यालो छ त्यहाँ बढीजहाँ छन्‌ इन्दिरा जस्ती उदाएकी पतिव्रता ।आँश्ा छन्‌ उनका चोखा आँसुको स्तातले सघैँचाख मानी उनी रोई रामायण सधैँभरिहेरिरहन्छिन्‌, हेरेर फेरि रुन्छन्‌ सधैभरि ।तिमी अब नफर्कै त केही पछि सरासरपग्लन्छिन्‌ इन्दिरा आँसु बनी आफैँ बिलाउँछिन्‌हावामा । ए, त्यहाँ मैते सोधेँ &#039;भन त इन्दिरा,कहाँनेर निको लाग्यौ ?&#039; भनिन्‌ &#039;रामाशवमेधमात्यहाँतिर जहाँ छौडे बीच जङ्गलमा गईहँदै लक्ष्मणले सीतालाई सन्देश राममापठाइन्‌ उनकै हात- हे राम ! कएणानिधान्‌ !भन्दै रौएर सीताले ।&#039; तसवीर उनीसिततिम्रो रहेख, बिग्रेको उडेको त्यसकै चिनुलाएकी रहिछन्‌ रामायणमा, आँसुको त्यहाँधोपाको दाग देखेधेँ तिम्रो त्यो तसबरीरलेमेरो कञ्चट पक्रेर तिचोरी गहमा भरीरस॑ ल्यायो उनीलाई त्यसले झन्‌ रुबाउला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2101&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
झव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भनेर डीलको आँसु झिमूझिम्‌ गर्दै यताउताहेर्दै छल्दै पचाएँ । के तिम्रो दर्शनशास्त्रमादया छैन ! जता हेर सबै आफ्नो स्वदेशकोनिम्ति मर्छन्‌, तिमी मात्र जनको लाउँछौँ लुगाबाहिरी चाहिँदो भित्री गुण छोड्छौ उनैसित,ती बेलायतको नाम “घर&#039; राख्छन्‌ सुगा बनीके बेलायतको नाम हामी पनि घरै भनौँतिमी पढेगुनेका छौ मैले के भन्नुपर्दछतर मानिस कोही त रूख अग्लो चढी बढीदेखिन्छन्‌ सुन्तलाजस्तै रङै उत्ताउलो लिई;नजानी सुन झैं कोही आफ्नो कदर लुक्तछन्‌,माटो र बालुवाभित्र गँडघौलासित बस्तछन्‌,त्यतैले कहिले आफ्नी मोल सम्झाउने कुनैमित्र चाहिन्छ- ती जाम्बवन्त झैँ हनुमन्तको ।तिमी सुयोग्य विद्वान्‌ छौ, घेरै दर्शन हेर्दछौ,लडाउँछौँ सबै मर्छन्‌, एउटा शून्य नाँच्तछ,त्यै शून्यमा तिमी चल्छौँ हामी मूर्खहरू भनेनेपाली भनिठान्दैनौं, &#039;वसुधैव कुदुम्बकम्‌&#039;भन्नेलाई । त्यही मात्र नेपाली हो स्वदेशमाजो स्वधर्म गरी बस्छ स्वजातिसँग, या कतैजान्छ जो त निकै सेवा गर्न ।हा, मूर्ख इन्दिरा !इन्दिसा अझ के हाम्रै घरमा बस्तछे !तिनी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो हाम्रो घरमा, तिम्रै घरमा नस्तछिन्‌ सधैँ !ओहो । मुकुन्द, यो “हाम्रो घर&#039; जो गहिले भन्यौत्यसकै पुण्यले तिम्रा पाप सारा पखालिए ।म यता आउने बेला गई पशुपति प्रभु-कहाँ सोधेँ, &#039;वहाँ के म मुकुन्दसित फर्कनसकुँला ।&#039; मुस्कुराए ती ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुकुत्व-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुल्वलप्व-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्दभव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुस&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भवन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मकर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कस्ता बाठा महेश्वर,थाहा छ उनलाई म फर्कन्त कहिल्यै भनीत्यसैले मुस्कुराए ती । (उठेर)जाउँ है म त बाहिर(उठेर) कता !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डुल्व।तिमीलाई अब छोड्छु म एकलैभनिठान्छौ !म के झ्यालखानियाँ हुँ ?तिमीरमदुई नै होइनौं । तिम्रो लागि बायु जहाँ बहीप्राण दिन्छ, मलाई के त्यो दिँदैन उही बही ?[दुवै बस्तछन्‌)म त नेपालमा जान्नै । तपाईं पनि के यहींबस्नुहन्छ ?यही बस्छु रक्सीको रङमा यही(पशुपतिको जल देखाएर)जञल हाली फिका पार्छु रण्डीले जन गाउँछसुर त्यो बेसुरा गर्दै वेदध्वनि फुकी फझुकीहाबा पवित्र पारेर जल्सा भङ्ग गराउँछु ।त्यतले फाइदा ?जानून्‌ कि मुकुन्द कि इन्दिरा !ओढेर आँसुको घुम्टो लुकाई मनमा हँसीसबै सोझाहरूलाई यसरी ती छकाउँछन्‌ ।स्वास्तीमानिसको जाल लोग्नेमानिसको गलदुवै सँगै रहे हुन्थे सबै मानिस राक्षस ।स्वामी मारी सती जान्छन्‌ यस्ता स्वीको चरित्र तब्रहमासमेत जान्दैनन्‌ के जान्लान्‌ भबदेव यीअफसोस ।जगत्मा जो जसरी दिन काट्तछ,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसको निम्ति यो | कु उसरी घुम्न थाल्दछ,कसैको निम्ति माटो भै कसैको निम्तिमा सुन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्- के घर्मात्माहरूलाई पाप नै धर्म जँच्छ र ?यदि घरमै त घरमै हो यदि हो पाप पाप नैभने स्त्रीहरुको जाल जालै हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव- यो वसुन्धरातिम्रो सिद्धान्तको लेखा ज्यादा नै स्थूल पो छ त;पापिनी छन्‌ यहाँ यस्ता जसको स्पर्शमात्रलेभूकम्प हुन्छ पृथ्वीको छातीमा पर्दछन्‌ चिरा,तुहुन्छ लोकको गर्भ, उठ्छन्‌ ज्वालामुखीहरू,समुद्व ती छचल्किन्छन्‌, फुट्छन्‌ पट्ट हिमालयडुन्छन्‌ टापूहरू, डदढ्छन्‌ माटो घातुहरू जली,कालो प्रलय नै हुन्छ ।यस्ता सतीहरू फेरि यहीं छन्‌ नाममात्रलेउसको मृत्युमा प्राण हरियो भै पह्लाउँछ,सब घाउ निको हुन्छन्‌ पृथ्वीका हर ठाउँमाशान्ति बर्सन्छ, यो भूमि देवताका विहारकोयोग्य हुन्छ । यही खालभित्र छन्‌ इन्दिरा पनि,यस्तो त एउटै फूल फुल्छ बाह्र वसन्तमा ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(मुकुन्व हाँस्तछ)के हाँस्छौ ? सत्य मर्दैन केहीसम्म सुते पनि,जाक हेर नपत्याए ।मुकुन्द- पत्याएँ खूप ! (हाँस्तछ)भव- लौ तिमीबाजी ठोम्छौ !मुकुन्द- तपाईँ यो इन्दिराष्टक रच्नुहोस्‌,म सुन्दै जान्छु ।भव- लौ मेरो यो प्रस्ताव तिमी सुन-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब हामीहरू फर्कौ उहाँ गुप्त हिसाबले,अनि मेरो घरैभित्र लुकेर दिनमा बसौं,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३रे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रातमा चाल मारेर भुल्का जस्तै भई घुमौं ।त्यहाँ पछि तिमी-घारामा इन्दिरालाई भेट, जाँच, कुरा भन ।02014002 धियो साह्रै त्यो उनीको मुकुन्द ततिम्रो घाँटीमा . पनि साँच्चि नैइन्दिराले तिमीलाई चिन्न नै सक्तिनन्‌ अनिफर्काक यदि कोही छु, सतीमन डगाउनसक्ने भने तिमी नै छौ रूप-यौवनले भरी,आफ्नीको जाँच आफूमा आफैँ, भक्ति उहाँपछि,फेला पन्योभने केही चूक फर्क यही तिमीनत्र बाजी जितेँ मैले उहीँ आनन्दले बस !(उठेर मुकुन्दलाई समाती)मुकुन्द, विन्ति लौ &#039;हुन्छ&#039; भन, “बिन्ति छ, ईश्वरमाथि हेरिरहेका छन्‌, मुख बाएर वाल्ल भैउता नेपाल खाल्डो त्यो पर्खेको छ, बिचेत भैमरेको नेत्रले- &#039;मागे: जस्तै जीवन इन्दिराबाटो ढुकीरहेकी छन्‌ तिम्रो चरणको, तिमीढुङ्गा नबन, लौ हुन्छ भन-फेरि उहाँ लंगी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धाहा दिएर बालाई थुनाउनुभयोभनेमलाई ?यो जनै छोई किरिया हाल्छु, ब्राह्मणहुँ, खोल्ने छैन यी भेद छेडखान नभै सबै(उठेर) लौ म जानै भएँ ।तिम्रो भलो होस्‌ !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म उहाँ गईस्त्री कस्ता फितला हुन्छन्‌ सिन्काभन्दा, सफा खिंचीतसबीर तपाईंको अगि राखेरसधैँको लागि नेपाललाई छोडेर आउँछु ।मुकुन्द, जीत होस्‌ तिम्रो म त्यसैमा : प्रसन्त छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ड्&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दृश्य ३- उहीँ : हवडा स्टेशन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एउटा पर्खने कोठा । नेपथ्यमा रेल इत्यादिको आवाज हल्ला ।बीचमा टेबिल, बरिपरि मेज । पुनाचा रटाउकोमा माल बोकेका तीन जनाकुल्लीको प्रवेश ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुना- यहाँ राख्‌ (कूल्लीहरू धारी राख्तछन्‌)लौ ले- (सबलाई हात हात्तमा ज्याला दिन्छ)अने जाओ है | पख, पख(एक जनाको र आफ्नो पनि टाउको छामेर)यहाँ के हँ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- हड्डी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खौँी अँ, हद्दी भएर पो यस्टो बलियो, हाम्रो ताउकोमा ट कुर्कुरे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हार छ, बल गएर हाट-खुत्तामा माट्टै बस्याको छ ।(कल्लीहरू ६2७ कौ गरेर निस्कन्छन्‌)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(गुण्टाको डोरी पयठ मस्काउँदै गीत&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उदन्टा चरी घुमेर आयो गुँदैमा,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरण्टा.जोगी घुमेर गयो गुणैमा ।! (रोहोस्याउँछ।अझ खुक्लै छ ए! मोरोट! (फेरि गीत गाउँछ)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सानोमा सानो नारीमा घरी कमानी नगन,असार मास्‌मा फर्केर आउँला बेमानी नभन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(दोहोन्याउँछ)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जु7&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
11511111111111111171,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुसेनको प्रबेश)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
० मुकुन्द अब भी नहीं आँयो ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(मैचमा बसेर) तिम्रो घर कहाँखछरे?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपाल ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपालमा कौनसा जगामा ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शहर।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौनसा शहर ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुनि के भन्छयो बिर्स्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्या?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुनि कुन शहर !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्या नाम ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुना ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूना शहर ? ओ बाबा !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनाचा ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चा?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हँ । मुकुन्द और उसका यार यहाँ रहन्छन्‌ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पातन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द बहुत धनी छ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ढनी छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और उसका साथी ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उ पनि ढनी नै छ भन्नुपत्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तुमरा महाराज आजकल कहाँ रहन्छन्‌ !उही नेपालमा । यी: ! (लकेटको तस्बीर देखाउँछ)हाँ, मैले एक दफे देहलीमा देखेछु। हेरेर फिर्ता दिन्छ)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महाराज कस्तो छ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जाती छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तुमरो उहाँ आर्मी कति छ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ढेरैछ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उहाँ तिमी के खान्छ रे?भाट।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(मुकुन्द, भबदेव, रमेशदासको प्रवेश)गुड आफ्टरनून मुकुन्द !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गुड आफ्टरनून। मुकुन्द तीनै |००००, हात मिलाउँछ)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुना, ला टिकट । (दिन्छन्‌)(मुकुन्द, रमेशदास, अब्दुल हुसेन टेबिलको वरिपरिबसेर कुरा गर्न लाग्दछन्‌ । सुस्तरी पुनाचासित)यो यहाँ आएर बसेको कति बेर भयो?(सुस्तरी भबदेवसित) एक छिन भयो !(सुस्तरी पुनाचासि)हामीहरू उता बाटो नलागेसम्ममा यिनीलामखुट्टेहरूबाट डरै हुन्छ अनेक छन्‌रोगका धरती तीखा जिब्रामा, रोग होस्‌ नहोस्‌अवश्य चुस्तछन्‌ रक्त चुस्त पाए भने पनि ।लुगा ट अझ उस्टै छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अहिले लाज हुन्छ रे,रेलभित्र फुकाल्ने रे, तै भन्न कतिसम्मको ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(अब्दुल हुसेन निस्कन्छ)(भवदेव गएर मेचमा बस्तछन्‌)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यसो उसो गरी हाम्रो मित्रलाई त देशमालान लाग्नुभयो हो कि?हो आफ्नो: देशलाई केशून्य पार्ने ?कहाँ शून्य एक व्यत्ति गएर के?एक नै सब हो बाबु, सब नै एक हो, जबघर देखाउँछौं हामी हाम्रो औंला त केवलईँटको एउटा सानो हिस्सालाई &#039;यही&#039; भनीदेखाउँछ । कुनै एक नेपालीले कतै गईघर्म घोडघो भने हाम्रा शिवको मूर्तिमा पनि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एउटा चोइटा जान्छ । कसरी सोमनाथकोमूर्तिसँगै फुटे हिन्दू जाति, जाति फुटे जबफुटघो प्रत्येकको भाग्य ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्- (रमेशदासतिर हेरेर) नाइन हण्ड्रेड नाइण्टिनाइन्‌ बि. सी. ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव- कोरिएका कतै देख्यौं भने त्यो शिवलिङ्गमा ।अलिकति, कि त्यो खाली सम्झ्यौं मात्र भने पनिमनले, रक्त टप्कन्छ हाम्रो हृदयबाट त ।(अब्बुल हुसेनको फेरि प्रबेश)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्दुल- (बिस्कुटको बाकस टेबिलमा राखेर)तपाईंहरूको वास्ती रेलको निम्ति बिस्कुट ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव- यस्तो बिष कुटेको त कालक्टसमान होखाँदैनौं, लानुहोस्‌ फिर्ता ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्दुल- पर प्यारै मुकुन्द तोखान्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भ्व- अवश्य खाँदैनन्‌, मलाई छुनुपर्दछ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रेलभित्र त्यसैले यो मेरो निति उनी पनिखाँदैनन्‌ । पछिको लागि राख्नुहोस्‌ जब फर्कलान्‌फर्केभने सबै खालान्‌, सबै खालान्‌ सबै सबै ।मुकुन्द, अइको निति बाँच, संसारमा अनिमर्दैनौ कहिल्यै, आफ्नो निंति बाँच्यौभने तिमीम्छौं आफूसितै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द- मैले खाएमा मै अघाउँछु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव- स्वार्थ नै धर्म हो हाम्रो मोक्षसम्म गराउनेस्वार्घकै निति होस्‌ सेवा स्वजाति र स्वदेशको !स्वार्थ त्यो स्वार्थ हो शुद्ध जसमा छ परार्ता,हाम्रो स्वार्थ छँदैछैन जब हाम्रो अधीनमा !अब वेला भयो जाऔं । (पुनाचा निस्कन्छ)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रमेश- मुकुन्द, कहिले अबफर्कन्छ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ड्द&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
0६७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भवमुकुन्द-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रमेश-भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनब्बुल-रमेश-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ग्रीष्म यो जाँदा नजाँदै ।तर भाग्यलेफेरि मारे ?म यो बाजी हान सक्तिनँ, यो पदि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;म्रैलेै हारेँभने आगोबाट तातो हराउँछ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लप्का बाँकी रही, मेरो यस्तो अनुभवी जगत्‌खाई-पल्टनबाजी के फुस्सामा मिल्त सक्तछ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
होला जे हुनुपर्दछ ।तपाईंको चिठी खै त ?(भ्वदेवसित चिठी लिई एकछिन हेरिसकेर बाच्तछ)१. औैले सकिन ल्याउन,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म निराश भएँ...&#039; ठीक,[रमेशदासलाई दिएर) हप्ता दिन बितेपछियो चलाइदिनोस्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[|जे गर्लान्‌ जगदीश्वर(पुनाको कुल्लीहरूसाथ फेरि प्रबेश)मुकुन्द, आज यो हाम्रो दिलमा, दार छैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो,नृत्य-गायतका सङ्गीहरूलाई नबिर्सनू ।(पुना र माल बोकेर कुल्लीहरू निस्कन्छन्‌,भवद्रेव पनि निस्कन्छन्‌)आफूलाई बरू आफैँ बिसुँला तर रङ्गितयस्तो यो दुनियाँलाई म कैले भुल्न सक्तथें ?यो रातो रङ्गको फूल, पहेंलो रङ्गको सुन !यो विनारङ्गको हीरा, यो सेतो रङ्गको जुन।(हात समातेर निस्कन्छन्‌)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजामती-इन्दिरा-राजामती-इन्दिरा-राजामती-इन्दिरा-राजामती-इन्दिरा-राजामती-इन्दिरा-राजामती-हात हेर्ने-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तृतीय अङ्कदृश्य १- पाटन, दिन भिड्किसकेपछि ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूपनारायणको घर | इन्दिराको कोठा ।इन्दिरा झ्यालमा बसेर रामायण बाचिरहेकी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(लय हालेर)“पृथ्वीमा न मिलिन्‌ सिता न जलमा जान्या छ बाटो कतै ।खोजौं जाउँ भन्या सक्यौं पुथिवि सब्‌ पायौं न सीता कतै ॥फर्की जाउँ भन्या पनी अब सहज्‌ मार्छन्‌ ति चाहीं यहीँ ।मर्नु आज निको&#039;-, (राजामतीको प्रवेश)नानी, जात्रामा नजाने ?कैले !भरे।नाइँ, कोसित जानू ?तिम्रो ससुरासित ।त, ससुरा केही काम नपाएर गड्रहनुहुन्छ ?अँ, तिम्रो ससुरा नजाने ?हेरुँला नि ।तिम्री सासू जान्छिन्‌ ।सासू पनि कुन्नि !जाने रे है, छि: ![नेपथ्यमा) माथि कोछ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-राजामती-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजामती-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजामंती-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजामती-इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उ: को आयो ?लौन, हामीसित गए पनि त हुन्छ नि, आफ्नै ज्येठाबाज्येबज्यै देखे ।अँ, जानोस्‌ तपाईंहरू ।आँखाको रमिता; हेछौँ हामी त ।रमिता ! अहँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म. त मर्दछु बाजाले चर्को त्यो नूनको ढिकाजस्तो,झन्‌ कानको कीरा खान्छ झ्याली, असाध्यनैहुल त्यो, देख्नुपर्दैन संझँदै वाक्क आउँछ,पुष्बीको एउटा चक्ला भासिई, त्यो इनारमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;कोलाहल मचाएर पीघमा सब फक्फनी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यधैं घुमीरहे तुल्य लाग्छ सत्ते मलाइ तआफ्नौ जात्रा भएको को हेरिदेओस्‌, त्यहाँ अनिके हेर्नु कसको जात्रा ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमी जस्तै भए अरूसखा, रूखहरू सारा काट्तधे पात पातमाकिन वंशी बज्यो भन्दै । तिमी जस्तै भए अरूसाह्वै बेरसिलौो खोला बतैसित सुकाउँथेलहरीहरुले नाच्ता किन चाँप बज्यो भनी।नाचगानहरू ज्यामा । मलाई मन पर्दछ,तर बादलको जस्तो हेर्नुहोस्‌, हेर्नुहोस्‌, त्यहाँबिनाआवाजले गाई भाउ लाएर नाच्तछकसरी !- कानले सुन्छ, जालीमा कत्ति शब्दकोधक्का पर्दैन, पग्लेको चन्द्र झैं छ तसर्थलेबिझाउँदैन यो आँखा सूर्यले झैं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कहिल्यै शब्द गर्दैन ?जन गर्दछ, कान यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नहिरो हुन्छ, आँखा यो अन्धो हुन्छ प्रकाशलेफेरि बन्दछ जस्ताको तस्तै त्यो पनि यो पनि,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमी भन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दोहोरिँदैन त्यो दृश्य नपन्ताटकको भनिथाकिदैन, अघाइन्न सधैं पिइरहे पनि ।राजामती- उसो भए तिमी धूवाँ आफैँ परिरह्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा- १जहाँ हेर्दछु; धूबैँ त देख्छु, आगो कहाँ छ र !धूवाँ बादल, धूवाँ हो हावा, धूवाँ छ सासमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
। आफ्नै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजामती- के सब यी धूवाँहरूका नाचगान छन्‌ !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा- छ्न्‌ ।तर ती वरका खेल हेर्दा हेर्दै गडेर योआँखा डेडो भई भित्र भित्र पुग्छ कता कता,टाढाकै खेलमा मात्र दृष्टि जम्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजामती- नुझेँ, नुझ-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पर पुग्दछ यो उत्ति जति टाढा मुकुन्द छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा- पर पुग्दछ यो उत्ति जति टाढा निराश छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजामती- निराशापारि आशाछ,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा- आशापरि निराश छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हात हेर्ने. (नैपथ्यमा) माथि कोछ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूपनारायण- (नेपथ्यमा) आउ, माथि आउ, आङ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजामती- नानी, केही गरी फर्के भने त उ, हरे शिव !कस्तो हुन्थ्यो, म ता नाच्थें सत्ते । तिम्रा त के कुरा,पूर्णेको जून पानीमा पोखिएझैं हुने थियो,तिम्रै टक परी हाम्रो, अँध्यारो मुखमा पनि,उज्यालो खेल्दथ्यो । लौन परमेश्वर । बिन्ति त्योदिन दानै दिए हुन्थ्यो, हामी . जय मनाउँथ्यौँ,जय हुन्थ्यो सधैं तिम्रो, सारा प्राण विकास भैफुलेर प्रभुको पूजा गर्थे, कस्तो रमाइलोहुन्थ्यो संसार 1. ताराको हीराको फूल बन्दथ्यो,पृथिवी हरियो भूईं फूलबुट्टै बडा.“गजीफरिया बन्दध्यो, लामो पछ्यौरा बन्दध्यो नदी,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
र्‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजामती-इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पहेँलो घामको पोते, चोलो बादलको, अनिभुमरीको - चुरा, बल्ध्यो महादीप झलामलरातमा “किन ? नानी त, सित्तैं रोइदियो, भयोडर लाग्छ, त्यसैले त म कुरा पछि गर्दिनँ ।नरोक बा, नरोङ, लौ त्यस्तै दुःख भए हिँडआफ्नै माइत ।के दुःख, सुख छ; तर दुःख नैभए पनि त्यसै आफ्नो घर छोड्ने ? उता पनिघर छोडिन्‌ यसो भन्दै भाउज्यूले भने कुनगई आमा र बालाई सुसार पनि गर्दछ ?-छोरीलाई त आमाले सक्तैनन्‌ काम लाउनमायाले नै त्यसैले त निकाल्छन्‌ अरुको घरआफ्नोमा चाहिँ अर्काकै छोरी ल्याएर जोत्तछन्‌ ।हो बा, त्यो त।बज्यै, हाम्रो जगत्मा जति दु:ख छन्‌स्वास्नीमानिसका पेवा, दाइजो हुन्‌ सबै, जतिलोग्नेमानिसका दुःख आईपर्दछ त्यो पनिचोरी मासी चलाएका हाम्रै पेबा र दाइजोहुन्‌ ती। विवाहमा लोग्नेमान्छे हाँसेर हिँड्दछन्‌ ।हामी आँसु झिकी भछौँ हिंड्ने साइतको घडापार्वतीको गर्भबाट ब्याएदेखि त्यही दिनस्वास्नीमान्छेहरूलाई चिनेको हुन्छ दु:खले,छायाँ जस्तै पिछ्ला गर्छ त्यो दुःख बरु सांझमाछायाँ फिका हुँदै जान्छ अँध्यारोमा : बिलाउँछ,दुःख झन्‌ साँझमा पोल्छ अँध्योरामा जलाउँछ,अँध्यारोमा जलाएर अँध्यारैमा डढाउँछ,उज्यालोमा निराशा र भस्म बाँकी गराउँछ,परन्तु पार्वती हामीलाई शिक्षा दिई गइन्‌ ।स्वामी कता कता ठूला ठूलो गिरि हिमालय-भन्दा पनि; उनैलाई जोखेदेखि विचारको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजामती-इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजामती-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजामती-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घनमती-राजामती-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तराजुमा सबै दु:ख जम्मा पारेर तौलँदापनि ती हलुकै हुन्छन्‌ पतिभन्दा कता कता ।“पाले पुण्य तिमीलाई मारे पाप&#039; भनी सुधीगाई दान गरै जस्तै गरी रोई अलीकतिजसलाई बुझाएर पन्छे जन्म दिनेहरूउही बाबु उही आमा उही ईश्वर ईश्वरी,उततैको नाममा दु:ख जति पर्दछ पर्दछ,गराउँछ तपस्या त्यै त्यतैमा मुक्ति मिल्दछ ।(एक छिन सन्नाटा)को त्यो भन्याङमा उक्ल्यो, सासू ।हो ? कसरी चिन्हचौ !?मैले चुरा बजेकैले चिन्हैँ ।(घनमतीको प्रवेश)हो त रहेछ त,बोक्सी !आमा, तपाईं के खानुहुन्न अली अलि ?धेरै तै खाउँला नानी, खानलाई त फेरि कहोला पर्खिरहेको र &#039;एकै छिन पुगेर मआउँला&#039; भन्दथी, ढीलो गरी भनी रिसाउला,भयो म एकलै खान्न, खुवाउनुभयो यहाँ,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले खाएँ, पुग्यो ।भोलि बूढालाई लिईकनआउनोस्‌ त ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बरू हुन्छ,(इन्दिरालाई देखाएर धनमतीसित) नानीको मात्रछिः यहाँ,आउने कहिले होला ?खै बाज्पे भवदेव नै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लिन जानुभएको छ, फर्कला कि नफर्कलादैव जानोस्‌, कि त्यै जानोस्‌, हो हामी जिउँदै भए&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो 2)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फर्कला, सब मुर्दा नै भए के काम फर्कन !क मात्रै सुखले बाँचे . भइहाल्यो नि देश नैडुबोस्न उसलाई के खाँचो !&#039;राजामती- को?(लद्‌्ठी टेकेर रूपनारायण र हात हेर्नेको प्रबेश)रूपनारायण- इन्दिरा यताआङ लौ हात देखा । (इन्दिरा उत्तै गर्छ)राजामती- (सुस्तरी रूपनारायणसित) के यो जान्दो रहेछ ?कूप- हो,मिलायो सब मेरो त।घन- छिः के भन्छ, म बस्तिनँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(तिस्किन्छिन्‌)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खू्प- निकै बेर भयो केही देखिएन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हात हेर्ने- यता यसो,उता, फर्क्यौं, घुम्यो फेरि, आयो फेरि यता उसोतर्क्यो, हँ हँ, उँभो लाग्यो, अँ हो, हो, मोडियो, गयो,गयो, लाम कस्यो, आयो, फन्क्यो, फेरि उँघो गयो,गएर छरियो, हाँगाँ फैलियो, अँ जुटघो, अब-कृपा हो गुरुको त्यस्तो जान्ने मान्छे कहाँ हुँ र,भन्छु तैपनि जो सक्छु यधाशक्ति ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छ्प त्यसै तहो,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हात हेर्ने, (बिस्तारै) यिनी मुक्ुन्दकी स्त्री हुन्‌ मुकुन्द यिनका पति ।यताको छ उता माया, त्यताको छ यता, उनीयता आउन चाहन्छन्‌, उता जान यिनी पनिचाहन्छिन्‌, भेट्न इच्छा छ उनीलाई यिनीसित,यिनी-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्प- भयो, पुग्यो यो त, तर भेट दुवैसितदुवैको कहिले होला ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हात हेर्ने- (माथितिर देखाएर) जैलै आकाशको गतिसाह्ै गजबको हुन्छ, सूर्य अस्त भएपछि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
0000&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुन्तला रङ्गको तित्रापङ्खी बादल उड्दछपूर्वपट्टि, दुपी ठाडो पारी पश्चिममा पनिबाउन्ने झैं निकै ठूलो रातो बादल दौड्दछ,फेरि दक्खिनमा खण्डवृष्टि हुन्छ र उत्तर-तिर नाग लिई माथि प्याजी गरुड भाग्दछ ।घरबाहिर संग्राम असिनाको चले पनिघरभित्र भने सानो गुण्टा बोकेर सुस्तरीशान्ति आएर आँखाको कुनामा झूल कस्तछ;सपना हुन्छ ताराको सिंहासन अमूल्यको,मेघ बाहिर गर्जन्छ, सुनिन्त तर ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यो दिन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कहिले आउला ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
. माछ्ापुछे चौलाख स्वस्तिकाबन्छन्‌ सिंहासनैमाथि सपनाभित्र, बाहिरचम्कन्छ बिजुली, किन्तु देखिन्न ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर त्यो दिन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कहिले आउला !ठीक आजको दुई वर्षमाचाँडो होस्‌ अहिलेभन्दा यसभन्दा ढिलो नहोस्‌,फर्कने होस्‌ कुरा साँचो, चाँडो पनि बरू नहोस्‌ ।(रूपनारायण र हात हेर्ने निस्केपछिमुखामुख गरी इन्दिरा र राजामतीपति निस्किन्छन्‌)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दृश्य २- उही राती&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृ्‌ष्णदेवलनेरको पर सडकमा । बरिपरि बत्ती बालेर बाजा बजाउँदैयात्रीहरू धारा लागेका देखिन्छन्‌ । कृष्णदेवलमा माथिमुकुन्द कालो नेपाली लुगामा कालै फेटा लाएरकोटभित्रको सेतो पटुकामा खुकुरी भिरेकोर सेतो दाही-जुँघा-कपाल लाएरकोकिटाका छकल्ले टोपी, सुरुवालर अंगरखामाथि ठूलो बदामी रङ्गकोधुस्सा ओढेको भवदेव लुकेरचियाइरहेका देखिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्- हाम्रो चिठी अब त आइपुग्यो होला । (मनमा हाँस्तछ)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव- आज केको जात्रा रहेछ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुक्न्- झन्‌ म के याहा पाउँ, मलाई त जे पनि नयाँ छ, जो पनिनयाँ छ, आफ्नै जीउ-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भ्वदेव- खेतीवालहरूको पूजासूजा रहेछ कि ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्- के हाम्रा उनीहरू पनि आउलान्‌ र ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव- हेरेँ, पर्खन, यस्तो जात्रा-पूजा भनेपछि तिम्रा बालाई नगईहुँदैन नि । बिचरा, आफूले रोपेको जुनसुकै धर्मको वृक्षमाहोस्‌ उनले माग्ने फल तिमी, नजन्मँदै तिमी, तिमीमै आयु,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आरोग्य, आनन्द ।मुकुन्- ऐ, हेर्नोस्‌, हेर्नोस्‌, त्यो शंखबहादुर ! सेतै भइसकेछ ।भव- म पनि त फुलिसकेँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द- नक्कली कपाल !?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुकुन्ब-भ्व-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मकता”भव-सुकुम्ब-भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
होइन, सकली पनि फुलिसक्यो, हेरन भित्र भित्र । मुख रातो-पिरो हुने वेला गयो; आगो निभिसक्यो, कपाल सेतो खरानीलेढाकिसक्यो; अब त सानो बताससित उड्न बाँकीछ!जानोस्‌, तपाईँले अहिल्यै यसो भन्नु त साह्रै अचाक्ली हुन्छ !के ! उ: त्यो सानो जिण्डाले भने पनि खुल्छ, हावा कति ठूलोआउँछ, को भन्न सक्छ, न खरानी मात्र उडाउने आउँछु, नआगै निभाउने आउँछ ।त्यसलाई पनि चिन्हे जस्तो लाग्यो !सीताराम काजी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कति नौलो जस्तो !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिन छोडे नौलो हुन्छ, बीस दिन छोडे बिर्सिन्छ, अझ तीस&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिन छोडे तर्सिन्छ ।लौ शङ्गरमानलाई हेर्नोस्‌, त्यसलाई अंग्रेजी लुगा लाइदियोभनेह्वाइट्वेको म्यानेजरलाई हेरी हेर्नुपर्दैन ।त्यस्तै ह्वाइदवेको म्यानेजरलाई नेपाली लुगा लगाइदिएशङ्टरदास हेरी हेर्नुपरोइन ! उ: त्यसलाई चिन्हयौ नि?अँहँ, खड्गबहादुर ?न; ! तेजरत्ल ।(सास मास्तिर तानेर)ए ! तेजरत्न ? त्यो त मेरो काखीसम्म पनि आइपुग्दैनथ्यो,सुइँखुट्टे कस्तरी बढेछ ! उसको दाज्यू कहाँ छ ?मन्यो बिचरा त उहिल्यै ।मेरो निति त भर्खर मन्यो । कस्तो बलियो थियो, पञ्जामाकाशीलाल, पौंठाजोडीमा उ, यिनीहरूलाई जित्ने तीनैशहरमा कोही निस्कैन । काशी फलामको कीलामा पञ्जाकोअभ्यास गर्थ्यो, क फलामको डण्डी घुमाएर पौंठाकोअभ्यास गर्थ्यौ, ज्यादै रसिलो; च्च्‌ च्च्‌ बिचरा !उसको निति च्च्‌ च्च्‌ नगर, उसका कमाइ तीन छोरा छन्‌,देशसेवाको निमित्त उसले आफूलाई तेबर विकासगरेर यहीँ छोडेको छ । मुकुन्द, तिमीलाई मात्र पितृक्रण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हद&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकु-भव-मुकुत्वभ्रव-मुकुन्दभव-सुकुत्ब-भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मकता?भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द-भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भवन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लागेको छ, के क्रण लिएर खर्च गर्दा ज्वरको जिब्रोलेचुकिलो कागती चाटेको अनुभव हुँदैन !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाजे, कति घोच्नुहुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अगुल्टो ठोस्नैले बल्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आँचमा आगौ नभए?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठोस्नाले बल्दैन, सल्काउनै पर्दछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काठ भिजेको भए ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुकाएर सल्काउनुपर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उ: बा, आमा अनि इन्दिरा हो ? के अचम्म! हो?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफ्नै हृदयसित सोध, त्यहाँसम्म पुगेर फर्कने हावासितसोध ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अवश्य होला, उही पखिती-हिंडाइ छँदै छ । &amp;quot;किनभने उनी हिंड्नैको निमित्त हिँडेकी छन्‌, कसैको परेलाझ्याली भएको पट्टलछूपी बैंजडीको ताल तालमा नाचेकी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छैनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुर्खताले उसको भलो गरोस्‌ ! किन गोरी भइछ नि?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनको रगत बिहान चोर्दै सूर्वले बराबर पश्चिमतिर लागेकोतिमीले कलकत्तामा समेत देखेको हुनुपर्छ !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खै, उता त विवेकको सूर्यलाई कोही दोष दिँदैनन्‌, दुन्लोलाईगरम पित्त चढाउने, कामज्वर आएकोलाई कँपाउने घामहोइन, उसकै आन्तरिक प्रकृति&amp;quot; कमजोरी हो भन्छन्‌,उद्योगीहरूको कुरै बेग्लैछ। .&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो, उद्योगीहरू बढ कोदालीले आफ्नै चिहान खन्छन्‌, आफ्नोलाश जलाउने दाउरा काटी छिँडीमा जम्मा पारिराख्छन्‌, तरपरदेशीको हातमा रण्डा भएर कहिल्यै खिइँदैनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पछयौरा लतारेको हेर, ढङ्गमरु । अफसोसी खुशी ! मैलेबुलबुले झिकेकी इन्दिरालाई पहिले नै जात्रामा देखेँ, बाजीकोछुक यही हो । यस्ता अशिक्षिता, स्वभावका दासी, प्रेमकोअनुहार नदेखेका कोर्काली नाठाहरूलाई जोसुकै, जस्तोसुकैगुण्डाले पनि चुड्काचुड्कीमा भालु नचाउन सक्छ । म&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तपाईंलाई प्रमाणित गरेर देखाइदिन्छु । सीता, सावित्री, सतीशर्मिष्ठाहरूका चरित्र गँजडीका घ्वाँसाको मसीले घोट्टाकोकागतमा लेखिएका केटाकेटीको निद्रा बोलाउने दन्त्यकथामात्र हुन्‌ । त्यो दिन चाँडै आउनेछ, म एउटा बोको डोन्याएरल्याई तपाईंको विचारको मौलोमा बाँधी आफ्नो सिद्धान्तलेछिनेर जन्मभूमिलाई सधैंको लागि म बलिदान दिन्छु, अनिजानेछु, अनि खानेछु, अनि पिउनेछु, अनि हाँस्नेछु ।(निस्कन्छन्‌)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
५७०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दृश्य ३- उहीँ(साँझ र रातको भेट)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूपनारायणको घर । अगिल्तिरको घारामा एक-दुईजना आई पानी थापी निस्कन्छन्‌ । धाराबाटछेकिने गरेर पर्खालको आडमा मुकुन्द&amp;quot;र भवदेवको प्रवेश ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भवदेव- तिमीलाई त केही गुण्डा होला भन्नेछन्‌, मचाहिँ ठगाहा-चोर,जोगीमा गिन्ती हुनेछु । दपन-छपन गरेर पकाउनुपर्ने पापकैपायस हो ।मुकुन्द- फेरि आज पनि अनेक बयलपातीहरूसित नारिँदै आउने बेलाभरो।(बिमानको प्रवेश ।पानी थाप्तछ।)(सुस्तरी) अब आस छैन ।भव- (सुस्तरी) किन, चोखो पानी विमानले लैजान्छ र ?(सानो घल्चा लिएकी एउटी स्वास्नीमान्छेको प्रबेश)स्वास्नीमान्छे- खै दाज्यू, मलाई बेर छ।बिमान- लौ । (आफ्नो गाग्रौ हटाउँछ)स्वा. मा.- भान्छा गर्नुभो ?विमान- बेलामा खान पाइने पुर्पुरो छ र आफ्नो !स्वा. मा. किन दाज्यू !बिमान पूजा-पूजा-पूजा गरिरहने देवताका प्यारा भक्तहरूलेमानिसलाई सुख दिन जानेका छन्‌ र !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द- (सुस्तरी) हो; यो रित्तो ढाँंगले कति जनालाई पिरिरहेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव- (सुस्तरी) भरी गिलासभन्दा रित्तो ढोंग सयकडा उनान्सयगुना असल छ। (स्बास्नीमान्छे निस्कन्छे)(एक जना धोती मात्र लाएको बाहुनको प्रवैश)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिमान- बाज्येकी दुलहीलाई कस्तो छ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाहुन- आज त अलिकति जाउलो खाई ।(विशान निस्कन्छ; बाहुनको नित्यपूजा शुरू हुन्छ)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव- (सुस्तरी) आए है आए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द- (सुस्तरी) फेरि नाचकी मैयाँ जस्तै एउटी सहेली लिएरआइपुगी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(इन्दिरा र एउटी स्वास्तीमान्छेको प्रवेश)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज पति फर्कनैमा बुद्धिमानी छ । (बाहुन निस्कन्छ)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव- (सुस्तरी) तर पहिले उल्ले पानी थापी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द-. (सुरःरी) पर्खतोस्‌ है त, म उसलाई अलमल्याउँछु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव- (सुस्तरी) जीवनभर अलमल्याइराख ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द- (सुस्तरी) सके खुशी हुन्थेँ । स्वास्नीमान्छे, संसारभरकाघारिला हतियार, जस-जसले सुन्दरताको भर्भर आँच लाउनसम्छ कसित कहिले-कहिले मतलबी झोल भएर पग्ले तापनिजवानी सेलाएकासित यिनीहरू जमेर फलाम हुन्छन्‌, अनिकपटी नखराले त्यसमा पाइन चढाउँछन्‌, तिनका दगाले साँधलाएको वरिपरि छुनेबित्तिकै काट्ने घार भएको कलेजालाईसौन्दर्यको सुनबुट्टे दाघले कसरी दबाइराखेको हुन्छ ?ज्ञान्नेहरू यिनलाई गोमन भन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव- (सुस्तरी) गोमनले गोमनका खुट्टा देख्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द- (सुस्तरी) अनि त्यसमा नेल ठोक्छ कि सुनको, कि चाँदीको,कि फलामको ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा- आज मेरो जीउ चौफट्टै गलेको छ, किन होला !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वास्नीमान्छै- मेरो पनि ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा- छिः कति गर्मी, यो घारा जत्रै पानी परे पनि हुन्थ्यो !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वास्नीमान्छे- आज जस्तो गर्मी त नेपालमा उत्रेकै छैन होला !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकन्द-भवन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वा. मा.-मुकुन्द-इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्विरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द-ड्रन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुकुन्ब-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चिन्हे भने । यो लाउँ !?चिन्दिनन्‌, जुँघा लाए त झन्‌ शंका पर्छ ।(स्वास्नीमान्छेले गाग्रो झिकेर इन्दिराले थाप्तानयाप्तै मुकुन्दअगाडि बढेर हात धुन लाग्दछ ।)इन्दिरा, गएँ म त, आज चटारो परेको छ । (निस्कन्छे)लौ त धापन नानी, म पछिबाट घोउँला ।होइन, घुनोस्‌ ।होइन, होइन, धाप । (इन्दिराले गागी थाप्तछे)(बिस्तारै) इन्दिरा ?त्यो नाम त उनकै हो, कसो हो, होकि क्या हँ !के&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द के-तिम्रो-पोइ-हो ! कि-हो, किनहँ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ए, भैले उहाँ जाँदा भेटेधें, घरको कुरागर्दथ्यो । क मलाई त आफू नै ठान्दध्यो, कतैउसको जीउमा काटे मेरोमा रक्त आउँथ्यो,म्रैले खाएँभने उल्ले खानुपर्दैनध्यो, थियोज्यान एक दुवै हामीहरूको । मनको सबैपोख्थ्यौं, कुरा त लामो छ बाटोभन्दा, तिमी अबकहिले सुन्दछघौ ? भोलि ! तिमीलाई सुनाउनेधेरै कुरा छ, भनुँला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाम्रो घर यही त हो,भेद्नुहोस्‌ ससुरालाई, लगिदिन्छु म. आउनोस्‌,ओहो, यो कै कुरा, खालि तिमीलाई सुनाउँछुतिमी सुन्ने भए । फेरि हल्ला गर्ने भए त मभन्ने छैन तिमीलाई पनि ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोलि उसो भए&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बारीमा आउनुहोस्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राती?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
५३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युक्त”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिहानै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
, हुन्छ, यो कुरामन्तैमा राख, (देखाएर) गाग्रीको मुखबाट नपोखियोस्‌,पानी जस्तै । (इन्दिरा गाग्री बोक्तछे)म पर्खन्छु सबेरैदेखि भोलि है ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेबिर्सनोस्‌ ।(हात धुँदै) ल, आमाको भोलि काम छ, तैपनिसंझुँला । (भबदेब भएतिर जान्छ, इन्दिरा निस्कन्छे)आउनोस्‌, आए रित्ता गाग्रा अरू पनि ।(निस्कन्छन्‌)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दृश्य ४- उहीँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिहान झिसमिसको अगिल्लो भाग । रूपनारायणाकोघरपछिल्तिरको बारी । चराहरू बीचबीचमायताउता कराइरहन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(इन्दिराको प्रबेश)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा- (धोएका लुगाहरू टाँगेर)कसैले बिपनामा के सपना देख्छ, आज मकिन हो सपना देख्छु त्यसै जागिरहे पनि ।(आशा र उत्साहले प्रफुल्लित हुँदै बीचबीचमा डराएर)उसको के क्रा होला मीठो अमृत पोछकिअधवा विषको गोला के त्यो मानिस आउला !के होला कि कसो होला भनी भुट्भुटिंदो मनभन्दा बह्‌ डढी तीतो भएको भन बेस हो।(अझ सन्तोष मानेर)लोग्नेमानिसका हामी पुतली हौं, नचाउँछन्‌जस्तो जे मनमा लाग्छ हामीलाई उसै गरी,कैले सिँगारिदिन्छन्‌ ती सितारा तासले सजी,कैले नङ्गा गरी फ्याँम्छन्‌ ती कसिङ्गरमा पनि,कहिले स्वर्गका देबी बनाएर उडाउँछन्‌,कहिले च्यामिनी पारी गाडिदिन्छन्‌ जुठयानमाननोले भन्दछन्‌ लाटी, बोले होइन्छ डङ्नी,भन्छन्‌ लहडमा कैले सीता कैले त लङ्िनीहामी हौं काठ वा माटाहरूकै पुतलीहरू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
00&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाम्रा जीवनका कर्मी देवता हुन्‌ उनीहरूजो आफ्नो पतिको टाढा रहन्छै, त्यो अभागिनीशून्यले बहिरी हुन्छे, रतन्धी अन्धारले;जो नारी भाग्यमानी छ, त्यही नै सुन्न पाउँछेपतिको स्वर चाहे त्यो गालीको रूपमा गुँजोस्‌;छुन त्यै पाउँछै पाउ चाहे त्यो बज्जलात होस्‌चाहे होस्‌ स्द्वको मूर्ति त्यही दर्शन पाउँछे !प्यासी के प्यासले मर्छे, कि त्यो विषसराबरीमिलेको .होस्न पानी नै पिएर बरु मर्दछे ।(होचो पर्खालबाहिर मुकुन्दको प्रवेश)के रे नाम ? हिजो मात्र तिम्रो ताम सुनेँ, तरआजै भुसुक्क निर्सेछु, के ? आ, अ, उ, इ, इन्दिरा ?घन्दा शुरू भयो एका बिहानैदेखि ?आज त&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्रा सुन्न म आएकी, नत्र निस्कन्नयेँ अगि-पछि बाहिर नै यस्तो सबेरै कहिल्यै पनि ।पृथ्वी बिहान पोतेको माथिको नीलरङ्गलेधेरै भयो नदेखेको, परै छन्‌ सूर्य ती अझ।यस्तो फिका उज्यालोमा पनि श्रुङ्गारशून्य त्योस्वरूप स्पष्ट देखिन्छ, मैलो झुत्रो लुगा पनि ।भाँडा माज्दा चुरा धेरै फुटे जस्तो छ, इन्दिरा,विधवापन झल्कन्छ तिम्रो सर्वाङ्गमा किन ?यस्तै हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कहिले हुन्थ्यो, कहिले मान्दथें म त्यो,दु:खको बदलीभित्र आएर भन कै अबडुब्न लागे जवानीको चन्द्रमा ? त्यो मुकुन्दलेतिम्रो सुहाउँदो सारी एउटा कहिल्यै पनिपठाउँदैन, थाहा छ । मैली भै जीवनी तिमीमैलाउँछचौ? जवानीको पाप लाग्दैन ? नाक त्योकान ती सब बुच्चै छन्‌ दिक्क लाग्छ मलाई पो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१६&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-मुकुन्द-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुत्द-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-मुकुन्द-इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द-इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुकुत्व।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के गर्दछ लुगाले र?लुगाले सब गर्दछ,श्रृङ्गार गहना नै होश्रृङ्गार पति मात्र होगहना र लुगा लाई गधा गाई हुने भएपवित्र प्रेमको अड्डा पैसामा मात्र जम्दथ्यो,खालि पिर्ती पिई बाँच्ने गरीब सब तापलेमर्थे भतभती, अर्कै हुन्थ्यो यो दुनियाँ, तरमायामा बाँच्तछौं हामी, माया गर्ने भए पुग्यो,सेवा गर्त उनैलाई खाली पेट भरे पुग्यो।आफ्नो खसमको प्रेम खारिएर नहोस्‌ धुन,कुँदिएर नहोस्‌ हीरा बुनिई फरिया नहोस्‌,यो जङ्गली अवस्थामै पछिसम्म रहिरहोस्‌ ।छोड्नोस्‌ यस्तो कुरा । भन्छु भन्नुहुन्थ्यो हिजो अब&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भन्नोस्‌ न । ॥सुन लौ, छोटो इतिहास सुनाउँछु,परन्तु यसले स्बास्नीमान्छेको कमलो मुटुसमात्न सक्छ, या फोड्नै पनि छैन असम्भवत्यसैले एक पापीले बनाएको कडा विषलागेको हातमा मेरो परी मर्ला कुनै झिँगा,व्यर्थ फेरि मलाई त्यो पाप लाग्ला ।म सुन्छु त्यो ।फुद्ला नि कानको जाली ?बिन्ती, चाँडै म सुन्दछु,के सञ्चै छ उहाँलाई ? यसरी नसताउनोस्‌ !सञ्चो छ।यदि सञ्चो छ उहाँलाई भने सबसंसारलाइ सञ्चै छ ।सञ्चोमाथि उहाँ अझआनन्दमाथि आनन्द, आनन्दैको अजीर्ण छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्र्७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-मुकुन्द-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-मुकुन्द-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उहाँ त दुबलो नीलो रोगी जस्तो असाध्य नैहुनुहुन्थ्यो, तपाईं त गोरो, मोटो, उतातिरहावापानी मिली यस्तै उहाँलाई समेत केफाइदा नै भएकोछकिउस्तैहो?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उहाँ अझ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिद्ढी-सिद्ढठी भएको छ, किन दिक्क भयौ उसै ?उसो भए उ मोटो छ, मोटो छ ल म जत्तिकै ।मुकुन्दको तिमीलाई माया लाग्दछ ?केकुरा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोधेको यो तपाईंले ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोटी पाक्तछ इन्दिरा,दोहोरै, नत्र जाडोमा आगोभित्र पसेसरिहुन्छ । जो प्रेमको पश्चात्तापमा पर्छ सेरिईअधकल्चो भएको झैं त्यो सधैँ छदपटाउँछत्यसको निति मिष्टान्न बिष्टा बा छाद बन्दछ,निद्रा मरण झैँ हुन्छ, सपना हुन्छ नारक,हाँसोले डाम्छ उल्लाई, पुष्प बन्दछ कण्टक,गाना करौंतिले तालु चिरेको ध्वनि बन्दछ,नाच भूकम्पमा गारो ढलेको दृश्य बन्दछ,अधुबैतरणीमाथि जीउँदै प्रेमतुल्य त्योपौडन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पनि छैन !?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के उहाँलाई मेरो माया अलीकति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दया होला; माया छ त म भन्दिनँ,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
झूटो कुरा ।दया कस्तो, माया कस्तो ?यौ अघीनमादया छ, गर्दछौं;, माया लाग्छ छैन अधीनमा ।दया त गर्दछौं हामी लुते कुक्रमा पनि ।ओहो, मुकुन्दको चाला सुन्न पायौ भने तिमी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नद&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द-इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माया फिर्ता लिई बस्न चाहन्छौ, तर सक्तिनौमायामा र दयामा छ यही फरक इन्दिरा!इन्दिरा, कलकत्तामा हाम्रो भेट भयो, यहींसँगै पढौं, सँगै खेल्यौं हाम्रो मेल पला पलाबढ्दै गयो, मलाई ञ, उल्लाई म परस्परआफू भन्थ्यौ । तिमी लोटचौ बिहानको दिनमा अनिउल्ले के के भन्यो रे हो ? तिमी भाग्यौ उठेर रे,तिम्रो कमरमा ठूलो कोठी छ पनि भन्दध्यो,हो-होइन उही जानोस्‌ । दुई वर्ष बितेपछि-देखि तिम्रो करा छोडघो उसले संझनै पनिमूढ बालक बिर्सन्छु जसरी पाठ अस्तिकोमुकुन्दले तिमीलाई उसरी बिर्संदै गयो;केही समयको खोला गहरी बेसरी जबबहघो मगजमा बिस्यौं अनि उल्ले सफासँगबौलाहाहरले जस्तै देशलाई र देशकोघरलाई र घरका जहान सबलाइ रजहानकै तिमीलाई र तिम्रो भक्तिभावकोद्यौतालाई र द्ौताको प्रेमलाई । तिमी किनअँधेरी रातको खोला जस्तै काली भयौ ? उताहेर, त्यो पूर्व डाँडाले ब्युँझी स्नान: गरीकनशीतले शिरमा लायो अग्लो मुकुट तेजकोतिमी अवश्य नै खिन्न भयौ ।होइन, भन्नुहोस्‌,अस्तिदेखि दुखेको छ मेरो आधा कपाल त।आज पूरा दुख्यो होला ।- सत्ते होइन, भन्नुहोस्‌ ।काटेको घाउमा फेरि यसले चहत्याउला !(इन्दिरा टाउको हल्लाउँछे)जब सारा कुरा बिर्स्यो जात, भात र इज्जत-समेत सब मिल्कायो भट्टी भट्टी डुली सब&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
५९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-मुकुन्दइन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आजको एक धोपाले भोगी लाख पिलाउँछ,भोलिका लाख्चमा पर्सि समुट्वै लहराउँछ,रक्सीले यसरी जीउ धन मान डुबाउँछ,त्यसैले बुद्धिमान्‌ : भन्छन्‌ मद्यमा पाप लुक्तछ ।झ एक दिन डेरामा फर्केन, किन हो भनीखोज्दै गएँ सधैं जान्थ्यो जहाँ त्यो अन्धकारमालाग्यो ठक्कर खुट्टामा, सलाई जेबमै थियो,बाले, देखेँ त्यहाँ हाम्रो मुर्दातुल्य मुकुन्दकोमुख चाटिरहेको छ कालो कुकुरले, म तरक्सीको गन्धले एक छिन बेहोश नै भएँ ।आफूलाई उठाएर बर्षा धिक्कारको गरीआफैँ बोकेर डेरामा आधारात गएपछिबल्ल ल्याइपुग्याएँ ! के इन्दिरा, अझ सुन्दछघौ ?अझ यो बिष लागेन तिम्रो निर्धो शरीरमा !विष लागेर के हुन्छ ?रिस उदठतछ ।कोसित ?जसले यसरी आफूलाई धोखा दियो ।किन?कतिचोटि दियो धोखा यो आँखाले, अझै पनिसंसारका सबै दृश्यभन्दा प्यारो छ दृष्टि यो,के फुटालूँ म यल्लाई ? झन्‌ के विषयजालमाबेह्री घोखा दियो भन्ने बात लाएर प्राणकोहिंसा गर्छ ? उहाँ साथै बस्ने भाग्य अभागिनीयो मलाई हुँदो हो त रक्सी पोखिदिई सबैकचौरा र सिसी सारा भर्दथें आँसु आँतुलेनसके यसरी रोक्न बढ्ता रक्सी पिई अझ,&#039;कलेजा ओकली लेख्थे टुक्राले भुइँमा यही,“यो प्राणेश्वरको निम्ति रक्सी नपिउनोस्‌&#039; भनी ।देखी चेत्ने भए हाम्रै छिमेकी दुइटा मरे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पिउँदा पिउँदा रक्सी त्यसै मुटु फुटेर, खैचेतेको !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुनी चेत्ने भए कस्ता कस्ता शिक्षा दिई दिईथाके शिक्षक स्वामी सद्ब्रहमचारी अनेक, खैचेतेको ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिम्रो क्रा उ मान्थ्यो र, कस्ता प्याराहरू पनिसधैँ हेलाँ भई फर्के प्यारी रक्सीअगिल्तिर ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा कोप्यारी?मुकुन्द- को भनूँ, प्यारीहरू धेरै थिए उहाँ,एक रण्डी थिई, फेरि उनमा पनि मुख्य त,हेरौं ?(सबै खल्तीमा खौजेर बल्ल पाएजस्तो गरी)हेर, यही हो लौ । (इन्दिरालाई पोस्टकार्ड दिन्छ)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमी व्यर्धै यहाँ बसीजप्छचौ मुकुन्दको नाम, उहाँ रण्डी उ जप्तछ ।पछिल्तिर चिठी हेर, लेखेको त्यो मलाइ हो,चिन्यौ अक्षर ? छातीको भूगोलभर राज्य त्योरण्डीको दासकी दासी तिमी ! &#039;रोजी&#039; छ नाम नैउसको, भन्दथ्यो, &#039;रोजी, तिमी, मेरी भयौभनेलात मार्छु म यो पृथ्वीभरका सुखलाइ नै ।&#039;अनि लात दियो आफूलाई, बच्जचो परन्तु त्योतिमीमाथि । भयो दे कति हेछरचौं, उ रूपकीखानी हो, खूप हेरेर सर्दैन जगदीशलेउसैलाई दिए रङ्ग, पति ऐश्वर्य जे पनि(आफ्नो हातको तसवीर देखाएर)जसलाई तिमी पूजा गरछ्यौं, तिम्रो उ देवतापूजा गर्छ यसैलाई ।इन्दिरा- पर्खनोस्‌ है, म आउँछु ।(दैडेर निस्कन्छ)मुकुन्द- बल्लतल्ल डग्यो, ओहो ! सतीको दृढ आसन,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-मुकून्द-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भ्रवदेव, भयो मेरै जीतबाजी, तिमी बसी,माला जपीरहू एक सय आठ &#039;हरे शिब ।&#039;इन्दिरा धघरन्य हो, त्यस्तो शीतको युगमा पनिनिकै बेर बलिस्‌ हेर कसरी अब निभ्दछेस्‌,सिद्ठी कालो गरी छोड्छेस्‌ या खरानी गरी सब !तर आईभने अर्को बत्ती सल्काउँदै, अझडर लाग्छ मलाई त उसको अनुहारले,स्त्रीको चरित्रमा केही देखिँदैन असम्भवयिनै हुन्‌ मन्धरा दासी, सीता माता यिनै, किनबेर लाई ! गई क्रोधागारमा अब निश्चय ।फेरि आई ।(इन्दिराको प्रवेश)सबै बाँकी कुरा भन्नोस्‌, म सुन्दछ्‌ ।रित्ता आँखा लिई आयौ, अगिको दु:खको जलघोप्टचाइछौ, बुझेँ मैले रातो रङ्ग त नेत्रमापोल्ने रगतको आँसु, कच्चा भाँडा फुटेभने ?कच्चा छैनन्‌ दुवै आँखा, तपाईं विष भक्भकीउमालेर त्यही हाली चलाईकन बेसरीपीराहा यी कचौरा त दुबै पक्का गरीकनशिरमा राखिएका छन्‌ जन्मैदेखि ।उसोभनेकिन भित्र गई रोयौ ? यहीं रोए म बाँड्दथैंदुःख पानी । उहाँ तिम्रो पोइको व्यवहारलेकतिचोटि म ज्यादा नै रोएको छु। म कोहुँर,लोग्नेमान्छे, म टाढाको पग्लेँ तैपनि मै पनिभने- सम्झ तिमीलाई स्त्री स्वरी स्त्री उसकै अझत्यस्तो निष्ठुरको साथ छोडी आएँ यही कुराभनुँ भनी तिमीलाई तिम्रो मन्त्र अशुद्ध छरक्षा गर्दैन त्यसले सत्यानास गराउँछछोडिदेकङ तिमी जप्न । म भएको भएत के&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पर्‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निष्ठुरी बेड्मानी स्त्रीघाती पापी पिशाच त्योपोइको नाममा खल्को हाल्थे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नरक झैं छुचोमुख पारेर यो पापी कुरा झिक्नुभयो, कतैदिन सक्छ कसैलाई कसैले दुःख, जे थिपोलेखेको कर्ममा मेरो त्यही भोगिरहेछु म ।आज संसारमा कोही महारोग भई त्यसैफत्फती कृहुँदै “पानी&#039; &#039;पानी&#039; भनी कराउँदैनिराशमा जली बाँचिरहेका छन्‌, कतैतिरकोही खान नपाएर आफ्नै मासु शरीरकोटोकी दुःखहरू तौलिरहेका छन्‌, कतैतिर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
. आफ्नै लु कलेजाले खुट्ढा हाली यताउति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बामे हँदै तोते बोलीको बीचबीचमा“आमा&#039; भनेर हाँसेझैँ पुत्रको लाश अगिनमाआफैँ पोलिरहेका छन्‌ । परमेश्वरलाइ तीसब दोष दिङन्‌ ? आफ्नै कर्मको अनुसारलेछातीभित्र सबै द्वार बन्द इन्द्रियको गरीकहिले दुःख घच्चिन्छ, कहिले सुख बस्तछ,कहिले असिना पर्छ, कहिले सूर्य बन्दछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अझ के त तिमी माया गरछर्थौ त्यस्ता मुकुन्दको ?माया त पहिल्यै गर्थे, त्यसमा अझ थप्तछुआमाले स्नेह सम्झेर त्यो उपद्रव, मूर्खतासम्झी दया महारानीहरूको, जड पत्धरजस्तो हृदय सम्झेर भक्ति आस्तिकवर्गकोअगिल्लो जन्मको पाप काद्तैमा जन्म यो बित्योभने जसै गरी, अर्को जन्ममा त म पाउँलादयाबन्त उहाँलाई, तपस्या अब गर्दनअझ गर्दछु, यो आयु तपस्यामै बिताउँछु ।यो मासु मासुको पिण्ड, सेवा गर्न नपाउनेहातखुट्टाहछू बोझा सीसा जस्तो शरीर यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुकाई तपको आगोमा सबै होम गर्दछु ।मुकुन्- भवदेव उहाँ आई तिम्रो सारा कुरा गरे,उसलाई यहाँ ल्याजँ भनी यत्न वृधा गरेवेश्यालाई अँगालेर मदले मत्त भैकनभन्यो मुकुन्दले हाँसी हाँसी आखिरमा यसै-“यहीं छ इन्दिरा मेरी रोजी, अर्को मुकुन्द त्योइन्दिराले उही खोजोस्‌ कि त रण्डी बजारकीबनोस्‌ फर्कन्नँ, वास्ता के ?&#039; तिमी रोयौ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा- म, खै कहाँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोएँ?मुकुन्द- रोयौ उ: रोयौ उ: !इन्दिरा- जानोस्‌ अन, भयो भयो !मुकुन्-_ तिमी रोयौ!इन्दिरा- जानोस्‌ भयो भयो !(भूइँको माटो उठाएर मुकुन्दतिर छरी घोप्टो परेर रुन्छे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द निस्कन्छ ।)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दृश्य- ५ उहीँ : रातको शुरूरूपनारायणको सुत्ने कोठा । रूपनारायण बिछ्यौनामा गुदुमुदुभएर ढुसुढुसु उडिरहेका । सामदान बलिरहेको ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूपनारायण- (बीच-बीचमा &#039;हाईं&#039; गर्दै)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वप्न वैशाख झैं फुल्छ पूस जस्तै हराउँछ,स्वप्तको दुनियाँ हामी ब्यूँझनासाथ मर्दछत्यहाँको विष लाग्दैन न पखेटा पह्लाउँछ;न त्यो सुवर्ण गिरिको एक चुन्दाम बाँच्तछ,न त्यो प्रलयको वर्षा ज्वलन्त नभमन्तिरडढेकी पृथिवीमाथि एउटा बूँद छर्दछ,पूर्ण आनन्दका चन्द्र न आधै मात्र अड्दछन्‌,सपनाको सबै मर्छ सम्झना मात्र बच्तछ,छिनेको स्वप्नको माला उन्दैमा आयु बित्तछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(उङ्दछन्‌)त्यसैले के कुरा सत्य जगत्‌को ? सपना पनिमर्दैन कहिल्यै किन्तु आत्माको स्मृतिभित्र नैबाँचिरहन्छ, या केही मरी मुक्त भयौँभनेमाला गाँथेर दुङ्गिन्छ जोडिन्छन्‌ दुइ छेउ यी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(उड्दछन्‌)(बिमानको प्रवेश)(लिएर आएको मासिक पत्र र चिठी उसले भूइँमा फ्यात्तफ्याँक्नेबित्तिकै घोप्टेर उडिरहेका रूपनारायण अस्कन्छन्‌)के ल्याइस्‌ शारदा ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
च्&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूपविमान-रूप&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विमान-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विमान-पशछप-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विमान-स्प-बिमान-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विमान-कप-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भान्छामा हुनुहुन्छ ।जा, म त आज भात खान्न भनिदै ।कहाँ भूइँ भत्क्यो, भन्नुभएको ?(अलि कराएर) घत्‌ उल्लू, भइहाल्यो, आइज एक छिन मेरोकमर अँठचाइदे ।(विमान त्यतै गर्दछ)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(रूपनारायण शारदा हेर्न थाल्दछन्‌)तँलाई थाहा छ बिमान, म पनि शारदाको ग्राहक बनेको छु,वर्ष दिनको चार रुपियाँ, दिनको एक पैसा भनूँ न, एक पैसात रोजिन्दा चाँदीको गिलास माझ्दा खर्च हुन्छ, यसको ग्राहकबनेपछि त मैले चुरोट छोडिदिएँ नि, के भनिस्‌ ?बढिया भयो, जाती भयो ।शारदालाई तुच्छ गन्ने पनि मान्छे छन्‌ नि, मानौं उनीहरूनेपाली नै होइनौं कि भनेजस्तो गर्छन्‌, मानौं उनको सभ्यताबेग्लै छ, हावाको किल्लामा छ ।अचम्मै छ ।म पनि शारदाको कहिले-कहिले निराश भएर निन्दा गर्छु तरत्यो बेला आफैँलाई निन्दित सम्झन्छु !हो त, त्यो त।(चस्मा लाउँछन्‌) कान दे यता ।भ्ा&#039; लाई कान दियो &#039;शा&#039; &#039;र&#039; &#039;द&#039; लाई कान दियो “दा&amp;lt;nowiki&amp;gt;&#039;&#039;&amp;lt;/nowiki&amp;gt;शारदा&#039; ।तँ चाहिँ मलाई कान दे ।&#039;मा&#039; भयो- “शारदामा&#039; ।सुन्‌, तँ कवि जस्तै छस्‌, शब्दसित खेल्न पाइस्‌भने जुवा खेल्तपनि छाडिदिन्छस्‌, सुन्‌- (लय हालेर)हेर्दा माथि थियो घना घन घटा सारा लतावृक्षकोभोको केवल अस्थिपञ्जर थियो माटो सुकी भूमिको,छारो मात्र उडेर नेत्र बहुधा हुन्थ्यो त्यसै बन्द नैयस्तो दुर्दिन निर्धती शिशिरको हाँसी उडायौं कुनै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ध््‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के भनेको यो?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुन्न अरू-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(लय हालेर)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेजी घाम थियो थिएन नभ्रमा टुक्रा कहीं बादलपृष्वीको हरियो थियो रङ जता हेन्यो उतै मञ्जुल,छोपेको फलफूलले अरु लता गुल्जार सारा वनैयस्तो स्वच्छ वसन्तको दिल उसै रोई बगायौं कुनै ।के अर्थ यसको ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नुझिनस्‌ ? रमाइलो वा बेरमाइलो बाहिर छँदै छैन रे,हाम्रो मनैमा छ रे । यो कसलाई थाहा छैन र ! यस्तै-यस्तै उङलाग्दा लेखले भरिएको भएर ता “शारदा&#039; मजस्तै दुब्लाउँदै गएको !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यसमा राम्रा-राम्रा कथा हुँदैनन्‌ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुखैमा गाउँखाने कथा कि कानका कीरा खाने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(पुस्तक फ्याँकेर) विमान,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि यो मनले मागे जस्तै मगजले पनि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भिक्षा उस्तै दिँदो हो त लेखनी खपरू भरी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म बाँझो खेतमा बस्थें यही मासिकपत्रको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बीणा बजाउँयैं यस्तो कि आकर्षित गर्दथे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्त भागिरहेका ती सारा बादललाइ, त्यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मधुर ध्वनिले: खिंच्नै अध्वुवर्षा गराउँदै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वीणा र आँसुको तार साथै झन्कार्दयैं अझ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोस्तर्थे रक्तको पानी छातीको पीँधसम्मकै,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनि उमार्दथे प्रेम-बाला लहलहाउँदा,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्तो त्यो लेखले झङ निद्रालाई घपाउँदै,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मीठो प्रेमान्तले प्याराहरूलाई बकाउँयै-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भाषा हो सभ्यता हाम्रो, सारा उदय उन्नति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीत वैभव भाषामै बाँच्तछन्‌ पछिसम्म यी,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भाषा हो जीवनी हाम्रो&#039;-ओहो यो कसको चिठी ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐले मैले सँगै ल्याएको ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
च्छ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूप-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिमान-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(रूप चिठी हातमा लिई देवताहरूलाई ढोगेर खोल्दछन्‌)(हेरिसकी ओढ्ने फ्याँकेर) भवदेव त पाल्पा आफ्नो गाउँमागएछन्‌- लाजले बिमान, हामी डुब्यौं- जलाथल भो !जलाथल भो ।किन यस्तो ?(लद्ढी टेकी उठेर) अगस्ति मुकुन्दको रक्सीको सात समुद्रमाउसको बाबु डुब्यो ! आमा डुनी !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(निस्कन्छन्‌)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
111&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव-पुनाचा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनाचा-भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुर्थ अंकदृश्य १- पाटनरात जाने बेलामा बिहानीपख&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भवदेवको घरको बैठक । एकातिर चारोटा झ्याल,अर्कोतिर तीनोटा दराज भएको लामो सोते । बीच-भित्तामा ढोका । दराजका माझ भित्ताहरूमा तीनतसबीर- श्री ३ महाराजको, रामराज्याभिषेकको,शिव-पार्वती-गणेश बयलमा चढेको, अनि अलिठूलो एउटा हेर्ने ऐना । बैठकभरिको कलेजी रङ्‌उडेको पुरानो गततैँचा, त्यही रङको बुट्टा भएकोकागत भित्तामा टाँसेको । एउटा सानो त्रिपाई ।ढृढो भेषमा भवदेव र घुम्टो हालेको पुनाचाको प्रबेश ।तँ कसरी आइपुगिस्‌, पुना ?यसकै घुम्तो हालेर । हेर्नोस्‌, उहाँ एक डुई जनाले मलाईसोढो।(दारहीजुँघाहरू भिकेर दराजमा यन्क्याउँदै)के भनिस्‌ त ज्यापू ?म माट्टै फर््यौ भनिडियो ।अब आज दिनभरि यहीं बस्तू । भरे रात परेपछियो दुलो छोडेर स्याल कराउँदै जालास्‌ । अब चार-पाँचदिन त हो नि, अनि त यसको वारपार लागिहाल्दछ,कि डुङ्गी बीचमै डुन्दछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनाचा- साह्खैट?भ्व- तँलाई थाहा नै छैन, उहाँ भेट-कुराकानी सब भैसक्यो अस्ति;फेरि क हिजो पनि उहाँ पुग्यो, फेरि आज पनि उहीँ, खेती पो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चलिरहेछ त ।पुनाचा- चिन्हेनट?भव- बिचरी कसरी चिन्दथी !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनाचा- रोजिन्डै किन पल्केछ ट ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव- रोजिन्दै अरिनपरीक्षा छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनाचा- अझ चिट्ट बुझेनछ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव- तेरो मुकुन्दको जिह्दी ! भोकभन्दा गरीबकोआशाभन्दा, जुवाडेको लोभभन्दा समेत त्योकडा छ, इन्दिरालाई भृगुको लातले अझजाँच्दै छ, अझ बढ्दा छ उसमा पाप पाइन ।तर दुद्दैन त्यो चाँडै लल्याम्लुलुक बन्दछजुन हाँगा, कडा हाँगा जुनचाहिं फलाम झैंकत्ति दोब्रिन जान्दैन जब दुद्तछ पट्ट त्योभाँचिन्छ एक सासैमा, बोक्राको पनि एउटात्यान्द्रोसम्म त्यहाँ बाँकी नरहीकन गिर्दछअनि त्यो पाउमा अर्को रूखको । तर चूप लाग्‌,परमेश्वरले आफैँ ठीक गर्दछ । रूपकाहातमा त चिठी मेरो पुगेछ नि, मच्योभनेबूढा मार्ने मलाई नै सम्झी, तौ मतियार त&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पापी मुकुन्द होस्‌, किन्तु हिंसाको पाप लाग्दछ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मलाई ने । (टाउको हल्लाउँछन्‌)पुना, तैँ भन्‌ के सवारी मुकुन्दको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ चलाउने गाडामा त श्री शिवजी पनि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बसाहो सुनकै जोत्न दिँदैनन्‌ हर्षले र ? के&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यो पापी लिपिमा मेरो धर्मरूपी सरस्वती&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छैनन्‌ भित्र लुकेकी र-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(तल हेरी नाक फुलाई रिसाएर)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनाचा-भ्वदेव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनाचा-भ्रवदेव-मुकुन्द-भ्नवदेव-सुकुन्द-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भवदेव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भ्रवदेव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुत्द-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भवदेव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मलाई पाप लाग्दछ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कहिले लाग्डद्यो ।रोगी खाई औषधि वैद्यकोआजसम्म नजानेर कुनै कारणले भन्योभने औषधि आशाले थप्ने त्यो वैद्यलाइ केपापी भन्ला कसैले र मलाई पाप लाग्दछ ?लाग्डैन कहिले लाग्ठ्घो !लेखेँ लाचार भै चिठी,लेख्नै पन्यो । उ आयो । (मुकुन्दको प्रवेश)के लखेटे सूर्यले यहाँ ?उज्यालैले लखेद्यो, छन्‌ अझ ती त कहाँ कहाँपुना पनि कताबाट ?मानेन भनले भनीआएछ । भेटभो?भारीतारी अब कसे भयोक त भाग्ने कुरा गर्छे ।किन, कोसित ?मैसितमलाई भेट्न जाने रे ।भारी अब फुए भयोउसो भने ।कहाँ हुन्थ्यो, अर्काकी स्त्री लिई मतकहीं जान्नै भने । (ऐनाअगिल्तिर गई हेरेर)बाज्ये, यो फेटाले मलाइ केखुलेको छ ! म के गोरो छुर ! सुन्नोस्‌न; इन्दिरागोरो मोटो भयो भन्थी मलाई अस्ति आज तहेरिरहन्धी मुखमा, के केही दाग पोछकिअथवा उसले फेला पारी यो अनुहारमाआफ्नो मुकुन्दको भोक टार्न सक्ने कुनै अरू !उनले कसरी हेरिन्‌ तिमीलाई ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भवदेव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्व-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भवदेव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खुकुन्द-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भ्रवदेव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जसो गरीटाढा जानेहरू हेर्छन्‌ बाटोलाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त ध्यानमाहोलिन्‌ मुकुन्दको, हेरिन्‌ भाग्ने सुर गरी अनितिम्रो बाटो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म के त्यत्ति पनि जान्दिनँ चोरको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आँखामा साधुको भन्दा के के हुन्छ विभिन्नताकति चिम्सन्छ वा कस्तो रेखा पर्दछ कोसमाडील उठ्छ कि उठ्तैन, गड्छ गड्दैन पट्टल;सेतोभित्र नसा हुन्छन्‌ कति राता, कतातिरनानी गड्छ भकुण्डो झैं, नानीको पुतली पनिकतिसम्म खुला हुन्छ, आँखीभौँ कसरी कतातर्कन्छ, कति जोडिन्छ जोर्नीमा, के म जान्दिनँ ?ठूलो दूर्बीन लाएर रोमकूप गनी गनीआँख्बा जाँचिसके कैयन्‌ अप्सराहरुका अबएउटी पखिनीको के म जाँच्न सक्तिनँ ?(लामो सास फेरेर) इन्दिरा,खस्यौ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तैपनि शंका छ, निश्चयै त म भन्दिनँइन्दिरा त अनौठी पो छ त, आजन्म एउटीयो जस्ती त अरू मैले देखेकै छैन, आखिरजानी नसकिने विद्या स्वास्नीमानिस नै न हुन्‌,को भन्त सक्छ के हुन्छ के हुँदैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमी अब&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मार्दछौ इन्दिरालाई अनुत्तीण भइन्‌भनेयस्तो कडा परीक्षामा ? अनि लाश जलाउँछौउन्तीको दाउरा पारी आफ्ना आमा र बाबुको?अरू जन्म दिनेलाई सेवा गर्दै मरेपछिदिन्छन्‌ स्वधर्म ठानेर दागबत्ती, तिमीभनेजन्मदाताहरूलाई जीउँदै रापतापमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भवदेव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भवदेव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनाचा-मुकुम्ब-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दागबत्ती बनाएर सल्काई जन्मभूमिकोजीउँदो मुखमा हाली, &#039;मेरो देश मन्यो&#039; भनीटोपी झिकी कराएर भाग्दछौ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अँ, यही थियो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाजीमा, इन्दिरा केही गरी तल गिरीभनेहुने होइन के हार तपाईंको, म पाउनेखुशीसाथ फिरी जाने सुजयन्ती मनाउँदै !अहिले हारको खार जब त्यो नाकमा घुस्यौहातखुट्टाहरू छोडी गालीको कविता अनिघोक्न लाग्नुभयो !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भैले यहाँ जति कुरा गरेँयो गाली हो भने तिम्रो बिरामैको जवाफ हो,रामका बाण हुन्‌, हाम्रा सत्यबोलीहरू सबै“चोर यो शब्द पस्दैन साधुको कानमा, उताचोरको मुटुमा तेर्सो परी अड्कन पुग्दछतिमी जाक खुशीसाध हामी हार्नेहरू यहाँआफ्नो घाउ समातेर &#039;मरैँ बाबा&#039; भनी सदैजित्नेलाई सराप्नेछौँ सधैँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो पक्ष लिए ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यो हारले यदि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हार इन्दिरा बन्दछिन्‌, अनितिम्रो त जीत नै हुन्छ, सबै जय मनाउँछन्‌ ।हामी पनि सबै भोज खान्छौं जय मनाउँदै ।परन्तु रुन थाल्नेछन्‌ &#039;मरे&#039; भनी कराउँदैजरा रमाइलो खाई बढेका सब इन्द्रिय !भोगले सुख मिल्दैन, त्यो त तृष्णा बढाउँछ,तृष्णामा दुःख उम्रन्छन्‌, दुःखमा पाप फल्दछ,जितेन्द्रिय भए मात्र सुखको फल फल्दछ;भोगे पनि सुखै हुन्छ, नभोगे अझ झन्‌ सुख ।उही घाम, उही नीलो-नीलो आकाश, बादल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उही सेतो शवा फड्के जस्तो, इन्द्रधनु उही,उही मन उही जिब्रो कहिले भन्छ &#039;आजकोदिन कस्तो उडेको&#039; त्यै आज कस्तो रमाइलोकहिले भन्छ । यो हामी जान्दछौँ मुखभित्र छभन्छौं तैपनि यो दृश्य हेर कस्तो रमाइलो ।यो तिम्रो भित्रको छाती चिरी हेन्यौभने यहाँनेपाल मात्र राम्रो छ, नेपालै छ रमाइलो;कर्तव्य मात्र राम्रो छ, कर्तव्ै छ रमाइलो ।विजास नित्य चल्दो छ, कर्ता कर्तव्य जान्दछ,बोल्ने चूप भई मर्छु, चुपैमा चूप मर्दछ,गुणभित्र घुमेका छौँ, कोही पुग्दैन पार त,पहिले घोर संग्राम अनि यो जीत हारत।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(निस्कन्छन्‌)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
0&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दृश्य २- उही : रूपनारायणको घर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिराको कोठा । झूल माथि उठाएर गाँठो पारी राखेको । इन्दिरासन्मयालको छेउमा बस्ने फल्याकमन्तिर ढाकाको खास्टोमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिमान-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिमान-इन्दिरा-बिमान-इन्दिरा-बिमान-इन्दिरा-विमान-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सञ्जाप हालिरहेकी देखिन्छे । एउटामा छ; ओटा मुनियाँ,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्कोमा मैना, अर्कोमा सुगा हालेका तीनओटापिजरा बोकेर विमानको प्रवेश ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(राखेर) तपाईंको ससुराले पाल्न पठाउनुभएको झ्यालकोबीच-बीचमा झुण्डघाइराख्नोस्‌ रे, आहार जे जे चाहिन्छभन्नोस्‌, मलाई ल्याइदिन्‌ भन्नुभएको छ ।मैले भनेको खै त ?अस्ति ल्याइहालेँ नि ।त्यस्तो धारै नभएको ।धेरै भएन ?होइन, धार । मासु, मासु त के आलु पनि काटिंदैन ।कसलाई के के भएछ ?छिः, अर्को ल्याइदिनू भनेको ।ल्याउँला, ल्याउँला हुन्छ । (निस्कन्छ)(इन्दिरा पिंजराहरू झ्यालको बीच-बीचमा,बस्ते ठाउँमा राख्तछे)मैना, लौ एउटा गीत गाइदे, राम, राम, भन्‌,लौ राधाकृष्ण बोल्‌ मैना, मैना मसित बोल्दिनस्‌(पिंजराका ढौकाहरू खोल्दै)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लौ, जा त जा जहाँ तेरा प्यारा छन्‌, जा सुगा पनि,जाओ सबै, चिमोद्तै म &#039;अप्या&#039;को गीत सुन्दिनँ ।(चराहरू उडेर जान्छन्‌)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेरो बन्धनमा मेरो मोक्ष छैन, उडी उडीआत्मालाई सिका मेरो कसरी उड्नुपर्दछ ।(झ्यालबाट हेरेर)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुगे उही जहाँ प्यारा परदेश गए पनिबसेको ठाउँ तातै छ गुँडको एक छेउमा,उसको स्वर गुँज्दैछ अझ त्यो पात पातमा,हावा हल्लिरहेको छ पड्खाले उसको अझछाया पर्दैछ उसको जलमा थलमा अझ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(खास्टो सन्दूकमाथि फ्याँकेर ओछ्यानमा बस्तछे)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घाम लागिरहेको छ एण्टलापुर बाहिरकालो रात पम्यो भित्र, आस अस्ताउँदै डुब्यो,एकको के कुरा कोटि सूर्य निस्केभने पनिकालो बिषादि यो धूवाँ भित्र छेडी अलीकतिउज्यालो पार्न सक्तैनन्‌; - छिप्पियो रातको मुख,सेता आकाशगङ्गाका केश सारा झरे, अनिकालो बादलको ज्यादै गहिरो चाउरी पत्योताराका दाँत ती फुक्ले, चीसो चीसो कंपाउनेहुरी चल्यो, पन्यो पानी, म ढुङ्गासित साथमाभिज्न लागेँ कतै ठाउँ छ यो शिर लुकाउने ?चराको मुटु यो हल्लीरहेछ अझके गरुँ,नत्र ढुङ्गा भई बस्थें, लेउ खाएर सुत्तथेँ,अब मेरो कतै कोही छैन यो दुनियाँभरि,मलाई जब मैले मनलाई बिदा दिएँ;जल्लाई पतिले हेला गप्यौ त्यल्लाई मै पनिहेला गर्दछु, यो मासु अब बेकामको भयोघूलोभन्दा दुसीभन्दा खियाभन्दा फलामको,यसको भोज ती काला गिद्ध आई गरे भयो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७६&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजामती-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(तकियामा टाउको जोती, त्यसमन्तिर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हात घुसाउै पुस्तक भेटिएपछि)राम यो नाममा शक्ति केही बाँकी भए अबखाउँ देक मलाई यो कालो शिर लुकाउने,त्यो काख नभए खाली पैतलामनि घुस्तछ्छु,या तिम्रो पाउ नै छोई अहिल्या झैं उठी भनेभन्ने डर भए तिम्रो न्यानो छायाँ भए पनिमलाई पुग्छ यो मेरी कालो मूर्ति लुकाउन ।(टाउको उठाएर सम्मी)कुनै दिन म ऐनामा मुख हेरी सिँगार्दथें,राम्री भएँ भनी ठान्थे अन ऐना म हेर्दिनँ,घोखा दियो मलाई त्यो आर्सीले, आज फेरि योयस्तो दिन यहाँ आयो ठाउँ खोज्छु सबैतिरज्यादै हेला भएकीको कालो शिर लुकाउन !(पल्टी फेरि उठेर)निराधार भई खालि राम राम म जप्तछुयस्तो यो कालरात्रीमा पनि यो राम रामकोहरेक शब्दमा, रातो रातो बन्दछ गोल, केअझ यो सास नै फुक्न सकेन, नलिईकनभित्र बाहिर नै एकनास छोडेर बाल्न त्योआफूलाई उज्यालोमा राख्ने ज्वाला सधैंभरिपानीमा पनि बल्नै त्यो हावा बन्द भए पनिभस्ममा पनि बल्ने त्यो दीपज्योति सघैँ सधैं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(घोप्टो परी पल्टन्छे)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भ्रयो, ज्यादा भयो नानी, रोई पाइन्त चन्द्रमासराप्छ आँसुले यस्तो घेरै पोखिरहघो भनेहँदा थकिन्छ यो आत्मा जहाँ आनन्दले सुती&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नारायण रहेका छन्‌ ।मेरो के दोष हेर्नुहोस्‌,सहुँ भनेर जोडैले बिर्को पट्टलको थुनी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ज्छ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजामती-इन्दिरा-राजामती-इन्दिरा-राजामती-इन्दिरा-राजामती-इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्बिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजामती-इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बस्छु, यो आँसु पोखिन्छ उम्ली अन्तरबाट नै ।त्यसैले त म भन्दैछु, घटाक, आँच तापकोज्यादा न मधुरो पारी सुकाक दूध आँसुको !कुराउनी जमी डढ्दा फुद्छ भाँडासमेत यो,या प्वाल बसमा पर्छ, ज्वाला छिर्दछ अगिनकोउस्तो भए तिमी आगै हटाक पर ।केवलयी भाँडा हुन्‌ दुवै मेर, मेरै हो दूध उम्लिदो,तर यो निर्दयी आगो अर्कैको हो ।उसो भनने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफ्नै भाँडा हटा ।यो पनि तातो छ ह्वतलेछोए त तालुमा ज्वाला पुग्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यो साहसी सनासोले ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भाँडा तिमी झिक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अफसोस, चुल्होसितटाँसिएको छ यो भाँडा, जसरी यो शरीरमाजोडिएको छ यो आँखा ।पानी छर्केर दैर्यकोअब आगै निभाङ ।त्यो आगोलाई निभाउँदाअँध्यारो हुन्छ संसार, हातमा सिस्नु बिझ्दछ,भासिन्छ भासमा खुट्टा, चर्कन्छ शिर भाग्यको,त्यसैले दुध नै उम्ली सिद्धियोस्‌, सब, तातिंदैपग्लोस्‌ भाँडा, म भोकी भै प्रीतिको अगिनमा परीजलेर मर्न राजी छु बाँचीरहन सक्तिनँसर्प जस्तो अँध्यारामा विष झैं अन्धकारमा !जल नानी, जलेकै छौँ ।तपाईं भन्नुहोस्‌ न तआफ्नो मानिसले छोडे के गर्ने ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ज्द&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजामती- केभनूँमखैके गर्नै किन सोध्छधौ यो मलाई, चुपचाप भैसोध ती बिधवा कान्छा बाज्येकी दुलहीसितजो सधैँ ब्रतले आन्द्रा झिनु पारेर कातछिन्‌,अधवा सोध त्यो तल्लो धरकीसित -पोइ छ,छोरो छ जीउँदै आई फेरि योसित तैपनिजारी खर्च दिलाएर अगिल्लोलाइ जो अझहाँसो हामीहरूलाई भुनिवा जन्तु भन्दछ,अधबा काल पर्खेर कथा जोडी उभीरह,स्त्रीलाई पार्दछन्‌ बूढी पोइले कि त कालले।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा- ज्यामा, यस्तो कुरा मैले सोधेकै पनि होइन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजामती- (तर्सैर) भूइँचालो गयो,-आक, उठ ।(दौडेर पर पुगी फर्केर) कस्ती तिमी त छि: !अझ ! आङ भनेको, लौ, गएँ त म उसो भए !उसलाई त हाँसो छ, हुन्छ है त बसीरह्‌ !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा- ज्यामा, खै झूल हल्लेको ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजामती- अब थामिसक्यो त के!एक झोँका दिई पृष्वीमाता चुप भइन्‌ अझझोलुङ्गो मुटुको उफ्रिरहेकै छ छिटो छिटो ।तिमी राक्षसनी कस्ती, हेर, पानी अचाउनपनि पाइनँ । लौ, आउ, म यहाँ बस्न सक्तिनँ,आज सिङ्गै गयो मेरो, म मरेँ सुत्न सक्तिनँ ।उफ्रीरहेछ झोलुक्गा !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(इन्दिराको हात समाती निस्कन्छ)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दृश्य ३ - काठमाडौंसिम्भु सरस्वतीस्थान&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
र बायाँपट्टिको पाटी देखिएको, धनमती र राजामती सरस्बतीअगिल्तिर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बसेर पाठ-पूजा गर्न लागेका । रूपनारायण पाटीमा बसेरबाँदरहरूलाई मकै छरिरहेका, राजामतीका पोइ बढात्यहीँ बसिरहेका । अगिल्तिर दुइटा डोलीबरिपरि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चार जना डोलेहरू बसिरहेका ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूपनारायण- हेर्नोस्‌, कस्तो दुरुस्त मान्छेकै सकल ! सुगाले जत्ति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बूढा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मात्र पनि बाँदरले बोल्न सक्ने भए, अधवा क्क्रलेज्ञत्ति यसले बुझ्न सक्ने भए अथवा कमिलाको जत्तियसको बुद्धि-विवेक भएको भए-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैजस्तो हुन्थ्यो बाबु, अलि दिनपछि तिमी जस्तो, धेरैदिनपछि क त्यो परको बालक जस्तो । हेर मैले आँखीभौँमाथि सारेको, गालाको खोपा हेर, जहाँ हाड छैनउही मासु बढ्दो रहेछ, मासु सुक्ने ठाउँमा हाड पनि हुँदोरहेनछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसले विरक्तिएर कपाल कन्याएको हेर्नोस्‌न ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमी मैले कन्याएको हेरन बाबू, बाँदर मान्छै भएकोमाआश्चर्य कि मान्छे बाँदर भएकोमा !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तपाईं कति वर्ष लाग्नुभयो !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो आउने मंसीरमा छयासी लाग्छु, अब त कसिङ्गर जस्तैकुनामा थुनिने बेला भयो |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
८०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तपाईँ हामीभन्दा बलियो हुनुहुन्छ, अझ खै कुम दोब्रेको ?मलाई पनि सय वर्ष नपुगी त कहाँ पो मझँला भन्ने लाग्छलाग्न त- जब पुग्यो सय अनि पो यमराजको भ्रय ।अरू पनि थिए नि &#039;जब पुग्यो&#039; हरू, सुनूँन ।(सबाइको लय हालेर)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ज्ञब पुग्यो एक भूइँमा खुट्टा टेक,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब पुग्यो दुई आ मेरो बुई,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब पुग्यो तीन छेपारो छिन,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब पुग्यो चार बाख्राको पाठा सार,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब पुग्यो पाँच आँगनमा नाच,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब पुग्यो छ: पढ्न लाग्यो च छ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब पुग्यो सात खान लाग्यो भात,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब पुरयो आठ घोक्न लाग्यो पाठ,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब पुग्यो नौ त्यल्लाई पन्यो घौँ,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब पुग्यो दश खेल्तामा रस,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब पुग्यो बीस बिहा गरिस्‌,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब पुग्यो तीस जहानबच्चा पालिस्‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब पुग्यो चालीस मनमा कुरा खेलिस्‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब पुग्यो पचास पेटमा बतास,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब पुग्यो साठी हातमा लाग्रै,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब पुग्यो सत्तरी हिंड्दाखेरि लत्तरी,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब पुग्यो असी कुनामा बसी,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब पुग्यो नब्बे हब्बे न कब्बे,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब पुग्यो सय यमराजको भय ।हिजोआज पेटले भने अलि घर्म छोड्ला-छोड्ला जस्तोगरिरहेछ, बराबर भित्र बडाइँ चलिरहन्छ ।मेरो पेटमा जति तपाईंकोमा के बडाइँ चल्ला, त्यहाँ बन्दूकहोला- त यहाँ तोप छ।बाबू, हामी दुवै भोकै बसेको दिनमा लडाइँ खेलौंला है,अनि कल्ले जित्ला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(छ; जना स्कूलका लडकाहरूको प्रवेश)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पहिलो लडका- पढे जति थ्योरेमभित्रको त म एउटा प्रोब्लेम पनि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दोस्रो ल०-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेस्रो ल०-दोसो ल०-पहिलो ल०-दोस्रो ल०-तैस्रो ल०-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बूढा.क्प-बूढाख्प-बूढा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दोस्रो ल०-तेस्रो ल?-पहिलो लन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेस्रो ल०-पहिलो ल०-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिराउँदिनँ जा !खै, आमा, सानो ठाउँ, हामी ढोग दिएर गइहालौं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(त्यसै गर्दछन्‌)मेरो त चौपट्टै बोधो मगज छ, अड्तीस र तेह्र कति ?एकचालीस ।एकाउन्न ।हो, एकाउन्न ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म त अहेँ; औंला नगनी भन्न सक्तिनँ, अभ्यासै छैन ।हिसाब भन्यो कि ओहो, त्यसै, त्यसै-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(लडकाहरू प्रदक्षिणा गर्दै निस्कन्छन्‌)रमाइलो यिनीहरूलाई छ ।हामीले देख्ता !हो, त्यसो त ।तिनीहरूको हातमा हेरे औंलापिच्छे नीरका औंठी होलान्‌ ।तर त्यसको मोल तिनीहरूको हृदयमा छ, जसले नीरको औंठीमासेर हीराको हार बनाउँछ । रमाइलो तिनीहरूलाई नै छ।(प्रदक्षिणा गर्दै लडकाहरूको फेरि प्रवेश)तैंले भनेर हुन्छ, छसी ! मास्टर बाज्येसित सोध्न, हाम्रो सूर्यपनि अर्को ठूलो सूर्यवरिपरि घुमिरहेको छ ।त्यो त कल्ले होइन भन्यो, पृध्वीवरिपरि पो घुमेको छैन भन्नेक्रा।किन घुम्दैन ? चक्कर लिंदा आफूवरिपरि घुमिरहनेलाईअवश्य घुमिन्छ । यो सिद्धान्तले सूर्य पृथ्वीलाई, चन्द्रमालाईपृष्वी परिक्रमा गर्दछन्‌ ।कसो, कसो रे ?तँ उभिएको ठाउँमा एउटा ढुङ्गा राख्‌, उही भयो तँ पृथ्वी मसूर्प) अब मेरो वरिपरि तँ घुम्दै आ, म सूर्य ठूलो चक्कालिन्छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डोग्रो ल०-२षहिलो ननबैरी ल०-दोस्रो ल०-बहिलो ल०-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्ढा-क््य-बूढा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तैस्रौ ल०-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(पहिलो ल० अगि चिनु राखेको ढुङ्गाबरिपरि घुम्दै जान्छ,दोस्रो ल० पहिलो लडकाको बरिपरि घुम्दै हिँड्छ ।)(तेव्रो ल० सित) तँ हेरिरह, म त्यो ढुङ्गाको बरिपरि घुम्छु किघुम्दिनँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नानीहो, तिमीहरूले देवतालाई प्रदक्षिणा गरिसम्यौ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पढ्नोस्‌, न यति गरौं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हेर, है चिम्से आँख्खा च्यातेर, घुमियो कि घुमिएन !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो, घुमियो, ढुङ्गा त ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कसरी?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कस्तो रैछ यो त, सुन्‌ मैले घुमेर एउटा ठूलो पिंजरा बनाएँ,तँ झींगा भएर हरेक पिजराको डण्डीबरिपरि घुम्दै गइस्‌, केहरेकपालि पिंजराभित्र परिनस्‌ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फेरि हरेकपालि पिंजराशाहिर परेँ, त्यस्तो पिंज्ञरालाई पनिघुम्नु भन्छन्‌ कतै !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकचोटि त घुमिहाल्यो कि ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फुस्सावरिपरि घुम्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कसरी फस्साबरिपरि? कत उहीँछ!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पचासचोटिमा पच्चीसचोटि फुस्सालाई र पच्चीसचोटिउसलाई-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकचोटि न एकचोटि त उसलाई घुम्यो कि ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आधाचोटि भन्‌, अनि पत्याउँला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सयको आधामा फ्घासओटा एक हुन्छन्‌ बुझिस्‌ !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यस्ता सय त कति कति- ,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(लडकाहरू फेरि प्रदक्षिणा गरे निस्कम्छन्‌)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यिनीहरूको निख्ाफ कसले छिनिदेला ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छन्‌ नि सब ग्रह चहारेका गुरुहरू ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चहार्न दिनोस्‌, यो ज्ञानको युग होइन, बिज्ञानको पुग हो ।बाबू, ज्ञानकै युग हो विशेष ज्ञानको ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(प्रदक्षिणा गर्दै लङकाहरूको फेरि प्रबेश)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अस्ति ठुलेले त हो नि, कुनाबाट उनीहरूले हाने, म हेड&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मास्टर-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हान्न उफ्रेको उसले त मेरो टाउकोमा खुट्टा ल्याइपुनयाएछ, महद्ता क लोट्यो, म पनि उसैमाथि पर्न लागेँ, भकुण्डोलाईहातले छुन लाग्यो र यसो हात हटाएको त च्यूँडोले सोझैगएर भूइँमा दुलो खन्यो । ओहो, एकचोटि म दुवैपट्टिको गोल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पोस्ट फननन--&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[लडकाहरू निस्कन्छन्‌)भविष्धतलाई हेर्नुहुन्छभने यिनलाई हेर्नोस्‌, भूतलाई हेर्नुहुन्छ-भने मतिर फर्कनोस्‌, वर्तमानलाई हेर्नुहुन्छभने त्यो थाममागएर ऐना हेर्नोस्‌ । बत्ती यसरी निभ्छ- खालि त्यसले उज्यालोपार्दा देखिएको हृदयको स्मृतिमा पाइला अगाडि सर्दै जान्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(एक स्कूलमास्टरको प्रवेश)ओहो, बूढा साहकारहरू पनि आउनुभएको रहेछ !ओहो, पाल्नोस्‌, पाल्नोस्‌ !(बरोर) साहका छोरा त अझ उहीँ छन्‌, हो कि?उही छ।साहका त दुवै अड्डामै जागीरे छन्‌ !अडडामै जागीरै छन्‌ !यी डोलीमा साहुनीहरू आएका ?किन हुन्थ्यो, उनीहरू त हिँडेरै आए ।साहृहरू डोलीमा, घन्य परमेश्वर ! लौ यहाँ त क्रषिअवतार, तर तपाईंले पनि डोली चढेर साहुनीलाई दुलहाबनाएर पछिपछि हिंडाउनु त खै- अलि यो मनले त खामेन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ए।रोगले कहाँ त्यो भन्दो रहेछ र मास्टरसाहेब ! त्यसले बुझचढेपछि त चार हात-खुट्टा टेकाएर घोडा बनाइहाल्दो रहेछ,अनि लट्ठी दिएर हिंडाउँदै हिंडाउँदै घोडालाई घोडी,घोडीलाई खच्चर पार्दो रहेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसो भए, खच्चर डोलीमा ? भएन, भएन, सेतो घुम्टो ओढेरसेतै पछघौराले छाती ढाकेकी कालकी डोला डोलीमा ।मानिस उहाँ डेढ सय वर्षभन्दा पनि बढी बाँच्न लागे, तपाईं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म $&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूप-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मास्टर-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अहिल्चै कालको डोला भएर डोलीमा हल्लन लाग्नुभयो ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धा बाँच्यो ? जसको नाम बाँचिरहेछ, नत्र बाँचेर मात्र केगर्नु ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नामले के गर्नु र अर्को जन्ममा रघुवंशको श्लोकको राम्रोव्याख्या गर्न सकेन भनेर गुरुले कालिदासको कनसिरीका रौंउखेले होलान्‌, ती कविले चाहिँ सरस्वती अवतार सम्झेरआफ्नो तस्बीरसित आफैँले प्रार्थना गरे होलान्‌- &#039;प्रभुकोशतांश प्रतिभा पाउँ !&#039; यस्तो नामको के मतलब छ, तपाईंसरस्वतीका पुजारीलाई थाहा भए कृपा गर्नोस्‌ न ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म के जानूँ ? मेरो आँखामा त प्रत्यक्ष प्रमाण पनिपूर्णविश्वासयोग्य छैन, अनुमान प्रमाण त अर्घ-विश्वास-योग्य पनि छैन । विश्वास नगरी हामी श्वास पनि लिनसक्तैनौं, तर हाम्रो श्वास लिनमा विश्वास गर्न अधिकारछैन, किनभने निश्चय छैन; मृत्यु पनि निश्चयात्मकछैन- मृत्यु एक नबिराएर गनिरहन्छ, तसर्थ हामी मूर्खता-सित मृत्युलाई अनिश्चित ठहराउँछौं, तर यही ठहराउनामाहाम्रो के अधिकार छ ! त्यसैले म अनुमान गर्दा आफैँलाज मान्दछु तापनि नामको विषयमा मेरो तर्कसारयही हो- हामी नाम हौं, जस्तो हाम्रो वासनाको पुञ्ज हामीहैं, वासना आत्माको होभने नाम पनि उसैको हो ।वासना स्मृतिमा रहन्छ, नाम पनि; नाम केवल नाममात्रहोइन, नाम कर्मको राखिन्छ, कर्म नामको निम्ति गरिन्छ,तसर्थ नाम कर्म हो । नाम अरूमा रहन्छ, त्यसभन्दाजहिले पनि बढी कर्म आफूमा रहन्छ, अब कालिदास-लाई लिञँ- कालिदास उनका नाटक र काव्य हुन्‌,परन्तु त्यति मात्र होइन, कवि सधैँ आफ्नो कविताभन्दाठूलो हुन्छ । हाम्रो अनेक जन्मको कर्मपुञ्ज हामी हौँ,हामी जत्ति जे गछौँ उत्ति नै नाम पाउँछौं । साहजी,आगौभित्र एक कण पनि नजली रहँदैन, पानीभित्रएक कण पनि नभिजी रहँदैन, परमेश्वर साक्षी छन्‌,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
॥ 0 ब&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ख्प-बूढा-मास्टर-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धर्म र पापलाई धर्मराजले जोछ्ता एक परमाणुको तलमाषिपर्न नदिने साक्षी परमेश्वर छन्‌ ।बल्ल पूजा सिद्धचाए ।इन्द्रासन नहल्लाईकन तिनीहरू कैले पूजा छोड्थे !आज हाम्रा छात्रवर्गको सरस्वती पूजा छ, हामीलाई पनिभ्रोजको निम्ता दिएका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(मास्टर सरस्वतीलाई ढौगेर निस्कन्छन्‌)इन्दिरालाई जल-प्रसाद लगिदिन्नौ ?यो पिवामा हालेकी छु ।पकाकते डोलैहरूको मद्दृत लिई सरस्वतीलाई ढोगेर डोली चढी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्कन्छन्‌)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिंड्न सम्छचौ अहिल्यै ? घाम त गदगदी पाकिरहेछ नि ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आ: बिस्तारै जाँदै गर्ने, नत्र पुग्दा अबेर हुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ओह्लदै गर त, म दर्शन गरेर आउँछु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(डोलेहरूसित) मेरो त्यहाँ सिंढीको टाउकोमा राखिछोड ।(रूपबाहेक अरू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(सरस्वतीलाई धेरै बेर ढोग दिएर घुँडा टेकी)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाउको नङले माता, लेख लौ एउटा कुरा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो ललाटमा : मर्ने बेलामा म मुकुन्दको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुख हेरैर यो आँखा पाउँ चिम्लन शान्तिले&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यसको निम्तिमा माता, दे सद्बुद्धिको वर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्दलाई । त्यो तिम्रो भक्तलाई, दया गरी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नदेक यतिका विद्या बढखर्ची हुने गरी-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिंड्ने के धर्म के पाप के चोखो के जुठो भनी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नबनाक महात्मा, जो भिन्त देख्तिन बन्दछ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परचक्रीहरूलाई र आफ्नो बाबुलाइ, नै,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जननी जन्मभूलाई रण्डीलाई विदेशका;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नदेक यतिका विद्या पैसा र रुपियाँ दुवै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सरोवर गरी छान्नै नसक्नेसम्म नास्तिक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुने गरैर जो वेदलाई कुल्चन सक्तछ,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दद&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आमाको बीचछातीमा जो कीला ठोक्न सक्तछ ।यति मात्र तिमी देक जुन पाएर सुस्तरीत्यो आफ्नो आमदानीले पाओस्‌ छाउन जिन्दगी;जुन मन्दिरमा जन्म्यो त्यही धुप भएर त्योहावा पबित्र पारोस्‌ वा जाओस्‌ अन्तसमेत त्योउडेर वा त्यहीं मात्र रुमल्लेर रहोस्‌; अरूजत्ति बढ्ता तिमी फेरि चाहन्छधौ दिन, शुद्ध त्योकेटाकेटी हुँदा लाटा भक्ति प्रीति दया जहाँबाल्दथ्यो त्यसमा ती-ती बाठा तेल त्यहीं धपोस्‌ ।त्यल्लाई शान्तिको भिक्षा देओस्‌ कर्तव्यकर्मलेआमाको सुखमा देओस्‌ सुख नै दुःखले पनि,आमाको दुःखमा डामोस्‌ हिउँ झैं सुखले पनिडेरासम्म गरी फर्कोस्‌ स्वर्गलाई समेत त्योजन्मभूमि बनोस्‌ आफू, आफू होस्‌ जन्मभूमि त्यो !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(निस्कन्छन्‌)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दृश्य ४- पाटन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रातसित बिहानले बिदा मारने बेला । रूपनारायणको घरपछिल्तिरकोबारी । पर्खालबाहिर हातमा घडी लिएको मुकुन्दकोप्रवेश । बीच-बीचमा कुखुरा रचराहरू कराउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्- तल आइरहेको छ जाँचकी झ्यालमन्तिर,कमलाक्षी, तँ के सूर्यलाई पर्खेर आसकीबनी लुकीरहेकी छस्‌ पत्रपट्टलभित्र नैया नुहाइरहेकी छस्‌ तकियालाइ शीतलेतिखारिएको नङले चाुँडालेर जमीनमाफालेको फूलले जस्तै त्यो गुलाफी गुलाफको !(एक छिनपछि)बरु के गर्छ रक्सीले घमण्ड पिउनेहरूक्षणमात्र कतै होश नपाईकन बित्तछौं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा !(सानो माटोको दुक्राले झ्यालमा हिर्काउँछ)छैनस्‌ त्यो कान चिम्लेकी आँखा चिम्लीरहे पनि !! (इन्दिरा झ्यालमा देखापर्दछै)इन्दिरा किन?मुकुन्द- सानो कुरा मेरो अझ बाँकी छ।इन्दिरा- केकुरा?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्- यहाँ आउन । (इन्दिरा भित्र पस्तछे)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दद&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुकुषब&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गुण्डाको ठाँटमा अप्सराहरूस्वर्गबाट त्यसै हामफाल्दछन्‌ जसरी सिनुदेखेर गिद्ध ओर्लन्छन्‌, । म को ! मेरो अलीकतिड्ृशारा पाउनासाथ उल्ले ओर्लनु ठीक हो ?तेरो आज परीक्षा तँ रण्डी होस्‌ कि त चण्डिका ?(इन्दिराको फेरि प्रबेश)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के भर्खरै उठेकी ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म ? नुहाई पनि सिद्धियो,भान्छामा जान लागेकी, के कुरा अझ बाँकीछ ?बिजुलीमा पच्यो चङ्गा बिजुली नै भई उडचो,लद्ठेको प्रीतिमा आफ्नै डोरी बाँकी छ, हातमा,सिद्देन र सबै फेरि के कुरा अझ बाँकी छ?मृत्युको गर्भमा सानो आशा बालक बाँकी छ ।मुख घोइसकेँ भन्छचौ, भान्छामा जान्छु भन्दछथौ !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कपाल कोरेर कैले श्रृङ्गार पार्दछघौ !तपाईंलाई थाहै छ, मेरा श्रृङ्गारदेवता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परदेश गएका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा अठका पनिआँखा छन्‌, सुन झैँ तिम्रो मुख देखेर चम्किलोमिही पुलिक लाएर उजिल्याउन जोसुकैचाहन्छन्‌, पार श्रृङ्गार श्रृङ्ारैलाइ बिन्ति छवास्ता व्यास्ता दया माया कसैको नभए पनि ।अब जल्दो चितामाथि एकैचोटि सिंगासँला,केश सम्याउँला चुल्ठी परेको अगिनले मुखसेतो बनाउँला फाहा खरानीको घसी, टिकाअस्तुको लाउँला, लाली ओठमा रक्तको दली,कालो गाजल धूबाँको आँखामा पोतुँला, अनिकात्रोको पातलो घुम्टो ढाँचा पारेर ओढुँला ।भन्नोस्‌न, के कुरा,हो त्यो !(गौर गरेर) मेरो पनि बिहा अझ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द-इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द-इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भएको छैन ।गर्ने त?पाए गर्थे।उसो भएपर्खनोस्‌ है त लौ, मेरै मामाकी एउटी यहींछोरी छ, बहिनी मेरी, ज्यादै राम्री छ, के त्यही&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुरा चलाउँ ?के मैले बिहा गर्दा तिमी पनि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तपाईंको बिहा यो हातले सबैउतारेको दिनैमा म मर्न पाएँ भने कतिसुखी हुन्थेँ ! सुगालाई छुटघाई सुगिनीसितसीताले झैं धुनी पाले हुँला मैले र घस्रँदैअगिल्लो जन्मको सोही पाप आई डस्यो, अबबिहा गरी कसैलाई मिलाउन सकेँभनेम पुनर्जन्मको हाँगा समाती मर्न पाउँछु ।मेरो यो मनको छायाँमनि अर्कै क्रा थियो ।गरिदिन्छघौ तिमी मेरो विवाह अब इन्दिरा ?देलान्‌, अवश्य नै देलान्‌, कुरा त गरिदिन्छु म,यस्तो वर मिले साग्है खुशी होलान्‌ उनीहरूतर फेरि तपाईंका मित्रले झैं अभागिनीबनाएर नफाल्नू नि बिचरीलाइ व्यर्षमा,पढे गुनेहरूका त भुल्दछन्‌ चुक्तछन्‌ कहीकूवाकी ब्याङ लाटीले कतै काम निराउली,गुरुले झैं दया..राखी राखी दण्ड गरे पनिया झोँकले सजा गर्दा छ ७ चूर्ण परे पनिकमलो दिलमा: खग्रो नचलाउनू ।नराम्री मैभने स्वास्नी दोष के उसको, कतैबजार रूपको छैन; मन नै नपरे पनिआफ्नो, आफू त उसको परेकै हुन्छ, दर्शन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खुशी हुन्छचौ !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
९०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द-इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गर्न त्यो शिरको निति आफ्नो खुट्टा सघैँ दिनूचरणामृतको साथै, खुट्टा धुन दिंदा त्यहाँखिइँदैन तपाईंको; नोक्सान न अलीकतिहुन्छ, जीवन सुध्रन्छ सुखी भै उसको भने ।(अलि सुस्तरी) कुरा अर्कै छ, अर्काको मनभित्रको पस्न सक्छ, त्यहाँ के छ कोही खोज्न सक्तछ ?सौताको बज्ज छातीमा बज्जैदा क कराउलीरोली, शब्द नतौलेर बोल्ली बेहोशमा परी,तर माया दया राखी खालि त्यत्ति बिराममानफ्याँक्नु, अगिनले पोल्दा कराउँदछ जो पनिके कुरा अबलाको झन्‌ तर्सन्छन्‌ &#039;हाउ&#039; मा पनिअसहच दु:खमा कोही द्यौतालाई सराप्तछन्‌,जब ईश्वरको न्याय बलेको स्पष्ट देख्तछन्‌पछि त्यै मुखले फेरि पछितो गर्दछन्‌ उनै,आफूलाई त्यहीं होमी ती प्रायश्चित्त गर्दछन्‌,पति हुन्‌ देवता हाम्रा ठूला ब्रह्मा महेश्वरराम कृष्णहरूभन्दा पनि, ठूलो त्यसै किनभनेर सोध्छ जो दिन्छ प्रीति त्यल्लाइ उत्तर“प्रीतिको प्रेम प्यारो छ जस्तो जीवन जीवको ।&#039;सीताको रिस जो गर्छन्‌ पतिकै निति त्यो पनिप्रेमको पुष्पमा आफ्नो टेक्न आई अरू भनी,त्यसैले सहनालाई दिनोस्‌ समय मात्र, त्योसहन्छै, घाउमा खाटा समयैले गराउँछ,प्रेमीको श्राद्धभा फेरि समयैले हँसाउँछ,दिनोस्‌ समय, त्यो आफैँ बौलाई पछि याक्तछे,उसको आँसुको वर्षा समयैले सुकाउँछ ।जने होस्‌ अब खुला हुन्छ, कतिसम्म मिचूँ मुदु !(एकैछिन बामिएर)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा, देवी मेरो हृदय-मन्दिर-भित्रकै, म तिमीलाई पाए गर्छु बिहा अरू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
९१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुकुन्द-इन्बिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डइन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरा लेखा सबै स्वास्नीमान्छै आमासमान छन्‌म मर्छु विष खाएर हुन्न भन्छधौभने तिमी,बोल, बोल म आशाको पाशमा मस्किँदै गएँ ।आजसम्म तपाईंमा मेरो भक्ति थियो, पिताजस्तो नै लाग्दथ्यो मीठो बोली वचनले सधैंअब त्यो मूर्तिमा देख्छु यमराज भयङ्रसब भक्ति डढ्यो मेरो ।इन्दिरा, मार मार लौ,आफ्नो मन्दिर आफैँले भत्काक, म खुशी भईचिताको दाउरा खोज्छु तिम्रो नाम जपी जपी;उसको गर्दछभौ माया जो घृणा गर्छ केवल,उसलाई घुणा गछौं जो माया गर्छ निश्चल,यो अन्याय तिमी गछर्धौ ममाथि, जगदीश्वरतिमीमाथि यसै गर्नन्‌ ।टाढा राम भएपछिकस्तो साहसले बोल्छन्‌ गल्लीका सन रावण !कि गाँजाले तपाईंको बुद्धिबाट सुगन्ध नैफुकी फुकी उडाएर सपना बटुलीकनत्यक्षभित्र धुनी राख्यो ? मित्र या मित्र नै भयो?संसारलाइ धिक्कार जहाँ दु:ख र पाप छन्‌ !दश रण्डी लिई हिंड्छ जो त्यो पोइ मरे पनिस्वास्नी आफ्नो जवानी के त्यसै फालोस्‌ इनारमा ?बलि संग्राममा गर्छन्‌ देशको निति यौवनलाखौं युवक, हो आफ्ना तिनै युवकलाइ नैबलि यौवनको गर्छन्‌ विधवा युवतीहरू !त्यो त पापी छ, पापी छ, देशभक्त भएत हो!देशभक्ति त मर्दैन चुत्यै देश भए पनिपतिभक्ति त मर्दैन पापी पति भए पनि।त्यो भक्ति जालले मर्छ, नमरे मार्नुपर्दछ ।के भयो, यो नशा हो या सत्य बोली ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
९२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुकृत्-इन्दिरा-मुकुन्द&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्बिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुषुल”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुवै कुरा,सत्य बोली, नशा चाहिं प्रेमीको तप्त प्रेमको ।परमेश्वर, यो पाप म सुन्न पनि सक्तिनँ ।त्यो पापको जरा काट्न नसुन्न पनि सक्तिनँ ।के पाप ? द्रौपदीले के गरिन्‌ ? कुन्ती कहाँ गइन्‌ ?रानी सत्यबतीको के भयो ! अम्बालिका अनिअम्बिकाले गरे के के ? महाभारतका यिनैबीर माता, यिनै वीर महिला होइनन्‌ ? यदिपट्टी बाँधेर आँखामा गान्धारी झैं सती बनेबाँझी भएर मर्नेछयौ, सय पुत्र भए पनिसीता भन्छौ, उही सीता जल्लाई बात लाउँदैत्यागेर रामले फाले घोर जङ्गलमा, तिमीहेर. संसारको नीति अनि धिक्कार बेसरीआफूलाई, मलाई र तिम्रो पति भनाउँदोमुकुन्दलाइयो मेरै पाप हो जे गरे पनिआफ्नो भाग्य-विधाताले हाँसेर नसहीकनअखरूकहाँ गई दु:ख पोख्खेको फल हो । किनतिनै नारीहरूमा के महाभारत युद्धकोछैन उत्तरदायित्व ? के भो भारतको ?अझसुन यो छभने कान, हेर आँखा भए यतासुँघ यो छभने नाक, पिक यो छभने मुखअगि आउ भए खुट्टा, भए हात समात यो,भ्रए दिल दरो पार, भए छाती खुला गर,संसारले बिचारेर जे धर्म हहराउँछत्यो हो संसारको धर्म, जाति जे ठहराउँछजातिको हो त्यही घर्म, तिमी जे ठहन्याउँछचौत्यो तिम्रो धर्म हो, तिम्रै सबभन्दा प्रिया तिमीतिमी जे रोज्दछघौ आफैँ त्यो तिम्रो मन पर्दछ,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
९३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमीलाई तिमीले नै यदि धोखा दियौभनेयो विश्वमा अरू फेरि कोही पनि बचाउनसक्तैन, वेदले ज्ञान पशुलाई दिलाउनसक्तैन, ब्रह्म हामीमा हामी आफैं बनाउँछौं ।तसर्थ इन्दिरा, आफ्ना आँखा फोडेर कान तीअरूको हातमा सुम्पी नुही हिंड्नु पशुत्व हो ।ठूलो प्रकृतिको बासा फुकाई हेर पुस्तककहीं बन्धनमा पोधीलाई के पाउँछौ त्यहाँ ?जत्ति स्वाधीनता माथि हेर आकाशमा चरीउत्ति स्वच्छन्दको हावा चाखी त्यो चिर्बिराउँछे ।जाली पुरुषको क्र्र स्वार्थसाधन जालमाबेह्विन्छयौ फन्फनी आफैँ ? माछा खोज्न समुद्रकोछोड्दखघौ हातको माछा ? थोरै सुख दिई तिमीधेरै बटुल्न चाहन्छौ, लाटा छन्‌ परमेश्वर ?सुख ता खालि मौका हो, या जवानी गएपछितिमी सान गरी डाक्छथौ डाँडामाथि चढीचढी ?म तिम्रो दास ऐले छु, पाउ मल्न तयार छु,नपाए अहिले फेरि दासी हुन्छु&#039; भने पनिदुःखको गुँड मूरखैको केशमा हुन्छ । लौ तिमीबर्साक प्रेमको बोली सुनोस्‌ चातकले ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अबयहाँ नकुल्चनोस्‌ पापी खुट्टाले, यस ठाउँमामेरा स्वामी हिँडेका छन्‌, त्यसैले यो पवित्र छ ।जानोस्‌ घर गई आफ्नी आमालाई फकाउनोस्‌ !पापी कुरा सुनेँ मैले प्रायश्चित्त म गर्दछु,जल मात्र पिई आज व्रत बस्तछु; ईश्वरमेरो त्यो प्रेमको मूर्ति जो मलाई ठ्वाउँछत्यसैले अझ प्यारो छ त्यो, यो वचन मात्रलेअधबा मनले दोष उनलाई अलीकति ।मैले केही दिएको नै भए नाथ, क्षमा गर !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
९४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द:इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुकुन्द-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुराण सुन्न आएकी स्वामीको नामको यहाँ,निन्दा मात्र सुनेँ मैले, पाप लाग्यो क्षमा गर !इन्दिरा, अझ मौका छ, विचार गर ।हे प्रभु,यमदूत यहाँ आई पातालतिर डाम्तछमलाई, के गरेँ मैले दुःख नै पाप हो ?तिमी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पापिनी हौ, म आएर तल लान समात्तछु।(मुकुन्द पर्खालमाथि चढ्दछ)कराइदिन्छु चण्डाल, घरै फुट्ने हिसाबलेहावामा बिजुली पर्ने गरेर अब, भित्रकोभकुण्डोमा दबी शत्रु आएको होस्‌, चिन्हेँ, कितअनुहार लुकाएर भाग्‌ तेरो पापपिण्डको,जा, जा, जा, जा ।(ओर्लेर) तँलाई म घोखा दिन्छु ।मलाइ तँपापीले दिन के समक्लास्‌, घोखा नै कर्ममा भएम आफैँ खान्छु त्यो खोस्न तँ सक्तैनस्‌तै के अनजोरी खोज्छेस्‌ ? म यो सेखी नझारीकन छोड्दिनँ,दुना गरेर &#039;मे मे&#039; र &#039;रो रो&#039; भन्दै घिसार्दछुजसरी बलि गर्नेले बोकालाई धिसार्दछ ।बिग्रन्छ जसको भाग्य उसको बुद्धि सड्दछमर्नै रोगीहरूलाई औषध्ै विष बन्दछ ।कृहुँदा कुहुँदा धेरै जसको मुखमा झिंगाभुसुना सब भन्केर गर्छन्‌ नित्य प्रदक्षिणा,बाटोको बीचमा जुत्ता मिल्केको जो सिरान छजसको, त्यै अघोरीले पनि पीप बराबरहेला गरेर जल्लाई फालेको छ, उ गर्दछेअभिमान यहाँ-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
९५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा- राम, राम ! (इन्दिरा कान थुनी निस्कन्छे)मुकुन्द- देवी हँदै गई ।दुःखीको घरमा मात्र तेरो बास हुने भए&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हे ईश्वर, दया राखी मलाई अझ दुःखदे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[निस्कन्छ)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनि छेपारो पालिस्‌, बाबू, सानो ठाउँ, एकचालीस भन्योघुमिरहेको ढुङ्गाको पढ्नोस्‌, बाबू, हटाएको हेर्नुहुन्छभनेभन्दो रहेछ मृत्युलाई बिवा कोरेर आँखामा प्रायड्चित्त&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
९६&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनाचा-भवदेव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनाचा-भवदेव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनाचा-भवदेव-पुनाचा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भवदेव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पञ्चम अङ्कदृश्य १ - पाटन । बिहानीपख&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भवदेव र पुनाचाको प्रवेश ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द अझ आएन, हातका रौंहरू पनिदेखिने अब बेला भो । खेलौं आ एक हात तबाघचाल, त्यहाँ काठ होला भित्र दराजमालेन। (पुनाचा त्यसै गर्छ)के के भयो होला आजको जाँचमा पुना ?घोकेको पाथ संझेकै होला- बाघ म लिन्छुहै?हुन्छ, बाख्रा यता ले त, गनेर- अब आज छ,इन्दिरा फसिदिन्छे कि ?(बसेर खेल्न घाल्छन्‌)ठाहा डिनुहुँदैन र ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- जनै छौएर किरिया हालिहालेँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ट।तैपनिकिरियाकाष्टमा फेरि परिहालिस्‌ ।हुने भए&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ढर्ममा हेलिडिन्ठघो यो किरियालाइ टा म ट।चाले, चाल्‌- किरिया हाल्नु बलियो मन पार्नु हो,खसाले किरियालाई मुखको झ्यालबाट त्योमनको जगको ईँट खल्बलाउन पुग्दछ,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
९७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनाचा-भवदेव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनाचा-भवदेव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनाखा-भ्रवदेव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भ्वदेव-मुकुन्द-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भ्रवदेव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मन भत्म्योभने हामी पुरिन्छौं भूइँमा गिरी,त्यही धुनिन्छ यो आत्मा गँडघौलाको शरीरमा ।लेखी तिलकले ठूलो लिपि पारी निधारमा&#039;हुँ ब्राह्मण&#039; भनी योग्य बन्न सक्तैन ब्राह्मणसत्य चन्दनले मात्र हुन्छ ब्राह्मण ब्राह्मणयधार्थमा- भयो मेरो पालि ? लौ, धुनियो अबयो त- के कलकत्तामै जाला फेरि मुकुन्द हँ ?खाएँ ।पुर्ने !यटा खाएँ!थुने फेरि यता पनिके खेल्दछस्‌ तँ जा- भन्न कसो गर्ला मुकुन्द हँ ?डैव जानोस्‌ !हुने हुन्छ, त्यसै हामी डराउँछौं,पाप दुर्बलता नै हो, हो त्यो दुर्बलता डर,डरले दु:ख टरदैंन, डरले सुख टार्दछ ।लौ, फेरि थुनियो, भैगो, आए, हेर्‌ तँ उतातिर ।(मुकुन्दको प्रवेश)लडाईँ के भयो ?(गम खाएर) जीत।(उठेर पर गई) कसको ?व्यवहारमाउसको हार मात्रै छ।सोझै भनन विन्ति छ ।(त्रिपाईमा बस्तछन्‌)[त्रिपाईमन्तिर बसी भवदेवको घुँडा समातेर)आफ्नो मुख गन्हाएर थुकेँछु अन्धकारमाउज्यालो जब भो देखेँ मेरो थूक त मूर्तिमापरेछ, मुखमै लक्ष्मीमाताको, अब आँसुलेप॒खाली पाप कटद्तैन, नुनिलो हिन्दसागर-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
९८&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्ब-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भित्रै हालेर घोए तापनि त्यो पाप-थूककोडाम जाँदैन; हा ! शालिग्राम लक्ष्मीनरायणसुनको लोभले फोडेँ, सारा नेपाल जङ्गलपहाडभरि खोजेर खोटो जम्मा गरै पनित्यो जोडिँदैन, यो हात मात्र जोडेर के अब !मलाई त खुशी लाग्यो !खुशीसाध बिदा दिनोस्‌,म प्रायडिचत्तमा जान्छु ।कहाँ ?शुद्ध हिमालमा,बालेर पछितो सारालाई सल्काइदिन्छु मभोज मोजमजा हाहा हिही गाना रिमीझिमी ।तातो रगत यो चीसो हावा खाई चिस्याउँछु,सफा हृदय पारेर इन्दिरा-मूर्ति थाप्तछु,उम्कन्ने सुख सम्झेर दुःखको सम्झना मिले,दुःखलाई अँगालेर दु:खकै देह बन्दछु ।हिउँमा मुख यो गाड्ख्नु इन्दिराले जहाँतकहेर्न लायक बन्दैन ।पापमा पाप थप्तछौँ ?यतिसम्म कुटी पाग्यौ निर्दयी भै वियोगिनी,अब के विधवा पारी खलमा खूब पिन्दछौ !निर्दोषी अबलामाथि दया गर, दया गर ।ती एण्डीहरुको जस्तो राम्रो आँखा भएन रइन्दिराका दुवै आँखा फोडिदिन्छौ ?गयो अब&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यो नशा विषको मैले धूवाँको, सुन्दरीहरूसंसारभरका जम्मा भई माहुर रूपकोबनाए पनि त्यो मेरो इन्दिराको स्वरूपकोखुट्टामा कत खत । अब सुन्दर खूप होभन्दछन्‌ त्यो जान्न थालेँ, विवेक त&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
९९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भ्वदेव-मुकुन्द-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भावले&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जान्दो रहेछ हृदयै, आँखा जान्दो रहेनछ;अब जानेर के गर्नु, ढुङ्गा बेचिसकेपछिधाहा पु ७.कि०4 हीरा. मात्र रहेछ त्यो।(मुकुन्दको समातेर)किन व्र्यषैं यसो भन्छौ ? अब के काम आँतुको ?पुछी सबै बुझाउ त्यो हावालाई बिहानको ।जो भयो सौ भयो बनिर्स, नयाँ जन्म भयो अबहरिया पातले फेरि सुकेको वन ढाकियो,जवानी कोपिला हाँसे सुगन्धी सासमा चली ।लिएर फूलको माला कुष्णदेबलमा गईतिमी घण्ट बजाक, म शङ्ख फुक्तछु, यो पुनाप्रेमजमिलनको गीत गाओस्‌, पाटनका सबैदौडेर रमिता हेर्न जाकन्‌; आनन्दमा परीहर्षपुष्प सबै वर्षा गरून्ग, मङ्गलको ध्वनिरूपको घरको नाच्तै नाच्तै जाओस्‌ सुखी सुसीतारा देखा परून्‌, फाटोस्‌ घना बादल दुःखकोबाटुला : चन्द्रमा बोलून्‌, कोठाभित्र पतिव्रताडुन्दिराको ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भयो बाजे म खुस्दिनँ, म खुल्दिनँ,नमार्नोस्‌ लोभ देखाई पापीलाई असम्भवबैकृण्ठको । जहाँ नीचा जातका झारपात छन्‌,बास्ना नआउने फूल नमीठो फल छन्‌ जहाँओर्ली ओर्ली उही जाओस्‌ नीचा शिर गरेर त्योआँखा तल लतारेर जसको दिल नीच छ!तिमी नीच भए लाखौँ लाखौं मानिस नीच छन्‌ !हुँदैन उच्च यो नीच अरू नीच भए पनि,इन्दिरा जसकी स्त्री छ त्यो उच्च पनि नीच छ,अझ नीच त-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो पृथ्वी काँढाको झाङ हो, कुनैभाँचेको छैन खुट्टाको घाउले, अरुको कुरा !-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१००&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ज्यादै होश गरी सुस्त हिंड्नेको पनि पैतलात्यसै छिया छिया हुन्छ, छिटो हिंड्नेहरू त झन्‌खुट्टा नै पाउँदैनन्‌ ती केही पर पुगेपछिकरोडौंमा करोडौंमा एउटा दुइटाबिझ्दैमा पहिला काँढा आकाशतिर हेर्दछन्‌देख्तछन्‌ उसलाई हाँसी हेरिरहेछ जोनहिँडी हात जोडेर रोई रोई फलाक्तछन्‌-“लामो डोरी खसालेर उतार परमेश्बर !&#039;जो उत्रन्छ &#039; उतैलाई जगदीश उतार्दछ,तल गर्नेहरूलाई जगदीश्वर गाड्दछ,ह्वौं हाम्रो कर्मको कर्मी हामी नै; -नीच कर्मकोम प्रायश्चित्तमा जान्छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाजी के छ मुकुन्द, त्योबिर्स्यी ? घर गई आफ्नो प्रायश्चित्त तिमी गर,स्त्रीको चुँडेर फालेथ्यौी कलेजा जुन हातलेअब आफ्नो चुँडालेर सट्टा देक तिमी उहीहातले, सुखका कोश आफ्ना जति सबै तिमीबुझाक इन्दिरालाई, आमा, बाबु र देशकोसेवा गरेर आफूले जति दुःख दियौ अगितिनलाई सबै फिर्ता लेक, जाङ, महेश्वरमाफी देलान्‌ तिमीलाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मलाई, माफ दिन्नँ म,तपाईलाइ थाहा छ मेरा पापहरू जति,त्योभन्दा अझ पापी छु म, माफी दिन सक्तिनँअबदेखि म रक्सी र चुरोट कहिल्यै पनिछुन्नँ, झूटो कुरा ज्यानै गए पनि म बोल्दिनँ,कुभलो म चिताउन्नै कसैको पनि, चोर्दिनँ,हिंसा गर्दिनँ, रोजिन्दा नुहाउँछु |“गीता पाठ गरी सुत्छु, स्वदेशी थुक ३७०० लासधैभरि, कहाँसम्मन्‌ छ र मेरो 2 ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१०१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सधैंभरि, जहाँसम्मन्‌ आत्माधात म गर्दिनँअगाडि उसकै ।(डराई ठट्टाको लयले)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाजी हामीमा कसले जित्यो ?हार्नेले ? सत्यता भन्ने त्यो टाढा कति कोस छ ?(ठट्टा छोडेर)तिमी त इन्दिराको पो धन हौ, मर्न पाउँछौँ ?तिम्री हुन्‌ इन्दिरा, मार उनीलाई गई बरु ।मैले स्वतन्त्रता पाएँ विषमा पौड्न, मर्न मपरतन्त्र बनुँ ? हुन्छ, एकचोटि म जाँच्तछुफेरि; त्यो जाँच आफैँले आफ्नै निर्णय भाग्यको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गर्ने ।अनि ?स्वयं आफ्नो बलि गर्ने अगिल्तिरदेवीकोके खुशी होलिन्‌ देवी ?संसार जान्दछजहाँ रगतको धारा खस्छ नित्य अदूट नै,पशुत्व पशुको घट्छ जुन दुर्बल नीच छ,रहन्छ बलियो उच्च मनुष्यत्व मनुष्यको ।स्वाद जान्दछ जिब्रो, यो हात मस्किन जान्दछबुद्धि जान्दछ सामग्री, खुक्री कादन जान्दछ,धर्म या पाप हो भन्ने कुरा आकाश जान्दछ,जसको मुटु चल्दैन पशु त्यो मर्न जान्दछ ।सब जान तिमी बाङ्गो क्रा, सोझो करामतरूपलाई सबै थाहा दिन जान्दछु (उठ्तछन्‌)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(उठेर भवदेवलाई समाती) पर्खनोस्‌पर्खने पछि पर्नेछ, सत्यानाश पुग्योभनेअगाडि दौडमा ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो आखिरी जाँच बाँकि छ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१०२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनि मात्र तपाईंको ठेगाना लाग्छ जीतको ।घुर्कीफुर्कीहरू स्वास्नीमान्छेको हातले सबैनझारीकन जाँदैन; मौका यो एउटा दिनोस्‌मलाई र उसैलाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनि के गर्दछौ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिब&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जस्तो नचाउँछन्‌ नाच्छु ।(बसेर) तिमी के के त गर्दछौ,गोहीको मुखमा भाँडा डोरी यो हातमा गरीथियो तानिरहेको जो झिकी न्वारानको बल,गोहीले च्वाट्ट छाडेर भाग्यो, त्यो हुत्तिदै लडोपच्चिल्तिर जता अर्को गहिरो पोखरी थियो,अवस्था उसकै ठीक हाम्रो पारिदियौ । पुना,यो सारा सपना तातो पानीसित मिसाउँदै ।(मुकुन्द बिस्तारै निस्कन्छ)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(सुस्तरी)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो मान्छे ठीकको छैन यल्लाई एकलै नछोड्‌ ।(सुस्तरी)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मर्छु टा मुखले भन्छ गाह्रो पो हुन्छ मर्नु ट।त्यसो नभन्‌, कतै मर्नुपर्ला भनी डराउँदैइमशानमा लुकी आफ्नो प्यारो ज्यान बचाउँछलुते श्याल, कुनै गर्छन्‌ भ्रूणहत्या गनी “गतीआफ्नो अत्यन्त नै प्यारो नाकलाई बचाउन;परन्तु जब भत्किन्छ सहने ठाउँ भित्रको,जब कीरा परी स्याउँस्याउँ मगज सडदछ,जब आँखाहरूभित्र तातेका झीर घुस्तछन्‌,जब कानहरू भर्छुन्‌ कनसुत्ला पचासले,जब नाकहरू आफैँ कुहिएर गन्हाउँछन्‌,जन मासुसितै छाला फत्फती झर्न थाल्दछन्‌,जन नन्काउँदै देह छिन्दछन्‌ यी नसाहरू,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१०३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आगो लागेर छातीमा दशै द्वार खुला भईजब लप्काहरू निस्की सबै रउँ जलाउँछन्‌,अनि-अनि-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निरोगी बलवान्‌ पढ्ठो बुद्धिमान्‌ भरलोकको,यो जगद्भरको राम्रो यो जगद्भरको धनी,चक्रवर्ती छ जो सोही पनि केवल मृत्युकोशिकार बन्न चाहन्छ रोजी खोजी सदै सदैवाणलाई लखेटेर छाती थापी खुशी हुँदै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१०४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(निस्कन्छन्‌)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वृश्य २- उहीँसूपस्ति हुने बेला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूपनारायणको सुत्नै कोठा । रूपनारायण र बूढा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बसिरहेका । घनमती र राजामती एउटा ढक्की-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बरिपरि बत्ती कातिरहेका । ब्राह्मणहरू सुग्री पाठसिध्याएर जलप्रसाव बाँडी निस्कन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजामती- (प्रसाद लाउँदै) परमेश्वर, काशीमा चाँडै डोरोबाटो लाइदेक ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घनमती- तपाईंको एक घाम त भयो, होइन !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजामती- एउटा जगन्नाथजीमा त गएँ नि ? अन्त भनेको अब त्यस्तै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो, काशीमा गएर । बिसुक्क मर्न गए पुग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कूपनारायण- किन मरण अन्त ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजामती- काशीमा गरे मुक्ति मिल्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूपनारायण- उसो भए त त्यहाँ जतिसुकै पापको बजार खोले पनि भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बृढा- हो, भनन बाबू, मलाई सधैँ काशी लगिदे भनेर द्वाक द्वाकद्वाक गरिरहन्छे बूढी, म भन्छु ए, काशी आफ्नो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छ्‌्।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजामती- मनमा के छैन, धर्म पनि यहीं छ, पाप पनि यहीं छ, मनकोपाप पखाल्तन त काशी जानुपन्यो कि ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बूढा- पाप पखाल्दा धर्मसमेत पखालिन्छ- काशीमरणले पापपखालिन्छ, तर आफ्नो जन्मभूमि नेपालमा नमरेबापत, मर्ननचाहेबापत धर्म पखालिन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ख्प- हाम्रा पूर्वजहरूले स्वास्नीमान्छेलाई हरेक पाठ पढाएका छन्‌-माता, पिता, पति, पुत्र, गुरु, देवता, धर्म, कर्म इत्यादिलाई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१०५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न्‌ढा-रूप-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चिन्ने बनाएका छन्‌ तर जन्मभूमिको पाठ पढाउँदा ज्यादा नैहेलचेक्स्याइ गरे । बह अरू केही नपढाएर खालि जन्मभूमिकास्तोत्र मात्र घोकाएका भए त्यहीँ माता, पिता, पति, धर्मइत्यादि सब झन्‌ स्पष्ट भएर चिन्हिन्थे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनीहरू विशेष उदार बने, अनि जन्मभूमि नभनेर भारतभूमि,पुण्यभूमि भन्त लागे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अझ सजिलो त खालि भूमिमाता भने हुन्थ्यो, तर केवल नातालाउँदैमा कोही मित्र बन्दैन, अरिनल्लाई मेरो मित्र भनेरअङ्माल गर्न जानेलाई अगिनेले शत्रुलाई जस्तै पोलिदिन्छ,तसर्थ हामीलाई जो प्यारा पुत्र गन्दछन्‌ तिनै हाम्रा पूज्यमाता वा पिता हुन्‌, जो हामीलाई प्यारा प्रजा सम्झन्छन्‌ तिनैहाम्रा पूजनीय राजा हुन्‌, जो हाम्रा स्त्री, धन: लुदून आउनेबैरीहरूका हतियारको आँधीलाई छातीको बाँध बाँधेररोक्तछन्‌ तिनै हाम्रा बीर सिपाही हुन्‌, जो हामीलाईविदेशीहरूसित लडाउँदा नहानै आँखो दिन्छन्‌ तिनै हाम्राआदरणीय गुर्‌ हुन्‌, जो हाम्रो सुदिनमा हाँसो र दुर्दिनमा आँसुबन्दछन्‌ हाम्रा सहोदर भाइ हुन्‌, जो आफ्नो छातीकोतरी हामीलाई अन्नामृत चुसाइरहेकी छिन्‌ उनै हाम्रीआमा, दर्शनीया जन्मभूमि हुन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुन, सुन, छूप के १७७० !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जुन काखमा हामी ) जुन काखमा हामी हुक्यौँ, त्यहीकाख के मर्ने बेलामा कामेको खुट्टाले कुल्चिन पनि लायककोछैन ? स्वर्गमा सबलाई ठाउँ छ । त्यसलाई छैन, जो बैगुनीछ; बैगुनी छ; बैगुनी छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूप, मर्ने बेलामा जसले जति अमूल्य खरानी मातृभूमिकोपाउमा चढाउन सक्यो उति खुशी भएर त्यसको खरानी0 ०५१ । तिनाथ आफ्नो निधारमा दल्नुहुन्छ, त्यो जल्योभने0७ १०० खप्परमा भिक्षा माग्नुहुन्छ, त्यो डुब्योभने त्यसैकोहाडले हिमालको सबभन्दा अग्लो शिखर कुच्याउनुहुन्छ, त्योखस्योभने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१०६&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजामती-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बूढा-राजामती-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बृढा-इन्दिरा-कपइन्दिरा-सरूप-इन्दिरा-क्प-डवन्बिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साँच्ची नै मेरो मत फर्क्यो, (एक चिम्टी खरानी लिएर) योखरानी छोएर किरिया हालें, अब म धाम जाने कुरा उठाउँदिनँ,नेपालबाट सोझै स्वर्गधाम जाग्छु, अन्त कतै जान्ने ।गएर के हानि छ, फर्के त भइहाल्यो ।नाइँ, नाइँ, नाइँ, नाइँ, अहिलेको कुरा मेरो मनमा गडिसक्यो,आफ्नै आमाको अनुहार भूइँमा झलझली देख्न लागें, यहाँमरेंभने म अवश्य आमालाई भेद्नेछु, अन्त मरेँभने- नाइँनाइँ, अब म कतै निस्कने छोरी होइन ।मेरो पनि चार धाम जाने संकल्प थियो, अब सट्टामा चारनारायण घुम्छु ।यो त बेश हो, तर अन्तबाट धर्म बटुलेर &#039;यहाँ ल्याउनाले पनिकेही हानि छैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ललामी अन्तबाट पाप मात्र बदुलेर ल्याउन सम्झौँ, पहाँफर्केपछि त्यसको प्रायश्चित्त गर्नुपर्छ । बाहिर गई ज्ञानपाइन्छ ॥८१५% करोडौं रुपियाँ खर्च गरे पनि पाइने वस्तुहोइन, स्फुरण हुने कुरा हो; हिँड्दा धर्म हुन्छभनूँभने डोले, ड्राइभर, घोडा, बयलहरूको टाउकोमाथि हाम्रोलात पर्दछ; परमेश्वरको दर्शन पाइन्छ भनूँभने मूर्ति त दूर्बीनमात्र ,हो, परमेश्वर हामीभित्रै छन्‌; उनलाई खोज्नहिड्नेहरूलेः भूल गरे, पलेटी कस्नेले नै पाए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(इन्दिराको प्रवेश)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आइपुगिछन; आज प्रसाद ला ।माइतबाट आयौ, नानी ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्धी-सम्धिनीलाई भेटथौ !?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बा त बाहिर निस्कनुभएको रहेछ, भर्खर जस्तो फर्कनुभो ।भेटी त?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भेटेँ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्घीले केरे?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बेशै छ ? भनेर सोध्नुहुन्थ्यो, बेशै छ भनें !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१०७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूप-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूप&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूप-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-राजामती-इन्बिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ख्प-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्बिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूप-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-राजामती-इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिमान-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूप-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुना-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्धिनीले नि?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किन चाँडचाँडै नआएकी भनेर त्यसै रुनुभयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमीले के भन्यौ त?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टाढा छ, आउँछु भनें ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अरू ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खै अरू त- तपाईंलाई सञ्चो नभएको कस्तो भयो,भन्नुहुन्थ्यो; उस्तै हो भनेँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनि ?सासूलाई पनि दुवै जनाको सलाम छ रे ।अँ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मामाकी छोरी- बहिनीको पनि बिहाको कुरा छिनिसके रे ।४ अस्ति छिने, नानीलाई मैले भनिनँ र?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अहँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अरू मुकुन्दको कुरा भएन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कैले फर्कने रे?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के भन्यौ त ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठेगान छैन भनिदिएँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(एकै छिनपछि) तिम्रो जुवाइँलाई कस्तो भएछ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निको भयो रे, बरु जुवाइँका भाइलाई सान्है छ रे ।उनलाई पनि कम भयो ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खै कुन्नि ।(विमानको प्रवेश)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनाचा तल आएको छ।आउनू भन्न, जा झट्टै लिएर आ। (विमान निस्कन्छ)पुना यहाँ कताबाट आइपुग्यो । के अचम्म !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(बिमान र पुनाचाको प्रवेश)क्या हो पुना ! कताबाट आइस्‌ ? सञ्चै छ?विमान डाइले बोलाएर ल्यायो ।मलाई देखेर त पुना बेपत्तासित भागेर गएको लौ, बल्लबल्लचैल्याएर ल्याएँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१०८&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूप- किन पुना, किन भागेको ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुना- भागेको ? किन भाग्ठ्यो !रूप- तँ यहाँ कताबाट आइपुगिस्‌ त !? बाजे खै !पुना- बाज्या ट पाल्पामा !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूप- अनि तँ किन आइस्‌ ?पुना- म आएँ टचसै।रूप- बाजेलाई किन एक्लै छोडिस्‌ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुना- बाज्या कटा गयो कटा !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूप- कस्तो सिल्ली रहेछ, बाजे पाल्पा गए भनेको होइन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुना- हो, टघो ट।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूप- फेरि?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुना- ट बाज्या कलकट्टा जानुभो, उटाबात पाल्पा जानुभो; अनिकटा गयो कटा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बूढा- क चाहिँ आयो ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुना- (टाउको हल्लाएर) अँ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूप- बाजेलाई किन छोडिस्‌ भनेको एक्लै ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुना- आच्चे, जा भन्नुभो, आएँ ।रूप- मुकुन्द कहाँछ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुना- बाज्यासितै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूप- बाजेसितै पाल्पा गयो र?पुना- आच्चे, बाजे पाल्पा गयो ।क्य मुकुन्द नि?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुना- कुन्नि !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छ्प- कलकत्तामा त भेटिस्‌ कि?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुना- भेतैँ क ट उही- यहाँ छैन ।रूप- फेरि कुन्नि भनेको केत?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुना- कटा गयो कटा !रूप- क यहाँ नआउने रे ?पुना- काँ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूप- आफ्नो देश ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१०९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुना-रूप-पुना-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूप-पुना-रूप-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुना-सख्प-पुना&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुना-रूप-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुता-रूप-पुना-रूपपुना-रूपबूढा-रूप-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घनमती-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुन्नि म के जानूँ !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द &#039;के के भन्थ्यो ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ञ ट के गर्छु अब- यहाँ खै, के के भन्ठ्यो कुन्नि- क्या हो,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्याहो!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भन्‌, तँलाई घाहा छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठाहा छैन मलाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(बर गएर) भन्‌, भन्‌, म मुकुन्दको जन्म दिने बाबु, उसको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुरा लुकाउनु तँलाई के काम ! भन्‌, भन्‌ झट्टै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उट-मट-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अझ भन्दैतस्‌ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द के गर्ने रै अब ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क ट- अब- मलाई ठाहा छैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छ तँलाई भन्‌, असत्ती, यति नभनी यताबाट जान पाउँदैनस्‌ ।(पुना लबेदाको फेरले आँसु पुछ्छ)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लौ भन्‌, नभनी सुखै पाउँदैनस्‌, (प्याकप्पाकती लाएर)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तँलाई भन्दैनस्‌ त ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मलाई केही ठाहा छैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
होइन, मुकुन्दलाई भेटिस्‌ कि भेटिनस्‌ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मलाई ठाहा छैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तँ बाजेसित कलकत्ता गएको त होस्‌ कि?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठाहा छैन मलाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कस्तो अधर्मी, बेइमान ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भइहाल्यो बाबू, छोडिदेङ, यस्ता बेतालसित के कुरा गर्छौं !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(दाहा किटेर) जा, निक्ली, घस्की, जा !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(नेपथ्यमा) मर्‌, मर्‌ जा । (विमान निस्कन्छ)यसरी रिसाउनुभयो, अब भरे फेरि के हुने हो, घाँटी दुख्योभनेर खाँदै नखाने हो कि, कपाल दुध््यो भनेर सुत्तै नुसुत्ने होकि, छाती दुख्यो भनेर खाँदा पनि नखाने, सुत्ता पनि नसुत्ने- ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूप-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूप-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(रूपनारायणको फेरि प्रवेश)संसारमा धेरै यस्ता सीङ्‌ र पुच्छर नभएका दुई खुटे पशुहरूघाँस खानाको दु:खले मानिसको नाम चोरेर जन्मेका छन्‌ ।यो घुसघुसेलाई धेरै कुरा थाहा छ, बासी छाला चपाएजस्तैकुरा चपाएको हर्नोस्‌ न, कसो मैले त्यसको कपालले रोपाईंगरिनँ, हद अडेँ ।ज्ञान देउ, बाजेले लेखिहालेका छन्‌ नि, दोहो-्याउनु के काम,कुरा दोहो-याउँदा दु:खको अनुभव पनि दोहोरिन्छ, अनिजीवनको बाटो अल्मलिन्छ !खै, वरकै कुराको त पच्चीस रङ छ्‌, टाढाको क्राको झन्‌ केनिधो । भवदेवले मुकुन्दलाई त भेटे ? कुन्नि ! (बस्तछन्‌)धन, मेरो छातीको मालिस बाँकी छ ?होला अलिकति ।ल्याइराख है ।किन, छाती असजिलो भयो ?होइन, धेरै भयो नलाएको, आज लाउँ भनेर ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(बिमानको फेरि प्रवेश)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दब्यो त्यो राँके भूत !तपाईंलाई नरिसाउनुहोस्‌, मेरो केही विराम छैन रे भनिदिनूभनेर गयो ।एकचोटि डाक्‌ त फेरि ।अरू त केही भनेन ।(कराएर) फेरि डाक्‌ भनेको तेरो सम्धीलाई !पर पुगिसक्यो होला, कतातिर गयो, तैपनि डाक्न जाउँ ?भडहाल्यो ।भो बाबू भो, त्यसबाट केही आउँदैन, को किन लिन गयो, कोकिन आएन, त्यसलाई के पत्ता, कीरा कितापको वारपारगर्दछ, तर एक अक्षर पनि बुझ्दैन, मुकुन्दको मुख हेप्यो आयो ।बिचरा मुकुन्दको मायाले पो रोएको होकि न ! कुराघुद्घुटी निल्न लाग्यो, छदाउँ भनेर एक्कासि हप्काइदिइहालेँ,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१११&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिमान-ख््प-विमान-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विमान-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूप-विमान-सू्प-विमान-रू्प-विमान-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विमान-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घनमती-बूढा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“बृढा-रूप-बूढा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
झन्‌ सातो गयो, नत्र एक दुईओटा कुरा त सुन्न पाइन्थ्यो । ।कराएर) जा त विमान, सोझो मुखले बोलाएर ले !पुनालाई ?हो, जातजा!अहिलेसम्म त नेटो काटिसम्यो !धत्‌, अघि नै डाकेको भए हुँदैनथ्यो । तँ यस्तै छस्‌ । अबभोलि भेटिस्‌ भने फकाएर ले हे?अन पनि पुनाले पाटनमा खुग्ने हाल्ला र ? उसको घर तशहरमा पो छ।तँ भोलि सबेरै शहरमा जा त !ङ ससुराली गएको रहेछभने ?कहाँ छ उसको ससुराली ?भक्तपुरमा ।उसो भए सरासर भक्तपुर जान !क ससुराली गएको रहेनछभने ?अल्सीको कुरा जैसीले जान्दैन, अब भोलि तैंले पुनलाई यहाँल्याउन सकिनस्‌भने, तेरै पैसा हालेर एक मोहरको तर्कारीकिनेर ल्याउनू, जा !ल्याउँला सकेसम्म, नसके के लाग्छ, मन्तर गरेर आउनेहोइन !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(निस्कन्छ)जाउं खान तल बगैँचामा ।किन नानी, बगैंचामा ?ए, मलाई वैद्यले सकेसम्म खुला हावामा बस्वू भनेको छ,नभन्दै आजकल ज्वर उनान्सय त पुग्छ सही, तर पैलेकोजस्तो पोल्नेओनेँ छैन, बरु हिजोदेखि-बाबू बाँच; बाँच्नाले नै ढीलो आउने सुखसित भेट हुन्छ ।सुख खोक्रो छ, दुःख मात्र खँदिलो छ ।होइन, होइन बाबू, सुख सूर्य हो, दुःख अन्धकार हो, सुखपरमात्मा हो, दुःख उनको नास्तित्व हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर-सर होइन, फेरि यो कुराले एक घण्टा खान्छ, तलै गएर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गर्नुभए पनि त हुन्छनि ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुन्नि; कोठाको परमात्मा बगैँचामा पनि त होलान्‌ ।(निस्कन्छन्‌)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दृश्य ३ उहीँमध्यरातको केही अगाडि ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिराको कोठा । झ्यालबाट कलिलो जूनछिरिरहेको । खोपामा टुकी बलिरहेको ।इन्दिरा मुख खोलिराखेको झूलभित्रसिरानी तकियामा राखेर भानुभक्तीय रामायणबाँचिरहेकी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा- (लय हालेर) ..,जिउनु घिक्‌ मर्नु निको मर्दछु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चुल्ठो लामु छ झुण्डिनाकत यहाँ डोरी त यै गर्दछु ॥कति लामो छ यो आयु, जति खर्च गरे पनिसकिदैन, म ज्यादा नै घनी छु, तर जीवननपूल छैन, यो जम्मा गरी मोल गयोभनेएक कौडीमा पनि । ओहो, हुने भएआयु बाँड्न म ऐले नै पुग्थे एक मशानमा,;मृत बालकलाई म दिई खर्च पठाउँदैहुँदो रहेछ के जस्तो मृत्युको सपना भनीआमाको काखमा पल्टी तोते बोली सुनाउन;मरेका स्त्रीहरूलाई आफ्नो घर पठाउँदैअझ सेवा गरी पूज्य पतिलाई रिझाउनमरेका पतिको हात पोते धागा चुरा दिईइन्तु चिन्तु भएकी स्त्रीलाई दिन पठाउँदै,आफ्ना आफ्ना सबै प्यारा मरेकालाइ खर्चले&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्यारा प्यारीहरूलाई प्यारी प्यारीहरू दिईपन्छाई आयुको बोझ परी झैँ माथि उड्दयें ।(फेरि लय हालेर)यस्तो निश्चय सुर्गरीकन सिता झुण्डीन आँटिन्‌ जसै ।काम्‌ बित्ला भनि सानु बोलि झटपट्‌ बोल्या हनूमान्‌ तसै ॥(हाइ गरेर किताबमा चिनु लगाई बन्द गर्दछे)उनैको नामको नातासितै बाँचिरहन्छु म,नामै लोग्ने भयो मेरो, उसैसित म बोल्दछु,सुसार उसकै गर्छु, उल्लाई ढोग दिन्छु म,जूठो खान्छु उसैको म, समाती हात डुल्दछु,अङ्माल गरी राती उसैसित म सुत्तछुकहिले कहिले हाँसो आइहाल्योभने पनिहेरी हाँस्छु उसैलाई, मन यो आँसुले भरीअरूले उनको नाम उच्चारण गप्योभनेत्यहीँ मसित बोलेको उनले सुन्न पाउँछु,म मर्दिनँ, त्यसैले म- म मर्दिनँ ! म मर्दिनँ !(किताबलाई ढोगैर गन्क्याउँछे)बेला हिँडिरहेको छ, थामियो यो घडीभने,आई हल्लाइदै मेरो यो बन्द मुदु बिन्ति छ,नत्र के काम चल्तीको जीउँदौ लोकमा बसी ?(गङ्गावतरणको तसवीरलाई हात जोडी)सुखी हुन्छन्‌ भने रक्सी सधैँ पिइरहत्‌ उनीतर बिग्रोस्‌ कलेजा यो मेरो चाहिँ, म केवलयसैका निम्तिमा मात्रै खालि: बाँचरहँ यहाँ ।(पल्टेर भित्रबाट झूल कस्तछे)(झ्यालबाट खुक्री भिरेर मुकुन्दको प्रवेश)(सुस्तरी मनमा)हेला गर्छ कि गर्दैन परमेश्वर जान्दछ ।गम तेरो पोइ&#039; यो बोली फुद्नुभन्दा अगाडि नैअगुल्टो लाजको ठाडै आई टम्म हुने गरी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुखभित्र बुजो हाल्छ । यो चुत्थो अनुहारलेआत्मादास बनी खाई भनाइ सब मूर्खकोहिं हिं गरेर बाँच्नाको को कामछर ? मुत्यु केपिता छैन यहाँ हाम्रो ? उल्टो संसार नै जबधिक्कार गर्छु, काखीमा राख्ली मृत्यु सुताउँछुथुम्धुम्याई कथा हाली &#039;निनि नानी&#039; भनी भनी ।देख्यो दर्शनमा &#039;बाँच्ने इच्छा&#039; सोपनहारलेस्वधर्म जीवको, &#039;इच्छा&#039; नित्शे भन्दछ शक्तिको,चुक्तछन्‌ आत्महत्यामा बौलाहाको बिचारमायिनी, म &#039;सुखको इच्छा&#039; भन्छु, त्यो सुख शान्ति हो,कोही जीवनमा पाङन्‌ म त्यो पाउँछु मृत्युमा ।(बिस्तारै गएर ढोकामा गजबार लाउँछत्यौ आवाजमा इन्दिरा झूल खोलेर हेर्दछे)(प्रकाशकरायौ कि गयो तिम्रो पोइको पनि इज्जततिम्रो पति । कुरा पैले नगरी हात हाल्दिनँ,नडराक ! (इन्दिरा अल बन्द गर्दछै)कराएर के गछ्र्धौ ? सब सोद्दछन्‌,म बात लाउने नै छु, सुन्छ पक्का मुकुन्दलेकेही पछि। तिमी डुन्छचौ सिन्धुभित्र निराशको,पर्नेछ निहुँको चिठ्ठा उसलाई (नरमसित) म बन्दछुतिम्रो हरेक इच्छाको खराउ । (कराएर)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मार्दछयौ तिमी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भक्तलाई ? (रवाफसित)बुझ्यौ, यस्तै जिद्दी गछौं भने अनि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जाला मुकुन्दको ज्यान !(झुल खोल्दछ, इन्दिरालाई त्यहाँनदेखी सिरक झिकेर बाहिर फ्याँक्तछ ।अनि झूल छिनाल्दछ । दुई हातमादुबै नाङ्गा खुकुरी लिएकी इन्दिरा झल-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११६&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-मुकुन्द-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-मुकुन्द-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पछिल्तिर देखिन्छै ।)उसको ज्यान को लिने !व्यर्थमा किन ल्यायौ ती खुकुरी मसितै थियो,लौ यो पनि तिमी लेञ, दाँतले च्याप(खुकुरी इन्बिरातिर फ्याँकिदिन्छ)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब के गर्दछौ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मार्छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षमा गर, दया गर,हामफालेर मर्नेछु नत्र यो झ्यालबाट म ।जसरी सुस्तरी उक्ल्यौ, उसरी ओर्ल्ह सुस्तरी,अववा मुन्टिदै जा, वास्ता छैव मलाइ त्यो,जानु अवश्य नै पर्छ चाहे प्रेत भई हिंड।उसो भए तिमी आफैँ मलाई मार, रेट योप्रेमको बाँसुरी-घोक्रो सातै सुर झिकेर लौ,सुत्ने कोठा तिमी मेरो आलो रगतले लिप,कि फाल खुकुरी छाम मेरो छाती, यहाँ कतिझ्याली पिटीरहेको छ &#039;इन्दिरा, इन्दिरा&#039; भनी ।(इन्दिरा भाग्न खोज्दछे, मुकुन्द छेक्तछ)जाक जाने भए सोझो मुखले, नत्र दु:खकोघना जङ्गलमा आजसम्मन्‌को क्रोध सल्किदैडढेलो लाग्न पुग्नेछ, ज्यानमारा हुनेछु म,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ज्यान जानेछ तिम्रो त ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रेमिकाको अगिल्तिरडर सीमलको भूवा हुँदैन र । तिमी त्यसैजा, जा भन्छौ कलेजाको डोरी किन अलीकतिखुकुलो पार्दिनौ ? उल्टो तान्छघौ आ आ भनी भनीमेरो राम॥ यहाँ आई मार राबणलाइ योपछि त्याग बरु सीतालाई साथ बसी भनीयसरी बन्द कोठामा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
॥ 0&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म खुल्दिनँ, म खुल्दिनँप्रायश्चित्त भयो, तिम्रो हातबाट म मर्दछु !(इन्बिरालाई समाल जान्छ, इन्दिराचिच्याएर दुवै हातको खुकुरीले हान्चछे ।मुकुन्व हात र टाउकोमा लाग्नाले ढल्दछ ।इन्दिरा दौडेर ढोकामा पुग्दछे ।)मान्यौ, खुशी भएँ, तिम्रो जय होस्‌ ! तर इन्दिरा,आधा काटेर राख्दैनन्‌ बलिदानीहरू पनि(छद्‌्पटाउँदै) अधकल्चो भएँ- एकचोटि फेरि वप्यौभनेमर्न पाउँदध्यो बाली, हुन्थ्यो शीतल देह यो-तमाम जीउमा डाहा भयो, मार, दया गरनहोक निष्ठुरी साह्रै । (इन्दिरा फेरि फर्केर आउँछे)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(नेपथ्यमा) हो है तिम्रो मुकुन्द त्यो,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा, इन्दिरा मर्ला खुकुरी खोस झट्ट नै।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(दिक्कले हाँसेर)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चिन्हिनौ अझ ! तिम्रो त्यो निर्दयी पति हो यही ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(भ्बदेवको झ्यालबाट प्रवेश)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द उनीसित हेरेर मृत्कुराउँछ)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द, खुप भो । (ढौका खोली मटानमा निस्कन्छन्‌)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(नेपथ्यमा ढोका घचघच्याउँदै)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूप, रूप हुस्सूहरू उठ ।घरमा बत्तिले आगौ लाग्न लाग्यो ! बरू अरूघरमा यो सुनी ताते ! मरिस्‌ आजै विमान तँ ?[नेपथ्यमा खलबल । इन्दिराका हातबाट खुकुरी खस्तछन्‌)सारा मुकुन्दका पाप मेरै हुन्‌, म मुकुन्द हुँ ।तिम्रो जाँच गरी धाकेँ, जति प्रश्न गरेँ उतितिम्रो उत्तरले झन्‌ झन्‌ बढायो प्रश्नको गतिजान्ने जाँच लिनेभन्दा पनि जाँच दिने भयो ।आफ्नो अयोग्यता आई आफैँलाई टुँगीरहपो,जँचेन, गर्नुबाहेक अर्को केही उपाय नै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११८&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मर्न आएँ बहन €९:4०५ छ्यौ तिमी जहाँ-यो कोठामा, बिग्यो बन्दोबस्त यहाँ पनिघातकी छैन जस्तो छ यो घाउ, मर्न पाइनँ ।क्षमा । म कसरी मागूँ तिमी दिन्छौ कसो गरी?(इन्दिरा मूर्छा पर्दछे)(बलैसित हात टेकी उठाएर)ओहो, नरकमा सुद्धा खाली ठाउँ रहेनछपापी मुकुन्दको निति । मूढा ताक्छु म, बञ्चरोघुँडा ताक्तछ । धूवाँ छ या आँखै धमिलो भयो !(फेरि पल्टन्छ)(भबदेव, रूपनारायण, घनमतीको प्रवेश)भवदेव- अनि आखिरमा यस्तो भेटेँ ।रूपनारायण- कस्तो अचम्म त,आगौ चीसो भएजस्तो ननिभ्दैमा, मुकुन्द, तँसट्टा मेरो दिई आफ्नो हाडको मुटु फ्याँकिदे !(मुकुन्दको शिर काखमा राछ्तछन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घनमती पनि मुकुन्दलाई समात्नजान्छिन्‌)मुकुन्व- उता छ मुटु झुम्रोको ।रूपनारायण- धन, लौ के भएछ, केभएछ इन्दिरालाई ?- मूर्खा ।क्त पानी कहाँछ,खै ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घनमती- त्यहाँ सिरानमा होला ।(भबदेव पानी ल्याइदिन्छन्‌,। घनमतीखास्टो भिजाएर इन्दिरालाई मुसार्दछिन्‌,रूपनारायण आफ्नो ओढ्नै च्यात्तछन्‌,भवदेव त्यसलै मुकुन्दका घाउहरू नाँध्छन्‌ ।)के गरेको मुकुन्द, यो ?मुकुन्- आमा, म भोलि भन्नेछु- कसरी चक्र यो घुम्यो,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कसरी चक्रका दाँती मिले ती एक ठाउँमाकसरी काटियो हावा सारा तत्त्वहरू त्यहाँकतिचोटि मिली फेरि छ्रुट्टिए कसरी सबै;आज सुत्न दिनोस्‌ चाँडै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घनमती- भो, बा भो, चूप लाग त,जे होस्‌ अरू कुरा, आयौ कृष्ण झैं नन्दको घरबन्यौ माई जसोदाको मन आनन्दको घर ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(इन्दिरा ब्यूँझन्छे)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर घाउ कसो होला बाजे ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भव- यो खालि खेलमाचिथरे झैं छ तङले दूधे बालकले ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घनमती- तरचाँडै आए त हुन्थ्यो त्यो नाक ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द- आमा, मलाइ योचोटले मार्न सक्तैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूपनारायणा- तर दुःख दियोभने ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्- बागुआमाहरूलाई जल्ले दुःख दियो यतित्यसलाई त यो घाउभन्दा मृत्यु छ लायक ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूप- जो बानु दुःखमा दुःखी हुन्छ यो पुत्रको, उतसजा तै जति खानेछस्‌ उति नै दण्ड भोग्दछ,त्यसैले तँ सधैँ मेरो शुभाशीर्वाद . पाउँछस्‌ ।फर्किस्‌ यो देशमा, भाग्यो मनको अनिकाल नैबितेको स्वप्नमा ।सुखलाई पिट्यो कैयनूचोटि व्यथैं सुनारलेढाल्यो लोहारले एकै चोटमा दुःखलाइ त।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भ्वदेव- मुकुन्दले मलाई पो झण्डैले वनबासमापठाएको !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूपनारायण- तपाईंको क्रणमा यो घरै गडयो,जसरी गड्छ पृथ्वीमा फैलेर रूखको जरा,पूजा गरेर पृथ्वीको फूल नैवेद्यले रुख&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१२०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुक्ति पाउन चाहन्छ क्षणबाट, परन्तु त्योझन्‌ झन्‌ गड्दछ ।यस्तो परोपकारीको भाग्यको ईख गर्दछन्‌इन्द्रै पनि; उनीको छ एउटा स्वर्ग केवलयहाँ परोपकारीले हरेक उपकारमास्वर्ग पाउँछ ।हो मेरो कार्य यो उपकार त,तर कारण स्वर्गीय इन्दिराको सतीत्व हो ।आए लौ नाउ बा,(बिमान र नाकको प्रवेश)हेर्नोस्‌ ।कल्लाई के भयो यहाँ ?खुक्रीले यिनीलाई चोट लाग्यो ।(घाउ जाँच्ै) मुकुन्द हुन्‌ !यी यहाँ कहिले आए ? (बिमान पानीहरू ल्याउँछ)केही दिन भयो !किन ?यो चोट कसरी लाग्यो ? (औषधि लाउन शुरू गर्छलेखेको नै रहेछ त्योलिपि खप्परमा पारी खुकुरीलाइ लेखनीग्रन्यकर्ता बिष्याताले यिनको अगि जन्ममा,कुनै उद्योगले मेट्न सकेनन्‌ यस जन्ममा,अनि यो खुकुरीले नै खुर्के आखिरमा ! (नाक हाँस्तछ)अब&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो घाउलाइ के गर्ने ? गहिरो छकि ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घाउयोम चाँडै नै निको पार्छु, धन्दा केही नमान्नुहोस्‌,मामूली चोट हो, फेरि भोलि हेर्न म आउँला,अहिले जान्छु, छन्‌ आफ्नै बिरामी घरमा पनि ।को बिरामी छ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१२१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाञ- बूढी नै, को हुन्थ्यो अः ।घनमती- केभयो?नाउ- के भो के, उसको आफ्नै आफ्नै फर्मायसी व्यथा,बूढीकोसित मिल्दैन ब्रहमाण्डभरको व्यधा-र्न्छे रुन्छ त्यतै फेरि हाँस्छै हाँस्छ उहाँपछि,&#039;अय्या&#039; भन्छे सधैं सोध्यो &#039;अय्या&#039; भन्छे जवाफमा;“कहाँनेर दुख्यो ?&#039; भन्छु बूढी औंला ठडचाउँछेढुहाको चाहिँ कहिले हातको कहिले, अनिदेखाउँछै फेरि आङ त्यो ठाउँमा जहाँउसको हात पुग्दैन- (निस्कन्छ)भव- अब हामीहरू पनिजाऔं तल कुरा गर्न, आरामी दिनुपर्दछ,आऔंला अहिले फेरि । लौ, विमान यता समा ।(बिमान, भवदेव, रूपनारायण-समेत भएर मुकुन्दलाईडोस्पाएर लगी इन्दिराकोओछ्यानमा पल्टाउँछन्‌)मुकुन्द, यो. बिछ्यौनामा केही छैन छ खालि यो,परन्तु यसमा जे छ, छैन त्यो विश्वमा कही ।रूप- बुहारी, बस लौ, निद्रा पार, बेचैन भो भन्योभने भन्न तिमी आउ; हामी बस्छौं उतातिर ।भूकम्प, आगलागी र आँधी हो, सुखको यही,भ्रोलि पो आउला बोली, आज मूर्छा छ शान्तिको ।(घनमतीसित) आङ । (रूपनारायण, भवदेव, विमान&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धनमती- नानी ! तँलाई के दुखेको छ कपालमा ?मुकुन्- होकि होइनजस्तोछ!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घनमती- के खान्छस्‌ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द- आज खान्न म,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले खाइसकें आमा, अगि नै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१२२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुकृत्द-इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुकुन्द-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नीद आउला !?आउला आउला जस्तो छ।(इन्दिराको फेरि प्रबेश)लौ; सुत म जान्छु है?(मुकुन्द टाउकोले हुन्छ भन्छ)(इन्दिरासित)यहाँ बस तिमी पानी यता राखन । (निस्कन्छिन्‌)इन्दिरा,पानी देउ ।दुखेको के कम भो? कि छ उत्तिकै !अगिभन्दा दुखेको पोछकि ?(खाटमनि अघिल्तिर बस्दछे)दुख्तैन इन्दिरा,पापी रगतले बग्ने बाटो पायो, बग्यो, अबकपाल सब काँढा नै झिकेको फूलको थुँगा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जस्तो छ हलुका ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिन्ती, नचिन्हैर भए पनियस्तो पाप गरेँ मैले के गर्छै अब !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिन्ति छ,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नछेड यसरी, मेरो पापमा त क्षमा पनिमाग्नु नै पाप हो, आफैँ दे दिन हुने भए ।यो कुरा घाउले भन्छ, माफी दिन्छ कि लिन्छ, योपाक्यो बिग्न्यो भने मर्छु आफैँ चोट भएर ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घाउ मेरो तिमी नै हो, पाकी दिक्क भयौभनेम बाँच्ने छैन, अहिल्चै तिमी शान्त रहघौभनेनिको भइसक्यो ।(एक छिनपछि)जून बत्तीको लाजले उताचियाएर रहेको छ, निभाक बृत्ति, त्यो तहाँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१२३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुकुन्च-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्विरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुकुन्द-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आओस्‌ निर्धक्क है। (इन्दिरा बत्ती निभाएरझ्याल पूरासित खोल्दछे)ओहो, जूनकीरीहरू तलतारा भइरहेका छन्‌ बगैंँचाभरि, हो, अनतारामाथि, पुग्यो हामी नीलो बैकुण्ठमसँगै;चन्द्रमा बिष्णु हुन्‌, हाम्रो कोठा उड्ने विमान हो।बिपना हो भने आजै मेरो रहर पूर्ण भो,सपना हो भने फेरि नब्युँझूँ यसबाट म !(आएर बसी मुकुन्दको कपाल मुसार्दछे)(इन्दिराको हात समातेर)जूनकीरीहरू आए हेर्‌; हेर यही पनिसानो चिराख बालेर खोज्दै आफ्ना प्रिया सती ।बत्ती बालेर छातीमा आँसुको तेलले कुनैभ्ैले झैं पतिपूजामा घुमी आरति गर्दछन्‌ ।आज के चन्द्रमालाई सञ्चो छैन र सूर्य नैपालो किक 42“ हुन्‌ कि, हेरन, नत्र योजून घाम लाग्थ्यो: तातो थप भए यहाँचराहरू सबै आफ्ना गुँड छोडी कराउँथे ।आरू जत्रा थिए तारा सम्झन्छु जतिसम्म म,ती आज कीप जत्रा छन्‌ के ती तिम्रो सहघारलेबढेका हुन्‌ ? ्‌थिए प्यारा ताराका दूर देशमा,फर्के होलान्‌ सबै आज, सारा दुईगुना बढे ।म एउटा कुरा माग्छु, दिनोस्‌ है, हुन्छ ?जत्ति छन्‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लौ, उसो भए&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुतलीका पखेटा झैं भएर दुईतर्फका&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पु हामी सँगै हिंड्ने कैले पनि नछुट्टिनेत?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
करा मसित ती यावत्‌ तिम्रै हुन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१२४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुन्द-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्दिरा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुन्छ, दुवैलाई मृत्युले पनि एउटैसम्झोस्‌, आयु सँगै जोडोस्‌ दुवैको अनिमात्र त्योलिन आगओोस्‌ यहाँ हामी बिहा सम्झी दुवै जनासोलाको शुद्ध जग्गेमा हाँस्तै बाजाहरूसितजाऔंला साथमा । बाँकी उत्रेका यी सुखी दिनबिताऔंला दुवै आत्मा टँसाई एक ठाउँमापछिको जन्मको निम्ति पनि, यो जन्मभूमिकोपवित्र पाउ दाबौंला काखमाखि सँगै बसीखेलौंला साथमा खेल सदुद्योग र उन्तति४५ गीत गाऔंला देशको सुरमा सँगै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिम्रो हर्षाश्चुगङ्गाले मेरो छाती भिज्यो, यहाँ,थियो डृदय ढुङ्गाको, शालिग्राम बन्यो अब ।पूजा गर्छु म त्यल्लाई दिनोस्‌ गर्न, म हातलेफूल लेख्खु तपाईंको आङमा, कुन फूल होचिन्नोस्‌ है, सुन्नुहोस्‌ पाठ कुराको स्तुति गर्दछुतपाईंकै, गयो रात आनन्दसित सुत्नुहोस्‌,आँखा चिम्लिन पाउन्‌ ती घाउले पनि ! ईश्वर,कस्ता दिन थियो कालो कुना झैं अन्धकारको !झोल्लिएका सबै मैला मेघ ती बीचमै दबे !कस्तो रात छ यो मध्य-दिन झैं सूर्यलोकको !आज श्ुङ्गार यस्तो छ चन्द्रमाको त भोलि झन्‌उत्तौला सूर्यको कस्तो होला ! हामीहरू पनिओछधघाई प्रेमको तन्ना टम्म नेपालमा कसीसेवाको पौडि खेलौंला पसीनामा दुवै पसी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(इन्दिरा खाटमा टाउको राख्तछे,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बुवै निवाउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धेरै जुनकीरी चस्किरहन्छन्‌ ।)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
झैँ इति झैँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बालकृष्ण समका केही नाटकहरू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अमित वासनाअमर सिंह&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क मरेकी छैनतानसेनको झरीधुव&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुल्हादप्रेमपिण्डभीमसेनको अन्त्यमुटुको व्यथामोतीरामस्वास्नीमान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुद्दक : साझा प्रकाशनको छापाखाना, पुलचोक, ललितपुर ।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%9C%E0%A4%AF_%E0%A4%AD%E0%A5%81%E0%A4%81%E0%A4%A1%E0%A5%80_(%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%99%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%B8%E0%A4%99%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B9)&amp;diff=99</id>
		<title>जय भुँडी (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%9C%E0%A4%AF_%E0%A4%AD%E0%A5%81%E0%A4%81%E0%A4%A1%E0%A5%80_(%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%99%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%B8%E0%A4%99%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B9)&amp;diff=99"/>
		<updated>2024-06-14T14:16:12Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: Created page with &amp;quot;फष्ठाप260 80:  ७१0०ने७साझा शिक्षा ई-पाटी[०11-0011 110  ५५४५४४४,[१15101(919%90,01५४४/५४४,01€21121221,01  केही भन्नु  हास्यव्यङ्गग्यतिर यो मेरो माहिलो सङ्ग्रह हो । यसको दाजु &amp;#039;काउकृती&amp;#039;ले दुई वर्षमै दोस्रो जुनि लिने...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;फष्ठाप260 80:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७१0०ने७साझा शिक्षा ई-पाटी[०11-0011 110&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
५५४५४४४,[१15101(919%90,01५४४/५४४,01€21121221,01&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केही भन्नु&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हास्यव्यङ्गग्यतिर यो मेरो माहिलो सङ्ग्रह हो । यसको दाजु &#039;काउकृती&#039;ले दुई वर्षमै दोस्रो जुनि लिने सौभाग्य पाएकोले पाठकसमक्ष यसलाई पनिसेवार्थ घचेद्ने रहर गरेको छु । सहोदरको नाताले &#039;काउकुती&#039; र &#039;जय भुँडी&#039;को अनुहार उस्तैउस्तै भए पनि दाजुभाइको स्वभावमा धेरै फरक पनि छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यसअन्तर्गतका धेरैजसो निबन्धहरू पत्रपत्रिकामा छापिएका हुन्‌ तापनिकेही नयाँ परिवर्द्धन र संशोधनसहित पुस्तकहरूमा यो समग्र नै पाठकहरूलाईमेरो नयाँ कोसेली हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्त्यमा, जुनजुन पत्रिकाबाट यी उद्धरण गरिए, तिनीप्रति आभार व्यक्तगर्नुको साथ्चै यसलाई प्रकाशमा ल्याउने विशेष आग्रह गर्ने रत्न पुस्तक भण्डारलाईपनि धन्यवाद दिनु छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- लेखक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मपाईं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;तँ&#039; को आदरार्थी &#039;तपाईं&#039; भएजस्तै &#039;म&#039; को आदरार्थी &#039;मपाई&#039; हुन्छ ।त्यसैले सभ्य भाषामा &#039;तँ&#039; को ठाउँ तपाईंले ओगटेपछि &#039;म&#039; को ठाउँ &#039;मपाई&#039; लेनलिनु किन ? &#039;म&#039; लाई संस्कृत वैयाकरणहरूले उत्तम पुरुषको श्रेणीमा पुज्दैआएका छन्‌ भने अरू भाषामा पनि “म&#039; को स्थान प्रथमै छ । त्यसैले हामीलेपनि बाह्रखरी पढ्दैदेखि &#039;म&#039; लाई राम्रो &#039;म&#039; भनी मान गर्दै आएका छौँ । जबसँगैको &#039;तँ&#039; जाबोले पदोन्नति पाई &#039;तपाईं&#039; भयो भने &#039;म&#039; लाई पदोन्तति दिई“मपाईं&#039; नगराउनु पच्चीसै आना पक्षपात हो, &#039;म&#039; प्रतिको अन्याय हो । यसकारणअरूले “तपाईं&#039; भने पनि नभने पनि हामीले आफूलाई &#039;मपाई&#039; भन्नै पर्छ, योयुगको माग हो; &#039;मपाईं&#039; को मन्तव्य यस्तै छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मपाईं&#039; शब्द सुन्दा नयाँजस्तो लाग्छ । तर यसको भाव भाषाभन्दा जेठोर इतिहासभन्दा बूढो छ । किनभने मुख चलाउनुभन्दा पहिले मान्छेले &#039;म&#039; कोमाया गर्न जान्यो, अरूलाई केही मान्नुभन्दा पहिले आफैँलाई सम्पूर्ण ठान्नथाल्यो । फलतः शक्ति बढ्ता हुनेले आफूलाई लायक वा नायक भनाई आत्मआदरखोजे, मपाई बने; बठ्याइँ बढ्ता हुनेले धर्मकर्ममा अक्कलझक्कल झिकीआफूलाई ईश्वरको नक्कल भनी &#039;म&#039; को महत्ता दर्शाए, मपाईं बने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक पटक ब्रह्मा र विष्णुमा तँ ठूलो कि म ठूलो भन्नेबारे गम्कागम्कीपरेछ, फैसलाको लागि दुवै महादेवकहाँ पुगेछन्‌ । देवमाथिका उपरदेव महादेव,उसै त तपाईंको धुरन्धर, झन्‌ त्यो मौका पाएका । हत्त न पत्त आफ्नोअनौठाको &#039;ज्योतिर्लिङ्ग&#039; तेर्स्याउँदै भनेछन्‌- “लौ, एक जना उँधो जार, अर्कोउँभो । जो यसको फेद वा टुप्पो पत्तो लगाउँछ, त्यही ठूलो ।” मारेन के ?न्यायाधीश मानिसकेपछि आज्ञा नमानून्‌ कसरी ? ब्रहमा र विष्णु राणाकालीनलाठसाहेबका चाकरीवाल दौडेक्ैँ स्याँस्याँ गर्दै लागे तल-माथि । तर दुवैले&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मपाई / ६१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लक्ष्य भेट्ठाएनन्‌ । कीर्ते साक्षी बकाएर भए पनि आफ्नी मपाईत्व जोगाउनेब्रह्माको षडयन्त्र पनि असफल भयो । अनि लँगौटी बाँध्दै महादेवले छाँटे-“देख्यौ, को ठूलो रहेछ ? मेरा अगाडि तिमीहरूको मपाईत्व &#039; दुवै उस्तै हौ, लौजाओ !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यसरी ब्रह्मा-विष्णुका पालादेखि चलेको मपाईंलाई कसरी नयाँमान्नुहुन्छ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मपाईंत्व प्रदर्शित गर्ने यस्ता कथाहरू नौ मुरी पाइन्छन्‌ । पुराण पढ्नोस्‌,पण्डित भैटदनोस्‌ कि पादरी भेट्नोस्‌ मपाईकै चर्तिकला तपाईं सुन्नुहुन्छ । कृष्णहुन्‌ कि काइस्ट हुन्‌, सबैका कथामा मपाईंकै गाथा सुनिन्छ । जौ बूढो उहीबाटो हगुवा भनेझँ जसजसलाई दुनियाँले महापुरुष मान्दै आयो, ती सबैलेआफ्नो महाप्ुरुषत्व मपाईंबाटै सुरु गरेका त होइनन्‌ ! कुन्नि, मपाईंलाई तशङ्कै लाग्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्काको तपाईंत्व स्वीकार नगरेर &#039;म&#039; कै महिमाको मादल बजाउनुमपाईं बन्नु हो । सभ्यताको जतिजति विकास हुँदै आयो, उतिउति मपाईंत्व-प्रवृत्ति पनि विष्णुमतीको मूला मौलाएभैँ मौलाउँदै आएको छ । त्यसैले प्रत्येकव्यक्ति आफूलाई हात्ती सम्झन्छ, अरूलाई बोका । अब समाज हात्तीहात्तीकोहो वा बोकैबोकाको हो कसले छुट्टयाइदिने ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्को शब्दमा मपाईंत्व एक नशा हो, यसले लटठ्याएपछि कक्टेल पार्टीकाश्रीमान्‌हरूझैँ सब मपाईंहरू एकअर्काका बीच ठक्कर खान र चर्किन थाल्दछन्‌ ।सम्झनुभएन ? राम र रावणको मपाईंत्व बजारिएर लङ्का डढ्यो, भीमरदुर्योधनको मपाईंत्व चर्केर कुरुक्षेत्र बन्यो । यस्तै मपाईं मपाईंको चर्काचर्कीमाहिरोशिमामा एटम बम पड्क्यो, त जर्मनी खडगीज्यूकहाँको बनेल बन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिरण्यकशिपुदेखि हिटलरसम्म, अलेक्जेन्डरदेखि एडवर्डसम्म, बाबरदेखिबबरसम्म कसले आफूलाई मपाईं भनेन ? तर के गर्नु ! सबै मपाईँ ठोक्किए-बरालिने पोइको खाटमूनि गुन्डाका मुन्डा टाउका जुझेकैँ । फलस्वरूप नौरङ्गीक्रान्ति भए, सङ्घर्ष भए, युद्ध र महायुद्हरू भए, आखिर बलियाहरूको मपाईझन्‌ पाक्यो, चतुरहरूको मपाई झन्‌ चर्क्यो । दव्ने मपाईको इतिहास माटोमामिल्यो, जितुवा मपाईको महिमा चितुवाझैँ उप्र्यो, त्यसैले रामायण लेखियो,रावणायण लेखिएन, &#039;“चन्द्रमयूख&#039; देखियो, &#039;देवमयूख&#039; देखिएन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मपाईंको त यस्तै खस्रा क्रा गर्ने बानी छ । नास्तिक भनून्‌ वा नाकठाडाभनून्‌, मपाईलाई पनि आफ्नो महान्‌ मपाईंत्वमा पूरा विश्वास छ । वास्तवमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६६ / भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मपाईं बन्नु आत्म-आदर खोज्ने मानवीय मनस्थितिको मोटो विशेषता हो ।आफ जस्तै बामपुड्के भए पनि अरूलाई होच्याइदिन पाए हातले नछोईकनधर्को लामो पार्ने &#039;बीरबल मेथड्‌ अफू डेभलपमेन्ट&#039; सफल भइरहन्छ । त्यसैलेहोला खुश्चेभले मरिसकेका स्तालिनको जरैसम्म जुँघा उखेलेर मपाईं बने ।त्यसैले त जुनसुकै गल्लीमा भेटिने जोसुकै मान्छेसित सोध्नोस्‌- सब चोरसब लोफर, सब आवारा, सब नामर्द, सद्दे भन्नु उही मात्र, जो तपाईसँगहाँकिरहेको हुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रत्येक पसले भन्छ- म अरूजस्तो ठगाहा होइन, प्रत्येक कर्मचारीछाँट्छ- म अरूजस्तो कामचोर र घूसखोर होइन, प्रत्येक युवती नखरा पार्छे-म अरूजस्तो छँडुली होइन, प्रत्येक युवक धक्कु लगाउँछ- म अरूजस्तो नामर्दहोइन, प्रत्येक कवि-कलाकार फुल्छ- म अरूजस्तो बकमफुसे होइन । प्रत्येकनेता गुड्डी हाँम्छ- म अरूजस्तो भ्यासझुस लिडर होइन । ओहो ! जसकाअगाडि उभिए पनि उही मपाईँजनित थुकका छिटा मुखमा पर्नुसिवाय केहीछैन । हुँदाहुँदा गल्लीको लुते कुक्रले कुइँकुइँ गरेको सुन्दा पनि म अरूजस्तोभुस्याहा होइन भनी फुइँ छोडेको त होइन ? भन्ने शङ्का लाग्छ मपाईलाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शङ्का मात्रै होइन, कुकुरको मपाईं झन्‌ मापाको हुन्छ । फोहोर खानेजात भएर के गर्नु, जुनसुकै देवीदेवताको स्थानतिर हेर्नोस्‌- वरिपरि झुम्मिइरहेकाहुन्छन्‌ उनै । मोटरमा गुड्नेदेखि रकेटमा उड्नेसम्म सौभाग्य पाएको कुक्रजस्तोसुकै लुते, लुखुरे, लिँडे, तिल्के, टाटे, रागेपाटे, झिल्के, भ्याउरे भए पनिआफूलाई बेलाइती नै सम्झन्छ । त्यसैले त मान्छे जहाँ पूजा गर्छन्‌ कुकरत्यहाँ जिभ्रो लतपताइदिन्छ, मान्छे जहाँ ढोग दिन्छन्‌, कुकुर त्यहाँ तुर्क्याइदिन्छ ।कसले नदेखेको छ र ? एक चौटा मासुको निम्ति अथवा एउटी माली ककुर्तीकोनिम्ति कुक्रहरूको मपाईं कसरी चर्किन्छ ? कसरी उनीहरू दाँत ङिच्च्याएरएकअर्कासित लुछाचुँडी गर्छन्‌ र कति चाँडै मित्र शत्रु हुन्छन्‌, अनि मपाईंकोधुमर्के झन्डा पिँधतिर झुन्डघाएर एकै दिन भए पनि, एकैछिन भए पनि,कुक्रतिहार मनाउँछन्‌, माला लाउँछन्‌ । जब मपाईंत्व चुर्लिंदा माछापुछेकोचुचुरोमा पुग्छ अनि कार्तिके डाँगाझँ उनीहरू जसको पाए पनि घोडा चढ्नखोज्छन्‌, जसलाई पाए पनि टोक्न थाल्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनि सबैतिरबाट घुस्सा खान्छन्‌, कुइँकुइँ गर्दै फेरि बिरालासित मित्रताबाँध्न थाल्छन्‌ । त्यसैले त कहिलेकाहीँ राजनीतिमा कुकुर-बिरालाको पनिसंयुक्त मोर्चा भएको देख्न पाइन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मपाई / ६७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मपाई- न धार्मिक दृष्टिले पाप हो, न कानुती दृष्टिले अपराध । मागेरखानेदेखि मात्तिएर खानेसम्म सबैलाई आफ्नो महिमा गाउने मौलिक अधिकारछ । त्यसैले त अचेल जसले आडदेखि टाङसम्म रङ्गीचङ्गी प्वाँख जडेरआफ्नो महत्ता दर्शाउन सक्छ त्यो महान्‌ हुन्छ । कामले नसके कुराले, दिमागलेनभ्याए सुराले, जसरी भए पनि आफ्नो महत्ता बढाउनुपर्छ, अनि स्वास्नीले नुनकिन्न पठाउँदा “नुनभन्दा त चुन सेतो रे&#039;छ, बूढी&amp;quot; भन्दै चुनको पोको गौजीमाहालेर आउने भलादमीले पनि चतुर चन्द्रको उपाधि पाउन सक्छ । युगमपाईंको हो । त्यसैले युगअनुसारको आवाज हुनुपर्छ, आफ्नो सहनी आफैँलेगर्नुपर्छ- अरू कसले गरिदिन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाम्रा साहित्यिकहरूले पनि यो कुरा छर्लङ्ग बुझेका छन्‌ । त्यसैलेकोही आफूलाई शेलीको सालो ठान्छन्‌ त कोही मिल्टनको मामा । कुनै पनिसभासम्मेलन वा समारोहमा जानोस्‌- कर्केछड्के हावभावका साथ मञ्चमाउभिनेचाहिँ कवि वा वक्ता सुनाइरहेको हुन्छ- मपाईं-महिमा । सुन्नेहरूचाहिँखासखास खुसखुस गर्दै सुनाउनेलाई तीन कौडीमा पनि नगनी आफआफ्नामहत्त्वको महिमा गाइरहेका हुन्छन्‌ । यसै क्रममा सम्मेलन सिद्धिन्छ । अरूलेलेखेको पनि पढिदिङँ, अरूले बोलेको पनि सुनिदिउँ, अरू पनि तपाईं हुन्‌भन्ने प्रवृत्ति कसैमा छैन । किनभने यो “नामकरण&#039; को बेला हो, कामकरणकोहोइन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मपाईं धेरै थरीका हुन्छन्‌ । कसैलाई उपाधि-मपाईंले छोएको भोलिपल्टैदेखिउनीहरू शङ्का गर्न थाल्छन्‌- के दुनियाँमा मजत्तिको पढैया र बढैया अर्कोकोही होला त ? कसैलाई पगरी-मपाईं लागेको हुन्छ, ओहदामा पुर्नेवित्तिकैउनीहरूका आँखाले सबैलाई हल्कारा देख्छ । त्यस्तै, कोही जहानियाँ-मपाईंहुन्छन्‌ त कोही घरानियाँ-मपाईं । कसैलाई मोहनी-मपाईँले सताएको हुन्छ ।बाटाघाटामा, अड्डाअदालतमा, कार्यालयमा वा विद्यालय, महाविद्यालयमा जतिपनि युवती देखिन्छन्‌ सबैका आँखा उनीहरू आफैँपट्टि फर्केको देख्छन्‌ रसाथीहरूसँग फुइँ छाड्छन्‌- मलाई देख्नासाथ सबै युवती मोहित हुन्छन्‌ किनहोला ? तर युवतीले उसको गालाको चाउरी हेरेका हुन्‌ वा गलाको गाँडहेरेका हुन्‌ उसलाई सुइँकै हँदैन । यस्तै कोही चुइयाँ-मपाईं हुन्छन्‌ जो पेट मार्नुतै आफ्नो पुरुषार्थ सम्झन्छन्‌, कोही फुइयाँ-मपाईं हुन्छन्‌, घर बन्धकी राखीपार्टी जमाउँछन्‌ । यस्तै कोही हुन्छन्‌ टपर्दुइयाँ-मपाईं, उनीहरूलाई एकै थोकमामात्रै मपाईत्व प्रदर्शित गरेर हुँदैन । चढ्नेमा रिक्सादेखि रकेटसम्म, पढ्नेमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दृव ” भैरब अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पित्तासको कथादेखि प्याराडाइज लँस्टसम्म, चिन्नैमा चोरदेखि चर्चिलसम्म,किन्नेमा रिबनदेखि रेडियोसम्म इत्यादि सबैतिर उत्तिकै महत्ता प्रदर्शन गर्नुटपर्टुइयाँ-मपाईंको मूलभूत विशेषता हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मपाईँ त छँदै छन्‌, अझ त्यस्ताको मपाई रमाइलो हुन्छ, जसलाईकसैले झुक्किएर पनि तपाईं भनिदिँदैन । बिचराहरू आफ्नो महत्ता देखाउनटोपीको चुच्चोदेखि जुत्ताको टुप्पोसम्म भझिलिक्क पार्दै दिनदिनभर मूल सडकचक्कर मार्छन्‌ । सिउन लागेको सूचीकार देखे पनि, पिउन लागेको जँडयाहादेखे पनि &#039;हलो&#039; भन्दै हात मिलाउँछन्‌ । एक-दुईवटा फिल्मी गीत गुनगुनाएरउसको ध्यान तान्न खोज्छन्‌ । जब कसैले पनि वास्ता गरिदिँदैन, घरमा गएरस्वास्नीलाई हकार्छन्‌- “बुझिस्‌, मलाई दुनियाँले कत्रो सन्मान गर्छ, तर तैँजैरी मात्र मेरो महत्ता बुभिदनस्‌ बाबै !” यस्ता पुङ न पुच्छरका मपाईंहरू जत्तिधेरै भए मपाईंलाई चाहिँ उत्ति रमाइलो लाग्छ । किनभने भेट हुनासाध “ओहोतपाईंजस्तो&amp;quot; भनिएपछि कमसेकम भोजन वा सिनेमाको निम्तो पाइहालिन्छ ।कोही यस्ता अभागी पनि हुन्छन्‌ ख्वाउँदा-प्याउँदा पनि प्रशंसा पाउँदैनन्‌ ।त्यस्ताको मपाईँ यस्तरी बटारिन्छन्‌ कि अर्थ न बर्थ धोक्रो फुलाएर तीन धोक्रोरिस मनमा कोची मनमनै आफ्नो प्रशंसा गर्न थाल्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबै तँजस्तै छुसी हुन्‌ त !- भन्नुहोला तपाईंहरू, त अचेल तपाईंनिम्ठो भए मपाईं झन्‌ झुसी ! नपत्याए तपाईं नै भन्नोस्‌, यो सिङ्गो लेखपनि एउटा मपाईंत्व-प्रदर्शन नै न हो ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिंहनाद&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मपाई / ६९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रलोक कसको ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उहिलेका क्रा खुइलिहाले, कोही सुन्दैन । अहिलेका कुरा सबैलाई थाहाछ, सुनाउनै पर्दैन । त्यसैले म कुरा भिक्तै छु- एक्काइसौँ शताब्दीकोउत्तरार्धतिरको, जुन बेला चन्द्रलोकको जग्गा वितरण गर्नेबारे संयुक्त मुलुक-सङ्घमा दिनहुँ बहस हुन्थ्यो । आकाशमा चील घुमेझैँ घुमिरहने टेलस्टार, घर-घरमा चलचित्रभँ झलमलाइरहने टेलिभिजन इत्यादिले गर्दा कहाँ के भइरहेछ,कसले के भने इत्यादि थाहा पाउन कत्ति गाह्रो थिएन । भोजपुरको खबरकान्तिपुरमा आइपुग्न महिना दिन लाग्ने वर्तमान अवस्थाका हामीलाई यो कुरासुन्दा अचम्म लाग्छ । तर, त्यतिखेर हावामा जेटको स्टेसन बनाउने र हाबैद्वारापेटको भोक मार्ने व्यवस्था हुनहुन आँटिसकेको थियो । “यो के हावा बिग्रेकोकुरा गच्यो&amp;quot; भनी तपाईंहरू अकमकिनुहोला, तर वास्तवमा यो हो इतिहासमानयाँ प्रयोग ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस्वी सन्‌ १९२० को डिसेम्बर महिना थियो, तारिखचाहिँ मैले बिसे,चन्द्रलोकको जग्गा आबाद गर्न जाने भनी धेरैजसो मुलुकका बलिया -बाङ्गानेताहरू जेनेभामा जम्मा भएका थिए । संयुक्त मुलुकसङ्गघको सूचना थियो-“त्यहीँबाट अन्तग्रृहयामी जेटद्वारा सबैले चन्द्रलोक जानुपर्छ । अनि 1५[0011910पारामा एगागाडनगा अर्थात्‌ चन्द्रलोक विभाजन आयोगले तयार पारेकोनापनक्साबमोजिम आआफ्नो भागमा आआफ्नो झन्डा गाड्नुपर्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संयुक्त मुलुकसङ्घको बनोट अहिलेको संयुक्त राष्ट्रसङ्घजस्तै थियोतापनि त्यति बेला भिटो पाउने दुई मुलुक मात्र थिए । सङ्घको अफिस थियोभर्खरै आबाद गरिएको सहारा नगरमा, जसलाई भूगोलमा एउटा नयाँ प्रयोगभनिदिए हुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म नब्बे पुगी हब्बे न कब्बे भैसकेको थिएँ, तैपनि उडिरहेको टेलस्टार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७9 ” भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जेनेभाको दृश्य सबै रिले गरिरहेको थियो, मेरा नातिनीबुहारीहरू सञ्जयलेधृतराष्ट्रलाई महाभारत सुनाएफ्ैँ भ्यालमा बसेर मलाई बेलीबिस्तार लगाउँदैथिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जेनेभामा साँच्ची एउटा अभूतपूर्व मेला लागेको थियो । नलागोस्‌ पनिकिन ! हजारौँ पटक यही सहरमा हजार थरी सम्मेलन भए, सहरभरिका घरथर्किए, भुइँ र भित्ता चर्किए, न निरस्त्रीकरण हुन सकेको थियो न विश्व-शान्ति । त्यसैले चन्द्रलोकको यात्रा यहीँबाट सुरु हुनुलाई जेनेभाले आफ्नो ठूलोगौरव र सफलता सम्झेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्तर्ग्रहयामी जेट दुइटा मात्र थिए, एउटा अमेरिकन, एउटा रसियन ।हुन त त्यस बेला सबैभन्दा जोधाहा र जुधाहा मुलुक थिए लन्डन र पेकिडङ,तैपनि विज्ञानका क्रामा रूस र अमेरिकाको नाम जाज्बल्य छँदै थियो ।अहिलेका केनेडी र खुश्चेभझँ त्यति बेला लवूलेस र च्याङ्बो नै त्यस्ताव्यक्तित्व थिए, जसको एक झोकमा पृथ्वीको दैनिक गति बटारिन सक्थ्यो ।अन्तर्राष्ट्रिय एकता भन्दाभन्दै अङ्ग्रेजको राज्य फेरि कहिल्यै घाम नअस्ताउनेस्थितिमा पुगिसकेको थियो । उता पेकिङ भनिरहेको थियो- परापूर्वकालमाचीनका राजा चूयान दर लोत्सेले राज्य गरेकाले मूनल्यान्डको नाम चन्द्रलोकरहेको हो । त्यसकारण चन्द्रलोकको प्रभुसत्ता चिनियाँ सन्तानकै हातमा रहनुपर्छ । चन्द्रलोकको प्रशासनका लागि ह्लासाको एउटा ध्याङमा खडा भैसकेकोथियो- गवर्नमेन्ट अफ्‌ मूनल्यान्ड क्वीनल्यान्ड रिपब्लिक । प्रभुसत्ता आफूलेलिए तापनि चन्द्रलोकको जग्गा वितरण गर्न क मन्जुर थियो । चीन भनेरतपाईंहरू हाम्रो अहिलेको शान्तिप्रिय छिमेकी राष्ट्रलाई सम्झनुहोला नि, उसबेलाका पेकिङेहरू अर्कै किसिमका थिए बुभ्नुभएन के ? बुझे बुभ्नोस्‌ नबुझेनबुभ्नोस्‌, यो थियो- अन्तर्राष्ट्रिय राजनीतिमा नयाँ प्रयोग ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अँ, यता प्रबन्ध हुँदै थियो, उता अमेरिकन जेट पाइलटले मौका छोप्नुबृद्धिमानी हौ भन्ने ठान्यो । सायद रूसीले पनि उही सम्भ्यो होला । परस्परसिडौरी खेल्दाखेल्दै आफआफैँ सिड फुक्लेर ठुटे भएका साँढेहरू (रूस रअमेरिका) बाहिर नुन खाएका कुखुराजस्तै अलि झोक्राएका भए तापनि भित्रअनौठा सपना देखिरहन्थे । त्यसैले भाग लाउने भन्दाभन्दै फुत्त बाँद्वरले लड्डुउडाएभैँ जेटहरू भुर्रे उडिहाले ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ए बितायो बा !” भन्दै एउटी पेकिडे युवती र एउटी लन्डने युवती हत्तन पत्त एकोटा जेटको पुच्छरमा झुन्डिन पुगे । सायद उनीहरूको मनमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रलोक कसको ? ” ७१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चढ्यो होला चन्द्रलोकमा पुग्नेबित्तिकै जेट ल्यान्ड गरुन्जेलमै प्यारासुटबाटउत्रेर आफ्नो झन्डा गाडिहाल्नुपर्छ । लन्डने युवतीको चतुन्याइँ बुझी हत्त नपत्त उसको खुट्टा समाउन पुग्यो थाइल्यान्डको युवक, अनि देख्तादेख्तै पहिलेकापश्चिमाभिमुख देशका प्रतिनिधिहरू पनि क उसको खुट्टामा, क उसकोखुट्टामा हत्त न पत्त झुन्डिन पुगिहाले । यता पेकिङे युवतीको खुट्टा पक्रन पुग्योक्यबाली ठिटो । त्यसपछि क्रमैसँग पहिलेका पोल्यान्ड, चेकोस्लाभ, हङ्गेरी रअल्बानिया आदि पनि त्यसै गरी झुन्डिए । फसाद पत्यो पहिलेका तटस्थ हौँभन्नेहरूलाई । उडूँ आफ्नो जेट छैन, नउडूँ मन मान्दैन । तटस्थको केहीअस्तित्व भएको बेलामा त एउटा न एउटा लोभले मै हुँ भन्ने तटस्थहरू शक्तिगुटको पाउ दाब्न पुग्छन्‌ भने त्यतिखेर त को तटस्थ, को अतटस्थ आखिरउड्न नपाउनेमा परे मुलुकसङ्घका सेक्रेटरी मिस्टर तन्याङतुरुङ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म कोठामा पल्टिरहेको थिएँ । मेरी कान्छी नातिनीबुहारी फलानो योफलानो क भन्दै टेलिस्टार र टेलिभिजनको प्लेटमा मलाई चिनाइरहेकी थिई ।टेरलिनको हाफपैन्ट र नाइलनको फ्रक लगाएकी मेरी नातिनीनुहारी गालाचाउरिएर पनि छाला टिमिक्क परेकी देखिन्थी । सम्पूर्ण पारदर्शक आवरणमासुरक्षित उसको छाती र तिघ्राको सुडौलपनले हामी जोसुकैको अङ्गमा पनिघरीघरी अन्तरइन्द्रियगामी जेट उडाइदिन्थ्यो । हुन त व्यक्तिव्यक्तिको यौनस्वतन्त्रतामा हाडनाताले पर्खाल लाउनु उसको वैयक्तिक मौलिक अधिकारहनन गर्नु हो भन्ने तत्कालीन जाग्रत्‌ समाजको एक मत थियो, तापनि मयिनताकको रूढिवादी बूढो भएकोले त्यति प्रगतिशील हुन सकेको थिइनँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यी सबै भएपछि चन्द्रलोकमा कसको चाहिँ प्रमुख सत्ता कायम होलात ?” मैले नातिनीबुहारीसित सोधेँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म अलि कान नसुन्ने भएकोले माउथ स्पीकरद्वारा उसले विश्लेषणगरी- “मेरो विचारमा महायुद्धपछिको जर्मनीजस्तै तानातान र खोसाखोस तहोला नि !” उसको कुरा मलाई पनि ठीकै लाग्यो र प्वाक्क भनिहालेँ- “अबतेस्रो महायुद्धको कारण र क्षेत्र चन्द्रलोक त हुन आउने होइन ? तै अहिलेसम्मसत्रोटा युद्ध भइसके पनि महायुद्ध त हुन सकेको छैन !&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुरा गर्दागर्दै लामालामा पुच्छर गाँसेका चङ्गाझैँ अकास्सिरहेका जेटहरूबादलपारि पुग्न लागिसकेछन्‌ । दुवैतिरबाट चर्काचर्की नारा लागेका थिए ।एउटा लाम भन्थ्यो- चन्द्रलोक कसको ? साम्यवादीको । अर्को लाम भन्थ्यो-चन्द्रलोक कसको ? समाजवादीको । एउटै लाममा पनि कोही जनवादीका&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७२ « भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भन्थे त कोही गणवादीको, कोही सुधारवादीको भन्थे त कोही उदारवादीको ।अलिहेका सम्पूर्ण ताराहरू मानौं पुनः जाग्रत्‌ भइरहेका थिए चन्द्रलोककायात्रीहरूमा । यता विश्व मुलुकसङ्घका सेक्रेटरी मिस्टर तन्याङतुरुङ ट्रृष्ट्रीशिपकाउन्सिलको बैठकमा भन्दै थिए- “चन्द्रलोकको संरक्षण मुलुकसङ्घअन्तर्गतहुनुपर्छ ।” अफिसका मेच-टेबुलहरू मात्र मौन रहेर उनको भनाइमा सम्मतिजनाउँथे । अरू भन्थे- “काग कराउँदै गर्छ पिना सुक्तै गर्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हामी हेर्दै र सुन्दै थियौँ, घुमिरहेको टेलस्टारको मद्दृतले- आफ्नै कोठाकोटेलिभिजन र रेडियोमा । उसले उसको खुट्टा, उसले उसको खुट्टामा बलैसँगसमातेर तन्द्रङ्ग झुन्डिँदै अकास्सिरहेका ताँतीमा जोस र उत्तेजना बढ्दैगइरहेको थियो । दुइटै जेटहरू आआफ्ना मान्छेमय पुच्छर झुन्डयाएर समानान्तररेखाबाटै उडिरहेका थिए । सम्मुख-सम्मुख परेकाले सबभन्दा माथिको पेकिङेयुवतीले कानै खाने गरी कराई- चन्द्रलोक कसको : पेकिङको ।” उसको योफुर्ती देखेर लन्डने युवतीको तालुदेखि पैतालासम्म तातेर आयो । “यी यत्रो तहो चाइनाको !” भनी हत्त न पत्त लोप्पा ख्वाउन हात झिक्ती भएकी जेटमाझुन्डिएको लाम खन्द्रचामखुन्द्रम ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यसरी आफ्नो प्रतिस्पर्धी म खन्द्रामखुन्द्रम भएको देखेर पल्लोज्ञेटमा झुन्डिने पेकिडे युवतीलगायत सबैलाई खितितित्त हाँसो उठ्यो । हर्षकोआवेशमा &#039;हा ! !&#039; गर्दै हात ठटाउन खोजेको उनीहरू पनि चर्ल्यामचुर्लुम्म ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुच्छरमा झुन्डिएका गहौँगह्रौँ तानहरू एक्कासि भवाट्ट छुट्टिँदा जेटहरूहत्त हत्तिए । एकअर्कामा डघाङ्ग -बजारिन पुगे । त्यसै वेला झिमिक्क के होझिल्केको थियो टेलिस्टारको बत्ती भ्याप्प निभ्यो । अनि के भयो म भन्नसक्तिनँ । दिमागमा भने अफ्गै त्यो झल्का आउँदै छ- चन्द्रलोककसको ?.. रस्साको । चन्द्रलोक कसको ?... अमेरिकाको... यो पनि मेरो स्मरणशक्तिको नयाँ प्रयोग होइन त ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुकुट माघ २०१९, ह्नैकन्तला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
000&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्त्रलोक कसको ? “ ७३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लाहुरेको पात्रासंस्मरण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक त आफ्नो जातै बीर, दोस्रो वीरबहादुरको झनाति, तेस्रो नामै मेरोवीरबल पाँडे- अब म कत्रो वीर हुँला भन्नै पर्दैन ! त्यसमाथि पनि नेपालकोनाइ्टैबाट जन्मेको कान्तिपुरेकाजी भनेपछि त कुरै खलास । त्यसैले त, बीरधाराकोकलकल जल वीरगन्जे ताप्केमा उमालेर सुर्क्याइदिएपछि कहिलेकाहीँ भोजन रसोजन, मेरो भोक त स्वयं भकुरिएर भागिहाल्छ । आखिर भुँडी भर्नुसम्मै त हो,बल र तागत भन्ने बस्तु त बाबुबाजेको नामैदेखि टाँसिएर आएको छँदै छ नि !कत्राकत्रा युद्ध, महायुद्धमा वीरता देखाउन सक्नेको सन्तान, एक बटुको खोलेपियोस्‌ वा हाफ प्लेट छोलेद, नर जिओस्‌, यति मामुली कुरामा केकोखोजीनिती ? अझै मेरो वीरतामीध विश्वास छैन भने हेर्न आउनुहोला, बाजेलेबर्माको लडाइँमा वीरगति प्राप्त गरी कमाएको वीरचक्र अलिहेसम्म चुहलोमाथिकोदलिनमा घुसारेको छँदै छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसैले त हो, रोग लागेको बेलामा पनि सौभाग्य मिले बीर अस्पतालैपुग्न पाइन्छ जहाँ औषधिले रङ्गाएको उही वीरधाराको निर्मल जल कैयौँवीरहरूले प्रत्येक दिन सित्तैमा सुर्क्याउन पाउँछन्‌, जसमध्ये म पनि एक हुँ ।तर मेरा कुनैकुनै साथी यस्ता निर्दोष छन्‌, वीरको अस्पताल पुग्न छाडेररोगाएको एक महिना नहुँदै डाक्टर-पूजा गर्न थाल्छन्‌ । यो कुरा मलाई पटक्कैमन पर्दैन र म भन्छु- नामर्दको ओखती पो नमर्दै हुन्छ त, मर्दको ओखती मर्दाभोलिपल्टसम्म गरे हुन्छ बाबै ! कतिपय साहित्यकार, कलाकार आदिले समेतअवलम्बन गरेको या सिद्धान्त आफूले छाड्ने कसरी ? आखिर बेकार भए पनिम एउटा कार हुँ, लुरे भए पनि वीर जातिको आकार हुँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आजको आर्थिक युगमा, आर्थिकै दृष्टिले हेर्ने हो भने पनि मेरो सिद्धान्तरामवाण जस्ता छ । &#039;मर्देका दसोटी हुन्छन्‌&#039; भन्ने हाम्रो लौकिक आदर्शमुताविक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उड « भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एउटा भालेलाई दसोटीसम्म पोथी गुटमुटयाउने लाइसेन्स समाजले दिएकैछ । यो विख्यात मर्देताको फलस्वरूप च्ह्लैपिच्छे खोलिएका पुत्रपृत्री प्रोडक्सन&#039;बहुपत्नी लिमिटेड&#039; का शाखाहरूबाट धडाधड उत्पादन हुने साराका सारालेभोक लाग्नेबित्तिकै खान र रोग लाग्नेबित्तिकै उपचार गराउन थाले भनेभोलिदेखि आकाशतिर फर्केर फुलौरा बर्सलान्‌ कि भनी आँ५५ मुख बाउननपर्ला भन्ने के ग्यारन्टी ? वीर भएकोले इलमउद्योगकी पीर गर्नापट्टि लागिएनत, कि दाउरे बन, कि लाउरे बनकै जम्वामर्दी संस्कारमा हु्कियो अहिलेसम्म !अनि भन्नोस्‌ मैले झैँ रोग, भोकलाई स्वातन्त्र्य नदिने हो भने आखिर पोखरा-भर्ती केन्द्रजस्तै लमजुड-भर्ती केन्द्रसमेत खोल्नुपच्यो भने !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लौ, म कुरो गर्न लागेको त सोझै हो, तर अतिथि इन्जिनियरहरूलेबनाइदिएको बाटाघाटाको नक्साझैँ दसतिर टेढिएर लम्किन गएकोमा माफराख्नुहोला । मुख्य कुरो के भने, यत्रो वीर भएर पनि अहिलेसम्म गोडामा एकजोर लाहुरे जुर्राफ पर्न सकेको छैन । हुन त नामको लागि एउटा कामगर्नुभन्दा नामको लागि सत्रोटालाई सलाम गर्नु आजको सभ्यता हो, तर एक,बारको चोलामा &#039;झोला बोकेर लाह्रै नगई के मर्नु जस्तो लागेर आयो ।तन्नेरीमा लाहुर नपस्ने र बुढ्याइँम&amp;quot; काशी नबस्ने नेपाली गति पर्दैन भन्छन्‌ ।हुन पनि वीरको छाउरो भएपछि फ्याउरोझँ के आफ्नै घरका लुते धन्धामालाग्नु त । ,ल, कुरो त फेरि मन्त्रीज्याको भाषणझैँ उही पो दोहोरियो । आखिर जतिभूमिका भट्टयाए पनि म जान लागेको थिएँ लाहुर, त्यसैले इस्टकोटको टाँकलगाएर खुकुरीबाल टोपी छड्के पारेँ, अलिअलि सामलतुमलको &#039;फोला भिरेँ,हिँडे । तपाईंलाई के ढाँटौँ कुरा ! जति ढाँट्ने साहुलाई नै ढाँटी गोजीमाजमाएको थिएँ- गोडा सोरेक रुपियाँ । त्यही पनि साट्सुट गर्दा ठ्याम्मै भयोदसुको नोट । पैसा मात्रै भनेर हुन्छ, देशी पैसा, हामीकहाँबाट मसिना चामलफ्िकाउने पैसा, हाम्रो पैसा उताबाट उसिना चामल बेसाउने पैसा ! जे होस्‌,आफूलाई चाहिएको थियो नयाँ ठाउँमा जान नयाँ पैसा । आखिर पुग्नुसम्मलाईत हो, लाहुर पुग्नेबित्तिकै त वीर नेपाली आएको भनेपछि नोटको माला लिएरस्वागत गरिहाल्छन्‌ । त्यसैले आनेकाने कुरा नहेरी कालधाराबाट म लुसुक्कनिस्केर पुगिहालेँ सुनधारा ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ओहो ! वीरबलबाबू कता नि ?” बसमा उक्लनेबित्तिकै सुनियो एउटाबूढी-स्वर । यसो हेर्छु त आफ्नै भंक्तिनी बज्यै । दुई-तिनोटी तरुनीको माझमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लाहुरेको यात्रासत्मरण “ ७१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बसेर रामनामी टाउकामा राखेर रुद्राक्ष घुमाइरहेकी । “म त लाहरतिर, आमैकतानि?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले सोधि नसक्तै बृढी थोते मुख नचाउँदै भन्न थालिन्‌- “कहाँ हुन्थ्यो,उनै विश्वनाथ बाबाको पाउमा त हो नि ? यी नानीहरूले पनि कहाँ साह्रैसास्ती पाएछन्‌, सवै अनाथको बाबा विश्वनाथ भनेर उतै लिएर हिँडेकी ।एउटीलाई सासूले नसहेर छुट्टी, अर्कीको पोइ लाहर.. ।” बूढी परी लाउँदै थिइन्‌,बीचैबाट अर्का एउटा भलादमीले प्वाक्क भन्यो- &amp;quot;कुरो राम्रो, विश्वनाथबाबालाई सधैँ भेटी मात्र कति चढाउनु त, कहिलेकाहीँ केटी पनि चढाइदिनैपर्छु । यसबाट एकतिर चेलीबेटीको उद्धार हुन्छ, अर्कोतिर आफ्नो दालरोटीकोसमस्यै टर्छ ।” भलादमीले यो कस्तो क्रा गरेका हन्‌, म त लक्क न बक्क भैजिल्लिदै थिएँ, बूढी आमै भने जिस्क्याइएको जँडयाहाभैँ पाखुरा खैँचेर सराप्नथालिन्‌- “तीर्थ जान लागेका मेरा छोरीबेटीसँग आँखा जुधाउने तँ लुठालाईपख्लास्‌ !” वास्तवमा त्यो बिचरो भलादमीले आँखा जुधाएकै थिएन है, नभएकोकुरा भन्नु पाप लाग्छ, तर बूढी किनकिन त्यसै रन्किन्‌ र मसित भन्न थालिन्‌-“हेर्नोस्‌ न बाबू, के मैले यी केटीहरूलाई भागीरथीमा वगाइदिउँला त ?”भलादमीले भने- “भागीरधीर र त केही थिएन, माझीले उतार्थ्यो, तरचचार पाथी चनामा मोलाउला भन्ने पो डर त ।” यो औडेखौडे कुरा के हो,मैले भने आधुनिक साहित्यजस्तै सबै बुझेर पनि केही बुझ्न सकिनँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;असार-साउनको माटो, बाइरोडको बाटो ।&#039; ड्राइभर रमले रन्न, ट्रकयात्रुले टन्न । अब चाहिया के र : एकछिन त थचाराथचार धक्कमधक्कालेनिकै स्वाद चखाएको थियो, तर जतिजति टक उँभोउँभो लांग्दै गयो, उतिउतिआफ्नो हंस भने उँधोउँधो हुँदै गयो । तैपनि वीरको यात्रा वीरताकै माफिकहुन्छ भन्दै बूढीका चेलीबेटीलाई म आश्वासन दिँदै थिएँ- तीर्थ जानेलाई केकोडर ? बाँचे बाराणसी, मरे अमरावती । तर, नढाँटीकन भनूँ भने आफूलाईचाहिँ सन्देहै थियो । बाँचे त म लाहुर पुग्छुपुग्छु, मरे कहाँ पुग्छु : स्वर्ग किनरक ! स्वगौं पुग्न त अमरावती इन्स्योरेन्स कम्पनीका एजेन्ट-बाजेहरूलाईखीर खुवाएकै छैन । जे होस्‌, वीरजातिको सन्तान भएकोले बाबुबाजेलेकमाइदिएको नामकै भरमा चित्रगुप्तले कमसेकम सेकेन्ड क्लास सिट त कसोनदेलान्‌ &#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म आफ्नै सोचाइमा एकस्र थिएँ, पछाडिबाट कोट्याउँदै एक जनासाहूजीले भने “तपाईं लाहर जाने भए त्यतातिर रायोको सागको माग विचार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७६ / भैरव अर्यालका हात्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गर्नुहोला है ! नभए एजेन्ट बनेर प्रचार गरे कमिसन पनि दिउँला । मेरोव्यापार चानचुने छैन बुभ्नुभो, यसपालि मात्रै पाँच हजारको साग निकासीभयो ।” आफ्नो मूल राष्ट्रिय तरकारी पनि विदेश निकासी गर्ने साहूको करासुन्दा मेरो भने साह्रै चित्त दुख्यो र भनिहालेँ- “बिहानबेलुका अरू थोक केहीनपाए पनि डुकुको झोलसित ढिँडो पुकुपुक्‌ निल्न सकिन्थ्यो, त्यही डुकु पनिनिकासी गरिदिएपछि त तरकारी मात्रै होइन, भोलिदेखि तिहुनकै समस्या तपर्दैन ?” साहले बीचैमा कुरा काद्तै भने- “तिहुनको समस्या झन्‌ टर्छ ।गहिरिएर हेर्नोस्‌ त, यताबाट सागका मुठा पठायो, उताबाट सब्जीको &#039; डिब्बाभिकायो । मीठोको ठाउँमा मीठो, छिटोको ठाउँमा छिटो, कुरा बुभ्नुभएन ?यस्तै हुन्छ चत्रहरूको व्यापार !” साहुको कुरा मलाई मनासिबै लाग्यो ।आजको जमानामा पनि उहाँको झिलिमिली रेडिमेड &#039;सब्जी&#039; खान छाडेरदुकुचामा पखालेको डुक्चा को केलाइरहोस्‌ । सरकारी काममा होस्‌ कितरकारी खानमा होस्‌, सबैतिर छिटोछरितोपनको आवश्यकता छ आज, आधुनिकसभ्यता भनेकै यही न हो!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साहूजीसित कुरा गर्दागर्दै आफू त सातघुम्तीमा हाराबारा तोरी गर्दैघुम्न पुगिसकिएछ । भक्तिनी बुढिया रामराम भन्दै थिइन्‌, तर ड्राइभर हरामपरेकोले ट्रक झन्‌झन्‌ वेगसित घुम्न थाल्यो । घच्चाघच्ची गर्दागर्दै लागेछक्यार चौधरीज्यूलाई ! कालोकालो अनुहारलाई रिसले झन्‌ कालो पार्दै झपारिहाले-“पहाडिया लोग मूर्ख होते है । सडक बनवा दी है हम लोगौं ने, घच्चा देते हैंहमेँ ही । जरा सन्मान के कायदे सीखो ।” आफूले त पक्की भाषा जानेको भएपो बुभनु ! पक्की बात गर्न पनि कि लाहरे हुनुपर्छ कि जोगी हुनुपर्छ यहाँ ।तैपनि शिष्टतापूर्वक चौधरीज्यूलाई भनेँ- “बाटोमा कहिलेकाहीँ घच्चा लाग्छहजुर ! नरिसाउनोस्‌ ।” चितुवाका जस्ता आँखा एक पटक तरेर उनकी श्रीमतीलेभनिन्‌- “आइन्दा ऐसा मत करना, कहाँ जा रहे हो ? हमारे यहाँ नौकरबैठेगा ?” यो कुराले भने मलाई यस्तरी रनक छुटायो कि फट्कारेर भनिदिएँ-“म त लाहुर पस्न लागेको पो त, तिमीकहाँ नोकर बस्छु ?” “बैठोगे तो तुम्हेँहम दरबान भी बना देगे” भनी चौधीरनी भाउजू आँखा नचाउँदै थिइन्‌, मफरक्क फर्केर पुगेँ अर्कै छेउमा ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राणबायु अपानबायु दुवै समान भएकाले ट्रकभित्र सास फेर्न पनिमुस्किल परिरहेको थियो । घुइँचोले कुन कसको सीट हो, कोको कहाँनिर छन्‌पत्तै भएन, मानौँ संसार-सागर त्यहीँ थियो । त्यसैले मलाई लागिरहेको थियो-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लाहुरेको यात्रासंस्मरणा ? ७७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लाहुरबाट फर्किंदा त म यो भद्रगोलमा के बस्थेँ, त्यति बेला आफूसित रुपियाँकोब्याग हुन्छ, स्वास्नीलाई ल्याइदिएका लुगागहना हुन्छन्‌- केके हुन्छन्‌ केके !सम्झेर के साध्य ! देश भनेको देशै हो, धन हुने बाबूसाहेबहरूको राख्न जानेठाउँ पनि उहीँ, नहुनेहरूको कमाउन जाने ठाउँ पनि उहीँ । दाजुभाइसितझगडा परे झिटीभझाम्टा जिम्मा दिने पनि उतै, बाबुआमाले गाली गरे पाखुराखैँचन पाइने पनि उतैबाट । कस्तो बिचित्र ठाउँ होला त त्यो !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले गम्दागम्दै ट्रक त पुगिसकेछ रक्सोल । उत्रनेबित्तिकै विभिन्न थरीउर्दीपोसाक लाएकाहरूले “बाबूजी, इधरउधर” भन्दै मलाई छोपिहाले । वीरनेपाली भनेपछि स्वागतार्थी पनि कतिकति आएका ए ! मैले नेप्टै भए पनिआफ्नो नाक फर्सीजस्तो पारी फूलाएँ । तर फसादचाहिँ के पन्यो भने सबैलेतानेपछि जाने कतातिर ? ससुराली भिन्न भएको साल सोह्7सरादको श्राद्धमागएको जुवाइँलाई जस्तो अप्ठ्यारो पन्यो आफूलाई त । “क्याहो ए वीरबलभान्जा ! तिमी पनि यहाँ ?” त्यहीँ नजिकबाट आफ्ना मामाको स्वरले मलाई&#039;झसङ्ग पारिदियो । “ओहो, मामा तिमी पनि यहाँ ?” मामालाई भम्टँदै मैलेपनि सोधिहालेँ- “उता लाहुर गएको भन्थे- यहीँ हो कि क्या हो लाहुर ?”मलाई आफूले तानिरहेको रिक्सामा बस्नै अनुरोध गर्दै मामाले भने- “तिमीअलि सोझा छौ भान्जा &#039; नेपालीको निम्ति डाँडो काट्यो कि लाहुर ! तिमीकता नि ?” मैले चकित भावमा जबाफ दिएँ- “म पनि लाहुरतिर लागेको !”“लाहर त लाहुर, तिमी साँच्चीकै लाहुर पुग्न आँटेछौ, पोकोपन्तरो खोइ ?”यताउति हेरेर झपादै मामाले भने । नभन्दै पोकोपन्तरो त अर्कै स्वागतार्थीलेअघि नै लगिसकेछ- अब कहाँ कसलाई समाउन जाने त लौ !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“फ्यँकिदेक त्यो टोपीसोपी, यता टोपीको दर्शन पाएपछि पोको मात्रैहोइन पोकोवालालाई बोकोभैँ घिच्च्याएर बेचिदिन बेर छैन बाबै !” मामाकोयो व्याख्यान मैले केही पनि बुझिनँ । तैपनि टोपी फुकालेर रिक्सामा बसेँ ।मामा सोध्दै गए- “अब के गर्छौं त ? रिक्सै चलाउँछौ भने, मामाभानिजकोकांमक्रो मिलिहाल्यो । होइन, म त नोकरी नै गर्छु भन्छौ भने कुनै होटलमाबेरा खाली छ कि बुभनुपर्ला ।” मामाको यस प्रश्नले मलाई छक्क पान्योरसोधेँ- &amp;quot;के साँच्चै लाहुर यही हो मामा ?” मामाले मुस्कुराउँदै जबाफ दिए-“भनिहालेँ नि, हाम्रो निम्ति डाँडो काट्यो कि सबतिर लाहुर । रक्सोलमा रिक्साचलार बा दरभङ्गामा दरबानी गर, मलायामा बुट ठोक कि मणिकर्णिकामामुर्दा बोक, घर गएपछि कमसेकम पाइजामा नफाटुन्जेल तिमी लाहरे भइहाल्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उद “ भ्ैरब अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मामाका यी मार्मिक क्राले म त छानाबाट खसेजस्तै भइहालेँ, निधारमाचिटचिट पसिना आयो, नाक-मुख खङ्ग्रङ्ग सुकेर रिक्सैमा घोप्टो परौँला भन्नेडर लाग्न थाल्यो । “के यही हो त लाहुर- हजारौँ नेपालीले आउने गरेकोलाहुर ? वीरजातिले पुरुषार्थ देखाउने लाहुर ?” मैले अत्तासिँदै सोधेँ आफ्नालाहुरै मामासँग । मामाले च्याँठिएर जबाफ दिए- “के तिम्रो हाम्रो बीरताखलङ्गामा लड्ने नेपालीको वीरता हो र ? त्यसो भए त तिमीलाई देशकोमाया हुन्थ्यो, उतै घोट्टिन्थ्यौ, उतै बाँच्थ्यौ । तर तिम्रो वीरता, त्यो &#039;गुर्खा&#039; कोवीरता, जसले देशमा एउटा काम गर्नुभन्दा विदेशमा सत्रोटालाई सलामगर्नुलाई पुरुषार्थ ठान्यो, आफ्नो पसिना दिनुभन्दा अरूको निम्ति रगत दिनजान्यो । तिमी त्यो कँवर-कुलको कमानमा दीक्षित नेपाली जसले तन्नेरीकोतन, तरुनीको मन सबको दरभाउ बसायो, धन कमायो, कैयौँ ब्याङ्क जमायो ।कुरो बुभ्यौ ?” तर सत्यसत्य मैले कुरो बुझिनँ । मैले मामाको कुरा बुझिनँ ।तर मनको भित्री भागमा चाहिँ के लाग्यो भने- घरबाट ल्यएको पोकोपन्तरोमात्रै नहराएको भए पनि म ठाडै खुट्टाले फर्कन्थेँ घर । तर, अब परियो यताआफू अलपत्र, जहान उता अलपत्र, जो भएको भझिटीझाम्टा पर्न गयो साहकोसत्र ! जे होस्‌, हामी वीरको साथै उदार पनि त हौँ, दुई-चार जना हामीजस्तास्वदेशीहरू हराएर के भो, कैयौँ &#039;देशी&#039; हरू नक्कली मयूरभैँ भित्रिदै पनि तछन्‌ के नि ! तर जति सम्झाए पनि मनचाहिँ बिग्य्रोबिग्य्रो, लाहुर बस्नै मानेनर फर्के घरैतिर । त्यसैले, हेर्नोस्‌, कहाँ लाहुरे बन्न गएको मान्छे अहिलेसम्मदाउरे बनेर भ्याउरे गाउँदै छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशाख, २०२१ गोकर्णरचना&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लाहुरेको यात्रा संस्मरण / ७९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेता नम्बर एक सय एक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दन्त्यकथामा आकाशबाट फुलौरा बर्सेझैँ अन्त्यकथामा एकताकापातालबाट नेता बर्सन्थे । काला, गोरा, ध्वाँसे, छिर्निरे, फ्याँते, फोक्से, चुच्चे,नेप्टे, भँगेरे, चमेरे- जस्तो नेता खोजे पनि त्यति बेला पाउन सकिन्थ्यो ।साँच्ची भनूँ भने तिनताक नुनमा कन्ट्रोल भए पनि नेतामा थिएन । पाटीमाबास नपाए पनि पार्टीमा त खास पाइन्थ्यो । त्यसैले म कुरा भिकम्तै छु त्यहीझालेमाले दशाब्दीको ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म थिएँ त्यस बेला बेनामी अड्डाको बहीदार । अड्डा बेनामी भन्दैमा मआफू पनि बेनामी थिएँ भन्ने नसम्झनुहोला नि । खासखुसबहादुर खतिबडाभनेपछि सिंहदरबारदेखि लिएर कमिलाकुटीसम्म मलाई नचिन्ने कोही थिएन ।बाहिर छउन्जेल घुम्ने, भित्र छउन्जेल उभ्ने भएकोले कोही मलाई बहीदारकोसट्टा फुइँदार पनि भन्ने गर्थे । तर के गर्नु र ! प्रमोसन पाउने बेला भयो किआइपुग्थ्यो अर्कै जगरसेठ, कहिले नेतामार्का, कहिले नातामार्का ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मलाई एक दिन झोकै चल्यो, दर्जाको पछाडि एउटा &#039;टर&#039; नझुन्डिएकोजागिर के खानु ? किनभने जमान्तै &#039;टर&#039; को छ हेर्नोस्‌ न- मिनिस्टर, डाइरेक्टर,इन्सपेक्टर, मास्टर, डाक्टर, एडिटर, अडिटर इत्यादि । पुलिस इन्सपेक्टर नपाएबस कन्डक्टर नै सही, एडिटर नपाए कम्पोजिटर नै सही, एउटा &#039;टर&#039; तझुन्ड्याउनै पर्छ बा ! यो जाबो बहीदार सधैँको दिक्दार । यस्तै कुरा सोच्तैमकैमार्का बेसनको लड्डु खाएर चुइँचुइँ कराउने साइकिलरूपी छुचुन्द्रोमागणपति लम्केभैँ ढल्किदैढल्किदै हल्लिरहेको थिएँ ! नयाँसडकको मूल ढोकैमाप्रसिद्ध नेता कछुवाकान्त कार्की भेट भए । साइकिलबाट ओह्लदै नमस्कारपूर्वकमैले सोधेँ- “नेताजी कता ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“एउटा पार्टी छोडिहालियो । अर्को पार्टी खोलिसकिएको छैन । त्यसैले&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
4० ” भैरब अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हालसाललाई नेताजी न यता न उता !” नेताजीले नाक मुसार्दै भने । अनिखल्तीबाट क्राइभेन चुरोट निकाल्दै गम्भीर मुद्रामा मलाई सम्झाए- “ तपाईंजस्तानौजवानले पनि बहीदारमा झुन्डिने हो ? आउनुहोस्‌ मेरो पार्टीमा काम गर्न ।सेक्रेटरी गराइदिन्छु । अहिलेलाई चिया-चुरोट चलाइदिउँला, चन्दा धेरै उठेपछिचप-चुस्कीको चमेना पनि गर्नुहोला ।” सेक्रेटरी, हँ ! &#039;टर&#039; भन्दा पनि ठूलोटरी !! उनको क्रा सुन्नेबित्तिकै के खोज्छन्‌ काना ? आँखो भनेझैँ मलाईलाग्यो र झोला र झन्डा काँधमा हालेर हिँडे त्यहीँदेखि चन्दा उठाउने धन्दामा ।जोजो जेजे चाहन्छन्‌ त्यहीत्यही मिलाइदिन आशा देखाएपछि चन्दा झर्न कतिबेर ! हाम्रो घोषणापत्रमै लेखेको थियो-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“व्यापारीलाई दर, सुकुमवासीलाई घर, जागिर खानेलाई पोस्ट, खाजाखानेलाई टोस्ट, जोगीलाई जंक्सन, रोगीलाई इन्जेक्सन, पढ्नेलाई पास, खेल्नेलाईतास, गाइनेलाई भ्वाइलिन, आइमाईलाई नाइलिन; पुलिसलाई डन्डा, नेतालाईझन्डा; पन्डालाई भेटी, गुन्डालाई केटी इत्यादि ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर के गर्नु- नेता थिए नम्बर वन, जति चन्दा उठाए पनि आफैँ.च्वाम्‌ । आखिरमा मएर मलाई जङ्बहादुरको पालाको एउटा जडाउरी कोटमाटारिदिए । चौटा खान गएको सम्धि झोलमा डुबेर मन्यो भनेभैँ म हिस्स बूढीहरिया दाँत भएँ । तर उद्योग गर्दै रहेपछि एकातिर नभए अर्कोतिर गल्फ भन्नेसम्झेर तुरुन्तै ज्वाइन गरेँ अर्को पार्टी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पार्टीको नाम त के हो कुन्नि, अङ्ग्रेजीमा थियो, तर नेताको नाम भनेरेशमवीर पाँडे हो ! नेतालाई भेटेकै दिन श्रीमती नेतीले मसित सुटुक्क भनिन्‌-“तपाई पहाडको मान्छे, एक टिन शुद्ध घिउ ल्याइदिनुहोस्‌ न, म उहाँ हजुरलाईभनेर अफिससेक्रेटरी गराइदिउँला ।&amp;quot; के गररँ-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“नेताना नेतीनां चैव वचन नैव लंघयेत्‌,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संसदीये प्रजातन्त्रै पार्टीनितैव ईश्वर: ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यही ठानी गएँ उही दिन काम्लोकुम्लो बोकेर देउपुरतिर । तै, घिउबोकेर आउँदै थिएँ, भाग्यमानीको भूतै कमारा भनेझैँ अर्को नेताले समाएरभने- “त्यो ठगसित किन लाग्छौ, बरु एक टिन घिउको अर्डर मै दिउँलातिमीलाई, मेरो पार्टीको सङ्गठन गर ।&amp;quot; कुरा मलाई ठीकै लाग्यो र थालेँउनैको पार्टीको लागि मान्छे फकाउन । माम पाएपछि काम गर्न को गाह्रोमान्छ ? कसैलाई कुराले फुलाएर, कसैलाई सुराले झुलाएर, कसैलाई झन्डालेलोभ्याएर, कसैलाई डन्डाले सोभ्याएर, कसैलाई खेती जोरिदिउँला भनेर,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेता नम्बर एक सय एक / यप&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कसैलाई केटी खोजिदिउँला भनेर, कसैलाई नुन पाउला भनेर, कसैलाई सुनलाउला भनेर इत्यादि गर्ने कृत्य गरी मेरा मनोमान खुसी राजीसाथ पार्टीकोसदस्यबुकमा सही गराएँ । यसको फलस्वरूप कैयौँ पटक जुलुस, भाषण,हडताल, पिकेटिङ गरियो । “जहाँसम्म हाम्रो अखिल नेपाल दुःखमोचन पार्टीकोसरकार हुँदैन, त्यहाँसम्म हाम्रो सङ्घर्ष जारी नै रहन्छ” भन्दै सभापति श्रीबकनबिलास बनियाँले नेपालचौरमा कुर्ले । शहीदको शपथ खाँदै उनले योपनि भने कि हाम्रो पार्टीको सरकार बनेको भोलिपल्ट नेपालको दुःखजतिकालमोचनमा लगी म बगाइदिन्छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नभन्दै नेताले फुर्का हालेको दिन उनकी सालीले हीराका लुर्का पाइन्‌,मैलेसम्म एक तुर्का चिया पाएको थिएँ, मैले बनाएका सदस्यले एक कुड्काल्बाङ पनि पाएनन्‌ वा अरू जनताले भने भोलिपल्टदेखि कतै नेताका सालाको,कतै सालाको पनि सालाको मुड्का पाउन थाले । यो देखी मलाई साह्रै जङचल्यो र म पुगेँ अर्कै पार्टीमा ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर त्यो रहेछ गजब पार्टी । जानासाथ मेरो इन्टरभ्यु पो लिन थाल्यो !प्रश्नोत्तर यिनै थिए-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हूलदङ्गामा तँ कति पटक पक्रिएको छस्‌ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“छैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हतियार चलाउन केके जान्दछस्‌ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“जान्दिनँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“चोरी, रहजनी इत्यादिमा बात लागेको छ कि छैन ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“छैन ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“परेको बेलामा चर्पीको प्वालबाट भाग्न सक्छस्‌ कि सक्तैनस्‌ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“सक्तिनँ” इत्यादि । अनि नेताले एउटा ठेलो पल्टाएर भन्यो-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“चोरीचकारी नगरी चतुन्याइँ हुन्न&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दङ्गाफसाद नगरे इजतै रहन्न ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोझा र सज्जन कबै नलिनू दलैमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पार्टी चलाउनु सधैँ छल औ बलैमा ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो सुनेर म अक्क न बक्क परी फर्कै बरैतिर । तर पार्टीको नशाअफिमको भन्दा पनि कडा हुने रहेछ । बाबुआमा गाली गर्थे- पार्टीमा कदनुभन्दापाटीमा एउटा नाङ्ले पसल थाप्नु नि बाबू ? तर के भन्या यस्तो ? नेता हुनेमान्छेले नाङ्लाँ तिलौरी बेचेर बस्नु ? तिलौरीको सट्टा बरु स्वास्नीको तिलरी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
५२ ” भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बेचुँला नि भनेजस्तो लाग्यो । अनि मैले धमाधम एकपछि अर्को, अर्कोपछिअर्को गर्दै भएजति पार्टी चहारेँ । दुई-चार वटाको नाम पनि सुनिहाल्नोस्‌-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(१) राष्ट्रिय छलछाम परिषद्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(२) अराष्ट्रिय पेडाजुल्फी दल ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(३) अन्तर्राष्ट्रिय खुर्पा पार्टी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(४) अराष्ट्रिय जम्बुक दल ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(५) सुराष्ट्रिय कन्याखोज मण्डल ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(६) कुराष्ट्रिय कुकर्म काउन्सिल इत्यादि ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्राद्ध गर्दा बिकरलाई घोप्टघाएको दुनो पनि पछि गएर पुरेतले सोभ्याउनलाउँछन्‌, तर मेरौ घोप्टिएको दुनो कतै पनि सोझिएन । एक सयवटा नेताकोसङ्गत गरेँ, जुत्ता बोके, आखिरमा आएर न यता न उता। त्यसैले &#039;फोकैशान्ति मैले पनि मावलीको मद्दतले एउटा पार्टी खोलेको छु, जसको नाम हो-अखिल नेपाल भस्याङभुसुङ दल&#039; । जसले जे भने पनि आखिर म पनि एउटानेता भैहालेँ । अन्त्यमा, मेरो पार्टीमा काम गर्न चाहने कुनै कङ्गाली छ भनेबङ्गाली भाषामा एउटा दरखास्त लेखी बतासे हुलाकमा खसालिदिनुहोलाअधवा जग खन्ने मुसा, घुरी खोस्रने बिरालाको सिङमा झुन्ड्याइदिए पनिहामीकहाँ आइपुग्छ । सो पनि नसके एउटा लाटोकोसेराको कानमा सुटुक्कभनी पठाए पनि हुन्छ । नोट गरी राख्नोस्‌- नेता नम्बर-एक सय एक ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रहरी फागुन, १९६५ सन्‌ह्नैकन्तला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेता नम्बर एक सय एक ” परे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महापुरुषको सङ्गत&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;जब भयो राति, अनि बूढी ताती&#039; भनेझैँ जब कालले पासो हाल्दैल्याउँछ, अनि मान्छेमा ज्ञानगुनको चासो लाग्दै आउँछ । पहिले सालीकाआसक्तहरू पछि कालीका भक्त हुन्छन्‌, पहिले खन्तीराजमा बदनामी कमाएकाहरूपछि सन्त महाराज भई रामनामी गुन्न थाल्छन्‌ । संस्कारै यस्तै छ । संसारैयस्तै छ । त्यसैले आफू पनि उस्तै । साठी नपुगुन्जेल पाठीको घिच्रो पनिनिमोठियो, लाटीको तिघ्रो पनि चिमोटियो । कसैको घाँटी अँठयाइयो त कसैकोगाँठी जिब्टधाइयो । कतै जोरै हात लम्काइयो त कतै सोह्दै भाइ झम्काइयो ।जब आँट मर्दै र दाँत झर्दै आयो, अनि बल्ल घट्टमा घाम लाग्यो- ए!महापुरुषको सङ्गत त गर्नै पर्ने ! मर्ने बेलामा बूढाबा&#039; ले भनेका थिए- “अरूथोक नसके पनि महापुरुषको सङ्गत त गरैस्‌ है बाबू ! ज्ञानगुन पाइन्छ, स्वर्गजाइन्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर महापुरुष पाउने कहाँ ? यसै त देशको जनसङ्ख्यामा स्त्रीको भन्दापुरुषको सङ्ख्या कम छ । त्यसमा पनि लाहुरे भएर विदेशमै रत्तिएका, दाउरेभएर स्वदेशमै लत्तिएकाको के भाउ ? योबाहेक जति छन्‌ तिनमा पनि जमानाकोजाँतोमा सभ्यताको सातु पिन्दापिन्दै जिङ्ग्राएको भयाउरै छन्‌ । त्यसैले क्रैगर्ने हो भने यहाँ पूरापुरुषको भन्दा लघुपुरुषको सङ्ख्या धेरै होला । महापुरुषकोत कुरै छोड्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तैपनि पहिल्यै हरेस खाएर त भएन । त्यसैले एक दिन बिहान टौबामाकौवा नबास्तै गौवाको बासी पानीले पूजा भूजा चामचुम पारेर निस्कैँ ममहापुरुषको सङ्गत गर्ने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाम्रा भेगका लम्वरी पण्डित पनि त महापुरुबै हुन्‌ । उनका नामै मात्रहुँदा हुन्‌- १०६ । कुराकानी गर्दा प्रत्येक वाक्यमा &#039;जो छन्‌ सो&#039; जोड्ने हँदा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द४ “ भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कोही उनलाई &#039;जो छन्‌ सो पण्डित&#039; भन्थे । घिउ चिनीबिनाको खाना बोसीकोदाना&#039; भन्ने उनको सिद्धान्त भएकोले कोही भन्थे उनलाई &#039;घिउ-चिनी बाजे ।&#039;यस्तै, दाँत उछिट्टिएकोले केटाकेटीहरू &#039;दन्तुरे बा&#039; भन्थे त खुट्टो अलि खोच्याउनेहुनाले ठिटाठिटीहरू भन्थे- &#039;खुन्तुरे बूढा । जजसले जे भने पनि उनी थिएधर्मशास्त्रका नम्बरी पण्डित । जरसाहेबका खोपीदेखि बाख्रे बूढीको झोप्रासम्मसबै उनका जजमान, सबैकहाँ उनको सम्मान, त्यसैले श्रीगणेशाय नम: मैलेपनि तोक उनकै दलान ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बूढा जबाँमर्दै हुन्‌, त्यति सबेरै पुसको ठन्डीमा पनि मन्डी ओढेर चन्डीभटभटचाउँदै गोठमा भुसा काटिरहेका । मैले पाउलागी गरेपछि मन्डी फालेररामनामी बेह्विँदै चिप्लो स्वरमा सोधै- “कताबाट जो छन्‌ सो आइस्‌ त नानी !तीर्थबर्त जो छन्‌ सो त केही आँटिनस्‌ ?” मैले भनेँ- “मर्ने बेलामा केहीज्ञानगुन पाइन्छ कि भनेर हजुरजस्ता महापुरुषको सङ्गत खोज्दै हिँडेको बा !”बूढाले मलाई हप्काउँदै भने- “मने बेलामा त जो छन्‌ सो दसदान गर्नु,वृषोत्सर्ग गर्नु, सप्ताह लाउनु, शय्यादान गर्नु पो पर्छ त जाबा ! दानबिनाकोज्ञान जो छन्‌ सो मकैबिनाको घानजस्तै हुन्छ, बुझिस्‌ !” उनी मलाई नुझाउँदैथिए, नजिकै बाँधेको भैँसीले गोबर लतपतिएको पुच्छर हल्लाउँदै बूढाकोमूखैमा छयाप्प हानिदियो । हत्त न पत्त रामनामीले दाह्टी पुछै, अकस्मात्‌हाच्छिउँ आएर तमाखुका धूवाँले धैँस्याएका जुँघामा नागपुरे पालिस थोपरिदियो ।त्यही बेला एक जना गाहकी गोरु खोज्दै उनैको गोठभित्र आइपुग्यो । जुँघामुसार्दै बूढाले भने- “हिजो एक जना पिशाचकहाँ जो छन्‌ सो सत्यनारायणकोकथा भन्न गएको, अमिलो ट्वाँक दही जो छन्‌ सो खान दिएर रुघा&#039; जो छन्‌सो लागिसक्यो ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गाहकीले यतिन्जेल गोरु हेरिसकेकोले मोलमोलाइ चल्न थाल्यो । बूढालेएकैचोटि कुरा सिद्धघाउन खोज्दै भने- “शास्त्र जो छन्‌ सो बाहुनले गाईगोरुजो छन्‌ सो नबेच्नु भन्ने लेखेको छ, त्यसैले ५० दिन्छौ भने लैजाक जो छन्‌सो नत्र म गोरु बेच्तिनँ ।” गाहकीले साह्रै बूढो भएकोले ४५ देखि दिन नसक्नेराय प्रकट गरेपछि बूढाले च्याँड्घिएर कुरा थपे- “अलि बूढो भए पनि जो छन्‌सो गुजाँतीको खच्चड हो ! कसो नानी ?&amp;quot; आफ्नो मुखतिर ताकेर सही मागेपछिमैले पनि बोल्नै पस्यो । भनिदिएँ- “यस्ता क्रषिजस्ता महापुरुषले पनि ५रुपियाँको निम्ति झूटो बोल्छन्‌ ? गोरु जातकै हो ।” गाहकी भन्दथ्यो- “योगोरुको पनि दाह्ठीजुँघा हुँदौ हौ ता बाजेजस्तै क्रषि देखिन्थ्यो होला ।&amp;quot; यो सुनी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महापुरुषको सङ्गत ८१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रन्किएर बूढा भैँसीलाई भुसा कोच्याउँदै उच्चा स्वरले चतुश्लोकी भागवत पाठगर्न थाले, मचाहिँ जुरुक्क उठेर हिँडे घरतिर । .&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ढुङ्गो खोज्दा देउता मिलेभैँ सच्चा महापुरुष त आफ्नै पिँढीमा पोप्रकट भएका रहेछन्‌ । सोझो मनले चिताएपछि &#039;तँ चिता म पुच्याउँछु&#039; भन्छरे दैवले, नत्र त पशुपतिपुरका स्वामी मेरो झुप्रामा कसरी प्रकट हुन्थे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनका पनि नाम त थुप्रै थिए । सन्तान नभएका आइमाईलाई सन्तानहुने जन्तर बाँध्नमा प्रख्यात भएकोले धेरै उनलाई &#039;सन्तान गिरी&#039; भन्थे । तरकोहीचाहिँ बाली उठाउन घरघर हिँड्ने हुँदा फटफटानन्द भन्थे त कोहीपार्टीप्रचारमा गाउँगाउँ चहार्ने हुँदा चटपटानन्द पनि भन्ने गर्थे । वास्तवमाउनको सम्कली नाम थियो- स्वामी सद्गुणानन्द षड्शास्त्रोपाध्याय । उनकोखान्की जग्गाको सानु टुक्रा आफूले पनि कमाएकाले आफ्नो त साक्खै तल्सिङपनि ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महापुरुष प्रकट हुनाको कारण खोतल्दै थिएँ- उनले बालीको कुराझिकेर आफैँलाई हपार्न थाले बा ! आङमा गेरुवा रेशम, हातमा बेरुआ औँठीलगाएका महात्मालाई मैले तिर्नुपर्ने पौँच पाथी धानको त्यत्रो मोह ! तैपनि मैलेआफ्नो मनको बह फोएँ, ज्ञानको निम्ति रोएँ । अनि आफ्ना महापुरुषार्धहरूउनले मलाई निकै सुनाए । एउटा मोहीले दुई पाथी कोदो बुझाउन ल्याएकोथिएन रे, उनको पालो घरैमा गएर त्रिशूल चखाइदिएपछि थुरधुर कामेरभोलिपल्टै ल्याए रे । एक पटक सेठकहाँ उनले यस्तरी गीताको प्रवचन गरे रेकि त्यो प्रवचन सुन्दासुन्दै मुग्ध भएर एउटी आइमाई उनको काखैमा लड्नआइपुगी रे । यसबाहेक उनले कतिपल्ट आफ्नो हातमा आइसकेको मन्त्रीपदछोडेर जनताको सेवा गर्न &#039;गुठी-बिर्ता संवर्द्धन परिषद्‌&#039; खोलेको र आगे सालजिल्ला पञ्चायतको चुनाव लडेर आफ्नो संस्थाको अधिवेशन गर्न आँटेको क्रापनि बताए । उनको पुरुषार्थ सबै सुनेपछि मैले पनि उनको संस्थामा सदस्यहुने भाका राखी दहीचिउरा ख्वाउँदै बालीको कुरा छल्न खोजेँ, तर हिँड्नेबेलामा उनले भने- &amp;quot;ज्ञान लेना है तो कल धान लेकै आइए, नहीं तोमोहीयानी मिलेगा दूसरेको ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यसरी दुईतिरबाट निराश भएपछि मैले निश्चय गरेँ- गोपी गुरुकै गोडाकिन नसमातूँ ! सक्कली महापुरुष उनी पो त ! राधाको झैँ सिउँदो, रुम्मिणीकोझैँ अलख, दुपीमा अत्तर, जुँघामा कलप, गलामा सिक्री, गालामा फाः, गुरुजीकोवैह्रन घोती र दोसल्ला । कलिमा जन्मेर मात्रै अलि लीला बढ्न सकेन, द्वापरमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६६ 7 भैरव अयलिका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जन्मेका भए कृ्‌ष्णमाथिका उपरकृष्ण हुन्थे होलान्‌ हाम्रा गोपी गुरु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दरबारै भने हुने उनको &#039;कुटी&#039; मा पुगेपछि आफू त वृन्दावनमा पसेकोमसोजस्तै अक्क न बक्क भएँ । अघिल्तिर कन्या साथमा सधवा, पछिल्तिरसयौँ बढी र विधवा राखेर गोपी गुरु सुनाउँदै रहेछन्‌- गोपिनीको चीरहरण ।मैले सम्झैं, एउटी आइमाई मान्ने हामी त पुरुष कहिन्छौँ भने यतिका आइमाईलेपत्याएका गोपी गुरुलाई महापुरुष नभन्ने को ? पुराण सकिएपछि गुरुकोचरणारविन्दमा आफ्नो अभागी पुर्पुरो टेकाउँदै मैले भनेँ- “म एउटा ज्ञानकोभोको महापुरुषको सङ्गत गर्ने धोको लिएर आएको छु हजुर ?” पुराणकाभेटीघाटी बटुलेर पोको पार्दै गुरुले भने- “लौ, सधैँ यहाँ आएर भक्तभक्तिनीकोसेवा गर्नू ।&amp;quot; गुरुको आज्ञा हुनासाथ एउटी भक्तिनीले मुज्याएको फरिया दिँदैमलाई भनिन्‌- “यति पछारेर ल्याइदिनोस्‌ त बूढा बा !” मलाई जङ चलिसकेकोथियो तैपनि सुनेको नसुन्यै गरेर चल्दिएँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनि मलाई लाग्यो- जसको धनधान्य, उही सर्वमान्य ।&#039; जाउँ कालुसाहूकहाँ नै, क पनि त एउटा महापुरुबै हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अस्तिसम्म नालुको जुत्ता लाएर आलु बेच्न जाने तालु खुइलिएको कालुसाहलाई अहिले ठालु भयो भन्दैमा महापुरुष कसरी भन्नु ? भन्ने तर्क पनिआउला, तर क लघुपुरुष हुँदो हो त लक्ष्मीले कसरी पत्याउँधिन्‌ ! स्वाँठ भएरअरूलाई लछार्ने भए पनि, ट्वाँट पिएर सडकमा पछारिने भए पनि क्याँट हुनेमान्छे महाजनै गनिन्छ । यसको क्याँट कताबाट कसरी बदलियो भन्नेतिरकिन सोचिरहूँ ? यसरी भित्रभित्रका कुरा खोतल्ने हो भने कसका केके देखिन्छकेके ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घरमा पुग्नेबित्तिकै साहुजीले चुरोट टक्प्राउँदै सत्कार गरेर छोराछोरीलेवैसा उडाइदिए भन्ने दुःख पनि प्रकट गरे । अनि कुरैकुरामा आफ्ना कुराकोबासा खोल्न नपाउँदै उनले साउती गर्दै भने- &amp;quot;म चाहिने जो तपाईंकहाँआउँदै थिएँ, चाइने जो म बद्री दर्शन गर्न चाहिने जो जाने अठोट गरेको छु,चाहिने जो &#039;पशुपतिको जात्रा सिद्राको बेपार&#039; भन्दछन्‌, चाहिने जो दुई-चारवटी केटीहरू पाए चाहिने जो लिएर जाँ भनेको, चाहिने जो अचेल उता(?) तिर केटीको भाउ चर्को छ भन्ने सुन्छु । चाहिने जो बाजेले यताउति दुइटीकेटीलाई चाहिने जौ नोकरी लाइदिन्छु भनेर ल्याइदिनुभए चाहिने जो, जोमिलेको आधाआधी गरौँला ।&amp;quot; साहका कुराले म छक्क परेँ । मेरा महापुरुषफेरि भन्दै गए- “चाहिने जो सोफो औँलाले घिउ आउँदैन, चाहिने जो यत्रो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महापुरुषको सङ्गत “ द७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्वीसम्पत्ति चाहिने जो आलु बेचेर मात्र अथवा चाहिने जो कुटोकोदालो गरेरमात्र चाहिनै जो कमाएको ठान्नुभएको छ ! चाहिने जो लक्ष्मीको ध्यान गर्नेलेचाहिने जो मौकामा गाई पनि, मार्नुपर्छ, भाइ पनि मार्नुपर्छ । चाहिने जोबिरालीको घिउ बेचेर भए पनि बुहारीको जीउ बेचेर भए पनि चाहिने जोढुकुटी भर्नुपर्छ बाजे ! यस कालमा !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साहका यी कुराले झन्‌ बिरक्त्याए मलाई । अनि सोचेँ- अब यस्ताथोत्राथोत्री केलाउन नलागूँ भाइ ! खोजौँ जमानाअनुसारको महापुरुष । यहीबिचारले रातभरि गम्दागम्दै महापुरुष ठहरिन गए मिस्टर ड्याहाल बौ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनका बानु थिए गणपति दाहाल बाजे भनेपछि निष्ठाकर्ममा नेपालवर्णाएका । उनैका छोरा हिन्दुस्तान छउन्जेल दाहालबाब्‌ भनिन्थे, अहिले अमेरिकागएपछि &#039;मिस्टर ड्याहाल बौ&#039; भएर फर्केछन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अमेरिकालाई उहिल्यैको नागलोक, अहिलेको कुबेरलोक भन्छन्‌ । त्यस्ताठाउँमा झन्डै दुई वर्ष पढेर आएकालाई महापुरुष नभने कसलाई भन्ने ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म पुग्नेबित्तिकै उनकी छोरीले भनिन्‌- “डाडी ब्रेकफास्ट लिँदै हुनुहुन्छ,एकछिन वेट गर्नुपत्यो” तर उसले भनेको कुरो नबुझेर म सरासर माथिउक्लेँ । छोरो पूजाचौकामा बसेर बूढा बाबूले भागवत राख्ने खटियामा पूजासामाहाल्ने तामाको प्लेट राखेर सन्जे भन्दा पानी अचाउने आचमनीले चिकेन पुलाउखाँदै रहेछ । मलाई देख्नेबित्तिकै उसले पनि &#039;डचाडी ब्रेकफास्टमा, ममी बाधरुममा,तपाईं एकछिन वेट गर्नोस्‌” भन्यो । म जिल्लिदै थिएँ मिस्टर डघाहाल बौ &#039;आईसी&#039; भन्दै ओर्ले । ससाना केटाकेटीलाई पनि अङ्ग्रेजीको राम्रो तालिम दिएकोमाम धन्यवाद प्रकट गर्दै थिएँ, उनले भने- “मेरो आइडिया छ, चिल्ड्रेनलाईचाइल्डहूडदेखि नै नेप्लीज ल्याङ्वेज बोल्नै नदिएर इङ्ग्लिस बोलाउँदै लानपाएपछि यिनको प्रोनाउन्सेसन्‌ करेक्ट हुन्थ्यो ।&amp;quot; सबै क्रा नबुझे पनि मैलेबीचबीचमा &#039;हजुर&#039; भन्नचाहिँ छौडिनँ । त्यताबाट थाले उनले अमेरिकाकोवर्णन । सडक, पर्खाल, रेस्टुराँ, चियाको कपदेखि लिएर टेलिभिजन रटेलिस्टारसम्मको बर्न सिद्धघापछि दुःख प्रकट गर्दै उनले भने- “के गर्नु र !यहाँ एउटा हिटर र एउटा रेफ्रिजेटर पनि पाइन्न । नेपाल एउटा कन्डी नै हैनबुभनुभो ?” मैले ठाडो उत्तर दिएँ- “बुझेँ ।” अनि उनले नेपाललाई उन्नतिशीलगराउने हो भने यीयी योजना बनाउनुपर्छ भनी आर्यघाटमा बाँध बाँध्नेदेखिलिएर चाँगुको ढिस्काबाट रकेट उडाउनेसम्मका उनका योजना सुनाए । दुईघण्टा अमेरिका माहात्म्य, दुई घण्टा आफ्नो पुरुषार्थ, दुई घण्टा योजना, दुई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घय ” भैरब अर्यालका हात्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घण्टा स्वदेश र संस्कृतिको निन्दोचर्चौ, दुई घण्टा अरू फाटफुट कुरा गरिसकेपछिउनले भने- “आई सी, तपाईं किन आउनुभएथ्यो सोध्नै बिर्सेछु ।” त्यही केलाउनकी नयाँ दुलहीले चिया ल्याइ्हालिन्‌, फेरि चल्यो दुलहीको परिचय । किनर कसरी ल्याइयो भन्ने विवेचना । उनी रहिछन्‌ इन्डो-अफ्रिकत केटी, पहिलेकता एयर होस्टेस थिइन्‌ रे, पछि पहिलो लभरले धोका दिएकोले कुन्निकुनचाहिँ धर्डक्लास होटेलमा बसिरहेकी । देशी दुलही भएकीले एउटा धम्मरधुसकोछोरो नाफा पनि आएको रहेछ उनलाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यी सबै कुरा सुनेपछि आधुनिक महापुरुषको सङ्गत पनि ज्ञानगुनकैहुने रहेछ भन्ने ठानी आफ्नो कुरो नखोलीकन म फर्के । फर्कदै थिएँ, नयाँ-सडकमा हात समाउन आइपुगे चरिचुच्चे काजी । अघिअघि महापुरुष खोज्नमान्छे पशुपतितिर जान्थे, अचेल नयाँसडकमै जस्तो खोज्यो उस्तै मान्छेपाइन्छन्‌ । झन्‌ उनको त स्थायी अस्थायी दुवै ठेगाना नयाँसडक भनिदिएहुन्छ । ुचुच्चेचुच्चे अनुहारका चरिचुच्चे काजीलाई नचिन्ने मान्छे विरलै होलान्‌ ।उनी के हुन्‌ त भन्ने भन्दा के होइनन्‌ त भन्ने प्रश्न पहिले उठ्छ । नेताहोइनन्‌ भनूँ, कतिवटा पार्टीको .प्रचारमन्त्री चलाइसके, अभिनेता होइनन्‌ भनूँ,चारवटा नाटकमा विदूषकको पाठ खेल्ने उनै । कवि होइनन्‌ भनूँ, कवि-सम्मेलनमा उनकै डाँको ठूलो, विद्वान्‌ होइनन्‌ भनूँ, जुन बेला भेटे पनि उनीट्युसनमा जान लागेको भन्छन्‌ । यति मात्र होइन, नुझक्कडमा उनी यतिसम्मथिए कि, वदु टोलदेखि गुच्चा टोलसम्म कसकसका घरको हालत के छ, कस-कसको ल्याकत के छ, सबै उनलाई सधैँ कण्ठस्थ । बोलक्कड यति थिए किआफू बोल्न लागेपछि बिग्रेको रेडियोझैँ चार घण्टासम्म एकनास भटभटाइरहन्थे ।अब यस्तो बहुमुखी प्रतिभासम्पन्न मान्छे भेट्टाएपछि म अर्को महापुरुष खोज्नकहाँ गइरहुँ भन्ठानेर मैले भनेँ- “अहो काजी ! म तपाईंलाई खोज्दै हिँडेको ।”काजीले फुरुक्क परेर भने- “लौत,&#039; उसो भए एक कप चिया ख्वाउनोस्‌ !”गङ्गाजलले सूर्यलाई अर्घ्य भनेझैँ महापुरुषलाई एक कप चिया को नख्वाउँदोहो!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रेस्टुराँमा पुगेपछि उनले चिया मात्र होइन चाउचाउ, चमचम, चप,चिकेन आदि चौध धोकको आर्डर गर्दै गफ छाँट्न थाले । आफ्नो साइकिलकोट्युब पड्केकोदेखि लिएर हिरोशिमामा अणुबम पड्केको गफसम्म छाँटेसकेपछिउनले भने- “तपाईंले किन भेट्न खोज्नुभएको हो कुन्नि, मलाई अहिले&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महापुरुषको सङ्गत ? 4९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मन्त्रीकी छौरीलाई पढाउन जान बित्यो, कृपया भोलि यसै बेला यतैतिरभेट्नुहोला |” उनको चाला देखेर एकछिन त म जिल्लै परेँ, तर महापुरुषलाईएक पेट मजैसँग आफ्नो पैसाले खुवाउन पाएकोमा सन्तोष पनि लाग्यो । उनीहिँडेसकेकाले पैसासैसा तिरेर बाहिर निस्केको, &#039;साइकिल चोर, साइकिल चोर&#039;भनी कराउँदै सबै दगुर्न थाले । एकछिनपछि हलमा पसेर हेरेको त आफ्नैमहापुरुष पो साइकिल चौरमा पक्रिएछन्‌ । एक पटक त माया पनि लाग्यो, तरके गर्नु, फुटपाथमा साइकिल अड्याएर किनमेल गर्न लागैकी एउटी महिलाकैसाइकिल उडाएछन्‌ चरिचुच्चे काजीले त । महापुरुष ठानेको मान्छेले कुदाउनैपरे पनि कमसेकम मर्दाना साइकिल त कुदाउनुपर्थ्यो, हेर विचित्रता भन्नेसम्झँदै आधारातमा घर पुगेँ । अघिपछि भएको भए त्यस बेलासम्म भातकृहाएबापत बूढी पन्यूँ लिएर झम्टन्थी होली, तर अहिले त महापुरुषकोसङ्गतमा लागेको उसलाई थाहै थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कहिलेकाहीँ जहानबाट पनि महान्‌ क्रा निस्कन्छन्‌ भन्थे, नभन्दै घरकीबूढीले एउटा जड कुरो झिकी- “महापुरुष खोज्न पनि लुखुरेले केटी खोजेझैँजहाँ पायो उहीँ लरखराएर हुन्छ ? पस्नुपर्छ सिंहदरबार ।” कुरा ठीकै हो । पढे-गुनेका र देखे-सुनेका जति बढुलिने ठाउँ सिंहदरबारबराबर अन्त कहाँ होलार ? फाईँफुट्टीराज मन्त्रीदेखि सुइँखुट्टीदास पालैसम्म उहीँ पाइन्छन्‌ । त्यसैलेहोला मर्न आँटेको स्याल पनि सिंहदरबारभित्र पस्न पायो भने एकछिनलाईसिंहै बनेर गर्जन्छ भनी अनुभवीहरू भन्छन्‌ । त्यस्तो ठाउँमा पुगेपछि महापुरुषपाइन्न कि भन्नु त स्वर्गमा देवता पाइयोनन्‌ कि भन्नुजस्तै असम्भव शङ्काहो । त्यसैले आनेकाने कौनै कुरा नहेरी भोलिपल्ट पसेँ उहीँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पस्न त पसिहालेँ तर कताकता ! सर्दारसाहेबको दाह्रीमा पसेको जुम्राभैँघरी यता घरी उता गर्दागर्दै आधा दिन त्यसै बित्यो । अलकापुरीमा कुनदेवता, कुन जनता भनेझैँ सबै बडेबड्ेमानका टेबुलअगाडि राखी गजवकागणेशफ्ँ गजक्क परिरहेछन्‌, अब कुनचाहिँ महापुरुषलाई समात्ने हो! तैअजिङ्गरको आहारा दैबले पुच्याउँछ भनेझैँ एउटा कोठामा झुलुक्क देखिए“हुक्के सुब्बा ! हुन त उनी अहिले सुब्बा मात्र होइन, सुब्बाभन्दा माथिकाउपरसुब्बा भैसकेका थिए । तर उहिल्यै सिमसिमे मन्त्रीको पालामा उनकोहुक्का समातेर सेवा गरेबापत एकै पटक सुब्बाङ्गगी पाएकाले अझै उनलाईभन्थे हुक्के सुब्बा । हात मल्न र &#039;हस्‌&#039; बोल्तमा उनको नाम चारभन्ज्याङभरिप्रख्यात थियो, त्यसैले आफ्ना लोकदेखि ससुराली लोकसम्म हक्के सुब्बा आए&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
९० / भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भनेपछि गरिबगुरुवा, राँडी, विधवा सबै थर्कमान हुन्थे । कमाइ पनि घागडान,जमाइ पनि घागडान भएका यस्ता साहेबलाई छाडेर अर्को महापुरुष कोखोजिरहोस्‌ भनी म पुगेँ उनकै अगाडि । तर कुर्सीकुर्सीमै तेसिएर स्वप्नलोकमापुगेका रहेछन्‌ । अफिसरजस्तालाई अफिसैमा निदाए भन्नु कसरी ? हुन सक्छमध्याह्नकालीन समाधिमा थिए हुनन्‌, महापुरुष न ठहरिए । त्यसैले समाधिमाबाधा पारिदिनु ठीक छैन भनी म ठडिएरै कुरिरहेँ, उनी तेर्सिएरै घुरिरहे, निकैबेरपछि आँखा माड्दै उतको समाधि टुट्यो । चुरोट टक्य्राउँदै मैले दर्शन गरेँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तले मलाई नचिनेका त होइनन्‌, तैपनि महापुरुषले जो पायो उसलाईकहाँ सम्झिराख्छन्‌ र ! सबै नाउँगाउँ सोधे, मैले नालीबेली लगाइदिएँ । आलपिनलेदाँतको लुई कोट्याउँदै उनी भन्न धाले- “कहाँ भन्नुहुन्छ तपाईंको मन्त्रचलाउने ल्याकत र हिम्मत भएको मान्छेलाई तपाईंको दर्जा परिरहेछ चानचुने ।त्यसैले तपाईंको काम गर्ने जाँगरै चल्दैन ।” त्यसपछि ०७ सालदेखि ०१६सालसम्म कुनकुन मन्त्रीले उनलाई कस्तोकस्तो स्याबासी दिए भन्ने बेलीवृत्तान्तसुनाउँदै साहेबले फेरि भने- “के गर्नु, तपाईको जागिर सरकारी भए पनितपाईंको समस्या छ तरकारीको, आफूले तपाईंको नमीठो खाइएन । अचेल तझन्‌ काउलीसाउली भए दुई मुढीको जाउली रुच्छ, साग भए तपाईंको भागबस्न पनि मन लाग्दैन ।” यो भूमिका छाँटिसकेपछि उनले भने- “तपाईंकोघिउ अलिकति किन्न पाए हुन्थ्यो...।&amp;quot; उनी भन्दै थिए चारको घण्टी लाग्यो, दुवैजना उठ्यौँ, त्यताबाट ढोकामा नआइपुग्दै एउटा पिउनले आएर उनलाईचिठी टक्ग्रायो । चिट्ठी हेर्नेबित्तिकै बिचरा कालोनीलो मुख लगाएर डडङ्रङ्गलिडे बरन्डामै । पछि पो थाहा पाइयो... तहबिलको पैसा मासेर तबेला बनाएबापतउनलाई भ्रष्टाचारको पुर्जी आएको रहेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दरबार पसे पनि घरबार बसे पनि फसादको दशा उत्तिकै । त्यतिकामहापुरुष भेट्वाउँदा पनि चित्त बुझाउन नसक्ता मलाई एक दिन भवाट्ट लाग्यो...म स्वयं पनि त एउटा महापुरुष हुँ, नभए महापुरुषको यो धुइँधुइँती खोज किनचल्थ्यो ? अनि मन बल्ल शान्त भयो । यहाँदेखि बिहान उठ्नेबित्तिकै यी प्रसिद्धआउ महापुरुषहरूको मैले पाठ गर्ने गरेको छु । तपाईंहरूले पनि नबिर्सनुहोला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिंहनाद पौष ०२०, गोकर्ण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महापुरुषको सङ्गत / ९१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जय भुँडी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यास बाजेले अठार पुराण लेखे, तर सबभन्दा जरुरी एउटा पुराणचाहिँलेख्न भुसुक्कै बिर्सेछन्‌ । वेदव्यासको युगमा बिर्सेको कुरो आज वेदनाशकोयुगमा तैँले कसरी सम्भिस्‌ ? भन्नुहोला, मलाई पनि हिजै मात्र आफ्नी बूढीआमाले भट्ट सम्झाइदिइन्‌ । साथै यस पुराणको माहात्म्य पनि मैले उनैबाटदृष्टान्तसहित बुझ्ने मौका पाएकोले अरू पुराणको प्रारम्भमा &#039;शारदायै नमः&#039;भनेजस्तै पुराणको सुरुमा म भन्दछु- बूढी आमायै नम: ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परलोकका निम्ति होइन, यसै लोकको निम्ति नसुनी नहुने र परोपकारकोनिमित्त होइन, आत्मोपकारको निमित्त नबुझी नहुने यो सर्वकालीन, सर्बदेशीयर सर्वधर्मीय पुराणको नाम हो- &#039;भुँडीपुराण ।&#039; भुँडी विश्वको सर्वोच्च देवीहुन्‌, जसलाई मान्छेले मात्र होइन, देवाधिदेव महादेबले पनि मान्नुपरेको थियो ।हेरिल्याएको खण्डमा कृष्ण हुन्‌ कि क्राइष्ट हुन्‌, बुद्ध हुन्‌ कि कन्फ्युसियस हुन्‌सबै देवात्माहरू भुँडीबाट मर्त्यलोकमा अवरोहण गरेका हुन्‌ । महर्षि हुन्‌ किमार्क्स हुन्‌, सन्त हुन्‌ कि सार्त्र हुन्‌, सबै दार्शनिकहरू भुँडीमै निर्मित भएर देखापरेका हुन्‌ । वाल्मीकि हुन्‌ कि होमर हुन्‌, टाल्सटाय हुन्‌ कि टैगोर हुन्‌, दाँतेहुन्‌ कि देवकोटा हुन्‌, सम हुन्‌ कि शेक्सपियर हुन्‌ प्रत्येक कविको जन्मभुँडीबाटै भएको हो । अलेक्जेन्डर हुन्‌ कि चङ्गोज खाँ हुन्‌, लिङ्कन हुन्‌ किलेनिन हुन्‌, नेपोलियन हुन्‌ कि जङ्गबहादुर हुन्‌, बिस्मार्क हुन्‌ कि पृथ्वीनारायणशाह हुन्‌, सबै नेताहरूको उद्गमस्थल भुँडी हो । त्यसैले भुँडी जीवनकीनिर्मात्री र विश्वकी अध्िष्ठात्री हुन्‌, जसको पूजाआजा गर्नु प्राणी मात्रको प्रमुखकर्तव्य हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भुँडीको पूजाविधि देख्नलाई त्यति &#039;झन्झटिया छैन, किनभने हाम्रा अरूदेवदेवीलाई जस्तो चन्दन, अबिर, सिन्दूर, फूल इत्यादिको भुँडीदेवीलाई जरुरत&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
₹२ ४ भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छैन । उनलाई त केवल जल र नैबेद्य भए पुग्छ । तर जल र नैवेद्यका प्रकारर मात्राहरूचाहिँ विवेचना गर्न लाग्यो भने भुँडीपूजाजस्तो अप्ठचारो न भीमसेनपूजा हुन्छ, न भगवतीपूजा । जल मात्र कति थरी चाहिन्छन्‌ कति थरी- चिसो,तातो, सेतो, रातो, चिल्लो, खल्लो, नुनिलो, गुलियो, अमिलो, धमिलो इत्यादि ।अझ नैवेद्य त के कति र कस्तो भनी बयान गरेर साध्य छैन । त्यस कारण,यसबारे पूरा जान्ने इच्छा छ भने बरु कुनै नैवेद्यविशेषज्ञले लेखेको भुँडीपूजापद्धतिपढ्नुहोला अथवा कुनै भुँडीवालकी बूढीसित सोध्नु भए पनि हुन्छ । यो पुराणमात यति मात्र जनाइन्छ कि भुँडीदेवीलाई नैवेद्य चाहिन्छ । नैवेद्यको अभावमा वाकमीमा, नैवेद्यको हेलचेक्य्राइँमा वा लापर्बाहीमा भुँडी रिसाइहाल्छिन्‌ । शङ्कररिसाउँदा संसार संहार हुन्छ भनी व्यास बाजे भन्थे भने शङ्करको पनि साक्खैआमा पर्ने महामाता भुँडी रिसाउँदा के होला के नहोला, आफैँ कल्पना गर्नसक्नुहुन्छ । विश्वामित्रजस्ता नैष्ठिकलाई कुकुरको मासु कोच्याएको क्रादेखिलिएर विश्वका कैयौँ नेता र जेताको जुगमा क्रान्तिको आगो सल्काउँदै भुँडीदेवीलेमच्चाएका घम्साघम्सी र ध्वंसाध्वंसी कसलाई थाहा छैन र ! यसैले ज्ञानमाजति गढे पनि, विज्ञानमा जति बढे पनि, विद्या जति पढे पनि, बृद्धि जति जडेपनि आखिर सबै चुलिँदै गई &#039;ओं&#039; बन्छ भनी क्रषिहरू भन्थे, तर मलाई लाग्छ-त्यो एउटा अक्षर “ओं&#039; होइन &#039;आँ&#039; बन्छ । यसकारण प्रत्येक बिहानै &#039;कुखुरी काँ&#039;को साथै प्रत्येक घरका केटाकेटीहरू मुख बाइहाल्छन्‌- &#039;आ&#039; ! अनि रातोरातोजल र मीठो पीठो जेजति पाइन्छ नैवेद्य चढाउँदै भुँडीपूजाको कार्यक्रम सुरुगर्नुपर्छ । घरमा होस्‌ कि होटलमा होस्‌, ब्यारेकमा होस्‌ कि होस्टेलमा होस्‌,ट्रेनमा होस्‌ कि प्लेनमा होस्‌, बाटैमा होस्‌ वा घाटैमा होस्‌, आखिर जहाँ भएपनि हातमुख जोर्दै सम्झनुपर्छ-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“नमो देव्यै पेट देव्यै सर्व देव्यै तथैव च ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आन्द्रा आन्द्री समेतायै भुँडी देव्यै नमो नम: ॥”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भुँडीपूजाको यस कार्यक्रममा अलिकति बाधा पच्यो भने आफ्नो भुँडीरिसाउनुभन्दा पहिले घरकी बूढी रिसाउँछिन्‌ र घुर्की लाउँछिन्‌- तपाईंको तसिङ्गल भुँडी त हो नि । नभन्दै उनको भुँडी साह्रै चामत्कारिक हुन्छ । आखिरगनेर ल्याउँदा बूढाबूढीदेखि लिएर भुराभुरीसम्मका सिङ्गा भुँडी र बूढीकोभुँडीभित्रको भुँडीसमेत जोडी प्रत्येक घरमा सालाखाला साढे सातभन्दा कमभुँडी पाइन मुस्किल छ । अनि कतिको भुँडीपूजा कतिपल्ट गर्ने ? त्यसैलेकोहीकोही गुनासो गर्छन्‌- भुँडीपूजाको झन्झट नहुँदो हो त म केके न गर्थेँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जय भुँडी : ९३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो पनि, मान्छेलाई त्यो झन्झट नपरेको भए क सत्यवादी हुन्थ्यो, सदाचारीहुन्थ्यो, अणुबम बनाउने खर्चले समुद्र पर्थ्यो, आकाश उतार्थ्यो । तर मलाईलाग्छ- यी केबल धाकै मात्र हुन्‌, भुँडी नभएको भए मान्छे सृत्थ्यो- कुम्भकर्णसुतेक्नैँ । अनि जङ्गल जङ्गलै रहन्थ्यो, मान्छे जङ्गलभित्रै हुन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबैलाई थाहै छ- भुँडी स्वयं परमेश्वरी भएकोले प्रत्येक प्राणीमाउनको अंश नभएको हुँदैन । अर्को शब्दमा प्रत्येक व्यक्ति भुँडीको एक अवतारहो । कसित सानो होस्‌ या ठूलो होस्‌ एउटा भुँडी हुन्छ । त्यसैले मान्छे उखानगर्छन्‌- जहाँ जान लागे पनि भुँडी सँगसँगै जान्छ । नभन्दै गोसाईंथान जानेयात्रु हुन्‌ वा अन्तरिक्षका यात्रु हुन्‌, सबैले सबभन्दा पहिले भुँडी जोहो गर्नैपर्छ । कोही राष्ट्रसङ्घीय काममा लागेको होस्‌ वा कोही मल सोहोर्न लागेकोहोस्‌ मुख्यतः सबैलाई भुँडीपूजाले नै प्रेरित गरिरहेको हुन्छ । गधाझैँ लादिनपरोस्‌ बा गाईभैँ दुहिन परोस्‌, कुक्रभैँ दैलैदैलो ढुक्नुपरोस्‌ वा लाटोकीसेरोभैँरातभरि जाग्राम बस्नुपरोस्‌, येनकेन प्रकारेण भुँडीपूजा गर्न सकिएन भनेघरबार सब पुरपार पारी कि रानीपोखरी ताक्नुपर्छ कि डाँडो काटनुपर्छ ।आखिर सत्य कुरो यही हो- &#039;येनकेन प्रकारेण उदर॑ परिपूरयेत्‌ ।&#039; सबैले थाहापाएकै छन्‌- यही भुँडीपूजाको लागि हाम्रा कैयन्‌ पुर्खाले परचक्रीको दैलोकुरे । हुक्काको नलीदेखि बन्दुकको नालीसम्म बोके । अझै कैयौँ बुढिया रदुलही नानीहरू भुँडीको पूजासामा खोज्न निस्केका आफ्ना छोरा र दुलाहाहरूकोप्रतीक्षामा आँखा तान्दै छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसैले त भनेको, प्रत्येक प्राणीमा भुँडीदेवताको अंश हुन्छ । अर्कोशब्दमा प्रत्येक भुँडी मिलेर देश बा समाजको विशाल भुँडी बन्छ र बिशाल-बिशाल पनि जुद्दा भुँडीको विराद्‌ रूप बोध हुन्छ । उस्तै र उत्रै भए पनिप्रत्येक भुँडीको बेग्लै आयतन हुन्छ र नैवेद्य ग्रहणका तरिकाहरू विभिन्नकिसिमका हुन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस दृष्टिले हेर्ने हो भने भुँडीलाई मुख्यत: चार भागमा वर्गीकरण गर्नसकिन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिनमध्ये पहिला छ- हाँडीघोप्टे भुँडी । सकेसम्म अरू साराको भाग.आफ्नै भुँडीभित्र घोप्टचाएर दुनियाँमा भुँडीवादको सिद्धान्त लाग्‌ गर्न हाँडीघोप्टेभुँडी सबैँ हाँडीजस्तै मुख बाइरहेको हुन्छ । कर्म न कुकर्म, सर्म न बेसर्म, धर्मन अधर्म, कुनै कुराको छ्यानविचार नगर्ने हुनाले नैवेद्यका ठूलाठूला स्रोतहरूहाँडीघोप्टे भुँडीकै सामु घोप्टिन पुगेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१४ / भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दोस्रो छ घ्याम्पे भँडी । जो हाँडीघोप्टे भुँडीभन्दा अलि सानो भए पनिस्वभावमा भने प्राय: उस्तैउस्तै हुन्छ । तेस्रौ हो- टाकतटुकन भुँडी । जसलाईतैवेद्य जुटाउन सत्रतिर दाह्वा डिच्च्याई टाकनटुकन नगरी हुँदैन । यिनकोअतिरिक्त अर्को छ- ठन्डाराम भुँडी जो प्राय: खोक्रै रहन्छ । हाँडीघोप्टे रघ्याम्पे भुँडीले खँगारेका यी ठन्डाराम भुँडीहरू यहाँ मात्र होइन, पृथ्वीकोभुँडीभरि &#039;ठाउँ न ठहर, धोको न रहर” भै भकुन्डिरहेका छन्‌ । कति वानरकोफौजझैं धपाइन्छन्‌ भने कति भेडाको भाउमा खरिदिन्छन्‌ पनि । भुँडीकोनैवेद्यको लोभले भुँडीवालका जुनसुकै सर्तमाथि नाकको टुप्पामा कालो दलेरल्याप्चे सही गर्नुपर्दा कति टाकनटुकन भुँडीहरूले हाँडीघोप्टे भुँडीझै हाउडेभुँडीमा पस्नुपरेथ्यो । यी कथाहरू सम्झेर सम्भिनसक्ना छन्‌ । एसिया, अफ्रिकाकाकैयौँ टाकनटुकन भुँडीहरूले अफ्नै पश्चिम फर्केर &#039;भवतिभवति गहुँ मे देहि&#039;भनी प्रार्थना गर्न छुटेको छैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबलाई थाहा छ- बीसौँ शताब्दीको विराट्‌ भुँडीले सुरसाको मुखबनाएको छ । मान्छे हनुमान्‌झँ आकाशपाताल चहारेर कति नै ठूलो आङफुलाओस्‌ भुँडीको बढ्दो आयतनको अनुपातमा उसको शक्तिसामर्थ्य हात्तीकोमुखमा जीरा हुन्छ । कसलाई थाहा छैन र ! भुँडीकै लागि समुद्र तरेकाभारतीयहरू भुँडीकै भाग नपुगी लड्काबाट लर्काइँदै छन्‌ भने भुँडीकै पिरलोलेजुगजुगदेखि &#039;ब्रहमाको मुलुक&#039; पसेका नेपालीहरू भुँडीकै समस्याले बर्माबाटफर्काइँदै छन्‌ । बु -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भुँडीपूजाका लागि मान्छेले के सोच्यो के सोचेन, के गतन्यो के गरेन,बयान गरी साध्य छैन । सुरुमा काँचा तरुल र भ्याकुरले भुँडीपूजा गर्ने मान्छेलेआज पृथ्वीको कुनै छेउलाई बाँझो रहन नदिई हलो चलाई नैवेद्य फलायो ।तर एकले अर्कोको अस्तित्व आवश्यक नठान्दा भुँडीभुँडी भक्राभक्र गर्नथाले । बलियो भुँडी घ्याम्पे भए, घ्याम्पाध्याम्पा जधै, कोही हाँडीघोप्टे हुन पुगेत धेरैजसो ठन्डाराम भै भकुन्डिए । आखिर अरबौँ ठन्डाराम भुँडीहरूले रुन्चेस्वरमा चिच्च्याउनुपन्यो । भुँडीपूजा हुन्छ भने सबैको हुनुपर्छ । फलस्वरूपमार्क्सले भुँडीपृजाको समान पद्धति सोचे, भुँडीवालहरूले उनलाई उडाए, तरआखिर कतिपय देशका ठन्डाराम भुँडीहरूको ध्यान त्यता नगराई छोडेन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यसैयसै गरी करोडौँ ठन्डाराम हाँडीहरूले भारतमा सर्वोदयको सपनादेखे भने लाखौँ ठन्डाराम हाँडीहरूको उचित पूजाको लागि नेपालले भूमि-सुधारको योजना लागू गर्न परिरहेछ । तैपनि हाँडीघोप्टै र घ्याम्पे हाँडीहरू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ज्ञय मुँडी / ९१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ड्यारङ्यार-डरङर गरी भर्सेलीबाट भाग्नुपरेका बिरालाझ्ैँ नाक बजाउँदै छन्‌ ।तर नैवेद्यको जोरजामका लागि कसिएका ९५ प्रतिशत भुँडीहरूको माझमातिहुँ खोज्न लागे भने उनीहरूको जुगानुजुगदेखि टन्किएको भुँडीले मादल रदमाहाभैँ बज्नुपर्ने कुरा स्वत: सिद्ध भइसकेको छ । कुराको जरो यही हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले यो भुँडीपुराण पनि भुँडीदेवीकै उपासनाको लागि लेखेको हुँ । जुनदिन भूमिसुधारको महामेला सकिएर खोजेजस्तै गरी सबैले भुँडीपूजाको सौभाग्यपाउलान्‌, त्यसै दिन व्यास बाजेका अठार पुराणमा उन्नाइसौँ महापुराणकोरूपमा मेरो भुँडीपुराण कसो नजोडिएला त ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जय भुँडी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
९६ / भैरव अर्यालका हात्यब्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रह्माको प्रयोगशालाबाट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उफ्‌, नवनिर्मित हिमालको चुचुरोमा घ्याच्च बसेर ब्रह्माजीले सुस्केराहाले । “कतै आकाश छोला जस्तो अग्लो, कतै पाताल छोला जस्तो गहिरो,कति मिहिनेतसाथ बनाएको पृथ्वी यस्तो औडे र खौडे :” जतिसुकै तानतुनगर्दा पनि पृथ्वीको तह मिल्न नसकेकोले ब्रहमाजी बाजेलाई साह्रै दिक्कलाग्यो । उनले सम्झे- आकाशको सतह मिलेको छ, पातालको मिलेको छ,तर उनैले बनाएको पृथ्वी मात्र यस्तो अबतारको भयो ।यो तह नमिलेको माटाको सतहमा अब म के सृष्टि गरुँ, तह मिलाउननसन्नेले नयाँ सृष्टि गर्ने किन खोज्नु भनी मलाई के मेरै रचनाले गिज्याओइनन्‌ ?”ब्रह्माजी आत्मग्लानिले द्ववित भए । एक फेरा फेरि सुय्य सुस्केरा हालेरमनमनै भने- “भैगो, तह त मिलेन, दह्रो त हुनुपर्थ्यो, बलियो त हुनुपर्थ्यो, एकझोक्का चल्यो भने जगदेखि धुरीसम्म थर्र काम्छ, अलि ठूलो कम्प भयो भनेचर्ल्यामचुर्लुम भएर फुट्न के बेर ! चरक्क चिरिएर फाट्न के बेर ! यो पृथ्वीनै यस्तो अग्लो-होचो छ भने यहाँ बस्नेहरूको गति कस्तो होला, पृथ्वी नैयस्तो लुलो छ भने यहाँ बाँच्नेहरूको गति कस्तो होला ।आफूले बनाएको घर बाङ्गोटिङ्गो र कमजोर देखेर खिन्न भएकोडकर्मीले क्रँ, आफ्नो चित्र बिग्रेर हताश भएको चित्रकारले झैँ अथवा आफ्नोआविष्कार खोजेजस्तो नहुँदा उदास भएको वैज्ञानिकले झैँ आफ्नो सिर्जनास्वरूपपृथ्वीलाई लक्ष्य गर्दै ब्रह्माजीले भने- “धिक्कार होस्‌ ।”तर निकैबेरपछि चुलीमा चलेको हिमाली हावाले बूढा ब्रह्माको विरक्तिएकोमन शान्त भएर आयो । आत्मशमन भयो । अनि उनलाई लाग्यो- “ठीक छ,यो पृथ्वी यस्तै होस्‌, तह नमिलेकै होस्‌, चुरो धरमराएकै होस्‌, तर म यस्तोप्राणी बनाउँछु जोसँग विवेक हुनेछ, बुद्धि हुनेछ र बर्कत हुनेछ । उसको नाम&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रहमाको प्रयोगशालाबाट ” ९७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राख्नेछु &#039;मान्छे&#039; । अनि यो तह नमिलेको पृथ्वीलाई त्यही मान्छेले सम्म पार्नेछ,जग बलियो पार्नेछ, अनि यसैमा स्वर्गका सम्पन्नताले सिँगारेर मेरो सिर्जतात्मकधोको साकार गर्नेछ । हो, साँच्ची म मान्छे बनाउँछु- प्रबल र प्रबुद्ध शक्ति रसीपको समन्वय गरी म आफूभन्दा उम्दा उत्तराधिकारी मान्छे बनाउँछ ।”ब्रहमाजी आफ्ना सेता दाह्री मुसार्दै एक पटक मुस्क्राए, अनि जुरुक्क उठेरओर्लिए बँसीतिर ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिमालय पर्वतका वरपर घुमेर ब्रह्माजीले एक भारी सुन, एक भारीवञ्ज, एक भारी सिमलको भुवा इत्यादि धेरै थोक सरसामान जोडे । अब उनलेबनाउनु थियो मान्छे- उसले उनको तह नमिलेको पृथ्वीलाई सम्म पारीमिलाउन सकोस्‌, अनन्तअनन्तसम्म त्यही सतहमा सृष्टिको शृङ्खला शाश्वतराख्तै नेतृत्व दिन सकोस्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुनका लाप्सा पिद्तापिट्तै उनलाई शङ्का लाग्यो- &#039;मान्छै त बनाउनलागेँ, कथङ्कदाचित्‌ प्राण भर्न सकिएन भने ! बरु एउटा सानो परीक्षण गरीहेर &amp;quot; अनि त्यहीँ छरिएको धूलोधालो एक मुठी उठाएर उनले पानीमा मुछे ।त्यही हिलोमा एउटा छहरा काटकूट पारी जोर खुट्टा, जोर पखेटा र चुच्चासहितकोएउटा प्राणी बनाए । जीउभरि भुवा टाँसदुँस पारी सुन-तामा पगालेको &#039;फोलमाएक पटक रङ्गाइदिए । उनको रचना साँच्चै विचित्रको भयो । ब्रह्माजीआफैँलाई पनि हाँसो उठ्यो । तर अचम्म मान्नुपर्ने केही थिएन, किनभनेगमला बनाउनुभन्दा पहिले चक्र ठीक छ कि छैन भन्तेर जाँच्नलाई कमालेलेएउटा छन्द न बन्दको घैँटो बनाई हेरैजस्तै प्रयास थियो यो व्रह्माजीको ।त्यसैले त्यस जीवनको चुच्चो र पिँध दुवैतिरबाट उनले प्राण फुकिदिए ।फुक्ताफुक्तै पख्रेटा फटफटाउँदै जन्तु एक फेरा बेसरी चिच्च्यायो- “कुखुरीकाँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रह्माजी मुसुक्क हाँसे, प्राणदान दिन सक्छु भन्ने कुरामा उनलाई पक्काविश्वास भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
0 0 क ८ ३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिमालयको एउटा गुफामा रहेको ब्रहमाजीको प्रयोगशाला आज खचाखचथियो । एकातिर वज्ज छाँटेर बनाइएका हात, खुट्टा, टाउको, ढाड, करङ इत्यादिसामानहरू एकअर्कोमा जोड्न हुने गरी बडा कलापूर्ण ढङ्गले काटेर थुप्प्राइएकाथिए, अर्कोतिर सुन पगाल्ते काम हुँदै थियो । एक्ला ब्रहमाजी कता हेरून्‌, कतानहेरून्‌ । सबभन्दा चम्किलो मणि छानेर आँखाको बान्की मिलाउँदै थिए उनी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp; ८ बैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सब सामान ठीक भयो । एकछिनपछि उनले जड्ने काम पनि थाले ।आफ्नै जस्तो चारैतिर चार मुख जडेपछि उनलाई लाग्यो- यत्रो तह नमिलेकोपृथ्वीलाई तह मिलाउनुपर्ने हुनाले हातगोडा पनि चचारकटै किन नराखिदिउँ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कहिल्यै नखिइने गरी बनेका बज्र पिजरमा सुनको मसल, मणिकाआँखा, पाराको गिदी र सिमलको भुवाको मुलायम दिल जडिसकेपछि उनलेसोचे- &#039;मेरो मान्छेलाई स्वर्गतिर उड्ने पखेटा पनि चाहिन्छ ।&#039; नभन्दै मान्छेउनले चिताएजस्तै रूपमा बन्यो । खुसीले गद्गद हुँदै प्रत्येक अङ्गप्रत्यङ्गछामेर ब्रह्माले जाँचे, सबै तन्दुरुस्त । अहिले नै पखेटा फटफटाएर उड्लाजस्तो, अहिले नै गोडा सरसराएर हिँड्ला जस्तो, अनि अहिले नै जिभ्रो फट्कारेरबोल्ला जस्तो । कस्तो कालिगडी उनको, ब्रह्माजीले आफैँलाई एक चोटिधन्यबाद दिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकछिनपछि नवनिर्मित मान्छेको प्रतिमालाई गुफाको दैलामा ठड्याएरअङ्गअङ्गबाट उनले प्राण भरे । अब मान्छे पूरा भयो, ब्रह्माको धोको पूराभयो । उनलाई खुसीको सीमा रहेन । अब एक फेरा बोलाइ पनि हालूँ न भनीखुबै वात्सल्यपूर्ण स्वरमा उसतिर फर्केर ब्रह्माले बोलाए- “मान्छे बाबू ! एमान्छे बाबू !” तर मान्छे बोलेन । स्वर अझ ठूलो पार्दै उनी फेरि चिच्च्याए-“ओ मान्छे !!&amp;quot; तैपनि क बोलेन । ब्रह्माको निधारमा चिटचिट पसिना आयो ।हातखुट्टा पग्लिए । उनले बनाएको त्यति राम्रो मान्छे, त्यति बलियो मान्छेचुइँक्कसम्म बोलेन, हरे !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रह्माको साहस एकै पटकमा किन सेलाउँथ्यो । भोलिपल्ट उनकाप्रयोगशालामा अर्को मूर्ति ठडियो । तर अघिल्लाको सुनको मसल थियो भने योथियो- त्रिमुखी । उस्तै भव्य, तब अलि हलुका मूर्तिलाई गुफाको आँगनमाउभ्याएर ब्रह्माले बोलाए- “मान्छे बाबू ! ओ मान्छे बाबू !” फेरि उसका तीनैमुखबाट कुनै आवाज निस्केन । दोस्रो प्रयोग पनि विफल हुँदा ब्रह्मा साह्रैहतासिए । आफ्नो प्रयोगशालामै आगो लगाएर जाँ तपस्या गर्न भन्ने &#039;फोकपनि उनलाई उठ्यो । घ्याच्च बसेर सुय्य सुस्केरा हालेपछि उनलाई लाग्यो-अब एक पटक इस्पातको पिंजरमा तामाको मसल राखेर प्रयोग गरी हेरै त !अबको पालिमा पखेटासखेटा पनि नजड्ने, मुख पनि अघिल्तिर र पछिल्तिरदुइटा मात्रै राखिदिने उनको ठहर भयो । सोहीबमोजिम भोलिपल्ट तेस्रोप्रयोगस्वरूप तामाको मान्छै ब्रहमाको अगाडि उभियो । उसै गरी ब्रह्माले प्राणभर्दै बोलाए- &amp;quot;मान्छे बाब्‌ ! ए मान्छे बाबू !” मान्छे अहिले पनि बोलेन !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रह्माको प्रयोगशालाबाट ” ९९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तै रिन तै रिन बूढी बाखी किन्‌&amp;quot;- यही कुखुराको सुलीको बनाई हेर्छुभनी ब्रह्माले रन्कँदै कुखुराको सुली थुपारे । सुनचाँदी गालेको अगेनाबाटअलिकति खरानी झिकेर त्यसैमा मुछै अनि मामुली काठको एउटा औडेखौडेअस्थिरपन्जर ठीकठाक पारेर त्यही मिस्कट हिलो थोपरथापर पारी अर्को मूर्तिठड्याए, एकाएक लल्याकलुलुक हुने हातखुट्टा, एकापट्टि मात्रै मुख, आङभरिझुस, टाउकोमा जगल्टा, मुख र आँखाको माझमा बडो चुच्चिएको नाक,साँच्चै मूर्ति अकबरी खालको भयो । छ्या: कस्तो विरूप मूर्ति, यस्तो पनिमान्छे होला ? एकतिरबाट सास भर्दै गयो अर्कोतिरबाट फुसुफुसु फुस्कलाजस्तो । कस्ताकस्ता बोलेनन्‌, अब यो भयाउ बोल्ला त ! ब्रह्माजीलाई आफ्नोचौथो प्रयोगदेखि साह्रै घृणा लाग्यो । जस्तो औडेखौडे पृथ्वी उस्तै औडेखौडेमान्छे : मिल्छ त मिल्छ नै, धन्य ब्रह्मे बूढा ! तेरो दाह्ठी पनि अब सिनित्तखौरेर यही मान्छेलाई बकस दिए भयो । उनी आफैँ आफैँलाई खिज्याउनथाले । कथड्कदाचित्‌ यो विकृत मूर्ति बोलिहाल्यो भने अर्को एउटा जोडा पनिबनाइदिन्छु र प्रजननको शक्ति दुवैलाई आधाआधा पारेर बाँडिदिन्छु । अनिझन्‌ रमाइलो हुन्छ । मान्छे छुसी सिङ्गो हुँदाहुँदै पनि आधा हुन्छ । त्यसो भएआफूलाई फेरि मान्छे बनाइरहने झमेला पनि पर्ने भएन- इत्यादि सोच्तैब्रह्माले त्यो कार्टुन मूर्तिमा प्राण भरे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बोल्ला भन्ने आशा त रौँजति पनि थिएन तैपनि विधि पुन्याइदिँदैमा केहोला त ! भनी कान्लामाथि टुसुक्क वसेर अचेलका धनी मानिसले नोकरलाईबोलाएझैँ बेवास्ताको स्वरमा बोलाइदिए- &amp;quot;ओ मान्छे भाते !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रह्माको आवाज खस्न नपाउँदै मुन्टो निहुराएर मूर्ति बोल्यो-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म्ज्य ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाजेको दिमाग झोकले तिलमिलायो । उसले बोलेको आफ्नो उपहासगरेको जस्तो उनलाई लाग्यो । त्यसैले मान्छेले &#039;ज्यू&#039; भन्नासाथ ब्रहमाजीलेझोकले भने- “मरेस्‌ मोरा !!&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब भएन के ! उसै त कुखुराका सुली र खरानीले बनेको कार्टुन मूर्ति-मान्छे, त्यसमाथि मर्ने सराप पायो भने कता पृथ्वीको सतह मिलाइदेला भन्नेब्रहमाजीको सपना; कता यस्ता गाईजात्रे रचना ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मगज सङड्केको बूढाभैँ ब्रह्माजी खितितिति हाँस्तै बेपत्ता भए । उनकोउपहासात्मक प्रयोग मान्छे एकपछि अर्को गर्दै त्यही औडेखौडे पृथ्वीमा जन्मन्छमर्छ; जन्मन्छ मर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१०० ” धैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नपत्याए कन्याई हेर्नोस्‌ प्रत्येक व्यक्तिको आङबाट एक प्रकारको छारोउड्दछ, जसमा कुखुराको सुली र खरानीको मिस्कट हुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देउराली (नेपाली लोककथामा आधारित)बैशाख २०२०, गोकर्ण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रहमाको प्रयोगशालाबाट १०१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पख्नोस्‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
०७,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“पख्नोस्‌, एउटा लेख दिउँला ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;पख्नोस्‌&#039;- उही चिरपरिचित शब्द ! उही पत्यारलाग्दो आश्वासन !उही झुलाएर फुलाउने बोक्रे बढत्व !!&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तपाईंको कन्सिरी तातेर आयो होला, होइन ! तर, डर नमान्नुहोस्‌कन्सिरी जतिसुकै .ताते पनि तपाईंको जीउमा आगलागी भैहाल्ने छैन ।भियतनामका बौद्ध भिक्षुले झैँ तपाईंले ज्यूँदै डढेर मर्नुपर्ने छैन । किनभनेनेपालमा रक्तकाली प्रकट भैसकेकी छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जे होस्‌ ल, आफ्नै कुरा गरूँ, धेरै पटक भैसक्यो, एउटा लेख तपाईंलेमसित माग्नुभएको, तर पटकैपिच्छे ,मैले &#039;पख्नोस्‌&#039; भन्दै आएको छु, पर्खाएकोछु । सम्पादकजस्तो मान्छेले पनि जमिनदारकहाँ क्रण माग्न गएको जैरै काहिँलोभझैँपटकैपिच्छे लुत्रे कान लगाएर फर्कनुपर्दा जङ चल्नु स्वाभाविकै हो ।जङ्गिँदाजड्गिँदै जङ्गबहादुरै बने पनि के लाग्छ र ! अर्काको हातबाट कुनैकाम लिनु छ भने आफ्नो बाबु साक्षी राखेर तपाईंले पर्खनुपर्छ । चिल्लोशब्दमा तपाईंले धैर्य गर्नुपर्छ । अझ भनूँ भने झुल्नुपर्छ, धाउनुपर्छ- पर्खनुपर्छ ।सभ्य शिक्षितहरू चिल्ला शब्द प्रयोग गर्छन्‌, थाङ्ने, माग्नेहरू खसा शब्द,फरकचाहिँ यत्ति हो । आखिर पर्खन सबै पर्खन्छन्‌, सबै पर्खाउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भनूँ भने, मान्छेले राम्ररी जानेका क्रिया नै पर्खनु र पर्खाउनु हो । यो केबकन्याइ छाँट्न लाग्यो भनी तपाईं जिल्लिनुहोला, तर पख्नोस्‌, तपाईं आफूमात्रै पर्खिरहेको नठान्नुहोस्‌, तपाईं अहिले जुन बेला मसित लेख पर्खिरहनुभएकोछ, यसै बेला यत्तिखेरै कहाँकहाँ, कोको, केके पर्खिरहेका होलान्‌ त ! लौमनमिटर घुमाउँदै जानोस्‌ ।,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यसै बेला यतिखेरै कपुरीकान्त कार्की कान्लामाथि बसेर माइत गएकी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१०२ / भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कार्किनीलाई पर्खदो हो । खस्याङखुसुङ खोलाका खबटानन्द खतिवडा खाटमाथिपल्टेर ख्वाडख्वाङ खोक्तै डाक्टर खुक्रीराम खत्रीलाई पखँदो हो । गाना सुन्नगाएकी गीतादेवी बेला नभैसकेकोले गजक्क परेर रेडियो भएनिर पर्खदी हो ।घटसिंह घले घट्टमा घैयाको प,ठा पिँध्न गएको, पालो नपाएर उँघीउँघी पखदोहो । जङ्गबहादुर डोलेसित लहस्सिएकी सुश्री नाकथोप्ली मैयाँ भन्याङमुनिङिच्च मुख लगाएर उसैलाई पर्खदी हो । चम्रेलबाबू चाक्सी किन्न पठाएकोचोर चतुरे चार घण्टा भैसक्यो आएन भनी पर्खंदा हुन्‌ । छत्रजङ्ग छातानहुनाले छत्रपाटीको छ्यापीपसलमा पानी रहला र हिँडुँला भनी पर्खदा हुन्‌ ।जरसाहेबकाँ जागिर माग्न गएको जगन्नाथ जैसीदेबलको छिँडीमा उनकोबाटो कुरी पर्खदो हो । झाडा लागेको झसवीरेकी बुहारी, झटपटसाथ टट्टीगएकी, भित्र अर्कै मानिस देखेर बाहिरैपट्टि पर्खदी हो । गोरुसिङ्गे &#039;अ&#039; जस्तोलट्टक अचाको नाति सिद्रा बेच्न देउपाटन गएको वनकालीमा बाँदर देखेरफरक्क फर्की गौशालाको बस पखँदो हो । ल भन्नोस्‌, नाम, काम र ठामकोपछि नलागेर जबाफ दिनोस्‌ कै यी सब सम्भाव्य पर्खाइ होइनन्‌ ? नेपालकोमात्र कुरा नलिङँ भने मनमिटर अलि टाढाटाढा नै पुग्याइदिनोस्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस बेला यत्तिखेरै तानाबाना भिरेर ताइपेहमा जम्मा भएका तोर्मेसिपाहीहरू विपक्षीको तालुमा तारो हान्न पर्खदा हुन्‌ । थाइल्यान्ड पुगेकाथाकखोलाका थाक्सेहरू अमेरिकी सैनिकको अड्डामा थुनिएर रिहाइको आदेशपर्खदा हुन्‌ । दलाई लामाका दलालहरू दानापुरमा दाना सिद्धिएर देवताकोनाम बा दाम कमाउन देश फर्कने दाउ हेर्दै देवाधिदेबको दैलामा दण्डवत्‌गरीगरी परखँदा हुन्‌ । धक्कुबाजका धुरन्धर धम्मरधुसहरू पेरिसको धोके क्लबमासाफसित रक्सी धोकेर बाटबाटैमा ओछ्थान लाउन आआफ्ना जोडीको मन्जुरीपखँदा हुन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ल, अब कति भनूँ, नपुगेको भए फेरि मनमिटरलाई जताजता पर्छ,उतैउतै छोड्नोस्‌- यस बेला यतिखेरै पोल्यान्ड जान लागेका पाँडेजी पालमएयरपोर्टमा पासपोर्ट जँचाएर &#039;पाइप&#039; पिउँदै प्लेन पर्खदा हुन्‌ । फर्सीजङ्गसुब्बा फैजावादको प्लेटफार्ममा फत्तेपुर जाने रेल पर्खंदा हुन्‌ । बाटुली बराल्नीलाहर गएको पोइ कहिले आइपुग्छ भनी पखँदी हो । भाटभटेनी बस्ने भुँडेकाजीभद्रेकालीनिर आफ्नी रखौटी पर्खंदो हो । मास्कोमा वैज्ञानिकहरू उडिरहेकोस्पुतनिक मरुभूमिमा खस्ने भो भनी आँखा तानेर पर्खिरहेका होलान्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ओहो !! अब त मेरो एकोहोरो फतफताइ अति नै भयो । तपाईंलाई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पछ्नोस्‌ / १०३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कति भरको लाग्यो होला हकि ? तर साह्रै नै झर्को लागेको भए त एक सर्कोचुरोट तान्नोस्‌ । अनि तपाईं नै भन्नोस्‌ को पर्खेको छैन ? कहाँ पर्खाइ चल्दैन ?त्यसैले दार्शनिकहरू जति घोत्लिइरहन्‌, वैज्ञानिकहरू जति घोट्टिइरहन्‌ मलाईत लाग्छ- बाँच्नुको पर्याय नै पर्खनु हो । सोझै कुरा गर भने पनि हेर्नोस्‌, दसौँमहिना आमाको एकमाने भुँडीमा गुँडुल्किएर नपर्खी तपाईंले पृथ्वीदर्शनपाउनुभएन । दसौँ दिन कुनामा गुटमुटिएर नपर्खी तपाईंले सूर्यदर्शतको साइतफेला पार्नुभएन । यसरी नजन्मेदैखि पर्खदै आउनुभएको तपाईंले सायद किशोरभएपछि विद्यालयमा शिक्षकलाई कैयौँ दिन पर्खनुभयो होला । बैँस लागेपछिबाटाको छेडोमा, बारीको डिलमा, या बिग्रेको पाटीमा प्रतीक्षाका गीत गुनगुनाईदिनको बाह्रौँ घण्टा पर्खनुपत्यो होला- आफ्ना केटी साथीहरूको गुलियो भाकामा ।यसरी पर्खाइबाटै सुरु भएको तपाईं-हाम्रो जिन्दगी यता र उता, यसलाई रउसलाई पर्खदा आज कताबाट यहाँ आइपुगेको छ, तपाईं पर्खने र म पर्खाउनेहुनुपरिरहेको छ । मान्नोस्‌, मैले आज लेख दिएँ तर भोलिदेखि तपाईंको पत्रिकाकहिले निस्कने हो भनी मैले पर्खनुपर्छ । एकमहिने भनेको चार महिनामानिस्कने नेपाली पत्रिकाको बानी नजान्ने को छैन ? भनूँ, एक न एक दिनतपाईंको पत्रिका निस्किहाल्यो, तर भोलिपल्टदेखि पुरस्कार लिन आजआजभोलिभोलि भन्दाभन्दै कैयौँ दिन तपाईंले झुलाउनुहुन्छ, पर्खाउनुहुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफू जुम्राजस्तो जुम्सो छ, अनि कामको सट्टा कुराले टार्न खोज्छ भनीतपाईं गिज्याउनुहोला । मुखिन्जेल नसके पनि पछाडि पक्कै उडाउनुहुन्छ । हुनपनि हो, म अचेल साह्टै जुम्सो भएको छु । बरु के तपाईं पत्याउनुहुन्छ ? योजुम्स्याइँको जन्मदाता पनि यस्तै जङचल्दा पर्खाइहरू हुन्‌ । साँच्चै भनूँ भनेमेरो दुनियाँ झन्‌ लम्स्याङलुम्सुडको छ । मेरो जमाना झन्‌ जम्स्याङजुम्सुङकोछ। मैले थाहा पाएदेखि म परखदो छु । काममा गएकी आमालाई, चाकरीमागएका बाबुलाई, पाठ दिने गुरुलाई, प्यार दिने आइमाईलाई, जागिर पाउनेआश्वासनलाई, तलब पाइने दिनलाई, ओखती गर्ने उपचारकलाई, बिदा दिनेनिर्देशकलाई, पैसा दिने मालिकलाई, लुगा सिउने दमाईलाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यी सबै पर्खाइको पछिल्तिर मेरा सयौँ सपनाहरू पर्खिरहेछन्‌, इच्छा रआकाङ्क्षाहरू पर्खिरहेछन्‌ । म केही गरुँ, केही बनूँ, केही दिउँ भन्छु, तर योअसीमित डृष्टसिद्धको लागि यतै पर्खनुपर्छ, उतै पर्खनुपर्छ, यतै झुल्नुपर्छ, उतैधाउनुपर्छ, दोष कसलाई ? जब जमाना नै यस्तो जुम्सो छ कि जर्मन एकीकरणकोप्रश्न क्राक्रैमा पर्खिरहेछ । पैँसद्ठी करोडको चीनलाई एउटा साधारण सदस्यताको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१०४ ” भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लागि राष्ट्रसङ्घले पन्धौँ वर्षदेखि पर्खाइरहेछ । धेर कुरा किन ? सुरुदेखि सत्य,समता र शान्ति पर्खदै आएको मानिस आज झन्‌ विषमताको विषले बौलाहिरहेछ,झन्‌ अशान्त भइरहेछ । बुझ्नै सकिँदैन- आणविक हतियारमा प्रतिबन्ध लगाउनेकुरोमा किन सबैको लम्स्याङलुम्सुड हो, भौतिक उन्नति यति तीव्र भैसक्योतैपनि दुई गज र दुई गाँसको निम्ति जिन्दगीभर पर्खनुपर्ने । यो कस्तोजम्स्याङजुम्सुङ हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब तपाईं मात्रै पर्खनुपन्यो भनेर किन पट्टाउनुहुन्छ जब तपाईंलाईनपर्खी सुखै छैन । त्यसैले मान्नोस्‌- पर्खाइदेखि डराउने पलायनबादी हो,पामर र पानीमरुवा हो । जुन आदर्श आज म तपाईंका अगाडि छाँद्तै छु,भोलि तपाईं मेरा अगाडि छाँदनुहुन्छ । वास्तवमा तपाईं पनि पर्खन चाहनुहुन्न,म पनि पर्खन चाहन्नँ । हामी दुबै चाहन्छौँ एउरा त्यस्तो दुनियाँको सिर्जनागरौं जहाँ कसैले कसैलाई कुराले मात्र टार्न नसकोस्‌ ! झुल्याएर फुल्याउने,लर्काएर पर्खाउने यस्तो जालेमाले परम्परा नहोस्‌ । तर समस्या त उही नै हो-जतिसुकै बलियोसँग चाहे पनि हाम्रो यो चाहना चाहनेबित्तिकै पूरा हुँदैन,पर्खनुपर्छ । त्यसैले त म लस्याङ्लुसुङ गरेर भए पनि घरी यता धाउँछु, घरीउता धाउँछु, घरी यता हुन्छु, घरी उता हुन्छु, जम्स्याङजुम्सुङ गरेर भए पनिपर्खिरहेछु र तपाईँलाई पनि भन्दै छु- पर्खनदेखि पट्टाउनु पलायनवादिता हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो पर्खाइ-पुराण त अहिल्यै के सकिन्थ्यो र ! तर अब कतिबेर पर्खाकैँ,तपाईंकी श्रीमती (सम्पादक्नी) ज्यू घरमा तपाईंलाई पर्खिरहेकी होलिन्‌ । आउँदैगर्नुहोला, धाउँदै गर्नुहोला, पख्नोस्‌, कुन न कुनै दिन म पनि एउटा लेख लेख्नेप्रयास गरुँला, तपाईंको पत्रिकामा छाप्न दिउँला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लौ त, नमस्तै !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिंहनाद कार्तिक २०, गोकर्ण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पख्नोस्‌ ” १०५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पशु- पशुपति र मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साँढेको नेतृत्वमा गएको पशुहरूको प्रतिनिधिमण्डलले एक दिन बिहानैपशुपतिको दक्खिन ढोका घचघच्यायो । पशुपतिले प्रसो हेरेका मात्र कै थिए,जुरो हल्लाउँदै प्रतिनिधिमण्डलको नेताले नम्रतासाथ भन्यो- “तपाईं पशुकापति भएर पनि हामी पशुहरूमाथि कुनै वास्ता गरिदिनुभएन । &#039;तपाईंलेपुलपुल्याइदिँदा आज मान्छेले गर्नुसम्म गरिसक्यो । रिसानी माफ हुन्छ भनेहामी समस्त पशुहरूको एउटै आवाज छ- मान्छे मात्तियो, मात्तियो तर पशुबिचरो आत्तियो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो मोरो पशुको जा.., 4, . पनि रङ्ग त ढङ्गको कचकच गर्नआउँछ भन्ने ठानी पशुपतिले झर्किएर सोधे- “आखिर तिमीहरूको समस्याक्या हो?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साँब्चैले भन्यो- “हामी फाँटको फाँट मडिया मार्ने साँढेजातिलाईकान्जीहाउसभित्र थुनेर दुई मुठा परालमा बाँच भन्छ- आजको स्वतन्त्रताप्रियभनाउँदो मान्छे ।” साँढेको कुरामा संशोधन थप्तै गोरुले भन्यो- “होइनहजुर ! वास्तविक मर्कामा परेको पशु त अझ म पो छु । जमिन जोत्नेको हुन्छभनी नारा लाग्दछ तर जमिनको खास जोताहा मलाई मुखमा पेरुङ्गोबाँधिदिन्छ- आजको समाजवादी मान्छे ।” साँढे र गोरु आँखा पल्टाउँदै थिए,वानर उफ्रेर पशुपतिका अगाडि पुग्यो । उसले अर्जी गन्यो- “हामी विश्वकासमस्त वानरजाति घरबारहीन छौँ, तर हाम्रो यो समस्या हेरिदिँदैन- आजकोविश्वबन्धुत्वबादी मान्छै ।” यत्तिकैमा रौँडा र ग्राहको संयुक्त डाँको सुनियो-“हामीलाई जङ्गल र जलमा पनि चुपचाप बाँच्न दिँदैन- आजको शान्तिवादीमान्छे ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ओहो ! सुन्दासुन्दा पशुपतिको कानै टट्टायो । उनले च्याँट्टिएर भने- “यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१०६ ” श्वैरव अर्यालका हास्यव्यङ्रय&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सब तिमीहरूका बकबास हुन्‌ । मान्छेमाथि मेरो पूरापूरा पत्यार छ। ककहिल्यै पशुभैँ मात्तिँदैन, क उत्ताउल्याइँ जान्दैन ।” पशुपतिको कुरा काद्तैपशुराज सिंहले भन्यो- “होइन हजुर ! हामीसित चोखो बल छ, तर मान्छेसितबिटुलो बुद्धि छ, बुद्धिभित्र छल छ । त्यसैले मान्छे भस्मासुर भैसक्यो, आज रकआफूबाहेक कसैलाई पनि गन्दैन, स्वयं पशुपतिलाई पनि पशुले मात्र पत्याउनेपाषाण पो ठान्छ ।”पशुपतिजीले पशुहरूका कुरा सुनी दिक्क भएर सोधे- “त भन नआखिर तिमीहरू के चाहन्छौ ?” साखुल्ले भएर अघि सर्दै ब्वाँसोले भन्यो-“अरू हामी केही चाहँदैनौं हजुर ! यो मान्छेको जातलाई हाम्रो जिम्मालगाइदिनुपन्यो । यिनीहरूले तपाईंकै टाउको खान लागिसके ।” “व्यर्धै केकोफिक्री ? मात्तिएको मान्छेलाई हात्तीले तह लगाउँछ ।” दाद्वावाल हात्ती कड्क्यो ।तर पशुपतिको चित्त बुझेन । उनले भने- “मैले कत्रो दुःख गरी पाले-पोसेका,सिकाए-सधाएका मान्छे अब म पशुको जिम्मा दिँ ? स्पुतनिक युगबाट केफेरि म जङ्गली युग फर्काउँ ?- यो हुन सक्तैन । पशुभन्दा मान्छे कहिल्यैनजाती हुँदैन ।” बूढी गाईले नम्रतासाथ भनिन्‌- “हो हजुर ! मान्छेलाई अबतहमा राख्ने हो भने यसको जिः 2 पशुलाई नै दिनुपर्छ । मान्छेसित केवलआसक्ति बाँकी छ, शक्ति छैन, आक्रोश बाँकी छ, प्रेम छैन । आशङ्का बाँकीछ, विश्वास छैन ।” गाईको पनि यस्तो कुरा सुन्दा पशुपतिको मनमा अलिकतिचिसो पस्यो । पशुपतिले गम्भीरतासाथ सोधे- “आखिर तिमीहरूसित यसकोप्रमाण के छ त ? प्रमाणबिना अर्कालाई दोष लाउन पाइँदैन- बुभ्यौ ?”मुखामुख गर्दै पशुको प्रतिनिधिमण्डल चुप लाग्यो । अन्त्यमा बिदाइको सलामगर्दै गधाले भन्यो- “प्रमाण एक मात्र होइन, हामी हजारौँ लिएर आऔँला ।”बाहिर आएर पशुहरू मान्छेका करतुतका सबुद खोज्न थाले । कोही.पुस्तकालयतिर गए त कोही वाचनालयतिर, कोही वेधशालातिर गए त कोहीगए सैन्यशालातिर ।१ १ १एक दिन पशुपतिको प्राङ्गणमा पशुहरूको कचहरी थियो । स्पष्टीकरणदिन मान्छेको प्रतिनिधि पनि उपस्थित थियो । सयौँ हात्तीहरूले रासका रासपुस्तकहरू पशुपतिका अगाडि राख्तै भने- “मान्छेका दिमागको एउटा करतुतयही हो, जसको कारण आजको मान्छे बौलाएको छ ।&amp;quot; पशुपतिले एउटापुस्तक पल्टाएर सर्र पढे, पुस्तकमा कसरी अरूलाई उछिनेर आफू अघि बढ्ने,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्शु- पशुपति र मान्छे / १०७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कसरी मान्छे फकाउने, कसरी छकाउने र कसरी बहकाउने इत्यादि कुराथियो । पशुपतिले आँखा अलि तरेर नजिकै बसिरहेको मान्छेलाई सोधे- &amp;quot;योक्या हो ?” मान्छेले फुर्तीसाथ जबाफ दियो- &amp;quot;यो पुस्तक हो- राजनीतिकोपुस्तक ।” पशुपतिले अर्को पुस्तक पल्टाएर, त्यसमा कसरी सम्पत्ति धेरै कमाउने,कसरी बचाउने इत्यादि कुरा थिए । मान्छेले बतायो- “यो अर्थशास्त्र ।&amp;quot;पशुपति पुस्तक टिप्तै गए, मान्छे भन्दै गयो- &amp;quot;यो व्यापारशास्त्र, यो आधुनिकदर्शन नित्सेको, यो मनोविज्ञान फ्रायडको, यो डार्बिनको थ्योरी, यो योगवाशिष्ठ,यो धम्मपद, यो बाइबिल, यो इजरा पौन्डको कबिता, यो क्यामुको कथा,यो.. ..&amp;quot;,पशुपतिले जिभ्रो कादतै भने- “यी सब किन: ? किन यी सब ? पशुठीकै भन्छन्‌- बुझिस्‌ मान्छे ! तँ बौलाहा भइछस्‌, धेरै मात्रामा बहुलाइसकिछस्‌ ।अब लैजा यी सारा कसिङ्गर । ए वानर हो ! च्यातिदेओ यी सारा थाड्नाहरू ।”मान्छे जिल्ल पत्यो । युगानुयुगदेखि उसले गर्दै आएको चिन्तन, मनन, मन्धन,आविष्कारको सम्पूर्ण राशि पुस्तकप्रति पशुपतिको यत्रो कुदृष्टि । आखिर पशुपतिपशुकै पति रहेछन्‌- यिनलाई मान्छेको दिमाग कति गहिरो र व्यापक छ- केथाहा ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यत्तिकैमा एक वधान तकुर बिराला र मुसाहरूले अखबारको ठेलीलगेर पशुपतिको समक्ष थुप्प्राए- त्ञाम्राज्यवादी अमेरिकाले भियतनामलाईध्वस्त पान्यो&#039;- पशुपतिले अखबार एक-एक गरी पल्टाउँदै गए- &#039;बिस्तारवादीचीनले भियतनाममा खुट्टो घुमायो&#039;, &#039;मङ्गलग्रहको तस्बिर खिचियो&#039;, &#039;अल्जेरियामासैनिक विद्रोह, &#039;रूसको नयाँ राकेट, जोन्सन र देगालको भनाभन&#039;, &#039;जनकपुरचुरोट कारखानाको प्रगति&#039;, &#039;कलकत्तामा लाठीचार्ज&#039;, &#039;बलिंनमा गोलीहानाहान “यी सब के हुन्‌ ?” रातो मुख लगाउँदै पशुपतिले सोधे । “यीअखबार हुन्‌ हजुर ! दिनदिनका समाचार, विचार छापिने अखवार ।” पशुपति-“के यिनमा सब सत्यसत्य छापिन्छन्‌ :” “सत्य त सत्यै हुन्‌, तर आजकोमान्छेको अगाडि सत्य गणितजस्तो छैन । देशदेशका आफ्ना सत्य, दलदलमाआफ्ना सत्य ....।&amp;quot; मान्छेले ब्याख्या गच्यो, पशुपति रन्किए । अखबारहरूलाईधुजाधुजा पारेर पशुपतिले भने- “विग्रेछौ मान्छेहो ! तिमीहरू पक्का विग्रेछौ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अँ, यो के हो नि ?”- वाघभालुहरूले सकीनसकी बोकेर ल्याएकाहातहतियारतिर नियाल्दै पशुपतिले सौधै । चितुवाले भन्यो- “हामीलाई हिस्रकजन्तु भन्तेर हेलाँ गर्ने मान्छेले मान्छेमाथि नै प्रहार गर्न बनाएको यो बन्दुक, योतोप, यो क्षेप्यास्त्र, यो एटम बम... ।” &amp;quot;धिक्कार !!&amp;quot; पशुपतिले लामो सुस्केरा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१०८ “ भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाल्दै मान्छेलाई धिक्कारे । सारा पशुहरूले कुनैले खुट्टा बजारेर, कुनैले सिङतिखारेर र कसैले जुरो हल्लाएर भने- “कसो भो !&amp;quot; मान्छेले अँध्यारो मुखलाएर स्पष्टीकरण दियो- “यी सब संहारको निम्ति होइन, सुरक्षाको निम्तिहामीले निर्माण गरेका हौँ, शक्तिसन्तुलनको लागि बनाएका छौँ........।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“गाय्यौ सुरक्षा !” भनेर अझ रन्कँदै पशुपतिले पशुहरूपट्टि फर्केर भने-“लैजाओ, अब मलाई वास्ता छैन- यी मान्छेहरूको बुद्धि र बठ्याइँ पाएँभन्दैमा मात्तिने र पात्तिने यी उत्ताउलाहरूलाई अब तिमीहरू नै जे गर्छौंगर ।” यति भनेर पशुपतिले मान्छेलाई फेरि भने- “जा, तँ पशुको पछि लाग्‌-अब मलाई कसैको वास्ता छैन, म समाधिमा पसेँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हाम्रो समाजमा त यसलाई ल्याउन हुन्न, यसले भित्रभित्र बम बनायोभने......... टि 2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हो हो ल्याउन हुन्न, यसले पशुका छाउराछाउरीलाई पनि पुस्तकपत्रिका पढ्न सिकाएर बिगारिदियो भने...&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“केही पशुहरू कराए । तर लुरुक्क परेर मानिसले आफ्नो बचेखुचेको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौलिकता पोली पशुका समक्ष आत्मसमर्पण गस्यो ।आषाढ, २०२२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सगुन . लायकुसाल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पशु- पशुपति र मान्छे १०९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अमरावती कान्तिपुरी नगरी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
«यहाँ छउन्जेल कहिले डिद्ठा-विचारीसित बिन्ती बिसाउँदैमा बित्यो,कहिले उड्स-उपियाँको नाचगान हेरेर भ्यालखाना रुङ्दैमा बित्यो, कवितालेख्ने कत्रो घोको हुँदाहुँदै पनि मन फुकाएर मनग्गे ठेली लेख्नै पाइएन........।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वर्ग पुगेकै दिन आदिकवि भानुभक्तले नन्दनवनस्थित उर्वशीपार्कमादुसुक्क बसेर अफसोचको एक सुस्केरा हाले । उर्वशीपार्कको रमिता बयानगरिनसक्नुको थियो । त्यसमाथि बिर्के टोपी र छड्के पछ्यौराले कसिएका&#039; निकैपुखला भानुभक्तलाई त्यहाँ देखेर झुम्मिन आउने रम्भा र तिलोत्तमा आदिचपलाअबलाहरूको चनमते आँखा र छनमते कम्मर कसले हेरिदेओस्‌ ! त्यसैलेअपशोचको सुस्केरा हाल्नेबित्तिकै आदिकविले अर्को खुसीको सुसेली पनि छाडिहाले-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कतिको बनिता कतिको रमिताअब लेख्छु याहिँ बसी कविता ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वर्गङ्गाको सिरसिर बताससित भानुभक्तको स्वरसितार पनि जबबग्न थालेको थियो त्यहाँ उपस्थित सारा यक्ष, अप्सराहरू सपेराको बाँसुरीमाझुमेका नागनागिनीझँ अधवा भनूँ, कृ्‌ष्णजीको मुरलीमा लद्टिएका गोपगोपनीझैँहेरेको हेन्यै भ्रृहाले । आशुकवि भानुभक्तलाई न मूड चाहियो, न कलम नै, त्यसदिनदेखि कविता रच्न थालेका, रच्तारच्तै कति शरद्‌ बिते, कति वसन्त बिते,उनलाई पत्तै भएन । धेरै वर्षपछि एक्कासि उनको मुखबाट निस्क्यो-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अमरावती कान्तिपुरी नगरी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनि पो भानुभक्त आफ्नो काव्य-निद्राबाट झल्याँस्स ब्युँफझे । टक्कअडिएर पल्याकपुलुक हेर्न थाले । केही सम्झैजस्तो, केही खोजेजस्तो उनकोमुद्रा देख्ता सबै निकैबेर चकित भए । तर कविजीले आफैँ उठेर पर्छिल्तिरफर्की समूहलाई सोधे- “होइन, यहाँ कान्तिपुरीबाट आउने कोही छ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११० “ भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कहिल्यै नसकिने अलका मार्क चुरोटको धूवाँ बुड्बुड्ती उडाउँदा पल्लोछेउमा पलेटी मारिरहेका मखिबुट्टे टोपीवाल भलादमीले जुरुक्क उठेर भने-“म पनि कान्तिपुरबाटै आएको तपाईंको चेलो हुँ । गुरुजी, मेरो नाम लक्ष्मीप्रसाददेवकोटा हो ।” भानुभक्तले दङ्ग परेर अँगालो मार्दै सोधिहाले- “त्यो मेरोप्यारो पुरी अचेल कस्तो छ हँ ?” चुरोटको लामो सर्को तान्दै देवकोटाजीलेभने- “तपाईंको पालाका भन्दा त कताकता सुन्दर छ । मैले आफ्नो &#039;मुनामदन&#039;मा पनि मन फुकाएर प्रशंसा गरेको छु, साँच्चै रमणीय छ त्यो गुरुजीकोअलकापुरी । म आउँदै त त्यस्तो थियो भने मैले छाडेको पनि भैसक्यो पाँच-छ वर्ष ।&amp;quot;देवकोटाको कुरा सुन्दा भानुभक्तलाई तुरुन्त ओह्लिएर एक पटककान्तिपुरको सैर नगरी भएन भन्ने लाग्यो । तर जाने कसरी ? उनी बिलखबन्दमापरी गुनगुनाउन थाले-॥ कतिका दिन याहिँ बिते सुखले,कतिका कविता रचिए मुखले ।अब झल्झल भो म भुलैँ कसरी,अमरावति कान्तिपुरी नगरी ।रामायणकार भानुभक्त भानुका मात्र भक्त थिएनन्‌, रामभक्त पनि हुनेभ्ैहाले । रामभक्तिको प्रताप कति अलौकिक हुन्छ भन्ने कुरा त हनुमानकोचरित्रबाट प्रस्ट छँदै छ । जुन भक्तिको प्रतापले हनुमानूले त्यत्रो सागर उडेरतरिदिए, त्यत्रो लङ्का पुच्छरमा आगो लिएर जलाइदिए, त्यत्रो द्रोणाचल पर्वतहत्केलामा राखेर ल्याइदिए । त्यसै भक्तिको प्रतापले हाम्रा भानुभक्त पनिकसरीकसरी एक दिन दुप्लुक्क बालाज्यूमा उत्रन आइपुगेछन्‌ । १०० वर्षभन्दाअघि मरेको मान्छे यहाँ आउला भन्ने कसलाई विश्वास लाग्ला र ! तर कसैलेपत्याए पत्याङन्‌, नपत्याए नपत्याकन्‌ मैले भन्न खोजेको कुरा यत्ति हो- एकदिन आफ्नो प्यारो अलकापुरी हेर्न हाम्रा आदिकविजी आइपुगोछन्‌ काठमाडौँमा ।त, बालाज्यू बाइसधारा उद्यान देख्नेबित्तिकै उनी एकछिन त जिल्लारामैपरे, झन्डै यो त अमरावतीको अप्सराउद्यानजस्तै पो छ ए ! भानुभक्तलाईखपिनसक्नु खुसी लाग्यो र तुरुन्तै टोपी झिकेर एउटा बेन्चमा पल्टिए, पल्टिनु,के थियो कबिताको मूल फुटिहाल्यो-यति दिनपछि फेरी बल्ल बालाज्यु देख्याँ ।पृथिवितलभरीमा स्वर्ग हो जानि लेख्याँ ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अमरावती कान्तिप्री नगरी “ १११&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर नगिचै औद्योगिक क्षेत्र थियो । त्यहाँका नयाँनयाँ भवनबाट निस्केकाघार्रघुर्रै आवाज एवं धुवाँको मुस्लोले गर्दा उनको कविता पूरा हुन पाएन ।उनलाई के लाग्यो भने अप्सरा आएर यहाँ यस्तो रमणीय उद्यान बनाइसकेछन्‌,बिश्वकर्मा आएर त्यहाँ त्यत्रो औद्योगिक क्षेत्र खोलिसकैछन्‌, लम्फू त मै मात्ररहेछु- अहिलेसम्म आफूलाई अत्तोपत्तो थिएन । तर वीणा र हतौडा एउटैखटियामा सजाएजस्तो उद्यान र उद्यमस्थान एउटै ठाउँमा गाँसेको चाहिँउनलाई अलि चित्त बुझेन । तैपनि कान्तिपुर अब केबल प्राकृतिक क्रान्तिलेमात्र होइन औद्योगिक क्रान्तिले पनि अकैँ ढङ्गमा बदलिन लागेजस्तो भानुभक्तलेअनुभव गरे । त्यसैले उनको कविता पनि यस्तरी फुट्यो-कहिँ घर्घर ज्यावल-मेसिनको,कहिँ चिर्बिर गान्‌ रसिला चरिको ।हरियो गहुँ झुल्दछ फाँटभरी,अलकापुरि कान्तिपुरी नगरी ॥यत्तिकैमा केही युवायुवतीहरू जोडाजोडी मिली उद्यानभित्र पसेकालेकविता रच्तारच्तै भानुभक्तजीका आँखाचाहिँ ठ्याक्क युवतीको टाइट हिपतिरलाग्न पुगेछन्‌ । आमै ! यी केटीहरू नागकन्या त होइनन्‌ ! लवाइ र हिँडाइ तठ्याम्मै उस्तै छ बा, हेर्दै राम्ररी ! भानुभक्तको सम्पूर्ण ध्यान उनीहरूकै वक्र-भङ्गिमा र भाव-भङ्गिमातिर पुगेर अड्यो । युवकहरू पनि माथिमाधिफुकिफुकाउ तलतल कसिकसाउ देख्ता भानुभक्तजी झन्‌ दङ्ग परे । हुन तत्यहाँ अरू पनि बालक, बूढा, गृहिणी सब थिए, तर ठिटाठिटीको नृत्यलीलामाती त केबल आफैँजस्ता दर्शक मात्र । आखिर उनलाई के लाग्यो भने काठमाडौँकोठाउँ मात्रै आाँघुरिँदै गएको होइन, मान्छेको लवाइ पनि साँघुरिँदै काँचुली नैबनिसकेछ । रसिक भानुभक्तलाई यो परिवर्तन झन्‌ रोचक लाग्यो र कबितापनि फुटिहाल्यो-कटि कूच कसी हिँडन्या युवती,चलन्या पथमा नलजाइ रति ।सँगमा छ युबा-दल ओरिपरी,अमरावति कान्तिपुरी नगरी ।साँझ परिसकेकोले त्यहाँ धेरैबेर बस्ता आफ्नो कवितामा अश्लील दोषपर्ला भन्ने ठानी उनी जुरुक्क उठेर उद्यानबाहिर निस्के । साझा यातायातकोहरियो बस पनि ठ्याक्क त्यहीँ रोकिइरहेको रहेछ । सबै पसेको देखी उनी पनि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११२ / भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पसे त्यैमा । पस्न त पसे, तर बस्न भने घुइँचोले दिएन । “कान्तिपुरीमामान्छे पनि निकै बढेछन्‌ ए, यतिका मान्छै खान्छन्‌ पो के ?” -उनको दिमागमाअर्को प्रश्न रिङ्न आयो । तर त्यत्रो हलमूलमा प्रश्न के रिङ्न पाउँथ्यो, उत्तीआफैँलाई रन्न रिडाएर हत्त्याउँदै एउटी पुषतीको छेउमा पुन्याइदियो । उनकोकाखमा एउटा रहरलारदो कुकुर पनि थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नारीसित नारिएर बस्न भानुभक्तको नैतिकताले मानेको त होइन, तरघुइँचोमा एउटा सानो छेउ पाएकोले आपद्धर्म सम्झी उनी दुसुक्क बसिहाले ।तर बस्नेबित्तिकै उनलाई घुच्चा ख्बाउँदै युवतीले सातो खाइन्‌- “महिलादेख्तादेख्तै टाँस्सिन आउने नकचरो लुठो कहाँको !” भानुभक्त जिल्ल परे ।भर्खरै मात्र पार्कमा छिल्लिएर हिँडेकी आफ्नै आँखाले देख्ने भानुभक्तले अहिलेनगिच बस्ता मर्दले छुनै नहुने जस्लो गरी छाँटा पारेको सहन सकेनन्‌ रकाखको कुकुरलाई औँल्याउँदै उनले सोधिहाले-- &amp;quot;होइन, मैयाँकी त्यो कृक्रपनि महिला नै होकि ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तँलाई के बास्ता !” भनी युबतीज्यू फेरि सातो खाँदै थिइन्‌, त्यसै बेलाबसले चाहिँ जञोल्टिङ खाइदियो । बसभरिका मान्छे माझीको पेरुङ्गाका माछाफ्षैँक उसको डँडाल्नोमा चढ्न पुग्यो त. क उसको भुँडीमा भकुन्डिन पुग्यो ।बिचरा भानुभक्तको चाहिँ बिर्के टोपी नै कता पुग्यो कता ! “धन्य परमात्मा !बाटोभन्दा ठूलो बस, बसभन्दा ठूलो थुप्रो बसभित्र बस्नेहरूको । त्यही पनिबस भन्नु मात्रै बस्न पाइने होइन, बरु उठीउठी यात्रा गर्नुपर्ने यस्तो वाहनकोनाम &#039;उठ्‌&#039; नै राखेको भए ठीक हुन्थ्यो कि ?&amp;quot; भानुभक्तले एउटा बृढ्ोपाकोयात्रुसित प्रस्ताव राखे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले भन्यो- “यस्तै सिन्कीकोचाइ र रन्कीकुदाइले त कति नेपालीबाइरोडको बाटो स्वर गइसके, थाहा पाउनुभएन ?” लर स्वर्ग गएका भए तभानुभक्तले बाटामा भेट्नुपर्ने । सायद ट्रकसित गुजुल्टिएकाले बैकुण्ठकै ट्रङ्ककालआयो कि उनीहरूलाई । तर जेसुकै आओस्‌ आदिकविज्यूलाई चाहिँ कबिताआइहाल्यो-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पथ सात फुटे, बस नौ गजको,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिट बीस भए भिड सौतकको ।छ त अन्त कतै सुबिधा यसरी ?अमराबति कान्तिपुरी नगरी ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अमराबती क्षान्तिप्री नगारी&#039; / ११३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कविताको तेस्रो चरण मिल्दानमिल्दै बस आफ्नो स्टपमा आएर बसिहाल्यो ।ओर्लिएर यसो हेर्छन्‌ त भानुभक्त छक्कै । टुँडखेलवरिपरि बार, बीचबीचमालामपुच्छे बत्ती, सडकभरि बस, मोटर सिलिङमिलिङ, रङ्गीचङ्गी मान्छे तकति हुन्‌ कति ! अमरावती पुगेको दिन जसरी अलमलिएका थिए, अहिले पनिझन्डैझन्डै उस्तैजस्तै भो भानुभक्तलाई । एकछिन यताउति नियाले- फराकिलासडक, बसको ताँती, दुँडिखेलको झिलमिलाउँदो रूप देखेर मक्ख पर्दै कवितारच्ने सुरमा थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर बीचैमा चार-पाँचवटा भुराभुरीहरू पिलपिलाउँदो मुख लगाउँदैभटमास किन्ने पैसा माग्न थालेकाले उनको मूड नै अफ्‌ भयो । यहीँ यतिकासेठसेठानीहरू छन्‌, यहीँ भटमास खाने पैसा माग्छन्‌- साँच्ची कान्तिपुर धनीभएको कि गरिन हुँदै गएको हो उनलाई छुट्टयाउन मुस्किल पन्यो, तैपनिकान्तिपुरै मुखमा कति कान्ति बढेछ भनी एक-एक गरी चियाउन थाले । छनता सबैका मुख सिँगारिएकै थिए, तर कसैका गोरिँदागोरिँदा हाड टल्कने सेता,कसैका नर्मिन्दानर्मिन्दा बासी जाईको फूलजस्ता नरम । आखिर उनले केठम्याए भने कान्तिपुरको कान्ति त निक्कै बढेछ, तर कान्तिपुरेको कान्ति भनेमामाघर जान थालेछ है ! यो गम्दा उनलाई यति खल्लो लागेर आयो किसुचीले समेत च्यापेर ल्यायो । त्यति रङ्गरमिताको भीडमा गर्ने कहाँ ? यताउतिहेरै कतै पत्तो लागेन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यतिका मान्छेमा सुची गर्नुपर्ने मान्छै मै मात्र रहेछु कि क्या हो, नत्रयस्तो जमघट हुने ठाउँमा एउटा शौचालय किन बन्दैनथ्यो ! भानुभक्त अकमक्कपरे । तर सहिनसक्नु भएकोले उनी सरासर लागे उत्तरतिर । सडककै छेउमालस्करै बसेका भुराभुरीलाई देख्ता यहाँ कसले के छेक्ने रहेछ र भन्ने उनलाईलाग्यो । तर सुची गरिसकेपछि पो उनी झल्याँस्स भए, त्यहीँनेर महात्माबुद्धको एउटा चैत्य रहेछ । नैष्ठिक भानुलाई आफू निष्ठाच्युत हुनुपरेकोमा खेदलाग्यो, तर लागेर के गर्ने ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आखिर उनी पसे नयाँसडकतिर । नयाँसडक सडक मात्र नयाँ थिएनतडकभडक पनि नयैँ थियो । कान्तिपुरेको कान्तिविहीन मुहार पनि नयाँ-सडकमा त फुर्तिलो देख्ता उनलाई अलि सन्तोषै लाग्यो । तर त्यहाँ कान्तिपुरेमात्रै थिएनन्‌, रङ्गरङ्गका चेहरा र कद थिए त्यहाँ- राता, सेता, काला, नेप्टाचेप्टा, फ्रकवाल, दोचावाल, पोटवाल, मोटवाल, शान्तिदूत, धर्मदूत, सन्देशदूतकोको हुन्‌ कोको ! भानुभक्तको प्रतिभा उम्लेर आयो-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११४ ” भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पिसकोर यहीँ घुसखोर यहीँ,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नव-जोर पहीँ दिलचोर यहीँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जति छन्‌ सब छन्‌ धनवानसरी,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अलकापुरि कान्तिपुरी नगरी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबै थरीका बीच भानुभक्त पनि त एक बेग्लै थरी व्यक्तित्व थिए-नयाँसडकमा । सबै दूतका बीच उनी आफू काव्यदूत थिए स्वर्गका । यसैलेअरूको वास्ता गरिरहनुभन्दा दुई-चार जना कविलाई नै भेटेर बात मार्नआदिकविलाई मन लाग्यो ।तर भेट्ने कहाँ गएर कसलाई । उनी अन्योलमा परै । तैपनि नगिच्चैको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक युवकलाई कोट्टयाउँदै उनले सोधे- “यहाँ कोको लेखक-कवि कहाँकहाँछन्‌ हँ ?” युवकले नाक नेठ्याएर जबाफ दियो- “पुराना कवि-लेखक अलिकतिएकेडेमीतिर साहित्यमा रिसरागबारे रिसर्च गर्दै छन्‌ भन्ने सुनेथेँ, नयाँ कवि-लेखकहरू प्राय: यतै वरपर छरिएका होलान्‌, तपाईं कसलाई खोज्नुहुन्छ ?एउटा बिलकुलै बफाउँदो नयाँ कबि.त म पनि हुँ !” भानुभक्तले नमस्ते गर्दैखुसी प्रकट गरे- &amp;quot;ओहो ! त्यसो भए त ढुङ्गो खोज्दा देउता मिलिहाल्यो नि !यहाँले कति वर्ष काव्यसाधना गर्नुभएको छ कुन्नि ?&amp;quot; युवकले चारमिनारकोबट्टा उघार्दै जबाफ दियो- “मैले लेख्न त यसैपालिदेखि थालेको हुँ, तर गोडासातेक लामालामा कविता लेखिसकैँ । एउटा ताजा कविता सुन्नुहुन्छ भनेसुनाइ पनि हालूँ ?” आदिकवि भानुभक्त आधुनिक कविको कविता सुन्नतरखराउँदै थिए, अर्को ठिटो आएर भन्न थाल्यो- &amp;quot;तँ पनि कविता लेख्ने ?ककितै सुन्नुहुन्छ भने मेरो सुन्नोस्‌ बाजे ! बिलकुलै आधुनिक- यही पीपलकोबोटको कबिता ।” “ओहो ! यहाँहरू सबै कवि हुनुहुँदो रहेछ, होइन यहाँ अरूकवि पनि छन्‌ ?” “अरू को छन्‌ र ?” भनी नयाँ कवि बताउँदै हुनुहुन्थ्यो,पत्रिका बेच्ने हकरले उहीँनेर आएर भन्यो- “एउटा कवि त म पनि छु हजुर ।”उसले भन्दाभन्दै पसलेले कुरा थप्यो- “यहाँ मिनिस्टरदेखि कम्पोजिटरसम्मसबै कवि ।&amp;quot; जे होस्‌, आदिकविलाई कविहरू बढेको सुन्दा खुसी नै लाग्यो ।यस्तै खुसीमा एक जना सज्जनले कबिजीलाई नजिकैको रेस्टुराँतिर डोच्याए ।उनी रेस्दुराँभत्र पस्न लागेको मात्र के थिए उनको बिर्के टोपीमा एउटा बडोमरेको मूसो फ्यात्त पर्न आयो । उनी जिल्ल परेर मास्तिर हेर्दै थिए- अर्कोभयालबाट एक थुप्रो फोहरफाहरका टाला मानौँ पुष्पवर्षा भएझैँ सडकमाबर्सिए । यो वर्षाले आफ्नो स्वागत गरेको हो कि विरोध गरेको हो उनलाई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अमरावती कान्तिपुरी नगरी ” १११&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठम्याउन घौधौ पत्यो ।रेस्टुराँभित्र एक छेउमा दुई-चार जना भात खाँदै थिए, अर्को छेउमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुई-चार जना जेरी जिप्ट्याउँदै थिए । अलि पर एउटा अँध्यारो कुनामा दुई-चार जना रम र मम भन्दै थिए ! त्यसैले यो भट्टी हो कि चियापसल हो किभोजनशाला हो- कविले केही बुभदै बुझेनन्‌ । उनको उत्सुकता शान्त गर्दैनगिचैका सज्जनले भने- “यस पसलको पहिलो विशेषता के भने शाकाहारी,मांसाहारी, दुरधाहारी र मद्याहारी जो जस्तो छ, यहाँ त्यस्तै खानेकुरा पाइन्छ ।दोस्रो विशेपता यहाँ जति पुरानोपुरानो खानेक्रा खोजे पनि तुरुन्त पाइन्छ ।”भानुभक्तले ठाने- “म पनि पुरानै मान्छे भएकोले यहाँ ल्याएको होला ।&amp;quot;यस्तैमा सिँगानको लत्को दौरातिर पुछतै एउटा मरन्च्याँसे केटाले खानेकुराकोरिकाबी टक्य्रायो । भानुभक्त भने कविताको धुनमा मस्त थिए-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मृत मृषिकको -बुटि झर्छ जहाँ,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिँडदा डुलदा टुपि जल्छ जहाँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुतिको कलरब्‌ अझ ओरिपरी,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अमरावति कान्तिपुरी नगरी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नै 0 नै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यलियाभरि पस्कि भझिँगालु रस,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खटियाउपरै कुतिसाथ बस ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खुब खाउ चपाउ पिङ सुमरी,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अलकापुरि कान्तिपुरी नगरी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ने? जै क&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
होटलबाट निस्केपछि भानुभक्तलाई ठूलो समस्या पच्यो- बासको । रात&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिहाल्यो, नयाँ कान्तिपुरीमा आफूले चिनेको काही छैन । पहिले त उनीसँगकासज्जनले आदरसाथ पसलमा - लगेर चिया खुबाएकोले उनैले घर लैजालान्‌भनी ढुक्कमा थिए, तर चिया खाइसकेपछि पो सज्जनको उद्देश्य उनले बुझे ।सज्जन रहेछन्‌ लाइफ्‌ इन्स्योरेन्स कम्पनीका एजेन्ट । उनलाई इन्स्योरेन्सगर्नोस्‌ भनेर निकै नुझाउँथै । तर भर्खर स्वर्गबाट ओर्लेका भानुभक्तलाईकहाँको लाइफ्‌ इन्स्योरेन्स । आखिर बल्लबल्ल सज्जनको पन्जाबाट फुत्केरभानुभक्तजी बास माग्ने तरखरमा हिँडे । घरैघरले बाटो नपाइने आजकोकान्तिपुरमा बासकै समस्या छ भन्ने उनलाई के थाहा थियो र एक-दुई गर्दैनयाँसडक गेटदेखि वसन्तपुरसम्म गोडा पन्ध्रेक घरमा उनले बास मागे एक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११६ / भैरव अर्यालका हास्यव्यड्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रातको लागि । तर कसैले छैन मात्र भनेर फर्काए त कसैले यतिका होटलहुँदाहँदै बास माग्न घरघर चहार्ने यो लबस्तरो बूढोलाई लगाइदेऔँ न कुकुरभनी पारे । कसैले उनलाई चोरको शङ्का गरे त कुनै लालबुझक्कडले यो“सी. आई. डी. हो, सी. आई. डी.&amp;quot; पनि भने ! बाह्र बजुन्जेल खोज्दा पनि बासपाउन नसकेर भानुभक्तजी रङमडिंदै थिए बेसमयमा हिँडेको दोषमा उनलाईपुलिसले पक्रिदियो । स्वर्गबाट कान्तिपुर हेरुँ भनेर आएको बास नपाएका कुराबताएपछि पुलिसले निगाह गरेर भन्यो- “यो हावा खुस्केको पहाडिया रहेछ,भ्रैगो छोडिदिङँ ।” अनि पेटीतिर गएर बस्‌ भनी पुलिस हिँड्यो । भानुभक्तजीपेटीपेटी रानीपोखरीको डिलमा पुगेर रोकिए । रानीपोखरीको पालेले कड्केरसोध्यो- “हामफाल्ने सुर छ कि क्या हो ?” उनले नम्रतासाथ होइन भनेर योपनि बताए- बाँकी रात काट्ने कुनै ओतसोत पाइन्छ कि ? बूढो पालेलेभानुभक्तलाई पनि बूढो देखेर हो कि किन हो- उ... त्यो सालिकमा बस्नोस्‌न बाजे ! भनी भानुभक्तकै सालिक देखाइदियो । उनी गएर यसो हेर्छन्‌ तआफ्नै प्रतिमूर्ति । एकछिन दङदास भएर उनले आफ्नो सालिक टुलुटुलु हेरिरहे ।माला लगाइदिएको, सिन्दूर दलिदिएको- भव्य मूर्ति, उनी एक मन दङ्ग परे ।तर आप्नो बिहानदेखिको रित्तो पेट छाम्दा र यत्रो कान्तिपुरीमा एक रात बासनपाउँदा भने उनलाई ग्लानि पनि लाग्यो । सालिकनिर टुसुक्क बसेर पछ्यौराझिकेर ओढ्दै उनले गमे-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शव सालिक पृजित हुन्छ जहाँ,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिँगुलै उभिँदा तर मिल्छ घृणा ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिलबार उदार कहाँ यसरी,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अमरावति कान्तिपुरी नगरी ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनी गुनगुनाउँदै थिए, त्यहीँनेर पेटीमा एक डल्लो भई सुतेको एउटाकेटो उठेर भन्न लाग्यो- “दाजु ! तिम्रो पछ्यौराको एउटा छेउ मलाई पनिदेक न, साह्रै जाडो भयो ।” भानुभक्तले उसलाई बोलाएर जम्मै पछ्थौराओढाइदिए । जीउ तातेपछि केटाले भन्यो- “आज भानुजयन्ती, राति नौबजेसम्म सारा मान्छे यहीँ जम्मा भएर बेलाँ सुत्न पनि पाइएन । यो भानुभक्तकोसालिक भन्छन्‌ । त्यो भानुभक्त भन्ने कुनचाहिँ रैछ, हँ दाइ ? भानुभक्तलाईतिमीले पनि देखेनौ हकि ?”एकोहोरो फतफत गरिरहेको केटोले निकैबेर सही थापेको नसुन्दा मुन्टो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उठाउँदै भन्यो- “साँच्ची भानुभक्तलाई देखेनौ हकि तिमीले ?” तर केटाका&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अमराबती कान्तिपुरी नगरी “ ११७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रश्नको जबाफ दिन भानुभक्त त्यहाँ थिएनन्‌, उसको अगाडि त जिल्ल परिरहेकोथियो भानुभक्तको सालिक मात्र । पर पर को भट्टयाउँदै जाँदै थियो-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक्‌ दिन्‌ भानु त कान्तिपुर्‌ पुगिगया लोकको बुझूँ रीत्‌ भनी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साह्दै दङ्ग पन्या घुम्या वरिपरी मो भानुभक्तै भनी ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाया हन्डर खूब कान्तिपुरमा चिन्दै नचिन्ने भया ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफ्नै सालिकमा कटाइ अलिबेर्‌ ति अन्तर्ध्यानै भया ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ध्वनि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११६ ४ भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B2_(%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8)&amp;diff=98</id>
		<title>ताल (उपन्यास)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B2_(%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8)&amp;diff=98"/>
		<updated>2024-06-14T14:15:29Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: Created page with &amp;quot;ताल  उपन्यास)  मूल लेखकयासुनारी कावाबाता।जापात)  अनुवादकविजयकुमार रौनियारजापानी उपन्याच 101700ए147 (मिजुयी)को अङग्रेजी अतुवाद  जपहजताका (३ लेक)बाट नेपालीमा अपुरित। प्रकाशकबिधाप्रथम सं...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;ताल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपन्यास)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मूल लेखकयासुनारी कावाबाता।जापात)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनुवादकविजयकुमार रौनियारजापानी उपन्याच 101700ए147 (मिजुयी)को अङग्रेजी अतुवाद&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जपहजताका (३ लेक)बाट नेपालीमा अपुरित। प्रकाशकबिधाप्रथम संस्करण :प्रतिआवरणक्र क,नेपाल प्रज्ञा-प्रतिष्ठान मृत्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1531 190.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपाल प्रज्ञा-प्रतिष्ठानकमलादी, काठमाडौँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपन्यास&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२०६८&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११००&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बृहत्‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रज्ञा-छापाखाना, प्रज्ञाभवन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कमलादी, काठमाडौँफोन नं. ४२२१२४२, ४२२१२द८३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रु. १०५।-978-9937-2-3466-5&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुलपतिको मन्तव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपाल प्रज्ञा-प्रतिष्ठान नेपालको सांस्कृतिक, भाषिक र धार्मिकविविधतालाई ध्यानमा राखी समग्र वाङ्मयको संरक्षण र संबर्धन गर्नाकानिम्ति सङ्गठित संस्था हो । नेपालका दर्शन, संस्कृति, भाषा, साहित्य,सङ्गीत, कला, नाट्य, सामाजिक शास्त्र आदिको अध्ययन-अनुसन्धानगराई तिनको प्राज्ञिक परम्परालाई सबल बनाउन २०१४ साल असार ९गते नेपाल एकेडेमी (पछि रायल नेपाल एकेडेमी र नेपाल राजकीय प्रज्ञाप्रतिष्ठान)को स्थापना भएको थियो। २०६२/०६३ सालकोजनआन्दोलनको सफलताबाट नेपालमा सङ्घीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्रकोस्थापना भयो र नेपाल भ्जज्ञा-प्रतिष्ठान नेपालका सबैजातिका भाषा,साहित्य, संस्कृति, दर्शन र समाजशास्त्रजस्ता वाङ्मयसँग सम्बन्धितप्रज्ञाको केन्द्र बन्यो । नेपाली वाङ्मयका यी प्रत्येक विषय र यिनकाविभिन्त विधामा अध्ययन-अनुसन्धान गराई प्रकाशनमा ल्याउनु, पुरानाज्ञानको संशोधन र विस्तारका साथै नयाँ ज्ञानको स्थापना गर्नु र नेपालकालोपोन्मुख जातिका भाषा, लिपि, संस्कृति, श्रुतिपरम्परा, जीवनपद्धति रसाहित्यको खोजी गरी तिनलाई जोगाउनु पनि यस प्रतिष्ठानको प्रमुखदायित्व हो । एक्काइसौँ शताव्दीको विश्वस्तरीय द्रुतवेगी ज्ञानप्रवाहबाटनेपाली प्राज्ञिक जगत्लाई र नेपालका नवीन प्राज्ञिक उपलब्धिबाटविश्वसमुदायलाई लाभान्वित तुल्याउने तर्फ पनि यो प्रतिष्ठान सजग छ।वास्तवमा नेपालका सम्पूर्ण क्षेत्रको प्राज्ञिक उन्नयन र स्‌जनात्मकसमृद्धिका निम्ति अग्रणी भूमिका खेल्दै राजधानी बाहिर पनि अनुकूलवातावरणको सिर्जना गरिदिनु यस प्जज्ञा-प्रतिष्ठानको दायित्व र कर्मक्षेत्रपनि हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपालभित्र तथा नेपाल बाहिरको सिन्गो नेपाली प्राज्ञिक जगत्‌कासबै विद्वान्‌-विदुषी, य्रष्टा-द्रष्टा तथा प्रज्ञाकर्मीहरूको सद्भाव सहयोग,गोष्ठी, विचार-मन्थनमा सहकार्य र प्राज्ञिक वैचारिक आदान-प्रदानबाट नैनेपाली प्रज्ञा-जगत्‌ विश्वको ज्ञानलहरीसँग होस्टैमा हँसे गर्दै नेपालकाज्ञान-परम्पराको समुन्तयन गर्न र राष्ट्रिय गौरवको श्रीवृद्धिको कार्यमासमयोचित योगदान गर्न नेपाल प्जज्ञा-प्रतिष्ठान सफल हुनेछ भन्ने दृढविश्वास लिएको छु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न्‌, ॥ कप १बैरागी काइँला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुलपतिनेपाल प्रज्ञा-प्रतिष्ठान&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रकाशकीय&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- नेपाल प्रज्ञा-प्रतिष्ठानका विधि काम, कर्तव्य र अधिकार एवम्‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लक्ष्यमध्ये नेपाली भाषामा लेखिएका भाषा, साहित्य, संस्कृति,सामाजिक शास्त्र र दर्शनसम्बन्धी उत्कृष्ट कृतिहरूलाईअङ्ग्रेजीलगायतका अन्तर्राष्ट्रिय भाषामा अनुवाद गरी प्रकाशितगरेर विश्वबजारमा पुन्याउने र अन्तर्राष्ट्रिय विभिन्न भाषामालेखिएका उत्कृष्ट रचनात्मक कृतिलाई नेपाली भाषामा अनुवादगरी प्रकाशित गर्ने कार्य पनि पर्दछन्‌ । यस्तै अन्तर्भाषिकअनुवादमार्फत ज्ञान र कलाको अन्तर्देशीय आदानप्रदान गर्ने हेतुलेनेपाल प्रज्ञा-प्रतिष्ठानअन्तर्गत विश्वसाहित्य र अनुवाद विभाग&#039;गठन भई कार्यरत छ । वार्षिक कार्ययोजनाअन्तर्गत नै यो विभागलेजापानी आख्यानकार यासुनारी कावाबाताको (द लेक&#039; नामकोउपन्यासलाई नेपाली भाषामा अनुवाद गराई यस ताल उपन्यासपाठकसामु प्रस्तुत गरेको छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- आख्यानकार यासुनारी कावाबाता नेपाली पाठकका लागि नयाँ नामहोइन । यो अघि नै उनका “सहस्र-सारस&#039; तथा &#039;हिमदेश&#039; नामकादुई आख्यानहरू नेपाली भाषामा अनुवाद भई प्रकाशित भइसकेकाछन्‌ । नेपाली पाठकमा मात्र होइन आख्यानकार कावाबाता आफ्नाकालजयी आख्यानमार्फत अन्तर्राष्ट्रिय जगतमा पनि राम्रैसँगपरिचित नाम रहेका छन्‌ । उनको यो प्रसिद्धि र उनका कलमकोचमत्कारलाई सराहना गर्दै यसपल्ट नेपाल प्रज्ञा-प्रतिष्ठानले उनको&#039;द लेक&#039; नामको अङ्ग्रेजी भाषामा अनूदित उपन्यासलाई &#039;ताल&#039; कोरूपमा नेपाली भाषामा रूपान्तरण गराई प्रकाशमा ल्याएको छ।अन्तर्राष्ट्रिय जगत्‌मा ख्यातिप्राप्त कृतिलाई नेपाली भाषामारूपान्तरण गरी प्रकाशन गर्ने नेपाल प्रज्ञा-प्रतिष्ठानको पूर्वपरम्पराकैक्रममा यो कृति पनि पाठकसमक्ष आएको छ । पहिला अनूदित भई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रकाशित भएका कृतिहरू जस्तै यस कृतिले पनि नेपाली पाठककोरुचिलाई सम्बोधन गर्नेछ भन्ने अपेक्षा प्रज्ञा-प्रतिष्ठानको रहेको छ ।कुनै पनि भाषाको सृजनात्मक कृतिको अर्को भाषामा रूपान्तरणएवम्‌ अनुवाद गर्ने कार्य असाध्यै जटिल कार्य हो । एउटा भाषामालेखिएका सृजनात्मक कृतिभित्र रहेका ततभाषा बोल्ने जातिकासांस्कृतिक मूल्य, मान्यता, परम्परा एवम त्यस भाषाकोअभिव्यक्तिको बान्की र कला अन्तर्निहित रहने हुँदा त्यसलाईजस्ताको तस्तै रूपान्तरण गर्नु अनुवादकका लागि ठूलै चुनौतीपूर्णकाम हो । प्रस्तुत कृति मूल जापानी पाठबाट अङ्ग्रेजी भाषामारूपान्तरण भई त्यसबाट नेपाली भाषा अनुवाद गरिएको हो । यसरीआख्यानकारको अभिव्यक्तिले दुई भाषामा बसाइँ सर्दै यस रूपमाआउनुपर्दा मूल पाठका कति मौलिक कुराहरू हराए र कति आएत्यसको बेग्लै विवेचना आवश्यक पर्छ। यही अनूदित कृतिमादिइएको प्रा.डा. गोविन्दराज भट्टराईको मन्तव्यले लेखक, उनकोकृति एवम्‌ अनुवादक र उनको अनुवादकलाबारे विस्तृत विवरणप्रस्तुत गरेकाले तत्‌सम्बन्धमा पाठकलाई यथोचित सूचना प्रवाहगरेको हाम्रो ठम्याइ छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस कृतिका अनुवादक श्री विजय रौनियार नेपाली र मैथिलीभाषाका उदीयमान स्रष्टा एवम्‌ अनुवादक पनि हुन्‌ । उनीबाटअनूदित प्रस्तुत ताल उपन्यास प्रकाशन गर्ने दायित्व प्नज्ञा-प्रतिष्ठानलाई प्राप्त भएको छ । पाठकबाट प्राप्त हुने यो अनूदितकृतिबारेको प्रतिक्रियाले निश्चय पनि उनलाई अनुवाद कार्यमाअघि बढ्न अरू प्रेरित गर्ला र अरू पनि कृतिहरू प्रज्ञा-प्रतिष्ठानलेप्रकाशित गर्ने अवसर प्राप्त होला भन्ने अपेक्षा हामीले राखेका छौं ।अन्त्यमा नेपाल प्ज्ञा-प्रतिष्ठानको विश्वसाहित्य तथा अनुवाद&#039;विभाग र यस कृतिका अनुवादक विजय रौनियारका कार्यकोसराहना गर्दै धन्यवादसहित यो मन्तव्य यहीँ टुङ्ग्याउँछु ।धन्यवाद ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बी ७, दन त&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(गङ्गाप्रसाद उप्रेती)उपकुलपतिनेपाल प्जज्ञाप्रतिष्ठान&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मन्तव्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देशको युगान्तकारी आन्दोलनपछि राजतन्त्र युगको समाप्ति रगणतन्त्र युगको उदय हुने महत्त्वपूर्ण घटना शृङ्खलाको कारण नेपालप्रज्ञा-प्रतिष्ठान केही समयका लागि नेतृत्वविहीन रह्यो, त्यो क्रासर्वविदितै छ। तर जब नेपाल राष्ट्रले नयाँ गणतान्त्रिक युगमा प्रवेशगप्यौ र नवीन प्राज्िक संस्कृतिको निर्माण गपम्यो, त्यससँगै एउटा नवीनविभागको पनि प्रादुर्भाव भयो- विश्वसाहित्य र अनुवाद बिभाग । हालदेशलाई जसरी समावेशी र नयाँ नेपाल बनाउनको लागि सबैलेलागिपर्नु परेको छ, त्यसरी नै नेपाल प्रज्ञा-प्रतिष्ठानको यस विभागलेपनि आफ्नो देशका सबै भाषाको साहित्यलाई एकआपसमा परिचयगराउनको लागि अनुवादको माध्यमबाट अगाडि बढिरहेको छ। यतिमात्र होइन वैश्विक स्तरमा पनि नेपालको साहित्यलाई विश्वमा रविश्वसाहित्यलाई नेपालमा पनि परिचित गराउने उद्देश्य बोकेको यसविभागले आफ्नो जिम्मेवारीअनुरूप आफ्ना कार्यलाई तीव्र गतिले अगाडिबढाएको छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्पूर्ण विश्वलाई एउटा कुटुम्बका रूपमा स्थापित गर्न रएकता-अभिन्नताको पावनसूत्रमा बाँध्नको दृष्टिबाट अनुवादको महत्त्वअसन्दिग्ध छ । प्रत्येक व्यक्तिका लागि विदेशको अनेक भाषाहरूमा दक्षहुनु सम्भव छैन । तसर्थ, विभिन्न देशहरूको भाषा-साहित्य, रीतिरिवाज,पर्व-उत्सव र विचार-सम्पदासित लाभान्वित हुनका लागि यदि विश्वकोकुनै एक भाषालाई खोज्दा त्यो भाषा &#039;अनुवाद&#039; नै हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज अनुवादको भूमिका यो दृष्टिबाट अत्यधिक प्रासङ्गिकभइसकेको छ। जसरी तीव्रगतिको वाहन, तत्काल सञ्चरणका लागिसञ्चारमाध्यम, वैचारिक एवं बौद्धिक आधुनिकता आज आवश्यक रअनिवार्य भइसकेको छ । वास्तवमा “अनुवाद&#039; मात्रै एक स्वतन्त्र विषयएवं महत्त्वपूर्ण विधाको रूपमा आफ्नो विशेष स्थान बनाइसकेको छैनबरु उसको व्यवस्थित तवरबाट उत्तरोत्तर विकास पनि हुँदै गइरहेकोछ। अनुवाद एउटा प्रविधि पनि छ, कला पनि छ, विज्ञान र शिल्प पनिछ। त्यसैले विश्वसभ्यताको विकासमा अनुवादको भूमिका सराहनीयरहेको छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यसैको फलस्वरूप ताल उपन्यास तपाईं सबैको सामुन्ने छ।जापानी लेखक यासुनारी कावाबाताको उपन्यास द लेकको अङ्ग्रेजीबाटनेपालीमा &#039;ताल&#039; ले नाम अनुवाद भएको छ । नेपाली साहित्यमाअहिलेसम्म करिब एक सय उपन्यास विश्वसाहित्यबाट भित्र्याइएको छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विश्वसाहित्यका यस्ता अमरकृतिहरूले हाम्रो नेपाली भाषा र साहित्यविस्तारमा तथा लेखक पाठकको बौद्धिक विकास, जिज्ञासा र चेतनामामहत्त्वपूर्ण भूमिका खेल्दछ ।जापानी साहित्यको विभिन्न विधाबाट नेपालीमा अनुवाद&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गरिएको छ। यसै सिलसिलामा नेपालमा जापानी लेखक यासुनारीकावाबाता अत्यधिक प्रेमले पढ्ने लेखक हुन्‌ । उहाँको हिमदेश र सहस्र-सारस जस्ता कालजयी कृति नेपालीमा आइसकेका छन्‌ । सम्बत्‌ १5९९मा जन्मेका कावाबाताको जिन्दगी दुखले भरिएको छ । त्यसैले उहाँकोसाहित्यका पनि वेदना, पीडाको प्रभाव बढी परेको छ । सानै उमेरमाआफ्नो परिवारको सम्पूर्ण सदस्यको अवसान र द्वितीय विश्वयुद्धले ध्वस्तजापानको दुखले भरिएको कावाबाताको जीवन र साहित्यमा यसकोगम्भीर प्रभाव परेको छ। जीवनकालको अन्त्यसम्ममा कावाबाताडिप्रेसनको पनि सिकार भए र त्यही स्थितिमा १९७१ मा आत्महत्यागरेर उनले आफ्नो इहलीला समाप्त गरे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्तत: बीसौँ शताब्दीका महान्‌ सर्जकको कृति &#039;ताल&#039;माअभूतपूर्व मोहनी छ । किताब सानो छ । यो एउटा पुरुषप्रधान उपन्यासहो, जसमा अपराध गर्ने घुमन्तेको कथा रहेको छ। यसको प्रमुखपात्रका नाम मोमोई गिम्पेई हो, जसको बाल्यकाल एउटा तालकावरिपरिको बस्तीमा बितेको हुन्छ । फ्ल्यासव्याकमा चलेको गिम्पेईकोकथा बाल्यकालको तालसँग जोडिन्छ । त्यो जीवनको अँध्यारो पक्ष छ।तालका अनेक अर्थ र प्रतीकार्थ छन्‌ । उसको बाबु पनि तालमै डुबेरमरेको थियो । ताल यसरी जीवनको प्रतीक हो साथै, तृष्णा, इच्छा रमृत्युको पनि। ताल उपन्यासको प्रमुख पात्र गिम्पेई वास्तविकजीवनलाई पछयाइरहेछ तर यसमाथि विजय प्राप्त गर्न सक्तैन त्यहीकुरा यस उपन्यासको मूल सार रहेको छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यसभित्र पसेर यो महान लेखकको लेखनीको जादु हेर्न पाइन्छ ।अनुवाद विभाग तपाईं सामुन्ने यसलाई पस्केर यो कुरामा विश्वस्त छकि, उसले तपाईं समक्ष एउटा अदभुत र रोचक साहित्य लाएको छ।यसलाई पढेर तपाईंहरूलाई एउटा बौद्धिक आनन्द र सन्तुष्टि मिल्नेछ रमलाई आशा छ र तपाईंहरू फेरि-फेरि यस्तै रोचक अन्य अनुदितकृतिहरू पढ्न रुचाउनुहुनेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्तमा अनुवादकर्ता विजय रौनियारलाई राम्रो अनुवादगर्नुभएकोमा धन्यवाद छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राज्ञ डा. संजीता वर्मासदस्य, अनुवाद विभागनेपाल प्रज्ञा-प्रतिष्ठान&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनुवादकीय&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुका शताब्दी नाघ्यो काठमाडौं खाडलमा भासिएको, जिन्दगी भने एकमोहर । जातिपेसाले वैश्य क्षत्री भए पनि न बेपार, न समरमा होमियो ।बरु लागियो पठनपाठनमा । अनि बियाँलिरहँदा धूलो टकटक्याइमा हातपच्यो किशोरावस्थामा मुग्लानका सहरहरूका रेलिमाई चढ्ने बेलाए.एच्‌.ह्विलरका काउन्टरबाट किनिएको सस्तो भारतीय संस्करणकोलेक, जापानीबाट अङ्ग्रेजीमा अनूदित । अनुवादकको मातृभाषा जापानीर दोस्रो अथवा तेस्रो भाषा अङ्ग्रेजी भएकाले र दुवै संसारको प्रत्यक्षअनुभव र साक्षात्कारले सजिलो भयो होला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर पाँचौं भाषा अङ्ग्रेजी र चौथो भाषा नेपाली भएको म बजारियामैथिलभाषीलाई सारै सास्ती । तथापि गोविन्द सरले एकताका भन्नुभएअनुसार अनुवादको भारी बोकेर उक्लिएँ, एक डाड्सम्म त जोगाईपुग्याउँला भनेर । भौगोलिक कठिनाइको पनि कम तगारो थिएन ।समथरमा हुर्केबढेकालाई ढिस्का, थुम्का गर्दै हिमालै छिचोल्नुपरे हुँदैनकन्तबिजोक ? लडिएला, पछारिएला भन्ने कत्रो डर ! पैसा त कमाइएन,लागिएन पनि, तर थोरबहुत कमाएको अमूर्त नाम पनि धरापमा पर्नेत्रास ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तैपनि थालेको, मनले खाएको काम गरिहाल्ने अठोटसाथ ताल अनुवादगरेँ मैले पहिलो पुस्तकाकारमा । प्रज्ञाको अनुवाद विभागको म्याडमसंजीताले कार्य दिनुभयो र गोविन्द सरले उचालेर महासागरको डिलमापुग्याइदिनुभयो । प्रज्ञाले त्यहीँ प्रतिष्ठापित हुन हौस्यायो, हैसे गत्यो मअकिञ्चनको होस्टैमा उठेँ। शेष पाठक, समालोचक, विज्ञरूपान्तरकारले परिमार्जन गर्न सल्लाहसुझाव दिनुहनेछ भन्ने विश्वासलिएको छु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अस्तु !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विजयक्‌मार रौनियार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भूमिका&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डा. गोविन्दराज भट्टराई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रज्ञाप्रतिष्ठानको अनुवाद तथा विश्वसाहित्य विभागअन्तर्गतकोपरियोजनामा भएको यस अनृदित ग्रन्थको अध्ययन र सम्पादन गरीत्यसमाथि भूमिका लेख्ने अवसर प्राप्त हुन्‌ एक स्‌योग ठान्दछु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तालको किनारामा उभिएर दुई शब्द&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरा एक जना भाइ छन- विजयकुमार रौनियार । दाजुभाइ सँगैछौँ झन्डै तीन दशकदेखि । हामी दुवै अङ्ग्रेजी पढाइरहेछौँ त्रिभुवनविश्वविद्यालयमा । उनी पनि लेखिरहन्छन्‌, नेपालीमा अङ्ग्रेजीमा । बढीसाहित्य लेख्छन्‌ केही अन्य पनि । उनी मधुपर्कमा, गरिमामा, शारदामा,कान्तिपुर, काठमान्डू पोस्ट, राइजिङ नेपाल र अन्य छापामा पनिआइरहन्छन्‌ । विशेष गरी अनुवाद उनको रुचिको र क्षमताको क्षेत्र हो ।अङ्ग्रेजी -नेपालीमा द्रैभाषिक क्षमता भएकाहरूले अनुवादमा ठूलो योगदानगर्न सक्तछन्‌, तिनीहरूको धेरै खाँचो छ। मेरा भाइ तीमध्ये एक हुन्‌ ।अझ उनी ता मातृभाषा मैथिलीमा झन्‌ धारिला छन्‌ । कहाँ पाउनुतीनचार रङमा चल्ने थुँगा जस्तो मान्छे ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नयाँ सिर्जना तयार भएपछि विजयले मलाई पठाउँछन्‌, सूचितगर्दछन्‌ । म पढ्छु, प्रशंसा गर्दछु । यतिकैमा एक दिन दुई वर्षअघि उनीताल लिएर आए । ताल भन्नु कि तलाउ भन्नु कि पोखरी भन्नु कि ? कुनबढी प्रिय लाग्छ म भन्न सक्तिनँ । पोखरी भन्दा मधेसमा त्यो पद अनौठोलाग्ला, ताल भन्दा पहाडमा, तलाउ भन्दा हिन्दीतिर घुस्छु कि जस्तोलाग्छ । यो अङ्ग्रेजी लेक ॥//८£) शब्दको अनुवाद ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपाली साहित्यमा पुष्करशमशेर राणाले गरेको राइडर ह्यागार्डकोशिदेखि विजयले गरेको द लेक (ताल) सम्म आइपुग्दा झन्डै एक सयउपन्यास नेपालीमा आइसकेका देखिन्छन्‌ । यी ता विश्वसाहित्यबाटभित्र्याइएका अमर कृति हुन्‌ । यस्ता कृतिको हाम्रो साहित्य विस्तारमा,लेखक-पाठकको नवचेतना निर्माणमा महत्त्वपूर्ण भूमिका रहेको छ,रहनेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जापानी साहित्यबाट नाटक, कविता, उपन्यास र अन्य विधा-समेतनेपालीमा अनूदित भएको छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीमध्ये यासुनारी कावाबाता अत्यधिक प्रेमले पढिने लेखक हुन्‌ ।उनको हिमदेश र सहस्र सारस जस्ता कालजयी कृति नेपालीमा आइसकेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज कावाबाताको अर्को उपन्यास द लेक/तालमाथि परिचयात्मकभूमिका लेख्ने अवसर पाउँदा अधिक खुसी लागेको छ । म प्रस्तुत रचनामा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुई कुरा राख्तछु- सर्वप्रथम, कावाबाताको परिचय र उनका उपन्यासमाद लेकको स्थान, दोस्रो कुरा द लेकको अनुवादमा विजयको कलम ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यति गर्नुको कारण के हो भने अनुवाद गर्दा स्रोत-भाषा-लेखक-प्रकाशक अनि मूल कृतिसित सम्बद्ध सबै जानकारी पारदर्शी हुनुपर्दछ ।त्यसै गरी लक्ष्य भाषामा त्यसको स्थानबारे आवश्यक जानकारी पनिदिनुपर्दछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महान्‌ साहित्यकार कावाबाता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कावाबाताका सिर्जना विश्वसाहित्यका साझा निधि हुन्‌ । तिनमाउनको जीवन र सिर्जनामा दोस्रो विश्वयुद्धले ध्वस्त जापानको दुखसुसाउँछ । उनको जीवन पनि दुखले घेरिएको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संवत्‌ १5९९ मा जन्मेका कावाबाता दुई वर्षको उमेरमा टुहराभए । त्यसपछि बाजेबजैका जिम्मा लागे तर बज्यै पनि सातवर्षे नातिलाईछाडेर बितिन्‌ । उत्ती पन्ध्रवर्ष हुँदा बाजे बिते । यसरी सम्पूर्ण आफन्तजनगुमाएपछि कावाबातालाई यस संसार एक्लो भयो, उनी परित्यक्त भए रकेही समय मावलपट्टिका नातेदारसँग बसे । सोर वर्षको उमेरदेखि स्कुल-कलेज विश्वविद्यालयपट्टि लागे । उनी स्नातक पुग्दाखेरि अनेक पूर्ववर्तीलेखकबाट प्रभावित भइसकेका थिए । त्यसपछि समकालीन साथीहरूकोसमूह बनाएर उनी पढ्न, लेख्न र कृति प्रकाशन गर्न थाले ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कावाबाताले सैन्य सेवाप्रति वितृष्णा प्रकट गरे, दोस्रो विश्वयुद्धप्रतिकुनै उत्साह देखाएनन्‌ । उनले भनेका छन्‌- सानैमा परिवारका सम्पूर्णसदस्यको अवसान भएपछि ती कुराको मेरो लेखनमा प्रभाव छ, त्यसभन्दापनि युद्धको अत्यन्तै गम्भीर प्रभाव परेको छ । अबउप्रान्त म केवलशोककाव्य लेख्न समर्थ हुनेछु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वास्तवमा उनले जीवनभरि चिन्ता र अवसादको झडका हानिरहे ।त्यसैकारणले उनले सधैँभरि मृत्युछाया, निराशा र असफलताका चित्रदेखिरहे, त्यही कुरा लेखे, त्यसमाथि यौनेच्छाको अतृप्ति भोगे, त्यही लेखे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कावाबाता आफ्नो समयका अग्रचेत थिए। उनी पश्चिमकाघनत्ववाद, अभिव्यसनावाद, दादावाद जस्ता समकालीन कला,आन्दोलनसित परिचित थिए । उनले नयाँ शक्तिले नयाँ कुरा लेखे, खासगरी कथा र उपन्यास ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दोस्रो महायुद्ध सकिँदा पूरा भएको उनको स्नो कन्ट्री /हिमदेश उत्तरीजापानको दूरस्थ सहरमा रचित प्रेमकथा हो । धेरैले यसलाई कावाबाताकोमास्टरपिस ठहस्याएका छन्‌ । उनका अन्य कृति हुन- थाउजेन्ड क्रेन्ज,नेपालीमा सहस्र सारस, यो पनि दुर्भाग्यपूर्ण प्रेमको कथा हो, द हाउस अव्‌स्लिपिङ ब्युटिज्‌, ब्युटी एन्ड स्याडनेस्‌, र द ओल्ड क्यापिटल ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनको युद्भेतर सिर्जनामा थाउजेन्ड क्रेन्ज /सहस्र सारस र द साउन्डअव्‌ माउन्टेन / पर्वतको प्रतिध्वनि महत्त्वपूर्ण कृति हुन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
थाउजेन्ड क्रेन्जमा जापानी संस्कृतिमा आधारित एउटाचियाउत्सवको पृष्ठभूमिमा लेखिएको र निराशाजनक प्रेमको कथा छ।यसको नायक आफ्नै स्वर्गीय पिताजीकी प्रेमिकातिर आकर्षित हुन्छ, पछित्यो नारीपात्र मरेपछि उसैकी छोरीतिर । तर छोरीले उसलाई छोडेरभाग्छे। यसको गम्भीर अर्थ छ- चियाउत्सवमा प्रयुक्त भाँडावर्तनचिरस्थायी छन्‌ परन्तु तिनमा संलग्न हुने मानव र तिनीहरूले प्रकट गरेकोप्रेम क्षणभङ्गुर । यस्ता प्रकारका गोप्य र व्याभिचारिक कुराका थिम,असम्भव प्रेमका थिम, आसन्न मृत्युका थिम उनीभित्र गाडिएका शक्ति हुन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द साउन्ड अव्‌ माउन्टेनमा पनि यही थिम पाइन्छ। यसउपन्यासको नायकको पनि आफ्ना सन्तानप्रति कुनै प्रेम छैन, आफ्नीपत्नीप्रति पनि कनै वासना-प्रेम छैन । यो बुढेसकालतिर ढल्केको पुरुषआफ्नै छोराबुहारीतिर आकर्षित हुन्छ । उसको त्यस नारीप्रतिको प्रेम अर्कोस्वर्गीय साथीको सम्झनाले प्रतिस्थापित हुन्छ । अन्त्यमा त्यो कथा त्यसैछोडिएको छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कावाबाताले आफ्ना अधिकांश कथा अपूरै छाडे कहिले तापाठकलाई रिस उठ्ने अवस्थामा- नटुङ्ग्याई । तर उनी जानीजानी त्यसोगर्दथे किनभने उनलाई लाग्छ- कथाको अन्त्यभन्दा घटनाको प्रस्तुतिशिल्प धेरै महत्त्वपूर्ण कुरा हुन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यसरी मानव दुख र अतृप्तिका लेखक कावाबाताको अन्त्यकालपनि दुखद रह्यो । उनले १९७२ मा आत्महत्या गरे । तर कतिले योसंयोगका कुरा मात्र हो भन्दछन्‌, यद्यपि आत्महत्या नै हो भन्ने तर्कबलिया छन्‌; सबैमा यही परेको छ, किनभने उनी बुढेसकालको पार्किन्सनबिमारले ग्रस्त थिए, उनलाई गलाउनेमा अनैतिक प्रेम सम्बन्ध पनि अर्कोकारक थियो । त्यसमाथि आफ्ना मित्र मिसिमाले आत्महत्या गरको सकपनि थपियो । तर उनले कुनै सुइसाइडल नोट छोडेनन्‌, इच्छापत्र छोडेनन्‌,ग्यास सुँघेर उनको अन्त्य भयो । यो कुरा रहस्यमयी भए तापनि एउटासङ्केत प्रस्ट छ- आफ्नो अभिन्न मित्र मिसिमाले १९७० मा आत्महत्यागरेपछि उनलाई अनेक दु:स्वप्नले छोप्न थाले । भन्छन- उनी झन्डै ३००रात लगातार तर्सिरहे, दु:स्वप्नले छोपिरहे । उनलाई खालि मिसिमाकोभूतले खेदिरह्यो । उनी अत्यन्तै डिप्रेस्ड मुडमा थिए र उनले आफ्नासाथीभाइलाई भन्थे अरे- कतै जाँदा प्लेन क्र्यास भइदिएर समाप्त हुन ।मर्न) पाए हुन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तालभित्र प्रवेशअब मात्रै म सम्बन्धित कृतिछेउ आउन चाहन्छु- आजको विश्लेष्यकृति द लेक/ताल। यो उपन्यास सानो छ १६० पृष्ठको । यो रेइको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुकिमुराद्वारा अङ्ग्रेजीमा अनुदित र पाइपर बुक्सद्वारा प्रकाशित कृति हो ।यो जापानीबाट सीध्रै नेपालीमा आएको नभएर बीचमा अङ्ग्रेजी माध्यममापसेपछि मात्र नेपालीमा आएको द्वितीयक अनुवाद (सेकेन्डरी ट्रान्सलेसन)हो । धेरै कृति नेपालीमा यसै गरी आएका छन्‌ । कावाबाताका थाउजेन्डक्रेन्ज र स्नो कन्ट्री पनि यसै गरी आए । यद्यपि एउटा राम्रो संयोगको कुराके छ भने कावाबाता स्वयं सफल अनुवादक थिए र जापानी साहित्यलाईअङ्ग्रेजीमा पुच्याउन उनले ठूलो प्रयत्न गरेका थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द लेक/ताल एउटा लुकीछिपी अपराध गर्ने घुमन्तेको कथा हो ।घरबारविहीन मोमोई गिम्पेई यसको प्रमुख पात्र हो। यो अनेक अज्ञातअपराधको कारणले अपराधबाट उम्किन चाहने भगुवा हो । यसरी भाग्दाभेटिएका आइमाईको पछि लाग्नु उसको गहिरो मानसिक प्यास भनौँ किरोग भएको छ। उ ती नारीको सौन्दर्यप्रति हुरुक्क हुन्छ यद्यपि उसकासारा इच्छा अधुरै रहन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द लेक/तालमा गिम्पेईको बाल्यकाल बितेको एउटा ताल भएकोसन्दर्भ बारम्बार आउँछ । त्यो जलाशय, वरिपरिको बस्ती, त्यसकोरहस्यात्मकता र सौन्दर्य अनि अगम्यतामा त्यो चल्दछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईंको कथा फ्ल्यासब्याकमा छ । बाल्यकालको तालसँग त्योजोडिन्छ । जीवनको अँध्यारो पक्ष छ त्यहाँ । तालका अनेक अर्थ रप्रतीकार्थ छन्‌ । उसले तालका जस्ता आँखा गरेका युवतीको पिछा गर्छ,उसको बाबु पनि तालमै डुबेर मरेको थियो । ताल यसरी जीवनको प्रतीकहो, तृष्णाको, इच्छाको र मृत्युको पनि । गिम्पेई वास्तविक जीवनलाईपछ्ययाइरहेछ तर यसमाथि विजय प्राप्त गर्न सक्तैन । उसका कुरूप गोडा,संसारका सारा बदनामी खपेर हिँडेका गोडाले उसको व्यर्थ, सिसिफसकोकुदाइलाई सङ्केत गर्दछन्‌ । उसले अन्त्यमा एउटी वेश्यालाई काखकोनानीसँगै छोडेर भाग्छ, कताकति गिम्पेई दयापात्र पनि लाग्दछ । क एकसामान्य व्यक्ति हो, अति सामान्य । आफू कुरूप छु भन्ने हीनत्वबोध छ,नारीबाट उ प्रेम र स्नेह चाहन्छ र आफ्नो विश्वास तिनीहरूबाट बढाउनचाहन्छ। क कुरूप भएकैले बाँदरका जस्ता गोडाप्रति सदा चिन्तित छ ।यो एउटा उदास, भ्रष्ट र विकृत मनोग्रन्थिले युक्त स्कुलटिचरको व्यथा हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कथाका अनेक प्रसङग स्मरणीय छन्‌- टकिस बाथमा स्नान, त्यहीकेटीसँगको आकर्षण, हिसाकोसँगको सम्बन्ध, ओन्दासँगको कथा,वेश्यासँगको कथा, जूनकीरी बल्ने रात, आरिताको जीवनी चित्र, युद्धअवशेषका चित्रहरू- तर कुनै कुराको पनि समाधान छैन, या सर्लक्क परेरअघि बढ्ने परम्परित कथा जस्तो छैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द लेक/तालका अनेक व्याख्या छन्‌ । तालले सारा रहस्यनिलिदिन्छ- मानवमनले झैँ । मानवशरीर, जीवजन्तु तालमा डुबाइन्छ,मरेका र ज्युँदै पनि सारा चोरिएका सामान त्यहीँ फ्याँकिन्छ, हिंसा गर्ने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हतियार, अपराधी र अपराध त्यसैमा । वास्तवमा गिम्पेईको चरित्रभैँरहस्यमय त्यो ताल र अनेक अपराध लुकाउने मनमा तादात्म्य छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईको बाबुको सानैमा हत्या भएको थियो । त्यो अपराधी पत्तालागेन । गिम्पेई आफैँ त्यो तालको छेउछाउ ढुकिहेर्छ । ससानामा तालकाछेउ मामा घरमा कुकुरले टोकेर रक्ताम्मे पारेपछि, डिच्च दाँत निकालेकोमुसा पक्रेर त्यो तलाउमा फ्याँकेको सम्भझिन्छ । बाल्यकालको त्यो सम्झनारक्त, मृत्यु र तलाउले उसलाई आजीवन खेदिरहे । मावली बहिनीयायोईलाई उसले तलाउमा डुबाउने चाहना राखेको थियो । मिचिलाईमार्ने इच्छा राखेको थियो, अर्की युवती तामाकालाई विद्यालय जीवनदेखिपछ्याएर बरबादै गरेको थियो, ओन्दालाई मृत्युचित्र देखाएको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कथा असम्बन्धित जस्तो छ तर प्रयोग गरिएको अतीतकोपृष्ठभूमिले गिम्पेईका बाल्यकालका कर्म र कुकर्मका झल्का, भत्केकोपारिवारिक स्थिति र आपराधिक मानसिकता ल्याइरहन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपन्यासमा त्यस्तो प्रबल घटना छैन- घटनाहरू छन्‌, रेखीयछैनन्‌, फ्ल्यासब्याकका झल्का, बाल्यकाल र अतीत, अपराध, अपराधचेतना, अन्धकार, अनैतिक, असुन्दर र भयप्रद अन्धकार, सौन्दर्य विनाशकोतिर्खा । फूलहरू टिप्ने, च्यात्ने, मार्ने, फ्याँक्ने रहस्यमय आपराधिक चेतना ।तर कति सुन्दर प्रस्तुति ।गिम्पेई लुकीछिपी अपराध गर्ने सधैँ कामातुर जस्तो युवतीहरूकोगुप्त सिकारी । उपन्यास खुल्दा गिम्पेई भागेर पुगेको नयाँ सहरमा स्नानगरिरहेको हुन्छ- एक युवतीको हातबाट वास्पस्तान, मसाज रसाफसफाइको आनन्दमा रमाइरहेको, सुगन्धित छ सारा । उसको मनघुमिरहन्छ- बाल्यकालमा उठेको यायोईप्रतिको कामना, हाईस्कुल टिचरहुँदा आफ्नै छात्रा हिसाकोलाई पछ्याएर दुख दिएको घडी, पन्त्रवर्षमाचीलाई चाहेको कल्पना... स्तानघरकी परीसँगका वाणी । यी साराव्यक्तिसँग जोडिएको भित्रभित्रै बुनिएको कथा छ मियाकोको- एउटीउदास, दुखी सुन्दरी जसले पैसाको लागि एउटा आरितानामक बूढालाईआफ्नो यौवन बेची । ती सुन्दरीको पैसा चोरेर अथवा तिनलाई पछ्याउनेहुँदा तिनको ब्याग हर्रिएर पैसासितै सडकमा झरेपछि त्यो टिपेर मोज गर्नक्धेको अपराधी गिम्पेई कुरूप छ, अपूर्ण छ, बाँदरका जस्ता खुट्टा छन्‌,नाङ्गो, घुमेको चाउरी परेका । त्यो देखाउन उसलाई सरम छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईका सारा बिचारहरू उसकै स्वभावका छन्‌- एक्लै,अँध्यारामा सिकारका पछि लाग्ने अपराधी । अँध्यारा कुनाकानी खोज्दै,&#039;झोडी र भ्यास खोज्दै, पर्खाल, खाडी र निर्जन ठाउँतिर डुल्ने एक छाया ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपन्यासको भित्री कथाद लेक/तालमा कावाबाताले एउटा प्रयोगात्मक शैलीको उपयोगगरेका छन्‌ । यो शैली उनका अन्य उपन्यासमा पाइँदैन । एउटा अवस्थामा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुँदाहुँदै विभ्रान्तिले छोप्छ, अर्को कथा आउँछ । पाठकलाई एउटा कथाभित्रअर्को पसेको हो अथवा गिम्पेईलाई यथार्थमा भ्रान्तिले छोपेको हो भन्नेकुरा छुट्टयाउन मुस्किल पर्दछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यसमा एउटा अँध्यारो कथा छ- दोस्रो विश्वयुद्धपछिको विनाश रमानिसको पतित अवस्था, अँध्यारा गल्ली र निकृष्ट जीवन, खुलायौनव्यापार र उठ्न नसक्ने मानिसका नैतिक पराजयहरू । यस्ताविशेषताहरू कावाबाताका अन्य कृतिमा पनि पाइन्छ । यसमा बेलाबेलैअचानक बदलिने वर्णनहरू र त्यस्तै आकस्मिक अन्त्यहरू आइरहन्छन्‌ ।स्वाभाविक रूपले बग्ने कथा कमै छ । यो कथा गिम्पेईको जीवनचक्र हो ।त्यसो त सहस्र सारस पनि अधुरै मानिन्छ । कावाबाताको बानी थियो-एकपल्ट लेखिएको कथालाई निरन्तर चलाइरहने, बदलिरहने । त्यसैले होकि द लेक/ताल पनि अधुरोझैँ लाग्दछ, अपूर्णझैँ । एकपल्ट आएका मूलचरित्र अन्त्यमा फेरि फर्केर आउँदैनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईको व्यवहार नै विपथगामी, अनिश्चित र अगम्य छ । एउटाउदाहरण छ- कथाको अन्त्यतिर फक एउटा खाल्डामा लुकिरहेको छ-आफूले प्रशंसा गरेकी युवती त्यो बाटो हिँडोस्‌ र त्यसको दर्शन गरौँलाभन्ने आशा गर्दछ। त्यसरी प्रतीक्षा गरिरहेका बेला ढुङ्गाको चेपबाटउग्नेको एउटा जङ्गली फूल टिपेर चपाउन थाल्छ । उसको जीवनै यस्ताविचित्रताको क्षणले भरिएको छ। उसको मस्तिष्कमा चल्नेअसम्बद्धताहरूलाई जोडन पनि कहिले ता मुस्किल पर्दछ । के थियो, केहुँदै छ, के हुनेछ भन्ने अनुमान गर्नै सकिँदैन । त्यसैले यथार्थ समय रकल्पित घटना, स्वैरकल्पना र स्वप्नवत्‌ दृश्यहरू, भ्रान्ति र झल्काहरूबारम्बार जोडिन्छन्‌ । त्यसैले कथाले बेलाबेलै बाटो बिराएजस्तो लाग्छ ।तर जे भए पनि बीसौँ शताब्दीका एक महान्‌ सर्जकको यस कृतिमाअद्भुत मोहनी छँदै छ । किताब सानो छ, यसभित्र पसेर कावाबाताकोलेखनीमा रहेको जादु हेर्न पाइन्छ, त्यो हेर्न लायक छ, अनुभूत गर्न लायकछ। त्यसो ता समालोचकहरूले कावाबाता बुभन सर्वप्रथम थाउजेन्डक्रेन्ज “सहस्र सारस र स्नो कन्ट्री /हिमदेशबाट प्रवेश गर्नु पनि भनेका छन्‌तापनि यति पृष्ठभूमि बुझिसकेपछि द लेक /तालभित्रै पस्ता पनि त्योआनन्द प्राप्त गर्न सकिन्छ भन्नेमा म विश्वस्त छु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनुवाद शिल्पभित्र प्रवेश&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले धेरै समय लगाएर पढेँ, भाषिक रूपले हाम्रा पाठकलाई ध्यानराखेर पढेँ, अनुवादको धर्म सम्झेर पढेँ । सकेपछि अनुवादकलाई दिएँ।उनले अक्षरशः मेरो सल्लाहको पालना गरे । अनि परिमार्जन गरे । त्योपरिमार्जित प्रति फेरि पढेँ । केही शब्दोच्चारणको लागि जापान बसेरआउनुभएका भाषाविद प्रा. डा. माधवप्रसाद पोखरेलज्यूसँग सल्लाह लिएँ ।यो एक गम्भीर कार्य थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कति कुरा छुटछन्‌, कति कुरा अननुवादच हुन्छन्‌, कति कुरा धेरै वाथोरै भएर आउँछन्‌ । के गर्नु ? त्यसमा कुनै उपाय छैन । अनुवादकर्मकोप्रकृति नै त्यस्तै हुन्छ । भएसम्मको उपाय लगाएर हुन सको काम विजयलेगरेका छन्‌ । उनी नेपालका एक अत्यन्तै सफल अनुवादकमध्ये एकगनिनेछन्‌ । अनुवाद गर्दा अपनाइएका सबै उपायको बयान गरिसाध्य छैनतर एउटा कुरा प्रस्ट छ यो द्वितीयक अनुवाद भएकाले जापानी-नेपालीबीचका सांस्कृतिक भाषिक अन्तरहरू एकैचोटि अनुवादमा पस्नपाएनन्‌ । ती कुरा अङ्ग्रेजी आँखामा पसेर मात्र नेपालीमा आएकाले कतिकुरा फिल्टर भएको अथवा अनुकूलित भएको हुन सक्छ । केही पदहरूआए एनल्म ट्री, गिड्क्गो ट्री जसको &#039;इकोलोजी&#039;को अन्तरले अनुवाद नहुनपनि सक्छ । मधेसमा हुने वनस्पति पहाडमा नभएभैँ हो । वनस्पति, वृक्ष,प्राणी, हरेक वस्तु स्थानपरक हुन सक्छन्‌ । हामीले त्यही राख्यौँ । एल्मट्वीलाई एक खालको वृक्ष भने पनि मौवा अथवा महुवाको रूख भने पनिअपूरो लाग्छ । कतिपय सांस्कृतिक अन्तरका कुरा छन्‌- चारम्याटकोकोठा, चियापर्व, जूनकीरी उत्सव... लगायत अनेक सामाजिक सांस्कृतिकव्यवहारका मान्यताका करा । त्यसको अनुभूतिको लागि जापानै पुग्नुपर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
याथ्लीट्स फुटलाई गोडाका औँलाका बीचको घाउ भनिएको छ,औँलाका कापको घाउ पनि होला- त्यस्तै कुनै शब्द नेपालीमा थिएन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अङ्ग्रेजीबाट यात्रा गर्दै नेपालीमा पुग्दा धेरै कुरा छुटेका हुन्छन्‌ ।सांस्कृतिक, धार्मिक, भाषिक, भौगोलिक, दार्शनिक अन्तरहरूले अनुवाद हुननसके तापनि जेजति रहन्छ त्यही नै अनुवाद हो। यो लाभ-हानिमिसिएको खेल हो । त्यसैले भनिन्छ- ९ 1176 5041700 15 0861 [479 51020 69810. भुस खाँदेर ठड्याइएको मृत चीलभन्दा जिउँदो भँगेरोनै उचित हुन्छ । यो एउटा जिउँदो भँगेरो हो, फुरफुर उड्न सक्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यसको प्रमुख उद्देश्य हो हाम्रा पाठकलाई एक महान्‌साहित्यकारको अमरक्‌तिमा प्रवेश गराउनु । सो कुरा इमानदारीपूर्वकसम्पन्न भएको छ, कुशलतापूर्वक, दक्षतापूर्वक । धेरै वर्षपछि जापानीसाहित्यबाट नेपालीमा आएको यस कृतिलाई अनेक स्वागत छ। म सफलअनुवादले दिने सन्तुष्टिको एक नमुना प्रस्तुत गर्न चाहन्छु&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3417010 पाथ एड 1० ७ _6€777256 1 वावा गा एथा० 5०.वा पट) ८००४॥॥ 1००४ बं ॥० लाथा)) 010550775 बै गाडा ता एलशा०काग, एट एव कछ पाणाइथ्व गी) 220076 पट लाटा) 02७51००॥७ब हाथव, बाव 72,012 97ब102725 ११७७ 770/,0707 8017.आऔ&amp;quot;था 5०, ॥2 ८0107 १/॥०,001&amp;quot;€15 ॥७८०९124 1० गी छ पीर शाटलाग८गड, गरा 310 ११६७ गा वा) काचड ०&amp;quot; आए) बढि णाई ।०जवी)०॥०, 14 बब 1० बातजाला, 576 जब पीच जया 512 1002॥0 गा ट गाई 12 लाग) 910550175 ए 1 डुवाबशा 1१२२ ब&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हटी जड, जप) 2605 जाट बा ००७ १2 ठा बदवाशव0915725 ०९॥०१, 512 ०15० गाथारँगाटव पी 312 1वब 522 02 जी3107 07 72 १०) 1० तटा510219 10006, 0048 पट 70७ 17611017 1017:१० ७श्री-००।०६ ९३३ बगाई ॥1€ 910550175 १ ७ लाटा) 00७५ पा[थ्व 172 1704. (74)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मियाकोले उतीहक्तलाई उएनो पार्कमा राति पैयुँका फूलहरू हेर्नसकूत्‌ भी त्यहाँको एज्टा चिनियाँ रेस्टुराँमा तिम्त्याई । पार्कमामातियहरूको घुइँचो थियो; पैयुँका छखहरू थकित ढेखिन्ये र फूल फुल्नेहाँगाहरूमा मुवा राग्रही पलाइसकेका थिएतत्‌ । तैपनि बिजुलीकोउज्यालोमा परेर फूलहरूको रङ गाढा एलाफी देखिन्थ्यो । स्वभावतयाशान्त भएर हो अथवा मियाकोलाई आदर गरेर हो माची कषेरै कुरागरिरहेकी थिइन । ज बिद्वात ब्युँझैँदा उदयको बारीया फूलेका पैआकर्षक देखिन्ये भनेर भनी । तिनका पत्रदलहरू तल झआाँटिएकाअजेलियाका भ्याङभरि चारैतिर छरिएका थिए । जले केइदुकेको घरआउँदै गर्दा बाटोमा अस्ताइरहेको दूर्य देखेको कुरा पति भनी / त्यो दूर्यवरम गरी उलिनेको अन्डाको पहेँलो भागझौँ खाडलबाहिर लहरै उभिएकापैयुँका फूलहरूमाफ तैरिरहेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्त्यमा, बिश्वसाहित्यबारेको ज्ञान अति आवश्यक भइरहेकोवर्तमान समयमा यो उत्कृष्ट अनुवादले हाम्रा पाठकको क्षितिज झन्‌फराकिलो पार्दै लानेछ भन्नेमा म विश्वस्त छु । नयाँ वर्षको यो अवसरमासम्पूर्ण नेपाली पाठकसमक्ष यो सुन्दर कोसेलीलाई पनि चिनाउन पाएकोमाम विशेष आनन्द प्रकट गर्दछु । यो सारा आनन्दको स्रोत ता विजय भाइनै हुन्‌ । उनैलाई विशेष बधाई छ । आशा छ, आउँदा दिनमा उनको अर्कोकृतिमाथि पनि यसै गरी भूमिका लेख्ने अवसर प्राप्त हुनेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन्दर्भ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भट्टराई, गोविन्दराज. अनुवाद अध्ययन परिचय. काठमाडौँ, रत्न पुस्तक भण्डार,२०६४।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नल उत्तरआधुनिक विमर्श, काठमाडौँ: मोडर्न बुक्स, २०६४ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भेनुति, लरेन्स. द स्क्यान्डल्ज अव्‌ ट्रान्स्लेसन. रुटलेज, १९९९ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1290/90919, 7951141. 11€ 1,41९. 106: 71) 3001/5, 1.0.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(यासुनारी कावाबाता १८९९ मा जापानको ओसाकामा जन्मेका थिए।उनले थाउनेन्ड क्रेन्स स्नो कन्ट्री र याउन्ड अब्‌ द माउन्टेत्‌ लेकजस्ता उपन्यास लेख्नुका साथै अनुवादहरू पनि गरेका थिए । उनका प्रथमदुई कृतिहरू अङ्ग्रैजीका साथै नेपालीमा पनि अनुवाद भइसकेका छन्‌ ।यहाँ उनको उपन्यास लेकको रूपान्तरण गरिएको छ । अन्य उपन्यासमाभँ यस कथामा पनि उनले आधुनिक व्यक्तिको एकाकीपन, निराशा रयौनसम्बन्धमार्फत त्यसको शमन गर्ने प्रयासलाई मीठो पाराले प्रस्तृतगरेका छन्‌ । कावाबाताको जटिल आधुनिक जीवनप्रतिको बुझाइ रत्यसलाई सरल साहित्यिक सम्प्रेषण गर्ने कलालाई कदर गर्दै सन्‌ १९६८मा उनलाई नोबल पुरस्कारबाट सम्मानित पनि गरियो । साहित्यतर्फ उक्तपुरस्कार प्राप्त गर्ने उनी पहिलो जापानी हस्ताक्षर थिए । उनले १९७१ माआत्महत्या गरेर देहत्याग गरे ।)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेई मोमोई कारुइजावामा पुग्दा गर्मी यामको आखिरीभइसकेको थियो । तर त्यहाँ शरद्‌ ग्रतुभझौँ भान हुन्थ्यो । उसलेफलाटिनको पतलुन किनेर पुरानो पतलुन फेप्यो । राति चिसौ बतासचल्नुका साथै कृहिरो लागेकाले उसले नयाँ स्वेटर र कमिज भिरेकोथियो । उसले नीलो बर्साती पनि किन्यो । तयारी पोसाकका लागिकारुइजावा राम्रो ठाउँ थियो । उसले एक जोडी आरामदायी जुत्तासमेतकिनेर पुरानोलाई पसलमै छाडिदियो । तर एउटा कपडामा पोका पारेकापुराना लुगा थिए, ती के गर्ने भन्ने उसलाई दोमन भयो । कुनै खालीघरमा मिल्काइदिँदा आगौँ गर्मी यामभन्दा पहिले भेटिन्नन्‌ । एउटागल्लीको बाटो घुम्दा उसले खाली छाडिएको बङ्गलाको भ्याल छाम्नपुगेछ । तर त्यहाँ काठ र कीला असरल्ले थिए । क भ्याल फोर्नचाहँदैनथ्यो । किनभने त्योचाहिँ गैरकानुनी काम हुन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीडितले उसको अपराधबारे भन्न नसक्ने हुँदा गिम्पेईले आफूसाँच्चीकै प्रहरीद्वारा खोजिएको अपराधी हुँ कि भनी गम्यो। उसलेआफ्ना लुगाफाटा पुरानो बाकसमा खाँदैर हलुङ्गो महसुस गप्यो । पोकोपीँधमा खाँददै गर्दा उसले चिसो कागजको खप्याकखुरुक सुन्यो । कि तबिदा मान्नेहरू फोहोरी थिए, कि त रखवाली गर्ने अल्छी थियो ।किनभने कन्तुर खन्याइएको थिएन । बिर्को पनि राम्ररी लाग्दैनथ्यो । तरउसले वास्ता गरेन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
करिब तीस पाइला हिँडेछि क मोडियो। उसले खालीबाकसनेर कहिरोमा सेता पुतलीको झुन्ड मडारिइरहेको देखेजस्तोठान्यो । क रोकिएर पुनः पाइला चाल्ने लाग्दा सेतो दृश्य उसकोटाउकार्माथ गुज्य्रो । त्यो माथि देवदारुका रूखहरूमा मधुरो, नीलोप्रकाश छर्दै अदृश्य भयो । रूखहरू बाटाका दुवैतिर लाम लागेभैँ ठिङ्गउभिएका थिए । तिनको अन्त्यमा झकिझकाउ प्रकाशले साजएकोघुमाउरो ढोका थियो । त्योचाहिँ टर्केली स्नानघरको मलद्वार थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बगैँचामा पस्ता गिम्पेईले आफ्नो हातले कपाल मुसाप्यो । उसकोकपाल चिटिक्क मिलेजस्तो थियो । वास्तवमा पत्ती (छुरा)ले आफैंमिलाएर कपाल काट्ने उसको कलादेखि सबै चकित थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यहाँकी सबैभन्दा लोर्काप्रय सुसारेले उसलाई स्नानकोठामाडोप्याएर लगी । ढोका ढप्काएर उसले आफ्नो ज्याकेट फुकाली । उसलेकम्मरमाथि ब्रा मात्र लाएकी थिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनन्क पै जबकि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटीले उसको बर्साती खोल्न लाग्दा गिम्पेईं एकछिन अनकनाईहेप्यो तर अन्तत: उसबाट लुगा फुकालिन मान्यो । गिम्पेईको गोडातिरनिहुरेर केटीले उसका मोजा तानेर निकाली ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेई बास्नादार नुहाउने भाँडोमा पस्यो । टाइलको रडले गर्दापानी हारियै देखिन्थ्यो । अत्तरको गन्ध भने त्यात मीठो थिएन । तरशिनानो भन्ने सहरमा एकपछि अर्को सस्तो होटलमा लुकीछिपीघुमिसकेर्पछा उसलाई सो बास्ना फूलहरूको झैं लाग्न थाल्यो ।भाँडोबाट निस्केपछि केटीले उसलाई सर्वाङ्गि पखालिदिई । गिम्पेईकोखुट्टामा टुक्रक्क बसेर उसले आफ्ना कोमल औंलाले उसका गोडाकाऔँलाहरूबीच पानि धोइपखाली गर्रादई । उसले केटीको टाउकोनियाल्यो । उसको कपाल घाँटीको पछिल्लो भागभन्दा थोरै तलसम्मकाटिएको र आइमाईहरूले कपाल नुहाएर छाडदाझैँ सीधा र खुलाफिँजिएको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यहाँको कपाल धोइदिउँ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हँ ? के गाहकहरूको कपाल पर्न धुने गर्छ्यौ र ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हजुर, म यहाँको कपाल धोइदिन्छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक्कासि आफ्नो कपाल कस्तो गनाउने होला भन्ठानेर गिम्पेई पछिसच्यो । कति भइसक्यो नधोएको । त्यसमा पनि पत्तीले मात्रै छौँटएको । तरसाबुनको फीँजमा कपाल रर्गडिएपछि टाउको अगाडिपट्टि निहुराएर रकृहिनाहरू घँँडामाथि टेकेर बस्ताखेरि गिम्पेईको डर हरायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“थाहा छ तिम्रो स्वर मीठो छ भनेर ? ”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“स्वररे? ”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हो। तिमीले बोल्न छाडे पनि तिम्रो स्वर मनमा बसिरहन्छ ।सधैँ त्यस्तो भइदिए पो हुन्थ्यो । लाग्छ, क्नै मीठो र नरम करा मेरोभित्री कान हुँदै मेरो मस्तिष्कको अन्तर्तहमा छिर्दै छ । साँच्चै, यसले तजस्तोसुकै खुँखार अपराधीलाई समेत भेडाभझौं सुधो बनाइदिन सक्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आच्चे ? मेरो स्वर त आत लज्जालु र केटी जस्तै छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“लज्जालु होइन नि । यो त ओधी मीठो छ । यसमा केही दुखदर केही नरमको साम्मश्चण छ । साथै यो ताजा र खुला छ । योचाहिँगायिकाको स्वरभन्दा फरक छ । के तिम्रो कसैसँग माया बसेको छ? ”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अहँ छैन । बसेको भए राम्रो हुन्थ्यो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“पख । तिमीले बोलिरहँदा मेरो टाउको बेसरी नमल । त्यसोगर्दा म तिम्रो स्वर राम्ररी सुन्न सक्तिनँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटी थामिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यहाँले यति लजाइदिनुहुन्छ कि म बोल्नै सक्तिनँ,” उसले लाजमान्दै भनी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विक रे क्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“देवदूतको जस्तो बोली हुने कसैलाई भेदुँला जस्तै कहिल्यैलागेको थिएन । फोनमा तिम्रो केही वचन सुन्न पाए पनि म त्यहीघन्किइरहने स्वर सुनेर बसिरहन्थेँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईका आँखामा झन्डै आँसु भरियो । केटीको बोलीले उसकोमनमा विशुद्ध हर्ष र न्यानो आनन्द भरिदियो । योचाहिँ शाश्वत नारीकोस्वर थियो कि सहृदयी आमाको ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिम्रो घर कहाँ हो?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटीले जबाफ फर्काइन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“स्वर्गबाट आएकी हो ? ”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ए, होइन । निइगाता हो मेरो घर ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“निइगाता ? निइगाता महानगर ? ”&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“होइन । यो यौटा सानु सहर हो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्तानघरकी केटीको स्वर मसिनो र नरम भइसकेको थियो, अबत्यो बिस्तारै कम्पित हुन थाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अहा, त्यो हिमप्रदेश ... त्यसैले होला तिमी त्यात गोरी र सुन्दरदेखिएकी ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अहँ । सुन्दर छुइनँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हो, छ्यौ । तर तिम्रो स्वर खास किसिमको छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटीले गिम्पेईको कपाल मिच्न सिद्धयाएपछि बाल्टीका बाल्टीतातो पानी खन्याएर त्यसलाई पखाली, उसको टाउको बडेमानकोतौलिया (रुमाल)ले बेरी त्यसलाई थपथपाउँदै सुकाई । उसले निकैपल्टकपाल पनि कोरिदिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनि केटीले गिम्पेईलाई कम्मरमा ठूलो रुमाल बाँधेर बाफस्तानगर्ने भाँडोमा बसाली । केटीले चारपाटे काठको बाकसका अगाडिकोपल्ला खोलेर उसलाई बिस्तारै भित्र घचेडी । बाकसको माथिल्लो भागमारहेको तखतामा उसको टाउको अड्चाउने ठाउँ थियो । अनि त्यो त्यहाँराम्ररी मिलिसकेरपछि उसले बाँकी ठाउँलाई एउटा ढकनीले छोपिदिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“गिलोटिन (टाउको छिनाउने यन्त्र),” उसले मनमनै भन्यो आनिउसले विस्फारित आँखाले वरिपरि हेप्यो । प्वालमा फसेर उसले टाउकोदायाँबायाँ घुमायो । तर क डराएको कुराको केटीले वास्ता गरिन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“गाहकहरूले प्राय: त्यसो भन्ने गर्छन,” उसले भनी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईले ढोकादेखि भ्यालसम्म आँखा कदायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“भ्याल लाइदिउँ ? ” केटी कतिर जाँदै थिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“पर्दैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भ्याल खुला थियो । सायद बाफस्नानबाट निस्कने तातो हावालेकोठा भरियो । स्नानकोठाबाट निस्कने उज्यालोले बाहिर एल्मको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लननिछ रे पयविबि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूखका हरिया पातहरू टाल्करहेका थिए । त्यो रूख भने अजङ्गकोथियो । त्यसैले यसको बाक्लो भयार्डभत्रसम्म उज्यालो छिर्नै पाएकोथिएन । गिम्पेईलाई लाग्यो-ती पातको अँध्यारोलाई चिर्दै कतैबाटपियानोको मधुरो आवाज आइरहेको होला । तर उक्त आवाजमा कुनैसङ्गीत थिएन । उसलाई विश्रम भएको हुन सक्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के भयालबाहिर कुनै बगैँचा छ ? ”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हजुर ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भ्यालपट्टि अर्धनग्न अवस्थामा मधुरो हरियो प्रकाश पर्दै गरेकीगोरी केटी भने अर्कै दूनियाँमा भएजस्ती थिई । गुलाफी टाइलओछ्याइएको भइँमा क खाली खुट्टा उभइएकी थिई । उसका गोडाहरूसाँच्ची नै तरुणावस्थाका प्रतीक थिए तर घुँडापछाडिका खाल्टामा भनेकाला दागहरू थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईलाई लामो स्नानकोठामा एक्लै बस्नुपरेमा खपिनसक्नु हुन्छहोला, प्वालको घेरा कसिएर उसलाई अठ्याउने हो कि भनेर आत्तियो,डरायो । आफ्नो सिटमुनि राप उठेको उसले महसुस गर्न सक्थ्यो ।उसको पिठचूँ तातो तखताभैँ लाग्ने वस्तुमा ढेसियो । वास्तवमा बाफलेगर्दा बाकसको तीनैतिर तातिएको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले यहाँ कतिबेर बस्नुपर्ने हो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“सो कुरा यहाँमै भर पर्छु । तर मेरो विचारमा करिब दस मिनेटबस्नुपर्छ होला । सधै आउने गाहकीहरू त यसमा लगभग पन्ध्र मिनेटबस्छन्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले ढोकैनेरको लुगा राख्ने लकरमाथिको सानो घडीतर्फहेप्यो । चारपाँच मिनेट मात्रै भएको थियो । केटी नेर आई, उसकोनिधारमा एउटा चिसो, भिजेको रुमाल राखिदिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ए बुझैं । यसले रगत मगजमा ल्याइपुग्याउँछ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन्चो मान्दै उसले अब आफ्नो गम्भीर अनुहार मात्र काठकोबाकसबाहिर देखिँदा कस्तो उल्ल्‌ जस्तो लाग्दो हँ भनी कल्पना गर्नसक्थ्यो । उसले आफ्नो न्यानो छाती र पेट माडन खोज्यो । उसको जीउच्यापच्याप थियो । तर त्यो पसिना हो वा बाफ भनी ठम्याउन सकेन ।उसले आँखा चिम्म गय्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गाहकी बाफस्नानमा भएको बेलामा पनि केही काम गर्नुप्योभनी केटीले स्नान गर्ने सुगन्धित भाँडोबाट तातो पानी निकाली र भइँसफा गर्न थाली, त्यस बेला छ्यापछ्याप आवाज आयो । गिम्पेईलाईत्यो आवाज चट्टानमा ठोकिने छालहरूको जस्तो लाग्यो । चट्टानमा दुईसमुद्री चरा अर्धचन्द्राकार पख्रेटा फैँजाउँदै एकअर्काका चुच्चा ठुडाठुङगर्दै थिए । उसले आफ्नो जन्मठाउँको समुद्र झलझली सम्झियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रनक्क जयय्लेर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अब कति मिनेट बाँकी छ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“करिब सात मिनेट ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटीले फेरि एउटा चिसो रुमाल ल्याएर गिम्पेईको निधारमाराखिदिई । एक्कासि आनन्दमयी चिसो महसुस गरेर उसले आफ्नोटाउको अगाडि हत्यायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आह ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के भयो, हजुर ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सायद गिम्पेईलाई बाफको न्यानोले टाउको रिडायो कि भनेरउसले भझारिदिएको रुमाल केटीले टिपेर फेरि उसको निधारमा राखिदिँदैसमाइरही ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“बाहिर निस्कनुहन्छ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अहँ । केही भएको छैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईलाई लहड चल्यो । उसले यस मीठो बोल्ने केटीलाईटोकियोमा कतै कारैकार गुड्ने बाटामा पछ्याइरहेको थियो । केहीबेर तउसले पेटीछेउ लामबद्ध गिडकगो रूखहरू मात्र हेर्न सक्यो। कपसिनाले निथ्रुक्के भइसकेको थियो । काठको बाकसमा टाउको बेसरीअँठयाइराखिएको हँदा घुम्न नसक्ने बुझेपछि उसले अप्ठेरो अनुहारलायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटी उसको छेउबाट हटी । क गिम्पेईको व्यवहारदेखि अलिचिन्तित जस्ती देखिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“टाउको मात्र बाहिर निकालेको बेला हेर्दा मेरो उमेर कतिर्जतिदेखिन्छ ?” उसले सोध्यो । तर केटीचाहिँ अलर्मालएर कनै जबाफ दिनसकिन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म लोग्नेमानिसहरूको उमेर भन्नै सक्तिनँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटीले उसलाई नियालेर हेर्न चाहिन । गिम्पेईले आफू चौँतीसलागेको बताउने क्रै थिएन । उसले केटी अझ बीसमुनिकी होली भनीसोच्यो । उसका कुम, पेट तथा गोडाहरूले क अक्षत कमारी नै भएकोदेखाउँथे । उसका गालाहरू ताजा र गुलाफभौँ थिए । तिनमा लालीमात्र लगाइएको देखिन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अब निस्कन पाए हुन्थ्यो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईको स्वर शोकाकूल थियो । केटीले उसको गलानेरकोतखता हटाई । घाँटीमा झुन्डिएको रुमालको दुवै छेउ समाएर उसकोटाउकालाई अमूल्य वस्तुभै बिस्तारै तानी । आन उसको जीउभरिकोपसिना पुर्छिदिई । गिम्पेईको कम्मरमा ठूलो रुमाल बेरिएको थियो ।केटीले भित्तासँगै राखिएको गजगजे खाटर्माथ सेतो तन्ना ओछ्याएरउसलाई घोप्टो परेर सुत्न भनी । अनि कुमदेखि मालिस गर्न थाली ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिमनिछ भै, प्वल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईलाई मालिस भनेको मुडकीले हिर्काउनु र मल्नु मात्र नभईखाली हातले थपथपाउनु र धाप हान्नु पनि हो भन्ने क्रा थाहा थिएन ।ती मालिस गर्ने हत्केलाहरू ता अत्यन्तै कोमल, एउटी कन्याका थिएपरन्तु उसले पिठ्युँमा निरन्तर र मर्ने गरी धाप हानिरहेकी थिई । यसलेगर्दा गिम्पेईको श्वासप्रश्वास तीव्र हुन थाल्यो । उसले आफ्नै छोरालेमुडकीले सारा शक्ते लगाएर निधारमा हानेको र टाउको निहराउँदाहान्याहान्यै गरेको सम्झियो । कहिले होला त्यो ? ... तर अहिले यसफुच्चीका हातले बेसरी पृथ्वीको भित्ताले थिचएको चिहानमाथिहिर्काएको हिकयि थियो । भ्यालखानाका अँध्यारा भित्ताहरूले गिम्पेईलाईचारै दिशाबाट छोप्न थाले । उसको जीउबाट चिसो पसिना छुट्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के तिमीले पाउडर ार्कदैँदै छ्यौ ?” उसले सोध्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हजुर । यहाँलाई असजिलो भो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ए होइन,” गिम्पेईले हत्तारिँदै भन्यो। “मेरो फेरि पसिनाछुटिरहेछ, हेन त ? थाहा छ, तिम्रो बोली सुनेर पानि अर्साजलो मान्नुअपराध जस्तै हुनेछ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटी हठात्‌ मालिस गर्न रोकिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले तिम्रो स्वर सुनेपछि अर्थोक सबै हराएर जान्छ । म आलिकबहकिएजस्तो लाग्ला तर कुनै स्वरलाई पछ्याउन वा समाउन सकिन्न,कसो ? मलाई यो समय ता जीवनको प्रवाह जस्तो लाग्छ । अहँ,त्यस्तो हुनु पर्दैन । तिमीले चाहेको बेला आफ्नो मीठो स्वर प्रयोग गर्नसक्छ्यो तर अहिलेभैँ चुप लागेर बस्छु भन्यो भने तिमीलाई कसैलेबोल्न कर लाउन सक्तैन । वास्तवमा तिमीलाई एक्कासि आश्चर्य, रिसवा दुख पर्दा बोल्छ्यौ तर तिमीलाई नैसर्गिक स्वरमा बोल्ने नबोल्ने हकछ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्तानघरकी केटी चुप लागेर गिम्पेईका नितम्ब तथा तिघ्रापर्छाडिमालिस गर्रिरही । उसले उसको गोडाको खाल्डादेखि ओँलासम्ममुडकीले थिच्तै रही ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“उत्तानो पर्नोस्‌ त ।” केटीले यति मसिनो स्वरमा बोली किउसलाई सुन्न हम्मे नै पप्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अब उत्तानो पर्नोस्‌ है ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“उत्तानो रे ? पिठ्यूँ फर्काएर पल्टिन भनेकी हो ?” गिम्पेईकम्मरमा बेरिएको रुमाल समाएरै पल्टियो । फूलहरूको सुवासभौँकेटीले निमेष मात्र कम्पनसाथ गरेको साउती उसको कानमा भरियो ।यो उसको जीउ घुमाएसँगै उसको पछि लाग्यो । उसका कानलेयसर्ञघ कहिल्यै त्यस्तो आनन्दको अनुभूति गरेका थिएनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शदरमम्ट पि पयबिबि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सानो गद्दादार ओछ्यानमा ढेसिएर केटीले गिम्पेईका पाखुराहरूमिचिदिई । उसका स्तनहरू गिम्पेईको अनुहारभन्दा माथि थिए । उसकोब्रा राम्ररी कसिएजस्तो नलागे पनि उसको जीउको मासु सेतो कपडाकोछेउमा आलि कसिएको थियो । तर उसको जीउबाट उाछट्टिएका स्तनहरूअझ पररिपक्ठ भइनसकेका लाग्थे । उसको अनुहार आलि प्राचीनस्वरूपको गोलाकार थियो । उसको निधार त्यात चौडा थिएन । तरसायद उसको कपाल पर्छाडसम्म कोरिएको र रौँहरू बाहिरननिकालिएकाले निधार अग्लो देखिनुका साथै उसका ठूलठूला आँखाझन्‌ उज्याला (तेजिला) देखिन्थे । उसको घाँटी र कमबीचको मास्‌पोटिलो थिएन । साथै उसका माथिल्ला पाखुराहरू जवानीले भरिएका रगोला थिए । उसको छालाको चमकले आँखै तिर्मिराएकोले गिम्पेईलेआँखा चिम्म पाप्यो । केटीका आँखाका ढकनीपर्छाड उसले सिकर्मीलेकीला राख्ने खालको बाकस देख्यो । त्यसभरि रहेका साना कीलाहरूउज्यालोमा टाल्करहेका थिए । गिम्पेईले आँखा उघारेर छानामन्तिरकोपटाईतर्फ हेप्यो । त्यो सेतो थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यस उमेरमै मेरो शरीर बृढो भएको लाग्दैन ? त्यसो हुनाकाकारण मैले भोगेको कठिन जीवन हो,” गिम्पेई फतफतायो । तर उसलेअझ पनि उमेर खोलेको थिएन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“थाहा छ, म चौँतीस वर्षको भएँ, बभ्यो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हो र ? यहाँ त्योभन्दा कम उमेरको देखिनुहुन्छ,” केटीले आफ्नोस्वरमा कुनै भाव नल्याई भनी । फक गिम्पेईको टाउकानेर उभिने गरीफर्केर भित्तासँगै रहेको पाखुरा मिच्न थाली ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मेरो गोडाका औँलाहरू लामा भइसकेका छन्‌, हे ?-ठीकबाँदरका भझौँ । ती चाउरी परिसकेका छन यर्द्याप म निकै डुल्ने गर्छुआफ्नो गोडाका औँलाहरू देखेर म सस्रैं तर्सन्छु । तर तिमीले आफ्नासुन्दर हातले तिनलाई छोयौ । मेरो मोजा फुकार्लिदँदा तिमीलाई दिक्कलागेन ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटीले जबाफ फर्काइन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म पनि जापानको समुद्री तटमा बस्ने मानिस हुँ । त्यहाँ कालाचट्टानले गर्दा बाटो खाल्डाडखुल्डुड छ। म चट्टानमा गोडाका लामाऔंला गाडदै नाङ्गो खुट्टा हिँड्ने गर्थे ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईले अर्धसत्य क्राहरू गर्थ्यो । आफ्ना गोडा क्रूप भएकालेगर्दा आफ्नो युवावस्थामा उसले कातिपल्ट झूटो बोलेको थियो । तरवास्तवमा औंला र गोलीगाँठाबीचको माथिल्लो भागसमेत कालो र खस्रोहुनुका साथै कापहरू चाउरी परेका र बाङ्गिएका औँलाहरू जता पनिमर्किने खालका थिए । केटीले मालिस गरिरहँदा उत्तानो परेको गिम्पेईले&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लम्न्छ 8 लचक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफ्नो गोडा हेर्न नसकेपछि हातहरू आँखाअगाडि ल्याई नियाल्नथाल्यो। केटीले गिम्पेईको स्तनभन्दा अलि माथि छातीदेखिपाखुरासम्मको मांसपेशी मालिस गर्दै थिई । गिम्पेईका हातहरू भनेगोडार्जात सारो भद्दा थिएनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“जापानी समुद्री तटको कुन भागबाट आउनुभएको हो ?” केटीलेस्वाभाविक स्वरमा सोधी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कुन भाग ...” गिम्पेईले अस्पष्ट स्वरमा बोल्यो। “आफूजन्मेको ठाउँबारे मलाई बोल्नै मन लाग्दैन । म फरक किसिमकोमानिस हुँ । हाल मेरो कुनै घर छैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटीले गिम्पेईको जन्मस्थलबारे जान्ने खासै चासो लिइन र कुनेविशेष चाख लिएर सुनिरहेकी जस्ती थिइन । स्नानकोठामा कसरीउज्यालो पस्यो ! केटीको शरीरमा कुनै छाया परेको देखिँदैनथ्यो ।उसको छाती मसाज गर्दागर्दै केटीले आफ्ना स्तन अघिल्तिर हत्याई ।अनि गिम्पेईले हात कहाँ राख्ने मेसो नपाएर आँखा चिम्लियो । उसलेपाखुरा तन्काउँदा केटीलाई स्पर्श गर्न सक्थ्यो । उसलाई औंलाको टुप्पोलेमात्र पनि छुँदा थप्पड आउन सक्ने लाग्यो र साँच्ची नै थप्पड लागेरउ भझस्कयो । उसले एक्कासि आत्तिएर आँखा खोल्न खोज्दा परेला नैउघार्न सकेन । तिनमा निकै चोट लागेको थियो । उसलाई रुन मनलाग्यो तर थोप्पै आँसु आएन । मानौँ तातो सियोले घोचेभौँ आँखा दुख्न थाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईको मुखमा केटीको हत्केलाले नभई छालाको नीलो हातेझीलाले लागेको थियो । उसलाई त्यतिखेर हाते झोलाको सुइँको भएनतर चोट लागेपछि विचार गर्दा गोडानेर झोला परिरहेको पायो। सोझोला आफूलाई हान्नै भनेर हो कि आफूतिर त्यसै हुत्याइएको हो भनीठम्याउन सकेन । तर उसलाई हिर्काइएको हो भन्ने क्रा सत्य थियोकिनभने त्यतिखेरै उसको होस खुल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेई चिच्च्यायो र आफूलाई त्यो नहान्न आग्रह गर्न थाल्यो ।तत्काल उसले ती महिलालाई तिमीले आफ्नो हाते झोला भझाप्यौभन्यो । तर औषधीपसलको मोडबाट उता लागेर्पाछ महिलाको पाछिल्लोभाग गायब भयो । माझ बाटामा मानौं उसको अपराधको दुरुस्तप्रमाणको रूपमा खालि नीलो हाते झोला थियो। झोलाको खुलाभागबाट हजारहजार येनका नोटहरूको बिटो निस्केको थियो। तरपैसाको बिटोभन्दा पनि हाते झोला नै उसको अपराधको सबुदप्रमाणहुन सक्नेमा पहिले ध्यान तानियो । भागेर अनि हाते झोला छाडिदिएरमहिलाले मानौँ उसको कामलाई अपराध बनाइदिएको थियो । आत्तिएरक स्वतः ।यन्त्रचालित ढंगले) झोलासम्म पुग्यो । त्यो टिपेपछि मात्रहजारहजार येनको नोटको बिटो देखेर तीन छक्क पस्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लनक्न्क पा थयक्कि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पछिबाट उसलाई औषधीपसल नै विश्वम हो कि जस्तो लाग्नथाल्यो। कनै पनि पसल नहुने आवास क्षेत्रमा सानो, पुरानोओऔषधीपसल देखिनु आश्चर्यजनक थियो । तर सिसाका ढोकाबाहेकउसले नाम्लेकीराको ओखतीको प्रचार गर्ने साइनबोर्ड पनि देखेकोथियो । अझ अचम्म के भने आवास क्षेत्र सुरु हुने ठाउँ, कार गुड्नेबाटाको मोडमा आमुन्नेसामुन्ने प्राय: उस्तै दुइटा फलफूल पसलहरूथिए । दुवै पसलमा साना काठका बाकसमा पैयुँ र भइँएँसेल्‌ राखिएकाथिए । महिलालाई पछ्याउँदा गिम्पेईले उसलाई बाहेक केही देखेकोथिएन । अनि कसरी एक्कासि दुवै फलफूल पसलमा उसका आँखा पुगेत ? के उसले मोड सम्झिन खोजेको थियो किनभने त्यहाँबाटमहिलाको घरको बाटो देखिन्थ्यो : फलफूलका पसल त्यहाँ भएकैहुनुपर्छ किनभने अहिले पनि उसका आँखामा चट्ट मिलाएर राखिएकाभइँएँसेलु देखिन्थे । तैर्पन कार गुडने सडकको मोडमा एक मात्र पसलहुनुपर्ने हो। अनि त्यस बेर अलमलमा उसले दुवैतिर पसल भएकोभन्ठान्यो । उसले पछि फलफूल र औषधीपसलहरू साँच्चीकै थिए भनीहेर्ने इच्छालाई येनतेन दबायो । तर वस्तुतः बाटोसमेत सम्झिन गारोथियो । सोबारे उसले आफ्नो दिमागमा टोकियोको नक्सा खिचेर मात्रधमिलो तस्बिर बनाउन सक्यो । किनभने त्यतिखेर सबभन्दा महत्त्वपूर्णक्रो त्यो महिला कुन बाटो गई भन्ने नै थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हो । महिलाले झोला फाल्नै खोजेकी थिइन होली,” केटीलेगिम्पेईको भूँडी मालिस गरिरहँदा क अनिच्छापूर्वक बरबरायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चकित भएर उसले आँखा विस्फारित गप्यो तर केटीले थाहापाउनुअगावै फेरि चिम्लियो । आँखाको भावले केटीलाई नर्कको कुनेसैतानी चराको सम्झना गरायो होला । उसले एक महिलाको हातेझोलाबारे गुनगुनाएका भए पनि धन्य, फालिएको वस्तु वा सो फाल्नेव्यक्तिबारे केही बोलेको थिएन । उसले पेट एक्कासि बटारिन र फुल्नथालेको अनुभव गर्न थाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“काउकृती लागिरहेछ,” बहाना बनाउँदै गिम्पेईले बोल्यो,त्यसपछि केटीले मालिसको रगत सुस्त पारी । अब भने उसलाई साँच्चीकाउकृती लाग्यो । अनि उ बेसरी हाँस्न थाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठीक त्यस बेरसम्म गिम्पेईको अडकल के थियो भने त्योमहिलाले झोलामा भएको पैसाका लागि उसले पछ्याएको भन्ठानेर सोफालेकी वा फाली हिर्काएकी थिई । अर्थात्‌ क यतिविध्न डराई किझोला छाडेर कूलेलम ठोकी । तर उसले झोला फाल्नै भनी चाहेकीथिइन होली । वास्तवमा उसले आफूले बोकेको सामानले हिर्काएरगिम्पेईलाई छेउतिर लडाउन चाहेकी थिई तर त्यो तीव्र गतिको क्षणमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शदयब्ट २, पयबिहर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हातबाट झोला फुत्कियो । जेसुकै भएको किन नहोस्‌ गिम्पेई र त्योमहिला सायद अत्यन्तै र्नाजक भएकी थिए हुनन्‌, महिलाले सोघुमाउनासाथ गिम्पेईको मुखमा लाग्यो । आवासीय क्षेत्रमा उनीहरूप्रवेश गर्नासाथ उसले थाहै नपाई दूरी छौटयाएर महिलाको पिछा गर्नथाल्यो । के महिलाले क आफूर्नाजकै आइपुगेको चाल पाएर उसर्माथझोला हप्याउँदै भागेकी हो ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसको मनसाय लुट्नु थएन । झोलामा ्यर्तिवाधि पेसा होलाभन्ने कुरा न उसले शड्का गरेको थियो न विचार । अपराध सिद्ध गर्नेत्यस्तो प्रस्ट प्रमाण हटाउन भनी हाते झोला टिप्ता त्यसभित्र उसले दुईलाख येन फेला पारेको थियो । एकएक लाखका दुई करकरे ब्याङ्कनोटका बिटाहरू र पासबुक हुनुको अर्थ महिला ब्याङ्गबाटै फर्किरहेकीहुनुपर्ने हो। आफूलाई त्यहीँबाट पछ्याइएको लागेको हुन सक्छ।झीलामा ब्याङ्क नोटका दुई बिटाबाहेक एक हजार छ सय नगद येनमात्र थियो। पासबुक खोलेर हेर्दा महिलाले दुई लाख येननिकालिसकेपछि सत्ताइस हजार येन वा यस्तै रकम बाँकी मौज्दातरहेको पायो । महिलाले अधिकांश बचत रकम भिकिसकेकी थिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईले पासबुकबाट थाहा पायो-महिलाको नाम मियाकोमिजुकी रहेछ। उसको पैसा लिने मनसाय नभई महिलाको अनौठोआकर्षणबाट मात्र तानिएको भए उसले पैसा र पासबुक निश्चय पानिफर्काइदिन्थ्यो। तर उसले ती सब फर्काउला भन्ने अपेक्षा गर्नरसकिँदैनथ्यो। उसले महिलालाई पछ्याएभैँ पैसाले दिमाग भएकोसजीव प्राणीसरह उसलाई पछ्याएको थियो । गिम्पेईले पैसा चोरेको योपहिलो घटना थियो । बरु उसले पैसा चोरेको नभई पैसा आफैँ आईजान नमानेको हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले हाते झोला टिप्ता पैसा चोर्नेबाहेकको करा उसको मनमाआएन । उसले आफैँसित अपराधका प्रमाण रहेको थाहा पाएरज्याकेर्टाभत्र झोला लुकाउँदै गाडीहरू कुदिरहेको बाटोतर्फ लम्कयो ।तर कस्तो फसाद भने त्यो ओभरकोट लाउने मौसम थिएन। कनजिकको पसलमा छियो, एक टुक्रा चारकुने कपडा किन्यो र हातेझीलालाई त्यसमा बेरेर कुलेलम ठोक्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेई एउटा घरको माथिल्लो तलाको कोठामा डेरा गरीबसिरहेको थियो । उसले सानो, माटाको अगेनुमा पासबुकका साथैमियाको मिजुकीको हाते रुमाल तथा अरू केही सामानहरू जलाइदियो !उसले पासब्‌ुकमा लेखिएको ठेगाना नाटपेको हुनाले त्यो सदाका लागिसमाप्त भयो । उसले पेसा फर्काउने करा पनि फेरि मनमा ल्याएन ।डढिरहेका पासबुक, हाते रुमाल तथा काइँयोले पिरो राग आउन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्ब्नि १0 «डक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
थाल्यो । छालाको हाते झोला पानि डढाएको भए झन्‌ तीव्र दुर्गन्धउत्पन्न हने हुनाले गिम्पेईले त्यसको टुक्राटुक्रा पारी दिनको एकएकटुक्रा गरी जलाउन थाल्यो ! उसले बर्गालस, लाली तथा बट्टाका धातुदारभाग जस्ता नबल्ने वस्तुहरूलाई मध्यरातमा खाडलमा फालिदियो ।कसैले ती फेला पारिहाले पनि सामान्य ध्यान नतान्ने खालका वस्तुमापरिणत भएका थिए । लालीको रहलपहल बाहिर निकाल्न लाग्दा उसकाहात थर्र कामे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईले ध्यानपूर्वक रेडियो सुन्यो र पत्रपत्रिका पढ्यो । तरउसले दुई लाख येन तथा पासबुकसमेतको हातेझोला चोरी भएको कुनेसमाचार फेला पारेन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अँ मैले सोचेजस्तो महिलाले प्रहरीलाई कने खबर गरेकीछैन । उसलाई त्यसो गर्नबाट रोक्ने कुनै क्रा हुनुपर्छ,” गिम्पेईं मनमनैगुनगुनायो र भित्री मनको अँध्यारोमा कुनै मधुरो बत्ती एक्कासि बलेकोअनभव गय्यो । महिलाको भित्री मनमा गिम्पेईले पछ्याइरहेजस्तो सन्देहउत्पन्न भएकोले गर्दा सायद उसले त्यो महिलालाई पछ्याइरहेकोथियो । उनीहरू दुवै जना एउटै नारकीय संसारका बासिन्दा हुनुपर्छ ।सो क्रा उसले आफ्नै अनुभवबाट हेर्न सक्थ्यो । उसले मियाको मिजुकीआफू जस्तै हुन सक्ने क्रा सोचेर आनन्द मान्नुका साथै उसको ठेगानानटिपेकोमा सारै पछुतो मान्न थाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईद्वारा पछ्याइँदा मियाको साँच्ची नै डराएकी हुनुपर्छ तरउसलाई मेसै नहुने गरी मजाको आनन्द पनि आएकोवास्तवमा मानवसंसारमा एकतर्फी आनन्दको अनुभूति हुन सक्छ ? केअन्य कातिपय सुन्दर महिला सहरमा हुँदाहुँदै उसले मियाकोलाई नेपछ्याउने खास सोच बनाउनु लाग्‌ पदार्थको दुर्व्यसनीद्वारा साथीकोदुख बुझेजस्तो थिएन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले पछ्याएकी पहिली महिला हिसाको तामाकी वास्तवमात्यस्तै खालकी महिला थिई । त्यतिखेर क आलिक कम उमेरकी, मीठोस्वरकी धनी स्नानघरकी केटीभन्दा पनि कम उमेरकी, केटी मात्र थिई ।हिसाको मार्ध्यामक कक्षामा पढ्ने केटी र गिम्पेईकी चेली थिई । अनि तीदुईबीचको सम्बन्धबारे थाहा भएपछि उसलाई शिक्षक पदबाट निकालियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईले केटीलाई उसको घरको बाहिरी द्वारसम्म पछ्याएकोथियो । तर प्रवेशद्वारको भव्यता देखेर चकित हुँदै त्यहीँ रोकिएकोथियो । ढुङ्गाको पर्खालमा रजाडित र फलामे डन्डीमा बेरिएको डिजाइनभएको ढोका खुला थियो । हिसाकोले फर्केर जालीबाट उसलाई हेरी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“सर” हिसाकोले गिम्पेईलाई बोलाई । केटीको पहेँलो अनुहारओधी उज्यालो हुन थाल्यो । गिम्पेईलाई आफ्ना गाला पानि धपक्कउज्यालो भएको महसुस भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शदमक्ट ११ ०३७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ए, तामाकी मैया, तिम्रो घर यही हो ?” गिम्पेईले धोत्रै स्वरमाभन्यो ।“यहाँ केलाई आउनुभयो, सर ? हामीलाई भेट्न आउनुभा&#039;को हो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एउटा शिक्षकले आफ्नी चेलीलाई लुक्ते उसको घरसम्म पिछागर्नुको कुनै सरल व्याख्या हुन सक्तैन । तर गिम्पेईले ढोकापारि हेरीघरको प्रशंसा गर्दै भन्यो : “हो । मलाई खुसी लागेको छ कि यस्तो राम्रोघर लडाइँताका जलाइएन । अचम्म छ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हाम्रो घर त जलाइएको थियो । हामीले यो घर लडाइँपाछिकिनेका हौं ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“लडाइँपछि रे ? ... तिम्रा बुबा के गर्नुहुन्छ, तामाकी मैयाँ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हजुरको यहाँ कनै काम छ, सर ?” हिसाकोले जालीकोअर्कोपट्टिबाट गिम्पेईमाथि कडके नजर लाउँदै भनी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हो, हो। वास्तवमा गोडाका औँलाबीच घाउ भएको छतामाकी मैयाँ, तिम्रा बुबासँग सो रोग निको पार्ने राम्रो औषधी छ रे ।”त्यसो भन्दा गिम्पेईले आफूले त्यत्रो भव्य प्रवेशद्वारको सामुन्ने आफ्नोछालाको रोगबारे किन क्रा निकालेको हँला भनेर आँसु भझारौँला जस्तोगप्यो । तर हिसाकोको नजरले उसलाई एकटक हेरिरह्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“गोडाका औँलाबीच घाउ भएको रे ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हो, गोडाका औँलाबीचको घाउको ओखती । तिमीले स्कुलमाआफ्नी साथीसँग त्यो रोग निको पार्ने ओखतीबारे करा गरेकोसम्भझिन्छ्यौ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटीका आँखाले क केही सम्झिन खोजेकी जस्तो बुझियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“घाउ यति बिग्रेको छ कि म हिँड्न सक्तिनँ । कृपया आफ्नाबुबासँग सो ओखतीबारे सोधेर तिमी आइदिन सक्छ्यौ : म यहाँपर्खिरहन्छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटी पश्चिमा शैलीको घर्रभत्र विलीन भएको यकिनभइसकेर्पाछा गिम्पेई भाग्न थाल्यो । उसलाई आफ्नै कुरूप खुट्टालेपछ्याइरहेको जस्तो लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिसाकोले आफूविरुद्ध परिवार वा स्कूलमा खबर गर्ली जस्तोलागेन तर गिम्पेईको टाउको निकै दुख्न थाल्यो, उसको आँखाको ढकनीबटारिन थाल्यो र त्यस रात क राम्ररी सृत्न पनि सकेन । जसोतसोनिद्रा लागे पनि क बेलाबेलामा झस्किरहन्थ्यो । ब्यँँझेको बेला हरेकपल्टउसले आफ्नो चिसो निधार छाम्थ्यो । अनि उसको टाउकाको पाछल्लोभागको विषाक्त अंश त्यहाँदेखि निधारमाथि हुँदै जाँदा टाउको रन्किनथाल्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शनम्न्क ती रे त्यक्कि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिसाकोको घरको ढोकादेखि भागेर नाजकको वेश्यालय क्षेत्रमाभौँतारिइरहँदा उसको टाउको दुख्न थालिसकेको थियो । उभिन नसकेरगिम्पेई व्यस्त सडकको बीचमा टाउको समाउँदै निहरिएर हिँड्यो ।टाउको दुख्नुका साथै रिँगटा पनि चल्न थालेको थियो । मानौं उपहारचिट्ठा जितेको घोषणा गर्ने घण्टी उसको टाउकामा बज्न थालेको थियो ।घण्टीले हडौँकँदै पछिर्पछ आइरहेको दमकलबारे पानि सचेत गरायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के गरेको ?” एक महिलाको घुँडाले गिम्पेईको कममा हल्कालाग्यो । फर्केर हेर्दा त्यो महिला लडाइँपछि वेश्यालय क्षेत्रमा प्राय:देखिने यौनव्यापार गर्ने केटीहरू झैं लागी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अझै बिसन्चो जस्तो लागेर गिम्पेई घिसारिँदै बटुवाहरू हिँड्नेबाटो काटी एउटा फूलमालाको पसलको भ्यालमा हेसिन पुग्यो । उसकोनिधार भ्यालको सिसामा ठोक्न पुग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमी मलाई पछ्याइरहेकी हो ?” गिम्पेईले महिलालाई सोध्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले तपाईंलाई पछ्याएकी छु जस्तो ता लाग्दैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले तिमीलाई पछ्याएको जस्तो पनि लागेको छैन, छ त ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“साँच्चै ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ती महिलाको जबाफ दोधारे थियो । “हो” उत्तर दिएको खण्डमाउसले अरू केही भन्थी होली । तर क रोकिएपछि अधीर भएर गिम्पेईलेसोध्यो : “मैले पछ्याएको होइन भने तिमीले पछ्याएकी हुनुपर्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“जे भए पनि के फरक पर्छुर?)  ”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महिलाको शरीर भ्यालमा प्रतिबिम्बित देखिन्थ्यो । क सिसाभन्दापर फूलहरूमाझ उभिइरहेकी जस्तो देखिन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के गरिरहनुभएको, हँ ? उभिएर बस्नोस्‌, छिटो । मानिसहरूलेतपाईंलाई नै हेरिरहेका छन्‌ । केही भा&#039;को हो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हो । मेरो गोडाका औँलाबीच घाउ भएको छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उही कुरा उसका मुखबाट निस्कँदा गिम्पेईलाई आफैँरमाथिआश्चर्य लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यो घाउ कातसारो दुख्छ भने म हिँडनै सक्तिनँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तपाईं कस्तो रिसउठूतो मान्छे ! मलाई यहाँ हामी दुवै जना गईमोज गर्न सक्ने एउटा राम्रो ठाउँ भएको थाहा छ । तपाईंले जुत्तामोजाफुकाल्नुपर्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म अरूले ती हेरेको मन पराउन्नँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म हेर्दिनँ । तपाईंका खुट्टा त कुनै हालतमा हेर्दिनँ ...”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमीलाई सर्ला है, होस गर ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यो सर्न सक्तैन ।” महिलाले गिम्पेईलाई उसको पाखुरा समाएरउचाली । “भो, आउनोस्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लनन्निक ती रे लकर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देब्रे हातले अझ निधार समाउँदै गिम्पेई फूलमा देखिने महिलाकोअनुहार नियाल्दै थियो । त्यतिखेरै सिसाभन्दा पर फूलहरूमाझ अर्कीमहिलाको अनुहार देखियो । फूलमाला बेच्ने साहुनी यिनै पो हुन्‌ किभनी गिम्पेई घोरियो । भ्यालको अर्कापट्टि रहेको सेतो लाहरे फूलकोगुच्छा लिन भनी दाहिने हात सिसातिर बढाएभझैँं गरी उभियो । पसलकीसाहुनीले उसलाई पातलो आँखीभौँ खुम्च्याउँदै हेरिन्‌ । ठूलो सिसाकोभ्यालमा हात अडकाएर पाखुरा काटिने डरले क महिलातर्फ ढल्कियो ।उसले येनतेन आफूलाई समाली ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अब नभाग्नोस्‌, है ?” भन्दै उसले एक्कासि जोडले छाती चिर्मोर्टिदेई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ऐया !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईको सास फिप्यो । हिसाकोको घरबाट भागेर आफू किनवेश्यालय क्षेत्रमा आएँ भन्ने कुरा राम्ररी बुभ्न सकेन । तर यसमहिलाले चिमोटिदिँदा उसको दिमागले बुभन थाल्यो । मानौँ कुनेतालछेउका पहाडबाट बग्ने मीठो बतासले उसलाई स्पर्श गर्दा जसरीउसले ताजा महसुस गप्यो । वसन्त यामको उत्तरार्धमा झैं चिसो बतासचल्ेजस्तो थियो । तैपनि हिउँले ढाकिएको ताल उसको आँखामा पच्यो-सायद तालर्जातकै ठूलो फलफूल पसलको भयालमा आफ्नो हातकाटिएला भन्ने डरले होला । उसको मावली गाउँ हुँदै बग्ने ताल थियोत्यो। तालको किनारमा एउटा सहर पानि थियो तर उसकोमावलीघरचाहिँ गाउँमा थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यो ताल कहिराले ढाकिएको थियो । अनि हिउँपारि डिलनेरकासबै क्रा अनन्त ठाढा भएजस्तो लाग्थे । गिम्पेईले आफ्नी मामाकी छोरीयायोईलाई झुक्म्याएर त्यो बरफमाथि हिँडाउन भनेर लग्यो किनभनेबालकै छुँदा उसलाई यायोईसँग रिस उठेर यसलाई सरापेको थियो ।उसको दृष्टतापूर्ण इच्छा के थियो भने खुट्टामनि रहेको बरफ भासिएरयायोई पानीमा डुबिजाओस्‌ । यायोई गिम्पेईभन्दा दुई वर्ष जेठी थिई तरक बढी छटटु थियो । क दस वर्षको हँदा उसको बुबाको आश्चर्यजनकमृत्यु भएको थियो । आमाले आफूलाई छाडी माइत फर्किने हो कि भन्नेत्रासले गिम्पेईले यायोईभन्दा बढी छटटू बन्ने प्रयास गर्नु आवश्यकैथियो । अर्कोतर्फ यायोई आफू वसन्तमा उदाउने सूर्यको न्यानो पाईहुर्केकी हँ भन्ने क्राको भान दिन्थी । अरू कारणमध्ये आमालाईनगुमाउने सायद यही गोप्य इच्छाले होला उसलाई पहिलो प्रेम,मामाकी यस छौोरीप्रति तानेको । बालकका रूपमा तालको ठेवैछेउयायोईसँग डुल्नु र पानीमा आफ्ना जोडी छाया हेर्नु सबैभन्दाआनन्ददायक लाग्थ्यो । डुल्दै तालमा हेर्दा लाग्थ्यो मानौँ आफ्ना छावसदासर्वदा पानीमा यसै गरी सँगसँगै हाँडरहनेछन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आदम पै ख्य्क्क&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर उसको खुसी धेरै टिकेन । चौधपन्ध्रकी भएपछि केटीलेगिम्पेईलाई बिर्सिएजस्तो भयो, क दुई वर्ष जेठी थिई र गिम्पेईविपरीर्तालङ्गी हो भन्ने बुझेकी थिई । साथै उसको बाबाको मृत्यर्पाछमावलीहरू बुबाका नातागोतालाई घृणा गर्न थाले । यायोईले उससँगचिसो व्यवहार गर्नुका साथै खुला रूपमा घृणा गर्थी । यसै बेला उसलेबरफ फुटेर यायोई भित्र त्यसमा डुबोस्‌ भनी चाहेको थियो । पछियायोईको नौसेनाका अधिकृतसँग बिहा भयो र गिम्पेईले क विधवाभएको क्रा थाहा पायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलको पसलमा रहेको एकदम सफा खाले सिसाले गिम्पेईलाईतालमाथिको बरफको सम्झना गरायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमीले मलाई चिमोटने आँट कसरी गप्यौ ?” गिम्पेईले छातीमल्दै महिलालाई भन्यो । “तिमीले पक्कै घाउ बनाइदियो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“घर फर्केपछि पत्नीलाई देखाउनोस्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मेरो कुनै पत्नी छैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यो सोचिएकै कूरा हो !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“होइन, साँच्ची भनेको हो। म अविवाहित स्कूल शिक्षक हुँ,”गिम्पेईले शान्त भावले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अनि म अविवाहित स्कूल पढ्ने केटी हुँ,&amp;quot; महिलाले जबाफ दिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क निरर्थक क्रा गर्दै छे भन्ने बुझेर उसले महिलाकोअनुहारतर्फ हेर्न पनि चाहेको थिएन तर &#039;स्कले केटी&#039; भनेको सुनेरउसको टाउको फेरि दुख्न थाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के गोडाका ओँलाको घाउ दुखिरहेछ ? धेरै नहिँडनोस्‌ भनेकीमैले ..” महिलाले उसका गोडा नियाली ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफूले उसको घरको ढोकैसम्म पछ्याएझैं हिसाकोले आफूलाईपछ्याएकी भए र यस्ती महिलासँग फेला पारेकी भए के भन्थी होलीभनेर गिम्पेई गम्न थाल्यो । उसले भीडमा चारैतिर फनन आँखाकुदायो ! अघिल्लो ढोकाबाट लोप भएर हिसाको नफर्के पनि कम्तीमाक उसलाई अझ पनि आफ्नो हृदयमा पछ्याइरहेकी थिई भन्ने पक्काथियो !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोलिपल्ट गिम्पेईले हिसाकोको जापानी भाषाको कक्षा लियो ।हिसाको कक्षाकोठाको ढोकामा पर्खिरहेकी थिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“सर, ओखती,” उसले हरतारिँदै उसको खल्तीमा केही कुराछिराउँदै भनी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टाउको दुखेको हुनाले उसले कक्षाको तयारी गरेको थिएन । अनिअनिदो रातले गर्दा र थाकेको हुँदा उसले विद्यार्थीहरूलाई केही लेख्नेकाम दियो । एक जना केटाले हात उठायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शकन्निक ती २. लकर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“सर, के म कुनै रोगबारे लेख्न सक्छु ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हुन्छ, जे भए पनि हुन्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“उदाहरणका लागि ... यस्तो नराम्रो विषयबारे बोल्न लागेकोमामाफी चाहन्छु ... गोडाका औंलाबीच हुने घाउबारे पनि लेख्न सक्छु ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक्कासि ठूला खित्का छुट्यो । तर सबै जना त्यस केटालाई नैहेर्दै थिए । गिम्पेईतिर कसैले कुनै उत्सुकता लिएर हेर्दा पानि हेरेनन्‌ ।वास्तवमा उनीहरू उसर्माथ नभई केटामाथि हाँसिरहेका थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मेरो विचारमा त्यो पनि हुन्छ । त्यो सूचनामूलक हुन सक्छकिनभने मलाई सोबारे केही पनि थाहा छैन,” गिम्पेईले त्यसो भन्दैहिसाकोको मेर्चतिर हेप्यो । विद्यार्थीहरू फेरि हाँस्न थाले तर त्यो हाँसोनै उसको अबोधपनाको पक्ष लिँदै थियो । टाउको निहुराएर लेखिरहेकीहिसाकोले कतिर हेरिन । तर उसका (हिसाकोका) कान राता भइसकेकाथए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिसाकोले आफ्नो लेख देखाउन ल्याउँदा गिम्पेईले त्यसकोशीर्षक &#039;मेरा शिक्षकबारे आफ्ना विचारहरू भएको देख्यो । उसलाई सोलेख आफूबारे हुन सक्ने लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तामाकी मैयाँ, कक्षा सकेपछि बसिराख ल !” गिम्पेईलेहिसाकोलाई भन्यो । निमेष मात्र स्वीकृति जनाउँदै उसले आँखा उठाएरउसलाई हेरी । उसले (गम्पेईले) आफूलाई हेर्दै गरिएको महसुस गप्यो ।भ्यालसम्म पुगेर हिसाकोले केहीबेरसम्म खेलमैदानतिर हेरिरही ।सबै छात्रछात्राले आआफ्ना निबन्ध गुरुलाई बुझाइसकेपछि फकफर्केर आफ्नो मेचसम्म आइपुगी । ती लेखहरू मिलाएर राखिसकेर्पछगिम्पेई जुरुक्क उभियो । हलमा नपुगेसम्म उसले केही भनेन । हिसाकोकरिब दुई हातको फरकमा उसको पछिपछि आई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ओखतीका लागि धन्यवाद ।” गिम्पेई फनक्क फर्कियो । “केतिमीले मेरो गोडाका औँलाबीच भएको घाउबारे कसैलाई सुनायो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कसैलाई सुनाइनौ ? ”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अहँ । तर मैले ओन्दालाई चाहिँ सुनाएँ । क मेरी सबैभन्दामिल्ने साथी हो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ओन्दा मैयाँ । के तिमीले उसलाई सुनाइदियौ ? ...”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ओन्दालाई मात्रै भनेँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“एकपल्ट कसैलाई भनिसकेर्पाछ अरू सबैलाई भनेसरह नै हो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“होइन, त्यस्तो छैन । यो क्रा ओन्दा र मेरो बीच मात्र रहनेछ ।हामीले एकअर्कालाई हरेक कुरा भन्ने बाचा गरेका छौँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमीहरूको घनिष्ठता त्यतिसम्म छ, हे ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
0000)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हजुर । मैले ओन्दासँग आफ्ना बुबाको छालाको रोगबारे क्रागरेको सुनेरै सो क्रा तपाईंले थाहा पाउनुभएको हो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हो र ? त्यसो भए ओन्दा मैयासँग तिमी कुनै कुरालुकाउँदिनौ ? अँ, यो सही होइन । राम्ररी सोच त । तिमीहरू दिनरातसँगै बसेर आफ्नो मनमा आएका बसै क्रा साटासाट गरे पनि द्ब थोकबताउनुचाहिँ सम्भव हुँदैन । उदाहरणका लागि कुनै राति आफूले देखेकोसपना भोलिपल्ट बिहानै बिर्सिएको क्रा लिऔँ । अनि सो कुरा ओन्दामैयाँलाई भन्न सक्तिनौ । सो सपना तिमीले फसँग छुट्टिएर उसलाईमार्न चाहेकोबारे पनि हुन सक्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले त्यस्ता सपना देखेकी छैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“जे होस्‌, आफूले सबै कुरा बाँडने खालको घनिष्ठ सम्बन्धमाविश्वास गर्नु एक बीभत्स कल्पना हो, केटीहरूले आफ्ना कमजोरीलुकाउने आवरण हो । पूर्ण सजगता स्वर्ग अथवा नर्कमा भए पनिमानवसंसारमा त्यो पाइँदैन । ओन्दा मैयाँबाट कुनै कूरा नलकाउनुकोअर्थ तिम्रो कुने अस्तित्व नहुनु हो, तिमीले आफ्नो जीवन आफैं नबाँच्नुहो । आफूप्रति पूर्ण इमानदार भएर मैले भनेको क्राप्रति विचार गर ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिसाकोले भने गिम्पेईको तर्क बुभ्न सकिन अथवा फ किनआफूसँग त्यसरी क्रा गरिरहेको होला भन्ने अर्थ्याउन सकिन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले मित्रतामा किन विश्वास गर्न हुन्न ?” उसले अन्तत:विरोध जनाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“गोप्यताबिना मित्रता असम्भव छ । तीबिना मित्रता मात्र नभईअन्य कनै मानवीय संवेग बाँच्न सक्तैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के ?” केटीले अफ्नै क्रा बुभ्न नसकेजस्ती थिई। “मओन्दासँग हरेक महत्त्वपूर्ण क्रा गर्छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आश्चर्य छु तिमीले अति महत्त्वपूर्ण अथवा महत्त्वहीनक्राहरू, जस्तै समुद्री किनारमा रहेका बालुवाका कणबारे क्रा गर्छर्योभनेर पत्याउन गारो लाग्छ । तिम्रा बुबा र मलाई लागेको छालाकोरोगलाई काति महत्त्व दिन्छ्यौ थाहा छैन । तिमीले सो क्रालाई बीचमाकतै राख्छ्यौ, हगि ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईका शब्दहरू यात घोच्ने खालका थिए कि हिसाकोलाईकसैले हावामा झुन्डिरहेको अवस्थामा एक्कासि तल बजारिदिएजस्तोलाग्यो । उसको अनुहारको रङ उडेर गयो र क रोली जस्ती भई ।गिम्पेईले भने शान्त मुद्रामा, बुझाउने किसिमले कुरा गरिरह्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कै तिमीले ओन्दालाई आफ्नो परिवारमा घट्ने सबै कुराबताउँछ्यौ ? तिमीले त्यस्ता कुरा भएर फकाउन बताउँछयौ जस्तोलाग्दैन । तिमी उसलाई आफ्ना बाबाको व्यापारिक गोप्यताबारै त&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लनन्निक ती ७ लकर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भन्दिनौ नि ? पक्कै भान्दनौ, कसो ? संयोगवश तिमीले आज आफ्नोनिबन्धमा मेरो बारे लेखेकी रे&#039;छ्यौ जस्तो लाग्छ । तर लेखमा भएकातिमीले ओन्दालाई नभनेका केही क्राहरू छैनन्‌ त ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिसाकोले गिम्पेईलाई गहर्भरि छेडने आँखाले हेरी । फक चुपलागेर बसिरही ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिम्रा बुबाले लडाइँ सकिएपछि कुन व्यवसायबाट ्यातविध्नसफलता प्राप्त गर्नुभयो भन्ने मलाई थाहा छैन । तर म तिम्री ओन्दाहोइन, तापनि तिमीले मलाई सोबारे कुनै बेला भन, म विस्तारमा सुन्नचाहन्छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईको स्वर सोचीसम्झी भनेको नलागे पनि उसकाशब्दहरूमा धम्की प्रस्ट घन्किन्थ्यो । त्यो घर उसका बुबाले लडाइँपाछिकिनेका भए उनले कुनै आपराधिक वा कालाबजारी जस्तो गैरकानुनीकाम गरेको शङ्का गर्नु स्वाभाविक हो । आफूले उसलाई पछ्याएकोक्रा नभन्देली भनेर जानाजानी गिम्पेईले उसका बुबाको क्रा झिक्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साथै आघल्लो साँझ आफूले सोचेको कुरा पान गिम्पेईलेसम्भझियो-हिसाकोले उसलाई भान्दने छैन । जे भएको भए पनि कआज उसको कक्षामा आएकी, उसलाई गोडाका औँलाबीच भएकोघाउको ओखती दिएकी र मेरा शिक्षकबारे आफ्ना विचारहरू भन्नेशीर्षकमा लेख लेखेकीले उसले डराउनुपर्ने कुने कारण नै थिएन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईको अचेतन मनले हिसाकोलाई पछ्याएको हुन सक्छ ।मानौँ उसको सौन्दर्यबाट आकर्षित भई रक्सीले मात्तिएर वा निद्रामाहिँडेर पछ्याएको होस्‌ । केटीले उसर्माथ जाद्‌ गरिसकेकी अर्थात्‌ टुनावा मोहिनी लाइसेकेकी थिई । साथै अघल्लो दिन पछ्याइएको क्रालेहिसाकोलाई आफ्नो आकर्षण शक्तिबारे चनाखो बनाउनुका साथै उसमापनि एक अदृश्य आनन्द भरिदिएको हनुपर्छ । जे होस, उसको मनमायसरी उत्सुकता जगाउने, त्यस रहस्यमयी केटीले निकै ठूलो तरङ्गउठाइदिएकी थिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिसाकोलाई धम्क्याएपछि क्रा सल्टियो भनेर गिम्पेईले केटीतिरदृष्टि लगाउँदा हलको छेउमा उाभएर नोबुको ओन्दाले उनीहरूलाईहेरिरहेकी देख्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिम्री साथी चिन्तित छे। क तिमीलाई पर्खिरहेकी छे नि।हेर ।” गिम्पेईले हिसाकोलाई जान दियो । अधिकांश केटीभौँ क कदेरओन्दानेर गइन, बरु टाउको मुन्ट्याएर हिँड्दै बिस्तारै उसको पर्छाडपुगी । तीनचार दिनपछि गिम्पेईले हिसाकोलाई धन्यवाद दियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यो ओखती -धेरै राम्रो छ। धन्यवाद । मलाई पूरै बिसेकभयो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आ्व्न्करी 5 सक्न&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ए साँच्चै हो र ?” हिसाको हिस्सी परी । उसका गालामामनमोहक खाल्डाहरू परे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर पछि गएर पहिलेजस्ती लजालु, आकर्षक हिसाको रहिन छ ।बरु उसको गिम्पेईसँग यस्तो सम्बन्ध बढ्यो कि ओन्दाले उसको विरुद्धपोल खोलिदिई । अन्त्यमा गिम्पेई स्कुलबाट निकालियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्तानघरकी सुसारेले कारुइजावाको टर्की स्तानघरमा उसकोपेटको मालिस गरिराख्ता गिम्पेईले यतिका वर्षपछि पनि हिसाकोकाबुबा भव्य पश्चिमा शैलीको घरमा गहिरो आरामकर्सीमा पल्टिएर घाउभएको गोडाको छाला कोट्टयाउँदै गरेको दृश्यबारे कल्पना गप्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“एहे ! ... गोडाका औँलाबीच घाउ भएको मानिसले कहिल्यैटर्की स्तान गर्नु हुँदैन क्यार । बाफले यसलाई खप्नै नसक्ने गरीचिलाउने बनाउँछ होला,” गिम्पेईले ठट्टा गर्दै हाँस्यो । “के गोडाकाऔँलाबीच घाउ भएको कुनै मानिस यहाँ पहिले आएको रहेछ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटीले गम्भीर भएर उसको क्राको जबाफ दिइरहेजस्ती थिइन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हामी जस्ता मानिसलाई गोडाका औंलाबीच हुने घाउबारे केथाहा हन्छ र ? त्यस्तो घाउ नरम र आति नै स्याहारसुसार गरिएकागोडामा हुन्छ, होइन त ? मतलब यो जीवनको एक सत्य मात्र हो-कमलो गोडामा खस्रो घाउ सर्छु। बाँदरको जस्तो हाम्रो गोडामासारिदिँदा पनि कीटाण्‌ लाग्दैनन्‌ । छाला अति कडा र बाक्लो भइसकेकोहुन्छ।” बोल्ने क्रममा उसलाई केटीले ररर्गाडिदिँदा उसका फोहोरीपैतालामा गोरा औँला नरम र चिसो भई टाँसएको महसुस भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“गोडाका औंलाबीच हुने घाउ मेरो पनि छेउछाउ पर्ने छैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेई गम्भीर भयो । सन्चो महसुस भइरहेका बेला उसले यस्तीसुन्दर स्नानघरकी केटीसँग किन छालासम्बन्धी रोगको क्रा झिक्योहोला ? के उसले साँच्ची सो क्रा निकाल्नुपर्ने थियो र ? उसले त्यसदिन हिसाकोसँग झूटो बोलेकोले होला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेई हिसाकोको घरअगाडि उभियो र त्यस केटीसित गोडाकाऔँलाबीच भएको घाउका लाग कुनै ओखतीको नाम सोध्यो । तर त्योक्रा झूटो थियो र त्यतिकै चिप्लेर आएको थियो । त्यो झूट बोलेकोतीन वा चार दिनपछि घाउ निको भयो भनी हिसाकोलाई धन्यवाद दिँदाउसले दोस्रो झूट बोल्यो। उसको गोडाका औँलाबीच घाउ भएकैथिएन । उसले कक्षामा सोबारे केही थाहा छैन भन्दा साँचो क्रा गरेकोथियो । साथै हिसाकोले उसलाई दिएको औषधी फालिदिएको थियो ।अनि वेश्यावृत्ति क्षेत्रमा महिलालाई आफ्नो गोडाका औँलाबीच घाउ भईहिँड्नै नसक्नेजस्तो भएको छु भन्दा झूटको सिलसिला झन्‌ बालियो हुँदै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नबन १९ कक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गयो । झूटो कुरा एकपल्ट भनिसकेर्पाछ कहिल्यै हराउँदैन, बरु त्यसलेहामीलाई पछ्याइरहन्छ । गिम्पेईले आइमाईलाई पछ्याएभीँ उसलेबोलेका भझूटहरूले उसलाई पछ्याइरहेका थिए । सायद सो कुराअपराधको हकमा पनि लाग्‌ हुन्थ्यो । अपराध एकपल्ट गरेपछि त्यसलेउसलाई सो अपराध नदोहोच्याएसम्म पछ्याइरहन्छ । खराब बानीभनेका त्यस्तै हुन्छन्‌ । गिम्पेईले पहिलोपल्ट एउटी आइमाईलाईपछ्याएपछि दोस्रो, अनि अनेकौँलाई पछ्याउँदै गयो आइमाईलाईपछ्याउने बानी गोडाका औंलाबीच हुने घाउ जस्तै छुटतैन, योहराउँदैन, बरु फिँजिन्छ । एउटा बर्खामा भएको घाउ अस्थायी रूपमानिको हुन सक्छ तर सो घाउ फेरि अर्को बर्खामा पलाएर आउँछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हेर, मेरो गोडाका औँलाबीच घाउ भएको छैन । मलाई सोबारेकेही थाहा छैन,” गिम्पेईले आफैँलाई हकारेसरि सो कुरा प्याच्चनिकाल्यो । उसले किन आइमाईलाई पछ्याउँदा आउने आनन्दकोकुरालाई गोडाका औंलाबीच हुने घाउ जस्तो घिनलाग्दो क्रासँग दाँजेकोहोला ? के पहिलो झूटले उसलाई अर्को झूट बोल्न बाध्य गरेको हो ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर अहिले गिम्पेईको दिमागमा एक्कासि एउटा विचार फुप्यो,सायद बिग्रेको गोडाले गर्दा लाज लागेर उसले एक्कासि हिसाकोकोघरअगाडि सो कुरा निकालेको थियो कि ? यदि त्यसो हो भने केआइमाईलाई पछ्याउने उसको बानी यस खराबीसँग सम्बन्धित थियोकि ? किनभने पछ्याउने काम त गोडाले गर्थे । सो क्रा सोचेरउसलाई आश्चर्य लाग्यो। के उसको शरीरको कुनै खराब अङ्गलेसौन्दर्यको चाहना गरिरहेको थियो ? के खराब गोडाले सुन्दर महिलालाईपछ्याउने कुरा ईश्वरको योजनाअन्तर्गत पर्थ्यो ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्नानघरकी केटीले गिम्पेईतर्फ पिठयूँ फर्काएर उसको घुँडादेखितल गोडासम्म मालिस गर्रिदेई । यसो गर्दा उसका गोडा केटीकाआँखामुनि परे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ल पुग्यो,” गिम्पेईले अलि अप्ठेरो मान्दै भन्यो । उसले आफ्नोगोडाका लामा औंलालाई कक्रक्क पार्दै खुम्च्यायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनि केटीले सुमधुर कर्णप्रय स्वरमा सोधी, “तपाईंका नडहरूपनि काट्ने होकि ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“नङ ? ... ए ! गोडाका नडहरू ... के तिमीले साँच्ची नैकाटिदिन्छद्यौ त ?” आफ्नो अप्ठेरोपन लुकाउन गिम्पेईले अगाडि भन्यो,“हो त, साँच्चै लामै भइसकेका रहेछन, हेन त ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटीले आफ्नो हत्केलो उसको पेतालामाथि राख्तै हातले हल्कास्पर्श गर्दै बाँदरका भझौँ खुम्चिएको लाग्ने उसको गोडाका औँलाहरूतन्क्याइदिई । “अलि लामै भएका रहेछन्‌ ...”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लनम्क रेट लब&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनि उसले ध्यान दिएर सजिलोसँग गिम्पेईका नङ काट्दै गरी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमीलाई यहाँ सघ्वैं भेटन पाउँदा रमाइलो लाग्छ,” गिम्पेईलेभन्न थाल्यो । उसले आफ्नो गोडाका औँलाहरू केटीको जिम्मामासुम्पिइसकेको थियो । “तिमीलाई जहिले भेटन चाहे पनि आउन सक्छु ।मलाई तिम्रो मालिसको आवश्यकता परेको बेला तिमीलाई फोन गर्नमिल्छ, होइन त ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“भइहाल्छ नि ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमी यसो आकलभझुकल मात्र भेट हुने मानिस त हेन नि ।तिमी मेरा लागि नामठेगाना थाहा नभएको कुनै अपरिचित त होइनौनि? तिमी मेरा लागि त्यस्ता व्यक्त जस्तो होइनौ जसलाई मैले यससंसारमा गुमाउँछु र जसलाई नपछ्याएसम्म फेरि भेटिन्नन्‌ । सुन्दाअनौठो लाग्न सक्छ.”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले आफ्नो नराम्रो देखिने गोडा अहिले आफ्ना हातमा लिई त्यसकानड काटिरहेकी यस केटीलाई देखाएझैं यसअघ कहिल्यै पूरै देखाएको थिएन ।सो क्रा घोल्लँदै गर्दा उसका आँखामा खुसीका आँसु रसाए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“सुन्दा अनौठो लागे नि तिमीलाई साँचो कुरा भन्दै छु। केतिमीले कहिल्यै त्यस्तो अनुभव गरेकी छ्यौ बाटामा कुनैअपरिचितलाई भेट्ता हुने गहिरो पछुतोको अनुभूति गरेकी छ्यौ ? मैलेप्राय: त्यस्तो अनुभव गरेको छु । म मनमनै सोच्छु, &#039;कस्तो हिस्सी परेकोमानिस &amp;quot; अथवा &amp;quot;क्या राम्री आइमाई !&amp;quot; अथवा &#039;क जस्तो आकर्षकमानिस मैले कहिल्यै देखेको छुइनँ ।&#039; त्यस्तो अनुभव बाटामा डुलिरहँदाअथवा सिनेमाहलमा कुनै अपर्रिचतसँगै बसरहँदा अथवा सङ्गीतकक्षबाट ओल्रदै गर्दा हुन्छ । तर एकपल्ट तिनीहरूले त्यो ठाउँ छोडेपछिम उनीहरूलाई सायद आफ्नो जुनीमा फेरि कहिल्यै भेर्टातनँ भन्ने कुराथाहा छ कोही टक्क अडिएर ठ्याप्पै अनजान मानिससँग तबोल्न सक्तैन नि, कसो ! सायद त्यही जीवन हो, तर त्यसो हुँदा मनिरास भएर मर्नेछु। कसोकसो मलाई रित्तिएको र खाली महसुसहुन्छ। म उनीहरूलाई पृथ्वीको अर्को छेउसम्म पछ्याउन चाहे पानिसक्तिनँ । त्यसरी कुनै मानिसलाई पछ्याउने एउटै उपाय हो उसलाईमारिदिन्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफू बरालिएको भान गरी गिम्पेईले लामो सास फेप्यो । अनिउसले घुमाउरो पाराले अर्गाड भन्दै गयो, “वास्तवमा, म आलिकबढाइचढाइ गर्दै छु । सौभाग्यवश तिम्रो स्वर सुन्न मन लागेको बेलाफोन गर्न सक्छु । तर गाहकीहरूभन्दा फरक समस्या तिमीमा छ, होइनत ? तिमी कुने खास गाहकीलाई मन पराएर फक फेरि आओस्‌ भन्नेचाहना गर्न सक्छ्यौ । तर क आउने-नआउने वा कहिल्यै नआउने कुरा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लनम्न्ट २१ सकि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसमा भर पर्छ । कहिलेकाहीँ नराम्रो लाग्दैन ? फेरि पनि मलाई त योअपरिहार्य लाग्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटीले गोडाका नडहरू काटतै गर्दा गिम्पेईले उसका कुमकापाता कोमल पिठ्युँपट्टि बिस्तारै चलायमान भएको हेरिरह्यो । कामसिद्धयाइसकेपछि पनि अझ पठयौूँ फर्काएरै केहीबेर रोकिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तपाईंका हातका नडहरू पनि काटने हो कि ?” सोध्दै कफनक्क फर्की । गिम्पेईले छातीमाथि पारेर हात हेप्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तीचाहिँ गोडाका औंलार्जात लामा भएका रेै&#039;नछन्‌ । त्यतिफोहोर पनि छैनन्‌ नि ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर उसको बोलीमा अस्वीर्कातको आभास नपाएर केटीले उसकाऔँलाका नडहरू पनि काटिदिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईले अनुमान गप्यो-स्तानघरकी केटीले यो मान्छेको मनमाकेही दृष्टता लुकेको छ भन्ने क्राको छनक पाई होली । आफूले भर्खरैबिसुद्धीमा बोलेको क्रा आफैँलाई समेत भयावह लाग्यो । के कसैलाईपछ्याउनुको अन्त्य हत्या गर्नु हो ? उसले मियाको मिजुकीको हातेझोला टिपेको मात्रै हो । उसलाई फेरि भेटने छाँट छैन । सायद बाटामाअपरिचितहरूसँग हुने छोटो जम्काभेटभन्दा धेरै फरक थिएन उक्त भेटपनि । क हिसाको तामाकीबाट पनि अलग्गिसकेको थियो र उसलाईभेटन पनि गारो थियो । उसले पछ्याएका आइमाईलाई अन्त्यैसम्मैपछ्याएको थिएन । हिसाको तथा मियाको दुवैलाई अब कहिल्यै नभेटनेगरी उसले यस लोकबाटै गुमाइसकेको हुन सक्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिसाको र यायोईका अनुहार विचित्र भावका साथ अचानकउसका आँखाअर्गाड उभिए । गिम्पेईले तिनीहरूको अनुहार स्तानघरकीकेटीको अनुहारसँग दाँज्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यस्तो स्याहार र ध्यान पुग्याएर पनि गाहकी नफर्के बित्यासपर्छ होला ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ए होइन । किन हुन्थ्यो ? यो त कामै हो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यस्तो स्वरमा &#039;यो त कामै हो&#039; भनेको सम्भिँदा अचम्मलाग्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटी अर्कातिर हेर्न थाली । गिम्पेईले लजाएभैँं गरी आँखाछोप्यो । खुम्चिएको आँखाले उसले केटीको सेतो ब्रा झल्लक हेस्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ब्रा फुकाल,” गिम्पेईले एकपल्ट हिसाकोको व्रा समातेर भनेकोथियो । हिसाकोले मानिन । उसले ब्रालाई जोडले अठ्याउँदै अगाडितान्दा इलास्टिक चौँडयो । अलर्मालएर हिसाकोले आफ्ना स्तन उघारैरहन दिई टुलुटुलु ब्रा हेरिरही । गिम्पेईले ब्रा केहीबेर आफ्ना दायाँहातमा समाइराखेर एकापट्टि मिल्काइदियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टन्न २२ सकि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले आँखा उघारेर नड काटतै गरेकी केटीको दायाँ हातलाईनियाल्यो । तिनताक हिसाको यस केटीभन्दा कात कान्छी थिई होली ?दुई वर्ष ? कि तीन वर्ष ? के हिसाको स्तानघरकी सुसारेझौँ गोरीभइसकेकी थिई ? गिम्पेईले कुरुमे कम्पनीको सूती कपडामा छापएकोगाढा नीलो बुट्टाको छापको गन्ध सुँघ्न सक्थ्यो । केटाकेटीमा उसलेलाउने गरेको किमोनो यसैबाट बनेको हुन्थ्यो तर त्यसको गन्धहिसाकोले स्कुलको पोसाकको रूपमा लाउने नीलो फनी कपडाकोस्कर्टको रङले गर्दा उठेर आउँथ्यो । आफ्ना गोडा स्कर्टमा घुसार्दै गर्दाहिसाको रुनुका साथै क पनि झन्डै रोएको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईलाई आफ्नो सारा तागत नड काटिरहेका दाहिने हातकाऔँलाबाट निख्रेर झरेजस्तो अनुभव भयो । केटीले त्यो समाएर नडहरूकैँचीले मिलाएर काटिदिई । उसले एकपल्ट आफ्नो मावलीमा रहेकोतालको बरफमाथि यायोईसँग हातेमालो गर्दै हिँडराख्ता यही हातलुलिएको सम्भझियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के भो ?” भन्दै यायोई किनारमा फर्केकी थिई । गिम्पेईलेउसको हात बेसरी समाएको भए समेत बरफमूनि पुरिन्थी होली ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यायोई र हिसाको आकलभुकल मात्रै भेटिने बटुवा जस्ता व्यक्तिथिएनन्‌ । उसलाई तिनीहरूका नाम र ठेगाना थाहा भएको मात्र होइन,त्यसभन्दा पर तिनीहरूसँग उसको सम्बन्ध्रै थियो अनि तिनीहरूलाईकुने बेला पनि भेटन सक्थ्यो। तैपनि उसले तिनीहरूलाईपछ्याइरहन्थ्यो र अन्तत: तिनीहरूबाट छुट्टिन बाध्य भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कान के गरूँ ? सफा गर्दिऔैँ ?” केटीले सोधी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कान रे ? कानमा के गर्ने र?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“सफा गर्दिन्छु । जुरुक्क उठेर बस्नुस्‌ त ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेई जुरुक्क उठेर गजगजे खाटमा बस्यो । उसलाई लाग्योकेटीले उसको कानको लोती बिस्तारै मली, त्यसपछि तत्कालै एउटाऔँला कानमा घुसारेर भित्र सुस्तरी घुमाई । बासी हावा बाहिरनिकालिएपछि गिम्पेईलाई कान हलुङ्गो भई ताजा सुवास भरिएकोअनुभूति भयो । उसले निरन्तर मीठो, कम्पनका स्वरहरू सुन्दै गर्दातिनका सुमधुर स्पन्दनहरू चारैतिर फिँजए । केटीले अर्का हातकाऔंलाले बिस्तारै गिम्पेईका कानभित्र स्पर्श गर्दै थिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के गरिरा&#039;की ? सपनीभौैँ लागिरा&#039;छ,” गिम्पेईले अनौठो आनन्दमान्दै भन्यो । साँच्ची फर्केर हेर्दा आफ्नै कान हेर्न सकेन । आन केटीलेआफ्नो बाहुला थोरै उसको अनुहारतर्फ घुमाउँदै फेरि कानमा घुसारेरबिस्तारै घुमाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मानौँ देवदूतले कानमा मायापूर्वक साउती गरिरहेथे । त्यहाँभित्रगुम्सिएका अन्य मानवीय स्वरहरू पानि सफा भइदिएर तिग्नै मात्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शकम्निट रेरे सक्न&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुमधुर स्वर सुनेर बस्न पाए हुन्थ्यो। झूटा क्राहरू पनि हराएरजान्थे ...”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटीले आफ्नो अर्धनग्न शरीर गिम्पेईको नाङ्गो शरीरछेउ ल्याउँदाभित्र स्वर्गीय सङ्गीत भरिएर आयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
«यहाँलाई मेरो सेवा मन पप्यो होला ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मालिस सक्सक्यो । गिम्पेई अझै बसरहँदा सुसारेले उसलाईमोजा लाउन सघाउनुका साथै उसको कमिजका टाँक लगाइदिई र जुत्तापहिराएर तुना बाँधिदिई । पेटी र टाई मात्र उसले आफैँ बाँध्यो ।चाहिँ स्नानघरबाहिर चिसो पिइरहँदा केटी उसको छेवैमा उभइरही ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटीले गिम्पेईलाई मुख्य द्वारसम्म डोच्याइदिई । रात छोपेकोबगैँचामा टेक्ता गिम्पेईले बडेमानको माक्राको जालो झलझली देख्यो ।त्यस जालोमा अन्य कीराफटयाडङग्रासँगै दुई वा तीनवटा सेता आँखाअल्झेका थिए । ती सुन्दर सेता घेराहरू तिनका नीला पखेटामा तथाआँखार्वारिपरि देखिन्थे । तिनले आफ्ना पखेटा चलमलाएका भए तीधागाका त्यान्द्राहरू चौँडन सक्थे । तर पखेटाहरू दोब्रिएकाले चराहरूत्यो जालोमा गुटमुटिएर अल्झिसकेका थिए । माक्रो भने बीचमा सेताआँखातर्फ पिठयूँ फर्काएर झुन्डिएको थियो । उसलाई चराका चुच्चाहरूनजिक पर्दा उसको शरीरमा ठुडेर छियाछिया पार्ला भन्ने डर थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईले अँध्यारो जङ्गलतर्फ आँखा कदायो । उसको मावलीकोतालको पल्लो किनारमा रात्रिको आगो धपक्क बलिरहेको थियो ।उसलाई आफू अँध्यारो पानीमा छाया पर्ने आगाका हप्काहरूतर्फरहस्यात्मक ढङ्गले वा नजानिँदो पाराले डोरिइरहेको भान भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लदन्छ रे कव्यके&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मियाको मिजुकीले आफ्नो ह्यान्डब्याग र त्यसभित्र रहेको दुईहजार येन हराए तापनि प्रहरीमा गइन । वास्तवमा त्यो उसकोजीवनमा गम्भीर असर पार्ने धेरै ठूलो रकम थियो। तर आफ्नापरिस्थितिले गर्दा उसलाई रकम हराएको बारेमा उजुरी गर्न गारो भयो ।त्यसैले सायद गिम्पेईले शिन्शुसम्म पनि भाग्नु परेन होला । यर्द्यापचोरीभन्दा पनि रकमले गर्दा क भौँतारिन बाध्य भएजस्तो थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले पैसा लिएको क्रामा कुने शड्टका थिएन तर मियाकोलेआफ्नो ब्याग भझारेपछि उसैलाई बोलाउँदै गिम्पेईले पछ्याएको हुँदासायद उसले चोरी गरेको नहुन सक्छ। न मियाकोलाई आफूगिम्पेईद्वारा लुटिएको लाग्यो । उसैले आफ्नो ब्याग लगेको क्रा मानिन ।उसले बाटामाझ ब्याग हप्याउँदा त्यहाँ गिम्पेई मात्र थियो । त्यसैलेउसर्माथ शडका गर्नु निकै स्वाभाविक थियो । तर गिम्पेईले त्यो ब्यागटिपेको चाहिँ नदेखेकी हुँदा अरू कसैले टिपेको पनि हुन सक्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भित्र पस्नासाथै मियाकोले काम गर्नेलाई बोलाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“साचिको ! ए साचिको ! मेरो ह्यान्डब्याग । ... मैले हराएँ।कृपया, गएर त्यो खोज त। त्यो क त्यहाँ औषधीपसलको सामुन्नेहुनुपर्छ । छिटो जाक ! कद ।!”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हवस्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमी तत्कालै गइनौ भने अरू कसैले लगिदेला ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मियाको लामो सास फेर्दै माथिल्लो तला उक्ली । अर्की काम गर्नेताचु पछिपछि आई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मिस, हजुरको ह्यान्डब्याग हरायो भन्नुभा&#039; ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ताचु भने साचिकोकी आमा थिई । उसले त्यस घरमा आफ्नीछोरीलाई सँगै काममा लाउनुभन्दा अघिदेखि नै काम गर्ने गर्थी । एउटीएक्ली आइमाईको सानो घरमा दुईदुई जना काम गर्ने चाहिने थिएन ।तर ताचुले घरको नैतिक अस्पष्टताको फाइदा उठाई नोकरभन्दामाथिको स्तरमा पुगिसकेकी थिई । कहिलेकाहीँ ताचुले मियाकोलाई&#039;म्याम&#039; र कहिलेकाहीँ &#039;मिस&#039; भन्ने गर्थी । तर आरिता भन्ने बढो मानिसत्यो घरमा आउँदा ताचुले मियाकोलाई सस्रैं &#039;म्याम&#039; भन्ने गर्थी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक दिन मियाकोले नचाहँदानचाहँदै ताचुसँग मन फुकाउन खोजी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“थाहा छ, हामी क्योतोमा हुँदा म आफ्नी परिचारिकासँग एक्लैहुँदा मलाई &#039;मिस&#039; भन्न रुचाउँथी। तर आरिता सँगै हुँदा म&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लनम्निक रेश लकर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आरिताभन्दा धेरै कान्छी भए पनि उसले &#039;म्याम&#039; भन्ने गर्थी । मलाई&#039;मिस&#039; भन्दा होच्याएजस्तो लागे पनि क मप्रति दया गरेझैं लाग्थ्यो ।उसले मलाई &#039;बिचरी&#039; मान्धथी । तर त्यस कुराले मलाई खिन्नबनाउँथ्यो ।” त्यस क्राको ताचुले जबाफ दिई, “त्यसो भए म पनिहजुरलाई त्यसै गरी बोलाउँछु,” र त्यस बेलादेखि उसले ससघ्वैं त्यसै गरीबोलाउने गर्थी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तर मिस॒, हजुरले बाटामा हिँड्दा आफ्नो ह्यान्डब्याग झारेरछाडिदिनुभएको क्रा अनौठै लाग्छ, होइन त ! हजुरले आफ्नो ब्याग मात्रबोक्नुभएको थियो, होइन त ? हजुरले अर्थोक केही बोक्नुभएको थिएन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफ्ना चिम्सा आँखा च्यातेर ताचुले मियाकोलाई हेरिरही ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसका आँखा विस्फारित नहुँदा पनि बाटुला देखिन्थे र तिनकोबाटुलोपनले ने तिनलाई सानो तथा चकित बनाउँथ्यो । काटीकुटीआफ्नी आमाझैँ देखिने साचिकोले आँखा च्यातेर हेर्दा ती सुन्दर देखिन्थे,तर ताचुका आँखा च्यातिँदा बाहिर निस्कन लागेझैँ देखिन्थे । ती कतैअशान्त र केही लुकाइरहेझैँं लाग्थे मानौं तिनको गहिराइमा केहीलुकेको होस्‌ । ती एकदम सफा, पहेँला खैरा थिए । त्यसले उसको भावकेही चिसो देखिन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसको गोरो अनुहार पनि सानो र बाटुलो थियो । गर्दन बाक्लोथियो, स्तन ठूलठूला थिए । उसको भारी जीउ सानो गोडासम्म पुगेझैँथियो । उसकी छोरीका साना पाउ आति सुन्दर र मिलेका थिए । तरताचुका गोडा जीउको भारले थिचएभझैं थिए । आमाछोरी दुवै जनाहोचा थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसको गर्दनको उठेका लुम्साले गर्दा ताचुलाई पर्छाडि टाउकोनिहुराउन गारो पार्थ्यो । त्यसैले उसले मियाकोलाई हेर्न आँखा उचालेरमास्तिर हेर्नुपर््यौ । यसले गर्दा मियाकोलाई ताचुले उसलाई छेड्ने गरीहेरिरहेकी हो कि भन्ने भान हुन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले ब्याग खसालेको कुरा भनेँ नि,” मियाकोले कामगर्नेहरूलाई हप्काउने गरेको स्वरमा भनी । “त्यसको प्रमाणस्वरूप,मसँग मेरो ह्यान्डब्याग छैन । हेर !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तर मिस॒, तपाईंले सौ ब्याग ता उ त्यहाँ औषधीपसलकोसामुन्ने झारेको भन्नुभएको हेन ? तपाईंलाई त्यो हराएको ठाउँ थाहा छर त्यो छिमेकमै छ। त्यसो भए, त्यो कसरी हराउन सक्छ त ?ह्यान्डब्याग जस्तो सामान ...”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले त्यो झारेँ त भन्दै छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“छाता जस्तो कुनै कुरा छाडेर आउनु त बुझिन्छ तर ब्यागहातबाट झार्नु भनेको ... माने, बाँदर त रूखबाट भझर्दैनन्‌ नि ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लदमन्छ रे कवबक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ताचुले रोचक ढङ्गले तुलना गरेकी थिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आफूले झारेको महसुस हुनासाथ तपाईंले टिप्न सक्नुहुन्थ्यो ।किन टिप्नुभएन त ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हो म टिप्न सक्थेँ । के व्यर्थको क्रा गरेकी ! आफूले कुनै क्राझारेको बुभनासाथ त्यो साँच्ची नै हराएको भन्न सकिन्न नि !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मियाकोलाई आफू माथि उकलेदेखि नै बाटामा लाउने लुगा लाएरैउभिरहेको क्रा महसुस भयो । लुगाहरू राख्ने पश्चिमा शैलीको दराज रजापानी शैलीका लुगाहरू राख्ने घर्रा त माथि साढे चार म्याटकोकोठामा थिए । मियाकोलाई आठ म्याटको कोठाछेउको कोठामा लुगाफेर्न सजिलो लाग्थ्यो । बढो आरिता त्यहाँ बस्न आउँदा उसले र बढोआरिताले त्यो आठ म्याटको कोठा प्रयोग गर्ने गर्थे । तर उसकालुगाहरू माथिल्ला तलामा हुनु भनेको भइँतलामा ताचुको विघ्नै प्रभावरहेको छर्लङ्गै हुन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कृपया, तल गएर मेरा लागि एउटा चिसो रुमाल ल्याइदेक न ।त्यसलाई चिसो पानीमा निचोर । मलाई हल्का पसिना आइरहेछ ।”मियाकोले आफ्नो अन्रोधपछि ताचुले तलै बस्नुपर्ने सोची । त्यतिन्जेलउसले आफ्नो जीउको पासिना पुछ्न चाहन्थी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हवस्‌ । के म रर्गाडिदिफँ ? म फ्रिजबाट बरफका टुक्रा राखेकोपानीको भाँडो ल्याउँछु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“पर्दैन, धन्यवाद,” मियाकोले आँखा तर्दै भनी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ताचु तल भर्दै गर्दा सामुन्नेको ढोका उघ्रयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले ओऔषधीपसलको सामुन्नेदेखि गाडीको घुइँचो भएकोसडकमसम्म पूरै चहारिसकेँ, तर मालिक्नी हजुरको ह्यान्डब्याग कहीँ पनिथिएन,” साचिकोले भनी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मलाई आश्चर्य लागेको छैन । माथि कुदेर जा र मालिक्नीलाईभन्‌ । के तैँले प्रहरीमा उजुर हालिस्‌ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हाम्ले उजुर हाल्नुपर्छ जस्तो लाग्छ र ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तँ त्यति बिसुदढ्धी कसरी हुन सक्छेस्‌ ? अहिले गएर निवेदन दिइहाल्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“साचिको ! ए साचिको !” मियाकोले माथिल्लो तलाबाट डाकी ।“तिमीले सो क्रा रिपोर्ट गर्नु पर्दैन । ब्यागमा कुनै महत्त्वपूर्ण क्रो छैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साचिकोले जबाफ दिइन तर ताचु एउटा काठको किस्तीमाहाथमुख धुने भाँडो बोक्ते माथि उक्ली । मियाकोले आफ्नो स्कर्टफुकालेर कट्टुमा थिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म्याम, हजुरको पिठयूँ मलिदिकँ ?” ताचुले आत नै विनम्रभावमा सोधी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“पर्दैन, धन्यवाद ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनिस रे लक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मियाको ताचुलाई आफूले निचारेर ल्याउन लाएकी रुमाललेआफैँ जीउ पुछ्न थाली । उसले तन्क्याएको गोडाबाट पुछ्न थालेर बूढीऔँलाहरूबीच सफा गरी । मियाकोले कच्याककचुक्क पारेर भइँमामिल्काइदिएको स्टाकड टिपेर राम्ररी पट्याएर राखी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“भो, तिमीले धन्दा मान्नु पर्दैन । म ती धोइहाल्छु नि,” भन्दैमियाकोले रुमाल ताचुतर्फ फाली ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साचिको माथि उक्ली। उसले छेवैको साढे चार म्याटकोकोठाको ढोकानेर हात राखेर निकै निहरिँदै भनी, “म फर्किसकेँ । ब्यागत्यहाँ रहेनछ ।” क प्यारी तर थोरै जोकर जस्ती देखिन्थी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ताचुले कडाइका साथ आफ्नी छोरीलाई त्यस्ता विनम्र भावसिकाएकी थिई । तर आफूचाहिँ मियाकोप्रति ढुलमुले भाव देखाउँथी ।क परिस्थितिअनुसार कहिले निकै विनम्र हुन्थी भने कहिले अति रुखोपनअथवा चिसो मित्रता देखाउँथी । उसले साचिकोलाई बढो आरिता बाहिरजान लाग्दा उसको जुत्ताको तुना बाँधदिन सिकाएकी थिई । आरिताटाउको अथवा अनुहारको नसा निकै दुख्ने स्नायुरोगबाट ग्रस्त थियो ।साचिको उसको गोडामा निहरिरहेको बेला कहिलेकाहीँ क उसकोकुममा हात राखेर उभिन्थ्यो। मियाको उहिल्यैदेखि आरितालाईछोरीतर्फ तान्ने ताचुको योजनादेखि परिचित थिई । तर ताचुले नै सत्रवर्षीया छोरीलाई त्यस योजनामा लाएकी भन्ने कुरामा क अझ यकिनथिइन । ताचुले साचिकोलाई अत्तर लाउन लाउँथी । मियाकोले एकपल्टयसबारे खोजीनिती गर्दा ताचुले जबाफ दिई, “उसको जीउबाट निकैकडा गन्ध आउँछ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हजुरले साचिकोलाई थानामा गई रिपोर्ट गर्न किन भन्नुहुन्न ?”ताचुले बल गरी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमी निकै जोड दिइरहेकी छ्यौ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तर त्यो हराउनु लाजमर्दो लाग्दैन यहाँलाई ? त्यसमा कातिपैसो थियो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यसमा फुट्टी पैसौ थिएन ।” मियाकोले आँखा चिम्म गरीतिनमाथि चिसो रुमाल राखी । क केहीबेर स्थिर बसी । उसको मुटुफेरि निकै ढुकढुक गर्न थाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मियाकोसँग दुइटा पासबुक थिए । एउटा ताचुको नाममा जम्मागर्न उसकै सल्लाहअनुसार बूढो आरिताबाट गोप्य राखिएको थियो ।अर्को उसको आफ्नै नाममा थियो र यसैबाट उसले दुई लाख येनभिकेकी थिई । उसले यसबारे ताचुलाई केही भनेकी थिइन । बढोआरिताले यसबारे सुनेर प्रश्नहरूको ताँती लाउन सक्नेछ । त्यसैले त्यातचाँडो कनै क्रा नखुस्काउन फ चनाखो थिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लनन्निक रे थ्व&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुई लाख येन मियाकोले आफ्नो जवानी गुमाएको क्षतिपूर्तिस्वरूपथियो-फूलको त्यो शक्षाणक फक्राइ जुन उसले आधा मरिसकेको, फुलेकोबूढोलाई आफ्नो शरीर समर्पण गरेर खेर फालेकी थिई । त्यस पैसामामियाकोको आफ्नै रगत बगेको थियो । तर त्यो पैसा हराएको हो भनेएकै क्षणमा गयो र अब फसँग बाँकी केही रहेन । उसले सो करापत्याउनै सकिन । कसैले पैसा खर्चिदा सो रकम गइसक्ता पानिसम्झिन्छ । तर आफूले जोगाइरहेको पैसा हराउँदा जगेडा गरेकोसम्झना पनि तीतो हुन आउँछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तैपनि मियाकोले पेसा हराउँदा क्षाणक रोमाञ्च-आनन्दानुभूतिमहसुस गरेको क्रा अस्वीकार गर्न सकिन । आफूलाई पछ्याउनेमानिसबाट डराएर भाग्नुसट्टा क एकातिर तर्केर एक्कासि उर्लेकोआनन्दलाई पन्छ्याउन सक्थी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वास्तवमा मियाकोलाई स्वयंले ह्यान्डब्याग नभझारेको क्रा थाहाथियो । ब्याग आफूलाई हिर्काउन प्रयोग गरिएको अथवा आफूर्माथफालिएको भनी गिम्पेईलाई थाहा नभएभैं मियाकोले पनि यकिनसाथसो ब्याग आफूले त्यो मानिसलाई हान्न प्रयोग गरेको अथवा त्यसमाथिफालिदिएको सम्झना गर्न सकिन । तर उसले पक्का पनि तीव्र रूपलेप्रतिक्रिया गरेकी थिई । उसको हात एक्कासि कक्रक्क परेर लट्टियो,अनि त्यो लट्टयाइ बाहला तथा छातीसम्म त्यसो सर्दैसरदैं पुग्यो । अन्तत:उसको सारा शरीर दुखद रोमाञ्चले कामिरहेको थियो । मानौँ त्योमानिसद्वारा पछ्याइरहँदा आफूभित्र ्सल्करहेको क्नै अस्पष्ट संवेदनाएक्कासि दन्किन लागेको थियो-झन्डै मानौँ बृढो आरिताको छायामागुमाएको आफ्नो जवानीले हठात्‌ पुनरुज्जीवित भई बदला लिएकोथियो। त्यो सही भए, दुई लाख येन बटुल्न लामा दिन रमहिनाहरूमा भोगेको सरमबापतको क्षतिपूर्ति मियाकोले त्यस घडीमाप्राप्त गरी र त्यसैले त्यो रकम सम्भवतः बित्यै गुमेको थिएन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर त्यतिखेर दुई लाख येनको त्यस दुर्घटनासँग कुनै सम्बन्धथिएन । मियाकोले ह्यान्डब्यागले त्यो मानिसलाई हिर्काउँदा अथवामाथि हत्याइदिँदा पैसाबारे भुसुक्कै बिर्सिसकेकी थिई । ह्यान्डब्यागआफ्नो हातबाट कतिखेर खुस्कियो भन्ने क्राको चालसमेत पाइनउसले । साथै एक्कासि फर्केर भाग्न लाग्दा उसलाई ब्यागकोसम्झनासमेत भएन । यस अर्थमा आफैँले ब्याग झारिदिएकी हुँ भन्नेकरा गर्दा मियाको सत्य बोलिरहेकी थिई ! वास्तवमा त्यो मानिसलाईहिर्काउनुअघसम्म पनि उसले ब्याग र भित्र रहेको पैसा दुवै थोकबारेभुलिसकेकी थिई ! आफूलाई कुनै मानिसले पछ्याइरहेको कुरा उसमाथिउर्लदो छालसरि आइलाग्यो र त्यो छाल हराएर जाँदा ह्यान्डब्याग पनिहराइसकेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शकन्निक २९ ल्क्क्कि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफ्नो घरको मूल ढोकामा प्रवेश गर्दा मियाकोलाई आनन्दलेआफ्नो शरीर कक्रक्क बनाइदिएको अनुभव भयो । त्यसैले क हतारिँदैलुसुक्क माथि उक्लेकी थिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म आफैँ लुगा फेर्न चाहन्छु । त्यसैले कृपया तल जार,”ताचुले आफ्ना घाँटी र बाहला पुर्छिदिएपछि मियाकोले उसलाई भनी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हजुर स्नानकोठामा लगा फेर्नुभए हुन्छ नि ?” ताचुलेमियाकोलाई शड्कालु नजरले हेर्दै भनी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म हिँडडुल गर्न चाहन्नँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ए ! तर हजुरले औषधीपसलका अगाडि ... गाडीहरू गुड्नेबाटोबाट फर्कदा ब्याग हराउनुभएको यकिन छ? _ सायद म थानामागई सबै कुरा बुभन सक्छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मलाई त्यो कहाँ हरायो सम्झना छैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“किन छैन ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“किनभने मलाई कसैले पछ्याउँदै थियो ...”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तेजनाको सबै लक्षण मेटन पाउने गरी एक्लै बस्न चाहनेसुरमा मियाकोको जीज्रो नराम्रो गरी चिप्लियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“फेरि ?” ताचुका बाटुला आँखा टवाल्ल परे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हो, म तिमीलाई भन्छु,” मियाकोले जोड दिएर भनी । तरत्यसो भन्न नपाउँदै उसमा रहेको आनन्द उडेर गयो र फक रित्तोरचिसो अनुभव गर्न थाली ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के हजुर आज सीधा घर आउनुभयो ? अथवा हजुरले आफ्नोपछाडि एउटा मानिस तानेर ल्याउनुभयो ? त्यसैले हो हजुरलेह्यान्डब्याग हराउनुभएको ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ताचु अझ त्यहाँ बसिरहेकी साचिकोतर्फ फर्की ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“साचिको, तँ यहाँ अझ केका लागि हल्लिरहेकी हँ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साचिकोका आँखा चाकत देखिन्थे र एउटै खुट्टामा लडबडाएरजाँदा उसको अनुहार लाजले राताम्मे भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर मियाकोलाई पहिले पनि लोग्नेमानिसहरूले पछ्याउने गरेकोक्रा साचिको जान्दथी । बढो आरितालाई पनि थाहा थियो । गिन्जाकोकेन्द्रमा मियाकोले बूढो मानिससँग साउती गरेकी थिई, “हेर्नोस्‌ ! मलाईकसैले पछ्याउँदै छ !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के रे!” बृढो मानिस फर्कन थाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अहँ । नहेर्नोस्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“किन नहेर्ने ? तिमीलाई पछ्याएको क्रा कसरी थाहा भयो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ए, म हेर्न सक्छु । उ: नीलो खाले ह्याट लाएको अग्लो मानिसहो जो भर्खरै अर्को दिशाबाट गुज्रियो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनम्निक २0 स्कक्कि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले ख्यालै गरिनँ । के उ गुज्रिन लाग्दा तिमीले कनै सड्केतगप्यौ र?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“उल्लू करा नगर्नुहोस्‌ ! के मैले उसलाई एक साधारण बटुवा होअथवा मेरो जीवनमा कुनै भूमिका खेल्नै लागेको कोही हौ भनीसोध्नुपर्ने हो र?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के तिमी खुसी छ्यो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“वास्तवमा म उसलाई सोध्न चाहन्छु । उसले मलाई कहाँसम्मपछ्याउनेछ भनी बाजी थापौँ । म तपाईंसँग बाजी लाउन चाहन्छु । तरम छडी लिएर हिँड्ने बूढो मानिससँग भएँ भने काम लाग्दैन । त्यसैलेतपाईं क त्यो दर्जी पसलमा गई उसलाई हेरिराख्नुहोस्‌ । क सडककोअन्त्य र पर्छाडसम्मै मलाई पछ्यायो भने मलाई गर्मीमा लाउने सेतोरडको सुट सिलाइदिनुपर्ला । तर प्रिय, मलाई सेतो समर सुटै चाहिन्छ,लिनेनचाहीँ होइन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमीले हाम्यौ भने नि? .. .”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हेरुँ । त्यसो भए तपाईं सारा रात मेरो पाखुरामा आफ्नोटाउको अड्याएर सुत्न पाउनुहनेछ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमीले फर्केर उसलाई हेर्न अथवा कसँग बोल्न उपयुक्त हुनेछैन, बुभ्यो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यो ता पक्कै छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बढो आरिताले त्यो बाजी हार्न खोजेको थियो । उसले आफू हारेभने मियाकोले सारा रात आफ्नो पाखुरामा टाउको अड्याएर सुत्न दिनेआस राखेको थियो । तर भुसुक्क निदाइसकेपछि क अझ त्यहीँ हुनेअथवा नहुने कुरा जान्न त सकिन्न भनी सोच्ता क मनमनै उदासभएर हाँस्तै दर्जी पसलमा छिच्यो । उसले मियाको तथा उसलाईपछ्याउँदै गरेको मानिसलाई हेरिरहँदा आफूभित्र अनौठो जवानीप्रस्फुटन भएको महसुस ग्यो । त्यो ईर्ष्या भने थिएन । ईर्ष्या निषेधितथियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घरमा आरिताले घरको रेखदेख गर्ने निहँमा एउटी सुन्दरी राखेकोथियो । क तीसमाझकी थिई, मियाकोभन्दा दस वर्ष जेठी । लगभगसत्तरीको बृढो आरिता यी दुई महिलाका पाखुरामा टाउको अड्याएर,तिनीद्वारा घाँटीमा सहारा दिएर र तिनका स्तन मुखमा चुसेर बस्ता यीदुई तरुणीहरूलाई आमाको रूपमा कल्पना गर्थ्यो । किनभने बढोमानिसले एउटी आमासँग मात्रै मनको शान्ति प्राप्त गर्न सक्थ्यो । उसलेमियाको र घर रेखदेख गर्ने महिला दुवैलाई एकअर्काका भूमिकाबारेसचेत गराइसकेको थियो । उसले मियाकोलाई दुवै जना डाहा गर्न थालेभने आफू रिसले आगो भई दुवैलाई चोट पुग्याउन सक्छु भनी तर्साएको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लनन्निक रे लकर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
थियो अथवा त्यसले गर्दा क हृदयाघात भई मर्न सक्थ्यो । क आफ्नैबारे मात्र सोच्ने गरेझैं लाग्थ्यो तर वास्तवमा आरिता उत्पीडनसम्बन्धीस्नायुरोगबाट ग्रस्त थियो । मियाकोलाई उसको मुटु कमजोर रहेकोथाहा थियो किनभने उसले आरिताको छातीलाई आफ्ना नरम हातलेबेस्सरी थिच्ने गर्थी र उसले चाहेको बेला आफ्नो सुन्दर गाला उसकोछातीमा राखिदिने गर्थी । तर घर रेखदेख गर्ने उमेकोनामक महिलाईर्ष्याबाट पूर्णतया मुक्त भएजस्ती थिइन । लामो अनुभवबाट मियाकोलेके अडकल काटी भने आरिता उसकहाँ पुगेर राम्रो व्यवहार गर्दाउमेकोको ई्ष्याले गर्दा आफ्नै घरबाट धापएर आएको हुनुपर्छु ।मियाकोलाई जवानीले भरिपूर्ण उमेको एउटा बृढो मानिसप्रति त्यतिविध्नईर्ष्या गर्ली भन्ने क्रा लज्जास्पद लागेर मनमा निकै निराशा छायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बृढ्ढो आरिताले प्राय: उमेकोलाई घरेलुपनको नमुनाको रूपमाप्रशंसा गरिरहने हँदा मियाको स्वयं असल केटी हुनुपर्ने अपेक्षा गरिएकोसोच्ने गर्थी । तर बूढो आरिताले दुवै महिलालाई आमातृुल्य छावमाचाहेको करा प्रस्ट थियो । उसकी आफ्नै आमाको आफू दुई वर्षको हुँदैपारपाचुके भइसकेको थियो र सट्टामा सौतेनी आमा आएकी थिई ।बढोले मियाकोलाई त्यो कथा कतिपल्ट भनिसकेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमी अथवा उमेको जस्ती कुनै महिला झडकेली आमाकोरूपमा भए पनि मेरो स्याहार गर्न आएकी भए म कात खुसी हुन्थेँहोला ।” बृढो मियाकोको साथ ।सान्तिध्य)मा बच्चा जस्तै रमाउनेगर्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तपाईं भन्न सक्नुहुन्न । तपाईं मेरो सौतेला छोरो हुनुभएको भएम तपाईंमाथि कराउँथे । तपाईं भयङ्कर केटो भएको हनुपर्ने हो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म प्यारो बच्चो थिएँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“झडकेलो सन्तानको रूपमा पाएको दुर्व्यवहारको क्षतिपूर्ति-स्वरूप अहिले बुढेसकालमा असल आमा-अझ दुईदुईवटी आमा पाउनु-भएको छ । तपाईं भाग्यशाली हुनुहुँदो टह्ेछ्ल होइन त ?” मियाकोलेअलि व्यडग्य गर्दै भनी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म साँच्चीकै भाग्यशाली रहेछु । सोका लाग म आभारी छु,”आरिताले जबाफ दियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“वास्तवमा उसले &#039;म आभारी छु&#039; कसरी भन्न सक्छ ?”मियाकोले मनमनै विचार गर्दा रिस उठेर आयो । तर उसले सत्तरीछेउपुग्न लागेको मिहिनेती बूढाको त्यस्तो व्यवहारबाट जीवनबारे केहीसिक्नुपर्छ भन्ने क्रा पनि नबुझी रहन सकिन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आरिताचाहिँ मियाकोले बिताउने निष्क्रिय जीवनप्रति अधीर हुनथालेजस्तो थियो । एक्लिएकी मियाकोसँग गर्नलायक कुनै काम थिएन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आनम्न्छ रे२ लक्क&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फक आफ्नो जवानी र जाँगर एउटा बूढो मानिसका आगमनहरूकोनिरर्थक आसमा जीवन बिताएरै गुमाइरहेकी थिई । मियाकोलाई आफ्नीकाम गर्ने केटी ताच्‌ कसरी त्यात फुर्तिली रहन सकेकी होली भनीआश्चर्य लाग्थ्यो । उसैले मियाकोलाई बढाले ससथ्वैं भ्रमणमा लिएर जाँदाहोटलका बिलहरू फेर्ने सल्लाह दिएकी थिई । ताचुले मियाकोलाई सहीखर्चभन्दा बढीका बिलहरू बनाउन र पछि बाँकी रकम आफूले पाउनेव्यवस्था गर्न भनेकी थिई । तर मियाकोलाई त्यस्तो क्रा मिलाउनेहोटल भए पनि त्यस किसिमको हिनामिनाले आफूलाई दुखी तुल्याउनेभन्ने लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हजुरलाई त्यस्तो लाग्छ भने कम्तीमा उहाँले दिने बक्सिसबाटफाइदा उठाउन सक्नुहुन्छ । म्याम, हजुरले होटलको बिल जोडिएकोकोठामा तिर्न सक्नुहुन्छ । श्रीमान्‌ आरितालाई राम्रो बक्सिस तिर्नलगाउनुहोस्‌ । उहाँले पक्कै पनि अनुहार हेरेरै पानि धेरै बक्सिसदिनुहुनेछ । हजुर कोठामा जानुअघि उहाँले तीन हजार दिए भने एकहजार थुतिहाल्नुहोस्‌ र त्यो पेसा आफ्नो थैलीमा अथवा चोलीभित्रनभेटिने गरी राख्नुहोस्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कस्तो गजबको विचार रहेछु ! मलाई तिमीमाथि आश्चर्यलाग्छ । र्काति लोभी र छुल्याही ...”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर काम गर्ने महिलाको तलब हेरी त्यसलाई लोभ मात्र मान्नसकिन्न ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यो छुद्र क्रो होइन, बुभ्नुभयो । हज्रसँग हरेक सेन्टमाथिनजर राख्नुसिवाय भावष्यका लागि जगेडा राख्ने अरू कुनै उपाय छैन ।हामी जस्ता महिलाले दिनदिनै र महिनामहिनामा पैसा थुपार्नेपर्छ,”ताचुले जोड दिँदै भनी । “म्याम, म हजुरको पक्षमा छु। म कसरीहजुरको जवानी त्यो लोभी, रगतचुसाहा बृढोर्माथ खेर गइरहेको हेरेरबसिरहन सक्छु र ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आरिताले उनीहरूलाई भेटता ताचुले पसले केटीभझैँ उसलाईखुसी पार्न तत्कालै आफ्नो बोली फेरिहाल्थी । अहिले भर्खरै उसलेमियाकोसँग दृष्ट स्वरमा क्रा गर्दा मियाकोको मनमा एक्कासि चिसोपस्यो । तर वास्तवमा उसको स्वर वा शब्दले मियाकोलाई काम्न बाध्यपारेको थिएन, यो त मिहिनेत गरी जगेडा गर्न लाग्ने समयको दाँजोमासमयले उसको आफ्नै शारीरिक जवानीलाई द्रृतर्गातले बगाएर लगेकोमाउत्पन्न भएको चिसो निराशा थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मियाकोको पालनपोषण ताचुको भन्दा फरक ढङ्गले भएकोथियो । युद्धको अन्त्यसम्म मियाको विलासी वातावरणमा, गुलाफकोओछ्यान&#039; भनिनेमा, हर्काइएकी थिई । त्यतिखेर होटलको बिलबाट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लनन्निक शेरे ल्क्क्कि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छुसछुस पैसा कमाउने कुरा विरलै सोच्न सकिन्थ्यो । मियाकोले ताचुकोविनाशकारी सल्लाहबाट उसकी नोकर्नीले भान्साबाट छुसछुस सामानचोरेको हुन सक्ने लख काटी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले ताचुलाई रुघाखोकीका लागि ओखती लिन पठाउँदा पनिसाचिकोलाई सोही करा लिन पठाउँदा लाग्ने मोलभन्दा पाँचदस येनबढी पर्ने गर्थ्यौ । ताचुले यस्ता साना रकमहरू जम्मा गरेर काति पैसाजोगाउन सकेकी हो भनी मियाको साचिकोमार्फत जान्न इच्छुक थिईतर ताचुले आफ्नी छोरीलाई समेत कुनै पैसा दिएको सड्केतसम्म पानिनहुँदा उसले उसलाई आफ्नो पासबुक नदेखाएको हुन सक्छ । मियाकोलेयी स-साना ठगीहरूलाई हल्का ढङ्गले लिए पानि कामलाझैं छुसछुसजोगाउने भनी ताचुको सल्लाहलाई बेवास्ता गर्न गारो भयो । ताचुकोजीवन स्वस्थताको रूपमा र मियाकोको जीवन रोगको रूपमा लिनर्साकन्छ । मियाकोको जवानी र सौन्दर्य बित्थामा गुमिरहेको थियो भनेताचुले आफ्नो जीवनको निमेष पनि नगुमाई बाँचरहेकी थिई । ताचुलेयुद्धमा मारिएको आफ्नो लोग्नेले आफूलाई निकै सकस गराएको भनीसुन्दा मियाकोले उत्सुकतापूर्वक सोधी, “के उसले तिमीलाई रुन बाध्यपाप्यो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हो, हजुर ! म कराएँ र ! रोएर मेरा आँखा रातै नभएका रनसुनिएको कुनै दिनै बितेन । एकपल्ट उसले साचिकोर्माथ चिम्टाफाल्दा उसको घाँटीमा चोट लाग्यो । सानो खत अझ पानि त्यहाँ,उसको घाँटीपर्छाडि छ । हजुर हेर्न सक्नुहुन्छ । मेरो विचारमा त्यो खतसबैभन्दा बलियो प्रमाण हो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“प्रमाण, केको ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अँ, मिस, म कसरी बयान गरूँ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमी जस्तो पनि कुनै मानिसलाई सताउने भनेको सुन्दा तलोग्नेमानिसहरू खतरनाकै हुनुपर्छ,” मियाकोले सुधो भएको स्वाड पार्दैभनी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हजुर, साँच्चै हो ! तर यसलाई अर्को तरिकालेत्यतिखेर त्यो कुरो फ्याउरोबाट सम्मोहित हुनु जस्तो थियो । म आफ्नोश्वीमानप्रति यात विमुग्ध थिएँ कि म अन्त कतै हेर्न सक्तिनथेँ । तरहामी त्यो सम्मोहनबाट एकपल्ट मुक्त भइसकेरपाछा सब थोक मिलेरआयो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ताचुका शब्दले युद्धमा आफ्नो पहिलो प्रेम गुमाएकी केटीकासम्झनाहरू गराएको भान भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विलासितामा हुर्केकी मियाको पैसाप्रति अलिर्कात उदासीन थिई रअहिले दुई लाख येन उसका लागि ठूलो रकम भए पनि उसले त्यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हि क हा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षतिबारे वास्ता गरिन । जे भए पनि मियाकोको परिवारले युद्धमा दुईलाख येनभन्दा निकै बढी नै गुमाइसकेको थियो । तर कुरो के थियो भनेयति रकम मिलाउन पानि फसँग अब कुनै उपाय थिएन । उसले के गर्नेभनी कनै उपाय फुरेन । किनभने उसले त्यो पैसा खास कामका लागिआफ्नै ब्याङ्क खाताबाट झिकेकी थिई । ठूलै रकम भएकाले त्यो पाइएररिपोर्ट भएमा पत्रपत्रिकामा सोबारे विज्ञापन हुन सक्छ र ह्यान्डब्यागमापासबुक भएकाले नामठेगाना हेर्न सकिन्छ र त्यो टिप्ने मानिसले ब्यागसीधा उसको घरमै ल्याइदिन अथवा प्रहरीले उसलाई सूचित गर्नसक्छ। मियाकोले तीनचार दिनसम्म सृक्ष्मतासाथ पत्रपत्रिका हेरी ।उसको नामठेगाना आफूलाई पछ्याउने मानिसलाई समेत थाहा भएकोभन्ने लाग्यो । वास्तवमा उसैले ब्याग चोरेको हो भनी फक घोत्ली ।होइन भने उसले त्यो टिपे वा नाटिपे पनि पक्कै आफूलाई अगाडिसम्मपछ्याइरहने थियो । सायद ब्यागले हिर्काइएपछि क आत्तिएर भागेकोहुन सक्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मियाकोले आरितालाई गिन्जामा गर्मी याममा लाउने सुटकोसामग्री किन्न लाएको लगभग एक सातार्पाछ नै आफ्नो ह्यान्डब्यागगुमाई । त्यस साता बढो मियाकोका घरमा आएन । ह्यान्डब्यागहराएको घटनाको दुई दिनपछि रातितिर भने क देखियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हामी तपाईंलाई फेरि भेट्न पाउँदा र्कात खुसी छौँ ।” ताचुलेउसलाई सहर्ष स्वागत गर्दै उसको भिजेको छाता लिई । “हजुर हिँडेरआउनुभएको हो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हो । मौसम डरलाग्दो छ। मेरो विचारमा अब वर्षा लाग्योक्यार ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यसले हजुरको बेथा बल्झायो क्यार, हजुर ? ... साचिको ! एसाचिको !” ताचुले डाक्तै भनी, “छ नुहाउँदै छे ।” क बूढो मानिसकोजुत्ता फुकाल्न सघाउन भनी नाङ्गै खुट्टा सिकुवा (पोर्च।तिर झरी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“नुहाउने सामान तयार भए म न्यानिन चाहन्थेँ । आजभैँ चिसोर निकै ठिंहिराउने भएपछि ...”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मलाई लाग्छ यसले हजुरलाई असर गर्छु।” उसका सानाचम्किला आँखामाथि रहेका साना आँखीभइँ सहानुभूतिमा बटारिए । “हरे,कस्तो बित्यास । हामीलाई हजुर आज राति आउने अपेक्षा नभएकालेसाचिको हजुरभन्दा पहिले नुहाउने कोठामा छिरी हालिछे। म केगरेँ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“केही छैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“साचिको ! ए साचिको ! नुहाउने कोठाबाट भट्ट निस्किहाल है ।भइँ राम्ररी पुछ्न है ? सफा पारेस्‌_ चारैतिर राम्ररी सफा धोएस्‌_ ”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शलम्न्क रे ल्य्क्कि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ताचु कल्याडबल्याङ गर्दै हिँडी र नुहाउनका लागि चुलोमाथि कित्लीराखेर ग्यास बालेर मात्र फर्की ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बूढो आरिता अफ्नै बर्सादी भिरेरै भइँमा खुट्टा तन्क्याएर मल्दै थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हजुरलाई नुहाउने कोठामा हुँदा साचिकोले मलिदिए हुन्छ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मियाको खोइ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अँ, म्याडम समाचार सुन्न थिएटर जान्छु भन्दै हनुहुन्थ्यो । मेरोविचारमा उहाँ छिट्टै फर्कनुहुन्छु किनभने उहाँ समाचार सुन्न मात्रसिनेमाहल जानुभएको हो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मालिस गर्ने मानिस बोलाउन साकन्छ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हुन्छ, हजुर । यहाँको सधैं मालिस गर्ने महिलालाई बोलाउँ ! ...”ताचु उभिएर बृढाका लुगा लिन गई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हजुर प्राय: नुहाउने कोठामा लुगा फेर्नुहुन्छ, होइन र ?” उसलेफर्केर सोधी । ताचुले एकपल्ट फेरि “साचिको !” भनेर डाकी, अनिभनी, “म अब मालिस गर्ने महिलालाई बोलाउन जाँदै छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के साचिको निस्किसकी ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हो, हजुर, क निस्किसकी .. साचिको !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लगभग एक घन्टापछि मियाको घर आउँदा बृढो आरितामाथिल्लो तलाको सुत्ने कोठामा एक जना महिलासँग मालिस गराउँदैथियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मलाई दुख्तै छ,” उसले सानो स्वरमा भन्यो । “तिमी यस्तोवर्षामा किन बाहिर निस्क्यौ ? नुहाएपछि ताजा महसुस गर्नेछौ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हुन्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मियाको थचक्क बसेर त्यसै दराजमा ढेसिई । उसले आरितालाईदेखेको हप्ता पुगेको थियो र आरिताको अनुहार खरानी रडको रनिन्याउरो भएजस्तो देखिन्थ्यो । उसका गाला र हातमा पहेँला कस्तादागहरू टडकारै देखिन्थे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म समाचार हेर्न गएँ । म समाचार हेर्दा रोमाञ्चित हुन्छु । उताजाँदा म समाचार सुन्न छाडेर कपाल नुहाउन जान चाहेँ तर ब्युटीपार्लर बन्द भइसकेको थियो, त्यसैले ...” मियाकोले बूढो मानिसकोकपाल नियाली जुन भर्खरै धोएको जस्तो देखिन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म तिम्रो कपालमा लाउने टनिक (दवाई) को गन्ध सुँघ्न सक्छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“साचिकोले निकै अत्तर लाउँछे, होइन त ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले उसको जीउ निकै गनाउँछ भनी सुनेको छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तलको नुहाउने कोठामा गएर मियाकोले आफ्नो कपाल धोई । उसलेसाचिकोलाई बोलाएर सुक्खा रुमालले रगडेर कपाल पुछुन लगाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठकम्न्छ रेप ल्व्क्कि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिम्रो गोडा कत राम्रो !” मियाकोले आफ्ना कृहिनाहरू घुँडामाटेकाएर ठीक आफ्ना आँखाअगाडि रहेको साचकोका पेताला छुन भनीहात तन्क्याउँदै भनी । उसले आफ्ना नाङ्गा कुमर्माथबाट केटीका हातकोकम्पन महसुस गरी । सायद आफ्नी आमाको स्वभाव पाएकीसाचिकोका पनि औँलाहरू चलिरहने खालका थिए। तर उसलेमियाकोका सामानबाट चलाइएका लालीहरू, कासिङ्गरदानीमा फालिएका,भाँचएका काइँयाहरू अथवा कपालमा लाउने झरेका चिम्टीहरू मात्रैचोर्थी । केटीले उसको सौन्दर्यको प्रशंसा र डाहा गर्ने भएर त्यसो गरेकीभनी मियाकोलाई थाहा थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नुहाइसकेपछि मियाको सेतो भइँमा थिसल फूलको जस्तो बुट्टाभएको सूतीको किमोनोमाथि हल्का कोट भिरेर बृढो मानिसको गोडा मल्नथाली । उसको घरमा सरेपछि दिनहँ यस्तै गर्नुपर्ने हो कि भनी उ घोत्ली ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यो मालिस गर्ने महिला ठीक छै?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अहँ छैन । मकहाँ आउनेचाहिँ बढी असल-बढी अनुभवी रविवेकशील छे ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कुनै महिला छे ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घरको रेखदेख गर्ने उमेकोका लागि मालिस गर्नु पनि दैनिककाम नै होला भन्ने सोचेर मियाकोलाई दिक्क लाग्यो र उसका हातफत्रक्क गले । आरिताले उसको औँलो लिएर आफ्नो ढाडको पीँधमारहेको खाल्डोमा थिच्यो । मियाकोको औंलो पर्छिल्तर नृहियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मेरो विचारमा मेरा जस्ता लामा, सर्लक्क मिलेका औंला त्यातठीक हुन्नन्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“औँ ... सायद, त्यस्तो पक्कै होइन । तर एउटी युवा, मायालुकेटीका औँलाहरू त्यातकै ठीक हुन्छन्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मियाकोलाई एक थरी चिसोपन सर्दै आफ्नो ढाडसम्म पुगेकोअनुभव भयो र उसको औलो खाल्डोबाट चिप्लियो । बूढो मानिसलेउसको औंलो फेरि समायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“साचिकोका जस्ता छोटा औँला बढी ठीक हुन्छन्‌ भन्ने लाग्दैन रतपाईंले साचिकोलाई थोरै अभ्यास गर्न दिनुहोस्‌ न ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बृढ्ढो मानिस मौन बस्यो । मियाकोलाई एक्कासि रादिगेकोयापिष्डमा बैतात को एउटा अनुच्छेदको सम्झना भयो । उसले&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१ रेमन्ड रादिगे (१९०३-२३) अल्पायुमै बित्ने फ्रान्सेली उपन्यासकार तथाकवि । उनी दुईवटा उपन्यासका लागि प्रसिद्ध छन्‌-ढ डेभिल इन ढ फ्लेब्न रद काउन्ट अब्‌ आर्गेलब बल । उनी महान्‌ रिम्बोको प्रभावमा रेसिनका जस्तादुखान्त रच्ने व्यक्ति थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लदन्छ रे ल्व्क&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिलिम हेरिसकेर्पाछ त्यो उपन्यास पढेकी थिई । “म तिम्रो जीवन दुखीबनाउन चाहन्नँ । म रोइरहेको छु किनभने म तिम्रो निम्ति धेरै नै वृद्धभइसकेको छु !&amp;quot; मार्थेले भन्यो । प्रेमको यो अभिव्यक्त आफ्नोबालसुलभतामा महान्‌ थियो। मैले यसर्पाछ अनुभव गर्नुपरेकाभावावेगहरू एउटी उन्नाइसवर्षे केटीलाई आफू निकै उमेरकी भएँ भनीसोचेर रुँदै गरेको देख्ता उर्लने तीव्र भावनालाई पुन: बयान गर्नु कहिल्यैसम्भव हुन्नथ्यो ।” मार्थेको प्रेमी सोरवर्षे जोबनमा थियो । उन्नाइसकोउमेरमा मार्थे आफैँ पनि पच्चीसवर्षे मियाकोभन्दा तरुणी थिई, अनियस बूढी मानिसका हातमा आफ्नो स्वयंको जवानी द्रृतर्गातले क्षीणभइरहेको क्राप्रति सचेत मियाको उक्त अनुच्छेद पढेर निकै उद्विग्नथाई । आरिताले ससघ्रैं भन्ने गर्थ्यो कि मियाको आफ्नो उमेरभन्दा बढीतरुणी देखिन्थी र सो क्रो बढोका पूर्वाग्रही आँखामा मात्र सत्य लाग्नेनभई सबैले मियाकोलाई वार्स्तावकभन्दा बढी तरुणी भएकी ठान्थे । तरमियाकोले आफ्नो जवानीप्रति बृढाको लालायित आनन्दले उसलाईत्यसो भन्न बाध्य पारेको क्रो बुभ्न सक्थी । उसलाई के डर थियो भनेमियाकोका कलिला, तरुणावस्थाका गुणहरू हराउनेछन्‌ र एक दिनउसको शरीरको सुगठन समाप्त हुनेछ । सत्तरीछैउ पुगेको मानिसलेआफ्नी पच्चीसवर्षे प्रेमिकामा अझ लावण्य खोज्नु अनौठो र अनुचितथयो तर मियाको प्राय: बृढोको क्रा उधिन्न भुल्ने गर्थी र उसकोजाँगर देखेर आफू बढी तरुण भएको भए हुन्थ्यो भन्ने कामना गर्थी ।मियाकोको जवानीप्रति लालायित आरिता उसको मातत्वपूर्ण वात्सल्यकोपनि चाहना गर्थ्यो । सो पूरा गर्ने विचार राख्तानराख्तै मियाकोलाईकहिलेकाहीँ आफू साँच्ची नै आमातुल्य भएको भ्रम हुन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आरिता घोप्टिएर सुतिरहेको बेला मियाकोले आफ्ना बूढी औंलालेउसका काटहरू थिचिरहन्थी । मियाको आफ्ना स्तनहरू फुत्त बाहिरनिस्किने गरी थोरै अगाडि नुही ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मेरा चाकमा उभिने प्रयास गर्ने हो कि ?” आरिताले भन्यो ।“तिमीले तिनलाई बिस्तारै खुट्टाले थिचे हुन्न र ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अहँ, म त्यसो गर्न चाहन्नँ ... साचिकोलाई त्यसो गर्न भन्छु।क होची छे र उसका गोडा साना भएकाले उसले राम्ररी थिच्छे ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“उ बच्ची छै । उसले लाज मान्ली ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मलाई पनि लाज लाग्छ,” साचिको मार्थेभन्दा दुई वर्ष रमार्थेको प्रेमीभन्दा एक वर्ष कान्छी रहेको कुरा सोच्तै उसले भनी । तरत्यसले के फरक पार्छर ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तपाईं बाजी हारेकाले आउनु नभएको होइन त ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आनम्न्ट रेप थव्ककि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ए, त्यो क्रो,” बूढोले फनक्क टाउको फर्काउने कछ्वा जस्तैआफ्नो टाउको फर्काएर भन्यो । “होइन, म ता सारै टाउको दुखेर पोनआएको ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यसो भए तपाईंकहाँ मालिस गर्न आउने महिला बढी मन परेरहोला ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अँ... हो कि क्या हो । औ, मैले बाजी हारेकाले तिमी मलाईआफ्नो पाखुरामा टाउको अड्याएर सुत्न दिन्नध्यौ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ए, केही छैन । म सुत्न दिन्छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आरिता बुढ्यौलीमा आफ्ना गोडा र तिघाको मालिस गराउनुअधवा उसका स्तनले आफ्नो मुख ढाक्न्‌ बढी उपयुक्त बसिबियाँलोभएकाले त्यहाँ आउने गरेको मियाकोलाई राम्ररी थाहा थियो । व्यस्तबृढाले मियाकोको घरमा बिताउने यी सन्तोषजनक समयलाई&#039;कमाराको मृक्ति&#039; भन्ने गर्थ्यो । ती शब्दले मियाकोलाई आफ्नै दासताकोझल्को दिन्थे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“सूतीको किमोनो लाए नुहाएपछि रुघाखोकी लाग्न सक्छ ।धन्यवाद, पुग्यो,” आरिताले कोल्टो फेर्दै भन्यो । उसले अपेक्षा गरेझैंआफूले पाखुराको तकिया बनाई सुत्न दिने क्रो प्रभावशाली रह्यो। कमालिस गर्दागर्दै थाकिसकेकी थिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“जे होस्‌, नीलो ह्याट लाएको मानिसभझैं कसैले पछ्याउँदातिमीलाई कस्तो लाग्छ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आहा, धेरै मज्जा लाग्छ । त्यसमा उसको ह्याटको रडको कुनैमतलब छैन,” उसले जानाजानी फुरुङ्ग भएर बोली ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हो, मलाई लाग्छ तिमीलाई कुनै मानिसले पछ्याएसम्म त्यस(रङ)को कुने महत्त्व हुँदैन, तर . . .”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अस्ति एउटा नौलो मानिसले मलाई छिमेकको औषधीपसलसम्मपछ्यायो र त्यस घटनामा मेरो ह्यान्डब्याग हरायो । म डराएकीथिएँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के रे ? एक सातामा दुईदुई जनाले पछ्याएका ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मियाकोले आरितालाई आफ्नो पाखुरामा टाउको अड्याउन दिँदैसहमतिमा टाउको हल्लाई । बाहिर घुम्न जाँदा आफ्नो ह्यान्डब्यागहराएकोमा बूढालाई ताचुझैं कुने आश्चर्य लागेन । उसलाई अर्कोमानिसले पछ्याएकोमा औधी आश्चर्यजनक लागेर अरू क्राको शड्कैगर्न भुलेजस्तो थियो। उसको आश्चर्य भावले मियाकोको मनमाआनन्दको लहर पैदा गप्यो । आरिताले आफ्नो अनुहार उसका स्तनमागाडेर तिनका न्याना आकारलाई आफ्ना हातले आफ्नो निधारमा थिच्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मेरो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठकम्न् २९ ल्व्क्कि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हो, तपाईंको,” मियाकोले बच्चासरि झट्ट जबाफ दिई र बूढो,फुलेको कपाललाई नियाल्दै स्थिर पल्टिरहँदा उसका आँखामा आँसुटलपलाउन थाले । उसले बत्ती निभाई । अँध्यारोमा उसको ह्यान्डब्यागटिप्ने मानिसको तैरिरहेको अनुहार देखियो, त्यो अनुहार जुन उसलाईपछ्याउन निर्णय गरेलगत्तै रुन खोजेजस्तो थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आत्था ...” क कराएको हुनु पर्छ । एकदमै नसुनिने भए पनिमियाकोलाई आफूले त्यो आवाज पक्कै सुनेजस्तो लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
र उसले आफ्नो मनको आँखाले त्यो मानिसलाई आफूतिर फर्केरहेर्न भनी रोकिएको देखी र झिमिक्क गर्दैमा उसको कपालको चमक,उसका कान तथा घाँटीनेरको अङ्गको चमकले त्यो मानिसलाई निकैदुखी तुल्यायो र मूर्च्छा पर्नुअगावे उसको हृदयबाट त्यो दबिएको क्रन्दननिस्कियो । उसलाई कराउँदै गरेको सुनेर मियाकोले फर्केर उसको दुखीअनुहारलाई हेरी र ठीक त्यातखेरै उसले आफूलाई पछ्याउने निर्णयगप्यो। क उदास देखिन्थ्यो, आफ्नै संसारमा डुबेझैँ । मियाकोलाईकभित्रको अँध्यारोपन फुत्केर आफूभित्र पसेको अनुभव भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मियाकोले सुरुमा एकपल्ट फर्केर हेरेकी मात्र थिई । उसले फेरियताउति हेरेकी थिइन । न उसले त्यो मानिसको अनुहारै सम्झिनसक्थी । उसले अझ पानि अँध्यारोमा आफ्ना आँस्‌ थाम्न प्रयास गर्दैगरेको उसको धामलो अनुहार तैरिरहेको देखी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमी बदमास छ्यौ, हैन त ?” केहीबेरपछि आरिताफतफतायो । मियाकोले कुनै उत्तर दिइन, किनभने आँसुले गर्दा उसकोघाँटी अवरुद्ध थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमी सैतान आइमाई हौ । त्यतिविध्न लोग्नेमानिसले पछ्याउनेकुरा सोचौं त ... के तिमीलाई आफैँसँग डर लाग्दैन ? तिमीभित्र कुनैसैतान (द्रात्मा) लुकेर बसेको हुनुपर्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ऐया !” मियाको कक्रक्क परी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकपल्ट वसन्तको प्रारम्भमा आफ्ना स्तनहरू दुख्न थालेकोउसले सम्झी । उसले पहिलेको आफ्नै निश्चल नग्न शरीरलाई हेर्नसकेको अनुभव गरी । क उमेरभन्दा सानो देखिए पनि शारीरिक रूपलेउसले पूर्ण नारीत्व प्राप्त गरिसकेको अनुभव गरी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तपाईं कति निष्ठुरी हुनुहँदो रहेछ ! यो तपाईंको न्युराल्जियालेगर्दा होला ।&amp;quot; उसको मन अन्तै बरालिइरहेको थियो । उसले कसरीएउटी सुशील केटी आफ्नो शरीर फेरिएसँगै निष्ठुरी हुन पुगेकी रहिछभनी घोरिइरहेकी थिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“किन निष्ठुरी भनेकी ?” बृढो आरिताले सीधा जबाफ दियो ।&#039;के कुने मानिसले तिमीलाई पछ्याउँदा रमाइलो लाग्छ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
0000)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“होइन, रमाइलो मान्दिनँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तर तिमीले आनन्द महसुस गरेँ भनेको हैन ? सायद म जस्तोबृढो मानिसको संसर्गले तिमीलाई टर्रो र प्रतिशोध भावले भरिपूर्णबनाएकोले होला ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“केप्रति प्रतिशोधको भाव ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मेरो विचारमा तिम्रो जीवन वा दर्भाग्यहरूको प्रतिशोध ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म यसमा रमाउँछु कि रमाउँँदनँ तर कुरो त्यो त्यातिसजिलो छैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अहँ, त्यो वास्तवमा सजिलो छैन । कसैको जीवनसँग बदलालिनु त्यति सजिलो छैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के तपाईं म जस्ती तरुणीसँग लागेर आफ्नो जीवनप्रति बदला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हुँ ?” बूढोलाई के बोलेँ जस्तो भयो तर भनिरह्यो । “अहँ, मैलेबदला लिन लागेको हैन । तिमीले त्यसै भन्ने जिक्री गर्छर्यो भने मेरोविचारमा बरु मर्माथ हमला गरी प्रतिशोध लिइँदै छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मियाको उसका कुरामा ध्यान दिइरहेकी थिइन । बृढालाई आफ्नोह्यान्डब्याग हराएको क्रा सुनाइसकेकीले त्यर्साभत्र ठूलै रकम रहेकोकुरा पनि उल्लेख गरिहालौंँला भन्ने सोचरहेकी थिई । आनि उसलेआफूलाई सोको क्षातपूर्ति गर्थ्यौ । तर दुई लाख येन निकै नै ठूलो रकमथियौ । उसले कति रकम माग्ने हो ? यर्द्याप त्यो रकम बुढाले ने दिएकोथियो । उसले सौ रकम आफूखुसी खर्चिन सक्थी किनभने त्यो उसकोजगेडा धन थियो । उसले आफ्नो भाइलाई विर्श्वावद्यालयमा भर्ना गर्नपैसा चाहियो भनेर त्यसका लागि बूढालाई ्साजलै “मलाई मद्दतगर्नोस्‌” भन्न सक्छे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनीहरू केटाकेटी हुँदै पनि मानिसहरूले प्राय: क र उसकोभाइले लिङ्ग परिवर्तन गर्नुपरेको थियो भन्थे । तर आफू आरिताकी प्रेमी(रखौटी) भएदेखि सम्भवत: सबै आशा मेटिइसकेकाले मियाको अल्छी रकाँतर भएर आएकी थिई । उसले “कसैले रखौटीको सुन्दरताबढाइचढाइ गर्न सक्छ तर श्वीमतीमा त्यो हुनु वा नहुनुले फरक पार्दैन”भन्नेजस्ता उखान पढ्दा अँध्यारोले उसलाई गर्ल्याम्मै छोपेसरि भएरनिकै दुखी हुन्थी । उसको अनुहारमा रहेको गर्वानुभूति लोप भइसकेकोथियो । कुनै लोग्नेमानिसले उसलाई पछ्याउँदा त्यो गर्व भाव फेरिउर्लेर आउँथ्यो तर मानिसहरूले आफूलाई सौन्दर्यकै कारणले मात्रनपछ्याउने करा मियाकोलाई थाहा थियो । आरिताले भनेझैँ कभित्रनिस्कन बल गरिरहेको कुनै दृष्टात्मा हुनुपर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“जे होस्‌, तिमी आगोसँग खेलिरहेकी छ्यौ,” बृढोले भन्यो ।“थाहा छ, लोग्नेमानिसहरूबाट त्याति विधि पछ्ययाइन्‌-सैतानलाईनिम्त्याउनुसरि हो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठदम्नङ १ ज्यन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हजुर, हुन सक्छ,” मियाकोले बिस्तारै जबाफ दिई । “सायदलोग्नेमानिसहरूबीच सैतानहरूको जमातै बस्छन्‌ तर ती तिनीहरूभन्दाफरक हुनुपर्छ र सायद उनीहरूको आफ्नै फरक संसार हुँदो रहेछ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के यो तिम्रो व्यक्तिगत अनुभव बोलिरहेको हो ? तिमीले तमलाई तर्सायौ । तिमीले कुनै हानि पुग्याउन सक्छयौ । म भन्छु, तिमीसामान्य मृत्यु वरण गर्दैनौ है ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मलाई हाम्रो परिवारका कुने केटीकेटीमाथि त्यस्तो घटना तघदने होइन भन्ने पीर लाग्छ । केटीझैँ सुशील मेरो सानो बारवर्षे भाइलेसमेत इच्छापत्र लेखिछाडेको छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“किन ? ”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“खालि एउटा सानो विषयलाई लिएर-उसको सबैभन्दा मिल्नेसाथीसरि आफू विश्वविद्यालय जान नपाउने हुँ कि भन्ने सोचेर मात्र ।सो घटना यसै वर्ष वसन्त याममा घट्यो । उसको साथी मिजुनो धनीपरिवारको हुनुका साथै प्रतिभाशाली पनि छ। उसले मेरो भाइलाईप्रवेश परीक्षामा सघाउने र जाँचमा उत्तर पनि लेखिदिनेसमेत बाचागप्यो । मेरो भाइ पनि स्कूलमा राम्रो छ तर क कात डरछेरुवा छ भनेउसलाई जाँचताका मूर्च्छा परुँला भन्ने लाग्यो र त्यस्तै भयो पनि । मेरोविचारमा जाँच उत्तीर्ण भएर पनि विश्वविद्यालयमा भर्ना हुन नपाउने हुँकि भन्ने पीरले क बढी आत्तिएको हन्‌पर्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमीले त्यो कुरो मलाई पहिले कहिल्यै भनिनौ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यो भन्नुमा मैले कुनै तुक देखिनँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकछिन रोकिएर उ फेरि भन्न थाली ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“उसको साथी मिजुनो चलाख र मिहिनेती दुवै भएकाले उसलाईकुनै समस्या भएन तर मेरी आमाले भाइको भर्नाका लागि पैसातिर्नुपत्यो । क दस पास गरेको खुसियाली मनाउन मैले उनीहरूलाईउएनोमा रात्रिभोजका लागि निम्त्याएँ र त्यसपछि हामी सबै जनाचिडियाखानामा राति पैयुँ फुलेको हेर्न गयौं अर्थात्‌ आफ्नो भाइ, मिजुनोर उसकी केटीसाथीसँग ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“होर?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले &#039;केटीसाथी&#039; भने पनि क अझ पनि पन्ध्र वर्षकी मात्रै छे ।हामीले पैयुँका फूलहरू हेरेको चिडियाखानामा मलाई एक जनालेपछ्यायो। क आफ्नी श्रीमती र छोराछोरीसँगै थियो तर आश्चर्य,उसले उनीहरूलाई छाडेर मलाई पछ्याउन थाल्यो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमी त्यस्तो काम किन गर्छयौ ?” प्रस्टतया आरिता र्चाकत थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म त्यस्तो गर्छु र ? ... मलाई मिजुनो र उसकी केटीसाथीप्रात पोईर्ष्या भयो र मलाई लाग्छ म उदास देखिन्थेँ, बस । यो मेरो दोष होइन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लदमनिक रे कवविकि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हो, यो तिम्रो दोष हो । तिमीलाई यसमा मज्जा लाग्छ, हेन ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यो निकै कठोर शब्द हो । म तपाईंलाई विश्वास दिलाउँछु किमलाई त्यसमा कहिल्यै मज्जा लाग्दैन । मैले आफ्नो ह्यान्डब्यागहराएको दिन यति डराएकी थिएँ कि मैले ब्यागले त्यस मानिसलाईहिर्काएँ अथवा मैले सो ब्याग उसैरमाथि फालेको हुनुपर्छ । म यति खिन्नथिएँ कि कुन कुरा गरेँ भनी ्याकन छैन । त्यस ब्यागमा निकै पेसाथियो-कम्तीमा मेरा लागि त्यो ठूलै रकम थियो । म ब्याङ्क गएकी थिएँर आफ्नी आमालाई दिन भनी केही नगद झिकेकी थिएँ । उहाँलेभाइलाई विश्वविद्यालयमा भर्ना गराउन बुबाको साथीले दिनुभएको क्रणतिर्नुपर्ने थियो ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यसमा काति पैसा थियो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“एक लाख येन ।” मियाकोले जानाजानी आधा रकम भनेर सासथामैर बसी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आम्मै । त्यो त निकै ठूलो रकम हो । त्यसो भए त्यो रकमकसैले चोरिदियो, हो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मियाकोले अँध्यारोमा टाउको हल्लाई । आरिताले उसका कुमहरूहल्लिएको र मुटु ढुकढुक गरेको महसुस गर्न सक्थ्यो । तर मियाकोलेभने आधा मात्रै रकम गुमाएकीमा लज्जित हुनाका साथै डराएकी पनिथिई । बृढाका हातले उसलाई बिस्तारै सुमसुम्याए । मियाकोलाई बूढालेकम्तीमा आधा रकम दिने क्रा यकिन भए पनि क फेरि रुन थाली ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कराउनु पर्दैन । तर तिमीले त्यस्तो काम गर्दै गयो भने कुनेदिन तिमीमाथि ठूलो समस्या आइपर्नेछ। तिमीले आफूलाईलोग्नेमानिसहरू पछ्याउने गरेको भनी गर्ने क्रामा निकै विरोधाभासदेखिन्छ । बुभ्यो ?” आरिताले उसलाई बिस्तारै हकाप्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उ मियाकोको पाखुरामा शिर राखेर निदाए पनि मियाको भनेसुत्न सकिन । गर्मी यामको आरम्भमा पर्ने पानी परिरह्यो । क त्यहाँपल्टिरहँदा उसको मनमा कै आयो भने आरिता सुतेको अवस्थामाउसको घुराइ मात्र सुनेर कसैले उसको उमेरबारे अडकल्न सक्तैनथ्यो ।मियाकोले आफ्नो पाखुरा हटाई । त्यसपछि मियाकोले आफ्नो अर्कोहातले आरिताको टाउकाको लागि सिरानी लगाइदिई, आरिताले आफ्नोटाउको उचाले पानि ब्यूँझेन । उसले भर्खरै आरिताले प्रयोग गरेको शब्दर आफूछेउ सुतिरहेको यस बूढो नारीद्रोहीमा झल्कने विरोधाभासबारेसोची जसले आफूलाई पूर्णतया एउटी नारीप्रति समर्पित गरिदिएकोथियो । मियाकोका विचारले उसलाई आफैँप्रति घुणा जगाइदिए । उसलेनारीहरूलाई काति घृणा गर्थ्यो भनी कसैले नभनीकनै उसले थाहापाइसकेकी थिई । छ तीसपैँतीसको हँदै उसकी श्रीमतीले ई्ष्याको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लदस्न्क हरे जचक्लिर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आवेशमा आएर आत्महत्या गरेकी थिई । त्यस बेलादेखि एउटीमहिलाको ईष्याले उसको मनमा कति गहिरो डोब पारेको थियो भनेकनै महिलाले थोरै पानि ईर्ष्या देखाउँदा आरिता हजार माइल परउछिट्टिएर बस्थ्यो । या त गर्वले या निराशाले, मियाकोले कहिल्यै पनिआरिताप्रति ईर्ष्या गरिन । तर महिला भएकीले ईर्ष्यासम्बन्धी कुनैवाक्यांश फुत्किहाल्थ्यो र आरिताले यस्तो नमीठो अनुहार लाउँथ्यो किउसको ईर्ष्या जमेर निराशामा परिणत भइहाल्थ्यो । तर बढाले ईर्ष्याकोडरले मात्रै नारीहरूलाई घृणा गर्ने भनेको होइन जस्तो लाग्छ। नउमेरले गर्दा त्यसो गरेको हो । स्वभावैले नारीप्रति द्वेष राख्ने मानिसप्रतिकसरी कुनै आइमाई ईर्ष्या महसुस गर्न सक्थी भनी मियाकोलाईआश्चर्य लाग्थ्यो र उसले आफूलाई आफ्नै भावनाका लागि दृत्कार्थी ।तर उमेरको भिन्नताबारे सोच्ता आरिताले महिलाहरूलाई घृणा अथवामाया गर्ने क्रा सोच्नु उसलाई हास्यास्पद लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मियाकोले आफ्नो भाइको साथी र उसकी प्रेमिकाबारे थोरैईष्यासाथ सम्झी । मिजुनोको माचीनामक एउटी केटी साथी भएकोक्रा उसले केइसुकेमार्फत सुनेकी थिई तर उसले पहिलोपल्ट त्यसकेटीलाई दस कक्षा पास गरेको खुसियाली मनाउँदा मात्र देखेकी थिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले कहिल्यै यस्तो निर्दोष सौन्दर्य देखेकी थिइनँ,” केइसुकेलेएकपल्ट भनेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“पन्ध्रकै उमेरमा प्रेमी पाउनु चाँडो भएन र ?” मियाकोलेजबाफ दिई अनि आफैँलाई सच्याउन गरेझैं थपी, “तर क्यालेन्डरवर्षको हिसाबले गन्दा कफ सत्र वर्षकी छे, होइन त ? अचेल पन्ध्रवर्षेकेटीहरूले प्रेमी बनाउन पाउने क्रा सोचौँ त ! ती कात भाग्यमानीहुन्‌ ! तर केइ, कुनै आइमाईमा हुने निश्छल सौन्दर्य भनेको के हो भन्नेकुरा तँ साँच्ची नै ब्‌भ्छस्‌ भन्ने लाग्छ ? मेरो विचारमा हेरेर मात्रै त्योबुझ्न सकिन्न जस्तो लाग्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ए हो, म बुभन सक्छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तर त्यसमा के हुन्छ ? मलाई भन त ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म त्यस्तो प्रश्नको जबाफ कसरी दिन सक्छु ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तैँले सोचेको हुनाले मात्रै पनि क चोखो र मायालु देखिन्छे रे,हो?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मलाई यकिन छ तपाईंले उसलाई देखेपछि बभनुहुनेछ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“महिलाहरू निष्ठुरी हुन्छन्‌, थाहा छ । उनीहरू तँ जस्तै नरमदिलका हुँदैनन्‌, केइ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सायद उसले आफ्नी दिदीले भनेको कुरा सम्झेर होला मियाकोपहिलोपल्ट माचीलाई भेटता केइसुकेभन्दा उसको साथीचाहिँ आमाको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हि क ता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घर हेरी अप्ठेरो मानी लजाउँदै थियो । मियाकोले आफ्नो भाइकासाथीहरूलाई आफूकहाँ बोलाउन नमिल्ने हँदा उसले आमाको घरमातिनीहरूलाई भेटने व्यवस्था मिलाएकी थिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म उसलाई पनि मन पराउनेछु, केइ,” मियाकोले पछिल्लोकोठामा उसको नयाँ युनिफर्म लाउन सघाउँदै भाइलाई भनेकी थिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ए, ला ! मैले पहिले मोजा लाउनुपर्ने रहेछ ।” केइसुके भइँमाबस्यो । मियाको आफ्नो नीलो मुजा पारिएको स्कर्ट फिँजाएर उसकोसामुन्ने बसी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मिजुनोलाई बधाई दिन नाबर्सिन्‌, है ? मैले उसलाई माचीलाईपनि सँगै ल्याउन भनेकी छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हजुर, पक्कै भन्छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मियाकोलाई आफ्नो लज्जालु भाइप्रति दुख लाग्यो किनभने उसलेपनि माचीलाई मन पराएको शङ्का भयो मियाकोलाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मिजुनोको परिवारले उनीहरूबीचको मार्यापरतीको कडा विरोधगरेर माचीका आमाबाबुलाई पत्र लेखे रे, थाहा छ । उनीहरूले त्यस्तोअपमानजनक पत्र पाएर निकै मुरमुरिएका थिए भनी मैले सुनेँ । माचीआज लुकीछिपी आउँदै छे,” केइसुकेले उत्तेजित भएर भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माचीले छात्रा हुँदा लाउने गरेकी माझीहरूको जस्तो चोलीलाएकी थिई । उसले विश्वविद्यालयमा भर्ना पाएबापत केइसुकेलाईबधाई दिन भनी मीठो बास्ना आउने पहेँलो लहरे फूलको थुँगा ल्याएकीथिई। त्यो थुँगा केइसुकेको डेस्कमाथि एउटा सिसाको गमलामासजाइयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मियाकोले उनीहरूलाई उएनो पार्कमा राति पेयुँका फूलहरू हेर्नसकून्‌ भनी त्यहाँको एउटा चिनियाँ रेस्टुराँमा निम्त्याई । पार्कमामानिसहरूको घुइँचो थियो, पैयुँका रूखहरू थाकत देखिन्थे र फूल फुल्नेहाँगाहरूमा मुना राम्ररी पलाइसकेका थिएनन्‌ । तैर्पान बिजुलीकोउज्यालोमा परेर फूलहरूको रङ गाढा गुलाफी देखिन्थ्यो। फकस्वभावतया शान्त भएर हो अथवा मियाकोलाई आदर गरेर हो माचीधेरै कुरा गरिरहेकी थिइन । क बिहान ब्यँझैदा उसको बारीमा फुलेकापैयुँहरू आकर्षक देखिन्थे भनेर भनी । तिनका पत्रदलहरू तल छाँटएकाअजेलियाका भ्याडर्भारि चारैतिर छारएका थिए । उसले केइसुकेको घरआउँदै गर्दा बाटामा अस्ताइरहेको सूर्य देखेको क्रा पानि भनी । त्यो सूर्यनरम गरी उसिनेको अन्डाको पहँलो भागभैँ खाडलबाहिर लहरैउभिएका पेयुँका फूलहरूमाझ तैरिरहेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनीहरू कियोमिजु हलको छेउमा रहेका अँध्यारा, एकलासकाढुङ्गे खुर्डाकलाहरू भर्दै गर्दा मियाकोले माचीलाई भनी, “मलाई लाग्छ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सायद म तीनचार वर्षकी हुँदी हँ ... म मेरो बाबा निको हुनुहोस्‌ भनीआफूले बनाएका कागजका सारसहरू यस हलमा झुन्ड्याउन आफ्नीआमासँग आएको सम्झन्छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माची मौन थिई तर खुडकिला झर्दै गर्दा मियाकोसँगै टक्कअडिएर कियोमिजु हलतर्फ हेरी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनीहरूका अर्गाड रहेको सङ्ग्रहालय जाने बाटोमा निकै भीडभएकाले उनीहरू चिडियाखानातर्फ मोडिए। तोसो विहारनाजकठूलठूला ढुङ्गा छांपएको स्थानमा राँका बलेको देखेर उनीहरू त्यतैलागे । बाटाछेउ ढुङ्गाका लालाटिनहरू टर्चलाइटमा पार्श्वछाया(सिलुएत)सरी उभिएका थिए । साथै पेयुँका फूलहरूका लामा हाँगाहरूउनीहरूमाथि पुगिरहेका थिए। फूल हेर्न आउने मानिसहरूलारलाटनपछाडिको खाली ठाउँमा घेरा हाली बासिरहेका थिए । उनीहरूरक्सी पिइरहेका थिए र समूहका माझमा मैनबत्तीहरू बालिरहेका थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनीहरूतर्फ कुनै जँडयाहा लडबडाउँदै आइरहेको बेला मिजुनोलेमाचीलाई आफ्नो पर्छाड लुकाएर रक्षा गर्थ्यौ । ती दुईभन्दा आलि पररहेको केइसुके उनीहरू र जँडचाहाबीच उभिएर दुवैलाई जोगाउनखोजेजस्तो गर्थ्यो । त्यो मानिसबाट जोगिन माचीले केइसुकेको कुमसमाउँदा मियाको केइसुके त्याति बहादुर भएको देखी चकित हुन्थी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टर्चहरूको उज्यालोमा माचीको रूपरड झन्‌ सुन्दर देखिन्थ्यो ।उसको अनुहार गम्भीर थियो, उसका ओठहरू कसिएका थिए र उसकागालाको रडले त्यो केटी मैनबत्तीको उज्यालोमा प्रार्थना गरिरहेकी हो किभन्ने लाग्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मियाको,” माचीले एक्कासि मियाकोको पर्छाड लुक्ते र कसँगटाँसँदै भनी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के भयो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मेरो स्कुलकी साथी ... क त्यहाँ, आफ्नो बुबासँग । उनीहरूमेरो घरनजिकै बस्छन्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तर तिमी किन लुकेकी ?” मियाकोले सोधी । उसले चारैतिरहेर्दै माचीको हात समाएर हिँडरही । उनीहरू दुवै जना महिला भएपनि मियाकोले माचीको हात छुँदा झन्डै खुसीले चिच्च्याई । कस्तोगजबको संवेदना भयो । उसले माचीको हात आफ्नो हातमा नरम रचिसो महसुस गरी । साथै युवतीको सौन्दर्यबाट निकै प्रभावित भई ।तर उसले याति मात्र भन्न सकी, “माची, तिमी खुसी देखिन्छयौ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माचीले असहमतिमा टाउको हल्लाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ए, किन होइन ?” मियाकोले माचीको अनुहारमा र्चाकत भएरहेरी । उसका आँखाहरू टर्चलाइटमा टल्किरहेका थिए । “के तिमीलेकहिल्यै दुख जानेको हुन सक्छ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
000)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माची चुप लागेर आफ्नो हात तल झारी । मियाको आफू अन्यकेटीसँग हातेमालो गरेर हिँडेको कति वर्ष बित्यो भनी सोचिरहेकी थिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले मिजुनोलाई पहिले पनि प्राय: भेटिरहेकी हुनाले त्यस रातउसको सारा ध्यान माचीमाथि केन्द्रित थियो र केटीलाई हेर्दै गर्दाउसको मनमा भयङ्कर गहिरो निराशा उर्लेर आयो जसले गर्दा आफूएक्लै र टाढ्वा जान पाए हुन्थ्यो भन्ने लाग्यो । उसले आइन्दा कतै जाँदाबाटो काटिरहेकी माचीलाई देखी भने एकपल्ट पछि फर्केर माचीकोटाढा जाँदै गरेको छावलाई नियालिरहौँला जस्तो लाग्यो। केमानिसहरूले मियाकोलाई उस्तै तर निकै बढी शक्तिशाली भावनालेगर्दा पछ्याइरहने हो ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भान्सामा कुनै भाँडो झरेको अथवा ठोकिएको आवाज सुनेरमियाकोको अतीत-स्मरण भङ्ग भयो र क फेरि वर्तमानमा फर्की ।मुसाहरू फेरि आए होलान्‌ । उठेर भान्सामा जाने कि नजाने भनी कअनकनाइरही । त्यहाँ एकभन्दा बढी म्‌सा हुनुपर्छ - सायद तीनवटामुसा पनि हुन सक्छन्‌ । मियाकोले तिनीहरूका साना, सर्लक्क परेका,त्यस यामको वर्षामा रुझेका शरीरहरूको कल्पना गरी त्यस बेला कआफ्नै चिसो कपालर्माथ हात राखेर बिस्तारै चिसो महसुस गर्दैत्यसलाई थिचिरही ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बूढो आरिताको छातीमा कुनै गरुङ्गो वस्तु भएझैँ घुम्यो। कनिकै डरलाग्दो गरी बटारिएर कक्रक्क पस्यो । मियाकोलाई लाग्योबूढाले फेरि क्नै सपना देख्तै छ र झर्किदै क अर्कापट्टि फर्की । बूढालाईप्राय: दुःस्वप्नले घेर्ने गर्थ्यो र मियाकोलाई यस्ता अवरोधहरूमा बानीपरिसकेको थियो । उसको घाँटी अँठयाउन लागेझैँ उसका कुमहरूतलमाथि गर्न थाले र उसले आफ पाखुराले कुने वस्तुलाई हटाउनखोज्दा मियाकोको घाँटीमा नराम्ररी लाग्यो। क बरबराइरह्यो ।मियाकोले उसलाई झकभक्याउनुपर्थ्यौ तर मियाकोको शरीर कक्रक्कपरेर अररिएको थियो र कभित्र हल्का क्र्र भाव जाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आह, आह !” बूढाले सपनामा मियाकोको शरीर छाम्न भनीआफ्ना पाखुरा हल्लाउँदै करायो । कहिलेकाहीँ क मियाकोसँग टाँसिनपुग्दा नब्युँझीकनै शान्त भइहाल्थ्यो तर आज राति उसको आफ्नैबरबराहटले उसलाई ब्यँझन बाध्य तुल्यायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आह !” आफ्नो टाउको हल्लाएपाछि क थकित भावलेमियाकोनजिक टाँसन पुग्यो । मियाकोको शरीर बिस्तारै नरम भएरआयो । यस्तो पटकपटक हुने द्‌:स्वप्नमा अभ्यस्त भइसकेकी मियाकोलेएकपल्ट भनेसरि फेरि भन्न पनि चाहिन, “के तपाईंले डरलाग्दो सपनादेख्नुभयो ? तपाईं पिरोलिइरहनुभएको छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
100)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर बूढाले अर्साजलो पाराले सोध्यो, “के मैले केही भनेँ र?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अहँ, भन्नुभएन । प्रिय, तपाईं खालि एउटा नराम्रो सपना देख्तैहुनुहुन्थ्यो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ए ! के तिमी सारा रात ब्यूँझै थियौ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हजुर प्रिय, म ब्यौँझरहेकी थिएँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“साँच्ची हो ? धन्यवाद ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बृढाले मियाकोको पाखुरा आफ्नो गर्दनमुनि तानेर ल्यायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“वर्षा याममा यो झन्‌ नराम्रो हुन्छ। त्यसले पनि सुत्ननसकिएको होला ।” उसले मानौं लाज्जत भएर भन्यो, “मलाई लाग्योमेरो बरबराहटले तिमीलाई ब्यँझायो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म सस्ैँ तपाईंका लागि ब्युँझन्छु, गहिरो निद्रामा भए पानि ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बढो आरिताको बरबराहट याति ठूलो थियो कि तल्लो तलामासुतिरहेकी साचिको पानि ब्यूँझिन पुगी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आमा ! आमा ! मलाई डर लाग्यो ।” साचिको तर्सेर ताचुकोजीउमा टाँसिई । ताचुले उसको कुम समाएर पछाडि धकाली ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“डराउनु पर्दैन । मालिक कराउनुभएको मात्रै हो। उहाँ पोडराउनुभएको हो, बुझिस्‌ । त्यसैले उहाँ कहिल्यै एक्लै सुत्न सक्नुहुन्न ।तँलाई थाहा छ उहाँले हाम्री मालिक्नीलाई भ्रमणहरूमा कसरी लानहुन्छर एकदमै मायापूर्वक व्यवहार गर्नुहुन्छ । उहाँ यसरी बिरामी नहुनुभएको भए, उहाँ जस्तो बूढा मानिसलाई स्वास्तीमानिसको आवश्यकतापर्दैनथ्यो होला। उहाँ खालि नराम्रा सपना देख्नुहुन्छ, र त्यसमाडराउनुपर्ने केही छैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
000&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एउटा भिरालो पाखामा छसात जना केटाकेटी कराउँदैउफ्रिरहेका थिए। तीमध्ये केही केटीहरू थिए र ती केटाकेटीकिन्डरगार्टन (नर्सरी स्कुल) बाट घर फर्किरहेजस्ता थिए । कसैकाहातमा लट्टी थिए भने नहुनेले पनि लट्टी लिइरहेजस्तो गरिरहेका थिए, रतिनीहरू सबै जना काप्रएर लट्टीमा बेस्सरी टेक्तै हौँडरहेका थिए ।उनीहरू यो सामूहिक गीत गाइरहेका थिए “बाजे, बजैको खुट्टा भाँचयो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाजे, बजैको खुट्टा भाँचयो ...” उनीहरूले गाउने शब्द तिनै मात्रथिए । केही कारणवश आफ्ना बालसुलभ क्याकलापमा मस्त तीकेटाकेटी अनौठो ढङ्गले गम्भीर देखिन्थे र बिस्तारै तिनका हावभाव बढीअतिरञ्जित र हिंसक हुन थाले । एउटी केटी यसरी फनफनी घुमी किक लाड ने हाली ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ऐया ! आह ! आह !&amp;quot; त्यस केटीले एउटी बूढी आइमाईले भौँआफ्नो पिठयूँ रगड्न थाली । तर क उठेर फेरि सामूहिक गीत गाउनथाली, “बाजे, बजैको खुट्टा भाँचयो ...”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीरको सिरानमा अग्लो किनार थियो जहाँ केही सल्लाहरू एक्लैनयाँ घाँसमा उभिएका थिए । रूखहरू अग्ला थिएनन्‌ र पुराना पर्दाअथवा सार्न मिल्ने ढोकाहरूमा देखिएका आकारका तिनका हाँगाबिँगावसन्त यामको साँझ आकाशमा लहलहराइरहेका थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटाकेटी पाखामा माझमा हिँड्दै क्षितिजतर्फ लागे । उदण्डकृयाकलाप गरिरहेका तिनीहरूलाई बाटामा कुद्ने कारबाट क्नै खतराथिएन किनभने बाटामा कम सवारी थिए र वारिपरि हिँडने मानिस पानिकमै थिए । अझ पनि टोकियोर्वारपरिका आवासीय क्षेत्रहरूमा त्यस्ताठाउँ भेटन सकिन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तल भिरालाको फेदबाट एउटी एक्ली केटी एउटा कुक्र लिएरउँभो उक्लिरहेकी थिई । होइन-उसलाई पछ्याउँदै एक जना अरू पनिथियो, गिम्पेई मोमोई तर फ केटीमा चुर्लुम्मै डुबेकाले उसलाई पूर्णमानिस मान्ने क्रामा शङ्का थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उ बाटाको एकापट्टि पेटीमा लहरै उभिएका गिड्क्गो रूखकापातहरूको छहारीमा हिँडरहेकी थिई । अर्कातिर एक बडेमानको घरकोढुङ्गे पर्खाल ठिङ्ग उभिएको र पुरै भिरालो बाटोमा फिँजिएको थियो ।त्यसको सामुन्ने सडकभन्दा निकै टाढा युद्धपूर्वको एक सामन्तको महलउभिएको थियो । यसको ढुङ्गे पर्खाल सानो किल्लाको खाडलभैं गहिरो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खाल्डोमा निर्माण गरिएको थियो । त्यस भवनको पर्खालपछाडि सानोसल्लाघारीतर्फ एउटा ढिस्को बिस्तारै उठेको थियो । सल्लाका हाँगाहरूराम्ररी मिलाइएको क्रा अझ हेर्न सकिन्थ्यो । सल्लाघारीमाथि होचो,सेतो, खपडा छाएको पर्खाल देखिन्थ्यो । सडकछेउका गिडक्गो रूखहरूअग्ला थिए र तिनका पहिला साना पातहरू हाँगाबिँगालाई लुकाउनसक्नेजतिको बाक्ला थिएनन्‌ । अस्ताउन लागेको सूर्य पातहरूलाई छेडदैचम्किरहेको थियो र हरेक पातको लम्बाइ र मुख हेरी यसले पहेँलाअँध्यारा छायाहरू परिरहेका थिए । केटी भने ताजा हरियो प्रकाशमानुहाएकी देखिन्थी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले सेतो नी स्वेटर र खस्रो सूती जिन्स भिरेकी थिई ।जिन्स भने खुइलिएको र खैरो देखिन्थ्यो तर पुछारमा चर्हाकला राताधर्काहरू थिए । उसले आलि छोटो जिन्स लाएकी थिई र उसको गोरोछाला कपडाको जुत्तामाथि चियाइरहेको देखिन्थ्यो। उसको कपालपछाडि हलका गरी पोनीटेल (घोडाकोकेशसज्जा)को रूपमा बाँधएको थियो जसले उसको लामो र कोमलघाँटी छर्लङ्ग देखाइरहेको थियो । कक्रले डोरी तानिदिँदा उसका कुमहरूअगाडि तानिन्थे । गिम्पेई उसको सपनीभौँ सौन्दर्यमा डुबेको थियो ।राता धर्का र सेतो जुत्ताबीच देखिने छालाको रडले समेत उसकोहृदयलाई भारी बनाइदिएर उ मर्न अथवा उसलाई मार्न चाहेजस्तोअवस्थामा पुगेको थियो । उसले आफ्नो गाउँमा बस्ने यायोई र आफ्नीछात्रा हिसाको तामाकीलाई सम्झियो तर उनीहरूको यस केटीसँग कुनेतुलना हुन सक्तैनथ्यो । यायोई गोरी भए पानि उसको छालामा कुनैचमक थिएन । हिसाकोको छाला कालो र चम्कलो भए पानि उसको रडसफा थिएन । न त्यसमा यस केटीको छालाभौँ दिव्य सुवास थियो ।गिम्पेई भित्रभित्रै छियाछिया भएको, शोकाकूल महसुस गरिरहेको थियो ।छ न कहिल्यै यायोईसँग बाल्यकालमा खेल्ने गरेको केटो हुन सक्थ्यो नहिसाकोलाई माया गर्ने शिक्षक हुन सक्थ्यो । वसन्त यामको साँझकोसमय भए पनि गिम्पेईका ्थाकत आँखामा आँस्‌ बिझाउन लागेकोथियो, मानौं क चिसो बतासमा हाँडरहेझै थियो र ठीकको उकालोभीरमा पनि उसलाई सास फेर्न गारो थियो । घँडामुनि कमजोरी र लट्टपरेकाले क केटीलाई भेट्टाउन सकिरहेको थिएन । उसले अझसम्मत्यसको अनुहार हेर्न सकेको थिएन । क खालि सँगै हिँडेर भिरालाकोसिरानमा पुग्न र बात मार्न चाहन्थ्यो ... सायद, कुक्रबारे क्रा गर्नचाहन्थ्यो । अरू कनै उपाय थिएन र यो मौका पान मिल्ने हो-होइनगिम्पेईलाई भरोसा भएन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले आफ्नो खाली हात उचालेर यतार्उात हल्लायो । क एकत हिँड्दै गर्दा आफूसँग फतफत गर्ने बानीस्वरूप त्यसो गरिरहेको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
० 0000 1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
थियो, अर्को कुरा आफू सानो छँदा मृसाको तातो लास टिप्ताखेरि भएकोअनुभूति सम्झेर पनि त्यसो गरिरहेको थियो । त्यस मुसाका आँखाचकित भएर हेरिरहेका थिए भने मुखबाट रगत बगिरहेको थियो ।तालरनाजक यायोईको घरमा बस्ने सान्‌ सिकारी कुक्रले त्यस मुसालाईभान्सामा समातेको थियो । कक्रले त्यसलाई आफ्नो बड्गाराले च्यापेरके गर्ने भन्ने मेसो नपाई उभिरहेको थियो । त्यतिकैमा यायोईकी आमालेकुकरलाई केही भन्दै उसको टाउकामा हिर्काएपछि उसले मुसालाईबिस्तारै त्यहाँ झारिदियो । मुसो काठको भइँमा झरेपछि कुक्रत्यसमाथि झम्टिनै लाग्दा यायोईले कुक्रलाई आफ्ना पाखुरामा च्यापी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अब, भयो ! स्याबास ! राम्रो कुक्र !” यायोईले त्यसलाईअँगालो हालेर गिम्पेईलाई मुसा लैजान भनी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले त्यसलाई तुरुन्तै टिप्यो र त्यसको मुखबाट एकदुई थोपारगत काठको भइँमा खसेको हेप्यो। यसको शरीरको न्यानोपनालेउसलाई कृतकत्यायो तर यसका आँखा शून्य र टवाल्ल हेरिरहेको हुँदापनि ती अझ पनि सुन्दर देखिन्थे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“छिटो, जा फालेर आफ !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कहाँ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तालमा फाले हुन्न र ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईले मुसालाई पुच्छरमा समातेर हल्लाउँदै तालको किनार-सम्म लगेर सकेसम्म टाढा र जोडले फालिदियो । अँध्यारो रातमा उसलेएकलासको, पानीमा छप्लाङ्ग गरेको आवाज सुन्यो र बर्तासँदै घरतर्फकददयो । यायोईले आफूलाई त्यस्तो काम गर्न लगाएकीमा उसलाईनराम्रो लाग्यो-जे भए पनि क बहिनी पर्ने, उसको ठूलो मामाकी छोरीमात्र थिई । त्यतिखेर क बारतेर वर्षको थियो र मुसाले लखेटतै गरेकोनराम्रो सपना देखेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफ्नो जिन्दगीमा पहिलोपल्ट मुसा समातेपछि कुक्रले हरेकदिन भान्सामा कडा नजर राख्न थाल्यो मानौँ उसले आजसम्ममासिकेको एक मात्र कला यही थियो । कुक्रलाई कसैले जे भने पनिउसले &#039;मुसा&#039; नै सुन्ने गर्थ्यो किनभने फ तत्कालै भान्सातर्फकदिहाल्थ्यो । त्यो नपाउँदा क कुनामा कुरेर बसिरहेको देखिन्थ्यो । तरज बिरालो थिएन नि । दराजबाट खम्बामाथि कद्दै गरेको मुसालाईहेरेर त्यो कुक्र बेस्सरी भुक्थ्यो । उसका आँखाको रङ फेरिएर आउँथ्यो,क बिरामी र विक्षिप्त देखिन थाल्थ्यो र गिम्पेईलाई त्यो जनावर रत्यसको ध्याउन्ना देखेर घणा लाग्न थाल्यो। उसले यायोईकोसिलाइबाकसबाट सियो र केही रातो धागो निकालेर त्यस कुक्रकोपातलो कानमा सियो घोचदिने मौका पर्खिरह्यो । उसले ठीक आफू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शदम्ब्छ ३१ बब&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिँड्नुअघि त्यो गर्नु सर्वोत्तम हने निर्क्योल गप्यो किनभने कुक्रकोकानमा सियो र रातो धागो झुन्डिएको देखेपछि घरका मानिसहरूलेनिकै हल्ला मच्चाउनेछन्‌ र यायोईले त्यसो गरेको हो भन्ठान्नेछन्‌ । तरगिम्पेईले त्यसको कानमा सियो छेडन खोज्दा कुक्र कराउँदै भाग्यो ।आफू विफल भएको बुझेर उसले सियो आफ्नो खल्तीमा लुकायो रघरतिर लाग्यो, यायोई र कुक्रको तस्बर कोप्यो, रातो धागाले अनेकठाउँमा सिलाएर आफ्नो डेस्कको घर्रामा राख्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईले म्‌सा समाउने क्‌क्रको सम्झनाको प्रसङ्ग जोडेर त्यसकेटीसँग क्रा गर्ने बहाना खोज्यो, उसले केटीले कक्र ल्याएको अथवात्यस्तै कुरा झिकेर पानि गफ चुदन चाह्यो तर उसलाई वास्तवमाकुक्रहरू मन पर्दैनथे र फसँग तीबारे गर्नलायक कुनै रोचक क्रा नैथिएन । जे होस्‌, आफू सारै नाजक गएमा त्यस केटीको कुक्रलेआफूलाई टोक्ने निश्चित थियो । तर त्यसैकारणले फ केटीसँगै हँडननसकेको भने थिएन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिँड्दै गर्दा उसले निहरेर कुक्रको घाँटीबाट डोरी फुकाइदिई ।फुक्का भएपछि त्यो पश्‌ केटीभन्दा अगाडि कुदेर गयो आन पछाडिकुदेर आई गिम्पेईको गोडामा पुग्यो । त्यसले उसका जुत्ता सुँघ्नथाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“जा !” गिम्पेई कराउँदै पर्छिल्तर उफ्रयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“फुक्‌ ! ए फुक्‌ !” केटीले कुक्रलाई बोलाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हे भगवान्‌ ! गुहार !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;फुक्‌ !” उसले फेरि बोलाउँदा कुकुर कुदेर आयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईको अनुहारको रङ उडिसकेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“छदा ! कस्तो डरलाग्दो !” गिम्पेई लडबडाएर थचक्क बस्यो ।उसले केटीको ध्यान तान्नका लागि जानाजानी बढी लडर्बडएकोदेखायो । तर उसको टाउको साँच्ची नै रिडाएकाले गर्दा आँखा चिम्मगप्यो । उसको मुटु निकै ढुकढुक गरिरहेको थियो र उसलाई बिसन्चोभएजस्तो भयो । हातमा निधार राखेर उसले थोरै आँखा उघाप्यो रकेटीलाई पर्छाड फर्केर नहेरीकनै भिरालोमाथि गइरहेको देख्यो र कृक्रभने फेरि डोरीमा बाँधएको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसलाई क्रोधयुक्त अपमानको तरङ्गले छोप्यो । उसलाई लाग्योसायद कुक्रलाई उसको कुरूप गोडाबारे थाहा भएरै उसका जुत्तासुँघेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“पख्लास्‌ । म यस कुक्रको कान पनि सिलाइदिन्छु,”फतफताउँदै फक भिरालोमाथि कदयो । तर केटीनजिक पुग्दानपुग्दैउसको रिसको पारो झरिसकेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लदमन्छ न रे क्वविकि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“माफ गर्नोस्‌, मिस !” उसले धोत्रे स्वरमा बोलायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटीले टाउको मात्र फर्काएर हेर्दा उसको पोनीटेल हल्लिएरघाँटीको घुचुक्क देखियो । गिम्पेईको पहँलो अनुहार बल्न थाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कस्तो राम्रो कुक्र रे&#039;छ, मिस । कुन जातिको कुक्र हो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“जापानी शिबा।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यो कहाँबाट आएको हो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कोशुबाट ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यो तपाईंको आफ्नै क्‌क्र हो, हैन त ? के तपाईं सस्रैं यसैसमयमा यसलाई घुमाउन लानुहुन्छ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हजुर ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“सधैँ यही बाटो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटीले जबाफ दिइन तर उसलाई गिम्पेईमाथि खासै शङ्कालागेन । उसले भिरालोमुनि फर्केर हेरेर केटीको घर कुनचाहिँ होलाभनी सोच्यो । उसलाई नयाँ पालुवामाझ शान्त र आनन्दमयी घरहरूहुनुपर्ने लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के तपाईंको क्क्रले मुसा समात्छ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटी त्यतिसारो हाँसिन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“बिरालाले पो मुसा समात्छन्‌, होइन र ? तर थाहा छ, कक्रलेपनि समात्छ । हाम्रो घरमा वर्षौ पहिले भएको एउटा कुक्र मुसासमात्न खप्पिस थियो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटीले गिम्पेईतिर हेर्दा पनि हेरिन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तर क्‌क्रले समात्ने मुसा तिनीहरूले खाँदैनन्‌ क्यार ? ... मत्यातिखेर साने थिएँ र मलाई मुसा फालेर आउन घिन लाग्थ्यो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईलाई त्यस्तो घतलाग्दो कथा सुनाउँदा आफैँमाथि आश्चर्यलाग्यो तैपनि मरेको मुसो उसको आँखैअर्गाडि झल्कियो । त्यसको मुखबाटरगत चुहिरहेको थियो र त्यसका सेता, कासएका दाँत प्रस्टै देखिन्थे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कुकुर एक थरी सानु सिकारी जातको थियो । यसका पातलाधनुभौँ गोडा थिए जुन कामिरहन्थे । मलाई त्यो क्रा मन पर्दैनथ्यो ।संसारमा मानवर्जातिर्जातकै कृकरहरूका जाति हुन्छन्‌ रे, होइन त ?तिमीसँग डुल्न पाउने यो कुक्र कात भाग्यशाली रहेछ !” सायद उसलेभर्खरेको डरलाई बिर्सेर होला गिम्पेई कुक्रमाथि निहप्यो र यसको ढाडसुमसुम्याउनै लागेको थियो कि केटीले डोरीलाई छिटो गरी दायाँबाटदेब्रे हातमा सारेर कक्रलाई गिम्पेईभन्दा टाढा पुग्याई । आफ्नो अगाडिकुक्रको आकार घुमेको देखेर गिम्पेईले केटीको गोडामा झन्डै छाँदहालिसकेको थियो । तर कुनै अभद्र व्यवहार गरिहाल्नुअगावै त्यो केटीहरेक साँझ आफ्नो कुक्र लिएर गिड्क्गो रूखको छहारीमा हिँड्न आउने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लकन्निक भै रे ल्क्क्कि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
र क भने नदीकिनारको सिरानमा कुनै गोप्य स्थानबाट उसलाईहेरिरहन पाउने क्राले उसको मनमा आशाको ज्योति बालिदियो । त्यसोगर्नु भनेको नयाँ घाँसमा नाङ्गै पल्टिनु जस्तो थियो, उसलाई त्यतिहाइसन्चो महसुस भएको थियो । हो, क केटीलाई नदीकिनारकोमाथिबाट हेरिरहनेछु र क ससघ्वैं भिरालोमा आफूतिर आइरहनेछिन्‌उसको खुसीको सीमा रहेन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मलाई माफ गर्नुहोला । तर तपाईंको कुकुर सुन्दर छ र मलाईकक्रहरू मन पर्छ म मुसा समात्ने क्क्रहरूलाई मात्र सहनसक्तिनँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसको कुनै प्रतिक्रिया भएन । नदीकिनारको मुनि पुगेर केटीआफ्नो कुक्रसँगै नयाँ घाँसमा उक्ली । ढिस्काको पारिपट्टि एक जनाछात्र देखियो । केटीलाई केटाको अभिवादन गर्न हात बढाएको देखेरगिम्पेईलाई आघात भयो । के फक कुक्रलाई डुलाउन लाने बहानामाकेटासँग भेट्तै थिई ? गिम्पेईले के देख्यो भने केटीका काला आँखारसाइरहेका र मायाले चम्करहेका थिए । एक्कासि त्यो क्रा थाहा पाएरउसको दिमाग सुन्न भयो र केटीका आँखा कालो तालसरि देखिए । कत्यसका चोखा आँखामा पौडिन, कालो तालमा नाङ्गै नुहाउन चाहन्थ्योतर क निकै निरास पनि भयो । क निरास भएर किनारसम्म हिँडेरगयो र आकाशमा टवाल्ल हेर्दै नयाँ घाँसमा पाल्टरह्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यो विद्यार्थी मिजुनो थियो, मियाकोको भाइको साथी र केटी भनेमाची थिई । यो घटना मियाकोले माची र मिजुनोलाई केटो स्कूल पासगरेको उपलक्ष्यमा खुसियाली मनाउन र राति उएनोमा पैयुँ फुलेको हेर्ननिम्त्याएको करिब दस दिनअघिको हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मिजुनोलाई पनि माचीका काला आँखामा रसाएको उज्यालोसुन्दर लाग्यो । काला परेलाले तिनलाई पूरै ढाकेजस्तो देखिन्थे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म बिहान पहिलो वस्तुको रूपमा तिमीले आफ्ना आँखाउघारेको हेर्न चाहन्छु,” मिजुनोले उसका आँखालाई प्रशंसापूर्वक हेर्दैभन्यो । उसलाई आफू तिनमै डुब्न थालेजस्तो लाग्यो । “तिमी ब्यँझँदाती कति सुन्दर देखिन्छन्‌ भन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मेरो विचारमा निदाउरा देखिन्छन्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“पक्का त्यस्ता देखिन्नन्‌ । माची, म ब्युँझनेबित्तिकैको क्षणमातिमीलाई नै हेर्न चाहन्छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माचीले टाउको हल्लाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“स्कूलमा म कम्तीमा ब्यँझेको दुई घन्टापछि हेर्न पाउँछु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमीले सो क्रा पहिले पनि भनिसकेका छौ र म ब्यँँझँदा पनित्यही “दुई घन्टाको समयबारे&#039; सोच्तछु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
00&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यसो भए त्यतिखेर तिम्रा आँखा निदाउरा देखिन्नन्‌ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मलाई थाहा छैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कै जापान आश्चर्यजनक छैन ? माने तिमी जस्ता मायालु,काला आँखा भएका मानिसहरू पाउनु ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसका काला आँखाले उसका ओठ र आँखीभौँको सौन्दर्यबढाउँथे । उसको कपाल पानि आँखाको रडसँग पौँठेजोरी खेल्दै टिलिक्कर्टाल्कएजस्तो थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमी घरबाट हिँड्दा कुक्रलाई डुलाउन लगेको भनी भन्याछ्यौ ?” मिजुनोले सोध्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अहँ, भनिनँ । तर मेरो साथमा कुक्र छ र मेरो लवाइबाट कुराबुझिन्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिम्रो घरको यातिसारै नाजक भेटनु खतरापूर्ण हुँदैन र ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म आफ्नो परिवारलाई ढाँटनु राम्रो मान्दिनँ । मैले कुक्रनल्याए, बाहिर जान पारउँँदन॑ँ। म जसोतसो उम्केर आए पानिउनीहरूले म कहाँ गएको भनी साजलै अडकल्न सक्छन्‌ किनभनेफर्किएपछि म लज्जित महसुस गर्नेछु । तर सायद मेरो भन्दा तिम्रोपरिवारले अनुमति दिन बढी इन्कार गर्ला जस्तो छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यसबारे करा नगरौँ । हामी दुवै जना आआफ्नो घर फर्कनुपर्छतर हामी यहाँ भइन्जेल तिनीहरूलाई सम्झिनु व्यर्थ हुनेछ । मेरोविचारमा खालि कुक्रसँग निस्केकी हुनाले तिमी लामो समय यहाँ बस्नसक्तिनौ, कि कसो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माचीले टाउको हल्लाई । ती दुई ताजा घाँसमा बसे र मिजुनोलेकुक्रलाई आफ्नो काखामा राख्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अब त फुकुले पनि तिमीलाई चिन्न थालेको छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कुक्रहरूले बोल्न सके उसले घरमा गएर कुरा लाउँथ्यो होलार हामी एकअर्कालाई कर्दाप भेटन सक्तैनथ्यौँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“भेट्न नसके पनि म कर्थे । जे होस्‌, मलाई यकिन के छ भनेसबै क्रा मिल्नेछ। मैले तिम्रो विरशश्ववद्यालयमा भर्ना हुने निधोगरिसकेकी छु। अनि फेरि हामी एकअर्कालाई &#039;दुई घन्टाको समयमा&#039;भेटन सक्छौँ, होइन त ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुई घन्टाको समयमा&#039; ” मिजुनो फतफतायो ।“मेरो विचारमा हामी दुई घन्टा पर्खनै नपर्ने गरी व्यवस्था मिलाउनसक्छौँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मेरी आमालाई हाम्रो भेटघाटको क्रा धेरै चाँडो भएजस्तोलाग्छ र त्यसैले हामीलाई विश्वास गर्नुहुन्न । तर मैले तिमीलाई चाँडोभेटन पाएकीमा खुसी छु । सारै सानी हुँदै तिमीलाई भेटन पाएकी भए&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शरक्निक नश. ल्व्व्किक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पो हुन्थ्यो जस्तो कल्पना गर्दछु । मैले तिमीलाई प्रार्थामक विद्यालयमाभेटेकी भए जाति सानी भए पानि पक्कै तिमीलाई निकै चाहन्थेँ होला ।म सानी हँदी उनीहरूले मलाई बुई चढाएर यहाँ भिरालोसम्म बोकेरल्याउँथे र किनारमा खेल्न छाडिदिन्थे । तिमी सानु छँदा कहिल्यै यहाँआयौ र ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अहँ, आइन त ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“साँच्ची आएनौ ! म प्रायः सोच्ने गर्छु कि म सानी हुँदीतिमीलाई यस भिरालोमा भेटेँ होली । सायद त्यसैले मैले तिमीलाईअहिले जाति नै माया गर्न थालेकी छु...”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मलाई सानु छुँदा यहाँ आएको भए हुन्थ्यो भन्ने लाग्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म सानी हुँदी अपररिचतहरूले मलाई सारै प्यारी ठानेर उचालेरअँगालो हाल्थे । तिनताक मेरा आँखा झन्‌ ठूला र बाटुला थिए ।” माचीफर्केर मिजुनोलाई आफ्ना ठूला, काला आँखाले हेरी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“केही समयअघि मार्ध्यामक विद्यालयहरूले ठीक परीक्षासकेर्पाछको समारोह गरिरहेको बेला म कुक्रलाई डुलाउन लाँदै थिएँ ।यस भिरालाको फेदमा दायाँ फर्कदा एउटा खाडल आउँछ जहाँ डुङ्गाभाडामा पाइन्छ, तिमीलाई थाहा छु ? म त्यो बाटो हिँड्दै गर्दा मैलेत्यहाँ यस वर्ष पास गरेका जस्ता केटाकेटीहरूलाई देखेँ र उनीहरूहातमा पास गरेको प्रमाणपत्र मोडेर राखी डुङ्गामा बसिरहेका थिए ।मलाई उनीहरू यसरी समारोह मनाइरहेकोमा ईर्ष्या लाग्यो । केटीहरूहातमा प्रमाणपत्र बोकी डुङ्गाको रेलिडमा अढेस लाग्दै आफ्ना केटासाथीहरूलाई हेरिरहेका थिए । मैले प्रार्थामक विद्यालय छाड्ने बेलामातिमीलाई भेटेकी थिइनँ । मलाई लाग्छ त्यतिखेर तिम्रो अर्की ने केटीसाथी थिई क्यार ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“होइन । म कुनै केटीसँग बाहिर डुल्ने गर्दिनथेँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
«हो र ? ...” माचीले आफ्नो टाउको यताउता ढल्काई । “थाहाछ, न्यानो हुनुअघ पानी जमेको खाडलमा निकै जङ्गली हाँस हुने गर्छन्‌र ढुङ्गाहरू त्यहाँबाट हिँड्छन्‌ । मलाई एकपल्ट हिउँमा बस्ने हाँस किपानीहाँस बढी चिसो हुन्छन्‌ भनी घोरिँदै गरेको सम्झना छ। मैलेसुनेकी थिएँ कि ती दिउँसो सिकार हुनबाट जोगिन यहाँ आउँथे रसाँझपख मूल पहाड र तालमा उडेर जान्थे ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“भलाई त्यो थाहा थिएन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले मई दिवसमा गाडीहरू गुड्ने बाटामा राता झन्डाफहराइरहेको देखेकी छु। बाटाछेउका गिड्क्गो रूखहरू सबैमा नयाँपालुवाहरू पलाएका थिए । पालुवाहरूमाझबाट सुन्तला जस्ता चहकिलाराता झन्डाहरू लामै बगेको देख्ता रमाइलो लाग्थ्यो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आकम्निङ २९ लवब्लि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनीहरू बसिरहेको स्थानभन्दा तलको खाडल साँझमा गल्फखेल्नेहरूका लागि अभ्यासस्थलका रूपमा भरिसकेको थियो । त्यहाँभन्दापर काला मूल भागहरू कालिला पातबीच आर्कीत बनाउँदै गरेकागिड्क्गो रूखहरू गाडी ओहोरदोहोर गर्ने बाटामा लहरै उभिएका थिए ।रूखहरूका माथि बेलुकीको क्षितिजमा गुलाफी कहिरोले घुम्टोओढाइदिँदै थियो। माचीले उसको काखामा रहेको कुक्रलाईसुमसुम्याउँदा मिजुनोले उसको हातलाई आफ्ना दुवै हातमा लिएरढाक्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“माची, म तिमीलाई पर्खिरहेको बेला कुने शान्त अकोर्डियनबाजाबाट निस्कने गीतको धुन मेरो मनमा आयो । म आँखा चिम्लेरपल्टिरहेको थिएँ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कस्तो खालको गीत ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अँ, &#039;किमिगायो&#039; भौ.”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“राष्ट्रिय गान ?” चकित भएर माची मिजुनोको नजिक टाँसिई ।“तर तिमी सेनामा भर्ती भएका त होइनौ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म त्यो गीत हरेक दिन ढिलो राति रेडियोमा सुन्ने गर्छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यसो भए मैले तिमीलाई &#039;शुभरात्रि&#039; भन्ने गरेको बेरमा सुन्छौहोला ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माचीले मिजुनोलाई गिम्पेईका बारेमा भनिन । वास्तवमा एकअपरिचित व्यक्तिले आफूसँग क्रा गरेको घटना पनि उसले बिर्सिसकेकीथिई । उसले राम्ररी हेरेकी भए गिम्पेईलाई नयाँ घाँसमा पल्टिरहेकोदेख्थी होली तैर्पान सायद उसलाई एकछिनअगावै आफूसँग बोलेकोमानिस भनी चिन्न सक्तिनथी होली । तर गिम्पेईले दुवैलाई नदेखिरहनसकेन । पल्टेको बेला उसको पिठ्यूँमा भइँको चिसो लाग्यो । यतिखेरमानिसहरू हिउँदबाट वसन्त यामको कोट फेर्ने क्रा सोच्ये तरगिम्पेईसँग कनै कोटै थिएन । उसले माची र मिजुनोलाई सामुन्ने हेर्नसकिने गरी कोल्टो फेच्यो । उसले उनीहरूको खुसीप्रति ईर्ष्या गर्नुभन्दाबढी त्यसलाई सराप्यो । उसले आफ्ना आँखा चिम्म गर्दा के देख्यो भनीती प्रेमीहरू बत्तिएर आगोका लप्काले खपलक्क निलेको र पछि यस्ताछालमा पुगे जसले उनीहरूलाई शीतलता प्रदान गर्न सक्तैनथे । उसलेत्यस परिकल्पनालाई उनीहरूको खुसीको अन्त्यको रूपमा देख्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिम्री आमा सुन्दर हुनुहुन्छ, होइन त, गिन-चान ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईले यायोईको स्वर सुन्यो । क तालको किनारमा ढकमक्कफुलेका पेयुँका रूखहरूमुनि केटीको छेउमा बसिरहेको थियो ।फूलहरूको छाया पानीमा देखिन्थ्यो भने चराहरू गाइरहेका थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मलाई तिम्री आमा करा गर्नुहँदा उहाँको दाँत देखिएको मन पर्छ ।&amp;quot;”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लननिछ ३७ लचक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सायद यायोईलाई आफ्नो बुबा जस्तो करूप मानिससँग त्यतिराम्री आइमाईले कसरी बिहा गरी होलिन्‌ भन्ने क्रा सोचिरहेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मेरो बुबाको तिम्री आमाबाहेक अरू कुनै भाइबहिनी छैन । उहाँप्रायः तिम्रो बुबा बितिसक्नुभएकाले तिम्री आमा तिमीलाई लिएर हाम्रोघर आउनुपर्छ भनी भन्नुहुन्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अहँ, म त्यो चाहन्नँ,” गिम्पेईले भन्यो र लाजले रातोपिरोभयो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले त्यसो भनेको भए उसलाई मन परेन किनभने उसलाईआफ्नी आमा गुमाएकोमा डर लागेको थियो अथवा यायोईभौँ सोहीघरमा बस्न पाउने राम्रो भविष्यको कल्पनामा उसलाई लाज लाग्यो ।सायद दुइटै भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिनताक गिम्पेईको घरपरिवारमा उसका बाजेबजै तथापारपाचुके भएकी जेठी फुपूका साथै उसकी आमा थिए । गिम्पेई दसवर्षको छँदै उसको बुबा तालमा डुबेर बितिसकेको थियो । उसकोबुबाको टाउकामा भएका चोटपटक देखेर मानिसहरूले उसलाई मारीलासलाई तालमा फालिदिएको अडकल निकालेका थिए । तर उसकाफोक्सामा पानी जमेकोले क डुबेको हुन सक्ने सम्भावना थियो । जेहोस्‌ उसको कसैसँग झगडा परेर त्यो मानिसले उसलाई तालमाधकालिदिएको हल्ला चलेको थियो । यायोईको परिवारले उसको बुबाकोमृत्युमा निकै क्षोभ प्रकट गप्यो किनभने उनीहरूको विचारमा उसलेआफूहरूलाई चोट पुग्याउन भनी आफैँलाई मारेको थियो-त्यो पानिअन्त नभई आफ्नै ससुरालीमा । दस वर्षको उमेरमा गिम्पेईले कोहीहत्यारा भए कहिल्यै छिप्न सक्तैन भन्ने अठोट गरेको थियो । मावलीजाँदा छ आफ्नो बुबाको लास फेला परेको ठाउँनजिकैको झाडीमालुकेर बटुवाहरूमाथि नजर राख्थ्यो। उसको तर्कना के थियो भनेहत्यारा कुनै अपराधबोध नगरी त्यस ठाउँबाट गुज्रन सक्ने छैन ।एकपल्ट एक जना मानिस एउटा गाई लिएर त्यहाँ आएको थियो रत्यस स्थलमा गाई उफ्रन थालेपछि गिम्पेई उत्तेजित भएर झन्डैनिसासिएको थियो । उसले त्यहाँको एक बुट्यानमा फुल्ने सेतो फूलआफूले टिपी घर लगेर कितापमा च्यापी आफ्नो बुबाको हत्यारासँगबदला लिने कसम खाने गरेको पनि सम्झियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मेरो बुबाको हत्या यस गाउँमा भएकाले मेरी आमा पनि फर्कनचाहनुहुन्न,” गिम्पेईले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यायोई गिम्पेईको अनुहारमा मृत्युरूपी पहँलोपना देखेर चकित भई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यायोईले उसलाई हाल उसको बुबाको प्रेतात्मा तालकाकिनारमा भौतारिरहेको गाउँले हल्लाबारे कुरा गरेकी थिइन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आन्स्न् 25 थकक्कि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गाउँलेहरूले उसको मृत्यु भएको घटनास्थलनजिक पुग्ने व्यक्तिहरूलाईपदचापहरूले पछ्याउने गरेको दाबी गर्थे तर उनीहरूले फर्केर हेर्दापर्छाड कोही हुँदैनथ्यो । उनीहरूले कूलेलम ठोकपछि पदचाप कम हुन्थेकिनभने भूत भने उनीहरूका पछाडि कुद्न सक्तैनथ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यायोईलाई पैयुँको रूखमा माथिल्ला हाँगाबाट तल्ला हाँगामाबिस्तारै झर्दै गरेको चरीको गीतले पनि भूतको पदचापको सम्झनादिलायो र उसले भनी, “घर जाऔँ, गिन-चान । तालमा छाया पर्नेफूलहरूले मलाई तर्साउँछन्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ती तर्साउने खालका छैनन्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमी तिनीहरूलाई राम्ररी हेर्दैनौ भनेर हो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तैपनि तिनीहरू सुन्दर छन्‌, हैन त ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यायोई उभिनासाथ गिम्पेईले उसको हात आफूतिर तान्योर कउसमाथि लडी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यायोई “गिन-चान !” भनी कराउँदै भागी । त्यसो गर्दा उसकोकिमोनोको स्कर्ट उघारियो । गिम्पेईले उसलाई पछ्यायो । क बेस्सरीसास फेर्दै रोकिई र गिम्पेईको कुम समाएर अँगालो हाली ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“गिन-चान, तिमी आफ्नी आमासँग हामीकहाँ बस्न आफ न ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अहँ, मलाई मन पर्दैन,” गिम्पेईले यायोईलाई आफ्ना पाखुरामाबेस्सरी कस्तै भन्यो र धुरुधुरु रोयो । यायोई र्चाकत भई, उसलाईहेरिरही ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिम्री आमाले मेरा बुबालाई तिम्रो जस्तो घरमा कहिल्यै बाँच्ननसक्ने बताउनुभएको थियो,” यायोईले केहीबेरपछि भनी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यातिबेर मात्र गिम्पेईले यायोईलाई अँगालो हालेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसकी आमा जन्मेको तालनेर रहेको यायोईको घर निकै सम्पन्नथियो र केही वर्षपछि मात्रै गिम्पेईकी आमा आफ्नो माइत फर्केपछि कटोकियोमा सङ्घर्षरत छात्रको रूपमा रहेको थियो । आनि गिम्पेईलाईआफ्नी आमाले कुनै नराम्रो घटनाले गर्दा अर्को जातिमा बिहा गर्नुपरेकोहोला भन्ने लाग्यो । क टोकियोमा रहँदा उसकी आमा क्षयरोगले मरी रआफूले पाउने थोरै खर्च पनि रोकियो । आन उसको हजुरबुबा बित्यो ।त्यसपछि गिम्पेईको परिवारमा एक जना फुपू र हजुरआमा मात्र जीवितरहे । उसले आफ्नी फुपूले पहिलो श्रीमानका तर्फबाट पाएकी छोरीलिएर आएकी छन्‌ भन्ने सुनेको थियो तर घरमा वर्षौदेखि चिठीनलेखेकाले फुपूले छोरीका लागि वर खोजेको वा नखोजेकोबारे उसलाईकेही थाहा भएन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईलाई माचीलाई पछ्याएर आएपछि नयाँ घाँसमा पल्टिनु रयायोईको गाउँको तालछेउ झाडीमा लक्नुमा खासै फरक लागेन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठलम्न्ट र, २ लव्क्कि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसको मनमा उस्तै उदासी छायो तर अब भने उसले बबाको हत्याकोबदला लिनेबारे गम्भीर रूपमा सोचिरहेको थिएन । कहीँ त्यो हत्याराभए पनि अहिलेसम्ममा छ बूढो भइसकेको होला । यदि कनै क्रूपबढाले उसलाई भेटेर आफूले हत्या गरेको तथ्यको साबिती बयान दियोभने के उसले आफ्नो आत्माबाट दृष्ट आत्मा निस्केर गएकोमा हल्कामहसुस गर्ला ? के आफ्नो पुन: योवन प्राप्त गरी त्यहाँ पल्टिरहेकायुवायुवतीभौँ बन्न सक्छ ? तालमा पर्ने जङ्गली पैयुँका फूलहरूको छायाउसको दिमाग पानि पस्यो । ताल भने विशाल ऐनार्सार देखिन्थ्यो ।त्यसको सतहमा कुने तरङ्ग थिएन । गिम्पेईले आँखा बन्द गरेर आफ्नीआमाको अनुहार झलझली सम्झियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईले आँखा उघार्दा त्यस विद्यार्थीलाई एक्लै किनारमाउभिरहेको देख्यो । केटी र उसको कुक्रले त्यो ठाउँ छोडिसकेजस्तोलाग्थ्यो । गिम्पेई जुरुक्क उठ्यो । फक केटीलाई ओरालो झर्दै गरेकोदृश्य हेर्न छुटाउन चाहन्तथ्यो । गिड्क्गो रूखका पातहरूमा गोधलिछाइसकेको थियो र बाटो सुनसान भइसकेको भए पनि केटीले फर्केरहेरिन । कुक्र भन्दा अगाडि डोरी घिसार्दै घरतिर लाग्दै थियो । केटीसानो, छिटो चालले सुन्दर ढङ्गले हिँडिरहेकी थिई । भोलिपल्ट साँझ फेरिपनि त्यो केटी उही भिरालो बाटो आउँछे भनी गिम्पेईले सुसेली मार्दैमिजुनोतर्फ हिँड्न थाल्यो । मिजुनोले उसलाई चिनिसक्ता पनि कसुसेलिरह्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मोज गरिरहेछौ, हेन त ?” गिम्पेईले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मिजुनो अर्कातिर हेरिरह्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“खुब रमाइलो भइरहेछ सोधेको क्या ? सुनेनौ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मिजुनोले गिम्पेईतर्फ आँखा फुकालेर हेप्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यति नाचढ । आफ बसेर क्रा गरौं । मलाई खुसी मान्नेमानिसहरूसँग ईर्ष्या हुन्छ, बस त्यात ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मिजुनो फर्केर जान थाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ए ! भाग्नु पर्दैन । आफ, करा गरौं भनेको होइन मैले ?”गिम्पेई करायो । मिजुनो फर्केर आयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म भागिरहेको छुइनँ । मैले तिमीलाई भन्नुपर्ने केही छैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के भयो ? के तिमीलाई म ठग्न वा त्यस्तै केही कर्ममा लागेकोमान्छे जस्तो लाग्छ ? आफ, बसौँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मिजुनो उभिइरह्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मलाई तिम्री केटी साथी गजबकी लागी ! मलाई थाहा छ,तिमीलाई त्यसो भनेको मन पर्दैन तर क साँच्चीकै राम्री छै, होइन त ?तिमी सारै खुसी हनुपर्ने हो !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बन्छ पि0 बब&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के कुरा गरेको ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म त कोही खुसी रहेको व्यक्त भए कसित क्रा गर्न चाहेकोमात्र हँ । साँचो भनूँ, क यति राम्री छे कि म उसलाई आज दिउँसोभरिपछ्दाइरहेको थिएँ । उसको तिमीसँग मिलन हुने थाहा पाएर छक्क परेँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मिजुनो चकित भएर गिम्पेईलाई हेप्यो तर पनि क आफ्नो बाटोलाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ए, आज करा गरौँ,” गिम्पेईले तत्कालै पर्छाडिबाट मिजुनोकोकुममा हात राखेर भन्यो । मिजुनोले उसलाई बेस्सरी हत्त्याइदियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“बेकुप !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईं किनारबाट तल कालोपत्रे सडकसम्म बल्डयाड खायो,उसको दायाँ कुममा चोट लाग्न पुग्यो । एकछिनसम्म र क पलेटीकसेर बाटामा बसिरह्यो ओनि कुम समाएर उाभयो। फक माथिकोकिनारमा चढेर हेर्दा त्यहाँ उसलाई आक्रमण गर्ने व्यक्ति थिएन । त्यहाँपुगे्पछ सास फेर्न हप्याकहप्याक गर्दै र छातीमा भारी महसुस गर्दैगिम्पेई त्यसमा टाउको गाडेर थचक्क बस्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले केटी हिँडिसकेपछि त्यहाँ एक्लिएको विद्यार्थीसमक्ष गएरकिन बोले हुँला भनी बुभ्न सकेन । उ सुसेली खेल्दै केटानेर जाँदाउसको मनमा वास्तवमा कुनै दुर्भाव थिएन । सायद उसले केटीकोसौन्दर्यबारे सँग क्रा गर्न चाहेको मात्र थियो र यदि केटाले बढीध्यान दिएर क्रा सुनेको भए गिम्पेईले उसलाई अहिलेसम्म केटीकोसौन्दर्यबारे नजानेको क्रा बताइदिन्थ्यो होला । तर प्रस्टतया त्यसरीएक्कासि र नराम्रो पाराले बोल्नु उसकै मूर्खता थियो । “मोज गरिरहेछौ,हैन त ?” उसले त्यो क्रा अर्कै ढङ्गले गर्न सक्थ्यो होला । आफूक्याविधि कमजोर भइसकिएछ भन्ने कुरा थाहा पाएपछि गिम्पेईकोगहभरि आँसु भरिए । त्यस विद्यार्थीको एक धक्काले उसलाई तटमुनिलडाइदिएको क्रा सोच्नु पनि हरे शिव ! क एक हातले ताजा घाँससमाएर र अर्काले दुखिरहेको कुम मल्दै बसिरहँदा गोर्धालको गुलाफीटलक उसका खुम्चिएका आँखामा बिस्तारै पर्न गयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यो केटी आफ्नो कुकर लिएर उही भिरालो बाटैबाटो फर्केरआउनु असम्भव थियो । क गिड्क्गो रूखको बाटो फेरि आउन सक्छेकिनभने त्यस विद्यार्थीले भोलिपल्ट नभएसम्म सँग सम्पर्क गर्न सक्नछैन । तर अब गिम्पेईले केटालाई रचिनसकेपछि केटो कहिल्यै त्योआरालोमा वा तटमा देखा पर्ने छैन । उसले व्यर्थमा तटर्वारपरि लुक्नेठाउँ खोज्यो । उसका आँखाअगाडि सेतो स्वेटर र रातो धर्का भएकोजिन्स भिरेकी केटीको छोव आयो । उसको मस्तिष्कमा गुलाफी आकाशछाएजस्तो भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लदम्ब्ट पिप कक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हिसाको ! हिसाको !” क अवरुद्ध स्वरमा करायो । उसलेहिसाको तामाकीको नाम भनेर बोलायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकपल्ट क हिसाकोलाई भेटन भनी ट्याक्सी चढ्न लाग्दासहरको आकाश सूर्यास्त हनुभन्दा धेरै अघ-दिउँसो करिब तीन बजे-नैगुलाफी देखिन थालेको थियो । आफूछेउको बन्द भ्यालबाट हेर्दाआकाश नीलो रडमा राङ्गएको थियो भने गाडी चालकको तल भझारिएकोभ्यालबाट आकाश फरक रडको देखिन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आकाश अलिक गुलाफी देखिन्न र ?” गिम्पेईले चालककोकमतर्फ ढल्केर सोधेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यस्तै देखिन्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चालकलाई त्यो कुन रडको हो भन्ने क्राले खासै फरक नपारेकोजस्तो लाग्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के त्यो गुलाफी देखिन्न र ? किन, आश्चर्य लाग्यो ? मेराआँखाले मात्र त्यस्तो देखेजस्तो लाग्यो, हो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“होइन, तपाईंको आँखाको दोष होइन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क अगाडि ढल्किँदा उसलाई चालकका पुराना कपडा ह्वास्स गनाए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसपछि क ट्याक्सी चढ्दा दुई थरी संसार भएको करानसम्झी रहँदैनथ्यो : एउटा पहँलो छाँटको गुलाफी र अर्को पहेँलोछाँटको नीलो संसार । उसले आफ्नो भ्यालबाट हेर्ने गरेका क्राहरूसायद नीलो रडका थिए तर त्यसको उल्टो चालकले तल झारेकोभययालबाट हेर्ने गरेका क्राहरू अलि गुलाफी देखिएका होलान्‌ । त्योसामान्य व्याख्या थियो तर गिम्पेई कुन क्रामा कायल भयो भनेआकाश, पर्खालहरू, बाटाहरू र सडकछेउका रूखका मूल भागहरू पनिवास्तवमा यही अनौठो गुलाफी रडमा पोतिएका थिए । वसन्त तथापतझरका मौसममा कतिपय ट्याक्सीहरूमा चालकको भयाल खुलारहने र पछाडिका भयालहरू बन्द रहने गर्छुन्‌ र आफू जाने हरेकठाउँका लागि ट्याक्सी लान गिम्पेईको साधनले नभ्याए पनिहरेकपल्टका सवारी अथवा यात्राले उसको अनुभूतिमा थप बलपुग्याइरहेको हुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छ यो कुरा मानेर बस्यो कि चालकको संसार न्यानो गुलाफी रयात्रुको संसार चिसो नीलो हुन्छ र गिम्पेई एक यात्रु थियो । वास्तवमा,संसार सिसाबाट हेर्दा बढी सफा देखिन्छ, सायद हावामा उड्ने धृलोलेटोकियोको आकाश र सडकहरूलाई गुलाफी रङ प्रदान गरिरहेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफ्ना कृहिनाको बलमा चालकको सिटपछाडि ढल्किएरगिम्पेईले आफ्नो गुलाफी संसारलाई नियाल्दै स्थिर वायुले प्रदान गर्नेन्यानोबाट दिक्क मान्थ्यो । क चालकर्माथ “ए !” भनी कराउँदै फझम्टन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नमम्छ पिर क्वक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चाहन्थ्यो । निस्सन्देह यो कनै कुराप्रति विद्रोह गर्ने अथवा त्यसलाईहुँकार्ने उसको इच्छाको प्रतीक थियो तर उसले चालकलाई अँठयाएकोभए मानिसहरूले उसलाई बौलाहा भन्ठान्थे । तैनि सहर र आकाशसामान्यतया दिउँसोको प्रकाश छँदै पानि हल्का गुलाफी देखिने हुँदागिम्पेईले आफ्नो डरलाग्दो अनुहार आफ्नो अगाडि अकस्मात ल्याउँदासमेत कुनै पनि चालक फदेखि त्रसित देखिँदैनथ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वास्तवमा, गिम्पेईसँग डराउनुपर्ने कुनै कारण ने थिएन । उसलेयी पहेँला, गुलाफी र नीला देखिने विपरीत खाले संसारहरूलाईसर्वप्रथम हिसाकोलाई भेट्न जाँदा अनुभव गरेको थियो र क सघ्रैँ यसैगरी चालकको पर्छाड ढल्केर बस्ने गर्थ्यौ । चालकका पुराना लुगालेहिसाकोको नीलो फनी पोसाकको सम्झना गराउने त्यस पहिलोसमयपश्चात्‌ उसले ट्याक्सीमा सघ्वैं हिसाकोका बारेमा सोच्ने गर्थ्यो ।हरेक चालकसँगै उसको गन्ध आउँथ्यो, चालकले नयाँ लुगा भिरेका भएपनि फरक पर्दैनथ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पहिलोपल्ट गुलाफी रङको आकाश फेला पारेको बेला गिम्पेईशिक्षक पदबाट निकालिएको थियो र हिसाकोले स्कूल फेरिसकेकी थिईजसले गर्दा उनीहरू लुकीछिपी भेट्न बाध्य भए । त्यसो हुनुअगावै पानियस्तो खतरा महसुस भएर उसले एकपल्ट हिसाकोसँग साउती गरेकोथियो, “यो कुरा मिस ओन्दालाई कहिल्यै नभन है । कहिल्यै होइन ! योहामी दुईबीचको गोप्य कुरा मात्र हो !” मानौं उनीहरू लुकीछिपी भेटनथालिसकेभैँ हिसाको लजाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यदि गोप्य क्रा कायम गर्न सके मीठो र आनन्ददायी हन्छ तरएकपल्ट पोल खुलिसकेर्पाछ बदलामा यसले हानि पुग्याउन सक्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गालामा खाल्डा परेकी हिसाकोले आँखा उठाएर गिम्पेईलाईकड्के नजरले हेरी । उनीहरू कक्षाकोठाबाहिरको हलको एक कुनामाथिए । बाहिर एउटी केटी पात भ्याम्म भएको पेयुँको रूखको हाँगामामानौँ कनै फलामे डन्डीमा उफ्रेझै उफ्रेर फनन्न फर्की । त्यो हाँगायसरी हल्लियो कि पातहरूको आवाज हलका भयाल हुँदै भित्रैसम्मसुनियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“प्रेमीहरूका अरू कुनै साथी हुँदैनन्‌ । ठयाप्पै कोही हुँदैन ! सृश्चीओन्दा पनि अहिले हाम्रो शत्रु-बाहिरी दुनियाँका आँखा र कान-भइसकी !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तर म उसलाई पक्कै आफ्नो क्रा भन्न सक्छु, होइन त ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अहँ ! भन्न हुँदैन !” गिम्पेईं चनाखो भई यताउति हेस्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“सहानुभूति राखेर के बिग्रेको छ ? भनी उसले सोध्दा मलाईदिक्क लाग्छ । मलाई लाग्छ म यो कुरा गोप्य राख्न सक्तिनँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शलन्निट पिरे लकक्कि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमीलाई कनै साथीको सहानुभूति किन चाहिन्छ र ?”गिम्पेईले कडकेर भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म उसलाई भेटेपछि पक्का कराउन थाल्छु । हिजो घर फर्केपछिमेरा आँखा रोएर सुन्तिसकेका थिए र मैले तिनलाई पानीले पखाल्नेप्रयास गरेँ । गर्मी याममा त फ्रिजमा बरफका ढिक्काहरू हुन्छन्‌ र कुनेसमस्या हुँदैन तर ”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“निरर्थक क्रा नगर ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तर म यो कुरा सहन सक्तिनँ ”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हेर तिम्रा आँखा ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिसाकोले केही नभनी आँखा उचाली। तर क उसलाईहेरिरहेकी थिइन । उसको हेराइले गिम्पेईले उसका आँखामा हेरोस्‌ भन्नेजनाउँथ्यो । तर केटीको शरीरप्रति सजग भएपछि क मौन भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिसाकोसँगको सम्बन्ध यहाँसम्म पुग्नुअघि हिसाकोको परिवारबारेजानकारी लिन उसले नोबुको ओन्दालाई समाउने विचार गरेको थियो ।जे भए पनि हिसाकोले भनेकी थिई-म ओन्दालाई सबै कुरा बताउनेगर्छु । तर ओन्दामा यस्तो केही थियो जसले गर्दा क समक्ष पुग्नगारो मान्थ्यो । उसलाई हिसाकोबारे केही सोध्दा त्यसले आफ्नो मनमाभएको कुरा खुस्किने हो कि भन्ने डर थियो । ओन्दा असल छात्रा थिईतर निकै स्वतन्त्र खालकी थिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकपल्ट आफ्नो कक्षामा गिम्पेईले ठूलो स्वरमा युकिचीफुकजावालिखित य्रोबल रिलेसतसिप्स बिट्नित मेत यान्ड दुमित (पुरुषट महिलाबीच यामाजिक सम्बन्ध नामक पुस्तकबाट केही पाठ पढेकोथियो । उसले त्यहाँको हास्यात्मक पड्क्तिबाट सुरु गच्यो, “दुई सय गजअथवा बढीको दूरीपछि दम्पती सँगसँगै हिँडन सक्छन्‌ ।” अनि क पढ्दैगयो : “उदाहरणका लागि, अहिले पनि श्रीमान्‌ बाहिर जान लाग्दाजवान श्रीमतीले बिछोड मनाउने अथवा युवा श्रीमानले बिरामी पत्नीकोराम्रो स्याहार गर्ने क्रालाई सास्सस्राले अनुचित र अपमानजनकठान्नेजस्तो व्यर्थको पुरावशेष क्रा सुन्न सकिन्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अधिकांश छात्राहरू गलल्ल हाँसे पनि ओन्दा हाँसिन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मिस ओन्दा, तिमी हाँसरहेकी छैनौ त, कसो ?” गिम्पेईलेभन्यो । ओन्दाले जबाफ फर्काइन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मिस ओन्दा, तिमीलाई यो क्रा हाँसउठतो लागेन ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अहँ, लागेन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अचम्म छ तिमी अरूसँग किन मिल्न सक्तैनौ । तिमीले नमानेपनि उनीहरूले प्रस्टतया यसलाई रमाइलो मानिरहेका छन्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म चाहन्नँ । मेरो विचारमा अरूसँग हाँस्नु नराम्रो होइन तरमैले मान्तकै लागि हाँस्नुपर्ने त छैन नि ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनरम्न्क पिट सयक्लिर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमी बित्यामा बहस गरिरहेकी छ्यौ,” गिम्पेईले िढिँदै भन्यो ।“मिस ओन्दाले यसलाई रमाइलो मानिन । के तिमीहरूलाई रमाइलोलाग्यो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कक्षामा मौनता छायो । गिम्पेईले अगाडि भन्दै गयो, “उसलाईयी पाठहरू रमाइला लागेनन्‌ । युकिची फुक्जावाले ती १५९६ मा लेखेतर लडाइँ सकिसकेर्पाछ पनि पढ्दा मिस ओन्दालाई त्यसमा मज्जालागेन । साँच्ची, मलाई आलिक अनौठो लागिरहेको छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक्कासि व्याख्या गर्दागर्दै गिम्पेईले झर्किएर भन्यो, “केतिमीहरूमध्ये कसैले मिस ओन्दालाई हाँसेको देखेका छौ ?”-सट्टामाउनीहरूले झन्‌ उल्किएर हाँस्तै जबाफ दिए :&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हजुर, मैले देखेकी छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले पनि देखेकी छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हजुर, क निकै हाँस्ने गर्छे ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पछि गिम्पेईलाई लाग्यो कि हिसाकोको व्यक्तित्वमा क्नै छिपेकोतत्वले ओन्दालाई तानेको थियो-उसमा सायद उही रहस्यात्मकआकर्षण थियो जसले गिम्पेईलाई उसलाई पछ्याउन र उसलाईगिम्पेईको पछ्याउने करा स्विकार्न बाध्य तुल्यायो । हिसाकोको नारीत्वमानौं अकस्मात्‌ बिजुलीको झडकाले झैं झकभझकाइदिएको थियो ।उसले गिम्पेईप्रति समर्पण गर्दा स्वयं गिम्पेई पनि कम्पित भयो र अन्यकेटीहरू पनि क जस्तै छन्‌ कि भनी घोत्लिंयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिसाकोलाई गिम्पेईको जीवनकी पहिली आइमाई भन्न साकन्छ ।उसकी चेली हँदाको समय, जुन बेला पनि उसले त्यसलाई माया गर्थ्यो,अहिले आएर उसको जीवनको आत सुखद भएजस्तो लाग्थ्यो । बुबाजीवित छँदै मामाकी छोरी यायोईसँगको बाल्यकालीन क्षाणक आवेगनिश्चय नै चोखो भाव भए पनि त्यसलाई मायाप्रेम भन्न सकिन्न ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईले एक थरी समुद्री माछाबारे देखेको सपना कहिल्यै बिर्सनसकेन । क त्यातखेर नौ अथवा दस वर्षको थियो र उक्त सपनाबारेनिकै प्रशंसा पाएको थियो । उसले सपनीमा आफ्नो गाउँनाजककोसमुद्रमाथि ठूलो जहाजसरि विमान तैरिरहेको देख्यो। तल लगभगमसीभौँ काला छालहरू थिए । तर अझ नाजकबाट नियाल्दा त्यो एउटाबडेमानको समुद्री माछो भएको पाइयो । त्यो माछौ छालमाथि उफ्रेरआकाशमा उडेको थियो र लगत्तै अरू माछा पनि आए सबैतिरमाछाहरू छालमाथि उाफ्ररहेका थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आहा ! कति ठूलो माछा !” गिम्पेई ब्यैँकझनुअघि कराएको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“राम्रो सपना, गजबको सपना, गिम्पेई । यसको अर्थ हो तिमीसंसारमा माथि उठनेछौ,” मानिसहरूले उसलाई भने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठ्म्न्ट पिर ल्व्क्कि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अघिल्लो दिन यायोईले उसलाई दिएकी तास्बरहरूको किताबमाएउटा विमानको चित्र थियो तर गिम्पेईले वास्तविक विमान कहिल्यैहेरेको थिएन र तिनताक त्यस्ता क्राहरू भए तार्पन अब ठूलठूलाहवाईजहाजहरू बनिसकेकाले ती सम्भवतः लोप भइसकेका छन ।गिम्पेईले देखेको विमान र माछासम्बन्धी सपना उसको अतीतको कुराभइसकेको थियो । उसले त्यस सपनालाई जीवनको सफलताभन्दायायोईसँग बिहा हुने शृभसाइतको रूपमा लिएको थियो। क सफलभएन । उच्चमार्ध्यामक विद्यालयमा जापानी भाषाको शिक्षकको पदमाकायमै रहेको त्यसको केही सम्भावना हुन्थ्यो । उसमा न विशाल समुद्रीमाछाभझौँ मानवताका छालबाट उम्कने शक्त थियो न फक अरूमानिसका टाउकार्माथ हावामा उड्न सक्ने मानिस नै थियो । उसकोभाग्यमा काला छालमा डुब्नु लेखिइसकेको थियो । हिसाकोका लागिउसको जीवनमा गोप्य भावहरू खेल्न थालेपछि खुसी एक क्षणका लागिआएको थियो । तर त्यसर्माथ दर्भाग्यको छाया त्यातकै चाँडो पर्न गयो ।ओन्दाको अभियोग गम्भीर थियो मानौँ गिम्पेईले भविष्यवाणी गरेभौँओन्दालाई बताइएको गोप्य क्राले वास्तवमा उनीहरूसँग बदला लिनथालेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कक्षामा घटेको त्यस घटनापछि गिम्पेईले हिसाकोतर्फ नहेर्नखोजेको थियो तर उसका आँखा आफ्नै पारामा ओन्दाको डेस्कतिरफर्केर जान्थे । उसले ओन्दालाई एकपल्ट स्कुलको खेलमैदानको कुनामाभेटन बोलाएर गोपनीयता कायम राख्न विनम्र पाराले आनि धम्क्याउँदैआग्रह गच्यो । तर उसले गिम्पेईलाई दोषी ठहराई । उसले त्यसो गर्नुकाकारण न्यायका लागि नभई फप्रतिको घुणा र उसको दोषसम्बन्धीप्रबल भावनाले गर्दा हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तपाईं नेतिकताविहीन हुनुहुन्छ,” ओन्दाले ठाडै भनी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कुरा त्यसको विपरीत रहेछु । तिमीलाई र केवल तिमीलाईभनिएको गोप्यता खोल्नुजत्तिको अनैतिक काम के हुन सक्छ र ?तिमीभित्र कुने बिखालु कीरा, कुनै बिच्छी घस्रिरहेको हुनुपर्छ !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले कसैलाई गोप्य भनेकी छैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर ओन्दाले लगत्तै प्राचार्य र हिसाकोका बुबालाई पत्र लेखी ।लेखक बेनामी थियो र पत्रहरूको अन्त्यमा &#039;बिच्छीका तर्फबाट&#039; भन्नेवाक्यांश लेखिएको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेई हिसाकोलाई उसैले रोजेको ठाउँमा लुकीछिपी भेटन बाध्यभयो । हिसाकोले आफ्ना बुबाले युद्धपर्छाड किनेको भन्ने घर पहिलेकोकाँठमा थियो तर युद्धअघिको सहरभन्दा टाढाको आवास आगाले सखापपारिदिएको थियो र आंशिक रूपले भत्केको गिट्टी अथवा रोडा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लर्निङ पिप लल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(करङ्क्रिट)को पर्खाल मात्र ठाडइरहेको थियो । हिसाको गिम्पेईसँग यसैपर्खालपछाडि दुनियाँको नजरबाट सुर्राक्षत भेटन चाहन्थी । युद्धमा ध्वस्तभएको बहत्‌ आवासीय क्षेत्रमा अनेक घरहरू निर्माण भएका थिए ।त्यहाँ केही मात्र खाली, भत्केका जग्गाहरू थिए । त्यस्ता भग्नावशेषमाएकताका खतरनाक र अनौठो वातावरण भएको मानिए पनि अहिलेत्यस्तो वातावरण थिएन र सो स्थानबारे मानिसहरूले बिर्सिसकेकाथिए । त्यहाँ पलाएको अग्लो घाँसले दुवै क्रालाई ओझेल पारिसकेकोथियो । हिसाकोलाई त्यहाँ एक प्रकारको सुरक्षा भावको अनुभव भएकोहोला किनभने फ केवल एउटी स्कूले छात्रा मात्र थिई र उक्त स्थानमाएकताका उसको घर हुने गर्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिसाकोका लागि गिम्पेईलाई चिठी लेख्नु गारो थियो भने उसकालागि हिसाकोलाई चिठी पठाउन्‌ अथवा घर वा स्कूलमा फोन गर्नु पनिअसम्भव थियो। न उसले कसैलाई उसकहाँ चिठी लैजान नै भन्नसक्थ्यो र त्यसैले क हिसाकोसँग लगभग पूर्णतया सञ्चारविहीन भएकोथियो । तर हिसाको गिम्पेईले खाली जग्गाको पर्खार्लाभत्र चकले कोर्नेगरेका क्राहरू पढ्ने गर्थी । उनीहरूले अग्लो पर्खालको मुनि आफ्नासन्देश लेख्ने सल्लाह गरेका थिए । त्यहाँ घाँसले छोपिएको लेखाइ कसैलेहेर्न सक्तैनथ्यो । स्वाभाविक छ कि त्यहाँ कुनै जटिल क्रा लेख्नसकिँदैनथ्यो र उसले हिसाकोसँग भेट्न चाहने समय र दिन जनाउनेअङ्ग मात्र लेख्न सक्थ्यो । तैर्पान यसले गोप्य सूचनापाटीको कामगरिरहेको थियो र कहिलेकाहीँ गिम्पेई हिसाकोले लेखेको करा पढ्नत्यहाँ आउँथ्यो । हिसाकोलाई भेट्ने समय मिलेको खण्डमा उसले खाससन्देश पठाउने अथवा तार पठाउने गर्थी तर गिम्पेईले समय र दिनधेरै अगावै पर्खालमा लेख्नुपर्ने र हिसाकोले सहर्मात गरी लेखेको सन्देशहेर्नुपर्ने हुन्थ्यो । उसर्माथ कडा निगरानी हुने गर्थ्यो र राति विरलैघरबाहिर निस्कन पाउँथी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईले ट्याक्सीमा पहिलोपल्ट गुलाफी र नीलो गरी दुई संसारफेला पारेको दिन भएको उनीहरूको जम्काभेट हिसाकोले जुराइदिएकीथिई । क पर्खालसँगैको घाँसमा निहरेर पर्खिरहेकी थिई । उसलेहिसाकोलाई एकपल्ट भनेकी थिई, “यस पर्खालको अग्लाइ हेर्दा तिम्राबुबा निकै पुरानो विचारका र अभैत्री स्वभावका व्यक्ति हुनुहुन्थ्यो जस्तोछ। मेरो विचारमा यसमाथि काँचका टुक्राहरू र माथि फर्काइएकाकीलाहरू पनि थिए क्यार ।” यसका वरिपरि बनाइएका नयाँ एकतलेघरहरूबाट पर्खर्लिभत्र हेर्न सकिन्नथ्यो । सायद नयाँ शैलीले गर्दा होला,पश्चिमा शैलीको एक मात्र दुईतले घर यात होचो थियो कि दोस्रोतलाबाट पानि निहरेर हेर्दा बगँचाको एक तिहाइ भाग मात्र देखिन्नथ्यो ।यस क्राबाट सचेत रहेकी हिसाको पर्खालनेरको भागमा बसेकी थिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लनस्न्क पि ज्च्क्लि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यहाँ कूनै ढोका थिएन । सायद त्यो ढोका काठको थियो र आगोमासखाप भइसकेको थियो होला । जग्गा बिक्रीमा नभएकाले गर्दा कोहीपनि उत्सुकतापूर्वक त्यहाँ आउने सम्भावना थिएन र गिम्पेई तथाहिसाको त्यहाँ दिउँसो तीन बजे पनि लुकीछिपी भेट्न सक्थे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यसो भए तिमी स्कूलबाट घर फर्कदै छ्यो, हो ?” गिम्पेईउसको टाउकोमा आफो हात राखी टुक्रुक्क बसेर उसलाई आफूतिरतान्यो अनि केटीका पहेँला गाला आफ्ना हातले समायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;थ्ेरैबेर भएको छैन । उनीहरू दिनहुँ मैले स्कुल छाडने समयबारेबुझिरहन्छन्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“थाहा छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले टेल अफ हेइके (हेइकेको कशषासम्बन्धी एउटा लेक्चरकालागि बस्नुपर्छ भने पनि मेरो परिवारले मलाई जान दिन्नन्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“साँच्चै हो र ? के तिमीले पर्खेको निकैबेर भइसक्यो त ! तिम्रोगोडा निदाए होलान्‌ ।” गिम्पेईले उसलाई आफ्नो काखामा उचालेर राख्यो ।दिनको उज्यालोमा लाज मान्ने हिसाको त्यहाँबाट फेरि चिप्लेर तल बसी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यो तपाईंका लागि हो...”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के हो ? पैसा ? कहाँबाट ल्यायो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तपाईंका लागि चोरेर ल्याएकी,” हिसाकोले आँखामा चमकल्याउँदै भनी । “यसमा सत्ताइस हजार येन छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिम्रा बाको पैसा हो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले यो पैसा आमाको कोठामा भेट्वाएँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मलाई यो पैसा चाहिँदैन । तिमी फर्काएर लैजा अन्यथा तिमीसमातिन्छयौ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“उहाँहरूले मलाई समाए भने म घरमा आगो लाइदिन्छु । मलाईत्यसको वास्ता हुने छैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“पागल नबन । जाबो सत्ताइस हजार येनका लागि एक करोडमोल पर्ने घर कसले जलाउँछ र ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आमाले बुबादेखि लुकाउनुभएजस्तो छ त्यसैले उहाँ यसबारेकुनै हल्ला मच्चाउनुहुन्न । थाहा छ, मैले यो निकै विचार गरेर मात्रैलिएँ । मलाई यो ल्याएको ठाउँमा फर्काएर राख्न बढी डर लाग्छ। मपक्का पनि काम्न थालेर स्मातिन्छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिसाकोले गिम्पेईलाई चोरेर ल्याएको पैसा दिएको यो पहिलोपल्टथिएन । यसबारे उसले उचालेको थिएन, केटीले आफैँ त्यो कदमचालेकी थिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तर म आफैँलाई धान्न सक्छु । मेरो विर्श्वावद्यालय पढ्ने एकजना साथी छे जो आरितानामक कम्पनीका अध्यक्षकी सेक्रेटरी छे।कहिलेकाहीँ आरिताले मलाई अध्यक्षीय भाषण तयार गर्न लगाउँछन्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनम्न्ट पिया ल्कक्कि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आरिता ? उनको पहिलो नाम के हो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“उनी औतोजी आरिता नाम गरेका एक बृढा मानिस हुन्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हे परमेश्वर ! उनी मेरो नयाँ स्कुलको सञ्चालक समितिकाअध्यक्ष हन्‌ । मेरा बुबाले श्रीमान्‌ आरितालाई त्यस स्कूलमा सरुवा गर्नआग्रह गर्नुभएको थियो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ए,होर?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तपाईं सञ्चालक सामतिका अध्यक्षले दिने भाषणहरू लेख्तैहुनुहुन्छ तर मलाई भने थाहा थिएन !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यही नै जीवन हो, होइन त ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हजुर, मलाई पानि त्यस्तै लाग्छ। थाहा छ, कहिलेकाहीँचहकिलो जून लागेका रातहरूमा जून हेरिरहँदा, मलाई लाग्छ तपाईपनि जून हेर्नुहुन्छ... र चिसो र बतास चलिरहेको बेला तपाईंएक्लैएक्ले आफ्नो अपार्टमेन्टमा रहनुहुँदा मलाई चिन्ता लागेर आउँछ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“सेक्रेटरीले मलाई भनेअनुसार बृढा आरिता एक थरी भयलेग्रस्त छन्‌ । सेक्रेटरीले मलाई भाषणहरूमा &#039;श्वीमती&#039; र &#039;बिहा&#039; जस्ताशब्द सकेसम्म कम प्रयोग गर्न भनेकी छे । उसले कन्या स्कूलमा दिइनेभाषणमा यी शब्दहरू घुस्न सक्ने अपेक्षा गरेकी होली । के भाषण दिँदाअध्यक्ष स्नायुरोगी जस्ता देखिन्थे र ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अहँ, मैले त्यस्तो ख्याल गरिनँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मेरा विचारमा उनी देखिँदैनथे । सार्वजनिक कार्यक्रममा तत्यस्तो देखिन्नथे,” गिम्पेईले आफैं टाउको हल्लायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“स्नायुरोगी । के भन्नुभएको ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“स्तायुरोगी पनि अनेक प्रकारका हुन्छन्‌ । हुन सक्छ हामी पनिस्तायुरोगी हौँ । बताएँ ?” गिम्पेईले भन्यो । हिसाकोका स्तन खोज्दैगिम्पेईले आँखा चिम्म गप्यो र उसको दिमागमा आफ्नो घरनजिककोगहुँको खेत आयो । किसानले प्रयोग गर्ने घोडामा पिठयूँ नाङ्गो पारेरबसेकी एउटी आइमाई गहुँको खेतसँगैको बाटोमा घोडा कृदाउँदै आई ।त्यस आइमाईले घाँटीमा अगाडि गाँठो परेको सेतो रुमाल बेरेकी थिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमी मेरो घाँटी निमाठेर मार्न सक्छौ ... म घर जान चाहन्नँ,”हिसाको कामुक स्वरमा फुसफुसाई । गिम्पेई आफ्नो एक हातकाऔँलाले उसको घाँटी अँठचाइरहेको पाएर र्चाकत भयो । उसले अर्कोहात उसको गला नाप्न प्रयोग गप्यो । त्यो नरम थियो, उसको औँलाकाटुप्पाले यसको वारपार घेरा बनाई छोए । गिम्पेईले पेसाको पोकोहिसाकोको लुगामा झाज्यो । केटीको भने स्तन तन्किएर क पछि सरी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमी ज्ञानी बनेर पैसा घर लैजा ... मलाई डर छकि यस्तोकाम गर्ने हो भने तिमी अथवा म कुनै अपराध गर्न पुग्छौँ होला । के&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आकम्न्क पि२, तमक्क&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ओन्दाले मलाई अपराधी भएको दोष लगाइन ? उसले आफ्नो पत्रमामैले यात धेरै झूटो बोलेँ र मेरो चरित्र यति अन्धकारमय छ कि मैलेपक्कै पनि केही गम्भीर अपराध गरेको हनुपर्छु भनी लेखेकी छे।तिमीलाई थाहा भएन र ? तिमीले आजभोलि उसलाई भेटेकी छ्यौ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अहँ, छैन । उसको कुनै चिठी पनि पाएकी छुइनँ । मलाई कमन पनि पर्दिन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेई केहीबेर शान्त रह्यो । हिसाकोले गिम्पेईलाई बस्नकालागि नाइलनको एक चारपाटे टुकडा ओछ्याइदिई। उसलेत्यसभित्रबाट भइँ चिसो भएको महसुस गप्यो । साथै चिसो घाँस तथाभझारपातको गन्ध पनि आइरहेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मलाई तपाईंले फेरि पछ्याइदिए हुन्थ्यो । मलाई मेसै नदिईपछ्याउनुहोस्‌ । म स्कूलबाट फर्कदै गर्दा तपाईंबाट पिछा गरिएको मनपराउँछु । थाहा छ, मेरो नयाँ स्कुल पहिलेभन्दा टाढा छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“र तिमी मलाई त्यो भव्य ढोकाअगाडि पहिलोपल्ट देखेजस्तोगर्लेक, होइन त ? तिमी मलाई फलामे ढोकाको अर्को पट्टिबाट हेरेरलजाउनेछदौ !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“होइन । म तपाईंलाई भित्र निम्त्याउनेछु ! मेरो घर यति ठूलोछ कि तपाईं भेटिनुहुन्न । म यसबारे विश्वस्त छु । मेरो कोठामा समेततपाईंलाई लुकाउन सक्नेर्जात ठाउँ छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईले आफूभित्र खुसीको लप्का उठेको महसुस गप्यो र छिट्टैने उसले केटीको योजनालाई व्यवहारमा त उताप्यो तर हिसाकोकोपरिवारले चाल पाइहाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसपछि महिनौँ र वर्षौंसम्म क र हिसाकोबीच दूरी रहिरह्यो ।तैनि अहिले त्यस छात्रले उसलाई तालको किनारबाट तलधकालिदिएपछि गोर्धालको हल्का लालिमालाई हेर्दै पल्टिरहँदा उसकोमुखबाट हिसाकोकै नाम फुत्क्यो । “हिसाको, हिसाको,” क टीठलाग्दोस्वरमा करायो । अपार्टमेन्टमा फर्केपछि उसले आफ्ना कम र घुँडाकापाङ्ग्रामा चोट लागेर रातै भइसकेको पायो : क घसारिएको किनारकोपाखो उसको आफ्नो लम्बाइभन्दा झन्डै दोब्बर थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोलिपल्ट साँझ गिम्पेईलाई गिड्क्गो रूख लहरै उभिएकोभिरालोमा त्यस केटीलाई फेरि हेर्न कृतकृती लाग्यो ! केटी भने उसकोपछ्याहटबाट ठ्याप्पै चिन्तित नभएजस्ती नै थिई, गिम्पेईले केटीलाईकसरी हानि पुग्याउन सक्छ र भनी दुखसाथ सोच्यो ! उसको दुखजङ्गली हाँस आकाशमा उडेपछिको दुख जस्तो थियो अथवासमयरूपी उज्यालो खोला बग्दै गएको हेर्दा उत्पन्न दुख जस्तो थियो ।उसको आफ्ने जीवन पानि भोलि अन्त्य हुन सक्छ र न यो केटी नैसदाका लागि सुन्दर रहिरहन सक्छे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्वव्क 90 ०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर गिम्पेईले अघिल्लो दिन छात्रसँग कुरा गरेर चिनजानगरिसकेकाले फक न गिड्क्गो रूखमुनि भिरालामा भौँतारिन सक्थ्यो नकेटाले केटीलाई पर्खबस्ने किनारमा गई बस्न सक्थ्यो । त्यसैले उसलेरूखैरूख भएको पेटी र एक सामन्तको बङ्गलाको बीच रहेको खाडलमालुक्ने निर्णय गप्यो । यदि कुनै प्रहरीले उसलाई सोध्यो भने उसलेआफ्नो गोडामा चोट लागेको र आफू रक्सी खाएर खाडलमा लडेकोअथवा कुने गुन्डाद्वारा त्यसमा फालिएको भन्न सक्थ्यो । मात्तिएको भन्नुबढी सुर्रक्षत बुझिएकाले सास गनाओस्‌ भनी गिम्पेईले घरबाटहिँडनुअघि अलिकति पिएर बाटा लागेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईले अघिल्लै दिन खाडल हेरेको थियो र त्यो उसलाई गहिरोलाग्यो तर भित्र छिरेपछि उसले त्यो चौडा तर निकै ्गहरो नभएकोपायो । त्यसको दुवै छेउ एकदम पक्की पर्खाल थिए भने भइँ पानि ढुङ्गालेछाएको थियो । ढुङ्गाबीचका पिराहरूमा घाँस उम्रेको थियो र गत वर्षकाकृहिएका पातहरू भइँमा पत्रैपत्र बनेर र्साडरहेका थिए । सडकछेउकोपर्खालमा टाँसिएर बस्ने हो भने माथि भिरालोबाट आउनेहरूले उसलाईहेर्न सक्तेनथे । क त्यहाँ बीसतीस मिनेट लुकेर बसिरहँदा उसलाईपर्खालको कुनै ढुङ्गालाई किटिक्क टोक्ने इच्छा जागेर आयो ! उसलेढुङ्गाहरूका बीच एउटा बैजनी फूल फुलिरहेको देख्यो र घास्रएर आलनजिक पुगेपछि उसले आफ्नो मुख खोली दाँतले थोरै टोकेर निल्यो !त्यो निल्न गारो पप्यो र गिम्पेईले कष्टसाथ आफ्ना आँस्‌ थाम्ने प्रयासगप्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटी भिरालाको फेदमा आफ्नो कक्रसँग देखा परी । आफ्नापाखुरा फिँजाएर र ढुङ्गाको छेउछेउ समाउँदै गिम्पेईले बिस्तारै टाउकोउचाल्यो । उसलाई पर्खाल भत्किने लागेजस्तो भयो, उसका हातकामिरहेका थिए भने मुटु ढुङ्गाहरूलाई ठोकेभैँ धडकिरहेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटीले अघिल्लो दिन लाएकै सेतो स्वेटर भिरेकी थिई । तरउसले जिन्सको सट्टा गाढा रातो स्कर्ट लाएकी थिई र उसले लाएकाजुत्ता पनि पहिलेभन्दा राम्रा थिए । सेतो र रातो रड स्वच्छ हरियारूखहरूबीच लहराउँदै आए । क गिम्पेईको टाउकाको ठीक माथिआइपुग्दा उसको हात गिम्पेईका आँखाअर्गाड थियो । छालाको रड गोरोथियो भने उसका पाखुरा अझ धेरै कोमल । उसको आकर्षक चिउँडोनियाल्दै गिम्पेईले सराहनास्वरूप कराउँदै आँखा चिम्म गप्यो। अनिकेटालाई देखेर क बेस्सरी फतफतायो, “ओह, क आएछ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यो विद्यार्थी किनारको सिरानमा केटीको पर्खाइमा थियो ।गिम्पेईले भिरालोभन्दा करिब आधाको दूरीमा रहेको खाल्डाको मुनिबाटहेरिरहँदा दुवै जना किनारैकिनार हाँडरहेका थिए । उनीहरू घुँडासम्मको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अग्लो हरियो घाँसमाथि उडिरहेजस्ता देखिन्थे । गिम्पेईले साँझनपरुन्जेल केटी फर्कने बाटो पर्खिरह्यो । तर क ओरालो झरी । सायदत्यस विद्यार्थीले हिजो भेटेको अपरिचित व्यक्तिबारे भनेकाले उनीहरूत्यो बाटो पन्छिएर गएका थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसदेखि गिम्पेई प्रायः गिड्क्गो रूखहरू भएको भिरालोमाभौँतारिरहनुका साथै घाँसे किनारमा घन्टौं हल्लरहन्थ्यो तर उसलेकेटीलाई भेटेन । उसको ्छावले उसलाई राति पनि झस्काउँथ्यो । नयाँपालुवाहरू छिट्टै नै गाढा हरियो भएर आए र काला नुहेका रूखहरूलेकालोपत्रे सडकमा पर्ने चन्द्रमाको उज्यालोर्माथ डरलाग्दा छायापारिरहेका थिए । उसले महासागरको कालोपनाबाट एक्कासि डराएरजापानी सागरको तटमा स्थित आफ्नो घरतर्फ क्लेलम ठोकेको दिनसम्झेर ल्यायो। उसले खाडलको पीँधमा बिरालाका बच्चाहरूम्याउँम्याउँ गरेको आवाज सुनेर रोकिई मुनि हेप्यो । उसले तिनलाईहेर्न सकेन तर भित्र केही चलमलाएको एउटा बाकस हल्का देखिन्थ्यो ।“यो ठाउँ बिरालाका बच्चाहरू फाल्न साँच्ची नै असल रहेछ,&#039; उसलेमनमनै सोच्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कसैले भख्ैरै जन्मेका बिरालाका बच्चाहरूलाई बाकसमा राखीत्यहाँ छाडिदिएका थिए । ती कतिवटा थिए क्यार ? बिचरा भोकभोकैमर्ने भए। उसले बिरालाका बच्चाहरूप्रतिको सहानुभूतिमा तिनकोबिलौना सुन्न बसिरह्यो । तर बेलुका भएरपाछि त्यो केटी फेरि कहिल्यैओरालोमा देखिइन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जुन महिनाको सुरुतिर उसले भिरालोर्नाजकै खाडलमा जूनकीरीसमात्ने पार्टीको आयोजना हुनेबारे अखबारमा पढेको थियो । खाडलमैभाडाका लागि ढुङ्गाहरू अड्याइराखिएका थिए । उसले त्यहाँ आफ्नोकुक्र घुमाउन लगेकीले उसको घर नजिकै हुनुपर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसको मावलीमा रहेको ताल पनि जनकीरीका लागि प्रसिद्धथियो र गिम्पेईकी आमाले उसलाई ती जूनकीरी समात्न भनी लग्नेगर्थी । क ओछ्यानमा पुगेर जनकीरीहरूलाई झूलमा छाडिदिन्थ्यो ।यायोईले पानि त्यसै गर्थी । उघारै रहेको घ्यार्र खुल्ने ढोकाबाट उसलेअर्को कोठामा यायोईलाई आफ्नो झूर्लाभत्र कसले बढी जूनकीरीसमातेको हो भनी गन्दै गरेको हेर्न सक्थ्यो । जूनकीरीहरू फुतुफुत्‌उडिरहने हँदा यायोईलाई गन्न गारो पर्दथ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“गिन-चान, ठग ! तिमी ससघ्रैं ठग्छौ !” यायोई उठेर कतिरमुडकी हल्लाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले आफ्ना हातले झूललाई हिर्काउन लाग्दा त्यो हल्लिएरत्यहाँ बसिरहेका जनकीरीहरू चलमलाए, तर भझूलले केही नगर्ने हँदा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
10&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यायोई बढी उत्तेजित भएर मुडकी नचाउँदै बुरुक्कबुरुक्क उफ्रन थाली ।उसले सानो कस्सिएको पाखुरा भएको गर्मी याममा लाउने किमोनोलाएकी थिई भने उसको स्कर्ट घँँडामाथि गुजमुजिएको थियो जसले गर्दाझूलको तल्लो भाग गिम्पेईतर्फ अचम्मसँग फहराइरहेको थियो । यायोईटाउकोर्माथ नीलो झूल ओढेकी भूतनी जस्ती देखिन्थी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अहिले मसँग तिमीभन्दा बढी जूनकीरीहरू छन्‌ ! पछाडि हेरत !” गिम्पेईले भनेपछि यायोई फनक्क फर्की ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“वास्तवमा मसँग बढी जूनकीरीहरू छन्‌ !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले पक्कै पनि गिम्पेईभन्दा बढी जूनकीरीहरू जम्मा पारेजस्तीथिई। झूल भझिलिर्कमालिक जल्ने उज्यालाको भारले यताउताहल्लिरहेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईले त्यस साँझ यायोईले लगाएकी किमोनोमा ठूलठूलाधर्काको छिर्का भएको क्रा अझ सम्भिरहेको थियो । तर गिम्पेईकोझूलमा बसेकी उसकी आमा के गर्दै थिई ? के उसले यायोईले त्यत्रोखलबली मच्चाएको भनी केही भनेकी थिई र ? र यायोईसँगै सुतेकीआमाले गिम्पेईकी आमालाई जान भनेकी थिइन र ? यायोईको भाइपनि उनीहरूसँग भएको हुनुपर्छ । तर उसले यायोईको उपर्स्थित रहेकोमात्र सम्झन सक्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अहिले पनि बेलाबेलामा उसको मावलीर्नाजकको तालमाथि रातिबिजुली चम्केको झझल्को आउँथ्यो । सारा जमिन बिजुली चम्केका तीक्षाणक समयमा उज्यालो भएर आउँथ्यो र त्यसपछिको अँध्यारोमाकिनारमा जूनकीरीहरू देखा पर्थे । तिनको उर्पस्थिति त्यस झझल्कोकोसही अंश थियो होला तर उसलाई ती अनुबोध भएजस्तो शङ्कालाग्थ्यो किनभने बिजुली प्रायः जूनकीरी वरिपरि हुँदा गर्मी याममाचम्किने गर्दछ । उसले जूनकीरीहरूलाई मानिसहरूले तालमा फेलापारेका आफ स्वर्गीय बुबाको आत्मासँग मिलाउने कुनै प्रयास नगरेपनि तालबाट बिजुली हराउनासाथ एक्कासि छोप्ने अँध्यारो क्षणकिञ्चित्‌ अशुभ भएको महसुस गप्यो । उसलाई त्यो खालि झझल्कोभएको थाहा भए पानि राति आकाशले एक्कासि उज्यालो पारेको स्थिरदेखिने विशाल र गहिरो जलक्षेत्रलाई जहिले पनि हेर्दा क प्रकृतिकोविस्मयकारी रहस्य र समयको पीडाले र्थाचएको महसुस गर्थ्यो । मानौँबिजुली उसैमाथि चम्केर उसका वारेपरि हरेक कुरा प्रकाशमय भएकोहोस्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिसाकोसँगको पहिलो विस्मयकारी भेट उस्तै भएको थियो । कुनैबेला हठी र अनुभवहीन रहेकी क बर्दालसकेकी थिई । गिम्पेई पनि कएक्कासि कति ओधी प्रगतिशील भइसकेकीमा र्चाकत थियो र उसलाई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लदन्छ छरे लब&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिसाकोले आफ्ना आमाबुबाको घरमा डोप्याएर लग्दा र आफ सृत्नेकोठामा सुटुक्क लाँदा त्यस्तै कुनै भावना महसुस भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यो त साँच्ची नै ठूलो घर रहेछ, हैन त ? कसैले नदेखीकनेकसरी निस्कुँला मलाई थाहा छैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म तपाईंलाई बाटो देखाउँछु । तपाईं भ्याल हुँदै तल भर्नसक्नुहुन्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तर यो माथिल्लो तला होइन र ?” गिम्पेई अनकनायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म केही ओढ्नीहरू अथवा अर्थोकै जोडेर डोरी बनाइदिन्छु ।हेर्नोस्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमीकहाँ कुने कुकर छ ? माफ गर, मलाई कुक्रहरू मनपर्दैनन्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अहँ, हामीकहाँ कुनै कुक्र छैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्रा गरिराख्नुसट्वा हिसाकोले फनक्क फर्केर चम्किला आँखालेगिम्पेईलाई हेरी । “थाहा छु म तपाईंसँग बिहा गर्न सक्तिनँ तरएकपल्टका लागि मात्र म तपाईंसँग आफ्नो कोठामा एक्लै बस्नचाहन्थेँ । मलाई यस्तो गोपनीयता, “घाँसमा लुक्ने काम&#039; मन पर्दैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“वास्तवमा “घाँसमा लुक्ने काम&#039; भन्ने अभिव्यक्तको शाब्दिकअर्थ हुन सक्छ तर आजभोलि प्राय: यसको अर्थ &#039;घाँसे मैदानमा&#039; अथवा“चिहानमा&#039; भन्ने हुन्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ए, हो र ?” हिसाको ध्यान दिएर सुनिरहेकी थिइन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“जे होस्‌, म अब जापानी भाषाको शिक्षक नरहेकाले त्यो सबलेकेही गर्दैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर समस्या के थियो भने क विगतमा त्यस किसिमको शिक्षकरहिसकेको थियो । समाज अचम्मको छ भनी सोच्तै र एउटी स्कूलेछात्राको पश्चिमा शैलीको कोठाको भव्यता र अप्रत्याशितविलासिताबाट विभोर भई गिम्पेईलाई आफू भगुवा अपराधीभन्दा फरकनभएजस्तो भान भयो । उसले हिसाकोलाई उसको नयाँ स्कुलकोप्रवेशद्वारदेखि घरसम्म पछ्याएदेखि उसको मुड फेरिइसकेको थियो ।दोस्रोपल्टको यो पछयाइ अरू केही नभई एउटा खेल मात्र थियो जसमाहिसाकोलाई सबै नियम थाहा भएर पनि अनजान भएभौँ गरिरहेकीथिई । तैपनि उसले आफूप्रति उहिल्यै समर्पण गरिसकेकी भए पानिउसले त्यो योजनामा पहल गरेकीमा उसलाई खुसी लागेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“एक मिनेट पर्खनोस्‌,” हिसाकोले उसको हात दबाउँदै भनी ।“अहिले रातिको खाना खाने समय भएको छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले हिसाकोलाई आफूतिर तानेर म्वाइँ खायो । हिसाको लामोम्बाइँ खान चाहन्थी । त्यसैले उसले आफ्नो सारा भार गिम्पेईको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ककन 9४ ल्क्क्क&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाखुरामा अड्याई । उसले पनि हिसाकोलाई थाम्नुपर्दा बढी खुसीमहसुस गप्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यतिन्जेल तपाईं के गर्न चाहनुहन्छ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अ ... तिम्रो आल्बम अथवा अरू केही छ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अहँ, माफ गर्नुहोला, मेरो डायरी पानि छैन ।” हिसाको उसकाआँखामा हेर्दै टाउको हल्लाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमी कहिल्यै आफ्नो बाल्यकालबारे कूरा गर्दिनौ, होंग ? किनर ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यो त्यति रमाइलो छैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिसाको आफ्ना ओठ नपुछ्ठीकनै गई । उसले हिसाको आफ्नापरिवारसित डाइनिङ टेबुलमा बस्ता कस्ती देखिन्छे होली भनी सोच्यो ।भित्तामा रहेको खोप्पामाथि तानिएको पर्दापर्छाड गिम्पेईले हात धुनेसानो बेसिन भेट्यो । उसले सत्तर्क भई धारो खोलेर हातमुख धोयो अनिकुल्ला गच्यो । क आफ्ना गोडा धुन भनी मोजा पानि फुकाल्न चाहन्थ्योतर हिसाकोले मुख धुने बेसिनमै त्यसो गर्ने हिम्मत गरेन । जे होस्‌,धोएरै गोडा राम्रो देखिने त होइनन्‌, बरु ती कात नराम्रा छन्‌ भन्ने नैदेखाउनेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिसाकोले स्यान्डवच बनाएर उसका लागि नल्याएकी भएउनीहरूको गोप्य भेटघाटबारे त्यो घरमा कहिल्यै थाहा हुँदैनथ्यो ।उसका लागि चाँदीको किस्तीमा कफी ल्याउनु पनि हेलचक्रचाइँ थियो ।तत्कालै उनीहरूले कसैले ढोका ढकढक्याएको सुने आन एक्कासि अठोटगरेझैं हिसाकोले भझर्केर भनी, “मुवा हो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ढोका नखोल्नोस्‌ । मसँग एक जना भेटन आउनुभएको छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“को हनुहुन्छ र ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मेरो शिक्षक हुनुहुन्छ,” हिसाकोले धक फुकाएर सानो तर सारोस्वरमा भनी । त्यस बेला गिम्पेई आनन्दातिरेकले उम्लँदै उभियो । त्यसबेला कसँग पिस्तोल भइदिएको भए उसले हिसाकोलाई पर्छाडिबाटसिद्धयाउँथ्यो होला । उसले उक्त दृश्यको कल्पना गप्यो : गोलीलेहिसाकोको छाती चिरेर ढोकापर्छाड उभिरहेकी उसकी आमालाईलाग्यो । ढोकाको वारिपारि उभिरहेका दुवै महिला पर्छाल्तर हत्तिए तरहिसाको आकर्षक रूपमा आफ्नो जीउलाई बड्ग्याउँदै फर्की र ढल्नैलाग्दा गिम्पेईको गोडा समात्न पुगी । उसको घाउबाट रगतको भेलबग्यो र गिम्पेईको गोडा हुँदै बगेर भित्री भागलाई निथ्रृक्कै भिजाइदियो ।एकै क्षणमा त्यो खस्रो, ध्वाँसे छाला गुलाफका पत्रसरि नरम र पवित्रभएर आयो भने उसका खुम्चिएका धनुषाकार अङ्गहरू सिपीभीँ चिल्लोभएर आए । हिसाकोको न्यानो रगतमा भिजेर उसका बाँदरका जत्रा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लनन्छ एन लचक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गोडाका बाङ्गा, खौँदिला र चाउरी परेका औँलाहरू पानि पुतलाका भौँनरम भएर आए । हिसाकोको जीउबाट मात्रै त्यतिविधि रगत कहिल्यैबग्न नसक्नुपर्ने भन्ने सोचले एक्कासि गिम्पेईलाई आफ्नो छातीमाभएको घाउको सम्झना दिलायो । उसलाई मूर्च्छा परुँला जस्तो भयोमानौँ क पञ्चरङ्गी बादलमा घेरिएको होस्‌ जसर्माथ चढेर आमिदा बुद्धसच्चा भक्तका आत्मा ग्रहण गर्न जान्छन्‌ । यो उत्कृष्ट स्वैरकल्पनानिमेषभर मात्र रह्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मेरी छोरीको रगत तपाईंको गोडाको औंलामा भएको घाउमालाउन भनी स्कूल लगेको मलममा मिसिएको छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईले हिसाकोका बुबाको स्वर सुन्यो र लगत्तै कक्रक्क पप्यो ।तर उसलाई फेरि विभ्रम भएको थियो। उसको होस खुलेपछिशान्तिपूर्वक ढोकाअगाडि उभिएकी हिसाकोको छाव मात्र देखा पप्यो रउसको डर हरायो । अर्कापट्टि कुनै हल्लाखल्ला थिएन । उसलाई आफूलेढोकाबाट छोरीको कर्के नजरका अगाडि काम्दै गरेकी आमालाई हेर्नर्साकने लाग्यो, क क्खुरी थिई, सर्वाङ्ग नाङ्गै र उसका पखेटा आफ्नैचल्लाले उखेलिदिएको थियो ! उसका एक्ला पदचापहरू तल हलमाहराए ! सीधा ढोकैमा पुगेर हिसाकोले ढोका बेस्सरी लगाउँदै ह्यान्डलमाहात राखेकै अवस्थामा गिम्पेईतर्फ फर्की । ढोकाअघ उभरहँदा उसकागालामा आँसु चुहियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्तत: उनीहरूले उसको बुबा कृददै आइरहेको सुने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ऐ ! हिसाको, ढोका खोल ! खोलिहाल, है ?” उसको बुबालेह्यान्डल बजायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“केही छैन, म तिम्रा बुबालाई भेट्छु,” गिम्पेईले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अहँ, म तपाईंले उहाँलाई भेटेको चाहन्न ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“किन चाहन्नौ ? म अरू केही गर्न सक्तिनँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म तपाईंलाई बुबासँग भेटन दिन चाहन्नँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म हिंसक काम गर्दिनँ । मसँग क्नै बन्दुक छैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म चाहन्नँ । भ्यालबाट बाहिर गइदिनुस्‌ । कृपया !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“भ्यालबाट ? हुन्छ। मेरो जस्ता गोडाले त्यसो गर्न साजलोहोला ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“जुत्ता लाएर खतरनाक हुनेछ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले जत्ता लाएको छैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिसाकोले घर्राहरूबाट दुईतीनवटा ओढ्नी झिकेर तिनीहरूलाईगाँसी । बाहिर ढोकामा उसको बुबा झन्‌भझन्‌ मुरमुरिँदै थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“एकैछिनमा खोल्छु । कृपया एकछिन पर्खनोस्‌ । हामी दुवै जनाएकैचोटि आत्महत्या अथवा त्यस्तै कुनै अन्य काम गर्नेवाला छैनौँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शदमन्ट दि लचक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के रे ? कस्तो डरलाग्दो क्रा गरेकी !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर ती शब्दले उसको बुबाको सातो लिएजस्तो थियो रकेहीबेरसम्म उनीहरूले ढोकाबाहरबाट कुनै आवाज सुनेनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भयालबाहिर झुन्डिएको ओढ्नीहरूमाथि गिम्पेईको भार थाम्नखोज्दा हिसाको रोई । उसले ती ओढ्नीलाई दुवै हातमा बेरेकी थिई रगिम्पेईले तल सर्र झर्नुअगाडि आफ्नो नाकको टुप्पो हिसाकोका औंलामारर्गाडियो । उसले हिसाकोका औंलामा चुम्न चाहेको थियो तर तर्लातरहेर्दा उसका नाकले तिनमा स्पर्श गप्यो । हिसाको भने ढाड सोभ्याउँदैभ्यालमुनिको भित्तामा कृहिना टेकाएर बसी । भ्यालबाहिर झुन्डिरहेकोगिम्पेई माथि पुगेर आभार प्रकट गर्दै बिदाइको म्वाइँ खान असमर्थथियो तर उसको गोडा भइँमा परिसकेपछि उसले भावावेशमा दुईपल्टओढ्नीहरूलाई झटका दियो । दोस्रो झटकाको कुनै प्रतिक्रिया आएन रओढ्नीहरू उज्यालो भ्यालमुनि फरफराउँदै झरे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के यी मेरा लागि हुन्‌ ?” उसले कराएर सोध्यो । “त्यसो भए मतिनलाई सदाका लागि आफूसँगै राख्नेछु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक हातमा ओढ्नीहरू हल्लाउँदै बरौँचैबगौँचा भएर गिम्पेईभाग्यो । भट्ट पर्छाड फर्केर हेर्दा उसले हिसाको र अर्को आकृति-सायदउसको बुबा-लाई आफू उम्केर आएको भ्यालछेउ उभिइरहेको देख्यो ।उसको बुबा ठूलो स्वरमा कराउन सकिरहेझैँ थिएन । यता गिम्पेई भव्यफलामे गेटबाट बाँदरभौँ उफ्रयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले सोच्यो-त्यात सब भइसकेर्पाछ के हिसाकोको अहिले बिहाभइसकेछ होला ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यस दिनदेखि गिम्पेईले हिसाकोलाई एकपल्ट मात्र भेटेको थियो ।वास्तवमा क हिसाकोले “घाँसमा लुकेको&#039; भनी वर्णन गरेको ठाउँ-युद्धमा ध्वस्त उसको परिवारको पुरानो घर-मा प्राय: जाने गर्थ्यौ तरत्यहाँ उसले न हिसाकोलाई घाँसमा घ्रिरहेको भेट्यो न कर्ड्क्रिटपर्खालको भित्री भागमा कनै सन्देश लेखिएको पायो । तैर्पान उसलेकहिल्यै आस मारेन र बेलाबेलामा त्यस स्थानमा गइरहन्थ्यो । यहाँसम्मकि घाँस ओइलेर हिउँले ढाकिने जाडो याममा पनि त्यहाँ गइरहन्थ्यो ।अनि एक दिन वसन्त याममा उसले त्यहाँ ताजा हारियो घाँसमाफझफहिसाकोलाई बसेको देखेर छक्क पप्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क नोबुको ओन्दासँग थिई । पहिले त गिम्पेईको मुटु हिसाकोसायद कहिलेकाहीँ उसलाई भेट्ने आसमा आएकी, तर भेटन नपाएकीहोली भन्ने सोचेर उफ्रयो ! तर हिसाकोको अनुहारमा देखिने आश्चर्यभावले भन्थ्यो-उसले गिम्पेईको ठ्याप्पै अपेक्षा गरेकी थिइन र त्यहाँउसले ओन्दालाई भेटने चाँजोपाँजो मात्र मिलाएकी थिई । तर यतिका&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रिबन 9७ लचक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मानिसहरूमा ओन्दा नै किन ? त्यो पनि उनीहरूको पुरानो गोप्यस्थानमा ? जे होस्‌, उसले गिम्पेईसँग विश्वासघात गरेकी थिई । गिम्पेईआफूले बोल्ने कुरामा चनाखो रहन चाह्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“सर !” हिसाको बोली ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“सर !” ओन्दाले मानौं उसलाई नियन्त्रणमा राख्नका लागि ठूलोस्वरमा त्यसै गरी बोली ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के तिमी अहिले पनि यस्तो खाले मानिससँग हिँडडुल गर्छ्यौ,तामाकी मैया ?” गिम्पेईले आफ्नो चिउँडो ओन्दातर्फ उचाल्यो । दुवैकेटी पातलो चारक्ने नाइलनको पिरामा बसेका थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“श्रीमान्‌ मोमोई, हिसाको आज आफ्नो स्कूलको ग्ग्राज्एसनसमारोहमा गएकी थिई,” ओन्दाले गिम्पेईलाई ठूलठूला आँखाले हेर्दै भनी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ए ! उसको ग्ग्राज्एसन समारोहमा. मलाई थाहा भएन ।”उसले आफूले चाहेभन्दा बढी ने बोलिसकेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म त्यस दिनदेखि स्कूल गएकी छैन,” हिसाकोले विनयशीलभएर बोली ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिसाकोका शब्दले उसको हृदयलाई छोए तर ओन्दाको नचाहिँदोउपर्स्थितले हो अथवा आफ्नो पुरानो शिक्षक पदबाट निरास भएर मात्रहो, उसले अप्रत्याशित रूपमा भन्यो, “तर त्यसो भएको हो भने तिमीलेकसरी ग्ग्राजुएट गर्न पाउँछयौ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“उसले पक्कै पाउँछे । बोर्ड अध्यक्षले उसको सिफारिस गरेकाहुन्‌ ।” उक्त जबाफ ओन्दाबाट आयो । उसले हिसाकोको भलो वाकभलो के चिताएकी हो प्रस्ट भएन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हेर, ओन्दा मैयाँ, तिमी चलाख केटी छ्यौ भन्ने मलाई थाहा छतर बीचमा प्याच्च बोल्न छाड है ?” गिम्पेईले भन्यो । “के बोर्डअध्यक्षले समारोहमा भाषण गरे ?” उसले हिसाकोलाई सोध्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हजुर ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“थाहा छ, आजकल म बूढो आरिताका भाषण कोर्दिनँ । मलाईलाग्छ, आजको भाषण पहिलाभन्दा फरक थियो होला ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“भाषण छोटो थियो ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के क्रा गरिरहेकी ?” ओन्दाले क्रा काटी । “मलाई लाग्थ्योतिमीहरू एक्कासि भेट्ता पानि एकअर्कासँग यसभन्दा बढी कुरागर्नेछ्यौ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमीले हामीलाई एक्लै छाडिदिए हामी लामै करा गर्छौं । तरतिमी जस्ती जासुसले सुनिरहेको बेला होइन । तिमीले तामाकी मैयाँलाईकेही भन्नु छ भने चाँडो भनिहाल ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फन्िच्निक 0८ न्कक्कि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म जासुस होइन । मैले तामाकी मैयाँलाई तपाईंको नराम्रोप्रभावबाट जोगाउन खोजेकी मात्र हुँ । मेरै पत्रले उसलाई स्कूल फेर्नसघायो र क नयाँ स्क्ल नगए पनि कम्तीमा तपाईंको बिखालुउर्पस्थतिबाट उम्केकी थिई । मलाई तामाकी मैयाँ निकै मन पर्छै रतपाईंले मलाई जे गर्न खोजे अथवा गरे पनि म प्रतिकार गर्नेछु । जेहोस्‌, उसले तपाईंलाई घृणा गर्छै ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म तिमीलाई के गरुँ ? तिमी यहाँबाट तुरुन्तै निस्केनौ भनेतिमीलाई हानि हुन सक्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म तामाकी मैयाँलाई छाडदिनँ । मैले नै कसँग यहाँ भेटने कुरामिलाएकी हुँ । त्यसैले कृपया तपाईं नै जानुहोस्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के तिमी संरक्षिका जस्ती हौ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म किन बन्नुपर्छ र ? तपाईं खतरा करा गर्नुहुन्छ ।” ओन्दालेएकातिर हेरेर भनी । “हिसाको, घर जाऔं। तिमी यस डरलाग्दोमानिसलाई घृणा गर्छयौ र उसलाई फेरि भेटन चाहन्नौ भनी भन्देक ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“पख ! मैले तामाकी मैयासँग तिमीले भनेअनुसार गर्नुपर्ने क्रासिद्घयाइसकेको छैन । त्यसैले तिमी जा ।” र उसले ओन्दाकोटाउकोमा विनम्र पाराले थपथपायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अचम्म छ,” ओन्दाले आफ्नो टाउको हल्लाउँदै भनी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“साँच्ची नै अचम्मलाग्दो छ । तिमीले पाछिल्लोपल्ट कहिले आफ्नोकपाल धोयौ ? यो गनाउन लाग्नुभन्दा अगावै केही गरिहाल्नुपर्छु । अरूकुनै मानिसले यस्तो कपाललाई छुने पानि छैन ।” ओन्दा मुरमुरिएजस्तैथिई । “हेर, सुन, तिमी भाग्छययौ कि भाग्दिनौ ? थाहा छ, मलाई कुनैमहिलालाई हिर्काउन अथवा लात हान्न आउँदैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मलाई कसैले हिर्काउने अथवा लात हान्ने कुराको वास्ता छैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धेरै राम्रो ।” गिम्पेईले ओन्दाको नाडी समाएर तान्नै लाग्दाआफू हिसाकोतर्फ फर्केर भन्यो, “हुन्छ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिसाकोका आँखाले सहर्मात भाव देखाएजस्तो थियो त्यसैलेगिम्पेईले हौसिएर ओन्दालाई तान्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हुँदैन ! पख्नोस्‌ ! के गर्न लाग्नुभएको हँ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले गिम्पेईको हातमा टोक्न खोजी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यसो भए तिमी मेरो सानो घिनलाग्दो हातमा म्वाइँ खानचाहन्छयौ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म तपाईंलाई टोकिदिन्छु,” ओन्दा कराई तर धम्क्याएजस्तै गरिन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनीहरू भग्नावशेषको अर्कापट्टि उहिल्यै ढोका भए ठाउँमा पुग्दाओन्दा आफूतिर ध्यान नतानिने गरी सीधा उभिरहेकी थिई । तरगिम्पेईले उसको नाडी समाइरहेर एउटा खाली ट्याक्सीलाई बोलायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आ्रव्न ७९ ल्कब&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हेर, यो केटी घरबाट भागेर आएकी छे र ओमोरी स्टेसनकोसामुन्ने यसको परिवारको कनै सदस्य यसलाई पर्खेर बसिरहेको छ। केतिमी गाडी कुदाएर यसलाई त्यहाँसम्म पुग्याइदिन्छौ ?” गिम्पेईलेकेटीलाई उचालेर पोको पार्दै ट्याक्सीमा राखदियो । उसले आफ्नोखल्तीबाट एक हजार येनको एउटा नोट झिकेर ड्राइभरको सिटमाफालिदियो । ट्याक्सी अगाडि गुड्न थाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फर्केर आउँदा उसले हिसाकोलाई अझ पनि पर्खालपछाडिनाइलनको पिरामाथि बसिरहेको पायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले क घरबाट भागेर आएकी भन्दै उसलाई ट्याक्सीमाहत्त्याइदिएँ । क ओमोरी गई । त्यसका लागि मैले एक हजार येनतिर्नुपच्यो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म पक्का भन्न सक्छु कि उसले त्यसको बदला फेरि मेरोपरिवारलाई चिठी लेखेर लिन्छे ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“बिच्छीको अर्को चिठी, हो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तर उसले नलेख्न पानि सक्छे । क विश्वविद्यालय जान चाहन्छेर क यहाँ मलाई पनि जाँ भनी फकाउन आएकी थिई । उसकोयोजना मेरो निजी शिक्षकसरह बन्नु रहेको छ जसले गर्दा मेरा बुबालेउसको कलेज फी बेहोर्नुहनेछ । उसको परिवार धेरै सम्पन्न छैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के क साँच्ची ने त्यही कूरा छलफल गर्न तिमीलाई यहाँ भेटेकीहो?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हजुर । जनवरीदेखि नै उसले प्राय: मलाई चिठी लेख्तै भेटनभनिरहेकी थिई । तर उसलाई आफ्नो घरमा बोलाउन नचाहेर मैलेचिढी लेखी ग्ग्राजुएसन समारोहका लागि बाहिर आउन सक्ने कुरा भनेँ ।उसले मलाई स्कूलको ढोकामा भेटी र म जसरी भए पानि एकपल्ट फेरियहाँ आउन चाहन्थेँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यस दिनदेखि म यहाँ रकातिपल्ट आएँ थाहा छैन ... एकपल्ट तबाक्लो हिउँले ढाकिएको बेला पनि आएँ...”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिसाकोले सहर्मात जनाउन आफ्ना गालामा पर्ने प्याराखाल्डाहरू देखाउँदै टाउको हल्लाई । यस केटीलाई हेरेर उसकोगिम्पेईसँग प्रेम सम्बन्ध होला भनी कसले कल्पना गर्न सक्थ्यो होला ?उसको &#039;बिखालु उपर्स्थात&#039; को केकस्ता असर केटीमा परेको देखिन्थेभनी गिम्पेई घौरियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तपाईं यहाँ आउनुभएको होला भनी म प्राय: सोच्ने गर्छु,”हिसाकोले भनी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“थाहा छ, बाटातिर हिउँ पग्लेको धेरै समयपछि पनि यहाँजमिरहेको थियो । मलाई लाग्छु पर्खाल अग्लो भएर होला । जे होस्‌,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्न 50 स्ककि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मानिसहरूले बाहिरबाट बेल्चाले यहाँको हिउँ निकाली फाले । ढोकाकोयतापट्टि हिउँको पहाडै खडा भएको थियो र त्यो पनि कसोकसो हाम्रोप्रेममा तगारो भई उभिएको थियो ... मलाई त्यसमुनि कुनै नानीपुरिएको होला जस्तो लाग्थ्यो ...”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफूले गरिरहेका अनौठा र बेतुकका क्राहरूबाटर्चाकत भईगिम्पेई एक्कासि चुप लाग्यो । तर हिसाको गम्भीर भएर सहमतिमाटाउको हल्लाई । उसले छिटोछिटो विषय फेच्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के तिमी ओन्दा मैयाँसँग विश्वविद्यालय जान लागेकी हौ ? केपढ्ने विचार छ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“एउटी केटी विश्वविद्यालयमा जानुको धेरै अर्थ रहँदैन,”हिसाकोले निस्पृह भावले उत्तर दिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यस दिनका ओढ्नीहरू-तिमीलाई सम्झना छ ? मैले त्यसैदिनदेखि तिनलाई साँचेर राखेको छु। तिमीले ती ओढ्नी आफूलाईसम्झन भनी दिएकी हेन त ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“माफ गर्नोस्‌ ती मेरा हातबाट चिप्लेका मात्र थिए,” हिसाकोलेनिर्दोष भएर भनी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के तिम्रा बुबाले तिमीलाई गाली गर्नुभयो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“उहाँले मलाई एक्लै बाहिर जान दिनुहुन्न ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमी स्कूल फर्केर कहिल्यै गइनौ भन्ने थाहा पाएको भए मराति तिम्रो भ्याल हुँदै माथि उक्लेर भेटन आउँथैँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कहिलेकाहीँ म मध्यरातमा भ्यालमा उभिएर बाहिर बगैँचातिरहेर्दै टोलाउने गर्थे,” हिसाकोले जबाफ दिई । तर उसलाई बाहिर जाननिषेध गरिएको समयमा हिसाको फेरि निर्दोष भावले बस्ने गर्थी रउसका विचारहरूलाई गहिरिएर बुभ्न नसक्ने लागेर गिम्पेईको उत्साहचिसो भएर गयो । तैपनि ओन्दा बसेको नाइलनका चकटीको आधाभागमा गिम्पेई बस्ता हिसाकोले उसलाई पन्छाउन खोजी । उसलेकलरमा लेस र तुना भएको सुन्दर, नयाँ, नीलो पोसाक लाएकी थिई ।उसले त्यो पोसाक ग्ग्राजुएसन समारोहका लागि लाएकी थिई क्यार ।उसले अत्याधुनिक ढङ्गले शृङ्गार गरे तार्पान त्यो कति स्वाभाविकखालको थियो भने गिम्पेईले पत्ता लाउनै सकेन । उसले थोरै मात्र अत्तरछर्केकी थिई । गिम्पेईले उसको कमर्माथ बिस्तारै आफ्नो हात राख्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हिँड कतै जाऔँ । सँगै-टाढा-भागेर जाऔँ । तालका एकान्ततटहरूमा ...”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले तपाईंलाई फेरि नभेटने निधो गरेकी छु। म आजतपाईंलाई यहाँ देखेर प्रसन्न छु तर कृपया यसलाई हाम्रो अन्तिमभेटघाट बनाऔं ।” हिसाको शान्त र विनम्र भावमा बोली जसमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसलाई तिरस्कार गरेको कुनै भाव थिएन । “तपाईंलाई नहेरी बाँच्नसकिनँ भने जे भए पनि मैले तपाईंलाई खोज्नेछु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तर म यस संसारको पीँधमै भासिन थालेँ नि...”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म तपाईंलाई खोजी निकाल्नेछु-जमिनमुनिबाट भए पनि, उएनोस्टेसनमुनिका प्यासेजहरूबाट पनि ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ल अब जाऔँ !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अहँ, अहिले होइन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“किन होइन ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मलाई चोट लागेको छ र मेरो मन अझ दुखिरहेछ । तर मलाईबिसेक भएको बेला पनि तपाईंको चाहना भएपछि म आउनेछु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मलाई लाग्छ ...”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईले गोडासम्मै चुलिएको महसुस गप्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म बुभदछु । म तिमीलाई आफ्नो संसारमा घिस्याउन चाहन्नँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर मैले तिम्रो मनमा गाडेका क्राहरूलाई पक्कै बिर्सिदेक . तीखतरनाक हुन सक्छन्‌ । म सदा तिम्रो आभारी रहनेछु। म जुनीभरि,तिम्रो भन्दा एकदम फरक संसारमा, तिम्रो सम्झना गरिरहनेछु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले सकेँ भने तपाईंलाई भुल्ने प्रयास गर्नेछु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हो, त्यो राम्रो हुनेछ ।” गिम्पेईले सो क्रा बलपूर्वक भने पनिउसलाई एक थरी निराशाले घोचेर ल्यायो । “तर आज ...” उसकोस्वर लडबडायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिसाकोले अप्रत्याशित ढङ्गले सहर्मात जनाउँदै टाउको हल्लाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ट्याक्सीमा क चुप लागिरही र शान्त भावले आँखा बेस्सरीचिम्म गरी बसिरही । उसका गालामा एक प्रकारको चमक देखा पस्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिम्रा आँखा खोल । तिनमा प्रेत बसेको छ, म बाजी थाप्नसक्छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिसाकोले तत्कालै आँखा च्यातेर हेरी तर तिनलाई कुनै कुरालेसताइरहेको देखिएन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ती कति उदास छन्‌, है ?” भन्दै उसले उसको परेला आफ्नाओठमाझ च्याप्यो । “तिमीलाई याद छु ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हजुर, याद छ।” हिसाकोको साउतीको आवाज गिम्पेईकोकानमा खोक्रो, मधुरो गुनगुनको रूपमा गुन्जियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यस दिनदेखि उसले त्यसलाई फेरि कहिल्यै भैटेन । क प्रायःत्यस भग्नावशेष स्थलमा भौँतारिरहन्थ्यो र एक दिन ढोकानेरकोक्षेत्रवरिपरि काठको बार लाएको, घाँस काटिएको र भइँ सम्म्याइएकोपायो । डेढ, सायद दुई, वर्षपछि एउटा सानो घर देखिने ठाउँमा निर्माणकार्य सुरु भयो । त्यो भने हिसाकोको बुबाका लागि होइन होला । उसले&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लनन्निक पारे सकन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जग्गा बेचिसक्यो कि भनी गिम्पेईं घोरियो। क आँखा चिम्म गरेरसिकर्मीको रन्दाको एकोहोरो ताल सुन्दै उभिरत्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“बिदा,” उसले अनुपस्थित हिसाकोलाई भन्यो। उसलेहिसाकोलाई गरेको सम्झनाबाट नयाँ घरमा बस्न आउने मानिसहरूलाईखुसी तुल्याउने आशा गप्यो । रन्दाको आवाज आत सुखकर थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्ततः गिम्पेई एकताका &#039;घाँसमा लुकेको&#039; भनिएको यसस्थानमा आउन छाड्यो । उक्त स्थान अर्को स्वामीमा हस्तान्तरणभएजस्तो थियो तर गिम्पेईले कुनै तरिकाबाट हिसाकोले बिहागरिसकेकी र क स्वयं त्यस घरमा सर्न लागेकी छे भन्ने क्रा थाहापाउन सकेन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लनन्नि परे थ्व्क्कि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मलाई निश्चय छ क आउँछे,” गिम्पेईले मनमनै भन्यो ।भाडाका लागि डुङ्गाहरू राखिएको खाडलनेर जूनकीरी समात्न माचीआउने क्रामा उसलाई यति विश्वास थियो कि उसले अन्तत: त्यसलाईतेस्रोपल्ट भेट्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उक्त घटना झन्डै पाँच दिनसम्म चल्यो तर क त्यहाँ दिनहुँजान तयार भए पानि उसले हिसाको आउने एउटा रात किटानगरिसकेको छ । त्यसो भएको दुई दिनपछि समाचारपत्रले सोबारे लेखेकोश्ययो । त्यसैले सायद गिम्पेईको अन्तर्ज्ञानले मात्र उसलाई त्यो गर्नहौस्याएको थिएन किनभने केटीले पनि त्यो लेख पढेपछि त्यहाँ जानउत्साहित भएको हन्‌ पर्छ । गिम्पेईले खल्तीमा अखबार राखेर घरबाटहिँड्दा केटीलाई भेट्ने पूर्वकल्पनाले उसको मन फुरुङ्ग थियो । केटीकालामा, सुलुत्त परेका आँखाको गहनता बयान गर्ने पर्याप्त शब्दनभएजस्तो थियो र हिँड्दै जाँदा बूढी ओँला र चोर औंलाले छाम्दागिम्पेईले आफ्नै आँखार्वारपारि सानो, सुन्दर माछाको आकार फेलापाप्यो । स्वर्गबाट आउने सङ्गीतले उसका कान भर्न थाले ।गिम्पेईले मनमनै प्रशंसा गर्दै भन्यो, “अर्को जुनीमा म राम्रोगोडा लिएर जन्मिनेछु । तिमी अहिले जस्ती नै रहनेछ्यो र हामी सेतोब्यालेमा सँगै नाच गर्नेछौँ ।” केटीको लुगा शास्त्रीय ब्यालेमा लाइनेनिकै मोहोरी भएको सेतो स्कर्ट थियो जुन फनफन नाच्ने र फहराउनेगरिरहेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“छ राम्री छैन त ? र पक्कै पनि राम्रो परिवारकी छे।दुर्भाग्यवश त्यस्तो पूर्णता सोरसत्रको उमेरपछि भेटिन्न र क पनि केहीवर्षसम्म मात्रै त्यस्ती रहन्छ,” गिम्पेईले सोच्यो । तर उसको सौन्दर्यलाईकेले त्यात चोखो र लालिमायुक्त बनाइरहेको थियो जब कि अन्यकेटीहरू आफ्नो जवानी र आकर्षण स्कूले पाठ्यपुस्तकहरूमाबिताइरहेको पाइन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डुङ्गाघरमा एउटा सूचना राखिएको थियो: “जूनकीरीहरू रातिआठ बजे छोडिनेछन्‌ ।” टोकियोमा जुन महनामा करिब साढे सात बजेरात पर्छु । त्यसैले त्यातन्जेल गिम्पेई खाडलर्माथ रहेको पुलवारिपारिडुलिरह्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कृपया डुङ्गा लिन चाहनेहरू नम्बर लिएर पर्खनुहन्छ ?” एउटाढुवाङ्गले बराबर फुक्तै थियो । जूनकीरी समात्ने खेलले यति घुइँचो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनव्निक फा ख्य्क्कि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बढ्यो कि डुङ्गा भाडा गर्ने मानिसले जानाजानी त्यसो गरेझैं बुझियो ।पर्खिरहँदा पुलमा जम्मा भएको भीडले मुनि डुङ्गामा जाने आउनेहरूलाईअथवा पानीमा तैरिरहेका डुङ्गाहरूलाई त्यातकै हेर्नेबाहेक अर्थोक केहीगर्न सक्तैनथे । तर यस्तो कुनै क्राले गिम्पेईको ध्यान तान्न सकेन ।उसले पर्खिरहेको केटीलाई मात्र हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क गिड्क्गो रूख भएको पाखामा दुईपल्ट पुगेर आइसकेकोथियो । पहिलेझैँ&#039; खाडलमा लुक्नुपर्ला भनी फक केहीबेर ढुङ्गे पर्खालमाहात अडाएर टुक्रुक्क बस्यो । तर रातिको समारोहले त्यहाँ अरू मानिसपनि तानिएका थिए र तिनको पदचापले उसलाई त्यहाँबाट भाग्न बाध्यगरायो । उसका पछाडि अझ अरू पदचापहरू पनि सुनिन्धे तर उसलेफर्केर त्यता हेरेन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाखाको फेदीमा रहेको चौरस्तामा पुगेर गिम्पेईले त्यहाँकोकोलाहलको निरीक्षण गप्यो । पुलभन्दा परका सडकमा बल्ने बत्तीहरूलेआकाशलाई उाजल्याइरहेका थिए भने कारका अगाडिका बत्तीहरूबाटामा पल्याकपुलुक्क गरिरहेका थिए। अब कार्यक्रम सुरु हुनैलागेकाले गिम्पेई उत्तेजित थियो तर केही कारणवश फ खाडलतिरजान नसकी अर्कापट्टि गयो । त्यो आवासीय क्षेत्र थियो । जनकीरीसमात्ने समारोहमा लागेपछि उसका पर्छाड सुनिने पदचापको स्वरहराउँदै गयो । तर गिम्पेईलाई एक्कासि आफ्ना पछाडि कसैले एउटाकागज टाँस्तै गरेको लाग्यो । निष्पट कालो पानामा रातो तीर कोरिएकोथियो जसले समारोहस्थलको बाटो देखाउँथ्यो । गिम्पेईले आफ्ना पर्छाडिटाँसिएको कागज च्यात्न खोज्यो तर त्यहाँसम्म उसको हात पुग्नैसकेन । उसको पाखुरा दुख्नुका साथै जोर्नी झमझमाउन थाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तीर तपाईंको पिठ्युँमा भए त्यसलाई पछ्याउन सक्नुहुन्न किकसो ? म निकालिदिन्छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुनै महिलाको मीठो स्वर सुनेर गिम्पेई फर्केर हेप्यो । पर्छाडिकोही थिएन यर्द्याप खाडलमा जान भनी आवासीय क्षेत्रका मानिसहरूआइरहेका थिए । त्यो स्वर एक रेडियोबाट आइरहेको थियो र कुने रेडियो ।श्रुति) नाटकमा संयोगवश बोलिने कुनै संवादको अंश जस्तो लाग्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“धन्यवाद !” गिम्पेईले काल्पनिक स्वरतर्फ हात हल्लाउँदै अलिहल्का ढङ्गले अघ बढ्दो । कुने पनि मानिसको जीवनमा राहतकाअप्ठेरा क्षणहरू आउछन्‌ भनी क तर्रङ्गत थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुलसम्म पुग्ने बाटामा प्रतिगोटा पाँच र पिँजडाभरिको चालीसयेनका दरले जूनकीरी बेच्ने केही स्टलहरू थिए । खाडलमाथि कुनैजूनकीरी थिएनन्‌ । पुलमाझ पुग्दा गिम्पेईले पानीमा उभ्याइएको होचोधरहरामाथि जूनकीरीको हेमानको पिँजडा देख्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिनलाई छाडिदेक ! तिनलाई छाडिदे !” भुराभुरी कौतृहल-वश कराइरहेका थिए । प्रस्टतया जूनकीरीहरू धरहराबाट छरिने रमुनिको भीडद्वारा समातिने क्रो थियो । दुईतीन जना मान्छे धरहरामाथिथिए र यसको पाँधमा केही साना ढुङ्गाहरू अड्याइएका थिए । डुङ्गामारहेका रकातपय मानिसले बाँसका हाँगा र जाली बोकेका थिए । उनीहरूपुलमा तथा पानीको किनारनेर रहेका भीडभन्दा बढी चिढिएका थिए ।केही खम्बाहरू निकै लामा थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुलको अन्त्यमा जूनकीरी बेच्ने थप स्टलहरू थिए । गिम्पेईलेकसैले भन्दै गरेको सुन्यो, “उनीहरू उता ओकायामा जूनकीरी बेच्छन्‌ रयतापट्टि कोशु जूनकीरी बेच्छन्‌ । ओकायामा जूनकीरीहरू साना हुन्छन्‌,साँच्चीकै साना आन एकदमै फरक हुन्छन्‌ ।” क स्टलहरू भएतर्फलाग्यो र त्यहाँ हरेक जनकीरीको मोल दस येन भएको पायो । यो मोलदोब्बर थियो तर सात जूनकीरी भएको एउटा पिँजडाको विशेष मूल्यसय येन थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मलाई दसवटा ठूला जूनकीरी दिनुहोस्‌,” भन्दै उसलेविक्रेतालाई दुई सय येन थमायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यी सबै ठूलाखाले हुन्‌ । सातसँगै दसवटा जूनकीरी ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जूनकीरी बेच्नेले आफ्नो पाखुरा ठूलो, चिसो, सूती झोलामाछिराएपछि भित्र निर्जीव बसेका बत्तीहरू सास फेर्न लागेभझैं चलमलाए ।त्यो मानिसले एकपल्टमा एक अथवा दुईवटा जूनकीरी निकाल्दै लामो,नली आकारको पिँजडामा सार्न थाल्यो । पिँजडामा सत्रवटा जनकीरीहुने सक्तैनन्‌ भनी गम्पेईले त्यसलाई आफ्ना आँखाअगाडि ल्यायो ।विश्वास दिलाउन विक्रेताले पिँजडाभित्र फुक्यो अनि कीराहरूझलिमिली बल्न थाले । मानिसको थूकका केही ठिटा गिम्पेईकोअनुहारमा पनि पर्न गए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मेरो विचारमा यसलाई अलि हौँसलो बनाउन थप दसवटाजूनकीरी चाहिन्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यस मानिसले थप दस जूनकीरी गन्दाहँदी केटाकेटी खुसीलेचिच्च्याउन थाले र गिम्पेईमाथि एक्कासि पानी छ्यापियो । धरहराबाटछाडिएका जूनकीरीहरू माथि आकाशमा उड्न थाले । आनि बलिसकेकापटकार्सार बिस्तारै तिनीहरू तल धर्तीमा झर्न थाले । पानीकोसतहनजिकै उड्ने र फेरि उड्न अप्ठेरो हुने जूनकीरीहरूलाई उचालीजाली र ढुङ्गामा बाँधएका बाँसका सेउलाहरूले फेरि उघाइन्थ्यो ।सायद दसभन्दा कम जूनकीरी छाडिएका थिए तर तिनलाई समात्नेहोडबाजीमा यस्तो हल्लीखल्ली मच्चियो कि चाँडै ने जाली र बाँसकासिर्कनाहरू भिज्न पुगे । अनि हरेकले आफ्ना भिजेका हाँगा यताउताहल्लाउँदा किनारमा उभिएका मानिसहरूमाथि पानी छ्यापियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
00)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यस वर्ष जूनकीरी राम्ररी उडेनन्‌, होइन त ? चिसो मौसमलेत्यस्तो भएको होला,” कसैले भन्यो । यो वार्षिक समारोहभैँ थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर सबै उत्सुकतासाथ पर्खिरहे पनि थप जूनकीरी छाडिएन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पल्लो किनारमा रहेको डुङ्गाघरबाट एउटा सूचना फुकियो :“जूनकीरीहरू नौ बजेसम्म छाडिइरहनेछन्‌ ।” धरहरामा बसेकामानिसहरू कत्ति चलेनन्‌ । साथै तल लागेको घुइँचो शान्त भएरपर्खिरह्यो । जनकीरीमा बढी चाख नराख्ने मानिसहरूले पानीमा डुङ्गाखियाउँदा बहनाहरू पानीमा चलेको स्वर सुन्न सकिन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आशा छ, उनीहरूले तिनलाई चाँडै नै छाडनेछन्‌ !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिनीहरू त्यसो गर्न चाहन्नन्‌ । उनीहरूले यसलाई अलिफनफन नचाउनुपर्नेछ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वयस्कहरू गफिइरहेका थिए । आफूले किनेका जूनकीरीबाटसन्तुष्ट गिम्पेई फेरि पानीले छर्यापनबाट जोगिन पानीको किनारबाटपछि सप्यो । सत्ताइसवटा जूनकीरी रहेको आफ्नो पिँजडा बोकेर क एकप्रहरी बिटको सामुन्ने रहेको रूखनेर गई अडेस लागेर बस्यो । यसरी कभीडबाट टाढा रहेर उक्त ठाउँलाई झन्‌ सजिलो गरी नियाल्न सक्थ्यो ।साथै क निर्लिप्त र विनम्र भाव लिएर खाडलतिर हेरिरहेको युवाप्रहरीछिउ उभिएर अनौठो शान्ति महसुस गरिरहेको थियो । क त्यहाँरहुन्जेल केटीलाई हेर्न चुकेन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चाँडै ने धरहराको सिरानबाट जूनकीरीहरू लगातार छाडिँदैथिए । वास्तवमा &#039;लगातार&#039; भन्ने शब्द सही थिएन किनभने नपल्टाईकनैएकै पटक हातभरि जूनकीरी बटुल्ने मानिसहरूलाई तिनलाई समाउनहम्मेहम्मे भइरहेको थियो-अथवा उनीहरू सायद जानाजानी समयअडकलिरहेका थिए-जसले गर्दा भीडको उत्तेजना उर्लेर आओस्‌, फेरिघटोस्‌ अनि झन माथि चुलियोस्‌ । गिम्पेईलाई आफूछेउ उभिएकोप्रहरीर्जातकै शान्त रहन गारो लाग्यो । र्कातपय जनकीरीहरू उड्ननसकी बैँसका नुहेका झाडीका केस्रासरि तत्रक्क पर्थे भने कहिलेकाहीँकेही जूनकीरी माथि चढ्थे अथवा किनारतर्फ उड्थे । पुलमा उभिएकायुवा तथा वृद्धहरू धरहरातर्फको रेलिडतिर भझुम्मिए । गिम्पेईलेउनीहरूका टाउकार्माथबाट हेर्दै तिनीहरूलाई पछ्यायो । केटाकेटीआफ्ना जाली झुन्ड्याएर रेलिडबाहिर झुन्डिरहेका थिए । उनीहरूनलडेको देख्ता अचम्म लाग्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीड जूनकीरी खोसाखोस गर्न झन्‌ वर आउँदा गिम्पेई तीफट्याङ्ग्राको मधुरो प्रकाशबारे घोरिँदै आफ्नो मावलीमा तालछेउदेखेका मानिसहरूलाई सम्झिन खोज्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हेर ! एउटा जूनकीरी फक तिम्रो कपालमा छ !” पुलमा उभिएकोएक जना मानिस धरहरामुनि रहेको डुङ्गातर्फ हेर्दै करायो । कपालमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कन्रम्न्क 5104&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जूनकीरी भएकी केटी आफूलाई बोलाइएको र डुङ्गामा सवार कसैले सोटिपिसकेकोबारे अर्नभिज्ञ थिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईले त्यस केटीलाई फेला पाप्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले सेतो रङको सृती लुगा लाएकी थिई । क रेलिङमाथि हातअड्याएर तल खाडलतिर हेर्दै थिई । उसका पछाडि रहेका मानिसहरूकोलामले गिम्पेईलाई उसका गाला तथा कम मात्र हेर्न दिए पनि आफ्नोठम्याइ गलत नरहेको थाहा थियो। क आलि पछाडि सप्यो र बिस्तारैघरस्रिँदै केटीका पछाडि पुग्यो । साथै केटीले फर्केर हेर्ने सम्भावना कमथियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले सोच्यो-यहाँ यो केटी एक्लै आएकी होइन होली । तरउसको देब्रेपट्टि एउटा केटालाई उभिएको देखेर उसलाई मुटुमा चक्कूलेहानेजस्तो आघात लाग्यो । त्यो अर्कै केटो थियो । उसलाई पछाडिबाटहेर्दा पनि क कुक्र डोप्याउने केटीको प्रतीक्षा गर्ने र गिम्पेईलाईतालको किनारमा धकाल्ने छात्र नभएको प्रस्टै थियो। उसले सेतोकमिज लाएको थियो र टोपी अथवा कोट नलाए पनि छात्रै जस्तोलाग्थ्यो । “दुई महिनाअगाडि मात्रैको घटना हो,” गिम्पेईले सोच्यो ।केटीको अस्थिरता अथवा ढुलमुलेपनले उसलाई आफूले अचानक कुनेफूल कुल्चेझैँ चकित तुल्यायो । के वास्तवमा केटीको मायाप्रेमप्रतिको आफ्नो अटल लगावभन्दा बढी कमजोर थियो ? जे होस्‌, ककेटासँग भए पनि दुवैबीच प्रेम सम्बन्ध नै थियो भन्न सक्न्तथ्यो ।तैपनि गिम्पेईलाई केटी र उसको अर्को केटा साथीबीच केही भएकैहुनुपर्छ भन्ने लाग्यो। क केटीपर्छाड रहेका अन्तिम केहीमानिसहरूबीच घचेदतै पुगेर रेलिड समाई सुन्न थाल्यो। थपजूनकीरीहरू छाडिँदै थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म केही जूनकीरी समाती उसका लागि लान चाहन्छु” क भन्दै थिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हुन्छ, तर जूनकीरी भनेको बिरामी मानिसका लागि उराठलाग्दोउपहार हुन्छ, होइन र ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तीचाहिँ क सुत्न नसक्ता राम्रो हुन सक्छन्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ती दयनीय प्राणी हुन्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईलाई आफूले दुई महिनाअघि भेटेको छात्र बिरामी भएकोहुन सक्ने लाग्यो । धेरै अघि निहरे केटीले देख्ली भन्ने डरले क आलिपर्छाड बसेरै त्यसको छाव नियाल्न बाध्य थियो । उसको कपाल माथिउचालेर सुर्काउनीभैँ बाँधएको थियो । त्योचाहिँ गाँठो परेको ठाउँबाटआकर्षक, नरम छालझैँ बगेको थियो । उसले गिड्क्गो रूखमुनि रहेकोभिरालोमा देख्ताखेरि ता त्यो केटीको कपाल बढी लापरबाहीसाथबाँधिएको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आनक पाप नयन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुलमा थोरै उज्यालो भए पानि केटीसँग रहेको केटो अर्कोछात्रभन्दा दुब्लो रहेको गिम्पेईले छुट्टयाउन सक्थ्यो । सायद उनीहरूमित्र थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के तिमीले उसलाई पछि भेट्ता जूनकीरी समात्ने खेलबारेसुनाउँछौ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आज रातिको खेलबारे ? ...” त्यस छात्रले मनमनै दोहोप्यायो ।“म मिजुनोलाई भेटन जाँदा हामीले तिम्रो बारे क्रा गर्न पाउने हुनालेक खुसी देखिनेछ । तर हामी यहाँ भएको क्रा उसलाई बताएँ भनेउसले सायद चारैतिर जूनकीरी टिर्लापल गरेको ठान्नेछ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तैपनि म उसलाई केही जूनकीरी दिन चाहन्छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यस छात्रले जबाफ दिएन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कठै, म आफैँ गएर उसलाई भेटन सक्तिनँ । कृपया उसलाईमेरो बारेमा भन है ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म सँ भन्ने गर्छु । उसले पनि सो करा बुभ्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यस रात उएनोमा तिम्री दिदीले पैयुँका फूलहरू हेर्न लानुहँदामलाई भन्नुभयो &#039;माची, तिमी प्रसन्न देखिन्छयो ।&#039; तर म प्रसन्त छैन ।”“तिमीले त्यसो भनेको सुनेर मेरी दिदी छक्क पर्नुहुनेछ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमी उहाँलाई किन चाकित तुल्याउँदैनौ त ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हुन्छ ।” त्यो छात्र यत्तिकै हाँस्यो तर उक्त क्राबाट पन्छिनभनेर थप्यो, “त्यस दिनदेखि स्वयं मैले उहाँलाई भेटेको छैन । उहाँलाईकम्तीमा केही मानिस जन्मँदै प्रसन्न भएर आएको कूरा विश्वास गर्नदिनु राम्रो हुन्न र )”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटो पनि माचीप्रति धेरै आसक्त भएको बुझेर गिम्पेईलाईमिजुनो सन्चो भए पनि उसको र मिजुनोको सम्बन्धविच्छेद हुनेपूर्वाभास भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले रेलिङलाई छाडेर सुटुक्क केटीको पर्छाड गई जनकीरीभएको पिँजडाको तारवाला ह्यान्डल लुसुक्क उसको पेटीमाझुन्डदयाइदियो । उसले लगाएको सूती वस्त्र गरुङ्गो लाग्यो तर माचीलेउसलाई देखिन । पुलको पुठ्छारमा पुग्दा उसले फर्केर केटीको पर्छाडिमधुरो प्रकाश छाडदै गरेको पिँजडा झुन्डिएको हेप्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटीले आफ्नो पेटीमा पिँजडा झुन्डिएको भेटेपछि के गर्ने होलीभनी गिम्पेईले कल्परह्यो। अनि उसले पुलको माभझसम्म फर्केरभीडबाट लुकेर उसलाई हेर्ने निधो गप्यो । जे भए पनि, उसले केटीकोपिठयूँ ब्लेडले ताछिदिएको होइन भने किन अपराधीसरह बस्नु ? तैपनिमाचीले आफूभित्रको काँतरपना खोतल्न वा पुनः खोतल्न लगाएकोकुराप्रति सचेत क पुलदेखि टाढा हिँड्न थाल्यो । आत्मरक्षाप्रतिको यस&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अकरन्किक पा ९ सव&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रयासबारे आश्वस्त भई क खिन्न भएर पाखामा रहेका गिड्क्गोरूखहरूतर्फ लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ओहो ! त्यो जूनकीरी अजङ्गको छ !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईले त आकाशमा तारा पो देखेको रहेछ तर उसलेत्यसलाई तत्कालै जूनकीरी ठानेर निकै भावुक भएर भनेछ, “तर त्योअजङ्गको छ &amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाटाका पातहरूमा पानीका थोप्ला प्याटप्याट गर्ने थालेका थिए-ठूला, बेलाबेलामा खस्ने पानीका थोपाहरू अर्धगलित तुसारो अथवाबलेँसीबाट तपतप चुहुने पानीझैँ आवाज गर्दै थिए । यस्ता होचाठाउँमा अपेक्षा गरिने खालको वर्षा थिएन त्यो । बरु पहाडी गाउँमाअग्ला, चाक्ला पातसहितका रूखहरूमुनि राति क्याम्प गर्दा सुनिने भारीथोपाहरूझैं सुनिन्थे ती । तैर्पान त्यो आवाज यति गहन थियो कित्यसलाई पातहरूबाट चुहिने रातिको ओस मान्न साकिँदैनथ्यो । गिम्पेईलेन कहिल्यै पहाड चढेको थियो न पठारमा क्याम्प बसेको थियो । त्यसैलेआफूले यो अनौठो आवाज पहिले कहिले सुने हुँला भनी छ ठम्याउनखोज्दै थियो । त्यो आवाज आफ्नी आमा बस्ने तालछेउ सुनेको हनुपर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तैपनि गाउँ त ठ्याक्कै अग्लो स्थानमा छैन । मैले यस्तोआवाज पहिले कहिल्यै सुनेको छैन । होइन, मैले त्यो एकपल्ट पक्कैसुनेको छु। त्यो आवाज बाक्लो जङ्गलमा वर्षासँगै आउने आँधीबेहरीशान्त हँदाखेरिको आवाज हुन सक्छ । त्यातखेर पातमा पर्ने पानीकोभलले स्वयं आकाशभन्दा बढी पानी पारिरहेको हुन्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यायोई-यान, यो वर्षामा रुभ्यौ भने रुघाखोकी लाग्ला हे ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मलाई त माचीको प्रेमी वर्षासँगै आउने आँचवीबेहरीमा क्याम्पिडगर्दा बिरामी पप्यो भन्ने लाग्छ। सायद उसको टर्रोपना गिड्क्गोरूखहरूबीच घन्किने यो सैतानी वर्षामा देखा परेको छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पानी नपर्दा वर्षाको आवाज सुन्न रुचाउने भएकाले गिम्पेईयसरी नै आफूसँग क्रा गरिरह्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज राति गिम्पेईले केटीको नाम थाहा पायो र अघल्लो दिनउ अथवा माची मरेकी भए उसले सो कहिल्यै थाहा पाउन्नथ्यो । त्यसोभए यो जानकारी नै उनीहरूबीच साइनो गाँस्ने भएकाले क केटीभन्दाटाढा पाखार्माथ किन हिाँडरहेको थियो र ? तर त्यस साँझ केलेउसलाई त्यहाँ तानेको मेसै नपाई क दुईद्ईपल्ट भिरालोमा पुगिसकेकोथियो । अनि यो तेस्रो भ्रमण माचीलाई पुलमा भेटिसकेपछि अपरिहार्यथियो किनभने उसले छाडिआएको केटीको आत्मा रूखहरूमुनि थियो रउसले आफ्नो रोगी प्रेमीका लाग जूनकीरीसमेतको एक पिँजडा लागरदिँदैथिई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मनन २0 बब&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एउटा सानो चाहनाले पानि उसलाई माचीको पेटीमा पिँजडाझुन्ड्याइदिन प्रेरित गप्यो । यर्द्याप बढी भावुक भएर सोच्ता उसलेकेटीको जीउमा आफ्नै उज्ज्वल हृदय झुन्ड्याइदिएजस्तो लाग्यो ।उसलाई आफूले सो करा लुकीछिपी गरेको मात्र थाहा थियोर कआफ्नो बिरामी साथीकहाँ जनकीरी लान चिन्तित भएकी कराप्रति सचेतथियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सैतानी वर्षा सेतो पोसाक लाएकी केटीको छायार्माथ परिरहेकोथियो । कफ आफ्नो अस्वस्थ प्रेमीलाई भेटन गिड्क्गो रूखहरूमुनिकोपाख्रैपाखा उड्दै गइरहेकी थिई । उसको पेटीमा जूनकीरीको पिँजडाहल्लिरहेको थियो गिम्पेईले मनमनै सोच्यो, त्यो कस्तो डरलाग्दोअभिव्यक्त थियो, भूतका लागिसमेत ! तर त्यो केटी अझै मिजुकीसँगैखाडलछेउमा रहेको थाहा भए पनि त्यस चकमन्न पाखामा क आफूसँगपनि रहेकी उसलाई भान भइरहेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेई किनारतल पुगेर उक्लन खोज्दा खुट्टा मर्केर हरियो घाँससमाएर बस्यो। घाँस आलि चिसो थियो। उसको खुट्टा त्यातसारोनद्‌खेकाले घिसार्न परेन । तर क चार हातपाउका भरमा घिस्रेर माथिउक्लियो । अनि क सर्दै जाँदा मुनि भइँमा एउटा बच्चो ऐनामा नक्कलगरेझैं उसका हत्केलाबराबर आफ्ना हत्केला राखेर सबै भेटियो। तीकुनै लासका चिसा हातर्सार थिए । चाकत भएर उसले कुनै तातोपानीभएको रिसोर्ट (होटल) मा रहेको वेश्यालय सम्भझियो .. त्यहाँ नुहाउनेटबको पुछारमा रहेको ऐना सम्झियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईले पहिलोपल्ट माचीलाई पछ्याएको दिन छात्रले आफूलाई&#039;बेकूप &amp;quot; भनी तल धकेलिदिएको किनारको सिरानमा पुग्दा उभएर तलबाटोमा एउटा गाडी बिस्तारै गुडेको देख्यो । त्यहाँ केटीले मई दिवसकोपरेडमा राता झन्डा देखेको क्रा मिजुनोलाई सुनाएकी थिई ! गाडीकाभ्यालबाट बाटामा लामै उभिएका बाक्ला, अँध्यारा रूखहरूमाथि बत्तीझल्याकभझुलुक्क गरिरहेका थिए । फक त्यस दिशामा गहिरिएर हेर्नथाल्यो । त्यतिन्जेल भूताहा वर्षाले गर्ने आवाज थामिइसकेको कराप्रतिक सचेत थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;बेकूप &amp;quot; क एक्कासि कराउँदै किनारमुनि लडीबुडी गर्दै झप्यो ।त्यसो गर्दा क आफूलाई राम्ररी समाल्न सकिरहेको थिएन । कालोपत्रेसडकमा ठोकिनै लाग्दा उसले एक मुठी घाँस समायो, आफ्नो गोडामाउभियो र हात झार्दै सडकमा हिँड्न थाल्यो । तल किनारमा बच्चोअझै आफूसँगै सर्दै गरेको उसलाई अनुभव भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसको बच्चो कहाँ थियो अथवा त्यो जीवित अधवा मृत थियो-उसलाई केही थाहा थिएन । त्यसकारण उसको जीवन निकै अनिश्चित&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नबन ९१ बक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
थियो । त्यो जीवित भए, उसले त्यसलाई कुने दिन भेट्न सक्छ र सोकुरामा उसलाई पक्का विश्वास थियो । तर त्यो उसकै अथवा अरूकसैको बच्चो भएको कुरा जान्ने कुनै उपाय थिएन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक साँझ आफू छात्रको रूपमा बस्ने गरेको निजी आवासगृ्हकोप्रवेशद्वारमा एउटो बच्चो छाडिएको थियो । कसँगै यस प्रकारको एउटालेखोट थियो, &#039;यो बच्चो गिम्पेईको हो ।&#039; उसकी साहुनी चिन्तित भई ।तर गिम्पेई खास चिन्तित भएन अथवा लज्जत अनुभव गरेन । किनभनेएउटा छात्रले कुने अवाञ्छनीय बच्चा-अझ कुनै वेश्याको बच्चा-लाईहुर्काउला भनी अपेक्षा नै गर्न सक्तैन । त्यसमा पानि उसलाई कुनै पनिबेला युद्धमा पठाउन साक्न्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यो एक क्र्र चाल मात्र हो । मैले उसलाई छाडिदिएकाले बदलालिन भनी त्यसो गरेकी हो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“श्वीमान्‌ मोमोई, वास्तवमा क दुई जीउकी भएपछि तपाईंभाग्नुभयो, होइन त ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“होइन, त्यस्तो केही होइन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यसो भए केका लागि भाग्दै हनुहुन्थ्यो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईले त्यो प्रश्नको जबाफ नदिए पनि बोल्यो, “जे होस्‌, मबच्चालाई ल्याएर त्यसको व्यवस्था गर्छु ।” उसले साहनीको काखामारहेको बच्चालाई हेप्यो । “यसलाई एकछिन राख्नुस्‌ है ? म आफ्नोसाथी खोजेर ल्याउँछु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“साथी ? कस्तो साथी ? श्वीमान्‌ मोमोई, तपाईं यसबच्चालाई छाडेर भाग्ने त होइन ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“होइन, म यसलाई एक्लै राख्न नचाहेको मात्र हो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के ?” साहुनीले शङ्का गर्दै ढोकैसम्म गिम्पेईलाई पछ्याई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले आफ्नो अपराधी साथी निसिमुरालाई बोलाएर ल्याएपछिदुवैजना सँगै लागे । बच्चालाई छाडी जाने आइमाई गिम्पेईकै भएकीलेस्वाभाविक रूपले उसले बच्चालाई बोकिरहेको थियो । उसले बच्चालाईआफ्नो कोर्टभत्र राखेर तलको टाँक लाउँदा उसको जीउ भूस भरिएकोजनावरभैँ देखिन्थ्यो । गाडीमा अन्तत: बच्चा रुन थाल्यो । तर अन्ययात्रुहरू यस विर्श्वावद्यालयीय छात्रको अनौठो भाव देखेर मित्रवत्‌हाँसरहेका थिए । गिम्पेई पनि उनीहरूतिर हेरेर हाँस्यो । क लज्जित रआलि जोकरभैँ देखिन्थ्यो । उसले बच्चाको टाउको ओभरकोटकोमाथिल्तिरबाट पाखा निकालेर राख्यो । तर त्यसो गर्दा उसको आफ्नैटाउको निहरिएर बच्चाको अनुहार नियालिरहेको भान पो भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उक्त घटना दोस्रो विश्वयुद्धताका पहिलो हवाई आक्रमणपछिटोकियो सहरको प्रमुख बजारक्षेत्रमा भएको ठूलो आगलागीपछि भएको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बन्छ २, रे कवबके&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो । गिम्पेई र उसको साथीले बच्चालाई घरको पछिल्लो ढोकाबाहिरराखेर छेस्किनी लगाए । कसैले उनीहरू भागेको देखेन किनभनेवेश्यालयहरू गल्लीसम्मै भरिभराउ थिएनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेई र निशिमुरा यस घरबाट भाग्ने पुराना खेलाडी थिए ।तिनताक छात्रहरूलाई युद्धसम्बन्धी कामका लागि थोत्रा, रबरको तलुवाभएका अथवा कपडाका जुत्ता दिइन्थ्यो । अनि उनीहरू वेश्यालयबाटभाग्दा प्राय: यी जुत्ता छाडेर जान्थे । उनीहरूसँग तिर्ने पैसा हुँदैनथ्योतर उनीहरू भाग्दा रोमाञ्चित हुन्थे-मानौँ कुनै अपमानजनक कामकोछायाबाट भाग्दा होस्‌ । साथै काममा हुँदा उनीहरू एकअर्कासँग आँखाभझिम्क्याएर आफ्ना जुत्ता लाउँदालाउँदै राख्नै नमिल्ने गरी जीर्णभइसकेको सुनाउँथे । कम्तीमा तिनलाई फाल्ने ठाउँहरूका बारेमा सोच्नुपनि रमाइलो मान्थे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तैपनि भागेपछि उनीहरूले वेश्याहरूबाट पाउने पत्रहरूमा सस्वैँपैसा मागिएको नभई फेरि आउने निम्तो मात्र हुन्थे । केटीहरूलाईउनीहरूका नाम र ठेगाना थाहा हुन्थ्यो किनभने गिम्पेई तथा क जस्ताअन्य छात्रहरू युद्धमा जानैपर्ने हुन्थ्यो र ती क्रा लुकाउनु आवश्यकथिएन । किनभने कसैको पनि त्यस्तो गोपनीयता अपनाउनुपर्ने खालकोकुने राम्रो भविष्य थिएन । मोर्चामा पठाइने छात्रहरू वीर (नायक)मानिन्थे । तर अनुर्मातप्राप्त अथवा अन्य खाले जानेमानेका (नामुद)वेश्याहरूलाई प्राय: श्रमकेन्द्रहरूमा लगिन्थ्यो । गिम्पेईकी आइमाईअनुर्मात नभएकी गोप्य ढङ्गले व्यापार गर्ने महिला परीहोली । तैपनिकेटाहरू के क्रामा आश्चर्य मान्थे भने वेश्यालय प्रथा र यसकानियमहरू यति खुकूला थिए कि तिनको सम्बन्धमा कुनै अनपेक्षितमानवीय तत्त्व यी महिलाहरूसँगै देखा पर्न थाले । वेश्याहरू युद्धकासमयमा कडा सजायँ पाइने डरले यस्तो अनौठो मौनसर्म्मात गर्न बाध्यभएको भनी दुवैमध्ये कसैले पनि महसुस गरेन । के उनीहरू यति पतितभए कि आफूहरू गायब हुने क्रालाई महिलाहरूले युवक भगोडा भनीमाफ गर्छन्‌ भनी कल्पना गर्ने गर्छन्‌ ? उनीहरू पेसै नातरीतीनचारपल्ट भागिसकेका थिए र त्यसर्पाछ वेश्याहरूले प्राय:उनीहरूबारे केही थाहा पाउँदैनथे । साथै उनीहरूले गल्लीमा अर्वास्थितत्यस घरमा बच्चालाई फालिआउँदा आफूहरूले फेरि पलायन गरेकोकुरा विरलै महसुस गरेका थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनीहरू लगभग मार्च महिनाको मर्ध्यातर गए तर भोलिपल्टदिउँसोतिर नै खस्न थालेको हिउँ साँझसम्म खसिरह्यो । उनीहरूलेगल्लीमा जमेर मर्न भनी बच्चालाई छाडदैनथे होला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिउँमै निशिमुराको कोठामा र्गाफन भनी गिम्पेई निस्क्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठकम्न्ट ९३ ल्व्क्कि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हामी हिजो राति गएको राम्रै भयो, होइन त ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हो, आति राम्रो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वेश्यालयबाट कसैले पानि सम्पर्क गरेन । साथै बच्चो गायबभइसकेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर गल्लीमा अवस्थित त्यो घर पछिल्लोपल्ट सातआठमहिनाअघि आफू भागेको वेश्यालय ने थियो त ? गिम्पेईको मनमा त्योटाउको दुखाउने कुरा आफूलाई मोर्चामा पठाइसकेर्पाछ उठ्यो र त्योउही वेश्यालय भए पनि के बच्चाकी आमा अथवा उसकी आइमाईअझै त्यहाँ थिई र ? के एकपल्ट बच्चा जन्माइसकेर्पाछ कुनेअनुमतिविहीन वेश्या वेश्यालयमा बस्न सक्छे ? किनभने त्यसलाईनिकृष्टतम पाप मानिन्छ । हुन सक्छ तिनताकको तनावपूर्ण अन्योलमाअनौठो करुणा भाव व्याप्त भएको अवस्थामा वेश्यालयले गर्भवतीमहिलाको स्याहार गर्ने गर्थ्यौ । तर त्यो सर्वथा असम्भव पनि थियो ।अनि गिम्पेईलाई वास्तवमा आफूले बच्चाबाट मुक्ति पाइसकेर्पाछ मात्रत्यसलाई साँच्चै परित्याग गररएको हुन सक्ने लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निशिमुरा युद्धमा मारियो । गिम्पेई बाँचेर सबै पेसा छाडी स्कुलशिक्षक बन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कनै बेला वेश्यालय भएका ठाउँका अवशेषहरू चहारेर गिम्पेईगलिसकेको थियो । एक्कासि उसले आफैँले ठूलो स्वरमा कराइरहेकोसुनेर तीनछक पप्यो, “ए ! तँ के बदमासी गर्न लागेकी छस्‌ ?” कवेश्यासँग क्रा गर्दै थियो। उसले उसको कोठाको ढोकाबाहिर एउटीबच्ची छाडिदिएकी थिई-त्यो उसकी आफ्नी वा गिम्पेईकी बच्चीथिइन । बरु त्यो साथी वेश्याबाट मागेर ल्याइएकी बच्ची थिई । उसलेत्यस (वेश्या)लाई ढोकामा फेला पारेको अथवा उसलाई पछ्याएरसमातेको जस्तो थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“बच्ची म जस्ती थिई वा थिइन भनिदिन निशिमुरा अब जीवितछैन ।” क फेरि आफैंसँग क्रा गर्दै थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छाडिएकी नानी बच्ची थिई तर अचम्म के छ भने गिम्पेईलाईपिरोल्ने नानीको लिङ्ग यकिन थिएन । सामान्यतया त्यो मृत बच्चो थियोतर आफू बढी सामान्य अवस्थामा हुँदा त्यो जिउँदो लाग्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले आफ्नी फुच्ची केटीले एकपल्ट आफूलाई आफ्नो ढयात्रेमुडकीले भएभरको बल निकाली निधारमा हिर्काएको सोच्यो र उसलेआफ्नो निधार निहराउँदा उसले बजाप्याबजाप्यै गरेकी थिई । उसले त्योकहिले भएको भनी घोत्लिरह्यो र त्यो आफ्नो कल्पना हुन सक्नेनिर्क्योल गप्यो । त्यो केटी अझै जीवित भए पानि क आफूले कल्पनागरेजति सानी र आइन्दा त्यस्तो कहिल्यै हुनु नपर्ने हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
० 000&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर जूनकीरी समात्ने राति गिम्पेई बाटोमा हिँडेसँगै तलकिनारमा हिँड्ने भूताहा बच्चो भने अझै बच्चो नै थियो र त्यसको लिङ्गअनिश्चित थियो, वास्तवमा त्यो कहिल्यै जानिएन र त्यो विचार मनमाआएलगत्तै त्यस बच्चाको नाकमुख नभएको ख्याकसरि डरलाग्दा छावदेखा पप्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यो केटी हो, केटी,” नाना थरी स्टोर लाम लागेको झकि-झकाउ सडकमा हतारिँदै गिम्पेई मनमनै फतफतायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“चुरोट छ ! मलाई केही चुरोट दिनुहोस्‌ !” कुनाबाट दोस्रोस्टोरको सामुन्ने स्वाँस्वाँ गर्दै गिम्पेई करायो । एक जना फुलेकी बूढीदेखिई । बढी उमेरकी भए पनि उसको लिङ्ग प्रस्ट भएकाले गिम्पेईलेहल्का महसुस गप्यो । तर माची अनन्त टाढा लाग्थी र क जस्ती कुनैकेटी यस संसारमा होली भनी कल्पना गर्न निकै सकस गर्नुपर्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसलाई आफ मुटु हलुङ्गो र रित्तिएको महसुस भयो र कतिदिनपछि पहिलोपल्ट गिम्पेईले आफ्नो जन्मथलो सम्झियो । उसलेअनौठो ढङ्गले बितेका आफ्ना बुबालाई नभई आफ्नी सुन्दर आमालाईसम्झियो । तैपनि आफ्नी आमाको मायालु अनुहारभन्दा आफ्ना बुबाकोकरूपताले उसर्माथ निकै दरो छाप छाडेको थियो । ठीक यायोईकोसानो गोडाभन्दा आफ्नै गोडाको विर्कृतले घोचिरहेझैँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तालको किनारछेउ यायोईले जङ्गली एमि झाडीबाट राता एँसेल्‌टिप्न खोज्दा उसको सानो औंलामा काँडा बिझेको थियो । त्यहाँदेखिएको एक थोपा रगत चुस्तै र गिम्पेईलाई ठूलठूला आँखा पल्टाएरहेर्दै यायोईले भनी, “गिन-चान, तिमी मेरा लाग एँसेलु र्टापदिन्नो ?तिम्रो बाँदरसरि गोडा ठीक तिम्रा बाको जस्तै छ । ती परिवारबाहिरबाटपक्कै आएका होइनन्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रिसले मुरमुरिएर यायोईको गोडा काँडामा बिझाइदिन चाहेकोतर छुने आँट नभएर गिम्पेईले आफ्ना दाँत खोलेर उसको नाडीमा टोक्नखोज्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हेर ! हेप्यौ ! त्यो बाँदरको अनुहार हो । इँडँँ !” यायोईले पनिआफ्ना दाँत देखाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जनावरको झैँ भद्दा उसको गोडाले गर्दा त्यो नानीले आफूलाईकिनारमा घर्रिँदै पछयाएकी थिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईले पनि परित्यक्त बच्चीको गोडा निरीक्षण गर्ने प्रयासगरेको थिएन किनभने उसलाई त्यो नानी आफ्नै भएकीमा दृर्ढावश्वासथिएन । तथापि अहिलेको परपीडित आत्मजुगुप्सा (घणा) भावले सोच्ताआफूले नानीको गोडा हेरेको र आफू जस्तै पाएको भए त्यो आफ्नैनानी भएको बलियो प्रमाण भेट्थ्यो होला । तर धरतीमा हिँड्नुअगाडि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टन्न १२ ल्व्क्कि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सानो नानीका गोडा सघ्रैं नरम र आकर्षक नै हुँदैनन्‌ र ? धार्मिकचित्रहरूमा यिसुको आकूतिलाई घेरिबस्ने बालदूतहरूका झैं ? यससंसारका सिमसार, चट्टान तथा काँडेझारहरू नाघ्दै जाँदा सबै गोडागिम्पेईका झैं कडा वा रूखो हुन थाल्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तर त्यो भूत भए त्यस्तो बच्चाको गोडा हुन सक्तैन,” गिम्पेईमनमनै बरबरायो । भूतहरूका गोडा हुँदैनन्‌ । उसले भूतहरूको त्योर्छाव पहिलोपल्ट कसले दियो होला भनी सोचिरह्यो । साथै आफूले झैँआदिम मानवहरूले पनि महसुस गरेका होलान्‌ भनी उसलाई लाग्यो ।मानौँ उसका आफ्नै पाइला यस संसारमा हिँडरहेझैँ थिएनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वर्गबाट खस्न लागेका तारा (रत्न)हरू समात्न खोजेझैँ हत्केलापल्टाएर गिम्पेई झकिझकाउ सडकमा भौँतारिरह्यो । विश्वकोअत्यधिक सुन्दर पहाड सस्वैं कुने अग्लो, हरियो शिखर नभईज्वालामुखीय खरानी तथा चट्टानहरूले छोपिएको विशाल, बाँझो ढिस्कोहुने कुरा उसको मनमा आयो । त्यो गुलाफी र भान्टा रडको हुन्छ ।यसमा मिरमिरेमा र सूर्यास्तका बखत स्वर्गका फेरिने रडहरू हुन्छन्‌ ।अनि यस्तै बिचार गर्दै गिम्पेईले माचीको चाहना गर्ने आफ्नो अंशबाटविमुख हुने अठोट गय्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले हिसाकोले प्रेम वा बिछोडको स्वीकारोक्तिस्वरूप बोलेकाभविष्यवाणी गर्ने खालका शब्दहरू सम्झियो, &#039;म तिमीलाई फेलापार्नेछु-भूमिगत स्थलमा पनि, तल उएनो स्टेसनका मार्गहरूमा पनि ।&#039;अनि ती मार्गहरू कस्ता देखिन्छन्‌ भनी घोरिँदै क उएनोतर्फ हानियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आजभोलि त्यो स्थान बढी शान्त देखिन्थ्यो र उसले अहले त्यहाँअल्छी र बेकार मानिसहरू मात्रै देख्यो । उनीहरू यसलाई आफ्नावासस्थान (अखडा) बनाएभैँ लाग्थे र मार्गमा लम्पसार परेका वाभित्तामा गुटमुटिएर बसेका थिए । यो प्राय: देखिने घरबार र पैसाविहीनखाते मानिसहरूसहितको दृश्य थियो, केही छेउमा डोकाहरू राखीकोइलाका रित्ता बोराहरूमाथि लम्पसार परेका थिए, अरूहरू लिसम्पन्न देखिन्थे । तिनका टाउकापर्छाड कपडामा बेरिएका बडेमानकापोकाहरू थिए । ती सबै आफ्नो परिवेशबाट एकदमै विमुख भई वरिपरिहेर्न अथवा त्यहाँबाट गुज्रिनेहरूको हेराइ फर्काउन कहिल्यै आँखाउठाउँदैनथे । कतिपय त निकै अघ नै ओछ्यानमा गई सुतिसकेकापनि थिए । एक युवा दम्पती शान्तिपूर्वक दोब्रिएर बसेका थिए ।महिलाचाहिँ पुरुषका घुँडामाथि टाउको टेकाएर आराम गरिरहेकी थिईभने पुरुषचाहिँ उसको जीउमा अडेस लगाइरहेको थियो । राति चल्नेरेलमा पनि तिनीहरूझैँ बटारिएर बसी यात्रा गर्न गारो हुन्थ्यो । ती दुईएकअर्काका पखेटामा मुन्टा छिराएर बसेका चखेवासरि देखिन्थे र ती&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लनम्न्ट २३ सव्क्कि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लगभग तीसको छेउछाउ थिए । गिम्पेई तिनलाई नियाल्दै उभियो,हल्लुवा दम्पती आफैँमा आलि असामान्य देखिन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भूमिगत मार्गमा हरहर चल्ने दुर्गन्ध क्‌खुराको सेकवा तथाजापानी स्ट्युको गन्धसँग एकाकार भइरहेको थियो । ढुङ्गाको एउटाखोक्रो गुफाबाहेक अरू केही नढाकेभझैँ देखिने कुनै पसलको पर्दामाटाउको लुकाएर गिम्पेईले दुईतीनवटा सस्ता ह्विस्की घुटक्यायो ।उसको गोडापर्छाड फूलबुट्दे स्कर्ट देखियो र उसले आफ्ना अगाडिकोपर्दा उचालेर हेर्दा बाहिर एक पुरुष वेश्या उभिरहेको पायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनीहरू चुपचाप आँखा जुधाउँदा त्यस पुरुष वेश्याले उसलाईआँखा भझिम्क्यायो । गिम्पेईले कलेलम ठोक्यो तर त्यस भगाइ(पलायन)मा कुनै आनन्द आएन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले स्टेसनको माथिल्लो तलाको विश्वामकोठाको भित्रपट्टि हेप्योतर आवाराहरूको गन्ध त्यहाँ पनि भरिएको थियो । स्टेसनको एककुल्लीले प्रवेशद्वारमा उभिएर उसको टिकट माग्यो । विश्वामकोठामामात्रै प्रवेश गर्न पनि आफ्नो टिकट देखाउनु असामान्य क्रो थियो ।अन्य बेकार जस्ता देखिने मानिसहरू बाहिर यताउति अथवा भित्तासँगैथचक्क बसेका थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्टेसन छाडेर गिम्पेई सहरको भित्री गल्लीतिर भौँतारिन थाल्यो ।उ समलिङ्गीहरूको दोहोरो प्रवृत्तिबारे सोच्तै गर्दा रबडको बुट लाएकीएउटी महिलालाई देख्यो जसले लोग्नेमानिसभझैं खुइलिएको कालो पाइन्टर धुँदा खुम्चिएको लाग्ने फोहोर सेतो ब्लाउज (चोली) लाएकी थिई ।उसका स्तनहरू फ्यात्त परेका थिए । उसको पहेँलो अनुहार घाममापोलेर कालै भएको थियो र उसले कुनै शृङ्गार गरेकी थिइन ।त्यो आइमाई केही गर्न खोजेझैं थिई र र्नाजक आएर उसलाईपछ्याउन थाली । महिला पछ्याउने कुरामा निकै खाप्पस भइसकेकोअनुभव बटुलेको गिम्पेईले उसले आफूलाई किन पछ्याएकी भनी बुभनसकेन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले हिसाकोको घरसामुको फलामे ढोकाबाट भागी नाजककोमनोरव्जन क्षेत्रमा शरण लिन पुग्दा आफूलाई पिरोलेकी-तर त्यसबाटएकदमै इन्कार गरेकी-कुलटा आइमाईलाई सम्झियो । तर अनुहार हेर्दात अहिलेकी आइमाई वास्तवमा वेश्या देखिन्नथी । उसको रबडका बुटहिलाम्मे थिए । हिलो आलो नभए पनि कैयौं दिनसम्म पुछिएको थिएन ।साथै बुट पुराना र रङ खुइलिएका थिए। फक पानी नपर्दा पनिउएनोबाट रबड बुट भिरी हिँड्ने कस्ती आइमाई होली भनी घोरियो ।के क अपाङ्ग थिई ? के उसका गोडा कुरूप (भद्दा) थिए ? केत्यसैकारण उसले स्ल्याक्स लाएकी हो त?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आकरव्न् ९७ ल्च्कक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईले एक्कासि आफ्नै गोडाबारे सोच्यो र आफ्ना पर्छांड त्यसआइमाईका नराम्रा गोडाबारे कल्पेर उसलाई जान दिन भनी हठात्‌ रोकियो ।त्यो आइमाई पनि रोकिई । उनीहरूले एकअर्कालाई प्रश्न गर्ने मुद्रामा हेरे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तपाईं मबाट के चाहनुहुन्छ ?” उसले सोधी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म तिमीलाई त्यही क्रा सोध्न चाहन्छु। तिमीले मलाईपछ्याएको होइन ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तर तिमीले मतिर पुलुक्क हेप्यौ, होइन त ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कसैले पछ्याएको हो भने त्यो तपाईं हो ।” गिम्पेईलाई आफूलेकेही गरेको हुँदा उसको बाटो काटी गएपछि उसले त्यसलाई सड्केतकोरूपमा लिएकी त होइन भन्ने लाग्यो । तैपनि उसलाई पक्कै त्योआइमाईले नै चाख लिएकी हो भन्ने लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले तिमीलाई एक झलक हेरेको मात्र हुँ। मेरो विचारमाआइमाई भएर पानि तिम्रो अनुहार अनौठो छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मलाई त्यस्तो अनौठो लागेको छैन नि ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हो, तर के तिमी आफूतिर यसो पुलुक्क हेर्ने जोसुकैलाई पनिपछ्याउँछ्यौ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“जे भए पनि तपाईं मलाई रमाइलो लाग्नुभयो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“खैर, तिम्रो दृष्टिकोण के हो त ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“केही होइन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मलाई पछ्याउने कुनै कारण त पक्कै होला ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म तपाईंलाई पछ्याइरहेकी होइन-म, अँ ... खालि सँगै हिँडनखोजेकी हुँ, बस ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ए त्यसो पो ।” गिम्पेईले फेरि उसलाई हेप्यो । उसका ओठहरूऔधी (घिन लाग्ने गरी) काला थिए । तिनमा लालीको लेस पनि थिएन ।साथै एउटा सुनपानी लाएको दाँत देखिन्थ्यो। क कति वर्षकी थिईभन्न गारो भए पनि सायद चालीसमुनिकी थिई । उसका चिम्सा आँखासतर्क, लोग्नेमानिसका झैँ सुक्खा थिए र तिनमा छटट्पन टाल्कन्थ्यो,साथै एउटा आँखा अर्कोभन्दा सानो थियो । घामले पोलेको उसकोअनुहारको छाला कडा थियो । गिम्पेईलाई उसबाट कुने खतरा हुन सक्नेआभास भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“केहीबेर हिँडराखौं,” एक्कासि उसको छाती हल्कासँग छुने गरीहात उचालेर उसले भन्यो । त्यसबारे कुने शड्का नै थिएन। फकआइमाई नै थिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तपाईंले अहिले भर्खरै के गर्नुभा&#039;को ?” त्यस आइमाईलेगिम्पेईको हात च्याप्प समाई । उसको हत्केला नरम थियो । प्रस्टतयाउसलाई नराम्रो व्यवहारको बानी थिएन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ककरन्किक २८ सव&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेईले पहिलोपल्ट कुनै मानिस महिला हो कि होइन भनीठम्याउन त्यसो गरेको थियो । वास्तवमा क महिला थिई भन्ने एकदमप्रस्ट थियो तर आफ्नै हातले छामेर ढुक्क भएपछि गिम्पेईलाई अनौठोकिसिमको राहत महसुस भयो र क मैत्रीपूर्ण व्यवहार पनि गर्न थाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ठीक छ, त्यहाँसम्म हिँडेर जाऔँ,” उसले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कहाँ त्यहाँ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यहाँ वरिपरि हामी जान हुने क्नै आरामदायी बार (रक्सी पिउनेठाउँ) छैन र ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यसरी अनौठो पोसाक भिरेकी महिलालाई मिलाई कतै लाने ठाउँछकि भनी घोल्लिँदै गिम्पेई फेरि झकिझकाउ गल्लीमा हिँड्न थाल्यो ।क जापानी स्ट्यु पाइने एक ठाउँ छियो र त्यो आइमाई उसकोपछिपछि आई । त्यहाँ खाना पकाउने चारकने क्षेत्रमा तीनतिर बस्नेव्यवस्था मिलाइएको थियो । साथै त्यहाँ अलग टेबुलहरू पानि थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राय: सबै ठाउँ ओगटिइसकिएकाले उसले प्रवेशद्वारसँगको टेबुललियो । खुला ढोकामाथि झुन्डिएको सानो पर्दाले बाटामा हिँड्नेमानिसहरूको आधा तल्लो भागबाहेक सब थोक ढाकेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“साके (जापानी रक्सी) कि बियर ?” गिम्पेईले सोध्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसको यस पठी आइमाईसँग कुनै व्यवहार गर्ने इच्छा थिएन तरफक खतरनाक नभएकी पाई हल्का र निर्ष्फिक्री महसुस गरिरहेकोथियो । उसले महिलालाई बियर अथवा साकेमध्ये एक छान्न दिने भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म साके लिन मन पराउँछु,” आइमाईले जबाफ दिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यहाँ स्टचुबाहेकका साधारण खाना (परिकारहरू) पनि उपलब्धथिए र ती पाइने चिन्ह भित्तामा झुन्डिरहेका थिए। गिम्पेईलेआइमाईलाई खाना पानि मगाउन दियो । उसको पर्रिचत तरिकाले ककुनै थोत्रे मधुशालामा लोग्नेमानिसहरूलाई फकाई ल्याउने खालकीआइमाई भएझैँ लाग्थी तर त्यो विवरण सही लागे पनि उसले आफ्नोकुरा सुनाउन चाहेन । सायद उसले गिम्पेईलाई आलि डरलाग्दो पाएरउसलाई फकाउने विचार त्यागिसकेकी थिई अथवा उसले आफू दुईबीचकुनै साझा बन्धन महसुस गरेर उसलाई पछ्याउने विचार गरेकीथिई । जे होस्‌, उसले तत्कालका लागि आफ्नो मूल उद्देश्य छाडिसकेकीथिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“जीवन अचम्मको छ, होइन त ? माने आजको भोलि के हन्छकहिल्यै थाहा हुन्न । म यहाँ तिमीसँग जाँड खाइरहेको छु तर मैलेतिमीलाई पहिले कहिल्यै भेटेको थिइनँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ठीक भन्नुभयो । मैलै तपाईंलाई पहिले कहिल्यै भेटेको छैन,”त्यो आइमाईले आफ्नै सुरमा रक्सी घुटक्याउँदै सही थापी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शकम्निट २९, सम्क्क&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आजको दिन तिमीसँग रक्सी खाएर बित्ने भयो क्यार ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हजुर, त्यसै गरी बित्ने भयो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के तिमी यहाँबाट घर जान्छ्यौ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हजुर । त्यहाँ मेरी बच्ची मलाई एक्लै पर्खिबसेकी छे ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“बच्ची रे?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यो आइमाई एकपछि अर्को रक्सी थापरही । गिम्पेईले रक्सीखानुसट्टा उसलाई हेरेर समय बिताइरह्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफूले एकै रातमा जूनकीरी समाउने समारोहमा माचीलेदेखेको, तालको किनारमा बच्चाको छायाद्वारा पछ्याइएको र अहलेएकदमै संयोगवश भेटेकी आइमाईसँग रक्सी पिइरहेको क्रा पत्याउनउसलाई गारो भयो । सायद त्यो आइमाईको कुरूपताले त्यो सम्भवभएको थियो । खाडलछेउ माचीलाई देख्नु एउटा सुन्दर सपनी थियो तरसस्तो रेस्टुराँमा बसिरहेकी यो कुरूप आइमाई वार्स्तावक थिई । तैर्पानयस “वास्तविकता&#039; सँग सुरापान गर्नु स्वप्नसुन्दरीसम्म पुग्ने बाटो जस्तोपनि थियो । जति बढी कुरूप आइमाई भयो त्यात राम्रो छाव देखिन्छ ।त्यस आइमाईको करूपताले माचीको स्वरूप आँखाअगाडि उभ्याइरहेकोथियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमीले किन रबडको बुट लाइरा&#039;की ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“घरबाट हिँड्दा आज पानी पर्ला जस्तो लागेको थियो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आइमाईको जबाफ प्रस्ट थियो । गिम्पेईलाई उसको गोडा हेर्नेउत्कट इच्छा भयो । त्यो भद्दा भए क पक्कै त्यसयोग्य मानिन्थी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रक्सी धोक्तै जाँदा उसको रूपरडको कुरूपता झनभन्‌ प्रखरभएर आयो । साना, नामलेका आँखा अझ चिम्सा भएर आए । तीमध्येसानोरचाहँ आँखाले उसले गिम्पेईलाई छडके पाराले हेरी । साथै आफ्नाकुम अघिपछि हल्लाइरहेकी थिई । गिम्पेईले उसका कुम च्याप्पसमाउँदा पनि उसलाई रोकिन । गिम्पेईलाई हातर्भरि हाडहरू समाएझैंलाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“बुभ्यो, तिमी त्यात ख्याउटी हुनु नपर्ने हो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तपाईं अरू के आस गर्नुहुन्छ ? म एक्ली आइमाईले एउटीबच्ची पाल्नुपर्नेछ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले गिम्पेईलाई आफू भित्री गल्लीमा भाडाको कोठामा तेरवर्षकी छोरीसँग बसेकी र छोरी स्कूलमा पढ्दै गरेको कथा सुनाई ।उसको श्रीमान्‌ युद्धमा मारिएको थियो, उसले भनी । तर त्यो कुरा शड्कास्पदलागे पनि उसले बच्चीबारे सही भनिरहेकी हुँदा छ सन्तुष्ट थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म तिमीलाई तिम्रो कोठासम्म पुग्याइदिन्छु,” गिम्पेईले दोस्रोपल्टभन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कन 00 ७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“पर्दैन, बच्ची भएकीले मेरो ठाउँ राम्रो छैन,” आइमाईलेएक्कासि विनम्र पारामा भनी यर्द्याप उसले पहिलो प्रतिक्रियास्वरूपसहमतिमा टाउको हल्लाएकी थिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गिम्पेई र आइमाई सँगसँगै भान्सेतर्फ फार्कबसे । तर उसले केगर्दै छे भनी बुभनुअगावै फ उसतर्फ फर्की स्वाड पार्दै उसको कुममाअडेस लगाइसकेकी थिई । फक उसप्रति समर्पित हुन तयार भएजस्तीथिई । मानौँ यस संसारको अन्त्य हुन गइरहेझैं गिम्पेईलाई निरासालेछोप्यो-वर्तमान परिस्थितिमा त्यो निरासा एकदमै ठूलो थियो । सायदउसले सोही दिन साँझ माचीलाई देखेकाले होला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आइमाईको रक्सी खाने तरिका पनि भद्दा थियो । हरेकपल्टसाकेको नयाँ सिसी मगाउँदा क उसको प्रतिक्रिया जान्न उत्सुक भईउसतर्फ हेर्ने गर्थी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्को सिसी मगाउँ,” गिम्पेई आत्तिएर भन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“थाहा छ, म हिँड्न सक्ने छैन । ठीक छ ?” उसले आफ्नो हातउसको काखमा राखी । “अँ, अझ एक सिसी मात्र । कृपया, गिलासमाखन्याइदिनुस्‌ न ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साके उसको मुखको कुनाबाट चुहेर टेबुलर्माथ बगिरहेकोथियो । उसको घामले डढेको अनुहार गाढा, बैगनी रातो रङमा परिणतहुँदै थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनीहरू त्यस ठाउँबाट हिँड्दा क गिम्पेईको पाखुरामा झुन्डिई ।उसले उसको नाडी समायो, त्यो अचम्मको चिल्लो थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाटामा फूल बेच्ने एउटी केटीलाई देखेर उसले भनी, “कपया,मेरा लागि केही फूल किनिदिनुहोस्‌ । म थोरै फूल आफ्नी बच्चीकालागि घर लान चाहन्छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर उसले त्यो फूलको थुँगो चकमन्न गल्लीको कुनामा रहेकोचाउचाउ बेच्ने पसलको स्ट्यान्डमा छाडिदिई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मित्र, यी फूल मेरा लागि राखिदिनुस्‌, है ? म चाँडै नै ती लिनआउँछु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले फूलहरूलाई त्यहाँ छाडिदिएपाछ उसको मताइ झन्‌ बढ्दै गयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“थाहा छ, मैले वर्षौं लोग्नेमानिसको साथ पाएको थिइनँ । तरत्यसमा केही गर्न सकिन्न । भनेको, तपाईं रोज्ने छान्ने गर्न सक्नुहुन्न,कि कसी ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हो, हामीलाई भाग्यले एकअर्कासँग बाँधिदिएको छ,” गिम्पेईलेअनकनाउँदै सहमति जनायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गल्लीमा अल्झिँदै हिँड्दै गर्दा उसलाई आत्महीनताबाहेक केहीअनुभूति नभए पनि उसको मनमा अझ पनि रबड बुर्टाबनाको उसको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लन्म् 0१ 54&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गोडा हेर्ने रहर थियो । तैर्पान उसले त्यो गोडा हेर्न सकिरहेझैं थियो-उसका बूढी औँलाहरू आफ्ना झैँ नभई आकार नमिलेका, बाक्लो, खैरोछाला भएका थिए । उसले आफू त्यस आइमाईसँग गोडा तन्क्याएरपल्टिरहेको कल्पना गर्दा गिम्पेईलाई वान्ता आउला जस्तो भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केहीबेरका लागि उसले आइमाईलाई बाटो डोच्याउन दियो ।आनि पछाडिको गल्लीमा छिरेर उनीहरू इनारी धर्मको एउटा सानोविहारअगाडि आइपुगे । त्यससँगै एउटा सस्तो होटल थियो जहाँ कोहीपनि कुनै केटीसँग रात बिताउन सक्तथ्यो। आइमाई अनकनाई ।गिम्पेईले उसको टाँसिएको पाखुरा तल लत्रन छाडिदिएपछि क बाटोमाहली ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमीलाई तिम्री छोरीले पर्खिबसेकी छै भने घर जाक,” भन्दैउसले उसलाई छाडिदियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मूर्ख ! मूर्ख !” आइमाई चिच्च्याई र विहारअगाडिबाट मासनाढुङ्गाहरू टिपी उसमाथि बर्साउन थाली । एउटा ढुङ्गो गिम्पेईकोकुर्कुचामा लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ऐया !” क करायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खुच्चिङ गर्दै हिँडेर जाँदा उसलाई आफैँमाथि दया जाग्यो ।माचीको पछाडि जूनकीरीको पिँजडा भझुन्डयाइदिएर क सीधा घर किनलागेन ? माथिल्लो तलामा रहेको आफ्नो कोठामा पुगेर गिम्पेईले आफ्नोमोजा फुकाल्यो । उसको गोलीगाँठो हल्का रातो भइसकेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कन्र् १0२ ७०&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=Main_Page&amp;diff=97</id>
		<title>Main Page</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=Main_Page&amp;diff=97"/>
		<updated>2024-06-14T14:14:26Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;strong&amp;gt;Welcome to Nepali Kitab Editing Team.&amp;lt;/strong&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
This website is a sub-website of nepalikitab.org. Here we convert old books into Unicode text format. It is a collective effort by volunteers around the world. If you are also interested, please join the team.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
We keep here the books generated after scanning and extracting texts with OCR. It contains many errors. Our goal is to remove the errors.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==How to edit==&lt;br /&gt;
[[File:Editor-timeline.png|thumb]]&lt;br /&gt;
1. Make an account or log in.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2. Select the book of your interest.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. Click edit&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
4. Edit and clean up the errors and book format. If you are familiar with wiki syntax, you can edit the source too.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
5. Save time to time while editing&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
For details about formatting text, refer to: https://www.mediawiki.org/wiki/Help:Formatting&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 1:  Scan and OCR ==&lt;br /&gt;
*[[रामायण]] भानुभक्त आचार्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* [[तरुण तपसी (नव्यकाव्य)]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[आदिकवि भानुभक्त (पटकथा)]] यादब खरेल&lt;br /&gt;
* [[इतिश्री (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[केही धार्मिक तथा साँस्कृतिक सम्पदाहरू (केही नमुना कलाकृतिहरू)]] सत्यमोहन जोशी&lt;br /&gt;
* [[रमाइला गाउँखाने कथा]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[दसैँ, पिङ र हात्ती (बालकथा-सङ्ग्रह)]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[८० दिनमा विश्‍व भ्रमण]] जुल्स वर्न,गोरखबहादुर सिंह&lt;br /&gt;
* [[बालभाका - १ (बालकविता सङ्ग्रह)]] उद्धवप्रसाद प्याकुरेल&lt;br /&gt;
* [[ताल (उपन्यास)]] यासुनारी कावाबाता&lt;br /&gt;
* [[चतुरेको चर्तिकला (कथा सङ्ग्रह)]] गोरखबहादुर सिंह&lt;br /&gt;
* [[ठूलो फुल (A Big Egg)]] Roma Pradhan, Shanta Das Manandhar&lt;br /&gt;
* [[आखिरमा टोम्मीको टोलीले जिती छाड्यो]] क्रिस्टिन स्टोन,शान्तदास मानन्धर&lt;br /&gt;
* [[जय भुँडी (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[मुकुन्द इन्दिरा (नाटक)]] बालकृष्ण सम&lt;br /&gt;
* [[खाल्डामा परेको भकुन्डो]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[जे छोए पनि सुन]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[खानामा पाइने पोषणहरू]] नताशा भिजकारा&lt;br /&gt;
* [[अन्तिम निम्तो]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[सूगवा]] रोशनी चौधरी&lt;br /&gt;
* [[भीमसेन थापा (ऐतिहासिक खण्डकाव्य)]] सिद्धिचरण श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[ऋतुविचार (खण्‍डकाव्य)]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[छन्दका १०१ कविता]] (सङ्कलन) कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[गणित प्राविधिक शब्दकोश]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[उज्यालोको खोजीमा (उपन्यास)]] हरिहर खनाल&lt;br /&gt;
* [[सपनाको देशमा]] चन्द्रकान्त आचार्य&lt;br /&gt;
* [[महिला लक्षित शिक्षक सेवा आयोग तयारी अध्ययन सामग्री]] विष्णुप्रसाद अधिकारी&lt;br /&gt;
* [[शिक्षक पेसागत विकास तालिम (तालिम पाठ्यक्रम)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[हाम्रा लोकबाजाहरू (बालबोध - ५१)]] रामप्रसाद कँडेल&lt;br /&gt;
* [[पर्दा, समय र मान्छेहरू (कथासङ्‍ग्रह)]] झमक घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[काउकुती (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* &amp;lt;nowiki&amp;gt;[[विदुर नीति Vidura Niti (Sanskrit-English)]]&amp;lt;/nowiki&amp;gt; (Extracted From) Mahabharata [महाभारत]&lt;br /&gt;
* [[जंगबहादुरको बेलाइती कापी]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[कति वटा रोटी]] शिल्पी प्रधान&lt;br /&gt;
* [[विश्वका प्रमुख सभ्यता तथा संस्कृति (बाल ज्ञानकोश - ३)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अस्माकम् संस्कृतम् - कक्षा १]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[प्रारम्भिक संस्कृत व्याकरण र रचना]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[गोरक्ष-साह-वंश (ऐतिहासिकं महाकाव्यम्)]] हरिप्रसाद शर्मा&lt;br /&gt;
* [[२०२ ओटा ठट्टा]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[धुमधामको घुमघाम (भक्तप्रसाद भ्यागुताको नेपालयात्रा)]] कनकमणि दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[महिलाका लागि डाक्टर नभएमा]] -&lt;br /&gt;
* [[दस औतार (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[A Perfect Match]] Ramendra Kumar&lt;br /&gt;
* [[मधुपर्क (वर्ष ४७, अंक ४, २०७१ भदौ)]] -&lt;br /&gt;
* [[सौगात (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[एक घर एक रोजगार (प्रयागदत्त तेवारीको कृषिकथा)]] मिलन बगाले&lt;br /&gt;
* [[रवीन्द्रनाथका नाटकहरू]] -&lt;br /&gt;
* [[पेसा, व्यवसाय र प्रविधि]] -&lt;br /&gt;
* [[मामा माइजु]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[म को हुँ]] पेमा डोल्मा लामा&lt;br /&gt;
* [[चनाचटपटे (बालकविता-सङ्ग्रह)]] बूँद राना&lt;br /&gt;
* [[आवाज (सामाजिक उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[स्पष्टीकरण (कथासङ्ग्रह)]] हरिभक्त कटुवाल&lt;br /&gt;
* [[दशैँको दक्षिणा (बालउपन्यास)]] गङ्गा पौडेल&lt;br /&gt;
* [[चार आर्य-सत्य (बुद्ध-शिक्षाका चार स्तम्भ)]] दोलेन्द्ररत्न शाक्य&lt;br /&gt;
* [[विजय चालिसेका बालकथाहरू]] विजय चालिसे&lt;br /&gt;
* [[सिर्जनशील विद्यालय]] अर्जुन श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[अभिभावकको सहयोगमा बालबालिकालाई घरमा नै गराउन सकिने सिकाइ क्रियाकलापहरू (कक्षा १)]] -&lt;br /&gt;
* [[दर्शन परिचय (विश्वका दर्शन र कला साहित्यिक बादहरू)]] परशुराम कोइराला&lt;br /&gt;
* [[खोज (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[अनिवार्य सामाजिक अध्ययन (१२३) - माध्यमिक शिक्षा परिक्षाको प्रश्न तथा उत्तरकुञ्जिका २०७५]] -&lt;br /&gt;
* [[बिहानीको घामसँग]] तारा पुन, शान्तदास मानन्धर&lt;br /&gt;
* [[एकादेशमा (बालकथाहरूको सँगालो)]] उषा दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[इतिहासका विम्बहरू]] पूर्णचन्द्र घिमिरे, रमेशचन्द्र घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[पन्ध्रौं योजना (२०७६७७-२०८०८१)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[नेपालको शाह तथा राणा वंशावली]] विष्णु प्रसाद श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[Aaloo-Maaloo-Kaaloo]] Vinita Krishna&lt;br /&gt;
* [[परित्याग (उपन्यास)]] माधव खनाल&lt;br /&gt;
* [[अमेरिका (उपन्यास)]] गंगा लिगल&lt;br /&gt;
* [[उखान मिलेन !]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[राष्ट्रकवि माधव घिमिरे (जीवनी, व्यक्तित्व र कृतित्वको सङ्‍क्षिप्त रेखाङ्‍कन)]] शैलेन्दुप्रकाश नेपाल&lt;br /&gt;
* [[केहि गुणकारी बोटबिरूवाहरू (बालबोध - ४१)]] डा. हरिप्रसाद&lt;br /&gt;
* [[दिवास्वप्न]] गिजुभाई, शरच्चन्द्र वस्ती&lt;br /&gt;
* [[संस्कृत, प्राकृत र नेपालीका सन्धिनियम]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[शिक्षाका ती दिन]] पुष्पराज पौडेल&lt;br /&gt;
* [[मपाईं (निबन्ध)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[Autobiography of a YOGI]] Paramhansa Yogananda&lt;br /&gt;
* [[ताराबाजी लै! लै!!]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[विश्वास (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[Akbar and Birbal Moral Stories]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[बुद्धवादका तीन आयाम]] पशुपति घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[करेसाबारीका जडिबुटीहरू]] केदार श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[काठमाडौं उपत्यका खुलास्थलहरू सम्बन्धी मानचित्र पुस्तक २०७१]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अन्ताक्षरी खेल]] ध्रुव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[साइबर बालकथा]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[कलेजी थाल]] ध्रुव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[कत्ति धुनु गधाहरूलाई (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] लक्ष्मण गाम्नागे&lt;br /&gt;
* [[गौरी (शोककाव्य)]] माधव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[आमाको माया]] रमेश चन्द्र अधिकारी&lt;br /&gt;
* [[Natural Treasures of Nepal]] Nepal Tourism Board&lt;br /&gt;
* [[नारीस्वर (महाकवि देवकोटा विशेष) - २०६६ असोज]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[चार गजलकारका उत्कृष्ट गजल (गजलसङ्ग्रह)]] मनु ब्राजाकी&lt;br /&gt;
* [[स्यालको जुक्ती]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[स्थानीय पाठ्यक्रम विकास तथा कार्यान्वयन मार्गदर्शन (मातृभाषा सहित) २०७६]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[बाँदर बन्ने रहर (बालकथा सङ्ग्रह)]] गोपीकृष्ण ढुङ्गाना&lt;br /&gt;
* [[डाढो (हास्यव्यङ्ग्यहरू)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[मध्यचन्द्रिका (नेपाली भाषाको मझौला व्याकरण)]] सोमनाथ शर्मा&lt;br /&gt;
* [[नेपाली क्रान्ति-कथा]] फणीश्वरनाथ रेणु&lt;br /&gt;
* [[डायना (महाकाव्य)]] शैलेन्दुप्रकाश नेपाल&lt;br /&gt;
* [[शङ्खे र फट्याङ्ग्रो]] अनन्तप्रसाद वाग्ले&lt;br /&gt;
* [[मोहिनीले खोसेको अमृतकलश]] अमर निराकार राई&lt;br /&gt;
* [[हिन्दू-धर्म के हो]] महात्मा गाँधी&lt;br /&gt;
* [[बालबालिकामा पढ्ने बानीको विकास]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[The Last Page of My Poem (मेरो कविताको अन्तिम पृष्ठ)]] Rajeshwor Karki&lt;br /&gt;
* [[जय भोलि !]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[संस्कृत व्याकरणको रूपरेखा]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[घरबारी बगैंचा]] बोल बहादुर थापा&lt;br /&gt;
* [[नबिर्सने यात्रा (यात्रा-कथा)]] समीर नेपाल&lt;br /&gt;
* [[समाज परिवर्तनमा संस्कृतिकर्मी]] विजय सुब्बा&lt;br /&gt;
* [[मेवालाल (बालकथा सङ्ग्रह)]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[A Helping Hand]] Payal Dhar&lt;br /&gt;
* [[आमा (कविता सङ्ग्रह)]] भक्ति दाहाल &#039;विष्फोट&#039;&lt;br /&gt;
* [[विज्ञान तथा वातावरण - कक्षा ८ (पुरानो संस्करण)]] गोपीचन्द्र पौडेल&lt;br /&gt;
* [[चप्पल]] अर्हन्त श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[मात्राहरू]] हरिहर लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[दोस्रो भाषाको रूपमा नेपाली भाषा]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अब्राहम लिंकन (१८०९-१८६५)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[घरभेटी भाउजू (कथासङ्ग्रह)]] कृष्णादेवी शर्मा&lt;br /&gt;
* [[Agreeing and Disagreeing - English Grade 10]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[शकुन्तला नाटक]] शम्भुप्रसाद ढुंग्याल&lt;br /&gt;
* [[Chunu and Munu Read]] Shanta Das Manandhar, Stephanie Wei&lt;br /&gt;
* [[अब खेल खेल्ने!]] शिल्पी प्रधान&lt;br /&gt;
* [[जनावरहरूको सभा]] ज्ञाननिष्ठ ज्ञवाली&lt;br /&gt;
* [[विश्वप्रसिद्ध पैंतिस साहित्यकार]] प्रभात सापकोटा&lt;br /&gt;
* [[कसिङ्गर (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[पंचतन्त्र कथासंग्रह]] &lt;br /&gt;
* [[अक्षर (बालकथा)]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 2: Title and heading corrections completed ==&lt;br /&gt;
* [[९७ साल]] आनन्ददेव भट्ट&lt;br /&gt;
* [[गलबन्दी (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 2&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 3: Text correction completed ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 3&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
==Step 4: Proof reading completed==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 4&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[अनौठो फल]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==Step 5: Finished books==&lt;br /&gt;
पुरा भएका किताब&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 5&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%86%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%BE_%E0%A4%9F%E0%A5%8B%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%9F%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A5%80%E0%A4%B2%E0%A5%87_%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%80_%E0%A4%9B%E0%A4%BE%E0%A4%A1%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B&amp;diff=96</id>
		<title>आखिरमा टोम्मीको टोलीले जिती छाड्यो</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%86%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%BE_%E0%A4%9F%E0%A5%8B%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%9F%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A5%80%E0%A4%B2%E0%A5%87_%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%80_%E0%A4%9B%E0%A4%BE%E0%A4%A1%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B&amp;diff=96"/>
		<updated>2024-06-14T14:11:44Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: Created page with &amp;quot;लेखकक्रिस्टिन स्टोन  चित्राङ्नकर्ताराजुबाबु शाक्य &amp;#039;शारब&amp;#039;  सम्पादकशान्तदास मानन्धर  द्ध पिना॥॥॥  [२००1६०1९९94  आखिरमा टदोमीको टोलीले जिती छाड्यो  लेखक क्रिस्टिन स्टोन  चित्राङ्गनकर...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;लेखकक्रिस्टिन स्टोन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चित्राङ्नकर्ताराजुबाबु शाक्य &#039;शारब&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्पादकशान्तदास मानन्धर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्ध पिना॥॥॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[२००1६०1९९94&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आखिरमा टदोमीको टोलीले जिती छाड्यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेखक क्रिस्टिन स्टोन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चित्राङ्गनकर्ता राजुबाबु शाक्य &#039;शारब&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्पादक शान्तदास मानन्धर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुद्रक एपोलो अफसेट प्रेस (प्रा) लि., काठमाडौँकलर सेपरेसन प्रिन्ट प्रोसेस (प्रा) लि., काठमाडौँसंस्करण पहिलो, १५,000 प्रति, वि.सं. २०६७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ग्रस किताबको प्रकाशन स्थानिय समुदाय्र, रुम टु रिड तथा एल्सा र डेविड ब्रुलेको सहयोगमा भएको हो। यो किताब क्रद्षिअमात्यको पठन शीप र शिक्षा प्रतिको लगन र समर्पण प्रति समर्पित गरिएको छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पा॥5 00015 20015180111700017 18 00010618101 0 10 10091 0गाग फणा, उि00101 1० 3890 910 £159 9110 0800 8110. | 18 06010910010 पिज्जा 0149 10 110101 119 [2959101 910 06४0101 (० 819० 910 80002101 101 16 0100) 0 ।५01291&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूम टु रीड पोस्ट बक्स नं. २११0३, काठमाडौँ, नेपाल, फोन ५५५३८८७, फ्याक्स ५५४७५२०001110 3600 120श 30 21103, 1601011101100, ।६61091. 2016: 5553987, 806: 5547520,6110: 1161001010001090.010, ४४60: [?://४/४/४/।00701000.010&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
45 09-- 30011103090 8906 कार्शणा प0॥ ४69 0 पा गा8 ४ जो वाल ॥) 00/0102119 000109 10/10009119 01&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1॥॥ पी 0190/ 900 9610061 6001 ॥) 80002101. &#039;/४०16110 ॥) 0019001001 फ।) 10041 0 फा।05, 06&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
01091072015 010 900/610116७, ५४७ ०6४6100 औं 0190/ 51/॥9 0110 9100 0 1090119 911019 10710801१/ $01001&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
0100, 900 $0000 018 10 001१10100 58001001१ 5011001 ५॥) 16 1610५क्ाा 02 $10॥5 1० ५०००७७९0 गी)$0110010110106/0110.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[२0011101२09&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
00फ्ा 020100/8000110 3990. 410911510501/00.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रकाशकको भनाइ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो किताप प्राथमिक तथा निम्न-माध्यमिक तहका विद्यार्थीहरूकालागि भनी तयार पारिएको हो। “टोम्मी टेम्पो” निस्केदेखि अहिलेसम्मका&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टोम्मी टेम्पोका कथाहरू हाम्रा पाठकहरूका माझ प्रिय बनेका छन्‌। प्रस्तुत कथामाटोम्मीले रिसी रिक्सा र टेक टुक्‌ टुकसहितको नौ पाङ्ग्रे टोली बनाएर धुमधामकोप्रतियोगितामा भाग लिन्छ । प्रतियोगिताका बिभिन्न चरणमा टोम्मीको टोलीलेचमत्कारपूर्ण कुशलता प्रदर्शन गरेर आखिरमा जिती छाड्छ। यसरी प्रतियोगितामाप्रथम भएको टोम्मीको टोली पुरस्कार स्वरूप पाएको पाराग्लाइडिङको अनुभव गर्नपोखरा पुग्छ । पोखराको फेवा तालको दृश्यावलोकन गरिरहँदा टोम्मी र उसकोटोलीले बहादुरीका साथ उद्धारको काम गर्छ। कथा रमाइलो छ, कौतृहलपूर्ण छ।वास्तवमा कथाले जीवनको हरेक क्षण आफैँ एक प्रतियोगिता हो र त्यसलाई जितीछाड्नुपर्छ भन्ने सन्देश दिन खोजेको छ। आशा छ, हाम्रा पाठक भाइबहिनीहरूले&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यसलाई मन पराउनुहुनेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(०३,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रतियोगिताको तुल पढेपछि टोम्मी रिसी रिक्सा अनि टेक टुक्‌ टुक्‌ भैट्न उत्निखेरै हिँड्यो ।यस कुराले तीनैजना साट्टै उत्साहित भए र टेकले गौँडा गेस्ट हाउसबाट प्रबेशपत्र ल्यायो र तिनीहरूलेत्यसमा सावधानीपूर्वक आफ्नो नाउँ भरे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टोलीको नाम -- नौपाङग्रे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टोली रिसीले ब्यानर तयार पाप्यो ।उनीहरू उत्तेजित, उत्साहित र अधैर्य भएर प्रतियोगिताका दिनको प्रतीक्षामा रहे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
4011&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रतियोगितामा नौपाङग्रे टोली, प्राध्यापक-टोली, सिपालुहरूको-टोली र अद्वितीय चम्किलोभविष्यका ताराहरूको टोली गरी जम्मा चारवटा टोलीले भाग लिइरहेका थिए । सञ्चालकहरूले आफूसुदीप र रेखा हौँ भनेर आफ्नो परिचय दिइसकेपछि प्रतियोगिताको पहिलो चरण सुरु भएको घोषणागरे- “तपाईंहरूको सजिलोका लागि एउटा लामो भन्याड र अर्को एकमात्र खुडकिलो भएको छोटोभन्याङ पनि दिइएको छ तर याद रहोस्‌, तपाईंहरूले आफ्नै जिउको भरमा हुनसम्मको अग्लो धरहरा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बनाउनुपर्नेछ अनि कमसेकम दुई मिनेटसम्मका लागि तपाईंहरूले ठड्याउनुभएको धरहरा भत्किन दिनपाइँदैन । तयार ! लौ सुरु !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खुट्टा नभएकाहरूका लागि यो ठूलो चुनौती नै थियो तर रिसीले तुरुन्तै टाकटुक मिलाइहाल्यो -“टेक र टोम्मी, लौ, तिमीहरू दुवै सोझो गरी एकै पड्क्तिमा उभिक त- टेक, तिमीले आफ्नापाङग्रालाई भव्याङमाथि राख । टोम्मीलाई बेस्सरी समात्न्‌ । अनि म यस सानो भन्याङलाई मुनितिर र[खेर उचालौँला । लौ लौ अब दुवै ठडिन्‌ !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसपछि टेकमाथि टोम्मी ठाडो गरी उभियो ! रिसीले भन्याडलाई तेर्सो गरी राख्यो रत्यसमाथि दुई पाङग्रेमा चढेर र खुट्टाले पाउदानी चलाउँदै र तान्दै आफू माथि टुप्पोमा पुग्यो अनि...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एउदै पाङग्राको भरमा क टोम्मीमाथि उभियो ।त्यसपछि उसले भवप्याङलाई घचेटेर परसम्म हुत्याइदियो ।उनीहरू भीमसेन थापाको धरहरा झैँ दरो र बलियो भएरनढलीकन सन्तुलन मिलाएर उभिइरहे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ल भयो, अब सबै भर्नु” सुदीपले सुनायो, “नौपाङ्ग्रे ११ अडक पाएर बिजेता भएको छ ! अब नृत्यकोप्रतियोगिता सुरू हुन्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाच्नु टेम्पोका लागि कम गाह्रो कुरा हो र ! उनीहरूले सकेसम्म प्रयत्न गरे तर उनीहरूले दुईअङक मात्र प्राप्त गर्न सके । त्यसैले यसमा उनीहरू चुत्थो भए । चम्किला ताराहरूको टोली नौअडकपाएर पहिलो भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसपछि तिनीहरू आफैँले सिर्जेर एउटा नाटक देखाउनु पर्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टेकले दुईवटा बिरालाहरू र एउटा चलाख बाँदरको नाटक रच्यो।यसमा “नौ पाङग्रे समूह र प्राध्यापकहरूको समूह दुवैले नौ नौ अडक पाए !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसपछि चित्रकला प्रतियोगिता सुरु भयो । रिसी चित्रकलामा साट्टै सिपालु भन्ने क्रो हामीसबैलाई थाहा छ । चित्रकलाको बिषय “सुख” थियो र रिसीले हँसिलो अनुहार, फूलहरू, चराहरू,आगो, हात मिलाइरहेका साथीहरू र थरीथरीका उज्याला रङगहरूको ढाँचा तयार पाय्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चित्र लेख्न दिइएको ४५ मिनेट सकिएपछि त्यस्तै दुईचार जना मुख्य मुख्य मानिसहरूजाँची हेर्न आए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आखिरमा उनीहरूले बिजेताको नाम घोषणा गरे- “नौ पाङ्ग्रे समूह !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रतियोगीहरूले दुइटा टेबुलका बीचको खाली ठाउँलाई पत्रिकाका कागतको पुल बनाएर जोडनुपर्छ,र आफ्नो समूहको सबभन्दा मोटो अर्थात्‌ बढी तौलको मान्छेलाई त्यसमाथि बस्न लाउनुपर्छ । पत्रिका-कागत पट्याउन, दोब्न्याउन, गाँस्न र ठीक भयो भएन जाँची हेर्न जम्मा २० मिनेट दिइएको छ।प्राध्यापकहरूले बनाएको पुल सबभन्दा पक्काको साबित भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिपालुहरूले बनाएको पनि त्यति नराम्रो भएन । उनीहरूले बनाएको अलि तलसम्म झोलियो। रताराहरूको समूहले बनाएको पनि त्यस्तै भयो तर त्यसपछि...यस प्रतियोगितामा तपाईं नौपाङग्रे टोलीलाई कति अडक दिनुहुन्छ, भन्नोस्‌ त ।त्यसपछि अन्तिम नतिजा सुनाइयो -सिपालुहरूको टोलीले पाएको छ, २० अडक ! (केही ताली)चम्किलो भविष्यका तारा टोलीले पाएको छ, २४ अडक ! (अलि बढी ताली)प्राध्यापक टोलीले पाएको छ, ३४ अडङक ! (तालीको गडगडाहट)नौपाङग्रे टोलीले .पाएको छ, ३८ अडक ! (हर्षोल्लासपूर्ण ताली)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मिराचाहिँ हाँम्नका लागि पछाडि रहेको आफ्नै सिटमा बसिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“टोम्मी, अब हामीहरू दुबै जना तल ओरालोतिर दगुछौँ, लौ, तपाईं पहिले दगर्नोस्‌ । हाम्रोपालमा हावा भरिनेछ र ओरालो सकेर भीरनेर आइपुग्दा हामीहरू प्रा हावामा भझुन्डिरहेका हुनेछौं ।त्यसपछि आरामसाथ बसेर मजा लिऔँ !” मिराले भनिन्‌ ।यसरी टोम्मी दणुन्यो अनि..एकै छिनपछि क बिहानको नीलो आकाशमा तैरिन थाल्यो । उसकोपछिपछि टेक र रिसी पनि तैरिए।.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[ भोलिपल्ट तीनै जना मन लागी ठाउँमा जान र हेर्न फुर्सदिला थिए । त्यसैलै तिनी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जाने बाटोमा रहेको भिउटावरमा पुगे । त्यसपछि तिनीहरूले सेती नदी र बिद्युत्घर हेरे ।तिनीहरूले डेभिज फल र महेन्द्र गुफा पनि हेरे । मई महिना भएकोले दिउँसो तीन बजेतिर नैआकाश कालो बादलले ढाकियो र तिनीहरू तालतिर छिटो छिटो फर्के । तिनीहरू तालकोछेउमा उभिएर पोखरा उपत्यकामा चलेको आँधी हेरेर बसे । रूखहरू डरलाग्दो गरी हल्लिए रधूलो, कागतका टुक्राहरू र पातपतिङड्गर हावासित आकाशमा यताउति उड्न थाले ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तालको पारिपट्टिबाट दाउरा र स्याउला लिएर फर्केकाहरूले भरिएको डुङ्गा हुरीमा फँसेकोथियो । चारजना मान्छेले खियाइरहँदा पनि तिनीहरूले डुङ्गालाई सोझै लान वा तीनजना साथीहरूउभिइरहेको किनारतिर ब्याइपुन्याउन सकिरहेका थिएनन्‌ । एक्कासि त्यसै बेला चर्को आँधी आयो रतालको सतहमा ठुल्ठूला छालहरू उर्लन थाले अनि ....&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डुङगा बेस्सरी डगमगियो अनि त्यसमा रहेका मानिसहरू पानीमा खसेपछि एकछ्निअघिसम्मतर्सिएर चिच्याइरहेकाहरूको कोलाहल बन्द भयो । केही टाउकाहरू पानीमाथि छिन छिनमा उत्रिरहेका रफेरि डुबिरहेका देखिए भने छिनछिनमा पानीभित्रबाट हातहरू फुत्त फुत्त उठाउँदै गरेको पनि देखिन्थ्यो ।एक जना भने पल्टेको डुङगा समात्दै उभिरहेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टोम्मी करायो, “ती मानिसहरू पौडन सकेनन्‌ जस्तो छ ! रिसी, तिमी छिटो गएर एम्बुलेन्स...डाक्टर अनि पुलिसलाई बोलाएर ह्याउन्‌... ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टोम्मी र टेक दुवै पानीमा फालहाले । तिनीहरू सक्दो छिटो पौडेँदै उनीहरूकहाँ पुगे । एकजनामहिलाले आत्तिएर टोम्मीको अगाडितिरको पाङग्रा समातिन्‌ । “त्यसरी नतान्नुस्‌, बरु राम्ररी समात्नुस्‌ ।”टोम्मीले सम्झाउँदै भन्यो । एक जना मानिसले उसलाई पछाडिबाट समात्न खोजिरहेको थियो । पौडिनुसाट्टै गाट्रो थियो तर उसले उनीहरूलाई डुङ्गानेरसम्म पुन्यायो, “लौ डुङ्गा समात्नुस्‌, नछोडनुस्‌ है”भन्दै उनीहरूलाई डुङ्गा समात्न लाउन सघायो र भन्यो, “मैले अरूलाई पनि सघाउनुपर्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
|| सु गह? 00“&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टेक पनि उत्तिकै ब्यस्त थियो । “जम्मा कति जना छन्‌ हँ ?” उसले सोध्यो। “दस जना ।”उत्तानो परेको डुङड्गालाई पल्टाउन पाए भने सबैले त्यसको आड लिन पाउँदै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टोम्मी स्वाँ स्वाँ गर्दै करायो, “टेक, लौ, डुङ्गाको त्यो छेउ समातेर पल्टाऔँ त.।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
य्रो कम गाह्रो काम थिएन । ड्ङगा गह्डौँ थियो र जोडका साथ उर्लिरहेका छालहरूले घरी यताघरी उता गरी डुङगालाई हुत्याइरहेका थिए । तर टोम्मीले एक छेउ र टेकले अर्को छेउमा समातेरडुङ्गालाई पल्टाइहाले । “लौ समात्नुस्‌, यता छेउमा समात्नुस, नछोडीकन समात्नुस्‌ है ।” टेकले सबैलाईजोगाउन समात्न लगाउन खोज्यो । टोम्मी चारैतिर नियाल्दै पौड्यो । “छ त्यो सारी हैन त ? लौ,त्यो त डुब्यो।” उ त्यतैतिर सकेसम्म छिटो पौड्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो, त्यो महिला नै हो, केही भाग पानीमा डुबेकी अनि हावा भरिएको उसको लुगा पानीमाथिफुक्क उठेकोले उत्रिरहेकी, लौ त्यो त डुब्नै लागी । टोम्मीले यसभन्दा अघि कहिल्यै पानीमा डुबुल्कीलगाएको थिएन तर उसले यस पालि पछाडिका आफ्ना खुट्टा उत्तानो पार्दै आफ्ना दुवै हात फिँजाएरलामो सास तान्यो । यसरी र पानीमुनि गयो र ती आइमाईको चोलाको बाहुला समातेर बाहिर तान्योअनि तिनलाई एक हातले उचालेर डुङगामा राख्यो । त्यसपछि टोम्मीले डुङ्गालाई अगाडिबाट तान्यो रटेकले चाहिँ पछाडिबाट घचरेटयो । दुवै लखतरान थिए तर त्यस बेला छालहरू ॥ भइसकेकाथिए । तिनीहरूले बिस्तारै पौडदै डुङ्गालाई किनारमा ल्याइपुस्याए । » छरे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किनारनेर झन्डै कम्मरसम्म आउने पानीमा थुप्रै मानिसहरू - पुलिसहरू, माभझीहरू र पर्यटकहरूपानीमा डुबेर अचेत भएकाहरूलाई किनारमा लान सघाउन भनी उभिइरहेका थिए । टोम्मीका पाङग्रालेपानीमुनिको हिलो छोए तर तिनलाई हिलोमा गाडिनुबाट जोगाउन अरूहरूले मदत गरे । एक जनाडाक्टरले टोम्मीले समातिरहेको त्यस महिलालाई लिएर तुरुन्तै उनको मुखमा आफ्नो मुख जोडेर सासफुक्दै र छातीमा थिच्दै सास लिन लगाए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मानिसहरूले टोम्मी र टेक दुवैलाई तालबाट माथि ताने । एम्बुलेन्सहरूले दसैजनालाई तुरुन्तैअस्पतालतिर लगे । त्यसबेला टोम्मी त बिरामीजस्तै भइसकेको थियो। क थरथर कामिरहेको थियो रउसका हात ढुङ्गाजत्तिकै बोझिला भएका थिए । उसको एक्सेल दुखिरहेको थियो । एन्जिनमा पूरापानी भरिएको थियो । छ्त पनि भिजेर गट्ठौँ भएको थियो । उसले कालो धमिलो बाहेक अरू केहीदेखिरहेको थिएन र फक एक छेउमा डङ्ग्रङग लड्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुदीप र रेखा ग्यारेजबाट मानिसहरू लिएर आए । तीमध्ये एक जना सहरभरिकामध्ये राम्रोमेकानिक थिए । “सफा गरेपछि र सुकाएपछि, नयाँ स्पार्क प्लग राखेर अनि पेट्रोल जाने पाइपहरूसफा गरेपछि र केही समयसम्म आराम लिन लगाएपछि दुवै नयाँजत्तिकै तगडा हुनेछन्‌ ।” राम्ररीजाँचेर हेरिसकेपछि उनले भने । “हामी यिनलाई हाम्रो ट्रकमा हालेर लान्छौँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“जित्तु भनेको के हो ?” टोम्मीले आफैँसित सोध्यो । “सबैभन्दा माथि पुग्नु, पहिलो हुनु अनिपुरस्कार पाउनु रमाइलो कुरो त हो तर साँच्चा साँच्ची भन्ने हो भने त्यो केही पनि हैन । हामीलेभयलाई जित्यौँ, दुःख दर्दलाई जित्यौँ र उता निराश हुने र हिम्मत नगर्नेजस्ता कुरालाई परास्त गन्यौँ ।साँचो जित्नु भनेको त्यो पो हो ! यस्तो खालको जित हात पार्ने काम प्रतियोगितामै भाग लिनेहरूलेमात्र हैन कसैले पनि गर्नसक्छ र जुनसुकै ठाउँमा पनि गर्नसक्छ । हामीले मानिसहरूलाई हुँला गर्ने वाआफू डरपोक हुने बा अल्छी, स्वार्थी र निर्दयी हुनेजस्ता कुरालाई जित्न सक्नुपर्छ । यस्तो काम गर्नकालागि एउटा ताल नै हुनु पर्ने बा आँधीबेहरी नै आइपर्नुपर्ने भन्ने रहँदैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिनीहरू शान्त र गम्भीर भएर बसिरहेका थिए । ती तीन जना साथीहरू जसले आखिरमाप्रतियोगिता जिती छाडे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आखिरमा टोम्मीको टोलीले जितिछाड्यो&#039; रिसी रिक्सा र टेक्‌ टुक्‌ टुकसमेतको टोम्मीको टोलीले भाग लिएकोप्रतियोगितामा टोम्मीको टोलीले जितिछाडेको कथा हो । प्रतियोगितामा पहिलो भएकोले पुरस्कार स्वरूप पाएकोपाराग्लाइडिङ्गमा सामेल हुन सारङ्ककोट पुग्नु यसभित्रको अर्को रोचक कथा हो। अन्तमा पोखराको फेवा तालको किनारमाबसिरहँदा तिनीहरूले गर्न पुगेका साहसिक काम सिङ्गो कथाको चरम उत्कर्ष हो। यसलाई राम्ररी पढ्नुहोस्‌ र कथाको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूरा मजा लिनुसहोस्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
011 101100 18 090 [गा 1012 90/€ 085 &#039;ष) पिज्ीं पि०68119/ 90 101 0 पण ।) 7000177)/ 10171000 //705 (00.1906. 116 86 गल05 0 ले? भं€ त श्र णाप8091 0070 910 फा) 9 0 1० 90 0940 क19 0 2010919, 16.10 ४ 191605 0 पा € ० भ5. शा 500119 90५/फ8 19016685 9 फणा) पा 9 जज) ए10085 ता 0 ठा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पठा॥20 910 गछ गि81105 एपशं ।8250606 9 1004 0116 1916.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बै भागी)8 06लेखक क्रिस्टिन स्टोन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्री क्रिस्टिन स्टोन ४० बर्षदेखि शिक्षिकाभएर काम गरिरहेकी छिन्‌ । आफ्नोशिक्षाप्रतिको प्रेम नेपालका केटाकेटीहरूसितबाँडचँड गर्ने तीव्र अनुराग उनमा छ रउन्नती नेपालका गाउँका प्राथमिकबिद्यालयहरूका पुस्तकालयहरूमा नेपालीबालकथाको किताब उपलब्ध गराई सहयोगगरिरहेकी छिन्‌ । उनले विद्यालयहरूमापढाएर, शिक्षकहरूलाई तालिम दिएर तथा केटाकेटी रकिशोरहरूलाई बिभिन्त किसिमका किताब लेखेर नेपालमा २४बर्ष काम गरिसकेकी छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
॥ ४8. ाडौ॥0 $010 1195 10 /0915 0 89006101108 ५४०110110.95 91690161. 516 15 |0945910148 9000 $191110 1161 10४8 01901091 7000 108 शँ०88 516 पी 05 107 010101 900 16जाँ श89119168910 815070 1१4 000169 1890) ॥0191709 गी ।फा॥॥4995 01161091. 5101195 ५४०९00॥) |॥61001101 24 6018, 10901-110 1) $010015, ॥010 199011018 910 010 9॥ 5018 011000/65.गि 0॥०01 910 ००9 1000106.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गाफ्जाश तिभुप उशँ० 29:99 &#039;8/4348&#039;चित्राङ्गनकर्ता राजु बाबु शाक्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्री राजु बाबु शाक्य सुपरिचित कलाकार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुन्‌ जो &#039;शारब&#039; नामले बढी प्रसिद्धछन्‌। नेपालमा पहिलोपल्ट कार्टुन चलचित्रक्त खपि, बचाउने शारबले कार्टुन चित्राड्कन तथा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
॥ गै कला संयोजनमा विशिष्टता हासिल गरेकाछन्‌ । उनले धेरै पाठचपुस्तक र बालचित्रकथा लग्गायत स्वास्थ्य तथाबाताबरणसम्बन्धी थुप्रै पुस्तकहरूको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चित्राड्कन र कला संयोजन पनि गरेका छन्‌ । गुनिसेफको“मीना&#039; चित्रकथा तथा चार बिदेशी भाषामा एकँसाथ प्रकाशितअन्तर्राष्ट्रिय प्रकाशन &#039;॥6 112 0 800012&#039; चित्रकथा उनकाप्रसिद्ध चित्राडकतहरूमध्येका हुन्‌ । उनले रूम टु रीडका थुप्रैबालप्रकाशतहरूमा पनि चित्राङ्कन गरेका छन्‌ । उनी कान्तिपुरपब्लिकेशतका कला बिभागका प्रमुख हुन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
290 8900 8199 15 095 1000) ॥) 1000 95 89199 छि छ४०८ ॥। 04001 धा॥एभँ00. ४) 9 520019॥% ॥) 00015 910प्रथणा006990,10119510शवा७01191/000000/6, 0010 0001,ला।ताशा३ 0001, 95 ४/७॥ 95 0000 01 1108) 910 शोशठाएल,80119 ४ 1॥8 ॥0010 वि005 ॥पशाक(015 ॥101006: 1१0 (0025।४0904 00100 1000/656195 910 779 1/0 0 8000/9 56199. 51901905 ॥पशधाँ७0 9 0फा)001 0 उि0011 1० उि090 [0009 910 15 १01290 0100 989900 089कगाशाँ शं ।€कँ00 रि000091015.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2584 ११37-500-08-0ति तरा[| | ॥। शिक्षित बालबालिकाहरूबाट नै विश्वमा परिवर्तनको थालनी हुन्छ ।[२००11०1२०१६ &amp;quot;४/०1० 019196 $क्षाँ&amp;amp; () £००0900 01101912१।१७११३21500909&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%A0%E0%A5%82%E0%A4%B2%E0%A5%8B_%E0%A4%AB%E0%A5%81%E0%A4%B2_(A_Big_Egg)&amp;diff=95</id>
		<title>ठूलो फुल (A Big Egg)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%A0%E0%A5%82%E0%A4%B2%E0%A5%8B_%E0%A4%AB%E0%A5%81%E0%A4%B2_(A_Big_Egg)&amp;diff=95"/>
		<updated>2024-06-14T14:11:14Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: Created page with &amp;quot;लेखक 0101रोमा प्रधान 13019 जिला  चित्राङ्गनकर्ता ॥०51901दीपक गौतम 10000916 04)  सम्पादक प्गा०ाशान्तदास मानन्धर 8168 1288 1481186078ा  दा पिन1॥॥॥1२00111(01२690  ठूलो फुल१ 810 ६99  लेखक रोमा प्रधान  00 111 &amp;amp; 3019 2909)  चित्राङुनकर्ता द...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;लेखक 0101रोमा प्रधान 13019 जिला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चित्राङ्गनकर्ता ॥०51901दीपक गौतम 10000916 04)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्पादक प्गा०ाशान्तदास मानन्धर 8168 1288 1481186078ा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दा पिन1॥॥॥1२00111(01२690&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठूलो फुल१ 810 ६99&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेखक रोमा प्रधान&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
00 111 &amp;amp; 3019 2909)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चित्राङुनकर्ता दीपक गौतम&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्डायाँण [2609016 04पंका)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्पादक शान्तदास मानन्धर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छ्ी0ा 1111101001101111101112 1110&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुद्रक एपोलो अफसेट प्रेस (प्रा) लि., काठमाडौँ[1111 “0010 8 रि885 रित. । [0, 1(8111291100कलर सेपरेसन प्रिन्ट प्रोसेस (पा) लि., काठमाडौँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(0000 800074107) जि जि00858 जित. 110., । (गा) ॥00&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संस्करण पहिलो, १५,०00 प्रति, वि.सं. २०६४[५ ।11०|॥] ताशँ, 15,000 001005, 2007 “10.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कादुरी च्यारिटेवल फाउन्डेसनको आर्थिक योगदानबाट यस किताबको प्रकाशन सम्भव भएको छ।पा॥5 1000 ४४७5 11906 [0059106 ५४) प10119 010४०60 0१ 168 1000018 0127010108 :00100101.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूम टु रीड पोस्ट बक्स नं. ५८४८, काठमाडौँ, नेपाल, फोन ५५५३८८७, फ्य्याक्स ५५५३८८३9007110 3080 1205 30 5848, 160101101100, 1६01001. 2016 5553987, 806: 5553983,0091: 161091601001900.0/9.110, ४/610: गा ?://४/४/४४.०01090.00&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
0002. 3001110 3290 |29471615 ष॥) 10091 0 गफ 25 ऐँ।0001100 16 06५61010119 ४/०० 1० 63890॥9)1 50110015, ॥012125,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
10 0101 00006910191 बडा 0008. /७ ५861 (0 गा 8/016 891 ॥) 18 ॥/65 0 जालो ॥) 16 1060 पय 6000810&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
॥ [| 1858180019 शी ऐशं €1100//615 [2901016 0 णँगशं ७ ए1010५8 500000010100 0 का 05 0 पी शि॥85, 0 गफ 85,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[२००1६०३२९१६ ०0001185, 900 पाँप2 936162ँ1015. 0000 १0 0910 फा 25 पथ्न 01/ 11 20009101 001 10006, ५७ श४७ ०[012916 १७ ०/०।७ 01 00४6 018 0110 शं 8008.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
0007 02007 ७/ 3000 10 3090 41 1001510501000. 1881: 978-99946-2-706-6&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रकाशकको भनाइ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो किताप प्राथमिक तहका विद्याथी भाइबहिनीहरूका लागि भनीतयार पारिएको हो । यो कथा आफ्नो ओथारामा पाइएको ठूलोफुलको साँच्चीकैकी आमा फेला पार्न हिँडेकी कृखुरीको कथाहो। साँच्चीकैकी आमाको खोजीका क्रममा हिँडेकी क्खुरीकोथरी-थरीका जन्तुहरूसित चिनापर्ची हुन्छ । क तिनीहरूसितभलाकुसारी गर्छे र तिनीहरुका आनीबानी र अन्य विषयमाअनेकन कुरा थाहा पाउँछे। यसरी कथाले बालजिज्ञासालाई बुझनर तिनको पूर्ति गर्न प्रयत्न गरेको छ। कथाको पुनलेंखनको कामसम्पादक शान्तदासले गरेका हुन्‌ । प्रस्तृत कथा हाम्रा बाल-पाठकहरूले अवश्य मनपराउनेछन्‌ भन्ने हामीले आशा गरेकाछौँ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रिय पाठकहरू, मानिसलाई शिक्षाले नै आत्मनिर्भर बन्न सक्नेबनाउँछ र गरिबीका मारबाट जोगाउँछ भन्ने विश्वास रूम टुरीडको छ। संसारमा सकारात्मक परिवर्तन शिक्षितबालबालिकाहरूबाटै थालिन्छ भन्ने क्रालाई आत्मसात्‌गरेर यो संस्था नेपालका बालबालिकाहरूलाई शिक्षाको अवसरदिने अनेक किसिमका काममा सन्‌ २००0 देखि जुटिरहेको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
20५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ओथारो बसिरहेको कुखुरी खुसी हुँदै आज आफ्ना फुल गनिरहेको थियो- “एक, दुई,तीन, चार, पाँच .... छ!” गन्दा-गन्दै क भुनभुनायो- “मैले राम्ररी गनेर हेरेँ। यीजम्मा छवटा छन्‌ तर यो एउटा किन ठूलो ? पाँचवटा उस्ता-उस्तै छ्न्‌, एकै आमाकाछोराछोरीजस्तै । क्या मिलेका छन्‌, तर यो भने ठूलो! यै एउटा किन ठूलो ? आः यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो फुल नै होइन कि क्या !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;0016..., 1/0..., 11626..., 00..., £/6..., 9१. ..,&amp;quot; ८60 फो 6207716 गी01€ा यो ]|0/०॥/. 516५/०१०७४७०, &amp;quot; 1०४७ ८वार्थप॥/ ८001620 ०॥ 116 6095. 1616 ०62 १ 6095 11 101०. ऐपा५४१४ 5119 016 299 50 10102 1171652 16७ 2095 100161116 5116 ॥८७ 11€/ 00016 ग&amp;quot;0) 16$0016 गी) €. ॥१€/ ०2 ५० [126122८ं, 10घाँ १४१ 519 016 6039 5010102? । ० ८ वी$ 15गी/ 699.&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले आफैसँग सोध्यो- “यो फुल मेरो हैन भने कसको होला त ?आः, सबैकहाँ पुगेर सोधेपछि कसको भन्ने क्रा खुलिहाल्छ नि ।”यस्तो विचार गरेर उसले सबै फूललाई एउटा सानो डालामाराख्यो र तिनलाई काखी च्यापेर बाहिर निस्क्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
916 ०३७० 1656, गी $ 1३ 10 11४ 600, 161 १४१०0५७ 6299 गी$गी 126? । ग)।॥( । श००० 30 010 09८ €/61%/०1€6, क गील्लो । १॥वढी ७0॥/ 416 गी) €.&amp;quot; 916 को [पा ०॥16 690511010096 6,1610 औं ८ 610॥/ पा10€ा 1€ा वा$ 010 १५ट ०पा.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाटामा उसले एउटा बिरालीलाई भेट्यो । उसले बिरालीसित भलाकुसारी गसन्यो रबिस्तारै भन्यो- “बिराली दिदी, मेरा फुलमा एउटा अर्कै, बिरलै, अलि ठूलै फुल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भेटियो । त्यो मेरोचाहिँ हुँदै होइन । हेर्नुहोस्‌ त, यो तपाईंको पो हो कि! एक पल्टराम्ररी हेर्नुहोस्‌ त ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
0176 १/०% १16 गीश्षे ० ०वाँ. 5916 ए26201116 ८ 00 १०५५ ०३९७०, &amp;quot;1010, ।/9. । १,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1०००। ००१० ०५७१ वाथिला, पाोप०५००।, 120 609 011019 11 6099. । का) श्या2 ३10गी॥€. //॥ ०० 11०/€ ० ।००।६ ठा औं 1० $७€७ | ।$ ४००।$? 00 100८ वा औं 0100061/.&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिरालीले मसिनो स्वरमा भन्यो- “कुखुरी बहिनी, हेर्नुहोस्‌, हामीहरू पनि तपाईंले जस्तैआफ्ना छोराछोरीहरूलाई माया गरी हुर्काउँछौँ, तर हामी बिरालीहरू फुल पार्दैनौँ, हामीहरूसोझै बच्चा पाउँछौँ । लौ, मेरा केटाकेटीहरू भोकाएर कराइसके होलान्‌ । अब मैलेतिनीहरूलाई दूध ख्वाउन जानुपर्छ। म त गएँ, पछि भेटौँला है।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
9. । ता 16010॥160 501४, &amp;quot;5. 1162, ५/€७ 1५6 00 01॥वालो ४) 105 ०1 ०४७ ॥८७ १०० ००.पा ५/७ ०010 1० 6095. &amp;quot;/७ ४५७ जा) घ601/101116 । ता 05. ।// । ता 0115 घा21210100101/0118 शा) ।फो9€1. ०१५ । 1०७ 10 ए01660 गी॥€ 10 11. ५७6 १०० ।वाँढा, ७000 ०७.&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसपछि कुखुरी फेरि हिँड्यो। अलिकति पर पुगेपछि उसको कुकुर्नीसित भेट भयो ।कुखुरीले नम्र भएर भन्यो- “नमस्ते कुकुर्ती दिदी, क्रा के भने मेरा फुलहरूमा एउटाअर्कै फुल मिसिन आएको पाइयो । त्यो फुल जसको हो; त्यसैलाई जिम्मा दिरँ भनेरहिँडेको। यो कहीँ तपाईंको पो हो कि ! एक पल्ट हेर्नुहोस्‌ त ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गल्ली 6 16 १/€आ 01600. /त्री€ा ० १/१।॥2 916 ग)€ँ ००00. 1/19. 116 श्वा॥ 501, &amp;quot;1610,5. 0090/. 1616 1$ वो पापभ००। 690 औँ) 11४ 6095. । 1०४७ ०661 1001/19 10 16ग01€ 0116 €09. ८००० औं ०6 १००५? 0०0 10० वा औँ 0106.&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के रे ? मेरो फुल रे ? होइन, होइन, म फुल पार्दिनँ। हेर्नुहोस्‌ कुखुरी नानी, हामीकुकुर्तीहरू फुल पारेर हिँड्नेहरू होइनौँ। हामी त एकै पल्ट बच्चा पाउँछौँ र तिनीहरूलाईआफ्नै दूध ख्वाएर हुर्काउँछौँ। यो फुल तिम्रो आफ्नो होइन भने अरू कसैको हुनुपर्छ ।जानुहोस्‌, तपाईं अरूसित सोध्नुहोस्‌ ।” कुकुर्तीको स्वर बिरालीको भन्दा अलि चर्को थियो ।त्यसैले कुखुरीले अझ नम्र भएर भन्यो- “माफ गर्नुहोस्‌, तपाईलाई अल्मल्याएँ, धन्यवाद !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;॥॥1वा? ।// 6002 19०, 190, । 0017 ।०/ 6095. &amp;quot;/७ ००0511661 ॥०/ 6995. &#039;//७ ४४७ पा) 1०पण ७५ वो 220 पीली 0फ गी॥८ ॥ 1716 600 1$ 10 १००५ औं ८००० 106 $011600061$6&#039;5. &amp;quot;०० 106 ॥ ए0 010 09८ $006 016 गा॥।,&amp;quot; 1।6012160 15. ००0७ 1) ०।1००७1016. &amp;quot;901१ 1 001161119 ४००.&amp;quot; 1७5. थो $घ० ॥) ० $कीं 1016.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चक ट््ह्‌ तथ्य ७ काप्णा८000 हा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिँड्दा-हिँड्दा कुखुरी धेरै पर पुग्यो। उसले बाटाछेउको हिले-पानीमा एउटा सुँगर्नीपल्टिरहेको देख्यो। सुँगर्नीको नजिकै पुगेर कुखुरीले बिस्तारै भन्यो- “सुँगुनी दिदी, नमस्कार !एउटा कुरा सोधूँ भनेको । मेरामा एउटा अर्कै फुल मिसिन आइपुगेको रहेछ । त्यो फूलजसको हो; त्यसैलाई जिम्मा दढिरँ भनेको । हेर्नुहोस्‌ त, यो फुल तपाईंको हो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिलामा खेलिरहेको सुँगुर्नीले सुरुमा यस्सो पनि हेरेन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
5. ।1€ १५/०॥९७० ०0 १&amp;quot;४०॥९७० ०ा016200160 पली पिा।।€ा. 916 ५०१/० 190 1४18 गी 6००००।७ ०१९ 6002 0116 1000. 916 ५ ५2101116 12४ 00 ०5।९2०11€6), &amp;quot; ।12॥०, 1/॥9.र0७//, । ]0शं (वा 20 1०0 ०३ १०० ०००९ शँ0). । 0010 0 गदाल 609 0100 गी ०९)6999. । &amp;quot;/०20 10 1010 ०५6 ७2 6090 $ 0016. ८0०० ०० 10०८ था गी?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
5. रिए9/ तावा 6५61 1920116160 0100 वार.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्खुरीले फेरि सोध्यो- “सुँगनी दिदी, सुन्नुहोस्‌ त, म तपाईंलाई यो देखाउन आएको । योफुल छ नि, यो तपाईंको हो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस पालि धोद्रो स्वरमा सृुँगुर्नीले जड्िँदै भन्यो- “आ: मेरा बच्चाहरू देखेनौ, ती फुलबाटनिस्केका होइनन्‌ म आफैँले पाएका, के कचकच गरिरहेको ?” यति भनेर र फेरिहिलामा खेल्त थाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
5. ।। यो ०१९७० ०ए८), &amp;quot;शा5. 00, [216056 1764 116, । १/ता 1० 91०५ १०० 115. 15 गी$699 ४००५?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
105 116 16 [७ 16121€20 0197, &amp;quot;0017 ५०० ५७७ 10 1003165, १6 ठा 10 0016 0पां०01) 6808, । ७०४९ जग) 10 गीथ्वी. &#039;१/॥ १०० शं०० 1001618 2?&amp;quot; ।॥ 5. गिए७/ पीठ५/टा [0००।८10 [010/ ।) 16 [200016.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुखुरी त्यसपछि बिस्तारै त्यहाँबाट हिँड्यो । बाटाछेउका चउरमा उसको गाईसँग भेटभयो । कुखुरीले गाईसँग सोध्यो- “गाई काकी, मेरा गूँडमा कसले हो, एउटा अलि ठूलैफुल छाडेर गएको भेटियो। जसको हो; त्यसैलाई जिम्मा लाइदिन पाए राम्रो भन्ठानेरसोध्दै हिँडेको । यो फुल यहाँकै पो हो कि ! हेर्नुहोस्‌ त ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
5. 6 ५/०॥९८७० 1फ॥1€।. 0 वा 516 गा ० ००५/ 9029 0116 9105510104 0) पी€1000906. 19. 11 ०१७०, &amp;quot;त. ८०५, । 1०४७ 1000 गीवाँ $0016016 । यी ॥ गाल्यी/ फा6091) 1116. | ५/०००106 $0 1106  । ८00011000/€61 16 699101$11101161. ८००००० 10०६ वा औं 016 10€ गी ।$ ५००५?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गाईले फुल हेरेर भन्यो- “कुखुरी नानी, हामी बियाउँछौँ, फुल पारेर तिनलाई कोरलेरहिँड्दैनौँ। हामी आफ्ना बाच्छालाई आफ्नै थुन चुसाएर हुर्काउँछौँ। चारखुट्ेहरूमा छेपाराहरूफुल पार्छन्‌, तिनका पो हुन्‌ कि !” त्यसपछि गाई चउरमा चर्न थाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
५. ८०५ 10०1९७० ठा 16 609 010 5००, &amp;quot;06 1४5. थो, &amp;quot;४७ ७४७ फा) 1० ०पा ८०।४७३,(ीठ॥०/1€ गा) 6905. ५/९ ७60 ०० ०८०५४७५ शी) ग॥(. “0100 १6 1001-10060 वा)0150११ ॥2घ05 10/ 6095 116 609 ८००० 06 1619.&amp;quot; 15. ८०५ की शा ७० 9102719.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
-1044:010&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बारीका डिलमा घाम तापिरहेको छेपारीलाई देखेपछि कुखुरी खुसी भयो र छेपारीकोनजिकै गएर बिस्तारै सोध्यो- “छेपारी बहिनी, केही मान्नुहुन्न भने एउटा क्रा सोधूँभनेको, कसो होला कुन्नि ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छेपारीले भन्यो- “हुन्छ नि। मैले के गर्नुपन्यो, भन्नुहोस्‌ न।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हेर्नुहोस्‌ त, यी पाँचवटा मेरा आफ्नै फुल हुन्‌ तर यो ठलोचाहिँ मेरो हुँदै होइन। योकहीँ तपाईंको पो हो कि !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
5. 11 १४०५ ५७1 1101012 1० ५७७ ० ॥2वा0 1४19 0 16 6006 ०00 चा). 916 ५८ पा?1० 161 010 ०5७० $८ी॥/, &amp;quot;9. 120, १०० ०० 10 गो), 601 । ०५६ ४०० ०००पा$011€।110?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;५७७, १४)वाँ 001 । ०० 0 १००?&amp;quot; ०५८० 16 ॥2010.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;१०० वा 16५6 6095. 1656 1४6 6095 02 गी॥)€ 10पाँ ।$ 100 016 1$ 10 10116. 15 औँ१००४?&amp;quot; ०३८७० 1/5. 116).&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फुल हेरिसकेपछि छेपारीले तुरुन्तै भन्यो- “कुखुरी दिदी, म पनि फुलै पार्छु र म कुकुरनीर बिरालीले जस्तै आफ्ना भुराहरूलाई दूध ख्वाएर हुर्काउँदिनँ, तर यो फुल मेरो होइन ।मेरा फुल त निक्कै साना हुन्छन्‌ । यो तपाईंको आफ्नै होइन भने अरू कसको होला,खोइ ! लौ, पानी पर्ला जस्तो छ। आफ्नो भने न गुँड, न घर, कहिल्यै फुर्सत पाउनसकेको होइन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मेरा कुरा झर्को नमानी सुनेर र आफूलाई लागेका कुरा भनेर ठूलो गुन लाउनुभयो ।तपाईंलाई धेरै-धेरै धन्यवाद !” कुखुरीले मधुरो स्वरमा कृतज्ञता प्रकट गन्यो । त्यसपछिकुखुरी त्यहाँबाट अघि बढ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
5. 1170 10०७० था ।16 6395 010 7116 वावाँ७।॥/ 160121620, &amp;quot;५. 101, । ००1० 6005॥०५/७५/€७। । 0010 260 ग॥€ 10 11 10010165. पा ।116562 0210 11 6995, 11४ 600502श1)0॥€. 1 जि $ 1510 १० 6006 ५४/१०५७ ८००० औं 06? 100 110 । 0०. ५/७॥, । गा € 50000पा10 1) 01 00 1०6 016 शं 0 0170116, । ८0010116५€1 1०९७ 0० 6 0 फणा016.&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;ग।वा।८ ५०० 10 ॥शंटाो)9 10 116 010 शीठा)9 ४० जालो.&amp;quot; 15. थ्यो गीवा॥(20 त.।।2घा0 ०04 1०७० ०१€००.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छिनि-छ्निमा आमाको थुन चुस्दै र उपफ्रँदै गरिरहेका पाठाहरूसँग चरिरहेको बाख्रीसित भेटभएपछि कुखुरीले नम्र भएर भन्यो- “बाख्री दिदी, कुरा के भने फुल छोप्दै बस्दा यसोहेरेको, जम्मा छ्वटा फुलमा यो एउटाचाहिँ मेरो हुँदै होइन जस्तो मलाई लाग्यो, किनभनेयो अरूभन्दा अचाक्ली ठूलो छ। फेरि यो फुल जसको हो; क मेरो फुल कता पस्योहोला भनी खोज्दै होला । त्यसैले म सबैसँग सोध्दै हिँडिरहेको । तपाईंको त होइन होलातर यसो हेरेर कसको होला, बताइदिनुहुन्छ कि..?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
5. 11 ८घ162000550 11का॥/ ० 004३. १6 ।/०५ &amp;quot;४७1७ ५०0८1010ए ती॥ ती गो गी€ गरीजी टा900. 125. 1121 ०१७०, &amp;quot;5. 000, गोजी शो॥9 ५१61 । 6002011% 6995, । ५०५ ठा। 1०० ०16 €09 0002 110) 0161 6099. । थि ऐ।$ १४०६ 10 11४ 609 5० । वा ।1%119 100 0० ग$ 1016. । ठा ग॥ ८ $ ४००५, 10पाँ ८0010 ०० 162॥ 106 । ४००७ 100५ ५४१0५66991?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाख्रीले आँखा चिम्लेर एक छिन सोच्यो र आफ्नो चिउँडामुनिको दारी हल्लाउँदै भन्यो-“चारखुट्वेहरुमा कसको भन्ने खोइ ! फुल पार्ने गोहीको भनेँ यता गोही नै छैन, त्यस्तैकछुवाको भनुँ, कछुवा पनि छैन। कुखुरी नानी, मेरा बिचारमा तपाईंले बियाउनेचारखुट्देहरूसँग सोध्ने होइन, ओथारो बस्ने दुईखुट्टे पन्छीहरूसँग सोध्नु राम्रो होला ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुन्छ, त्यसै गर्नुपर्ला । तपाईंलाई धेरै धन्यवाद !” त्यसपछि कुखुरी अन्तै लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
5. ७०वाँ 0००३७० 16 €/७५ ०01110प06 गि 0 ५४०।॥७. &amp;quot;। वा 0“ $्या2 11 600 106101951००००-००७० वा।)0।1. ८10८०0०॥6५ 1० 6005 10पां॥१€/ वा2 10 0फ01€216. 1गां01565०३०।०,/ 6095 ॥€/ 100 2170 [0010 7616. 9. गो, । गी ८ ५०० 910010 ०9८ 16212105.&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;1 वा।॥८ ५०७. । गी ( । ५४॥ 00 खाँ,&amp;quot; 500 ।/9. 1161.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्लाटिपस अस्ट्रेलियामा पाइने कि स्तनधारी जनावर हो; जसले फुल पार्दछ ।र।वा/००३।३ वा) 29910110 गरीव ॥। पीवाँ छ फा ।) &amp;amp;०औ0॥04.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नते८)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अलि पर पुग्नु के थियो, एउटा हाँससँग कुखुरीको भेट भयो । कुखुरीले सोध्न खोजेकोमात्र के थियो, हाँसले नै &#039;क्हाँ ! क्हाँ !! भनी सोधिहाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुखुरीले सानो स्वरमा &#039;यतैबाट डुल्दै आ&#039;को&#039; भन्दै बिस्तारै भन्यो- “हेर्नोस्‌ न हाँस दिदी,मैले धेरैलाई भेटौँ र भेटेजति सबैसँग सोधेँ। तिनीहरू सबैले &#039;हामी चारखुद्देहरूमाप्लाटिपसले मात्र पहिले फुल पार्छ अनि कोरलेपछि दूध ख्वाएर हुर्काउँछ, हामीहरू त फुलपार्दैनौँ, बरु एकै पल्ट बियाउँछौँ&#039; भने । तिनीहरूले मलाई फुल पार्ने पन्छीहरूसँग सोध्न्‌भनी सल्लाह दिए ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३0 चा ग&amp;quot;0ा) 1616, 19. गध गी ० ०००८. 861016 15. 1 ८००० ३०, 5018, 16०००९।८००००८७० 1० ०३८ &amp;quot;४१७७ श€ १४०३ 3019.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
।/5. 116 16101€20, &amp;quot;102 € ५४61 &amp;quot;१616.&amp;quot; “10 916 ००००, &amp;quot;५. ०००, । 1०७ ००८७० ]पशं01००पाँ €/61%०१७ । गल 100 ॥१€१/ ०॥ $घ0 गी ॥&amp;quot;€/ ४४७ जा) 1016 १००१ 010 006510 ।०/ 6095. । ०5०0 1000 ०पां गीवाँ वा10180 16 10प-100120 वा)0॥9, 01 121 वा/205&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
।०/५ 6005 010116 22051162 ००१७ 0165 शी) गि॥८ 11€/ ५॥0ए9651201116 10 0०51(11612105.&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के कुरा सोध्नुपन्यो ?” हाँसले सोध्यो ।कुखुरीले जतनसाथ काखी च्यापेर हिँडेको टोकरीलाई छोपिराखेको रुमाल झिकेर देखाउँदैभन्यो- “ओथाराका मेरा यी फुलमा योचाहिँ मेरो हुँदै होइन, कहाँबाट कसले मेरामाराखिदिए, त्यही सोध्दै-खोज्दै हिँडेको ! म त हिँड्दा-हिँड्दा हैरानै भएँ !”“खै, खै, राम्ररी हेछँ त! म नि अलि बेहोसी, आज सम्झेर खोज्दै हिँड्दै छु, मेरो पोहो कि !” हाँसले आफ्नो लामो घाँटी तानेर टोकरीमा हेप्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;५७८ ०00 तीवाँ 5. पध्ो?&amp;quot; $वाँव त. ०००८.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
5. 1 यो ।0/201171611घ॥। दा ला€&amp;amp; री ॥1€2 1209८6 ० 6305010 5००, &amp;quot;।॥५ ०016 699।$ 10 गी।)62. 50062016 पीप 1०१७ ।&amp;amp;ी औं ही गी 1€शं, पीवाँ ।$ १४१४ । वा) 0019 00010051019 १&amp;quot;/१०01115 609 12610195 10. । वा) $071620.&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;| को $० 0056) 060. । ।0101611061620 1००० ०1०11०/७ ०661 1001018 10 औं. € 6$७७ रौं ।1$ गी॥)€,&amp;quot; ।/॥$. ००९।६ आ610160 161 6200 10 $€€6 ॥1510€6 16 100$66ँ.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यही बेला टोकरीको त्यो ठूलोचाहिँ फुलबाट टिउरो चलमलाउँदै निस्क्यो । टिउराकोआँखा र चुच्चो हेर्दै कुखुरीले खुसी हुँदै- “लौ काटीकुटी यसको रूप र रङ्ग त दुरुस्ततपाईंको जस्तै !” भनिरहेकै बेला अरू फुलहरूबाट पनि कुखुरीका चल्लाहरू चिँ-चिँ गर्दैनिस्कत थाले । दुवैको खुसीको सीमा रहेन। हाँसले कुखुरीलाई धन्यवाद दियो र कुखुरीलेपनि हाँसलाई बधाई दियो। टिउरा र चल्लाहरू पनि कक्हाँ-क्हाँ&#039; र त्यै त्यै भन्दै यताउतिचहार्न थाले ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फश गल्ली 112 600 060901110 गीव्ाँ८) ० ०००9. 1/॥9. 116 ।0०७० था 6 ०००८19 010गील्लो $वाव बी) ]०/, &amp;quot;01 औँ ।$ $0 ग0टी ॥८७ ४००.&amp;quot; 916 10० 1006 गिश। 60 ३०४0 गीवाँ५16 0) 2ए9501500600110 वाली घा100पां ८0016116 लो ०७. 80 5. टो वा॥5. ०००।६ &amp;quot;४७1७ 101012/. 12 0० वाँप।वाँ७० 60८ गी€॥ १४१॥७ 6 ०००८119 0101116०110७ ५५ €४€।% ५/१€616 10 11110 1000.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दु तत (51 |&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%9A%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A4%BE_(%E0%A4%95%E0%A4%A5%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%99%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B9)&amp;diff=94</id>
		<title>चतुरेको चर्तिकला (कथा सङ्ग्रह)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%9A%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A4%BE_(%E0%A4%95%E0%A4%A5%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%99%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B9)&amp;diff=94"/>
		<updated>2024-06-14T14:10:03Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: Created page with &amp;quot;बाल सन्दर्भसामग्री  बाल बोध - २२  चतुरेकोचर्तिकला  (कथा सङग्रह)  श्री ५ को सरकारशिक्षा तथा खेलकुद मन्त्रालयपाठ्यक्रम विकास केन्द्र  प्रकाशक : श्री ५ को सरकारशिक्षा तथा खेलकुद मन्त्र...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;बाल सन्दर्भसामग्री&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाल बोध - २२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेकोचर्तिकला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(कथा सङग्रह)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्री ५ को सरकारशिक्षा तथा खेलकुद मन्त्रालयपाठ्यक्रम विकास केन्द्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रकाशक : श्री ५ को सरकारशिक्षा तथा खेलकुद मन्त्रालयपाठ्यक्रम विकास केन्द्रसानोठिमी, भक्तपुर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनर्लेखन : गोरखबहादुर सिंह&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भाषा सम्पादन : गणेशप्रसाद भट्टराई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दृष्टान्त चित्र : श्रीहरि श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आवरण : नवीन्द्र राजभण्डारी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कम्प्युटर लेआउट : नन्दमाया सिटौला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छु सर्वाधिकार प्रकाशकमा निहित&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पहिलो संस्करण : २०५८ वैशाख&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रावक॒थन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बालकालिकाहरूका ज्ञान, सीप तथा अभिवृत्ति बढाउन, मनोरञ्जन प्रदान गर्न रमानसिक तथा बौद्धिक विकासका लागि सन्दर्भसामग्रीहरू उपलब्ध हुनु अत्यावश्यकठानिन्छ । यस्ता विविध सन्दर्भसामग्रीहरूले विद्यार्थीहरूलाई लगनशील र अध्ययनशीलबनाई पाठ्यपुस्तकमा भएका विषयवस्तु सजिलै ग्रहण गर्न सहयोग पुन्याउँछन्‌ ।उल्लिखित कुरालाई मनन गरी पाठ्यक्रम विकास केन्द्रले पाठ्यपुस्तकका अतिरिक्तअन्य पाठ्यसामग्रीहरू पनि प्रकाशन गर्दै आएको छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विद्यार्थीहरूको सर्वाङ्गीण विकास गराई उनीहरूमा जिज्ञासु प्रवृत्ति र सिर्जनात्मकक्षमता अभिवृद्धि गराउनका लागि सर्न्दभसामग्री निर्माण गर्ने क्रममा पाठ्यक्रमविकास केन्द्रले यो शृङ्खखला तयार पारेको हो । हाम्रो देशका अधिकांशबालबालिकाहरूले पाठ्यपुस्तकका अतिरिक्त अन्य सामग्री नगण्य रूपमा मात्रपढ्न पाउने भएकाले पनि यस्ता सामग्री बढी आवश्यक र उपयोगी हुने कुरामादुईमत हुँदैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो सामग्री विशेषत: कक्षा चार र पाँचका विद्यार्थीहरूको स्तर हेरी तयार पारिएको छतापनि परिस्थितिअनुरूप अन्य कक्षाहरूमा पनि उपयोगी हुने अपेक्षा गरिएको छ ।प्राथमिक कक्षा भनेको शिक्षाको आधार भएको कुरालाई दृष्तिगत गरी शिक्षकहरूलेप्रस्तुत सामग्री विद्यार्थीहरूलाई पढ्ने मौका दिई परषणर छलफल समेत गराउनसके यसको प्रभावकारिता बढ्नेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो सामग्री तयार पार्न सहयोग पुग्याउनुहुने सम्पूर्ण महानुभावहरूलाई पाद्यक्रमविकास केन्द्र कृतज्ञता व्यक्त गर्दछ, साथै यस सामग्रीका सन्दर्भमा प्राप्त हुने सुझावएवम्‌ प्रतिक्रियाको हार्दिक स्वागत गर्दछ ।शिवप्रसाद सत्यालमहानिर्देशक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाठ्यक्रम विकास केन्द्र२०५८ सानोठिमी, भक्तपुर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२. दुई रोटीको भागबन्डा डड&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४. भालेको मोल द&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६. सहरको ठूलो चोर १३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
य. देख्ने अन्धो १९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१०. खेतको पहाड २४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१२. ढुङ्गे फोल ३०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अचम्मको दाँत&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकपटक चतुरे कामको खोजीमा हिँड्यो । उ घुम्दैफिरदै राजदरबारमा पुग्यो । संयोगवशउसले दरबारमा काम पायो । सजिलै काम पायो, त्यो त राम्रै भयो, तर काम थियोतबेलाको । तबेलाकै भए पनि चतुरेले काम गर्न मन्जुर गत्यो किनभने उसले कहिल्यैराजालाई देखेको थिएन । चतुरेको सोचाइ थियो - दरबारमा काम गरे राजालाई सजिलैदेख्न पाइन्छ । तर संजोग मिलेन, महिनौँ काम गरे पनि उसले राजालाई देख्न पाएन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकपटक चत्रेको दाँत दुख्यो । उसको दाँत दुख्ने रोग अलिक पुरानै थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरे दुख्ने दाँत निकाल्ने विचारमा थियो । उ दाँत निकाल्न दरबारकै दन्त चिकित्सककहाँजाँदै थियो । चतुरे दरबारको प्रवेशद्वारमा पुग्यो । त्यसैवेला राजा बाहिरबाट दरबार फर्कंदैथिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा पलङमा थिए । पलङलाई चारजना बलिया मानिसले बोकेका थिए । राजा पलङमाथिपल्टिएका थिए । बूढा र कमजोर राजालाई देखेर चत्रेको आश्चर्य बाहिरै निस्क्यो, “एहे !मैले त राजा सुन्दर, बलिया र युवक होलान्‌ भन्ठानेको त यस्तो कमजोर र बूढा पोरहेछन्‌ । राजा यस्ता छन्‌ भन्ने थाहा पाएको भए कसले खान्थ्यो तबेलामा जागिर !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेको चर्तिकला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजाका पहरेदारले चतुरेको कुरा सुने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हाम्रा राजाको खिल्ली उडाउने आँट कसरी गरिस्‌ ?” राजाका पहरेदारले चतुरेलाई एउटाकोठामा थुनेर भकूर्न थाले ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ठीक छ ! तपाईंहरू मलाई जति भकुरे पनि भकुर्नुस्‌ तर खानेकुरा चाहिँ नदिनुहोला ।”- चतुरेले दुवै हात जोड्दै भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कुट्नु चाहिँ हुन्छ रे, तर खाना भने दिनुहुँदैन रे ।” - चतुरेको कुरा सुनेर राजाका मान्छेआश्चर्यमा परे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“किन ? किन दिनुहुँदैन खाना ?” - पहरेदारले सोधे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“डाक्टरले भनेका छन्‌, खाना खायो कि मेरो भुँडी फुट्छ रे । भुँडी फुटेपछि बाँच्ने त कुरैभएन । खाना खानेबित्तिकै मर्ने भएपछि खाना खाने पनि कुरै भएन । दुई वर्ष भयो मैलेखाना नखाएको ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेको चर्तिकला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हामीलाई उल्लु बनाउन खोजेको ? दुईदुई वर्ष नखाएर कोही जिउँदो रहन सक्छ ?”एकजनाले चतुरेको पिठ्युँमा एक कोर्रा थप्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कृपया नरिसाउनुस्‌, मैले साँचै भनेको छु ।” उसले मुख खोलेर एउटा दाँत देखाउँदैथप्यो- “मलाई यो दाँतले बचाएको छ । यो दाँतमा विचित्र शक्ति छ । यसबाट रसनिस्कन्छ र त्यही रसले अघाएर म बाँचेको छु । त्यसैले म हात जोडी बिन्ती गर्छु, यो दाँतपनि नउखेलिदिनुहोला ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भनिराख्नुनपर्ला -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छिनभरमै चतुरेका अगाडि थालभरि खाना आयो । उसलाई जबरजस्ती खान लगाइयो ।त्यसपछि चतुरेले नउखेल्नु भनेको दाँत पनि उखेलियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तँ उल्लू रहिछस्‌ चतुरे, उल्लू ! आफ्नो रहस्य आफैँले खोलिस्‌ । अब छिटै तँ उल्लूको भुँडीफुटेर काम तमाम हुँदै छ ।” पहरेदारले भने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मलाई त भोक लागेको थियो, खाना खाएँ, दाँतले दुःख दिएको थियो, दाँत पनि उखेल्नलगाएँ । उल्लू तिमीहरू कि म ?” यति भनेर चतुरे तबेलातिर दौड्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरे फुर्तीसाथ तबेलामा पुग्यो । तबेलाबाट एउटा घोडा निकाल्यो र त्यसैमा चढेर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भाग्यो । एकैछिनमा उसलाई पिछा गरिरहेका राजाका सिपाही चतुरेभन्दा धेरै पछि छुटेकिनभने चतुरेले छानेको घोडा तबेलाको सबैभन्दा छिटो दौडने घोडा थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुई रोटीको भागबन्डा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरे सानैदेखि नै चतुर थियो। योकुरा क स्कुलमा पढ्दै गर्दाकोतलको कथाले पनि पुष्टि गर्दछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैशाख महिनाको कुनै दिनचतुरेलाई स्कुल जानुपर्ने थिएन,स्कुल बिदा थियो । रूखबिरुवामानयाँ पालुवा पलाएका थिए ।काफल र एँसेलु पाक्ने महिनाथियो, जङ्गल रमाइलो थियो ।त्यसैले चतुरे र उसका दुईजनासाथीले गाउँ नजिकको जङ्गलमाघुम्न जाने सल्लाह गरे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिउँसो जङ्गलमा घुम्दाघुम्दै तीसाथीहरू थाके ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मलाई त भोकले पनि सतायो ।” चतुरे भुइँमा पल्ट्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यसो भए खाजा खाउँ न त ! हामीले तीनै जनालाई खाजा पुग्ने दुईओटा रोटी ल्याएकाछौँ ।” - एकजना साथीले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तर रोटी बाँड्ने कसरी, भोका तीन र रोटी दुई ?” साथीले समस्या राखे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमीहरूले सिङ्गासिङ्गै खा, मलाई त्यसैबाट आधाआधा देउ हुँदैन ?” दुवै साथीलेमन्जुर गरे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर ती साथीहरूले रोटी खाइसक्दा पनि चतुरेसँग आधा रोटी बाँकी रहेको देखे । त्यसपछि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मात्र उनीहरूलाई थाहा भयो सिङ्गो रोटी त उनीहरूलाई होइन चतुरेले पो आफ्नो भागमापारेछ । उनीहरूलाई रोटी थोरै पाएको भन्दा पनि उल्लू हुनुपरेकाले दु:ख लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
०७७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरे अलिक परको झरनामा पानी खान गएको मौका पारी ती दुई साथीले सल्लाह गरे,01 चतुरेको चर्तिकला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यो चतुरेले हामीलाई उल्लू बनायो । अब हामीले पनि उसका जुत्ता जङ्गलमा लुकाइदिऔँर उसलाई गाउँ फर्कदा नाङ्गै खुट्टा हिँड्ने बनाऔँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो कुरामा दुवैको सहमति भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तर चतुरेलाई कसरी जुत्ता फुकाल्न लगाउने ?” एकजनाले समस्या राख्यो । सल्लाहटुङ्गिने बित्तिकै चतुरे पानी पिएर फर्क्यो । “ए चतुरे भाइ ! तिमी अगाडिको यो काफलकोरूखमा चढ्न सक्छौ ?” एकछिनपछि एकजनाले सोध्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“किन ?” चतुरेले अचम्म मान्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“खास त केही होइन, मैले भनेँ तिमी त्यो रूखमा सजिलै चढ्न सक्छौ; मोहन भन्छ तिमीत्यो रूखमा चढ्न सक्दैनौ । हामीले यही कुरामा बाजी थाप्यौँ । अब मलाई जिताउने किमोहनलाई जिताउने तिम्रो हातमा छ ।” उसको साथीले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यो चतुरेको त्यो रूखमा चढ्ने ढङ्ग भए जस्तो त लाग्दैन ।” अर्को साथीले उक्साउनेप्रयास गस्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यस्तो रूख त म सजिलै चढ्न सक्छु भन्ने कुरा यी दुवैलाई थाहा छ । तर यिनीहरूलेकिन मलाई उक्साइरहेका छन्‌ ?” चतुरे अल्मलियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“प्रयास गरौँ के हुन्छ ?” तैपनि चतुरे रूख चढ्ने सुरसार गर्न लाग्यो ।“चतुरे जुत्ता यहीँ फुकाल्‌, हामी राखिदिन्छौँ ।” दुईजना साथीले एकैचोटि भने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेलाई लाग्यो साथीको रूख चढ्ने कुरा जुत्तासँग सम्बन्धित हुनुपर्छ । होइन भने दुवैजनाले एकैचोटि जुत्ताको कुरा किन गर्थे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“भइहाल्यो तिमीहरूले जुत्ता राख्नुपर्दैन । साथीहरूलाई बेकारमा किन दु:ख दिनु ?” चतुरेलेजुत्ता फुकालेर खल्तीमा राख्यो र रूखमा चढ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेका साथीहरूले फेरि पनि जिल्लिनुपस्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुखियाको ज्वाइँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकदिन चतुरे दिनभरि खेतमा काम गरेर निकै थाकेको थियो । त्यसैले साँझ खानाखानेबित्तिकै उ सुत्ने कोठामा गयो । चतुरेले बत्ती निभाउनै आँटेको थियो, ढोकाढकढक्याएको आवाज आयो । चतुरेले जाँगर नलागीनलागी ढोका खोल्यो । ढोकाबाहिरएकजना मानिस उभिएको थियो । त्यो ढोकाबाहिर उभिएको मानिसले भन्यो, “मलाई आजएक रात बास दिनुहोस्‌, मेरो घर टाढा छ, म अब धेरै हिँड्न सक्दिनँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तर बुबा म पनि दिभरिको कामले साह्रै थोकेको छु, म त सुत्नै आँटेको थिएँ । मेरी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीमती पनि घरमा छैनन्‌ । त्यसैले हुन्छ भने छिमेकका घरतिर बास खोज्दा राम्रो होला ?”चतुरेले नम्र भएर भन्यो । ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यसो नगर बाबु ! म बूढो मान्छेलाई अब कहाँ दु:ख दिन्छौ ? मलाई एक छाक खाना रबास यहीँ मिलाक बाबु !” - ती बृद्धले नम्र भएर भने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरे थाकेको भए पनि त्यसपछि आनाकानी गरेन - “ठीक छ, तपाईं साँझको पाहुना,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुःखसुख गरौँला, भित्र आएर बस्नुस्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेले ती बास माग्ने मानिसलाई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लगेर आफ्नै कोठामा राख्दै भन्यो,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“बुबा तपाईँ आराम गर्दै गर्नुस्‌, म&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तपाईँलाई खाना बनाउन जान्छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले न्यानो कम्बल ओढ्न दियो । हि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ठीक छ ! खाना राम्रो बनाउन्‌,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मलाई मीठो खाना खुवायौ भने तिम्रै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लागि राम्रो हुनेछ, किनभने तिमी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बसेको यो गाउँका मुखिया मेरा ससुरा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुन्‌ । तिमीले मलाई यसै पनि बास&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिनै पर्थ्यो ।” छ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेलाई बास माग्नेको कुराचित्तबुझ्दो लागेन । एक त चतुरेलाई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६ चतुरेको चर्तिकला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बास दिनै पर्थ्यो भन्ने कुरा मनपरेन, अर्को मीठो खाना बनाकभन्ने आदेश पनि ठीक लागेन । कमुखियाको ज्वाइँ भएको कुरामा पनिउसलाई विश्वास लागेन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर यी मन नपरेका र विश्वासनलागेका कुरालाई मनभित्रै राखेरचतुरेले भन्यो, “ठीक छ तपाईँमुखियाको ज्वाइँ हुनुहुँदो रहेछ, म&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तपाईँलाई राम्रो बासको व्यवस्थामिलाउँछु । बरु एकछिन पर्खनोस्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरे आफ्नो कोठामा गयो रकपडा लगाएर बाहिर निस्क्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ल मेरो पछिपछि आउनुस्‌ ।” चतुरे अघिअघि त पाहुना पछिपछि लागे । तिनीहरूलेगाउँको गोरेटो बाटो नाप्न थाले ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हैन हामी कहाँ जाँदै छौ ?” अलिक पर पुगेपछि पाहुनाले सोध्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आत्तिनु पर्दैन, तपाईँलाई राम्रो गाँसबासको व्यवस्था भएको ठाउँमा लैजाँदै छु ।” चतुरेलेजवाफ दियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मीठो खाना र आरामदायी बासको कल्पनामा हराउँदै ज्वाइँ पाहुना चतुरेलाई पछ्याउँदैगयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केही बेरपछि तिनीहरू एउटा ठूलो घरको आँगनमा पुगे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यो घर हाम्रा मुखियाको घर हो, अर्थात्‌ तपाईंको भनाइअनुसार तपाईंको ससुराली घर ।तपाईंलाई मेरो घरमा बस्नुभन्दा आफ्नै ससुरालीमा बस्नु राम्रो र सुविधायुक्त होला भनेरयहाँ पुग्याइदिएको ।” यति भनेर चतुरे फटाफट आफ्नो घरतिर लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिचरो त्यो ज्वाइँ भनाउँदो चतुरे ओझेल भएपछि बास खोज्न फेरि गाउँ चहार्न थाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेको चर्तिकला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मालेको मोल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुनै गाउँमा जैमाने नाम गरेको एउटाठिटो थियो । एकपटक क कामको खोजीमानजिकैको बजारमा पुग्यो । जैमाने वजारपुगेर काम खोज्दै धेरै ठाउँ पुग्यो, तर कामपाएन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यो सानो ठाउँमा के काम पाइन्थ्यो?” ककाठमाडौँ पुग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काठमाडौँ पुग्दा उसका खल्ती र पेट दुवैरित्तिएका थिए । भोकले साह्रै सताएपछि जेपर्लापर्ला भन्दै क एउटा होटेलमा पस्यो ।होटेलमा जैमानेले दुईओटा उसिनेको अन्डा,केही पाउरोटी र चिया मगाएर खायो ।जैमानेले भोक त मेट्यो तर उसँग तिर्नेपैसा थिएन । त्यसैले पसलका मानिसकोआँखा छलेर उ लुसुक्क वाहिर निस्कयो रफटाफट आफ्नो बाटो लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केही दिनको दौडधुपपछि जैमानेले एउटाससानो उद्योगमा काम पायो । उ मेहनतीर सिपालु थियो, राम्ररी काम गर्दै गयो ।वर्षदिन बित्दानबित्दै उसले केही पैसाजम्मा गयो । उसले त्यस वर्षको दसैँमागाउँ पुगेर बाबुआमालाई भेद्ने विचारगस्यो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“साहुजी ! यो पच्चीस रुपैयाँ लिनुस्‌ ।वर्षदिन पहिले म तपाईँकहाँ आएर दुईओटाअन्डा, केही पाउरोटी र चिया खाएको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेको चर्तिकला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
थिएँ । त्यतिबेला मसँग पैसाथिएन, त्यसैले पैसा तिर्न सकेकोथिइनँ । ल पैसा लिनुस्‌ ।”गाउँतिर हिँड्नुभन्दा पहिलेजैमाने होटेलमा पुग्यो । पहिलेखाएर पैसा नतिरेको जैमानेलाईपटक्कै मन परेको थिएन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जैमानेको इमानदारिता देखेरसाहुले अचम्म मान्यो । “यसरीवर्षदिन पहिलेको पैसा तिर्नआउने मानिस पक्कै पनि बुद्धहुनुपर्छ ।” साहुले साच्यो ।एकछिनपछि साहुले भन्यो, “हेरभाइ ! चिया र पाउरोटीको तकुरा नगरौँ तर अन्डाको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्रा गर्दा दुईओटा अन्डाबाट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुईओटा भाले निस्कन सक्थे । वर्षदिनमा ती भाले कम्तीमा पनि पाँच सयका हुन्थे । त्यसैलेदुईओटै भालेको नभए पनि तिमीले एउटा भालेको पैसा तिर्नुपर्छ ।”जैमाने अत्ताल्लियो “दुईओटा अन्डाको मोल दुईसय पचास ?!” साहु र जैमानेको वादविवादचल्यो । साहु दुईसय दिनै पर्छ भन्थ्यो, जैमाने “पच्चीस रुपैयाँ नै धेरै छ, मैले त वर्षदिनभएकाले थपेर दिएको भन्थ्यो ।जैमानेको भाग्य भनौँ कि संजोग तिनीहरूको वादविवाद चर्किरहेका वेला चतुरे त्यहीँ चियापिउँदै थियो । उनीहरूको विवाद देखेर चतुरेले साहुलाई भन्यो “साहुजी तपाईँलाई यो पैसा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot; र भालेको &#039;मोल म तिर्छु, हुन्छ ?”चतुरेको कुरा साहुले मन्जुर गन्यो ।“तर आज छैन भोलि ल्याइदिन्छु ।” चतुरे वेलावेला त्यो होटेलमा चिया पिउन आउँथ्यो ।त्यसैले चतुरेको दोस्रो प्रस्ताव पनि साहुले मन्जुर गस्यो । चतुरेले जैमानेको पच्चीस रुपैयाँजैमानेलाई नै फिर्ता दियो । जैमाने पनि आफ्नो बाटो लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेकोचर्तिला 2” ९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दोस्रो दिन चिया पिउन आउँदा जैमानेले सानोसानो पोको साहुलाई दिँदै भन्यो, “ल लेकतिम्रो हिजोको ठिटाले वर्ष दिन पहिले खाएको अन्डाबाट निस्कने कुखुराको भालेको मोल ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साहुले पोको खोलेर हेत्यो । त्यहाँ उसिनेको मकै थियो । साहुले आश्चर्य मान्दै र केहीझकँदै सोध्यो, “यो के दिएको चतुरे तिमीले ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;यो मकैको बिउ हो । साहजी, यो मकैको बिउ छर, यसबाट फलेको मकै बेच, कम्तीमाभनि पाँचसय पाउनेछौ । यसरी तिमीले अन्डाबाट निस्केका एउटाको मात्र होइन दुईओटैभालेको मोल पाउने छौ ।” चतुरेले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;तिमीलाई उसिनेको मकै उम्रँदैन भन्ने पनि थाहा छैन ।” साहुले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;उसिनेको अन्डाबाट भाले निस्कन्छ भने उसिनेको मकै पनि उम्रन्छ साहुजी ।” साहुलेत्रतुरुको चलाखी बुझ्यो । उसले चतुरेलाई केही जवाफ दिन सकेन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भइहाल्यो त्यो ठिटाले दिएको पच्चीस रुपैयाँ त देक ।” केही बेरपछि साहुले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एउटा इमानदार मान्छेलाई ठग्न खोजेकाले त्यो पच्चीस रुपैयाँ तिमीलाईरिमाना ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ति भनेर चतुरे आफ्नो बाटो लाग्यो ।0 चतुरेको चर्तिकला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकदिन चतुरेका छिमेकीकाकाले चतुरेलाई बोलाएर भने“ए चतुरे ! सिरुटारकाज्वाइँलाई एउटा चिठी लेखिदेकत एउटा सल्लाह माग्नु छ ।”त्यतिवेला पढेलेखेका मान्छे थोरैथिए । चतुरे पनि ती थोरैपढेलेखेकामध्ये एकजना थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काका लेख्नुपर्ने कुरा बताउँदैगए चतुरेले चिठी लेख्दै गयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर चिढी लेख्दालेख्दै उसलाई पनि सिरुटार जानुपर्ने कुराको सम्झना भयो र काकासँगभएको फुर्तिलो घोडा पनि सम्झ्यो । त्यसैले चिठी लेखिसकेपछि चतुरेले भन्यो । “चिठी तलेखेँ काका, तर मेरा अक्षर साह्टै नबुझिने छन्‌ । भिनाजुलाई पढन गाह्रो पर्ला कि ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यसो भए तिमी मेरो घोडा लिएर जाङ । सिरुटार टाढा पनि छ, घोडामा गयौ भने आजपुग्छौ र भोलि फर्कन सक्छौ ।” काकाको कुराले. चतुरे रमायो । घोडा चढ्न पाउँदा कनिकै खुसी हुन्थ्यो । तिनै ताका चतुरेलाई उसको सिरुटारको मीतलाई भेट्नै पर्ने कामपरेको थियो । तर बाटो लामो भएकाले जाँगर गरेको थिएन । काकाको घोडा पाएपछि&#039;फुर्तीसाथ सिरुटारतिर लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिरुटार पुगेर पहिले चतुरेले काकाको ज्वाइँलाई चिठी दियो अनि बास बस्न मीतको घरमा गयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot; “मीतज्यू, मैले नयाँ घर बनाएँ । मिस्त्रीहरूलाई ज्याला बुझाउन पैसा पुगेन । त्यसैले केहीदिनका लागि पैसा सापट माग्न आएको ।” खाना साना खाएपछि सुत्ने बेलामा चतुरेलेउसको मीतसँग कुरा राख्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिरुटार मीतसँग पनि त्यतिबेला घरमा पैसा रहेनछ । उनले भने, “माफ गर्नुहोलामीतज्यू, मसँग अहिले घरमा पैसा रहेनछ । अर्को हप्ता आउनुस्‌, खोजिराख्छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेको चर्तिकला न विवि वा) ]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्को हप्ता आउने सल्लाह गरेर चत्रे फर्क्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“चिठीको जवाफ ल्यायौ त ?” गाउँमा फर्केपछि चतुरेका काकाले सोधे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“काकाले जवाफ लिनु भन्नुभएकै थिएन । मलाई के थाहा ?” चतुरेले थाहै नपाए जस्तोगच्यो । “जवाफ लिनै पर्ने भए म गइहाल्छु नि काका ! सिरुटार पुगेर आउँदा थाकेको छु ।दुईचार दिन थकाइ मेटौँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्को हप्ता एकाबिहानै चतुरे काकाको घरमा पुग्यो । चतुरेलाई देख्नेवित्तिकै काकालेचिठीको कुरा सम्झे । चतुरे अघिल्लो हप्ता जस्तै काकाको घोडा कुंदाउँदै सिरुटारतिरलाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्को दिन सिरुटारवाट गाउँ फर्कदा चत्रेको खल्तीमा काकाको चिठीको जवाफ मात्र थिएन- मिस्त्रीलाई ज्याला बुझाउन पुग्ने पैसा पनि थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“काका ! तपाईंलाई धेरैधेरै धन्यवाद, म तपाईँप्रति आभारी छु ।” काकालाई चिठी बुझाएरघर फर्कन लाग्दा चतुरेले उसका काकालाई भन्यो ।“चतुरेले दुईदुईपटक सिरुटार पुगेरमेरो काम गरिदियो, उल्टै मलाई धन्यवाद दिएर गयो । किन होला ?” चतुरेको बढ्याइँकोछेउटुप्पो नपाएका काका निकैबेर सोचिरहे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१२ चतुरेको चर्तिकला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सहरको ठूलो चोर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धेरै पहिले कुनै देशमा एकजना राजा थिए । उनी जनताको सुखसुविधाको निकै ख्यालराख्दथे । त्यसैले उनी जनप्रिय थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकपटक उनको राज्यमा चोरीका घटनाहरू घट्न थाले । राजधानीमै पनि चोरी बढ्नथाल्यो । राजधानीमै त्यसरी चोरी बढ्न थालेपछि राजालाई जनताले के भन्लान्‌ भन्नेलाग्यो । त्यसैले राजाले घोषणा गरे :&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“सहरको चोर पत्ता लगाउनेलाई सरकारी ढुकुटीबाट एकहजार चाँदीका सिक्का&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुरस्कार दिइनेछ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संयोग नै भनौँ चतुरे पनि त्यही सहरमा बस्दथ्यो । अर्को संयोग के पन्यो भने राजालेपुरस्कारको घोषणा गरेकै भोलिपल्ट चतुरेको बाकसको साँचो हरायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेको भनाइअनुसार साँचो हराएको बाकसभित्र एउटा पुरानो बत्ती थियो । त्यसैले उसले&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सहरबासीलाई एकै ठाउँमा जम्मा गरेर उसको एउटा पित्तलको महत्त्वपूर्ण पानसबत्तीभएको बाकसको साँचो हराएको कुरा सुनायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यो पित्तलको पानस पनि कसरी महत्त्वपूर्ण भयो ?” - भिडबाट कसैले सोध्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
«त्यो त मलाई पनि थाहा छैन । तर बत्तीसँगै एउटा बन्द चिठी छ । बत्ती र त्यो बन्दचिठी नखोली भोलिसम्म राजालाई पुग्याउन सके आधा राज्य पाइन्छ रे । तर मेरो दुर्भाग्यबत्ती भएको बाकसको साँचो हराएको छ । कसैले साँचो मेट्टाएर दिनुभयो भने उचितपुरस्कार दिनेख्नु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसको बाकसको साँचो त भेटिएन तरत्यसै रात उसको बत्ती भएको बाकसभने चोरियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अर्को दिन कुनै सहरबासीले चतुरेकोबाकसभित्रको बत्ती र चिठी लगेरराजालाई दियो । राजालाई दिएकोबत्तीसँगैको बन्द चिठीमा लेखिएकोथियो -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेको चर्तिकला | ---....भनाामााममममममममिमममममममममममममममगमललामाामाममममममममममम्बर रै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न्यायप्रेमी वरकार ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सरकारको यो सहरको चोर पत्ता लगाउने सदिच्छा पूरा गर्न मैले एउटा जुक्ति सोचेँ ।सोचेको जुक्तिअनुसार मैले हिजो सहरमा प्रचार गरेँ :&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मेरो बाकसमा एउटा बत्ती र बत्तीसँगै एउटा चिठी छ । त्यो बत्ती र चिठी नखोलीभोलिसम्म राजा समक्ष पुग्याउन सके आधा राज्य पाइन्छ रे । तर दुःखको कुरा त्योबाकसको साँचो हराएको छ । कतैले साँचो भेटेर दिनुभयो भने राम्रो पुरस्कार दिनेछु ।”मेरो प्रचार सुनेर यो बत्ती र चिठी लिएर आउनेले मेरो बाकस चोप्यो र बत्ती र चिठीलिएर हजुरकहाँ आएको छ । अहिले सरकारका अगाडि उभिएको यो मानिस सहरको ठूलोचोर हो । सरकार ! आवश्यक कार्यवाहीका लागि अनुरोध गर्दछु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सरकारको भक्तचतुरप्रसाद&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसको भोलिपल्टै राजाले सहरमा ठूलो सभाको आयोजना गरे । भेलामा राजाले चोरसमाउने चतुरेको जुक्तिबारे सबै कुरा सुनाए । त्यही सभामा राजाले चतुरेलाई पुरस्कारस्वरूप एकहजार चाँदीका सिक्का दिए । चोरलाई अपराधअनुसारको दण्ड मिल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१४ चतुरेको चर्तिकला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पिपल छायाको कारोबार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धेरै पहिले कुनै गाउँमा एउटा धनी मानिस बस्थ्यो । उसको नाम धनीराम थियो । उसलेबाटाको छेवैमा ठूलो घर बनाएको थियो । उसको घरनजिकै पिपलको राम्रो चौतारी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
थियो । चौतारीबाट वरिपरिका रमाइला दृश्यहरू देख्न सकिन्थ्यो । गर्मीको बेला चौतारीकोछायामा बसेर शीतल हावा खान निकै रमाइलो हुन्थ्यो । त्यसै कारणले धनीरामले त्योचौतारी खुबै मन पराउँथ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गर्मी महिनाको कुनै एक दिन धनीराम शीतल ताप्न चौतारीमा पुग्यो । धनीराम त्यहाँपुग्दा कुनै अर्को मानिस चौतारीमा पुगेर पहिलेदेखि नै बसिरहेको थियो । चौतारीमा कुनैअर्कै मानिस बसेको देखेर धनीरामलाई रिस उठ्यो । उसलाई त्यहाँ अरू मानिस बसेकोमन परेन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चौतारीमा भेट भएपछि धनीराम र चतुरेबीचमा भएका कुराकानी यस्ता थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमीलाई यो चौतारीमा कसले बस्नु भन्यो ?”- धनीराम ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेको चर्तिकला 2.----५५५५4444449444994999999०५०००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००००५ पपन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“चौतारी राम्रो लाग्यो र म आफैँ बसेँ ।” - चतुरे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
«राम्रो लाग्यो भन्दैमा अरूको चौतारीमा बस्न पाइन्छ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यो चौतारो तपाईँको हो र ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हो यो मेरो चौतारो हो ! मेरो स्वीकृतिबिना अरूलाई यहां बश्न मनाही छ।“साह्रै गर्मी छ, मलाई एकछिन बस्न दिनुहोस्‌ न ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यो चौतारीमा मबाहेक अरू बस्न पाउँदैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वास्तवमा चौतारी धनीरामको थिएन । त्यो चौतारी साझा थियो । त्यो चौतारी धेरै पहिलेगाउँलेहरू मिलेर बनाएका थिए । चतुरेलाई पनि यो क्रा थाहा थियो तर उसले प्रतिवादगर्न उचित ठानेन र आफ्नो बाटो ततायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धनीरामको कुराले चतुरेको चित बुझेको भने थिएन । “साझा चौतारीमा पनि बस्ननपाइने ?” उसको मनमा यो प्रश्न उठिरहयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्को दिन पनि चतुरे चौतारीमा गएर बस्यो । धनीराम आएर अघिल्लो दिनको जस्तैउसलाई हकार्ने सुरमा थियो । त्यत्तिकैमा चतुरेले भन्यो -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मलाई देखेर तपाईँ रिसाउनुभयो होला तर आज म अर्कै कामले आएको छु ।”“अर्कै काम रे, कस्तो अर्कै काम ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मलाई यो चौतारीको बरपिपलको छाया असाध्यै मन पस्यो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तर मन परेर के गर्ने ! यो चौतारी मेरो हो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ठीकै छ, चौतारी कसको हो भन्नेबारेमा मलाई केही भन्नु छैन । तर बेच्नुहुन्छ भने मपिपलको छाया मात्र किन्न चाहन्छु । यही कुरा राखौँ भनेर आएको ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धनीराम धनी मात्र थिएन लोभी पनि थियो । छाया किन्ने कुराले क निकै खुसी भयोकिनभने चौतारी उसको थिएन । अर्का कुरा चतुरे छाया मात्रै किन्न खोजका थियो, पूरै चौतारीकिन्न त खोजको थिएन । त्यसैले छाया किनवेच गर्ने कुराको सहमति भयो । दिनभरिकोछलफल पछि छायाको मोलतोलको टुङ्गो लाग्यो । चतुरेले मोल भुक्तान गस्यो । सर्तनामालेखियो र दुवैले एकएकप्रति सर्तनामा राखे । छाया किनबेचको सबै कार्य सकियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छायाको कारोबारपछि चतुरेलाई चौतारीमा जान कुनै अप्ठेरो रहेन । क मन लागेको बेला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१६ चतुरेको चर्तिकला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जान्थ्यो, अघाउन्जी चौतारीमा बस्थो । केही दिनपछि एकदिन चतुरे धनेसाहुको आँगनमापुगेर बस्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
८ए चतुरे मेरो आँगनमा किन आएको ?” धनीरामले रिसाउँदै सोध्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चत्रेले जवाफ दियो, “वरपिपलको छाया तपाईँको आँगनमा छ, त्यसैले म छाया ताप्नआएको ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धनेसाहु झस्कियो - “हो त नि उसँग छाया परेको ठाउँमा बस्न पाउने त सहमति नैभएको छ । त्यतिवेला पनि त मेरो आँगनमा छाया थियो होला तर मैले मेरो आँगनमापनि छाया पर्न सक्छ भन्ने कुरा किन सोच्न सकिनँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धनेलाई तुरुन्तै सम्झना भयो त्यो दिन वादल लागेको थियो । छिटपुट पानी पनि परेकोथियो । त्यसैले सम्झौतापत्र लेख्दा धनेको घरभित्र बसेर लेख्नुपरेको थियो । धनीरामलेचतुरेको चलाखी वुझ्यो । तर काम विग्रिसकेपछि चलाखी बुझेर के गर्ने ? धनेले मनबुझाउन प्रयास गप्यो “भैहाल्यो चिन्ता गरेर के हुन्छ र ? छायाको मोल पनि त राम्रैलिएको छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिनै ताका धनीरामकी छोरीको बिहेको कुरा छिनियो । बिहेको दिन बिहानै दुलाहाकोतर्फबाट आएका जन्तिहरू धनीरामका आँगनमा टनाटन भरिए । बिहेको रमझममा धनीरामको घर बिछट्टै रमाइलो थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्कोतिर चतुरे पनि आफ्नै योजनामा जुटेको थियो । उसलाई धनीरामले चौतारीमा एकछिनपनि बस्न नदिएको पटक्कै मन परेको थिएन । अर्को कुरा धनीराम घमन्डी पनि थियो ।गाउँलेहरूप्रतिको धनीरामको घमन्डी व्यवहार पनि चतुरेलाई मन पटक्कै परेको थिएन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिहेको रमझम चलिरहेको वेला चतुरे, उसका छिमेकी र दर्जनौँ गाईवस्तुको हुल विवाहमण्डपमा पुग्यो । गाईवस्तुको हुल विवाहको रमझमले तर्सियो । गाईवस्तु बाँबाँ र बुँबुँ गर्दैयताउता दौडन थाले ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यति मात्र नभएर चतुरेको हुल बैठक, भान्साघर, पाहुनाकोठा जहाँजहाँ पिपलको छायापुगेको छ त्यहीँत्यहीँ मनखुसी घुम्न थाले । बिचरा धनीरामसँग लाजले रातोपिरो हुनुबाहेकअरू उपाय थिएन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जन्तीहरू आश्चर्यमा परे । विवाह मण्डपमा त्यस्तो खैलाबैला मच्चिएको देखेर जन्तीहरूचतुरेसँग रिसाउन थाले । जन्ती रिसाउन थालेको देखेर चतुरेले भएको सबै कुरा जस्ताकोतस्तै राख्यो । उसले धनीरामसँग भएको सहमतिपत्र पनि देखायो । चतुरेको कुरा सुनेरजन्तीहरू रिसाउनुको सट्टा रमाइलो मानेर पेट मिचिमिची हाँस्न थाले । धनीराम लाजलेभुतुक्कै भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसपछि धनीरामले विचार गप्यो त्यो गाउँमा बस्नु ठीक छैन । त्यसैले क अर्को गाउँमाबसाइँ सस्यो । पिपल चौतारी पहिले जस्तै गाउँलेको भेटघाट, छलफल, सरसल्लाह गर्ने,आराम गर्ने ठाउँ भयो । त्यहीँ चौतारीमा बसेर गाउँलेले धनीरामको आधा घरलाईपाहुनाघर बनाउने र आधा घरमा चतुरे बस्ने सल्लाह गरे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तर अरूको घरमा म कसरी बस्ने ? मैले धनीरामलाई पाठ मात्र सिकाउन खोजेको हुँ,उसको घरमा बस्न खोजेको होइन ।” चतुरेले असहमति जनायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यो घर र चौतारी तिम्रो बुद्धिले प्राप्त भएको हो । यो घरमा गाउँलेको पनि प्रशस्तपरिश्रम भिजेको छ । फेरि तिम्रो घर पनि त छैन, धनीरामसँग पिपलको छाया किन्दातिमीले तिम्रो घर बेचिसकेका छौ । त्यसैले तिमीले यो घरमा बस्न अप्ठ्यारो मान्नुपर्दैन ।”गाउँलेहरूले भने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरे गाउँलेको सल्लाहमा सहमत भयो । उसले पिपल चौतारी र पाहुनाघरकोमरम्मत सम्भार गर्ने जिम्मा पनि लियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१८ चतुरेको चर्तिकला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देख्ने अन्घो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेको छिमेकमा एउटा परिवार थियो । परिवारमा दुई दाजुभाइ थिए । जेठो दाजुकीश्रीमती पनि थिइन्‌ । दुई दाजुभाइको सम्बन्ध राम्रै थियो, तर भाइजूले देवरलाई मनपराउँदिनथिन्‌ । भाउजूको सोचाइमा देवर हुनुभन्दा नभएको भए राम्रो हुन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसैले उनी सधैँ नजिकैको मन्दिरमा गएर प्रार्थना गर्थिन्‌, “भगवान्‌, मेरो देवरलाई अन्धोबनाइदेक । तिमीले उसलाई अन्धो मात्र बनाइदियौ भने त्यसपछि के गर्नुपर्छ मलाई थाहा छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकदिन कान्छो भाइलाई उत्सुकता जाग्यो, “भाउजू सधैँ मन्दिरमा गएर केका लागि पृजागर्छिन्‌ ?” त्यसैले एकपटक उ भाउजूले थाहा नपाउने गरी उनको प्रार्थना सुन्न पछिपछिमन्दिरतिर गयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले भाउजूको प्रार्थना सुन्नमन्दिर पछाडि बसेर कानथाप्यो । जब उसले भाउजूकोप्रार्थना सुन्यो, क चकित&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पस्यो । जे भए पनि भाउजूलेत्यति साह्वो नराम्रो गर्छिन्‌ भन्नेउसलाई लागेको थिएन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मन्दिरबाट घर फर्कंदा कान्छोभाइको चतुरेसँग भेट भयो ।उसलाई दु:खी र निरास देखेरचतुरेले त्यसको कारण साध्यो ।भाइले भएको सबै व्यहोराबतायो र भाउजूको दुष्टताबाटबच्ने उपाय बताइदिन पनिचतुरेसँग अनुरोध गप्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेको चर्तिकका .._____. १९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेले भन्यो, “आज म विचार गर्छु, त्यसको उपाय म भोलि बताउँला ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्को दिन चतुरेले बताएको उपायअनुसार कान्छो भाइ भाउजू मन्दिर जानुभन्दा पहिले नैमन्दिरपछाडिको रूखको टोडकामा लुक्यो । उसकी भाउजूले सधैँझैं भगवानसँग अन्धोबनाउने प्रार्थना सिध्याइन्‌ । त्यसपछि उसले आफ्नो आवाजलाई भाउजूले नचिन्ने गरीभन्यो, “तिम्रो देवरलाई एक महिनासम्म मीठोमीठो खानेकुरा दियौ भने क अन्धो हुन सुरुगर्नेछ र तीन महिनाभित्र केही पनि देख्न नसक्ने गरी पूरै अन्धो हुनेछ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसपछि उसले रूखको टोडकाबाट परेवा उडाइदियो । भाउजूलाई लाग्यो त्यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परेवा त्यही भगवान्‌ हो जसले देवरलाई अन्धो बनाउने उपाय बताएको थियो । भाउजूलेपरेवालाई नमस्कार गर्दै भनिन्‌, “भगवानको जय होस्‌ !” &amp;quot;त्यसको भालिपल्टदेखि भाउजूले देवरलाई मीठोमीठो खानेक्रा दिन थालिन्‌ । वासमतीकोसुगन्धित चामलको भुजा, माछामासु र मीठोमीठो तरकारी; त्यो पनि दिनको तीनतीनपटक,कान्छाको अनुहार फेरिन धेरै दिन लागेन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक महिना पुगेकै दिन भाइले दाजुसँग भन्यो, “दाजु मैले धामलो देख्न थालेँ किन होला ?&amp;quot;भाइले यो कुरा भाउजूले सुन्ने गरी भनेको थियो । उद्देश्य प्रा हुन लागेको देखेर भाउजूमख्ख परिन्‌ । उनी विहानदेखि साँझसम्म मीठा खाना वनाउन व्यस्त रहन थालिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देवर पान वेलावेला आँखा कमजार हुँदैगएका कुरा दाहास्याउंथ्या । देवरकोआँखा कमजोर हँदै गएको कुरालेभाउजूको मीठा खाना बनाउने जाँगरअझ वढाउँथ्या ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अव त म केही पनि देख्न सक्दिनँ ।”तीन महिनापछि भाइले भन्यो । दुवैजनाले उसले नसुन्ने गरी ताली&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बजाए । दुवै जनाले सल्लाह गरे, “अवयसलाई वाटोवाट पन्छाउनुपर्छ ।यसलाई पन्छायौ भने यसको सम्पत्तिपनि हाम्रै हुन्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेको चर्तिकला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकदिन अन्धाले भन्यो, “दिउँसो तपाईँहरू बाहिर जानुहुन्छ । मलाई भुस्याहा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुकुरले सताउँछन्‌, एउटा बलियो लौरो ल्याइदिनुस्‌ न ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अव कति नै वाँच्न पाउलास्‌ र ?” उनीहरूले एउटा बलियो लौरो खोजेर भाइलाई दिए ।उनीहरूको योजना उसलाई वाँधेर नजिकैको भिरबाट खसाउने थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकदिन उसकी भाउजू उसलाई वाँध्न डोरी लिएर उसको नजिकै पुगिन्‌ अन्धो बनेकोदेवरले भाउजूको योजना वुझेको थियो । क अन्धो भएको थिएन, उसले अन्धो भएकोवहाना मात्र पारेको थियो । त्यसैले भाउजू नजिकै आएको मौका पारेर अन्धाले भएभरकोवल लगाएर भाउजूको पिठ्युँमा लौरो बजायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीनतीन महिनासम्म बसीवसी खाएको मीठो खानाको बल लगाएर बजारेको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लौरोको बोटले भाउजू अचेत भएर लडिन्‌ । अन्धो चिच्यायो, “ए दाजुभाउजू ! बाहिरआउनुस्‌-आउनुस्‌ !! मैले एउटा कुक्रलाई भुतुक्कै पारेँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दाजु वाहिर आएर हेर्छ त श्रीमतीको बिजोग ! दाजुले श्रीमतीको विजोग मात्र देखेन,भाइको चतुयाइँ पनि वुझ्गो ।त्यसपछि दाजुले भाइसँग माफीमाग्दै भन्यो, “भाइ हामीलाईमाफ गर, अव कहिल्यै पनितिम्रो कुमलो सोच्नेछैनौँ ।”उनीहरूको कल्याङवल्याङ हल्लासुनेर खिमेकी चतुरे पनि त्यहिँआइपुग्यो । आफ्नो बुद्धिकोचमत्कार देखेर क आफैँरमाइरहेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
.चतुरेको चर्तिकला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुई पण्डितको कथा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“पण्डितजीहरू दुवैलाई नमस्कार !”चतुरेको घरअगाडिको बाटोबाटदुईजना पण्डित कतै जाँदै थिए ।उनीहरूलाई देखेर चतुरेले नमस्कारगप्यो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कता जाँदै हुनुहन्छ ?” चतुरेलेसोध्यो !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“पल्लो गाउँमा पुराण सुनाउन जाँदैछौँ ।&amp;quot; पण्डितले जवाफ दिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“खाना खानुभएको छैन होला, गाउँ अझै टाढै छ । यतै भान्सा गरेर जाँदा राम्रो होला कि !”चतुरेको कुरा पण्डितहरूलाई पनि बेसै लाग्यो । उनीहरू चतुरेकहाँ खाना खाने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुरामा सहमत भए । चतुरेको श्रीमती माइतीमा गएकी थिइन । पण्डितहरूलाई चोटामाबसाएर चतुरे खाना तयार गर्न लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेको घरनजिकै सफा पानीको खोलो थियो । एकजना पण्डित नुहाउन खोलातिर लागे ।“पण्डितजी ! तपाईंहरू निकै विद्वान्‌ हुनुहुन्छ हगि ? जसले पनि धार्मिक कर्मकाण्डमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तपाईंहरूलाई नै खोज्छन्‌ ।” चतुरेले खानाको तयारी र पण्डितसँगको गफगाफ दुवैभ्याइरहेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नुहाउन नगएका पण्डितले चतुरेलाई जवाफ दिए, “त्यो नुहाउन गएको पण्डित नाममात्रैको पण्डित हो । त्यसलाई एउटा श्लोक पनि शुध्दसँग उच्चारण गर्न आउँदैन, मेरोभरमा पण्डित बनेको छ । त्यो गधा हो गधा ! बुझिस्‌ चतुरे ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकछिनपछि नुहाउन गएका पण्डित नुहाएर फर्किए र अर्का पण्डित नुहाउन गए । त्यहीमौका पारेर कुरै क्रामा नुहाइसकेका पण्डितले पनि चतुरेसँग नुहाउन गएका पण्डितलाई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२२ चतरेको चर्तिकला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केही नजान्ने, सोझासाझालाई ठग्न मात्र सक्ने र उसैको भरमा मात्र कर्मकाण्ड गर्न सक्नेकुरा सुनाए । उनले पनि चतुरेसँग कुरा गर्दा वेलावेला नुहाउन गएका पण्डितलाई गधा भने ।एउटै गाउँमा बस्ने, कर्मकाण्ड, सप्ताह-पुराणमा सँगसँगै हिँड्ने तर एकले अर्कालाई मान्छेनगन्ने र मौका पारेर अर्काको कुरा काट्ने ती पण्डितहरूको बानी चतुरेलाई पटक्कै मनपरेन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पण्डितहरूको नुहाइधुवाइ र पूजापाठ सकिएपछि चतुरेले भन्यो-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“भान्सा तयार भयो, खाना खान आउनुहोस्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिहान सबेरैदेखि केही नखाई लामो बाटो हिँडेका पण्डितहरू भोकाएका थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेको उनीहरूप्रतिको श्रध्दा देखेर उनीहरूले सोचेका थिए, चतुरेले पक्कै पनि मीठोखाना बनाएको होला । पण्डितहरू मुख मिठाउँदै भान्सातिर लागे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पण्डितहरू धोती फेरेर खाना खान पिर्कामा बसे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लौ फसाद.! चतुरेले खाना त ल्यायो तर ठूल्ठूला बाटामा कलिलो र हरियो घाँस र थोरथोरैभिजाएको चना र भुस !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हाम्रो यत्रो बेइज्जती ! हामी तँलाई श्राप दिन्छौँ ।” दुवै पण्डित रिसले आगो भए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चत्रेले शान्त स्वरमा भन्यो, “पण्डितजीहरू ! नरिसाउनुहोस्‌, मैले त तपाईँहरूले लाए ।अद्दाएको काम मात्र गरेको हुँ । दुवैले एकअर्कालाई गधा भन्नुभयो, मैले त्यहीअनुसारकोखाना ल्याइदिएँ । भन्नुस्‌ यसमा मेरो के दोष छ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ती पण्डितहरूले न केही बोल्न सके न त एकअर्कालाई हेर्न नै ।चतुरे भने पण्डितहरूले नदेख्ने गरी मरीमरी हाँस्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेको चर्तिकला ....................................ननततमममममममभिमिििििििििजिजिजिजििििििजलि रे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खेतको पहाड&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेको छिमेकी गाउँमा एकजना जमिन्दार बस्दथ्यो । जमिन्दारको गाउँको पुछारमा ठूलोफाँट थियो । त्यो फाँटको आधा खेत जमिन्दारको थियो । तर जमिन्दारलाई एउटा समस्याथियो । जमिन्दारको खेतमा स-सानो पहाडजस्तो देखिने ठूलो ढिस्को थियो । जमिन्दार त्योपहाडलाई सम्याउन चाहन्थ्यो तर पहाड सम्याउँदा लाग्ने खर्च देखि भने डराउँथ्यो ।एकदिन जमिन्दार खेतसँगैको बाटोमा बसेर त्यही पहाडबारे सोच्दै थियो, टुप्लुक्क चत्रेपुग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के सोच्दै हुनुहन्छ जमिन्दार बा ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यो खेतको पहाड कसरी पन्छाउन सकिएला ? यही धुनमा छु चतुरे बाबु !” जमिन्दारलाईचतुरे चलाख छ भन्ने थाहा थियो । त्यसैले उमेरमा चतुरे जमिन्दारभन्दा धेरै कान्छो भएपनि अरूलाई जस्तो हेपेर कुरा गर्दैनथ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
«यसको चिन्ता नगर्नुस्‌, यो पहाड पन्छाउने जिम्मा मेरो भयो ।” एकछिन सोचेर चतुरेलेभन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कसरी पन्छाउँछौ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२४ चतुरेको चर्तिकला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यसमा तपाईंले चिन्तै नगर्नुस्‌ जमिन्दार बा । कसरी पन्छाउने भन्ने कुरा मेरो जिम्मामाछोडिदिनोस्‌ ।”“अनि कति लिन्छौ त पहाड पन्छाएको ?”“यत्ति कामको पनि केको पैसा, त्यो पनि आफ्नै गाउँको मान्छेसँग तपाईंले एकपैसादिनुपर्दैन ।”मानौँ पहाड पन्छाउनु वरको सिन्को पर सार्नु हो । जमिन्दार खुसी भयो ।“अनि कहिले पन्छाउने त यो पहाड ?”“भोलि नै पन्छाउँदा पनि हुन्छ, तर मैले हिजो मात्र खेतीपातीको काम सकेँ । केही कमजोरभएको छु । केही दिन अलि तागतिलो खाना खएर बलियो हुन्छु, अनि पन्छाउँला हुन्न ?”“तिमी आजैदेखि मेरो घरमा आङ । तिम्रा लागि खानेबस्ने सबै व्यवस्था म गर्छु ।”सस्तोमा पहाड पन्छिने कुराले जमिन्दार हुनसम्म खुसी भयो । त्यसै दिनदेखि नै चतुरेजमिन्दारको घरमा बस्न थाल्यो । जमिन्दारको मेजमानीमा मीठोमीठो खानाले हप्तादिनभित्रै चतुरेको रङरूप फेरियो ।“अब त पहाड पन्छाउने कि ?” - चत्रे जमिन्दारको घरमा बसेको सय दिन पुगेपछिएकदिन जमिन्दारले चतुरेका अगाडि कुरा राख्यो ।“म भोलि नै पहाड पन्छाउँछु, यसलाई लगेर रानीवनको पैरोमा राख्ने विचार गरेको छु ।खेत पनि सफा हुने, पैरोमा पनि हरियाली भरिने ।” चतुरेले तुरुन्तै जवाफ दियो । “बरूपहाड पन्छाएको हेर्न गाउँलेहरूलाई पनि खबर गर्नुहोस्‌ ।”अर्को दिन बिहान टन्न खाजा खाएर चत्रे खेततिर लाग्यो । खेतमा पुग्दा गाउँलेहरू पनिरमिता हेर्न खचाखच थिए ।चतुरेले दुईओटा केराका पात मगायो । क दुईओटा हात घुँडामा राखेर घोप्टो पस्यो ।केराका पातलाई उसको पिठ्युँमा राख्न लगायो । पिठ्युँमा केराका पात राखिसकेपछिगाउँलेहरूलाई भन्या, “लौ गाउँले दाजुभाइहरू हो ! त्यो पहाड उठाएर मेरो पिठ्युँमा, राख्नुस्‌ ! अनि म यसलाई अहिल्यै रानीवनको पैरोमा पुन्याएर राख्छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसपछि मात्र जमिन्दार र गाउँलेहरूले थाहा पाए उनीहरूलाई चत्रेले उसको अर्कोचर्तिकलामा फसायो ।“यसपटकको खेतीपातीको थकाइ राम्रै गरी मेटियो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- चतुरे मनमनै हाँस्दै घरतिर लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेको चर्तिकला ..............................................--भभभभममभाममममाभभभभिभिभभिभिमममभिभिभिभििजिभिभिभिभिभिभिभिभिभिजिलिजि रेश&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लौ पन्यो फसाद्‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकदिन काम विशेषले चतुरे कतै जाँदै थियो । बाटामा उसले तीनजनालाई भेट्यो ।उनीहरू तीन भाइ थिए । चतुरे र ती तीन भाइ सँगसँगै एउटै बाटो लागे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरे नयाँनयाँ कपडा लगाएर चिटिक्क परेको थियो । ती तीन भाइले सल्लाहगरे - “कुनै तरिकाले यसका नयाँ कपडा फूत्काउनुपर्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साँझको बास चतुरे पनि ती तीन भाइसँग बस्यो । खानासाना खाएर उनीहरूले सुत्नेसुरसार गर्न थाले ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसै वेला एक भाइले प्रस्ताव राख्यो - “रात लामा छन्‌ । हामीलाई जसरी पनिरात बिताउनु छ । त्यसैले हामी आफ्नाआफ्ना कथा सुनाऔँ । जसले अपत्यारिलो कथा भन्नसक्छ - त्यसैको जित हुनेछ, जित्नेले भनेको कुरा अरू तीन जनाले मान्नुपर्नेछ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुई भाइले तुरुन्त स्वीकार गरे किनभने यो प्रस्ताव ती तीनै भाइको सल्लाहले राखिएको थियो ।“तिम्रो के विचार छ चतुरे ?” एक भाइले चतुरेलाई सोध्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ठीक छ, मेरो पनि सहमति छ तर पहिले तपाईंहरूले आफ्ना कथा सुनाउनुहोस्‌, अनि मसुनाउँला ।” चतुरेको सहमति सुनेर ती तीनै भाइ खुसी भए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विवि चतुरेको चर्तिकला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसपछि जेठो भाइले आफ्नो कथा भन्न सुरु गन्यो, “म जन्मेको दिनको कुरा हो । आमालेबुबालाई घरअगाडिको ठूलो आँपको रूखबाट आँप टिपिदिनुहोस्‌ भन्नुभयो । बुबाले अल्छीगर्नुभयो । अनि म गएर दुई टोकरी आँप टिपेँ । सबैले मज्जासँग खायौँ । जन्मेकै दिनछोराले आँप टिपेर खान दियो भनेर आमा निकै खुसी हुनुभयो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबै भाइले चतुरेलाई हेरे । जेठो भाइको कुरा पत्यारिलो त थिएन तर उसकोकुरा नपत्याउनुको अर्थ उसको जित हुन्थ्यो । त्यसैले चतुरेले जवाफ दियो - “हुन सक्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दोस्रो भाइले भन्यो, “मेरो उमेर एकहप्ता मात्र भएको थियो, नजिकैको जङ्गलमा बुबासँगसिकार खेल्न गएँ । बुबाले ठूलो बाघ देखेर गोली चलाउनुभयो । तर गोली बाघकोखुट्टामा मात्र लाग्यो । बाघले बुबालाई झम्टेर मार्ने आँटेको थियो - मैले बाघलाई समाएरछिन्नभिन्न पारेर मारेँ । मैले कमिजभित्र लगाएको बनियन त्यही बाघको छालाको हो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“खै बनियन हेर ।” चतुरेले यो कुरा भनेन किनभने यसको अर्थ उसको कुरा अपत्यारिलोहुन सक्थ्यो । अपत्यारिलो हुनुको अर्थ कथा भन्नेको जित हुन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसपछिको कथा भन्ने पालो कान्छो भाइको थियो । कान्छो भाइ पनि के कम थियो र !उसले कथा भन्न सुरु गन्यो, “मेरो उमेर एक महिना पनि पुगेको थिएन, एकपटक मसाथीहरूसँग माछा &#039;मार्न समुद्रमा गएँ । तर आधा दिन बितिसक्दा पनि हामीले एउटा पनिमाछा समाउन सकेनौँ । अनि म समुद्रमा डुबँ । लगातार चार घण्टासम्म डुबेपछिसमुन्द्रको पिँध भेटेँ । त्यहाँ एउटा पहाड जत्रो विशाल माछा थियो । मैले एक मुक्कादिएको त माछो खुत्रुक्कै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मलाई असाध्यै भोक लागेको थियो । मैलेत्यही समुन्द्रको पिँधमै एक थुप्रा सुकेकादाउरा खोजेँ । त्यो विशाल माछालाईआगोमा पोलेँ । माछाले टन्न अघाएपछिमात्र बाहिर आएँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हुन सक्छ समुद्रका ठूलाठूला माछासमुद्रको पिँधमै बस्छन्‌ ।” चतुरेले कान्छोभाइको पत्याउनै नसकिने कुरामा पनिअविश्वास गरेको देखाएन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेको चर्तिकला तिजीडिडिसिसिसीिसीडिसिसि्ि् सि र)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसपछिको कथा सुनाउने पालो चत्रेकोथियो । चतुरेले आफ्नो कथा सुरु गन्यो -“मैले तपाईंहरूले जस्तो अचम्मलाग्दाकाम गर्न सकिनँ । तर धेरै वर्ष पहिले मकपासको खेती गर्थेँ । एकपटक अचम्मभयो - मैले कपास टिप्दाटिप्दै कपासकोएउटा दानामा कपासको सट्टा तीन जनामानिस भेटेँ । ती मानिस साना मात्रैथिएनन्‌; साह्रै साना थिए - केवल माहुरीजत्रा मात्र । मैले तिनीहरूको पालनपोषण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गरेँ । ती मानिस हुकंदै गए । एक वर्षभित्रै तिनीहरू खेतीपाती गर्न सक्ने भए । खुसीकोकुरा के थियो भने तिनीहरूले मलाई कपास खेतीमा सघाउँथे । तर उनीहरूसँग खुसीकोकुरा मात्रै थिएन, तिनीहरू अल्छी र वेलावेला काममा ठग्न खोज्थे । वेलावेला तिनीहरूकोपिठ्युँमा लठ्ठी नबर्साए कामै गर्दैनथे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकपटक म काम विशेषले बाहिर गएको थिएँ । त्यही मौका पारेर तिनीहरू भागेछन्‌ । तीअल्छी र ठगभगुवा अरू कोही नभएर तिमीहरू नै हौ । तिमीहरूलाई खोज्दा खोज्दा हैरानपरेँ, तर आशा भने मारिनँ । बल्ल आज तिमीरूलाई भेटेँ । उता कपास खेती चौपट छ ।ल तिमीहरू अहिले नै हिँड ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लौ पप्यो फसाद्‌ चतुरेको कुरा साँचो होइन भन्दा पनि चतुरेको जित हुन्छ किनभनेअपत्यरिलो कुरा गर्नेको जित हुनेछ भनेर पहिल्यै सर्त राखिएको छ । साँचो हो भन्दा पनिचतुरेसँग उसको कपास खेतीमा काम गर्न जानुपर्ने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेको कुराले ती तीनै भाइ अक्क न बक्क परे । ती तीन भाइले एकअर्कालाई मुखामुखगरेर हेर्न थाले । तिनीहरू मनमनै भन्दै थिए, “आफूले खनेको खाल्डोमा आफैँ परियो ।”त्यतिन्जेलसम्म चतुरेले विचार गस्यो, “यी मोरालाई पछि लगाएर पनि के गर्ने ? खै!गरी खालान्‌ जस्ता देखिँदैनन्‌ । पाल्नको मात्र हैरानी ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२८ ....................................................--०॥भनभाभमभममममममभििभिभफििभििमिममििभिमि चतुरेको चर्तिकला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसैले एकछिन पछि चत्रेले भन्यो, “तर एउटा सर्त मान्छौ भने तिमीहरूलाई छोड्नसक्छु ।”भन चतुरे तिम्रो सर्त के हो ?&#039; तिनै भाइमा केही आशा पलायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमीहरूले लगाएका कपडा दिन्छौ भने तिमीहरूलाई छोडिदिन्छु ।”चतुरेले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेको सर्त मन्जुर गर्नै पर्ने थियो ।होइन भने चतुरेको पछिपछि लागेरउसले भनेअनुसार गर्नुपर्थ्यो । त्यसैलेएकै स्वरमा तीनै भाइले भने, “चतुरे !तिम्रो सर्त हामीलाई मन्जुर छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेले,ती तीन भाइ कपडाको कुटुरोबनायो । कपडाको कुटुरोलाईलौरोको एकापट्टि बाँध्यो र लौरोकाँधमा राखेर आफ्नो बाटो ततायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विचरा ती तीन भाइ जाडाले थुर्‌-थुर्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नानी हो ! तिमीले यो कथा पत्यायौ ?पत्यायौ भने ठीक छ । तर पत्याएनौभने ... । पत्याएनौ भने के गर्नुपर्छतिमीहरूलाई थाहा छँदै छनि !,किकसो ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेको चर्तिकला जिया विजिजि्ववव्वव्् वि 00०१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दढुङगे झोल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“नमस्कार बुबा !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“नमस्कार बाबु ! कति कामले आयौकुन्नि ?” “यसो डुलेर घर फर्कंदैगरेका, रात पर्न आँद्यो, बास पाइन्छकि भनेर ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बनजङ्गल,खोला, झरना नदी हेर्दै घुम्नचतुरेलाई निकै मन लाग्थ्यो । यसपटकपनि क घुमेर फर्कदै थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेको बास माग्ने कुरा सुनेर घरबेटीबा अलमल्ल परे । बास नदिउँ भनेसाँझको पाहुँना, बास दिरँ भनेउसलाई खाना दिनुपर्ने । फेरि चतुरेघरबेटी बाको चिन जानको मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पनि थिएन र नातेदार पनि थिएर ।त्यसैले घरबेटीबाले भने “बास तसाङ्ग्रो गरौँला, केही भएन, तरखानलाई अप्ठेरो छ नि त बाबु, मसँगकेही छैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेले विचार गस्यो, “यी बूढाबा अलिकन्जुस रहेछन्‌ । यति ठूलो घर भएरपनि खानलाई केही छैन रे ।” अनिएकछिन विचार गरेर चतुरेले भन्यो,“खानाको चिन्ता नगर्नुस्‌, मलाई बासमात्रै भए पनि पुग्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेको चर्तिकला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
झ्याउँकिरी कराउन थाले । झमक्क साँझ पस्यो । चिसो चिसो पनि भयो । उनीहरू घरभित्रपसेर अगेनाको आगो ताप्न थाले ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आगो ताप्दै गर्दा चतुरेलाई थाहा भयो उसको पेटमा मुसा पनि कुद्न थालेछन्‌ । तर घरबेटीले खाना छैन भनिसकेको छ । एकछिन बिचारेर चतुरेले भन्यो, “एउटा कराही रअलिकति पानी पाइएला बुबा ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“केका लागि खोज्यौ कराही र पानी ? ० बूढाबाले सोधे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ढुङ्गाको सुप बनाउन, मसँग एउटा ढुङ्गो छ यसको साह्रै मीठो सुप बन्छ ।” दिउँसोराम्रो लागेर नदीकिनारबाट उसले एउटा ढुङ्गो ल्याएको थियो । त्यही ढुङ्गो झोलाबाटझिकेर देखाउँदै चतुरेले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के नभा&#039;को कुरा गरेको चत्रे बाबु ? ढुङ्गाको पनि सुप बन्छ ?”“बन्छ वुबा बन्छ, म तपाईंलाई अहिल्यै बनाएर देखाइदिन्छु । हेर्नुस्‌ न ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बूढाले कराही र पानी दिए । चतुरेले सफा गरेर उम्लँदै गरेको पानीमा ढुङ्गाराख्यो । “यसलाई नुन खुर्सानी चाहिँदैन बाबु ?” उत्सुकतापूर्वक सुप हेर्दै गरेका बूढाबालेसोधे । “भए त चाहिन्थ्यो, तर नभए पनि खास फरक पर्दैन ।” चतुरेले जवाफ दियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“छु छ यत्रो घरमा नुनखुर्सानी पनि नहुने त कुरै भएन ।” चतुरेले सुपमा ननुखुर्सानीराख्यो । एकछिन पछि चतुरेले भन्यो । यसो त “यो सुप यसै पनि मीठो छ तर प्याजराख्न पाए अझै राम्रो हुन्थ्यो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“छु चतुरे बाबु प्याज पनि छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेले सुपमा प्याज राख्यो । चतुरेले सुप पकाउन निकै मेहनत गरेजस्तो गरी डाडुचलाउँदै गस्यो । “अरू केही चाहिन्थ्यो कि ?” वूढाबाले सोधे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“खास केही चाहिँदैन, तर छ भने अलिकति सुकुटी राख्न पाए निकै मीठो हुने थियो ।”चतुरेले अगेनामाथि सुकाएको सुकुटी देखिसकेको थियो ।छु बाबु छ, दसैँमा काटेको खुसीको सुकुटी बाँकी छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ढुङ्गाको सुप खान बूढाबा पनि उत्सुक देखिन्थे । उनले सुकुटी राखेको नाङ्लै चतुरेकोअगाडि राखिदिए । चतुरेले सुपमा सुकुटी राख्न कन्जुस्याइँ गरेन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरेको चर्तिकला _ूटटटटलनाभननममाममभभमिममिमििभजिजिजििजिलजजजिलजिजलिललिलिलिजलिलललिलललिलललललिलिलललिलिलिलिलिलिलिलिलिलिललललििििलिललििलिलिलििलिललिललललिलिणि रौ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ल बुबा चाख्नुस्‌ त कस्तो भयो ?” आहा ! क्या मीठो, यो त भातसँग खान पाए अझैमीठो हुन्थ्यो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बूढाबाले चामल झिके र आफैँ भात पकाए । चत्रेको ढुङ्गाको झोल र बूढाबाको भातकोसंयुक्त स्वाद निकै मीठो थियो । दुवै जनाले जिब्रो पड्काउँदै पेटमा दौडेका मुसा मारेँ ।अर्को दिन बिहान चतुरेले बिदा भाग्दै थियो । बूढाबाले भने, “बाबु मलाई तिम्रो त्यो ढुङ्गादिन्छौ ? हिजो साँझ पकाएको झोल खुबै मीठो लाग्यो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तर यसको सुप बनाउँदा हिजो साँझ राखेका सबै कुरा राख्ने भए मात्र दिन्छु ।” चतुरलेसर्त राख्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हुन्छ बाबु हुन्छ, म सबै राखेर मात्र ढुङ्गे सुप बनाउँला ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चतुरे बूढाको बृद्धि देखेर हाँस्दै आफ्नो बाटो लाग्यो । बूढाबाले पछिसम्म पनि ढुङ्गाकोसुपको स्वाद लिन छोडेनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३२ चतुरेको चर्तिकला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाठ्यक्रम विकास केन्द्रद्धारा वि.सं २०५७ मा प्रकाशितबाल सन्दर्भसामग्रीहरू भगामतामगअअतामाआजामाड अमयासआाएयादाआमामगतममालापरआामाआाभाधमममगमगमाआआासामालाममममाममामा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाललीला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(कविता सङ्ग्रह)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अल्छीको औषधी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(कथा सङ्ग्रह)टाटे-पाङग्रे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(कथा सङ्ग्रह)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केही अमर मानिस(जीवनी)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाईस पाटन-त्रिपन्न ताल(हाम्रा सम्पदा)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1112 19165 1२€९(०10(6101 $01165)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
0९ $5012501 टा वाथा(1२11511165)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के कसरी बन्छ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(विज्ञान तथा वातावरण)पेटमा भूत कसरी पस्यो ?(विज्ञान तथा वातावरण)सङ्गत गुनको फल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(कथा सङ्ग्रह)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्री ५ को सरकारशिक्षा तथा खेलकुद मन्त्रालयपाठ्यक्रम विकास केन्द्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संयोजन: बाल साहित्य समाज, नेपाल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गोरखबहादुर सिंह&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संयोजन: बाल साहित्य समाज, नेपाल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
, संयोजन: बाल साहित्य समाज, नेपाल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संयोजन: बाल साहित्य समाज, नेपालगा) “9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(011600701: 341 5914 $9114विश्वम्भर चञ्चल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ध्रुब घिमिरे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रमेश विकल&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BE_-_%E0%A5%A7_(%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%99%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B9)&amp;diff=93</id>
		<title>बालभाका - १ (बालकविता सङ्ग्रह)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BE_-_%E0%A5%A7_(%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%99%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B9)&amp;diff=93"/>
		<updated>2024-06-14T14:08:13Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: Created page with &amp;quot;बालमाका -१५  (बालकविता सङ्ग्रह)  श्री बाबुराम पौडेल, महानिर्देशक, शिक्षा विभागश्री केशवप्रसाद दाहाल, निर्देशक, शिक्षा विभागश्री दीपक शर्मा, निर्देशक, शिक्षा विभाग  श्री जयप्रसाद लम्...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;बालमाका -१५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(बालकविता सङ्ग्रह)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्री बाबुराम पौडेल, महानिर्देशक, शिक्षा विभागश्री केशवप्रसाद दाहाल, निर्देशक, शिक्षा विभागश्री दीपक शर्मा, निर्देशक, शिक्षा विभाग&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्री जयप्रसाद लम्सालश्री युक्त शर्माश्री हारे खनाल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्री हरिभक्त पौडेल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(9&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रकाशकशिक्षा विभागप्रारम्भिक बालविकास शाखासानोठिमी, भक्तपुर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुस्तकको नाम : बालभाका - १ (ब्वालकविता सङ्ग्रह)सर्वाधिकार : शिक्षा विभागलेखन : प्रभा भट्टराई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनुराधा शर्मा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हरिहर तिमिल्सिना&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उमा घिमिरे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गेहनाथ गौतम&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रमिक बराल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हरि खनाल (हरे)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सविता दङ्गाल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उद्धवप्रसाद प्याकुरेल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनन्त वाग्लेप्रकाशक : शिक्षा विभाग, सानोठिमी भक्तपुरचित्र : गोविन्द बिमली, योगेश महर्जनसज्जा/कलर : टच क्रियसन प्रा.लि., बागबजार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फोन : ०१-४२१५४४८&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुद्रण : टिकाराम अफसेट प्रेस, अनामनगर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस पुस्तकलाई प्रकाशको अनुमतिवेगर प्रकाशन तथा बिक्री वितरण गर्न पाइनेछैन। कविता कविका निजी सिर्जना भएकाले यसप्रतिको जवाफदेहिता सम्बन्धितकविहरूमै निहित हुने छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ग्म्मति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लय हालेर गाइने कविता बालबालिकाका लागि प्रिय एवं रूचकर हुन्छ। कविता गाउँदा गाउँदैभाषिक विकास हुने र यसबाट विषयगत सिकाइमा पनि मद्दत पुग्ने भएकाले पाठ्यक्रमकाविषयवस्तुमा आधारित गरेर शिक्षा विभागको प्रारम्भिक बालविकास शाखाले &#039;बालभाका&#039;एक, दुई र तीन विकास गरी प्रकाशन गरेको छ । प्रस्तुत &#039;बालभाका&#039;हरू बालबालिकाकालागि सिकाइको उपयुक्त सामग्री बन्न सक्ने अपेक्षा गरेको छु । यसका लागि सम्बन्धितविद्यालय तथा बालविकास केन्द्रका, शिक्षक र अभिभावकबाट महत्त्वपूर्ण सहयोग हुनेविश्वास गर्दछु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कविता लेखेर उपलब्ध गराइदिने बालसाहित्यकारहरू, कवितालाई चित्राङ्कन गरिदिनेचित्रकारहरू, मेहनतपूर्वक रचना छनोट गर्ने छनोट समिति र सम्पादन गरी प्रकाशनयोग्यबनाउने सम्पादक मण्डल, प्रारम्भिक बालविकास शाखा तथा &#039;बालभाका&#039; विकास रप्रकाशनमा संलग्न सबैलाई हार्दिक धन्यवाद दिन चाहन्छु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाबुराम पौडेलमहानिर्देशकशिक्षा विभाग&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रकार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[कीय&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कविता गेयात्मकहावभावसहित&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्मक विधा भएकाले बालबालिकाहरू रमाइलो मान्दै, आनन्द लिदै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हित गाउने अभ्यास गर्दछन्‌ । गायन रूचकर भयो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भने त्यसले नयाँ शब्दको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ज्ञान गराउनुका साथै संवेगात्मक पक्षको विकासमा पनि मद्दत पुस्याउँछ । गायनलाई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हावभावसहित गराउँदा बालबालिकाहरूको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हरूको शारीरिक विकासको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सको पक्षसँग पनि कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जोडिन पुग्छ । त्यसैले बालबालिकाहरूको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[हरूको सर्वाङ्गीण विकासका लागि कविता सशक्त&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माध्यम हुनसक्छ भन्ने विश्वास गरिएको छ । प्रस्तुत बालकवितामा प्रतीक र विम्बको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रयोग&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
।ग खोजिएको छैन । यसमा त केवल बालसुलभता र रूचलाई स्वभाविक गतिमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रकट गराईदिने गरी शव्द संयोजन गरिएको छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रारम्भिक बालविकास पाठ्यक्रमको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विषयवस्तुलाई आधार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
र बनाएर लेखिएकाले यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;बालभाका&#039; बालबालिकाहरूको सिकाइसँग&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बालशिक्षक र अन्य कक्षाका शिक्षकले पनि यसलाई उद्देश्यमूलक र मनोरञ्जन प्रदान गर्नेप्रारम्भिक बालविकास कक्षाका बालबालिका स्वयम्‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुबै प्रयोजनले प्रस्तुत गर्नुहुने छ । प्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सँग जोडिने अपेक्षा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गरिएको छ । आशा छ,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पढ्न नसक्ने भएकाले यी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
। भाकाहरूलाई गति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बालकक्षाभन्दा माथिकाहाम्रो अपेक्षा रहेको छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बालबालिकाहरूले पनि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बालबालिकाहरूका लागि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निर्धारित विषयमा आधारित भएर कविता लेख्ने काम सजिलोअवश्य होइन तरपनि बालसाहित्यकारहरूले त्यसलाई सहज रूपमा ग्रहण गर्नुभई रचना&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिने काम बार्लशिक्षकबाटै हुनुपर्ने हुन्छनि यसको सहज प्रयोग गर्न सक्छन्‌ भन्ने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रदान गर्नु भएबाट यसकोसर्जकहरूलाई सादर धन्यवाद&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बनाइदिने रचना छनोट समिति र सम्पादन समितिप्रति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रकाशन सम्भव भएको हो । हामी रचना प्रदान गर्नुहुने सम्पूर्णद दिन्छौं। कविता छनौट गरिदिने र सम्पादन गरी प्रकाशनयोग्यति हामी आभारी छौं । कवितामा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चित्र दिने श्री गोविन्द बिमली, योगेश&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गेश महर्जन र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डिजाइन टच क्रिएसन तथा मुद्रक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्री टिकाराम अफसेट प्रेसप्रति कृतज्ञ छौं । बालकावता विकास र सम्पादनको क्रममासहयोग पुस्याउनु हुने श्री सत्यदेवी गिरी र सुभद्रा पौडेललाई हार्दिक धन्यवाद दिन्छौं । विज्ञ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तथा पाठकहरूबाट रचनात्मक सुझाव प्राप्त हुने आशा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रारम्भिक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ग राखेका छौं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा विभागगरम्भिक बालविकास शाखासानोठिमी, भक्तपुर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफैँ गर्छु म&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खोइ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चरी बोल्यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाप&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भान्छा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मामाघर जाने होमुसाको वनभोजमेरो सानो मुनेरमाइलो स्कुल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सानो हुँ कि ठूलो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रभा भट्टराई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनुराधा शर्माहरिहर तिमिल्सिनाउमा घिमिरे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गरेहनाथ गौतमश्रमिक बराल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हरि खनाल (हरे)सबिता दङ्गालउद्वप्रसाद प्याक्रेल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनन्त वारले&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१६&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१८&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रभा भट्राई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले आज जुत्ता लाएँ, मोजा मिलाएँ ।किताबकापी राखेर, झोला मिलाएँ ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टोपी खोजेँ, लठ्ठी खोजेँ, हजुर्‌बुवाको ।भन्नुहुन्छ नातिनीलाई कस्तो सुहा&#039;को ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साना-साना गोडाहरू आफैँ चाल्छु म ।आजदेखि खाना आफैँ खान थाल्छु म॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आमाले नै भन्नुभाको ठूली भएँ रे।दाँत माझ्दै पँधेरामा आफैँ गएँ रे ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सानो-सानो घैलाभरि पानी भर्छु म।सकेजति सबै काम आफैँ गर्छु म॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कता गयो नाक मेरो नाक मेरो खोइ ?रै,छ यो त आँखा मेरो नाक मेरो खोइ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कता गयो नाक मेरो नाक मेरो खोइ ?रै,छ यो त मुख मेरो नाक मेरो खोइ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कता गयो नाक मेरो नाक मेरो खोइ ?रै,छ यो त कान मेरो नाक मेरो खोइ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कता गयो नाक मेरो नाक मेरो खोइ ?रै,छ यो त गाला मेरो नाक मेरो खोइ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कता गयो नाक मेरो नाक मेरो खोइ ?मुखभन्दा माथि रै, छ हो कि होइन होइ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चरी बोल्यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हरिंहर तिमिल्सिना&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चरी बोल्यो चिरबिर ।पुतलीको फिर्‌फिर ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले फुके बाँसुरी ।बज्न थाल्यो तिरिरी ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्कुल जाने बेलामा ।गर्दिन म अलमल ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाप&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उमा घिमिरे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मकै भर्ने माना, सुकाउने छाना ।भुटी फुल पारी, राख्ने पाथी भरी ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाप्ने मानापाथी, थाहा होला साथी ।एक पाथी पारौं, आठमाना हाली ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अहिले ढक तराजु, छक्क पर्छन्‌ बराजु ।धार्नी, पाउ, किलो, जोख्न पर्दा सजिलो ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गान्छा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गेहनाश गौतम&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक टेवल चार कुर्सी,भान्छा कोठामा ।दिदी दाइ जम्मा भयौं,खाने बेलामा ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सागभात थालमा,कचौरामा दही ।गोलुभैडाको अचार,थपी दिनुस्‌ है ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काँक्रो गाँजर मूलाको,सलाद हुन्छ मीठो ।सबै थोक खाएर,स्कुल जाउँ छिटो ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मामाघर जाने हो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्कुल आज छुट्टी छ,ज्यानमा अर्कै फूर्ति छ।बोलाउनु भो मामाले,जाउँ भन्नु भो आमाले ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मामाघर गाउँमा छ,रमाइलो ठाउँमा छ।आमासँगै जाने हो,भाइलाई पनि लाने हो॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोटर गाडी चढेर,झोलुङ्गे पुल तरेर ।मामाघर जाने हो,मीठो-मीठो खाने हो॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुसाको वनभोज&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हरि खनाल (हरे)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिजो, सानो मुसाका, साथी जम्मा भए ।साथी साथी मिलेर, वनभोज गए ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कोही चढे साइकल, घण्टी टिन टिन ।प्वाँप्वाँ गर्दै बस आयो, रोके एकै छिन ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बस पुग्यो डाँडामा, गुडी छिटो छिटो ।सबै मिली पकाए, खाना मीठो मीठो ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घिन्ताङ्‌ घिन्ताङ्‌ मादलु, बजाउने भानु ।तिरितिरी मुरली, फुक्ने साथी सानु ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाच गान गर्दै जाँदा, हुँदै गयो राती ।रमाइलो भयो भन्छन्‌, सबै जना साथी ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो सानो मुनले&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सविता दङगाल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो सानो मुने ।डोको भित्र थुने ॥गर्न थाल्छ म्याँ-म्याँ ।रोएजस्तो प्याँ-प्याँ ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खेल्न जाने बारी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुने चर्ने झाडी ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान दुवै हल्लाई ।कुदूछ मलाई पछ्याई ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आँखा गोला गोला ।पुच्छर डोला डोला ॥बुबु खान्छ रमाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्यारो लाग्छ मलाई ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रमाइलो स्कुल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उद्धवप्रसाद प्याकुरेल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लागे घाम झलमल ।गर्दिन म अलमल ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पसिना भो खलखल ।पिएँ पानी कलकल ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बज्यो घण्टी टिङटङ ।जान्छु स्कुल दिनदिन ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चल्यो हावा सरर ।हाग्रो झण्डा फरर ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनन्त वाग्ले&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कहिले भन्छन्‌ सानै छौ, कहिले ठूलो भइसक्यौ ।सानो हुँ कि ठूलो हुँ, के हो बताइदेज ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलबारीका फूलहरू, राता, नीला, पहेँला ।लालुपाते लहलह, मनमा फुलाइदेञ ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सानो सानो जामुनो अग्लिएछ म भन्दा ।जामुनोको हाँगामा छुने बनाइदेज ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रकाशकशिक्षा विभागप्रारम्भिक बालविकास शाखासानोठिमी, भक्तपुर&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A5%AE%E0%A5%A6_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A4%AE%E0%A4%BE_%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%B5_%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%A3&amp;diff=92</id>
		<title>८० दिनमा विश्‍व भ्रमण</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A5%AE%E0%A5%A6_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A4%AE%E0%A4%BE_%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%B5_%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%A3&amp;diff=92"/>
		<updated>2024-06-14T14:06:23Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: Created page with &amp;quot;बाल सन्दर्भ सामग्री - २६  नेपाल सरकार  शिक्षा मन्न्ालयपाठयक्रम विकास केन्द्र  ८० ढिनमा प्िद्रण भ्रमण  लेखनजुल्स वर्न  अनुवादगोरखबहादुर सिंह  चित्राड्कन कर्ताअविन्द्रमान श्रेष्ठ...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;बाल सन्दर्भ सामग्री - २६&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपाल सरकार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा मन्न्ालयपाठयक्रम विकास केन्द्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
८० ढिनमा प्िद्रण भ्रमण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेखनजुल्स वर्न&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनुवादगोरखबहादुर सिंह&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चित्राड्कन कर्ताअविन्द्रमान श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आवरणनबिन्द्र राजभण्डारी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपाल सरकारशिक्षा मन्त्रालयपाठ्यक्रम विकास केन्द्रसानोठिमी, भक्तपुर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रकाशक : नेपाल सरकारशिक्षा मन्त्तालयपाठ्यक्रम विकास केन्द्रसानोठिमी, भक्तपुर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
6 प्रकाशकमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिमार्जित संस्करण : २0७३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अमेरिकी अन्तर्राष्ट्रिय विकास नियोग (ग्रुएसएआइडी) को सहयोगमा यो सन्दर्भ सामग्री प्रकाशनभएको हो । यसमा समाविष्ट सामग्रीको जिम्मेवारी प्रकाशकमा निहित छ। यसमा रहेका सामग्रीलेगयरुएसएआइडी र अमेरिकी सरकारको अवधारणालाई प्रातिनधित्व गर्दैनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाम्रो भनाइ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाल बालिकाको पठन सिप बढाउन, मनोरञ्जन प्रदान गर्न, मानसिक र बौद्धिक विकासकालागि सिकाइ सम्बद्ध सन्दर्भ सामग्रीहरूको महत्त्वपूर्ण भूमिका हुन्छ । सन्दर्भ सामग्रीलेबाल बालिकालाई अध्ययनशील बनाउनका साथै पढाइ सिप विकास गरी पाठ्य पुस्तकमाभएका विषय वस्तु ग्रहण गर्नसमेत मदत गर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाठ्यक्रम विकास केन्द्रद्वारा राष्ट्रिय प्रारम्भिक कक्षा पढाइ कार्यक्रम कार्यान्वयनगर्ने क्रममा यो सन्दर्भ सामग्रीलाई अद्यावधिक गरी गुएसएआइडीको आर्थिक सहयोगमाप्रकाशनमा ल्याइएको हो । प्रस्तुत सन्दर्भ सामग्री कक्षा १ देखि ३ सम्मका विद्यार्थीहरूकालागि उपयोगी हुने गरी विकास गरिएको छ तापनि आवश्यकतानुसार जुनसुकै कक्षामा पनिप्रयोग गर्न सकिने छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रस्तुत सामग्री शिक्षकहरूले सबै बाल बालिकाहरूलाई पढ्ने मौका दिई आपसमाछलफलसमेत गराई उनीहरूको पठन सिप विकासमा सहयोग गर्नुहुने छ भन्ने अपेक्षागरिएको छ । अन्त्यमा यस सामग्रीका सम्बन्धमा प्राप्त हुने सुझाव एवम्‌ प्रतिक्रियाकालागि पाठ्यक्रम विकास केन्द्र सदैव स्वागत गर्दछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बि.सं. २०७३ पाठयक्रम विकास केन्द्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
८० दितमा विश्व भ्रमण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिलियस फग निकै धनी थियो । उसको निकै ठुलो घर थियो । फिलियसको घरलन्डन सहरको मध्यभागमा थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिलियस फगको जीवन चर्या अत्यन्तै व्यवस्थित थियो । क सधैँ एकै समयमाउठथ्यो । उसको खाना सधैँभरि एकै प्रकारको हुन्थ्यो । उसको खाना खाने समयपनि निश्चित थियो । खाना खाने समयमा कहिल्यै पनि तलमाथि गर्दैनथ्यो ।र जहिले पनि एकै प्रकारका काम गर्थ्यो । उसले गर्ने सबै काम पनि निश्चितसमयमा नै हुने गर्थे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिलियस फग कुनै नयाँ काम गर्न मन पराउँदैनथ्यो । उसलाई उसको निश्चितकार्य तालिका मन पर्थ्यो । फिलियस त्यसलाई परिवर्तन गर्न मन पराउँदैनथ्यो ।हरेक दिन क क्लबमा जान्थ्यो र पुरै दिन क्लबमा नै बिताउँथ्यो । क्लबमा पनिक सधैँभरि एउटै कुर्सीमा बस्थ्यो र सधैँभरि एउटै प्रकाशनको अखबार पढ्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अक्टोबर महिनाको एक बिहान उसले उसको घरमा काम लगाउन एक जनामानिसलाई सोधपुछ गम्यो । त्यो काम खोज्न आउने मानिसको नाम पासपारटुथियो । क फ्रान्सबाट आएको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
। «&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मेरो घरमा तिमी किन काम गर्न चाहन्छौ ?” फिलियस फगले पासपारटुलाईसोध्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“किनभने तपाइँ शान्त र व्यवस्थित मानिस हुनुहुन्छ । तपाइँको जीवन शान्त रनियमित छ। मलाई पनि त्यस्तै जीवन मन पर्छ ।” उसले जवाफ दियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसको जवाफ फिलियस फगलाई चित्तबुझ्दो लाग्यो । फिलियसले भन्यो, “मैलेपनि तिमी जस्तै मान्छै खोजेको थिएँ । मलाई लाग्छ, तिमी मैले खोजे जस्तै छौ ।तिमीलाई मेरो घरमा स्वागत छ । तिमीले अहिलेदेखि नै काम सुरु गर्न सक्छौ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तपाइँलाई धन्यवाद छ, श्रीमान्‌ ।” पासपारटदुले भन्यो । त्यति भनेर क कोठाबाटबाहिर निस्क्यो । क आफूले जागिर पाएको खुसीमा उसको मालिकले नदेख्ने गरीनाच्यो पनि ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म यस्तै कामको खोजीमा थिएँ ।” उसले मनमनै भन्यो, “कुनै समस्या छैन, कुनैदुख चिन्ता छैन र कुनै परिवर्तन छैन । क्या मजाको शान्त र व्यवस्थित जीवन ।”तर पासपारटदुको अनुमान मिलेन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पासपारट्ले काम पाएकै दिन दिउँसो फिलियस फग क्लबमा गयो । क्लब भएकोघर ठुलो र राम्रो थियो । फिलियस फग क्लबमा कुर्सीमा बसेर समाचार पत्र पढ्नखुबै मन पराउँथ्यो । त्यो दिनको समाचारमा मुख्य समाचार बैङ्क डकैती थियो ।समाचारअनुसार पुलिस बैङ्क डकैती गर्नेहरूको खोजी गरिरहेका थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साँझपख फिलियस फग क्लबको अर्को कोठामा गयो र अर्को समाचार पत्र पढ्यो ।त्यसैबेला उसको एउटा साथीले भन्यो, “पृष्ठ तिनको समाचार पढ त, फिलियस ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिलियस फगले समाचार पत्रको तेस्रो पृष्ठ फर्कायो ।५८० दिनमा विश्व परिक्रमा ... ” समाचार यहीँबाट सुरु भएको थियो ।“बिचित्रको समाचार रहेछ ।” उसले हाँस्दै भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसको साथीले भन्यो, “हेर त, समाचार पत्रमा ८० दिनको हिसाबकिताब पनिदिएको छ।” लेखअनुसार यो सम्भव छ। तर वास्तवमा कसैले पनि यो कुरा सम्भबछ भनेर ठोकुवा गरेर भन्न सक्दैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिलियस फगले यसबारे गहिरिएर सोच्यो, “सायद यो सम्भव छ । फिलियस,सायद तिमी ८० दिनमा विश्वको फन्को मार्न सक्छौ ।” उसले आफैँलाई भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्लबको कोठामा अरू दुई जना साथी थपिए । चारै जना तास खेल्न थाले । तासखेल्दै गर्दा पनि उनीहरू त्यस लेखबारे कुरा गर्दै रहे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
«यो सम्भव छैन ।” फिलियसको एक जना साथीले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तर केही पनि असम्भव हुँदैन ।” फिलियसले जवाफ दियो । त्यहाँ तास खेल्दै गरेकाफिलियसका साथीहरू गल्लल हाँसै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनीहरूले भने, “फिलियस तिमी सपना देख्दै छौ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिलियसलाई एकाएक एउटा विचार आयो । उसको जीवनको सबैभन्दा विचित्रकोविचार ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म यो काम गर्न सक्छु । उसले भन्यो, “म अहिले नै हिँड्छु र ८० दिनभित्र म यहीँआइपुग्ने छु।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसका साथीहरूले सारै अचम्म माने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यदि म असी दिनभित्र आउन सकिन भने मेरो ब्याडकमा रहेको २० हजारपौन्ड (करिब २० लाख नेपाली रुपियाँ) तिमीहरूको हुने छ ।” फिलियसले भन्यो ।यसपछि त उसका साथीहरू अझै अच्चम्ममा परे । यति अचम्म कि उनीहरू छक्कपरेर फिलियसलाई हेर्नुबाहेक केही बोल्नै सकेनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्त्यमा फिलियस र उसका पाँच जना साथीहरूले बाजी थापे । बाजीका सर्तनिश्चित गरियो : यदि फिलियसले ८० दिन अथवा ८० दिनभन्दा कम समयमाविश्व परिक्रमा गरेमा फिलियस फगलाई उसका साथीहरूले २० हजार पौन्ड दिनेतर उसको भ्रमण ८० दिनभन्दा लामो भएमा फिलियसले उसका प्रत्येक साथीलाईचार हजारका दरले जम्मा २० हजार पौन्ड दिने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिलियसले फेरि थप्यो, “आज २ अक्टोबर हो र अहिले ८:४५ बजेको छ। मतिमीहरूलाई २१ डिसेम्बरमा यही कोठामा यही समयमा भेट्ने छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले समाइराखेको तास राख्यो र तुरुन्तै क्लबबाट बाहिरियो । क फटाफट घरतिरलाग्यो । उसको घरमा पासपारटु शान्तपूर्वक आफ्नै तालमा काम गरिरहेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“पासपारटु !” फिलियसले भन्यो, “एउटा झोलामा मेरो र अर्को झोलामा तिम्रोसामान राखेर छिटो तयार होर ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हामी कतै जाँदै छौँ ?” पासपारटुले सोध्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो, हामी जाँदैछौ । हामी विश्वको परिक्रमा गर्न जाँदै छौँ ।” फिलियस फगलेभन्यो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पासपारटु हाँस्न त खोज्यो तर कुन्नि किन हो हाँस्न सकेन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसको दुई घण्टापछि फिलियस फग र पासपारटु च्यारिङ क्रस स्टेसनको एउटारेलमा थिए । गार्डले रेल चलाउन सिठी बजाएपछि रेलले बिस्तारै आफ्नो गतिलियो । यही नै उनीहरूको विश्व भ्रमणको सुरुआत थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनीहरू बेलायतको समुद्री किनारमा पुगे । त्यो समुद्री किनार बेलायतको सिमानाथियो । त्यसपछि उनीहरूले डुड्गाबाट इङ्लिस नहर पार गरेर फ्रान्सको कालाइससहरमा पुगे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फ्रान्समा पुगेपछि पासपारट्ले सोध्यो, “के हामी केही दिन फ्रान्समा बिताउनसक्छौँ ? मलाई यहाँ धेरै क्रा हेर्ने मन .......”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“पटक्कै सक्दैनौँ ।” फिलियस फगले भन्यो, “हामी एकदम हतारमा छौँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कालाइसमा उनीहरू एउटा रेलमा चढे र पेरिस हुँदै इटाली पुगे । रेल इटालीलाईपार गर्दै ब्रिन्दिसी बन्दरगाह पुग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यो दिन अक्टुबर महिनाको ५ तारिख थियो । अर्थात्‌ उनीहरूले यात्रा सुरु गरेकोतिन दिन पुगिसकेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उता लन्डनका अखबारहरूमा बैडक डकैतीको खबर निकै चर्चामा थियो । पुलिसबैडक डकैतको खोजीमा लागिपरेको थियो । अखबारमा बैडक डकैतको विवरणर तस्बिर छापिएको थियो । क्लबमा फिलियस फगका साथीहरूले आश्चर्यले जिब्रोटोके । बैङक डकैतको तस्बिर त फिलियस फगसँग दुरुस्तै मिल्छ नि। केत्योकुख्यात बैङ्क डाँका उहीनैहोत?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिलियस फग र पासपारटु स्वेज जानका लागि डुङगामा चढे । उनीहरू अक्टोबर९ मा स्वेज पुगे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हामी एकदमै ठिक समयमा आइपुग्यौँ।” डुङ्गाबाट ओलँदै फिलियसले भन्यो, “हाम्रोयात्रा हाम्रो योजनाअनुसार नै गइरहेको छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनीहरू स्वेज बन्दरगाहमा ओलँदा सयौँ मानिसले यात्रु ओर्लदै गर्दाको दृश्यहेरिरहेका थिए । ती सयौँ मानिसमध्ये एक जना पुलिस इन्सपेक्टर फिक्स पनिथियो । तर क पुलिस पोसाकमा थिएन । कसँग बैङ्क डकैतको तस्बिर थियो ।डुङ्गाबाट ओर्लने सबैलाई फिक्सले निकै ध्यान दिएर हेरिरहेको थियो । त्यही बेलाउसले फिलियस फगलाई देख्यो । उसले घरि तस्बिर घरि फिलियसलाई हेर्न थाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यो मान्छै यही हो।” उसले मनमनै भन्यो, “हामीले समाउन खोजेको बैडक लुटेरायहि नै हो ।” इन्सपेक्टर फिक्स निकै खुसी भयो । किनभने बैङ्क लुटेराको पत्तालगाउने मानिसलाई ठुलो पुरस्कारको घोषणा गरिएको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्सपेक्टरले सोच्यो - “अब त्यो पुरस्कार मैले नै पाउने छु । तर इन्सपेक्टरफिक्सलाई एउटा समस्या पस्यो । क फिलियस फगलाई समाउन त चाहन्थ्यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर त्यसका लागि बेलायत प्रहरीको अधिकार पत्र चाहिन्थ्यो । त्यसैले फिक्सलेबेलायतको पुलिस कार्यालयमा फोन गरेर अधिकार पत्र पठाइदिन अनुरोध गस्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म अहिले नै यसलाई गिरफ्तार गर्न सक्दिनँ ।” उसले मनमनै भन्यो, “उसलाईपक्रन पक्राउ पुर्जी चाहिन्छ । तैपनि मैले उसको पिछा छोड्नु हुँदैन । जहाँ पुग्दापक्राउ पुर्जी पाउँछु त्यहीँ पक्राउ गर्छु ।” फिलियस फगको लामो यात्रा योजनाथाहा नपाउन्जेल इन्सपेक्टर फिक्स निकै खुसी भयो । तर फिलियस फग भारतकोबस्बईमा जाँदै थियो । फिक्सले फिलियसलाई पिछा गर्दै भारत पनि जाने विचारगन्यो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसै दिन दिउँसो एउटा डुङ्गा स्वेजबाट बस्बईका लागि हिँड्यो । डुङ्गामाफिलियस र पासपारटु मात्र थिएनन्‌ इन्सपेक्टर फिक्स पनि थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डुङ्गामा इन्सपेक्टर फिक्सले पासापारटुलाई भेट्यो र उनीहरू एकअर्काका मित्र बने ।पासपारट्ले फिक्सलाई फिलियससँगको त्यो यात्राका बारेमा बतायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हामी ८० दिनमा विश्वको फन्का मार्दै छौँ ।” उसले भन्यो, “अन्यथा फिलियसफगले उसँग भएको सबै पैसा उसका साथीहरूलाई दिनुपर्ने छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसपछि त फिलियस फग नै बैड्क लुटेरा हो भन्नेमा फिक्सलाई कुनै शङ्का रहेन ।“८० दिनमा विश्व भ्रमण ? कसैले पनि यस्तो फन्टुस विचार गर्दैन ।” उसले विचारगन्यो, “र, भएको सबै पैसा लुटेराबाहेक अरू कसैले पनि साथीलाई बाँड्दैन ! मलाईकेवल पक्राउ पुर्जी चाहियो, त्यति भयो भने म उसलाई सजिलै पक्राउ गर्न सक्छु।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिक्सले उसले सोचेका यी कुरा उसको नयाँ साथी पासपारदुलाई भनेन । बरु उसलेके आशा गप्यो भने उनीहरू बम्बई पुग्दा फिलियस फगको पक्राउ पुर्जी पनि बम्बईपुगेको हुने छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अनि त बस्बई पुग्ने बित्तिकै फिलियस फगलाई पक्राउ गर्ने छु र पुरस्कार पाउने छु।”इन्सपेक्टर फिक्सको सोचाइ थियो । फिक्स समुन्द्री यात्राभरि नै निकै प्रसन्न थियो ।जति बेला पनि उसले फिलियस फगलाई निकै सतर्कता साथ हेरिरहयो । उनीहरूचढेको डुङ्गा अक्टोबर २० तारिखमा बम्बई पुग्यो । बम्बई पुग्नेबित्तिकै इन्स्पेक्टरफिक्स पक्राउ पुर्जी लिन बेलायत सम्पर्क कार्यालयमा पुग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कार्यालय कर्मचारीले भन्यो, “माफ गर्नुहोला, यहाँ त्यस्तो कुनै पत्र आएको छैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तैपनि मैले पक्राउ पुर्जी नआउन्जेलसस्म फिलियस फगको पिछा छोडनुहुँदैन ।”इन्सपेक्टर फिक्सले विचार गस्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“फिलियस फग कहाँ छ ?” क फर्केर होटेलमा गयो र सोध्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“उनी त हिँडिसके ।” होटेल कर्मचारीले जवाफ दियो, “उनी कलकत्ता जानकालागि रेल स्टेसन गए ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्सपेक्टर फिक्स जिल्ल पम्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“रेल ६ बजे छुट्छ ....” होटेल कर्मचारीले भन्दै थियो तर कर्मचारीको वाक्य पुरानहुँदै इन्सपेक्टर फिक्स बाहिर पुगिसकेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क रेल स्टेसन पुग्यो । रेल स्टेसनमा उसले फिलियस फग र पासपारट्लाई देख्यो ।उनीहरू टिकट लिँदै थिए । उसले उनीहरू रेल नचढ्न्जेलसम्म पर्ख्यौ । त्यसपछि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले पनि टिकट लियो र त्यही रेलमै चढ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साभँको ६ बजे रेलले स्टेसन छोड्यो । सयौँ अरू यात्रुसँगै ती तिन जना पनि सयौँमाइल टाढाको कलकत्ताका लागि यात्रा सुरु गरे । रेलभित्र गर्मी थियो, असजिलोपनि थियो तर फिलियस फगलाई यसको कुनै मतलब थिएन । किनभने उनीहरूकलकत्ता जाँदै थिए र सबै काम योजनाअनुसार नै हुँदै थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतका रमाइला पहाड र जङ्गलका सुन्दर दृश्यहरूमा रमाउँदै नदी र फौटहरूलाईपार गर्दै रेल अघि बढ्दै थियो .... एक्कासी रोकियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के भयो ?” फिलियस फग भस्क्यो । के भएको रहेछ, उसले पासपारट्लाई बुझ्नपठायो । पासपारटु निकै मलिनो अनुहार लिएर फर्क्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकछिनपछि भन्यो, “यहाँभन्दा अघि रेल नजाँदो रहेछ । इलाहावाद पुगेपछि मात्रफेरि रेल भेटिन्छ । त्यसैले हामीले इलाहावादसम्मका लागि अर्कै व्यवस्था गर्नुपर्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यसो भए यातायातको अरू कुनै व्यवस्था गर ।” फिलियस फगले भन्यो ।पासपारटु फेरि बाहिर गयो र एक घण्टापछि आयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“श्रीमान्‌ ! इलाहावाद पुग्न एउटा मात्रै साधन रहेछ ।” उसले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के साधन हो ?” फिलियस फगले सोध्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हात्ती ।” पासपारटुले भन्यो र ठुलो हात्ती लिएर रेलनजिकै उभिएको एक जनापथ प्रदर्शकलाई देखायो । हात्ती चढ्नु अत्यन्तै कष्टकारक थियो र बाटो पनि लामोपनि थियो । तर उनीहरूसँग अरू उपाय थिएन । हात्तीले उनीहरूलाई जङ्गल हुँदैपहाड माथि पनि पुस्यायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जङ्गलमा उनीहरूले एउटा अनौठो दृश्य देखे । उनीहरूले सयौँ मानिसको जुलुस देखे।उनीहरूले काँधमा मानिसको शरीर बोकेका थिए । जुलुसका बिचमा एक जनासुन्दर महिला पनि थिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
«यहाँ के हुँदै छ ?” फिलियस फगले पथ प्रदर्शकसँग सोध्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यिनीहरू शब यात्री हुन्‌।” पथ प्रदर्शकले भन्यो, “त्यस महिलाको श्रीमान्‌ मरेको छ।”उसले दाउराको ठुलो चाङलाई देखाउँदै भन्यो, “उनीहरूले त्यही चाङमा उसको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१४|&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शरीरलाई जलाउँदै छन्‌ ।”“अनि ती महिला किन त्यति हताश देखिन्छिन्‌ ।” फिलियस फगले सोध्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पथ प्रदर्शकले भन्यो, “किनभने यहाँको प्रचलनअनुसार उनीहरूले जिउँदी श्रीमतीलाईपनि उनको मृत पतिसँगै जलाउँदै छन्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यो हुनै सक्दैन ।” फिलियस फगले भन्यो, “हामीले उनलाई बचाउनुपर्छ ।”“यो सम्भव छैन ।” पथ प्रदर्शकले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“केही पनि असम्भव छैन ।” फिलियस फगले भन्यो र पासपारट्सँग सल्लाह गर्नथाल्यो । उनीहरूले त्यो सुन्दर युवतीलाई चितामा चढाएको हेरिराखे । चिताकोएकतिर उनी पल्टिन्‌, उनीसँथै उनको मृत पति पल्टेको थियो । ती मानिसमध्येएक जनाले दाउराको चाङमा आगो सल्कायो, तुरुन्तै चिताको वरिपरि धुवाँ फैलियो ।धुवाँले गर्दा पासपारटु चितामा चढेको कसैले देखेन अनि उसले ती महिलालाईलिएर भाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“भूत ! भूत !!” त्यहाँ थुप्रिएका शवयात्री डरले चिच्याउँदै जडङ्गलतिर भागे ।“एकदम ठिक गन्यौ, पासपारटु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिलियस फगलेभन्यो, “गजबको जुक्तिनिकाल्यौ !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिलियस फगले तीमहिलासँग सोध्यो,“तिम्रो नाम केहो?”“अउदा ।” उनलेकृतज्ञताको भावमाभनिन्‌, “मलाई बचाउनुभएकामा म धेरै आभारीछु।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्र र ॥“२ ,,%/,. 1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमी पनि हामीसँगै आउन सक्छ्यौ ।” फिलियस फगले भन्यो, “हामी विश्वभ्रमण गर्दैछौँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मलाई पनि भ्रमण गर्न मन पर्छ ।” अउदाले भनिन्‌ । फिलियस फगले उनलाई पनिहात्तीमा चढायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अब इलाहवाद पुगेर उनीहरू कलकत्ता जाने रेलमा चढे । कलकत्ता पुगेर उनीहरूहङकङ जाने डुङ्गामा चढे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन्सपेक्टर फिक्स पनि उनीहरूसँगै आइरहेको छ भन्ने कुराको उनीहरूलाई अत्तोपत्तोथिएन । हङकङमा फिलियस फगले केही झमेलाको सामना गर्नुपन्यो । पहिलो क्रात पासपारटु हरायो र कति खोज्दा पनि फेला पर्न सकेन । अर्को कुरा फिलियसहङकङ पुगेको अर्को बिहान जापानको योकोहामा जानका लागि डुङ्गा खोज्दाउसले डुङ्गा पाएन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“डुङ्गा हिजो राति नै गयो ।” डुङ्गा कम्पनीको मानिसले भन्यो, “डुङ्गामा तिम्रोसहयोगी पासपारटु पनि थियो । अब केही दिनसम्म योकोहामा जाने अर्को डुङ्गापाइँदैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तैपनि फिलियस आत्तिएन । उसले चीनको साङघाइ जाने डुङ्गा भेट्यो रसाङघाइमा जापानको योकोहामा जाने अर्को डुङगामा चढ्यो । उनीहरू नोभेम्बरको१४ तारिखमा योकोहामा पुगे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हामीले कसरी पासपारटुलाई भेट्न सकौँला र ?” अउदाले भनी, “यो असम्भव“केही कुरा पनि असम्भव छैन ।” फिलियस फगले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनीहरूले पासपारदुलाई जताततै खोजे र अन्त्यमा एउटा सर्कसमा देखे पनि ।उसलाई उनीहरूले सर्कस गर्नेहरूको एउटा समूहमा देखेका थिए । उनीहरूलेमान्छे मान्छेको समूह मिलेर ठुलो त्रिभुज बनाएका थिए । उनीहरूले त्रिभुजकोपुच्छरमा पासपारटुलाई देखे । पासपारटुले पनि जब फिलियस र अउदालाई देख्यो,क तत्कालै उनीहरू भएतिर दौड्यो । उसकै भरमा उभिएका विशाल त्रिभुजमासर्कस गर्नेहरू भुइँमा पछारिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ती तिन जनाले त्यसै रात अमेरिकाको सान फ्रान्सिस्कोका लागि डुङ्गा चढे ।भनिराख्नु नपर्ला, उनीहरू चढेको डुङ्गामा फिक्स पनि थियो । उनीहरू प्रशान्तमहासागर पार गर्दै २१ दिनमा सान फ्रान्सिस्को पुगे । उनीहरूले विश्वको आधाभन्दाबढी भाग पार गरिसकेका थिए । सान फ्रान्सिस्को पुगेकै रात उनीहरू संयुक्तराज्यलाई पार गर्दै न्युयोर्क जानका लागि रेल चढे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यो यात्राका सुरुमा सबै कुरा राम्रो थियो । तर केही समयपछि नै उनीहरू स्युइन्डियनहरूको प्रदेशमा पुगे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
«यो ठाउँ निकै खतरनाक छ ।” फिलियस फगले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिलियस फगले यसो भन्नेबित्तिकै रेलको झ्यालका सिसा टुक्रा टुक्रा भएर फुटे,जताततै घोडामा चढेर आएका स्यु इन्डियनहरू देखिए । उनीहरू रेलमा चढे ।उनीहरू सबैसँग छुरा र बन्दुक थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“सबैले आफ्नो सुरक्षा गर ।” फिलियस फग चिच्यायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यो असम्भव छ।” इन्सपेक्टर फिक्सले भन्यो, “उनीहरू सयौँको सङ्ख्यामा छन्‌ ।”“केही पनि असम्भव छैन ।” फिलियस फगले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यहाँ ठुलो लडाइ चल्दै थियो, त्यसैबेला केही सैनिकहरू पुगे । सैनिकलाई देखेर स्यूइन्डियनहरू भागे । तर उनीहरूले पासपारटुलाई बन्दीका रूपमा लगे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म उसलाई छुटाउन जान्छु ।” फिलियस फगले भन्यो, “मसँग को आउँछ ?”थोरै मात्र फिलियस फगको पछि लागे । इन्सपेक्टर फिक्ससमेत धेरै मानिस न्युयोर्कजादैँ गरेको त्यो रेलबाट बाहिर निस्किएनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म तिमीलाई पर्खेर यहीँ बस्छु।” अउदाले भनिन्‌ । उनी रातभरि त्यहीँ नै बसिन्‌ ।उनीहरू बिहानै फर्कदा पासपारटु पनि उनीहरूसँगै थियो । उनीहरू विजय उत्सवमनाउन चाहन्थे तर फिलियस फगलाई फुर्सत थिएन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हामी हाम्रो योजनाभन्दा एक दिनपछि परिसकेका छौँ ।” फिलियस फगले भन्यो,“हामी जति सक्यो छिटो न्युयोर्क पुग्नुपर्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसपछिको गाडी केही टाढाको स्टेसनबाट जान्थ्यो र हिउँ जमेको मैदान पार गरेरजानुपर्ने अर्को स्टेसनमा पुग्ने साधन हिमगाडी मात्र थियो । हिम गाडीको यात्रा चिसोथियो र सुविधानजक पनि थिएन । तैपनि केहीबेर पछि नै उनीहरू न्युयोर्कका लागिरेलमा चढिसकेका थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न्युयोर्क पुगेपछि उनीहरूले नराम्रो समाचार सुने । उनीहरूले इङ्ल्यान्ड जाने डुङ्गाभेटाउन सकेनन्‌ । उनीहरू त्यहाँ पुग्नुभन्दा ३५ मिनेट पहिले नै डुङ्गा छुटिसकेको रहेछ ।इन्सपेक्टर फिक्सले त डुङ्गा भेट्यो तर फिलियस फग, अउदा र पासपारट्ले भनेडुङ्गा समाउन सकेनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पासपारटुले भन्यो, “अब हामी समयमै लन्डन फर्कन सक्दैनौँ । यो असम्भव छ।”“केही पनि असम्भव छैन ।” फिलियस फगले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बन्दरगाहमा सानो डुङ्गा थियो । डुङ्गाको नाम हेन्रिएता थियो । तर हेन्रिएताकोक्याप्टेन उसको डुङ्गामा यात्रु बोक्न मन पराउँदैनथ्यो । तर फिलियस फगले डुङ्गानै किन्यो र यस समस्यालाई टास्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिलियस फग, अउदा र पासपारदु तथा नाविकलाई लिएर राति नौ बजे डुङ्गान्युयोर्कबाट हिँड्यो । हेन्रिएताले एटलान्टिक महासागर पार गर्दै थियो । अप्ठेरो के&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पस्यो भने हावा पनि चल्दै थियो । यसले गर्दा डुङ्गामा भएको इन्धन छिटै सकियो ।डुङ्गाको इन्जिनमा बाल्नका लागि डुङ्गाका काठबाहेक केही पनि बाँकी रहेनन्‌ ।फिलियस फगले नाविकहरूलाई भन्यो, “डुङ्गामा भएका कुर्सी, टेबुल, म्र्यालको खापासबै जस्मा गर । डुङ्गालाई चलाई राख्न हामीले यिनै काठ इन्जिनमा बाल्नुपर्छ ।”“तर यसो गर्दा हामीले डुङ्गालाई भताभड्ग पार्ने छौँ ।” चालकले भने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हो।” फिलियस फगले भन्यो, “मैले विचार गरेको कुरा पनि त्यही हो । हामीसँगइङ्ल्यान्ड पुग्न दुई दिन मात्र बाँकी छ।” डुङ्गा चालकले भेटेजति काठ बाले ।दुई दिनपछि डुङ्गामा कुर्सी, टेबुल, खाट केही पनि थिएनन्‌ ..... यहाँसम्म किउनीहरूले डुङ्गाको छाना पनि बालिसकेका थिए । जति बेला डुङ्गाको इन्जिनमाबाल्नका लागि केही पनि बाँकी रहेको थिएन उनीहरूले आयरल्यान्डको किनार देखे ।“इङ्ल्यान्ड पुग्न अझै २४ घण्टा बाँकी छ ।” बन्दरगाहमा पुगेपछि फिलियस फगलेभन्यो, “मैले यहाँबाट डब्लिनका लागि छिटो कुद्ने रेल लिन सक्छु र डब्लिनबाटलिभरपुल पुग्न छिटो कुद्ने डुङ्गा लिन सक्छु। यसरी १८ घण्टामा लन्डन पुग्न सक्छु।यसको मलतब, म अभै पनि समयमै लन्डन पुग्न सक्छु । ”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
0&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
22) 0१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सस&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पस&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिह&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबै कुरा ठिकठाक चलिरहेको थियो । उनीहरू रेल र डुङ्गा चढेर लिभरपुल आए ।“मिस्टर फिलियस !” उनीहरू लिभरपुल पुग्नेबित्तिकै कसैले फगको कुममा हातराख्यो । फिलियस फग फर्केर पछाडि हेस्यो । क इन्सपेक्टर फिक्स थियो ।“तिमी पक्राउ पन्यौ ।” इन्सपेक्टर फिक्सले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिलियस फग पुलिस चौकीमा पुस्याइँदा बिहानको ११ बजेको थियो । लन्डन जानेरेल जहिले पनि दिउँसो तिन बजे छुटथ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म त्यही रेलमा जाने छु।” फिलियस फगले विचार गन्यो । “म ८:३० बजे लन्डनपुग्ने छु र क्लबको मिटिङमा समयमै पुग्ने छु, होइन भने मेरा साथीले मसँग भएकोसबै पैसा लैजाने छन्‌ ...”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म इन्सपेक्टर फिक्ससँग केही क्रा बुझ्न चाहन्छु।” एक जना पुलिससँग फिलियसफगले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“उहाँ छिट्टै आउँछु भनेर जानुभयो ।” यति भनेर पुलिस हिँड्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिलियस फग इन्सपेक्टर फिक्सलाई पर्खिंराख्यो । १२ बज्यो, १ बज्यो, २ बजेपछिमात्र इन्सपेक्टर फिक्स आयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मलाई माफ गर, फग ।” फिक्सले भन्यो, “मैले सोचेको थिएँ बैङ्क लुटेरा तिमी नैहौ तर म गल्तीमा रहेछु । जतिबेला हामी संयुक्त राज्यमा थियौँ पुलिसले वास्तविकबैङ्क लुटेरालाई पक्रिसकेका रहेछन्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिलियस फग अरू छलफल गर्न लागेन । उ पहिले पासपारटु र अउदा भएकोठाउँमा पुग्यो र तिन बजेको रेल समाउन भ्यायो । कसँग अझै पनि समय थियो ।तर रेलले ढिलो गस्यो र रेल राती ८:५० बजे मात्र लन्डन पुग्यो । ८० दिनसम्मविश्वको फन्का मारेर पनि क क्लबमा पुग्न पाँच मिनेट ढिला भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिलियस लन्डनको उसको घरमा पुग्यो । उसको अगाडि अउदा बसेकी थिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अब स गरिब भएँ ।” उसले बिचार गस्यो तर पनि क चिन्तित देखिँदैनथ्यो ।अब उसलाई अउदाका बारे विचार गर्नु थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अडदाले भनिन्‌, “श्रीमान्‌ फिलियस फग, अहिले तिमी धेरै झमेलामा छौ । तिमीसँगयति समस्या छन्‌ कि तिमी एक्लैले समाधान गर्न अप्ठेरो हुने छ। अनि एक्लैले भन्दा हि२१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुई जना मिलेर प्रयास गर्दा समस्या समाधान गर्न सजिलो हुन्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकाएक फिलियस फगले उसले सोचेको क्रा सम्भ््यो । फिलियसले भन्यो, “अउदा,के तिमी ....”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मिस्टर फग, कृपया यो कुरा मलाई भनिदेक । तिमी मसँग बिहे गर्छौं ?”“अवश्य बिहे गर्छु ।” फिलियस खुसीले उफ्रियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनीहरू तुरुन्तै पादरीलाई भेट्न गए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हामी भोलि नै बिहे गर्न चाहन्छौँ ।” उनीहरूले पादरीलाई भने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आइतबार ?” पादरीले भन्यो, “आइतबार बिहे गर्नु त्यति राम्रो मानिँदैन ।”“सोमबार बिहे गरे हुन्न, भोलि त आइतबार होइन सोमबार हो ।” फिलियसलेभन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तर फग, मलाई त्यस्तो लाग्दैन ।” पादरीले भन्यो, “आजको समाचार पत्रमा मितिहेर त।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिलियसले समाचार पत्रमा मिति हेप्यो । पादरीले भनेकै ठिक रहेछ - त्यो दिनआइतबार, डिसेस्बर २० रहेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिलियसले तुरुन्तै गते र बारका सम्बन्धमा आफूले गरेका गल्ती थाहापायो । विश्वको विभिन्न ठाउँको भ्रमण गर्दा उसले कहिल्यै पनि आफ्नो घडीमासमय मिलाएको थिएन । त्यसैले क इडल्यान्ड पुग्दा वास्तविक समयभन्दा २४घण्टा छिटो थियो । (पूर्वतिरबाट विश्व भ्रमण गरेकाले र पश्चिमको भन्दापूर्वको समय छिटो हुने तथा यसरी विश्वको एक फन्कामा २४ घण्टा छिटो हुनेभएकाले - अनुवादक) त्यसैले त्यो दिन २१ डिसेम्बर नभएर २० डिसेम्बर थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कसँग क्लबमा साथीहरूलाई भेट्ने समय बाँकी नै थियो । फिलियस क्लबतिर दौड्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दने बजिसकेको थियो । क पुग्नुपर्ने समय एक मिनेट मात्र बाँकी थियो ।क्लबभित्रका उसका साथीले घडी हेरे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“उ फर्कन सकेन ।” एक जनाले भन्यो र त्यति नै बेला अर्थात्‌ (८5:४५ बज्नुभन्दाकेही पहिले) फिलियस फग कोठाभित्र पस्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पह नत कै प्रे“म आइपुगेँ।” उसले लगभग चिच्याउँदै भन्यो, “मैले ८० दिनमा विश्वको परिक्रमापुरा गरेँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्को दिन फिलियस फगले अउदालाई बिहे गस्यो । उनीहरूको बिहे हेर्न सयौँ मानिसचर्चमा पुगेका थिए । त्यो समारोहको नायक फिलियस फग थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले फिलियस फगबाट निकै महत्त्व पूर्ण कुरा सिकेँ ।&#039; पासपारटुले विचारगत्यो, &#039;मैले सिकेको त्यो महत्त्व पूर्ण कुरा हो । केही कुरा पनि असम्भव छैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समाप्त&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२४)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संसार फेरिएको छ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो किताब सन्‌ १८७२ मा लेखिएको हो । त्यतिबेला र अहिलेको भारतमा धेरैफरक परिसकेको छ । त्यति बेला भारत एउटा गरिब मुलुक थियो । भारतकोकेही भागमा बेलायतको शासन थियो र अरू भागमा स्थानीय राजाहरूले शासनगर्थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जापात&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यतिबेला यातायात र सञ्चारको अहिलेको जस्तो विकास भएको थिएन ।त्यसैले जापानको विश्वका अरू मुलुकसँग धेरै सम्पर्क थिएन । जापानकामानिस अरू मुलुकमा नगण्य सडख्यामा मात्र जान्थे र विदेशी मानिस पनि कमसङ्ख्यामा मात्र जापान जाने गर्थे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संयुक्त राज्य अमेरिका&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन्‌ १८७२ मा संयुक्त राज्य अमेरिकाको जनसङ्ख्या २ करोड मात्र थियो ।त्यहाँका धेरै मानिस किसान थिए । सहरहरू थोरै र साना थिए । देशको ठुलोभागमा त्यहाँका स्थानीय अमेरिकन इन्डियनहरू बस्थे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यातायात&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सन्‌ १८७२ सम्म राम्रा गाडी र हवाईजहाजको विकास भइसकेको थिएन ।त्यतिबेलाको सबैभन्दा छिटो साधन रेल थियो । रेल पनि अहिलेको भन्दा निकैढिलो चल्थ्यो । अरू देशमा जानका लागि मानिसहरू डुङ्गाबाट यात्रा गर्थे ।त्यतिबेला यात्रा गर्न महँगो पनि थियो । त्यसैले थोरै मानिसले मात्र देशविदेशको यात्रा गर्थे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आजकल छोटो समयमै यात्रा गर्न सकिन्छ । पुरै अमेरिका अथवा आन्ध्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महासागर सुपरसोनिक जेटबाट तिन घण्टामा पार गर्न सक्छौँ । रकेटहरूले२० मिनेटमै विश्वको परिक्रमा गर्न सक्छन्‌ । तर त्यतिबेला फिलियस फगलाईविश्व भ्रमण गर्न पुरै ८० दिन लागेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पोसाक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यतिबेलाको पोसाक पनि अहिलेको भन्दा निकै फरक थियो । अहिलेको भन्दात्यतिबेलाको पोसाक औपचारिक हुन्थे । पुरुषहरूले जहिले पनि टोप लगाउँथे ।महिलाहरूले लामा लामा पोसाक लगाउँदै । त्यसैले त्यतिबेलाको पोसाक त्यतिसुविधाजनक र हल्का थिएनन्‌ । हिजोआजका मानिसहरू हल्का कपडा लगाउँछन्‌।टि सर्ट र जिन्स कपडा त विश्वमै प्रचलित छन्‌ । त्यतिबेला र अहिलेको तुलनागर्दा धेरै कुराहरूमा धेरै फरक परिसकेको छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भाइ बहिनीहरू ! तिमी पनि विचार गर त अरू के के कुरामा फरक परेकोहोला ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शब्द जाल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रेखा तानेर तलका शब्दजालमा यो किताबमा प्रयोग भएका देश र सहरको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाम पत्ता लगाक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लिन्डजा ओभा त ता लब्लिन बाला इ जा[पा|भ।लि [ पु। ल|को|त्ता|जा|इ|ला|हा [वा द|न [क | तार |त [मा | बे|हा | य | [मा | | सं | [क्त | | यु | दा|ल|रि[ पु | [पा | जा|न|न [चा | [मा | न।भा|ची | य | ली|रा [क | | स |ले [बे । ला [सं [यु [क्त राज्य मे।रि [का | [य | त्ता|तहि [मा | सि।ब्लि।ई | न |ला [वा | ड्‌ ।त्ता | सं | रा।ज्य|रि [का |ज्यू [पा | जा [घा | यो|द|के|ड [घा | [पा | जा|ई|ला|र|पेको।ओ|ङ|हा [मा ली [मा [न्यु यो।र कन [पा । यो।र कदन्ड [सा | भान |टा|ला|बे|ता|।ल|रि|पे | स | न | न | डहा।त्ता।ला|इ [वा | वे।द न [क | ङ्‌ [क | त्ता [सा | ङ्‌इ्‌|न [घा | [पा । जाला न|र [मा पे|२रि [स | अ [का | रिल।|न्ड|भा|अ |२रि | य | इ|टा|ह ली|ल | पु | [मा | न्ड।त्ता[मा | ल।दा|भा|र|त पे | स | ङ।री|जा| ड|ब्लि| न | न |ल |।त्ता [क | [प। डा [मा ल [सा | [क | न [मा रि [स | आ [बे ।ग।ची|।जा|न|न|दा [वा | न|ङ|ला|लि | पु | न्ड | स |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माथिको शब्दजालमा किताबमा प्रयोग भएका ६ ओटा देश र १० ओटासहरको नाम दिइएको छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रयोग भएका देश र सहरको नाममा बुझिने गरी घेरा हाल ।घेरा हाल्दा तलमाथि, दायाँबायाँ, माथितल वा छड्के जसरी पनि घेरा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(२७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाल्न सकिन्छ तर घेरा सोझो हुनुपर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४. शब्दजालका देशमा चीन, जापान, भारत, बेलायत, इटाली र संयुक्तराज्य अमेरिका छन्‌ । सहरमा पेरिस, हङ्कङ, लन्डन, साङघाईं, डब्लिन,न्युयोर्क, योकोहामा, इलाहवाद, कलकत्ता र लिभरपुल छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफूलाई जाँचौँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२० मिनेटमा सक्ने अति प्रतिभाशाली,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३० मिनेटमा सक्ने - प्रभावशाली,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४० मिनेटमा सक्ने - सामान्य र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४० मिनेटभन्दा बढी समय लगाउने - कमजोर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
०200 0&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
८० दिनमा विश्व भ्रमणका कठिन शब्दको अर्थ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शब्दअक्टोबर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अचस्मअधिकारअधिकार पत्रअनुमानअत्तोपत्तोअन्यथाअसम्भवआभारीआयरल्यान्डइटालीइन्धनइन्सपेक्टरइलाहावादओर्लनुकम्पनीकुख्यातखतरनाकचर्चा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चाङ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चिताचिन्तितछ्क्क&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शब्दार्थ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
असोजको आधाआधीदेखि कार्तिकको आधाआधीसम्म पर्ने इस्वीसंवत्‌को दसौँ महिना&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नचिताएको उदेकलाग्दो कुरा, आश्चर्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ह्क&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुनै काम गर्नका निस्ति पाएको हकपत्रअड्कल, अन्दाज&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुनै काम क्राका बारेमा केही पनि थाहा नहुनेस्थिति होइन भने, नत्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्भव नभएको, हुन नसक्ने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्काले गरेको उपकार मान्ने, गुनिलोबेलायतको एक प्रदेशको नाम&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युरोप महादेशको एक देश&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शक्ति प्रदान गर्ने साधन मटितेल, डिजल, पेट्रोल, कोइलाप्रहरी सेवाको एक दर्जा, प्रहरी निरीक्षकभारतको एउटा सहर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माथिबाट तलतिर झर्नु, ओरालो लाग्नुव्यापारिक संस्था, समुदाय&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बदनाम, नराम्रो काम गर्नमा नाम चलेकोखतराले भरिएको, डरलाग्दो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रसङ्ग, छलफल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
थुप्रो, खात, रास&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुर्दा पोल्न बनाएको दाउराको टाँड वा खातसुर्ताएको, पिर लागेको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आश्चर्य, अचम्म&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छुराजापानजीवन चर्याझस्कनुझमेलाटारनुठोकुवा गरेरडकैतीडब्लिनदुरुस्त&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दृश्यनियमितनिश्चितन्युयोर्कपत्रिका&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पथ प्रदर्शकपौन्डपरिक्रमापटक्कै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पक्रनु&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पक्राउ पुर्जीपिछाप्रशान्तप्रशान्त महासागरप्रकाशनप्रचलन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चक्कु जस्तो लाग्ने हतियार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एसियाको सुदूर पूर्वमा रहेको एउटा प्रसिद्ध देशजीवनका दिनदिनै गरिने कार्यक्रम, दिनचर्या, दैनिक नियमएकाएक तर्सनु वा डराउनु&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
झन्झट, भझम्मार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निर्वाह गर्न, जे जसरी भए पनि काल चलाउन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निश्चित गरेर, निर्णय गरेर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाँका मार्ने काम, डाँकाको काम&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बेलायतको एउटा सहर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जस्ताको तस्तै, ठिकठाक, उस्तै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हेर्न वा देख्नका लागि राम्रो, हेर्न लायक, मनोहर, सुन्दरसबै कुरा ठिकठाक समयमा भइरहने, निर्धारित&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निश्चय गरिएको, निधो भएको, पक्का गरिएको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तर अमेरिकाको पूर्वी किनारमा रहेको प्रशिद्ध सहरनिश्चित समयमा प्रकाशित हुने समाचार पत्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाटो देखाउने व्यक्ति, मार्ग दर्शक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बेलायतको मुद्रा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चारैतिर घुम्ने क्रिया&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कति पनि, एकदमै ठ्याम्मै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समाउनु, पक्डनु&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पक्रिने समयमा अभियुक्तलाई दिइने पुर्जी, वारेन्ट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
थाहा नपाउने गरी कसैको पछि लाग्ने काम, लखेट्ने कामशान्त, निश्चल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाँच महासागरमध्ये एउटा महासागर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुस्तक, पत्र पत्रिका प्रकाशित गर्ने काम, छपाउने कामचालचलन, चलन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फन्को&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फटाफटफाँटफ्रान्सफन्का मार्नुफन्दुसफेला पार्नुबन्दीबन्दरगाहबाजीभ्रमणभताभुङ्गमहासागरमजाकोमतलबसलिनुमृतयातायातयात्रुयोकोहामायोजनालन्डनलिभरपुलव्यवस्थितविचित्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक पटकको घुमाइ, एक ठाउँबाट हिँडेर फेरि त्यसै ठाउँमाआइपुग्ने कामचाँडोचाँडो हिड्ने, कुनै काम छिटो छिटो गर्ने किसिमखेती गर्न लायक सम्म परेको जमिन वा मैदानयुरोप महादेशको एक प्रशिद्ध देशएक छाउँबाट हिँडेर घुम्दै फेरि त्यसै ठाउँमा आइपुग्ने कामकाम न काजको, बिना मतलबकोभेट्नु, भेट्ने काम गर्नुथुनुवा, कैदी, अ्यालखानामा थुनामा परेको व्यक्तिपानी जहाज अडिने समुद्र किनारको घाट, पानी जहाजको स्टेसनकुनै खेलमा दुई थरीका बिच हारजित हुँदा गरिने सर्त, होडयात्रा, सफर, घुमफिर गर्ने कामबरबाद, नाश, लथालिङ्गठुलो समुद्रउत्तम, राम्रो, रमाइलोकुनै भनाइको अर्थ, माने, आशयउज्जल नभएको, अँध्यारोमृत्यु भएको, प्राणहीनआवत जावत, बाटोघाटोयात्रा गर्दै रहेको व्यक्ति, बटुवा, पर्यटकजापानको एउटा सहरकुनै काम गर्न गरिएको पूर्व निश्चित तयारीबेलायत (इङ्ग्ल्यान्ड) को राजधानी सहरबेलायतको एउटा सहरव्यवस्था मिलेको, जस्तो हुनुपर्ने हो त्यस्तै भएको राम्रो अवस्थाकोअनौठो, अद्भूत[३१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वाक्यविश्वशवयात्रीसपना देख्नुसमूह&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्त&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्भवसंयुक्तसर्कससाडघाईसाधनसासनासिमानासुरुवातसुरक्षासोधपुछस्टेसन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हतासहिसाबकिताबहिमगाडी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुरा अर्थ दिने सार्थक शब्दहरूको समूहसम्पूर्ण सृष्टि, संसार, जगत्‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शवयात्रामा सम्मिलित हुने व्यक्ति, मलामीरमाइलो भविष्यको आशा वा कल्पना गर्नुधेरै मानिसको जमात, हुल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्झौता गर्दाका कुरा, कबुल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुन सक्ने, सम्भावित&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मिसिएको, सिलेको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आश्चर्य जनक खेल, तमासा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चीनको पूर्वी किनारमा रहेको ठुलो सहरउपकरण, कुनै काममा प्रयोग गरिने सामानमुकाविला, मुठभेड&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साँध, किनारा, छेउ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुनै कामको थालनी, आरम्भ, सुरु&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रक्षा, राम्रो बचाउ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रश्न गराई, केरकार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रेल, मोटर आदि रोकिने ठाउँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निराश, अत्तालिएको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हरहिसाब, आम्दानी खर्चको लेखाजोखा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मालसामान वा यात्रीलाई हिउँमा ओसारपसार गर्ने साधन&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%88%E0%A4%81,_%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%99_%E0%A4%B0_%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%80_(%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A4%A5%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%99%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B9)&amp;diff=91</id>
		<title>दसैँ, पिङ र हात्ती (बालकथा-सङ्ग्रह)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%88%E0%A4%81,_%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%99_%E0%A4%B0_%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%80_(%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A4%A5%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%99%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B9)&amp;diff=91"/>
		<updated>2024-06-14T14:04:39Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: Created page with &amp;quot;जय प्रिय साथी रत्न 2  १. अक्षर ३२. जालमाथि चाल  २.- अनमोल मणि (बालकथा सङ्कलन) ३३. जिन्की र जोकर (बालकथासङ्ग्रह)३. अनुहारको चित्र ३४. जुनेली साँझ  ४. अन्तरिक्षयात्रीहरू (वैज्ञानिकको जीवनी। ३...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;जय प्रिय साथी रत्न 2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१. अक्षर ३२. जालमाथि चाल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२.- अनमोल मणि (बालकथा सङ्कलन) ३३. जिन्की र जोकर (बालकथासङ्ग्रह)३. अनुहारको चित्र ३४. जुनेली साँझ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४. अन्तरिक्षयात्रीहरू (वैज्ञानिकको जीवनी। ३५. झुन्डिएको बगैंचा (यात्रासंस्मरण)५, अर्थ न बर्षका क्रा ३६. झ्यापुल्लेको बिजोग&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
६, आनन्दको आविष्कार ३७. टुटिलो र धनेश&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७. आप्पाको झण्डा ३६. डिक र बिरालो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
५. आमाको उपचार ३९, तारामण्डल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
९. इन्द्र्धनुष (बालकथासङ्ग्रह) ४०. तिरमिर तारा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१०. इन्द्रेनी ४१. दङ्ग-फुरुङ्ग (बालकथा)११. कथाको किताब ४२. दयालु परी१२. कथा-कोपिला ४३. दसैं, पिङ र हात्ती (बालकथा)१३. कथा कथ्यौरी ४४, नयाँ साथी१४, काँक्रो र बूढीको नाक ४५. नातितातिना१५. काना-काना कुर्र (बालकविता) ४६. नानीहरूका कथाको किताब१६. काले कुकुर ४७, पञ्चतन्त्रका पाँच कथा१७. कालो माला (बालकथा) ४. पाँच प्रसिद्ध वैज्ञानिकहरूको जीवनी१५. कुभिन्डे भूत ४९, पुतलीको बिहे (बालकविता)१९, केही राष्ट्रिय विभूतिहरू भाग १, २ ५०. पुष्टकारी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२०. केही रमाइला कथा ५१. पौराणिक बालकथा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२१. गणितबाट रमाइलो (बौद्धिक परीक्षा) ५२. फुच्चे खरायो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२२. चरी आयो ५३. फूलजस्तो मन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२३. चहचह ५४, बाँदर्तीको माया (बालकथा)२४. चार चङेरी 99. बामपुड्के&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२५. चिरबिर चरी ५६. बालगीत (भाग १, २)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२६. चील गाडीमा सरर ५७. बालबाटिका&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२७, चुस्के र ल्लुस्के (बालकथा) ५५. बालबालिकाहरूका नाटक२८. छिमेकी चरा ५९, बाल रत्न&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२९. जङ्गलमा मङ्गल ६०. बिचरो बुख्याचा (बालकथा)३०, जमिनदारको जुक्ति ६१. बुद्धिमानीको परीक्षा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
की. जातक कथा ६२. बुहारी (लोककथासङ्ग्रह)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दसैँ, पिङ र हात्ती&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(बालकथा-सङ्ग्रह)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेस्रो संस्करण : २०६७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रकाशक : रत्न पुस्तक भण्डारकाठमाडौं, फोन : ४२२३०२६लेखन : कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चित्र : शान्ता हिताङ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्पादन : शाश्वत पराजुली&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७ सर्वाधिकार : लेखकमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चित्र तथा लेआउट 6 : प्रकाशकमासंस्करण : पहिलो २०६३मुद्वक : डंगोल प्रिन्टर्सकाठमाडौँ, फोन : ४२५६९३२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
0954, 270 तव्यगी1589 : 99933-0-444-1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कथासन्दर्भ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अक्षर (२०५१), काले कुकुर (२०५१), भाँडाकुटी(२०५८), सुनकथा (२०५९), दसैँ, पिङ र हात्ती(२०६०) र राँकेभूत (२०६१) बालकथासङ्ग्रहमार्फत नेपालीबालसाहित्यका क्षेत्रमा देखिएका कपिल लामिछाने(२०१५) यस विधाका आसलाग्दा युवाप्रतिभा हुन्‌ । ...थोरै पात्र, संवाद, सरल र छोटा वाक्य तथा रोचकप्रस्तुतिका कारण लामिछानेका कथाहरू प्रभावपूर्ण हुनपुगेका छन्‌ । बालबालिकालाई शिक्षा, ज्ञान, चेतना रमनोरञ्जन आफ्ना बालकथामार्फत दिनु यिनको वैशिष्टचहो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“प्रमोद प्रधान&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कथाक्रम&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१. दसैँ पिङ र हात्ती ५२. उनीहरूको टारी खेत १२३. मोहन, सोहन र कछुवा १६&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
४४. एक विद्या चौध चतुस्याइँ २२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
५. फूलको राजा रद&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दसैँ, पिङ र हात्ती&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भर्खर स्कूलमा दसैँको छुट्टी भएको थियो । केही दिनका लागि उनीहरूपढाइको टनटनबाट बचेका थिए । शरद्‌ क्रतुको मौसम रमाइलो थियो ।टाढाटाढाबाट आएका आफन्तसित भेट हुने, राम्रो खानलाउन पाइँने हुँदा पनि दसैँसबैलाई रामाइलो लाग्थ्यो । दिनेश र उसका साथीहरू छुट्टीको आनन्द लिँदै घुम्दैथिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिनेशले भन्यो- “मेरा दाजु हिजो काठमाडौँबाट आउनुभयो । मलाई राम्रोलुगा ल्याउनुभएको छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मेरी दिदी पनि त आज बिहानै पोखराबाट आउनुभयो नि ! मलाई कितापल्याइदिनुभएको छ ।” उमेशले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“केको किताप नि ?” दिनेश र दीपेशले एकैसाथ सोधे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कथाको !” उमेशले जवाफ दियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“क्या रमाइलो होला, हामीलाई पनि पढ्न देक ल !” बाबुचाले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुरेशले भन्यो- “मेरा बुबा त फूलपातीपछि आउनुहुन्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मेरा बुबा पनि !” बाबुचा र मङ्गलेले थपे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस्तैमा उमेशका हजुरबा पनि त्यहीँ पुग्नुभयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“नमस्ते हजुरबा !” उनीहरूले भने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उमेशका हजुरबाले भन्नुभयो- “तिमी स्कूले केटाहरूलाई लामो छुट्टी हुँदादिक्क लागेको होला, होइन ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हामीलाई त बडो रमाइलो पो भएको छ, हजुरबा !” उमेशले भन्यो-“दिक्क लाग्ने त कुरै छैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अझ रमाइलो बनाउने उपाय भए बताउनुहोस्‌ न बरु !” बाबुचाले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उमेशका हजुरबाले घोरिएर भन्नुभयो- “हेर बाबुनानी हो, हामी ठाउँठाउँबाटतराईको यस ठाउँमा आएर बसेका छौँ । तिमीहरू त यहीँ जन्म्यौ । हामीले पहाडर तराई दुवै ठाउँको हावापानी खाएका छौँ । त्यहाँ र यहाँको रहनसहन देखेकाछौँ । त्यसैले तिमीहरूले पहाडतिरको दसैँको झलक पाउने गरी टोलमा एउटाचौराली पिड हालौँ । तिमीहरू रमाउला, हामी पनि पिर्की पु्जौँला ।..”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पिडको नाम सुन्नेबित्तिकै दिनेशहरू खुसीले बुरुक्क उफ्रे । उनीहरूले मेलामामात्र पिङ देखेका थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाबुचाले सोध्यो- “कस्तो हुन्छ त्यो चौराली पिङ ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हजुरबाले भन्नुभयो- “कस्तो भन्ने अब ? कापा परेका दुईवटा खाँबा हुन्छन्‌,एउटा बलो हुन्छ, चारवटा पिर्की हुन्छन्‌, तल-माथि घुम्छ । अरू त बनेपछिदेखिहाल्छौ नि । अझ कहीँ चर्खे पिङ पनि भन्छन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज फूलपातीको दिन । टोलछिमेकमा सबै जुटिसकेका छन्‌ । हरेक घरमाअघिपछिभन्दा मीठोमसिनो पाकेको छ । घरघरबाट खसीबोकाको म्याँम्याँ आवाजआइरहेको छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उमेशका हजुरबाको क्रा सबैलाई मन परेको छ । खुला ठाउँमा पिङ हाल्नेतयारी भइसकेको छ । पिडका खम्बा गाड्न दिनेश र उमेशले एकएकवटा खाल्डाखन्न थाले । खन्दाखन्दा हात दुखे अनि बाबुचा र मङ्गलेले पालो दिए । खाल्डाखन्ने काम सकिएपछि उनीहरू सिकर्मीहरू लिएर वनमा पुगे । वन कार्यालयलेअनुमति दिई छ्पान गरिदिएका ठूलाठूला रूखहरू ढलाए । रूख ढल्दा अरू रूखकाहाँगाहरू र साना बोटबिरुबाहरू भाँचिए । दिनेशहरूलाई नरमाइलो लाग्यो ।काटकुट र ताछतुछ पारी खम्बा तयार भए । खम्बा तीन फुट गोलाइका थिए,माथिपट्टि चोके परेका थिए । त्यही चोके वा कापामा राख्ने एउटा दरो बलो तथाअरू सरजाम पनि हेदहिदै तयार भए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनि सबै मिलेर काटेका खम्बा पल्टाउन खोजे - होस्टे-हँसे ! होस्टे-हँसे !!होस्टे-हँसे !!1 फेरि एकैचोटि सबैले बल लगाए- होस्टे-हँसे ! होस्टे-हँसे !! होस्टे-हँसे 1! तर खाँबो हच्केन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खाँबाहरू, बलो र अन्य सरजाम झन्डै एक किलोमिटर टाढा पुन्याउनु थियो ।यति मानिसले मात्र पुन्याउनु सम्भव देखिएन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“डोजर ह्याउनुपन्यो, काका !” दिनेशका बाबुले उमेशका हजुरबाका मुखतिरहेरेर भने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“डोजर होइन, क्रेन ल्याउनुपर्छ भन्नुहोस्‌ त बुवा ! यस्तो कामका लागि क्रेत कामलाग्छ ।&amp;quot; दिनेशले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“होहो !” दिनेशका दामलीहरूले भने ।“मान्छेको वशको कुरो होइन, यत्रा सत्तरीलाई उठाएर लैजान ।” रमितेले भने ।“अग्राख त फलामभन्दा गरुङ्गो र बलियो पो हुन्छ ।” सिकर्मीको नाइकेले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मानिसहरू थरीथरीका कुरा गरिरहेका थिए । उमेशका हजुरबा भने घोरिएरसोचिरहनुभएको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“खम्बा लैजान सकिन्न भने यहीँ पिङ हालौँ ।” बाब्चाले भन्यो ।“यस्तो जङ्गलका बीचमा पनि कहीँ पिङ हाल्छन्‌ ?” अर्कोले जवाफ दियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“उठाउन-चलाउनै नसकेपछि यहीँ पनि कसरी हाल्ने पिङ ?” उमेशका हजुरबालेभन्नुभयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“औँ त नि, हा हा हा ........!” सबै हाँसे ।उमेशका हजुरबा कसैलाई केही नभनी एक्कासि जानुभयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हजुरबा एकैछिनमा जिमदारको हात्तीमाथि चढेर आइपुग्नुभयो । सबैले हजुरबाकोअक्कलको सराहना गरे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हात्तीका लामा-लामा दारा थिए । त्यस हात्तीलाई प्रायः सबैले चिन्थे । माउतेकाइसारामा हात्तीले खम्बालाई सुँढले च्याप्प समात्यो र घिसान्यो । सबै खुसी भए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अगिअगि खम्बा घिसारिरहेको हात्ती र पछिपछि मानिसको लस्कर ।जन्तीभौँ लाग्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिनेशहरूलाई पनि रमाइलो लाग्यो । मानिसको बृद्धि र हात्तीको बल भएठूलाठूला काम पनि सहज हुने रहेछन्‌ भन्ने कुरा सबैले बुझे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खम्बा टोलमा पुग्यो । मानिसहरू चारैतिर झुम्मिएका थिए । त्यत्रो अजङकोखम्बा एउटै हात्तीले ठडयाएको हेर्ने जोकोहीलाई पनि इच्छा थियो । त्यसैले सबैघचेडाघचेड गर्दै थिए र सबैको ध्यान हात्तीपट्टि थियो । कतै खम्बा ढल्ला रउछिट्टिएर आफूतिर आउला भन्ने डरले एकदमै नजिक जान कोही पनि सकिरहेकोथिएन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माउतेले हात्तीलाई खनेर ठिक्क पारेको खाल्डोमा खम्बाको फेद हाल्न भन्यो,हात्ती मानेन । माउतेले हात्तीलाई पटकपटक अरायो, तैपनि मानेन । यस्तो तकहिल्यै गर्दैनथ्यो भनी माउते भुतभुतायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माउतेले हात्तीलाई पिट्यो । फेरि पनि हात्ती मानेन । हात्ती जहाँको तहीँउभिइरह्यो, सुँढ उचालेर ड्वाँ-ड्वाँ कराइरह्यो । मानिसहरू जिल्ल परिरहेकाथिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“होइन ए चौधरी, आज किन मानिराखेको छैन यो हात्ती ? बहुलाउन तबहुलाएन ?” उमेशका हजुरबाले भने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यसो नभन्नुहोस्‌ काका, हात्ती लाखमा एक हो । तपाईंलाई थहा छैन र ?&amp;quot;माउतेले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कुखुरा चढाउँला भनेर भाकल हाल्नुहोस्‌ काका, मान्ला बरु ।” दिनेशकाबाबुले भने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कस्तो नचाहिने कुरा गर्छौं ए भाइ, हात्तीले पनि कहीँ भाकल खोज्छ ?...बरु खम्बाको मोटाइअनुसारको खाल्डो खनेको छैन होला, त्यसौ भएर नमानेकोहात्तीले । नापिहेर्नुहोस्‌ त ।” माउतेले दिनेशका बाबुसित भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“नचाहिने दुःख दिन्छौ चौधरी, दाइ ।” दिनेशका बाबुले भने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनि उनी खम्बाको मोटाइ नापेर खाल्डातिर लागे । उनलाई देखेर बिरालाकोछाउरो म्याउँ गर्दै खाल्डाबाट फुत्त बाहिर निक्ल्यो । छाउरो निक्लेर जानेबित्तिकैहात्तीले खम्बाको फेद खाल्डामा हालेर उभ्याइदियो । सबैले ताली बजाए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१0&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“छाउरो रहेछ र पो नमानेको मोरो ।” माउते भुतभुतायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हात्तीले अर्को खम्बा पनि खडा गरिदियो, खम्बामाथि बलो चढाइदियो ।सिकर्मीहरूले पिङ जोड्ने काम फटाफट गरे । हेदहिदै चौराली पिङ तयार भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अब पहिले कोको खेल्ने ?” कर्मी दाइले भने ।उमेशले भन्यो- “हजुरबा र माउते काका खेल्ने ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“एउटा पिर्कीमा सिकर्मी दाइ र अर्को पिर्कीमा म र बिरालाको छाउरो पनिखेल्ने । कसो ?” बाबुचाले थप्यो ।|&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनीहरूको टारी खेत&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बजारको मुन्तिर उनीहरूको बारी थियो । बारीमा कतैबाट कूलो लाग्दैनथ्यो ।त्यसैले पाखेबाली कोदो, मकै, तोरी आदि लगाइन्थ्यो । धानखेती हुन्नथ्यो ।बेसाएको चामलको भात कहिलेकाहीँ मात्र खान पाइन्थ्यो । यसबाट आमाबाबुदुःखी थिए । यो उनीहरूको बुझेका थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
असारको महिना उनीहरू पिँढीमा बसेर दुनोट घोक्दै थिए- पाँच एकाने पाँच,पाँच दुना दस.... ! बादल चारैतिरबाट घेरिँदो थियो । पातीका ठूलाठूला थोपातप्त्याकतुप्लुक खस्न थाले । हेदहिरदै पानी दरर दर्क्यो । एकै छिन पानी थामियो रफेरि लगातार दर्किरह्यो, दर्किरह्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आकाशबाट पानीका थोपा-थोपा पर्दै थिए, &#039; तर छानाबाट बलेसीको धारैखसिरहेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विशालले भन्यो- “असल, हेर पानीका धारा !”“देखिरहेको छु । किन र ?” किताब बन्द गर्दै असलले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“बुझेनौ ? अस्तिअस्ति हामी स्कूलबाट आउँदा सडकको छैउछेउ भल बगेको ?त्यो भल काटेर बारीमा हाल्ने हो भने खेत बनाई रोप्न कसो नसकिएला ?”बिशालले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
असल बुरुक्क उफ्ग्रो । उसले किताबकापी थन्क्यायो र उठ्यो । विशालपनि उठ्यो । पानी दर्किरहेको थियो । दुबैले मुखामुख गरे । दुबैले एक-अर्काकोमनको कुरा बुझे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आमाबाबु मेलामा गएका थिए । असल र विशालले एकेकवटा कोदालोसमाते, घुम ओढे र उनीहरू आँगनबाट ओर्लिहाले ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बारी सडकको मुन्तिर थियो । पानी परिरहेको थियो र भल सडककोछेउछेउ बगिरहेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिशालले कोदालाले भल काट्यो । भल बारीतिर सोभ्ियो । असललेकुलेसो अझ गहिन्यायो । भलपानी झन्‌ ठूलो भयो । बारीमा पानी त पुग्यो, तरबगोर जान थाल्यो । हतार-हतार उनीहरूले बारीका छेउछेउमा आली (डिल)लगाए । पानीले गरो डम्म भयो । विशालले दुई-तीन ठाउँमा पातलो-पातलोढुङ्गा राखेर समा बनायो । समाबाट पानी सलल्ल भर्न थाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ढाड सोझ्याउँदै निधारका पसिना पुछ्दै असलले भन्यो- “अब त भात खानपाइन्छ हगि ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“किन नपाउनु ? तर हेर, उ त्यो गराबाट पनि पानी बगिराखेको छ...”विशालले तल्ला गरामा भर्दै भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
असल पनि तल्ला गरामा झन्यो । भर्दाझर्दै उसले भन्यो- “त्यसो त सबैगरामा आली लगाउनुपर्छ नि !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पानी परेको पच्चै थियो । उनीहरू आली लगाइरहेका थिए, हिलो बनाउँदैथिए । छेउकुना खन्दै, किच्दै थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काम गर्दा गार्हो हुँदो हो, तर उनीहरूलाई रमाइलो लागिरहेको थियो ।उनीहरूको मन चङ्गा भयो । जीउ खुसीले फुरुङ्ङ भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“टुल्दाइ, ल खाजा खाने बेला भयो ।” कित्लीमा चिया र मजेत्रोमा मकैलिएर बहिनी लता आइपुगी । उसले भनी- “अब हाम्रो बारी त टारी खेत पोभएछ त !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“भयो नि ! कस्तो लाग्यो त ! गरे कित हुन्न ?” विशालले भन्यो ।कित्लीको टुटीबाट बाफ निक्लिरहेको थियो ।“मौकैमा आइपुगिस्‌, ले !” असलले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्लामा टुक्रुक्क बसेर उनीहरूले मकै र चिया खाए । कान्लाभरि भुइँकाफलथिए । मकै खाँदाखाँदै लताले भनी- &amp;quot;असल दाइको गोडामा कोदालाले काटेछ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
असलले गोडा हेप्यो, छाम्यो र भन्यो- “जुका रहेछ ।” उसले कान्लाबाटपाती टिप्यो र जुकाले टोकेको ठाउँमा दल्यो । जुका खस्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्लामा जुका उनीहरूले “माछो-माछो-भ्यागुतो खेल्दा औँला हल्लाएझैँहल्लिरहेका थिए । कुनै बित्ता नाप्दै थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मकै खाँदै लताले थपी- “दाइहरूले त आज गर्नु गर्नुभयो नि !”“हामीले होइन, भातले गरेको हो !” असलले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीनै जना हलल्ल हाँसे । पानी परिरहेको थियो । भर्खर बनेको टारी खेतमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भ्यागुताहरू ट्वारट्वार गर्न थाले ।॥ |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोहन, सोहन र कछुवा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोहन र सोहन घुम्दाघुम्दै नारायणी नदीका किनारमा पुगे । नदी ठूलो रबाङ्गोटिङ्गो थियो । चितवन राष्ट्रिय निकुञ्जभित्रको त्यो ठाउँ घना जङ्गलकाबीचमा थियो । छुट्टीको समय बिताउन उनीहरू त्यहाँ पुगेका थिए । यसरी घुम्नउनीहरूलाई रमाइलो लाग्थ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नारायणीमा ठूलाठूला लहर उठिरहेका थिए । लहरसँगै एउटा कछुवाआयो र उनीहरूछेउ रोकियो । मोहन पछि हट्न खोज्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोहनले भन्यो- “अरे यो त कछुवा हो- 1011(015€ ! यसले केही गर्दैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोहनले कछुवाको ढाडमा सुमसुम्यायो । सोहनले कछुवालाई छुँदा कछुवालेटाउको आफ्नो जीउमा बोकेको ठूलो खबटाभित्र लुकायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोहनलाई पनि रमाइलो लाग्यो । उसले पनि कछ्वालाई छोयो । उसकोआङ जिरिङ्ग भयो । कछुवाले सोहनका खुट्टामा सुमसुम्यायो । खुट्टा हटाउँदैसोहन हाँस्यो । मोहन पनि हाँस्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मेरो नाम कुलबहादुर हो ।&amp;quot; कछुवाले अगाडिको पखेटा उचालेर भन्यो ।“मेरो नाम मोहन हो ।&amp;quot; दङ्ग पर्दै मोहनले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मेरो नाम सोहन हो ।” जिल्ल पर्दै सोहनले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“नदीकिनारमा तिमीहरूलाई स्वागत छ ।” कछुवाले भन्यो ।“तिमीलाई पनि हाम्रो जमिनमा स्वागत छ ।” मोहनले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कछुवाले टाउको ठड्याएर भन्यो- “त्यो त ठीक छ, तर यो जमिन मेरोपनि हो नि !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोहनले भन्यो- “कसरी ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१६&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कछुवाले भन्यो- “ल तिमीलाई थाहा छैन ? म माछाजस्तोहोर ?मतपानी र जमिनमा बराबर बस्न सक्छु । पानी र जमिन दुवै मेरो संसार हो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोहनले मसिनो घाँस कछुवालाई दियो । कछुवाले त्यो ड्याडङयाड पारेरखाइदियो । छालले एउटा माछालाई छाडेर गयो । माछा उफ्रँदै अर्कोचोटि छालआउने बाटो हेरिरह्यो । मोहनले माछा च्याप्प समात्यो र कछुवाका मुखमाहालिदियो । कछुवाले त्यो पनि खाइदियौ । छालले एउटा ठूलो माछा छाडेरगयो । मोहनले त्यो माछा पनि च्याप्प समात्यो र कछुवाका मुखमा हालिदिनखोज्यो, तर कछुवाले त्यो खाएन । माछा फूत्केर पानीमा पुग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“किन खाएनौ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मेरो दाँतले यति ठूलो माछा चपाउन सक्दैन ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हो र ?” उनीहरूले सोधे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अनि के त ?” कछुवाले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनीहरूलाई रमाइलो लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीनै जना रमाउँदै खेल्दै थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तरबाट एउटा जङ्गली जनावर आइरहेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पहिले कछुवाले देख्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले भन्यो- “उ: हेर है, ब्वाँसो आइरहेछ । त्यो खतरनाक जनावर हो ।”मोहन र सोहनले पनि देखे । ब्वाँसो आफूहरूतिरै लम्किरहेको थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोहनले भन्यो- “हामी त अब दगु्छौं, भाग्छौँ र गुहार मागेर बच्छौँ । तिमीके गर्छौ नि ? मेरो बुई आउ बरु ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“धेरै-धेरै धन्यवाद ! तर बुझ, दौडेर त्यसबाट बच्न सक्दैनौ । मलाई धेरैथाहा छ । पर्ख !” कछुवाले भन्यो र तुरुन्तै पानीभित्र डुबुल्की मान्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सौहनले भन्यो- “कति डरछेरुवा रहेछ !”१८&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोहनले भन्यो- “त्यस्तासित पनि के मीत लाउन्‌ ? बेकार !”सोहनले भन्यो- “अब भागौँ, नत्र त्यो ब्वाँसाले खान्छ हामीलाई ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोहनले भन्यो- “तर बस्ती पनि त टाढा छ । अब हामी दुग्रेर बच्न त सक्दैसक्दैनौँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोहनले भन्यो- “त्यो त हो, तर हामीसित दुगुर्नुबाहेक अर्को उपाय पनि तछैन नि!”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुवै दगुनै तयारी गर्दै थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकाएक कुलबहादुर पानीबाहिर निक्ल्यो । उसका दुवै हातमा बडाबडाखबटा थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नजिकै पुगेर उसले भन्यो- “ल एकएकवटा खबटा मैले जस्तै ओढ !तिमीहरू यस्ता जनावर र चराहरूको झम्टाइबाट बच्न सक्छौ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“खबटा ?” मोहन र सोहन आश्चर्यले चकित भए- “कत्ति ठूलठूला ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुलबहादुरले भन्यो- “हामी समुद्रबाट यता बसाइँ सरेर आउँदा यस्तै केहीपर्ला भनी हामीले यस्ता खबटा ल्याएका थियौँ । आज काम लाग्ने भे । मलाईबडो खुसी लागेको छ । अहिले मेरा बाबुआमा पनि आउनुहुन्छ । ल ल लगा ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दङ्ग पर्दै मोहन र सोहनले खबटा ओढे । तिनीहरूलाई रमाइलो अनुभब भयो ।मीत कछुवालाई भगुवा ठानेकोमा मनमनै पछुतो लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुवैले कछुवालाई अँगालो हाले ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनीहरूले भने- “यति ठूलो पनि हुन्छ खबटा ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कछुवाले भन्यो- “यो त के ठूलो नि ? समुद्री कछुवा आठ फुटसम्म लामो रबार सय किलोसम्मका हुन्छन्‌ । चानचुने जन्तु नठान हामीलाई ।...”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यसै पनि तिमी चानचुने होइन रहेछौ । हामीले बुझिसक्यौँ ।” मोहनले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२0०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नारायणी किनारका रूखमा चराहरू चिरबिर गर्दै थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्वाँसो उतै जङ्गलभित्र पस्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोहन र सोहन पनि फर्के । कुलबहादुरले उनीहरूलाई नदीका किनारबाटहेरिरह्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुलबहादुरले पखेटा उठाएर उनीहरूलाई टाटा गस्यो । उनीहरूले बाई-बाई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गरे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक विद्या चौध चतृस्याइँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क जतिखेर पनि पढ्विरहन्थ्यो । साथीहरू खेल्दा पनि क छेउमा बसेर पढिरहेकोहुन्थ्यो । स्कूल जाँदा-आउँदा बाटामा क घरीघरी किताबकापी निकालेर हेरथ्यो र रद्दैअघि बढ्थ्यो । मानौँ रट्नुलाई नै उसले पढाइ वा सिकाइ ठानेको थियो । आज पनि कहिसाबका सूत्र रट्दै थियो । त्यत्तिकैमा हस्याङफस्याङ गर्दै श्याम आइपुग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामले भन्यो- “हितेश, हिँड जाञँ, मेला घुम्न । कत्ति पढिरहेको ? बैशाखपूर्णिमाका उपलक्ष्यमा लुम्बिनीमा ठूलो मेला लागेको छ रे, देशविदेशका मान्छे आएकाछन्‌ रे । त्यहाँ थरीथरीको मेलाका साथै विज्ञान-प्रदर्शनी पनि लागेको छ रे ! जाउँ है,सबै मिलेर जाउँ । बडो रमाइलो हुन्छ । आखिर छुट्टीको दिन त हो !...”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले सोच्यो -मेला-प्रदर्शगीमा गएपछि दिनभर त्यतै भइन्छ । पढ्न पाइन्न ।सिक्ने समय त्यत्तिकै खेर जान्छ । अत्ति उसले भन्यो- &amp;quot; नाइँ, म जान्नै ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“बिन्ती, त्यसो नभन न हितेश । जाउँ न ।” श्यामले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“नाइँ, मलाई पढ्न देक । म पढ्न चाहन्छु- जान्न चाहन्छु र आउँदो परीक्षामापहिलो हुन चाहन्छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामले सम्झाउने गरी भन्यो- “तिमी जहिले पनि यस्तै कुरा गर्छौं । पढ्नु, सिक्नुभनेको खालि घोक्नु र रट्नु होइन है, हेर । पढ्नु पनि पर्छ, घुम्नु-हेर्नु पनि पर्छ गटपनि जानिन्छ, सिकिन्छ, बुझिन्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमी जेसुकै भन, म जान्नँ । क्षण त्यागे कृतो विद्या रे ! म मेरो अमूल्य समनष्ट गर्न चाहन्नँ । मलाई एक्लै छाडिदेङ, पढ्न देक !&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामले कति गर्दा पनि हितेशको मन पग्लेन । श्याम दुःखित भएर फर्क्यौ । हितेशकिताप पल्टाएर पढ्न थाल्यो । मोहन, जोहन, सोहन र सीता पनि मेलामा गएनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्यामको मेलाटोली हिँड्यो । टोलीमा श्यामका साथ दीपेश, नरेश, राजेश तथारन्जु, अन्जु, सन्जुहरू थिए । प्रत्येकले एकएक झोला लिएका थिए । झोलामा डायरी,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कलम, पानीको तुम्लेट र खाजा राखेका थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेलामा हजारौँ मान्छे भेला भएका थिए । ठेलमठेल थियो । त्यो देखेरउनीहरू खुपै रमाए । बालबालिकाहरू, तरुनी-तन्नेरीहरू, बृढाबढीहरू, गाउँलेहरू,सहरियाहरू, किनमेल गर्नेहरू, खेल्नेहरू-खेलाउनेहरू, नाच्ने-बजाउने र गाउनेहरू,माग्नेहरू-दिनेहरू, मेला लगाउनेहरू र मेला भर्नेहरू आदिले गर्दा मेला साँच्चैहेर्खलायकको देखिन्थ्यो । सबै रमाएका देखिन्थे । यता पनि भीडभाड उता पनिभ्रीडभाड थियो । धक्कमधक्का, ठेलमठेल थियो । कतै मान्छेको कोलाहल थियोभने कतै माइक्रोफोनको । कतै खुसीको सुसेली थियो भने कतै हराएका मान्छेकोहुलिया र आफन्तको सन्देश थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्याम रमायो- “हेर दीपेश, कति मज्जा हगि ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपेशले थप्यो- “अँ त निहै !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रन्जु उफ्री- “श्याम, उ त्यता जाउँ । त्यहाँ त बिज्ञान-प्रदर्शनी रहेछ ।”दीपेशले भन्यो- “हुन्छ, हुन्छ, हामी सबै त्यतै लागौं ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विज्ञान-प्रदर्शनी मेलाको एक मुख्य आकर्षण नै थियो । प्रदर्शनीमा धमिलो पानीलाईफिटकीरीले तुरुन्तै सफा पार्ने, पानीबाट बिजुली उत्पादन गर्ने, गोबरबाट बिजुली निकाल्ने,भझारबाट पेट्रोल उत्पादन गर्ने आदि प्रविधि, कम्प्युटरको सफ्टवेयर सिस्टम, इन्टरनेटबाटजानकारी पाउने तरिका आदि थुप्रै प्रयोग देखाइएका थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्याम गम्भीर भयो । उसले भन्यो- “साथीहरू, हाम्रा खोला र नदीहरूले नेपालकोसिमाना छिचोल्ने ठाउँमा फिटकीरीका ठूलाठूला ढिकाहरू राखिदिने हो भने हाम्रो मलिलोबलौटे माटो हामीकहाँ नै रहन्थ्यो । अनि बङ्गालको खाडीमा हरेक वर्ष नयाँनयाँ पहाडजन्मने काम कम हुन्थ्यो । यो पक्का हो ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रन्जु हाँसी । उसले ओठ लेप्प्राउँदै भनी- “हावादारी क्रा !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपेशले थप्यो- “क्या फ्यान्टास्टिक आइडिया ! कहाँबाट आयो यो आइडिया ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“इन्डियातिर बगिरहेका नदीहरू र फिटकीरीले धमिलो पानीलाई सङ्ल्याएकोदेखेर ममा यस्तो बिचार आयो ।&amp;quot; श्यामले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“असम्भव !” राजेशले भन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“सम्भव !” श्यामले अठोटका साथ भन्यो- “प्राविधिक रूपले यो सम्भव छ ।”सबैले बुझेभौँ टाउको हल्लाए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अहिले भने रन्जुलाई पनि पत्यार लागेछ क्यार ! लाजले ओठ टोक्न थाली ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेला लागेको लगत्तै विद्यालयको वार्षिकोत्सव सुरु भयो । सो उपलक्ष्यमा विभिन्नकार्यक्रम सञ्चालन हुन थाले । तीमध्ये हाजिरीजवाफ प्रतियोगिता पनि एक थियो ।योथाहा पाएर हितेश र श्यामले निम्तअनुसार आआफ्नो टिमको नाम दर्ता गराए-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भानु सदन हितेश सोहन, जोहन, सीताभानु वा देवकोटा सदन कुतले जित्छ भनेर व्यापक पूर्वानुमान चल्न थाल्यो ।- भानु सदनले जित्छ । हितेश पढैया छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
-काँटाको टक्कर हुन्छ । दुवै बराबर छन्‌ ।-नपत्याउने खोलाले बगाउला नि !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यी कुनै पक्ष कमजोर थिएनन्‌ । यस्ता अनुमानले गर्दा यस कार्यक्रमप्रति शिक्षकर विद्यार्थी सबैको आकर्षण र चासो बढ्यो । सहभागीमा जाँगर थपियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हितेशहरू सामान्य ज्ञानका पुस्तकहरू खोजेर रट्न थाले । श्यामहरू पढ्नुकासाथसाथै छलफल र सोधपुछ गर्न थाले ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रतियोगिताको दिन । प्रतियोगितासम्बन्धी नियम सुनाएपछि प्रतियोगिता सुरु भयो ।प्रतियोगितामा सामान्य ज्ञानका विभिन्न प्रश्नहरू सोधिए । एक-दुई प्रश्न मात्रपाठ्यपुस्तकभित्रबाट परेका थिए । समाज र साथीहरूसित घुलमिल हुने, खेलकुदमाभाग लिने, समाचार सुन्ने, मेलाप्रदर्शनी र शैक्षिक भ्रमण, आमसभा, कविगोष्ठी आदिमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२६&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सहभागी हुने, साथीभाइसित बसेर छलफल गर्ने, नबुझेका कुरा घोक्नुभन्दा सोधेरबुझ्नपट्टि लाग्ने श्यामको बानीले गर्दा श्यामले हरेक प्रश्नको फटाफट सही उत्तर दिनसक्यो । अन्तमा अत्यधिक अङ्क ल्याई देवकोटा सदन विजयी भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हितेशको शिर झुक्यो । श्यामको टिमलाई उसले अबिर लगाइदियो र बधाई दिँदैभन्यो- “श्याम, अब म पनि शैक्षिक भ्रमण, मेला-प्रदर्शनीमा अवश्य जान्छु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्याम मुसुक्क हाँस्यो । भानु सदन र देवकोटा सदन दुवैतर्फका सहभागी हातेमालोगरी उभिए र फोटो खिचाए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फलको राजा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
असल र अनूप गफ गर्दागर्दै बगैँचामा पुगे । त्यहाँ फूलहरू पनि मुन्टो हल्लाईहल्लाईकुरा गर्दै थिए । गुलाफको हाँगा झुक्यो र पहिले असल अनि अनूपलाई फूलको भुप्पालेम्वाइँ खायो । गुलाफको बास्ना उनीहरूलाई खुप मन प-्यो । उनीहरू लद्‌ठ परे र त्यहीँथपक्क बसे । एकै छिनपछि त उनीहरूले फूलका क्रा बुझ्न थाले ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आज म हामीले फूलको राजा कसरी चुन्यौँ त्यो सुनाउँछु&amp;quot; भनी गुलमोहरलेभन्यो । “हुन्छ हुन्छ, सुनाउनुहोस्‌” भनी बगैँचामा रहेका अरू फूलहरूले भने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कथा सुनाउने पारामा गुलमोहरले भन्यो- एक पटक फूलहरूको सम्मेलन भयो ।तीनतिर हरिया पहाड र उत्तरतर्फ हिमालले घेरेको नदीनाला र तालैताल भएकोरमाइलो ठाउँ पोखरा सम्मेलनका लागि छानिएको थियो । सम्मेलनमा गुराँस, सयपत्री,लालुपाते, गुलाफ, बाञ्हमासे, कमल, बुकी, गुहँली, जाही, जुही, बेली, चमेली, गोदावरी,सूर्यमुखी, मेरीगोल्ड, लाउरे, लिली, मखमली, सुपारे, असारे, बान्हबजे, बेगनबेलियाआदि हजारौँ फूल भेला भएका थिए । म पनि त्यहाँ पुगेको थिएँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलहरूको जमघट देखेर मानिसहरू रमाइरहेका थिए । अतिथिका रूपमा आएकाचराचुरुङ्गीहरू पुतलीहरू, भमरा, मौरी र गाइनेकीराहरू पनि त्यहीँ रमाउँदै थिए ।पोखरा यी सबैको उपस्थितिले झन्‌ झिलिमिली र रमाइलो भएको थियो । रातकोअँधैरीमा आकाश र धर्ती दुवै विवाहका बेला सजाएको घरजस्तै देखिएका थिए ।आफूलाई खुपै राम्रो छु भन्ने फूलहरू पनि त्यो देखेर भित्रभित्रै लनाइरहेका थिए । मतझन्‌ अक्क न बक्क भइसकेको थिएँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्मेलनको पहिलो सत्रमा उद्घाटन कार्यक्रम थियो । यस सत्रमा फूलको हकहितकाबारेमा छलफल भयो । आफूलाई कसरी जगाउने र जोगाउने, मान्छे, पुतली र अरूलाईकसरी लोभ्याउने, वनकौँचादेखि बैठक, बार्दली, कोठाचोटा र मठमन्दिरसम्म फूलकोराज कसरी फैलाउनेजस्ता विषयमा खुपै छलफल भयो । अतिथिहरूले सफलताकोशुभकामना प्रकट गरे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रह&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दोस्रो बन्द सत्रमा बिभिन्न प्रस्ताव प्रस्तुत भए । लामो छलफलपश्चात्‌ तिनलाईपारित गरियो । बन्द सत्रकै अर्को महत्त्वपूर्ण काम थियो- नेता छान्ने काम ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उद्घोषकको काम सुनगाभाले जिम्मा लिएको थियो । उसले कदुसको हाँगाबाटबास्ना छदै भन्यो- “अब राजा छान्ने काम सुरु हुन्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुनगाभाका कुराले सबका कान ठाडा भए । सबै टाठा भए । निदाएका जागे ।टाठाबाठाहरू नेता हुन तँछाडमछाड गर्न थाले ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूर्यमुखीले भन्यौ “म राजा हुन्छु । म फूल पनि, तेल पनि । त्यसैले मैले राजाहुन पाउनुपर्छ । सबैसँग मलाई राजा छान्न आग्रह गर्दछु ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गुराँसले भन्यो- “मलाई राजा चुन्नुहोस्‌ । म त भन्‌ नेपालको राष्ट्रिय फूल नै हुँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के कोर ७.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म फुल्दा सारा पहाडै ढकमक्क फुलेको देखिन्छ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कमलले पोखरीबाट टाउको हल्लाउँदै भन्यो- “दाजुभाइ तथा दिदीबहिनीहरू !राजा म पो हुनुपर्छ । म एकै ठाउँमा सीमित छैन । पहाडदेखि तराईसम्म जहाँजहाँजलाशय, पोखरी छन्‌ त्यहाँत्यहाँ म फुल्छु म फैलिएको छु । मेरो फूल, फल, जरा, डाँठसबै मानिस र अन्य प्राणीलाई उपयोगी छन्‌ । त्यसैले मलाई राजा चुन्नुहोस्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गुलाफले बास्ना चलाउँदै भन्यो- “सुन्नुहोस्‌ राजा भनेको प्रेम हो, दया हो, दान होर दण्ड पनि हो । ममा यी सबै छन्‌ । मलाई सबै प्रेम गर्छन्‌, माया गर्छन्‌ । मइच्छुकहरूलाई दान गर्छु सोभझासाभझा दुःखीलाई दया गर्छु तर नियमसित नचल्ने,अनुशासन गुमाउनेलाई तीखा-अङ्कुसे काँढाले चिथर्छु पनि । म व्यापक पनि छु । त्यसैलेमलाई राजा छान्नुहोस्‌ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सयपत्री, पारिजात, लिली, गोदावरी, लालुपातेहरूले पनि आफ्‌ राजा छानिनचाहेका थिए, तर सरर्यमुखी, गुराँस, कमल र गुलाफले आआफ्नो इच्छा र योग्यताबताइसकेकाले उनीहरू चुप लागे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फूलहरू कोही कतै र कोही कतै लागे । हेदहिदै सम्मेलनमा फूलका चार समूहभए । सबै आआफ्ना अडानमा देखिए । मतदानै गर्नुपर्ने मान्छेको रोग फूलमा पनिसल्कन थाल्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म केही नबोली हेरिरहेको थिएँ, सुनिरहेको थिएँ । मजस्तै सबैका क्रा सुन्दै गमखाएर बसिरहेको लालुपातेले आफ्ना राताराता पत्ती हल्लाउँदै भन्यो- “म राजा हुनखोजेको छैन (सबै हाँसे) । सुन्नुहोस्‌, हाम्रो लक्ष्य एकातिर छ, त्यसलाई चटक्क छाडेरएउटा नेता छान्ने काममा नबाझौँ । हामी त्यस्तो फूललाई नेता छानौँ, जसले हाम्रो लक्ष्यपूरा गर्न सकोस्‌, जसले सबैको मन जित्न सकोस्‌, जो संसारैभर पुगेको होस्‌, जसका&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३0&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धेरैभन्दा धेरै प्रजाति होङन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लालुपातेका कुरा नसकिँदै पारिजातले बीचैमा भन्यो- “एकदम राम्रो क्रा, तरत्यस्तो फूल कृत होला ? थाहा पाउँ न !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गुराँस गम्भीर भएर अघि सन्यो । अरूहरू जिल्ल परे, आश्चर्यमा परे । मैले पनिकेही बुझन सकेको थिइनँ । गुराँसले हाँगा हल्लाएर फूल बर्साउँदै भन्यो- “धन्दा नमान्नुहोस्‌ ।म आफ्नो नाम फिर्ता लिन्छु । त्यस्तो फूल हो- गुलाफ ! हामी सबै मिलेर गुलाफलाईराजा छानौँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गुलाफको नाम आउनेबित्तिकै सबैले छुनुमुनु टाउको हल्लाएर बास्ना छदै समर्थनजनाए । कमल र सरर्यमुखीले पनि आआफ्नो नाम फिर्ता लिँदै समर्थन जनाए । उनीहरूलेभने- “ठीक हो । हामीभन्दा गुलाफ नै नेता हुनलायक छ । त्यसैले हामी पनि गुलाफलाईनेता मान्छौँ ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गुलाफ मक्ख पन्यो । त्यसै राम्रो, झन्‌ राम्रो देखियो । उसले सबैतिर गुलाफजल&#039;र पराग छदै भन्यो- “मलाई सबै फूलले सर्वसम्मतिले नेता चुनेकोमा म सबैलाई धन्यवाददिन चाहन्छु । म आफ्नो शक्तिले भ्याएसम्म फूलको हकहित, इज्जत, मानप्रतिष्ठाबढाउनमा सधैँ लागिरहनेछु । धन्यवाद !”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबै फूलहरू खुसीले नाच्न-गाउन र रमाउन थाले । म पनि खुप नाचेँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आजसम्म पनि गुलाफ नै फूलहरूको राजा रहिआएको छ । गुलाफलाई सबैलेराजा मानेका छन्‌ । गुलाफ सबै ठाउँमा सबै रङमा पाइन्छ । यी यहाँ पनि छ ।गुलाफतिर हेरेर गुलमोहरले भन्यो- कसो गुलाफ राजा !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गुलाफले भन्यो- “ठीक भन्यौ काका, म त सधैँ पुष्पबन्धुहरूप्रति आभारी छु ।”कुरा सुनिरहेका असल र अन्‌पले भने- “गुलाफ राजा- जिन्दावाद !”उनीहरूको नारा सुनेर फूलहरू पनि रमाए । सबै फूलले एकैचोटि बास्ना छरे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
. बूढाको अर्ती&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
. भकूल्लेको साथी को ? (बालकथा). भाँडाकुटी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
. भालुलाई पाठ (बालकथा)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
, भूतको कथा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
. भूतसँग जम्काभेट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
. मकमक घुर्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
. मकैको रोटी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- मनु र भँगेरा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
. मन्टुकी बज्यैको कथाको पेटारो. मानिस नै देवता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
. मामाघरको हजुरबा (बालकथा). माहरीको पुस्तकालय&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
. मितेरी गाउँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७७. मेरो सानो घोडा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
. मेरो मुरली&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
. मोती र गुलाब&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
. रङ्ग्गीचङ्गगी कथाहरू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
. रमाइला नानी (भाग १, २, ३). रामेको कथा (बाल-उपन्यास). राम्रो काम&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
. राहुलका माछा र सुगा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
. रूपैयाँ फल्ने रूख&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
. रि&amp;quot; का केही कथा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
5७.. लुकामारी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
. ल्वाँदै र गरबाँदै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
. लोखर्केको बिहे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
. विज्ञानका ताराहरू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
. विदेशी बगैंचाका चार थुँगा फूल. विदेशी बगैँचाका पाँच थुँगा फूल. विदेशी बगैंँचाका छ थुँगा फूल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- शोकाकूल ढुङ्गाहरू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- श्रीकृ्‌ष्णलीला&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
।, सगुन र सडक (बालकथा)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
. सन्तु र सुगा (बालकथा)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
. सर्वश्रेष्ठ प्राणी को ? (बालकयासङ्ग्रह)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लाटोकोसेरोलाई लड्डू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१००.१०१.१०२.१०३.१०४.१०५.१०६.१०७.१०८.१०९.११०.१११.११२.११३.११४.१११.११६.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११७.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
११०.११९.१२०.१२१.१२२.१२३.१२४,१२५.१२६.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१२७.१२०.१२९.१३०.१२१.१३२.१३३.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साथीसँग बनभोज&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सारङ्गी (बालकविता)सीमाको सुगा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुनचाँदीको बालक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुनकेस्रा (बालकथा सङ्कलन)सुनौला तीन कुरा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुनाखरी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुनको छाती&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुरीको साइकल (बालकथा)सुशीला र सगुन (बालकथा)सेती परी काली परी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सूर्यमुखी फूल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सोझी नानू छद्दू राजु (बालकथा)स्वार्थी ब्वाँसो (बालकथासङ्ग्रह)हराएकी छोरी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हरियाली (बाल-उपन्यास)हान्स क्रिस्चियन एन्डरसन रउनका परीकथाहरू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाम्रा केही प्रसिद्ध साहित्यकार(भाग १, २)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिउँकान्छा (बालकथा)हिमाली डाँफे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हीराको टुक्रा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हीरा र मोती&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कसले के बुझ्यो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छाको मोटर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किसान र भालु&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गीता पापा (पौराणिक बालकाव्य)घामको घर जूनको छानो(बालगीतमाला)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चराहरुको पर्यटन मेलाझलमल्ल घाम (बालकथासङ्ग्रह)झिलिमिली तारा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दानवीर स्कूल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लालीगुराँस&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साथी-साथी (बौलकथासङ्ग्रह)सुन्दर पार्कका सुन्दर फूलहरू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
।५।८५८०५ ४५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७१60&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
/४०४/४.००५४०।८०|०००.०/८/४////,0[८।१८|0०41.0/4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाम्रा नयाँ प्रकाशनहरू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1581 १1133-॥ ३ 1995911, 2118 [२३ 11917 |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[॥-पमप-].2100 211०९: रर. 50.00 १9॥789११३ ॥&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=Main_Page&amp;diff=90</id>
		<title>Main Page</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=Main_Page&amp;diff=90"/>
		<updated>2024-06-14T14:03:19Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: /* Step 1:  Scan and OCR */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;strong&amp;gt;Welcome to Nepali Kitab Editing Team.&amp;lt;/strong&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
This website is a sub-website of nepalikitab.org. Here we convert old books into Unicode text format. It is a collective effort by volunteers around the world. If you are also interested, please join the team.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
We keep here the books generated after scanning and extracting texts with OCR. It contains many errors. Our goal is to remove the errors.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==How to edit==&lt;br /&gt;
[[File:Editor-timeline.png|thumb]]&lt;br /&gt;
1. Make an account or log in.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2. Select the book of your interest.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. Click edit&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
4. Edit and clean up the errors and book format. If you are familiar with wiki syntax, you can edit the source too.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
5. Save time to time while editing&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
For details about formatting text, refer to: https://www.mediawiki.org/wiki/Help:Formatting&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 1:  Scan and OCR ==&lt;br /&gt;
*[[रामायण]] भानुभक्त आचार्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* [[तरुण तपसी (नव्यकाव्य)]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[आदिकवि भानुभक्त (पटकथा)]] यादब खरेल&lt;br /&gt;
* [[इतिश्री (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[केही धार्मिक तथा साँस्कृतिक सम्पदाहरू (केही नमुना कलाकृतिहरू)]] सत्यमोहन जोशी&lt;br /&gt;
* [[रमाइला गाउँखाने कथा]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[दसैँ, पिङ र हात्ती (बालकथा-सङ्ग्रह)]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[८० दिनमा विश्‍व भ्रमण]] जुल्स वर्न,गोरखबहादुर सिंह&lt;br /&gt;
* [[बालभाका - १ (बालकविता सङ्ग्रह)]] उद्धवप्रसाद प्याकुरेल&lt;br /&gt;
* [[ताल (उपन्यास)]] यासुनारी कावाबाता&lt;br /&gt;
* [[चतुरेको चर्तिकला (कथा सङ्ग्रह)]] गोरखबहादुर सिंह&lt;br /&gt;
* [[ठूलो फुल (A Big Egg)]] Roma Pradhan, Shanta Das Manandhar&lt;br /&gt;
* [[आखिरमा टोम्मीको टोलीले जिती छाड्यो]] क्रिस्टिन स्टोन,शान्तदास मानन्धर&lt;br /&gt;
* [[शिक्षक निर्देशिका मेरो सामाजिक अध्ययन तथा सिर्जनात्मक कला कक्षा ५ (पुरानो संस्करण)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[जय भुँडी (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[मुकुन्द इन्दिरा (नाटक)]] बालकृष्ण सम&lt;br /&gt;
* [[खाल्डामा परेको भकुन्डो]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[जे छोए पनि सुन]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[खानामा पाइने पोषणहरू]] नताशा भिजकारा&lt;br /&gt;
* [[अन्तिम निम्तो]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[सूगवा]] रोशनी चौधरी&lt;br /&gt;
* [[भीमसेन थापा (ऐतिहासिक खण्डकाव्य)]] सिद्धिचरण श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[ऋतुविचार (खण्‍डकाव्य)]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[अनिवार्य नेपाली (१०६) - माध्यमिक शिक्षा परिक्षाको प्रश्न तथा उत्तरकुञ्जिका २०७४]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[छन्दका १०१ कविता]] (सङ्कलन) कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[गणित प्राविधिक शब्दकोश]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[उज्यालोको खोजीमा (उपन्यास)]] हरिहर खनाल&lt;br /&gt;
* [[सपनाको देशमा]] चन्द्रकान्त आचार्य&lt;br /&gt;
* [[महिला लक्षित शिक्षक सेवा आयोग तयारी अध्ययन सामग्री]] विष्णुप्रसाद अधिकारी&lt;br /&gt;
* [[शिक्षक पेसागत विकास तालिम (तालिम पाठ्यक्रम)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[हाम्रा लोकबाजाहरू (बालबोध - ५१)]] रामप्रसाद कँडेल&lt;br /&gt;
* [[पर्दा, समय र मान्छेहरू (कथासङ्‍ग्रह)]] झमक घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[काउकुती (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[विदुर नीति Vidura Niti [Sanskrit-English]] (Extracted From) Mahabharata [महाभारत]&lt;br /&gt;
* [[जंगबहादुरको बेलाइती कापी]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[कति वटा रोटी]] शिल्पी प्रधान&lt;br /&gt;
* [[विश्वका प्रमुख सभ्यता तथा संस्कृति (बाल ज्ञानकोश - ३)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अस्माकम् संस्कृतम् - कक्षा १]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[प्रारम्भिक संस्कृत व्याकरण र रचना]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[गोरक्ष-साह-वंश (ऐतिहासिकं महाकाव्यम्)]] हरिप्रसाद शर्मा&lt;br /&gt;
* [[२०२ ओटा ठट्टा]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[धुमधामको घुमघाम (भक्तप्रसाद भ्यागुताको नेपालयात्रा)]] कनकमणि दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[महिलाका लागि डाक्टर नभएमा]] -&lt;br /&gt;
* [[दस औतार (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[A Perfect Match]] Ramendra Kumar&lt;br /&gt;
* [[मधुपर्क (वर्ष ४७, अंक ४, २०७१ भदौ)]] -&lt;br /&gt;
* [[सौगात (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[एक घर एक रोजगार (प्रयागदत्त तेवारीको कृषिकथा)]] मिलन बगाले&lt;br /&gt;
* [[रवीन्द्रनाथका नाटकहरू]] -&lt;br /&gt;
* [[पेसा, व्यवसाय र प्रविधि]] -&lt;br /&gt;
* [[मामा माइजु]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[म को हुँ]] पेमा डोल्मा लामा&lt;br /&gt;
* [[चनाचटपटे (बालकविता-सङ्ग्रह)]] बूँद राना&lt;br /&gt;
* [[आवाज (सामाजिक उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[स्पष्टीकरण (कथासङ्ग्रह)]] हरिभक्त कटुवाल&lt;br /&gt;
* [[स्वास्थ्य, जनसङ्ख्या तथा वातावरण शिक्षा स्वाध्ययन सामग्री (२०६७)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[दशैँको दक्षिणा (बालउपन्यास)]] गङ्गा पौडेल&lt;br /&gt;
* [[चार आर्य-सत्य (बुद्ध-शिक्षाका चार स्तम्भ)]] दोलेन्द्ररत्न शाक्य&lt;br /&gt;
* [[विजय चालिसेका बालकथाहरू]] विजय चालिसे&lt;br /&gt;
* [[सिर्जनशील विद्यालय]] अर्जुन श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[अभिभावकको सहयोगमा बालबालिकालाई घरमा नै गराउन सकिने सिकाइ क्रियाकलापहरू (कक्षा १)]] -&lt;br /&gt;
* [[दर्शन परिचय (विश्वका दर्शन र कला साहित्यिक बादहरू)]] परशुराम कोइराला&lt;br /&gt;
* [[खोज (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[अनिवार्य सामाजिक अध्ययन (१२३) - माध्यमिक शिक्षा परिक्षाको प्रश्न तथा उत्तरकुञ्जिका २०७५]] -&lt;br /&gt;
* [[बिहानीको घामसँग]] तारा पुन, शान्तदास मानन्धर&lt;br /&gt;
* [[एकादेशमा (बालकथाहरूको सँगालो)]] उषा दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[इतिहासका विम्बहरू]] पूर्णचन्द्र घिमिरे, रमेशचन्द्र घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[पन्ध्रौं योजना (२०७६७७-२०८०८१)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[नेपालको शाह तथा राणा वंशावली]] विष्णु प्रसाद श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[Aaloo-Maaloo-Kaaloo]] Vinita Krishna&lt;br /&gt;
* [[परित्याग (उपन्यास)]] माधव खनाल&lt;br /&gt;
* [[अमेरिका (उपन्यास)]] गंगा लिगल&lt;br /&gt;
* [[उखान मिलेन !]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[राष्ट्रकवि माधव घिमिरे (जीवनी, व्यक्तित्व र कृतित्वको सङ्‍क्षिप्त रेखाङ्‍कन)]] शैलेन्दुप्रकाश नेपाल&lt;br /&gt;
* [[केहि गुणकारी बोटबिरूवाहरू (बालबोध - ४१)]] डा. हरिप्रसाद&lt;br /&gt;
* [[दिवास्वप्न]] गिजुभाई, शरच्चन्द्र वस्ती&lt;br /&gt;
* [[संस्कृत, प्राकृत र नेपालीका सन्धिनियम]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[शिक्षाका ती दिन]] पुष्पराज पौडेल&lt;br /&gt;
* [[मपाईं (निबन्ध)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[Autobiography of a YOGI]] Paramhansa Yogananda&lt;br /&gt;
* [[ताराबाजी लै! लै!!]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[विश्वास (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[Akbar and Birbal Moral Stories]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[बुद्धवादका तीन आयाम]] पशुपति घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[करेसाबारीका जडिबुटीहरू]] केदार श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[काठमाडौं उपत्यका खुलास्थलहरू सम्बन्धी मानचित्र पुस्तक २०७१]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अन्ताक्षरी खेल]] ध्रुव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[साइबर बालकथा]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[कलेजी थाल]] ध्रुव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[कत्ति धुनु गधाहरूलाई (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] लक्ष्मण गाम्नागे&lt;br /&gt;
* [[गौरी (शोककाव्य)]] माधव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[आमाको माया]] रमेश चन्द्र अधिकारी&lt;br /&gt;
* [[Natural Treasures of Nepal]] Nepal Tourism Board&lt;br /&gt;
* [[नारीस्वर (महाकवि देवकोटा विशेष) - २०६६ असोज]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[चार गजलकारका उत्कृष्ट गजल (गजलसङ्ग्रह)]] मनु ब्राजाकी&lt;br /&gt;
* [[स्यालको जुक्ती]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[स्थानीय पाठ्यक्रम विकास तथा कार्यान्वयन मार्गदर्शन (मातृभाषा सहित) २०७६]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[बाँदर बन्ने रहर (बालकथा सङ्ग्रह)]] गोपीकृष्ण ढुङ्गाना&lt;br /&gt;
* [[डाढो (हास्यव्यङ्ग्यहरू)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[मध्यचन्द्रिका (नेपाली भाषाको मझौला व्याकरण)]] सोमनाथ शर्मा&lt;br /&gt;
* [[नेपाली क्रान्ति-कथा]] फणीश्वरनाथ रेणु&lt;br /&gt;
* [[डायना (महाकाव्य)]] शैलेन्दुप्रकाश नेपाल&lt;br /&gt;
* [[शङ्खे र फट्याङ्ग्रो]] अनन्तप्रसाद वाग्ले&lt;br /&gt;
* [[मोहिनीले खोसेको अमृतकलश]] अमर निराकार राई&lt;br /&gt;
* [[हिन्दू-धर्म के हो]] महात्मा गाँधी&lt;br /&gt;
* [[बालबालिकामा पढ्ने बानीको विकास]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[The Last Page of My Poem (मेरो कविताको अन्तिम पृष्ठ)]] Rajeshwor Karki&lt;br /&gt;
* [[जय भोलि !]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[संस्कृत व्याकरणको रूपरेखा]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[घरबारी बगैंचा]] बोल बहादुर थापा&lt;br /&gt;
* [[नबिर्सने यात्रा (यात्रा-कथा)]] समीर नेपाल&lt;br /&gt;
* [[समाज परिवर्तनमा संस्कृतिकर्मी]] विजय सुब्बा&lt;br /&gt;
* [[मेवालाल (बालकथा सङ्ग्रह)]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[A Helping Hand]] Payal Dhar&lt;br /&gt;
* [[आमा (कविता सङ्ग्रह)]] भक्ति दाहाल &#039;विष्फोट&#039;&lt;br /&gt;
* [[विज्ञान तथा वातावरण - कक्षा ८ (पुरानो संस्करण)]] गोपीचन्द्र पौडेल&lt;br /&gt;
* [[चप्पल]] अर्हन्त श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[मात्राहरू]] हरिहर लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[दोस्रो भाषाको रूपमा नेपाली भाषा]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अब्राहम लिंकन (१८०९-१८६५)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[घरभेटी भाउजू (कथासङ्ग्रह)]] कृष्णादेवी शर्मा&lt;br /&gt;
* [[Agreeing and Disagreeing - English Grade 10]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[शकुन्तला नाटक]] शम्भुप्रसाद ढुंग्याल&lt;br /&gt;
* [[Chunu and Munu Read]] Shanta Das Manandhar, Stephanie Wei&lt;br /&gt;
* [[अब खेल खेल्ने!]] शिल्पी प्रधान&lt;br /&gt;
* [[जनावरहरूको सभा]] ज्ञाननिष्ठ ज्ञवाली&lt;br /&gt;
* [[विश्वप्रसिद्ध पैंतिस साहित्यकार]] प्रभात सापकोटा&lt;br /&gt;
* [[कसिङ्गर (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[पंचतन्त्र कथासंग्रह]] &lt;br /&gt;
* [[अक्षर (बालकथा)]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 2: Title and heading corrections completed ==&lt;br /&gt;
* [[९७ साल]] आनन्ददेव भट्ट&lt;br /&gt;
* [[गलबन्दी (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 2&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 3: Text correction completed ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 3&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
==Step 4: Proof reading completed==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 4&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[अनौठो फल]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==Step 5: Finished books==&lt;br /&gt;
पुरा भएका किताब&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 5&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=Main_Page&amp;diff=89</id>
		<title>Main Page</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=Main_Page&amp;diff=89"/>
		<updated>2024-06-14T14:01:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: /* Step 1:  Scan and OCR */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;strong&amp;gt;Welcome to Nepali Kitab Editing Team.&amp;lt;/strong&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
This website is a sub-website of nepalikitab.org. Here we convert old books into Unicode text format. It is a collective effort by volunteers around the world. If you are also interested, please join the team.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
We keep here the books generated after scanning and extracting texts with OCR. It contains many errors. Our goal is to remove the errors.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==How to edit==&lt;br /&gt;
[[File:Editor-timeline.png|thumb]]&lt;br /&gt;
1. Make an account or log in.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2. Select the book of your interest.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. Click edit&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
4. Edit and clean up the errors and book format. If you are familiar with wiki syntax, you can edit the source too.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
5. Save time to time while editing&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
For details about formatting text, refer to: https://www.mediawiki.org/wiki/Help:Formatting&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 1:  Scan and OCR ==&lt;br /&gt;
*[[रामायण]] भानुभक्त आचार्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* [[तरुण तपसी (नव्यकाव्य)]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[आदिकवि भानुभक्त (पटकथा)]] यादब खरेल&lt;br /&gt;
* [[इतिश्री (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[रूखको रूप]] रिन्छेन्ला लामा&lt;br /&gt;
* [[केही धार्मिक तथा साँस्कृतिक सम्पदाहरू (केही नमुना कलाकृतिहरू)]] सत्यमोहन जोशी&lt;br /&gt;
* [[रमाइला गाउँखाने कथा]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[दसैँ, पिङ र हात्ती (बालकथा-सङ्ग्रह)]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[८० दिनमा विश्‍व भ्रमण]] जुल्स वर्न,गोरखबहादुर सिंह&lt;br /&gt;
* [[बालभाका - १ (बालकविता सङ्ग्रह)]] उद्धवप्रसाद प्याकुरेल&lt;br /&gt;
* [[ताल (उपन्यास)]] यासुनारी कावाबाता&lt;br /&gt;
* [[चतुरेको चर्तिकला (कथा सङ्ग्रह)]] गोरखबहादुर सिंह&lt;br /&gt;
* [[ठूलो फुल (A Big Egg)]] Roma Pradhan, Shanta Das Manandhar&lt;br /&gt;
* [[आखिरमा टोम्मीको टोलीले जिती छाड्यो]] क्रिस्टिन स्टोन,शान्तदास मानन्धर&lt;br /&gt;
* [[शिक्षक निर्देशिका मेरो सामाजिक अध्ययन तथा सिर्जनात्मक कला कक्षा ५ (पुरानो संस्करण)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[जय भुँडी (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[मुकुन्द इन्दिरा (नाटक)]] बालकृष्ण सम&lt;br /&gt;
* [[खाल्डामा परेको भकुन्डो]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[जे छोए पनि सुन]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[खानामा पाइने पोषणहरू]] नताशा भिजकारा&lt;br /&gt;
* [[अन्तिम निम्तो]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[सूगवा]] रोशनी चौधरी&lt;br /&gt;
* [[भीमसेन थापा (ऐतिहासिक खण्डकाव्य)]] सिद्धिचरण श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[ऋतुविचार (खण्‍डकाव्य)]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[अनिवार्य नेपाली (१०६) - माध्यमिक शिक्षा परिक्षाको प्रश्न तथा उत्तरकुञ्जिका २०७४]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[छन्दका १०१ कविता]] (सङ्कलन) कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[गणित प्राविधिक शब्दकोश]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[उज्यालोको खोजीमा (उपन्यास)]] हरिहर खनाल&lt;br /&gt;
* [[सपनाको देशमा]] चन्द्रकान्त आचार्य&lt;br /&gt;
* [[महिला लक्षित शिक्षक सेवा आयोग तयारी अध्ययन सामग्री]] विष्णुप्रसाद अधिकारी&lt;br /&gt;
* [[शिक्षक पेसागत विकास तालिम (तालिम पाठ्यक्रम)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[हाम्रा लोकबाजाहरू (बालबोध - ५१)]] रामप्रसाद कँडेल&lt;br /&gt;
* [[पर्दा, समय र मान्छेहरू (कथासङ्‍ग्रह)]] झमक घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[काउकुती (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[विदुर नीति Vidura Niti [Sanskrit-English]] (Extracted From) Mahabharata [महाभारत]&lt;br /&gt;
* [[जंगबहादुरको बेलाइती कापी]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[कति वटा रोटी]] शिल्पी प्रधान&lt;br /&gt;
* [[विश्वका प्रमुख सभ्यता तथा संस्कृति (बाल ज्ञानकोश - ३)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अस्माकम् संस्कृतम् - कक्षा १]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[प्रारम्भिक संस्कृत व्याकरण र रचना]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[गोरक्ष-साह-वंश (ऐतिहासिकं महाकाव्यम्)]] हरिप्रसाद शर्मा&lt;br /&gt;
* [[२०२ ओटा ठट्टा]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[धुमधामको घुमघाम (भक्तप्रसाद भ्यागुताको नेपालयात्रा)]] कनकमणि दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[महिलाका लागि डाक्टर नभएमा]] -&lt;br /&gt;
* [[दस औतार (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[A Perfect Match]] Ramendra Kumar&lt;br /&gt;
* [[मधुपर्क (वर्ष ४७, अंक ४, २०७१ भदौ)]] -&lt;br /&gt;
* [[सौगात (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[एक घर एक रोजगार (प्रयागदत्त तेवारीको कृषिकथा)]] मिलन बगाले&lt;br /&gt;
* [[रवीन्द्रनाथका नाटकहरू]] -&lt;br /&gt;
* [[पेसा, व्यवसाय र प्रविधि]] -&lt;br /&gt;
* [[मामा माइजु]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[म को हुँ]] पेमा डोल्मा लामा&lt;br /&gt;
* [[चनाचटपटे (बालकविता-सङ्ग्रह)]] बूँद राना&lt;br /&gt;
* [[आवाज (सामाजिक उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[स्पष्टीकरण (कथासङ्ग्रह)]] हरिभक्त कटुवाल&lt;br /&gt;
* [[स्वास्थ्य, जनसङ्ख्या तथा वातावरण शिक्षा स्वाध्ययन सामग्री (२०६७)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[दशैँको दक्षिणा (बालउपन्यास)]] गङ्गा पौडेल&lt;br /&gt;
* [[चार आर्य-सत्य (बुद्ध-शिक्षाका चार स्तम्भ)]] दोलेन्द्ररत्न शाक्य&lt;br /&gt;
* [[विजय चालिसेका बालकथाहरू]] विजय चालिसे&lt;br /&gt;
* [[सिर्जनशील विद्यालय]] अर्जुन श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[अभिभावकको सहयोगमा बालबालिकालाई घरमा नै गराउन सकिने सिकाइ क्रियाकलापहरू (कक्षा १)]] -&lt;br /&gt;
* [[दर्शन परिचय (विश्वका दर्शन र कला साहित्यिक बादहरू)]] परशुराम कोइराला&lt;br /&gt;
* [[खोज (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[अनिवार्य सामाजिक अध्ययन (१२३) - माध्यमिक शिक्षा परिक्षाको प्रश्न तथा उत्तरकुञ्जिका २०७५]] -&lt;br /&gt;
* [[बिहानीको घामसँग]] तारा पुन, शान्तदास मानन्धर&lt;br /&gt;
* [[एकादेशमा (बालकथाहरूको सँगालो)]] उषा दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[इतिहासका विम्बहरू]] पूर्णचन्द्र घिमिरे, रमेशचन्द्र घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[पन्ध्रौं योजना (२०७६७७-२०८०८१)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[नेपालको शाह तथा राणा वंशावली]] विष्णु प्रसाद श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[Aaloo-Maaloo-Kaaloo]] Vinita Krishna&lt;br /&gt;
* [[परित्याग (उपन्यास)]] माधव खनाल&lt;br /&gt;
* [[अमेरिका (उपन्यास)]] गंगा लिगल&lt;br /&gt;
* [[उखान मिलेन !]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[राष्ट्रकवि माधव घिमिरे (जीवनी, व्यक्तित्व र कृतित्वको सङ्‍क्षिप्त रेखाङ्‍कन)]] शैलेन्दुप्रकाश नेपाल&lt;br /&gt;
* [[केहि गुणकारी बोटबिरूवाहरू (बालबोध - ४१)]] डा. हरिप्रसाद&lt;br /&gt;
* [[दिवास्वप्न]] गिजुभाई, शरच्चन्द्र वस्ती&lt;br /&gt;
* [[संस्कृत, प्राकृत र नेपालीका सन्धिनियम]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[शिक्षाका ती दिन]] पुष्पराज पौडेल&lt;br /&gt;
* [[मपाईं (निबन्ध)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[Autobiography of a YOGI]] Paramhansa Yogananda&lt;br /&gt;
* [[ताराबाजी लै! लै!!]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[विश्वास (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[Akbar and Birbal Moral Stories]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[बुद्धवादका तीन आयाम]] पशुपति घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[करेसाबारीका जडिबुटीहरू]] केदार श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[काठमाडौं उपत्यका खुलास्थलहरू सम्बन्धी मानचित्र पुस्तक २०७१]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अन्ताक्षरी खेल]] ध्रुव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[साइबर बालकथा]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[कलेजी थाल]] ध्रुव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[कत्ति धुनु गधाहरूलाई (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] लक्ष्मण गाम्नागे&lt;br /&gt;
* [[गौरी (शोककाव्य)]] माधव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[आमाको माया]] रमेश चन्द्र अधिकारी&lt;br /&gt;
* [[Natural Treasures of Nepal]] Nepal Tourism Board&lt;br /&gt;
* [[नारीस्वर (महाकवि देवकोटा विशेष) - २०६६ असोज]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[चार गजलकारका उत्कृष्ट गजल (गजलसङ्ग्रह)]] मनु ब्राजाकी&lt;br /&gt;
* [[स्यालको जुक्ती]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[स्थानीय पाठ्यक्रम विकास तथा कार्यान्वयन मार्गदर्शन (मातृभाषा सहित) २०७६]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[बाँदर बन्ने रहर (बालकथा सङ्ग्रह)]] गोपीकृष्ण ढुङ्गाना&lt;br /&gt;
* [[डाढो (हास्यव्यङ्ग्यहरू)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[मध्यचन्द्रिका (नेपाली भाषाको मझौला व्याकरण)]] सोमनाथ शर्मा&lt;br /&gt;
* [[नेपाली क्रान्ति-कथा]] फणीश्वरनाथ रेणु&lt;br /&gt;
* [[डायना (महाकाव्य)]] शैलेन्दुप्रकाश नेपाल&lt;br /&gt;
* [[शङ्खे र फट्याङ्ग्रो]] अनन्तप्रसाद वाग्ले&lt;br /&gt;
* [[मोहिनीले खोसेको अमृतकलश]] अमर निराकार राई&lt;br /&gt;
* [[हिन्दू-धर्म के हो]] महात्मा गाँधी&lt;br /&gt;
* [[बालबालिकामा पढ्ने बानीको विकास]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[The Last Page of My Poem (मेरो कविताको अन्तिम पृष्ठ)]] Rajeshwor Karki&lt;br /&gt;
* [[जय भोलि !]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[संस्कृत व्याकरणको रूपरेखा]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[घरबारी बगैंचा]] बोल बहादुर थापा&lt;br /&gt;
* [[नबिर्सने यात्रा (यात्रा-कथा)]] समीर नेपाल&lt;br /&gt;
* [[समाज परिवर्तनमा संस्कृतिकर्मी]] विजय सुब्बा&lt;br /&gt;
* [[मेवालाल (बालकथा सङ्ग्रह)]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[A Helping Hand]] Payal Dhar&lt;br /&gt;
* [[आमा (कविता सङ्ग्रह)]] भक्ति दाहाल &#039;विष्फोट&#039;&lt;br /&gt;
* [[विज्ञान तथा वातावरण - कक्षा ८ (पुरानो संस्करण)]] गोपीचन्द्र पौडेल&lt;br /&gt;
* [[चप्पल]] अर्हन्त श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[मात्राहरू]] हरिहर लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[दोस्रो भाषाको रूपमा नेपाली भाषा]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अब्राहम लिंकन (१८०९-१८६५)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[घरभेटी भाउजू (कथासङ्ग्रह)]] कृष्णादेवी शर्मा&lt;br /&gt;
* [[Agreeing and Disagreeing - English Grade 10]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[शकुन्तला नाटक]] शम्भुप्रसाद ढुंग्याल&lt;br /&gt;
* [[Chunu and Munu Read]] Shanta Das Manandhar, Stephanie Wei&lt;br /&gt;
* [[अब खेल खेल्ने!]] शिल्पी प्रधान&lt;br /&gt;
* [[जनावरहरूको सभा]] ज्ञाननिष्ठ ज्ञवाली&lt;br /&gt;
* [[विश्वप्रसिद्ध पैंतिस साहित्यकार]] प्रभात सापकोटा&lt;br /&gt;
* [[कसिङ्गर (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[पंचतन्त्र कथासंग्रह]] &lt;br /&gt;
* [[अक्षर (बालकथा)]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 2: Title and heading corrections completed ==&lt;br /&gt;
* [[९७ साल]] आनन्ददेव भट्ट&lt;br /&gt;
* [[गलबन्दी (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 2&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 3: Text correction completed ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 3&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
==Step 4: Proof reading completed==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 4&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[अनौठो फल]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==Step 5: Finished books==&lt;br /&gt;
पुरा भएका किताब&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 5&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=Main_Page&amp;diff=88</id>
		<title>Main Page</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=Main_Page&amp;diff=88"/>
		<updated>2024-06-11T13:26:20Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;strong&amp;gt;Welcome to Nepali Kitab Editing Team.&amp;lt;/strong&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
This website is a sub-website of nepalikitab.org. Here we convert old books into Unicode text format. It is a collective effort by volunteers around the world. If you are also interested, please join the team.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
We keep here the books generated after scanning and extracting texts with OCR. It contains many errors. Our goal is to remove the errors.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==How to edit==&lt;br /&gt;
[[File:Editor-timeline.png|thumb]]&lt;br /&gt;
1. Make an account or log in.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2. Select the book of your interest.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. Click edit&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
4. Edit and clean up the errors and book format. If you are familiar with wiki syntax, you can edit the source too.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
5. Save time to time while editing&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
For details about formatting text, refer to: https://www.mediawiki.org/wiki/Help:Formatting&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 1:  Scan and OCR ==&lt;br /&gt;
*[[रामायण]] भानुभक्त आचार्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* [[तरुण तपसी (नव्यकाव्य)]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[नेपालको नक्सा (राजनीतिक तथा प्रशासनिक)]] नेपाल सरकार&lt;br /&gt;
* [[आदिकवि भानुभक्त (पटकथा)]] यादब खरेल&lt;br /&gt;
* [[इतिश्री (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[स्वाध्ययन सामग्रीः घरमा नै गर्न सकिने सिकाइ क्रियाकलापहरू (कक्षा ५)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[रूखको रूप]] रिन्छेन्ला लामा&lt;br /&gt;
* [[केही धार्मिक तथा साँस्कृतिक सम्पदाहरू (केही नमुना कलाकृतिहरू)]] सत्यमोहन जोशी&lt;br /&gt;
* [[रमाइला गाउँखाने कथा]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[दसैँ, पिङ र हात्ती (बालकथा-सङ्ग्रह)]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[८० दिनमा विश्‍व भ्रमण]] जुल्स वर्न,गोरखबहादुर सिंह&lt;br /&gt;
* [[बालभाका - १ (बालकविता सङ्ग्रह)]] उद्धवप्रसाद प्याकुरेल&lt;br /&gt;
* [[ताल (उपन्यास)]] यासुनारी कावाबाता&lt;br /&gt;
* [[चतुरेको चर्तिकला (कथा सङ्ग्रह)]] गोरखबहादुर सिंह&lt;br /&gt;
* [[ठूलो फुल (A Big Egg)]] Roma Pradhan, Shanta Das Manandhar&lt;br /&gt;
* [[आखिरमा टोम्मीको टोलीले जिती छाड्यो]] क्रिस्टिन स्टोन,शान्तदास मानन्धर&lt;br /&gt;
* [[शिक्षक निर्देशिका मेरो सामाजिक अध्ययन तथा सिर्जनात्मक कला कक्षा ५ (पुरानो संस्करण)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[जय भुँडी (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[मुकुन्द इन्दिरा (नाटक)]] बालकृष्ण सम&lt;br /&gt;
* [[खाल्डामा परेको भकुन्डो]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[जे छोए पनि सुन]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[खानामा पाइने पोषणहरू]] नताशा भिजकारा&lt;br /&gt;
* [[अन्तिम निम्तो]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[सूगवा]] रोशनी चौधरी&lt;br /&gt;
* [[भीमसेन थापा (ऐतिहासिक खण्डकाव्य)]] सिद्धिचरण श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[ऋतुविचार (खण्‍डकाव्य)]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[अनिवार्य नेपाली (१०६) - माध्यमिक शिक्षा परिक्षाको प्रश्न तथा उत्तरकुञ्जिका २०७४]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[छन्दका १०१ कविता]] (सङ्कलन) कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[गणित प्राविधिक शब्दकोश]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[उज्यालोको खोजीमा (उपन्यास)]] हरिहर खनाल&lt;br /&gt;
* [[सपनाको देशमा]] चन्द्रकान्त आचार्य&lt;br /&gt;
* [[महिला लक्षित शिक्षक सेवा आयोग तयारी अध्ययन सामग्री]] विष्णुप्रसाद अधिकारी&lt;br /&gt;
* [[शिक्षक पेसागत विकास तालिम (तालिम पाठ्यक्रम)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[हाम्रा लोकबाजाहरू (बालबोध - ५१)]] रामप्रसाद कँडेल&lt;br /&gt;
* [[पर्दा, समय र मान्छेहरू (कथासङ्‍ग्रह)]] झमक घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[काउकुती (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[विदुर नीति Vidura Niti [Sanskrit-English]]] (Extracted From) Mahabharata [महाभारत]&lt;br /&gt;
* [[जंगबहादुरको बेलाइती कापी]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[कति वटा रोटी]] शिल्पी प्रधान&lt;br /&gt;
* [[विश्वका प्रमुख सभ्यता तथा संस्कृति (बाल ज्ञानकोश - ३)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अस्माकम् संस्कृतम् - कक्षा १]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[प्रारम्भिक संस्कृत व्याकरण र रचना]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[गोरक्ष-साह-वंश (ऐतिहासिकं महाकाव्यम्)]] हरिप्रसाद शर्मा&lt;br /&gt;
* [[२०२ ओटा ठट्टा]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[धुमधामको घुमघाम (भक्तप्रसाद भ्यागुताको नेपालयात्रा)]] कनकमणि दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[महिलाका लागि डाक्टर नभएमा]] -&lt;br /&gt;
* [[दस औतार (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[A Perfect Match]] Ramendra Kumar&lt;br /&gt;
* [[मधुपर्क (वर्ष ४७, अंक ४, २०७१ भदौ)]] -&lt;br /&gt;
* [[सौगात (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[एक घर एक रोजगार (प्रयागदत्त तेवारीको कृषिकथा)]] मिलन बगाले&lt;br /&gt;
* [[रवीन्द्रनाथका नाटकहरू]] -&lt;br /&gt;
* [[पेसा, व्यवसाय र प्रविधि]] -&lt;br /&gt;
* [[मामा माइजु]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[म को हुँ]] पेमा डोल्मा लामा&lt;br /&gt;
* [[चनाचटपटे (बालकविता-सङ्ग्रह)]] बूँद राना&lt;br /&gt;
* [[आवाज (सामाजिक उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[स्पष्टीकरण (कथासङ्ग्रह)]] हरिभक्त कटुवाल&lt;br /&gt;
* [[स्वास्थ्य, जनसङ्ख्या तथा वातावरण शिक्षा स्वाध्ययन सामग्री (२०६७)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[दशैँको दक्षिणा (बालउपन्यास)]] गङ्गा पौडेल&lt;br /&gt;
* [[चार आर्य-सत्य (बुद्ध-शिक्षाका चार स्तम्भ)]] दोलेन्द्ररत्न शाक्य&lt;br /&gt;
* [[विजय चालिसेका बालकथाहरू]] विजय चालिसे&lt;br /&gt;
* [[सिर्जनशील विद्यालय]] अर्जुन श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[अभिभावकको सहयोगमा बालबालिकालाई घरमा नै गराउन सकिने सिकाइ क्रियाकलापहरू (कक्षा १)]] -&lt;br /&gt;
* [[दर्शन परिचय (विश्वका दर्शन र कला साहित्यिक बादहरू)]] परशुराम कोइराला&lt;br /&gt;
* [[खोज (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[अनिवार्य सामाजिक अध्ययन (१२३) - माध्यमिक शिक्षा परिक्षाको प्रश्न तथा उत्तरकुञ्जिका २०७५]] -&lt;br /&gt;
* [[बिहानीको घामसँग]] तारा पुन, शान्तदास मानन्धर&lt;br /&gt;
* [[एकादेशमा (बालकथाहरूको सँगालो)]] उषा दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[इतिहासका विम्बहरू]] पूर्णचन्द्र घिमिरे, रमेशचन्द्र घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[पन्ध्रौं योजना (२०७६७७-२०८०८१)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[नेपालको शाह तथा राणा वंशावली]] विष्णु प्रसाद श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[Aaloo-Maaloo-Kaaloo]] Vinita Krishna&lt;br /&gt;
* [[परित्याग (उपन्यास)]] माधव खनाल&lt;br /&gt;
* [[अमेरिका (उपन्यास)]] गंगा लिगल&lt;br /&gt;
* [[उखान मिलेन !]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[राष्ट्रकवि माधव घिमिरे (जीवनी, व्यक्तित्व र कृतित्वको सङ्‍क्षिप्त रेखाङ्‍कन)]] शैलेन्दुप्रकाश नेपाल&lt;br /&gt;
* [[केहि गुणकारी बोटबिरूवाहरू (बालबोध - ४१)]] डा. हरिप्रसाद&lt;br /&gt;
* [[दिवास्वप्न]] गिजुभाई, शरच्चन्द्र वस्ती&lt;br /&gt;
* [[संस्कृत, प्राकृत र नेपालीका सन्धिनियम]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[शिक्षाका ती दिन]] पुष्पराज पौडेल&lt;br /&gt;
* [[मपाईं (निबन्ध)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[Autobiography of a YOGI]] Paramhansa Yogananda&lt;br /&gt;
* [[ताराबाजी लै! लै!!]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[विश्वास (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[Akbar and Birbal Moral Stories]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[बुद्धवादका तीन आयाम]] पशुपति घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[करेसाबारीका जडिबुटीहरू]] केदार श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[काठमाडौं उपत्यका खुलास्थलहरू सम्बन्धी मानचित्र पुस्तक २०७१]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अन्ताक्षरी खेल]] ध्रुव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[साइबर बालकथा]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[कलेजी थाल]] ध्रुव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[कत्ति धुनु गधाहरूलाई (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] लक्ष्मण गाम्नागे&lt;br /&gt;
* [[गौरी (शोककाव्य)]] माधव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[आमाको माया]] रमेश चन्द्र अधिकारी&lt;br /&gt;
* [[Natural Treasures of Nepal]] Nepal Tourism Board&lt;br /&gt;
* [[नारीस्वर (महाकवि देवकोटा विशेष) - २०६६ असोज]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[चार गजलकारका उत्कृष्ट गजल (गजलसङ्ग्रह)]] मनु ब्राजाकी&lt;br /&gt;
* [[स्यालको जुक्ती]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[स्थानीय पाठ्यक्रम विकास तथा कार्यान्वयन मार्गदर्शन (मातृभाषा सहित) २०७६]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[बाँदर बन्ने रहर (बालकथा सङ्ग्रह)]] गोपीकृष्ण ढुङ्गाना&lt;br /&gt;
* [[डाढो (हास्यव्यङ्ग्यहरू)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[मध्यचन्द्रिका (नेपाली भाषाको मझौला व्याकरण)]] सोमनाथ शर्मा&lt;br /&gt;
* [[नेपाली क्रान्ति-कथा]] फणीश्वरनाथ रेणु&lt;br /&gt;
* [[डायना (महाकाव्य)]] शैलेन्दुप्रकाश नेपाल&lt;br /&gt;
* [[शङ्खे र फट्याङ्ग्रो]] अनन्तप्रसाद वाग्ले&lt;br /&gt;
* [[मोहिनीले खोसेको अमृतकलश]] अमर निराकार राई&lt;br /&gt;
* [[हिन्दू-धर्म के हो]] महात्मा गाँधी&lt;br /&gt;
* [[बालबालिकामा पढ्ने बानीको विकास]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[The Last Page of My Poem (मेरो कविताको अन्तिम पृष्ठ)]] Rajeshwor Karki&lt;br /&gt;
* [[जय भोलि !]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[संस्कृत व्याकरणको रूपरेखा]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[घरबारी बगैंचा]] बोल बहादुर थापा&lt;br /&gt;
* [[नबिर्सने यात्रा (यात्रा-कथा)]] समीर नेपाल&lt;br /&gt;
* [[समाज परिवर्तनमा संस्कृतिकर्मी]] विजय सुब्बा&lt;br /&gt;
* [[मेवालाल (बालकथा सङ्ग्रह)]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[A Helping Hand]] Payal Dhar&lt;br /&gt;
* [[आमा (कविता सङ्ग्रह)]] भक्ति दाहाल &#039;विष्फोट&#039;&lt;br /&gt;
* [[विज्ञान तथा वातावरण - कक्षा ८ (पुरानो संस्करण)]] गोपीचन्द्र पौडेल&lt;br /&gt;
* [[चप्पल]] अर्हन्त श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[मात्राहरू]] हरिहर लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[दोस्रो भाषाको रूपमा नेपाली भाषा]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अब्राहम लिंकन (१८०९-१८६५)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[घरभेटी भाउजू (कथासङ्ग्रह)]] कृष्णादेवी शर्मा&lt;br /&gt;
* [[Agreeing and Disagreeing - English Grade 10]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[शकुन्तला नाटक]] शम्भुप्रसाद ढुंग्याल&lt;br /&gt;
* [[Chunu and Munu Read]] Shanta Das Manandhar, Stephanie Wei&lt;br /&gt;
* [[अब खेल खेल्ने!]] शिल्पी प्रधान&lt;br /&gt;
* [[जनावरहरूको सभा]] ज्ञाननिष्ठ ज्ञवाली&lt;br /&gt;
* [[विश्वप्रसिद्ध पैंतिस साहित्यकार]] प्रभात सापकोटा&lt;br /&gt;
* [[कसिङ्गर (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[पंचतन्त्र कथासंग्रह]] &lt;br /&gt;
* [[अक्षर (बालकथा)]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 2: Title and heading corrections completed ==&lt;br /&gt;
* [[९७ साल]] आनन्ददेव भट्ट&lt;br /&gt;
* [[गलबन्दी (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 2&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 3: Text correction completed ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 3&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
==Step 4: Proof reading completed==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 4&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[अनौठो फल]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==Step 5: Finished books==&lt;br /&gt;
पुरा भएका किताब&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 5&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A5%AF%E0%A5%AD_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B2&amp;diff=87</id>
		<title>९७ साल</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A5%AF%E0%A5%AD_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B2&amp;diff=87"/>
		<updated>2024-06-11T13:25:41Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;Source: https://nepalikitab.org/ananda-dev-bhatta-97-saal/&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पुस्तक परिचय==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१९७ साल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यवण्ड काव्य)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आनन्ददेव भट्ट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुस्तकको नाम : &#039;९७ साललेखक ; झनन्ददेव भट्ट&lt;br /&gt;
संस्करण ; प्रथम, २०१५ सालदोस्रो, २०४६ साल श्राश्विन २० गते,मंगलबार, विजया दशमी,अक्टोबर ६, १९६२)&lt;br /&gt;
प्रकाशक ; श्री अशोक उप्रेतीगोंगब्‌ , काठमाडौं, नेपाल(घर) फोन : ४१६१६७&lt;br /&gt;
लेखकको ठगाना : पुख्यौ लौ घर : पल्लाचौंडलीदशरथचन्द गा.वि.स; बेतडी, महाकाली अश्वलअहिले बसेको घर : कालिकास्थान ख २|१५डिल्लीबजार, काठमाडौं, नेपालफोन (घर) ४१०५२४पो. ब, नं. ४१००, जि. पि. ग्रो, काठमाडौं&lt;br /&gt;
(हु सर्वाधिकार : लेखक स्वयंमा&lt;br /&gt;
कभर डिजाइन ; श्री कान्छा कर्माचायं&lt;br /&gt;
म्‌ल्य १ रू. १५।-मुव्रक ; हिसि प्रेस, जमल, काठमाडौंफोन २-२६-४१६&lt;br /&gt;
54119414880: 54। : 8 410109 0९४ 819113(€4111119100 : 4509 00७१; 2049 १5४४०/1992, 00(0061)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==दोश्ो संस्करणको भूसिका==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;९७ साल नामक यो मेरो खण्ड काव्य २०१५सालमा पहिलो चोटि छापिएको हो । त्यसबेला म भर्खेर २२वर्षको युबक थिएँ । त्यसपछि ४५ वर्षमा त्यो कितावबजारमा नपाइने भयो हेला । त्यति बेला नेपाल-भारतमैत्री संघले उक्त किताब छापेर मलाई धेरै गुन लगाएकोथियो । तर त्यसपछि २०४७ सालसम्म म त्यस कितावप्रतिएक प्रकारले निस्क्रिय, विइ्चेष्ट जस्तै भैरहँ । २०४० सालबैशाख २९ गतेक्रो वहुदलीय प्रजातन्त्रको पहिलो आमचुनावका सिलसिलामा जव म आफ्नो पुर्खाको भूमि बैतडीमात्यहाँका कम्युनिष्ट उम्मेदवारहहको पक्षमा चुनावअभियानमा भाग लिन गएँ अनि मलाई थाहा भयो : त्यहाँकाकैयन्‌ माविसहरूले आफ्नो विद्यार्थी एवं युवा कालमा त्योकिताब पढी श्रानन्द लिएथे र शहीदहरूप्रति श्रद्धा गर्दै देश-प्रति भक्ति भावना आर्जन गरेका थिए । साथै उहाँहरूलेमलाई सोध्नु भोः त्यो किताव भए दिनोस्‌ न, फेरि एक पल्ट&lt;br /&gt;
(क)&lt;br /&gt;
हेरौँ । मैले भने: त्यति पहिले छापिएको किताब अहिले कहाँपाउनु ? अनि उहाँहरूले नै भन्नु भो: छपाउनोस्‌ न त फेरि।आज भोलिका यूवक विद्यार्थीहरूले पनि पढ्लान्‌ र हामी-पत्ति फेरि दोहोराउँला । यो सुनेर म अ्रवाक्‌ भएँ तर मनमनैभनें पनि: पैस। त हात परोस्‌, म नछपाई कहाँ छोडुला ?शहीदहरूको भक्ति किन नजगाउँला ? नभन्दै आज पुनःयो दोश्रो संस्करण तपाई हरूका हातमा राख्न पाएकोमाअव्यन्त खुशीछु ।&lt;br /&gt;
यस दोश्रो संस्करणमा मैले धेरै ठूलो परिवतँनकेही गरेको छैन । सामार्य केही शब्दहरूको परि-वर्तैन बाहेक । किनभने अहिले पढ्दा पहिले उक्त खण्डकाव्यलेख्दाकै सरल मनस्थितिमा झोर्लेन संभव भएन र यसलाईबढी जटिल कल्पनाले सिगार्नु मलाई उपयुक्त लागेन । एउटाआलीचकका आँखाले यस कवितामा घेरै कुराका ग्रभावखट्कन्छन्‌ र साथै परिपक्व बुद्धिजीवी एवं परिस्कृतसाहित्यपारखीहरूलाई पनि। तर पनि मैले ठार्वेः म आाफ्नोयुबा-सुलम सरलता र स्वाभाविक कल्पनाकै आधारमा फेरिपाठकवगे सामु किन न जाउँ ? व्यसँले हाम्रा चार श्रमरशहीद र उनका निक्टटतम सहयोगी समकालौन वीर वीराङ्गना-हरूलाई सम्मान चढाउँदै मैले यो सानो पुस्तक पाठकवगेकासेवामा प्रस्तुत गरेको छु । जस्तो शुभेच्छा पाउने छु त्यै मेरानिम्ति श्रेष्ठ कोसेली हुने छ ।&lt;br /&gt;
भ्रहिलि मेरा आफन्त, राष्ट्रिय भाबनाले उत्सा-&lt;br /&gt;
(ख)&lt;br /&gt;
हित, प्रजातान्त्रिक चेतनाले अग्रसर उद्यौग वाणिज्यव्यवश्षायमा संजग्न श्री भ्रशोक उप्रेतीज्य्‌ शहीदहरू प्रतिसम्मान राख्दै यो पुस्तक प्रकाशना्थ मेरो सहयोगी हुनधाउनु भएको छर मैले मेरा बेतडेली मित्रहरूको इच्छापुरागरने मौका पाएको छु । यो मौका दिनु भएकोमा मश्रीअशोक उप्रेती प्रति हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापन गर्दछु । प्रफ हेर्नेदेखि प्रेसको अन्य सम्पुरं कार्यमा समेत समय दिनु भएकोमाभित्र प्राध्यापक, श्री हेमनाथ पौडेलज्युप्रति पनि आभारप्रकट गर्छु । साथै, कभर डिजाइन गरिदिन्‌ हुने श्री कान्छाकर्माचायं, हिसि प्रेसका कम्पोजिटर देखि अन्यसंपूर्ण श्रमजीवी परिवारप्रति सह्दृदयता साटासाट गढदेछ्‌।अन्तमा सम्पूणे पाठकबृन्दमा २०४९ को बडा दशैंको हादिक &#039;शुभ कामना ।&lt;br /&gt;
लेखक२०४९ साल झाश्विन २० गते, मंगलबार, विजया दशमीअक्टोबर ६, १९९२, ।&lt;br /&gt;
(गय)&lt;br /&gt;
5911 211289:2 22 ४०३६] ॥ १७ &amp;quot;2२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शहीद दशरथ चन्द शहीद धमंभक्त माथेमा&lt;br /&gt;
शहीद गंगालाल श्रेष्ठ शहीद शुक्रराज शास्त्री&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==तपाइँको &#039;९७ सालको झ्याल==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुनै पनि लेखक वा कल्लाकारलाई सबभन्दा भ्रानन्दलाग्ने क्षण त्यही होला, जुन बेला झ श्राफूले गरेको ्रसलकाम र त्यसको भविष्यको मूल्याङ्कन गर्ने सक्दैन। योक्षण कुनै एक खास डोरीमा बाँधिएको हुँदैन होला ।यसमा सुख दुःख र त्यसले पैदा गर्ने बिस्मातका सुस्केरा-साई खुल्ला छुट पनि श्रबस्यै हुन्छ होला । तिनैका एक-एक रेख्राहरूको नाप गर्नु नै त्यो लेखक वा कलाकारकोआत्मालाई चिन्न खोज्नु हो। उसको आतृमाको सबभन्दानजीक बस्ने उडान नै “कविता&#039;&#039; हो । देश, काल,परिस्थिति, त्यसमा भएका र देखिने बेग्लाबेग्लै वस्तुले जह्दिलेपनि लेखकको आत्मालाई भन्‌ भन्‌ उज्यालो र नौलोप्रतिभा दिने हुनाले, हेर्ने र शोच्ने ढंगमै परिवर्तन ल्याउनेहुवाले समयको प्रवाहृसंगै कविताको रूप भन्दै भएरगएको हो । यसैलाई नै “समयको छापा र माग” पनिभनिएको हो, पहिलो भन्दा नौलो भन्ने संज्ञा दिइने गरेको&lt;br /&gt;
न्$ २&lt;br /&gt;
हो। यो मेरो &#039;६७ साल पनि त्यही समयको प्रवाहमालहरिदै आएको मेरो आत्माकी उडानको याौटा साक्षात्‌रूप हो, मेरो आत्मा हो ।&lt;br /&gt;
१९७ साल मैले किन र कसरी लेख्न पुगें वा मेरोआत्मामा त्यसको छापा, किन र कश्री पन्यो भन्ने कुरात्यही सबभन्दा मीठो क्षणमा राखौ हेर्दा, मलाई नै यौटाखोजीको विषय भैराखेको छ । म बारबार संकन्छु, गुन्छु-५१७ साजन लेख्दा ममा के को हुरी आ्राएको थियो ? मनकोकुन असजिलो, नरमाइलो, कडा विरोध-शनि त्यसबाटपँदा भएको उत्त जनालाई व्यक्त गर्ने र साफ गर्ने मन-लागेको थियो ? कसलाई केका निम्ति मैल यो लेखेको हुँ?यी सबै कुराको सामुहिक जवाफ म आफै य्रहिले यत्ति दिनसक्छु: सवंप्रथम म २००७ साल पछिको युवक हुँ ।मलाई २००७ साल पड्धिका विवश भएर धमिलिदै रमासिदै गएका सामाजिक, आथिक र मुख्प्रतः राजनैतिकगतिविधिले प्रत्यक्षरुपमा प्रभाव पारेका छन्‌ । तमामविरपराघ नेपालीले झै तर दृढ चेतना र सक्रिय कार्यवाहीलेसुसज्जित भएर, म आफ्नो देशमा सवँप्रथम दरिलोआादशं, प्रनि इमानदारी, देशभक्ति र जति सक्यो बढ्ताउदात्त उदार बिचार र कमले परिपुष्ट सर्वाङ्गीण उन्नतिर विकासको क्वोजमा छु । शायद यी सबै, कुरालाई,समष्टिमत रूपमा पाउन, मेरौ चेतन) ग्रधचेतन रखासगरी अचेतन मतले, मलाई त्यतातिर घचेडेको&lt;br /&gt;
नरेन&lt;br /&gt;
हुनुपर्दछ; &#039;९७ सालको पृष्ठभूमि र उस बेलाको शुद्ध चेतना-लाई पक्रव खोजेको हुनु पढेछ; त्यस बेलाका ती वीर घहीद-हरूका सामु अछ बाँकी वीरहरूले गरेका कब्‌ललाई संका-उन वा दोहन्याउन मनलागेको हुनुपदेछ । तबै ग्राजकोनेपाली हुँदाहुँदै, भविष्यलाई हेने सक्ने खुला मैदान र दृष्टिहुँदाहुँदै, भूतको त्यो अग्लो, उराठिलो र पातलै भए पनि-हरीयो दूबो, काफल, झैंसेलु र चुत्राका बोटले छापेकोत्यो झोह्वाडको घरलाई हेने मनलागेको होला, यो मैलोवतैमानमा त्यो भूतको सरल भए पनि सौन्दर्यको प्रदशनगने मन लागेको होला ।&lt;br /&gt;
त्यसैले &#039; ६७ साल लेख्न मलाई क्सँले सम्झाएको सम्मपनि ह्वँ न । न त त्यो आनन्दको बेलामा चेतन रूपले, सउद्देश्यकुनै व्यक्ति वा ग्रुपको नै उतार चढाब हेने वा देखाउनयसको सिजेना गरेको हू । त्यसैले मलाई यो भ्रभै पनि,अज्ञात देशबाट, मातो नयाँ तारोको किरण भौ आफूमा आएकोदेख्दा, अचम्म लाग्छ खुशी लाग्छ र फेरि फेरि पनिकेकेही कहिल्य यस्तै थाहा नदिएर ममा आउलाभन्नेनाबालकको जस्तो कल्पना पनि मनमा उठ्छ ।&lt;br /&gt;
तर, थ्रहिले त म, विस्तारै आफूले नजान्दा-नजान्दैबनाएको रचनालाई लिएर चेतन बन्ने कोशिश गर्दैछु ।त्यो चेतनाले मलाई यही भनिरहेछ-“यो &#039;९७ सालमा तैँलेभनेका जम्मै कुरा के सत्य छन्‌ ? के त्यसमा गाएका तेरागीतहरू सब निस्पक्ष छुन्‌ ? के त्यसमा तैँले आजको युग-&lt;br /&gt;
॥ 61 पन&lt;br /&gt;
को मागलाई पनि केही प्रंशमा स्थान दिएर भविष्यलाईयतातिर आञ भनी संकेत गरेको छस्‌ ? र तेरा संकेतहरूलेनेपालीमात्रलाई सीधा वाटो देख।उन सक्लान्‌ ?”&amp;quot;.. जबयी प्रश्नहरू मेरा सामुन्ने उभिन्छन्‌, मलाई अछ कुरा भन्दापत्ति पहिले यत्ति भन्न मनलाग्छ:- यी सब गीत ग्राफ्नै मेरा,मेरै लयका मेरै बाजाका र मेरै ढाँचाका छन्‌ । यिनलेसबै नेपाली-हृदयमा उस्तै र उत्तिकै ठाउँ पाउलान्‌ भनीकृहिल्यै र कसैले पनि भन्ने कुरो ह्वन । तर यत्ति त किटेरभन्न सक्छु श्राधार रहितका हावादारी कल्पनाको जग,शरीर र मस्तिष्क &#039;९७ सालको ह्वँन । यो उस बेलाकोनेपाली आत्माकै कृल्का हो- व्यव्तिविशेषको हव न। नेपाल-ले २००७ साल पार गरिसकेकाले &#039;&amp;amp;७ सालले पछि फर्कनेकुरै छैन । उसले श्राफूलाई जे जस्तो देखाएको छ, त्यसकुरामा कुनै शंका वा दुविधा पनि छैन । यदि यी मूलभूतकुराहरू नै कसँलाई मञ्जूर छैन, झ &#039;९७ सालको यस्तोउज्ज्वल प्रतिमा हेने चाहान्न भने उसको र मेरो भेट हुने कुरैछैन । सिद्धान्त र व्यवस्थामा सबैको आफ्नो आफ्नो श्रास्थावा पक्ष विपक्ष हुनसक्छ । त्यसलाई खलवह्याउने वा त्यस-लाई थामथूम पारी मिलाउन वा मिल्न खोज्ने उदेश्य पतिलेखकको छैन ।&lt;br /&gt;
त ता रा&amp;quot;९७ सालले १।२ झछ कुरो पनि मेरो “अह” सित&lt;br /&gt;
मागेको जस्तो मलाई लाग्छ । किनभने मेरो सीधा मनलेयो स्पष्ट जानेको छ भविष्य र पराईलाई चुनौती दिनु&amp;quot;&lt;br /&gt;
बहन&lt;br /&gt;
अघि, आफूसित ठूलो खजाना तैय्यार हुनुपर्छ । फेरिभविष्य सबै नौलो र जवान हुने हुनाले त्यस्तो चुनौतीआफू जवान छँदै दिन सक्नृपर्देछ । तर किन हो कुन्नि यीकुरालाई मिच्न खोजे भै गरी, म र मेरो रचनालाई यहीबरदान दिन लागिरहेछु- “यदि :९७ सालले ऐतिहासिकमहत्वका - त्यसमापन्ति राष्ट्रियता र प्रजातन्त्रका बस्तुलाईनेपाली काव्यजगत्‌्मा उतार्ने एक परम्परा बसालेर श्राज-सम्मको हाम्रो कान्धकलाको मापदण्डमा केही बेग्लै, केहीलिऔँ लिउंजस्तो, प्रत्यक्ष चेतना दिई अ्रघि बढाउने राज-नैतिक सामाजिक ३० तत्वहरूको समावेश गराउन सकेनभने यो कविता नभइकन केवल &#039;९७ सालको कथाबन्न जाला । त्यसमा लेखकका तर्फबाट कुनै बीचबचाउकोकोशिश हुनेछैन” मेरो अहं भविष्यलाई आफैं नियाल्दैछर उसको निणंय पनि छिटै नै सुन्न पाउने छ ।&lt;br /&gt;
यो &#039;९७ साल ठीक १ वर्ष अघि नै लेक्चिएको हो ।त्यसैले यो मेरो लेखन समयको एक प्रकारले ठीक बीचमाउब्जेको कुरो हो । हुन त कुनै रचनालाई हेर्ने मापदण्डकेवल लेखिएको समय, लेखकको ज्ञानको स्तर, उसकोउमेर र परिस्थिति मात्र ह्वैँव 1 यसमा लेखकलाई खाससमयमा, खास कुराले असर गरेको तीव्र वेदना वा झट्कानै मुख्य हो । त्यसैले मैले यसअघि र यसपछि लेखेको३।४ वटा कवितासंग्रहहरू लिएर जनताको सामु श्राउनूवाँकी नै छ। ती नै मेरो यस रचनालाई प्रत्येक दृष्टि-&lt;br /&gt;
न्ञ्ुल्‌&lt;br /&gt;
कोणबाट ठीक ठीकसित मूल्याङ्कन गर्ने वस्तु वा आ्राधारहरूहुनेछन्‌ । तर पनि मैले यो रचना सबभन्दा पहिले छपाउनेमौका पाएको छु (र म बास्तबमा चाहन्थे पनि यही) र त्यहीहिसाबले पाठक्रवगेलाई मेरो कलम, भावना र विचारलाईपरीक्षा गर्ने यो पहिलो कुरो हुनग्राएको छ । यो रचनालाईसुन्नेमान्छेएक किसिमले घेर नै छन्‌ र उनीहरूले यसप्रति जेजस्तो विचार व्यक्ज गरेका छन्‌ सो मेरो हृदयमा टाँसिएकानै छन्‌ । आशा गर्छु तीमध्ये ५०।९० प्रतिशत कुराहरूमेरो उन्नतिका निम्ति नै सिद्ध हुनेछन्‌ । श्रव म चाहन्छ--यस पुस्तकको जति सकिन्छ क्रियात्मक र रचनात्मक तीव्रआलोचना होओस्‌ जसबाट म पनि तिनलाई जति सक्योचाँडो मनन गर्ने सकुँ ।&lt;br /&gt;
२०१०-११ सालको कुरो हो- जब म भद्रगोलजेलमामेरा भर राजनै तिकबन्दी हरूसंगै श्री कृ्‌ष्णचन्द्रसिह प्रधान-सित थिएँ, ग्रक्‌ अघिदेखि फाटफुट लेख्ने गरेको बानीलाईउहाँसंग बसेर मैले निक्कै बढाएँ, उन्नति पनि गरेँ । त्यस-बेलादेखि ध्राजसम्मको मेरो साहित्यिक अभिरुचि र गति-विधिले, मलाई यही लागेको छ साहित्य- त्यसमा पनिकविता नै, मेरो जीवनको मूल क्षेत्रमध्ये एक हो । आजधेरै कवि र लेखकहरू जन्मिसके र भटाभट जन्मँदैछन्‌ ।२००७ सालपछिको यो अपूर्व वृद्धिलाई हामीले सजग,भईहेन्गौं भने प्रष्ट देख्ने छौं- उनीहरूमा केही नौलोशक्तिको उदय भएको छ, फलस्वख्प उनीहरूमा समाज,&lt;br /&gt;
न्$&amp;quot;”&lt;br /&gt;
दैद्ञ र अन्तर्राष्ट्रिय जिम्मेदारी पर्नि बढ्दैछ । ज्याई तीव्रगतिले यो छिटै छर्लङ्ग हुने पनि छ ।. त्यस उसले उनीहरू-ल्ने केवल हाम्रो साहित्य-ढुकुटीलाई खेँदिलो र भरिलोभत्रै पार्ते ह्वँन- हाम्रो बतेमान पङगू समाजलाई नै प्रामूलपरिवर्तन गर्ने, प्रगतिको संकेत गर्दै हाम्रो गिरेकोजीवनको मूल्य- बढाउन- केही नौलो, ठोस र भाजसम्मकाप्रख्यात, लेखक कवि (जो पुरानी बिचार र व्यवस्थाकाहिमायती छन्‌) को भन्दा पनि बेजोड शक्ति लिएर केहीभन्न र गने सक्नु परेको छ : “तलवार भन्दा कलम धेरैबलियो&amp;quot;&#039; भन्ने सावित गरी देखाउनु छ । यसको निम्तिलेखको मुटुलाई डाक्टरले भन्दा बढ्ता छामी त्यसको धड्‌-कनलाई सुनी आलोचकले जवजेस्त शब्दमा क्रियात्मकआलोचना गर्नु सवभन्दा वलियो बाटो हुनेछ ! शत यत्तिछ आलोचकको बिचार र ज्ञान उत्तिकै माभिएको रव्यापक हुनुपर्छ अनि उसले ठोकेर भन्नुपद्छ मेरो ससंरीविचारमा आजको नेपरली- घाहित्यजगत्‌ले यही नैमूलरूपले खोजेको छ र यसको स्थापनावाट यस युगरआउने यूगक्ा लेखकहरूलाई ठोस निर्देशन हुनेछ ।&lt;br /&gt;
भ्रब मेरा आफ्नै आफन्तप्रति केही भु छ । आजठपाइँन्ने मलाई जुन रूपमा देख्नु भएको छ, मेरो जीवनको,द्वार जे जति विशाल र खुला छ, मलाई भ्रा्फै संम्कजति खुशी लाग्छ त्यो सबैको मुहान श्री पूज्य साहिला बुवालवदेव भट्ट र दाज्‌ श्री त्रैलोक्यनाय उप्रेतीज्यू (श्रिसि-&lt;br /&gt;
न छ&amp;quot;&lt;br /&gt;
पल- कलेज-भ्रफ-एजुकेशन लाजिम्पाट, काठमाडौं) हुनुं-हुन्छ । खास गरी शिक्षाको क्षेत्रमा मेरो यति प्रगति हुनुउहाँहरूकै तन, मन, घनकी हादिक मद्दृतलेहो ! श्रीदाजुका उदार, मनोविज्ञानपूर्ण र गंभीर रेखदेखको फलहो । त्यसैले उहाँहरूको म सदा क्रणी रहनेछु ।&lt;br /&gt;
मैले पढे, जानेका र सुनेका भरले (१७ सालकाजे-जति कुरा लेखेको थिएँ त्यसमा अनेक नौला कुरा- जोमलाई थाहा थिएन- उस बेलाका भोक्ताश्री भू पु उप-मंत्रीज्यू पुष्करनाथ उप्रेतीबाट पाएँ । मँले आफै जोरेकासामग्रीहरू पति सम्पूण तथ्य-सहित छन्‌ भन्ने कुरा पनिउहाँलाई त्यो कविता सुनाएर यकीन गरें । यसको निम्तिम उहाँप्रति आभारी छु । यसमा रहेका ६ तस्वीरमध्येखासगरी ४ शहीदहरूको फोटो दिनु भएर भू पू प्र. मंत्रीश्री टंकप्रसाद आचार्यले समयको खाँचो पुरा गर्नु भएको छ&lt;br /&gt;
त्यस्तै केह्वी थपघट गर्ने सल्लाह्‌ प्रिय मित्र श्रीखड्गबहादुरजीबाट पनि पाएको हुँ ।&lt;br /&gt;
विशेषतः कविताको क्षेत्रमा श्राफूलाई परिमाजितगर्दै लैजान र निरन्तर संपकेंबाट दिन प्रतिदिनअरू लेख्न प्रेरणा पाउँदै जानमा कविद्रय श्रीसिद्धिचरण श्रेष्ठ र श्रो माघत्प्रसाद बिमिरेप्रति मधेरै मात्रामा क्ररणी छु ।&lt;br /&gt;
स्वस्तँ आफू बिरामी हुँदा हुँदै पनि बाउँडिने भ्रौंला-लाई तेल मालिस गर्दै यस पुस्तकको एक प्रति पाण्डुलिपिसारिदिनुभएकोमा सम्माननीय काका श्री बासुदेव भट्टुमाभारी क्रतज्ञता प्रटक गर्दछु ।&lt;br /&gt;
अन्तमा, खुल्ला दिलले, बडो सोचसमकुका साथ,केही नौलो र राम्रोको आकांक्षा गरेर, जति सक्यो छिटोछापियोस्‌ भन्ने हेतुले मेरो यो ऐतिहाक्षिक खण्ड-काव्य“१७ साल” प्रकाशित गरिदिएकोमा &#039;“नेपाल-भारत-मैत्री-संघ&#039;&#039; लाई हादिक धन्यवाद दिन्छु ।यस संघले आफूसित भएको पूजी यसै गरी नवीन-लेखक-हरूका रचना प्रकाशित गरी उनीहरूको उत्साहलाई खूबबढाउन खर्चे गरोस्‌ भन्ने मेरो इच्छा सहितकोशुभकामना छ।&lt;br /&gt;
- झनन्ददेव भट्ट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==९७ साल==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(ऐतिहासिक खण्डकाव्य) .&lt;br /&gt;
बिइवबव्यथाको पूर्वी तहको, एक सिरानी बनी-रहेकोमात्तिस जस्ता उभिने पर्वेत, बोकी बोकी ड्ली रहेकोफाँट फाँटका हरियालीमा, माछा झै सललल बग्दोसमीरहरूका झोक्का चाख्दै, हर्देम स्नायु खुम्चिरहेकोएक सुन्दर नावालकको, अंस्याहार नेपाल थियोहरेक प्रभातमा परिवर्तनको, सारञ्चजी त्यो बजिरहेको !देख्यो उसले मातिसहरूका, चेहरामा दौडिरहेको !अव्यक्त व्यथा खुम्ची खुम्ची, लज्जावती झै फुल्न खोज्दोड्ल्थे मानिस जसरी डुल्छन्‌, विचारको रस पिउँदैदिन्थ्यो मीठो स्वाद अनौठो, जिव्रो सप सरी ददगर्दैभन्थे उनका गिदीमा बस्ने, जीवित सूक्ष्म किटाणुहरू&lt;br /&gt;
 ११-&lt;br /&gt;
“कति परी बन्दी पारिरहन्छौ? हा उठाञ जाउँजाओ[हेर सुतेक्का निपालाका, ती त्यागी सुझ्रे कलमहरूजसका पुर्खा बीरहरूका, औंलामा हाँस्थे मुसुमुसुवेग निकल्थ्यो, अग्नि फुट्थ्यो, काला बाङ्गा बुट्टा कोर्दैनेपालीको अन्तदिलको भावना सब मुखरित पार्दैतिनै कलमका वाणीबाट पृथ्वीनारायण बोल्न थालेतितकै शक्ति बुकन सकेर भीमसेन थापा हाँबन थालेभ्राजादीको विगुल ध्वनिमा, नेपालीका बाह्नु फड्केपुष्ष, नारी औ केटाक्रेटी, हाँसी हाँती श्रमर भएझाजादीको एक कहानी भ्राज कसरी नुप्त हुँदैछ ?दासताको बेजोड राप, दनदन आगो बालिरहेछ ?सरस्वतीका वरदानस्वरूप, नेपालीका ताजा बच्चासक्दैनन्‌ के सिर्फ चलाउन, दाहिने हातमा औंला ?”,&lt;br /&gt;
एक करोडका दुई करोड, हातहरू झाँखा खोल्थेदुई करोड ती खुट्टाहछ उनलाई सीधा उमभ्याउँथेसबका छाती ढाल बनिकत एक स्वरले अ्रधि सर्थेमानी युद्ध छिड्नै श्राटघो, भन्दै सारा लोहा बन्थेसिरिरिरि सिरिरिरि हावा थ्राई, केशराशिमा विजुली भर्थउड्दै उड्दै ्राकाशमा, कति सुन्दर ती रूप सिगार्थहृदय हृदयमा अव्यक्त छटाले डररर डमडम पल्टन खेल्थेबीरभावका झिल्काहरूले कूलमल बाटो खोली-दिन्थे ।गम्न थाल्यो चेतनाको त्यो भ्रद्भुत सुघो पाले&lt;br /&gt;
$के नबढ्ने ? के नछेड्ने ? संग्रामको एक रडाको ?&lt;br /&gt;
-१२-&lt;br /&gt;
किन म आएँ, किन म घाएँ, यो मानवको स्मृतिमा ?के बन्ने मैले पशु समान, वुद्धदैवको जन्मस्थलमा ?ह्वौन ह्वन यो जन्म लिएको, एक खोटो कलद्धु होलायदि आत्माको टङ्कारलाई, मैले आज सुन्न छौडुला&amp;quot;&lt;br /&gt;
यही भावले पुलकित पार्दा, यही रागले भक्त पार्दाउम्भिन आए दुइ बरदान, स्वतन्त्रताका आकासमा&lt;br /&gt;
एक थियो नि क्षत्रिय वलले, टैङक तोप झैँ हृदय कडानसा नसाका ताता झिल्का, फैलाउन खोज्ने पृथ्वीमा&lt;br /&gt;
बचन कडा थ्यो, बिचार सफा थ्यो, स्वाभिमानले टल्किरहेकोहिम्मत कस्तो, साहस कस्तो, पावरहाउस भै घन्किरहेकोक्रान्ति क्रान्तिको स्वणिम गौत, पलपलमा त्यो गाइरहन्थ्यो“दशरथ चँद&#039; यो &#039;दशरथ चंद&#039;, युद्ध घोषमा उम्लिरहेको&lt;br /&gt;
आर्को त्यस्तै हृदय-वागमा, स्वाधीनताको फूल फुलेकोहाःहाः हाःहाः हाँसी, हाँसी शुद्ध हृदयको कान्ति छरर्दोब्राह्मण कुलको युवक दीप, द्रोण भन्दा वलियो मान्छेडल्ले डल्ले स्याउ फले भै अ्रमृतको त्यो वर्षा गर्ने&#039;टंकप्रसाद&#039; यसको स्मृति, दानवहरूसित कुम ठेल्ने !&lt;br /&gt;
थपियो ग्रर्को तेस्रो शक्ति, धर्मभक्तको बाहुबलजनशक्तिको स्वच्छ, पुनीत, आत्मनिणंयी स्तम्भस्वरूपमनुजतामा परुषताको, तिदेयी त्यो शानलाईशक्ति उजाई, एक चुनौती, हाक्न सक्ने मधुरता ली ।&lt;br /&gt;
न पदेन&lt;br /&gt;
जनजीवनको नाडी छाम्त, हृदय हृदयको धुक धुक सुन्नपहेलमान आयो धैरयंवान यो कल्याणी कलश उचाल्न&lt;br /&gt;
दोस्त दोस्त थे यो तीन शक्ति, दोस्तानाका गहिराइँलेदोस्ती बढाए दुनियाँसंग, चक्रब्यूह गुप्त रच्न भरे!&lt;br /&gt;
आए कैपन्‌ श्रा, बलिया, मृद्‌ कलेजावाला मान्छेयुवकहृदयका फोहोरा बोकी, नयाँ जोशले कुद्ने मान्छेकमेयोगी वीरका माझमा, एक दिन दशरथ भन्न थाले:-&lt;br /&gt;
“्देश्नुहुन्छ यो संघ्या बेला, सूयंदेवको जाने बेला ?हामी खडा छौं बैठकमा, नयाँ युगको कल्पनामाराणाशाही हुकूमतका, हामी कट्टर दुशमन ह्रौंत्य्षकै शवको जात्रा हेने, यसरी हामी आतुर छौं |!अ त्यो पश्चिमको सानो क्याल, भन्तिम प्रकाशको बाटो होहाम्रो संघर्षी जीवनको, कन्‌ छ साँगुरो बाटो हो&lt;br /&gt;
सूयं साक्षौ छ गीता पुस्तक, एक एकको शिर छुन्छभाज सबैले कबूल गछ्न्‌, हाम्रो एकता अमर रहन्छहामी कोही तरङ्गी ह्व नौं, हामी कोही भरङ्गी ह्वनौंआजादीको झण्डा गाड्न, अघि बढ्यौं, बढयौंचेतनाको चिराग समाती, देशभरी न घुम्नेछौंविश्वासको निर्णयको हामीले सिक्री पक्रका छौं&lt;br /&gt;
लौ खाऔ्रौं यो थालीको, फलफूल हाम्रो नेपालकोबाँडीचु&#039;डी नेपालग्रामा, साक्षी राखी इमानको&lt;br /&gt;
&amp;quot;१४.&lt;br /&gt;
हे, देशका सपूतहरूको ! हे, देशका रत्नहरूहो !आजँदैखि हान्नो पो तन, मन, घन पियो&#039;&#039;यही भावना गजिन थाल्यो, चेतन जगत्‌का किल्लामाअनि त आगो सल्कित थाल्यो, स्वाधीनताको आगनमाबुझ्न सक्ने, हेर्ने सक्ने, आँख(का निम्नि ज्योति थियोस्वच्छ चाँदनी माथिबाटै, चिन्ताको दाहा मेटिरहेथ्योवनकाली औ गुह्यञश्वरीका, सिम्भूका घना जंगलमानेपालका सुन्दर स्वच्छन्द, छहारीका कुना कुनामालम्कन थाले युवकहरूका, एकाकार न्रह्वा स्वरूपकोमल, निर्मल, बल्दा ज्योति, बृद्ध प्रभुको हठ स्वरूपतडपन औँ जलन थियो, केही नौलो शक्ति बटुल्नेनेपालको छातीमाथि, आजादीको हार चढाउनेएक चिन्तन, एक तनमन, हावामा फटफट उड्दै थ्योकस्ले छेक्ने, कस्ले रोक्ने ? यो त समयको आह्वान थियोटिक क 20कैलाशको त्यो मुट्मा यौटा, शान्त समीर उडी-रहेछ !परीको सुन्दर लत्रक बोकी, एक्‌ भङ्गमा छोडिरहेछस्वगपुरीका कल्पित नगरी बेबिलोनका झुलना होलान्‌ऐश-नसामा सललल वग्दै, दिब्य उल्लास नाची रहलान्‌यो त कान्तिले घपधप वल्दो, पृथ्वीकै यौटा थालीहोजसमा तानी: केटीहरूका, कोमल फूलहरू हल्लिरहेकोबिजुनी उज्याला वाह फ्याँकी, बैटकको आलिगन गर्छे !चाँदीको सेतो पलङ उचाली, हृदय उमाली बोलिरहेछ !सिंहदरबारमा गर्मीमा महाराजको हावा बंगला&lt;br /&gt;
-पेष् -&lt;br /&gt;
यो गद्दी हो महाराजको, जसको छाती प्यार भरीहेरिरहेछ कल्पनाको रेशमी चादर उडाई&lt;br /&gt;
लेटिरहेछन्‌ श्री ३ जुद्ध, बूढानी लकण्ठका विष्णुसरिसपनाको फाटक खोली श्रायो एक विचित्र कहानी:-&lt;br /&gt;
“बुररुरु उड्दै “पुछु तारो गगनभेदी हीरा बन्छ&lt;br /&gt;
के उज्यालो सूर्य दिदो हो ! यसले पृथ्वी बालिदिन्छअन्धकारको बिचरो तन्ना, तत्कालै डड्दै राख बन्छ&lt;br /&gt;
विह्वल छटाको शीव बिन्दुमा, उही तारो टिलपिलाउँछ;एक मोहिनी जुद्धनसामा, किरीबिरी चित्र उतादथ्यो&lt;br /&gt;
भग्न भयो यो, मेटियो यो, त्रासक्रो घोडा दौड्न थाल्यो:-”&lt;br /&gt;
“किन भयो यो कित भपो, के ईश्वरको श्रासन हल्ल्यो?एकान्त अनि प्राराधना, कसले श्राज तोड्न थाल्यो ?&lt;br /&gt;
आज पृथ्वीका बलिया शासक, के मेरो दाँजो उभ्भिन सक्छन्‌ ?दान पुण्यको मेरो हवन, हल्ट पारी गर्जन सक्छन्‌ ?&lt;br /&gt;
म त राजा नेपालको, हिन्दू धर्मको पहरो पो&lt;br /&gt;
पशुपतिको अंगरक्षक, कसले छाती खोल्ने हो?&lt;br /&gt;
जपिरहेछन्‌ तमाम दुनियाँ, मेरो प्रतिमाको दशैन पाउनमेरो प्रसन्न अनुहार देखी, स्वर्गद्वारको नजीक पुग्न&lt;br /&gt;
केत्रुटि भो मेरो तपमा, के कमी भो उदारतामा ?&lt;br /&gt;
ज्ञानिन मैले हे भगवान्‌, मर्जी हवस्‌ शिर चरणमा ! ५&lt;br /&gt;
शा १६&amp;quot;&lt;br /&gt;
यो त उनको कातर दिलको, एक अथाह वेदना थियोबज्न नपरोस्‌ भन्ने भिक्षा माग्ने एउटा पुकार थियो !असत्पता औ उत्पीडनको, वस्ती माथि व्यङ्ग गर्दैभन्न थाल्यो बाउन्नेजस्तो एक भ्राक्कति फिस्सहाँस्दै:-&lt;br /&gt;
&amp;quot;छैन कुनै कमी विमीबाट नयाँ संसार सिजिँदै छकिहदरबार दिनपरदिन, कं यन्‌ जुम्ल्याहा जन्माउँदै छ !हेर कति ती बगैँचामा, मीठा मीठा फल लाग्दै छन्‌&lt;br /&gt;
एक कीटाणु छुन सक्दैनन्‌, फाँसोको डोरी देखिहाल्छन्‌ईश्वर बोल्दछ ती स्याउमा, लौन मलाई छोडिदेडपहाड मदेश, खाल्डामा, मेरा सन्तति सुक्न नदेड&lt;br /&gt;
त्यस डाँडाको छातीमाथि, हेर डढेलो लागेको !&lt;br /&gt;
लौ न निभाञ वारुणयन्त्र, लैजाञ सृष्टि नासिन लाग्योकति कुनाका कति भाई, तिम्रा दायाँ बायाँ बस्छन्‌ ?देखेका छौं कसरी रुन्छन्‌, जो बित्ताभर पनि टाढा छन्‌ ?धर्मे, कर्मेको पुण्यस्थल यो, पाप तापको नरक बन्योदिउँसै मानिस भाँखा विम्ली, अन्धकारमा डुब्न पुग्योभन्दैछ त्यो “लामपुर्छु तारो” परिवतँन &#039;यहाँ उम्रन थाल्यो!&#039;&lt;br /&gt;
नेपालका अगुवा महाराज, श्री ३ जुद्ध अचम्म परे&lt;br /&gt;
दान पुण्यको वलिवेदीमा लाञ्छनाले बास गरे&lt;br /&gt;
क्रोध रोषको आँधी आई, खोपीको ढाँचा हल्लन थाल्योबेह्रोश बिरामी बर्बराए भै, आक्रोश निस्की भन्न थाल्यो:-&lt;br /&gt;
000&lt;br /&gt;
&amp;quot;दृष्टि दरमा छाया बोल्लान्‌, बोल्ते मानिस लाटा होलान्‌पापी हृदयका खोपीबाट, श्रापका ज्वाला बत्तिन थाल्लान्‌के कसुर लौ यसमा मेरो, जब म साउनको मेषघसरीर्छाररहेछु सुन, चाँदीका श्रबिरल धारा ददिद्र-माथिदरिद्रताको त्यो विशाल फाँट, जब मेरो शीतल दृष्टि पाउँछउर्षेर फाँट लहराए झै, कसरी सजीव भै बोल्न थाल्छ!पाप गर्लान्‌ मूखे दुनियाँ, यदि परत्रको त्रास छोडीगिर्लान्‌ आफैं सब नरकमा, यमराजको कोर्रा खाई&lt;br /&gt;
राजा हू म राज गर्छु, धर्मेलाई श्रीपेच संफी&lt;br /&gt;
दिल दिमापको सन्तुलनमा, सुन चाँदीको ढक राखी&lt;br /&gt;
खने मानिस कोही हुन्न जो हाँस्न पनि सक्छ?पूवंजवमको लेखालाई, कसरी उसले मेट्न सक्छ ?हेरिरहेछु भूकम्प पछि, कस्तो राम्रो नेपाल बन्यो&lt;br /&gt;
नयाँ स्वर्गको ढाँचामा, जुद्ध सडकको जन्म भयो&lt;br /&gt;
हेर्दा होलान्‌ कोही मानिस मेरा नजरच्ले छटपटिएर&lt;br /&gt;
छोप्त पाए यो तेजलाई, कति सित्तल ताप्थें उक्लेर&lt;br /&gt;
राज गरुन्जेल मिचिराखुँला हेट को त्यो शिर उचाल्छ ?”१&lt;br /&gt;
त्यस सपनाको त्यस उडानमा, भझूलका झल्लरी उड्दैथे&lt;br /&gt;
नानीहरू ती पाउ-निरै, कोमलता वर्षाइरहेथे&lt;br /&gt;
बिजुलीका किरणहरूले, मखमली कार्फट चुम्दैथे&lt;br /&gt;
फर्की आतन्द भित्ताहरूमा, आलो पालो नाचिहन्रथे&lt;br /&gt;
गम्मीर मुद्रा जागी आयो जुद्ध श्री को मुखमण्डलमा&lt;br /&gt;
अर्को सपना सलामी दिदै, थाल्यो केही गुप्ती बताउनः--&lt;br /&gt;
त पप न&lt;br /&gt;
«क्रिन हो कुश्चि, जागिरहेछन्‌, दुनियाँका मनमा खुल्दुली ?ल्दैनन्‌ ती, हेर्दैतन्‌ ती, केबल बोह्छन्‌ आक्कति&lt;br /&gt;
असह्य भयो ! असह्वा भयो ! अरव बिस्फोट हुन कर लाग्यो&lt;br /&gt;
नेपालीका एक एक आत्मा बलिदान हुने बेला भयो !&lt;br /&gt;
चल्ने छैन यो हुकूमको, विष्टाको जस्तो ढुगेन्ध&lt;br /&gt;
एक मानिस लाखौं - माथि, घोडा चढ्ने दुष्ट प्रबन्ध&lt;br /&gt;
के छ ग्रधिक्ार जुद्धलाई, आ्रामाका छोरी लुट्ने ?&lt;br /&gt;
घमेशास्त्रकै मर्यादालाई, दानवले भै कुल्चने ?&lt;br /&gt;
नेपालीको पसिनामा विलासिताको पौडी खेल्ने ?&lt;br /&gt;
छैन कुनै एकाधिकार, एक परिवारलाई देश चिथर्ने&lt;br /&gt;
कुन वीरता अनि योग्यतामा, बन्दछ बालक जर्नेल ?&lt;br /&gt;
कुन ग्रपराधको दाग लागी, हुन्छन्‌ नेपाली पाउ दाब्ने ?&lt;br /&gt;
त्यो ढुकुटीको &#039;तीन साँचो&#039; नेपालीको हातमा होस्‌&lt;br /&gt;
दुनियाँ सारा तय गछ्न्‌, कहिले, किन यो खोलियोस्‌ !&lt;br /&gt;
कानून उसको शब्द, शब्द ,रे &#039;ख्ज निशाना&#039; पेवा रे ।&lt;br /&gt;
नेपालीको तन, मन, धन, वचन उसको इच्छा रे&lt;br /&gt;
कसरी वज्ला त्यो नगरा, नेपालीको छाती-माथि ?&lt;br /&gt;
फोरीदिन्छौं त्यो जालो अनि आजादी वबोल्ला निस्क्री&amp;quot;&lt;br /&gt;
विस्मृतिक्रो प्रठपहरियाले, फेरि शान्ति पोशाक फेन्योसुन्नक्षान रुचनीको माझमा, सुस्त सुस्त त्यो डुल्न थाल्यो ।शायद ग्रहले अचेतन, हृदय पनि संक्न थाल्यो&lt;br /&gt;
कति हिसाव पुगिसक्ेछ, ढड्डा खोली जाँच्न चाल्यो:-&lt;br /&gt;
&amp;quot; १९-&lt;br /&gt;
“साँच्चै होला यस छातीको, दुनियाँले रौं नदेखेको ?&lt;br /&gt;
के देखे पति नदेखे झैँ टारी मुन्टो बटारेको !?&lt;br /&gt;
सुनेन होलान्‌ तिनले कुनै, यो बाघ-घाँटीको गर्जेन ?कसरी मानवहृदय मात्रमा, उब्जाउन सक्दछ कोलाहल ?होलान्‌ शायद मूखहरू, मूढे बलमा हुत्तएका&lt;br /&gt;
आखिर हुन्‌ ती नेपालका, सुद्ध गठिला भेंडा वाख्रा !&lt;br /&gt;
तर-&lt;br /&gt;
ह्वनन्‌ ह्वौनन्‌ भेडा बाख्रा, ती अवश्य होलान्‌ ब्वाँसा नैशिक्षा भन्ने चश्मालगाई, आए होलान्‌ ती ब्वाँसा&lt;br /&gt;
भेंडा, बाख्रा नुट्न भनेर, बरा आनन्दले चरी-रहेका“चद्धदाजू हृक्गुम हुन्थ्यो, हाम्रो खुट्टामा बञ्चरो पर्छकलेजको चौर -माथि, फट्याङग्राले राज गर्छे&amp;quot;&lt;br /&gt;
होलान्‌ ती फट्याङग्रा झै नै, टिटिटि श्रावाज दिनेज्ञानकोषमा दूषित हावा, लागी ब्यर्थै बौलाउने&lt;br /&gt;
अव परमेश्वरको हुकुमलाई, यो छातीले बोकी लड्छसंहारको वादल ल्याई, विद्रोहीको प्राण लिनेछ ।”&lt;br /&gt;
2८ 2८ रद&lt;br /&gt;
आज किन हो ? महाराजको, सूर्यं-श्रगावै सुकला ब्यु&#039;झ्योबीभत्सरसको कए खोलो,छ्यालब्याल छ्यालब्याल बग्न थाल्योअगाध, तीव्र छ यसको वेग, कान फुटाल्छन्‌ यसका स्वरहुनुनुनु ह्वाई ह्वाई चिच्याई, तोडिरहेछन्‌ श।म्ति-विनोद ।&lt;br /&gt;
न २०&amp;quot;&lt;br /&gt;
बैठकको सिहासनले, एक ्रंशान्ति गाइरहेछ&lt;br /&gt;
सिसा झल्लरी हल्ली हल्लौ, छननन कल्लोल छोडिरहेछ ।पित्ताका ती तस्वीरहरूमा, आक्रोषको छाँया झैंउडिरहेछ ग्रदृश्य हाबा,- शंकाको भ/री उचाल्दै&lt;br /&gt;
सब जस्त छन्‌ महारानी, केटीका वी सुमधुर गालाचिन्ताको लाली गराई, घोडिरहेछ किरण धनौठा&lt;br /&gt;
वाक्य वन्दछन्‌, भयका भूतहरू गजिरहेछन्‌&lt;br /&gt;
मप्ान कुने भ्रध्घोरी झै भयंकर नाच देखाउँदैछन्‌ !&lt;br /&gt;
&amp;quot;के भएको ? के हुनेछ ?&#039; छैन कसैलाई पत्ता&lt;br /&gt;
चली रहेछ मनमनमा, प्रशन गर्ने जोरको घक्का,अठपहरिया ढोकाबाहिर, संगीन च्यापी उम्मिरहेछखोपीभित्रको चलबलको, सृक्ष्म भ्राभास पाइरहेछहृजूरिपा एक जर्नेल झाई, दशनको विन्ती विसाउँछ&lt;br /&gt;
तर नाजवाफ अति सशंकित ढोकेमा त्यो कुरीरहन्छमहाराजको ग्रस्थिर तन, छटपटाई उठ्न खोज्छमहारानीको स्पशै पनि, आज किन हो फिक्का जँच्छ ?हुकूम भयो महाराजको,- “भन्दे, अहले दशेन छैन&amp;quot;ओडाहाले उफ्री भुइमा गोडा दुईलि कसरत गर्छन्‌&lt;br /&gt;
डुल्दै डुल्दै भ्राक्रोश वग्छ:-&lt;br /&gt;
सहान्ना हजुरका घामलाई, छेक्ने रे जेरे हुस्सुले ?यस श्रीपेचका ज्वालासित, आँखा जोड जैरेले ?घाह छ किन यो जृद्ध जन्म्यो नेपाली राजकुलमा ?&lt;br /&gt;
क रेप&lt;br /&gt;
भ्रागो झोस्न, गो कोस्न, खारिएका खरका भौरमा;कत्रो सेखी ! कत्रो फूति ! ती नालका कीरासंग !&lt;br /&gt;
कत्रो हिम्मत कत्रो तागत, छेसवा किताबे कीरासंग;&lt;br /&gt;
यी ! देखेका छन्‌ तिनले के ? पिस्तौलको सानो मोह्रीकसरी छेड्दछ यसले छातो, तातो रगतको घार पिई ?अन्याय भयो रे, अत्याचार, बढ्दै बढ्दै उम्लिन्छ अरेनेपालीका छातीमा सब, घोर प्रापत वैरिन्छ अरे&lt;br /&gt;
बोल्न मिलेन, मुख थुनियो जीवन आकांक्षा टुट्न गयो रेदेख्लान्‌ पाजी भुसुनाहरू कति कराउन सक्छन्‌ अ्रहिलेजब वर्षेलान्‌ तो सुइखुङ्ट , पातला आ्राङमाथि कोर्रा&lt;br /&gt;
अनि बोल्लान्‌ प्रघउञ्जेल, यै हुनेछ आ्जादी-सोडा&amp;quot;”&lt;br /&gt;
थर्क मान छन्‌ कोमल परी हरू, त्यो गर्जेन मुटुमा गाडिएरकानका गोल छिद्रबाट, श्रनायासै घुस्न पुगेर&lt;br /&gt;
थररर काम्दै महाराजका, गोडाहरू लुगलुगिन्छन्‌&lt;br /&gt;
५ए किस्ने ! यहाँ सुन्‌” भन्ने हुकूम जाहेर गर्छन्‌;कृष्णबहादुर अठपइरिया, राइफलसहित सलामी दिन्छ“बीर गोर्खाली&#039; सिपाहीको, पोजिसनमा उम्भिरहन्छ ।भन्दै, मेरो हजूरिया- &#039;गोवरगणेश&#039; लाई अहिल्यैराजद्रोही घुमी रहेछन्‌, पक्री ल्या जिउँदा जिउँदै&amp;quot;&#039;&lt;br /&gt;
“जो हुकूम प्रभु ” भन्दै, किस्ने सलाम ठोकी पछि सँफरक्क फर्की फुटबल झै, ढोका प्रघि झै ढप्काउँछ !&lt;br /&gt;
ती ॥ यम त&lt;br /&gt;
२२”&lt;br /&gt;
डन थाले आकाशमा ती, नयाँ जोशका पंछीहरूमधुप्रभातका लालिमामा रंगिएर विमान स्वख्प&lt;br /&gt;
प्रक कृतिका नयाँ लुगामा मोहित थे सव प्राणीहरूकोशिश गर्थे सिगारिन, वैशे-जोडा थापी गुरु;&lt;br /&gt;
के थिएन उल्लास नभमा ? निर्मल श्राकाशको तनमाचिरबिराहट गुञ्जिरहेथ्यो, अभियानको हावामासररर उक्ल्यो सूयं उता, आक्रोशको ज्वाला झैंमानो रगत उम्लिरहेथ्यो, हिमालयको चमक भैआजको यो दिन विचित्र, प्राजको यो राग बिछट्टफेरि नौलो दिव्य ग्रति, जनताको काखमा छ ।&lt;br /&gt;
पुलिसका ती राता फेटा आज किन हो मलिन छन्‌उनका भ्राक्कति शंका, त्रास बोकी फन्‌ फ्न्‌ गंभीर छन्‌;भेटिएछन्‌ कागजका छाती छोप्ने नौला टुक्रा&lt;br /&gt;
राता राता अक्षरले, झलमल झलमल बलीरहेका,&lt;br /&gt;
यो त थियो ए ! क्रान्ति निम्ति, नौजवानक्रो आह्वानपरिवर्तनको वेगमा पौड्ने, लालसाको मध्य उडान;नेपालीका हृदय हृदयमा, केही नौलो बीज रोप्ने&lt;br /&gt;
जसका चिल्ला बिसवा होलान्‌, मीठा फूल ौ फल दिने;भयका झिहका पोल्दै छन्‌, पुलिसहरूका आत्मा&lt;br /&gt;
के हुने हो ? के यस्तो हो ? श्री ३ जुद्धको उदयमा ?भन्छ उनको कोमल आत्मा, “के होला यसमा लेखेकोकिन बौल्वाए मानिस यसरी, यमराजलाई निम्त्याएको ?&lt;br /&gt;
न रद&amp;quot;&lt;br /&gt;
दाखिल हुन्छन्‌ एक एक पाना, महाराजका खोपीमामानो रगत पोती भन्थे:-&lt;br /&gt;
“अब आयौं हान्न निशानासंभझन्थ्यौ होला संघेभरि, अन्धकारमा राज गरौंला ?फूट गराई लूट गर्ने मामाको नीति बिछ्लाईरौंलायो नेपाल हो जहाँ बस्छन्‌ वीर आमाका छोराछोड्ने छैनन्‌, भाग्ने छैनन्‌, नभराई पूरा हर्जानाखुब चूसेथ्यौ दुनियाँलाई, आँपका गुलिया कोया भैआइरहेछन्‌ तिने कोया, चट्टानका छोरा बन्दै&amp;quot;&lt;br /&gt;
बगिरहेथ्यो नगरीमरमा सनसनाहट एक धाराशरीरभरका रौँलाई, उभ्याई मानो पहरावादविवादको आँघी चल्यो, भुप्रादेखि पक्की घरमाघुइरी घुइ्री नेपालीले, गुन्न थाले जीवन गाथा:-&amp;quot;आब बिध्वंस अत्ति रगत, देखिनेछ यी गल्लीमाकति घरमा बज्नेहुन्‌ कोलाहलका, नाश नगराहुन्न हुन्न प्रब यो देशमा, शान्ति औ समृद्धि कतैहुन्छ यहाँ माराकाट शिर र गींडका थुप्रा मात्रै&lt;br /&gt;
भन्न सकिन्न प्रक के होला ? कति पहरा गल्लीमा बस्लान्‌ ?एक एकका घाँटी च्याप्दै, गोलघरमा मेला लाग्लान्‌ !”&lt;br /&gt;
चेतन मनका चेतन मूर्ति, गुप्त रही छलफल गर्थे:-“आयो बेला केहो गर्ने, आमाको इज्जत रक्षा गर्ने&lt;br /&gt;
५ अंगेज साम्राज्यवाद&lt;br /&gt;
छि । कि&lt;br /&gt;
हेर कपरी खुम्बिएकी, हाम्री गरीब नेपालभ्रामा !बुजो लागी निसास्सिएकी राक्षसहरूका घेरामा !प्राण उड्ला प्राण उड्ला, ठूलो कलंक अपहत्या होलामातृभूमिको दीप निभेमा, अन्धकारमै रोइरहांला,&lt;br /&gt;
भन्छ पर्चा &#039;प्राञ आउ ! &#039;&amp;quot; नेपालका रगतवालाजति सपूत छौ कम्मर कक्षो, बलिदानको यै हो बेलादेश डुब्यो, लौ देश डुब्यो ! प्रलय यहाँ आउन लाग्यो !एक घरानिया स्वार्थतलि, द्वाम्रो मासु छाला काडयोकसरी सहने ? कसरी हेर्ने ? हेर त ग्रागो सल्केकोकैयन्‌ निमुखा प्राणीहरू, दिनहुँ पशुपति पुग्दैछन्‌ ।“चिता भन्ला हार खाएँ, सबितिन अब यो भारी बोक्नफर्काञ यी सव लासहरू, मेरो घरमा बासँ छैन ।मसान जागी झगडा गर्ला, कसरी मैले पारी तर्ने ?लास मात्रको भार उचाली, कसरी मैले गोडा सार्ने ?जाङ,, मरेका ज्यूँदा मानिस, सक्दिन हेने तिम्रो श्रनुहारतिम्रो लाछी मुख देखी, घट्दछ मेरो बल श्रगाध !के ढुङ्गा हुन्‌ ती तिम्रा सन्तान ? जहाँ संघै टोपा लाग्छचोइटाका चोइटा ढुङ्गाले&#039; बेहोश भै उछिट्टिन्‌ पर्छ ?अल्छीका ए पिण्डहरूहो ! पशुताका हे, प्रतीकहरू हो !लाज पचाई लुरुलुरु हिड्छौ यही के तिम्रो मानवता हो ?छैन छँन अव हामीलाई, यस पृथ्वीमा कतै स्थानउड्न सके यस जमीनबाट, मात्रै होला पुनरुत्थान !&#039;&#039;&lt;br /&gt;
न २५--&lt;br /&gt;
क्रान्तिकारीका जमातहरू ग्रर्कै धुनमा ब्यस्त थिएराणाशाही ग्रन्त गर्ने बन्दूक पिस्तोल जम्मा गर्थे !कत्रो विशाल यो पृथ्वी; कत्रा चौडा ती छातीएक एक लडाक्‌ गाडिरहेछन्‌, बनकालीमा श्स्त्रहरूथाहा छैन, को कस्तो हो ? कुन डिग्री कसमा भुण्डेको छएक भावना एक वेदना, हरदम क्रान्ति गाइरहैछ !नेताका प्रत्येक वचनमा पृथ्वीका पुस्तक सिद्धिन्छन्‌एक धापमा एक आशमा, प्राण-पखेरु चलबलछन्‌कवि-कल्पना के उड्ला ? तीव्र बिजुलीभझै दौडेरवीरहरूका हृदय कुद्‌्छन्‌, आफ्नो कतेव्य उचालेरयो त थियो नि यौटा युद्ध, योद्धाहरूले हाँकेकोचिःस्वाथं चमकमा उदाएर झकझक कृकझक बल्दोप्रसञ्नता त यसको ढाल, आ्रात्मविश्वास लाग्ने खुकुरीनेपालको बन्धनलाई तोड्ने यौटा बज्न सरी ।&lt;br /&gt;
ती ती तीश्रबएक प्रलयको नृत्य शुरू भो, पृथ्बीमा यौटा खेल शुरूभो ।घरपकडको वबन्डरमा, नाशको वाजा बज्न थाल्योनयाँ कहानी, नयाँ भयावी, उन्माद सिजन थाल्योकाठमाण्डुको छाती- माथि, रातो भ्यान दगुने याह्यो !रात थिएन यहाँ कुनै, दिनभन्दा पनि चम्कन थाल्योएक एक घरको ढोकाले, कुन्दाको आवाज सुन्न थाल्योबन्दुक, पिस्तोल, संगीनले आफ्नो फूति देखाउन थाल्योखाकी पोशाक घ्रफिसरको मानो गदगद हाँस्न थाल्यो&lt;br /&gt;
नर&lt;br /&gt;
त्रेस्त त्रस्त थे दुनियाँका एक एक साना ठूला प्राणसडक, गल्लीमा हिंड्दा छिप्ता, अस्पष्ट झस्का हर्देम साथ ।&lt;br /&gt;
आज कसँका नजरहरूले, उम्भी चम्कन पाएनन्‌&lt;br /&gt;
दुइ तीनका व्ययाहरूले, मिल्ने साहस गर्ने सकेनन्‌पृथ्वीको सृष्टि नासिदैथ्यो गह्ृ (गा बूटका दम्कालेकदम कदमको भार वढी भै, ढुङ्गा माटो उप्किरहेकोप्रेमीहरुका कम्पित हृदय, वीचवीच भै दौडिरहेथ्यो-बिश्लोडको त्यो वियोग वायु, सनसनाई मच्चिरहेथ्यो,ग।[रतका गारत तैनात थे, शंहरका जोर्नी जोर्नीमाश्मसान यो भन्नु हुँदैन, मलामीका हूल थिएनन्‌आवादी पनि यो ह्वन, आवाज सबैका बेपत्ता छन्‌&lt;br /&gt;
के हो कुन्नि ? पृथ्वीको यो एक सानो सिरानीमा&lt;br /&gt;
के नाच्दै छ? कोखाँदै छ? बग्दै नन्‌ थोपा रगत नसामाअक विचित्र दृश्य त अ्रक, जहाँ विद्रोही खोजिन्छन्‌ !राजभक्त ती पशुहरूका नाकहरू सुघ्दै आउँछन्‌&lt;br /&gt;
मानो यहाँ श्रात्महत्या, अयो क्या रे ग्रचानक&lt;br /&gt;
अनि त यसरी फौजहरू घेरि-रहेछन्‌ सिङ्गै घर&lt;br /&gt;
तर ह्वौन केही यस्तो चाहि, यहाँ त यौटा फिलिङ्गो रेडिलिभझिल झिलभिल बलीरहेथ्यो, क.डारकट पोह्न रेयही फिलिङ्गो बेपत्ता भो, यही तेज कतै उड्योछोप्नुपन्यो रे होइन भने, सिहासनै डगमगिने भो !&lt;br /&gt;
यो सानो घरको सानो काया एक लाश झै उम्भिरहेथ्योयस सिनोमा धावा बोल्ने, गिद्ध-राजको हुक्‌म थियो&lt;br /&gt;
-२७-&lt;br /&gt;
कित चुकुन्‌ ती ? किन हटुन्‌ ? भय कसैको कहाँ थियो ?&lt;br /&gt;
इच्छाध्ीन विषय पढे भै लाशको चोक्टा झिक्नु थियोमहापुरषषको राजपुरुषको तरङ्ग ग्रव लहरिन थाल्योसमुद्रका ती छुफानले झै, लाखेनाच देखाउन थाल्योएक एक कोठा चोटाहरूले, बूटको जब्बर थप्पर चाखेखाट, डसना, दराजहरूले मजबूरीको धावा खापेसिलिङहछूका कम्मरमा, खुकुरीका धार बज्जन थालेरंगीन भित्ता, इट्ठाहरूले दृश्य मेटिने धूलो फ्याँकेदानवी उद्गारलाई, साँच्चै नौलो मशला मिल्यो:-“अहा ! भेटियो बिद्रोहीको कालो करतृत लुकेको&lt;br /&gt;
हेर कापी लेखिएको, नेपाल आमा रोइरहेको”&lt;br /&gt;
एक सानो फोटो भन्छ, मै हुँ उसको बिद्रोही गुठदिन रात सिकाउँथे उसलाई, अनेक जादु मन्त्रहू”भागि-सकेछ दौडी-सकेछ, बिद्रोही त भ्रधिनैशायद उसको ग्रात्मा होला, त्यस सानो घ्यम्पोभित्रैह्यैन, ह्वैन, यो चौंठोमा, 5 भै केही बोल्दै होलाभिक भिक्र बिर्को हेरौं त्यहाँ जख्रै कोही बस्ला”,हेरिरहेछन्‌ साना बच्चा, कौतूहलले उम्लेर&lt;br /&gt;
क्के गरेको ? के खोजेको ? त्यो रित्तो भकारीभित्रराजपुरुषको महान खोजमा उपहासको सृष्टि गरे झैंबोल्यो एउटा सानो वालक, कटु सत्यको सास फेदै:-“ह्वैन त आमा, अस्ति मात्रै, ह।मीले मूसा मारेकोमुसेटोले उत्तको थृतुनो च्वाट्ट काटी रगत बगेको ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
न २६&amp;quot;&lt;br /&gt;
मातुनयनमा अथु बिन्दु ती टलबल चम्क्ी भन्छन्‌:-&lt;br /&gt;
कठँ कस्तो खोजी हो यो ? के कन्तुरमा पति माविस लुक्छन्‌कता गयो लौ हाम्रो इज्जत, कता गयो लौ हाम्रो प्यार?यक्ष पुरानो घरको छनो, कसरी टाल्ने उक्लिनासाथ ?&lt;br /&gt;
के पस्यो यो हाम्रो घरमा ? भूत भनौं यी मानिसलाई ?नत्र भने किन छटपटाउँथ्यो, हाम्रो हृदय यसरी तर्सी ?के छैन होला यी कसैको, आफ्नो प्यारो सानो घर?त्यसको रेखदेख गर्ने यौटा, हिम्मती छोरो जब्बर&lt;br /&gt;
यिनका घरमा आमा, बुहारी, सहन सक्लान्‌ यो बिचल्ली ?त्यो घरको जगले खप्न सक्चा, कतँ यस्तो जवरजस्ती ?षब किन यस्तो राक्षसले झै, ग्देछन्‌ यो हानथाप ?दुनियादारको कच्ची घरमा, छरिरहेछन्‌ हाह्ाकर ! ”&lt;br /&gt;
श्राज यौटा छाप्रो छैन, जसले जाति र चेन पाग्रोस्‌यी पशुहरूका धावाबाट, बच्दै खुसीको गीत सुनाओस्‌&lt;br /&gt;
त ना पी&lt;br /&gt;
बिफल भयो ति बिफल भयो, क्रान्तिकारीको अरमानउनको फलामे छ।तीमाथि,वञ्चन थाल्यो अभिषापगवारग्बारती ल्याइन थाले, वीरहरूका ताँती ताँतीलात बजाई कोर्रा हानी, कठालो औ दृप्पी समाईहाय ! वित्यो बीरहरूको, आजादीको अरमान&lt;br /&gt;
उमेर नपुग्दै चुँडिन थाल्यो, उनको आ्राधा औ प्रभियानकेमे चोक्चो, हृदय उज्यालो, उनको यो अभियान थियो&lt;br /&gt;
नरे”&lt;br /&gt;
अन्यायको चाङ लागेको, चित्तामा आगो लाउनु थियोजनवलको गुम्फित ज्वाला, राम्ररी त्यो फुट्न सकेनचेतनाको अड्कुरले पनि, कठोरतालाई चिर्ने सकेननेपालीको करोड दिल, करोड धार बन्न सकेन&lt;br /&gt;
छिटफुट छिटफुट धारहरूको, मार गहीरो जम्च सकेन !एक कारण ग्रर्को पनि लौ, राज कसोरी थपिन गयो ?दुइ कुरूषी दुष्टहरूले, यस मंडलीमा घुस्न पुगेको !घरतीको माटो, पानी, झामाको दूधलाई&lt;br /&gt;
चुस्दै चुस्दै थुन्न भनी, आएका यी देत्यहरु&lt;br /&gt;
मानिस ह्वँ नन्‌ जीव हवैनन्‌, घरतीका लाल ह्वै नन्‌बहुत घूतँ, कपूत कहाँका, हृदभन्दा पनि बेशर्मी !&lt;br /&gt;
यौटा चाहि बीर पुरक, भाई भै त्यो नक्कल गर्नेक्रान्तिकारी, जोशघारी, बात मादेँ क्रान्ति मार्ने&lt;br /&gt;
भन्थ्यो शैतान वीर सामू, गुप्तिकार्यले के गर्ने ?&lt;br /&gt;
झन्डा बोको भ्रघि सर्छु म, अरु भाइले साथ दिन्‌राणाहरुको प्रथम दलाल, इमान्दार टट्ट्थ्यो यो&lt;br /&gt;
तब त बाँच्यो दण्डविना नै वोरहरुको शिकार गर्ने !&lt;br /&gt;
कस्तो अनुहार श्रर्काको, छद्म भेष त्यो हरामकोघोती फेर्ने, टुप्पी पाल्ते, चन्दनले निधार पोत्नेगीताको ब।णीलाई जानाजान भुल्न खोज्ने ।&lt;br /&gt;
जन डर ०&lt;br /&gt;
के भनौं ल यसको नाम ! ढुर्गन्धी धुणित कामसुब्बा बन्ने, घन बट्ल्ने, बेइमानको नौलो प्ररमान,&lt;br /&gt;
यिनै पापी, देशद्रोही, मुहान बने रहस्य छोल्नतबै जान्यो राणाशाहीले, प्रथम क्रान्तिको गला घोट्न,&lt;br /&gt;
दासताको भित्तोमाथि, तैपनि बलियो लात कसियो&lt;br /&gt;
क्रान्तिकारीको शक्ति र शाहस, गर्जी गर्जी लम्किरहेथ्यो !&lt;br /&gt;
नेपालीको एक जनमको, यो गवित राग थियो&lt;br /&gt;
सबैप्रथम मुक्का तान्ने वीरहरो अनुराग थियो&lt;br /&gt;
कसरी टुट्यो, कसरी फुट्यो ! यो विषादको भेल थियो&lt;br /&gt;
पड्चात्तापको श्रम्निज्वाला अरब छिटै कसरी निम्थ्यो !&lt;br /&gt;
सूर्य हेर्देथ्यो, चन्द्र देख्दथ्यो, यो सफलताको भ्रवसान&lt;br /&gt;
चिन्ताका ज्वाला उम्लन थाले, बाली बेचैनी चिराग“एक छिनको एक दिनको, निम्ति चराको बेग टुट्यो&lt;br /&gt;
साहसको समुद्रमाथि, पखेटा चाल्न कठिन भयो ।&lt;br /&gt;
तर-&lt;br /&gt;
हेर गजब ! लो हेर गजब&#039; &#039;दशरथ चन्द&#039; को अनुहारमा&lt;br /&gt;
दायाँ बायाँ मुस्काइरहेका, &#039;धमंभक्त, प्रौ &#039;गंगामा&#039;&lt;br /&gt;
ख्वै त रेखा बित्नताको, ती हिम्मती गालामा ?&lt;br /&gt;
बली-रहेछन्‌, चंकिरहेछन्‌, शिरस्थातका ज्वाला भै&lt;br /&gt;
भ्रभै सजीव छन्‌ अ्रभै प्रकट छन्‌ प्र्क्नताका मुहान भै&lt;br /&gt;
कति अत्याचारका ज्वालाले, तिनलाई भुल्स्याउन खोज्ला&lt;br /&gt;
डड्नै छैनन्‌, निभूते छैनन्‌ नेपाल झामाको काखमा !&lt;br /&gt;
५ ३१२&lt;br /&gt;
सिहदर्बार पाटङगीमा एक ग्रद्भुत नक्सा हेरिरहेछ&lt;br /&gt;
जान्दैन कोही, किन यो यसरी, ठिङग उभ्भिई धोरिरहेछ ?हेर्दा मानिस भन्लान यो, राजकुमारको मैदान हो&lt;br /&gt;
जहाँ हलुका भकुण्डाहरू, उठछन्‌ मानो ब्यालुन झै&lt;br /&gt;
अनि बाँका ती दुई खम्बा गोलपोष्टका चिन्हत्त्वरूपपखिरहेछन्‌, कहिले आउला ? भकुन्डोको सुन्दर रूप&lt;br /&gt;
ह्वैन ह्वैन त्यो एक ग्रर्क, संहारकी साधन होश्रत्याचारको रेखा कोने उम्याइएको पाले हो&lt;br /&gt;
अलि बेरमा बग्नन्‌ यहाँ, रगतका निमुखा धारा&lt;br /&gt;
चारदिवारी चतुष्कोणमा, भझुल्किरहेछन्‌ झ्याल कर्यालमा&lt;br /&gt;
कौतुहल, औ त्रासमा खोली, परीदृरू आफ्न। तीखा आँखा&lt;br /&gt;
आज यौटा ठूलो जात्रा, यस रंगमञ्चमा देख्लाइनेछ&lt;br /&gt;
नेपालीको जीवनसंग खेलबाड गर्ने जाल यहाँ छ&lt;br /&gt;
पश्चिमको त्यो ठूलो बैठक, आज मानो हात्तौ बन्छहाराजको सिन्दूर जात्रा, गर्दा जो खुशीले लस्कन्छ&lt;br /&gt;
नरम कौच, सुन्दर कार्पेट, खुसबूले आत्मा मोहित पार्छ&lt;br /&gt;
उपहार उमंगी वाँडी बाँडी, सारा भारदार निम्त्याको छ&lt;br /&gt;
बिजुली गारत धेरिरहेछ, त्यस बैठकको पालो घेरा&lt;br /&gt;
बहुत सतर्क मृग भै त्यो नयन सवैत्र घुमाइरहेछ&lt;br /&gt;
हो हो आज यहीं हुनेछ, एक क्रान्तिको अवसन !&lt;br /&gt;
५ ३२&amp;quot;&lt;br /&gt;
कुन अचानो खोजी ल्याई, खडा हुनेछ यहाँ मसानयोनहो लौ खूनीहरूको, एक भयंकर बैठकएक लवजमा शब्दशब्दमा, मच्चिनेछ उथलपुथकहेर, छेउका कुना काप्चीमा, कोच्चिएका क्रान्तिकारीबाँधिएका बाघ डोरीले, मानो हुन्‌ ती ग्रत्याचारी !&lt;br /&gt;
अब सवारी भो महाराजको, चमरहरूको शीतल ताप्दैहीरा मोतील्ले झलमलिएका, ताराहरूको सरि बस्त्र पहिन्दैउनको ज्योति, उनको क्रोध, भारदारको हृदय उमाल्छसबले उठ्दै “सर्कार ! प्रभु ! | &amp;quot; एक शब्दमा स्वागत हुन्छ !धीमा चालमा, गर्व छातीमा, क्रोघ, रोष ती नयनबिन्दुमाएक विशाल काया उक्ल्यो, हेर उज्यालो सिंहासनमा !&lt;br /&gt;
उठिरहेछन्‌ भारदारका, ती क्रोधी काला काला आँखानसाहरू ती फुली-रहेछन्‌, निमोठ्न घाँटी विद्रोहीकाराखिएका बिचरा ती युवकहरू त्यस कुनामामानौ अस्पृश्य वस्तुहरू हुन्‌, घृणाको ढक्कनले छोपिएका !भारदारका नाक्कका पोरा, फुर्दै फुदैँ गोमन बन्छन्‌मूसा निलेका घाँटी जस्तै, राँब्किएर फुट्न खोज्छन्‌ !रुद्रघण्टी छटपटिएर, तलमाथि दौडिरहन्छन्‌पागल भै नरमाइला गीत गाई अमङ्गल रोप्न खोज्छन्‌ !भ्रब महाराजको हुकूम हुन्छ:-&lt;br /&gt;
“औँ! कहाँ छन्‌ ती शैतान ? ......&lt;br /&gt;
ना डेड क&lt;br /&gt;
गथ गादी ताक्न खोज्ने, यस कलि जुगका वरदाननजर गराओ हाम्रा हजूरमा, भस्म पारु तिनको शवउठेका रे होइनन्‌ ती राजद्रोहको पर्दामा ? ..... ”&lt;br /&gt;
अंगरक्षक एक हजुरिया, जुरक्क उभिई बिन्ती गर्छ:-“सर्कार ! यहीं छन्‌ ती कुक्कुर, नजर गराउन घिन लाग्छ!यी त प्रभो के विन्ती चढाझँ ? यमराजका दूतहरू हुन्‌ !अरब तैयार छन्‌ कोर्रा, लात, खाई तोरीको फूल देख्लान्‌ !&lt;br /&gt;
एक यही हो शुण्डमुशुण्ड राक्षसको अनुहार जस्तो&lt;br /&gt;
आँखा नदेखी चशमा लाउने नाम हो बेइमानको &#039;दशरथ चंदडीलडौल औ कुलमा सर्कारको पक्का सेवक जस्तो&lt;br /&gt;
तर घमण्डले जरखरिएको नजर होस्‌ अनुहार यसको !&lt;br /&gt;
“म्रर्को महाराज ! यो काले, कुलाङ्गार मशानकोभूतप्रेतको शाखा सन्तान, नाशको मूति जस्तो !अहंकारले मोट्टाएको कसरतले कस्सिएको&lt;br /&gt;
मानिस मात्रलाई तर्साएर, यतिको सुरिलो वनेको !नजर होस्‌ यसका साँप्रा यी भुस्तिघ्‌ खुट्टा&lt;br /&gt;
छाती नै छ क्या ठूलो मानो फलामे तावा&lt;br /&gt;
क्या मजा होला यसमा आगो सल्काई रोटी सेक्दा&lt;br /&gt;
कति छिटै पाकिहाल्लान्‌ ! जोगीका भुप्रे रोटी जस्तापहलमान रे पहलमान रे ! यो पाजी कहाँको न्यावार !&lt;br /&gt;
न ३४२&lt;br /&gt;
कक्तरी कुत्ति सिक्यो कुस्ती फ्याँकी श्राफ्नो कातर स्वभावभन्छन्‌ यसलाई &#039;घर्मभक्त”, पापको गहिरो महाकुण्ड&amp;quot;&#039;&lt;br /&gt;
भ्ररू त प्रभो ! यो भेडा बाखा, प्रत्येकको गिन्ती नै केछ!सब पणु हुन्‌ घाँस खाने, खप्परमा गिदी शुन्य छ&lt;br /&gt;
भ्राज परे फेलामा गरिप्रभो ! भ्रब कसरी यिनले काल काट्ने ?कृति बुद्ध उपर त टीठ लाग्छ तर सजाय नभोगी कहाँ माग्ने ?&lt;br /&gt;
झँ, प्रमो ! माफी पाउ, बिर्सेछु यौटा मूला गन्नसानो भए पनि ज्यादै पीरो, बिन्ती नगरी सुख्खै छैनबिच्छी हो यो बिच्छी हो, बिषको सानो थैलोहेर्दा कस्तो कलिलो केटो ? तर छ पहिला हात घुमाउनअस्ति मात्रै हो लौ, यो गधा इन्द्रचोककोडब्लीमाथि उभिई भन्थ्यो-नेपालले परिवतेन खोज्योउठ ! उठ ! ए, नेपाली हो ! भ्रन्चकारले लाटो पान्योहाम्रो गाँस हाम्रो बास, हरी हरी दुर्गति ल्यायो&#039;भन्छन्‌ यसलाई ती चोरहरू, &#039;गंगालाल, गंगालाल !ता रु तीबातावरणमा भ्रक हावा, धब हुत्तिएर बग्न थाल्योमहाराजका तेर्सा जै घा, सवप्रथम हल्लाउन थाल्यो“गोवर गणेश&#039; भौ जम्बुमन्त्री&#039; उफ्री उफी हेन थाले“गोपाल&#039; को त्यो नपु&#039;सकताले अहिले केही शक्ति पायोगुरु पुरेतका टृप्पीहरू, चाँदतोडाभित्र हल्लिव थाले&lt;br /&gt;
न दैन तल&lt;br /&gt;
हृदयकण्ठ औ जिब्रोले, राजद्रोहको दण्ड पढे&lt;br /&gt;
चिम्से बाहुन-आँखामा पनि, क्षत्रीको उस्तो राग आयोआफ्नो छाती हेरी हेरी मत्ताहात्ती भ घुम्न थाल्यो,जुठो भुजा चाख्ने अरूहरु, भारदारको बुद्धि बसेनमानो अन्धो सपजस्तै, वस्ने कुनै स्थान रहेन&lt;br /&gt;
प्रत्येक हृदयमा गुनगुनाहट, एक सुरले घुइरिन थाल्योशिवरात्रीको मूढो भै त्यो ताप छोडी जल्न थाल्यो !&lt;br /&gt;
तेलिएका जुँघा चम्के, विस्तारै मानो उठ्न थालेउनका संगी भै रौंहरू ठाडा ठाडा देखिन थालेमहाराजको आसन हल्ल्यो त्यो तीस घार्नीको लचकमाबाक्य फुट्यो पाकेको घाउ, श्राफे फुटे झै हावामा:-&lt;br /&gt;
«ठीक भनिस्‌, अँ ! ठीक भनिस्‌ हाम्रा हजुरको चित बुझ्योयी पाजी सब हुन्‌ कत्लघरका, मेहमानहरू, याद आयो !के त्यो ह्वन ? चश्मेठकुरी, हामो कुलको सेवक दासआज कसरी उछिट्टिएछ ? दुर्मेतिले गर्दा होला लाश&lt;br /&gt;
“पहलमान रे आर्को चाहिँ ? कहाँ त्यसले सिक्न पुग्यो ?हामा हुकुमको प्रमाङगी विना, कसरी त्यसले मुकदल छोयो ?शुरुदेखिकै दुष्ट रहेछ, यो पनि स्यालको तर्कारी बन्योखूव केर्नू, खुब मथ्नु, एक एक नौनी रहुञ्जेल&lt;br /&gt;
खूब चुट्नु, खूब लुछ्नु, एक एक क्कत्य लुकाउञ्जेलदेशद्रोहको श्रागो ताप्ने, कलियुगका यी कंगाल !&lt;br /&gt;
३६२०&lt;br /&gt;
टी. बी हैजा छारे रोगले, मने नसक्रेका जंजालछने नपाञन्‌ कतै यिनले, महारोगका कीटाणृहरू&amp;quot;&lt;br /&gt;
ती ती तीराजकुमारको हाहा हूह फुटवलको त्यो रन्कापदै झ्यालका परीहरूको उल्लास भरेको खित्काहेर्ने, सुन्ने, सुरमा शायद, उभ्भिरहेथे बाँसको खम्वाअब टाँगिएका युवक-हृदयका सुन्न थाले बीर भावनालाम लागेका यमदूत जस्ता, प्रठपहरिया कैयन्‌ उम्भिरहेछन्‌कहिले थाक्ला पहिलो साथी ! यत्ति सुरमा उम्लिरहेछन्‌हतार हुँदैछ, हतार हुँदै छ, तर के गर्ने खै पालो ?बीरहरूको शौयं देखी कोर्रावाल झन्‌ कसिन्थ्योक्रोधको एक एक करेन्ट भराई, च्यास्स च्यास पोली भाग्थ्योपशुताको अन्तर्ज्वालामा घिउतिलको हवन चल्थ्योचलिरह्यो यो क्रम निरन्तर, कोमल परी ती नानी सामुबोरभाथिको अत्याचार, डामिरहेथ्यो उनको छातीशायद यो नै त्यस महलको, अ्रक्षीम व्यथाको पानी !सिस्नो पानी, कोर्रा हानी चाहन्थ्यो चुक्की राणाशाहीबीरताको यस समरमा, वी रहरूको पानी कारौएक वीरले घैयं छोडे, आत्मवलले सहन छोडेस्वतन्त्रताको बलिवेदील।, घोकाका दुई चार छिटा फ्याँकेवर्षेनेथ्यो भुक्तिमुक्ति नयाँ जीवन सृष्टि गर्ने;तर-प्ररन मात्र थे एकोहोरा, ती सोध्ने सुब्बाका मुखमा&lt;br /&gt;
-३७-&lt;br /&gt;
थिएन जवाफ वीरहरूको, च लिरहेथ्यो श्रनगिन्ती कोर्रादाह्वा किट्दै जर्साबहरू, श्रत्याचार बर्षाइरहेथेमहाराजका भयभीत नेत्र रक्तसिन्धुमा पोडिरहेथे&lt;br /&gt;
यत्रो सर्जाम जोने सकेर, वीरहरू दी हाँसिरहेथेक्रान्तिको त्यो गुँडलाई, रक्तधारले छोपिरहेथे !&lt;br /&gt;
भुई लाल थ्यो, कोर्रा लाल, आखिर हान्नेको कपडा लालकरण भाव ती उब्जन थाली, नारीहरूका गाला लाल !लाल लालको लाली थ्यो यो, लाल नेपाल पार्ना निम्तिहेरिरहेथे अत्याचारी, आँखाहरू पनि थाकी थाकी,&lt;br /&gt;
कसले पायो होला, सयभन्दा पनि कम कोर्रा&lt;br /&gt;
तर कसले भनेन होला गर्जी, दुई सय बढी भाव अनौठाबसिरहेथे वीरहरूका कण्ठस्थलका मोहरीबाट“अत्याचारी वास गरौंला, नेपाललाई मूक्त गरौंला&amp;quot;यस्ता चर्का यस्ता ताता, शब्द रुपका गठिला गोलीछोडिरहेथे महाराज औ भारदारका छातीमाथि&lt;br /&gt;
अब के हुन्थ्यो, व्यर्थै थियो, केवल तनको रक्त बगाईकपोलकल्पित दोषहरुमा, लिइयो बूढी औंलाको सहीमूखित नेता नेपालीका, हेरिरहेथे अत्याचार&lt;br /&gt;
जगको निमेल आत्मा भन्थ्यो, यो त भयो है सीमापार !थररर काँप्दै भित्रभित्रै, पापी आत्मा बरवरायो:-&lt;br /&gt;
“गयो अब त्यो भ्रत्याचारको, ग्रघि अघि भै पोल्ने राप”&lt;br /&gt;
0 ती ता&lt;br /&gt;
न. इद&amp;quot;&lt;br /&gt;
दुई महीनाको चीसो स्याँठ, दुई महिनाको फिक्का घार्मेकाठमाण्डूको बाक्लो कुहिरो, छोपिरहन्थ्यो नगर तमामहृदय भएका कोमलता, पालीपाली हुर्केका&lt;br /&gt;
जीवनको गरवित शक्ति, देश-भक्तिमा ग्रर्पेका&lt;br /&gt;
बीरहरू नै खप्न सक्दथे&#039; छेदवाहरूको धैर्य कहाँ ?हेर्नोस्‌ यौदा एउटा जेल यहाँ छ, सिंहदरवार बोकिरहेछसृष्टि गर्ने आमाले भै, कष्ट भोगी डुलिरहेछ&lt;br /&gt;
“रेडियो नेपाल&#039; बोल्दछ श्राज, उसकै का&amp;amp;्षमा पल्टेरनेपालीका पयर टहल्छन्‌, संगीतको राग लिएर&lt;br /&gt;
यहीं थिए ती वीरहजरू, हुन्‌ रे देशद्रोहीहरू&lt;br /&gt;
हुकुमी चुक्कुल फोरी घुस्ने, हूल गर्ने डाँकूहरूसिपेन्टमाथि दरी बिछ्याई, सुताएका जीवहरूदेश्प्रेमको यौटा आगो, तापी वस्ने ख्वै र प्र ?&lt;br /&gt;
राणाशाहीको प्रत्येक कञ्चट, पसिनाले निलिप्त गरेरमहाकालको मूति जस्तो, एक भयावी दृश्य रचेरगुप्त भेषमा व्याप्त भेजमा, महीना दिनतक पौडेरदुर देशमा, क्रान्ति रेसमा, नूतन ज्योति जगाएरघाइरहेको प्रथम सेवानी, पक्रियो रे जाल गरेर&#039;टकप्रसाद&#039; आइरहेछ, विशाल तराई पार गरेर&lt;br /&gt;
उड्न थाल्यो सन्देश यो, काठमाण्डूको हृदयभित्रप्रतिक्रान्तिका फौज हाँसे, मानो एटम फोर्ने सकेर !&lt;br /&gt;
- ३६ --&lt;br /&gt;
यही एउटा भूल शिखरको, फलको ज्यादै तृष्णारेआज मिल्यो नि हातै बाँधी, कत्रो ठूलो बिजय भयोरे !&lt;br /&gt;
तोन धार्नीका नेल सिक्री, प्रक थप त्यसमा गलफन्दीसिंगै गारत घेरिरहेछ, उनको शक्ति तौल्वा निम्तिउड्छ, उड्छ रे पक्षी जस्तै, यो त यौटा जादू हो&lt;br /&gt;
एक निमेषमा एक भिक्रा, खेल्न पाए पार पुग्योमहाराजको सामुन्नेमा, एक अफिसरले बिन्ती गन्यो:-&lt;br /&gt;
“हे आ्रोजस्वी ! धर्मावतार, यही हो तिसर्मी बाहुन बच्योहावाजहाज हो सर्कार यो, बाघडोरीले कस्नु परेको“टंकप्रसाद, भन्ने कुनामले, यो ती डाँकूमा विख्यात छ !”&lt;br /&gt;
राजबैठक कन्‌ बिचित्र, विश्मयको स्वास फेर्छ&lt;br /&gt;
कल्पनाको ह्यामान चिडिया, लुप्त हुँदा त्यो गम खान्छ !उपहासको रंगमा यौटा अर्को भाव व्यक्त हुन्छ:--भद्दाराजको प्रइन उभिन्छ:-&lt;br /&gt;
“के यं पुड्के वाहुन चरी, घाँच्नै उही टंकप्रसाद हो ?सम्पूणे बिद्रोही ग्रागीको, के यही नै पहिलो किल्को हो?पत्यार लाग्दो, भर पर्दो, ख्वै त यसको रूपै छैन !&lt;br /&gt;
वल, बुद्धि ्रौ सुच्याईको, वस्ने कत ठावै छैन !&lt;br /&gt;
भूल भयो हो, भूल भयो हो, पक्कै हुलिया अलमलियोयो त यौटा सित्तै आयो, माछाको हलमा फूल ग्राए भैदुध निकल्ला श्रोठबाट, भो भो छोडिदै लौ ग्रहिल्यै !&lt;br /&gt;
कन गि क&lt;br /&gt;
ए युड्के पण्डित बा कहाँ जानू, महाराजको स्तुति जप्दै !महाराजको भाषणलाई, सभागृहले खेद मान्छकस्तो बिचार, कति उदार ! कसरी हाम्रो राज्य अड्छ!भन्छ उफ्री &#039;गोवर गणेश&#039;:-&lt;br /&gt;
“महाराज यो श्रनर्थ भयो.नजर होस्‌ यसको रिपोट, कत्तिको छ यो बाहुन गहिरो ?यो सबैक्रो नाइके पो हो ब्राह्माणकुलमै आगो लाउनेहाम्रो रीतिथिति नाश गरी म्लेच्छहरूको सीको गर्नेहेर्दा पो यो सानो सानो, तर यसको मन कति साह्लो ?मौका पाए पिस्तोल उजाई, गाथमा चढ्थ्यो हान्न तारोभारतवर्षका राजद्रोहीसित, बलियो छ साँठगाँठ यसकोतब त निक्ले सर्कारबिरोधीः लाञ्छनाले पोतिकाहुना नहुना वकवादहरू, पेर्टाभत्र जनताको &#039;१विश्वास लागोस्‌ सर्कारमा, खास हुलिया यहीनैहीबिजुली हो यो बिजुली हो, ज्यूदै छाला काढ्नुपर्छरगतका धारा संगै-संगैँ, यसले षड्यन्त्र खोलिदिनेछकति छिटो लौ भागिसकेथ्यो, बाबुको किरिया बस्न आयो ! ”बह !&#039; महाराजको चेत फर्क्यो, शंकाको कुहिरो उड्न थाल्योत्यसको विशाल पंखले, कातर हृदय घोच्न थाल्योउसो भए लौ वाँध्‌ यसलाई, यो त सपको बच्चो पोयति सानो मान्छे यति चर्को, तव त्यो गंगे कस्तो होला ?&lt;br /&gt;
शागलाभाममि आमिनिनिनिहिम्िनिलिहिनतिरिकिल्टिटिजलाण जग ए0114100100000१ पटनावाट निस्कने पत्रिका&lt;br /&gt;
-४१-&lt;br /&gt;
काल भैरव भै त्यो धर्मे ! उम्झ्नन पाए संसार निल्लापर्वेत जस्तो त्यो दशरथे, जरूर जख्र सातो लेला !त्यहाँ थुप्रिएका पशुको पनि, त्यसतै तीखो सिंग होलाओहो ] नेपालका घरघरमा, धेरै साना वच्चा होलान्‌ ।कतै, के, ती पनि यस्तै, राजद्रोही पाठ त पढ्दैनन्‌ ?पुर्वी डाँडो रंगिएदेखि पश्चमी डाँडो धमिलिउन्जेलआमा ! बावा भन्नेदेखि, स्कूल कलेज जाउञ्जेल&lt;br /&gt;
एक एकका गब्द उतानू, मनमनमा डिग्री लाउनू&lt;br /&gt;
साना भन्दै एक नहेप्नू, पेरङ्गो कोक्रो खाली गर्नू&lt;br /&gt;
&#039;गंगे&#039; जस्तै बुलबुली पाल्ने &#039;दशर्थे&#039; जस्तै चइमा लाउनेएक नछोइनू, एक न छोड्न्‌ सारा बट्ली कोच्न थाल्नू !हो त साँच्चै, विचार गर लौ, गन्ध भनेको कत्रो हुन्छ ?एक्कै थोपा खस्न पाए, सिङ्गै बैठक मगमगाउँछ&lt;br /&gt;
लौ ठीक पार्‌ सिस्नो पानी, तन्काइहाल्‌ छाले कोर्रालैजा तल त्यो फ्टाँगीमा, भुण्ड्या बाँसको छम्बामा&lt;br /&gt;
एक एक ररन्का रन्किन थाल्दा, श्रनि होला इतिहास पूरा&amp;quot;&lt;br /&gt;
अब के थियो त्यो बैठकको, उम्लिएको कराईमासब मसाला घुलमिल गे, वनिसकेथ्यो सुरुवाबाँड्नु अ्रगावै एक सुर्को, चाख्न भने भै कल्पेर मौनआज्ञा महाराजको पाए भै भट्ट बौलाएर घर्किएकोशान राख्न, पहलमान त्यो जागीहाल्यो:- “मन एपुड्के टंके काठा | तै ह्वैनस्‌ राज उडाउने ?&lt;br /&gt;
ला चड्कन गालामा, गर्छस्‌ सेखी हम्रो साम्ने ?&lt;br /&gt;
बन चक&lt;br /&gt;
डाइनामेटको आवाज भै टंकप्रसाद गजिए:-कर्मचण्डाल ! ए पहलमाने ! चिनिस्‌ को छ तेरो सामुन्ने !क्रान्तिको पहिलो गोली, तेरो राज उडाई छाड्नेबैठकभरिका मूर्खे पशु हो ! सर्कार देशको मुटु होलिइँदा खिइँदा चक्छ भने, त्यो मुटुको के काम लाग्यो ?हुकुमी राज नेपालीको, सवभन्दा ठूलो खाडल होयसकै गहिराइमा सब, नेपालीको सर्वस्व डुबेको,कसरी भन्छौ तिम्रो राज ईश्वरको बरदान हो यो ?बताञ हिसाब कति करोड नेपाली धन बिदैश पुग्यो ?आज शत्ति,को श्रन्घो बलमा, यसरी पागल बन्दै छौ !हजारौं नेपालीलाई, बिदेशमा लखेट्दै छौ&lt;br /&gt;
लाखौं नेपालीलाई, कात्रो तिमीहरु ओडाउँदै छौ&lt;br /&gt;
के झधिकार तिमीलाई नेपाललाई छ रित्याउने ?कसको दिल चाहिरहन्छ बाँची बाँची मर्ने ?&lt;br /&gt;
ढुङ्गा ह्व नन्‌ मानिस जाति, छाती खोली वढ्न नसक्नेभ्रब ग्रर्के मुटू बदल्न, अ्रव दोस्रै दम भने&lt;br /&gt;
देशमा जाँदो पहिरो लाई, राम्ररी नै रोक्न&lt;br /&gt;
देख्लौ कति चाँडै नै, एक तृफान यहाँ उठ्छ&lt;br /&gt;
त्यसको बेगमा ढुन्‌मृनिदै, तिम्रो बंशकै इतिथरी हुन्छ&amp;quot;विस्मित थियो त्यो पहलमाने, बन्दीको कुर्लन सुनेरहेरिरह्यो आँखा च्याती टृप्पीदेखि खृट्ठासम्म !&lt;br /&gt;
॥ नि नी रनित्य वहान वीरका फौज, पल्टन जस्तै निस्कन्छन्‌खर्लाङ्ग खुलुँङ सर्ल्याङसुलुँङ ब्याण्ड वाजा बज्छन्‌ !&lt;br /&gt;
नङ&lt;br /&gt;
एंक सिपाही अठपहरिया प्रत्येकका साथमा छन्‌&lt;br /&gt;
बात कसैले माने हुँदैन, मानो &amp;quot; छोटा- लाठ ताड्छन्‌&lt;br /&gt;
शेर जस्तो जगर फिजाई, ठाडा ठाडा केश उठाई&lt;br /&gt;
सूयंदेवको तेजलाई, मानो जलपलाउनालाई&lt;br /&gt;
उर्दी दिन्छन्‌ &#039;दशरथ चंद,-&lt;br /&gt;
क्“्झम्‌ सेलोट नेतालाई!”&lt;br /&gt;
सवक्रा मोटा मोटा सिक्री, खुट्टाका ती नेल पनि&lt;br /&gt;
छुन्द्रङ्ग गर्छन्‌, शब्द उचाली! सबभन्दा चर्को सलामी&lt;br /&gt;
हा हा हा हा हाँसो छोड्दै, हेछे तेजी नेत्र धुमाई&lt;br /&gt;
नेता हो यो &#039;टकप्रसाद&#039;, उत्साहको नौलो शक्ति&lt;br /&gt;
भन्छ प्रेमको स्रोत उमाली, सान्त्वताको किरण छरी:-&lt;br /&gt;
“थ्वन्दा छैन: धन्दा छैन, हे देशका लडाकूहरु हो !&lt;br /&gt;
सही कदममा हाम्रो पाइला, हेर कसोरी लस्किरहेको ! &#039;”&lt;br /&gt;
एक जोडको हर्ष बहन्छः एक शक्तिको पर्वत उठ्छ&lt;br /&gt;
आत्मविश्वास, श्रद्धाको, तातो रस गहमा ड्ल्छ&lt;br /&gt;
सब मौन छन्‌, सब प्रफुल्ल छन्‌, लडाक्‌ इतिहासका पानामा&lt;br /&gt;
उक्लिरहेको सूर्य छटामा, उद्द लित तिनका चेहरा&lt;br /&gt;
लाग्ने मानौ विजय पक्षको, हो यो राम्रो दिव्य सभाछि त छ छी उ&lt;br /&gt;
» भारतमा अंग्रेज शासन छँदा प्रान्त प्रान्तका गभनेर&lt;br /&gt;
(बडाहाकिम) लाई छोटा लाठ भनिन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
५ सिहदरवारमा थुनिराख्दा हरेक विहान टंकप्रसादलाई&lt;br /&gt;
बन्दीहरुले दिने गरेको सलामी (हाँसो गर्दै)&lt;br /&gt;
क डौ ला&lt;br /&gt;
यस बन्धनको छप रंगमा केबल चिन्ता मात्रै छैनबीरहस्को यस मण्डलमा, केवल ” भूत जमेको छैन&lt;br /&gt;
नयाँ युगको नयाँ कहानी, आक्कल-भुककल सिजिइँदँछहर्ष, विजयको ग्रमर प्रभाव, सतत प्रभावित भैरहेछखुला विश्वमा एक बिचित्र, नाटक फेरि खेलिन्छ&lt;br /&gt;
दशरथ चंदको एक स्वर उठ्छ:-&lt;br /&gt;
“ए ! लम्की लम्की हिड्ने मान्छे, के त्यो छोपी लग्दै छस्‌ ?कक्षका निम्ति कसका उपहार, श्राज लुकाई लग्दैछस्‌ ?अ्रठपहरिया थरथर कामी, झण्डै किस्ती खस्न लाग्छखूब सह्याली थूक निलेर दशरथ - सामु हाजिर हुन्छभयभीत स्वरमा भन्न थाल्छ:-&lt;br /&gt;
“केही ह्वैन यो केही ह्वैन; जर्साबको मिष्टान्न होहेर्नुहोस्‌ लौ भन्छु, यो अनार र मौसम हो”&lt;br /&gt;
देखादेखी हात उठाई, किस्तीमा अधिकार जमाईहाँसी, हाँसी, छानी, छानी, मिष्टान्न पुरै मृठयाईआदेश दिन्छन्‌ दशरथ चंद:-&lt;br /&gt;
“जा भन्दे तेरो जर्सावलाई, मैले यसरी हात हाल्यो !के त्यसको मात्रै हिस्सा लाग्ने, स्वादिलो यो श्रनार होहामी यहाँ छौं ज्युँदा मानिस, मात्रको हक चिनाउने।पयवलितिभियल गोल्टिन रित्तिइसक्यो, सिगरेट पत्ति पठाइदे ! ”&lt;br /&gt;
गोली लागी मर्ने प्रडेको, एक बिजुली चिडिया जस्तो” भूतकाल (पहिलेको याद)&lt;br /&gt;
४५२&lt;br /&gt;
रल्लटल्ल विस्मित भई, त्रासले हुत्याइरहेकोभ्रठपहरिया किस्ती समाती, गुन्दै गुन्दै हिड्न थाल्यो:-“हुन को हो, यो मान्छे ?&lt;br /&gt;
कैदी भनी समातिएर, सिमेस्टमाथि तपस्या गर्दो,आम्मै आम्मै कस्तो ठण्डी, संक्दै होश उड्छ मेरो&lt;br /&gt;
दुई जुराफमा बूट लगाई, हामी आफैं पहरा दिन्छौंगरमकोट, जर्सी लगाई, गलवन्दीले घाँटी सेक्छौं,तैपनि जाडो पञ्जाभित्र, इन्जेक्सन झैँ घोचिरहन्छखुट्टाका यी दश औंलाले, सुनिई कृण्डै मर्नुपरछे,&lt;br /&gt;
हेर यसको सुत्ने कोठा, हेर यसको ओड्ने कपडा !एक चादर ः्रेढी यसले, गरेको लौ कसरी गुजरा ?”“कर्साब्च, जर्साव, कवाँड्चिफ, अरक्‌ महाराजकै दाँया बाँयाहामी वस्छौ सधैं जस्तो, तैपान कस्तो हाम्रो चेहराहोश उड्दछ, ह्वेश उड्छ, मानो मुटु नै अ्रडिन पुग्योएक्कै शब्द वोल्नालाई, शरीर पसिनामा ड्ब्नुपर्छ&lt;br /&gt;
तर, हेर यो दशरथचन्द ! , जर्सावको थाली खोस्छमहाराजको भन्दा चर्को, यसको सवलाई हुकुम छ,हवन, के यो मानिस ह्वन ? ह्वैन, के यो ठकुरी ह्वन ?ईश्वरले सृष्टि गरेको, के यो उस्तै जीव ह्वन?&lt;br /&gt;
तब किन यो यस्तो चंकेको ? सुयं जस्तै हेर्ने गाह्रो ?न मुटुले दोस्रो वाजी, हात हाल्यो, मुख छोड्यो,&lt;br /&gt;
किन यस्तो विचित्र हो ?”&lt;br /&gt;
नो न वै&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
बन्दरीहहुको बन्धन प्राज, दिन परदित खुकुलिँदैथ्योराणाशाहीकी निगाह होइन, यो त उनैको चमक थियोहिजोसम्मका गुप्त सिपाही, बिस्तारै कान खोल्दैथेदेशभबितिको राग पाई, आफ्नो घरको फोटो संझीराणाहरूले गाडिरहेका, बनेलका जस्ता दान्हा देखीउनका ग्रात्मा ब्युँझि रहेथे !&lt;br /&gt;
एक सिपाही लम्की लम्की, पुत्रशोकी भै दौडी प्रायोदशरथचन्दको कोठामा, देखादेखी घुस्त पुग्योघिग कोठा उचालिने गरी, एक स्वासले भन्न थाल्यो:-&lt;br /&gt;
&amp;quot;हजुर ! आज त ज्यादै भो......सहन नशकी मेरो आत्मा, यसरी हुत्ती हुत्ती श्रायो,अन्याय र प्रत्याचारको, वेदना र सासनाकोहिमालय यहीँ खडा भयो .....मन पोल्दै छ ओ्रोडाहाले, अ्रव कत्ता लाने लौ जानेहो?&lt;br /&gt;
शो&lt;br /&gt;
उभ्भिएरे मुख छोपी, धुँक्क घुँक्क त्यो रुन थाल्यो&lt;br /&gt;
उसको उर्दी खाकी पोशाक, आँसुले नै धोइन गो&lt;br /&gt;
&#039;दशरथ&#039; भन्छन्‌ सान्त्वना दी, मुखमण्डलमा लाली छाईचश्माका ती चमकभित्र, श्राँखाका नानी सोम्याईः-&lt;br /&gt;
“के भयो हँ ? किन रुन्छौ ? पहिला जम्मै रिपोर्ट द्यौकालको निम्तो टान खोज्दौ, राणाले कसको रगत बगायो ?&lt;br /&gt;
न्‌ ७ न&lt;br /&gt;
श्रस्थिर तनले कम्पित मनले सिपाहीले फेरि भन्यो:-(“को हुन्थ्यो ग्रछू ? उही बाबु, भूइँचम्फा त्यो गंगालालकोएक एक लोता छाला तानी रक्तपात लौ मच्चाइएकोहरे, कस्तो बाबुको मुटु, हो भने त पुगिहाल्थ्यो !”&lt;br /&gt;
वीर &#039;दशरथ&#039; दश सूयं, उदाए झैं भन्न थालेः-&lt;br /&gt;
“को नडराङ, पर्वाह छैन, यही त वीरको वीरता होउसका पाथी पाथी रगत, राणाशाहीको चिहान होप्राणको वाजी लगाएर, हामी यसरी ग्राएका ह्वौं&lt;br /&gt;
रगत के हो ?- पसिना जस्तो प्राण दिन पनि तैयार छौं ! ”सम्पूर्ण कोठा गरमायो, एक एक आत्मा भन्न थाल्यो&lt;br /&gt;
“धन्य बीर हो घन्य धन्य, तिम्रो वीरता खेर जान्न ।&#039;&#039;&lt;br /&gt;
मौ ॥ तभारेभुरे सारा बात छन्‌ खालि कल्की टल्कन्छन्‌त्यस सूयंको उज्वल छायाँ, कोतूहलले तापिरहेछन्‌महाभारतको विराटपर्वे, हेर फेरि शुरू भयोप्रतिक्रान्तिका सेनानीको, यो शक्तिशाली जमघट होअदव यहाँ छ, राजदर्वार, सवले तौली बोल्नु पर्छप्रतिभाशाली राजाको, हुकूमलाई पचाउनु छबादविवादको सिलसिलामा, श्री ३ जुद्ध प्रश्न राख्छन्‌गाईले बाच्छो चाटे झै, शान्त स्वरमा बोल्न थाल्छन्‌:-&lt;br /&gt;
“हेर यतिका टल्किएका, निधार हामी देखिरहेछौं&lt;br /&gt;
न ब्द-&lt;br /&gt;
थिनका एक एक टलकत्राट, सत्य हृदयक्रो श्रामास माग्छौँबिचार गर लौ हाम्रो राज, कसरी कहिले आ्राएथ्यो&lt;br /&gt;
आज कसरी चौदिशामा, श्रकै झिल्का देखिरहेछौं&lt;br /&gt;
क्के यस्तै फेरि उम्लने छ ?...&lt;br /&gt;
अथवा सामसुम सुक्का ढोड, कक्रिए &#039;झ लत्रिनेछ ?कसरी हाम्रो इच्छा श्रफ दिनपरदिन बढ्दै जानेछ ?”त्मगर&#039; अगाडि आई भन्छन्‌, तीखा तीखा जुँघा मृठारीजोश रोषको ताप छीडी, भकभकाई गर्जी:”&lt;br /&gt;
“ठीक हुकूम भो महाराजको, सरकारको ज्ञान चौडा छनतमस्तक छौं हामी छोरा, आज केद्दी गर्नु जरूरी छ,&lt;br /&gt;
म त संझन्छू, हामीहरू ह्वौं नेपालका ज्यूँदा शेर&lt;br /&gt;
एक गर्जेन, एक तजेन, हल्लाउँछ त्यो मेघ;&lt;br /&gt;
हाम्रा पुर्खा &#039;जंग प्रभु&#039; ले जसरी रगतमा पौडी खेलेत्यसकै शक्ति ल्याइरहेछ, हामीमा तागत अहिले;&lt;br /&gt;
नेपाल हाम्रो, दुनियाँ हाम्रो, त्यो हिमालय भन्‌ राम्रोकत्रो शक्ति बृटिश राज्यको, सो पनि बोल्दछ बोली हाम्रोश्राज दुई चार घरमा द्रोही, जन्मन्छन्‌ यदि साँपसरिताकिरहने के काम छ ? सक्नुपर्दछ भुट्न यहीं&lt;br /&gt;
नजर होस्‌ लौ कैयौं दिन भो, को पाजी मूसो चुइँयगन्यो?सत्यानासी, ती अ्रभागी, खाँदै छन्‌ हावा सिमेन्टको,राजकाजमा पछि हट्नाले, श्रयवा माया राख्नाले&lt;br /&gt;
पाण्डव किस्सा बन्दछ, इस्पात बन्नु छ हामीले,”&lt;br /&gt;
४९&amp;quot;&lt;br /&gt;
एक भाषणले गउचर गन्यो, भाइ भारदारको रगत उमाल्योसबका मनको स्वच्छ भावना, एना जस्तै चंकन थाल्यो“ठीक, ठीक हो त्यस्तै हुन्छ” -पालैपालो शब्द निकल्छ«क्कृत्रिम मनको वज्जलाई, आजै प्रहार गर्नुपर्छ&lt;br /&gt;
थाहा पाउन्‌ दुनियाँका एक एक कुनाका मान्छे&lt;br /&gt;
कस्ता सूरा, कस्ता बलिया, होइवनिमन्छ महाराज अहिले”&lt;br /&gt;
गम्ब थाले श्री ३ जुद्ध ठूलो शोचमा भूटिएर&lt;br /&gt;
देन्गे हातले जू&#039;घामाथि, हलुकासित ताउ दिएर:-&lt;br /&gt;
न्सूरा छन्‌ लौ हाम्रा छोरा, हाम्रा भतिजा झन्‌ बलियाभारदारका बुच्चा बुच्चा, नाक प्नि खूब घारिला !शंका लाग्छ कतै यिनले होशको ग्रमृत चाख्न विसून्‌समयको घार नजानी, सिकारु भै डुब्न थालून्‌&lt;br /&gt;
राजद्रोही जरुर हुन्‌ ती सख्त दण्डका भागी&lt;br /&gt;
कसरी भन्ने ? प्रहिल्यै हामी लागौं तिनको प्राणको बजीकतै आगो कन्‌ सहकोस्‌ रगतका सिर्का छ्न नआग्रोस्‌&lt;br /&gt;
खूत भएपछि भन्दछ शास्त्र, बोक्नुपर्दछ पश्चात्ताप,”&lt;br /&gt;
खसखस घाँटी साफ गरी, घाँटीका सव वाक्य समेटीभन्छन्‌ प्रष्ट श्री ३ जुद्ध, गम्भीरउपर गम्भीर बनी:-&lt;br /&gt;
“थाहा छ तिमी सबलाई, मेरो यो छाती को नापजत्ति चौडा यो देखिन्छ, डब्बल अक यो हुनसक्छ&lt;br /&gt;
बाबु-प्रामाको मुस्कानमा, छोरा-छोरीको सृष्टि हुन्छउनको प्यारो चुम्बनमा तिनको तोते वोली खिल्छ&lt;br /&gt;
३०&amp;quot;&lt;br /&gt;
ईइवबरका वरदान यदि, छौरा-छोरी हुन्‌ भनेपृथ्वीका ईश्वर संरक्षक, आमा-वाबुले हुन्‌ पर्नेभूल भएमा, ्रलमलिएमा, संकटका भूत उज्नन्छन्‌तिनको अदृश्य झस्काले, जीवनका फूल वैलाउँछन्‌&lt;br /&gt;
बात, साफ छ, ताप ठूलो छ, यो त रणको बेला होबढ्ने, हट्ने अथवा अडिने ? यही नै मूल समस्या हो:गद्गद छु म देखिरहेछु तिमीहरू दिग्गज विद्वान्‌ छौसरस्वतीको बरदान पाई, दुनियाँको नाडी छाम्न सक्छौ;छाम त फेरि दोस्रो पल्ट, शुरु शुरुमा कैयन्‌ भूल हुन्छन्‌खस्रो सिलट, पिन्सिन आफै, घोई घोटिई चिल्ला हुन्छन्‌;भन मेरा शूर वीर हो ! अहिले कसरी लड्नु बेस छ?के रगतकै होली खेल्ने ? यो त गर्मीको बेला छ&lt;br /&gt;
परिसके सव माछा जालमा, के अहिल्यै सुइरो कोच्नुपछे;भस्मभित्रको आगो माने, फू फू गदैं उडाउनैपर्छे ?&lt;br /&gt;
अथवा समय पर्ख देखि, आफ्नो इच्छा पूरा हुन्छ ?”&lt;br /&gt;
“सोग्है श्राना समर्थन छ, श्री ३ प्रभूको हुकूमलाई&lt;br /&gt;
तर सम्झौं, अहिले भोक लाग्छ, मीठो नमीठो सव निलिन्छ ?अर्कोतिर त्यो कसौंडीमा, कवाफ पनि तैयार हुँदै छ;&lt;br /&gt;
श्रब के गर्ने ? -घण्टी हेदँ, भोकको ज्वाला उड्न दिने ?कवाफको त्यो लोभ गर्दै, शिथिल हुँदै चित्ता ज्वाने ?&lt;br /&gt;
खानु बढिया सामुन्नेका, रुस्खा सुख्खा पहिले&lt;br /&gt;
त्यसकै शक्ति बटुली फेरि, कवाफ मात्रै किन छोड्ने ?&lt;br /&gt;
&amp;quot;9१२&lt;br /&gt;
अहिले यौटा आगो सह्क्यो, यसको मृट्‌ लुछ्नुपर्छगाग्राका गाग्रा पानी खन्याई, यसलाई खग्रास पार्नुपर्छ;&lt;br /&gt;
नत्र ज्वाला कसरी मार्ने ? बिनात्रासको पानी पोखरी ?विद्रोहीको रगत नपिई, सकिन्न मोर्चा लिन बेक्रिक्री ! ”&lt;br /&gt;
&#039;जम्बू&#039; को यो वाणी सुनी, फेरि झर्को हे बग्योखूनीहरूका प्यासी दिलमा, त्यस दिनको श्राशा उम्यो&#039;पद्म&#039; उठी बोल्त थाले, मानो पद्यकमल भै&lt;br /&gt;
शान्त स्वरमा खोजे झै, अपूवे रंगको चित्र कोर्दे:-&lt;br /&gt;
““भाइहरूको ! याद छ सबैलाई, कवाँडचिफको रोल मेरो&#039;जृद्ध प्रभुको शान्तिका निम्ति, वोक्नुपदेछ मैले डोको;हेर भारत, जहाँ हाम्रा मित्रहरुको हंकम छ&lt;br /&gt;
दिनह कैयन्‌ काँग्रेसीको, हाट्टा हह वगिरहेछ;&lt;br /&gt;
उनी के गर्लान्‌ हाम्रा निम्ति ? जव हामी ज्यादै थोरै छौंपरिवतेनको घेराभित्र, नेपाल पनि धुमिरहेछनयाँ रोगको कीटाणु, जर्र यहाँ रोग सानेछ,&lt;br /&gt;
प्रहार नगरौं अहिले हामी, कत उत्ति बलले फर्केला_गोलघरको एक एक ईट, पार्ला बिद्रोही कोला कोला !रणनीतिको यो एक भेद, बुज,कहरूका निम्ति होशक्तिको घारलाई, तिखान यो साँद हो&lt;br /&gt;
कोही छैनन्‌ यहाँ मूखें त, के को धक्कम्‌धक्का हो ?”&lt;br /&gt;
न शेरे&amp;quot;&lt;br /&gt;
झौगौ साँच्चै मक्कल फुट्यो, सारा फिलिगो छरबारियौगोबर गणेशको हृदय फुटी&#039; जताततै पोल्न थाल्यो;-&lt;br /&gt;
“ढुन्न हुन्न यो, कतै हुन्न, को भन्छ यो रणनीति हो ?यो त यौटा कातर दिलको, सानो मूसे स्वर ह्वो&lt;br /&gt;
&#039;्द्र&#039; कहाँ गए, श्रनि त्यस्तै, अघिका &#039;खड्ग&#039; र &#039;देव&#039;के उनको प्रात्मा ज्युँदो रहे, हामी खेल्थ्यौं यो खेल ?&lt;br /&gt;
मर्नुपर्देछ छाती वाला, जो जो छन्‌ रणस्थलमा&lt;br /&gt;
पर्वाह के को जत्र सुरियौं, भ्रर्काको त्यस्तै ज्यान लिनआज ज्यानको बाजीमा, ती बिद्रोह्रीहरू आएका छन्‌ज्यानकै बाजी लगाइकनै हाम्रा गोली छुट्नुपर्छन्‌&amp;quot;&#039;&lt;br /&gt;
“सत्य बोल्यो, सत्य वोल्यो&#039; गोबरगणेशको बाघमुखले&lt;br /&gt;
के हाम्रो मात्रै पालो ह्वौन प्राइमिनिष्टरको कल्की लाउने ?यो त पौठा आफ्नो पालो, सकी उम्कने दाउ होभाइहरूको जीवनमाथि ठूलो अन्याय र खेलबाड हो&lt;br /&gt;
सहन्नौं हामी मरे पनि, ती बिद्रोहीलाई ननिली&lt;br /&gt;
हवन भने छोड्न्‌ सबले, जो सक्दैनन्‌ सन भ्रधि&lt;br /&gt;
हाम्रा छाती किन खडाछन्‌ यी तक्माका चमक लिई ?बिद्रोह्रीका रगत पिउन, भोकाएका छन्‌ यी अर्ति&amp;quot;&lt;br /&gt;
गर्जेन थियो यो गोबरगणेश, गोपाल त्यस्तै जम्बूमंत्री&#039; को&lt;br /&gt;
न शपे &amp;quot;-&lt;br /&gt;
आखिर बोले महाराज भझुकी:-““भँगो बाबु त्यस्तै मान्छौं&lt;br /&gt;
हाम्रो कलह, हाम्रो झगडा दिनेछ ती बिद्रोहीलाईनिम्न लाग्दाखेरि पनि, एक अ्रयाह शांक्त,&amp;quot;&lt;br /&gt;
ती त फँ&lt;br /&gt;
महाराजको राज बैठक, आज यौटा देत्यनगरीभारदारका गुणहरुले, तिरमभिराउँदो यमपुरी&lt;br /&gt;
वीरहरूको रक्त पौडी खेल्ने क्या लालसा छ&lt;br /&gt;
अन्धकारको कोठरीमा, यौटा चिडिया छोपन्छबन्धनभित्रै उसको प्राण, त्रस फ्याँकी चुँडिन थाल्छजसको मोहिनी सुन्दर नाम, “श्री ९ त्रिभुवन” बल्दै छजुद्धशसेर सिहासनको, आत्मालाई हलुका पार्छन्‌&lt;br /&gt;
रोब राख्दै कडा शब्दमा, एक बिचित्र माग गछेन्‌:-&lt;br /&gt;
“सर्कारः यो ही खड्गतिशाना, बिद्रोहीहरूका छ&#039;तीमावर्षने छ प्रब छिटै नै, गोलीको एक नजराना&lt;br /&gt;
श्री ५ को अटल गाथ-गादी मा उनको आँखा छवबिसयोस्‌ लालमोहर, गत्तिकँको फरियाद छ!”&lt;br /&gt;
खिस्स हाँस्यो त्यो विभूति, हृदय-वागको फूलमावेदनाको अथु रोकी, यहको एक कुनामा !&lt;br /&gt;
१ उडी न&lt;br /&gt;
बोल्न थाल्यो शान्ति रसको, एक अलङ्कार उनीजसकी सुन्दर रूप देखी भस्कन्छन्‌ ग्रमरावती:-&lt;br /&gt;
«दङग पर्छु आज सुन्दा, मेरो गद्दीको हाल सबै&lt;br /&gt;
को रहेछन्‌, सूरा बलिया, तिमौहरूभन्दा बेग्लै ?भन्नुहुन्न भन्नुहुन्न, भ्राज मेरो गद्दीमाथि&lt;br /&gt;
आँखा गाड्ने कोही जन्म्यो, यस नेपाल नगरीमाथि- लालमोहर के, ज्यान वाजी लाइदिउँला को रहेछश्री ५ को यो तख्तलाईं, फेर्ने खोज्ने बताञत ?”&lt;br /&gt;
जुद्धको त्यो भीम काया, जुरुक्क उभिई बिन्ती गर्छँ:-“उही पहलमान्‌ जो हजूर्को, गुरु भएर खेल गर्थ्योएक ह्वँ नन्‌, चार ह्वं नन्‌ आज हाम्रो देशमाथिचिलले कावा ख।ए झै तो, मडारिदै छन्‌ साँझ रातिख्याल होला सर्कारलाई, कसरी ती पर्काडए पनि&amp;quot;&lt;br /&gt;
ती पहलमान ! चिन्छु मेरा आदरणीय गुरु हुन्‌ !कसरी भनू&#039; उनले मेरो, गाथगादी ताक्न खोजे ?के छ मेरो भ्राज यहाँ ? के छ ततमा सिर्फ माया ?भूल होला, भूल होला, छोडिद्यौ मो छोडिद्यौ !”&lt;br /&gt;
घोष्टिएका, भुम्मिएका, खैर जस्ता ती जुँघामाएक संहार, एक प्रलय, नाच्न थाल्यो नानीमा&lt;br /&gt;
9५&lt;br /&gt;
भेक्मकाई, थूक छरेर, उम्लियो नि यौटा प्रतिमाकुलियो त्यो साँढे जस्तै, कुमक्ो जूरो हल्लाएर:-&lt;br /&gt;
“के भनेको ? के भनेको ? बोल ठकुरी के भनेको ?&lt;br /&gt;
चाख्न खोज्छौ तिमी भा, चटनी मीठो मृत्युको ?हेर पिस्तौल, हेर बैठक, यो त हाम्रो राजहोतिमी त यौटा पालिएको, बोस्सिएको बोका पोभ्रब खबरदार एक शब्द, तिस्किएमा यो बिचित्रतिम्रो, ज्यूदो लाशलाई, गोर्खामा दफनाइनेछ !”&lt;br /&gt;
भ्रब खतम भो त्रिभुवनको, शान्तिको पीगूष घाराफागुका भै पचका बन्दै, छोड्न थाल्यो तोड साराः--&lt;br /&gt;
बज्ञब म यौटा मोटो बोका, तव कित मेरो लालमोहर&lt;br /&gt;
के बोकाको हात र पञ्जा, हुन्छ र बक्स्योस्‌ लालमोहर ?दिन्न दिन्न लालमोहर म, यो मेरो श्राफ्तो धनहो&lt;br /&gt;
लैजाउ चाहे मेरो लाश, डाँडामाथि गोर्खाको ।आजसम्म के तिम्रो दिलले, केही कहिल्यै बात मान्यो ?शुद्ध हृदयले, प्रेमपुष्पले, मेरी मन्दिर शोभायो ?&lt;br /&gt;
उल्टै मेरो खोपीभित्र, तिम्रो लूट चल्न थाल्यो&lt;br /&gt;
मेरो कोमल झात्मा-सामु, उल्टो पिस्तोल-भूत नाच्यो !अझ देशको बर्बादीले, संसारको इतिहास तोड्यो;&lt;br /&gt;
झाज यौटा घृणित राग, फैलिरहेछ यस बैठकमा&lt;br /&gt;
माछौँ मलाई जाना जानी घचेडी त्यो दुगन्धमा ?&lt;br /&gt;
&amp;quot;३६&amp;quot;&lt;br /&gt;
घरमैभक्त यी त्रिभुवनको, सच्चा पूज्य गुरु हुन्‌&lt;br /&gt;
त्यस्तै उनका भ्ररू शिष्य, मेरा प्यारा भाइ हुन्‌;छोडिदिन्छु, जसरी छोडेँ, भेरो प्राण तिम्रो हत्केलामाराख, फ्याँक, पर्वाह छैन, यं हो हाम्रो फैसला !”&lt;br /&gt;
एक बन्दी बोलिरहेथ्यो, सुनको पिजडाबाट&lt;br /&gt;
उसको गर्जेन्‌, उसको छाती, घकेलिरहेथ्यो पापी परथर्केमान थे भारदारका, हूल आई उनलाई घेन्योएक असहाय बेला पारी, उनको लालमोहर लिइयोभित्र भित्रै उनको आत्मा, चित्कारिरहेथ्यो विषादझचि चाकिएर भन्न थाल्यो:-&lt;br /&gt;
पलौ, लेङ मेरो दुवै हातको लालमोहरतर दिलको गाढा लालमोहर ता यही कलेजाभित्रै छटुका टुक्रा पारी खोसे, तैपत्ति कहिल्यै भाग्दैन ! ”&lt;br /&gt;
तै न न&lt;br /&gt;
झाज मानो संहारको दिन हो, सिंहदरवारको पटाङगी आवादछविद्रोही ती वीरहरूको, कम्पनले मानो भूकम्प उठ्छ;&lt;br /&gt;
माघ मासको तातो धाम, श्राजै तिनले जान्न पाएमृत्युद्वारमा पुग्दा पनि, भ्रपूवं आनन्द अनुभव गरे;खड्गनिशाना लागी बनेको त्यो लामो श्रक्षरको खाकातैयार थियो ती वीरहङूको, टुङ ग्याउन जीवनगाथा;तैपनि मानो उदारताको एक भावना बग्न थाल्योमहाराजको सिह्वसनले, शब्द रूपमा दीप्ति छम्यो:-&lt;br /&gt;
नकल&lt;br /&gt;
(माफी माग, माफी माग, तिम्रो जीवन बच्न सक्छ !यमराजको ढोकाबाट, तिम्रो बापस यात्रा हुन्छ”&lt;br /&gt;
वीरहछको मुकुटरूपी त्यो अजङ्गको रूप बढ्यो&lt;br /&gt;
&#039;दशरथ चंद&#039; को त्यो आकार, बीरत्वको किरण छर्थ्योपृथ्वीको कुनाकुनासम्म सुनिने गरी भन्न थाल्यो:-&lt;br /&gt;
“ए ! नपुसक्र राणाहरू हो ! यो कस्तो तिम्रो ्रावाज होथाहा छैन के यहाँ उभिएका, नेपालीको अपमान हो ?&lt;br /&gt;
छैन कोही यस्तो व्यक्ति, यस मण्डलीको सदस्य भई&lt;br /&gt;
नेपाल ग्रामाको आँसु हेरी, आफू उम्कन मागोस्‌ माफी;भन लौ कत्रो तिम्रो प्रोग्राम, आज त्यस लालमोहरमाछ?परिवतँनको हावा रोक्ने, के तिमी कसैमा तागत छ?&lt;br /&gt;
यस कायाको रूप छिनेर भित्री उद्गार मर्दैन&lt;br /&gt;
छाला, मासु, रगत लिएर, बिद्रोही आ्रागो निभ्दैन,&lt;br /&gt;
_ सुन्यौ सुनेनौ ? अत्याचारी ! नेपालमा आगी सल्क्यो; सल्क्योआजादीको निम्ति आज, सबप्रयम प्रभियान हो यो;&lt;br /&gt;
तिम्रा मनभरका ती साँग्रा एक दिन कीना हाड हुने छन्‌तिम्रा राता गालाहरूले न्यायवेदीमा भोगदिनेछन्‌ !&lt;br /&gt;
हेर, हामी तिम्रै सामु, मुक्का तानी कब्‌ल गर्छौँ :-सआजादीको हावा नवगी, हामी कहित्यै मदैँनौं&amp;quot;बिद्रोहीका हृदयका पहिल्यै, अमर वती उड्त थाल्छन्‌ ]&lt;br /&gt;
न कद»&lt;br /&gt;
तिनकै एक एक संकेत पाई, अनेक लीला रच्न थाह्छन्‌ँ;हेर कस्ता बल्दा ज्योति, त्यस डोरीले बाँधिएकातिनका वीर आत्मा कसरी, तिम्रा मुटु हल्लाइरहेकासाग्दैनौं माफी इच्छा लाग्दो गर, हेछौं छाती खोलेर&#039;&#039;&lt;br /&gt;
कत्रो साहसको गजेन थ्यो यो, कत्रो विश्वासको भवन थ्यो?कति शुद्ध चेतना छल्किरहेथ्यो, कत्रो प्रतिभा बोलिरहेथ्यो !टररर ताली बीरहरूले, वन्धनमा बस्दा वस्दै ठोकेनेपाल-आमाको हार बन्न, एक भयंकर आवाज दिएः:-“इत्कलाव-जिन्दावाद ! राणाशाही-मूर्दाबाद प्रजातन्त्र-जिन्दावाद !&lt;br /&gt;
बैठकका ती भारदारले, एक छाया अहिल्यै देखेभोलि पसि के हुनेछ, छिटो गुन्न थाले&lt;br /&gt;
दुष्टहरूका गिदीमा फेरि, गुञ्जन थाह्यो क्रोधी रागदाह्वा किट्दै, सिंगै काँप्दै, बैठक भयो कम्प,यमानबूट बजाई गोबरगणेशले, एक फर्मान जारौ गन्यो:-“हानु कोर्रा ती पाजीलाई काढ रौं नछुटाई&lt;br /&gt;
दे कुन्दाले, दे बूटले, अ्रथवा जे जे भेट्टाउँछौवन्द होस्‌ ती विद्रोहीहरूको, सास फेर्ने त्यो नालो&amp;quot;&#039;&lt;br /&gt;
प्रहार शुरू भो हिसा फेरि, रगतका धारा उछिट्टिन थालेहुकुमभो श्री ३ जुद्धको-भैगो अहिले छोडिदेकाल पख्नका कुपकुरहरू तो, सुन्‌न्‌ आफ्नो अन्तिम घडी&amp;quot;&lt;br /&gt;
नप -&lt;br /&gt;
हड्गनिश्ञाना भन्दै गो, एक भयानक शब्द उचालीवीरहृदयका ज्वालामा, प्रतिक्रान्तिको राग उमाली:-&lt;br /&gt;
«सबेप्रथम त्यो शुक्रराज, जो गान्धी बुढोकी ढोकै होगीता गीता फलाक्दै, राजद्रोह्ी भाषण गर्थ्यो&lt;br /&gt;
सीधा साधा रैती दुनियाँ, भड्काई मानो चोर श्रीघुम्थ्यो, फिथ्यो, गल्ली गल्ली, भुस्याहा कुकुर चंक्राईमृत्युदण्डको सजाय दिइन्छ&#039; त्यस राजद्रोही अघमलाई,)”&lt;br /&gt;
“दोस्रो चाँहि घर्सप्रगत, पापको ज्यू&#039;दो मूर्ति होगाथ गादी ताकी ताकी, भित्र भित्रै भन्दै हिड्थ्योपहलमान्‌ त्यो भैकत ठूलो, बलको शेख्री गर्दो होनेपालका पशुपतिनाथको, त्यसले तेस्रो नेत्र खोल्योभइम हुन्छ ग्रब महाराजकी, हुकुमको निल्दै आगो,”&lt;br /&gt;
“तेस्रो ध्यो हो दशस्थचंद, बेशर्मी ठकुरी बच्चोनिमेक हराम, वरुवाल, सबभन्दा चण्डाल भेडोकाटिनेछ त्यो टुक्रा टुक्रा, गुहेश्वरीको बली भयो,”&lt;br /&gt;
“चौथो चाहि त्यो कलिलो, वेहोशी गंगालाल होबित्ता भरको छाती लिई, ढालसरि फुकाउन खोज्दोलहै नहँमा गुड्दै जाने, त्यो छालाको भकुण्डो होमारिनेछ त्यो बूट खाई, कोप्राका कोप्रा रगत छादीयही फर्मान महाराजको, पढी श्रहिले सुनाइयो&amp;quot;&lt;br /&gt;
परः ती चै&lt;br /&gt;
न. ६०&lt;br /&gt;
छैन चिन्ता शुक्रराजमा, त्यो अग्लो, बलियो शरीरमासत्घमेको, सत्कर्मको त्यो हँसिलो साधुमा&lt;br /&gt;
«अत्याचारका मुकेट्टाहरू, नाच देखाउन्‌ मेरा सामुसत्य विचारको खरानीले, उडाउनेछु रची जादूखुशी छु म, जाँदै छु यी, स्वगँद्वारको यात्रामाहाँसी हाँसी फाँसी चढु&#039;ला, प्रेम त मेरो नेपालैमा&amp;quot;&lt;br /&gt;
“पहलमान हो धर्ममक्त, ह_न्न कसैको दरवान&lt;br /&gt;
संझन्छौ म यस जुनीमा, तिमी झै हू दूषित मशान ?फलामका ती चक्रसित, यी वाहुले किन खेले ?&lt;br /&gt;
यस छातीले लाखौं बाजी, केका निम्ति डण्डा पेले ?जन्मिसक्यो एक शक्ति, यस लौह पुरुषभित्र&lt;br /&gt;
छरीसक्यो यसले वीउ झैँ लाखौंमा शक्ति विचित्रलैजान्छौ के तिमीहरू श्राज, मेरो यो पुण्य बात्मालाई ?यस पृथ्वीको काखबाट हावामा पारी उडाई ?&lt;br /&gt;
ङ, आउँदै छन्‌ केयन्‌ चेला, नयाँ चोला फेरेर&lt;br /&gt;
तिम्रो पशुता औ हीनतासित, ठन्दयुद्ध गने भनेर,कम्मर कस्यौ वरू अहिले, तिम्रो वेहोशी मेटिदिन्छुत्यो नारकीय महलको जात्रा ती नजरमा कोरीदिन्छु,”&lt;br /&gt;
“तिमक हराम ! निमक हराम !! खुव चिनिछ्ठस्‌मेरो राम ?”छाती खोल्दै दशरथ भन्छ, “5 हेर लौ परमधाम;&lt;br /&gt;
&amp;quot; ६१&amp;quot;&lt;br /&gt;
घेरै दिनतक छोपेको थिस्‌; त्यस दोसल्लाले आँखादान, पुण्यको छुसी बासना, छदै मेरौ कुलमा;देखेँ मैले आज पृथ्वी, कति उज्यालो चम्किरहेछ&lt;br /&gt;
- तेरो घृणित दोसल्ला त्यो, छौप्नलाई उड्दो रेछ;प्रक्रतिका कण कण सब, स्वच्छन्दतामा हुकिरहेछन्‌नेपालीका ध्रात्मा मात्रै तेरा वन्धन बोकिरहेछन्‌;पक्रीहाल्यौ पहिले मात्रै, तिम्रो यसरी ज्यान बच्योनत्र हुन्थ्यो थाहा हिज नै, यहाँ कसको राज हुन्थ्यो;तैपनि केही पर्वाह छैन, आइरहेछन्‌ वीर नेपालीहवामो इच्छा मूतै गराउन, वान्न तिमा ती जुह्फी&amp;quot;&lt;br /&gt;
&#039;देखिस्‌ तैले मेरो छाती ? तेरोलाई मात गर्छे&lt;br /&gt;
हृदय छाम्छस्‌ ? कति गोजी, डम डम यसले छोड्दै छख्वै त हेरूँ, को रहेछ ? यस तनको भकुण्डो हान्नेकसमा त्यति बल रहेछ, साँचै ज्यानकै बाजी थाप्ने ?गंगाको यो सुन्दर काया हाड छालाको ह्वँन&lt;br /&gt;
ईश्वरको यो दिव्य, सृष्टि, तिमीहरूको पेवा ह्वैँन;&lt;br /&gt;
यो त यौटा &#039;तील कमल&#039; हो, नेपालीको प्यारो घन होदेश प्रेमको आजादीको, चुम्बन गर्ने बालक हो;&lt;br /&gt;
बरबराई मानिस हिड्छन्‌, जो ओराफे चेतमा हुन्नन्‌&lt;br /&gt;
संक्‌ पशु हो ! तिमी कहाँ छौ ? कति त्रासका खाँदै छौ ?आज यौटा युवक ह्वैन, लाखौं लाखौं आइरहेछन्‌सरस्वतीको बरदान बोकी, तिमू मुकुटको हाई हान्नन्‌ ।&lt;br /&gt;
न दुर&amp;quot;&lt;br /&gt;
भनुला म इतिहासका पानामा, आखिरकार को विजपीहुन्छन्‌ डक&lt;br /&gt;
यी थिए ती वीरहरूका, वीरताका सच्चा वौली&lt;br /&gt;
शुक्र, गंगा, दशरथ, धम, शहीद पकितिका राम्रा जोडी;बीरताको विमान चढी, हेर कत्रो तेज श्रायो&lt;br /&gt;
अड्त सकेन, श्रड्न सकेन, हेन सकेन, हेने सकेन !&lt;br /&gt;
त्यस ज्वालामा उड्ने डरले, राणाशाही बोल्न सकेन;फरक्क फर्की, थररर काँपी, हत्यारो झैँ मुख लगाईबैठकले नै उद्घोष ग-्यो:-&lt;br /&gt;
“हुकुम नगन्ने शक्ति !?&#039;चै न ती&lt;br /&gt;
फेरि फर्मान पढिन थाल्यो खड्गनिशाना चम्किरहेथ्योवीरहरूका वल्दा आँखा, एकनासले हेरिरहेथेकानका-जाली भझन्‌कुनाकार, पाई खुशीले भुमिरहेथे;-&lt;br /&gt;
“हाम्रो धर्म परम्पराले, ब्राह्मणको ठूलो सम्मान गर्छेटंकप्रसाद औ रामहरि, घर्मवाट च्युत गरिन्छन्‌चारपाटे मृड्दा खेरि, उनका जातले बिदा लेलानगोलघरमा जनमर्भारि,, उपियाँ उट्सका साथ देलान्‌ !&#039;&lt;br /&gt;
एवं रितले अरू बिद्रोही, क्रमैसँग टांगिएफाँसीका डोरीमा ह्व न, कारावासको यातनाले&lt;br /&gt;
६२&lt;br /&gt;
कति जतमभर, कति आघा, मानो यसको हिस्स। लाग्योजसरी भोज औ भत्यारमा, मान्छे हेरी टपरी मिल्छन्‌ !&lt;br /&gt;
तन ती ती&lt;br /&gt;
दुई महिनाको कालो करतूत, राणाशाहीको जीवन मूलदुङ्गियो नि बीरात्मामा, घोप्ट्याई ज्यादै अमिलो चूकआज उनको सफर हुँदै छ, प्राज उनको आत्मा उड्छगोलघरको नक्सा हेर्ने, हृदय सबको मजबूर हुन्छ !बिदाईको बेला थ्यो यो, मित्रहरूको बिछोडथ्योयोअशुवारा लाम लागी, पह्रेदारको शरीर भिज्योकाँपिरहेको, प्रेम गढेको, हृदयको अनूराग लुकेकोदेवद्त झैँ, बाबु, दाजु, भाइ हिलमिल गरेको&lt;br /&gt;
रुरण कृण्ठ ती फुट्न थाले:-&lt;br /&gt;
“हे नेपालका अ्रगुव।हरू हो ! हं वीरताका राकेटहरू हो ।जान लाग्यो छोडी हाम्लाई, फेरि दशेन कहिले हो?&lt;br /&gt;
आज यसरी दुःखी जस्तै दीन, हीन, निमुखा जस्तै&lt;br /&gt;
तिम्रो योग्य काप्रालाई, घिसारिनेछ कठै ! व्यर्थ&lt;br /&gt;
यस्तो तिमी तेजलाई यस्तो तिमो स्नेहलाई&lt;br /&gt;
कसरी बिसौ ? कसरी छोडौं ? हाय हामी क्या अभागी ?&lt;br /&gt;
“यौटा यौटा गुन्टा वोकी नेल, गल्फन्दीले बेहिईकसरी हिंडौंला त्यस सडकमा ? कसरी सहने त्यो बेइज्जती&lt;br /&gt;
&amp;quot;६४&lt;br /&gt;
«ग्रयम-विश्व-युद्ध गर्दा जर्मनीलाई घ्वस्तपार्दा&lt;br /&gt;
यसरी नै जान्थे लाम लागी, हरलपक्ष सिपाहीका“तिमी हामा गुरु थ्यौ नि, तिमी हामा जोति थ्यौ नितिमूँ मिहिनेत, तिम्‌ँ&#039; आशीष, दिन्थ्यो फल हामीलाईहामी अन्धा, हामी काना, आज प्रलि अलि देखिरहेछौँखेल्न पाए, बोल्न पाए, तिमीहरूसँगै कति गर्थ्यौं ?“एक्कै सक्ो चुरोट तान्दा, एक्कै चिलिम तमाखु खाँदाकति आानन्द मनमा हुँथ्यो ? प्रब कहाँ र त्यो मजा ?&lt;br /&gt;
“आज पसरी छुट्नु भन्दा, आज यसरी च्वाउनु भन्दाबर हिजै हिँडीदिदा ह्वौ के थियो पर्खाल नाघ्न ?&lt;br /&gt;
वा कुनँ क्यै राह खोजी, यी नजरमा कोरिदिन्थ्यौ !कक थियौ लौ मार्च गर्ने, हामी सुरिला शिपाही थ्यौं ?वा श्रभ$ै लौ भनीदिदा ह्वौ, यो दैत्यलाई साफ पार्नरगत दिन्थ्यौं, प्राण दिन्थ्यौं, देश हामो स्वगे पार्ने&amp;quot;&lt;br /&gt;
&#039;किन मानेनौ ? किन बोलेनौ ? किन यो प्रीति गाडिदियौ !&lt;br /&gt;
भ्रब यी आँसु हामीसंगै तिमीहरू ग्रहिले जाइजान्छौ&lt;br /&gt;
नविस्यौं है हामीलाई, नेपालका यी प्रतपढलाई&lt;br /&gt;
“तिमी चारको स्वगे यात्रा” शान्ति फिजाओस्‌ शान्ति00 खै 020&lt;br /&gt;
क्रान्तिकारीका जीवन-वनमा एक विषाद गुङ्जिन थास्यो&lt;br /&gt;
घन्किरहेथ्यो काठमान्डूको, घण्टाघर झै राग भ्रनौठो&lt;br /&gt;
न दश&lt;br /&gt;
तड्पिरहेका हृदथहरू ती भित्रभित्रै जलिरहेथे&lt;br /&gt;
एक सुरमा व्यथित छटाका मौन अनुहार चाम्क रहेथे;को होला त्यो मृत्यु भूलेर दिल मुहारले हाँस्न सक्ने ?को होला त्यो मित्रवियोग, अनेन्तसम्म खप्न सक्ने ?रहेछ रहेछ, यौटा मान्छे, नेपालीको दिव्य मुकुट&lt;br /&gt;
डेंग नहिली, धैर्य लिएर, शान्त्वनाको बीउ रोप्नेकरुण रसले हृदय भिजाई, भावनाले भुलुलु उमालीस्मृतिको चिप्लो ऐना, एक बाजी हेने भनी&lt;br /&gt;
&#039;दशरथ&#039; बोल्यो छाती फुत्राई:-&lt;br /&gt;
गयै ह्यो हाम्रो अन्तिम बिदाई&lt;br /&gt;
जान लाग्यौं चार हामी, उड्न लाग्यौं चार हामीविस्मातको कुर छा, यो तिलक हो हाम्रा लागि&lt;br /&gt;
जुने आत्मा हाम्रो कममा छ, जुन भावना यो उम्लिरहेछइमान्दारीको मीटो दाख, दल्ली हल्ली भझुमी-रहेछ;&lt;br /&gt;
त्यै नै भविष्य साफ पार्ला, त्यै नै बन्धन तोडी-देलानबिस्यौ&#039; यस क्रान्तिलाई, यही नै हाम्लाई शान्ति देलाके भयो र ? त्रिजय घडीमा स्वर्ग्रटै हाँती दिउँला&amp;quot;&lt;br /&gt;
बीरताको, जोशको त्यो, हर्षक्रो अत्ति प्रेमको&lt;br /&gt;
एक घर्मी, एक कर्मी, एक जाति एक छातीबन्धुत्व अनि विश्वासको लम्किएको लहरो यो,थाक्रिए झैं हृदयबाट उम्ली उम्ली बेह्रिन थाल्यो&lt;br /&gt;
नष्द्नि&lt;br /&gt;
आ्रश्रु बिन्दुका चमकमा केही ग्रमूल्य लेखिदियो:-“काबूल गर्छौं, कवूल गर्छौं , क्रान्तिलाई बिसंदैनौ”नी ती नरआज एउटा नरकपुरीमा, वीर आत्माको बासछकोलाहलको आँधीले, मानव-जगत विस्मितछकत्रो खडेरी यप्त वस्तीमा ? कत्रो अभाव यस कुण्डमा !क्केका निम्ति भ्राएका छन्‌ ? यतिका मानिस भुम्मिदैकेका निम्ति रोइरहेछन्‌ ? पीडाका कथा कहँदैदोषीहरूको आत्मालाई, दण्ड दिने यो ब्यापार रेउनको शक्ति चूणँ, पाने खेलिएको नाटक रेचोर यहाँ छन्‌, डाँकाहरू पनि ज्यानमाराका लाम खडा छन्‌एक भयावह दृश्य उमारी निरथंकता गाइरहेछन्‌चार दिवालको चौगिर्दामा, चार दिवालकै घेरोछययको मुटुमा टोलिरहेको यौटा पिजडा छ;“&#039;गोलघर” रे यसक्रो नाम, हो त साँच्चै गोल यहाँशरीर श्रात्मा पोतिरहेछ, कालो मोसो साँक्‌ बिहान,प्राणरक्षक चूलोबाट, घू“वाले सास फेर्नु हुँदैनत्यही कोठाको भित्तो, दलिन, उसले नगनी सुख्खै छैनत्यसकै पछि पछि वीरहरूका आँखाहरू पनि नाच्छन्‌शायद दुइटै आफ्ना वन्धन, संझी संकी आँसु पोख्छन्‌;अफ्‌ उपल्लो एक वगेमा, कालकठोरी रोइरहेछबिचरो आजै वीरहरूको, सास पाउ चल्बलाउँछ;शरीर उसको चीसो धर्ती दिन प्रतिदिन पानी प्युंछ&lt;br /&gt;
न पि9 न&lt;br /&gt;
यसकै चीसो संझनामा, वीरहरूले डुख्नुपछे&lt;br /&gt;
यस पृथ्वीका सन्तापले, पोलिएर वीरहरू&lt;br /&gt;
पठाइएका होलान्‌ शायद, तोप पोख्न धुर धुरूह्वैन ह्ैन लौ पापीहरूले, पापसँगाली सृष्टि गरेको&#039;कालकोठरी&#039; पवित्र पाने, बीरहरूको प्रवेश भएको&lt;br /&gt;
हेने वोरका आँखालाई, तिनै चौसा भित्ता छन्‌- जहाँ लेउका लेपहरू, हरिया घाँस झै टल्कन्छन्‌&lt;br /&gt;
पृथ्वीको यौटा सानो टुक्रा, आज उनको जीवनसाथीत्यसकै दृष्टि त्यसकै प्रति, आज यिनको गाथगादी&lt;br /&gt;
माथि अकाश मलिन मुहार, मौन बाणी छोडिरहेखु&lt;br /&gt;
कसले सुन्ने ? कसले बुक्ने ? यो त कविको आत्मा चिन्छ ।&lt;br /&gt;
नै ती नी&lt;br /&gt;
सिंहदर्वार, पड्चिमकोणको त्यो उज्यालो पटाङगीमाशुरू भयो लौ मानवताको, बज्यो गाईजात्रे समेनाविद्रोही वी ब्राह्मणमद्ध &#039;टकप्रसाद&#039; औ “रामहरि&#039;उभ्याइए ती निमंम मूति, नीचताको शान लगाई;बकुल्ला झै नाक भएको, पापीहरुको पाप बोकेकोघर्मेशास्त्रको ठेकेदार, गुरुज्य्‌ पदले शोभिएको&lt;br /&gt;
एक झौीनो म ति अ्रघि सदै, ब्रह्य बाक्य छोड्न थाल्यो:-&lt;br /&gt;
५ए कलिगुगका नराधमहो ! भन, के के तिमी दुई खान्छौ ?चाख्न नपाई तुलबुलाउँदो, त्यो जिब्रोलाई संतोष दथौ&lt;br /&gt;
न दुय&lt;br /&gt;
दरिद्र, ओका नाङ्गा तिमीहरु, राहत खोज्दै हिड्थ्यौ ह्वैनौ ?श्री ३ प्रमुको उइयचिल, देख्ने सुन्दर मौका पायौ !&lt;br /&gt;
यप पर्वेतको लाली हेर, कति तमतमाई कल्किरहेछ !कति न्यानो न्यानो पार्नुपर्छ ? सामग्री सब दस्तूर छआज तिम्रो व्रतबन्धको त्यो शुद्ध जनै उतारिनेछमहानरकमा पौडी खेल्ने, तिम्रो इच्छा म.त॑ हुनेछ !गायत्रीका गेडाहरूसित, बिदा माग्ने बेला होयोपरपराको क्रमग्रननुसार कहतारोमा दही चिउरा खाओत्यो पोडेले मुछी दिनेछ, तिमीहरूले छुनुप्दैन !&lt;br /&gt;
क्रष्ट होला गाँस हाल्न, म_ख बाञ, उसले हालिदिन्छ ?हरिश्चन्द्रका चाण्डालहरूका, अरब तिमीहरू सन्तति हुन्छौकुनै मशानको कात्रो बटुल्ने, घुणित कार्यमा आज दरिन्छौहाँसो लाग्छ मलाई देख्दा, तिम्रा ती मौन आकारहरूपक्कै दिलमा भनी रहेछौः-&lt;br /&gt;
“धिक्कार यसरी मानिस बन्नु&lt;br /&gt;
अघि नै हाम्रो मृत्यु भए, कति राम्रो नगरी देखिन्थ्यो ?पापी, दोषी हामी रहेछौं, तब त यसरी बेहोशिदै छौहाः हाः हाः हाः कित चुप लाग्छौ ? पहिले नँवेद्य खाइहाल&amp;quot;&lt;br /&gt;
॥।&lt;br /&gt;
फेरि एकपल्ट ती दुई वीरका सुप्त झिल्का उछिट्टिन थालेडाम्न भनी, पोल्न भनी झिलमिलाई उड्न थाले !भात्माभिमानको राग छोडी वातावरण शूस्य बताईफिलिगोको मूते छटा, &#039;टंकप्रसाद&#039; बोल्न थाले:-&lt;br /&gt;
&amp;quot;६३&amp;quot;&lt;br /&gt;
“हाँस्‌ हाँस्‌ ए ! नरपिशाच !! हाँस्न नपाई रोइरहिथिस्‌&lt;br /&gt;
सरस्वतीका राशभित्र, दूषित बृद्धि फ्याँकिरिहिथिस्‌&lt;br /&gt;
हेर, झाज तेरो मालिक, जुट्ढ भन्ने त्यो राजा&lt;br /&gt;
कसरी मनमनै थररर काँपी, हेरिरहेछ भविष्य-ज्वाला ?&lt;br /&gt;
मूल जरो नै सुक्दै जान्छ, तव शाखाहरूले के गर्ने ?&lt;br /&gt;
भक प्रशाक्लाका भझूसहरू त हुन्छन्‌ बिलकुल काप नलाग्ने;&lt;br /&gt;
तँ त यौटा दास होस्‌ नि, कौरबका लाखौं जूत्ता जतो&lt;br /&gt;
के छ तँमा आफ्नै शवित ? झस्कलास्‌ तँ यत्ति सुन्दा&lt;br /&gt;
नेपालका धुरी धुरी पिच्छे छ छ पैसा बटुलेर-व्चान्द्रायणी ३. दान थापी, पोल्टौमा धेरै दाम लिएर&lt;br /&gt;
अझ त्यो आफ्नो मालिकको, जुत्ताका तलुवा चाटेर&lt;br /&gt;
बनिरहेछस्‌ घमंगुरु, घमेलाई नै पोलेर;&lt;br /&gt;
कसले भन्दछ तेरो धर्म, वेपालको हृदय उघार्छ ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
कसले भन्दछ तेरो कर्मे, निर्मल जलले घोइरहेछ?&lt;br /&gt;
भन्छस्‌ अहिदे-हामी भोका, नाङ्गा बन्दै केही माग्छौं ?[ज्य दिए पनि लिनेछैनौं, जत्रतक बाहुबलले लिन्नौं&lt;br /&gt;
ए, लोभी, लुच्चो, फटाद्वा बाहुन ! एक ढिक्का दहीमा राल&lt;br /&gt;
चृहाउने !&lt;br /&gt;
कसरी मानौं ? आज तैँले, हाम्रो धम र जात उडाउने !&lt;br /&gt;
जब हामी ह्वाँला पापी पुर्ष, ईश्वरकै श्रादेश हुनेछ&lt;br /&gt;
अन्ति हाम्रा प्रात्मा थ्राफे नै, यप्त जनमलाई धघिक्कार्ने छ&lt;br /&gt;
नै श्री ६ वडा गुरुजूले प्रत्येक घर घुरीबाट उठाउने ६।६पैसाको क&lt;br /&gt;
&amp;quot;७० &amp;quot;&lt;br /&gt;
तै, तँ झे, जुठे बाहुने, अनि तेरा पतित मालिकसिर्तैवरत्र, परत्र, दुवै ठाउँमा, तैयार छौं तौल्न शाफ्नो कर्म;बाँचिरहेस्‌, बरु त्यक्ष दिनसम्म, जब जनताको राज होला!&lt;br /&gt;
सत्घर्मको कलश उठाई, हामी तंमाथि छकिदिउँला;आजसम्मको तेरा पाप, कसरी कुलेसो पार्दै बग्छकोठा, कोठा, चोटा चोटा, सब पश्चाली धे फुछे !पापी आत्मा पोल्छौं हामी, त्यो दुर्गन्धी शव झैदेख्लास्‌, फेरि सूर्य उदाउंछ, पुण्पात्माको खूप सिगादँ”&lt;br /&gt;
म्श्री इ प्रभु ! दयानिधान ! ओजस्वी राजन्य वरण्य !!व्यायमूति, हे महाराज ! अब क्तरी सुन्ने यो तान ?तब त मँले बिन्ती चढ।एँ, भारदारको महिफलमा&lt;br /&gt;
टंके नै हो सबको आ्रागो, जिरे खुर्सानी आकारमा&lt;br /&gt;
किन हो कुन्नि ईश्चरले पनि, यस अधमको जन्म दियो ?अझ ब्राह्यणकुलमा हुर्काई, राजद्रोहको मन्त्र फुक्योघमेशास्त्र सब साक्षी छन्‌, पाना पाना हरप हरपउद्धृत गे, औँह्याउँदै, भन्न सक्छु छैन गजव,&lt;br /&gt;
राजद्रोह एक यस्तो पाप हो, जस्को अर्को सीमा छैनकुनै जाति औ कुल बताओस्‌, प्राणदण्ड दिन बाघा छैनठोक्नै पर्दछ तात्तो गोली, लुद्नैं पदछ यसको हस&lt;br /&gt;
समय छ प्रभो, विन्ती लागोस्‌, ग्रभै देखियोस्‌ यसको अन्त ]&lt;br /&gt;
आफ्नै महान्‌ गुरुज्यूको, यत्रो आज्ञा पाएर पनिसकेन जुद्ध आत्मा उठ्त ब्राद्यण हत्यौँ गर्ने प्रघि&lt;br /&gt;
-७१-&lt;br /&gt;
कसरी फेरि हुकुम देवस्‌ अब त यहाँ जन्मिसकेथ्योआत्महार औं भयक्रो, एक नपृंसक लउको,भंडामुनिको बैठकबाट बास्किए ती महाराज:-&lt;br /&gt;
“ भँगौ जे मो भनिसक्यौं, फेदैनौं हामी हाम्रो बाचा&lt;br /&gt;
लै जा बर शहर घुमाउन, यी चण्डालका फौजलाई&lt;br /&gt;
देखुन्‌ सारा दुनियाँका श्राँखा खोली यिनका पाप कहानी&lt;br /&gt;
नराख्‌ नराख्‌ एक क्षण पनि, ती पापीलाई हाम्रो सामु&lt;br /&gt;
चुक्ता गरून्‌ तो बांकी हिसाब, गोलघरक चर्पी सामू&amp;quot;रु ची गी&lt;br /&gt;
तर हिम्मत हारे राणाहरूका, एक एक बुज्नु क भारदारले&lt;br /&gt;
तसेन थाले, के हुने हो ? यो ज्यूदा मूति घुमाउनाले&lt;br /&gt;
फिर्ता लिए महाराजले, भाफ्नो बेह्रोशी हुकुमलाई&lt;br /&gt;
हारको त्यो तीखो झस्का; चिमोद्न थाल्यो उनलाई;&lt;br /&gt;
त्यस त्रासले वाटो पायो, सिहदर्वार औ झ्यालखान बीच&lt;br /&gt;
तैपनि कत्रो मेला लाग्यो इन्द्रजात्रा हेने भने भै;&lt;br /&gt;
दुनियाँका घर घरवाट, वैरिए श्रात्मा उलंदे;&lt;br /&gt;
एक सुईको चुईकी वन्यो, एक छेस्को जंगल भो&lt;br /&gt;
हेर्दा हेदै मनुज सागर, हृदयबोकी जम्मा भो&lt;br /&gt;
वेदनाको, चाहताको, यो मानौ यौटा जुलूस थियौ&lt;br /&gt;
गाई जात्रामा सद्घ मानिस, भूतप्र तका जामा लाउँछन्‌त्यस समाजका कुना काप्वा, खोत्ली खोतली देखाउँछन्‌आज कै जात्रा हो यो, होइन भूत झऔ प्रतहृरूको&lt;br /&gt;
&amp;quot;७२&lt;br /&gt;
साँच्चै मानिस डोस्पाई, मानवताकै बेइ्जत हो होचारपाटे शिर खौरेको, जुठो वोहोता हात लिएकोसुँगुरका आन्द्रा बेह्ठी, मानिसलाई दैत्य भनेको&lt;br /&gt;
भुत्रा झात्रा बोराहरूले, वरिपरि राम्ररी बेज्हेको&lt;br /&gt;
जंगली मानिस छोपे भै, भाग्न नदिई घेरिरहेको;&lt;br /&gt;
भ्रव भयो रे बीरहरूको, आजैदेखि घमं-नाश&lt;br /&gt;
उनको पुण्य फुत्त छली, गदँछ रे दर्वारमा नाच&lt;br /&gt;
तर चम्किरहेछन्‌, उनका सुन्दर मूतिहरू&lt;br /&gt;
बेफ्रिक्री अ्रनि शान्त्वनाको, दुनियाँमा वरदान छरी,&lt;br /&gt;
बूढा बूढी, तश्ता तश्नी, साना साना बालक पनिहेरिरहैन्‌; कसरी चम्बयो ! यी दोषी ? को रूप भनी“दोषी मानिस शिर भुकाउँछन्‌, जस्तो चोर लाज मान्छन्‌उनका आत्मा कुहिई सक्छन्‌, अनि त्रासका दुगन्त्र उड्छन्‌ख्वै र यहाँ ती सब चाला ? देखिरहेछौं अपूव प्यालामानो शक्तिको रसभरी, पिलाइ्ररहेछन्‌ मीठो सुरुबा”&lt;br /&gt;
अघि पछि लाग्ने मिपाहीहरू, टुलुटुलु हेछेन्‌ उनका मुखसंभिल्छन्‌, काँप्दै, कसरी ज्वाला, वालेथे तिनले हर्देम उन्पूख“यो त गजब हो, कुन शक्तिको, साँच्चै नै अवतार रहेछनत्र कप्तरी, त्यसरी निर्भीक, गोलीसरि बाक्य छुट्छ ?&lt;br /&gt;
हेर अहिले हिंडिरहेछन्‌, मानो यी हुन्‌ मौसम केस्रा&lt;br /&gt;
रहर लाग्दा, नखाई कनै डम्म डकार्दा”&lt;br /&gt;
भन्छन्‌ लस्कर मानिसहरुका, खासखास खुसखुस बात गरी&lt;br /&gt;
७३&amp;quot;&lt;br /&gt;
“को हुन्‌ यस्ता ब्रह्मा जस्ता ? हाँस्न सकेको कति ग्रमौीर ?दुःख परे पनि रून नजान्ने, यी हुन्‌ पक्कै देव सरी&lt;br /&gt;
कस्तो पाप यिनले गरेछन्‌, जान्यौ के तिमीले साथी ?&lt;br /&gt;
म त भन्छु-यी हुन्‌ सच्चा, स्वच्छ हृदयी निरपराधी,”&lt;br /&gt;
मेला सकियो, मेला सकियो, नेताको मूति जेल पस्योतर मनको छापा तैलचित्र झै, घुम्दै नाच्दै चम्किरह्यो !घर घरमा, मानिस गुन्न थाले:-&lt;br /&gt;
“आव ती नेता के भए ? ..अपराधी झै दब्न गए, अथवा कन्‌ स्मरणीय भए ?ब्राद्यणहरूको जात लिएर, के तिनको करतूत निभ्यो ?हेर कसरी भन्‌ सल्कनेछ, हावाको श्रब बेग वढ्यो&amp;quot;&lt;br /&gt;
त पट ॥&lt;br /&gt;
(३)आज रातको बिभीषिका, हेर्दै कस्तो डरलाग्दो छ!यसका ग्रन्तर - कुन्तरबाट, एक ज्वाला दंकिरहेछ !माघ मासको औंसी रात, एक विकराल छाया दिन्छकुहिराका ती कणकणलाई, विद्रोही झै हुरुद उडाउँछ !कस्तो स्याँठ ! कस्तो हुरी ! आज नेपाल बढादै छमानो, भोलि बिहानसम्म, सारा पृथ्वी साफ हुनेछ,देख्ने छैनन्‌ कोही आँखा, कत्रो परिवतेन यो आयो !कसरी सर्वत्र बेग हानी, यसले कूडाककेट सोह्लयो ?मध्यरातको त्यस किनारामा, तारा-गणहरू रुन थाल्छन्‌;&lt;br /&gt;
-७४--&lt;br /&gt;
भावी बीभत्स रप्तको याद, पाई शायद आँसु पुच्छन्‌;छैन यढाँ शोकपुरोमा, आश्वासनको हावा&lt;br /&gt;
सत्र देखियो करुण रसको, अर्कै, बेग्लै, छाँया;मेघ पनि ती उत्तरतर्फ, हिमालयसित बिदा माग्छन्‌&lt;br /&gt;
झुम्मिई झुम्मिई, गोलघरका छातामाथि टक्क अडिन्छन्‌;चडडड मेघ गर्जी आयो, एक विजुली सररर दगुम्यो&lt;br /&gt;
एक ब्यथाको एक चित्कार, आज यसले सुनाइरहेथ्यो“रोक रोक यो कालो करतृत छेक छेक यो अप्रिय स्वख्पहेर कसरी बढ्न थाल्यो, वीरहरूको छाती नजीक”&lt;br /&gt;
सेन्ट्रल जेलको शिवालयमा, पाटीमाथि बच्चा रोयोआमाको त्यो रुख्खो छाती, चुस्न नपाई छटपटायोपिपलको त्यो अग्लो बोट, झाञ्चिइकन हेरदैथ्यो&lt;br /&gt;
“के भयो लौ के भयो ? किन मेरो शरीर काँप्न थाल्यो ?हुनुनुनु हावा गडडड मेघ &amp;quot;यही उसको स्मृति थ्यो&lt;br /&gt;
लौन संह्वार बग्न थाल्यो, छौ त कोही थामी द्ौ&#039;शिवालयको भित्रि मूति, मौन वेदना गाइरहेथ्यो&lt;br /&gt;
“उठ्न सके यदि मादिस भै, रोक्थे, रोक्थे&amp;quot; त्यो भन्थ्योघोर अन्याय, प्रत्याचारको, किन यस्तो दुगंन्ध उडेको ?कता गए ती फूलका विख्वा, सुगन्ध तिनको किन श्रडेको ?&#039;”&lt;br /&gt;
आए तीन राता भ्यान, त्यस रात्रीका बीचमातिनको थररर श्रावाज करतो, वातावरण चौकन्नतिक्ल्यो रावणको त्यो छोरो, &#039;मेघताद&#039; भै गकेर&lt;br /&gt;
७५&lt;br /&gt;
म्यानको स्थूल शरीरमा, कम्पनको सञ्चार गरेरजस्को तीतो नाम “पहलमान्‌&amp;quot;” बोल्न थाल्यो थुक घरेर:-&lt;br /&gt;
“खोल्‌ त्यो ढोका खबरदार ! कतै कोही नबगोस्‌मानिस मात्रका कानको, एक एक जालो टालियोस्‌झाज यौटा, लीला हुनेछ, राजद्रोहीका प्राण लिइन्छन्‌भोलि देख्लौ कहाँ कहाँ तो, ल।श बनीकन भुण्डिरन्छन्‌”&lt;br /&gt;
ढोका उध्यो त्यो र।तको, बिजुलीको स्वीच ग्रफ गरेरचकमन्न अंध्यारो नाच्न थाल्यो खुशियालीको गीत छरेरखडा थिए ती, कडा थिए ती, जेल झेलका पालो पहरा;स्वप्नवागमा वीरात्माले, देखे नेपाल आमाको&lt;br /&gt;
एक ठूलो मूति सामु, भक्तिले बलिदान गरेकोबिउँझाइयो आँखामा पट्टी बाँधी बाँधी डोस्याइयोभिन्दाभिन्दै भ्यानमा राखी, एक नाटकको पर्दा गिन्यो&lt;br /&gt;
नु 00 तहुररर दौड्यो यौटा भ्यान, दक्षिणको बाटो पक्ररचौकीका ती पुलिसहरू, छक्क परे सनसनिएरमानो यौटा अपराधी झै त्यो स्यानको पाङग्रा गुड्थ्योढलमलिई, हतपताई, एक सासले सतर्क बनीभ्रडिन पुग्यो पचली भैरब, एक बृक्षको हात समाई !&lt;br /&gt;
भ्रव शुरु भो पुर्ण नयाँ नेपालमा एक कहानीथाहा थिएन कसैलाई, कस्तो यसको भ्रानी बानी&lt;br /&gt;
७६-.&lt;br /&gt;
झाधारातका छातीमा, श्रशान्तिको बच्न गित्योचकमन्न छटा टुक्रा टूक्का, फुदून गए भै छरबस्यो !सेन्ट्रल जेलको चौगिर्दामा, कुनाकुनाका गृलुबहरूचारसुरका बुर्जाहरू, वैलाएक्ा चपटेहरू&lt;br /&gt;
मौन भावले हेरिरहेथे, हृदय फुटाली रोइरहेथेभद्रगोलको झग्लो ढिस्को, हेर्ने नसकी लुट भयो रेतल बागमती अविरल छाल, छ्यालब्याल छ्यालब्यालफ्याँकिरहेथ्यो&lt;br /&gt;
बिद्रोही सब गीतहरूको, ताल सुर त्यो जाँचिरहेथ्योबीच बीचमा बग्दै बग्दै, सुप्त बालुवाउफ्री हेर्थे&lt;br /&gt;
शायद देखे होलान्‌ तिनले, नरहत्याको नाट रचेको ।&lt;br /&gt;
शुक्रराजको ज्युँदो प्रतिमा, मोटरको पेटले छाद्यो&lt;br /&gt;
त्यो अग्लो, योग्य, राम्रो छायाँ, बन्धकारमा टल्कन थाल्योउसका तनका प्वाल प्वालमा, उब्जेका ती काँढाहरुलेबिदाइको भेट स्वखूप लौ, तारागणको ढोक गरे,मनुष्यत्वको हावा मात्रै रत्तिएर पनि चाख्न नपाईजीवनको प्रन्ततंहमा बस्ने, कोमलताको ज्ञान नपाईबोलाइरहेको, राल छुटेको, पागल नाले-पशु झै&lt;br /&gt;
नारकीय त्यो जीवन बनमा, घुम्दै शब्द उचाले झै&lt;br /&gt;
प्रश्न गन्यो, पाप कुण्डको &#039;पहलमान्‌&#039; नामको गोहीले-&lt;br /&gt;
भन्‌ लौ अहिले के चाहन्छस्‌ ? नरमेध हवनको बोकोमिल्छ तँलाई फूल अक्षता, विश्वभरिका बस्तु भोको ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
बन 9७9 न&lt;br /&gt;
जीवनको यस भ्रन्तिम क्षणमा, ईष्टदेव कुल साक्षी राखीमाग हृदयको प्यारो बस्तु, मृत्युको क्षण भुल्ना लागिहेर, यही रूखको हाँगो, तेरो प्राणको चिडिया माग्छ ।&lt;br /&gt;
वीर वोल्यो गम्भीर मुद्रा, चौडा छातीलाई फुक्काएरएकान्त ग्रनि चिर संझना, दियोमा तेल थपेरकालरात्रीका यस बेलामा पति, सौम्य भावको कान्ति छरेरनभमा बल्दा माराहरूको, मलीनतामा धैर्य भरेर&lt;br /&gt;
एक नौजवान खेलाडी झै, सीधा घरहरा भै उभिएर:-&lt;br /&gt;
&#039;बाँचिरह्यौ, बाँचिरदह्यौ&#039; ए ! पापका कुण्डली हो |तिम्रो दयाको दानलाई, कुन मुखले बयान गरुँ ?मेरो दिलको यस धुकधुकीमा कत्रो तिम्रो मायाछ?यसको पुण्य यात्रा निम्ति, कत्रो प्यारो तरखरछ?तर, याद गर यो चौडो छाती&#039; तिम्रो आशीस चाहन्नयो चम्केको निधार पनि, तिम्रा बाहु चुम्दैन,&lt;br /&gt;
माग्छ त्यसैले, जसले जीवन-पथमा साहस छोड्छआत्माज्योतिको वल्दो पाला, आँखा चिम्ली भुल्छ,म त उज्यालो नेपाली हू, नेपालको रंगमा खेल्दैजूठा टपरी लात मारी, चोखाका निम्ति लड्दैश्राइरहेयँ, आइरहेछु, हिम्मतको पिङ मच्चाउँदैहिम्मतकै तनले लच्काएर, फाँसीमा हाँरदै भूल्नेदेश-सेवा औ समाज-सुधार गर्ने प्रबल शुद्ध भावनावीरताका यौ दुई तक्‌मा, झल्काई हिडने मेरो बाना,&lt;br /&gt;
जा एप लन&lt;br /&gt;
यही सुन्दर सानो गीता-पुस्तक मेरो प!वन छ !जब चाहन्छु, तब पढछु, यही नै जीवन साथी छ,पढछु भ्रहिले अंतिम बेला, श्री क्रष्ण प्रभूको भाषणजसले सृष्टि संहार ग-यो, रची त्यत्रो महाभारत !&lt;br /&gt;
“क्मे क्षेत्रमा अक्ल अक्ल&#039; यही भगवानको श्रादेश होयसकै पालन-पोषण गर्दा, यसरी ्राज म उम्भिरहेकोभन्छुग्राखिर निभ्ने बेज्ञा गीता नै हाम्रो ग्रात्मा होयसमै हामो जीवनको, सच्चा अनुराग भरेको&lt;br /&gt;
म त ग्रहिले यौटा चिडिया, इन्द्रासनमा पुग्न हिडेकोभयका हावा किन छुन्थे; देखी यी कोमल पंख उडेकोतर यो चिडिया पृथ्वी तलमा, श्रायो केही सन्दैश दिनदुःखी, दरिद्री, दलितहरूको, जीवनमा चर्को बिगुल फुवनदमन नीतिको सिक्री तोड्नु. जीवनको पहिलो मागयसमै मृद्यु तर्सी तर्सी, भागी बग्दछ मुग्ध सुवास&lt;br /&gt;
आज गीताको बाणीलाई, राणाशाही लत्त्याउँंदैछत्यसकै रक्षा गर्ना निम्ति शुक्रतारो ज्यान दिदैछ&amp;quot;&lt;br /&gt;
क्षणभरमै खतम गरियो, यस वीरको इह्‌ लीला&lt;br /&gt;
भुल्न थाल्यो त्यस हाँगोमा, त्यस वीरको दिव्य छटा&lt;br /&gt;
प्राण उसको उडी-सकेथ्यो, किक्लिक किक्लिक गर्दै&lt;br /&gt;
दुइ चार बाजी, छटपटाई, आखिर ,सरल शान्त हुँदै&lt;br /&gt;
तर गुन्जिरहेथ्यो, त्यो घर्मे गुरुको, गीता बाणी बागमतीमा&lt;br /&gt;
चे ते त&lt;br /&gt;
०० छे?&lt;br /&gt;
अर्को स्थान दशरथ, गंगा, बोकी कुद्दै भाग्न थाल्योकाठमाण्डूको सुप्त चेतना, स्वप्न देशमा चलमलायोभुकिरहेथे, टोल टोलका, ती इमानदार कुबकुरकृतुवार मात्रै जसको जीवन, साँची राख्ने दस्तुर&lt;br /&gt;
के भन्छस्‌ तँ दशरथ हँ ? ह्वनस्‌ स्पाते ठकुरी बच्चो ?भ्रब आफैं ग्रहिल्यै फंसला गर्‌, त कच्चो कि पक्को ?तेरै पहिले ्ोत्मा उडाई, अन्ति त्यो गंगे तेर्स्याउँला कि ?तेरो पिशाची मृत्यु देखी बेहोश भै त्यो पहिल्यै मर्ला,त्यसो भएमा गोली बच्छ, अझ ढुकुटीको घन बढ्छफेरि हान्ने पोडेलाई, ताकी रहने के जर्रत छ?“अठपहरिया भ्रहिले मेरो बाहु समाती तैनात छ&lt;br /&gt;
तँ लाछी पनि वाँठो भै, त्यति टाढा वसी बोल्दैछस्‌&lt;br /&gt;
नत्र देश्यिस्‌ को हो &#039;दशरथ&#039;, बैतडीको रसिलो पानीरमरमाउँदो महाकालीको, हावाले हुकेको जवानीत्रिपुर सुन्दरी साक्षात्‌ भगवती, कुलदेवीको आसिकमाछाती फुकाई बढी रहेको, बज्न हृदयको सुन हुँकार;-&lt;br /&gt;
“ठानिस्‌ तैँले ह्वामीलाई, एक साधारण मान्छे ?&lt;br /&gt;
जो घुम्छन्‌, डुल्छन्‌, हाँस्छन्‌, रुन्छन्‌&lt;br /&gt;
संकट रौ हप हुनाले,&lt;br /&gt;
हामी ह्वौं ती कठोर मानिस, जसका हृदय ढाल समागैँडाका खाग जस्तै, छुट्छन्‌ बलिया, ठोस जवान&lt;br /&gt;
सक्छस्‌ यदि हिम्मत क्यै छ ? आइज कुस्ती एक एक साथ&lt;br /&gt;
ब् द्2 क&lt;br /&gt;
खैलौं यही विष्णुमतीको, बगरमा आत्मविश्वासका साथ,बन्दुकको त्यो नली पक्री, भैरहेछस्‌ शेरसमान&lt;br /&gt;
गर्जी गर्जी हाम्रो आत्मा, तोड्न खोज्छस्‌ कत्रो शान&lt;br /&gt;
तेरा सेख्ली ढुगेन्ध बनेर, उउलान्‌ यै आकाशमाथि&lt;br /&gt;
कुहिएको तेरो लासलाई, श्याल गिद्धले पनि नरुचाई&lt;br /&gt;
पीठ फर्काई घुणा, लाञ्छुना बालुवाले पुजा गर्लान्‌ !स्वतन्त्रताको शत्रु तेरो, आत्मालाई ललकार्लान्‌,&lt;br /&gt;
हान्‌ जसलाई तेरो इच्छा, खुला छ छातीको श्रास्मान&lt;br /&gt;
किन लिन्छस्‌ भगवतीको, तँ पापी यसरी नाम ?&lt;br /&gt;
उनको पवित्र ग्रात्मालाई, डोच्याउन खोंज्छस्‌ नरक द्वार ?&lt;br /&gt;
तर, यदि तेरो वंशको नै, कतै रत्तिभर साहस छ&lt;br /&gt;
पख्‌ ग्रभै तीन घडी रात, भोलि बिहान भोर हुन्छ,नुहाउने ती सारा मानिस, यस गंगाको तीर&lt;br /&gt;
पुजा गर्ने भक्तहरू सब, त्यस मन्दिरको द्वार&lt;br /&gt;
सारा जम्मा होउन्‌, श्रनि पछि पढ्न सकेस्‌ त्यो फरमानजसले गर्दा हामी दोषी हुन्छौं, हुन्नौं दृष्टि समानभनुन्‌ सारा दुनियाँहरूले-“तिमीहरु पुरा दोषी छौ&amp;quot;अनि हानेस्‌ यो छातीमा, गौलीका मनलाग्दा-फैर,मध्यरातमा चोरी गर्दै, ्रात्माको टङ्घार बिर्सीझ्यालखानको ढोका फोर्दै, स्थूल कायाको ममता पुछी,पस्न सकिस्‌, त्यस बन्धनमा, जहाँ तेरो राजछकसरी यत्रो बायुमण्डल, तेरो कातरता हेने सक्छ ?&lt;br /&gt;
तँ पाजीको वातलाई, त्यो नुते कुक्कुर टेर्देन&lt;br /&gt;
&amp;quot;५१२&lt;br /&gt;
यक्त बगरको छेञ्छाउ ढुङ्गोले पनि हेर्दैन,&lt;br /&gt;
तमाम दुनियाँको रगत पिई, सूगुर जस्तै बोसो हालीघुमिरहेछस्‌ यस रछानमा, शंकाको घार बगाई,&lt;br /&gt;
देख्लास्‌ गोली छोड्नेबित्तिकै, त्यस निधारमा कत्रो टाटो !बोक्सीको तिम्नामा झैँ, डाम्नेछ टिका कालो कालो&lt;br /&gt;
खास दोषी को रहेछ ?-छुट्याउलान्‌ नेपालीले&lt;br /&gt;
एक करोड देशबासीले सलाम ठोक्लान्‌ वञ्चरोले ।&lt;br /&gt;
तर”&lt;br /&gt;
सुनिस्‌ उल्लू, जन्म अन्घा, यी त सारा बात मात्र हुन्‌तेरा पुस्ताका पुस्ताले पनि, यसमा साक्षी वक्न सक्वैनन्‌तेरो खूनी भ्रात्मालाई, आज यत्ति चुनौती दिन्छु-हानेस्‌ सीधा फायर भ्रडिई, पहिले प्यारो गंगा माथि,मेरा गाला चाउरिन लागे, घस्काएका कागज झैँछातीका रौं उम्रिसके यी, निर्भिकताका बिरुवा झै&lt;br /&gt;
गंगा मेरो कम उमेरको, 5 मेरो मृत्यु नहेरोस्‌&lt;br /&gt;
मै हेर्छु, जाँच गर्छु, उसको मृत्यु कसरी होस्‌ !”&lt;br /&gt;
यत्तिकँमा वीर गंगा, फुत्त बिजुली झै उड्योभाक्रोशको ज्वाला छोडी, प्रक्रति नै थर्काउन थाल्यो:-&lt;br /&gt;
“ए, पहलमान्‌ ! बिर्सीस्‌ तले ? तेरा पुर्खाको नपूंसकताविश्वासघात औ बेइमानीको, हंकन्थे जो पंखा,बाबु, दाजु, कोही नभनी, खूनको सिर्का पिउँथे&lt;br /&gt;
न परे&amp;quot;&lt;br /&gt;
त्यसकै तातो तातो ह्वाबामा, हाड छ्लोस्न अ्रघि सर्थे&lt;br /&gt;
तँ तिनकै सन्तान ह्वयौँनस्‌ ? बोतलका भरमा जिउने&lt;br /&gt;
हटा नशा त्यो श्रनि हेरौं, मेरो तागत त्यो बोल्नेगंगालाल बच्चो हो रे, कसले तँलाई भन्न श्रायो ?उसको छाती सानो पात, नापी लिनेहोकोत्यो?&lt;br /&gt;
ल्या त्यसलाई यहाँ म, हो होइन प्रमाण दिन्छु&lt;br /&gt;
त्यस पांगलको खुस्केको होश, क्षणभरमै जगाइदिन्छुकसले भन्दछ तेरो थाक्कति, मनुष्य मात्रको अंश होकसले गन्दछ तेरो विस्मृति यो त सीमाहीन सागर होजीबित राक्षस प्राज खडा छस्‌ मनृष्यताको महलमाहाड, छाला, रगत मात्रै सँक्न्छस्‌ काँचको प्यालामातेरा फर्मान्‌ मरुभूमिका बालुवाका सुख्खा हावा&lt;br /&gt;
हामी आफ्नो उबेर बाली, सिच्ने रसिला फोहोराकसरी सुनौं तेरो गजेन, सिट्टा साँढे गर्जे झैं&lt;br /&gt;
यो त हाम्रो इज्जत जाने, वीरताको शत्रु नै&lt;br /&gt;
हेर्‌, बेहीशी आँखाका नानी, च्यात्नसकुञ्जेल उघारेरइन्द्रचोकको डबलीमा बोल्ने, वीर गंगालाल यहाँ खडा छयाद छैन के, उत्तिखेरैं, उसले छाती खोलेको ?&lt;br /&gt;
हज्जारौं नेपालीलाई, क्रान्तिको सन्देश फुकेको ?&lt;br /&gt;
अब के सोध्छस्‌ कसले खोल्छौ ? छाती पहिले ग्रालो पालोहाम्रा छाती सँधै खुला छन्‌, च्यात्त अन्धकार जालो योकति राम्ररी गंगाजीले, हम्किरहिछिन्‌ हावा&lt;br /&gt;
भुक्ति मृक्तिको दुइटै द्वार, पस्नलाई पारी खुला&lt;br /&gt;
न पद&amp;quot;&lt;br /&gt;
सुन्‌ तसेलास्‌ श्याल करायो, यो त ठूलो मसानघाट होयहाँ ज्यूदै भूत प्रेत, शुण्ड मुसुन्ड शिवका गण&lt;br /&gt;
फुटवल औ क्रिकेट खेल्छन्‌, तै जस्ता लाछीहरूको&lt;br /&gt;
अब के को देरी, किन भ्रडिइस्‌, अलि बेरमा भोर हुन्छतेरा घरानियाँका&#039; मासु लुछी दुनियाँले ठूलो भोज लाउँछगर्‌ के गर्छस्‌, किन ल्याइस्‌ ? तैयार छौं हामी लड्नालाई&#039;&lt;br /&gt;
सुन्न सकेत, सुन्न सकेन, पहलमान्‌का पापी कानलेउम्लिरेहेथ्यो उसको घृणा, नरभक्षणको तृष्णालेदुई बीरका शब्द खूपी, दुई तलवार चम्किरहेथेउसको अह भावनामा मार हान्दै काँपिरहेथे,उनीहरूका शोभित मूति, दुई किल्लाका बार बनेआज्ञा पाई पोडे सुरियो, बन्दूक धामी कम्पनले ।&lt;br /&gt;
हृदय उसको छटपटायो, प्यास उसको बढ्न थाल्योविष्णुमतीको चोसो पानी, घट घट तुर्ने मन लाग्योकाँपिरहेथे उसका हात, मानो पिप्पलकात पात&lt;br /&gt;
के भएको बुझ्न सकेन, रित्तो थियो उसको माथ,आँखा उसका तिरमिराए, मानो ध्रवतारो देखेरकान उसका बन्द भए, मानो गर्जेन सुन्न पुगेरक्रान्तिकारीका सत्य भावना, हृदयतलमा रोपिएरतिस्तब्ध रात्री हेरिरहेथ्यो, शुद्ध हृदयको वग्दो घारा,चाहन्थ्यो हौ तपेण दिन, त्यस पोडेको बलिन्द्र धारा&lt;br /&gt;
न पोई&lt;br /&gt;
फेल खायो, फेल खायो, उसका काला हातहरूलेबोल्न, नसको दन्त बजाई, घोरित थाल्यो कल्पनलेपहलमान्‌का नेत्र पल्टी, एक पशूता जागी झयो:-&lt;br /&gt;
“ले पाजी ? कहाँको कुक्कुर ! ! सकिनस्‌ तैँले गोली छोड्नती दुई घिच्‌ सारसलाई, हाँसी हाँसी काने !&lt;br /&gt;
-छोड्‌ म हान्छु, श्रार्फ मार्छु, यी बाहुका तेज अति&lt;br /&gt;
देख्चान्‌ पशुहरू आमा संझी कत्ति भयंकर यो रजनी 1&amp;quot;&lt;br /&gt;
ठाई य, ठाई, ठाई गोली छुट्यो, उसका अस्थिर हातबाटफन फनाई रातो गोली, भेद्न पुग्यो तारोनेर&lt;br /&gt;
कसरी सक्थे पापी हात, काँपिरहेका दुइटै काँघ&lt;br /&gt;
पापको त्यो तातो राग, छेकिरहेथ्यो मानो बाँध&lt;br /&gt;
चम्किरहेथे चारै आँख्वा, हाँसिरहेथे राता गालाजीतबाजीका घारमा उभिई, तैरिरहेका वीरात्मा&lt;br /&gt;
त्यत्तिकँमा कु्त्पो टाढा, तिख्लामा रक्त-धार लिएरदशरथको त्यो परुष बचन, पहलमानका कान चिरेर:-&lt;br /&gt;
“हान्‌ श्रभ तेरा बाबुलाई, रौं &#039;छ भने, त्यस छातीमाआमाको छोरो दुध पिएको, भएदेखि जन्म लिदाउहिल्यै तेरो प्राण उडेथ्यो, घाई बुढियाका मायालेउभिनसकिस्‌ प्रहिलेसम्म, उसकै तातो बलले&lt;br /&gt;
आज तेरा मुटाभत्र मनुजताको ताप छैन&lt;br /&gt;
यसले फुक्ने रगत नाला, शक्ति संचार गर्दैन&lt;br /&gt;
नप&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के हेर्ने चाहिस्‌ अत्याचार ? पिल्सी पिल्सी तड्पिरहेकोवीरताको वलिवेदीमा, साहसको अवसन भएको ?&lt;br /&gt;
सुन्न दशरथ, रुन्न गंगा, पृथ्वीको भार हने आए&lt;br /&gt;
तेरा कुलका दानव लीला, एक सासमा तिल्न भाएहल्लिरहेका तेरा हात, रूखका भझीना हाँगा भै&lt;br /&gt;
भ्रब छिटै नै भाँच्चिनेछन्‌ धमिरा निमित ढिस्का भै&lt;br /&gt;
ए बाँची बाँची मरिसकेको, रक्तचापको ढल्दो शवआफ्ना कुकृत्यको प्रदशेनमा, लौ आ फेरि अघि सर्‌देखिस्‌ यत्रो चौडो छाती विश्व कथा सब थापी हिंड्ने&lt;br /&gt;
ललकारिरहेछ तेरो बन्दुक, नग्राटाएको गोलीले&lt;br /&gt;
हान्‌ हान्‌ लौ, किन पर्खंको ! किन चाँडै भयभीत भएको ?हाम्रो आदेश श्राज छ्ट्छ, यही नै तेरो कतँव्य भयोनेपालको चिसो बतासले हेर्‌ लौ ङ, बिमान ल्यायो”&lt;br /&gt;
शब्द शब्दमा रक्तधारा, भुलभुलाई आाइरहेथ्यो&lt;br /&gt;
एक अथाह वीरत्वको, बाणी मुखमा झूम्मिरहेथ्योनेपालीको खुकुरी झैँ, दापवाट त्यो निस्क्यो&lt;br /&gt;
गंगा फेरि शान्त स्वरमा, एक चुनौती दिन थाल्यो:-&lt;br /&gt;
“खुल्ली छ गंगा, खुशी छ दशरथ, आजै तेरो हार देखीयत्रा छाती खोलिदिँदा पनि, माने नसकेको एक निसानीठूलो शिकारी, मुटु उचाली, मृत बाघमाथि लात राखीफोटो खिच्थिस्‌, सूरो बन्दै, शिकार गर्दा चितौने काडी&lt;br /&gt;
न द६&amp;quot;&lt;br /&gt;
ख्वै त तेरा कसरत गर्ने, ती बलिया, मोटा हातहरू ?एक नम्वरी तारो हान्ने भन्ने झुट्टा बखानहरू ?&lt;br /&gt;
ड्याल कहाँको गुफा खन्ने ! राती राती भट्याउने&lt;br /&gt;
ए ! कातर पशु !! के टोल्लिन्छस्‌ ? घंटाघर छ पाले ।&lt;br /&gt;
गंगाको यो प्राण खडा छ, तेरो कायर यात्रा हेनझ मरेपछि कूल्कनेछ, उसको छोरो वदला लिनकति उमंगी गीत म गाड ? कति खुशीले नाच्न थालु&#039; ?भरखर दुई दिन मात्र बिते, काखमा च्याँ च्याँ गर्दै होलाआमाको मीठो दूध प्यु&#039;दै, हे्दोह्ीला अभिषेक घडाउसको निर्मल स्वर्गीय श्रात्मा, आरजादीमा उड्दो होलाभोलि मेरो ग्रादशंलाई, दिन आउनेछ पालो पहराहेर्‌, प्रक उसको शुभ मुहुतँमै, कति नेपालीको जन्म भयोतिनको सत्य सुकोमल तनले, घरघरमा खुशीको दीप बल्यो;किन भ्रडिन्छस्‌ ? किन ग्रडिन्छस्‌ ? छोड्‌ त्यो गोली चाँडैकृष्ट दिएर सक्ने छैनस्‌, हृदय ज्यू दो हरदम उड्दै ।”पापीहरुको पापी अ्रनुहार, वीरहरूले हेन सकेनन्‌नेपालीको रणभूमिमा, कलंक कहिल्यै पस्न दिएनन्‌भ्रशान्तिको, अत्याचारको, यो घिनलाग्दो मँदानमाबीरहरूको मृदङ्ग प्रघि झैं, बजिरहेथ्यो उच्च स्वरमाभ्राखिर १।६ गोली उडी, ती विभूति तन्क्याइएमृत्यु, रगतको द्वार वनाई, भित्र पसिकन शान्ति लिन्थेशान्त प्रकृति, विष्णुमती, क्षुन्ध हृदयको गीत बुन्थिन्‌&lt;br /&gt;
न्नुः ती न&lt;br /&gt;
&amp;quot;5७ --&lt;br /&gt;
अझ ज्यादा छटप्टाई, तेल्लो भ्यानले सिफन्लेमा&lt;br /&gt;
घननन, घननन शब्द उचाली, थर्कायो त्यस घरकी ्रामाके राक्षस आयो ? अथवा अर्कै, राँकेभूत दौडन थाल्यो रैलाग्छ मलाई जलिरहेको, भरभर ज्वाला श्रागाको&lt;br /&gt;
ब्यूकी दक्षिण बाटोमुन्तिर, एक कुनामा सुतिरहेको&lt;br /&gt;
केश फुलेकी, हृदय उठेकी, एक बुढिया कयाल खोल्दी&lt;br /&gt;
सामुन्नेको अग्लो रुखमा, बाघडोरी लट्किरहेछ&lt;br /&gt;
निख्खर सेतो सप जस्तो, टिलटिल टिलटिल चम्किरहेछचकमन्न दिशा, अग्ला होचा, बरपर घरका प्रत्येक छानाछाती फुकाई नभमा तारा, एक सुरमा गनिरहेछन्‌;पहलमानको विशाल काया, गुरुप्रति गरिने कुत्सित धावावर्की फर्की हेरिरहेछ, हत्याको मन रंगाइरहेछ&lt;br /&gt;
मनुष्यत्वले खिसी काट्ने भयले पसिना छोडिरहेछ,&lt;br /&gt;
साँच्चै नै लौ कुम जोने भने झैँ, दानवता ललकानें भने झैंदेख्यो उसले त्यस बुढियाको निभिकताले क्याल खुलेकोक्रोधाग्निले ड।भिनजाँदा, औडाहाले बौरिनजाँदा&lt;br /&gt;
पिलिक्क पह्टे ती दुइटा, उसका शराबी श्रांखा:-&lt;br /&gt;
“ठोक्‌ को हो त्यो क्याल खोल्ने ? यस श्राधा रातका बीचमाढीक फुटाली, सिक्री चुँडाली हेर्‌ हेर्‌ को त्यो पशु रहेछ&amp;quot;&lt;br /&gt;
ढ्याम्म झ्यालको खापा लाग्यो, ती बुढियाको हृदय काम्यो“किन रातो गाडी, पुनिस, सिपाही ? केको ज्वाला दन्कने द्वो ?&lt;br /&gt;
न दल&lt;br /&gt;
आज मैरो छाप्रो सामने, के को अचानो तेसिएको?हे परमेश्वर ! पशुपतिनाथ !! लौ न मलाई शरण देड ! &amp;quot;&lt;br /&gt;
त्रासभित्रको कौतुहलमा, तैपनि इच्छा बग्दै गो&lt;br /&gt;
कम्पतको सेकेन्ड सूई, मिनट र घंटा गन्दै गो&lt;br /&gt;
पाको अनुभव, जीवन देख्न, उम्ली उम्ली आत्तिरहेथ्योमृत्युको यस सँघारमा पनि, स्पन्दनको ढोका देख्यो;गजब देखियो गजब देखियो हेर मुटुले ठाउँ छोड्योछातीको त्यो धडकनमा, हेर कसैले ब्रेक लगायो&lt;br /&gt;
ती बुढियाका गहरभरि उर्ले, ममता औ मानेवताका विन्दुमानो उनकै पुत्र गयो नि, बिर्सी उनको प्रेम कुसुमतर-&lt;br /&gt;
“शायद जान्यो होला त्यो, श्रमर क्रान्तिको सेनानीलेनेपाल-प्रामा प्रतिनिधि बन्दै, रोइरहेकी बुढिया त्योभन्न खोज्थ्यो उसको पौर्ष, पहलमानको शक्ति उचाली“नरुनोस्‌ आमा, नर्नोस्‌ ! छाम्नोस्‌ लौ मेरो छातीकेश फुलाई, हृदय उमाली, दिनुभएको मीठो चुम्बन&lt;br /&gt;
के बिसंन्छे ? अहिल्यै आमा ! नपुछी ग्रशरु बीच नयनजीवित छु म, जीवितै छु, यी पापीहरूलाई सजायँ दिनहिम्मत मेरी डब्ल्याइदिनोस्‌, के बेर लाग्छ लौ हाँस्न ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
पहलमानूको मुखबाट, त्रसित आतुरता सुनिपोः-“मर्ने सकेने, मने सकेन, हेर पासो के विग्प्यो ?भ्रम भयो वा साँच्चै हो ! यो त भन्‌ भन्‌ मोट्टायो”&lt;br /&gt;
&amp;quot; ब£&lt;br /&gt;
हाँसिन्‌, हाँसिन्‌, घरकी आमा, घु&#039;क्क घुषक बजाईमातृत्वको एक एक गेडा, आफ्ना गलामा श्रड्काईजब सुन्न पाईन्‌ पहलमान्‌का, कातर शब्द मुखबाटबग्न थाल्यो हर्षाशरुक, एक श्रज्ञात, अविरल घारा;बन्द झ्यालको सान प्वाल, उनका निम्ति विश्व बन्योविश्वभरिमा सर्वोत्तम, जीवनको संचार यहाँभो |&lt;br /&gt;
घरमेभक्तको साधनाको, यो ठूलो करतृत थियोहोश उडेको पापी चेलो, यत्रो रहस्य कसरी बृझ्थ्यो |रोकिदियो त्यो वीर पुरुषले, ग्रान्द्रादेखिन्‌ आफ्नो प्राणजसरी गर्थे होलान्‌ क्रषिमूनि, परत्रह्वाको अ्रनुसन्धानगम खाए मानिस सारा, घटनास्थलका लहरा !फाँसी बोक्ने खख भन्थ्यो:-&lt;br /&gt;
“घत्‌ कहाँको ज्यानमारा !पहलमान्‌ तै, तेरै सन्तति, बोक्लान्‌ यत्रो पापनरक यात्रा गर्ने खुशले, कर्माकमको बेहिसाबबोक्दिन एक, दुई, तीन म त, तेरो जघन्य अपराधहे परमेश्वर ! मेरा तनमा, कतै कलंकी टिका लाग्लाप्रेमाश्रुले फेटिएको, सिद्र ग्रक्षता मात्रै दे&#039;&#039;हल्लियो त्यो रूखको हाँगो, हल्लिए भै त्यो पृथ्वीहल्लाइरहेथे व।युमण्डल, श्यालहरू विद्रोह मचाईदोल्लो पल्ट पासो लाउन, पासोको चीरफाड भयोब्यर्थे थियो ड निरोगी, केवल रहस्य दौडिरहेथ्यो&lt;br /&gt;
९०&lt;br /&gt;
अब घर्मभक्तको बायाँ हात, त्यस बाघडोरीमा अडियो !मानो सुन्दर लहरदार क्रीडा यसले भेट्टायो&lt;br /&gt;
किन जान्थ्यो त्यो वीर आत्मा, सव्धमेको छाप नछोडीपिङ खेल्दै दियो उसले, एक लात त्यो छातीमाथिजक्षको भित्री बाहिरी टालो, संझाउँथ्यो पहलमान्‌ भनी&lt;br /&gt;
फेरि अर्को बिजुली चम्क्यो, एक छिनमै बास्ना फिजियोत्यस कोठाकी ती बुढियाको, हृदयतलमा शान्ति छायो !&lt;br /&gt;
रन्धनिदै, ढुनमुतिदै, लड्न लागेथ्यो जसैपहलमान्‌का दूतहरूले, सोझ्याए हुलुका हात दिदैभूत लाग्यो, प्रेत लाग्यो, वा कुनै केही जीव लाग्योहोश खुस्की छरबारदै, बरबारिदै 5 भन्न थाल्यो:-&lt;br /&gt;
के भयो नि, के भयो यो ? कुन श्रपरिचित बज्र आयो ?देवद्त कुन स्बगेपुरीको, भीषण चक्र उजाई आयो ?&lt;br /&gt;
ए ! धर्मभक्त ख्वै ? हेर उक्ल्यो, कठघराको टाउकोमावृक्ष-शाखामाथि बस्दै, सास फेर्ने दाउमा छ&lt;br /&gt;
छेश्वा त्यो मृत्युदेखि, के त साँच्चै हुत्तियो हो ?चौडिएको छातीमाथि, केही घक्का दी गयो हो?&lt;br /&gt;
ह्वंन हवन उसको चेतन, जहिले कहाँ पुगिसक्यो हो !भूल्दै झूल्दै कठघरामा, अब छिटै 5 शव हुनेछ&lt;br /&gt;
कर्मको फल भोग गर्दै, नकंको पथ सोभिने छ&#039;&#039;&lt;br /&gt;
-- &amp;amp;१-&lt;br /&gt;
भ्रम थिप्रोयो भ्रम थियो, रन्किएको त्यस दिमागमापिल्सिएको छाती छामी पिलपिलाउँदा नेत्र बालीआत्मग्लानी बिष दिएर घोरिएको व्यस बखतमाभ्रकमकाई चेत खुस्की, शब्दको झन्कार पाई&lt;br /&gt;
झस्की कस्की सुन्न थाल्यो, धर्मको हुंकार यस्तो :-&lt;br /&gt;
&amp;quot;&#039;छोडिक्षकं त्यो पहिलो आत्मा, नेपाल आमाको रेखदेखमाजसको रक्षा गर्ने भनेरै, लात कसे तेरो छातीमामानवताको रक्षा गने, सिके मैले पहलमानी&lt;br /&gt;
दानवलाई दण्ड दिएर, हृदय उठ्दछ बेफिक्री ।&lt;br /&gt;
चेलो थिइस्‌ तं पहिले मेरो, आइस्‌ आज शत्रु बनी&lt;br /&gt;
अरू दिन्न चुनौती लडनालाई, आखिर होस्‌ तँ खरानी,&lt;br /&gt;
यस शरीरको एक एक रौंमा, हात कसैको पर्ने छैन&lt;br /&gt;
यस ्रात्माको स्वच्छन्दतामा, दासता पनि उक्लँदैन&lt;br /&gt;
अव त आफ्नै खुशीले तेरो, सामु भुल्दै प्राण त्याग्छु !पछि पछि आउने सन्ततिलाई, मृत्युमाथि विजय सिकाउँछु”&lt;br /&gt;
आज जान्यो व्यस चेलोले, गुरुको शक्ति कति बलियो !धूर्तेताको श्राड लिएको, उसकै चेलो कति निफरो !रल्ल टल्ल थे उसका आँखा, शोचशून्य त्यो दिमागकिकर्तव्य-विमूढ एक शिला झैँ, आव्मवल सब बेमाखएक निस्वास छाड्न थाल्यो, आफ्नो गुरुको फाँसी हेरी !आखिर छोड्यो वीर घमंले, जानी जानी ग्राफ्नो प्राणचाहँदो हो यदि अझ पनि, रोक्न सक्थ्यो अ्घिभै प्राण&lt;br /&gt;
2६२२&lt;br /&gt;
यो त यौटा नाटक मात्रै, खेल्न प्रलि बेर चाहन्थ्योविस्मित पारी प्रत्याचारी, हृदय फुटाल्न सुरिएको !अन्तिम घडीको एकांकी नाटक ख्रेली पर्दा आोर्ल्योउही घरकी बूढियालाई, थप बेदनाको ग्रध्यं चढ्यो !&lt;br /&gt;
ती क 0 क&lt;br /&gt;
(४)नेपालीका भक्व हृदयले, छोडेनन्‌ थ्राफ्नो गंगास्तानसरस प्रेमको धघारस्वछूप, बागमतीको जलपानगर्मी, ठण्डीको जोख-तौलको, यो कत्रो संमिश्रणहृदयभित्रको पुण्य रागको, तातो तातो किरणगुहेश्वरी प्रनि शोभाभगवती, पशुपति औं पचलीकोशान्ति प्रेम औं मारकाटको, यो दुई हाते बरदान !एक रंगमा धैयं उज्यालो, अर्कोमा वदला भावदौडिरहैथ्यो नेपालीका, नसा नसामा यो भ्रभियानबोलिरहेथ्यो, पूव दिशामा, आगाको थाली चंकेरकुहिरी नगरी चीरफाड गरी, अभ्यन्तरको क्रोध छरेरबागमतीका, विष्णुमती का, श्रन्तरमा गुड्ने तारानवाञलोकको तुहिन छटामा, लोल्लायित ती धारासंगसंगै, ती दौडिरहेथे, शहीदहरूका स्मृतिउनको चौडो छातीमाथि, टाँसिएको कालो पुर्जी:-£“राजद्रोहीको यै गत हुन्छ ! राजद्रोहीको यै गत हुन्छ&amp;quot;&lt;br /&gt;
न. ६३”&lt;br /&gt;
जपिरहेथ्यो नेपालीको पचलीको त्यो लस्करपश्चिमपट्टि दौडिरहेथ्यो शोभा-भगवतीको लस्करआखिर पूर्वी राह दियालो, सिफलेको आकार पढेरसु&#039;क-सु&#039;की औ अभुसिन्धुका, बेगन्ती घार पुछेरगाइरथे हृदयविदारक, गीत अनौठो घिक्कारेर:-&lt;br /&gt;
“हेर कठैबरी कस्ता राम्रा, कलिला, बलिया मानिसलाईरूख रूखका हाँगा बोकिरहेछन्‌, तृथ्वीको भार उचालीछैन शक्ति लौ हाँगाहरूमा, भ्रति भारले नुहिरहेछन्‌तेर्छौ, तेर्खी कृता कता पुगी, निन्याउरो भै सास फेर्छन्‌ !शुक्रराज त्यो गीता पढ्ने, बेदव्यास झै साधुलाईइन्द्रचोकको डबलीमाथि, ज्ञान सुनाई तानेलाई&lt;br /&gt;
आज यत्रा हाँगामाथि, कसरी निदुरीले भुण्ड्चाएको ?बरा कत्तिको अप्ठेरो भै, हेर मुन्टो दोन्त्याएको !&lt;br /&gt;
लौ न, कसोरी हेरिसक्ने ? लौ न फसोरी बोलिसको ?झौडाहाले छाती पोल्छ, कलेजोमा के लगाउने ?&lt;br /&gt;
छन्‌ कतै के डाक्टर वैद्य, यस रोगलाई निको पार्ने ?परमेश्वर ए ! हेछंस्‌ कसरी ? के भ्रहिले इन्साफ नगर्ने ?के कसुर हो ? यसको भनिदे, के बिरायो यसले कहिदे !भा न आ त्यो शैय्या घोडी, लौन चाँडै मालिस गरिदे&amp;quot;&lt;br /&gt;
“अहो लौ न नि, कसरी हेर्ने ? यहाँ त अर्कै उपद्र रै&#039;छघर्म जस्तो पहलमान्‌को, लास हल्लिई झुण्डिरहेछ&lt;br /&gt;
वि)&lt;br /&gt;
धर्मेभक्त ह नारानहिटीमा राजालाई कुस्ती सिकाउँथ्योमहाराजा-धिराज उनको चेलो, कसरी यस्तो अनर्थ भयो ?कठै कस्तो हृष्ट पुष्ट छ ? मानो हात्ती जित्ला जस्तो&lt;br /&gt;
तर चेहडा शान्ति भावले, हेर ग्रभझ पत्ति वलिरहेको !राजकुलको दायाँ बायाँ, बसी यसले के गन्योलौ ?&lt;br /&gt;
शत्रु लागे पृथ्वी तलका, ख्वै र कसको जीवन बाँच्प्रो ?राम, र।म, है पहलमान्‌ ! तेरै पनि स्वगँंवास भयो&lt;br /&gt;
कसरी बाँच्लान्‌ हामी जस्ता, झीना, ख्याउटा इह लोककाजा स्वगंमा, त्यहीँ अदालत तेरो जम्मै उजुरी सुन्ला” |&lt;br /&gt;
“अब त साँच्चै धर्मे कर्मे नै, यस देशमा के बाँच्यो ?सब ययो नि, सब बित्यो नि, केवल लासको थुप्रो लाग्यो !“दशरथ&#039; जस्तो जोधा ठकुरी, यस पृथ्वीमा आज छैन !कति पीडा खायो होला ? बिचरोको आङ खाली छैनझ, जाँचमा, तिल्लाहरूमा, गोलीको गो पसेछ&lt;br /&gt;
कठै त्यत्रो फुक्का छाती ! चाल्ती झै प्वाल परेछखप्नु कसरी ? रोक्नु कसरी ? यी गहका पानी पनिभुलभुलाई वैरिरहेछन्‌, क्रस्दनका छाँगा बनी;&lt;br /&gt;
कुन डाँडोको कुन कुनामा, तेरी आमा रुन्छे होलीभक्कानो फोर्ने तातो आँसु, महाकालीमा बग्दो हो नि;होड भयो लौ पक्कै होड, उसको आँसु र पानीकोमहाकालीको भेलसँग, लड्दा उसकै जीत भयो हो;घन्य थापिस्‌ त्यतिका गोली, घच्य रोकिस्‌ कति बोलीभुण्डी भुण्डी छ्न लागिस्‌ नि, नेपालको माटोलाई&lt;br /&gt;
८५&amp;quot;&lt;br /&gt;
“संगै कस्री बाँधिएको, ए ! गोरो कलिलो बाबु !!&lt;br /&gt;
के लागेन रतिभर डर ? त्यत्रो राइफल फायर सामु?मरिसकिस्‌ तँ, मरिसकिस्‌, तर पनि कस्तो राम्रो ?हाँस्डस्‌ क्यारे, वोल्छस्‌ क्यारे ? छाती चिदेँ हाम्रो&lt;br /&gt;
कहाँ गइथिस्‌, के गरिथिस्‌, भन्छस्‌ सुटुबक हामीलाई ?किन तेरो छाती प्वाल परेको ? भनि दिउँला आमालाईकठै ! उता स्वास्नी कुनामा, सानो बालक बोकिरहीछेपतिको भं,षण मृत्यु सुन्दा, कसरी मूछित बज्रिने छे&lt;br /&gt;
हेने पाइनस्‌ जाने बेला, प्यारी स्वास्नी भ्रौ छोरा&lt;br /&gt;
पापी हुन्‌ ती पापी हुन्‌, जसले हाल्यो यत्रो बाधा”&lt;br /&gt;
करुण रसको धारभित्र, उट्द गको चस्का हिड्थ्योचलबलाई हेरिरहेका, आँखामा प्रीति जागिरहेथ्यो&lt;br /&gt;
कति हलुका, खुकुला, चाल लिएर, सर्थे मानिसक्रा खंबाप्रत्येक गोडा भारी बोकी, भ्रल्की अल्झी हिडिरहेकामनुष्यःबको गहीरो सागर, दानवताको गाँस माग्थ्यो !घेरिरहेका शहीदहरूका, लासलाई छोपिरहेथ्यो !बिस्तार, थिस्तार, उम्लन थाल्यो, केही अक गुप्त शक्तिप्रतिशोधको भाव लिएर, दौदि रहेको रन्धनिईशहीदप्रतिक्रो ममताको सागरमा यौटा ढुङ्गा बज्यो !चक्कामा चक्का, काटी काटी, बढ्न थाल्यो करोधाग्नि:-&lt;br /&gt;
(खुन, खून यो बाँच्ने छैन, यमपुरीको त्यो द्वारपखिरहेछ ला उठाउन, भ्रन्यायीको तलवार साथ&lt;br /&gt;
न ६६&amp;quot;&lt;br /&gt;
आज चारका आत्मालाई, लुटिकन खूब हाँसिरहेकोघुणित दन्तका लहरमाथि, हेर बदला छाल उर्त्यो !जति वर्सूद्‌ ज्ञीत सिन्धु, चम्कनेछन्‌ हृदय इन्दु&lt;br /&gt;
जोश, रोषका छालहरू ती कुलनेछन्‌ शक्ति सिन्धुमनु-जनपको पाप बोकी, इमसानको राह हेरीगिद्धहरूका चुच्चालाई, क्षीण हृदयको ढाल वनाईबढिरहेको राणाशाही, तासको ग्रवतार बन्छ!पिल्ती पिल्सी रोइरहेको, हृदय-सिन्धु व्याप्त हुन्छ;आज यत्रो त्रास फ्याँकी, युवकहरूको लास खाईचेतत[को समुद्रभित्र, चाहन्छ मृत्यु राणाशाही !&lt;br /&gt;
तर, हवन हवन, मने दिञ्न, चेतनाको बत्तीलाईनेपालीका युवक हृदय यी, अन्याय-सामु शिर भुकाईपापको यो हाँकलाई, धमेको हतियार बोकी&lt;br /&gt;
बढ्छ, बढ्छ, लड्छ, लड्छ, कर्मेयोगी बीर नेपाली !लौन गाऔौँ गीत यौटा, लौन नाचौं नाच यौटाभझन्झनाकार हृदयबाट, बहन थालोस्‌ राग यौटा |हात, खुट्टा, छाती, शिरले, तानमा एक सुर चढाउँलावीर रसको बाढीमाथि, हर्षको अनुराग पौड्ला !”&lt;br /&gt;
हेर कस्तो जुलूस राम्रो, हेर कस्तो हृदय चोखो !रन्धनाई, चक्कराई, कान्तिपुरको सास उड्दोबुझ लगाईं बाबु, नानी, जननीहरूका लाम साराकरुण रसका वाक्य धारा, गुनगुनाई बगिरहेका !&lt;br /&gt;
न हु&amp;quot;&lt;br /&gt;
याद झाई, भाव जागी, पुष्षहरूका छाती फुक्छन्‌शहीदहरूका क्रान्तिदेखी, जयमगाई हाँस्न थाल्छन्‌ !एक अवुपम वीरताको, कोटि कोटि होम लाग्छधैयेताका चाँदनीले, दाह मनको शान्त पार्छ !सक्छ कसले श्राज गन्न ? कति हृदयको बाँध बन्छस्वाथेताको, दासताको, भेल छेकी बढ्न थाल्छ !ख्बै र जाति, ख्वै र पाति, एक हृदय उम्लिएकोको छराम्रो ? को नराम्रो ? राष्ट्रको हित नै उज्यालोजो विभूति जन्मिएथे, मुक्तिको भ्रभिषेक गर्नेदेशका मधु पुष्पलाई, वासनाको मूल्य किट्न ?उक्ली उक्ली, चम्की चम्की, गैरहेथे स्वगंमाथिचेतनाको, कोमलताको, सागरको उत्साह पाई&lt;br /&gt;
हेदेथे तो शहीद बोकी, उक्लंदो त्यो बिमानलाईपुण्य तिथिको याद ग्राई, फूल प्रक्नताले बिदाई&lt;br /&gt;
जागृतिको मुग्ध वायु, कान्तिपुरको जोड स्नायुदासताको धुस्नुमाथि, फ्याँकिएका अग्निका तीभझिलमिलाउने चट्चटिने, एक एक फिलिगा बोकी !कुद्यो सारा वायुमण्डल, मेची औ महाकालीबाग्मतीका एक एक लहर&lt;br /&gt;
हुनहुनाई त्यो त्रिशूखी, काली, सेती, कर्नाली&lt;br /&gt;
पूर्वी नभमा कोशी, रोशी, सप्त हाँगा छबंराई&lt;br /&gt;
हेर, सारा हिमाल त्यरतँ लेक, पर्वेत जुमुं राए !&lt;br /&gt;
ना देन&lt;br /&gt;
“हे ! पूर्व दिश्ञाको पहिलो यात्री ! यस पृथ्वीको साक्षी [!सुयंदेव हे, मेरो भगवन्‌, भो नबाल्‌ तँ यो बत्ती,&lt;br /&gt;
आज पृथ्वी अन्धकारमय छ, आज हृदय ठुस्किरहेछ&lt;br /&gt;
यी दुई ठूला श्रांखा पनि, प्रप्रिय बिरौध जनाउँदै छन्‌;के गछैस्‌ तँ तेज फ्याँकी ? यसले पित्त मनु पर्छ&lt;br /&gt;
कके गर्छस्‌ तँ तातो बाँडी ? यसले शिला झै बस्नुपछे&lt;br /&gt;
हुन त यही हो कैलाशकूट, जहाँ तेरो भक्त वस्छ&lt;br /&gt;
आज अर्कै आकृति आई, तेरो दशन पाइरहेछ;&lt;br /&gt;
ह्वन मेरो नाम जुद्ध, जोधा, हिम्मती शासक्र&lt;br /&gt;
पिँजडाको एक चरो हू, बन्धनमा पालित-पोषित&lt;br /&gt;
सक्छस्‌ यदि लौ यस तनमा, चिन्ताको आगो मार्ने&lt;br /&gt;
अन्ति मात्रै जुड फेरि, पुनरजेन्म ली सेवा गर्ला;&lt;br /&gt;
गयो गयो त्यो पहिलो तेज, घमं, &#039;शुक्र&#039; औं दशरथ&#039; मागंगाको त्यो निर्मेल ज्योति, जिती लग्यो मेरो सुन्दरता !&lt;br /&gt;
तेरै आज्ञा, तेरै आदेश, झ्वोल्थ्यो मेरो चेतन बट्टा&lt;br /&gt;
मजबूरीको कँचीमा यो, काटियो ति टुक्रा टुक्रा !&lt;br /&gt;
भो, भो, लैजा, आज मलाई, तेरै ठूलो आँगनमा&lt;br /&gt;
यो पृथ्वीको खटन कठिन भो, बिन्ति छ मेरो परमात्मा ! ...&lt;br /&gt;
“ओहो, कस्तो राम्रो, प्यारो; गुलाब गमला छोपिरहेछकति मीठो सुबास छदै छदँ, आज यसरी हुकिरहेछतेरो कमलो रातो गाला, कति चिप्लिई चम्किरहेछआः मेरो हावमा बसू, मेरो तँलाई प्यार छ..&lt;br /&gt;
१.१००-&lt;br /&gt;
कति मुसारी माय। पोखी, म, यसरी चुम्मा खाँदैछ&lt;br /&gt;
कित नआई भागेको लौ, के म देख डर लाग्यो ?&lt;br /&gt;
चुँड्दिन, चुँड्दिन भो नडरा, तँ नै मेरो प्राण होस्‌ !&lt;br /&gt;
ङ त्यो सानो राजा जस्तो, तँ भृकुल्ले बालक होस्‌ !&lt;br /&gt;
लौ न उल्टो थुतुनो गाडी, कान्छीऔंला काटिदिइस्‌&lt;br /&gt;
मेरो शरीरको रगत प्यून, कहिलेदेखि तँ पह्किस्‌ ?&lt;br /&gt;
उहुहुहु कस्तो औडाहा भो ? चिरिरिरी चिरिरिरी चहरायो!&lt;br /&gt;
&#039;देशरथ&#039; “गंगा&#039; छातीमाथि, तातो गोली कसरी बर्स्यो ?&lt;br /&gt;
के भन्पो हो त्यो छातीले ? के संकायो हो रगतले ?&lt;br /&gt;
एक माथि श्रर्को थपिदा कक्चरी हामफाल्यो प्राणले ?&lt;br /&gt;
कठँ ! आज गुलाब तँ, मेर बुर्जाको हावामा&lt;br /&gt;
सुनाइरहेछस्‌, भुत्ताइरहेछस्‌, पीडाको झमर कथा&lt;br /&gt;
बिद्रोह गरिस्‌ नि धावा बोलिस्‌ मेरै कोमल ग्रौलामाथि&lt;br /&gt;
तब किन चुप हुन्‌ विद्रोही, मनुष्यको जुनी पाई!&amp;quot;&lt;br /&gt;
मझाः आः आः आाः: ए ! फुर्के भँगेरा !&lt;br /&gt;
यी, हालिदिन्छु कत्तिकाको, तेरो मीठो आहारा&lt;br /&gt;
चिबिराई गाइदे तं, चलबलाई भुरे उड्‌ तँ&lt;br /&gt;
यस बुर्जाको काखमा श्राई, एक सानी खेल खेल्‌ त ..&lt;br /&gt;
सुन, संगै आउँदा खेरि, धोविती फिस्टा जम्मैलाई&lt;br /&gt;
“भोजमा जाउँ, भोजमा जाउँ” भन्दै ल्याएस्‌ बोलाई&lt;br /&gt;
आज सबैलाई बाँडिदिन्छू, यी आफ्नै ठूला मुठीले&lt;br /&gt;
खूव थप्नू, खूब अघाउनू, भोलि पति के हो कुन्नी ?चै? त 60&lt;br /&gt;
१०१--&lt;br /&gt;
किन उडिस्‌ ए ! किन उडिस्‌ ? यी चारो आफ्नै मृढीमा छबन्दूक छैन, पेस्तोल छैन, तसेने कै कारण छ?&lt;br /&gt;
ए लः जानें, ए, लः जाने, तिमीहरू पनि मेरा दुश्मन ह्वौखालि मलाई घुत्न भनेरै, यस आश्रममा आयौ ”......&lt;br /&gt;
“पशु पंक्षी औं फनफूल पनि, मेरा भ्ाफ्ना छैनन्‌ तकसरी मैले राज गरुला ? दुनियाँ जम्मै बागी छ!युद्ध क्षेत्रमा उत्रिन जाँदा, शत्रुसँग मुठभेट पर्दा&lt;br /&gt;
आफ्ना कुटुम्ब बल दिन्छन्‌, ती तै सबभन्दा पत्यारकाख्दै र त्यो पनि मेरा निम्ति ? थ्राफ्नो छोरो प्राफ्नै भतिजादाउमा छन्‌ पिस्तोल लिई, मेरो गद्दी खोस्न भनी&lt;br /&gt;
पुत्र तिम्ति छोडिदिन्थे, गद्दी के, यो प्राण पनि&lt;br /&gt;
मूखे कहाँको संझँदैन, बातावरण वरिपरि !&lt;br /&gt;
भतिजाहरू छन्‌ त्यस्ता कपटी, फम्टन खोज्ने सातो लीपुत्र मेरो शूत्य बृद्धि, हाद्दामा उड्ने क्षुद्व मति&lt;br /&gt;
के भनु म, को खोजु&#039; म, आफ्नै तनको संरक्षक ?&lt;br /&gt;
बास उद्दछ, गाँ्त उठ्दछ, कसरी अड्ने मेरो हिम्मत ?&lt;br /&gt;
गयो दशरथ, गयो गंगा, त्यस्तै घर्मे र शुक्र&lt;br /&gt;
आज सुन्छु गइरहेछन्‌, लाखौं उनका मम्मुख&lt;br /&gt;
शक्ति अभ छ. बिजुली गारत, एक हुकुमको दर्कार छबिजुलीले भै सञ्चाप पाने, यस सृष्टिलाई सक्छ,&lt;br /&gt;
तर, सृष्टि उडेपछि मरुभूमिमा, हाम्रो बस्ती कसरी बस्ला ?&lt;br /&gt;
-१०२-&lt;br /&gt;
मानिसलाई मादिसकै के, फेरि फेरि दर्कार नपर्ला ?&lt;br /&gt;
बिद्रोही भनी मारिदिएथ्यौं, भय र घुणाका कारणदेखिरहेछु प्रश्नुधारा, करुणाको उद्गार बेगन्ती&lt;br /&gt;
किन रोए ? किन रुँदैछन्‌ ? त्यत्रा हलका हल मानिस !राजद्रोही भनी, चिनिसकेपछि, दिन्नन्‌ किन हाम्लाई आशिश?श्वाप, श्रापकै नाली मात्रै, बगिरहेछ रे घटनास्थलमा&lt;br /&gt;
तव कसरी भन्ने हामी बलीया, यत्ति गारतका भरमा ?&lt;br /&gt;
हे दिनकर ! लौ क्षमा गरेस्‌, अब मैले श्रासन फेर्नेछुराजाबाट चाँडै नै, राजर्षी म वन्नेछु&lt;br /&gt;
यत्रो पाप, यत्रो हत्या, कतै कतै यो टिक्दैन&lt;br /&gt;
मेरो भुजाका दाना दानामा, यसले स्वाद राख्ने छैन&lt;br /&gt;
मेरा पलङ्गका एक एक मलमल, खस्रा खस्रा बोह्ला बन्लान्‌मतमा शान्ति कविराजका, भ्रोखलमा जस्तै चूर्ण होलान्‌डर लाग्दैछ, देखिसके अ, त्यो विधिको बढ्दो लस्कर&lt;br /&gt;
बेर छैन, बेर छैन त्यो, फर्कन एक दिन हाम्रा अपर;राजर्षी नै यस्तो बाटो, त्याग नै हो यस्तो जालोगेरु-वस्त्रकै यौटा स्वाँग, मेरो प्राणको चपटे हो;&lt;br /&gt;
तर आँसु चुहाई शरण लिन्छु, हृदय खोली स्वीकाछु&lt;br /&gt;
गर्ने नहुने कुक्कत्य त्यो, अ्रहिले मबाट हुन गयो&lt;br /&gt;
वृद्ध-वृक्ष यो कायालाई, वाँकी दुई दिन जूग बन्यो&lt;br /&gt;
माफ गरेस्‌ नि माफ गरेस्‌, हे जगको सृष्टि संहारक”&lt;br /&gt;
ती ती ती&lt;br /&gt;
&amp;quot;१०३०&lt;br /&gt;
विध्वंश लीजाको सृष्टि गरेर, युग परिवर्तनको फाँसीमालट्की लट्की राणाशाही, बेह्रीस्‌ हुँदैथ्यो घावामा [शहीदहरूका लाल रगतका, थोपा थोपा देखेर&lt;br /&gt;
फहरिन थाल्यो नेपालीको, जागृति भण्डा प्राण दिएर !&lt;br /&gt;
समाप्त&lt;br /&gt;
१०४&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रकाशित पुस्तकहरू==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(१)(२)(३)दश)(२)(६)(७)(५)(९)(१०)(११)(१२)(१३)(१४)(१५)(१६)(१७)(१८)&lt;br /&gt;
अन हिमालय बोल्छ, २०१४, (कबिता संग्रह)&lt;br /&gt;
“३७ साल, २०११, (खण्ड काव्य)&lt;br /&gt;
गुराँस, २०१५, (कबिता संग्रह)&lt;br /&gt;
ओमरखैधामलाई जवाफ, २०१६, (काख्य)&lt;br /&gt;
जोचनकै थुम्कोबाट, २०१६, (काव्य)&lt;br /&gt;
ग्रामा वोलाउँछिन्‌, २०१६, (कविता संग्रह)&lt;br /&gt;
तिमीलाई देख्दा, २०१७, (काव्य)&lt;br /&gt;
साहिलौं मैयाँ, २०१५, (खण्ड काव्य)&lt;br /&gt;
युरी अलेक्सएभिच गागारिने, २०१६, (काव्य)&lt;br /&gt;
समालोचनाको बाटोतिर, २०१६, (समीक्षा संग्रह)&lt;br /&gt;
हाम्ना प्रतिभाहरू, २०१६, (जीवनीपरक समीक्षा संग्रह)जनताको शल्नु, २०२०, (हेनरिक इन्सेनको नाटकको अनुवाद)जगतको सृष्टि र सञ्चालन प्रक्रिया, २०४६|१६५६, (दशंन)प्रतिभा पहिचान, २०४७, चैत्व (जीवनीपरक समीक्षा संग्रह)जनताको साहित्य, २०४८, आश्विन (सैद्धान्तिक समीक्षा संग्रह)स्वतन्त्तता र कम्युनिष्टहरू, २०४५, कार्तिक (राजनीति)दृष्टि बिन्दु, २०४८, मंसिर (किशोर साहित्य)&lt;br /&gt;
व्यावहारिक समालोचना, २०४८, माघ&lt;br /&gt;
प्रकाशित पुस्तिकाहरू&lt;br /&gt;
(१९)(२०)(२१)(रर)&lt;br /&gt;
राष्ट्रिय राजनैतिक सहमति, २०४४&lt;br /&gt;
भाषिक अधिकार, २०४४&lt;br /&gt;
नेपालको भाषा नीति, २०४४&lt;br /&gt;
नेपाली र नेपालका अन्य भाषा माझको सम्बन्ध, २०४४&lt;br /&gt;
५४&lt;br /&gt;
क्रान्तिका यौ गीत बुन्दै, फाँट फाँटै सिच्च थाले |&lt;br /&gt;
के तराई, गरीब भाई, के पहाइका ती सिपाही&lt;br /&gt;
शहीदहरूको राग पाई, मृक्तिका अवतार जानी&lt;br /&gt;
एक श्रामा, एक छोरा, हेने थाले शिर उचाली&lt;br /&gt;
एक ग्रर्को आँघि ल्याउने, हृदय हृदयको भो तयारी !0 न्‌ ती&lt;br /&gt;
आज सकियो पापीहरूको, नरहत्याको श्ररमान&lt;br /&gt;
मनुष्यताको छाती माथि, परेड खेल्ने एहसान&lt;br /&gt;
तर के भएको ? यस्तो चर्को, कता गयो त्यो बिमान ?&lt;br /&gt;
जसमा चढ्दै शैर गर्ने, हिम्मत उक्लोस्‌ घनवान्‌;&lt;br /&gt;
राणाशाही हाँस्न सकेन, हृदय खोली रुन सकेन&lt;br /&gt;
केही बितेको, केही चुकेको, झस्काले निद्रा पने दिएन&lt;br /&gt;
कृति ब्याकुल, चिन्ताका भँवरी, फनफनाई घुम्न थाले&lt;br /&gt;
नव जीवन, नव उल्लास, नयाँ बिचार खोस्न थाले&lt;br /&gt;
त्यस गर्जेनको पूर्वी डाँडो, सुस्केराले लाल भयो&lt;br /&gt;
त्यस क्रोधको अरिन शिखाले, उल्टो निम्दै मर्नु पन्यो !&lt;br /&gt;
नपुसकता उक्लन थाल्यो, सिथिलताको भन्याङ चढेर&lt;br /&gt;
प्राण-पखेरू उम्कन छ्योज्पो, त्यो ताजको भार छोडेर !&lt;br /&gt;
दासताका मालिकहरूका, सर्बोच्च नेता बिरामी भए&lt;br /&gt;
श्री ३ जुद्ध ग्राफ्नो आकृति, जानी जानी विसंन थाले,&lt;br /&gt;
शहीदहरूका स्वर्गीय यात्रा-वणौंन आफ आ्राइपुग्यो&lt;br /&gt;
उनको सामू दुबै कानमा, पालै पालो झ्याली पिद्थ्यो !&lt;br /&gt;
सूर्य पूर्वी नभमा एक्लै, पेट मिच्दै हाँस्न थाल्यो&lt;br /&gt;
बेहोश, तर हिंड्दै डुल्दै, श्री ३ जुद्ध बबेराए:-&lt;br /&gt;
न&amp;quot; ८९&amp;quot;.&lt;br /&gt;
१.२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==लेखक परिचय==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जन्म : सन्‌ १९३६, अक्टोबर&lt;br /&gt;
स्थान : जुम्ला खलंगा, जुम्ला,कर्णाली अञ्चल, नेपाल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुर्ख्यौली घर : पल्लाचौंडली,बैतडी, महाकालीअञ्चलख २/१५डिल्लीबजार,काठमाडौं,कानन्ददव भट्‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टैल्षिफोत (घर) ४-१०८२४पौ. ब. नं. (काठमाडौं) ४१०६ तकार्यालय : केन्द्रीय अंग्रेजी शिक्षण विभाग, पुर क्याम्पसत्रिभुवन जिरन विद्यालय, हक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा :&lt;br /&gt;
&amp;quot;एम्‌, ए. (अँग्रेजी साहित्य), १९६० पटना विशवनिद्यालय,&lt;br /&gt;
-. फोष्छ-ग्रयाजुएट डिप्लोमा (पाठयक्रम), लीद्‌स विश्वविद्यलय,संयुक्त अधिराज्य, १९८२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1. एम्‌. एड्‌, (पाठ्यक्रम तथा बिक्रासोन्मुख देशमा शिक्षा), लण्डनबिश्वविद्यालय, संयुक्त अभिराज्य, १९८३&lt;br /&gt;
पिता : व्यस्याधीश, श्री जयदेव भद्‌ (दिवंगत, १९८३)माता : श्रीमती हीरादेवी (भट्‌) भदे (बर्ष ७६)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[category: step 2]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A5%AF%E0%A5%AD_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B2&amp;diff=86</id>
		<title>९७ साल</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A5%AF%E0%A5%AD_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B2&amp;diff=86"/>
		<updated>2024-06-11T13:25:09Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;Source: https://nepalikitab.org/ananda-dev-bhatta-97-saal/&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पुस्तक परिचय==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१९७ साल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यवण्ड काव्य)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आनन्ददेव भट्ट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुस्तकको नाम : &#039;९७ साललेखक ; झनन्ददेव भट्ट&lt;br /&gt;
संस्करण ; प्रथम, २०१५ सालदोस्रो, २०४६ साल श्राश्विन २० गते,मंगलबार, विजया दशमी,अक्टोबर ६, १९६२)&lt;br /&gt;
प्रकाशक ; श्री अशोक उप्रेतीगोंगब्‌ , काठमाडौं, नेपाल(घर) फोन : ४१६१६७&lt;br /&gt;
लेखकको ठगाना : पुख्यौ लौ घर : पल्लाचौंडलीदशरथचन्द गा.वि.स; बेतडी, महाकाली अश्वलअहिले बसेको घर : कालिकास्थान ख २|१५डिल्लीबजार, काठमाडौं, नेपालफोन (घर) ४१०५२४पो. ब, नं. ४१००, जि. पि. ग्रो, काठमाडौं&lt;br /&gt;
(हु सर्वाधिकार : लेखक स्वयंमा&lt;br /&gt;
कभर डिजाइन ; श्री कान्छा कर्माचायं&lt;br /&gt;
म्‌ल्य १ रू. १५।-मुव्रक ; हिसि प्रेस, जमल, काठमाडौंफोन २-२६-४१६&lt;br /&gt;
54119414880: 54। : 8 410109 0९४ 819113(€4111119100 : 4509 00७१; 2049 १5४४०/1992, 00(0061)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==दोश्ो संस्करणको भूसिका==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;९७ साल नामक यो मेरो खण्ड काव्य २०१५सालमा पहिलो चोटि छापिएको हो । त्यसबेला म भर्खेर २२वर्षको युबक थिएँ । त्यसपछि ४५ वर्षमा त्यो कितावबजारमा नपाइने भयो हेला । त्यति बेला नेपाल-भारतमैत्री संघले उक्त किताब छापेर मलाई धेरै गुन लगाएकोथियो । तर त्यसपछि २०४७ सालसम्म म त्यस कितावप्रतिएक प्रकारले निस्क्रिय, विइ्चेष्ट जस्तै भैरहँ । २०४० सालबैशाख २९ गतेक्रो वहुदलीय प्रजातन्त्रको पहिलो आमचुनावका सिलसिलामा जव म आफ्नो पुर्खाको भूमि बैतडीमात्यहाँका कम्युनिष्ट उम्मेदवारहहको पक्षमा चुनावअभियानमा भाग लिन गएँ अनि मलाई थाहा भयो : त्यहाँकाकैयन्‌ माविसहरूले आफ्नो विद्यार्थी एवं युवा कालमा त्योकिताब पढी श्रानन्द लिएथे र शहीदहरूप्रति श्रद्धा गर्दै देश-प्रति भक्ति भावना आर्जन गरेका थिए । साथै उहाँहरूलेमलाई सोध्नु भोः त्यो किताव भए दिनोस्‌ न, फेरि एक पल्ट&lt;br /&gt;
(क)&lt;br /&gt;
हेरौँ । मैले भने: त्यति पहिले छापिएको किताब अहिले कहाँपाउनु ? अनि उहाँहरूले नै भन्नु भो: छपाउनोस्‌ न त फेरि।आज भोलिका यूवक विद्यार्थीहरूले पनि पढ्लान्‌ र हामी-पत्ति फेरि दोहोराउँला । यो सुनेर म अ्रवाक्‌ भएँ तर मनमनैभनें पनि: पैस। त हात परोस्‌, म नछपाई कहाँ छोडुला ?शहीदहरूको भक्ति किन नजगाउँला ? नभन्दै आज पुनःयो दोश्रो संस्करण तपाई हरूका हातमा राख्न पाएकोमाअव्यन्त खुशीछु ।&lt;br /&gt;
यस दोश्रो संस्करणमा मैले धेरै ठूलो परिवतँनकेही गरेको छैन । सामार्य केही शब्दहरूको परि-वर्तैन बाहेक । किनभने अहिले पढ्दा पहिले उक्त खण्डकाव्यलेख्दाकै सरल मनस्थितिमा झोर्लेन संभव भएन र यसलाईबढी जटिल कल्पनाले सिगार्नु मलाई उपयुक्त लागेन । एउटाआलीचकका आँखाले यस कवितामा घेरै कुराका ग्रभावखट्कन्छन्‌ र साथै परिपक्व बुद्धिजीवी एवं परिस्कृतसाहित्यपारखीहरूलाई पनि। तर पनि मैले ठार्वेः म आाफ्नोयुबा-सुलम सरलता र स्वाभाविक कल्पनाकै आधारमा फेरिपाठकवगे सामु किन न जाउँ ? व्यसँले हाम्रा चार श्रमरशहीद र उनका निक्टटतम सहयोगी समकालौन वीर वीराङ्गना-हरूलाई सम्मान चढाउँदै मैले यो सानो पुस्तक पाठकवगेकासेवामा प्रस्तुत गरेको छु । जस्तो शुभेच्छा पाउने छु त्यै मेरानिम्ति श्रेष्ठ कोसेली हुने छ ।&lt;br /&gt;
भ्रहिलि मेरा आफन्त, राष्ट्रिय भाबनाले उत्सा-&lt;br /&gt;
(ख)&lt;br /&gt;
हित, प्रजातान्त्रिक चेतनाले अग्रसर उद्यौग वाणिज्यव्यवश्षायमा संजग्न श्री भ्रशोक उप्रेतीज्य्‌ शहीदहरू प्रतिसम्मान राख्दै यो पुस्तक प्रकाशना्थ मेरो सहयोगी हुनधाउनु भएको छर मैले मेरा बेतडेली मित्रहरूको इच्छापुरागरने मौका पाएको छु । यो मौका दिनु भएकोमा मश्रीअशोक उप्रेती प्रति हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापन गर्दछु । प्रफ हेर्नेदेखि प्रेसको अन्य सम्पुरं कार्यमा समेत समय दिनु भएकोमाभित्र प्राध्यापक, श्री हेमनाथ पौडेलज्युप्रति पनि आभारप्रकट गर्छु । साथै, कभर डिजाइन गरिदिन्‌ हुने श्री कान्छाकर्माचायं, हिसि प्रेसका कम्पोजिटर देखि अन्यसंपूर्ण श्रमजीवी परिवारप्रति सह्दृदयता साटासाट गढदेछ्‌।अन्तमा सम्पूणे पाठकबृन्दमा २०४९ को बडा दशैंको हादिक &#039;शुभ कामना ।&lt;br /&gt;
लेखक२०४९ साल झाश्विन २० गते, मंगलबार, विजया दशमीअक्टोबर ६, १९९२, ।&lt;br /&gt;
(गय)&lt;br /&gt;
5911 211289:2 22 ४०३६] ॥ १७ &amp;quot;2२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शहीद दशरथ चन्द शहीद धमंभक्त माथेमा&lt;br /&gt;
शहीद गंगालाल श्रेष्ठ शहीद शुक्रराज शास्त्री&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==तपाइँको &#039;९७ सालको झ्याल==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुनै पनि लेखक वा कल्लाकारलाई सबभन्दा भ्रानन्दलाग्ने क्षण त्यही होला, जुन बेला झ श्राफूले गरेको ्रसलकाम र त्यसको भविष्यको मूल्याङ्कन गर्ने सक्दैन। योक्षण कुनै एक खास डोरीमा बाँधिएको हुँदैन होला ।यसमा सुख दुःख र त्यसले पैदा गर्ने बिस्मातका सुस्केरा-साई खुल्ला छुट पनि श्रबस्यै हुन्छ होला । तिनैका एक-एक रेख्राहरूको नाप गर्नु नै त्यो लेखक वा कलाकारकोआत्मालाई चिन्न खोज्नु हो। उसको आतृमाको सबभन्दानजीक बस्ने उडान नै “कविता&#039;&#039; हो । देश, काल,परिस्थिति, त्यसमा भएका र देखिने बेग्लाबेग्लै वस्तुले जह्दिलेपनि लेखकको आत्मालाई भन्‌ भन्‌ उज्यालो र नौलोप्रतिभा दिने हुनाले, हेर्ने र शोच्ने ढंगमै परिवर्तन ल्याउनेहुवाले समयको प्रवाहृसंगै कविताको रूप भन्दै भएरगएको हो । यसैलाई नै “समयको छापा र माग” पनिभनिएको हो, पहिलो भन्दा नौलो भन्ने संज्ञा दिइने गरेको&lt;br /&gt;
न्$ २&lt;br /&gt;
हो। यो मेरो &#039;६७ साल पनि त्यही समयको प्रवाहमालहरिदै आएको मेरो आत्माकी उडानको याौटा साक्षात्‌रूप हो, मेरो आत्मा हो ।&lt;br /&gt;
१९७ साल मैले किन र कसरी लेख्न पुगें वा मेरोआत्मामा त्यसको छापा, किन र कश्री पन्यो भन्ने कुरात्यही सबभन्दा मीठो क्षणमा राखौ हेर्दा, मलाई नै यौटाखोजीको विषय भैराखेको छ । म बारबार संकन्छु, गुन्छु-५१७ साजन लेख्दा ममा के को हुरी आ्राएको थियो ? मनकोकुन असजिलो, नरमाइलो, कडा विरोध-शनि त्यसबाटपँदा भएको उत्त जनालाई व्यक्त गर्ने र साफ गर्ने मन-लागेको थियो ? कसलाई केका निम्ति मैल यो लेखेको हुँ?यी सबै कुराको सामुहिक जवाफ म आफै य्रहिले यत्ति दिनसक्छु: सवंप्रथम म २००७ साल पछिको युवक हुँ ।मलाई २००७ साल पड्धिका विवश भएर धमिलिदै रमासिदै गएका सामाजिक, आथिक र मुख्प्रतः राजनैतिकगतिविधिले प्रत्यक्षरुपमा प्रभाव पारेका छन्‌ । तमामविरपराघ नेपालीले झै तर दृढ चेतना र सक्रिय कार्यवाहीलेसुसज्जित भएर, म आफ्नो देशमा सवँप्रथम दरिलोआादशं, प्रनि इमानदारी, देशभक्ति र जति सक्यो बढ्ताउदात्त उदार बिचार र कमले परिपुष्ट सर्वाङ्गीण उन्नतिर विकासको क्वोजमा छु । शायद यी सबै, कुरालाई,समष्टिमत रूपमा पाउन, मेरौ चेतन) ग्रधचेतन रखासगरी अचेतन मतले, मलाई त्यतातिर घचेडेको&lt;br /&gt;
नरेन&lt;br /&gt;
हुनुपर्दछ; &#039;९७ सालको पृष्ठभूमि र उस बेलाको शुद्ध चेतना-लाई पक्रव खोजेको हुनु पढेछ; त्यस बेलाका ती वीर घहीद-हरूका सामु अछ बाँकी वीरहरूले गरेका कब्‌ललाई संका-उन वा दोहन्याउन मनलागेको हुनुपदेछ । तबै ग्राजकोनेपाली हुँदाहुँदै, भविष्यलाई हेने सक्ने खुला मैदान र दृष्टिहुँदाहुँदै, भूतको त्यो अग्लो, उराठिलो र पातलै भए पनि-हरीयो दूबो, काफल, झैंसेलु र चुत्राका बोटले छापेकोत्यो झोह्वाडको घरलाई हेने मनलागेको होला, यो मैलोवतैमानमा त्यो भूतको सरल भए पनि सौन्दर्यको प्रदशनगने मन लागेको होला ।&lt;br /&gt;
त्यसैले &#039; ६७ साल लेख्न मलाई क्सँले सम्झाएको सम्मपनि ह्वँ न । न त त्यो आनन्दको बेलामा चेतन रूपले, सउद्देश्यकुनै व्यक्ति वा ग्रुपको नै उतार चढाब हेने वा देखाउनयसको सिजेना गरेको हू । त्यसैले मलाई यो भ्रभै पनि,अज्ञात देशबाट, मातो नयाँ तारोको किरण भौ आफूमा आएकोदेख्दा, अचम्म लाग्छ खुशी लाग्छ र फेरि फेरि पनिकेकेही कहिल्य यस्तै थाहा नदिएर ममा आउलाभन्नेनाबालकको जस्तो कल्पना पनि मनमा उठ्छ ।&lt;br /&gt;
तर, थ्रहिले त म, विस्तारै आफूले नजान्दा-नजान्दैबनाएको रचनालाई लिएर चेतन बन्ने कोशिश गर्दैछु ।त्यो चेतनाले मलाई यही भनिरहेछ-“यो &#039;९७ सालमा तैँलेभनेका जम्मै कुरा के सत्य छन्‌ ? के त्यसमा गाएका तेरागीतहरू सब निस्पक्ष छुन्‌ ? के त्यसमा तैँले आजको युग-&lt;br /&gt;
॥ 61 पन&lt;br /&gt;
को मागलाई पनि केही प्रंशमा स्थान दिएर भविष्यलाईयतातिर आञ भनी संकेत गरेको छस्‌ ? र तेरा संकेतहरूलेनेपालीमात्रलाई सीधा वाटो देख।उन सक्लान्‌ ?”&amp;quot;.. जबयी प्रश्नहरू मेरा सामुन्ने उभिन्छन्‌, मलाई अछ कुरा भन्दापत्ति पहिले यत्ति भन्न मनलाग्छ:- यी सब गीत ग्राफ्नै मेरा,मेरै लयका मेरै बाजाका र मेरै ढाँचाका छन्‌ । यिनलेसबै नेपाली-हृदयमा उस्तै र उत्तिकै ठाउँ पाउलान्‌ भनीकृहिल्यै र कसैले पनि भन्ने कुरो ह्वन । तर यत्ति त किटेरभन्न सक्छु श्राधार रहितका हावादारी कल्पनाको जग,शरीर र मस्तिष्क &#039;९७ सालको ह्वँन । यो उस बेलाकोनेपाली आत्माकै कृल्का हो- व्यव्तिविशेषको हव न। नेपाल-ले २००७ साल पार गरिसकेकाले &#039;&amp;amp;७ सालले पछि फर्कनेकुरै छैन । उसले श्राफूलाई जे जस्तो देखाएको छ, त्यसकुरामा कुनै शंका वा दुविधा पनि छैन । यदि यी मूलभूतकुराहरू नै कसँलाई मञ्जूर छैन, झ &#039;९७ सालको यस्तोउज्ज्वल प्रतिमा हेने चाहान्न भने उसको र मेरो भेट हुने कुरैछैन । सिद्धान्त र व्यवस्थामा सबैको आफ्नो आफ्नो श्रास्थावा पक्ष विपक्ष हुनसक्छ । त्यसलाई खलवह्याउने वा त्यस-लाई थामथूम पारी मिलाउन वा मिल्न खोज्ने उदेश्य पतिलेखकको छैन ।&lt;br /&gt;
त ता रा&amp;quot;९७ सालले १।२ झछ कुरो पनि मेरो “अह” सित&lt;br /&gt;
मागेको जस्तो मलाई लाग्छ । किनभने मेरो सीधा मनलेयो स्पष्ट जानेको छ भविष्य र पराईलाई चुनौती दिनु&amp;quot;&lt;br /&gt;
बहन&lt;br /&gt;
अघि, आफूसित ठूलो खजाना तैय्यार हुनुपर्छ । फेरिभविष्य सबै नौलो र जवान हुने हुनाले त्यस्तो चुनौतीआफू जवान छँदै दिन सक्नृपर्देछ । तर किन हो कुन्नि यीकुरालाई मिच्न खोजे भै गरी, म र मेरो रचनालाई यहीबरदान दिन लागिरहेछु- “यदि :९७ सालले ऐतिहासिकमहत्वका - त्यसमापन्ति राष्ट्रियता र प्रजातन्त्रका बस्तुलाईनेपाली काव्यजगत्‌्मा उतार्ने एक परम्परा बसालेर श्राज-सम्मको हाम्रो कान्धकलाको मापदण्डमा केही बेग्लै, केहीलिऔँ लिउंजस्तो, प्रत्यक्ष चेतना दिई अ्रघि बढाउने राज-नैतिक सामाजिक ३० तत्वहरूको समावेश गराउन सकेनभने यो कविता नभइकन केवल &#039;९७ सालको कथाबन्न जाला । त्यसमा लेखकका तर्फबाट कुनै बीचबचाउकोकोशिश हुनेछैन” मेरो अहं भविष्यलाई आफैं नियाल्दैछर उसको निणंय पनि छिटै नै सुन्न पाउने छ ।&lt;br /&gt;
यो &#039;९७ साल ठीक १ वर्ष अघि नै लेक्चिएको हो ।त्यसैले यो मेरो लेखन समयको एक प्रकारले ठीक बीचमाउब्जेको कुरो हो । हुन त कुनै रचनालाई हेर्ने मापदण्डकेवल लेखिएको समय, लेखकको ज्ञानको स्तर, उसकोउमेर र परिस्थिति मात्र ह्वैँव 1 यसमा लेखकलाई खाससमयमा, खास कुराले असर गरेको तीव्र वेदना वा झट्कानै मुख्य हो । त्यसैले मैले यसअघि र यसपछि लेखेको३।४ वटा कवितासंग्रहहरू लिएर जनताको सामु श्राउनूवाँकी नै छ। ती नै मेरो यस रचनालाई प्रत्येक दृष्टि-&lt;br /&gt;
न्ञ्ुल्‌&lt;br /&gt;
कोणबाट ठीक ठीकसित मूल्याङ्कन गर्ने वस्तु वा आ्राधारहरूहुनेछन्‌ । तर पनि मैले यो रचना सबभन्दा पहिले छपाउनेमौका पाएको छु (र म बास्तबमा चाहन्थे पनि यही) र त्यहीहिसाबले पाठक्रवगेलाई मेरो कलम, भावना र विचारलाईपरीक्षा गर्ने यो पहिलो कुरो हुनग्राएको छ । यो रचनालाईसुन्नेमान्छेएक किसिमले घेर नै छन्‌ र उनीहरूले यसप्रति जेजस्तो विचार व्यक्ज गरेका छन्‌ सो मेरो हृदयमा टाँसिएकानै छन्‌ । आशा गर्छु तीमध्ये ५०।९० प्रतिशत कुराहरूमेरो उन्नतिका निम्ति नै सिद्ध हुनेछन्‌ । श्रव म चाहन्छ--यस पुस्तकको जति सकिन्छ क्रियात्मक र रचनात्मक तीव्रआलोचना होओस्‌ जसबाट म पनि तिनलाई जति सक्योचाँडो मनन गर्ने सकुँ ।&lt;br /&gt;
२०१०-११ सालको कुरो हो- जब म भद्रगोलजेलमामेरा भर राजनै तिकबन्दी हरूसंगै श्री कृ्‌ष्णचन्द्रसिह प्रधान-सित थिएँ, ग्रक्‌ अघिदेखि फाटफुट लेख्ने गरेको बानीलाईउहाँसंग बसेर मैले निक्कै बढाएँ, उन्नति पनि गरेँ । त्यस-बेलादेखि ध्राजसम्मको मेरो साहित्यिक अभिरुचि र गति-विधिले, मलाई यही लागेको छ साहित्य- त्यसमा पनिकविता नै, मेरो जीवनको मूल क्षेत्रमध्ये एक हो । आजधेरै कवि र लेखकहरू जन्मिसके र भटाभट जन्मँदैछन्‌ ।२००७ सालपछिको यो अपूर्व वृद्धिलाई हामीले सजग,भईहेन्गौं भने प्रष्ट देख्ने छौं- उनीहरूमा केही नौलोशक्तिको उदय भएको छ, फलस्वख्प उनीहरूमा समाज,&lt;br /&gt;
न्$&amp;quot;”&lt;br /&gt;
दैद्ञ र अन्तर्राष्ट्रिय जिम्मेदारी पर्नि बढ्दैछ । ज्याई तीव्रगतिले यो छिटै छर्लङ्ग हुने पनि छ ।. त्यस उसले उनीहरू-ल्ने केवल हाम्रो साहित्य-ढुकुटीलाई खेँदिलो र भरिलोभत्रै पार्ते ह्वँन- हाम्रो बतेमान पङगू समाजलाई नै प्रामूलपरिवर्तन गर्ने, प्रगतिको संकेत गर्दै हाम्रो गिरेकोजीवनको मूल्य- बढाउन- केही नौलो, ठोस र भाजसम्मकाप्रख्यात, लेखक कवि (जो पुरानी बिचार र व्यवस्थाकाहिमायती छन्‌) को भन्दा पनि बेजोड शक्ति लिएर केहीभन्न र गने सक्नु परेको छ : “तलवार भन्दा कलम धेरैबलियो&amp;quot;&#039; भन्ने सावित गरी देखाउनु छ । यसको निम्तिलेखको मुटुलाई डाक्टरले भन्दा बढ्ता छामी त्यसको धड्‌-कनलाई सुनी आलोचकले जवजेस्त शब्दमा क्रियात्मकआलोचना गर्नु सवभन्दा वलियो बाटो हुनेछ ! शत यत्तिछ आलोचकको बिचार र ज्ञान उत्तिकै माभिएको रव्यापक हुनुपर्छ अनि उसले ठोकेर भन्नुपद्छ मेरो ससंरीविचारमा आजको नेपरली- घाहित्यजगत्‌ले यही नैमूलरूपले खोजेको छ र यसको स्थापनावाट यस युगरआउने यूगक्ा लेखकहरूलाई ठोस निर्देशन हुनेछ ।&lt;br /&gt;
भ्रब मेरा आफ्नै आफन्तप्रति केही भु छ । आजठपाइँन्ने मलाई जुन रूपमा देख्नु भएको छ, मेरो जीवनको,द्वार जे जति विशाल र खुला छ, मलाई भ्रा्फै संम्कजति खुशी लाग्छ त्यो सबैको मुहान श्री पूज्य साहिला बुवालवदेव भट्ट र दाज्‌ श्री त्रैलोक्यनाय उप्रेतीज्यू (श्रिसि-&lt;br /&gt;
न छ&amp;quot;&lt;br /&gt;
पल- कलेज-भ्रफ-एजुकेशन लाजिम्पाट, काठमाडौं) हुनुं-हुन्छ । खास गरी शिक्षाको क्षेत्रमा मेरो यति प्रगति हुनुउहाँहरूकै तन, मन, घनकी हादिक मद्दृतलेहो ! श्रीदाजुका उदार, मनोविज्ञानपूर्ण र गंभीर रेखदेखको फलहो । त्यसैले उहाँहरूको म सदा क्रणी रहनेछु ।&lt;br /&gt;
मैले पढे, जानेका र सुनेका भरले (१७ सालकाजे-जति कुरा लेखेको थिएँ त्यसमा अनेक नौला कुरा- जोमलाई थाहा थिएन- उस बेलाका भोक्ताश्री भू पु उप-मंत्रीज्यू पुष्करनाथ उप्रेतीबाट पाएँ । मँले आफै जोरेकासामग्रीहरू पति सम्पूण तथ्य-सहित छन्‌ भन्ने कुरा पनिउहाँलाई त्यो कविता सुनाएर यकीन गरें । यसको निम्तिम उहाँप्रति आभारी छु । यसमा रहेका ६ तस्वीरमध्येखासगरी ४ शहीदहरूको फोटो दिनु भएर भू पू प्र. मंत्रीश्री टंकप्रसाद आचार्यले समयको खाँचो पुरा गर्नु भएको छ&lt;br /&gt;
त्यस्तै केह्वी थपघट गर्ने सल्लाह्‌ प्रिय मित्र श्रीखड्गबहादुरजीबाट पनि पाएको हुँ ।&lt;br /&gt;
विशेषतः कविताको क्षेत्रमा श्राफूलाई परिमाजितगर्दै लैजान र निरन्तर संपकेंबाट दिन प्रतिदिनअरू लेख्न प्रेरणा पाउँदै जानमा कविद्रय श्रीसिद्धिचरण श्रेष्ठ र श्रो माघत्प्रसाद बिमिरेप्रति मधेरै मात्रामा क्ररणी छु ।&lt;br /&gt;
स्वस्तँ आफू बिरामी हुँदा हुँदै पनि बाउँडिने भ्रौंला-लाई तेल मालिस गर्दै यस पुस्तकको एक प्रति पाण्डुलिपिसारिदिनुभएकोमा सम्माननीय काका श्री बासुदेव भट्टुमाभारी क्रतज्ञता प्रटक गर्दछु ।&lt;br /&gt;
अन्तमा, खुल्ला दिलले, बडो सोचसमकुका साथ,केही नौलो र राम्रोको आकांक्षा गरेर, जति सक्यो छिटोछापियोस्‌ भन्ने हेतुले मेरो यो ऐतिहाक्षिक खण्ड-काव्य“१७ साल” प्रकाशित गरिदिएकोमा &#039;“नेपाल-भारत-मैत्री-संघ&#039;&#039; लाई हादिक धन्यवाद दिन्छु ।यस संघले आफूसित भएको पूजी यसै गरी नवीन-लेखक-हरूका रचना प्रकाशित गरी उनीहरूको उत्साहलाई खूबबढाउन खर्चे गरोस्‌ भन्ने मेरो इच्छा सहितकोशुभकामना छ।&lt;br /&gt;
- झनन्ददेव भट्ट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==९७ साल==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(ऐतिहासिक खण्डकाव्य) .&lt;br /&gt;
बिइवबव्यथाको पूर्वी तहको, एक सिरानी बनी-रहेकोमात्तिस जस्ता उभिने पर्वेत, बोकी बोकी ड्ली रहेकोफाँट फाँटका हरियालीमा, माछा झै सललल बग्दोसमीरहरूका झोक्का चाख्दै, हर्देम स्नायु खुम्चिरहेकोएक सुन्दर नावालकको, अंस्याहार नेपाल थियोहरेक प्रभातमा परिवर्तनको, सारञ्चजी त्यो बजिरहेको !देख्यो उसले मातिसहरूका, चेहरामा दौडिरहेको !अव्यक्त व्यथा खुम्ची खुम्ची, लज्जावती झै फुल्न खोज्दोड्ल्थे मानिस जसरी डुल्छन्‌, विचारको रस पिउँदैदिन्थ्यो मीठो स्वाद अनौठो, जिव्रो सप सरी ददगर्दैभन्थे उनका गिदीमा बस्ने, जीवित सूक्ष्म किटाणुहरू&lt;br /&gt;
 ११-&lt;br /&gt;
“कति परी बन्दी पारिरहन्छौ? हा उठाञ जाउँजाओ[हेर सुतेक्का निपालाका, ती त्यागी सुझ्रे कलमहरूजसका पुर्खा बीरहरूका, औंलामा हाँस्थे मुसुमुसुवेग निकल्थ्यो, अग्नि फुट्थ्यो, काला बाङ्गा बुट्टा कोर्दैनेपालीको अन्तदिलको भावना सब मुखरित पार्दैतिनै कलमका वाणीबाट पृथ्वीनारायण बोल्न थालेतितकै शक्ति बुकन सकेर भीमसेन थापा हाँबन थालेभ्राजादीको विगुल ध्वनिमा, नेपालीका बाह्नु फड्केपुष्ष, नारी औ केटाक्रेटी, हाँसी हाँती श्रमर भएझाजादीको एक कहानी भ्राज कसरी नुप्त हुँदैछ ?दासताको बेजोड राप, दनदन आगो बालिरहेछ ?सरस्वतीका वरदानस्वरूप, नेपालीका ताजा बच्चासक्दैनन्‌ के सिर्फ चलाउन, दाहिने हातमा औंला ?”,&lt;br /&gt;
एक करोडका दुई करोड, हातहरू झाँखा खोल्थेदुई करोड ती खुट्टाहछ उनलाई सीधा उमभ्याउँथेसबका छाती ढाल बनिकत एक स्वरले अ्रधि सर्थेमानी युद्ध छिड्नै श्राटघो, भन्दै सारा लोहा बन्थेसिरिरिरि सिरिरिरि हावा थ्राई, केशराशिमा विजुली भर्थउड्दै उड्दै ्राकाशमा, कति सुन्दर ती रूप सिगार्थहृदय हृदयमा अव्यक्त छटाले डररर डमडम पल्टन खेल्थेबीरभावका झिल्काहरूले कूलमल बाटो खोली-दिन्थे ।गम्न थाल्यो चेतनाको त्यो भ्रद्भुत सुघो पाले&lt;br /&gt;
$के नबढ्ने ? के नछेड्ने ? संग्रामको एक रडाको ?&lt;br /&gt;
-१२-&lt;br /&gt;
किन म आएँ, किन म घाएँ, यो मानवको स्मृतिमा ?के बन्ने मैले पशु समान, वुद्धदैवको जन्मस्थलमा ?ह्वौन ह्वन यो जन्म लिएको, एक खोटो कलद्धु होलायदि आत्माको टङ्कारलाई, मैले आज सुन्न छौडुला&amp;quot;&lt;br /&gt;
यही भावले पुलकित पार्दा, यही रागले भक्त पार्दाउम्भिन आए दुइ बरदान, स्वतन्त्रताका आकासमा&lt;br /&gt;
एक थियो नि क्षत्रिय वलले, टैङक तोप झैँ हृदय कडानसा नसाका ताता झिल्का, फैलाउन खोज्ने पृथ्वीमा&lt;br /&gt;
बचन कडा थ्यो, बिचार सफा थ्यो, स्वाभिमानले टल्किरहेकोहिम्मत कस्तो, साहस कस्तो, पावरहाउस भै घन्किरहेकोक्रान्ति क्रान्तिको स्वणिम गौत, पलपलमा त्यो गाइरहन्थ्यो“दशरथ चँद&#039; यो &#039;दशरथ चंद&#039;, युद्ध घोषमा उम्लिरहेको&lt;br /&gt;
आर्को त्यस्तै हृदय-वागमा, स्वाधीनताको फूल फुलेकोहाःहाः हाःहाः हाँसी, हाँसी शुद्ध हृदयको कान्ति छरर्दोब्राह्मण कुलको युवक दीप, द्रोण भन्दा वलियो मान्छेडल्ले डल्ले स्याउ फले भै अ्रमृतको त्यो वर्षा गर्ने&#039;टंकप्रसाद&#039; यसको स्मृति, दानवहरूसित कुम ठेल्ने !&lt;br /&gt;
थपियो ग्रर्को तेस्रो शक्ति, धर्मभक्तको बाहुबलजनशक्तिको स्वच्छ, पुनीत, आत्मनिणंयी स्तम्भस्वरूपमनुजतामा परुषताको, तिदेयी त्यो शानलाईशक्ति उजाई, एक चुनौती, हाक्न सक्ने मधुरता ली ।&lt;br /&gt;
न पदेन&lt;br /&gt;
जनजीवनको नाडी छाम्त, हृदय हृदयको धुक धुक सुन्नपहेलमान आयो धैरयंवान यो कल्याणी कलश उचाल्न&lt;br /&gt;
दोस्त दोस्त थे यो तीन शक्ति, दोस्तानाका गहिराइँलेदोस्ती बढाए दुनियाँसंग, चक्रब्यूह गुप्त रच्न भरे!&lt;br /&gt;
आए कैपन्‌ श्रा, बलिया, मृद्‌ कलेजावाला मान्छेयुवकहृदयका फोहोरा बोकी, नयाँ जोशले कुद्ने मान्छेकमेयोगी वीरका माझमा, एक दिन दशरथ भन्न थाले:-&lt;br /&gt;
“्देश्नुहुन्छ यो संघ्या बेला, सूयंदेवको जाने बेला ?हामी खडा छौं बैठकमा, नयाँ युगको कल्पनामाराणाशाही हुकूमतका, हामी कट्टर दुशमन ह्रौंत्य्षकै शवको जात्रा हेने, यसरी हामी आतुर छौं |!अ त्यो पश्चिमको सानो क्याल, भन्तिम प्रकाशको बाटो होहाम्रो संघर्षी जीवनको, कन्‌ छ साँगुरो बाटो हो&lt;br /&gt;
सूयं साक्षौ छ गीता पुस्तक, एक एकको शिर छुन्छभाज सबैले कबूल गछ्न्‌, हाम्रो एकता अमर रहन्छहामी कोही तरङ्गी ह्व नौं, हामी कोही भरङ्गी ह्वनौंआजादीको झण्डा गाड्न, अघि बढ्यौं, बढयौंचेतनाको चिराग समाती, देशभरी न घुम्नेछौंविश्वासको निर्णयको हामीले सिक्री पक्रका छौं&lt;br /&gt;
लौ खाऔ्रौं यो थालीको, फलफूल हाम्रो नेपालकोबाँडीचु&#039;डी नेपालग्रामा, साक्षी राखी इमानको&lt;br /&gt;
&amp;quot;१४.&lt;br /&gt;
हे, देशका सपूतहरूको ! हे, देशका रत्नहरूहो !आजँदैखि हान्नो पो तन, मन, घन पियो&#039;&#039;यही भावना गजिन थाल्यो, चेतन जगत्‌का किल्लामाअनि त आगो सल्कित थाल्यो, स्वाधीनताको आगनमाबुझ्न सक्ने, हेर्ने सक्ने, आँख(का निम्नि ज्योति थियोस्वच्छ चाँदनी माथिबाटै, चिन्ताको दाहा मेटिरहेथ्योवनकाली औ गुह्यञश्वरीका, सिम्भूका घना जंगलमानेपालका सुन्दर स्वच्छन्द, छहारीका कुना कुनामालम्कन थाले युवकहरूका, एकाकार न्रह्वा स्वरूपकोमल, निर्मल, बल्दा ज्योति, बृद्ध प्रभुको हठ स्वरूपतडपन औँ जलन थियो, केही नौलो शक्ति बटुल्नेनेपालको छातीमाथि, आजादीको हार चढाउनेएक चिन्तन, एक तनमन, हावामा फटफट उड्दै थ्योकस्ले छेक्ने, कस्ले रोक्ने ? यो त समयको आह्वान थियोटिक क 20कैलाशको त्यो मुट्मा यौटा, शान्त समीर उडी-रहेछ !परीको सुन्दर लत्रक बोकी, एक्‌ भङ्गमा छोडिरहेछस्वगपुरीका कल्पित नगरी बेबिलोनका झुलना होलान्‌ऐश-नसामा सललल वग्दै, दिब्य उल्लास नाची रहलान्‌यो त कान्तिले घपधप वल्दो, पृथ्वीकै यौटा थालीहोजसमा तानी: केटीहरूका, कोमल फूलहरू हल्लिरहेकोबिजुनी उज्याला वाह फ्याँकी, बैटकको आलिगन गर्छे !चाँदीको सेतो पलङ उचाली, हृदय उमाली बोलिरहेछ !सिंहदरबारमा गर्मीमा महाराजको हावा बंगला&lt;br /&gt;
-पेष् -&lt;br /&gt;
यो गद्दी हो महाराजको, जसको छाती प्यार भरीहेरिरहेछ कल्पनाको रेशमी चादर उडाई&lt;br /&gt;
लेटिरहेछन्‌ श्री ३ जुद्ध, बूढानी लकण्ठका विष्णुसरिसपनाको फाटक खोली श्रायो एक विचित्र कहानी:-&lt;br /&gt;
“बुररुरु उड्दै “पुछु तारो गगनभेदी हीरा बन्छ&lt;br /&gt;
के उज्यालो सूर्य दिदो हो ! यसले पृथ्वी बालिदिन्छअन्धकारको बिचरो तन्ना, तत्कालै डड्दै राख बन्छ&lt;br /&gt;
विह्वल छटाको शीव बिन्दुमा, उही तारो टिलपिलाउँछ;एक मोहिनी जुद्धनसामा, किरीबिरी चित्र उतादथ्यो&lt;br /&gt;
भग्न भयो यो, मेटियो यो, त्रासक्रो घोडा दौड्न थाल्यो:-”&lt;br /&gt;
“किन भयो यो कित भपो, के ईश्वरको श्रासन हल्ल्यो?एकान्त अनि प्राराधना, कसले श्राज तोड्न थाल्यो ?&lt;br /&gt;
आज पृथ्वीका बलिया शासक, के मेरो दाँजो उभ्भिन सक्छन्‌ ?दान पुण्यको मेरो हवन, हल्ट पारी गर्जन सक्छन्‌ ?&lt;br /&gt;
म त राजा नेपालको, हिन्दू धर्मको पहरो पो&lt;br /&gt;
पशुपतिको अंगरक्षक, कसले छाती खोल्ने हो?&lt;br /&gt;
जपिरहेछन्‌ तमाम दुनियाँ, मेरो प्रतिमाको दशैन पाउनमेरो प्रसन्न अनुहार देखी, स्वर्गद्वारको नजीक पुग्न&lt;br /&gt;
केत्रुटि भो मेरो तपमा, के कमी भो उदारतामा ?&lt;br /&gt;
ज्ञानिन मैले हे भगवान्‌, मर्जी हवस्‌ शिर चरणमा ! ५&lt;br /&gt;
शा १६&amp;quot;&lt;br /&gt;
यो त उनको कातर दिलको, एक अथाह वेदना थियोबज्न नपरोस्‌ भन्ने भिक्षा माग्ने एउटा पुकार थियो !असत्पता औ उत्पीडनको, वस्ती माथि व्यङ्ग गर्दैभन्न थाल्यो बाउन्नेजस्तो एक भ्राक्कति फिस्सहाँस्दै:-&lt;br /&gt;
&amp;quot;छैन कुनै कमी विमीबाट नयाँ संसार सिजिँदै छकिहदरबार दिनपरदिन, कं यन्‌ जुम्ल्याहा जन्माउँदै छ !हेर कति ती बगैँचामा, मीठा मीठा फल लाग्दै छन्‌&lt;br /&gt;
एक कीटाणु छुन सक्दैनन्‌, फाँसोको डोरी देखिहाल्छन्‌ईश्वर बोल्दछ ती स्याउमा, लौन मलाई छोडिदेडपहाड मदेश, खाल्डामा, मेरा सन्तति सुक्न नदेड&lt;br /&gt;
त्यस डाँडाको छातीमाथि, हेर डढेलो लागेको !&lt;br /&gt;
लौ न निभाञ वारुणयन्त्र, लैजाञ सृष्टि नासिन लाग्योकति कुनाका कति भाई, तिम्रा दायाँ बायाँ बस्छन्‌ ?देखेका छौं कसरी रुन्छन्‌, जो बित्ताभर पनि टाढा छन्‌ ?धर्मे, कर्मेको पुण्यस्थल यो, पाप तापको नरक बन्योदिउँसै मानिस भाँखा विम्ली, अन्धकारमा डुब्न पुग्योभन्दैछ त्यो “लामपुर्छु तारो” परिवतँन &#039;यहाँ उम्रन थाल्यो!&#039;&lt;br /&gt;
नेपालका अगुवा महाराज, श्री ३ जुद्ध अचम्म परे&lt;br /&gt;
दान पुण्यको वलिवेदीमा लाञ्छनाले बास गरे&lt;br /&gt;
क्रोध रोषको आँधी आई, खोपीको ढाँचा हल्लन थाल्योबेह्रोश बिरामी बर्बराए भै, आक्रोश निस्की भन्न थाल्यो:-&lt;br /&gt;
000&lt;br /&gt;
&amp;quot;दृष्टि दरमा छाया बोल्लान्‌, बोल्ते मानिस लाटा होलान्‌पापी हृदयका खोपीबाट, श्रापका ज्वाला बत्तिन थाल्लान्‌के कसुर लौ यसमा मेरो, जब म साउनको मेषघसरीर्छाररहेछु सुन, चाँदीका श्रबिरल धारा ददिद्र-माथिदरिद्रताको त्यो विशाल फाँट, जब मेरो शीतल दृष्टि पाउँछउर्षेर फाँट लहराए झै, कसरी सजीव भै बोल्न थाल्छ!पाप गर्लान्‌ मूखे दुनियाँ, यदि परत्रको त्रास छोडीगिर्लान्‌ आफैं सब नरकमा, यमराजको कोर्रा खाई&lt;br /&gt;
राजा हू म राज गर्छु, धर्मेलाई श्रीपेच संफी&lt;br /&gt;
दिल दिमापको सन्तुलनमा, सुन चाँदीको ढक राखी&lt;br /&gt;
खने मानिस कोही हुन्न जो हाँस्न पनि सक्छ?पूवंजवमको लेखालाई, कसरी उसले मेट्न सक्छ ?हेरिरहेछु भूकम्प पछि, कस्तो राम्रो नेपाल बन्यो&lt;br /&gt;
नयाँ स्वर्गको ढाँचामा, जुद्ध सडकको जन्म भयो&lt;br /&gt;
हेर्दा होलान्‌ कोही मानिस मेरा नजरच्ले छटपटिएर&lt;br /&gt;
छोप्त पाए यो तेजलाई, कति सित्तल ताप्थें उक्लेर&lt;br /&gt;
राज गरुन्जेल मिचिराखुँला हेट को त्यो शिर उचाल्छ ?”१&lt;br /&gt;
त्यस सपनाको त्यस उडानमा, भझूलका झल्लरी उड्दैथे&lt;br /&gt;
नानीहरू ती पाउ-निरै, कोमलता वर्षाइरहेथे&lt;br /&gt;
बिजुलीका किरणहरूले, मखमली कार्फट चुम्दैथे&lt;br /&gt;
फर्की आतन्द भित्ताहरूमा, आलो पालो नाचिहन्रथे&lt;br /&gt;
गम्मीर मुद्रा जागी आयो जुद्ध श्री को मुखमण्डलमा&lt;br /&gt;
अर्को सपना सलामी दिदै, थाल्यो केही गुप्ती बताउनः--&lt;br /&gt;
त पप न&lt;br /&gt;
«क्रिन हो कुश्चि, जागिरहेछन्‌, दुनियाँका मनमा खुल्दुली ?ल्दैनन्‌ ती, हेर्दैतन्‌ ती, केबल बोह्छन्‌ आक्कति&lt;br /&gt;
असह्य भयो ! असह्वा भयो ! अरव बिस्फोट हुन कर लाग्यो&lt;br /&gt;
नेपालीका एक एक आत्मा बलिदान हुने बेला भयो !&lt;br /&gt;
चल्ने छैन यो हुकूमको, विष्टाको जस्तो ढुगेन्ध&lt;br /&gt;
एक मानिस लाखौं - माथि, घोडा चढ्ने दुष्ट प्रबन्ध&lt;br /&gt;
के छ ग्रधिक्ार जुद्धलाई, आ्रामाका छोरी लुट्ने ?&lt;br /&gt;
घमेशास्त्रकै मर्यादालाई, दानवले भै कुल्चने ?&lt;br /&gt;
नेपालीको पसिनामा विलासिताको पौडी खेल्ने ?&lt;br /&gt;
छैन कुनै एकाधिकार, एक परिवारलाई देश चिथर्ने&lt;br /&gt;
कुन वीरता अनि योग्यतामा, बन्दछ बालक जर्नेल ?&lt;br /&gt;
कुन ग्रपराधको दाग लागी, हुन्छन्‌ नेपाली पाउ दाब्ने ?&lt;br /&gt;
त्यो ढुकुटीको &#039;तीन साँचो&#039; नेपालीको हातमा होस्‌&lt;br /&gt;
दुनियाँ सारा तय गछ्न्‌, कहिले, किन यो खोलियोस्‌ !&lt;br /&gt;
कानून उसको शब्द, शब्द ,रे &#039;ख्ज निशाना&#039; पेवा रे ।&lt;br /&gt;
नेपालीको तन, मन, धन, वचन उसको इच्छा रे&lt;br /&gt;
कसरी वज्ला त्यो नगरा, नेपालीको छाती-माथि ?&lt;br /&gt;
फोरीदिन्छौं त्यो जालो अनि आजादी वबोल्ला निस्क्री&amp;quot;&lt;br /&gt;
विस्मृतिक्रो प्रठपहरियाले, फेरि शान्ति पोशाक फेन्योसुन्नक्षान रुचनीको माझमा, सुस्त सुस्त त्यो डुल्न थाल्यो ।शायद ग्रहले अचेतन, हृदय पनि संक्न थाल्यो&lt;br /&gt;
कति हिसाव पुगिसक्ेछ, ढड्डा खोली जाँच्न चाल्यो:-&lt;br /&gt;
&amp;quot; १९-&lt;br /&gt;
“साँच्चै होला यस छातीको, दुनियाँले रौं नदेखेको ?&lt;br /&gt;
के देखे पति नदेखे झैँ टारी मुन्टो बटारेको !?&lt;br /&gt;
सुनेन होलान्‌ तिनले कुनै, यो बाघ-घाँटीको गर्जेन ?कसरी मानवहृदय मात्रमा, उब्जाउन सक्दछ कोलाहल ?होलान्‌ शायद मूखहरू, मूढे बलमा हुत्तएका&lt;br /&gt;
आखिर हुन्‌ ती नेपालका, सुद्ध गठिला भेंडा वाख्रा !&lt;br /&gt;
तर-&lt;br /&gt;
ह्वनन्‌ ह्वौनन्‌ भेडा बाख्रा, ती अवश्य होलान्‌ ब्वाँसा नैशिक्षा भन्ने चश्मालगाई, आए होलान्‌ ती ब्वाँसा&lt;br /&gt;
भेंडा, बाख्रा नुट्न भनेर, बरा आनन्दले चरी-रहेका“चद्धदाजू हृक्गुम हुन्थ्यो, हाम्रो खुट्टामा बञ्चरो पर्छकलेजको चौर -माथि, फट्याङग्राले राज गर्छे&amp;quot;&lt;br /&gt;
होलान्‌ ती फट्याङग्रा झै नै, टिटिटि श्रावाज दिनेज्ञानकोषमा दूषित हावा, लागी ब्यर्थै बौलाउने&lt;br /&gt;
अव परमेश्वरको हुकुमलाई, यो छातीले बोकी लड्छसंहारको वादल ल्याई, विद्रोहीको प्राण लिनेछ ।”&lt;br /&gt;
2८ 2८ रद&lt;br /&gt;
आज किन हो ? महाराजको, सूर्यं-श्रगावै सुकला ब्यु&#039;झ्योबीभत्सरसको कए खोलो,छ्यालब्याल छ्यालब्याल बग्न थाल्योअगाध, तीव्र छ यसको वेग, कान फुटाल्छन्‌ यसका स्वरहुनुनुनु ह्वाई ह्वाई चिच्याई, तोडिरहेछन्‌ श।म्ति-विनोद ।&lt;br /&gt;
न २०&amp;quot;&lt;br /&gt;
बैठकको सिहासनले, एक ्रंशान्ति गाइरहेछ&lt;br /&gt;
सिसा झल्लरी हल्ली हल्लौ, छननन कल्लोल छोडिरहेछ ।पित्ताका ती तस्वीरहरूमा, आक्रोषको छाँया झैंउडिरहेछ ग्रदृश्य हाबा,- शंकाको भ/री उचाल्दै&lt;br /&gt;
सब जस्त छन्‌ महारानी, केटीका वी सुमधुर गालाचिन्ताको लाली गराई, घोडिरहेछ किरण धनौठा&lt;br /&gt;
वाक्य वन्दछन्‌, भयका भूतहरू गजिरहेछन्‌&lt;br /&gt;
मप्ान कुने भ्रध्घोरी झै भयंकर नाच देखाउँदैछन्‌ !&lt;br /&gt;
&amp;quot;के भएको ? के हुनेछ ?&#039; छैन कसैलाई पत्ता&lt;br /&gt;
चली रहेछ मनमनमा, प्रशन गर्ने जोरको घक्का,अठपहरिया ढोकाबाहिर, संगीन च्यापी उम्मिरहेछखोपीभित्रको चलबलको, सृक्ष्म भ्राभास पाइरहेछहृजूरिपा एक जर्नेल झाई, दशनको विन्ती विसाउँछ&lt;br /&gt;
तर नाजवाफ अति सशंकित ढोकेमा त्यो कुरीरहन्छमहाराजको ग्रस्थिर तन, छटपटाई उठ्न खोज्छमहारानीको स्पशै पनि, आज किन हो फिक्का जँच्छ ?हुकूम भयो महाराजको,- “भन्दे, अहले दशेन छैन&amp;quot;ओडाहाले उफ्री भुइमा गोडा दुईलि कसरत गर्छन्‌&lt;br /&gt;
डुल्दै डुल्दै भ्राक्रोश वग्छ:-&lt;br /&gt;
सहान्ना हजुरका घामलाई, छेक्ने रे जेरे हुस्सुले ?यस श्रीपेचका ज्वालासित, आँखा जोड जैरेले ?घाह छ किन यो जृद्ध जन्म्यो नेपाली राजकुलमा ?&lt;br /&gt;
क रेप&lt;br /&gt;
भ्रागो झोस्न, गो कोस्न, खारिएका खरका भौरमा;कत्रो सेखी ! कत्रो फूति ! ती नालका कीरासंग !&lt;br /&gt;
कत्रो हिम्मत कत्रो तागत, छेसवा किताबे कीरासंग;&lt;br /&gt;
यी ! देखेका छन्‌ तिनले के ? पिस्तौलको सानो मोह्रीकसरी छेड्दछ यसले छातो, तातो रगतको घार पिई ?अन्याय भयो रे, अत्याचार, बढ्दै बढ्दै उम्लिन्छ अरेनेपालीका छातीमा सब, घोर प्रापत वैरिन्छ अरे&lt;br /&gt;
बोल्न मिलेन, मुख थुनियो जीवन आकांक्षा टुट्न गयो रेदेख्लान्‌ पाजी भुसुनाहरू कति कराउन सक्छन्‌ अ्रहिलेजब वर्षेलान्‌ तो सुइखुङ्ट , पातला आ्राङमाथि कोर्रा&lt;br /&gt;
अनि बोल्लान्‌ प्रघउञ्जेल, यै हुनेछ आ्जादी-सोडा&amp;quot;”&lt;br /&gt;
थर्क मान छन्‌ कोमल परी हरू, त्यो गर्जेन मुटुमा गाडिएरकानका गोल छिद्रबाट, श्रनायासै घुस्न पुगेर&lt;br /&gt;
थररर काम्दै महाराजका, गोडाहरू लुगलुगिन्छन्‌&lt;br /&gt;
५ए किस्ने ! यहाँ सुन्‌” भन्ने हुकूम जाहेर गर्छन्‌;कृष्णबहादुर अठपइरिया, राइफलसहित सलामी दिन्छ“बीर गोर्खाली&#039; सिपाहीको, पोजिसनमा उम्भिरहन्छ ।भन्दै, मेरो हजूरिया- &#039;गोवरगणेश&#039; लाई अहिल्यैराजद्रोही घुमी रहेछन्‌, पक्री ल्या जिउँदा जिउँदै&amp;quot;&#039;&lt;br /&gt;
“जो हुकूम प्रभु ” भन्दै, किस्ने सलाम ठोकी पछि सँफरक्क फर्की फुटबल झै, ढोका प्रघि झै ढप्काउँछ !&lt;br /&gt;
ती ॥ यम त&lt;br /&gt;
२२”&lt;br /&gt;
डन थाले आकाशमा ती, नयाँ जोशका पंछीहरूमधुप्रभातका लालिमामा रंगिएर विमान स्वख्प&lt;br /&gt;
प्रक कृतिका नयाँ लुगामा मोहित थे सव प्राणीहरूकोशिश गर्थे सिगारिन, वैशे-जोडा थापी गुरु;&lt;br /&gt;
के थिएन उल्लास नभमा ? निर्मल श्राकाशको तनमाचिरबिराहट गुञ्जिरहेथ्यो, अभियानको हावामासररर उक्ल्यो सूयं उता, आक्रोशको ज्वाला झैंमानो रगत उम्लिरहेथ्यो, हिमालयको चमक भैआजको यो दिन विचित्र, प्राजको यो राग बिछट्टफेरि नौलो दिव्य ग्रति, जनताको काखमा छ ।&lt;br /&gt;
पुलिसका ती राता फेटा आज किन हो मलिन छन्‌उनका भ्राक्कति शंका, त्रास बोकी फन्‌ फ्न्‌ गंभीर छन्‌;भेटिएछन्‌ कागजका छाती छोप्ने नौला टुक्रा&lt;br /&gt;
राता राता अक्षरले, झलमल झलमल बलीरहेका,&lt;br /&gt;
यो त थियो ए ! क्रान्ति निम्ति, नौजवानक्रो आह्वानपरिवर्तनको वेगमा पौड्ने, लालसाको मध्य उडान;नेपालीका हृदय हृदयमा, केही नौलो बीज रोप्ने&lt;br /&gt;
जसका चिल्ला बिसवा होलान्‌, मीठा फूल ौ फल दिने;भयका झिहका पोल्दै छन्‌, पुलिसहरूका आत्मा&lt;br /&gt;
के हुने हो ? के यस्तो हो ? श्री ३ जुद्धको उदयमा ?भन्छ उनको कोमल आत्मा, “के होला यसमा लेखेकोकिन बौल्वाए मानिस यसरी, यमराजलाई निम्त्याएको ?&lt;br /&gt;
न रद&amp;quot;&lt;br /&gt;
दाखिल हुन्छन्‌ एक एक पाना, महाराजका खोपीमामानो रगत पोती भन्थे:-&lt;br /&gt;
“अब आयौं हान्न निशानासंभझन्थ्यौ होला संघेभरि, अन्धकारमा राज गरौंला ?फूट गराई लूट गर्ने मामाको नीति बिछ्लाईरौंलायो नेपाल हो जहाँ बस्छन्‌ वीर आमाका छोराछोड्ने छैनन्‌, भाग्ने छैनन्‌, नभराई पूरा हर्जानाखुब चूसेथ्यौ दुनियाँलाई, आँपका गुलिया कोया भैआइरहेछन्‌ तिने कोया, चट्टानका छोरा बन्दै&amp;quot;&lt;br /&gt;
बगिरहेथ्यो नगरीमरमा सनसनाहट एक धाराशरीरभरका रौँलाई, उभ्याई मानो पहरावादविवादको आँघी चल्यो, भुप्रादेखि पक्की घरमाघुइरी घुइ्री नेपालीले, गुन्न थाले जीवन गाथा:-&amp;quot;आब बिध्वंस अत्ति रगत, देखिनेछ यी गल्लीमाकति घरमा बज्नेहुन्‌ कोलाहलका, नाश नगराहुन्न हुन्न प्रब यो देशमा, शान्ति औ समृद्धि कतैहुन्छ यहाँ माराकाट शिर र गींडका थुप्रा मात्रै&lt;br /&gt;
भन्न सकिन्न प्रक के होला ? कति पहरा गल्लीमा बस्लान्‌ ?एक एकका घाँटी च्याप्दै, गोलघरमा मेला लाग्लान्‌ !”&lt;br /&gt;
चेतन मनका चेतन मूर्ति, गुप्त रही छलफल गर्थे:-“आयो बेला केहो गर्ने, आमाको इज्जत रक्षा गर्ने&lt;br /&gt;
५ अंगेज साम्राज्यवाद&lt;br /&gt;
छि । कि&lt;br /&gt;
हेर कपरी खुम्बिएकी, हाम्री गरीब नेपालभ्रामा !बुजो लागी निसास्सिएकी राक्षसहरूका घेरामा !प्राण उड्ला प्राण उड्ला, ठूलो कलंक अपहत्या होलामातृभूमिको दीप निभेमा, अन्धकारमै रोइरहांला,&lt;br /&gt;
भन्छ पर्चा &#039;प्राञ आउ ! &#039;&amp;quot; नेपालका रगतवालाजति सपूत छौ कम्मर कक्षो, बलिदानको यै हो बेलादेश डुब्यो, लौ देश डुब्यो ! प्रलय यहाँ आउन लाग्यो !एक घरानिया स्वार्थतलि, द्वाम्रो मासु छाला काडयोकसरी सहने ? कसरी हेर्ने ? हेर त ग्रागो सल्केकोकैयन्‌ निमुखा प्राणीहरू, दिनहुँ पशुपति पुग्दैछन्‌ ।“चिता भन्ला हार खाएँ, सबितिन अब यो भारी बोक्नफर्काञ यी सव लासहरू, मेरो घरमा बासँ छैन ।मसान जागी झगडा गर्ला, कसरी मैले पारी तर्ने ?लास मात्रको भार उचाली, कसरी मैले गोडा सार्ने ?जाङ,, मरेका ज्यूँदा मानिस, सक्दिन हेने तिम्रो श्रनुहारतिम्रो लाछी मुख देखी, घट्दछ मेरो बल श्रगाध !के ढुङ्गा हुन्‌ ती तिम्रा सन्तान ? जहाँ संघै टोपा लाग्छचोइटाका चोइटा ढुङ्गाले&#039; बेहोश भै उछिट्टिन्‌ पर्छ ?अल्छीका ए पिण्डहरूहो ! पशुताका हे, प्रतीकहरू हो !लाज पचाई लुरुलुरु हिड्छौ यही के तिम्रो मानवता हो ?छैन छँन अव हामीलाई, यस पृथ्वीमा कतै स्थानउड्न सके यस जमीनबाट, मात्रै होला पुनरुत्थान !&#039;&#039;&lt;br /&gt;
न २५--&lt;br /&gt;
क्रान्तिकारीका जमातहरू ग्रर्कै धुनमा ब्यस्त थिएराणाशाही ग्रन्त गर्ने बन्दूक पिस्तोल जम्मा गर्थे !कत्रो विशाल यो पृथ्वी; कत्रा चौडा ती छातीएक एक लडाक्‌ गाडिरहेछन्‌, बनकालीमा श्स्त्रहरूथाहा छैन, को कस्तो हो ? कुन डिग्री कसमा भुण्डेको छएक भावना एक वेदना, हरदम क्रान्ति गाइरहैछ !नेताका प्रत्येक वचनमा पृथ्वीका पुस्तक सिद्धिन्छन्‌एक धापमा एक आशमा, प्राण-पखेरु चलबलछन्‌कवि-कल्पना के उड्ला ? तीव्र बिजुलीभझै दौडेरवीरहरूका हृदय कुद्‌्छन्‌, आफ्नो कतेव्य उचालेरयो त थियो नि यौटा युद्ध, योद्धाहरूले हाँकेकोचिःस्वाथं चमकमा उदाएर झकझक कृकझक बल्दोप्रसञ्नता त यसको ढाल, आ्रात्मविश्वास लाग्ने खुकुरीनेपालको बन्धनलाई तोड्ने यौटा बज्न सरी ।&lt;br /&gt;
ती ती तीश्रबएक प्रलयको नृत्य शुरू भो, पृथ्बीमा यौटा खेल शुरूभो ।घरपकडको वबन्डरमा, नाशको वाजा बज्न थाल्योनयाँ कहानी, नयाँ भयावी, उन्माद सिजन थाल्योकाठमाण्डुको छाती- माथि, रातो भ्यान दगुने याह्यो !रात थिएन यहाँ कुनै, दिनभन्दा पनि चम्कन थाल्योएक एक घरको ढोकाले, कुन्दाको आवाज सुन्न थाल्योबन्दुक, पिस्तोल, संगीनले आफ्नो फूति देखाउन थाल्योखाकी पोशाक घ्रफिसरको मानो गदगद हाँस्न थाल्यो&lt;br /&gt;
नर&lt;br /&gt;
त्रेस्त त्रस्त थे दुनियाँका एक एक साना ठूला प्राणसडक, गल्लीमा हिंड्दा छिप्ता, अस्पष्ट झस्का हर्देम साथ ।&lt;br /&gt;
आज कसँका नजरहरूले, उम्भी चम्कन पाएनन्‌&lt;br /&gt;
दुइ तीनका व्ययाहरूले, मिल्ने साहस गर्ने सकेनन्‌पृथ्वीको सृष्टि नासिदैथ्यो गह्ृ (गा बूटका दम्कालेकदम कदमको भार वढी भै, ढुङ्गा माटो उप्किरहेकोप्रेमीहरुका कम्पित हृदय, वीचवीच भै दौडिरहेथ्यो-बिश्लोडको त्यो वियोग वायु, सनसनाई मच्चिरहेथ्यो,ग।[रतका गारत तैनात थे, शंहरका जोर्नी जोर्नीमाश्मसान यो भन्नु हुँदैन, मलामीका हूल थिएनन्‌आवादी पनि यो ह्वन, आवाज सबैका बेपत्ता छन्‌&lt;br /&gt;
के हो कुन्नि ? पृथ्वीको यो एक सानो सिरानीमा&lt;br /&gt;
के नाच्दै छ? कोखाँदै छ? बग्दै नन्‌ थोपा रगत नसामाअक विचित्र दृश्य त अ्रक, जहाँ विद्रोही खोजिन्छन्‌ !राजभक्त ती पशुहरूका नाकहरू सुघ्दै आउँछन्‌&lt;br /&gt;
मानो यहाँ श्रात्महत्या, अयो क्या रे ग्रचानक&lt;br /&gt;
अनि त यसरी फौजहरू घेरि-रहेछन्‌ सिङ्गै घर&lt;br /&gt;
तर ह्वौन केही यस्तो चाहि, यहाँ त यौटा फिलिङ्गो रेडिलिभझिल झिलभिल बलीरहेथ्यो, क.डारकट पोह्न रेयही फिलिङ्गो बेपत्ता भो, यही तेज कतै उड्योछोप्नुपन्यो रे होइन भने, सिहासनै डगमगिने भो !&lt;br /&gt;
यो सानो घरको सानो काया एक लाश झै उम्भिरहेथ्योयस सिनोमा धावा बोल्ने, गिद्ध-राजको हुक्‌म थियो&lt;br /&gt;
-२७-&lt;br /&gt;
कित चुकुन्‌ ती ? किन हटुन्‌ ? भय कसैको कहाँ थियो ?&lt;br /&gt;
इच्छाध्ीन विषय पढे भै लाशको चोक्टा झिक्नु थियोमहापुरषषको राजपुरुषको तरङ्ग ग्रव लहरिन थाल्योसमुद्रका ती छुफानले झै, लाखेनाच देखाउन थाल्योएक एक कोठा चोटाहरूले, बूटको जब्बर थप्पर चाखेखाट, डसना, दराजहरूले मजबूरीको धावा खापेसिलिङहछूका कम्मरमा, खुकुरीका धार बज्जन थालेरंगीन भित्ता, इट्ठाहरूले दृश्य मेटिने धूलो फ्याँकेदानवी उद्गारलाई, साँच्चै नौलो मशला मिल्यो:-“अहा ! भेटियो बिद्रोहीको कालो करतृत लुकेको&lt;br /&gt;
हेर कापी लेखिएको, नेपाल आमा रोइरहेको”&lt;br /&gt;
एक सानो फोटो भन्छ, मै हुँ उसको बिद्रोही गुठदिन रात सिकाउँथे उसलाई, अनेक जादु मन्त्रहू”भागि-सकेछ दौडी-सकेछ, बिद्रोही त भ्रधिनैशायद उसको ग्रात्मा होला, त्यस सानो घ्यम्पोभित्रैह्यैन, ह्वैन, यो चौंठोमा, 5 भै केही बोल्दै होलाभिक भिक्र बिर्को हेरौं त्यहाँ जख्रै कोही बस्ला”,हेरिरहेछन्‌ साना बच्चा, कौतूहलले उम्लेर&lt;br /&gt;
क्के गरेको ? के खोजेको ? त्यो रित्तो भकारीभित्रराजपुरुषको महान खोजमा उपहासको सृष्टि गरे झैंबोल्यो एउटा सानो वालक, कटु सत्यको सास फेदै:-“ह्वैन त आमा, अस्ति मात्रै, ह।मीले मूसा मारेकोमुसेटोले उत्तको थृतुनो च्वाट्ट काटी रगत बगेको ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
न २६&amp;quot;&lt;br /&gt;
मातुनयनमा अथु बिन्दु ती टलबल चम्क्ी भन्छन्‌:-&lt;br /&gt;
कठँ कस्तो खोजी हो यो ? के कन्तुरमा पति माविस लुक्छन्‌कता गयो लौ हाम्रो इज्जत, कता गयो लौ हाम्रो प्यार?यक्ष पुरानो घरको छनो, कसरी टाल्ने उक्लिनासाथ ?&lt;br /&gt;
के पस्यो यो हाम्रो घरमा ? भूत भनौं यी मानिसलाई ?नत्र भने किन छटपटाउँथ्यो, हाम्रो हृदय यसरी तर्सी ?के छैन होला यी कसैको, आफ्नो प्यारो सानो घर?त्यसको रेखदेख गर्ने यौटा, हिम्मती छोरो जब्बर&lt;br /&gt;
यिनका घरमा आमा, बुहारी, सहन सक्लान्‌ यो बिचल्ली ?त्यो घरको जगले खप्न सक्चा, कतँ यस्तो जवरजस्ती ?षब किन यस्तो राक्षसले झै, ग्देछन्‌ यो हानथाप ?दुनियादारको कच्ची घरमा, छरिरहेछन्‌ हाह्ाकर ! ”&lt;br /&gt;
श्राज यौटा छाप्रो छैन, जसले जाति र चेन पाग्रोस्‌यी पशुहरूका धावाबाट, बच्दै खुसीको गीत सुनाओस्‌&lt;br /&gt;
त ना पी&lt;br /&gt;
बिफल भयो ति बिफल भयो, क्रान्तिकारीको अरमानउनको फलामे छ।तीमाथि,वञ्चन थाल्यो अभिषापगवारग्बारती ल्याइन थाले, वीरहरूका ताँती ताँतीलात बजाई कोर्रा हानी, कठालो औ दृप्पी समाईहाय ! वित्यो बीरहरूको, आजादीको अरमान&lt;br /&gt;
उमेर नपुग्दै चुँडिन थाल्यो, उनको आ्राधा औ प्रभियानकेमे चोक्चो, हृदय उज्यालो, उनको यो अभियान थियो&lt;br /&gt;
नरे”&lt;br /&gt;
अन्यायको चाङ लागेको, चित्तामा आगो लाउनु थियोजनवलको गुम्फित ज्वाला, राम्ररी त्यो फुट्न सकेनचेतनाको अड्कुरले पनि, कठोरतालाई चिर्ने सकेननेपालीको करोड दिल, करोड धार बन्न सकेन&lt;br /&gt;
छिटफुट छिटफुट धारहरूको, मार गहीरो जम्च सकेन !एक कारण ग्रर्को पनि लौ, राज कसोरी थपिन गयो ?दुइ कुरूषी दुष्टहरूले, यस मंडलीमा घुस्न पुगेको !घरतीको माटो, पानी, झामाको दूधलाई&lt;br /&gt;
चुस्दै चुस्दै थुन्न भनी, आएका यी देत्यहरु&lt;br /&gt;
मानिस ह्वँ नन्‌ जीव हवैनन्‌, घरतीका लाल ह्वै नन्‌बहुत घूतँ, कपूत कहाँका, हृदभन्दा पनि बेशर्मी !&lt;br /&gt;
यौटा चाहि बीर पुरक, भाई भै त्यो नक्कल गर्नेक्रान्तिकारी, जोशघारी, बात मादेँ क्रान्ति मार्ने&lt;br /&gt;
भन्थ्यो शैतान वीर सामू, गुप्तिकार्यले के गर्ने ?&lt;br /&gt;
झन्डा बोको भ्रघि सर्छु म, अरु भाइले साथ दिन्‌राणाहरुको प्रथम दलाल, इमान्दार टट्ट्थ्यो यो&lt;br /&gt;
तब त बाँच्यो दण्डविना नै वोरहरुको शिकार गर्ने !&lt;br /&gt;
कस्तो अनुहार श्रर्काको, छद्म भेष त्यो हरामकोघोती फेर्ने, टुप्पी पाल्ते, चन्दनले निधार पोत्नेगीताको ब।णीलाई जानाजान भुल्न खोज्ने ।&lt;br /&gt;
जन डर ०&lt;br /&gt;
के भनौं ल यसको नाम ! ढुर्गन्धी धुणित कामसुब्बा बन्ने, घन बट्ल्ने, बेइमानको नौलो प्ररमान,&lt;br /&gt;
यिनै पापी, देशद्रोही, मुहान बने रहस्य छोल्नतबै जान्यो राणाशाहीले, प्रथम क्रान्तिको गला घोट्न,&lt;br /&gt;
दासताको भित्तोमाथि, तैपनि बलियो लात कसियो&lt;br /&gt;
क्रान्तिकारीको शक्ति र शाहस, गर्जी गर्जी लम्किरहेथ्यो !&lt;br /&gt;
नेपालीको एक जनमको, यो गवित राग थियो&lt;br /&gt;
सबैप्रथम मुक्का तान्ने वीरहरो अनुराग थियो&lt;br /&gt;
कसरी टुट्यो, कसरी फुट्यो ! यो विषादको भेल थियो&lt;br /&gt;
पड्चात्तापको श्रम्निज्वाला अरब छिटै कसरी निम्थ्यो !&lt;br /&gt;
सूर्य हेर्देथ्यो, चन्द्र देख्दथ्यो, यो सफलताको भ्रवसान&lt;br /&gt;
चिन्ताका ज्वाला उम्लन थाले, बाली बेचैनी चिराग“एक छिनको एक दिनको, निम्ति चराको बेग टुट्यो&lt;br /&gt;
साहसको समुद्रमाथि, पखेटा चाल्न कठिन भयो ।&lt;br /&gt;
तर-&lt;br /&gt;
हेर गजब ! लो हेर गजब&#039; &#039;दशरथ चन्द&#039; को अनुहारमा&lt;br /&gt;
दायाँ बायाँ मुस्काइरहेका, &#039;धमंभक्त, प्रौ &#039;गंगामा&#039;&lt;br /&gt;
ख्वै त रेखा बित्नताको, ती हिम्मती गालामा ?&lt;br /&gt;
बली-रहेछन्‌, चंकिरहेछन्‌, शिरस्थातका ज्वाला भै&lt;br /&gt;
भ्रभै सजीव छन्‌ अ्रभै प्रकट छन्‌ प्र्क्नताका मुहान भै&lt;br /&gt;
कति अत्याचारका ज्वालाले, तिनलाई भुल्स्याउन खोज्ला&lt;br /&gt;
डड्नै छैनन्‌, निभूते छैनन्‌ नेपाल झामाको काखमा !&lt;br /&gt;
५ ३१२&lt;br /&gt;
सिहदर्बार पाटङगीमा एक ग्रद्भुत नक्सा हेरिरहेछ&lt;br /&gt;
जान्दैन कोही, किन यो यसरी, ठिङग उभ्भिई धोरिरहेछ ?हेर्दा मानिस भन्लान यो, राजकुमारको मैदान हो&lt;br /&gt;
जहाँ हलुका भकुण्डाहरू, उठछन्‌ मानो ब्यालुन झै&lt;br /&gt;
अनि बाँका ती दुई खम्बा गोलपोष्टका चिन्हत्त्वरूपपखिरहेछन्‌, कहिले आउला ? भकुन्डोको सुन्दर रूप&lt;br /&gt;
ह्वैन ह्वैन त्यो एक ग्रर्क, संहारकी साधन होश्रत्याचारको रेखा कोने उम्याइएको पाले हो&lt;br /&gt;
अलि बेरमा बग्नन्‌ यहाँ, रगतका निमुखा धारा&lt;br /&gt;
चारदिवारी चतुष्कोणमा, भझुल्किरहेछन्‌ झ्याल कर्यालमा&lt;br /&gt;
कौतुहल, औ त्रासमा खोली, परीदृरू आफ्न। तीखा आँखा&lt;br /&gt;
आज यौटा ठूलो जात्रा, यस रंगमञ्चमा देख्लाइनेछ&lt;br /&gt;
नेपालीको जीवनसंग खेलबाड गर्ने जाल यहाँ छ&lt;br /&gt;
पश्चिमको त्यो ठूलो बैठक, आज मानो हात्तौ बन्छहाराजको सिन्दूर जात्रा, गर्दा जो खुशीले लस्कन्छ&lt;br /&gt;
नरम कौच, सुन्दर कार्पेट, खुसबूले आत्मा मोहित पार्छ&lt;br /&gt;
उपहार उमंगी वाँडी बाँडी, सारा भारदार निम्त्याको छ&lt;br /&gt;
बिजुली गारत धेरिरहेछ, त्यस बैठकको पालो घेरा&lt;br /&gt;
बहुत सतर्क मृग भै त्यो नयन सवैत्र घुमाइरहेछ&lt;br /&gt;
हो हो आज यहीं हुनेछ, एक क्रान्तिको अवसन !&lt;br /&gt;
५ ३२&amp;quot;&lt;br /&gt;
कुन अचानो खोजी ल्याई, खडा हुनेछ यहाँ मसानयोनहो लौ खूनीहरूको, एक भयंकर बैठकएक लवजमा शब्दशब्दमा, मच्चिनेछ उथलपुथकहेर, छेउका कुना काप्चीमा, कोच्चिएका क्रान्तिकारीबाँधिएका बाघ डोरीले, मानो हुन्‌ ती ग्रत्याचारी !&lt;br /&gt;
अब सवारी भो महाराजको, चमरहरूको शीतल ताप्दैहीरा मोतील्ले झलमलिएका, ताराहरूको सरि बस्त्र पहिन्दैउनको ज्योति, उनको क्रोध, भारदारको हृदय उमाल्छसबले उठ्दै “सर्कार ! प्रभु ! | &amp;quot; एक शब्दमा स्वागत हुन्छ !धीमा चालमा, गर्व छातीमा, क्रोघ, रोष ती नयनबिन्दुमाएक विशाल काया उक्ल्यो, हेर उज्यालो सिंहासनमा !&lt;br /&gt;
उठिरहेछन्‌ भारदारका, ती क्रोधी काला काला आँखानसाहरू ती फुली-रहेछन्‌, निमोठ्न घाँटी विद्रोहीकाराखिएका बिचरा ती युवकहरू त्यस कुनामामानौ अस्पृश्य वस्तुहरू हुन्‌, घृणाको ढक्कनले छोपिएका !भारदारका नाक्कका पोरा, फुर्दै फुदैँ गोमन बन्छन्‌मूसा निलेका घाँटी जस्तै, राँब्किएर फुट्न खोज्छन्‌ !रुद्रघण्टी छटपटिएर, तलमाथि दौडिरहन्छन्‌पागल भै नरमाइला गीत गाई अमङ्गल रोप्न खोज्छन्‌ !भ्रब महाराजको हुकूम हुन्छ:-&lt;br /&gt;
“औँ! कहाँ छन्‌ ती शैतान ? ......&lt;br /&gt;
ना डेड क&lt;br /&gt;
गथ गादी ताक्न खोज्ने, यस कलि जुगका वरदाननजर गराओ हाम्रा हजूरमा, भस्म पारु तिनको शवउठेका रे होइनन्‌ ती राजद्रोहको पर्दामा ? ..... ”&lt;br /&gt;
अंगरक्षक एक हजुरिया, जुरक्क उभिई बिन्ती गर्छ:-“सर्कार ! यहीं छन्‌ ती कुक्कुर, नजर गराउन घिन लाग्छ!यी त प्रभो के विन्ती चढाझँ ? यमराजका दूतहरू हुन्‌ !अरब तैयार छन्‌ कोर्रा, लात, खाई तोरीको फूल देख्लान्‌ !&lt;br /&gt;
एक यही हो शुण्डमुशुण्ड राक्षसको अनुहार जस्तो&lt;br /&gt;
आँखा नदेखी चशमा लाउने नाम हो बेइमानको &#039;दशरथ चंदडीलडौल औ कुलमा सर्कारको पक्का सेवक जस्तो&lt;br /&gt;
तर घमण्डले जरखरिएको नजर होस्‌ अनुहार यसको !&lt;br /&gt;
“म्रर्को महाराज ! यो काले, कुलाङ्गार मशानकोभूतप्रेतको शाखा सन्तान, नाशको मूति जस्तो !अहंकारले मोट्टाएको कसरतले कस्सिएको&lt;br /&gt;
मानिस मात्रलाई तर्साएर, यतिको सुरिलो वनेको !नजर होस्‌ यसका साँप्रा यी भुस्तिघ्‌ खुट्टा&lt;br /&gt;
छाती नै छ क्या ठूलो मानो फलामे तावा&lt;br /&gt;
क्या मजा होला यसमा आगो सल्काई रोटी सेक्दा&lt;br /&gt;
कति छिटै पाकिहाल्लान्‌ ! जोगीका भुप्रे रोटी जस्तापहलमान रे पहलमान रे ! यो पाजी कहाँको न्यावार !&lt;br /&gt;
न ३४२&lt;br /&gt;
कक्तरी कुत्ति सिक्यो कुस्ती फ्याँकी श्राफ्नो कातर स्वभावभन्छन्‌ यसलाई &#039;घर्मभक्त”, पापको गहिरो महाकुण्ड&amp;quot;&#039;&lt;br /&gt;
भ्ररू त प्रभो ! यो भेडा बाखा, प्रत्येकको गिन्ती नै केछ!सब पणु हुन्‌ घाँस खाने, खप्परमा गिदी शुन्य छ&lt;br /&gt;
भ्राज परे फेलामा गरिप्रभो ! भ्रब कसरी यिनले काल काट्ने ?कृति बुद्ध उपर त टीठ लाग्छ तर सजाय नभोगी कहाँ माग्ने ?&lt;br /&gt;
झँ, प्रमो ! माफी पाउ, बिर्सेछु यौटा मूला गन्नसानो भए पनि ज्यादै पीरो, बिन्ती नगरी सुख्खै छैनबिच्छी हो यो बिच्छी हो, बिषको सानो थैलोहेर्दा कस्तो कलिलो केटो ? तर छ पहिला हात घुमाउनअस्ति मात्रै हो लौ, यो गधा इन्द्रचोककोडब्लीमाथि उभिई भन्थ्यो-नेपालले परिवतेन खोज्योउठ ! उठ ! ए, नेपाली हो ! भ्रन्चकारले लाटो पान्योहाम्रो गाँस हाम्रो बास, हरी हरी दुर्गति ल्यायो&#039;भन्छन्‌ यसलाई ती चोरहरू, &#039;गंगालाल, गंगालाल !ता रु तीबातावरणमा भ्रक हावा, धब हुत्तिएर बग्न थाल्योमहाराजका तेर्सा जै घा, सवप्रथम हल्लाउन थाल्यो“गोवर गणेश&#039; भौ जम्बुमन्त्री&#039; उफ्री उफी हेन थाले“गोपाल&#039; को त्यो नपु&#039;सकताले अहिले केही शक्ति पायोगुरु पुरेतका टृप्पीहरू, चाँदतोडाभित्र हल्लिव थाले&lt;br /&gt;
न दैन तल&lt;br /&gt;
हृदयकण्ठ औ जिब्रोले, राजद्रोहको दण्ड पढे&lt;br /&gt;
चिम्से बाहुन-आँखामा पनि, क्षत्रीको उस्तो राग आयोआफ्नो छाती हेरी हेरी मत्ताहात्ती भ घुम्न थाल्यो,जुठो भुजा चाख्ने अरूहरु, भारदारको बुद्धि बसेनमानो अन्धो सपजस्तै, वस्ने कुनै स्थान रहेन&lt;br /&gt;
प्रत्येक हृदयमा गुनगुनाहट, एक सुरले घुइरिन थाल्योशिवरात्रीको मूढो भै त्यो ताप छोडी जल्न थाल्यो !&lt;br /&gt;
तेलिएका जुँघा चम्के, विस्तारै मानो उठ्न थालेउनका संगी भै रौंहरू ठाडा ठाडा देखिन थालेमहाराजको आसन हल्ल्यो त्यो तीस घार्नीको लचकमाबाक्य फुट्यो पाकेको घाउ, श्राफे फुटे झै हावामा:-&lt;br /&gt;
«ठीक भनिस्‌, अँ ! ठीक भनिस्‌ हाम्रा हजुरको चित बुझ्योयी पाजी सब हुन्‌ कत्लघरका, मेहमानहरू, याद आयो !के त्यो ह्वन ? चश्मेठकुरी, हामो कुलको सेवक दासआज कसरी उछिट्टिएछ ? दुर्मेतिले गर्दा होला लाश&lt;br /&gt;
“पहलमान रे आर्को चाहिँ ? कहाँ त्यसले सिक्न पुग्यो ?हामा हुकुमको प्रमाङगी विना, कसरी त्यसले मुकदल छोयो ?शुरुदेखिकै दुष्ट रहेछ, यो पनि स्यालको तर्कारी बन्योखूव केर्नू, खुब मथ्नु, एक एक नौनी रहुञ्जेल&lt;br /&gt;
खूब चुट्नु, खूब लुछ्नु, एक एक क्कत्य लुकाउञ्जेलदेशद्रोहको श्रागो ताप्ने, कलियुगका यी कंगाल !&lt;br /&gt;
३६२०&lt;br /&gt;
टी. बी हैजा छारे रोगले, मने नसक्रेका जंजालछने नपाञन्‌ कतै यिनले, महारोगका कीटाणृहरू&amp;quot;&lt;br /&gt;
ती ती तीराजकुमारको हाहा हूह फुटवलको त्यो रन्कापदै झ्यालका परीहरूको उल्लास भरेको खित्काहेर्ने, सुन्ने, सुरमा शायद, उभ्भिरहेथे बाँसको खम्वाअब टाँगिएका युवक-हृदयका सुन्न थाले बीर भावनालाम लागेका यमदूत जस्ता, प्रठपहरिया कैयन्‌ उम्भिरहेछन्‌कहिले थाक्ला पहिलो साथी ! यत्ति सुरमा उम्लिरहेछन्‌हतार हुँदैछ, हतार हुँदै छ, तर के गर्ने खै पालो ?बीरहरूको शौयं देखी कोर्रावाल झन्‌ कसिन्थ्योक्रोधको एक एक करेन्ट भराई, च्यास्स च्यास पोली भाग्थ्योपशुताको अन्तर्ज्वालामा घिउतिलको हवन चल्थ्योचलिरह्यो यो क्रम निरन्तर, कोमल परी ती नानी सामुबोरभाथिको अत्याचार, डामिरहेथ्यो उनको छातीशायद यो नै त्यस महलको, अ्रक्षीम व्यथाको पानी !सिस्नो पानी, कोर्रा हानी चाहन्थ्यो चुक्की राणाशाहीबीरताको यस समरमा, वी रहरूको पानी कारौएक वीरले घैयं छोडे, आत्मवलले सहन छोडेस्वतन्त्रताको बलिवेदील।, घोकाका दुई चार छिटा फ्याँकेवर्षेनेथ्यो भुक्तिमुक्ति नयाँ जीवन सृष्टि गर्ने;तर-प्ररन मात्र थे एकोहोरा, ती सोध्ने सुब्बाका मुखमा&lt;br /&gt;
-३७-&lt;br /&gt;
थिएन जवाफ वीरहरूको, च लिरहेथ्यो श्रनगिन्ती कोर्रादाह्वा किट्दै जर्साबहरू, श्रत्याचार बर्षाइरहेथेमहाराजका भयभीत नेत्र रक्तसिन्धुमा पोडिरहेथे&lt;br /&gt;
यत्रो सर्जाम जोने सकेर, वीरहरू दी हाँसिरहेथेक्रान्तिको त्यो गुँडलाई, रक्तधारले छोपिरहेथे !&lt;br /&gt;
भुई लाल थ्यो, कोर्रा लाल, आखिर हान्नेको कपडा लालकरण भाव ती उब्जन थाली, नारीहरूका गाला लाल !लाल लालको लाली थ्यो यो, लाल नेपाल पार्ना निम्तिहेरिरहेथे अत्याचारी, आँखाहरू पनि थाकी थाकी,&lt;br /&gt;
कसले पायो होला, सयभन्दा पनि कम कोर्रा&lt;br /&gt;
तर कसले भनेन होला गर्जी, दुई सय बढी भाव अनौठाबसिरहेथे वीरहरूका कण्ठस्थलका मोहरीबाट“अत्याचारी वास गरौंला, नेपाललाई मूक्त गरौंला&amp;quot;यस्ता चर्का यस्ता ताता, शब्द रुपका गठिला गोलीछोडिरहेथे महाराज औ भारदारका छातीमाथि&lt;br /&gt;
अब के हुन्थ्यो, व्यर्थै थियो, केवल तनको रक्त बगाईकपोलकल्पित दोषहरुमा, लिइयो बूढी औंलाको सहीमूखित नेता नेपालीका, हेरिरहेथे अत्याचार&lt;br /&gt;
जगको निमेल आत्मा भन्थ्यो, यो त भयो है सीमापार !थररर काँप्दै भित्रभित्रै, पापी आत्मा बरवरायो:-&lt;br /&gt;
“गयो अब त्यो भ्रत्याचारको, ग्रघि अघि भै पोल्ने राप”&lt;br /&gt;
0 ती ता&lt;br /&gt;
न. इद&amp;quot;&lt;br /&gt;
दुई महीनाको चीसो स्याँठ, दुई महिनाको फिक्का घार्मेकाठमाण्डूको बाक्लो कुहिरो, छोपिरहन्थ्यो नगर तमामहृदय भएका कोमलता, पालीपाली हुर्केका&lt;br /&gt;
जीवनको गरवित शक्ति, देश-भक्तिमा ग्रर्पेका&lt;br /&gt;
बीरहरू नै खप्न सक्दथे&#039; छेदवाहरूको धैर्य कहाँ ?हेर्नोस्‌ यौदा एउटा जेल यहाँ छ, सिंहदरवार बोकिरहेछसृष्टि गर्ने आमाले भै, कष्ट भोगी डुलिरहेछ&lt;br /&gt;
“रेडियो नेपाल&#039; बोल्दछ श्राज, उसकै का&amp;amp;्षमा पल्टेरनेपालीका पयर टहल्छन्‌, संगीतको राग लिएर&lt;br /&gt;
यहीं थिए ती वीरहजरू, हुन्‌ रे देशद्रोहीहरू&lt;br /&gt;
हुकुमी चुक्कुल फोरी घुस्ने, हूल गर्ने डाँकूहरूसिपेन्टमाथि दरी बिछ्याई, सुताएका जीवहरूदेश्प्रेमको यौटा आगो, तापी वस्ने ख्वै र प्र ?&lt;br /&gt;
राणाशाहीको प्रत्येक कञ्चट, पसिनाले निलिप्त गरेरमहाकालको मूति जस्तो, एक भयावी दृश्य रचेरगुप्त भेषमा व्याप्त भेजमा, महीना दिनतक पौडेरदुर देशमा, क्रान्ति रेसमा, नूतन ज्योति जगाएरघाइरहेको प्रथम सेवानी, पक्रियो रे जाल गरेर&#039;टकप्रसाद&#039; आइरहेछ, विशाल तराई पार गरेर&lt;br /&gt;
उड्न थाल्यो सन्देश यो, काठमाण्डूको हृदयभित्रप्रतिक्रान्तिका फौज हाँसे, मानो एटम फोर्ने सकेर !&lt;br /&gt;
- ३६ --&lt;br /&gt;
यही एउटा भूल शिखरको, फलको ज्यादै तृष्णारेआज मिल्यो नि हातै बाँधी, कत्रो ठूलो बिजय भयोरे !&lt;br /&gt;
तोन धार्नीका नेल सिक्री, प्रक थप त्यसमा गलफन्दीसिंगै गारत घेरिरहेछ, उनको शक्ति तौल्वा निम्तिउड्छ, उड्छ रे पक्षी जस्तै, यो त यौटा जादू हो&lt;br /&gt;
एक निमेषमा एक भिक्रा, खेल्न पाए पार पुग्योमहाराजको सामुन्नेमा, एक अफिसरले बिन्ती गन्यो:-&lt;br /&gt;
“हे आ्रोजस्वी ! धर्मावतार, यही हो तिसर्मी बाहुन बच्योहावाजहाज हो सर्कार यो, बाघडोरीले कस्नु परेको“टंकप्रसाद, भन्ने कुनामले, यो ती डाँकूमा विख्यात छ !”&lt;br /&gt;
राजबैठक कन्‌ बिचित्र, विश्मयको स्वास फेर्छ&lt;br /&gt;
कल्पनाको ह्यामान चिडिया, लुप्त हुँदा त्यो गम खान्छ !उपहासको रंगमा यौटा अर्को भाव व्यक्त हुन्छ:--भद्दाराजको प्रइन उभिन्छ:-&lt;br /&gt;
“के यं पुड्के वाहुन चरी, घाँच्नै उही टंकप्रसाद हो ?सम्पूणे बिद्रोही ग्रागीको, के यही नै पहिलो किल्को हो?पत्यार लाग्दो, भर पर्दो, ख्वै त यसको रूपै छैन !&lt;br /&gt;
वल, बुद्धि ्रौ सुच्याईको, वस्ने कत ठावै छैन !&lt;br /&gt;
भूल भयो हो, भूल भयो हो, पक्कै हुलिया अलमलियोयो त यौटा सित्तै आयो, माछाको हलमा फूल ग्राए भैदुध निकल्ला श्रोठबाट, भो भो छोडिदै लौ ग्रहिल्यै !&lt;br /&gt;
कन गि क&lt;br /&gt;
ए युड्के पण्डित बा कहाँ जानू, महाराजको स्तुति जप्दै !महाराजको भाषणलाई, सभागृहले खेद मान्छकस्तो बिचार, कति उदार ! कसरी हाम्रो राज्य अड्छ!भन्छ उफ्री &#039;गोवर गणेश&#039;:-&lt;br /&gt;
“महाराज यो श्रनर्थ भयो.नजर होस्‌ यसको रिपोट, कत्तिको छ यो बाहुन गहिरो ?यो सबैक्रो नाइके पो हो ब्राह्माणकुलमै आगो लाउनेहाम्रो रीतिथिति नाश गरी म्लेच्छहरूको सीको गर्नेहेर्दा पो यो सानो सानो, तर यसको मन कति साह्लो ?मौका पाए पिस्तोल उजाई, गाथमा चढ्थ्यो हान्न तारोभारतवर्षका राजद्रोहीसित, बलियो छ साँठगाँठ यसकोतब त निक्ले सर्कारबिरोधीः लाञ्छनाले पोतिकाहुना नहुना वकवादहरू, पेर्टाभत्र जनताको &#039;१विश्वास लागोस्‌ सर्कारमा, खास हुलिया यहीनैहीबिजुली हो यो बिजुली हो, ज्यूदै छाला काढ्नुपर्छरगतका धारा संगै-संगैँ, यसले षड्यन्त्र खोलिदिनेछकति छिटो लौ भागिसकेथ्यो, बाबुको किरिया बस्न आयो ! ”बह !&#039; महाराजको चेत फर्क्यो, शंकाको कुहिरो उड्न थाल्योत्यसको विशाल पंखले, कातर हृदय घोच्न थाल्योउसो भए लौ वाँध्‌ यसलाई, यो त सपको बच्चो पोयति सानो मान्छे यति चर्को, तव त्यो गंगे कस्तो होला ?&lt;br /&gt;
शागलाभाममि आमिनिनिनिहिम्िनिलिहिनतिरिकिल्टिटिजलाण जग ए0114100100000१ पटनावाट निस्कने पत्रिका&lt;br /&gt;
-४१-&lt;br /&gt;
काल भैरव भै त्यो धर्मे ! उम्झ्नन पाए संसार निल्लापर्वेत जस्तो त्यो दशरथे, जरूर जख्र सातो लेला !त्यहाँ थुप्रिएका पशुको पनि, त्यसतै तीखो सिंग होलाओहो ] नेपालका घरघरमा, धेरै साना वच्चा होलान्‌ ।कतै, के, ती पनि यस्तै, राजद्रोही पाठ त पढ्दैनन्‌ ?पुर्वी डाँडो रंगिएदेखि पश्चमी डाँडो धमिलिउन्जेलआमा ! बावा भन्नेदेखि, स्कूल कलेज जाउञ्जेल&lt;br /&gt;
एक एकका गब्द उतानू, मनमनमा डिग्री लाउनू&lt;br /&gt;
साना भन्दै एक नहेप्नू, पेरङ्गो कोक्रो खाली गर्नू&lt;br /&gt;
&#039;गंगे&#039; जस्तै बुलबुली पाल्ने &#039;दशर्थे&#039; जस्तै चइमा लाउनेएक नछोइनू, एक न छोड्न्‌ सारा बट्ली कोच्न थाल्नू !हो त साँच्चै, विचार गर लौ, गन्ध भनेको कत्रो हुन्छ ?एक्कै थोपा खस्न पाए, सिङ्गै बैठक मगमगाउँछ&lt;br /&gt;
लौ ठीक पार्‌ सिस्नो पानी, तन्काइहाल्‌ छाले कोर्रालैजा तल त्यो फ्टाँगीमा, भुण्ड्या बाँसको छम्बामा&lt;br /&gt;
एक एक ररन्का रन्किन थाल्दा, श्रनि होला इतिहास पूरा&amp;quot;&lt;br /&gt;
अब के थियो त्यो बैठकको, उम्लिएको कराईमासब मसाला घुलमिल गे, वनिसकेथ्यो सुरुवाबाँड्नु अ्रगावै एक सुर्को, चाख्न भने भै कल्पेर मौनआज्ञा महाराजको पाए भै भट्ट बौलाएर घर्किएकोशान राख्न, पहलमान त्यो जागीहाल्यो:- “मन एपुड्के टंके काठा | तै ह्वैनस्‌ राज उडाउने ?&lt;br /&gt;
ला चड्कन गालामा, गर्छस्‌ सेखी हम्रो साम्ने ?&lt;br /&gt;
बन चक&lt;br /&gt;
डाइनामेटको आवाज भै टंकप्रसाद गजिए:-कर्मचण्डाल ! ए पहलमाने ! चिनिस्‌ को छ तेरो सामुन्ने !क्रान्तिको पहिलो गोली, तेरो राज उडाई छाड्नेबैठकभरिका मूर्खे पशु हो ! सर्कार देशको मुटु होलिइँदा खिइँदा चक्छ भने, त्यो मुटुको के काम लाग्यो ?हुकुमी राज नेपालीको, सवभन्दा ठूलो खाडल होयसकै गहिराइमा सब, नेपालीको सर्वस्व डुबेको,कसरी भन्छौ तिम्रो राज ईश्वरको बरदान हो यो ?बताञ हिसाब कति करोड नेपाली धन बिदैश पुग्यो ?आज शत्ति,को श्रन्घो बलमा, यसरी पागल बन्दै छौ !हजारौं नेपालीलाई, बिदेशमा लखेट्दै छौ&lt;br /&gt;
लाखौं नेपालीलाई, कात्रो तिमीहरु ओडाउँदै छौ&lt;br /&gt;
के झधिकार तिमीलाई नेपाललाई छ रित्याउने ?कसको दिल चाहिरहन्छ बाँची बाँची मर्ने ?&lt;br /&gt;
ढुङ्गा ह्व नन्‌ मानिस जाति, छाती खोली वढ्न नसक्नेभ्रब ग्रर्के मुटू बदल्न, अ्रव दोस्रै दम भने&lt;br /&gt;
देशमा जाँदो पहिरो लाई, राम्ररी नै रोक्न&lt;br /&gt;
देख्लौ कति चाँडै नै, एक तृफान यहाँ उठ्छ&lt;br /&gt;
त्यसको बेगमा ढुन्‌मृनिदै, तिम्रो बंशकै इतिथरी हुन्छ&amp;quot;विस्मित थियो त्यो पहलमाने, बन्दीको कुर्लन सुनेरहेरिरह्यो आँखा च्याती टृप्पीदेखि खृट्ठासम्म !&lt;br /&gt;
॥ नि नी रनित्य वहान वीरका फौज, पल्टन जस्तै निस्कन्छन्‌खर्लाङ्ग खुलुँङ सर्ल्याङसुलुँङ ब्याण्ड वाजा बज्छन्‌ !&lt;br /&gt;
नङ&lt;br /&gt;
एंक सिपाही अठपहरिया प्रत्येकका साथमा छन्‌&lt;br /&gt;
बात कसैले माने हुँदैन, मानो &amp;quot; छोटा- लाठ ताड्छन्‌&lt;br /&gt;
शेर जस्तो जगर फिजाई, ठाडा ठाडा केश उठाई&lt;br /&gt;
सूयंदेवको तेजलाई, मानो जलपलाउनालाई&lt;br /&gt;
उर्दी दिन्छन्‌ &#039;दशरथ चंद,-&lt;br /&gt;
क्“्झम्‌ सेलोट नेतालाई!”&lt;br /&gt;
सवक्रा मोटा मोटा सिक्री, खुट्टाका ती नेल पनि&lt;br /&gt;
छुन्द्रङ्ग गर्छन्‌, शब्द उचाली! सबभन्दा चर्को सलामी&lt;br /&gt;
हा हा हा हा हाँसो छोड्दै, हेछे तेजी नेत्र धुमाई&lt;br /&gt;
नेता हो यो &#039;टकप्रसाद&#039;, उत्साहको नौलो शक्ति&lt;br /&gt;
भन्छ प्रेमको स्रोत उमाली, सान्त्वताको किरण छरी:-&lt;br /&gt;
“थ्वन्दा छैन: धन्दा छैन, हे देशका लडाकूहरु हो !&lt;br /&gt;
सही कदममा हाम्रो पाइला, हेर कसोरी लस्किरहेको ! &#039;”&lt;br /&gt;
एक जोडको हर्ष बहन्छः एक शक्तिको पर्वत उठ्छ&lt;br /&gt;
आत्मविश्वास, श्रद्धाको, तातो रस गहमा ड्ल्छ&lt;br /&gt;
सब मौन छन्‌, सब प्रफुल्ल छन्‌, लडाक्‌ इतिहासका पानामा&lt;br /&gt;
उक्लिरहेको सूर्य छटामा, उद्द लित तिनका चेहरा&lt;br /&gt;
लाग्ने मानौ विजय पक्षको, हो यो राम्रो दिव्य सभाछि त छ छी उ&lt;br /&gt;
» भारतमा अंग्रेज शासन छँदा प्रान्त प्रान्तका गभनेर&lt;br /&gt;
(बडाहाकिम) लाई छोटा लाठ भनिन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
५ सिहदरवारमा थुनिराख्दा हरेक विहान टंकप्रसादलाई&lt;br /&gt;
बन्दीहरुले दिने गरेको सलामी (हाँसो गर्दै)&lt;br /&gt;
क डौ ला&lt;br /&gt;
यस बन्धनको छप रंगमा केबल चिन्ता मात्रै छैनबीरहस्को यस मण्डलमा, केवल ” भूत जमेको छैन&lt;br /&gt;
नयाँ युगको नयाँ कहानी, आक्कल-भुककल सिजिइँदँछहर्ष, विजयको ग्रमर प्रभाव, सतत प्रभावित भैरहेछखुला विश्वमा एक बिचित्र, नाटक फेरि खेलिन्छ&lt;br /&gt;
दशरथ चंदको एक स्वर उठ्छ:-&lt;br /&gt;
“ए ! लम्की लम्की हिड्ने मान्छे, के त्यो छोपी लग्दै छस्‌ ?कक्षका निम्ति कसका उपहार, श्राज लुकाई लग्दैछस्‌ ?अ्रठपहरिया थरथर कामी, झण्डै किस्ती खस्न लाग्छखूब सह्याली थूक निलेर दशरथ - सामु हाजिर हुन्छभयभीत स्वरमा भन्न थाल्छ:-&lt;br /&gt;
“केही ह्वैन यो केही ह्वैन; जर्साबको मिष्टान्न होहेर्नुहोस्‌ लौ भन्छु, यो अनार र मौसम हो”&lt;br /&gt;
देखादेखी हात उठाई, किस्तीमा अधिकार जमाईहाँसी, हाँसी, छानी, छानी, मिष्टान्न पुरै मृठयाईआदेश दिन्छन्‌ दशरथ चंद:-&lt;br /&gt;
“जा भन्दे तेरो जर्सावलाई, मैले यसरी हात हाल्यो !के त्यसको मात्रै हिस्सा लाग्ने, स्वादिलो यो श्रनार होहामी यहाँ छौं ज्युँदा मानिस, मात्रको हक चिनाउने।पयवलितिभियल गोल्टिन रित्तिइसक्यो, सिगरेट पत्ति पठाइदे ! ”&lt;br /&gt;
गोली लागी मर्ने प्रडेको, एक बिजुली चिडिया जस्तो” भूतकाल (पहिलेको याद)&lt;br /&gt;
४५२&lt;br /&gt;
रल्लटल्ल विस्मित भई, त्रासले हुत्याइरहेकोभ्रठपहरिया किस्ती समाती, गुन्दै गुन्दै हिड्न थाल्यो:-“हुन को हो, यो मान्छे ?&lt;br /&gt;
कैदी भनी समातिएर, सिमेस्टमाथि तपस्या गर्दो,आम्मै आम्मै कस्तो ठण्डी, संक्दै होश उड्छ मेरो&lt;br /&gt;
दुई जुराफमा बूट लगाई, हामी आफैं पहरा दिन्छौंगरमकोट, जर्सी लगाई, गलवन्दीले घाँटी सेक्छौं,तैपनि जाडो पञ्जाभित्र, इन्जेक्सन झैँ घोचिरहन्छखुट्टाका यी दश औंलाले, सुनिई कृण्डै मर्नुपरछे,&lt;br /&gt;
हेर यसको सुत्ने कोठा, हेर यसको ओड्ने कपडा !एक चादर ः्रेढी यसले, गरेको लौ कसरी गुजरा ?”“कर्साब्च, जर्साव, कवाँड्चिफ, अरक्‌ महाराजकै दाँया बाँयाहामी वस्छौ सधैं जस्तो, तैपान कस्तो हाम्रो चेहराहोश उड्दछ, ह्वेश उड्छ, मानो मुटु नै अ्रडिन पुग्योएक्कै शब्द वोल्नालाई, शरीर पसिनामा ड्ब्नुपर्छ&lt;br /&gt;
तर, हेर यो दशरथचन्द ! , जर्सावको थाली खोस्छमहाराजको भन्दा चर्को, यसको सवलाई हुकुम छ,हवन, के यो मानिस ह्वन ? ह्वैन, के यो ठकुरी ह्वन ?ईश्वरले सृष्टि गरेको, के यो उस्तै जीव ह्वन?&lt;br /&gt;
तब किन यो यस्तो चंकेको ? सुयं जस्तै हेर्ने गाह्रो ?न मुटुले दोस्रो वाजी, हात हाल्यो, मुख छोड्यो,&lt;br /&gt;
किन यस्तो विचित्र हो ?”&lt;br /&gt;
नो न वै&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
बन्दरीहहुको बन्धन प्राज, दिन परदित खुकुलिँदैथ्योराणाशाहीकी निगाह होइन, यो त उनैको चमक थियोहिजोसम्मका गुप्त सिपाही, बिस्तारै कान खोल्दैथेदेशभबितिको राग पाई, आफ्नो घरको फोटो संझीराणाहरूले गाडिरहेका, बनेलका जस्ता दान्हा देखीउनका ग्रात्मा ब्युँझि रहेथे !&lt;br /&gt;
एक सिपाही लम्की लम्की, पुत्रशोकी भै दौडी प्रायोदशरथचन्दको कोठामा, देखादेखी घुस्त पुग्योघिग कोठा उचालिने गरी, एक स्वासले भन्न थाल्यो:-&lt;br /&gt;
&amp;quot;हजुर ! आज त ज्यादै भो......सहन नशकी मेरो आत्मा, यसरी हुत्ती हुत्ती श्रायो,अन्याय र प्रत्याचारको, वेदना र सासनाकोहिमालय यहीँ खडा भयो .....मन पोल्दै छ ओ्रोडाहाले, अ्रव कत्ता लाने लौ जानेहो?&lt;br /&gt;
शो&lt;br /&gt;
उभ्भिएरे मुख छोपी, धुँक्क घुँक्क त्यो रुन थाल्यो&lt;br /&gt;
उसको उर्दी खाकी पोशाक, आँसुले नै धोइन गो&lt;br /&gt;
&#039;दशरथ&#039; भन्छन्‌ सान्त्वना दी, मुखमण्डलमा लाली छाईचश्माका ती चमकभित्र, श्राँखाका नानी सोम्याईः-&lt;br /&gt;
“के भयो हँ ? किन रुन्छौ ? पहिला जम्मै रिपोर्ट द्यौकालको निम्तो टान खोज्दौ, राणाले कसको रगत बगायो ?&lt;br /&gt;
न्‌ ७ न&lt;br /&gt;
श्रस्थिर तनले कम्पित मनले सिपाहीले फेरि भन्यो:-(“को हुन्थ्यो ग्रछू ? उही बाबु, भूइँचम्फा त्यो गंगालालकोएक एक लोता छाला तानी रक्तपात लौ मच्चाइएकोहरे, कस्तो बाबुको मुटु, हो भने त पुगिहाल्थ्यो !”&lt;br /&gt;
वीर &#039;दशरथ&#039; दश सूयं, उदाए झैं भन्न थालेः-&lt;br /&gt;
“को नडराङ, पर्वाह छैन, यही त वीरको वीरता होउसका पाथी पाथी रगत, राणाशाहीको चिहान होप्राणको वाजी लगाएर, हामी यसरी ग्राएका ह्वौं&lt;br /&gt;
रगत के हो ?- पसिना जस्तो प्राण दिन पनि तैयार छौं ! ”सम्पूर्ण कोठा गरमायो, एक एक आत्मा भन्न थाल्यो&lt;br /&gt;
“धन्य बीर हो घन्य धन्य, तिम्रो वीरता खेर जान्न ।&#039;&#039;&lt;br /&gt;
मौ ॥ तभारेभुरे सारा बात छन्‌ खालि कल्की टल्कन्छन्‌त्यस सूयंको उज्वल छायाँ, कोतूहलले तापिरहेछन्‌महाभारतको विराटपर्वे, हेर फेरि शुरू भयोप्रतिक्रान्तिका सेनानीको, यो शक्तिशाली जमघट होअदव यहाँ छ, राजदर्वार, सवले तौली बोल्नु पर्छप्रतिभाशाली राजाको, हुकूमलाई पचाउनु छबादविवादको सिलसिलामा, श्री ३ जुद्ध प्रश्न राख्छन्‌गाईले बाच्छो चाटे झै, शान्त स्वरमा बोल्न थाल्छन्‌:-&lt;br /&gt;
“हेर यतिका टल्किएका, निधार हामी देखिरहेछौं&lt;br /&gt;
न ब्द-&lt;br /&gt;
थिनका एक एक टलकत्राट, सत्य हृदयक्रो श्रामास माग्छौँबिचार गर लौ हाम्रो राज, कसरी कहिले आ्राएथ्यो&lt;br /&gt;
आज कसरी चौदिशामा, श्रकै झिल्का देखिरहेछौं&lt;br /&gt;
क्के यस्तै फेरि उम्लने छ ?...&lt;br /&gt;
अथवा सामसुम सुक्का ढोड, कक्रिए &#039;झ लत्रिनेछ ?कसरी हाम्रो इच्छा श्रफ दिनपरदिन बढ्दै जानेछ ?”त्मगर&#039; अगाडि आई भन्छन्‌, तीखा तीखा जुँघा मृठारीजोश रोषको ताप छीडी, भकभकाई गर्जी:”&lt;br /&gt;
“ठीक हुकूम भो महाराजको, सरकारको ज्ञान चौडा छनतमस्तक छौं हामी छोरा, आज केद्दी गर्नु जरूरी छ,&lt;br /&gt;
म त संझन्छू, हामीहरू ह्वौं नेपालका ज्यूँदा शेर&lt;br /&gt;
एक गर्जेन, एक तजेन, हल्लाउँछ त्यो मेघ;&lt;br /&gt;
हाम्रा पुर्खा &#039;जंग प्रभु&#039; ले जसरी रगतमा पौडी खेलेत्यसकै शक्ति ल्याइरहेछ, हामीमा तागत अहिले;&lt;br /&gt;
नेपाल हाम्रो, दुनियाँ हाम्रो, त्यो हिमालय भन्‌ राम्रोकत्रो शक्ति बृटिश राज्यको, सो पनि बोल्दछ बोली हाम्रोश्राज दुई चार घरमा द्रोही, जन्मन्छन्‌ यदि साँपसरिताकिरहने के काम छ ? सक्नुपर्दछ भुट्न यहीं&lt;br /&gt;
नजर होस्‌ लौ कैयौं दिन भो, को पाजी मूसो चुइँयगन्यो?सत्यानासी, ती अ्रभागी, खाँदै छन्‌ हावा सिमेन्टको,राजकाजमा पछि हट्नाले, श्रयवा माया राख्नाले&lt;br /&gt;
पाण्डव किस्सा बन्दछ, इस्पात बन्नु छ हामीले,”&lt;br /&gt;
४९&amp;quot;&lt;br /&gt;
एक भाषणले गउचर गन्यो, भाइ भारदारको रगत उमाल्योसबका मनको स्वच्छ भावना, एना जस्तै चंकन थाल्यो“ठीक, ठीक हो त्यस्तै हुन्छ” -पालैपालो शब्द निकल्छ«क्कृत्रिम मनको वज्जलाई, आजै प्रहार गर्नुपर्छ&lt;br /&gt;
थाहा पाउन्‌ दुनियाँका एक एक कुनाका मान्छे&lt;br /&gt;
कस्ता सूरा, कस्ता बलिया, होइवनिमन्छ महाराज अहिले”&lt;br /&gt;
गम्ब थाले श्री ३ जुद्ध ठूलो शोचमा भूटिएर&lt;br /&gt;
देन्गे हातले जू&#039;घामाथि, हलुकासित ताउ दिएर:-&lt;br /&gt;
न्सूरा छन्‌ लौ हाम्रा छोरा, हाम्रा भतिजा झन्‌ बलियाभारदारका बुच्चा बुच्चा, नाक प्नि खूब घारिला !शंका लाग्छ कतै यिनले होशको ग्रमृत चाख्न विसून्‌समयको घार नजानी, सिकारु भै डुब्न थालून्‌&lt;br /&gt;
राजद्रोही जरुर हुन्‌ ती सख्त दण्डका भागी&lt;br /&gt;
कसरी भन्ने ? प्रहिल्यै हामी लागौं तिनको प्राणको बजीकतै आगो कन्‌ सहकोस्‌ रगतका सिर्का छ्न नआग्रोस्‌&lt;br /&gt;
खूत भएपछि भन्दछ शास्त्र, बोक्नुपर्दछ पश्चात्ताप,”&lt;br /&gt;
खसखस घाँटी साफ गरी, घाँटीका सव वाक्य समेटीभन्छन्‌ प्रष्ट श्री ३ जुद्ध, गम्भीरउपर गम्भीर बनी:-&lt;br /&gt;
“थाहा छ तिमी सबलाई, मेरो यो छाती को नापजत्ति चौडा यो देखिन्छ, डब्बल अक यो हुनसक्छ&lt;br /&gt;
बाबु-प्रामाको मुस्कानमा, छोरा-छोरीको सृष्टि हुन्छउनको प्यारो चुम्बनमा तिनको तोते वोली खिल्छ&lt;br /&gt;
३०&amp;quot;&lt;br /&gt;
ईइवबरका वरदान यदि, छौरा-छोरी हुन्‌ भनेपृथ्वीका ईश्वर संरक्षक, आमा-वाबुले हुन्‌ पर्नेभूल भएमा, ्रलमलिएमा, संकटका भूत उज्नन्छन्‌तिनको अदृश्य झस्काले, जीवनका फूल वैलाउँछन्‌&lt;br /&gt;
बात, साफ छ, ताप ठूलो छ, यो त रणको बेला होबढ्ने, हट्ने अथवा अडिने ? यही नै मूल समस्या हो:गद्गद छु म देखिरहेछु तिमीहरू दिग्गज विद्वान्‌ छौसरस्वतीको बरदान पाई, दुनियाँको नाडी छाम्न सक्छौ;छाम त फेरि दोस्रो पल्ट, शुरु शुरुमा कैयन्‌ भूल हुन्छन्‌खस्रो सिलट, पिन्सिन आफै, घोई घोटिई चिल्ला हुन्छन्‌;भन मेरा शूर वीर हो ! अहिले कसरी लड्नु बेस छ?के रगतकै होली खेल्ने ? यो त गर्मीको बेला छ&lt;br /&gt;
परिसके सव माछा जालमा, के अहिल्यै सुइरो कोच्नुपछे;भस्मभित्रको आगो माने, फू फू गदैं उडाउनैपर्छे ?&lt;br /&gt;
अथवा समय पर्ख देखि, आफ्नो इच्छा पूरा हुन्छ ?”&lt;br /&gt;
“सोग्है श्राना समर्थन छ, श्री ३ प्रभूको हुकूमलाई&lt;br /&gt;
तर सम्झौं, अहिले भोक लाग्छ, मीठो नमीठो सव निलिन्छ ?अर्कोतिर त्यो कसौंडीमा, कवाफ पनि तैयार हुँदै छ;&lt;br /&gt;
श्रब के गर्ने ? -घण्टी हेदँ, भोकको ज्वाला उड्न दिने ?कवाफको त्यो लोभ गर्दै, शिथिल हुँदै चित्ता ज्वाने ?&lt;br /&gt;
खानु बढिया सामुन्नेका, रुस्खा सुख्खा पहिले&lt;br /&gt;
त्यसकै शक्ति बटुली फेरि, कवाफ मात्रै किन छोड्ने ?&lt;br /&gt;
&amp;quot;9१२&lt;br /&gt;
अहिले यौटा आगो सह्क्यो, यसको मृट्‌ लुछ्नुपर्छगाग्राका गाग्रा पानी खन्याई, यसलाई खग्रास पार्नुपर्छ;&lt;br /&gt;
नत्र ज्वाला कसरी मार्ने ? बिनात्रासको पानी पोखरी ?विद्रोहीको रगत नपिई, सकिन्न मोर्चा लिन बेक्रिक्री ! ”&lt;br /&gt;
&#039;जम्बू&#039; को यो वाणी सुनी, फेरि झर्को हे बग्योखूनीहरूका प्यासी दिलमा, त्यस दिनको श्राशा उम्यो&#039;पद्म&#039; उठी बोल्त थाले, मानो पद्यकमल भै&lt;br /&gt;
शान्त स्वरमा खोजे झै, अपूवे रंगको चित्र कोर्दे:-&lt;br /&gt;
““भाइहरूको ! याद छ सबैलाई, कवाँडचिफको रोल मेरो&#039;जृद्ध प्रभुको शान्तिका निम्ति, वोक्नुपदेछ मैले डोको;हेर भारत, जहाँ हाम्रा मित्रहरुको हंकम छ&lt;br /&gt;
दिनह कैयन्‌ काँग्रेसीको, हाट्टा हह वगिरहेछ;&lt;br /&gt;
उनी के गर्लान्‌ हाम्रा निम्ति ? जव हामी ज्यादै थोरै छौंपरिवतेनको घेराभित्र, नेपाल पनि धुमिरहेछनयाँ रोगको कीटाणु, जर्र यहाँ रोग सानेछ,&lt;br /&gt;
प्रहार नगरौं अहिले हामी, कत उत्ति बलले फर्केला_गोलघरको एक एक ईट, पार्ला बिद्रोही कोला कोला !रणनीतिको यो एक भेद, बुज,कहरूका निम्ति होशक्तिको घारलाई, तिखान यो साँद हो&lt;br /&gt;
कोही छैनन्‌ यहाँ मूखें त, के को धक्कम्‌धक्का हो ?”&lt;br /&gt;
न शेरे&amp;quot;&lt;br /&gt;
झौगौ साँच्चै मक्कल फुट्यो, सारा फिलिगो छरबारियौगोबर गणेशको हृदय फुटी&#039; जताततै पोल्न थाल्यो;-&lt;br /&gt;
“ढुन्न हुन्न यो, कतै हुन्न, को भन्छ यो रणनीति हो ?यो त यौटा कातर दिलको, सानो मूसे स्वर ह्वो&lt;br /&gt;
&#039;्द्र&#039; कहाँ गए, श्रनि त्यस्तै, अघिका &#039;खड्ग&#039; र &#039;देव&#039;के उनको प्रात्मा ज्युँदो रहे, हामी खेल्थ्यौं यो खेल ?&lt;br /&gt;
मर्नुपर्देछ छाती वाला, जो जो छन्‌ रणस्थलमा&lt;br /&gt;
पर्वाह के को जत्र सुरियौं, भ्रर्काको त्यस्तै ज्यान लिनआज ज्यानको बाजीमा, ती बिद्रोह्रीहरू आएका छन्‌ज्यानकै बाजी लगाइकनै हाम्रा गोली छुट्नुपर्छन्‌&amp;quot;&#039;&lt;br /&gt;
“सत्य बोल्यो, सत्य वोल्यो&#039; गोबरगणेशको बाघमुखले&lt;br /&gt;
के हाम्रो मात्रै पालो ह्वौन प्राइमिनिष्टरको कल्की लाउने ?यो त पौठा आफ्नो पालो, सकी उम्कने दाउ होभाइहरूको जीवनमाथि ठूलो अन्याय र खेलबाड हो&lt;br /&gt;
सहन्नौं हामी मरे पनि, ती बिद्रोहीलाई ननिली&lt;br /&gt;
हवन भने छोड्न्‌ सबले, जो सक्दैनन्‌ सन भ्रधि&lt;br /&gt;
हाम्रा छाती किन खडाछन्‌ यी तक्माका चमक लिई ?बिद्रोह्रीका रगत पिउन, भोकाएका छन्‌ यी अर्ति&amp;quot;&lt;br /&gt;
गर्जेन थियो यो गोबरगणेश, गोपाल त्यस्तै जम्बूमंत्री&#039; को&lt;br /&gt;
न शपे &amp;quot;-&lt;br /&gt;
आखिर बोले महाराज भझुकी:-““भँगो बाबु त्यस्तै मान्छौं&lt;br /&gt;
हाम्रो कलह, हाम्रो झगडा दिनेछ ती बिद्रोहीलाईनिम्न लाग्दाखेरि पनि, एक अ्रयाह शांक्त,&amp;quot;&lt;br /&gt;
ती त फँ&lt;br /&gt;
महाराजको राज बैठक, आज यौटा देत्यनगरीभारदारका गुणहरुले, तिरमभिराउँदो यमपुरी&lt;br /&gt;
वीरहरूको रक्त पौडी खेल्ने क्या लालसा छ&lt;br /&gt;
अन्धकारको कोठरीमा, यौटा चिडिया छोपन्छबन्धनभित्रै उसको प्राण, त्रस फ्याँकी चुँडिन थाल्छजसको मोहिनी सुन्दर नाम, “श्री ९ त्रिभुवन” बल्दै छजुद्धशसेर सिहासनको, आत्मालाई हलुका पार्छन्‌&lt;br /&gt;
रोब राख्दै कडा शब्दमा, एक बिचित्र माग गछेन्‌:-&lt;br /&gt;
“सर्कारः यो ही खड्गतिशाना, बिद्रोहीहरूका छ&#039;तीमावर्षने छ प्रब छिटै नै, गोलीको एक नजराना&lt;br /&gt;
श्री ५ को अटल गाथ-गादी मा उनको आँखा छवबिसयोस्‌ लालमोहर, गत्तिकँको फरियाद छ!”&lt;br /&gt;
खिस्स हाँस्यो त्यो विभूति, हृदय-वागको फूलमावेदनाको अथु रोकी, यहको एक कुनामा !&lt;br /&gt;
१ उडी न&lt;br /&gt;
बोल्न थाल्यो शान्ति रसको, एक अलङ्कार उनीजसकी सुन्दर रूप देखी भस्कन्छन्‌ ग्रमरावती:-&lt;br /&gt;
«दङग पर्छु आज सुन्दा, मेरो गद्दीको हाल सबै&lt;br /&gt;
को रहेछन्‌, सूरा बलिया, तिमौहरूभन्दा बेग्लै ?भन्नुहुन्न भन्नुहुन्न, भ्राज मेरो गद्दीमाथि&lt;br /&gt;
आँखा गाड्ने कोही जन्म्यो, यस नेपाल नगरीमाथि- लालमोहर के, ज्यान वाजी लाइदिउँला को रहेछश्री ५ को यो तख्तलाईं, फेर्ने खोज्ने बताञत ?”&lt;br /&gt;
जुद्धको त्यो भीम काया, जुरुक्क उभिई बिन्ती गर्छँ:-“उही पहलमान्‌ जो हजूर्को, गुरु भएर खेल गर्थ्योएक ह्वँ नन्‌, चार ह्वं नन्‌ आज हाम्रो देशमाथिचिलले कावा ख।ए झै तो, मडारिदै छन्‌ साँझ रातिख्याल होला सर्कारलाई, कसरी ती पर्काडए पनि&amp;quot;&lt;br /&gt;
ती पहलमान ! चिन्छु मेरा आदरणीय गुरु हुन्‌ !कसरी भनू&#039; उनले मेरो, गाथगादी ताक्न खोजे ?के छ मेरो भ्राज यहाँ ? के छ ततमा सिर्फ माया ?भूल होला, भूल होला, छोडिद्यौ मो छोडिद्यौ !”&lt;br /&gt;
घोष्टिएका, भुम्मिएका, खैर जस्ता ती जुँघामाएक संहार, एक प्रलय, नाच्न थाल्यो नानीमा&lt;br /&gt;
9५&lt;br /&gt;
भेक्मकाई, थूक छरेर, उम्लियो नि यौटा प्रतिमाकुलियो त्यो साँढे जस्तै, कुमक्ो जूरो हल्लाएर:-&lt;br /&gt;
“के भनेको ? के भनेको ? बोल ठकुरी के भनेको ?&lt;br /&gt;
चाख्न खोज्छौ तिमी भा, चटनी मीठो मृत्युको ?हेर पिस्तौल, हेर बैठक, यो त हाम्रो राजहोतिमी त यौटा पालिएको, बोस्सिएको बोका पोभ्रब खबरदार एक शब्द, तिस्किएमा यो बिचित्रतिम्रो, ज्यूदो लाशलाई, गोर्खामा दफनाइनेछ !”&lt;br /&gt;
भ्रब खतम भो त्रिभुवनको, शान्तिको पीगूष घाराफागुका भै पचका बन्दै, छोड्न थाल्यो तोड साराः--&lt;br /&gt;
बज्ञब म यौटा मोटो बोका, तव कित मेरो लालमोहर&lt;br /&gt;
के बोकाको हात र पञ्जा, हुन्छ र बक्स्योस्‌ लालमोहर ?दिन्न दिन्न लालमोहर म, यो मेरो श्राफ्तो धनहो&lt;br /&gt;
लैजाउ चाहे मेरो लाश, डाँडामाथि गोर्खाको ।आजसम्म के तिम्रो दिलले, केही कहिल्यै बात मान्यो ?शुद्ध हृदयले, प्रेमपुष्पले, मेरी मन्दिर शोभायो ?&lt;br /&gt;
उल्टै मेरो खोपीभित्र, तिम्रो लूट चल्न थाल्यो&lt;br /&gt;
मेरो कोमल झात्मा-सामु, उल्टो पिस्तोल-भूत नाच्यो !अझ देशको बर्बादीले, संसारको इतिहास तोड्यो;&lt;br /&gt;
झाज यौटा घृणित राग, फैलिरहेछ यस बैठकमा&lt;br /&gt;
माछौँ मलाई जाना जानी घचेडी त्यो दुगन्धमा ?&lt;br /&gt;
&amp;quot;३६&amp;quot;&lt;br /&gt;
घरमैभक्त यी त्रिभुवनको, सच्चा पूज्य गुरु हुन्‌&lt;br /&gt;
त्यस्तै उनका भ्ररू शिष्य, मेरा प्यारा भाइ हुन्‌;छोडिदिन्छु, जसरी छोडेँ, भेरो प्राण तिम्रो हत्केलामाराख, फ्याँक, पर्वाह छैन, यं हो हाम्रो फैसला !”&lt;br /&gt;
एक बन्दी बोलिरहेथ्यो, सुनको पिजडाबाट&lt;br /&gt;
उसको गर्जेन्‌, उसको छाती, घकेलिरहेथ्यो पापी परथर्केमान थे भारदारका, हूल आई उनलाई घेन्योएक असहाय बेला पारी, उनको लालमोहर लिइयोभित्र भित्रै उनको आत्मा, चित्कारिरहेथ्यो विषादझचि चाकिएर भन्न थाल्यो:-&lt;br /&gt;
पलौ, लेङ मेरो दुवै हातको लालमोहरतर दिलको गाढा लालमोहर ता यही कलेजाभित्रै छटुका टुक्रा पारी खोसे, तैपत्ति कहिल्यै भाग्दैन ! ”&lt;br /&gt;
तै न न&lt;br /&gt;
झाज मानो संहारको दिन हो, सिंहदरवारको पटाङगी आवादछविद्रोही ती वीरहरूको, कम्पनले मानो भूकम्प उठ्छ;&lt;br /&gt;
माघ मासको तातो धाम, श्राजै तिनले जान्न पाएमृत्युद्वारमा पुग्दा पनि, भ्रपूवं आनन्द अनुभव गरे;खड्गनिशाना लागी बनेको त्यो लामो श्रक्षरको खाकातैयार थियो ती वीरहङूको, टुङ ग्याउन जीवनगाथा;तैपनि मानो उदारताको एक भावना बग्न थाल्योमहाराजको सिह्वसनले, शब्द रूपमा दीप्ति छम्यो:-&lt;br /&gt;
नकल&lt;br /&gt;
(माफी माग, माफी माग, तिम्रो जीवन बच्न सक्छ !यमराजको ढोकाबाट, तिम्रो बापस यात्रा हुन्छ”&lt;br /&gt;
वीरहछको मुकुटरूपी त्यो अजङ्गको रूप बढ्यो&lt;br /&gt;
&#039;दशरथ चंद&#039; को त्यो आकार, बीरत्वको किरण छर्थ्योपृथ्वीको कुनाकुनासम्म सुनिने गरी भन्न थाल्यो:-&lt;br /&gt;
“ए ! नपुसक्र राणाहरू हो ! यो कस्तो तिम्रो ्रावाज होथाहा छैन के यहाँ उभिएका, नेपालीको अपमान हो ?&lt;br /&gt;
छैन कोही यस्तो व्यक्ति, यस मण्डलीको सदस्य भई&lt;br /&gt;
नेपाल ग्रामाको आँसु हेरी, आफू उम्कन मागोस्‌ माफी;भन लौ कत्रो तिम्रो प्रोग्राम, आज त्यस लालमोहरमाछ?परिवतँनको हावा रोक्ने, के तिमी कसैमा तागत छ?&lt;br /&gt;
यस कायाको रूप छिनेर भित्री उद्गार मर्दैन&lt;br /&gt;
छाला, मासु, रगत लिएर, बिद्रोही आ्रागो निभ्दैन,&lt;br /&gt;
_ सुन्यौ सुनेनौ ? अत्याचारी ! नेपालमा आगी सल्क्यो; सल्क्योआजादीको निम्ति आज, सबप्रयम प्रभियान हो यो;&lt;br /&gt;
तिम्रा मनभरका ती साँग्रा एक दिन कीना हाड हुने छन्‌तिम्रा राता गालाहरूले न्यायवेदीमा भोगदिनेछन्‌ !&lt;br /&gt;
हेर, हामी तिम्रै सामु, मुक्का तानी कब्‌ल गर्छौँ :-सआजादीको हावा नवगी, हामी कहित्यै मदैँनौं&amp;quot;बिद्रोहीका हृदयका पहिल्यै, अमर वती उड्त थाल्छन्‌ ]&lt;br /&gt;
न कद»&lt;br /&gt;
तिनकै एक एक संकेत पाई, अनेक लीला रच्न थाह्छन्‌ँ;हेर कस्ता बल्दा ज्योति, त्यस डोरीले बाँधिएकातिनका वीर आत्मा कसरी, तिम्रा मुटु हल्लाइरहेकासाग्दैनौं माफी इच्छा लाग्दो गर, हेछौं छाती खोलेर&#039;&#039;&lt;br /&gt;
कत्रो साहसको गजेन थ्यो यो, कत्रो विश्वासको भवन थ्यो?कति शुद्ध चेतना छल्किरहेथ्यो, कत्रो प्रतिभा बोलिरहेथ्यो !टररर ताली बीरहरूले, वन्धनमा बस्दा वस्दै ठोकेनेपाल-आमाको हार बन्न, एक भयंकर आवाज दिएः:-“इत्कलाव-जिन्दावाद ! राणाशाही-मूर्दाबाद प्रजातन्त्र-जिन्दावाद !&lt;br /&gt;
बैठकका ती भारदारले, एक छाया अहिल्यै देखेभोलि पसि के हुनेछ, छिटो गुन्न थाले&lt;br /&gt;
दुष्टहरूका गिदीमा फेरि, गुञ्जन थाह्यो क्रोधी रागदाह्वा किट्दै, सिंगै काँप्दै, बैठक भयो कम्प,यमानबूट बजाई गोबरगणेशले, एक फर्मान जारौ गन्यो:-“हानु कोर्रा ती पाजीलाई काढ रौं नछुटाई&lt;br /&gt;
दे कुन्दाले, दे बूटले, अ्रथवा जे जे भेट्टाउँछौवन्द होस्‌ ती विद्रोहीहरूको, सास फेर्ने त्यो नालो&amp;quot;&#039;&lt;br /&gt;
प्रहार शुरू भो हिसा फेरि, रगतका धारा उछिट्टिन थालेहुकुमभो श्री ३ जुद्धको-भैगो अहिले छोडिदेकाल पख्नका कुपकुरहरू तो, सुन्‌न्‌ आफ्नो अन्तिम घडी&amp;quot;&lt;br /&gt;
नप -&lt;br /&gt;
हड्गनिश्ञाना भन्दै गो, एक भयानक शब्द उचालीवीरहृदयका ज्वालामा, प्रतिक्रान्तिको राग उमाली:-&lt;br /&gt;
«सबेप्रथम त्यो शुक्रराज, जो गान्धी बुढोकी ढोकै होगीता गीता फलाक्दै, राजद्रोह्ी भाषण गर्थ्यो&lt;br /&gt;
सीधा साधा रैती दुनियाँ, भड्काई मानो चोर श्रीघुम्थ्यो, फिथ्यो, गल्ली गल्ली, भुस्याहा कुकुर चंक्राईमृत्युदण्डको सजाय दिइन्छ&#039; त्यस राजद्रोही अघमलाई,)”&lt;br /&gt;
“दोस्रो चाँहि घर्सप्रगत, पापको ज्यू&#039;दो मूर्ति होगाथ गादी ताकी ताकी, भित्र भित्रै भन्दै हिड्थ्योपहलमान्‌ त्यो भैकत ठूलो, बलको शेख्री गर्दो होनेपालका पशुपतिनाथको, त्यसले तेस्रो नेत्र खोल्योभइम हुन्छ ग्रब महाराजकी, हुकुमको निल्दै आगो,”&lt;br /&gt;
“तेस्रो ध्यो हो दशस्थचंद, बेशर्मी ठकुरी बच्चोनिमेक हराम, वरुवाल, सबभन्दा चण्डाल भेडोकाटिनेछ त्यो टुक्रा टुक्रा, गुहेश्वरीको बली भयो,”&lt;br /&gt;
“चौथो चाहि त्यो कलिलो, वेहोशी गंगालाल होबित्ता भरको छाती लिई, ढालसरि फुकाउन खोज्दोलहै नहँमा गुड्दै जाने, त्यो छालाको भकुण्डो होमारिनेछ त्यो बूट खाई, कोप्राका कोप्रा रगत छादीयही फर्मान महाराजको, पढी श्रहिले सुनाइयो&amp;quot;&lt;br /&gt;
परः ती चै&lt;br /&gt;
न. ६०&lt;br /&gt;
छैन चिन्ता शुक्रराजमा, त्यो अग्लो, बलियो शरीरमासत्घमेको, सत्कर्मको त्यो हँसिलो साधुमा&lt;br /&gt;
«अत्याचारका मुकेट्टाहरू, नाच देखाउन्‌ मेरा सामुसत्य विचारको खरानीले, उडाउनेछु रची जादूखुशी छु म, जाँदै छु यी, स्वगँद्वारको यात्रामाहाँसी हाँसी फाँसी चढु&#039;ला, प्रेम त मेरो नेपालैमा&amp;quot;&lt;br /&gt;
“पहलमान हो धर्ममक्त, ह_न्न कसैको दरवान&lt;br /&gt;
संझन्छौ म यस जुनीमा, तिमी झै हू दूषित मशान ?फलामका ती चक्रसित, यी वाहुले किन खेले ?&lt;br /&gt;
यस छातीले लाखौं बाजी, केका निम्ति डण्डा पेले ?जन्मिसक्यो एक शक्ति, यस लौह पुरुषभित्र&lt;br /&gt;
छरीसक्यो यसले वीउ झैँ लाखौंमा शक्ति विचित्रलैजान्छौ के तिमीहरू श्राज, मेरो यो पुण्य बात्मालाई ?यस पृथ्वीको काखबाट हावामा पारी उडाई ?&lt;br /&gt;
ङ, आउँदै छन्‌ केयन्‌ चेला, नयाँ चोला फेरेर&lt;br /&gt;
तिम्रो पशुता औ हीनतासित, ठन्दयुद्ध गने भनेर,कम्मर कस्यौ वरू अहिले, तिम्रो वेहोशी मेटिदिन्छुत्यो नारकीय महलको जात्रा ती नजरमा कोरीदिन्छु,”&lt;br /&gt;
“तिमक हराम ! निमक हराम !! खुव चिनिछ्ठस्‌मेरो राम ?”छाती खोल्दै दशरथ भन्छ, “5 हेर लौ परमधाम;&lt;br /&gt;
&amp;quot; ६१&amp;quot;&lt;br /&gt;
घेरै दिनतक छोपेको थिस्‌; त्यस दोसल्लाले आँखादान, पुण्यको छुसी बासना, छदै मेरौ कुलमा;देखेँ मैले आज पृथ्वी, कति उज्यालो चम्किरहेछ&lt;br /&gt;
- तेरो घृणित दोसल्ला त्यो, छौप्नलाई उड्दो रेछ;प्रक्रतिका कण कण सब, स्वच्छन्दतामा हुकिरहेछन्‌नेपालीका ध्रात्मा मात्रै तेरा वन्धन बोकिरहेछन्‌;पक्रीहाल्यौ पहिले मात्रै, तिम्रो यसरी ज्यान बच्योनत्र हुन्थ्यो थाहा हिज नै, यहाँ कसको राज हुन्थ्यो;तैपनि केही पर्वाह छैन, आइरहेछन्‌ वीर नेपालीहवामो इच्छा मूतै गराउन, वान्न तिमा ती जुह्फी&amp;quot;&lt;br /&gt;
&#039;देखिस्‌ तैले मेरो छाती ? तेरोलाई मात गर्छे&lt;br /&gt;
हृदय छाम्छस्‌ ? कति गोजी, डम डम यसले छोड्दै छख्वै त हेरूँ, को रहेछ ? यस तनको भकुण्डो हान्नेकसमा त्यति बल रहेछ, साँचै ज्यानकै बाजी थाप्ने ?गंगाको यो सुन्दर काया हाड छालाको ह्वँन&lt;br /&gt;
ईश्वरको यो दिव्य, सृष्टि, तिमीहरूको पेवा ह्वैँन;&lt;br /&gt;
यो त यौटा &#039;तील कमल&#039; हो, नेपालीको प्यारो घन होदेश प्रेमको आजादीको, चुम्बन गर्ने बालक हो;&lt;br /&gt;
बरबराई मानिस हिड्छन्‌, जो ओराफे चेतमा हुन्नन्‌&lt;br /&gt;
संक्‌ पशु हो ! तिमी कहाँ छौ ? कति त्रासका खाँदै छौ ?आज यौटा युवक ह्वैन, लाखौं लाखौं आइरहेछन्‌सरस्वतीको बरदान बोकी, तिमू मुकुटको हाई हान्नन्‌ ।&lt;br /&gt;
न दुर&amp;quot;&lt;br /&gt;
भनुला म इतिहासका पानामा, आखिरकार को विजपीहुन्छन्‌ डक&lt;br /&gt;
यी थिए ती वीरहरूका, वीरताका सच्चा वौली&lt;br /&gt;
शुक्र, गंगा, दशरथ, धम, शहीद पकितिका राम्रा जोडी;बीरताको विमान चढी, हेर कत्रो तेज श्रायो&lt;br /&gt;
अड्त सकेन, श्रड्न सकेन, हेन सकेन, हेने सकेन !&lt;br /&gt;
त्यस ज्वालामा उड्ने डरले, राणाशाही बोल्न सकेन;फरक्क फर्की, थररर काँपी, हत्यारो झैँ मुख लगाईबैठकले नै उद्घोष ग-्यो:-&lt;br /&gt;
“हुकुम नगन्ने शक्ति !?&#039;चै न ती&lt;br /&gt;
फेरि फर्मान पढिन थाल्यो खड्गनिशाना चम्किरहेथ्योवीरहरूका वल्दा आँखा, एकनासले हेरिरहेथेकानका-जाली भझन्‌कुनाकार, पाई खुशीले भुमिरहेथे;-&lt;br /&gt;
“हाम्रो धर्म परम्पराले, ब्राह्मणको ठूलो सम्मान गर्छेटंकप्रसाद औ रामहरि, घर्मवाट च्युत गरिन्छन्‌चारपाटे मृड्दा खेरि, उनका जातले बिदा लेलानगोलघरमा जनमर्भारि,, उपियाँ उट्सका साथ देलान्‌ !&#039;&lt;br /&gt;
एवं रितले अरू बिद्रोही, क्रमैसँग टांगिएफाँसीका डोरीमा ह्व न, कारावासको यातनाले&lt;br /&gt;
६२&lt;br /&gt;
कति जतमभर, कति आघा, मानो यसको हिस्स। लाग्योजसरी भोज औ भत्यारमा, मान्छे हेरी टपरी मिल्छन्‌ !&lt;br /&gt;
तन ती ती&lt;br /&gt;
दुई महिनाको कालो करतूत, राणाशाहीको जीवन मूलदुङ्गियो नि बीरात्मामा, घोप्ट्याई ज्यादै अमिलो चूकआज उनको सफर हुँदै छ, प्राज उनको आत्मा उड्छगोलघरको नक्सा हेर्ने, हृदय सबको मजबूर हुन्छ !बिदाईको बेला थ्यो यो, मित्रहरूको बिछोडथ्योयोअशुवारा लाम लागी, पह्रेदारको शरीर भिज्योकाँपिरहेको, प्रेम गढेको, हृदयको अनूराग लुकेकोदेवद्त झैँ, बाबु, दाजु, भाइ हिलमिल गरेको&lt;br /&gt;
रुरण कृण्ठ ती फुट्न थाले:-&lt;br /&gt;
“हे नेपालका अ्रगुव।हरू हो ! हं वीरताका राकेटहरू हो ।जान लाग्यो छोडी हाम्लाई, फेरि दशेन कहिले हो?&lt;br /&gt;
आज यसरी दुःखी जस्तै दीन, हीन, निमुखा जस्तै&lt;br /&gt;
तिम्रो योग्य काप्रालाई, घिसारिनेछ कठै ! व्यर्थ&lt;br /&gt;
यस्तो तिमी तेजलाई यस्तो तिमो स्नेहलाई&lt;br /&gt;
कसरी बिसौ ? कसरी छोडौं ? हाय हामी क्या अभागी ?&lt;br /&gt;
“यौटा यौटा गुन्टा वोकी नेल, गल्फन्दीले बेहिईकसरी हिंडौंला त्यस सडकमा ? कसरी सहने त्यो बेइज्जती&lt;br /&gt;
&amp;quot;६४&lt;br /&gt;
«ग्रयम-विश्व-युद्ध गर्दा जर्मनीलाई घ्वस्तपार्दा&lt;br /&gt;
यसरी नै जान्थे लाम लागी, हरलपक्ष सिपाहीका“तिमी हामा गुरु थ्यौ नि, तिमी हामा जोति थ्यौ नितिमूँ मिहिनेत, तिम्‌ँ&#039; आशीष, दिन्थ्यो फल हामीलाईहामी अन्धा, हामी काना, आज प्रलि अलि देखिरहेछौँखेल्न पाए, बोल्न पाए, तिमीहरूसँगै कति गर्थ्यौं ?“एक्कै सक्ो चुरोट तान्दा, एक्कै चिलिम तमाखु खाँदाकति आानन्द मनमा हुँथ्यो ? प्रब कहाँ र त्यो मजा ?&lt;br /&gt;
“आज पसरी छुट्नु भन्दा, आज यसरी च्वाउनु भन्दाबर हिजै हिँडीदिदा ह्वौ के थियो पर्खाल नाघ्न ?&lt;br /&gt;
वा कुनँ क्यै राह खोजी, यी नजरमा कोरिदिन्थ्यौ !कक थियौ लौ मार्च गर्ने, हामी सुरिला शिपाही थ्यौं ?वा श्रभ$ै लौ भनीदिदा ह्वौ, यो दैत्यलाई साफ पार्नरगत दिन्थ्यौं, प्राण दिन्थ्यौं, देश हामो स्वगे पार्ने&amp;quot;&lt;br /&gt;
&#039;किन मानेनौ ? किन बोलेनौ ? किन यो प्रीति गाडिदियौ !&lt;br /&gt;
भ्रब यी आँसु हामीसंगै तिमीहरू ग्रहिले जाइजान्छौ&lt;br /&gt;
नविस्यौं है हामीलाई, नेपालका यी प्रतपढलाई&lt;br /&gt;
“तिमी चारको स्वगे यात्रा” शान्ति फिजाओस्‌ शान्ति00 खै 020&lt;br /&gt;
क्रान्तिकारीका जीवन-वनमा एक विषाद गुङ्जिन थास्यो&lt;br /&gt;
घन्किरहेथ्यो काठमान्डूको, घण्टाघर झै राग भ्रनौठो&lt;br /&gt;
न दश&lt;br /&gt;
तड्पिरहेका हृदथहरू ती भित्रभित्रै जलिरहेथे&lt;br /&gt;
एक सुरमा व्यथित छटाका मौन अनुहार चाम्क रहेथे;को होला त्यो मृत्यु भूलेर दिल मुहारले हाँस्न सक्ने ?को होला त्यो मित्रवियोग, अनेन्तसम्म खप्न सक्ने ?रहेछ रहेछ, यौटा मान्छे, नेपालीको दिव्य मुकुट&lt;br /&gt;
डेंग नहिली, धैर्य लिएर, शान्त्वनाको बीउ रोप्नेकरुण रसले हृदय भिजाई, भावनाले भुलुलु उमालीस्मृतिको चिप्लो ऐना, एक बाजी हेने भनी&lt;br /&gt;
&#039;दशरथ&#039; बोल्यो छाती फुत्राई:-&lt;br /&gt;
गयै ह्यो हाम्रो अन्तिम बिदाई&lt;br /&gt;
जान लाग्यौं चार हामी, उड्न लाग्यौं चार हामीविस्मातको कुर छा, यो तिलक हो हाम्रा लागि&lt;br /&gt;
जुने आत्मा हाम्रो कममा छ, जुन भावना यो उम्लिरहेछइमान्दारीको मीटो दाख, दल्ली हल्ली भझुमी-रहेछ;&lt;br /&gt;
त्यै नै भविष्य साफ पार्ला, त्यै नै बन्धन तोडी-देलानबिस्यौ&#039; यस क्रान्तिलाई, यही नै हाम्लाई शान्ति देलाके भयो र ? त्रिजय घडीमा स्वर्ग्रटै हाँती दिउँला&amp;quot;&lt;br /&gt;
बीरताको, जोशको त्यो, हर्षक्रो अत्ति प्रेमको&lt;br /&gt;
एक घर्मी, एक कर्मी, एक जाति एक छातीबन्धुत्व अनि विश्वासको लम्किएको लहरो यो,थाक्रिए झैं हृदयबाट उम्ली उम्ली बेह्रिन थाल्यो&lt;br /&gt;
नष्द्नि&lt;br /&gt;
आ्रश्रु बिन्दुका चमकमा केही ग्रमूल्य लेखिदियो:-“काबूल गर्छौं, कवूल गर्छौं , क्रान्तिलाई बिसंदैनौ”नी ती नरआज एउटा नरकपुरीमा, वीर आत्माको बासछकोलाहलको आँधीले, मानव-जगत विस्मितछकत्रो खडेरी यप्त वस्तीमा ? कत्रो अभाव यस कुण्डमा !क्केका निम्ति भ्राएका छन्‌ ? यतिका मानिस भुम्मिदैकेका निम्ति रोइरहेछन्‌ ? पीडाका कथा कहँदैदोषीहरूको आत्मालाई, दण्ड दिने यो ब्यापार रेउनको शक्ति चूणँ, पाने खेलिएको नाटक रेचोर यहाँ छन्‌, डाँकाहरू पनि ज्यानमाराका लाम खडा छन्‌एक भयावह दृश्य उमारी निरथंकता गाइरहेछन्‌चार दिवालको चौगिर्दामा, चार दिवालकै घेरोछययको मुटुमा टोलिरहेको यौटा पिजडा छ;“&#039;गोलघर” रे यसक्रो नाम, हो त साँच्चै गोल यहाँशरीर श्रात्मा पोतिरहेछ, कालो मोसो साँक्‌ बिहान,प्राणरक्षक चूलोबाट, घू“वाले सास फेर्नु हुँदैनत्यही कोठाको भित्तो, दलिन, उसले नगनी सुख्खै छैनत्यसकै पछि पछि वीरहरूका आँखाहरू पनि नाच्छन्‌शायद दुइटै आफ्ना वन्धन, संझी संकी आँसु पोख्छन्‌;अफ्‌ उपल्लो एक वगेमा, कालकठोरी रोइरहेछबिचरो आजै वीरहरूको, सास पाउ चल्बलाउँछ;शरीर उसको चीसो धर्ती दिन प्रतिदिन पानी प्युंछ&lt;br /&gt;
न पि9 न&lt;br /&gt;
यसकै चीसो संझनामा, वीरहरूले डुख्नुपछे&lt;br /&gt;
यस पृथ्वीका सन्तापले, पोलिएर वीरहरू&lt;br /&gt;
पठाइएका होलान्‌ शायद, तोप पोख्न धुर धुरूह्वैन ह्ैन लौ पापीहरूले, पापसँगाली सृष्टि गरेको&#039;कालकोठरी&#039; पवित्र पाने, बीरहरूको प्रवेश भएको&lt;br /&gt;
हेने वोरका आँखालाई, तिनै चौसा भित्ता छन्‌- जहाँ लेउका लेपहरू, हरिया घाँस झै टल्कन्छन्‌&lt;br /&gt;
पृथ्वीको यौटा सानो टुक्रा, आज उनको जीवनसाथीत्यसकै दृष्टि त्यसकै प्रति, आज यिनको गाथगादी&lt;br /&gt;
माथि अकाश मलिन मुहार, मौन बाणी छोडिरहेखु&lt;br /&gt;
कसले सुन्ने ? कसले बुक्ने ? यो त कविको आत्मा चिन्छ ।&lt;br /&gt;
नै ती नी&lt;br /&gt;
सिंहदर्वार, पड्चिमकोणको त्यो उज्यालो पटाङगीमाशुरू भयो लौ मानवताको, बज्यो गाईजात्रे समेनाविद्रोही वी ब्राह्मणमद्ध &#039;टकप्रसाद&#039; औ “रामहरि&#039;उभ्याइए ती निमंम मूति, नीचताको शान लगाई;बकुल्ला झै नाक भएको, पापीहरुको पाप बोकेकोघर्मेशास्त्रको ठेकेदार, गुरुज्य्‌ पदले शोभिएको&lt;br /&gt;
एक झौीनो म ति अ्रघि सदै, ब्रह्य बाक्य छोड्न थाल्यो:-&lt;br /&gt;
५ए कलिगुगका नराधमहो ! भन, के के तिमी दुई खान्छौ ?चाख्न नपाई तुलबुलाउँदो, त्यो जिब्रोलाई संतोष दथौ&lt;br /&gt;
न दुय&lt;br /&gt;
दरिद्र, ओका नाङ्गा तिमीहरु, राहत खोज्दै हिड्थ्यौ ह्वैनौ ?श्री ३ प्रमुको उइयचिल, देख्ने सुन्दर मौका पायौ !&lt;br /&gt;
यप पर्वेतको लाली हेर, कति तमतमाई कल्किरहेछ !कति न्यानो न्यानो पार्नुपर्छ ? सामग्री सब दस्तूर छआज तिम्रो व्रतबन्धको त्यो शुद्ध जनै उतारिनेछमहानरकमा पौडी खेल्ने, तिम्रो इच्छा म.त॑ हुनेछ !गायत्रीका गेडाहरूसित, बिदा माग्ने बेला होयोपरपराको क्रमग्रननुसार कहतारोमा दही चिउरा खाओत्यो पोडेले मुछी दिनेछ, तिमीहरूले छुनुप्दैन !&lt;br /&gt;
क्रष्ट होला गाँस हाल्न, म_ख बाञ, उसले हालिदिन्छ ?हरिश्चन्द्रका चाण्डालहरूका, अरब तिमीहरू सन्तति हुन्छौकुनै मशानको कात्रो बटुल्ने, घुणित कार्यमा आज दरिन्छौहाँसो लाग्छ मलाई देख्दा, तिम्रा ती मौन आकारहरूपक्कै दिलमा भनी रहेछौः-&lt;br /&gt;
“धिक्कार यसरी मानिस बन्नु&lt;br /&gt;
अघि नै हाम्रो मृत्यु भए, कति राम्रो नगरी देखिन्थ्यो ?पापी, दोषी हामी रहेछौं, तब त यसरी बेहोशिदै छौहाः हाः हाः हाः कित चुप लाग्छौ ? पहिले नँवेद्य खाइहाल&amp;quot;&lt;br /&gt;
॥।&lt;br /&gt;
फेरि एकपल्ट ती दुई वीरका सुप्त झिल्का उछिट्टिन थालेडाम्न भनी, पोल्न भनी झिलमिलाई उड्न थाले !भात्माभिमानको राग छोडी वातावरण शूस्य बताईफिलिगोको मूते छटा, &#039;टंकप्रसाद&#039; बोल्न थाले:-&lt;br /&gt;
&amp;quot;६३&amp;quot;&lt;br /&gt;
“हाँस्‌ हाँस्‌ ए ! नरपिशाच !! हाँस्न नपाई रोइरहिथिस्‌&lt;br /&gt;
सरस्वतीका राशभित्र, दूषित बृद्धि फ्याँकिरिहिथिस्‌&lt;br /&gt;
हेर, झाज तेरो मालिक, जुट्ढ भन्ने त्यो राजा&lt;br /&gt;
कसरी मनमनै थररर काँपी, हेरिरहेछ भविष्य-ज्वाला ?&lt;br /&gt;
मूल जरो नै सुक्दै जान्छ, तव शाखाहरूले के गर्ने ?&lt;br /&gt;
भक प्रशाक्लाका भझूसहरू त हुन्छन्‌ बिलकुल काप नलाग्ने;&lt;br /&gt;
तँ त यौटा दास होस्‌ नि, कौरबका लाखौं जूत्ता जतो&lt;br /&gt;
के छ तँमा आफ्नै शवित ? झस्कलास्‌ तँ यत्ति सुन्दा&lt;br /&gt;
नेपालका धुरी धुरी पिच्छे छ छ पैसा बटुलेर-व्चान्द्रायणी ३. दान थापी, पोल्टौमा धेरै दाम लिएर&lt;br /&gt;
अझ त्यो आफ्नो मालिकको, जुत्ताका तलुवा चाटेर&lt;br /&gt;
बनिरहेछस्‌ घमंगुरु, घमेलाई नै पोलेर;&lt;br /&gt;
कसले भन्दछ तेरो धर्म, वेपालको हृदय उघार्छ ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
कसले भन्दछ तेरो कर्मे, निर्मल जलले घोइरहेछ?&lt;br /&gt;
भन्छस्‌ अहिदे-हामी भोका, नाङ्गा बन्दै केही माग्छौं ?[ज्य दिए पनि लिनेछैनौं, जत्रतक बाहुबलले लिन्नौं&lt;br /&gt;
ए, लोभी, लुच्चो, फटाद्वा बाहुन ! एक ढिक्का दहीमा राल&lt;br /&gt;
चृहाउने !&lt;br /&gt;
कसरी मानौं ? आज तैँले, हाम्रो धम र जात उडाउने !&lt;br /&gt;
जब हामी ह्वाँला पापी पुर्ष, ईश्वरकै श्रादेश हुनेछ&lt;br /&gt;
अन्ति हाम्रा प्रात्मा थ्राफे नै, यप्त जनमलाई धघिक्कार्ने छ&lt;br /&gt;
नै श्री ६ वडा गुरुजूले प्रत्येक घर घुरीबाट उठाउने ६।६पैसाको क&lt;br /&gt;
&amp;quot;७० &amp;quot;&lt;br /&gt;
तै, तँ झे, जुठे बाहुने, अनि तेरा पतित मालिकसिर्तैवरत्र, परत्र, दुवै ठाउँमा, तैयार छौं तौल्न शाफ्नो कर्म;बाँचिरहेस्‌, बरु त्यक्ष दिनसम्म, जब जनताको राज होला!&lt;br /&gt;
सत्घर्मको कलश उठाई, हामी तंमाथि छकिदिउँला;आजसम्मको तेरा पाप, कसरी कुलेसो पार्दै बग्छकोठा, कोठा, चोटा चोटा, सब पश्चाली धे फुछे !पापी आत्मा पोल्छौं हामी, त्यो दुर्गन्धी शव झैदेख्लास्‌, फेरि सूर्य उदाउंछ, पुण्पात्माको खूप सिगादँ”&lt;br /&gt;
म्श्री इ प्रभु ! दयानिधान ! ओजस्वी राजन्य वरण्य !!व्यायमूति, हे महाराज ! अब क्तरी सुन्ने यो तान ?तब त मँले बिन्ती चढ।एँ, भारदारको महिफलमा&lt;br /&gt;
टंके नै हो सबको आ्रागो, जिरे खुर्सानी आकारमा&lt;br /&gt;
किन हो कुन्नि ईश्चरले पनि, यस अधमको जन्म दियो ?अझ ब्राह्यणकुलमा हुर्काई, राजद्रोहको मन्त्र फुक्योघमेशास्त्र सब साक्षी छन्‌, पाना पाना हरप हरपउद्धृत गे, औँह्याउँदै, भन्न सक्छु छैन गजव,&lt;br /&gt;
राजद्रोह एक यस्तो पाप हो, जस्को अर्को सीमा छैनकुनै जाति औ कुल बताओस्‌, प्राणदण्ड दिन बाघा छैनठोक्नै पर्दछ तात्तो गोली, लुद्नैं पदछ यसको हस&lt;br /&gt;
समय छ प्रभो, विन्ती लागोस्‌, ग्रभै देखियोस्‌ यसको अन्त ]&lt;br /&gt;
आफ्नै महान्‌ गुरुज्यूको, यत्रो आज्ञा पाएर पनिसकेन जुद्ध आत्मा उठ्त ब्राद्यण हत्यौँ गर्ने प्रघि&lt;br /&gt;
-७१-&lt;br /&gt;
कसरी फेरि हुकुम देवस्‌ अब त यहाँ जन्मिसकेथ्योआत्महार औं भयक्रो, एक नपृंसक लउको,भंडामुनिको बैठकबाट बास्किए ती महाराज:-&lt;br /&gt;
“ भँगौ जे मो भनिसक्यौं, फेदैनौं हामी हाम्रो बाचा&lt;br /&gt;
लै जा बर शहर घुमाउन, यी चण्डालका फौजलाई&lt;br /&gt;
देखुन्‌ सारा दुनियाँका श्राँखा खोली यिनका पाप कहानी&lt;br /&gt;
नराख्‌ नराख्‌ एक क्षण पनि, ती पापीलाई हाम्रो सामु&lt;br /&gt;
चुक्ता गरून्‌ तो बांकी हिसाब, गोलघरक चर्पी सामू&amp;quot;रु ची गी&lt;br /&gt;
तर हिम्मत हारे राणाहरूका, एक एक बुज्नु क भारदारले&lt;br /&gt;
तसेन थाले, के हुने हो ? यो ज्यूदा मूति घुमाउनाले&lt;br /&gt;
फिर्ता लिए महाराजले, भाफ्नो बेह्रोशी हुकुमलाई&lt;br /&gt;
हारको त्यो तीखो झस्का; चिमोद्न थाल्यो उनलाई;&lt;br /&gt;
त्यस त्रासले वाटो पायो, सिहदर्वार औ झ्यालखान बीच&lt;br /&gt;
तैपनि कत्रो मेला लाग्यो इन्द्रजात्रा हेने भने भै;&lt;br /&gt;
दुनियाँका घर घरवाट, वैरिए श्रात्मा उलंदे;&lt;br /&gt;
एक सुईको चुईकी वन्यो, एक छेस्को जंगल भो&lt;br /&gt;
हेर्दा हेदै मनुज सागर, हृदयबोकी जम्मा भो&lt;br /&gt;
वेदनाको, चाहताको, यो मानौ यौटा जुलूस थियौ&lt;br /&gt;
गाई जात्रामा सद्घ मानिस, भूतप्र तका जामा लाउँछन्‌त्यस समाजका कुना काप्वा, खोत्ली खोतली देखाउँछन्‌आज कै जात्रा हो यो, होइन भूत झऔ प्रतहृरूको&lt;br /&gt;
&amp;quot;७२&lt;br /&gt;
साँच्चै मानिस डोस्पाई, मानवताकै बेइ्जत हो होचारपाटे शिर खौरेको, जुठो वोहोता हात लिएकोसुँगुरका आन्द्रा बेह्ठी, मानिसलाई दैत्य भनेको&lt;br /&gt;
भुत्रा झात्रा बोराहरूले, वरिपरि राम्ररी बेज्हेको&lt;br /&gt;
जंगली मानिस छोपे भै, भाग्न नदिई घेरिरहेको;&lt;br /&gt;
भ्रव भयो रे बीरहरूको, आजैदेखि घमं-नाश&lt;br /&gt;
उनको पुण्य फुत्त छली, गदँछ रे दर्वारमा नाच&lt;br /&gt;
तर चम्किरहेछन्‌, उनका सुन्दर मूतिहरू&lt;br /&gt;
बेफ्रिक्री अ्रनि शान्त्वनाको, दुनियाँमा वरदान छरी,&lt;br /&gt;
बूढा बूढी, तश्ता तश्नी, साना साना बालक पनिहेरिरहैन्‌; कसरी चम्बयो ! यी दोषी ? को रूप भनी“दोषी मानिस शिर भुकाउँछन्‌, जस्तो चोर लाज मान्छन्‌उनका आत्मा कुहिई सक्छन्‌, अनि त्रासका दुगन्त्र उड्छन्‌ख्वै र यहाँ ती सब चाला ? देखिरहेछौं अपूव प्यालामानो शक्तिको रसभरी, पिलाइ्ररहेछन्‌ मीठो सुरुबा”&lt;br /&gt;
अघि पछि लाग्ने मिपाहीहरू, टुलुटुलु हेछेन्‌ उनका मुखसंभिल्छन्‌, काँप्दै, कसरी ज्वाला, वालेथे तिनले हर्देम उन्पूख“यो त गजब हो, कुन शक्तिको, साँच्चै नै अवतार रहेछनत्र कप्तरी, त्यसरी निर्भीक, गोलीसरि बाक्य छुट्छ ?&lt;br /&gt;
हेर अहिले हिंडिरहेछन्‌, मानो यी हुन्‌ मौसम केस्रा&lt;br /&gt;
रहर लाग्दा, नखाई कनै डम्म डकार्दा”&lt;br /&gt;
भन्छन्‌ लस्कर मानिसहरुका, खासखास खुसखुस बात गरी&lt;br /&gt;
७३&amp;quot;&lt;br /&gt;
“को हुन्‌ यस्ता ब्रह्मा जस्ता ? हाँस्न सकेको कति ग्रमौीर ?दुःख परे पनि रून नजान्ने, यी हुन्‌ पक्कै देव सरी&lt;br /&gt;
कस्तो पाप यिनले गरेछन्‌, जान्यौ के तिमीले साथी ?&lt;br /&gt;
म त भन्छु-यी हुन्‌ सच्चा, स्वच्छ हृदयी निरपराधी,”&lt;br /&gt;
मेला सकियो, मेला सकियो, नेताको मूति जेल पस्योतर मनको छापा तैलचित्र झै, घुम्दै नाच्दै चम्किरह्यो !घर घरमा, मानिस गुन्न थाले:-&lt;br /&gt;
“आव ती नेता के भए ? ..अपराधी झै दब्न गए, अथवा कन्‌ स्मरणीय भए ?ब्राद्यणहरूको जात लिएर, के तिनको करतूत निभ्यो ?हेर कसरी भन्‌ सल्कनेछ, हावाको श्रब बेग वढ्यो&amp;quot;&lt;br /&gt;
त पट ॥&lt;br /&gt;
(३)आज रातको बिभीषिका, हेर्दै कस्तो डरलाग्दो छ!यसका ग्रन्तर - कुन्तरबाट, एक ज्वाला दंकिरहेछ !माघ मासको औंसी रात, एक विकराल छाया दिन्छकुहिराका ती कणकणलाई, विद्रोही झै हुरुद उडाउँछ !कस्तो स्याँठ ! कस्तो हुरी ! आज नेपाल बढादै छमानो, भोलि बिहानसम्म, सारा पृथ्वी साफ हुनेछ,देख्ने छैनन्‌ कोही आँखा, कत्रो परिवतेन यो आयो !कसरी सर्वत्र बेग हानी, यसले कूडाककेट सोह्लयो ?मध्यरातको त्यस किनारामा, तारा-गणहरू रुन थाल्छन्‌;&lt;br /&gt;
-७४--&lt;br /&gt;
भावी बीभत्स रप्तको याद, पाई शायद आँसु पुच्छन्‌;छैन यढाँ शोकपुरोमा, आश्वासनको हावा&lt;br /&gt;
सत्र देखियो करुण रसको, अर्कै, बेग्लै, छाँया;मेघ पनि ती उत्तरतर्फ, हिमालयसित बिदा माग्छन्‌&lt;br /&gt;
झुम्मिई झुम्मिई, गोलघरका छातामाथि टक्क अडिन्छन्‌;चडडड मेघ गर्जी आयो, एक विजुली सररर दगुम्यो&lt;br /&gt;
एक ब्यथाको एक चित्कार, आज यसले सुनाइरहेथ्यो“रोक रोक यो कालो करतृत छेक छेक यो अप्रिय स्वख्पहेर कसरी बढ्न थाल्यो, वीरहरूको छाती नजीक”&lt;br /&gt;
सेन्ट्रल जेलको शिवालयमा, पाटीमाथि बच्चा रोयोआमाको त्यो रुख्खो छाती, चुस्न नपाई छटपटायोपिपलको त्यो अग्लो बोट, झाञ्चिइकन हेरदैथ्यो&lt;br /&gt;
“के भयो लौ के भयो ? किन मेरो शरीर काँप्न थाल्यो ?हुनुनुनु हावा गडडड मेघ &amp;quot;यही उसको स्मृति थ्यो&lt;br /&gt;
लौन संह्वार बग्न थाल्यो, छौ त कोही थामी द्ौ&#039;शिवालयको भित्रि मूति, मौन वेदना गाइरहेथ्यो&lt;br /&gt;
“उठ्न सके यदि मादिस भै, रोक्थे, रोक्थे&amp;quot; त्यो भन्थ्योघोर अन्याय, प्रत्याचारको, किन यस्तो दुगंन्ध उडेको ?कता गए ती फूलका विख्वा, सुगन्ध तिनको किन श्रडेको ?&#039;”&lt;br /&gt;
आए तीन राता भ्यान, त्यस रात्रीका बीचमातिनको थररर श्रावाज करतो, वातावरण चौकन्नतिक्ल्यो रावणको त्यो छोरो, &#039;मेघताद&#039; भै गकेर&lt;br /&gt;
७५&lt;br /&gt;
म्यानको स्थूल शरीरमा, कम्पनको सञ्चार गरेरजस्को तीतो नाम “पहलमान्‌&amp;quot;” बोल्न थाल्यो थुक घरेर:-&lt;br /&gt;
“खोल्‌ त्यो ढोका खबरदार ! कतै कोही नबगोस्‌मानिस मात्रका कानको, एक एक जालो टालियोस्‌झाज यौटा, लीला हुनेछ, राजद्रोहीका प्राण लिइन्छन्‌भोलि देख्लौ कहाँ कहाँ तो, ल।श बनीकन भुण्डिरन्छन्‌”&lt;br /&gt;
ढोका उध्यो त्यो र।तको, बिजुलीको स्वीच ग्रफ गरेरचकमन्न अंध्यारो नाच्न थाल्यो खुशियालीको गीत छरेरखडा थिए ती, कडा थिए ती, जेल झेलका पालो पहरा;स्वप्नवागमा वीरात्माले, देखे नेपाल आमाको&lt;br /&gt;
एक ठूलो मूति सामु, भक्तिले बलिदान गरेकोबिउँझाइयो आँखामा पट्टी बाँधी बाँधी डोस्याइयोभिन्दाभिन्दै भ्यानमा राखी, एक नाटकको पर्दा गिन्यो&lt;br /&gt;
नु 00 तहुररर दौड्यो यौटा भ्यान, दक्षिणको बाटो पक्ररचौकीका ती पुलिसहरू, छक्क परे सनसनिएरमानो यौटा अपराधी झै त्यो स्यानको पाङग्रा गुड्थ्योढलमलिई, हतपताई, एक सासले सतर्क बनीभ्रडिन पुग्यो पचली भैरब, एक बृक्षको हात समाई !&lt;br /&gt;
भ्रव शुरु भो पुर्ण नयाँ नेपालमा एक कहानीथाहा थिएन कसैलाई, कस्तो यसको भ्रानी बानी&lt;br /&gt;
७६-.&lt;br /&gt;
झाधारातका छातीमा, श्रशान्तिको बच्न गित्योचकमन्न छटा टुक्रा टूक्का, फुदून गए भै छरबस्यो !सेन्ट्रल जेलको चौगिर्दामा, कुनाकुनाका गृलुबहरूचारसुरका बुर्जाहरू, वैलाएक्ा चपटेहरू&lt;br /&gt;
मौन भावले हेरिरहेथे, हृदय फुटाली रोइरहेथेभद्रगोलको झग्लो ढिस्को, हेर्ने नसकी लुट भयो रेतल बागमती अविरल छाल, छ्यालब्याल छ्यालब्यालफ्याँकिरहेथ्यो&lt;br /&gt;
बिद्रोही सब गीतहरूको, ताल सुर त्यो जाँचिरहेथ्योबीच बीचमा बग्दै बग्दै, सुप्त बालुवाउफ्री हेर्थे&lt;br /&gt;
शायद देखे होलान्‌ तिनले, नरहत्याको नाट रचेको ।&lt;br /&gt;
शुक्रराजको ज्युँदो प्रतिमा, मोटरको पेटले छाद्यो&lt;br /&gt;
त्यो अग्लो, योग्य, राम्रो छायाँ, बन्धकारमा टल्कन थाल्योउसका तनका प्वाल प्वालमा, उब्जेका ती काँढाहरुलेबिदाइको भेट स्वखूप लौ, तारागणको ढोक गरे,मनुष्यत्वको हावा मात्रै रत्तिएर पनि चाख्न नपाईजीवनको प्रन्ततंहमा बस्ने, कोमलताको ज्ञान नपाईबोलाइरहेको, राल छुटेको, पागल नाले-पशु झै&lt;br /&gt;
नारकीय त्यो जीवन बनमा, घुम्दै शब्द उचाले झै&lt;br /&gt;
प्रश्न गन्यो, पाप कुण्डको &#039;पहलमान्‌&#039; नामको गोहीले-&lt;br /&gt;
भन्‌ लौ अहिले के चाहन्छस्‌ ? नरमेध हवनको बोकोमिल्छ तँलाई फूल अक्षता, विश्वभरिका बस्तु भोको ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
बन 9७9 न&lt;br /&gt;
जीवनको यस भ्रन्तिम क्षणमा, ईष्टदेव कुल साक्षी राखीमाग हृदयको प्यारो बस्तु, मृत्युको क्षण भुल्ना लागिहेर, यही रूखको हाँगो, तेरो प्राणको चिडिया माग्छ ।&lt;br /&gt;
वीर वोल्यो गम्भीर मुद्रा, चौडा छातीलाई फुक्काएरएकान्त ग्रनि चिर संझना, दियोमा तेल थपेरकालरात्रीका यस बेलामा पति, सौम्य भावको कान्ति छरेरनभमा बल्दा माराहरूको, मलीनतामा धैर्य भरेर&lt;br /&gt;
एक नौजवान खेलाडी झै, सीधा घरहरा भै उभिएर:-&lt;br /&gt;
&#039;बाँचिरह्यौ, बाँचिरदह्यौ&#039; ए ! पापका कुण्डली हो |तिम्रो दयाको दानलाई, कुन मुखले बयान गरुँ ?मेरो दिलको यस धुकधुकीमा कत्रो तिम्रो मायाछ?यसको पुण्य यात्रा निम्ति, कत्रो प्यारो तरखरछ?तर, याद गर यो चौडो छाती&#039; तिम्रो आशीस चाहन्नयो चम्केको निधार पनि, तिम्रा बाहु चुम्दैन,&lt;br /&gt;
माग्छ त्यसैले, जसले जीवन-पथमा साहस छोड्छआत्माज्योतिको वल्दो पाला, आँखा चिम्ली भुल्छ,म त उज्यालो नेपाली हू, नेपालको रंगमा खेल्दैजूठा टपरी लात मारी, चोखाका निम्ति लड्दैश्राइरहेयँ, आइरहेछु, हिम्मतको पिङ मच्चाउँदैहिम्मतकै तनले लच्काएर, फाँसीमा हाँरदै भूल्नेदेश-सेवा औ समाज-सुधार गर्ने प्रबल शुद्ध भावनावीरताका यौ दुई तक्‌मा, झल्काई हिडने मेरो बाना,&lt;br /&gt;
जा एप लन&lt;br /&gt;
यही सुन्दर सानो गीता-पुस्तक मेरो प!वन छ !जब चाहन्छु, तब पढछु, यही नै जीवन साथी छ,पढछु भ्रहिले अंतिम बेला, श्री क्रष्ण प्रभूको भाषणजसले सृष्टि संहार ग-यो, रची त्यत्रो महाभारत !&lt;br /&gt;
“क्मे क्षेत्रमा अक्ल अक्ल&#039; यही भगवानको श्रादेश होयसकै पालन-पोषण गर्दा, यसरी ्राज म उम्भिरहेकोभन्छुग्राखिर निभ्ने बेज्ञा गीता नै हाम्रो ग्रात्मा होयसमै हामो जीवनको, सच्चा अनुराग भरेको&lt;br /&gt;
म त ग्रहिले यौटा चिडिया, इन्द्रासनमा पुग्न हिडेकोभयका हावा किन छुन्थे; देखी यी कोमल पंख उडेकोतर यो चिडिया पृथ्वी तलमा, श्रायो केही सन्दैश दिनदुःखी, दरिद्री, दलितहरूको, जीवनमा चर्को बिगुल फुवनदमन नीतिको सिक्री तोड्नु. जीवनको पहिलो मागयसमै मृद्यु तर्सी तर्सी, भागी बग्दछ मुग्ध सुवास&lt;br /&gt;
आज गीताको बाणीलाई, राणाशाही लत्त्याउँंदैछत्यसकै रक्षा गर्ना निम्ति शुक्रतारो ज्यान दिदैछ&amp;quot;&lt;br /&gt;
क्षणभरमै खतम गरियो, यस वीरको इह्‌ लीला&lt;br /&gt;
भुल्न थाल्यो त्यस हाँगोमा, त्यस वीरको दिव्य छटा&lt;br /&gt;
प्राण उसको उडी-सकेथ्यो, किक्लिक किक्लिक गर्दै&lt;br /&gt;
दुइ चार बाजी, छटपटाई, आखिर ,सरल शान्त हुँदै&lt;br /&gt;
तर गुन्जिरहेथ्यो, त्यो घर्मे गुरुको, गीता बाणी बागमतीमा&lt;br /&gt;
चे ते त&lt;br /&gt;
०० छे?&lt;br /&gt;
अर्को स्थान दशरथ, गंगा, बोकी कुद्दै भाग्न थाल्योकाठमाण्डूको सुप्त चेतना, स्वप्न देशमा चलमलायोभुकिरहेथे, टोल टोलका, ती इमानदार कुबकुरकृतुवार मात्रै जसको जीवन, साँची राख्ने दस्तुर&lt;br /&gt;
के भन्छस्‌ तँ दशरथ हँ ? ह्वनस्‌ स्पाते ठकुरी बच्चो ?भ्रब आफैं ग्रहिल्यै फंसला गर्‌, त कच्चो कि पक्को ?तेरै पहिले ्ोत्मा उडाई, अन्ति त्यो गंगे तेर्स्याउँला कि ?तेरो पिशाची मृत्यु देखी बेहोश भै त्यो पहिल्यै मर्ला,त्यसो भएमा गोली बच्छ, अझ ढुकुटीको घन बढ्छफेरि हान्ने पोडेलाई, ताकी रहने के जर्रत छ?“अठपहरिया भ्रहिले मेरो बाहु समाती तैनात छ&lt;br /&gt;
तँ लाछी पनि वाँठो भै, त्यति टाढा वसी बोल्दैछस्‌&lt;br /&gt;
नत्र देश्यिस्‌ को हो &#039;दशरथ&#039;, बैतडीको रसिलो पानीरमरमाउँदो महाकालीको, हावाले हुकेको जवानीत्रिपुर सुन्दरी साक्षात्‌ भगवती, कुलदेवीको आसिकमाछाती फुकाई बढी रहेको, बज्न हृदयको सुन हुँकार;-&lt;br /&gt;
“ठानिस्‌ तैँले ह्वामीलाई, एक साधारण मान्छे ?&lt;br /&gt;
जो घुम्छन्‌, डुल्छन्‌, हाँस्छन्‌, रुन्छन्‌&lt;br /&gt;
संकट रौ हप हुनाले,&lt;br /&gt;
हामी ह्वौं ती कठोर मानिस, जसका हृदय ढाल समागैँडाका खाग जस्तै, छुट्छन्‌ बलिया, ठोस जवान&lt;br /&gt;
सक्छस्‌ यदि हिम्मत क्यै छ ? आइज कुस्ती एक एक साथ&lt;br /&gt;
ब् द्2 क&lt;br /&gt;
खैलौं यही विष्णुमतीको, बगरमा आत्मविश्वासका साथ,बन्दुकको त्यो नली पक्री, भैरहेछस्‌ शेरसमान&lt;br /&gt;
गर्जी गर्जी हाम्रो आत्मा, तोड्न खोज्छस्‌ कत्रो शान&lt;br /&gt;
तेरा सेख्ली ढुगेन्ध बनेर, उउलान्‌ यै आकाशमाथि&lt;br /&gt;
कुहिएको तेरो लासलाई, श्याल गिद्धले पनि नरुचाई&lt;br /&gt;
पीठ फर्काई घुणा, लाञ्छुना बालुवाले पुजा गर्लान्‌ !स्वतन्त्रताको शत्रु तेरो, आत्मालाई ललकार्लान्‌,&lt;br /&gt;
हान्‌ जसलाई तेरो इच्छा, खुला छ छातीको श्रास्मान&lt;br /&gt;
किन लिन्छस्‌ भगवतीको, तँ पापी यसरी नाम ?&lt;br /&gt;
उनको पवित्र ग्रात्मालाई, डोच्याउन खोंज्छस्‌ नरक द्वार ?&lt;br /&gt;
तर, यदि तेरो वंशको नै, कतै रत्तिभर साहस छ&lt;br /&gt;
पख्‌ ग्रभै तीन घडी रात, भोलि बिहान भोर हुन्छ,नुहाउने ती सारा मानिस, यस गंगाको तीर&lt;br /&gt;
पुजा गर्ने भक्तहरू सब, त्यस मन्दिरको द्वार&lt;br /&gt;
सारा जम्मा होउन्‌, श्रनि पछि पढ्न सकेस्‌ त्यो फरमानजसले गर्दा हामी दोषी हुन्छौं, हुन्नौं दृष्टि समानभनुन्‌ सारा दुनियाँहरूले-“तिमीहरु पुरा दोषी छौ&amp;quot;अनि हानेस्‌ यो छातीमा, गौलीका मनलाग्दा-फैर,मध्यरातमा चोरी गर्दै, ्रात्माको टङ्घार बिर्सीझ्यालखानको ढोका फोर्दै, स्थूल कायाको ममता पुछी,पस्न सकिस्‌, त्यस बन्धनमा, जहाँ तेरो राजछकसरी यत्रो बायुमण्डल, तेरो कातरता हेने सक्छ ?&lt;br /&gt;
तँ पाजीको वातलाई, त्यो नुते कुक्कुर टेर्देन&lt;br /&gt;
&amp;quot;५१२&lt;br /&gt;
यक्त बगरको छेञ्छाउ ढुङ्गोले पनि हेर्दैन,&lt;br /&gt;
तमाम दुनियाँको रगत पिई, सूगुर जस्तै बोसो हालीघुमिरहेछस्‌ यस रछानमा, शंकाको घार बगाई,&lt;br /&gt;
देख्लास्‌ गोली छोड्नेबित्तिकै, त्यस निधारमा कत्रो टाटो !बोक्सीको तिम्नामा झैँ, डाम्नेछ टिका कालो कालो&lt;br /&gt;
खास दोषी को रहेछ ?-छुट्याउलान्‌ नेपालीले&lt;br /&gt;
एक करोड देशबासीले सलाम ठोक्लान्‌ वञ्चरोले ।&lt;br /&gt;
तर”&lt;br /&gt;
सुनिस्‌ उल्लू, जन्म अन्घा, यी त सारा बात मात्र हुन्‌तेरा पुस्ताका पुस्ताले पनि, यसमा साक्षी वक्न सक्वैनन्‌तेरो खूनी भ्रात्मालाई, आज यत्ति चुनौती दिन्छु-हानेस्‌ सीधा फायर भ्रडिई, पहिले प्यारो गंगा माथि,मेरा गाला चाउरिन लागे, घस्काएका कागज झैँछातीका रौं उम्रिसके यी, निर्भिकताका बिरुवा झै&lt;br /&gt;
गंगा मेरो कम उमेरको, 5 मेरो मृत्यु नहेरोस्‌&lt;br /&gt;
मै हेर्छु, जाँच गर्छु, उसको मृत्यु कसरी होस्‌ !”&lt;br /&gt;
यत्तिकँमा वीर गंगा, फुत्त बिजुली झै उड्योभाक्रोशको ज्वाला छोडी, प्रक्रति नै थर्काउन थाल्यो:-&lt;br /&gt;
“ए, पहलमान्‌ ! बिर्सीस्‌ तले ? तेरा पुर्खाको नपूंसकताविश्वासघात औ बेइमानीको, हंकन्थे जो पंखा,बाबु, दाजु, कोही नभनी, खूनको सिर्का पिउँथे&lt;br /&gt;
न परे&amp;quot;&lt;br /&gt;
त्यसकै तातो तातो ह्वाबामा, हाड छ्लोस्न अ्रघि सर्थे&lt;br /&gt;
तँ तिनकै सन्तान ह्वयौँनस्‌ ? बोतलका भरमा जिउने&lt;br /&gt;
हटा नशा त्यो श्रनि हेरौं, मेरो तागत त्यो बोल्नेगंगालाल बच्चो हो रे, कसले तँलाई भन्न श्रायो ?उसको छाती सानो पात, नापी लिनेहोकोत्यो?&lt;br /&gt;
ल्या त्यसलाई यहाँ म, हो होइन प्रमाण दिन्छु&lt;br /&gt;
त्यस पांगलको खुस्केको होश, क्षणभरमै जगाइदिन्छुकसले भन्दछ तेरो थाक्कति, मनुष्य मात्रको अंश होकसले गन्दछ तेरो विस्मृति यो त सीमाहीन सागर होजीबित राक्षस प्राज खडा छस्‌ मनृष्यताको महलमाहाड, छाला, रगत मात्रै सँक्न्छस्‌ काँचको प्यालामातेरा फर्मान्‌ मरुभूमिका बालुवाका सुख्खा हावा&lt;br /&gt;
हामी आफ्नो उबेर बाली, सिच्ने रसिला फोहोराकसरी सुनौं तेरो गजेन, सिट्टा साँढे गर्जे झैं&lt;br /&gt;
यो त हाम्रो इज्जत जाने, वीरताको शत्रु नै&lt;br /&gt;
हेर्‌, बेहीशी आँखाका नानी, च्यात्नसकुञ्जेल उघारेरइन्द्रचोकको डबलीमा बोल्ने, वीर गंगालाल यहाँ खडा छयाद छैन के, उत्तिखेरैं, उसले छाती खोलेको ?&lt;br /&gt;
हज्जारौं नेपालीलाई, क्रान्तिको सन्देश फुकेको ?&lt;br /&gt;
अब के सोध्छस्‌ कसले खोल्छौ ? छाती पहिले ग्रालो पालोहाम्रा छाती सँधै खुला छन्‌, च्यात्त अन्धकार जालो योकति राम्ररी गंगाजीले, हम्किरहिछिन्‌ हावा&lt;br /&gt;
भुक्ति मृक्तिको दुइटै द्वार, पस्नलाई पारी खुला&lt;br /&gt;
न पद&amp;quot;&lt;br /&gt;
सुन्‌ तसेलास्‌ श्याल करायो, यो त ठूलो मसानघाट होयहाँ ज्यूदै भूत प्रेत, शुण्ड मुसुन्ड शिवका गण&lt;br /&gt;
फुटवल औ क्रिकेट खेल्छन्‌, तै जस्ता लाछीहरूको&lt;br /&gt;
अब के को देरी, किन भ्रडिइस्‌, अलि बेरमा भोर हुन्छतेरा घरानियाँका&#039; मासु लुछी दुनियाँले ठूलो भोज लाउँछगर्‌ के गर्छस्‌, किन ल्याइस्‌ ? तैयार छौं हामी लड्नालाई&#039;&lt;br /&gt;
सुन्न सकेत, सुन्न सकेन, पहलमान्‌का पापी कानलेउम्लिरेहेथ्यो उसको घृणा, नरभक्षणको तृष्णालेदुई बीरका शब्द खूपी, दुई तलवार चम्किरहेथेउसको अह भावनामा मार हान्दै काँपिरहेथे,उनीहरूका शोभित मूति, दुई किल्लाका बार बनेआज्ञा पाई पोडे सुरियो, बन्दूक धामी कम्पनले ।&lt;br /&gt;
हृदय उसको छटपटायो, प्यास उसको बढ्न थाल्योविष्णुमतीको चोसो पानी, घट घट तुर्ने मन लाग्योकाँपिरहेथे उसका हात, मानो पिप्पलकात पात&lt;br /&gt;
के भएको बुझ्न सकेन, रित्तो थियो उसको माथ,आँखा उसका तिरमिराए, मानो ध्रवतारो देखेरकान उसका बन्द भए, मानो गर्जेन सुन्न पुगेरक्रान्तिकारीका सत्य भावना, हृदयतलमा रोपिएरतिस्तब्ध रात्री हेरिरहेथ्यो, शुद्ध हृदयको वग्दो घारा,चाहन्थ्यो हौ तपेण दिन, त्यस पोडेको बलिन्द्र धारा&lt;br /&gt;
न पोई&lt;br /&gt;
फेल खायो, फेल खायो, उसका काला हातहरूलेबोल्न, नसको दन्त बजाई, घोरित थाल्यो कल्पनलेपहलमान्‌का नेत्र पल्टी, एक पशूता जागी झयो:-&lt;br /&gt;
“ले पाजी ? कहाँको कुक्कुर ! ! सकिनस्‌ तैँले गोली छोड्नती दुई घिच्‌ सारसलाई, हाँसी हाँसी काने !&lt;br /&gt;
-छोड्‌ म हान्छु, श्रार्फ मार्छु, यी बाहुका तेज अति&lt;br /&gt;
देख्चान्‌ पशुहरू आमा संझी कत्ति भयंकर यो रजनी 1&amp;quot;&lt;br /&gt;
ठाई य, ठाई, ठाई गोली छुट्यो, उसका अस्थिर हातबाटफन फनाई रातो गोली, भेद्न पुग्यो तारोनेर&lt;br /&gt;
कसरी सक्थे पापी हात, काँपिरहेका दुइटै काँघ&lt;br /&gt;
पापको त्यो तातो राग, छेकिरहेथ्यो मानो बाँध&lt;br /&gt;
चम्किरहेथे चारै आँख्वा, हाँसिरहेथे राता गालाजीतबाजीका घारमा उभिई, तैरिरहेका वीरात्मा&lt;br /&gt;
त्यत्तिकँमा कु्त्पो टाढा, तिख्लामा रक्त-धार लिएरदशरथको त्यो परुष बचन, पहलमानका कान चिरेर:-&lt;br /&gt;
“हान्‌ श्रभ तेरा बाबुलाई, रौं &#039;छ भने, त्यस छातीमाआमाको छोरो दुध पिएको, भएदेखि जन्म लिदाउहिल्यै तेरो प्राण उडेथ्यो, घाई बुढियाका मायालेउभिनसकिस्‌ प्रहिलेसम्म, उसकै तातो बलले&lt;br /&gt;
आज तेरा मुटाभत्र मनुजताको ताप छैन&lt;br /&gt;
यसले फुक्ने रगत नाला, शक्ति संचार गर्दैन&lt;br /&gt;
नप&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
के हेर्ने चाहिस्‌ अत्याचार ? पिल्सी पिल्सी तड्पिरहेकोवीरताको वलिवेदीमा, साहसको अवसन भएको ?&lt;br /&gt;
सुन्न दशरथ, रुन्न गंगा, पृथ्वीको भार हने आए&lt;br /&gt;
तेरा कुलका दानव लीला, एक सासमा तिल्न भाएहल्लिरहेका तेरा हात, रूखका भझीना हाँगा भै&lt;br /&gt;
भ्रब छिटै नै भाँच्चिनेछन्‌ धमिरा निमित ढिस्का भै&lt;br /&gt;
ए बाँची बाँची मरिसकेको, रक्तचापको ढल्दो शवआफ्ना कुकृत्यको प्रदशेनमा, लौ आ फेरि अघि सर्‌देखिस्‌ यत्रो चौडो छाती विश्व कथा सब थापी हिंड्ने&lt;br /&gt;
ललकारिरहेछ तेरो बन्दुक, नग्राटाएको गोलीले&lt;br /&gt;
हान्‌ हान्‌ लौ, किन पर्खंको ! किन चाँडै भयभीत भएको ?हाम्रो आदेश श्राज छ्ट्छ, यही नै तेरो कतँव्य भयोनेपालको चिसो बतासले हेर्‌ लौ ङ, बिमान ल्यायो”&lt;br /&gt;
शब्द शब्दमा रक्तधारा, भुलभुलाई आाइरहेथ्यो&lt;br /&gt;
एक अथाह वीरत्वको, बाणी मुखमा झूम्मिरहेथ्योनेपालीको खुकुरी झैँ, दापवाट त्यो निस्क्यो&lt;br /&gt;
गंगा फेरि शान्त स्वरमा, एक चुनौती दिन थाल्यो:-&lt;br /&gt;
“खुल्ली छ गंगा, खुशी छ दशरथ, आजै तेरो हार देखीयत्रा छाती खोलिदिँदा पनि, माने नसकेको एक निसानीठूलो शिकारी, मुटु उचाली, मृत बाघमाथि लात राखीफोटो खिच्थिस्‌, सूरो बन्दै, शिकार गर्दा चितौने काडी&lt;br /&gt;
न द६&amp;quot;&lt;br /&gt;
ख्वै त तेरा कसरत गर्ने, ती बलिया, मोटा हातहरू ?एक नम्वरी तारो हान्ने भन्ने झुट्टा बखानहरू ?&lt;br /&gt;
ड्याल कहाँको गुफा खन्ने ! राती राती भट्याउने&lt;br /&gt;
ए ! कातर पशु !! के टोल्लिन्छस्‌ ? घंटाघर छ पाले ।&lt;br /&gt;
गंगाको यो प्राण खडा छ, तेरो कायर यात्रा हेनझ मरेपछि कूल्कनेछ, उसको छोरो वदला लिनकति उमंगी गीत म गाड ? कति खुशीले नाच्न थालु&#039; ?भरखर दुई दिन मात्र बिते, काखमा च्याँ च्याँ गर्दै होलाआमाको मीठो दूध प्यु&#039;दै, हे्दोह्ीला अभिषेक घडाउसको निर्मल स्वर्गीय श्रात्मा, आरजादीमा उड्दो होलाभोलि मेरो ग्रादशंलाई, दिन आउनेछ पालो पहराहेर्‌, प्रक उसको शुभ मुहुतँमै, कति नेपालीको जन्म भयोतिनको सत्य सुकोमल तनले, घरघरमा खुशीको दीप बल्यो;किन भ्रडिन्छस्‌ ? किन ग्रडिन्छस्‌ ? छोड्‌ त्यो गोली चाँडैकृष्ट दिएर सक्ने छैनस्‌, हृदय ज्यू दो हरदम उड्दै ।”पापीहरुको पापी अ्रनुहार, वीरहरूले हेन सकेनन्‌नेपालीको रणभूमिमा, कलंक कहिल्यै पस्न दिएनन्‌भ्रशान्तिको, अत्याचारको, यो घिनलाग्दो मँदानमाबीरहरूको मृदङ्ग प्रघि झैं, बजिरहेथ्यो उच्च स्वरमाभ्राखिर १।६ गोली उडी, ती विभूति तन्क्याइएमृत्यु, रगतको द्वार वनाई, भित्र पसिकन शान्ति लिन्थेशान्त प्रकृति, विष्णुमती, क्षुन्ध हृदयको गीत बुन्थिन्‌&lt;br /&gt;
न्नुः ती न&lt;br /&gt;
&amp;quot;5७ --&lt;br /&gt;
अझ ज्यादा छटप्टाई, तेल्लो भ्यानले सिफन्लेमा&lt;br /&gt;
घननन, घननन शब्द उचाली, थर्कायो त्यस घरकी ्रामाके राक्षस आयो ? अथवा अर्कै, राँकेभूत दौडन थाल्यो रैलाग्छ मलाई जलिरहेको, भरभर ज्वाला श्रागाको&lt;br /&gt;
ब्यूकी दक्षिण बाटोमुन्तिर, एक कुनामा सुतिरहेको&lt;br /&gt;
केश फुलेकी, हृदय उठेकी, एक बुढिया कयाल खोल्दी&lt;br /&gt;
सामुन्नेको अग्लो रुखमा, बाघडोरी लट्किरहेछ&lt;br /&gt;
निख्खर सेतो सप जस्तो, टिलटिल टिलटिल चम्किरहेछचकमन्न दिशा, अग्ला होचा, बरपर घरका प्रत्येक छानाछाती फुकाई नभमा तारा, एक सुरमा गनिरहेछन्‌;पहलमानको विशाल काया, गुरुप्रति गरिने कुत्सित धावावर्की फर्की हेरिरहेछ, हत्याको मन रंगाइरहेछ&lt;br /&gt;
मनुष्यत्वले खिसी काट्ने भयले पसिना छोडिरहेछ,&lt;br /&gt;
साँच्चै नै लौ कुम जोने भने झैँ, दानवता ललकानें भने झैंदेख्यो उसले त्यस बुढियाको निभिकताले क्याल खुलेकोक्रोधाग्निले ड।भिनजाँदा, औडाहाले बौरिनजाँदा&lt;br /&gt;
पिलिक्क पह्टे ती दुइटा, उसका शराबी श्रांखा:-&lt;br /&gt;
“ठोक्‌ को हो त्यो क्याल खोल्ने ? यस श्राधा रातका बीचमाढीक फुटाली, सिक्री चुँडाली हेर्‌ हेर्‌ को त्यो पशु रहेछ&amp;quot;&lt;br /&gt;
ढ्याम्म झ्यालको खापा लाग्यो, ती बुढियाको हृदय काम्यो“किन रातो गाडी, पुनिस, सिपाही ? केको ज्वाला दन्कने द्वो ?&lt;br /&gt;
न दल&lt;br /&gt;
आज मैरो छाप्रो सामने, के को अचानो तेसिएको?हे परमेश्वर ! पशुपतिनाथ !! लौ न मलाई शरण देड ! &amp;quot;&lt;br /&gt;
त्रासभित्रको कौतुहलमा, तैपनि इच्छा बग्दै गो&lt;br /&gt;
कम्पतको सेकेन्ड सूई, मिनट र घंटा गन्दै गो&lt;br /&gt;
पाको अनुभव, जीवन देख्न, उम्ली उम्ली आत्तिरहेथ्योमृत्युको यस सँघारमा पनि, स्पन्दनको ढोका देख्यो;गजब देखियो गजब देखियो हेर मुटुले ठाउँ छोड्योछातीको त्यो धडकनमा, हेर कसैले ब्रेक लगायो&lt;br /&gt;
ती बुढियाका गहरभरि उर्ले, ममता औ मानेवताका विन्दुमानो उनकै पुत्र गयो नि, बिर्सी उनको प्रेम कुसुमतर-&lt;br /&gt;
“शायद जान्यो होला त्यो, श्रमर क्रान्तिको सेनानीलेनेपाल-प्रामा प्रतिनिधि बन्दै, रोइरहेकी बुढिया त्योभन्न खोज्थ्यो उसको पौर्ष, पहलमानको शक्ति उचाली“नरुनोस्‌ आमा, नर्नोस्‌ ! छाम्नोस्‌ लौ मेरो छातीकेश फुलाई, हृदय उमाली, दिनुभएको मीठो चुम्बन&lt;br /&gt;
के बिसंन्छे ? अहिल्यै आमा ! नपुछी ग्रशरु बीच नयनजीवित छु म, जीवितै छु, यी पापीहरूलाई सजायँ दिनहिम्मत मेरी डब्ल्याइदिनोस्‌, के बेर लाग्छ लौ हाँस्न ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
पहलमानूको मुखबाट, त्रसित आतुरता सुनिपोः-“मर्ने सकेने, मने सकेन, हेर पासो के विग्प्यो ?भ्रम भयो वा साँच्चै हो ! यो त भन्‌ भन्‌ मोट्टायो”&lt;br /&gt;
&amp;quot; ब£&lt;br /&gt;
हाँसिन्‌, हाँसिन्‌, घरकी आमा, घु&#039;क्क घुषक बजाईमातृत्वको एक एक गेडा, आफ्ना गलामा श्रड्काईजब सुन्न पाईन्‌ पहलमान्‌का, कातर शब्द मुखबाटबग्न थाल्यो हर्षाशरुक, एक श्रज्ञात, अविरल घारा;बन्द झ्यालको सान प्वाल, उनका निम्ति विश्व बन्योविश्वभरिमा सर्वोत्तम, जीवनको संचार यहाँभो |&lt;br /&gt;
घरमेभक्तको साधनाको, यो ठूलो करतृत थियोहोश उडेको पापी चेलो, यत्रो रहस्य कसरी बृझ्थ्यो |रोकिदियो त्यो वीर पुरुषले, ग्रान्द्रादेखिन्‌ आफ्नो प्राणजसरी गर्थे होलान्‌ क्रषिमूनि, परत्रह्वाको अ्रनुसन्धानगम खाए मानिस सारा, घटनास्थलका लहरा !फाँसी बोक्ने खख भन्थ्यो:-&lt;br /&gt;
“घत्‌ कहाँको ज्यानमारा !पहलमान्‌ तै, तेरै सन्तति, बोक्लान्‌ यत्रो पापनरक यात्रा गर्ने खुशले, कर्माकमको बेहिसाबबोक्दिन एक, दुई, तीन म त, तेरो जघन्य अपराधहे परमेश्वर ! मेरा तनमा, कतै कलंकी टिका लाग्लाप्रेमाश्रुले फेटिएको, सिद्र ग्रक्षता मात्रै दे&#039;&#039;हल्लियो त्यो रूखको हाँगो, हल्लिए भै त्यो पृथ्वीहल्लाइरहेथे व।युमण्डल, श्यालहरू विद्रोह मचाईदोल्लो पल्ट पासो लाउन, पासोको चीरफाड भयोब्यर्थे थियो ड निरोगी, केवल रहस्य दौडिरहेथ्यो&lt;br /&gt;
९०&lt;br /&gt;
अब घर्मभक्तको बायाँ हात, त्यस बाघडोरीमा अडियो !मानो सुन्दर लहरदार क्रीडा यसले भेट्टायो&lt;br /&gt;
किन जान्थ्यो त्यो वीर आत्मा, सव्धमेको छाप नछोडीपिङ खेल्दै दियो उसले, एक लात त्यो छातीमाथिजक्षको भित्री बाहिरी टालो, संझाउँथ्यो पहलमान्‌ भनी&lt;br /&gt;
फेरि अर्को बिजुली चम्क्यो, एक छिनमै बास्ना फिजियोत्यस कोठाकी ती बुढियाको, हृदयतलमा शान्ति छायो !&lt;br /&gt;
रन्धनिदै, ढुनमुतिदै, लड्न लागेथ्यो जसैपहलमान्‌का दूतहरूले, सोझ्याए हुलुका हात दिदैभूत लाग्यो, प्रेत लाग्यो, वा कुनै केही जीव लाग्योहोश खुस्की छरबारदै, बरबारिदै 5 भन्न थाल्यो:-&lt;br /&gt;
के भयो नि, के भयो यो ? कुन श्रपरिचित बज्र आयो ?देवद्त कुन स्बगेपुरीको, भीषण चक्र उजाई आयो ?&lt;br /&gt;
ए ! धर्मभक्त ख्वै ? हेर उक्ल्यो, कठघराको टाउकोमावृक्ष-शाखामाथि बस्दै, सास फेर्ने दाउमा छ&lt;br /&gt;
छेश्वा त्यो मृत्युदेखि, के त साँच्चै हुत्तियो हो ?चौडिएको छातीमाथि, केही घक्का दी गयो हो?&lt;br /&gt;
ह्वंन हवन उसको चेतन, जहिले कहाँ पुगिसक्यो हो !भूल्दै झूल्दै कठघरामा, अब छिटै 5 शव हुनेछ&lt;br /&gt;
कर्मको फल भोग गर्दै, नकंको पथ सोभिने छ&#039;&#039;&lt;br /&gt;
-- &amp;amp;१-&lt;br /&gt;
भ्रम थिप्रोयो भ्रम थियो, रन्किएको त्यस दिमागमापिल्सिएको छाती छामी पिलपिलाउँदा नेत्र बालीआत्मग्लानी बिष दिएर घोरिएको व्यस बखतमाभ्रकमकाई चेत खुस्की, शब्दको झन्कार पाई&lt;br /&gt;
झस्की कस्की सुन्न थाल्यो, धर्मको हुंकार यस्तो :-&lt;br /&gt;
&amp;quot;&#039;छोडिक्षकं त्यो पहिलो आत्मा, नेपाल आमाको रेखदेखमाजसको रक्षा गर्ने भनेरै, लात कसे तेरो छातीमामानवताको रक्षा गने, सिके मैले पहलमानी&lt;br /&gt;
दानवलाई दण्ड दिएर, हृदय उठ्दछ बेफिक्री ।&lt;br /&gt;
चेलो थिइस्‌ तं पहिले मेरो, आइस्‌ आज शत्रु बनी&lt;br /&gt;
अरू दिन्न चुनौती लडनालाई, आखिर होस्‌ तँ खरानी,&lt;br /&gt;
यस शरीरको एक एक रौंमा, हात कसैको पर्ने छैन&lt;br /&gt;
यस ्रात्माको स्वच्छन्दतामा, दासता पनि उक्लँदैन&lt;br /&gt;
अव त आफ्नै खुशीले तेरो, सामु भुल्दै प्राण त्याग्छु !पछि पछि आउने सन्ततिलाई, मृत्युमाथि विजय सिकाउँछु”&lt;br /&gt;
आज जान्यो व्यस चेलोले, गुरुको शक्ति कति बलियो !धूर्तेताको श्राड लिएको, उसकै चेलो कति निफरो !रल्ल टल्ल थे उसका आँखा, शोचशून्य त्यो दिमागकिकर्तव्य-विमूढ एक शिला झैँ, आव्मवल सब बेमाखएक निस्वास छाड्न थाल्यो, आफ्नो गुरुको फाँसी हेरी !आखिर छोड्यो वीर घमंले, जानी जानी ग्राफ्नो प्राणचाहँदो हो यदि अझ पनि, रोक्न सक्थ्यो अ्घिभै प्राण&lt;br /&gt;
2६२२&lt;br /&gt;
यो त यौटा नाटक मात्रै, खेल्न प्रलि बेर चाहन्थ्योविस्मित पारी प्रत्याचारी, हृदय फुटाल्न सुरिएको !अन्तिम घडीको एकांकी नाटक ख्रेली पर्दा आोर्ल्योउही घरकी बूढियालाई, थप बेदनाको ग्रध्यं चढ्यो !&lt;br /&gt;
ती क 0 क&lt;br /&gt;
(४)नेपालीका भक्व हृदयले, छोडेनन्‌ थ्राफ्नो गंगास्तानसरस प्रेमको धघारस्वछूप, बागमतीको जलपानगर्मी, ठण्डीको जोख-तौलको, यो कत्रो संमिश्रणहृदयभित्रको पुण्य रागको, तातो तातो किरणगुहेश्वरी प्रनि शोभाभगवती, पशुपति औं पचलीकोशान्ति प्रेम औं मारकाटको, यो दुई हाते बरदान !एक रंगमा धैयं उज्यालो, अर्कोमा वदला भावदौडिरहैथ्यो नेपालीका, नसा नसामा यो भ्रभियानबोलिरहेथ्यो, पूव दिशामा, आगाको थाली चंकेरकुहिरी नगरी चीरफाड गरी, अभ्यन्तरको क्रोध छरेरबागमतीका, विष्णुमती का, श्रन्तरमा गुड्ने तारानवाञलोकको तुहिन छटामा, लोल्लायित ती धारासंगसंगै, ती दौडिरहेथे, शहीदहरूका स्मृतिउनको चौडो छातीमाथि, टाँसिएको कालो पुर्जी:-£“राजद्रोहीको यै गत हुन्छ ! राजद्रोहीको यै गत हुन्छ&amp;quot;&lt;br /&gt;
न. ६३”&lt;br /&gt;
जपिरहेथ्यो नेपालीको पचलीको त्यो लस्करपश्चिमपट्टि दौडिरहेथ्यो शोभा-भगवतीको लस्करआखिर पूर्वी राह दियालो, सिफलेको आकार पढेरसु&#039;क-सु&#039;की औ अभुसिन्धुका, बेगन्ती घार पुछेरगाइरथे हृदयविदारक, गीत अनौठो घिक्कारेर:-&lt;br /&gt;
“हेर कठैबरी कस्ता राम्रा, कलिला, बलिया मानिसलाईरूख रूखका हाँगा बोकिरहेछन्‌, तृथ्वीको भार उचालीछैन शक्ति लौ हाँगाहरूमा, भ्रति भारले नुहिरहेछन्‌तेर्छौ, तेर्खी कृता कता पुगी, निन्याउरो भै सास फेर्छन्‌ !शुक्रराज त्यो गीता पढ्ने, बेदव्यास झै साधुलाईइन्द्रचोकको डबलीमाथि, ज्ञान सुनाई तानेलाई&lt;br /&gt;
आज यत्रा हाँगामाथि, कसरी निदुरीले भुण्ड्चाएको ?बरा कत्तिको अप्ठेरो भै, हेर मुन्टो दोन्त्याएको !&lt;br /&gt;
लौ न, कसोरी हेरिसक्ने ? लौ न फसोरी बोलिसको ?झौडाहाले छाती पोल्छ, कलेजोमा के लगाउने ?&lt;br /&gt;
छन्‌ कतै के डाक्टर वैद्य, यस रोगलाई निको पार्ने ?परमेश्वर ए ! हेछंस्‌ कसरी ? के भ्रहिले इन्साफ नगर्ने ?के कसुर हो ? यसको भनिदे, के बिरायो यसले कहिदे !भा न आ त्यो शैय्या घोडी, लौन चाँडै मालिस गरिदे&amp;quot;&lt;br /&gt;
“अहो लौ न नि, कसरी हेर्ने ? यहाँ त अर्कै उपद्र रै&#039;छघर्म जस्तो पहलमान्‌को, लास हल्लिई झुण्डिरहेछ&lt;br /&gt;
वि)&lt;br /&gt;
धर्मेभक्त ह नारानहिटीमा राजालाई कुस्ती सिकाउँथ्योमहाराजा-धिराज उनको चेलो, कसरी यस्तो अनर्थ भयो ?कठै कस्तो हृष्ट पुष्ट छ ? मानो हात्ती जित्ला जस्तो&lt;br /&gt;
तर चेहडा शान्ति भावले, हेर ग्रभझ पत्ति वलिरहेको !राजकुलको दायाँ बायाँ, बसी यसले के गन्योलौ ?&lt;br /&gt;
शत्रु लागे पृथ्वी तलका, ख्वै र कसको जीवन बाँच्प्रो ?राम, र।म, है पहलमान्‌ ! तेरै पनि स्वगँंवास भयो&lt;br /&gt;
कसरी बाँच्लान्‌ हामी जस्ता, झीना, ख्याउटा इह लोककाजा स्वगंमा, त्यहीँ अदालत तेरो जम्मै उजुरी सुन्ला” |&lt;br /&gt;
“अब त साँच्चै धर्मे कर्मे नै, यस देशमा के बाँच्यो ?सब ययो नि, सब बित्यो नि, केवल लासको थुप्रो लाग्यो !“दशरथ&#039; जस्तो जोधा ठकुरी, यस पृथ्वीमा आज छैन !कति पीडा खायो होला ? बिचरोको आङ खाली छैनझ, जाँचमा, तिल्लाहरूमा, गोलीको गो पसेछ&lt;br /&gt;
कठै त्यत्रो फुक्का छाती ! चाल्ती झै प्वाल परेछखप्नु कसरी ? रोक्नु कसरी ? यी गहका पानी पनिभुलभुलाई वैरिरहेछन्‌, क्रस्दनका छाँगा बनी;&lt;br /&gt;
कुन डाँडोको कुन कुनामा, तेरी आमा रुन्छे होलीभक्कानो फोर्ने तातो आँसु, महाकालीमा बग्दो हो नि;होड भयो लौ पक्कै होड, उसको आँसु र पानीकोमहाकालीको भेलसँग, लड्दा उसकै जीत भयो हो;घन्य थापिस्‌ त्यतिका गोली, घच्य रोकिस्‌ कति बोलीभुण्डी भुण्डी छ्न लागिस्‌ नि, नेपालको माटोलाई&lt;br /&gt;
८५&amp;quot;&lt;br /&gt;
“संगै कस्री बाँधिएको, ए ! गोरो कलिलो बाबु !!&lt;br /&gt;
के लागेन रतिभर डर ? त्यत्रो राइफल फायर सामु?मरिसकिस्‌ तँ, मरिसकिस्‌, तर पनि कस्तो राम्रो ?हाँस्डस्‌ क्यारे, वोल्छस्‌ क्यारे ? छाती चिदेँ हाम्रो&lt;br /&gt;
कहाँ गइथिस्‌, के गरिथिस्‌, भन्छस्‌ सुटुबक हामीलाई ?किन तेरो छाती प्वाल परेको ? भनि दिउँला आमालाईकठै ! उता स्वास्नी कुनामा, सानो बालक बोकिरहीछेपतिको भं,षण मृत्यु सुन्दा, कसरी मूछित बज्रिने छे&lt;br /&gt;
हेने पाइनस्‌ जाने बेला, प्यारी स्वास्नी भ्रौ छोरा&lt;br /&gt;
पापी हुन्‌ ती पापी हुन्‌, जसले हाल्यो यत्रो बाधा”&lt;br /&gt;
करुण रसको धारभित्र, उट्द गको चस्का हिड्थ्योचलबलाई हेरिरहेका, आँखामा प्रीति जागिरहेथ्यो&lt;br /&gt;
कति हलुका, खुकुला, चाल लिएर, सर्थे मानिसक्रा खंबाप्रत्येक गोडा भारी बोकी, भ्रल्की अल्झी हिडिरहेकामनुष्यःबको गहीरो सागर, दानवताको गाँस माग्थ्यो !घेरिरहेका शहीदहरूका, लासलाई छोपिरहेथ्यो !बिस्तार, थिस्तार, उम्लन थाल्यो, केही अक गुप्त शक्तिप्रतिशोधको भाव लिएर, दौदि रहेको रन्धनिईशहीदप्रतिक्रो ममताको सागरमा यौटा ढुङ्गा बज्यो !चक्कामा चक्का, काटी काटी, बढ्न थाल्यो करोधाग्नि:-&lt;br /&gt;
(खुन, खून यो बाँच्ने छैन, यमपुरीको त्यो द्वारपखिरहेछ ला उठाउन, भ्रन्यायीको तलवार साथ&lt;br /&gt;
न ६६&amp;quot;&lt;br /&gt;
आज चारका आत्मालाई, लुटिकन खूब हाँसिरहेकोघुणित दन्तका लहरमाथि, हेर बदला छाल उर्त्यो !जति वर्सूद्‌ ज्ञीत सिन्धु, चम्कनेछन्‌ हृदय इन्दु&lt;br /&gt;
जोश, रोषका छालहरू ती कुलनेछन्‌ शक्ति सिन्धुमनु-जनपको पाप बोकी, इमसानको राह हेरीगिद्धहरूका चुच्चालाई, क्षीण हृदयको ढाल वनाईबढिरहेको राणाशाही, तासको ग्रवतार बन्छ!पिल्ती पिल्सी रोइरहेको, हृदय-सिन्धु व्याप्त हुन्छ;आज यत्रो त्रास फ्याँकी, युवकहरूको लास खाईचेतत[को समुद्रभित्र, चाहन्छ मृत्यु राणाशाही !&lt;br /&gt;
तर, हवन हवन, मने दिञ्न, चेतनाको बत्तीलाईनेपालीका युवक हृदय यी, अन्याय-सामु शिर भुकाईपापको यो हाँकलाई, धमेको हतियार बोकी&lt;br /&gt;
बढ्छ, बढ्छ, लड्छ, लड्छ, कर्मेयोगी बीर नेपाली !लौन गाऔौँ गीत यौटा, लौन नाचौं नाच यौटाभझन्झनाकार हृदयबाट, बहन थालोस्‌ राग यौटा |हात, खुट्टा, छाती, शिरले, तानमा एक सुर चढाउँलावीर रसको बाढीमाथि, हर्षको अनुराग पौड्ला !”&lt;br /&gt;
हेर कस्तो जुलूस राम्रो, हेर कस्तो हृदय चोखो !रन्धनाई, चक्कराई, कान्तिपुरको सास उड्दोबुझ लगाईं बाबु, नानी, जननीहरूका लाम साराकरुण रसका वाक्य धारा, गुनगुनाई बगिरहेका !&lt;br /&gt;
न हु&amp;quot;&lt;br /&gt;
याद झाई, भाव जागी, पुष्षहरूका छाती फुक्छन्‌शहीदहरूका क्रान्तिदेखी, जयमगाई हाँस्न थाल्छन्‌ !एक अवुपम वीरताको, कोटि कोटि होम लाग्छधैयेताका चाँदनीले, दाह मनको शान्त पार्छ !सक्छ कसले श्राज गन्न ? कति हृदयको बाँध बन्छस्वाथेताको, दासताको, भेल छेकी बढ्न थाल्छ !ख्बै र जाति, ख्वै र पाति, एक हृदय उम्लिएकोको छराम्रो ? को नराम्रो ? राष्ट्रको हित नै उज्यालोजो विभूति जन्मिएथे, मुक्तिको भ्रभिषेक गर्नेदेशका मधु पुष्पलाई, वासनाको मूल्य किट्न ?उक्ली उक्ली, चम्की चम्की, गैरहेथे स्वगंमाथिचेतनाको, कोमलताको, सागरको उत्साह पाई&lt;br /&gt;
हेदेथे तो शहीद बोकी, उक्लंदो त्यो बिमानलाईपुण्य तिथिको याद ग्राई, फूल प्रक्नताले बिदाई&lt;br /&gt;
जागृतिको मुग्ध वायु, कान्तिपुरको जोड स्नायुदासताको धुस्नुमाथि, फ्याँकिएका अग्निका तीभझिलमिलाउने चट्चटिने, एक एक फिलिगा बोकी !कुद्यो सारा वायुमण्डल, मेची औ महाकालीबाग्मतीका एक एक लहर&lt;br /&gt;
हुनहुनाई त्यो त्रिशूखी, काली, सेती, कर्नाली&lt;br /&gt;
पूर्वी नभमा कोशी, रोशी, सप्त हाँगा छबंराई&lt;br /&gt;
हेर, सारा हिमाल त्यरतँ लेक, पर्वेत जुमुं राए !&lt;br /&gt;
ना देन&lt;br /&gt;
“हे ! पूर्व दिश्ञाको पहिलो यात्री ! यस पृथ्वीको साक्षी [!सुयंदेव हे, मेरो भगवन्‌, भो नबाल्‌ तँ यो बत्ती,&lt;br /&gt;
आज पृथ्वी अन्धकारमय छ, आज हृदय ठुस्किरहेछ&lt;br /&gt;
यी दुई ठूला श्रांखा पनि, प्रप्रिय बिरौध जनाउँदै छन्‌;के गछैस्‌ तँ तेज फ्याँकी ? यसले पित्त मनु पर्छ&lt;br /&gt;
कके गर्छस्‌ तँ तातो बाँडी ? यसले शिला झै बस्नुपछे&lt;br /&gt;
हुन त यही हो कैलाशकूट, जहाँ तेरो भक्त वस्छ&lt;br /&gt;
आज अर्कै आकृति आई, तेरो दशन पाइरहेछ;&lt;br /&gt;
ह्वन मेरो नाम जुद्ध, जोधा, हिम्मती शासक्र&lt;br /&gt;
पिँजडाको एक चरो हू, बन्धनमा पालित-पोषित&lt;br /&gt;
सक्छस्‌ यदि लौ यस तनमा, चिन्ताको आगो मार्ने&lt;br /&gt;
अन्ति मात्रै जुड फेरि, पुनरजेन्म ली सेवा गर्ला;&lt;br /&gt;
गयो गयो त्यो पहिलो तेज, घमं, &#039;शुक्र&#039; औं दशरथ&#039; मागंगाको त्यो निर्मेल ज्योति, जिती लग्यो मेरो सुन्दरता !&lt;br /&gt;
तेरै आज्ञा, तेरै आदेश, झ्वोल्थ्यो मेरो चेतन बट्टा&lt;br /&gt;
मजबूरीको कँचीमा यो, काटियो ति टुक्रा टुक्रा !&lt;br /&gt;
भो, भो, लैजा, आज मलाई, तेरै ठूलो आँगनमा&lt;br /&gt;
यो पृथ्वीको खटन कठिन भो, बिन्ति छ मेरो परमात्मा ! ...&lt;br /&gt;
“ओहो, कस्तो राम्रो, प्यारो; गुलाब गमला छोपिरहेछकति मीठो सुबास छदै छदँ, आज यसरी हुकिरहेछतेरो कमलो रातो गाला, कति चिप्लिई चम्किरहेछआः मेरो हावमा बसू, मेरो तँलाई प्यार छ..&lt;br /&gt;
१.१००-&lt;br /&gt;
कति मुसारी माय। पोखी, म, यसरी चुम्मा खाँदैछ&lt;br /&gt;
कित नआई भागेको लौ, के म देख डर लाग्यो ?&lt;br /&gt;
चुँड्दिन, चुँड्दिन भो नडरा, तँ नै मेरो प्राण होस्‌ !&lt;br /&gt;
ङ त्यो सानो राजा जस्तो, तँ भृकुल्ले बालक होस्‌ !&lt;br /&gt;
लौ न उल्टो थुतुनो गाडी, कान्छीऔंला काटिदिइस्‌&lt;br /&gt;
मेरो शरीरको रगत प्यून, कहिलेदेखि तँ पह्किस्‌ ?&lt;br /&gt;
उहुहुहु कस्तो औडाहा भो ? चिरिरिरी चिरिरिरी चहरायो!&lt;br /&gt;
&#039;देशरथ&#039; “गंगा&#039; छातीमाथि, तातो गोली कसरी बर्स्यो ?&lt;br /&gt;
के भन्पो हो त्यो छातीले ? के संकायो हो रगतले ?&lt;br /&gt;
एक माथि श्रर्को थपिदा कक्चरी हामफाल्यो प्राणले ?&lt;br /&gt;
कठँ ! आज गुलाब तँ, मेर बुर्जाको हावामा&lt;br /&gt;
सुनाइरहेछस्‌, भुत्ताइरहेछस्‌, पीडाको झमर कथा&lt;br /&gt;
बिद्रोह गरिस्‌ नि धावा बोलिस्‌ मेरै कोमल ग्रौलामाथि&lt;br /&gt;
तब किन चुप हुन्‌ विद्रोही, मनुष्यको जुनी पाई!&amp;quot;&lt;br /&gt;
मझाः आः आः आाः: ए ! फुर्के भँगेरा !&lt;br /&gt;
यी, हालिदिन्छु कत्तिकाको, तेरो मीठो आहारा&lt;br /&gt;
चिबिराई गाइदे तं, चलबलाई भुरे उड्‌ तँ&lt;br /&gt;
यस बुर्जाको काखमा श्राई, एक सानी खेल खेल्‌ त ..&lt;br /&gt;
सुन, संगै आउँदा खेरि, धोविती फिस्टा जम्मैलाई&lt;br /&gt;
“भोजमा जाउँ, भोजमा जाउँ” भन्दै ल्याएस्‌ बोलाई&lt;br /&gt;
आज सबैलाई बाँडिदिन्छू, यी आफ्नै ठूला मुठीले&lt;br /&gt;
खूव थप्नू, खूब अघाउनू, भोलि पति के हो कुन्नी ?चै? त 60&lt;br /&gt;
१०१--&lt;br /&gt;
किन उडिस्‌ ए ! किन उडिस्‌ ? यी चारो आफ्नै मृढीमा छबन्दूक छैन, पेस्तोल छैन, तसेने कै कारण छ?&lt;br /&gt;
ए लः जानें, ए, लः जाने, तिमीहरू पनि मेरा दुश्मन ह्वौखालि मलाई घुत्न भनेरै, यस आश्रममा आयौ ”......&lt;br /&gt;
“पशु पंक्षी औं फनफूल पनि, मेरा भ्ाफ्ना छैनन्‌ तकसरी मैले राज गरुला ? दुनियाँ जम्मै बागी छ!युद्ध क्षेत्रमा उत्रिन जाँदा, शत्रुसँग मुठभेट पर्दा&lt;br /&gt;
आफ्ना कुटुम्ब बल दिन्छन्‌, ती तै सबभन्दा पत्यारकाख्दै र त्यो पनि मेरा निम्ति ? थ्राफ्नो छोरो प्राफ्नै भतिजादाउमा छन्‌ पिस्तोल लिई, मेरो गद्दी खोस्न भनी&lt;br /&gt;
पुत्र तिम्ति छोडिदिन्थे, गद्दी के, यो प्राण पनि&lt;br /&gt;
मूखे कहाँको संझँदैन, बातावरण वरिपरि !&lt;br /&gt;
भतिजाहरू छन्‌ त्यस्ता कपटी, फम्टन खोज्ने सातो लीपुत्र मेरो शूत्य बृद्धि, हाद्दामा उड्ने क्षुद्व मति&lt;br /&gt;
के भनु म, को खोजु&#039; म, आफ्नै तनको संरक्षक ?&lt;br /&gt;
बास उद्दछ, गाँ्त उठ्दछ, कसरी अड्ने मेरो हिम्मत ?&lt;br /&gt;
गयो दशरथ, गयो गंगा, त्यस्तै घर्मे र शुक्र&lt;br /&gt;
आज सुन्छु गइरहेछन्‌, लाखौं उनका मम्मुख&lt;br /&gt;
शक्ति अभ छ. बिजुली गारत, एक हुकुमको दर्कार छबिजुलीले भै सञ्चाप पाने, यस सृष्टिलाई सक्छ,&lt;br /&gt;
तर, सृष्टि उडेपछि मरुभूमिमा, हाम्रो बस्ती कसरी बस्ला ?&lt;br /&gt;
-१०२-&lt;br /&gt;
मानिसलाई मादिसकै के, फेरि फेरि दर्कार नपर्ला ?&lt;br /&gt;
बिद्रोही भनी मारिदिएथ्यौं, भय र घुणाका कारणदेखिरहेछु प्रश्नुधारा, करुणाको उद्गार बेगन्ती&lt;br /&gt;
किन रोए ? किन रुँदैछन्‌ ? त्यत्रा हलका हल मानिस !राजद्रोही भनी, चिनिसकेपछि, दिन्नन्‌ किन हाम्लाई आशिश?श्वाप, श्रापकै नाली मात्रै, बगिरहेछ रे घटनास्थलमा&lt;br /&gt;
तव कसरी भन्ने हामी बलीया, यत्ति गारतका भरमा ?&lt;br /&gt;
हे दिनकर ! लौ क्षमा गरेस्‌, अब मैले श्रासन फेर्नेछुराजाबाट चाँडै नै, राजर्षी म वन्नेछु&lt;br /&gt;
यत्रो पाप, यत्रो हत्या, कतै कतै यो टिक्दैन&lt;br /&gt;
मेरो भुजाका दाना दानामा, यसले स्वाद राख्ने छैन&lt;br /&gt;
मेरा पलङ्गका एक एक मलमल, खस्रा खस्रा बोह्ला बन्लान्‌मतमा शान्ति कविराजका, भ्रोखलमा जस्तै चूर्ण होलान्‌डर लाग्दैछ, देखिसके अ, त्यो विधिको बढ्दो लस्कर&lt;br /&gt;
बेर छैन, बेर छैन त्यो, फर्कन एक दिन हाम्रा अपर;राजर्षी नै यस्तो बाटो, त्याग नै हो यस्तो जालोगेरु-वस्त्रकै यौटा स्वाँग, मेरो प्राणको चपटे हो;&lt;br /&gt;
तर आँसु चुहाई शरण लिन्छु, हृदय खोली स्वीकाछु&lt;br /&gt;
गर्ने नहुने कुक्कत्य त्यो, अ्रहिले मबाट हुन गयो&lt;br /&gt;
वृद्ध-वृक्ष यो कायालाई, वाँकी दुई दिन जूग बन्यो&lt;br /&gt;
माफ गरेस्‌ नि माफ गरेस्‌, हे जगको सृष्टि संहारक”&lt;br /&gt;
ती ती ती&lt;br /&gt;
&amp;quot;१०३०&lt;br /&gt;
विध्वंश लीजाको सृष्टि गरेर, युग परिवर्तनको फाँसीमालट्की लट्की राणाशाही, बेह्रीस्‌ हुँदैथ्यो घावामा [शहीदहरूका लाल रगतका, थोपा थोपा देखेर&lt;br /&gt;
फहरिन थाल्यो नेपालीको, जागृति भण्डा प्राण दिएर !&lt;br /&gt;
समाप्त&lt;br /&gt;
१०४&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रकाशित पुस्तकहरू==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(१)(२)(३)दश)(२)(६)(७)(५)(९)(१०)(११)(१२)(१३)(१४)(१५)(१६)(१७)(१८)&lt;br /&gt;
अन हिमालय बोल्छ, २०१४, (कबिता संग्रह)&lt;br /&gt;
“३७ साल, २०११, (खण्ड काव्य)&lt;br /&gt;
गुराँस, २०१५, (कबिता संग्रह)&lt;br /&gt;
ओमरखैधामलाई जवाफ, २०१६, (काख्य)&lt;br /&gt;
जोचनकै थुम्कोबाट, २०१६, (काव्य)&lt;br /&gt;
ग्रामा वोलाउँछिन्‌, २०१६, (कविता संग्रह)&lt;br /&gt;
तिमीलाई देख्दा, २०१७, (काव्य)&lt;br /&gt;
साहिलौं मैयाँ, २०१५, (खण्ड काव्य)&lt;br /&gt;
युरी अलेक्सएभिच गागारिने, २०१६, (काव्य)&lt;br /&gt;
समालोचनाको बाटोतिर, २०१६, (समीक्षा संग्रह)&lt;br /&gt;
हाम्ना प्रतिभाहरू, २०१६, (जीवनीपरक समीक्षा संग्रह)जनताको शल्नु, २०२०, (हेनरिक इन्सेनको नाटकको अनुवाद)जगतको सृष्टि र सञ्चालन प्रक्रिया, २०४६|१६५६, (दशंन)प्रतिभा पहिचान, २०४७, चैत्व (जीवनीपरक समीक्षा संग्रह)जनताको साहित्य, २०४८, आश्विन (सैद्धान्तिक समीक्षा संग्रह)स्वतन्त्तता र कम्युनिष्टहरू, २०४५, कार्तिक (राजनीति)दृष्टि बिन्दु, २०४८, मंसिर (किशोर साहित्य)&lt;br /&gt;
व्यावहारिक समालोचना, २०४८, माघ&lt;br /&gt;
प्रकाशित पुस्तिकाहरू&lt;br /&gt;
(१९)(२०)(२१)(रर)&lt;br /&gt;
राष्ट्रिय राजनैतिक सहमति, २०४४&lt;br /&gt;
भाषिक अधिकार, २०४४&lt;br /&gt;
नेपालको भाषा नीति, २०४४&lt;br /&gt;
नेपाली र नेपालका अन्य भाषा माझको सम्बन्ध, २०४४&lt;br /&gt;
५४&lt;br /&gt;
क्रान्तिका यौ गीत बुन्दै, फाँट फाँटै सिच्च थाले |&lt;br /&gt;
के तराई, गरीब भाई, के पहाइका ती सिपाही&lt;br /&gt;
शहीदहरूको राग पाई, मृक्तिका अवतार जानी&lt;br /&gt;
एक श्रामा, एक छोरा, हेने थाले शिर उचाली&lt;br /&gt;
एक ग्रर्को आँघि ल्याउने, हृदय हृदयको भो तयारी !0 न्‌ ती&lt;br /&gt;
आज सकियो पापीहरूको, नरहत्याको श्ररमान&lt;br /&gt;
मनुष्यताको छाती माथि, परेड खेल्ने एहसान&lt;br /&gt;
तर के भएको ? यस्तो चर्को, कता गयो त्यो बिमान ?&lt;br /&gt;
जसमा चढ्दै शैर गर्ने, हिम्मत उक्लोस्‌ घनवान्‌;&lt;br /&gt;
राणाशाही हाँस्न सकेन, हृदय खोली रुन सकेन&lt;br /&gt;
केही बितेको, केही चुकेको, झस्काले निद्रा पने दिएन&lt;br /&gt;
कृति ब्याकुल, चिन्ताका भँवरी, फनफनाई घुम्न थाले&lt;br /&gt;
नव जीवन, नव उल्लास, नयाँ बिचार खोस्न थाले&lt;br /&gt;
त्यस गर्जेनको पूर्वी डाँडो, सुस्केराले लाल भयो&lt;br /&gt;
त्यस क्रोधको अरिन शिखाले, उल्टो निम्दै मर्नु पन्यो !&lt;br /&gt;
नपुसकता उक्लन थाल्यो, सिथिलताको भन्याङ चढेर&lt;br /&gt;
प्राण-पखेरू उम्कन छ्योज्पो, त्यो ताजको भार छोडेर !&lt;br /&gt;
दासताका मालिकहरूका, सर्बोच्च नेता बिरामी भए&lt;br /&gt;
श्री ३ जुद्ध ग्राफ्नो आकृति, जानी जानी विसंन थाले,&lt;br /&gt;
शहीदहरूका स्वर्गीय यात्रा-वणौंन आफ आ्राइपुग्यो&lt;br /&gt;
उनको सामू दुबै कानमा, पालै पालो झ्याली पिद्थ्यो !&lt;br /&gt;
सूर्य पूर्वी नभमा एक्लै, पेट मिच्दै हाँस्न थाल्यो&lt;br /&gt;
बेहोश, तर हिंड्दै डुल्दै, श्री ३ जुद्ध बबेराए:-&lt;br /&gt;
न&amp;quot; ८९&amp;quot;.&lt;br /&gt;
१.२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==लेखक परिचय==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जन्म : सन्‌ १९३६, अक्टोबर&lt;br /&gt;
स्थान : जुम्ला खलंगा, जुम्ला,कर्णाली अञ्चल, नेपाल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुर्ख्यौली घर : पल्लाचौंडली,बैतडी, महाकालीअञ्चलख २/१५डिल्लीबजार,काठमाडौं,कानन्ददव भट्‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टैल्षिफोत (घर) ४-१०८२४पौ. ब. नं. (काठमाडौं) ४१०६ तकार्यालय : केन्द्रीय अंग्रेजी शिक्षण विभाग, पुर क्याम्पसत्रिभुवन जिरन विद्यालय, हक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा :&lt;br /&gt;
&amp;quot;एम्‌, ए. (अँग्रेजी साहित्य), १९६० पटना विशवनिद्यालय,&lt;br /&gt;
-. फोष्छ-ग्रयाजुएट डिप्लोमा (पाठयक्रम), लीद्‌स विश्वविद्यलय,संयुक्त अधिराज्य, १९८२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1. एम्‌. एड्‌, (पाठ्यक्रम तथा बिक्रासोन्मुख देशमा शिक्षा), लण्डनबिश्वविद्यालय, संयुक्त अभिराज्य, १९८३&lt;br /&gt;
पिता : व्यस्याधीश, श्री जयदेव भद्‌ (दिवंगत, १९८३)माता : श्रीमती हीरादेवी (भट्‌) भदे (बर्ष ७६)&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=Main_Page&amp;diff=85</id>
		<title>Main Page</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=Main_Page&amp;diff=85"/>
		<updated>2024-06-11T13:17:02Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;strong&amp;gt;Welcome to Nepali Kitab Editing Team.&amp;lt;/strong&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
This website is a sub-website of nepalikitab.org. Here we convert old books into Unicode text format. It is a collective effort by volunteers around the world. If you are also interested, please join the team.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
We keep here the books generated after scanning and extracting texts with OCR. It contains many errors. Our goal is to remove the errors.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==How to edit==&lt;br /&gt;
[[File:Editor-timeline.png|thumb]]&lt;br /&gt;
1. Make an account or log in.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2. Select the book of your interest.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. Click edit&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
4. Edit and clean up the errors and book format. If you are familiar with wiki syntax, you can edit the source too.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
5. Save time to time while editing&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
For details about formatting text, refer to: https://www.mediawiki.org/wiki/Help:Formatting&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 1:  Scan and OCR ==&lt;br /&gt;
*[[रामायण]] भानुभक्त आचार्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* [[९७ साल]] आनन्ददेव भट्ट&lt;br /&gt;
* [[तरुण तपसी (नव्यकाव्य)]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[नेपालको नक्सा (राजनीतिक तथा प्रशासनिक)]] नेपाल सरकार&lt;br /&gt;
* [[आदिकवि भानुभक्त (पटकथा)]] यादब खरेल&lt;br /&gt;
* [[इतिश्री (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[स्वाध्ययन सामग्रीः घरमा नै गर्न सकिने सिकाइ क्रियाकलापहरू (कक्षा ५)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[रूखको रूप]] रिन्छेन्ला लामा&lt;br /&gt;
* [[केही धार्मिक तथा साँस्कृतिक सम्पदाहरू (केही नमुना कलाकृतिहरू)]] सत्यमोहन जोशी&lt;br /&gt;
* [[रमाइला गाउँखाने कथा]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[दसैँ, पिङ र हात्ती (बालकथा-सङ्ग्रह)]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[८० दिनमा विश्‍व भ्रमण]] जुल्स वर्न,गोरखबहादुर सिंह&lt;br /&gt;
* [[बालभाका - १ (बालकविता सङ्ग्रह)]] उद्धवप्रसाद प्याकुरेल&lt;br /&gt;
* [[ताल (उपन्यास)]] यासुनारी कावाबाता&lt;br /&gt;
* [[चतुरेको चर्तिकला (कथा सङ्ग्रह)]] गोरखबहादुर सिंह&lt;br /&gt;
* [[ठूलो फुल (A Big Egg)]] Roma Pradhan, Shanta Das Manandhar&lt;br /&gt;
* [[आखिरमा टोम्मीको टोलीले जिती छाड्यो]] क्रिस्टिन स्टोन,शान्तदास मानन्धर&lt;br /&gt;
* [[शिक्षक निर्देशिका मेरो सामाजिक अध्ययन तथा सिर्जनात्मक कला कक्षा ५ (पुरानो संस्करण)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[जय भुँडी (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[मुकुन्द इन्दिरा (नाटक)]] बालकृष्ण सम&lt;br /&gt;
* [[खाल्डामा परेको भकुन्डो]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[जे छोए पनि सुन]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[खानामा पाइने पोषणहरू]] नताशा भिजकारा&lt;br /&gt;
* [[अन्तिम निम्तो]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[सूगवा]] रोशनी चौधरी&lt;br /&gt;
* [[भीमसेन थापा (ऐतिहासिक खण्डकाव्य)]] सिद्धिचरण श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[ऋतुविचार (खण्‍डकाव्य)]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[अनिवार्य नेपाली (१०६) - माध्यमिक शिक्षा परिक्षाको प्रश्न तथा उत्तरकुञ्जिका २०७४]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[छन्दका १०१ कविता]] (सङ्कलन) कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[गणित प्राविधिक शब्दकोश]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[उज्यालोको खोजीमा (उपन्यास)]] हरिहर खनाल&lt;br /&gt;
* [[सपनाको देशमा]] चन्द्रकान्त आचार्य&lt;br /&gt;
* [[महिला लक्षित शिक्षक सेवा आयोग तयारी अध्ययन सामग्री]] विष्णुप्रसाद अधिकारी&lt;br /&gt;
* [[शिक्षक पेसागत विकास तालिम (तालिम पाठ्यक्रम)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[हाम्रा लोकबाजाहरू (बालबोध - ५१)]] रामप्रसाद कँडेल&lt;br /&gt;
* [[पर्दा, समय र मान्छेहरू (कथासङ्‍ग्रह)]] झमक घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[काउकुती (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[विदुर नीति Vidura Niti [Sanskrit-English]]] (Extracted From) Mahabharata [महाभारत]&lt;br /&gt;
* [[जंगबहादुरको बेलाइती कापी]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[कति वटा रोटी]] शिल्पी प्रधान&lt;br /&gt;
* [[विश्वका प्रमुख सभ्यता तथा संस्कृति (बाल ज्ञानकोश - ३)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अस्माकम् संस्कृतम् - कक्षा १]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[प्रारम्भिक संस्कृत व्याकरण र रचना]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[गोरक्ष-साह-वंश (ऐतिहासिकं महाकाव्यम्)]] हरिप्रसाद शर्मा&lt;br /&gt;
* [[२०२ ओटा ठट्टा]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[धुमधामको घुमघाम (भक्तप्रसाद भ्यागुताको नेपालयात्रा)]] कनकमणि दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[महिलाका लागि डाक्टर नभएमा]] -&lt;br /&gt;
* [[दस औतार (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[A Perfect Match]] Ramendra Kumar&lt;br /&gt;
* [[मधुपर्क (वर्ष ४७, अंक ४, २०७१ भदौ)]] -&lt;br /&gt;
* [[सौगात (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[एक घर एक रोजगार (प्रयागदत्त तेवारीको कृषिकथा)]] मिलन बगाले&lt;br /&gt;
* [[रवीन्द्रनाथका नाटकहरू]] -&lt;br /&gt;
* [[पेसा, व्यवसाय र प्रविधि]] -&lt;br /&gt;
* [[मामा माइजु]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[म को हुँ]] पेमा डोल्मा लामा&lt;br /&gt;
* [[चनाचटपटे (बालकविता-सङ्ग्रह)]] बूँद राना&lt;br /&gt;
* [[आवाज (सामाजिक उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[स्पष्टीकरण (कथासङ्ग्रह)]] हरिभक्त कटुवाल&lt;br /&gt;
* [[स्वास्थ्य, जनसङ्ख्या तथा वातावरण शिक्षा स्वाध्ययन सामग्री (२०६७)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[दशैँको दक्षिणा (बालउपन्यास)]] गङ्गा पौडेल&lt;br /&gt;
* [[चार आर्य-सत्य (बुद्ध-शिक्षाका चार स्तम्भ)]] दोलेन्द्ररत्न शाक्य&lt;br /&gt;
* [[विजय चालिसेका बालकथाहरू]] विजय चालिसे&lt;br /&gt;
* [[सिर्जनशील विद्यालय]] अर्जुन श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[अभिभावकको सहयोगमा बालबालिकालाई घरमा नै गराउन सकिने सिकाइ क्रियाकलापहरू (कक्षा १)]] -&lt;br /&gt;
* [[दर्शन परिचय (विश्वका दर्शन र कला साहित्यिक बादहरू)]] परशुराम कोइराला&lt;br /&gt;
* [[खोज (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[अनिवार्य सामाजिक अध्ययन (१२३) - माध्यमिक शिक्षा परिक्षाको प्रश्न तथा उत्तरकुञ्जिका २०७५]] -&lt;br /&gt;
* [[बिहानीको घामसँग]] तारा पुन, शान्तदास मानन्धर&lt;br /&gt;
* [[एकादेशमा (बालकथाहरूको सँगालो)]] उषा दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[इतिहासका विम्बहरू]] पूर्णचन्द्र घिमिरे, रमेशचन्द्र घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[पन्ध्रौं योजना (२०७६७७-२०८०८१)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[नेपालको शाह तथा राणा वंशावली]] विष्णु प्रसाद श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[Aaloo-Maaloo-Kaaloo]] Vinita Krishna&lt;br /&gt;
* [[परित्याग (उपन्यास)]] माधव खनाल&lt;br /&gt;
* [[अमेरिका (उपन्यास)]] गंगा लिगल&lt;br /&gt;
* [[उखान मिलेन !]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[राष्ट्रकवि माधव घिमिरे (जीवनी, व्यक्तित्व र कृतित्वको सङ्‍क्षिप्त रेखाङ्‍कन)]] शैलेन्दुप्रकाश नेपाल&lt;br /&gt;
* [[केहि गुणकारी बोटबिरूवाहरू (बालबोध - ४१)]] डा. हरिप्रसाद&lt;br /&gt;
* [[दिवास्वप्न]] गिजुभाई, शरच्चन्द्र वस्ती&lt;br /&gt;
* [[संस्कृत, प्राकृत र नेपालीका सन्धिनियम]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[शिक्षाका ती दिन]] पुष्पराज पौडेल&lt;br /&gt;
* [[मपाईं (निबन्ध)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[Autobiography of a YOGI]] Paramhansa Yogananda&lt;br /&gt;
* [[ताराबाजी लै! लै!!]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[विश्वास (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[Akbar and Birbal Moral Stories]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[बुद्धवादका तीन आयाम]] पशुपति घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[करेसाबारीका जडिबुटीहरू]] केदार श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[काठमाडौं उपत्यका खुलास्थलहरू सम्बन्धी मानचित्र पुस्तक २०७१]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अन्ताक्षरी खेल]] ध्रुव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[साइबर बालकथा]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[कलेजी थाल]] ध्रुव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[कत्ति धुनु गधाहरूलाई (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] लक्ष्मण गाम्नागे&lt;br /&gt;
* [[गौरी (शोककाव्य)]] माधव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[आमाको माया]] रमेश चन्द्र अधिकारी&lt;br /&gt;
* [[Natural Treasures of Nepal]] Nepal Tourism Board&lt;br /&gt;
* [[नारीस्वर (महाकवि देवकोटा विशेष) - २०६६ असोज]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[चार गजलकारका उत्कृष्ट गजल (गजलसङ्ग्रह)]] मनु ब्राजाकी&lt;br /&gt;
* [[स्यालको जुक्ती]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[स्थानीय पाठ्यक्रम विकास तथा कार्यान्वयन मार्गदर्शन (मातृभाषा सहित) २०७६]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[बाँदर बन्ने रहर (बालकथा सङ्ग्रह)]] गोपीकृष्ण ढुङ्गाना&lt;br /&gt;
* [[डाढो (हास्यव्यङ्ग्यहरू)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[मध्यचन्द्रिका (नेपाली भाषाको मझौला व्याकरण)]] सोमनाथ शर्मा&lt;br /&gt;
* [[नेपाली क्रान्ति-कथा]] फणीश्वरनाथ रेणु&lt;br /&gt;
* [[डायना (महाकाव्य)]] शैलेन्दुप्रकाश नेपाल&lt;br /&gt;
* [[शङ्खे र फट्याङ्ग्रो]] अनन्तप्रसाद वाग्ले&lt;br /&gt;
* [[मोहिनीले खोसेको अमृतकलश]] अमर निराकार राई&lt;br /&gt;
* [[हिन्दू-धर्म के हो]] महात्मा गाँधी&lt;br /&gt;
* [[बालबालिकामा पढ्ने बानीको विकास]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[The Last Page of My Poem (मेरो कविताको अन्तिम पृष्ठ)]] Rajeshwor Karki&lt;br /&gt;
* [[जय भोलि !]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[संस्कृत व्याकरणको रूपरेखा]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[घरबारी बगैंचा]] बोल बहादुर थापा&lt;br /&gt;
* [[नबिर्सने यात्रा (यात्रा-कथा)]] समीर नेपाल&lt;br /&gt;
* [[समाज परिवर्तनमा संस्कृतिकर्मी]] विजय सुब्बा&lt;br /&gt;
* [[मेवालाल (बालकथा सङ्ग्रह)]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[A Helping Hand]] Payal Dhar&lt;br /&gt;
* [[आमा (कविता सङ्ग्रह)]] भक्ति दाहाल &#039;विष्फोट&#039;&lt;br /&gt;
* [[विज्ञान तथा वातावरण - कक्षा ८ (पुरानो संस्करण)]] गोपीचन्द्र पौडेल&lt;br /&gt;
* [[चप्पल]] अर्हन्त श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[मात्राहरू]] हरिहर लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[दोस्रो भाषाको रूपमा नेपाली भाषा]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अब्राहम लिंकन (१८०९-१८६५)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[घरभेटी भाउजू (कथासङ्ग्रह)]] कृष्णादेवी शर्मा&lt;br /&gt;
* [[Agreeing and Disagreeing - English Grade 10]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[शकुन्तला नाटक]] शम्भुप्रसाद ढुंग्याल&lt;br /&gt;
* [[Chunu and Munu Read]] Shanta Das Manandhar, Stephanie Wei&lt;br /&gt;
* [[अब खेल खेल्ने!]] शिल्पी प्रधान&lt;br /&gt;
* [[जनावरहरूको सभा]] ज्ञाननिष्ठ ज्ञवाली&lt;br /&gt;
* [[विश्वप्रसिद्ध पैंतिस साहित्यकार]] प्रभात सापकोटा&lt;br /&gt;
* [[कसिङ्गर (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[पंचतन्त्र कथासंग्रह]] &lt;br /&gt;
* [[अक्षर (बालकथा)]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 2: Title and heading corrections completed ==&lt;br /&gt;
* [[गलबन्दी (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 2&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 3: Text correction completed ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 3&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
==Step 4: Proof reading completed==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 4&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[अनौठो फल]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==Step 5: Finished books==&lt;br /&gt;
पुरा भएका किताब&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 5&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A4%B2%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80_(%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%99%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%B8%E0%A4%99%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B9)&amp;diff=84</id>
		<title>गलबन्दी (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A4%B2%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80_(%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%99%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%B8%E0%A4%99%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B9)&amp;diff=84"/>
		<updated>2024-06-11T13:16:13Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;Source: https://nepalikitab.org/bhairab-aryal-galbandi/&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पुस्तक परिचय==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भैदव अर्यील&lt;br /&gt;
गलबन्दी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भूगिका==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घ्याम्पे भुँडीको विपक्षमा जयगानको फलाको उरालेर र अल्छे शरीरमाबेस्मारी काउकुती लाएर भ्रैरव अर्यालले हास्यव्यङ्गयलेखकका रूपमा आफ्नोकीतिंपताका निक्कै रमाइलोसित पहिल्यै फरफराइसक्नुभएको थियौ । उनैरमाइला लेखन्ते फेरि सबै पाङ्दुरे मुखुन्डाहरूको आन्द्राभुँडी धुतेर सत्यलाईनड्ग्याउन र असत्यलाई उदाङ्गो पार्न सुरिनुभएको छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यसरी नै उत्तरदायी कलाकारले सचेत रूपले समाजका मैलाहरूलाईउधिनेर देखाइदिन्छ र ती मैलाहरूलाई मिल्काउने सङ्केतले सुतेकाहरूलाईअगुल्टाले झैं &#039;झोस्तै बिउँफझाउँछ । लासवादी साहित्यको थुप्रोले निसास्सिएकोनेपाली वातावरण अर्यालजस्ता भित्तो पुन्याएर सत्यको पक्षमा कु्लन सक्नेथोरै मात्र साहित्यकार नभइदिए कहालीलाग्ने हुने थियो । उहाँ निर्धक्कभन्नुहुन्छ- “हो त नि यहाँ कसले के छोपेको छैन ? टेरिलिनको सूटलेदाउरिएको आङ छोपिन्छ, एक बट्टा पाउडरले चाउरिएको छाला छोपिन्छ,डिग्रीको साइनबोर्डले दिमुगको गोबर छोपिन्छ, मानको पगरीले बेइमानको :घ्याम्पो छोपिन्छ, मैत्रीको जालले ब्वाँसाको राल छोपिन्छ ।”&lt;br /&gt;
हास्यलेखको मूल उद्देश्य हँसाउनु होइन । यसले हँसाउने आवरणभित्रजीवनका गृढतम रहस्यहरूको उद्घाटन गर्छ । यस दृष्टिकोणले हेर्दा अर्याललाईसफल हास्यकार मान्नुपर्छ । उहाँभन्दा अगाडिका लेखकहरूमा केही कृत्रिमताजवरजस्ती ठोकठाक पारेर हँसाउने मूल उद्देश्यको निम्ति मिलाइएको बोधहुन्थ्यो । अर्यालका लेखहरूमा भने अनुप्रासबाट उत्पन्त हाँसोसमेत स्वाभाविकप्रवृत्तिकै रूपमा प्रकट हुन्छ । यस स्वाभाविकताले गर्दा नै अर्याल आजसम्मकाहास्यलेखकहरूभन्दा बढी सफल, बढी प्रभावशाली र बढी जनप्रिय हुनपुग्नुभएको छ ।&lt;br /&gt;
अर्यालको शैली आकर्षक हन्छ । झरौ नेपाली भाषाका शब्दहरूलाई&lt;br /&gt;
अत्यन्त उपयुक्त ठाउँमा उहाँ प्रयोग गर्नुहुन्छ । &#039;उडाउनु&#039; सित एकछिनउड्दा&#039; मा नेपाली क्रिया &#039;उडाउनु&#039; का विभिन्न अर्थको व्याख्या गर्दै हास्यकोसाह्दै राम्रो भाषिक उदाहरण लेखकले दिनुभएको छ । वास्तबमा शब्दढुकटीकोज्ञानबाट वञ्चित हाम्रा बहुसङ्ख्यक लेखकहरूको बीचमा शब्दज्ञानले भूषितथोरै चम्किला नक्षत्रहरूमध्ये एक हुनुहुन्छ भैरव अर्याल । हुन त हास्यकोक्षेत्रमा अरूले पनि प्रवेश गरेका छन्‌ तापनि तिनको मूल उद्देश्य झर्राशब्दहरूलाई टर्रा प्रमाणित गर्ने रहेकाले अर्यालको जस्तो हास्यलाई व्यापकक्षेत्रमा साधारणीकरण गर्ने क्षमता तिनीहरूमा पाइन्न । ती हास्यमा जबरजस्तीहँसाउने जमर्को र तुच्छ व्यङ्ग्य हुन्छन्‌ तर अर्याल त्यस्तो व्यङ्ग॒यलाई मनपराउनुहुन्न । अर्यालको व्यङ्ग्य चित्तबुभदो, फराकिलो र स्थायी हुन्छ ।उदाहरणको लागि अर्यालको यस व्यङ्गञयलाई लिन सकिन्छ, “निरस्त्रीकरणकोप्रस्ताव एउटा गलबन्दी हो- आणविक गाँडको । शान्तिवार्ता एउटा गलबन्दीहो- करतुत र कुचक्रका गाँडको । यसरी सोच्तै ल्याउँदा क ठम्याउँछ- कमात्रै होइन, उसको समाजै गँडाहा छ, उसको युगै गँडयाहा छ । आफू चुत्थोमान्छे भएकोले साह्रै ठूलाको कल्पना गर्न सक्तैन र मात्रै, नत्र क यो पनिठान्दो हो- यो विश्व नै ब्रह्माण्ड नभई ब्रह्मगाँड होला । पृथिवी त्यसगाँडमाथिको खटिरा, अरू हुन सक्छ- मान्छेचाहिँ त्यस खटिराभित्रका कीरा ।”&lt;br /&gt;
&#039;गलबन्दी&#039; निबन्धले एकातिर तुलेगाँडोको विवशतालाई अघि तेर्स्याएरहामीलाई मरीमरी हँसाउँछ भने अर्कातिर दोष, कुरूपता र अयोग्यता लुकाएरगुण, रूप र योग्यताको पगरी गुत्ने फटाहाहरूको आन्द्राभुँडी केलाएर सत्यकोउद्घाटन व्यङ्ग्यात्मक रूपले गर्छु । &#039;टाउको&#039; अथवा &#039;आलु&#039; जस्ता मामुलीविषयहरूलाई लिएर पनि लेखकले एक प्रकारले हाम्रो स्वाँगे र पाखण्डीसमाजको चित्तबुभदो चित्र उपस्थित गर्नुभएको छ । &#039;मान्छे मोडेल १९६७&#039; र&#039;पच्चीसौँ शताब्दी अझ्गप्रत्यङ्गमा&#039; ले वैज्ञानिक कलपुर्जाले हाम्रो जीवनमाल्याएका यान्त्रिकताको व्यङ्ग्यात्मक दृश्य देखाउँछन्‌ भने &#039;सातसूत्रीयसाहित्यदर्पण&#039; ले हाम्रो साहित्यिक क्षेत्रका साइँदुवाहरूको राम्रो झाँको झारेकोछ।&lt;br /&gt;
अर्यालका हास्यलेखहेरूलाई दुई तहमा हेर्न सकिन्छ । बाहिरी तहमाती हँसाउन लेखिएका हुन्‌ तर हँसाउने उद्देश्यबाहेक अर्को उद्देश्य लेखककोछ। यसको भित्री तहमा उहाँ सामाजिक अन्याय र शोषणलाई उदाङ्गोपार्नुहुन्छ । &#039;साँढे&#039; शीर्षक निबन्ध बाहिरी तहमा साँढेसम्बन्धी हास्य मात्र हो&lt;br /&gt;
तर भित्री तहमा यसले विश्वका मै हुँ भन्ने घमन्डीहरू, चाकरीवाला,मपाईंवादीहरू र बुद्धिहीन ढँटुवारेहरूका कार्यहरूलाई विश्लेषण गरेरमानवतावादको स्थापना गर्न खोजेको छ । &#039;चुरोट केही झिलिमिली संस्मरण&#039;मा पनि दुई तह छन्‌ । मामुली चुरोटको तलतलबाट यस निबन्धले उँभोउठेर मानवका मानसिक कमजोरीहरूलाई साह्रै राम्ररी प्रकट गरेको छ।मान्छे अर्कालाई उडाउँछ अनि आफैँ उडेको चाहिँ पत्तो पाउँदैन र &#039;ए ज्याभुसुक्कै !&amp;quot; भन्दै आफ्ना कमजोरीहरूलाई लुकाउँछ । अर्यालले यिनै मानवकाविश्वव्यापी कमजोरीहरूलाई ढन्डेसो खुस्कुन्जेलको व्यङ्ग्य गर्नुभएको छ ।ज्ञे होस्‌, यो सँगालोले सिद्धहस्त हास्यव्यङ्गग्यकारको प्रशंसनीय प्रतिनिधित्वगर्दै हामी पाठकहरूलाई रसिला उपमाहरू, अनौठा तर सुन्दर भनाइहरू रसफल कलात्मकताको भोज प्रस्तुत गर्छ । हाम्रो समाजको यथार्थ र कलात्मकचित्रण नडराई गर्ने अर्याल यसरी हाम्रो हृदय जित्न सफल हुनुभएको छ ।हास्यव्यङ्गयको क्षेत्रमा कौवा प्रकाशतले गरेका सुनौला कार्यहरूमायस सङ्घलनले अवश्य नै केही सुगन्ध त थप्ने नै छ भनेर म फुरुङ्ग छु।&lt;br /&gt;
जमल, काठमाडौँ तानासर्मा१५.४.१९६९,&lt;br /&gt;
(प.सं. बाट)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==नवौँ नवकीसिली==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्यालज्यूले कविता नलेख्नुभएको होइन, दुई-चारओटा तक्मैझुन्डघाउनुभएको छ । लेख-निबन्ध नलेख्नुभएको होइन, त्यस्तै लेखेर जीवनघान्नुभएको छ । तर पनि मान्छे उहाँलाई बढी चिन्छन्‌- हास्यव्यङ्गझयकारकोनाताले । उहाँका हास्यव्यङ्ग्यहरूको सङ्घलन काउकुती र जय भुँडीले पाएकोलोकप्रियताकै लोभले हामी उहाँको यो तेस्रो सङ्ग्रह प्रस्तुत गर्दै छौँ- गलबन्दी ।फुकाएर हेरे यहाँ जीवन र जगतका अनेकौँ विसङ्गतिका गाँडहरू देखिन्छन्‌ रती गाँडमाथि आधुनिक युगले उमारेका पुत्लेपाङ्रै फोकाहरू देखिन्छन्‌ । योदेख्ता भैरवको हास्यव्यङ्गग्यबारे कृ्‌ष्णचन्द्रसिंहले भन्नुभएको कुरा मान्न करलाग्छ- &amp;quot;...राँकोको उज्यालोमा दसै अवतार पर्दामा टाँगिन्छन्‌, भैरवकोछुबाइमा नेपालीको आधुनिक जीवन व्यक्तिन्छ । पर्दा बोल्दैन, इतिहास लाटिन्छ,मूक जनता मन बहलाई आत्मसन्तोष गर्छन्‌; तर भैरवका व्यङ्ग्यले मथिङ्गलधुन्छ । सामाजिक विकृति र विरोधाभासहरू उपहास भई नाङ्गिन्छन्‌ । जीवनकोछन्दहीन व्यथाप्रति सहानुभूति व्यक्तिन्छ ।&amp;quot; हुन पनि अर्याल ग्रामीण वाअश्लील खालका ठट्टा गरेर बलात्कार हँसाउन खोज्नुहुन्न, न त कुनै व्यक्तिलाईगिज्याएर लेख्नुहुन्छ । इन्द्रबहादुर राईले उहाँको काउकुती छुँदै लेख्नुभएकोछ- &amp;quot;अर्यालको व्यङ्ग्य कसैलाई ताकेर होइन, केहीलाई ताकेर हुन्छ ।”&lt;br /&gt;
चिन्तनशील कवि र युगअवस्था बुझेको पत्रकार भएर पनि होला,हास्यव्यङ्कग्यको परिवेशलाई अर्यालले सबैँ हिपटाइट र ठाडो टुपीमा मात्रैअलमल्याउनुभएन । गलबन्दीमा उहाँ राष्ट्रिय, अन्तर्राष्ट्रिय जीवनका विभिन्नपक्षमा ओढाइएका वाघबुट्टै गलवन्दीहरू फुकालेर चियाउन पुग्नुभएको छ ।अण्‌बम र अपोलो, मानवताको नारा र काला-गोराको जातिभेद, हैजा लागेकोबृढो र मुटुको परिवर्तनसम्म उहाँले कलमको सुइरो चलाउनुभएको छ।कवित्वले उहाँको शैली साजएको छ । व्यापकताले बौद्धिकता नअंगाली सुख&lt;br /&gt;
पाएको छैन । त्यसैले सस्तो हाँसो खोज्नेहरूले यहाँ केही पाउन नसक्लान्‌, तरबुद्धिजीवीहरूले पक्कै रुचाउलान्‌ भन्ने हामीले आशा गरेका छौँ ।&lt;br /&gt;
यही आशामा दसतिर छरिएका निबन्धहरू बटुली यसलाई सङ्ग्रहकोरूप दिनु हामीले आवश्यक ठानेका छौँ । कौवा प्रकाशनको उद्देश्य नै नेपालीहास्यव्यङ्ग्यसाहित्यको सेवा गर्नु हो । मात्रा बढाउन होइन, स्तर बढाउन पनिप्रकाशनले धेरै क्रा गर्नु छ । यसभन्दा अघिका प्रकाशनलाई झैँ यसलाई पनिप्रेम गरिदिनुभए प्रकाशनको हौसला अझ बढ्नेछ ।&lt;br /&gt;
यसको सङ्गलन र प्रकाशनको निम्ति अनुमति दिनुहुने लेखकलाई,भूमिका लेखिदिनुहुने तानासर्मालाई र व्यङ्गयचित्रको निमित्त पारिवारिक मित्रटेकवीर मुखियालाई प्रकाशन धन्यवाद टक्रचाउँछ ।&lt;br /&gt;
यसमा सङ्ग्रह गरिएका टुक्राहरू पहिले प्रकाशित गर्ने रमश्षम, रूपरेखा,रचना, रत्नश्री, अर्पण, प्रतिबिम्ब, सगुन पत्रिकाहरूप्रति पनि प्रकाशन आभारप्रकट गर्दछ ।&lt;br /&gt;
आत्मदेव शर्माआज प्रोप्राइटर, कौवा प्रकाशनअसारको पन्ध ढुङ्घाअडडाबजार, काठमाडौँ ।&lt;br /&gt;
२०२६&lt;br /&gt;
(प.सं.बाट)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==&#039;उडाउनु&#039; सित एकछिन उड्दा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एउटा देशले भूउपग्रह उडाएकै दिन मेरो घरमा बिरालाले दूधउडाइदिएछ । सन्जोग पनि कहिलेकाहीँ कस्तो पर्छ भने एउटा बिनसित्तिकोकराले पनि एकछिन सित्तैँ अलमल्याइदिन्छ । न त्यो देश र बिरालामा कुनैसम्बन्ध छ, न भउपग्रह र दुधमा समानता । तर क्रियाचाहिँ दुइटैले एउटैगरे- उडाइदिए । भूउपग्रह उडाउन कैयौँको साधन र साधना लाग्यो, तरबिरालालाई द्ध उडाउन त साधनको नाममा एउटा चम्चा चाहियोसाधनाको नाममा केही चालचल । तर यी दुवै कामलाई उडाउनु नै भनिन्छभने उडाउने क्रियालाई महत्त्वपूर्ण भन्ने कि मामुली ? यो पनि एउटा प्रश्नहो । तर कस्तो केटाकेटी प्रश्न : यो ल एउटा भाषाको चमत्कार मात्र हो ।हाम्रो देशमा एउटा मान्छेका दसोटा सिद्धान्त भएकै हाम्रो भाषामा एक&lt;br /&gt;
“ज्डाउनु&#039; लित एकछिन उड्दा - १२७&lt;br /&gt;
शब्दका अनेक अर्थ हुन्छन्‌ । उदाहरणको लागि आफ्नो लभ परेको दिन आफ्नोनजिकको नातादारको जुठो परेको हुन्छ । जीवनको असङ्घति भनेको यही नयै ? त्यसैले बिरालाको दूधउडान र त्यस देशको भूउपग्रहको उडानमा पक्कपर्नुसट्वा अर्को कुनै महत्त्वपूर्ण समस्यामा विचार गर्नु राम्रो । मन अर्कोविचारणीय समस्या खोज्न थाल्छ, तर मगजको तन्तु हल्लाउँदै एउटालेप्वाक्क सुनाउन आउँछ- “रामबहादुरले त सीतादेवीलाई उडाएछ नि बुझिस्‌ !&#039;रामबहादरले सीतादेवीलाई क्यारेभलमा राखेर ब्याङ्ककतिर उडाएको हो किपछ्यौरामा तानेर भण्डारकोठातिर कुदाएको हो- त्यो दुबिधामा अलमलिँदैनअलमलिई म साथीसित सोध्छु- “उडाएछ ? कसरी थाहा पाइस्‌ :” कथप्छ- “अहिले त्यहीँ रेस्टुराँमा सबै ठिटाहरू रामबहादुरलाई उडाउँदै थिए ।&amp;quot;अब भएन के : एकै दिनमा सुन्नुघरेका यी चार उडानका समाचारहरूबाटबुझेको सानो क्षितिजमा कौतूहलको चारचोसे विमान फन्का मारीमारीउड्न थाल्छ-&lt;br /&gt;
अन्तरिक्ष जान संलग्न देशले भूउपग्रह उडायो ।&lt;br /&gt;
बिरालाले दूध उडायो ।&lt;br /&gt;
रामबहादुरले सीतादेवीलाई उडायो ।&lt;br /&gt;
ठिटाहरूले रामबहादुरलाई उडाए ।&lt;br /&gt;
उडाउनुको यसै फन्कोमा कान्छाले बेलुन उडाएको, ठाइँलाले चङ्गाउडाएको, काइँलाले गाँजा उडाएको, साहिँलाले परेवा उडाएको, माहिलालेतहबिल उडाएको, जेठाले सर्वस्व उडाएको सम्झना पनि फन्कामाथि फन्काथप्तै उड्न थाल्छन्‌ । अनि म फेरि छक्क पर्छु- कति बिचित्र क्रियाछयोउडाउनु &#039;&lt;br /&gt;
तर छक्क पर्ने क्रा पो के रह्यो र : प्रकृतिले पक्षपात गरेर मान्छेलाईपखेटा दिएन । त्यसै झोकमा होला, उसले उड्नु र उडाउनुका अनेकौँक्रियाहरू सिक्न थाल्यो । उड्नुमा भन्दा उडाउनुमा आफ्नो पुरुषार्थ व्यक्त हुनेदेख्न थाल्यो । अझ भनूँ भने प्रकृतिले त उडाउनलाई प्वाँख र पखेटा नभईनहने गराएथ्यो, तर मान्छेले मान्छेलाई बिनापखेटा हावामा पनि उडाइदिनलाग्यो, हाहामा पनि उडाइदिन लाग्यो । त्यसैले एपोलो र सौयुजका उडानसफल भएकै ताका आफ्नो घ्याम्पोउडान असफल भएर मध्यटौँडखेलमाअरिनकाण्ड परे तापनि नेपालीहरूसमेत उडाउने काममा पछि परेका छैनन्‌ ।भनूँ भने उडाउने क्रियामा नेपालीहरू अरू दुई पाइला अगाडि नै छन्‌ भन्ने&lt;br /&gt;
१२ ” थैरव अयलिका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
मेरो धारणा छ; किनभने प्रकृति प्वाँख र पखेटा खोजिरहोस्‌, विज्ञान अक्सिजनर नाइट्रोजन जोडिरहोस्‌, हामी कुरैक्रामा कैयौँ कुरा भुर्र उडाइदिन्छौं । हाम्रोभाषा स्वयं कति वैज्ञानिक छ भने उडाउने क्रियामै उसले सयौँ प्वांख रपखेटाहरू जोडिराखेको छ, त्यसैले कसैले चाहेमा यहाँ पच्चीस पैसामाजुँगादाह्री उडाउन सक्छ, सोह्रठाडीमा घरबारी उडाउन सक्छ; अलिकतिभेटीघाटीले एउटा गजबको ठेकदारी उडाउन सक्छ; एक-दुई जनाले धर्मछाडे एक-दुई हजारको धर्मभकारी उडाउन सकिन्छ । उडाउनुलाई यतिव्यापक र बहुउद्देश्यीय गराई आफ्ना &#039; कैयौँ क्रियाप्रतिक्रियासित सम्बद्ध राख्ननेपालीहरूले कम श्रम र समय खर्चेका छैनन्‌ । त्यसैले एउटा कागतकोघ्याम्पो उडाउन असफल हुँदैमा हामीले आफूलाई उडाउन नजान्ने भनीआत्मग्लानि लिनु पर्दैन । हावामा उडाउने प्रतियोगिता अमेरिका र रूसले गर्दैरह्न्‌, हाहामा उडाउने विज्ञानको लागि विश्वले नेपालबाट धेरै कुरा सिक्नबाँकी नै छ। मउडाउने काम गर्न वैज्ञानिकहरूलाई विमान र वेधशाला नभई हुँदैन,तर हाम्रा क्रषिमुनि मन्त्रैमन्त्रले पहाड उडाइदिन्थे रे, हाम्रा गुभाजूहरू तन्त्रमन्त्रलेहाड उडाइदिन्थे रे । त्यसैले मान्छे जाबालाई उडाउन विमान र बेधशालाकोके खाँचो ? आजको युगमा मन्त्रतन्त्रको खोजीनिती झन्‌ कल्ले गरिरहोस्‌ ?हो, कसैलाई मेचैसमेत उडाइदिनु छ भने यसो चुक्लीसुक्ली लगाइदिए भइहाल्यो,होइन; सामान्यलाई सामान्दै किसिमबाट उडाउनचाहिँ त दुई चुच्चाको एकजमघट भए जत्ति भने पनि पुग्छ । त्यसैले धारामा होस्‌ वा चौतारामा होस्‌;सडकको पेटीमा होस्‌ कि रेस्टुराँको कुर्सीमा होस्‌, हामी चुच्चैचुच्चा मिलाएरएउटा बिचित्र बेधशाला बनाउन सक्छौँ र धमाधम मान्छे उडाउन सक्छौँ ।उडाइने मान्छे भोजपुरमा होस्‌ कि भक्तपुरमा होस्‌, भोज खान लागेकोहोस्‌ कि भोकै मर्न आँटेको होस्‌, उसको उपस्थितिबिना नै उसलाई भुर्रउडाइदिन सक्नु हाम्रो उडानको अद्वितीय विशेषता हो । अर्को विशेषता के छभने जुन बेला तपाईं अर्कालाई उडाइरहनुभएको हुन्छ, त्यसै बेला तपाईंलाईअर्कोले उडाइरहेको हुन्छ । त्यसैले यो उडानमा जति आनन्द आउँछ, उडाउनेलेनै पाउँछ, उड्ने बिचराले कहाँकहाँ कसकसले कसरीकसरी आफूलाई उडाउँदैछन्‌ भन्ने कुराको सुइँको पाउँदैन । उडाउने कलामा अशिक्षित र गाउँलेहरूभन्दासभ्य र शिक्षितहरूले बढी सफलता पाउनु स्वाभाविकै हो, किनभने आजकोशिक्षा र सभ्यता नै गराइदिनुमा भन्दा उडाउनुमा बढी लहसिएको छ । त्यसैले&lt;br /&gt;
&#039;उडाज्नु&amp;quot; लित एकछिन उड्दा “ १२९&lt;br /&gt;
तपाईं मलाई उडाउनुहुन्छ, म तपाईंलाई उडाउँछु । हामी दुबै जनाको भेटभए फलानालाई उडाउँछौँ । उड्नु र उडाउनुको यस अभियानमा घरकोतरकारी समस्यादेखि अफिसको सरकारी फाइलसम्म न केहीको पीर, नकसैको परवाह ! अरूलाई उडाउँदा पाइने एउटा गुलियो रसमा रसना रसाउँदैएकैछिन हल्ल हाँस्न पाइन्छ; आफ्नो अहंमा एक थप्की लगाउँदै बाँच्नुको मजाचाख्न पाइन्छ ।&lt;br /&gt;
यो त भयो अनुपस्थितिमा उडाउने कुरा । कोही मान्छे अघिल्तिरैउपस्थित छ र उसलाई उडाउनु छ भने थाल्नोस्‌ तपाईं उसको तारिफ गर्न ।उसको टोपीको टुप्पो सगरमाथाको जस्तो छ कि गौरीशङ्गरको जस्तो छ ?त्यसको बयानबाट सुरु गरी अन्त्यमा भनिदिनुहोस्‌- “चाहेको भए तपाईँउहिल्यै केके भइसक्नुहुन्थ्यो !” यो दिव्य वचन सुन्नासाथ क आफ्नो भित्र-बाहिर हेर्दै नहेरी अहंका पखेटा फटफटाउन थाल्छ र एकैछिनमा भारहीन,भएर स्वयं उड्न थाल्छ- “प्रधानमन्त्रीसम्म पाएको भए सोच्नुहुन्थ्यो, मन्त्रीजाबो को भइरहोस्‌ !&amp;quot; तपाईं थपिदिनुहोस्‌- “यहाँजस्तो योग्य व्यक्तिले मन्त्रीमात्र हुनु त नसुहाउने नै कुरा हो !” अनि क झन्‌ अकासिन्छ र आफूबाहेकसबैलाई लम्फूलम्फू देख्न थाल्छ । तर आफूलाई कति हाइलम्फू ठानेरउडाउँदछन्‌, बिचराले पत्तै पाउँदैन । उडाउने योचाहिँ कलामा उडनेलेआत्मतृप्तिको महँगो मेवा पाउँछ, उडाउनेले मनोरञ्जनको सितनस्वरूप सकेदुई घुट्को जाँडै पाउला नसके एक तुर्को चिया कतै नजा !&lt;br /&gt;
त्यसैले, मर्सिडिज कारले कसैका आँखासम्म धूलो उडाओस्‌ बा शिक्षितबेकारले एक थाल भातबाट दुई थाल भझिँगा उडाओस्‌- उडाउनु भनेकोवास्तवमा उडाउनु नै हो । यी सबै हेरिल्याएको खण्डमा बीसौँ शताब्दीउडाउने युग हो । राकेट उडाउनेदेखि पाकेट उडाउने कलासम्ममा आजजति प्रगति भएको छ, त्यति पहिले कहिल्यै थिएन । हिरोशिमा उडाउनेदेखिलिएर साँधसीमा उडाउनेसम्मका सयौँ उडान पृथिवीमा भएका छन्‌ भनेचन्द्रदेखि मङ्गलसम्मका कैयौँ उडान अन्तरिक्षमा भएका छन्‌ । तर मलाईसोध्नुहुन्छ भनेचाहिँ, आधुनिक उडानको इतिहास हनुमान्देखि सुरु हुन्छ ।हनुमानूले द्रोणाचल उडाए भने उनका वंशज वानरहरूले पशुपतिको पूजासामाउडाउनुमा के आश्चर्य; वानरले देवताको पूजासामा उडाउँछ भने वानरबाटविकसित नरले पृथिवी नै उडाउनुमा के दोष ?&lt;br /&gt;
रमभझमबाट&lt;br /&gt;
१३० ४ भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==चुरोट : केही झिलिमिली संस्मरण==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकातिर बैँसदार मायालुको ओठ, अर्कोतिर गैँडामार एक कित्ता नोट,माझमा एक बट्टा मोटरमार चुरोट- यी तीनै थोक अहिले अगाडि परे भनेपहिले म कुनचाहिँ टिपुँला ? निद्वाविहीन एक रात बाह्र-एक बजेतिर मेरोदेमागमा एउटा प्रश्न गुजुल्टयो । निकैबेर भ्यालको डँडाल्तीमा ट्वालट्वालती&#039;रेर तरङ्गिएपछि एक्लै खिसिक्क ओठ फुस्क्यो- कहाँ पालिसदार हीरा, कहाँफुसिलकीरा ! जाबो दुईपैसे चुरोटको पनि कहीँ बैँसदार ओठ र गैँडामारपोटसँग तुलना हुन सक्छ ? धत्‌, बहुला कहाँको ! मैले आफैँलाई हप्काएँ, तर(प्काउँदाहप्काउँदै मानौँ नाइटैदेखि तुलबुलीको एउटा कस्तो मुस्लो उठ्योपने बसेको ठाउँमा बस्नै नसकी जुरुक्क उठेँ, भननन्न एक पटक कोठामापौँतारिएँ । झुन्डिएजति कोट, पैन्ट, कमिज, बुससर्ट सबका खल्तीखल्ती छामेँ,गउटा टफी कताबाट अडकेको रहेछ क्वाप्प मुखमा हालेर मर्मरी चपाएँ ।पैपनि तुलबुलीको रन्को छुटेन । अनि दराज, तखता, खोपा, मेच, बाकस,म्याल, ढोका सबका अन्तरकुन्तरतिर हात घुसारँ अस्ति नै हरायो भनेकोएउटा काँगियो पाइयो, ककसले खसालेर नभेट्टाएका दुई-तीनओटा दुईपैसे,बारपैसे र पाँचपैसे ढ्याक भेटिए । टेबुल र खाट सारेर मुन्तिरका घुरानहलाएं- एउटा भाँच्चिएको होल्डर, दुई-चारओटा गोरखापत्र, समीक्षा र नयाँ[माजका पत्र, साँचो हराएको एउटा ताल्चा, दुइटा बेजोडा मोजा, एउटा&amp;quot;लो रिबन यस्तैयस्तै अर्थ न बर्थका सत्र थोक फेला परे, तर खोजेको जे होपोचाहिँ हात लागेन । हैरान भएर एक गिलास पानी तन्न पिइदिएँ र तन्द्रङ्गल्टएँ त्यही भताभुङ्ग ओछचानमाथि । प्रश्न फेरि दोहोरियो- हँ, अहिले मलाईचाहिएको त : सुर्केस खोलेँ भने एउटा गैँडामार नोट कसो ननिस्केला, जेए पनि महिनाको पहिलै साताको जागिरदार॒ पो त ! बैँसदार मायालुकै कुरार भने कमसेकम आफ्नी पमनिन्ट त तुरुन्तै एभैलेबुल । यी दुई थोक पाएर&lt;br /&gt;
चरोट : केही क्रिलिमिली संह्मरण १३१&lt;br /&gt;
पनि यो तलबली किन, यो छटपटी किन ? किन भनूँ ः दानापानीको, सेक्सपानीकोअहपानीको प्यासभन्दा बेग्लै (:) त्यस बेला मलाई सताएको थियो अर्कै प्यासले,&lt;br /&gt;
माने- एक सर्को चुरोटको प्यासले । त्यसकारण ओठ न नोट, म घधुइँधुइँती&lt;br /&gt;
खोज्दै थिएँ चुरोटको एउटा ठुटै भए पनि कतै अलमलिएको छ कि भनेर ।&lt;br /&gt;
प्रत्येक वर्षझैँ- त्यो वर्ष पनि वैशाख १ गतेदेखि चुरोट छाड्ने माघ १पातेदेखिकै सङ्कल्प थियो । चुरोट खान छाडनु आवश्यक मात्र होइन, मेरोनिम्ति अनिवार्य पनि थियो । यो अनिवार्यता मैले नबुझेको होइन, बुभ्दाबुभ्दा-बुझ्दा कति बुझिसकेको थिएँ भने प्रत्येक चुरोट सल्काउँदा यही नै अन्तिमहो भनी आफ्नो तालिमी मनले सङ्कल्प पढिसक्थ्यो । तर तलतलै न हो, मेरासङ्कल्प सारालाई तलतलै पुन्याएर आफू तेलझैँ मास्तिर तहरिहाल्थ्यो । अनिपैतै आज एक दिनलाई भैगो, भोलिदेखि खाए के ?&#039; म दृढतासाथ सङ्कल्पदोहोस्याउँथेँ । यसै गरी आज एक दिनबाट यो एक महिना, यो एक महिनाबाटयो बाँकी वर्ष हुँदाहुँदै चुरोट छौड्नलाई नयाँ वर्षको प्रारम्भ पर्खने लुत्रे र झुत्रेतालले कहिल्यै छाडेन । सइल्पशक्तिको यो हीनता जिन्दगीकै क्षीणता हो भनीम नबुभ्ने त होइन, तर बुभदैमा त्यो दह्ढो भइहाल्ने पनि त होइन । चुरोट रक्यान्सरका सम्बन्धमा कति चर्चा सुनिए, पर्चा पढिए, तैपनि चुरोट छोड्नसकिँदैन । आजित भएर २०१९ साल चैत मसान्तको दिन बेलुका मैले आफ्नोलाइटर फोरफार पारी फ्याँकिदिएँ, आस्ट्रै किचकाच पारी मिल्काइदिएँ, बाँकीबचेका दुई-चार खिलीसहित बट्टा च्यातचुत पारी आफल्दिएँ । &amp;quot;ए, लाइटर तनफालौँ” भनी बराबर सलाई नपाएर भोगेका कतिपय सङ्टको- सम्झना उनीदिँदै थिइन्‌, तर मैले भीष्मको आवाजमा सगर्व उडाइदिएँ- “अब पनि मैलेचुरोट खाला भन्ने ठानेको कि?”&lt;br /&gt;
१ गतेदेखि नखाएको ४ गते बेलुका यो दसा ! मलाई आफ्नो कमजोरीदेखिरिस, घृणा, ग्लानि सबथोक उठे, तर सबैभन्दा अग्लो भएर उठ्यो फेरि उहीतलतल । हो, म साँच्चै तलतलाएँ, तर उपाय केही थिएन, गाउँको घरभएकोले पसल नजिक थिएन, आधा रातमा आधा कोस पर कसलाई उठाउनजाने ? बरु काकाकहाँ माग्न पठाकँ- एउटा मसिनो आशा उदायो । तर यतिजाबो क्रामा पनि आफ्नो दृढ प्रतिज्ञा अहिल्यै उनको अगाडि कसरी भन्गगर्ने ? मेरो पौरुष अनकनायो ।&lt;br /&gt;
अम्बलले न पौरुष भन्छ, न प्रेस्टिज ! तत्कालै एउटा घटनाको सम्झनाआयो । एकताका पोखराको एउटा गाउँले स्कूलमा म शिक्षक थिएँ । एक दिन&lt;br /&gt;
१३२ ८ भैँरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
यसै गरी चुरोट खान पाइएन । दिनभर पुग्ला भनियो, बेलुका त ठन्डाराम !भोलिपल्ट तलतलले सबेरै तल ओरालिहाल्यो । आँगनमा आफू बसेको घरकोहली हल्लँदै रहेछ । आफ्नो मास्टरी प्रेस्टिजलाई दाह्वाले सकेसम्म थिचेर त्यहीग्वाङ्ग्रौ खालको हलीसित मैले दीन पुकार गरेँ- &amp;quot;रामेदाइ, तिमीसित एउटाचुरोट छैन :&amp;quot; रामेले अर्साजलो मानेर भन्यो- “चुरोट बनाउँदै छु मास्टरसाहेब !”नभन्दै क बेलौती (अम्बा) का सुकेका पात टिपेर माड्दै रहेछ । म केटाकेटीहरूलाईपसल पठाउने धुनमा थिएँ, रामेले भुसा ल्याएर टक्रघायो । बूढी औँलाजत्रोकलात्मक चिलिममा अम्बाको पात माडेको धूलो हालेर निकालेको धूवाँ- नतमाखु, न कक्कड साँच्चै भुसाहा नै थियो त्यो ! “तानूँ त ?&amp;quot; मैले लजाउँदै सोधेँ ।“यति सात्तो चिलिम उचाल्न सक्नुहुन्न र तान्नै पन्यो, तान्नलाई डोरी पनिचाहिन्छ कि ?” रामे हल्ल हाँस्यो, मैले सुइँसुइँ भुसाहा तानेँ । भयालबाटकेटाकेटीले गिज्याए- “जात फाल्नु गहता&#039; झोलमा !” तर के लाग्छ, म्याकक्याकगरेर पनि तलतलले मूतको न्यानो तापिछाडचो । त्यसरी त लाज पचाइयो भनेउनलाई उठाएर काकाकहाँ चुरोट माग्न पठाउन के गाह्रो ! तर काका पनि तचुरोटपीडित रहेछन्‌ भने ? फेरि अर्को सम्झना आयो ।&lt;br /&gt;
एक दिन केटाकेटीमै काका (बलराम अर्याल) र म पढेर घर फर्कंदैथियौं । तलबी हुँदा त तीन दिन भरी भए तेह्र दिन पन्चट रहने आफ्नो खल्तीकोकुलाङ्गार बानी, त्यस बेला बिलकुल ढाक्रे बिद्यार्थी । एकातिर बाबुबाजेकोअघिल्तिर चुरोट नखाने हामी आदर्श छोरा, अर्कातिर एकान्तमा ठुटा बेरेर भएपनि मुख नधुवाँई नहुने हामी अम्बली मोरा ! अनि पैसा पनि सधैँ कहाँबाटपुगोस्‌, दुवै जना हरिकङ्गाल । टङ्गाल हुँदै कमलपोखरीबाट गौशालातिरको सडकमालुखुरलुखुर हिँड्दै थियौँ । हुन त भोकले पनि कम सताएको थिएन, तर भोकभन्दामापाको थियो उही तलतल ! रातो पुलनिर पुगेपछि तिनताकाका पुड्कापुड्काहाम्रा काकाले मायालाग्दो गरी प्वाक्क भन्नुभयो- “बाटामा राम्रोसित हेर्दै हिँड्‌है, त्यतिका पशुपतिभक्तहरू हिँड्दा यो सडकमा एउटा दुईपैसे ढ्याक कसौनपाइएला !” यो ठट्टा भइदिएको भए वरु त्यति हाँसो उठतैनथ्यो तर कुरो थियोमर्मान्तकै ! अहिले पनि त्यो बाटो हिँड्दा बुक वन र बिगिनसँं ट्रान्स्लेसनकाकिताप च्यापेर बाटामा ढ्थाक पाइन्छ कि भन्दै हिँडेका पैसाविहीन काका-भ्रतिजाका तलतलग्रस्त तुलबुले मुद्रा झलझली सम्झन्छु ।&lt;br /&gt;
चुरोट नपाउँदाका, सलाई नजुट्दाका, बाआमाले थाहा पाउलान्‌ भन्नेडरले लुक्ता-लुकाउँदाका चाखलाग्दा काण्ड कति छन्‌ कति- घरतिर,&lt;br /&gt;
च्रोट : केही क्िलिमिली सत्मरण 233&lt;br /&gt;
छात्रावासतिर, स्कूलकलेजतिर, अडडाअफिसतिर अनि सबैतिर । जतिसुकै प्रेस्टिजर नैतिकता राख्नुपर्ने मान्छे छ भने पनि चुरोटमा उसको केही लाग्दैन ।कहिलेकाहीँ चिन्दै नचिनेका मान्छेसित्त पनि एकोटा अप्ठ्यारो जनाउँदै चुरोटमागिएको छ, चुरोट नभएको बेलामा चिनेको मान्छे भेट भयो भने त &#039;केखोज्छस्‌ काना आँखा&#039; भइहाल्छ । माग्नै किन पच्यो र ! आफ्नो रित्तो खल्तीछामछुम पान्यो, चुरोट खाने मित्र रहेछ भने यसले चुरोट खोज्यो भनीबुझिहाल्छ । यो त मामुली नै भयो, सुटुक्क भनिदिउँ भने कहिलेकाहीं मैलेबाबुको खल्तीबाट चुरोट चोरेको पनि छु, काहलेकाहीं मेरो चुरोट चोरिएकोपनि छ।&lt;br /&gt;
यस्तै कुराहरू सोचेर आत्मग्लानि मेट्तै मैले उनलाई उठाएँ र भनेँ-“म त चुरोट छोड्न नसक्ने भएँ बा ! के गर्ने ?” आफूले गरेको भविष्यवाणीसत्य निस्कँदा उनी गर्वले गजक्क फुलेर नाक नेप्ट्याउन थालिन्‌- “मैलेसक्नुहुन्न भनेकै थिएँ, अब यस बेला के गर्ने तमाखु खाने ?&amp;quot; प्रस्ताव तगजबै हो, तर मध्यरातमा द्वार्रटवार्र हुक्का बजेको सुन्दा ख्याक आयो भनेरभाइबहिनीहरू कतै नभस्कून्‌, त्यो पनि छोडिदिऔँ, बाले सुन्नुभयो भने,&#039;चुरोटसुरोट खाँदैन भनेको छोरो त आधा रातमा हुक्का पो टुर्टुराउँदो रहेछए !&#039; त्यसौ भए पानोसानी मिल्काएर स्वाइँस्वाइँ तान्ने त ! कुरो योचाहिँलम्बरी ! अगेनो तलै भएकोले त्यो अकबरी तलतल मार्न तलै ओर्लिएर तमाखुहालियो । पानी रित्तिएको हुक्कामा नली नहाली स्वाइँस्वाइँ-स्वाइँस्वाइँ एकनासशौषले झैँ तानेर मैले तमाखु सिद्धचाउनै आँटेको थिएँ, आमाले आफ्नै कोठाबाटबोलाइदिनुभयो- “बाबु !” तलैबाट आवाज दिउँ, यस बेला तल किन :&#039;हजुर&#039; अन्नको लागि कोठामा पुगूँ, त्यति छिटो बिरालाचालले कसरी भन्याङउक्लने ? आफूलाई फेरि रिङटा लागेर छुट्टी ! तर छौराबुहारी कसैबाट आवाजनगएकोले उहाँले फेरि दोहोच्याउनुभएन र मात्रै, नत्र प्रतिज्ञा तोडेको अपराधकोफल तुरुन्तै फलेजस्तो हुन्थ्यो आफूलाई ।&lt;br /&gt;
चुरोट त खादैखान्नँ भन्दाभन्दै तमाखु र बिँडी दुई थोक नयाँ अम्मलसमातिए । घरमा तमाखु, बाहिर बिँडी, कति सजिलो &#039;! तैपनि चुरोट नै चाहिँनखाएकोले जे भए पनि गर्वै थियो । तर एक साँझ सिनेमाको मध्यान्तरमारोचकले झसङ्ग पार्दै भने- “ए चुरोट छाडेको होइन के ?&amp;quot; नभन्दै म तमजासित गोल्डफ्लेक उडाउंदै पो रहेछु । रमेश विकलले कन बेला चुरोटदिएछन्‌, आफूले सुइँम्याइएछ, कस्तो मजा बेहोसी !&lt;br /&gt;
१३४ / भैरब अर्यालका हात्यब्यड्रय&lt;br /&gt;
आफू चुरोट नखाने मान्छे, त्यसै पनि हामीले खाएको मन पराउँदैनन्‌,झन्‌ म त छाड्नै पर्ने र छोडिसकेको मान्छे, त्यसैले कति दिन अरूको अगाडिमैले चुरोट, बिँडी केही पनि खाँदै खाइनँ । एक दिन राति म एक जनासाथीकहाँ थिएँ, मलाई आफ्नो कोठा छोडेर उनी अर्कै घरतिर गइसकेपछि मैलेलुसुक्क चुरोट सल्काउन खोजेको, सलाई पाइनँ । ताल्चा नमारेका ठाउँजतिसबैतिर खानतलासी गर्दा पनि एक छेस्को सलाई पाइएन । आखिर कताकताबाटखाटमुनि एउटा थोत्रो हिटर फेला पार्न पुगेँ म । तार तानतुन पारी टुपिनजोडेको मात्र के थिएँ- बिजुली, भ्याप्पै । अब भएन के : चन्द्रावतीले भातखान लागेको जस्तो पो भयो आफूलाई । चुरोट खाने चाँजो मिल्दै मिलेन ।तिनताका मेरो डेरा थियो बाङ्गेमोहडानिर, बाङ्गेमोहडानिर डेरा भए पनि म तमान्छे सोझै थिएँ । भोलिपल्ट बेलुकी नौ-दस बजेतिर अफिसको काम रहोटलको माम सकी कोठामा पस्ता त आस्ट्रे, लाइटरसहित एक बट्टा क्याप्टेनसिरानमा सजिइराखेको ! छक्कै परेर सूचना पढेँ- “हिजो सलाई नपाएरजिल्लिएको बुझिएकोले सबधोक हाजिर छ, भोलि सबेरै एउटा हास्यव्यङ्ग्य-लेख प्रेसमा हाजिर गराउनू !” यो थियो रचनाका लहडकान्त सम्पादकज्यूकोआदेश ।&lt;br /&gt;
हुन त महाकवि देवकोटाको चुरोटखुवाइ सम्झँदा हाम्रो चुरोटखुवाइकै हो र, प्रशस्त खाएको दिन सालाखाला दुई बट्टा खाइएला, त्यसमा पनि मत सिंहमारदेखि बिरालोमारसम्म जे पनि सरासर चल्ने क्लासविहीन भलादमी ।तैपनि बढ्दै थियो- आफ्नो स्थिति हेरी । त्यसैले छोड्नै नसके पनि घटाउनेप्रयत्तमा मैले बट्टाको सट्टा खुद्रा खरिदको नीति लिएँ । तर आफूले नलिँदैमाखान घदछ भन्ने आशा पनि बेकार ! बरु आफूले चुरोट तानिरहेको बखतमान्नुपर्ने मान्छेले &#039;खोइ, एउटा यता पनि&#039; भनिदिए भने उल्टो आफैँले हिन्नेत्याइँअनुभव गर्नुपर्छ । कवि सिद्धिचरणज्यू र रामराजज्यूसित कसोकसो प्राय: यस्तैपरेको छ धेरै पटक । आफूलाई खान छ, अरूले माग्दा छैन, छैन, चुरोट पनिछैन, सलाई पनि छैन साथमा, कहिल्यै पनि । चुरोट छोड्नै सकेको पनि होइनकहिल्यै पनि- कस्तो दरिद्र चाल !&lt;br /&gt;
त्यसैले एक दिन मैले अरू विभिन्न प्रतिज्ञाहरूको साथ “चुरोट खानुरमान्छे पोलेको धूवाँ खानु बराबर&#039; हो भनी किरिया खाएर कागत लेखेँ, सहीगरेँ, हुक्काले अलमल्याउला भनी त्यो पनि फोरिदिएँ र सन्त भएर ती दिनगाबैँमा काटैँ तर पनि कही लागैन । मैले तीन-चार वर्ष मासु छोडेँ, कति दिन&lt;br /&gt;
चुरोट : केही फ्रिलिमिली संस्मरण - १३४&lt;br /&gt;
नुन छाडेँ, कति लामालामा अवधिसम्म आफ्ना अति प्रिय वस्तु र प्रियतमहरूछाडेँ, तर एक साता पनि धूम्रपानलाई बिलकलै छाडन सक्निँ । मेरी यो चुरोटेसमस्यामा सबै साथीको सहानुभूति उब्जन्छ र अफिसमा एकछिन चुपोलागेको देख्ता हाम्रा केदारज्यू सोध्छन्‌- &amp;quot;दाजुको ट्वान्जिस्टरलाई ब्याटीचाहिएको जस्तो छ नि !” हो, निकोटिनको क्यान्सर हुन्छ, तर सेलाएका बखतस्तायविक तारहरू तताउन निकोटिनको निकै आवश्यकता पर्दो रहेछ क्यारेहामीलाई ।&lt;br /&gt;
साँच्ची नै शिथिलतामा सुर्तीले ग्लुकोजको काम दिई फुर्ती निकालिदिन्छभने सुर्तीका क्षणको सबभन्दा ठूलो सङ्गाती पनि सूर्तीको धूवाँसिवाय कही:छैन । यी दुवै कुरा मैले आफ्नो एक महिनाजतिको दिल्लीप्रवासको बखतराम्चैसित अनुभव गरेको छु । त्यहाँ पनि मैले चुरोट छोडेँ, पपाँच मिनेटमाएउटाएउटा ट्याप लगाएको बात नलागोस्‌ नत्र बाबुराम पौड्याल साक्षी छन्‌,मैले प्रत्येक दिन चुरोट छोडेँ, प्रत्येक रात चुरोट छोडेँ । त्यसै बेलादेखिमार्कटिवनको यो भनाइ साह्टै घतलाग्दो गरी म सम्झन्छु- “चुरोट छोड्नुकुनै गाह्रो काम होइन, मैले एक सातामा कैयौं पटक चुरोट छोडिसकेँ(उसैको वाक्य आएन) ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
त, व्यापारीले बातैपिच्छे धरोधर्म भन्नु र मैले सासैपिच्छै चुरोट खान्नभन्नु एकै भयो । तैपनि जमुनाको किनारमा बसेर अर्की सङ्ल्प गरेँ- अबगङ्गाजीको किनारमा उभिएर पानी छुँदै किरिया हालौँला । तर बनारस पुगेपछिभेटनेबित्तिकै चारमिनारका बढ्ठा तेर्स्याउँदै शिव भट्टराईज्यूले भने- “विश्वनाथबाबाको नगरमा सके गाँजाकै चिलिमले स्वागत गर्नुपर्थ्यौ !” म पनि पशुपतिनाथबाबाकै प्रजा हुँ नि ! चारमितारको कहिरीमण्डलमा हाम्रो ठट्टाध्याय सुरुभइहाल्यो । कहाँको चुरोट छोडने ? व्यावहारिकता र सांसारिकतादेखि नैवाक्क भएर घरबार राजीनामा गर्ने त्यागी, महात्यागीले त चुरोट छाडन्‌कोसट्टा गाँजासमेत उडाउन थाल्छन्‌ भने मैले चुरोट किन छाडने ! स्वास्थ्यकोनिम्ति भनुँ भने अब चुरोट छोडेर स्वास्थ्य सुधार्छु भन्नू बूढी बेश्याले आर्यघाटनुहाएर जीबन पचित्र पार्छु भनेजस्तै त हो नि ! यस्ता क्रा सोच्तासोच्तै पनिकाठमाडौं पुगेर चुरोट छाड्ने धोको ठ्याम्मै बिसाएको त थिइनँ । तर शृभसाइतमाचाहिँ कहिल्यै परेको होइन ।&lt;br /&gt;
चुरोट छाड्ने अर्को प्रयास मैले पोहोर रावर्लापण्डीमा पनि गरेँ । त्यसबेला साथी हनुहुन्थ्यो- रूपरेखाका सम्पादक बालमुकुन्ददेव पाण्डे र&lt;br /&gt;
१३६ भैरब अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
मदरल्याण्डका सम्पादक मणीन्द्रज्यू । काठमाडौँ-त्रिशूली सडकजस्तै ।ठीकउस्तै र उत्रै) एउटा पहाडी यात्रामा उहाँहरूले मलाई धेरै सम्झाउनुभयो, तरमैले पो चुरोट छाडनुपर्छ भन्ने करो बिर्सेको कहाँ थिएँ र मोटरैबाट चुरोटकोवट्टा मिल्काएर भनेँ- “लौ त लौ, म चुरोट खान्नँ ।&amp;quot; तर साँझ एउटा पार्टीमाभने उनीहरूको आँखा छलेर पनि चुरोट तानिछाडेँ ।&lt;br /&gt;
म कहिलेकाहीँ त्यसै पनि व्रत वसिदिन्छु । साथीहरू भन्छन्‌- खानापत्ति छाड्न सक्छ कस्तो मान्छे यो ! फेरि जब चुरोट सल्काउन थाल्छु उनीहरूदोहोच्याउँछन्‌- जाबो चुरोट पनि छाड्न सक्तैन कस्तो मान्छे यो ! अब मयस्तै मान्छे ! के गर्ने ? चुरोट त म खान्न भन्दै छु, तर चुरोटले चोरेर भएपनि मलाई खाइहाल्छ । हो, सत्य भन्छु- मलाई चुरोटदेखि डर लाग्छ, घुणालाग्छ तर म आत्मसमर्पित हुँदै आएको छु- यही छुसी चुरोटसँग । यो क्रमकतिसम्म चल्ने हो, म हजुरले कति पटक चुरोट छाड्ने हुँ त्यो त भन्नसक्तिनँ, तर फेरि नयाँ वर्ष लाग्दै छ, म चुरोट छोड्दै छु- योचाहिँ पक्का हो ।&lt;br /&gt;
रूपरेखाबाट&lt;br /&gt;
बुरोट : केही क्षिलिसिली संस्मरण ” 19७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टाउको==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“पृथिवी गोल छ&amp;quot; -म चिच्च्याउँछु ।&lt;br /&gt;
कस्तो गोल गुरु ?” -विद्यार्थीले स्पष्टीकरण माग्छ ।&lt;br /&gt;
“पृथिवी भोगटेजस्तो गोल छ” -म बुझाउँछ ।&lt;br /&gt;
“कस्तो गोल रे गुरु ?” -विद्यार्थी बुझ पचाउँछ । म रिसले तिलमिलाउँछु ।&lt;br /&gt;
मभित्रको गुरुत्व कक्षा चर्काएँर टेबुलमा बजारिन पुग्छ-&lt;br /&gt;
“पृथिवी तेरो टाउकोजस्तो छ !&amp;quot;&lt;br /&gt;
विद्यार्थीको मुखमा बडे बुझो लाग्छ । तर टेबुलमा रन्धनिएको मेरोहात आफ्नै टाउको छाम्न पुग्छ, टोपीको सिउनीले कुन्नि कसको एउटा पङ्क्तिसम्झाइदिन्छ-&lt;br /&gt;
१३६ ” बैरब अर्यालका डास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
“यो टाउको होइन, टोपीको स्टयान्ड पो हो त !”&lt;br /&gt;
नभन्दै यो त टोपीको स्ट्यान्ड हो; हिजो मात्रै किनेको सक्कली ढाकाकोटोपी मैले यही स्टान्डमा राखेको छु । (कसैको निम्ति यो टोपको स्टचान्डहोला, कसैको निम्ति फेटाको, कसैको निम्ति फ्रेसक्यापको स्ट्यान्ड होला,कसैको निम्ति पगरीको । तर मेरो टाउको टोपीको स्टयान्ड हो) । टोपी,सभ्यताको पताका, संरक्षणको गुटिका अनि व्यक्तित्वको झन्डा हो । त्यसैलेयो राख्ने एउटा गतिलो स्टयान्ड चाहिन्छ । मेरो टोपीको स्ट्यान्ड पृधिबीजस्तैगोल छ।&lt;br /&gt;
छाम्दाछाम्दै शड्डा उठ्छ- त्यसो भए मेरो टाउको खोइ त ? साँच्चीटाउको खोइ त ? विद्यार्थीहरू डराएर मेरो मुखाकृतिमा टुलुटुलु हेरिरहन्छन्‌-मानौँ उनीहरूको कृतृहल यही छ- पृथिबी टाउकोजस्तो हुन्छ, तर टाउकोभनेको कस्तो हुन्छ ? म आफैँ अलमलिन्छु- टाउको भनेको कस्तो हुन्छ? मपढेको मास्टर, नपढेको करा जान्दिनँ । नपढेको कुरा बुझ्न गिदी चाहिन्छ,गिदी । गिदी भनेको टाउकाको गुदी हो, लिपि घोटेर लेपेको लेप होइन । तरमसँग गिदी छैन, त्यसैले टाउकाको ग्रर्थ पर छैन । यो अर्थबिनाको अस्तित्व... ।&lt;br /&gt;
हं, न, होइ: टाउका पं किन छैन ; शरीरको माथिबाट ठडिएररहने यसको अर्थ हो; त्यसैले सुत्ता पनि यसलाई तकियाको अग्लो स्टयान्डचाहिन्छ ।&lt;br /&gt;
अर्थात्‌ ठडिएर रहनुमा टाउको सार्थक हुन्छ । तर मजस्तो एउटासाधारण शिक्षकको टाउकाले कहाँ पाउँछ सधैँ ठडिरहन ? नौ सय नमस्तेमानिहरनुपर्छ; हजारौं हस्‌मा लच्कनुपर्छ । बलभद्र र अमरसिंहजस्ता मेरा कैयौँबाजे-बराज्यूले बरु टाउको दिए, तर टाउको निंहराएनन्‌ रे; तर मैरौ टाउकोकति लुलो छ भने भिंगालाई पनि गोडैमा ढोगिदिउँला झैँ गरी निहुरन्छ, मानौँउसको पाखुराखँँचाइ मेरो टाउकालाई चुनौती हो । म टाउको छाम्दाछाम्दैहराउँछु । विद्यार्थीको प्रश्नको घोचो लिएर मलाई कक्षामा तान्छ-&lt;br /&gt;
“भन्नोस्‌ न गुरु, पृथिवी टाउकोजस्तो भए टाउको कस्तो छ ?” मलाईरिस उद्छ- यो पनि कुनै प्रश्न हो : तर आफूले बौल्न नपाउँदै अर्को विद्यार्थीजबाफ दिन्छ- “टाउको फुटबलजस्तै हुन्छ ।” त्यसैले यसलाई बरावर पम्पुदिनुपर्छ । मेरो टाउकामा पहिलो पम्पु मास्टरले दिएका थिए, विद्यालयलेजोख्यो, तौलचिहन लगायो, प्राध्यापकले पम्पु दिए, महाविद्यालयले जोख्यो,तौलचिहन लगायो । पम्पु दिने काम बढ्दै गयो । विश्वविद्यालयले जोख्यो,&lt;br /&gt;
टाउको ट १२९&lt;br /&gt;
बडेमानको फुर्के चिह्न झुन्ड्याई गुडाइदियो चौतणांछ तौल गर्दै सत्र पटकतौलिएको यो मेरो टाउको कति गर्विलो छँ, कति दर्पिलो छ। म आफ्नोटाउकाका तौलको बहाल माग्न अड्डा: पुग्छु, .अदालत पुग्छु, कम्पनी रकर्पोरेसन धाउँछु सेवाआयोग अझ बडेमानको तुलो लिई अघि सर्छ । जोख्ताजोख्तैगाँठिएको टाउको फेरि जोखाउँछु, एउटा अर्को तौलचिह्न थपेर पुन्याइदिन्छस्कूलतिर । अहिले म मास्टर छु । होइन, होइन, म एउटा पम्पु छु, हावा दिँदैछु सयौँसयौँ बलहरूमा, यी सबैका टाउकाको तौल बढाउनु छ, यिनीहरूबाटपनि त्यसै गरी जीवनको रङ्गशालामा आआफ्नै टाउकाको भकुन्डो खेलाउनुछ । एउटाले अर्कोलाई बुङ्ग हिर्काउँछ, अर्काले अर्कालाई । खेल न हो ! कुनैटाउको बुद्रुम्क उफ्रन्छ माथि पुग्छ, कुनै माथिबाट तल झर्छ । टाउकै खेलाडी,टाउकैको खेल, &#039;गोल, गोल&#039; भन्दाभन्दै कति टाउकाको बीचैमा भद्रगोलहुन्छ।&lt;br /&gt;
“तर होइन, टाउको भकुन्डोजस्तो होइन, मलाई त अरिङ्गालको गोलोजस्तोलाग्छ ।&amp;quot; मजस्तै अर्को गुरु बीचैबाट प्वाक्क बोल्छ । म नजिकैको रूखमाअरिङ्गालले लगाएको गोलो सम्झन्छु, आङ जिरिङ्ग हुन्छ ।&lt;br /&gt;
अरिङ्गालहरू भुनभुनाइ&#039;छन&#039; गोलामा, मानौँ त्यहाँ बास नपुगेको ठूलोरन्का छ, बलियाबाङ्गाहरूले धेरैधेरै ठाउँ पहिल्यै ओगटिसकेकाले लुत्रेलाम्रेहरूलाईटाउको घुसार्नसम्म ठाउँ छैन, एउटा &#039;ठाउँ छाडिदे&#039; भन्छ, अर्को &#039;धक्का नलगा&#039;भन्छ, गर्भिणी अरिब्गाल्तीले बच्चा खसाल्ने ठाउँ पाउन्न, कसैले बल्लबल्लपाएको बच्चा कसैले थिचिदिएको छ, मिचिदिएको छ, आमै नि! कस्तोगन्जागोल यो अरिङ्गालको गोलामा । मलाई अघि नै सुझेको भए विद्यार्थीलाईयही भनिदिन्थेँ- पृथिवी अरिङ्गालको गोलाजस्तो छ; अरिङ्गालको गोला हाम्रोटाउकोजस्तो छ । स्मृतिसामु एउटा अरिङ्गाल उड्छ, क सायद आहारा खोज्नपाएको होला आफ्ना बच्चाहरूलाई; ओहो, मेरो सानू बच्चाले आज दूध खायोकि खाएन कुन्नि :ः उसलाई निमोनिया भएको थियो, बल्लबल्ल हिजोदेखिअलिअलि बिसेक भयो । आमाचाहिँ पनि साह्रै मूर्ख छ, विचारै पुस्याउन्न ।अघि उडेको अरिङ्गाल अर्को दलिनमा बस्छ । अर्को एउटा पनि भुनभुनाउँदैत्यहीँ पुगेर बस्छ, मानौं ती भाले-पोथी हुन्‌ । तर एउटा भ्यागुताको बच्चाजस्तो,अर्को माछाको बच्चाजस्तो ! छ्या, जोडा पनि भनेजस्तो नमिल्नु; यो जोडाभित्रकोएक जौर बिजौडा ! त्यसैले पनि अरिन्गाल एउटा समस्या, समस्या एउटाअरिङ्गाल, अब कल्ले भन्न सम्छ- टाउको अरिब्गालको गोला होइन ! पालेले&lt;br /&gt;
१४० .” थैंरव अर्पालका हात्यव्यड्ग्य&lt;br /&gt;
घण्टी लाउँछ- सम्झनाले उठाएका अरिङ्गालहरू गालामा गढ गुजमुजिन्छन्‌,भुराहरू भुरभुराउँदै उठ्छन्‌ । म अफिसको टेबुलमा हाजिर कापी थचाछ,थ्वचक्क बसेर टाउको समाउँछु । प्रधानाध्यापकज्यू भन्नुहुन्छ- मेरो त मुद्दालेटाउको खायो ।&lt;br /&gt;
मेरो टाउको पनि कुटुकटु खान्छ- बिरामी छोराले । टोपी फुकालेरटेबुलमा राख्छु- एउटा प्रश्न राखिएझैं लाग्छ टेबुलमाधि- के अरू सबैअङ्गभन्दा टाउकै कमलो छ ? नत्र चार महिनाको छोराले आमाको स्तन चुस्नछाई? बाबुको टाउको किन खान्छ ? छोराले मात्र होइन, कहिलेकाहीँ प्रेमिकालेपूनि जब आँपजस्ता गाला छाडेर यही ओखरजस्तो टाउको खान थाल्छिन्‌, तबमलाई लाग्छ- भगवातू्‌ले मलाई मुर्कट्टा नै जन्माइदिएको भए हुन्थ्यो । त्यसोगरिदिएको भए जोरीपारीले पनि &#039;तेरो टाउको नफुटाई के छाडौँला&#039; भन्तपाउने थिएनन्‌ । टाउकै बनाउनु थियो त ढुङ्गाको बनाइदिएको भए पनि नकम्नैले खान सक्थ्यो न कसैले फुटाउन । तर मान्छेको टाउको कस्तो कमलोछ भने यसलाई जोगाएर राख्ने फिक्रीले नै कुटुकुटु टाउको खाइरहेको हुन्छ ।तैपनि जोगिन्छ कि भनी म कपाल पाल्छु, टोपी लाउँछ र भन्न खोज्छु-टाउको टोपीको स्टयान्ड होइन, टोपी टाउकाको कभर हो ।&lt;br /&gt;
म टौपी टिपैर टाउको छोप्छु, तर कपाल मात्र छोपिन्छ, टाउकोभित्रकोसिलिङबिलिङ छोौपिँदैन । बरु त्यहाँ एउटा छाल आउँछ, एउटा भुमरी पर्छ,भुमरीमा म फन्न रिङ्छु, देश रिङ्छ, विश्व रिङ्छ मानौँ सिन्दै ब्रह्माण्डअटाए को छ मेरो टाउकोभित्र ! आमै नि ! कति ठूलो हुन्छ मान्छेको टाउको !पुथिबीभन्दा धेरै ठूलो, ब्रहमाण्डभन्दा धेरै ठूलो ! ओहो, यत्रो भयइर टाउकोमैले कसरी बोकेको छु ! मलाई खलखली पसिना आउँछ, टाउको छाम्छ-एउगा सानो जुम्रो छ्यास्स टेबुलमा खस्छ । बह्माण्डभन्दा ठूलो टाउकाकोवासिन्दा यो जुम्रोले मानौं आफ्नो परिचय दिन्छ- म त्यस गोल दुनियाँकोअर्वश्रष्ठ जुम्राजाति हँ । म पनि यस गोल दुनियाँको सर्वश्रेष्ठ मानवजाति हुँ ।दुवैको पृथिवी गोल छ भने जुम्रा र मान्छेमा के फरक छ : जब मेरो टाउकोधेरै फोहोर हुन्छ जुम्राको सृष्टि हुन्छ, जबसम्म म नुहाउन्नँ, उसको स्थितिहन्छ, एकअकाँसित मायापिर्ती बस्छ, लिखा जन्मन्छन्‌ । लिखाबाट जुमा बन्छन्‌,यो रौंबाट क नैँ, यो कुनाबाट क कुना ओह्वोरदोहोर चालरहन्छ । जुम्रामापनि कनै भास्कोडिगामा र कुनै कोलम्बस नौलानौला ठाउंको पत्ता लगाउलान्‌ ।जम्रामा पनि कुनै व्यास, होमरजस्ता कवि होलान्‌ । कोपरनिंकस, न्युटन र&lt;br /&gt;
टाउको १४१&lt;br /&gt;
आइन्स्टाइन निस्केर टाउकाको परिधि र व्यासको लेखाजोखा गर्लान्‌ ।गुरुत्वाकर्षण र सापेश्षतावादको व्याख्या गर्लान्‌ । त्यहाँ पनि कृष्ण, कन्फ्युसियस,क्राइस्ट, बुद्ध र मोहम्मदजस्ता महात्मा जन्मैर जम्राजातिका उद्ारका लागिभरमग्दुर कोसिस गर्लान्‌ । अझ सम्भव क्रा- त्यहाँ पनि गाँसबास र यौन-प्यासको निम्ति युद्ध होला । ढाडी जुम्राहरू चमकनाहरूलाई छिर्नाछनमासताउँदा हुन्‌, तर जव म नुहाउन थाल्छु, सावनको झोलले जुम्रालाकमाहाइड्रोजनको काम गर्छ । महाप्रलय भएर उनीहरूको दुनियाँ उजाङ हुन्छ ।मेरो र जुम्राको संसारमा के फरक छ : मेरो र जुम्राको अस्तित्वमा के फरकछ ? बरु हन सम्छ, पृथिवी कसैको गोल टाउको हो, मान्छे त्यस. टाउकाकाजुम्रा ! जब टाउकोवाला नुहाउन थाल्छ, हाम्रो प्रलय हुन्छ, फोहोरै राखिछाडोस्‌बरु उसले आफ्नो टाउको । म सोच्तै जान्छु- जुम्रा टेबुलमा रगरगाउँछ,कस्तो अनुभव हुँदो हो त्यसलाई टेबुलमा । उसले यहाबाट फेरि फर्कन पायोभने जुम्रालोकमा कस्तो यात्रावत्तान्त सुनाउँदो हो- “बुभ्यौ, हाम्रो संसारभन्दाबाहिर अर्कै संसार रहेछ ।” हो, पक्कै यस्तो व्याख्यात छाँदतो हो । एउटाकुतूहल ल्याउँदो हो । तर मलाई जुम्रादेखि असाध्यै घिन लाग्छ, नमारे पनित्यो धेरैबेर बाँच्न सक्तैन भन्ने थाहा हुँदाहुँदै पनि म मारिदिन्छु । कस्तोनिर्ममता ! हस्याङफस्याड गर्दै घरको नोकर भन्त आउंछ- “सानो नानीलाईसाह्टै भइसक्यो, छिटै पाल्नोस्‌ रे ।&amp;quot; य&lt;br /&gt;
म टोपी मिलाउँदै कृदछ । तर जुम्राको बाबु कुदेर आएन । आएकै भएपनि के लछानँ सक्थ्यो र त्यसले, जसरी केही गर्ने सक्तिनँ म आफ्नो मर्नलागेको छोरो नमान । मृत्युको टाउको देख्न पाए मान्छेले कति टोक्तो हो,कति ठोक्तो हो ! तर अहिलेसम्म कति दार्शीनकहरूको टाउको खायो योमृत्युले । अहिलेसम्म कति वैज्ञानिकहरूको टाउको खाँदै छ यही मृत्यु ।त्यसैले भन्न मन लाग्छ- मृत्युकै टाउकोमा हाम्रो सृष्टि छ । मैरो टाउकोअझ रन्धनाउँछ, तर छोरोको टाउकोमा अब कुनै रन्धन छैन, जुम्रा र हाम्रोगत्युमा फरक यत्ति छ- उसलाई जीवनको मायाले रन्थनाउदैन, मृत्युकाछायाले तसाँउँदैन । कारण उसको र हाम्रो टाउको उस्तै हँदैन ।&lt;br /&gt;
हो, सबै प्राणीभन्दा अनौठो टाउका मान्छेकै हो । भनूँ भने मान्छेकोविशेषता नै टाउको हो र टाउकाको साधथकता नै मान्छे ! त्यसैले कृष्ण एउटाटाउको, क्राइस्ट एउटा टाउको, कन्फ्युसियस एउटा टाउको ! कपल, कणाद,गौतम सब टाउकैटाउका । सुकरात, प्लेटो, एरिस्टोटल टाउकैटाउका । वृद्ध&lt;br /&gt;
१४२ - भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
जनक, अरनिको टाउकैटाउका । आर्किमिडिज, आइन्स्टाइन र ग्यालिलियो-टाउकैटाउका । मलाई भन्न मन लाग्छ- इतिहास टाउकैटाउकाको मालाहो ।&lt;br /&gt;
गधा पिठचूँले बाँच्छ, गाई कल्चौँडाले बाँच्छ भने मान्छेले बाँच्नै माध्यमटाउको पाएको छ, आफूलाई साँच्ने माध्यम टाउको पाएको छ । हो, मेरो पनिपुर्खा थिए, तिनमा कोही टाउकैले बाँच्ये होलान्‌ । तर मलाई थाहा छ- मेराधेरै मामाहरू गर्धनले बाँचे, मेरा कति काकाहरू पाखुराले बाँचे, मेरा कैयौँभाइबहिनीहरू केवल भुँडीले बाँच्छन्‌- त्यसैले मैले टाउकाले बाँच्न पाएकोछैन, जब टाउको उठाउन खोज्छु, भित्रभित्रै मेरो टाउको साटिइसक्छ, यसकोबिचित्रता नै यस्तै छ- आफ्नो टाउको साटिएको आफैँलाई थाहा हुँदैन ।त्यसैले टाउकोबाट बाँच्न खोज्दाखोज्दै म टाउकोबाटै हराउँछु । तर मेरोहिमालय मलाई बराबर सोधिरहन्छ- ए, तैँले आफ्नो टाउको हराएको तछैन ? हत्त न पत्त छाम्छु, टोपी त सिँगुलै छ । तर टाउको कति साटिएको छ,कति छाँटिएको छ, त्यो ठम्याउन सक्तिनँ । अनि मेरो टाउकाभरि हीनताभासभरिन्छ- मेरो टाउको टाउको नभएर टेपरिकर्डर बन्छ । त्यसैले म प्रत्येकदिन स्कूलमा टेपरिकर्डर फुकाउँछ्‌- “सगरमाथाको उचाइ २९००२ फिटछ ।” सगरमाथाको उचाइ... ... ।&lt;br /&gt;
रचनाबाट&lt;br /&gt;
टाउको ” १३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==गलबत्दी ==&lt;br /&gt;
लाटा&#039; देशाँ&#039; गाँडो तन्नेरी भन्ने उखान सुने भने विश्वका समस्तगाँडाहरू धमाधम मानचित्र पल्टाएर धुइँघुइँती खोज्न थाल्दाहन्‌- त्यो लाटाकोदेश कुन महाद्ठीपमा कहाँनेर पर्छ ? त्यस देशको भौगोलिक स्थिति कस्तो छर किन त्यहाँ तन्नेरी हुने अधिकार गाँडाको लागि मात्र सुरक्षित हुन्छलाटाको देशमा जाने भिसा कहाँबाट लिनुपर्ने हो र कुन प्लेन वा ट्रेन समाएरत्यहाँ पुग्न सकिने हो इत्यादि । तर उनीहरूलाई कसले बुझाइदिने ? लाटोभनेको बाटौ न घाटोसित दगुर्ने प्राणी हो, जो इतिहासको -फेदीदेखि थिति नठेगातासित गुँड जमाउँदै आएको छ । हेरिल्याउँदा प्रत्येक देश लाटैलाटाकोनिर्माण हो तर हेरिलैजाँदा जहाँ बसे पनि लाटो स्वयं देशविहीन हुन्छ ।&lt;br /&gt;
१४४ ” भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
क पनि भन्थ्यो- कोलम्बसले अमेरिका पत्ता लगायो भने उसले लाटा&#039;देश ठम्याउन किन सक्तैन ? तर क कोलम्बस होइन, क त हो तुलेगाँडो,तुलामा राखेर जोख्ने हो भने जीउ जति धार्नीको छ, त्यति नै धार्नीको थियोउसको गाँड । त्यसैले उसको नाम पनि तुलेगाँडो, उपाधि पनि तुलेगाँडो ।वास्तवमा क लाटो नै होइन, गाँडो मात्र हो, तर राम्रैराम्राका बीच गाँडो हुनुपनि उपहासको भाँडो हनु हो, त्यसैले पार्नु मर्का पारेको छ उसलाई - त्योगाँडले । अन्तर्वार्ता गर्न जान्छ गाँडले पहिल्यै बहिर्वाता गरिदिन्छ, सभाभित्र पस्तासबैको खिसी आकर्षित गरी सभापति बिर्साइदिन्छ उसकै गाँड । त्यसैले कझर्किन्छ, रुन्छ र रुँदारुँदै हाइय्य गर्छ, एकैछिनमा मन्त्री हुन्छ ।&lt;br /&gt;
त्यो लाटाको देश हो त ? केही थाहा छैन उसलाई, केवल यत्ति थाहा छ,क मन्त्री हो- सबैबाट सम्मानित, सबैबाट प्रशंसित । पण्डितहरू उसको गाँडकोमाहात्म्य गाउँछन्‌- अघिल्लो जन्ममा क सरस्वतीको साह्रै प्यारो भक्त थियो,एक दिन उनले के माग्छस्‌ भनी सोधिन्‌ । ठाडो घाँटी लगाउँदै उसले भन्यो-“मलाई विद्यामृत दिनुहोस्‌ ।&amp;quot; सरस्वतीले तथास्तु भनी वीणाको गट्टाले उसकोघाँटीमा छोइदिइन्‌ । जन्मजन्मान्तर नसिद्धिने गरी समस्त विद्याहरू पोको परेरउसको कण्ठमा झुन्डिए, त्यसैले मन्त्रीज्यूको विद्वत्ता अनुपमेय छ, अपरिमेय छ&lt;br /&gt;
गलबत्दी 2 १४५&lt;br /&gt;
डृत्यादि । उसलाई विश्वास लाग्दैन, तर इतिहास व्याख्या गर्दछ- मन्त्रीज्यू तीगण्डक क्रषिका सन्तान हुनुहुन्छ, जसले तपस्या गरेकोले नदीको नाम नै गण्डकीरहेको थिग्रो, गण्डक गाँडवान्‌ महर्षि थिए, त्यसैले मन्त्रीज्यू पनि आधुनिक जगत्‌काएक महर्षि नै हुनुहुन्छ । अझ उसलाई पत्यार लाग्दैन, तर कवि गाइदिन्छ-&lt;br /&gt;
हे चिशाल रुद्रघण्टीशवर&lt;br /&gt;
यो तिम्रो गाँड होइन, गहना हो&lt;br /&gt;
दु:खसागर तर्ने बहना हो ?&lt;br /&gt;
हो त नि, क ढङ्ग पर्छ, मक्ख पर्छ, नोकर्नीको हात समाएर दिवस्ट गर्छ ।तर अपशोच ! खाटबाट लडेर गाँड ढोकिन्छ, रगत बगाउँदै झल्याँस्स हुन्छ-ऐना हेर्दा आफूलाई तुलेगाँडै पाउँछ ।&lt;br /&gt;
उसको सपना सत्य थिएन, तर यो असत्य कुरो पनि होइन । ठूलो हुनसके गाँडै पनि गहना हुन्छ, कृष्णको चीरहरण लीलामा गनिएफैँ, भियतनामकोनरसंहार शान्तिको निम्ति भनिएझैँ । तर ठूलो कसलाई भन्ने ? घर ठूलो, बैड्ब्यालेन्स ठूलो, दर्जा ठूलो, अधिकार ठूलो, डाँको ठूलो, देश ठूलो, डन्डा ठूलोया झन्डा ठूलो ! उसको केही पनि छैन, छ भने त्यही गाँड छ सबैभन्दा ठूलो !त्यसैले क ठूलाबडामा गनिन सक्तैन, किनभने चुत्थो मान्छेको रुद्रघण्टी नैपनि गाँड भइदिन्छ, दुनियाँमा गाँड गहना हुने त कुरै छैन । तुलेगाँडो हताशहुन्छ, निराश हुन्छ ।&lt;br /&gt;
अनि उसलाई झोक पनि चल्छ- भएभरका लाटागाँडा बटुलेर म नेताकिन नभइदिङँ ? गाँडाको ग्लानि खोरन्डालाई पनि हुन्छ, खोरन्डाले जतिखिसी कानाले पनि पाउँछ । क आफ्ना साथीहरूसित प्रस्ताव राख्छ- एउटासङ्गठन बनाउने, जसको नाम रहनेछ- लाटागाँडा एवं लुलालङ्गडा सम्मानसमिति । तर खल्बाट धूर्त हुन्छ- सभापतिको बाक्लो पगरी उसलाई चाहिन्छ ।तुलेको चित्त बुभ्दैन; किनभने उसमा अरूको जस्तो कमी छैन । हुन पनि गाँडएउटा बढग्रन्थि हो, विशेष अङ्ग हो, जुन जो पायो उहीसित हुँदै हुँदैन । खुट्टैखँड्काले निहुँ खोज्छ, त्यसो भए उसको खुट्टो झन्‌ खम्बाजत्रो छ । मोटो सुँडहुने गणेशलाई सबभन्दा पहिले पुजिन्छ भने उसको खुट्टो सभापति बन्न किनसक्तैन ? कसित थोरै भए पनि गणेशत्व छ तर डुँडेले सभा ब्याकआउट गर्छ ।क सद्दे मान्छे गाँडागर्चाको गोष्ठीमा किन बस्छ ? नभन्दै हो पनि, पन्जाभित्रकोहातलाई कसले डुँडे देख्छ ः सङ्गठन गठन नहुँदै विघटन हुन्छ, तुलेगाँडो जिल्लपरेर गाँड कोतर्छ ।&lt;br /&gt;
१४६ ; थैंरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
हुन त क पनि त्यस्तै ! बाठैबाठासँग बाँच्नुपरेपछि उसले पनि बाठोबन्नै पर्छ । बठ्याइँको दीक्षा लिन छोप्ने विद्या जान्नै पर्छ । हो त नि, यहाँकसले के छोपेको छैन : टेरिलिनको सूटले दाउरिएको आङ छोपिन्छ, एक बट्टापाउडरले चाउरिएको छाला छोपिन्छ, डिगीको साइनबोर्डले दिमागको गोबरछोपिन्छ, मानको पगरीले बेइमानीको घ्याम्पो छोपिन्छ, मैत्रीको जालले ब्वाँसाकोराल छोपिन्छ । हो, हो- गाँडाको गम कम होइन- गलबन्दीले गाँड छोप्नसकेमा तन्नेरी हुन अरू केही चाहिँदैन । तुलेगाँडो डिसिक्क हाँस्छ ।&lt;br /&gt;
गाँड उसको कत्रो समस्या ? तर समस्याको समाधान कति सजिलो छएउटा गलबन्दी गुतिदिनु । अनि कसले भन्न सक्छ रङ्गीचङ्ठी गलबन्दीभित्रजाँडको पुन्गोजस्तो एउटा कुहिएको गाँड पनि छ । कसैले भनिहाले पनि जबाफदिनुपर्छ भित्रभित्र खोतल्ने हो भने ककसको केके छन्‌, केके छन्‌ ? क श्री &#039;क&#039;लाई सम्झन्छ- जसले एक हजार घर लुटेको थियो, सयौँ घरमा पोइलाईबाँधेर स्वास्नीको सतीत्व लुटेको थियो, रामनामीको गलबन्दीले क कतिसजिलैसित आफ्नो अपराधको गाँड छोप्छ, महामहोपाध्याय बनी नैतिकताकोव्याख्या गर्छ ।&lt;br /&gt;
श्री &#039;ख&#039; लाई सम्झन्छ, श्री &#039;ग&#039; लाई सम्झन्छ- मासुको नहोस्‌ सही,पापको गाँड उनीहरूको पनि छ, क देख्छ- जजसको ठूलो गलबन्दी छतिनको गाँड पनि ठूलै हुन्छ, तर क गलबन्दी गुत्दैन ।&lt;br /&gt;
तर उसले नगुतेर के गर्नु ? आजको विश्वमा सबभन्दा बढी खपत छगलबन्दीको । निरस्त्रीकरणको प्रस्ताव एउटा गलबन्दी हो- आणविक गाँडको ।शान्तिवार्ता एउटा गलबन्दी हो- करतुत र क्चक्रका गाँडको । यसरी सोच्तैल्याउँदा क ठम्याउँछ- क मात्रै होइन, उसको समाजै गँडयाहा छ, उसकोयुगै गँडयाहा छ । आफू चुत्थो मान्छे भएकोले साह्रै ठूलाको कल्पना गर्नसक्तैन र मात्रै, नत्र क यो पनि ठान्दो हो- यो विश्व नै ब्रहमाण्ड नभईब्रह्मगाँड होला । पृथिवी त्यस गाँडमाथिको खटिरा, अरू हुन सक्छ- मान्छेचाहिँत्यस खटिराभित्रको कीरा ।&lt;br /&gt;
छ्या: आफू गाँडो हुँदैमा सबैतिर गाँडैगाँड्ड देख्न क चाहँदैन । तरउसले नचाहेर के गर्नु ? गाँड यथार्थ हो, गलबन्दी त त्यसलाई छोप्ने आदर्शमात्रै । त्यसैले यथार्थवादलाई ठूलाबडा मन पराउँदैनन्‌, किनभने यसबाटसमाजको गाँड देखिन्छ- जो सभ्यताको विरुद्ध कर्म हो । हो, त्यसैले ततन्नेरीलाई गाँड देखाउन लाज लाग्छ, अनि गलबन्दीमै रमिता देख्छ, बूढालाई&lt;br /&gt;
गलबन्दी ” १४७&lt;br /&gt;
गाँड कोट्टयाउनु अपराध लाग्छ- अनि गलबन्दीकै कविता लेख्छ, तुलेगाँडोचिन्तक बन्छ, क पुराण पल्टाउँछ, इतिहास पल्टाउँछ ।&lt;br /&gt;
रामको पनि गाँड थियो । क आफू नर भएर वानर बदुल्छ, आफू भुँडीबोकाउँछ, स्बास्तीलाई बात लगाउँछ । एउटाको रिसमा हजारौँको घरबारजलाउँछ, सबलाई आदर्शको शिक्षा दिन्छ- तर मनमनै उसको गाँड पाक्छ-पश्चात्तापको पीप बगाएर, अनि सरयूमा हामफाल्छ, मर्छ । तर वाल्मीकिगलबन्दी गुताइदिन्छन्‌ उसलाई । क पूजनीय लाग्छ हामीलाई । चन्द्रशमशेरलाईलोभ लाग्छ, त्यस्तै गलबन्दीको अनि सेढाई बुन्न थाल्छ चन्द्र-मयूख । तरजङ्गबहादुर साह्टै बाठो मान्छे हो, आफ्नो गाँड छोप्न । क कृष्णका आदर्शकोगलबन्दी गुत्छ । नाङ्गी तरुनी उसको आराध्य, परचक्री तरुनी उसका साध्य ।लाटा गौपहरूका देशको कृष्ण एउटा गाँडो तन्नेरी, त्यसैले हत्क उसकाचुद्कीको काम, सर्बसंहार उसको दर्शनको अन्तिम धाम । तुलेगाँडो युगजोर्छ- महाभारतको हिटलर कृष्ण, कुरुक्षेत्र उसको ग्यासच्याम्बर, जहाँआइकम्यानको पूर्णावतार अर्जुन भुट्छ- आफ्ना दाजुभाइहरूलाई, लाखौँलाखौँआइमाईका छोराहरूलाई, पोइहरूलाई ! आखिर गाँड पाक्छ. कृहिन्छ,सलबलाउँछन्‌ पश्चात्तापका कीराहरू । र आत्महत्या गर्छ डा. बाड्ले झै ।मर्दामर्दै व्यासले: ओढाइदिन्छन्‌ स्वर्गरोहणको सुकिलो गलबन्दी 1 के गीताएउटा बलियो गलबन्दी होइन कृष्णको ?&lt;br /&gt;
ध्तेरी ! म कस्तो नास्तिक, आफू गाँडो भएँ भन्दैमा आफ्न पूजनीयऐतिहासिक पुरुषहरूलाई उडाउनु अपराध हो, अनास्था हो । के भित्र विष्ठा छभन्दैमा आफ्नै पेटलाई चर्पी मान्ने ? तुलेगाँडो आफैँलाई हप्काउँछ । अत्र ककसैलाई निन्दा गर्दैन । यस लोकमा त गाँडो भइयो भइयो, परलोकमा उसकोगाँड हुने छैन, क सुन्दर र सलसलाउँदौ हुनेछ किनभने उसले कसैका हत्यागरेको. छैन, उसले कसैलाई दु:ख दिएको छैन, उ स्वगैं जान्छ सरासर ।उसको मन प्रफुल्ल हुन्छ, तकिया सजिलो लाग्छ । सोच्तासोच्तै &amp;quot;० हर्रउड्छ । एकैछिनमा क एउटा ठूलो ढोकामा उभिन पुग्छ । पालेले चर्कोडाँकोमा उसलाई सोध्छ- तिम्रो नाम के ? कहाँबाट आयौ र बाँच्ताकोल्याकत कस्तो थियो इत्यादि । तुलेगाँडो सबै &#039;हुलिया&#039; यथार्थ दिन्छ र भन्छ-मैले जीवनभर धमैधर्म गरेको छ । घोक्रेसुत्ती लाउँदै पाले गर्जन्छ- गह्नाउनेगाँड लिएर धर्मात्मा भन्दै अप्सराको देशमा आउन पाइन्छ ? तुरुन्तै जान्छस्‌भने गैहाल्‌ नत्र सोझै रौरवमा खसालिएलास्‌ मोरा ! क भुतभूताउँछ- स्वर्ग&lt;br /&gt;
१षषद ” भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
गोराहरूको हो, स्वर्ग जोधाहाहरूको हो, यहाँ कत्राकत्रा सेठ, कत्राकत्रा शासक,कत्राकत्रा मन्त्री र कत्राकत्रा विजयीहरू छन्‌, यस्तायस्ता भएको ठाउँमाआउने को रे भने तुलेगाँडो ! क जिल्ल पर्छ । हुत त हो नि ! दक्षिणा लिँदैस्वर्गको पासपोर्ट बाँड्ने पण्डितहरूलाई सम्झन्छ उ, धर्म र पापको तिनलाईके वास्ता ? दस रुपियाँको गोदान डाँकाले गरे पनि स्वर्गकै बास पाउँछ ।उसले आफू हजार दुःख खपेर पनि अरूलाई दुःख नदिएको सित्तैँ भो त : सित्तैँभो त ? क चिच्च्याउँछ । स्त्रास्ती बोलाउँदै उठाइदिन्छे- के सित्तँ भो तपाईंको ?&lt;br /&gt;
उसको यो लोक पनि सित्तै भो, परलोक पनि सित्तैँ भो । यो लोककोहैसियत राम्रो नहुनेको परलोक पनि कुम्भीपाक हुन्छ । हत्या गरेरै भए पनिकमाउनुपर्छ, लुटलाट गरेर पनि जमाउनै पर्छ, करोडपति हुन सके हजारकोपाटी बनाएर अखबारमा दानको विज्ञापन पाइन्छ, ढवाड नठटाई गरेकी धर्मस्वर्गको तथ्याइबिभागले कहाँ सुन्न सक्छ ! त्यसैले त व्यापारीहरू बहुतैचतुरा हुन्छन्‌, धरोधर्मको गलबन्दी गुतेर मन लागेको भाउ गर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
धत्तेरि, फेरि म नास्तिक भएँ । तुलेगाँडो पछुताउँछ । हो, दुनियाँमाकसैको पनि गाँड छैन, उसको मात्रै छ, क मात्रै अभागी छ, क मात्रै हतभागीछ । त्यसैले क गाँड चिर्न अस्पताल पुग्छ । रातो &#039;झोल प्याउँदै नर्स गिज्याउँछे-गाँडको ओखती निल्न गाद्दो पर्छ, एउटा राम्रो मफलर गृत्ने गर्नोस्‌ न,देखिँदैदेखिँदैन नि ! उसलाई &#039;फोक चल्छ, क लुकाएर सिप्लिस पाल्ने जातकोमान्छे होइन । त्यसैले गाँड भनेको चिर्नै पर्छ चाहे भित्री होस्‌, चाहे बाहिरी ।तुलेगाँडो एक्लै चिच्च्याउँछ । डाक्टर फकाउँछ- हुँदैन बा हुँदैन ! गाँड चिर्दारुद्रघण्टी चिरिन्छ, मरिन्छ । त्यसैले एउटा पट्टी बाँधिदिन्छ उसलाई, पट्ठीस्वास्तीको आँखा पहिले पट्टीमै पुग्छ । गाँड चिर्न गएको मान्छे गाँडमा साइनबोर्डटाँसेर आउँछ, क पश्मिनाको गलबन्दी टक्रचाउँछे, तर तुलेगाँडो चिच्च्याउँछ-गाँडको समस्या गलबन्दीले समाधात हुँदैन ! क गलबन्दी फ्याँकिदिन्छ, गाँडहल्लाउँदै बजार घुम्छ ।&lt;br /&gt;
क गाँडो मात्रै होइन, लाटो पनि हो, लाटो मात्रै होइन, अब बौलाहापनि भो- सर्वत्र यही चर्चा चल्छ, के क पक्कै बहुलायो : क आफैँलाई शाड्डालाग्छ, घरमा पुगी ऐना हेर्छ- गँडचाहा र बौलाहाको समन्चय झन्‌ नरमाइलोप्रतीत हुन्छ । ऐनाको गाँडले प्रश्न गर्छ- के गाँडको समस्या गलबन्दीलेसमाधान हुन्छ : क गलबन्दी ओढ्दै जबाफ दिन्छ- विज्ञानले चिर्ने चक्कुभन्दछोप्तै गलबन्दी धेरै बनाएको छ ।&lt;br /&gt;
गलबन्दी “ १४९&lt;br /&gt;
गलबन्दीबाट तुलेगाँडाको दृष्टिमा अब मानचित्रभरि लाटैलाटाका देशदेखिन्छन्‌, क कोलम्बसभन्दा पनि ठूलो कोलम्बस हन्छ, कतैको प्रधानपञ्चहुन्छ त कतैको प्रधानमन्त्री । हुँदाहुँदै भूगोललाई भकन्डाझैँ बुङ्ग हानिदिनखोज्छ जक, तर झजस्ता गाँडा अरू पनि त छन्‌ नि ! भकुन्डो राम्रैसित सुरुहुन्छ । लाटाहरूको सातोपुत्लो जान्छ, रेफ्री हुने मान्छे नै छैन । त्यसैलेउनीहरू पूर्व फर्केर चिच्च्याउँछन्‌- यो विश्वमा जान्नेसुन्ने को छ हँ ?जबाफ आउँछ- तुलेगाँडो र म ।&lt;br /&gt;
रचनाबाट&lt;br /&gt;
१४० ४ भैरव अर्यालका हात्यव्पङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आलु==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आलुको नामकरण कसले कसरी गरेको हो, त्यो भाषाशास्त्रीहरू नैजान्लान्‌, तर मलाई लाग्छ- पहिलेपहिले खेतका आलीतिर उम्रेर फलेकोभेट्टिएकोले यसको नाम आलु रहेको होला । तर मेरै विचार सबैले मान्नुपर्छभन्ने केही छैन, तपाईँ पनि आफ्नो तर्क तान्न सक्नुहुन्छ- कोही आले थरकोमान्छेले पहिलो पटक पत्ता लगाएको वा खाएको हुनाले यसको नाम आलुरहेको हो कि : भन्छन्‌- आलु पहिले कसैले खाँदैनथ्यो, तर अनिकाल परेकोबखत उसिन्ने क्रा केही नपाएर सायद कुनै बूढाले आफ्नो बूढीलाई भन्योहोला- “आ, लेन त्यही गाँठा उसिनेर खाङँ ।&amp;quot; यसरी &#039;आ लेन&#039; भनेकोले&lt;br /&gt;
आलु १११&lt;br /&gt;
यसको नामै आले रहेको र खांदा साह्रै मीठो भएकोले आलेलाई प्रेमपूर्वकपुकारी &#039;आलु” भनेको पनि हुन सक्छ ।&lt;br /&gt;
मान्छे भन्छन्‌- गोलभिँडा आलुको ठिमाहा छोरो हो, तर बोट उस्तै भएपनि एउटाको जन्म जराबाट, अर्काको जन्म हाँगाबाट हुने हुँदा यो तर्क खालिपहिलेपहिले गोलभिँडा खान पल्केका बाजेहरूले छाँटेको गफ मात्रै हो जस्तोमलाई &#039; लाग्छ । बरु, साँच्चै आलुको नातागोता नखोजी नछाड्ने हो भनेपिँडालुसित सोध्नुपर्छ । पिँडालु आलुको बाबु हो, त्यो किद्न सकिन्न तापनिआलु र पिँडालुमा रगतको नातो छ भन्ने कुरा दुवैको मिल्दोजुल्दो नामलेबताउँछ । एक शब्दमा दुबैको जात कन्दमूल र पेसा तरकारी-कारबार हो ।उपव्यवसायमा पिँडालु कहिलेकाहीँ मस्यौरा-उद्योगमा सहयोग दिन्छ र&#039;यदाकदाघेवारेको तौल पुगेन भने भरथेग पनि गर्छ । यसबाहेक पिँडालुको त्यति प्रसिद्धिछैन, जति आलुको ।&lt;br /&gt;
पोलिएर, उसिनिएर, पाकेर, साँधिएर, तारिएर, चप, पकौडी, कट्लेटआदि बिभिन्न परिकारमा परिणत भएर जुन बेला जस्तो चाहियो उस्तै बन्नसक्ने आलुको व्यक्तित्व साँच्चै नेपाली बुद्धिजीवीको जस्तै बहुमुखी छ । अर्थात्‌जसरी यहाँ एउटै व्यक्ति शिक्षक, दीक्षक, लेखक, सेवक, पत्रकार, अलपत्रकार,नेता, अभिनेता, जुन मौकामा जेको महत्त्व देखिन्छ, त्यसैमा फिट भइदिन्छ,त्यसै गरी आलु पनि जुन बेला जे चाहियो त्यसैमा फिट । ढिँड्डोलाई सितनचाहियो आलु फिट, जाँडलाई सितन चाहियो आल नै फिट । ज्वाइँलाईझटपट खाजा ख्वाउनुप्यो आलुको कबाफ, पाहुना धैरै लागे भने एक पाउआलुमा एक पाथी पानी राखी छडकाइदिनोस्‌ आलुदम काइदासाथ ।&lt;br /&gt;
त्यसैले आलु साह्रै जनप्रिय छ । बिच्रार गर्दा आलु पिँडालुभन्दा निकैबाठोटाठौ र अपटुडेट लाग्छ, त्यसैले यसलाई बूढो भन्न मेरो आलुप्रिय जिभ्रोलेकदापि सक्तैन । वरु बूढो बाबुचाहिँ पिँडालु नै होला, किनभने यसका मुखभरिरौं र कत्ला देखिन्छन्‌ । तर आलुको अनुहार सधैँ सुकुमार, मानौँ उठनेबित्तिकैअपट्डेट सैलुन पुगेर आएको युवकजस्तो । दाह्टीजुँगा नेभएका भन्दा तपाईंहरूशङ्का गर्नुहोला- के आल्‌ स्त्रीजाति त होइन : कुन्नि बा गौरलाभँडालाईआलुको ठिमाहा छोरो भनेको कारण आलुले पिँडालुसित लभ गर्दागर्दै पाएकोलेपो हो कि? जे होस्‌, को कसरी जन्मेको हो र कसको जात के होत्यौनालीबेली लगाइरहनुपर्ने जरुरत छैन । मैले त आलुको सामान्य परिचय मात्रदिन खोजेको हुँ, मैले चिनेसम्म आलुको नाम आलु, आलुको थर आलु, आलुको&lt;br /&gt;
१४२ “ भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
बाबु-बाजे-बराज्यू आलु, आलुको छोरा-नाति-पनाति आलु, आलुको मामा-भातिज-साला-जेठान आल, आलुको लोग्ने-स्वास्नी, प्रमी-प्रेमिका, जार-नाठोसप्पै आलु ।&lt;br /&gt;
आलु कस्तो मिलनसार छ भने गान्टोमा स्वयं गान्टेमूलादेखि लिएरअग्लोमा लौकासम्म, चच्चेमा स्वयं चुच्चेकरेलादेखि लिएर बुच्चेमा परवरसम्म,खाँदिएकोमा गृुन्द्रकदेखि लिएर बांधिएकोमा करिलोसम्म, जेसँग जसरीमिलाइदिनुहोस्‌ आलु ठ्याम्मै मिलिहाल्छ । त्यसैले धनी, गरिब, मानी, मगन्ते,विद्वान्‌, लम्फू, बृढिमान्‌ लटठू साराका भान्सामा आलुका समान सम्मान छ,समान प्रवेश र प्रतिष्ठा छ । यस अर्थमा आलुलाई समाजवादी, समन्वयवादी,साम्यवादी तपाईं जे नाम दिनुहोस्‌, वस्तुतः आलुको मूल सिद्धान्त आलुवाद नैहो । जतिसुकै समानताको आदभश राखे पनि आफूआफूमा मेल नगर्नु आलुवादकोविशेषता हो । आल्‌ वर्णले रातो र सेतो हुन्छ, सायद आफ्रिकाका फाँटतिरकाला आलु पनि होलान्‌ । तर अहिलेसम्मको अध्ययनमा सेतो आलु नै ठाल्‌मानिन्छ । त्यसैले सेतो र रातो आलुको भाउमा मसिन्‌ र उसिनुको जत्तिकैफरक पर्दछ भने सेतो र कालोमा चाहिँ मार्सी र कोदोजत्तिकँ । त्यस्तैफलाइका, तन्त्राइका, क्टाइका, प शन भेदले पनि आलुलाई विभिन्न वर्गमाबाँड्न सकिन्छ, जसको बर्णन गरेर यहां साध्य छैन ।&lt;br /&gt;
कसैलाई ढाक्रेबाट सोझै भन्सारअडडाको हाकिम हने काकताली पच्योर यता बहाली गरेको भोलिपल्टै उता जेठी सासूको अपृताली पनि पन्यो मर्नेहामी भन्छौं- फलानाको तालमा त आलु फलेछ । यसरी फल्ने आलुलाई नमल चाहिन्छ, न जल, न माटो चाहिन्छ, न स्थल । कसैको रौँ पनि उम्नननसकेर वाँफो पल्टिरहेको तालमा पनि रोप्न्‌ न गोडनुसित आलु फलिदिन्छ ।यसरी तालुमा आलु फलेपाछि मगजमा पिँडाल्‌ भरिएका र मुट्मा नालुबेरिएका भलादमी पान ठाल्‌ हन्छन्‌ । जसको तालमै आल फल्छ, उसलाइतरकारी-समस्याले त कं पिथ्याँ र, सरकारी नियमकानुनल पनि केही लछानसक्तैन । त्यसैले आलु परम भाग्यको प्रतीक हो, जो तालमा फलाउन सक्योभने आफ्नो जीवन मात्र होइन, सालीपट्टिका सात पुस्ता र भिताजपट्टिका नौपुस्तासम्म सङ्टमुक्त हुन्छन ।&lt;br /&gt;
तर एकातिर परम सौभाग्यको प्रतीक गनिने हाम्रो महामान्य आलुअर्कोतिर दभाँग्यको गाली पनि भर्डादन्छ । हिँडदाहिडदै कसैले तपाइँलाई “एफलानाले त आलु खाएछ नि थाहा पाइस्‌ ?&amp;quot; भनी सनाया भने कहिले, कहाँ,&lt;br /&gt;
आल : १४३&lt;br /&gt;
कसरी र कति प्लेट आलु खाएछ भनी बुभनुभन्दा पहिल्यै &#039;हरे शिव&#039; भनीअपसोच प्रकट गर्नुहुन्छ । दनियाँमा कोको केके खान्छन्‌ कके ? कोही माडखान्छन्‌ त कोही जाँड खान्छन्‌, कोही जुस खान्छन्‌ त कोही घूस खान्छन्‌,क्रोही ताली खान्छन्‌ त कोही अपुताली खान्छन्‌ । यी सबै खाएको सुन्दातपाईंलाई कुनै अपसोच लाग्दैन ।पाए आफैं उडाउनुहोला बरु) तर कसैलेआलु खाएको सुन्नासाथ मुख बिगारेर च्चः च्च: भन्ने किन ? किनभने यहाँसबै थोक खाए पनि आलु खान हुन्न, फलानाले आलु खायो भन्नुको मतलबउसले परीक्षामा पुल्टुङबाजी खाएछ या आलु भनी आफ्नै जिभ्रो टोकेरपरमधामको बाटो तताएछ भन्ने बुझिन्छ । अब तपाईं नै भन्नोस्‌, जुन आलुतालुमा फल्दा मान्छे ऐश्वर्यशाली भनिन्थ्यो, यही आलु खाएछ भन्दा गुल्टिएछभन्ने बुझिन्छ भने आलु आफैँ सौभाग्यको वस्तु हो कि दुर्भाग्यको ? आलुवादीदर्शनमा यो महत्त्वपूर्ण प्रश्न हो ।&lt;br /&gt;
जिम्रो मिठ्याउन होस्‌ वा भुँडी उक्स्याउन, आलु सबै खान्छन्‌ । तरकसैलाई आलु खान लागेकै बखत “तपाईंले आलु खानुभो कि क्या हो ?&amp;quot; भनेरमुस्कुराई सोध्नोस्‌, त्यही आलुको चौटोले तपाईंको तालु ताक्छ । कस्तोबिचित्रता, आलु बाए पनि मा खाएको कुरा सकार्न सक्तैन । सायदयसैले होला &#039;आलु खाएर पेडाको धाक&#039; लगाउने चलन चलेको । उसिनाकोभात हसुरेर मसिनाको भुजा ज्यूनार गरेँ भन्नेदैखि लिएर बम पड्काईशान्तिको अभियान चलाएको भन्नेसम्म दर्जादर्जाका धक्कुबाजहरू संसारमापाइन्छन्‌ । बास्तवमा यी सबै आलु खाएर पेडाको धाक लगाउने हुन्‌, अर्थात्‌कर्मले गरेका नीचतालाई धाकले ढाक्नु आलुवादको धार्मिक पक्ष हो, जो बीसौँशताब्दीका प्रत्येक व्यक्तिले पालन गर्नै पर्छ ।&lt;br /&gt;
तर आलु त्यति तुच्छ वस्तु कहाँ हो र जसलाई पेडाको तुलनामा यत्रोइन्सल्ट गरिएको छ । भनूँ भने कति हलुवाई दाजुलाई पेडा बनाउन महृत गर्दोहो- यही आलुले । मान्छेलाई बैगुनी भन्नुपर्ने कारपै यही हो, क गुणकोपारख गर्नुको साटो बेइज्जती गर्छ- कसैको राम्ररी टाइम नदिने घडी रहेछभने प्वाक्क भनिदिन्छ- यो कस्तो आलुघडी । यसै हो भने भोक, रोग रशोकले सुकेर सामर्थ्यहीन भएका आजका लाखौँ मान्छे के साँच्चै आलुमान्छेहोइनन्‌ त ? किन होइनन्‌ ? आलु खाएर पेड्डाको धाक नलगाउने हो भनेवास्तवमा आल नै मान्छै र मान्छे नै आलु हो- त्यसैले कहीँ उसिनिन्छ, कहीँकबाफ लाग्छ ।&lt;br /&gt;
४ « भैँटवब अर्यालका डात्यव्यडय&lt;br /&gt;
तर जेसुकै होस्‌, म सधैँ आलु खान्छु, तर मलाई सधैँ आलु खान डरलाग्छ किनभने म पनि बीसौँ शताव्दीकै आलुमान्छे, जसको कर्म हो आलुखानु; तर धर्म हो आलु खाएर पेडाको धाक लगाउनु ।&lt;br /&gt;
त्यसैले आलुको बारेमा लेखिएकी यो निबन्धलाई कसैले आलु-निबन्धभन्छ भने भनिरहोस्‌, मेरो दृष्टिमा यो पूरापूरा पेडा-तिबन्ध हो ।&lt;br /&gt;
रत्नश्वीबाट&lt;br /&gt;
आलु / ११४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मान्छे मोडेल १९६७==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गृड्डनेमा गज्जादेखि कारसम्म, उडनेमा वेल्‌नदेखि टलिस्टारसम्म,जडनेमा औँठीदेखि हारसम्म, अडनेमा झुपडीदेखि दरवारसम्म, मब्रैकोमोडेल बारम्बार वर्दालन्छ, नर मान्छे नै यस्तो बोत्रो प्रडक्सन हो, जसकोमोडेल जहिले हेरे पनि जस्तातस्तै । उह्दी एउटा कभिन्डोजस्ता टाउकोमाटिंप्लर्कार्टाप्लक टचंका गुलबजस्ता एक जार आँखा, मध्यसडकमा अलपत्रमिकिणको डवल पाइपवाला ढलजस्तो छन्द न बन्दको एउटा नाक, जतिटाले पनि छिनछिनमा हिङ्ग भई फुस्किनै पडकेको ट्युबजस्तो एउटा म्‌ख-&lt;br /&gt;
१४६ - भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
साच्चै मान्छको मोडेल आघ आखट-यगमा जस्तो थियो. हाल रार्कट-युगसम्म उस्तै छ । कमसेकम दुइटा आंखालाई दुईतिरै गालामा टाँसेरसाबिक दुईंप्वाले तेर्सो नाकलाई सिङ्गलप्वाले दुई गोल वनाई हाल आँखारहेको ठाउंमा राखिदिन पाए पनि माडेलमा आलिकति हेरफेर पक्कै आउँथ्यो ।या हात, खुट्टा, आँखा, कान डवलडबल- भएपछि आजको वृद्धिवादी युगमाटाउका पान डवलै जड्दिन पाए मान्छेले डवल बुद्धि निकाल्न सक्थ्यो ।एउटा टाउकाले ज्ञानको काम गर्थ्यो त अर्काले बिज्ञानको । टाउको थप्ननसके भएका दुइटा कानलाई नै एउटालाई टाउकामा अर्कोलाई पैतालामाराखिदिन पाए एकातिरबाट आकाशवाणी सुन्न पाइन्थ्यो भने अर्कोतिरबाटपातालबाणी पनि सुनिँदो हो । अथवा हरेकासत दुईदुइटा आँखा छन्‌ भनेएउटा अगाडि एउटा पछाडि जड्दिएको खण्डमा मोडेलमा चेन्ज आउनु तछँदै छ, देउतास्थानमा दर्शन गर्न जाँदा अघिल्लो आँखा देउतामा चढाउनपनि पाइन्थ्यो, पछिल्लो आँखा कुनै देउतीतिर लडाउन पनि पाइन्थ्यो । तरके गर्नु र : ब्रहमाजी बूढाले जस्तो बनाइदिए त्यसमा कत्ति पनि अदलबदलगर्ने सकिएन । अरूको कुरा किन गरूँ, म आफैँले सात समुद्वपारिका सत्रजना नामुद इन्जिनियर झिकाएर बिलकलै अत्याधुनिक मोडेलको वङ्गलाबनाएँ, न्युयोर्कबाट अल्ट्रा मोडन॑ मोडेलको कार ल्याएँ, हङकङदेखिहलिउडसम्म घुमाएर श्रीमतीलाई अत्याधुनिक फेसन सिकाएँ, तर वैठककोऐनामा उभिएर हेस्यो- आफ्नौ त उही दुई हात, नाक, आँखाका खोपामाटिलपिल-टिलपिल तिनै जिरो बाटका गुलुब । छ्या ! रिसै उठ्छ, कस्तोआउट अफ्‌ डेट्‌ मोडेल ! एक रात साह्रै दिक्क लागेर म ओछ्यानमा पल्टीसोच्तै थिएँ- मान्छेले सयौं पटक आफ्नो इतिहासको मोड बदल्यो, कैयौँपटक आफ्ना आवासहरूको मोडेल बदल्यो । उदाहरण लिन अन्त किनजानुपत्यो र ! ९० सालको भूकम्पले पुराना घर स्वाहा हुँदा यहाँ कति नयाँमोडेलका घर बने, नयाँ बाटा बने, यही क्रममा पुराना अनुहार स्वाहाभएपछि मान्छेले सक्ने भएको भए त्यसपछि जन्मनेको अन्‌ुहारै बेग्लै पार्दैनथ्योत - साच्चै त्यसै हुँदो हो त ९० सालयताका प्रत्येक मान्छे पखेटावाल हुन्थेहोला, किनभने भैँचालो जाँदा भाग्न नभ्याई भक्रान हुनुपरेको अनुभवलेउसलाई पक्कै सुभथ्यो- पखेटा भइदिएको भए भूकम्प हुनासाथ मिलेभ्यालबाट, नामले खटप्बालबाट फुत्त निस्की भुर्र उड्न पाइन्थ्यो । साँच्चैआजका युवक -युवतीहरू सारा पखेटावाल भइदिएको भए हाम्रो मात्रै होइन,&lt;br /&gt;
मान्छे मोडेल 1९६७ १४७&lt;br /&gt;
नेपालकै मोडेल बर्दालइसक्थ्यो । नेपालको मात्र होइन, दुनियाँकै मोडेलब्दलिइसक्थ्यो । तर के गर्नु, बिचारको दृष्टिले दस सेकंन्डमा दस अवतारलिन सक्ने मान्छेले दस हजार वर्ष कोसिस गरे पनि आफ्नो अनुहार बदल्नसक्तैन । ब्रहमाजी बूढालाई कतै भेट्न पाए मेरो पहिलो उजुरी हुन्थ्यौ- &amp;quot;एबाजे, केही त बदलिदिनोस्‌ ।”&lt;br /&gt;
राति निकैबेर ओछ्यानमा पल्टेर तर्कना गर्दागर्दै नभन्दै ब्रहमाजीसितटुप्लुक्क मेरो भेट भइहाल्यो । ढुङ्गो खोज्दा देउता मिलेजस्तो सन्जोग !भियतनाममा बम पड्केको सुनेर &#039;ए मान्छेका छाउराहरूले मेरो सुन्दरसृष्टि भताभुङ्ग पारिदिन आँटेछन्‌&#039; भन्ने पीरले रन्थनाउँदै हिँडेका रहेछन्‌बूढा त । भेट हुनासाथ ढोगभेट गरेर मैले आफ्नो अर्जी गरेँ- “मान्छेकोमोडेल साह्रै आउट्‌ अफ्‌ डेट्‌ भो बाजे, यही असन्तुष्टिले कुण्ठित भएर मान्छेजे पायो उही फलाक्न थालेको छ ! नपत्याए बिटनिकहरूलाई सोध्नोस्‌,कति बिद्रोही भएर निस्केका छन्‌ उनीहरू, सैगोनमा गएर अमेरिकी सिपाहीर भियतकङ गुरिल्लाहरूलाई भेट्नोस्‌, कसरी उम्लेको छ उनीहरूको रगत !यस्तै चाल हो भने बाजे, हाइड्जोजनको एक वृष्टिमा तपाईंको सम्पूर्ण सृष्टिखतम !” ।&lt;br /&gt;
बह्माजीले सुस्केरा हाल्दै भने- “ठीक छ, मान्छेको मोडेल बदलिदिनम तयार छु, तर कस्तो मोडेलमा ढालिदिउँ, लौन त तिमीहरू पनि केहीसुझाव देओ, हामीले युग बदस्यौं भन्छौ, बदलिएका युगको अनुकूल मान्छेकोमोडेलको एउटा इस्टमेट पनि देओ न त मलाई ।” बूढाको क्रा मलाई पनिमनासिबै लाग्यो र नयाँ मोडेल कस्तो हुनुपर्छ भन्ने राय लिन विभिन्न विद्वान्‌,बुद्धिमानहरूलाई निम्ता पठाएर राष्ट्रिय रङ्खशालामा एउटा बृहत्‌ सभा बोलाएँ ।सभापतिको पदमा ब्रह्माजी स्वयं निर्वाचित भए ।&lt;br /&gt;
आजको आर्थिक युगमा मान्छेको मोडेल पनि सकेसम्म छरितो र कमखर्ची हुनुपर्छ भन्दै एक जना अर्थशास्त्रीले आफ्नो राय व्यक्त गरे- “टाउकाकोहुप्पामा एउटा आँखा जडिदिनू, सुन्नको लागि त्यहीँनेर एउटा सानो एरियलराखिदिन्‌, हावा र खावा पास गराउन त्यहीँनेर दुइटा प्वाल खोपिदिनू सिद्धिगो ।यो दमाहाजस्तो पेटको बिलकुलै जरुरत छैन, पाकस्थली राख्न एउटा सानोबेलुत्तजस्तो पेट भए पर्याप्त । आइमाईलाई एकोटा अस्थायी पाठेघर राखिदिनुपर्छजो दुइटा छोराछोरी पाउनासाथ स्वत: सुकेर गइहालोस्‌; त्यसो भए जनसङ्ख्यापनि अटोमेटिक मेथडबाटै कन्ट्रोल हुन्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
१४६ ” धैरव अयालका हास्यव्यडाय&lt;br /&gt;
राजनीतिक दृष्टिले हेर्दा हामीलाई मान्छे घटाउनुभन्दा बढाउनुजरुरी छ भन्दै एक राजनीतिज्ञले भने- “मान्छे बढे नागरिक बढ्छन्‌,नागरिक बढे सैनिक बढ्छन्‌, सैनिक बढे शक्ति बढ्छ अनि विश्वमाशक्तिसन्तुलन हुन्छ । त्यसैले पेट नराखे पनि प्रत्येक महिलामा एक-एकदर्जन पाठेघर राखिदिनुपर्छ ता कि वासिङटनमा एउटी आइमाई सुत्केरीहुँदा सैगोनमा बाद्द जना अमेरिकी सैन्य थपिन सकून्‌ । साथै माछेलाईआँखाजस्तो मुख पनि डबल हुनु जरुरत छ । यसो भएमा परेको बेला एउटामुखले शान्तिवार्ता र अर्को मुखले युद्धवार्ता एकै पटक गर्ने सुविधा विश्वकाराजनीतिक नेताहरूलाई मिल्दछ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
उत्तको भाषणपछि एक जना धर्मशास्त्रीले कडकिएर भने- “पाप गर्नेअङ्गहरू सबै फेरी खालि पुण्य गर्ने अङ्गलाई मात्र नयाँ मोडेलमा स्थानदिनुपर्छ । त्यसैले पहिला यो फोहोर धुने देउरे हातै झिक्नुपर्छ, दिसा-पिसापका यन्त्र उडाइदिनुपर्छ ।” उनी बोल्दै थिए, एक जना डाक्टरले घोरविरोध गरे- “यसरी त शरीरै चल्दैन । मेरो विचारमा सम्पूर्ण रोगहरूकोकारण पेट हो, किनभने यसमा जथाभाबी आहार कोचेर मान्छेले नाना थरीरोग जन्माउँछ- त्यसैले नयाँ मोडेलमा पेट राख्नहुन्न ।” उनीहरू वोल्दाबोल्दैएक जना मनोवैज्ञानिकले कुरा काटे- “सम्पूर्ण दुःखको कारण मानिसकोचिन्ता हो, चिन्ता दिमागबाट उत्पन्न हुन्छ, त्यसैले नयाँ मोडेलमा टाउकैनराखे कसो होला ?” तर बेदान्ती महोदयलाई यो पटक्कै मन परेन । उनलेभने- &amp;quot;निरञ्जन निराकार चैतन्य परमेश्वरको प्राप्तिका लागि मान्छेकोचैतन्यशक्ति विस्तृत पार्नुपरेकोले नयाँ मोडेलमा टाउका बाइ्ओटा राख्नुपर्छ ।इन्द्रियहरू सब लोभ, मोह, मद, मात्सर्यका कारण भएकाले टाउकोबाहेकअरू कुनै पनि अङ्गको जरुरत छैन, हिँड्नडुल्न बाह्रै टाउकामा ससानापाङ्ग्रा राखिदिए भइहाल्यो ।”&lt;br /&gt;
एउटा कविलाई यो मन परेन, उनले भने- “मान्छे सौन्दर्यको उपासकहो, सौन्दर्यपानको लागि उसको टाउकामा दुई आँखाले पुग्दैन, दुई हजारआँखा चाहिन्छ । साथै उसलाई वबाह्वओटा वेदना खप्ने छाती चाहिन्छ ।” तरअर्को कविले संशोधन गर्दै भने- “हामीलाई मुटुसुटु चाहिन्न, एउटा ठूलोटाउको हुनुपर्छ, प्रत्येक इन्द्रिय पत्थरको चाहिन्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
पत्रकारले राय व्यक्त गरे- “नयाँ मोडेलमा मान्छेको पखेटा हुनै पर्छ,नाकको जरुरत छैन, चारओटा मुख र बाह्रओटा जिश्रो हन्‌ नितान्त जरुरी छ&lt;br /&gt;
मान्छे मोडेल 1९६७ .” १४९&lt;br /&gt;
त्यसो भए मान्छे घेरै बोल्छ, नयाँनयाँ समाचार धेरै पाइन्छ ।”&lt;br /&gt;
साथै किसान र मजदुर दुई जनाले पनि आफ्नो संयुक्त राय प्रकट गरे-“नयाँ मोडेलमा मख एउटै भए पुग्छ, तर हात एक दर्जन चाहिन्छ, टाउकोसकेसम्म सातै होस्‌ तर आङ र टाड हात्तीकँ जत्रो हनुपर्दछ ।&amp;quot; यस्तैमा एउटीयुबती भीडबाट निस्केर मञ्चमा पुगी फलाक्न थालिन्‌- &amp;quot;मोडेल चेन्ज गर्दास्त्री र पुरुषको मोडेलमा लिङ्गभेद गर्न हँदैन, प्रत्येकको नाकमूनि जुँगा होस्‌,प्रत्येकको पेटमुनि एउटा पाठेघर होस्‌ । छोरा पाउनुपरे बाबुले, छोरी पाउनुपरेआमाले पालैसित पाए भइहाल्यो ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“अब क्‌त्रिम गर्भाधान सुलभ हुन आँटिसकेकोले लिङ्गमेदै हुनुपर्छभन्ने म पनि मान्दिनँ, तर चन्द्रलोक र मब्घललोक पनि आबाद गर्नुपर्नेभएकोले अब प्रसर्वाक्रयाचाहिँ दुवै थरीलाई अनिवार्य गराउनै पर्छ&amp;quot; भन्दैएक वैज्ञानिकले राय झिके- “वरु आहारको लागि इन्जेक्सनले काम चल्नेहुँदा पेट नभए हुन्छ ।”&lt;br /&gt;
अर्को वैज्ञानिकले भन्यो- “अब कम्प्युटरले सबै काम गर्ने भएकोलेमान्छ बनाउने झन्झट किन ः”&lt;br /&gt;
यसपछि एक फिल्म अभिनेताले भने- &amp;quot;मान्छे काला र गोरा मात्रैकिन : नयाँ मोडेलमा हरिया, नीला, झालेमाले, छिरविरे, आकाशरड्ी, पहेँला,सब रङ्गी बनाउनुपर्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
एबंक्रमले मतमतान्तर चल्दै गए, सबैको कोसिस व्रहमाजीलाईएकोहोच्याएर आफूले भनेबमोजिमको मोडेल स्वीकृत गराउनुमै लागेकोथियो । राजनीतिज्ञचाहिँ नजिकै बसेर कहिले बूढाको दाह्ठी कन्याइदिन्थे,कहिले ख्वाक्क खोक्ता फिकदानी लिई उनको अघि सधैं । सवै आआफ्नोरायको औचित्य साबित गर्न अरूको रायको निन्द्री र चर्चों गर्न थाले,अलिआलि गर्दागर्दै घरै भयो, सल्लाह गर्दागर्दै हल्ला बढ्यो । कस्ताकस्ती रमुवकामुक्की हुन थाल्यो- ब्रहमालाई पर्नसम्म फसाद पस्यो । त्यसैले उनलेएउटा कम्प्रोमाइज ्कामटी गठन गरे- सवैको राय ख्याल गरी उपयुक्तमोडेलवारे यथाशीघ रिपोट दिन्‌ नै त्यसको काम थियो ।&lt;br /&gt;
र्कामटीले सवै विद्वान्‌, विशेषज्ञ, वुद्धिमान्‌, व्यवहारज्ञको मतमतान्तरकोअध्ययन गरी सन्‌ १९६७ को लागि मान्छेको णउटा माडर्लाचत्र तयार गरीबह्माजीछिउ पेस गयो ।&lt;br /&gt;
चित्र यस्ता थियो-&lt;br /&gt;
१६० « भैरब अर्यालका हास्यव्यङ्रय&lt;br /&gt;
नित्य रिंगिरहने एउटा च्याप्टो जाँतोजस्तो टाउको, टाउकाको वरिपरिदसतिर फार्कएका दसोटा एरियल, निधारमा माखोजत्रो एउटा आँखो; नाक,कान, गाला केही छैन, तीन बित्ता लम्बाइ, तीन बित्ता चौडाइको एउटाचारपाटै मुख, मुर्खभित्र बाह्रओटा जिभ्रा, चारओटा दाँत, छाती दुनोजस्तो, पेटसारड्गीजस्तो, हीप कीपजत्रो, नलीखुट्टा नीपजत्रो ।&lt;br /&gt;
व्रहमाजीले त्यो चित्र लिई प्रत्येक व्यक्तलाई सोध्न थाले- “के यही होतिमीले खोजेको नयाँ मोडेल ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
एउटाले भन्यो- “छि: यस्तो पनि नयाँ मोडेल हुन्छ ?”&lt;br /&gt;
अर्कोले भन्यो- “यो त मान्छेजस्तो नै देखिएन !”&lt;br /&gt;
अर्कोले भन्यो- “आबै ! यस्तो पनि मान्छे हुन्छ ?”&lt;br /&gt;
अर्कोले भन्यो- &amp;quot;यस्तो वनाउनुभन्द्यु चाहिँ वरु फे्दैनफेर्नू !”&lt;br /&gt;
धेरैले एकै स्वरमा भने- “भैगो व्रहमाजी ! भैगो । हामीलाई आउद्‌अफ्‌ डेट भए पनि साबिकै मोडेल ठीक छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“अनि के बौलाइराखेका त तिमीहरू ?&amp;quot; -ब्रहमाजी गर्जे ।&lt;br /&gt;
उनको गर्जना सुनेर मेरो पनि निद्रा खुल्यो । झटपट उठेर आङ तान्दैऐनाअघिल्तिर उाभएँ, आफ्नो अनुहार आफैँले म्वाइ खाकँ जस्तो राम्रो लाग्यो ।त्यस दिनदेखि मोडेलको करो उठ्यो कि म मान्छेको नयाँ माडेव सम्झन्छु,अनि मेरो दिमागमा चक्कराउन आइपुग्छ उही मान्छै मोडेल १९६७ ।&lt;br /&gt;
रउमझमवाट&lt;br /&gt;
मान्छे मोडेल १९६७ &amp;quot; १६१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पच्चीसौँ शताब्दी अङ्गप्रत्यङ्गमा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आच्या, नाक त नेप्टै पो देख्छु नि; नफेरी आउँदिनँ भन्नुहुन्थ्यो, खोइत फेरेको ; केन्द्रतिर जादै जानुभएन कि क्या हो :&amp;quot; एकसुरले तानाबाना बुन्दैफर्केको नेपुलकलाई कोठाभित्र पस्नेबित्तिकै स्वास्नीले झल्याँस्स पारी, क घरआडइपुगेछ ।&lt;br /&gt;
“केन्द्रतिर नगएको त कहाँ हो र ? तर... ...” वाक्य पूरा हँदानहँदैनेपुलकको दिमागमा एउटा स्विच घुम्यो, उसको अघिल्तिर न्यु स्टेटस्थित &#039;अइ-परिवर्तन केन्द्र&#039; भन्ने सङ्ेतपाटीसहितको विशाल भवन उभिन आयो । आफ्नोकोठा कोठैकोठा भई तानियो- कुनैमा तन्द्राङतुन्द्रःङ हातैहात &#039;झुन्डिएका,क्नैमा खुट्ढैखुट्टा । अर्कापट्टि लङ मिलाई पारदर्शक बट्टामा राखिएका नाक.कान र आँखाहरू अनि भित्ताको सानो कोठामा &#039;गोप्य&#039; अड्रित बट्टामा स्त्री रपुरुषका जननेन्द्रियहरू ।&lt;br /&gt;
१६२ .” भैरव अर्यालका हात्यब्यड्ग्य&lt;br /&gt;
नेपुलकले कोट फुकालेर मिर्कायो । अनि सुटुक्क सोफामा बसी स्वास्तीतिरएकटकसित हेत्यो । हेदाहेदैं स्वास्नी थेप्चिएर पुड्की भईं, पग्लिएर कमलीभई, बैँसको बाक्लो पालिसले उसको गाला फक्रक्क फक्रे, चिम्सा आँखालम्बिएर टिप्लिकटिप्लिक चलमलाउन थाले, नेपुलकको आँखा जुध्यो । त्योकप्लक्कै निलिदिकँ जस्ती नमुनाकी तरुनी मुस्कुराएर साँधिरहेकी थिई-“भन्नोस्‌ श्रीमान्‌, तपाईंको कुन अङ्ग फेर्नुपन्यो ?” नेपुलक अनकनाउँदै थियो,तरुनीले फेरि सोधी- “भन्नोस्‌ न, म यस केन्द्रकी रिसेप्सनिस्ट कम्‌ गाइड हुँ,मेरो नाम हो सुकमारी प्यारेन्टलेस्‌ ।”&lt;br /&gt;
नेपुलकले हडबडाउँदै भन्यो- “ए, त्यसो भए तपाईंसँग कुरा गरे पनित भौ नि, होइन ?”&lt;br /&gt;
“साँच्चै भनुँ भने म त यो अङ्गपरिवर्तन केन्द्रमा आज पहिलो पटकआउँदै छु, अझ भनूँ भने यहाँ कुन अङ्ग परिवर्तन हुन्छ र कसरी के दरमा हुन्छत्यो पनि मलाई थाहा छैन ।”&lt;br /&gt;
सुकुमारी एउटा कान उसको कुरातिर लगाई जबाफचाहिँ अर्कै एउटाग्राहकतिर फर्केर दिँदै थिई- “ल यो कागज लिएर सर्जरी रुममा जानोस्‌,डाक्टरले तपाईंको आँखा सरक्क झिकेर राख्छ, तपाईँले रोजेअनुसार भर्खरएउटा पर्यटकले फेरेर मिर्काएका एक जोर मधुरा आँखा छन्‌; त्यही जडनलगाउनुहोस्‌, अनि एकाउन्ट अफिसबाट बाँकी पैसा लिई जानोस्‌ । दुईघण्टामा झिक्ने-हाल्ने दुवै काम चट्‌ ।” य&lt;br /&gt;
त्यो मान्छे गयो । नेपुलकतिर हेरेर सुकुमारीले भनी- “बुभ्नुभयो, योअङ्गपरिवर्तन केन्द्रमा सबै थोकको सुविधा छ । तपाईं आफ्नो कुनै अङ्ग बेच्नचाहनुहुन्छ भने स्ट्यान्डर्ड र इन्टरनेसनल मार्केटमा त्यसको माग हेरी उचितमोलमा हामी किनिदिन्छौं, तपाईंको कुनै अङ्ग छैन अथवा भए पनि गतिलो छैनर फेर्न चाहनुहुन्छ भने रोजेर किन्न सक्नुहुन्छ, यहाँ नभएको अङ्ग रहेछ भनेअर्डर दिएको तीन दिनभित्र हामी मगाइदिन्छौँ । जीवित अन्ग बेचेर कृत्रिम अङ्गजडन चाहनुहुन्छ भने त्यो पनि जडेर पठाइदिन्छौँ । जीवित अङ्गको जडानशुल्क १००।- छ र कृत्रिमको १०।- मात्र । अब भन्नोस्‌, तपाईंको के सेवागर ?&amp;quot; सुकुमारीले गालामा गुराँस फुलाई ।&lt;br /&gt;
नेपुलकले अनकनाईअतकनाई भन्यो- “अरू त केही होइन, यो नाकएउटा अलि नेप्टो भएकोले फेर्दै कि भनेर आ&#039;को ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
सुकमारीले फोनमा रिङ गर्दै भनी- &amp;quot;हलो, हलो नाक सेक्सन !”&lt;br /&gt;
पन््चीर्यौ शताब्बी अङ्ग्रत्यङ्मा “ १६३&lt;br /&gt;
जवाफको प्रतीक्षामा रिसिभर गालामा अड्याउंदै नेपुलकतिर फर्केर भनी-“फेर्नु त पर्छ त ! पच्चीसौँ शताब्दीमा पनि यस्तो नेप्टो नाक लिएर निर्बाहहुन्छ त ?”&lt;br /&gt;
नेपुलकलाई यो आवाज स्वास्नीको जस्तो लाग्यो । नभन्दै उसकीआफ्नै स्वास्ती सोफानिर उभिएर भनिरहेकी थिई- “यस्ता असभ्य मान्छेसितके क्रा गर्नु । नेप्टो नाक देख्ता म्वाइँ खानै घिन लागेर पो फेरेर आउनोस्‌भनेकी ! साँच्चै अङ्गपरिवर्तन केन्द्रमा स्तनको भाउ के रहेछ हँ ?”&lt;br /&gt;
प्रश्नले नेपुलकलाई फेरि घचेटेर अङ्गपरिवर्तन केन्द्रमा पुन्यायो । सो-रुमहरूमा बिभिन्न अन्गप्रत्यङ्गहरू देखाउँदै सुकुमारी भनिरहेकी थिई- &amp;quot;यीबीस-बाइसे स्तन भर्खर हिजो मात्रै दुइटी तरुनीले बेचेर गएका ।”&lt;br /&gt;
नेपुलकले आश्चर्यचकित भएर सोध्यो- “बीस-बाइसैमा स्तन बेच्नेवैराग्य किन आएको त ती मोरीहरूलाई ?” सुकुमारीले खिस्स हाँस्तै भनी-“ती दरिद्व मोरीहरूलाई यति टुमुक्क परेका स्तनहरू किन चाहिए त; आफ्नास्तन चचार हजारमा बेच्ने, चचार सयमा यहाँ बूढीहरूले फेरेर मिर्काएकाझुम्रे स्तन टाँसे, गए । छाती रित्तो पत्ति रहेन, ढिँडो निस्तो पनि रहेन । बरुतपाईंकी श्रीमतीलाई चाहिन्छ भने लैजानुहोस्‌, आजै लिनुभए अलि सस्तैमापाउनुहुन्छ भोलिसम्ममा यी उडिसक्छन्‌ । स्तनको माग कति चढ्दो छ,तपाइँलाई के थाहा ! भोलि नै यो आठ हजार जोडीमा विक्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“एक जोर बीस-बाडइसै स्तनको आठ हजार पर्दो रहेछ !” नेपुलकस्वास्नीलाई उत्तर दिन्छ । स्वास्ती एक पटक जिश्रो काढ्छे र पोइको उत्तरदोहोस्याउँछे- “एक जोरको आठ हजार !” एकछिन गमेर अनुनयपूर्वकपोइको नजिक गई भन्छे- “एउटा कुरा भन्छु मान्ने है त !&amp;quot; अन्यमनस्कभावमा नेपुलक सोध्छ- &amp;quot;के :” &amp;quot;मलाई पनि एक जोर वीस-बाइसे स्तनकोसाह्रै रहर लागेको छ । आफ्नो बेचेर नपुगेको पैसा थपी किन्न पाए कस्तो&lt;br /&gt;
कुन आँखा फुटेकीले किन्ली र तिम्रो बेलुन फुटेजस्ता स्तन ।” नेपुलकस्वास्नीतिर फर्केर झोक्किन्छ ।&lt;br /&gt;
“आँखा फुटेकीले आँखै किनिहाल्छे नि ! सुटुक्क लगेर बेचिदिउँ, कसलेथाहा पाउँछ र मैले स्तन बेचेको :” नेपुलकको मुखाकृतिमा रिसले घिनकोगुइँठा पात्यो; छा, कस्तो जुग आयो ।&lt;br /&gt;
“बुभ्नुभयो, जुग अर्कै आयो ।” रिसेप्सनिस्ट ठिटीले सो-रुममा&lt;br /&gt;
४ “ भँरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
हिफाजतसाथ राखिएका मुटुहरू देखाउँदै भनी- “आजको जगमा पैसालेसाथ दियो भने मान्छे हजारौँ वर्ष बाँच्न सक्छ । एक अमेरिकी धनर्पातको कुरासुनिहाल्नभयो । २२५ वर्षको उमेरमा यसर्पाल फेरि उनले आफ्नो मुटुफेरेछन्‌ । औषधिविज्ञानको कत्रो प्रगति !&amp;quot;&lt;br /&gt;
“क्ो, औषधिविज्ञानको उन्नतिले गर्नेसम्म ग-यो । मान्छे पनि मोटरझैँफडइत्याडफुड्लुङ फुक्लने भयो, टाकटुक जोडिने भयो, कृत्रिम ट्युबमा बच्चाजन्मने भयो, तर शक्ति र सम्पत्ति नहुनेहरूको निम्ति के भयो ?&amp;quot; नेपुलकगम्भीर मुडमा सोच्नै थियो । रिसेप्सनिस्ट सुकुमारीले अर्को शौ-केस देखाउँदैभनी- “लौ, तपाईंले नाक खोज्नुभएको हाइन : कुन नाक हाल्नुहुन्छ ? रसियननाक तपाईंको बनोटमा अलि म्याच गर्दैन । अमेरिकी नाकको कलरै नमिल्नेभइहाल्यो, चिनियाँ नाक हाल्नोस्‌, तपाईँलाई मङ्गोलियन टाइपकै नाक सुहाउँछ ।अचेल फेसन सानो नाकको छ बुभनुभयो ?” नेपुलकले मुन्टो हल्लाउँदै भन्यो-“मलाई त नेपाली नाकै दिनुहोस्‌ बा, हिसी र रङ्ग दवै फिट हुन्छ।&amp;quot; तररिसेप्सनिस्ट तरुनीले नेपाली नाक पाउनै मुस्किल छ भन्दै टिप्पणी गरी- “छनत एक दर्जन नेपाली नाक छन्‌, तर यी सबै विदेशीको अडंरमा लिइराखेका,आखिर विदेशी मुद्रा कमाउनु पनि त पन्यो । हाड हार्मोन्स सबै विदेशबाटझिकाउनुपर्छ ।&#039; फेर्ने पर्ने भएपछि नेपाली नाक नै के टाँस्नुहुन्छ त ल,योइन्डियन नाक हाल्नोस्‌; सस्तो, राम्रो, बलियो, मलाई त यस्तै मन पर्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
नेपुलकलाई त्यो नाक अलि असजिलो होला जस्तो लाग्यो- वास्तवमाउसलाई आफ्नो शरीरमा बेजातको अङ्ग जड्ने मन छैन । तर क करा टानखोज्दै भन्छ- “यी नाक बेच्नेहरूले युरोपियन नाक हालेर गए होलान्‌,होइन :&amp;quot; ठिटीले खिसीको भावमा मुख बङ्ग्याउँदै भनी- “ती तपाइंजस्ताफेर्न चाहने क्रहाँ थिए र; भरिया न हुन्‌, एक मानो रगत बेचेर एक पाथीमट्टीतेल किन्छन्‌ । आफ्ना साबुत अङ्ग बेचेर यहाँ तपाईंजस्तो भलादमी वा“पर्यटकले फेरेर जगेडा रहेका चेप्टानेप्टा, लुला, बाब्गा अङ्ग सस्तोमा टाँस्छन्‌,जान्छन्‌ । अझ कति त बीस-तीस रुपियाँमा प्लास्टिक अन्ग लगाई जीवन टानेँनियतले फर्कन्छन्‌ बिचराहरू ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“धनले गरिब भए पनि स्वास्थ्यले त उनीहरू धनी नै थिए; औषधिविज्ञानलेउनीहरूको त्यही धन पनि खोसी विकृत र विकलाङ्ग त पारेन ?&amp;quot; नेपुलकलेलामो सास फेरेर गम्भीर वैकल्य प्रकट गप्यो । रिसेप्सनिस्ट सुकुमारी मुसुक्कहाँसी- &amp;quot;तपाईँ मान्छे साह्रै भावुक हनुहँदो रहेछ; शो-केस हेदैमा यति विकल&lt;br /&gt;
पच्चीर्यौ शताब्दी अहप्रत्यङ्षमा / १६१&lt;br /&gt;
हुनुहुन्छ भने मेरो जस्तै यहीँ काम गर्नुपन्यो भने त तीन दिनमा तपाइंको टाउकैफेर्नुपर्ने हुन्छ कि क्या हो ! तपाईंलाई थाहा छ, यहाँ राखिएका प्रत्येक अङ्गकोएकोटा करुण कथा छ । उ: ती कान एउटा साह्रै सुन्दर नेपाली केटाका हुन्‌ ।मलेरियाले मर्न आँटेको बाबुलाई औषधि गराउन नसकी हिजा मात्र उसलेआफ्नो दुवै कान बेचेर प्लास्टिकका कान टँसाई गयो ।”&lt;br /&gt;
नेपुलक ट्वाल्ल परेर ठिटीको कुरा सुनिरहेथ्यो, उसले फेरि थपी-“बुभनुभो, एक थरी त्यस्ता छन्‌, अर्को थरीको कथा सुन्नुहुन्छ भने हिँडनुहोस्‌पल्लो कोठामा, त्यहाँ आजै लिएका नाक र कानहरू छन्‌ । एक जना दरिद्रबृढालाई अस्ति हैजा लागेछ, बेलामा औषधि नपरेकाले उनी बाँच्न नसक्नेभए । उँनका छोराहरू हिरिकहिरिक्‌ हुन लागेको बाबुलाई भ्याइँकुटी पार्दैदगुराएर यहाँ ल्याएर भने- “नमर्दै यिनका साबुतजति अङ्ग किनिदिनुहोस्‌ ताकि यिनलाई पोल्ने दाउरा किनेर बाँकीबक्यौता बाँडचुँड गरी अलिक दिनहामी पनि पेट पाल्न सकौँ... ...&amp;quot; म त त्यो बिचराको चिरफार हेर्न नसकीएक बोतल हाइल्यान्ड ह्विस्की लिएर ढोका धुनी बसेँ ।”&lt;br /&gt;
नेपुलकले भन्यो- “कस्तो आजको विवशता !”&lt;br /&gt;
सुकुमारीले भनी- “यो हो आजको वास्तविकता !”&lt;br /&gt;
तर नेपुलककी स्वास्नीले आफ्नो पोइले सुनाएका यी घटना र टिप्पणीहरूराम्ररी बुझिन । उसको मन छोराले गरेको उपद्रोतिर गइरहेको थियो । &#039;अहिलेक इन्तु न चिन्तु भई लडेको छ, के गर्नु त अब अर्को पाउँला !&#039; तर क छोरो&lt;br /&gt;
१६६ भैरव अयालिका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
पाउँदाको कष्ट साम्झन्छे, आट जरुङ्ग हन्छ; नाइँ क राडिमेड बच्चा किनेरन्याउंछे । अँ. त्यसमा भा उसलाई पाद्रेघरको के जरुरत : यो बेर्चिदिए पनि हन्छ,वल्ल समस्याको समाधान निस्क्यो, खिसिक्क हांस्तै उसले पातलाई सोधी- “अवमरे पाठेघरका के काम छ र हाँग : यही वेच्चर स्तन लिन पाए कसो होला :”&lt;br /&gt;
नेपूलकको दिमाग चक्कराउँदै अङ्गपरिबनेन केन्द्रको अर्को कक्षमापग्दछ । एउटी सोझी खालकी महिलासंग रिमेप्सानस्ट ठिटी सोधिरहेकीहुन्छे- &amp;quot;के तपाइँका वच्चा छैनन्‌ ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
“छन्‌, तर दइटै गँडमड किनेका; आफ्नै पाठेघरमा वनेको वच्चाकोम्वाइ खाने मेरो जिन्दगीमा एउटै धोको छ । त्यसैले एक तोला विशुद्ध हिमालीवीर्य आफूमा भिव्याजँ भनेर आएकी !&lt;br /&gt;
“कस्ती हरिलदठक आइमाई...&amp;quot; -नेपुलकलाई हाँसो उठ्यो, “कुनैलोग्नेमान्छेसित पोइल गए न भइहाल्यो नि ।” उसले प्वाक्क भन्यो । सोझीमहिलाले सोक्षै तालमा उत्तर दिई-.“लोग्ने त भइहाल्तुहुन्छ नि, मालिकलेमेरो पतिसित आफ्नो सम्पत्ति साटिदिए । करा वुझिहाल्नुभयो होला, आजहाम्रो घर छ, मोटर छ, जग्गा छ, जागिर छ, तर... ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
नम केही सहयोग गर्ने सक्छु कि :” नेपुलकले अनकनाईअनकनाईभन्यो । महिलाले आफ्नो सतीत्वत्रार निक्कै लामो व्याख्या गरी र भनी- “मखालि वीर्य चाहन्छु, सतीत्व बेच्न चाहन्नँ ।”&lt;br /&gt;
नेपुलर्कातर फर्केर मस्कुराउँदै सुकुमारीले भनी- “उन्नाइसौँ शताब्दीकोअबशेष पनि यो देशमा अझै वांकी छ ।&amp;quot; नेपुलकले महिलालाई आश्वासनदिदै भन्यो- “तपाईँको सतीत्च मैले किन्न खोजेको होइन, एक तोला वीयंतपाईंलाई निःशुल्क दान दिन खोजेको मात्र हो ।” केहीवेर अन्यमनस्क भइमहिलाले सुकुमारीतिर हेरिन्‌, क मृस्कराउँदै अर्को कक्षतिर लागी ।&lt;br /&gt;
केहीवेरपाँछि नेप्लक र महिलाको मुखमृद्रा पालैपालोसित हेर्दै ठिटीलेव्यङ्ग्य गरी- &amp;quot;कन्ट्र्चाक्टरको कोमसन कसले दिने नि?&amp;quot; महिलाले मुखरातो पार्दै केटीलाई प्याट्ट हिकाँई । यसो गर्दा सृकमारी त पिलिकपिलिक्‌ गर्दैरुन पा थाली । नेप्लक फरि जिल्ल पस्यो । आखिर त्यात साह्रो दुख्ने गरीपिटेकी त कहाँ हो र उसले : तर यो चनमनी किन रुन्छ : उसको दिमागरन्धनियो । झन्‌झन स्दै आफ्नो छातीमा लिप्सन आएकी महिला आत्तिई रशि्टाचार ,पान देखाउन नभ्याई निस्किहाली । दुनमताएकी सुकुमारीलाईसमाएर बमबुम्याउंदै नेपुलकले सोध्यो- &amp;quot;तिमीजस्ती मान्छेलाई पानि यस्ताविधि&lt;br /&gt;
फन्चीतौ गतान्दी अङप्रत्यड्मा - 1६5&lt;br /&gt;
रुन मन लाग्छ :” सँक्कसक्क गर्दै केटीले आफ्ना मन फाटे- “टचचमाजन्माइएकी भन्दैमा म आर्टाफसल मान्छे ह २ - तपाइजस्तै कने लाग्नमान्छु२ उनीजस्तै कनै स्वास्तीमान्छको रगत मिसाएर जन्माड्ाकी तह नि&amp;quot;फरक यति हो- तपाइँहरू आफ्ना नातागोता पचन्नहन्छ: स्नेट ममता णउनहन्छःमलाई आफ्नै विगत-आगतको पत्ता छैन ।”&lt;br /&gt;
उसको सकमार अनुहार मसादै नेपलकले सोच्र्या- &amp;quot;फे निमीलाईआफ्नोवारे कही बाहा छैन त ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
“म अमेरिकाको कनै लेबोरटरीमा जन्माइण्की था, गन्थ्रापीलाजीकोआधारमा वभ्दावुभदा म नेपाली रगनकैँ प्रडक्सन ट भन्ने लागेकोले यट्टाआएर नोकरी गर्दै छु । मेरो होलिया यत्ति हा ।&amp;quot; मायाल स्वरमा याँत ननरसुकमारीले आफ्नो मन्टो नेप्‌लकका छातीमा टाँसी, नपुलक रामाच्चरित भयो,उत्तेजित भयो । उसका औँलाहरू सुकमारीका अइप्रत्यद्रमा चलमलाएर छिरैउसलाई निर्वाइ पारी उधाने र्कासए । तर आफूले वोल्न नपाउँदै सकमारीलेएउटा फलिक्रो छाडी- &amp;quot;तपाइँ नै मेरो वा भर्ड्रादन्‌भएको भा कस्ता हन्थ्योहगि ?”&lt;br /&gt;
नेपुलक जिल्ल पप्यो । उर्साभत्रको पितत्तर तरै आखाबाट झरेर नेपालीनाक राखेको सो-कंसमा तप्पतप्प थोप्लिइरहेको उसले निकैवेरपाँछ चालपायो । यो पनि थाहा पायो- त्यमै वेला एक जना साहेव ९ वर्षको उमेरमाआफ्नो आइप्रत्यङ्घको तेस्रो पटक ओभरहल गराई सकमार्रीसत विवाहकोप्रस्ताव राख्न आएका थिए ।&lt;br /&gt;
“नाक फेर्ने भए छिटा छान्नुहोस्‌, काउन्टरमा ग्राहक र विक्रताहरूकोामीड लागिसक्यो&amp;quot; -निकँवेरपछि स्‌कमारीले नेपुलकलाई भनी । नेपुलकलेगम्भीर मुद्रामा भन्यो- “भैगो नानी, मलाई नेप्टै नाक भए हन्छ; उमेर पानित ५० पुग्न लाग्यो ।”&lt;br /&gt;
ए, त्यसो भए तपाईलाइ न्य स्टेट्की मैयाँले छांट पारेर पगालिर्साकछन्‌,लौ, उसैलाई ब्याएर बस्नास्‌; आजदेखि हाम्रो विवाह विच्छेद &#039;&amp;quot; -नेपूलककोस्वास्तीले एक सासमा रन्क्दै भनी र फन्कदै काठावाट निम्कि पनि हाली !&lt;br /&gt;
एकछिन जिल्ल परेर नेपुलकले सोध्यो- “सानु कहा छ त?&amp;quot; फर्कदैनफर्की स्वास्तीचाहिले जवाफ दिई- “कान्त, त्यता खार्टातर मरिराखकाहोला ।” नेपुलकले छोराको लास छामछम पान्यो- त्यसमा टाउकै थिएन ।&lt;br /&gt;
सगनवबाट&lt;br /&gt;
१६5 शैरव अयालका हात्यब्यड्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ए ज्या भुसुक्कै !!==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पढेका र परेका, गुनेका र सुनेका, सुझेका र बुझेका इत्यादि जम्मैगरी हाम्रो दिमागमा कति मुरी क्रा कोचिएका छन्‌, त्यसका नापजोख गरीसाध्यै छैन । मानौँ, मान्छेको मगज एउटा बहमाण्ड-व्याइ हो, जहाँ सहसौँस्वरूपका कच्ची-पक्की करेन्सीहरू कित्ताका कित्ता गरी थन्क्याइएका छन्‌ ।आशामरुलाई चिट्ठा परेको, सर्वहाराले जुवा जितेको, चुक्लीकान्तले वकसपाएको वा घाटेबाजेलै दान पाएको रकमझैँ एकै पटक र एकै कलम गरीथुपारिएको होइन, बरु खस्याङखुसुडको खुद्रा पसलेले दुई पैसाको हिड्देखिजरायोको सिङसम्म बेचेर चुबुरचुबुर गरी लिएका चानचुन पैसा खाइनखाईखुत्रुम्के कन्तुरमा खुत्रुकखुत्रुक खसालेझै प्रतिमिनेट, घण्टा, दिन, महिना र वर्षकेही न केही कमाउँदै र थन्क्याउँदै यो पुँजी जम्मा भएको छ । चाहिएका बेलाझिकौंला, परेको बेला खर्चौंला र आबश्यक परै अरूलाई आफ्नो कमाइबाटगुन लगाउँला भन्ने उद्देश्यले नै मान्छे केही कमाउँछ, केही बचाउँछ-व्याड्मा राख्छ । यसकारण दिमागका व्याङ्गममा बचत खाताको भन्दा चल्तीखाताको महत्त्व बेसी छ ।&lt;br /&gt;
तर भएर के गर्नु ? चाहिएको बेला चेक काटन खोज्यो भने के कताके कता बेपत्ता ! पढेगुनेका कुरा नआउनु त त्यति आश्चयंका कुरा हाइन,किनभने अचेल पढ्नुगुन्नुको अर्थ ज्ञानगरिमा वढाउनु र त्यसलाई व्यबह्ृनगर्नुसम्मको झन्झट-भझमेलामा जेलिएको छैन । येनकेन प्रकारेण परीक्षामाउत्तीर्ण हुनु, आफ्नो नामका अगाडिपर्छाडि डिग्री र उपाधिका नन्द्रचाडतुन्द्रझुन्डयाउनु र जागिरका लागि कर्न, ढुम्नु, धाउनु अनि केही नलागे चुक्ली,चाकरी र चाप्लुसी गर्न धाल्नु नै आज शिक्षादीक्षाको उद्देश्य केन्द्रित छ ।त्यसैले कहिलेकाहीँ अन्तर्वातामा सोधिदेलान्‌ भनेर मात्रै हो, नत्र पढेका कराविर्सेकोमा विस्मात मान्नुपर्ने केही छँदै छैन । तर कतिपय भुक्तभोगी भइसकेका&lt;br /&gt;
ए ज्या मृतक ” “ 1६९&lt;br /&gt;
कुरामा पनि सम्झनाको रिसिभर उठाउँदा कम्पाराबाट डायलटोन नै आउँदैनर पो साह्रै अचम्म लाग्छ ।&lt;br /&gt;
हुन त हो नि, आइन्स्टाइन र न्युटन पनि निकै बिर्सुवा थिए । अझटोमस एल्बा एँडिसनले त एक पटक कनै आविष्कार दर्ता गर्न जाँदा आफ्नोनामै भुसुम्क बिर्सेर बताउन नसकेका रे ! कवि किटसलाई सम्झनोस्‌, उनलाईअरू त कै भर्खरै खाएको वा लुगा लाए-नलाएको पनि होस हुँदैनथ्यो । यस्तै&#039;तपाईंको पैसौः तिर्नु थ्यो&#039; कि :&#039; भती तलब पाएको दिनः भेटिएजति सबैलाईसोध्दै जाने महाकेखि देबकोटा हाम्रो नाजकै थिए ! तर उनीहरू सबै करा बिर्सेपनि सुभझिका र बुझेका कुरा बिसंदैनथे । आफ्नो साध्यक्षेत्रमा उनीहरूकोध्यान कस्तरी एकोहोरिएको थियो भने त्यससित असम्बन्धित अरू सम्पूर्ण क्रानबिर्सी उनीहरूलाई सुखै थिएन । कै सबैको बिर्साइ त्यस्तै हो त ? भुत्रो निहोइन ।&lt;br /&gt;
हामीमध्ये कति मै हुँ भन्ने विद्वान्‌ वा लेखकलाई आफ्नै विषयमा एउटासामान्य लेख लेख्न दसोटा पुस्तक वरिपरि राखी घण्टौँघण्टा लेख्तै-केर्दै, केर्दैलेख्तै गर्नुपर्छ भने हामीलाई यो पत्याउन मुस्किल पर्छ- लर्ड मेकालेलेवेलाइतको आठ भागमा विभाजित इतिहास कनै पनि पुस्तकको सहाराबिनालेखेका थिए । हामीमध्ये कति मै हुँ भन्ने व्याख्याताहरूलाई आफ्नै विषय वाविभागमा एक साधारण व्याख्यान दिन निकै अघिदेखि घोत्लिएर, घोट्टिएर पनिभन्ने बेलामा क्न्नै पर्छ भने यो पत्याउन पानि मुस्किलै पर्दो हो- स्वामीबिवेकानन्द कैयौँकैयौँ घण्टा धाराप्रवाह व्याख्यान दिएर विश्वका दर्शन-दिग्गजहरूको मगज तिलमिलाइदिन्थे । हामीले नपत्याउंदैमा साँचो करोझ्टो हन्छरः&lt;br /&gt;
ज्ञानगुनको कुरामा त हेक्काको हबिगत त्यस्तै भो नाइँ, तर चानचुनकूरामा पनि आफूसमेत कतिको होसल्याङ्गै गति देख्ता पो झन्‌ रमाइलोलाग्छ ।&lt;br /&gt;
“विहान उहाँ जाने भनेको गइस्‌ त ?”&lt;br /&gt;
“ए मैले त बिसँछु ।” .&lt;br /&gt;
“तपाईंले हिजो आउंछु भन्नु भा&#039; होइन ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
“जा, मैले त भुसुक्कै !”&lt;br /&gt;
“खोइ त पुस्तक :”&lt;br /&gt;
“ए ज्या भुसुक्कै !”&lt;br /&gt;
१७० भैरव अर्यालका हास्यव्यड्रय&lt;br /&gt;
यस्तैयस्तै गरी दिनको सैयौँ पटक अचेल हामीमध्ये धेरैको मुखबाटनिस्कने गर्छ- &#039;ज्या भुसुक्कै !!&#039;&lt;br /&gt;
आफ्नै अत्यावश्यक र नियमित कामकुरा त विसिंडन्छ भने अरूकोकुरा नसम्झेकोमा के अचम्म ! त्यसैले हिजो मात्रै कसैको कुनै काम गरिदिन्छुभनी आश्वासन दिएका छौं भने आज सजिलैसित हामी भनिदिन्छौँ- “ज्या,मैले त भुसुक्कै बिसँछु ।” पैँचो तिर्ने वा दिने, माल लगिदिने, केही गरिदिनुपर्ने,कतै गइदिनुपर्ने अथवा केही भनिदिनुपर्ने जस्ता कुरामा दिइएका भाका तझन्‌ दिनको पाँच पटक सम्झाए पनि ज्या भुसुक्कै ! &#039;ल&#039;, &#039;हुन्छ&#039;, &#039;हस्‌&#039; र &#039;जोआज्ञा“ आदि प्रिय शब्द निकालेर बचन दिनु कत्ति पनि गाह्रो छैन, जति गाह्रोछ- तिनलाई सम्झनुमा छ । त्यसैले यहाँ भाषणको सिलसिलामा दिइनेबकितम्‌ आश्वासनको त कुरै छाडिदिनुहोस्‌, सालङ्डार शुभनामको सहीदानगरिदिएका कैयौँ लिखितम्‌ तोकहरू पनि यहाँ बिस्मृतिको बास्केटमा फालिएकागुनासो बराबर सुन्नुपर्छ । त्यसैले मान्छेको दर्जासितै पदोन्नति हुँदै जाने केहीबानीहरूमध्ये बिर्सने बानी पनि एक हो भनेमा तपाईं पक्कै पत्याउनुहोला ।नपत्याए, कुनै धनीमानी वा अधिकारी-अधिकारिणीसित एउटा मामुली कामकोअनुरोध बोकेर जानोस्‌, खाने-पाउने कुराको अनुरोध रहेछ भने म भन्नसक्तिनँ, नत्र तपाईं पक्कै भोलिपर्सिको आश्वासन पाउनुहुन्छ । पर्सिपल्ट जानोस्‌उनी बिनम्रतापूर्वक सोध्दछन्‌- यहाँ कति कामले पाल्नुभयो कुन्ति ! फेरिबिलौना गर्नोस्‌- आश्वासन दोहोरिन्छ । अब त गरिदिए होलान्‌ भनी अलिदिनपछि जानोस्‌- तपाइँका सम्पूर्ण आशाभरोसालाई चूर्ण पार्दै उनी सजिलैसितमुस्क्राइदिन्छन्‌- &#039;ए ज्या भुसुक्कै &amp;quot; अब बिर्सेपछि के लाग्यो ! बिर्सनुकोविरोधमा नालिस दिने कुनै दफा ऐनमा छैन । धर्मशास्त्रले पनि पाप गर्न हुन्नभनेको छ, बिर्सनै हुन्न त भनेको छैन । त्यसैले त कैयौं महाशयहरू नबिर्सेपनि बिर्सेको अभिनय गर्दछन्‌ । चाकरी, नसनाता, भनसुन, करकर र डरधम्कीलेकाम लिने विगत जहानियाँ तन्त्रले बसालेको संस्कार नतिखुन्जेल हुन्न भन्ननसक्नेले बिर्सने वानी पनि बसाल्नुपर्दो रहेछ । तर कुरा यो बेग्लै हो, प्रसङ्गकोकुराचाहिँ के भने बिर्सने बानी एक प्रकारको फेसन पनि हो । धेरै ठूलावडामाबिर्सने बानी पाइएपछि चानचुने बडाहरूलाई पनि आफ्नो वढत्व बढाउन यहीबानी बसाल्ने रहर लाग्छ र भन्न थाल्छन्‌- ठूल्ठूला भारी बोकेकाहरूलाईससानो कुराको हेक्का कहाँ रहिरहन्छ र ? तर यो अर्जी अब्राहम लिङ्नले किननिकालेनन्‌ ? सम्झने शक्तिमा नामुद जुलियस सिजर र रुजबेल्टको कार्यभार&lt;br /&gt;
ए ज्या भुतुक्कै &amp;quot;० १७१&lt;br /&gt;
आजका कुनै पानि जीउको भन्दा हजार खण्ड बेसी थिएन त ! अझ नेपोलियनके भन्थे भने मेरो दिमाग खण्डैखण्ड भएको एउटा कन्त्रजस्तो छ, जुन बेलाज्ञ चाहिए पनि म यसबाट साजिर्लौसत झिक्न सक्छु । त भन्तोस्‌, कार्यभारबढ्दैमा विर्सन बानी पनि वढ्नै पछ भन्न कनै आनवार्यता रहेछ त !अर्कातिर, कलाकार वा काव्यकार भएपछि मान्छे अलिर्कात बेहोसीहुन्छ भन्छन्‌ । तर आदिर्काव व्यास र होमरसित चाहिएको बेला प्याट्ट पल्टाएरस्या्ट सारिदिने न कुनै किताप थियो न सुझेको क्रा सम्झनाको लागिटिपिराख्ने एउटा नक्कले नोटबुक नै । जे थियो उनीसित आफ्नै होस थियो ।त्यस्तै सुप्रसिद्ध अस्ट्रेलियन सङ्गीतकार मोजार्ट थिए । उनी गिर्जाघरमा गाइएकोसङ्गीतको नोटेसन आफ्नो दिमागमा कस्तरी टिपिदिन्थे भने घर पुगेर कापीमाएक नबिराई सारेर गाउन सम्थे रे ! रे का कुरा किन चाहियो, बालकृष्ण समर बाबुराम आचार्यको स्मरणशक्ति सम्झँदा साधकहरूले बिर्सुवा हुनै: पर्छभन्ने अर्जी &#039;नाच्न नजान्नेले आँगन टेढो&#039; भनेजस्तै लाग्छ ।वास्तवमा हामीमध्ये कतिको दिमाग अचेल ब्रह्माण्ड-व्याङ्ग होइन,कच्चा घरको निदालजस्तै छ । अलिकति मकाएको, अलिकति कीराले खाएकोर समस्त ध्वाँसोले रङ्गिएको त्यस निदालका प्वालप्वालमा गृहिणीहरू जे पायोउही घुसारिदिन्छन्‌ । दुई-चारोटा खुद्रा पैसा, फुटेको ऐना, सलाईको बट्टा,काँचो धागो, केटाकेटीको खेलौना, साबुनको टुक्रा, दाँत माभने बुरुस इत्यादिगन्ठ्याङमन्ठ्याङ केके हुन्‌ केके ! अनि चाहिएको बेला केही खोज्यो भनेकताकता ! हातभरि आउँछ ध्वाँसो र घूलो मात्र । आजका वुद्धिजीवीकोदिमागको पनि हालत यस्तै त होइन : एकातिर माल्थसको जनसङ्ख्या-सिद्धान्तलाई अधकल्च्याएर घुसारिएको छ भने अर्कोतिर मौका परे अर्कीषोडशीको लगनगाँठा समात्ने धोको पनि सिउरिएकोा छ । एउटा कनामामाक्स, लेनिन, गान्धी, रसेलका विचारको पोका छन्‌ भने अर्को कुनामाभूमिसुधारका फलस्वरूप जग्गा घटैको पीरले पनि कातिलाई पिरेकँ होला ।.. उसले त उसलाई सामन्ती भनेछ, अब भियतनामको स्थितिकस्तो होला, फलानाफलाना पञ्चायतको सीमामा &#039;फगडा पन्यो, कच्छबाटकसले के भन्यो ? मंगीको खोस्टे दाल माना एकको १।२५, चिनी बन्द, चीनर न्थ्सको मतभेद कहाँ टुङ्डिएला, फलानाले फलानाको कविता चोस्यो, मन्त्रीलेमानेन, गुडँठा वितरण सामतिका स्‌चना, सातौं हप्तामा ब्रह्मचारी, फलानीत सिद्धिइछ, वी एस्पी को रिजल्ट कहिले निस्कला हँ :, त्रिभुवन राजपथमा&lt;br /&gt;
१७२ , भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
सान जना खतम, शुभविवाहको निमन्त्रणा. ..इत्यादिइत्यादि समाचार,प्रतिक्रिया, टिप्पणी, व्यवहार, आचारबिचार, भ्रष्टाचार, क्यामू र सात्रै, किसानसक्रटनको सभापति, युबामहोत्सव, बहुउद्देश्यीय विद्यालय, अस्तित्ववाद, विविधभारतीको पञ्चरक्ठी कार्यक्रम- हावामहल... ।&lt;br /&gt;
यस्तै जिली न गाँठीका अनेक वेप्रसङ्गी प्रसङ्हरू जब तरङ्गिरहन्छन्‌,दिमाग रन्थनिएर दुख्न थाल्छ, होस पातलिँदैपातलिँदै हावासँग मिल्न खोज्छ,अनि वन्द भएको घडीलाई औंल्याएर दम दिनुभएन ? भनी कसैले सोध्यो भनेडिस्स हांस्तै जबाफ दिन्‌पर्छ- &#039;ए ज्या भुसुक्कै !!&#039; अव भन्नुहोस्‌, ए ज्याभुसुक्कै पनि यही युगको देन ह्वोइन त : तर मैले आग्रा&#039; कुरा गर्दागर्दै गाग्राकोगफ पो छाँटैँ क्यार : बिर्सने वानीका बयान गर्न लागेको विच्छुब्ठलताको बहसगर्न पुगियो, लेखै विच्छुङ्जल भयो । तर टाउकामा खिचडीको खँडकौलो छड्कनेयस युगमा साहित्यमा भृड्डला खोजेर के साध्य हगि ?&lt;br /&gt;
हुन त बिर्सनु झन्‌ चाहिने कुरा हो, कति आज खुइलिएकाहरू हिजोकोजगजगी बिर्सन नसकेर रुन्छन्‌, कति खली खाएकाहरू आफ्ना चोटचपेटाबिर्सन नसकेर बहुलाउँछन्‌ र कति लैला र मजनूहरू एकअर्कालाई बिर्सननसकेर सिलटिम्मुर खाइदिन्छन्‌ । हाकिमले हप्काएको, खुकुरी रमको जोसमाखुकुरी चलाउँदा मामाघरको निम्ता पाएको, ज्वानुको ठेक्कामा गानु गएको,क्यासिनोमा क्यास होम्दाहोम्दा हरि ३० जप्तै माला घुमाउनुपरेको, भत्याङमनिमन थाम्न नसक्ता साहको काखमा राहु रोएको आदिआदि कुराहरू बिर्सननसकेर बहुलाएकाहरूको उपचारको उपाय एउटै बाँकी रहन्छ- बिर्सनु रबिर्साउनु । तर बिर्सनुपर्ने कुरा बिर्सन सकेको भए सम्झनुपर्ने कुरा किनबिर्सन्थ्यो र ? त्यसैले मैले पनि केके न लेखुँला भनेर यो निबन्ध सुरु गरेकोलेख्तालेख्नै यहाँ नलेखिएजति जम्मै करा बिर्सिएछ । तपाइँको पनि टाउकोखचाखबै होला, यो छुसी गफ फेरि कहानेर कोच्नुहुन्छ, पढिसक्नासाथ बिर्सिंदिएहुन्छ ।&lt;br /&gt;
रचनाबाट&lt;br /&gt;
ए ज्या भुतुक्कै ” / १७१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==साढि==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिन्दूहरूले साढिलाई महादेवको निजी वाहनको पदमा नियुक्त गरिदिएकाछन्‌ । महादेवलाई वाहनको आवश्यकता थियो-थिएन दैव जानोस्‌, तर आफूलाईजेजे चाहिन्छ देवीदेवताहरूलाई पनि त्यही चाहिन्छ भन्ने मान्छेको धारणारहँदै आएको छ । आफू घोडा, हात्तीमा चढ्ने हुंदा हाम्रा पुर्खाले आफ्नादेवीदेवताहरूको लागि पनि चढेर हिँड्ने एकोटा जनावरको प्रवन्ध गरिदिएकाछन्‌ । जस्तै- विष्णुलाई गरुड, देवीलाई वाघ, यमराजलाई राँगो र गणशलाईमुसो । आजको जमाना हुँदो हो त विष्णुलाई गरुडको सङ्टा हेलिकोप्टर दिङँदाहो । त्यस्तै अरूलाई पनि दजा हेरी कार, स्कुटर, रिक्सा, साइकल वितरण गर्दैगणेशजीलाई चाहिँ गाडाकै प्रवन्ध गरिन्थ्यो कि ः भन्नाको मतलव आजकाहिन्दूले महादेवको बन्दोवस्त गर्नुपरेको भए या महादेव अहिलेसम्म रहेका&lt;br /&gt;
१७४ - भैरव अर्यालका हात्यव्यड्ग्य&lt;br /&gt;
भए त्यही साँढे चढी के हिँड्दा हुन्‌ । यतार्उात हिँडन कमसेकम एउटामर्सिडिज कार र हिमालयमा ससुराली जात एउटा विशेष किसिमको हेलिकोप्टरत उनलाई चाहिन्थ्यो, चाहिन्थ्यो । तर जान दिकँ उस बेला जे भयो, भयो ।महादेवको विशेष वाहनमा श्रीमान्‌ साँढे नै नियुक्त भयो ।&lt;br /&gt;
त्यति उच्च ओहदामा नियुक्ति पाउने योग्यता साँढेसित के थियौ रभन्ने प्रश्न उठाउने आवश्यकता नै छैन । कारण योग्यताभन्दा माथिका दुइटामहायोग्यता कसित थिए । पहिलो त सांढै भनेको गाईको साक्वै लोग्ने हो,उसकी श्रीमतीसित आमाजस्तै एउटा धार्मिक साइनो हाम्रो लागेको छ । यहीसाइनोले उपल्लो नातेदार भएको साँढेलाई तल्लो ओहदामा राख्ता उसकोप्रतिष्ठा घट्ने कुरा त छँदै छ, दुनियाँमा नसनाताको महत्त्वै नासिँदै जान बेरछैन । साँढेको अर्को महायोग्यता हो उसको फुँकार । आध्यात्मिक जगतमाऔँकारको जति महत्व छ व्यावहारिक जगतमा फुँकारको उत्तिकै महत्त्व छभन्ने कुराको ज्वलन्त प्रतीक साँढेले पाएको सम्मान हो । क रुष्ट भयो भनेपर्खाल भत्काउन, बाली बेमाख पार्न र फाँक्क र फुँक्क गरी मान्छे हान्न सक्छ,त्यसैले उसलाई एउटा माथिल्लो पदमा सुशोभित गरिदिन पाए जुरो नचाउँदैजिभ्रो मिठयाइरहन्छ, सायद यही सोचेर उसलाई त्यत्रो ओहदा प्रदान गरिएकोहोकि ? जे होस्‌-&lt;br /&gt;
महादेवको विशेष वाहनमा नियुक्त भएकोले साँढेको चुरीफुरी निश्चय नैकुनै मन्त्रीको पी.ए. को भन्दा कम छैन । मन्त्रीज्यको आदेश खोज्नेले पी. ए. लाईरिझाउनुपर्छ भन्ने पद्धतिको श्रीगणेश नै हिन्दूहरूले साँढेबाट गरेका छन्‌ ।त्यसैले पशुपतिनाथको दर्शन गर्नुभन्दा पहिले उनको अगाडि लँगौटीसमेत नलगाएरगजधम्म बसेको लबस्तरो साँढेलाई साष्टाङ्ग प्रमाण गर्नुपर्छ । बाली फाँडोस्‌ किमान्छेलाई हातोस्‌ उसलाई लट्ठी देखाउनु महापाप ठानिन्छ । जिमीदारलेजतिसुकै अत्याचार र व्यभिचार गरे परि नेपाली किसानले ठूलाबडासित जौरीखोज्न हुन्न भनी सहनुपरेझैँ हिन्दूहरूले सढिको अत्याचार सहँदै आएका छन्‌ ।साँढेको सिङमा हाम्रो इहलोकको भाग्य निर्भर गछ भने सांढेको पुच्छर परलोककोनिम्ति बैतरणीको &#039;झोलुङ्गे पुल हुन्छ रे ! वृषोत्सर्ग हिन्दूको तर्ने उत्सव, गाईपुत्रकोजीवनोत्सव । यस दिन त्रिशूलचक्रको ब्याज भि्ने सौभाग्य पायो भने गाईपूत्रलेआजीवन छाडा हुने अधिकार पाउँछ- साँढा भएर खाने बिर्ता पाउँछ । उब्जाउनेर कमाउने झन्झट साँढेलाई पर्दैन । तर अपसौच के भने साँढे हुने सौभाग्यदुई-चार भाग्यमानीले मात्र पाउँछन्‌, बहुसङ्ख्यक गाईपुत्रहरूको निम्ति त&lt;br /&gt;
साङ.” १७४&lt;br /&gt;
वालकैँमा भेसेक्टोमी गरर मखमा पेरुङ्गो लगाई काँधमा जुवा बोक्नुसिवाय अर्कोवाटो रहदिन । त्यमैले सढि सामन्त हन्छ, गोरु सर्वहारा । साढे गोराझैँ रजाइँगछ, गास निग्राकै काजन्छ, साढै शक्तिपूर्ण स्वतन्त्र र स्वच्छन्द नेता बर्गमा पुग्छ,गारु लरलाम्ज जनता &#039;&lt;br /&gt;
साढेको आफ्नो खुव्री &#039;फकार मात्र ही टन त. जेर्जात अहङ्गार उसमाचढ्छ त्यो त्रिशूलकै प्रतापको &#039;फल हो । यसो भनेर साढेको सम्पूर्ण प्रसिद्धिमहादेवको वाहन हुनाले मात्र भएको भन्नुचाहि गाइको बेइज्जती गर्नु हो ।उच्च ओहदामा पुर्ने श्रीमतीका श्रीमान्ले “चिन्नुभएन : म फलानीकीश्रीमान्‌ हुँ&#039; भनी फुलेर परिचय दिएझैं साँढे पनि जुरो नचाउँदै गर्व गर्छ- &#039;मगौमाताको पतिदेव हुँ ।&#039; मास्टरकी श्रीमतीलाई वर्णमाला नखारीकनै मास्टर्नीमान दिएझैं दिने हो भने सांढे पदेन हाम्रो गौपिता हो । पतिको अस्तित्वविनापत्नीको अस्तित्व आधा हुने हाम्रो संस्कारअनुरूप गाईलाई मान्दा साँढेलाईनमान्नु आधा गाईको पूजा गर्नुजस्तै हो । तर यस तथ्यलाई कत्ति ध्यान नदिईहामी गाईतिहार मान्छौँ, साँढेतिहार मान्दैनौं, गाईजात्रा गर्छौं, सांढेजात्रा गर्दैनौँ ।यो हेर्दा आफैँले सम्मान गरेको साँढेको आफैँले अपमान गर्न खोजेजस्तोलाग्छ । गाईतिहार, गोरुतिहार मानी साँढेतिहार नमान्नु जनाना र नामर्दकोअगाडि पुरुषको उपेक्षा गर्नु होइन र ?&lt;br /&gt;
तर होइन, छोरीले राजीनामा दिएको भोलिपल्ट &#039;ज्वाइँ न स्वाईँ अगुल्टालेच्वाइँ&#039; भनेकै गाईमैयाँले छाडिदिनासाथ राँको बालेर साँढे लखेट्ने चलन पनियहाँ देखिएको छ । हाम्रो संस्कारमा जेसुकै होस्‌, व्यवहारमा गाईको निम्ति&#039;उक्तदान&#039; बाहेक साँढेको अरू योगदान के हुन्छ र ? जिभ्रोमा लोभ, जुरोमाअह्वङ्कार, सिङमा रिस र मनमा ईख लिएको सढि वास्तवमा फांटफाँडा रसमाजभाँडा तत्त्व हो, जो एकअर्कोसँग मिलेर बाँच्न सक्तैन । एकले अर्कोलाईदेख्नासाथ भुइँ खोसदै होक्काँ गर्छ र जुध्न थालिहाल्छ । कोही नपाए भित्तैमापनि सिड्ौरी खेलेर तुजुक शान्त गर्ने साँढेको प्रवृत्तिले मान्छेमा पति साँढा हुनेरहर जगाइदिन्छ । त्यसैले हामी कान्जी हाउस बनाएर थुन्न खोज्छौं, सांढहरूपर्खालमा सिड्औौरी खेलेर भत्काउन र भाग्न खोज्छन्‌ । हामी शान्तिशान्तिभनेर चिच्च्याउँछौं, साढिहरू होक्काँ-होक्काँ- गर्दै जुघिरहेछन्‌, सम्भव छ एकदिन दुई-चारओटा हान्ने सढिको जुधाइमा सँसारका सम्पूर्ण शान्तिप्रिय चाच्छाहरूकिचिन के बेर : मिचिन के बेर ?&lt;br /&gt;
अर्पणावराट परिवतित&lt;br /&gt;
१७६ भैरव अर्यालका हात्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सातसत्रीय.साहित्यदर्पण==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रस्तावना&lt;br /&gt;
छायावादी या मायावादी, प्रयोगवादी या उपयोगवादी, पुरातन यानूतनवादी आदिआदि जेजति बादीको नाम लिए पनि सारांश एउटै निस्कन्छ-साहित्य सबैँ बादविवादी रहँदै आएको छ । एक थरी वा एकताकाको व्याख्यार वर्गीकरण अर्को थरी वा अर्कोताकाका समीक्षाशास्त्रीहरूलाई मन पर्दैन ।मार्न्छोपच्छेको सिर्जना मान्छ्यैपिच्छेको पारख । त्यसैले तपाइँ-हामीजस्तापाठकलाई ठूल्ठूला ठेलामै ठेलिएका सृत्रहरूमा सही हालेर रटन्ताम्‌ गर्नुपर्ने केखाँचो : जव साँच्चो समीक्षा दुलम हुन थालिसकेको छ । यसकारण कसैलाईकल परोस्‌ या नपरोस्‌, मैले देखेको कुरा लेखेको छु, साहित्य तपसिलबमोजिमसान प्रकारका हुन्छन-&lt;br /&gt;
सातस्‌त्रीय साहित्यवर्पणा “ १७७&lt;br /&gt;
१. क्रीत साहित्यविकृत साहित्यअधिकृत साहित्य. स्वीकृत साहित्यअनुकृत साहित्यनिजीकृत साहित्य, परिष्कृत साहित्यअब संक्षेपमा प्रत्येक प्रकारको भाष्य पनि दिँदै जाँदा तपाईंहरूलाईपट्टाइ त लागोइन : ।लागिहालेमा शीर्षक पढेर छाडिदिनुभए पनि हुन्छ ।आफ्नो रचनाबाहेक अरू कसकसले केके गथासो गरेका छन्‌ पढेर समयफ्याँक्न बेकार । धेरैजसो रचना पत्रिकाका पत्रै भर्ने त हुन्‌ नि, सत्य, यो पनिमैले टाकटुक पारेको मात्र हो । आफू घागडान लेखक भएकोले राम्ररी लेख्नफुर्सत कहाँ पाउनु ?) अँ, कुरा के भने मेरो सातसूत्रीय साहित्यदर्पणको भाष्यपनि म आफैँ लेख्नै छु । (अचेल आफ्नो रचनाको आलोचना त कति घागडान्‌साहित्यकारज्यूहरू अरूलाई किन दुःख दिनु भनी आआफैँ लेखेर कल्पित वाविर्कल्पित नामले छपाउन थालेका छन्‌ भने मेरा सूत्रको मैल्यै व्याख्या नगरेकसले गरिदेला त ?)सुबोध भाष्यक्रीत साहित्य- बिषय वा प्रसङ्गले अर्को अर्थ नलागेमा क्रीत साहित्यभन्नाले किनिएको साहित्य भन्ने बुभनुपर्दछ । पैसा भए भेडाच्याङ्ग्रा मात्रैहोइन, मान्छेमान्छी नै किन्न पाइने संसारमा साहित्य मात्र किन्न नसकिनेकारण के छ र : साहित्य झन्‌ सस्तो छ- एउटा लम्बुकोट, जिम्बुको कोटा,निबुवा भन्सारको डिद्ठा, जेको लाभ देखाइदिए पनि गरिब साहित्यकार छभने जे पनि लेखिदिन्छ, लेखेको कापी मात्र होइन, लेख्ने कलम पनि उधारैमाबेचिदिन्छ । त्यसैले साहित्यको इतिहास पल्टाई हेर्नोस्‌ सामन्ती समाजमामात्र होइन, जस्तोसुकै प्रगतिशील युगा वा समाजमा पनि साहित्यको एउटाधारा स्तोत्र, स्तुति, प्रशस्ति र महिमामा रडर्माडएको पाइन्छ । खोज्दै र खोतल्दैगएमा गनिगनाउ गरी नकिनिएको भए तापनि अप्रत्यक्ष रूपमा यस्तो साहित्यकिनिएकै हुन्छ ।क्रीत साहित्यको &#039;ख&#039; श्रेणीमा त्यस्ता पुस्तकहरू पर्दछन्‌ जसको रचनाएउटाबाट भएको हुन्छ तर लेखकमा नाम दर्ता भएको हुन्छ अर्कै महाशयको ।&lt;br /&gt;
क कम ठुद ्ट त लु&lt;br /&gt;
१७८ “ भैरव अर्यालका हात्यब्यड्ग्य&lt;br /&gt;
टाढाको कुरा नगर भने हाम्रै कति जरसाहेब करसाहेबहरूले पत्ति कीर्तिराख्नाखातिर यसो गरेका थिए रे । &#039;ख&#039; श्रेणीका क्रीत साहित्य परिष्कृत पनिहुन सक्छ, उपयोगी पनि हुन सक्छ, तर &#039;क&#039; श्रेणीको क्षणिक स्वार्थपूरक मात्र ।&lt;br /&gt;
विकृत साहित्य- विषय वा प्रसङ्गले अर्को अर्थ नलागेमा विकृत साहित्यभन्नाले विकारग्रस्त या बिग्रिएको साहित्य बुभ्नुपर्छ । जति लाजभाँड लेख्नसक्यो, जति अरूलाई सराप्न सक्यो, अहम्‌ गर्जाउन सक्यो, जति चोरचार पार्नसक्यो, त्यति आधुनिकताको श्रेणी बढ्ने विकृत साहित्यको स्रोत पेरिस, न्युयोर्कर यस्तै अत्याधुनिक सहरहरू भए तापनि यसले अचेल नेपाली साहित्यजगत्‌मापनि आफ्नो कृहिएको खुट्टो घुमाउन थालिसकेको छ रे !&lt;br /&gt;
अधिकृत साहित्य- विषय वा प्रसङ्गले अर्को अर्थ नलागेमा क्नै न कुनैकुराको खास अधिकारप्राप्त मान्छेले लेख्ने साहित्यलाई अधिकृत साहित्यमान्नुपर्छ । प्रतिभा भए होस्‌, नभए नहोस्‌ कागत-गोस्वाराको सुब्बाले आफ्नीछोरी पोइल गएको उपलक्ष्यमा गरेको गुनासोलाई यो मेरो कविता छापिदिनुस्‌न भनेर कुनै सम्पादकज्यू कागतको कुपन माग्न जाँदा विनयपूर्वक भन्यो भनेनाइँ भनेर सुख ! अहिले अस्वीकार गरिदेओस्‌, भोलि पत्रिका छाप्ने कागतपाउँदैन । स्वीकार वा अस्वीकार गर्ने अधिकार सम्पादकैसित रहोस्‌ कागतकोअधिकार कसित हुन्छ, प्रेसम्यानेजरले एउटा छेउ न दुप्पाको कथा दिए पनिकमसेकम मुद्रणशुल्कमा अलिकति घटाइदेला भन्ने आशाले स्वीकृत गरिदिनुपर्नेहाम्रा पत्रिकाको स्थिति कसलाई थाहा नभएको हो र ? यसको मतलबअधिकारप्राप्त व्यक्तिहरू सबै उस्तै हुन्छन्‌ भनेको होइन, कति जना प्रतिभाशालीसाँच्चैको साहित्यकार पनि हुनुहोला ।&lt;br /&gt;
स्वीकृत साहित्य- घागडान-मण्डलीमा दर्ता भएर पनि झारा तिरेरलेखिने साहित्यलाई स्वीकृत साहित्य भन्नुपर्छ । एकेडेमीसियन वा लेखक सङ्घवा अरू कुनै यस्तै स्वीकृत संस्थाका स्वीकृत लेखक-कविले लेखेको रचनालाईयसोउसो भनी पन्छाउने कसको के तागत ? तर स्वीकृत कवि भयो भन्दैमाउसले लेखेको तमसुक पनि कविता हुन्छ भन्ने के ग्यारन्टी ? तर मान्नुपर्छ,स्वीकृत मान्छेले लेखेको जुनसुकै कीर्ति जस्तोसुकै खोक्रो भए पनि स्वीकृतैहुन्छ । बोक्रोभित्रको गुदी भेट्ठाउन नसक्नु पाठकको बुद्धिको कमी हो, बुभनु-भएन के ः&lt;br /&gt;
अनुकृत साहित्य- विषय वा प्रसङ्घले अर्को अर्थ नलागेमा अनुकृतसाहित्य भन्नाले अर्काको अनुकरण पारिएको साहित्य भन्ने बुझिन्छ । टी.एस्‌.&lt;br /&gt;
सातसृत्रीय साहित्यकर्पण । १७९&lt;br /&gt;
इलियटले खोक्रो मान्छे लेखे भने तपाईं उही शब्दशैली, उस्तै भाव र विचारराखेर &#039;छोक्रा मान्छे&#039; लेख्न सक्नुहन्छ । तर म त भन्छु साहित्यकार पहिलेअग्रजहरूको अनुकरण नै गर्छ, त्यसैले क्रीत, विकृत र अधिकृत साहित्यभन्दाअनुकृत साहित्यलाई वेस भन्नै पर्छ तापनि शतप्रतिशत मौलिकचाहिँ तपाईंभन्न सक्नुहोला जस्तो मलाई लाग्दैन ।&lt;br /&gt;
निजीकृत साहित्य- अरूले लेखेर छपाइसकेको या सुनाइसकेको कृतिलाईसुटुबक नामसारी गरेर आफ्नो गरिएको साहित्यलाई निजीकृत साहित्य भन्नुपर्छ ।हुन त क्रीत साहित्यको &#039;ख&#039; श्रेणीसित यसको रचनात्मक सीप मिल्छ तरक्रीत साहित्य किनिएकै .हुन्छ, कमसेकम लेखकले केही पाएको वा पाउनेआश्वासन पाएको वा आशा कमाएको हुन्छ तर निजीकृत साहित्य अर्कालेबिहा गरेर तैजान लागेकी दुलहीलाई कृष्णले हरेझैँ देखादेखी हरिएको अथवाअर्काको बगलीको नोट सुट्ट तानी आफ्नो बगलीमा घुसारेजस्तो सोझै चोरिएकोहुन्छ । निजीकरण कला जानेको छ भने क प्रतिभा र परिश्रमबिना नैमहामान्य साहित्यकार हुन्छ, त्यसैले निजीकृत साहित्यको मात्रा पनि अचेलप्रशस्तै बढ्न लागेकोले असम्भव छैन यही खेस्रो पनि रहंदाबस्दा अर्कैकोनाममा नामसारी नभइजाओस्‌ !&lt;br /&gt;
अन्त्यमा एउटा छ, परिष्कृत साहित्य- विषय वा प्रसङ्गले अर्को अर्थनलागेमा परिष्कृत साहित्य भन्नाले परिष्कार पुगेको मौलिक र जीवनवादीसाहित्यलाई लिनुपर्छ, । परिष्कृत साहित्य छँदैछैन भन्न सकिन्न, तर अरू छप्रकारका साहित्यको दाँजोमा यो साह्ै कम पाइन्छ ।&lt;br /&gt;
परिष्कृत साहित्य अलिर्कात &#039;क्रीत&#039; पनि हुन्छ किनभने समाजले यसलाईधेरैधेरै मोल परे पनि किनेर पढ्छ । अलिकति विकृत पनि हुन्छ, किनभने यहाँमानवीय प्रवृत्ति तथा सामाजिक विकृतिहरूलाई कलात्मक ढङ्गले देखाएरसुधार्ने सजगता पनि दिइएको हुन्छ । अलिकति अधिकृत पनि हन्छ, किनभनेयो प्रतिभा, परिश्रम र अध्ययन एवं अनुभवले भाषा र साहित्यका अधिकारप्राप्तमस्तिष्क र मुटुको समन्वयबाट सिर्जना भएको हुन्छ । आलिकति स्वीकृत पनिहुन्छ तर यो स्वीकृति कुनै आफ्ना मान्छै भएको बोर्ड वा समितिबाट होइन,सबै किसिमका पाठक भएको समाजबाट । अलिकति अनुकृत पनि हुन्छ,किनभने यहाँ जीवन र जगत्‌को राम्रो, नराम्रो दुवै पक्ष इमानदारीसाथअनुकरण गरिएको हुन्छ र अलिकति निजीकृत पनि हुन्छ जसमा लेखकलेपूर्णतः निजी शैली र स्वरूप छाडेको हुन्छ र बीचको जुनसुकै एक पङ्क्ति&lt;br /&gt;
१८० ० भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
पढ्दा पनि यो फलानाको भनी ठ्याक्कै भन्त सकिन्छ ।&lt;br /&gt;
तर तपाईंलाई मात्र भनेको, उपल्ला पाँच प्रकारका साहित्य(निजीकृतबाहेक। मैले पनि निकै लेखेँ हुँला, तर परिष्कृत साहित्य भनेरअहिलेसम्म लेखेकोमा खाइ कुनचाहिँ देखाउँ, तपाईंलाई त म पक्कै ढाँदनसक्छु, तर आफैँलाई ढाँटन पो धौधौ पर्दो रहेछ । छातीमा हात राखेर भन्नोस्‌,।भन्नु पर्दैन, आफैं गम्नोस्‌। साहित्यकार हुनुहुन्छ भने तपाईंलाई पक्कै मेरैजस्तो अनुभव भएको होला । तर डर छैन, यो सातसूत्रीय साहित्यदर्पण पढेरआफ्नोआफ्नो कृतिहरूको समीक्षा गर्दै जान थाले भने एक दिन लाटाको खुट्टोपान बाटाँ&#039; कस्सो परोइन ? ।माफ राख्नुहोला- मैले यो सम्पूर्ण &#039;म&#039; को प्रयोग१०% मात्र गरेको छु, हिजोआज एउटा लेखमा ५०% सम्म मपाईँको प्रयोगगर्ने अधिकार लेखक- खास गरेर समीक्षकहरूलाई प्राप्त छ। हुन पतिमपाइँमहिमा नमिसाए लेखकको स्तर कसरी उठ्छ र हगि ?)&lt;br /&gt;
प्रतिबिम्बबाट&lt;br /&gt;
सातसृत्रीय साहित्यवर्पण -&amp;quot; 241&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[category: step 2]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A4%B2%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80_(%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%99%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%B8%E0%A4%99%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B9)&amp;diff=83</id>
		<title>गलबन्दी (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A4%B2%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80_(%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%99%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%B8%E0%A4%99%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B9)&amp;diff=83"/>
		<updated>2024-06-11T13:15:44Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;Source: https://nepalikitab.org/bhairab-aryal-galbandi/&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पुस्तक परिचय==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भैदव अर्यील&lt;br /&gt;
गलबन्दी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भूगिका==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घ्याम्पे भुँडीको विपक्षमा जयगानको फलाको उरालेर र अल्छे शरीरमाबेस्मारी काउकुती लाएर भ्रैरव अर्यालले हास्यव्यङ्गयलेखकका रूपमा आफ्नोकीतिंपताका निक्कै रमाइलोसित पहिल्यै फरफराइसक्नुभएको थियौ । उनैरमाइला लेखन्ते फेरि सबै पाङ्दुरे मुखुन्डाहरूको आन्द्राभुँडी धुतेर सत्यलाईनड्ग्याउन र असत्यलाई उदाङ्गो पार्न सुरिनुभएको छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यसरी नै उत्तरदायी कलाकारले सचेत रूपले समाजका मैलाहरूलाईउधिनेर देखाइदिन्छ र ती मैलाहरूलाई मिल्काउने सङ्केतले सुतेकाहरूलाईअगुल्टाले झैं &#039;झोस्तै बिउँफझाउँछ । लासवादी साहित्यको थुप्रोले निसास्सिएकोनेपाली वातावरण अर्यालजस्ता भित्तो पुन्याएर सत्यको पक्षमा कु्लन सक्नेथोरै मात्र साहित्यकार नभइदिए कहालीलाग्ने हुने थियो । उहाँ निर्धक्कभन्नुहुन्छ- “हो त नि यहाँ कसले के छोपेको छैन ? टेरिलिनको सूटलेदाउरिएको आङ छोपिन्छ, एक बट्टा पाउडरले चाउरिएको छाला छोपिन्छ,डिग्रीको साइनबोर्डले दिमुगको गोबर छोपिन्छ, मानको पगरीले बेइमानको :घ्याम्पो छोपिन्छ, मैत्रीको जालले ब्वाँसाको राल छोपिन्छ ।”&lt;br /&gt;
हास्यलेखको मूल उद्देश्य हँसाउनु होइन । यसले हँसाउने आवरणभित्रजीवनका गृढतम रहस्यहरूको उद्घाटन गर्छ । यस दृष्टिकोणले हेर्दा अर्याललाईसफल हास्यकार मान्नुपर्छ । उहाँभन्दा अगाडिका लेखकहरूमा केही कृत्रिमताजवरजस्ती ठोकठाक पारेर हँसाउने मूल उद्देश्यको निम्ति मिलाइएको बोधहुन्थ्यो । अर्यालका लेखहरूमा भने अनुप्रासबाट उत्पन्त हाँसोसमेत स्वाभाविकप्रवृत्तिकै रूपमा प्रकट हुन्छ । यस स्वाभाविकताले गर्दा नै अर्याल आजसम्मकाहास्यलेखकहरूभन्दा बढी सफल, बढी प्रभावशाली र बढी जनप्रिय हुनपुग्नुभएको छ ।&lt;br /&gt;
अर्यालको शैली आकर्षक हन्छ । झरौ नेपाली भाषाका शब्दहरूलाई&lt;br /&gt;
अत्यन्त उपयुक्त ठाउँमा उहाँ प्रयोग गर्नुहुन्छ । &#039;उडाउनु&#039; सित एकछिनउड्दा&#039; मा नेपाली क्रिया &#039;उडाउनु&#039; का विभिन्न अर्थको व्याख्या गर्दै हास्यकोसाह्दै राम्रो भाषिक उदाहरण लेखकले दिनुभएको छ । वास्तबमा शब्दढुकटीकोज्ञानबाट वञ्चित हाम्रा बहुसङ्ख्यक लेखकहरूको बीचमा शब्दज्ञानले भूषितथोरै चम्किला नक्षत्रहरूमध्ये एक हुनुहुन्छ भैरव अर्याल । हुन त हास्यकोक्षेत्रमा अरूले पनि प्रवेश गरेका छन्‌ तापनि तिनको मूल उद्देश्य झर्राशब्दहरूलाई टर्रा प्रमाणित गर्ने रहेकाले अर्यालको जस्तो हास्यलाई व्यापकक्षेत्रमा साधारणीकरण गर्ने क्षमता तिनीहरूमा पाइन्न । ती हास्यमा जबरजस्तीहँसाउने जमर्को र तुच्छ व्यङ्ग्य हुन्छन्‌ तर अर्याल त्यस्तो व्यङ्ग॒यलाई मनपराउनुहुन्न । अर्यालको व्यङ्ग्य चित्तबुभदो, फराकिलो र स्थायी हुन्छ ।उदाहरणको लागि अर्यालको यस व्यङ्गञयलाई लिन सकिन्छ, “निरस्त्रीकरणकोप्रस्ताव एउटा गलबन्दी हो- आणविक गाँडको । शान्तिवार्ता एउटा गलबन्दीहो- करतुत र कुचक्रका गाँडको । यसरी सोच्तै ल्याउँदा क ठम्याउँछ- कमात्रै होइन, उसको समाजै गँडाहा छ, उसको युगै गँडयाहा छ । आफू चुत्थोमान्छे भएकोले साह्रै ठूलाको कल्पना गर्न सक्तैन र मात्रै, नत्र क यो पनिठान्दो हो- यो विश्व नै ब्रह्माण्ड नभई ब्रह्मगाँड होला । पृथिवी त्यसगाँडमाथिको खटिरा, अरू हुन सक्छ- मान्छेचाहिँ त्यस खटिराभित्रका कीरा ।”&lt;br /&gt;
&#039;गलबन्दी&#039; निबन्धले एकातिर तुलेगाँडोको विवशतालाई अघि तेर्स्याएरहामीलाई मरीमरी हँसाउँछ भने अर्कातिर दोष, कुरूपता र अयोग्यता लुकाएरगुण, रूप र योग्यताको पगरी गुत्ने फटाहाहरूको आन्द्राभुँडी केलाएर सत्यकोउद्घाटन व्यङ्ग्यात्मक रूपले गर्छु । &#039;टाउको&#039; अथवा &#039;आलु&#039; जस्ता मामुलीविषयहरूलाई लिएर पनि लेखकले एक प्रकारले हाम्रो स्वाँगे र पाखण्डीसमाजको चित्तबुभदो चित्र उपस्थित गर्नुभएको छ । &#039;मान्छे मोडेल १९६७&#039; र&#039;पच्चीसौँ शताब्दी अझ्गप्रत्यङ्गमा&#039; ले वैज्ञानिक कलपुर्जाले हाम्रो जीवनमाल्याएका यान्त्रिकताको व्यङ्ग्यात्मक दृश्य देखाउँछन्‌ भने &#039;सातसूत्रीयसाहित्यदर्पण&#039; ले हाम्रो साहित्यिक क्षेत्रका साइँदुवाहरूको राम्रो झाँको झारेकोछ।&lt;br /&gt;
अर्यालका हास्यलेखहेरूलाई दुई तहमा हेर्न सकिन्छ । बाहिरी तहमाती हँसाउन लेखिएका हुन्‌ तर हँसाउने उद्देश्यबाहेक अर्को उद्देश्य लेखककोछ। यसको भित्री तहमा उहाँ सामाजिक अन्याय र शोषणलाई उदाङ्गोपार्नुहुन्छ । &#039;साँढे&#039; शीर्षक निबन्ध बाहिरी तहमा साँढेसम्बन्धी हास्य मात्र हो&lt;br /&gt;
तर भित्री तहमा यसले विश्वका मै हुँ भन्ने घमन्डीहरू, चाकरीवाला,मपाईंवादीहरू र बुद्धिहीन ढँटुवारेहरूका कार्यहरूलाई विश्लेषण गरेरमानवतावादको स्थापना गर्न खोजेको छ । &#039;चुरोट केही झिलिमिली संस्मरण&#039;मा पनि दुई तह छन्‌ । मामुली चुरोटको तलतलबाट यस निबन्धले उँभोउठेर मानवका मानसिक कमजोरीहरूलाई साह्रै राम्ररी प्रकट गरेको छ।मान्छे अर्कालाई उडाउँछ अनि आफैँ उडेको चाहिँ पत्तो पाउँदैन र &#039;ए ज्याभुसुक्कै !&amp;quot; भन्दै आफ्ना कमजोरीहरूलाई लुकाउँछ । अर्यालले यिनै मानवकाविश्वव्यापी कमजोरीहरूलाई ढन्डेसो खुस्कुन्जेलको व्यङ्ग्य गर्नुभएको छ ।ज्ञे होस्‌, यो सँगालोले सिद्धहस्त हास्यव्यङ्गग्यकारको प्रशंसनीय प्रतिनिधित्वगर्दै हामी पाठकहरूलाई रसिला उपमाहरू, अनौठा तर सुन्दर भनाइहरू रसफल कलात्मकताको भोज प्रस्तुत गर्छ । हाम्रो समाजको यथार्थ र कलात्मकचित्रण नडराई गर्ने अर्याल यसरी हाम्रो हृदय जित्न सफल हुनुभएको छ ।हास्यव्यङ्गयको क्षेत्रमा कौवा प्रकाशतले गरेका सुनौला कार्यहरूमायस सङ्घलनले अवश्य नै केही सुगन्ध त थप्ने नै छ भनेर म फुरुङ्ग छु।&lt;br /&gt;
जमल, काठमाडौँ तानासर्मा१५.४.१९६९,&lt;br /&gt;
(प.सं. बाट)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==नवौँ नवकीसिली==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्यालज्यूले कविता नलेख्नुभएको होइन, दुई-चारओटा तक्मैझुन्डघाउनुभएको छ । लेख-निबन्ध नलेख्नुभएको होइन, त्यस्तै लेखेर जीवनघान्नुभएको छ । तर पनि मान्छे उहाँलाई बढी चिन्छन्‌- हास्यव्यङ्गझयकारकोनाताले । उहाँका हास्यव्यङ्ग्यहरूको सङ्घलन काउकुती र जय भुँडीले पाएकोलोकप्रियताकै लोभले हामी उहाँको यो तेस्रो सङ्ग्रह प्रस्तुत गर्दै छौँ- गलबन्दी ।फुकाएर हेरे यहाँ जीवन र जगतका अनेकौँ विसङ्गतिका गाँडहरू देखिन्छन्‌ रती गाँडमाथि आधुनिक युगले उमारेका पुत्लेपाङ्रै फोकाहरू देखिन्छन्‌ । योदेख्ता भैरवको हास्यव्यङ्गग्यबारे कृ्‌ष्णचन्द्रसिंहले भन्नुभएको कुरा मान्न करलाग्छ- &amp;quot;...राँकोको उज्यालोमा दसै अवतार पर्दामा टाँगिन्छन्‌, भैरवकोछुबाइमा नेपालीको आधुनिक जीवन व्यक्तिन्छ । पर्दा बोल्दैन, इतिहास लाटिन्छ,मूक जनता मन बहलाई आत्मसन्तोष गर्छन्‌; तर भैरवका व्यङ्ग्यले मथिङ्गलधुन्छ । सामाजिक विकृति र विरोधाभासहरू उपहास भई नाङ्गिन्छन्‌ । जीवनकोछन्दहीन व्यथाप्रति सहानुभूति व्यक्तिन्छ ।&amp;quot; हुन पनि अर्याल ग्रामीण वाअश्लील खालका ठट्टा गरेर बलात्कार हँसाउन खोज्नुहुन्न, न त कुनै व्यक्तिलाईगिज्याएर लेख्नुहुन्छ । इन्द्रबहादुर राईले उहाँको काउकुती छुँदै लेख्नुभएकोछ- &amp;quot;अर्यालको व्यङ्ग्य कसैलाई ताकेर होइन, केहीलाई ताकेर हुन्छ ।”&lt;br /&gt;
चिन्तनशील कवि र युगअवस्था बुझेको पत्रकार भएर पनि होला,हास्यव्यङ्कग्यको परिवेशलाई अर्यालले सबैँ हिपटाइट र ठाडो टुपीमा मात्रैअलमल्याउनुभएन । गलबन्दीमा उहाँ राष्ट्रिय, अन्तर्राष्ट्रिय जीवनका विभिन्नपक्षमा ओढाइएका वाघबुट्टै गलवन्दीहरू फुकालेर चियाउन पुग्नुभएको छ ।अण्‌बम र अपोलो, मानवताको नारा र काला-गोराको जातिभेद, हैजा लागेकोबृढो र मुटुको परिवर्तनसम्म उहाँले कलमको सुइरो चलाउनुभएको छ।कवित्वले उहाँको शैली साजएको छ । व्यापकताले बौद्धिकता नअंगाली सुख&lt;br /&gt;
पाएको छैन । त्यसैले सस्तो हाँसो खोज्नेहरूले यहाँ केही पाउन नसक्लान्‌, तरबुद्धिजीवीहरूले पक्कै रुचाउलान्‌ भन्ने हामीले आशा गरेका छौँ ।&lt;br /&gt;
यही आशामा दसतिर छरिएका निबन्धहरू बटुली यसलाई सङ्ग्रहकोरूप दिनु हामीले आवश्यक ठानेका छौँ । कौवा प्रकाशनको उद्देश्य नै नेपालीहास्यव्यङ्ग्यसाहित्यको सेवा गर्नु हो । मात्रा बढाउन होइन, स्तर बढाउन पनिप्रकाशनले धेरै क्रा गर्नु छ । यसभन्दा अघिका प्रकाशनलाई झैँ यसलाई पनिप्रेम गरिदिनुभए प्रकाशनको हौसला अझ बढ्नेछ ।&lt;br /&gt;
यसको सङ्गलन र प्रकाशनको निम्ति अनुमति दिनुहुने लेखकलाई,भूमिका लेखिदिनुहुने तानासर्मालाई र व्यङ्गयचित्रको निमित्त पारिवारिक मित्रटेकवीर मुखियालाई प्रकाशन धन्यवाद टक्रचाउँछ ।&lt;br /&gt;
यसमा सङ्ग्रह गरिएका टुक्राहरू पहिले प्रकाशित गर्ने रमश्षम, रूपरेखा,रचना, रत्नश्री, अर्पण, प्रतिबिम्ब, सगुन पत्रिकाहरूप्रति पनि प्रकाशन आभारप्रकट गर्दछ ।&lt;br /&gt;
आत्मदेव शर्माआज प्रोप्राइटर, कौवा प्रकाशनअसारको पन्ध ढुङ्घाअडडाबजार, काठमाडौँ ।&lt;br /&gt;
२०२६&lt;br /&gt;
(प.सं.बाट)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==&#039;उडाउनु&#039; सित एकछिन उड्दा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एउटा देशले भूउपग्रह उडाएकै दिन मेरो घरमा बिरालाले दूधउडाइदिएछ । सन्जोग पनि कहिलेकाहीँ कस्तो पर्छ भने एउटा बिनसित्तिकोकराले पनि एकछिन सित्तैँ अलमल्याइदिन्छ । न त्यो देश र बिरालामा कुनैसम्बन्ध छ, न भउपग्रह र दुधमा समानता । तर क्रियाचाहिँ दुइटैले एउटैगरे- उडाइदिए । भूउपग्रह उडाउन कैयौँको साधन र साधना लाग्यो, तरबिरालालाई द्ध उडाउन त साधनको नाममा एउटा चम्चा चाहियोसाधनाको नाममा केही चालचल । तर यी दुवै कामलाई उडाउनु नै भनिन्छभने उडाउने क्रियालाई महत्त्वपूर्ण भन्ने कि मामुली ? यो पनि एउटा प्रश्नहो । तर कस्तो केटाकेटी प्रश्न : यो ल एउटा भाषाको चमत्कार मात्र हो ।हाम्रो देशमा एउटा मान्छेका दसोटा सिद्धान्त भएकै हाम्रो भाषामा एक&lt;br /&gt;
“ज्डाउनु&#039; लित एकछिन उड्दा - १२७&lt;br /&gt;
शब्दका अनेक अर्थ हुन्छन्‌ । उदाहरणको लागि आफ्नो लभ परेको दिन आफ्नोनजिकको नातादारको जुठो परेको हुन्छ । जीवनको असङ्घति भनेको यही नयै ? त्यसैले बिरालाको दूधउडान र त्यस देशको भूउपग्रहको उडानमा पक्कपर्नुसट्वा अर्को कुनै महत्त्वपूर्ण समस्यामा विचार गर्नु राम्रो । मन अर्कोविचारणीय समस्या खोज्न थाल्छ, तर मगजको तन्तु हल्लाउँदै एउटालेप्वाक्क सुनाउन आउँछ- “रामबहादुरले त सीतादेवीलाई उडाएछ नि बुझिस्‌ !&#039;रामबहादरले सीतादेवीलाई क्यारेभलमा राखेर ब्याङ्ककतिर उडाएको हो किपछ्यौरामा तानेर भण्डारकोठातिर कुदाएको हो- त्यो दुबिधामा अलमलिँदैनअलमलिई म साथीसित सोध्छु- “उडाएछ ? कसरी थाहा पाइस्‌ :” कथप्छ- “अहिले त्यहीँ रेस्टुराँमा सबै ठिटाहरू रामबहादुरलाई उडाउँदै थिए ।&amp;quot;अब भएन के : एकै दिनमा सुन्नुघरेका यी चार उडानका समाचारहरूबाटबुझेको सानो क्षितिजमा कौतूहलको चारचोसे विमान फन्का मारीमारीउड्न थाल्छ-&lt;br /&gt;
अन्तरिक्ष जान संलग्न देशले भूउपग्रह उडायो ।&lt;br /&gt;
बिरालाले दूध उडायो ।&lt;br /&gt;
रामबहादुरले सीतादेवीलाई उडायो ।&lt;br /&gt;
ठिटाहरूले रामबहादुरलाई उडाए ।&lt;br /&gt;
उडाउनुको यसै फन्कोमा कान्छाले बेलुन उडाएको, ठाइँलाले चङ्गाउडाएको, काइँलाले गाँजा उडाएको, साहिँलाले परेवा उडाएको, माहिलालेतहबिल उडाएको, जेठाले सर्वस्व उडाएको सम्झना पनि फन्कामाथि फन्काथप्तै उड्न थाल्छन्‌ । अनि म फेरि छक्क पर्छु- कति बिचित्र क्रियाछयोउडाउनु &#039;&lt;br /&gt;
तर छक्क पर्ने क्रा पो के रह्यो र : प्रकृतिले पक्षपात गरेर मान्छेलाईपखेटा दिएन । त्यसै झोकमा होला, उसले उड्नु र उडाउनुका अनेकौँक्रियाहरू सिक्न थाल्यो । उड्नुमा भन्दा उडाउनुमा आफ्नो पुरुषार्थ व्यक्त हुनेदेख्न थाल्यो । अझ भनूँ भने प्रकृतिले त उडाउनलाई प्वाँख र पखेटा नभईनहने गराएथ्यो, तर मान्छेले मान्छेलाई बिनापखेटा हावामा पनि उडाइदिनलाग्यो, हाहामा पनि उडाइदिन लाग्यो । त्यसैले एपोलो र सौयुजका उडानसफल भएकै ताका आफ्नो घ्याम्पोउडान असफल भएर मध्यटौँडखेलमाअरिनकाण्ड परे तापनि नेपालीहरूसमेत उडाउने काममा पछि परेका छैनन्‌ ।भनूँ भने उडाउने क्रियामा नेपालीहरू अरू दुई पाइला अगाडि नै छन्‌ भन्ने&lt;br /&gt;
१२ ” थैरव अयलिका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
मेरो धारणा छ; किनभने प्रकृति प्वाँख र पखेटा खोजिरहोस्‌, विज्ञान अक्सिजनर नाइट्रोजन जोडिरहोस्‌, हामी कुरैक्रामा कैयौँ कुरा भुर्र उडाइदिन्छौं । हाम्रोभाषा स्वयं कति वैज्ञानिक छ भने उडाउने क्रियामै उसले सयौँ प्वांख रपखेटाहरू जोडिराखेको छ, त्यसैले कसैले चाहेमा यहाँ पच्चीस पैसामाजुँगादाह्री उडाउन सक्छ, सोह्रठाडीमा घरबारी उडाउन सक्छ; अलिकतिभेटीघाटीले एउटा गजबको ठेकदारी उडाउन सक्छ; एक-दुई जनाले धर्मछाडे एक-दुई हजारको धर्मभकारी उडाउन सकिन्छ । उडाउनुलाई यतिव्यापक र बहुउद्देश्यीय गराई आफ्ना &#039; कैयौँ क्रियाप्रतिक्रियासित सम्बद्ध राख्ननेपालीहरूले कम श्रम र समय खर्चेका छैनन्‌ । त्यसैले एउटा कागतकोघ्याम्पो उडाउन असफल हुँदैमा हामीले आफूलाई उडाउन नजान्ने भनीआत्मग्लानि लिनु पर्दैन । हावामा उडाउने प्रतियोगिता अमेरिका र रूसले गर्दैरह्न्‌, हाहामा उडाउने विज्ञानको लागि विश्वले नेपालबाट धेरै कुरा सिक्नबाँकी नै छ। मउडाउने काम गर्न वैज्ञानिकहरूलाई विमान र वेधशाला नभई हुँदैन,तर हाम्रा क्रषिमुनि मन्त्रैमन्त्रले पहाड उडाइदिन्थे रे, हाम्रा गुभाजूहरू तन्त्रमन्त्रलेहाड उडाइदिन्थे रे । त्यसैले मान्छे जाबालाई उडाउन विमान र बेधशालाकोके खाँचो ? आजको युगमा मन्त्रतन्त्रको खोजीनिती झन्‌ कल्ले गरिरहोस्‌ ?हो, कसैलाई मेचैसमेत उडाइदिनु छ भने यसो चुक्लीसुक्ली लगाइदिए भइहाल्यो,होइन; सामान्यलाई सामान्दै किसिमबाट उडाउनचाहिँ त दुई चुच्चाको एकजमघट भए जत्ति भने पनि पुग्छ । त्यसैले धारामा होस्‌ वा चौतारामा होस्‌;सडकको पेटीमा होस्‌ कि रेस्टुराँको कुर्सीमा होस्‌, हामी चुच्चैचुच्चा मिलाएरएउटा बिचित्र बेधशाला बनाउन सक्छौँ र धमाधम मान्छे उडाउन सक्छौँ ।उडाइने मान्छे भोजपुरमा होस्‌ कि भक्तपुरमा होस्‌, भोज खान लागेकोहोस्‌ कि भोकै मर्न आँटेको होस्‌, उसको उपस्थितिबिना नै उसलाई भुर्रउडाइदिन सक्नु हाम्रो उडानको अद्वितीय विशेषता हो । अर्को विशेषता के छभने जुन बेला तपाईं अर्कालाई उडाइरहनुभएको हुन्छ, त्यसै बेला तपाईंलाईअर्कोले उडाइरहेको हुन्छ । त्यसैले यो उडानमा जति आनन्द आउँछ, उडाउनेलेनै पाउँछ, उड्ने बिचराले कहाँकहाँ कसकसले कसरीकसरी आफूलाई उडाउँदैछन्‌ भन्ने कुराको सुइँको पाउँदैन । उडाउने कलामा अशिक्षित र गाउँलेहरूभन्दासभ्य र शिक्षितहरूले बढी सफलता पाउनु स्वाभाविकै हो, किनभने आजकोशिक्षा र सभ्यता नै गराइदिनुमा भन्दा उडाउनुमा बढी लहसिएको छ । त्यसैले&lt;br /&gt;
&#039;उडाज्नु&amp;quot; लित एकछिन उड्दा “ १२९&lt;br /&gt;
तपाईं मलाई उडाउनुहुन्छ, म तपाईंलाई उडाउँछु । हामी दुबै जनाको भेटभए फलानालाई उडाउँछौँ । उड्नु र उडाउनुको यस अभियानमा घरकोतरकारी समस्यादेखि अफिसको सरकारी फाइलसम्म न केहीको पीर, नकसैको परवाह ! अरूलाई उडाउँदा पाइने एउटा गुलियो रसमा रसना रसाउँदैएकैछिन हल्ल हाँस्न पाइन्छ; आफ्नो अहंमा एक थप्की लगाउँदै बाँच्नुको मजाचाख्न पाइन्छ ।&lt;br /&gt;
यो त भयो अनुपस्थितिमा उडाउने कुरा । कोही मान्छे अघिल्तिरैउपस्थित छ र उसलाई उडाउनु छ भने थाल्नोस्‌ तपाईं उसको तारिफ गर्न ।उसको टोपीको टुप्पो सगरमाथाको जस्तो छ कि गौरीशङ्गरको जस्तो छ ?त्यसको बयानबाट सुरु गरी अन्त्यमा भनिदिनुहोस्‌- “चाहेको भए तपाईँउहिल्यै केके भइसक्नुहुन्थ्यो !” यो दिव्य वचन सुन्नासाथ क आफ्नो भित्र-बाहिर हेर्दै नहेरी अहंका पखेटा फटफटाउन थाल्छ र एकैछिनमा भारहीन,भएर स्वयं उड्न थाल्छ- “प्रधानमन्त्रीसम्म पाएको भए सोच्नुहुन्थ्यो, मन्त्रीजाबो को भइरहोस्‌ !&amp;quot; तपाईं थपिदिनुहोस्‌- “यहाँजस्तो योग्य व्यक्तिले मन्त्रीमात्र हुनु त नसुहाउने नै कुरा हो !” अनि क झन्‌ अकासिन्छ र आफूबाहेकसबैलाई लम्फूलम्फू देख्न थाल्छ । तर आफूलाई कति हाइलम्फू ठानेरउडाउँदछन्‌, बिचराले पत्तै पाउँदैन । उडाउने योचाहिँ कलामा उडनेलेआत्मतृप्तिको महँगो मेवा पाउँछ, उडाउनेले मनोरञ्जनको सितनस्वरूप सकेदुई घुट्को जाँडै पाउला नसके एक तुर्को चिया कतै नजा !&lt;br /&gt;
त्यसैले, मर्सिडिज कारले कसैका आँखासम्म धूलो उडाओस्‌ बा शिक्षितबेकारले एक थाल भातबाट दुई थाल भझिँगा उडाओस्‌- उडाउनु भनेकोवास्तवमा उडाउनु नै हो । यी सबै हेरिल्याएको खण्डमा बीसौँ शताब्दीउडाउने युग हो । राकेट उडाउनेदेखि पाकेट उडाउने कलासम्ममा आजजति प्रगति भएको छ, त्यति पहिले कहिल्यै थिएन । हिरोशिमा उडाउनेदेखिलिएर साँधसीमा उडाउनेसम्मका सयौँ उडान पृथिवीमा भएका छन्‌ भनेचन्द्रदेखि मङ्गलसम्मका कैयौँ उडान अन्तरिक्षमा भएका छन्‌ । तर मलाईसोध्नुहुन्छ भनेचाहिँ, आधुनिक उडानको इतिहास हनुमान्देखि सुरु हुन्छ ।हनुमानूले द्रोणाचल उडाए भने उनका वंशज वानरहरूले पशुपतिको पूजासामाउडाउनुमा के आश्चर्य; वानरले देवताको पूजासामा उडाउँछ भने वानरबाटविकसित नरले पृथिवी नै उडाउनुमा के दोष ?&lt;br /&gt;
रमभझमबाट&lt;br /&gt;
१३० ४ भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==चुरोट : केही झिलिमिली संस्मरण==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एकातिर बैँसदार मायालुको ओठ, अर्कोतिर गैँडामार एक कित्ता नोट,माझमा एक बट्टा मोटरमार चुरोट- यी तीनै थोक अहिले अगाडि परे भनेपहिले म कुनचाहिँ टिपुँला ? निद्वाविहीन एक रात बाह्र-एक बजेतिर मेरोदेमागमा एउटा प्रश्न गुजुल्टयो । निकैबेर भ्यालको डँडाल्तीमा ट्वालट्वालती&#039;रेर तरङ्गिएपछि एक्लै खिसिक्क ओठ फुस्क्यो- कहाँ पालिसदार हीरा, कहाँफुसिलकीरा ! जाबो दुईपैसे चुरोटको पनि कहीँ बैँसदार ओठ र गैँडामारपोटसँग तुलना हुन सक्छ ? धत्‌, बहुला कहाँको ! मैले आफैँलाई हप्काएँ, तर(प्काउँदाहप्काउँदै मानौँ नाइटैदेखि तुलबुलीको एउटा कस्तो मुस्लो उठ्योपने बसेको ठाउँमा बस्नै नसकी जुरुक्क उठेँ, भननन्न एक पटक कोठामापौँतारिएँ । झुन्डिएजति कोट, पैन्ट, कमिज, बुससर्ट सबका खल्तीखल्ती छामेँ,गउटा टफी कताबाट अडकेको रहेछ क्वाप्प मुखमा हालेर मर्मरी चपाएँ ।पैपनि तुलबुलीको रन्को छुटेन । अनि दराज, तखता, खोपा, मेच, बाकस,म्याल, ढोका सबका अन्तरकुन्तरतिर हात घुसारँ अस्ति नै हरायो भनेकोएउटा काँगियो पाइयो, ककसले खसालेर नभेट्टाएका दुई-तीनओटा दुईपैसे,बारपैसे र पाँचपैसे ढ्याक भेटिए । टेबुल र खाट सारेर मुन्तिरका घुरानहलाएं- एउटा भाँच्चिएको होल्डर, दुई-चारओटा गोरखापत्र, समीक्षा र नयाँ[माजका पत्र, साँचो हराएको एउटा ताल्चा, दुइटा बेजोडा मोजा, एउटा&amp;quot;लो रिबन यस्तैयस्तै अर्थ न बर्थका सत्र थोक फेला परे, तर खोजेको जे होपोचाहिँ हात लागेन । हैरान भएर एक गिलास पानी तन्न पिइदिएँ र तन्द्रङ्गल्टएँ त्यही भताभुङ्ग ओछचानमाथि । प्रश्न फेरि दोहोरियो- हँ, अहिले मलाईचाहिएको त : सुर्केस खोलेँ भने एउटा गैँडामार नोट कसो ननिस्केला, जेए पनि महिनाको पहिलै साताको जागिरदार॒ पो त ! बैँसदार मायालुकै कुरार भने कमसेकम आफ्नी पमनिन्ट त तुरुन्तै एभैलेबुल । यी दुई थोक पाएर&lt;br /&gt;
चरोट : केही क्रिलिमिली संह्मरण १३१&lt;br /&gt;
पनि यो तलबली किन, यो छटपटी किन ? किन भनूँ ः दानापानीको, सेक्सपानीकोअहपानीको प्यासभन्दा बेग्लै (:) त्यस बेला मलाई सताएको थियो अर्कै प्यासले,&lt;br /&gt;
माने- एक सर्को चुरोटको प्यासले । त्यसकारण ओठ न नोट, म घधुइँधुइँती&lt;br /&gt;
खोज्दै थिएँ चुरोटको एउटा ठुटै भए पनि कतै अलमलिएको छ कि भनेर ।&lt;br /&gt;
प्रत्येक वर्षझैँ- त्यो वर्ष पनि वैशाख १ गतेदेखि चुरोट छाड्ने माघ १पातेदेखिकै सङ्कल्प थियो । चुरोट खान छाडनु आवश्यक मात्र होइन, मेरोनिम्ति अनिवार्य पनि थियो । यो अनिवार्यता मैले नबुझेको होइन, बुभ्दाबुभ्दा-बुझ्दा कति बुझिसकेको थिएँ भने प्रत्येक चुरोट सल्काउँदा यही नै अन्तिमहो भनी आफ्नो तालिमी मनले सङ्कल्प पढिसक्थ्यो । तर तलतलै न हो, मेरासङ्कल्प सारालाई तलतलै पुन्याएर आफू तेलझैँ मास्तिर तहरिहाल्थ्यो । अनिपैतै आज एक दिनलाई भैगो, भोलिदेखि खाए के ?&#039; म दृढतासाथ सङ्कल्पदोहोस्याउँथेँ । यसै गरी आज एक दिनबाट यो एक महिना, यो एक महिनाबाटयो बाँकी वर्ष हुँदाहुँदै चुरोट छौड्नलाई नयाँ वर्षको प्रारम्भ पर्खने लुत्रे र झुत्रेतालले कहिल्यै छाडेन । सइल्पशक्तिको यो हीनता जिन्दगीकै क्षीणता हो भनीम नबुभ्ने त होइन, तर बुभदैमा त्यो दह्ढो भइहाल्ने पनि त होइन । चुरोट रक्यान्सरका सम्बन्धमा कति चर्चा सुनिए, पर्चा पढिए, तैपनि चुरोट छोड्नसकिँदैन । आजित भएर २०१९ साल चैत मसान्तको दिन बेलुका मैले आफ्नोलाइटर फोरफार पारी फ्याँकिदिएँ, आस्ट्रै किचकाच पारी मिल्काइदिएँ, बाँकीबचेका दुई-चार खिलीसहित बट्टा च्यातचुत पारी आफल्दिएँ । &amp;quot;ए, लाइटर तनफालौँ” भनी बराबर सलाई नपाएर भोगेका कतिपय सङ्टको- सम्झना उनीदिँदै थिइन्‌, तर मैले भीष्मको आवाजमा सगर्व उडाइदिएँ- “अब पनि मैलेचुरोट खाला भन्ने ठानेको कि?”&lt;br /&gt;
१ गतेदेखि नखाएको ४ गते बेलुका यो दसा ! मलाई आफ्नो कमजोरीदेखिरिस, घृणा, ग्लानि सबथोक उठे, तर सबैभन्दा अग्लो भएर उठ्यो फेरि उहीतलतल । हो, म साँच्चै तलतलाएँ, तर उपाय केही थिएन, गाउँको घरभएकोले पसल नजिक थिएन, आधा रातमा आधा कोस पर कसलाई उठाउनजाने ? बरु काकाकहाँ माग्न पठाकँ- एउटा मसिनो आशा उदायो । तर यतिजाबो क्रामा पनि आफ्नो दृढ प्रतिज्ञा अहिल्यै उनको अगाडि कसरी भन्गगर्ने ? मेरो पौरुष अनकनायो ।&lt;br /&gt;
अम्बलले न पौरुष भन्छ, न प्रेस्टिज ! तत्कालै एउटा घटनाको सम्झनाआयो । एकताका पोखराको एउटा गाउँले स्कूलमा म शिक्षक थिएँ । एक दिन&lt;br /&gt;
१३२ ८ भैँरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
यसै गरी चुरोट खान पाइएन । दिनभर पुग्ला भनियो, बेलुका त ठन्डाराम !भोलिपल्ट तलतलले सबेरै तल ओरालिहाल्यो । आँगनमा आफू बसेको घरकोहली हल्लँदै रहेछ । आफ्नो मास्टरी प्रेस्टिजलाई दाह्वाले सकेसम्म थिचेर त्यहीग्वाङ्ग्रौ खालको हलीसित मैले दीन पुकार गरेँ- &amp;quot;रामेदाइ, तिमीसित एउटाचुरोट छैन :&amp;quot; रामेले अर्साजलो मानेर भन्यो- “चुरोट बनाउँदै छु मास्टरसाहेब !”नभन्दै क बेलौती (अम्बा) का सुकेका पात टिपेर माड्दै रहेछ । म केटाकेटीहरूलाईपसल पठाउने धुनमा थिएँ, रामेले भुसा ल्याएर टक्रघायो । बूढी औँलाजत्रोकलात्मक चिलिममा अम्बाको पात माडेको धूलो हालेर निकालेको धूवाँ- नतमाखु, न कक्कड साँच्चै भुसाहा नै थियो त्यो ! “तानूँ त ?&amp;quot; मैले लजाउँदै सोधेँ ।“यति सात्तो चिलिम उचाल्न सक्नुहुन्न र तान्नै पन्यो, तान्नलाई डोरी पनिचाहिन्छ कि ?” रामे हल्ल हाँस्यो, मैले सुइँसुइँ भुसाहा तानेँ । भयालबाटकेटाकेटीले गिज्याए- “जात फाल्नु गहता&#039; झोलमा !” तर के लाग्छ, म्याकक्याकगरेर पनि तलतलले मूतको न्यानो तापिछाडचो । त्यसरी त लाज पचाइयो भनेउनलाई उठाएर काकाकहाँ चुरोट माग्न पठाउन के गाह्रो ! तर काका पनि तचुरोटपीडित रहेछन्‌ भने ? फेरि अर्को सम्झना आयो ।&lt;br /&gt;
एक दिन केटाकेटीमै काका (बलराम अर्याल) र म पढेर घर फर्कंदैथियौं । तलबी हुँदा त तीन दिन भरी भए तेह्र दिन पन्चट रहने आफ्नो खल्तीकोकुलाङ्गार बानी, त्यस बेला बिलकुल ढाक्रे बिद्यार्थी । एकातिर बाबुबाजेकोअघिल्तिर चुरोट नखाने हामी आदर्श छोरा, अर्कातिर एकान्तमा ठुटा बेरेर भएपनि मुख नधुवाँई नहुने हामी अम्बली मोरा ! अनि पैसा पनि सधैँ कहाँबाटपुगोस्‌, दुवै जना हरिकङ्गाल । टङ्गाल हुँदै कमलपोखरीबाट गौशालातिरको सडकमालुखुरलुखुर हिँड्दै थियौँ । हुन त भोकले पनि कम सताएको थिएन, तर भोकभन्दामापाको थियो उही तलतल ! रातो पुलनिर पुगेपछि तिनताकाका पुड्कापुड्काहाम्रा काकाले मायालाग्दो गरी प्वाक्क भन्नुभयो- “बाटामा राम्रोसित हेर्दै हिँड्‌है, त्यतिका पशुपतिभक्तहरू हिँड्दा यो सडकमा एउटा दुईपैसे ढ्याक कसौनपाइएला !” यो ठट्टा भइदिएको भए वरु त्यति हाँसो उठतैनथ्यो तर कुरो थियोमर्मान्तकै ! अहिले पनि त्यो बाटो हिँड्दा बुक वन र बिगिनसँं ट्रान्स्लेसनकाकिताप च्यापेर बाटामा ढ्थाक पाइन्छ कि भन्दै हिँडेका पैसाविहीन काका-भ्रतिजाका तलतलग्रस्त तुलबुले मुद्रा झलझली सम्झन्छु ।&lt;br /&gt;
चुरोट नपाउँदाका, सलाई नजुट्दाका, बाआमाले थाहा पाउलान्‌ भन्नेडरले लुक्ता-लुकाउँदाका चाखलाग्दा काण्ड कति छन्‌ कति- घरतिर,&lt;br /&gt;
च्रोट : केही क्िलिमिली सत्मरण 233&lt;br /&gt;
छात्रावासतिर, स्कूलकलेजतिर, अडडाअफिसतिर अनि सबैतिर । जतिसुकै प्रेस्टिजर नैतिकता राख्नुपर्ने मान्छे छ भने पनि चुरोटमा उसको केही लाग्दैन ।कहिलेकाहीँ चिन्दै नचिनेका मान्छेसित्त पनि एकोटा अप्ठ्यारो जनाउँदै चुरोटमागिएको छ, चुरोट नभएको बेलामा चिनेको मान्छे भेट भयो भने त &#039;केखोज्छस्‌ काना आँखा&#039; भइहाल्छ । माग्नै किन पच्यो र ! आफ्नो रित्तो खल्तीछामछुम पान्यो, चुरोट खाने मित्र रहेछ भने यसले चुरोट खोज्यो भनीबुझिहाल्छ । यो त मामुली नै भयो, सुटुक्क भनिदिउँ भने कहिलेकाहीं मैलेबाबुको खल्तीबाट चुरोट चोरेको पनि छु, काहलेकाहीं मेरो चुरोट चोरिएकोपनि छ।&lt;br /&gt;
यस्तै कुराहरू सोचेर आत्मग्लानि मेट्तै मैले उनलाई उठाएँ र भनेँ-“म त चुरोट छोड्न नसक्ने भएँ बा ! के गर्ने ?” आफूले गरेको भविष्यवाणीसत्य निस्कँदा उनी गर्वले गजक्क फुलेर नाक नेप्ट्याउन थालिन्‌- “मैलेसक्नुहुन्न भनेकै थिएँ, अब यस बेला के गर्ने तमाखु खाने ?&amp;quot; प्रस्ताव तगजबै हो, तर मध्यरातमा द्वार्रटवार्र हुक्का बजेको सुन्दा ख्याक आयो भनेरभाइबहिनीहरू कतै नभस्कून्‌, त्यो पनि छोडिदिऔँ, बाले सुन्नुभयो भने,&#039;चुरोटसुरोट खाँदैन भनेको छोरो त आधा रातमा हुक्का पो टुर्टुराउँदो रहेछए !&#039; त्यसौ भए पानोसानी मिल्काएर स्वाइँस्वाइँ तान्ने त ! कुरो योचाहिँलम्बरी ! अगेनो तलै भएकोले त्यो अकबरी तलतल मार्न तलै ओर्लिएर तमाखुहालियो । पानी रित्तिएको हुक्कामा नली नहाली स्वाइँस्वाइँ-स्वाइँस्वाइँ एकनासशौषले झैँ तानेर मैले तमाखु सिद्धचाउनै आँटेको थिएँ, आमाले आफ्नै कोठाबाटबोलाइदिनुभयो- “बाबु !” तलैबाट आवाज दिउँ, यस बेला तल किन :&#039;हजुर&#039; अन्नको लागि कोठामा पुगूँ, त्यति छिटो बिरालाचालले कसरी भन्याङउक्लने ? आफूलाई फेरि रिङटा लागेर छुट्टी ! तर छौराबुहारी कसैबाट आवाजनगएकोले उहाँले फेरि दोहोच्याउनुभएन र मात्रै, नत्र प्रतिज्ञा तोडेको अपराधकोफल तुरुन्तै फलेजस्तो हुन्थ्यो आफूलाई ।&lt;br /&gt;
चुरोट त खादैखान्नँ भन्दाभन्दै तमाखु र बिँडी दुई थोक नयाँ अम्मलसमातिए । घरमा तमाखु, बाहिर बिँडी, कति सजिलो &#039;! तैपनि चुरोट नै चाहिँनखाएकोले जे भए पनि गर्वै थियो । तर एक साँझ सिनेमाको मध्यान्तरमारोचकले झसङ्ग पार्दै भने- “ए चुरोट छाडेको होइन के ?&amp;quot; नभन्दै म तमजासित गोल्डफ्लेक उडाउंदै पो रहेछु । रमेश विकलले कन बेला चुरोटदिएछन्‌, आफूले सुइँम्याइएछ, कस्तो मजा बेहोसी !&lt;br /&gt;
१३४ / भैरब अर्यालका हात्यब्यड्रय&lt;br /&gt;
आफू चुरोट नखाने मान्छे, त्यसै पनि हामीले खाएको मन पराउँदैनन्‌,झन्‌ म त छाड्नै पर्ने र छोडिसकेको मान्छे, त्यसैले कति दिन अरूको अगाडिमैले चुरोट, बिँडी केही पनि खाँदै खाइनँ । एक दिन राति म एक जनासाथीकहाँ थिएँ, मलाई आफ्नो कोठा छोडेर उनी अर्कै घरतिर गइसकेपछि मैलेलुसुक्क चुरोट सल्काउन खोजेको, सलाई पाइनँ । ताल्चा नमारेका ठाउँजतिसबैतिर खानतलासी गर्दा पनि एक छेस्को सलाई पाइएन । आखिर कताकताबाटखाटमुनि एउटा थोत्रो हिटर फेला पार्न पुगेँ म । तार तानतुन पारी टुपिनजोडेको मात्र के थिएँ- बिजुली, भ्याप्पै । अब भएन के : चन्द्रावतीले भातखान लागेको जस्तो पो भयो आफूलाई । चुरोट खाने चाँजो मिल्दै मिलेन ।तिनताका मेरो डेरा थियो बाङ्गेमोहडानिर, बाङ्गेमोहडानिर डेरा भए पनि म तमान्छे सोझै थिएँ । भोलिपल्ट बेलुकी नौ-दस बजेतिर अफिसको काम रहोटलको माम सकी कोठामा पस्ता त आस्ट्रे, लाइटरसहित एक बट्टा क्याप्टेनसिरानमा सजिइराखेको ! छक्कै परेर सूचना पढेँ- “हिजो सलाई नपाएरजिल्लिएको बुझिएकोले सबधोक हाजिर छ, भोलि सबेरै एउटा हास्यव्यङ्ग्य-लेख प्रेसमा हाजिर गराउनू !” यो थियो रचनाका लहडकान्त सम्पादकज्यूकोआदेश ।&lt;br /&gt;
हुन त महाकवि देवकोटाको चुरोटखुवाइ सम्झँदा हाम्रो चुरोटखुवाइकै हो र, प्रशस्त खाएको दिन सालाखाला दुई बट्टा खाइएला, त्यसमा पनि मत सिंहमारदेखि बिरालोमारसम्म जे पनि सरासर चल्ने क्लासविहीन भलादमी ।तैपनि बढ्दै थियो- आफ्नो स्थिति हेरी । त्यसैले छोड्नै नसके पनि घटाउनेप्रयत्तमा मैले बट्टाको सट्टा खुद्रा खरिदको नीति लिएँ । तर आफूले नलिँदैमाखान घदछ भन्ने आशा पनि बेकार ! बरु आफूले चुरोट तानिरहेको बखतमान्नुपर्ने मान्छेले &#039;खोइ, एउटा यता पनि&#039; भनिदिए भने उल्टो आफैँले हिन्नेत्याइँअनुभव गर्नुपर्छ । कवि सिद्धिचरणज्यू र रामराजज्यूसित कसोकसो प्राय: यस्तैपरेको छ धेरै पटक । आफूलाई खान छ, अरूले माग्दा छैन, छैन, चुरोट पनिछैन, सलाई पनि छैन साथमा, कहिल्यै पनि । चुरोट छोड्नै सकेको पनि होइनकहिल्यै पनि- कस्तो दरिद्र चाल !&lt;br /&gt;
त्यसैले एक दिन मैले अरू विभिन्न प्रतिज्ञाहरूको साथ “चुरोट खानुरमान्छे पोलेको धूवाँ खानु बराबर&#039; हो भनी किरिया खाएर कागत लेखेँ, सहीगरेँ, हुक्काले अलमल्याउला भनी त्यो पनि फोरिदिएँ र सन्त भएर ती दिनगाबैँमा काटैँ तर पनि कही लागैन । मैले तीन-चार वर्ष मासु छोडेँ, कति दिन&lt;br /&gt;
चुरोट : केही फ्रिलिमिली संस्मरण - १३४&lt;br /&gt;
नुन छाडेँ, कति लामालामा अवधिसम्म आफ्ना अति प्रिय वस्तु र प्रियतमहरूछाडेँ, तर एक साता पनि धूम्रपानलाई बिलकलै छाडन सक्निँ । मेरी यो चुरोटेसमस्यामा सबै साथीको सहानुभूति उब्जन्छ र अफिसमा एकछिन चुपोलागेको देख्ता हाम्रा केदारज्यू सोध्छन्‌- &amp;quot;दाजुको ट्वान्जिस्टरलाई ब्याटीचाहिएको जस्तो छ नि !” हो, निकोटिनको क्यान्सर हुन्छ, तर सेलाएका बखतस्तायविक तारहरू तताउन निकोटिनको निकै आवश्यकता पर्दो रहेछ क्यारेहामीलाई ।&lt;br /&gt;
साँच्ची नै शिथिलतामा सुर्तीले ग्लुकोजको काम दिई फुर्ती निकालिदिन्छभने सुर्तीका क्षणको सबभन्दा ठूलो सङ्गाती पनि सूर्तीको धूवाँसिवाय कही:छैन । यी दुवै कुरा मैले आफ्नो एक महिनाजतिको दिल्लीप्रवासको बखतराम्चैसित अनुभव गरेको छु । त्यहाँ पनि मैले चुरोट छोडेँ, पपाँच मिनेटमाएउटाएउटा ट्याप लगाएको बात नलागोस्‌ नत्र बाबुराम पौड्याल साक्षी छन्‌,मैले प्रत्येक दिन चुरोट छोडेँ, प्रत्येक रात चुरोट छोडेँ । त्यसै बेलादेखिमार्कटिवनको यो भनाइ साह्टै घतलाग्दो गरी म सम्झन्छु- “चुरोट छोड्नुकुनै गाह्रो काम होइन, मैले एक सातामा कैयौं पटक चुरोट छोडिसकेँ(उसैको वाक्य आएन) ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
त, व्यापारीले बातैपिच्छे धरोधर्म भन्नु र मैले सासैपिच्छै चुरोट खान्नभन्नु एकै भयो । तैपनि जमुनाको किनारमा बसेर अर्की सङ्ल्प गरेँ- अबगङ्गाजीको किनारमा उभिएर पानी छुँदै किरिया हालौँला । तर बनारस पुगेपछिभेटनेबित्तिकै चारमिनारका बढ्ठा तेर्स्याउँदै शिव भट्टराईज्यूले भने- “विश्वनाथबाबाको नगरमा सके गाँजाकै चिलिमले स्वागत गर्नुपर्थ्यौ !” म पनि पशुपतिनाथबाबाकै प्रजा हुँ नि ! चारमितारको कहिरीमण्डलमा हाम्रो ठट्टाध्याय सुरुभइहाल्यो । कहाँको चुरोट छोडने ? व्यावहारिकता र सांसारिकतादेखि नैवाक्क भएर घरबार राजीनामा गर्ने त्यागी, महात्यागीले त चुरोट छाडन्‌कोसट्टा गाँजासमेत उडाउन थाल्छन्‌ भने मैले चुरोट किन छाडने ! स्वास्थ्यकोनिम्ति भनुँ भने अब चुरोट छोडेर स्वास्थ्य सुधार्छु भन्नू बूढी बेश्याले आर्यघाटनुहाएर जीबन पचित्र पार्छु भनेजस्तै त हो नि ! यस्ता क्रा सोच्तासोच्तै पनिकाठमाडौं पुगेर चुरोट छाड्ने धोको ठ्याम्मै बिसाएको त थिइनँ । तर शृभसाइतमाचाहिँ कहिल्यै परेको होइन ।&lt;br /&gt;
चुरोट छाड्ने अर्को प्रयास मैले पोहोर रावर्लापण्डीमा पनि गरेँ । त्यसबेला साथी हनुहुन्थ्यो- रूपरेखाका सम्पादक बालमुकुन्ददेव पाण्डे र&lt;br /&gt;
१३६ भैरब अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
मदरल्याण्डका सम्पादक मणीन्द्रज्यू । काठमाडौँ-त्रिशूली सडकजस्तै ।ठीकउस्तै र उत्रै) एउटा पहाडी यात्रामा उहाँहरूले मलाई धेरै सम्झाउनुभयो, तरमैले पो चुरोट छाडनुपर्छ भन्ने करो बिर्सेको कहाँ थिएँ र मोटरैबाट चुरोटकोवट्टा मिल्काएर भनेँ- “लौ त लौ, म चुरोट खान्नँ ।&amp;quot; तर साँझ एउटा पार्टीमाभने उनीहरूको आँखा छलेर पनि चुरोट तानिछाडेँ ।&lt;br /&gt;
म कहिलेकाहीँ त्यसै पनि व्रत वसिदिन्छु । साथीहरू भन्छन्‌- खानापत्ति छाड्न सक्छ कस्तो मान्छे यो ! फेरि जब चुरोट सल्काउन थाल्छु उनीहरूदोहोच्याउँछन्‌- जाबो चुरोट पनि छाड्न सक्तैन कस्तो मान्छे यो ! अब मयस्तै मान्छे ! के गर्ने ? चुरोट त म खान्न भन्दै छु, तर चुरोटले चोरेर भएपनि मलाई खाइहाल्छ । हो, सत्य भन्छु- मलाई चुरोटदेखि डर लाग्छ, घुणालाग्छ तर म आत्मसमर्पित हुँदै आएको छु- यही छुसी चुरोटसँग । यो क्रमकतिसम्म चल्ने हो, म हजुरले कति पटक चुरोट छाड्ने हुँ त्यो त भन्नसक्तिनँ, तर फेरि नयाँ वर्ष लाग्दै छ, म चुरोट छोड्दै छु- योचाहिँ पक्का हो ।&lt;br /&gt;
रूपरेखाबाट&lt;br /&gt;
बुरोट : केही क्षिलिसिली संस्मरण ” 19७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टाउको==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“पृथिवी गोल छ&amp;quot; -म चिच्च्याउँछु ।&lt;br /&gt;
कस्तो गोल गुरु ?” -विद्यार्थीले स्पष्टीकरण माग्छ ।&lt;br /&gt;
“पृथिवी भोगटेजस्तो गोल छ” -म बुझाउँछ ।&lt;br /&gt;
“कस्तो गोल रे गुरु ?” -विद्यार्थी बुझ पचाउँछ । म रिसले तिलमिलाउँछु ।&lt;br /&gt;
मभित्रको गुरुत्व कक्षा चर्काएँर टेबुलमा बजारिन पुग्छ-&lt;br /&gt;
“पृथिवी तेरो टाउकोजस्तो छ !&amp;quot;&lt;br /&gt;
विद्यार्थीको मुखमा बडे बुझो लाग्छ । तर टेबुलमा रन्धनिएको मेरोहात आफ्नै टाउको छाम्न पुग्छ, टोपीको सिउनीले कुन्नि कसको एउटा पङ्क्तिसम्झाइदिन्छ-&lt;br /&gt;
१३६ ” बैरब अर्यालका डास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
“यो टाउको होइन, टोपीको स्टयान्ड पो हो त !”&lt;br /&gt;
नभन्दै यो त टोपीको स्ट्यान्ड हो; हिजो मात्रै किनेको सक्कली ढाकाकोटोपी मैले यही स्टान्डमा राखेको छु । (कसैको निम्ति यो टोपको स्टचान्डहोला, कसैको निम्ति फेटाको, कसैको निम्ति फ्रेसक्यापको स्ट्यान्ड होला,कसैको निम्ति पगरीको । तर मेरो टाउको टोपीको स्टयान्ड हो) । टोपी,सभ्यताको पताका, संरक्षणको गुटिका अनि व्यक्तित्वको झन्डा हो । त्यसैलेयो राख्ने एउटा गतिलो स्टयान्ड चाहिन्छ । मेरो टोपीको स्ट्यान्ड पृधिबीजस्तैगोल छ।&lt;br /&gt;
छाम्दाछाम्दै शड्डा उठ्छ- त्यसो भए मेरो टाउको खोइ त ? साँच्चीटाउको खोइ त ? विद्यार्थीहरू डराएर मेरो मुखाकृतिमा टुलुटुलु हेरिरहन्छन्‌-मानौँ उनीहरूको कृतृहल यही छ- पृथिबी टाउकोजस्तो हुन्छ, तर टाउकोभनेको कस्तो हुन्छ ? म आफैँ अलमलिन्छु- टाउको भनेको कस्तो हुन्छ? मपढेको मास्टर, नपढेको करा जान्दिनँ । नपढेको कुरा बुझ्न गिदी चाहिन्छ,गिदी । गिदी भनेको टाउकाको गुदी हो, लिपि घोटेर लेपेको लेप होइन । तरमसँग गिदी छैन, त्यसैले टाउकाको ग्रर्थ पर छैन । यो अर्थबिनाको अस्तित्व... ।&lt;br /&gt;
हं, न, होइ: टाउका पं किन छैन ; शरीरको माथिबाट ठडिएररहने यसको अर्थ हो; त्यसैले सुत्ता पनि यसलाई तकियाको अग्लो स्टयान्डचाहिन्छ ।&lt;br /&gt;
अर्थात्‌ ठडिएर रहनुमा टाउको सार्थक हुन्छ । तर मजस्तो एउटासाधारण शिक्षकको टाउकाले कहाँ पाउँछ सधैँ ठडिरहन ? नौ सय नमस्तेमानिहरनुपर्छ; हजारौं हस्‌मा लच्कनुपर्छ । बलभद्र र अमरसिंहजस्ता मेरा कैयौँबाजे-बराज्यूले बरु टाउको दिए, तर टाउको निंहराएनन्‌ रे; तर मैरौ टाउकोकति लुलो छ भने भिंगालाई पनि गोडैमा ढोगिदिउँला झैँ गरी निहुरन्छ, मानौँउसको पाखुराखँँचाइ मेरो टाउकालाई चुनौती हो । म टाउको छाम्दाछाम्दैहराउँछु । विद्यार्थीको प्रश्नको घोचो लिएर मलाई कक्षामा तान्छ-&lt;br /&gt;
“भन्नोस्‌ न गुरु, पृथिवी टाउकोजस्तो भए टाउको कस्तो छ ?” मलाईरिस उद्छ- यो पनि कुनै प्रश्न हो : तर आफूले बौल्न नपाउँदै अर्को विद्यार्थीजबाफ दिन्छ- “टाउको फुटबलजस्तै हुन्छ ।” त्यसैले यसलाई बरावर पम्पुदिनुपर्छ । मेरो टाउकामा पहिलो पम्पु मास्टरले दिएका थिए, विद्यालयलेजोख्यो, तौलचिहन लगायो, प्राध्यापकले पम्पु दिए, महाविद्यालयले जोख्यो,तौलचिहन लगायो । पम्पु दिने काम बढ्दै गयो । विश्वविद्यालयले जोख्यो,&lt;br /&gt;
टाउको ट १२९&lt;br /&gt;
बडेमानको फुर्के चिह्न झुन्ड्याई गुडाइदियो चौतणांछ तौल गर्दै सत्र पटकतौलिएको यो मेरो टाउको कति गर्विलो छँ, कति दर्पिलो छ। म आफ्नोटाउकाका तौलको बहाल माग्न अड्डा: पुग्छु, .अदालत पुग्छु, कम्पनी रकर्पोरेसन धाउँछु सेवाआयोग अझ बडेमानको तुलो लिई अघि सर्छ । जोख्ताजोख्तैगाँठिएको टाउको फेरि जोखाउँछु, एउटा अर्को तौलचिह्न थपेर पुन्याइदिन्छस्कूलतिर । अहिले म मास्टर छु । होइन, होइन, म एउटा पम्पु छु, हावा दिँदैछु सयौँसयौँ बलहरूमा, यी सबैका टाउकाको तौल बढाउनु छ, यिनीहरूबाटपनि त्यसै गरी जीवनको रङ्गशालामा आआफ्नै टाउकाको भकुन्डो खेलाउनुछ । एउटाले अर्कोलाई बुङ्ग हिर्काउँछ, अर्काले अर्कालाई । खेल न हो ! कुनैटाउको बुद्रुम्क उफ्रन्छ माथि पुग्छ, कुनै माथिबाट तल झर्छ । टाउकै खेलाडी,टाउकैको खेल, &#039;गोल, गोल&#039; भन्दाभन्दै कति टाउकाको बीचैमा भद्रगोलहुन्छ।&lt;br /&gt;
“तर होइन, टाउको भकुन्डोजस्तो होइन, मलाई त अरिङ्गालको गोलोजस्तोलाग्छ ।&amp;quot; मजस्तै अर्को गुरु बीचैबाट प्वाक्क बोल्छ । म नजिकैको रूखमाअरिङ्गालले लगाएको गोलो सम्झन्छु, आङ जिरिङ्ग हुन्छ ।&lt;br /&gt;
अरिङ्गालहरू भुनभुनाइ&#039;छन&#039; गोलामा, मानौँ त्यहाँ बास नपुगेको ठूलोरन्का छ, बलियाबाङ्गाहरूले धेरैधेरै ठाउँ पहिल्यै ओगटिसकेकाले लुत्रेलाम्रेहरूलाईटाउको घुसार्नसम्म ठाउँ छैन, एउटा &#039;ठाउँ छाडिदे&#039; भन्छ, अर्को &#039;धक्का नलगा&#039;भन्छ, गर्भिणी अरिब्गाल्तीले बच्चा खसाल्ने ठाउँ पाउन्न, कसैले बल्लबल्लपाएको बच्चा कसैले थिचिदिएको छ, मिचिदिएको छ, आमै नि! कस्तोगन्जागोल यो अरिङ्गालको गोलामा । मलाई अघि नै सुझेको भए विद्यार्थीलाईयही भनिदिन्थेँ- पृथिवी अरिङ्गालको गोलाजस्तो छ; अरिङ्गालको गोला हाम्रोटाउकोजस्तो छ । स्मृतिसामु एउटा अरिङ्गाल उड्छ, क सायद आहारा खोज्नपाएको होला आफ्ना बच्चाहरूलाई; ओहो, मेरो सानू बच्चाले आज दूध खायोकि खाएन कुन्नि :ः उसलाई निमोनिया भएको थियो, बल्लबल्ल हिजोदेखिअलिअलि बिसेक भयो । आमाचाहिँ पनि साह्रै मूर्ख छ, विचारै पुस्याउन्न ।अघि उडेको अरिङ्गाल अर्को दलिनमा बस्छ । अर्को एउटा पनि भुनभुनाउँदैत्यहीँ पुगेर बस्छ, मानौं ती भाले-पोथी हुन्‌ । तर एउटा भ्यागुताको बच्चाजस्तो,अर्को माछाको बच्चाजस्तो ! छ्या, जोडा पनि भनेजस्तो नमिल्नु; यो जोडाभित्रकोएक जौर बिजौडा ! त्यसैले पनि अरिन्गाल एउटा समस्या, समस्या एउटाअरिङ्गाल, अब कल्ले भन्न सम्छ- टाउको अरिब्गालको गोला होइन ! पालेले&lt;br /&gt;
१४० .” थैंरव अर्पालका हात्यव्यड्ग्य&lt;br /&gt;
घण्टी लाउँछ- सम्झनाले उठाएका अरिङ्गालहरू गालामा गढ गुजमुजिन्छन्‌,भुराहरू भुरभुराउँदै उठ्छन्‌ । म अफिसको टेबुलमा हाजिर कापी थचाछ,थ्वचक्क बसेर टाउको समाउँछु । प्रधानाध्यापकज्यू भन्नुहुन्छ- मेरो त मुद्दालेटाउको खायो ।&lt;br /&gt;
मेरो टाउको पनि कुटुकटु खान्छ- बिरामी छोराले । टोपी फुकालेरटेबुलमा राख्छु- एउटा प्रश्न राखिएझैं लाग्छ टेबुलमाधि- के अरू सबैअङ्गभन्दा टाउकै कमलो छ ? नत्र चार महिनाको छोराले आमाको स्तन चुस्नछाई? बाबुको टाउको किन खान्छ ? छोराले मात्र होइन, कहिलेकाहीँ प्रेमिकालेपूनि जब आँपजस्ता गाला छाडेर यही ओखरजस्तो टाउको खान थाल्छिन्‌, तबमलाई लाग्छ- भगवातू्‌ले मलाई मुर्कट्टा नै जन्माइदिएको भए हुन्थ्यो । त्यसोगरिदिएको भए जोरीपारीले पनि &#039;तेरो टाउको नफुटाई के छाडौँला&#039; भन्तपाउने थिएनन्‌ । टाउकै बनाउनु थियो त ढुङ्गाको बनाइदिएको भए पनि नकम्नैले खान सक्थ्यो न कसैले फुटाउन । तर मान्छेको टाउको कस्तो कमलोछ भने यसलाई जोगाएर राख्ने फिक्रीले नै कुटुकुटु टाउको खाइरहेको हुन्छ ।तैपनि जोगिन्छ कि भनी म कपाल पाल्छु, टोपी लाउँछ र भन्न खोज्छु-टाउको टोपीको स्टयान्ड होइन, टोपी टाउकाको कभर हो ।&lt;br /&gt;
म टौपी टिपैर टाउको छोप्छु, तर कपाल मात्र छोपिन्छ, टाउकोभित्रकोसिलिङबिलिङ छोौपिँदैन । बरु त्यहाँ एउटा छाल आउँछ, एउटा भुमरी पर्छ,भुमरीमा म फन्न रिङ्छु, देश रिङ्छ, विश्व रिङ्छ मानौँ सिन्दै ब्रह्माण्डअटाए को छ मेरो टाउकोभित्र ! आमै नि ! कति ठूलो हुन्छ मान्छेको टाउको !पुथिबीभन्दा धेरै ठूलो, ब्रहमाण्डभन्दा धेरै ठूलो ! ओहो, यत्रो भयइर टाउकोमैले कसरी बोकेको छु ! मलाई खलखली पसिना आउँछ, टाउको छाम्छ-एउगा सानो जुम्रो छ्यास्स टेबुलमा खस्छ । बह्माण्डभन्दा ठूलो टाउकाकोवासिन्दा यो जुम्रोले मानौं आफ्नो परिचय दिन्छ- म त्यस गोल दुनियाँकोअर्वश्रष्ठ जुम्राजाति हँ । म पनि यस गोल दुनियाँको सर्वश्रेष्ठ मानवजाति हुँ ।दुवैको पृथिवी गोल छ भने जुम्रा र मान्छेमा के फरक छ : जब मेरो टाउकोधेरै फोहोर हुन्छ जुम्राको सृष्टि हुन्छ, जबसम्म म नुहाउन्नँ, उसको स्थितिहन्छ, एकअकाँसित मायापिर्ती बस्छ, लिखा जन्मन्छन्‌ । लिखाबाट जुमा बन्छन्‌,यो रौंबाट क नैँ, यो कुनाबाट क कुना ओह्वोरदोहोर चालरहन्छ । जुम्रामापनि कनै भास्कोडिगामा र कुनै कोलम्बस नौलानौला ठाउंको पत्ता लगाउलान्‌ ।जम्रामा पनि कुनै व्यास, होमरजस्ता कवि होलान्‌ । कोपरनिंकस, न्युटन र&lt;br /&gt;
टाउको १४१&lt;br /&gt;
आइन्स्टाइन निस्केर टाउकाको परिधि र व्यासको लेखाजोखा गर्लान्‌ ।गुरुत्वाकर्षण र सापेश्षतावादको व्याख्या गर्लान्‌ । त्यहाँ पनि कृष्ण, कन्फ्युसियस,क्राइस्ट, बुद्ध र मोहम्मदजस्ता महात्मा जन्मैर जम्राजातिका उद्ारका लागिभरमग्दुर कोसिस गर्लान्‌ । अझ सम्भव क्रा- त्यहाँ पनि गाँसबास र यौन-प्यासको निम्ति युद्ध होला । ढाडी जुम्राहरू चमकनाहरूलाई छिर्नाछनमासताउँदा हुन्‌, तर जव म नुहाउन थाल्छु, सावनको झोलले जुम्रालाकमाहाइड्रोजनको काम गर्छ । महाप्रलय भएर उनीहरूको दुनियाँ उजाङ हुन्छ ।मेरो र जुम्राको संसारमा के फरक छ : मेरो र जुम्राको अस्तित्वमा के फरकछ ? बरु हन सम्छ, पृथिवी कसैको गोल टाउको हो, मान्छे त्यस. टाउकाकाजुम्रा ! जब टाउकोवाला नुहाउन थाल्छ, हाम्रो प्रलय हुन्छ, फोहोरै राखिछाडोस्‌बरु उसले आफ्नो टाउको । म सोच्तै जान्छु- जुम्रा टेबुलमा रगरगाउँछ,कस्तो अनुभव हुँदो हो त्यसलाई टेबुलमा । उसले यहाबाट फेरि फर्कन पायोभने जुम्रालोकमा कस्तो यात्रावत्तान्त सुनाउँदो हो- “बुभ्यौ, हाम्रो संसारभन्दाबाहिर अर्कै संसार रहेछ ।” हो, पक्कै यस्तो व्याख्यात छाँदतो हो । एउटाकुतूहल ल्याउँदो हो । तर मलाई जुम्रादेखि असाध्यै घिन लाग्छ, नमारे पनित्यो धेरैबेर बाँच्न सक्तैन भन्ने थाहा हुँदाहुँदै पनि म मारिदिन्छु । कस्तोनिर्ममता ! हस्याङफस्याड गर्दै घरको नोकर भन्त आउंछ- “सानो नानीलाईसाह्टै भइसक्यो, छिटै पाल्नोस्‌ रे ।&amp;quot; य&lt;br /&gt;
म टोपी मिलाउँदै कृदछ । तर जुम्राको बाबु कुदेर आएन । आएकै भएपनि के लछानँ सक्थ्यो र त्यसले, जसरी केही गर्ने सक्तिनँ म आफ्नो मर्नलागेको छोरो नमान । मृत्युको टाउको देख्न पाए मान्छेले कति टोक्तो हो,कति ठोक्तो हो ! तर अहिलेसम्म कति दार्शीनकहरूको टाउको खायो योमृत्युले । अहिलेसम्म कति वैज्ञानिकहरूको टाउको खाँदै छ यही मृत्यु ।त्यसैले भन्न मन लाग्छ- मृत्युकै टाउकोमा हाम्रो सृष्टि छ । मैरो टाउकोअझ रन्धनाउँछ, तर छोरोको टाउकोमा अब कुनै रन्धन छैन, जुम्रा र हाम्रोगत्युमा फरक यत्ति छ- उसलाई जीवनको मायाले रन्थनाउदैन, मृत्युकाछायाले तसाँउँदैन । कारण उसको र हाम्रो टाउको उस्तै हँदैन ।&lt;br /&gt;
हो, सबै प्राणीभन्दा अनौठो टाउका मान्छेकै हो । भनूँ भने मान्छेकोविशेषता नै टाउको हो र टाउकाको साधथकता नै मान्छे ! त्यसैले कृष्ण एउटाटाउको, क्राइस्ट एउटा टाउको, कन्फ्युसियस एउटा टाउको ! कपल, कणाद,गौतम सब टाउकैटाउका । सुकरात, प्लेटो, एरिस्टोटल टाउकैटाउका । वृद्ध&lt;br /&gt;
१४२ - भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
जनक, अरनिको टाउकैटाउका । आर्किमिडिज, आइन्स्टाइन र ग्यालिलियो-टाउकैटाउका । मलाई भन्न मन लाग्छ- इतिहास टाउकैटाउकाको मालाहो ।&lt;br /&gt;
गधा पिठचूँले बाँच्छ, गाई कल्चौँडाले बाँच्छ भने मान्छेले बाँच्नै माध्यमटाउको पाएको छ, आफूलाई साँच्ने माध्यम टाउको पाएको छ । हो, मेरो पनिपुर्खा थिए, तिनमा कोही टाउकैले बाँच्ये होलान्‌ । तर मलाई थाहा छ- मेराधेरै मामाहरू गर्धनले बाँचे, मेरा कति काकाहरू पाखुराले बाँचे, मेरा कैयौँभाइबहिनीहरू केवल भुँडीले बाँच्छन्‌- त्यसैले मैले टाउकाले बाँच्न पाएकोछैन, जब टाउको उठाउन खोज्छु, भित्रभित्रै मेरो टाउको साटिइसक्छ, यसकोबिचित्रता नै यस्तै छ- आफ्नो टाउको साटिएको आफैँलाई थाहा हुँदैन ।त्यसैले टाउकोबाट बाँच्न खोज्दाखोज्दै म टाउकोबाटै हराउँछु । तर मेरोहिमालय मलाई बराबर सोधिरहन्छ- ए, तैँले आफ्नो टाउको हराएको तछैन ? हत्त न पत्त छाम्छु, टोपी त सिँगुलै छ । तर टाउको कति साटिएको छ,कति छाँटिएको छ, त्यो ठम्याउन सक्तिनँ । अनि मेरो टाउकाभरि हीनताभासभरिन्छ- मेरो टाउको टाउको नभएर टेपरिकर्डर बन्छ । त्यसैले म प्रत्येकदिन स्कूलमा टेपरिकर्डर फुकाउँछ्‌- “सगरमाथाको उचाइ २९००२ फिटछ ।” सगरमाथाको उचाइ... ... ।&lt;br /&gt;
रचनाबाट&lt;br /&gt;
टाउको ” १३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==गलबत्दी ==&lt;br /&gt;
लाटा&#039; देशाँ&#039; गाँडो तन्नेरी भन्ने उखान सुने भने विश्वका समस्तगाँडाहरू धमाधम मानचित्र पल्टाएर धुइँघुइँती खोज्न थाल्दाहन्‌- त्यो लाटाकोदेश कुन महाद्ठीपमा कहाँनेर पर्छ ? त्यस देशको भौगोलिक स्थिति कस्तो छर किन त्यहाँ तन्नेरी हुने अधिकार गाँडाको लागि मात्र सुरक्षित हुन्छलाटाको देशमा जाने भिसा कहाँबाट लिनुपर्ने हो र कुन प्लेन वा ट्रेन समाएरत्यहाँ पुग्न सकिने हो इत्यादि । तर उनीहरूलाई कसले बुझाइदिने ? लाटोभनेको बाटौ न घाटोसित दगुर्ने प्राणी हो, जो इतिहासको -फेदीदेखि थिति नठेगातासित गुँड जमाउँदै आएको छ । हेरिल्याउँदा प्रत्येक देश लाटैलाटाकोनिर्माण हो तर हेरिलैजाँदा जहाँ बसे पनि लाटो स्वयं देशविहीन हुन्छ ।&lt;br /&gt;
१४४ ” भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
क पनि भन्थ्यो- कोलम्बसले अमेरिका पत्ता लगायो भने उसले लाटा&#039;देश ठम्याउन किन सक्तैन ? तर क कोलम्बस होइन, क त हो तुलेगाँडो,तुलामा राखेर जोख्ने हो भने जीउ जति धार्नीको छ, त्यति नै धार्नीको थियोउसको गाँड । त्यसैले उसको नाम पनि तुलेगाँडो, उपाधि पनि तुलेगाँडो ।वास्तवमा क लाटो नै होइन, गाँडो मात्र हो, तर राम्रैराम्राका बीच गाँडो हुनुपनि उपहासको भाँडो हनु हो, त्यसैले पार्नु मर्का पारेको छ उसलाई - त्योगाँडले । अन्तर्वार्ता गर्न जान्छ गाँडले पहिल्यै बहिर्वाता गरिदिन्छ, सभाभित्र पस्तासबैको खिसी आकर्षित गरी सभापति बिर्साइदिन्छ उसकै गाँड । त्यसैले कझर्किन्छ, रुन्छ र रुँदारुँदै हाइय्य गर्छ, एकैछिनमा मन्त्री हुन्छ ।&lt;br /&gt;
त्यो लाटाको देश हो त ? केही थाहा छैन उसलाई, केवल यत्ति थाहा छ,क मन्त्री हो- सबैबाट सम्मानित, सबैबाट प्रशंसित । पण्डितहरू उसको गाँडकोमाहात्म्य गाउँछन्‌- अघिल्लो जन्ममा क सरस्वतीको साह्रै प्यारो भक्त थियो,एक दिन उनले के माग्छस्‌ भनी सोधिन्‌ । ठाडो घाँटी लगाउँदै उसले भन्यो-“मलाई विद्यामृत दिनुहोस्‌ ।&amp;quot; सरस्वतीले तथास्तु भनी वीणाको गट्टाले उसकोघाँटीमा छोइदिइन्‌ । जन्मजन्मान्तर नसिद्धिने गरी समस्त विद्याहरू पोको परेरउसको कण्ठमा झुन्डिए, त्यसैले मन्त्रीज्यूको विद्वत्ता अनुपमेय छ, अपरिमेय छ&lt;br /&gt;
गलबत्दी 2 १४५&lt;br /&gt;
डृत्यादि । उसलाई विश्वास लाग्दैन, तर इतिहास व्याख्या गर्दछ- मन्त्रीज्यू तीगण्डक क्रषिका सन्तान हुनुहुन्छ, जसले तपस्या गरेकोले नदीको नाम नै गण्डकीरहेको थिग्रो, गण्डक गाँडवान्‌ महर्षि थिए, त्यसैले मन्त्रीज्यू पनि आधुनिक जगत्‌काएक महर्षि नै हुनुहुन्छ । अझ उसलाई पत्यार लाग्दैन, तर कवि गाइदिन्छ-&lt;br /&gt;
हे चिशाल रुद्रघण्टीशवर&lt;br /&gt;
यो तिम्रो गाँड होइन, गहना हो&lt;br /&gt;
दु:खसागर तर्ने बहना हो ?&lt;br /&gt;
हो त नि, क ढङ्ग पर्छ, मक्ख पर्छ, नोकर्नीको हात समाएर दिवस्ट गर्छ ।तर अपशोच ! खाटबाट लडेर गाँड ढोकिन्छ, रगत बगाउँदै झल्याँस्स हुन्छ-ऐना हेर्दा आफूलाई तुलेगाँडै पाउँछ ।&lt;br /&gt;
उसको सपना सत्य थिएन, तर यो असत्य कुरो पनि होइन । ठूलो हुनसके गाँडै पनि गहना हुन्छ, कृष्णको चीरहरण लीलामा गनिएफैँ, भियतनामकोनरसंहार शान्तिको निम्ति भनिएझैँ । तर ठूलो कसलाई भन्ने ? घर ठूलो, बैड्ब्यालेन्स ठूलो, दर्जा ठूलो, अधिकार ठूलो, डाँको ठूलो, देश ठूलो, डन्डा ठूलोया झन्डा ठूलो ! उसको केही पनि छैन, छ भने त्यही गाँड छ सबैभन्दा ठूलो !त्यसैले क ठूलाबडामा गनिन सक्तैन, किनभने चुत्थो मान्छेको रुद्रघण्टी नैपनि गाँड भइदिन्छ, दुनियाँमा गाँड गहना हुने त कुरै छैन । तुलेगाँडो हताशहुन्छ, निराश हुन्छ ।&lt;br /&gt;
अनि उसलाई झोक पनि चल्छ- भएभरका लाटागाँडा बटुलेर म नेताकिन नभइदिङँ ? गाँडाको ग्लानि खोरन्डालाई पनि हुन्छ, खोरन्डाले जतिखिसी कानाले पनि पाउँछ । क आफ्ना साथीहरूसित प्रस्ताव राख्छ- एउटासङ्गठन बनाउने, जसको नाम रहनेछ- लाटागाँडा एवं लुलालङ्गडा सम्मानसमिति । तर खल्बाट धूर्त हुन्छ- सभापतिको बाक्लो पगरी उसलाई चाहिन्छ ।तुलेको चित्त बुभ्दैन; किनभने उसमा अरूको जस्तो कमी छैन । हुन पनि गाँडएउटा बढग्रन्थि हो, विशेष अङ्ग हो, जुन जो पायो उहीसित हुँदै हुँदैन । खुट्टैखँड्काले निहुँ खोज्छ, त्यसो भए उसको खुट्टो झन्‌ खम्बाजत्रो छ । मोटो सुँडहुने गणेशलाई सबभन्दा पहिले पुजिन्छ भने उसको खुट्टो सभापति बन्न किनसक्तैन ? कसित थोरै भए पनि गणेशत्व छ तर डुँडेले सभा ब्याकआउट गर्छ ।क सद्दे मान्छे गाँडागर्चाको गोष्ठीमा किन बस्छ ? नभन्दै हो पनि, पन्जाभित्रकोहातलाई कसले डुँडे देख्छ ः सङ्गठन गठन नहुँदै विघटन हुन्छ, तुलेगाँडो जिल्लपरेर गाँड कोतर्छ ।&lt;br /&gt;
१४६ ; थैंरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
हुन त क पनि त्यस्तै ! बाठैबाठासँग बाँच्नुपरेपछि उसले पनि बाठोबन्नै पर्छ । बठ्याइँको दीक्षा लिन छोप्ने विद्या जान्नै पर्छ । हो त नि, यहाँकसले के छोपेको छैन : टेरिलिनको सूटले दाउरिएको आङ छोपिन्छ, एक बट्टापाउडरले चाउरिएको छाला छोपिन्छ, डिगीको साइनबोर्डले दिमागको गोबरछोपिन्छ, मानको पगरीले बेइमानीको घ्याम्पो छोपिन्छ, मैत्रीको जालले ब्वाँसाकोराल छोपिन्छ । हो, हो- गाँडाको गम कम होइन- गलबन्दीले गाँड छोप्नसकेमा तन्नेरी हुन अरू केही चाहिँदैन । तुलेगाँडो डिसिक्क हाँस्छ ।&lt;br /&gt;
गाँड उसको कत्रो समस्या ? तर समस्याको समाधान कति सजिलो छएउटा गलबन्दी गुतिदिनु । अनि कसले भन्न सक्छ रङ्गीचङ्ठी गलबन्दीभित्रजाँडको पुन्गोजस्तो एउटा कुहिएको गाँड पनि छ । कसैले भनिहाले पनि जबाफदिनुपर्छ भित्रभित्र खोतल्ने हो भने ककसको केके छन्‌, केके छन्‌ ? क श्री &#039;क&#039;लाई सम्झन्छ- जसले एक हजार घर लुटेको थियो, सयौँ घरमा पोइलाईबाँधेर स्वास्नीको सतीत्व लुटेको थियो, रामनामीको गलबन्दीले क कतिसजिलैसित आफ्नो अपराधको गाँड छोप्छ, महामहोपाध्याय बनी नैतिकताकोव्याख्या गर्छ ।&lt;br /&gt;
श्री &#039;ख&#039; लाई सम्झन्छ, श्री &#039;ग&#039; लाई सम्झन्छ- मासुको नहोस्‌ सही,पापको गाँड उनीहरूको पनि छ, क देख्छ- जजसको ठूलो गलबन्दी छतिनको गाँड पनि ठूलै हुन्छ, तर क गलबन्दी गुत्दैन ।&lt;br /&gt;
तर उसले नगुतेर के गर्नु ? आजको विश्वमा सबभन्दा बढी खपत छगलबन्दीको । निरस्त्रीकरणको प्रस्ताव एउटा गलबन्दी हो- आणविक गाँडको ।शान्तिवार्ता एउटा गलबन्दी हो- करतुत र क्चक्रका गाँडको । यसरी सोच्तैल्याउँदा क ठम्याउँछ- क मात्रै होइन, उसको समाजै गँडयाहा छ, उसकोयुगै गँडयाहा छ । आफू चुत्थो मान्छे भएकोले साह्रै ठूलाको कल्पना गर्नसक्तैन र मात्रै, नत्र क यो पनि ठान्दो हो- यो विश्व नै ब्रहमाण्ड नभईब्रह्मगाँड होला । पृथिवी त्यस गाँडमाथिको खटिरा, अरू हुन सक्छ- मान्छेचाहिँत्यस खटिराभित्रको कीरा ।&lt;br /&gt;
छ्या: आफू गाँडो हुँदैमा सबैतिर गाँडैगाँड्ड देख्न क चाहँदैन । तरउसले नचाहेर के गर्नु ? गाँड यथार्थ हो, गलबन्दी त त्यसलाई छोप्ने आदर्शमात्रै । त्यसैले यथार्थवादलाई ठूलाबडा मन पराउँदैनन्‌, किनभने यसबाटसमाजको गाँड देखिन्छ- जो सभ्यताको विरुद्ध कर्म हो । हो, त्यसैले ततन्नेरीलाई गाँड देखाउन लाज लाग्छ, अनि गलबन्दीमै रमिता देख्छ, बूढालाई&lt;br /&gt;
गलबन्दी ” १४७&lt;br /&gt;
गाँड कोट्टयाउनु अपराध लाग्छ- अनि गलबन्दीकै कविता लेख्छ, तुलेगाँडोचिन्तक बन्छ, क पुराण पल्टाउँछ, इतिहास पल्टाउँछ ।&lt;br /&gt;
रामको पनि गाँड थियो । क आफू नर भएर वानर बदुल्छ, आफू भुँडीबोकाउँछ, स्बास्तीलाई बात लगाउँछ । एउटाको रिसमा हजारौँको घरबारजलाउँछ, सबलाई आदर्शको शिक्षा दिन्छ- तर मनमनै उसको गाँड पाक्छ-पश्चात्तापको पीप बगाएर, अनि सरयूमा हामफाल्छ, मर्छ । तर वाल्मीकिगलबन्दी गुताइदिन्छन्‌ उसलाई । क पूजनीय लाग्छ हामीलाई । चन्द्रशमशेरलाईलोभ लाग्छ, त्यस्तै गलबन्दीको अनि सेढाई बुन्न थाल्छ चन्द्र-मयूख । तरजङ्गबहादुर साह्टै बाठो मान्छे हो, आफ्नो गाँड छोप्न । क कृष्णका आदर्शकोगलबन्दी गुत्छ । नाङ्गी तरुनी उसको आराध्य, परचक्री तरुनी उसका साध्य ।लाटा गौपहरूका देशको कृष्ण एउटा गाँडो तन्नेरी, त्यसैले हत्क उसकाचुद्कीको काम, सर्बसंहार उसको दर्शनको अन्तिम धाम । तुलेगाँडो युगजोर्छ- महाभारतको हिटलर कृष्ण, कुरुक्षेत्र उसको ग्यासच्याम्बर, जहाँआइकम्यानको पूर्णावतार अर्जुन भुट्छ- आफ्ना दाजुभाइहरूलाई, लाखौँलाखौँआइमाईका छोराहरूलाई, पोइहरूलाई ! आखिर गाँड पाक्छ. कृहिन्छ,सलबलाउँछन्‌ पश्चात्तापका कीराहरू । र आत्महत्या गर्छ डा. बाड्ले झै ।मर्दामर्दै व्यासले: ओढाइदिन्छन्‌ स्वर्गरोहणको सुकिलो गलबन्दी 1 के गीताएउटा बलियो गलबन्दी होइन कृष्णको ?&lt;br /&gt;
ध्तेरी ! म कस्तो नास्तिक, आफू गाँडो भएँ भन्दैमा आफ्न पूजनीयऐतिहासिक पुरुषहरूलाई उडाउनु अपराध हो, अनास्था हो । के भित्र विष्ठा छभन्दैमा आफ्नै पेटलाई चर्पी मान्ने ? तुलेगाँडो आफैँलाई हप्काउँछ । अत्र ककसैलाई निन्दा गर्दैन । यस लोकमा त गाँडो भइयो भइयो, परलोकमा उसकोगाँड हुने छैन, क सुन्दर र सलसलाउँदौ हुनेछ किनभने उसले कसैका हत्यागरेको. छैन, उसले कसैलाई दु:ख दिएको छैन, उ स्वगैं जान्छ सरासर ।उसको मन प्रफुल्ल हुन्छ, तकिया सजिलो लाग्छ । सोच्तासोच्तै &amp;quot;० हर्रउड्छ । एकैछिनमा क एउटा ठूलो ढोकामा उभिन पुग्छ । पालेले चर्कोडाँकोमा उसलाई सोध्छ- तिम्रो नाम के ? कहाँबाट आयौ र बाँच्ताकोल्याकत कस्तो थियो इत्यादि । तुलेगाँडो सबै &#039;हुलिया&#039; यथार्थ दिन्छ र भन्छ-मैले जीवनभर धमैधर्म गरेको छ । घोक्रेसुत्ती लाउँदै पाले गर्जन्छ- गह्नाउनेगाँड लिएर धर्मात्मा भन्दै अप्सराको देशमा आउन पाइन्छ ? तुरुन्तै जान्छस्‌भने गैहाल्‌ नत्र सोझै रौरवमा खसालिएलास्‌ मोरा ! क भुतभूताउँछ- स्वर्ग&lt;br /&gt;
१षषद ” भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
गोराहरूको हो, स्वर्ग जोधाहाहरूको हो, यहाँ कत्राकत्रा सेठ, कत्राकत्रा शासक,कत्राकत्रा मन्त्री र कत्राकत्रा विजयीहरू छन्‌, यस्तायस्ता भएको ठाउँमाआउने को रे भने तुलेगाँडो ! क जिल्ल पर्छ । हुत त हो नि ! दक्षिणा लिँदैस्वर्गको पासपोर्ट बाँड्ने पण्डितहरूलाई सम्झन्छ उ, धर्म र पापको तिनलाईके वास्ता ? दस रुपियाँको गोदान डाँकाले गरे पनि स्वर्गकै बास पाउँछ ।उसले आफू हजार दुःख खपेर पनि अरूलाई दुःख नदिएको सित्तैँ भो त : सित्तैँभो त ? क चिच्च्याउँछ । स्त्रास्ती बोलाउँदै उठाइदिन्छे- के सित्तँ भो तपाईंको ?&lt;br /&gt;
उसको यो लोक पनि सित्तै भो, परलोक पनि सित्तैँ भो । यो लोककोहैसियत राम्रो नहुनेको परलोक पनि कुम्भीपाक हुन्छ । हत्या गरेरै भए पनिकमाउनुपर्छ, लुटलाट गरेर पनि जमाउनै पर्छ, करोडपति हुन सके हजारकोपाटी बनाएर अखबारमा दानको विज्ञापन पाइन्छ, ढवाड नठटाई गरेकी धर्मस्वर्गको तथ्याइबिभागले कहाँ सुन्न सक्छ ! त्यसैले त व्यापारीहरू बहुतैचतुरा हुन्छन्‌, धरोधर्मको गलबन्दी गुतेर मन लागेको भाउ गर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
धत्तेरि, फेरि म नास्तिक भएँ । तुलेगाँडो पछुताउँछ । हो, दुनियाँमाकसैको पनि गाँड छैन, उसको मात्रै छ, क मात्रै अभागी छ, क मात्रै हतभागीछ । त्यसैले क गाँड चिर्न अस्पताल पुग्छ । रातो &#039;झोल प्याउँदै नर्स गिज्याउँछे-गाँडको ओखती निल्न गाद्दो पर्छ, एउटा राम्रो मफलर गृत्ने गर्नोस्‌ न,देखिँदैदेखिँदैन नि ! उसलाई &#039;फोक चल्छ, क लुकाएर सिप्लिस पाल्ने जातकोमान्छे होइन । त्यसैले गाँड भनेको चिर्नै पर्छ चाहे भित्री होस्‌, चाहे बाहिरी ।तुलेगाँडो एक्लै चिच्च्याउँछ । डाक्टर फकाउँछ- हुँदैन बा हुँदैन ! गाँड चिर्दारुद्रघण्टी चिरिन्छ, मरिन्छ । त्यसैले एउटा पट्टी बाँधिदिन्छ उसलाई, पट्ठीस्वास्तीको आँखा पहिले पट्टीमै पुग्छ । गाँड चिर्न गएको मान्छे गाँडमा साइनबोर्डटाँसेर आउँछ, क पश्मिनाको गलबन्दी टक्रचाउँछे, तर तुलेगाँडो चिच्च्याउँछ-गाँडको समस्या गलबन्दीले समाधात हुँदैन ! क गलबन्दी फ्याँकिदिन्छ, गाँडहल्लाउँदै बजार घुम्छ ।&lt;br /&gt;
क गाँडो मात्रै होइन, लाटो पनि हो, लाटो मात्रै होइन, अब बौलाहापनि भो- सर्वत्र यही चर्चा चल्छ, के क पक्कै बहुलायो : क आफैँलाई शाड्डालाग्छ, घरमा पुगी ऐना हेर्छ- गँडचाहा र बौलाहाको समन्चय झन्‌ नरमाइलोप्रतीत हुन्छ । ऐनाको गाँडले प्रश्न गर्छ- के गाँडको समस्या गलबन्दीलेसमाधान हुन्छ : क गलबन्दी ओढ्दै जबाफ दिन्छ- विज्ञानले चिर्ने चक्कुभन्दछोप्तै गलबन्दी धेरै बनाएको छ ।&lt;br /&gt;
गलबन्दी “ १४९&lt;br /&gt;
गलबन्दीबाट तुलेगाँडाको दृष्टिमा अब मानचित्रभरि लाटैलाटाका देशदेखिन्छन्‌, क कोलम्बसभन्दा पनि ठूलो कोलम्बस हन्छ, कतैको प्रधानपञ्चहुन्छ त कतैको प्रधानमन्त्री । हुँदाहुँदै भूगोललाई भकन्डाझैँ बुङ्ग हानिदिनखोज्छ जक, तर झजस्ता गाँडा अरू पनि त छन्‌ नि ! भकुन्डो राम्रैसित सुरुहुन्छ । लाटाहरूको सातोपुत्लो जान्छ, रेफ्री हुने मान्छे नै छैन । त्यसैलेउनीहरू पूर्व फर्केर चिच्च्याउँछन्‌- यो विश्वमा जान्नेसुन्ने को छ हँ ?जबाफ आउँछ- तुलेगाँडो र म ।&lt;br /&gt;
रचनाबाट&lt;br /&gt;
१४० ४ भैरव अर्यालका हात्यव्पङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आलु==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आलुको नामकरण कसले कसरी गरेको हो, त्यो भाषाशास्त्रीहरू नैजान्लान्‌, तर मलाई लाग्छ- पहिलेपहिले खेतका आलीतिर उम्रेर फलेकोभेट्टिएकोले यसको नाम आलु रहेको होला । तर मेरै विचार सबैले मान्नुपर्छभन्ने केही छैन, तपाईँ पनि आफ्नो तर्क तान्न सक्नुहुन्छ- कोही आले थरकोमान्छेले पहिलो पटक पत्ता लगाएको वा खाएको हुनाले यसको नाम आलुरहेको हो कि : भन्छन्‌- आलु पहिले कसैले खाँदैनथ्यो, तर अनिकाल परेकोबखत उसिन्ने क्रा केही नपाएर सायद कुनै बूढाले आफ्नो बूढीलाई भन्योहोला- “आ, लेन त्यही गाँठा उसिनेर खाङँ ।&amp;quot; यसरी &#039;आ लेन&#039; भनेकोले&lt;br /&gt;
आलु १११&lt;br /&gt;
यसको नामै आले रहेको र खांदा साह्रै मीठो भएकोले आलेलाई प्रेमपूर्वकपुकारी &#039;आलु” भनेको पनि हुन सक्छ ।&lt;br /&gt;
मान्छे भन्छन्‌- गोलभिँडा आलुको ठिमाहा छोरो हो, तर बोट उस्तै भएपनि एउटाको जन्म जराबाट, अर्काको जन्म हाँगाबाट हुने हुँदा यो तर्क खालिपहिलेपहिले गोलभिँडा खान पल्केका बाजेहरूले छाँटेको गफ मात्रै हो जस्तोमलाई &#039; लाग्छ । बरु, साँच्चै आलुको नातागोता नखोजी नछाड्ने हो भनेपिँडालुसित सोध्नुपर्छ । पिँडालु आलुको बाबु हो, त्यो किद्न सकिन्न तापनिआलु र पिँडालुमा रगतको नातो छ भन्ने कुरा दुवैको मिल्दोजुल्दो नामलेबताउँछ । एक शब्दमा दुबैको जात कन्दमूल र पेसा तरकारी-कारबार हो ।उपव्यवसायमा पिँडालु कहिलेकाहीँ मस्यौरा-उद्योगमा सहयोग दिन्छ र&#039;यदाकदाघेवारेको तौल पुगेन भने भरथेग पनि गर्छ । यसबाहेक पिँडालुको त्यति प्रसिद्धिछैन, जति आलुको ।&lt;br /&gt;
पोलिएर, उसिनिएर, पाकेर, साँधिएर, तारिएर, चप, पकौडी, कट्लेटआदि बिभिन्न परिकारमा परिणत भएर जुन बेला जस्तो चाहियो उस्तै बन्नसक्ने आलुको व्यक्तित्व साँच्चै नेपाली बुद्धिजीवीको जस्तै बहुमुखी छ । अर्थात्‌जसरी यहाँ एउटै व्यक्ति शिक्षक, दीक्षक, लेखक, सेवक, पत्रकार, अलपत्रकार,नेता, अभिनेता, जुन मौकामा जेको महत्त्व देखिन्छ, त्यसैमा फिट भइदिन्छ,त्यसै गरी आलु पनि जुन बेला जे चाहियो त्यसैमा फिट । ढिँड्डोलाई सितनचाहियो आलु फिट, जाँडलाई सितन चाहियो आल नै फिट । ज्वाइँलाईझटपट खाजा ख्वाउनुप्यो आलुको कबाफ, पाहुना धैरै लागे भने एक पाउआलुमा एक पाथी पानी राखी छडकाइदिनोस्‌ आलुदम काइदासाथ ।&lt;br /&gt;
त्यसैले आलु साह्रै जनप्रिय छ । बिच्रार गर्दा आलु पिँडालुभन्दा निकैबाठोटाठौ र अपटुडेट लाग्छ, त्यसैले यसलाई बूढो भन्न मेरो आलुप्रिय जिभ्रोलेकदापि सक्तैन । वरु बूढो बाबुचाहिँ पिँडालु नै होला, किनभने यसका मुखभरिरौं र कत्ला देखिन्छन्‌ । तर आलुको अनुहार सधैँ सुकुमार, मानौँ उठनेबित्तिकैअपट्डेट सैलुन पुगेर आएको युवकजस्तो । दाह्टीजुँगा नेभएका भन्दा तपाईंहरूशङ्का गर्नुहोला- के आल्‌ स्त्रीजाति त होइन : कुन्नि बा गौरलाभँडालाईआलुको ठिमाहा छोरो भनेको कारण आलुले पिँडालुसित लभ गर्दागर्दै पाएकोलेपो हो कि? जे होस्‌, को कसरी जन्मेको हो र कसको जात के होत्यौनालीबेली लगाइरहनुपर्ने जरुरत छैन । मैले त आलुको सामान्य परिचय मात्रदिन खोजेको हुँ, मैले चिनेसम्म आलुको नाम आलु, आलुको थर आलु, आलुको&lt;br /&gt;
१४२ “ भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
बाबु-बाजे-बराज्यू आलु, आलुको छोरा-नाति-पनाति आलु, आलुको मामा-भातिज-साला-जेठान आल, आलुको लोग्ने-स्वास्नी, प्रमी-प्रेमिका, जार-नाठोसप्पै आलु ।&lt;br /&gt;
आलु कस्तो मिलनसार छ भने गान्टोमा स्वयं गान्टेमूलादेखि लिएरअग्लोमा लौकासम्म, चच्चेमा स्वयं चुच्चेकरेलादेखि लिएर बुच्चेमा परवरसम्म,खाँदिएकोमा गृुन्द्रकदेखि लिएर बांधिएकोमा करिलोसम्म, जेसँग जसरीमिलाइदिनुहोस्‌ आलु ठ्याम्मै मिलिहाल्छ । त्यसैले धनी, गरिब, मानी, मगन्ते,विद्वान्‌, लम्फू, बृढिमान्‌ लटठू साराका भान्सामा आलुका समान सम्मान छ,समान प्रवेश र प्रतिष्ठा छ । यस अर्थमा आलुलाई समाजवादी, समन्वयवादी,साम्यवादी तपाईं जे नाम दिनुहोस्‌, वस्तुतः आलुको मूल सिद्धान्त आलुवाद नैहो । जतिसुकै समानताको आदभश राखे पनि आफूआफूमा मेल नगर्नु आलुवादकोविशेषता हो । आल्‌ वर्णले रातो र सेतो हुन्छ, सायद आफ्रिकाका फाँटतिरकाला आलु पनि होलान्‌ । तर अहिलेसम्मको अध्ययनमा सेतो आलु नै ठाल्‌मानिन्छ । त्यसैले सेतो र रातो आलुको भाउमा मसिन्‌ र उसिनुको जत्तिकैफरक पर्दछ भने सेतो र कालोमा चाहिँ मार्सी र कोदोजत्तिकँ । त्यस्तैफलाइका, तन्त्राइका, क्टाइका, प शन भेदले पनि आलुलाई विभिन्न वर्गमाबाँड्न सकिन्छ, जसको बर्णन गरेर यहां साध्य छैन ।&lt;br /&gt;
कसैलाई ढाक्रेबाट सोझै भन्सारअडडाको हाकिम हने काकताली पच्योर यता बहाली गरेको भोलिपल्टै उता जेठी सासूको अपृताली पनि पन्यो मर्नेहामी भन्छौं- फलानाको तालमा त आलु फलेछ । यसरी फल्ने आलुलाई नमल चाहिन्छ, न जल, न माटो चाहिन्छ, न स्थल । कसैको रौँ पनि उम्नननसकेर वाँफो पल्टिरहेको तालमा पनि रोप्न्‌ न गोडनुसित आलु फलिदिन्छ ।यसरी तालुमा आलु फलेपाछि मगजमा पिँडाल्‌ भरिएका र मुट्मा नालुबेरिएका भलादमी पान ठाल्‌ हन्छन्‌ । जसको तालमै आल फल्छ, उसलाइतरकारी-समस्याले त कं पिथ्याँ र, सरकारी नियमकानुनल पनि केही लछानसक्तैन । त्यसैले आलु परम भाग्यको प्रतीक हो, जो तालमा फलाउन सक्योभने आफ्नो जीवन मात्र होइन, सालीपट्टिका सात पुस्ता र भिताजपट्टिका नौपुस्तासम्म सङ्टमुक्त हुन्छन ।&lt;br /&gt;
तर एकातिर परम सौभाग्यको प्रतीक गनिने हाम्रो महामान्य आलुअर्कोतिर दभाँग्यको गाली पनि भर्डादन्छ । हिँडदाहिडदै कसैले तपाइँलाई “एफलानाले त आलु खाएछ नि थाहा पाइस्‌ ?&amp;quot; भनी सनाया भने कहिले, कहाँ,&lt;br /&gt;
आल : १४३&lt;br /&gt;
कसरी र कति प्लेट आलु खाएछ भनी बुभनुभन्दा पहिल्यै &#039;हरे शिव&#039; भनीअपसोच प्रकट गर्नुहुन्छ । दनियाँमा कोको केके खान्छन्‌ कके ? कोही माडखान्छन्‌ त कोही जाँड खान्छन्‌, कोही जुस खान्छन्‌ त कोही घूस खान्छन्‌,क्रोही ताली खान्छन्‌ त कोही अपुताली खान्छन्‌ । यी सबै खाएको सुन्दातपाईंलाई कुनै अपसोच लाग्दैन ।पाए आफैं उडाउनुहोला बरु) तर कसैलेआलु खाएको सुन्नासाथ मुख बिगारेर च्चः च्च: भन्ने किन ? किनभने यहाँसबै थोक खाए पनि आलु खान हुन्न, फलानाले आलु खायो भन्नुको मतलबउसले परीक्षामा पुल्टुङबाजी खाएछ या आलु भनी आफ्नै जिभ्रो टोकेरपरमधामको बाटो तताएछ भन्ने बुझिन्छ । अब तपाईं नै भन्नोस्‌, जुन आलुतालुमा फल्दा मान्छे ऐश्वर्यशाली भनिन्थ्यो, यही आलु खाएछ भन्दा गुल्टिएछभन्ने बुझिन्छ भने आलु आफैँ सौभाग्यको वस्तु हो कि दुर्भाग्यको ? आलुवादीदर्शनमा यो महत्त्वपूर्ण प्रश्न हो ।&lt;br /&gt;
जिम्रो मिठ्याउन होस्‌ वा भुँडी उक्स्याउन, आलु सबै खान्छन्‌ । तरकसैलाई आलु खान लागेकै बखत “तपाईंले आलु खानुभो कि क्या हो ?&amp;quot; भनेरमुस्कुराई सोध्नोस्‌, त्यही आलुको चौटोले तपाईंको तालु ताक्छ । कस्तोबिचित्रता, आलु बाए पनि मा खाएको कुरा सकार्न सक्तैन । सायदयसैले होला &#039;आलु खाएर पेडाको धाक&#039; लगाउने चलन चलेको । उसिनाकोभात हसुरेर मसिनाको भुजा ज्यूनार गरेँ भन्नेदैखि लिएर बम पड्काईशान्तिको अभियान चलाएको भन्नेसम्म दर्जादर्जाका धक्कुबाजहरू संसारमापाइन्छन्‌ । बास्तवमा यी सबै आलु खाएर पेडाको धाक लगाउने हुन्‌, अर्थात्‌कर्मले गरेका नीचतालाई धाकले ढाक्नु आलुवादको धार्मिक पक्ष हो, जो बीसौँशताब्दीका प्रत्येक व्यक्तिले पालन गर्नै पर्छ ।&lt;br /&gt;
तर आलु त्यति तुच्छ वस्तु कहाँ हो र जसलाई पेडाको तुलनामा यत्रोइन्सल्ट गरिएको छ । भनूँ भने कति हलुवाई दाजुलाई पेडा बनाउन महृत गर्दोहो- यही आलुले । मान्छेलाई बैगुनी भन्नुपर्ने कारपै यही हो, क गुणकोपारख गर्नुको साटो बेइज्जती गर्छ- कसैको राम्ररी टाइम नदिने घडी रहेछभने प्वाक्क भनिदिन्छ- यो कस्तो आलुघडी । यसै हो भने भोक, रोग रशोकले सुकेर सामर्थ्यहीन भएका आजका लाखौँ मान्छे के साँच्चै आलुमान्छेहोइनन्‌ त ? किन होइनन्‌ ? आलु खाएर पेड्डाको धाक नलगाउने हो भनेवास्तवमा आल नै मान्छै र मान्छे नै आलु हो- त्यसैले कहीँ उसिनिन्छ, कहीँकबाफ लाग्छ ।&lt;br /&gt;
४ « भैँटवब अर्यालका डात्यव्यडय&lt;br /&gt;
तर जेसुकै होस्‌, म सधैँ आलु खान्छु, तर मलाई सधैँ आलु खान डरलाग्छ किनभने म पनि बीसौँ शताव्दीकै आलुमान्छे, जसको कर्म हो आलुखानु; तर धर्म हो आलु खाएर पेडाको धाक लगाउनु ।&lt;br /&gt;
त्यसैले आलुको बारेमा लेखिएकी यो निबन्धलाई कसैले आलु-निबन्धभन्छ भने भनिरहोस्‌, मेरो दृष्टिमा यो पूरापूरा पेडा-तिबन्ध हो ।&lt;br /&gt;
रत्नश्वीबाट&lt;br /&gt;
आलु / ११४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मान्छे मोडेल १९६७==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गृड्डनेमा गज्जादेखि कारसम्म, उडनेमा वेल्‌नदेखि टलिस्टारसम्म,जडनेमा औँठीदेखि हारसम्म, अडनेमा झुपडीदेखि दरवारसम्म, मब्रैकोमोडेल बारम्बार वर्दालन्छ, नर मान्छे नै यस्तो बोत्रो प्रडक्सन हो, जसकोमोडेल जहिले हेरे पनि जस्तातस्तै । उह्दी एउटा कभिन्डोजस्ता टाउकोमाटिंप्लर्कार्टाप्लक टचंका गुलबजस्ता एक जार आँखा, मध्यसडकमा अलपत्रमिकिणको डवल पाइपवाला ढलजस्तो छन्द न बन्दको एउटा नाक, जतिटाले पनि छिनछिनमा हिङ्ग भई फुस्किनै पडकेको ट्युबजस्तो एउटा म्‌ख-&lt;br /&gt;
१४६ - भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
साच्चै मान्छको मोडेल आघ आखट-यगमा जस्तो थियो. हाल रार्कट-युगसम्म उस्तै छ । कमसेकम दुइटा आंखालाई दुईतिरै गालामा टाँसेरसाबिक दुईंप्वाले तेर्सो नाकलाई सिङ्गलप्वाले दुई गोल वनाई हाल आँखारहेको ठाउंमा राखिदिन पाए पनि माडेलमा आलिकति हेरफेर पक्कै आउँथ्यो ।या हात, खुट्टा, आँखा, कान डवलडबल- भएपछि आजको वृद्धिवादी युगमाटाउका पान डवलै जड्दिन पाए मान्छेले डवल बुद्धि निकाल्न सक्थ्यो ।एउटा टाउकाले ज्ञानको काम गर्थ्यो त अर्काले बिज्ञानको । टाउको थप्ननसके भएका दुइटा कानलाई नै एउटालाई टाउकामा अर्कोलाई पैतालामाराखिदिन पाए एकातिरबाट आकाशवाणी सुन्न पाइन्थ्यो भने अर्कोतिरबाटपातालबाणी पनि सुनिँदो हो । अथवा हरेकासत दुईदुइटा आँखा छन्‌ भनेएउटा अगाडि एउटा पछाडि जड्दिएको खण्डमा मोडेलमा चेन्ज आउनु तछँदै छ, देउतास्थानमा दर्शन गर्न जाँदा अघिल्लो आँखा देउतामा चढाउनपनि पाइन्थ्यो, पछिल्लो आँखा कुनै देउतीतिर लडाउन पनि पाइन्थ्यो । तरके गर्नु र : ब्रहमाजी बूढाले जस्तो बनाइदिए त्यसमा कत्ति पनि अदलबदलगर्ने सकिएन । अरूको कुरा किन गरूँ, म आफैँले सात समुद्वपारिका सत्रजना नामुद इन्जिनियर झिकाएर बिलकलै अत्याधुनिक मोडेलको वङ्गलाबनाएँ, न्युयोर्कबाट अल्ट्रा मोडन॑ मोडेलको कार ल्याएँ, हङकङदेखिहलिउडसम्म घुमाएर श्रीमतीलाई अत्याधुनिक फेसन सिकाएँ, तर वैठककोऐनामा उभिएर हेस्यो- आफ्नौ त उही दुई हात, नाक, आँखाका खोपामाटिलपिल-टिलपिल तिनै जिरो बाटका गुलुब । छ्या ! रिसै उठ्छ, कस्तोआउट अफ्‌ डेट्‌ मोडेल ! एक रात साह्रै दिक्क लागेर म ओछ्यानमा पल्टीसोच्तै थिएँ- मान्छेले सयौं पटक आफ्नो इतिहासको मोड बदल्यो, कैयौँपटक आफ्ना आवासहरूको मोडेल बदल्यो । उदाहरण लिन अन्त किनजानुपत्यो र ! ९० सालको भूकम्पले पुराना घर स्वाहा हुँदा यहाँ कति नयाँमोडेलका घर बने, नयाँ बाटा बने, यही क्रममा पुराना अनुहार स्वाहाभएपछि मान्छेले सक्ने भएको भए त्यसपछि जन्मनेको अन्‌ुहारै बेग्लै पार्दैनथ्योत - साच्चै त्यसै हुँदो हो त ९० सालयताका प्रत्येक मान्छे पखेटावाल हुन्थेहोला, किनभने भैँचालो जाँदा भाग्न नभ्याई भक्रान हुनुपरेको अनुभवलेउसलाई पक्कै सुभथ्यो- पखेटा भइदिएको भए भूकम्प हुनासाथ मिलेभ्यालबाट, नामले खटप्बालबाट फुत्त निस्की भुर्र उड्न पाइन्थ्यो । साँच्चैआजका युवक -युवतीहरू सारा पखेटावाल भइदिएको भए हाम्रो मात्रै होइन,&lt;br /&gt;
मान्छे मोडेल 1९६७ १४७&lt;br /&gt;
नेपालकै मोडेल बर्दालइसक्थ्यो । नेपालको मात्र होइन, दुनियाँकै मोडेलब्दलिइसक्थ्यो । तर के गर्नु, बिचारको दृष्टिले दस सेकंन्डमा दस अवतारलिन सक्ने मान्छेले दस हजार वर्ष कोसिस गरे पनि आफ्नो अनुहार बदल्नसक्तैन । ब्रहमाजी बूढालाई कतै भेट्न पाए मेरो पहिलो उजुरी हुन्थ्यौ- &amp;quot;एबाजे, केही त बदलिदिनोस्‌ ।”&lt;br /&gt;
राति निकैबेर ओछ्यानमा पल्टेर तर्कना गर्दागर्दै नभन्दै ब्रहमाजीसितटुप्लुक्क मेरो भेट भइहाल्यो । ढुङ्गो खोज्दा देउता मिलेजस्तो सन्जोग !भियतनाममा बम पड्केको सुनेर &#039;ए मान्छेका छाउराहरूले मेरो सुन्दरसृष्टि भताभुङ्ग पारिदिन आँटेछन्‌&#039; भन्ने पीरले रन्थनाउँदै हिँडेका रहेछन्‌बूढा त । भेट हुनासाथ ढोगभेट गरेर मैले आफ्नो अर्जी गरेँ- “मान्छेकोमोडेल साह्रै आउट्‌ अफ्‌ डेट्‌ भो बाजे, यही असन्तुष्टिले कुण्ठित भएर मान्छेजे पायो उही फलाक्न थालेको छ ! नपत्याए बिटनिकहरूलाई सोध्नोस्‌,कति बिद्रोही भएर निस्केका छन्‌ उनीहरू, सैगोनमा गएर अमेरिकी सिपाहीर भियतकङ गुरिल्लाहरूलाई भेट्नोस्‌, कसरी उम्लेको छ उनीहरूको रगत !यस्तै चाल हो भने बाजे, हाइड्जोजनको एक वृष्टिमा तपाईंको सम्पूर्ण सृष्टिखतम !” ।&lt;br /&gt;
बह्माजीले सुस्केरा हाल्दै भने- “ठीक छ, मान्छेको मोडेल बदलिदिनम तयार छु, तर कस्तो मोडेलमा ढालिदिउँ, लौन त तिमीहरू पनि केहीसुझाव देओ, हामीले युग बदस्यौं भन्छौ, बदलिएका युगको अनुकूल मान्छेकोमोडेलको एउटा इस्टमेट पनि देओ न त मलाई ।” बूढाको क्रा मलाई पनिमनासिबै लाग्यो र नयाँ मोडेल कस्तो हुनुपर्छ भन्ने राय लिन विभिन्न विद्वान्‌,बुद्धिमानहरूलाई निम्ता पठाएर राष्ट्रिय रङ्खशालामा एउटा बृहत्‌ सभा बोलाएँ ।सभापतिको पदमा ब्रह्माजी स्वयं निर्वाचित भए ।&lt;br /&gt;
आजको आर्थिक युगमा मान्छेको मोडेल पनि सकेसम्म छरितो र कमखर्ची हुनुपर्छ भन्दै एक जना अर्थशास्त्रीले आफ्नो राय व्यक्त गरे- “टाउकाकोहुप्पामा एउटा आँखा जडिदिनू, सुन्नको लागि त्यहीँनेर एउटा सानो एरियलराखिदिन्‌, हावा र खावा पास गराउन त्यहीँनेर दुइटा प्वाल खोपिदिनू सिद्धिगो ।यो दमाहाजस्तो पेटको बिलकुलै जरुरत छैन, पाकस्थली राख्न एउटा सानोबेलुत्तजस्तो पेट भए पर्याप्त । आइमाईलाई एकोटा अस्थायी पाठेघर राखिदिनुपर्छजो दुइटा छोराछोरी पाउनासाथ स्वत: सुकेर गइहालोस्‌; त्यसो भए जनसङ्ख्यापनि अटोमेटिक मेथडबाटै कन्ट्रोल हुन्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
१४६ ” धैरव अयालका हास्यव्यडाय&lt;br /&gt;
राजनीतिक दृष्टिले हेर्दा हामीलाई मान्छे घटाउनुभन्दा बढाउनुजरुरी छ भन्दै एक राजनीतिज्ञले भने- “मान्छे बढे नागरिक बढ्छन्‌,नागरिक बढे सैनिक बढ्छन्‌, सैनिक बढे शक्ति बढ्छ अनि विश्वमाशक्तिसन्तुलन हुन्छ । त्यसैले पेट नराखे पनि प्रत्येक महिलामा एक-एकदर्जन पाठेघर राखिदिनुपर्छ ता कि वासिङटनमा एउटी आइमाई सुत्केरीहुँदा सैगोनमा बाद्द जना अमेरिकी सैन्य थपिन सकून्‌ । साथै माछेलाईआँखाजस्तो मुख पनि डबल हुनु जरुरत छ । यसो भएमा परेको बेला एउटामुखले शान्तिवार्ता र अर्को मुखले युद्धवार्ता एकै पटक गर्ने सुविधा विश्वकाराजनीतिक नेताहरूलाई मिल्दछ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
उत्तको भाषणपछि एक जना धर्मशास्त्रीले कडकिएर भने- “पाप गर्नेअङ्गहरू सबै फेरी खालि पुण्य गर्ने अङ्गलाई मात्र नयाँ मोडेलमा स्थानदिनुपर्छ । त्यसैले पहिला यो फोहोर धुने देउरे हातै झिक्नुपर्छ, दिसा-पिसापका यन्त्र उडाइदिनुपर्छ ।” उनी बोल्दै थिए, एक जना डाक्टरले घोरविरोध गरे- “यसरी त शरीरै चल्दैन । मेरो विचारमा सम्पूर्ण रोगहरूकोकारण पेट हो, किनभने यसमा जथाभाबी आहार कोचेर मान्छेले नाना थरीरोग जन्माउँछ- त्यसैले नयाँ मोडेलमा पेट राख्नहुन्न ।” उनीहरू वोल्दाबोल्दैएक जना मनोवैज्ञानिकले कुरा काटे- “सम्पूर्ण दुःखको कारण मानिसकोचिन्ता हो, चिन्ता दिमागबाट उत्पन्न हुन्छ, त्यसैले नयाँ मोडेलमा टाउकैनराखे कसो होला ?” तर बेदान्ती महोदयलाई यो पटक्कै मन परेन । उनलेभने- &amp;quot;निरञ्जन निराकार चैतन्य परमेश्वरको प्राप्तिका लागि मान्छेकोचैतन्यशक्ति विस्तृत पार्नुपरेकोले नयाँ मोडेलमा टाउका बाइ्ओटा राख्नुपर्छ ।इन्द्रियहरू सब लोभ, मोह, मद, मात्सर्यका कारण भएकाले टाउकोबाहेकअरू कुनै पनि अङ्गको जरुरत छैन, हिँड्नडुल्न बाह्रै टाउकामा ससानापाङ्ग्रा राखिदिए भइहाल्यो ।”&lt;br /&gt;
एउटा कविलाई यो मन परेन, उनले भने- “मान्छे सौन्दर्यको उपासकहो, सौन्दर्यपानको लागि उसको टाउकामा दुई आँखाले पुग्दैन, दुई हजारआँखा चाहिन्छ । साथै उसलाई वबाह्वओटा वेदना खप्ने छाती चाहिन्छ ।” तरअर्को कविले संशोधन गर्दै भने- “हामीलाई मुटुसुटु चाहिन्न, एउटा ठूलोटाउको हुनुपर्छ, प्रत्येक इन्द्रिय पत्थरको चाहिन्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
पत्रकारले राय व्यक्त गरे- “नयाँ मोडेलमा मान्छेको पखेटा हुनै पर्छ,नाकको जरुरत छैन, चारओटा मुख र बाह्रओटा जिश्रो हन्‌ नितान्त जरुरी छ&lt;br /&gt;
मान्छे मोडेल 1९६७ .” १४९&lt;br /&gt;
त्यसो भए मान्छे घेरै बोल्छ, नयाँनयाँ समाचार धेरै पाइन्छ ।”&lt;br /&gt;
साथै किसान र मजदुर दुई जनाले पनि आफ्नो संयुक्त राय प्रकट गरे-“नयाँ मोडेलमा मख एउटै भए पुग्छ, तर हात एक दर्जन चाहिन्छ, टाउकोसकेसम्म सातै होस्‌ तर आङ र टाड हात्तीकँ जत्रो हनुपर्दछ ।&amp;quot; यस्तैमा एउटीयुबती भीडबाट निस्केर मञ्चमा पुगी फलाक्न थालिन्‌- &amp;quot;मोडेल चेन्ज गर्दास्त्री र पुरुषको मोडेलमा लिङ्गभेद गर्न हँदैन, प्रत्येकको नाकमूनि जुँगा होस्‌,प्रत्येकको पेटमुनि एउटा पाठेघर होस्‌ । छोरा पाउनुपरे बाबुले, छोरी पाउनुपरेआमाले पालैसित पाए भइहाल्यो ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“अब क्‌त्रिम गर्भाधान सुलभ हुन आँटिसकेकोले लिङ्गमेदै हुनुपर्छभन्ने म पनि मान्दिनँ, तर चन्द्रलोक र मब्घललोक पनि आबाद गर्नुपर्नेभएकोले अब प्रसर्वाक्रयाचाहिँ दुवै थरीलाई अनिवार्य गराउनै पर्छ&amp;quot; भन्दैएक वैज्ञानिकले राय झिके- “वरु आहारको लागि इन्जेक्सनले काम चल्नेहुँदा पेट नभए हुन्छ ।”&lt;br /&gt;
अर्को वैज्ञानिकले भन्यो- “अब कम्प्युटरले सबै काम गर्ने भएकोलेमान्छ बनाउने झन्झट किन ः”&lt;br /&gt;
यसपछि एक फिल्म अभिनेताले भने- &amp;quot;मान्छे काला र गोरा मात्रैकिन : नयाँ मोडेलमा हरिया, नीला, झालेमाले, छिरविरे, आकाशरड्ी, पहेँला,सब रङ्गी बनाउनुपर्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
एबंक्रमले मतमतान्तर चल्दै गए, सबैको कोसिस व्रहमाजीलाईएकोहोच्याएर आफूले भनेबमोजिमको मोडेल स्वीकृत गराउनुमै लागेकोथियो । राजनीतिज्ञचाहिँ नजिकै बसेर कहिले बूढाको दाह्ठी कन्याइदिन्थे,कहिले ख्वाक्क खोक्ता फिकदानी लिई उनको अघि सधैं । सवै आआफ्नोरायको औचित्य साबित गर्न अरूको रायको निन्द्री र चर्चों गर्न थाले,अलिआलि गर्दागर्दै घरै भयो, सल्लाह गर्दागर्दै हल्ला बढ्यो । कस्ताकस्ती रमुवकामुक्की हुन थाल्यो- ब्रहमालाई पर्नसम्म फसाद पस्यो । त्यसैले उनलेएउटा कम्प्रोमाइज ्कामटी गठन गरे- सवैको राय ख्याल गरी उपयुक्तमोडेलवारे यथाशीघ रिपोट दिन्‌ नै त्यसको काम थियो ।&lt;br /&gt;
र्कामटीले सवै विद्वान्‌, विशेषज्ञ, वुद्धिमान्‌, व्यवहारज्ञको मतमतान्तरकोअध्ययन गरी सन्‌ १९६७ को लागि मान्छेको णउटा माडर्लाचत्र तयार गरीबह्माजीछिउ पेस गयो ।&lt;br /&gt;
चित्र यस्ता थियो-&lt;br /&gt;
१६० « भैरब अर्यालका हास्यव्यङ्रय&lt;br /&gt;
नित्य रिंगिरहने एउटा च्याप्टो जाँतोजस्तो टाउको, टाउकाको वरिपरिदसतिर फार्कएका दसोटा एरियल, निधारमा माखोजत्रो एउटा आँखो; नाक,कान, गाला केही छैन, तीन बित्ता लम्बाइ, तीन बित्ता चौडाइको एउटाचारपाटै मुख, मुर्खभित्र बाह्रओटा जिभ्रा, चारओटा दाँत, छाती दुनोजस्तो, पेटसारड्गीजस्तो, हीप कीपजत्रो, नलीखुट्टा नीपजत्रो ।&lt;br /&gt;
व्रहमाजीले त्यो चित्र लिई प्रत्येक व्यक्तलाई सोध्न थाले- “के यही होतिमीले खोजेको नयाँ मोडेल ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
एउटाले भन्यो- “छि: यस्तो पनि नयाँ मोडेल हुन्छ ?”&lt;br /&gt;
अर्कोले भन्यो- “यो त मान्छेजस्तो नै देखिएन !”&lt;br /&gt;
अर्कोले भन्यो- “आबै ! यस्तो पनि मान्छे हुन्छ ?”&lt;br /&gt;
अर्कोले भन्यो- &amp;quot;यस्तो वनाउनुभन्द्यु चाहिँ वरु फे्दैनफेर्नू !”&lt;br /&gt;
धेरैले एकै स्वरमा भने- “भैगो व्रहमाजी ! भैगो । हामीलाई आउद्‌अफ्‌ डेट भए पनि साबिकै मोडेल ठीक छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“अनि के बौलाइराखेका त तिमीहरू ?&amp;quot; -ब्रहमाजी गर्जे ।&lt;br /&gt;
उनको गर्जना सुनेर मेरो पनि निद्रा खुल्यो । झटपट उठेर आङ तान्दैऐनाअघिल्तिर उाभएँ, आफ्नो अनुहार आफैँले म्वाइ खाकँ जस्तो राम्रो लाग्यो ।त्यस दिनदेखि मोडेलको करो उठ्यो कि म मान्छेको नयाँ माडेव सम्झन्छु,अनि मेरो दिमागमा चक्कराउन आइपुग्छ उही मान्छै मोडेल १९६७ ।&lt;br /&gt;
रउमझमवाट&lt;br /&gt;
मान्छे मोडेल १९६७ &amp;quot; १६१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पच्चीसौँ शताब्दी अङ्गप्रत्यङ्गमा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आच्या, नाक त नेप्टै पो देख्छु नि; नफेरी आउँदिनँ भन्नुहुन्थ्यो, खोइत फेरेको ; केन्द्रतिर जादै जानुभएन कि क्या हो :&amp;quot; एकसुरले तानाबाना बुन्दैफर्केको नेपुलकलाई कोठाभित्र पस्नेबित्तिकै स्वास्नीले झल्याँस्स पारी, क घरआडइपुगेछ ।&lt;br /&gt;
“केन्द्रतिर नगएको त कहाँ हो र ? तर... ...” वाक्य पूरा हँदानहँदैनेपुलकको दिमागमा एउटा स्विच घुम्यो, उसको अघिल्तिर न्यु स्टेटस्थित &#039;अइ-परिवर्तन केन्द्र&#039; भन्ने सङ्ेतपाटीसहितको विशाल भवन उभिन आयो । आफ्नोकोठा कोठैकोठा भई तानियो- कुनैमा तन्द्राङतुन्द्रःङ हातैहात &#039;झुन्डिएका,क्नैमा खुट्ढैखुट्टा । अर्कापट्टि लङ मिलाई पारदर्शक बट्टामा राखिएका नाक.कान र आँखाहरू अनि भित्ताको सानो कोठामा &#039;गोप्य&#039; अड्रित बट्टामा स्त्री रपुरुषका जननेन्द्रियहरू ।&lt;br /&gt;
१६२ .” भैरव अर्यालका हात्यब्यड्ग्य&lt;br /&gt;
नेपुलकले कोट फुकालेर मिर्कायो । अनि सुटुक्क सोफामा बसी स्वास्तीतिरएकटकसित हेत्यो । हेदाहेदैं स्वास्नी थेप्चिएर पुड्की भईं, पग्लिएर कमलीभई, बैँसको बाक्लो पालिसले उसको गाला फक्रक्क फक्रे, चिम्सा आँखालम्बिएर टिप्लिकटिप्लिक चलमलाउन थाले, नेपुलकको आँखा जुध्यो । त्योकप्लक्कै निलिदिकँ जस्ती नमुनाकी तरुनी मुस्कुराएर साँधिरहेकी थिई-“भन्नोस्‌ श्रीमान्‌, तपाईंको कुन अङ्ग फेर्नुपन्यो ?” नेपुलक अनकनाउँदै थियो,तरुनीले फेरि सोधी- “भन्नोस्‌ न, म यस केन्द्रकी रिसेप्सनिस्ट कम्‌ गाइड हुँ,मेरो नाम हो सुकमारी प्यारेन्टलेस्‌ ।”&lt;br /&gt;
नेपुलकले हडबडाउँदै भन्यो- “ए, त्यसो भए तपाईंसँग कुरा गरे पनित भौ नि, होइन ?”&lt;br /&gt;
“साँच्चै भनुँ भने म त यो अङ्गपरिवर्तन केन्द्रमा आज पहिलो पटकआउँदै छु, अझ भनूँ भने यहाँ कुन अङ्ग परिवर्तन हुन्छ र कसरी के दरमा हुन्छत्यो पनि मलाई थाहा छैन ।”&lt;br /&gt;
सुकुमारी एउटा कान उसको कुरातिर लगाई जबाफचाहिँ अर्कै एउटाग्राहकतिर फर्केर दिँदै थिई- “ल यो कागज लिएर सर्जरी रुममा जानोस्‌,डाक्टरले तपाईंको आँखा सरक्क झिकेर राख्छ, तपाईँले रोजेअनुसार भर्खरएउटा पर्यटकले फेरेर मिर्काएका एक जोर मधुरा आँखा छन्‌; त्यही जडनलगाउनुहोस्‌, अनि एकाउन्ट अफिसबाट बाँकी पैसा लिई जानोस्‌ । दुईघण्टामा झिक्ने-हाल्ने दुवै काम चट्‌ ।” य&lt;br /&gt;
त्यो मान्छे गयो । नेपुलकतिर हेरेर सुकुमारीले भनी- “बुभ्नुभयो, योअङ्गपरिवर्तन केन्द्रमा सबै थोकको सुविधा छ । तपाईं आफ्नो कुनै अङ्ग बेच्नचाहनुहुन्छ भने स्ट्यान्डर्ड र इन्टरनेसनल मार्केटमा त्यसको माग हेरी उचितमोलमा हामी किनिदिन्छौं, तपाईंको कुनै अङ्ग छैन अथवा भए पनि गतिलो छैनर फेर्न चाहनुहुन्छ भने रोजेर किन्न सक्नुहुन्छ, यहाँ नभएको अङ्ग रहेछ भनेअर्डर दिएको तीन दिनभित्र हामी मगाइदिन्छौँ । जीवित अन्ग बेचेर कृत्रिम अङ्गजडन चाहनुहुन्छ भने त्यो पनि जडेर पठाइदिन्छौँ । जीवित अङ्गको जडानशुल्क १००।- छ र कृत्रिमको १०।- मात्र । अब भन्नोस्‌, तपाईंको के सेवागर ?&amp;quot; सुकुमारीले गालामा गुराँस फुलाई ।&lt;br /&gt;
नेपुलकले अनकनाईअतकनाई भन्यो- “अरू त केही होइन, यो नाकएउटा अलि नेप्टो भएकोले फेर्दै कि भनेर आ&#039;को ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
सुकमारीले फोनमा रिङ गर्दै भनी- &amp;quot;हलो, हलो नाक सेक्सन !”&lt;br /&gt;
पन््चीर्यौ शताब्बी अङ्ग्रत्यङ्मा “ १६३&lt;br /&gt;
जवाफको प्रतीक्षामा रिसिभर गालामा अड्याउंदै नेपुलकतिर फर्केर भनी-“फेर्नु त पर्छ त ! पच्चीसौँ शताब्दीमा पनि यस्तो नेप्टो नाक लिएर निर्बाहहुन्छ त ?”&lt;br /&gt;
नेपुलकलाई यो आवाज स्वास्नीको जस्तो लाग्यो । नभन्दै उसकीआफ्नै स्वास्ती सोफानिर उभिएर भनिरहेकी थिई- “यस्ता असभ्य मान्छेसितके क्रा गर्नु । नेप्टो नाक देख्ता म्वाइँ खानै घिन लागेर पो फेरेर आउनोस्‌भनेकी ! साँच्चै अङ्गपरिवर्तन केन्द्रमा स्तनको भाउ के रहेछ हँ ?”&lt;br /&gt;
प्रश्नले नेपुलकलाई फेरि घचेटेर अङ्गपरिवर्तन केन्द्रमा पुन्यायो । सो-रुमहरूमा बिभिन्न अन्गप्रत्यङ्गहरू देखाउँदै सुकुमारी भनिरहेकी थिई- &amp;quot;यीबीस-बाइसे स्तन भर्खर हिजो मात्रै दुइटी तरुनीले बेचेर गएका ।”&lt;br /&gt;
नेपुलकले आश्चर्यचकित भएर सोध्यो- “बीस-बाइसैमा स्तन बेच्नेवैराग्य किन आएको त ती मोरीहरूलाई ?” सुकुमारीले खिस्स हाँस्तै भनी-“ती दरिद्व मोरीहरूलाई यति टुमुक्क परेका स्तनहरू किन चाहिए त; आफ्नास्तन चचार हजारमा बेच्ने, चचार सयमा यहाँ बूढीहरूले फेरेर मिर्काएकाझुम्रे स्तन टाँसे, गए । छाती रित्तो पत्ति रहेन, ढिँडो निस्तो पनि रहेन । बरुतपाईंकी श्रीमतीलाई चाहिन्छ भने लैजानुहोस्‌, आजै लिनुभए अलि सस्तैमापाउनुहुन्छ भोलिसम्ममा यी उडिसक्छन्‌ । स्तनको माग कति चढ्दो छ,तपाइँलाई के थाहा ! भोलि नै यो आठ हजार जोडीमा विक्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“एक जोर बीस-बाडइसै स्तनको आठ हजार पर्दो रहेछ !” नेपुलकस्वास्नीलाई उत्तर दिन्छ । स्वास्ती एक पटक जिश्रो काढ्छे र पोइको उत्तरदोहोस्याउँछे- “एक जोरको आठ हजार !” एकछिन गमेर अनुनयपूर्वकपोइको नजिक गई भन्छे- “एउटा कुरा भन्छु मान्ने है त !&amp;quot; अन्यमनस्कभावमा नेपुलक सोध्छ- &amp;quot;के :” &amp;quot;मलाई पनि एक जोर वीस-बाइसे स्तनकोसाह्रै रहर लागेको छ । आफ्नो बेचेर नपुगेको पैसा थपी किन्न पाए कस्तो&lt;br /&gt;
कुन आँखा फुटेकीले किन्ली र तिम्रो बेलुन फुटेजस्ता स्तन ।” नेपुलकस्वास्नीतिर फर्केर झोक्किन्छ ।&lt;br /&gt;
“आँखा फुटेकीले आँखै किनिहाल्छे नि ! सुटुक्क लगेर बेचिदिउँ, कसलेथाहा पाउँछ र मैले स्तन बेचेको :” नेपुलकको मुखाकृतिमा रिसले घिनकोगुइँठा पात्यो; छा, कस्तो जुग आयो ।&lt;br /&gt;
“बुभ्नुभयो, जुग अर्कै आयो ।” रिसेप्सनिस्ट ठिटीले सो-रुममा&lt;br /&gt;
४ “ भँरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
हिफाजतसाथ राखिएका मुटुहरू देखाउँदै भनी- “आजको जगमा पैसालेसाथ दियो भने मान्छे हजारौँ वर्ष बाँच्न सक्छ । एक अमेरिकी धनर्पातको कुरासुनिहाल्नभयो । २२५ वर्षको उमेरमा यसर्पाल फेरि उनले आफ्नो मुटुफेरेछन्‌ । औषधिविज्ञानको कत्रो प्रगति !&amp;quot;&lt;br /&gt;
“क्ो, औषधिविज्ञानको उन्नतिले गर्नेसम्म ग-यो । मान्छे पनि मोटरझैँफडइत्याडफुड्लुङ फुक्लने भयो, टाकटुक जोडिने भयो, कृत्रिम ट्युबमा बच्चाजन्मने भयो, तर शक्ति र सम्पत्ति नहुनेहरूको निम्ति के भयो ?&amp;quot; नेपुलकगम्भीर मुडमा सोच्नै थियो । रिसेप्सनिस्ट सुकुमारीले अर्को शौ-केस देखाउँदैभनी- “लौ, तपाईंले नाक खोज्नुभएको हाइन : कुन नाक हाल्नुहुन्छ ? रसियननाक तपाईंको बनोटमा अलि म्याच गर्दैन । अमेरिकी नाकको कलरै नमिल्नेभइहाल्यो, चिनियाँ नाक हाल्नोस्‌, तपाईँलाई मङ्गोलियन टाइपकै नाक सुहाउँछ ।अचेल फेसन सानो नाकको छ बुभनुभयो ?” नेपुलकले मुन्टो हल्लाउँदै भन्यो-“मलाई त नेपाली नाकै दिनुहोस्‌ बा, हिसी र रङ्ग दवै फिट हुन्छ।&amp;quot; तररिसेप्सनिस्ट तरुनीले नेपाली नाक पाउनै मुस्किल छ भन्दै टिप्पणी गरी- “छनत एक दर्जन नेपाली नाक छन्‌, तर यी सबै विदेशीको अडंरमा लिइराखेका,आखिर विदेशी मुद्रा कमाउनु पनि त पन्यो । हाड हार्मोन्स सबै विदेशबाटझिकाउनुपर्छ ।&#039; फेर्ने पर्ने भएपछि नेपाली नाक नै के टाँस्नुहुन्छ त ल,योइन्डियन नाक हाल्नोस्‌; सस्तो, राम्रो, बलियो, मलाई त यस्तै मन पर्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
नेपुलकलाई त्यो नाक अलि असजिलो होला जस्तो लाग्यो- वास्तवमाउसलाई आफ्नो शरीरमा बेजातको अङ्ग जड्ने मन छैन । तर क करा टानखोज्दै भन्छ- “यी नाक बेच्नेहरूले युरोपियन नाक हालेर गए होलान्‌,होइन :&amp;quot; ठिटीले खिसीको भावमा मुख बङ्ग्याउँदै भनी- “ती तपाइंजस्ताफेर्न चाहने क्रहाँ थिए र; भरिया न हुन्‌, एक मानो रगत बेचेर एक पाथीमट्टीतेल किन्छन्‌ । आफ्ना साबुत अङ्ग बेचेर यहाँ तपाईंजस्तो भलादमी वा“पर्यटकले फेरेर जगेडा रहेका चेप्टानेप्टा, लुला, बाब्गा अङ्ग सस्तोमा टाँस्छन्‌,जान्छन्‌ । अझ कति त बीस-तीस रुपियाँमा प्लास्टिक अन्ग लगाई जीवन टानेँनियतले फर्कन्छन्‌ बिचराहरू ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“धनले गरिब भए पनि स्वास्थ्यले त उनीहरू धनी नै थिए; औषधिविज्ञानलेउनीहरूको त्यही धन पनि खोसी विकृत र विकलाङ्ग त पारेन ?&amp;quot; नेपुलकलेलामो सास फेरेर गम्भीर वैकल्य प्रकट गप्यो । रिसेप्सनिस्ट सुकुमारी मुसुक्कहाँसी- &amp;quot;तपाईँ मान्छे साह्रै भावुक हनुहँदो रहेछ; शो-केस हेदैमा यति विकल&lt;br /&gt;
पच्चीर्यौ शताब्दी अहप्रत्यङ्षमा / १६१&lt;br /&gt;
हुनुहुन्छ भने मेरो जस्तै यहीँ काम गर्नुपन्यो भने त तीन दिनमा तपाइंको टाउकैफेर्नुपर्ने हुन्छ कि क्या हो ! तपाईंलाई थाहा छ, यहाँ राखिएका प्रत्येक अङ्गकोएकोटा करुण कथा छ । उ: ती कान एउटा साह्रै सुन्दर नेपाली केटाका हुन्‌ ।मलेरियाले मर्न आँटेको बाबुलाई औषधि गराउन नसकी हिजा मात्र उसलेआफ्नो दुवै कान बेचेर प्लास्टिकका कान टँसाई गयो ।”&lt;br /&gt;
नेपुलक ट्वाल्ल परेर ठिटीको कुरा सुनिरहेथ्यो, उसले फेरि थपी-“बुभनुभो, एक थरी त्यस्ता छन्‌, अर्को थरीको कथा सुन्नुहुन्छ भने हिँडनुहोस्‌पल्लो कोठामा, त्यहाँ आजै लिएका नाक र कानहरू छन्‌ । एक जना दरिद्रबृढालाई अस्ति हैजा लागेछ, बेलामा औषधि नपरेकाले उनी बाँच्न नसक्नेभए । उँनका छोराहरू हिरिकहिरिक्‌ हुन लागेको बाबुलाई भ्याइँकुटी पार्दैदगुराएर यहाँ ल्याएर भने- “नमर्दै यिनका साबुतजति अङ्ग किनिदिनुहोस्‌ ताकि यिनलाई पोल्ने दाउरा किनेर बाँकीबक्यौता बाँडचुँड गरी अलिक दिनहामी पनि पेट पाल्न सकौँ... ...&amp;quot; म त त्यो बिचराको चिरफार हेर्न नसकीएक बोतल हाइल्यान्ड ह्विस्की लिएर ढोका धुनी बसेँ ।”&lt;br /&gt;
नेपुलकले भन्यो- “कस्तो आजको विवशता !”&lt;br /&gt;
सुकुमारीले भनी- “यो हो आजको वास्तविकता !”&lt;br /&gt;
तर नेपुलककी स्वास्नीले आफ्नो पोइले सुनाएका यी घटना र टिप्पणीहरूराम्ररी बुझिन । उसको मन छोराले गरेको उपद्रोतिर गइरहेको थियो । &#039;अहिलेक इन्तु न चिन्तु भई लडेको छ, के गर्नु त अब अर्को पाउँला !&#039; तर क छोरो&lt;br /&gt;
१६६ भैरव अयालिका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
पाउँदाको कष्ट साम्झन्छे, आट जरुङ्ग हन्छ; नाइँ क राडिमेड बच्चा किनेरन्याउंछे । अँ. त्यसमा भा उसलाई पाद्रेघरको के जरुरत : यो बेर्चिदिए पनि हन्छ,वल्ल समस्याको समाधान निस्क्यो, खिसिक्क हांस्तै उसले पातलाई सोधी- “अवमरे पाठेघरका के काम छ र हाँग : यही वेच्चर स्तन लिन पाए कसो होला :”&lt;br /&gt;
नेपूलकको दिमाग चक्कराउँदै अङ्गपरिबनेन केन्द्रको अर्को कक्षमापग्दछ । एउटी सोझी खालकी महिलासंग रिमेप्सानस्ट ठिटी सोधिरहेकीहुन्छे- &amp;quot;के तपाइँका वच्चा छैनन्‌ ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
“छन्‌, तर दइटै गँडमड किनेका; आफ्नै पाठेघरमा वनेको वच्चाकोम्वाइ खाने मेरो जिन्दगीमा एउटै धोको छ । त्यसैले एक तोला विशुद्ध हिमालीवीर्य आफूमा भिव्याजँ भनेर आएकी !&lt;br /&gt;
“कस्ती हरिलदठक आइमाई...&amp;quot; -नेपुलकलाई हाँसो उठ्यो, “कुनैलोग्नेमान्छेसित पोइल गए न भइहाल्यो नि ।” उसले प्वाक्क भन्यो । सोझीमहिलाले सोक्षै तालमा उत्तर दिई-.“लोग्ने त भइहाल्तुहुन्छ नि, मालिकलेमेरो पतिसित आफ्नो सम्पत्ति साटिदिए । करा वुझिहाल्नुभयो होला, आजहाम्रो घर छ, मोटर छ, जग्गा छ, जागिर छ, तर... ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
नम केही सहयोग गर्ने सक्छु कि :” नेपुलकले अनकनाईअनकनाईभन्यो । महिलाले आफ्नो सतीत्वत्रार निक्कै लामो व्याख्या गरी र भनी- “मखालि वीर्य चाहन्छु, सतीत्व बेच्न चाहन्नँ ।”&lt;br /&gt;
नेपुलर्कातर फर्केर मस्कुराउँदै सुकुमारीले भनी- “उन्नाइसौँ शताब्दीकोअबशेष पनि यो देशमा अझै वांकी छ ।&amp;quot; नेपुलकले महिलालाई आश्वासनदिदै भन्यो- “तपाईँको सतीत्च मैले किन्न खोजेको होइन, एक तोला वीयंतपाईंलाई निःशुल्क दान दिन खोजेको मात्र हो ।” केहीवेर अन्यमनस्क भइमहिलाले सुकुमारीतिर हेरिन्‌, क मृस्कराउँदै अर्को कक्षतिर लागी ।&lt;br /&gt;
केहीवेरपाँछि नेप्लक र महिलाको मुखमृद्रा पालैपालोसित हेर्दै ठिटीलेव्यङ्ग्य गरी- &amp;quot;कन्ट्र्चाक्टरको कोमसन कसले दिने नि?&amp;quot; महिलाले मुखरातो पार्दै केटीलाई प्याट्ट हिकाँई । यसो गर्दा सृकमारी त पिलिकपिलिक्‌ गर्दैरुन पा थाली । नेप्लक फरि जिल्ल पस्यो । आखिर त्यात साह्रो दुख्ने गरीपिटेकी त कहाँ हो र उसले : तर यो चनमनी किन रुन्छ : उसको दिमागरन्धनियो । झन्‌झन स्दै आफ्नो छातीमा लिप्सन आएकी महिला आत्तिई रशि्टाचार ,पान देखाउन नभ्याई निस्किहाली । दुनमताएकी सुकुमारीलाईसमाएर बमबुम्याउंदै नेपुलकले सोध्यो- &amp;quot;तिमीजस्ती मान्छेलाई पानि यस्ताविधि&lt;br /&gt;
फन्चीतौ गतान्दी अङप्रत्यड्मा - 1६5&lt;br /&gt;
रुन मन लाग्छ :” सँक्कसक्क गर्दै केटीले आफ्ना मन फाटे- “टचचमाजन्माइएकी भन्दैमा म आर्टाफसल मान्छे ह २ - तपाइजस्तै कने लाग्नमान्छु२ उनीजस्तै कनै स्वास्तीमान्छको रगत मिसाएर जन्माड्ाकी तह नि&amp;quot;फरक यति हो- तपाइँहरू आफ्ना नातागोता पचन्नहन्छ: स्नेट ममता णउनहन्छःमलाई आफ्नै विगत-आगतको पत्ता छैन ।”&lt;br /&gt;
उसको सकमार अनुहार मसादै नेपलकले सोच्र्या- &amp;quot;फे निमीलाईआफ्नोवारे कही बाहा छैन त ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
“म अमेरिकाको कनै लेबोरटरीमा जन्माइण्की था, गन्थ्रापीलाजीकोआधारमा वभ्दावुभदा म नेपाली रगनकैँ प्रडक्सन ट भन्ने लागेकोले यट्टाआएर नोकरी गर्दै छु । मेरो होलिया यत्ति हा ।&amp;quot; मायाल स्वरमा याँत ननरसुकमारीले आफ्नो मन्टो नेप्‌लकका छातीमा टाँसी, नपुलक रामाच्चरित भयो,उत्तेजित भयो । उसका औँलाहरू सुकमारीका अइप्रत्यद्रमा चलमलाएर छिरैउसलाई निर्वाइ पारी उधाने र्कासए । तर आफूले वोल्न नपाउँदै सकमारीलेएउटा फलिक्रो छाडी- &amp;quot;तपाइँ नै मेरो वा भर्ड्रादन्‌भएको भा कस्ता हन्थ्योहगि ?”&lt;br /&gt;
नेपुलक जिल्ल पप्यो । उर्साभत्रको पितत्तर तरै आखाबाट झरेर नेपालीनाक राखेको सो-कंसमा तप्पतप्प थोप्लिइरहेको उसले निकैवेरपाँछ चालपायो । यो पनि थाहा पायो- त्यमै वेला एक जना साहेव ९ वर्षको उमेरमाआफ्नो आइप्रत्यङ्घको तेस्रो पटक ओभरहल गराई सकमार्रीसत विवाहकोप्रस्ताव राख्न आएका थिए ।&lt;br /&gt;
“नाक फेर्ने भए छिटा छान्नुहोस्‌, काउन्टरमा ग्राहक र विक्रताहरूकोामीड लागिसक्यो&amp;quot; -निकँवेरपछि स्‌कमारीले नेपुलकलाई भनी । नेपुलकलेगम्भीर मुद्रामा भन्यो- “भैगो नानी, मलाई नेप्टै नाक भए हन्छ; उमेर पानित ५० पुग्न लाग्यो ।”&lt;br /&gt;
ए, त्यसो भए तपाईलाइ न्य स्टेट्की मैयाँले छांट पारेर पगालिर्साकछन्‌,लौ, उसैलाई ब्याएर बस्नास्‌; आजदेखि हाम्रो विवाह विच्छेद &#039;&amp;quot; -नेपूलककोस्वास्तीले एक सासमा रन्क्दै भनी र फन्कदै काठावाट निम्कि पनि हाली !&lt;br /&gt;
एकछिन जिल्ल परेर नेपुलकले सोध्यो- “सानु कहा छ त?&amp;quot; फर्कदैनफर्की स्वास्तीचाहिले जवाफ दिई- “कान्त, त्यता खार्टातर मरिराखकाहोला ।” नेपुलकले छोराको लास छामछम पान्यो- त्यसमा टाउकै थिएन ।&lt;br /&gt;
सगनवबाट&lt;br /&gt;
१६5 शैरव अयालका हात्यब्यड्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ए ज्या भुसुक्कै !!==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पढेका र परेका, गुनेका र सुनेका, सुझेका र बुझेका इत्यादि जम्मैगरी हाम्रो दिमागमा कति मुरी क्रा कोचिएका छन्‌, त्यसका नापजोख गरीसाध्यै छैन । मानौँ, मान्छेको मगज एउटा बहमाण्ड-व्याइ हो, जहाँ सहसौँस्वरूपका कच्ची-पक्की करेन्सीहरू कित्ताका कित्ता गरी थन्क्याइएका छन्‌ ।आशामरुलाई चिट्ठा परेको, सर्वहाराले जुवा जितेको, चुक्लीकान्तले वकसपाएको वा घाटेबाजेलै दान पाएको रकमझैँ एकै पटक र एकै कलम गरीथुपारिएको होइन, बरु खस्याङखुसुडको खुद्रा पसलेले दुई पैसाको हिड्देखिजरायोको सिङसम्म बेचेर चुबुरचुबुर गरी लिएका चानचुन पैसा खाइनखाईखुत्रुम्के कन्तुरमा खुत्रुकखुत्रुक खसालेझै प्रतिमिनेट, घण्टा, दिन, महिना र वर्षकेही न केही कमाउँदै र थन्क्याउँदै यो पुँजी जम्मा भएको छ । चाहिएका बेलाझिकौंला, परेको बेला खर्चौंला र आबश्यक परै अरूलाई आफ्नो कमाइबाटगुन लगाउँला भन्ने उद्देश्यले नै मान्छे केही कमाउँछ, केही बचाउँछ-व्याड्मा राख्छ । यसकारण दिमागका व्याङ्गममा बचत खाताको भन्दा चल्तीखाताको महत्त्व बेसी छ ।&lt;br /&gt;
तर भएर के गर्नु ? चाहिएको बेला चेक काटन खोज्यो भने के कताके कता बेपत्ता ! पढेगुनेका कुरा नआउनु त त्यति आश्चयंका कुरा हाइन,किनभने अचेल पढ्नुगुन्नुको अर्थ ज्ञानगरिमा वढाउनु र त्यसलाई व्यबह्ृनगर्नुसम्मको झन्झट-भझमेलामा जेलिएको छैन । येनकेन प्रकारेण परीक्षामाउत्तीर्ण हुनु, आफ्नो नामका अगाडिपर्छाडि डिग्री र उपाधिका नन्द्रचाडतुन्द्रझुन्डयाउनु र जागिरका लागि कर्न, ढुम्नु, धाउनु अनि केही नलागे चुक्ली,चाकरी र चाप्लुसी गर्न धाल्नु नै आज शिक्षादीक्षाको उद्देश्य केन्द्रित छ ।त्यसैले कहिलेकाहीँ अन्तर्वातामा सोधिदेलान्‌ भनेर मात्रै हो, नत्र पढेका कराविर्सेकोमा विस्मात मान्नुपर्ने केही छँदै छैन । तर कतिपय भुक्तभोगी भइसकेका&lt;br /&gt;
ए ज्या मृतक ” “ 1६९&lt;br /&gt;
कुरामा पनि सम्झनाको रिसिभर उठाउँदा कम्पाराबाट डायलटोन नै आउँदैनर पो साह्रै अचम्म लाग्छ ।&lt;br /&gt;
हुन त हो नि, आइन्स्टाइन र न्युटन पनि निकै बिर्सुवा थिए । अझटोमस एल्बा एँडिसनले त एक पटक कनै आविष्कार दर्ता गर्न जाँदा आफ्नोनामै भुसुम्क बिर्सेर बताउन नसकेका रे ! कवि किटसलाई सम्झनोस्‌, उनलाईअरू त कै भर्खरै खाएको वा लुगा लाए-नलाएको पनि होस हुँदैनथ्यो । यस्तै&#039;तपाईंको पैसौः तिर्नु थ्यो&#039; कि :&#039; भती तलब पाएको दिनः भेटिएजति सबैलाईसोध्दै जाने महाकेखि देबकोटा हाम्रो नाजकै थिए ! तर उनीहरू सबै करा बिर्सेपनि सुभझिका र बुझेका कुरा बिसंदैनथे । आफ्नो साध्यक्षेत्रमा उनीहरूकोध्यान कस्तरी एकोहोरिएको थियो भने त्यससित असम्बन्धित अरू सम्पूर्ण क्रानबिर्सी उनीहरूलाई सुखै थिएन । कै सबैको बिर्साइ त्यस्तै हो त ? भुत्रो निहोइन ।&lt;br /&gt;
हामीमध्ये कति मै हुँ भन्ने विद्वान्‌ वा लेखकलाई आफ्नै विषयमा एउटासामान्य लेख लेख्न दसोटा पुस्तक वरिपरि राखी घण्टौँघण्टा लेख्तै-केर्दै, केर्दैलेख्तै गर्नुपर्छ भने हामीलाई यो पत्याउन मुस्किल पर्छ- लर्ड मेकालेलेवेलाइतको आठ भागमा विभाजित इतिहास कनै पनि पुस्तकको सहाराबिनालेखेका थिए । हामीमध्ये कति मै हुँ भन्ने व्याख्याताहरूलाई आफ्नै विषय वाविभागमा एक साधारण व्याख्यान दिन निकै अघिदेखि घोत्लिएर, घोट्टिएर पनिभन्ने बेलामा क्न्नै पर्छ भने यो पत्याउन पानि मुस्किलै पर्दो हो- स्वामीबिवेकानन्द कैयौँकैयौँ घण्टा धाराप्रवाह व्याख्यान दिएर विश्वका दर्शन-दिग्गजहरूको मगज तिलमिलाइदिन्थे । हामीले नपत्याउंदैमा साँचो करोझ्टो हन्छरः&lt;br /&gt;
ज्ञानगुनको कुरामा त हेक्काको हबिगत त्यस्तै भो नाइँ, तर चानचुनकूरामा पनि आफूसमेत कतिको होसल्याङ्गै गति देख्ता पो झन्‌ रमाइलोलाग्छ ।&lt;br /&gt;
“विहान उहाँ जाने भनेको गइस्‌ त ?”&lt;br /&gt;
“ए मैले त बिसँछु ।” .&lt;br /&gt;
“तपाईंले हिजो आउंछु भन्नु भा&#039; होइन ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
“जा, मैले त भुसुक्कै !”&lt;br /&gt;
“खोइ त पुस्तक :”&lt;br /&gt;
“ए ज्या भुसुक्कै !”&lt;br /&gt;
१७० भैरव अर्यालका हास्यव्यड्रय&lt;br /&gt;
यस्तैयस्तै गरी दिनको सैयौँ पटक अचेल हामीमध्ये धेरैको मुखबाटनिस्कने गर्छ- &#039;ज्या भुसुक्कै !!&#039;&lt;br /&gt;
आफ्नै अत्यावश्यक र नियमित कामकुरा त विसिंडन्छ भने अरूकोकुरा नसम्झेकोमा के अचम्म ! त्यसैले हिजो मात्रै कसैको कुनै काम गरिदिन्छुभनी आश्वासन दिएका छौं भने आज सजिलैसित हामी भनिदिन्छौँ- “ज्या,मैले त भुसुक्कै बिसँछु ।” पैँचो तिर्ने वा दिने, माल लगिदिने, केही गरिदिनुपर्ने,कतै गइदिनुपर्ने अथवा केही भनिदिनुपर्ने जस्ता कुरामा दिइएका भाका तझन्‌ दिनको पाँच पटक सम्झाए पनि ज्या भुसुक्कै ! &#039;ल&#039;, &#039;हुन्छ&#039;, &#039;हस्‌&#039; र &#039;जोआज्ञा“ आदि प्रिय शब्द निकालेर बचन दिनु कत्ति पनि गाह्रो छैन, जति गाह्रोछ- तिनलाई सम्झनुमा छ । त्यसैले यहाँ भाषणको सिलसिलामा दिइनेबकितम्‌ आश्वासनको त कुरै छाडिदिनुहोस्‌, सालङ्डार शुभनामको सहीदानगरिदिएका कैयौँ लिखितम्‌ तोकहरू पनि यहाँ बिस्मृतिको बास्केटमा फालिएकागुनासो बराबर सुन्नुपर्छ । त्यसैले मान्छेको दर्जासितै पदोन्नति हुँदै जाने केहीबानीहरूमध्ये बिर्सने बानी पनि एक हो भनेमा तपाईं पक्कै पत्याउनुहोला ।नपत्याए, कुनै धनीमानी वा अधिकारी-अधिकारिणीसित एउटा मामुली कामकोअनुरोध बोकेर जानोस्‌, खाने-पाउने कुराको अनुरोध रहेछ भने म भन्नसक्तिनँ, नत्र तपाईं पक्कै भोलिपर्सिको आश्वासन पाउनुहुन्छ । पर्सिपल्ट जानोस्‌उनी बिनम्रतापूर्वक सोध्दछन्‌- यहाँ कति कामले पाल्नुभयो कुन्ति ! फेरिबिलौना गर्नोस्‌- आश्वासन दोहोरिन्छ । अब त गरिदिए होलान्‌ भनी अलिदिनपछि जानोस्‌- तपाइँका सम्पूर्ण आशाभरोसालाई चूर्ण पार्दै उनी सजिलैसितमुस्क्राइदिन्छन्‌- &#039;ए ज्या भुसुक्कै &amp;quot; अब बिर्सेपछि के लाग्यो ! बिर्सनुकोविरोधमा नालिस दिने कुनै दफा ऐनमा छैन । धर्मशास्त्रले पनि पाप गर्न हुन्नभनेको छ, बिर्सनै हुन्न त भनेको छैन । त्यसैले त कैयौं महाशयहरू नबिर्सेपनि बिर्सेको अभिनय गर्दछन्‌ । चाकरी, नसनाता, भनसुन, करकर र डरधम्कीलेकाम लिने विगत जहानियाँ तन्त्रले बसालेको संस्कार नतिखुन्जेल हुन्न भन्ननसक्नेले बिर्सने वानी पनि बसाल्नुपर्दो रहेछ । तर कुरा यो बेग्लै हो, प्रसङ्गकोकुराचाहिँ के भने बिर्सने बानी एक प्रकारको फेसन पनि हो । धेरै ठूलावडामाबिर्सने बानी पाइएपछि चानचुने बडाहरूलाई पनि आफ्नो वढत्व बढाउन यहीबानी बसाल्ने रहर लाग्छ र भन्न थाल्छन्‌- ठूल्ठूला भारी बोकेकाहरूलाईससानो कुराको हेक्का कहाँ रहिरहन्छ र ? तर यो अर्जी अब्राहम लिङ्नले किननिकालेनन्‌ ? सम्झने शक्तिमा नामुद जुलियस सिजर र रुजबेल्टको कार्यभार&lt;br /&gt;
ए ज्या भुतुक्कै &amp;quot;० १७१&lt;br /&gt;
आजका कुनै पानि जीउको भन्दा हजार खण्ड बेसी थिएन त ! अझ नेपोलियनके भन्थे भने मेरो दिमाग खण्डैखण्ड भएको एउटा कन्त्रजस्तो छ, जुन बेलाज्ञ चाहिए पनि म यसबाट साजिर्लौसत झिक्न सक्छु । त भन्तोस्‌, कार्यभारबढ्दैमा विर्सन बानी पनि वढ्नै पछ भन्न कनै आनवार्यता रहेछ त !अर्कातिर, कलाकार वा काव्यकार भएपछि मान्छे अलिर्कात बेहोसीहुन्छ भन्छन्‌ । तर आदिर्काव व्यास र होमरसित चाहिएको बेला प्याट्ट पल्टाएरस्या्ट सारिदिने न कुनै किताप थियो न सुझेको क्रा सम्झनाको लागिटिपिराख्ने एउटा नक्कले नोटबुक नै । जे थियो उनीसित आफ्नै होस थियो ।त्यस्तै सुप्रसिद्ध अस्ट्रेलियन सङ्गीतकार मोजार्ट थिए । उनी गिर्जाघरमा गाइएकोसङ्गीतको नोटेसन आफ्नो दिमागमा कस्तरी टिपिदिन्थे भने घर पुगेर कापीमाएक नबिराई सारेर गाउन सम्थे रे ! रे का कुरा किन चाहियो, बालकृष्ण समर बाबुराम आचार्यको स्मरणशक्ति सम्झँदा साधकहरूले बिर्सुवा हुनै: पर्छभन्ने अर्जी &#039;नाच्न नजान्नेले आँगन टेढो&#039; भनेजस्तै लाग्छ ।वास्तवमा हामीमध्ये कतिको दिमाग अचेल ब्रह्माण्ड-व्याङ्ग होइन,कच्चा घरको निदालजस्तै छ । अलिकति मकाएको, अलिकति कीराले खाएकोर समस्त ध्वाँसोले रङ्गिएको त्यस निदालका प्वालप्वालमा गृहिणीहरू जे पायोउही घुसारिदिन्छन्‌ । दुई-चारोटा खुद्रा पैसा, फुटेको ऐना, सलाईको बट्टा,काँचो धागो, केटाकेटीको खेलौना, साबुनको टुक्रा, दाँत माभने बुरुस इत्यादिगन्ठ्याङमन्ठ्याङ केके हुन्‌ केके ! अनि चाहिएको बेला केही खोज्यो भनेकताकता ! हातभरि आउँछ ध्वाँसो र घूलो मात्र । आजका वुद्धिजीवीकोदिमागको पनि हालत यस्तै त होइन : एकातिर माल्थसको जनसङ्ख्या-सिद्धान्तलाई अधकल्च्याएर घुसारिएको छ भने अर्कोतिर मौका परे अर्कीषोडशीको लगनगाँठा समात्ने धोको पनि सिउरिएकोा छ । एउटा कनामामाक्स, लेनिन, गान्धी, रसेलका विचारको पोका छन्‌ भने अर्को कुनामाभूमिसुधारका फलस्वरूप जग्गा घटैको पीरले पनि कातिलाई पिरेकँ होला ।.. उसले त उसलाई सामन्ती भनेछ, अब भियतनामको स्थितिकस्तो होला, फलानाफलाना पञ्चायतको सीमामा &#039;फगडा पन्यो, कच्छबाटकसले के भन्यो ? मंगीको खोस्टे दाल माना एकको १।२५, चिनी बन्द, चीनर न्थ्सको मतभेद कहाँ टुङ्डिएला, फलानाले फलानाको कविता चोस्यो, मन्त्रीलेमानेन, गुडँठा वितरण सामतिका स्‌चना, सातौं हप्तामा ब्रह्मचारी, फलानीत सिद्धिइछ, वी एस्पी को रिजल्ट कहिले निस्कला हँ :, त्रिभुवन राजपथमा&lt;br /&gt;
१७२ , भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
सान जना खतम, शुभविवाहको निमन्त्रणा. ..इत्यादिइत्यादि समाचार,प्रतिक्रिया, टिप्पणी, व्यवहार, आचारबिचार, भ्रष्टाचार, क्यामू र सात्रै, किसानसक्रटनको सभापति, युबामहोत्सव, बहुउद्देश्यीय विद्यालय, अस्तित्ववाद, विविधभारतीको पञ्चरक्ठी कार्यक्रम- हावामहल... ।&lt;br /&gt;
यस्तै जिली न गाँठीका अनेक वेप्रसङ्गी प्रसङ्हरू जब तरङ्गिरहन्छन्‌,दिमाग रन्थनिएर दुख्न थाल्छ, होस पातलिँदैपातलिँदै हावासँग मिल्न खोज्छ,अनि वन्द भएको घडीलाई औंल्याएर दम दिनुभएन ? भनी कसैले सोध्यो भनेडिस्स हांस्तै जबाफ दिन्‌पर्छ- &#039;ए ज्या भुसुक्कै !!&#039; अव भन्नुहोस्‌, ए ज्याभुसुक्कै पनि यही युगको देन ह्वोइन त : तर मैले आग्रा&#039; कुरा गर्दागर्दै गाग्राकोगफ पो छाँटैँ क्यार : बिर्सने वानीका बयान गर्न लागेको विच्छुब्ठलताको बहसगर्न पुगियो, लेखै विच्छुङ्जल भयो । तर टाउकामा खिचडीको खँडकौलो छड्कनेयस युगमा साहित्यमा भृड्डला खोजेर के साध्य हगि ?&lt;br /&gt;
हुन त बिर्सनु झन्‌ चाहिने कुरा हो, कति आज खुइलिएकाहरू हिजोकोजगजगी बिर्सन नसकेर रुन्छन्‌, कति खली खाएकाहरू आफ्ना चोटचपेटाबिर्सन नसकेर बहुलाउँछन्‌ र कति लैला र मजनूहरू एकअर्कालाई बिर्सननसकेर सिलटिम्मुर खाइदिन्छन्‌ । हाकिमले हप्काएको, खुकुरी रमको जोसमाखुकुरी चलाउँदा मामाघरको निम्ता पाएको, ज्वानुको ठेक्कामा गानु गएको,क्यासिनोमा क्यास होम्दाहोम्दा हरि ३० जप्तै माला घुमाउनुपरेको, भत्याङमनिमन थाम्न नसक्ता साहको काखमा राहु रोएको आदिआदि कुराहरू बिर्सननसकेर बहुलाएकाहरूको उपचारको उपाय एउटै बाँकी रहन्छ- बिर्सनु रबिर्साउनु । तर बिर्सनुपर्ने कुरा बिर्सन सकेको भए सम्झनुपर्ने कुरा किनबिर्सन्थ्यो र ? त्यसैले मैले पनि केके न लेखुँला भनेर यो निबन्ध सुरु गरेकोलेख्तालेख्नै यहाँ नलेखिएजति जम्मै करा बिर्सिएछ । तपाइँको पनि टाउकोखचाखबै होला, यो छुसी गफ फेरि कहानेर कोच्नुहुन्छ, पढिसक्नासाथ बिर्सिंदिएहुन्छ ।&lt;br /&gt;
रचनाबाट&lt;br /&gt;
ए ज्या भुतुक्कै ” / १७१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==साढि==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिन्दूहरूले साढिलाई महादेवको निजी वाहनको पदमा नियुक्त गरिदिएकाछन्‌ । महादेवलाई वाहनको आवश्यकता थियो-थिएन दैव जानोस्‌, तर आफूलाईजेजे चाहिन्छ देवीदेवताहरूलाई पनि त्यही चाहिन्छ भन्ने मान्छेको धारणारहँदै आएको छ । आफू घोडा, हात्तीमा चढ्ने हुंदा हाम्रा पुर्खाले आफ्नादेवीदेवताहरूको लागि पनि चढेर हिँड्ने एकोटा जनावरको प्रवन्ध गरिदिएकाछन्‌ । जस्तै- विष्णुलाई गरुड, देवीलाई वाघ, यमराजलाई राँगो र गणशलाईमुसो । आजको जमाना हुँदो हो त विष्णुलाई गरुडको सङ्टा हेलिकोप्टर दिङँदाहो । त्यस्तै अरूलाई पनि दजा हेरी कार, स्कुटर, रिक्सा, साइकल वितरण गर्दैगणेशजीलाई चाहिँ गाडाकै प्रवन्ध गरिन्थ्यो कि ः भन्नाको मतलव आजकाहिन्दूले महादेवको बन्दोवस्त गर्नुपरेको भए या महादेव अहिलेसम्म रहेका&lt;br /&gt;
१७४ - भैरव अर्यालका हात्यव्यड्ग्य&lt;br /&gt;
भए त्यही साँढे चढी के हिँड्दा हुन्‌ । यतार्उात हिँडन कमसेकम एउटामर्सिडिज कार र हिमालयमा ससुराली जात एउटा विशेष किसिमको हेलिकोप्टरत उनलाई चाहिन्थ्यो, चाहिन्थ्यो । तर जान दिकँ उस बेला जे भयो, भयो ।महादेवको विशेष वाहनमा श्रीमान्‌ साँढे नै नियुक्त भयो ।&lt;br /&gt;
त्यति उच्च ओहदामा नियुक्ति पाउने योग्यता साँढेसित के थियौ रभन्ने प्रश्न उठाउने आवश्यकता नै छैन । कारण योग्यताभन्दा माथिका दुइटामहायोग्यता कसित थिए । पहिलो त सांढै भनेको गाईको साक्वै लोग्ने हो,उसकी श्रीमतीसित आमाजस्तै एउटा धार्मिक साइनो हाम्रो लागेको छ । यहीसाइनोले उपल्लो नातेदार भएको साँढेलाई तल्लो ओहदामा राख्ता उसकोप्रतिष्ठा घट्ने कुरा त छँदै छ, दुनियाँमा नसनाताको महत्त्वै नासिँदै जान बेरछैन । साँढेको अर्को महायोग्यता हो उसको फुँकार । आध्यात्मिक जगतमाऔँकारको जति महत्व छ व्यावहारिक जगतमा फुँकारको उत्तिकै महत्त्व छभन्ने कुराको ज्वलन्त प्रतीक साँढेले पाएको सम्मान हो । क रुष्ट भयो भनेपर्खाल भत्काउन, बाली बेमाख पार्न र फाँक्क र फुँक्क गरी मान्छे हान्न सक्छ,त्यसैले उसलाई एउटा माथिल्लो पदमा सुशोभित गरिदिन पाए जुरो नचाउँदैजिभ्रो मिठयाइरहन्छ, सायद यही सोचेर उसलाई त्यत्रो ओहदा प्रदान गरिएकोहोकि ? जे होस्‌-&lt;br /&gt;
महादेवको विशेष वाहनमा नियुक्त भएकोले साँढेको चुरीफुरी निश्चय नैकुनै मन्त्रीको पी.ए. को भन्दा कम छैन । मन्त्रीज्यको आदेश खोज्नेले पी. ए. लाईरिझाउनुपर्छ भन्ने पद्धतिको श्रीगणेश नै हिन्दूहरूले साँढेबाट गरेका छन्‌ ।त्यसैले पशुपतिनाथको दर्शन गर्नुभन्दा पहिले उनको अगाडि लँगौटीसमेत नलगाएरगजधम्म बसेको लबस्तरो साँढेलाई साष्टाङ्ग प्रमाण गर्नुपर्छ । बाली फाँडोस्‌ किमान्छेलाई हातोस्‌ उसलाई लट्ठी देखाउनु महापाप ठानिन्छ । जिमीदारलेजतिसुकै अत्याचार र व्यभिचार गरे परि नेपाली किसानले ठूलाबडासित जौरीखोज्न हुन्न भनी सहनुपरेझैँ हिन्दूहरूले सढिको अत्याचार सहँदै आएका छन्‌ ।साँढेको सिङमा हाम्रो इहलोकको भाग्य निर्भर गछ भने सांढेको पुच्छर परलोककोनिम्ति बैतरणीको &#039;झोलुङ्गे पुल हुन्छ रे ! वृषोत्सर्ग हिन्दूको तर्ने उत्सव, गाईपुत्रकोजीवनोत्सव । यस दिन त्रिशूलचक्रको ब्याज भि्ने सौभाग्य पायो भने गाईपूत्रलेआजीवन छाडा हुने अधिकार पाउँछ- साँढा भएर खाने बिर्ता पाउँछ । उब्जाउनेर कमाउने झन्झट साँढेलाई पर्दैन । तर अपसौच के भने साँढे हुने सौभाग्यदुई-चार भाग्यमानीले मात्र पाउँछन्‌, बहुसङ्ख्यक गाईपुत्रहरूको निम्ति त&lt;br /&gt;
साङ.” १७४&lt;br /&gt;
वालकैँमा भेसेक्टोमी गरर मखमा पेरुङ्गो लगाई काँधमा जुवा बोक्नुसिवाय अर्कोवाटो रहदिन । त्यमैले सढि सामन्त हन्छ, गोरु सर्वहारा । साढे गोराझैँ रजाइँगछ, गास निग्राकै काजन्छ, साढै शक्तिपूर्ण स्वतन्त्र र स्वच्छन्द नेता बर्गमा पुग्छ,गारु लरलाम्ज जनता &#039;&lt;br /&gt;
साढेको आफ्नो खुव्री &#039;फकार मात्र ही टन त. जेर्जात अहङ्गार उसमाचढ्छ त्यो त्रिशूलकै प्रतापको &#039;फल हो । यसो भनेर साढेको सम्पूर्ण प्रसिद्धिमहादेवको वाहन हुनाले मात्र भएको भन्नुचाहि गाइको बेइज्जती गर्नु हो ।उच्च ओहदामा पुर्ने श्रीमतीका श्रीमान्ले “चिन्नुभएन : म फलानीकीश्रीमान्‌ हुँ&#039; भनी फुलेर परिचय दिएझैं साँढे पनि जुरो नचाउँदै गर्व गर्छ- &#039;मगौमाताको पतिदेव हुँ ।&#039; मास्टरकी श्रीमतीलाई वर्णमाला नखारीकनै मास्टर्नीमान दिएझैं दिने हो भने सांढे पदेन हाम्रो गौपिता हो । पतिको अस्तित्वविनापत्नीको अस्तित्व आधा हुने हाम्रो संस्कारअनुरूप गाईलाई मान्दा साँढेलाईनमान्नु आधा गाईको पूजा गर्नुजस्तै हो । तर यस तथ्यलाई कत्ति ध्यान नदिईहामी गाईतिहार मान्छौँ, साँढेतिहार मान्दैनौं, गाईजात्रा गर्छौं, सांढेजात्रा गर्दैनौँ ।यो हेर्दा आफैँले सम्मान गरेको साँढेको आफैँले अपमान गर्न खोजेजस्तोलाग्छ । गाईतिहार, गोरुतिहार मानी साँढेतिहार नमान्नु जनाना र नामर्दकोअगाडि पुरुषको उपेक्षा गर्नु होइन र ?&lt;br /&gt;
तर होइन, छोरीले राजीनामा दिएको भोलिपल्ट &#039;ज्वाइँ न स्वाईँ अगुल्टालेच्वाइँ&#039; भनेकै गाईमैयाँले छाडिदिनासाथ राँको बालेर साँढे लखेट्ने चलन पनियहाँ देखिएको छ । हाम्रो संस्कारमा जेसुकै होस्‌, व्यवहारमा गाईको निम्ति&#039;उक्तदान&#039; बाहेक साँढेको अरू योगदान के हुन्छ र ? जिभ्रोमा लोभ, जुरोमाअह्वङ्कार, सिङमा रिस र मनमा ईख लिएको सढि वास्तवमा फांटफाँडा रसमाजभाँडा तत्त्व हो, जो एकअर्कोसँग मिलेर बाँच्न सक्तैन । एकले अर्कोलाईदेख्नासाथ भुइँ खोसदै होक्काँ गर्छ र जुध्न थालिहाल्छ । कोही नपाए भित्तैमापनि सिड्ौरी खेलेर तुजुक शान्त गर्ने साँढेको प्रवृत्तिले मान्छेमा पति साँढा हुनेरहर जगाइदिन्छ । त्यसैले हामी कान्जी हाउस बनाएर थुन्न खोज्छौं, सांढहरूपर्खालमा सिड्औौरी खेलेर भत्काउन र भाग्न खोज्छन्‌ । हामी शान्तिशान्तिभनेर चिच्च्याउँछौं, साढिहरू होक्काँ-होक्काँ- गर्दै जुघिरहेछन्‌, सम्भव छ एकदिन दुई-चारओटा हान्ने सढिको जुधाइमा सँसारका सम्पूर्ण शान्तिप्रिय चाच्छाहरूकिचिन के बेर : मिचिन के बेर ?&lt;br /&gt;
अर्पणावराट परिवतित&lt;br /&gt;
१७६ भैरव अर्यालका हात्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सातसत्रीय.साहित्यदर्पण==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रस्तावना&lt;br /&gt;
छायावादी या मायावादी, प्रयोगवादी या उपयोगवादी, पुरातन यानूतनवादी आदिआदि जेजति बादीको नाम लिए पनि सारांश एउटै निस्कन्छ-साहित्य सबैँ बादविवादी रहँदै आएको छ । एक थरी वा एकताकाको व्याख्यार वर्गीकरण अर्को थरी वा अर्कोताकाका समीक्षाशास्त्रीहरूलाई मन पर्दैन ।मार्न्छोपच्छेको सिर्जना मान्छ्यैपिच्छेको पारख । त्यसैले तपाइँ-हामीजस्तापाठकलाई ठूल्ठूला ठेलामै ठेलिएका सृत्रहरूमा सही हालेर रटन्ताम्‌ गर्नुपर्ने केखाँचो : जव साँच्चो समीक्षा दुलम हुन थालिसकेको छ । यसकारण कसैलाईकल परोस्‌ या नपरोस्‌, मैले देखेको कुरा लेखेको छु, साहित्य तपसिलबमोजिमसान प्रकारका हुन्छन-&lt;br /&gt;
सातस्‌त्रीय साहित्यवर्पणा “ १७७&lt;br /&gt;
१. क्रीत साहित्यविकृत साहित्यअधिकृत साहित्य. स्वीकृत साहित्यअनुकृत साहित्यनिजीकृत साहित्य, परिष्कृत साहित्यअब संक्षेपमा प्रत्येक प्रकारको भाष्य पनि दिँदै जाँदा तपाईंहरूलाईपट्टाइ त लागोइन : ।लागिहालेमा शीर्षक पढेर छाडिदिनुभए पनि हुन्छ ।आफ्नो रचनाबाहेक अरू कसकसले केके गथासो गरेका छन्‌ पढेर समयफ्याँक्न बेकार । धेरैजसो रचना पत्रिकाका पत्रै भर्ने त हुन्‌ नि, सत्य, यो पनिमैले टाकटुक पारेको मात्र हो । आफू घागडान लेखक भएकोले राम्ररी लेख्नफुर्सत कहाँ पाउनु ?) अँ, कुरा के भने मेरो सातसूत्रीय साहित्यदर्पणको भाष्यपनि म आफैँ लेख्नै छु । (अचेल आफ्नो रचनाको आलोचना त कति घागडान्‌साहित्यकारज्यूहरू अरूलाई किन दुःख दिनु भनी आआफैँ लेखेर कल्पित वाविर्कल्पित नामले छपाउन थालेका छन्‌ भने मेरा सूत्रको मैल्यै व्याख्या नगरेकसले गरिदेला त ?)सुबोध भाष्यक्रीत साहित्य- बिषय वा प्रसङ्गले अर्को अर्थ नलागेमा क्रीत साहित्यभन्नाले किनिएको साहित्य भन्ने बुभनुपर्दछ । पैसा भए भेडाच्याङ्ग्रा मात्रैहोइन, मान्छेमान्छी नै किन्न पाइने संसारमा साहित्य मात्र किन्न नसकिनेकारण के छ र : साहित्य झन्‌ सस्तो छ- एउटा लम्बुकोट, जिम्बुको कोटा,निबुवा भन्सारको डिद्ठा, जेको लाभ देखाइदिए पनि गरिब साहित्यकार छभने जे पनि लेखिदिन्छ, लेखेको कापी मात्र होइन, लेख्ने कलम पनि उधारैमाबेचिदिन्छ । त्यसैले साहित्यको इतिहास पल्टाई हेर्नोस्‌ सामन्ती समाजमामात्र होइन, जस्तोसुकै प्रगतिशील युगा वा समाजमा पनि साहित्यको एउटाधारा स्तोत्र, स्तुति, प्रशस्ति र महिमामा रडर्माडएको पाइन्छ । खोज्दै र खोतल्दैगएमा गनिगनाउ गरी नकिनिएको भए तापनि अप्रत्यक्ष रूपमा यस्तो साहित्यकिनिएकै हुन्छ ।क्रीत साहित्यको &#039;ख&#039; श्रेणीमा त्यस्ता पुस्तकहरू पर्दछन्‌ जसको रचनाएउटाबाट भएको हुन्छ तर लेखकमा नाम दर्ता भएको हुन्छ अर्कै महाशयको ।&lt;br /&gt;
क कम ठुद ्ट त लु&lt;br /&gt;
१७८ “ भैरव अर्यालका हात्यब्यड्ग्य&lt;br /&gt;
टाढाको कुरा नगर भने हाम्रै कति जरसाहेब करसाहेबहरूले पत्ति कीर्तिराख्नाखातिर यसो गरेका थिए रे । &#039;ख&#039; श्रेणीका क्रीत साहित्य परिष्कृत पनिहुन सक्छ, उपयोगी पनि हुन सक्छ, तर &#039;क&#039; श्रेणीको क्षणिक स्वार्थपूरक मात्र ।&lt;br /&gt;
विकृत साहित्य- विषय वा प्रसङ्गले अर्को अर्थ नलागेमा विकृत साहित्यभन्नाले विकारग्रस्त या बिग्रिएको साहित्य बुभ्नुपर्छ । जति लाजभाँड लेख्नसक्यो, जति अरूलाई सराप्न सक्यो, अहम्‌ गर्जाउन सक्यो, जति चोरचार पार्नसक्यो, त्यति आधुनिकताको श्रेणी बढ्ने विकृत साहित्यको स्रोत पेरिस, न्युयोर्कर यस्तै अत्याधुनिक सहरहरू भए तापनि यसले अचेल नेपाली साहित्यजगत्‌मापनि आफ्नो कृहिएको खुट्टो घुमाउन थालिसकेको छ रे !&lt;br /&gt;
अधिकृत साहित्य- विषय वा प्रसङ्गले अर्को अर्थ नलागेमा क्नै न कुनैकुराको खास अधिकारप्राप्त मान्छेले लेख्ने साहित्यलाई अधिकृत साहित्यमान्नुपर्छ । प्रतिभा भए होस्‌, नभए नहोस्‌ कागत-गोस्वाराको सुब्बाले आफ्नीछोरी पोइल गएको उपलक्ष्यमा गरेको गुनासोलाई यो मेरो कविता छापिदिनुस्‌न भनेर कुनै सम्पादकज्यू कागतको कुपन माग्न जाँदा विनयपूर्वक भन्यो भनेनाइँ भनेर सुख ! अहिले अस्वीकार गरिदेओस्‌, भोलि पत्रिका छाप्ने कागतपाउँदैन । स्वीकार वा अस्वीकार गर्ने अधिकार सम्पादकैसित रहोस्‌ कागतकोअधिकार कसित हुन्छ, प्रेसम्यानेजरले एउटा छेउ न दुप्पाको कथा दिए पनिकमसेकम मुद्रणशुल्कमा अलिकति घटाइदेला भन्ने आशाले स्वीकृत गरिदिनुपर्नेहाम्रा पत्रिकाको स्थिति कसलाई थाहा नभएको हो र ? यसको मतलबअधिकारप्राप्त व्यक्तिहरू सबै उस्तै हुन्छन्‌ भनेको होइन, कति जना प्रतिभाशालीसाँच्चैको साहित्यकार पनि हुनुहोला ।&lt;br /&gt;
स्वीकृत साहित्य- घागडान-मण्डलीमा दर्ता भएर पनि झारा तिरेरलेखिने साहित्यलाई स्वीकृत साहित्य भन्नुपर्छ । एकेडेमीसियन वा लेखक सङ्घवा अरू कुनै यस्तै स्वीकृत संस्थाका स्वीकृत लेखक-कविले लेखेको रचनालाईयसोउसो भनी पन्छाउने कसको के तागत ? तर स्वीकृत कवि भयो भन्दैमाउसले लेखेको तमसुक पनि कविता हुन्छ भन्ने के ग्यारन्टी ? तर मान्नुपर्छ,स्वीकृत मान्छेले लेखेको जुनसुकै कीर्ति जस्तोसुकै खोक्रो भए पनि स्वीकृतैहुन्छ । बोक्रोभित्रको गुदी भेट्ठाउन नसक्नु पाठकको बुद्धिको कमी हो, बुभनु-भएन के ः&lt;br /&gt;
अनुकृत साहित्य- विषय वा प्रसङ्घले अर्को अर्थ नलागेमा अनुकृतसाहित्य भन्नाले अर्काको अनुकरण पारिएको साहित्य भन्ने बुझिन्छ । टी.एस्‌.&lt;br /&gt;
सातसृत्रीय साहित्यकर्पण । १७९&lt;br /&gt;
इलियटले खोक्रो मान्छे लेखे भने तपाईं उही शब्दशैली, उस्तै भाव र विचारराखेर &#039;छोक्रा मान्छे&#039; लेख्न सक्नुहन्छ । तर म त भन्छु साहित्यकार पहिलेअग्रजहरूको अनुकरण नै गर्छ, त्यसैले क्रीत, विकृत र अधिकृत साहित्यभन्दाअनुकृत साहित्यलाई वेस भन्नै पर्छ तापनि शतप्रतिशत मौलिकचाहिँ तपाईंभन्न सक्नुहोला जस्तो मलाई लाग्दैन ।&lt;br /&gt;
निजीकृत साहित्य- अरूले लेखेर छपाइसकेको या सुनाइसकेको कृतिलाईसुटुबक नामसारी गरेर आफ्नो गरिएको साहित्यलाई निजीकृत साहित्य भन्नुपर्छ ।हुन त क्रीत साहित्यको &#039;ख&#039; श्रेणीसित यसको रचनात्मक सीप मिल्छ तरक्रीत साहित्य किनिएकै .हुन्छ, कमसेकम लेखकले केही पाएको वा पाउनेआश्वासन पाएको वा आशा कमाएको हुन्छ तर निजीकृत साहित्य अर्कालेबिहा गरेर तैजान लागेकी दुलहीलाई कृष्णले हरेझैँ देखादेखी हरिएको अथवाअर्काको बगलीको नोट सुट्ट तानी आफ्नो बगलीमा घुसारेजस्तो सोझै चोरिएकोहुन्छ । निजीकरण कला जानेको छ भने क प्रतिभा र परिश्रमबिना नैमहामान्य साहित्यकार हुन्छ, त्यसैले निजीकृत साहित्यको मात्रा पनि अचेलप्रशस्तै बढ्न लागेकोले असम्भव छैन यही खेस्रो पनि रहंदाबस्दा अर्कैकोनाममा नामसारी नभइजाओस्‌ !&lt;br /&gt;
अन्त्यमा एउटा छ, परिष्कृत साहित्य- विषय वा प्रसङ्गले अर्को अर्थनलागेमा परिष्कृत साहित्य भन्नाले परिष्कार पुगेको मौलिक र जीवनवादीसाहित्यलाई लिनुपर्छ, । परिष्कृत साहित्य छँदैछैन भन्न सकिन्न, तर अरू छप्रकारका साहित्यको दाँजोमा यो साह्ै कम पाइन्छ ।&lt;br /&gt;
परिष्कृत साहित्य अलिर्कात &#039;क्रीत&#039; पनि हुन्छ किनभने समाजले यसलाईधेरैधेरै मोल परे पनि किनेर पढ्छ । अलिकति विकृत पनि हुन्छ, किनभने यहाँमानवीय प्रवृत्ति तथा सामाजिक विकृतिहरूलाई कलात्मक ढङ्गले देखाएरसुधार्ने सजगता पनि दिइएको हुन्छ । अलिकति अधिकृत पनि हन्छ, किनभनेयो प्रतिभा, परिश्रम र अध्ययन एवं अनुभवले भाषा र साहित्यका अधिकारप्राप्तमस्तिष्क र मुटुको समन्वयबाट सिर्जना भएको हुन्छ । आलिकति स्वीकृत पनिहुन्छ तर यो स्वीकृति कुनै आफ्ना मान्छै भएको बोर्ड वा समितिबाट होइन,सबै किसिमका पाठक भएको समाजबाट । अलिकति अनुकृत पनि हुन्छ,किनभने यहाँ जीवन र जगत्‌को राम्रो, नराम्रो दुवै पक्ष इमानदारीसाथअनुकरण गरिएको हुन्छ र अलिकति निजीकृत पनि हुन्छ जसमा लेखकलेपूर्णतः निजी शैली र स्वरूप छाडेको हुन्छ र बीचको जुनसुकै एक पङ्क्ति&lt;br /&gt;
१८० ० भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
पढ्दा पनि यो फलानाको भनी ठ्याक्कै भन्त सकिन्छ ।&lt;br /&gt;
तर तपाईंलाई मात्र भनेको, उपल्ला पाँच प्रकारका साहित्य(निजीकृतबाहेक। मैले पनि निकै लेखेँ हुँला, तर परिष्कृत साहित्य भनेरअहिलेसम्म लेखेकोमा खाइ कुनचाहिँ देखाउँ, तपाईंलाई त म पक्कै ढाँदनसक्छु, तर आफैँलाई ढाँटन पो धौधौ पर्दो रहेछ । छातीमा हात राखेर भन्नोस्‌,।भन्नु पर्दैन, आफैं गम्नोस्‌। साहित्यकार हुनुहुन्छ भने तपाईंलाई पक्कै मेरैजस्तो अनुभव भएको होला । तर डर छैन, यो सातसूत्रीय साहित्यदर्पण पढेरआफ्नोआफ्नो कृतिहरूको समीक्षा गर्दै जान थाले भने एक दिन लाटाको खुट्टोपान बाटाँ&#039; कस्सो परोइन ? ।माफ राख्नुहोला- मैले यो सम्पूर्ण &#039;म&#039; को प्रयोग१०% मात्र गरेको छु, हिजोआज एउटा लेखमा ५०% सम्म मपाईँको प्रयोगगर्ने अधिकार लेखक- खास गरेर समीक्षकहरूलाई प्राप्त छ। हुन पतिमपाइँमहिमा नमिसाए लेखकको स्तर कसरी उठ्छ र हगि ?)&lt;br /&gt;
प्रतिबिम्बबाट&lt;br /&gt;
सातसृत्रीय साहित्यवर्पण -&amp;quot; 241&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=Main_Page&amp;diff=82</id>
		<title>Main Page</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=Main_Page&amp;diff=82"/>
		<updated>2024-06-11T13:06:01Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: /* Step 1:  Scan and OCR */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;strong&amp;gt;Welcome to Nepali Kitab Editing Team.&amp;lt;/strong&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
This website is a sub-website of nepalikitab.org. Here we convert old books into Unicode text format. It is a collective effort by volunteers around the world. If you are also interested, please join the team.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
We keep here the books generated after scanning and extracting texts with OCR. It contains many errors. Our goal is to remove the errors.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==How to edit==&lt;br /&gt;
[[File:Editor-timeline.png|thumb]]&lt;br /&gt;
1. Make an account or log in.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2. Select the book of your interest.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. Click edit&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
4. Edit and clean up the errors and book format. If you are familiar with wiki syntax, you can edit the source too.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
5. Save time to time while editing&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
For details about formatting text, refer to: https://www.mediawiki.org/wiki/Help:Formatting&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 1:  Scan and OCR ==&lt;br /&gt;
*[[रामायण]] भानुभक्त आचार्य&lt;br /&gt;
* [[गलबन्दी (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[९७ साल]] आनन्ददेव भट्ट&lt;br /&gt;
* [[तरुण तपसी (नव्यकाव्य)]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[नेपालको नक्सा (राजनीतिक तथा प्रशासनिक)]] नेपाल सरकार&lt;br /&gt;
* [[आदिकवि भानुभक्त (पटकथा)]] यादब खरेल&lt;br /&gt;
* [[इतिश्री (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[स्वाध्ययन सामग्रीः घरमा नै गर्न सकिने सिकाइ क्रियाकलापहरू (कक्षा ५)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[रूखको रूप]] रिन्छेन्ला लामा&lt;br /&gt;
* [[केही धार्मिक तथा साँस्कृतिक सम्पदाहरू (केही नमुना कलाकृतिहरू)]] सत्यमोहन जोशी&lt;br /&gt;
* [[रमाइला गाउँखाने कथा]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[दसैँ, पिङ र हात्ती (बालकथा-सङ्ग्रह)]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[८० दिनमा विश्‍व भ्रमण]] जुल्स वर्न,गोरखबहादुर सिंह&lt;br /&gt;
* [[बालभाका - १ (बालकविता सङ्ग्रह)]] उद्धवप्रसाद प्याकुरेल&lt;br /&gt;
* [[ताल (उपन्यास)]] यासुनारी कावाबाता&lt;br /&gt;
* [[चतुरेको चर्तिकला (कथा सङ्ग्रह)]] गोरखबहादुर सिंह&lt;br /&gt;
* [[ठूलो फुल (A Big Egg)]] Roma Pradhan, Shanta Das Manandhar&lt;br /&gt;
* [[आखिरमा टोम्मीको टोलीले जिती छाड्यो]] क्रिस्टिन स्टोन,शान्तदास मानन्धर&lt;br /&gt;
* [[शिक्षक निर्देशिका मेरो सामाजिक अध्ययन तथा सिर्जनात्मक कला कक्षा ५ (पुरानो संस्करण)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[जय भुँडी (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[मुकुन्द इन्दिरा (नाटक)]] बालकृष्ण सम&lt;br /&gt;
* [[खाल्डामा परेको भकुन्डो]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[जे छोए पनि सुन]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[खानामा पाइने पोषणहरू]] नताशा भिजकारा&lt;br /&gt;
* [[अन्तिम निम्तो]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[सूगवा]] रोशनी चौधरी&lt;br /&gt;
* [[भीमसेन थापा (ऐतिहासिक खण्डकाव्य)]] सिद्धिचरण श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[ऋतुविचार (खण्‍डकाव्य)]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[अनिवार्य नेपाली (१०६) - माध्यमिक शिक्षा परिक्षाको प्रश्न तथा उत्तरकुञ्जिका २०७४]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[छन्दका १०१ कविता]] (सङ्कलन) कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[गणित प्राविधिक शब्दकोश]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[उज्यालोको खोजीमा (उपन्यास)]] हरिहर खनाल&lt;br /&gt;
* [[सपनाको देशमा]] चन्द्रकान्त आचार्य&lt;br /&gt;
* [[महिला लक्षित शिक्षक सेवा आयोग तयारी अध्ययन सामग्री]] विष्णुप्रसाद अधिकारी&lt;br /&gt;
* [[शिक्षक पेसागत विकास तालिम (तालिम पाठ्यक्रम)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[हाम्रा लोकबाजाहरू (बालबोध - ५१)]] रामप्रसाद कँडेल&lt;br /&gt;
* [[पर्दा, समय र मान्छेहरू (कथासङ्‍ग्रह)]] झमक घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[काउकुती (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[विदुर नीति Vidura Niti [Sanskrit-English]]] (Extracted From) Mahabharata [महाभारत]&lt;br /&gt;
* [[जंगबहादुरको बेलाइती कापी]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[कति वटा रोटी]] शिल्पी प्रधान&lt;br /&gt;
* [[विश्वका प्रमुख सभ्यता तथा संस्कृति (बाल ज्ञानकोश - ३)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अस्माकम् संस्कृतम् - कक्षा १]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[प्रारम्भिक संस्कृत व्याकरण र रचना]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[गोरक्ष-साह-वंश (ऐतिहासिकं महाकाव्यम्)]] हरिप्रसाद शर्मा&lt;br /&gt;
* [[२०२ ओटा ठट्टा]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[धुमधामको घुमघाम (भक्तप्रसाद भ्यागुताको नेपालयात्रा)]] कनकमणि दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[महिलाका लागि डाक्टर नभएमा]] -&lt;br /&gt;
* [[दस औतार (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[A Perfect Match]] Ramendra Kumar&lt;br /&gt;
* [[मधुपर्क (वर्ष ४७, अंक ४, २०७१ भदौ)]] -&lt;br /&gt;
* [[सौगात (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[एक घर एक रोजगार (प्रयागदत्त तेवारीको कृषिकथा)]] मिलन बगाले&lt;br /&gt;
* [[रवीन्द्रनाथका नाटकहरू]] -&lt;br /&gt;
* [[पेसा, व्यवसाय र प्रविधि]] -&lt;br /&gt;
* [[मामा माइजु]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[म को हुँ]] पेमा डोल्मा लामा&lt;br /&gt;
* [[चनाचटपटे (बालकविता-सङ्ग्रह)]] बूँद राना&lt;br /&gt;
* [[आवाज (सामाजिक उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[स्पष्टीकरण (कथासङ्ग्रह)]] हरिभक्त कटुवाल&lt;br /&gt;
* [[स्वास्थ्य, जनसङ्ख्या तथा वातावरण शिक्षा स्वाध्ययन सामग्री (२०६७)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[दशैँको दक्षिणा (बालउपन्यास)]] गङ्गा पौडेल&lt;br /&gt;
* [[चार आर्य-सत्य (बुद्ध-शिक्षाका चार स्तम्भ)]] दोलेन्द्ररत्न शाक्य&lt;br /&gt;
* [[विजय चालिसेका बालकथाहरू]] विजय चालिसे&lt;br /&gt;
* [[सिर्जनशील विद्यालय]] अर्जुन श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[अभिभावकको सहयोगमा बालबालिकालाई घरमा नै गराउन सकिने सिकाइ क्रियाकलापहरू (कक्षा १)]] -&lt;br /&gt;
* [[दर्शन परिचय (विश्वका दर्शन र कला साहित्यिक बादहरू)]] परशुराम कोइराला&lt;br /&gt;
* [[खोज (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[अनिवार्य सामाजिक अध्ययन (१२३) - माध्यमिक शिक्षा परिक्षाको प्रश्न तथा उत्तरकुञ्जिका २०७५]] -&lt;br /&gt;
* [[बिहानीको घामसँग]] तारा पुन, शान्तदास मानन्धर&lt;br /&gt;
* [[एकादेशमा (बालकथाहरूको सँगालो)]] उषा दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[इतिहासका विम्बहरू]] पूर्णचन्द्र घिमिरे, रमेशचन्द्र घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[पन्ध्रौं योजना (२०७६७७-२०८०८१)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[नेपालको शाह तथा राणा वंशावली]] विष्णु प्रसाद श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[Aaloo-Maaloo-Kaaloo]] Vinita Krishna&lt;br /&gt;
* [[परित्याग (उपन्यास)]] माधव खनाल&lt;br /&gt;
* [[अमेरिका (उपन्यास)]] गंगा लिगल&lt;br /&gt;
* [[उखान मिलेन !]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[राष्ट्रकवि माधव घिमिरे (जीवनी, व्यक्तित्व र कृतित्वको सङ्‍क्षिप्त रेखाङ्‍कन)]] शैलेन्दुप्रकाश नेपाल&lt;br /&gt;
* [[केहि गुणकारी बोटबिरूवाहरू (बालबोध - ४१)]] डा. हरिप्रसाद&lt;br /&gt;
* [[दिवास्वप्न]] गिजुभाई, शरच्चन्द्र वस्ती&lt;br /&gt;
* [[संस्कृत, प्राकृत र नेपालीका सन्धिनियम]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[शिक्षाका ती दिन]] पुष्पराज पौडेल&lt;br /&gt;
* [[मपाईं (निबन्ध)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[Autobiography of a YOGI]] Paramhansa Yogananda&lt;br /&gt;
* [[ताराबाजी लै! लै!!]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[विश्वास (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[Akbar and Birbal Moral Stories]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[बुद्धवादका तीन आयाम]] पशुपति घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[करेसाबारीका जडिबुटीहरू]] केदार श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[काठमाडौं उपत्यका खुलास्थलहरू सम्बन्धी मानचित्र पुस्तक २०७१]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अन्ताक्षरी खेल]] ध्रुव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[साइबर बालकथा]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[कलेजी थाल]] ध्रुव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[कत्ति धुनु गधाहरूलाई (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] लक्ष्मण गाम्नागे&lt;br /&gt;
* [[गौरी (शोककाव्य)]] माधव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[आमाको माया]] रमेश चन्द्र अधिकारी&lt;br /&gt;
* [[Natural Treasures of Nepal]] Nepal Tourism Board&lt;br /&gt;
* [[नारीस्वर (महाकवि देवकोटा विशेष) - २०६६ असोज]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[चार गजलकारका उत्कृष्ट गजल (गजलसङ्ग्रह)]] मनु ब्राजाकी&lt;br /&gt;
* [[स्यालको जुक्ती]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[स्थानीय पाठ्यक्रम विकास तथा कार्यान्वयन मार्गदर्शन (मातृभाषा सहित) २०७६]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[बाँदर बन्ने रहर (बालकथा सङ्ग्रह)]] गोपीकृष्ण ढुङ्गाना&lt;br /&gt;
* [[डाढो (हास्यव्यङ्ग्यहरू)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[मध्यचन्द्रिका (नेपाली भाषाको मझौला व्याकरण)]] सोमनाथ शर्मा&lt;br /&gt;
* [[नेपाली क्रान्ति-कथा]] फणीश्वरनाथ रेणु&lt;br /&gt;
* [[डायना (महाकाव्य)]] शैलेन्दुप्रकाश नेपाल&lt;br /&gt;
* [[शङ्खे र फट्याङ्ग्रो]] अनन्तप्रसाद वाग्ले&lt;br /&gt;
* [[मोहिनीले खोसेको अमृतकलश]] अमर निराकार राई&lt;br /&gt;
* [[हिन्दू-धर्म के हो]] महात्मा गाँधी&lt;br /&gt;
* [[बालबालिकामा पढ्ने बानीको विकास]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[The Last Page of My Poem (मेरो कविताको अन्तिम पृष्ठ)]] Rajeshwor Karki&lt;br /&gt;
* [[जय भोलि !]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[संस्कृत व्याकरणको रूपरेखा]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[घरबारी बगैंचा]] बोल बहादुर थापा&lt;br /&gt;
* [[नबिर्सने यात्रा (यात्रा-कथा)]] समीर नेपाल&lt;br /&gt;
* [[समाज परिवर्तनमा संस्कृतिकर्मी]] विजय सुब्बा&lt;br /&gt;
* [[मेवालाल (बालकथा सङ्ग्रह)]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[A Helping Hand]] Payal Dhar&lt;br /&gt;
* [[आमा (कविता सङ्ग्रह)]] भक्ति दाहाल &#039;विष्फोट&#039;&lt;br /&gt;
* [[विज्ञान तथा वातावरण - कक्षा ८ (पुरानो संस्करण)]] गोपीचन्द्र पौडेल&lt;br /&gt;
* [[चप्पल]] अर्हन्त श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[मात्राहरू]] हरिहर लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[दोस्रो भाषाको रूपमा नेपाली भाषा]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अब्राहम लिंकन (१८०९-१८६५)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[घरभेटी भाउजू (कथासङ्ग्रह)]] कृष्णादेवी शर्मा&lt;br /&gt;
* [[Agreeing and Disagreeing - English Grade 10]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[शकुन्तला नाटक]] शम्भुप्रसाद ढुंग्याल&lt;br /&gt;
* [[Chunu and Munu Read]] Shanta Das Manandhar, Stephanie Wei&lt;br /&gt;
* [[अब खेल खेल्ने!]] शिल्पी प्रधान&lt;br /&gt;
* [[जनावरहरूको सभा]] ज्ञाननिष्ठ ज्ञवाली&lt;br /&gt;
* [[विश्वप्रसिद्ध पैंतिस साहित्यकार]] प्रभात सापकोटा&lt;br /&gt;
* [[कसिङ्गर (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[पंचतन्त्र कथासंग्रह]] &lt;br /&gt;
* [[अक्षर (बालकथा)]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 2: Title and heading corrections completed ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 2&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 3: Text correction completed ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 3&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
==Step 4: Proof reading completed==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 4&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[अनौठो फल]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==Step 5: Finished books==&lt;br /&gt;
पुरा भएका किताब&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 5&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96_%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE&amp;diff=81</id>
		<title>लेखनाथका प्रमुख कविता</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96_%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE&amp;diff=81"/>
		<updated>2024-06-11T13:05:24Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: /* सामा प्रकाशनका केही कविता /काव्य */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;Source:https://nepalikitab.org/lekhnath-poudel-lekhnath-ka-pramukh-kabita/&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पुस्तक परिचय==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्रि. वि. मा. सा. शा, सं. अन्तर्गत स्नातक तहको द्वितीय पत्रकोऐच्छिक अध्ययन &#039;ख&#039; खण्डका लागि निर्धारित नेपाली पाठ्यक्रमअनुसार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्पादन&lt;br /&gt;
डा. वासुदेव त्रिपाठी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रकाशक : साम्रा प्रकाशन&lt;br /&gt;
संस्करण : पहिलो, २०४६दोस्रो, २०४९तेस्रो, २०६२ (११०० प्रति)&lt;br /&gt;
आवरणकला : टेकवीर मुखिया&lt;br /&gt;
म्‌ल्य : रु. ३५।-&lt;br /&gt;
मुद्रक : सार्रा प्रकाशनको छापाखाना, पुलचोक ललितपुर&lt;br /&gt;
फोन : ५५२१०२३, फ्याक्स : ५५४४ २३६15819 : 99933-2-488-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‍‍&lt;br /&gt;
== मन्तव्य ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्रिभुवन विश्वविद्यालयको मानविकी र सामाजिक शास्त्र सङ्काय-अन्तर्गतको ऐच्छिक नेपाली विषयको प्रवीणता प्रमाणपत्र / स्तातक /स्नातकोत्तर तहको पाठयक्रमको आवश्यक संशोधनका क्रममा सम्बन्धितनेपाली विषय समितिले कतिपय पाठ्यसामग्रीमा विशेष सुधार ल्याई तिनलाईअद्यावधिक एवं सान्दर्भिक तुल्याउनु आवश्यक ठहत्याई पाठचसामग्री विकासपरियोजनाको तर्जुमा २०४५ सालमा गरेको थियो । सोही परियोजनाकाकार्यान्वयनका क्रममा प्रथम चरणमा नेपाली साहित्यका विविध फुटकरविद्या (कविता, कथा, एकाङ्की, निबन्ध एवं समालोचना) का तहगत शैक्षिकआवश्यकतालाई दृष्टिगत गरी विधागत पाठघसङ्कलनहरू सम्पादन गर्ने रदौसौ चरणमा साहित्यसिद्धान्त, भाषाविज्ञान र नेपाली साहित्यकोइतिहासलगायत अन्य अपेक्षित पाठयसामग्रीको तयारी गर्ने निधो गरियो ।उक्त प्रथम चरणअन्तर्गत सम्पादित प्रस्तुत ग्रन्थ लेखनाथका प्रमुख कवितास्तातक तहको द्वितीय पत्रको खण्ड &#039;ख&#039; को विशिष्ट अध्ययनकोपाठचसामगरीका रूपमा स्वीकृत पाठहरूको सङ्खलन हो । यसका सम्पादनकाक्रममा विषय समितिद्वारा निर्धारित आधारहरूको अवलम्बन गरी स्नातकतहमा पढाउनका निम्ति लेखनाथका प्रमुख कविताहरू सङ्कलित गरिएकाछन्‌ । .यो ग्रन्थ लेखनाथका प्रमुख कविताको सङ्कलनतर्फको एक अर्कोप्रयास हुँदै हो तर सम्बन्धित शैक्षिक तहका पाठघण्टा र पाठ्यस्तरकापरिधिमा रही सोही शैक्षिक प्रयोजनअनुरूप यहाँ लेखकविशेष र कृतिविशेषको&lt;br /&gt;
चयन गरिएको छ । यस चयनमा सम्बन्धित बिधाका प्रमुख युग र घाराएवं तिनका प्रमुख स्रष्टाका शैक्षिक तहगत रूपमा उपयुक्त हुन सक्नेकृतिहरूको समावेश हुनु स्वाभाविकै हो । शैक्षिक क्षेत्रमा प्रयुक्त हुने यसप्रकारका सङ्कलनहरू आफ्ना शैक्षिक तहगत शृङ्खलामा आबद्ध र आधारितरहने तथ्य छँदै छ।नेपाली विषय समितिको उक्त परियोजनाअन्तर्गतको यस ग्रन्थकोप्रकाशनको चाँजोपाँजोलगायत सम्पूर्ण अभिभारा वहन गर्ने साप्ज प्रकाशनप्रतिपनि त्रि.वि. मानविकी र सामाजिक शास्त्र सङ्कायको नेपाली विषय समितिकातर्फबाट आभार व्यक्त गर्दछु ।२०४५ चैत्र १७ गते डा. बासुदेव त्रिपाठीअध्यक्षनेपाली विषय समितिनेपाली केन्द्रीय शिक्षण विभागत्रिभुवन विश्वविद्यालयकीर्तिपुर, काठमाडौँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==विषयस्‌ची==&lt;br /&gt;
कविशिरोमणि लेखनाथ पौडघालको कवितायात्रा : एक चर्चा&lt;br /&gt;
री 5 उ” १८ ५ ३५ 70 परी&lt;br /&gt;
कबिकवबितालाप&lt;br /&gt;
वैतिक दृष्टान्त&lt;br /&gt;
वसन्त कोकिल&lt;br /&gt;
जीवन-चङ्गा&lt;br /&gt;
गौँधलीको चिरिबिरी (१)&lt;br /&gt;
सत्य सन्देशहरू&lt;br /&gt;
विज्ञानको मोह&lt;br /&gt;
पतित-पावनी श्री गङ्गाजीको माँकीवंशीघरको दिव्य वंशी&lt;br /&gt;
. युगवाणी. वर्षा. सरस्वती स्मृति&lt;br /&gt;
साहित्यको फुटबल&lt;br /&gt;
. हाम्रो इन्द्रेनी&lt;br /&gt;
पूर्वस्मृति&lt;br /&gt;
. आखिरी कविता&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
१०१२१५१९&lt;br /&gt;
२४&lt;br /&gt;
२८२९&lt;br /&gt;
३२३४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कविशिरोमणि लेखनाथ पौड्यालकोकवितायात्रा : एक चर्चा==&lt;br /&gt;
कविशिरोमणि लेखनाथ पौडथाल (वि.सं. १९४१-२०२२) लेबाल्यकालमा आफ्नो जन्मस्थल कास्की जिल्लाको पोखरा उपत्यकाको अघौँअर्चले गाउँमा नै कविताको उद्बोधन प्राप्त गरै तापनि खास गरी काठमाडौंकोरानीपोखरी संस्कृत छात्रावास (तीनधारा पाठशाला) मा रही संस्कृत मध्यमाकोअध्ययन गरिरहेका बखत नै उनको कविताअभ्यास विशेष तीव्र भएकोबुझिन्छ । उनको यो कविताअभ्यास तात्कालिक शैक्षिक परिप्रेक्ष्यअनुरूपसंस्कृत र नेपाली दुवै भाषाका माध्यमबाट थालिएको थियो भने उनलेअध्ययन गर्ने गरेको रानीपोखरी पाठशालाको वर्णन गर्ने संस्कृत समस्यापूर्ति&#039;पाठशाला विशाला&#039; सुरक्षित रूपमा उपलब्ध पनि छ र उनका प्राथमिककविता-आराधनाका परिचायक दुई नेपाली कविता &#039;कविताकल्पद्रम&#039; (सन्‌१९०५ : बि.सं. १९६१-६२) मा प्रकाशित भएको पाइन्छ । &#039;शृङ्घारपच्चीसी&#039;र &#039;मानसाकर्षिणी&#039; शीर्षकका यी दुई कविता नै उनका प्रकाशित प्राथमिकनेपाली कविताहरू हुन्‌ । नेपाली लेख्य व्याकरणको निर्धारण नभइसकेको,भङ्गाररसतर्फ नेपाली कविताको विशेष चाख देखा परेको र परम्परागतवर्णमात्रिक छन्दमा शब्दालङ्कार र अर्थालङ्ारको सजधजतर्फ विशेष उत्सुकताप्रकट भएको नेपाली कविताको उत्तरमाध्यमिक कालको कविता-परिवेशकाउपजका रूपमा लेखनाथका उपर्युक्त दुई कविता देखा पर्छन्‌ । समकालीतकवबिता-परिवेशका उपज हुँदाहुँदै पनि यी दुई कवितामा लेखनाथको उर्वर प्रतिभाको मिर्मिरे रन्कोचाहिँ सुनिन्छ नै । यसरी २०-२१ वर्षका उमेरमा&#039;कविताकल्पद्रुम&#039; का माध्यमबाट लेखनाथको जुन कवितायात्रा थालियो त्योउनको शेष जीवनकालभर अक्षुण्ण र गतिशील रह्यो । उनको ८२ वर्षेजीवनकालमध्ये लगभग ६० वर्षको अवधि नेपाली कविताको साधनामासमर्पित रह्यो । यतिको लामो समयावधिअन्तर्गत युवावस्थाका &#039;कविताकल्पद्रुम&#039;(बि.सं. १९६१-६२) का उपर्युक्त दुई श्ृङ्घारिक कवितादेखि बृढ्घौलीमामृत्युसम्ममा लेखिएको &#039;आखिरी कविता&#039; (२०२२) सम्मको ६० वर्षभन्दा बढीअवधिको कवितायात्रा कविशिरोमणि लेखनाथले गरेको पाइन्छ ।&lt;br /&gt;
युवा लेखनाथ पौडघालका कविताहरू सुन्दरी पत्रिका १९६३) माछापिन थाले । समस्यापूर्ति र फुटकर कविताको रचना गर्दै प्रथमतः उनले&#039;नुङ्घारिक घाराकै आवाहन गरेका हुन्‌ र &#039;वियोगिनी विलाप&#039; यतिखेरकोउनको उल्लेखनीय कविता हो । उनका भाव, लय र शैलीको प्रतिभापूर्णछलबल पर्याप्त मात्रामा यस कवितामा प्रकट भएको पाइन्छ । तर सुन्दरी-कालमै उनको &#039;कालिकाविलासी&#039; जस्तो समस्यापूर्तिले शृष्वारधाराप्रति छेडहाल्न थालेको र &#039;वैराग्यवल्ली&#039; कविताले श्ुङ्गारविपरीत शान्तरसतर्फ चाखदेखाएको भेटिन्छ र उनका भाव, लय र शैलीमा विशिष्ट छचल्काहरूप्रकट भइरहेको कुरा &#039;बैराग्यवल्ली&#039; कविताले एनि फल्काउँछ । यसरी१९६३ सालमै लेखनाथ समसामयिक आङ्गारिक परिवेशबाट तकिँदै आफ्नोशान्तरसमूलक कबितायात्रातर्फ प्रवत्त भएको र उनको कवित्व पनि प्रतिभापूर्णछचल्काहरूले उद्देलित भइरहेको अनुभव हुन आउँछ ।&lt;br /&gt;
१९६५-६६ साल लेखनाथको प्राथमिक कवितायात्राका निर्णायकवर्ष हुन्‌ । लेखनाथको काव्यघाराको खास प्रवर्तन माघवी पत्रिकाकामाध्यमबाट यतिखेर नै थालियो । हलन्त बहिष्कारमूलक लेख्य व्याकरणकाअनुशासनमा कविता रच्दै र राष्ट्रिय जागरणका सामाजिक, साँस्कृतिक,धार्मिक तथा आध्यात्मिक लहरहरूलाई छुँदै अकृत्रिम तर अलङ्वारपूर्णशैलीमा कविताको स्तरीकरण गर्ने चासो माधवी प्रत्रिकामा छापिएकालेखनाथका कविताले देखाएको पाइन्छ । यस पत्रिकामा छापिएको ४८पद्यको &#039;वर्षाविचार&#039; लामो कविता वा लघु काव्यका रूपमा देखा पर्छ रयो&lt;br /&gt;
न्ख-&lt;br /&gt;
उनको आगामी क्रतुबिचार काव्यको प्रारूप पनि हो । नेपाली भाषामापनि संस्कृत वा फारसी भाषाको जस्तो स्तरीय काव्य लेखिन सक्छ भनीप्रमाणित गर्ने क्रममा प्रथम पाइलास्वरूप लेखिएको वर्षाविचार मा लेखनाथपौडचालको निजी काव्यधारा र त्यसका आधारभूत प्रवृत्तिहरूको प्राथमिकदिग्दर्शनसम्म प्राप्त हुन्छ । लेख्य व्याकरणका अनुशासनमा कविता रच्ने,परिष्कारवादी (शास्त्रीय वा क्लासिकल) काव्यधाराको बरण गर्दै नेपालीकविताको स्तरीकरण गर्ने र राष्ट्रिय जागरणको सन्दर्भतर्फ उन्मुखतादेखाउने जस्ता कुरा उनका काव्यधाराका केन्द्रीय पहिचान हुन्‌ भनेबर्षाविचारमा ती कुरा प्रारम्भिक तर स्पष्ट रूपमा देखिन्छन्‌ । काव्यकारचनासामग्रीका दृष्टिले प्रकृतिका छनि, सामाजिक परिदृश्य, हिन्दू पुनर्जागरण,नैतिक चेतना र आध्यात्मिक मनन नै लेखनाथका केन्द्रीय सामगी हुन्‌ भनेत्यतातर्फ वर्षाविचारका लेखनाथ उन्मुख भइसकेका छन्‌ । काव्यभाषा रशैलीका सन्दर्भमा तत्सम र तद्भव पदावलीको समुचित सन्तुलनमा आधारितसरल-गम्भीर तथा सहज-मनोरम शब्दशय्याको अनुप्रासीय अन्तर्धाराकोलयलालित्य लेख्य व्याकरणका अनुशासनभित्र रही प्राप्त गर्नु लेखनाथकोपहिचान हो भने त्यसको प्रारूप &#039;वर्षाविचार&#039; मा देखा पर्छ । सहज स्तस्फूर्ततुल्यकिन्तु शक्तिशाली अलङ्करण लेखनाथका कविताका लालित्यका परिपोषकतत्त्वमध्यै एक हो भने त्यो सहज मनोरम आलङ्कारिक छटा पनि वर्षाविचारमाचहकिलो छ्‌ । काव्यचेतनाका दृष्टिले वस्तुतत्त्व र अन्तर्भावका बीचकोबौद्धिक पुटसमेत परेको चेतनापरिपाक परिष्कारवादी लेखनाथको केन्द्रीयपहिचान हो भने त्यो वर्षाबिचारमा मिरमिराइरहेको पाइन्छ । यसरीलेखनाधका प्राकृतिक पर्यवेक्षण, सामाजिक व्यङ्गय र आदर्शीकरण, नीतिचेत,पौराणिक सन्दर्भको नवीन व्याख्या, युगोन्मेष, हिन्दू पुनर्जागरणको स्वर रअध्यात्मचेतका साथ्यै लय, ौली र अलङ्गरणका अनुशासित लालित्यसहितसहज-संयमित परिष्कारघर्मी स्तरीय कविताचेतका प्राथमिक प्रस्फुटनकाबिन्दुका रूपमा वर्षाबिचार लघु काव्य ।१९६५-६६) देखा पर्छ र यसलाईनेपाली खण्डकाव्यको परिष्कारधर्मी प्रथम स्तरीय प्रयास पनि भन्न सकिन्छ ।वास्तवमा यसै बिन्दुदेखि नै लेखनाथ पौडयालको कवितायात्रामा उनको&lt;br /&gt;
नज&lt;br /&gt;
काव्यधारा आफ्ना खास काव्यस्रोत र काव्यप्रवत्तितर्फ अभिमुखीकृत भईदेखा परेको पाइन्छ ।&lt;br /&gt;
लेखनाथका कवितायात्राका क्रममा लालित्य (१९६९) उनकोकवितायात्राको अर्को महत्त्वपूर्ण पाइलो हो । यसमा लेखनाथका ६ कबितापरेका छन्‌ जसमध्ये &#039;मनोलड्ड्‌&#039; कविता उनको धार्मिक-अध्यात्मिक कवि-चेतको परिष्कारोन्मुख भावार्द्र अभिव्यक्ति हो । त्यस्तै अर्को &#039;विचित्रवाहिनी&#039;कवितामा शोषण र उत्पीडनको हास्यआभास अँगाल्दै लेखनाथको युगोन्मेषमुल्किएको छ र सामाजिक पर्यवेक्षण र व्यङ्गघको क्षमता पनि झल्कन्छअनि शब्दालङ्कार र अर्थालङ्कारको विशेष, चहक पनि प्रकट भएको छ।अर्को &#039;रामराज्य&#039; कवितामा पूर्वीय राज्यआदर्शहरूको संस्मरण छ र शब्दार्थकोअलङ्कार सृष्टिसामर्थ्य पनि चहकिलो छ । लालित्यभित्रको &#039;कविकवितालाप&#039;कविताचाहिँ कवि लेखनाथको निजी काव्यघाराको घोषणापत्रतुल्य देखापर्छ । माध्यमिककालको उत्तरार्धका समसामयिक साहित्यिक प्रचलनप्रतिआक्षेप, व्यङ्ग्य र अस्वीकारसहित कविताका भाषामा व्याकरणसम्मत सुघारल्याउने, मौलिक कविप्रतिभाको सञ्चार गर्ने, नीतिचेत र आदर्शोन्मुखविचार गर्दै सामाजिक जागरण र सुधारप्रति सोट्टेश्य कविताको प्रवर्तन गर्नेर पूर्वी उच्च साहित्यिक परम्पराप्रति श्रद्धासाथ नेपाली कविताको स्तरीकरणगर्दै नवीन काव्ययुगको आवाहन गर्ने सङ्कल्प &#039;कविकवितालाप&#039; कवितामाउनले प्रकट गरेका छन्‌ । यस तात्पर्यमा १९६९ सालसम्म आइपुग्दालेखनाथ नेपाली कवितामा युगान्तर ल्याउन कृतसङ्ल्प देखा पर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
१९७० सालको शोकप्रवाह खण्डकाव्यले लेखनाथको उच्चभावक्षमताको परिचय दिन्छ । उनका लय र शैलीमा आइरहेको परिष्कृतिलेगर्दा यसको भावधारा कझन्‌ चहकिएको छ । परिष्कारवादी काव्यधाराकोउल्लेख्य कृतिका रूपमा यस करुण खण्डकाव्यले लेखनाथको विकासशीलकविप्रतिभालाई प्रस्तुत गरेको छ । -&lt;br /&gt;
१९७२-७६ सालका अवधिमा लेखनाथको परिष्कारवादीनबकाव्यधाराको सृजनात्मक क्षमता प्रभावकारी रूपमा प्रकट भएको रस्थापित भएको देखिन्छ । यस अवधिमा उनका प्रशस्त फुटकर कविताहरू&lt;br /&gt;
न्च--&lt;br /&gt;
र तीन खण्डकाव्यका साथै एक नाटक प्रकाशित भएको पाइन्छ । उनकाफुटकर कविताहरू खास गरी गोरखाशिक्षाका भाग १, २ र ३ (क्रमशः१९७२, १९७३, र १९७४) मा र सूक्तिसिन्धु १९७४) मा सङ्कलित छन्‌ ।१९७३ सालका &#039;हिउँदका दिन&#039;, &#039;इन्द्र्धनु&#039; र १९७४ सालका &#039;प्रभात&#039;,शबसन्त&#039; र &#039;वसन्तकोकिल&#039; कवितामा लेखनाथको पूर्वस्वच्छन्दताबादीस्पर्शसहित परिष्कारवादी प्रकृतिपर्यवेक्षणको कुशलता प्रकट हुन्छ । १९७२सालका &#039;दशैँ&#039; र &#039;तिहार&#039; मा उनको साँस्कृतिक चेत तथा &#039;ईश्वरस्तुति&#039; माआध्यात्मिक चेत रुल्कनाका साथै १९७३ सालको “म कस्तो हँ&#039; र १९७४सालका &#039;म केके नगरँ&#039; र नैतिक दृष्टान्त कवितामा उनको नैतिकआदर्शचेत व्यक्तिएको छ । १९७४ सालको &#039;पिँजराको सुगा&#039; तात्कालिकयुग-व्यथा र स्वतन्त्रता-कामनाका प्रतीकात्मक व्यञ्जनाका रूपमा बह्चर्चितरहेको छ । १९७४ सालका सूक्तिसिन्धुका कवितामध्ये &#039;विरहिणीका उपरसखीको प्रश्न&#039; कविता वियोगिनी र योगिनीका श्लेषात्मक भावसन्धिमैउभिँदै शृङ्गार युग र शान्त-आध्यात्मिक युगको दोसाँधको अत्यन्त कलात्मकअभिव्यक्ति हुन आएको छ । १९७४ सालको भर्तुहरिनिर्वैद नाटकको पद्यांशलेपनि खास गरी उनको आध्यात्मिक कवित्व तथा शैलीगत अन्तर्विकासकोपरिचय दिन्छ । यसताकाका लेखनाथका खण्डकाव्यहरूमध्ये व््रतुविचारप्रकृतिकाव्यका रूपमा, बृद्धिविनोद बौद्धिक काव्यका रूपमा अनिसत्यकलिसंवाद सामाजिक काव्यका रूपमा देखा पर्छन्‌ । लेखनाथले प्रवर्तनगर्न लागेको नयाँ काव्यधाराका प्राकृतिक, बौद्धिक र सामाजिक सन्दर्भलाईयी तीन काव्यहरूले प्रस्तुत गरेका छन्‌ । यी काव्यहरूमध्ये समाजसन्दर्भ रयुगोन्मेषको वस्तुगत पर्यवेक्षण, व्यङ्घवय र आदर्शीकरणतर्फ सत्यकलिसंवादविशेष जागरूक छ र यसमा हिन्दू पुनर्जागरणका स्वरसँग लेखनाथकासांस्कृतिक स्वप्न तथा सुधारवादी स्वर पनि सलबलाउन खोजेका छन्‌ ।सामाजिक रूढि, विकृति र अमङ्गतिप्रति व्यङ्ग्य तथा आर्थिक दैन्यप्रतिआक्रोश एवम्‌ धार्मिक नैतिक पतनप्रति कौतुकसहित राजनैतिक सन्त्रासकाप्रतिच्छायामा सत्यकलिसंवाद रचिएको छ र यसमा काव्यमूल्यभन्दा हिन्दूपुनर्जागरणको स्वर तथा सामाजिक मूल्य र युगचापको मात्रा बढी देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
न्ङ-&lt;br /&gt;
बुद्धिविनोद समकालीन नेपालका पूर्वी-पश्चिमी वा प्राचीन नवीन मूल्य,दृष्टि र चेतनाका प्रश्न-प्रतिप्रश्नको द्वन्द्वमय अभिव्यक्तिका रूपमा उभिँदैज्ञान र विज्ञानको घर्षण थालिएका युगीन बौद्धिक धरातलको व्यञ्जक नैबढी देखा पर्छ । क्रतुविचार खण्डकाव्य भने प्रकृतिकाव्य भएर पनिलेखनाथका सबैजसो काव्यप्रवृत्तिहरूको सङ्गमस्थलतुल्य छ र यसमासामाजिक-सांस्कृतिक तथा नैतिक-आध्यात्मिक प्रतिच्छविसहित लेखनाथकोसृक्ष्म प्रकृति-पर्यवेक्षण प्रकट भएको छ । लेखनाथका लय, भाव, चिन्तन रशैली-शिल्पको पूर्वस्बच्छन्दतावादी स्पर्शसहित सहज-परिष्कृत संश्लिष्टसौन्दर्यको नमुनास्वछूप क्रतुविचार खण्डकाव्य नेपाली कविताकै पनिप्रथम परिष्कृत सौन्दर्यबाटिकाका रूपमा देखा पर्छ । यसरी १९७२-७६सालका उपर्युक्त कविता र काव्यका माध्यमबाट लेखनाथ पौडयाललेनेपाली कविताको माध्यमिककाललाई तोड्दै आधुनिक नेपाली कविताकोउषाकाल बा मिर्मिरे प्रथम प्रहरस्वरूप परिष्कारवादी (शास्त्रीय? कलासिकल)धाराको प्रवर्तन तथा प्रतिष्ठापन गरेको पाइन्छ । खास गरी १९७३-७६सालका बीच प्रवर्तित यो परिष्कारवादी धारा शारदा पत्रिकाको अभ्युदय[वि. सं. १९९१) पूर्वको अवधिसम्म नेपाली कविताको अग्रणी धाराकोरूपमा रह्यो । यस अबधिमा गोरखा शिक्षाको चारौँ भाग १९८० मालेखनाथका &#039;धनमहिमा&#039;, &#039;सन्ध्या&#039; र &#039;धतिशीलता&#039; कविता छापिएका छन्‌ रउनको &#039;गीताञ्जली&#039; र लघु स्तुतिकाव्य पनि प्रकाशित भएको छ । &#039;धनमहिमा&#039;ले खास गरी धनमूलक सामन्त परिवेश र भौतिक मोहप्रति व्यङ्गय गरेकोछ भने &#039;धवृुतिशीलता&#039; चाहिँ आदर्शवादी धीर व्यक्तित्वको गायन हो अनिसन्ध्या&#039; चाहिँ प्राकृतिक सौन्दर्यको पूर्वस्वच्छन्दतावादी पुट पनि परेकोपर्यवेक्षण । &#039;गीताञ्जली&#039; शासक स्तुतिको सन्दर्भसँग जोडिएको छ रलेखनाथको जागरण-स्वर मूलतः राजनीतिनिक्षेप सांस्कृतिक-सामाजिकजागरणको व्यञ्जक हो भन्ने जानकारी सत्यकलिसंवादपछि यस लघुकाव्यले दिन्छ । तर परिष्कारवादी प्रसन्न शैली-शिल्प र मनौोरथ भावकोलय-लालित्यको छटा भने यस स्तुतिकाव्यमा पनि व्याप्त रहेको छ।लेखनाथको ६ दशकभन्दा लामो कवितायात्राको पूर्वार्द्ध वा प्रथम प्रहर ।&lt;br /&gt;
छ&lt;br /&gt;
१९६१-६२ सालदेखि १९९० सालसम्मको पूर्वोक्त अवधि नै हो। यसअवधिमा प्रथमतः: १९६३-७३ सालका बीचमा उनले समसामयिक माध्यमिकश्यङ्गारधारालाई तोड्दै आफ्नो परिष्कारबादी काव्यधारातर्फको प्रयोग रप्रवर्तन गर्दै क्रमश: त्यसलाई स्थापित गरेको पाइन्छ । नेपाली कवितामालेखनाथको यो भूमिका युगान्तकारी र्‌ नवयुगप्रवर्तक देखा पर्छ अनिनेपाली कविताको स्तरीकरण गर्दै र स्तरीय खण्डकाव्यको समेत रचना गर्दैपरिष्कारवादी काव्यचैतन्य र काव्यसौन्दर्यका स्रष्टा प्रथम महान्‌ नेपालीकविका रूपमा उनी यस अबधिमा प्रतिष्ठित हुन आउँछन्‌ । उनले सिर्जेकोयही परिष्कारवादी धारा नै नेपाली कविताको आधुनिकतातर्फको सङ्क्रान्तिकोउषाकाल वा प्रधम प्रहरसमेत देखा पर्न आउँछ ।&lt;br /&gt;
१९९१ सालदेखि शारदा पत्रिकासँगै नेपाली कवितामा नयाँ चहलपहलथालिन्छ र लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा र सिद्धिचरणजस्ता कविहरू स्वच्छन्दतावादीकाव्यधारा अँगाल्दै प्रकट हुन लाग्दछन्‌ । लेखनाथका परिष्कारवादीकाव्यधारामा पूर्वस्वच्छन्दतावादी तत्त्वहरू केही मात्रामा अन्तर्निहित रहैतापनि देवकोटा र सिद्धिचरणका सहकारितामा खास स्वच्छन्दतावादकोअभ्युदय नै १९९१-९२ सालतिरको नेपाली कविताको मुख्य घटना हो ।वि. सं. १९७६ पछि राजनैतिक चाप र व्याकरण-दवन्द्वका साथै अन्यसान्दर्भिक कारणहरूले गर्दा फक्रिन नपाई खुम्चिन पुगेको लेखनाथकोकवित्ब पनि शारदाकाल लाग्दानलाग्दै मन्‌ खारिएर प्रकट हुन थाल्यो ।वि. सं. १९९१ सालको परिवर्तित-संशोधित क्रतुविचार नै लेखनाथकोकबितायात्राको पूर्वार्द्धको उत्तराद्धको उद्घोषक कृति हुन आउँछ । लेखनाथकाकाव्यधाराका सन्दर्भमा स्वच्छन्दतावादको आंशिक चास्तीसहित परिष्कारवादीकाव्य-सुषमाको उत्कृष्ट कान्ति प्राप्त गर्दै उनका विविध काव्यप्रवृत्तिहरूअक तिम्खर र परिष्कृत भई, विशेष स्तरीकृत बन्नु नै क्रतुबिचार (१९९१)को केन्द्रीय प्राप्ति हो । यसरी देवकोटाका केन्द्रीयतामा स्वच्छन्दतावादीकाव्यधारा हुर्कन लागेको त्यस युगमा परिष्कारवादी काव्यधाराको नेतृत्वगर्दै लेखनाथ आफ्नो सामाजिक पर्यवेक्षण र आध्यात्मिक चेतनालाई अरखादै र समीकृत गर्दै अनि आफ्ना कविताको लय, शैली, शिल्प र संरचनालाई&lt;br /&gt;
प्छ&lt;br /&gt;
अर परिष्कृत तुल्याउँदै गतिशील रही परिष्कारवादी काव्यसौन्दर्यका उत्तुङ्गशिंखरका रूपमा चुलिँदै गएको पाइन्छ ।&lt;br /&gt;
लेखनाथको कवितायात्राको पूर्वार््धलाई प्रथम चरण .स्वीकार्दैउत्तरार्द्धस्वरूप १९९१-२०२२ सालको अवधिलाई चाहिँ २००७ सालकोविभाजक युगरेखाका आधारमा दुई भागमा वर्गीकृत गर्न सकिन्छ । यसरी१९९१-२००७ र २००८-२२ सालका दुई समयावधिमा उनको उत्तरार्द्धकवितायात्रालाई विभाजित गर्दा पहिलोचाहिँ समयावधि उनको कवितायात्राकोदोस्रो चरण र दोस्रोचाहिँ अवधि तेस्रो चरणका रूपमा देखिन आउँछन्‌ ।अवश्यै उक्त तेस्रो चरणका माफ्माक २०१३ सालदेखि लेखनाथको कवितामाअर्को चौथो चरणको सम्भाव्यता कल्कन्छ तर त्यो अघूरै रही तेग्रो चरणमैअन्तर्भुक्त बन्न पुगेको छ । प्रथमत: उनको कवितायात्राको दोस्रो चरण(१९९१-२००७ साल) का बारेमा नै चर्चा गरौँ ।&lt;br /&gt;
&#039;ञ्रतुविचार&#039; (१९९१) को परिवर्धन-परिष्कारपछि लेखनाथकाकवितायात्रामा कवित्व र चैतन्य दुवैको अन्तर्विकास र परिष्कारको प्रकियाझन्‌ तीव्र हुन लागेको पाइन्छ । यतिखेर उनको उमेर पचास वर्ष पार गरीजीवनको छैटौँ दशकतर्फ लाग्दै थियो र पेसागत चक्करबाट मुक्त हुँदैप्राय: स्वाधीन रूपमा उनको जीवनचर्या पनि चालिँदै थियो । यतिखेरसमकालीन राणाशासनका सन्दर्भमा पनि उनी नियमित चाकडी र दौडघुपकाप्रक्रियाबाट पन्छिदै र सत्ताकेन्द्रका विपरीत दिशामा उन्मुख कतिपयराणापरिवारहरूसँग सम्बद्ध हुँदै थिए । उनले आफ्नो कवितायात्राका पूर्वार्द्धमातत्कालीन कठोर राजनैतिक पर्याबरणमा जागरणधर्मी कवितासृजनाकाकठिनाइ र भुक्तमान भोगिसकेका थिए भने उनका युगचेत सूक्ष्म व्यञ्जनाकास्तरमा नै विशेष मुखरित हुनाका साथ प्राय: राजनीतिइतर सामाजिक,आर्थिक तथा सांस्कृतिक, नैतिक, धार्मिक र आध्यात्मिक जागरणकै सेरोफेरोमाबढी सुसेलिएको पनि हो । वास्तवमा आफ्ना कविजीवनभरि नै राजनैतिकस्तरमा उनी विप्लवी-विद्रोही कविभन्दा स्तुति-प्रशंसाका सामयिक अपेक्षाकोपूर्ति गरिदिने खालका कवितासमेत लेख्तै रहे तर युगचेतनाका पूर्वोक्तव्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक सन्दर्भचाहिँ उनका कृतिहरूमा स्पन्दित र&lt;br /&gt;
न्ज-&lt;br /&gt;
व्यञ्जित नै रह्यो । कवितायात्राको उत्तसर्द्धमा पनि उनी यही वृत्तमा नै२००७ सालसम्म केन्द्रित रहेको देखिन्छ तापनि उनका १९९१-२००७सालका अवधिका कवितामा जागरणधर्मी चैतन्य विशेष रूपमा स्पन्दित रव्यञ्जित भएको पाइन्छ । पेसागत मुक्तता, उमेरको परिपक्वता रसत्ताकेन्द्रविपरीत क्रियाशील कतिपय राणापरिवारहरूसँगको तादात्म्य तथाशारदाकालीन साहित्यिक जागरणका युगमा प्राप्त साहित्यिक आत्मप्रतिष्ठाकाकारणले गर्दा पनि उनी आफ्नो कवित्व र चैतन्य दुबैको बिस्तार रपरिष्कारतर्फ यतिखेर क्रमिक रूपमा उत्प्रेरित भएको बुझिन्छ । उनकोकवितायात्राको दोस्रो चरण (१९९१-२००७) मा दुई खण्डकाव्य, एकनाटक र प्रशस्त फुटकर कविताहरू प्रकाशित भएका छन्‌ । यी रचनाहरूलाईकेलाउँदा एकतर्फ उनका जीवनदृष्टिमा परिपक्वता आइरहेको र त्यसमापूर्वीय दर्शनको अध्ययन र सामाजिक सचेतता दुवैको भूमिका बढिरहेकोभेटिन्छ भने अर्कातर्फ परिष्कारवादी कवित्वको कलात्मक प्राप्तितर्फ उनकोदक्षता उत्तरोत्तर विकसित भइरहेको पनि पाइन्छ ।&lt;br /&gt;
लेखनाथको कवितायात्राको दोस्रो चरण (१९९१-२००७) मा देखापर्ने प्रमुख फुटकर कविताहरू हुन्‌- &#039;जीवनच्गरा&#039;, &#039;कालमहिमा&#039; र &#039;गौँथलीकोचिरिबिरी&#039; (१९९२), सत्य सन्देशहरू १९९५-२०००,), विज्ञानको मोह(१९९५), &#039;पिँजराको प्यासा मैना&#039; ।१९९७), &#039;पतितपावनी श्रीगङ्गाजीकोज्ञँकी&#039; १९९२), &#039;बंशीघरको दिव्यवंशी&#039; (१९९९), &#039;हाँसेको साहित्यसागर&#039;(२००४), &#039;गौंधलीको चिरिबिरी&#039; (२) (२००४), “नारद र विज्ञान&#039; (२००६)आदि । यी फुटकर कवितामध्ये &#039;जीवनचङ्गा&#039; ले लेखनाथमा आध्यात्मिकजीवनदृष्टिको सघन अन्जषणको अभिर्शंच बढिरहेको र त्यसलाई कतितात्मकपरिणति दिने चासो तीब्र भइरहेको सङ्केत दिन्छ भने &#039;गौँथलीको चिरिनिरी&#039;हरूले व्यक्तिवादी, बहिर्मुखी, सामन्ती र भौतिकवादी स्वार्थ र तृष्णाकाविपरीत मानवतावादी, अन्तर्मुखी, आर्ष र अध्यात्मवादी जीवनमूल्यतर्फलेखनाथको बढ्दो मुकाउलाई प्रस्तुत गर्दछन्‌ । &#039;विज्ञानको मोह” र &#039;नारद रविज्ञान&#039; जस्ता कविताबाटै सत्यकलिसंवादको विज्ञानप्रतिको कौतुक भाव रबुद्धिवितोदको विज्ञानतर्फ पनि सचेत पृष्ठभूमिपछि लेखनाथ विज्ञानलाई&lt;br /&gt;
नस&lt;br /&gt;
मनुष्यका दुरन्त भौतिक तृष्णाको विस्तारक तथा ध्वंसात्मक दिशातर्फविश्वसृष्टिलाई धकेल्ने तत्त्व ठान्दै विज्ञानविरुद्ध उभिरहेको देखिन्छ । प्रथमविश्वयुद्धदेखि दोस्रो बिश्वयुद्धसम्मका चार दशकमा लेखनाथले भौतिकसभ्यताको प्रतीक ठहन्याई यसका ध्वंसात्मक पक्षमा विशेष जोडसमेतदिएको अनुभव हुन आउँछ । &#039;पिँजराको प्यासा मैना&#039; कविताले लेखनाथकोआध्यात्मिक जीवनदृष्टिलाई विषय-तृष्णा र त्यसका अशान्तिज्वारका सन्दर्भमाविश्वबोधसहित प्रस्तुत गरेको छ र उनका &#039;सत्य सन्देश&#039; हरूले मानवीयआत्मिक उज्ज्वलतामा केन्द्रित आध्यात्मिक जीवनदृष्टिको आर्ष व्यञ्जनागरेका छन्‌ । पूर्वीय पुराकथाको पुनर्व्याख्या गर्दै भौतिक भोगवादीजीवनमूल्यका सीमाहरू औंल्याउँदै परम ज्योतिको आत्मिक अन्वेषणकोप्रक्रियातर्फ लेखनाथको संलग्नतालाई &#039;वंशीघरको दिव्य वंशी&#039; जस्ता कवितालेजनाएका छन्‌ । यी फुटकर कविताहरूका आलोकमा लेखनाथकोकवितायात्राको दोस्रो चरणको भौतिक तथा भोगवादी जीवनमूल्य र त्यसमूल्यका कारणले उब्जेका सामाजिक वैषम्य तथा बिश्व-वैषम्यप्रति पनिसच्चेत हुँदै पूर्वीय अध्यात्मदर्शनको युगीन प्रस्तुतिमा आधारित उदात्त चेतनाकाआवाहनतर्फ केन्द्रित भइरहेको तथ्य स्पष्टिन्छ । लेखनाथको यसचिन्तनप्रक्रियालाई उनको बुद्धिविनोदको प्रथम विनोद काव्य (१९९४) रलक्ष्मीपूजा नाटक (१९९४) का पद्यांशले पनि झूल्काएका छन्‌ भने उनकापूर्वोक्त फुटकर कविताहरूमा त्यो चिन्तनप्रक्रिया कन्‌रन्‌ खारिँदै आएकोपाइन्छ । यसरी लेखनाथको कवितायात्राको दोस्रो चरण क्रमश: चिन्तनशीलकवित्वतर्फ उन्मुख भएको र त्यसमा आध्यात्मिक चैतन्यको उज्ज्वलताकासाथ युगीन आदर्शोन्मेषसमैत प्रकट भइरहेको अनुभव हुन्छ । समाजबोध,विश्वबोधका क्रममा आध्यात्मिक जागृतिको यही उदात्त चैतन्यकै विस्तारितअभिव्यञ्जनाका त्िम्ति २००४ सालतिरदेखि तरुण तपसी नव्यकाव्यकासृजनामा प्रवृत्त भएको कुरा पनि यहाँ उल्लेखनीय छ ।&lt;br /&gt;
लेखनाथको कवितायात्राको प्रथम चरण बा पूर्वार्मा नै पनिआध्यात्मिक चिन्तनशीलता उनको कवित्वको एक विशिष्ट प्रवृत्ति वाअभिलक्षणका रूपमा रहेको हो । यही प्रवृत्तिविशैष नै उनको कवित्वको&lt;br /&gt;
ननम.&lt;br /&gt;
केन्द्रबिन्दु हुन आउनु र उनी चिन्तक कविका रूपमा प्रकट हुनु नै उनकोकवितायात्राको दोस्रो चरणको मूल घटना देखा पर्छ । तर लेखनाथकोचिन्तक व्यक्तित्व र कवि व्यक्तित्वको सुन्दर समीकरणका परिणति हुन्‌उनका कवितायात्राका दोस्रो चरणका अधिकांश कविता । जीवनकोआध्यात्मिक चिन्तन नै कविताको मुख्य विषयवस्तु रहे पनि त्यो चिन्तनभावमय हुनु र त्यो चिन्तनधर्मी भाव वर्णमात्रिक लय-लालित्य, शैली-समृद्धि, शिल्प-सामर्थ्य र संरचनाक्षमताको उच्च परिष्कारघर्मी सिद्धिद्वाराओतप्रोत रहनु उनका यस चरणका अधिकाँश कविताको वैशिष्टघ हो ।उनका &#039;जीवनचङ्गा&#039; जस्ता कवितामा चिन्तनचाप रहे पनि रूपपरक शक्तिपनि उत्तिकै बेजोड छ भने &#039;पिँजराको प्यासा मैना&#039; मा चिन्तन र भावरूपकोअन्योन्य उच्च सहकारिता देखिन्छ । &#039;पतितपावनी श्री गङ्गाजीको शाँकी&#039;जस्ता कवितामा शैलीको उच्च समृद्धि छ भने उनका अधिकांश कवितामाशैलीको त्यही माधुर्य र लयको लालित्यसँगै अलङ्कारविधान र संरचनाकोउच्चतम सामर्थ्यसहित चिन्तन भावमय भई परिष्कारधर्मी कवित्व चुलिएकोपाइन्छ र &#039;कालमहिमा&#039; जस्ता कविता उनको कवित्वका यस्तै उच्च्चतमक्षणका प्राप्ति हुन्‌ । अध्यात्मिक चैतन्यसँग कविता-कलाको समेत परिष्कृतसिद्धि नै उनको कवितायात्राको यस दोस्रो चरणको केन्द्रीय प्राप्ति हो । यसैपरिप्रेक्ष्यमा उनी २००४ सालको नेपालको साहित्यिक चहलपहलको मारआफूलाई &#039;हाँसेको साहित्यसागर&#039; ठान्न पुग्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
२००७ सालदेखि यताका लेखनाथका कवितामा प्रधमत: युग-परिवर्तनको उत्साहका साधै सङ्क्रमणकालीन नेपाली समाजका विविधअसङ्गतिप्रति व्यङ्यको प्रवत्ति तीव्र रूपमा प्रकट भएको छ र दोस्रो चरणमैदेखा परेको विश्वबोध र मनुष्यताका परिप्रेक््यमा आध्यात्मिक चैतन्यकोव्यापक आवाहनको प्रवृत्ति नै यस तेस्रो चरणका प्रारम्भिक अवधिमा पनिविस्तारित भइरहेको पाइन्छ । २०0७-२२ को समयावधि उनको उत्तरार्द्कवितायात्राको अन्तिम प्रहर र समुच्चा कवितायात्राको तेस्रो चरण पनिहो । परिष्कारवादी काव्यकलालाई सामाजिकता र युगोन्मेषका साथै विश्वबोधर जीवनबोधको प्रगतिवादी स्पर्शसहित उदात्त भावचिन्तनका केन्द्रीयतामा&lt;br /&gt;
नट&lt;br /&gt;
अँगाल्दै आफ्ना अन्य विविध प्रवृत्तिहरूलाई पनि समेट्दै आएको तरुणतपसी (२०१०) नै उनको यस चरणको शीर्षस्थ कृति हो । «उनको मेरोराम ।२०११) कीव्यचाहिँ रामभक्तिमूलक अध्यात्मचिन्तनको उपज कृतिहो र अमर ज्योतिको सत्य स्मृति काव्यचाहिँ महात्मा गान्धीका शोकमार स्मृतिमा लेखिएको आध्यात्मिक मानवताचादी युगोन्मेषको काव्य हो ।यीदुई काव्यको आआफ्नो महत्त्व हुँदाहुँदै,पनि समाजचेतना र अध्यात्मचेतनाकोसमीकरण बिन्दुमा विश्व र मानवताको अतीतवर्तमानको काव्यात्मकसर्वेक्षण गर्दै आर्ष, उदात्त, आध्यात्मिक चैतन्यद्वारा नै बीसौँ शताब्दीकोमनुष्यजातिको उपचार सम्भव ठहराउने महाकाव्यधर्मी तरुण तपसी नव्यकाव्यनै यस चरणको सर्वोच्च कृति ठहरिन आउँछ । वास्तवमा क्रतुविचार(१९९१) को परिष्कारवादी काव्यसौन्दर्यको उच्च सृष्टिपछि लेखनाथकोकवितायात्राको प्रौढ काव्यचैतन्यको अर्को परिपक्व काव्यकृतिका रूपमायो महाकाव्यधर्मी तरुण तपसी नव्यकाव्य देखा पर्छ । यस चरणमा उनकादुई कवितासङ्ग्रह लालित्य प्रथम भाग (२०१०) र द्वितीय भाग (२०२५)पनि देखा परेका छन्‌ । लेखनाथका कवितायात्राका विभिन्न चरणकाकविताकृतिहरू यी दुई सङ्ग्रहमा समाविष्ट छन्‌ तापनि यिनमा उनकाकविताहरूको क्रमतद्ध व्यापक सङ्कलन नभई आंशिक सङ्कलन मात्र हुनसकेको पाइन्छ । लेखनाथको कवितायात्राको तेसो चरणका सुरुसुरुकामुख्यमुख्य फुटकर कविता हुन्‌- युगबाणी (२००७), वर्षा (२००९), प्रगति(२०१०), कविताको खोजी, साहित्यको फुटबल (२०१०। आदि । यीकविताहरूमा एकातर्फ २००७ सालको परिवर्तनपछिको नवयुगको रन्कोछ भने अर्कातर्फ त्यस युगको सङ्क्रमणकालका अनेक सामाजिकअन्तर्विरोधप्रति व्यङ्ग्य छ अनि जीवनका अन्तर्बाह्य परिष्कारका स्वच्छआदर्शतर्फको कवितात्मक चासो पनि छ । यस सन्दर्भमा यी कविताहरूजीवनको अन्तर्बाह्य आध्यात्मिक उज्ज्वल कामनासहित प्रगतिवादी पुटपनि परेका कविता देखा पर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
समुच्चा कवितायात्राको अन्तिम दशक (२०१३-२२) मा लेखनाथकोरचनाप्रक्रियामा बुढ्यौलीको जर्जरता, शारीरिक शिथिलता र रोगव्याधिका&lt;br /&gt;
न्ठ्न&lt;br /&gt;
कारणले लेखनकठिनाइ आइपरे पनि उनको सृजनात्मक प्रतिभाचाहिँ अक्षुण्णनै रहेको पाइन्छ । २०१८ सालतिरैदेखि उनले लेख्न प्रयास गरेको गङ्गागौरीमहाकाव्य अपूर्ण नै रहेको पाइन्छ । गङ्गागौरी महाकाव्य अपूर्ण नै रहे पनि योमहाकाव्यांश, परिष्कृत भर्तृहरिनिर्वेद नाटक (२०२०) को पद्यांश र विभिन्नफुटकर कविताहरूले उनको कवितायात्राको तृतीय चरणको अन्तिम अवधिसम्मनै उनको सृजनात्मक प्रतिभा अफ नौला सम्भाव्यताका साथ छलबलाइरहेकोकुरा स्पष्टयाउँछन्‌ । यस तेस्रो चरणका प्रारम्भिक अवधिमा प्रगतिवादीवायुमण्डलको चाप तीव्र रहेको अनि सामाजिकता र आध्यात्मिकताकोसमीकरणको प्रक्रिया अँगाली उनको परिष्कारवादी कवित्व विशेष गतिशीलरहेको साक्ष्य तरुण तपसी र पूर्वोक्त फुटकर कविताहरूबाट प्राप्त हुन्छ भनेजीवनको सान्ध्य अन्तिम दशाकका &#039;कवितामा चाहिँ उनको समाज द्रष्टा रचिन्तक व्यक्तित्व अफ खारिँदै र अफ सौन्दर्ययुक्त हुँदै आइरहेको र त्यसलेराष्ट्रवादको युगीन सन्दर्भ अँगाल्नाका साथै आफ्ना पूर्वस्वच्छन्दतावादीकाव्यतत्त्वहरूतर्फ पनि पुनः चाख लिइरहेको सङ्केत प्राप्त हुन्छ । क्रतुविचारको उत्कृष्ट सौन्दर्यप्राप्ति र तरुण तपसीको उत्कृष्ट चैतन्यबिस्तारसहितपरिपक्व काव्यप्राप्ति दुवैको समन्वित बिन्दु हुन खोज्ने गङ्गागौरी महाकाव्यअपूर्ण नै रहे पनि लेखनाथको समुच्चा कविव्यक्तित्वको सान्ध्य उत्कृष्टसिद्धिको स्पर्श प्राप्त गरेका कतिपय फुटकर कविताहरू विशेष स्मरणीयदेखिन्छन्‌ र ती हुन्‌-हाम्रो इन्द्रेणी (२०१३), मेरो किशोर (२०२०), पूर्वस्मृति(२०२२) र आखिरी कबिता ।२०२२) आदि । यी कविताहरूमध्ये धेरैजसोमालेखनाथको आत्मसंस्मरणको मुद्राका साथै आध्यात्मिक जीवनचिन्तन रसौन्दर्यबोधसमेतको समन्तित उत्कृष्ट व्यञ्जना देखा पर्छ । आंशिकपुर्वस्वच्छन्दतावादी पुटसमेत परेको भाव-शिल्प-सौन्दर्यको उत्कृष्ट परिष्कारवादीकाव्यवाटिका क्रतुबिचार र सामाजिक-आध्यात्मिक चैत व्यको उत्कृष्टकलात्मक अभिव्यक्तिस्वरूप महाकाव्यधर्मी परिष्कारवादी नव्यकाव्य तरुणत्पसी को सृजनापछि यी दुवैको सङ्गमबिन्दुका रूपमा प्राकृतिक, सांस्कृतिक,राष्ट्रिय र आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्यमा लेखनाथले रच्न लागेको गङ्गागौरी महाकाव्यपूर्ण भएको भए त्यो जेजस्तो हुन्थ्यो त्यसको सङ्गत उनका पूर्वोक्त फुटकर&lt;br /&gt;
जाड&lt;br /&gt;
कृतिहरूबाट केही मात्रमा प्राप्त हुन्छ । यस तात्पर्यमा लेखनाथको कवितायात्राकोसम्भाव्य चौथो चरण अपूर्ण रही तेस्रो चरणभित्रै अन्तर्भुक्त देखा पर्छ ।&lt;br /&gt;
उपर्युक्त चर्चाको अन्त्यमा के भन्न सकिन्छ भने लेखनाथको ८२ वर्षेजीवनको लगभग ६० वर्षको कवितायात्रामा निरन्तर गतिशीलता, परिपक्वतार प्रतिभाको अक्षुण्णताका साथ उत्तरोत्तर सिद्धिका लक्षणहरू देखा पर्छन्‌ ।,यस कवितायात्राका क्रममा उनले नेपाली कविताको माध्यमिक काललाईतोड्दै -पूर्वस्वच्छन्दतावादको आंशिक स्पर्शसहितको नेपाली परिष्कारवादीकाव्यधाराको प्रवर्द्धन, प्रतिष्ठापन र नेतृत्व गरी नेपाली कविताको आधुनिकयुगको पहिलो प्रहरको सूत्रपात गर्नाका साथै नेपाली कविताका स्वच्छन्दतावादी,प्रगतिवादी र प्रयोगवादी धाराका चहलपहलका माफ पनि त्यस परिष्कारवादीकाव्यधाराको आजीवन संवर्द्धन गरेको पाइन्छ । उनी नेपाली वर्णमात्रिकगीतिचेतना वा छन्दचेतनाका सर्वाधिक ललित र परिष्कृत गायक हुन्‌ र्‌ उनीपरिष्कृत नेपाली काव्यभाषा, काव्यशैली र काव्यशिल्पका प्रथम पारखी स्रष्टाहुन्‌ । उनी नेपाली प्रकृतिको सौन्दर्यको सूक्ष्म पर्यवेक्षण र व्यञ्जना गर्ने प्रथमपरिष्कारवादी कविकोकिल हुन्‌ र उनी नेपाली समाजका सांस्कृतिक-आध्यात्मिकपुनर्जागरण-प्रक्रियाका प्रवक्ता काव्यकोविद्‌ हुन्‌ । नेपाली आध्यात्मिक चैतन्यपरम्परा र युगोन्मेषको समीकरणका बिन्दुमा विश्वबोध र मनुष्यता-बोधगर्ने क्रषि कवि वा कवि तपसीका रूपमा उनको स्थान सर्वोपरि छ । उनीआधुनिक नेपाली समाजका नैतिक-आध्यात्मिक कवि-गुरु हुन्‌ र आध्यात्मिककाव्यसौन्दर्यका सर्वोच्च नेपाली स्रष्टा पनि हुन्‌ । उनी हाम्रा प्राना कविहरूमध्येसबभन्दा नयाँ र हाम्रा आधुनिक कविहरूमध्ये सबभन्दा पुराना र जगकोभूमिका खेल्ने महान्‌ परिष्कारवादी कवि हुन्‌ । उनी नेपाली कविताकोपरिष्कारवादी (शास्त्रीय : क्लासिकल) काव्यधाराका सर्वोच्च चुली हुन्‌ ।उनका क्रतुविचार खण्डकाव्य र महाकोव्यधर्मी तरुण तपसीका साथै तीन-चार दर्जनजति उत्कृष्ट फुटकर कविताहरू उनको त्यही परिष्कारवादीकाव्यधाराका उत्तम कृतिका रूपमा नेपाली जातिका र नेपाली भाषाकाचिरस्मरणीय निधि हुन आएका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==लेखनाथका प्रमुख कविता==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== १. कविकवितालाप ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कवि-&lt;br /&gt;
भगवति ! ककिते ! देवी, जुगजुग तिम्रो म हुँ सदासेवी;&lt;br /&gt;
बाहिर निस्कन आज, किन माननुभो बडो लाज ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कविता-&lt;br /&gt;
रसिला गुणिजन हेरी, हाली अँगालो गलाविषे फेरी&lt;br /&gt;
रञ्जन पारी समाज, डुली रहेकी मलाई के लाज ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कवि-&lt;br /&gt;
तिमी भनि अरू सब बात, छोडी बिताये बसी रात;&lt;br /&gt;
तैपनि करुणा गरिनौँ, कसूर के देखि सामूमा परिनौ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कविता-&lt;br /&gt;
गर तिमी आफनु काम, न लेक बानु । कसूरको नाम;&lt;br /&gt;
मेरै कर्म अभागी, बुझेर दबिनरे कुना लागी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कवि-&lt;br /&gt;
जसका वश परि सुकृति, कहलाये व्यास वाल्मीकि प्रभृति;&lt;br /&gt;
मनमनमा धैर्य धारी, सौही तपाजी अभागिनी कसरी !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कविता-&lt;br /&gt;
सकदिन बानु ! सहन, अब अरु केही कुरा नभन;चरचरि चिरिनछ छाती, वाल्मीकि व्यास सम्झ्दामा ती ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कवि-&lt;br /&gt;
तिमी छौ रसरङ्गवती, भनेर, डाकेँ गरी ठूलो विनति;उल्टा आँशु खसाली, किन रुन लाग्यौ घुस्धुरु खालि ?&lt;br /&gt;
लेखनायका प्रमुख कविता /१&lt;br /&gt;
कविता-&lt;br /&gt;
व्यासादिक सत्कविले छोडि मलाई बिदा भये जहिले;उस दिनदेखि छु नङ्गी, छैन कुनै रङ्गिचङ्गिको भङ्गि ।कवि-&lt;br /&gt;
जाउन वृद्ध व्यासप्रभृतिक, तिम्रो भयो र के नाश?अक पनि सत्कवि हामी, खडा छँदै छौँ बडा नामी ।कविता-&lt;br /&gt;
शिब ! शिव ! यो बज्जसरी, शरीरभैदी कुरा सुनौँ कसरी,अब चुप चुप चुप बाबू । गन्यो मलाई अभाग्यले काब्‌ !कवि-&lt;br /&gt;
म गरख्लु तिमि भनि; मान, तिमि थुनछेउ स्वयं वृथा कान;हुन आयो कुन हेतु, रहेछ तिम्रो कहाँ केतु?कविता-&lt;br /&gt;
तिमि जस्ता बनि कविजी, गरदछु कविता भनेर पत्र फिजी;लागून यो केही दशा, न बिग्री हुनथ्यो कहाँ सहसा ।कवि-&lt;br /&gt;
मकन बेसरी पोली, न बोल अति पेचिला रुखा बोली;चिन्हिनौ कत्ति मलाई, जान तिमी व्यासको भाइ !!कविता-&lt;br /&gt;
आफ्नु शक्ति नजानी, नबने अबदेखि, पण्डितम्मानी;कुह् बरु धनिका ढोका, मिलछन पछि दानका पोका !!!कबि-&lt;br /&gt;
प्रतिभा पूर्ण छ मेरी, लेखि लगाएँ किताबको ढेरी,यस्तो सत्कवि सुजन, जानछु र ढोकाविषे म किन ?कबिता-&lt;br /&gt;
अक्षर अक्षर भाँची, कनि कुथि गरि खालि छन्दमा नाची;प्रतिभा नभये कसरी ? लेखन्‌ कन्था अगाडि सरी ।&lt;br /&gt;
२/लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
कवि-&lt;br /&gt;
लेखनशैली मेरी, प्रसादगुण-शालिनी हेरी;बालक पनि छन दङ्ग, थियो कि यो व्यासमा ढङ्ग ?कविता- £खतिदिनु दिन दिन कन्था, ग्रामीण भ्रष्ट बोलिको पन्था;बुसु्दछ पलटन सारा, चलदछ अनि बिक्रिको धारा ।कवि-&lt;br /&gt;
अपठित जङ्गलिलाई, समन सजिला किताब फैलाई;हुनुपरने यश मात्र, किन अपयशको भन्ने पात्र ?कविता-&lt;br /&gt;
छेक न दुप्पो पारी, कविता-सौन्दर्य बेसरी मारी;गरि उल्था खालि कथा, नभननु &#039;कवि हुँ&#039; भनेर वृथा ।कवि-&lt;br /&gt;
गरँला उन्नति भारी, तिमीकन सर्वाङ्ग- सुन्दरी पारी;भनने यो अभिलाषा, पेचि कुराले भयो नाश।कबिता-&lt;br /&gt;
यस्ता स्तन भनी लेखी, वर्णन गर ती कुरा पढे देखी;शिक्षित हुनछ समाज, पचदछ मनको सबै लाज ।कवि-&lt;br /&gt;
व्यासजिका पनि देख, . अनेक आँंगारका लेख;त्यसै गुङ्ि नहाँक, छोपनु परला वृथा नाक।कवबिता-&lt;br /&gt;
व्यासजिका लेख जति, हेरी हेरी सफा गराइ मति;पायेछीँ खुब सार भँडुवा ग्रामीण शंगार ।कवि-&lt;br /&gt;
हितकारी जो छ खडा, गरनु उसैका समीपमा फगडा;होला अनि सब जाति, काङ्गारियौली भलिभाँती ।&lt;br /&gt;
लेखनायका प्रमुख कविता /३&lt;br /&gt;
कविता-&lt;br /&gt;
जसले लेखन शैली, बिगारनाले भजऔै अति मैली,उहि मेरो हितकारी !! धन्य महात्मा दयाधारी !!!कृवि-&lt;br /&gt;
फिकिकन संस्कृत- नेल, गराइ भाषा वबिषे ठूलो मेल;खेलाजै जसलाई, शत्र उसैको भज्जे अरे !! हाई ।कविता-&lt;br /&gt;
ञ्रिकिकन संस्कृत- सारी, मर्यादा अङ्ग अङ्गको मारी,न नचायै उदर- दरी, भरीभराक हुने कसरी ?कवि- है&lt;br /&gt;
भाषामा उपदेश, लेखिदिनाले स्वयं बुढो देश;लिन सक्दछ शुभ शिक्षा, मागनु परदैन काहिँ गै शिक्षा ।कविता-&lt;br /&gt;
गर फगडा सब माफ, बल्ल सुनायौ मिठा कुरा साफ;देश सुधारन भाषा, कुञ्जि छ यो कालमा खासा ।कवि-&lt;br /&gt;
भाषाका गुणधारा, मालुम मनमा छँदा छँदै सारा;किन हो यतिनजेल, थापिरहेकी ठूलो रेल?कविता-&lt;br /&gt;
भद्दा अबनतिकारी, रसियाजस्ता किताबका भारी;दिन दिन बढ्ता देखि अघोर मनमा उठ्यो शैखी ।कवि-&lt;br /&gt;
शिक्षा विचारशाली, लेखन्‌ मिहिनेत मात्र हो खाली,गरदछ को रुचि यसमा, छन सब बोक्रे कथारसमा ।कविता-&lt;br /&gt;
रसिला नैतिक बात, लेखन उठ्दैन आफनै हात ?भ्रन बरु छ भने होस्‌ किन दिनु अरूमा वथा दोष ?&lt;br /&gt;
४ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
कृबि-&lt;br /&gt;
उपयोगी परिपाटी, लियेर कन्धा कटाकटी काटी;लेखनु यो कठिन कुरा, छन सब त्यस्ता कहाँ .चत्रा ?कविता-&lt;br /&gt;
उपकारी मर्मज्ञ, विचारवाला गुणी महाप्नज्ञ;भाषामा छैन कुनै, यो त बताज्रे स्वयं अघि नै।कवि-&lt;br /&gt;
अघिका सत्कवि जस्ता, मिलछन्‌ कविजी कहाँ सस्ता,तर तिमी हार नखाङ, स्थिर गर भाषाविषे पाउ ।कबिता-&lt;br /&gt;
होला शिक्षित देश, भनेर भाषाविषे सहैँ क्लेश;कविको पुगेन ढङ्ग, उल्टा मेरो टुटै अङ्ग।कवि-&lt;br /&gt;
दर्द बुझ चुपचाप, बस तिमी मनमा न लेक सन्ताप;आफनु जीबनसम्म, सुधार गर्ला सकेसम्म ।कविता-&lt;br /&gt;
अघितिर पुच्छर घुसारी, कविता प्रत्यक्ष लोकमा पारी;गंकनछौ तिमी यसरी, सुधार होला हरे! कसरी;कवि-&lt;br /&gt;
गुणवति ! सुन अबदेखि, गन्धन कन्धा बिकामका लेखी;गरने छैन दिमाक, पक्का यो चित्तमा राख।कविता-&lt;br /&gt;
बैस भन्यौ अबदेखि, विचारशाली मिठा कुरा लेखी;मेरो गरनु सुधार, शिरमा तिमी बोक यो भार ।कवि-&lt;br /&gt;
पहिले अलि अलि . हाँसी, नुहिकन पछि बेसरी छाँसी;अर्ति दियौ हितकारी, नपाइ शाकना ठूला भारी ।&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता /५&lt;br /&gt;
कविता-बढिया हो &#039;यो वचन,. तिमीसित शिवजी सदा खुसी रहन;बन्द - गरौँ सब बात, सुत अब धेरै गयो रात।- प्रार्थनाखुसिसित बसि मेरो लेख यो हेरि साफगुण जति लिनु होला दोषमा पाउँ माफ ।भनि नुहिकन सारा मित्रमा प्रीतिसाथगरदछ कर जोडी प्रार्थना &#039;लेखनाथ&#039; ॥&lt;br /&gt;
वि. सं. १९६९ लालित्यबाट&lt;br /&gt;
६लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==२. नैतिक दृष्टान्त==&lt;br /&gt;
बडाले जो गन्यौ काम हुन्छ त्यो सर्व-संमत ।छैन शङ्करको नङ्घा, मगन्ते भेष निन्दित ॥&lt;br /&gt;
॥।गरदैन ठूलो व्यक्ति मर्यादा-स्थिति-लङ्खन ।बसेको छ महासिन्ध सीमाबद्ध बनीकन ॥र्‌ £दबिन्छ गुणिको दोष गुणका राशिमा परी ।रश्मिले चन्द्रको दाग दबाएकै छ बेसरी ।त ३कसैको लोकमा छैन एकैनास समुन्नति ।अरूको के कुरा हेर सन्ध्यामा सूर्यको गति ॥॥&lt;br /&gt;
छोटो बढ्यो भने ज्यादा फूर्ति ढाँचा बढाउँछ ।&lt;br /&gt;
उलँदो खहरे हेर कत्तिको गड्गडाउँछ ॥द्‌&lt;br /&gt;
ज्यादा सोको हुनूभन्दा टेढिनु छ फला५धिक ।&lt;br /&gt;
गरदैन कुनै सोग्गो ग्रहको पूजना$५दिक ॥॥&lt;br /&gt;
टपर्टुञ्या पनि हुन्छ मूर्खमध्ये प्रतिष्ठित ।&lt;br /&gt;
बोलने को अँध्यारोमा महा$६५त्मा जुन्किरीसित ॥७&lt;br /&gt;
लेखनायका प्रमुख कविता /७&lt;br /&gt;
सानैदेखि छुचो हुन्छ दुष्ट मानिसको मति ।&lt;br /&gt;
घोचने जङ्गली काँढा पहिले नै तिखा कति ॥यू&lt;br /&gt;
मिलेर काम गर्नाले हुन्छ अत्यन्त फायदा ।&lt;br /&gt;
एकता हेर कस्तो छ मौरीको महमा सदा ॥९&lt;br /&gt;
जो दिंदैन उही दिन्छु भनी गर्जन्छ सत्त्वर ।&lt;br /&gt;
जो हो नवर्षने मेघ उसैको हुन्छ घर्घर ॥१०&lt;br /&gt;
हुनुपर्दछ मौकामा शत्रुको पनि सेवक ।&lt;br /&gt;
कोइली कागकै बच्चा बन्छ सानू छँदा तक ॥9 ११&lt;br /&gt;
गुणग्राही जहाँ छैन वहाँ के गरला गुणी।&lt;br /&gt;
.कौडीमा तक मिल्किन्छ भिल्लका देशमा मणि ॥१२&lt;br /&gt;
योग्य स्थानविषे मान सानाले पनि पाउँछ ।&lt;br /&gt;
कृ्‌ष्णाका तटको ढुङ्गा देवता कहलाउँछ ॥१३&lt;br /&gt;
उपकारी गुणी व्यक्ति निहरन्छ निरन्तर ।&lt;br /&gt;
फलेको वृक्षको हाँगो नमुकेको कहाँ छ र॥१४&lt;br /&gt;
मेटिँदैन कसैबाट आफनू कर्मपद्धति ।&lt;br /&gt;
बतवासी बने राम चौधै भुवनका पति ॥११&lt;br /&gt;
धर्म हो धीरको धैर्य राखनू दु:ःखजालमा ।&lt;br /&gt;
मान्‌ मौनव्रती हुन्छ कोइली शीतकालमा ॥१६&lt;br /&gt;
५/ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
सारा सार लिई कन्था छोडी-दिन्छ गुणी जन ।&lt;br /&gt;
रस चसेपछि भृङ्ग फूलमा भूल्दथ्यो किन ?१७&lt;br /&gt;
सङ्घले पनि जाँदैन दुष्टको दुष्टता रिस ।&lt;br /&gt;
श्रीखण्डमा बसी सर्प कहाँ हुन्थ्यो र निर्विष ॥१८&lt;br /&gt;
मूर्खका मनमा अर्ती गालीतुल्य बि्ाउँछ ।&lt;br /&gt;
दूधपान गरी सर्प खालि विष बहाउँछ ॥१९&lt;br /&gt;
वि. सँ. १९७४ गोरखाशिक्षाको तेसो पुस्तकबाट&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता /९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ३. वसन्त कोकिल ==&lt;br /&gt;
भरी लता वृक्ष विषे टनाटननवीन लाखौँ फूल पालुवाकन ।बसन्त आयो कलकण्ठको अबसुनिन्छ साह्ै कल कण्ठ-गौरव ॥१अगाडि जो दीन बनी लुकीकनबिताउँथ्यो केवल दु:खमा दिन ।अहो ! उही कोकिल हेर आज योप्रमोदले पूर्ण महासुखी भयो ॥&lt;br /&gt;
01बसी बगैँचा-बिच मोजमा परीनयाँ कलीला सहकारमञ्जरी ।चपाउँदै मस्त भएर बेसरीकुहकुहू गर्दछ त्यो घरीघरी ॥&lt;br /&gt;
21चलीरहेको छ सिरी सिरी हवाजुलीरहेछन्‌ सब मञ्जु पालुवा ।जता दियो दृष्टि उतै खुसी मनप्रमोदले पूर्ण नहोस त्यो: किन ?॥॥ 4&lt;br /&gt;
१०४ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
वि. सं. १९७४&lt;br /&gt;
समीरले पुष्प परागको फ्रीलगाउँदा त्यो रसरङ्गमा परीमुलीरहेको छ शरीर बेसरीमुछेर तेही रजमा घरीघरी ॥श्रपिएर सा५५नन्द रसालको रसघुमाउँदै नेत्र दुवै मदाभ्लससहर्ष खोलौं सुरिलो गलाकन&lt;br /&gt;
घनक्क घन्काउँछ त्यो सबै वन ॥&lt;br /&gt;
द्‌घरीघरी भुर्र उडी अलीकतिघुमेर शाखान्तरमा यताउति ।बडो बहाडी रसिकै बनी तहाँढलीमली गर्दछ पालुवामहाँ ॥७चुचो ठडाईकन चट्ट मञ्जरीढुँगेर च्यापीकन देखिने गरी ।फरक्क फर्कन्छ घरी पछिल्तिरप॒सन्नता-साथ लतारि पुच्छर ॥दन शीत-बाघा, न त घामको डरन बाग नङ्गा, न त वृष्टिको पिर ।बसन्तका गौरवले गरीकनखुसी छ साह्कै कलकण्ठको मन ॥९&lt;br /&gt;
गोरखाशिक्षाको तेसो पुस्तकबाट&lt;br /&gt;
लेखनायका प्रमुख कविता /११&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ४. जीवन-चङ्वा==&lt;br /&gt;
कछुवाले अङ्गसरी खुम्च्याई बाह्य वृत्तिका तार ।भित्र अलकति हेर्दा अर्कै रसिलौ चमत्कार ॥&lt;br /&gt;
१दुर्गम भै उर्लेकी तलतिर समतुल्य मोहकी गग्ना ।फरफर गर्छु उपर यो जीवनमय पातलो चङ्गा ॥&lt;br /&gt;
र्‌ममतासहित अहन्ता ग्रन्थि परेका बडा रम्य।सुखदु:खका कका छन्‌ खूब मिलेका दुवै टम्म ॥१ ,&lt;br /&gt;
मनमय घुम्छ लटाइ फनफन फन्का पलापला मारी ।&lt;br /&gt;
अतिशय दुर्लभ तर त्यो रसिक लटाई लिने चमत्कारी ॥॥ ॥ 1&lt;br /&gt;
सङ्गल्पको छ धघागौ छुटी रहेको लगातार ।&lt;br /&gt;
गर्दछ जसका भरमा जीवन-चङ्गा विचित्र संचार ॥५&lt;br /&gt;
त्यो मसिना धागामा खिरिलोपन ल्याउने ताजा ।&lt;br /&gt;
घसिएको बहुत सफा विवेक, बुद्धिको माजा ॥&lt;br /&gt;
ददचङ्गाको मुखचाहिँ पवृत्तिमय रङ्गले लाल ।&lt;br /&gt;
अलिअलि कालो आशा-पुच्छर, उसको छ चलबले चाल ॥७&lt;br /&gt;
१२/लेखनायका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
वैषम्य झै ककामा अलिकति गतिमा घुस्यो भने दोष ।&lt;br /&gt;
ग्वाँख मिलाउनलाई संयम, सुविचार, शान्ति, सन्तोष ॥द्‌&lt;br /&gt;
यस्तो अद्भुत चङ्गा तयार पारी बडो चमत्कारी ।&lt;br /&gt;
नभमा कौतुक गर्ने कुन होला धीर अविकारी ?&lt;br /&gt;
९जतिजति गडेर हेर्छु यस चङ्गाको विचित्र संचार ।उतिउति शून्य गगनमा विलिन हुन्छु न देखदा पार ॥१०कहिले नीलो दहमा सफारी माछो सरी भरी।लीला गर्छ गगनमा चक्कर लाखौँ थरी मारी ॥११कहिले प्रेम हावामा सररर अक्कासिँदै जान्छ ।कहिले फरक्क फरकी तम तल कौँठी पनी खान्छ ।१२कहिले भुजङ्गजस्तै सुलुलुलु बग्दै बटारिन्छ ।कहिले वबिधिवश बिचमा अरूअरूसँग बेसी लठारिन्छ ॥&lt;br /&gt;
१३कहिले पुगेर माथि सोकै बहँदै शनैः शनै: सल्ल ।निश्चल टक्कर मारी अडिन्छ बँउडाइ-बोहरी-तुल्य ॥१४जलचर नभचर सबका सुन्दर लाखौँ थरी चाल ।देखिन्छन्‌ यही हाम्रो जीवन-चङ्गा विषे सदाकाल ॥१५अक्काशिएर ज्यादा माथि जाँदा हराउने भय छ।तल गङ्गा-लहरीले लपक्क पार्ने विछट्ट संशय छ॥१६&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता /१३&lt;br /&gt;
शीतल सरसर बहने बीच गगनको सफा हावा ।&lt;br /&gt;
जति पायो उति यसले खान्छ गजब चालले कावा ॥१७&lt;br /&gt;
कहिलेदेखि उडेथ्यो? अब उड्ने हो कति बेर।&lt;br /&gt;
आखिर चङ्गा ठहतन्यो चुँडिनालाई छ के बेर?१८&lt;br /&gt;
जति दिन यो उड्ने हो उति दिन उडन्यै छ बीचमा नअडी ।&lt;br /&gt;
तर त्यो देखिनुपरने अद्भुत चङ्गा उडाउने लहडी ॥१९&lt;br /&gt;
जय जगदीश्वर ! देखेँ विश्वव्यापी प्रकाश त्यो खास ।&lt;br /&gt;
सृक्ष्म लटाईभित्रै रहेछ प्रभुको निवास वा भास ॥२०&lt;br /&gt;
वि. सं. १९९२ शारवा वर्ष १ सङ्ख्या २ बाट&lt;br /&gt;
१४ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ५. गौँथलीको चिरिबिरी (१)==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म बस्ने कोठाकै दलिन-बिचमा गौँधली बस्यो,पिटाएको तन्नाउपर फिर मैला पनि खस्यो।मलाई त्यो देखी हृदयबिच लाग्यो किरकिरीचरी बोल्यो मेरो मन सब बुकी त्यो चिरिबिरी ॥१अहो !! त्यस्ता ताता नजर अति राता विष सरीतरी तात्यौ बाबा ! किन मनमनै त्यो रिस गरी ।तिमी धर्मात्मा छौ घरबिच म छू आज अतिथितिथी माघे औँसी शहरभर भूकम्प-फजिती ॥र्‌जहाँ बस्थ्यौँ हामी भवन उहि पातालमय भोचल्यो भारी हा हा नसहिसकनू नै प्रलय भओ।कहाँ पाउँ ठाडो घर, कसरि ओतौँ शिर भनीदुवै भाले-पोषी फनफन घुम्यौँ व्याकुल बनी ॥&lt;br /&gt;
डेबिरालोको फेरि अधम चिलको, काग शठकोशिकारी बोहोरी, कुकुरहरुका दुष्ट हठको ।परी शङ्का भारी सबतिर बिचारी डुलिड्लीनिराशामा एन्थेँ अघि अघचिलो ठाम नमिली ॥॥ $&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता / १५&lt;br /&gt;
यहाँ तिम्रो सानू घरमहल वा रामजुपडीखडा. देखी राम्रो गगन-बिच खेल्दै लडिबुडी ।पसेको हुँ बाबा ! अलि दिन बसूँला कि म भनीप्रियाको आगामी प्रसव दिनको उत्सव गनी ॥५तिमी भन्छौ मेरो सकल घर यो खास यसमाचरी घुस्प्रो सानू कुन चिरबिरे रङ्गरसमा ।म भन्छू हे बाबा ! घरमहल मेरो छ नभनपलामा घर्केका घरउपर दौडाउ नयन ॥0निमेषैमा भत्की घररर गरी घर्र त्यसरीढली ज्यानै हर्ने घर छ डरको दीर्घ भुमरी ।विधाताको भित्रै मधुर करुणाको रस परीपरेनौँ तै हामी विकट भुमरीमा अरु सरी ॥७&lt;br /&gt;
तिमी जान्ने सुन्ने मनुज चतुरा, हामी बिचराचरा साह्दै साना अबुरु वनका केवल किरा ।तथापी श्रद्धाले फुकि विनति गर्छु म सरसवथा मेरो भन्ने जटिल ममता-ग्रन्वि नकस ॥द्‌खुला पारी राम्रो सँग नयनको भित्र नयनबिचारी यी सारा गृह-विभवको चञ्चलपन ।दयालु भै रोक मिलिजुलि सबै वान्धवसितभलो होला जाक, रिस नगर रन्केर मसित ।९कुनै पल्टेका छन्‌ मलिन मुख लाई रुखमनिकुनै रुन्छन्‌ बाटो-बिच नमिलि सानू रुख पनि ।&lt;br /&gt;
१६“ लेखनायका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
कनै भोका शोका५५कुल मरिरहेछन्‌ नगरमाहरे ! तिम्रो यस्तो कुन तुजुक यो तृच्छ घरमा ॥१०त्यहाँ त्यो शय्यामा गर तिमि खुशीसाथ शयनयहाँ यो डन्डीमा बसिबसि म चिम्लन्छु नयन ।अरू सेरोफेरो सब मुफत मेरो छ नभनअघी मेरो भन्ने। कतिकति गए ती सब गन ॥११उघारी त्यो भारी मधुर कषणा-द्वार मनकोगरी रक्षा सारा विकल बिचरा दीन जनको ।यता विश्व-प्रेमी बन, मनुज चोला सफल होस्‌उता स्वर्गद्वारा क्षणभर पनी बन्द नरहोस्‌ ॥१२तिमीभन्दा लाखौँ गुन अफ धनी मानिस पनिडुलेका छन्‌ बाबा ! फगत भिखमङ्गासरि बनी ।विधाताको सारा अघट घटना सम्कू मनमासबै मेरो मेरो भनि नभुल यो मोह- वनमा ॥१३,कदाचित्‌ यो तिम्रो भवन चकनाच््‌र पहिलेहुँदो हो ता हन्थ्यो कसरि किन यो भेट अहिले ।दया राख्यो भारी सदय विधिले सङ्गत भयोसुन्यौ मेरो सानू चिरिबिरि, सबै पाठ पढ यो॥१४कसै सक्तैनौ यो यदि तिमि भने घच्च सहनमलाई द्यौ बाबा ! फगत अब यौ रात रहन ।म भोली नै जान्छु नुपतिसँग भूकम्प कहनपखेटा छन्‌ सक्छू अफ्‌ त नभमा सर्र बहन ॥१५&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता /१७&lt;br /&gt;
गरी यस्तो राम्रो चिरिबिरि चरी त्यो चुप भयो&lt;br /&gt;
भनेँ मैले भैगो तँ बसि कुद्टि दे गैह्र घर यो।&lt;br /&gt;
पखेटा पैँचो दे बरु म पछि आएर तिएँला&lt;br /&gt;
दयाधारी राजासित सकल मै बिन्ति गहँला ।१६&lt;br /&gt;
बि. सं. १९९२ शारदा वर्ष १ सङ्ख्या ७ बाट&lt;br /&gt;
१८ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==६. सत्य सन्देशहरू==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कालो मन्दाकिनीको जलजल, निधिको मोतिको जोति कालो,&lt;br /&gt;
कालो सौदामिनीको चहक, सब शरच्चन्द्रको कान्ति कालो ।&lt;br /&gt;
कैलाश-श्रेणि कालो, कूलमल गरने सूर्यको बिम्ब कालो&lt;br /&gt;
यो सारा सृष्टि कालो, मनबिच्च छ भने दम्भ दुर्भाव कालो ॥१&lt;br /&gt;
थोत्रो पाटी उज्यालो, मलिन तृणकुटी, कन्दरा झन्‌ उज्यालो&lt;br /&gt;
भिक्षा भारी उज्यालो, अझ धन वनको शागशिस्नू उज्यालो ।&lt;br /&gt;
फ्याङ्लो गुन्द्री उज्यालो, वरपर घुमदा जीर्ण कन्था उज्यालो&lt;br /&gt;
तृष्णाको तुच्छ जालो मनबिच नभएर जो मिल्यो सो उज्यालो ॥१&lt;br /&gt;
भर्दाभर्दै हजारौँ विषय-सुख-घडा देह लम्तन्न पर्दा&lt;br /&gt;
र्कर्दा सम्पूर्ण सेखी, तुजुक, पवनले निस्कने जोड गर्दा ।&lt;br /&gt;
सर्दा आपस्त डैं परपर, धमिलो नाचको अन्त्य पर्दा&lt;br /&gt;
गिर्दामा साथ जाने क्न कुन चिज हुन्‌ ? सम्क ती काम गर्दा ॥१&lt;br /&gt;
विद्याको, वयको र बुद्धि, बलको, सौन्दर्यको, मानकोप्रज्ञाको, कुल-जातिको, इलमको ऐश्वर्षको ज्ञानको ।तातो ग्यास मनुष्यका मगजको सम्पूर्ण उत्री दिएपृथ्वीमा सब देवता घरघरै आएर खेल्ने थिए ॥&lt;br /&gt;
बि. सं. १९९१ शारदा बर्ष ४ सङ्ख्या ३,४,५ र १२ बाट&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता /१९&lt;br /&gt;
मत्ता हात्ती हलुङ्गो, वितत जलधिको ह्वेल माछो हलुङ्गोजङ्गी बेडा हलुङ्गो, विकट कटकटै रेलगाडी हहलुङ्गो ।शैलश्ेणी हलुङ्गो, पृथुतम पृथिवी-गौल सारा हलुङ्गोयो बह्माण्डै हलुङ्गो, जब सब मनकी तिर्सना लाग्छ टुङ्गो ॥&lt;br /&gt;
वि. सं. १९९९ शारदा वर्ष ८ सङ्ख्या ३ बाटदोषी माता-पिताका वचन, गुरुजना६५देश निःशेष दोषीसत्त्या(५त्मा मित्र दोषी, गृह-परिजनको चाल देखिन्छ दोषी ।&lt;br /&gt;
पत्नीको प्रेम दोषी, अमृतमय मिठा बेदका वाक्य दोषीयो सारा सृष्टि दोषी, विधि-वश छ भने आफन्‌ू दृष्टि दोषी ॥&lt;br /&gt;
वि. सं. २००० शारदा वर्ष ९ सङ्ख्या ६ बाट&lt;br /&gt;
२०४ लेखनायका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ७. विज्ञानको मोह==&lt;br /&gt;
सानू विज्ञान पैले जुन उदित हुँदा साहसी मर्त्यजातिगर्थ्यौ छाती फुलाई पलपल सुखका कल्पना भाँतिभाँति ।सोही उन्मत्त भस्मा५सुर बनि अहिले बाहु लम्बा पसारीपीछा गर्दो छ दौडी विकट मुख लिई सर्वसंहारकारी ॥१जस्को नि:सार बोक्रो चहलपहल वा रङ्गमा दङ्ग मानीभुल्दामा पेट-पूजा विधि विकट बन्यो भार भो जिन्दगानी ।उस्कै आराधनामा अरु किन यसरी मर्छ यो मर्त्यजातिकस्तो विश्वास, भक्ति, प्रणय शिव ! हरे ! तुच्छ विज्ञानमाथि ॥र्‌चाहे विज्ञान पैले त्रिभुवनभरको सार सारा उतारोस्‌चाहे आकाशमाथी किसिमकिसिमको सृष्टि-शोभा फिँजारोस्‌ ।त्यो त्यस्को तुच्छ बोक्रे चटकमटक हो भित्र अर्कै छ चर्कोसर्को लाग्दो अशान्ति-ज्वरमय सरुवा व्याधिको दीर्घ धर्को ॥&lt;br /&gt;
३यो विद्याले सबैको हृदयबिच ठूलो उन्नति-भ्रान्ति पारीदैवी सम्पत्ति, मैत्री, शम दम, करुणा, शान्ति, सन्तोष मारी ।खित्का छोडेर गर्दा जटिल जहरिलो ग्याँसको अट्रहासको हेर्ने शास फेरी उस बखत कठै !! सृष्टिको सर्वनाश ॥॥&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कबिता / २१&lt;br /&gt;
यै छोटो जिन्दगीमा अमृतं पद दिने विश्वकल्याणकारी&lt;br /&gt;
उस्तो अध्यात्म-विद्या-विषयक महिमा मोहले दूर सारी ।&lt;br /&gt;
फोस्रो विज्ञानमाथी जतिजति गहिरो गर्दछौँ प्रेम हामी&lt;br /&gt;
रुन्छन्‌ सम्पूर्ण पृध्वी उतिउति डरले थर्थराएर कामी ॥1&lt;br /&gt;
वि.सं. १९९५ शारदा वर्ष ४ सङ्ख्या ६, ७ बाट&lt;br /&gt;
२२/ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==८. पतित-पावनी श्री गङ्गाजीको झाकी==&lt;br /&gt;
ठाडै कैलाशदेखीद्रुततर गतिले गड्गडाएर क््दीर्स्दा श्रीशङ्करैकोगल-गलित ठुलो सर्पकैँ सल्ल पर्दी ।लाखौँ चट्टान चिर्दीबिकट गिरिशिला-कन्दरा चूर्ण गर्दी ।बन्दै नाची दगुर्दी,श्रबण-विवरमा नित्य संगीत भर्दी ।१आमा ! भन्दै करैकासकल गिरिनदी काखमा टप्प धर्दीछर्दी पीयूष जस्ताजलकण लहरी-हस्तले, मस्त पर्दी ।कालो बर्दी-सरीकोकलिमल मनको ध्वस्त पारेर हर्दीगङ्गामा भुक्ति-मुक्तिदुद्ग दिदि-बहिनी नित्य खेल्छन्‌ कपर्दी ।र्‌&lt;br /&gt;
वि.सं. १९९८ शारदा वर्ष ७ सङ्ख्या ६ बाट&lt;br /&gt;
सेखनायका प्रमुख कविता /२३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==९. बंशीधरको दिव्य बंशी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सारा भौतिकवृन्दरूप जड यो विस्तीर्ण वृन्दावनघन्काएर घनक्क, भित्र उसमा भर्दै नयाँ जीवन ।हे बंशीघर, ! विश्वमोहन ! परा बाग्रूपिणी बाँसुरीफुक्छौ नित्य नयाँ नयाँ सुर किकी व्यामोह-वर्षा गरी ॥&lt;br /&gt;
१त्यो चर्को सुरबाट जागृत बनी तिम्रो गरी खोजनीघुम्ने रासविलासको रहरमा धीवत्ति छन्‌ गोपिनी ।&lt;br /&gt;
साथै छौ; तर लुक्नमा चतुर छौ, हाँसी रहन्छौ लुकीत्यै तिम्रो रस-रङ्गमा छ रसिलो यो सृष्टिको चक्चकी ॥२&lt;br /&gt;
वि.सं. १९९९ शारदा वर्ष ८ सङ्ख्या ८ बाट&lt;br /&gt;
२४ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==१०. युगवाणी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रिय नेपाली शूरवीर हो, नवयुगको यो संक्रान्ति-समय छ, यसमा नचढोस्‌ तिमिमा फूट-बैरको भ्रान्ति !एकै तन भै एकै मन भै देश-कालको गति जानीबढ्दै जाङ, चढ्दै जा, भन्दछ यो युगवाणी ॥&lt;br /&gt;
१तोडचौ हुकुमी साङ्ला, फाल्यौ फ्याङ्ला खड्गनिशानामुयाङ्ला काटचौ सब मर्जीका, बदल्यौ स्थिति र जमाना ।अब तिमी नै छौ सेवक, तिमि नै मालिक, यो पहिचानीलाग निरन्तर देशोन्नतिमा भन्दछ यो युगवाणी ॥॥दुःशासनले केश खिच्नेकी द्रुपदकुमारी जस्तीदुःख दर्दको विकट दल्दलमा बिचरी पलपल फस्ती ।जन्मभूमिका सुनीनसक्ना लम्बा करुण कहानीसुन्दै जाङ, गुन्दै जाक भन्दछ यो युगवाणी ॥डैगर्नैपर्दछ अब तिमि सबले नव राष्ट्रको निर्माणयसमा तिलभर नहट पछाडी, चाहे जाओस्‌ प्राण ।वीर देशका वीर तिमी छौ वीरव्रतका अभिमानीनजुकोस्‌ तिम्रो वीरपताका, भन्दछ यो युगवाणी ॥डे&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता / २५&lt;br /&gt;
हिमगिरितटका सब बासिन्दा तिमी दुनियाँ छौ कोटिएकमती भै हात बढाउ कर्तव्यमा दुई कोटि।फुट्टाफुट्टै दूर देशमा कल्लीगिरि बा दरबानीगर्दा गर्दै जनम नजाओस्‌, भन्दछ यो पुगवाणी ॥१जुन तागतले एक शताब्दीतक सब यो नेपालरगत सुकाई जर्जर नंगा पात्यो नरकंकाल ।उसको छाया छाप उडाक नगरी आनाकानीभर अब अर्कै दिव्य जवानी, भन्दछ यो युगवाणी ॥1भरखर जननी जन्मभूमिका तोडचौ साङ्ला सिक्रीऔषदको नै पहिले इनको गर्नुपर्द छ बिक्री ।यस मौकामा केही नसोची पछिको लाभ र हानिकिन खलबलिने ? किन अलमलिने ? भन्दछ यो युगवाणी ॥७&lt;br /&gt;
राजा रैती एक मतो भै ल्याएथ्यौ त्यो क्रान्तिअब सब बदली क्रान्ति-लहर ती ल्याउनुपर्दख शान्ति ।त्यसका लागि बारिक मनले छानी दूध र पानीकर्मयोगमा वन सहयोगी, भन्दछ यो युगबाणी ॥यअडबेखडबे डाँडाकाँडा तोडीफोडी सारासंथल पारी उसमा जारी कर्नाका जलधारा ।पार सबैतिर लहलह खेती, सुक्न नपाओस्‌ पानीमुलुकै सुखमय बन्दछ त्यसले, भन्दछ यो युगवाणी ॥2पूर्व र पश्चिम उत्तर दक्षिण रस्ता निस्कून्‌ खासारेल र मोटर तिनमा दौड्न्‌, बस्नू नपरोस्‌ बासा ।&lt;br /&gt;
२६/लेखनायका प्रमुख कबिता&lt;br /&gt;
घरघर बिजुली, कल, कार्खाना, कपडा अन्न र पानीइच्छा माफिक सबले पाउन्‌, भन्दछ यो युगवाणी ॥१०ग्रामैपिच्छे शिक्षा पाकन्‌ लाखन बालबालाकुनै कुनामा घुस्न नपाओस्‌ गरिबीपनको ज्वाला ।सबका घरघर डबल होस्‌ व्ययभन्दा आम्दानीधर्म सनातन तब पो रहला, भन्दछ यो युगवाणी ॥११उच्च हिमाचल सेती गाई, तल उपपर्वतँ-मालाधूनसरी छन्‌ दूध-बराबर रत्न अनेक उज्याला ।दुहुनैपर्दछ ती सब तिमीले किसिमकिसिमका खानीतब पो रहला तिम्रो पानी, भन्दछ यो युगवाणी ॥१२अहिले अग्ला दशं-आठोटा रङ्गमहलमा खालीचहलपहलका साथ निरन्तर खेल्दछ जो खुसियाली ।त्यो सब सुप्रामुप्राहरूमा ल्याउनुपर्दछ तानीनत्र भयो के ? दु:ख गयो के ? भन्दछ यो युगवाणी ॥१३&lt;br /&gt;
वि.सं. २००७ युगवाणी वर्ष ४ अङ्क ४२-४३ बाट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==११. वर्षा==&lt;br /&gt;
सं सं सं सं पानी बस्यौ अब वर्षा क्रतु आयो ।विश्वशान्तिको खातिर बढ्दो क्रान्तिवीरमँ घनघोरगर्जन गर्दै घन-मण्डल त्यो नभमा सबतिर छायो ॥ म सं ...&lt;br /&gt;
लपलप गर्दो असिघारालँ चमचम बिजुली उसमासुषमा भर्छे, त्यसले सबको खुसियाली मुसुकायो ॥ सं फं ...&lt;br /&gt;
उस ज्वालाले सुकी सकेका तृण, तरु, लहरा सारालहलह गर्दै उठे पल्हाये, हरियाली लहरायो ॥ मं म्रै ...&lt;br /&gt;
खलखल खोला, छरर छहरा टिलबिल टिलबिल सरिताधनरस-भरिता धरणी रसिली त्यो सब ताप विलायो ॥ सं कं ...&lt;br /&gt;
घुलो धमिलो हालि नयनमा, दुनियाँ अन्धो पारीभतभत पोल्ने उष्ण पवनले शीतलता अपनायो 7 सं छं ...&lt;br /&gt;
घनरव सुन्दै नाचिरहेछन्‌ मदले मत्त-मयूरमनमन भन्दछ कोकिल कसले युगपरिवर्तन ल्यायो ॥ सं सं...&lt;br /&gt;
वि.सं. २००९ भारती वर्ष ४ अङ्ग १ बाट&lt;br /&gt;
२८ लेखनाथका प्रमुख कबिता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==१२. सरस्वती स्मृति==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मिही प्राशै वीणा, मन मुदुनखी, कम्प कलना;गरी लाखौँ ञिक्ती स्वर-मधुरिमा स्मेरवदनारसीलो फक्रेको हृदय-कमलै आसन गरीबसेकी वाग्दैवी क्षणभर नबिसूँ जुनिभरी ॥१सफा वर्णा५५कार स्फटिकमय मालाकन घरीजगत्‌मा तदृद्वारा व्यवहृति-कला शीतल गरी ।सदा भर्दै हाम्रो हृदयबिच आलोक-लहरीबसेकी वाग्दैवी क्षणभर नबिसूँ जुनिभरी ॥र्‌सुनेको, देखेको, अनुभव गरेको जति कुराकुनै आघा मात्रा तक नछोडी सब पुरा ।छपाई-राखेको स्मृतिमय महापुस्तक घरीबसेकी वाग्दैवी क्षणभर नबिसूँ जुनिभरी ॥३यही हाम्रो भित्री हृदयमय गम्भीर सरमाडुबी उत्री खेल्दो, चपल, चटकी हंसबरभा ।चढी लीला साथै भुवन महिमा जीवित गरीबसेकी वाग्दैवी क्षणभर नबिसूँ जुनिभरी ॥1&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता / २९&lt;br /&gt;
जगद्व्यापी मेरो अति मधुर यो जीवन-कला&lt;br /&gt;
बुर््यो जस्ले उस्को कसरि भय अज्ञान रहला ।&lt;br /&gt;
भनी सामुन्नेमा वर अभय मुद्राकन घरी&lt;br /&gt;
बसेकी वाग्दैवी क्षणभर नबिसूँ जुनिभरी ॥र&lt;br /&gt;
वि.सं. २०१० लालित्य भाग १ बाट&lt;br /&gt;
३०० लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==१३. साहित्यको फुटबल==&lt;br /&gt;
भाषाको छ विशाल चौर जसमा गर्दै ठुलो तर्खरभ्रै कोही फरवार्ड, रेफरि कुनै ब्याकिड्‌ र गोल्कीपर ।खेल्दै छौँ फुटबाल बालक सबै साहित्यको बेसरीहावा छैन परन्तु भित्र उसमा गुड्दैन केही गरी ॥&lt;br /&gt;
१खेल्नै हो अब खेल यो यदि भने चाँडो अगाडी सरील्याउँ शुद्ध विचार-पम्प, उसमा जोडौँ र त्यो सुस्तरी ।हावा जागृतिको क्रमैसित भरौँ सर्वत्र त्यो टन्न होस्‌भर्दा जोड परेर किन्तु पहिल्यै टुट्ने र फुट्ने नहोस्‌ ॥&lt;br /&gt;
रेत्यो घात-प्रतिघात-चङ्क्रमणको चातुर्य-सौदामिनीलड्नासाथ उठेर चक्कर लिंदै घुम्दै रहोस्‌ फन्फनी ।खेल्छौँ हामि जती उती चटपटे उस्को नयाँ रङ्ग होस्‌सारा दर्शक वर्ग मस्त सुरमा ताली पिटी दङ्ग होस्‌ ॥|&lt;br /&gt;
वि.सं. २०१० लालित्य भाग १ बाट&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता / ३१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==१४. हाम्रो इन्द्रेनी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पर्वत नगिचै त्यो जलतटमा सात रङ्गको सुरिलो आकारकर्के कर्के गरी उठेको छविको अद्भुत मुस्लो उसपारदेख्नासाथै लोचन खिचिये, कौतुकिताका उरमा छालउर्लन थाले, साथै मनमा रङ्ग रङ्गका उठे सबाल !&lt;br /&gt;
उही कुनाको बादल फुस्रो, उही पखेरो, उही खोला&lt;br /&gt;
त्यसमा त्यस्तो छविको लट्टी कसले कहिले टाँग्यो होला ?के सुरकँवरी त्यस लट्टीको पीङ बनाई चहचह गर्छन्‌ ?अथवा चटकी साँझ त्यो हो जसले ती स्वर्गङ्गा तर्छन्‌ ?&lt;br /&gt;
अमर क्सुमका रसले रञ्जित सात किसिमका छविधारीकामघधनुषको छाया हो बा विरहीको जीवन हारी ।त्यस्तो घनुले मदन कृसुमका कति तीखा शर हान्दो होलाजसले गर्दा पलपल चल्छन्‌ विरहीका मुटुका सोला !&lt;br /&gt;
अथवा त्यो हो दिगङ्गनाका कण्ठस्थलको मञ्जुलमालाभर्दख जसले नव जलधरमा प्रणय-सुधा-रसको प्यालाकलमल त्यस्तो अद्भुत छविको हार गाँथने सुरकन्याकुन कुन होलान्‌ शूत्य गगमा शिल्पकतामा चतृरी घ्रन्या&lt;br /&gt;
३२“ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
रतिमन्मधका केलिभवनको यही द्युतिमय तोरन हो&lt;br /&gt;
अथवा अमीरहरूकै शिरको चुनरीरष्ठी रीवन हो।&#039;मुनामदन&#039; की उही मुनाको सुन्दरताको नमुना होकि ?जसले हाम्रा प्रिय कविजीमा सुन्दरताको छापा ठोकी !&lt;br /&gt;
यो सब गन्दा गन्दै दिलमा अर्कै अद्भुत छाया भास्योत्यस छायाको रूप अँगाली मेरो दिल कन्‌ झन्‌ हाँस्यो ।हृदय गगनमा सबको देख्यो आशाको नानारङ्गीइन्द्रेनीको क्षणिक उज्यालो उठदो छिपदो रद्ठीचङ्ठी !&lt;br /&gt;
बि.सं. २०१३ ड्न्द्रैनी वर्ष १ अङु ५ बाट&lt;br /&gt;
सेखनाथका प्रमुख कविता / ३३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==१५, पूर्वस्मृति==&lt;br /&gt;
हे मेरो प्रिय बन्धु ! आज तिमिले जो लेखका खातिरलेख्यौ सा५५दर पत्र, त्यो सब पढेँ केही मुकाई शिर ।ठेगानातिर हेरदा नयनमा देखा पन्यो &#039;पोखरा&#039;जो देख्दा मनमा मिहीं स्मरणका लाखौँ फुटे आँक्रा ॥१पैह्ला अङ्कुरमा हिमाल हँसिलो अग्लो अगाडी सस्यो-साथै पर्वत-शृङ्खला विपुल त्यो चौरतफि देखा पन्यो ।लंबा संधर फाँट तालहरुको कल्क्यो ठुलो चक्घकीफेरी त्यो गड्वा, विजेपुर, खुदी, सेती बगेकी लुकी ॥&lt;br /&gt;
द्‌कोठे साँघु, बजारको झिलिमिली, काला उखु, सुन्तलादोस्रो अङ्क्रमा खचाखच भये ज्यादै मिठा शीतला ।पैसा ढाँक उखू यतातिर, उता कोरी बढी सुन्तलात्यो संगी खुशिले रमाउँछ यहाँ अद्यापि मेरो गला ॥&lt;br /&gt;
डेतेस्रो अङ्कुरमा उपस्थित भयो अघौं तथा अर्चलेपुर्खाको जसमा थियो जस ठुलो प्रख्यात पाण्डित्यले ।चौथोमा उभियो पवित्र खरको छानू भयेको घरआमाको मृदु लालना सुख जहाँ लिन्थे म लोकोता ॥&lt;br /&gt;
11&lt;br /&gt;
३४लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
पाँचौंमा सुकुमार बाल्य वयका साथी सबै देखियेसाना पल्लव तुल्य त्यो बखतमा नाना थरी जो थिये ।तिन्का साथ डुलेर काफल, तिँदू, ऐसेलु, चुत्रो &#039;सब&#039;टिप्ता जो पुरुषार्थ- गर्व मनमा चढ्थ्यो, कहाँ त्यो अब ॥&lt;br /&gt;
१छैटौँ अङ्कुरमा मिल्यो असजिलो, पाटी धुलौटो, खरीदेखाएर कडा उक्स्मुकुसमा, जर्काउँथ्यो कन्सिरी ।त्यो आपत्ति सही सुखाखर गरी साह्वा सबै अक्षरभाषा-श्लोक फलाक्न घोक्न मनले कस्तै गयो कम्मर ॥&lt;br /&gt;
0सातौँ अङ्कुरभित्र अङ्कित भये गङ्गा-गणेश-स्तुतिचण्डी कोश र कौमुदीहरु ममा भर्दै निजी संस्कृति ।त्यो देखर भन्यो- कठै !! नवमले “जा राजधानीतिरबेडा पार हुँदैन अध्ययनको खाली अँगाली घर” ॥&lt;br /&gt;
७चर्को चक्र घुम्यो शनैः समयको, टाढा भयो अर्चलेप्यारा साथि पनि क्रमैसित सबै संसारदेखी-. चले ।&lt;br /&gt;
देख्दा यो सब तारतम्य विधिको धर्कन्छ छाती सबत्यो जन्मस्थलमा कठै !! म कसरी कैले पुगूँला अब ?पन&lt;br /&gt;
बि.सं. २०२२ बेणीबाट&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता / ३५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==१६. आखिरी कविता==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो दु:ख भोग्ने परमेश्वरै हो ।यो देह उस्को रहने घरै हो॥यो भत्कँदा दुःख अवश्य मान्छ ।सुटुक्क सामान लिएर जान्छ ॥&lt;br /&gt;
बि.सं. २०२२ कविता वर्ष २ अङ्ग र बाट&lt;br /&gt;
३६/ लेखनाथका प्रमुख कबिता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सामा प्रकाशनका केही कविता /काव्य==&lt;br /&gt;
अज्ञात प्रारम्भअतिरिक्त अभिलेखअराजक अक्षरहरूअसमर्थ श्लोक&lt;br /&gt;
एउटा अर्को बुइँगल&lt;br /&gt;
एक फूल अनेक पत्रएक्लो विजेता&lt;br /&gt;
काँडाका फूलहरू&lt;br /&gt;
केही गीत केही गजलघाउमा हरिश्चक्त कटुवालचिसो च्‌ह्लो&lt;br /&gt;
छुटेका यादहरू&lt;br /&gt;
दाजै ! कविता गाउँमै छनफुलेका फूलहरू&lt;br /&gt;
नरमेध -निर्माणाधीन सडकपञ्चदशिका&lt;br /&gt;
पलकभित्र पलकबाहिरपृथिबीमाथि आलेखप्रेमका कवितामृत्यु-कविता&lt;br /&gt;
लक्ष्मी कवितासङ्ग्रहवीरकालीन कविताशाकुन्तल (महाकाव्य)समसामयिक सासा कबितासाफा कविता&lt;br /&gt;
हिमालचुली ।सङ्कलन)&lt;br /&gt;
पान राररुरुललाकाररुर, कार ककन&lt;br /&gt;
भ्रीम विराग&lt;br /&gt;
दिनेश अधिकारीविजय सुब्बा&lt;br /&gt;
राजव&lt;br /&gt;
सं. कशघकृष्णहरि बरालपुरुषोत्तम सुवेदीमनु ब्राजाकीकालीप्रसाद रिजालकणाद महर्षिबालकृष्ण समवियोगी बुढाथोकीभूपाल राई&lt;br /&gt;
क्षेत्र प्रताप अधिकारीखुमनारायण पौडेलशङ्कर थपलियाअनु, भरतराज पन्तमञ्जु काँचुलीगोपाल पराजुली&lt;br /&gt;
सं. फणीन्द्र खेतालामञ्जुल&lt;br /&gt;
सं. चूडामणि बन्धुसं. दयाराम श्रेष्ठलक्ष्मीप्रसाद देवकोटासं. डा. तारानाथ शर्मासं. चृडामणि बन्धुसं. ईश्वर बराल&lt;br /&gt;
उँ५ 99933-2-488-4&lt;br /&gt;
| हेई।&lt;br /&gt;
६99 | 3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category: step 2]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96_%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE&amp;diff=80</id>
		<title>लेखनाथका प्रमुख कविता</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96_%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE&amp;diff=80"/>
		<updated>2024-06-11T13:04:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;Source:https://nepalikitab.org/lekhnath-poudel-lekhnath-ka-pramukh-kabita/&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पुस्तक परिचय==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्रि. वि. मा. सा. शा, सं. अन्तर्गत स्नातक तहको द्वितीय पत्रकोऐच्छिक अध्ययन &#039;ख&#039; खण्डका लागि निर्धारित नेपाली पाठ्यक्रमअनुसार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्पादन&lt;br /&gt;
डा. वासुदेव त्रिपाठी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रकाशक : साम्रा प्रकाशन&lt;br /&gt;
संस्करण : पहिलो, २०४६दोस्रो, २०४९तेस्रो, २०६२ (११०० प्रति)&lt;br /&gt;
आवरणकला : टेकवीर मुखिया&lt;br /&gt;
म्‌ल्य : रु. ३५।-&lt;br /&gt;
मुद्रक : सार्रा प्रकाशनको छापाखाना, पुलचोक ललितपुर&lt;br /&gt;
फोन : ५५२१०२३, फ्याक्स : ५५४४ २३६15819 : 99933-2-488-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‍‍&lt;br /&gt;
== मन्तव्य ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्रिभुवन विश्वविद्यालयको मानविकी र सामाजिक शास्त्र सङ्काय-अन्तर्गतको ऐच्छिक नेपाली विषयको प्रवीणता प्रमाणपत्र / स्तातक /स्नातकोत्तर तहको पाठयक्रमको आवश्यक संशोधनका क्रममा सम्बन्धितनेपाली विषय समितिले कतिपय पाठ्यसामग्रीमा विशेष सुधार ल्याई तिनलाईअद्यावधिक एवं सान्दर्भिक तुल्याउनु आवश्यक ठहत्याई पाठचसामग्री विकासपरियोजनाको तर्जुमा २०४५ सालमा गरेको थियो । सोही परियोजनाकाकार्यान्वयनका क्रममा प्रथम चरणमा नेपाली साहित्यका विविध फुटकरविद्या (कविता, कथा, एकाङ्की, निबन्ध एवं समालोचना) का तहगत शैक्षिकआवश्यकतालाई दृष्टिगत गरी विधागत पाठघसङ्कलनहरू सम्पादन गर्ने रदौसौ चरणमा साहित्यसिद्धान्त, भाषाविज्ञान र नेपाली साहित्यकोइतिहासलगायत अन्य अपेक्षित पाठयसामग्रीको तयारी गर्ने निधो गरियो ।उक्त प्रथम चरणअन्तर्गत सम्पादित प्रस्तुत ग्रन्थ लेखनाथका प्रमुख कवितास्तातक तहको द्वितीय पत्रको खण्ड &#039;ख&#039; को विशिष्ट अध्ययनकोपाठचसामगरीका रूपमा स्वीकृत पाठहरूको सङ्खलन हो । यसका सम्पादनकाक्रममा विषय समितिद्वारा निर्धारित आधारहरूको अवलम्बन गरी स्नातकतहमा पढाउनका निम्ति लेखनाथका प्रमुख कविताहरू सङ्कलित गरिएकाछन्‌ । .यो ग्रन्थ लेखनाथका प्रमुख कविताको सङ्कलनतर्फको एक अर्कोप्रयास हुँदै हो तर सम्बन्धित शैक्षिक तहका पाठघण्टा र पाठ्यस्तरकापरिधिमा रही सोही शैक्षिक प्रयोजनअनुरूप यहाँ लेखकविशेष र कृतिविशेषको&lt;br /&gt;
चयन गरिएको छ । यस चयनमा सम्बन्धित बिधाका प्रमुख युग र घाराएवं तिनका प्रमुख स्रष्टाका शैक्षिक तहगत रूपमा उपयुक्त हुन सक्नेकृतिहरूको समावेश हुनु स्वाभाविकै हो । शैक्षिक क्षेत्रमा प्रयुक्त हुने यसप्रकारका सङ्कलनहरू आफ्ना शैक्षिक तहगत शृङ्खलामा आबद्ध र आधारितरहने तथ्य छँदै छ।नेपाली विषय समितिको उक्त परियोजनाअन्तर्गतको यस ग्रन्थकोप्रकाशनको चाँजोपाँजोलगायत सम्पूर्ण अभिभारा वहन गर्ने साप्ज प्रकाशनप्रतिपनि त्रि.वि. मानविकी र सामाजिक शास्त्र सङ्कायको नेपाली विषय समितिकातर्फबाट आभार व्यक्त गर्दछु ।२०४५ चैत्र १७ गते डा. बासुदेव त्रिपाठीअध्यक्षनेपाली विषय समितिनेपाली केन्द्रीय शिक्षण विभागत्रिभुवन विश्वविद्यालयकीर्तिपुर, काठमाडौँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==विषयस्‌ची==&lt;br /&gt;
कविशिरोमणि लेखनाथ पौडघालको कवितायात्रा : एक चर्चा&lt;br /&gt;
री 5 उ” १८ ५ ३५ 70 परी&lt;br /&gt;
कबिकवबितालाप&lt;br /&gt;
वैतिक दृष्टान्त&lt;br /&gt;
वसन्त कोकिल&lt;br /&gt;
जीवन-चङ्गा&lt;br /&gt;
गौँधलीको चिरिबिरी (१)&lt;br /&gt;
सत्य सन्देशहरू&lt;br /&gt;
विज्ञानको मोह&lt;br /&gt;
पतित-पावनी श्री गङ्गाजीको माँकीवंशीघरको दिव्य वंशी&lt;br /&gt;
. युगवाणी. वर्षा. सरस्वती स्मृति&lt;br /&gt;
साहित्यको फुटबल&lt;br /&gt;
. हाम्रो इन्द्रेनी&lt;br /&gt;
पूर्वस्मृति&lt;br /&gt;
. आखिरी कविता&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
१०१२१५१९&lt;br /&gt;
२४&lt;br /&gt;
२८२९&lt;br /&gt;
३२३४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कविशिरोमणि लेखनाथ पौड्यालकोकवितायात्रा : एक चर्चा==&lt;br /&gt;
कविशिरोमणि लेखनाथ पौडथाल (वि.सं. १९४१-२०२२) लेबाल्यकालमा आफ्नो जन्मस्थल कास्की जिल्लाको पोखरा उपत्यकाको अघौँअर्चले गाउँमा नै कविताको उद्बोधन प्राप्त गरै तापनि खास गरी काठमाडौंकोरानीपोखरी संस्कृत छात्रावास (तीनधारा पाठशाला) मा रही संस्कृत मध्यमाकोअध्ययन गरिरहेका बखत नै उनको कविताअभ्यास विशेष तीव्र भएकोबुझिन्छ । उनको यो कविताअभ्यास तात्कालिक शैक्षिक परिप्रेक्ष्यअनुरूपसंस्कृत र नेपाली दुवै भाषाका माध्यमबाट थालिएको थियो भने उनलेअध्ययन गर्ने गरेको रानीपोखरी पाठशालाको वर्णन गर्ने संस्कृत समस्यापूर्ति&#039;पाठशाला विशाला&#039; सुरक्षित रूपमा उपलब्ध पनि छ र उनका प्राथमिककविता-आराधनाका परिचायक दुई नेपाली कविता &#039;कविताकल्पद्रम&#039; (सन्‌१९०५ : बि.सं. १९६१-६२) मा प्रकाशित भएको पाइन्छ । &#039;शृङ्घारपच्चीसी&#039;र &#039;मानसाकर्षिणी&#039; शीर्षकका यी दुई कविता नै उनका प्रकाशित प्राथमिकनेपाली कविताहरू हुन्‌ । नेपाली लेख्य व्याकरणको निर्धारण नभइसकेको,भङ्गाररसतर्फ नेपाली कविताको विशेष चाख देखा परेको र परम्परागतवर्णमात्रिक छन्दमा शब्दालङ्कार र अर्थालङ्ारको सजधजतर्फ विशेष उत्सुकताप्रकट भएको नेपाली कविताको उत्तरमाध्यमिक कालको कविता-परिवेशकाउपजका रूपमा लेखनाथका उपर्युक्त दुई कविता देखा पर्छन्‌ । समकालीतकवबिता-परिवेशका उपज हुँदाहुँदै पनि यी दुई कवितामा लेखनाथको उर्वर प्रतिभाको मिर्मिरे रन्कोचाहिँ सुनिन्छ नै । यसरी २०-२१ वर्षका उमेरमा&#039;कविताकल्पद्रुम&#039; का माध्यमबाट लेखनाथको जुन कवितायात्रा थालियो त्योउनको शेष जीवनकालभर अक्षुण्ण र गतिशील रह्यो । उनको ८२ वर्षेजीवनकालमध्ये लगभग ६० वर्षको अवधि नेपाली कविताको साधनामासमर्पित रह्यो । यतिको लामो समयावधिअन्तर्गत युवावस्थाका &#039;कविताकल्पद्रुम&#039;(बि.सं. १९६१-६२) का उपर्युक्त दुई श्ृङ्घारिक कवितादेखि बृढ्घौलीमामृत्युसम्ममा लेखिएको &#039;आखिरी कविता&#039; (२०२२) सम्मको ६० वर्षभन्दा बढीअवधिको कवितायात्रा कविशिरोमणि लेखनाथले गरेको पाइन्छ ।&lt;br /&gt;
युवा लेखनाथ पौडघालका कविताहरू सुन्दरी पत्रिका १९६३) माछापिन थाले । समस्यापूर्ति र फुटकर कविताको रचना गर्दै प्रथमतः उनले&#039;नुङ्घारिक घाराकै आवाहन गरेका हुन्‌ र &#039;वियोगिनी विलाप&#039; यतिखेरकोउनको उल्लेखनीय कविता हो । उनका भाव, लय र शैलीको प्रतिभापूर्णछलबल पर्याप्त मात्रामा यस कवितामा प्रकट भएको पाइन्छ । तर सुन्दरी-कालमै उनको &#039;कालिकाविलासी&#039; जस्तो समस्यापूर्तिले शृष्वारधाराप्रति छेडहाल्न थालेको र &#039;वैराग्यवल्ली&#039; कविताले श्ुङ्गारविपरीत शान्तरसतर्फ चाखदेखाएको भेटिन्छ र उनका भाव, लय र शैलीमा विशिष्ट छचल्काहरूप्रकट भइरहेको कुरा &#039;बैराग्यवल्ली&#039; कविताले एनि फल्काउँछ । यसरी१९६३ सालमै लेखनाथ समसामयिक आङ्गारिक परिवेशबाट तकिँदै आफ्नोशान्तरसमूलक कबितायात्रातर्फ प्रवत्त भएको र उनको कवित्व पनि प्रतिभापूर्णछचल्काहरूले उद्देलित भइरहेको अनुभव हुन आउँछ ।&lt;br /&gt;
१९६५-६६ साल लेखनाथको प्राथमिक कवितायात्राका निर्णायकवर्ष हुन्‌ । लेखनाथको काव्यघाराको खास प्रवर्तन माघवी पत्रिकाकामाध्यमबाट यतिखेर नै थालियो । हलन्त बहिष्कारमूलक लेख्य व्याकरणकाअनुशासनमा कविता रच्दै र राष्ट्रिय जागरणका सामाजिक, साँस्कृतिक,धार्मिक तथा आध्यात्मिक लहरहरूलाई छुँदै अकृत्रिम तर अलङ्वारपूर्णशैलीमा कविताको स्तरीकरण गर्ने चासो माधवी प्रत्रिकामा छापिएकालेखनाथका कविताले देखाएको पाइन्छ । यस पत्रिकामा छापिएको ४८पद्यको &#039;वर्षाविचार&#039; लामो कविता वा लघु काव्यका रूपमा देखा पर्छ रयो&lt;br /&gt;
न्ख-&lt;br /&gt;
उनको आगामी क्रतुबिचार काव्यको प्रारूप पनि हो । नेपाली भाषामापनि संस्कृत वा फारसी भाषाको जस्तो स्तरीय काव्य लेखिन सक्छ भनीप्रमाणित गर्ने क्रममा प्रथम पाइलास्वरूप लेखिएको वर्षाविचार मा लेखनाथपौडचालको निजी काव्यधारा र त्यसका आधारभूत प्रवृत्तिहरूको प्राथमिकदिग्दर्शनसम्म प्राप्त हुन्छ । लेख्य व्याकरणका अनुशासनमा कविता रच्ने,परिष्कारवादी (शास्त्रीय वा क्लासिकल) काव्यधाराको बरण गर्दै नेपालीकविताको स्तरीकरण गर्ने र राष्ट्रिय जागरणको सन्दर्भतर्फ उन्मुखतादेखाउने जस्ता कुरा उनका काव्यधाराका केन्द्रीय पहिचान हुन्‌ भनेबर्षाविचारमा ती कुरा प्रारम्भिक तर स्पष्ट रूपमा देखिन्छन्‌ । काव्यकारचनासामग्रीका दृष्टिले प्रकृतिका छनि, सामाजिक परिदृश्य, हिन्दू पुनर्जागरण,नैतिक चेतना र आध्यात्मिक मनन नै लेखनाथका केन्द्रीय सामगी हुन्‌ भनेत्यतातर्फ वर्षाविचारका लेखनाथ उन्मुख भइसकेका छन्‌ । काव्यभाषा रशैलीका सन्दर्भमा तत्सम र तद्भव पदावलीको समुचित सन्तुलनमा आधारितसरल-गम्भीर तथा सहज-मनोरम शब्दशय्याको अनुप्रासीय अन्तर्धाराकोलयलालित्य लेख्य व्याकरणका अनुशासनभित्र रही प्राप्त गर्नु लेखनाथकोपहिचान हो भने त्यसको प्रारूप &#039;वर्षाविचार&#039; मा देखा पर्छ । सहज स्तस्फूर्ततुल्यकिन्तु शक्तिशाली अलङ्करण लेखनाथका कविताका लालित्यका परिपोषकतत्त्वमध्यै एक हो भने त्यो सहज मनोरम आलङ्कारिक छटा पनि वर्षाविचारमाचहकिलो छ्‌ । काव्यचेतनाका दृष्टिले वस्तुतत्त्व र अन्तर्भावका बीचकोबौद्धिक पुटसमेत परेको चेतनापरिपाक परिष्कारवादी लेखनाथको केन्द्रीयपहिचान हो भने त्यो वर्षाबिचारमा मिरमिराइरहेको पाइन्छ । यसरीलेखनाधका प्राकृतिक पर्यवेक्षण, सामाजिक व्यङ्गय र आदर्शीकरण, नीतिचेत,पौराणिक सन्दर्भको नवीन व्याख्या, युगोन्मेष, हिन्दू पुनर्जागरणको स्वर रअध्यात्मचेतका साथ्यै लय, ौली र अलङ्गरणका अनुशासित लालित्यसहितसहज-संयमित परिष्कारघर्मी स्तरीय कविताचेतका प्राथमिक प्रस्फुटनकाबिन्दुका रूपमा वर्षाबिचार लघु काव्य ।१९६५-६६) देखा पर्छ र यसलाईनेपाली खण्डकाव्यको परिष्कारधर्मी प्रथम स्तरीय प्रयास पनि भन्न सकिन्छ ।वास्तवमा यसै बिन्दुदेखि नै लेखनाथ पौडयालको कवितायात्रामा उनको&lt;br /&gt;
नज&lt;br /&gt;
काव्यधारा आफ्ना खास काव्यस्रोत र काव्यप्रवत्तितर्फ अभिमुखीकृत भईदेखा परेको पाइन्छ ।&lt;br /&gt;
लेखनाथका कवितायात्राका क्रममा लालित्य (१९६९) उनकोकवितायात्राको अर्को महत्त्वपूर्ण पाइलो हो । यसमा लेखनाथका ६ कबितापरेका छन्‌ जसमध्ये &#039;मनोलड्ड्‌&#039; कविता उनको धार्मिक-अध्यात्मिक कवि-चेतको परिष्कारोन्मुख भावार्द्र अभिव्यक्ति हो । त्यस्तै अर्को &#039;विचित्रवाहिनी&#039;कवितामा शोषण र उत्पीडनको हास्यआभास अँगाल्दै लेखनाथको युगोन्मेषमुल्किएको छ र सामाजिक पर्यवेक्षण र व्यङ्गघको क्षमता पनि झल्कन्छअनि शब्दालङ्कार र अर्थालङ्कारको विशेष, चहक पनि प्रकट भएको छ।अर्को &#039;रामराज्य&#039; कवितामा पूर्वीय राज्यआदर्शहरूको संस्मरण छ र शब्दार्थकोअलङ्कार सृष्टिसामर्थ्य पनि चहकिलो छ । लालित्यभित्रको &#039;कविकवितालाप&#039;कविताचाहिँ कवि लेखनाथको निजी काव्यघाराको घोषणापत्रतुल्य देखापर्छ । माध्यमिककालको उत्तरार्धका समसामयिक साहित्यिक प्रचलनप्रतिआक्षेप, व्यङ्ग्य र अस्वीकारसहित कविताका भाषामा व्याकरणसम्मत सुघारल्याउने, मौलिक कविप्रतिभाको सञ्चार गर्ने, नीतिचेत र आदर्शोन्मुखविचार गर्दै सामाजिक जागरण र सुधारप्रति सोट्टेश्य कविताको प्रवर्तन गर्नेर पूर्वी उच्च साहित्यिक परम्पराप्रति श्रद्धासाथ नेपाली कविताको स्तरीकरणगर्दै नवीन काव्ययुगको आवाहन गर्ने सङ्कल्प &#039;कविकवितालाप&#039; कवितामाउनले प्रकट गरेका छन्‌ । यस तात्पर्यमा १९६९ सालसम्म आइपुग्दालेखनाथ नेपाली कवितामा युगान्तर ल्याउन कृतसङ्ल्प देखा पर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
१९७० सालको शोकप्रवाह खण्डकाव्यले लेखनाथको उच्चभावक्षमताको परिचय दिन्छ । उनका लय र शैलीमा आइरहेको परिष्कृतिलेगर्दा यसको भावधारा कझन्‌ चहकिएको छ । परिष्कारवादी काव्यधाराकोउल्लेख्य कृतिका रूपमा यस करुण खण्डकाव्यले लेखनाथको विकासशीलकविप्रतिभालाई प्रस्तुत गरेको छ । -&lt;br /&gt;
१९७२-७६ सालका अवधिमा लेखनाथको परिष्कारवादीनबकाव्यधाराको सृजनात्मक क्षमता प्रभावकारी रूपमा प्रकट भएको रस्थापित भएको देखिन्छ । यस अवधिमा उनका प्रशस्त फुटकर कविताहरू&lt;br /&gt;
न्च--&lt;br /&gt;
र तीन खण्डकाव्यका साथै एक नाटक प्रकाशित भएको पाइन्छ । उनकाफुटकर कविताहरू खास गरी गोरखाशिक्षाका भाग १, २ र ३ (क्रमशः१९७२, १९७३, र १९७४) मा र सूक्तिसिन्धु १९७४) मा सङ्कलित छन्‌ ।१९७३ सालका &#039;हिउँदका दिन&#039;, &#039;इन्द्र्धनु&#039; र १९७४ सालका &#039;प्रभात&#039;,शबसन्त&#039; र &#039;वसन्तकोकिल&#039; कवितामा लेखनाथको पूर्वस्वच्छन्दताबादीस्पर्शसहित परिष्कारवादी प्रकृतिपर्यवेक्षणको कुशलता प्रकट हुन्छ । १९७२सालका &#039;दशैँ&#039; र &#039;तिहार&#039; मा उनको साँस्कृतिक चेत तथा &#039;ईश्वरस्तुति&#039; माआध्यात्मिक चेत रुल्कनाका साथै १९७३ सालको “म कस्तो हँ&#039; र १९७४सालका &#039;म केके नगरँ&#039; र नैतिक दृष्टान्त कवितामा उनको नैतिकआदर्शचेत व्यक्तिएको छ । १९७४ सालको &#039;पिँजराको सुगा&#039; तात्कालिकयुग-व्यथा र स्वतन्त्रता-कामनाका प्रतीकात्मक व्यञ्जनाका रूपमा बह्चर्चितरहेको छ । १९७४ सालका सूक्तिसिन्धुका कवितामध्ये &#039;विरहिणीका उपरसखीको प्रश्न&#039; कविता वियोगिनी र योगिनीका श्लेषात्मक भावसन्धिमैउभिँदै शृङ्गार युग र शान्त-आध्यात्मिक युगको दोसाँधको अत्यन्त कलात्मकअभिव्यक्ति हुन आएको छ । १९७४ सालको भर्तुहरिनिर्वैद नाटकको पद्यांशलेपनि खास गरी उनको आध्यात्मिक कवित्व तथा शैलीगत अन्तर्विकासकोपरिचय दिन्छ । यसताकाका लेखनाथका खण्डकाव्यहरूमध्ये व््रतुविचारप्रकृतिकाव्यका रूपमा, बृद्धिविनोद बौद्धिक काव्यका रूपमा अनिसत्यकलिसंवाद सामाजिक काव्यका रूपमा देखा पर्छन्‌ । लेखनाथले प्रवर्तनगर्न लागेको नयाँ काव्यधाराका प्राकृतिक, बौद्धिक र सामाजिक सन्दर्भलाईयी तीन काव्यहरूले प्रस्तुत गरेका छन्‌ । यी काव्यहरूमध्ये समाजसन्दर्भ रयुगोन्मेषको वस्तुगत पर्यवेक्षण, व्यङ्घवय र आदर्शीकरणतर्फ सत्यकलिसंवादविशेष जागरूक छ र यसमा हिन्दू पुनर्जागरणका स्वरसँग लेखनाथकासांस्कृतिक स्वप्न तथा सुधारवादी स्वर पनि सलबलाउन खोजेका छन्‌ ।सामाजिक रूढि, विकृति र अमङ्गतिप्रति व्यङ्ग्य तथा आर्थिक दैन्यप्रतिआक्रोश एवम्‌ धार्मिक नैतिक पतनप्रति कौतुकसहित राजनैतिक सन्त्रासकाप्रतिच्छायामा सत्यकलिसंवाद रचिएको छ र यसमा काव्यमूल्यभन्दा हिन्दूपुनर्जागरणको स्वर तथा सामाजिक मूल्य र युगचापको मात्रा बढी देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
न्ङ-&lt;br /&gt;
बुद्धिविनोद समकालीन नेपालका पूर्वी-पश्चिमी वा प्राचीन नवीन मूल्य,दृष्टि र चेतनाका प्रश्न-प्रतिप्रश्नको द्वन्द्वमय अभिव्यक्तिका रूपमा उभिँदैज्ञान र विज्ञानको घर्षण थालिएका युगीन बौद्धिक धरातलको व्यञ्जक नैबढी देखा पर्छ । क्रतुविचार खण्डकाव्य भने प्रकृतिकाव्य भएर पनिलेखनाथका सबैजसो काव्यप्रवृत्तिहरूको सङ्गमस्थलतुल्य छ र यसमासामाजिक-सांस्कृतिक तथा नैतिक-आध्यात्मिक प्रतिच्छविसहित लेखनाथकोसृक्ष्म प्रकृति-पर्यवेक्षण प्रकट भएको छ । लेखनाथका लय, भाव, चिन्तन रशैली-शिल्पको पूर्वस्बच्छन्दतावादी स्पर्शसहित सहज-परिष्कृत संश्लिष्टसौन्दर्यको नमुनास्वछूप क्रतुविचार खण्डकाव्य नेपाली कविताकै पनिप्रथम परिष्कृत सौन्दर्यबाटिकाका रूपमा देखा पर्छ । यसरी १९७२-७६सालका उपर्युक्त कविता र काव्यका माध्यमबाट लेखनाथ पौडयाललेनेपाली कविताको माध्यमिककाललाई तोड्दै आधुनिक नेपाली कविताकोउषाकाल बा मिर्मिरे प्रथम प्रहरस्वरूप परिष्कारवादी (शास्त्रीय? कलासिकल)धाराको प्रवर्तन तथा प्रतिष्ठापन गरेको पाइन्छ । खास गरी १९७३-७६सालका बीच प्रवर्तित यो परिष्कारवादी धारा शारदा पत्रिकाको अभ्युदय[वि. सं. १९९१) पूर्वको अवधिसम्म नेपाली कविताको अग्रणी धाराकोरूपमा रह्यो । यस अबधिमा गोरखा शिक्षाको चारौँ भाग १९८० मालेखनाथका &#039;धनमहिमा&#039;, &#039;सन्ध्या&#039; र &#039;धतिशीलता&#039; कविता छापिएका छन्‌ रउनको &#039;गीताञ्जली&#039; र लघु स्तुतिकाव्य पनि प्रकाशित भएको छ । &#039;धनमहिमा&#039;ले खास गरी धनमूलक सामन्त परिवेश र भौतिक मोहप्रति व्यङ्गय गरेकोछ भने &#039;धवृुतिशीलता&#039; चाहिँ आदर्शवादी धीर व्यक्तित्वको गायन हो अनिसन्ध्या&#039; चाहिँ प्राकृतिक सौन्दर्यको पूर्वस्वच्छन्दतावादी पुट पनि परेकोपर्यवेक्षण । &#039;गीताञ्जली&#039; शासक स्तुतिको सन्दर्भसँग जोडिएको छ रलेखनाथको जागरण-स्वर मूलतः राजनीतिनिक्षेप सांस्कृतिक-सामाजिकजागरणको व्यञ्जक हो भन्ने जानकारी सत्यकलिसंवादपछि यस लघुकाव्यले दिन्छ । तर परिष्कारवादी प्रसन्न शैली-शिल्प र मनौोरथ भावकोलय-लालित्यको छटा भने यस स्तुतिकाव्यमा पनि व्याप्त रहेको छ।लेखनाथको ६ दशकभन्दा लामो कवितायात्राको पूर्वार्द्ध वा प्रथम प्रहर ।&lt;br /&gt;
छ&lt;br /&gt;
१९६१-६२ सालदेखि १९९० सालसम्मको पूर्वोक्त अवधि नै हो। यसअवधिमा प्रथमतः: १९६३-७३ सालका बीचमा उनले समसामयिक माध्यमिकश्यङ्गारधारालाई तोड्दै आफ्नो परिष्कारबादी काव्यधारातर्फको प्रयोग रप्रवर्तन गर्दै क्रमश: त्यसलाई स्थापित गरेको पाइन्छ । नेपाली कवितामालेखनाथको यो भूमिका युगान्तकारी र्‌ नवयुगप्रवर्तक देखा पर्छ अनिनेपाली कविताको स्तरीकरण गर्दै र स्तरीय खण्डकाव्यको समेत रचना गर्दैपरिष्कारवादी काव्यचैतन्य र काव्यसौन्दर्यका स्रष्टा प्रथम महान्‌ नेपालीकविका रूपमा उनी यस अबधिमा प्रतिष्ठित हुन आउँछन्‌ । उनले सिर्जेकोयही परिष्कारवादी धारा नै नेपाली कविताको आधुनिकतातर्फको सङ्क्रान्तिकोउषाकाल वा प्रधम प्रहरसमेत देखा पर्न आउँछ ।&lt;br /&gt;
१९९१ सालदेखि शारदा पत्रिकासँगै नेपाली कवितामा नयाँ चहलपहलथालिन्छ र लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा र सिद्धिचरणजस्ता कविहरू स्वच्छन्दतावादीकाव्यधारा अँगाल्दै प्रकट हुन लाग्दछन्‌ । लेखनाथका परिष्कारवादीकाव्यधारामा पूर्वस्वच्छन्दतावादी तत्त्वहरू केही मात्रामा अन्तर्निहित रहैतापनि देवकोटा र सिद्धिचरणका सहकारितामा खास स्वच्छन्दतावादकोअभ्युदय नै १९९१-९२ सालतिरको नेपाली कविताको मुख्य घटना हो ।वि. सं. १९७६ पछि राजनैतिक चाप र व्याकरण-दवन्द्वका साथै अन्यसान्दर्भिक कारणहरूले गर्दा फक्रिन नपाई खुम्चिन पुगेको लेखनाथकोकवित्ब पनि शारदाकाल लाग्दानलाग्दै मन्‌ खारिएर प्रकट हुन थाल्यो ।वि. सं. १९९१ सालको परिवर्तित-संशोधित क्रतुविचार नै लेखनाथकोकबितायात्राको पूर्वार्द्धको उत्तराद्धको उद्घोषक कृति हुन आउँछ । लेखनाथकाकाव्यधाराका सन्दर्भमा स्वच्छन्दतावादको आंशिक चास्तीसहित परिष्कारवादीकाव्य-सुषमाको उत्कृष्ट कान्ति प्राप्त गर्दै उनका विविध काव्यप्रवृत्तिहरूअक तिम्खर र परिष्कृत भई, विशेष स्तरीकृत बन्नु नै क्रतुबिचार (१९९१)को केन्द्रीय प्राप्ति हो । यसरी देवकोटाका केन्द्रीयतामा स्वच्छन्दतावादीकाव्यधारा हुर्कन लागेको त्यस युगमा परिष्कारवादी काव्यधाराको नेतृत्वगर्दै लेखनाथ आफ्नो सामाजिक पर्यवेक्षण र आध्यात्मिक चेतनालाई अरखादै र समीकृत गर्दै अनि आफ्ना कविताको लय, शैली, शिल्प र संरचनालाई&lt;br /&gt;
प्छ&lt;br /&gt;
अर परिष्कृत तुल्याउँदै गतिशील रही परिष्कारवादी काव्यसौन्दर्यका उत्तुङ्गशिंखरका रूपमा चुलिँदै गएको पाइन्छ ।&lt;br /&gt;
लेखनाथको कवितायात्राको पूर्वार््धलाई प्रथम चरण .स्वीकार्दैउत्तरार्द्धस्वरूप १९९१-२०२२ सालको अवधिलाई चाहिँ २००७ सालकोविभाजक युगरेखाका आधारमा दुई भागमा वर्गीकृत गर्न सकिन्छ । यसरी१९९१-२००७ र २००८-२२ सालका दुई समयावधिमा उनको उत्तरार्द्धकवितायात्रालाई विभाजित गर्दा पहिलोचाहिँ समयावधि उनको कवितायात्राकोदोस्रो चरण र दोस्रोचाहिँ अवधि तेस्रो चरणका रूपमा देखिन आउँछन्‌ ।अवश्यै उक्त तेस्रो चरणका माफ्माक २०१३ सालदेखि लेखनाथको कवितामाअर्को चौथो चरणको सम्भाव्यता कल्कन्छ तर त्यो अघूरै रही तेग्रो चरणमैअन्तर्भुक्त बन्न पुगेको छ । प्रथमत: उनको कवितायात्राको दोस्रो चरण(१९९१-२००७ साल) का बारेमा नै चर्चा गरौँ ।&lt;br /&gt;
&#039;ञ्रतुविचार&#039; (१९९१) को परिवर्धन-परिष्कारपछि लेखनाथकाकवितायात्रामा कवित्व र चैतन्य दुवैको अन्तर्विकास र परिष्कारको प्रकियाझन्‌ तीव्र हुन लागेको पाइन्छ । यतिखेर उनको उमेर पचास वर्ष पार गरीजीवनको छैटौँ दशकतर्फ लाग्दै थियो र पेसागत चक्करबाट मुक्त हुँदैप्राय: स्वाधीन रूपमा उनको जीवनचर्या पनि चालिँदै थियो । यतिखेरसमकालीन राणाशासनका सन्दर्भमा पनि उनी नियमित चाकडी र दौडघुपकाप्रक्रियाबाट पन्छिदै र सत्ताकेन्द्रका विपरीत दिशामा उन्मुख कतिपयराणापरिवारहरूसँग सम्बद्ध हुँदै थिए । उनले आफ्नो कवितायात्राका पूर्वार्द्धमातत्कालीन कठोर राजनैतिक पर्याबरणमा जागरणधर्मी कवितासृजनाकाकठिनाइ र भुक्तमान भोगिसकेका थिए भने उनका युगचेत सूक्ष्म व्यञ्जनाकास्तरमा नै विशेष मुखरित हुनाका साथ प्राय: राजनीतिइतर सामाजिक,आर्थिक तथा सांस्कृतिक, नैतिक, धार्मिक र आध्यात्मिक जागरणकै सेरोफेरोमाबढी सुसेलिएको पनि हो । वास्तवमा आफ्ना कविजीवनभरि नै राजनैतिकस्तरमा उनी विप्लवी-विद्रोही कविभन्दा स्तुति-प्रशंसाका सामयिक अपेक्षाकोपूर्ति गरिदिने खालका कवितासमेत लेख्तै रहे तर युगचेतनाका पूर्वोक्तव्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक सन्दर्भचाहिँ उनका कृतिहरूमा स्पन्दित र&lt;br /&gt;
न्ज-&lt;br /&gt;
व्यञ्जित नै रह्यो । कवितायात्राको उत्तसर्द्धमा पनि उनी यही वृत्तमा नै२००७ सालसम्म केन्द्रित रहेको देखिन्छ तापनि उनका १९९१-२००७सालका अवधिका कवितामा जागरणधर्मी चैतन्य विशेष रूपमा स्पन्दित रव्यञ्जित भएको पाइन्छ । पेसागत मुक्तता, उमेरको परिपक्वता रसत्ताकेन्द्रविपरीत क्रियाशील कतिपय राणापरिवारहरूसँगको तादात्म्य तथाशारदाकालीन साहित्यिक जागरणका युगमा प्राप्त साहित्यिक आत्मप्रतिष्ठाकाकारणले गर्दा पनि उनी आफ्नो कवित्व र चैतन्य दुबैको बिस्तार रपरिष्कारतर्फ यतिखेर क्रमिक रूपमा उत्प्रेरित भएको बुझिन्छ । उनकोकवितायात्राको दोस्रो चरण (१९९१-२००७) मा दुई खण्डकाव्य, एकनाटक र प्रशस्त फुटकर कविताहरू प्रकाशित भएका छन्‌ । यी रचनाहरूलाईकेलाउँदा एकतर्फ उनका जीवनदृष्टिमा परिपक्वता आइरहेको र त्यसमापूर्वीय दर्शनको अध्ययन र सामाजिक सचेतता दुवैको भूमिका बढिरहेकोभेटिन्छ भने अर्कातर्फ परिष्कारवादी कवित्वको कलात्मक प्राप्तितर्फ उनकोदक्षता उत्तरोत्तर विकसित भइरहेको पनि पाइन्छ ।&lt;br /&gt;
लेखनाथको कवितायात्राको दोस्रो चरण (१९९१-२००७) मा देखापर्ने प्रमुख फुटकर कविताहरू हुन्‌- &#039;जीवनच्गरा&#039;, &#039;कालमहिमा&#039; र &#039;गौँथलीकोचिरिबिरी&#039; (१९९२), सत्य सन्देशहरू १९९५-२०००,), विज्ञानको मोह(१९९५), &#039;पिँजराको प्यासा मैना&#039; ।१९९७), &#039;पतितपावनी श्रीगङ्गाजीकोज्ञँकी&#039; १९९२), &#039;बंशीघरको दिव्यवंशी&#039; (१९९९), &#039;हाँसेको साहित्यसागर&#039;(२००४), &#039;गौंधलीको चिरिबिरी&#039; (२) (२००४), “नारद र विज्ञान&#039; (२००६)आदि । यी फुटकर कवितामध्ये &#039;जीवनचङ्गा&#039; ले लेखनाथमा आध्यात्मिकजीवनदृष्टिको सघन अन्जषणको अभिर्शंच बढिरहेको र त्यसलाई कतितात्मकपरिणति दिने चासो तीब्र भइरहेको सङ्केत दिन्छ भने &#039;गौँथलीको चिरिनिरी&#039;हरूले व्यक्तिवादी, बहिर्मुखी, सामन्ती र भौतिकवादी स्वार्थ र तृष्णाकाविपरीत मानवतावादी, अन्तर्मुखी, आर्ष र अध्यात्मवादी जीवनमूल्यतर्फलेखनाथको बढ्दो मुकाउलाई प्रस्तुत गर्दछन्‌ । &#039;विज्ञानको मोह” र &#039;नारद रविज्ञान&#039; जस्ता कविताबाटै सत्यकलिसंवादको विज्ञानप्रतिको कौतुक भाव रबुद्धिवितोदको विज्ञानतर्फ पनि सचेत पृष्ठभूमिपछि लेखनाथ विज्ञानलाई&lt;br /&gt;
नस&lt;br /&gt;
मनुष्यका दुरन्त भौतिक तृष्णाको विस्तारक तथा ध्वंसात्मक दिशातर्फविश्वसृष्टिलाई धकेल्ने तत्त्व ठान्दै विज्ञानविरुद्ध उभिरहेको देखिन्छ । प्रथमविश्वयुद्धदेखि दोस्रो बिश्वयुद्धसम्मका चार दशकमा लेखनाथले भौतिकसभ्यताको प्रतीक ठहन्याई यसका ध्वंसात्मक पक्षमा विशेष जोडसमेतदिएको अनुभव हुन आउँछ । &#039;पिँजराको प्यासा मैना&#039; कविताले लेखनाथकोआध्यात्मिक जीवनदृष्टिलाई विषय-तृष्णा र त्यसका अशान्तिज्वारका सन्दर्भमाविश्वबोधसहित प्रस्तुत गरेको छ र उनका &#039;सत्य सन्देश&#039; हरूले मानवीयआत्मिक उज्ज्वलतामा केन्द्रित आध्यात्मिक जीवनदृष्टिको आर्ष व्यञ्जनागरेका छन्‌ । पूर्वीय पुराकथाको पुनर्व्याख्या गर्दै भौतिक भोगवादीजीवनमूल्यका सीमाहरू औंल्याउँदै परम ज्योतिको आत्मिक अन्वेषणकोप्रक्रियातर्फ लेखनाथको संलग्नतालाई &#039;वंशीघरको दिव्य वंशी&#039; जस्ता कवितालेजनाएका छन्‌ । यी फुटकर कविताहरूका आलोकमा लेखनाथकोकवितायात्राको दोस्रो चरणको भौतिक तथा भोगवादी जीवनमूल्य र त्यसमूल्यका कारणले उब्जेका सामाजिक वैषम्य तथा बिश्व-वैषम्यप्रति पनिसच्चेत हुँदै पूर्वीय अध्यात्मदर्शनको युगीन प्रस्तुतिमा आधारित उदात्त चेतनाकाआवाहनतर्फ केन्द्रित भइरहेको तथ्य स्पष्टिन्छ । लेखनाथको यसचिन्तनप्रक्रियालाई उनको बुद्धिविनोदको प्रथम विनोद काव्य (१९९४) रलक्ष्मीपूजा नाटक (१९९४) का पद्यांशले पनि झूल्काएका छन्‌ भने उनकापूर्वोक्त फुटकर कविताहरूमा त्यो चिन्तनप्रक्रिया कन्‌रन्‌ खारिँदै आएकोपाइन्छ । यसरी लेखनाथको कवितायात्राको दोस्रो चरण क्रमश: चिन्तनशीलकवित्वतर्फ उन्मुख भएको र त्यसमा आध्यात्मिक चैतन्यको उज्ज्वलताकासाथ युगीन आदर्शोन्मेषसमैत प्रकट भइरहेको अनुभव हुन्छ । समाजबोध,विश्वबोधका क्रममा आध्यात्मिक जागृतिको यही उदात्त चैतन्यकै विस्तारितअभिव्यञ्जनाका त्िम्ति २००४ सालतिरदेखि तरुण तपसी नव्यकाव्यकासृजनामा प्रवृत्त भएको कुरा पनि यहाँ उल्लेखनीय छ ।&lt;br /&gt;
लेखनाथको कवितायात्राको प्रथम चरण बा पूर्वार्मा नै पनिआध्यात्मिक चिन्तनशीलता उनको कवित्वको एक विशिष्ट प्रवृत्ति वाअभिलक्षणका रूपमा रहेको हो । यही प्रवृत्तिविशैष नै उनको कवित्वको&lt;br /&gt;
ननम.&lt;br /&gt;
केन्द्रबिन्दु हुन आउनु र उनी चिन्तक कविका रूपमा प्रकट हुनु नै उनकोकवितायात्राको दोस्रो चरणको मूल घटना देखा पर्छ । तर लेखनाथकोचिन्तक व्यक्तित्व र कवि व्यक्तित्वको सुन्दर समीकरणका परिणति हुन्‌उनका कवितायात्राका दोस्रो चरणका अधिकांश कविता । जीवनकोआध्यात्मिक चिन्तन नै कविताको मुख्य विषयवस्तु रहे पनि त्यो चिन्तनभावमय हुनु र त्यो चिन्तनधर्मी भाव वर्णमात्रिक लय-लालित्य, शैली-समृद्धि, शिल्प-सामर्थ्य र संरचनाक्षमताको उच्च परिष्कारघर्मी सिद्धिद्वाराओतप्रोत रहनु उनका यस चरणका अधिकाँश कविताको वैशिष्टघ हो ।उनका &#039;जीवनचङ्गा&#039; जस्ता कवितामा चिन्तनचाप रहे पनि रूपपरक शक्तिपनि उत्तिकै बेजोड छ भने &#039;पिँजराको प्यासा मैना&#039; मा चिन्तन र भावरूपकोअन्योन्य उच्च सहकारिता देखिन्छ । &#039;पतितपावनी श्री गङ्गाजीको शाँकी&#039;जस्ता कवितामा शैलीको उच्च समृद्धि छ भने उनका अधिकांश कवितामाशैलीको त्यही माधुर्य र लयको लालित्यसँगै अलङ्कारविधान र संरचनाकोउच्चतम सामर्थ्यसहित चिन्तन भावमय भई परिष्कारधर्मी कवित्व चुलिएकोपाइन्छ र &#039;कालमहिमा&#039; जस्ता कविता उनको कवित्वका यस्तै उच्च्चतमक्षणका प्राप्ति हुन्‌ । अध्यात्मिक चैतन्यसँग कविता-कलाको समेत परिष्कृतसिद्धि नै उनको कवितायात्राको यस दोस्रो चरणको केन्द्रीय प्राप्ति हो । यसैपरिप्रेक्ष्यमा उनी २००४ सालको नेपालको साहित्यिक चहलपहलको मारआफूलाई &#039;हाँसेको साहित्यसागर&#039; ठान्न पुग्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
२००७ सालदेखि यताका लेखनाथका कवितामा प्रधमत: युग-परिवर्तनको उत्साहका साधै सङ्क्रमणकालीन नेपाली समाजका विविधअसङ्गतिप्रति व्यङ्यको प्रवत्ति तीव्र रूपमा प्रकट भएको छ र दोस्रो चरणमैदेखा परेको विश्वबोध र मनुष्यताका परिप्रेक््यमा आध्यात्मिक चैतन्यकोव्यापक आवाहनको प्रवृत्ति नै यस तेस्रो चरणका प्रारम्भिक अवधिमा पनिविस्तारित भइरहेको पाइन्छ । २०0७-२२ को समयावधि उनको उत्तरार्द्कवितायात्राको अन्तिम प्रहर र समुच्चा कवितायात्राको तेस्रो चरण पनिहो । परिष्कारवादी काव्यकलालाई सामाजिकता र युगोन्मेषका साथै विश्वबोधर जीवनबोधको प्रगतिवादी स्पर्शसहित उदात्त भावचिन्तनका केन्द्रीयतामा&lt;br /&gt;
नट&lt;br /&gt;
अँगाल्दै आफ्ना अन्य विविध प्रवृत्तिहरूलाई पनि समेट्दै आएको तरुणतपसी (२०१०) नै उनको यस चरणको शीर्षस्थ कृति हो । «उनको मेरोराम ।२०११) कीव्यचाहिँ रामभक्तिमूलक अध्यात्मचिन्तनको उपज कृतिहो र अमर ज्योतिको सत्य स्मृति काव्यचाहिँ महात्मा गान्धीका शोकमार स्मृतिमा लेखिएको आध्यात्मिक मानवताचादी युगोन्मेषको काव्य हो ।यीदुई काव्यको आआफ्नो महत्त्व हुँदाहुँदै,पनि समाजचेतना र अध्यात्मचेतनाकोसमीकरण बिन्दुमा विश्व र मानवताको अतीतवर्तमानको काव्यात्मकसर्वेक्षण गर्दै आर्ष, उदात्त, आध्यात्मिक चैतन्यद्वारा नै बीसौँ शताब्दीकोमनुष्यजातिको उपचार सम्भव ठहराउने महाकाव्यधर्मी तरुण तपसी नव्यकाव्यनै यस चरणको सर्वोच्च कृति ठहरिन आउँछ । वास्तवमा क्रतुविचार(१९९१) को परिष्कारवादी काव्यसौन्दर्यको उच्च सृष्टिपछि लेखनाथकोकवितायात्राको प्रौढ काव्यचैतन्यको अर्को परिपक्व काव्यकृतिका रूपमायो महाकाव्यधर्मी तरुण तपसी नव्यकाव्य देखा पर्छ । यस चरणमा उनकादुई कवितासङ्ग्रह लालित्य प्रथम भाग (२०१०) र द्वितीय भाग (२०२५)पनि देखा परेका छन्‌ । लेखनाथका कवितायात्राका विभिन्न चरणकाकविताकृतिहरू यी दुई सङ्ग्रहमा समाविष्ट छन्‌ तापनि यिनमा उनकाकविताहरूको क्रमतद्ध व्यापक सङ्कलन नभई आंशिक सङ्कलन मात्र हुनसकेको पाइन्छ । लेखनाथको कवितायात्राको तेसो चरणका सुरुसुरुकामुख्यमुख्य फुटकर कविता हुन्‌- युगबाणी (२००७), वर्षा (२००९), प्रगति(२०१०), कविताको खोजी, साहित्यको फुटबल (२०१०। आदि । यीकविताहरूमा एकातर्फ २००७ सालको परिवर्तनपछिको नवयुगको रन्कोछ भने अर्कातर्फ त्यस युगको सङ्क्रमणकालका अनेक सामाजिकअन्तर्विरोधप्रति व्यङ्ग्य छ अनि जीवनका अन्तर्बाह्य परिष्कारका स्वच्छआदर्शतर्फको कवितात्मक चासो पनि छ । यस सन्दर्भमा यी कविताहरूजीवनको अन्तर्बाह्य आध्यात्मिक उज्ज्वल कामनासहित प्रगतिवादी पुटपनि परेका कविता देखा पर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
समुच्चा कवितायात्राको अन्तिम दशक (२०१३-२२) मा लेखनाथकोरचनाप्रक्रियामा बुढ्यौलीको जर्जरता, शारीरिक शिथिलता र रोगव्याधिका&lt;br /&gt;
न्ठ्न&lt;br /&gt;
कारणले लेखनकठिनाइ आइपरे पनि उनको सृजनात्मक प्रतिभाचाहिँ अक्षुण्णनै रहेको पाइन्छ । २०१८ सालतिरैदेखि उनले लेख्न प्रयास गरेको गङ्गागौरीमहाकाव्य अपूर्ण नै रहेको पाइन्छ । गङ्गागौरी महाकाव्य अपूर्ण नै रहे पनि योमहाकाव्यांश, परिष्कृत भर्तृहरिनिर्वेद नाटक (२०२०) को पद्यांश र विभिन्नफुटकर कविताहरूले उनको कवितायात्राको तृतीय चरणको अन्तिम अवधिसम्मनै उनको सृजनात्मक प्रतिभा अफ नौला सम्भाव्यताका साथ छलबलाइरहेकोकुरा स्पष्टयाउँछन्‌ । यस तेस्रो चरणका प्रारम्भिक अवधिमा प्रगतिवादीवायुमण्डलको चाप तीव्र रहेको अनि सामाजिकता र आध्यात्मिकताकोसमीकरणको प्रक्रिया अँगाली उनको परिष्कारवादी कवित्व विशेष गतिशीलरहेको साक्ष्य तरुण तपसी र पूर्वोक्त फुटकर कविताहरूबाट प्राप्त हुन्छ भनेजीवनको सान्ध्य अन्तिम दशाकका &#039;कवितामा चाहिँ उनको समाज द्रष्टा रचिन्तक व्यक्तित्व अफ खारिँदै र अफ सौन्दर्ययुक्त हुँदै आइरहेको र त्यसलेराष्ट्रवादको युगीन सन्दर्भ अँगाल्नाका साथै आफ्ना पूर्वस्वच्छन्दतावादीकाव्यतत्त्वहरूतर्फ पनि पुनः चाख लिइरहेको सङ्केत प्राप्त हुन्छ । क्रतुविचारको उत्कृष्ट सौन्दर्यप्राप्ति र तरुण तपसीको उत्कृष्ट चैतन्यबिस्तारसहितपरिपक्व काव्यप्राप्ति दुवैको समन्वित बिन्दु हुन खोज्ने गङ्गागौरी महाकाव्यअपूर्ण नै रहे पनि लेखनाथको समुच्चा कविव्यक्तित्वको सान्ध्य उत्कृष्टसिद्धिको स्पर्श प्राप्त गरेका कतिपय फुटकर कविताहरू विशेष स्मरणीयदेखिन्छन्‌ र ती हुन्‌-हाम्रो इन्द्रेणी (२०१३), मेरो किशोर (२०२०), पूर्वस्मृति(२०२२) र आखिरी कबिता ।२०२२) आदि । यी कविताहरूमध्ये धेरैजसोमालेखनाथको आत्मसंस्मरणको मुद्राका साथै आध्यात्मिक जीवनचिन्तन रसौन्दर्यबोधसमेतको समन्तित उत्कृष्ट व्यञ्जना देखा पर्छ । आंशिकपुर्वस्वच्छन्दतावादी पुटसमेत परेको भाव-शिल्प-सौन्दर्यको उत्कृष्ट परिष्कारवादीकाव्यवाटिका क्रतुबिचार र सामाजिक-आध्यात्मिक चैत व्यको उत्कृष्टकलात्मक अभिव्यक्तिस्वरूप महाकाव्यधर्मी परिष्कारवादी नव्यकाव्य तरुणत्पसी को सृजनापछि यी दुवैको सङ्गमबिन्दुका रूपमा प्राकृतिक, सांस्कृतिक,राष्ट्रिय र आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्यमा लेखनाथले रच्न लागेको गङ्गागौरी महाकाव्यपूर्ण भएको भए त्यो जेजस्तो हुन्थ्यो त्यसको सङ्गत उनका पूर्वोक्त फुटकर&lt;br /&gt;
जाड&lt;br /&gt;
कृतिहरूबाट केही मात्रमा प्राप्त हुन्छ । यस तात्पर्यमा लेखनाथको कवितायात्राकोसम्भाव्य चौथो चरण अपूर्ण रही तेस्रो चरणभित्रै अन्तर्भुक्त देखा पर्छ ।&lt;br /&gt;
उपर्युक्त चर्चाको अन्त्यमा के भन्न सकिन्छ भने लेखनाथको ८२ वर्षेजीवनको लगभग ६० वर्षको कवितायात्रामा निरन्तर गतिशीलता, परिपक्वतार प्रतिभाको अक्षुण्णताका साथ उत्तरोत्तर सिद्धिका लक्षणहरू देखा पर्छन्‌ ।,यस कवितायात्राका क्रममा उनले नेपाली कविताको माध्यमिक काललाईतोड्दै -पूर्वस्वच्छन्दतावादको आंशिक स्पर्शसहितको नेपाली परिष्कारवादीकाव्यधाराको प्रवर्द्धन, प्रतिष्ठापन र नेतृत्व गरी नेपाली कविताको आधुनिकयुगको पहिलो प्रहरको सूत्रपात गर्नाका साथै नेपाली कविताका स्वच्छन्दतावादी,प्रगतिवादी र प्रयोगवादी धाराका चहलपहलका माफ पनि त्यस परिष्कारवादीकाव्यधाराको आजीवन संवर्द्धन गरेको पाइन्छ । उनी नेपाली वर्णमात्रिकगीतिचेतना वा छन्दचेतनाका सर्वाधिक ललित र परिष्कृत गायक हुन्‌ र्‌ उनीपरिष्कृत नेपाली काव्यभाषा, काव्यशैली र काव्यशिल्पका प्रथम पारखी स्रष्टाहुन्‌ । उनी नेपाली प्रकृतिको सौन्दर्यको सूक्ष्म पर्यवेक्षण र व्यञ्जना गर्ने प्रथमपरिष्कारवादी कविकोकिल हुन्‌ र उनी नेपाली समाजका सांस्कृतिक-आध्यात्मिकपुनर्जागरण-प्रक्रियाका प्रवक्ता काव्यकोविद्‌ हुन्‌ । नेपाली आध्यात्मिक चैतन्यपरम्परा र युगोन्मेषको समीकरणका बिन्दुमा विश्वबोध र मनुष्यता-बोधगर्ने क्रषि कवि वा कवि तपसीका रूपमा उनको स्थान सर्वोपरि छ । उनीआधुनिक नेपाली समाजका नैतिक-आध्यात्मिक कवि-गुरु हुन्‌ र आध्यात्मिककाव्यसौन्दर्यका सर्वोच्च नेपाली स्रष्टा पनि हुन्‌ । उनी हाम्रा प्राना कविहरूमध्येसबभन्दा नयाँ र हाम्रा आधुनिक कविहरूमध्ये सबभन्दा पुराना र जगकोभूमिका खेल्ने महान्‌ परिष्कारवादी कवि हुन्‌ । उनी नेपाली कविताकोपरिष्कारवादी (शास्त्रीय : क्लासिकल) काव्यधाराका सर्वोच्च चुली हुन्‌ ।उनका क्रतुविचार खण्डकाव्य र महाकोव्यधर्मी तरुण तपसीका साथै तीन-चार दर्जनजति उत्कृष्ट फुटकर कविताहरू उनको त्यही परिष्कारवादीकाव्यधाराका उत्तम कृतिका रूपमा नेपाली जातिका र नेपाली भाषाकाचिरस्मरणीय निधि हुन आएका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==लेखनाथका प्रमुख कविता==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== १. कविकवितालाप ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कवि-&lt;br /&gt;
भगवति ! ककिते ! देवी, जुगजुग तिम्रो म हुँ सदासेवी;&lt;br /&gt;
बाहिर निस्कन आज, किन माननुभो बडो लाज ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कविता-&lt;br /&gt;
रसिला गुणिजन हेरी, हाली अँगालो गलाविषे फेरी&lt;br /&gt;
रञ्जन पारी समाज, डुली रहेकी मलाई के लाज ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कवि-&lt;br /&gt;
तिमी भनि अरू सब बात, छोडी बिताये बसी रात;&lt;br /&gt;
तैपनि करुणा गरिनौँ, कसूर के देखि सामूमा परिनौ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कविता-&lt;br /&gt;
गर तिमी आफनु काम, न लेक बानु । कसूरको नाम;&lt;br /&gt;
मेरै कर्म अभागी, बुझेर दबिनरे कुना लागी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कवि-&lt;br /&gt;
जसका वश परि सुकृति, कहलाये व्यास वाल्मीकि प्रभृति;&lt;br /&gt;
मनमनमा धैर्य धारी, सौही तपाजी अभागिनी कसरी !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कविता-&lt;br /&gt;
सकदिन बानु ! सहन, अब अरु केही कुरा नभन;चरचरि चिरिनछ छाती, वाल्मीकि व्यास सम्झ्दामा ती ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कवि-&lt;br /&gt;
तिमी छौ रसरङ्गवती, भनेर, डाकेँ गरी ठूलो विनति;उल्टा आँशु खसाली, किन रुन लाग्यौ घुस्धुरु खालि ?&lt;br /&gt;
लेखनायका प्रमुख कविता /१&lt;br /&gt;
कविता-&lt;br /&gt;
व्यासादिक सत्कविले छोडि मलाई बिदा भये जहिले;उस दिनदेखि छु नङ्गी, छैन कुनै रङ्गिचङ्गिको भङ्गि ।कवि-&lt;br /&gt;
जाउन वृद्ध व्यासप्रभृतिक, तिम्रो भयो र के नाश?अक पनि सत्कवि हामी, खडा छँदै छौँ बडा नामी ।कविता-&lt;br /&gt;
शिब ! शिव ! यो बज्जसरी, शरीरभैदी कुरा सुनौँ कसरी,अब चुप चुप चुप बाबू । गन्यो मलाई अभाग्यले काब्‌ !कवि-&lt;br /&gt;
म गरख्लु तिमि भनि; मान, तिमि थुनछेउ स्वयं वृथा कान;हुन आयो कुन हेतु, रहेछ तिम्रो कहाँ केतु?कविता-&lt;br /&gt;
तिमि जस्ता बनि कविजी, गरदछु कविता भनेर पत्र फिजी;लागून यो केही दशा, न बिग्री हुनथ्यो कहाँ सहसा ।कवि-&lt;br /&gt;
मकन बेसरी पोली, न बोल अति पेचिला रुखा बोली;चिन्हिनौ कत्ति मलाई, जान तिमी व्यासको भाइ !!कविता-&lt;br /&gt;
आफ्नु शक्ति नजानी, नबने अबदेखि, पण्डितम्मानी;कुह् बरु धनिका ढोका, मिलछन पछि दानका पोका !!!कबि-&lt;br /&gt;
प्रतिभा पूर्ण छ मेरी, लेखि लगाएँ किताबको ढेरी,यस्तो सत्कवि सुजन, जानछु र ढोकाविषे म किन ?कबिता-&lt;br /&gt;
अक्षर अक्षर भाँची, कनि कुथि गरि खालि छन्दमा नाची;प्रतिभा नभये कसरी ? लेखन्‌ कन्था अगाडि सरी ।&lt;br /&gt;
२/लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
कवि-&lt;br /&gt;
लेखनशैली मेरी, प्रसादगुण-शालिनी हेरी;बालक पनि छन दङ्ग, थियो कि यो व्यासमा ढङ्ग ?कविता- £खतिदिनु दिन दिन कन्था, ग्रामीण भ्रष्ट बोलिको पन्था;बुसु्दछ पलटन सारा, चलदछ अनि बिक्रिको धारा ।कवि-&lt;br /&gt;
अपठित जङ्गलिलाई, समन सजिला किताब फैलाई;हुनुपरने यश मात्र, किन अपयशको भन्ने पात्र ?कविता-&lt;br /&gt;
छेक न दुप्पो पारी, कविता-सौन्दर्य बेसरी मारी;गरि उल्था खालि कथा, नभननु &#039;कवि हुँ&#039; भनेर वृथा ।कवि-&lt;br /&gt;
गरँला उन्नति भारी, तिमीकन सर्वाङ्ग- सुन्दरी पारी;भनने यो अभिलाषा, पेचि कुराले भयो नाश।कबिता-&lt;br /&gt;
यस्ता स्तन भनी लेखी, वर्णन गर ती कुरा पढे देखी;शिक्षित हुनछ समाज, पचदछ मनको सबै लाज ।कवि-&lt;br /&gt;
व्यासजिका पनि देख, . अनेक आँंगारका लेख;त्यसै गुङ्ि नहाँक, छोपनु परला वृथा नाक।कवबिता-&lt;br /&gt;
व्यासजिका लेख जति, हेरी हेरी सफा गराइ मति;पायेछीँ खुब सार भँडुवा ग्रामीण शंगार ।कवि-&lt;br /&gt;
हितकारी जो छ खडा, गरनु उसैका समीपमा फगडा;होला अनि सब जाति, काङ्गारियौली भलिभाँती ।&lt;br /&gt;
लेखनायका प्रमुख कविता /३&lt;br /&gt;
कविता-&lt;br /&gt;
जसले लेखन शैली, बिगारनाले भजऔै अति मैली,उहि मेरो हितकारी !! धन्य महात्मा दयाधारी !!!कृवि-&lt;br /&gt;
फिकिकन संस्कृत- नेल, गराइ भाषा वबिषे ठूलो मेल;खेलाजै जसलाई, शत्र उसैको भज्जे अरे !! हाई ।कविता-&lt;br /&gt;
ञ्रिकिकन संस्कृत- सारी, मर्यादा अङ्ग अङ्गको मारी,न नचायै उदर- दरी, भरीभराक हुने कसरी ?कवि- है&lt;br /&gt;
भाषामा उपदेश, लेखिदिनाले स्वयं बुढो देश;लिन सक्दछ शुभ शिक्षा, मागनु परदैन काहिँ गै शिक्षा ।कविता-&lt;br /&gt;
गर फगडा सब माफ, बल्ल सुनायौ मिठा कुरा साफ;देश सुधारन भाषा, कुञ्जि छ यो कालमा खासा ।कवि-&lt;br /&gt;
भाषाका गुणधारा, मालुम मनमा छँदा छँदै सारा;किन हो यतिनजेल, थापिरहेकी ठूलो रेल?कविता-&lt;br /&gt;
भद्दा अबनतिकारी, रसियाजस्ता किताबका भारी;दिन दिन बढ्ता देखि अघोर मनमा उठ्यो शैखी ।कवि-&lt;br /&gt;
शिक्षा विचारशाली, लेखन्‌ मिहिनेत मात्र हो खाली,गरदछ को रुचि यसमा, छन सब बोक्रे कथारसमा ।कविता-&lt;br /&gt;
रसिला नैतिक बात, लेखन उठ्दैन आफनै हात ?भ्रन बरु छ भने होस्‌ किन दिनु अरूमा वथा दोष ?&lt;br /&gt;
४ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
कृबि-&lt;br /&gt;
उपयोगी परिपाटी, लियेर कन्धा कटाकटी काटी;लेखनु यो कठिन कुरा, छन सब त्यस्ता कहाँ .चत्रा ?कविता-&lt;br /&gt;
उपकारी मर्मज्ञ, विचारवाला गुणी महाप्नज्ञ;भाषामा छैन कुनै, यो त बताज्रे स्वयं अघि नै।कवि-&lt;br /&gt;
अघिका सत्कवि जस्ता, मिलछन्‌ कविजी कहाँ सस्ता,तर तिमी हार नखाङ, स्थिर गर भाषाविषे पाउ ।कबिता-&lt;br /&gt;
होला शिक्षित देश, भनेर भाषाविषे सहैँ क्लेश;कविको पुगेन ढङ्ग, उल्टा मेरो टुटै अङ्ग।कवि-&lt;br /&gt;
दर्द बुझ चुपचाप, बस तिमी मनमा न लेक सन्ताप;आफनु जीबनसम्म, सुधार गर्ला सकेसम्म ।कविता-&lt;br /&gt;
अघितिर पुच्छर घुसारी, कविता प्रत्यक्ष लोकमा पारी;गंकनछौ तिमी यसरी, सुधार होला हरे! कसरी;कवि-&lt;br /&gt;
गुणवति ! सुन अबदेखि, गन्धन कन्धा बिकामका लेखी;गरने छैन दिमाक, पक्का यो चित्तमा राख।कविता-&lt;br /&gt;
बैस भन्यौ अबदेखि, विचारशाली मिठा कुरा लेखी;मेरो गरनु सुधार, शिरमा तिमी बोक यो भार ।कवि-&lt;br /&gt;
पहिले अलि अलि . हाँसी, नुहिकन पछि बेसरी छाँसी;अर्ति दियौ हितकारी, नपाइ शाकना ठूला भारी ।&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता /५&lt;br /&gt;
कविता-बढिया हो &#039;यो वचन,. तिमीसित शिवजी सदा खुसी रहन;बन्द - गरौँ सब बात, सुत अब धेरै गयो रात।- प्रार्थनाखुसिसित बसि मेरो लेख यो हेरि साफगुण जति लिनु होला दोषमा पाउँ माफ ।भनि नुहिकन सारा मित्रमा प्रीतिसाथगरदछ कर जोडी प्रार्थना &#039;लेखनाथ&#039; ॥&lt;br /&gt;
वि. सं. १९६९ लालित्यबाट&lt;br /&gt;
६लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==२. नैतिक दृष्टान्त==&lt;br /&gt;
बडाले जो गन्यौ काम हुन्छ त्यो सर्व-संमत ।छैन शङ्करको नङ्घा, मगन्ते भेष निन्दित ॥&lt;br /&gt;
॥।गरदैन ठूलो व्यक्ति मर्यादा-स्थिति-लङ्खन ।बसेको छ महासिन्ध सीमाबद्ध बनीकन ॥र्‌ £दबिन्छ गुणिको दोष गुणका राशिमा परी ।रश्मिले चन्द्रको दाग दबाएकै छ बेसरी ।त ३कसैको लोकमा छैन एकैनास समुन्नति ।अरूको के कुरा हेर सन्ध्यामा सूर्यको गति ॥॥&lt;br /&gt;
छोटो बढ्यो भने ज्यादा फूर्ति ढाँचा बढाउँछ ।&lt;br /&gt;
उलँदो खहरे हेर कत्तिको गड्गडाउँछ ॥द्‌&lt;br /&gt;
ज्यादा सोको हुनूभन्दा टेढिनु छ फला५धिक ।&lt;br /&gt;
गरदैन कुनै सोग्गो ग्रहको पूजना$५दिक ॥॥&lt;br /&gt;
टपर्टुञ्या पनि हुन्छ मूर्खमध्ये प्रतिष्ठित ।&lt;br /&gt;
बोलने को अँध्यारोमा महा$६५त्मा जुन्किरीसित ॥७&lt;br /&gt;
लेखनायका प्रमुख कविता /७&lt;br /&gt;
सानैदेखि छुचो हुन्छ दुष्ट मानिसको मति ।&lt;br /&gt;
घोचने जङ्गली काँढा पहिले नै तिखा कति ॥यू&lt;br /&gt;
मिलेर काम गर्नाले हुन्छ अत्यन्त फायदा ।&lt;br /&gt;
एकता हेर कस्तो छ मौरीको महमा सदा ॥९&lt;br /&gt;
जो दिंदैन उही दिन्छु भनी गर्जन्छ सत्त्वर ।&lt;br /&gt;
जो हो नवर्षने मेघ उसैको हुन्छ घर्घर ॥१०&lt;br /&gt;
हुनुपर्दछ मौकामा शत्रुको पनि सेवक ।&lt;br /&gt;
कोइली कागकै बच्चा बन्छ सानू छँदा तक ॥9 ११&lt;br /&gt;
गुणग्राही जहाँ छैन वहाँ के गरला गुणी।&lt;br /&gt;
.कौडीमा तक मिल्किन्छ भिल्लका देशमा मणि ॥१२&lt;br /&gt;
योग्य स्थानविषे मान सानाले पनि पाउँछ ।&lt;br /&gt;
कृ्‌ष्णाका तटको ढुङ्गा देवता कहलाउँछ ॥१३&lt;br /&gt;
उपकारी गुणी व्यक्ति निहरन्छ निरन्तर ।&lt;br /&gt;
फलेको वृक्षको हाँगो नमुकेको कहाँ छ र॥१४&lt;br /&gt;
मेटिँदैन कसैबाट आफनू कर्मपद्धति ।&lt;br /&gt;
बतवासी बने राम चौधै भुवनका पति ॥११&lt;br /&gt;
धर्म हो धीरको धैर्य राखनू दु:ःखजालमा ।&lt;br /&gt;
मान्‌ मौनव्रती हुन्छ कोइली शीतकालमा ॥१६&lt;br /&gt;
५/ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
सारा सार लिई कन्था छोडी-दिन्छ गुणी जन ।&lt;br /&gt;
रस चसेपछि भृङ्ग फूलमा भूल्दथ्यो किन ?१७&lt;br /&gt;
सङ्घले पनि जाँदैन दुष्टको दुष्टता रिस ।&lt;br /&gt;
श्रीखण्डमा बसी सर्प कहाँ हुन्थ्यो र निर्विष ॥१८&lt;br /&gt;
मूर्खका मनमा अर्ती गालीतुल्य बि्ाउँछ ।&lt;br /&gt;
दूधपान गरी सर्प खालि विष बहाउँछ ॥१९&lt;br /&gt;
वि. सँ. १९७४ गोरखाशिक्षाको तेसो पुस्तकबाट&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता /९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ३. वसन्त कोकिल ==&lt;br /&gt;
भरी लता वृक्ष विषे टनाटननवीन लाखौँ फूल पालुवाकन ।बसन्त आयो कलकण्ठको अबसुनिन्छ साह्ै कल कण्ठ-गौरव ॥१अगाडि जो दीन बनी लुकीकनबिताउँथ्यो केवल दु:खमा दिन ।अहो ! उही कोकिल हेर आज योप्रमोदले पूर्ण महासुखी भयो ॥&lt;br /&gt;
01बसी बगैँचा-बिच मोजमा परीनयाँ कलीला सहकारमञ्जरी ।चपाउँदै मस्त भएर बेसरीकुहकुहू गर्दछ त्यो घरीघरी ॥&lt;br /&gt;
21चलीरहेको छ सिरी सिरी हवाजुलीरहेछन्‌ सब मञ्जु पालुवा ।जता दियो दृष्टि उतै खुसी मनप्रमोदले पूर्ण नहोस त्यो: किन ?॥॥ 4&lt;br /&gt;
१०४ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
वि. सं. १९७४&lt;br /&gt;
समीरले पुष्प परागको फ्रीलगाउँदा त्यो रसरङ्गमा परीमुलीरहेको छ शरीर बेसरीमुछेर तेही रजमा घरीघरी ॥श्रपिएर सा५५नन्द रसालको रसघुमाउँदै नेत्र दुवै मदाभ्लससहर्ष खोलौं सुरिलो गलाकन&lt;br /&gt;
घनक्क घन्काउँछ त्यो सबै वन ॥&lt;br /&gt;
द्‌घरीघरी भुर्र उडी अलीकतिघुमेर शाखान्तरमा यताउति ।बडो बहाडी रसिकै बनी तहाँढलीमली गर्दछ पालुवामहाँ ॥७चुचो ठडाईकन चट्ट मञ्जरीढुँगेर च्यापीकन देखिने गरी ।फरक्क फर्कन्छ घरी पछिल्तिरप॒सन्नता-साथ लतारि पुच्छर ॥दन शीत-बाघा, न त घामको डरन बाग नङ्गा, न त वृष्टिको पिर ।बसन्तका गौरवले गरीकनखुसी छ साह्कै कलकण्ठको मन ॥९&lt;br /&gt;
गोरखाशिक्षाको तेसो पुस्तकबाट&lt;br /&gt;
लेखनायका प्रमुख कविता /११&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ४. जीवन-चङ्वा==&lt;br /&gt;
कछुवाले अङ्गसरी खुम्च्याई बाह्य वृत्तिका तार ।भित्र अलकति हेर्दा अर्कै रसिलौ चमत्कार ॥&lt;br /&gt;
१दुर्गम भै उर्लेकी तलतिर समतुल्य मोहकी गग्ना ।फरफर गर्छु उपर यो जीवनमय पातलो चङ्गा ॥&lt;br /&gt;
र्‌ममतासहित अहन्ता ग्रन्थि परेका बडा रम्य।सुखदु:खका कका छन्‌ खूब मिलेका दुवै टम्म ॥१ ,&lt;br /&gt;
मनमय घुम्छ लटाइ फनफन फन्का पलापला मारी ।&lt;br /&gt;
अतिशय दुर्लभ तर त्यो रसिक लटाई लिने चमत्कारी ॥॥ ॥ 1&lt;br /&gt;
सङ्गल्पको छ धघागौ छुटी रहेको लगातार ।&lt;br /&gt;
गर्दछ जसका भरमा जीवन-चङ्गा विचित्र संचार ॥५&lt;br /&gt;
त्यो मसिना धागामा खिरिलोपन ल्याउने ताजा ।&lt;br /&gt;
घसिएको बहुत सफा विवेक, बुद्धिको माजा ॥&lt;br /&gt;
ददचङ्गाको मुखचाहिँ पवृत्तिमय रङ्गले लाल ।&lt;br /&gt;
अलिअलि कालो आशा-पुच्छर, उसको छ चलबले चाल ॥७&lt;br /&gt;
१२/लेखनायका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
वैषम्य झै ककामा अलिकति गतिमा घुस्यो भने दोष ।&lt;br /&gt;
ग्वाँख मिलाउनलाई संयम, सुविचार, शान्ति, सन्तोष ॥द्‌&lt;br /&gt;
यस्तो अद्भुत चङ्गा तयार पारी बडो चमत्कारी ।&lt;br /&gt;
नभमा कौतुक गर्ने कुन होला धीर अविकारी ?&lt;br /&gt;
९जतिजति गडेर हेर्छु यस चङ्गाको विचित्र संचार ।उतिउति शून्य गगनमा विलिन हुन्छु न देखदा पार ॥१०कहिले नीलो दहमा सफारी माछो सरी भरी।लीला गर्छ गगनमा चक्कर लाखौँ थरी मारी ॥११कहिले प्रेम हावामा सररर अक्कासिँदै जान्छ ।कहिले फरक्क फरकी तम तल कौँठी पनी खान्छ ।१२कहिले भुजङ्गजस्तै सुलुलुलु बग्दै बटारिन्छ ।कहिले वबिधिवश बिचमा अरूअरूसँग बेसी लठारिन्छ ॥&lt;br /&gt;
१३कहिले पुगेर माथि सोकै बहँदै शनैः शनै: सल्ल ।निश्चल टक्कर मारी अडिन्छ बँउडाइ-बोहरी-तुल्य ॥१४जलचर नभचर सबका सुन्दर लाखौँ थरी चाल ।देखिन्छन्‌ यही हाम्रो जीवन-चङ्गा विषे सदाकाल ॥१५अक्काशिएर ज्यादा माथि जाँदा हराउने भय छ।तल गङ्गा-लहरीले लपक्क पार्ने विछट्ट संशय छ॥१६&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता /१३&lt;br /&gt;
शीतल सरसर बहने बीच गगनको सफा हावा ।&lt;br /&gt;
जति पायो उति यसले खान्छ गजब चालले कावा ॥१७&lt;br /&gt;
कहिलेदेखि उडेथ्यो? अब उड्ने हो कति बेर।&lt;br /&gt;
आखिर चङ्गा ठहतन्यो चुँडिनालाई छ के बेर?१८&lt;br /&gt;
जति दिन यो उड्ने हो उति दिन उडन्यै छ बीचमा नअडी ।&lt;br /&gt;
तर त्यो देखिनुपरने अद्भुत चङ्गा उडाउने लहडी ॥१९&lt;br /&gt;
जय जगदीश्वर ! देखेँ विश्वव्यापी प्रकाश त्यो खास ।&lt;br /&gt;
सृक्ष्म लटाईभित्रै रहेछ प्रभुको निवास वा भास ॥२०&lt;br /&gt;
वि. सं. १९९२ शारवा वर्ष १ सङ्ख्या २ बाट&lt;br /&gt;
१४ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ५. गौँथलीको चिरिबिरी (१)==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म बस्ने कोठाकै दलिन-बिचमा गौँधली बस्यो,पिटाएको तन्नाउपर फिर मैला पनि खस्यो।मलाई त्यो देखी हृदयबिच लाग्यो किरकिरीचरी बोल्यो मेरो मन सब बुकी त्यो चिरिबिरी ॥१अहो !! त्यस्ता ताता नजर अति राता विष सरीतरी तात्यौ बाबा ! किन मनमनै त्यो रिस गरी ।तिमी धर्मात्मा छौ घरबिच म छू आज अतिथितिथी माघे औँसी शहरभर भूकम्प-फजिती ॥र्‌जहाँ बस्थ्यौँ हामी भवन उहि पातालमय भोचल्यो भारी हा हा नसहिसकनू नै प्रलय भओ।कहाँ पाउँ ठाडो घर, कसरि ओतौँ शिर भनीदुवै भाले-पोषी फनफन घुम्यौँ व्याकुल बनी ॥&lt;br /&gt;
डेबिरालोको फेरि अधम चिलको, काग शठकोशिकारी बोहोरी, कुकुरहरुका दुष्ट हठको ।परी शङ्का भारी सबतिर बिचारी डुलिड्लीनिराशामा एन्थेँ अघि अघचिलो ठाम नमिली ॥॥ $&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता / १५&lt;br /&gt;
यहाँ तिम्रो सानू घरमहल वा रामजुपडीखडा. देखी राम्रो गगन-बिच खेल्दै लडिबुडी ।पसेको हुँ बाबा ! अलि दिन बसूँला कि म भनीप्रियाको आगामी प्रसव दिनको उत्सव गनी ॥५तिमी भन्छौ मेरो सकल घर यो खास यसमाचरी घुस्प्रो सानू कुन चिरबिरे रङ्गरसमा ।म भन्छू हे बाबा ! घरमहल मेरो छ नभनपलामा घर्केका घरउपर दौडाउ नयन ॥0निमेषैमा भत्की घररर गरी घर्र त्यसरीढली ज्यानै हर्ने घर छ डरको दीर्घ भुमरी ।विधाताको भित्रै मधुर करुणाको रस परीपरेनौँ तै हामी विकट भुमरीमा अरु सरी ॥७&lt;br /&gt;
तिमी जान्ने सुन्ने मनुज चतुरा, हामी बिचराचरा साह्दै साना अबुरु वनका केवल किरा ।तथापी श्रद्धाले फुकि विनति गर्छु म सरसवथा मेरो भन्ने जटिल ममता-ग्रन्वि नकस ॥द्‌खुला पारी राम्रो सँग नयनको भित्र नयनबिचारी यी सारा गृह-विभवको चञ्चलपन ।दयालु भै रोक मिलिजुलि सबै वान्धवसितभलो होला जाक, रिस नगर रन्केर मसित ।९कुनै पल्टेका छन्‌ मलिन मुख लाई रुखमनिकुनै रुन्छन्‌ बाटो-बिच नमिलि सानू रुख पनि ।&lt;br /&gt;
१६“ लेखनायका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
कनै भोका शोका५५कुल मरिरहेछन्‌ नगरमाहरे ! तिम्रो यस्तो कुन तुजुक यो तृच्छ घरमा ॥१०त्यहाँ त्यो शय्यामा गर तिमि खुशीसाथ शयनयहाँ यो डन्डीमा बसिबसि म चिम्लन्छु नयन ।अरू सेरोफेरो सब मुफत मेरो छ नभनअघी मेरो भन्ने। कतिकति गए ती सब गन ॥११उघारी त्यो भारी मधुर कषणा-द्वार मनकोगरी रक्षा सारा विकल बिचरा दीन जनको ।यता विश्व-प्रेमी बन, मनुज चोला सफल होस्‌उता स्वर्गद्वारा क्षणभर पनी बन्द नरहोस्‌ ॥१२तिमीभन्दा लाखौँ गुन अफ धनी मानिस पनिडुलेका छन्‌ बाबा ! फगत भिखमङ्गासरि बनी ।विधाताको सारा अघट घटना सम्कू मनमासबै मेरो मेरो भनि नभुल यो मोह- वनमा ॥१३,कदाचित्‌ यो तिम्रो भवन चकनाच््‌र पहिलेहुँदो हो ता हन्थ्यो कसरि किन यो भेट अहिले ।दया राख्यो भारी सदय विधिले सङ्गत भयोसुन्यौ मेरो सानू चिरिबिरि, सबै पाठ पढ यो॥१४कसै सक्तैनौ यो यदि तिमि भने घच्च सहनमलाई द्यौ बाबा ! फगत अब यौ रात रहन ।म भोली नै जान्छु नुपतिसँग भूकम्प कहनपखेटा छन्‌ सक्छू अफ्‌ त नभमा सर्र बहन ॥१५&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता /१७&lt;br /&gt;
गरी यस्तो राम्रो चिरिबिरि चरी त्यो चुप भयो&lt;br /&gt;
भनेँ मैले भैगो तँ बसि कुद्टि दे गैह्र घर यो।&lt;br /&gt;
पखेटा पैँचो दे बरु म पछि आएर तिएँला&lt;br /&gt;
दयाधारी राजासित सकल मै बिन्ति गहँला ।१६&lt;br /&gt;
बि. सं. १९९२ शारदा वर्ष १ सङ्ख्या ७ बाट&lt;br /&gt;
१८ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==६. सत्य सन्देशहरू==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कालो मन्दाकिनीको जलजल, निधिको मोतिको जोति कालो,&lt;br /&gt;
कालो सौदामिनीको चहक, सब शरच्चन्द्रको कान्ति कालो ।&lt;br /&gt;
कैलाश-श्रेणि कालो, कूलमल गरने सूर्यको बिम्ब कालो&lt;br /&gt;
यो सारा सृष्टि कालो, मनबिच्च छ भने दम्भ दुर्भाव कालो ॥१&lt;br /&gt;
थोत्रो पाटी उज्यालो, मलिन तृणकुटी, कन्दरा झन्‌ उज्यालो&lt;br /&gt;
भिक्षा भारी उज्यालो, अझ धन वनको शागशिस्नू उज्यालो ।&lt;br /&gt;
फ्याङ्लो गुन्द्री उज्यालो, वरपर घुमदा जीर्ण कन्था उज्यालो&lt;br /&gt;
तृष्णाको तुच्छ जालो मनबिच नभएर जो मिल्यो सो उज्यालो ॥१&lt;br /&gt;
भर्दाभर्दै हजारौँ विषय-सुख-घडा देह लम्तन्न पर्दा&lt;br /&gt;
र्कर्दा सम्पूर्ण सेखी, तुजुक, पवनले निस्कने जोड गर्दा ।&lt;br /&gt;
सर्दा आपस्त डैं परपर, धमिलो नाचको अन्त्य पर्दा&lt;br /&gt;
गिर्दामा साथ जाने क्न कुन चिज हुन्‌ ? सम्क ती काम गर्दा ॥१&lt;br /&gt;
विद्याको, वयको र बुद्धि, बलको, सौन्दर्यको, मानकोप्रज्ञाको, कुल-जातिको, इलमको ऐश्वर्षको ज्ञानको ।तातो ग्यास मनुष्यका मगजको सम्पूर्ण उत्री दिएपृथ्वीमा सब देवता घरघरै आएर खेल्ने थिए ॥&lt;br /&gt;
बि. सं. १९९१ शारदा बर्ष ४ सङ्ख्या ३,४,५ र १२ बाट&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता /१९&lt;br /&gt;
मत्ता हात्ती हलुङ्गो, वितत जलधिको ह्वेल माछो हलुङ्गोजङ्गी बेडा हलुङ्गो, विकट कटकटै रेलगाडी हहलुङ्गो ।शैलश्ेणी हलुङ्गो, पृथुतम पृथिवी-गौल सारा हलुङ्गोयो बह्माण्डै हलुङ्गो, जब सब मनकी तिर्सना लाग्छ टुङ्गो ॥&lt;br /&gt;
वि. सं. १९९९ शारदा वर्ष ८ सङ्ख्या ३ बाटदोषी माता-पिताका वचन, गुरुजना६५देश निःशेष दोषीसत्त्या(५त्मा मित्र दोषी, गृह-परिजनको चाल देखिन्छ दोषी ।&lt;br /&gt;
पत्नीको प्रेम दोषी, अमृतमय मिठा बेदका वाक्य दोषीयो सारा सृष्टि दोषी, विधि-वश छ भने आफन्‌ू दृष्टि दोषी ॥&lt;br /&gt;
वि. सं. २००० शारदा वर्ष ९ सङ्ख्या ६ बाट&lt;br /&gt;
२०४ लेखनायका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ७. विज्ञानको मोह==&lt;br /&gt;
सानू विज्ञान पैले जुन उदित हुँदा साहसी मर्त्यजातिगर्थ्यौ छाती फुलाई पलपल सुखका कल्पना भाँतिभाँति ।सोही उन्मत्त भस्मा५सुर बनि अहिले बाहु लम्बा पसारीपीछा गर्दो छ दौडी विकट मुख लिई सर्वसंहारकारी ॥१जस्को नि:सार बोक्रो चहलपहल वा रङ्गमा दङ्ग मानीभुल्दामा पेट-पूजा विधि विकट बन्यो भार भो जिन्दगानी ।उस्कै आराधनामा अरु किन यसरी मर्छ यो मर्त्यजातिकस्तो विश्वास, भक्ति, प्रणय शिव ! हरे ! तुच्छ विज्ञानमाथि ॥र्‌चाहे विज्ञान पैले त्रिभुवनभरको सार सारा उतारोस्‌चाहे आकाशमाथी किसिमकिसिमको सृष्टि-शोभा फिँजारोस्‌ ।त्यो त्यस्को तुच्छ बोक्रे चटकमटक हो भित्र अर्कै छ चर्कोसर्को लाग्दो अशान्ति-ज्वरमय सरुवा व्याधिको दीर्घ धर्को ॥&lt;br /&gt;
३यो विद्याले सबैको हृदयबिच ठूलो उन्नति-भ्रान्ति पारीदैवी सम्पत्ति, मैत्री, शम दम, करुणा, शान्ति, सन्तोष मारी ।खित्का छोडेर गर्दा जटिल जहरिलो ग्याँसको अट्रहासको हेर्ने शास फेरी उस बखत कठै !! सृष्टिको सर्वनाश ॥॥&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कबिता / २१&lt;br /&gt;
यै छोटो जिन्दगीमा अमृतं पद दिने विश्वकल्याणकारी&lt;br /&gt;
उस्तो अध्यात्म-विद्या-विषयक महिमा मोहले दूर सारी ।&lt;br /&gt;
फोस्रो विज्ञानमाथी जतिजति गहिरो गर्दछौँ प्रेम हामी&lt;br /&gt;
रुन्छन्‌ सम्पूर्ण पृध्वी उतिउति डरले थर्थराएर कामी ॥1&lt;br /&gt;
वि.सं. १९९५ शारदा वर्ष ४ सङ्ख्या ६, ७ बाट&lt;br /&gt;
२२/ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==८. पतित-पावनी श्री गङ्गाजीको झाकी==&lt;br /&gt;
ठाडै कैलाशदेखीद्रुततर गतिले गड्गडाएर क््दीर्स्दा श्रीशङ्करैकोगल-गलित ठुलो सर्पकैँ सल्ल पर्दी ।लाखौँ चट्टान चिर्दीबिकट गिरिशिला-कन्दरा चूर्ण गर्दी ।बन्दै नाची दगुर्दी,श्रबण-विवरमा नित्य संगीत भर्दी ।१आमा ! भन्दै करैकासकल गिरिनदी काखमा टप्प धर्दीछर्दी पीयूष जस्ताजलकण लहरी-हस्तले, मस्त पर्दी ।कालो बर्दी-सरीकोकलिमल मनको ध्वस्त पारेर हर्दीगङ्गामा भुक्ति-मुक्तिदुद्ग दिदि-बहिनी नित्य खेल्छन्‌ कपर्दी ।र्‌&lt;br /&gt;
वि.सं. १९९८ शारदा वर्ष ७ सङ्ख्या ६ बाट&lt;br /&gt;
सेखनायका प्रमुख कविता /२३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==९. बंशीधरको दिव्य बंशी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सारा भौतिकवृन्दरूप जड यो विस्तीर्ण वृन्दावनघन्काएर घनक्क, भित्र उसमा भर्दै नयाँ जीवन ।हे बंशीघर, ! विश्वमोहन ! परा बाग्रूपिणी बाँसुरीफुक्छौ नित्य नयाँ नयाँ सुर किकी व्यामोह-वर्षा गरी ॥&lt;br /&gt;
१त्यो चर्को सुरबाट जागृत बनी तिम्रो गरी खोजनीघुम्ने रासविलासको रहरमा धीवत्ति छन्‌ गोपिनी ।&lt;br /&gt;
साथै छौ; तर लुक्नमा चतुर छौ, हाँसी रहन्छौ लुकीत्यै तिम्रो रस-रङ्गमा छ रसिलो यो सृष्टिको चक्चकी ॥२&lt;br /&gt;
वि.सं. १९९९ शारदा वर्ष ८ सङ्ख्या ८ बाट&lt;br /&gt;
२४ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==१०. युगवाणी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रिय नेपाली शूरवीर हो, नवयुगको यो संक्रान्ति-समय छ, यसमा नचढोस्‌ तिमिमा फूट-बैरको भ्रान्ति !एकै तन भै एकै मन भै देश-कालको गति जानीबढ्दै जाङ, चढ्दै जा, भन्दछ यो युगवाणी ॥&lt;br /&gt;
१तोडचौ हुकुमी साङ्ला, फाल्यौ फ्याङ्ला खड्गनिशानामुयाङ्ला काटचौ सब मर्जीका, बदल्यौ स्थिति र जमाना ।अब तिमी नै छौ सेवक, तिमि नै मालिक, यो पहिचानीलाग निरन्तर देशोन्नतिमा भन्दछ यो युगवाणी ॥॥दुःशासनले केश खिच्नेकी द्रुपदकुमारी जस्तीदुःख दर्दको विकट दल्दलमा बिचरी पलपल फस्ती ।जन्मभूमिका सुनीनसक्ना लम्बा करुण कहानीसुन्दै जाङ, गुन्दै जाक भन्दछ यो युगवाणी ॥डैगर्नैपर्दछ अब तिमि सबले नव राष्ट्रको निर्माणयसमा तिलभर नहट पछाडी, चाहे जाओस्‌ प्राण ।वीर देशका वीर तिमी छौ वीरव्रतका अभिमानीनजुकोस्‌ तिम्रो वीरपताका, भन्दछ यो युगवाणी ॥डे&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता / २५&lt;br /&gt;
हिमगिरितटका सब बासिन्दा तिमी दुनियाँ छौ कोटिएकमती भै हात बढाउ कर्तव्यमा दुई कोटि।फुट्टाफुट्टै दूर देशमा कल्लीगिरि बा दरबानीगर्दा गर्दै जनम नजाओस्‌, भन्दछ यो पुगवाणी ॥१जुन तागतले एक शताब्दीतक सब यो नेपालरगत सुकाई जर्जर नंगा पात्यो नरकंकाल ।उसको छाया छाप उडाक नगरी आनाकानीभर अब अर्कै दिव्य जवानी, भन्दछ यो युगवाणी ॥1भरखर जननी जन्मभूमिका तोडचौ साङ्ला सिक्रीऔषदको नै पहिले इनको गर्नुपर्द छ बिक्री ।यस मौकामा केही नसोची पछिको लाभ र हानिकिन खलबलिने ? किन अलमलिने ? भन्दछ यो युगवाणी ॥७&lt;br /&gt;
राजा रैती एक मतो भै ल्याएथ्यौ त्यो क्रान्तिअब सब बदली क्रान्ति-लहर ती ल्याउनुपर्दख शान्ति ।त्यसका लागि बारिक मनले छानी दूध र पानीकर्मयोगमा वन सहयोगी, भन्दछ यो युगबाणी ॥यअडबेखडबे डाँडाकाँडा तोडीफोडी सारासंथल पारी उसमा जारी कर्नाका जलधारा ।पार सबैतिर लहलह खेती, सुक्न नपाओस्‌ पानीमुलुकै सुखमय बन्दछ त्यसले, भन्दछ यो युगवाणी ॥2पूर्व र पश्चिम उत्तर दक्षिण रस्ता निस्कून्‌ खासारेल र मोटर तिनमा दौड्न्‌, बस्नू नपरोस्‌ बासा ।&lt;br /&gt;
२६/लेखनायका प्रमुख कबिता&lt;br /&gt;
घरघर बिजुली, कल, कार्खाना, कपडा अन्न र पानीइच्छा माफिक सबले पाउन्‌, भन्दछ यो युगवाणी ॥१०ग्रामैपिच्छे शिक्षा पाकन्‌ लाखन बालबालाकुनै कुनामा घुस्न नपाओस्‌ गरिबीपनको ज्वाला ।सबका घरघर डबल होस्‌ व्ययभन्दा आम्दानीधर्म सनातन तब पो रहला, भन्दछ यो युगवाणी ॥११उच्च हिमाचल सेती गाई, तल उपपर्वतँ-मालाधूनसरी छन्‌ दूध-बराबर रत्न अनेक उज्याला ।दुहुनैपर्दछ ती सब तिमीले किसिमकिसिमका खानीतब पो रहला तिम्रो पानी, भन्दछ यो युगवाणी ॥१२अहिले अग्ला दशं-आठोटा रङ्गमहलमा खालीचहलपहलका साथ निरन्तर खेल्दछ जो खुसियाली ।त्यो सब सुप्रामुप्राहरूमा ल्याउनुपर्दछ तानीनत्र भयो के ? दु:ख गयो के ? भन्दछ यो युगवाणी ॥१३&lt;br /&gt;
वि.सं. २००७ युगवाणी वर्ष ४ अङ्क ४२-४३ बाट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==११. वर्षा==&lt;br /&gt;
सं सं सं सं पानी बस्यौ अब वर्षा क्रतु आयो ।विश्वशान्तिको खातिर बढ्दो क्रान्तिवीरमँ घनघोरगर्जन गर्दै घन-मण्डल त्यो नभमा सबतिर छायो ॥ म सं ...&lt;br /&gt;
लपलप गर्दो असिघारालँ चमचम बिजुली उसमासुषमा भर्छे, त्यसले सबको खुसियाली मुसुकायो ॥ सं फं ...&lt;br /&gt;
उस ज्वालाले सुकी सकेका तृण, तरु, लहरा सारालहलह गर्दै उठे पल्हाये, हरियाली लहरायो ॥ मं म्रै ...&lt;br /&gt;
खलखल खोला, छरर छहरा टिलबिल टिलबिल सरिताधनरस-भरिता धरणी रसिली त्यो सब ताप विलायो ॥ सं कं ...&lt;br /&gt;
घुलो धमिलो हालि नयनमा, दुनियाँ अन्धो पारीभतभत पोल्ने उष्ण पवनले शीतलता अपनायो 7 सं छं ...&lt;br /&gt;
घनरव सुन्दै नाचिरहेछन्‌ मदले मत्त-मयूरमनमन भन्दछ कोकिल कसले युगपरिवर्तन ल्यायो ॥ सं सं...&lt;br /&gt;
वि.सं. २००९ भारती वर्ष ४ अङ्ग १ बाट&lt;br /&gt;
२८ लेखनाथका प्रमुख कबिता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==१२. सरस्वती स्मृति==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मिही प्राशै वीणा, मन मुदुनखी, कम्प कलना;गरी लाखौँ ञिक्ती स्वर-मधुरिमा स्मेरवदनारसीलो फक्रेको हृदय-कमलै आसन गरीबसेकी वाग्दैवी क्षणभर नबिसूँ जुनिभरी ॥१सफा वर्णा५५कार स्फटिकमय मालाकन घरीजगत्‌मा तदृद्वारा व्यवहृति-कला शीतल गरी ।सदा भर्दै हाम्रो हृदयबिच आलोक-लहरीबसेकी वाग्दैवी क्षणभर नबिसूँ जुनिभरी ॥र्‌सुनेको, देखेको, अनुभव गरेको जति कुराकुनै आघा मात्रा तक नछोडी सब पुरा ।छपाई-राखेको स्मृतिमय महापुस्तक घरीबसेकी वाग्दैवी क्षणभर नबिसूँ जुनिभरी ॥३यही हाम्रो भित्री हृदयमय गम्भीर सरमाडुबी उत्री खेल्दो, चपल, चटकी हंसबरभा ।चढी लीला साथै भुवन महिमा जीवित गरीबसेकी वाग्दैवी क्षणभर नबिसूँ जुनिभरी ॥1&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता / २९&lt;br /&gt;
जगद्व्यापी मेरो अति मधुर यो जीवन-कला&lt;br /&gt;
बुर््यो जस्ले उस्को कसरि भय अज्ञान रहला ।&lt;br /&gt;
भनी सामुन्नेमा वर अभय मुद्राकन घरी&lt;br /&gt;
बसेकी वाग्दैवी क्षणभर नबिसूँ जुनिभरी ॥र&lt;br /&gt;
वि.सं. २०१० लालित्य भाग १ बाट&lt;br /&gt;
३०० लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==१३. साहित्यको फुटबल==&lt;br /&gt;
भाषाको छ विशाल चौर जसमा गर्दै ठुलो तर्खरभ्रै कोही फरवार्ड, रेफरि कुनै ब्याकिड्‌ र गोल्कीपर ।खेल्दै छौँ फुटबाल बालक सबै साहित्यको बेसरीहावा छैन परन्तु भित्र उसमा गुड्दैन केही गरी ॥&lt;br /&gt;
१खेल्नै हो अब खेल यो यदि भने चाँडो अगाडी सरील्याउँ शुद्ध विचार-पम्प, उसमा जोडौँ र त्यो सुस्तरी ।हावा जागृतिको क्रमैसित भरौँ सर्वत्र त्यो टन्न होस्‌भर्दा जोड परेर किन्तु पहिल्यै टुट्ने र फुट्ने नहोस्‌ ॥&lt;br /&gt;
रेत्यो घात-प्रतिघात-चङ्क्रमणको चातुर्य-सौदामिनीलड्नासाथ उठेर चक्कर लिंदै घुम्दै रहोस्‌ फन्फनी ।खेल्छौँ हामि जती उती चटपटे उस्को नयाँ रङ्ग होस्‌सारा दर्शक वर्ग मस्त सुरमा ताली पिटी दङ्ग होस्‌ ॥|&lt;br /&gt;
वि.सं. २०१० लालित्य भाग १ बाट&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता / ३१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==१४. हाम्रो इन्द्रेनी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पर्वत नगिचै त्यो जलतटमा सात रङ्गको सुरिलो आकारकर्के कर्के गरी उठेको छविको अद्भुत मुस्लो उसपारदेख्नासाथै लोचन खिचिये, कौतुकिताका उरमा छालउर्लन थाले, साथै मनमा रङ्ग रङ्गका उठे सबाल !&lt;br /&gt;
उही कुनाको बादल फुस्रो, उही पखेरो, उही खोला&lt;br /&gt;
त्यसमा त्यस्तो छविको लट्टी कसले कहिले टाँग्यो होला ?के सुरकँवरी त्यस लट्टीको पीङ बनाई चहचह गर्छन्‌ ?अथवा चटकी साँझ त्यो हो जसले ती स्वर्गङ्गा तर्छन्‌ ?&lt;br /&gt;
अमर क्सुमका रसले रञ्जित सात किसिमका छविधारीकामघधनुषको छाया हो बा विरहीको जीवन हारी ।त्यस्तो घनुले मदन कृसुमका कति तीखा शर हान्दो होलाजसले गर्दा पलपल चल्छन्‌ विरहीका मुटुका सोला !&lt;br /&gt;
अथवा त्यो हो दिगङ्गनाका कण्ठस्थलको मञ्जुलमालाभर्दख जसले नव जलधरमा प्रणय-सुधा-रसको प्यालाकलमल त्यस्तो अद्भुत छविको हार गाँथने सुरकन्याकुन कुन होलान्‌ शूत्य गगमा शिल्पकतामा चतृरी घ्रन्या&lt;br /&gt;
३२“ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
रतिमन्मधका केलिभवनको यही द्युतिमय तोरन हो&lt;br /&gt;
अथवा अमीरहरूकै शिरको चुनरीरष्ठी रीवन हो।&#039;मुनामदन&#039; की उही मुनाको सुन्दरताको नमुना होकि ?जसले हाम्रा प्रिय कविजीमा सुन्दरताको छापा ठोकी !&lt;br /&gt;
यो सब गन्दा गन्दै दिलमा अर्कै अद्भुत छाया भास्योत्यस छायाको रूप अँगाली मेरो दिल कन्‌ झन्‌ हाँस्यो ।हृदय गगनमा सबको देख्यो आशाको नानारङ्गीइन्द्रेनीको क्षणिक उज्यालो उठदो छिपदो रद्ठीचङ्ठी !&lt;br /&gt;
बि.सं. २०१३ ड्न्द्रैनी वर्ष १ अङु ५ बाट&lt;br /&gt;
सेखनाथका प्रमुख कविता / ३३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==१५, पूर्वस्मृति==&lt;br /&gt;
हे मेरो प्रिय बन्धु ! आज तिमिले जो लेखका खातिरलेख्यौ सा५५दर पत्र, त्यो सब पढेँ केही मुकाई शिर ।ठेगानातिर हेरदा नयनमा देखा पन्यो &#039;पोखरा&#039;जो देख्दा मनमा मिहीं स्मरणका लाखौँ फुटे आँक्रा ॥१पैह्ला अङ्कुरमा हिमाल हँसिलो अग्लो अगाडी सस्यो-साथै पर्वत-शृङ्खला विपुल त्यो चौरतफि देखा पन्यो ।लंबा संधर फाँट तालहरुको कल्क्यो ठुलो चक्घकीफेरी त्यो गड्वा, विजेपुर, खुदी, सेती बगेकी लुकी ॥&lt;br /&gt;
द्‌कोठे साँघु, बजारको झिलिमिली, काला उखु, सुन्तलादोस्रो अङ्क्रमा खचाखच भये ज्यादै मिठा शीतला ।पैसा ढाँक उखू यतातिर, उता कोरी बढी सुन्तलात्यो संगी खुशिले रमाउँछ यहाँ अद्यापि मेरो गला ॥&lt;br /&gt;
डेतेस्रो अङ्कुरमा उपस्थित भयो अघौं तथा अर्चलेपुर्खाको जसमा थियो जस ठुलो प्रख्यात पाण्डित्यले ।चौथोमा उभियो पवित्र खरको छानू भयेको घरआमाको मृदु लालना सुख जहाँ लिन्थे म लोकोता ॥&lt;br /&gt;
11&lt;br /&gt;
३४लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
पाँचौंमा सुकुमार बाल्य वयका साथी सबै देखियेसाना पल्लव तुल्य त्यो बखतमा नाना थरी जो थिये ।तिन्का साथ डुलेर काफल, तिँदू, ऐसेलु, चुत्रो &#039;सब&#039;टिप्ता जो पुरुषार्थ- गर्व मनमा चढ्थ्यो, कहाँ त्यो अब ॥&lt;br /&gt;
१छैटौँ अङ्कुरमा मिल्यो असजिलो, पाटी धुलौटो, खरीदेखाएर कडा उक्स्मुकुसमा, जर्काउँथ्यो कन्सिरी ।त्यो आपत्ति सही सुखाखर गरी साह्वा सबै अक्षरभाषा-श्लोक फलाक्न घोक्न मनले कस्तै गयो कम्मर ॥&lt;br /&gt;
0सातौँ अङ्कुरभित्र अङ्कित भये गङ्गा-गणेश-स्तुतिचण्डी कोश र कौमुदीहरु ममा भर्दै निजी संस्कृति ।त्यो देखर भन्यो- कठै !! नवमले “जा राजधानीतिरबेडा पार हुँदैन अध्ययनको खाली अँगाली घर” ॥&lt;br /&gt;
७चर्को चक्र घुम्यो शनैः समयको, टाढा भयो अर्चलेप्यारा साथि पनि क्रमैसित सबै संसारदेखी-. चले ।&lt;br /&gt;
देख्दा यो सब तारतम्य विधिको धर्कन्छ छाती सबत्यो जन्मस्थलमा कठै !! म कसरी कैले पुगूँला अब ?पन&lt;br /&gt;
बि.सं. २०२२ बेणीबाट&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता / ३५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==१६. आखिरी कविता==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो दु:ख भोग्ने परमेश्वरै हो ।यो देह उस्को रहने घरै हो॥यो भत्कँदा दुःख अवश्य मान्छ ।सुटुक्क सामान लिएर जान्छ ॥&lt;br /&gt;
बि.सं. २०२२ कविता वर्ष २ अङ्ग र बाट&lt;br /&gt;
३६/ लेखनाथका प्रमुख कबिता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सामा प्रकाशनका केही कविता /काव्य==&lt;br /&gt;
अज्ञात प्रारम्भअतिरिक्त अभिलेखअराजक अक्षरहरूअसमर्थ श्लोक&lt;br /&gt;
एउटा अर्को बुइँगल&lt;br /&gt;
एक फूल अनेक पत्रएक्लो विजेता&lt;br /&gt;
काँडाका फूलहरू&lt;br /&gt;
केही गीत केही गजलघाउमा हरिश्चक्त कटुवालचिसो च्‌ह्लो&lt;br /&gt;
छुटेका यादहरू&lt;br /&gt;
दाजै ! कविता गाउँमै छनफुलेका फूलहरू&lt;br /&gt;
नरमेध -निर्माणाधीन सडकपञ्चदशिका&lt;br /&gt;
पलकभित्र पलकबाहिरपृथिबीमाथि आलेखप्रेमका कवितामृत्यु-कविता&lt;br /&gt;
लक्ष्मी कवितासङ्ग्रहवीरकालीन कविताशाकुन्तल (महाकाव्य)समसामयिक सासा कबितासाफा कविता&lt;br /&gt;
हिमालचुली ।सङ्कलन)&lt;br /&gt;
पान राररुरुललाकाररुर, कार ककन&lt;br /&gt;
भ्रीम विराग&lt;br /&gt;
दिनेश अधिकारीविजय सुब्बा&lt;br /&gt;
राजव&lt;br /&gt;
सं. कशघकृष्णहरि बरालपुरुषोत्तम सुवेदीमनु ब्राजाकीकालीप्रसाद रिजालकणाद महर्षिबालकृष्ण समवियोगी बुढाथोकीभूपाल राई&lt;br /&gt;
क्षेत्र प्रताप अधिकारीखुमनारायण पौडेलशङ्कर थपलियाअनु, भरतराज पन्तमञ्जु काँचुलीगोपाल पराजुली&lt;br /&gt;
सं. फणीन्द्र खेतालामञ्जुल&lt;br /&gt;
सं. चूडामणि बन्धुसं. दयाराम श्रेष्ठलक्ष्मीप्रसाद देवकोटासं. डा. तारानाथ शर्मासं. चृडामणि बन्धुसं. ईश्वर बराल&lt;br /&gt;
उँ५ 99933-2-488-4&lt;br /&gt;
| हेई।&lt;br /&gt;
६99 | 3&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96_%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE&amp;diff=79</id>
		<title>लेखनाथका प्रमुख कविता</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96_%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE&amp;diff=79"/>
		<updated>2024-06-11T13:03:46Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;Source:https://nepalikitab.org/lekhnath-poudel-lekhnath-ka-pramukh-kabita/&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पुस्तक परिचय==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्रि. वि. मा. सा. शा, सं. अन्तर्गत स्नातक तहको द्वितीय पत्रकोऐच्छिक अध्ययन &#039;ख&#039; खण्डका लागि निर्धारित नेपाली पाठ्यक्रमअनुसार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्पादन&lt;br /&gt;
डा. वासुदेव त्रिपाठी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रकाशक : साम्रा प्रकाशन&lt;br /&gt;
संस्करण : पहिलो, २०४६दोस्रो, २०४९तेस्रो, २०६२ (११०० प्रति)&lt;br /&gt;
आवरणकला : टेकवीर मुखिया&lt;br /&gt;
म्‌ल्य : रु. ३५।-&lt;br /&gt;
मुद्रक : सार्रा प्रकाशनको छापाखाना, पुलचोक ललितपुर&lt;br /&gt;
फोन : ५५२१०२३, फ्याक्स : ५५४४ २३६15819 : 99933-2-488-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‍‍==मन्तव्य==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्रिभुवन विश्वविद्यालयको मानविकी र सामाजिक शास्त्र सङ्काय-अन्तर्गतको ऐच्छिक नेपाली विषयको प्रवीणता प्रमाणपत्र / स्तातक /स्नातकोत्तर तहको पाठयक्रमको आवश्यक संशोधनका क्रममा सम्बन्धितनेपाली विषय समितिले कतिपय पाठ्यसामग्रीमा विशेष सुधार ल्याई तिनलाईअद्यावधिक एवं सान्दर्भिक तुल्याउनु आवश्यक ठहत्याई पाठचसामग्री विकासपरियोजनाको तर्जुमा २०४५ सालमा गरेको थियो । सोही परियोजनाकाकार्यान्वयनका क्रममा प्रथम चरणमा नेपाली साहित्यका विविध फुटकरविद्या (कविता, कथा, एकाङ्की, निबन्ध एवं समालोचना) का तहगत शैक्षिकआवश्यकतालाई दृष्टिगत गरी विधागत पाठघसङ्कलनहरू सम्पादन गर्ने रदौसौ चरणमा साहित्यसिद्धान्त, भाषाविज्ञान र नेपाली साहित्यकोइतिहासलगायत अन्य अपेक्षित पाठयसामग्रीको तयारी गर्ने निधो गरियो ।उक्त प्रथम चरणअन्तर्गत सम्पादित प्रस्तुत ग्रन्थ लेखनाथका प्रमुख कवितास्तातक तहको द्वितीय पत्रको खण्ड &#039;ख&#039; को विशिष्ट अध्ययनकोपाठचसामगरीका रूपमा स्वीकृत पाठहरूको सङ्खलन हो । यसका सम्पादनकाक्रममा विषय समितिद्वारा निर्धारित आधारहरूको अवलम्बन गरी स्नातकतहमा पढाउनका निम्ति लेखनाथका प्रमुख कविताहरू सङ्कलित गरिएकाछन्‌ । .यो ग्रन्थ लेखनाथका प्रमुख कविताको सङ्कलनतर्फको एक अर्कोप्रयास हुँदै हो तर सम्बन्धित शैक्षिक तहका पाठघण्टा र पाठ्यस्तरकापरिधिमा रही सोही शैक्षिक प्रयोजनअनुरूप यहाँ लेखकविशेष र कृतिविशेषको&lt;br /&gt;
चयन गरिएको छ । यस चयनमा सम्बन्धित बिधाका प्रमुख युग र घाराएवं तिनका प्रमुख स्रष्टाका शैक्षिक तहगत रूपमा उपयुक्त हुन सक्नेकृतिहरूको समावेश हुनु स्वाभाविकै हो । शैक्षिक क्षेत्रमा प्रयुक्त हुने यसप्रकारका सङ्कलनहरू आफ्ना शैक्षिक तहगत शृङ्खलामा आबद्ध र आधारितरहने तथ्य छँदै छ।नेपाली विषय समितिको उक्त परियोजनाअन्तर्गतको यस ग्रन्थकोप्रकाशनको चाँजोपाँजोलगायत सम्पूर्ण अभिभारा वहन गर्ने साप्ज प्रकाशनप्रतिपनि त्रि.वि. मानविकी र सामाजिक शास्त्र सङ्कायको नेपाली विषय समितिकातर्फबाट आभार व्यक्त गर्दछु ।२०४५ चैत्र १७ गते डा. बासुदेव त्रिपाठीअध्यक्षनेपाली विषय समितिनेपाली केन्द्रीय शिक्षण विभागत्रिभुवन विश्वविद्यालयकीर्तिपुर, काठमाडौँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==विषयस्‌ची==&lt;br /&gt;
कविशिरोमणि लेखनाथ पौडघालको कवितायात्रा : एक चर्चा&lt;br /&gt;
री 5 उ” १८ ५ ३५ 70 परी&lt;br /&gt;
कबिकवबितालाप&lt;br /&gt;
वैतिक दृष्टान्त&lt;br /&gt;
वसन्त कोकिल&lt;br /&gt;
जीवन-चङ्गा&lt;br /&gt;
गौँधलीको चिरिबिरी (१)&lt;br /&gt;
सत्य सन्देशहरू&lt;br /&gt;
विज्ञानको मोह&lt;br /&gt;
पतित-पावनी श्री गङ्गाजीको माँकीवंशीघरको दिव्य वंशी&lt;br /&gt;
. युगवाणी. वर्षा. सरस्वती स्मृति&lt;br /&gt;
साहित्यको फुटबल&lt;br /&gt;
. हाम्रो इन्द्रेनी&lt;br /&gt;
पूर्वस्मृति&lt;br /&gt;
. आखिरी कविता&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
१०१२१५१९&lt;br /&gt;
२४&lt;br /&gt;
२८२९&lt;br /&gt;
३२३४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कविशिरोमणि लेखनाथ पौड्यालकोकवितायात्रा : एक चर्चा==&lt;br /&gt;
कविशिरोमणि लेखनाथ पौडथाल (वि.सं. १९४१-२०२२) लेबाल्यकालमा आफ्नो जन्मस्थल कास्की जिल्लाको पोखरा उपत्यकाको अघौँअर्चले गाउँमा नै कविताको उद्बोधन प्राप्त गरै तापनि खास गरी काठमाडौंकोरानीपोखरी संस्कृत छात्रावास (तीनधारा पाठशाला) मा रही संस्कृत मध्यमाकोअध्ययन गरिरहेका बखत नै उनको कविताअभ्यास विशेष तीव्र भएकोबुझिन्छ । उनको यो कविताअभ्यास तात्कालिक शैक्षिक परिप्रेक्ष्यअनुरूपसंस्कृत र नेपाली दुवै भाषाका माध्यमबाट थालिएको थियो भने उनलेअध्ययन गर्ने गरेको रानीपोखरी पाठशालाको वर्णन गर्ने संस्कृत समस्यापूर्ति&#039;पाठशाला विशाला&#039; सुरक्षित रूपमा उपलब्ध पनि छ र उनका प्राथमिककविता-आराधनाका परिचायक दुई नेपाली कविता &#039;कविताकल्पद्रम&#039; (सन्‌१९०५ : बि.सं. १९६१-६२) मा प्रकाशित भएको पाइन्छ । &#039;शृङ्घारपच्चीसी&#039;र &#039;मानसाकर्षिणी&#039; शीर्षकका यी दुई कविता नै उनका प्रकाशित प्राथमिकनेपाली कविताहरू हुन्‌ । नेपाली लेख्य व्याकरणको निर्धारण नभइसकेको,भङ्गाररसतर्फ नेपाली कविताको विशेष चाख देखा परेको र परम्परागतवर्णमात्रिक छन्दमा शब्दालङ्कार र अर्थालङ्ारको सजधजतर्फ विशेष उत्सुकताप्रकट भएको नेपाली कविताको उत्तरमाध्यमिक कालको कविता-परिवेशकाउपजका रूपमा लेखनाथका उपर्युक्त दुई कविता देखा पर्छन्‌ । समकालीतकवबिता-परिवेशका उपज हुँदाहुँदै पनि यी दुई कवितामा लेखनाथको उर्वर प्रतिभाको मिर्मिरे रन्कोचाहिँ सुनिन्छ नै । यसरी २०-२१ वर्षका उमेरमा&#039;कविताकल्पद्रुम&#039; का माध्यमबाट लेखनाथको जुन कवितायात्रा थालियो त्योउनको शेष जीवनकालभर अक्षुण्ण र गतिशील रह्यो । उनको ८२ वर्षेजीवनकालमध्ये लगभग ६० वर्षको अवधि नेपाली कविताको साधनामासमर्पित रह्यो । यतिको लामो समयावधिअन्तर्गत युवावस्थाका &#039;कविताकल्पद्रुम&#039;(बि.सं. १९६१-६२) का उपर्युक्त दुई श्ृङ्घारिक कवितादेखि बृढ्घौलीमामृत्युसम्ममा लेखिएको &#039;आखिरी कविता&#039; (२०२२) सम्मको ६० वर्षभन्दा बढीअवधिको कवितायात्रा कविशिरोमणि लेखनाथले गरेको पाइन्छ ।&lt;br /&gt;
युवा लेखनाथ पौडघालका कविताहरू सुन्दरी पत्रिका १९६३) माछापिन थाले । समस्यापूर्ति र फुटकर कविताको रचना गर्दै प्रथमतः उनले&#039;नुङ्घारिक घाराकै आवाहन गरेका हुन्‌ र &#039;वियोगिनी विलाप&#039; यतिखेरकोउनको उल्लेखनीय कविता हो । उनका भाव, लय र शैलीको प्रतिभापूर्णछलबल पर्याप्त मात्रामा यस कवितामा प्रकट भएको पाइन्छ । तर सुन्दरी-कालमै उनको &#039;कालिकाविलासी&#039; जस्तो समस्यापूर्तिले शृष्वारधाराप्रति छेडहाल्न थालेको र &#039;वैराग्यवल्ली&#039; कविताले श्ुङ्गारविपरीत शान्तरसतर्फ चाखदेखाएको भेटिन्छ र उनका भाव, लय र शैलीमा विशिष्ट छचल्काहरूप्रकट भइरहेको कुरा &#039;बैराग्यवल्ली&#039; कविताले एनि फल्काउँछ । यसरी१९६३ सालमै लेखनाथ समसामयिक आङ्गारिक परिवेशबाट तकिँदै आफ्नोशान्तरसमूलक कबितायात्रातर्फ प्रवत्त भएको र उनको कवित्व पनि प्रतिभापूर्णछचल्काहरूले उद्देलित भइरहेको अनुभव हुन आउँछ ।&lt;br /&gt;
१९६५-६६ साल लेखनाथको प्राथमिक कवितायात्राका निर्णायकवर्ष हुन्‌ । लेखनाथको काव्यघाराको खास प्रवर्तन माघवी पत्रिकाकामाध्यमबाट यतिखेर नै थालियो । हलन्त बहिष्कारमूलक लेख्य व्याकरणकाअनुशासनमा कविता रच्दै र राष्ट्रिय जागरणका सामाजिक, साँस्कृतिक,धार्मिक तथा आध्यात्मिक लहरहरूलाई छुँदै अकृत्रिम तर अलङ्वारपूर्णशैलीमा कविताको स्तरीकरण गर्ने चासो माधवी प्रत्रिकामा छापिएकालेखनाथका कविताले देखाएको पाइन्छ । यस पत्रिकामा छापिएको ४८पद्यको &#039;वर्षाविचार&#039; लामो कविता वा लघु काव्यका रूपमा देखा पर्छ रयो&lt;br /&gt;
न्ख-&lt;br /&gt;
उनको आगामी क्रतुबिचार काव्यको प्रारूप पनि हो । नेपाली भाषामापनि संस्कृत वा फारसी भाषाको जस्तो स्तरीय काव्य लेखिन सक्छ भनीप्रमाणित गर्ने क्रममा प्रथम पाइलास्वरूप लेखिएको वर्षाविचार मा लेखनाथपौडचालको निजी काव्यधारा र त्यसका आधारभूत प्रवृत्तिहरूको प्राथमिकदिग्दर्शनसम्म प्राप्त हुन्छ । लेख्य व्याकरणका अनुशासनमा कविता रच्ने,परिष्कारवादी (शास्त्रीय वा क्लासिकल) काव्यधाराको बरण गर्दै नेपालीकविताको स्तरीकरण गर्ने र राष्ट्रिय जागरणको सन्दर्भतर्फ उन्मुखतादेखाउने जस्ता कुरा उनका काव्यधाराका केन्द्रीय पहिचान हुन्‌ भनेबर्षाविचारमा ती कुरा प्रारम्भिक तर स्पष्ट रूपमा देखिन्छन्‌ । काव्यकारचनासामग्रीका दृष्टिले प्रकृतिका छनि, सामाजिक परिदृश्य, हिन्दू पुनर्जागरण,नैतिक चेतना र आध्यात्मिक मनन नै लेखनाथका केन्द्रीय सामगी हुन्‌ भनेत्यतातर्फ वर्षाविचारका लेखनाथ उन्मुख भइसकेका छन्‌ । काव्यभाषा रशैलीका सन्दर्भमा तत्सम र तद्भव पदावलीको समुचित सन्तुलनमा आधारितसरल-गम्भीर तथा सहज-मनोरम शब्दशय्याको अनुप्रासीय अन्तर्धाराकोलयलालित्य लेख्य व्याकरणका अनुशासनभित्र रही प्राप्त गर्नु लेखनाथकोपहिचान हो भने त्यसको प्रारूप &#039;वर्षाविचार&#039; मा देखा पर्छ । सहज स्तस्फूर्ततुल्यकिन्तु शक्तिशाली अलङ्करण लेखनाथका कविताका लालित्यका परिपोषकतत्त्वमध्यै एक हो भने त्यो सहज मनोरम आलङ्कारिक छटा पनि वर्षाविचारमाचहकिलो छ्‌ । काव्यचेतनाका दृष्टिले वस्तुतत्त्व र अन्तर्भावका बीचकोबौद्धिक पुटसमेत परेको चेतनापरिपाक परिष्कारवादी लेखनाथको केन्द्रीयपहिचान हो भने त्यो वर्षाबिचारमा मिरमिराइरहेको पाइन्छ । यसरीलेखनाधका प्राकृतिक पर्यवेक्षण, सामाजिक व्यङ्गय र आदर्शीकरण, नीतिचेत,पौराणिक सन्दर्भको नवीन व्याख्या, युगोन्मेष, हिन्दू पुनर्जागरणको स्वर रअध्यात्मचेतका साथ्यै लय, ौली र अलङ्गरणका अनुशासित लालित्यसहितसहज-संयमित परिष्कारघर्मी स्तरीय कविताचेतका प्राथमिक प्रस्फुटनकाबिन्दुका रूपमा वर्षाबिचार लघु काव्य ।१९६५-६६) देखा पर्छ र यसलाईनेपाली खण्डकाव्यको परिष्कारधर्मी प्रथम स्तरीय प्रयास पनि भन्न सकिन्छ ।वास्तवमा यसै बिन्दुदेखि नै लेखनाथ पौडयालको कवितायात्रामा उनको&lt;br /&gt;
नज&lt;br /&gt;
काव्यधारा आफ्ना खास काव्यस्रोत र काव्यप्रवत्तितर्फ अभिमुखीकृत भईदेखा परेको पाइन्छ ।&lt;br /&gt;
लेखनाथका कवितायात्राका क्रममा लालित्य (१९६९) उनकोकवितायात्राको अर्को महत्त्वपूर्ण पाइलो हो । यसमा लेखनाथका ६ कबितापरेका छन्‌ जसमध्ये &#039;मनोलड्ड्‌&#039; कविता उनको धार्मिक-अध्यात्मिक कवि-चेतको परिष्कारोन्मुख भावार्द्र अभिव्यक्ति हो । त्यस्तै अर्को &#039;विचित्रवाहिनी&#039;कवितामा शोषण र उत्पीडनको हास्यआभास अँगाल्दै लेखनाथको युगोन्मेषमुल्किएको छ र सामाजिक पर्यवेक्षण र व्यङ्गघको क्षमता पनि झल्कन्छअनि शब्दालङ्कार र अर्थालङ्कारको विशेष, चहक पनि प्रकट भएको छ।अर्को &#039;रामराज्य&#039; कवितामा पूर्वीय राज्यआदर्शहरूको संस्मरण छ र शब्दार्थकोअलङ्कार सृष्टिसामर्थ्य पनि चहकिलो छ । लालित्यभित्रको &#039;कविकवितालाप&#039;कविताचाहिँ कवि लेखनाथको निजी काव्यघाराको घोषणापत्रतुल्य देखापर्छ । माध्यमिककालको उत्तरार्धका समसामयिक साहित्यिक प्रचलनप्रतिआक्षेप, व्यङ्ग्य र अस्वीकारसहित कविताका भाषामा व्याकरणसम्मत सुघारल्याउने, मौलिक कविप्रतिभाको सञ्चार गर्ने, नीतिचेत र आदर्शोन्मुखविचार गर्दै सामाजिक जागरण र सुधारप्रति सोट्टेश्य कविताको प्रवर्तन गर्नेर पूर्वी उच्च साहित्यिक परम्पराप्रति श्रद्धासाथ नेपाली कविताको स्तरीकरणगर्दै नवीन काव्ययुगको आवाहन गर्ने सङ्कल्प &#039;कविकवितालाप&#039; कवितामाउनले प्रकट गरेका छन्‌ । यस तात्पर्यमा १९६९ सालसम्म आइपुग्दालेखनाथ नेपाली कवितामा युगान्तर ल्याउन कृतसङ्ल्प देखा पर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
१९७० सालको शोकप्रवाह खण्डकाव्यले लेखनाथको उच्चभावक्षमताको परिचय दिन्छ । उनका लय र शैलीमा आइरहेको परिष्कृतिलेगर्दा यसको भावधारा कझन्‌ चहकिएको छ । परिष्कारवादी काव्यधाराकोउल्लेख्य कृतिका रूपमा यस करुण खण्डकाव्यले लेखनाथको विकासशीलकविप्रतिभालाई प्रस्तुत गरेको छ । -&lt;br /&gt;
१९७२-७६ सालका अवधिमा लेखनाथको परिष्कारवादीनबकाव्यधाराको सृजनात्मक क्षमता प्रभावकारी रूपमा प्रकट भएको रस्थापित भएको देखिन्छ । यस अवधिमा उनका प्रशस्त फुटकर कविताहरू&lt;br /&gt;
न्च--&lt;br /&gt;
र तीन खण्डकाव्यका साथै एक नाटक प्रकाशित भएको पाइन्छ । उनकाफुटकर कविताहरू खास गरी गोरखाशिक्षाका भाग १, २ र ३ (क्रमशः१९७२, १९७३, र १९७४) मा र सूक्तिसिन्धु १९७४) मा सङ्कलित छन्‌ ।१९७३ सालका &#039;हिउँदका दिन&#039;, &#039;इन्द्र्धनु&#039; र १९७४ सालका &#039;प्रभात&#039;,शबसन्त&#039; र &#039;वसन्तकोकिल&#039; कवितामा लेखनाथको पूर्वस्वच्छन्दताबादीस्पर्शसहित परिष्कारवादी प्रकृतिपर्यवेक्षणको कुशलता प्रकट हुन्छ । १९७२सालका &#039;दशैँ&#039; र &#039;तिहार&#039; मा उनको साँस्कृतिक चेत तथा &#039;ईश्वरस्तुति&#039; माआध्यात्मिक चेत रुल्कनाका साथै १९७३ सालको “म कस्तो हँ&#039; र १९७४सालका &#039;म केके नगरँ&#039; र नैतिक दृष्टान्त कवितामा उनको नैतिकआदर्शचेत व्यक्तिएको छ । १९७४ सालको &#039;पिँजराको सुगा&#039; तात्कालिकयुग-व्यथा र स्वतन्त्रता-कामनाका प्रतीकात्मक व्यञ्जनाका रूपमा बह्चर्चितरहेको छ । १९७४ सालका सूक्तिसिन्धुका कवितामध्ये &#039;विरहिणीका उपरसखीको प्रश्न&#039; कविता वियोगिनी र योगिनीका श्लेषात्मक भावसन्धिमैउभिँदै शृङ्गार युग र शान्त-आध्यात्मिक युगको दोसाँधको अत्यन्त कलात्मकअभिव्यक्ति हुन आएको छ । १९७४ सालको भर्तुहरिनिर्वैद नाटकको पद्यांशलेपनि खास गरी उनको आध्यात्मिक कवित्व तथा शैलीगत अन्तर्विकासकोपरिचय दिन्छ । यसताकाका लेखनाथका खण्डकाव्यहरूमध्ये व््रतुविचारप्रकृतिकाव्यका रूपमा, बृद्धिविनोद बौद्धिक काव्यका रूपमा अनिसत्यकलिसंवाद सामाजिक काव्यका रूपमा देखा पर्छन्‌ । लेखनाथले प्रवर्तनगर्न लागेको नयाँ काव्यधाराका प्राकृतिक, बौद्धिक र सामाजिक सन्दर्भलाईयी तीन काव्यहरूले प्रस्तुत गरेका छन्‌ । यी काव्यहरूमध्ये समाजसन्दर्भ रयुगोन्मेषको वस्तुगत पर्यवेक्षण, व्यङ्घवय र आदर्शीकरणतर्फ सत्यकलिसंवादविशेष जागरूक छ र यसमा हिन्दू पुनर्जागरणका स्वरसँग लेखनाथकासांस्कृतिक स्वप्न तथा सुधारवादी स्वर पनि सलबलाउन खोजेका छन्‌ ।सामाजिक रूढि, विकृति र अमङ्गतिप्रति व्यङ्ग्य तथा आर्थिक दैन्यप्रतिआक्रोश एवम्‌ धार्मिक नैतिक पतनप्रति कौतुकसहित राजनैतिक सन्त्रासकाप्रतिच्छायामा सत्यकलिसंवाद रचिएको छ र यसमा काव्यमूल्यभन्दा हिन्दूपुनर्जागरणको स्वर तथा सामाजिक मूल्य र युगचापको मात्रा बढी देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
न्ङ-&lt;br /&gt;
बुद्धिविनोद समकालीन नेपालका पूर्वी-पश्चिमी वा प्राचीन नवीन मूल्य,दृष्टि र चेतनाका प्रश्न-प्रतिप्रश्नको द्वन्द्वमय अभिव्यक्तिका रूपमा उभिँदैज्ञान र विज्ञानको घर्षण थालिएका युगीन बौद्धिक धरातलको व्यञ्जक नैबढी देखा पर्छ । क्रतुविचार खण्डकाव्य भने प्रकृतिकाव्य भएर पनिलेखनाथका सबैजसो काव्यप्रवृत्तिहरूको सङ्गमस्थलतुल्य छ र यसमासामाजिक-सांस्कृतिक तथा नैतिक-आध्यात्मिक प्रतिच्छविसहित लेखनाथकोसृक्ष्म प्रकृति-पर्यवेक्षण प्रकट भएको छ । लेखनाथका लय, भाव, चिन्तन रशैली-शिल्पको पूर्वस्बच्छन्दतावादी स्पर्शसहित सहज-परिष्कृत संश्लिष्टसौन्दर्यको नमुनास्वछूप क्रतुविचार खण्डकाव्य नेपाली कविताकै पनिप्रथम परिष्कृत सौन्दर्यबाटिकाका रूपमा देखा पर्छ । यसरी १९७२-७६सालका उपर्युक्त कविता र काव्यका माध्यमबाट लेखनाथ पौडयाललेनेपाली कविताको माध्यमिककाललाई तोड्दै आधुनिक नेपाली कविताकोउषाकाल बा मिर्मिरे प्रथम प्रहरस्वरूप परिष्कारवादी (शास्त्रीय? कलासिकल)धाराको प्रवर्तन तथा प्रतिष्ठापन गरेको पाइन्छ । खास गरी १९७३-७६सालका बीच प्रवर्तित यो परिष्कारवादी धारा शारदा पत्रिकाको अभ्युदय[वि. सं. १९९१) पूर्वको अवधिसम्म नेपाली कविताको अग्रणी धाराकोरूपमा रह्यो । यस अबधिमा गोरखा शिक्षाको चारौँ भाग १९८० मालेखनाथका &#039;धनमहिमा&#039;, &#039;सन्ध्या&#039; र &#039;धतिशीलता&#039; कविता छापिएका छन्‌ रउनको &#039;गीताञ्जली&#039; र लघु स्तुतिकाव्य पनि प्रकाशित भएको छ । &#039;धनमहिमा&#039;ले खास गरी धनमूलक सामन्त परिवेश र भौतिक मोहप्रति व्यङ्गय गरेकोछ भने &#039;धवृुतिशीलता&#039; चाहिँ आदर्शवादी धीर व्यक्तित्वको गायन हो अनिसन्ध्या&#039; चाहिँ प्राकृतिक सौन्दर्यको पूर्वस्वच्छन्दतावादी पुट पनि परेकोपर्यवेक्षण । &#039;गीताञ्जली&#039; शासक स्तुतिको सन्दर्भसँग जोडिएको छ रलेखनाथको जागरण-स्वर मूलतः राजनीतिनिक्षेप सांस्कृतिक-सामाजिकजागरणको व्यञ्जक हो भन्ने जानकारी सत्यकलिसंवादपछि यस लघुकाव्यले दिन्छ । तर परिष्कारवादी प्रसन्न शैली-शिल्प र मनौोरथ भावकोलय-लालित्यको छटा भने यस स्तुतिकाव्यमा पनि व्याप्त रहेको छ।लेखनाथको ६ दशकभन्दा लामो कवितायात्राको पूर्वार्द्ध वा प्रथम प्रहर ।&lt;br /&gt;
छ&lt;br /&gt;
१९६१-६२ सालदेखि १९९० सालसम्मको पूर्वोक्त अवधि नै हो। यसअवधिमा प्रथमतः: १९६३-७३ सालका बीचमा उनले समसामयिक माध्यमिकश्यङ्गारधारालाई तोड्दै आफ्नो परिष्कारबादी काव्यधारातर्फको प्रयोग रप्रवर्तन गर्दै क्रमश: त्यसलाई स्थापित गरेको पाइन्छ । नेपाली कवितामालेखनाथको यो भूमिका युगान्तकारी र्‌ नवयुगप्रवर्तक देखा पर्छ अनिनेपाली कविताको स्तरीकरण गर्दै र स्तरीय खण्डकाव्यको समेत रचना गर्दैपरिष्कारवादी काव्यचैतन्य र काव्यसौन्दर्यका स्रष्टा प्रथम महान्‌ नेपालीकविका रूपमा उनी यस अबधिमा प्रतिष्ठित हुन आउँछन्‌ । उनले सिर्जेकोयही परिष्कारवादी धारा नै नेपाली कविताको आधुनिकतातर्फको सङ्क्रान्तिकोउषाकाल वा प्रधम प्रहरसमेत देखा पर्न आउँछ ।&lt;br /&gt;
१९९१ सालदेखि शारदा पत्रिकासँगै नेपाली कवितामा नयाँ चहलपहलथालिन्छ र लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा र सिद्धिचरणजस्ता कविहरू स्वच्छन्दतावादीकाव्यधारा अँगाल्दै प्रकट हुन लाग्दछन्‌ । लेखनाथका परिष्कारवादीकाव्यधारामा पूर्वस्वच्छन्दतावादी तत्त्वहरू केही मात्रामा अन्तर्निहित रहैतापनि देवकोटा र सिद्धिचरणका सहकारितामा खास स्वच्छन्दतावादकोअभ्युदय नै १९९१-९२ सालतिरको नेपाली कविताको मुख्य घटना हो ।वि. सं. १९७६ पछि राजनैतिक चाप र व्याकरण-दवन्द्वका साथै अन्यसान्दर्भिक कारणहरूले गर्दा फक्रिन नपाई खुम्चिन पुगेको लेखनाथकोकवित्ब पनि शारदाकाल लाग्दानलाग्दै मन्‌ खारिएर प्रकट हुन थाल्यो ।वि. सं. १९९१ सालको परिवर्तित-संशोधित क्रतुविचार नै लेखनाथकोकबितायात्राको पूर्वार्द्धको उत्तराद्धको उद्घोषक कृति हुन आउँछ । लेखनाथकाकाव्यधाराका सन्दर्भमा स्वच्छन्दतावादको आंशिक चास्तीसहित परिष्कारवादीकाव्य-सुषमाको उत्कृष्ट कान्ति प्राप्त गर्दै उनका विविध काव्यप्रवृत्तिहरूअक तिम्खर र परिष्कृत भई, विशेष स्तरीकृत बन्नु नै क्रतुबिचार (१९९१)को केन्द्रीय प्राप्ति हो । यसरी देवकोटाका केन्द्रीयतामा स्वच्छन्दतावादीकाव्यधारा हुर्कन लागेको त्यस युगमा परिष्कारवादी काव्यधाराको नेतृत्वगर्दै लेखनाथ आफ्नो सामाजिक पर्यवेक्षण र आध्यात्मिक चेतनालाई अरखादै र समीकृत गर्दै अनि आफ्ना कविताको लय, शैली, शिल्प र संरचनालाई&lt;br /&gt;
प्छ&lt;br /&gt;
अर परिष्कृत तुल्याउँदै गतिशील रही परिष्कारवादी काव्यसौन्दर्यका उत्तुङ्गशिंखरका रूपमा चुलिँदै गएको पाइन्छ ।&lt;br /&gt;
लेखनाथको कवितायात्राको पूर्वार््धलाई प्रथम चरण .स्वीकार्दैउत्तरार्द्धस्वरूप १९९१-२०२२ सालको अवधिलाई चाहिँ २००७ सालकोविभाजक युगरेखाका आधारमा दुई भागमा वर्गीकृत गर्न सकिन्छ । यसरी१९९१-२००७ र २००८-२२ सालका दुई समयावधिमा उनको उत्तरार्द्धकवितायात्रालाई विभाजित गर्दा पहिलोचाहिँ समयावधि उनको कवितायात्राकोदोस्रो चरण र दोस्रोचाहिँ अवधि तेस्रो चरणका रूपमा देखिन आउँछन्‌ ।अवश्यै उक्त तेस्रो चरणका माफ्माक २०१३ सालदेखि लेखनाथको कवितामाअर्को चौथो चरणको सम्भाव्यता कल्कन्छ तर त्यो अघूरै रही तेग्रो चरणमैअन्तर्भुक्त बन्न पुगेको छ । प्रथमत: उनको कवितायात्राको दोस्रो चरण(१९९१-२००७ साल) का बारेमा नै चर्चा गरौँ ।&lt;br /&gt;
&#039;ञ्रतुविचार&#039; (१९९१) को परिवर्धन-परिष्कारपछि लेखनाथकाकवितायात्रामा कवित्व र चैतन्य दुवैको अन्तर्विकास र परिष्कारको प्रकियाझन्‌ तीव्र हुन लागेको पाइन्छ । यतिखेर उनको उमेर पचास वर्ष पार गरीजीवनको छैटौँ दशकतर्फ लाग्दै थियो र पेसागत चक्करबाट मुक्त हुँदैप्राय: स्वाधीन रूपमा उनको जीवनचर्या पनि चालिँदै थियो । यतिखेरसमकालीन राणाशासनका सन्दर्भमा पनि उनी नियमित चाकडी र दौडघुपकाप्रक्रियाबाट पन्छिदै र सत्ताकेन्द्रका विपरीत दिशामा उन्मुख कतिपयराणापरिवारहरूसँग सम्बद्ध हुँदै थिए । उनले आफ्नो कवितायात्राका पूर्वार्द्धमातत्कालीन कठोर राजनैतिक पर्याबरणमा जागरणधर्मी कवितासृजनाकाकठिनाइ र भुक्तमान भोगिसकेका थिए भने उनका युगचेत सूक्ष्म व्यञ्जनाकास्तरमा नै विशेष मुखरित हुनाका साथ प्राय: राजनीतिइतर सामाजिक,आर्थिक तथा सांस्कृतिक, नैतिक, धार्मिक र आध्यात्मिक जागरणकै सेरोफेरोमाबढी सुसेलिएको पनि हो । वास्तवमा आफ्ना कविजीवनभरि नै राजनैतिकस्तरमा उनी विप्लवी-विद्रोही कविभन्दा स्तुति-प्रशंसाका सामयिक अपेक्षाकोपूर्ति गरिदिने खालका कवितासमेत लेख्तै रहे तर युगचेतनाका पूर्वोक्तव्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक सन्दर्भचाहिँ उनका कृतिहरूमा स्पन्दित र&lt;br /&gt;
न्ज-&lt;br /&gt;
व्यञ्जित नै रह्यो । कवितायात्राको उत्तसर्द्धमा पनि उनी यही वृत्तमा नै२००७ सालसम्म केन्द्रित रहेको देखिन्छ तापनि उनका १९९१-२००७सालका अवधिका कवितामा जागरणधर्मी चैतन्य विशेष रूपमा स्पन्दित रव्यञ्जित भएको पाइन्छ । पेसागत मुक्तता, उमेरको परिपक्वता रसत्ताकेन्द्रविपरीत क्रियाशील कतिपय राणापरिवारहरूसँगको तादात्म्य तथाशारदाकालीन साहित्यिक जागरणका युगमा प्राप्त साहित्यिक आत्मप्रतिष्ठाकाकारणले गर्दा पनि उनी आफ्नो कवित्व र चैतन्य दुबैको बिस्तार रपरिष्कारतर्फ यतिखेर क्रमिक रूपमा उत्प्रेरित भएको बुझिन्छ । उनकोकवितायात्राको दोस्रो चरण (१९९१-२००७) मा दुई खण्डकाव्य, एकनाटक र प्रशस्त फुटकर कविताहरू प्रकाशित भएका छन्‌ । यी रचनाहरूलाईकेलाउँदा एकतर्फ उनका जीवनदृष्टिमा परिपक्वता आइरहेको र त्यसमापूर्वीय दर्शनको अध्ययन र सामाजिक सचेतता दुवैको भूमिका बढिरहेकोभेटिन्छ भने अर्कातर्फ परिष्कारवादी कवित्वको कलात्मक प्राप्तितर्फ उनकोदक्षता उत्तरोत्तर विकसित भइरहेको पनि पाइन्छ ।&lt;br /&gt;
लेखनाथको कवितायात्राको दोस्रो चरण (१९९१-२००७) मा देखापर्ने प्रमुख फुटकर कविताहरू हुन्‌- &#039;जीवनच्गरा&#039;, &#039;कालमहिमा&#039; र &#039;गौँथलीकोचिरिबिरी&#039; (१९९२), सत्य सन्देशहरू १९९५-२०००,), विज्ञानको मोह(१९९५), &#039;पिँजराको प्यासा मैना&#039; ।१९९७), &#039;पतितपावनी श्रीगङ्गाजीकोज्ञँकी&#039; १९९२), &#039;बंशीघरको दिव्यवंशी&#039; (१९९९), &#039;हाँसेको साहित्यसागर&#039;(२००४), &#039;गौंधलीको चिरिबिरी&#039; (२) (२००४), “नारद र विज्ञान&#039; (२००६)आदि । यी फुटकर कवितामध्ये &#039;जीवनचङ्गा&#039; ले लेखनाथमा आध्यात्मिकजीवनदृष्टिको सघन अन्जषणको अभिर्शंच बढिरहेको र त्यसलाई कतितात्मकपरिणति दिने चासो तीब्र भइरहेको सङ्केत दिन्छ भने &#039;गौँथलीको चिरिनिरी&#039;हरूले व्यक्तिवादी, बहिर्मुखी, सामन्ती र भौतिकवादी स्वार्थ र तृष्णाकाविपरीत मानवतावादी, अन्तर्मुखी, आर्ष र अध्यात्मवादी जीवनमूल्यतर्फलेखनाथको बढ्दो मुकाउलाई प्रस्तुत गर्दछन्‌ । &#039;विज्ञानको मोह” र &#039;नारद रविज्ञान&#039; जस्ता कविताबाटै सत्यकलिसंवादको विज्ञानप्रतिको कौतुक भाव रबुद्धिवितोदको विज्ञानतर्फ पनि सचेत पृष्ठभूमिपछि लेखनाथ विज्ञानलाई&lt;br /&gt;
नस&lt;br /&gt;
मनुष्यका दुरन्त भौतिक तृष्णाको विस्तारक तथा ध्वंसात्मक दिशातर्फविश्वसृष्टिलाई धकेल्ने तत्त्व ठान्दै विज्ञानविरुद्ध उभिरहेको देखिन्छ । प्रथमविश्वयुद्धदेखि दोस्रो बिश्वयुद्धसम्मका चार दशकमा लेखनाथले भौतिकसभ्यताको प्रतीक ठहन्याई यसका ध्वंसात्मक पक्षमा विशेष जोडसमेतदिएको अनुभव हुन आउँछ । &#039;पिँजराको प्यासा मैना&#039; कविताले लेखनाथकोआध्यात्मिक जीवनदृष्टिलाई विषय-तृष्णा र त्यसका अशान्तिज्वारका सन्दर्भमाविश्वबोधसहित प्रस्तुत गरेको छ र उनका &#039;सत्य सन्देश&#039; हरूले मानवीयआत्मिक उज्ज्वलतामा केन्द्रित आध्यात्मिक जीवनदृष्टिको आर्ष व्यञ्जनागरेका छन्‌ । पूर्वीय पुराकथाको पुनर्व्याख्या गर्दै भौतिक भोगवादीजीवनमूल्यका सीमाहरू औंल्याउँदै परम ज्योतिको आत्मिक अन्वेषणकोप्रक्रियातर्फ लेखनाथको संलग्नतालाई &#039;वंशीघरको दिव्य वंशी&#039; जस्ता कवितालेजनाएका छन्‌ । यी फुटकर कविताहरूका आलोकमा लेखनाथकोकवितायात्राको दोस्रो चरणको भौतिक तथा भोगवादी जीवनमूल्य र त्यसमूल्यका कारणले उब्जेका सामाजिक वैषम्य तथा बिश्व-वैषम्यप्रति पनिसच्चेत हुँदै पूर्वीय अध्यात्मदर्शनको युगीन प्रस्तुतिमा आधारित उदात्त चेतनाकाआवाहनतर्फ केन्द्रित भइरहेको तथ्य स्पष्टिन्छ । लेखनाथको यसचिन्तनप्रक्रियालाई उनको बुद्धिविनोदको प्रथम विनोद काव्य (१९९४) रलक्ष्मीपूजा नाटक (१९९४) का पद्यांशले पनि झूल्काएका छन्‌ भने उनकापूर्वोक्त फुटकर कविताहरूमा त्यो चिन्तनप्रक्रिया कन्‌रन्‌ खारिँदै आएकोपाइन्छ । यसरी लेखनाथको कवितायात्राको दोस्रो चरण क्रमश: चिन्तनशीलकवित्वतर्फ उन्मुख भएको र त्यसमा आध्यात्मिक चैतन्यको उज्ज्वलताकासाथ युगीन आदर्शोन्मेषसमैत प्रकट भइरहेको अनुभव हुन्छ । समाजबोध,विश्वबोधका क्रममा आध्यात्मिक जागृतिको यही उदात्त चैतन्यकै विस्तारितअभिव्यञ्जनाका त्िम्ति २००४ सालतिरदेखि तरुण तपसी नव्यकाव्यकासृजनामा प्रवृत्त भएको कुरा पनि यहाँ उल्लेखनीय छ ।&lt;br /&gt;
लेखनाथको कवितायात्राको प्रथम चरण बा पूर्वार्मा नै पनिआध्यात्मिक चिन्तनशीलता उनको कवित्वको एक विशिष्ट प्रवृत्ति वाअभिलक्षणका रूपमा रहेको हो । यही प्रवृत्तिविशैष नै उनको कवित्वको&lt;br /&gt;
ननम.&lt;br /&gt;
केन्द्रबिन्दु हुन आउनु र उनी चिन्तक कविका रूपमा प्रकट हुनु नै उनकोकवितायात्राको दोस्रो चरणको मूल घटना देखा पर्छ । तर लेखनाथकोचिन्तक व्यक्तित्व र कवि व्यक्तित्वको सुन्दर समीकरणका परिणति हुन्‌उनका कवितायात्राका दोस्रो चरणका अधिकांश कविता । जीवनकोआध्यात्मिक चिन्तन नै कविताको मुख्य विषयवस्तु रहे पनि त्यो चिन्तनभावमय हुनु र त्यो चिन्तनधर्मी भाव वर्णमात्रिक लय-लालित्य, शैली-समृद्धि, शिल्प-सामर्थ्य र संरचनाक्षमताको उच्च परिष्कारघर्मी सिद्धिद्वाराओतप्रोत रहनु उनका यस चरणका अधिकाँश कविताको वैशिष्टघ हो ।उनका &#039;जीवनचङ्गा&#039; जस्ता कवितामा चिन्तनचाप रहे पनि रूपपरक शक्तिपनि उत्तिकै बेजोड छ भने &#039;पिँजराको प्यासा मैना&#039; मा चिन्तन र भावरूपकोअन्योन्य उच्च सहकारिता देखिन्छ । &#039;पतितपावनी श्री गङ्गाजीको शाँकी&#039;जस्ता कवितामा शैलीको उच्च समृद्धि छ भने उनका अधिकांश कवितामाशैलीको त्यही माधुर्य र लयको लालित्यसँगै अलङ्कारविधान र संरचनाकोउच्चतम सामर्थ्यसहित चिन्तन भावमय भई परिष्कारधर्मी कवित्व चुलिएकोपाइन्छ र &#039;कालमहिमा&#039; जस्ता कविता उनको कवित्वका यस्तै उच्च्चतमक्षणका प्राप्ति हुन्‌ । अध्यात्मिक चैतन्यसँग कविता-कलाको समेत परिष्कृतसिद्धि नै उनको कवितायात्राको यस दोस्रो चरणको केन्द्रीय प्राप्ति हो । यसैपरिप्रेक्ष्यमा उनी २००४ सालको नेपालको साहित्यिक चहलपहलको मारआफूलाई &#039;हाँसेको साहित्यसागर&#039; ठान्न पुग्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
२००७ सालदेखि यताका लेखनाथका कवितामा प्रधमत: युग-परिवर्तनको उत्साहका साधै सङ्क्रमणकालीन नेपाली समाजका विविधअसङ्गतिप्रति व्यङ्यको प्रवत्ति तीव्र रूपमा प्रकट भएको छ र दोस्रो चरणमैदेखा परेको विश्वबोध र मनुष्यताका परिप्रेक््यमा आध्यात्मिक चैतन्यकोव्यापक आवाहनको प्रवृत्ति नै यस तेस्रो चरणका प्रारम्भिक अवधिमा पनिविस्तारित भइरहेको पाइन्छ । २०0७-२२ को समयावधि उनको उत्तरार्द्कवितायात्राको अन्तिम प्रहर र समुच्चा कवितायात्राको तेस्रो चरण पनिहो । परिष्कारवादी काव्यकलालाई सामाजिकता र युगोन्मेषका साथै विश्वबोधर जीवनबोधको प्रगतिवादी स्पर्शसहित उदात्त भावचिन्तनका केन्द्रीयतामा&lt;br /&gt;
नट&lt;br /&gt;
अँगाल्दै आफ्ना अन्य विविध प्रवृत्तिहरूलाई पनि समेट्दै आएको तरुणतपसी (२०१०) नै उनको यस चरणको शीर्षस्थ कृति हो । «उनको मेरोराम ।२०११) कीव्यचाहिँ रामभक्तिमूलक अध्यात्मचिन्तनको उपज कृतिहो र अमर ज्योतिको सत्य स्मृति काव्यचाहिँ महात्मा गान्धीका शोकमार स्मृतिमा लेखिएको आध्यात्मिक मानवताचादी युगोन्मेषको काव्य हो ।यीदुई काव्यको आआफ्नो महत्त्व हुँदाहुँदै,पनि समाजचेतना र अध्यात्मचेतनाकोसमीकरण बिन्दुमा विश्व र मानवताको अतीतवर्तमानको काव्यात्मकसर्वेक्षण गर्दै आर्ष, उदात्त, आध्यात्मिक चैतन्यद्वारा नै बीसौँ शताब्दीकोमनुष्यजातिको उपचार सम्भव ठहराउने महाकाव्यधर्मी तरुण तपसी नव्यकाव्यनै यस चरणको सर्वोच्च कृति ठहरिन आउँछ । वास्तवमा क्रतुविचार(१९९१) को परिष्कारवादी काव्यसौन्दर्यको उच्च सृष्टिपछि लेखनाथकोकवितायात्राको प्रौढ काव्यचैतन्यको अर्को परिपक्व काव्यकृतिका रूपमायो महाकाव्यधर्मी तरुण तपसी नव्यकाव्य देखा पर्छ । यस चरणमा उनकादुई कवितासङ्ग्रह लालित्य प्रथम भाग (२०१०) र द्वितीय भाग (२०२५)पनि देखा परेका छन्‌ । लेखनाथका कवितायात्राका विभिन्न चरणकाकविताकृतिहरू यी दुई सङ्ग्रहमा समाविष्ट छन्‌ तापनि यिनमा उनकाकविताहरूको क्रमतद्ध व्यापक सङ्कलन नभई आंशिक सङ्कलन मात्र हुनसकेको पाइन्छ । लेखनाथको कवितायात्राको तेसो चरणका सुरुसुरुकामुख्यमुख्य फुटकर कविता हुन्‌- युगबाणी (२००७), वर्षा (२००९), प्रगति(२०१०), कविताको खोजी, साहित्यको फुटबल (२०१०। आदि । यीकविताहरूमा एकातर्फ २००७ सालको परिवर्तनपछिको नवयुगको रन्कोछ भने अर्कातर्फ त्यस युगको सङ्क्रमणकालका अनेक सामाजिकअन्तर्विरोधप्रति व्यङ्ग्य छ अनि जीवनका अन्तर्बाह्य परिष्कारका स्वच्छआदर्शतर्फको कवितात्मक चासो पनि छ । यस सन्दर्भमा यी कविताहरूजीवनको अन्तर्बाह्य आध्यात्मिक उज्ज्वल कामनासहित प्रगतिवादी पुटपनि परेका कविता देखा पर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
समुच्चा कवितायात्राको अन्तिम दशक (२०१३-२२) मा लेखनाथकोरचनाप्रक्रियामा बुढ्यौलीको जर्जरता, शारीरिक शिथिलता र रोगव्याधिका&lt;br /&gt;
न्ठ्न&lt;br /&gt;
कारणले लेखनकठिनाइ आइपरे पनि उनको सृजनात्मक प्रतिभाचाहिँ अक्षुण्णनै रहेको पाइन्छ । २०१८ सालतिरैदेखि उनले लेख्न प्रयास गरेको गङ्गागौरीमहाकाव्य अपूर्ण नै रहेको पाइन्छ । गङ्गागौरी महाकाव्य अपूर्ण नै रहे पनि योमहाकाव्यांश, परिष्कृत भर्तृहरिनिर्वेद नाटक (२०२०) को पद्यांश र विभिन्नफुटकर कविताहरूले उनको कवितायात्राको तृतीय चरणको अन्तिम अवधिसम्मनै उनको सृजनात्मक प्रतिभा अफ नौला सम्भाव्यताका साथ छलबलाइरहेकोकुरा स्पष्टयाउँछन्‌ । यस तेस्रो चरणका प्रारम्भिक अवधिमा प्रगतिवादीवायुमण्डलको चाप तीव्र रहेको अनि सामाजिकता र आध्यात्मिकताकोसमीकरणको प्रक्रिया अँगाली उनको परिष्कारवादी कवित्व विशेष गतिशीलरहेको साक्ष्य तरुण तपसी र पूर्वोक्त फुटकर कविताहरूबाट प्राप्त हुन्छ भनेजीवनको सान्ध्य अन्तिम दशाकका &#039;कवितामा चाहिँ उनको समाज द्रष्टा रचिन्तक व्यक्तित्व अफ खारिँदै र अफ सौन्दर्ययुक्त हुँदै आइरहेको र त्यसलेराष्ट्रवादको युगीन सन्दर्भ अँगाल्नाका साथै आफ्ना पूर्वस्वच्छन्दतावादीकाव्यतत्त्वहरूतर्फ पनि पुनः चाख लिइरहेको सङ्केत प्राप्त हुन्छ । क्रतुविचारको उत्कृष्ट सौन्दर्यप्राप्ति र तरुण तपसीको उत्कृष्ट चैतन्यबिस्तारसहितपरिपक्व काव्यप्राप्ति दुवैको समन्वित बिन्दु हुन खोज्ने गङ्गागौरी महाकाव्यअपूर्ण नै रहे पनि लेखनाथको समुच्चा कविव्यक्तित्वको सान्ध्य उत्कृष्टसिद्धिको स्पर्श प्राप्त गरेका कतिपय फुटकर कविताहरू विशेष स्मरणीयदेखिन्छन्‌ र ती हुन्‌-हाम्रो इन्द्रेणी (२०१३), मेरो किशोर (२०२०), पूर्वस्मृति(२०२२) र आखिरी कबिता ।२०२२) आदि । यी कविताहरूमध्ये धेरैजसोमालेखनाथको आत्मसंस्मरणको मुद्राका साथै आध्यात्मिक जीवनचिन्तन रसौन्दर्यबोधसमेतको समन्तित उत्कृष्ट व्यञ्जना देखा पर्छ । आंशिकपुर्वस्वच्छन्दतावादी पुटसमेत परेको भाव-शिल्प-सौन्दर्यको उत्कृष्ट परिष्कारवादीकाव्यवाटिका क्रतुबिचार र सामाजिक-आध्यात्मिक चैत व्यको उत्कृष्टकलात्मक अभिव्यक्तिस्वरूप महाकाव्यधर्मी परिष्कारवादी नव्यकाव्य तरुणत्पसी को सृजनापछि यी दुवैको सङ्गमबिन्दुका रूपमा प्राकृतिक, सांस्कृतिक,राष्ट्रिय र आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्यमा लेखनाथले रच्न लागेको गङ्गागौरी महाकाव्यपूर्ण भएको भए त्यो जेजस्तो हुन्थ्यो त्यसको सङ्गत उनका पूर्वोक्त फुटकर&lt;br /&gt;
जाड&lt;br /&gt;
कृतिहरूबाट केही मात्रमा प्राप्त हुन्छ । यस तात्पर्यमा लेखनाथको कवितायात्राकोसम्भाव्य चौथो चरण अपूर्ण रही तेस्रो चरणभित्रै अन्तर्भुक्त देखा पर्छ ।&lt;br /&gt;
उपर्युक्त चर्चाको अन्त्यमा के भन्न सकिन्छ भने लेखनाथको ८२ वर्षेजीवनको लगभग ६० वर्षको कवितायात्रामा निरन्तर गतिशीलता, परिपक्वतार प्रतिभाको अक्षुण्णताका साथ उत्तरोत्तर सिद्धिका लक्षणहरू देखा पर्छन्‌ ।,यस कवितायात्राका क्रममा उनले नेपाली कविताको माध्यमिक काललाईतोड्दै -पूर्वस्वच्छन्दतावादको आंशिक स्पर्शसहितको नेपाली परिष्कारवादीकाव्यधाराको प्रवर्द्धन, प्रतिष्ठापन र नेतृत्व गरी नेपाली कविताको आधुनिकयुगको पहिलो प्रहरको सूत्रपात गर्नाका साथै नेपाली कविताका स्वच्छन्दतावादी,प्रगतिवादी र प्रयोगवादी धाराका चहलपहलका माफ पनि त्यस परिष्कारवादीकाव्यधाराको आजीवन संवर्द्धन गरेको पाइन्छ । उनी नेपाली वर्णमात्रिकगीतिचेतना वा छन्दचेतनाका सर्वाधिक ललित र परिष्कृत गायक हुन्‌ र्‌ उनीपरिष्कृत नेपाली काव्यभाषा, काव्यशैली र काव्यशिल्पका प्रथम पारखी स्रष्टाहुन्‌ । उनी नेपाली प्रकृतिको सौन्दर्यको सूक्ष्म पर्यवेक्षण र व्यञ्जना गर्ने प्रथमपरिष्कारवादी कविकोकिल हुन्‌ र उनी नेपाली समाजका सांस्कृतिक-आध्यात्मिकपुनर्जागरण-प्रक्रियाका प्रवक्ता काव्यकोविद्‌ हुन्‌ । नेपाली आध्यात्मिक चैतन्यपरम्परा र युगोन्मेषको समीकरणका बिन्दुमा विश्वबोध र मनुष्यता-बोधगर्ने क्रषि कवि वा कवि तपसीका रूपमा उनको स्थान सर्वोपरि छ । उनीआधुनिक नेपाली समाजका नैतिक-आध्यात्मिक कवि-गुरु हुन्‌ र आध्यात्मिककाव्यसौन्दर्यका सर्वोच्च नेपाली स्रष्टा पनि हुन्‌ । उनी हाम्रा प्राना कविहरूमध्येसबभन्दा नयाँ र हाम्रा आधुनिक कविहरूमध्ये सबभन्दा पुराना र जगकोभूमिका खेल्ने महान्‌ परिष्कारवादी कवि हुन्‌ । उनी नेपाली कविताकोपरिष्कारवादी (शास्त्रीय : क्लासिकल) काव्यधाराका सर्वोच्च चुली हुन्‌ ।उनका क्रतुविचार खण्डकाव्य र महाकोव्यधर्मी तरुण तपसीका साथै तीन-चार दर्जनजति उत्कृष्ट फुटकर कविताहरू उनको त्यही परिष्कारवादीकाव्यधाराका उत्तम कृतिका रूपमा नेपाली जातिका र नेपाली भाषाकाचिरस्मरणीय निधि हुन आएका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==लेखनाथका प्रमुख कविता==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== १. कविकवितालाप ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कवि-&lt;br /&gt;
भगवति ! ककिते ! देवी, जुगजुग तिम्रो म हुँ सदासेवी;&lt;br /&gt;
बाहिर निस्कन आज, किन माननुभो बडो लाज ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कविता-&lt;br /&gt;
रसिला गुणिजन हेरी, हाली अँगालो गलाविषे फेरी&lt;br /&gt;
रञ्जन पारी समाज, डुली रहेकी मलाई के लाज ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कवि-&lt;br /&gt;
तिमी भनि अरू सब बात, छोडी बिताये बसी रात;&lt;br /&gt;
तैपनि करुणा गरिनौँ, कसूर के देखि सामूमा परिनौ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कविता-&lt;br /&gt;
गर तिमी आफनु काम, न लेक बानु । कसूरको नाम;&lt;br /&gt;
मेरै कर्म अभागी, बुझेर दबिनरे कुना लागी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कवि-&lt;br /&gt;
जसका वश परि सुकृति, कहलाये व्यास वाल्मीकि प्रभृति;&lt;br /&gt;
मनमनमा धैर्य धारी, सौही तपाजी अभागिनी कसरी !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कविता-&lt;br /&gt;
सकदिन बानु ! सहन, अब अरु केही कुरा नभन;चरचरि चिरिनछ छाती, वाल्मीकि व्यास सम्झ्दामा ती ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कवि-&lt;br /&gt;
तिमी छौ रसरङ्गवती, भनेर, डाकेँ गरी ठूलो विनति;उल्टा आँशु खसाली, किन रुन लाग्यौ घुस्धुरु खालि ?&lt;br /&gt;
लेखनायका प्रमुख कविता /१&lt;br /&gt;
कविता-&lt;br /&gt;
व्यासादिक सत्कविले छोडि मलाई बिदा भये जहिले;उस दिनदेखि छु नङ्गी, छैन कुनै रङ्गिचङ्गिको भङ्गि ।कवि-&lt;br /&gt;
जाउन वृद्ध व्यासप्रभृतिक, तिम्रो भयो र के नाश?अक पनि सत्कवि हामी, खडा छँदै छौँ बडा नामी ।कविता-&lt;br /&gt;
शिब ! शिव ! यो बज्जसरी, शरीरभैदी कुरा सुनौँ कसरी,अब चुप चुप चुप बाबू । गन्यो मलाई अभाग्यले काब्‌ !कवि-&lt;br /&gt;
म गरख्लु तिमि भनि; मान, तिमि थुनछेउ स्वयं वृथा कान;हुन आयो कुन हेतु, रहेछ तिम्रो कहाँ केतु?कविता-&lt;br /&gt;
तिमि जस्ता बनि कविजी, गरदछु कविता भनेर पत्र फिजी;लागून यो केही दशा, न बिग्री हुनथ्यो कहाँ सहसा ।कवि-&lt;br /&gt;
मकन बेसरी पोली, न बोल अति पेचिला रुखा बोली;चिन्हिनौ कत्ति मलाई, जान तिमी व्यासको भाइ !!कविता-&lt;br /&gt;
आफ्नु शक्ति नजानी, नबने अबदेखि, पण्डितम्मानी;कुह् बरु धनिका ढोका, मिलछन पछि दानका पोका !!!कबि-&lt;br /&gt;
प्रतिभा पूर्ण छ मेरी, लेखि लगाएँ किताबको ढेरी,यस्तो सत्कवि सुजन, जानछु र ढोकाविषे म किन ?कबिता-&lt;br /&gt;
अक्षर अक्षर भाँची, कनि कुथि गरि खालि छन्दमा नाची;प्रतिभा नभये कसरी ? लेखन्‌ कन्था अगाडि सरी ।&lt;br /&gt;
२/लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
कवि-&lt;br /&gt;
लेखनशैली मेरी, प्रसादगुण-शालिनी हेरी;बालक पनि छन दङ्ग, थियो कि यो व्यासमा ढङ्ग ?कविता- £खतिदिनु दिन दिन कन्था, ग्रामीण भ्रष्ट बोलिको पन्था;बुसु्दछ पलटन सारा, चलदछ अनि बिक्रिको धारा ।कवि-&lt;br /&gt;
अपठित जङ्गलिलाई, समन सजिला किताब फैलाई;हुनुपरने यश मात्र, किन अपयशको भन्ने पात्र ?कविता-&lt;br /&gt;
छेक न दुप्पो पारी, कविता-सौन्दर्य बेसरी मारी;गरि उल्था खालि कथा, नभननु &#039;कवि हुँ&#039; भनेर वृथा ।कवि-&lt;br /&gt;
गरँला उन्नति भारी, तिमीकन सर्वाङ्ग- सुन्दरी पारी;भनने यो अभिलाषा, पेचि कुराले भयो नाश।कबिता-&lt;br /&gt;
यस्ता स्तन भनी लेखी, वर्णन गर ती कुरा पढे देखी;शिक्षित हुनछ समाज, पचदछ मनको सबै लाज ।कवि-&lt;br /&gt;
व्यासजिका पनि देख, . अनेक आँंगारका लेख;त्यसै गुङ्ि नहाँक, छोपनु परला वृथा नाक।कवबिता-&lt;br /&gt;
व्यासजिका लेख जति, हेरी हेरी सफा गराइ मति;पायेछीँ खुब सार भँडुवा ग्रामीण शंगार ।कवि-&lt;br /&gt;
हितकारी जो छ खडा, गरनु उसैका समीपमा फगडा;होला अनि सब जाति, काङ्गारियौली भलिभाँती ।&lt;br /&gt;
लेखनायका प्रमुख कविता /३&lt;br /&gt;
कविता-&lt;br /&gt;
जसले लेखन शैली, बिगारनाले भजऔै अति मैली,उहि मेरो हितकारी !! धन्य महात्मा दयाधारी !!!कृवि-&lt;br /&gt;
फिकिकन संस्कृत- नेल, गराइ भाषा वबिषे ठूलो मेल;खेलाजै जसलाई, शत्र उसैको भज्जे अरे !! हाई ।कविता-&lt;br /&gt;
ञ्रिकिकन संस्कृत- सारी, मर्यादा अङ्ग अङ्गको मारी,न नचायै उदर- दरी, भरीभराक हुने कसरी ?कवि- है&lt;br /&gt;
भाषामा उपदेश, लेखिदिनाले स्वयं बुढो देश;लिन सक्दछ शुभ शिक्षा, मागनु परदैन काहिँ गै शिक्षा ।कविता-&lt;br /&gt;
गर फगडा सब माफ, बल्ल सुनायौ मिठा कुरा साफ;देश सुधारन भाषा, कुञ्जि छ यो कालमा खासा ।कवि-&lt;br /&gt;
भाषाका गुणधारा, मालुम मनमा छँदा छँदै सारा;किन हो यतिनजेल, थापिरहेकी ठूलो रेल?कविता-&lt;br /&gt;
भद्दा अबनतिकारी, रसियाजस्ता किताबका भारी;दिन दिन बढ्ता देखि अघोर मनमा उठ्यो शैखी ।कवि-&lt;br /&gt;
शिक्षा विचारशाली, लेखन्‌ मिहिनेत मात्र हो खाली,गरदछ को रुचि यसमा, छन सब बोक्रे कथारसमा ।कविता-&lt;br /&gt;
रसिला नैतिक बात, लेखन उठ्दैन आफनै हात ?भ्रन बरु छ भने होस्‌ किन दिनु अरूमा वथा दोष ?&lt;br /&gt;
४ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
कृबि-&lt;br /&gt;
उपयोगी परिपाटी, लियेर कन्धा कटाकटी काटी;लेखनु यो कठिन कुरा, छन सब त्यस्ता कहाँ .चत्रा ?कविता-&lt;br /&gt;
उपकारी मर्मज्ञ, विचारवाला गुणी महाप्नज्ञ;भाषामा छैन कुनै, यो त बताज्रे स्वयं अघि नै।कवि-&lt;br /&gt;
अघिका सत्कवि जस्ता, मिलछन्‌ कविजी कहाँ सस्ता,तर तिमी हार नखाङ, स्थिर गर भाषाविषे पाउ ।कबिता-&lt;br /&gt;
होला शिक्षित देश, भनेर भाषाविषे सहैँ क्लेश;कविको पुगेन ढङ्ग, उल्टा मेरो टुटै अङ्ग।कवि-&lt;br /&gt;
दर्द बुझ चुपचाप, बस तिमी मनमा न लेक सन्ताप;आफनु जीबनसम्म, सुधार गर्ला सकेसम्म ।कविता-&lt;br /&gt;
अघितिर पुच्छर घुसारी, कविता प्रत्यक्ष लोकमा पारी;गंकनछौ तिमी यसरी, सुधार होला हरे! कसरी;कवि-&lt;br /&gt;
गुणवति ! सुन अबदेखि, गन्धन कन्धा बिकामका लेखी;गरने छैन दिमाक, पक्का यो चित्तमा राख।कविता-&lt;br /&gt;
बैस भन्यौ अबदेखि, विचारशाली मिठा कुरा लेखी;मेरो गरनु सुधार, शिरमा तिमी बोक यो भार ।कवि-&lt;br /&gt;
पहिले अलि अलि . हाँसी, नुहिकन पछि बेसरी छाँसी;अर्ति दियौ हितकारी, नपाइ शाकना ठूला भारी ।&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता /५&lt;br /&gt;
कविता-बढिया हो &#039;यो वचन,. तिमीसित शिवजी सदा खुसी रहन;बन्द - गरौँ सब बात, सुत अब धेरै गयो रात।- प्रार्थनाखुसिसित बसि मेरो लेख यो हेरि साफगुण जति लिनु होला दोषमा पाउँ माफ ।भनि नुहिकन सारा मित्रमा प्रीतिसाथगरदछ कर जोडी प्रार्थना &#039;लेखनाथ&#039; ॥&lt;br /&gt;
वि. सं. १९६९ लालित्यबाट&lt;br /&gt;
६लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==२. नैतिक दृष्टान्त==&lt;br /&gt;
बडाले जो गन्यौ काम हुन्छ त्यो सर्व-संमत ।छैन शङ्करको नङ्घा, मगन्ते भेष निन्दित ॥&lt;br /&gt;
॥।गरदैन ठूलो व्यक्ति मर्यादा-स्थिति-लङ्खन ।बसेको छ महासिन्ध सीमाबद्ध बनीकन ॥र्‌ £दबिन्छ गुणिको दोष गुणका राशिमा परी ।रश्मिले चन्द्रको दाग दबाएकै छ बेसरी ।त ३कसैको लोकमा छैन एकैनास समुन्नति ।अरूको के कुरा हेर सन्ध्यामा सूर्यको गति ॥॥&lt;br /&gt;
छोटो बढ्यो भने ज्यादा फूर्ति ढाँचा बढाउँछ ।&lt;br /&gt;
उलँदो खहरे हेर कत्तिको गड्गडाउँछ ॥द्‌&lt;br /&gt;
ज्यादा सोको हुनूभन्दा टेढिनु छ फला५धिक ।&lt;br /&gt;
गरदैन कुनै सोग्गो ग्रहको पूजना$५दिक ॥॥&lt;br /&gt;
टपर्टुञ्या पनि हुन्छ मूर्खमध्ये प्रतिष्ठित ।&lt;br /&gt;
बोलने को अँध्यारोमा महा$६५त्मा जुन्किरीसित ॥७&lt;br /&gt;
लेखनायका प्रमुख कविता /७&lt;br /&gt;
सानैदेखि छुचो हुन्छ दुष्ट मानिसको मति ।&lt;br /&gt;
घोचने जङ्गली काँढा पहिले नै तिखा कति ॥यू&lt;br /&gt;
मिलेर काम गर्नाले हुन्छ अत्यन्त फायदा ।&lt;br /&gt;
एकता हेर कस्तो छ मौरीको महमा सदा ॥९&lt;br /&gt;
जो दिंदैन उही दिन्छु भनी गर्जन्छ सत्त्वर ।&lt;br /&gt;
जो हो नवर्षने मेघ उसैको हुन्छ घर्घर ॥१०&lt;br /&gt;
हुनुपर्दछ मौकामा शत्रुको पनि सेवक ।&lt;br /&gt;
कोइली कागकै बच्चा बन्छ सानू छँदा तक ॥9 ११&lt;br /&gt;
गुणग्राही जहाँ छैन वहाँ के गरला गुणी।&lt;br /&gt;
.कौडीमा तक मिल्किन्छ भिल्लका देशमा मणि ॥१२&lt;br /&gt;
योग्य स्थानविषे मान सानाले पनि पाउँछ ।&lt;br /&gt;
कृ्‌ष्णाका तटको ढुङ्गा देवता कहलाउँछ ॥१३&lt;br /&gt;
उपकारी गुणी व्यक्ति निहरन्छ निरन्तर ।&lt;br /&gt;
फलेको वृक्षको हाँगो नमुकेको कहाँ छ र॥१४&lt;br /&gt;
मेटिँदैन कसैबाट आफनू कर्मपद्धति ।&lt;br /&gt;
बतवासी बने राम चौधै भुवनका पति ॥११&lt;br /&gt;
धर्म हो धीरको धैर्य राखनू दु:ःखजालमा ।&lt;br /&gt;
मान्‌ मौनव्रती हुन्छ कोइली शीतकालमा ॥१६&lt;br /&gt;
५/ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
सारा सार लिई कन्था छोडी-दिन्छ गुणी जन ।&lt;br /&gt;
रस चसेपछि भृङ्ग फूलमा भूल्दथ्यो किन ?१७&lt;br /&gt;
सङ्घले पनि जाँदैन दुष्टको दुष्टता रिस ।&lt;br /&gt;
श्रीखण्डमा बसी सर्प कहाँ हुन्थ्यो र निर्विष ॥१८&lt;br /&gt;
मूर्खका मनमा अर्ती गालीतुल्य बि्ाउँछ ।&lt;br /&gt;
दूधपान गरी सर्प खालि विष बहाउँछ ॥१९&lt;br /&gt;
वि. सँ. १९७४ गोरखाशिक्षाको तेसो पुस्तकबाट&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता /९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ३. वसन्त कोकिल ==&lt;br /&gt;
भरी लता वृक्ष विषे टनाटननवीन लाखौँ फूल पालुवाकन ।बसन्त आयो कलकण्ठको अबसुनिन्छ साह्ै कल कण्ठ-गौरव ॥१अगाडि जो दीन बनी लुकीकनबिताउँथ्यो केवल दु:खमा दिन ।अहो ! उही कोकिल हेर आज योप्रमोदले पूर्ण महासुखी भयो ॥&lt;br /&gt;
01बसी बगैँचा-बिच मोजमा परीनयाँ कलीला सहकारमञ्जरी ।चपाउँदै मस्त भएर बेसरीकुहकुहू गर्दछ त्यो घरीघरी ॥&lt;br /&gt;
21चलीरहेको छ सिरी सिरी हवाजुलीरहेछन्‌ सब मञ्जु पालुवा ।जता दियो दृष्टि उतै खुसी मनप्रमोदले पूर्ण नहोस त्यो: किन ?॥॥ 4&lt;br /&gt;
१०४ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
वि. सं. १९७४&lt;br /&gt;
समीरले पुष्प परागको फ्रीलगाउँदा त्यो रसरङ्गमा परीमुलीरहेको छ शरीर बेसरीमुछेर तेही रजमा घरीघरी ॥श्रपिएर सा५५नन्द रसालको रसघुमाउँदै नेत्र दुवै मदाभ्लससहर्ष खोलौं सुरिलो गलाकन&lt;br /&gt;
घनक्क घन्काउँछ त्यो सबै वन ॥&lt;br /&gt;
द्‌घरीघरी भुर्र उडी अलीकतिघुमेर शाखान्तरमा यताउति ।बडो बहाडी रसिकै बनी तहाँढलीमली गर्दछ पालुवामहाँ ॥७चुचो ठडाईकन चट्ट मञ्जरीढुँगेर च्यापीकन देखिने गरी ।फरक्क फर्कन्छ घरी पछिल्तिरप॒सन्नता-साथ लतारि पुच्छर ॥दन शीत-बाघा, न त घामको डरन बाग नङ्गा, न त वृष्टिको पिर ।बसन्तका गौरवले गरीकनखुसी छ साह्कै कलकण्ठको मन ॥९&lt;br /&gt;
गोरखाशिक्षाको तेसो पुस्तकबाट&lt;br /&gt;
लेखनायका प्रमुख कविता /११&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ४. जीवन-चङ्वा==&lt;br /&gt;
कछुवाले अङ्गसरी खुम्च्याई बाह्य वृत्तिका तार ।भित्र अलकति हेर्दा अर्कै रसिलौ चमत्कार ॥&lt;br /&gt;
१दुर्गम भै उर्लेकी तलतिर समतुल्य मोहकी गग्ना ।फरफर गर्छु उपर यो जीवनमय पातलो चङ्गा ॥&lt;br /&gt;
र्‌ममतासहित अहन्ता ग्रन्थि परेका बडा रम्य।सुखदु:खका कका छन्‌ खूब मिलेका दुवै टम्म ॥१ ,&lt;br /&gt;
मनमय घुम्छ लटाइ फनफन फन्का पलापला मारी ।&lt;br /&gt;
अतिशय दुर्लभ तर त्यो रसिक लटाई लिने चमत्कारी ॥॥ ॥ 1&lt;br /&gt;
सङ्गल्पको छ धघागौ छुटी रहेको लगातार ।&lt;br /&gt;
गर्दछ जसका भरमा जीवन-चङ्गा विचित्र संचार ॥५&lt;br /&gt;
त्यो मसिना धागामा खिरिलोपन ल्याउने ताजा ।&lt;br /&gt;
घसिएको बहुत सफा विवेक, बुद्धिको माजा ॥&lt;br /&gt;
ददचङ्गाको मुखचाहिँ पवृत्तिमय रङ्गले लाल ।&lt;br /&gt;
अलिअलि कालो आशा-पुच्छर, उसको छ चलबले चाल ॥७&lt;br /&gt;
१२/लेखनायका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
वैषम्य झै ककामा अलिकति गतिमा घुस्यो भने दोष ।&lt;br /&gt;
ग्वाँख मिलाउनलाई संयम, सुविचार, शान्ति, सन्तोष ॥द्‌&lt;br /&gt;
यस्तो अद्भुत चङ्गा तयार पारी बडो चमत्कारी ।&lt;br /&gt;
नभमा कौतुक गर्ने कुन होला धीर अविकारी ?&lt;br /&gt;
९जतिजति गडेर हेर्छु यस चङ्गाको विचित्र संचार ।उतिउति शून्य गगनमा विलिन हुन्छु न देखदा पार ॥१०कहिले नीलो दहमा सफारी माछो सरी भरी।लीला गर्छ गगनमा चक्कर लाखौँ थरी मारी ॥११कहिले प्रेम हावामा सररर अक्कासिँदै जान्छ ।कहिले फरक्क फरकी तम तल कौँठी पनी खान्छ ।१२कहिले भुजङ्गजस्तै सुलुलुलु बग्दै बटारिन्छ ।कहिले वबिधिवश बिचमा अरूअरूसँग बेसी लठारिन्छ ॥&lt;br /&gt;
१३कहिले पुगेर माथि सोकै बहँदै शनैः शनै: सल्ल ।निश्चल टक्कर मारी अडिन्छ बँउडाइ-बोहरी-तुल्य ॥१४जलचर नभचर सबका सुन्दर लाखौँ थरी चाल ।देखिन्छन्‌ यही हाम्रो जीवन-चङ्गा विषे सदाकाल ॥१५अक्काशिएर ज्यादा माथि जाँदा हराउने भय छ।तल गङ्गा-लहरीले लपक्क पार्ने विछट्ट संशय छ॥१६&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता /१३&lt;br /&gt;
शीतल सरसर बहने बीच गगनको सफा हावा ।&lt;br /&gt;
जति पायो उति यसले खान्छ गजब चालले कावा ॥१७&lt;br /&gt;
कहिलेदेखि उडेथ्यो? अब उड्ने हो कति बेर।&lt;br /&gt;
आखिर चङ्गा ठहतन्यो चुँडिनालाई छ के बेर?१८&lt;br /&gt;
जति दिन यो उड्ने हो उति दिन उडन्यै छ बीचमा नअडी ।&lt;br /&gt;
तर त्यो देखिनुपरने अद्भुत चङ्गा उडाउने लहडी ॥१९&lt;br /&gt;
जय जगदीश्वर ! देखेँ विश्वव्यापी प्रकाश त्यो खास ।&lt;br /&gt;
सृक्ष्म लटाईभित्रै रहेछ प्रभुको निवास वा भास ॥२०&lt;br /&gt;
वि. सं. १९९२ शारवा वर्ष १ सङ्ख्या २ बाट&lt;br /&gt;
१४ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ५. गौँथलीको चिरिबिरी (१)==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म बस्ने कोठाकै दलिन-बिचमा गौँधली बस्यो,पिटाएको तन्नाउपर फिर मैला पनि खस्यो।मलाई त्यो देखी हृदयबिच लाग्यो किरकिरीचरी बोल्यो मेरो मन सब बुकी त्यो चिरिबिरी ॥१अहो !! त्यस्ता ताता नजर अति राता विष सरीतरी तात्यौ बाबा ! किन मनमनै त्यो रिस गरी ।तिमी धर्मात्मा छौ घरबिच म छू आज अतिथितिथी माघे औँसी शहरभर भूकम्प-फजिती ॥र्‌जहाँ बस्थ्यौँ हामी भवन उहि पातालमय भोचल्यो भारी हा हा नसहिसकनू नै प्रलय भओ।कहाँ पाउँ ठाडो घर, कसरि ओतौँ शिर भनीदुवै भाले-पोषी फनफन घुम्यौँ व्याकुल बनी ॥&lt;br /&gt;
डेबिरालोको फेरि अधम चिलको, काग शठकोशिकारी बोहोरी, कुकुरहरुका दुष्ट हठको ।परी शङ्का भारी सबतिर बिचारी डुलिड्लीनिराशामा एन्थेँ अघि अघचिलो ठाम नमिली ॥॥ $&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता / १५&lt;br /&gt;
यहाँ तिम्रो सानू घरमहल वा रामजुपडीखडा. देखी राम्रो गगन-बिच खेल्दै लडिबुडी ।पसेको हुँ बाबा ! अलि दिन बसूँला कि म भनीप्रियाको आगामी प्रसव दिनको उत्सव गनी ॥५तिमी भन्छौ मेरो सकल घर यो खास यसमाचरी घुस्प्रो सानू कुन चिरबिरे रङ्गरसमा ।म भन्छू हे बाबा ! घरमहल मेरो छ नभनपलामा घर्केका घरउपर दौडाउ नयन ॥0निमेषैमा भत्की घररर गरी घर्र त्यसरीढली ज्यानै हर्ने घर छ डरको दीर्घ भुमरी ।विधाताको भित्रै मधुर करुणाको रस परीपरेनौँ तै हामी विकट भुमरीमा अरु सरी ॥७&lt;br /&gt;
तिमी जान्ने सुन्ने मनुज चतुरा, हामी बिचराचरा साह्दै साना अबुरु वनका केवल किरा ।तथापी श्रद्धाले फुकि विनति गर्छु म सरसवथा मेरो भन्ने जटिल ममता-ग्रन्वि नकस ॥द्‌खुला पारी राम्रो सँग नयनको भित्र नयनबिचारी यी सारा गृह-विभवको चञ्चलपन ।दयालु भै रोक मिलिजुलि सबै वान्धवसितभलो होला जाक, रिस नगर रन्केर मसित ।९कुनै पल्टेका छन्‌ मलिन मुख लाई रुखमनिकुनै रुन्छन्‌ बाटो-बिच नमिलि सानू रुख पनि ।&lt;br /&gt;
१६“ लेखनायका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
कनै भोका शोका५५कुल मरिरहेछन्‌ नगरमाहरे ! तिम्रो यस्तो कुन तुजुक यो तृच्छ घरमा ॥१०त्यहाँ त्यो शय्यामा गर तिमि खुशीसाथ शयनयहाँ यो डन्डीमा बसिबसि म चिम्लन्छु नयन ।अरू सेरोफेरो सब मुफत मेरो छ नभनअघी मेरो भन्ने। कतिकति गए ती सब गन ॥११उघारी त्यो भारी मधुर कषणा-द्वार मनकोगरी रक्षा सारा विकल बिचरा दीन जनको ।यता विश्व-प्रेमी बन, मनुज चोला सफल होस्‌उता स्वर्गद्वारा क्षणभर पनी बन्द नरहोस्‌ ॥१२तिमीभन्दा लाखौँ गुन अफ धनी मानिस पनिडुलेका छन्‌ बाबा ! फगत भिखमङ्गासरि बनी ।विधाताको सारा अघट घटना सम्कू मनमासबै मेरो मेरो भनि नभुल यो मोह- वनमा ॥१३,कदाचित्‌ यो तिम्रो भवन चकनाच््‌र पहिलेहुँदो हो ता हन्थ्यो कसरि किन यो भेट अहिले ।दया राख्यो भारी सदय विधिले सङ्गत भयोसुन्यौ मेरो सानू चिरिबिरि, सबै पाठ पढ यो॥१४कसै सक्तैनौ यो यदि तिमि भने घच्च सहनमलाई द्यौ बाबा ! फगत अब यौ रात रहन ।म भोली नै जान्छु नुपतिसँग भूकम्प कहनपखेटा छन्‌ सक्छू अफ्‌ त नभमा सर्र बहन ॥१५&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता /१७&lt;br /&gt;
गरी यस्तो राम्रो चिरिबिरि चरी त्यो चुप भयो&lt;br /&gt;
भनेँ मैले भैगो तँ बसि कुद्टि दे गैह्र घर यो।&lt;br /&gt;
पखेटा पैँचो दे बरु म पछि आएर तिएँला&lt;br /&gt;
दयाधारी राजासित सकल मै बिन्ति गहँला ।१६&lt;br /&gt;
बि. सं. १९९२ शारदा वर्ष १ सङ्ख्या ७ बाट&lt;br /&gt;
१८ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==६. सत्य सन्देशहरू==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कालो मन्दाकिनीको जलजल, निधिको मोतिको जोति कालो,&lt;br /&gt;
कालो सौदामिनीको चहक, सब शरच्चन्द्रको कान्ति कालो ।&lt;br /&gt;
कैलाश-श्रेणि कालो, कूलमल गरने सूर्यको बिम्ब कालो&lt;br /&gt;
यो सारा सृष्टि कालो, मनबिच्च छ भने दम्भ दुर्भाव कालो ॥१&lt;br /&gt;
थोत्रो पाटी उज्यालो, मलिन तृणकुटी, कन्दरा झन्‌ उज्यालो&lt;br /&gt;
भिक्षा भारी उज्यालो, अझ धन वनको शागशिस्नू उज्यालो ।&lt;br /&gt;
फ्याङ्लो गुन्द्री उज्यालो, वरपर घुमदा जीर्ण कन्था उज्यालो&lt;br /&gt;
तृष्णाको तुच्छ जालो मनबिच नभएर जो मिल्यो सो उज्यालो ॥१&lt;br /&gt;
भर्दाभर्दै हजारौँ विषय-सुख-घडा देह लम्तन्न पर्दा&lt;br /&gt;
र्कर्दा सम्पूर्ण सेखी, तुजुक, पवनले निस्कने जोड गर्दा ।&lt;br /&gt;
सर्दा आपस्त डैं परपर, धमिलो नाचको अन्त्य पर्दा&lt;br /&gt;
गिर्दामा साथ जाने क्न कुन चिज हुन्‌ ? सम्क ती काम गर्दा ॥१&lt;br /&gt;
विद्याको, वयको र बुद्धि, बलको, सौन्दर्यको, मानकोप्रज्ञाको, कुल-जातिको, इलमको ऐश्वर्षको ज्ञानको ।तातो ग्यास मनुष्यका मगजको सम्पूर्ण उत्री दिएपृथ्वीमा सब देवता घरघरै आएर खेल्ने थिए ॥&lt;br /&gt;
बि. सं. १९९१ शारदा बर्ष ४ सङ्ख्या ३,४,५ र १२ बाट&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता /१९&lt;br /&gt;
मत्ता हात्ती हलुङ्गो, वितत जलधिको ह्वेल माछो हलुङ्गोजङ्गी बेडा हलुङ्गो, विकट कटकटै रेलगाडी हहलुङ्गो ।शैलश्ेणी हलुङ्गो, पृथुतम पृथिवी-गौल सारा हलुङ्गोयो बह्माण्डै हलुङ्गो, जब सब मनकी तिर्सना लाग्छ टुङ्गो ॥&lt;br /&gt;
वि. सं. १९९९ शारदा वर्ष ८ सङ्ख्या ३ बाटदोषी माता-पिताका वचन, गुरुजना६५देश निःशेष दोषीसत्त्या(५त्मा मित्र दोषी, गृह-परिजनको चाल देखिन्छ दोषी ।&lt;br /&gt;
पत्नीको प्रेम दोषी, अमृतमय मिठा बेदका वाक्य दोषीयो सारा सृष्टि दोषी, विधि-वश छ भने आफन्‌ू दृष्टि दोषी ॥&lt;br /&gt;
वि. सं. २००० शारदा वर्ष ९ सङ्ख्या ६ बाट&lt;br /&gt;
२०४ लेखनायका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ७. विज्ञानको मोह==&lt;br /&gt;
सानू विज्ञान पैले जुन उदित हुँदा साहसी मर्त्यजातिगर्थ्यौ छाती फुलाई पलपल सुखका कल्पना भाँतिभाँति ।सोही उन्मत्त भस्मा५सुर बनि अहिले बाहु लम्बा पसारीपीछा गर्दो छ दौडी विकट मुख लिई सर्वसंहारकारी ॥१जस्को नि:सार बोक्रो चहलपहल वा रङ्गमा दङ्ग मानीभुल्दामा पेट-पूजा विधि विकट बन्यो भार भो जिन्दगानी ।उस्कै आराधनामा अरु किन यसरी मर्छ यो मर्त्यजातिकस्तो विश्वास, भक्ति, प्रणय शिव ! हरे ! तुच्छ विज्ञानमाथि ॥र्‌चाहे विज्ञान पैले त्रिभुवनभरको सार सारा उतारोस्‌चाहे आकाशमाथी किसिमकिसिमको सृष्टि-शोभा फिँजारोस्‌ ।त्यो त्यस्को तुच्छ बोक्रे चटकमटक हो भित्र अर्कै छ चर्कोसर्को लाग्दो अशान्ति-ज्वरमय सरुवा व्याधिको दीर्घ धर्को ॥&lt;br /&gt;
३यो विद्याले सबैको हृदयबिच ठूलो उन्नति-भ्रान्ति पारीदैवी सम्पत्ति, मैत्री, शम दम, करुणा, शान्ति, सन्तोष मारी ।खित्का छोडेर गर्दा जटिल जहरिलो ग्याँसको अट्रहासको हेर्ने शास फेरी उस बखत कठै !! सृष्टिको सर्वनाश ॥॥&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कबिता / २१&lt;br /&gt;
यै छोटो जिन्दगीमा अमृतं पद दिने विश्वकल्याणकारी&lt;br /&gt;
उस्तो अध्यात्म-विद्या-विषयक महिमा मोहले दूर सारी ।&lt;br /&gt;
फोस्रो विज्ञानमाथी जतिजति गहिरो गर्दछौँ प्रेम हामी&lt;br /&gt;
रुन्छन्‌ सम्पूर्ण पृध्वी उतिउति डरले थर्थराएर कामी ॥1&lt;br /&gt;
वि.सं. १९९५ शारदा वर्ष ४ सङ्ख्या ६, ७ बाट&lt;br /&gt;
२२/ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==८. पतित-पावनी श्री गङ्गाजीको झाकी==&lt;br /&gt;
ठाडै कैलाशदेखीद्रुततर गतिले गड्गडाएर क््दीर्स्दा श्रीशङ्करैकोगल-गलित ठुलो सर्पकैँ सल्ल पर्दी ।लाखौँ चट्टान चिर्दीबिकट गिरिशिला-कन्दरा चूर्ण गर्दी ।बन्दै नाची दगुर्दी,श्रबण-विवरमा नित्य संगीत भर्दी ।१आमा ! भन्दै करैकासकल गिरिनदी काखमा टप्प धर्दीछर्दी पीयूष जस्ताजलकण लहरी-हस्तले, मस्त पर्दी ।कालो बर्दी-सरीकोकलिमल मनको ध्वस्त पारेर हर्दीगङ्गामा भुक्ति-मुक्तिदुद्ग दिदि-बहिनी नित्य खेल्छन्‌ कपर्दी ।र्‌&lt;br /&gt;
वि.सं. १९९८ शारदा वर्ष ७ सङ्ख्या ६ बाट&lt;br /&gt;
सेखनायका प्रमुख कविता /२३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==९. बंशीधरको दिव्य बंशी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सारा भौतिकवृन्दरूप जड यो विस्तीर्ण वृन्दावनघन्काएर घनक्क, भित्र उसमा भर्दै नयाँ जीवन ।हे बंशीघर, ! विश्वमोहन ! परा बाग्रूपिणी बाँसुरीफुक्छौ नित्य नयाँ नयाँ सुर किकी व्यामोह-वर्षा गरी ॥&lt;br /&gt;
१त्यो चर्को सुरबाट जागृत बनी तिम्रो गरी खोजनीघुम्ने रासविलासको रहरमा धीवत्ति छन्‌ गोपिनी ।&lt;br /&gt;
साथै छौ; तर लुक्नमा चतुर छौ, हाँसी रहन्छौ लुकीत्यै तिम्रो रस-रङ्गमा छ रसिलो यो सृष्टिको चक्चकी ॥२&lt;br /&gt;
वि.सं. १९९९ शारदा वर्ष ८ सङ्ख्या ८ बाट&lt;br /&gt;
२४ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==१०. युगवाणी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रिय नेपाली शूरवीर हो, नवयुगको यो संक्रान्ति-समय छ, यसमा नचढोस्‌ तिमिमा फूट-बैरको भ्रान्ति !एकै तन भै एकै मन भै देश-कालको गति जानीबढ्दै जाङ, चढ्दै जा, भन्दछ यो युगवाणी ॥&lt;br /&gt;
१तोडचौ हुकुमी साङ्ला, फाल्यौ फ्याङ्ला खड्गनिशानामुयाङ्ला काटचौ सब मर्जीका, बदल्यौ स्थिति र जमाना ।अब तिमी नै छौ सेवक, तिमि नै मालिक, यो पहिचानीलाग निरन्तर देशोन्नतिमा भन्दछ यो युगवाणी ॥॥दुःशासनले केश खिच्नेकी द्रुपदकुमारी जस्तीदुःख दर्दको विकट दल्दलमा बिचरी पलपल फस्ती ।जन्मभूमिका सुनीनसक्ना लम्बा करुण कहानीसुन्दै जाङ, गुन्दै जाक भन्दछ यो युगवाणी ॥डैगर्नैपर्दछ अब तिमि सबले नव राष्ट्रको निर्माणयसमा तिलभर नहट पछाडी, चाहे जाओस्‌ प्राण ।वीर देशका वीर तिमी छौ वीरव्रतका अभिमानीनजुकोस्‌ तिम्रो वीरपताका, भन्दछ यो युगवाणी ॥डे&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता / २५&lt;br /&gt;
हिमगिरितटका सब बासिन्दा तिमी दुनियाँ छौ कोटिएकमती भै हात बढाउ कर्तव्यमा दुई कोटि।फुट्टाफुट्टै दूर देशमा कल्लीगिरि बा दरबानीगर्दा गर्दै जनम नजाओस्‌, भन्दछ यो पुगवाणी ॥१जुन तागतले एक शताब्दीतक सब यो नेपालरगत सुकाई जर्जर नंगा पात्यो नरकंकाल ।उसको छाया छाप उडाक नगरी आनाकानीभर अब अर्कै दिव्य जवानी, भन्दछ यो युगवाणी ॥1भरखर जननी जन्मभूमिका तोडचौ साङ्ला सिक्रीऔषदको नै पहिले इनको गर्नुपर्द छ बिक्री ।यस मौकामा केही नसोची पछिको लाभ र हानिकिन खलबलिने ? किन अलमलिने ? भन्दछ यो युगवाणी ॥७&lt;br /&gt;
राजा रैती एक मतो भै ल्याएथ्यौ त्यो क्रान्तिअब सब बदली क्रान्ति-लहर ती ल्याउनुपर्दख शान्ति ।त्यसका लागि बारिक मनले छानी दूध र पानीकर्मयोगमा वन सहयोगी, भन्दछ यो युगबाणी ॥यअडबेखडबे डाँडाकाँडा तोडीफोडी सारासंथल पारी उसमा जारी कर्नाका जलधारा ।पार सबैतिर लहलह खेती, सुक्न नपाओस्‌ पानीमुलुकै सुखमय बन्दछ त्यसले, भन्दछ यो युगवाणी ॥2पूर्व र पश्चिम उत्तर दक्षिण रस्ता निस्कून्‌ खासारेल र मोटर तिनमा दौड्न्‌, बस्नू नपरोस्‌ बासा ।&lt;br /&gt;
२६/लेखनायका प्रमुख कबिता&lt;br /&gt;
घरघर बिजुली, कल, कार्खाना, कपडा अन्न र पानीइच्छा माफिक सबले पाउन्‌, भन्दछ यो युगवाणी ॥१०ग्रामैपिच्छे शिक्षा पाकन्‌ लाखन बालबालाकुनै कुनामा घुस्न नपाओस्‌ गरिबीपनको ज्वाला ।सबका घरघर डबल होस्‌ व्ययभन्दा आम्दानीधर्म सनातन तब पो रहला, भन्दछ यो युगवाणी ॥११उच्च हिमाचल सेती गाई, तल उपपर्वतँ-मालाधूनसरी छन्‌ दूध-बराबर रत्न अनेक उज्याला ।दुहुनैपर्दछ ती सब तिमीले किसिमकिसिमका खानीतब पो रहला तिम्रो पानी, भन्दछ यो युगवाणी ॥१२अहिले अग्ला दशं-आठोटा रङ्गमहलमा खालीचहलपहलका साथ निरन्तर खेल्दछ जो खुसियाली ।त्यो सब सुप्रामुप्राहरूमा ल्याउनुपर्दछ तानीनत्र भयो के ? दु:ख गयो के ? भन्दछ यो युगवाणी ॥१३&lt;br /&gt;
वि.सं. २००७ युगवाणी वर्ष ४ अङ्क ४२-४३ बाट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==११. वर्षा==&lt;br /&gt;
सं सं सं सं पानी बस्यौ अब वर्षा क्रतु आयो ।विश्वशान्तिको खातिर बढ्दो क्रान्तिवीरमँ घनघोरगर्जन गर्दै घन-मण्डल त्यो नभमा सबतिर छायो ॥ म सं ...&lt;br /&gt;
लपलप गर्दो असिघारालँ चमचम बिजुली उसमासुषमा भर्छे, त्यसले सबको खुसियाली मुसुकायो ॥ सं फं ...&lt;br /&gt;
उस ज्वालाले सुकी सकेका तृण, तरु, लहरा सारालहलह गर्दै उठे पल्हाये, हरियाली लहरायो ॥ मं म्रै ...&lt;br /&gt;
खलखल खोला, छरर छहरा टिलबिल टिलबिल सरिताधनरस-भरिता धरणी रसिली त्यो सब ताप विलायो ॥ सं कं ...&lt;br /&gt;
घुलो धमिलो हालि नयनमा, दुनियाँ अन्धो पारीभतभत पोल्ने उष्ण पवनले शीतलता अपनायो 7 सं छं ...&lt;br /&gt;
घनरव सुन्दै नाचिरहेछन्‌ मदले मत्त-मयूरमनमन भन्दछ कोकिल कसले युगपरिवर्तन ल्यायो ॥ सं सं...&lt;br /&gt;
वि.सं. २००९ भारती वर्ष ४ अङ्ग १ बाट&lt;br /&gt;
२८ लेखनाथका प्रमुख कबिता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==१२. सरस्वती स्मृति==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मिही प्राशै वीणा, मन मुदुनखी, कम्प कलना;गरी लाखौँ ञिक्ती स्वर-मधुरिमा स्मेरवदनारसीलो फक्रेको हृदय-कमलै आसन गरीबसेकी वाग्दैवी क्षणभर नबिसूँ जुनिभरी ॥१सफा वर्णा५५कार स्फटिकमय मालाकन घरीजगत्‌मा तदृद्वारा व्यवहृति-कला शीतल गरी ।सदा भर्दै हाम्रो हृदयबिच आलोक-लहरीबसेकी वाग्दैवी क्षणभर नबिसूँ जुनिभरी ॥र्‌सुनेको, देखेको, अनुभव गरेको जति कुराकुनै आघा मात्रा तक नछोडी सब पुरा ।छपाई-राखेको स्मृतिमय महापुस्तक घरीबसेकी वाग्दैवी क्षणभर नबिसूँ जुनिभरी ॥३यही हाम्रो भित्री हृदयमय गम्भीर सरमाडुबी उत्री खेल्दो, चपल, चटकी हंसबरभा ।चढी लीला साथै भुवन महिमा जीवित गरीबसेकी वाग्दैवी क्षणभर नबिसूँ जुनिभरी ॥1&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता / २९&lt;br /&gt;
जगद्व्यापी मेरो अति मधुर यो जीवन-कला&lt;br /&gt;
बुर््यो जस्ले उस्को कसरि भय अज्ञान रहला ।&lt;br /&gt;
भनी सामुन्नेमा वर अभय मुद्राकन घरी&lt;br /&gt;
बसेकी वाग्दैवी क्षणभर नबिसूँ जुनिभरी ॥र&lt;br /&gt;
वि.सं. २०१० लालित्य भाग १ बाट&lt;br /&gt;
३०० लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==१३. साहित्यको फुटबल==&lt;br /&gt;
भाषाको छ विशाल चौर जसमा गर्दै ठुलो तर्खरभ्रै कोही फरवार्ड, रेफरि कुनै ब्याकिड्‌ र गोल्कीपर ।खेल्दै छौँ फुटबाल बालक सबै साहित्यको बेसरीहावा छैन परन्तु भित्र उसमा गुड्दैन केही गरी ॥&lt;br /&gt;
१खेल्नै हो अब खेल यो यदि भने चाँडो अगाडी सरील्याउँ शुद्ध विचार-पम्प, उसमा जोडौँ र त्यो सुस्तरी ।हावा जागृतिको क्रमैसित भरौँ सर्वत्र त्यो टन्न होस्‌भर्दा जोड परेर किन्तु पहिल्यै टुट्ने र फुट्ने नहोस्‌ ॥&lt;br /&gt;
रेत्यो घात-प्रतिघात-चङ्क्रमणको चातुर्य-सौदामिनीलड्नासाथ उठेर चक्कर लिंदै घुम्दै रहोस्‌ फन्फनी ।खेल्छौँ हामि जती उती चटपटे उस्को नयाँ रङ्ग होस्‌सारा दर्शक वर्ग मस्त सुरमा ताली पिटी दङ्ग होस्‌ ॥|&lt;br /&gt;
वि.सं. २०१० लालित्य भाग १ बाट&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता / ३१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==१४. हाम्रो इन्द्रेनी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पर्वत नगिचै त्यो जलतटमा सात रङ्गको सुरिलो आकारकर्के कर्के गरी उठेको छविको अद्भुत मुस्लो उसपारदेख्नासाथै लोचन खिचिये, कौतुकिताका उरमा छालउर्लन थाले, साथै मनमा रङ्ग रङ्गका उठे सबाल !&lt;br /&gt;
उही कुनाको बादल फुस्रो, उही पखेरो, उही खोला&lt;br /&gt;
त्यसमा त्यस्तो छविको लट्टी कसले कहिले टाँग्यो होला ?के सुरकँवरी त्यस लट्टीको पीङ बनाई चहचह गर्छन्‌ ?अथवा चटकी साँझ त्यो हो जसले ती स्वर्गङ्गा तर्छन्‌ ?&lt;br /&gt;
अमर क्सुमका रसले रञ्जित सात किसिमका छविधारीकामघधनुषको छाया हो बा विरहीको जीवन हारी ।त्यस्तो घनुले मदन कृसुमका कति तीखा शर हान्दो होलाजसले गर्दा पलपल चल्छन्‌ विरहीका मुटुका सोला !&lt;br /&gt;
अथवा त्यो हो दिगङ्गनाका कण्ठस्थलको मञ्जुलमालाभर्दख जसले नव जलधरमा प्रणय-सुधा-रसको प्यालाकलमल त्यस्तो अद्भुत छविको हार गाँथने सुरकन्याकुन कुन होलान्‌ शूत्य गगमा शिल्पकतामा चतृरी घ्रन्या&lt;br /&gt;
३२“ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
रतिमन्मधका केलिभवनको यही द्युतिमय तोरन हो&lt;br /&gt;
अथवा अमीरहरूकै शिरको चुनरीरष्ठी रीवन हो।&#039;मुनामदन&#039; की उही मुनाको सुन्दरताको नमुना होकि ?जसले हाम्रा प्रिय कविजीमा सुन्दरताको छापा ठोकी !&lt;br /&gt;
यो सब गन्दा गन्दै दिलमा अर्कै अद्भुत छाया भास्योत्यस छायाको रूप अँगाली मेरो दिल कन्‌ झन्‌ हाँस्यो ।हृदय गगनमा सबको देख्यो आशाको नानारङ्गीइन्द्रेनीको क्षणिक उज्यालो उठदो छिपदो रद्ठीचङ्ठी !&lt;br /&gt;
बि.सं. २०१३ ड्न्द्रैनी वर्ष १ अङु ५ बाट&lt;br /&gt;
सेखनाथका प्रमुख कविता / ३३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==१५, पूर्वस्मृति==&lt;br /&gt;
हे मेरो प्रिय बन्धु ! आज तिमिले जो लेखका खातिरलेख्यौ सा५५दर पत्र, त्यो सब पढेँ केही मुकाई शिर ।ठेगानातिर हेरदा नयनमा देखा पन्यो &#039;पोखरा&#039;जो देख्दा मनमा मिहीं स्मरणका लाखौँ फुटे आँक्रा ॥१पैह्ला अङ्कुरमा हिमाल हँसिलो अग्लो अगाडी सस्यो-साथै पर्वत-शृङ्खला विपुल त्यो चौरतफि देखा पन्यो ।लंबा संधर फाँट तालहरुको कल्क्यो ठुलो चक्घकीफेरी त्यो गड्वा, विजेपुर, खुदी, सेती बगेकी लुकी ॥&lt;br /&gt;
द्‌कोठे साँघु, बजारको झिलिमिली, काला उखु, सुन्तलादोस्रो अङ्क्रमा खचाखच भये ज्यादै मिठा शीतला ।पैसा ढाँक उखू यतातिर, उता कोरी बढी सुन्तलात्यो संगी खुशिले रमाउँछ यहाँ अद्यापि मेरो गला ॥&lt;br /&gt;
डेतेस्रो अङ्कुरमा उपस्थित भयो अघौं तथा अर्चलेपुर्खाको जसमा थियो जस ठुलो प्रख्यात पाण्डित्यले ।चौथोमा उभियो पवित्र खरको छानू भयेको घरआमाको मृदु लालना सुख जहाँ लिन्थे म लोकोता ॥&lt;br /&gt;
11&lt;br /&gt;
३४लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
पाँचौंमा सुकुमार बाल्य वयका साथी सबै देखियेसाना पल्लव तुल्य त्यो बखतमा नाना थरी जो थिये ।तिन्का साथ डुलेर काफल, तिँदू, ऐसेलु, चुत्रो &#039;सब&#039;टिप्ता जो पुरुषार्थ- गर्व मनमा चढ्थ्यो, कहाँ त्यो अब ॥&lt;br /&gt;
१छैटौँ अङ्कुरमा मिल्यो असजिलो, पाटी धुलौटो, खरीदेखाएर कडा उक्स्मुकुसमा, जर्काउँथ्यो कन्सिरी ।त्यो आपत्ति सही सुखाखर गरी साह्वा सबै अक्षरभाषा-श्लोक फलाक्न घोक्न मनले कस्तै गयो कम्मर ॥&lt;br /&gt;
0सातौँ अङ्कुरभित्र अङ्कित भये गङ्गा-गणेश-स्तुतिचण्डी कोश र कौमुदीहरु ममा भर्दै निजी संस्कृति ।त्यो देखर भन्यो- कठै !! नवमले “जा राजधानीतिरबेडा पार हुँदैन अध्ययनको खाली अँगाली घर” ॥&lt;br /&gt;
७चर्को चक्र घुम्यो शनैः समयको, टाढा भयो अर्चलेप्यारा साथि पनि क्रमैसित सबै संसारदेखी-. चले ।&lt;br /&gt;
देख्दा यो सब तारतम्य विधिको धर्कन्छ छाती सबत्यो जन्मस्थलमा कठै !! म कसरी कैले पुगूँला अब ?पन&lt;br /&gt;
बि.सं. २०२२ बेणीबाट&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता / ३५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==१६. आखिरी कविता==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो दु:ख भोग्ने परमेश्वरै हो ।यो देह उस्को रहने घरै हो॥यो भत्कँदा दुःख अवश्य मान्छ ।सुटुक्क सामान लिएर जान्छ ॥&lt;br /&gt;
बि.सं. २०२२ कविता वर्ष २ अङ्ग र बाट&lt;br /&gt;
३६/ लेखनाथका प्रमुख कबिता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सामा प्रकाशनका केही कविता /काव्य==&lt;br /&gt;
अज्ञात प्रारम्भअतिरिक्त अभिलेखअराजक अक्षरहरूअसमर्थ श्लोक&lt;br /&gt;
एउटा अर्को बुइँगल&lt;br /&gt;
एक फूल अनेक पत्रएक्लो विजेता&lt;br /&gt;
काँडाका फूलहरू&lt;br /&gt;
केही गीत केही गजलघाउमा हरिश्चक्त कटुवालचिसो च्‌ह्लो&lt;br /&gt;
छुटेका यादहरू&lt;br /&gt;
दाजै ! कविता गाउँमै छनफुलेका फूलहरू&lt;br /&gt;
नरमेध -निर्माणाधीन सडकपञ्चदशिका&lt;br /&gt;
पलकभित्र पलकबाहिरपृथिबीमाथि आलेखप्रेमका कवितामृत्यु-कविता&lt;br /&gt;
लक्ष्मी कवितासङ्ग्रहवीरकालीन कविताशाकुन्तल (महाकाव्य)समसामयिक सासा कबितासाफा कविता&lt;br /&gt;
हिमालचुली ।सङ्कलन)&lt;br /&gt;
पान राररुरुललाकाररुर, कार ककन&lt;br /&gt;
भ्रीम विराग&lt;br /&gt;
दिनेश अधिकारीविजय सुब्बा&lt;br /&gt;
राजव&lt;br /&gt;
सं. कशघकृष्णहरि बरालपुरुषोत्तम सुवेदीमनु ब्राजाकीकालीप्रसाद रिजालकणाद महर्षिबालकृष्ण समवियोगी बुढाथोकीभूपाल राई&lt;br /&gt;
क्षेत्र प्रताप अधिकारीखुमनारायण पौडेलशङ्कर थपलियाअनु, भरतराज पन्तमञ्जु काँचुलीगोपाल पराजुली&lt;br /&gt;
सं. फणीन्द्र खेतालामञ्जुल&lt;br /&gt;
सं. चूडामणि बन्धुसं. दयाराम श्रेष्ठलक्ष्मीप्रसाद देवकोटासं. डा. तारानाथ शर्मासं. चृडामणि बन्धुसं. ईश्वर बराल&lt;br /&gt;
उँ५ 99933-2-488-4&lt;br /&gt;
| हेई।&lt;br /&gt;
६99 | 3&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96_%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE&amp;diff=78</id>
		<title>लेखनाथका प्रमुख कविता</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%96_%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE&amp;diff=78"/>
		<updated>2024-06-11T13:03:16Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;Source:https://nepalikitab.org/lekhnath-poudel-lekhnath-ka-pramukh-kabita/&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पुस्तक परिचय==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्रि. वि. मा. सा. शा, सं. अन्तर्गत स्नातक तहको द्वितीय पत्रकोऐच्छिक अध्ययन &#039;ख&#039; खण्डका लागि निर्धारित नेपाली पाठ्यक्रमअनुसार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्पादन&lt;br /&gt;
डा. वासुदेव त्रिपाठी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रकाशक : साम्रा प्रकाशन&lt;br /&gt;
संस्करण : पहिलो, २०४६दोस्रो, २०४९तेस्रो, २०६२ (११०० प्रति)&lt;br /&gt;
आवरणकला : टेकवीर मुखिया&lt;br /&gt;
म्‌ल्य : रु. ३५।-&lt;br /&gt;
मुद्रक : सार्रा प्रकाशनको छापाखाना, पुलचोक ललितपुर&lt;br /&gt;
फोन : ५५२१०२३, फ्याक्स : ५५४४ २३६15819 : 99933-2-488-4&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‍‍==मन्तव्य==&lt;br /&gt;
त्रिभुवन विश्वविद्यालयको मानविकी र सामाजिक शास्त्र सङ्काय-अन्तर्गतको ऐच्छिक नेपाली विषयको प्रवीणता प्रमाणपत्र / स्तातक /स्नातकोत्तर तहको पाठयक्रमको आवश्यक संशोधनका क्रममा सम्बन्धितनेपाली विषय समितिले कतिपय पाठ्यसामग्रीमा विशेष सुधार ल्याई तिनलाईअद्यावधिक एवं सान्दर्भिक तुल्याउनु आवश्यक ठहत्याई पाठचसामग्री विकासपरियोजनाको तर्जुमा २०४५ सालमा गरेको थियो । सोही परियोजनाकाकार्यान्वयनका क्रममा प्रथम चरणमा नेपाली साहित्यका विविध फुटकरविद्या (कविता, कथा, एकाङ्की, निबन्ध एवं समालोचना) का तहगत शैक्षिकआवश्यकतालाई दृष्टिगत गरी विधागत पाठघसङ्कलनहरू सम्पादन गर्ने रदौसौ चरणमा साहित्यसिद्धान्त, भाषाविज्ञान र नेपाली साहित्यकोइतिहासलगायत अन्य अपेक्षित पाठयसामग्रीको तयारी गर्ने निधो गरियो ।उक्त प्रथम चरणअन्तर्गत सम्पादित प्रस्तुत ग्रन्थ लेखनाथका प्रमुख कवितास्तातक तहको द्वितीय पत्रको खण्ड &#039;ख&#039; को विशिष्ट अध्ययनकोपाठचसामगरीका रूपमा स्वीकृत पाठहरूको सङ्खलन हो । यसका सम्पादनकाक्रममा विषय समितिद्वारा निर्धारित आधारहरूको अवलम्बन गरी स्नातकतहमा पढाउनका निम्ति लेखनाथका प्रमुख कविताहरू सङ्कलित गरिएकाछन्‌ । .यो ग्रन्थ लेखनाथका प्रमुख कविताको सङ्कलनतर्फको एक अर्कोप्रयास हुँदै हो तर सम्बन्धित शैक्षिक तहका पाठघण्टा र पाठ्यस्तरकापरिधिमा रही सोही शैक्षिक प्रयोजनअनुरूप यहाँ लेखकविशेष र कृतिविशेषको&lt;br /&gt;
चयन गरिएको छ । यस चयनमा सम्बन्धित बिधाका प्रमुख युग र घाराएवं तिनका प्रमुख स्रष्टाका शैक्षिक तहगत रूपमा उपयुक्त हुन सक्नेकृतिहरूको समावेश हुनु स्वाभाविकै हो । शैक्षिक क्षेत्रमा प्रयुक्त हुने यसप्रकारका सङ्कलनहरू आफ्ना शैक्षिक तहगत शृङ्खलामा आबद्ध र आधारितरहने तथ्य छँदै छ।नेपाली विषय समितिको उक्त परियोजनाअन्तर्गतको यस ग्रन्थकोप्रकाशनको चाँजोपाँजोलगायत सम्पूर्ण अभिभारा वहन गर्ने साप्ज प्रकाशनप्रतिपनि त्रि.वि. मानविकी र सामाजिक शास्त्र सङ्कायको नेपाली विषय समितिकातर्फबाट आभार व्यक्त गर्दछु ।२०४५ चैत्र १७ गते डा. बासुदेव त्रिपाठीअध्यक्षनेपाली विषय समितिनेपाली केन्द्रीय शिक्षण विभागत्रिभुवन विश्वविद्यालयकीर्तिपुर, काठमाडौँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==विषयस्‌ची==&lt;br /&gt;
कविशिरोमणि लेखनाथ पौडघालको कवितायात्रा : एक चर्चा&lt;br /&gt;
री 5 उ” १८ ५ ३५ 70 परी&lt;br /&gt;
कबिकवबितालाप&lt;br /&gt;
वैतिक दृष्टान्त&lt;br /&gt;
वसन्त कोकिल&lt;br /&gt;
जीवन-चङ्गा&lt;br /&gt;
गौँधलीको चिरिबिरी (१)&lt;br /&gt;
सत्य सन्देशहरू&lt;br /&gt;
विज्ञानको मोह&lt;br /&gt;
पतित-पावनी श्री गङ्गाजीको माँकीवंशीघरको दिव्य वंशी&lt;br /&gt;
. युगवाणी. वर्षा. सरस्वती स्मृति&lt;br /&gt;
साहित्यको फुटबल&lt;br /&gt;
. हाम्रो इन्द्रेनी&lt;br /&gt;
पूर्वस्मृति&lt;br /&gt;
. आखिरी कविता&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
१०१२१५१९&lt;br /&gt;
२४&lt;br /&gt;
२८२९&lt;br /&gt;
३२३४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कविशिरोमणि लेखनाथ पौड्यालकोकवितायात्रा : एक चर्चा==&lt;br /&gt;
कविशिरोमणि लेखनाथ पौडथाल (वि.सं. १९४१-२०२२) लेबाल्यकालमा आफ्नो जन्मस्थल कास्की जिल्लाको पोखरा उपत्यकाको अघौँअर्चले गाउँमा नै कविताको उद्बोधन प्राप्त गरै तापनि खास गरी काठमाडौंकोरानीपोखरी संस्कृत छात्रावास (तीनधारा पाठशाला) मा रही संस्कृत मध्यमाकोअध्ययन गरिरहेका बखत नै उनको कविताअभ्यास विशेष तीव्र भएकोबुझिन्छ । उनको यो कविताअभ्यास तात्कालिक शैक्षिक परिप्रेक्ष्यअनुरूपसंस्कृत र नेपाली दुवै भाषाका माध्यमबाट थालिएको थियो भने उनलेअध्ययन गर्ने गरेको रानीपोखरी पाठशालाको वर्णन गर्ने संस्कृत समस्यापूर्ति&#039;पाठशाला विशाला&#039; सुरक्षित रूपमा उपलब्ध पनि छ र उनका प्राथमिककविता-आराधनाका परिचायक दुई नेपाली कविता &#039;कविताकल्पद्रम&#039; (सन्‌१९०५ : बि.सं. १९६१-६२) मा प्रकाशित भएको पाइन्छ । &#039;शृङ्घारपच्चीसी&#039;र &#039;मानसाकर्षिणी&#039; शीर्षकका यी दुई कविता नै उनका प्रकाशित प्राथमिकनेपाली कविताहरू हुन्‌ । नेपाली लेख्य व्याकरणको निर्धारण नभइसकेको,भङ्गाररसतर्फ नेपाली कविताको विशेष चाख देखा परेको र परम्परागतवर्णमात्रिक छन्दमा शब्दालङ्कार र अर्थालङ्ारको सजधजतर्फ विशेष उत्सुकताप्रकट भएको नेपाली कविताको उत्तरमाध्यमिक कालको कविता-परिवेशकाउपजका रूपमा लेखनाथका उपर्युक्त दुई कविता देखा पर्छन्‌ । समकालीतकवबिता-परिवेशका उपज हुँदाहुँदै पनि यी दुई कवितामा लेखनाथको उर्वर प्रतिभाको मिर्मिरे रन्कोचाहिँ सुनिन्छ नै । यसरी २०-२१ वर्षका उमेरमा&#039;कविताकल्पद्रुम&#039; का माध्यमबाट लेखनाथको जुन कवितायात्रा थालियो त्योउनको शेष जीवनकालभर अक्षुण्ण र गतिशील रह्यो । उनको ८२ वर्षेजीवनकालमध्ये लगभग ६० वर्षको अवधि नेपाली कविताको साधनामासमर्पित रह्यो । यतिको लामो समयावधिअन्तर्गत युवावस्थाका &#039;कविताकल्पद्रुम&#039;(बि.सं. १९६१-६२) का उपर्युक्त दुई श्ृङ्घारिक कवितादेखि बृढ्घौलीमामृत्युसम्ममा लेखिएको &#039;आखिरी कविता&#039; (२०२२) सम्मको ६० वर्षभन्दा बढीअवधिको कवितायात्रा कविशिरोमणि लेखनाथले गरेको पाइन्छ ।&lt;br /&gt;
युवा लेखनाथ पौडघालका कविताहरू सुन्दरी पत्रिका १९६३) माछापिन थाले । समस्यापूर्ति र फुटकर कविताको रचना गर्दै प्रथमतः उनले&#039;नुङ्घारिक घाराकै आवाहन गरेका हुन्‌ र &#039;वियोगिनी विलाप&#039; यतिखेरकोउनको उल्लेखनीय कविता हो । उनका भाव, लय र शैलीको प्रतिभापूर्णछलबल पर्याप्त मात्रामा यस कवितामा प्रकट भएको पाइन्छ । तर सुन्दरी-कालमै उनको &#039;कालिकाविलासी&#039; जस्तो समस्यापूर्तिले शृष्वारधाराप्रति छेडहाल्न थालेको र &#039;वैराग्यवल्ली&#039; कविताले श्ुङ्गारविपरीत शान्तरसतर्फ चाखदेखाएको भेटिन्छ र उनका भाव, लय र शैलीमा विशिष्ट छचल्काहरूप्रकट भइरहेको कुरा &#039;बैराग्यवल्ली&#039; कविताले एनि फल्काउँछ । यसरी१९६३ सालमै लेखनाथ समसामयिक आङ्गारिक परिवेशबाट तकिँदै आफ्नोशान्तरसमूलक कबितायात्रातर्फ प्रवत्त भएको र उनको कवित्व पनि प्रतिभापूर्णछचल्काहरूले उद्देलित भइरहेको अनुभव हुन आउँछ ।&lt;br /&gt;
१९६५-६६ साल लेखनाथको प्राथमिक कवितायात्राका निर्णायकवर्ष हुन्‌ । लेखनाथको काव्यघाराको खास प्रवर्तन माघवी पत्रिकाकामाध्यमबाट यतिखेर नै थालियो । हलन्त बहिष्कारमूलक लेख्य व्याकरणकाअनुशासनमा कविता रच्दै र राष्ट्रिय जागरणका सामाजिक, साँस्कृतिक,धार्मिक तथा आध्यात्मिक लहरहरूलाई छुँदै अकृत्रिम तर अलङ्वारपूर्णशैलीमा कविताको स्तरीकरण गर्ने चासो माधवी प्रत्रिकामा छापिएकालेखनाथका कविताले देखाएको पाइन्छ । यस पत्रिकामा छापिएको ४८पद्यको &#039;वर्षाविचार&#039; लामो कविता वा लघु काव्यका रूपमा देखा पर्छ रयो&lt;br /&gt;
न्ख-&lt;br /&gt;
उनको आगामी क्रतुबिचार काव्यको प्रारूप पनि हो । नेपाली भाषामापनि संस्कृत वा फारसी भाषाको जस्तो स्तरीय काव्य लेखिन सक्छ भनीप्रमाणित गर्ने क्रममा प्रथम पाइलास्वरूप लेखिएको वर्षाविचार मा लेखनाथपौडचालको निजी काव्यधारा र त्यसका आधारभूत प्रवृत्तिहरूको प्राथमिकदिग्दर्शनसम्म प्राप्त हुन्छ । लेख्य व्याकरणका अनुशासनमा कविता रच्ने,परिष्कारवादी (शास्त्रीय वा क्लासिकल) काव्यधाराको बरण गर्दै नेपालीकविताको स्तरीकरण गर्ने र राष्ट्रिय जागरणको सन्दर्भतर्फ उन्मुखतादेखाउने जस्ता कुरा उनका काव्यधाराका केन्द्रीय पहिचान हुन्‌ भनेबर्षाविचारमा ती कुरा प्रारम्भिक तर स्पष्ट रूपमा देखिन्छन्‌ । काव्यकारचनासामग्रीका दृष्टिले प्रकृतिका छनि, सामाजिक परिदृश्य, हिन्दू पुनर्जागरण,नैतिक चेतना र आध्यात्मिक मनन नै लेखनाथका केन्द्रीय सामगी हुन्‌ भनेत्यतातर्फ वर्षाविचारका लेखनाथ उन्मुख भइसकेका छन्‌ । काव्यभाषा रशैलीका सन्दर्भमा तत्सम र तद्भव पदावलीको समुचित सन्तुलनमा आधारितसरल-गम्भीर तथा सहज-मनोरम शब्दशय्याको अनुप्रासीय अन्तर्धाराकोलयलालित्य लेख्य व्याकरणका अनुशासनभित्र रही प्राप्त गर्नु लेखनाथकोपहिचान हो भने त्यसको प्रारूप &#039;वर्षाविचार&#039; मा देखा पर्छ । सहज स्तस्फूर्ततुल्यकिन्तु शक्तिशाली अलङ्करण लेखनाथका कविताका लालित्यका परिपोषकतत्त्वमध्यै एक हो भने त्यो सहज मनोरम आलङ्कारिक छटा पनि वर्षाविचारमाचहकिलो छ्‌ । काव्यचेतनाका दृष्टिले वस्तुतत्त्व र अन्तर्भावका बीचकोबौद्धिक पुटसमेत परेको चेतनापरिपाक परिष्कारवादी लेखनाथको केन्द्रीयपहिचान हो भने त्यो वर्षाबिचारमा मिरमिराइरहेको पाइन्छ । यसरीलेखनाधका प्राकृतिक पर्यवेक्षण, सामाजिक व्यङ्गय र आदर्शीकरण, नीतिचेत,पौराणिक सन्दर्भको नवीन व्याख्या, युगोन्मेष, हिन्दू पुनर्जागरणको स्वर रअध्यात्मचेतका साथ्यै लय, ौली र अलङ्गरणका अनुशासित लालित्यसहितसहज-संयमित परिष्कारघर्मी स्तरीय कविताचेतका प्राथमिक प्रस्फुटनकाबिन्दुका रूपमा वर्षाबिचार लघु काव्य ।१९६५-६६) देखा पर्छ र यसलाईनेपाली खण्डकाव्यको परिष्कारधर्मी प्रथम स्तरीय प्रयास पनि भन्न सकिन्छ ।वास्तवमा यसै बिन्दुदेखि नै लेखनाथ पौडयालको कवितायात्रामा उनको&lt;br /&gt;
नज&lt;br /&gt;
काव्यधारा आफ्ना खास काव्यस्रोत र काव्यप्रवत्तितर्फ अभिमुखीकृत भईदेखा परेको पाइन्छ ।&lt;br /&gt;
लेखनाथका कवितायात्राका क्रममा लालित्य (१९६९) उनकोकवितायात्राको अर्को महत्त्वपूर्ण पाइलो हो । यसमा लेखनाथका ६ कबितापरेका छन्‌ जसमध्ये &#039;मनोलड्ड्‌&#039; कविता उनको धार्मिक-अध्यात्मिक कवि-चेतको परिष्कारोन्मुख भावार्द्र अभिव्यक्ति हो । त्यस्तै अर्को &#039;विचित्रवाहिनी&#039;कवितामा शोषण र उत्पीडनको हास्यआभास अँगाल्दै लेखनाथको युगोन्मेषमुल्किएको छ र सामाजिक पर्यवेक्षण र व्यङ्गघको क्षमता पनि झल्कन्छअनि शब्दालङ्कार र अर्थालङ्कारको विशेष, चहक पनि प्रकट भएको छ।अर्को &#039;रामराज्य&#039; कवितामा पूर्वीय राज्यआदर्शहरूको संस्मरण छ र शब्दार्थकोअलङ्कार सृष्टिसामर्थ्य पनि चहकिलो छ । लालित्यभित्रको &#039;कविकवितालाप&#039;कविताचाहिँ कवि लेखनाथको निजी काव्यघाराको घोषणापत्रतुल्य देखापर्छ । माध्यमिककालको उत्तरार्धका समसामयिक साहित्यिक प्रचलनप्रतिआक्षेप, व्यङ्ग्य र अस्वीकारसहित कविताका भाषामा व्याकरणसम्मत सुघारल्याउने, मौलिक कविप्रतिभाको सञ्चार गर्ने, नीतिचेत र आदर्शोन्मुखविचार गर्दै सामाजिक जागरण र सुधारप्रति सोट्टेश्य कविताको प्रवर्तन गर्नेर पूर्वी उच्च साहित्यिक परम्पराप्रति श्रद्धासाथ नेपाली कविताको स्तरीकरणगर्दै नवीन काव्ययुगको आवाहन गर्ने सङ्कल्प &#039;कविकवितालाप&#039; कवितामाउनले प्रकट गरेका छन्‌ । यस तात्पर्यमा १९६९ सालसम्म आइपुग्दालेखनाथ नेपाली कवितामा युगान्तर ल्याउन कृतसङ्ल्प देखा पर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
१९७० सालको शोकप्रवाह खण्डकाव्यले लेखनाथको उच्चभावक्षमताको परिचय दिन्छ । उनका लय र शैलीमा आइरहेको परिष्कृतिलेगर्दा यसको भावधारा कझन्‌ चहकिएको छ । परिष्कारवादी काव्यधाराकोउल्लेख्य कृतिका रूपमा यस करुण खण्डकाव्यले लेखनाथको विकासशीलकविप्रतिभालाई प्रस्तुत गरेको छ । -&lt;br /&gt;
१९७२-७६ सालका अवधिमा लेखनाथको परिष्कारवादीनबकाव्यधाराको सृजनात्मक क्षमता प्रभावकारी रूपमा प्रकट भएको रस्थापित भएको देखिन्छ । यस अवधिमा उनका प्रशस्त फुटकर कविताहरू&lt;br /&gt;
न्च--&lt;br /&gt;
र तीन खण्डकाव्यका साथै एक नाटक प्रकाशित भएको पाइन्छ । उनकाफुटकर कविताहरू खास गरी गोरखाशिक्षाका भाग १, २ र ३ (क्रमशः१९७२, १९७३, र १९७४) मा र सूक्तिसिन्धु १९७४) मा सङ्कलित छन्‌ ।१९७३ सालका &#039;हिउँदका दिन&#039;, &#039;इन्द्र्धनु&#039; र १९७४ सालका &#039;प्रभात&#039;,शबसन्त&#039; र &#039;वसन्तकोकिल&#039; कवितामा लेखनाथको पूर्वस्वच्छन्दताबादीस्पर्शसहित परिष्कारवादी प्रकृतिपर्यवेक्षणको कुशलता प्रकट हुन्छ । १९७२सालका &#039;दशैँ&#039; र &#039;तिहार&#039; मा उनको साँस्कृतिक चेत तथा &#039;ईश्वरस्तुति&#039; माआध्यात्मिक चेत रुल्कनाका साथै १९७३ सालको “म कस्तो हँ&#039; र १९७४सालका &#039;म केके नगरँ&#039; र नैतिक दृष्टान्त कवितामा उनको नैतिकआदर्शचेत व्यक्तिएको छ । १९७४ सालको &#039;पिँजराको सुगा&#039; तात्कालिकयुग-व्यथा र स्वतन्त्रता-कामनाका प्रतीकात्मक व्यञ्जनाका रूपमा बह्चर्चितरहेको छ । १९७४ सालका सूक्तिसिन्धुका कवितामध्ये &#039;विरहिणीका उपरसखीको प्रश्न&#039; कविता वियोगिनी र योगिनीका श्लेषात्मक भावसन्धिमैउभिँदै शृङ्गार युग र शान्त-आध्यात्मिक युगको दोसाँधको अत्यन्त कलात्मकअभिव्यक्ति हुन आएको छ । १९७४ सालको भर्तुहरिनिर्वैद नाटकको पद्यांशलेपनि खास गरी उनको आध्यात्मिक कवित्व तथा शैलीगत अन्तर्विकासकोपरिचय दिन्छ । यसताकाका लेखनाथका खण्डकाव्यहरूमध्ये व््रतुविचारप्रकृतिकाव्यका रूपमा, बृद्धिविनोद बौद्धिक काव्यका रूपमा अनिसत्यकलिसंवाद सामाजिक काव्यका रूपमा देखा पर्छन्‌ । लेखनाथले प्रवर्तनगर्न लागेको नयाँ काव्यधाराका प्राकृतिक, बौद्धिक र सामाजिक सन्दर्भलाईयी तीन काव्यहरूले प्रस्तुत गरेका छन्‌ । यी काव्यहरूमध्ये समाजसन्दर्भ रयुगोन्मेषको वस्तुगत पर्यवेक्षण, व्यङ्घवय र आदर्शीकरणतर्फ सत्यकलिसंवादविशेष जागरूक छ र यसमा हिन्दू पुनर्जागरणका स्वरसँग लेखनाथकासांस्कृतिक स्वप्न तथा सुधारवादी स्वर पनि सलबलाउन खोजेका छन्‌ ।सामाजिक रूढि, विकृति र अमङ्गतिप्रति व्यङ्ग्य तथा आर्थिक दैन्यप्रतिआक्रोश एवम्‌ धार्मिक नैतिक पतनप्रति कौतुकसहित राजनैतिक सन्त्रासकाप्रतिच्छायामा सत्यकलिसंवाद रचिएको छ र यसमा काव्यमूल्यभन्दा हिन्दूपुनर्जागरणको स्वर तथा सामाजिक मूल्य र युगचापको मात्रा बढी देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
न्ङ-&lt;br /&gt;
बुद्धिविनोद समकालीन नेपालका पूर्वी-पश्चिमी वा प्राचीन नवीन मूल्य,दृष्टि र चेतनाका प्रश्न-प्रतिप्रश्नको द्वन्द्वमय अभिव्यक्तिका रूपमा उभिँदैज्ञान र विज्ञानको घर्षण थालिएका युगीन बौद्धिक धरातलको व्यञ्जक नैबढी देखा पर्छ । क्रतुविचार खण्डकाव्य भने प्रकृतिकाव्य भएर पनिलेखनाथका सबैजसो काव्यप्रवृत्तिहरूको सङ्गमस्थलतुल्य छ र यसमासामाजिक-सांस्कृतिक तथा नैतिक-आध्यात्मिक प्रतिच्छविसहित लेखनाथकोसृक्ष्म प्रकृति-पर्यवेक्षण प्रकट भएको छ । लेखनाथका लय, भाव, चिन्तन रशैली-शिल्पको पूर्वस्बच्छन्दतावादी स्पर्शसहित सहज-परिष्कृत संश्लिष्टसौन्दर्यको नमुनास्वछूप क्रतुविचार खण्डकाव्य नेपाली कविताकै पनिप्रथम परिष्कृत सौन्दर्यबाटिकाका रूपमा देखा पर्छ । यसरी १९७२-७६सालका उपर्युक्त कविता र काव्यका माध्यमबाट लेखनाथ पौडयाललेनेपाली कविताको माध्यमिककाललाई तोड्दै आधुनिक नेपाली कविताकोउषाकाल बा मिर्मिरे प्रथम प्रहरस्वरूप परिष्कारवादी (शास्त्रीय? कलासिकल)धाराको प्रवर्तन तथा प्रतिष्ठापन गरेको पाइन्छ । खास गरी १९७३-७६सालका बीच प्रवर्तित यो परिष्कारवादी धारा शारदा पत्रिकाको अभ्युदय[वि. सं. १९९१) पूर्वको अवधिसम्म नेपाली कविताको अग्रणी धाराकोरूपमा रह्यो । यस अबधिमा गोरखा शिक्षाको चारौँ भाग १९८० मालेखनाथका &#039;धनमहिमा&#039;, &#039;सन्ध्या&#039; र &#039;धतिशीलता&#039; कविता छापिएका छन्‌ रउनको &#039;गीताञ्जली&#039; र लघु स्तुतिकाव्य पनि प्रकाशित भएको छ । &#039;धनमहिमा&#039;ले खास गरी धनमूलक सामन्त परिवेश र भौतिक मोहप्रति व्यङ्गय गरेकोछ भने &#039;धवृुतिशीलता&#039; चाहिँ आदर्शवादी धीर व्यक्तित्वको गायन हो अनिसन्ध्या&#039; चाहिँ प्राकृतिक सौन्दर्यको पूर्वस्वच्छन्दतावादी पुट पनि परेकोपर्यवेक्षण । &#039;गीताञ्जली&#039; शासक स्तुतिको सन्दर्भसँग जोडिएको छ रलेखनाथको जागरण-स्वर मूलतः राजनीतिनिक्षेप सांस्कृतिक-सामाजिकजागरणको व्यञ्जक हो भन्ने जानकारी सत्यकलिसंवादपछि यस लघुकाव्यले दिन्छ । तर परिष्कारवादी प्रसन्न शैली-शिल्प र मनौोरथ भावकोलय-लालित्यको छटा भने यस स्तुतिकाव्यमा पनि व्याप्त रहेको छ।लेखनाथको ६ दशकभन्दा लामो कवितायात्राको पूर्वार्द्ध वा प्रथम प्रहर ।&lt;br /&gt;
छ&lt;br /&gt;
१९६१-६२ सालदेखि १९९० सालसम्मको पूर्वोक्त अवधि नै हो। यसअवधिमा प्रथमतः: १९६३-७३ सालका बीचमा उनले समसामयिक माध्यमिकश्यङ्गारधारालाई तोड्दै आफ्नो परिष्कारबादी काव्यधारातर्फको प्रयोग रप्रवर्तन गर्दै क्रमश: त्यसलाई स्थापित गरेको पाइन्छ । नेपाली कवितामालेखनाथको यो भूमिका युगान्तकारी र्‌ नवयुगप्रवर्तक देखा पर्छ अनिनेपाली कविताको स्तरीकरण गर्दै र स्तरीय खण्डकाव्यको समेत रचना गर्दैपरिष्कारवादी काव्यचैतन्य र काव्यसौन्दर्यका स्रष्टा प्रथम महान्‌ नेपालीकविका रूपमा उनी यस अबधिमा प्रतिष्ठित हुन आउँछन्‌ । उनले सिर्जेकोयही परिष्कारवादी धारा नै नेपाली कविताको आधुनिकतातर्फको सङ्क्रान्तिकोउषाकाल वा प्रधम प्रहरसमेत देखा पर्न आउँछ ।&lt;br /&gt;
१९९१ सालदेखि शारदा पत्रिकासँगै नेपाली कवितामा नयाँ चहलपहलथालिन्छ र लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा र सिद्धिचरणजस्ता कविहरू स्वच्छन्दतावादीकाव्यधारा अँगाल्दै प्रकट हुन लाग्दछन्‌ । लेखनाथका परिष्कारवादीकाव्यधारामा पूर्वस्वच्छन्दतावादी तत्त्वहरू केही मात्रामा अन्तर्निहित रहैतापनि देवकोटा र सिद्धिचरणका सहकारितामा खास स्वच्छन्दतावादकोअभ्युदय नै १९९१-९२ सालतिरको नेपाली कविताको मुख्य घटना हो ।वि. सं. १९७६ पछि राजनैतिक चाप र व्याकरण-दवन्द्वका साथै अन्यसान्दर्भिक कारणहरूले गर्दा फक्रिन नपाई खुम्चिन पुगेको लेखनाथकोकवित्ब पनि शारदाकाल लाग्दानलाग्दै मन्‌ खारिएर प्रकट हुन थाल्यो ।वि. सं. १९९१ सालको परिवर्तित-संशोधित क्रतुविचार नै लेखनाथकोकबितायात्राको पूर्वार्द्धको उत्तराद्धको उद्घोषक कृति हुन आउँछ । लेखनाथकाकाव्यधाराका सन्दर्भमा स्वच्छन्दतावादको आंशिक चास्तीसहित परिष्कारवादीकाव्य-सुषमाको उत्कृष्ट कान्ति प्राप्त गर्दै उनका विविध काव्यप्रवृत्तिहरूअक तिम्खर र परिष्कृत भई, विशेष स्तरीकृत बन्नु नै क्रतुबिचार (१९९१)को केन्द्रीय प्राप्ति हो । यसरी देवकोटाका केन्द्रीयतामा स्वच्छन्दतावादीकाव्यधारा हुर्कन लागेको त्यस युगमा परिष्कारवादी काव्यधाराको नेतृत्वगर्दै लेखनाथ आफ्नो सामाजिक पर्यवेक्षण र आध्यात्मिक चेतनालाई अरखादै र समीकृत गर्दै अनि आफ्ना कविताको लय, शैली, शिल्प र संरचनालाई&lt;br /&gt;
प्छ&lt;br /&gt;
अर परिष्कृत तुल्याउँदै गतिशील रही परिष्कारवादी काव्यसौन्दर्यका उत्तुङ्गशिंखरका रूपमा चुलिँदै गएको पाइन्छ ।&lt;br /&gt;
लेखनाथको कवितायात्राको पूर्वार््धलाई प्रथम चरण .स्वीकार्दैउत्तरार्द्धस्वरूप १९९१-२०२२ सालको अवधिलाई चाहिँ २००७ सालकोविभाजक युगरेखाका आधारमा दुई भागमा वर्गीकृत गर्न सकिन्छ । यसरी१९९१-२००७ र २००८-२२ सालका दुई समयावधिमा उनको उत्तरार्द्धकवितायात्रालाई विभाजित गर्दा पहिलोचाहिँ समयावधि उनको कवितायात्राकोदोस्रो चरण र दोस्रोचाहिँ अवधि तेस्रो चरणका रूपमा देखिन आउँछन्‌ ।अवश्यै उक्त तेस्रो चरणका माफ्माक २०१३ सालदेखि लेखनाथको कवितामाअर्को चौथो चरणको सम्भाव्यता कल्कन्छ तर त्यो अघूरै रही तेग्रो चरणमैअन्तर्भुक्त बन्न पुगेको छ । प्रथमत: उनको कवितायात्राको दोस्रो चरण(१९९१-२००७ साल) का बारेमा नै चर्चा गरौँ ।&lt;br /&gt;
&#039;ञ्रतुविचार&#039; (१९९१) को परिवर्धन-परिष्कारपछि लेखनाथकाकवितायात्रामा कवित्व र चैतन्य दुवैको अन्तर्विकास र परिष्कारको प्रकियाझन्‌ तीव्र हुन लागेको पाइन्छ । यतिखेर उनको उमेर पचास वर्ष पार गरीजीवनको छैटौँ दशकतर्फ लाग्दै थियो र पेसागत चक्करबाट मुक्त हुँदैप्राय: स्वाधीन रूपमा उनको जीवनचर्या पनि चालिँदै थियो । यतिखेरसमकालीन राणाशासनका सन्दर्भमा पनि उनी नियमित चाकडी र दौडघुपकाप्रक्रियाबाट पन्छिदै र सत्ताकेन्द्रका विपरीत दिशामा उन्मुख कतिपयराणापरिवारहरूसँग सम्बद्ध हुँदै थिए । उनले आफ्नो कवितायात्राका पूर्वार्द्धमातत्कालीन कठोर राजनैतिक पर्याबरणमा जागरणधर्मी कवितासृजनाकाकठिनाइ र भुक्तमान भोगिसकेका थिए भने उनका युगचेत सूक्ष्म व्यञ्जनाकास्तरमा नै विशेष मुखरित हुनाका साथ प्राय: राजनीतिइतर सामाजिक,आर्थिक तथा सांस्कृतिक, नैतिक, धार्मिक र आध्यात्मिक जागरणकै सेरोफेरोमाबढी सुसेलिएको पनि हो । वास्तवमा आफ्ना कविजीवनभरि नै राजनैतिकस्तरमा उनी विप्लवी-विद्रोही कविभन्दा स्तुति-प्रशंसाका सामयिक अपेक्षाकोपूर्ति गरिदिने खालका कवितासमेत लेख्तै रहे तर युगचेतनाका पूर्वोक्तव्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक सन्दर्भचाहिँ उनका कृतिहरूमा स्पन्दित र&lt;br /&gt;
न्ज-&lt;br /&gt;
व्यञ्जित नै रह्यो । कवितायात्राको उत्तसर्द्धमा पनि उनी यही वृत्तमा नै२००७ सालसम्म केन्द्रित रहेको देखिन्छ तापनि उनका १९९१-२००७सालका अवधिका कवितामा जागरणधर्मी चैतन्य विशेष रूपमा स्पन्दित रव्यञ्जित भएको पाइन्छ । पेसागत मुक्तता, उमेरको परिपक्वता रसत्ताकेन्द्रविपरीत क्रियाशील कतिपय राणापरिवारहरूसँगको तादात्म्य तथाशारदाकालीन साहित्यिक जागरणका युगमा प्राप्त साहित्यिक आत्मप्रतिष्ठाकाकारणले गर्दा पनि उनी आफ्नो कवित्व र चैतन्य दुबैको बिस्तार रपरिष्कारतर्फ यतिखेर क्रमिक रूपमा उत्प्रेरित भएको बुझिन्छ । उनकोकवितायात्राको दोस्रो चरण (१९९१-२००७) मा दुई खण्डकाव्य, एकनाटक र प्रशस्त फुटकर कविताहरू प्रकाशित भएका छन्‌ । यी रचनाहरूलाईकेलाउँदा एकतर्फ उनका जीवनदृष्टिमा परिपक्वता आइरहेको र त्यसमापूर्वीय दर्शनको अध्ययन र सामाजिक सचेतता दुवैको भूमिका बढिरहेकोभेटिन्छ भने अर्कातर्फ परिष्कारवादी कवित्वको कलात्मक प्राप्तितर्फ उनकोदक्षता उत्तरोत्तर विकसित भइरहेको पनि पाइन्छ ।&lt;br /&gt;
लेखनाथको कवितायात्राको दोस्रो चरण (१९९१-२००७) मा देखापर्ने प्रमुख फुटकर कविताहरू हुन्‌- &#039;जीवनच्गरा&#039;, &#039;कालमहिमा&#039; र &#039;गौँथलीकोचिरिबिरी&#039; (१९९२), सत्य सन्देशहरू १९९५-२०००,), विज्ञानको मोह(१९९५), &#039;पिँजराको प्यासा मैना&#039; ।१९९७), &#039;पतितपावनी श्रीगङ्गाजीकोज्ञँकी&#039; १९९२), &#039;बंशीघरको दिव्यवंशी&#039; (१९९९), &#039;हाँसेको साहित्यसागर&#039;(२००४), &#039;गौंधलीको चिरिबिरी&#039; (२) (२००४), “नारद र विज्ञान&#039; (२००६)आदि । यी फुटकर कवितामध्ये &#039;जीवनचङ्गा&#039; ले लेखनाथमा आध्यात्मिकजीवनदृष्टिको सघन अन्जषणको अभिर्शंच बढिरहेको र त्यसलाई कतितात्मकपरिणति दिने चासो तीब्र भइरहेको सङ्केत दिन्छ भने &#039;गौँथलीको चिरिनिरी&#039;हरूले व्यक्तिवादी, बहिर्मुखी, सामन्ती र भौतिकवादी स्वार्थ र तृष्णाकाविपरीत मानवतावादी, अन्तर्मुखी, आर्ष र अध्यात्मवादी जीवनमूल्यतर्फलेखनाथको बढ्दो मुकाउलाई प्रस्तुत गर्दछन्‌ । &#039;विज्ञानको मोह” र &#039;नारद रविज्ञान&#039; जस्ता कविताबाटै सत्यकलिसंवादको विज्ञानप्रतिको कौतुक भाव रबुद्धिवितोदको विज्ञानतर्फ पनि सचेत पृष्ठभूमिपछि लेखनाथ विज्ञानलाई&lt;br /&gt;
नस&lt;br /&gt;
मनुष्यका दुरन्त भौतिक तृष्णाको विस्तारक तथा ध्वंसात्मक दिशातर्फविश्वसृष्टिलाई धकेल्ने तत्त्व ठान्दै विज्ञानविरुद्ध उभिरहेको देखिन्छ । प्रथमविश्वयुद्धदेखि दोस्रो बिश्वयुद्धसम्मका चार दशकमा लेखनाथले भौतिकसभ्यताको प्रतीक ठहन्याई यसका ध्वंसात्मक पक्षमा विशेष जोडसमेतदिएको अनुभव हुन आउँछ । &#039;पिँजराको प्यासा मैना&#039; कविताले लेखनाथकोआध्यात्मिक जीवनदृष्टिलाई विषय-तृष्णा र त्यसका अशान्तिज्वारका सन्दर्भमाविश्वबोधसहित प्रस्तुत गरेको छ र उनका &#039;सत्य सन्देश&#039; हरूले मानवीयआत्मिक उज्ज्वलतामा केन्द्रित आध्यात्मिक जीवनदृष्टिको आर्ष व्यञ्जनागरेका छन्‌ । पूर्वीय पुराकथाको पुनर्व्याख्या गर्दै भौतिक भोगवादीजीवनमूल्यका सीमाहरू औंल्याउँदै परम ज्योतिको आत्मिक अन्वेषणकोप्रक्रियातर्फ लेखनाथको संलग्नतालाई &#039;वंशीघरको दिव्य वंशी&#039; जस्ता कवितालेजनाएका छन्‌ । यी फुटकर कविताहरूका आलोकमा लेखनाथकोकवितायात्राको दोस्रो चरणको भौतिक तथा भोगवादी जीवनमूल्य र त्यसमूल्यका कारणले उब्जेका सामाजिक वैषम्य तथा बिश्व-वैषम्यप्रति पनिसच्चेत हुँदै पूर्वीय अध्यात्मदर्शनको युगीन प्रस्तुतिमा आधारित उदात्त चेतनाकाआवाहनतर्फ केन्द्रित भइरहेको तथ्य स्पष्टिन्छ । लेखनाथको यसचिन्तनप्रक्रियालाई उनको बुद्धिविनोदको प्रथम विनोद काव्य (१९९४) रलक्ष्मीपूजा नाटक (१९९४) का पद्यांशले पनि झूल्काएका छन्‌ भने उनकापूर्वोक्त फुटकर कविताहरूमा त्यो चिन्तनप्रक्रिया कन्‌रन्‌ खारिँदै आएकोपाइन्छ । यसरी लेखनाथको कवितायात्राको दोस्रो चरण क्रमश: चिन्तनशीलकवित्वतर्फ उन्मुख भएको र त्यसमा आध्यात्मिक चैतन्यको उज्ज्वलताकासाथ युगीन आदर्शोन्मेषसमैत प्रकट भइरहेको अनुभव हुन्छ । समाजबोध,विश्वबोधका क्रममा आध्यात्मिक जागृतिको यही उदात्त चैतन्यकै विस्तारितअभिव्यञ्जनाका त्िम्ति २००४ सालतिरदेखि तरुण तपसी नव्यकाव्यकासृजनामा प्रवृत्त भएको कुरा पनि यहाँ उल्लेखनीय छ ।&lt;br /&gt;
लेखनाथको कवितायात्राको प्रथम चरण बा पूर्वार्मा नै पनिआध्यात्मिक चिन्तनशीलता उनको कवित्वको एक विशिष्ट प्रवृत्ति वाअभिलक्षणका रूपमा रहेको हो । यही प्रवृत्तिविशैष नै उनको कवित्वको&lt;br /&gt;
ननम.&lt;br /&gt;
केन्द्रबिन्दु हुन आउनु र उनी चिन्तक कविका रूपमा प्रकट हुनु नै उनकोकवितायात्राको दोस्रो चरणको मूल घटना देखा पर्छ । तर लेखनाथकोचिन्तक व्यक्तित्व र कवि व्यक्तित्वको सुन्दर समीकरणका परिणति हुन्‌उनका कवितायात्राका दोस्रो चरणका अधिकांश कविता । जीवनकोआध्यात्मिक चिन्तन नै कविताको मुख्य विषयवस्तु रहे पनि त्यो चिन्तनभावमय हुनु र त्यो चिन्तनधर्मी भाव वर्णमात्रिक लय-लालित्य, शैली-समृद्धि, शिल्प-सामर्थ्य र संरचनाक्षमताको उच्च परिष्कारघर्मी सिद्धिद्वाराओतप्रोत रहनु उनका यस चरणका अधिकाँश कविताको वैशिष्टघ हो ।उनका &#039;जीवनचङ्गा&#039; जस्ता कवितामा चिन्तनचाप रहे पनि रूपपरक शक्तिपनि उत्तिकै बेजोड छ भने &#039;पिँजराको प्यासा मैना&#039; मा चिन्तन र भावरूपकोअन्योन्य उच्च सहकारिता देखिन्छ । &#039;पतितपावनी श्री गङ्गाजीको शाँकी&#039;जस्ता कवितामा शैलीको उच्च समृद्धि छ भने उनका अधिकांश कवितामाशैलीको त्यही माधुर्य र लयको लालित्यसँगै अलङ्कारविधान र संरचनाकोउच्चतम सामर्थ्यसहित चिन्तन भावमय भई परिष्कारधर्मी कवित्व चुलिएकोपाइन्छ र &#039;कालमहिमा&#039; जस्ता कविता उनको कवित्वका यस्तै उच्च्चतमक्षणका प्राप्ति हुन्‌ । अध्यात्मिक चैतन्यसँग कविता-कलाको समेत परिष्कृतसिद्धि नै उनको कवितायात्राको यस दोस्रो चरणको केन्द्रीय प्राप्ति हो । यसैपरिप्रेक्ष्यमा उनी २००४ सालको नेपालको साहित्यिक चहलपहलको मारआफूलाई &#039;हाँसेको साहित्यसागर&#039; ठान्न पुग्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
२००७ सालदेखि यताका लेखनाथका कवितामा प्रधमत: युग-परिवर्तनको उत्साहका साधै सङ्क्रमणकालीन नेपाली समाजका विविधअसङ्गतिप्रति व्यङ्यको प्रवत्ति तीव्र रूपमा प्रकट भएको छ र दोस्रो चरणमैदेखा परेको विश्वबोध र मनुष्यताका परिप्रेक््यमा आध्यात्मिक चैतन्यकोव्यापक आवाहनको प्रवृत्ति नै यस तेस्रो चरणका प्रारम्भिक अवधिमा पनिविस्तारित भइरहेको पाइन्छ । २०0७-२२ को समयावधि उनको उत्तरार्द्कवितायात्राको अन्तिम प्रहर र समुच्चा कवितायात्राको तेस्रो चरण पनिहो । परिष्कारवादी काव्यकलालाई सामाजिकता र युगोन्मेषका साथै विश्वबोधर जीवनबोधको प्रगतिवादी स्पर्शसहित उदात्त भावचिन्तनका केन्द्रीयतामा&lt;br /&gt;
नट&lt;br /&gt;
अँगाल्दै आफ्ना अन्य विविध प्रवृत्तिहरूलाई पनि समेट्दै आएको तरुणतपसी (२०१०) नै उनको यस चरणको शीर्षस्थ कृति हो । «उनको मेरोराम ।२०११) कीव्यचाहिँ रामभक्तिमूलक अध्यात्मचिन्तनको उपज कृतिहो र अमर ज्योतिको सत्य स्मृति काव्यचाहिँ महात्मा गान्धीका शोकमार स्मृतिमा लेखिएको आध्यात्मिक मानवताचादी युगोन्मेषको काव्य हो ।यीदुई काव्यको आआफ्नो महत्त्व हुँदाहुँदै,पनि समाजचेतना र अध्यात्मचेतनाकोसमीकरण बिन्दुमा विश्व र मानवताको अतीतवर्तमानको काव्यात्मकसर्वेक्षण गर्दै आर्ष, उदात्त, आध्यात्मिक चैतन्यद्वारा नै बीसौँ शताब्दीकोमनुष्यजातिको उपचार सम्भव ठहराउने महाकाव्यधर्मी तरुण तपसी नव्यकाव्यनै यस चरणको सर्वोच्च कृति ठहरिन आउँछ । वास्तवमा क्रतुविचार(१९९१) को परिष्कारवादी काव्यसौन्दर्यको उच्च सृष्टिपछि लेखनाथकोकवितायात्राको प्रौढ काव्यचैतन्यको अर्को परिपक्व काव्यकृतिका रूपमायो महाकाव्यधर्मी तरुण तपसी नव्यकाव्य देखा पर्छ । यस चरणमा उनकादुई कवितासङ्ग्रह लालित्य प्रथम भाग (२०१०) र द्वितीय भाग (२०२५)पनि देखा परेका छन्‌ । लेखनाथका कवितायात्राका विभिन्न चरणकाकविताकृतिहरू यी दुई सङ्ग्रहमा समाविष्ट छन्‌ तापनि यिनमा उनकाकविताहरूको क्रमतद्ध व्यापक सङ्कलन नभई आंशिक सङ्कलन मात्र हुनसकेको पाइन्छ । लेखनाथको कवितायात्राको तेसो चरणका सुरुसुरुकामुख्यमुख्य फुटकर कविता हुन्‌- युगबाणी (२००७), वर्षा (२००९), प्रगति(२०१०), कविताको खोजी, साहित्यको फुटबल (२०१०। आदि । यीकविताहरूमा एकातर्फ २००७ सालको परिवर्तनपछिको नवयुगको रन्कोछ भने अर्कातर्फ त्यस युगको सङ्क्रमणकालका अनेक सामाजिकअन्तर्विरोधप्रति व्यङ्ग्य छ अनि जीवनका अन्तर्बाह्य परिष्कारका स्वच्छआदर्शतर्फको कवितात्मक चासो पनि छ । यस सन्दर्भमा यी कविताहरूजीवनको अन्तर्बाह्य आध्यात्मिक उज्ज्वल कामनासहित प्रगतिवादी पुटपनि परेका कविता देखा पर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
समुच्चा कवितायात्राको अन्तिम दशक (२०१३-२२) मा लेखनाथकोरचनाप्रक्रियामा बुढ्यौलीको जर्जरता, शारीरिक शिथिलता र रोगव्याधिका&lt;br /&gt;
न्ठ्न&lt;br /&gt;
कारणले लेखनकठिनाइ आइपरे पनि उनको सृजनात्मक प्रतिभाचाहिँ अक्षुण्णनै रहेको पाइन्छ । २०१८ सालतिरैदेखि उनले लेख्न प्रयास गरेको गङ्गागौरीमहाकाव्य अपूर्ण नै रहेको पाइन्छ । गङ्गागौरी महाकाव्य अपूर्ण नै रहे पनि योमहाकाव्यांश, परिष्कृत भर्तृहरिनिर्वेद नाटक (२०२०) को पद्यांश र विभिन्नफुटकर कविताहरूले उनको कवितायात्राको तृतीय चरणको अन्तिम अवधिसम्मनै उनको सृजनात्मक प्रतिभा अफ नौला सम्भाव्यताका साथ छलबलाइरहेकोकुरा स्पष्टयाउँछन्‌ । यस तेस्रो चरणका प्रारम्भिक अवधिमा प्रगतिवादीवायुमण्डलको चाप तीव्र रहेको अनि सामाजिकता र आध्यात्मिकताकोसमीकरणको प्रक्रिया अँगाली उनको परिष्कारवादी कवित्व विशेष गतिशीलरहेको साक्ष्य तरुण तपसी र पूर्वोक्त फुटकर कविताहरूबाट प्राप्त हुन्छ भनेजीवनको सान्ध्य अन्तिम दशाकका &#039;कवितामा चाहिँ उनको समाज द्रष्टा रचिन्तक व्यक्तित्व अफ खारिँदै र अफ सौन्दर्ययुक्त हुँदै आइरहेको र त्यसलेराष्ट्रवादको युगीन सन्दर्भ अँगाल्नाका साथै आफ्ना पूर्वस्वच्छन्दतावादीकाव्यतत्त्वहरूतर्फ पनि पुनः चाख लिइरहेको सङ्केत प्राप्त हुन्छ । क्रतुविचारको उत्कृष्ट सौन्दर्यप्राप्ति र तरुण तपसीको उत्कृष्ट चैतन्यबिस्तारसहितपरिपक्व काव्यप्राप्ति दुवैको समन्वित बिन्दु हुन खोज्ने गङ्गागौरी महाकाव्यअपूर्ण नै रहे पनि लेखनाथको समुच्चा कविव्यक्तित्वको सान्ध्य उत्कृष्टसिद्धिको स्पर्श प्राप्त गरेका कतिपय फुटकर कविताहरू विशेष स्मरणीयदेखिन्छन्‌ र ती हुन्‌-हाम्रो इन्द्रेणी (२०१३), मेरो किशोर (२०२०), पूर्वस्मृति(२०२२) र आखिरी कबिता ।२०२२) आदि । यी कविताहरूमध्ये धेरैजसोमालेखनाथको आत्मसंस्मरणको मुद्राका साथै आध्यात्मिक जीवनचिन्तन रसौन्दर्यबोधसमेतको समन्तित उत्कृष्ट व्यञ्जना देखा पर्छ । आंशिकपुर्वस्वच्छन्दतावादी पुटसमेत परेको भाव-शिल्प-सौन्दर्यको उत्कृष्ट परिष्कारवादीकाव्यवाटिका क्रतुबिचार र सामाजिक-आध्यात्मिक चैत व्यको उत्कृष्टकलात्मक अभिव्यक्तिस्वरूप महाकाव्यधर्मी परिष्कारवादी नव्यकाव्य तरुणत्पसी को सृजनापछि यी दुवैको सङ्गमबिन्दुका रूपमा प्राकृतिक, सांस्कृतिक,राष्ट्रिय र आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्यमा लेखनाथले रच्न लागेको गङ्गागौरी महाकाव्यपूर्ण भएको भए त्यो जेजस्तो हुन्थ्यो त्यसको सङ्गत उनका पूर्वोक्त फुटकर&lt;br /&gt;
जाड&lt;br /&gt;
कृतिहरूबाट केही मात्रमा प्राप्त हुन्छ । यस तात्पर्यमा लेखनाथको कवितायात्राकोसम्भाव्य चौथो चरण अपूर्ण रही तेस्रो चरणभित्रै अन्तर्भुक्त देखा पर्छ ।&lt;br /&gt;
उपर्युक्त चर्चाको अन्त्यमा के भन्न सकिन्छ भने लेखनाथको ८२ वर्षेजीवनको लगभग ६० वर्षको कवितायात्रामा निरन्तर गतिशीलता, परिपक्वतार प्रतिभाको अक्षुण्णताका साथ उत्तरोत्तर सिद्धिका लक्षणहरू देखा पर्छन्‌ ।,यस कवितायात्राका क्रममा उनले नेपाली कविताको माध्यमिक काललाईतोड्दै -पूर्वस्वच्छन्दतावादको आंशिक स्पर्शसहितको नेपाली परिष्कारवादीकाव्यधाराको प्रवर्द्धन, प्रतिष्ठापन र नेतृत्व गरी नेपाली कविताको आधुनिकयुगको पहिलो प्रहरको सूत्रपात गर्नाका साथै नेपाली कविताका स्वच्छन्दतावादी,प्रगतिवादी र प्रयोगवादी धाराका चहलपहलका माफ पनि त्यस परिष्कारवादीकाव्यधाराको आजीवन संवर्द्धन गरेको पाइन्छ । उनी नेपाली वर्णमात्रिकगीतिचेतना वा छन्दचेतनाका सर्वाधिक ललित र परिष्कृत गायक हुन्‌ र्‌ उनीपरिष्कृत नेपाली काव्यभाषा, काव्यशैली र काव्यशिल्पका प्रथम पारखी स्रष्टाहुन्‌ । उनी नेपाली प्रकृतिको सौन्दर्यको सूक्ष्म पर्यवेक्षण र व्यञ्जना गर्ने प्रथमपरिष्कारवादी कविकोकिल हुन्‌ र उनी नेपाली समाजका सांस्कृतिक-आध्यात्मिकपुनर्जागरण-प्रक्रियाका प्रवक्ता काव्यकोविद्‌ हुन्‌ । नेपाली आध्यात्मिक चैतन्यपरम्परा र युगोन्मेषको समीकरणका बिन्दुमा विश्वबोध र मनुष्यता-बोधगर्ने क्रषि कवि वा कवि तपसीका रूपमा उनको स्थान सर्वोपरि छ । उनीआधुनिक नेपाली समाजका नैतिक-आध्यात्मिक कवि-गुरु हुन्‌ र आध्यात्मिककाव्यसौन्दर्यका सर्वोच्च नेपाली स्रष्टा पनि हुन्‌ । उनी हाम्रा प्राना कविहरूमध्येसबभन्दा नयाँ र हाम्रा आधुनिक कविहरूमध्ये सबभन्दा पुराना र जगकोभूमिका खेल्ने महान्‌ परिष्कारवादी कवि हुन्‌ । उनी नेपाली कविताकोपरिष्कारवादी (शास्त्रीय : क्लासिकल) काव्यधाराका सर्वोच्च चुली हुन्‌ ।उनका क्रतुविचार खण्डकाव्य र महाकोव्यधर्मी तरुण तपसीका साथै तीन-चार दर्जनजति उत्कृष्ट फुटकर कविताहरू उनको त्यही परिष्कारवादीकाव्यधाराका उत्तम कृतिका रूपमा नेपाली जातिका र नेपाली भाषाकाचिरस्मरणीय निधि हुन आएका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==लेखनाथका प्रमुख कविता==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== १. कविकवितालाप ===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कवि-&lt;br /&gt;
भगवति ! ककिते ! देवी, जुगजुग तिम्रो म हुँ सदासेवी;&lt;br /&gt;
बाहिर निस्कन आज, किन माननुभो बडो लाज ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कविता-&lt;br /&gt;
रसिला गुणिजन हेरी, हाली अँगालो गलाविषे फेरी&lt;br /&gt;
रञ्जन पारी समाज, डुली रहेकी मलाई के लाज ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कवि-&lt;br /&gt;
तिमी भनि अरू सब बात, छोडी बिताये बसी रात;&lt;br /&gt;
तैपनि करुणा गरिनौँ, कसूर के देखि सामूमा परिनौ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कविता-&lt;br /&gt;
गर तिमी आफनु काम, न लेक बानु । कसूरको नाम;&lt;br /&gt;
मेरै कर्म अभागी, बुझेर दबिनरे कुना लागी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कवि-&lt;br /&gt;
जसका वश परि सुकृति, कहलाये व्यास वाल्मीकि प्रभृति;&lt;br /&gt;
मनमनमा धैर्य धारी, सौही तपाजी अभागिनी कसरी !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कविता-&lt;br /&gt;
सकदिन बानु ! सहन, अब अरु केही कुरा नभन;चरचरि चिरिनछ छाती, वाल्मीकि व्यास सम्झ्दामा ती ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कवि-&lt;br /&gt;
तिमी छौ रसरङ्गवती, भनेर, डाकेँ गरी ठूलो विनति;उल्टा आँशु खसाली, किन रुन लाग्यौ घुस्धुरु खालि ?&lt;br /&gt;
लेखनायका प्रमुख कविता /१&lt;br /&gt;
कविता-&lt;br /&gt;
व्यासादिक सत्कविले छोडि मलाई बिदा भये जहिले;उस दिनदेखि छु नङ्गी, छैन कुनै रङ्गिचङ्गिको भङ्गि ।कवि-&lt;br /&gt;
जाउन वृद्ध व्यासप्रभृतिक, तिम्रो भयो र के नाश?अक पनि सत्कवि हामी, खडा छँदै छौँ बडा नामी ।कविता-&lt;br /&gt;
शिब ! शिव ! यो बज्जसरी, शरीरभैदी कुरा सुनौँ कसरी,अब चुप चुप चुप बाबू । गन्यो मलाई अभाग्यले काब्‌ !कवि-&lt;br /&gt;
म गरख्लु तिमि भनि; मान, तिमि थुनछेउ स्वयं वृथा कान;हुन आयो कुन हेतु, रहेछ तिम्रो कहाँ केतु?कविता-&lt;br /&gt;
तिमि जस्ता बनि कविजी, गरदछु कविता भनेर पत्र फिजी;लागून यो केही दशा, न बिग्री हुनथ्यो कहाँ सहसा ।कवि-&lt;br /&gt;
मकन बेसरी पोली, न बोल अति पेचिला रुखा बोली;चिन्हिनौ कत्ति मलाई, जान तिमी व्यासको भाइ !!कविता-&lt;br /&gt;
आफ्नु शक्ति नजानी, नबने अबदेखि, पण्डितम्मानी;कुह् बरु धनिका ढोका, मिलछन पछि दानका पोका !!!कबि-&lt;br /&gt;
प्रतिभा पूर्ण छ मेरी, लेखि लगाएँ किताबको ढेरी,यस्तो सत्कवि सुजन, जानछु र ढोकाविषे म किन ?कबिता-&lt;br /&gt;
अक्षर अक्षर भाँची, कनि कुथि गरि खालि छन्दमा नाची;प्रतिभा नभये कसरी ? लेखन्‌ कन्था अगाडि सरी ।&lt;br /&gt;
२/लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
कवि-&lt;br /&gt;
लेखनशैली मेरी, प्रसादगुण-शालिनी हेरी;बालक पनि छन दङ्ग, थियो कि यो व्यासमा ढङ्ग ?कविता- £खतिदिनु दिन दिन कन्था, ग्रामीण भ्रष्ट बोलिको पन्था;बुसु्दछ पलटन सारा, चलदछ अनि बिक्रिको धारा ।कवि-&lt;br /&gt;
अपठित जङ्गलिलाई, समन सजिला किताब फैलाई;हुनुपरने यश मात्र, किन अपयशको भन्ने पात्र ?कविता-&lt;br /&gt;
छेक न दुप्पो पारी, कविता-सौन्दर्य बेसरी मारी;गरि उल्था खालि कथा, नभननु &#039;कवि हुँ&#039; भनेर वृथा ।कवि-&lt;br /&gt;
गरँला उन्नति भारी, तिमीकन सर्वाङ्ग- सुन्दरी पारी;भनने यो अभिलाषा, पेचि कुराले भयो नाश।कबिता-&lt;br /&gt;
यस्ता स्तन भनी लेखी, वर्णन गर ती कुरा पढे देखी;शिक्षित हुनछ समाज, पचदछ मनको सबै लाज ।कवि-&lt;br /&gt;
व्यासजिका पनि देख, . अनेक आँंगारका लेख;त्यसै गुङ्ि नहाँक, छोपनु परला वृथा नाक।कवबिता-&lt;br /&gt;
व्यासजिका लेख जति, हेरी हेरी सफा गराइ मति;पायेछीँ खुब सार भँडुवा ग्रामीण शंगार ।कवि-&lt;br /&gt;
हितकारी जो छ खडा, गरनु उसैका समीपमा फगडा;होला अनि सब जाति, काङ्गारियौली भलिभाँती ।&lt;br /&gt;
लेखनायका प्रमुख कविता /३&lt;br /&gt;
कविता-&lt;br /&gt;
जसले लेखन शैली, बिगारनाले भजऔै अति मैली,उहि मेरो हितकारी !! धन्य महात्मा दयाधारी !!!कृवि-&lt;br /&gt;
फिकिकन संस्कृत- नेल, गराइ भाषा वबिषे ठूलो मेल;खेलाजै जसलाई, शत्र उसैको भज्जे अरे !! हाई ।कविता-&lt;br /&gt;
ञ्रिकिकन संस्कृत- सारी, मर्यादा अङ्ग अङ्गको मारी,न नचायै उदर- दरी, भरीभराक हुने कसरी ?कवि- है&lt;br /&gt;
भाषामा उपदेश, लेखिदिनाले स्वयं बुढो देश;लिन सक्दछ शुभ शिक्षा, मागनु परदैन काहिँ गै शिक्षा ।कविता-&lt;br /&gt;
गर फगडा सब माफ, बल्ल सुनायौ मिठा कुरा साफ;देश सुधारन भाषा, कुञ्जि छ यो कालमा खासा ।कवि-&lt;br /&gt;
भाषाका गुणधारा, मालुम मनमा छँदा छँदै सारा;किन हो यतिनजेल, थापिरहेकी ठूलो रेल?कविता-&lt;br /&gt;
भद्दा अबनतिकारी, रसियाजस्ता किताबका भारी;दिन दिन बढ्ता देखि अघोर मनमा उठ्यो शैखी ।कवि-&lt;br /&gt;
शिक्षा विचारशाली, लेखन्‌ मिहिनेत मात्र हो खाली,गरदछ को रुचि यसमा, छन सब बोक्रे कथारसमा ।कविता-&lt;br /&gt;
रसिला नैतिक बात, लेखन उठ्दैन आफनै हात ?भ्रन बरु छ भने होस्‌ किन दिनु अरूमा वथा दोष ?&lt;br /&gt;
४ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
कृबि-&lt;br /&gt;
उपयोगी परिपाटी, लियेर कन्धा कटाकटी काटी;लेखनु यो कठिन कुरा, छन सब त्यस्ता कहाँ .चत्रा ?कविता-&lt;br /&gt;
उपकारी मर्मज्ञ, विचारवाला गुणी महाप्नज्ञ;भाषामा छैन कुनै, यो त बताज्रे स्वयं अघि नै।कवि-&lt;br /&gt;
अघिका सत्कवि जस्ता, मिलछन्‌ कविजी कहाँ सस्ता,तर तिमी हार नखाङ, स्थिर गर भाषाविषे पाउ ।कबिता-&lt;br /&gt;
होला शिक्षित देश, भनेर भाषाविषे सहैँ क्लेश;कविको पुगेन ढङ्ग, उल्टा मेरो टुटै अङ्ग।कवि-&lt;br /&gt;
दर्द बुझ चुपचाप, बस तिमी मनमा न लेक सन्ताप;आफनु जीबनसम्म, सुधार गर्ला सकेसम्म ।कविता-&lt;br /&gt;
अघितिर पुच्छर घुसारी, कविता प्रत्यक्ष लोकमा पारी;गंकनछौ तिमी यसरी, सुधार होला हरे! कसरी;कवि-&lt;br /&gt;
गुणवति ! सुन अबदेखि, गन्धन कन्धा बिकामका लेखी;गरने छैन दिमाक, पक्का यो चित्तमा राख।कविता-&lt;br /&gt;
बैस भन्यौ अबदेखि, विचारशाली मिठा कुरा लेखी;मेरो गरनु सुधार, शिरमा तिमी बोक यो भार ।कवि-&lt;br /&gt;
पहिले अलि अलि . हाँसी, नुहिकन पछि बेसरी छाँसी;अर्ति दियौ हितकारी, नपाइ शाकना ठूला भारी ।&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता /५&lt;br /&gt;
कविता-बढिया हो &#039;यो वचन,. तिमीसित शिवजी सदा खुसी रहन;बन्द - गरौँ सब बात, सुत अब धेरै गयो रात।- प्रार्थनाखुसिसित बसि मेरो लेख यो हेरि साफगुण जति लिनु होला दोषमा पाउँ माफ ।भनि नुहिकन सारा मित्रमा प्रीतिसाथगरदछ कर जोडी प्रार्थना &#039;लेखनाथ&#039; ॥&lt;br /&gt;
वि. सं. १९६९ लालित्यबाट&lt;br /&gt;
६लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==२. नैतिक दृष्टान्त==&lt;br /&gt;
बडाले जो गन्यौ काम हुन्छ त्यो सर्व-संमत ।छैन शङ्करको नङ्घा, मगन्ते भेष निन्दित ॥&lt;br /&gt;
॥।गरदैन ठूलो व्यक्ति मर्यादा-स्थिति-लङ्खन ।बसेको छ महासिन्ध सीमाबद्ध बनीकन ॥र्‌ £दबिन्छ गुणिको दोष गुणका राशिमा परी ।रश्मिले चन्द्रको दाग दबाएकै छ बेसरी ।त ३कसैको लोकमा छैन एकैनास समुन्नति ।अरूको के कुरा हेर सन्ध्यामा सूर्यको गति ॥॥&lt;br /&gt;
छोटो बढ्यो भने ज्यादा फूर्ति ढाँचा बढाउँछ ।&lt;br /&gt;
उलँदो खहरे हेर कत्तिको गड्गडाउँछ ॥द्‌&lt;br /&gt;
ज्यादा सोको हुनूभन्दा टेढिनु छ फला५धिक ।&lt;br /&gt;
गरदैन कुनै सोग्गो ग्रहको पूजना$५दिक ॥॥&lt;br /&gt;
टपर्टुञ्या पनि हुन्छ मूर्खमध्ये प्रतिष्ठित ।&lt;br /&gt;
बोलने को अँध्यारोमा महा$६५त्मा जुन्किरीसित ॥७&lt;br /&gt;
लेखनायका प्रमुख कविता /७&lt;br /&gt;
सानैदेखि छुचो हुन्छ दुष्ट मानिसको मति ।&lt;br /&gt;
घोचने जङ्गली काँढा पहिले नै तिखा कति ॥यू&lt;br /&gt;
मिलेर काम गर्नाले हुन्छ अत्यन्त फायदा ।&lt;br /&gt;
एकता हेर कस्तो छ मौरीको महमा सदा ॥९&lt;br /&gt;
जो दिंदैन उही दिन्छु भनी गर्जन्छ सत्त्वर ।&lt;br /&gt;
जो हो नवर्षने मेघ उसैको हुन्छ घर्घर ॥१०&lt;br /&gt;
हुनुपर्दछ मौकामा शत्रुको पनि सेवक ।&lt;br /&gt;
कोइली कागकै बच्चा बन्छ सानू छँदा तक ॥9 ११&lt;br /&gt;
गुणग्राही जहाँ छैन वहाँ के गरला गुणी।&lt;br /&gt;
.कौडीमा तक मिल्किन्छ भिल्लका देशमा मणि ॥१२&lt;br /&gt;
योग्य स्थानविषे मान सानाले पनि पाउँछ ।&lt;br /&gt;
कृ्‌ष्णाका तटको ढुङ्गा देवता कहलाउँछ ॥१३&lt;br /&gt;
उपकारी गुणी व्यक्ति निहरन्छ निरन्तर ।&lt;br /&gt;
फलेको वृक्षको हाँगो नमुकेको कहाँ छ र॥१४&lt;br /&gt;
मेटिँदैन कसैबाट आफनू कर्मपद्धति ।&lt;br /&gt;
बतवासी बने राम चौधै भुवनका पति ॥११&lt;br /&gt;
धर्म हो धीरको धैर्य राखनू दु:ःखजालमा ।&lt;br /&gt;
मान्‌ मौनव्रती हुन्छ कोइली शीतकालमा ॥१६&lt;br /&gt;
५/ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
सारा सार लिई कन्था छोडी-दिन्छ गुणी जन ।&lt;br /&gt;
रस चसेपछि भृङ्ग फूलमा भूल्दथ्यो किन ?१७&lt;br /&gt;
सङ्घले पनि जाँदैन दुष्टको दुष्टता रिस ।&lt;br /&gt;
श्रीखण्डमा बसी सर्प कहाँ हुन्थ्यो र निर्विष ॥१८&lt;br /&gt;
मूर्खका मनमा अर्ती गालीतुल्य बि्ाउँछ ।&lt;br /&gt;
दूधपान गरी सर्प खालि विष बहाउँछ ॥१९&lt;br /&gt;
वि. सँ. १९७४ गोरखाशिक्षाको तेसो पुस्तकबाट&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता /९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ३. वसन्त कोकिल ==&lt;br /&gt;
भरी लता वृक्ष विषे टनाटननवीन लाखौँ फूल पालुवाकन ।बसन्त आयो कलकण्ठको अबसुनिन्छ साह्ै कल कण्ठ-गौरव ॥१अगाडि जो दीन बनी लुकीकनबिताउँथ्यो केवल दु:खमा दिन ।अहो ! उही कोकिल हेर आज योप्रमोदले पूर्ण महासुखी भयो ॥&lt;br /&gt;
01बसी बगैँचा-बिच मोजमा परीनयाँ कलीला सहकारमञ्जरी ।चपाउँदै मस्त भएर बेसरीकुहकुहू गर्दछ त्यो घरीघरी ॥&lt;br /&gt;
21चलीरहेको छ सिरी सिरी हवाजुलीरहेछन्‌ सब मञ्जु पालुवा ।जता दियो दृष्टि उतै खुसी मनप्रमोदले पूर्ण नहोस त्यो: किन ?॥॥ 4&lt;br /&gt;
१०४ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
वि. सं. १९७४&lt;br /&gt;
समीरले पुष्प परागको फ्रीलगाउँदा त्यो रसरङ्गमा परीमुलीरहेको छ शरीर बेसरीमुछेर तेही रजमा घरीघरी ॥श्रपिएर सा५५नन्द रसालको रसघुमाउँदै नेत्र दुवै मदाभ्लससहर्ष खोलौं सुरिलो गलाकन&lt;br /&gt;
घनक्क घन्काउँछ त्यो सबै वन ॥&lt;br /&gt;
द्‌घरीघरी भुर्र उडी अलीकतिघुमेर शाखान्तरमा यताउति ।बडो बहाडी रसिकै बनी तहाँढलीमली गर्दछ पालुवामहाँ ॥७चुचो ठडाईकन चट्ट मञ्जरीढुँगेर च्यापीकन देखिने गरी ।फरक्क फर्कन्छ घरी पछिल्तिरप॒सन्नता-साथ लतारि पुच्छर ॥दन शीत-बाघा, न त घामको डरन बाग नङ्गा, न त वृष्टिको पिर ।बसन्तका गौरवले गरीकनखुसी छ साह्कै कलकण्ठको मन ॥९&lt;br /&gt;
गोरखाशिक्षाको तेसो पुस्तकबाट&lt;br /&gt;
लेखनायका प्रमुख कविता /११&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ४. जीवन-चङ्वा==&lt;br /&gt;
कछुवाले अङ्गसरी खुम्च्याई बाह्य वृत्तिका तार ।भित्र अलकति हेर्दा अर्कै रसिलौ चमत्कार ॥&lt;br /&gt;
१दुर्गम भै उर्लेकी तलतिर समतुल्य मोहकी गग्ना ।फरफर गर्छु उपर यो जीवनमय पातलो चङ्गा ॥&lt;br /&gt;
र्‌ममतासहित अहन्ता ग्रन्थि परेका बडा रम्य।सुखदु:खका कका छन्‌ खूब मिलेका दुवै टम्म ॥१ ,&lt;br /&gt;
मनमय घुम्छ लटाइ फनफन फन्का पलापला मारी ।&lt;br /&gt;
अतिशय दुर्लभ तर त्यो रसिक लटाई लिने चमत्कारी ॥॥ ॥ 1&lt;br /&gt;
सङ्गल्पको छ धघागौ छुटी रहेको लगातार ।&lt;br /&gt;
गर्दछ जसका भरमा जीवन-चङ्गा विचित्र संचार ॥५&lt;br /&gt;
त्यो मसिना धागामा खिरिलोपन ल्याउने ताजा ।&lt;br /&gt;
घसिएको बहुत सफा विवेक, बुद्धिको माजा ॥&lt;br /&gt;
ददचङ्गाको मुखचाहिँ पवृत्तिमय रङ्गले लाल ।&lt;br /&gt;
अलिअलि कालो आशा-पुच्छर, उसको छ चलबले चाल ॥७&lt;br /&gt;
१२/लेखनायका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
वैषम्य झै ककामा अलिकति गतिमा घुस्यो भने दोष ।&lt;br /&gt;
ग्वाँख मिलाउनलाई संयम, सुविचार, शान्ति, सन्तोष ॥द्‌&lt;br /&gt;
यस्तो अद्भुत चङ्गा तयार पारी बडो चमत्कारी ।&lt;br /&gt;
नभमा कौतुक गर्ने कुन होला धीर अविकारी ?&lt;br /&gt;
९जतिजति गडेर हेर्छु यस चङ्गाको विचित्र संचार ।उतिउति शून्य गगनमा विलिन हुन्छु न देखदा पार ॥१०कहिले नीलो दहमा सफारी माछो सरी भरी।लीला गर्छ गगनमा चक्कर लाखौँ थरी मारी ॥११कहिले प्रेम हावामा सररर अक्कासिँदै जान्छ ।कहिले फरक्क फरकी तम तल कौँठी पनी खान्छ ।१२कहिले भुजङ्गजस्तै सुलुलुलु बग्दै बटारिन्छ ।कहिले वबिधिवश बिचमा अरूअरूसँग बेसी लठारिन्छ ॥&lt;br /&gt;
१३कहिले पुगेर माथि सोकै बहँदै शनैः शनै: सल्ल ।निश्चल टक्कर मारी अडिन्छ बँउडाइ-बोहरी-तुल्य ॥१४जलचर नभचर सबका सुन्दर लाखौँ थरी चाल ।देखिन्छन्‌ यही हाम्रो जीवन-चङ्गा विषे सदाकाल ॥१५अक्काशिएर ज्यादा माथि जाँदा हराउने भय छ।तल गङ्गा-लहरीले लपक्क पार्ने विछट्ट संशय छ॥१६&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता /१३&lt;br /&gt;
शीतल सरसर बहने बीच गगनको सफा हावा ।&lt;br /&gt;
जति पायो उति यसले खान्छ गजब चालले कावा ॥१७&lt;br /&gt;
कहिलेदेखि उडेथ्यो? अब उड्ने हो कति बेर।&lt;br /&gt;
आखिर चङ्गा ठहतन्यो चुँडिनालाई छ के बेर?१८&lt;br /&gt;
जति दिन यो उड्ने हो उति दिन उडन्यै छ बीचमा नअडी ।&lt;br /&gt;
तर त्यो देखिनुपरने अद्भुत चङ्गा उडाउने लहडी ॥१९&lt;br /&gt;
जय जगदीश्वर ! देखेँ विश्वव्यापी प्रकाश त्यो खास ।&lt;br /&gt;
सृक्ष्म लटाईभित्रै रहेछ प्रभुको निवास वा भास ॥२०&lt;br /&gt;
वि. सं. १९९२ शारवा वर्ष १ सङ्ख्या २ बाट&lt;br /&gt;
१४ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ५. गौँथलीको चिरिबिरी (१)==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म बस्ने कोठाकै दलिन-बिचमा गौँधली बस्यो,पिटाएको तन्नाउपर फिर मैला पनि खस्यो।मलाई त्यो देखी हृदयबिच लाग्यो किरकिरीचरी बोल्यो मेरो मन सब बुकी त्यो चिरिबिरी ॥१अहो !! त्यस्ता ताता नजर अति राता विष सरीतरी तात्यौ बाबा ! किन मनमनै त्यो रिस गरी ।तिमी धर्मात्मा छौ घरबिच म छू आज अतिथितिथी माघे औँसी शहरभर भूकम्प-फजिती ॥र्‌जहाँ बस्थ्यौँ हामी भवन उहि पातालमय भोचल्यो भारी हा हा नसहिसकनू नै प्रलय भओ।कहाँ पाउँ ठाडो घर, कसरि ओतौँ शिर भनीदुवै भाले-पोषी फनफन घुम्यौँ व्याकुल बनी ॥&lt;br /&gt;
डेबिरालोको फेरि अधम चिलको, काग शठकोशिकारी बोहोरी, कुकुरहरुका दुष्ट हठको ।परी शङ्का भारी सबतिर बिचारी डुलिड्लीनिराशामा एन्थेँ अघि अघचिलो ठाम नमिली ॥॥ $&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता / १५&lt;br /&gt;
यहाँ तिम्रो सानू घरमहल वा रामजुपडीखडा. देखी राम्रो गगन-बिच खेल्दै लडिबुडी ।पसेको हुँ बाबा ! अलि दिन बसूँला कि म भनीप्रियाको आगामी प्रसव दिनको उत्सव गनी ॥५तिमी भन्छौ मेरो सकल घर यो खास यसमाचरी घुस्प्रो सानू कुन चिरबिरे रङ्गरसमा ।म भन्छू हे बाबा ! घरमहल मेरो छ नभनपलामा घर्केका घरउपर दौडाउ नयन ॥0निमेषैमा भत्की घररर गरी घर्र त्यसरीढली ज्यानै हर्ने घर छ डरको दीर्घ भुमरी ।विधाताको भित्रै मधुर करुणाको रस परीपरेनौँ तै हामी विकट भुमरीमा अरु सरी ॥७&lt;br /&gt;
तिमी जान्ने सुन्ने मनुज चतुरा, हामी बिचराचरा साह्दै साना अबुरु वनका केवल किरा ।तथापी श्रद्धाले फुकि विनति गर्छु म सरसवथा मेरो भन्ने जटिल ममता-ग्रन्वि नकस ॥द्‌खुला पारी राम्रो सँग नयनको भित्र नयनबिचारी यी सारा गृह-विभवको चञ्चलपन ।दयालु भै रोक मिलिजुलि सबै वान्धवसितभलो होला जाक, रिस नगर रन्केर मसित ।९कुनै पल्टेका छन्‌ मलिन मुख लाई रुखमनिकुनै रुन्छन्‌ बाटो-बिच नमिलि सानू रुख पनि ।&lt;br /&gt;
१६“ लेखनायका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
कनै भोका शोका५५कुल मरिरहेछन्‌ नगरमाहरे ! तिम्रो यस्तो कुन तुजुक यो तृच्छ घरमा ॥१०त्यहाँ त्यो शय्यामा गर तिमि खुशीसाथ शयनयहाँ यो डन्डीमा बसिबसि म चिम्लन्छु नयन ।अरू सेरोफेरो सब मुफत मेरो छ नभनअघी मेरो भन्ने। कतिकति गए ती सब गन ॥११उघारी त्यो भारी मधुर कषणा-द्वार मनकोगरी रक्षा सारा विकल बिचरा दीन जनको ।यता विश्व-प्रेमी बन, मनुज चोला सफल होस्‌उता स्वर्गद्वारा क्षणभर पनी बन्द नरहोस्‌ ॥१२तिमीभन्दा लाखौँ गुन अफ धनी मानिस पनिडुलेका छन्‌ बाबा ! फगत भिखमङ्गासरि बनी ।विधाताको सारा अघट घटना सम्कू मनमासबै मेरो मेरो भनि नभुल यो मोह- वनमा ॥१३,कदाचित्‌ यो तिम्रो भवन चकनाच््‌र पहिलेहुँदो हो ता हन्थ्यो कसरि किन यो भेट अहिले ।दया राख्यो भारी सदय विधिले सङ्गत भयोसुन्यौ मेरो सानू चिरिबिरि, सबै पाठ पढ यो॥१४कसै सक्तैनौ यो यदि तिमि भने घच्च सहनमलाई द्यौ बाबा ! फगत अब यौ रात रहन ।म भोली नै जान्छु नुपतिसँग भूकम्प कहनपखेटा छन्‌ सक्छू अफ्‌ त नभमा सर्र बहन ॥१५&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता /१७&lt;br /&gt;
गरी यस्तो राम्रो चिरिबिरि चरी त्यो चुप भयो&lt;br /&gt;
भनेँ मैले भैगो तँ बसि कुद्टि दे गैह्र घर यो।&lt;br /&gt;
पखेटा पैँचो दे बरु म पछि आएर तिएँला&lt;br /&gt;
दयाधारी राजासित सकल मै बिन्ति गहँला ।१६&lt;br /&gt;
बि. सं. १९९२ शारदा वर्ष १ सङ्ख्या ७ बाट&lt;br /&gt;
१८ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==६. सत्य सन्देशहरू==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कालो मन्दाकिनीको जलजल, निधिको मोतिको जोति कालो,&lt;br /&gt;
कालो सौदामिनीको चहक, सब शरच्चन्द्रको कान्ति कालो ।&lt;br /&gt;
कैलाश-श्रेणि कालो, कूलमल गरने सूर्यको बिम्ब कालो&lt;br /&gt;
यो सारा सृष्टि कालो, मनबिच्च छ भने दम्भ दुर्भाव कालो ॥१&lt;br /&gt;
थोत्रो पाटी उज्यालो, मलिन तृणकुटी, कन्दरा झन्‌ उज्यालो&lt;br /&gt;
भिक्षा भारी उज्यालो, अझ धन वनको शागशिस्नू उज्यालो ।&lt;br /&gt;
फ्याङ्लो गुन्द्री उज्यालो, वरपर घुमदा जीर्ण कन्था उज्यालो&lt;br /&gt;
तृष्णाको तुच्छ जालो मनबिच नभएर जो मिल्यो सो उज्यालो ॥१&lt;br /&gt;
भर्दाभर्दै हजारौँ विषय-सुख-घडा देह लम्तन्न पर्दा&lt;br /&gt;
र्कर्दा सम्पूर्ण सेखी, तुजुक, पवनले निस्कने जोड गर्दा ।&lt;br /&gt;
सर्दा आपस्त डैं परपर, धमिलो नाचको अन्त्य पर्दा&lt;br /&gt;
गिर्दामा साथ जाने क्न कुन चिज हुन्‌ ? सम्क ती काम गर्दा ॥१&lt;br /&gt;
विद्याको, वयको र बुद्धि, बलको, सौन्दर्यको, मानकोप्रज्ञाको, कुल-जातिको, इलमको ऐश्वर्षको ज्ञानको ।तातो ग्यास मनुष्यका मगजको सम्पूर्ण उत्री दिएपृथ्वीमा सब देवता घरघरै आएर खेल्ने थिए ॥&lt;br /&gt;
बि. सं. १९९१ शारदा बर्ष ४ सङ्ख्या ३,४,५ र १२ बाट&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता /१९&lt;br /&gt;
मत्ता हात्ती हलुङ्गो, वितत जलधिको ह्वेल माछो हलुङ्गोजङ्गी बेडा हलुङ्गो, विकट कटकटै रेलगाडी हहलुङ्गो ।शैलश्ेणी हलुङ्गो, पृथुतम पृथिवी-गौल सारा हलुङ्गोयो बह्माण्डै हलुङ्गो, जब सब मनकी तिर्सना लाग्छ टुङ्गो ॥&lt;br /&gt;
वि. सं. १९९९ शारदा वर्ष ८ सङ्ख्या ३ बाटदोषी माता-पिताका वचन, गुरुजना६५देश निःशेष दोषीसत्त्या(५त्मा मित्र दोषी, गृह-परिजनको चाल देखिन्छ दोषी ।&lt;br /&gt;
पत्नीको प्रेम दोषी, अमृतमय मिठा बेदका वाक्य दोषीयो सारा सृष्टि दोषी, विधि-वश छ भने आफन्‌ू दृष्टि दोषी ॥&lt;br /&gt;
वि. सं. २००० शारदा वर्ष ९ सङ्ख्या ६ बाट&lt;br /&gt;
२०४ लेखनायका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ७. विज्ञानको मोह==&lt;br /&gt;
सानू विज्ञान पैले जुन उदित हुँदा साहसी मर्त्यजातिगर्थ्यौ छाती फुलाई पलपल सुखका कल्पना भाँतिभाँति ।सोही उन्मत्त भस्मा५सुर बनि अहिले बाहु लम्बा पसारीपीछा गर्दो छ दौडी विकट मुख लिई सर्वसंहारकारी ॥१जस्को नि:सार बोक्रो चहलपहल वा रङ्गमा दङ्ग मानीभुल्दामा पेट-पूजा विधि विकट बन्यो भार भो जिन्दगानी ।उस्कै आराधनामा अरु किन यसरी मर्छ यो मर्त्यजातिकस्तो विश्वास, भक्ति, प्रणय शिव ! हरे ! तुच्छ विज्ञानमाथि ॥र्‌चाहे विज्ञान पैले त्रिभुवनभरको सार सारा उतारोस्‌चाहे आकाशमाथी किसिमकिसिमको सृष्टि-शोभा फिँजारोस्‌ ।त्यो त्यस्को तुच्छ बोक्रे चटकमटक हो भित्र अर्कै छ चर्कोसर्को लाग्दो अशान्ति-ज्वरमय सरुवा व्याधिको दीर्घ धर्को ॥&lt;br /&gt;
३यो विद्याले सबैको हृदयबिच ठूलो उन्नति-भ्रान्ति पारीदैवी सम्पत्ति, मैत्री, शम दम, करुणा, शान्ति, सन्तोष मारी ।खित्का छोडेर गर्दा जटिल जहरिलो ग्याँसको अट्रहासको हेर्ने शास फेरी उस बखत कठै !! सृष्टिको सर्वनाश ॥॥&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कबिता / २१&lt;br /&gt;
यै छोटो जिन्दगीमा अमृतं पद दिने विश्वकल्याणकारी&lt;br /&gt;
उस्तो अध्यात्म-विद्या-विषयक महिमा मोहले दूर सारी ।&lt;br /&gt;
फोस्रो विज्ञानमाथी जतिजति गहिरो गर्दछौँ प्रेम हामी&lt;br /&gt;
रुन्छन्‌ सम्पूर्ण पृध्वी उतिउति डरले थर्थराएर कामी ॥1&lt;br /&gt;
वि.सं. १९९५ शारदा वर्ष ४ सङ्ख्या ६, ७ बाट&lt;br /&gt;
२२/ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==८. पतित-पावनी श्री गङ्गाजीको झाकी==&lt;br /&gt;
ठाडै कैलाशदेखीद्रुततर गतिले गड्गडाएर क््दीर्स्दा श्रीशङ्करैकोगल-गलित ठुलो सर्पकैँ सल्ल पर्दी ।लाखौँ चट्टान चिर्दीबिकट गिरिशिला-कन्दरा चूर्ण गर्दी ।बन्दै नाची दगुर्दी,श्रबण-विवरमा नित्य संगीत भर्दी ।१आमा ! भन्दै करैकासकल गिरिनदी काखमा टप्प धर्दीछर्दी पीयूष जस्ताजलकण लहरी-हस्तले, मस्त पर्दी ।कालो बर्दी-सरीकोकलिमल मनको ध्वस्त पारेर हर्दीगङ्गामा भुक्ति-मुक्तिदुद्ग दिदि-बहिनी नित्य खेल्छन्‌ कपर्दी ।र्‌&lt;br /&gt;
वि.सं. १९९८ शारदा वर्ष ७ सङ्ख्या ६ बाट&lt;br /&gt;
सेखनायका प्रमुख कविता /२३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==९. बंशीधरको दिव्य बंशी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सारा भौतिकवृन्दरूप जड यो विस्तीर्ण वृन्दावनघन्काएर घनक्क, भित्र उसमा भर्दै नयाँ जीवन ।हे बंशीघर, ! विश्वमोहन ! परा बाग्रूपिणी बाँसुरीफुक्छौ नित्य नयाँ नयाँ सुर किकी व्यामोह-वर्षा गरी ॥&lt;br /&gt;
१त्यो चर्को सुरबाट जागृत बनी तिम्रो गरी खोजनीघुम्ने रासविलासको रहरमा धीवत्ति छन्‌ गोपिनी ।&lt;br /&gt;
साथै छौ; तर लुक्नमा चतुर छौ, हाँसी रहन्छौ लुकीत्यै तिम्रो रस-रङ्गमा छ रसिलो यो सृष्टिको चक्चकी ॥२&lt;br /&gt;
वि.सं. १९९९ शारदा वर्ष ८ सङ्ख्या ८ बाट&lt;br /&gt;
२४ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==१०. युगवाणी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रिय नेपाली शूरवीर हो, नवयुगको यो संक्रान्ति-समय छ, यसमा नचढोस्‌ तिमिमा फूट-बैरको भ्रान्ति !एकै तन भै एकै मन भै देश-कालको गति जानीबढ्दै जाङ, चढ्दै जा, भन्दछ यो युगवाणी ॥&lt;br /&gt;
१तोडचौ हुकुमी साङ्ला, फाल्यौ फ्याङ्ला खड्गनिशानामुयाङ्ला काटचौ सब मर्जीका, बदल्यौ स्थिति र जमाना ।अब तिमी नै छौ सेवक, तिमि नै मालिक, यो पहिचानीलाग निरन्तर देशोन्नतिमा भन्दछ यो युगवाणी ॥॥दुःशासनले केश खिच्नेकी द्रुपदकुमारी जस्तीदुःख दर्दको विकट दल्दलमा बिचरी पलपल फस्ती ।जन्मभूमिका सुनीनसक्ना लम्बा करुण कहानीसुन्दै जाङ, गुन्दै जाक भन्दछ यो युगवाणी ॥डैगर्नैपर्दछ अब तिमि सबले नव राष्ट्रको निर्माणयसमा तिलभर नहट पछाडी, चाहे जाओस्‌ प्राण ।वीर देशका वीर तिमी छौ वीरव्रतका अभिमानीनजुकोस्‌ तिम्रो वीरपताका, भन्दछ यो युगवाणी ॥डे&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता / २५&lt;br /&gt;
हिमगिरितटका सब बासिन्दा तिमी दुनियाँ छौ कोटिएकमती भै हात बढाउ कर्तव्यमा दुई कोटि।फुट्टाफुट्टै दूर देशमा कल्लीगिरि बा दरबानीगर्दा गर्दै जनम नजाओस्‌, भन्दछ यो पुगवाणी ॥१जुन तागतले एक शताब्दीतक सब यो नेपालरगत सुकाई जर्जर नंगा पात्यो नरकंकाल ।उसको छाया छाप उडाक नगरी आनाकानीभर अब अर्कै दिव्य जवानी, भन्दछ यो युगवाणी ॥1भरखर जननी जन्मभूमिका तोडचौ साङ्ला सिक्रीऔषदको नै पहिले इनको गर्नुपर्द छ बिक्री ।यस मौकामा केही नसोची पछिको लाभ र हानिकिन खलबलिने ? किन अलमलिने ? भन्दछ यो युगवाणी ॥७&lt;br /&gt;
राजा रैती एक मतो भै ल्याएथ्यौ त्यो क्रान्तिअब सब बदली क्रान्ति-लहर ती ल्याउनुपर्दख शान्ति ।त्यसका लागि बारिक मनले छानी दूध र पानीकर्मयोगमा वन सहयोगी, भन्दछ यो युगबाणी ॥यअडबेखडबे डाँडाकाँडा तोडीफोडी सारासंथल पारी उसमा जारी कर्नाका जलधारा ।पार सबैतिर लहलह खेती, सुक्न नपाओस्‌ पानीमुलुकै सुखमय बन्दछ त्यसले, भन्दछ यो युगवाणी ॥2पूर्व र पश्चिम उत्तर दक्षिण रस्ता निस्कून्‌ खासारेल र मोटर तिनमा दौड्न्‌, बस्नू नपरोस्‌ बासा ।&lt;br /&gt;
२६/लेखनायका प्रमुख कबिता&lt;br /&gt;
घरघर बिजुली, कल, कार्खाना, कपडा अन्न र पानीइच्छा माफिक सबले पाउन्‌, भन्दछ यो युगवाणी ॥१०ग्रामैपिच्छे शिक्षा पाकन्‌ लाखन बालबालाकुनै कुनामा घुस्न नपाओस्‌ गरिबीपनको ज्वाला ।सबका घरघर डबल होस्‌ व्ययभन्दा आम्दानीधर्म सनातन तब पो रहला, भन्दछ यो युगवाणी ॥११उच्च हिमाचल सेती गाई, तल उपपर्वतँ-मालाधूनसरी छन्‌ दूध-बराबर रत्न अनेक उज्याला ।दुहुनैपर्दछ ती सब तिमीले किसिमकिसिमका खानीतब पो रहला तिम्रो पानी, भन्दछ यो युगवाणी ॥१२अहिले अग्ला दशं-आठोटा रङ्गमहलमा खालीचहलपहलका साथ निरन्तर खेल्दछ जो खुसियाली ।त्यो सब सुप्रामुप्राहरूमा ल्याउनुपर्दछ तानीनत्र भयो के ? दु:ख गयो के ? भन्दछ यो युगवाणी ॥१३&lt;br /&gt;
वि.सं. २००७ युगवाणी वर्ष ४ अङ्क ४२-४३ बाट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==११. वर्षा==&lt;br /&gt;
सं सं सं सं पानी बस्यौ अब वर्षा क्रतु आयो ।विश्वशान्तिको खातिर बढ्दो क्रान्तिवीरमँ घनघोरगर्जन गर्दै घन-मण्डल त्यो नभमा सबतिर छायो ॥ म सं ...&lt;br /&gt;
लपलप गर्दो असिघारालँ चमचम बिजुली उसमासुषमा भर्छे, त्यसले सबको खुसियाली मुसुकायो ॥ सं फं ...&lt;br /&gt;
उस ज्वालाले सुकी सकेका तृण, तरु, लहरा सारालहलह गर्दै उठे पल्हाये, हरियाली लहरायो ॥ मं म्रै ...&lt;br /&gt;
खलखल खोला, छरर छहरा टिलबिल टिलबिल सरिताधनरस-भरिता धरणी रसिली त्यो सब ताप विलायो ॥ सं कं ...&lt;br /&gt;
घुलो धमिलो हालि नयनमा, दुनियाँ अन्धो पारीभतभत पोल्ने उष्ण पवनले शीतलता अपनायो 7 सं छं ...&lt;br /&gt;
घनरव सुन्दै नाचिरहेछन्‌ मदले मत्त-मयूरमनमन भन्दछ कोकिल कसले युगपरिवर्तन ल्यायो ॥ सं सं...&lt;br /&gt;
वि.सं. २००९ भारती वर्ष ४ अङ्ग १ बाट&lt;br /&gt;
२८ लेखनाथका प्रमुख कबिता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==१२. सरस्वती स्मृति==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मिही प्राशै वीणा, मन मुदुनखी, कम्प कलना;गरी लाखौँ ञिक्ती स्वर-मधुरिमा स्मेरवदनारसीलो फक्रेको हृदय-कमलै आसन गरीबसेकी वाग्दैवी क्षणभर नबिसूँ जुनिभरी ॥१सफा वर्णा५५कार स्फटिकमय मालाकन घरीजगत्‌मा तदृद्वारा व्यवहृति-कला शीतल गरी ।सदा भर्दै हाम्रो हृदयबिच आलोक-लहरीबसेकी वाग्दैवी क्षणभर नबिसूँ जुनिभरी ॥र्‌सुनेको, देखेको, अनुभव गरेको जति कुराकुनै आघा मात्रा तक नछोडी सब पुरा ।छपाई-राखेको स्मृतिमय महापुस्तक घरीबसेकी वाग्दैवी क्षणभर नबिसूँ जुनिभरी ॥३यही हाम्रो भित्री हृदयमय गम्भीर सरमाडुबी उत्री खेल्दो, चपल, चटकी हंसबरभा ।चढी लीला साथै भुवन महिमा जीवित गरीबसेकी वाग्दैवी क्षणभर नबिसूँ जुनिभरी ॥1&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता / २९&lt;br /&gt;
जगद्व्यापी मेरो अति मधुर यो जीवन-कला&lt;br /&gt;
बुर््यो जस्ले उस्को कसरि भय अज्ञान रहला ।&lt;br /&gt;
भनी सामुन्नेमा वर अभय मुद्राकन घरी&lt;br /&gt;
बसेकी वाग्दैवी क्षणभर नबिसूँ जुनिभरी ॥र&lt;br /&gt;
वि.सं. २०१० लालित्य भाग १ बाट&lt;br /&gt;
३०० लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==१३. साहित्यको फुटबल==&lt;br /&gt;
भाषाको छ विशाल चौर जसमा गर्दै ठुलो तर्खरभ्रै कोही फरवार्ड, रेफरि कुनै ब्याकिड्‌ र गोल्कीपर ।खेल्दै छौँ फुटबाल बालक सबै साहित्यको बेसरीहावा छैन परन्तु भित्र उसमा गुड्दैन केही गरी ॥&lt;br /&gt;
१खेल्नै हो अब खेल यो यदि भने चाँडो अगाडी सरील्याउँ शुद्ध विचार-पम्प, उसमा जोडौँ र त्यो सुस्तरी ।हावा जागृतिको क्रमैसित भरौँ सर्वत्र त्यो टन्न होस्‌भर्दा जोड परेर किन्तु पहिल्यै टुट्ने र फुट्ने नहोस्‌ ॥&lt;br /&gt;
रेत्यो घात-प्रतिघात-चङ्क्रमणको चातुर्य-सौदामिनीलड्नासाथ उठेर चक्कर लिंदै घुम्दै रहोस्‌ फन्फनी ।खेल्छौँ हामि जती उती चटपटे उस्को नयाँ रङ्ग होस्‌सारा दर्शक वर्ग मस्त सुरमा ताली पिटी दङ्ग होस्‌ ॥|&lt;br /&gt;
वि.सं. २०१० लालित्य भाग १ बाट&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता / ३१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==१४. हाम्रो इन्द्रेनी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पर्वत नगिचै त्यो जलतटमा सात रङ्गको सुरिलो आकारकर्के कर्के गरी उठेको छविको अद्भुत मुस्लो उसपारदेख्नासाथै लोचन खिचिये, कौतुकिताका उरमा छालउर्लन थाले, साथै मनमा रङ्ग रङ्गका उठे सबाल !&lt;br /&gt;
उही कुनाको बादल फुस्रो, उही पखेरो, उही खोला&lt;br /&gt;
त्यसमा त्यस्तो छविको लट्टी कसले कहिले टाँग्यो होला ?के सुरकँवरी त्यस लट्टीको पीङ बनाई चहचह गर्छन्‌ ?अथवा चटकी साँझ त्यो हो जसले ती स्वर्गङ्गा तर्छन्‌ ?&lt;br /&gt;
अमर क्सुमका रसले रञ्जित सात किसिमका छविधारीकामघधनुषको छाया हो बा विरहीको जीवन हारी ।त्यस्तो घनुले मदन कृसुमका कति तीखा शर हान्दो होलाजसले गर्दा पलपल चल्छन्‌ विरहीका मुटुका सोला !&lt;br /&gt;
अथवा त्यो हो दिगङ्गनाका कण्ठस्थलको मञ्जुलमालाभर्दख जसले नव जलधरमा प्रणय-सुधा-रसको प्यालाकलमल त्यस्तो अद्भुत छविको हार गाँथने सुरकन्याकुन कुन होलान्‌ शूत्य गगमा शिल्पकतामा चतृरी घ्रन्या&lt;br /&gt;
३२“ लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
रतिमन्मधका केलिभवनको यही द्युतिमय तोरन हो&lt;br /&gt;
अथवा अमीरहरूकै शिरको चुनरीरष्ठी रीवन हो।&#039;मुनामदन&#039; की उही मुनाको सुन्दरताको नमुना होकि ?जसले हाम्रा प्रिय कविजीमा सुन्दरताको छापा ठोकी !&lt;br /&gt;
यो सब गन्दा गन्दै दिलमा अर्कै अद्भुत छाया भास्योत्यस छायाको रूप अँगाली मेरो दिल कन्‌ झन्‌ हाँस्यो ।हृदय गगनमा सबको देख्यो आशाको नानारङ्गीइन्द्रेनीको क्षणिक उज्यालो उठदो छिपदो रद्ठीचङ्ठी !&lt;br /&gt;
बि.सं. २०१३ ड्न्द्रैनी वर्ष १ अङु ५ बाट&lt;br /&gt;
सेखनाथका प्रमुख कविता / ३३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==१५, पूर्वस्मृति==&lt;br /&gt;
हे मेरो प्रिय बन्धु ! आज तिमिले जो लेखका खातिरलेख्यौ सा५५दर पत्र, त्यो सब पढेँ केही मुकाई शिर ।ठेगानातिर हेरदा नयनमा देखा पन्यो &#039;पोखरा&#039;जो देख्दा मनमा मिहीं स्मरणका लाखौँ फुटे आँक्रा ॥१पैह्ला अङ्कुरमा हिमाल हँसिलो अग्लो अगाडी सस्यो-साथै पर्वत-शृङ्खला विपुल त्यो चौरतफि देखा पन्यो ।लंबा संधर फाँट तालहरुको कल्क्यो ठुलो चक्घकीफेरी त्यो गड्वा, विजेपुर, खुदी, सेती बगेकी लुकी ॥&lt;br /&gt;
द्‌कोठे साँघु, बजारको झिलिमिली, काला उखु, सुन्तलादोस्रो अङ्क्रमा खचाखच भये ज्यादै मिठा शीतला ।पैसा ढाँक उखू यतातिर, उता कोरी बढी सुन्तलात्यो संगी खुशिले रमाउँछ यहाँ अद्यापि मेरो गला ॥&lt;br /&gt;
डेतेस्रो अङ्कुरमा उपस्थित भयो अघौं तथा अर्चलेपुर्खाको जसमा थियो जस ठुलो प्रख्यात पाण्डित्यले ।चौथोमा उभियो पवित्र खरको छानू भयेको घरआमाको मृदु लालना सुख जहाँ लिन्थे म लोकोता ॥&lt;br /&gt;
11&lt;br /&gt;
३४लेखनाथका प्रमुख कविता&lt;br /&gt;
पाँचौंमा सुकुमार बाल्य वयका साथी सबै देखियेसाना पल्लव तुल्य त्यो बखतमा नाना थरी जो थिये ।तिन्का साथ डुलेर काफल, तिँदू, ऐसेलु, चुत्रो &#039;सब&#039;टिप्ता जो पुरुषार्थ- गर्व मनमा चढ्थ्यो, कहाँ त्यो अब ॥&lt;br /&gt;
१छैटौँ अङ्कुरमा मिल्यो असजिलो, पाटी धुलौटो, खरीदेखाएर कडा उक्स्मुकुसमा, जर्काउँथ्यो कन्सिरी ।त्यो आपत्ति सही सुखाखर गरी साह्वा सबै अक्षरभाषा-श्लोक फलाक्न घोक्न मनले कस्तै गयो कम्मर ॥&lt;br /&gt;
0सातौँ अङ्कुरभित्र अङ्कित भये गङ्गा-गणेश-स्तुतिचण्डी कोश र कौमुदीहरु ममा भर्दै निजी संस्कृति ।त्यो देखर भन्यो- कठै !! नवमले “जा राजधानीतिरबेडा पार हुँदैन अध्ययनको खाली अँगाली घर” ॥&lt;br /&gt;
७चर्को चक्र घुम्यो शनैः समयको, टाढा भयो अर्चलेप्यारा साथि पनि क्रमैसित सबै संसारदेखी-. चले ।&lt;br /&gt;
देख्दा यो सब तारतम्य विधिको धर्कन्छ छाती सबत्यो जन्मस्थलमा कठै !! म कसरी कैले पुगूँला अब ?पन&lt;br /&gt;
बि.सं. २०२२ बेणीबाट&lt;br /&gt;
लेखनाथका प्रमुख कविता / ३५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==१६. आखिरी कविता==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यो दु:ख भोग्ने परमेश्वरै हो ।यो देह उस्को रहने घरै हो॥यो भत्कँदा दुःख अवश्य मान्छ ।सुटुक्क सामान लिएर जान्छ ॥&lt;br /&gt;
बि.सं. २०२२ कविता वर्ष २ अङ्ग र बाट&lt;br /&gt;
३६/ लेखनाथका प्रमुख कबिता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सामा प्रकाशनका केही कविता /काव्य==&lt;br /&gt;
अज्ञात प्रारम्भअतिरिक्त अभिलेखअराजक अक्षरहरूअसमर्थ श्लोक&lt;br /&gt;
एउटा अर्को बुइँगल&lt;br /&gt;
एक फूल अनेक पत्रएक्लो विजेता&lt;br /&gt;
काँडाका फूलहरू&lt;br /&gt;
केही गीत केही गजलघाउमा हरिश्चक्त कटुवालचिसो च्‌ह्लो&lt;br /&gt;
छुटेका यादहरू&lt;br /&gt;
दाजै ! कविता गाउँमै छनफुलेका फूलहरू&lt;br /&gt;
नरमेध -निर्माणाधीन सडकपञ्चदशिका&lt;br /&gt;
पलकभित्र पलकबाहिरपृथिबीमाथि आलेखप्रेमका कवितामृत्यु-कविता&lt;br /&gt;
लक्ष्मी कवितासङ्ग्रहवीरकालीन कविताशाकुन्तल (महाकाव्य)समसामयिक सासा कबितासाफा कविता&lt;br /&gt;
हिमालचुली ।सङ्कलन)&lt;br /&gt;
पान राररुरुललाकाररुर, कार ककन&lt;br /&gt;
भ्रीम विराग&lt;br /&gt;
दिनेश अधिकारीविजय सुब्बा&lt;br /&gt;
राजव&lt;br /&gt;
सं. कशघकृष्णहरि बरालपुरुषोत्तम सुवेदीमनु ब्राजाकीकालीप्रसाद रिजालकणाद महर्षिबालकृष्ण समवियोगी बुढाथोकीभूपाल राई&lt;br /&gt;
क्षेत्र प्रताप अधिकारीखुमनारायण पौडेलशङ्कर थपलियाअनु, भरतराज पन्तमञ्जु काँचुलीगोपाल पराजुली&lt;br /&gt;
सं. फणीन्द्र खेतालामञ्जुल&lt;br /&gt;
सं. चूडामणि बन्धुसं. दयाराम श्रेष्ठलक्ष्मीप्रसाद देवकोटासं. डा. तारानाथ शर्मासं. चृडामणि बन्धुसं. ईश्वर बराल&lt;br /&gt;
उँ५ 99933-2-488-4&lt;br /&gt;
| हेई।&lt;br /&gt;
६99 | 3&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=Main_Page&amp;diff=77</id>
		<title>Main Page</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=Main_Page&amp;diff=77"/>
		<updated>2024-06-10T13:24:34Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: /* Step 1:  Scan and OCR */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;strong&amp;gt;Welcome to Nepali Kitab Editing Team.&amp;lt;/strong&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
This website is a sub-website of nepalikitab.org. Here we convert old books into Unicode text format. It is a collective effort by volunteers around the world. If you are also interested, please join the team.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
We keep here the books generated after scanning and extracting texts with OCR. It contains many errors. Our goal is to remove the errors.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==How to edit==&lt;br /&gt;
[[File:Editor-timeline.png|thumb]]&lt;br /&gt;
1. Make an account or log in.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2. Select the book of your interest.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. Click edit&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
4. Edit and clean up the errors and book format. If you are familiar with wiki syntax, you can edit the source too.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
5. Save time to time while editing&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
For details about formatting text, refer to: https://www.mediawiki.org/wiki/Help:Formatting&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 1:  Scan and OCR ==&lt;br /&gt;
*[[रामायण]] भानुभक्त आचार्य&lt;br /&gt;
* [[लेखनाथका प्रमुख कविता]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[गलबन्दी (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[९७ साल]] आनन्ददेव भट्ट&lt;br /&gt;
* [[तरुण तपसी (नव्यकाव्य)]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[नेपालको नक्सा (राजनीतिक तथा प्रशासनिक)]] नेपाल सरकार&lt;br /&gt;
* [[आदिकवि भानुभक्त (पटकथा)]] यादब खरेल&lt;br /&gt;
* [[इतिश्री (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[स्वाध्ययन सामग्रीः घरमा नै गर्न सकिने सिकाइ क्रियाकलापहरू (कक्षा ५)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[रूखको रूप]] रिन्छेन्ला लामा&lt;br /&gt;
* [[केही धार्मिक तथा साँस्कृतिक सम्पदाहरू (केही नमुना कलाकृतिहरू)]] सत्यमोहन जोशी&lt;br /&gt;
* [[रमाइला गाउँखाने कथा]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[दसैँ, पिङ र हात्ती (बालकथा-सङ्ग्रह)]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[८० दिनमा विश्‍व भ्रमण]] जुल्स वर्न,गोरखबहादुर सिंह&lt;br /&gt;
* [[बालभाका - १ (बालकविता सङ्ग्रह)]] उद्धवप्रसाद प्याकुरेल&lt;br /&gt;
* [[ताल (उपन्यास)]] यासुनारी कावाबाता&lt;br /&gt;
* [[चतुरेको चर्तिकला (कथा सङ्ग्रह)]] गोरखबहादुर सिंह&lt;br /&gt;
* [[ठूलो फुल (A Big Egg)]] Roma Pradhan, Shanta Das Manandhar&lt;br /&gt;
* [[आखिरमा टोम्मीको टोलीले जिती छाड्यो]] क्रिस्टिन स्टोन,शान्तदास मानन्धर&lt;br /&gt;
* [[शिक्षक निर्देशिका मेरो सामाजिक अध्ययन तथा सिर्जनात्मक कला कक्षा ५ (पुरानो संस्करण)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[जय भुँडी (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[मुकुन्द इन्दिरा (नाटक)]] बालकृष्ण सम&lt;br /&gt;
* [[खाल्डामा परेको भकुन्डो]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[जे छोए पनि सुन]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[खानामा पाइने पोषणहरू]] नताशा भिजकारा&lt;br /&gt;
* [[अन्तिम निम्तो]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[सूगवा]] रोशनी चौधरी&lt;br /&gt;
* [[भीमसेन थापा (ऐतिहासिक खण्डकाव्य)]] सिद्धिचरण श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[ऋतुविचार (खण्‍डकाव्य)]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[अनिवार्य नेपाली (१०६) - माध्यमिक शिक्षा परिक्षाको प्रश्न तथा उत्तरकुञ्जिका २०७४]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[छन्दका १०१ कविता]] (सङ्कलन) कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[गणित प्राविधिक शब्दकोश]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[उज्यालोको खोजीमा (उपन्यास)]] हरिहर खनाल&lt;br /&gt;
* [[सपनाको देशमा]] चन्द्रकान्त आचार्य&lt;br /&gt;
* [[महिला लक्षित शिक्षक सेवा आयोग तयारी अध्ययन सामग्री]] विष्णुप्रसाद अधिकारी&lt;br /&gt;
* [[शिक्षक पेसागत विकास तालिम (तालिम पाठ्यक्रम)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[हाम्रा लोकबाजाहरू (बालबोध - ५१)]] रामप्रसाद कँडेल&lt;br /&gt;
* [[पर्दा, समय र मान्छेहरू (कथासङ्‍ग्रह)]] झमक घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[काउकुती (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[विदुर नीति Vidura Niti [Sanskrit-English]]] (Extracted From) Mahabharata [महाभारत]&lt;br /&gt;
* [[जंगबहादुरको बेलाइती कापी]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[कति वटा रोटी]] शिल्पी प्रधान&lt;br /&gt;
* [[विश्वका प्रमुख सभ्यता तथा संस्कृति (बाल ज्ञानकोश - ३)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अस्माकम् संस्कृतम् - कक्षा १]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[प्रारम्भिक संस्कृत व्याकरण र रचना]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[गोरक्ष-साह-वंश (ऐतिहासिकं महाकाव्यम्)]] हरिप्रसाद शर्मा&lt;br /&gt;
* [[२०२ ओटा ठट्टा]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[धुमधामको घुमघाम (भक्तप्रसाद भ्यागुताको नेपालयात्रा)]] कनकमणि दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[महिलाका लागि डाक्टर नभएमा]] -&lt;br /&gt;
* [[दस औतार (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[A Perfect Match]] Ramendra Kumar&lt;br /&gt;
* [[मधुपर्क (वर्ष ४७, अंक ४, २०७१ भदौ)]] -&lt;br /&gt;
* [[सौगात (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[एक घर एक रोजगार (प्रयागदत्त तेवारीको कृषिकथा)]] मिलन बगाले&lt;br /&gt;
* [[रवीन्द्रनाथका नाटकहरू]] -&lt;br /&gt;
* [[पेसा, व्यवसाय र प्रविधि]] -&lt;br /&gt;
* [[मामा माइजु]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[म को हुँ]] पेमा डोल्मा लामा&lt;br /&gt;
* [[चनाचटपटे (बालकविता-सङ्ग्रह)]] बूँद राना&lt;br /&gt;
* [[आवाज (सामाजिक उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[स्पष्टीकरण (कथासङ्ग्रह)]] हरिभक्त कटुवाल&lt;br /&gt;
* [[स्वास्थ्य, जनसङ्ख्या तथा वातावरण शिक्षा स्वाध्ययन सामग्री (२०६७)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[दशैँको दक्षिणा (बालउपन्यास)]] गङ्गा पौडेल&lt;br /&gt;
* [[चार आर्य-सत्य (बुद्ध-शिक्षाका चार स्तम्भ)]] दोलेन्द्ररत्न शाक्य&lt;br /&gt;
* [[विजय चालिसेका बालकथाहरू]] विजय चालिसे&lt;br /&gt;
* [[सिर्जनशील विद्यालय]] अर्जुन श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[अभिभावकको सहयोगमा बालबालिकालाई घरमा नै गराउन सकिने सिकाइ क्रियाकलापहरू (कक्षा १)]] -&lt;br /&gt;
* [[दर्शन परिचय (विश्वका दर्शन र कला साहित्यिक बादहरू)]] परशुराम कोइराला&lt;br /&gt;
* [[खोज (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[अनिवार्य सामाजिक अध्ययन (१२३) - माध्यमिक शिक्षा परिक्षाको प्रश्न तथा उत्तरकुञ्जिका २०७५]] -&lt;br /&gt;
* [[बिहानीको घामसँग]] तारा पुन, शान्तदास मानन्धर&lt;br /&gt;
* [[एकादेशमा (बालकथाहरूको सँगालो)]] उषा दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[इतिहासका विम्बहरू]] पूर्णचन्द्र घिमिरे, रमेशचन्द्र घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[पन्ध्रौं योजना (२०७६७७-२०८०८१)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[नेपालको शाह तथा राणा वंशावली]] विष्णु प्रसाद श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[Aaloo-Maaloo-Kaaloo]] Vinita Krishna&lt;br /&gt;
* [[परित्याग (उपन्यास)]] माधव खनाल&lt;br /&gt;
* [[अमेरिका (उपन्यास)]] गंगा लिगल&lt;br /&gt;
* [[उखान मिलेन !]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[राष्ट्रकवि माधव घिमिरे (जीवनी, व्यक्तित्व र कृतित्वको सङ्‍क्षिप्त रेखाङ्‍कन)]] शैलेन्दुप्रकाश नेपाल&lt;br /&gt;
* [[केहि गुणकारी बोटबिरूवाहरू (बालबोध - ४१)]] डा. हरिप्रसाद&lt;br /&gt;
* [[दिवास्वप्न]] गिजुभाई, शरच्चन्द्र वस्ती&lt;br /&gt;
* [[संस्कृत, प्राकृत र नेपालीका सन्धिनियम]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[शिक्षाका ती दिन]] पुष्पराज पौडेल&lt;br /&gt;
* [[मपाईं (निबन्ध)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[Autobiography of a YOGI]] Paramhansa Yogananda&lt;br /&gt;
* [[ताराबाजी लै! लै!!]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[विश्वास (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[Akbar and Birbal Moral Stories]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[बुद्धवादका तीन आयाम]] पशुपति घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[करेसाबारीका जडिबुटीहरू]] केदार श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[काठमाडौं उपत्यका खुलास्थलहरू सम्बन्धी मानचित्र पुस्तक २०७१]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अन्ताक्षरी खेल]] ध्रुव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[साइबर बालकथा]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[कलेजी थाल]] ध्रुव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[कत्ति धुनु गधाहरूलाई (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] लक्ष्मण गाम्नागे&lt;br /&gt;
* [[गौरी (शोककाव्य)]] माधव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[आमाको माया]] रमेश चन्द्र अधिकारी&lt;br /&gt;
* [[Natural Treasures of Nepal]] Nepal Tourism Board&lt;br /&gt;
* [[नारीस्वर (महाकवि देवकोटा विशेष) - २०६६ असोज]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[चार गजलकारका उत्कृष्ट गजल (गजलसङ्ग्रह)]] मनु ब्राजाकी&lt;br /&gt;
* [[स्यालको जुक्ती]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[स्थानीय पाठ्यक्रम विकास तथा कार्यान्वयन मार्गदर्शन (मातृभाषा सहित) २०७६]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[बाँदर बन्ने रहर (बालकथा सङ्ग्रह)]] गोपीकृष्ण ढुङ्गाना&lt;br /&gt;
* [[डाढो (हास्यव्यङ्ग्यहरू)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[मध्यचन्द्रिका (नेपाली भाषाको मझौला व्याकरण)]] सोमनाथ शर्मा&lt;br /&gt;
* [[नेपाली क्रान्ति-कथा]] फणीश्वरनाथ रेणु&lt;br /&gt;
* [[डायना (महाकाव्य)]] शैलेन्दुप्रकाश नेपाल&lt;br /&gt;
* [[शङ्खे र फट्याङ्ग्रो]] अनन्तप्रसाद वाग्ले&lt;br /&gt;
* [[मोहिनीले खोसेको अमृतकलश]] अमर निराकार राई&lt;br /&gt;
* [[हिन्दू-धर्म के हो]] महात्मा गाँधी&lt;br /&gt;
* [[बालबालिकामा पढ्ने बानीको विकास]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[The Last Page of My Poem (मेरो कविताको अन्तिम पृष्ठ)]] Rajeshwor Karki&lt;br /&gt;
* [[जय भोलि !]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[संस्कृत व्याकरणको रूपरेखा]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[घरबारी बगैंचा]] बोल बहादुर थापा&lt;br /&gt;
* [[नबिर्सने यात्रा (यात्रा-कथा)]] समीर नेपाल&lt;br /&gt;
* [[समाज परिवर्तनमा संस्कृतिकर्मी]] विजय सुब्बा&lt;br /&gt;
* [[मेवालाल (बालकथा सङ्ग्रह)]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[A Helping Hand]] Payal Dhar&lt;br /&gt;
* [[आमा (कविता सङ्ग्रह)]] भक्ति दाहाल &#039;विष्फोट&#039;&lt;br /&gt;
* [[विज्ञान तथा वातावरण - कक्षा ८ (पुरानो संस्करण)]] गोपीचन्द्र पौडेल&lt;br /&gt;
* [[चप्पल]] अर्हन्त श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[मात्राहरू]] हरिहर लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[दोस्रो भाषाको रूपमा नेपाली भाषा]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अब्राहम लिंकन (१८०९-१८६५)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[घरभेटी भाउजू (कथासङ्ग्रह)]] कृष्णादेवी शर्मा&lt;br /&gt;
* [[Agreeing and Disagreeing - English Grade 10]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[शकुन्तला नाटक]] शम्भुप्रसाद ढुंग्याल&lt;br /&gt;
* [[Chunu and Munu Read]] Shanta Das Manandhar, Stephanie Wei&lt;br /&gt;
* [[अब खेल खेल्ने!]] शिल्पी प्रधान&lt;br /&gt;
* [[जनावरहरूको सभा]] ज्ञाननिष्ठ ज्ञवाली&lt;br /&gt;
* [[विश्वप्रसिद्ध पैंतिस साहित्यकार]] प्रभात सापकोटा&lt;br /&gt;
* [[कसिङ्गर (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[पंचतन्त्र कथासंग्रह]] &lt;br /&gt;
* [[अक्षर (बालकथा)]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 2: Title and heading corrections completed ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 2&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 3: Text correction completed ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 3&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
==Step 4: Proof reading completed==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 4&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[अनौठो फल]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==Step 5: Finished books==&lt;br /&gt;
पुरा भएका किताब&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 5&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%80_(%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8)&amp;diff=76</id>
		<title>नोकरी (उपन्यास)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%80_(%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8)&amp;diff=76"/>
		<updated>2024-06-10T13:23:25Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: /* गीताकेशरी */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;Source file: https://nepalikitab.org/gita-kesari-nokari/&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==किताब परिचय==&lt;br /&gt;
नोकरी&lt;br /&gt;
(उपन्यास)&lt;br /&gt;
गीताकेशरी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वाणी प्रकाशन विराटनगर- १४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रकाशक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाणी प्रकाशन सहकारी संस्था लि.&lt;br /&gt;
विराटनगर-१४, मोरङ, नेपाल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संस्करण: प्रथम&lt;br /&gt;
मृयः रु. १००&lt;br /&gt;
मिति: २०५५ आषाढ&lt;br /&gt;
छापिएको प्रति: १०००&lt;br /&gt;
सर्जाधिकार;ः लेखिकाको&lt;br /&gt;
कम्प्युटर सेटिङ्ग: वाणी प्रकाशन, विराटनगर&lt;br /&gt;
मुद्वक:&lt;br /&gt;
श्री नेपाल शैक्षिक सा. उ. प्रा. लि.स्वयम्भू, काठमाडौ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रकाशकीय==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपाली उपन्यास । साहित्यका क्षेत्रमा श्रीगीताकेशरी परिचित,चर्चित र प्रशंसित व्यक्तित्व हुनुहुन्छ । तीन दशकभन्दा बढी समयदेखिउपन्यास लेखनमा सक्रिय, सबल र समर्थवान्‌ सर्जक उपन्यासकारहरूमध्येमा उहाको स्थान अग्॒गण्य नै छ । संगति र विसंगति, घात ।प्रतिघात, चारित्रिक संगठन र विगठन, पात्र।पात्राको सचरित्र र दश्चरित्र,घटना र दर्घटना, मानवीयता र संवेदना, सबलता र दर्बलताहरू उहाँकाउपन्यासका विषयहरू भई आएका छन्‌ र तिनलाई बृहत्‌ क्यान्भासमाउहाँले सबलताकासाथ प्रस्तुत गर्नुभएको छ ।&lt;br /&gt;
पुस्तुत उपन्यास &amp;quot;नौकरी&amp;quot; नेपालको २०४६ सालको राजनीतिकपरिवर्तनतपछिको यथार्ष दस्तावेज हो, जसलाई उहाँले उपन्यासकामाध्यमबाट सफलतापूर्वक उतार्नु भएको छ । राजनीतिका दृश्चक्रमा परेकोनेपालको नोकरशाही ।ब्युरोकेसी) को दःखान्त कथाका रूपमा आएकोनोकरी (उपन्यास) प्रकाशन गर्न पाउँदा वाणी प्रकाशनले खशीको अनभवगरैको छ । उहाँबाट भविष्यमा पनि यसौ शास्त्रीय,मान्य र स्तरीयउपन्यासको आग्रह गर्दछौं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिराटनगर परशु प्रधान&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२०५४।९।१० अध्यक्ष&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==&amp;quot;नोकरी! भित्र चहार्दा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपाली उपन्यास जगतमा गीताकेशरी नाउँ अपरिचित छ भन्नेमलाई लाग्दैन । २०३४ सालमै पहिलो उपन्यास &#039;कसिङ्गर&#039; साझाप्रकाशनबाट छपाएर नेपाली उपन्यास साहित्यमा नाम दर्ता गर्नैगीताकेशरीले २० वर्षभित्रै सातओटा उपन्यास लेखी छओटा प्रकाशित पनिगराइसक्नुभएको छ । २०५० सालको धरणीधर पुरस्कार प्राप्तगर्नै मुक्तिउपन्यास त आकारमा पनि ज्यादै ढव्बु छ । २०४६ सालको प्रजातान्त्रिक_ प॒नर्बहालीपछि त झन्नै डेढ वर्षका दरले एउटा उपन्यास दिएर यसविघालाई समृद्ध तुल्याउने गीताकेशरीको प्रस्तृत उपन्यास नोकरी नितान्तसघारवादी दृष्टिले लेखिएको देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस उपन्यासको प्रमख पात्र हो शिव खँड्का । शिव खँड्काएउटा कार्यालयमा काम गर्छे, स्पष्ट शव्दमा सोभैँ भनौं नोकरी गर्छ ।उसैका सेरोफेरोमा उपन्यास घुम्छ । उसकी पत्नी गौरी पनि कुनैकार्यालयकी कर्मचारी छै, काम गर्छै, नोकरी नै गर्छै । शिव खँड्काइमान्दार र हक्की कर्मचारी हो । आफना हातमा आएका टुङ्ग्याउन पर्नेकाम फत्ते नगरुन्जेल क कार्यालयबाट हिड्दैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुन त कर्मचारीप्रति जनसाधारणको सोचाइ नै शिवका विपरीतछ किनकि कर्मचारी जति सबै कामचोर हुन्छन्‌, भ्रष्ट हुन्छन्‌, घुस नखाईकामै गर्दैनन्‌ भन्ने धारणा सर्वसाधारणले पालेको पनि देखिन्छ, सुनिन्छ रनेपालीमा उखानै बनेको छ &amp;quot;सरकारको काम, कहिले जाला घाम,”&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त आचार्यका समयका कर्मचारी पनि यस्तै थिए,छन्‌ र त उनले जडे कविता ।&lt;br /&gt;
“बिन्ती डिट्ठाबिचारीसित म कति गरूँ चप्‌ रहन्छन्‌ नबोली&lt;br /&gt;
बोल्छन्‌ ता ख्याल गउ्या झैं अनि पछि दिनदिन्‌ भन्दछन्‌ भोलि भोलीकी ता सम्तीत भन्नु कि तब छिनिदिन्‌ क्यान भन्छन्‌ यी भोलीभौली भोली हुँदैमा सब घर बितिगौ बम्सियौस्‌ आज झौली &amp;quot;&lt;br /&gt;
धेरैजसो कर्मचारीको परिचय आज पनि यही हो ।&lt;br /&gt;
तर &#039;हात्ती र हात्ती छाप उस्तै उस्तै हो&amp;quot; भने झैँ सबैकार्यालयका सबै कर्मचारीलाई एक भनिहाल्न हुँदैन । इमान नछोड्ने ररातदिन घोटिएर काम गरे पनि अवकाशमा पर्ने शिव खँड्काहरू एकातिरछन्‌, भेटिन्छन्‌ भने अर्कातिर दमन जस्ता कर्मचारीहरू पनि धेरै छन्‌. जौबाहिरी आय हुने भए जेजस्तो &#039; नहुँदौ काम पनि गर्दछन्‌ । त्यसैले&amp;quot;नोकरी&amp;quot; लाई केन्द्रविन्दु बनाएर यस उपन्यासलाई उभ्याएको छु रशीर्षक पनि &amp;quot;नोकरी&amp;quot; नै छ ।&lt;br /&gt;
उपन्यासकारले नारीहरूले नोकरी गर्दा समाजले हेय ठान्नेपरम्परा हाम्रा समाजमा आज पनि उत्तिकै विद्यमान भएको प्रसङ्गसाधनाका प्रेमीले साधनाले विमान परिचारिकाको नोकरी छोडेमा मात्रबिहे गर्ने कुरा गराएबाट पस्ट पार्न भएको छ । नारीहरूको कामघरधन्दा मात्र हो । घरभित्रै रहेर परिवारको भरणपोषण गर्न नारीकोकर्तव्य हो । उनीहरूले बाहिर गएर नोकरी गर्न हुँदैन भन्ने खूढीविचारलाई यस उपन्यासले राम्रो जवाफ दिएको छ ।&lt;br /&gt;
उपन्यासकी अर्की पात्रा रेनाको जीवन पनि समान छ तरअर्कातिर आजका विकृत मस्तिष्कका यवावर्गको प्रतिनिधित्व गर्दछन्‌ सघाकालोग्नेले र संझनाका लोग्नेले । सुधाका लोग्नेले आफनी पत्नीलाई व्यापारवृद्धिका लागि मात्र प्रयोग गर्छ चाहे त्यो व्यापार अवैध वा तस्करी नैकिन नहोस्‌ । त्यस्तै सझनाका लोग्नेले संझनासङ होइन, उसकाकमाइसङ बिहे गरेको हुन्छ ।&lt;br /&gt;
यस्ता प्रसङ्घबाट उपन्यासकारले सामाजिक सघारलाई प्रम मट्दाउपन्यासमा बनाएको देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
उपन्यासको प्रारम्भसडै राजनीतिक वातावरणको उल्लेख छ ।प्रजातन्त्रको पनर्बहालीपछि कर्मचारीको सरक्षाका लागि, कर्मचारीकोसुविधाका लागि आवाज उठाउने शिव खँड्का स्वयं असरक्षित छ,सविधाहीन छ । राजनीतिका नोउँमा आफनो दनो साफयाउने नेताहरूलेकर्मचारीहरूलाई उचालेर सत्तापक्षका विरोधमा उभिन लोभ्याउँछन्‌ ।प्रलोभनले तानिएका बिच्चरा कर्मचारी होहोरैमा लागेर राजनीतिक दासतामस्तिष्कमा बोम्तछन्‌ र नेताका. निर्देशनमा : होमिन्छन्‌ तर नेताहरूलेस्चार्पूर्तिपछि गेकाक काहा प्लाम्मा दोष पन्छाएर आफू निर्दोषी र अनभिज्ञहुन्छन्‌ भन्ने प्रसङ्‌ र कय खँड्काबाट प्रस्टिन्छ ।&lt;br /&gt;
यता आएर “राजनीतिक विभेदले गर्दा सत्तापक्षीय कर्मचारीमात्र सुरक्षित हुन्छन्‌, सेवासङं मेवा पनि पाउँछन्‌ तर विपक्षी दलसङसम्बद्ध कर्मचारी असुरक्षित हुन्छन्‌ भन्ने धारणा पनि परिलक्षित भैरहकोछु । राजनीतिक परिवर्तनले देशको बिकास, कर्मचारीको उन्नति र&lt;br /&gt;
नोकरीको सुरक्षा नहुँदो रहेछ भन्ने शिव खँड्काका प्रसङ्चबाट देखाएरउपन्यासकारले नेताहरूका, हाकिमहरूका र देशवासी बा नागरिकहरूकोमानसिक परिवर्तन हुनुपर्छ, साथै देशविकास, कर्मचारीको उन्तति रनोकरीको सुरक्षा गर्नै ऐन, कानुन र नियममा पनि परिवर्तन हुनपर्छ भन्नेउपैन्यासमा देखाइएको छ । राजनीतिक दासताले भरिएका मस्तिष्कबाटदेश, जनता, कर्मचारी आदि कसैको पनि भलाइको आकाइक्षा मृगतृष्णामात्र हो भन्नै करा उपन्यास पढेपछि पाठकका मस्तिष्कमा स्पष्ट हुन्छ ।&lt;br /&gt;
उपन्यासको नाउँ &amp;quot;नौकरी&amp;quot; छ । यसभ्ित्रका सबै पात्र नोकरी गर्नैनै छन्‌ तर नोकरीका परिभाषाबाट सबै अर्नभिज्ञ छन्‌ । ११ वर्षसम्मनोकरी गर्दा पनि नोकरीको परिभाषा नजानेका शिव खड्कालाई दिलेलेआफ्‌नी पत्नी राधालाई बताइदिएका कुराबाट बोध हुन्छ । खड्का खुसीहुन्छन र &#039;यरेका&#039; भनेर उफ्रेजसतै मानसिक रूपबाट उफ्रिन पुग्छ । दिलेलेभन्छ, &amp;quot;उनीहरू सरकारका नौकर, हामी घरका नोकर, दबै धरी नोकर।&amp;quot; नोकरको परिभाषा बपछिं शिव खड्का सोच्छ, “मैले ग्रति कुराजान्त पन्ध्र वर्ष नोकरी गरेर पनि सकिनँ । यसले यति सजिलोसड कसरीअर्थ्याइदियो : म सोच्थे, म त कर्मचारी हुँ, पदाधिकारी हुँ । आदेशकोमात्र पालना गर्ने म अब होइन । मेरा पदको पनि केही दायित्व छ रयसको निर्वाह गर्न चाँहिदो हक मैले प्राप्त गर्नै पर्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
शिव खड्काका सोचाइसङ परिबर्तित प्रजातान्त्रिक व्यवस्था मिल्नसक्तैन र पदोन्नति पाउनुको सट्टा क अवकाश पाउँछ । अवकाश किनपायौ : हाकिमले माथि देखाउँछ मन्त्रीतिर अनि मन्त्रीले हाकिमतिरदेखाएर आफूलाई थाहा नभएको भन्ने जनाउँछ । एक अर्काका टाउकामादोषारोपण गरेर आफू चोखो बन्न खोज्छन्‌ । आजित क अब अदालतकाशरणमा जान्छ ।&lt;br /&gt;
उपन्यासमा न्यायव्यवस्थालाई स्वतन्त्र, निर्विवाद र जनताकोआधारस्तम्भका रूपमा लिइएको छ र अन्तमा शिव खड्काले मुद्दा जितेर.पुनर्बहाली गर्छ अनि उसै दिन राजीनामा पनि गर्छ ।.&lt;br /&gt;
प्रजातन्त्रको पुनर्बहाली त भयो तर ऐन, नियम र मानसिकताउनै भएकाले प्रजातन्त्रको स्वस्थ उपभोग जनताले गर्न पाएका छैनन्‌ ।पछिल्लो व्यवस्थाका १०५ ले पाएकोभन्दा हजारौं गुना बढ्ता आस्वादन२६५ ले पाएका छन्‌, लिएका छन्‌ । सर्वसाधारणलाई हिजो बरु सरलजीवन बाँच्न सजिलो थियो, बाली जस्तै गौली पनि नियन्त्रित थियो तरआज बोली र गोली दुवैलाई उत्तिकै स्वतन्त्रता छ । त्यसैले प्रजातन्त्रकोपुनर्बहालीपछि पनि प्रजातन्त्रत्वका राजीनामा भैसकको छ शिव खड्कालेजस्तै भन्ने कुरा प्रतीकात्मक रूपबाट स्पष्ट हुन्छ । नेताहरूका अनुहार&lt;br /&gt;
मात्र फरक छन्‌ र हिजोका नेताका ठाउँमा केही नयाँ जनुहारहरूप्रतिष्ठापित छन्‌ तर बानी, बेहोरा र मानसिकतामा केही फरक छैन&lt;br /&gt;
उपन्यासले सुधारको मार्ग पनि देखाएको छ । शिव र साघनाबाब र छोरी । बाब्ले छोरीलाई सुधारको बाटो देखाउँछ ।&lt;br /&gt;
&amp;quot;सामाजिक सेवा गर्छु भनेर तम्सने हो भने जातीय &#039;र लैङ्गिकभदेभाव राख्नु हुँदैन । समाजमा पुरुषको विक्रास भएन&#039; भने नारीकोविकास असम्भव हुन्छ । आजको नारा &#039;नारी विकास&#039; लाई बदल्न पर्छ रकेवल भन्नुपर्छ &amp;quot;मानव विकास” ।&lt;br /&gt;
“आजको समाज पुरुषप्रधान छ । पुरुषमा चेतना आउन सकेमामात्र उसले थाहा पाउनसक्छ (पुरुषको अर्को रूप &#039;नारी&#039; शोषित भएकीलेनै उसले समाजमा पहिलो स्थान ओगदन सकेको हो ।”&lt;br /&gt;
जातिसुधार, नारीसुधार, देशसधार, नोकरीसधार आदि जति पनिसुधारका कुरा छन्‌, सबै मानिसका मस्तिष्कसुघधारमा भरपर्छन्‌ । मान्नबिचारमा परिवर्तन नआई सुधारको क्रागर्न भनेको आकाशको फल झार्नजस्तै हो । यस्तै कुरा उपन्यासले देखाएको छ भन्ने मलाई लाग्छ ।&lt;br /&gt;
यस उपन्यासले आज उठेका प्रश्नलाई बाटो देखाउन सहयोगगर्छ भन्ने मलाई लाग्छ । आफूना आमाबाबका प्रति छोरामा भन्दाखछोरीमा बढ्ता कर्तव्यबोध हुन्छ भन्ने कुरा छोरी साधनाका उदाहरणबाटप्रस्ट पारिएको छ र यसरी छोरीलाई अंश दिनपर्छ भन्ने “ प्रश्नको जवाफयस उपन्यासमा पाइन्छ । छोरा र छोरीमा भेद नगरी दृवैलाई सन्तानकारूपमा हेर्ने दृष्टिकोण उपन्यासमा छ । शिव खड्काले छोरो विनोद रछोरी साधना बा प्रेरणामा कुनै पृथक्ता- वा भेद गरेको छैन । छोराकोकमाइ खान हुन्छ भने छोरीका कमाइबाट पनि पालिन हुन्छ भन्ने विचारसाधनाले विमान परिचारिकाको नौकरी गरेबाट र त्यसबाट आउनेतलबबाट घर खर्च गरी घर धानेका कुराबाट स्पष्ट पारिएको छ ।सुधारका दृष्टिले उपन्यास आदर्शमय बनेको छ ।&lt;br /&gt;
उपन्यासले भाषा, साहित्य र कला समाजका परिचायक हुन्‌,सभ्यताका परिचायक हुन्‌ भन्ने पनि देखाएको छ । यी र यसौ प्रायङ्गिककुरा उपन्यासका धेरै ठाउँबाट उद्धृत गर्न सकिन्छ तर पनि यसकोगदीचाँहि हो नारीले आफनो व्यक्तित्व विकासका लागि, जोसुकैले जेसकैसंझून्‌ वा भनून्‌, नोकरी गर्नै पर्छ । नोकरी गर्नु भनेको आर्थिक दृष्टिलेसबल हुनु हो । पुरुषका हातमा -आर्थिक नियन्त्रण वा सम्पत्तिकोहालीमुहाली हुन्‌ र नारीले आर्थिक मामलामा कमजोर हुनु हो र यो नैपरुषका नियन्त्रणमा रहन हो । आर्थिक रूपले नारीहरू सबल भएमा मात्रसमानता आउँछ । नोकरी गर्दा आइपर्ने सम्भावित दोष वा अवगुणलाई&lt;br /&gt;
दृढ भएर सामना गर्नपर्छ । नारीलै अब अबला होइन, सबला बन्नुपर्छ ।नारीमा आत्मविश्वास जगाउन यस्ता उपन्यास र साधना, पेरणा, दयाजस्ता नारीहरूको आवश्यकता छ अनि शिव खड्का जस्ता परुषहरूकोपनि आवश्यकता छ ।&lt;br /&gt;
सामाजिक सुधारका कराहरूको उल्लेख नगरै मेरो लेखाइ वाबभझाइ अपुरो हुन्छ । प्रेरणाका विवाहमा समाजमा प्रचलित देखावटी खर्चगराउने प्रथा बन्द गराइएको छ । छोरी साधनाको नोकरी, राधाकोगायनबाट आर्जन, प्रेरणाका पतिले अमेरिकामा बालसेवा गरी पत्नीकाप्रसवसमयमा स्वदेश फर्की माया गर्नु, बाबुछोरी, शिव र साधना अन्त्यमासामाजिक प्रदुषण हटाई मानवएकता ल्याउने अभियानमा लाग्ने कुराकोप्रसङ्ग ल्याई सुधारका कुरा निकालेर उपन्यासलाई पठनीय र सुधारयोग्यसमाज बनाउने प्रयास स्तृत्य छ ।&lt;br /&gt;
उपन्यासको बैचारिक पक्ष आदर्शमा अडेको छ । समस्याकोसिर्जना गरी निराकरणको बाटो पनि देखाएर उपन्यासलाई जीवन्त बनाउनैउपन्यासेकारको प्रयास सराहरीय छ । देउकीको विवाह गराएर घरबसाउनेप्रयास, ब्राबाको सबैलाई माया र स्नेह बाँडी सेवा गर्ने प्रवृत्ति आदिआदर्शका उदाहरण हुन्‌ ।&lt;br /&gt;
आफना अन्य उपन्यासमा जस्तै यस उपन्यासमा पनि उपन्यासलाईजीवनको प्रतिछाया मान्ने उपन्यासकार गीताकेशरीले परम्परागत सामाजिकमान्यता र मूल्यलाई बद्लिदो परिप्रेक्षमा हेरी नवीन सन्देश दिने प्रयासगर्नभएको छ ।&lt;br /&gt;
नारीचेतना र आधनिक बिचारको सङ्गम शिक्षा, सुखी दाम्पत्यजीवन भन्न कट्टरपन्थी विचारको विरोध र सामाजिक र कानुनी नियममापरिवर्तन गर्न मानसिक्न परिवर्तन हुनुपर्ने कुरा यसका प्रमुख मृद्दा हुन्‌ ।&lt;br /&gt;
यसरी सुधार र आदर्शका नयाँ विचार दिनै उपन्यासकारगीताकेशरीबाट भविष्यमा अझ रोचक, यगान्तकारी उपन्यासहरूको अपेक्षासमाजले गरेको छ र उहाँको कलम अझ प॒खर बन्दै तिरन्तर अग्रगामीहोस्‌ भन्ने कामना गर्न समीचीन नै होला ।&lt;br /&gt;
घटस्थापना २०५४ डा. गणेश भण्डारी“भृकुटीकुन्ज&amp;quot;&lt;br /&gt;
१०५ धर्मभक्तमार्ग,&lt;br /&gt;
विराटनगर - २&lt;br /&gt;
पाठक साथीहरूतपाईंहरू पनि जागिरै हुनुहुन्छ भने आफनो मट छामेर&lt;br /&gt;
भन्त होस्‌ कही कतै चाट लागको छ कि ! व्यवहारघाट, व्यवस्वाबाटसहुलियतबाट यतबाट या हाकिमका तजबिजबाट अधघबा आफना मातहतकाजागिरदारहरूबाट ।&lt;br /&gt;
यो उपन्यास &#039;नोकरी&#039; ले समस्त जागिरदारहरूलाइ लक्ष्य गरेतापनियसको मुख्य माध्यम मध्यमर्वागेंय जागिरदारहरूई नै बनाएकी छु रक आफना हाकिम र मातहतका व्ययक्तिहरूबाट कस्ता स्थितिमा परेकोछ त्यो नै देखाएकी छु । घर, समाज, कार्यालय र राजनीतिका सेरोफेरोभित्र व्यक्तिको व्यक्तित्व कसरी बन्दै गएको हुन्छ, कस्तो अधिकार रदायित्व यी क्षेत्रमा उसको रहेको हुन्छ भन्ने तथ्य देखाउनका साथै हालकार्यालयहरूमा हुनसक्ने स्थितिको समेत जानेबुझेसम्म वर्णन गरेकी छु ।&lt;br /&gt;
नोकरीका विशेषणलाई यथावत्‌ राखेर पूर्ण अख्तियारको भारसमालेर कार्य संचालन गर्न सक्ने, निर्भीक र कर्मठ व्यक्ति समयको मागअनुसार यर्गौ पुरानो नियम कानुनमा थपघट गरि बनाउनु पर्नेआवश्यकतालाई औंल्याएर &#039;नोकर&#039; बाट मुक्त गराई विश्वासी कर्मचारीबनाउनु पर्ने प्रजातन्त्रको आवश्यकता हो अन्नेतर्फ ध्यान आकृष्ट गर्नकासाथै न्याय जीवित राख्न भ्रष्ट र कुनीतिज्ञहरूलाई सजाय दिन चुक्न नहुनेउद्देश्य राखी बिनाकारण जागिरदारहरूलाई पदमुक्त गरी देशको प्रशासनिकव्यवस्थालाई हास्यास्पद बनाई जागिरदारहरूको मनोबल होच्याउनेतर्फलाग्नाले देशका प्रगतिमा नै सुस्त गति देखापर्न सक्छ भन्ने पनिदर्शाएकी छु ।&lt;br /&gt;
लेख्तालेख्तै के कसो लेखिन प॒गेको छ यो पाठकहरूकै जिम्मामाछ । मेरो लागि तपाईहरूको समालोचना आलोचना सबै ग्रहणीय हुनेछ ।तथ्य राय सुभावबाट अबश्य पनि उम्किन पाउदिन होला भन्नै ठानैकीछु । मैले उपन्यास लेख्ने प्रेरणा पाठकहरूबाटै पाएको हु र एक पछिअर्को पुस्तक लेख्ने श्रेय यहाँहरूमा अर्पण गर्न चाहन्छु&lt;br /&gt;
अन्त्यमा यस उपन्यासको प्रकाशन गरिदिएकोमा वाणी प्रकाशनकासंचालकवर्गमा हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापन गर्दछु र यसको पाण्डुलिपि हेरीभुमिका लेखिदिने समालोचक डा. गणेश अण्डारीलाई पनि हार्दिक धन्यवाददिन्छु ।&lt;br /&gt;
गीताकेशरीविशालनगर, काठमाडौं ।टेलिफोन नं ४३२१२०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==नोकरी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आइतबार, हप्ताको पहलो दिन, शिव खँड्दका पन्ध दिनपछि आजअफिस जदिँ छु । कामको ज्यादै बोझले गर्दा तनाउ बढ्न गएकालेउसलाई गौरीले बलजफत गरेर नै छुट्टी लिनलगाएकी थिई तर स्वभावलेलाचार शिवले कुनै दिन पनि अफिसका कामकाजहरूलाई बिर्सत सकेन ।&lt;br /&gt;
आज उसले झन्‌ ज्यादा ती कामहरू संझदैछ र कुनलाईप्राथमिकता दिएर सिध्याउन पर्ला भनैर ती थन्किएका संभावितकामहरूलाई केलाउन थाल्दै छ मनमनै । छान्दाछान्दै सबै उत्तिकै जरुरीभइसकेका पाएर त्यति लामो छुट्टी लिन कर लगाउने गौरीसंग पनि बिछडदैझौकिन्छु र अठोट गर्दछ राति अबेरसम्म बसैर भए पनि दुई चारदिनमा सबै काम समाप्त पारेर नै छोड्छ । त्यस वेला पनि किन अबेरआउनु भयो ? भन्न लागी भने अनि मैले जबाफ दिन जानेको छु भनेरमनैभित्र गौरीप्रति उठेका रिसलाई थैचारेर सन्तुष्टि लिन्छ ।&lt;br /&gt;
उसका अफिसको व्यवस्था भिन्दै प्रकारको भएकोले पनि उसलाईधेरै चिन्ता लागेको हो । त्यहाँ जो जसले छुट्टी लिए पत्ति कार्यालयमाफर्केपछि थप्रिएका कामहरू आफैँले सिध्याउन पर्छ । त्यसमाथि पनिसबैको विश्वासी सबैले एचाएकाले माथिका हाकिमदेखि मुनिकासहयोगीहरूले संमैत काम उसलाई पन्छाउने भएकाले उसका टेबलमाफाइलहरूको थुप्रो कहिल्यै छ्लुटतैन थियो । उसको -स्वभाव पनि त्यस्तै छकसैलाई “नाईँ, सक्तिनँ” अन्त नसक्ने । उसलाई कुनै मित्रले किन यसरीसबैको काम जिम्मा लिन खोज्छौ, काम बिग्रे दोष तिमीलाई आउँछ, राम्रोभए जसजति अरुमा जान्छ, भन्दा क भन्ने गर्थ्यो, &amp;quot;काम गर्नु भनेकोयस्तो कुरा हो, यसले नै हामीलाई अनभवी बनाउँछ र अनुभवी हर्नसफल हुनु पति हो । त्यसैले जस उनैले लिए पनि अनभव मेरो तखोस्न सक्तैनन्‌ । मसँग तिनीहरू जसले काम पन्छाउने गरेका छन्‌ तीअनुगृहीत त हुन्छन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
यसरी आफ्नो उपस्थिति अफिसका लागि जहरी बनाएर बसेकाव्यक्तिलाई जब गौरीले एक दिन भनी, &amp;quot;कसैको पनि कतै खाँचो धेरै दिनटिक्न सक्तैन । परिस्थितिले त्यसलाई मिलाउँदै गएको हुन्छ । तपाईं मात्रएक यस्तो हुनुहुन्छ जसले आफू नभएमा सबै डुब्छ भनेजस्तो गरी छोपौहिँड्नुहुन्छु । यो सोचाइ तपाईको भ्रम मात्र हो, अफिसको आवश्यकताहोइन”, भन्दा क कति रिप्ाएको थियो भने त्यस दिन क घरमा खाना&lt;br /&gt;
१&lt;br /&gt;
खान पनि आएन र कसैसग बोल्दा पनि बोलेन ; त्यस बेलादेखि गौरीलेउसलाई जुन वेला अफिसबाट घर फर्के पनि केही भन्दिनथीई । सोच्थी,&amp;quot;उसलाई अफिसका बारेमा केही भन्न व्यर्थ छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
मस्तिप्कमा विभिन्न कुरा खेलाउँदै शिव ठेक समयमा अफिसपुग्छ । उसलाई कामको चिन्ता लागै पनि आफिसका प्राङ्गणमा पुगेपछिखुसी लाग्छ । दश बज्ने बेला भएकाले कर्मचारीहरू चारैतिर छरिएकादेखिन्छन्‌ । कोही हस्याङ फस्याङ गर्दै आफनो कार्य कक्षतर्फ लाग्दै छन्‌अने कोही सूचना पाटीमा टौसेको खबर पढ्न झुम्मिदै छन्‌ । पदोन्ततिकोयोग्यताक्रमको स्‌ची निकाल्ने करा चलेको क संझन्छ र अड्कल पनिगर्छ, सके त्यो त्यही नै होला । उसलाई त्यहाँ त्यसरी यष्रिएर त्यो खवरपढ्न जिज्ञासु भएकाहरूलाई देख्ता भित्रभित्रै हाँस उद्छ र एक व्यक्तिसँगसोध्छ पनि, &amp;quot;ककसको नाम निस्किएछ : तपाईंको छ कि छैन ?&amp;quot; त्यसव्यक्तिले उसका प्रश्नलाई अनसुनी गर्दै यसै पन्छिन्छ । त्यस व्यक्तिकात्यस व्यवहारले उसको मन खल्लो हुन्छ र आफै त्यहाँ गएर हेर्नतम्सिन्छ । यत्तिकैमा अर्का एकले उसलाई देखाउँदै, “क माडसाहेव पनिआइपुग्नभएछ,&amp;quot; भनेको सुन्छ । शिवले प॒लुक्क उसको अनुहार हेर्दाखिस्रिक्क परेको देखेर उससँग केही सोध्दैन । संझन्छ, सायद उसको नामत्यस सूचिमा परेनछ क्यारे &#039; यस्तो पति कसरी हुनसक्छ ? उसको नामत आउनै पर्ने थियो ज्ञ काम पनि राम्रो गर्ने हो, नोकरीका वर्षले पनिपुरानो कर्मचारी नै हो, फेरि के भएछ ?” शिवलाई त्यो सूचना पढ्नअरु उत्साही गराउँछ र का अगाडि सर्छ । हाकिम नै त्यहाँ आएकोदेखेर अरु कर्मचारीहरूले उसलाई बाटो छोडिदिन्छन्‌ र क त्यो पढ्नथाल्छ ।&lt;br /&gt;
सुचनाको व्यहोरा पढ्दैमा क सननन्त हुन्छ र त्यहाँ उल्लिखितनामहरू ध्यान दिएर पढ्न थाल्छ । अन्त्यमा आफनै नाम पढेपछि कखड्गै हुन्छ । विश्वास लाग्दैन र दोहोन्याएर पढ्छ “त्यहाँ प्रष्टसँग अंङ्कितथियो शिव खँडकाको नाम ।&amp;quot; क लाजले त्यहाँ भेला भएका कसैको पनिअनुहार हेर्न सक्तैन र त्यहाँबाट फुत्केर कार्यालय बाहिर निस्कन्छ ।मनमा प्रश्न प्रतिप्श्नको आँधी चल्न थाल्छ र सोच्छ, “एक फेर तीहाकिमहरूसँग भेटेर सोध्नै पर्छ, “मेरो निष्काशन गरिनाको कारण के हो? कुन आधार अपनाउनु भयो ? कै यही हो तपाईहरूको विश्वासी भएरकाम गरेबापत मैले पाएको इनाम ! यस्तै हो भने यहाँ न्याय जीवितरहन सक्तैन ?&amp;quot; न&lt;br /&gt;
क त्यसरी ठिङ्ग उभिएर सोचिरहेकै बेलामा अर्को झजस्तै पीडितआइपुग्छ । दुवैले खिस्स हाँसेर आ।आफना वेदना पोख्छन्‌ र शिवले&lt;br /&gt;
र्‌&lt;br /&gt;
सोध्छ, &amp;quot;के हो यस्तो ? कुनै तक पाउन सम्नभयो :&amp;quot; उसले पनि खिन्नहुँदै जवाफ दिन्छ, “भन्छन्‌, पजनी हुँदा घस्नै हुन्छ रे ? अहिले मात्रहोइन, २०१५ सालमा पनि यस्तै भएको थियो रै : जनसकै व्यवस्थामापनि मार खाने हामी जागिरे नै हुन्छौं । राणाशासनदेखि आजसम्म पनियो प्रधा जान नसकेकाले डर लाग्छ, कहीं यो हामो परम्परा नै बन्ननजाओस्‌ । यस्तै हो भने हामी बलियो कहिले हुने खै : भन्‌ यो तप्रशासन व्यवस्था नै परिवर्तन भएका वेलामा भएको छ । कसलै विचारगर्ने, दोषी कोहो अनेर, व्यवस्था कि कर्मचारी ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
यति भनेर क एक छिन चप लाग्छ र चारैतिर हेर्दै असजिलोमानेर भन्छ, &amp;quot;हिँडनोस्‌ जाऔं । कै उाभएर ढोकाबाहिर बसिरहने : यौएउटा मात्र ठाउँ छ र जागिर खानलाई : आफूनौ इलम छ भने जहाँपनि यत्तिको नोकरी पाउन सकिन्छ ।&amp;quot; यस्तो भन्दै त्यस साथीले शिवलाई .लिएर अफिसका प्राङ्गणबाट नै टाडा हुन चाहे पनि क भन्न छोड्दैन“होइन, एकफेर त्यस मुख्य हाकिमसँग यसरी अकस्मात्‌ निष्काशितगराउनाको कारण नसोधेर कपरी जानै &#039; यो त हामीले बझनै पर्छ ।हिड्नोस्‌ बर हामी दुवै जाऔं र सोधौं । कूनै अर्थ त जरुर होलानि?”&lt;br /&gt;
शिवको प्रस्ताव सुनेर त्यो साथी हितक, कुन र भन्छ, “त्यसोभए तपाईं नै अनर्थमा अर्थ खोजेर बस्नौस्‌ र अनर्ष भोग्नोस्‌ , मत हिडे” भन्दै फतफताउँदै आफनो बाटो लाग्छ ।&lt;br /&gt;
शिवलाई साथीका कुराले कुनै असर पार्दैन र क भेट गर्नेनिश्चय गर्दै फेरि अफिसतर्फ फर्कन्छ । हाकिम साहव निकै व्यस्त भैकालेकेही बेर कुरेपछि मात्र भेट पाउँछ । वादविवाद निकै हुन्छ । चर्को स्वरदुवैको सुनिन्छ । केही बेरसम्म भनाभन भएपछि शिव खँड्का हाकिमकाकक्षबाट निस्केर यताउति कतै नहेरी सरासर घरतर्फ लाग्छ ।&lt;br /&gt;
नोकरी. गएको सङ.कोचले भन्दा हाकिमसँगका कुराकानीले कआकोशित भई लिभरित हुततरको नगएको छ । उसलाई लागिरहेछ कहाँ गएर केविध्वंस पारी तिनका प्रत्यत्तर दिऔं ।&lt;br /&gt;
यस्तो भरङ्ग मनस्थिति लिएर घरमा पुग्दा त्यहाँ उसलाई सान्त्वनादिने कोही: पाउंदैन । त्यस रित्ता घरले झन्‌ मनलाई चिढाउँछ । गौरीपनि नोकरी गर्थी र क पनि आजै पन्ध दिनको ब्रिदापछि अफिस गएकीछे । शिव कोठामा पस्नासाथ लगै नफुकालेर बिछ्य्याउनमा आफूलाईहुत्याउँछ र हात पछाडि लगी शिर अड्याउँदै रित्तो भित्तालाई . एकनाससँगहेर्दै मनलाई एकत्रित पार्न खोज्छ तर, कसरी शान्त हुनसक्छ त्यो मन ?&lt;br /&gt;
३&lt;br /&gt;
एकोहोरोसँग उही प्रश्न दौहोरिइरहन्छ, “किन मलाई निष्काशित गरे &#039;मैले के गरेँ त्यस्तो : त्यस हाकिमले किन कुरा खोल्दैन !&amp;quot;&lt;br /&gt;
अनुत्तरित प्रश्नले गर्दा क झन्‌ अशान्त हुँदै जान्छ र जुरुक्कउठेर तवला बजाउन थाल्छ जोडजोडले । टाउको तालकासाथमा नाच्नथाल्छ र क आँखा चिम्लेर बजाइरहन्छ ........, बजाइरहन्छ ।. औँलाहरूठोकिइरहन्छन्‌ । ती दुई तवलाले उसको आकोशको वेग म्रामेरपड्किरहन्छन्‌, सुनाइरहन्छन्‌, शिवका मनभित्र अन्धाधुन्धले चलेकोआँधी ।&lt;br /&gt;
राधा त्यस घरकी नोकर्नी । मालिकले दिउँसै अफिस छोडेर आईत्यसरी तबला बजाएको देखेर डराउँछ । लाग्थ्यो, त्यहाँ आकाशगडगडाएर बर्षा हुन लाग्दै छ । क आत्तिदै घर बाहिर निस्कन्छे रकता जा भएर चारैतिर आँखा घुमाएर हेर्न थाल्छे । दिलबहादुरलेभरखरै बिवाह गरेर पहाडबाट शहर ल्याइएकी त्यस राधालाई न तमालिकको स्वभावको राम्रो ज्ञान हुनपाएको छ, न त शहरिया वातावरणकै। उ निक्कै हडबडाई के गर भएर छटपटाइरहेका बेला टाढाबाट गौरीआइरहेकी देख्छे । ज्यानमा केही शक्ति अनुभव गर्दै मालिकनीलाईपर्खिन्छे ।&lt;br /&gt;
द्रभाष भनुँ या अरू केही, त्यस दिन गौरीलाई अफिसमा बस्नपटक्कै मन नलागेर कुनै आपत्‌ आउन लागेको जस्तो संगत भइरहेकाले,यंस्तो मनस्थिति लिएर अफिसमा बसिरहँदा के हुन्छ, के भनी, आधादिनको छुट्टी लिएर घर फर्केकी थिई । नभन्दै घरका ढोकामा आइपुग्दाराधालाई त्यस स्थितिमा देखेर सोध्छे &amp;quot;किन यसरी आत्तिएर बाहिरआएकी ? कि कतै जान लागेकी हो ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
गौरीलाई देखेर राधाले लामो सास तानेर ढुक्क हुँदै भन्छे“बल्ल तपाईं खु छ नु भयो । म त कहाँ जाउँ, कता लाग भएर बाहिरनिस्केकी । &amp;quot;यी दुई बीच कुरा चल्दा पनि तवलाको आवाज तुनिइरहन्छ। गौरी राधाको कुरा सुनेर विचलित हुँदै फेरि सोध्छ, “किन घरमा केभयो र बाहिर आएकी ! त्यो तबला बजाउने को नि ! कि दिलेले:पनि तवला किनेर ल्यायो ?”&lt;br /&gt;
“छैन उसले के किन्थ्यौ ः त्यो बजाउनै त साहब हो । अघि नैघर फर्किसक्न्‌ भयो ।” यति भनेर क चुप लाग्छै । गौरीले राधालाईघरभित्र हिंड्द भनेर साधमा लिएर जान्छै र उसलाई चिया ल्याउन अह्वाएरआफू कोठामा पस्छै । शिवले एक सुरले तवला बजाइरहेको देखेर सोध्छै&amp;quot;के सुर चल्यौ यस्ता ? आफिसै छोडेर आई यसरी एकलै तबलाबजाउनवाल्तु भएको ! कि सन्चो भएन ? अनुहार पनि अँध्यारो छ&amp;quot;&lt;br /&gt;
॥ 0&lt;br /&gt;
शिवले गौरीका प्रश्नको जवाफ नै नदिएर बजाउँदैको तवलालाई घचेटेरपन्छाइदिन्छ । एउटा तबला झयालमा ठोक्किएर फुट्छ पनि ।&lt;br /&gt;
तबला त्यसरी फुटेको देखेर गौरीले भनी, “केको रिस यसतबलामाथि घोप्टाइदिन्‌ भएको ! यो फुटेर नाश कसको भयो ! हेर,यहाँ पट्ट भएछ ।&amp;quot; तबला उठाएर हेर्दै भन्छे ।&lt;br /&gt;
शिवले पलवक गौरीलाई हेर्छ र भन्छ &amp;quot;यो तवला फुटेको जस्तोगरी म सबैलाई छयालव्याल पारिदिन्छु । मलाई यिनले चिनेकै छैनन्‌ ।&lt;br /&gt;
कसलाई त्यसो भन्नभएको ? मैले यसो भने भनेर रिसाउनभएको ? लौ हुन्छ, तपाईंलाई जे गरेर तपाईंको रिस शान्त हुन्छ त्यहीगर्नोस्‌ ।&amp;quot; गौरीलाई थाहा छ शिवले उसँग रिसाएर भनेको होइन तरकुरा ,फुत्काउन मात्र त्यपा भनेका हो । &amp;quot;छोड यी क्रा, अनि भन, तिमीकसरी आज चाँडै आयौ ? कि कसैले खबर गन्यो ? -शिव सशङ्डितहुन्छ ।॥ &amp;quot;क्रस्तो खबर : अहँ मलाई कसैले केही भनेको छैन, अलिसन्चो नहोला जस्तो भएर बेचैन भएकीले मात्र आएकी हुँ अनि तपाईं नि; अफिसमा थप्रै काम छ, तिमीले गर्दा बिनसित्ति बिदा लिन पन्यो भनीकराउने तपाईँ अहिले आफैँ अफिस छोडेर आउनु भएछ । यसपटक तमैले छिट्टै घर आउनुहोस्‌ भनेकी थिइनँ । दोप मलाई लगाउन पाउनहुन्न है :&amp;quot; खुसी पार्न जिस्काउँदै गौरीले कुरो उठाउँछै । उसलेअनमान गरेकी छ, शिव आज कक्ससँग अफिसमा रिसाएर आएको छ ।त्यसैले क शिबको ध्यान अर्कैतर्फ खिच्न र रिसजति आफूमै खनाइदिएरभए पनि शान्त होस्‌ भनेर ठट्टाका भाकामा कुरा गर्छै ।&lt;br /&gt;
ठट्टा गर्नपर्ने त शिवको पनि बानी नभएको होइन । यी दईदम्पतिमा यस्तै भाकामा संवाद चलिरहन्थ्यो । त्यसैले गौरीले यस्तो प्रश्नगरेका थिई, तर आज उसको मनस्थिति अर्कै भएकाले जवाफ दिने तरिकापनि फरक हुन्छ । सोध्छ, &amp;quot;तिमीलाई कारण जान्त पत्यो होइन &#039;सन्छयौ, म किन घर फर्के &#039;क आकोशित हुन्छ । गौरी डराउँछै ।राधाले चिया ल्याइपन्याउंछे र टेबलमाथि राखेर जान्छे । एक छिन कोहीकेही नबौलेर चिया समाउँछन्‌ । गौरीले पुलक्क शिवको अनुहार हेर्छ ।शिव केही शान्त भए पनि ठूलो स्वरमा नै त्यस स्थगित प्रश्नको जवाफयसरी दिन्छ, &amp;quot;तिम्रा लोग्नेलाई नालायक भएकाले आजदेखि नोकरीबाटनिकालिदिए, थाहा पायौ त तिमीले ः फेरि सोधौली । त्यसो भए योग्यजागिरदार कस्तो हनपर्छ भनेर ? म त्यसको जवाफ दिन सक्तिनँ । कतिमात्र म भन्नसक्छु भने म उनीहरूले लगाउने जागिरदारको परिभाषामापर्न नसकेको रहेछु । तर म यत्तिकैमा कहाँ छोड्छु र : उनीहरूको&lt;br /&gt;
शर&lt;br /&gt;
परिभाषा मात्र होइन, मेरौ आफनै परिभाषा तिनीहरूलाई सिकाइदिन्छु ।प्रजातान्त्रिक व्यवस्थामा जागिरदारहरूलाई कुन स्थानमा राखेर कामगराउन पर्छ र उनीहरूको अधिकार. र दायित्व के कस्ता हुन्छन्‌ भन्नेकुरा माथिदेखि तलसम्मका जागिरदारहरूले बझन सकेनन्‌ भने यसव्यवस्थाले नकारात्मक रूप लिन्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“भो छोडिदिनोस्‌ । कति चिन्ता तपाईं मात्र लिनुहुन्छ ः देशबनाउँछौं, हामी नेता हौं, भन्नेहरूलाई पनि राम्ररी चिनिसक्नभएको छ ।आफनो इलम र इमान भएसम्म यस्ता नौकरी जहाँ पनि पाइन्छन्‌ । बहयिनीहरूलाई नै इमान्दार कर्मचारी पाउन गाह्रो हुन्छ ! &amp;quot;मनभित्र त्योखबर सुनेर आफू दृःखी भए पनि शिवलाई सान्त्वना दिन गौरीले यसरीसंझाउँछै ।&lt;br /&gt;
शिव धेरै थाकिसकेका हुन्छ । उसको मन अशान्त भएको रआफनो प्रा शक्ति लगाएर घण्टौसम्म तबला पिटेकाले क शिथिलभइसकेको प्रस्ट देखिन्छ । गौरीका आँखा टेबुलमा फयाँकिएका चिठीमापर्छु र त्यो झिकेर पढ्दै भन्छे, &amp;quot;यस्तो पनि कही हुन्छ ? कारण योभनेर बताउन पनि त सक्नुपर्छ ! खै त्यो दिनसकैको ः जे मन लाग्योत्यही गर्ने हो भने हामीले व्यवस्था परिवर्तन गराएर के पायौं : उस्तैगरी शासित हुँदै जानपर्छ भने, व्यर्थ छ प्रजातन्त्रको नारा लगाउनु ।व्यर्थ छ हामी स्वतन्त्र भयौं भन्नू । &amp;quot;क दिक्क हुन्छे ।&lt;br /&gt;
गौरीका यस्ता कुरा सुनेपछि बल्ल शिवका अधरमा - मुस्कानआउँछ मानौं त्यस मुस्कुराहटले उसका प्रश्नको समर्थन गर्दै भनिरहेछ,&amp;quot;मैले खोजेका पनि त तिनै हुन्‌ । कसले दिन सक्छ तिम्रा हाम्रा प्रश्नकोजवाफ र बेकार छन्‌ तिम्रा प्रश्नहरू बेकार छन्‌ तिम्रा जिज्ञासा ।&lt;br /&gt;
जज&lt;br /&gt;
“नोकर भने भनेर किन पिरोलिन्छैस्‌ : हेरिल्याउने हो भनेतिनीहरू पनि हामीजस्तै नोकर हुन्‌ । नोकरी नगरेर यहाँ कसको जीविकाचलेको छ &#039; सरकारका हुन्‌ या दुनियाँदारका, हुन्‌ त नोकर नै &#039; जाभनेपछि जानुपर्ने र बस भनेसम्म झुकेर बस्नुपर्ने । अहिले साहेबले कसरीबलुपरेको छ ? &amp;quot;&lt;br /&gt;
“त्यसो भनेर कहँ हुन्छ ? हामी नोकरको पनि नोकर भएनौंर ? त्यति पनि बझन नसक्ने ठानी फकाउन थाल्नुभएको होला, हेर्नोस्‌मत ..... / पहाडकी केटी हेप्नलाई कति सजिलो भनेर नछकाउनुहोस्‌। फेरि म माइत गएर आउँदै आउन्नँ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
ती दुईका गन्धन शिवका कानमा टड्कारै पर्छ । उसलाई योनिकै घत लाग्छ र सुतेकी स्वास्नीलाई घच्घच्याउँदै सोध्छ, &amp;quot;ए गौरी, एगौरी, दिलेको कुरा सुन्यौ ः कि निदाइसम्यौ !&lt;br /&gt;
“के गरी सत्नसक्न माहुरी भनभनाएजतिकै गुन्‌ गुन गन गनचल्दै छ । कुरा पनि कति -आएको ? त्यो राधा कम्ताकी कहाँ छेर ;कस्ताकी छोरी गाउँबाट टिपेर ल्याएको हो, आफूलाई मै हुँ भन्ने ठान्छे ।सानो कुरा पूर्नु हुन्न, उसलाई पुगिहाल्छ । के भएको थियो, त्यतिनोकर्नी भन्दैमा ? म त्यसलाई नन्द भनेर पनि त मान्न सक्तिनँ नि ?बिमलाले त्यसलाई देखेर “नन्द” हो भनेर सोधेकी थिई, मैले होइननोकरी हो के भनिदिएकी थिएँ, कालो मुख लगाएर फनक्क फर्केकी त्योफेरि मैँथि उम्लिदै उक्लिन । भाडाँ पनि मलाई नै मजाई र आफूअरिङ्गालले टोकेको जस्तो मुख पारेर बसेकी बस्वै थिई । अहिले त्यहीकुरा बुट्टा भरेर लोग्नेलाई सुनाउन थालेकी छे ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“तिमीलाई पनि नोकर्नी भनेर किन भन्नपरेको नि : सहचरीभनेकी भए पनि त हुन्थ्यो । सुन्दा पनि मीठो, कसैको दिल पनिनदुख्ने । काठमाडौंमा कै के न कामे गरेर बसेको छु भनेर बिवाह गरेरल्याएको होला दिलेले, यहाँ नोकर्नी भन्दा छाना बाट खसेकी जस्तो हुनेनै भई नि । यस्तो मानसिक धक्का परेपछि सबैलाई त्यस्तै हुन्छ ।यसमा अलिकति गल्ती तिम्रो पनि भएको रहेछ । हेर्दा यिनीहरूजस्तासुकै देखिए पनि बुद्धि नभएका हुँदैनन्‌ । सुनिनौ तिमीले, त्यस दिलेलेकस्तो मार्मिक कुरा बोल्यो । ।अलि गंभीर भएर ) साँच्चै हामी नोकरै त&lt;br /&gt;
छ&lt;br /&gt;
हौं नि, सरकारी कर्मचारी कहाँ हुनपगेका रहेछौं र ? आदेशअनुसारअह्याएपराएको काम गर्नपने, आफना भनाइको सुनाइ नहुने,, आफनोसोचाइ अनुसार काम गर्न नपाइने । हाम्रो पनि घरको नोकर भन्दा अर्कैअस्तित्व के भयो र हामी नोकर होइनौं भनौं ? ठिक भनिस्‌ दिलेतैले ?&lt;br /&gt;
“त्यस्ताका कुराको समर्थन गर्दै तपाईं आफूलाई नोकर मान्नुहुन्छभने मलाई केही भन्न छैन । उसका आँखाले त सबैलाई आफूजस्तै नोकौदेख्छ । छि ....... यिनीहरूको यो गनभ्न पनि कतिबेरसम्म चल्नै हा ।यिनका लागि एउटा खुट्टै घर वनाइदिऔं भने पनि सकिने भइएन !”&lt;br /&gt;
यति भन्दै आफू कोल्टै फर्किएका र सत्नै कोसिश गर्छे रशिवलाई पति रात छिप्पिइसकेको सङ्घत दिदै सुत्ने अनुरोध गर्छैशिवलाई पटक्कै निद्रा लाग्दैन, उसका मस्तिष्कमा दिलबहाद्रले भनेको“सरकारी नौकर&amp;quot; भन्ने शब्दले हावा खौदै तहल्का मचाइरहन्छएकनाससंग ।&lt;br /&gt;
क सोच्छ, मैले यति कुरा जान्न पन्धवर्ष नोकरी गरेर पनिसकिनँ, यसले यति सजिलोसंग कसरी अर्थ्याइदियो ) म सोच्थे, म तकर्मचारी हुँ । आदेशको मात्र पालना गर्ने म अब हैन । मेरा पदकोपनि केही दायित्व छ र यत्तको निर्वाह गर्न चाहिदो हक मैले प्राप्त गर्नैपर्छु । यही सोचाइ लिएर म वादविवादमा आफूलाई पार्दै गएँ र आफनाआत्माले ठहस्याएको काम मात्र गर्नथाले । प्रजातन्त्रको पन;ःस्थापना भयोभनेर जब आम जनताले खुसियाली मच्चाको सुने जब नेताहरूले मन्त्रीकोपद समालेर प्रजातान्त्रिक राज्य घोषणा गरी शासन सञ्चालन गर्न याले,म मूर्खले पनि प्रजातान्त्रिक देशको स्वतन्त्र नागरिक मानेर आफूलेनोकरको कौचली फेरेको संझन थालेँ । कत्रो भूल गरेको रहेल्नु ।&lt;br /&gt;
अविश्वासलै भरिएका नियम कानुन तानाशाही शासनपढ्धति रहँदाजागिरदारलाई नोकरको हैसियतले मात्र प्रयोग गरी नियन्त्रगका साथ राज्यसञ्चालन गर्ने गरिन्थ्यो, तिनै नियम कानुनको अझैँ पालना गर्दै त्यसैलेतोकेका परिधिभित्र रहेर प्रशासन चलाउनु पर्ने हामीले आफूलाई कर्मचारीया पदाधिकारी भनेर मान्नु सरासर झूटो हो ? यतातिर प्रजातन्त्रकोनारा, उतातिर परानै प्रशासनिक कानुन व्यवस्था, यसले त जालीफटाहालाई बदला लिने मौका मात्र पदान गर्ने रहेछ । तसर्थ जबसम्मतन्त्र सहाउँदो व्यवस्था र व्यवस्था चलाउन सापेक्ष नियम कानुन बन्दैनन्‌एक घोषणाले मात्र सत्ता परिवर्तन भइसक्यो भन्ने ठानेर आफूलाई स्वतन्त्रछु भन्त नसृहाउँदो रहेछ । पार्टीका नेताहरू मन्त्रीका पदमा आसीन हुनसविधान निस्कनु देशव्यापी चुनाव हुन्‌ र संसदको स्थापना हुनुले मात्र&lt;br /&gt;
द्र&lt;br /&gt;
प्रजातान्त्रिक शासन जलाउनलाई कहाँ पर्याप्त हँदो रहेछ र ! लुँडोखेलका गोटीहरू दाउ पर्दा सर्केर माथि पुग्ने र सर्पका मुखमा पुग्दापुच्छरबाट निस्कनु पर्ने जस्तो, हाम्रा हाकिमहरू भएको देख्तादेछौ पनिमलाई बद्धि आएन र भन्दै गएँ &amp;quot;हिजोका दिन बितिसके । स्वतन्त्र भएकाहरेक हामीमाथि अब देशको भलाइको जिम्मेदारी आएको छ । यो तन्त्रहाम्रो आफनै हो । यस्ता धारणा लिएर म जहाँ, जसको तरटि देख्येँ,प्वाक्कै भनिदिन्थेँ र सुधार गर्न सकेजति गर्थे पनि । आफू खुलेर पबैसंगव्यवहार गर्थे र भन्थे &amp;quot;प्रजातन्त्रमा पारदर्शी पनि हुनुपर्छ । &amp;quot;त्यसैलेआफूलाई शङ्का लागेको कुनै पनि काम खोतलेर त्यसको निचोडनिकाल्न छोडिनँ ।&lt;br /&gt;
मैले उठाएका यी चालहरू धेरैलाई असहनीय भएका रहेछन्‌ रमलाई यस निष्कर्षमा ल्याएर पछारी दिए । म छक्किएँ । मैले सोच्नसकिनँ, आवना परिवर्तनका लागि भावनात्मक क्रान्ति ल्याएर मात्र हाम्रोप्रजातन्त्रमाधिका आस्थालाई दिगो बनाउन सकिन्छ र त्यस्ता कान्तिकोआहवान भएकै छैन ! हाम्रो आन्दोलन अधरो रहेको छ ।&lt;br /&gt;
प्रजातन्त्रको खिल्ली उडाउनेहरूले भन्दैछन्‌ । &amp;quot;यिनले के परिवर्तनल्याएँ भन्छन्‌ । प्रशासन चलाउने व्यक्ति पनि उही नै छन्‌ । नियमकानुन पनि उही नै छन्‌ । आयो, आयो, फर्कियौ, फर्कायौं भन्छन्‌, केआयो, के फर्कियो : के थियो, के गयो : के छ : यी सबै विरोधाभासछन्‌ । परिवर्तत प्रष्ट देखिएको भने एउटैमा छ, संविधानका फेरोभित्रराजा सुरक्षित । &amp;quot;के यति नै हो त, हामीले आन्दोलनबाट चाहेको :शासक र जनता, जनता र शासकको मध्यस्थता कायम गर्ने चौथोनिकाय भनिएको पत्रकारिताको भूमिका आफैँमा अल्मलिएको छ । पक्ष रविपक्षको द्वन्द्व लिएर आफैँमा प्रष्ट हुन नसकेका खबरले जनता अझ धेरैभ्रममा परेका छन्‌ । यहाँ पार्टीहरूका शक्तिको होडबाजी भ्रसभसेआगौसरह सल्किरहेछ । जससँग जे सौधे पनि असन्तुष्टि नै व्यक्त गर्छन्‌। भष्टाचार र विकाससम्बन्धी तारा दिन प्रतिदिन अकाशिदै छन्‌ भनेप्रजातन्त्रको परिभाषा खुलेको छैन । देश र संस्थाको हितका लागि यस्ताविरोधाभास नियमलाई समयमा नै निर्णय लिनपर्दा उलड्घन गर्नु पन्योभने पनि आरोप आइलाग्छ ।“भ्रष्टाचारको&amp;quot; । नियमकै परिधिभित्र बाँधिएरहात चलाउँदा समय फुत्किएमा पनि दोष आइलाग्छ उही जागिरदारमाथिकाम भएन भन्ने ? हुन त यस्तै अवस्थाको सिर्जना गरी आफूना भुँडीभर्नेहरू नभएका पनि होइनन्‌ तर कर्मका आधारमा न्याय हुने चलनकिन बस्न सकेको छैन ? कि नियम कानुन समय सहाउँदा, व्यवस्थाचुहाउँदो हुनु पर्यौ कि त न्याय बलियो भई हित र अहितको विश्लेषण&lt;br /&gt;
॥।&lt;br /&gt;
गरी कर्मचारीहरूको मनोवल र आस्था बढाउने प्रकारले फँसला गर्नेहुनुपर्थ्यो । यहाँ त यस्तो भएकै छैन । हामी कुन संघारमा उभिएका&lt;br /&gt;
यस्ता करा खेलाउँदै शिव छटपटाउन थाल्छ र गौरी फुसफ्‌सफेरि निदाइसकेकी देखेर घचघच्याएर -उठाउन खोज्दै भन्छ, “ए कु १कति निदाएकी !&#039; उठ, एकछिन कृरा गरौं । &amp;quot;गौरी उठ्नलाई अल्छीगर्दैभन्छे, “सत्नसक्नु भएन : यसरी नसुतेर रात बिताउन थाल्नुभयो भनेशरीर के होला ! ज्यानजस्तो ठुलो अरु कै छ : &amp;quot;केही हुँदैन तेरोलोग्नेलाई, मैले गर्नपर्ने थप्रै काम बाँकी छन्‌ । यति छिटै कै मरिहाल्यें। &amp;quot;हो, निदाउनु स्वास्थ्यका लागि जरुरी छ, पीर नगर र कहिलेकाँहीजसले पनि थोरै तृतेमा केही फरक पर्दैन । त्यसैले आज तिमी मसँगगफ गरछर्यौ र यो रात फेरि अर्को एक सुहागरात बनाएर बिताउँछयौ ।कुरा बझयौ के ? प्रेमका कुरा नभए पनि वेदना पोखेर बिताउँला । लौउठ र मतर्फ फर्क । &amp;quot;&lt;br /&gt;
गौरी त्यसै गर्छे र मनमनै भन्छे,“यो दिलेको बुद्धि कहिले आउला? भरखर नोकरीबाट निष्काशित भएर दुखेका मनमा यसले कुनै तृकैनभएको कुरा उठाएर यत्रो चोट लगाइदियो । त्यो जस्तो नोकर पनिकहीं सरकारी नौकर हुन्छ &#039; स्वास्नीसँग आफूलाई ठूलो देखाउन हामीलाईनै खसाली दियो । अब यसले उहाँको मुटु छोइसक्यो । कति दिनरातयसरी नै छटपटाएर बिताउने हो । हामीले संझाउन थाल्यौं भने झन्‌उल्टै भन्नथाल्नु हुन्छ,&amp;quot;घरमा त मैले साँचो कुरा ठुन्न पाउँ । यससभ्यताले पनि हामीलाई के बनाउने हो ? घरलाई कूटनीतिबाट टाढाराख, नत्र साँचो थाहा पाउन नसकेर के हुन्छ के, यसका खोजमा कहाँपुग्नुपर्छ, त्यो झन्‌ ठूलो आपत्‌ हुनसक्छ ?” यस्तो बोल्न याल्नभएपछिमलाई झन्‌ डर लाग्छु । के गरूँ, सहनबाहेक मेरो अर्को उपाय 0] भएन। यति मनमा कुरा खेलाउँदै शिवलाई भन्छे, “के चिन्ताले सतायोतपाईंलाई ? सक्नुहुन्छ भने तपाईका ती सबै चिन्ता मलाई दिनोस्‌ ।तिनलाई म ठिक पारेर राखिदिन्छु । तिनको टाउको उठ्नै दिन्न ।चिन्तासंग त मेरो दस्मनी छ ।&lt;br /&gt;
“अनि तिमी म हुन्छयौ र म तिमी । मैले पनि तिमीले भनेकोजस्तै भन्न वाल्नुपर्ने हुन्छ । त्यसैले त्यो भारी काम पनि त बाँडौंभनेको ? &amp;quot;बल्ल यो वाक्य बोलेपछि शिवका चेहरामा अलिकति हाँसोकोरेखा देखापर्छ । यसले गौरीलाई हौसला दिन्छ र बिजय प्राप्त गरेकोअनुभूति लिएर संझाउने भाकामा भन्छे, “दिलेको त्यति साधारण कुरालेतपाईलाई यत्रो घत पन्यो ? अनुशासित हुँदा आफू अपमानित भइन्नँ ।&lt;br /&gt;
१०&lt;br /&gt;
व्यवस्था सञ्चालन गर्नलाई नै अनशासनको जरूरत पर्छ । तह र पदकोमर्यादा राख्नुपर्छ जसमा जिम्मेदारीको भार तोकिएको हुन्छु भनेर मलाईसंफाइ, बुझाइ गर्ने तपाईं नै आज नोकरीबारे दिलेले लगाएकोपरिभाषालाई समर्थन गरेर भन्नुहुन्छ, “यसले ठिकसंग अर्थ्यायो, हामी पनिउस्तै नोकर हौं । &amp;quot;कसरी तपाईं त्यससरहको नोकर हनभयो : यस्तोअर्थ न बर्षको कुरालाई पनि समर्थन गर्ने : वोन्दाबोल्दै गौरी एक छिनचप लाग्छे र दिक्क भएर भन्छे, “यस्ता कुरालाई लिएर महत्व दिन केबहस तपाईंसँग गर्ने ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
“अहिले पनि अनुशासनहीन हुन्‌ नै कर्मचारी या पदाधिकारी हुनुहो भन्ने म मान्दिनँ । अनुशासन नभई प्रशासन नै चलाउन सक्दैन ।फरक कति मात्र छ भने अनुशासन एक कर्म हो भने नियम एकबिर्दिष्ट लक्ष्य लिएको तीति हो । कनीतिका पालना गराउन जागिरदारमाथिअनुशासनको लगाम लगाइन्छ भने त्यो शोषण हुनजान्छ अनि त्योमहत्वहीन व्यक्ति बन्छ । अहिले संविधान आइसकेको छ । यस अन्तर्गतरहेर प्रशासनिक नियमावलीलाई पजातान्त्रिक बनाउँदै कर्मचारीमाजिम्मेवारी दिएर, विश्वास गरेर बद्लिन पर्ने आवश्यकता आइसकेको छ ।&lt;br /&gt;
भ्रष्टाचार के, कसले गरेको छ भन्ने जाँचबफझ गरी अरभियक्तलाईसजाय दिलाउनलाई नै प्रजातन्त्रमा न्यायपालिका स्वतन्त्र हुन्छ । त्यसैलेस्वतन्त्रताको परिचालन गर्न दिनका लागि कार्यको जाँच व्यक्तिगत,राजनीतिगत र पक्षका आधारमा नभई स्वतन्त्र नार्गारकको हक उचितन्याय पाउन हो भन्ने उद्देश्य राखेर हुनुपर्छ भनेको । यो अहिलेसम्मकिन, हुन नसकेको ? यो सोच्ता द:ख लाग्छ र ! गौरी त्यसैले तिमीसंगगफ गरेर भए पनि शान्त छु भनेको ।&lt;br /&gt;
“तपाईंको सोचाइ जस्तै सबैको हुनुपर्छ भन्ने के छ र ? फेरिपनि त हामीलाई थाहा छैन कही उनीहरूले तपाईंले भन्नुभएजस्तै गरीसोच विचार पुच्याएर नै आदेश दिने र पालना गर्ने गरेका छन्‌ कि !यस्ता विभिन्न अर्थ लाग्नसक्ने कुरालाइ लिएर पति तपाई गन्‌गन्‌गर्नुहुन्छ ।&lt;br /&gt;
यसरी गौरीले शिवका कुराको प्रसङ्ग बदल्न प्रयास गर्छै तर कछोड्दैन । उसलाई यसै विषयमा कुरा गरेर शान्त हुनुछ । त्यसैले भन्छएउटै मात्र अर्थ लाग्ने नियम हुनुपर्छ भन्ने त मेरो भनाइ हो । नत्रकर्मचारी नियमावलिको कम्जोरी पक्षलाई समात्तैर उच्च पदका जागिरदारलेतल्लो पदका जागिरदारलाई दु:ख दिने प्रवृत्ति बस्न गयो भने त्यो लाचारशोषित जागिरदार एउटा नोकर हुन । प्रशासनको होइन प्रशासकको ।उदाहरण खोज्छयौ भने मलाई ॥ नौकर भएर बस्न सकिनँ र&lt;br /&gt;
११&lt;br /&gt;
कर्मचारी हुँ भन्दै नोकर बनिन पर्नै नियम तौड्दै हिँडैँ । म कर्मचारीभनिएकाले कर्मचारी खौसवा अभियानमा परें र जसले सरकारी नोकरैभएर रहन मन्जर गरे, ती बहाल नै रहिरहे ।”&lt;br /&gt;
“त्यसो भन्नुहुन्छ न्छ भने क्रा आफैँ खुलेन र ? तपाईंले नियमबद्धभएर रहन नचाहनु ने तपाईंको निष्काशनको कारण हुनसक्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
- &amp;quot;क्र हो, के होइन ! यो नै हो भनेर कसरी भनुँ । त्यहीकारण थाहा पाउनलाई नै मुट्टा दिडौँ कि भन्ने सोचिरहेको छु । मैलेनियमै उलङ्घन गरेको रहेछु भने पनि संस्थाका हितका लागि त्योसुहाउँदो नभएको पाएर नै गरेँ हुँला : राम्रो नै गर्ने उद्देश्य राखेर कुनैचलनलाई पन्छाएर अगाडि सर्त बेइमानी नहुनु पर्ने हो । फेरि त्यस्तोपनि कुनै गरेको जस्तो लाग्दैन । हो, म स्पष्टवक्ता भने छु तर त्यसलाईअनुशासनहीन भन्न पनि त मिल्दैन । के कुरामा कुनबेला मसंग रुष्टभएका थिए, मौका छौपिहाले । आफनो भुल धाहा नपाई यस्ता सजायमात्र भोग्नु पर्दा ज्यादै गाह्रो पर्दो रहेछ :&lt;br /&gt;
नत्र भन न, प्रजातन्त्रको पुनःस्थापनाको आन्दोलनमा भाग लिनअफिसबाट छुट्टी लिएर सघाउ पुप्याउनै म प्रजातान्त्रिक शासन चल्दानिकालिन्धे : ती हाकिमहरू पनि टेलिफोन गर्दै भन्चे, &amp;quot;लौ लौ शिवतपाईं त्यतैतिर लाग्दै गर्नोस्‌, यहाँ हामी छौं । के गर्न, हामीले देखिनेगरी लाग्नु भएन, हाम्रा तर्फबाट तपाईंलाई पुरा बल मिल्नेछ । योव्यवस्था, यस तन्त्रलाई ढाल्नै पर्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“म पनि के के न बहाद्री गरेको छु भन्ने ठान्दै सबैकुराको बिस्तार सनाउँयें तिनैलाई । प्रजातन्त्रको प॒नर्बहालीपछिअफिस जाँदा मेरो कत्रो कदर भएको थियो, मानौ म पनि विजयी नेताहुँ र समस्त जागिरदारको प्रतिनिधि हुँ ।&lt;br /&gt;
धेरै वर्षदेखि दवावमा बस्ताबस्तै सहन अभ्यस्त भएका तीजागिरदारहरूमा २०४६ साल चैत्र २६ गते पश्चात्‌ आफूहरूलाईबन्धनमक्त भएको संझदै अनुशासनलाई समैत स्वतन्त्रताको वाधक मान्दैप्रजातन्त्रका नाममा उल्कदै स्वछन्दपना देखाएर अफिसका मर्यादालाईउल्लङ्घन गर्न थाल्नेहरूको संख्या हवात्त बढ्दै जान थालेकाले ममाथि नैतिनीहरूलाई संझाई बुझाई गर्ने कामको जिम्मा थप गरिएको थियो ।त्यसबेला म नै अनुशासन र स्वतन्त्रता जान्ने भएको थिएँ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
क संफझन्छ, त्यो दिन जब उतीहरूले उसलाई हाकिमको चम्चा,प्रजातन्त्रको स्वागी भनेर जधाभावी बोलेका थिए । यस संझनाले उसकामनमा खेद हुन्छ र मनसँग आज त्यो अनुशासित चम्चा स्वतन्त्रता रस्वछन्दताको परिभाषा अर्थ्याउँदै अफिसको मर्यादा तिनीहरूलाई संझाउन&lt;br /&gt;
१२&lt;br /&gt;
खटिएको त्यो व्यक्ति प्रश्न गर्दै छु, “मैले के बिराएँ र यो सजाय पाएकोछु?&amp;quot;&lt;br /&gt;
थाहा पाउन थाल्दैछु । समय वबित्तै जाँदा मेरा ती साहसी कदम,ती प्रजातान्त्रिक भावना, उद्दैश्य सबैलाई अर्कै दृष्टिले हेन घालीएछ म पोत स्वतन्त्रतापेमीबाट उच्छिङ्खलमा गनिदै जान वालिएछु ।&lt;br /&gt;
एक दिन मलाई हाकिमले बोलाएर भनेका थिए, &amp;quot;ए शिव, होस्‌गर्नोस्‌ है, यहाँ को कांग्रेस, को काम्युनिष्ट, को पूर्वपञ्च, को राष्ट्रियप्रजातन्त्र पार्टीको पक्षधर छन्‌ भनेर छानबीन हुँदै छ रे भन्छन्‌ । केथाहा, यिनै आधार बनाएर पजनी पनि गर्छन्‌ कि ? पर्नु होला फेरि ।धेरै चम्केर नहिइनोत्‌ । म कुनै पार्टीको पनि सदस्य होइन, म तस्वतन्त्रताप्रेमी मात्र हुँ भन्नु भएर सुख पाउनु हुन्न । त्यस्तै कुनैको पनिपक्षधर नभएका लागि त निकालेर बिदा गर्न सजिलो हुन्छ । तसर्थअह्याए पराएका काम गरेर बस्नोस्‌, नत्र पछ्नुताउनु पर्ला ।”&lt;br /&gt;
मैले पनि निर्भीकताका साध भनेको थिएँ, “जे गर्छन्‌ गरून्‌ ।आफैले कर्मचारीहरूले राजनीतिमा लाग्न नपाउने, कुनै पनि पार्टीकोसदस्य हुन नपाउने भन्ने, फेरि जे मन लाग्यो त्यही दोष लगाउन पाइन्छर ? म त आफूलाई स्वतन्त्रताप्रेमी भन्न छोड्दिनँ । मेरो सबै पार्टीकानेतादेखि ल्याएर सदस्यहरूसंग एकै प्रकारको सम्बन्ध छ । मैलै चाहेकोनेपाल प्रजातान्त्रिक मुलक भएर रहिरहोस्‌ भन्ने मात्र हो । यदि योप्रजातन्त्र, जसलाई पुन:स्थापना गर्न हामीले कति मानसिक, शारीरिक दु:खभौग्यौं, त्यसैलाई धक्का लगाउने काम कुनैबाट हुन्छ भने म त्यसलाईछोडदिनँ, चाहे त्यो अन्तरङ्ग मित्र नै किन नहोस्‌ या ...... ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
सके मैलै यसो भन्नु नै उनीहरूका लागि खतरा भयो कि ?सोचे होलान्‌ ।हिजो अरूमाथि जाइलाग्ने यो आज हामीमाथि पनिआइलाग्न सक्छ । यसैले संभावनाकी जरो नै उखेलेर फँयाक्नु बेस मानीमलाई निष्काशत गरी आफू मक्त भएका पनि हुनसक्छन्‌ । यस्ताहरूलाई,स्वादै चखाउन भए पनि, मैले मद्दा हाल्ने निश्चय गरिसके । “बोल्दाबोल्दैक पुलुक्क गौरीको अनुहार हेर्छ” । गौरी निद्राले लट्टिएको स्वरमा भन्छे,“मुद्दा हाल्छु भन्नुहुन्छ अनि जितिएन भने के गर्नु दह नि ? त्यो कानुन&lt;br /&gt;
त तपाईंकै भनाइ अनुसार परिवर्तन भएको होला ! त्यसपछिन्याय खोज्न कहाँ जानुहुन्छ ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
“फैसला हुँदा लुड्काइ नै दिएछन्‌ भने पनि याहा त पाउँला,मेरो दोष के रहेछु भनेर ? एक दुई शब्द मनमा लागेको औकलेर शान्तहुन त पाइएला ! जिते भने त म नोकर होइनँ, कर्मचारीमा स्थापितहुने नै छु । यस जितले हामी जागिरदारहरूल।ई प्रोत्साहित पार्नेछ र&lt;br /&gt;
१३&lt;br /&gt;
हामीले आफूलाई कर्मचारी मानेर ओहदा - अनुसार निर्णय लिन सक्नेठान्नेछौँ । यसभन्दा बढी मैले चाहेको पनि छैन ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;मुद्दा हाल्ने निश्चय नै गर्नुभएको हो भने मैले भनेर के हुन्छुर ? तर मद्टा मामिलामा पर्त भनेको वकिललाई पोस्न हो र आफनोभएभरको समय अदालत घाउँदैमा बिताउनु हो तैपनि यसले तपाईंलाईशान्ति दिन्छ भन्ने ठान्नुभएको छ भने पछुताउने बाटो राख्नुहुन्न ।हाल्तोस्‌ मृद्दा । हामी पनि तपाईंलाई सहयोग गर्छौं ।&amp;quot; रातको चकमन्नर गहिरो विषयको शान्त छलफललाई खलबलाउँदै दिलेको आवाज सुनिन्छ। झ राधालाई खुसी पार्न उसको जाँगर र पाक्कलाको तारिफ गर्दैभनिरहेको हुन्छ, “यति रात बित्ता पनि जाँगर चलाएर यति मीठो मासुपकाएर ख्वाइस्‌, म तँलाई भोलि नै इनाम दिन्छु । एकफेर खिस्स हाँसिदेन | ए ....राधा, तेरो रिस अझ मरेको छैन कि कसो ! किन त्यसरीमुन्टो फर्काएकी : मलाई हेर त ?&amp;quot; य&lt;br /&gt;
शिव र गौरीका कुराको प्रवाह यहीं ट्रङ्टिछ । गौरी दिक्क मान्दैभन्छे, “यसले दिने इनाम त्यही सिनेमा हेर्न लैजाने त होला नि ः भौलिघ्नुड्री पारेर साथीहरू बोलाएकी थिएँ, यसले एक्लै पार्ने भयो अब ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;म हुँदाहुँदै पनि तिमी एक्लै कसरी हुन्छयौ ! व्यर्थै दिक्क किनहुन्छयौ &#039; त्यसले पनि त स्वास्नीलाई फकाउन सक्ने यति नै त छ ।जान्छन्‌ भने जानदेक्‌ । भरखर विवाह गरेर आएका छन्‌ । तिमीलेआफनो पालौ बिर्सियौ ? घरबाट माइत जान्छु भनेर आमासँग बिदालिएर हामी कहाँ काहाँ पुग्थ्यौं ? कति सिनेमा हेर्दै त्यसका मज्जामाडुब्यौं, भन त ? यिनको त्यो बाहेक जाने ठाउँ पनि कहाँ होला र ःआफनो जन्मथलो छोडेर यहाँ आएका छन्‌ । दिनभर एउटा एकातिरअर्का अर्कातिर हुन्छन्‌ ।”&lt;br /&gt;
शिवको कुरा सुनेर गौरी भन्छे, “कत्रो माया, कत्रो दया, रातठाडै पारिदिइसक्यो । बरु माया नै लागेको हो भने सम्झाइदिनोस्‌ आफनोकमाइ यसरी मोजमजामा मात्र उडाउने होइन भनेर ? बालबच्चा होलान्‌कतिसम्म अर्काको नौकर भएर बाँच्ने ?&lt;br /&gt;
१४&lt;br /&gt;
राधाको उमेर पन्ध सोह्र वर्ष मात्रको छ । उसको अनुहारकोकट निकै मिलैको छु र कुनै पनि दाग नलागैको गालाको छाला अतिकोमल देखिन्छ । सेतो वर्णकी राधाका यस्ता गालामा चढ्न थालेकागुलाबी रङ्गले उसलाई पुतली जस्तै देखाइदिएको छ । उसले हाँसी भनेत्यो गालामा पर्ने खोपिल्टाभित्र दिललाई चर्लुम्म डुबाइदिन्थी ।&lt;br /&gt;
दिलबहाद्रले राधालाई बिवाह गरेर म्याएपछि आफूलाई विजयीसंझैको छ र जुन बेला मौका पाउँछ, राधालाई जिस्काइरहेकै हुन्छ ।भन्छ, &amp;quot;ए राधा, त॑ इन्द्रपरीबाट पृथ्वीमा झरेकी होस्‌ कि पृव्वीबाट नैसीता झैँ उत्पन्त भएकी होस्‌ तर तँलाई मान्छेले जन्माएकोचाहिँ होइन ।यस अँध्यारा कोठामा पनि तेरै ती गालाका रङ्घले मलाई उज्ज्यालोदेखाइरहेछन्‌ । तेरो नाम &amp;quot;राधा&amp;quot; होइन बिजुली पो राखु कि ? लोग्नेलेस्वास्नीलाई आफूलाई मन लागेको नाम राख्न पर्छ भन्छन्‌ ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
राधा पनि लाज मान्दै भन्छे, “नाम मेरो जेसुकै राख्नोस्‌ तरआफू भने झयाउरे भएर हिड्ने होइन :? गाँउबाट शहर आएर पनियस्तो गतिछाडा भएर हिड्ने हो ? सिनेमाको हिरोजस्तो बनेर हिंड्नोस्‌ न। राम्रोमा त तपाईं पनि कमको कहाँ हुनुहुन्छ र मलाई मात्र यस्तोभन्नुहुन्छ । बस हामी पनि त्यो रानीवनमा गएर गाँउघर बिर्सने गरीगाना गाउँदै नाच्तै रमाइलो गरौं न ? भाँडा माज्दा त्यो वनआँखाअगाडि नै पर्छ । जाऔ जाँ लाग्छ तर तपाईं भने जहिले पनिआधा रात बितेपछि आउनुहुन्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
यी जोडी वास्तविकतादेखि टाढा भागेर मुखैको रमाइलामाआफूलाई यसरी नै अल्मलाइरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
दिलबहादर आमाबाबको एक्लो छोरो दुई दिदीपछि जन्मिएकोकान्छो सन्तान, बाबको मृत्यपछि स्थितिले गदा गाउँघर छोडेर पैसाकमाउन शहर पसेको तीन चार वर्षजति भइसकैर पनि फर्केर गाँउमागई बस्न पग्ने रकम जोड्न सकेको छैन । त्यसमाथि अहिले भरखरैबिवाह पनि गरेको छ । स्वास्ती छै, सानो उमेरकी धनीकी छोरी,व्यावहारिक अझ बन्नसकेकी छैन ।&lt;br /&gt;
पृ&lt;br /&gt;
उनीहरूलाई सिनेमा हेन मन लाग्छ, मीठा खाने, राम्रो लगाउनेत्यो त उमेरले नै गराउने गैहाल्या । यसैले गदा झषारपाल भएर कमाएकोपैसा र राधाले घरधन्दा गरेर पाएको पैसा सबैजसो मामु, रक्सी रसिनेमामा उड्न धालिरहेछ । उनीहरूको मोजमस्ती भन्न नै यही भएकोछ।&lt;br /&gt;
जुन बेला गाउएमा छोराका कमाइको आश गर्दै कुरेर बसिरहेकी“आमालाई खर्च पठाउन सक्तैन, त्यसबेला दिले खिन्न भएर राघालाईभन्छ, &amp;quot;राधे हेर, मेरा बाले गरीबी निम्ताएर बित्नुभयो । म पनियसभन्दा उभी लाग्न सक्छु सक्तिनँ । हाम्रा सन्तान भए भने तिनको गतिके होला : मैले वरु रातिको पालो पनि गर्छ कि ? केही त कमाउनपप्यो : आमाकहाँ पनि पैसा पढाउन सर्केको छैन । उमेर गएपछि त्योपनि गर्न नसक्ने भइएला !&amp;quot;&lt;br /&gt;
“पर्दैन, राति पगि बेपत्ता हुन । मैले भनिदिएकी छु । म एक्लैयहाँ बस्न सक्तिनँ । यी कुरा पहिले नै सोच्नुपर्थ्यो कस्तो नै नोकरीशहरमा गरेको छु जस्तोगरी गाउँमा रवाफ देखाउँदै विवाह गरेर ल्यायौँ,अच के छटपटाउँछौ !&lt;br /&gt;
“अनि, के गरर त : राम्रो जागिर खान पढेको हनुपत्यो कियस्तै नोकरी पनि लामो समयसम्म गर्नपत्यौ । त्यसै पर्दैन भनेर हुन्छ :औगात्ले पनि पन्याउन पर्छ । करा बाझिस मेरो ः&lt;br /&gt;
त्यसो हो भने हामी पनि पढ्न जाऔं न त ? पढेपछि राम्रैकाम गरौला : तलब पनि पुग्ने नै पाइएला, हुन्न &amp;quot; यति भनेरजवाफको पतीक्षा गर्छे । दिले चुप लागेकाले, फेरि सोध्छै, &amp;quot;किननबोलेका : मेरो कुरा मन परेन :&amp;quot;&lt;br /&gt;
राधाको यस्तो अल्लारै कुरा सुनेर दिलबहादुरलाई हाँसो उख्छसाथै &#039;फोक पनि चल्छ । तर भन्न केही सक्तैन किनकि क राघालाईखुब माया गर्छ । उसको चित्त दुखाउन क चाँहदैन । राधालाई पाउनउसको एउटा सफलता थियौ र गाउँ छोडेर शहर पस्त पनि त्यसैकालागि अपनाएको उपाय थियौ ।, क संधै मनैमन डराई रहन्थ्यो, “कहींराघाले मलाई छौडेर गाउँ नै त फर्किन्न !&lt;br /&gt;
पहाडमा राधाको माइत र दिलबहाद्रको घर धेरै टाढाथिएन । यी दुईको भेट भइरहन्थ्यो । दिलेलाई राधा चौपट्टै राम्री लाग्थ्योर एक दिन आमाले यसलाई अब तैले विवाह गर्नुपर्छ भन्दा मुखै फोरेरभनेको थियो, &amp;quot;आमा, मलाई विवाह गर भन्नुहुन्छ भने म राधासँग मात्रगर्छु, अरुसँग गर्दिनँ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
१६&lt;br /&gt;
छोराको यस्तो इच्छा सुनेर उदभान्त भएकी आमाले सझाउँदैभनेकी थिई, &amp;quot;“औगात हेरेर चाहना राख्नुपर्छ । तैजम्तालाई उनीहरूलेआफनी छोरी कं दिन्छन्‌ र त॑ विवाह” गर्छस्‌ : भएका जमिन सबैबन्धकमा परेको निखन्न सर्केको छैन, गाउँघरमा सबैलाई थाहा छ, हामीके खाएर कसरी दिन कारटरहैछौँ भन्ने । तेरो पढाइ मिद्धिएर राम्रोकमाइ गलांस्‌ र भ्रणमक्त हन पाउँला भनेर बाबले बाँकी छोडेकासम्पत्ति जति पनि सबै धिता राखिसकै । न त तेरो पढाइ सकिएको छ,नत बांकी दिन काटनलाई सम्पत्ति न छ । यस्ता अवस्थामा पगेकाहामीले गाउँको ठालकहाँ उसकी छोरी माग्न गर्यौ भेने के गर्लान्‌, केभन्लान्‌ : हेर, जे जस्तो दुःख भए पनि गर्ने बेलामा नातिको अनहारहेर्दै भनेर तँलाई विवाह गर भनेकी । त॑ भने आकाशकी चरी ताक्छल ।क त्यो मुडुल्लीलाई ठीक पारेकी “छु, त्यसैसंग चप लागेर बिवाहगर ।&amp;quot;- दिलबहादरले जड्ेर भनको थियो, “त्यसो गर भन्नहन्छ भने मभाग्छु र फेरि फर्केर यस गाउँमा आउँदै आउन्नै । आनि तपाईं रमडुल्ली साथै बसेर रोइरहन्‌ होला ।&lt;br /&gt;
धम्कीले लाचार भएकी दिलबहाद्रकी आमाले राघाका माइतमाबिवाहको कुरा पठाउँदा यस्तो जवाफ पाएकी थिई, “गाउँमा यसैलरबराइरहने, खान बस्नलाई समेत घौँ धौ पर्ने तिनले हामी छोरीको हातभाग्नसक्ने कत्रो ताकत &#039; हामी छोरीसंग विवाह गर्नै हो भने सनाइदिनोस्‌, पहिले उसले कमाइगरेर देखाओस्‌, क्रण मक्त होस्‌, अनि केगर्नपर्छ सोचौंला ।&lt;br /&gt;
यस्तो मार्मिक बचन सुनेपछि गाउँ छोडेर काठमाडौं पसेकोदिलबहादुरले प्रसस्त कमाइ गर्न थालेको देखाउन आफनो छाक काटेर भएपनि रातोदिन ज्यालादारी काम गरेर भए पनि घरमा पैसा पठाउनथालेको थियो । गाउँलेहरूमा उसले गरेका तरक्कीको प्रचार भएपछिढोकेकै उर्दी पोशाक लगाएर गाउँमा पस्ता पनि यसको खाइलाग्दो रूपदेखेर र शहरबाट हक भएर आएको ठानेर मान पाउन थालेकाले नैहो, राधाका बाब दुई वर्षपछि नै आफनो मन बदलेर छोरी दिन राजीभएका ।&lt;br /&gt;
नभन्दै नोकरी गरेको पहिलो वर्षदेखि नै क्राण निखन्न थालेकोविबाह गरुन्जेलसम्म झण्डै आधाआधी क्राण तिरिसकेको थियो । जबराधाका बाबले आफनो पुर्ववचन अनुसार विवाह गरिदिन तयार भएत्यसपछि उसले केही साचेन, मानौं उसको उद्देश्य प्रा भइसकेको छ ।&lt;br /&gt;
१७&lt;br /&gt;
राम्रा राम्रा सारी, आधुनिक श्रृङ्वारका सामान र झल्कने रचम्कने गहना ल्याएर विवाह गर्ने दिलेलाई आजभोलि औंल्याएर गाउँकाअल्लारे केटाहरूलाई उपमा दिन थालेको करा उसले सुन्त थालेको छ ।&lt;br /&gt;
यता राघाको फर्मायस दिन प्रतिदिन बढ्दो छ । गाउँबाटकाठमाडौं आउने पाहुनाहरू पनि त्यस्तै बढेका छन्‌ । यस्ता समस्यालेगर्दा दिले बेलाबेलामा विचलित हुन्छ र पनि क खुलेर राध्यालाई आफनोअवस्थाबारे बताउन सकिरहेको छैन । राधालाई थाहा छैन ढोके पालेभनेको कस्तो नोकरी हो । यसले साइकल चढेर घर अफिस पनि अरुलेगर्नेजस्तो गरी गर्छ । त्यही साइकलमा राखेर उसलाई घमाउँछ पनि ।कुन नोकरी ठूलो, कुन नोकरी सानो, क के जानोस्‌ ।&lt;br /&gt;
राधाले सोचेकी छै काठमाडौंमा उनीहरूको घर नभएकैले मात्रबास दिनै ती घरपटीको भाँडा माजेर उनका घरधन्दामा क सहयोगीभइदिजु परेको हो । आफना जीवीकाका लागि नोकर्नी भएकी चाहिँ होइन। यस्तो भावना लिएर काम गरिदिने गरेकी राधाले उसको परिचय जबनोकर्नी भनेर दिएको सन्छे, क झनक्क रिसाउँछु र त्यस दिन कनै नकुनै बहाना बनाई काम गर्न जान्न । क भन्छे, “मलाई यिनीहरूलेखोजेर ल्याई नोकर्नी राखेका हु र त्यसौ भन्छन्‌ : तपाईंले सकेजतिकाम सघाईदेक भनेकाले पो लौ त भनेर गरिदिएकी । यतै मालिक बन्नखोज्दा रहेछन्‌ : अब म काम सघाउन पनि जान्नै र तपाईँले पनि जाभन्न पाउनु हुन्न । त्यति पैसा चरा धागो लगा भनेर दिने गरेकामहिनावारी दिएको ठानेका होलान्‌ । त्यो पनि अबदेखि लिन्नँ ।&lt;br /&gt;
राधाको क्रा सनेर दिलेले भन्नसक्नै यति मात्र हो, “त्यति भनेरतँलाई &#039;के भयो ! यिनीहरू यतिमै खुसी हुन्छन्‌ भने तैले सनिदिएर त॑सानी हुन्नस्‌ : आफूनो कर्तव्य यसै छोड्न हुन्न । हेरिल्याएमा उनीहरूपनि कुन डयाङ्गका मूला हुन्‌ र ! उही नोकर नै त हुन्‌ । कतिसंफझाउँ तँलाई यी क्रा ।&lt;br /&gt;
राधाले चित्त बुझाएर चुप लागे पनि दिलबहादरलाई भने दुःखलागिरहन्छ । संझन्छ राधाले विवाह हुने निश्चय भएपछि पनेरामा भेटहुँदा भनेका ती कुराहरू । लाज मान्दै भनेकी थिई, &amp;quot;विवाह गरेरकाठमाडौं फर्कदा मलाई यही छोड्ने हो भनेँ म तपाईंसँग विवाह गर्दिनँ। यहाँ त अहिले पनि वसेकी नै छु । काठमाडौं शहरमा सुरुवाल कुर्तालगाएर, कपाल काटेर नाडीमा घडी लगाएर घमला भन्ने आफनौ कस्तोरहर तपाईं भने यहीँ आमाका लागि साथी छोडेर जान्छु भन्न हुन्छरे ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
१्द&lt;br /&gt;
दिलबहाद्रले पनि राधालाई मीठो भाकामा भनेको थियो, &amp;quot;तिमीलेविवाहपछि मबाट चाहेकी यतिमात्र हो : लौ लौ म तिमीलाई चिटिक्कपरेकी प॒तली बनाएर नै काठमाडौं मात्र किन भक्तप्र, पाटन शाहरैघमाउँला, भएन अब ?”&lt;br /&gt;
यति जवाफ सुनेपछि खुसी हुँदै मृग उफ्रेको जस्तो गरीउच्चालिदै भागेकी राधालाई विवाहपछि उसँग गरेका बाचा पनिदिलबहादुरलाई पुन्याउन घौँ घौ भइरहेछ । राधाले बारम्बार ती बाचाहरूकोट्याई संझाउन खोज्छ । नसुनेको झै गरी पन्छिन खोजे क आफैढुस्किन्छे, कहिले हाँस्छ त कहिले जिस्किन्छे तर ती बाचालाई लिएर भन्नछोडदिन । राधाले बिवाह गरेर चाहेकी तिनै दुई ई इच्छा प्रा गर्ने थियो ।एक दिलबहादुरलाई पाउने र अर्को शहरको तमासा रमझमहेर्ने ।&lt;br /&gt;
एक दिन राघाले निकै रहरयमय तरिकाले दिलेलाई कुरासुनाई । क भन्दै थिई, “दया मैयाको पनि बिवाह हँ भयो रे, सुन्नुभयोतपाईंले ? त्यो दुलाहा हुने केटो अर्काको देशमा धेरै वर्षदेखि काम गर्छरे र विवाह भएपछि मैयाँलाई पनि त्यहीँ लैजान्छु भन्छ रे । तर मैले तमैयाँलाई भनिदिएँ,&amp;quot; मैया, त्यस्तो टाडा गएर काम गर्नेहरूमाथि विचारपुग्याएर मात्र विवाह गर्नुहोला । कस्तो काम गर्छ कस्तो : न गौराकोजुठा भाँडा माजेर घर कुरुवा भएर पो बसेको छ कि !: त्यहाँसम्मपुगेपछि बस्नै नसकेर फर्कनु पत्यो भने विवाह नै त्यस्तासँग किन गर्ने ?हामी छोरीको त विवाहले पनि भाग्य राम्रो नराम्रो बनाइ दिन्छ । यस्ताकुरामा पहिले नै होस्‌ पुग्याउनु होला, नत्र धोखा खाइन्छ । मैले ठिकैभने होइन त !”राधाका यस्ता कुराले दिलेको मुटु छोएको थियो र उसलेराधासंग नै सोधेको थियो, “मैयौले तेरो कुरा सुनेर के भन्नुभयो त ?मलाई सिकाउन आउने नोकर्नी भनेर गाली गर्नुभयो होला, होइन ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
“किन गाली गर्नुहुन्थ्यो ? भन्नुभयो, हेर्दा यस्ती लाटीजस्ती तिमीत हुनसम्मकी बाठी रहिछौ । दिले दाइले तिमीलाई झुक्याइ दियो किकसो ?&amp;quot; उहाँको कुरा सुनेपछि पो मैले के भनेछु त्यस्तो भनेर लाजलाग्यो । अनि त के भनुँ, के भएर फरक्क फर्किहालें । कहिलेकहीं केबोलिन्छ के ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
राधाका यी कुराबाट दिलबहादुरले राधाका मनमा उसप्रति केधारणा लुकेर बसेको रहेछ भन्ने थाहा पाएको थियो ।&lt;br /&gt;
वास्तवमा दिलबहादुरले झुक्याएर राधासँग बिवाह भने गरेकोथिएन । कसैले पनि उसलाई काठमाडौंमा कस्तो नोकरी गर्छस्‌ भनेर&lt;br /&gt;
१५&lt;br /&gt;
सोधेनन्‌ त क के गरोस्‌ : त्यस वेला उसले गाउँमा आमालाई ग्रणनिखन्न पैमा पढाउनु, राम्रो लुगा लगाएर गाउँमा आउनु नै विवाहकालागि योग्य भएको ठहरियो । त्यो लगा लगाएर दिनरात, शहर गाउँ गर्नुउसको मजवरी थियो किनकि अर्को लुगा किनेर लगाउने कसँग पैसाथिएन । यसरी आवश्यकताले उसलाई ,ठूलो बनाइदियो भने उसले गरोस्‌के ॥)&lt;br /&gt;
काठमाडौंमा काम गर्ने योग्य वर पाएकी छु भन्ने सोच्ने सुनौलासपना बोकेर आएकी राधालाई सत्य कुरा बताएर चित्त दुखाउने काममात्र गर्ने उसले आँट नगरेको हा र अहिले त्यही सानी कम्जोरीले दिनप्रतिदिन उनीहरूको जीवनभरका लागि भनेर जाँडएका नातामा पनि केहुने हो भन्ने प्रश्न उठन थालेको उसलाई अनुभूति हुँदैछ । क राघालाईंआफूसँग रत्याउन पनि खुबै संझाउने र आफूले भ्याएसम्मको उसकोइच्छा प्रा गरिदिने गर्छु । जब जब गाउँबाट माइतका मान्छे राधालाईभेटन आउँछन, दिलबहादर कही राधा यिनैका पछि लागेर त जान्न भनेरडराउँछ र समपित हन्छ ।&lt;br /&gt;
एक दिन कामबाट फर्कदा राघालाई निकै दामी सुरुवाल कर्तादिलबहादरले ल्याएर दिएको थियो । राघाले पनि तरुन्तै खसी भएर लगाईर दिलेलाई देखाउँदै भनेकी थिई, “मलाई सहायो, हेनाँस त, यस्तै लुगाधेरै दिनदेखि लगाउने मन लागेको थियो, बल्ल तपाईंले ल्याउन भयो ।लुगा मिलाउँदै भनेकी थिई,&amp;quot; यौ रातो रङ्ग त मलाई अतिनै मन पर्छ ।कति पर्दो रहेछ यसको !&amp;quot;&lt;br /&gt;
पैसा भन्न नचाहेर अलमलाउने तरिका खोज्दै दिलबहादुरले भनेकोथियो, “पैसाको तिमीलाई किन चासो चाहियो : रामा लागे भड्हाल्यो नि; भौलि यही लुगा लगाएर बस्नु हामी रानीपोखरी घुम्न जाऔँला । त्यहाँगएर राम्रो गाना मात्र गाउने होइन, नाच्नु पनि पर्छ, हुन्छ !&amp;quot;&lt;br /&gt;
“तपाईसँग बिवाह गरेपछि नाच्नै बिर्सिसकै जस्तो छ । एक फेरपनि नाच्न पाएजो होइन । गाना गाइदिन्छु हुन्न ?”&lt;br /&gt;
“औँहैँ, गाना मात्र गाएर हुँदैन, ताच्नै पर्छ । त्यो दिन तैँले&amp;quot;नाचेको देख्ता त यो कम्मर च्याप्प समातिदिकँ जस्तो लागेको थियो”भनेर उसको कम्मर समात्ता छिः तपाईं त ! कस्तोसंग सासैँ फेर्न गाह्रोपर्ने गरी एँठेको, छोडनोस्‌, भन्दै सोध्छु, “तीनओटा अरू किनिदिने हो त? हरियो, र निलो रङ्ग पनि मलाई खुबै मन पर्छु । यो एउटा मात्रकति रगड्ने ?”&lt;br /&gt;
राधाको फुमाँइस्‌ सनेर झस्केको दिलबहादुर राधाका अनुहारमाटोलाएर हेरेको हेरै भएको वियो र राधाले नै के कहिल्यै नदेखेको जस्तो&lt;br /&gt;
२०&lt;br /&gt;
गरेर हेरेको, कि पैसा सिध्याउने भई भनेर वाल्ल पर्नु भएको भन्दा पोक नियन्त्रणमा आई मुखबाट सत्य कुरा फुत्कन गएको थियो, “यस्तालुगा हामीले आफना कमाईले किनेर लगाउन सक्ने हो र फेरी फेरीलगाउने इच्छा गर्छैस्‌ । मेरो साहेबनीले तलाई भनेर दिइन्‌ र पोल्याएको ।”&lt;br /&gt;
सोच्तै नसोचेको कुरा दिलबहादुरका मुखबाट निस्केकाले छक्कपरेकी राधाले घृणाले भनेकी थिई, “त्यसो भए यो जडाउरी लुगा उठाएरस्वास्नी खुसी पार्न ल्याएको : मेरो लोग्नेले कति माया गरेर आफनाकमाइबाट किनेर ल्याइदिनु भयौ भनेर म कस्तो खुसी हुँदै लगाएकी थिएँ। यो त त्यस्तो पो रहेछ : मेरा आङमा यस्तो लुगा कहिल्यै परेकोथिएन । यो के गर्नुभएको तपाईं ले ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
यसो भन्दै लगाएको सुगा फुकालेर फयांगतै खुबसँग रोएकीथिई । दिलबहाद्रले जब संझाउंदा संझाउँदा वाम्यो । त्यसपछि उसलेपनि आक्रोशित हुँदै भनेको थियौ, &amp;quot;के गर्छस्‌ त : तेरा बाबले यस्तैलाईछोरी दिएर पठाइहाले । यी हेर, यो कोट पनि तिनै मालिकले जाडामाकपिर उभिइरहेको हेर्न नसकेर दिएका हुन्‌ । मैले लगाउन हुने, तैलेनहुने ? के भएको छ, यो लुगा । नयाँ जस्तै देखिन्छ । राम्रो पनि छ ।ज्यादा जिद्दी गर्ने बानी छोड र यी लुगा खुरुक्क उठा ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“के मान्धी राधाले । उसले भनेकी थिई, “तपाईंले किन्नसक्नुहुन्न भनेको भए मैले ल्याउनुहोस्‌ पनि भन्दिन थिएँ । यस्तै जडाउरीलगाउँदा लगाउँदै राम्रो मात्र लगाउने बानी बस्यो भने कै गरी पुन्याउनुहुन्छ &#039; अहिले नै कात्त बानी बिग्रिइसक्यो । खर्च बढ्यो भनेर किन्नेनाम लिएँ कि पुरपरामा हात राख्न थाल्नुहुन्छ अनि यहाँ भने जडाउरीबट्लेर ल्याएर भए पनि राम्रो लगाउने बानी बसाउन तत्पर हुनुहुन्छ ।औगात आफूनो के छ, त्यो सोच भन्ने तपाई मलाई किन आफ्नैऔगातमा रहन ? राम्रो लगाकँ मीठो खाँ भन्ने मेरो मात्रइच्छा होइन, पनि राम्रो मैले लगाएको हेर्ने इच्छा छ । योकुरा किन लुकाउन खोज्नुहुन्छ ! म फेरि भन्छु, “राम्रो म त्यस बेलामात्र लगाउछुँ जब तपाईले आफनै कमाइले किनेर दिनसक्ने हुनहुन्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
राधाका भनाइमा केही सच्चाइ नभएको होइन । हामी मुफतमापायौ भने जे पनि बट्ल्छौं र सोच्तै नसोची प्रयोग पनि गर्छौं । दैनिकउपयोगमा यसको बानी बसेपछि क्रण काढेर पनि त्यो नकिनी नहुनेहुन्छ । यसै गरेर त&#039; हामीले आफना आवश्यकता बढाउँदै गएका हुन्छौं ।हिजोसम्म सोख मानेर प्रयोग गरिएका वस्तु आज आएर आवश्यक बनेकाहुन्छन्‌ । होइन र ?&lt;br /&gt;
२१&lt;br /&gt;
यस विवादमा दिलबहादरले नै राधासंग चपलाग्न परेको थियोकिनकि राधाको सोचाइले मुक्ति खोजेको थियो ।&lt;br /&gt;
राधाले यस्ता धेरै घटनाहरू र व्यवहारहरूबाट आफू को रहेछुर भविप्यका लागि अब उसले के गर्नपर्ने भएको छ भन्ने क्राहरूबिस्तारै बफदै जादै छे । उसका चञ्चलता, कल्पना र इच्छ्वा पनिनक पि ५०:१५ लेका छन्‌ । गाउँकी त्यो राधा जिम्वालकी छोरी राधा अबझु दिर्नादनैको परिवर्तनले शहरिया हुँदै गाउँका संस्कृतिबाट पर पर हुँदैछे । कं गाउँबाट आएका पाहुनाहरूलाई अहिले काइदा कदर सिकाउनेभइसकेकी छै । भन्छे, &amp;quot;यहाँ सबै कुरा लकाउनु पर्छ, नत्र पाख्रे भनेरहाँस्छन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
001&lt;br /&gt;
गौरी अझै नोकरी गर्दै छे । शिव खँडकाको नोकरी छुटेपछि घरखर्च घान्त परेको छ उत्तको र जेठी छोरीका कमाइले । बेलासपरकोपर्ख्यौली घलाबाट धान मकै आए पनि घरका अरु खर्च बेपत्ताकै छन्‌ ।दुई छोरी, दुई छोरामा जेठी छोरी विवाह गर्ने उमेरमा प॒गिसकेकी छेभने जेठी छोरो हिन्दस्तानमा इन्जिनियरिइ पढ्दै छ आफनै खर्चमा ।कान्छी छोरीले यसै वर्ष बि.कम. पास गर्दै छे भने कान्छा छोरो भरखरआइ.एस्पी, को प्रयम वर्षमा छ । उसको इच्छा पनि दाजुले जस्तो गरीबाहिरै गएर पढ्ने छ ।&lt;br /&gt;
शिव खड्काले अवकाश पाउँदा आएको रकम मट्टामा खर्चभइरहेछ । क भन्छ, “यस रकममा भर गरेर व्यवहार चलाउँछु भन्नेनठान । सक्छयौ भने दैनिक खर्च के कति घटाउन सकिन्छ त्यसतर्फबिचार गर र मलाई यो मुद्दा लद्दनमा सहयोग गर । यौ नै एउटामाध्यम मैले पाएको छु, आफूलाई स्वतन्त्र देशको स्वतन्त्र नागरिककोपरिचय दिने । यो मुट्ठा दिनु भनेको मैले कर्मचारीको अधिकारको मागगरेको हुँ । यस्तो भन्ने लोग्नेलाई गौरीले के भन्नै : उसको मनस्थितिबुझेर उसलाई अरु दुःख नदिन घरधन्दा चलाउनेबारे केही भन्दिन थिईभने आफना भएका गहनाहरू हरेक महिना सुनारकहाँ पठाउनु परको&lt;br /&gt;
शिवले अवकास प्राप्त गरेपछि दुनियाँलाई राम्ररी चिन्न थालेकोछ । हिजोका घनिष्ठ मित्रहरू आज उसदेखि पर पर हुन थालेका छन्‌अने कार्यालयमा आफना साथ काम गर्नेहरू र आफना मातहतमा कामगर्नेहरू पनि नयाँसडक, असन, इन्द्रचोकमा यदाकदा भेट भईहाले छ भनेपनि कुनैले देखे नदेखेको जस्तो गरी जान्छन्‌ भने कनैले औपचारिकतापुरा गरेर पन्छिहाल्छन्‌ । कुनैसँग उसैले करा गरौं भनेर अगाडि बढ्दापनि अर्कातर्फ लाग्छन्‌ । त्यसैले उसलाई शहर घुम्न, मानिसहरूकोसमुहमा जान मन लाग्दैन । उसलाई बाहिर जानै पन्यो भनै अदालतमाजान्छ कि त बेलासप्रका गाउँमा । त्यहाँ जाँदा उसलाई अभै आफूजिउँदो नै छु जस्तो लाग्छ ।&lt;br /&gt;
२३&lt;br /&gt;
, &amp;quot;एकपटक उसलाई आफना .प्राना साथीसँग भेट गर्ने इच्छा लाग्छ। त्यो साथी उसका अरू साथीभन्दा धेरै नै सम्पन्न छ । त्यसैले उससँगकुरा गर्दा कतै कतैबाट उसको घमण्डीपना झल्किएको आभास हन्छ ।शिवले उसलाई चाहने किन हो भने क धनलाई अति महत्ब दिइ कुरागर्ने गर्छ र ज्ञानलाई दौसो तहमा मात्र राख्छ । विवेकलाई अव्यावहारिकमान्दै यक्री भन्छ, “विवेक, माया, सहानुभूति भन्ने यी भाबनाहरूलेव्यक्तिलाई कम्जोर बनाइदिन्‌छन्‌, लिने र दिने दृवै पक्षलाई. । तसर्थ,सहयोग नै गर्नु छ भने पनि त्यस व्यक्तिलाई परिश्चम गराएर, मात्र दे। धन भनेको लक्ष्मी हो । यसलाई जथाभावीसंग नचाउन हुँदैन ! यहीधन जोडनलाई हामी उद्योग गछौं, पढ्छौं काम गर्छौ, परिश्रम गछौं रठग्छौं पनि । कुनै कुनै स्थितिमा त ज्यानको पनि मतलब नगरेर धनकैपछि दौडन्छौं । इज्जत नै फालेर पनि पछि लाग्नेहरू प्रसस्त छन्‌ ।यसैले धनले धिचेर मर्नु नै पत्यो भने पगि त्यस व्यक्तिलाई त्यसलेदुखाएको हुँदैन र मरिनै- गयौ भने पनि हाम्रो संस्कार कस्तो छ भनेउसलाई यी धन, सोख, आराम परलोकमा पनि पृग्याइ दिने विधिबताइदिएको छ । धनको महत्व कहिल्यै सक्दिन ।&lt;br /&gt;
मलाई आज जुन अवस्थामा देखेका छौँ त्यो मेरो पृर्घ्यौली देनहोइत र मेरो विगत पल्टाउन पनि नखोज । यति मात्र म भन्न सक्छुहाम्रो आर्थिक &#039; स्थितिको इतिहास धेरै ठाउँमा शुन्यमा पुग्दै उठेको छ रकति ठाउँमा चुलीमा प॒गेर पतन भएको पाइन्छ । शून्यमा पुग्नभन्दापहिले रै पतनतर्फ लाग्नुभन्दा पहिले आफूलाई समाल्न सक्यो भने मात्रयथास्थितिमा रहन सकिनै हुँदौ रहेछ ।&lt;br /&gt;
संझ, म शान्यमा पुन्याए आफनो भाग्यसँग लडेर जिउनलाई हुँरै आफनै प्रयासले धनको कदर गर्दै यहाँसम्म आइपुगेको छु । यो लामोदौडमा चल्दा मैले विवेक, माया, सहानुभूति जस्ता मन छुने भावनाहरूसँगराम्ररी खेल्न पाएको छु र यसको अप्तर र नतिजा पनि देखेको छु ।सायद, तिमीहरूका जीवनमा यस्तो अवस्था नै आएन होला र आदर्शकाकुरा गर्छौं । मलाई धेरैको दयालै ठाउँ ठाउँमा पोलेर नमेटिने टाटोलगाइदिएका छन्‌ । त्यसैले म यस्ता दुःख अरूलाई नहोस्‌ भनेर दयागर्दिनँ, बरु. काम मिलाइदिन सहयोग गर्छु ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
शिवलाई जीउनको सच्चइ. जुन अति तितो हुन्छ, त्यो जान्न कप्रतापकहाँ&#039; जाने गर्छ र त्यस. दिन पनि क परतापको दार्शनिक प्रवचनमात्र सुन्न गएको थिएन । उसलाई यसपटक पैसा सापट लिन पर्नेआवश्यकता पनि परेर गएको थियो । उसले सोचेको थियो, अरूलाई जेजस्तो गरे पनि मलाई भन्दैन होला ? प्रतापले निकै बेरसम्म शिवका&lt;br /&gt;
0 हु&lt;br /&gt;
माँगलाई हाँसोमा लटपटाइरहन्छ तर उसले पानि जब दोह्तोआाईं तिहयाईछोरीको विवाहका लागि सापट खोजेको बताइरहन्छ, क क्र्र भएर गर्जदैभन्छ, &amp;quot;त्यसो भए तँ पनि सन्तानलाई उस्तै शृन्यमा प्॒याउने बाटो खोज्दैछस्‌ आफू शुन्यमा पुगेर सोच, त्यहाँ पुग्दा र्कात कप्ट सहनपर्छ ।आधाभन्दा बढी जीवन तेरो त वितिसकेको छु र दृःखै भोग्न प्यो भनेपनि केही वर्षका लागि मात्र हुनेछ तर तेरा ती केटाकेटीहरूलाई त्यहाँपुन्याएर छोडिस्‌ भने तिनीहरू जीवनभर रुने छन्‌ । तेरो छोरो कसरीइन्जिनियर होला ? कान्छी छोरी र छोराले के पढ्छन्‌ : भाउजुले कतिहाड घोदने ? दिन्न जा, तँलाई म एक पैसा पनि छोरीको विवाहकालागि सापट दिन्नँ दिन्न । विवाह नै गराउन छ भने भनिदे त्यो दलाहाहुनेलाई केही पनि दाइजोमा दिन सक्तिनँ भनेर । विवाह गराउने विभिन्नतरिका छन्‌, जुन अपनाउनाले तैलाई क्राण लिनु पर्दैन । त॑ त्यसो किनगर्दैनस्‌ ? मसँग नरिसा । हेर, यस क्राणले तेरी छोरीलाई आशीबाददिँदैन, बरु पोलेर छोरीप्रतिका प्रेममा फाटौ मात्र ल्याउँछ । . छोरीलाईदेख्नासाथ तैले आफूले लिएको क्षण सोझनेछस्‌ ,। मेरी आमाले झैँहुनसक्छ छोरीलाई नै पर पर गर्न याल्नेछस्‌ ।&amp;quot; ॥&lt;br /&gt;
शिवले पनि झोक्किएर भन्छ, &amp;quot;ए आमालाई किन निठरीबनाउँछस्‌ ? सोझै भनन, &amp;quot;तेरा क्षण तिर्ने नसकेर पचाइ दिन्छु भनेरदच्चेको, जागिर खुस्किएको ममाथि तलाई विश्वास लागेन । कुराबझिहालें । तेरो निमित्त मित्रताभन्दा ठूलो धन रहेछ । दुःखसखमा साथदिनेलाई साथी भन्छन्‌ तर तँ साथी होइन रहेछस्‌ । धनले हुङ कारगरिरहेको हान्ने साँढेलाई शिव बाँध्न भनेर छुन पुगेछ । यो मैले ठूलोभूल गरेको रहेछुँ । यही भल - स्वीकारेर त॑कहाँ अब म कहिल्यै पनि&amp;quot; आउँदिनँ । धन्दा नमान्‌ु, म तँसँग पैसा त के, कुनै पनि सहायतालिन्नै । दिन भनेको सबैको एकनासको सँधै हुँदैन । हिम्मत, छ, मलाईक्रण लिए पति तिर्नसक्छु भन्ने । यस पाखुरीको बल हराएको छैन,बुझिस्‌ । इज्जत, भनेको बेलामा राख्नुपर्छ, त्यो टरे&amp;quot; पछि फर्केर आउँदैनर इज्जतै गएपछि समाजमा के गरी बाँच्नु : त॑ प्रवासीलाई, न तयहाँको समाज चाहिन्छ, न त इज्जत नै । मलाई त दुवै चाहिन्छ ।क्रण पनि लिन्छु, विवाह पनि गरिदिन्छु, त्यो क्षण तिर्छु पनि ।&amp;quot; त्यसरीरिसाएर शिवले फलाक्ता पनि क हाँसेर नै जवाफ दिन्छ, “सापट लिएकोइज्नत कति दिन टिम्नसक्छ ?” १ यु&lt;br /&gt;
यस जवाफले छेड्छ शित्रको मुट्र र क त्यहाँबाट जुरुक्क उठेरहिँडेको घरमा .प॒गेपछि गौरीले “के भयो यस्तो । कित नीलोकालोअनुहार लगाएको भनेर” सोद्धा पो बल्ल बोल्न सक्छ । क एकोहोरोसँग&lt;br /&gt;
0010&lt;br /&gt;
त्यसपछि बोलेको बोलै हुन्छ ! भन्छ, “त्यसले आज मेरो आत्मसम्मानमाघक्का लगाएको छ । त्यो नफर्काई कहाँ छोड्छु : धन मात्र मनुष्यकोसब थोक होइन । घनले किन्न नपाइने अरू पनि आवश्यकता जीवनमाहुन्छन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
यम्तो बेतालको क्रा लोग्नेले गर्न थालेकाले गौरीले सुनेर पनिकेही सोध्न सक्तिन । डराएर मनमनै भगवानसँग पार्थना गर्छे उसकालोग्नेका मनलाई शान्त पारी देक, रिस रागबाट बचाइ देक । कंचारैतिरबाट गिज्याइएको छ । उसको जिजीविषा सुर्राक्षत रहोस्‌ । जस्तैदुःख भोग्नु परे पनि सहनसक्नै शिव खँड्काको आत्मवलले उसलाई किनलाचार हुनदिन्थ्यो ? किन मृत्यलाई खोज्दै हिड्न पर्ने बनाउँथ्यो : यौगौरीको पतिप्तिको माया र कम्जोर सोचाइ मात्र थियौँ । मायालेझस्काई उत्पन्न गराएको उसको त्रास मात्र थियो । शिवले जीवन रजिउनु दुबैलाई धृणा होइन, पेमले हेर्ने गर्छ र भन्छु, &amp;quot;जिउँदो रहँदाआइपर्ने बाधाहरूले नै मलाई अनुभवी बनाउँछन्‌ र यी अनुभवहरू नै मैलेआउने प॒स्तालाई छौडेर जानसक्ने ज्ञान हुनेछ । मलाई “एकादेशमा&amp;quot;भनेर भए पनि संक्षिकन्‌ भन्ने आशा छ र मेरा यस्ता आशालाई पुरागर्ने मेरा कर्महरू हुन्‌ । तसर्थ म कर्म गर्नबाट हटतित र हरेस खाएरबेपत्ता पनि हुन्नै । तिमी नडराक, गौरी, तिम्रौ लोग्नेले संघर्ष गरी बाँच्नजानेको छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
२६&lt;br /&gt;
पैसा छैन भनेर दयाको विवाह टार्ने स्थितिमा पनि शिव छैन ।केटो राम्रो, पढेलेखको र विदेशीले समेत पत्याई नोकरीमा राखेको छ ।घर पनि सुसम्पन्न र परिवार सबै शिक्षित छन्‌ । त्यसैले शिव रगौरीले केटाका परिवारकहाँ छोटकरीमा विवाह गर्ने प्रस्ताव लिएर जानेनिश्चय गर्छन्‌ तर उनीहरूले जेठा छोराको रहरको विदाह त्यसरी गर्दैनौंभनेर मानेनन्‌ भने सुहाउँदो उपाय के गर्नुपर्ला भनेर सोचाड्गमा डुबेकाछन्‌ अनि त्यसरी नै प्रतापले साथीलाई चोट पुप्याई भगाएपछि अति दुःखीभएर बसेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
प्रतापले समाज सुधारपष्टि लिएको धारणा ज्यादै जटिल हुनुकासाधसाथै यसतर्फ अपनाएको बाटो पनि अप्रिय छ । क यस्तो धारणालिएर त्यस बाटामा कति टाढा | ५७०० छ भने क फेरि फर्कनसक्तैन । दनियाँले उसलाई कसरी छन्‌ भने क निर्दयी छ,घन खर्च गर्न कन्जुस्याइँ गर्छु र धन नै उसका लागि सर्वश्रेष्ठ छ तर,सत्य त्यो होइन । उसको सौचाइ छ, हामीले आत्मसम्मान राख्न आफनाअवस्थासँग संझौता गर्नपर्छ । आत्मनिर्भरताले नै व्यक्तित्व विकासगर्नसक्छ ।&lt;br /&gt;
तसर्थ क भन्ने गर्छ, “उद्यमी भएर धन कमाक, परिश्रम गर रधनको प्रयोग उचित लक्ष्य हासिल गर्नेतिर गर नत्र भने यही धनलेतिमीलाई नाशतर्फ धकेलिदिन्छ । स्वभाव बिगारी दिन्छ र क्रणकाखाल्डोमा निस्कन नसक्ने गरी गाडीदिन्छ । त्यसैले क्षण माग्नेलाईसहयोग गर्नु त्यसलाई पतन पार्न हुनेछ । आत्मसम्मान हराउनाले त्योअगाडि बढ्न नसक्ने हुन्छ । समयसँग, अवस्थासँग आफूलाई मिलाएरलैजान जानेन या सकेन भने त्यो व्यक्ति जतिसुकै विद्वान्‌ होस्‌, आँटिलोहोस, दःख पाउँछ । यही कारण हो, सहयोग गर्दा पनि विचार कसरीपत्याउन पर्छ भने क आत्मनिर्भर हुनबाट कम्जोर नबनोस्‌ । यसअवस्थामा सहयोग गर्नु र दया गर्नु पनि कठिन छनौट हुन्छ । मैले आजयही सिद्धान्तमा रहँदा आफनो घनिष्ठ मित्रलाई समेत गुमाउने संभावना छ&lt;br /&gt;
२७&lt;br /&gt;
॥ घाहा छ मलाई शिवले मेरो वचन सहन सक्तैन । मैले उसलाईखिज्याएको उसको अवस्थाप्रति होइन, उसले क्राण लिलुको सद्दा आफनोस्थितिसँग सम्झौता गरोस्‌ भनेर उसलाई सुझाउ दिएको मात्र हुँ । क्रणमाग्ने कर्म कस्तो हो भनेर देखाएको हुँ । उसले मेरा भनाइको अर्थ जेजस्तो लगाए पनि मकहाँ फर्केर त क अवश्य आउँदैन । सायद अरूकहाँपनि माग्न गइहाल्न अलिक सङ कोचले गर्दा हतोत्साही अवश्य होला ।यही नै मेरो विजय हो र साथीमाथिको सहयोग पनि हो ।&lt;br /&gt;
प्रतापले यसो भनेर आफूता मनलाई बझाउन खोज्छ । क सोच्छशिवले यदि मसँग कुनै काम शुरु गर्ने प्रस्ताव ल्याएर पैसा मागेको भएम त्यो दिन तयार हुन्थें । पैसा मात्र दिएर यसै बस्नै थिइनँ । काममासहयोग पनि गर्थहोला । तर क त्यसतर्फ लाग्नै खोज्दैन । अनि म केगरु ? म आफूनो सिद्धान्त छोड्न पनि त चाहन्नँ । क सफझन्छ, शिवलेखिन्न भएर एक दिन भनिरहेको थियो, &amp;quot;हेर यार, आजभोलि यो दिनकाट्न पनि कति पट्यार लाग्नै रहेछ । सबै काममा गएपछि रित्तोघरमा एक्लै माथितल गरिरहँदा अफिसमा बिताएका समयको याद आउँदोरहेछ । कत्रो फरक हुँदो रहेछ । त्यस बेलाको बेफुर्सतमा सोचिन्थ्यो कतिमेसिन चलेको जस्तो गरी काममा घोटिइरहने &#039; बिदा लिएर घरमाआराम गर्नपश्यो क्यारे । अहिले आरामै आराम पाउँदा यो छटपटी छ ।फुर्सतको मज्जा पनि व्यस्त भएकै बेलामा हुँदो रहेछ जस्तो अति दुःखमासुखको छायालै मात्र पनि कति रमाइलो गराउँछ । यस कहालिलाग्दाअवस्थाबाट बच्ने उपाय नगरी भएको छैन भन्दा प्रतापले दोहो-्याईंभनिरहन्थ्यो, &amp;quot;फेरि अरू कुनै ठाउँमा नोकरी गर्न धाल । देखाइ देक नतिमी नबिक्ने खोटो पैसा होइनौ । समयको प्रयोग गर, यौ अति अमुल्यछ । ती यर्थैमा बित्तै गएका दिनहरूसंग तिम्रो जीवनी पनि छोट्दिदैगएको हुन्छ भन्ने तथ्यलाई नभरल 1 यसै बमिरहयौ भने तिम्रा हयाउनिष्किय हुदै जान्छन्‌ अनि तिमी चाहेर पनि अगाडि बढ्न नसम्ने हृन्छौ। यस कुराको अनुभव मैले गरिसकेकाले तिमीलाई यसरी सल्लाह दिदैछु ।तिमीले अर्को नोकरी गर्नै पर्छु र यहाँ नोकरीको कमी छैन । तिमीहरूजस्ता पढेलेखेकाहरूले त नयाँ व्यवसाय पनि निकाल्न सक्छौ ।&lt;br /&gt;
यहाँ चाहनाको थप्रो बढ्दैछ । कति हिजोको मनोरन्जन आजकाजरूरत भइसकेका छन्‌ । नयाँ ज्ञान, नयाँ जरू्रत, नयाँ प्रयोगले नै नयाँव्यवसायको सिर्जना गराइरहेको हुन्छ । तिमी यसतर्फ लाग्न चाहन्छौ भनेम तिमीलाई सहयोग गर्छु भनेको पनि थिएँ ।&lt;br /&gt;
प्रतापका यस्ता क्राले उसलाई कुनै अप्तर पारेको थिएन । कभन्थ्यो, पहिले मलाई कर्मचारी, हुँ भन्ने प्रमाण प्राप्त गर्नुपरेको छ र&lt;br /&gt;
ब्‌द&lt;br /&gt;
त्यसपछि नोकरीबाट मुक्त भई व्यवसायतर्फ लाग्न सोचैँला । नोकरी गरेरफेरि म नोकर हुन भने चाहन्न । यो पेट पाल्न कुनै समम्या छैन ।समस्या छ भने समयको सद्पयोग कसरी गर्न भन्नेमा छ । यमैले मैलेप्रशासन व्यवस्थाबारे केही लेख्न थालुँ कि भन्ने पनि सोचिरहेको छु । योपनि भएन भने म नेपाल भ्रमणतर्फ लाग्छु । त्यहाँ लकेका जनजीवन,संस्कृति र व्यवसायको अध्ययन गर्छु । अनि नेपालको परिचय दिन्छु ।यसो भन्दै उसले करा ट्ङ्गाइदिने गर्थ्यो ।&lt;br /&gt;
त्यस बेला पनि मित्रको मन फर्काउन प्रतापले हाँसेर, ए त्यसोभए मन्त्री बन्ने विचार लिएको छौँ या प्रधानमन्त्री नै बन्ने इच्छाराखेका छौ : त्यसमा पनि विचार भने गर है, ती मन्त्रीहरूले पनिआफूलाई &amp;quot;जनताको नोकर&amp;quot; भनेर घोषित गरेको पढेकै छौ होला । यसोभन्दा पनि क यसरी जवाफ दिन्थ्यो, “पढेको पनि छु र भाषणमा भनेकोसुनेको पनि छु । कोही जनताको गोकर हुँ भन्दै आए पति होलान्‌ ।तर म त्यस्ता नोकर बनेकाहरूलाई कसरी कजाउन पर्छ, त्यो सिकाउनदेशका कुना कुनामा प्ग्न चाहन्छु । तिनीहरूलाई ठीक तारिकाले राख्नसकिएन भने नोकर बनेर आएका ती मालिक बन्छन्‌ र मालिकहरूनोकर । कुरा बझयौ त तिमीले ? अव पनि तिम्रो केही भन्न बाँकी छ&lt;br /&gt;
छ भने घाँटीमा नै अड्डकाएर नराख ।&lt;br /&gt;
त्यति सानो प्रश्नको यति लामो जबाफ पाएपछि प्रतापले त्यसमाअरू के थपोस्‌ &#039; हुन पनि उसले देख्नै आएको छ, कैयौ नोकरहरूलेमालिकलाई मृर्ख बनाई छक्याएका हुन्छन्‌ । सेवाको नाममा लुट गर्दैउल्टै जण्ड वनेर मालिकलाई काकाककुक्रुक पारेर आफूले रजाइ गरेरबसेका पनि छन्‌ ।&lt;br /&gt;
यस्तै गरी यी दई बीच आ।आफना विचारको प्रस्तति भइरहन्थ्यो। खुसी पनि हुन्थे, रिसाउँथे पनि र छेडछाड पनि गरिरहन्थे । जतिमनमोटाउ वादविवाद भए पनि धेरै दिन टिक्न पाउँदैनथ्यो । यी दुईखोजी खोजी फेरि भेटिहाल्धै र त्यस्तै गरी छलफल गरिरहन्थे ।&lt;br /&gt;
&#039; तर त्यस दिन चोट लागेर फर्किएको शिव प्रतापकहाँ गएकोछैन । शिवले बिर्सने प्रयास गर्दा पति मनले दोहो-्याइ हाल्छ, “सापटलिएको इज्जत कति दिन टिक्नसक्छ ।&amp;quot; उसको यौ भनाइ सत्य भएकालेनै उसलाई धेरै बिझेको छ र प्रतापले यस्तो वचन लगाएर उसलाईतिरस्कृत जानीजानी गरेको हाँ भन्ने ठानेर उसँग धेरै जङ्गिएको छ, साथैअठोट पनि गर्दै छ क छोरीको विवाह गरेर नै छोड्छ चाहे उसलाईझै लिन किन नपरोस्‌ ।&lt;br /&gt;
२९&lt;br /&gt;
छोटकरीमा विवाह गर्ने प्रस्ताव लिएर केटाकहाँ जान सङ्घ कोचलागे पनि जव उनीहरूले केटीका वाबआमाको यस्तो धारणा रहेको चालपाउँछन्‌, केटापक्षले आफनो सहमति दिई यस समस्याको हल गरिदिन्छन्‌ ।त्यसैले पनि शिव आजभोलि दङ्ग परेको छ । उसलाई लाग्न बालिरहेछयो छुटकारा प॒तापको तीतो बचनले नै दिलाएको हो । उसले हिम्मतगरेर आफनो औगात खोल्नसक्ने बनाएको नै प्रतापका व्यङ ग्यले हो ।एक मनले उसलाई धन्यवाद दिने इच्छा उठे पनि अर्का मनले क्षमासमेत दिन चाहँदैन । अझै क त्यही सोचाइमा छ, प्रतापले उसकोनोकरी नहुँदैमा असमर्थ सोफझयो । साथीमाथि गर्नपर्ने व्यवहार समेत धनमोतृजकमा गर्ने छोड्यो ।&lt;br /&gt;
३०&lt;br /&gt;
गाउँबाट आमाले पठाएको चिठी पढेर दिलबहादर ज्यादै चिन्तितभएको छ । लेखिएको छ । तिरो तिर्ने, म्याद नाधिसकैकाले रातोदिनकचकच सुन्न थालेकी छु । यस्तै दःखमा तेरी कान्छी दिदीलाई दुई जियाभएको बेला बात लगाएर घरबाट माइत लगारिदिएकाले अको चिन्ताघपिएको छ । के गर्छस्‌ बाब् त॑ एक्लो छारो भइस्‌ । दुःखका कुरानभनुँ भनै पनि अरू कुनै उपाय पाइनँ र सुताउनै पच्यो । खेतीकाउब्जनीले वर्ष धाउन्न सकिदैन । हुन त तैले पनि विवाह गरिस्‌, त्यहाँकोपनि खर्च बढेकै होला : तर के गर, बर्भेर मात्र गर्जो टर्दो रहेनछ ।सक्छस्‌ भने यही चिठी लिएर आउनेको हात केही रकम पठाइदिएमामलाई होलो हुने थियो ।&lt;br /&gt;
यो सानुको बारे म के गर्छ ? रातोदिन रोई मात्र रहन्छे ।भन्छे, &amp;quot;मेरी आमा, मैले तपाईंहरूको नाक कटाउने काम गरकी छैन ।घरबाट निकालिदिएपछि म तपाईंकहाँ नआएर कहाँ जाड ? बस्नै बास रजिउन गाँस त चाहियो । यस घरको अवस्था जे जस्तो भए पनि मतपाईंका काखमा पर्न आएकी छु । मलाई जा नभन्नु हौला । यौकोखको नानी जन्मने बेलासम्म मलाई राख्नोस्‌ । त्यसपछि म पनि केहीगरेर नै खान्छु । भाइको बोझ म हुन्नै आमा ज म भाइको सहयोगीभई सघाउ पुच्याउँछ्नु ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“सानुमाथि यस्तो अन्याय गर्न पाउँदैनौ” भनेर त्यसको घरमागएर भनिदिने पनि हाम्रो कोही छैन । गाउँलेहरूलाई कुरा गर्ने एउटाबिषय सानु भएकी छे भने क त्यसरी सबैका लागि तमासा बन्नहनु ज्यादै पिरोलिइरहन्छे । गरीब र असहाय हुनु ठूलो दोष हुँदो&lt;br /&gt;
[|&lt;br /&gt;
तेरा बाबुलाई मैले यसरी धन उडाउन थाल्नुभयो भने&lt;br /&gt;
छोरानातिले द्‌:ख पाउलान्‌, धनको इज्जत गर्नुपर्छ भन्दा ठाडौ जवाफ दिंदै&lt;br /&gt;
३१&lt;br /&gt;
भन्नुभएको थियो, &amp;quot;आफैले कमाउँछन्‌, अनि जे मन लाग्छ गर्छन्‌ ।&amp;quot;भएका राम्रा(रामा गराहरू बेचिए, सुनाचाँदी केही रहेन, न त मन्त्री बन्नसके, हामीजस्तो गाउँले किसान -ले चनावमा भएभरको संपत्ति लगाएरपनि हार्नु परेकाले त्यही नै, मृत्यको कारण बनेर आफू बित्नुभयो ।&lt;br /&gt;
आजभोलि आफूनो पेट कोक्याएको बेला ती हाम्रा बेचिएकागरामा झूलेका बालाहरू देख्ता र मैले लगाउने गरेका बाआमाले दिएकाती ढुङ,गीमुन्द्री अरूका कानमा झुण्डिएका देख्ता यो मन यतै घस्धरुरुन्छ । ती गहनाहरू बा अङ ग्रेजको फौजमा हुँदा उतै बिदेशको नमूनाल्याएर बनाएकाले नौला र निकै राम्रा थिए । आफना हातबाट गएकातिनलाई किन हेर भने पनि कसो कसो आँखा तिनैमा परिहाल्छन्‌ अनिआफूना बाआमादेखि ल्याएर सबै कुरा संझन थाल्छु । त्यस मोरीले पनिनकुच्याएर त्यही अर्काको जडौरी लगाएर के हिँड्नु परेको होला जस्तोलाग्छु । मलाई त्यस्तो लागेर के गर्नु, उसलाई त्यो देखाएर नै मलाईइख्याउने मन छ कि !&lt;br /&gt;
हामीले आफू जल्दोबल्दो हुँदा उसको भाइका लागि तेरा दिदीकोहात माग्दा “दिन्नौं” भनेका थियौं । त्यस बेला ती परिवार अलिखस्केका थिए । त्यो रिस अझैँ मरेको छैन जस्तो छ ।&lt;br /&gt;
तेरी कान्छी दिदीले अहिले दु:ख पाउनाको मुख्य. कारण पनि यहीघन हो । जेठीको विवाह जति गरगहना दिएर गरेका थियौं त्यति नैकान्छीका पालामा दिन सकेनौं । आशा लागेको थियो होला, के गर्नेत्यस वेला हामी आर्थिक सङ कटमा परिसकेका थियौं ।&lt;br /&gt;
यी दुःखका कुरा बताएर कहिल्यै अन्त्य हुँदैन । यति भए पनितैले बुझनु पर्ते आवश्यक भएकाले लेखाउन लगाएकी हुँ । दुवैतर्फ ठिक्कहुन खोज्नेले पाउनुपर्ने सजाय तेरा बाबका स्थितिमा पुग्नु रहेछ । तँ भनेकहिल्यै दुई जिब्रे नबन्न्‌ र फाइदाको खोजीमा आफै नहराउनू ।&lt;br /&gt;
अँ, बुहारीलाई कस्तो छ । दुई जिया त्यो पति भई कि भएकीछैन ! नाति हेर्ने इच्छ्ला त पुग्याइदैलास्‌ । बुहारीले नानी पाउने भई भनेयहाँ पठाइदिनू । तैले त्यहाँ कं जान्लास्‌ कुन बेला के गर्नपर्छ ?&lt;br /&gt;
राधालाई, हाम्री बुहारी हुन लेखेको रहेछ र तेरा बाले त्यसलाईसानैदेखि खुबै मनपराउनु हुन्थ्यो । तिमीहरू खेलिरहेको देखेर भन्नुहुन्थ्यो,“हेर त दिलेकी आमा, यो राधा कति राम्री छे । यसको बोली कतिमीठो छ । गाउँ घरमा जन्मी, नत्र यसले गाना गाउनेमा तालिम लिईभने निकै नाम कमाउने थिई । कोइलीको स्वर त तीखो मात्र हुन्छयप्तकोमा त मिठास छ ।” मलाई तेरा बाबले गरैको यो टीकाटिप्पणीकत्ति मन परेन र खिजाउँदै भनेकी थिएँ, “गाइनेमा नाम कमाएर कुन&lt;br /&gt;
बेर&lt;br /&gt;
ठूलो भइन्छन्‌ र ! अर्काकी छीरीलाई नानाथरी नभन्नोस्‌ है । त्यप्तकाबाबले सने भने झन्‌ हामीमाथि वैरभाव बढ्छ ।!&lt;br /&gt;
मुर्खहरूले मात्र यस्तो क्रा गर्छन्‌ । गाउने भन्दैमा सबैले सक्नेहुन्‌ र ? स्वर, शक्ति र तालिम तीनै कुरा मिल्नुपर्छ । त्यसमा पनि स्वरर शक्ति प्राकृतिक देन हो जसलाई तालिमले निखारेर सुर ल्याउन सकेमात्र पनि पारङ्गत भइन्छ । यो त कला हो, प्रतिभा हो । यसलाईसाधारण नमान ।&amp;quot; २&lt;br /&gt;
“साधारण कहाँ मानेकी छु र ? गाउँमा सबै चेलीहरूले भन्दाराम्रो यसैले गाउन जानेकी छ । खालि स्वर सुनाएर के ठूलो भइन्छभनेकी मात्र हुँ । छोरीले ठूलो स्वर समेत नगर्न भन्छन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
मैले यति के -भनेकी धिएँ तेरा बाब उफेर झण्डै मलाई हानुँलाजस्तो गरे । म वाल्ल परेँ किन रिसाएको, मैले के नचाहिने बोलें ।केही थाहा पाउन सकिनँ । ठूलो स्वरले उहाँ कराएकाले सदाको झैं मच्‌प लागेँ । अहिले त्यसको अर्थ बुझ्दै आएकी छु र एकरफेर त्यसकोस्वर सुन्ने इच्छा छ । कहिले राधालाई यहाँ पठाउने सुर गरेको छस्‌,अबेर भने नगर है मेरो, ज्यानको के भरोसा &#039; एकपल्ट नातिलाईकाखमा लिइहानुँ । नातिको मुख हेरे एक सिंढी उक्लिइन्छ भन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
हालको गर्जो टार्नलाई केही रकमको&#039; बन्दोबस्त गर्ने नै छस्‌ भन्नेआशा राखेकी छु ।&lt;br /&gt;
शुभ आशिष्‌ ।&lt;br /&gt;
चिठी सबै पढिसकेपछि रणबहादुरसंग दिलेले सोध्छ, “को चिठीलेख्ने पनि कहीं तिमी नै त होइनौँ ?”&lt;br /&gt;
“अक्षर चिन्यौं कि कसो ? यसमा मैले जे लेखेँ त्यो कुनै बट्टाबनाएर लेखेको छैन । ठूलीआमाले मनको वेदना पररर पोख्तै जानुभयोमैले त्यसैलाई टिपेर लेखिएको मात्र हो । मकहाँ आएर भन्नभयो,“ तैलेभाखा मिलाएर लेख्न जानेको छस्‌, दिलेलाई एउटा चिठी लेखिदेन भनेपछिमैले लेखेको हुँ । ज्यादै दिक्क भएर भन्नुहुँदै थियो, &amp;quot;के गर्नु आफूलेलेखपढ गर्न नजान्ताले आफूना मनका कुरा पनि आफूले अरूलाई भनेरछुन 21 हुँदो रहेछ । हाम्रो यौ कथा अरूलाई नभने है भनेर अनुरोष्&lt;br /&gt;
गर्नुभयो ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
तिम्रो यही खुवीले त हो, मलाई लोभ्याइरहेको । स्कूलमा पढ्दापति तिमीले कविता लेखेर कथा सुनाएर सबैलाई धुरुधुरु रुवाएको यियौ। यसले पछि लक्ष्मीप्रसाद देवकोटाको ठाउँ लिन्छ भन्दा म तिम्रो रित्तगर्दै लेख्ने कापी लुकाइदिन्थेँ । तिमीलाई यस कुराको संझना छ ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
३३&lt;br /&gt;
“किन नसम्झन्‌ । म पनि त त्यो खोजेर ल्याई गरूलाई भनेरतिमीलाई पिटाउँथे । &amp;quot;हेर रणे, मलाई यस्तो हुन्‌ लेखेको रहेछ । त्यसैलेसानैदेखि बुद्धि पनि त्यस्तै हुँदै गयो । बाचन्जेलसम्म त स्कूल गएको नैथिएँ । त्यस बेला पनि पढ्नमा भन्दा बढी मन यताउति चहानु, खेल्नुवन।जङ्लमा पसेर ढुकुर, चराचरुङ्डी मारेर हिड्नुले गर्दा कुनै तरक्की गर्नसकिनँ । बा बित्नभएपछि घरको मालिक बनेको मैले कसलाई टेर्ने ?पढ्नमा वाक्क लागेको मैले आमालाई हँदै जब गरुले मैले जति पढे पतिपास गारेदिँदैनन्‌, पिट्छन्‌ मात्र । अब स्कूल जादै जान्न, भनेर सुनाएँ ।उनले पनि पढाइमा म अब खर्च गर्न सक्तिनँ, नजाने भए नजा भनेरसमर्थन गरिन्‌ । त्यो माया थियो कि के थियो ? त्यसरी पढाइबाटछुट्कारा लिएको म अहिले यस रूपमा छु । केटाकेटीको भ्रविष्य बा।आमाका हातमा हुन्छ भनेको सत्य हो, रणे एक्ली मैले के मात्र हे ?अब तैले मेरा साथमा खेतीपाती गर्नपर्छ भन्नका बदलामा उहाँले एकचड्कन मलाई दिएर लौ स्कूल जान्नँ भन्‌ भन्नुभएको भए....? त्योउमेरमा हामीले के नै जानेका हुन्छौं र : त्यस बेला समाल्ने बाआमा नैहुन्‌, रणे उनै हुन्‌ ! तिमी र म नै एउटा उपमा भएका छौं । तिमीमास्टर छौं भने म नोकर । उ हाँस्छ र सोध्छ, “आजभोलि स्कूलमाकतिका केटाकेटी पढ्न आउँछन्‌ &#039; काम त प्रशस्त पाएकै छौंहोला ! &amp;quot;&lt;br /&gt;
“पाएकै छु भन्नपन्यो । राम्रो नोकरी गर्न पढ्नपर्छ भनेरतम्सिएका त घेरै छन्‌ तर ज्ञान बढाउनलाई पढ्नु भन्नेचाहि छँदैछैनन्‌, “भाग्यमा ठूलो जागिर खाने मन्त्री हुने लेखेको भए पो पढ्नजान्छन्‌ दुखै भोग्ने कर्म लिएर आएकालाई हामीले मुख दुखाएर केहुन्छ ?”&lt;br /&gt;
“उहिले उहिले पढ्नको अर्थ ज्ञानआर्जन मानिन्थ्यो । ठाउँ ठाउँमाभेला भई ज्ञानोपदेश दिन्थे । धर्मैको कित नहोस्‌, नीतिज्ञान जीवनआदर्शको कुरा सुन्न पाइन्थ्यो । अहिले यस्तो केही छैन । भेलामा सुन्नपाइने नेताको आफनो र आफनो पार्टीको बढाइचढाइ मात्र हो । सबैबदमास, सबै मुर्ख केवल आफू र आफूनो पार्टी मात्र देशभक्त भन्नेसुनाउँछन्‌ र जान्छन्‌ । यस्तो सुन्दा र तिनका गति देख्ता लाग्छ भक्ति३ त काठमाडौंमा छ र देश मात्र पूर्व मेचीदेखि पञ्चिममा महाकालीसम्मफै नएको छ । देश र भक्ति कहिले जोडिने हो र देशभक्त निस्कन्छन्‌ ?&lt;br /&gt;
दुबै हाँस्छन्‌ । राधाले खाना ठीक पार्छे । दिलबहाद्रलाई घरकोखवर सुनेर दिक्क लागे पनि रणेको सत्कारमा कुनै कमी नपार्न खल्लोहाँसो हाँसीरहन्छ । मनले भने गुन्दै हुन्छ, अब पैसा कहाँबाट ल्याउने ः&lt;br /&gt;
३४&lt;br /&gt;
दिदी र आमाको अनुहार थालमा पस्किएका भातमा देख्छु । उरुलाई लाग्नघाल्छ ती दिदी र आमालै उसंग भनिरहेका छन्‌ः एक गाँस अन्न यतापनि फयाँकी देकं, हेर हाम्रा पेट सारङ्गी जस्ता भइसके । &amp;quot;क्रणमा परेकाखेत गराहरू धेरैजसो निश्चनी सके पनि त्यसमा काम गरेर अन्नउब्जाउने कसलै : मेरा यी हाँड मक्किसकेका छन्‌ । छोरीको अवस्थाराम्रो छैन । अब तैंमाथि मात्र हाम्रो आशा छ, बाव ।&amp;quot; दिलबहादुरआफना मनले उब्जाएका यस्ता आमाका वबिलौनादेखि डराउँछ ।&lt;br /&gt;
राती सुत्ने वलामा दिलबहादुरले राधालाई चिठीको बेहोरा सबैबताउँछ । त्यस्ता मार्मिक क्रा सुनेर राधा पनि चिन्तित हुन्छे र जसक्कउठेर गई आफना भएभरका गहना ल्याएर लोग्नेलाई दिदैं भन्छे &amp;quot;यीगहना धरौटी राखेर हुन्छ या बेचेर हुन्छ, आमाकहाँ पैसा पढाइदिनोस्‌ ।कमाउँदै गयौं भने यस्ता गहना पछि बनाउँला ।&lt;br /&gt;
गहनाको पोको लिएर उभिएकी राधाको अनहार र उसकाहातका पोकालाई हेर्दै स्तम्भित भएकै दिलबहादरलाई देखेर राधा आफनोहात अगाडि बढाउँदै फेरि भन्छे, “लिनोस्त किन अन्कनाउन भएको ? योहाम्रो आफूनौ त हो ।&lt;br /&gt;
&amp;quot;तँलाई थाहा छैन राधा, यी गहना गहना मात्र हुन्‌, धनकोआवश्यकता यिनले प्रा गर्न सक्तैनन्‌&amp;quot; दिलबहादरले यति मात्र के बोलेकोथियो बीचैमा कुरा काटेर राधा भन्छे, “सक्तैन रे ? किन सम्तैन !गहना नै त हो, जरूरत परेका वेला बेचेर हुन्छ या बन्धक राखेर हुन्छ,खाँचो टार्न । यो नलगाएर म मर्दिन तर त्यहाँ पैसा नपुगे जे पनिहुनसक्छ । त्यस्तो परेको रहेछ । साँचै भन्ने हो भने मलाई गहनालगाउने सोख पनि छैन ।&lt;br /&gt;
दिलबहाद्रलाई राध्याका यस्ता पश्नले उसका घैर्यलाईखलबलाईदिन्छु र अलिकति ठूलो स्वरमा दिक्क हुँदै भन्छ, “सक्तैनभनेपछि चप लागेर थन्काउन्नस्‌ : यी पित्तलका गहना हुन्‌ ।यसबाट के पाइन्छ र बेच्छेस्‌ ः तेरो यस्तै जिह्रीले मलाई मख्चै फोर्न पर्नेपार्छ ?” यति भन्दै क अति अफशोच मानेर बस्छ ।&lt;br /&gt;
राधा पनि दिलबहादुरको कुरा सुनेर जिल्ल पर्छै र हँदै भन्छे,कति मलाई छक्याउनु हुन्छ &#039; अब त लाग्न लागिसक्यो कहीं तपाई नैपनि उही दिलबहाद्र हो कि होइन : किन तपाईंलाई यस्ता गहनाल्याएर विवाह गर्नुपर्थ्यो ? कसलाई के रवाफ देखाउनु परेको थियो ?भन्नोस्‌, तपाईले अरू पनि कुरामा मलाई ढाँद्न्‌ भएको छ भने आज मसबै सुन्न चाहन्छु ।&amp;quot; यसो भन्दै ती गहनाहरू भुङै भरी छरिदिन्छे ।&lt;br /&gt;
३&lt;br /&gt;
कोठो पहेला गहनाले सिगारिन्छ्‌ । दिलबहादुर र राधाका आँखा त्यसैमानाच्न थाल्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
दिलबहाद्र केही बेरपछि साम्य भएर संझाउँदै भन्छ, &amp;quot;के गररत, मैले पनि : तँलाई मन पराइहालैँ । तेरा बाबले गहना नल्याएरबिवाह गर्न आएँ भने छोरी नदेलान्‌ भनेर यिनै पित्तलका भए पनि लगे ।यस्ता महगीमा सुना।चाँदी कसरी जोड ः यसलाई राखी राख, यसरीफयौक्ने होइन । गाउँमा कसलाई के थाहा हुन्छु : कसीमा घोटेर जाँच्नेहोइन । हैर्दा राम्रा छँदै छन्‌ । कसले भन्न सक्छ यी पितल हुन्‌भनेर :&lt;br /&gt;
“राम्रो छ अभ लगा भन्दै हुनुहुन्छ । म त लगाउनन्न यस्ताजे पानि यस्तै दिनुहुन्छ र लगा भन्नुहुन्छ म पनि अब कमाइ गर्नथाल्छु ।रेडियो नेपाल र नेपाल टेलिभिजनमा गाना गाउँछु । कति झूठभूरुमादिन काँटने :&amp;quot; हिक्क हिक्क गर्दै रुन्छ ।&lt;br /&gt;
“ए मेरी राधा, यसरी दुखी नहो न ? के मेरो इज्जत राख्न भएपनि गाउँमा जौदाँ यी गहना लगाउन्नस्‌&amp;quot; भन्दै ती छरिएका गहनाबटुलेर दिन्छु । लोग्नेले मायाल स्वरले भनेका कुराले छिट्टै प्रभावितभइहाल्छ र ती गहना समातेर नबोले पनि टाउको हल्लाई लगाउँछु भन्नेसङ्केत दिन्छे । उसका मन्जुरीले दिलबहादुर ज्यादै खुसी हुन्छ र ढाडसदिदै संझाउँदै भन्छ, &amp;quot;कुनै वेला हाम्रो पनि राम्रो दिन आउला, अनिसक्कली गहना लगाउलिस्‌ । त्यतिन्‌जेललाई यस नक्कली समाजलाईनक्कली नै गहना लगाएर देखाइदे । म तँलाई तेरै इच्छा अनुसार गानागाउन पठाइदिन्छु । दया मैयासंग भौलि नै कुरा गरी हाल ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
राधा दिलबहादुरले त्यति भनेपछि आफूलाई समाल्न सक्तिन रबिस्तारै दिलबहादुरको नाजकै गएर ट्सक्क बस्छे । दिलबहादुरले उसलाईअड्रालामा लिएर निकै वेरसम्म संझाइरहन्छ । चित्त बुझे पनि नबुझे पनिराधा दिलबहाद्रका कुरामा फैरि पत्याएर आफूलाई सुम्पिनुभन्दा अर्कोकुनै उपाय पाउँदिन । क उज्यालो भविष्यको आशा गर्दै दिलैको सबैआश्वासनमा फेरि विश्वास गर्दै संझौता गर्दै जान्छे ।&lt;br /&gt;
नै&lt;br /&gt;
३६&lt;br /&gt;
शिव खड्काको आज पेसीको दिन छ । क अड्डा जानेतयारीमा छ । गौरीले यसपटक पनि लिएर घरमा बसेकी छै, हरेकपेसीका .दिन क घरैमा शिवलाई पी बस्छे किनाक उसलाई शिवकोस्वभाव राम्री थाहा छ; मृद्दा हारियो भने के गर्ने भन्ने कुराकोचिन्ताभन्दा बढी, उसले हार्नु पत्यो भने के गर्ने हो भन्ने सोचेर त्राहि ।त्राहि भई फैसला सुन्न पर्खिरहेकी हुन्छे ।&lt;br /&gt;
मोजा लगाउँदैको शिव मनमनै गनगुनाइरहन्छ । सोच्छ, आजमेरो जित भयो भने पहिले म त्यही मलाई फुस्काउने हाकिमकहाँ जान्छुर हारेँ भने ..... ? ती हराउनेहरूको योग्यता जाँच्न थाल्छु । कुनपानीका तहमा रहेर न्याय दिलाउँदा रहेछन्‌ भन्ने पत्ता लगाई न्यायकोपरिचय कि आफू लिन्छु कि तिनीहरूलाई बताइदिन्छु । यसका लागिजनसकै, जस्तोसकै बाटो समात्नु परे पनि म छोडदिनँ । मलाई बदमासअहिलेकाले भने पनि आउने पुस्ताले वाहा पाएर भन्नेछन्‌ &amp;quot;त्यसबेला पनिबोल्ने जिउँदो मान्छे रहेछ ।” देश मसान नभई जिउँदो नागरिकलेभरिएको बस्ती पो रहेछ । खान, लगाउन र बस्नका जरुरत पुरागरिसकेपछि पनि व्यक्तिलाई समुह जीवन यापन गर्न अर्को जरुरतन्यायको पर्दो रहेछ । उसलै इमान दिएर इज्जत खोजिरहेको हुँदोरहेछ ।&lt;br /&gt;
संझन्छ, त्यो दिन जब उसले निष्कासनको सूचना पढेर चिठीबुझेको थियो र हाकिमका कक्षमा सरासर पुगेर त्यसको अर्थ सोद्धाजवाफ पाएको थियो, &amp;quot;के गर्ने हामीले तपाईलाई बचाउन यति गरेनौं,यहि भनेनौं तर हाम्रो क्रा सुने पौ ! आखिर निर्णय अनुसार गर्नैपम्यो । हामीले तपाईंलाई त्यस वेला पनि नसंझाएका होइनौं । मान्तुन भिएन । उल्टै हाम्रो विरोध गर्दै हिडन थाल्नुभयो । हामी नोकरी गर्नेलै&lt;br /&gt;
३७&lt;br /&gt;
कन सरकार हुँदा के भन्न सक्छौँ : लगाए अह्याएको खुरक्क गर्नै पर्दोरहेछन्‌ । देशको कानुन, प्रशासनिक नियम सबैमा उनैको बौल भएकोबेला हामीले भनेर के हुन्छ : जति म्या... म्या... गरे पनि बोकाकोजन्म लिएपछि दीर्घाय हुन पाइन्छ र ः &amp;quot;&lt;br /&gt;
शिव खडकाले पनि पतिकार गर्दै यसरी भनेको थियो, &amp;quot;दैनिकगीता पाठ गर्ने तपाईको यो सोचाइ &#039; धर्मको लडाईँ गर्न उक्साउनेगन्थको पाठ गर्नाको नतिजा यस्तो निस्केको देखेर मलाई तपाईंहरूप्रतिखेद लाग्दै छ । के ज्ञान प्राप्तिका लागि, के मोक्षका लागि पाठ गर्नुहुन्छजब त्यसले बताएका चालमा चल्न सक्नुहुन्न भने : मेरो तपाईसँगकाप्रश्नको मतलव तपाईको सफाइ सुन्ने होइन । मेरो खोज मेरोनिष्कासनको आधार र भुल केहो ? तपाईले के गर्नु भयो, के भन्नु भयो,त्यो त यस नतिजाले नै देखाइसकेको छ ।&lt;br /&gt;
केही समयसम्म दुवै चुप लागेपछि शिव खड्का त्यहाँबाट फर्केरघरतर्फ लागेको थियो । घरमा पुगेर आफूलाई नियन्त्रणमा ल्याउन तवलाबजाएको र त्यसलाई घचेड्दा फुटेको सम्झेर हाँस्छ । त्यस्तै गरीसम्झन्छ, त्यस बैलकी क कोठाभित्र पस्ता छोराछोरी सबै जम्मा भएरबसेका थिए र गौरीले भन्दै थिई, “नोकरी पेशा नै यस्तो हो हुँदा पनिचैन दिँदैन र सक गा पनि आनन्द हुँदैन । तेरो बाब जस्तो समयलाई सधैँयमै खेरफाल्त हन भन्नेले अब के गर्छन्‌ कन्नि&lt;br /&gt;
शिवले त्यसै प्रश्नलाई टिपेर भनेको थियो, के क्रा गरछर्यौ तिमी२? चैन लिन आनन्द भोग्न भनेर पनि त नोकरी गरेको होइन नि ?सुन, प्रत्येक पेशामा उस्तै चिन्ता र छटपटी हुन्छ र यही बेचैनीलेउन्तति पनि गराउँछ । त्यसमा हुनुपर्ने दुई कुरा छन्‌, न्याय र इमानदारी। तेरा बाबुले यस पेशामा रहँदा इमानदारी दियो तर पाउनु पर्ने न्यायभने पाएन । त्यसैले म न्यायको धुक/धुकी अझै कतै लुकेको छ किभनेर खोज्ने प्रयास गर्छु । मलाई विश्वास छ, सत्य हराउँदैन रतिमीहरूमाधि पनि मलाई आशा छ, यस लडाइँमा साथ दिनेछौं । मबहकिएँ भने पनि समाल्नै काम तिमीहरूले गर्नुपर्छ । हाम्रो निर्दिष्ट लक्ष्ययही हो । यसलाई नबिर्सिएर परिवारको धर्म प्रा गरेँ । नोकरी गयोभनेर मलाई पीर लागेको छैन, लागेको छ भने न्याय कता गयो भन्नेमाछ । समाजभित्र रहेर बाँच्नलाई चाहिनै बन्धन नै यही न्याय हो । यसैलेअधिकारको सुरक्षा गरेको हुन्छ र कर्तव्य जन्माएको हुन्छ । यी तीनैन्याय, अधिकार र कर्तव्य हुन्‌ जसले हामीलाई पशृजगत्‌बाट छुट्याएरबेग्लै प्राणी सबैभन्दा श्रेष्ठ जीव बनाएको छ एउटा समाजको सिर्जनागरर ।&lt;br /&gt;
उद&lt;br /&gt;
बाबको मनस्थिति र उसको जीवनको परिभाषा बुझेका तीछोराछोरीले पनि &amp;quot;आफूले उसलाई सहयोग गर्नेछौँ, तपाईं निश्चिन्तहुनोस्‌&amp;quot; भनेको संफन्छ ।&lt;br /&gt;
यी सफनाले शिवलाई सन्तानमाथि गर्व गराउँछ र संझनाजगत्‌बाट जाग्रत्‌ भई फटाफट तयार हुँदै टेम्पो बिसौनीतर्फ लाग्छ ।त्यसबेला नौ बजिसकेको थियो ।&lt;br /&gt;
विक्रम टेम्पोको ट्यार्‌ ट्यार्‌ आवाज र त्यसले पछाडिबाटफूँयाकेको धुवाँ यति पिरो थियो, क नाक रगड्दै मन्त्रीसंग भेट गर्नजाँदा भएको वार्ता संझन्छ ।&lt;br /&gt;
धेरै व्यक्तिहरू मन्त्रीसंग भेट गर्न बाहिर क्रिरहेका थिए । त्यसधेरै माझ पनि उसको अनुहार देखेपछि मन्त्रीज्यूले पहिले उसलाई नैबोलाएर भित्री कोठामा लगैर त्यहाँ आउनाको कारण सोधेका थिए ।शिवले बाटाभरि मन्त्रीज्यूसंग भेटेर उसलाई निष्कासन गराउनाको कारणके हो भनेर यसरी सोध्छु भनी गुथेका कुराहरू सबै मन्त्रीज्यको शिष्टभाषा र सौहार्दपूर्ण व्यवहारले गर्दा कताकर्ता पुच्याइदिएकाले यति मात्रसोध्न सकेको थियो, “तपाईलाई धन्यवाद दिन आएको प्रजातन्त्रकोपनःस्थापनापछिको पहिलो फल हामीलाई नै चखाउनु भएकाले गर्वलाग्यो । हो, काम सिद्धिएपछि ती रित्ता ट्वाकहरूलाई यसरी नै पन्छाउनपर्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
मन्त्रीज्यले छक्कै परेर भन्नुभएको थियो, “के तिनीहरूले तपाईलाईपनि पारेछन्‌ &#039; कति वर्षको नोकरी भएको धियो : ३० वर्ष पुगेकोअवश्य थिएन होला ? यहाँ यस्तै भइरहेछ । एउटा कुरा भन्यो, अर्घकोअनर्थ लगाइदिन्छन्‌ । आ।आफूनो मतलव जताबाट पनि प॒न्याइहाल्छन्‌ रहामीलाई बदनाम गराउँछन्‌ । जब काम फत्ते भइसक्छ अनि मात्रहामीलाई थाहा हुन्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;मेरो मात्र क्रा नगर्नोस्‌ न तपाईं पनि ? जहाँ जाक आफ्नैसफाइ मात्र लिन आएको संभझन्छन्‌, नोकरीबाट झिक्न कुनै आधारचाहिन्छ र ३० वर्षको कुरा गर्नुहुन्छ ! ६७ वर्ष मात्र नोकरी गरेकापनि के निष्कासित भएका छैनन्‌ र ? फेरि यो तीस वर्षको नोकरीकोअवधि तोकेर के फाइदा हुन्छ भन्ने सोच्नु भएको छ ? यसले यतापूर्वाग्रह राखेको हो कि भन्ने झल्केको छ भने उता अनुभवी दक्षप्रशासकहरूको कमी भएको छ । जागिरदारहरूले न्याय पाएका यही होत ! मलाई निकाल्नाको के आधार हो, त्यो मलाई भन्न सक्नुहुन्छ !सक्नुहुन्न भने यसलाई पनि दमन नीति नै भन्नुपर्छ । संझनोस्‌ २०४६प्तालमा हामी जागिरदारहरूले पनि साथ नदिएको भए, के हुन्थ्यो&lt;br /&gt;
३९&lt;br /&gt;
मन्त्रीज्युले पनि अनजिलो मान्दै भनेका थिए ।“हामीले ३० वर्षकोअवधि तोकेको कुनै पूर्वागह राखेर होइन । यो पञ्चायत कालकोशासनजबधिसँग प्रसङ्ग मिल्न गएको मात्र हौ । हाम्रो कुनै उद्देश्य यसमाछैन । अलि रोषका साथमा भनेका थिए, “हेर्नोस्‌ हामीले मात्र के गर्ने ?एउटा . क्रा भन्यो अर्को, गरिदिने त छँदैछ । त्यसमाथि के कस्तो हुँदै छ,त्यो समेत भन्दैनन्‌ । अरू त के तपाईलाई निष्कासन गरेको कुरा समेतभनेका छैनन्‌. । को इमान्दार छ, को छैन भन्ने छुट्याउन सक्ने क्षमतायिनीहरूमा नभएकाले त हामीलेमाथिदेखिनै पजनी गर्नुपरेको हो ।&lt;br /&gt;
हुनु नपर्ने जे थियो, त्यो, भइहालेछ । अब केही दिन पर्खनोस्‌कुनै संस्थानमा जनरल म्यानेजर नै बनाइ दिउँला । यता तपाईले नालिसदिनोस्‌ । आफनो अधिकार यसै छोडन हुँदैन । प्रशासकहरूले मौका पाएभने हामीलाई झुक्याउन खोज्छन्‌ । त्यसै बेला भनेका थिए । हामीप्रशासनद्वारा नै बदला लिन्छौं । जागीरदारहरू : पनि थरी थरीका छन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
मन्त्रीका यस्ता कुरा सुनेपछि मनमा लागेको थियो, उसलाई- निष्कासित गर्ने मन्त्रीचाहँ नहुन सक्छ । त्यसो भए को हो त : हाकिमभन्छामाथिको आदेश भनेर माविको भनाइ यस्तो: छ : के यी सबै दोषलिनबाट उम्कन खोजी रहेकात छैन ? यस्तालाई यसै छोडन हुँदैन भनेरशिवले भझोक्किएर भनेको थियो, “जसलाई निकाल भन्नुभएको भए पनित्यो जागिरदारप्रति गरेको अपमान नै हो । भ्रष्टाचारीलाई राख्नु पनिहुँदैन र निर्दोषलाई पनि हुँदैन । त्यसैले दोषको किटान गरेरमात्र निष्कासन गर्न । प्रशासनमा सुधार ल्याउनलाई यसो गरेकोभन्नुहुन्छ भने नियम कानुन, नीति, उद्देश्यलाई समयसापेक्ष बनाउदै लैजानुजरूरी हुन्छ ।&lt;br /&gt;
ती जागिरदारहरू हिजो त्यो व्यवस्था हुँदा पनि त्यसै मुताबिकचले कै थिए र आज यौ व्यवस्था आउदा पनि सुहाउँदो छपले चलिनैहाल्छन्‌ । त्यस्ता नियमकानुनका पालकलाई चलाएर के उपलब्धि पाउनेआशा लितुहुन्छ ! बरु अनुभवीहरूको खाँचो पर्नगई प्रशासनमा सुस्तीअरू बढ्नसक्छ । : प्रशापन चलाउनुलाई , सजिलो नठान्नोस्‌ र यसलाईमहत्वहीन पनि नढान्नोस्‌ ।”&lt;br /&gt;
“आफना - तरिकाले काम चलाउने, आफूले विश्वास गर्नसक्नेब्यक्ति पनि, त ठाँउठाउँमा हुनपर्छ । जुन कुरामा पनि नियमै मात्रतेर्स्याइराख्ने प्राना शैलीमा हिंडनेलाई . राखेर पनि त काम राम्रो रछिटोसँग हुन सक्तैन । उनीहरू सक्षम र अनुभवी छन्‌ भने अहिलेहातमा पैसा परेका बेला नयाँ व्यवसायतर्फ पनि लाग्न सक्छन्‌ । हाम्रोआर्थिक नीति खुला बजारको स्थापनातर्फ छ जसअनुसार धेरै व्यवसाय&lt;br /&gt;
0&lt;br /&gt;
खुल्त सक्छन्‌ । बेरोजगारी हट्छ. र साथसाथै प्रतिपर्धा बढ्नाले देशमागुणात्मक प्रगति आउन -सक्छ । यसलाई नकारात्मक दृष्टिले हेर्नु हुँदैन ।&amp;quot;यति भनेर मन्त्रीज्यु टकटकिएका थिए ।&lt;br /&gt;
&amp;quot;ए, यस्तो घुमाउरो बाटोबाट विकास ल्याउने लक्ष्य राख्नु भएकोछ भने त्यसलाई छिटै &#039; बदल्नेतर्फ लाग्नुहोला, नत्र हामीले ल्याएको२०४६ सालका उपलब्धिलाई बाथको रोगले डल्ल्याइदैला । तपाईंहरूलाईनियम तेर्स्याउने पनि मन पर्दैन र नियम तीड्ने पनि । तपाईहरू -केचाहनु हुन्छ, त्यो आफैँलाई थाहा छैन । मलाई फेरि यस्तो नोकरी गर्नुछैन केको जनरल म्यानेजर हुने !”&lt;br /&gt;
शिवलाई यस संझनाले हाँसो उठाउँछ । विद्यार्थी युनियनकोझण्डा उठाएर उससंगसँगै पढ्ने त्यो साथी आज मन्त्रीज्युका हुँदादेखिएका फरकलाई केलाउँदै मनै संगभन्छ, “यसले राजनीतिका क्षेत्रमासमर्पित भएर पाएको उपलब्धि के यसरी बोल्न जान्ने मात्र हो ? लामोसमयसम्म राजनीतिमा निष्किय भएर रहन पर्दा उसले के सबै बिर्सिसकेछ? राजनीतिको पनि आफनै तरिकाको नैतिकता -र निष्ठा हुन्छ । कहाँगए ती सबै ? यसरी मनमा कुरा खेलाउँदाछेलाउँदै कति बजिसक्योबिसंन्छ र एउटा टेम्पोमा तछाड मछाड गर्दै पस्छ । भित्र पसेपछि थाहाहुन्छु, त्यसरी लडाईँ गर्नै नपर्ने थियो, एउटा सिट अझै खाली नै छ ।हामीमा आएको हुलदङ्गा गर्ने प्रवतिलाई संझेर क आफै विषादित हुन्छ ।&lt;br /&gt;
टेम्पो आफना गतिमा गुड्दै, थियो, एउटा यात्रीले हात उठाएररोक्ने सङ्केत गर्छ । ड्राइभरले गृड्दागददैका टेम्पोलाई ध्याच्च अडाउँछ |सहयात्रीहरू आपसमा ठोकिन्छन्‌ र कराउँछन्‌ &amp;quot;ऐया! झण्डै मारेको ! केगरेको यस्तो जथाभावीसँग ब्रेक, लगाउनु हुन्छ ? कसो पल्टैन !”&lt;br /&gt;
चढ्न पाउने यात्री शान्त छ । क टेम्पोभित्र फैलिएर बसेकायात्रीहरूलाई अगाडिसरेर पछाडिको सिट खाली पार्न भन्छ । टैम्पोड्राइभरले कराउने ती यात्रीलाई रुख्खा जवाफ दिदै भन्छ, &amp;quot;दौड्दैकोटेम्पोलाई रोक्नुपर्दा कस्तो हुन्छ भन्ने थाहा छैन कि कसो : चोट लाग्छकि भन्ने .डर लागे राम्ररी समातेर बस्नुपर्छ ।&amp;quot; यस्तो जवाफ दिदै स्टार्टरतान्छ र फेरि गति बढाउँछ ।&lt;br /&gt;
अहो! यहाँ कसैले कसैलाई पनि भूल गप्यौ भन्न नहुने भएको छ॥ उल्टो जवाफ सुनेर पनि लौ तेरो मिजासले पाएको सजाय भनेर. सबैलेमिलेर केही गर्न सक्तैनौं र उसैमाथि समर्पित भएर आफनो जरुरतपुन्याउन्‌ परेको छ । सेवाका व्यवसायमा काम गर्ने यिनीहरूको तव्यबहार यस्तो छ भने अरूमा के होला ? प्रजातन्त्रको अर्थ यिनलेलगाउन थालेका उन्‌ ।जे मन लाग्यो बोल्ने, जहाँ मन लाग्यो जाने, जे&lt;br /&gt;
गर्नलाई पनि छुट खोज्ने, आफनो मात्र हकहितको दाबी गर्ने र&amp;quot; आफनोतर्फको कर्तव्य भने विर्सने : कसले संफाउने ? को निस्कनसक्थ्यो यिनीहरूलाई संभाउन जब घेरै जसोको धारणा यस्तैतर्फ बढ्दैछ । अनुशासन बेगर कुन देशमा प्रजातन्त्र फस्टाएको छ । प्रजातन्त्रमाआत्मपरख आत्मअनुशासन हनुपर्नेमा यौ स्थिति देखा पर्दैछ &#039; यस्तोसोचिरहेका शिवका आँखा झबाटट फोहोरमैला थपारेका रासमा पर्छ ।प्लाष्टिकका यैला, खाना झिकेर फयाकेका टिनका टठवाक्रा, कहिएरमिल्किएका फलफूल, पराल, शिशी थपै के/के र त्यसमाथि मिल्किएकामरेका क्क्र, तिनलाई पन्छाउँदै खोतली जिउने साधन जम्मा पार्ठैगरेकाकेही केटाकेटीहरू : त्यो देखेर क मनमनै अरू कँडिन्छ र सोच्छ, यसदेशका भविष्यका तारा हामै देशका नागरिक यसरी हर्कदै छन्‌ । केहोलान्‌ यिनीहरू : यिनको संस्कार कस्तो बन्ला ? यसतर्फ ध्यातहामीहरूले किन दिनसकेका छैनौं : फेरि आफनै मनले भन्छ, &amp;quot;हाम्रोसोचाइको क्षेत्र त यही फोहोरमैलाको थुप्रो सडकमा फँयाकिएकाले नैबताइरहेछ्‌ भने यहाँ अरू संयक्त सोचाइको भावना कहिले जागरणहुने : हामीले जान्न थालेका छौं विभिन्न आधुनिक सामानका प्रयोगगर्नलाई, घररभित्रका फोहोर सडकमा ल्याएर फयाँम्नलाई तर फोहोरलाईत्यहाँबाट हटाउन पर्छ, सडक हामी सबैको साझा हो भन्ने अर्थ भनेजानेका छैनौ । घर ठूलठूला बनाउछौँ र त्यहाँबाट बग्ने पानी सडकमाल्याएर प्रत्येक सडकका किनारमा बनेका घरका पर्खालमा फयाँग्न हन्छ१ त्यसमा आँखा सबै निकायका परेकै छन्‌ होला तर उनीहरू त्यो बन्दगराउन सक्तैनन्‌, किनकि घर ठूलो छ । अवश्य त्यहाँ बस्नेहरू पनिठूला व्यक्तिनै होलान्‌ । जताततै थिचोमिचो छदैछ ।&lt;br /&gt;
सार्वजनिक भावनाको खाँचो जबसम्म प्रा हुँदैन र नागरिकसहभागिताको जरूरतको ज्ञान जबसम्म हामी सबै नागरिकमा आउँदैनयस्ता असामाजिक क्रिया अरू बढ्दै जाने छन्‌ । यसमा ज्ञान फैलाउनेदायित्व लिएर को अगुवा हुने : अफसोच त यसमा छ । यही स्थितिकतिसम्म लम्बिने हो&lt;br /&gt;
शिव खँड्का ठिक यसै बेला आफनो पुरानो साथीमोटरसाइकलमा गएको देख्छ । उसले हात हल्लाएर आफूलाई चिनाउँछभने त्यो साथीले हाँसेर भेटको अभिवादन गर्छ ।&lt;br /&gt;
यो अर्को उसको दु:खसुख सादने साथी थियो । दुबै एउटैअफिसमा एउटै पदमा, एउटै विभागमा काम गर्व । शन्त शर्मा शिवकादाँजामा घेरै शान्त प्रकृतिको थियो । उसको काम शिवलाई संझाई।बझाईगर्नु मात्र नभई अब के गर्नपर्छ भनेर सल्लाह दिने पनि हुन्थ्यो । दुवैको&lt;br /&gt;
र्‌&lt;br /&gt;
राय धेरैजसो मिल्थ्यो पनि केवल त्यसलाई कार्यान्वित गर्ने पद्धतिमा फरकहुन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
मन्त्रीज्यसंग भेट गरेको दिन शिव यिनै शन्त शर्माकहाँ गएकोथियो । हाकिमको भनाइ र मन्त्रीज्यको भनाइ कुनै कतै पनि नमिलेकोपाएर जङ्गिदै भनेको थियो, “कसले किन निकाल्यो त मलाई : सत्य कुरालुकाएर व्यर्थै मलाई किन छटपटी पार्छन्‌ ! म भौंतारिएको भतारिएकै&lt;br /&gt;
शन्त शमांले शिवलाई शान्त पार्न भनेको थियो, &amp;quot;कस्तोनबर्भको तिमीले ? यस्ता बेलामा बोल्ने भाषा यस्तै त हुन्छ । यतातिमीलाई त्यसरी अर्थ्याए, उता हामीलाई तिम्रै उपमा दिएर घम्क्याए ।निकाल्ने पक्कै यिनैमध्ये छन्‌ । यसलाई छोडन भने हुँदैन । उजुरी दिनैपर्छु । तिमीलाई अब केको डर : नोकरी जान्छ कि भन्ने छैन, बरुफर्कन्छ कि भन्ने आशा त छ !&amp;quot;&lt;br /&gt;
“आशा” भनेको सुनेर उसले हाँसतै भनेको थियो “ठिक भन्यौतिमीले । हामीलाई हौसला दिने पनि त यही आशा हो, होइन र शन्तै? आन्दोलनमा पिटाइ खाएको यहाँनिर अझैँ वेलाबेलामा चस्किदै छ ।त्यति बेला पनि म आशै लिएर सञ्चालित भएको थिएँ । हाकिमहुनेहरूर अहिले मन्त्री बनेकाहरूले नै उक्साउँदै भन्थे, &amp;quot;तपाईंहरू जस्ताजोशिलाहरूले नै अगाडि सर्नपछौ । तपाईंहरूलाई समर्थन गर्ने हामी छौं ।निर्धक्क हुनोस्‌ अहिले यी नोकरीको झन्झटबाट नै मुक्त पारी दिए ।कस्तो सहयोग गरे !”&lt;br /&gt;
“बल्ल तिमी लाइनमा आउन थाल्यौ । अरूलाई खाने बाघलेमलाई पनि खान्छ भन्ने सोचेर पनि निष्कासन गरेको हुनुपर्छ । नत्रतिम्रो ल्याकत, तिम्रो लगनशीलता, संस्थामाथि रहेको तिम्रो माया, तिम्रोइमानको नतिजा यो हुनुपर्दैनथ्यो । तिमीबारे थाहा नभएको कसलाईथियो र ? त्यो पनि आफूले चाहेर ल्याएका सरकारका शासनमा ?चित्रकारले प्रयोग गरी फयाँकिएको कुची पो तिमीलाई बनाइ दिए ?त्यसैले देखाइदेक तिम्रो अस्तित्व अझैँ बाँकी छ भनेर ।” शन्त शर्माकायस सल्लाहले पनि क घेरै प्रभावित भएर मृद्दा हालेको थियो । :&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
0 ।&lt;br /&gt;
बिहानीपख मधुरो स्वरमा झ्याउरे लयमा गाएको गाना सुन्दाअति मीठो लाग्छ । एउटी उमेर पुगेकी चेलीका बिलौनाले भरिएकात्यस गानालाई राधाले आफूनो सुरिलो कण्ठबाट लय मिलाएर गाउँदा रत्यस गीतको भावना र राधाका स्वरले साधना र दया. दुवैका मनलाईप्रभावित पार्छ । त्यो मधरो गीतको रसपान गर्दा उनीहरूलाई त्यस शान्तवातावरणलाई आफू. उठेर खल्वलाउन मनलाग्दैन । बिहानको उठ्ने समयबित्तै जान्छ । -&lt;br /&gt;
भान्छाबाट आमाले अझै ती उठेका छैनन्‌ भन्दा पो झस्केर उदतैसाधना भन्छे “कति मीठो झयाउरे गाना गाएकी राधाले : साँच्चै यस्कोस्वर त अति मीठो छ ?”&lt;br /&gt;
बहिनीले गरेको राधाका स्वरको टिप्पणीलाई औंल्याउँदै दयालेथप्छ, “झ्याउरे लय नै यस्तै हुन्छ । मनलाई कस्तो कस्तो पारी हाल्छ ।अझ यसमा सारङ्गी बज्यो भने त रुवाएर नै छोड्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“किन हाम्रा बाजा, गानाको लय सबै रुवाउने मात्र हने, दिदी ःके हामीले खुशी मनाउनै जानेका छैनौ । सारडी हेप्यो त्यस्तै, सनाईकोत के क्रा गर्ने स्वाउन नै बजाउँछन्‌ । मादल र तबला नहुँदा हुन्‌ त&#039;गानाको जगत्‌मा के हुन्थ्यो होला ?”&lt;br /&gt;
“यसमा धेरै विकास हुन नसकेको कारण अर्कै छ । उहिले गानागाउने, गानाबाट रमाइलो लिने व्यक्ति निकै कम हुन्थे । कि हुन्थे ठूलाबढा शौखिनहरू कि गाना गाउँदै माग्ने गाइनेहरू । यिनीहरू यस्तै सवाइकहँदै गाना गाउँदै कसैका दिलमा चोट पुन्याएर रुबाएर या कसैलाईखिज्याएर रमाउने गराएर पैसा माग्ने गर्चे । हामी जस्ता मभझौलावर्गलेगाना सुनैर रमाउनै जानेका थिएनौं भने पनि हुन्छ । २००७ सालपछिजब रेडियो नेपाल खुल्यो, त्यसपछि गाना बजानाहरूमा प्रगति देखा पन्यौर हामीजस्ताले पनि गानाको रसपान गर्न थाल्ने भयौं । अंब त के&lt;br /&gt;
101&lt;br /&gt;
टेलिभिजन आएपछि गाना मात्र कहाँ हो र नाटक र अरू ज्ञानवर्द्धकखबरहरू पति सुन्न पाइने भइसकेको छ । नत्र पुरा बिश्व एकातिर,नेपाल छुट्टै अर्कातिर जस्तो हुन्थ्यो । सबै बिकास सबै देशहरू एकादेशकाकवासरह थिए । साधनाले दयालाई क टेलिभिजनमा काम गर्ने भएकीलेजिस्म्याउँदै भन्छे, “भन्नोस्‌ न, टेलिभिजन आएपछि&#039; देखेर सुनेर छोटोसमयमा नै रमाइलो वातावरणमा रही दिमागलाई सोच्ने कष्टै नपर्ने गरीनिरक्षरहरूले पनि धेरै कुरा . जान्नसक्ने भएका छन्‌ र साहित्यकारलाईकिताब छपाउने समस्या नै नपर्ने भएको छ ।” न&lt;br /&gt;
“तिमी जस्ती पढेलेखेकीले पनि यसरी टेलिभिजनका बारेमा भन्नमिल्छ ! फेरि निरक्षरहरूले यसरी सिक्नपाउनु के नराम्रो हो र ! हो,शिक्षितवर्गले किताब पढेरभन्दा बढी यस्तै टेलिभिजनका कार्यक्रम हेरेरबिताउन थालेका समय बचाउनलाई हो या अरू कुनै अर्थले हो त्यो भनेसोचनीय छ तैपनि यो दोष टेलिभिजनलाई लगाएर साहित्य साघकहरूलाईनिरुत्साही बनाईदिएको छ भन्तचाहिँ मिल्दैन । याद गर, ती देशहरूमाजहाँ गाउँगाउँमा टेलिभिजन प्रसारण पुगेको छ, त्यहाँ पनि साहित्य क्षेत्रमात्यतिकै प्रगति भएको पाइन्छ । समयकै कुरा गर्छर्यी भने उनीहरूलेजस्तोगरी लामो समयको उपभोग हामीले कहाँ गर्त सकेका छौं र ?अझैँ पैतृक सम्पत्तिमा मोजमस्ती गरेर बसिरहेकाहरू र काम गर्न नतम्मीदिउसो पनि सुतिरहनेहरूको संख्या हामी कहाँ छँदैछ । यसरी समयबिताइरहेकाहरूलाई के भन्छयौ ?&lt;br /&gt;
दोष टैलिभिजनद्वारा कार्यक्रम प्रसारण गर्नेको छैन । छ भनेआफूनो रुचि छानेर मात्र हेर्ने नगर्नेहरूको छ । टेलिभिजनले त सबैस्तरका, सबै क्षेत्रका व्यक्तिहरूका लागि कार्यक्रम दिनुपर्छ । यो राष्ट्रियकार्यक्रम हो ।&lt;br /&gt;
“ए दिदी, तपाईंको जवाफ दिने कला त बोलिनसक्नुको छ ।आफना व्यवसायमा धक्का पुन्याएको सोच्नभयो कि कसो ? ”&lt;br /&gt;
“मेरा कार्यक्रमकाबारे कुरा गर्नै पर्दैन मैले. सुनाउने खबर हो ।त्यो सुन्ने सबैको इच्छा भइहाल्छ । मेरो व्यवसायमा तिम्रो भनाइले कुनैअसर पार्दैन ।”&lt;br /&gt;
यसरी दुबैबीच वार्ता चाल्दाचल्दै राधाले चिया ल्याइपुग्याउँछै रदुवैलाई एक एक ग्लास हातमा धमाइदिन्छे । साधनाले चिया खाँदै राधालेबिहान गाएका गानाको तारिफ गर्छे । राधा पनि ढङ्ग पर्छे आफूलेपहाडमा गाउने गरेको बताउँछै र सोध्छे, “मैयाँहरूलाई यो गाना सुनेररू रू लाग्यो कि लागेन ? यो गाना हाम्रा घरतिर सबैजसो छोरीहरूलेगाउने गर्छन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
01&lt;br /&gt;
“के त्यहाँ छोरीहरूको जिन्दगी त्यस्तै हुन्छु कि गानामा बढाईचढाई लेखिदिएका हुँन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;के बढी भनेको छ र त्यस गानामा :&#039; यसभन्दा पनि दुःखीहुन्छु गाउँका चेलीबेटीको जिन्दगी । यो त शहरकाले गाउँकाछोरीहरूलाई संझेर मात्र लेखेका हुन्‌ । यो गाना हाम्रा गाउँमा ल्याएरसुनाउँदा नरुने कोही पनि भएनन्‌ । आज मलाई त्यही गानाको यादआयो र गाउँदै घर कसिङ्गर गरेकी । सानामा पढ्लेख गर्न पाएकी भएर तपाईंका कान्छा दाइले पनि पढाइ प्रा गर्न पाएको भए हाम्रो योगतिकेही गरे पनि हुँदैनथ्यो । उनले धन नभएर पढ्न पाएनन्‌ मैले छोरीभएर जन्मिनाले पाइनँ ।&lt;br /&gt;
हजुरहरूले पत्याउनु हुन्छ, या हुन्न गाउँमा मेरा दुइटै दाजुहरूएउटा हेडमास्टर छन्‌ त अर्का मास्टर । मेरा बाबुको खेतबारी यति छ,आट हल त गोरु नै पालेका छन्‌ । घर पनि पक्की ईँटको ठूलोफराकिलो छ । २० जना हामी छोरा बुहारी छोरी, नातिनातिना गरेरछौँ । छोरीमा जेठी म नै हुँ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
राधाको कुरा नटुङ्ददै दयालाई राधामाथि दया उठ्छ र सोध्छे,“अनि तिमीलाई कान्छा दाइसंग कसरी बिबाह गराइदिए तबनपाखा जाँदा प्रीती बसेको त होइन ?”&lt;br /&gt;
भ्होइन, मैयाँ होइन । मेरो त पीती बसेको थिएन तपाईंकाकान्छा दाइको भने मैसँग मात्र बिवाह गर्छु भन्ने जिह्टी थियो । मेराबाबुले यस्तो गाउँडुलुवालाई पनि छोरी दिन्छु भनेर जङ्गेर कुरा ल्याउनेमान्छेलाई पठाएपछि त उहाँ चित्त दुखाएर गाउँनै छोडेर कमाइगर्न यहाँआउनुभएको हो । आफना बाबुले लगाएको क्रण निख्ननेर देखाएपछिपराइघर पठाउनै पर्ने छोरीलाई शहरमा नोकरी गर्न थालिसकेकोलाई छोरी. दिएपछि दुःख पाउन्त भनेर दिएका हुन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“ए, त्यसो भए कान्छा दाइले के नाकरी गर्छन्‌, कति कमाउँछन्‌भन्ने केही जानकारी नराखेर नै छोरी दिए ः&amp;quot;&lt;br /&gt;
“क्के थाहा पाउतु यहाँ ढोके पालेलाई पनि त्यस्तो उर्दीपोशाकदिदा रहेछन्‌ भन्नै ? त्यही पौशाक लगाएर डटेर गाउँमा पस्ता, खर्चपनि नडराई गर्न थालेपछि बाबाले माने होलान्‌ उहाँले राम्रै नोकरी गर्नथाल्नुभएको छ गाउँघरमा अझै बढेका छोरी घरमा भएपछि निद्रा नैपर्दैन भन्छन्‌ । तपाईंहरू गाउँका छोरी भएको भए कममा पनि तीननानीकी आमा भइसक्नुहुन्थ्यो ।”&lt;br /&gt;
पक&lt;br /&gt;
साधना र दया राधाको करा सुनेर खुबै हाँस्छन्‌ र सोध्छन्‌,“अनि तिम्रा दाइहरू त पढेलेखेका रहेछन्‌ । उनीहरूले त यमौ बझनु पर्नैनि?”&lt;br /&gt;
&amp;quot;के गर्थे उनीहरूले पनि । बाबसंग भन्दै थिए यत्तिकोलाई बाहिनीदिन नहुने म त देख्तिनँ । केटो आफनै जातको आफनै गाउँको हो ।हाम्री बहिनी भनेर हुरुक्कै भएको छ । आहिले त कमाउन पनिचालिहालेछ । कही गरी पछि दृखै पाई भने यत्रो खेतवारी हामो छँदै छलौ कमाएर खाओ भनेर दिउँला । एउटा छोरो भएको खानदानी परिवारपनि त यसै कहाँ पाइन्छ । त्यसका बाबु चुनाव जितेका भए मन्त्रीहुन्थो । हिङनभए पनि हिङबाँधेको टालो त हो ।&lt;br /&gt;
यसरी दाजुहरूले भने पछि लौ त अव तिमीहरू त्यसो भन्छौभने छोरी दिने पक्का गरौं भनिहाले नि । आमाले त भन्दै हनुहुन्थ्योअहिले बालाई उकम्साउछौ, पछि बहिनीले दु:ख पाई भने हेर विचारगर्न पन्छिन पाउदैनौ । हामी डाँडामाधिका घाम कति दिनका हौं रभन्दा त्यसमा पीर नलिनोस्‌ त भनेका छन्‌ । यति भनेर राधा आँखाभरी आस पार्दै दयालाई भन्छे, “मैयाँ, हजुरको पनि बिवाह विदेशमा कामगर्नेसंग हुनलागेको कुरा सुन्छु । आफनै देशको केटा भए पनि त्यहाँ केकस्तो काम गर्दैछ, त्यो राम्री बुझेर मात्र गर्नु होला । विवाह भएपछिकुरा अर्कै हुन्छ । तपाईं जस्ताका लागि हजार केटा यही पनिपाइन्छन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
राधाले देखाएको आत्मीयताको सर्मथन गर्दै दयाले राधाले दिएकोसल्लाह अनुसारै बुझेर मात्र विवाह गरला भन्दा क खुशी हुँदै भन्छे,&amp;quot;यहाँ आएपछि तपाईंहरू दुई दिदीबहिनीलाई देखेर नै मैले आफनो माइतबित्तँकी छु । यसरी नै हामी दिदीबहिनी कुरा गरिरहन्थ्यौँ । तपाईंहरूकोकति माया लागिरहन्छ, सत्ये नहोला !”&lt;br /&gt;
हामीलाई पनि त तिम्रो कस्तो माया लाग्छ । तिमी पढ्छयौ भनेहामी पढाइ दिन्छौं भनेर दयाले भन्दा राधाले केही ढाडस पाएको अनुभवगर्छे र अनुरोध गर्छे टेलिभिजनमा लोकगीत गाउने काम मिलाइदिने ।दयाले नोकरी मिलाउन कति गाह्रो हुन्छ भन्ने तथ्य बताउँदै कुनै बेलामौका परेमा म तिमीलाई काममा लगाउने छु तर तिमीले रियाज गर्नुपर्छर नेपाली अक्षर पढलेख गर्नसक्ने हुनुपछौ भनेर पनि आवश्यकताबताइदिन्छे । राधाले त्यति लामो समयसम्म प्रतीक्षा गर्नसक्ने धैर्य लिनसक्तिन र कुनै उपाण छ भने अहिलेदेखि नै काम शुरु गरेर पैसाकमाउनु परेको आवश्यकता बताउँछ । घरबाट दिलबहादुरका आमाले खर्चपढाउन लेखेको चिष्ठी देखि लिएर आफूले घरबाट दिएका गहना खोटो&lt;br /&gt;
छ&lt;br /&gt;
भए&#039; पनि माइतीले- दिएको ढुङग्री मन्द्री समेत बेच्न पठाएको बताउँदैभन्छे, “तपाईंका कान्छा दाइलाई निकै ठूलो सङ.कट आइपरेको छ । मैलेपनि बुहारी भएर उनलाई परेका आपत्‌मा तिनका छोरालाई साथ दिदै,सहयोग गर्नै पर्छ । छोरामाथिको बाबुआमाको इच्छा यस्तो हुन्छ भनेरहाम्रा गाउँमा भन्ने गर्छन्‌ भनेर सुनाउँछे “यो छोरा बढ्ला, . कमाइ गर्लादृधभात खान देला ।”&lt;br /&gt;
“अनि तिमीले आफनो माइतको चिनो पनि बेच्न पठाएकी कान्छादाइले उसकी आमालाई दृधभांत खुवाओस्‌ भनेर हो त :&lt;br /&gt;
राधा भन्छे , “हो त , बढी आमालाई भोकभोकै राख्नु पनि तभएन । लोग्नेको अँध्यारो. मुख हेर्दै ती गहना मैले झुण्डाएर के हुन्छ !कसलाई देखाउनु परेको छ र यो बिरानो ठाउँमा : कमाउन सकेत्यसभन्दा राम्रो लगाउँला नसके बुच्चै बसला । खुशीले हाँसीखुशी बाच्नुत पच्यो, भनेर दिएँ । मैले ठिक गरिनं त मैयाँ ?”&lt;br /&gt;
राधाका प्रश्नको जवाफ दिनुभन्दा पहिले साधना दयालाईजिस्याउदै भन्छे, &amp;quot;“सनिराख्नोस्‌ दिदी विवाह भएपछि लोग्नेको सहयोगकसरी गर्नुपर्छ । &amp;quot;दयाले लाज मान्दै बहिनीलाई थप्पड लाउन खेज्दैभन्छे, “तँ धेरै नकरा है, दिदीलाई पनि बहिनीले सिकाउँछै ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
यत्तिकैमा गौरीले माथि चोटामा बोलेको सनिनछ । क भनिरहेकीहुन्छे,  “छोरीहरूका कोठामा गएकी त फर्कनै जान्दन यो राध्रासंग पनिम वाक्क भइसके । कुन बेला पकाउने, कुन बेला ख्वाईपिलाई अफिसजाने । एक दिन होइन संघैँ अफिस जाँदा अबेर हुन्छु । कुन दिन मलाईपनि बिदा दिन्छन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“म आएँ भनेर रित्तो ग्लास लिएर राधा भान्सातिर लाग्छे ।साधना पनि आमालाई सघाउन जान्छे ।. दयाले राधाले औल्याएको बिवाहगर्दा लिनुपर्ने सतर्कपष्टि गहिरिएर सोच्न थाल्छे र निष्कर्षमा पुग्छे पनिविवाहका बन्धनलाई क्षणभङ्कुर नबनाउन र विवाहलाई पत्नुताउमा परिणतनगराउन उसले दीपेशबारे जाँचबुझ गर्नै पर्छ । यस विषयलाई लिएरदयाले प्रेरणासंग भेट्ने निश्चय गर्छ । कुरा जतिसुकै अगाडि बढे पनिसौ हेर्दा केटो बेसै प्रकृतिको देखिए पनि उसको पृष्ठभुमि के कस्तो«हैछ र त्यहा अमेरिकामा कै गर्दै छ त्यो जान्नु नितान्त जरूरी छ ।बिदेशमा जागिर खाएकोसंग बिवाह भयो भने त्यहाँ जान पाइन्छ भनेर:मोहित हुनु डलरको कमाइ छ भनेर खुवै राम्रो लोग्ने पाएँ भनेरआफूलाई सुम्पिहाल्दा धोका पनि पाइनसक्छ । अहिले के भएको छ र ?बरमाला लगाइसकेको छैन । चित्त नबुझे छोड्न पनि सकिन्छ ।&lt;br /&gt;
0001&lt;br /&gt;
फेरि अर्का मनले भन्छ, प्रेरणाले पनि न्यर्तिभत्रको क्रा के वाहा&lt;br /&gt;
पाउन सक्ती र : त्यस परिवारसंग कत्तिको सङ गत छ । मैले वावालाईयत्रा चोट परेको बेला यति अगाडि बढिसकेका प्रस्तावलाई खल्बलाई दिएभने उहाँहरूको मतस्थिति कस्तो होला ! त्यसो भए म के गत ,यति तुच्छ कुरा पनि मैले कसरी याद गरिनँ र त्यस राघाले&lt;br /&gt;
संझाइदिनुपन्यो ! धन्यको रहेछ मेरो बाद्धि&lt;br /&gt;
कता कताबाट आँट पनि पलाउँछ र सोच्छै, इन्जिनियर हुँदै हुन&lt;br /&gt;
त्यहाँ पुगे भन्दैमा ज्यामी भएका त छैन होलान्‌ । डलर कमाउने भनेरयसरी आफनो अहम्‌ पनि : त्यागेको त छैन होलान्‌ : जे पर्छ त्यहीसहुँला : आखिर जीवनको एक पक्ष परिस्थितिसग भिडेर जिउनु पनि त&lt;br /&gt;
हो 1: , .&lt;br /&gt;
आँट आए पनि मनले मान्दैन । मनले भन्छ मैले विदेशमा काम&lt;br /&gt;
गर्नेसँग नै विवाह गर्छु भनेर बाचा गरेकी पति छैन । योसंग बिवाहनभए नहोस्‌ केही दिन तनाउ होला, कुरा त्यतिमै टुङ्गी हाल्छ&lt;br /&gt;
जीवनभरको समस्या बोकेर त बस्नु पर्दैन ।साधनाले आएर उसलाई गंभीर मृद्वामा परेकी देखेर भन्छे,&amp;quot;राधाका कुराले तपाईलाई सोचमा डुवाइदियो कि क्या हो : मेरो कुराकस्ता रहेछ व्यक्तिको. स्वभाव, त्यसको संस्कारले बनेको हुन्छ,पढ्नालेख्नाले त्यसलाई परिमार्जित - मात्र पार्ने हो । कति अनपढहरूकोपनि गंहन बिचार हुन्छ, आदर्श हुन्छ, त्यस्तै विद्वान्‌&#039; कहलाइएका पनिकर्म गर्नुपर्दा अनैतिक चाल चल्छन्‌ । राधालाई नै हेर्नोस त्यो पढलेख-नगरैकी भए पनि काम गरेर खान चाहन्छे आफनो आत्मसम्मान राख्न&amp;quot; गहना: बेच्न पठाउँछै । लोग्नेलाई ढाँटेकामा क्षमा दिँदै सहयोग गर्न तत्परहुन्छु, आफ्नै मनले, कसैले. दवाब दिएर होइन । उसले चाहेकी भएत्यसरी: छक्याउने कान्छा दाइलाई छोडेर माइत जान सक्थी तर उसलेत्यसो गरिन किनकि क आफनो भन्ने कोही चाहन्छे । आशा राख्नैपरिश्चम गर्छै, सोच्छै राम्रा दिन उनीहरूको मात्र कसो नआउला ! यदियिनीहरूले साँच्चिकै परिश्रमी हुँदै समयको उचित प्रयौग गरे भने त्योकल्पेको दिन पनि आएरै छोड्छ । &amp;quot;दिदी, त्यसैले मं भन्दैछु मैले अब नोकरी गर्न शुरु गर्नु पर्छ र&#039;दाजुका पढाइमा सहयोग, प्रुच्याउनुपर्छ । तपाईं त केही दिनपछि विवाहगरेर गइहाल्नु हुन्छ । एउटी आमाका कमाइले कै गर्न सकिन्छ !दाजुलाई कुनै हालतमा पनि- यता न- उताको बनाउनु हुँदैन ; दुई &amp;quot;वर्षकोमात्र कुरा हो, त्यसपछि इन्जिनियर बनिहाल्न हुन्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;९,&lt;br /&gt;
“के भन्छे यो : विवाह भइसकेको त छैन । के थाहा अन्त्यमापुगेर पनि नहुन सक्छ &#039; हामी छोरीको भन्दा अभै छोराका रोजाइले नैविवाहमा महत्व पाउँदै छ । झोक चल्यो भने अहिले पनि म गर्दिनँभनेर खवर पठाए भने हामीले चपै लाग्नुपर्छ । म त्यहाँ कि भिमजस्तीछैन । कालो कपालको चल्छो बाँटछु, सारी लगाएर मात्र हिड्छु ।तडकभडक पटक्कै मन पर्दैन अनि ...... ?&lt;br /&gt;
“भो ... भी अब धेरै भन्नु पर्दैन । हेर्नोस्‌ त्यो दीपेशलेतपाईंलाई विबाह &#039; नगरी छोड्दैन । यो करा मलाईभन्दा बढी तपाईंलाई नैथाहा होला । स्वाड धेरै पार्न खोज्न भयो भने ठूलो भ्वाङ पर्ला है,त्यसको बरु याद गर्नोस्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
भघाहा छैन साधना, मान्‌ यो मैले स्वाङ पारेको होइन कितकिमेरा मनले यो सम्बन्ध पक्कै बांधिन्छ भन्नै मानेको छैन । देख्छुबाआमाले विवाहका लागि तैयारी गर्न थालिसक्न्‌ भएको छ । उताबाटपनि क्राको ओहोर दोहोर भइनै रहेको छ, तर मेरा भित्री मनले भनेपत्याएकै छैन । डर लाग्छ किन हो कुन्नि, म भरङ्ग हुन्छु । केहीहराउन लागेजस्तो हुन्छु र आमा, बा तिमीहरू सबैलाई संझैर छँ छलाग्छु । भनिदिकैँ म विवाह नै गर्दिनँ भन्ने लाग्छ । सोच्छु ती कलिलाउमेरमा विबाह गरेर जाने केटीहरूका मनमा कति कुरा खेल्दा होलान्‌ केगरेर मनलाई शान्त पार्लान्‌ ?&lt;br /&gt;
“तिनीहरू अशान्त नै हुँदै हुँदैनन्‌ । सोच्न सक्ने, संफन सक्नेभएपछि मात्र चिन्ता लाग्ने, पीर पर्ने, अशान्त हुने हुन्छ । केटाकेटीतिनीहरूलाई विवाह त एउटा रमाइलो खेलजस्तो लाग्छ होला तपाईंलाईजस्तो लाग्ने हो र ? लौ हिड्दनोस्‌ माथि आमाकहाँ गएर कामसघाइदिऔं । एक्लै भन्छामा रुङ्रिहन्‌ भएको छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
दयाले घडी हेर्छ र अहो साढे आठ बजिसकेछ । यो बिहान पनिकति छिटो बित्छ भन्दै जुरुक्क उठ्छे । साधनाले आफूनो स्वभाव अनुसारफेरि जिस्क्याउँदै भन्छे, “हाम्रो उमेर बितेको जस्तो गरी होइन त, दिदी ?दयाले साधनालाई पुलक्क७हेर्छै अनि |क्गेही नभनेर कोठाबाहिर जान्छे ।&lt;br /&gt;
मलाई यो केको नशा चढ्छ ? छोरीस्वास्ती नै किन नहुन्‌अफिस जाने बेला भयो भनैर जब उनीहरू तयार हुनथाल्छन्‌ मअनियन्त्रित भई त्यसै त्यसै कराउन मन लागिहाल्छ । कहीं म उनीहरूलेनोकरी गरिरहेकामा ईर्ष्या गर्न लागेको त होइन ? छि ... म केस्वभावको हुन लागें &#039; शिव खड्का यस्तै कुरा मनमा खेलाउँदै हैरानहुन्छ । ॥&lt;br /&gt;
५०&lt;br /&gt;
झ सोच्छ । दया र गौरी दुबै मजस्तै भएर घरैमा बसुन्‌ भन्नेपनि त मैले अवश्य सोचेको छैन, फेरि म किन उनीहरूलाई अल्मल्याउनखोज्छु : मेरो समय यवै -बित्तछ र पनि म उनीहरूलाई सहयोग गर्नतम्सिन्नै बरु उनीहरूलाई मै आफनो व्यक्तिगत काम पनि अह्राउँछु अनिआफैँ ठूलो भएर भन्छु, “अफिसमा काम तिमीहरूले मात्र गरेका छौँ :मैले पनि गरेको थिएँ । कति वेला घरबाट निस्कन्‌ पर्छ, त्यौ मलाईथाहा छ ।&amp;quot; शिव खँडका यसरी आत्मपारख गर्दै आफूलाई अबकाश पाप्तजीवनसँग अभ्यस्त हुन खौज्दै छ भने परिवारले उसलाई किन विरक्ततुल्याउनु भनेर नोकरीका बारे जे जसो भने पनि सहिदिने गरिरहन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
कहिलेकाही परिवारको सहनशीलतासँग पनि उसलाई हुनसम्मकोरिस उदतैन । क सुन्न चाहन्छ, तिनीहरूलाई गाली गरेका बेलामाउन्तीहरूले भनिदिकन्‌, “तपाईंले गरे जस्तो त कसले गर्नै सक्छ र ?”अनि उसले त्यसका जवाफमा भन्न पाओस्‌, &amp;quot;कसले बुझूत सके मेरोइमानदारी ।” यति भन्न सुन्न पाएमा पनि उसलाई सन्ताष लाग्नै हुँदात्यस्ता स्थितिको सिर्जनामा लागिरहन्छ । तर उसको यस्तो आशय पनिअसफल भइदिएकाले धेरैपटक अफसोच मानेर चपलाग्छ ।&lt;br /&gt;
यता मद्दाको छिनोफानो भएको छैन । उसका मनको स्थितियस्तो छ । उता छोरीको विवाह नाजिकै आइसकेको छ । घरमा विवाहकालागि सहयोग गर्न आउनेहरू बढ्दैछन्‌ र त्यसका साथसाथै शिवकोनौकरी गएका बारे चर्चा पनि चाम्कन थालेको छ । जति आउँछन्‌उनीहरूको पहिलो प्रश्न नै यही हुन्छ, “फैसला सुनायो ! बिचरालाईकसरी फसाइदिए ।&amp;quot; त्यो विचरा शब्दले उसलाई हुनसम्म दिक्क गराउँदैन। यस्तै कुरा सुन्नपर्ला भनेर बिदाको दिन आयो कि त क बाहिरैहिडिदिने गर्छ । आजभोलि क आफता गाउँमा पनि जानेआउने गर्नधालेको छ । लेखनमा अल्भाई समयको सदपयोग गर्नै मनसायले नेपालकोप्रशासन व्यवस्थाका बारै अध्ययन गर्न थालिरहेछ । यस्तै क्रममा पर्दाउसले थाहा पाउन थालैको छ, शासन प्रणालीले प्रशासनिक व्यवस्था मात्रहोइन, यसले सामाजिक स्थितिमा समैत असर पारी देशको अवस्था रजनताको मनस्थिति नै बदलिदिन्छ । तसर्थ यसलाई सृहाउँने प्रकारकोव्यवस्था बसाउन आवश्यक छ ?&lt;br /&gt;
यसै आधारमा क सोच्छ १९९५ सालदेखि पजातन्त्र ल्याउनेउद्देश्यले उठेका पाइलाहरू २००७ सालमा पगेर क्षणिक विश्राम पाएपनि ती उदतै मडारिदै गएका काला बादलले २०१७ सालमा बर्षेरप्रजातन्त्रको पहिरो नै खसाल्यो । पुनर्निमाण गरेर व्यवस्थित गराउनेचाहनाले २०४६ साल कुूर्नुप्यो । पजातन्त्र प्राप्ति र स्थापनाकालागि&lt;br /&gt;
५१&lt;br /&gt;
चलेको यस लामा अवधिमा तीतचारपटक ठूलै आधात पर्न गएर पतिकिन हामीले प्रशासनिक व्यवस्थामा शासनप्रणालीलाई सुहाउँदो रूपमासुधार ल्याउनपष्टि लागेका छैनौं : खुला बजार नीति अपनाईप्रतिस्पर्धाबाट गुणस्तर बढाउने र जनतालाई राहत दिने भनेर निकैउद्योगहरू खोल्नलाई अनुमति दिइन थालिए तर के यस खुला नीतिलेजनताले राहत र उद्यमीहरूले सुरक्षा पाएको छ त : &amp;quot;खुला&amp;quot; कोपरिभाषामा प्रजातन्त्र नै गिज्याइएको छ । सायद, यो मजस्तो चोट परेकाव्यक्तिका मस्तिष्कमा नघुसेको पो हो कि !&lt;br /&gt;
शिव खँड्का यिनै तथ्य बुझने हेतुले साथीहरूसंग छलफल गरीनिचाडमा पुग्न कोसिस गरिरहन्छ । अहिले आएर. “यो के हो&amp;quot; भनेरसोधौं भने लाज लाग्छ नसोधौं भने आफूले बभेको भ्रम हो कि भनेजस्तोहुन लागिरहेछ । के यस्ता तन्त्रहरूका परिभाषा पनि बदलिरहन्छन्‌ किकसो !&amp;quot;&lt;br /&gt;
“जनताका बौद्धिक स्तरमा आधारित हुने यस तन्त्रको परिभाषाबदलिएको होइन यसलाई कसरी जनताले बुझेको हुन्छ फरक त्यसैलेगराउछ । नैतिकता, अनुशासन, सद्भावना र दायित्वलाई स्वतन्त्रतामाथिकोरोकावट मान्न थाल्यौं भने हामी प्रजातन्त्र नबुझने मात्र होइन, उहीअवस्थामा फर्कन थालेका हुन्छौं जुन वेला हामीले समाजको स्थापना गर्नआपसमा संझौता समेत गर्न सकेका थिएनौं ।&lt;br /&gt;
सम्झौताको पहिलो ज्ञान 9२ नै बौद्धिक उदय भएको हो जसलेमनुष्यको परिचय एकले अर्कालाई हुन्छ जसबाट मिलापको भावनाबिकसित भई लडाइँ झगडा हटेर शान्तिको वातावरणको सिंजना हुनथालेको हुन्छ । विचार गर्ने हो भने यो मन यति चञ्चल छ छिनैमा योकहाँ कहाँ पुग्छ, के के गराउँ छ के के खोज्छ ज्ञ तर ती सोचाइजब कर्ममा व्यक्त भई जनसमक्ष आउन थाल्छन्‌ के ती आफै छाँटिएकाहुँदैनन्‌ र ! त्यहाँ कर लगाउने कोही पनि त हुँदैन । यसलाई छाँटनेत्यही संस्कार हो, उही सम्झौता हो, जसमा समपूर्ण जनताको र. मनुष्यजातिकै भलाइ रहेको हुन्छु । यस्ता आत्म अनुशासन नै प्रजातन्त्रकोसफलताको मुख्य आधार हो ।&lt;br /&gt;
- शिक्षा र ज्ञान्‌ सफलताका आधार हुन्‌ । सोचाइमा विवेक रबुद्धि, लगाउन र आफू स्वयंम्‌ः पनि सद्भावना र नैतिकताका बललेअनुशासित हुनैसक्नपर्छ । &#039;व्यावहारिक पक्षमा यस्तो हुन नसकेकाले भ्रमउत्पन्न हुन्‌ स्वभाविक कुरा हो । यसैले हामी सबै मिलेर नै यसलाईव्यवहारमा ल्याउन के उपाय निकाल्नु पर्छ, त्यसो गर्नपट्टि लाग्न पर्छ ।आखिर प्रजातान्त्रिक सरकार भन्नु आफनो हाम्रो सरकार हो, हाम्रो&lt;br /&gt;
श्र&lt;br /&gt;
सम्झौताबाट स्थापित सरकार हो । यसको : सफलतातर्फ लाग्नु हाम्रोदायित्व हो । &amp;quot;&lt;br /&gt;
साथीको यस्तो कुरा सुनेर शिव भन्छ । &amp;quot;यो तथ्य थाहा नपाउनेकुनै नेता छैनन्‌ होला, फेरि यस्तो किन हुँदै छैन त ? शिक्षाकोप्रतिशत निकै कम भएकाले त्यसै अनुपातमा प्रजातन्त्रको सफलता भएकोछ भन्ने तिम्रो भनाइ हो ?”&lt;br /&gt;
केही अर्थमा हो पनि । अहिलै जे जति हुँदै छ त्यो पर्याप्तछैन र यसलाई बढाउदै लैजानु पर्छ । आनै अक्षरारम्भ गर्दैमा शिक्षाकोस्तर बढी हाल्छ भन्ने पनि छैन, यसलाई जरुरी गति दिएर बढाउदैलैजानुका साथसाथै यस तन्त्रको परिचय दिँदै ज्ञान प्रवर्द्धन गराउनज्ञानोपदेश दिने व्यवस्था वसेमा या कसैले यो समालिदिएमा छिटै यो केहो भन्नै धेरैले थाहा पाउनेछन्‌ । जब सबैले थाहा पाउँछन्‌ यसलाईअमरत्व दिनसक्ने हामीले नै हो भनेर त्यसपछि मात्र जनता र सरकारदुबैको एकत्रित बल पाएर सबै कर्महरू त्यसैतर्फ लक्षित हँदै जान्छन्‌ ।यसमा धैर्य र आस्थाको निकै ठूलो भूमिका रहेकोहन्छ ।”&lt;br /&gt;
&amp;quot;ज्ञानोपदेश त दिने भन्यौ तर यो कसरी र कहाँ दिने ःनेताहरूका वक्तृत्व नसुनेका छैनन्‌ । के त्यो पनि पर्याप्त छैन भन्नेलागेको छ ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
हाल हामीले सुन्ने गरेका भाषणहरूमा पार्टीको प्रगति रिपोर्ट,अर्का पार्टीको आलोचना र तेस्रो भइहाल्यो भने बृहत्‌ देश विकासकाअकाशिएका योजनाहरू मात्र छन्‌ । यो पनि हुन्‌ केही हदसम्म आवश्यकहोला तर ती जनता, जसल्ने केही जानेकै छैनन्‌ तिनका अगाडि गएर जेभने पनि त्यसबाट के परिणाम निस्कन सक्छ ? अनि यी सबै प्रयासकेवल भोट प्राप्तिका लागि मात्र सीमित हुन्छन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“मैले दिने ज्ञानोपदेश भनेको तन्त्रबारेका ज्ञान हो जुन प्रवचनकारूपमा. ठाउँ ठाउँमा गई प्रत्यक्षरूपले जनता समक्ष गएर दिन सकिन्छ,अर्को रेडियो।टेलिभिजनबाट रोचक तरिकाले यस बिषयमा कार्यक्रम बनाएरबताउन सकिन्छ र तेस्रो पढेलेखेकाहरूको ध्यान आकर्षण गर्ने लेखहरूलेखाएर पत्रपत्रिकामा छपाएर गर्न सकिन्छ जसले गर्दा लेख्ने र पढ्नेदुवैले यसतर्फ आफूलाई फूर्तिलो बनाइ राख्न सक्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
यसरी तन्त्रबारै व्याख्या गर्दा पार्टीहरूको व्यवस्था, यिनका नीतिके कस्ता सबै थाहा हुन्छ । सबै नीति पारदर्शी हुनुपर्ने पनि आबश्यकछ । राज्यप्रणाली के कस्तो हुनुपर्छ, यो के हो, कसका लागि होभन्नेदेखि लिएर सम्झौता कै हो, नैतिकता, अधिकार, कर्तव्य, समाज केहो, अनि हाम्रो संस्कृतिले के सिकाउँछ, नेपालको विश्वमा परिचय केमा&lt;br /&gt;
१३&lt;br /&gt;
छ इत्यादि धेरै जान्न पर्ने कुरा छन्‌ र यी सबै सिक्ने उपायहरू यिनैहुन्‌ जानोपदेश, भाषण र प्रबचन अनि प्रचारका माध्यमहरू ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
अहिले, प्रबचन भन्दा धर्म प्रचारको माध्यम मात्र मानिन्छ ।हुन त पहिले धर्मबाट नै कर्तव्य, नैतिकता र आदर्शको ज्ञान , दिइनेगरिन्थ्यो र त्यसबेला यस अर्चले पनि केही फरक पार्दैनथ्यो तर अहिलेधर्मलाई दर्शतशास्त्रको रूपमा मात्र लिन थालिएकाले पृथक तरिकाले यस्ताबिभिन्न विषयहरूमा ज्ञान हासिल गर्नु पर्ने भएको हो र प्रवचनधर्मज्ञानका लागि मात्र नभई सबैको लागि प्रचारको माध्यम बनाउन पर्नेभएको छ । यति हुन सकेमा प्रजातन्त्रको सफलताको औसत निकै बढ्नेसंभावना म ठान्छु ।&lt;br /&gt;
आजका युगमा आइपुग्दा मनुष्यले थाहा पाइसकेको छ उसकाजीवनमा आधारभृत आवश्यकता बाहेक अरू धेरै आवश्यकताहरू पनिछन्‌ जसका लागि क ज्यानलाई भन्दा बढी महत्व दिएर लागिरहेको हुन्छ। यही अर्थमध्येको एक हो शहीदहरूको सख्या बढ्दै जान । ती शहीदआफना लागि भएका होइनन्‌ मानव जातिका लागि स्वच्छ वातावरणकोचाहना राखेर बिभिन्न अबरोधहरूसंग संघर्ष गर्दा ज्यान फयाँकेर भएकाहुन्‌ ।&amp;quot;.&lt;br /&gt;
स्वच्छ वातावरणको मिर्जना गर्न प्रगतिको मार्ग खोज्न हो रप्रत्येक व्यक्तको चाहना समयको गतिअनसार ज्ञानको विकास गरीपरिवर्तन ल्याउनु नै हो । एकर्फेर पछाडि फर्केर हेन्यौं भने थाहा हुन्छसमय र अवस्थाले शासनप्रणालीमा छोडेको छाप कति गहिरिएर बसेकोहुन्छ ।&lt;br /&gt;
जुन बेला जसको शक्ति उसैको राज भन्ने थियो त्यस वेलासीमा विस्तारको नीति अनुसार जो लडाकू र शक्तिशाली छ त्यो नैजमातको मुखिया हुने गध्यौं र तिनैले जब पदको स्वाद पाए त्यस पछिचलाकी गरी वंशप्रणालीको स्थापना गरी आफूनो वंशका लागि पदकोसुरक्षा, शक्तिका आधारमा गरेर एक शासक अर्को शासित दुई वर्ग खडागरे ।&lt;br /&gt;
शासक वर्गलाई शक्तिले मत्यायो र शासितले संझन थाले,उनीहरूले आपसमा संझौता गरी समाजको सिर्जना गरेका र आफूमध्येबृञ्जक पाका र शक्तिशालीलाई त्यसको मूली छानेका कुरा । त्यहीसंझौताको संस्मरण गराउँदै भन्न थाले, &amp;quot;हे, शासक हो हामीले तिम्रोशासन रुचाएको सास्ती खानका लागि होइन । व्यवस्थित शासन प्रणालीबसाएर सबैले समानरूपले अधिकार पाउन न्यायोचित तरिकालेसमस्याहरूको समाधान होस्‌ भनेर हो । यदि त्यसो गर्न सक्तैनौ भने त्यो&lt;br /&gt;
प्र&lt;br /&gt;
स्थान हामी फिर्ता लिन्छौँ र जो योग्य व्यक्ति छ र जसले हाम्रो भलाईमात्र साँचिरहन्छ त्यसैलाई छनोट गरी पाउँछौं ।&lt;br /&gt;
जनतातर्फको चेतावनी र शासकको शक्ति र पर्दालप्साले गर्दारक्तपात भई भुमि, रङ्डियो । कत्तिका सन्तान शहीद भए । आवाज उठ्योप्रजातन्त्रका लागि ।&lt;br /&gt;
आज समयको मांग भएको छ । पजातन्त्रको जस अन्तर्गत हामीस्वशासित हुन्छौँ र यसरी प्रजातन्त्रको मांग गरेर हामीले आफूलाई सक्षमभइसकेको पनि देखाएका छौं । शासन शांक्त खोसेर आफैँनै परिचालितगर्न तमसनु पनि ज्ञानोदय भएको नै मान्न पर्छ ।&amp;quot; शन्त यति भाषणगरेर एक छिन चप लाग्छ । शिव खड्काले उसको भनाइको व्याख्यायसरी गर्छु ।&lt;br /&gt;
“यसको मतलव हो पहिले मुखियातन्त्र, त्यसपछि राजतन्त्र अनिप्रजातन्त्र र त्यसोगरी पहिले सीमाना निर्धारण नीति अनि यसको बिस्तारर त्यसपछि व्यवस्थित स्थिति बन्यो : आज भोली ठाउँठाउँमा चल्नथालेका लडाइँ झगडालाई हेर्दा हामी उही विस्तार वादमा नै छौँकिजस्तो के लाग्दैन र : &amp;quot;शिवले यसमा अरू सफाइ खोज्दै प्रश्न गर्छ ।&lt;br /&gt;
“यस्तो लाग्नसक्छ तर यसमा फरक छ । यो विस्तार सीमानाकोहोइन, यो हो व्यवस्थाको विस्तार, तन्त्रको विस्तार र यस बिस्तारकोउद्देश्य हो सुरक्षा आफूले औगटैर मेरो भन्ने टाँचा लागिसकेकालाईशान्तिको साथ सुरक्षित राख्ने ।&amp;quot; छोटो जवाफ शन्तले दिदै कराटुङयाउन खोज्छ ।&lt;br /&gt;
&amp;quot;अर्थअझै हमला होला कि भन्ने त्रास छँदै छ : नत्र सुरक्षाकोप्रश्न नै उक्तैनथ्यो ? यो वैज्ञानिक युगमा आएर लडाईँ भइहाल्यो भनेयुगको अन्त्य प्रलय भयो भन्ने सोचे हुन्छ, होइन र&lt;br /&gt;
“त्यो खास यसै कहाँ हद्छ र : विस्तारवादले ल्याइरहेकै हुन्छतर लडाइँको पारा भने बेग्लै हुन्छ । यसले सीमाना ओगटनेलाई हमलागर्दैन, व्यवस्था हातमा पारी आफूता तरिकाले उनीहरूमाथि शासन त्यसदेशकै जनताबाट गराउन लगाई चालबाजी खेलिरहन्छन्‌ । रक्त युद्ध नभएपति शीत यद्ध चलिनै रहन्छ ।&lt;br /&gt;
ज्योतिपीहरूले भनिसकेका छन्‌ तेस्रो महायुद्ध हुन्छ भनेर । योलडाइँ वैज्ञानिक अस्त्र शस्त्र प्रयोग गरी खेलिने हुँदा हेर्न लायककै होला,होइन त, शिव ?”&lt;br /&gt;
“आआफूना अहम्‌ले कृत्कुत्याएर निम्त्याएको आफनै अन्त्यको खेलआफ्नै सृष्टिको अन्त्य आफैँले रचेको आत्महत्याको साथसाथै सभ्यताको। पराकाष्ठाको यो खेल हनेछ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
२३,&lt;br /&gt;
हु “त्यमैले त यी सब देख्ता कहिले सोच्छु प्रगति पनि के चक्रकाबिन्दुबाट शुरु भई त्यही पुगेर अन्त्य हुने त होइन ? यदि यस्तै हो भनेयौ सभ्यता मानव नाताको बन्धन भएर किन आयो जब उस्तै हाहाकारमच्चाउनु छ भने, उसैगरी लडाई झगडा चलिरहने हो भने ? आजरक्तयद्वबाट शीतयद्धमा उत्रिएका छौँ भने के भोलि बरफयुद्ध भन्दै अर्कोनामकरणको युद्ध निस्कदैन र : आखिर यी सबैको उपलब्धि मानव हत्यानै हो । रातदिन टि.भी.मा देखौ आएका छौं मनुष्यको हत्या मनुष्यले नैगर्दै आएका । बौलाहा कुक्रलाई मारेको जस्तो गरी मारिएका छन्‌ ।मावनताले यहाँ खिज्याउदै छ शिव ः&lt;br /&gt;
“प्रत्येक शुरुको साथ अन्त्य र प्रत्येक अन्त्यको विन्द्रबाट नयाँशुरु हुन्छ भने यस अन्त्य र शुरुका समयभित्र सदभावना राखेर चल्नसक्यौं भने पनि सायद, अन्त्यलाई पछाडि धकेल्न सक्छौं कि क्सौ,शन्त ! ु&lt;br /&gt;
“कुरा त तिम्रो ठीक हो, तर यहाँ सदभावना राखेर नै यी सबगर्दै छौं भन्छन्‌ र पो यो चिन्ताको विषय भएको छ । सुरक्षा रशान्तिका लागि नै यस तर्फका विध्वंसकारीको नाश गर्नुपर्छ, भन्नेसोचाइले नै यस्ता गराउँदै छ । यहाँ कसको कहाँ के दोष छ त्योजाँच्ने को ? एकले अर्कालाई दोष लगाउँछ र आफू उत्तम छु भनेरअर्काको नाश गर्छ। .&lt;br /&gt;
“जस्तो मलाई निकाल्दा सोचेका थिए !&amp;quot; शिव यति भनेर&lt;br /&gt;
हाँस्छ ।&lt;br /&gt;
२६&lt;br /&gt;
कस्तो सुत्न सक्छ गो : संगसंगै बहिनी खाएर कहाँ प॒गिसकीयसको भने निद्रा प॒गेको छैन ।” यति. भन्दै गौरीले मुख छोपेर सतिरहेकोविनोदको सिरक हटाईदिँदै भन्छ &amp;quot;ए, मख छोपेर सत्तैमा रात पर्छहेर बाहिर झलमल्ल घाम लागेको । के त्यहाँ पनि यति नै बेला मात्रउदथिस्‌ कि कसो&lt;br /&gt;
विनोदले आमाको करा सुनेर हाँस्तै भन्छ, &amp;quot;निदाएको ठान्तभयो :नउठेर यसै पल्टिरहेको पो । सोच्तै थिएँ म अब क्न बाटोतर्फ लागौं ।पढाइलाई यहीं नै टुङ्गयाईंदिएर नोकरी गर्न पो लागौ कि ? घरकोआर्थिक स्थिति यस्तो छ&lt;br /&gt;
“नोकरी गर्न पनि त इलमै चाहिन्छ &#039; दई बर्ष मात्र इन्जिनियरहुन बाँकी छ । यस अवस्थामा पुगेर कसरी छोड्ने : यसलाई यतिकैमाअघृरो छाडिस्‌ भने तेरा बाउलाई जागिर खस्केर लागेका आलो चोटमानुन छरेको जस्तै हुन्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
अनि मैले कसरी के गरी बिदेशमा बसेर प्रढ्ने भन्नोस्‌ त ?खर्च त्यतिकै चाहिन्छ । जे जसौ भए पनि आइ.ए.सम्म पढिसकेकै छ्नुसातोतिनो नोकरी कसो नपाइएला त ! नोकरी गर्दै विषय परिवर्तन गरेरजे पढ्न सजिलो पर्छ जति पढ्न सकिन्छ पढ्दै जान्छु । इन्जिनियर नैतपाईंको छोरो, हुनपर्छ भन्नै केही छैन ।&lt;br /&gt;
विनोदले आफनो मन यसरी उदाङ्ग पारेपछि गौरीले पनि जिह्टीकोसाथ आफनो राय व्यक्त गर्दै इन्जिनियर हुनै पर्छ भन्छे । खर्च कसरीपुग्याउने भन्ने प्रश्नमा पनि आफूले त्यसको व्यवस्था मिलाइसकेकीबताउँदै आफनो राय यसरी व्यक्त गर्छे, “परिवारमा एकले अर्कालाईजरूरत परेका बेला सहयौग गर्न सकेमा मात्र सखी शान्त परिवारहुन्छ । अहिले कसरी खर्च टारौं भन्ने तैले सोच्ने होइन, त्यस कुरामासोच हामी पुग्याउछौँ, बरु पछि भाइलाई पढाउने: जिम्मा तैले लिन्‌ ।तेरी बहिनी आज. बिहानै बाहिर गएकी नोकरीका लागि अन्तर्वार्तादिनलाई हो । दिदी त विवाह भएर जाने भइहाली त्यसको कमाइका केआश गर्नु ।. विवाह भएर गएकी छोरीको कमाइ यता ल्या भन्न पनिछु । विवाहमा केही दिन &#039; सकतैनौं भनेर पहिले नै टकटकी सकेका&lt;br /&gt;
||&lt;br /&gt;
9७&lt;br /&gt;
क्रा चल्दाचल्दै विनोदले बीचैमा प्रश्न गर्छ, &amp;quot;अनि साधनालेकहाँ नोकरी गर्न अन्तर्वार्ता दिन गएकी : हिजो त्यतिका बेरसम्म क्रागर्दा पनि मलाई बताउँदै बताइनँ ?&lt;br /&gt;
मिल्छ मिल्दैन यसै बाबादाजुलाई किन भन्ने भन्थी, शायदत्यसैले नभनेकी होली । फेरि तिमीहरूको स्वभाव पनि कस्तो छनि ?“पर्दैन&amp;quot; भन्न बैर लगाउदैनौ ।” गौरीले यति भनेर कुरा फेरि खोल्दिन ।&lt;br /&gt;
“कुरा थाहा भइहाल्यौ बि । आमाछोरीको सल्लाह नै त्यस्तोरहेछ । कुन ठाउँमा कस्तो नोकरी गर्न खोजेकी हो, राम्ररी नबग्नेरपठाउन हुन्नथियो । तपाईंलाई त थाहा होला कहाँ नोकरी खान नम्सेकी&lt;br /&gt;
एअरहोस्टेस हुने रे ? भन्छे पैसा राम्रो दिन्छन्‌ रे घरको रदाजको पढाइ खर्च दुवै पुन्याउन सकिन्छ । अनि मैले पनि खाने भएं खाभनिदिए । दर्खास्त हालेकी थिई अन्तर्वार्तामा बोलाइहालेछ ।&lt;br /&gt;
“ए आमा, तपाईंले छोराको पढाइका लागि छोरीलाईएअरहोस्टेसमा जागिर खान स्वीकृति दिनुभयो ! के म बहिनीका कमाइलेबिदेशमा बसेर पढ्छु भन्ठान्त भएको छ ? लोकले तपाईं हामीलाई केभन्छन्‌ । त्यो पनि सोच्नु भएको छ ! नोकरी पनि कस्तो रेएअरहोस्टेसको &#039; थाहा छ, यो कस्तो नोकरी हो ? हेर्नोस्‌ आमा, केहीगरी त्यो छानिइछ भने पनि एअरहोस्टेस हुन पठाउने होइन :&amp;quot; विनोदलेआवेशमा आउँदै बहिनीलाई त्यस्ता नोकरीमा नपठाउनु भन्छ । आमालाईछोराको विचार मन पर्दैन र भन्छे, “किन नपठाउने : हवाइपरिचारिकाको नोकरी गरेर के हुन्छ ! राम्रो आम्दानी हुनसक्छ, देशविदेशघम्न पाउँछे । मान्छेहरू त्यही नपाएर कति कल्पिरहेका छन्‌ । त॑ भनेनपठा भन्छस्‌ । छानिइछ भने नोकरी गर्छे । काम गरेर खान केही पनिलाज हुँदैन ।&lt;br /&gt;
“लाज हुन्छ या हुँदैन त्यो मलाई थाहा छैन तर एअरहोस्टेसकापेशालाई सम्मानजनक मानिदैन र कुलघरानाका छोरीहरूले त्यस्ता नोकरीगर्न जाँदैनन्‌, यसमा तपाईले जिह्ठी नगर्नु नै बैस हुन्छ । यति भन्दै कजुरुक्क उठ्छ र फत्‌फताउन थाल्छ घरका मुलीले नै संस्कृतिको रक्षागरेको हुन्छ भन्छन्‌ यस घरमा भने के भएको हो यस्तो : छोराकोपढाइका लागि छोरीलाई नोकरी गराउने ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“संस्कृतिका बारे जसलाई केही थाहा छैन क नै यसका बारेबोल्न थालेपछि के हुन्छ : समयसापेक्ष यसलाई पनि बनाउँदै लगेनौं भनेयो आफैँ इतिहास भएर थन्किन्छ र कोही पति यसको अतुयायी हुनसक्तैन ।”&lt;br /&gt;
पप&lt;br /&gt;
छोरी बहिनी, स्वास्नी र आमाको कमाइ खानु भन्नेले सस्कृतिलाईअहिले आएर पालना गर्छु भन्न खोज्यो भने के त्यो संभव हुन्छ : हो,उहिले स्वास्नीमान्छेलाई पढाइन्न थियो, कुनै सीप तालिम दिइन्तथ्यो, त्यसबेला उनीहरूको कमाइ खान भनेको अनैतिक काममा लगाएर घनकमाएको मानिन्थ्यो । त्यसैले सस्कृतिद्वारा नै नारीलाई शौषण हुनबाटबचाउन यसो भनिएको हो । तर अहिले नारीहरूको अवस्था त्यस्तोछैन । उनीहरू बौद्धिक स्तरमा समानरूपले काम गर्न सक्ने भइसकेकाछन्‌ ।&lt;br /&gt;
त्यसैले इमानको कमाट्र छोरीको छ भने पनि मज्जाले लिए हुन्छर यदि त्यो कमाइ छोराको छ जसमा भ्रष्टाचारको दुर्गन्ध आउँछ भनेत्यो त्याज्य हुन्छ । संस्कृतिका कट्टरवादलाई अँगालेर हामी प्रष्ट हुनसकेनौं भने लुकिलुकी हामीलाई कति अनैतिक काम गर्न पनि वाध्यताआइपर्न सक्छ । कुरा राम्ररी बझिराख ।”&lt;br /&gt;
“यहाँ पश्न बहिनीको कमाइको&#039; मात्र छैन पेशाको छ । म फेरिदोहोच्याउँदै छु, यस पेशामा म साधनालाई छिर्न केही गरे पनि दिन्नँ ।तपाईं जे जति भन्नोस्‌ । मेरो पनि बहिनीको भविष्यबारे अधिकार छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“कस्तो एकहोरो लागेको लाग्यै भएको : कुनै पनि व्यवस्थापनलेसेवाका लागि स्थापित गरेको पेशा घृणित हुँदैन । त्यस पेशामा लाग्नैव्यक्तिको व्यक्तित्व कुन स्तरको छ त्यसैमा यो निर्भर हुन्छ । मलाईबिश्वास छ जुन प्रकारले मैले त्यसको चरित्र निर्माण गरेकी छु त्यसलेआफनो नैतिकता जोगाउन राम्ररी सक्छ । यसमा तैले हामीले चिन्तालित पर्दैन । म त्यसकी आमा बोलिरहेकी छु मैले जति त्यसलाई कसलेचिनेको छ !&lt;br /&gt;
आमाछोरा बीच यस्तै गलबदी चलिरहेकै बेलामा राधा आइपुग्छेर भान्छा अझै नउठेकाले केही घन्टा लोग्नेसंग बाहिर गएर आउनअनुमति गौरीसंग माग्छे । हुन्छ, हुन्न केही भन्न नसकी गौरी राधाकोअनुहार हेर्छ । राधालाई कुरिराख्ने फुर्सत छैन क त्यति सूचन। दिएरकोठाबाट हिंडिहाल्छे ।&lt;br /&gt;
ज्यादै व्यस्त हुन्‌ परे पनि राधा आजभोलि धेरैजसो प्रसन्न मुद्रामाहुन्छे । उसलाई दयाले रेडियो नेपालमा गाना गाउने काममा लगाइदिएकीछ । यसरी आफूले पनि पैसा कमाई दिबहादुरलाई सहयोग प॒त्याउनसकेकीले क प्रफुल्ल छे भने दिलबहाद्र आफूलाई दिलोज्यानले साथ दिनेराधालाई के कसरी खुशी राखुँ भनेर प्रयत्न गरिरहेको हुन्छ । छुट्टीकादिनमा उनीहरू पनि घरघन्धा दुबै मिलेर सिध्याईं बाहिर धुम्न निस्कनेगर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
५९&lt;br /&gt;
त्यस दिन पनि घुम्त जाने योजना बनाएर पर्खदापर्खदै ।आमाछोराको गन्धन नट्ङ्गिएकाले दिलबहादुरले राधालाई छुट्टी माग्नपढाएको थियो ।&lt;br /&gt;
जब ती दुई डटेर बाहिर निस्केको गौरीले झ्यालबाट देख्छे अनिछोरालाई तिनीहरूले नोकर र नोकरीको परिभाषा लगाएको सुन्दाशिवलाई कति चोट परेको थियो भन्ने कुरा सुनाउँछे । कुराकासिलसिलामा उनीहरूले बाबासंग आफूलाई दाँजेर उनीहरू र बाबा उस्तै «नोकर त हुन्‌ मालिक कहाँ हुन्‌ र भनेको सुनेर बडबडाउँदै के भन्नथाल्नुभएको थियो त्यो सबै सनाइदिन्छै ।&lt;br /&gt;
“जेसुकै कुराको पनि यस्तै खिन्न अर्थ लगाउने बाबाको बानीबसिसकेको रहेछ । मृद्दाको फैसला नभएसम्म यो यत्तिकै भइरहन्छ ।मसंग पनि यस्तै कुरा धेरै बेरसम्म गरिरहनु भयो । उहाँमा देखा पर्नथालेको यस्तो परिवर्तनले त मलाई डरलाग्न थालिरहेछ । हामीसंग यस्तादिक्क लाग्दा क्रा गर्ने थाल्नुभयो भने हामीले हाँसोमा नै त्यसलाई उडाइदिनपर्छ ।&lt;br /&gt;
विनोदका कुरामा समर्थन गर्दै आफूले त्यस्तैगरी हँसाउने गरेकोबताउँदै भन्छे “बाबाले आफूलाई नोकर मात्र भनको सुनेर दिक्क भईमैले पनि एक. दिन भनिदिएँ तपाई आफूलाई हाकिमको आदेश मान्नुपर्नेनोकर भन्नुहुन्छ भने घरमा तपाईको र अफिसमा हाकिमको आदेश मान्नपर्ने . मलाइ तपाईं के भन्नु हुन्छ ! विनोदले हाँसेर सोध्छ, “बाबालेडब्बल नोकर त भन्नु भएन ?”&lt;br /&gt;
“कहाँ त्यसो भन्नु । भन्नुभयो तिमी कसरी नोकर हुन्छयौँ :तिमी त नीकर्नी पो त ।” उहाँसंग यस्तो कुरा गरेर कहाँ जित्न सकिन्छर्‌?&lt;br /&gt;
&amp;quot;जे होस्‌, कुरा त मिलाउनु नै भएको हो । त्यस बेलातपाईलाई कति हाँसो उठ्यो ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
“के उद्नु हाँसो ? झन्‌ झोक पो चल्यो । त्यति भनेर चप -लाग्ने हौ र ? भन्दै हुनुहुन्थ्यो सरकारी नोकरले त अफिसको ड्युटीसिध्याएपछि पनि मालिक हुन पाउदैन उसको नोकरीको तीमानै रहँदैन ।घर पस्ता पनि त्यो नोकर छाप टाँसिएर नै आएको हुन्छ । किहाम्रासाथ फाइल आएको हुन्छ कि त आदेशका लागि टेलिफोन बज्नथाल्छ .। यसरी आदेश लिने र आफूना मातहतका लागि दिने अनिहाकिमको आशय बभेर त्यसतर्फ- आफूलाई मोडदा नै हो कहिले चिप्लनेकहिले उक्सने त कहिले लुड्कने भइरहने । यसोउसो &#039;गरी कुरालाई उहीबिन्दुमा -ल्याएर राखी हाल्नुहुन्छ&#039; । हाँसो त केही छिन्‌का लागि मात्र हो&lt;br /&gt;
६७&lt;br /&gt;
। कसरी यस निराशाबाट आशावादी बनाउन भन्नेतर्फ लाग्दालाग्दै म पनिकुनै वेला हरेस खाई चिप्लि हाल्छु । मनमा एउटा कुरा, बोल्दा अर्कोकुरा गर्ने अभ्यासमा नपरेकी मेरो क्रा तेरा बाब्लाई वझ्‌न के गाह्रोपर्नु  हाँस्तै भनिहाल्नु हुन्छ, &amp;quot;सत्य कुरालाई लकाउन खीज्दैमा लक्छ र? मलाई भन्न नहच्के पनि हुन्छ । अब कुनै क्राले पनि मलाई छुँदैन ।म त्यति चाम्रो भइसकेको छु ।”&lt;br /&gt;
“बाबाको कुरा सुनाएर मलाई जति अल्मलाउन खोज्नु भए पनिसाधनाले विमान परिचालिकाको जागिर खान्न । बरु अर्को कुनै नोकरीगरोस्‌ त्यसमा म केही भन्दिनँ । यो सत्य पनि बाबाले भन्नु भएजस्तैलुकाउन नसकिने छ । मैले थाहा पाइसकेको छ्लु साधनालाई यो नोकरीगराउन पठाउनु तपाईको विवशता हौ चाहना भने पक्कै होइन, उसकोधारणाबारे विनोदले यस्तो अड्कल गरेको सुनेपछि गौरीले यस पेशामाछोरीलाई लाग्न उसले मन्जुरी दिएको विवशताते होइन, चाहनाले नै होभन्ने बताउन यस पेशालाई यसरी अर्थ्याउछे “यो पेशा सेवाम्‌लक छ रयसले देशविदेश घुमाउने हुँदा विभिन्त सोचाइ रहका यात्रीहरूसंग- एकनाशको व्यबहार गर्नु पर्ने हुँदा .र रातमा बास पनि बाहिरी मुलुकमासमेत बस्न पर्नेले गर्दा यस स्वतन्त्रतालाई लिएर तेरौजस्तो भावना भएकालेयसको बदनाम गरेका हुन्‌ । पहिले तेरा सानीमालाई एअरलाइन्समा&#039; लेखाबिभागमा काम गर्दा पनि के मात्र “ भनेनन्‌. । त्यसले आफनो चरित्रमाथिकसैले औंला उठाउन सक्ने नबनाई &#039;काम गर्दै जाँदा अहिले उसैको राम्रोतरिफ गर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
यहाँ करा काटनेको कमी छैन । यस्ता कुरा सुनेर त्यसलाईप्रोत्साहन पनि दिनु हुँदैन ।&lt;br /&gt;
साथमा बसेर काम गर्दा साथी अवश्य बनिन्छन्‌ र एकै प्रकारकोकाम हुन जाँदा एकले अर्काको सहयोग गर्नु उनीहरूको दायित्व वनेकोहुन्छ र जुन संबन्ध यसले बसाएको हु, ) शन त्यसमा अनुशासनको रेखाकोरिएको नै हुन्छ । त्यसैले मंलाई छ जबसम्म उनीहरूलेस्वुइच्छाले त्यस बन्धनलाई नाघेर अगाडि बढ्न चाहदैनन्‌ त्यसलाई पेशालेघचेद्तैन । त्यस्तै सीमा नाघदै जान चाहनेलाई नोकरीको पेशा खोज्दैहिड्नु- पति पर्दैन । घरैभित्र कडा निग्रानीमा रहेकाहरू &#039;कतिले आफूलाईचरित्रहीन बनाएका पनि छन्‌ । यो कुरा बझ्ने स्थितिमा त पुगिसकेकोछैनन्‌ । त्यसैले यस विषयमा चुप लागेर खुरुबैक्ष भात खान हिड भनेरभान्छातर्फ -लैजान्छे । र &amp;quot;०&lt;br /&gt;
६१-&lt;br /&gt;
भात पस्कदै भन्छे, “ती जोडी गइहाले कुन बेला फर्कने हुन्‌ ।यो धन्दा आफैँले गर्नुपर्छु । तेरो विवाह भएर बुहारी घरमानआउनजेलसम्म यो यतिकँले बित्ने भयो ।”&lt;br /&gt;
बिनोद पनि हाँस्तै भन्छ, “ए, त्यसौ भए तपाईलाई ट्रिपल नोकरचाहियो :&amp;quot;&lt;br /&gt;
“हेर, अहिले नै उसकी स्वास्नीलाई दुःख दिने भए भनेर भनेको; लौ त्यसलाई केही पनि भन्दिनँ भयो अब !” क हांस्तै भन्छे ।&lt;br /&gt;
“काम नलगाउनु होस्‌ भनेको हो त ? डब्बल नोकरको नोकरभएपछि ट्पिल नोकर भएन र ! त्यस अर्चले पो हाँसेको । अब तपाईंपनि बाँउठेको कुरा गर्न थाल्नुभया ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
बाँउठेको कुरा होइन, तेरी स्वास्नीलाई मैले जे गरे पनि ट्रिपलनोकर बनाउनै सक्दिनँ&lt;br /&gt;
विनोदले आमाले भनेको कुरा बुझ्छ र भन्छ, &amp;quot;ए....हो त !त्यो त भई भने पनि ट्रिपल नोकनी पो हुन्छे, होइन आमा !&amp;quot; हाँस्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
समय दिनको ११ बजेको छ । घरमा ती आमाछोरा बाहेक अरूछैन । शिव भ्रमणमा गएको छ र सबै आआफना काममा । गौरीलाईसन्चो नभएकाले छुट्टीमा घर बसेकी छे । यो घरको व्यवस्था बेग्लैप्रकारको छ । आमाबाव, छोराछोरी सबै हुर्किसकेकाले साधी जस्ता भईक्राकानी गर्छन्‌ । राख्न पर्ने मान मर्यादा आमाबाबुलाई नराख्ने होइनन्‌ ।तर हाँसखेल, ठट्टा, दुःखसुख सबै आपसमा बाडिरहेका हुन्छन्‌ । गौरीशिब दुबै भन्छन्‌ “यो घर यौ परिवार हाम रचना हो । यहाँ हामी एकछौं । एक अर्काका साथी छौं ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
कुनैले छोराछौरीसंग पनि यस्तो के व्यवहार गरेको भनेर सोधेभने भन्छे, “सानोमा पनि यी आमाकै साथमा हुन्छन्‌ र्‌ बढेर ठूलाभएपछि ती साथी हुन्छन्‌ । मैले त्यही त व्यवहार गर्दै छु । नत्र यीछोराछोरीले साथी खोज्दै कहाँ पुग्ने हुन्‌ कहाँ, आ।आफनो लक्ष्यनलागेसम्म उनीहरूको दुःखसुख सुनिदिने, अर्तीवुद्धि दिदै सुच्याउनु पर्नेक्रामा सुन्याउने र यम्थम्याउत पर्नेमा थुम्थम्याउने र त्याज्य क्रालाईछोड्ने सल्लाह त दिनुपरिहाल्छ नि । आजभोलिका छोराछोरीलाई उहिलेकोजस्तो गरी दबाएर राख्नु हुँदैन । दबावले त सन्तानको भित्रि हयाउ नैसखाप पारिदिएर समयसंग सामना गर्न अगाडि सर्नै नसक्ने बनाइदिदोरहेछ । यसले त्यसरी मनस्थितिमै घक्का पार्ने हुँदा हामीले यिनीहरूलाईमुठ्ठीमा राख्न उचित हुँदैन ।&lt;br /&gt;
देशको शासनप्रणालीले पति समाज र घरका वातावरणमा प्रभावपार्दो रहेछन्‌ जसरी दवाव नभई समझदारीमा सरकार चल्दैछ, त्यसरी नै&lt;br /&gt;
दैरे&lt;br /&gt;
छलफल गर्नु, न्याय खोज्नु जस्ता स्थिति घरघरमा ल्याउनु पर्ने हुन्छ ।घदि यस्ता करा हामीले छोराछोरीको सनिदिएनौं भने ती बिद्रोही भएरनिस्कन सक्छन्‌ । अनुशासन, मयांदा र नैतिकता हामीले घरैबाट सिकाउँदैलैजानु पर्ने कुरा हो नत्र स्वतन्त्रतालाई बुझून नसकेर घर मात्र होइन,देशै पनि बिकृतितर्फ लाग्न सक्छ । त्यसर्थ म कहिले यिनीहरूको साथीभई छलफल गर्न सिकाउँछु, त कहिले गुरु भई अर्ध्याउँदै सम्झाउँदैअवस्थाको परिचय दिन्छु । यसरी आफूले जाने बुझेको ज्ञान सन्तानसम्मपुन्याउन्‌ सकेनौं भने हामीले बिताएका समय र जीवनसङ घर्ष व्यर्यकाहुन्छन्‌ किनकि यति नै अनुभव र ज्ञान तितलाई बटुल्न हामीले जतिकैउमेर बिताउनु पर्छ । अनि प्रगति कता उन्मुख हुन्छ ! त्यसैले भनिएकोहो, “आमाबाबु नै जीवनका पहिला गुरु हुन्‌ र घर नै पहिलोपाठशाला ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
ज्ञति गम्भीर कुरा गरै पनि हाँस्नै स्वभाव उसको भएको हुँदाअन्त्यमा हँसाउन भनिहाल्छे, “आज भोलिका गुरुहरूले पनि स्कूल जाँदालदी छोडेर जान थालेका छन्‌ ।”&lt;br /&gt;
यसको प्रतिकार कसले गर्नै : यस्तो भइरहेकै छ ।&lt;br /&gt;
र&lt;br /&gt;
0&lt;br /&gt;
सौर्य मण्डलबाट उछिट्टिएको एक चोइटाले पृथ्वीको सिर्जनाभएझैं शिवगौरीका घरबाट अन्भाइएर पठाइएकी दयाले दीपेशका घरमापुगी नयाँ जीवन सृष्टितर्फ लागेकी छे । व्यवहार नयाँ, मान्छे नयाँ,तितीहरूसंगका सम्बन्धबाट उमार्नु पर्ने माया भएको हुँदा क समर्पित हुदैछे हरेक क्षेत्रमा । क चनाखो हुन सिक्ने कोसिसमा लागेकी छ । त्यसघरको व्यबहोर जुन उसका घरकोभन्दा बेग्लै छ, कतिमा क आफूलाईढाल्त सक्तिन र अल्मलिएर आदेशका लागि प्रतीक्षा गर्छे त कतिमा कअचम्मित भएर लोग्नेको सहयोग माग्छ ।&lt;br /&gt;
यस नयाँ घरमा “सरस्वतीको भन्दा लक्ष्मीको बास बढी रहेकोउसले पाएकी छै । सबै भौतिक साधनहरूले पूर्ण भएकाले त्यहाँ कमीकेहीको छैन भने जस्तौ देखिन्छ । त्यसैले त्यहाँ कोही पनि , प्रयत्नशीलरहेको देखिएन । ससराले जीवनभर नोकरी नै नगरेर बिताएका छन्‌ भनेसास्‌ घरव्यवहारमा मात्र सीमित छै । समय फुर्सतका साध बितिरहेछ ।आमाबाबु एकातिर आफना धुनमा छन्‌ भने छोराछोरी अर्कातिर । कसैलाईकेही थाहा हुँदैन को के गरिरहेको छ र त्यो जान्ने चासो पनि कसैमाछैन । .&lt;br /&gt;
अहिले मात्र नयाँ दुलही भित्रिएकीले सबैको ध्यान उसतर्फखिचिएको छ । उततलै देखाएको नयाँपनाप्रति उनीहरू पनि त्यत्तिकै मजालिदै हाँस्तै ,छन्‌ र सिकाउने, संभझाउने -गर्दै उसलाई आफना घरकोव्यवहारमा ढाल्न खोज्दै छन्‌ ।&lt;br /&gt;
सबैले घरमा उसलाई चाहेको हुनाले दया अति खुसी भएकी, र पनि बाआमाका घरलाई बिर्सन सकेकी छैन आमा, बहिनी,भाइहरूसंग टेलिफोनमा कुरा भए पनि बाबुसंग न कुरा हुनसकेको छ नत भेट नै । सङ कोच गर्दै दीपेशलाई एक दिन बाआमासंग माइतीमाभैट गर्न जाऔं भन्नै प्रस्ताव राख्ता उसले जब स्वीकार गयो त्यहदिखिझन्‌ दयाको माया र , श्रद्धा दीपेशतर्फ बढेको छ । मनमनै भन्दै छै,(मैले लोग्ने&amp;quot; भगवानका कृपाले नै यस्तो सज्जन पाएकी छु ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
द्र&lt;br /&gt;
यस्तै रमाइला दिनलाई खल्लो पार्न दीपेशको अमेरिका फर्कनेतरखर घरमा शुरु हुनथाल्छ । दयाले फकाउँदै छुट्टी बढाउन अनुरोध गर्छेतर दीपेशले उसको यस अनुरोधलाई प्रा गर्न असमर्थ रहेको बताउनअमेरिकाको नोकरी गर्नुपर्दा स्वीकार्नु पनै नियम बताउँछ । जांगरदारकोकर्तव्य के हो भन्ने बुझेकी दयाले त्यसपछि यसमा घेरै जोड गर्दिन रसौध्छै &amp;quot;तपाईंको इच्छा आफूले अवकाश प्राप्त नगरुन्जेलसम्म त्यहीनोकरी गर्ने छ कि केही वर्षपछि स्वदेशमा नै फर्कने छ । तपाईंइन्जिनियर हुनुहुन्छ । पैसाको समस्या पनि नपरेको तपाईंले त आफ्नैफर्म खोलेर यही काम गर्न थाल्नु भए पनि हुन्न र ? आफनो देशजस्तो त अरूको देश हुँदैन होला ? यहाँ जे भए पनि आफना भन्ने धेरैछन्‌ । परिवार छ, समाज छ, आखिर घन कमाउनु, यश कमाउनु पनित यिनै परिवारका र समाजका लागि हौ नि ? यिनै हुन्‌ आफनाकोमान, कदर गर्नसक्ने । त्यहाँ प्रवासीलाई भसनासरह पनि गन्दैनन्‌ रे भन्नेसुन्छु । भनाइमा कति सत्य छ, त्यो मलाई थाहा नभए पनि ज्ञानहासिल गर्न विदेशी सहयोग लिए पनि त्यसको प्रयोग स्वदेशमा नै गर्नुदेशसेवा हुन्छ कि भन्ने लाग्छ । हेर्नोस्‌ न, यही हुर्की, बढी, यहीकैअन्तपानी खाएर बाआमाको स्याहारसुसार पाएर यहाँकै शिक्ादीक्षा प्राप्तगरी हामीले आफूतो परिचय बनाउन सक्यौं । के हामीमाथि यस देशकोक्रण लागेको हुँदैन र :&lt;br /&gt;
&amp;quot;हुन्छ तर म आदर्शलाई मात्र होइन, यथार्थलाई पनि मान्छु ।यत्रो भावनामा बग्नै तिमी यति त सौचेर हेर, यो देश, तेरो र यो देश,मेरो भन्न नै गलत होइन र ? हामीले किन मान्न सकिरहेका छैनौं, योएउरा पृथ्वी हो र यहाँ बस्ने हामी सबै प्रकारका मनुष्य मात्र हौं । यहाँके फरक छ ! उस्तै छ प्राकृतिक देन एस्तैगरी बनेको छ मनुष्य शरीरर उत्तै छन्‌ बाँच्ने जाधारभृत आवश्यकताहरू । अझ सीमाना रेखाङ्नगरेका ठाउँमा गएर हेन्यौ भने लाग्छ, हाम्रो सोचाइ कति खुम्चिएकोछु ।”&lt;br /&gt;
दीपेशले आफनो मन्तव्य त्यसरी राखेपछि दयाले भन्छे, &amp;quot;यतिकुरा जानेर तपाईंले यसो भन्नु मलाई खिज्याउनु भएको त होइन ! पूरापृथ्वीलाई एक मानिन थालियो भने यहाँ कार्य विभाजन र शासनविभाजन नभएर कसैले पनि दायित्व नलिइदिदा प्रगति नै रोकिन्छ ।समष्टिगतका आधारमा हेर्नुपर्ने मानवता र मानव सभ्यता मात्र हा ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“सीमाना तोकिनु पर्ने आवश्यकता किन छु भने प्रत्येकचागरिकले आफूनो राज्य सीमानाभित्र रही आआफूनै क्षमता अनुसारआफना भलाइका लागि यिनै प्राकृतिक देनहरूबाट के उपलब्ध गर्न&lt;br /&gt;
ध्ष&lt;br /&gt;
सकिन्छ भनी बद्धि प्रयोग गरी परिश्म गर्दै जानाले नै विकासमा फरकआएको हो । त्यसैले अर्काका क्षेत्रमा पनि अर्काका विकाससंग -निर्लिप्तभई त्यही रमाइरहनुमा आफू र आफूना देशलाई आफैँले निम्न ठान्नुहुनआउँछ कि भन्ने मेरो सोचाइ मात्र बताएकी हुँ ।&lt;br /&gt;
हामीले परिश्चम गर्न सकेनौं, हाम्रो बुद्धि विकास हुन सकेन,आफनो राज्य सीमानाभित्रका प्राकतिक बनोट धनी भएर पनि यसबाटफाइदा लिन सकेनौं भनेर विदेशिनुले झन्‌ झन्‌ हामीलाई पछाडि धकेल्नेत होइन भन्ने लाग्छ ! त्यसैले मैले त्यहाँबाट ज्ञान प्राप्त गरेपछि यहीफर्कने पो हो कि भनेर प्रस्ताव राखेकी हुँ ! गाउँका शहर पस्ने,शहरका विदेशिने सबै विकासको खोजमा भन्छन्‌ । बिकास भनेभागिरहन्छ क्या रे : मृगतृष्णा जस्तै जति नजिक पुग्यो उति परपरत्यस्तै आकर्षण देखाउँदै ।”&lt;br /&gt;
दयाका कुरा निकै घतलाग्दा भए पनि दीपेश फर्केर जान नैतैयार हुँदै आफूले विदेशिनु परेका कारणको साथमाथै यहाँ योग्यताकोपारख नहुने परम्परा बस्तै आएका करा अरनीका चाइना पलायन हुनु रत्यो मरतिकार जसले पलान्चोक भगवतीको मूर्ति अति राम्रो बनाएकालेकलालाई नै मार्न हातखुट्टा दुन्क्याइदिएका उपमाहरू दिदैँ भन्छ, यहाँनोकरी योग्यताले मात्र पाइँदैन । कपावादले योग्यतालाई &#039;झुकाइदिएकालेस्वयं हामी आत्मग्लानीले भतुक्कै हुनुपर्छ । मैले पहिले यहीँ नोकरी गर्छुभनेर कोसिस नगरेका पनि होइन । आफनो देशले पत्याएन विदेशलेबोलाए पछि नाईँ जान्न म भनेर बसिरहुँ : यस्तो भने म गर्न सक्तिनँ ।&lt;br /&gt;
अहिले म एक्लै जान्छु र त्यहाँको चाँजो मिलाएपछि चिठी लेख्तैगरछला । मलाई पनि तिमीलाई छोडेर जाने मन कहाँ छ र : नोकरीछोडन सक्दिन ? म विवश खु दया ।&lt;br /&gt;
दयाले जे जति भने पनि सबैको रायअनुसार दीपेशले अमेरिकाफर्केर जानु उत्तम मानेकाले त्यसमा धेरै जिह्टी गर्न सक्तिन र आँखाभरीआस लिएर बिदा गर्दा खुसुक्क संझाउछे, “चिठी लेख्न नभुल्नु होला, मपर्खिरहन्छु ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
दीपेश गएपछि दयालाई निकै शून्य लाग्छ । माइती जान पनिमन लाग्दैन । अफिसबाट घर फर्कदा झिनो आशाले सताइरहेको हुन्छ रनन्दसंग सोधिहाल्छे, “दाजुको चिठी आयो, मैयाँ ?”&lt;br /&gt;
लोग्नेसँग यति छिटो, यति गहिरो प्रेम बसेको संझैर दयाछक्कपर्दै सोच्छु, “तिनै बाआमासंग जन्मेदेखि अहिलेसम्म रहँदै आएकामात्यस संबन्धको वियोग बिर्सेर यो नयाँ व्यक्तिप्रति ज्यादा संझना कसरी रकिन आउँदै छ ! संस्कृतिको या, धर्मको या स्वार्थको, केका शक्तिले&lt;br /&gt;
दद&lt;br /&gt;
मलाई यस्तो बनाइरहेछ : संखदःख भन्न नै लोग्ने हो, लोग्नेको सबै अबतेरो आफनो हो, भनेकाले त्यसैका मोहले ज्यादा चाहेकी त होइनआमावबाबुसंग त जीवन नै गाँसिएको छ, उनीहरू गल्तीनै भएमा पनिक्षमा दिनसबने माया र ममताको भण्डार छातीमा राखेर वसेका हुन्छन्‌ ।त्यसैले यतातर्फको चाहना बढ्नु मायाको भन्दा वढी मोहले नै हो तया छोडिदेला भन्ने डरले हो ? यस्तो प्रश्न उद्ठाएए दया आफ्नैसोचाइमा अल्मलिन्छे । यही हो भनेर ठम्याउन नसकी पेरणासंग बसेरयसबारे छलफल गर्ने निधो गर्दै मनलाई लगाम लगाउँछै ।&lt;br /&gt;
प्रेरणा दयाकी खुबै मिल्ने साथी&#039; हो ! उसको विवाह भई नानीसमेत भइसकेको र दीपेशका परिवारमंग पनि चिनारी भएकाले उसकाघरमा जाँदा कसैले पति केही नभन्ने भएकाले त्यहाँ गएर उही प्रश्नदोहोन्याउँदा प्रेरणाले भन्छे, “शुरु शुरुमा तिमीले भन्ने भैँ मोह, त्रास,स्वार्थ, सामाजिक रीति अनि धर्मले नै अङ कश हाल्छ त्यसपछि जीवनकाहरेक क्षेत्रमा साथ रहँदा माया बस्तै जान्छ । तिमीले दीपेश जस्तो लोग्नेपाउनचाहि संयोग भन्छुयौ या भाग्य यो राम्रो भएको छ । उसले कुनैकुरामा पनि कहिल्यै कुनैभन्दा कम हुन्‌ परेन । एकफेर, जागिर खानभनी अन्तर्वार्ता दिदा अनुत्तीर्ण भएको थियो र यहाँ नोकरी नै गर्दिनँ भनेरआवेशमा आई एउटा फर्म भरेर अमेरिकामा कै पठाएको थियो, तुरुन्तैबोलाइहाले । त्यसपछि पनि यसै कहाँ गएको हो र ! मलाई योचाहिन्छ त्यो चाहिन्छ भनेर लेखी पठाउँदा पति त्यो समेत दिन राजीभएर बोलायो । अहिले त नोकरी पनि पक्का भईसक्यो रे ः&lt;br /&gt;
त्यसैले तँलाई त्यहाँ लैजान उसलाई कुनै गाह्रो पर्दैन । केहीदिनको मात्र कुरा हो । अँ, त्यहाँ पुगेपछि तँ पनि काम गर्न याल्नू ।विदेशमा काम गर्दा कस्तो हुन्छ भन्ने अनुभव त लिन सकिन्छ ।&lt;br /&gt;
“मैले आफूलाई भाग्यमानी नै संझेकी छु । बिदेशमा यति लामोसमयसम्म बस्ता पनि कुलतमा नपरेर पैसा कमाई घर पठाउनु भनेकोसराहनीय नै हो । अब पीर लाग्न यालेको अर्कै कुराले छ । अब तउहाँले पहिलेको जस्तो फुक्का आफूलाई सोच्नु हुँदैन । विवाहका बन्धनलेयसतर्फको दायित्व कति संझाउने हो भन्ने छ । विवाह भएर एक महिनापनि साथ बस्न पाएका छैनौं । त्यसैले उहाँको पूर्ण स्वभाव बुझन सकेकीछैन । यहाँबाट जानु भएकै आज झण्डै १५/२० दिन भइसक्यो । न तटेलिफोन आउँछ न त चिठी नै । अमेरिका फर्कने बेलामा पनि मैरोएउटै अनुरोध “चिठी पठाउदै गर्नोस्‌ है&amp;quot; भन्ने थियो । ख्वै कुनै समाचारत्यहाँको पाउन सकेकी छैन । यता आफूनो भने .....?&amp;quot; यति भन्दै कलज्जाउँदै टक्क अडझछै ।&lt;br /&gt;
६७&lt;br /&gt;
गन्‌ भन्‌ के भयो तेरो : आँसले तक्या भिज्यो कि मनकँडिएर छियाछिया भयो ? यही हो हाम्रो । मायाका खानी हामी,यसैगरी भावनामा डुबिरहन्छौ, अन्तर्मखी भइरहन्छौ, यसलाई हामी आफनोकम्जोरी मान्ने कि नारीस्वभाव भन्ने कि संस्कारको छाप ज्ञ मलाई लाग्दैछ, दया, यो स्थिति हाम्रा छोराछोरीका पालामा पुगेर पनि जान्छ जादैनभन्न सकिदैन समय निकै अगाडि बढी सकेको छ दायित्वले ठूलो भागओगटेको छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
मेरो कुरा सबै सुन्दै नसनेर तिमीले एक्लै यति लामो कुराफलाक्यौ । मेरो अर्घ त्यो होइन । अब हामी दुई मात्र नभई तीद हुनेभयौं जस्तो भान मलाई हुन वालिरहेछ भनेर दयाले आफनो स्थितिप्रेरणालाई बताएपछि, प्ेरणा खुशी हुँदै भन्छे, “अब त झन्‌ राम्रो भयो। तिमीले समय काट्ने खेलौना जोडन थालिछ्यौ । अनि यो कुरापरिबारलाई थाहा भइसक्यो त ?”&lt;br /&gt;
“कसरी भन्नु : यो घरको काइदा कदर हाम्रो माइतको जस्तोछैन । अझै के कोसंग भन्न हुन्छ र के भन्ने वाहा पाउन सकेकीछैन । यस्तो कुरा कसलाई सुनाउने म क&lt;br /&gt;
यसरी दयाले आफनो असमर्थता बताएपछि प्रेरणा भन्छे, “गजबकीछेस्‌ त॑ ? अहिले कसैलाई पनि नबताएर पनि यो लुक्ने कुरा हो ! त्यसबेला घरकाले मात्र होइन, टोलकाहरूले समेत थाहा पाउँछन्‌ । यस्ताकुराको खबर घर परिवारलाई पहिले दिनुपर्छ । फेरि तिम्रो त लोग्ने पनियहाँ छैन । भरखर विवाह भएको छ ।”&lt;br /&gt;
“उहाँ नभएर कै भयो त ? नानी त उसैको हो, यसमा कुनैशङ्का यसै लिन कहाँ पाइन्छ :&amp;quot; दया यति भन्दै प्रेरणालाई हेर्छ र प्रेरणापनि दयाले उसले बोलेका कुरामा त्यस्तो अर्थ लगाएकाले दिक्कहुँदै भन्छै,“होइन, कसले के भन्न आएको छ : यस्तो कुरा गरेर बचाउ लिनतम्सिन्छेस्‌ । यस बेलामा स्वास्थ्य परीक्षण भइरहनु पर्छ, कसैले ध्यानदिनुपर्छ भनेर पो त मैले त्यसौ भनेकी । तिमीलाई भन्न अप्ठ्यारो लाग्छभने म नै गएर यो शुभ समाचार सुनाइदिन्छु । भयो अब ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
च्रेरणाले लिएको जिम्माबारै दयाले त्यसपछि अरू केही पनिभन्दिन बर अर्को पनि सहयोग गर्न अनुरोध गर्छे, “ए .... सक्छैस्‌ भनेउहाँको अमेरिकाको टेलिफोन नम्बर पनि लिइदेन । बाहिरैबाट भए पनिम एक्फेर कुरा गर्छु । हेर्न म कस्ती हुस्म छु । छुट्टिने नै भएपछित्यहाँको टेलिफोन नंबर माग्नु पर्दैनथ्यो ? त्यस्तो खर्च गर्ने बानी नभएकीमैले त्यस बेला यसको आवश्यकता नै बिर्सिए । अझ अचम्मको कुरा तयो छ प्रेरणा, मसंग उहाँको ठेगानासम्म पनि छैन ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
दद&lt;br /&gt;
एक दिन साह्रै सङ,कोच मानेर भए पनि नग्दसंग सुटुक्कउहाँको ठेगाना के मागेकी थिएँ क्रा उनीहरूलाई प॒गी हाल्यो । नन्दलेमैले कुनै माग्नै नहुने कुरो मागेकी जस्तो गरी हाँसेर सबैलाई सुनाउनुभयो । उनीहरूका अट्टहासको आवाज सुनेर म लाजले भतुक्क भएँ ।तैपनि न त्यो सुन्नेले न त पुनाउनेले मलाई अमेरिकाको ठेगाना दिए ।व्यवैं किन माग्न गएँछु भनेर आफैँसंग कुपित भए । लौ तँ नै भन्‌ मैलेआफूना लोग्नेको ठेगाना माग्दैमा तिनीहरूलाई त्यसरी किन हाँसेर उडाउनुपर्थ्यो ?&lt;br /&gt;
तँ लाज मान्ने भएकीले नै उनीहरूलाई जिस्क्याउन मज्जालाग्यो होला । फेरि. जिस्क्याउने पनि त भरखर विवाह भएकैलाई त होनि ? साना साना कुरालाई लिएर पनि तँ कति सोचेर बस्छैस्‌ ? यसबानीलाई छोड्नेतर्फ लाग्‌ । नत्र दुःख पाउलिस्‌ । जे भए पनि तेरो यसपटकका दुवै काम म गरिदिन्छु त्यसपछिको जिम्मा भने म लन्नँ । त्योतैले आफैँले सल्टाउनु पर्छ । तेरो काम गरिदिए बापत मलाई केदिन्छेस्‌ ?”&lt;br /&gt;
“मसंग के छ र तँलाई दिउँ : यस्तो व्यापारीको जस्तो कुरागर्न कहिलेदेखि थालिस्‌ !”&lt;br /&gt;
“यो अनुहारलाई उज्यालो पारेर एकफेर हाँसिदित त सम्छेस्‌ ?तँ धेरै दुखी भइस्‌ भने तेरो त्यो अदृश्य नानी पनि तँजस्तै चिन्ता लिनेहुन्छ । अनि के त्यसको नाम चिन्तार्माण राख्छेस्‌ ?”&lt;br /&gt;
दया पनि हांँस्तै भन्छे, “होइन, त्यसको नाम म हँसमुख राख्छु ।तिमीले हँसाइ हाल्यौ ।&amp;quot; दुवै केही छिन हाँसीखुशीले बिताउँछन्‌ र भोलिआफिसबाट फर्केपछि दयाका घरमा पस्नै बाचा गरेर पेरणाले दयालाईबिदा गर्छे । ७ १ ०&lt;br /&gt;
साधनाले जहाजका ढोकामा उभिएर जहाजभित्र छि्दैका सबैपात्रीहरुलाई हाँसेर नमस्कार गरी अभिवादन गर्छै । जब जहाजको ढोकाबन्द गरिन्छ र त्यो धावन मार्गतर्फ बढ्छ यात्रीहरू “सिटको पेटीबाँध्नोस्‌” भन्ने सङ,केत अनुसार धमाधम पेटी बाँध्न थाल्छन्‌ ।परिचारिकाहरू हातमुख पुस्ने रुमाल बाँड्दै यात्रीहरूले पेटी बाँधे तबाधेकोजाँच्तै ओहोरदोहोर गर्न थाल्छन्‌ । केही छिनमा नै जहाजले टाउकोउठाएर जमिन छोड्दै आफना पाङ गाहरू पख्रेटामुनि लुकाउँछ र निर्धारितउचाइ समात्न आफतो गति बढाउँछ । जब जहाज आफनो उचाइकोतहमा आउँछ “पेटी बाँध्नोस्‌&amp;quot; भन्ने सङ केतको “बत्ती निभ्छ ।&lt;br /&gt;
अनन्त आकाशमा बादललाई चिर्दै बढिरहेका जहाजभित्र साधनालेजीवन सुरक्षाको ज्याकेट प्रयोग गर्ने विधि&#039; बताइरहेकी छ । सबै यात्रीहरू&lt;br /&gt;
“६९&lt;br /&gt;
उसले सङ,केत गरेको ठाउँ हेर्न र पहिरन कसरी गर्नुपर्छ भनेर आफैलेलगाई सिकाउन थालेकीलेै त्यो तरिका सिक्न साधनामाथि आँखाघुमाइरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
शुरु शुरुमा साधनालाई त्यतिका यात्रीहरूलाई आफूतर्फ ध्यानआकृष्ट गराई त्यो विधि सिकाउँदा सङ कोच लागे पनि अब उ अभ्यस्तभइसकेकी छ । जब जब अर्की परिचारिकाले बताउन बाल्छै, त्यहीअनुसार उसका हातहरू चल्दै सङ केत दिन वालिहाल्छन्‌ । जहाजभित्रयात्री कक्षमा परिचारिकाहरू भान्छा र स्टोभमा खाना तताउन र मिलाउनथाल्दा खत्राकखुत्रुकको आवाजका साथसाथै खानाको बास्ना हरहर चल्नथाल्छ, एउटा यात्रीले परिचारिका बोलाउने घण्टी थिच्छ । पिलिक्क बत्तीबल्नासाथ साधना छिटोछिटो हिडेर त्यस यात्रीनौजक पग्छे र बत्तीनिभाउँदै बोलाउनको तात्पर्य सौध्छै । यात्रीबाट जवाफ अनौठो आउँछ ।क अलि त्रस्त भएर नै सोधी रहन्छ, &amp;quot;तपाईंले त्यो ज्याकेट लगाउन किनसिकाउनु भयो र कुनै आपत्‌ आएकाले बताएको त होइन ! हो भने,भन्नोस्‌ हामी अहिले नै लगाएर बसिहाल्छौँ । त्यस बेला अल्मलिएलालगाउनै पनि नजालिएला बरु ओलिँदा यसको जञ्रत परेन भने तपाईंलाईफिर्तै दिउँला :”&lt;br /&gt;
यात्रीको यस्तो प्रश्न सन्दा साधनाले के थाहा पाउछ भने कपहिलोपल्ट जहाज चढेको हौ र नग्नताको साथ भन्छे, &amp;quot;यो विधिसिकाएको आपत्‌ आइपरेको छ भनेर होइन, आपत्‌ आइपरेमा के कस्तोगर्नपर्छ भनेर उपाय मात्र सिकाएको हो । केही सङ्घ कट पर्नआएछ भनेहामी खबर गर्छौं । त्यसबेला अक्सिजन मास्क यहाँबाट आफैँ झर्छ ।हामी फेरि आएर नजान्नेका लागि लगाउन सिकाउँछौं र अरूलाईलगाउन पनि सिकाउँछौं । यो पढ्नोस्‌, यसमा पनि सिकाइएको छ भन्दैपढ्नलाई सिटका खल्तीबाट एउटा प्रति झिकेर दिन्छे । त्यसै बेला अर्कीपरिचारिकाले पेय पदार्थ र खाना बाँड्न धालेको सूचना दिएको सुनिन्छर त्यस यात्रीलाई निश्चिन्त भएर बस्न र खाना खाएपछि आरामलिनलाई के कसो चाहिन्छ त्यो भन्नलाई अनुरोध गर्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
केही थाहा नपाएको त्यस यात्रीले भनोस्‌ के : उसैलाई सोध्छ,“के के दिन सक्नुहुन्छ, त्यो थाहा पाए पो त यो चाहिन्छ भनुँ ?”&lt;br /&gt;
“कम्मल, तकिया, शिर दुख्न लागेमा र उल्टी आउन लागेमाऔषधी सबै छन्‌ । उल्टी थाप्ने यौ ब्याग भने हेर्नोस्‌ यहाँ छ भनेरदेखाइदिन्छै ।” वि&lt;br /&gt;
यतिकैमा अर्को सिष्टबाट घण्टीको आवाज सुनिन्छ । साधना त्यहाँपुग्छु र सहयोगका लागि सोध्छ । त्यस यात्रीले केवल पढ्ने लाइट&lt;br /&gt;
७०&lt;br /&gt;
बाल्नलाई बोलाएको रहेछ । त्यो सुनेर साधना खिस्स हाँस्तै बत्तिबालिदिन्छे । अर्का यात्रीले सबैकहाँ साधना पुगेकी र उसकहाँ नआएकीलेअलि रिसाउँदै भन्छ, “यहाँ खोइ, के चाहिन्छ भनेर सोध्ने चलन छैन किकसो ? म जाडाले अघिदेखि काँपिरहेछु । अन्तराष्ट्रिय क्षेत्रमा उड्नथालेपछि यस्ता कुरामा ध्यान दिनु पनि पर्छ । कसरी यिनीहरूले प्रतिर्स्पधागर्लान्‌ खै ।!&lt;br /&gt;
साधनाले, &amp;quot;सरी” भनेर कम्मल निकालेर दिदै सोध्छे, “चियाकफी या कुनै डिङ् ल्याकै !&amp;quot; उसले त्यसो भन्नाको आशय सेवामासुधार ल्याउनलाई हो भन्ने देखाउन भन्छ, “मलाई अरू केही चाहिदैन ।बरु तपाईंहरूले यात्रीहरूकहाँ बीचमा गएर के कसौ चाहिन्छ भनेर सोध्नेगर्नोस्‌ । अरू एयरलाइन्समा कस्तो हुन्छ, यहाँ भने !&amp;quot; यति भन्दै गमक्कपरेर कम्मल ओढ्छ र आँखा चिम्लिन्छ ।&lt;br /&gt;
साधनाले उससंग केही बहस गर्दिन र एकफेर केबिनको तलदेखिमाथिसम्म घुमेर सबै यात्रीहरूलाई निरीक्षण गर्छौ र कुनै कूनैलाई हाँसेर,“के ल्याऔौ&amp;quot; भनेर पनि सोध्छ । कूनै यात्री जिस्कने पाराले भन्छन्‌ पनि,“के छ तपाईसंग त्यो सबै दिनोस्‌ ।&amp;quot; यस्तो जवाफ सुनेपछि त्यहाँउभिइरहनु उचित ठान्दित र आफनै ठाउँमा फर्कन्छ ।&lt;br /&gt;
यीमध्ये एउटा यात्रीले उससँग सोध्छ, “तपाईंले यो काम गर्नथाल्नुभएको कति भयो !” साधना यात्रीको प्रश्न सुनेर स्तम्भित हुन्छै ।यात्री फेरि बोल्न थाल्छ, “यस्तो प्रश्न सोधेकामा नराम्रो नठान्नोस्‌ । मपहिले नै माफ माग्छु । त्यसपछि साधना झस्किन्छे र जवाफ दिन्छे,&amp;quot;किन नराम्रो मान्नु मेरो सेवामा केही कमी पो भयो कि ?”&lt;br /&gt;
“तपाईंले गर्नुसम्मको सेवा गरेको, भनाइ सहेको देख्तादेख्तै पनियसो भनुँला के ? तपाईंलाई देख्ता र तपाईंको स्वभाव देख्ता तपाईंकुलीन परिवारकी छोरी हो कि जस्तो लाग्यो र सोधेको अनि तपाईंकोबाबुको ताउँ के नि ? घर त काठमाण्डूमै त होला ?”&lt;br /&gt;
साधनालाई यात्रीको सबै जवाफ दिनु जरुरी संझिन्न र आफूअलि व्यस्त भएकी देखाउँदै एक छिन ल, फेरि आउँछु भनेर जान्छे रमनमनै भन्छे, “अर्काका बाबुको नाम र ठेगाना जान्न यसलाई कतिचासो परेको : सायद यसले पनि सोचेको होला, कुलीन परिवारकोछोरीले यस्तो नोकरी गर्दिन भनेर । यस नौकरीका सेवामा त्यस्तो कै छ१ यहाँ काम गर्नै नहुने : यस्ता सोचाइमा परिवर्तन कहिले आउने&lt;br /&gt;
। |&lt;br /&gt;
फेरि घण्टी बजेको सुनिन्छ । त्यसै यात्रीका सिटमाथिको बत्ती&lt;br /&gt;
पिलिक्क बलेको देखिन्छ । साधनाले सोध्छे । उसले उही अघरो प्रश्नको&lt;br /&gt;
क्ष&lt;br /&gt;
जवाफ खोज्न उसलाई बोलाएको होला । त्यसैले उसले आफना साथीलाईत्यस. यात्रीकहाँ जान अनुरोध गर्छे ।&lt;br /&gt;
बन्दना त्यहाँ प॒गेर बत्ती निभाउँदै बोलाउनको अर्थ सोध्छे । त्यसयात्रीले पनि अर्कै परिचारिका आएकाले अन्कनाउँदै चिया ल्याउनलाईप्वाक्क भन्छ ।&lt;br /&gt;
वन्दनाले साधनाको नजिक आएर भन्छे, “चिया पिउने रे, अबत्यो भने तँ नै लिएर जा, म त जान्न । त्यो बुढो मलाई त कस्तोकस्तो लाग्यो । हामीलाई हेरान पार्न के के बोल्छ के के ? मैले अरूत केही पनि बुझिनँ, &amp;quot;चिया&amp;quot; भनेको मात्र सुने र &amp;quot;हस्‌&amp;quot; भनेरआइहाले ।&lt;br /&gt;
“तिमीले अर्डर लिएर आएपछि जान्न भनेर हच्कन पाइन्छ :अहिले चिया लिएर तिमी जाक र त्यसर्पाछा बोलायो भने म जाउँला ।यात्रीहरूले जे जस्दो भने पनि आफूले प्याँच्च बोलिहाल्नु हुँदैन । यतिछोटो समयका साथले के नै हुन्छ । उनीहरूको कुरा सुनिद्रिएर यदितिनीहरू खुशी हुन्छन्‌ भने हामीले सुनिदिएर के हुन्छ !”&lt;br /&gt;
साधनाको यति कुरा सुनेपछि वन्दनालाई चिया लिएर जान करैलाग्छ । क चिया लिएर त्यहाँ पुग्छ र उसलाई दिदै भन्छे, “चिनी रदुध यसमा छ, कति चाहिन्छ मिलाएर खानु होला ।”&lt;br /&gt;
चिया समातेर दुध र चिनी मिलाउँदै यात्रीले सोध्छ, &amp;quot;दुवईबाटफयाङ्गफोर्ट पुग्न कति समय लाग्छ : प्लेनमा वस्तावस्तै कहिले पुगिएलाजस्तो लाग्दो रहेछ । तपाईंहरूलाई लाग्दैन : सँधै यसरी उड्नु पर्दा कतिपट्यार लाग्दो हौ ।”&lt;br /&gt;
“पट्यार मानेर हामीहरूलाई कहाँ पुग्छ र ? बरु तपाईलाईझर्को लागेको भए यो म्यागजीन पढ्नोस्‌, समय बितेको पत्तै लाग्दैनभनेर साङ गीला म्यागजीन पढ्न दिन्छे ।&lt;br /&gt;
म्यागजीन नसमातिकन भन्छ, &amp;quot;जहाजभित्र न त पढ्नै सक्छु नत सुत्न नै । हेर्नोस्‌ न, त्यता, यहाँ कति जना मस्तसंग निदाइरहेकाछन्‌, आफनो बानी भने यस्तै छ । मान्छेले दुःख पाउने गरेको नै आफनैस्वभावले हो ।&amp;quot; बन्दना त्यतिखेर हिडीसकेकी हुन्छे । यात्रीले आफूलेमात्र बोली रहेको थाहा पाएर चुप लाग्छ ।&lt;br /&gt;
जहाज उड्दाउड्दै बादलभित्र छिर्छ । हृप्प हुन्छन र माथि तलहुँदै वरथराउन थाल्छ, सिटको पेटी बाँध्नोस्‌ भन्ने सङ केतको बत्ती फेरिबल्छ । हबाइ परिचारिकाहरू यात्रीहरूले पेटी बाँधे नबाधेको जाँच्तैकुनैलाई बाँध्नमा सहयोग गर्दै घुम्न थाल्छन्‌ । एकफेर, जहाज उफ्रदा&lt;br /&gt;
पि&lt;br /&gt;
साधना भन्नै यात्रीमाथि परेकी थिई । सिट समातेर आफूलाई समालिहालीर पो केही भएन । ॥&lt;br /&gt;
परिचारिकाहरूको लागि सुरक्षित राखेका सिटमा पुगी । क, पतिउनीहरूसंग बसेर पेटी बौ ध्दै त्यो घटना साथीलाई बताउछ र खृवसंगसबै हाँस्छन्‌ । हाँसोले उज्ज्यालो भएको अनुहार त्यस यात्रीले पनि देख्छ। उसको ध्यान साधनातर्फ नै खिचेको खिचिएकै हुन्छ । साधना र त्यसयात्रीको आंखा जब जुष्छन्‌ साधनाले पर्दा तानेर यात्री कक्षलाईछेकिदिन्छे ।&lt;br /&gt;
केही समयपछि नै जहाज पुन: नियन्त्रणमा आउँछ । यात्रीहरूरगरगाउन थाल्छन्‌ । शौचालयतर्फ जाने, त्यस बाहिर पर्खने रसाथीहरूका सिट नजिकै गएर उभिई उभिई कुरा गर्न क्रम चल्नथाल्छ ।साधना फेरि त्यस यात्री कक्षामा घुम्दा उसले प्रश्न गरिहाल्छ ,“तपाईंमसंग साँच्चै रिसाउनु भयो जस्तो छ ? मैले तपाईंको परिवारबारे सोध्नुनपर्ने थियो, सौधिहालै, माफ गर्नोस्‌ है !&amp;quot; उसैका साथमा बसेको यात्रीटाढो भएर उसको कुरा सुनिरहेको हुन्छ । साधनाले “छैन, मलाई यतिसाता कुराले रिसै उठाउँदैन तपाईं ढुक्क हुनोस्‌&amp;quot; भन्दा त्यो यात्री दङपर्छ । अर्का यात्रीले अब फयाङफोर्ट पुग्न कति बाँकी छ भनेर सोध्छ रसाधनाले एक घण्टा मात्र बाँकी छ भन्ने जवाफ दिदा त्यो यात्री अलिगंभीर भएर भन्छ, “त्यसो भए हाम्रो छुट्टिने बेला आयो ।” एकफेरलामो स्वास तान्छ र फेरि भन्न वाल्छ, “मेरो पनि तपाईं जसौ छोरीथिई । त्यो पनि यस्तै विमान परिचारिका थिई । तपाईंसंग यहाँ भेट हुँदामेले त्यसैलाई संझिरहेँ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“अहिले तपाईकी छोरी के गर्दै हुनुहुन्छ त : यो काम छोडिदिनु भयो !&amp;quot;&lt;br /&gt;
३ “याहा छैन के गर्दै छे : घरबाट उड्न हिडेकी फेरि फर्किन ।मैले यस्तो नोकरी नगर भन्दा तपाईंहरूले यहाँ यात्रीहरूसंग गरेकोव्यवहार :र तिनीहरूलाई पुच्याएको सेवा देखेर मेरा मनले त्यस छोरीलेपति: यसै गर्थी होली भनेर कुरा खेलाइ रह । मलाई एकपटक त्योभएको जहाज चढ्ने रहर थियो । त्यो पुग्नै पाएन ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
क एकपटक भावविभोर हुन्छ । साधनालाई के भनेँ के हन्छ ।त्यस यात्रीले भन्न छोड्दैन क भन्छ, &amp;quot;तपाईंहरूजस्ता कलिला केटीहरूयसरी उडिरहेको देख्ता कस्तो कस्तो लागिहाल्छ र के के भन्न थाल्छुपत्तै पाउन्न । भगवानले त्यस्तो अन्याय कसैमाथि पनि नगरून्‌ ।साधनाको मन पति उसको कुरा सुनेर विरक्त हुन्छ र वास्तविकतासंफाउन भन्छे, “जीवन लिएपछि मर्नु त परिहाल्छ । कुनै न कुनै कुरा&lt;br /&gt;
७३&lt;br /&gt;
निमित्त भएर आउँछ नै । ङ मात्र होइन, त्यस जहाजमा चढ्ने कतिथिए सवैको त्यस्तै गति त भयो होला ? यो सबै भवितव्य हो । उड्नैर गुड्नेको त कुरा छोडी दिऔं, हिड्नेहरूलाई त कुन बेला के हुन्छुथाहा हुँदैन । यस्ता क्रा संझैर किन दु:खी हुनहुन्छ !”&lt;br /&gt;
यति भन्दै क त्यहाँबाट उम्केर फेरि आफना साथीहरू भएकाठाउँमा पुग्छे । त्यस यात्रीको क्रासनेपछि उसपति सहानुभूति लाग्नुकासावसाथधै स्नेह लाग्न थाल्छ र एउटा कागजका टुक्रामा आफनो नाम रठेगाना लेखेर उसलाई दिदै भन्छे, “काठमाडौं फर्केपछि भेटगर्न आउनुहोला । मेरा बाआमासंग पनि चिनाजानी हुन्छ । मलाई चाहनु हुन्छ भनेतपाईले &amp;quot;छोरी&amp;quot; भन्नु भएको थियो त्यही छोरी मसंग आकाशमा नै भेटभयो र क ड्युटीमा रहेका बेलामा उससंग उड्ने इच्छा थियो भन्नुभएकोपनि आज मसंग उड्दा प्रा भयौ । त्यस यात्रीले साधनाले दिएकोठेगाना लिएर छक्कपरी हेर्छु । साधनालाई अब त्यहाँ अरूबेर अड्नेफुर्सत हुँदैन । अवतरणका लागि सेवाका तयारीमा लाग्नुपर्ने बेलाभइसकेको हुन्छ ।&lt;br /&gt;
&#039; त्यस दिन होटलमा पुगेपछि साधनालाई त्यस यात्रीको निकै मायालाग्छ र उसकी छोरीबारे कल्पना गर्न थाल्छे । यो पेशा निश्चय नैज्यादै कठिन हुनुको सावसावै आकर्षक पनि छु । सरसर हेर्दा हामी सबैशान्त देखिन्छौँ । राम्रो लगाएर, श्रृङ्गारिएर हांस्तै सेवामा हाजिर हुनु,ठाडो जवाफ यात्रीलाई दिनुहुन्न भन्ने सिद्धान्तको पालना गर्दै जानु,आकाशमा उड्दा सबै यात्रीको केन्द्रविन्दु भई सहयोगी भई दिनु कत्रोकठिनको जिम्मा छ, जसलाई हामीले शीतल तरिकाले निर्वाह गर्नुपर्छ ।&lt;br /&gt;
सबै यात्री एकै प्रकारका सभ्य हुँदैनन्‌ । कुनैको दृष्टि हामीमाथिअति नै तुच्छ हुन्छ मानौं हामी सेवाका लागि होइन, यात्री मनोरन्जनकालागि त्यहाँ खटिएका छौं । त्यही भावना लिएर जिस्क्याउने, सताउने,त्यतिले चित्त बुर्भेन भने गाली गर्ने कुनैले गर्छन्‌ भने कुनैले “पैसातिरेका छौं यसै भनेका छैनौं तिम्रो एरलाइन्सलाई छानेर आउनुको मतलवयही व्यवहार पाउनलाई हो” भनेर असन्तोष व्यक्त गरेको पनि सहेरबस्नुपर्छ । सबै यात्रीले सोचेका हुन्छन्‌ उनीहरूलाई एक एकलाई समयदिएर सेवा गरून्‌ तर हमी चार पाँच परिचारिकाले छोटो समयभित्र सबैयात्रीहरूलाई त्यस रूपको सेवा पुन्याउन सक्तैनौं र तोकिएको सेवा मात्रगर्दा, छोटो जवाफ दिएर आफू काममा व्यस्त हुँदा चढेकी र बढेकी भन्नेलान्छना सुन्नपर्छ र त्यस्तै विभिन्न मौग गर्दा आफनो असमर्थता व्यक्तगर्दै “सरी” भन्यौ भने उनीहरू झन्‌ रिसाउँछन्‌ । खासगरी खाना रपेय पदार्थ दिदा कोही शाकाहारी भइदिन्छन्‌ भने कोही गुलियो नखाने,&lt;br /&gt;
छा&lt;br /&gt;
कसैलाई अमिलो पिरो चाहिने इत्यादि । तोकिएको खाना र ताकिएको पेयपदार्थ लिएर उडेका हामीले माग अनसार दिन नसक्ता आफू रएरलाइन्स बारे गाली गरेको सुनेर पचाउन पर्छ र मृसुक्क हाँसेरभावहीन भई फेरि काममा जुदनुपदा निकै मानसिक कष्ट सहनुपर्छ । योकठिनाइ हामीलाई देख्नेहरूले बुझन सक्तैनन्‌ र भन्छन्‌, &amp;quot;म्या मोज छयिनलाई ? हातभरि पैसा छ रातदिन खुट्टा देशविदेशमा पर्छन्‌ ।जोमसोमको स्याउदेखि दुवई र हड्डङको सुन भित्रयाउन पाउँछन्‌ । यस्तोबोल्दा के सौच्न बिर्सन्छन्‌ भने हामीमाथि पनि कम्पनीको नियम रसरकारी कानुन लाग्छ भनेर । हाम्रो अर्को कठिन अवस्था त त्यो वेलाआउछ जब जहाज :- उड्दाउडंदै आपतकालीन अवस्थामा पुग्छ । यात्रीहरूकोसुरक्षाको व्यवस्था गर्नु, उनीहरूको चिच्याइ, घवराहट, शुवावासी सबै कोसामना गर्दै र तिनलाई सान्तावना दिदै हौसला दिन हामीले अर्गाडबढ्नपर्छ । त्यस अखतको हाम्रो अवस्थाको ज्ञान कसैलाई पनि हुँदैन ।अरुले त भन्छन्‌,” ती परिचारिकाहरूले के गरे आफैँ सुरक्षित हुन खोज्दैथिए । हामीलाई हेर्ने को ः “&lt;br /&gt;
यस्ता कुरा मनमा खेलाउँदा खेलाउँदै त्यो दिन सभझन पुग्छे जुनबेला क आन्तरिक क्षेत्रमा उड्दै थिई । श्रावणको महिना थियो, आकाशकाला बादलले ढाकेको थियो । जहाज उडेको केही समयपछि नै मौसमअरू खराब हुँदै जानथाल्यो । हावाका झोक्काले जहाजलाई कहिले यतात कहिले उता हुत्याउन थाल्यो । जहाज फर्कने स्थितिमा पनि आउनसकेन । यात्री कक्षामा कोही बान्ता गर्न थाले भने कोही राम...रामभन्दै भगवानलाई गुहार्न थाले । कोही लौन नि अब कहाँ समाङै भनेरकराउन थाले भने एउटी आइमाई यात्रीले उसलाई नै च्याप्प समातेरभन्न लागी, &amp;quot;लौ न मेरो त पेट दुख्न थाल्यो नानी पो जन्मन्छ कि :&amp;quot;&lt;br /&gt;
भित्रभित्रै आत्तिएकी त क पनि थिई तर गरोस्‌ के आफनामनको व्यवा उसले कसैलाई पति सुनाउन सक्तिनधिई । मुखमा घैर्यल्याई यात्रीलाई ढाडस दिनु परेको थियो, “नहडबडाउनुहोस्‌ डराउनु पर्नेकेही छैन हाम्रा कप्तान साहेबहरू खली छन्‌, एकै छिनमा ठिक भइहाल्छ। यौ गडवड खाली मौसमको खराबीले मात्र भएको हो ।&amp;quot; वास्तवमात्यस वेला जहाजले आफूनौ बाटो छोडी निकै पर  हतिहाकको थियो रकप्तानहरूले ठिक बाटामा ल्याउन हरप्रयास धिए । उनीहरूकुहिरोका काग भइरहेका थिए । अवतरण भइसम्नु पर्ने समयभन्दा झण्डैआघा घण्टा बढी जहाज उडिसकेकाले त्यहाँ इन्धनको समस्या आइपर्छकि जस्तो स्थिति देखापर्न लागेको थियो । तर त्यसै बेला फेरि भयड्ररकोहावा चल्नाले जहाजै हृत्तिन थालेको थियो यात्रीहरू बेहोस हुने स्थितिमा&lt;br /&gt;
000&lt;br /&gt;
पुग्न लागैका मात्र के थिए जहाजलाई कप्तानले नियन्त्रणमा लिन सफलभए र एकँ छिनमा बादललाई छल्दै जहाज उज्ज्यालोतर्फ बढ्न थालेकोसबैले चाल पाए । बिस्तारै यात्रीहरू शान्त र सुस्त हुँदै गएका थिए रसाधनाले पनि त्यस आवस्थाबाट छुटकारा पाएर आफना सिटमा आईपिना पछुतै आफना बावआमालाई संभैकी थिई । उनीहरूका संझनालेकण्ठ रुद्ध भएको त्यस बेलाका पीडाका सेंझनाले अहिले पनि उसकाआँखा रसाउन थाल्छन्‌ । अनि संझन्छे त्यस यात्रीकी छोरीलाई उसले पनियस्तै समस्या जहाजभित्र भोगी होली । तर हामीले जस्तो आपत्‌बाटसुरक्षित भएको खबर दिन नपाएर आफैँसहित हराई ।&lt;br /&gt;
मैले यसरी आपतृबाट बचेर घरपुगेपछि आमासंग टाँसिएर रोईशान्त भएकी थिएँ तर त्यस यात्रीले छोरीलाई तातो दिएर उसको आँसुपुछीदिन नपाएर आफैँ उसका लुगाहरू समातेर कति रोयो होला ।साधनालाई यस कल्पनाले त्यस यात्रीको अनुहार संझाउछ र त्यसैकासाथसाथै उसकी छोरीको अनुहार कोर्छौं जो आत्तिएर बाआमालाई पुकार्दैहँदै भनी होली &amp;quot;मेरा बाआमा, म मरेँ भने तपाईंहरूले धेरैनलिनुहोला ?”&lt;br /&gt;
यस सोचाइले दिक्कभएकी साधना फैरि आफना मनलाई यसरीसंझाउँछे, &amp;quot;जन्मन, बाँच्नु र मर्नु जीवनका अवस्थाहरू हुन्‌ । यिनलाईपेशाले के फरक पार्छ । मरिन्छ कि भनेर भाग्ने हो भने सन्सारमा कुनैठाउँ छैन जहाँ लुक्ता मृत्युबाट बच्न सकिन्छ । घरमा बस्ने पनि तभवितव्यमा परेर मरेका छन्‌ । बरु मर्नु नै छ भने पनि अन्तिम साहसदेखाएर मर्नु नै के बेस होइन र : जसले जेसुकै भनून्‌ मलाई आफनोयस पेशासंग गर्व छ र यसलाई सबैका सोचाइमा आदर्श सेवा भन्नेपारेर छोड्छु । यस्तो अठोट मनमा लिएर क सुत्ने कोसिस गर्छे ।&lt;br /&gt;
सह&lt;br /&gt;
रात पर्न लागेपछि शिव खड्का जङ्गलको अन्त्य भागमा पृग्छ ।त्यहाँ एउटा घर देखिन्छ र झ त्यही बास बस्ने निधो गर्दै ढोकाढकढकम्याउन पुग्छ । एउटी ९/१० वर्षकी बालिका आई ढोका खोन्छे ।शिवले बासको माग गर्दा त्यस बालिकाले जवाफ दिन पाउँदा नपाउँदैमाथि चोटाबाट आवाज आउँछ, “ए नानी, वास र गाँस खोज्दै आएकाहुन्‌ भने खुरुक्क माथि ल्याएर सत्कार गर । साँझका पाहुना देवताहुन्छन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
आजको भौतिक युगमा पनि त्यस्तो सत्कारको भावना राख्ने त्यसव्यक्तिसंग भेट गर्ने इच्छाले पनि क. त्यस बालिका पछिलागैर चोटामाजान्छ । त्यहाँ प॒गेपछि बालिकाले गन्दी बिछ्याइदिदै बस्नै अनरोध गर्छै रआफू बाबाकहाँ पृजाकाठामा जान्छे । त्यहाँ क ध्यानमा लीन भइसकेकालेभान्छाकोठातर्फ लाग्छे । कतै खाने कुरा छ कि भनेर खोज्दा एक दुईकोसा केरा फेलापार्छै र त्यही पानीका साथमा ल्याएर दिदै भन्छे, “बाबाध्यानमा बसिसक्नु भएछ । एक छिन पर्खनोस्‌ ,उहाँ आएर भेट गर्नहुनेछ॥ म त्यही तलका गाउँमा गएर आउँछु भनेर दौडन्छे । शिवले उसलाईरोक्न खोज्दाखाज्दै क ओभैल भइहाल्छे । कं विस्मित भएर बसिरहन्छे ।केही बेरपछि एउटा वृद्ध हातमा फूल र नैवेद्च लिएर आइपुग्छ र त्योपाहुनालाई दिदै भन्छ, “यो प्रसाद ग्रहण गर्नोस्‌ यसलै मनलाई शान्तिदिन्छ । तपाईंले लिएका लक्ष्यलाई पुरा गर्छ । यसरी विचलित भएर&lt;br /&gt;
हुँदैन ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
र - वृद्धको कुरा सुनेर शिब उद्श्वान्त हुन्छ र झ्वाट्ट भन्छ, &amp;quot;मेरोलक्ष्यबारै तपाईंले के थाहापाउनु भयो र यसो भन्नुहुन्छ !”&lt;br /&gt;
त्यस वृद्धले पनि हाँस्तै जवाफ दिन्छन्‌, “यति मात्र थाहा छ,मनुष्य लक्ष्यविहीन जाग्रत्‌ हुनै सक्तैन र तपाईंमा जागरण आइसकेको छ। यही भ्रमणको लध््य पूरा गर्नलाई पनि त शान्ति र मनको स्थिरताचाहिन्छ नि, होइन ?”&lt;br /&gt;
शिवलाई त्यस व्यक्तिका तर्कमा. निकै सत्यता रहेको पाउँछ रभन्छ, &amp;quot;अकाद्‌्य छ तपाईंको भनाइ । मैलै त्यस्तो प्रश्न गर्नु नै मेरोअज्ञानता हो । माफ गर्त होला, बाबा !&amp;quot;&lt;br /&gt;
७७&lt;br /&gt;
बाबाले शिवको आत्मप्रशंसा सुनेर हाँस्तै भन्छन्‌, &amp;quot;तपाईंको प्रश्नमेरो भनाइले उठाएको हो । त्यसैले माफ कसलाई कसले दिने : दुईव्यक्तिको भेट भएपछि क्राको श्रृङखला बनिहाल्दछ । अरू भन्नोस्‌तपाइँको घर कहाँ हो :&lt;br /&gt;
&amp;quot;घर त मेरो काठमाडौंमा हो । अनि तपाईँ, एक्लो व्यक्ति यस्ताजङ्गलका छेउमा कसरी बस्न सक्नुभएको छ :&amp;quot;&lt;br /&gt;
शिवको कुरा सुनेर नी हाँस्छन्‌ र एक छिन चुप लागेपछिभन्छन्‌, &amp;quot;म एक्लो कहाँ छु र ! यो सन्सारको वस्ती यति ठूलो छ मकहिल्यै पनि एक्लो हुन्न । झलक्क हेर्दा यहाँ म र मेरी त्यो सानीनातिती मात्र छौ जस्तो लाग्छ र यो वास्तविक सत्यता पनि हो । तर,यदि हामीले मनलाई साँघरो र मतलबी बनाएनौं भने हामी सबै साथमारहेको पाउन सक्छौँ । आजैको कुरा गरौं तपाईं आउनु भयो र हामासाथमा हृनुहुन्छ । मलाई “वाबा&amp;quot; भन्न थाल्नुभएको छ र मैले तपाईंलाई“बाब&amp;quot; । हाम्रा बीचमा बनेको यो संबन्ध र साथमा बिताउन लागेकोयस रातले के हामीलाई “तँ एक्लो छस्‌&amp;quot; भन्छु र : संबन्ध रगतलेगाँसेको, मानवताले जोडेको र प्राणीको नाताले बनेको हुन्छ । यत्रोफैलिएको सम्बन्धलाई विखण्डित पारी यति मात्र मेरो भन्न कहाँ हन्छ र? सबै मेरा हुन्‌ र सवैको म हुँ भन्ने सोचाइ राखे एक्लो कहिल्यैभइन्न&lt;br /&gt;
अलि अकमकाउदै शिवले सोध्छ, “अनि व्यवहारमा : सिद्धान्त रव्यवहारका फरकले ल्याउने गरेका भिन्नतालाई केले हेर्नुहुन्छ ?”&lt;br /&gt;
बाबा यसपटक भने शान्त हुन्छन्‌ र भन्छन्‌, “मैले बताएकोसम्बन्धका विषयमा मात्र हौ, व्यवहारबारे केही बोलेकै छैन । व्यवहारमाभिन्नता नैतिकताले ल्याउँछ नै र त्यस नैतिकताको प्रयोग गर्न समाजलेआफूता रीति स्थितिका माध्यमबाट सिकाएको हुन्छ । समाज हाम्रोसभ्यताको परिचय हो र सभ्यता समयले ल्याएको विकास हो । यादराख्नोस्‌, समय जति अगाडि बढ्छ मनुष्यले मनष्यलाई उति नै राम्ररीचिन्दै जानेछ र त्यसका नतिजाले अटुट सम्बन्धको सिर्जना गर्नेछ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
भावानात्मक कुरा गर्नमा तल्लीन रहेका तिनको ध्यान मैनाकाप्रवेशले भङ्ग पारिदिन्छ र मैनाले डसाराले बाबालाई बोलाएर भान्छाकोठामा लैजान्छ । झोलामा चामल र केही आल मात्र ल्याएको देखाउँदैअरू बजार उठिसकेकाले नल्याएको बताउँछै । जे उपलब्ध भएको छ,त्यसैको खाना बनाउने आदेश दिएर बाबा शि्वनिर आई बस्तै फेरि कुराचाल गर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
शिवलाई बाबाप्रति भन्दा बढी ध्यान त्यस बेला त्यो सानीबालिकापट्टि खिचिन गएकाले बाबासंग अनमति लिएर मैनालाई भान्छामासहयोग गर्न तत्पर हुन्छ । वाबाले उसलाई रोक्नै मैनाको खुबीको तारिफगर्दै भन्छन्‌, “भान्छामा गएर के गर्नुहुन्छ : मैनाले तपाईंलाई छुनै दिन्न। आजभन्दा दई वर्ष पहिलेदेखि नै उसले अतिविहरूलाई पकाएर खुवाउनेगर्दै आएकी छे । गरीब र दुःखीको सन्तान भएपछि उमेरलाई उछिनेरकाम गर्नपर्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
शिवलाई बाबाको कुरा सुनेपछि के भनेँ के भनुँ हुन्छ र सोध्छ,“यहाँबाट गाउँ धेरै टाढा छैन क्या रे । थकाइ लागेपछि एक पाड्लाचाल्न पनि नपरोस्‌ जस्तो भइहाल्छ अनि घर त के खुबै पनि आलिझयाम्म परेको देखियो भने बसेँ बसुँ लागिहाल्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
शिवले उनका कुरामा विशेष चाख नलिएजस्तो मानी बावाभन्छन्‌, &amp;quot;मेरो गल्फत्तीसंग झर्को लागेर गाउँतर्फ किन बढिनँ भनेरपछनुताउन थाल्नुभयो कि कसो ! यस बेला जङ्गलका छेउछाउमा हिड्नुयात्रीहरूका लागि उचित हुँदैन । बरु म चप लागिदिन्छु । मेरोस्वभावसंग पनि म आफै आजित भइसके । कुनै पाहुना आए कि मतिनीसंग कुरा गर्दागर्दै दिक्कै लगाइदिन्छु क्यारे जौ पनि मदेखि भाग्नैखोज्छन्‌ ।”&lt;br /&gt;
“मेरा सोधाइको तात्पर्य त्यस्तो होइन, बाबा ! त्यो सानी छोरीत्यति छिटो गाउँमा पुगेर आइसकी । मैले अलिकति हिडाइ अगाडिसारेको भए बस्तीमा पुग्थेँ । यहाँ तपाईंहरूलाई यसरी दौडन्‌ पर्ने नौवतआउंदैनथ्यो भनेर मेरा अल्छिपनालाई जाँच्न मात्र मैले सोधेको हुँ, यसलाईअन्यथा नमान्न होला&amp;quot; भनैर सफाइ दिदै उहाँको ज्ञानवर्द्धक क्राहरू सुन्नअझै आफू लालायित रहेको बताउँछ ।&lt;br /&gt;
बाबालाई शिवका कुरामा विश्वास लाग्दैन र भन्छन्‌, &amp;quot;मेरोफतौरोलाई यसै ज्ञानवर्क बनाइ दिनुभयो । यो त मेरो मन यौलाहाजस्तोगरी कराइरहने भएकाले बोलिरहेको मात्र हुँ । कुनै दिन कोही पनिपाहुना भएनन्‌ भने त्यही मैनालाई मात्र भए पनि राखेर बोलेको बोल्यैहुन्छु । त्यो बिचरी सुन्दासुन्दै जब निद्राले घुप्लुक्क भई ढल्छे अनि पोग्र फसङ हुन्छु ।”&lt;br /&gt;
यस बानीलाई नराम्रो भन्त मिल्दैन । हामी सामाजिक प्राणीभएकाले हाम्रो अन्तर इच्छा नै साथी खोज्ने हुन्छ बोल्ने र बोलेको सुन्नेव्यक्तिको आवश्यकता भइरहेको हुन्छु । म पनि त त्यस बेलादेखितपाईंसँग बोलेको बोल्यै छु । मेरो पनि चप लाग्न नसक्नुको अर्थ त्यहीहो ।&lt;br /&gt;
७९&lt;br /&gt;
“राजधानीनिवासी तपाईलाई वाकपट्तामा कसले छुनसबने :. सकेपेशा पनि व्यापारी नै हो कि सन्छु, काठमाडौंमा खेतीपाती गरेर खाउँलाभन्ने नचिताए पनि हुने भइसकेको छ रे ? घरैघरले ढाकेर खुल्ला जग्गादेखिएको भन्न त्यही टुँडिखेल मात्र छ । त्यो पनि कति दिन टिक्नसक्छभन्छन्‌ ? पहिले नाङले पसलहरू जसरी ठाउँ ठाउँमा हुन्थे, अहिले तीहराएर ग्राहकहरूका सुविधाका लागि भन्दै आकाशिएका हात्ती पसारिएजस्तो फैलिएका घरहरू बनाई थप्रै विभिन्न किसिमका सामानहरू एकैथलामा पाउन सकिने गरी पसलहरू खोलिएका छन्‌ रे ? कहीं तपाईंपनि त्यहीका पसलेमध्येको एक त होइन : विदेशी सामान भित्र्याउँदैस्वदेशी र पर्यटकहरूलाई बेच्न चत्र व्यापारी : कि सरकारी नोकरीदिएर पालेकोमध्ये पर्नुभयो !&amp;quot;&lt;br /&gt;
“पैसाको खेती गर्नु भनेको व्यापार हो । खेती गरेर खान सक्नेऔगात मेरो छैन । सरकारी नौकरी दिएर पालेको हो कि भन्नै तर्क गर्नभएकामा भने&amp;quot; हो &amp;quot;म नोकरीमा थिएँ तर अहिले मलाई आफैँ गरीखाक ननेर पाल्न छोडिदिएका छन्‌ । &amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ए बु्े, त्यसैले फुर्सत पाएर देशश्चमणमा लाग्न थाल्नुभएको ?नोकरीमा रहँदा घेरै विदेशमा भ्रमण गर्नुभएको होला : आफनो देशत्यसका अगाडि कस्तो पाउँनु भएको छ : गर्काको देशको उन्नति देखेरआफनो देशलाई संझदा च्वास्स घोच्थ्यो कि घोच्दैनथ्यो :” अलि हाँस्तैभन्छन्‌, “घोचे पानि त्यो दुखाइ मेटिइ हाल्थ्यो भन्नौस्‌ न ? यही भएकोछ हाम्रो देशप्रेम ।”&lt;br /&gt;
शिवले केही जवाफ दिन नसकी शान्त हुन्छ । उनी अझै भन्दैहुन्छन्‌, “जागिर कुन अड्डामा खानुभएको थियो ! वकिल हुनुभएको तहोइन ? बेला हेरी पीपलपाते बन्नसक्ने तिनै हुनसक्छन्‌ र आँहले त्यस्तैमान्छे सबैको प्यारो बनेका पनि छन्‌ । जहाँ पनि पुगेका छन्‌ । जेजस्तो खबर बटुले पनि कसलाई के मन पर्छ, त्यसै प्रकारले रचना गरेरत्यसकहाँ पत्याउने गर्छन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“वकिललाई भन्नुभएको कि वकिलको पेशाबारे यसो भन्दै हुनुहुन्छ? कृ बक्स त्यस्ता निस्के पति यो पेशा त्यस्तो पीपलपाते हुँदैन । पक्षर दुबै दृष्टिकोणले हेरेर बहस गरेपछि मात्र साँचो कुरा पत्तालाग्न सक्ने भएकाले नै यो मही मधेजस्तो गरी मध्ने प्रधा बसाएर नौनीनिकाल्न खोजेको हो । यसरी कहिले पक्ष र कहिले विपक्षबाट बोल्नुपर्नेतिनीहरूलाई पीपलपाते भन्न खोज्नु भएको हो भने पनि न्यायलाई योपरिभाषा नल्याउनु भए बेप हुन्छ ।”&lt;br /&gt;
८०&lt;br /&gt;
शिवले अलि नराम्रो मानेको ठानेर बाबाले भन्छन्‌, &amp;quot;सबैलेजानेका छन्‌ यी वकिल डाक्टर, पुलिस र शिक्षकको पेशा देशका लागिकति जरुरी छ भनेर । यिनैले हुन्‌ न्यायोचित अधिकार दिएर आत्मबलबढाउने, ज्ञानको भण्डार उघारेर उन्नतितर्फ लम्कन बाटो देखाउने रआइपर्ने बाघाहरू हटाई सहयोग गर्ने तर त्यस बेलासम्म उपयोगीहुनसक्छन्‌ बाब; जबसम्म यस पेशामा कार्यरत व्यक्तिहरूले सेवाको महत्वबुझेर आफना निर्णयलाई व्यापारीले नाप तौल गर्ने ढक खोज्नेजस्तो गरीआर्थिक लाभका पछि लाग्दैनन्‌ ।”&lt;br /&gt;
“पेशा र त्यसमा संलग्न व्यक्तिमा फरक छ । यदि ती व्यक्तिलेपेशाको नैतिकता पालन गरेका छैनन्‌ भने त्यो गराउने जिम्मा पनियसैको व्यवस्थाले लिनुपर्छ । व्यक्तिले पेशा धमिल्याउन पाइँदैन भन्ने मेरोलाटा बद्धिले भन्छ । तर हो, तपाईंले भनेजस्तो गरी यहाँ यस्तो&lt;br /&gt;
छैन । बिश्वास गर्न अति गाह्रो हुदैछ । चोर फटाहा भनेर&lt;br /&gt;
(0240 पनि जबसम्म तपाईं प्रमाण जुटाउन सक्नुहुन्न, तपाईं केही&lt;br /&gt;
गर्न सक्नुहुन्न । विश्वासको सरकारको स्थापना भएपछि पनि यस्ताअविश्वासहरू हट्न सकिरहेका छैनन्‌ । यही त दुःखलाग्दो कुरा छ ।&lt;br /&gt;
“मलाई यस उमेरकी नातिनीको समेत डर लाग्न थालिसकेको छ। स्कूलबाट फर्कदा अबैर भयो भने मन छट्पटाउन थाल्छ । मनलेनराम्रा कुराको शङ्का उठाउँछ । धेरैले आफनो धर्म छोडिसकै । यसतर्फलाग्नु असंभव भएकै ठान्न थालिरहैछन्‌ । नैतिकताको रेखा कोर्नेहरू नैत्याज्य हुन थालेपछि मानवधर्म कता पुग्ला खै : यसतर्फ ध्यान आकर्षणगराउन पनि कोही अगाडि सर्दैनन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“तपाईंका भनाइको अर्थ पृजापाठमा लाग्नसक्नेको मात्र धर्म हुन्छ,नैतिकता हुन्छ र उसले मानवधर्म वुभझेको हुन्छ भन्ने हो कि कसो : केयसैले मानव संबन्ध सुदृढ गराउँछ ! धर्म कर्मको जरुरत यत्तिकैमाट्ीन्छ !&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;बाबाले शिवका प्रश्नलाई आफूप्रतिको वाक्य प्रहार संझेर हांस्तैभन्छन्‌, “होइन, यसको अर्घ बफन र बफाउनलाई त म तपाईंहरू जस्ताज्ञाताहरूलाई भन्दै छु । धर्म कर्मको रक्षा गर्ने जिम्मा तपाईंहरूले लिनुपर्नेजरुरी छ । आडम्बरको कुहिरो हटाई धर्मलाई चम्काउने गराउनयसतर्फको सोचाइ स्वच्छ राख्ने विधि निकाल्नोस्‌ । यो मासिदै जानुकोअर्घ हो हामीले यसलाई चिन्न सकेका छैनौं । धर्म कर्तव्य हो, धर्मआदर्श हो, धर्मले सिकाउँछ दार्शनिकता । यसको मनन गरेर आत्मश्‌द्धिगर्न सकेमा मानवधर्मको पालना हुन्छ । एकता आउँछ । अनि मनुष्यलेमनुष्य भएर बाँच्न सक्छ । यो मेरो भनाइ हो र मेरो अनुरोध छ&lt;br /&gt;
८१&lt;br /&gt;
यसलाई लोप हुने स्थितिबाट बचाई व्यावहारिक बनाउन रूढीवादी रआडम्बरलाई पन्छाउनतर्फ लागिदिनोस्‌ । म पूजापाठ गर्छु, यसकोमतलब मैले मार मानवता चिनेको छु भनेको होइन । म गलतमा छुभने मलाई बताइदिनोस्‌ ठीक के हो ! नत्र भने मान्नोस्‌, पूजापाठ गर्नउपासना हो, मनमा आत्मबल जाग्रत्‌ गर्न विश्वास उत्पन्न गर्नु हो,एक अदृश्यशक्तिप्रति अर्पित भएर जागरण ल्याउनु हो । अर्पण र जागरणअन्त्य र शुरुसरह छन्‌ ।&lt;br /&gt;
हाम्रा नयाँ पुस्ताले आफनो संस्कृति छोड्दै पलायनातिर लाग्दैछन्‌। तिनलाई बचाउनु होस्‌, बाब । धर्म हाम्रो नीतिशास्त्र हो । यसमाबैज्ञानिक तत्वज्ञान पनि छ । हाम्रो धर्म चार वेदमा आधारित छ ।यसका अठार उपनिषद्हरूले जीवनका हरेक क्षेत्रलाई छोएका छन्‌ रपथप्रदर्शकको भूमिका लिएका छन्‌ । यो पुर्खाको धरोहर सुम्पन्न 0१७ ।या सक्तिनँ भनेर मलाई डर लागिरहेछ, बाब । म यहाँ बसेरपाहुनालाई यसैगरी अनरोध गरिरहन्छु, कतैको मन छोएर केही गरि नैहाल्छन्‌ कि भन्ने आशा लिएर बसेको छु । मेरो करा बाबले कस्तोमान्नु भयो त्यो थाहा छैन तर मैले आफनो चिन्ता पोखेको हुँ ।&lt;br /&gt;
“तपाईंका कुराले प्रभावित नहुने को होला ? मेरो पनि सोचाइतपाईसंग मिल्दोजुल्दो नै छ । केवल, मैले पृजाबारे भनेको अझ मविस्तृत पार्छु र त्यसपछि तपाईंलाई सोधुँला मेरा सोचाइबारे ।”&lt;br /&gt;
म भन्छु, &amp;quot;हामीले जुन तरिकाले भगवानूको पुजा गर्दै छौं, केत्यस तरिकामा पाखण्डीपत छैन : श्रद्धाभन्दा बढी पाखण्डीपनकोप्रदर्शनको भाव छ । आँखा, मुख, नाक जताततै अबिर र केशरीलेपोतिदिन्छौं । अक्षताले हानिदिन्छौं, पैसा छुवाएर मुखैमा ठोकिदिन्छौं अनिबरदान प्राप्तिका आशाले भाकल गर्दै आफनो माग राख्छौं । हामीलेभगवानलाई पनि हामीजस्तै आशे मानेर व्यापार गर्न खोज्छौं । छैनन्‌यहाँ, तपाईंले जस्तो धारणा लिएर पृजा गर्नेहरू ? भक्ति र ज्ञान मार्गसम्झाउने शान्ति प्राप्तिका लागि लिनुपर्ने मार्ग सम्झाउने काम हामीलेहोइन तपाईं जस्ता ज्ञानी बाबाले लिनु भएमा मात्र हाम्रो संस्कृति र धर्मअमर रहन्छ ।”&lt;br /&gt;
शिवको कुरा सुनेर बाबा भन्छन्‌, “पहिले हुन्थ्यो होला तरअहिले ? यी महात्मा र हामीजस्तै फुङ्गाले धर्मको आड लिएर धेरैतर्साउने काम गरेको हुनाले धर्मबारे हामीले भनेको भन्दा तपाईंहरूलेभन्नुभएमा आजका नवयवक युवतिहरूले मान्छन्‌ । हामीहरूमाथिउनीहरूको विश्वास उठिसकेको छ ।&amp;quot; यति भन्दै उनी हाँस्छन्‌ र भन्छन्‌,&lt;br /&gt;
द२&lt;br /&gt;
“छोड्नोस्‌ वी क्रा, तपाईंलाई मेरा भनाइको बिश्वास गर्न गाह्रो परेकोछ भन्ने कुरा म 0 नि?”&lt;br /&gt;
शिवले हो, क्रेही भन्न नपाउँदै टाढाबाट स्याउलाभित्रेकोजस्तो एकनाशको आवाज आएको सनिन्छ । बाबा र शिवले कहाँबाटआवाज आएको पत्ता लगाउन ध्यान लगाएर सुन्छन्‌ । लाग्छ, कुनै हात्तीआएर त्यस स्याउलालाई माडिरहेको छ या कुनै जनावरले त्यसमाथिलडिबुडी खेल्दै आङ.को चिलाइ मारिरहेको छ । शिवलाई त्यस ठाउँमानिरीक्षण गर्न जान मनलाग्छ र सोध्छ, “केको आवाज हो ? म गएरहेरै ?”&lt;br /&gt;
“के भन्न भएको यस्तो ! यस जङ्गलमा त भालु पनि आउँछ ।यति राति यसै (हिड्नु हुँदैन । वनका छेउमा बसेपछि यस्ता सन्याकसुरुक्‌त कति सुनिन्छन्‌ कति ? कतिपल्ट जादै फर्कदै गर्नुहुन्छ । चपलागेर बस्नोस्‌ र खाना खाएर सृत्नोस्‌ । कति थाक्न भएको होला ?”&lt;br /&gt;
यसरी बाबाले त्यहाँको स्थितिको अवगत गराउँछन्‌ र मैनाले पनिखाना तयार भएको खवर दिन्छे । दुवै जना खाना खानलाई भान्छामाजान उठ्छन्‌ । शिवका आँखा झ्यालबाट बाहिर खोज्न पुग्छन्‌ । त्यहाँएउटा सेतो आकृति हिडेको देख्छ र कराउँछ, &amp;quot;हेर्नोस्‌ त बाबा, त्योजनावर होइन, कुनै मान्छे नै हिडिरहेको जस्तो छ । त्यसले राति बाटोबिरायो या त्यो कुनै सङ कटमा परेको छ त्यसलाई सहयोग गर्नु पर्छ ।लौ म त हिंड्दे भनेर ढोकातर्फ लाग्छ । बाबाले रोक्ने प्रयास गर्दा पनिझ आफनो गति बढाइरहन्छ र ढोका खोलेर बाहिर जान्छ ।&lt;br /&gt;
आवाजलाई पछ्याउदै जाँदा क यस्तो ठाउँमा पग्छ जहाँ एकनारी आकृतिले आफूनो घाँटीमा पासो लगाउन तयार भएकौ देख्छ । शिवलम्केर त्यसलाई समात्छ र यस्तका गालामा चट्काउन याल्छ । ठूलोस्वरले गाली गर्दै भन्छ, “ए लाछी आइमाई, के अधिकार छ तेरो योअमूल्य जीवनलाई नाश गर्ने हँ ? सङ घर्षदेखि भागेर के प्राप्तिको लागिमृत्य खोज्दै हिड्छेस्‌ ?&amp;quot; दवैको होस त्याहाँका स्थितिले बिर्साइ दिएको छ। एक बकबकाउदै छ भने अर्को चुप लागेर सुनिरहेकी छे । मानौं कअपराधी हो ।&lt;br /&gt;
जब शिवले बोल्न थामेर “चुप लागेर हिँड” भनेर त्यसकापाख्खरा समातेर तान्छ अनि त्यो नारी डाँको छोडेर रुन्छै र भन्छै, “कहाँलैजान हिँड भन्नुहुन्छ ? मलाई मर्ने अधिकार छैन भन्ने तपाईं को मलाईबचाउने के अधिकार छ ! हिँड भनेर कता लैजाने के अधिकार छ :छोड्नोस्‌ मलाई मैले यस्ता कुरा धेरै सुनिसकेकी छु । तपाईंले मलाईजोगाएर के पुण्य पाएँ भन्ठान्‌ भएको छ ! किन मलाई लखेट्न&lt;br /&gt;
। दाई&lt;br /&gt;
तपाईंहरू. छोड्न हुन्न । यति भन्दै आवेशलाई रोके पनि बेफवाँककोकुरा बोल्दै अरू रुवाइ बढाउँछै र लाचारीका साथ भन्छे, है भगवान्‌ मतिमीकहाँ द:ख बिसाउन, पनि आउन पाइनँ यिनले मलाई रोके किनराक &#039;&amp;quot;&lt;br /&gt;
त्यस नारीले मनमा लागेका सबै कुरा बताई रुन थालेपछिशिवले उसैको घर फर्काउने कोशिस गर्दै संफाउन थाल्छ । उसका धेरैअर्तीवद्धि सनिसकेपछि र अब उसका लागि अर्को विकल्प पनि नहुँदा त्योनारी यति भन्दै घर फर्कन तयार हन्छे, “तपाईंले मलाई लाछी त्रभनिसवन्‌ भएको छ । अब आफैँ मेरा घरमा पुगेर हेर्नोस्‌ म सङ घर्षदेखिभागेकी हुँ या थाकेर आरामका खोजीमा लागेकी हुँ । त्यहाँ पुगेर अनिबझाइदिनोस्‌ त्यहाँ रहेर बाँच्ने चाहना कताबाट पलाउन सक्छ रसङ.घर्प गर्ने साहस कसरी बटुल्न सकिन्छ । अनि तपाईंका अर्तीलाईशिरोपर गरी मलाई बचाएकामा उपकार गरेको ठानुँला नत्र तपाईं कोहो म जान्दिनँ तर यति म १५ ०१. तपाईं पापी हो, निठ्री हो र होअधर्मी पनि । मेरा सरापले सुख चैन कहिल्यै दिने छैन ।बझूत भयो त मेरा कुराको साराँश ?&lt;br /&gt;
“जति सराप दिन मन लाग्छ दिनोस्‌, मलाई यसमा विश्वास छैनर यसका डरले कर्तव्य गर्न पनि पछि पर्दिनँ । यो मेरो अधिकार नभएपनि तपाईलाई यस कुकृत्यबाट बचाई घरमा जिम्मा लगाउने मेरो धर्मभनेँ या कर्तव्य म भुल्न सक्तिनँ ।”&lt;br /&gt;
“हिडनोस्‌ त म भन्दै छु , त्यहाँ नपुगिकन तपाईंले मेरो कर्मकोअर्थ बझत हुन्न ।&amp;quot; क यति भनेर खेदको हाँसो हाँसै भन्छे, “कसैलेपनि सितिमिति आत्महत्या गर्न चाहँदैन, जीवनप्रति मायामोह नहुनेकसैलाई पनि हुँदैन । जब क जताबाट पनि हार खान थाल्छ, कुनैआशाको त्यान्द्रो कतै पाउँदैन, त्यसपछिको उपाय यही मात्र हुन आउँछ ।यस्ता अवस्थामा नपुगेका तपाईंहरूलाई के थाहा हुन्छ मर्ने निर्णय लिनपनि कति गाह्रो हुन्छ ।&lt;br /&gt;
बाटाभरि यस्तै कुरा गर्दै उनीहरू गाउँमा पुग्छन्‌ । नुरले आफनोघर देखाउँछे र शिवले निर्धक्क भएर ढोका ढकढकाउँछ । सायद, त्यतिबेलासम्म सबै निदाइसकेका थिए क्यार, ढोका उघन निकै बेर लाग्छ ।झन्नै १५ मिनेट ढकढकाएपछि एक वृद्ध आएर ढौका खोल्छ र शिवलेनुरलाई जिम्मा लगाउन खोज्दै भन्छ, “तपाईंकी यिनी को हुन्‌ झन्नैआत्महत्या गर्न लागेकी थिइन्‌, यिनलाई बचाएर ल्याइदिएको छु । फेरिअर्को के गर्छिन्‌ अलि ध्यान दितहोला ।&amp;quot; यति भन्दै क फर्कन लाग्छ ।त्यस वृद्धले एक्कासी उसलाई रोक्दै छोरा -र स्वास्नीलाई बोलाउन थाल्छ ।&lt;br /&gt;
प्र&lt;br /&gt;
उनीहरूलाई जम्मा पारेपछि कड्केर भन्न थाल्छ, &amp;quot;ए पाजी, रातभरयससंग सुखभोग गरेर यस वेला कुन मुख लिएर फिर्ता न्याउनसकिस्‌ ?तँ को होस्‌ : यस्ती बेश्येलाई मेरा घरमा यसै छोडेर जान पाउँछस्‌ ःआफैना साथ लैजान्छस्‌ कि गाउँलेलाई उठाङँ । यसले मर्न खोज्ने :पहिले हामी सबैलाई यसले मार्छे ः बेइज्जत गरेर त मारिसकी, अबअकाल मृत्य मात्र ल्याउन बाँकी छ । त्यहाँ अरू कोही पनि नबोलेरटूलुटुल हेरि मात्र रहेको देखी त्यो वृद्ध अरू कुर्लिदै भन्छ, &amp;quot;के हेरेरबसिरहछौं ः यसलाई घरभित्र हुल्छौं कि यस लुढाका साथ लगारिदिन्छौं !के गर्छौं भनिहाल, म यसको अनुहार हेर्न पनि चाहन्नँ ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
त्यस वृद्धकी स्वास्ती अगाडिसदैं भन्छै, “के भनेर राख्छन्‌ योबाइफालेलाई, यहाँ ? कुन सडकको कन सड्को हामीलाई छलेर मोज गर्नगई, अहिले त्यसैका लुठाको कुरा सुनेर म आइज बहारी भनेर घरभित्रहुल्छु के : नानीदेखिको बानी कहाँ छुट्छ भनेर त्यसै वेला यो लतमापरि सकेकीलाई राख्न हुन्न भनेकी थिएँ, आखिर त्यही भयो किभएन ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
“यत्रो ठूलो पाप नबोल्न्स्‌ न आमा । म पहिले जे थिएँ“तपाईंको बहारी भएपछि गृहधमंमा छु । उहाँसंग मेरो कुनै सम्बन्ध छैन। मैले तपाईंहरूलाई नै मबाट छुट्कारा दिलाउन आफनो हत्या गर्नलागेकी थिएँ । हेर्नोस्‌, मेरो हातको डौरी यसलाई मैले कत्रो मेहनत गरेरयसैका लागि बाटेकी थिएँ&amp;quot; भन्दै देखाउँछे । उसका यी बयानले कसैलाईपनि कुनै असर पार्दैन र शिवले नुरका लोग्नेपट्टि फर्केर सोध्छ ।उसलाई बिश्वास थियो उसले यस सत्यलाई स्वीकार्छ “तपाईंकी जहानलाईमृत्यका मुखबाट बचाएर तपाईंकहाँ जिम्मा लगाउन आएको छु । तपाईंलेत मलाई उल्टो दोष लगाएर रोक्नुहुन्न होला ? तर यस्तो अनर्थ हुँदापनि किन केही बोल्नु हुन्न : न त मृत्युबाट जोगिएर आएकीस्वास्नीलाई आत्महत्या गर्न परेको कारण सोध्नु हुन्छन ! यो के हो यस्तोक&lt;br /&gt;
“अब थाहा पाउलास्‌ यसको अर्ध । बडो जान्ने आउँदोरहेछ” भन्दै कराएर त्यस वृद्धले छिमेकीहरूलाई जम्मा थाल्छ ।ओरिपरिका छिमेकीहरू आएपछि ती बढावढीले झन्‌ कुर्लेर नुरलाई देखाउँदैभन्न वाल्छन्‌, “हेर्नोस्‌ यसलाई, यस बेला राति यो कहाँको गृण्डालाईम्रमातेर घरैमा आफनो पेशा गर्न ल्याएकी ः बुहारी भइसकी, अव पुरानाकुरा बिर्सिदिनोस्‌ भन्नुहुन्थ्यो तपाईंहरू, अब यस्तो हुन लागेपछि हामीले&lt;br /&gt;
गर्ने, लौ तपाईंहरू नै भन्नोस्‌ ? ती शहरका केटीहरू आएर यसबेश्येलाई यो घरमा के हुलेर गएका थिए, अब त यसको हिम्मत&lt;br /&gt;
दश&lt;br /&gt;
यतिसम्म बढी सकेको छ । कति कुरा त लौ भनेर सहदै गर्यौं अब योके गरी सहुँ ?” छोरापट्टि फर्केर भन्छे “क चप लागेर बस्छस्‌ त॑ !तँलाई पनि ती शहरियाले घाँडो लगाएर गएका थिए, अब त॑ पनियसैलाई यतिकाको सामन्ने जिम्मा लगाएर पन्छाइदै । तेरो बिहै यससंगपन्चै बाजा बजाएर गरेका छैनौ । यो देवकीसंग तेरो के स्वास्नीको नाताछ र मायाले भुतुक्क भई “जा&amp;quot; भन्न सकिनस्‌ । यसका लोग्ने सहस्रछन्‌ त॑ मात्र हो र : धर्मले पनि यसलाई घरमा राख्नु हुदैन । देवकीहो ..... यो देवकी ?”&lt;br /&gt;
आमाको आड पाएर जब लोग्नेले पनि जथाभावी बोल्नथाल्छनुरलाई असहनीय हुन्छ र शिवलाई भन्छे, &amp;quot;थाहा पाउनु भयो त यहाँबाँच्न कति गाह्रो रहेछ : मलाई आत्महत्या गर्ने नदिएर कसको उपकारगर्नुभयो : बरु आफैँ बद्नाममा .- पर्नुभयो । यस्ता जीवनलाई तपाईलेअमृल्य भन्नभएको होइन !”&amp;quot; सबै छिमेकीहरूलाई संबोधन गर्दै नुरलेभन्छे, &amp;quot;तपाईंहरूले, यिनीहरूले भनेका कुरामा विश्वास नगर्नोस्‌ । यीव्यक्तिले मलाई आत्महत्या गर्न लागेका वेलामा फेला पारेर मलाईसझाउँदै घर फर्काएका हुन्‌ । उनलाई मैले आफनो शारीरिक भोक पूर्णगर्न घरमा ल्याएकी होइन, यो झृ्टो हो । मलाई पन्छाउने दाउ मात्र हो। यस पेटमा यस पापीको सन्तान हुर्कदै छ । म कहाँ जाउँ ? एकफेरती दिदीहरूले मलाई यस घरमा हुलेर जानाले बाँच्नुभन्दा मृत्य रोज्नर्नेबनायो अब तपाईंले बचाएर यो कस्तो भैमरी पार्ने हुनभयो !&amp;quot; नुर रुन्छेपनि कराउँछे पनि अनि बाँच्ने उपाय वताइदिन छिमेकीहरूसंग अनरोधगर्छे । त्यहाँ कराउने र बोल्ने तिनै सास्‌ससरा अनि लोग्ने मात्र छन्‌ ।नरको रुवाइ मात्र सनिन्छ ।&lt;br /&gt;
धेरैपटक नुरलाई शिवका साथ लखेदन कराइरहेका तिनीहरूकाकर्कसा स्वर सनैर एउटा यवक छिमेकीले भन्छ, &amp;quot;किन यस्तो दौष यीव्यक्तिलाई लगाउनु हुन्छ, दाइ ? आत्महत्या गर्न लागेकी तपाईंकीस्वास्नीलाई यिनले बचाइदिएकामा स्यावासी पो दिन पर्छ झन्‌ उल्टैस्वास्नी नै उसलाई पन्छाउने दाउ पो गर्नुहुन्छ । यस्तो व्यवहार हुनलाग्योभने सन्सारबाटै दया धर्म भन्ने हराउँछ । अनि यिनलाई मात्र होइन, यहाँसबैलाई जिउन गाह्रो पर्छ । तपाईंहरूका घरको रातदिनको कलह हामीलेनसुनेका छैनौं । पहिले त्यही देवकी तपाईंका छोरालाई नभई भएन, अबत्यो स्वास्नी हुन सुहाइन ?&lt;br /&gt;
“आफू दोषी नहुँदो हो त ती शहरिया केटीहरूले तपाईंकै घरखोजेर किन जिम्मा लगाएर जान्थे र तपाईंहरूले पनि तिनीहरूले जे जति&lt;br /&gt;
पै&lt;br /&gt;
भने पनि नटेरेर घरमा राख्नुहुन्न थिया । अहिले पेट बोकेकीलाई जेपायो त्यही भनेर लगार्न कहाँ पाइन्छ :&lt;br /&gt;
ए दाइ, अब धेरै हल्लाखल्ला नगर र खुरुक्क स्वास्नीलाई घरमालैजाङ । होइन भने हामीले पनि के गर्नपर्छ त्यो गर्न जानेका छौं ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
त्यस यवकले आफना छोरालाई चेतावनी दिदै नुरलाई सकार्नभनेको सुनेर त्यो बृद्धा रोषपर्ण स्वर निकालेर कराउँदै भन्छै, &amp;quot;ए .... योभुसुनाले पनि अब हामीलाई हेप्ने, धम्की दिने भयो । के गर्नसक्छस्‌ तैभे,लौ गरेर देखा त : बिनासित्तै यो छुचन्द्रै फूर्ती देखाउँदो रहेछ ।”&lt;br /&gt;
त्यो यवक पनि जोमिदै, “के गर्न सक्तो रहेछ, हेर्ने हो&amp;quot; भन्दैसुरिएको देखेर दृवै पक्षलाई साम्य पार्न तिनै वृद्धवृद्धालाई संभाएर त्यहाँजम्मा भएका छिमेकहरूले नुरलाई घरभित्र लैजान वाध्य पार्छन्‌ । नुरलाईपनि आत्महत्या गर्न महापाप हौ । यस्तो काम कहिल्यै गर्न नर्ताम्सनूभनेर संफाउँदै समस्याको समाधान गर्छन्‌ र शिवलाई पनि छुटकारादिलाई अनर्थ हुनबाट रोक्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
त्यहाँबाट फर्केर बाबाकहाँ पुग्दा मध्यरात भइसक्छ । उसकोनिद्रा भोक दुवै यस घटनाले गर्दा मरिसकेको छ । अलिकति पानी पिएरसत्ने विचारले पानी पिउन अँखरा उठाएको मात्र के हुन्छ, बाबाले खानालिएर पर्खिरहेकी मैनालाई देखाउँदै भन्छन्‌, &amp;quot;खाना नखाई नसृत्न होला, कत्यसलाई हेर्नौस्‌ त खाना लिएर पर्खदापर्खदै त्यही निदाएकी ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
त्यसपछि शिवलाई खाने मनै नभए पनि खान्छु भन्न करै लाग्छर मैनालाई उठाएर आरामले सुत्न पठाई आफू त्यही चिसो खाना लिएरखात बस्छ । बाबाले यत्रो बेर लगाएर फर्कनाको कारण सोध्दै त्यस्तोआवाज गर्ने के रहेछ, के देख्नुभयो भनेर सोध्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
मैले देखे मात्र हाइन, बाबा, कल्पनाभन्दा टाढाको मानवसभ्यताको अर्का रूपको पति अनुभव बटुल्न पाएँ । यहाँ नारी र पुरुषकोसाथलाई किन एउटै अर्थ लगाएर हेर्ने गरिन्छ । मृत्यबाट एक नारीलाईकुनै पुरुषले बचाउँदा पनि आपत्ति आइलाग्छ भने यहाँ मानवता कतालुकेको हुन्छ ! लोग्नेस्वास्तका बीचमा प्रेम र समझदारी नभईछुट्काराका लागि उपायको खोजी हुन्छ भने तिनीहरूको जीवन कुन्‌रूपले बितिरहेका होला ? आज यिनै तथ्यलाई नजिकै पुगेर अनुभव गर्नपाएँ । यो देख्ता त मलाई लागिरहेछ, मैले जीवनका अझै कति पक्षहरूदेख्न बाँकी नै छ ।&lt;br /&gt;
बाबालाई शिवका कुराले बोल्त वाध्य तुलाउँछ । उनी भावनामाहु का “दया, माया जस्ता संवेदनशील भावनाले पनि कुनै बैला&lt;br /&gt;
दिएर बेपत्ता पारीदिन्छ । उसले वचार्दै लडाउँदै लाचार बनाएर&lt;br /&gt;
८७&lt;br /&gt;
हाम्रो परीक्षा लिन्छ । त्यसै बेला हो, तपाईंले आफूभित्र निहित दयामायालाई चिन्न सक्ने । यत्ता चिप्लेटीका खेलबाट उठेर तपाईं आफूलाईकति दरो बनाउन सक्नुहुन्छ, त्यो नै यसको मात्र हुने,छ ? मेरी मैनायसैको त उपलव्धि हो ।&lt;br /&gt;
“त्यप्षो भए मैना तपाईंका दयाको परिचय मात्र हो ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“दयाको परिचय मात्र होइन, मावनताको उपलब्धि पनि हो ।मैरो तेस्रो पृस्ताकी नातिनी भएकी छे । मैले यसलाई संरक्षण दिएको मेरोदया मात्र देखाउनलाई होइन । यो मेरा घरमा मेरी छोरीले ल्याएकीमानव नातिनी पनि हो । यो कसरी आई, त्यसले कसरी ल्याई, थाहाछैन । न त यो मैनाले जान्दछे न त हामीले नै । यो को हो भन्नेकुरा रहस्यमै छ ।&lt;br /&gt;
एक दिन केटाकेटीहरू आपसमा लुकामारी खेल्दाखेल्दै यो मैनालक्ने बहानाले पसलअगाडि रोकेका टुकभित्र पसिछ । ट्कवालाले पनिआफूनै धुनमा चलाएर यहाँ आयो । सामान खसाल्न लाग्दा पौ योत्यहाँबाट फुत्केर भागी छ । त्यसपछि रुँदै कराउँदै यताउती भड्किदै त्योबालिका यहाँ आइप॒गिछ । त्यस वखत यसको उमेर ४/५ को मात्रथियो ।&lt;br /&gt;
यस घरमा मेरी एक छोरी थिई । त्यो आफ्नी छोरीका मृत्युकोवियोगमा विरक्त भएर बसिरहेकी थिई । यसलाई देख्नासाथ घरमा ल्याईम्वाइ खाई माया गर्दै आफना साथमा टाँसेर राखी । त्यस बेलादेखि योयहीं छे । कसैले सोध्न आएका छैनन्‌ । यो पनि घर कहाँ हो, बताउनसक्तिन । यसरी पनि मान्छे यहाँ अलपत्र परेका छन्‌ र अरूकासंरक्षणमा रहनपरेको छ ।&lt;br /&gt;
यस्तो कथा बोकेकी यो मैना छे भने मेरी त्यस छोरीको जीवनअर्कै छ । म र त्यस छोरीका बीचमा बन्त गएको बन्धन झन्‌ अनौठोछु । सुन्नुहुन्छ भने भनुँ ? कि नसुन्ने भन्नोस्‌ न &amp;quot;मेरो आफनै जेठीछोरी र यो मानवी छोरीको स्थिति उस्तै थियो । मैले आफनी छोरीगुमाएका वेदनामा त्यसैबाट मलमपट्टी लगाउन पाएको थिएँ । यसैले कमेरो दयाको स्वरूप हुनुभन्दा मैले उल्टै उसको दया, माया र सेवामाआफूलाई जीवित राख्न पाएको थिएँ । अहिले त्यो छोरी पनि बितेकीलेयस नातिनीलाई लिएर परिबार बिर्सेको छु । यसैले म भन्छु सबै गुमाएपनि मानवनाताले हामीलाई एक्लो पार्दैन । यो भावनाको मात्र फरकहो । आफूले माया दिन सक्यो भने अरूबाट पनि त्यस्तै माया पाइन्छ रयो बन्धन पनि उत्तिकै बलियो राख्न सकिन्छ । । उनी आत्मकथा यसरीशुरु गर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
चक&lt;br /&gt;
हाम्रो आर्थिवा अवस्था त्यति बलियो नभएकाले तीन छोरा र तीनछोरी, बृढी आमा र स्वास्नीलाई भौतिक सुख पनि दिडै र छोराछोरीलाईउच्च र स्तरीय शिक्षा पनि दिनसक्नै गरी आर्थिक क्षमता बनाउँ भन्नेउद्देश्य राखी म केही वर्षका लागि घर सल्लाह गरेर भारतमा पसेँ ।गाउँमा रहँदा मास्टरसम्म भइसकेको भए तापनि त्यहाँ मैले खतरायक्तकाम गर्ने मजदृ्‌र भएर केही वर्ष बिताए । मैले गरेको मेहनत र मेराव्यवहारले प्रभावित भएर मलाई मजद्री गराउने मालिकले मलाई अन्यव्यापारसंम्बन्धी काममा लगाइदिए । त्यसपछि मैले स्वाध्ययन गर्ने पनिपाएँ र पैसा पनि अलि घेरै नै कमाउन वाले । एक बर्ष पनि मैलेत्यहाँ बिताउन सकिनँ । पैसा प्रसस्त कमाए पनि त्यहाँ नोकरी गर्नभावनताप्रति आधात प॒याउन थियो । त्यमैले त्यहाँ छोडेर म एकविद्धानका साथ उनका पस्तकालयमा र अध्ययन कक्षमा काम गर्न बाले ।पैसा यहाँ त्यति धेरै थिएन तर उहाँबाट जन्‌ जीवनदर्शन र घर्मप्रतिकोज्ञान पाउथे, त्यौ अमुल्य थियो । मेरा दुबै चाहना पैसा कमाउने र ज्ञानप्राप्त गर्ने, यस नोकरीबाट पाउन वालेँ । धेरै वर्ष उहाँको साथमा रहँदायत्ति आत्मीयता बढ्यो घरको संझना आए पनि त्यसमा चिन्तितछोड्दै जान थालेँ । तर यो यात्रा पनि एक्कासी चौँडयो । मेरा तीमालिक किताव हातमा लिएको लियै परलोक हुनुभयो । त्यहाँ निकैहल्लिखल्ली उहाँका मृत्यले ल्यायो । आमा, स्वास्नी, छोराछोरी सबैआइ्प॒गे र रुँदै छाती पिट्तै वेदना पोख्न थाले । कुनैले त्यस्ता अवस्थामापनि मलाई शङ कालु आँखाले हेर्न लागे । म तिनीहरूसंग अर्थ न बर्थडराउन थालें । उहाँको शव समेत जँचाइयो । हृदयाघातबाट मृत्यु भएकोभन्ने ठहर भए पनि घर तलासी प॒लिसबाट गराइयो । प॒लिसका हातमाएउटा फाइल पर्न गयौ जसमा लेखिएको विवरण पढेपछि उसले मेरोवाम लिदै यो को हो भनेर सोध्यो । म त्यस बखत त्यही नै थिएँ रधरयर काँप्दै त्यो व्यक्त म नै हुँ भनेर चिनाएँ । मालिकका छोराले पनियसमा सही थपिदिए । त्यस पुलिसले तब त्यस फाइलमा लेख्खेको पढेरसुनाए जसमा मेरा मालिकले मैले उहाँको सेवा गरें बापत्‌ पाँच लाख₹पियाँ मलाई दिनु भनेर परिवारका नाममा लेखेर छोडेका रहेछन्‌ । मपति त्यो सुनेर छक्क परें र उहाँको परिवार पनि । मेरा आँखाहरूरसाउन थाले मालिकप्रतिको द्धा र मायाले । उनीहरू शान्त रहे ।त्यहाँ मृत्युले ल्याएको शान्ति तवै मात्र देखियो ।&lt;br /&gt;
मालिकका कान्छा छोराले मेरा मख्मा हेरेर भने, &amp;quot;हामीले दिननसकेको आराम र सुख यसले दिएको रहेछ । पिताजीलाई यतिका वर्षस्याहात्यो, उहाँलाई सेवाका त्रणमुक्त पार्न भए पनि यति रकम दिएर&lt;br /&gt;
८९&lt;br /&gt;
हटाइ दिनुपर्छ । जेठा छोराले अलि चित्त भारी पारेर भने, &amp;quot;नदिएर सुखपाइयो र &#039; कागत प॒लिसका हातमा परिसक्यो । यत्तिकाले पिताजीकामहानता सनिसके । नदिएमा हामी दषप्ट हुन्छौं । मान्छेको परिवारबाट मनउठेपछि कस्तोसम्म हनसक्तो रहेछ त्यो बझियो । गल्ती हाम्रो नै हो ।यस्तो शान्तिप्रिय उहाँलाई हामीले त्यसरी कचकच गर्नै नहुने : एक्लोयहाँ आएर बस्ता पनि हामी भेटन आएनौं । परिवारका मायाको बल्छीलेतानेर ल्याउँछ भनेर पर्खेर बस्न कति दृखदायी कुरा हो । भो, यी कुराअहिले संभझेर के गर्नु &#039; आमा र बजैले त्यतिका धन महात्मामाथि लुटाएर त हामीले सहेर बस्यौं भने बाबाले यति यस सेवकलाई दिएर के खतीहाम्रो हुन्छु &#039; यसको पनि जीवन बन्छ । हाम्रा संपत्तिको पनि सदपयोगहुन्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
॥ मालिकको मृत्यपछि चलेको यस्तो कुरा र मालिकका बुढी आमार स्वास्नी रोएको देखेर जरुम्क उठेर आफनो घरतर्फ लागि हालुँजस्तोभएँ । मालिकका मृत्यमा मैले आफूनो मृत्य देख्नथालें । जे जस्तो मलाईलागे पनि अन्त्येष्टिको काम नसिध्याई र त्यहाँ भएका धनदौलतको जिम्मानलगाई भागिहाल्न उचित नहुने हुँदा मनलाई विचेर निहरी रहेँ, सही रहेँ,के के भने त्यो सुनिरहैँ । यसबाहेक म गर्न पनि केही सक्तिनथें ।&lt;br /&gt;
केही दिन यक्तिकैमा बिताएपछि त्यो बक्स भएको धन र आफनोकमाइ लिएर घर फर्के । बाटाभरि यति सुखका कल्पना गरिनँ, यतिसपना देखिनँ ज्ञ सं्झे, यति लामो समयसम्म परिवारसंग छुट्टिएर वस्नेकस्तो योजना बनाएको रहेछु, आफूलाई नै तँ कति मुर्ख रहेछस्‌ भनेरमनमनै गाली गरें पनि । तर ती दिनहरू विगत भइ सकेकाले आउनेदिनहरूमा यस धनका प्रयोगबाट के गर्न सकिन्छ भनेर सोच्तै बाटोकाट्न वाले ।&lt;br /&gt;
म घर फर्केको महिना श्रावणको थियो । आकाश पूरा कालोबादलले ढाकेको थियौ र कच्ची बाटो हिलैहिलाले खाल्डाखुल्डी परेकोथियौ । बिहानीपख बसबाट ओर्लिएर एउटा भरियालाई भारी बोकाई मआफना गाउँको बाटो लागेँ ।&lt;br /&gt;
मेरो घर पूर्वाञ्चल क्षेत्रमा थियो । कोशी नदीका छेउछाउमा नैकेही बिघा जमिन थियो र सानो एउटा घर । एक गाँस खान रशरीरलाई ओत दिन यिनै पर्ख्यौली संपत्तिले पत्याउने गर्थ्यो । मेरी जहानअतिजाँगरिली थिई । घरमा बसीबसी खसीबाख्रा पालेकी थिई । भैंसीकोदुध, घिउ र तिनै खसीबाखा वेलावेलामा बेच बिखन गरेर घर खर्चधान्थ्यो । मास्टरको मेरो कमाइ यति थोरै थियो, जहानले यस्ता कामशुरु नगरेकी भए सन्तानलाई पढाइ/लेखाइ गराउनै सकिन्नथ्यो । जीवन&lt;br /&gt;
९०&lt;br /&gt;
हाम्रो शान्तसंग रामै गरेर बित्तै थियो । केवल हामीले धन बढाउनसकेका थिएनौं र सन्तानलाई शहरमा राखेर राम्रो स्तरीय शिक्षा दिनसकेका थिएनौं । मलाई यी दैनिक क्रमबाट मुक्त भई सन्तानलाईकाठमाडौं पठाई पढाउने इच्छाले गर्दा विदेशमा बसी धन कमाएर फर्कनेचाहना बढ्न थाल्यो र त्यसै गरें पनि । त्यहाँ पगेपछि त्यहाँको स्थान रद्रीले गर्दा त्यतैतिर लामो समयसम्म भल्याइ दियो । त्यही सानो एकभूलले मेरा स्मृतिपटमा ताडना दिदै रहनेभयो । यो घाउ कहिल्यै निकोहुने भएन ।&lt;br /&gt;
अलि दुःखी हुँदै सइ.... अ गर्दै भन्छन्‌, “म जब आफनो घरनिरप्रगे त्यहाँ न त घर थियो, न त खेत नै । म त स्तम्भित भएर एकछिन ठिङ्ग उभिइरहैँ । आँखाबाट आँसु खस्न थालेछन्‌ । त्यसै वेला मैलेके देखेँ भने त्यो निर्दयी कोशीले आफना तीरको माटो काटतै एकै चोटिझवाम्म पारेर निलिदिइन्‌ । म त्यो देखेर झन्‌ विचलित भएर कराउनथालेछु । साथमा आएका भरियाले मेरो स्थिति देखेर सोध्यो, “के तपाईंपनि यही इलाकामा बस्नुहुन्थ्यो : पहिले नै मलाई भन्नुभएको भएयहाँको बस्ती सरेका ठाउँमा पुच्याइदिन्थे : केही भन्नु भएन लौ फर्कीउततैतिर ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
कुरा त त्यसले ठिकै भनेको भए तापनि सन्दा नराम्रो लाग्ने नैथियो । मनले कस्तो मुर्ख धेरै बकबक गर्नुपर्ने भने पनि मैले नमताकासाथ भनेको थिएँ, &amp;quot;यहाँको यौ गति धाहा पाएको भए यो सर्वनाश हेर्नकिन आउथे : उ हेर, त्यो कोशीका छातीमा त्यही नै मेरो सर्वस्वथियो ...... दाई मेरो सर्वस्व । कहा होलान्‌ मैरा गङ.गा, जमुनाभागीरथी ? कहाँ प्गेहोलान्‌ मेरा राम, श्याम र हरि ? ती बुढी आमा,त्यो एक्लै परेकी मेरी जहानले कसरी यस आपत्‌को सामना गरिरहेकीहोली ! म तितलाई पाउन सक्छु या सक्तिनँ भन्दै थचक्क त्यही बसेरकून कराउन थालेँ ।&lt;br /&gt;
त्यस वेला पूर्वक्षितिजलाई छोड्दै सूर्य बादलसंग लुक्तै अगाडिसर्दैगिए । शून्य चकमन्द त्यहाँ कोशीको आक्रोश बाहेक केही सुनिदैन थियो,सायद मेरो आवाज पनि त्यसैभित्र हराएको थियो ।&lt;br /&gt;
त्यो भरिया मुर्ख भए पनि मानव थियो । उसले पनि मेरासाथमा आँसु खसालेको मैले देखेँ र मलाई त्यस बस्तीमा गएर आफनोपरिवार खोज्त फैरि जोड गत्यो । मेरा लागि पत्ति यो बाहेक अर्कोउपाय थिएन । त्यसैलै त्यतैतिर लाग्यौं । बाटाभरि_ दुबैले केही बोलेनौं,त्यस भरियाले भनोस्‌ पनि के : उसले थाहा पाएको थियो, सैयौं मान्छे,&lt;br /&gt;
९१&lt;br /&gt;
१७ कोशीले निलिदिएको । त्यसमध्ये मेरा परिबार परेका छन्‌ यान्‌ ।त्यहाँ पुगेर सबै गाउँलेहरूसंग सौधखोज गर्दा उनीहरू एक पनि&lt;br /&gt;
नरहेको थाहा पाएँ । ती गाउँलेहरूले त्यस वेला हाम्रो बस्ती गुमेको कुरासुनाउँदा यस्तो दृश्य कसरी हेरेर बस्न सकिन्छ भने जस्तो लाग्ने छ ।पानीमा तैरिएको घरको छानी, साना हात उठाएर सहारा मागेकावालकहरूका हात, नानीलाई च्यापेर बगेका लाशहरू देख्न कति हृदयविदारक हुन्छ भन्नोस्‌ त म त्यहाँ भएको भए मैले पनि त्यो हेरेरआफूले केही गर्न नसकेको वेदना सहेर बस्नुपर्ने थियो ।&lt;br /&gt;
त्यही सुनेपछि म त्यहाँ टिक्न सकिनँ र म सोझै अञ्चलै छोडेरयतातिर आएँ र मालिकले बक्स भएको धनको सदुपयोग गर्न यो यात्रीविश्वामगृह बताएर बसेको छु । पात्रीहरूलाई खुवाउनु र आफूलाई खानजेनतेन मेरो पूर्व कमाइले धानिरहेको छु । अहिले यी यात्रीहरूको सन्तुष्टिनै मेरो सुख भएको छ ।&lt;br /&gt;
केही संझे झैं गरी विषय फेरेर सुनाउन थाल्छन्‌ “आफूतो गाउँछोडेर यस ठाउँमा आएपछि यस मैनाकी आमाप्रतिको स्नेह र कर्तव्यलेखिचेर मलाई यहाँबाट फुत्कन नदिएकाले नै मैले यहाँ दोस्रो बसोवासबसाए । मेरी जेठी छोरी गङगा जस्तै यसकी आमा थिई, लरखराएरहिड्थिई र मागेर खाइजीविका चलाउँथी । ए₹खमनि बस्नलाई एउटा सानोछाप्रो थियो । बस्‌, यही उसको गुजाराको बाटो थियौ । उसलाई कसैलेभन्थे, &amp;quot;यो देवकीकी छोरी हो, कसैले भन्थे, कहाँबाट आई यहाँ वाहाछैन । त्यो रामी त थिइन नै साथै स्वस्थ पनि देखिन्न थिई । थियो भनेउससंग जवानी थियो । चिधरा मागेका लुगा लगाउँथी र राम्ररी लगाउननजानेकीले कुनै कुनै वेला उसको भित्री अङ.ग पनि देखिन्थ्यो ।केटाकेटीहरू हाँस्तै त्यसलाई उल्याउँथे । उसलाई बौलाहीभन्दा बढी केहीमान्दैनथे । मलाई भने त्यसलाई देख्नासाथ लाग्न थालेको थियो, कोशीउल्टेर बगी मेरी गड गालाई यहाँ छौडेर गएछ । मैले त्यसलाई नयाँलुगा किनेर सिलाई दिएँ र खानलाई पैसा दिएर मृत गर्न थालेँ ।उसलाई त्यतै वेला आफना साथमा राख्न सक्तिनथें किनकि स्वयम्‌ म नैत्यस समयमा एउटाका घरमा पाहुना भएर बसेको थिएँ पैसा तिरेर ।&lt;br /&gt;
केही महिना त्यतिकैमा बिताएपछि मात्र यहाँ जग्गा लिएर योघर बनाएको हुँ । तलको एक कोठा बनेपछि म यही घरमा सरेँ ।त्यतिन्जेल म त्यस बस्तीमा राम्ररी नै भिजिसकेको थिएँ र सबैले मलाईबाबा भन्न थालेका थिए । यहाँ म सरेको यस्तै १०/१५ दिन मात्रभएको थियो । एक विहान बस्तीतिर जाँदा त्यस मैनाकी आमालाई&lt;br /&gt;
९२&lt;br /&gt;
आफना छाप्रोअगाडि भरखर समहरूपमा बलात्कार गरेर छोडेका अवस्थामादेखेँ । मैले सहन सकिनँ र त्यसका अस्तव्यस्त भएका शरीरलाई छोपीदिएँ उठाएर बसाए । त्यसैले पनि पहिलोपटक मलाई अँगालो हालेरखुबसंग रोई ।&lt;br /&gt;
मैले त्यसका आँसु प॒छिदिँदै अँगालोबाट आफूलाई खुटाईजोडजोडले ती अधर्मीलाई अगाडि आइज भनेर ललकारेँ । मैले ठूलठूलोस्वरले कराएको सनेर छिनैमा हुल जम्मा भयो । मैले त्यसमाथि भएकाअत्याचार बताउँदा, घाहा छ तितले के भने ? उल्टै मैमाथि आरोपलगाउँदै जथाभावी भन्न घाले । म जिल्ल परें । तिनीहरूले कतिसम्मपनि भने मैले पहिलेदेखि त्यसको माया गरेको कारण यही कर्म गर्नलाईहो रै । म पराई बस्ती सरेर आएकालाई कसले साथ दिने ? भोग्ने रदेख्ने त्यो लाटी र त्यो छाप्रो मात्र थियो । त्यस असमर्थले के बताउने१ मलाई हूल आक्रोशित भएर पिट्न आउन थाल्यो । म पनि गरेकोपाप भए पो डराउनु । निर्धक्कसंग भने, “ए अधर्मी, पापी हा, योविचरीमाथि यत्रो अत्याचार भएको छ । पुलिसलाई बोलाएर तथ्य पत्तालगाउन छोडेर यस्तो बोल्दै हुनुहुन्छ : अनर्य गर्न नतुल्नोस्‌ र सक्नुहुन्छभने यो पीडितलाई हुलमा घुमाएर अपराधी समात्न लगाउनु होस्‌ ।घरमा लुकेर बसेका कोही छन्‌ भने बाहिर निकाल्नौोस्‌ । म भन्दै छुमलाई यस्तो दोष लगाउन महापाप हो । ममाथि यसरी झुटो आरोपलगाउनु हुन्छ भने ती निदैयीहरूले अरू अपराध गर्न प्रश्नय पाउने छन्‌ रगाउँका अरू चेलीहरूले पनि दुःख भोग्न पर्ने छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
म एकोहोरो कराउँदै थिए । हलबाट लगाइएका लान्छना पनिसुन्दै थिएँ । यत्तिकैमा मैताकी आमा दौडेर हलभित्र पसी र एउटाअधबैंसे बुढालाई समातेर क्वाँ क्वाँ हँदै कराउदै पिट्न वाली । क छोड्‌भनेर पन्छिन खोज्दा पनि बिरालाले झम्टेको जस्तो गर्न वाली । बल्लहुलको ध्यान त्यतातिर मोडियो । त्यस लाटीलाई पन्छाउन अरूहरू लाग्दापनि त्यसले छोडिनँ र रूदै टोकुला जस्तो पति गरी । यिनले त्यसपछित्यस व्यक्तिलाई केर्न थाले । पोल खुल्दै गयो । दुइटा अरू जवानकेटाहरू पनि त्यसमा मछिए । पुलिसले तिनीहरूलाई समातेर करवाहीचलाउन लगेपछि मैले त्यही हललाई साक्षी राखेर छोरी बनाएर घरमाल्याएँ ।&lt;br /&gt;
केही महिनापछि त्यसले छोरी जन्माई । त्यस लाटीले पनि छोरीपाएपछि खुव रमाई । थाहा छ, त्यसले पनि कसैले नसिकाएर पनिछोरीलाई रामोसंग स्याहार्न सकी र हुर्काउन थाली । तर के गर्ने, सुखकहाँ घेरै दिन टिक्न सक्तीरहेछ्ख र ) एक दिन त्यो छोरी एकै रातका&lt;br /&gt;
९३&lt;br /&gt;
बिमारीले मरी । त्यसपछि त्यो मेरी छोरी पनि बिरामीको बिरामी नैभएर गई ।&lt;br /&gt;
मैना नाम त्यस वच्चीलाई त्यसैकी आमाले मर्नभन्दा पहिलेराखेकी थिई । एक दिन त्यसले वारीमा मलाई घमाउन लगी र त्यहाँचिरबिराईरहेका चराहरूलाइ देखाउँदै आफनी छोरीलाई देखाई । मैलेत्यसको अर्थ बुझे र धेरै चराहरूको नाम लिन थालेँ । जब मैले &amp;quot;मैना&amp;quot;भने, उसले टाउको हल्लाएर समर्थन गरी, नत्र मैले त्यसको नाम“सहज&amp;quot; राख्न खोजेको थिएँ । त्यसपछि जब त्यो नातिनी मैना मरी,त्यसैले यस नातिनीलाई यहाँ ल्याई । मैले बझिहालें त्यसले छोरीलाईसझर त्यसको माया पाउन ल्याएकी हो भनेर । तसर्थ मैले यसको नामपनि संझना स्वरूप “मैना&amp;quot; नै राखी दिएँ । बाँचनजेलसम्म त्यस छोरीलेयस मैनालाई उही काखकी छोरी जस्तै गरी माया गर्थी ।&lt;br /&gt;
यही हो, म, &amp;quot;मेरी छोरी र नातिनी मैनाको सम्बन्ध । आजभौलियो बढ्दै जान थालेकी मैनालाई देख्ता गाउँमा सबैले माया गरे पतिकसैको गिद्धे आँखा यसमा नपरोस्‌ भनेर म रातदिन भगवान्‌संग प्रार्थनागर्छु ।&amp;quot;७ यस्तो लामो वेदनापूर्ण कहानी बाबाकां, मैनाको र त्यस छोरीकोसनेपछि शिवलाई लाग्न थाल्छ, सुख र दु:ख जीवनको अंश हो । कहीसुख पाउनलाई दृःख उठाउनु परेको छ भने कही द:खले आफनो परिचयदिलाउन सुखको नाश गर्दै जाँदो रहेछ । यो सखी र यो दुःखी भनेरकसलाई छुट्याउने : कोही धनले खुशी छन्‌ भने मनले दुःखी छन्‌ ।कोही मनले आनन्दित छन्‌ भने धनले दुःखी छन्‌ । म के भनुँ । मदुःखी कि यी बाबा ?&lt;br /&gt;
यिनै कुरा मनमा खेलाउँदै उसलाई एउटा प्रश्न बाबासंग गर्नमनलाग्छ र सोध्छ पनि, “आजभोलि तपाईंले आफूलाई के सोच्नहुन्छ ?&amp;quot; शिवको प्रश्न गराइ थियो “सुखी कि दुःखी&amp;quot;? तर बाबाले हाँस्तैजवाफ दिन्छन्‌, “म केही पनि सोच्तिनँ, सबै परिस्थितिलाई सम्पिदिएको। त्यसले जुन वेला जे गराउँछ त्यही भइदिन्छु । केवल म आफूलाईमानव हुँ भन्ने चिनाउन मानव धर्म छोड्दिनँ । यस मिथ्या सन्सारमाकेलाई मेरो भनेर टाँसी रहूँ । सबै त परिवर्तन शील छन्‌ । तपाईं, मर यो मैना एक अर्काका को हौं ? कसरी एकै ठाउँमा जुट्न पुगेका छौं। कसलाई कसले कुन दृष्टिले हेर्छ, त्यसले त्यसै अनुसारको प्रतिफलपाउँछ । मन, बिचार र व्यवहार नै हो जसले हामीलाई सन्तष्टि दिन्छर सुखदायी बनाउँछ । भलै दुःखका स्रोत पनि यिनै भएका किन नहुन्‌ ?&lt;br /&gt;
९४&lt;br /&gt;
सबैको मल जड हो, आत्मशृद्धि । यस आत्मालाई मानवताकोपरिचय दिन नछोडनोस्‌ ।”&lt;br /&gt;
ति भनेपछि बाबा अरू केही बोल्दैनन्‌ । रात बित्दै जान्छ । सबैसपनाका सन्सारमा घुम्न थाल्छन्‌ । ओलिपल्ट बिहान मैनाले दैलो खोल्दाएक विक्षिप्त अबस्थामा अनहारभरि नीलडाम लिएकी एक अपरिचित नारीसुतिरहेकी देख्छे र “बाबा” भनेर जोडतोडले चिच्याउँछे ।&lt;br /&gt;
मैनाका चिच्याइले त्यो नारी पनि बिउझन्छे र शिव र बाबादुवै आइप॒ग्छन्‌ । शिवले नुरलाई चिन्छ । बाबाले पनि नुरलाई त्यसअवस्थामा प॒गेर आफना ढोकामा आई लम्पसार परेकी देखेर असमञ्जसमापर्छन्‌ । तुरले रुँदै भन्छै, &amp;quot;ए अपरिचित व्यक्ति ज्ञ तपाईंले मलाई मर्नेअधिकार त भन्नभयो, अब मेरो बाँच्ने अधिकार के छ त्या पनिबताइदिनोस्‌ । कि हाम्रो यस्तै ताडना भोग्नै मात्र अधिकार छ भन्नेमान्नु भएको छ : मलाई तपाईंको जवाफ चाहिएको छ ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
“हामीलाई देवकी वनाई हाम्रो भोग गर्दै रमाउने अधिकार कसलेयिनलाई दियो ! तिनैमध्यै एक भौगीलाई समातेर गृहस्थ जीवन बिताउँछुभन्दा मलाई तुच्छ मान्दै पन्छाउने अधिकार त्यसलाई कसले दियौ :भन्नोस्‌ बाबा, तपाईं त ज्ञानी हुनुहुन्छ । म त्यसको यो भारी कहाँ गएरबिसाडै : मलाई यति मात्र बाटो देखाइदिनौस्‌ त यो अत्याचार मसम्मपुगेर त्यहीँ अन्त्य होस्‌ र गर्भका सन्तानलाई आँच पनि नपरोस्‌ ।” करुन्छ र रुँदै आफना पाखुरीका डामहरू देखाउँदै भन्छे, “समाजले तोकेकासन्मार्गमा हामी पनि लाग्न तम्सदा भोग्नुपरेको ताडना यी यस्तो छ ।यो नै गृहस्थ जीवनमा नारीले बेहोर्न पर्ने चलन हो या हामीलाई यस्तास्थितिबाट उब्कन लगाइएको बन्देज हो । म अज्ञानीलाई संझाइदिनोस्‌बाबा ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
नुरका रोदनले पर्रिलएका बाबाले सभ्य भएर जवाफ दिन्छन्‌, &amp;quot;योकुनै पनि होइन । यो सभ्यताको विकासमा उम्रिएको असभ्यताको झयाउहो । यसलाई फौड्न संघर्ष गर्नबाट नहच्क । यसैले अत्याचारको अन्त्य,गराई अधिकार दिनेछ । जति तिम्रा शरीरमा नील डाम लाग्न थाल्छन्‌तिनलाई तिम्रो विजयको छाप भन्ने ठान । तिमीले यस शरीरलाई त्यागीतै सकेकी थियौ भने त्यस्तो त्याज्य शरीरलाई किन .माया गर्दैसुम्समाउँछयौ ! हेर, भगवान्‌ बन्नलाई त्यस ढुङ्गाले छिनाका धुप्रै चोटसहिसकेपछि मात्र त्यसमा आकार आउँछ भने छोरी, तिमीले पान संघर्षगर्नै पर्छ । तसर्थ त्यही घरमा जाक र भन, मलाई तिमीहरूले कसरीनिकाल्न सक्छौ । यो गाउँले थाहा पाएको छ म तिग्रो वंशलाई धारणागर्दै छु । भन, तिमीहरूले मलाई देवकी भन्ने जानेर नै सम्पर्क गन्यौ र&lt;br /&gt;
९&lt;br /&gt;
अहिले कसरी उम्कन सक्छौँ । अनि सुन, तिनीहरूको जवाफ । म तिगैपछि रहनेछु । अहिले माथि आङ, केही छिन आराम गर आनि भतिमीलाई त्यहाँ पन्याइदिन्छु । तिमी मर्न पाउौँदनौ । बाँच र अरूलाईपनि बाँच्न सिकाईंदिने बन ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
नुर यति सुनेपछि भइँबाट जरुक्क उठतै भन्छे, “हामीलाई धौक्रोदिन्छु भनेर झूटो आश्वासन नदिने हो भने म पानि सङ घर्ष गर्नबाटपन्छिन्नै । नैतिक पतनको छाप लगाएर छोडिदिएकाले हाम्रो शक्ति यसैलेखर्लप्प पारेर निलिदिएको छ । नबिर्सिनौस्‌ म यहाँ सहाराको खोजीमाआएकी, तपाईंको विश्वास लिएर फर्कदै छु । एकर्फर घोका पाइसकेकी मबारबार तडपिँदै हिडन नसक्ने भइसकेकी छु ।”&lt;br /&gt;
बाबाले नुरलाई आफनातर्फबाट दिन सब्नेजात सहयोग प॒थ्याउनेविश्वास दिलाउँदै ।वदा गरेपछि शिव माँध्छ, &amp;quot;के नारी विकासको नमुतायही होत ?”&lt;br /&gt;
“यो नम्‌ना होइन, यो त नारीका अवस्था मात्र हो” यत्ति भन्दैबाबा भावविभोर भएर वोल्दै जान्छन्‌, “यस अवस्थासंग सामना गरसुधार ल्याएपछि मात्र यसको नमुना निस्कन्छ । विकासका शुरुलाई नैनमूना मान्न थालियो भने विकास हर्रो भएर निस्कन्छ । मखै बाध्ने टर&lt;br /&gt;
थकथक लाग्नै ।&amp;quot;शिब हाँस्तै भन्छ, “यो मेरा भनाइ व्यड ग्य वियो, सत्यततपाईंले भन्नभएकै हो ।&amp;quot; बाबाले मैनालाई यनाउति खोज्छ । मैना&lt;br /&gt;
त्यहाँबाट वमँचामा फूल, टिप्न प॒गिसकुकी हुन्छे वाद्युकै प॒जाका लागि ।&lt;br /&gt;
घरका सबै परिबार विवाहका निम्तो मान्न गएकाले घर कुर्नेजिम्मा दयामा आइपरेको छ । त्यमैले आज क अफिस गएकी छैन ।मधुरो धृतमा नेपाली गाना कोठामा बाजरहेको छ र क किताव पढ्नमामस्त भएकी छे । उसको रुचि साहित्य अध्ययन गर्नमा झन्‌ झन्‌ बढ्दोछ । लोग्नेसंग भएका विछ्लोडको मर्म यस्तै अध्ययन गरेर र कवितालेखेर बिताउन खोज्दै छै ।&lt;br /&gt;
त्यस घरको शोभा भएका एउटा घरेलु पृत्तकालय छ जहाँ धर्म,विज्ञानदेखि लिएर साहित्य रचनाका विभिन्न किसिमका किताबहरू छन्‌ ।त्यही नै दयाको दिन काट्ने उपाय भएको छ । किताव पढ्दापढ्दै दयाटबक रोकिन्छे र सुन्न याल्छे । तल कमैले ढोका ढक्ढकाएको जस्तोलाग्छ । क त्यहाँ पग्छै र ढोका खोलेपछि देख्छे हलकाराले चिठीबझाउन ल्याएको । चिठी अमेरिकाबाट आएको थियो, उसको नाममाहोइन, दीपेशका नाममा झन्नै तीन महिनापहिले पढाएको ।&lt;br /&gt;
९६&lt;br /&gt;
चिठी बुझेर लिएपाद्ध खोल कि नखोलै भई ओकांइफर्काँईगरिरहन्छ । झवाट्व विचार आउँछ । का दीपेशकी स्वास्नी भएकीहैसियतले त्यो खोल्नसक्नै उसले आधिकार पाएकी छे । सोचाइ गलतथिएन । त्यमले क न्यो खोलेर सरसरी पढ्न वाल्छे । त्यहाँ लेखिएकाखबरहरू पढेर क तीन छक्क पर्छै । बिश्वास गर्न माँग्तनै मनप्यकोव्यवहार पति त्यस्तो हनसक्छ भनेर । दीपशको न्यो सुन्दर चेहराजसलाई उसले आफनो स्मृतिपटमा सजाएर राखेकी छे, छिनैमा त्यो कुरूपभएका पाउँछछे । दयालाई त्यो अनुहार च्यातेर ट्काटुका पारि दिडाँजस्तो लाग्छ । माया छिनैमा घणामा पाररार्तत भएका पाएर क बारबारएकै शव्द दाहोच्याउन बान्छै, &amp;quot;धोका, कत्रो धोका दिएछ ।” क्यासेटमापनि उसका मनको कुरा वझे झै गरी अर्को गानाको धुन बज्न थाल्छ ।दया लम्केर गई त्यसलाई आंल ठूलो स्वरमा बजाउँछ । गानागन्जिरहन्छ “तिम्रो माया कागजको रही चढी फूल जस्तो, तिम्रो मायाश्रावणको भलभन्दा पनि सस्तो... ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
साँच्चै दयाका लागि दीपेशको माया श्रावणको भेलभन्दा पनिसस्तो भएको पाउँछे । त्या झुटा मायामा आफू परेकी सोझिएर दयालाईसिर्कासको लाग्छ त्यसै वेला फार गानातर्फ उसको ध्यान जान्छ । त्यहाँगाना बजिरहेको थियो, &amp;quot;भगवान्‌संग फेरि तिमीलाई माग्ने छैन ।&amp;quot; आफूलेदीपेशलाई पहिलोपल्ट देख्तासको रूपर कुरा गर्ने तरिका देखेर मुग्ध भईभगवानसंग लोग्नेका रूपमा यसैलाई वरणगर्न पाउँ, भनेर मागेकी थिई ।त्यसरी त्यो लोग्ने मागेर आफूले कत्रो भूल गरेकी रहेछु भन्ने सोचेरघुरुधरु रुन्छे ।&lt;br /&gt;
चिठीका भाखाबाट दयाले थाहा पाएकी छे । दीपेशले त्यहींकीविदेशी मिमसंग विवाह गरिसकेको रहेछन र क एउटा छोरी &amp;quot;मेरी&amp;quot; कोबाबु भइसकंको छ । त्यो विदैशी केटी र आफूलाई दिएको घोका सम्झेरदयालाई लाग्छ एउटा चिठी लेख्नेर त्यस मिमका हात पर्नेगरी पठाइदिउँ ।क निणर्य लिन सक्तिनँ र प्रेरणासंग सल्लाह लिने विचार गर्छै । यसरीएक्लै छटपटाइरहेकी अवस्थामा माइतीबाट राधा आइपुग्छ । आमालेउसलाई मनपर्ने भनेर ट्रसा र मासु पकाएर पठाएकी रहिछन्‌ ।&lt;br /&gt;
आफूनी मैयौसंग भेट गर्न पाएकीले राधा खुशी भएकी छे रमैयालाई पनि खुशी पार्न सोच्छे, “ज्वाइँ साहेब, अमेरिका प॒गेको खबरआयो, मैया :”&lt;br /&gt;
दयाले उसका प्रश्नको जबाफ दिन पन्छिदै सोध्छु, &amp;quot;अहिले,आमालाई कस्तो छ : अफिस जान थाल्नुभयो ! अनि बाबा कहिलेफर्कने रे थाहा छ तिमीलाई :&amp;quot;&lt;br /&gt;
९७&lt;br /&gt;
राधाले दयाले गरेको चलाखी थाहा पाउँदिन र आफूले गरेकोप्रश्न नै बिसछि । कं दयाका प्रश्नको जवाफ दिनथाल्छे, “मालिकहरूकोकुरा हामीलाई कहाँ थाहा हुन्छ र : हजरको बिबाह भएपछि त्यो घरयति शन्य भएको छैन । साधना भैया धेरैजस्तो बाहिरै हुनुहुन्छ । साहेबघरमा त्यति बस्नै चाहन हुन्न जस्तो लाग्छ । काहले त साहेवनीले बोल्नेसाधी पनि पाउन हुन्न । म एउटीसंग के कुरा गर्ने कति गर्नु ः&amp;quot;&lt;br /&gt;
राधालाई आमाको एक्लापनावारे सनेपछि दिक्क लाग्छ र मनमनैभन्छे, &amp;quot;क गरहँ आमा, तपाईंहरूले मेरो भविप्य राम्रो होस्‌ भनेर मेरोघर वसोस्‌ भनी विवाह गरेर पठाइदिन्‌ भयो । म यता यस्तो फसादमापरेकी छु भने तपाईं त्यहाँ यसरी एक्लै पर्नभएको छ । बिरामी पर्दाएक्लो हुन्‌ कति गाह्रो हुन्छ ! मेरो हालको क्रा सुन्नुभयो भने आफनीछोरीको भविष्य सम्झेर क गर्न होला : बाबाको नोकरी गएको पीरमाथियौ थपिदा थामैर वस्न सक्नुहुन्छ :&#039; मेरी आमा कै गर्नु तपाईंहरूजस्तैलाई यस्तो दरुःख परीपरी आउँदो रहेछु । अब म तपाईंको एक्लोपनहटाउन सावी बनेर छिटै आउँदै छु । हामी दुई भएर फेरि घरथामौंला ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
आफूसंग कुरा गर्दागर्दै दया त्यसरी टोलाउन लागेकीले राधालेफेरि सोध्छे, “यसो हेदां, मैयालाईं सन्चो छैन जस्ता छ नि, होअनुहार अँध्यारो देख्छु । घरमा पनि छैन जस्तो शृन्य छ । हिंद्दनोस्‌मसंग आज उतै आमाकहाँ जाऔं । यसरी एक्लो यत्रो घरमा कसरीबस्नै&lt;br /&gt;
दयाले यसपटक पनि राधाका कुरालाई हांसेर उडाउँदै विपयबदल्दै भन्छे, “गाना गाउन जादै छ्यौ कि छोड्यौ : कान्छा दाइले पर्दैनभने पनि उसलाई फकाएर हुन्छ या के गरेर हन्छ, आफू इलममालागिसकेको यसै चट्ट नछोडन्‌ । कसलाई के थाहा हुन्छ, कुन वेला कस्तोआपत्ति भोग्नु पर्छ । त्यस बेला मद्दत गर्ने आफनो इलमले मात्र हो,बझयौ कुरा ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
मैयाले वोल्न थालेकाले राधा दङ्ग परेर भन्छै, “के छोड्थें त्यस्तोकाम । भनेजस्तो काम पाएकी छु । कान्छा दाइले पनि मलाई “नजा&amp;quot;न्नुहुन्न । बरु सुन्नौस्‌ न, मैया हिजो उसलाई के जङ चलेछ । घरफकदा मलाई हार्मानियम र आफूलाई तवला किनेर पो आइरहनु भएको। मैले हाँसेर यो कसले बजाउने भन्दा भन्नुभयो, “यो तैँले र यो मैलेबजाउने&amp;quot; भनेर हार्मोनियम र तवला देखाउनु भयो । मैले पनि हाँस्तै भनें&amp;quot;लौ लौ, तबला तपाईं बजाउनु होस्‌, यो हार्मोनियम हाम्रो यो सन्तान&lt;br /&gt;
थ्द&lt;br /&gt;
जन्मेपछि बजाउँछ । मैले कहिले फुर्सत पाएर यो बजाउने भन्दा यतिहाँस्न भएन ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
राधाका कुराबाट क गर्भवती भएकी रहिछ भन्ने बर्झेर दयालैजिस्क्याउँदै भन्छे, &amp;quot;मिठाइ खुवाउनु पलां भनेर हामीलाई आमा बन्नलागेको नबताएकी : कति महिना भयो !&amp;quot;&lt;br /&gt;
“भरखर भरखरै हो । यस्तो करा पनि आफू उत्ताउलेर कसरीप्वाक्क बोलिहाल्नु भनेर नभनेकी । अहिले कुराक्रैमा फुम्कीहालेछ ।&amp;quot; यतिभनेर क लाज मान्दै निहुरिन्छे ।&lt;br /&gt;
“हेर यसले लाज मानेकी : मेरो पनि तिमीलाई लाज लाग्छ :कान्छा दाइसंग भने लाज लागेन मसंग भने यस्तो :”&lt;br /&gt;
“छि, यो मैयाँ पनि । कति मलाई मात्र जिस्क्याउनु हुन्छ .।हजुरको कुरा पनि मैले थाहा पाएकी छु । मालिकनीले भन्दै हुनुहुन्थ्यो,“दुवै जना झण्डै साथसावै जस्तो गरी बस्ने भएछन्‌ । सत्केरी स्याहार्नकसलाई ल्याकैं भनेर पिरोलिदै हुनुहुन्थ्यो ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“आमाको पीरको पनि अन्त्य कहिल्यै हुने भएन&amp;quot; यति भन्दै दयाफेरि गंभीर हुन्छे । उसको चेहरा मलिन भएको देखेर राधालाई व्यधैंबोलेखछ्लु भन्ने लाग्छ । दया मनमनै भन्छे, &amp;quot;हाम्रो विवाहपछिको उपलब्धियही त रहेछ । पहिले समर्पण अनि नानी ।&#039;&amp;quot; &amp;quot;&lt;br /&gt;
दयाका मनमा के कुरा खेलिरहेछु त्यो राधाले कसरी वभीोस्‌ ।कति मात्र थाहा पाई भने आज उसकी मैयाँलाई निकै विरक्त लागेको छ। कुरैपिच्छै चप लागिहाल्न राम्रो लक्षण होइन । त्यसरी हाँस्ने, सबैलाईखुसी पार्न खोज्ने यस मैयालाई के भएको यस्तो ! राधा मनमा यस्तोभावना लिएर दयालाई हेरिरहन्छ ।&lt;br /&gt;
दया पनि राघाको हेराइ देखेर डराउँछ र बलजफत्तीले ओठमाहाँसो ल्याई भन्छे, “के हेरैकी मेरा मुखमा आँखा झिम्काउन बिर्सियौ किकसो ! यसरी मलाई मात्र हेरिरहयो भने मजस्तै दुःखी छोरी पाउली है,याद गरे । तिम्रो त छोरा पाउने रहर छ होला, होइन !&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;हजुरको पनि त यस्तै रहर होला नि ? कसले मात्र आफूनाड्च्छ्याले आफू जस्तै दुःखी जीवन हुने छोरो जन्माउन खोज्छ र ?बाचन्जेल आफू पनि दुःखी हुने आमा बाबुलाई पनि पारै पार्ने हुन्छछोरीको जन्म । कस्तै पढाइ लेखाइ यिनलाई गराए पनि बाआमालाईचित्ताले छोड्दो रहेनछ हजुरकै आमाले साधना मैयाँको बारे पीरगरिरहेको देख्छु ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;त्यो त आमाको बानी नै हो । भाइकै कुरा लिएर पनि चिन्तागरिनै रहनु हुन्छ । अलि केही संझेको जस्तो गरी दयाले भन्छे, “तिमीले&lt;br /&gt;
९९&lt;br /&gt;
मेरा बारेमा अड्कल काटी हाल्यौ र मात्र म सफाइ दिदैछु ! सुन, मछोरा होइन छोरी पाउन चाहन्छु । एउटी यस्ती छोरी जसले आफूलाईउपमा भएर प्रस्तत गर्न सकोस्‌ र यस दुनियाँलाई बताउन सकोस्‌छोरीमा पनि आवश्यक गुणहरू छन्‌ जसले गर्दा क त्याज्य छैन ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
राधाले दयाका भनाइको अर्ध बझदिन र उससंग दया रिसाइन्‌कि भन्ने सोचेर सोध्छे “मैले नचाहिदो तपाईंको चित्त दुख्ने कुरा बोलेकोभए माफ पाउँ । के गर्छ बोल्न थालेपछि म आफूलाई लगाम लगाउनसक्तिनँ । उहीँ गाउँको ठालुकी छोरी संझिहाल्छु&lt;br /&gt;
राधाका नमताले प्रभावित भएकी दयाले उसलाई संझाउँदै भन्छे,“तिमीले त्यस्तो केही भनेकी छैनौ । तिमीले साँचो मात्र बोलेकी छ्यौ ।लोकको सोचाइ नै यस्तो छ । कसैले लुकाउँछन्‌ त कसैले प्रष्ट बताउँछन्‌फरक यति मात्रको हो । म यस लोकका धारणालाई बदल्न चाहन्छु ।.त्यबैले छोरी होस्‌ भनेकी हुँ । म फेरि तिमीले जस्तोगरी आफू छोरीभएर जन्मेकीमा द:ख मान्दिनँ । यही जनिले हो, लोकलाई केही सीर्जनागरी दिनसक्ने । छोड यी करा, यो रुपिया लेक र मेरा तरफबाट केमीठो खान मनलाग्छ किनेर खान । फेरि छोरा त जन्मैला र्‌याले होला,अतृप्त ?”&lt;br /&gt;
राधा त्यहाँबाट बिदा लिएर गएपछि दया फेरि एक्लै हुन्छै रमनमनै वादविवाद गर्दै विवाह मात्र गरेर गएकाहरू घर नफर्केपछिप्रेरणाकहाँ गएर आफना मनको बह खोलेर सल्लाह लिने निश्चय गर्छै ।&lt;br /&gt;
धेरैपटक त्यो चिठी पढ्छे र आफना भ्रमलाई मेट्ने कतै कुनैशब्द छन्‌ कि जसले अर्थको अनर्थ लगाएको छ भनेर हरफ हरफदोहन्याई पढ्छे । आह ज्ञ यदि त्यस्तो भइदिँदो हो त ज्ञ&lt;br /&gt;
मै&lt;br /&gt;
१००&lt;br /&gt;
साधनाले नोकरी गर्न शुरु गरेपछि घरको स्थितिमा धेरै सुधारआएको छ । कान्छा भाइलाई पति हिन्द्स्थानमा पठाएर भए पनि स्तरीयशिक्षा दिनुपर्छ भन्ने सोचाइ शिव र गौरीको नभए पनि साधनालेलिनघालेकी छे । क भन्छे, “थाहा छ मलाई, तपाईंहरूले छोरीको कमाइखर्च गराउँदै भाइलाई पनि पढाउन चाहन हुन्न । तर यो सोचाइ लिएरभाइको भविष्य नबिगारिदिनोस्‌ । जागिरै खान पति जहाँ गए पनिउनीहरूले हेर्ने नै कत्तिको फुर्तिलो छ नहच्की सललल्ल अंग्रेजी बोल्नसक्छ सक्तैन, सामान्य ज्ञान कति छ खेलक्‌द, साहित्य, कलामा कस्तोरुचि राख्छ भन्ने नै हो । त्यसपछि मात्र आउँछ राजनीतिक दलमाकुनमा आस्था छ र कसको छोरो नाति हो, कहाँको जन्म हो इत्यादि ।तसर्थ व्यक्तिमा विशेष गुण ल्याउन भाइलाई बाहिरै पढाउनु पर्छ ।तपाईंलाई मैले बताएकी थिएँ । मेरो अंग्रेजी अलि कम्जोर भएकाले भन्नैनोकरी नदिन आँटेका थिए । मैले म सिक्छु, त्यसो नभन्नोस्‌ भनेपछि केलागेछ अनि मात्र दिए । आफूले भोगिसकेको कुरा जानाजानी आफूनाभाइलाई पनि भौग्न दिऔँ ? तपाईं नै भन्नोस्‌, दाजुभाइले मात्र हामीदिदीबहिनीप्रति खर्च गरे हुन्छ, हामीले हुँदैन भन्ने यस चलनले के हामीदाजभाइ र दिदीबहिनीमा फाटो ल्याउने होइन ? के तपाईं यसको समर्थनगर्नुहुन्छ अहिले दिदीभाइ, दाजुबहिनी बीच मिलाप हुन्‌ जरुरी छ ।&lt;br /&gt;
आमा छोरीकामाझ यस्ता कुरा भइरहन्थे । त्यस दिन पनि कुराचल्दाचल्दै शिव आइपृग्छ र आफनो राय यसरी व्यक्त गर्छ भाषाकाबिकासले देशको उन्नति देखाएको हुन्छ । यही भाषाका माध्यमबाटज्ञानविज्ञानको अध्ययन गर्न सक्छौ । सन्सारमा तीन भाषाले ओगटेकास्थानलाई अझै अर्को कुनले उछिन्त सकेको छ । ती तीनमा पनि पहिलोस्थान अंग्रेजीले नै लिएको लिएकै छ । भारतले अंग्रेजलाई धपाए तरप्रैगेनी भाषालाई धपाउन सकेका छैनन्‌ । आजभोलि यस्ता भाषामान्नेखिएका प॒स्तक आफना भाषामा उदित गरेर पनि राष्ट्रिय भाषामासिकाउन थालिएको छ तर हाम्रा देशलाई त्यस स्थितिमा पुग्न पनि निकै&lt;br /&gt;
१०१&lt;br /&gt;
समय कुर्नपर्छ । वास्तवमा देशलाई विश्वमा परिचय दिने&#039; माध्यम यिनैभापा, कला र साहित्य हुन्‌ ।&lt;br /&gt;
जसले जति भापा जान्दछ त्यति राम्रोसँग आफूलाई विज्ञ बनाउनसकछ तर सत्य यौ पनि छ साघना, लोकले भन्न थालिरहेछ खड्कापरिवार छोरीको कमाइ खान पल्किएको छ । हाइन हामी भन्न पानिसक्तैनौँ तेरै कमाइमा भर गरेर विनोद हिन्दस्थानमा पढ्दै छ । फेरियसलाई पनि कसरी पठाउने : फेरि तेरो यस नाोकरीलाई श्रद्धा दिएरअझै हेर्ने हाम्रो समाजले जानेको छन । एउटा व्यापारीले त मसंग मखैफोरेर पनि भन्यो । त्यस बेला मलाई कस्तो भयो, के भनेँ :”&lt;br /&gt;
“के भन्यो त्यसले : भन्यो होला यात हजार डलर पारगराइदिन लगाइदिनोस्‌, म यति पैसा दिन्छु भनेर या भन्यो होला यतिक्याप्सुल मात्र छन्‌ लिन एयरपोर्टमा आउँछन्‌ दिनलगाइदिन्‌ होला, मतपाईंलाई मालामाल बनाइदिन्छु । यिनले भन्ने र यिनले जानेका व्यापारयत्ति नै हो । यिनले हामी यस पेशामा लागेको छिटै घनी बन्नलाई भन्नेसोचेका छन्‌ । यसैले धनको लोभी हामी जे पनि गर्न तयार हुन्छौं भनेरहामीलाई प्रयोग गर्न विभिन्न- दाउ खेल्छन्‌ । यिनीहरूको सोचाइ नै कतिगरीव छ, बाबा : हाम्रा यस नोकरीमा आदर्शभन्दा बढी अनैतिकता छभन्छन्‌ । हामीलाई कप्तानको दिल बहलाउको माध्यम मानेर हँस्सी ठट्टागर्छन्‌ । देश विदेशमा नोकरीका सिलसिलामा जानुपर्ने हुँदा यात्रीहरूसंगसाँठगाँठ बाँध्छौं भनेर भन्छन्‌ । यी सत्य हुन्‌ त. बाबा ः तपाईंकीछोरीलाई तपाईंले चिन्नुभएकै छ, म के गर्दैछु : यस्ता करालाई लिएरतपाईंहरूले पनि आफनो धारणा बदल्न चाहेको हो भने मैले तपाईंहरूकोममाथिको विश्वास उठेको मान्न करै लाग्छ ः&lt;br /&gt;
यस पेशाको विकात आधृनिक भएकोले यसलाई चिन्न सकिरहेकाछैनन्‌ । यसैले तपाईंहरू दिक्क नभई तितीहरूको पेटको किरा नै मर्नेगरी जवाफ दिने गर्नुभयो भने बाबा, हामीले न्याय पाउछौं । हामीआफ्ना पेशामा निष्ठाकासाथ सफल हुनसक्छ ।”&lt;br /&gt;
“थाहा छ, यी सबै कथित हुन्‌ । त्यही पनि सुन्दा नराम्रो लाग्छर पन्छिने इच्छा भइहाल्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“किन पन्छिन खोजेर तिनीहरूलाई अरू कुरा काट्न प्रोत्साहनदिने : म यस घरको परिवारका हैसियतले टेवा दिन खोजिरहेछु, केतपाईंहरू छोरीलाई छोरी मात्र मान्नुहुन्छ, सन्तान मान्नु हुन्न : छोरीभएर जन्मे भनेर मेरो बाआमामाथि केही कर्तव्य नै ? तपाईंहरूछोरीपरतिको सामाजिक दायित्वको भार बोकेर हामीलाई आशामुखी बनाएरमगन्ते भएको हेर्ने चाहनुहुन्छ : दिदीको विवाह कुन रूपले कसरी भएको&lt;br /&gt;
१०२&lt;br /&gt;
थियो, त्यो मैले देखेकी छु । दिदीलाई दाइजोको अधिकारी मानेर मगन्तेबनाइएको मैले विसँकी छैन, बाबा :ः”&lt;br /&gt;
&amp;quot;ए आमा, तपाईं त भानादिनोस्‌, भाइ मभन्दा मानौ भएकालेउसलाई सहयोग गर्न मेरो कर्तव्य हो भनेर ? दुनियाँको गलत धारणा छुभने त्यो वर्दालदिनोस्‌ त्यसैको पछि लाग्यौं भने हामी के गरी अर्गाडसर्ने : तपाइँहरूको समर्थन हामीलाई चाहिएको छ, आमा । मलाईसन्तानको दायित्व पुरागर्ने दिनोस्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“तलाई समर्थन गरेर नै त आजसम्म तलाई नोकरीमा पठाउदैछौँ । समाजमा बसेपछि कनै करो यसै गर्छु भनेर कम्मर कस्न सकिदोरहेनछ । परम्परा, धर्म, सम्कृति र इतिहासको कम्लो बोकेर आर्धानकपरिप्रेक्षमा मिलजल गर्न खोज्दा कहाँ के भइदिन्छ भन्नै सकिदैन । त्यमैलेआफू हाँत्तोको विषयबाट उम्कन कसो कसो लोकोक्तिको पछि लाग्न मनभडकिहाल्दो रहेछ ।&lt;br /&gt;
आफना चरित्लाई नैतिकताका पर्रिधभित्र राखेर आफनायोग्यताबाट धन कमाउनमा कहिल्यै तिरस्कृत हुनुपर्दैन । तैले नोकरी गर्नजाँदा एक ठोस उद्देश्य लिएर गएकी विइस्‌ । त्यसैले तँलाई कुनै कुरालेपनि पथघ्रम पार्न सक्नैन भन्ने कुरामा म विश्वस्त छु । तेरा बाबा रदाइलाई नैले नाकरीमा प्रवेश गरी धन आर्जन गर्न लागेकामा ठेसलागेको कुरा हो हामी परुपले पो नारीलाई संरक्षण दिनुपर्छ, तिनीहरूबाटलिने होइन भन्ने भावनाले गर्दा र आफू परिवारमा ठूलो र जेठो भएरपनि आफना लक्ष्यका प्राप्तिका लागि एक सानी केटीलाई कमाइमालगाउनु शोषण त हुने होइन भनेर डराएका हुन्‌ । तँलाई सन्तान नैनमानेर भने होइन । यति भन्दै शिवपट्टि फर्केर सोध्छ, “हो कि होइन,लौ भन्नोस्‌ त हजुरले !”&lt;br /&gt;
शिव पनि हांस्तै भन्छन्‌, “एक्लो परेकामा के भनुँ : भएका दुवैछोराहरू यहाँ साथ दिने छैनन्‌ होइन त भन्नै भएन : आमाछ्लोरी साथलागेर भन्दैछौँ ।” :&lt;br /&gt;
&amp;quot;हजुरहरूसंग यसरी कुरा गर्नु मेरो धृष्टता हो । माफ पाउँ ।आवेशमा आई के के भनें के के । धेरैले यस पेशामा लागेका हामीलाईनिस्तत्साही पार्न नानाथरी भनेको सुन्दा दिक्क भइसकेकी मैले तपाईंहरूबाटपति यस्तो सुन्दा आफूलाई नियन्त्रण गर्न सकिनं । हुन त, यस पेशामालागेका सबका सबले संभाव्य विकृतिबाट आफूलाई जोगाउन सकेका छन्‌भनेर पनि म भन्दिनँ । किनकि यस्तो मति भएका व्यक्ति नभएको कुनैपैशा नै छैन । तर कुनै भइदिए रे भनेर यस पेशालाई नै दोष दिन भनेमिल्दैन । असल, खराब, राम्रो, नराम्रो भन्ने व्यक्तिको स्वभाव हो ।&lt;br /&gt;
&amp;quot; १०३&lt;br /&gt;
त्यस्ता व्यक्तिहरू जहाँ जहाँ पुगेका छन्‌, त्यहाँ त्यस्तै हुन्छ । घरमाबसेर गृहस्थ सेवामा लागे पनि यस्ता अनैतिक कामबाट रोकिएको हुदैनँ ।भन्नै नै हो भने यौ हवाइ परिचारिकाको पेशा सेवा हो । त्यहाँ कसैलेपनि यात्रीलाई सेवा पुन्याउने विपयमा वाहेक अरू व्यक्तिगत दबाबदिदैनन्‌ । यस पेशाबारे कसैले केही भने भने म जवाफ मात्र दिएरछोइदिन त्यसलाई अर्थ्याएर यो कं हो भन्ने बझाएर नै छोड्ने गरेकी छुतर यी छोरा र छारी एउटै बाआमाका सन्तान भए पनि यिनीहरूकाकर्नव्यमा रहेको भिन्नता दाजभाइप्रतिको दिदीबहिनीको दायित्वमा फरक जेछ त्यो म स्वीकार्न सक्तिनँ ! त्यसैले भाइलाई पढ्न पठाउँछु भन्दातपाईंहरूले नकारात्मक सङ,केत दिन भएको मानेर मैले आफनो अधिकारसन्तानका हैसियतले मागेकी हँ । यसमा हुन्न भनी भाइका जीवनकोउन्नति नबिगारि दिनौस्‌ । म त्यसलाई डक्टर बनाउन चाहन्छु । मज्येप्ठताका हैसियतले भाइलाई पढाउन चाहन्छु ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
भतिमी छोरीहरू माया, दया र मर्यादाका अधिकारी हौँ, बाहिरक्षेत्रमा उत्रिएर कर्तव्य गर्ने तिमीहरूको अधिकार होइन भन्नै भनाइ मेरोहोइन, समाजको हो । मेरो भनाइ के छु, त्यो आमाले अर्थ्याउलिन्‌उनैसङ सौध, म ,त गएँ” भन्दै घडी हेर्छ र शिव बाहिर निस्कन्छ ।&lt;br /&gt;
आमाले साधतालाई शिबकोा सोचाइ नारीपति राम्रो रहेकाले नैस्वयं उनले र दयाले पनि नोकरी गर्न पाएका हुन्‌ भन्ने जनाउँदै भनिन्‌पढ्न पनि छौरासरह पाएको मख्य कारण वाबाको स्वच्छ विचारघारालेगर्दा नै हो । यदि म नोकर्रामा प्रेश नगरेकी भए तिमीहरूलाई उच्चशिक्षा नदिएको भए अहिले के हुन्थ्यो : नोकरीको भरोसा हुँदो रहेनछ ।&lt;br /&gt;
तसर्थ तैले आफनो व्यक्तित्व विकास गर्दा कसले के भन्छभन्नेतर्फ नलागेर मेरो कर्तव्य के हो र यसका घेराभित्र म कतिचल्मलाउन सक्छु भन्नै सौचाइ राखेर कर्म गर्दै जानु । काममा रहँदाघरको समस्या तेर्स्याएर काम चोर हुने बानी बसाउनतर्फ लागिस्‌ भनेत्यसले तँलाई क्षणिक विजयी बनाउला तर नारी कामदारमाथि लगाउनेगरेका काला धब्बामा अरू रङ थप्ने मौका मात्र तिनले पाउँछन्‌ । हामीलेप्रगतिका पथमा उमरिएका झयाउ र काँडाहरू थप्ने होइन, तिनलाई सफागर्दै जान सकेमा मात्र आउँदा सन्ततिले छिटौ अगाडिबद्न सहयोग पाउनेछन्‌ ।, पुमाणित गर्नुपरेको छ, हामीले अधिकार समाल्त सक्ने रूपलेआफनौ व्यक्तित्व विकास गरिसकेका छौँ । त्यो तैले गरेर देखाउँदै छस्‌पनि । यसतर्फ के कस्तो सहयोग कुन बेला चाहिन्छ त्यो हामीले दिएका&lt;br /&gt;
छौँ र दिन्छौं पनि ।१०४&lt;br /&gt;
सुमार्गमा लागेर छोरीले कमाएको धन परिवारको प्रगतिका लागिलगाउन नहुने होइन, तर यहाँ आएर समाज अल्मलिएको छ केवल एकप्रश्नले । अब के छोरीलाई छोरासरह अभिभारा बोकाउन सकिन्छ त !प्रश्त उठेको छ अभिभारा बोकाउने हो भने समान अंधकार अंशमा पनित दिनुपला : त्यसैले समाज आफूले यममा लालमोहर लगाउन हाच्क्दैयसमा विभिन्न पक्षलाई आफैँले निर्णय गर्न छोडिदिएको छ । याहा छहामीलाई, यता छोरीको कमाइ खानु हुँदैन, छोरीको शोषण गर्नु हुँदैन, यीमाया, दया र मर्यादाका मूर्ति हुन्‌ भन्ने अर्कातर्फ तिनैलाई लकीलकी दहव्यापार गराएर पनि पैसा कमाउन लगाई आफनो जीवननिर्वाह गरेकोसमाज आफनै सदस्यहरूसंग डराई आफैंले बनाएका नियम र चलनलाईराम्रो पर्दाले ढ्वाकेर भित्रभित्रै भत्काइरहेका ट्चुटुल हेरिरहेछु । तीनाशकारकहरू आफूनो बेइज्जत हुने डरले सामुन्ने आउँदैनन्‌ र आफूलाईचोखो, सज्जन प्रमाणित गराउन र समाजलाई अल्मल्याउन अगाडि बढेकातिमीहरूजस्ता शृरवीर नारीहरूलाई आँखा चिम्लेर निन्दा गर्छन्‌ र आफूलेगरेका कामसंग जोड्दै खसाल्न खोज्छन्‌ । यस्तासंग नडराई आफू अगाडिबढ्दै जा, त्यसैमा तेरो मात्र हाइन, नारी जातिकै भलाइ हुन्छ । भाइलाईजे जस्ती बनाउन चाहन्छैस, गर । यसरी परिवारमा एक अर्कालाईसहयोग गर्न सके स्नेहको गाँठो अरु बलियो हुन्छ । तिमीहरूको आपसीस्नेह देखेर हामी शान्तिले जिम्मेवारीबाट पर हुन पाउँछौँ । आखिरहामीले पनि त आफनै लागि बौच्ने समय पाउनुपर्छ । व्यवहारबाट,कर्मबाट र जिम्मेवारीबाट अवकास दिलाई शान्तिले जिउने अधिकारहामीलाई दिने तिमीहरूले हो । यस्तो कर्तव्यपथधको चाल चाल्नैलाई सत्यर इमानलै सहयोग पुन्याएको हुन्छ ।&lt;br /&gt;
आमाको यस्तो ओजस्वी अर्ती सुनेर साधनालाई आफूमाआत्मबलको वृद्धि भएको अनुभूति हुन्छ । छोरीलाई दिनभरको उडानलेथकायो होला भनेर आराम गर्न भनी कोठाको ढोका ढप्काई बाहिरनिस्कन्छे । साधना लुगा फेर्दै आफनो हवाइ परिचारिकाको जीवनकेलाउन वाल्छे । ड्रेसिङ टेबुल अगाडि उभिएर कपाल कोर्छै, अनुहारलाईकपासले पुछेर कोल्ड क्किम लगाउँछै र संझन्छै भोलि डयुटीमा जाँदाउज्ज्याली हुनुपर्छ । केशहरू राम्ररी मिलाएर फूर्तिलो हुनुपर्छ । साधनालाईचिटिक्क परेर हिँड्ने रहर नभए पनि यस नोकरीले प्रभावकारी देखिनु,हँसमुख हुन्‌ र फूर्तीका साथ छरितो भई सेवा गर्नसक्ने हुन्‌ यसकाअनिवार्य गुणहरूलाई मान्नै पर्छ । दुःख, कष्ट, / चिन्ता जस्तामनोभावनालाई थिचैर किचिक्क हांस्नसक्ने हज यसको योग्यता हो । तसर्थउसले आफूलाई यस्ता कुरामा ढाल्नै हुँदा आफना इच्छालाई धेरै&lt;br /&gt;
१०५&lt;br /&gt;
महत्व नदिएर आफूलाई यसमा अभ्यस्त वनाइसकेकी छे । जस्तै बेदनालाईपनि पन्छाएर यात्रीहरूका समक्ष पगी हाँस्तै सोध्नसक्छे, “यहाँलाई कंल्याऔँ, कोल्ड डिङ् किस्की या चिया, कफी :&amp;quot; यस्तै प्रश्न उसलेहनीमून मनाएर फर्कदैका मघलाई पानि सोधेकी थिई । मेघले गौरवकासाथ आफना साथमा वमेकी श्रीमतीलाई देखाएर उसलाई कोल्ड डिङ्‌ रमलाई व्दहिस्की आल स्ट्ड है भन्दा उसले भनेकी थिई &amp;quot;निट नैन्याइदिएकी छु प॒गेन भने वोलाउन होला, यहाँ परिचारिकालाई बोलाउनेकलबेल छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
मेघसंग साधनाको सानैदेखिको सड गत वियो । दुवैले ताथै खेल्दै,पढ्दै, घुम्दै जाँदा जीवनसाथी बन्ने सोचाइमा पु॒न्याइसकेका थिए । जबशिबको नोकरी छुटयो, दयाको बिवाह हुने पक्का भयो र साघनालेघरको आर्थिक स्थितिमा सहयोग गर्ने हवाइ पाँरचारिकाको नोकरी गर्नथाली, त्यस वेलादेखि मेघ साधनादेखि परपर हुनथाल्यो । साधनाले कतिसंझाइ बझाइ गर्दा पनि मेघले आफना मनलाई फर्काउन सकेन । मेघलेप्रप्ट्संग भनिदिएको थियो, “छारीले वावआमाको घर घान्नपर्छ भन्ने छैनत्यो पनि नोकरी गरेर : स्वास्नीमान्छले नोकरी यस्ता ठाउँमा गर्नुपर्छ,जहाँ काम गर्दा इज्जत होस्‌ । तिम्रो अहिले अझैँ पढ्ने उमेर छ, पढ्दैजाक र विवाहँ पछि जे गर्न पर्छ त्यो मेरो जिम्मा हो । पैसा मात्रजोड्न जीवनको लध्व्य होइन र तिम्रा वाको एक ठाउ को नोकरी गयोभनेर आफूले अन्त काम नगर्ने र छोरीलाई यस्ता काममा लगाउनेसोचाइ पनि राम्रो होइन ।”&lt;br /&gt;
मेघको कुरा सुनेर साधनाले भनेकी थिई, “हेर मेघ, मेरोबावलाई तिमीले केही भन्न पाउदैनौं र छोरीको दायित्वबारे पनिविचारमा परिवर्तन ल्याउन सिक । लोकको भनाइ अनसार मात्र आफूलेकर्तव्य गर्दै जाने मेरो सोचाइ छैन । म मानव हूँ मेघ, घरको यस्तोअवस्था हुँदाहुदै म उच्च अध्ययनका लागि विश्वविद्यालय कुन्‌ मनस्थितिलिएर जान सकुँला : हेर, वाब्आमाले हामी छोराछोरीलाई समानरूपलेपढाए र अब्न उनीहरूलाई सहयोग गर्ने वेलामा मात्र यो दाजुभाइकोजिम्मा, मेरो त विवाह गरेर लोग्नेका घरमा गएपछि मात्र जिम्मा हुन्छभन्न सुहाउँछ : मैले कुन्‌ मुखले भनु मलाई एम.ए. सम्म पढाइ दिनोस्‌,लोग्नेका घरलाई राम्रोसंग समाल्त काम लाग्छ भनेर । यस्तो स्वार्थी कामत त्याज्य हुनुपर्छ । केही हामीले पाउन चाहन्छौं भने हामीले दिन पनिसक्नपर्छ ।&lt;br /&gt;
अब रहयो हवाइ परिचारिकाको नोकरीबारे ज्ञ चोरेर, बेइमानीगरेर, देहव्यापार गरेर धन कमाउनु पौ हुँदैन । आफनो खुबी देखाएर&lt;br /&gt;
१०६&lt;br /&gt;
यात्रीसंवा गरेर इमान्दारीपूर्वक आर्जन गरेका श्रमका मोल लिन नहुने केछ &amp;quot; केही क्षण घात्रीहरूका साथमा रहँदा उनीहरूको सेवा गर्दा कस्तोअनर्थ भइहाल्छ : जहाजभित्र सबै आआफूना काममा व्यस्त रहेकै हुन्छौंक्याप्टेन ककपिटमा र हामी केविनमा । कसलाइ फुर्मत हुन्छ नचाहिँदोकाम गरेर त्यत्रा यात्रीहरूको सामुन्ने तमासा देखाउने !&lt;br /&gt;
“ राती होटेलमा रहँदा पनि हाम्मा कोठाहरूको बेग्लाबेग्लै अफिसलेनै व्यवस्था गरिदिएको हुन्छ । हामीले आफैँले नचाहेसम्म कसैसंग पनिकुनै सम्बन्ध राख्नु जरुरी पर्दैन । तपाईंले केवल मेरो चरित्र, मेरोप्रेममाथि विश्वास गर्नोम्‌ । म ही पेशामा रहेर पनि आफूलाईअनैतिकताबाट जोगाउन सक्छु । मैले दाइ फर्केर नआउन्जेल यो नोकरी&#039;छोड्नु हुँदैन ।&lt;br /&gt;
“हेर मेघ, म साधना हुँ, एक व्यक्ति हुँ, मेरो व्यक्तित्वलाई :पेशासंग मिल्लाएर निश्खारै भएर निस्कन देक । हाम्रो प्रेमलाई : जस्तैअवस्थामा पनि बचाएर राख्न म सक्छु, यस नोकरीलाई हाम्रा बीचकोतगारो नबनाईदेक ।&amp;quot; &amp;quot;&lt;br /&gt;
जति साधनाले संझुए पनि, आश्वासन दिए पनि मेघले विभिन्नपरिचारिकाहरूको उपमा दिएर कसले कप्तानसंग प्रेम विवाह गरे रकुनले स्ट्ुबाटसंग र कसले व्यापारीसंग गरे भन्ने बताउँदै कति अबैधओसारपसारमा पक्रिए भन्ने गणना गराउँदै भनेको थियो, “तिम्रो भाबनाउच्च होला । तिमीले आफूलाई आदर्शभित्र नियन्त्रित राखौली । यसपेशालाई श्रद्धाका दृष्टिले हेर्ने बनाउन प्रयास गरौली तर तिमी यसरीरहुन्जेल एउटी योद्धा मात्र हुन्छयौ, विकृतिसंग लड्ने, विकृतिभित्र परेकीएउटी योद्धा । हेर, दलदलबाट निस्कन र त्यहाँबाट निकाल्नलाई पहिलेआफू त्यहाँ पुगेको हुनुपर्छ र म चञ्चल मनका प्रकृतिलाई राम्ररीजान्दछु जुन समय परिस्थिति हेरी परिवर्तन भइरहन्छ ।&lt;br /&gt;
एकफेर यस नोकरीमा पसेपछि यिनीहरूले आफूलाई कुनैअन्तरिक्षबाट अवतारित भएकी सोचेका । प्रशस्त पैसा उमेरमैखेलाउन पाउँदा घमण्डले चुर भएर “826 टेर्दैनन्‌ । समाजले हाम्रोपुरुषत्वलाई -नै आघात पार्ने गरी हामी तिनका सम्बन्धी भएमा परजीवीकारूपमा लिएर भन्छन्‌ । तिम्रा परिवारलाई त्यस्तो केही नलागेको भए पनिम सहन सक्तिनँ । म समाजसुधारक हुन हबाइ परिचारिकासंग विवाहगरेर इज्जत नष्ट गरी बस्न सक्तिनँ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“तपाईँले यस पेशालाई लिएर मलाई खसाल्दै लगैर पातालमापुत्याइ दिनुभयौ तर मलाई एउटा पेशा मात्र बताइदिनोस्‌ जहाँ नारीलेनोकरी गरेकामा निन्दा गर्न छोडेको छ : कुन्‌ नोकरी तपाईंले भनेजस्तो&lt;br /&gt;
१०७&lt;br /&gt;
नारीका लागि इज्जतदार छ, डक्टरी, इन्जिनियरिङ्ग, शिक्षिका हुनु,प्रशासनका क्षेत्रमा या नर्स बनेर सेवा गर्न । यी सबैमा हाकिमसंग यासहकर्मीसंग यस्तै प्रेमकथा जोडिएका हुन्छन्‌ । नारीले बाहिर कर्मक्षेत्रमाउत्रेकामा निरुत्साही पार्न यस्ता कुरा उब्जाइरहन्छन्‌ । नारी र पुरुष साथैरहेर काम गर्दा यस्ता घटनाहरू भइरहन पनि सक्छन्‌ तर यी सबै,उपमा होइनन्‌ । यो व्यक्तिको चाहना हो र आफूलाई म्यादाका घेराभित्रराख्नसक्ने नसक्ने खूबीको कुरा हो । फेरि म दोहोस्याउँछु, यस पेशालेगराएको भने पक्कै होइन । होइन, तिमी उपमा नै बट्ल्न खोज्छौ भनेराम्रो काम गरेर बसेका नारीहरू पनि छन्‌, तिनको उपमा किन दिदैनौ? हेर, म साफलाफ भनिदिन्छु, म यो नोकरी झट्ट छोडन सक्तिनँ रयदि तिमी आफनो धारणा बदल्त सक्नैनौ भने मैले आफनौ जीवनकोबाटी बदल्नुपर्छु । म यस्ता अनैतिक दोष लिएर तपाईंकी त्याज्य पेमिकाहुन्‌भन्दा म नै तपाईंलाई छोडिदिन्छु । प्रेमको अन्तिम लक्ष्य विबाह मात्रपनि होइन । लौ भन्नोस्‌, तपाईं के चाहनुहुन्छ ः&amp;quot;&lt;br /&gt;
साधनाका प्रश्नको जवाफै नदिएर हिडेको मेघले अर्की केटीसंगविवाह गरी उसैलाई ईंखाउन र उसका हातबाट आफनी स्वास्नीलाई सेवादिलाउन क त्यो जहाज छानेर चढेको थियो । यो क्रा बझेर पनिसाधनाले कुनै प्रतिक्रिया नदेखाई ती दुवैलाई चाहेजति र दिन सकेजतिसैवा दिएकी थिइ ।&lt;br /&gt;
क आत्मपरख गर्दै आफैलाई मनको गुनासो सुनाउँछे । कमनसंग सोध्छ, “के म मेघले भनेजस्तो गरी परिवर्तन भएकी छु त !नोकरी शुरु गरेको पनि एक वर्षभन्दा बढी भइसक्यो ।”&amp;quot; मनैले जवाफदिन्छे, “तँ बदलिएकी त छस्‌ नि । त यति ठूलो यति, अटल कहिलेभएकी यिइस्‌ । ? समय र परिस्थितिले तँलाई कति अनुभव दियो भनेआज तँ डटेर नोकरीसम्बन्धी आफनो राय दिनसक्ने भइस्‌ भन्न सक्नेभईस्‌ कर्मचारीको व्यक्तित्व जसले चिनाउने र इज्जत दिने गर्छु । पेशात केवल एक अवसर हो त्यसलाई हामी कसरी प्रयोग गछौं त्यो नैहाम्रो योग्यताको परिचय हो । नारीले आफनौ व्यक्तित्व विकासका लागिर आत्मनिर्भरताका लागि अरूको जे जस्तो भनाइ रहे पनि नोकरी गर्दैजानुपर्छ । नोकरीका प्रदुषणलाई हटाई स्वच्छ वातावरणको सिर्जना गर्नै&lt;br /&gt;
।”&lt;br /&gt;
नयाँ दुलहीका साथमा बसेर व्हिस्की खाँदै गरेका मेघसंगसाधनाले सोध्न चाहेकी थिई, “के तपाईंको परुषार्थको अर्घ यही नै होत? यति मलाई देखाएर तपाईंले के सन्तुष्टि पाउनु भयो ? के आनन्द&lt;br /&gt;
१०८&lt;br /&gt;
पाउनु भयो मलाई ईखाएर ! प्रश्न मनमा उठे पनि जवाफको कल्पनागर्दिन किनकि यति वेला रात निकै : बितिसकेको थियो ।&lt;br /&gt;
साधनाका आँखा झयालमा पर्छन्‌ । खुला झयालबाहिर पूर्णचन्द्रमा चम्किरहेको देख्छे मानौं त्यो आफनो पूर्ण रूपमा भौलिको दिनदेखेर हाँस्तै छ या रुँदै छ ।&lt;br /&gt;
रात छिपिदै गएकाले शान्त र शीतल छ । टाढा कता कताबाटबाँसरीको धुन बजेको सुनिन्छ । कुन विरहीले रात काट्न मुस्किल परेरबाँसरीका घुनसंग आफुलाई शान्त पार्न खोजिरहेको छ भन्ने सोच्रेरसाधना आफूलाई त्यस वादकको मनसग आफूलाई दाँज्दै सृत्ने चेप्टा गर्छे। निकै बेरसम्म छदपद्‌ भइरहन्छ । चाहेर या नचाहेर केले भनँ आजउसलाई मेघको सम्झना खुबै आइरहेछु । उसकी नयाँ दुलहीलाई देखरउसका चाहनाको अड्कल गर्छे । उसका पेशासंग नारीप्रतिको मङ्काचतभावना संझेर उससङका सम्बन्धबाट आफू उम्कन पाएकीमा छ्रुटकाराकोअनुभव गर्दै बिस्तारै निदाउन थाल्छे ।&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
१०९&lt;br /&gt;
घर फर्केर पनि प्रेरणाले बिर्सन सकिरहेकी छैन आफना अफिसकाकुराहरू । क सोच्छे, किन नारीलाई नोकरी गरेर खान अप्द्यारो पार्छन्‌? त्यस शैलीलाई अफिसमा नचाहेका बोझको स्थापना मात्र भएकोजस्तोगरी व्यवहार गर्छन्‌ । पिउनले समेत टेर्दैन । पुरुष जागिरेको त कुरैके गर्ने : सोझै भन्छन्‌, &amp;quot;यी स्वास्नीमान्छे किन जागिर खान आउँछन्‌ ।घरैमा बालबच्चा स्याहारेर बसे भैहाल्थ्यो । यहाँ बसेर पनि अफिसकोभन्दा बढी घरैको चिन्ता लिन्छन्‌ । यस्तालाई हाकिम भनेर कसरी मान्नुसबै काम हामीले नै गरिदिनुपर्छ । तलव सोहोर्न मात्र आएका हुन्छन्‌ यीआइमाईहरू ।&amp;quot; &amp;quot;&lt;br /&gt;
वास्तवमा औौली त्यस्ती छैन । पढाइमा पहिला दोस्रा मात्र भएकीछे । काम पति पन्छाउने उसको स्वभाव छैन । केवल क जवान छे,राम्री छै र साथै कसैसंग पनि झयाम्मिएर गफु मात्र गर्ने प्रवृतिकी छैन। हा हामा पैसा खर्च गर्न अलि हात कमाउँछ । यसलाई गुण भन्ने किदुर्गण : उसको आफनै विवशता पनि त हनसक्छु : यसको अर्थ कसैलेपनि सोचौनन्‌ र भन्छन्‌, &amp;quot;त्यो अति हठी छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
पुरुष जागिरे पनि भगुवा, गफी, कामचोर र पढाइमा डिग्रीप्राप्त गरेका भए पनि काम गराइमा फितलो नहुने होइनन्‌ । तरउनीहरूका यस्ता कम्जोरीहरूलाई उनीहरूको स्वभाव संझैर साधारणमानिन्छन र यस्तामा छुट पनि पाइरहेकै हुन्छन्‌ भने त्यस्तै नारी भएमाक हाँसोमा उडाइन्छे र उसले छेडछाड निकै सहतनुपर्छ । नारीकोस्वामित्व हतपती स्वीकार्न चाहँदैनन्‌ कित ! किनभने क अल्पमतमा छै,भरखर घिस्त्रन थालेकी छै । सामाजिक स्थिति र भावनामा परिवर्तनल्याउन अगाडि बढ्दै छे । पिउनदेखि हाकिमसम्म ज्यादा परुष कामदारछन्‌ । पुरुषका नाताले उनीहरू एक हुन्छन्‌ तर नारी जागिरदार त्यहाँकागका हृलमा बकुल्ला भएकी हुन्छे ।&lt;br /&gt;
क संझन्छे, शैलीले नानीका निम्ति दुध किन्न पठाएका बेलामापिउनले बोलेको भाषा र त्यस्तै एउटा पुरुष कामदारले रक्सी किनेर ल्याभनेर पठाउँदा रमाउँदै गएको । उसका मनले भन्छ, यस्तो मनस्थितिरहेकाहरूसंग जुधेर कर्मक्षेत्रमा उत्रिन पर्दा निश्चय नै हामीले आफनो&lt;br /&gt;
११०&lt;br /&gt;
स्वभावलाई बदल्नु पर्छ र उनीहरूभन्दा बढी मेहनती र सुयोग्य हुनैकोशिस हामीले गर्नपर्छ । यस्तो प्रतिस्पद्धात्मक स्थितिमा रहेर हामीले कामगर्नपर्ने हुँदा र नारी जातिलाई कृर्सीमा स्थापित गराउनु पर्ने आवश्यकतापरेकाले हामीहरू जो अहिले अगुवाका रूपमा रहेका छौँ कार्यक्षेत्रभित्रचल्दा आफूलाई निष्ठावान्‌ बनाई अनुशासित हुन्‌ अत्यावश्यक छ, नत्रनारीलाई कर्मक्षेत्रमा भित्रिएर सफल हुन यगौं कुर्न पर्नेहन्छ । अयोग्यमादर्ता आई नोकरीमा भर्नै नलिने पनि हुनसक्छ ।&lt;br /&gt;
प्रेरणा संफन घाल्छे मीरालाई, उसको बानी अफिसमा वसेरस्वेटर बनिरहने छ । आफ्नो खुबी र रुचि बुन्ने काममा रहेको देखाउँदैअर्की महिलालाई भनिरहेकी हुन्छे, &amp;quot;यो बट्टा कस्तो माग्यो &#039; मैलेअमेरिकामा श्रीमानसंग जाँदा जहाजमा एउटाले यस्तै बट्टाको स्वेटरलगाएको देखेर टिपेकी । यो कति सजिलो छ तैपनि हामीले पहिलेआफैले यस्तो बुट्टा कादन किन नजानेका ! साँचै हामी सोच्नै सम्तैनौंक्यारै । देखेपछि मात्र बृद्धि आउने । त्यसैले पति हो हामी जै कुरामापनि पिर्छड्िएका ।”&lt;br /&gt;
प्रेरणाले मीराका यस्ता कुरा सनेर आफूलाई थाम्नै नसकी त्यहीपुगेर भनेकी थिई, “हो हामी त्यस्तै छौँ । घर र अफिस कुन हो, कहाँहाम्रो कस्तो जिम्मा छ त्यति पनि सोच्ने कष्ट नगरी नारी जागिरदारकोखिल्ली उडाउने मौका दिइरहेका हुन्छौं । अमेरिकासम्म पुगेर त्यहाँनारीहरूले पनि अफिसमा डटैर कसरी काम गर्दा रहेछन्‌ भन्ने, सिकेरआएकी भए र यहाँ आई आफना साथीहरूलाई बताएकी भए एक चालप्रगतितर्फ बढ्ने थियो कि ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
प्रेरणाको पेचिलो भनाइ सुनेर मीराले भनेकी थिई, “नारी भएरतपाईँ पति खाली हामीलाई मात्र संघ्रै गाली गरिरहनु हुन्छु । क त्यतापनि हेर्नौस्‌ न, उनीहरू त्यप्त वेलादेखि चुरोट फुक्तै नयाँ सडकदेखिसिनेमाको हिरोहिरोइन, संसददेखि मन्त्रीहरूसम्म, राजनीति पार्टदिखिराजासम्मका गफ हाँकेर बसिरहेका छन्‌ त्यस्तालाई केही भन्नुहुन्न ।खाली हामीलाई मात्र साथी साथी मिलेर केही कुरा गर्न लाग्यो कि केकै न बिराएका छौं जस्तौगरी हपारिहाल्नु हुन्छ । हामीले त जस्तो भएपनि उपयौगी काम अफिसको काम सिद्धाएपछि गरेका छौँ । तिनीहरूलेजस्तोगरी फाल्त्‌ गफ गर्दै काम थपारेर समय बिताएका त छैनौं ।त्यसैले हामीले मागेका हौं, हाम्रो यहाँ पनि युनियन हुनुपर्छ । यस्तोअन्याय त सहनु पर्दैन ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
अफिसमा यस्तो काम नगर भन्दा अन्याय हुन्छ भने म अन्यायीहुन पनि तयार छु । अर्काले यसो गर्न हुने, हामीले नहुने भनेर सिक्ने नै&lt;br /&gt;
१११&lt;br /&gt;
हो भने क त्यता पनि हेर उनीहरू कति व्यरत छन्‌ भनेर देखाउँदै आफूफर्केकी मात्र के थिई, एउटीले भनेको हुन्छे, “पहिले यही ठाउँमालोग्नेमान्छे हाकिम थियौ । उसले कहिल्यै हामीलाई यस्तो भनेन । सुइटरबुनेको देखे भने त्यो नदेखेको जस्तोगरी आफै जान्थे । यसलाई जस्तोठूली कसैलाई हुनपर्दैनक ।&amp;quot; अर्कीले त्यसमा थपेकी थिई, “कसैले मनपराए पो त कुरा गरेर बस्थी । यस्ती ठाडी छै । घरको इलम केहीआउँदैन, अर्काले गरेको पनि सहँदिन । यसले लोग्नेलाई घरमा के गर्दीहो ? विचरा लोग्ने !”&lt;br /&gt;
प्रेरनालाई यस संझनाले हँसाउँछ र आफैँसंग भन्छे, “हो,स्वास्नीमान्छे नै स्वास्नीमान्छेका अवरोध हुन्छन्‌ । म तिनीहरूलाईस्वास्नीमान्छेको प्रगतिको अवरोध संभझन्छु जसले गर्दा नारी जातिलाईनालायक घोषित गर्न प्रमाण बनिदिएको छ र त्यस्तै म उनीहरूकोबाधक भएकी छु किनकि म उनीहरूलाई होसियार रहन खवरदारी गर्दै छु। मेरो खबरदारीले पछाडि ताँती लागैर बसेकाहरूलाई अगाडि सर्ने बाटोदिन्छ भनै नारी जाति काम नलाग्ने प्रमाण बट्ल्नेहरूलाई तिनीहरूकायस्ता कर्मले सहयोग गर्ने हुँदा कसैले केही बोल्दैनन्‌, रोक्न चाहदैनन्‌हेरिरहन्छन्‌, हाँसोमा उडाइरहन्छन्‌ र बेलामा औंल्याएर भन्छन्‌ पनि ,“&amp;quot;स्वास्नीमान्छे जागिरेले सात घण्टाको डयुटीमा तीन घण्टा पनि कामगर्छन्‌, गर्दैनन्‌ बहाना बनाएर गइहाल्छन्‌ । यिनले त अरू कामदारलाईभाँड्ने मात्र गर्छन्‌ । क हेर्नोस्‌, त्यो नानी बिरामी छ भनेर गई कत्यो सासुले आइज भनेकी छ, गईन भने मार्छै भनेर अगिनै गइसकीइत्यादि ।&lt;br /&gt;
प्रेणा यी सब संझैर छटपटाउँछै र अठोट गर्छ, म यसकोविरोध गर्न छोड्दिन । यसले गर्दा राम्रो जिम्मा लिएर काम गर्ने नारीहरूपनि बदनाम भएका छन्‌ र आउनेलाई पनि हाँसो भएको छ । संझाउदैजान्छु अफिसमा रहँदा जागिरदार भएर बस्नुपर्छ । हाम्रो समय पैसा दिएरअफिसले किनेको हुन्छ । स्वास्नीमान्छेको परिचय दिने ठाउँ अफिस होइन। यहाँ कुर्सीमा भेदभाव रहन नदिन व्यवहार ठीक राछ््ने उपाय हामीनारी आफैंले गर्नुपर्छ । समानता खोज्छौ भने समान हुनसक्छौँ भनेर पनिदेखाउनसक्ने हुनुपर्छ ।”&lt;br /&gt;
“कस्तो गहिरो सोचाइमा डुबेकी हुँ ? म आएर यहाँ उभिएकोउभिएकै छु, कहिले आँखा पर्ला भनेर कुर्दाकुदै आफैले भन्नुपत्यो । मआएकी छु भनेर । हेर, कुन बेलादेखि पस चियाले पनि तँलाई ताकेरसैलाइसकेछ ।&amp;quot; दया यति भनेर हाँस्तै उसैका छेउमा गएर बस्छै । उसकाहँसाइले पेरणालाई केही शान्ति दिन्छ र सोध्छ, &amp;quot; खुव दङ्गदास देखिन्छेस्‌,&lt;br /&gt;
११२:&lt;br /&gt;
के खवर छ त्यस्तो ? अमेरिकाबाट ट्ड्ल आयो कि चिठ्ठी : श्रीमान्‌कहिले फर्कते र ? यति वघोरै दिन लोग्ने साथमा नहुँदा पनि तैरौहोस्‌हवास उाडसक्यो जस्तो छ । तिमीह्ठका मायाले परेवाका जोडीलाईपनि मात गरिदिन्छु कि कसो ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ए हो त्यस्ती देखिएछु ! कहिलेकाही मलाई के हन्छ कं. यसैयसै के के सोच्न थाल्छु । अतन्तृष्ट छु क्या रे म आफू आफैँसंग ।बिद्रोह गर्न मन लाग्छ आफनै नारी कम्जोरी संग, दया, म अधुरो छ्नु ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“एउटा स्थापित परिबार आफनै भएकी तँ आफूलाई अघूरोमान्छेस्‌ भने मैले आफूलाई के संझू्‌ : तेरो हाम्रो संफझाइले कसैलाई केहीअसर पार्दैन । जीवनको गति आफनै प्रकारले चलिरहन्छ । हामी मात्रयसै चिन्तित भइरहेका हुन्छौं ।&lt;br /&gt;
“जीवनको प्रबाहसंग मिलेर चल्न नसक्नाले त म असन्तृष्ट0010 474 मान्छु । अशान्त छु म, दया लाग्छ, कहिले म आफनोनारी निकालेर विध्वंस गरी शान्ति ल्याउनपट्टि लाग ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
दया हाँस्तै भन्छै, “तर मलाई थाहा छ, त॑ त्यसो गर्नसक्तिनस्‌ । त॑ निरन्तरतामा विश्वास गर्छेस्‌ र तैमा पघैर्यको मात्रा धेरैच्या ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“अनि” &amp;quot;अनि के तँ मात्र होइन, तेरी साथी म पनि फुटेरबाहिर निस्कन सक्तिनँ । हामीमा सङ कोच छ, समाजसंग डर छ ।हामी इज्जत चाहन्छौ, प्रशम्सा सन्न मन पराउँछौं । त्यमैले हामीविद्रोहको कल्पना मात्र गर्न सक्छौं, साक्षात्कारमा उत्रन सक्नैनौं । यस्तोआँट बटुल्ने हो भने हामीले धेरै कुरा त्याग्नसक्ने हुनुपर्छ जन हामी गर्नसक्तैनौं । हामी मोहमा भूलेका छौं ।”&lt;br /&gt;
“कस्तो मोहको कुरा भनेकी ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
“यही सान्सारिक मोह ।” यति भनेर एक छिन अड्छै रप्रेरणाको अनुहार हेर्छ । क छक्क परेकी देखेर भन्छे, “तेरो र मेरोबीचको यस दोस्तीको मोह कमको छ र ! तेरो र मेरो, छोरीकाबीचको स्नेहलाई के भन्छेस्‌ : त्यस्तै तेरो र मेरो लोग्नेका बीचकोप्रैमलाई त्याग्न सक्छेस्‌ ? यस्तै असमर्थत। ल्याउने नै मोह हो ।&lt;br /&gt;
भ्म त यसले के के न भन्न लागी भनेकी त यसै फिस्स पारेरछोडी ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“यसरी मैले बेला बेलामा तँलाई धेचारिन भने त॑ त उडेको उडैहुन्छेस्‌ अनि चिया त के म पनि तेराअगाडि ठण्डा भइसकेकी हुन्छु ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
दुवै दङ्ग पर्छन्‌ र अर्को एक कम तातो चिया खाउने इच्छाराख्नै प्रेरणाले हरिलाई बोलाउँछै । केही छिनका लागि कोठा फेरि शान्त&lt;br /&gt;
११३&lt;br /&gt;
हुन्छ्‌ । दयाले सरसरी अखवार पढ्न थाल्छे र प्रेरणा आफूले फेरेकोसारी पट्याउन थाल्छै । यतिकैमा इला आइप॒ग्छे र बाहिर खेल्न जानआमासंग अनुमति माग्दै लाडिन थाल्छे ।&lt;br /&gt;
रात पर्ने वेला हुन लागेकाले चिया ल्याएपछि हरिको साथ खेल्नजाने क्रा सम्झाउँदै छोरीलाई फकाउँछै । दयाले प्रेरणाको ध्यान खिच्तैभन्छे, “यहाँ यस्तो के उल्का हुँदै छ ! हरेक दिन मान्छे हराएकोछापिएको हुन्छ । कहाँ जान्छन्‌ यी ? कसले कता लगिरहेछ !बालकबालिका, बृढाबृढी सबै उमेरका हराउन थालिरहेछन्‌ । तिनीहरूफेला पर्छन्‌ या हराएको हराएकै हुन्छन्‌ । त्यसतर्फ सरकारको ध्यानगएको छैन जस्तो लाग्छ । अहिले कति वर्ष भइसक्यो यसरी हराउनथालेको : यसको कारण के त भन्नै अभैँ पत्ता लगाएर जनचेतनाल्याउन सकेको छैन । यस अपराधबारे पनि खोजी हुनुपर्ने होइन ?”&lt;br /&gt;
“हुनु त पर्ने हो नि ? आफै भागेका भए पनि किन र कसरीभन्ने प्रश्न हुनसक्छ या कसैले लैजाने गरेको भए पनि किन र कहाँभन्ने त हुनु पर्ने हो । यसैले त मलाई साँझबिहान इलालाई एक्लै खेल्नपठाउन डर लाग्छ । हराई भने आफनो त बितेको बितेकै हुन्छ ?”&lt;br /&gt;
“उहिलेउहिले नेपालमा यस्तो कुरा पटक्कै सुनिन्नथ्यो, अहिले तयस्तो विकृति दिनदिनै बढ्दो छ । अरू त के, घर्म रै सम्प्रदायको अहंपनि फाटफुदट सुनिन वालिदै छ । हामीलाई नेपालमा एकताको जरूरतछ तर यहाँ भने यस्तो दङ्गाफसाद भित्र्याएर फूट ल्याउने तत्वहरूलेप्रश्नय पाउँदै छन्‌ । यसको नतिजा के हुने हो : राम्रो त अवश्य हुँदैनहोला&amp;quot; भन्दै दया खिन्न हुन्छे ।&lt;br /&gt;
यही हो स्वतन्त्रताप्रतिको गलत धारणा । यसले दवाइ दिन्छ किभनेर बचाउका लागि जमातको सिर्जना गर्न थालेको । यसलाई हामीलेविकास मान्ने कि फेरि फर्केर उही जातीय व्यवस्थाको आधिपत्यमा जानलागेको भन्ने । अहिले जुन किसिमले यो बढ्दै छ, यसले कुनै वेला पनिएक समूहको अर्को समूहसंग लडाईं गराउँछ । यसरी त हामीलेझगडाको बीउ रोप्तै छौं ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“त्यही त दःखको करा छ । मानव सभ्यताको यत्रो विकासभइसकेर पनि यो के देखा पर्दै छ ? के यो शक्ति र घमण्डको प्रदर्शनमात्र हो ? मानवधर्म, मानवता चिनाउने &#039; कँयौं संघ संस्थाहरू खोलिएकाछन्‌ तर यहाँ जानेका कर्महरू पनि त्यही रूपले बिर्सदैछन्‌ । बरु यस्तासमुह खौलिनुभन्दा पेशागत समूह खुल्दै गएका भए विकास हुने थियो&lt;br /&gt;
११४&lt;br /&gt;
“विकासको के कुरा गर्छेस्‌ त॑ ? हामी त अभौ विकासको रेखाछुने ठाउँमा पनि पुगेका छैनौं । त्यसैले हामीलाई अग्रेजीमा &amp;quot;अण्डरडिभेलोपिङ कन्ट्री” भन्छन्‌, डिभेलोपिङ पनि हाइन यानै यहाँ विकासकोपुर्वाधार नै अझ बन्न सकेका छैन ।&lt;br /&gt;
&amp;quot;हामी जतिसकै पढे लेखेका भए पनि हाम्रो भावना र सोचाइस्वार्चिपनाबाट पर हुनसकेका छैनन्‌ हामीले हामीजस्तै अर्का व्यक्तिको पनिउस्तै चाहना र जरूरत हुन्छ भन्ने बफन सकेका छैनौं । तसर्थ हामीअर्काका लागि र देशका लागि केही गर्न सक्तैनौं । देश कसको हाभनेर सोधियो भने नारावाजीले सिकाएको हुनाले फयाट भन्छौं, &amp;quot;हाम्रोहो” तर त्यसमा साधारण प्रश्न कसरी र किन भनेर मात्र सोधियो भनेपनि हामी अल्मलिन्छौं, थाहा पाउदैनौं किर्नकि हामीले त्यो बझने कोशिसनै गरेका छैनौं र त्यसतर्फ भावना जागृत गराउने अवसर पनि पाएकाछैनौ । देशको व्यवस्था एकातिर छ, हामी अर्कातिर छौं । हामी आफ्नैध्ननमा छौं, देशको व्यवस्वा आफनै पाराले कसको स्वार्थको लागि चल्दैछ,त्यो थाहा छैन ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
प्रेरणाको आजको उदासीपन दयासंगका वार्ताले झन्‌ प्रज्ज्वलभएको छ । क भन्छे, &amp;quot;हुन त स्वार्थमा नै देशर्भक्त, देशप्रेम, राष्ट्रियताटिकेको हुन्छ तर त्यस्तो स्वार्थ हामीले कहाँ फैलाउन सकेका छौँ ! यहाँत पढेलेखका, विद्वान्‌ कहलाएका व्यक्तिहरूले समेत स्वास्नीमाथि स्वार्थीपनाराखेर व्यवहार गर्ने गर्छन्‌ । भाषण दिन्छन्‌, नारी स्वतन्त्रता दिनुपर्छ भनेरअनि घरमा आएर तिनैले स्वास्नीलाई भन्छन्‌, “त्यस्ता नारी जागृतिहामीलाई चाहिएको छैन । हाम्रो घर, हाम्रा समाजमा भाँडभैलो हुनदिदैनौं । धेरै तिमीहरू चम्कने होइन । आफनो संस्कृति, परम्पराछोड्नयाले दु:ख पाइएला ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
दयाले पनि यसको समर्थन गर्दै भन्छे, &amp;quot;हो, त्यसो त भन्ने गर्छन्‌। तर यस्तो बोल्नेको संख्या घदतै जानुलाई पनि विकास मान्नु पर्छ ।फवाट्दै परिवर्तन ल्याउने हो भने आन्दोलन गर्न पर्दछ र आन्दोलन सबैक्षेत्रमा गर्दै जानु पनि उचित हुदैन ।” दया अलिकति आफूलाई आशावादीबनाउँछे र पेरणाले यसमा समर्थन गर्दिन र भन्छे, “पर्खने :कतिसम्म : &amp;quot;&lt;br /&gt;
दया छक्क पर्छै । प्रेरणाले गरेका कुरा सुनेर भन्छे, “किन पर्खनुपर्छु&amp;quot; भने आन्दोलन र क्रान्तिले धेरैको ज्यान लिन्छ, कति सुधार यस्ताहुन्छन्‌ जसलाई देशका कानुनले बदल्न सक्छ, त्यस्तै कति यस्ता छन्‌जसलाई व्यवहारले परिवर्तन गर्न सकिन्छ, संमफझदारीले हल गर्न सकिन्छ। आन्दोलनलाई केटाकेटीका हातमा भरेको बन्दुक दिएसरह दिनु हुँदैन ।&lt;br /&gt;
१११&lt;br /&gt;
आन्दोलन मच्चाउनु अन्तिम निर्णय हो ब्रम्हास्व जस्तै र यसको प्रयोगभीषण सङ,कट आइपर्दा मात्र गर्नुपर्छ ।”&lt;br /&gt;
“मलाई थाहा छ तँ विद्रोह चाहन्नस्‌ &amp;quot;भन्ने त्यस्तै म पनि घैर्यधारण गर्ने सक्तिनँ त॑ दया होस्‌ र म पेरणा । &amp;quot;प्रेरणाले दयासंगकोबहस यसरी ट्ङग्याउन खोज्छ तर दयाले कुरा उठाउँदै भन्छे, “त्यसोभन्छेस्‌ भने एकफेर हामी आपसमा आफना धारणा साँटेर यस समस्यालाईनिराकरण गरौं न त भनेर दीपेशको अमेरीकाबाट आएको चिठी पढ्नदिन्छे, प्रेरणा खरखरी पढ्न थाल्छे । दयाले उसका चेहरामा कस्तोपरिवर्तन देखापर्छ त्यो हेर्न थाल्छै । चिठी प्रा पढी सकेपछि प्रेरणालेत्यो दयालाई फर्काउँदै भन्छे, “जीवन छोटो नाटक त होइन, के संझैकाछन्‌ यिनीहरूले : कै उसका घरका परिवारलाई पनि यो सब याहाछ?”&lt;br /&gt;
&amp;quot;याहा होला नि । आफना छोराको करो पनि थाहा नपाउनेहुन्छ र ?”&lt;br /&gt;
“त्यसो नभन्‌ दया, थाहा नभएको पनि हुनसक्छ । नत्र कसरीतँसंग विवाह गराउँथे । विवाहमा ती कति खसी थिए । त्यो दीपेश पनितँलाई हेरेर आएका दिन यति खुसी भएको थिएन, मैले कति जिस्क्याएँ ।षदि यो कुरा वाहा थियो भने त्यस्तो खुसी आउनै सक्तैन ।&lt;br /&gt;
&#039;थाहा छ । यी सबै करा थाहा छ । यिनीहरूले कत्ति करा देख्नेनदेखेको जस्तो गरेर व्यवहार गर्नसक्छन्‌ । यिनीहरूलाई नेपाली बहारीआफनै जातको वंश धघाम्नै, पिण्ड दिने नेपालमा चाहिएको थियो ।त्यसैको लागि व्यवस्था मिलाएका हुन्‌ ।&lt;br /&gt;
यिनीहरूका घरको अर्को कुरा पनि तँलाई थाहा छैन होला ।सुन, मेरो देवर लागू पदार्थको सेवन गर्नुहुँदो रहेछ । मैले त्यो छ 2धाहा पाएर खुव संझाउँदै गाली गरेँ र सास्‌ससरालाई पनि सुनाएँ । जरोउनीहरूलाई देवरको बारे सुनाउनुको अर्ध थियो उहाँहरूले पनि देवरमधिनिगरानी राखन्‌ र यस लतबाट छुटाकन्‌ तर अचम्म ज्ञ त्यहाँ कसैलेपनि यसमा चासो राखेनन्‌ । मलाई नै त्यसपछि किन सुनाउन गएँछुभन्ने लाग्यौ र म आफैँले देवरलाई जे जसो भन्नु छ भन्न थालेँ ।एकफेर त देवर नै धरस्धरु हँदै भन्नभ्यो, “तपाईं किन पहिले नै यसघरमा आउन भएन : सायद म यस स्थितिमा पग्नै थिइनँ ॥।&#039; आहिले मन त छोड्न सक्छु, न त खानलाई नै पैसा जटाउन सक्छु । कहिले तएक सरको तान्त नपाई थरथर काँप्न थाल्दा आमाको होस्‌ या तपाईंकैघाँटीमा लगाएको तिलहरी छिनालेर लैजाङै र एक छिनलाई आनन्दितभई डङ रङ ङ लडिदिकँ जस्तो लाग्छ । के छ यस संसारमा : सबका&lt;br /&gt;
११६&lt;br /&gt;
सब मजस्तै भएर नशामा हराइरहेका छन्‌ । जागिरदार जागिरका नशाम्रा,नेताहरू राजनीतिका, व्यापारी नाफाका, उद्योगपति धन्धाका,धर्मावलम्बीहरू धर्मका र प्रेमीहरू प्रेमको नशामा त छन्‌ । माया जालहो यो संसार । नशाले लरखराएका छौं हामी सबै, । तपाईं पनि त्योचिप्ले दाजुका प्रेममा हराइरहनः भएको छ, मेजस्तै भएर । हो कि होइन,लौ भन्नोस्‌ त ?” त्यसो भनेको सुनेर म के भाएँहुँला लौ भन्‌ त ?उसले किन दीपेशलाई चिप्ले भन्यो : उसको स्वभाव थाहा रहेछ भनेरके म लख नकाटूँ त ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;खै के भन्ने ? नहुनु पर्ने कुरो तँमाथि भडहालेछ । अब हामीलेखुब सावधानीसंग व्यवहार गर्दै जानुपर्छ । यो करा तैले आफूताबाआमालाई भन्छेस्‌ ? वरु यी सासृससुरालाई पनि दीपेशको त्यो मिमसंगरहेको सम्बन्ध र दीपेश बाबु भईसकेको तिमीले थाहा पाइसके कीछयौभन्ने नबताक । उनीहरूको नाटकीय खुबी हेर्दा तँलाई समय काटनसजिलो हुनेछ र मलाई विश्वास छ एक दिन दीपेश आफैँले यो कुरातौसंग ओकल्छ । त्यस वेला तेरो विजय हृनेछ र दीपेश तँसंग झुक्नेछ। सत्य कुरा लुकाएर लुक्छ र ! तैँले दीपेशलाई लेख्तै रहन्‌ कहिलेतँलाई बोलाउने भनेर । यो पनि बताइ दिए, त॑ आमा हुने भएकी छेस्‌ ।अब प्रेमको कुरा त, यो लेख उ लेख भनेर भनुँ त्यो त॑ आफैँ जान्ने नैछस्‌ । यति मात्र म भन्छु, प्रेम घृणामा बदलिसकेको भए पनि उसलाईसजाय औओगाउनलाई नै भनेर पनि प्रेमको भाषालाई जीवित राखेस्‌ ।”&lt;br /&gt;
&amp;quot;म त्यसका स्वास्नीलाई मसंग त्यसले विवाह गरेको खवरपठाउँछु भनेर तँसंग राय लिन आएकी त त॑ यस्तो सल्लाह पो दिन्छैस्‌। मलाई समय काट्न तिनीहरूको नाटक किन हेर्नुपर्छ : ती घिनौलाचाललाई म कसरी हेरेर नहासखु ? मैले त सौचिरहेकी छु यो छोटोदाम्पत्य जविनका उपलब्धिलाई यस घरको अन्तिम चिनो मानेरछोडिदिउँ । यो दाम्पत्य जीवन के रहेछ त्यो पनि त बिनै हाले ।अब पनि केका लागि बेइज्जत सहेर बस्ने ? के पाउनका लागि : केवलउनीहरूको नाटक हेर्न या उनीहरूलाई मानसिक ताडना दिन मेरोउपस्थिति त्यहाँ रहिरहन दिनै ?&lt;br /&gt;
यसले उनीहरूलाई केही पनि गर्दैन । यसरी छक्याएर विवाहगराइदिनु नै भूल हो भन्ने लागेको छैन भने पछ्नुताउ किन हुन्छ :ःदीपेशले पनि सोचेको होला नेपालको कानुन अनुसार एउटैसंग विवाहभएको छ र त्यहाँ ? घरदैखि टाढा हुँदा दिलबहलाउ गर्ने एउटा उपायमात्र । हामी दुवैले धोका पाएका छौँ । &amp;quot;दयाले पटद्ट यति उत्तेजितभएर भन्छे ।&lt;br /&gt;
११७&lt;br /&gt;
&amp;quot;अहिले तेरो मनस्थिति कावमा छैन । त्यसैले केही दिन शान्तमनले सोच र फेरि हामी दुई भएर कुनै निर्क्यौल गरौंला । दलदलमापरिसकेपछि त्यहाँबाट उम्कदा पनि फेरि कुनै आपत्‌ नआइपरोस्‌ भनेरसोचेर मात्र काम गर्नपर्छ । यहाँको कानुन तँलाई थाहा छ, नानी ठूलोभएपछि त्यसमाथि बाबको हक लाग्छ, आमाको हुँदैन । त॑ त जन्माएरहुर्काउने मात्र होस्‌ अनि नानी उसलाई सुम्पेर बङ्गो हुनबाहेक केही उपायअर्को लाग्दैन । त्यस बखत नानीका प्रेमले तँलाई के के बनाएर छोड्छ,त्यो तलाई थाहा छैन । )&lt;br /&gt;
अर्को कुरा, यति सजिलोसंग सन्तान उसलाई दिने र आफनोसम्बन्ध उनीहरूकंगको छोड्ने गच्यो भने यसको बढी दृःख तँलाई हुन्छ,उनीहरूलाई होइन । हाम्रा देशको नारीप्रतिको व्यवस्था यस्तै छ । यसलाईसंरक्षण दिएको भन्ने कि यातना : त्यसैले यदि तिनीहरूलाई सास्ती नैदिने हो भने आफू त्यही घरमा रहेर, त्यस घरका सबै पक्षलाईविश्वासले जितैर वशमा लिनुपर्छ र ती परिवारमाथि माया नभए पनिदयाले त्यस्ताको मन जित्नपर्छ । दया मायाले दिएको सजाय चोटपटककोभन्दा गहिरो हुन्छ । स्मृतिपटमा बारबार त्यसले हानिरहन्छ । लाचारी रसमर्पण बाहेक त्यसको पत्यत्तर अर्को हुँदैन ।&lt;br /&gt;
यसरी चोट परेका तिनीहरूले जब आफनो गल्ती कबल गर्छन्‌त्यसै वेला आफनो अधिकार देखाउँदै उनीहरूकै खर्च्नेमा अलग बस्ने इच्छाव्यक्त गर्नुपर्छ । कानुनले एक तर्फबाट हामीलाई शोषण गरेको छ भनेत्यही कानूनलाई फर्काएर आफूनो सुरक्षाको आधार पनि बनाउन पर्छ ।अहिलेसम्म त हामीले शोषणमात्र सहेका छौं, त्यसको उपयौग गरीआफूलाई विजयी बनाउन जानेका छैनौं । यसरी हामी आफैले आफूलाईशोषण गराइरहेका छौं । धाहा छैन त्यसको उद्दैश्य के हो ?”&lt;br /&gt;
“उद्देश्य केही नहुन पनि सक्छ तर यो नारीभित्रकै कम्जोरीलेगराएको हुनसक्छ । पढेलेखेकी त॑ त अझै भन्दै छेस्‌ सहेर हेर, आफूलाईमानसिकरूपले मारेर तिनैमाधि दया गरेर हेर । यो नै उनीहरूलाई सजायदिएका हन भन्छौँ । यस्तै निरन्तरतावाद र सहनशीलताले हो हामी आफूआफैँ भएका ।&lt;br /&gt;
बहिनी साधानाले ठीक भन्दै थिई, दिदी तपाईं ज्यादै नरमहुनुहुन्छ । डर लाग्छ कतै कसैले तपाईंलाई माडमुड गरेर नफयाँकीदेओस्‌ । दया, माया र नग्रतालाई पनि सीमाको जरुरत छ । यसरी जेजसो भन्दा पनि लौ हुन्छ भन्नु हुँदैन । यो दीपेशका बिवाहकोप्रस्तावलाई राम्ररी सोचेर मात्र आफूनौ निर्णय दिनोस्‌ । राधाका कुरासंझनोस्‌ । अमेरिका जान पाउँछु भन्ने रहरलाई एक कुनामा छोडेर&lt;br /&gt;
११८&lt;br /&gt;
स्वछुन्यमनले सोच्नोस्‌, “किन उनीहरू तपाईंसंग नै विवाह गर्न मरिमेदतैछन्‌ । तपाईंमा त्यस्तो कै देखे, तपाईं नै उनीहरूलाई चाहियो । तपाईंकोप्रेमविवाह भएको त होइन अनि किन यत्रो त्याग यौ त्याग नभएरअरू नै केही हुन पनि सक्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
उसको कुरा सुनेर बाआमादेखि लिएर सबैले त्यसैलाई गालीगरे ।बाले भन्नभयो देशविदेश घमेर जान्नेसन्ने भएकाले सुधारको नीति तिनलागे पनि तिमीहरूलाई त्यसैमा शङ.का लाग्छ अत्ति खोज्छौ “नागीविकास ? &amp;quot;पहिले आफनो बुद्धि र सोचाइको विकास गर्न पछि बादरकोहातमा नरिवल होला !&amp;quot;&lt;br /&gt;
त्यस वेला मैले पनि साधनाका भनाइलाई अपरिपक्व मान्दैहाँसिदिएकी थिएँ । अब त्यही ठीक हुन आएपछि मैले कुन मुख लिएरत्यससंग यो सब कुरा गर्छ ! लाज लाग्दै छ मलाई आफूनै बहिनीसंगपनि । &amp;quot;&lt;br /&gt;
“यो पनि नाइँ, “क पनि नाईँ भन्ने हो भने गर्नै के : न हिजौन आजको दोसाँधमा परेका हामीले भोग्न पर्ने समस्या नै यस्तै हन्छ ।म त फेरि उही कुरा दोहोन्याउँछु उनीहरूलाई पछ्नुताउमा पारेर सत्यकोसामना गर्नसक्ने बनाइदै ।”&lt;br /&gt;
“के बन्छन्‌, के बनाउन सक्छु, त्यो त म केही जानिन । यतिभने अवश्य गर्छु “यो भारी नविसाएमम्मलाई म वैंले भनेका बाटामाचल्छु । हेरू, साक्षात्‌ नाटक हामी कसरी खेलिरहेका हुन्छौँ र तमासाबनेर देखाइरहेका हुन्छौँ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“दीपेशले तँलाई रुवाएर धेरै अधर्म गर्दै हुनुहुन्छ । उहाँले कसरीढाँदन सक्नुभयो । यो कुरा नै मैले सोच्न सकेकी छैन । दीपेश त्यसप्रकारका व्यक्ति नै थिएनन्‌ । मलाई राम्ररी थाहा छ मेरा श्रीमानूलाईसही बाटामा ल्याउने नै तेरा श्रीमान्‌ हुन्‌ । रक्सी, चुरोट्र रस्वास्नीमान्छेमा नै रमेर कुख्यात भइसकेका उहाँलाई म समान्य बनेरआँट गरी बिबाह त गरेँ तर हार खाएर पन्छिने अवस्थामा पुमलाई र उहाँलाई यही दीपेशले मिलाइ दियो र अहिले मैले उहाँलाईमेरो मात्र बनाउन सफल भएकी छु । दीपेशलाई नारी मनोबिज्ञान रवैदना थाहा छ तर कसरी यस्तो भयो ........ ? समय र वातावरणलेकत्रो परिवर्तन ल्याउन सक्तो रहेछ । यो संझैर पो म हैरान हुनघालिरहेछु । विश्वासै गर्न सकिरहेकी छैन ?&lt;br /&gt;
दया, तँ नआत्ती, तेरौ साथ दिन म तयार छु । यस जङ्गमाविजय हाम्रो नै हुनुपर्छ ।”&lt;br /&gt;
११९&lt;br /&gt;
“म रोए, दिक्क भए पनि हिम्मत गर्न पन्छिने मेरो स्वभाव छैन। चुन्छु त म एक्लै रुन्छु दुःखलाई आँसुले बगाएर फयाँबन र नयाँउत्साह बटुल्न यसै त गर्न पर्दो रहेछ । जब म रुन्छु, म खाली खाली&lt;br /&gt;
हु मस्तिष्क शान्त हुन्छ, एक छिन शून्यमा हराउँछु अनि नतामा३ रगत तात्न थाल्छ, म आँसु पुछतै उठ्छु र मनमा अठोटगर्छु । आँसको मुल पत्ता लगाई त्यसलाई त्यही नै सकाइ दिन्छुबारम्बार रोएर जीवन यात्रालाई अध्रो राख्न चाहन्न र त्यसी मेरोहिम्मत र उत्साह व्यर्थमा यस्ता समस्यामा लगाई समय खेरफाल्न पनिचाहन्न । अहो यत्रो लामो समय गफ गर्दैमा बिताएछौं । अब म घरगइहाल्छु । चाँडै आउँछु भनेर आएकी ।” दया यसो भन्दै घर जानजरुक्क उठ्छ ।&lt;br /&gt;
“पुन्याइ दिनुपर्छ भने भन्‌ म साथमा जान्छु&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;अनि त्यहाँबाट तँलाई कसले यहाँ पत्याउन आउनै नि &#039; किरातभर त॑ मकहाँ, म तैकहाँ एक अर्कालाई प॒च्याउन हिरडी राख्ने : बरुटर्च भए दे । क्याँच्च हिलामा खुट्टा पत्यो भने असाध्यै सिकसिकोलाग्छ ।”&lt;br /&gt;
केही दिन बितेपछि एक दिन दयाको टेलिफोन प्रेरणाको घरमाआउँछ । क भन्दै हुन्छे, &amp;quot;मैले सेक्सपियरका भनाइमा “यो सन्सार एउटानादयशाला हो, हामी यहाँका अभितयकर्ता हौं” भनेको अर्थ राम्ररी बझनेमौका पाइरहेकी छु र मैले पनि एउटी अभिनेत्रीको भमिका निर्बाहगरिरहेकी छु, तैले भनेअनसार । रमाइलो लाग्दो रहेछ वास्तविकता रकृत्रिमपन नमिलेर निस्केको वेढङ्गी नतिजा हेर्न । अर्को पराकाष्ठा पनिसुनिराख, दीपेशको पहिलो सन्तान जन्मन लागेकाले हरेक दिन जस्तोमलाई मन्दिरमा लिएर जान्छन्‌ र के केको हा पृजा आजा गराउँछन्‌ ।थाहा छ, त्यही घरको एउटा कोठामा आफनै छोरो नशालिएर अचेत भईलडिरहेछ्‌ । त्यो छोरो जसलाइ गर्भधारण गर्दा सायद यस्तै पृजाआजागरिएको हुँदो हो, आफूनो परम्परा अनुसार । एउटा छोरो के भन्ने,भनाइ अनुसार दोसी छौराको चाहना लिएर गर्भवती भएकी थिइन्‌ होलिन्‌ती आमा ।&lt;br /&gt;
यहाँको स्थिति हाँस्यास्पद र संवेदनशील दृबै छैनन्‌ त पेरणा !लौँ भन्‌ त॑, मलाई कुन स्थितिमा रहेकी मान्छेस्‌ ! :&lt;br /&gt;
उताबाट जबाफ आउँछ, &amp;quot;तँ । तँ, त डाँफैचरी भएकी छेस्‌,कुरो बझिस्‌, होइन त ?”&lt;br /&gt;
“बुझेँ, तर तैंले ममा अरू रङ्ग पनि थपिदिइ्रस्‌ कि कसो !&amp;quot;&lt;br /&gt;
१२०&lt;br /&gt;
हाँसो दोहोरो चल्छ । अनि दयाले भन्छे, “म यी सब हेरेररमाइरहेकी छु । आफूलाई बिर्सेर यिनीहरूलाई नै हेर्दै छु । सिक्तै छुजीवन के हो, मनोभावना के हो, सुख दुःख के हुन्‌, सबै सबै थाहापाउने मौका यही पाइरहे पनि रातमा एक्लै रुन नपर्ने स्थितिमा भनेप॒ग्नसकेकी छैन । अरू बाँकी क्रा भेटैमा गरुँला भनेर टेलिफोन राखीदिन्छे ।&lt;br /&gt;
“तिमीले आजको अखवार पढ्यौ &#039; विचरा शर्मालाई बित्यासैपारेछन्‌ ।&amp;quot; यसो भन्दै शिवले गौरीलाई गोरखापत्र पढ्न दिन्छ । गौरीपनि अखबार गढ्दै भन्छे, &amp;quot;हेर, कस्तो बेइज्जत भएको ? पैसा धेरैकमाएर के गर्न : सबैले थक्ने काम भडहालेछ्न । आफूले ठाउं छौड्नथालेपछि यस्तै के के भग्नपर्छ के के ?&lt;br /&gt;
“नियम कानुव उल्लङ घन आयो भन्नु बेग्लै कुरा हो तर नियतनै खराव रहन, घस मृद्टा लागेर जेलै जानपर्ने हुन भनेको सानो क्राहोइन ।&amp;quot; शिवले आफनो र उसको निष्कासनको फरक यसरी बताउँछ ।&lt;br /&gt;
गौरीले समर्थन - अर्कै तरिकाले गर्दै भन्छे, “कुनलाई ठूलो रकुनलाई सानो भन्ने &#039; निष्कासन हुनु नै नराम्रो हो । यहाँ कसलेलेखाजोखा गरेर भन्छ : निकालिएका जति सबैलाई एकै दृष्टिले त हेर्छन्‌नि ? यो दमनले त गर्न पनि उल्कै गरेको हो त : बाहिरबाट आएरडेरामा बसेर जीवन गुजारा गर्ने त्यो ठूलो हुँदै आफ्नै मोटर चढेरहिड्ने भयो । त्यसका छोराछोरी कोही अमेरिकामा, कोही अष्ट्रेलियामापढ्न जाने भए । स्वास्नी हुनेको फूर्ति कसले हेरिदिओस्‌ जस्तो भएकोथियो । त्यत्रो पैसा कहाँबाट आयो होला भन्ने शङ,का न मलाई पनिलागेको थियो । जसले विष खान्छ त्यसले त ओक्ल्नै पर्छ, हामीले चिन्तागरेर के गर्नै ? लौ चिया खानुहोस्‌&amp;quot; भनेर एक कप अगाडि सार्छैं ।&lt;br /&gt;
शिवले चियाको चस्की लिदै मनमनै गम्न थाल्छ, “कुनै पनिव्यक्तिको चरित्रमा त्यसका परिवारका आकाङ क्षाले प्रभाव पारेको हुँदोरहेछ । उसले संझन्छ, एक दिन दमनले दिक्क भएर भनेका कुराहरू ।“यार, मलाई तिमीहरू केही नभन । मैले यस्तो काम गर्न सक्तिनँ भन्दापति नगरी धर पाइनँ । हात हालेको छु, कति सफल हुन्छु यामिल्काइन्छु थाहा छैन । छोराछोरी पढाउनेदेखि लिएर घरजम जौडन पर्दाखर्च थामिनसक्नुको भयो । नयाँ नयाँ सौखिन सामग्रीको प्रयोगले बानीबिगार्दै गयौ । साथीभाइ, इष्टमित्रका अगाडि आफनो इज्जत राख्नै पप्यो। तलवको भरमा चल्नै के सक्ने भयो र । अति मैले पनि उपरीआम्दानी बढाउन थालेको छु । रातदिनको घरको कचकचबाट यति भयोभने मुक्त हुन त सकुँला !”&lt;br /&gt;
१२१&lt;br /&gt;
छिः परिवारको यो मोह ज्ञ यसैमा आफूलाई टाँसी राखौं भनेनिस्कने नतिजा यस्तै त रहेछ नि ? दमनले यदि आफनो आम्दानीमृताविक आफनो खर्च मिलाउन सकेको भए आकाश छुने इच्छा नराखेकोभए र आफनो सैद्धान्तिक र नैतिकताका बलले आफूलाई विजयीबनाउनपट्टि आफनो कर्तव्य संभैको भए आज त्यसको यो गति पक्कै हुनेथिएन । त्यस बेला उल्टै हामीलाई भन्न बालेको थियौ, “मौका आउंछपर्खदैन । तेपसैले मौकाको फाइदा लिइहाल्नपर्छ । छोराछोरीका शिक्षामाअहिले जे जति खर्च गर्न सकिन्छ, त्यही नै हाम्रो यिनीहरूका लागिगरेको लगानी हो । अहिले हाम्रा पालामा त काम पाउन यति गाह्रो छ,यो बढ्दो प्रतिस्पद्धलि कस्तो स्थिति ल्याउला ? हेर यार, अहिले नैहामीले यिनका लागि केही गरेनौं भने ।यनीहरू कहिल्यै शिर उठाउनसक्नेहुँदैनन्‌ । मनोबल गुमाएर हरेक क्षेत्रमा अपमानित हुनुपर्नाले अगाडि बढेरकेही गर्न नसक्ने हुन्छन्‌ । यो नोकरको जीवनबाट कहिल्यै छुटकारायिनले पाउँदैनन्‌ । एक न एकपटक परिवारमा कमै न कसैले यस्तोखतरा बोक्न नै पर्छ । सन्तानलाई यस्तामा फस्न नदिई म आफैँलेउठाएको छु । मेरो अन्त्य भएपछि यी सबै मेरो साथै जान्छन्‌,छोराछोरीहरू मुक्त भइहाल्छन्‌ ।&amp;quot;”&lt;br /&gt;
दमनका यस्ता कुराहरूका सफझनाले उसलाई जङ. चलाउँछ रमनमनैमा उसलाई हकार्न थाल्छ, “खुव गरिस्‌ तैले :ः के अब तेरासन्तानको शिर ठाडो हन्छ भन्ठानेको छस्‌ ः छोराछोरीको भविष्य बासुभनेर आँखा चिम्लेर सकेसम्म. कुम्ल्याउन थालिस्‌, अहिले त्यस कर्मलेतेरा सन्तानका भविष्यमा कहिल्यै नमेटिने कालो छाप लगाउँदै छ । जतिठूला तेरा सन्तान भए पनि भन्न छोड्दैनन्‌ यो त्यही घुस्याहाको सन्तानहो । त्यसका बाबले दुनियाँलाई मारेको थियो ।”&lt;br /&gt;
शिव एक छिन शून्य हुन्छ । उसको तातेको रगत सेलाउँछअनि व्यावहारिक रूपले सोच्छ । के गर्छ : एकफेर त्यससङ भेट गर्नजाँ कि : त्यसले अरूसंग जे जस्तो भनेर फूर्ती देखाए पनि मलाई तसाँचो कुरा पछ्नुताएर नै गर्थ्यौ । आफनो शिर झुकाएकै हुन्थ्यो । अहिलेम त्यसलाई राखेका ठाउँमा भेट गर्न गएँ भने के पो गर्ला ? त्यसकाघरका परिवारसंग भेट कसरी गर्न जाडौँ : नजाङैँ मनले मान्दैन, जाँतिनीहरूले के सोच्ने हुनै : यसरी उदाब्गिनु परेकाले पीर त परेकँहोला । यस्ता व्यक्तिहरूले हामीले देखाएको सहानुभृतिप्रति खिसीटिउरीउडाउदै हामीले जासृसी गर्न आएको पनि भन्नसम्छन्‌ या भन्छन्‌उनीहरूलाई खुच्चिङ गर्न आएको ।&lt;br /&gt;
१२२&lt;br /&gt;
है भगवान्‌ ज्ञ भगवान्‌बाट मैले कुनै वरदान पाएको रहेछु भनेमेरा परिवारलाई आफनो औगात सोच्नसक्ने शक्ति दिएका रहेछौ । मैलेविनैप्रतिका मोहमा बाँधिएर पघभ्रष्ट हुनु परेन । छन त मसग पनि केनै थियो र ? छाक टारदैमा &#039; कमाइ सिद्धिन्थ्यो । थियो भने एउटा कुराथियो । सन्तोष ।&lt;br /&gt;
“जागिर खाएर निष्ठावान्‌ रहनु र इमान्दारीपूर्वक कामगर्ने रगराउनु दुवै निकै गाह्री हुँदो रहेछ । यहाँ आफूलाई चिफ्याइदेला भन्नेडरले होसियार हुनुका साथसाथै विभिन्न किसिमका आकर्षणले हामीलाईछोप्न आउँदा त्यस्ता कर्मबाट उम्कन र आफना मातहतकालाई उम्काउनुएक जागिरदारका लागि चुनौती हो उसको निष्ठा र इमान्दारीको परीक्षणगरिने बैला हुँदो रहेछ । हे भगवान्‌ ज्ञ मेरो प्रार्थता छ, मेरा सन्तानलेसुबद्धिको आशीर्वाद पाइरहन्‌ । यिनका पेट इमान्दारीपूर्वक कमाइएकाअन्नलै मात्र भरियन्‌ ।&lt;br /&gt;
दमनका बारेमा सोच्तासौच्तै शिवले आफनो अर्का साधीलाईसंझन्छ ! उसको छोरो सबै क्षेत्रमा योग्य भएर पनि नोकरी पाउननसकेर भौतारिन परेको गुनासो थियौ, “भई नभई श्रण काढेर छोरालाईपढाएँ । ठूलो भएपछि राम्रो नोकरी पाउला, यी श्रणहरू निख्न्ला भन्नेकत्रो आशा राखेको थिएँ । अहिले नौकरीका खोजमा छोरो छटपटाइरहेछतैपनि काम पाउने यत्ति पनि आश छैन । जहाँ जाक भन्छन्‌ रे,“हामीकहाँ जागिरे धेरै भएर भरखर निकालेका छौं कसरी तपाईंलाईअहिले लिइहाल्न्‌ : ज्यालादारीमा बस्ने हो भने साना दर्जामा लिनसक्किएला तर तपाईंको योग्यता अनुसार लिन सकिदैन । लौ, भन तत्यस्तै पनि खा कसरी भनुँ ? हाकिमको जागिर खोज्दै जाँदा पिउनकोपाइन्छ । २०४६ साल यता भन्नै दुई वर्ष हुन लाग्यो त्यो लोकसेवाआयोगले पनि कर्मचारीहरू माग गरेको छैन । गोरखापत्र किन्यो, पढ्यो ।त्यतिकै भइरहेछ । फेरि अचम्म त एउटा कुरामा लागिरहेछ, एउटा मेरोआफन्त नै भन्नुपन्यो, त्यसको छोरो आइ.ए. सम्म पनि पटके भएर पासगरेको थियो । त्यसको मार्क ३३ पर्तैन्ट जति पनि छ, छैन तर त्योएउटा संस्थामा ज्यालादारीमा, जागिरै भएछ कुन्‌ ओहदामा थाहा छ ःम्यानेजमेन्ट एक्सपर्टमा रै : यस्तो छ, यहाँ ? मन कसरी बुझाउने ।हाम्रो योग्यता बाहेक अरू कस्तो गुण हुनुपर्छ जागिरे हुन, त्यो थाहापाउन सकेको छैन ।&lt;br /&gt;
बिचरा कति दुखी भएको छ क । होइन, सबैलाई सरकारीनोकरी नै किन चाहिन्छ ! आफैँ कुनै नयाँ व्यवसाय शुरु गरे चाँडै नैउठिन्थ्यो । यो जामिर खाएर पचाउन कति गाह्रो छ, त्यसको ज्ञान&lt;br /&gt;
१२:&lt;br /&gt;
यिनलाई छैन । शिवले दुवै साथीहरूका समस्यासंग आफनो मिलाएरजाँच्छ र त्यसबाट मुक्त हुन क फेरि तबला बजाउन थाल्छ एक सुरलेएक्लै । शिब त्यस्तै स्वभावको छ । उसको सङ्गीत माथिको प्रेमको पक्षअर्कै छु । क आफू बेचैन भएको बेला मनलाई काबूमा राख्नपरेमातवलावादन गर्न थाल्छ । सिरिरिर हावा कोठाभित्र पस्छ । शिवलाई केहीचङ्गा भएको अनुभूति हुन्छ । क उठेर झयालबाहिर हेर्न जान्छ । टाडाउसले स्वयंभ्‌को स्तृप देखछ । गौरीले उसलाई तवलावादन छोडेरझ्यालमा टोल्याएर हेरिरहेको देखेर सोध्छ, “तपाईंलाई पनि कति चिन्ता,के केमा लाग्ने हो : कर्मअनसार फल त कुनै बेला ओग्नै त पर्छ ।दमनले यसकौ परिणाम यस्तो पनि हुन सक्छ भन्ने थाहा पाएर नै तअगाडि बढेको होला । सायद, उसलाई यति चिन्ता लागेको छैन होलाजत्तिको तपाईंलाई लागेको म देख्तै छु । बरु आउनुहोस्‌, तपाईं तबलाबजाउनु होस्‌, म हार्मोनियम बजाउँछु ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
मैले बजाइ सकेँ । फेरि बजाउने मन छैन । हिँड, बरु घुम्नजाऔं “भन्दै गौरीलाई लुगा बदलेर आउन पठाउँछ र आफू डोटीकाबाबाका घरमा नुरलाई संझन पुग्छ ।&lt;br /&gt;
दिनभरका भ्रमणले थाकेर त्यस घरमा बास लिएर छुप्लक सुत्तछुभन्दा उसले त्यहाँ सामाजिक प्राणी मानिएका मनुष्यका जीवनलाई समाजलेनै थिचोमिचो गरी कुच्याएर निकालेका ती प्राणीहरूसंग भेट भएको थियो॥ उसले जीवनका अविस्मरणीय ती गाथाहरूलाई आफूनो अवस्थाकोभन्दाधेरै दयनीय ठानेको छ ।&lt;br /&gt;
उसका सोचाइले कोल्टै फेर्छ र आफैसंग भन्छ, “मनुष्य ज्ञतिमीले जति दुख पाएको छौँ, त्यो आफनै जातिबाट पाइरहेछौ र जति,सुखको अनुभूति हुन्छ त्यो पनि उनैबाट पाएका छौँ । हामी एकअर्काबाट टाढा किन हुन सकिरहेका छैनौं भने सुख दुःखको स्रोत नैहामी बीचको सम्बन्ध हो । यस सम्बन्धलाई चेतना र बिकले हेर्न किनसकिरहेका छैनौ ! आखिर हामी नै त चेतनशील प्राणी हौँ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
सोच्तासोच्तै शिवका मुखबाट यस्ता शब्दहरू फुत्कन वाल्छन्‌,&amp;quot;आयु काटनु नै कत्रो समस्या बनेको छ भने हामी के नै गर्न सक्नेभएका छौं ! बाँच्न सक्नु नै जीवनको ठूलौ उपलब्धि हो भन्नसुहाउनेभइ सकेको छौँ । जसलाई हेत्यो सबै आफनै दुखका बोझलेरोइरहेका मात्र छन्‌ । यी हाँस्ने र हँसाउने बुक बन नसक्लान्‌ !&amp;quot;&lt;br /&gt;
लुगा फेरेर आई टक्क उभिइरहेकी शिव एक्लै यसरीफतृफताएको सुनेर भन्छे, “सख द:ख भनेको मनको स्थिति हो । तपाईंआफैँ द:खी हनहन्छ भने तपाईंले सबैका जीवनमा दुख मात्र देख्नुहुन्छ ।&lt;br /&gt;
सुखको कि वास्ता गर्नुहुन्न कि जान्नै खोज्नुहुन्त । म त अरूलाई दुःखीहोइन, तपाईं नै किन हाँस्न नजानेको भन्छु :”&lt;br /&gt;
न्यसै हाँसेर हिड्नेलाई के भन्छन्‌ थाहा छ : सिल्ली हो, म त्योहोइन । लौ हिड, एक छिन भए पनि यस गुम्म वातावरणबाट सुक्तहोऔं ।&amp;quot; भन्दै गौरीलाई लिएर निस्कन्छ ।&lt;br /&gt;
बाटामा हिड्दै शिवले पश्चिमाञ्चल क्षेत्रमा घम्त जाँदा नुरसंगकुन अवस्थामा भेट हनगयो, त्यसपछि कुन परिस्थितिको सामना गर्नपत्योर बाबा ,र मैनाको जीवन कथा कस्तो रहेछ सबै सुनाउँदै दमन, शनतर प्रतापलाई पनि जोडेर आफ्ना मनमा उक्समकुस भएर रहेका सबैकरा गौरीलाई बताउँदै जान्छ ।&lt;br /&gt;
स्वयंभुको सिढी चढ्दै शिवले गौरीसंग सोध्छ, &amp;quot;के तिनीहरूकाकथा सुनेर पनि तिमी मलाई सुख बिर्सने प्रकृतिको भन्ने ठान्छयौ &#039; यहाँहाँसोभन्दा ज्यादा आँशु नै छ । यिततीहरूको जीवन नै हेर, यिनीहरूलेसुख के हो भनेर चिन्न पाएका छन्‌ &#039; म त भन्छु, जसले धेरै आँशृदेखेको छ, खपेको छ, त्यसले जीवन पति राम्रोसंग बुर्भको हन्छ ।सखैसखमा रङ मङ गिएर मस्त हुनेको एउटै सोचाइ हुन्छ भने दुःखमागाडिएर उक्सन खोज्नेले हरेक क्षेत्रमा सोच्तै उम्कने प्रयास गरिरहेकोहुन्छ । यिनै अट्टट प्रयासले ज्ञान: दिन्छ, सफलता ल्याउँछ र अनुभवी पनिबनाउँछ ।&lt;br /&gt;
“त्यसो हो भने दमनले दुखबाट उम्कन जन प्रयास गरे त्यसबाटके उनले. सफलता पाए भन्नुहुन्छ : यो तदुबंलता हो । जीवनलाईदिशाहीन बनाउने असफलता हो । यस सफलताका खोजमा पाएकोअसफलता हो, जन्‌ उनका प्रयासको लक्ष्य दर्बल हनाले भएको छ ।जसमा पहिलेपटक असफल हुँदा त्यसबाट उठेर फैरि सफलताका लागिप्रयास गर्ने ठाउँ रहँदैन । मुन, प्रयास भन्दैमा र सफलता भन्दैमा सबैउत्तम नै डुन्धन्‌ ॥ जबे अषट्रट प्रयास गरिन्छ त्यसको नतिजाअन्त्यमा सफलता नै हुनसक्छ । तर त्यो सफलता कति उपयुक्त छया हानिकारक छ, त्यो प्रयासका लक्ष्यमा आधारित हुन्छ । त्यसकोआधार सत्‌ या मिथ्या हुने गर्छ ।&lt;br /&gt;
सत्‌ मार्ग अपनाउनाले दुःख दिए पनि धोखा दिदैन र मिथ्यालावण्यमय भए पनि शान्ति र सुख दिदैन । तसर्थ सत्‌ प्रयासका क्रममाधेरै असफलता पनि आइपर्न सक्छन्‌ बुल 02 र्णत्य प्राप्तिका लागि अट्रूटप्रयास गर्दै जाने बाटो भने रोकिदैन मानी असफलता नै सफलताकालागि अनुभूति प्राप्त गर्ने स्रोत हो ।&lt;br /&gt;
१२१&lt;br /&gt;
हेर न, अहिले हाम्रो यो सिढी चढाइलाई नै लिऔं । हामीथाकेका छौं तैपनि माथि पुग्ने लक्ष्य नछोडी अगाडि वढ्दै छौँ । यसैलेहामी त्यहाँ पग्छौं पनि तर यदि हामी सक्नैनौँ भनेर यहीबाट फर्कियौंभने के पाउँछौं ! यी स्वाँ फ्वाँ पनि व्यर्थका हुन्छन्‌ । त्यस्ता निरुत्साहीपार्ने तत्वहरूलाई निराकरण गर्दै जानुपर्छ, आफूता आत्मबलले धिच्तैजानुपर्छ गौरी । प्रयास, लक्ष्य र नतिजाबाट नै हाम्रा जीवनमा सुखदःखआइगइरहेका हुन्छन्‌ ।: यी तीनैलाई हामीले होशियारपूर्वक बारम्बारल्याउनपर्छ ।&lt;br /&gt;
तपाईं आत्मबलको कुरा गर्नुहुन्छ । त्यो आत्मबल बढाउनलाईप्रतिस्पद्धा गर्नसक्ने गुणको प्रवर्द्धन पनि त गर्नुपर्छ । दमनजीले त्यसैलेभनेको होइन, “मेरा सन्तानले कुनै पनि क्षेत्रमा प्रतिस्परद्धा गर्दा हार खाननपरोस्‌ भनेर उच्चस्तरीय शिक्षा पाञन्‌ भनेर मैलै पैसा कमाउनपष्टि लागेँ। यौ आदर्श मात्र खोजेर हिड्यौं भने जीवनमा दुःख बाहेक के पाइँदोरहेछ र ।”&lt;br /&gt;
“अहिले त्यसले के पायौ त : आदर्श छोडेर कताटाता दौडिदाक्षणिक सुख पायौ होला तर के त्यो दाग जीवनभर मेटिने भयो र !वर्षाको भेलजस्तो सुख भोगेर आफनो अस्तित्व गुमाउन लाग्यो भने नतिजायस्तै हुन्छ । मलाई त्यसैले आफना परिवारसंग गर्व छु । तिमीहरूलेमलाई कहिल्चै यसतर्फ धकेलेनौ । इच्छा त तिमीहरूको पनि बिदेशमापढ्ने, शौखमा बस्ने थियो होला ।&lt;br /&gt;
तिमीहरूको आत्मबल पनि कसैको भन्दा कम छैन । योग्य छौँ,त्यसैले आफै कमाउँछौं । मन बलियो छ, त्यसैले अरूको पछि पतिलाग्दैनौं र आकर्षणले लोलुप पनि हुदैनौं । यही त हो आत्मबलभनेको ।&lt;br /&gt;
कसैले आएर स्वास्तीमान्छेलाई किन पढाउनु पर्छ । घर धान्त रबालकहरूको रेखदेख गर्न जान्नेसम्मको ज्ञान भए भइहाल्यो भन्छन्‌ भनेम यो घरको उपमा दिएर भन्नसक्छु, &amp;quot;यस्तो सहयोगी जीवन गृजार्नकालागि शिक्षा र बृद्धिको जरुरत सबै परिवारका लागि हुन्छ । यिनैकासुबद्धिले गर्दा आत्मसम्मानका साथ बाँच्न र शिर ठाडो गरेर हिंड्नसकको छु । मेरी अर्घाड्टिनीले पढ्लेख गरेकी हुनाले यी मेरा छोराछोरीलेशिक्षा प्राप्त गर्नमा नै प्राथमिकता पाए र आज घरमा आपत्‌ विपत्‌आइपर्दा पनि परिबार मिलेर घरका इज्जतलाई थामिरहेका छन्‌ । यदि मएक्लोमाधि सबै भार परेको भए अहिले हाम्रो के गति हुन्थ्यो !&amp;quot;&lt;br /&gt;
“यी कुरा थाहा पाउने सबै भइसकेका छन्‌ तर के गर्नुहुन्छयिनैले स्वास्नीछोरीहरूको कमाइ खान पल्केको भनेर तपाईंमाथि नामर्दको&lt;br /&gt;
१२६&lt;br /&gt;
शिरपेँच लगाइ दिन पनि छोडेका छैनन । सफझन हन्छ, तपाईं हैरानभएर के भन्नुभएको थियो !&amp;quot; न&lt;br /&gt;
“बिर्सन सक्ने कुरा हुँदौ हो त म हैरान हुने नै थिइनँ । थाहापाएर बिर्सन खोज्न र ज्ञान भएर मुर्ख बन्नु जस्तो गाह्रो के हुन्छ ?समाजलाई तिमीले चिनेकै छयौ ।&lt;br /&gt;
यौ समाज एक समुह हो, समाजका सोचाइको स्तर देशको ज्ञानक्षेत्रका विकासमा निर्भर हुन्छु र तिमीलाई थाहा छ, बिकास भनेकोपरिवर्तनका लागि रोपेको बीज मात्र हो । यो शुरुमा अन्त्यन्त सानोहुन्छ र यसले बाँच्ने र फैलिने यिनै वातावरणसंग मिलेर गर्नुपर्नेहुन्छन । जब यो बढेर ठूलो हुन्छ यसमा फल लाग्न थाल्छ, तब मात्रथाहा हुन्छ, त्यस बीजको उपयोगिता कै हो : त्यसले के दिन्छ : कस्तोस्वाद दित्छ : &amp;quot; ,&lt;br /&gt;
अहिले हामी जुन स्थितिमा पिल्सिएर बाँची रहेका छौं, जन बोलीसमाजले बोलेर बिपाक्तै पार्ने खोजीरहेछ, यसलै बीजैका अवस्थामा यसलाईमार्न तत्पर भएको हो । तर यो हलचलले नै अयोग्यलाई सडाएरहटाउँछ भने निक्खर र उपयक्तलाई मात्र हर्कत दिई विजयी बनाउँछ ।,त्यसैले नारीका उत्साह र उमङ्गहरूलाई गालेर झार्ने प्रयासमा लाग्नखोज्नेहरू अभौ बहु संख्यामा छन्‌, तिनीहरूले हामी पुरुष जातिलाईजागरण गराएर, फैलाएर आफनो स्थान नछोडन र सबै आफैँले ओगटेरनारीलाई आदर्शको संज्चा दिई पन्छाउन पुरुषहरूलाई उसका शक्ति रयोग्यताको उपेक्षा गर्दै ललकारेका हुन्‌ ।&lt;br /&gt;
त्यो म बझूदछु र यसले मलाई, मेरा विचारधारालाई डगमगाउनसक्तैन । यसो सुन्नु पर्दा नराम्रो लाग्छ नै, हैरान पनि हुन्छु तर त्योहैरानी पछ्नुताउंले ल्याएको असक्त भएर आएको म मान्दिन किनकि तीअफसोचका सुस्केराहरू हुन्‌ हाम्रो समाजप्रतिको जसलाई बुझन धेरै समयलिदैछ । बीज अङ.कुरित हुनै अनुकूल वातावरणको सिर्जनातर्फ नलागिसमय काटिरहेछ । यस्ता वाधक हामी पुरुषभन्दा ,बढी तिमी नारीहरू नैरहेकाले नै हो म धेरै दिक्क भएको । यस बिचित्रतालाई मैले बुझनसकिरहेको छैन किन नारी नै नारीका उन्नतिमा वाधक हुन्छन्‌ !&amp;quot;&amp;quot;मलाई त बुझन गाह्रो छ भने तपाईं त लोग्नेमान्छै हने नैभ्रया ?” ॥यतिन्जेलसम्म उनीहरूले सिँढी उक्लिसकेका हुन्छन्‌ रं थकाइकोसुस्केरा हाल्दै थाप्लाका सिंढीमा थचक्क विश्वाम गर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
पश्चिमको अस्तायचल आकाश शान्त र रहीच्री देखिन्छ ।स्तृपका वरिपरि राखेका माने घमासदै “३० मणि पद्य हुँ&amp;quot; भनेर एक&lt;br /&gt;
१२७&lt;br /&gt;
चित्त भई भक्तजनहरूले पाठ गर्ने थालेको सुनिन्छ त कुनैले चैत्यकाआगाडिका दियामा बत्ती बाल्नथालेको देखिन्छ । त्यहाँको वातावरण पनिशान्त र रमणीय छ ।&lt;br /&gt;
शिवले यही शान्तिलाई लक्ष्य गर्दै कुरा उठाउँछ, “हाम्रो अन्तिमचाहना पनि त यस्तै शान्ति हो । असफलता र सफलताको लामोदौडाइपछि प्राप्त अनुभूति र ज्ञानले ल्याएको यो शान्ति नै हाम्रो अन्तिमउपलब्धि हो गौरी, तिमीलाई थाहा छ कि छैन गौतम बढ्धले बुद्धत्वप्राप्त गरेपछि मात्र शान्ति चिनेका थिए । त्यसैले उहाँका उपदेशले भन्छ,“सङ ग्राममा लाखौंलाई जित्नेभन्दा आफूले आफैँलाई जित्नसक्ने नै सच्चाबिजयी हुन्‌ ।” यसैले आशीर्वाद दिदा सबैलाई भन्थे, &amp;quot;अप्प दीपो भव&amp;quot; ।आफना दर्शनहरू सबै व्यक्त गरेपछि भन्थे, &amp;quot;वत्स, म मोक्षदाता होइन,म त मार्ग दर्शक मात्र हूँ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
तसर्थ गौरी मेरो धर्म हिन्द भए पनि यी बडका आदर्शलाई मविश्वास गर्छु र मान्छु पनि । उहाँका सिद्धान्तमा व्यक्ति नै सर्वोत्कृष्टहुन्छ र यो नै यथार्थ पनि हो । शान्ति, विजय र मोक्ष प्राप्त गर्न स्वयंव्यक्ति आफैँले प्रयास गर्नपर्छ । मनुष्यभित्र सबै प्रकारका भावनाहरू हुन्छन्‌इन्द्रियहरू छन्‌ । हरेक इन्द्रियले आफूलाई सञ्चालित राख्न चाहन्छन्‌ रएक अर्कालाई निष्किय पार्न तछाड मछाड गर्न थाल्छन्‌ । पत्येकव्यक्तिभित्र नै कुरुक्षेत्रको लडाईं मच्चिरहेको हुन्छ । पाँच इन्द्रिय एकपक्षमा छन्‌ भने पाँच कर्मेन्द्रिय अर्का पक्षमा हुन्छन्‌ र दुवैलाई एकविन्दुमा ल्याउन दौडेको हुन्छ मन ।&lt;br /&gt;
यस मनलाई बल ज्यादा दिई कर्म गराउन अग्रसर पार्नलाई नैज्ञानेन्द्रियहरू लाई बढी परिचालित गराउनु आवश्यक पर्छ । विद्याआर्जनको महत्व पनि यही ज्ञानेन्द्रियलाई अतिरिक्त बल पृच्याउनलाई हो। मनुष्यका मनभित्र विभिन्न कामनाहरू उर्लन सक्छन्‌ र ती सबैकामनाहरू पुर्ण गर्नपट्टि व्यक्ति लाग्यौ भने त्यो त्यसैका थृप्रामा हराउँछ। यसको छनोटको अभिभारा ज्ञानेन्द्रियलाई दिन सक्यो भने क सफलहुनसक्छ ।&lt;br /&gt;
इच्छा अनुसार उठेका भोगलाई भोग्नाले इच्छाको पूर्ति हुन्छभन्न सकिदैन । यसले झन्‌ इच्छ्ञा भड्काउने काम मात्र गर्छ जस्तो बल्दैगरे का आगामा घिउ घप्नाले त्यो उत्तेजित हुन्छु । भोगविलासमालागेका मनुष्यले सिद्धि प्राप्ति कहिल्यै गर्न सक्तैन जस्तो हाल दमनकोभएको छ ।&lt;br /&gt;
शिवका यस्ता तथ्यज्ञान सुन्दासुन्दै गौरी भन्छे, &amp;quot;तपाईंका यीविचार र ज्ञान सुन्दा त मलाई आभास हुँदैछ, कही तपाईं त्यागी भएर&lt;br /&gt;
१२८&lt;br /&gt;
जङ्गलमा मठ खोलेर उपासक त बन्नु हुन्न &#039; रातदिन यस्तै धर्मकाप॒स्तक अध्ययन गर्नमा व्यस्त हुनुहुन्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ज्ञान पाप्त गरेपछि जङ्गलमा पस्नै होइन, त्यो ज्ञानको रसपानगराउन त मनुष्यका समृहमा पो पस्तपर्छ । फेरि म कुन ज्ञानीहुनसकेको छु र तिमीले जङ्गलतिर लाग्छु कि भनेर शङका गर्छ्यौ !&lt;br /&gt;
म त सौच्तछु, गौरी जसले म त्यागी हुँ भनेर देखाउंछ, त्योत्यागी नै होइन । क त आफनो बढाइ सन्नका लागि, बनेको हुन्छ ।त्यसको त्यो त्याग होइन, कामना लिप्सा हो ।&lt;br /&gt;
&#039;्ह्यो यो कुरा साँचै चित्त बझने भन्नुभयो । त्यागी भन्ने कतिसन्यासीहरू गार्हस्थ्य जीवनमा फर्किएका पनि छन्‌ । एउटा कुरा तपाईंलेज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय अनि मनका बारे जुन भन्नभयो, त्यसमा कति मथप्न चाहन्छु भने यी इन्द्रियहरूलाई पर्ज्वलित पार्ने, सक्रिय पार्ने कृत्यगरेको छ वातावरण र परिस्थितिले पनि । यसमा तपाईंको भनाइ केछ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
“यही बातावरण र परिस्थिति त मनुप्यको समस्या हो, गुरु होरप्रेरणा पनि हो र यसैले, निम्त्याएको छ सभ्यता पनि ।&lt;br /&gt;
अन्पतालको वतिर दिलबहाँद्र अ्वैर्य भईँ छटपटाइरहेछ मानौंराधाको प्रसृति पीडा उसलाई नै सरेको छ : क सकुशल नानी जन्मेकोसुन्न आतुर भएको छ्‌ । क संझन थाल्छ ती खबरहरू जसमा लेखिएकोथियौ रै दुई टाउके बालक जन्मेको, कसैका खुट्टा नभएको, ओठकाटिएको, तीन हात भएको या आँखा नभएको बेरूपका शिशुहरू ।उसलाई कता कता डर लाग्छ कहीं राधाले पनि कुनै त्यस्तै पाई भने&lt;br /&gt;
२&lt;br /&gt;
क संझन्छ, राधालाई पेट दृखेर जँचाउन ल्याउँदा डाक्टरलेसोधेका कुराहरू । क पछुताउँछ पनि किन उसले खुवाउन हुन्न भन्दापनि राधालाई दुई जिया भएका वेलामा पनि रक्सी खुवायो । हेर्दाहातखुट्टा सबै ठीक भए पनि लुरे लाम्रै भयो भने के गर्ने ? आफूलाईबढेसकालमा हेरचाह गर्ला भनेर सन्तान जन्माइन्छ । त्यसैलाई उल्टैस्याहारेर बस्नुपर्ने त हुँदैन !&lt;br /&gt;
यस्ती अवस्थाकी आइमाईलाई बारम्बार डाक्टर जँचाउनुपर्छ भन्दाकेको स्वाँङ हामीलाई पार्नपर्छु भनेर मानिनं, यसको फल के कस्तोदेखाउने हो । अहिलेसम्म त अप्रेसन मात्र गर्नुपर्छ भनेका छन्‌ ।त्यसपछि के के सुनाउने हुन्‌ ।”&lt;br /&gt;
मनमा यस्ता कुरा खेलाउँदा खेलाउँदै एउटी नस भित्रबाटनिस्केकी मात्र के हुन्छे, उसले सोधीहाल्छ “राधाको के भयो :” हतारमा&lt;br /&gt;
१२९&lt;br /&gt;
निस्केकी त्यस नर्सले के बेलिबिस्तार लगाएर बताउन पाउँवी, “थाहा छैन&amp;quot;भनेर जवाफ दिदै जान्छे ।&lt;br /&gt;
दिलबहाद्रलाई उसका जवाफले कृपित पार्छ र झर्कदै भन्छ,“थाहा छैन भन्ने जवाफ सन्न हामी यहाँ पर्खेर बसेका होइनौं । हाम्राजहानहरूलाई भित्र लगेको यतिका वेला भइसक्यो कै भयो भनेर सोध्दाथाहा छैन भन्ने जवाफ आउंछ । केही थाहा नै नहुने तपाईंहरूले योप्रसुति गृहमा किन नौकरी गर्नुहन्छु ः&lt;br /&gt;
क रिसाएको देखेर त्यहाँ पर्खेर बस्ने अरूहरू पनि भन्छन्‌, “खैके हो के : यहाँ पर्खेर बसेको बिहानदेखि नै हो केही भन्न आउँदैनन्‌सोधे यस्तै ठाडो जवाफ दिन्छन्‌ । मैले त आ लैजान्नै अस्पताल भनेकोधिएँ, मानेनन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
एउटी नर्स फेरि निस्कन्छे र सोध्छ, &amp;quot;श्याम भन्नै यहाँ कोहुनुहुन्छ !”&amp;quot; खवर सुन्न हतारिदै श्याम भन्ने मै हुँ भनेर क अगाडिजान्छु र सोध्छ, &amp;quot;के जन्मियो :&amp;quot; नर्सले छोरो, जन्मियो मात्र के भनेकीथिई -क खुसी हुँदै भन्नथाल्छ, “मैले पहिले नै भनेको थिएँ यसपटक छोरानै जन्मन्छ भनेर । अनि कस्तो छत्यो&lt;br /&gt;
नर्स रोक्दै भन्छे, &amp;quot;पहिले मेरो क्रा त सबै सन्नोस्‌ । त्योनानी जन्मन त जन्मियो तर त्यसलाई बचाउन भने सकिएन । तपाईंकीजहान रोएकी रोयै छन्‌ गएर फुलाउतु होस्‌ ।&lt;br /&gt;
यस्तो हृदयविदारक खबर सुनेर श्याम चप लाग्दैन । क कराउनथाल्छ, &amp;quot;तपाईंहरूले राम्रो उपचार गर्न भएन, त्यसैले त्यो मन्यो ।तपाईंहरू ज्यानमारा हो, मेरा छोरालाई मार्ने तपाईहरू हो । घरैमाग्यालग्याल्ती सात छोरी जन्माउँदा न त आमालाई कष्ट भयो, न ततानी नै मच्यो । छोरो जन्माउँछै यसले भनेर अस्पताल ल्याएँ, यो दशाभोग्नु पन्यो । यसो भन्दै छाती पिटीपिटी . क रुन थालेपछि&#039; नर्सले पनिअस्पतालमाथि लगाएको आरोप सहन सकिनँ र भन्छे, “यहाँ ल्याउनभएकाले मात्र तपाईकी जहान बाँचिन्‌ नत्र सात नानी जन्माइसकेकी त्यसउमेरकी तिनको के अवस्था हुनेथियो होला ? आपत्‌ नपरी तपाईहरूपहिले जँचाउन हुन्न अनि यस्तो उस्तो भन्नुहुन्छ । क त्यो लेखेको पढ्नसक्नु हुन्छ भने पढ्नोस्‌ र यस्तो गल्ती आफना सन्तानले कहिल्यैदोहोन्याउनु भनेर संझाउनु होला ।&lt;br /&gt;
“अव पनि त्यसले अर्को नानी पाउन सक्ली र त्यो पढी रहुँलौ, मेरो जहानलाई भेटाइ दिनोस्‌” &#039; भनेर जान्छ । श्याम गएपछि त्यहाँकुरेर बस्नेहरू त्यस नर्सले देखाएका &#039; पाटीमा हेर्न जान्छन्‌ जहाँ लेखिएको&lt;br /&gt;
१८ वर्षभन्दा कम र ३४ वर्षभन्दा बढी उमेर पगेपछि गर्भवती&lt;br /&gt;
१३०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुनुहुँदैन र प्रत्येक गर्भवती महिलाले आफूतो र नानीको स्वास्थ्यजँचाइरहनु पर्छ । पौष्टिक आहार खाने गर्नुपर्छ इत्यादि कुराहरू उनीहरूक्रमैले पढ्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
दिलबहादुरलाई श्यामका घटनाले झन्‌ छटपटी थपिदिन्छ र नर्सआउने जाने बाटोतर्फ हेरिरहन्छ । उससंग रहेका हूलमध्ये सबैजसो एकएक गरेर आआफूनो खबर सुनेर जान्छन्‌ केवल दिलबहादुर पर्खिरहेकोहुन्छु । गर्भवती महिलाहरूको प्रवेश चलिरहन्छ । उतीहरूका : साथमाआएका अभिभावकहरूका नयाँ नयाँ अनुहार थपिदै जान्छन्‌ । उस्तैछटपटी, उस्तै गरी चनाखो भएर उनीहरू . पर्खिरहेका हुन्छन्‌ । अनिरिचतसमयसम्म उपलब्धि पर्खेर बस्ता हुने मानसिक तनाउ पनि कमको हुँदैनके गर्नु जन्म र मरणमाथि कसको के लाग्छ : दिलबहाद्र अस्पतालकाएक कुनामा थुप्रिएर बस्षिरहन्छ, कुरिरहन्छ, कल्पना गरिरहन्छ, सम्भिरहन्छआफूनो गाउँ, त्यहाँको घर, आफू जन्मदा दुई दिदीहरूपछि छोरोजन्मिएकाले बाआमाले खुसी हुँदै के के गर्नु भयो होला ।&lt;br /&gt;
उहाँहरूको त्यो प्यारो चाहनाको छोरो आज आफ्नौ भन्न सबैछोडेर यस बिराना ठाउँमा आएर आफूतो भाग्यसंग यसरी जुद्धै जिइरहेछ। केका लागि : वाहा छैन बाँच्नका लागि हो या बचाउनका लागि ःझ बलभद्रलाई पनि संझन्छ, जो विदेशमा नोकरी गर्न गई धन कमाएरगाउँमा फर्केपछि ठूलो मान्छै भएर मान पाएको रवाफ देखाउँदै भन्नेगर्थ्यो। एकफेर नविदेशिएर धन कहाँबाट फल्छ : त्यसरी नै क संफन्छसेतेलाई, जो संयुक्त राष्ट्रसंघ मार्फत्‌ शान्ति स्थापना गराउने फौजमासामेल भई ती लडाइँ चलिरहेका देशहरूमा छिरी कार्यरत हुनपसेकोमगर्नी आमाको छोराको अभिलाषा पनि घन कमाई फर्कने नै छ भन्नैमेरो जस्तो ।&lt;br /&gt;
. कै पाए ती आमाबाले हामीजस्ता छोरा जन्माएर । बुढेसकालमाहामी उनीहरूको सहारा बन्न सकेका छैनौं । आफनो भविष्य बनाउनेबिचार राखैर उनीहरूलाई आफनै जीवनसंग लडेर जिउन यसै छोडिदियौंशून्य घरमा, उजाड बस्तीमा बढ्यौलीले कम्जोर भइसकेका तीआमाबाबलाई । अचम्म यो छ, तैपनि हामीले उनीहरूबाट माफ पाएकाछौँ, उनीहरूको आशीर्वाद र स्नेह रहिरहेको छ । अझै उनीहरूमा झिनोआशा छ हाम्रो सुख सम्वृद्धि र सन्तात हेर्ने । यो माया साँच्चै अनन्तछ।&lt;br /&gt;
दिलबहादुरले सोच्तासोच्तै आफनो र ती साथीहरूको जीवनीकेलाउन थाल्छ । क मनमनै भन्छ “हाँ, हामी साथै बसेर माया बाँड्ननसकै पनि बिर्सिएका छैनौं त्यो दैलानेर उभिएर बिदाइको टीका&lt;br /&gt;
१२३१&lt;br /&gt;
लगाइदिएको । घर छोडेर शहर पस्नु या विदेशिनु हाम्रो इच्छा होइनविवशता हो । यहाँ वसेर पनि हामीले के नै पाएका छौं र : कमैलेज्यान संकल्प गरेर गाउँ छोडेका छन्‌ भने कोही बिरानो देशमा एक्लैलडेर जिउन कम्मर कसेर जान तैयार भएका छन्‌ । के सुख तिनलेपाएका छन्‌ &#039; एक नोकर भएर जिइरहेका छन्‌ केवल भविष्यलाई संझैर,कल्पेर आज बिताइरहेका छन्‌ । गरिबीले ल्याएको यस विवशतालाईनिठुरीपना पनि त भन्त सक्दिन ।&lt;br /&gt;
दुखको अन्त्य पनि छिटै होला कि भन्नै पनि म देख्तिनँ ।अहिले मेरो छोरो नै जन्मियो भने पनि त्यो नोकर बाहेक अरू के होला! यौ आफनै देशमा, आफनै गाउंमा शिक्षाको र आर्थिक स्थितिको सधारनआई हदतैन ।&lt;br /&gt;
यहाँ हामी छोराहरू मात्र विदेशिएका छैनौं, गाउँबाट «शहरपसेका थप्रै छोरीहरू पनि छन्‌ जसका आँखाक्का परेलीहरू कहिल्यैओभाएका छैनन्‌ । गरिबी र समस्याका अजिइरले हामी सबैलाई निलिदिदैछ ।&lt;br /&gt;
थाहा छ, पढ्न कति जरुरी छ, ज्ञान हासिल त्ग्री केही पनिगर्न सक्तैनौं तर हामीले थाहा पाएर चाहेर पनि पढ्न पाएका छैनौं ।हामीले भविष्य होइन, आजको समस्या टार्न प्रयत्नशील हनुपरेको छ ।भोको पेट, नाङ्गो शरीर, रुखमनिको ओतले पहिलो प्रश्न यही गर्छ,“हामीलाई प्राथमिकता देक ।” यसैमा हामी रडमडगिएका छौं ।&lt;br /&gt;
गरीव हुनु कुनै अपराध होइन, गरीब हुनाको कारण भनेसोचनीय छ । वंशका कुनैले जवभावी धन उडाएर या परिश्रमी हुननसकेर नै गरिवी वढ्दै गएको हुनुपर्छ । ज्ञानको कमी, मौकाको कमी रधनको कमीले गर्दा उसले आफूलाई आन्मसंरक्षण दिन सक्तैन, अनि कंक्के हुन्छ ? जससंग यी शक्ति, यी गुण छन उनैमा समर्पित हुन्छन्‌ रउनैबाट शोषित पनि । क जानाजानी यसलाई स्वीकारी रहेको हुन्छ ।१ कम्जोरी कतै न कतै गरीव हुनमा हाम्रो आफनै हात छ ।त्यसैले भगवान्‌संग यति नै प्रार्थना छ, तिमीले मलाई छोरी दिन्छौँ याछोरो, जै भए पनि त्यौ परिश्रमी होस्‌ । मैलेभन्दा केही बढी उपलब्धिगर्नसकोस्‌ । आफूनै आउने प॒स्तालाई यस महामारीका गरिबी रोगबाटबचाउन सक्नेहोस्‌ ।&lt;br /&gt;
१३२&lt;br /&gt;
मिठाइको थाल शिवतर्फ बढाउँदै गौरी उसलाई मख मीठोबनाउन आग्रह गर्छै । शिव अकमकिन्छ र हाँस्नै भन्छ, &amp;quot;ए, न्यसा भएहामी बाजेवजै भयौं : कहिले पाई :&amp;quot;&lt;br /&gt;
“हिजो पाई, छोरी राम्री छे ।”&lt;br /&gt;
गा राम्रो भयो लक्ष्मी आइछ । अनि ज्वाइसाहेव नि &#039; कहिलेआइपुग्ने रे :&amp;quot;&lt;br /&gt;
“कस्तो थाहा नपाउनु भएको, तपाईले : दयाको सुत्केरी हुनेवेला नै भएको छैन । यो त दिलेले खुसी भएर मिठाइ खुवाएको नि ?घरमा साथै बमैपछि त्यो पति त हाम्रै परिबार मान्तपर्छ । त्यमैलेतपाईंले हामी बाजेबजै भयौं भन्दा चप लागेकी । साँच्चि नै, त्यस दिलेलेराधालाई कति माया गरेको &#039;”&amp;quot; यति रोएन त्यो । नानी पनि अप्नेसन नैगरेर निकाल्नु पच्यो । अलि ठूलो ओजनकी रही छ ।&lt;br /&gt;
शिवले मिद्राइ चपाउँदै भन्छु, &amp;quot;लोग्नेले स्वास्नीलाई माया नगरेकसलाई गर्छ : खुव अचम्मको क्रा थाहा पाए जस्तो गयौँ तिमीले त&lt;br /&gt;
बरु त्यो त राधाले छोरो पाइन भने पहाड लखेटिदिन्छु भन्थ्यो ।अहिले छोरी भएकोमा पनि मिठाइ खुवाउन तम्मेछ । कसरी त्यसले मनफर्काएछ्‌ ।&amp;quot; अर्को एक बर्फी मुखमा हाल्दै भन्छ, &amp;quot;मिठाइ पनि राम्रोछानेर ल्याएछ । तिमीले त्यसको मख हेरेर के दियौ &#039; रामे कुरा दिनूजे भए पति त्यसले हामीलाई आफनै ठान्न थालेको छ्‌ ।&lt;br /&gt;
&amp;quot;यति कुरा पनि म जान्दिनँ र तपाईंले वताउनपर्छ । मअस्पतालमै गई मुख हेरिसके । त्यसले नानी जन्माउन शत्यक्रिया गर्नपर्छभन्दा अस्पतालमा नै मनिर आएर यति रोएन, राधा बाचन भने म केगर्छ भनेको भनै थियो । त्यस्तो पो माया !”&lt;br /&gt;
“तिम्रौ र हाम मायामा पनि कहाँ कम्ती छ र : मलाई ठ्नेमौकै दिइनौ, झट्ट पाइहाल्यौ, नत्र म पनि दुई तीन हाते रुमाल भिज्नेगरी रोइदिन्वे&amp;quot; शिवलाई आज ठट्टा गर्न मन लाग्छ । झं बाहिरबाट घरफर्कदा नै प्रसन्न मृद्वामा थियो त्यसमाथि पनि मिठाइ खाएको ।&lt;br /&gt;
लोग्नेको ठट्टा सुनेर गौरीलाई लाज लागै पनि कता कतारमाइलो लाग्छ र हाँसै भन्छे, “के कुरा गर्नु तपाईसंग । लौ अरू पनिमिठाइ खानुहुन्छ भने लिनोस्‌ हामीले त खाइसक्यौँ &#039;&amp;quot;&lt;br /&gt;
शिवले अर्को एक समात्तै थालै आफनो अर्गाड नराख न भन्छ ।गौरीले थाल लिएर नै भआन्छातिर जान्छे । शिवले नुरले पनि नानिजन्माइहोली भनेर सझन्छ । न्‌र उसको संझनामा झलक्क आइरहन्छे ।&lt;br /&gt;
१३३&lt;br /&gt;
सोच्छ, नुरलाई बाबाले आफू उसको पछाडि रहिरहुँला भनेरआश्वासन दिई लोग्नेका घरमा पठाएको थियो । त्यसले उसलाई घरमाराख्यो या राखेन : फर्केर आई बाबा कहाँ नै बसेकी रहिछ भने बाबालेके गरी घानिरहेको होला : कतिलाई संरक्षण दिदै जाने ती बाबाले ःउनीसंग नै के छ र : एकपटक मृत्युको मुखबाट मैले नुरलाईजोगाएकाले मेरो केही कर्तव्य त्यसमाथि हुनपर्छ ।&lt;br /&gt;
शिवलाई यस सोचाइले च्वाँस्स घोच्छ र गौरीलाई बोलाउँछ ।गौरी दुई कप चिया लिएर आइपग्छ । एक कप शिवलाई दिदैबोलाउनको अर्थ सोध्छे । उसको हाँसी खुशी त्यति छिटै बदलिएको देखेरगौरीलाई असजिलो लाग्छ र जवाफको प्रतीक्षा गर्छे ।&lt;br /&gt;
शिवले नुरको करा उठाउँछ र गौरीसंग सोध्छ, “हामीले त्यसलाईयहाँ ल्यायौं भनेँ कै तिमीले नुर र त्यसको नानीलाई संरक्षण दिनसक्छयौं ! लोग्नेले घरबाट निकालिएकी रहेछ भने त्यो कहाँ जाओस्‌बाबालाई पनि राख्न गाह्रै हुन्छ दुई दई थपिन्छन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
झट्ट आएको पस्ताव सुनेर गौरी स्तम्भित हुन्छे र अक्मकाएरशिवको अनुहार हेर्छ । उसको अनुहारमा झल्केको दृढ संकल्पलाई जाँचेरक सोच्न थाल्छे भने शिवले सोही प्रश्नलाई विशेष जोड दिएरदोहोन्याउँछ ।&lt;br /&gt;
गौरीले त्यसपछि पनि केही नबोलेकीले शिवले संझाउने प॒कारलेभन्छ, &amp;quot;“कमार्ग छोडेर सतमार्गमा लाग्न चाहनेहरूलाई सहयोग गर्न हामोकर्तव्य हो, गौरी : त्यो अब फेरि देवकीको रूपमा रहन चाहन्न ।त्यसले. त्यो चाहेकी भए आत्महत्या गर्न तयार हुने थिइन । त्यसलेसुमार्गको स्वाद चाखिसकेकी छ तर उसलाई स्वीकारी नदिएकोले त्योआफपत्‌मा परेकी छे । तसर्थ नडराक, त्यो यहाँ आई भने हाम्रो तेस्रीछोरी भएर बस्छे । . साधनाले पनि यस पस्तावलाई नकार्ते छैन भन्नेमलाई विश्बास छ । तिमी नारीहरूले यी समाजले कुल्चिएका नारीहरूकोरक्षा गर्नुपर्छ । म पहिले त्यहाँको स्थिति बुझ्नु । त्यसपछि मात्र यहाँल्याउँला । जब मैले नुरलाई मर्न दिइन; त्यसले आक्रोशित हुँदै मलाईगाली गर्दै आफना असमर्थता जुन्‌ फलाकी र त्यसका घरमा पुग्दापरिवारले उसलाई देखेर गरेको व्यवहार जन्‌ छ त्यो म बिर्सन सकितनँ। गौरी, त्यसलाई जीवनसंग घृणा होइन, रहरले बाँच्न तिमीले सिकाइद्र ।&lt;br /&gt;
&amp;quot;भावक भएर लिएको निर्णय गलत पनि हुनसक्छ । यसलाई शान्तमनले सोचौं र के गर्न उपयक्त हुन्छ अनि त्यसै गरौला । भाग्ने रभगाउने नीति कम्जोर पनि हुनसक्छ त्यसले लक्ष्यदेखि टाडा लैजान पनि&lt;br /&gt;
१३४&lt;br /&gt;
सक्छ ।&amp;quot; यौरीले यसो भन्दै शिवको अनुहारमा यसले कस्तो प्रतिक्रियापार्छ, त्यो हेर्न खोज्छे । शिवलाई गौरीको भनाइ चित्त बझदो नलागेपनि जवाफ दिदैन र मनैमन भन्छ, “यो पनि डराई नूरदेखि पन्छिने नैयसको नियत छ । &amp;quot;देवकी&amp;quot; भन्ने चिन्नासाथ हाच्कहाल्छन्‌ चाहे त्योलोग्नेमान्छे होस्‌ या स्वास्नीमान्छे ।&lt;br /&gt;
शिव जति दिन डोटीमा बस्यो यी देवकीहरू र बदनीहरूकहाँ गईभेट गर्न छोडेन । प्रत्येक देवकीहरूको आत्मकवा बटुल्ने हो भने नारीसुधारका लागि विषयवस्त॒ आफैँ उपलब्ध हुन्छन्‌ । ती देवकीहरूपढेलेखेका त थिएनन्‌ तर तिनीहरूले जीवनको अर्को तस्बिर नजिकैबाटदेखेका हुँदा रहेछन्‌ । धेरैजसोको यस वृत्तिबाट मुक्त हुने नै चाहना हुँदारहेछन्‌ । उनीहरू भन्थे, &amp;quot;हामीलाई कहिल्यै गृहस्थी कस्तो हुन्छ,लोग्नेस्वास्नी बालबच्चा र अन्य परिवारसंग साध रहेर जिउँदा कस्तोअनुभूति हुन्छ, लोग्नेको माया कस्तो हन्छ, त्यो केही पनि थाहा छैन ।&#039;रातदिन यिनै लोग्ने मान्छेसंग हुन्छौ घीनैसंग क्रीडा गरिरहेका हुन्छौ तरलोग्नेको भृमिका के भन्ने जानेका छैनौं । ती लोग्नेमान्छेलाई सोध्छौ“तपाईंहरूको घरमा स्वास्नी छैन र यहाँ पैसा खर्च गरेर दिलबहलाउ गर्नआउनुहुन्छ भन्दा जवाफ दिन्छन्‌,” “ती घरका मली दाल बराबर भइहालेनि । उनीहरूलाई घरघन्दा गर्दैमा, नानी जमाउँदै हर्काउँदै तिनैलाई मायागर्दै स्याहार्दैमा हामीतर्फ विचार गर्नै कहाँ फुर्सत हुन्छ र !&amp;quot; जतिसन्तान बढ्दै जान्छन्‌ घरगृहस्थीमा झन्‌ झन्‌ डुब्दै जान्छन्‌ अनि स्वास्नीकहिलेकाही खाँचो टार्ने मात्र हुन्छे । हामी उनीहरूका कुरा सुनेर सोच्छौं,“यस्तो कसरी हुनसक्छ ! हामी सबैको भएर पनि तपाईंहरूलाई सन्तुष्टिदिन सक्छौं भने उनीहरू एउटा लोग्नेलाई पनि सक्तैनन्‌ ?&amp;quot; हाम्रा कुरासुनेर उनीहरू हाँस्तै भन्छन्‌ ,“तिमीहरूको जस्तो कला तिनलाई के थाहाछु? ती त मुर्ख छन्‌ ।&amp;quot; /&lt;br /&gt;
कुनैलाई त भन्यौं पनि, “किन दिनदिनै यत्रो कप्ट उठाउँदैलुकिछिपी आउनु हुन्छ । विबाह गरेर लैजानोस्‌, घरैमा म तपाईंकीएकलौटी भएर धेरै सुख दिन्छु । तँपाईँलाई एड्स सर्ला कि भन्ने डरहुँदैन भने मैले पनि स्वास्नी बन्ने रहर पुरा गर्न पाउँछु । हाम्रा कुरासुनेर उपिया फट्केजस्तो गरी फदकन खोज्दै भन्छन्‌, “गार्हस्थ्य जीबनमाके देखेका छौ र त्यसमा तिमीहरू यसरी आकर्षित भएका, यही जीवनस्वच्छन्दको छ । अधिकार र कर्तव्यको द्वन्द्वले गर्दा त्यस जीवतमा हरेकदिन रुनवाहेक केही हुँदैन । फेरि तिमीहरू भयौ देवकी ! धर्मसंगजोडिएका ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
१३५&lt;br /&gt;
के हो यो कुनचाहि ठीक, हामीले जान्नै पाएका छैनौं । एकपटकएउटा गृहस्थकी स्वास्नी आफैं आएर हामीलाई उसको लोग्ने - भाँड्ने दोषलगाउँदै भन्नुसम्म भनी आति आफैँ खुवसंग रोई । त्यो देब्रेर हामीलाईपनि खुवै माया लाग्यो । बिचरी कठै त भन्यौं तर हामीले गर्ने के ःतिनका लोग्नेहरूलाई नआउ भन्दा पनि मान्दैनन्‌ । उल्टै हामीलाई देवकीबनाएको अर्थ बताउँदै हामीले नाईं भन्न पाउदैनौं भन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
यस्तो अबस्था आफनै घरबार वालकहू भएका आइमाइलाई पनिकिन आउँछ : स्वास्नीमान्छे त्यहाँ पनि किन सताइएकी छे त्यो हामीलाईथाहा छैन । हेर्नोस्‌, न त बाव न त दाजुभाइ नै हाम्रो साथमा बमेकाछन्‌ । छन्‌ भने, आमा, दिदी, बहिनी मात्र यो वृत्ति लिएर जीविकोपार्जनगरेर बसेका छौँ । त्यस्ता हामीलाई के थाहा हुन्छ लोग्नेमान्छेकोस्वास्तीमान्छैसंगको सम्बन्ध रतीक्रीडामा मात्र सीमित नरही अरू क्षेत्रमापनि हुन्छ । हामी धेरैजसो यस वृतिबाट निस्केर अरू जीबन पनि हेर्नचाहन्छौं । अनुभव गर्न चाहदै पर्खिरहेछौ, कहिले त्यस्ता उद्दार नीतिभएका आउलान्‌ र हामीलाई सहयोग गर्लान्‌ । यहाँ हामीलाई खानलगाउन गाह्रो छैन । हाँसो, ठट्टा र मोजमस्तीमा नै जीवन गजारी रहेकाछौँ भन्नपत्यो । तर आज भोलि यी छोरीहरूको चिन्ता लाग्न धालिरहेछ। हामी यिनीहरूलाई मात्र भए पनि यसबाट उम्काउन चाहन्छौँ को छ,यहाँ यिनीहरूको जिम्मा लिइदिनै &#039; स्कूलमा पढाउन पठायौँ । तीछोरीहरू घर फर्कदा सदै आउछन्‌ र हामीसंग नै प्रश्न गर्छन, &amp;quot;आमातिमी खराब आइमाई रे हो : तिम्रो छोरी म पनि त्यसैले त्यस्तै खरावहुन्छु रे : तिमीहरूले पढेर के गर्छौ&amp;quot; भन्छन्‌ । किन आमा हामीलाईत्यसो भनेको भनेर प्रश्न गर्दै दिवकै लगाउछँन्‌ । लौ भन्नोस्‌, यस्ताप्रश्नको हामीले कै जवाफ दिनै :&amp;quot;&lt;br /&gt;
एकपटक त स्कूलको माप्टरै आएर हामीलाई धम्की दिदै भन्यो, &amp;quot;एतिमीहरूले छोरी पढाउने अरू कुनै स्कूल पाएनौ र हाम्रोमा नै पढायौ :तिम्रा कारणले गर्दा विद्यार्थीहरू दिनदिनै स्कूल छोडेर अन्तै जदि छन्‌ ।खबर पठाइसके, हामा छोराछोरीलाई कृसंगतमा लगाउन तिम्रो स्क्लमापठाउदैनौं । याद गर, भोलिदेखि छोरीहरूलाई स्कूल परायौ भने म केगर्छु ! तिमीहरूका एक दुई छोरीहरूले गर्दा गाउँका केटाकेटी सबैअनपढ हुने छाँट आइसक्यो । तिम्रा छोरीहरूले पढेर कुन्‌ अडडाअदालतजानुपर्छ र स्कूल पठाउछौँ हँ :&amp;quot;&lt;br /&gt;
हिजोको आमाको जीवनी हेछौं, आजको हाम्रो स्थिति संझन्छौँ रआउने भोलि त सपारौं भनेर यी छोरीहरूलाई स्कूल पठाउँदा यस्तोसुन्नुपर्छ । अनि हामीले के नै गर्ने सक्छौं : यो नारी जागृति र नारी&lt;br /&gt;
१३६&lt;br /&gt;
सुधार भन्ने पनि के हो : विग्रिएको कहाँ छ, त्यसमा पो सुधारल्याउनुपर्छ । सुधारमाथिको सुधार गर्न चाहन्छन्‌ हामीलाई हेर्ने हो कायता न उता पर्न थालेका हामी भएका छौं । छिर्न कसैले कतै दिदैनन्‌ ।&lt;br /&gt;
यस अवस्थामा परेका हामी आफैँ, बाँच्ने उपाय नपाएर मारिरहेकोबेला गाउँका यी बरालिएकाहरू आएर हाम्रा ती साना छोरीहरूमा पनिआँखा गाडदै जब नमीठा बोली ओकल्न थाल्छन्‌, त्यस वखत तिनलाईमन्टयाएर त्यही, जमिनमा गाडी दिऔँ कि जस्तो लाग्छ । तीघरालिएकाहरू यति साढि भइसकेका छन्‌ लाजै नमानेर झन्‌ छिल्लिनथाल्छन्‌ । लौ भन्नोस्‌ त, हामीलाई कस्तो बनाएका छन्‌ यिनले : यस्तोचलन कसले ल्याएको हो देवकी बनाउने ! धर्मको नाममा परुपलेआफूनो स्वार्थपर्तिको लागि रचेको चलन हो यो । यसमा हाम्रो के गल्तीछ, दाइ : त्यस्तै आमाले हामीलाई जन्माई क्रो त्यतिमात्र होइन र :हाम्रो आमादेखि ल्याएर हाम्रा छोरीहरूसम्मलाई देवकी बनाई मजा लुटनेयिनै मै हुँ भन्नै त हन्‌ नि । हामीमा मात्र सीमित राखी यो प्रथा&amp;quot; हटाउन” सरकारले मद्दत गर्छ कि, दाइ : कुनै बन्दोवस्त मिलाउन साक्न्छभने गरिदिनोस्‌ र यी छोरीहरूलाई बचाइदिनोस्‌ ।&#039; ॥&lt;br /&gt;
देवकी, बदिनी र झूमाका जीवन सुधारका बाटाहरू केही छन्‌ भनेबताइदिनोस्‌ &#039; कसैले यसतर्फ अगुवाइ नगरी यी छोरीहूको लुट हददैन॥ तपाईं लोग्नेमान्छेले जब्च यस्तो धार्मिक नियम, कानुन बनाउन भयो,अब यो पनि तपाईं नै मिलेर हटाउनु होस्‌ र समयको परिचय दिनोस्‌ ।यो कुन्‌ राम्रो चलन हो र यसलाई जगेडा गरेर राख्नुपर्छ । एकादेशकोक्रथा भएर बस्छ भने बसोस्‌, सुन्नेले एक दुई थोपा आँसु चहाउलान्‌ ।कुरा त्यतिमै सिद्धिन्छ ।&lt;br /&gt;
यस्ता मार्मिक व्यथा ती देवकी र बदितीहरूको र तृरको सुनेपछिशिबले संकल्प गरेको छ क यो नोकरीको फँसला भएपछि त्यसतर्फ नैलाग्ने र के योगदान दिएर उनीहरूका छोरीहरूलाई जोगाउन सकिन्छ,त्यो गर्दै जाने । नूर यसको संरक्षिका हुनेछ । साधना र म सहयोगी ।&lt;br /&gt;
शिवको संकल्प र संझनाको ताँदोलाई बाहिर बजेको मोटरकोहर्नले खलबल्याइ दिन्छ । उसको ध्यान त्यतैतिर जान्छ । साधनाको स्वरसुनिन्छ, &amp;quot;लौ त भौलि भेटौंला&amp;quot; । त्यसपछि क घरभित्र पसेकी जुत्ताकोद्वाक दवाक आवाज वढ्दै गएको बाट याहा हुन्छ ।&lt;br /&gt;
म&lt;br /&gt;
१३७&lt;br /&gt;
साधना आज धेरै खुसी भएकी छै । के कसलाई सुनाउँ जस्तो भईआमाको छेउमा जान्छे र आमाको हातबाट कादतैको आल पन्छाएरभन्छे,&amp;quot;आमा, दिदीले सड्ट पारगरिन्‌ । अब उनी खुसी छन्‌ विवाहलेल्याएको वितृष्णा गयो, आमा “गयो !&amp;quot;&lt;br /&gt;
गौरी छवकपर्दै भन्छे, “के सङ्कट परेको थियो तेरी दिदीलाई र अबगयो भनेर खुसी भएकी : ज्वाइँ साहेवसंग केही महिना छुट्टिएर बस्नपन्यो भनेर &#039; त्यो त चाँडै बोलाउँछु भनेकै थिए ।&lt;br /&gt;
साधना अलि गंभीर भएर भन्छ, “त्यो कारण होइन आमा । त्यतिनबझने हामी दिदी कहाँ छिन्‌ र । दिदीले तपाईंहरूलाई केही पनिसुनाउन भएन भन्दैमा उहाँ खुसी हुनुहुन्थ्यो भन्न सक्नुहुन्न । हाँस्ने मान्छेविवशतामा पनि हाँस्छ र आफनो दुःख लकाएर त्यसले अरूलाई दुःखीनपारोस्‌ भनेर पनि बाहिर देखावटी हाँसो निकाल्छ । हामी दिदीकोअवस्था त्यै थियो । मसंग कति हनु भएको थियो । प्रेरणा दिदीकोसल्लाह मानेर मात्र जिउ हलङ्गो नहुन्जेललाई त्यहाँ बस्न, राजी हुनुभएकोथियो । नत्र दिदी यहाँ कहिल्ब्रै घर छौडेर आइसक्नु हुन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
मलाई पनि लागेको थियो, पराइकी छोरीमाथि यी कति निठुरी हुँदारहेछन्‌ । स्वार्थले के मात्र गराउँदो रहेनछ ।&amp;quot; :&lt;br /&gt;
साधनाले अझै आमालाई तथ्य कुरा नखोलेर भूमिका मात्रबाँधिरहेकी सुनेर गौरी झर्कदै सोध्छे, &amp;quot;कुरो के हो, त्यो भन्न ? कतिलामो बखान मात्र छाँटिरहेकी । ज्वाईँबाट केही त्यसो भएको रहेछ भनेअहिले यहाँ भएकै वेलामा संझाडौँ । त्यसको जीवन यसै बिग्रत दिन तभएन ? विवाह भएपछि घर छोडेर माइत बस्न भनेको निकै गाह्रो क्राहुन्छ ।&lt;br /&gt;
साधना हाँस्तै भन्छे, &amp;quot;“भिनाजको दोसो बिबाह हाम्री दिदीसंग भएकोरहेछ । अमेरिकामा छोरी रहिछे । विवाह भएको तीन महिनाभित्रै लोग्नेकोछोरी भएको क्रा थाहा पाउनु, यता आफू आमा हुनलाग्नु, लोग्नेलेभिसाको कुरा उठाएर अमेरिका एक्लै नु र उताबाट आएका&lt;br /&gt;
१३०८&lt;br /&gt;
चिठीहरूमा प्रेमका स्वाङले मात्र भरिएको पाउन वास्तविकता कतैनलेखेको हुन्‌ के ती सबै कष्टदायी होइन्‌ र ! चिन्ताले चर्लम्म डुबेकीथिइन्‌ । हाम्री दिदीले भनोस्‌ पनि कसलाई, बदल्नसक्ने कुरै थिएन रत्यसैमा मिलौँ भने पनि मनलाई निकै निमोठनु पर्ने स्थिति भयो । उहाँकोअवस्था देख्ता हामीले नै केही दिन सहेर बस्नोस्‌ दिदी, भन्नुपर्ने थियो ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;अनि अनि : अहिले कसरी खुसी भई त ! कि ज्वाइँले आएरजाद्‌ गरिदिन भयो ? तँ पनि दिदीका त्यस्ता द:खलाई “थियो&amp;quot; माप्रत्याएर खसी हनथालिस्‌ : डमान नभएकाहरूलाई त म फुटेको आँखालेपनि हेर्न चाहन्न” भन्दै क रिसाउँछे ।&lt;br /&gt;
साधनाले आमाको रोषलाई हाँसोमा परिवर्तन गर्न हाँसौ भन्छे, “एआमा तपाइँको यो उच्लानको अर्वाध सकिडसकेको छु । फुटेको आँखाले केदेखिन्छ र हेर्दिन भन्नुहुन्छ : अब सबै कुराको रहस्य खलिसकेकालेतपाईंले चश्मा लगाएर राम्ररी हेरे पनि हन्छ । दिदीको शङका निर्मुलभइसकेकाले उहाँ खुसी हनुभएकी छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“लोग्नेले आएर क के भनेर फकायौ, त्यसैमा फुरुङ्ग परी होली ।यही त हामी नारीहरूको कम्जोरी हो । त्यस्ता चिप्लाको कुरा साँचोपनि कसरी मान्नु : राम्रोसंग वझबभझारथ गर्नुपर्छ, जीवन नै बिग्रिनेकुरा हो, यो । हाँसेर नउडाओ ।&lt;br /&gt;
&amp;quot;पीर गर्ने वेला बितिसक्यो आमा । मैले पनि भिनाजसंग भेटेरकरा गर्दा उहाँले दिदीको अगाडि भन्नभयो, “मेरी छोरी अवश्य हो तरस्वास्नी भने तिम्री दिदी मात्र हो । त्यस बालिकासंग मेरो मानवताकोनाता छ । मैले त्यहाँको सामाजिक संस्थामा पनि काम गर्नेगरेको छ्न ।त्यहाँका बालकहरू मसंग ज्यादै झयामिने गर्थे र मलाई डयाडी भन्थे ।म यहाँ आउँदा घेरै दिनसम्म तिनको साथ छुटेकाले त्यो स्याहार्ने संस्थाकीआमालाई दुःख दिइछ र तिनले चिठी लेखेर पठाएकी रहिछे । त्यहाँपुगेपछि मैले थाहा पाएको थिएँ, तितले घरमा चिठी पठाएकी छन्‌ भनेर। म चप यमैले थिएँ किर्नाक त्यो चिठी सायद घरमा प॒गेको छैन होलानत्र दयाले यसबारै केही न केही लेख््थी होली । तर तिमी दिदी साधारणअरू आइमाई जस्ती रहिनछैँ । मेरो अनुमान झूठो निस्कियो ।&lt;br /&gt;
जब मैले आफनै सन्तान जन्मनै भयो भन्ने सन, त्यसपछि म यतिखुसी भइनँ । हप्ता हप्तामा चिठी पठाउन थालें । तिम्री दिदीलाई यसोगर्नु, उसो गर्नु भनेर सिकाएर पठाउँथें । मलाई केटाकेटी अति मन पर्ने,त्यसमा पनि आफनै अंश । लौ भन त म कसरी त्यहाँ ६,७ महिना दिनगनेर बसेँ हुँला । यता भने त्यस्तो शङ.का तिम्री दिदीका मनमा पसेरहुर्किसकेको रहेछु । यसमा तिमी मलाई के दोष लगाउँछयौ : समाज&lt;br /&gt;
१३९,&lt;br /&gt;
सेवा गर्नु अधर्म हो : ती बालकहरू जसले बाबको माया पाएका छैनन्‌,त्यस्ताहरूलाई मैले माया गर्न के अनर्थ हो ? दयाजस्ती शिक्षित नारीलेयसबारे सोच्नपथ्यौं या सोधेर तथ्य पत्ता लगाउनपषट्टि लाग्नपर्थ्यो ।&lt;br /&gt;
मैले पनि दिदीको पक्ष लिएर भने, “के प्रमाण छ त्यो तपाईंकोआफनै सन्तान होइन र संस्थाको हो भन्ने : हामीले देखेका छैनौं भन्नेलेतपाईंलाई &amp;quot;ड्याडी&amp;quot; भनेकै छन्‌ ।&lt;br /&gt;
मेरो कुरा सुनेर भिनाजलै हाँस्तै दिदीलाई भन्नुभयो, “यिनले पनितिमीले जस्तो बिश्वास गर्न जानेकी रहिनछिन्‌ । लोग्नेमान्छेले तर्साएको छकि कसो : लौ दया, अब तिमी नै आफनी बहिनीलाई प्रमाण देखाएरदेङ । मैले भनेको पत्याउन्न होली ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
अनि दिदीले मलाई फोटो र भिनाजुको परिचयपत्र देखाउन भयोत्यो स्थाहार्ने आमासंग पनि टेलिफोनमा कुरा भयो । त्यो मेरी पनि अरूबालकहरूसरह संस्वाको संरक्षणमा नै रहिछे ।&lt;br /&gt;
एकले खुलस्त नभन्नु र अर्कोले शङ,का मात्र लिएर त्यसबारै खोजखवर नगर्नु दवैको सानो गल्तीले गर्दा जीवनले अर्कै मोड लिनलागिसकेको थियो । प्रेरणा दिदीका सल्लाहले बचाइदियौ र पौ आज दवैसाथमा रहन पाएका छौं ।&lt;br /&gt;
अहिले त दिदीले मलाई संझाउने पाराले भन्न हुँदै छ, &amp;quot;साधनाहेर यो दाम्पत्य जीवनको सफलता समझदारी, घैर्य र दरदर्शितामा निर्भर&lt;br /&gt;
। तैले पनि यौ करा नाविर्सन्‌ । ।अलि हाँस्तै। मानौं मैले पनिजीवन निता ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“मेरा त सन्तानै कपटी । यत्रो कुरा भइसक्ता पनि हामीलाईअत्तोपत्तो दिएको होइनन्‌, आमाबाबुले केलाई सुख र केलाई दुःख भनेरमान्छन्‌, त्यस कुराको ज्ञानै छैन । तेरो पनि मनमा के छ, भन्‌ ?विवाह गर्नपर्ने उमैर भइसक्यो : यो वेला घर्केपछि भनेजस्तो लोग्नैपाउन गाह्ठो हुन्छ । कोही तेरो मनले ठम्याएको छ भने भन्‌, नत्र हामीखोज्न याल्छौं । दाजको पनि फर्कने वेला भइसक्यो !&amp;quot; यति भनेरजवाफको प्रतीक्षा गर्छ ।&lt;br /&gt;
साधना आमासंग टाँसिदै भन्छे, “तपाईंले कान्छो ज्वाइँ कहिलेहराउनु भयो र खोज्छु भन्नुहुन्छ । त्यस्तो भगवा र लुकुवासंग मैलेकसरी जीवन निर्वाह गर्न सकुँला ! त्यसलाई लुकेर नै बस्न दिनोस्‌ रमेरो विवाह भइसकेको खबर त्यहीं सनाइदिनास्‌ ।”&lt;br /&gt;
&amp;quot;के रे &#039;विवाह भइसक्यो रे ? कोसंग कहिले विवाह गरिस्‌ ?तिमीहरूका लागि हाम्ती कोही भएनछौँ : जा मसंग टाँसिन पनि आउनपर्दैन” भनेर घचेडिदिन्छै ।&lt;br /&gt;
१४०&lt;br /&gt;
रिसाएकी आमालाई संफझाउने हेत्ले भन्छे, &amp;quot;मेरो कुरा त पुरासुनिदिनोस्‌ । अनि जै गर्न मन लाग्छ, गर्नोस्‌ । घचेड्ने मात्र होइनघरैबाट निकाले पनि निकाल्नोस्‌ । बाआमाको छहारी पाएकी थिएँ, त्योपनि हरिने भयो छोरीको जनी मानेर सहुँला ।”&lt;br /&gt;
छोरीको क्रा सुनेर गौरी शान्त हुन्छे र मनमनै भन्छे, “विवाहकोबन्धन के हो भन्ने यिनलाई थाहा छैन । लुकिश्िपी जोसंग यसो भेटभयो, केही दिन मीठा कुराहरू गन्यो, पुगीहाल्यो । के हावा चल्नथालेको&lt;br /&gt;
- यस्ता ?&lt;br /&gt;
गौरीको मनले जे जसो भनिरहेको भए पनि साधनाले आफनोविवाह भएको यसरी बताउँछै, &amp;quot;म विमान परिचालिकाको नोकरीमासमर्पित भइसकेकी छु, मेरो बिवाह यसैसंग भइसकेको छ याने । “सेवा”संग । मैले व्यक्तिसंग बिवाह गरी वैवाहिक जीवन बिताउने सपना देख्नछोडिसकेकी छु । ती हाग्ना साथीहरू जसले विवाह गरेका छन्‌, जसलेविवाहको प्रस्ताव पाएका छन्‌, ती धेरैजसोको कुरा सुन्दा हामी यसपेशामा लागेकाहरूले सेवामा नै समर्पित भई जीवन यापन गर्न श्रेयस्कर&lt;br /&gt;
जस्तो मानेका छौं । हजुरआमाले बाबालाई यसका शिरमा राजाको&lt;br /&gt;
द्र परेको छ भन्नुहुन्थ्यो । त्यस्तै नोकरी गर्नेहरूमाथि पर्ने त्यो छापहामीमा पनि लागिसकेकाले यसैसंग विवाह भइसकेको भनेकी हुँ । मैलेगल्ती भने आमा ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
“अहिले पैसा कमाएका छौं, उडेका छौँ र उमेर र समय वितेकोपत्तै हुँदैन । पछि यिनै धनको प्रयोग गरी सामाजिक सेवा गर्छु भन्नेसोचेकी छु । शिशुको रहरै लागै कि कुत्रिम गर्भधारण गर्छु कि अनाथआश्रम खोल्छु । एक मात्र होइन, बीसौं सन्तानमाथि मभित्र उम्लिएकोममता पोख्न पाउनेछु । अनि मलाई के नै चाहिन्छ र ! अहिले हेछुँ,त्यो संझनाले के पाएकी छे : जसले घरमा विरोध गर्दै बाआमासंगबोलिचाली छोडेर विवाह गरी केवल लोग्नेको माया पाउन । तर लोग्नेलेभने संझनासंग होइन, उसका कमाइसंग विवाह गरेको रहेछ । यो कुरापछि मात्र थाहापाई जब समय उसका हातबाट चिप्लिसकेको थियो ।&lt;br /&gt;
त्यस्तै छु सधाको जीवन पनि । लोग्नेले उसलाई आफनो व्यापारबढाउन प्रयोग गरिरहेको छ । कुनै दिन पनि उससंग प्यारको व्यवहारगरिएको हुँदैन रे । भन्छ रे, यसपटक यो ल्या, त्यो ल्या । समात्छ किभन्ने डर पति उसलाई छैन रे । “नाईँ” भन्ने शब्द निस्क्यो कि त&amp;quot;सहिनसक्न्‌ गरी गाली गर्छु रै । पैसाका लोभले कै कस्तौसम्म गराउँदोरहेछ भन्ने यही पैसा कमाउन थालेपछि थाहा पाउँदै छु । यो मोहमहजस्तै रहेछ जसको स्वाद लिन झिंगा झम्टेर जान्छ र त्यहीँ भनभनाई&lt;br /&gt;
१०१&lt;br /&gt;
रमाइरहन्छ । उसले त्यसभन्दा वढी आनन्द अरूमा सोच्नै सक्तैन ।कुनैको यस्तासंग संवन्ध हुनगई यस प्रकारले जिइरहेका छन्‌ भने अर्कीसाथीको प्रेमबियोग भएको छ यही नोकरीले गर्दा । उसको प्रेमीले भन्छरे, यो नोकरी छोडिस्‌ भने मात्र म तँसंग बिहे गर्छु । उसलाई योनोकरीप्रति घुणा छ रे । रेनाले यो नौकरी म त्याग्न सक्तिनँ । मैरौयोग्यताले यति पैसा कमाउनसक्ने अर्को नोकरी पाउन सक्तिनँ र यौसेवाको प्रकृति नै लावण्यमय छ । नोकरी र प्रेमको चेपामा परेकी रेनाविचलित भएकी मैले देखेकी छु । त्यसैले म विवाह गरेर समस्यामा पर्नचाहन्नँ । मलाई पनि वैवाहिक जीवनभन्दा यही नौकरी गर्नमा ज्यादाप्रसन्नता छ । म आफू भएर बाँच्न चाहन्छु । म कसैको पनि प्रयोगकालागि न त दबाब सहन सक्छु त त आफूलाई अर्पण गर्न नै । त्यस्तोस्वभावको मैले विबाह गरेर के सुख पाउँला !&amp;quot;&lt;br /&gt;
गौरीले छोरीको कुरा सुनिरहन्छे । क कहिले शान्त त कहिलेआवेगमा आउँदै बोलिरहन्छे । उसका अनुहारमा विभिन्न रङ्गहरू उलदैंभावनासंग खेल्दै उत्रन थाल्छन । हाँस्तै साधनाले उठाएका कुराको अन्त्यगंभीर स्थितिमा पुगेर प्रशनवाचक भई अड्छ । गौरीले छोरीको मनस्थितिबुर्भेर सोध्छे, “साथीहरूको कथा मात्र सुनाएकी हो कि तेरो आफनैपनि हो ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
झूटो बोदिल्त भन्ने अठोट लिएर चल्ने साधनाले पनि यसपटकबाआमाका मनको शान्तिका लागि भनिदिन्छे, “अरूको व्यथा सुनेर बेलैमासतर्क भएकी मेरो के घटना हुनसक्छ ः तपाईंहरू निश्चित हुनोस्‌, यस्तासमस्या म आफना जीवनमा आउनै दिन्नँ । त्यसैले त म संकल्पबद्ध भईभनिरहेकी छु, विवाह नै गर्दिनँ भनेर । तपाईंहरूलाई दुःख लाग्नसक्छमैले वढी कन्या रहेर नै जीवन बिताउने निश्चय गरेँ भनेर । विवाहितजीवन नै उत्तम जीवन हो भनेर भन्ने पनि केही छैन । जसरी हरेकक्षेत्रमा नयाँ नयाँ तरिका देखा पर्दैछन्‌ त्यसैगरी जिउने क्षेत्रमा पनिआउनुपर्छ । म परिवर्तन चाहन्छु, म नयाँ बाटाको कुन न&amp;quot; । मैंसाधना गर्न चाहन्छु जिन्दगी र जीवनका शैलीबारे । यसप्रतिआफनो अरुचि नदेखाई, सक्नुहुन्छ भने सहयोग गरिदिनोस्‌ । त्यसले मलाईहौसला दिनेछ । शारीरिक सम्बन्धबाट संतुष्ट हुनुभन्दा बढी नारीले खोज्नेअरू पनि छन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
यति पररर बोलेर आँखाभरि आसु पार्दै साधना आमासंग बस्ननसकेर उठेर हिड्छै । छोरीको मनस्थितिको अड्कल काटेर गौरी सोच्छैसाधनाको जीवन उजाड पारिदिने कारण उनीहरूको आर्थिक स्थितिकोबोझ उसमा लादूनले त होइन ? यस सोचाइले गौरीलाई छोरीको&lt;br /&gt;
१४२&lt;br /&gt;
पछिलाग्नै पार्छ र उसले साधनालाई आफूर्पाट्ट फर्काई उसको आँस पछतैभन्छे “तिमीलाई दु:ख दिने हामी भयौं माफ गरिदैक छोरी ः”&lt;br /&gt;
साधनालाई आमाको क्षमायाचनाले झसङ्ग पार्छ र छिनैमा हँसिलोअनुहार पार्ने प्रयासगर्दै भन्छे, -&amp;quot;केमा क्षमा माग्नु भएको, आमाले ?तपाईंले मलाई बलजफती नोकरी गर्न लगाएको ठान्न भएको : तपाईंलेयसो भन्न थाल्नुभयो भने मेरो स्वल्प सन्तुष्टि पनि हराउँछ । मैलेआफनो कर्तव्य संझैर तपाईंहरूसंग जिट्टी गरेर जागिर खाएकी हुँ । मेरोआँखामा आँस्‌ देखेर तपाईंले मेरो मनमा चोट परेको छ भन्ने सोच्नभएको होला, कुरो त्यो होइन । गलाई अफसोच मात्र लागेको हो हाम्रोसोचाइको तह संझैर । लोग्नेस्वास्तीको नाता, बाबआमा छोरीको नाता,दाजुभाइदिदीबहितीको नातामा समेत कै भावना आउन थालेको आमा ?यसलाई विकास भन्ने कि अधोगति मान्ने ः&lt;br /&gt;
हरेक दिनको अखवार पढ्दा एक न एक खबर यस्तो छापिएकोहुन्छ जसमा नजिकका नाताले पनि नारीलाई धोखा दिएको हुन्छन्‌ । केकालागि : छिः, सोच्न पनि मन लाग्दैन । कस्तो: भौतिकवादतर्फ मोहबढ्दैछ । मृगतृष्णा लिएर भौतारी रहेछन्‌, केका प्राप्तिको लागि, थाहाछैन । त्यो सुखको लागि हो या द:खको लागि । यो पनि थाहा छैन यीसब उनीहरूले कसका लागि गर्दै छन्‌ । केवल हामा हा मिलाएरदौडिरहेछन्‌ । कसले पथप्रदर्शन गराउने : यही सोचेर रुन मन लाग्छ ।कम्जोर भएर रोएकी होइन, आमा, यो आँस बगाएर शान्त हुन मात्र&lt;br /&gt;
चाहेकी ॥।&lt;br /&gt;
“किन शान्तिको खोजीमा परिस्‌ त्यो बुझेर नै मैले भनेकी हुँ ।आँसुलाई त जे जसौ भन्‌ त्यो असमर्थताको परिचप नै हो । त॑भित्रचिन्ताको चिता जलिरहेछ, तँ त्यस अग्निलाई लुकाउने प्रयास गर्दै छेस्‌ ।पथप्रदर्शनको आवश्यकता तैलाई पनि त्यतिकै छ जत्तिको तैले अरूमादेखेकी छैस्‌ । तैले चनौती स्वीकारेर नै प्रमाणित गर्न सक्नुपर्छ कुनधारणा कसले लिएको गलत रहेछ । भागेर होइन त्यागेर होइन अपनाएरअगाडि बढ्दै जा । त्यो नै नारीको आजको जरुरत हो । सक्छैस्‌ भनेहौप्तला बट्लेर भन्न सन्नुपर्छु मैले नोकरी गरेर कुनै अकर्म गरेकीछैन । नारीले पनि बाहिरी क्षेत्रमा काम गर्नसक्छ ।”&lt;br /&gt;
साधना आमालाई हेरिरहन्छ र मनमनै भन्छे, “थाहा छ, आमातपाईंले मेरा प्रगतिमा साथ दिनुहुन्छ भनेर । त्यही विश्वास लिएर त मदही भएकी छु ।”&lt;br /&gt;
आमाछ्ोरीका सबै कुरा नसुने पनि छोरीले विवाह गर्दिन र सेवामासमर्पित हुन्छु भनेको सुनेर शिव खड्का टुप्लक त्यहाँ आइपुग्छ र&lt;br /&gt;
१४३&lt;br /&gt;
भनिहाल्छ, &amp;quot;विवाह गर्दिन, सामाजिक सेवामा लाग्छु भन्ने यो धृन तँलाईकताबाट आयो ! ए नानी सेवा नै गर्ने तेरो इच्छा छ भने विवाहलेकहिल्यै रोक्तैन । जीवनको हरेक अटालीबाट नै अर्को जीवनयात्रा शुरुहुन्छ । पुर्णत्व प्राप्तिका लागि विवाह र दाम्पत्य जीवनको पनि अनुभवचाहिन्छ । यस दनियाँमा सबै व्यक्तिको एउटै विचार हुँदैन । तेरोसामाजिक सेवा गर्न इच्छालाई प्रा गर्न तेरी आमाले मात्र होइन, मपनि तयार छु ।&lt;br /&gt;
तर वन एउटा क्रामा भने याद राख्नुपर्छ, सामाजिक सेवा गर्छुभनेर नै तम्सने हो भने जातीय भेदभाव ।पुरुष र नारी) राख्न उचितहुँदैन । समाजमा पुरुषको विकाप भएन भने नारी विकास असम्भवहुन्छ । आजको नारा “नारी विकास” लाई वदल्नु पर्छ र केवल भन्नुपर्छ“मानव विकास&amp;quot; ।&lt;br /&gt;
साधना बाबाको तर्क सुनेर केही पनि बभझिदन र सोघ्छे, “नारीविकास पुरुष विकास बेगर असम्भव रे ? किन बाबा ?”&lt;br /&gt;
शिब संभझाउने भाकाले भन्दै जान्छ, &amp;quot;आजको समाज पुरुषप्रधानछ्‌ । प॒र्षमा चेतना आउन सकेमा मात्र उसले थाहा पाउनसक्छ मानवकोअर्को छूप नारी शोषित भएकीले नै उसले समाजमा पहिलो स्थानओगद्न सकेको हो । यस्ता सोचाइले जाग्रत्‌ भएर मात्र सुधारका लागिअग्रसर हुन सकिन्छ । नत्र जे छ, त्यसैलाई औँठ्याइ राखेर सुधारलाईनिम्त्याउँदैन । बरु नारी स्वतन्त्रताप्रति घोर बिरोध गर्दै आफ्तो समाजमाप्राप्त प्रधान स्थानको सुरक्षा गर्न घाल्छ । तैले याद गरेकी हुनुपर्छ जुनघर सुसम्पन्न छ, त्यस घरका नारीहरू जतिसुकै शिक्षित भए पनिघरभित्रै रही आफनो इच्छा अनुसार आफनो व्यक्तित्व विकास गर्न पाएकाछैनन्‌ । काम गर्न बाहिरी दुनियाँमा निस्कनु केवल पैसा कमाउनलाई मात्रहो भन्ने धारणा छ । अहिलेसम्म नारी बिकासको लागि पहिलो एकपाइला मात्र उठेको छ । त्यसतर्फ चाल चल्न अझ सकेको छैन । बल्लथाहा हुन थालेको छ, छोराछोरी दुवैको लागि पढाउनु उत्तिकै आवश्यकन्छर । छोरीको विवाहको लागि योग्यता बढाउन र छोराको नोकरीनै योग्यता बढाउनलाई मात्र भन्नै संझिएको होस्‌ । &amp;quot;यति भनेर कखूबसंग हाँस्छ । गौरी र साधना यसको अर्थ राम्री नबुझैकाले एकअर्काको अनुहार हेराहेर मात्र गर्छन्‌ । शिवले फेरि क्रा उठाउँछ, &amp;quot;यस्तोपरिभाषा लिएको छ पढाइको आवश्यकताले । यो ज्यादै सङ्घीर्ण सोचाइहो तर के गर्छस्‌, घेरैको भनाइ यस्तै छ ।”&lt;br /&gt;
१४४&lt;br /&gt;
साधनाले फयाटट जवाफ दिन्छे, “ती घेरैभित्र हामी त छैनौं । मैलेपढेकी नोकरी गरेर जीविका चलाउनलाई हो, विवाह गर्नलाई योग्यताबढाएको होइन ।”&lt;br /&gt;
“फरक यति मात्र सोचिस्‌ : आफूलाई समानतामा पुन्याउन सकेमात्रले पुग्यो ! ए छोरी, त्यसभन्दा माथि उठ्नै उद्देश्य राखी सोच्नेप्रयास गर अनि मात्र तैँले थप्रै उपलब्धि पाउन सक्छेस्‌ । मलाई यतिमात्र थाहा छ शिक्षा र अध्ययन पैसा कमाउने उपाय मात्र होइनन्‌यिनले ज्ञानप्रबरद्धन गराई जिज्ञासा उत्पन्त गराउँछ जसको खोजीमा हामीक्रियाशील बनिरहेका हुन्छौं । आफनो व्यक्तित्वको विकास गरि रहेकाहुन्छौ यी नै विकासले हो आउने प॒स्ताका लागि मार्गदर्शन गराउने ।यही नै हाम्रो लक्ष्य हो मावन सभ्यताप्रतिको हाम्रो कर्तव्ययक्त योगदान हो॥ यसै सिलसिलामा उसले आफतो भ्रमणबाट प्राप्त भएका ज्ञानहरू नुरको,देदकी, बदिनीहरूको जीवनगाथा र बालबालिकाहरूको गाउँबाटैशहरतर्फको भागदौड, गाउँको स्थिति सबैवारे क्रमबद्ध तरिकाले सनाउछ रभन्छ, &amp;quot;हेर नाती, सुधारको पहिलो चाल यिनका शिशुहरूलाई संरक्षणदिएर, यो बदिनी, देवकी र झुमा प्रथा हटाएर ती जो जति अहिले छन्‌तिनीहरूलाई नयाँ जिउने उपाय बताएर अनि बालबालिकाहरू जो भड्केरदिशाहीत भएका छन्‌, तिनीहरूलाई समालेर शिक्षा र स्वास्थ्यप्रतिको ज्ञानदिनुको साथ साथै अनशासन, स्वतन्त्रता र हाम्रो संस्कृतिको बारे अर्थ्याउनअनिवार्य भएको छ । समयले बताइसकेको छ, यी प्रधा स्वार्थपूर्ण छन्‌ रयी धर्मको आडमा टिकेको शोषण नीति हो ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
तपाईले भन्नभएको मिध्या त अवश्य होइन तर मैले यसबारेसुनेकी अर्कै छ । यी बदिनी र देवकीहरूलाई यो वृत्ति छोड्छौँ भनेरसोध्दा भने रे, “किन छोड्ने र यसले हामीलाई कनै वाधा दिएको छैनबर₹ आजभौलि हामीलाई यस्ता काम गर्न नदिएर दुख दिन लागिरहेछन्‌ ।हामी यसको विरुद्धमा जुलुस निकाल्ने भएका ।&amp;quot; साधनाले आफूलेसुनेको कुरा बाबालाई बताइ उहाँबाट यसबारे सफाइको माँग गर्छे ।&lt;br /&gt;
शिवले जवाफ दिन्छ, &amp;quot;क्नैले भने पनि सबैको धारणा यस्तोछैन । जीवन घान्न सक्ने अर्को उपाय नपाएपछि भनेछन्‌ भने पनियसलाई प्रतिशोध मान्नपर्छ । यिनले परिश्वमी काम गर्न पनि सक्तैनन्‌ नत घरेल काममा नै कसैले लगाउँछन्‌, नत चाहेर स्वास्नीको रूपमारहनपाएका हुन्छन्‌ । त्यस अवस्थाका यिनले भन्छन्‌ के ! तैपनि यिनीहरूसबैजसोले आफ्नी छोरीले यस वृत्तिमा बस्नु नपरोस्‌ भनेर अनुरोध गर्दैहिड्न थालेका छन्‌ । एक प्रकारको ज्ञानज्योति उनीहरूमा उदाइसकेकोछ । तसर्थ यी हालका नारीहरू जो यस प्रथाको चेपोमा परेका , छन्‌&lt;br /&gt;
११४&lt;br /&gt;
यिनलाई पनि कुनै कामगा लगाइ बाँच्ने नयाँ आधार दियौँ भने यिनलेस्वीकार्छन्‌ भन्ने मलाई विश्वास छ । यदि उपाय बताउँदा पनि मानेनन्‌भने त्यस्तालाई संझाएर, दबाव दिएर या के गरेर हुन्छ यसबाट छुटाउनेप्रयास भने गर्दै जानुपर्छ । हामीले समय अनुसार छुटाउनपष्टि दवावदिनपनिसक्नु पर्छ । यस्तो कामलाई अत्याचार भनिदैन ।&lt;br /&gt;
बाबुआमाको छलफल र बाबले दिएको धारणा र संकल्प सुनेरसाधना मनमनै भन्छे, “यी नारीहरूको जीवन शोषणको एक भाग अवश्यहाँ । यस्ता शोषित यहाँ कँयौं छन्‌ । वाकप्रहारले छटपटाइरहे पनि संघर्षगरिरहेका छन्‌ । यहाँ आफनै छोरीलाई हेर्नोस्‌ न, मैले यो विमानपरिचालिकामा नोकरी गरेको कसलाई मन परेको छ । म जुटपत्ती खेल्दाफर्यांकिएका तासको नमिल्ने पत्ती भएकी छु, किन ? एउटै अर्थले यहाँसेवाको काम गर्नेहरू तुच्छ मानिने गरिन्छन्‌ । मेरो त्यो नर्स साथीको केबिराम छ र त्यो बदनाम भइरहेकी छे । उसको नोकरीका प्रकृति नै केकलङ् हो : यदि यही नै हो भने किन यस्ता नौकरीका लागिस्वास्नीमाछेको नै माँग हुन्छ ? के नोकरी गर्ने स्वास्नीमान्छेको सामाजिकस्थितिमा नीच तह रहनुपर्छ : नारी यसै पनि व्यवहारमा दोसो दर्जामा छेभने नोकरी गर्ने नारीलाई कुन तहमा झार्ने ?&lt;br /&gt;
यहाँ पनि स्वार्थ लुकेको छ । आफनो र अर्काको भावनानीतिशास्त्र अनसार छुट्टिन राम्रो कुरा हो तर गण र अवग्णको पारखगर्ने दृष्टिमा आफूनो र अर्काको विषयको फरक आउत स्वार्थीपत हो ।अर्काकी छोरी जेसुकै होस्‌ आफनो असल हुनुपर्छ । अर्काकी स्वास्नीजुन्‌सकै स्वभावकी होस्‌, आफनो हुने असल हुनुपर्छ इत्यादि कति छन्‌कति : याहा छैन । यसरी छनोट गर्दै र आफूनोमा अहम्ले बन्देजलगाउँदै जाँदा ती नारीहरू शोपित भई निकम्बा भइरहेका हुन्छन्‌ । मेरोआफूनै ठूला बाका छोरीहरू कुन स्थितिमा जीवन निर्वाह गरिरहेका छन्‌ ।तिनै दिदीहरू सँदै भन्छन्‌, &amp;quot;तिमी त आफ्नै खुट्टामा उभिन सकेकी छौँ,कसले के ताना सुनाउन सक्छ ! वेलैमा हामीलाई इलममा लगाउनसकेनन्‌ अहिले हातको गाँस आँखाभरि आँसु लिएर निल्नुपर्छु । घाँटीबाटजति तल निल्न खोज्छु दुःखका गाँठाले अव्याउँछ । त्यस बखत आफनोइज्जत भनेर हामीलाई लन्ठाएर राखे, अहिले हामी नै यिनका बोझभएका छौं ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
अहिलै पनि ठूलो बा घरकी आफूता छोरीलाई बिर्सेर नारीप्रगतिको महात्म्य सुनाउँदै भाषण दिंदै हिड्नुहुन्छ र साथसाथै बाबालाईभन्न पनि छोड्नुहुन्न, “कान्छा, के चाला हो तेरो : हाम्रो सन्तानले पनित्यस्तो नोकरी गर्ने ? त्यो पनि छोरीले । ताक कटाउने काम गर्दैछस्‌ तँ,&lt;br /&gt;
१०६&lt;br /&gt;
होस्‌ राखे : पैसाले पुग्दैन भन्छस्‌ भने मसंग लिए म दिन्छु तँलाई भन्‌कति चाहिन्छ : &amp;quot;यस्तो छ हाम्रो समाजको चलन ? क अफसोच मान्दैबाआमालाई आपसमा कुरा गर्न छोडेर आफनो कोठामा जान्छे रझ्यालको पर्दा खोल्दै बाहिर हेर्छे । नीलो अनन्त आकाशमा बादलकाटुकाटाक्रीलाई छुने कोशिश गर्दै एउटा च्ठा कावा खादै फरफराइरहेकोदेख्छ । त्यो क दृश्य उसलाई निकै प्रभावकारी लाग्छ । त्यहाँबाट टक्कैहद्न मन । हेदहिर्दै आफूलाई त्यही चङ्गासंग उड्दै बादल छुनेप्रयास गर्न थालेकी अनुभव गर्नयाल्छे ।&lt;br /&gt;
र&lt;br /&gt;
१४७&lt;br /&gt;
बिहानीपखको स्वच्छ वातावरण साँच्चै रमाइलो हुन्छ । चारैतीरशान्ति नै शान्ति । शिव खड्कालाई कहिले के हुन्छ के यस्तोवातावरणको आकर्षणमा फसी हाल्छ र जुरुक्क उठेर घुम्न हिँड्छ ।फर्कदा ताजासाग पातको मठा बोकेर ल्याउनै वानी नै बसिकेको छ ।&lt;br /&gt;
एक बिहानीमा यसरी नै घम्दै जाँदा उसको ध्यान त्रिचन्द्र कलेजकोभवनमा गएर अडछ । जहाँबाट उसका जीवनका मख्य मुख्य घटनाहरूशा भएका थिए । गौरी त्यही बाटो गरी पद्यकन्या कलेजमा जाने गर्थीर क गौरीलाई पर्खालबाट टाउको उठाएर छेड हानेर बोलाउने गर्थ्यो ।गौरीले आँखा तरेर रिसाएमा लम्ने गरेको देखेर साथीहरूले उसलाईहुनसम्म खिज्याउँदैनथे ।&lt;br /&gt;
एकफेर यस्तै क्रममा करा बढ्दाबढ्दै कटपीट पनि, भएको थियो ।त्यस उमैरको सोचाइ पति कस्तो कस्तो : कुनै ठोस कारणै नभएरझगडा हने र मिलाप पनि भइहाल्ने, उसले संझन्छ उसको त्यही साथीमकन्दलाई जाँचको नतिजा सुनेर दिक्क भईबसेका बेलामा आफूलाईसान्त्वना दिदै संझाउने गरेको । अनि क सोच्छ मैले जुन भावनालेउस्तलाई हेर्थे र व्यवहार गर्थे उसले मलाई ठीक त्यसको विपरीत रूपलेमाया गर्थ्यौ र संझाउदै भनेको थियो, “सफलताको खोजमा नै यस्ताअसफलताहरू आइपर्छन्‌ । यसैमा दुःखी हुँदै अल प्रयास गर्न छोड्दै गयौंभने हामी परीक्षामा मात्र होइन, जीवनको हरेक क्षेत्रमा हार्दै जान्छौं ।तिम्रो त यो असफलता पनि होइन आफूले अनुमान गरे जति भएन भन्नेमात्र हो । यति मै पढ्नै छोड्छु भनेर कुबद्धि नलेक । तिमीले पढ्नछोड्यौ भने कसको मेख मर्छ : तिमी आफैले द:ख ओग्नुपर्छ । यस्तोरिस निकालेर भविष्य नष्ट नपार ।&lt;br /&gt;
त्यस्तो सल्लाह दिनै मुकुन्द पनि अहिले हरेक क्षेत्रमा हारेरबाँचिरहेछ । यो समयको कस्तो चक्र हो ? बद्लिदो परिस्थितिसंगआफूलाई मिलाउन नसक्ने सबै यस्तै हुँदा रहेछन्‌ । मेरो हार पनि तकमको छैन । केवल मैले स्वीकारेको मात्र छैर । त्यस बेला परीक्षाफल&lt;br /&gt;
१४&lt;br /&gt;
सुनेका अवस्थामा जस्तै म हरेक नतिजामा अनुमानको विपरीत नै परेकोहुन्छु । म ठान्छु मैले राम्रो गरेको छु तर त्यो कसरी कहाँ चिप्लिन्छु म&lt;br /&gt;
छक्कपर्छु । समालिनु चिप्लनु र छक्कपर्नमा नै आधाभन्दा बढीजीवन बितिसकेको छ, अब बाँकीमा के नै गर्न सकुँला । त्यसै वेलाघण्टाघरले ट्वाङ ट्वाङ गरी सात हान्छ । उसको आखाँ घण्टाघरकोघडी हेर्दै भत्किएर जीर्ण स्थितिमा अल्पत्र परेको कलेजको दक्षिणपट्टिकोलङ्मा पर्छ । उसको सोचाइ अरू हुनी ता जान्छ र मनमनै प्रश्नगर्छ, “यही कलेजमा अध्ययन गर्ने ती अहिले देशका हर्ताकर्ताभएका छन्‌ तिनका आँखा यसमा नपरेको किन होला :&#039; या भवनको यसस्थितिले उनीहरूको मन नछोएको किन ?&lt;br /&gt;
शिव खँडका यस्तै सोचाइ र संझनाले घचेटिंदै दरबार स्कूल ररानीपोखरी तर्फ लाग्छ । उसलाई त्रिचन्द्र कलेज र सरस्वती सदनकोअवस्था देखेपछि दरवार स्कूल पनि हेर्न मनलाग्छ । जहाँ उसले प्रथमशिक्षा हासिल गरेको थियो ।&lt;br /&gt;
त्यौ दरवार स्क्ल आज भानुभक्त माध्यामिक नामाकरण भएरबाँचिरहेको छ त्यसलाई पनि त्रिचन्द्र कलेजका स्थितिमा पुग्न अब घेरैबाकी छैन । बढो हातखुट्टा मर्किएको ढाड भाँचिएको लम्पसार परेरलडिसकेको छ । कसैको ध्यान त्यसतर्फ मर्मत गर्न तर्फ गएको छैनमानौ त्यसको अस्तित्वको जरुरत अब कसैलाई पनि छैन । विद्यार्थीहरूकोसंख्या हरेक वर्ष घदतै गएकोले विस्तारै त्यस जीर्ण शरीरभित्र मृत्य पस्तैछ । यस्तै स्थिति छ सरकारी स्क्ल क्याम्पसहरू सबैको ।&lt;br /&gt;
भन्छन्‌ परम्पराको जगेर्ना गर्नपर्छ तर खोइ यी भवनहरूकोसंरक्षणप्रति ध्यान दिइएको : यी त नेपाल अधिराज्यका पहिलोविद्यालयहरू हुन्‌ जसले नेपालमा शिक्षाप्रति चेतना जागृत भएको समयकोसंझना गराउँछ । यस्ता स्कूल, क्याम्पसहरू सरकारी भएका यिनलेत देशले शिक्षाप्रति कस्तो स्तर निर्धारण गरेको छ, कस्तो लिएकोछ कस्तो शैक्षिक वातावरण खोजेको छ, आफना जनताका भविष्यकोकल्पना कुन्‌हपले गरेको छ, भन्नै बताउन नमुनाको रूपमा राख्नुपर्नेथियो । के पब्लिक स्कूल र क्याम्पसहरूभन्दा माथिल्ला स्तरमा गुणस्तरवृद्धिका लागि यिनलाई राख्न नसक्ने स्थितिमा नेपाल सरकार छ त !विभिन्न क्षेत्रमा अनुदान लिन सकिन्छ भने यिनको मर्मत र सुधारकालागि किन एक वचन कसैले पनि नबौलि दिएको &#039; थाहा नभएको रनजान्ने यहाँ कोही छैनन्‌ बरु ध्यान भने किन अन्तै अकाशिएको : हाम्रोहिजो बिगियौ भनेर कराउदै सचेत गर्नै हामीले नै आजलाई हिजो कैस्थिति तर्फ धकेल्दै छौं । भोलिको चिन्ता अभै हामीमा आउन सकेको&lt;br /&gt;
१२९&lt;br /&gt;
छैन । सडकमा बालकहरू रल्लिरहेका अझै देख्तै छौं । गाउँ, घर,पहाड, तराईतर्फ जाऔं त्यहाँ बालक बालिकाहरूका जीवनमा कुनै नौलोपरिवर्तन देखापर्ने पाएको छैन । के देशको भविष्य भन्नु नै आजका यिनै बालबालिका होइनन्‌ र ?&lt;br /&gt;
आफनो मनमा उठेको प्रश्नले शिव खँड्कालाई केही बेरसम्मजवाफको खोजीमा अल्मल्याईदिन्छ । विकासका नाममा उठेका हजारौंनाराहरूले एकै चोटि उसका स्कृतिपटमा आक्रमण गर्दा प्रश्नकर्ता कंआफैले ठम्याउन सक्तैन विकासको अर्थ नबझने क हो या अरू कुन्‌ जोदेशको भविष्य निर्माण गर्ने हौं भनेर लागेका छन्‌ । नेताहरू भनेजनताको विश्वास जित्न हाहाकार मच्चाउँदै आफनै गृणगान गर्दै छन्‌ ।&lt;br /&gt;
यस्ता सौचाइले आक्रान्त भएको शिव ठिमीलेहरूले बेच्न ल्याएकाहरिया सागपात किनेर त्यहीँबाट घर फर्कन्छ । गौरी चिया तयारपार्नलागेकी र उसलाई देख्नासाथ सोध्छै, “यति सबैरै कहाँ कहाँ पुगैरतरकारी ल्याइसक्नुभयो ! लौ, मैले पनि ठीक समय मिलाएर चियातयार पारेकी छु भन्दै एक कप शिवका अगाडि बढाउँछे ।&lt;br /&gt;
चियाको कप समाएर मेचमा बस्तै शिव भन्छ, &amp;quot;गौरी, आजबिहानै स्वच्छ मन होस्‌ भनेर घम्दै सङ.कटाको दर्शन गरेर आउँछु भनेरनिस्केको म दरवार स्कूलसम्म प॒गी यी सागपात किनेर फर्किहालेँ । दिक्कैलाग्यो त्रिचन्द्र कलेज र दरवार स्कूलको स्थिति देखेर । सबै क्षेत्रपब्लिकलाई छोडेर पतिस्पर्धा गराई गणस्तर बढाउने भन्दैमा एउटा कुनैमापदण्ड पनि नराखेर हुन्छ : कसैका आफना छोराछोरीलाई पव्लिकशिक्षालयमा पढाउन सक्ने आर्थिक क्षमता रहेनछ भने के तिनकाकेटाकेटीहरूले गुणस्तरीय शिक्षा नै नपाउनै ? यसले त गरीवअसहायहरूलाई कहिल्यै माथि उद्नसक्ने मौका दिदैन । यहाँ शिक्षाकोपनि किन बेचको व्यापार हुन थालिरहेछ ।&lt;br /&gt;
गौरीलाई शिवका चिन्ता मात्र लिने बानि देखेर वाक्कै लाग्छर भन्छे, “कति कुरामा चिन्ता लिनुहुन्छ ? सात क्लाससम्म पढाइनिःशुल्क गरिदिएकै छन्‌ । भानु माध्यामिक स्कूलमा नै त्यतिका छोराछोरीपढ्न गएकै देख्छु । अब केको पीर लिनुहुन्छ : भवन मात्र राम्रो भएर&lt;br /&gt;
पनि त “ज्यु ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
क भवन मात्र राम्रो हनपर्छ भनेको छु र ! पढाइकागुणस्तरको पनि कुरा गरेको छु । पव्लिक स्कूलमा पढ्ने र यस स्कूलमापढ्ने एउटै कक्षाका विद्यार्थीहरूलाई जाँचेर हेर, अनि थाहा हुन्छ मैलेभन्न खोजेको के रहेछ भन्नै &#039; यहाँ पैसाको आधारमा गुणस्तर रहनगएकाले भनेकी हुँ । यिनै सरकारी स्कूलमा पनि त्यस्तै प्रकारका चौतर्फी&lt;br /&gt;
1१०&lt;br /&gt;
ज्ञान बढ्ने गरी कित नपढाउने : सरकारले अझ यी पव्लिक स्कूलहरूमाभन्दा बढी सुविधा दिनसक्ने हुनुपर्ने हो । यो स्कूल भनेको सरकारलेचाहेको जस्तो गरी बालक बालिकाहरूको बौद्धिक स्तर बढाउने संस्थाहो । यसलाई साधारण कुरा मानेर यसै प्याच्च नबोलिदेक आजभोलि योखुला आर्थिक बजार नीतिले गर्दा सरकारी निकायहरू जे जति छन्‌ सबैकङ,कालको रूप मात्र लिएर बाँचिरहेका छन्‌ जसले गर्दा तल्लो आर्थिकस्तरमा भएका जनताले अरू बढी गरिबीका चपेटा सहनु परेको छ ।अरू त के स्वास्थ्य र शिक्षा समेत्‌ यस समस्याबाट उम्कन सब्नैभएकाछैनन्‌ । त्यस बीर अस्पताललाई हेर । त्यहाँ काम गर्ने डाक्टरहरूआयोग्य छैनन्‌ त्यस्तै छन्‌ यी सरकारी स्कूल क्याम्पस विश्व विद्यालयमापढाउने शिक्षकहरू पनि । दक्ष यी सबै छन्‌ तर अस्पतालमा बिरामीलेपाउनु पर्ने सेवा र विद्यालयहरूणः विद्यार्थीहरूले पाउनु पर्ने शिक्षामा भनेभिन्नता छ । किन यौ सोच्नुपर्ने विषय हो । यहाँका डाक्टर रशिक्षकहरू संग कुरा गन्यो भने थाहा हुन्छ उनीहरू पनि कतिअसन्तुष्ट छन्‌ आफूनो संस्थाको स्थिति देखेर । तलब र भत्ताले मात्रहोइन त्योभन्दा बढी अरू नै कारणहरू पनि छन्‌ । समष्टिरुपबाट हेर्नेहो भने उही नियम कानुन नै कारण हुन आउँछ ।&lt;br /&gt;
“त्यसको मतलव&amp;quot;&lt;br /&gt;
“मतलब साफ छ । मैले भन्दै आएको उही व्यवस्था परिवर्तन होयसमा आउन पर्छ प्रजातन्तको सिद्धान्त अनुसारको हेरफेर । नत्रप्रजातन्त्रको नै बदनाम हुन्छ । सुनेकी हौली, प्रजातन्त्र हामीलाई फापेनभन्न चालित्तकेका ।&lt;br /&gt;
जो सुकैले जेसुकै भनोस, हामी स्वास्नीमान्छेले भने प्रजातन्त्रआएपछि घेरै कुरामा बिकास गर्ने पाएका छौं । हामो स्वतन्त्रतानपचेकाहरूले प्रजातन्त्रलाई जथाभावी भन्दै हिडेका पनि हुन सक्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“तिमीहरू मात्र कहाँ हो र : जातभातको प्रधा हटनालेव्यवसायमा समानता आएको छ, आत्मबल बढ्न गई जो उद्यमी छन्‌तिनीहरूको आर्थिक स्थिति उद्तै छ । पैसा लगानी गर्न विभिन्नव्यवसायहरू खल्दै छन्‌ । लकाएर राखेका धनहरू देखा पर्दै उद्योगमालगनी हुँदैछ । यी सबै विकासका पर्वाधारहरू बन्दै गएको पनि हामीलेबिसैका छैनौं । केवल एउटै करामा ध्यान प॒गेको छैन भन्ने म ठान्छुत्यो हो, यसरी उठेका यी बाढीका भेललाई व्यवस्थित रूपले के, कति,कुन ठाउँमा, कतिसम्मका लागि लगायन पर्छु भन्ने योजनाबद्ध रूपदिनसकेका छैन । केमा प्राथमिकता दिनै भन्नेतर्फ ध्यान जान सकेको -छैन॥ घैरै गलियो खाएपछि नमीठी स्वाद आउँछ भने झैँ यस्ता राम्रा&lt;br /&gt;
१५१&lt;br /&gt;
पाइलाहरू चलेका भए पनि भ्रममा परेका छौं हामी सबै । विकसितदेशको नक्कल गर्न खोज्दै छौं पनि बिर्सदै छौँ ती देशहरूले पनि हालकास्थितिमा पुग्न कस्तो समस्याहरूको सामना गर्न परेको थियो । आजकोहाम्रो अवस्था ५,६ वर्षको बालकले आफनो बाको कोट लगाएर ख्ूवराम्रो भएँ भनेर दङ्ग परेको जस्तो छ यहाँ हामी र हाम्रो प्रजातन्त्र ।”&lt;br /&gt;
“ठीक छ ल, तपाईंले भनेजस्तै भएको होला रे ? अब हामीले गर्नेके त ! के गर्दा यो सुहाउने हुनसक्छ !?” , गौरीले यसरी प्रश्न शिवसङै नै गरी उसको राय बझत खोज्छै ।&lt;br /&gt;
“गर्नसक्ने धेरै छन्‌ अहिलै पख, मेरो मृद्ठाको पहिले टुङ्गो लागोस्‌अनि यस देशको नागरिकको हैसियतले मैलेँ के गर्नसम्छु त्यो गर्नेतर्फलाग्नेछु । देश बनाउने भनेको हामी एक एक जनताले आ।आफूना खुबीलेकमजोर पक्षमा सुधार ल्याएर हुने हो । भरखर व्यवस्था परिवर्तन हुँदायस्ता नमिल्दा कुरा देखापर्दै जान्छन्‌ तर सुधारको क्रम पनि साथसाथैजानुपर्छ । अनि मात्र व्यवस्था सुहाउँने हुँदै जान्छ । प्रजातन्त्र भनेकोहाम्रो आफनो शासन ही । त्यसैले प्रत्येक हामी एउटा सिङ्गो राष्ट्र हौं ।व्यक्तित्व विकास नै यहाँ राष्ट्रविकाससंग गाँसिएको हुन्छ । हामी सबैनेपालीको एकता नै यस व्यवस्थाको बल र सफलता हो ।”&lt;br /&gt;
कुराको प्रसङ्घलाई अर्कै तिर लैजान गौरीले शिवलाई भन्छै, “आजदयाका घरमा जाने निम्तो छ नि, संझन्‌ भएको छ : फेरि अस्तिकोजस्तो गरी हामीलाई कुरेको कुरै पारिदिन्‌ होला । खाना खाएर आजघरैमा आराम गर्नोस्‌ । साथीभाइकहाँ एक दिन नगएर केही हुँदैन ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
शिवले केही जवाफ दिदैन र भान्छाबाट तल कोठातर्फ लाग्छ ।कोठामा साधना अखवार पढ्दै चिया खाइरहेकी हुन्छे र बाब कोठाभित्रपसेको चाल पाएर सोध्छै, “बाबा, यहाँ हेर्नोस्‌ त तपाईले बताउनु भएकोनुरको फोटो यो त होइन !&amp;quot; भन्दै अखवार बाबलाई दिन्छु । शिवअखबार लिएर पढ्न थाल्छ । खवर न्‌रको नभए पनि एक देवकीकोहत्या र आत्महत्याबारेकै थियो । शिव खडकाले त्यो अखवार छोरीलाईफर्काउदै भन्छ, “यस्ता संस्कृतिको भने रक्षा गर्नुहुन्न । उठ, उद्‌ साधनाउठ, छोरीलाई छोरी भएर बाँच्नसक्ने बातावरणको सिर्जना गरिदे । त॑अब सक्षम भइसकिस्‌ । विद्या र धनको दुबै शक्तिलाई लिएर दुर्गा भईजागिदै ।&lt;br /&gt;
तँलाई याद छ या छैन जब त॑ सानी थिइस्‌, मैले तेरा दाइलाईपढेन भनेर पिट्तै मपछि यस घरको जिम्मा लिन पर्ने तेरो यौ चाल छ,म कसमाथि यो भार बिसाउँ, काँध थाम्न सक्नै कसरी हुन्छस्‌ भनेरकराउँदा तैले भनेकी थिड्दस्‌ “बाबा, दिदीको काँध कस्तो बलियो छ ।&lt;br /&gt;
११२&lt;br /&gt;
भाइलाई काँधमा लिएर घमाउन हुन्छ उसैका काँधमा भार बिसाउन होस्‌न ? &amp;quot;तेरो त्यस सल्लाहले मेरो रिस कता भाग्यौ कता र मैले हाँस्तैभनेको थिएँ, “छोरीका काँधमा भारी बिसाउने बेला पनि आउँदै छ ।त्यस बेला तेरो यौ काँध पनि खुव बलियो हुनुपर्छ : बलियोबनाउँछेस्‌ ?”&lt;br /&gt;
हो, त्यो बेला आहिले आएको छ । नारी जातिको भार वाम्न यसकाँधलाई उचाल, नानी । सुपुत्र छोरा मात्र हुनुपर्छ भन्ने छैन । त्योकती छोरी पनि हुनसम्छे । छोरीको जन्म पनि चाहना भएर रहनसक्ने&lt;br /&gt;
तिरस्कार भएर होइन । राधा र दिलेले झैं छोरीलाई आफनो अंशमान्नसक्ने सबैलाई संभाई बझाई गराइदै । त्यसपछि यस्ता हत्या,आत्महत्याबाट नारीहरू जोगिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
आवेशमा आई फलाकिरहेको बाबलाई साधनाले बीचैमा प्रश्न नगरीबोली रहन दिन्छे र जब क अडछ अनि भन्छे, &amp;quot;बाबा, साधना नामहजुरले मलाई जे सोचेर राख्न भएको थियो, म त्यो प्रा गर्न लाग्दै छु। जव म आफूनो लक्ष्य ठीकसंग पैल्याउन सक्छु त्यसपछि मेरा वेगलाईकसैले पनि रोक्न सक्तैन । म नारी प्रगति मात्र होइन, मानव मुक्तिकालागि लाग्छु र नारीलाई मानवको परिचय दिएर अगाडि बढाउँछ ।&lt;br /&gt;
“मानव मानवताको खोज । मानवमा या ...... १&amp;quot; खुवसंग दिलखोलेर शिव हाँस्छ साधनाले बाबाको हाँसो सुनेर भन्छे, &amp;quot;यस्तै हाँसोमाथिपहिलो खोज मेरो हुनेछ, बाबा : हांस्तैको शिव टक्क अड्छ र भन्छ,“अनुभवको खाँचो त॑ मा अझै छ । त्यो आफनो कमजोरी पनिबझिराखेस्‌ ।”&lt;br /&gt;
बाब छोरीको बीच क्रा चल्दाचल्दै गौरी आइपग्छे र भन्छे, “यीबाबछोरीको के हो यस्तो गफ ! कुनै गहन विषयकै वादविवाद तहोइन । तपाई त अब छोरीहरूसंग पनि यस्तो छलफल गर्नयाल्नेहुनुभयो !&lt;br /&gt;
“छोराछोरी ठूला भए पछि यिनीहरूसंग वसेर व्यवहार गर्नपर्छ ।यिनको राय पनि सुनिदिने गर्नुपर्छ यो प्रजातन्त्रले सिकाएको होबझयौ ! व्यवस्थाको असर घरभित्र हुने व्यवहारमा पनि परेको हुन्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“लौ, तपाईं र तपाईको चाहनाको प्रजातन्त्र अमर रहोस्‌ । हामीयही नारा लगाउँछौँ । तपाई हाँस्नोस, खुसी हनोस्‌ इमानमा रहौं इमानकोकमाइ मात्र हाम्रा पेटमा परोस्‌ यति भए हामीलाई प॒ग्छ । यी अहिलेतपाईको नोकरी गए पनि कसैले काखी बजाउँदै कुकर्मको फल भन्नसकेका त छैनन्‌ । यही हा ह।मीले पाएको इमान्दारीको फल ।&lt;br /&gt;
१५३&lt;br /&gt;
गौरीको कुरा सुनेर शिवले झवादट संझन्छ लोचनको धम्काइ ।उसले बारम्बार टेलिफोनबाट या पत्रपत्रिकाबाट उसको नियतिमा दोषलागाउँदै जथाभावी छापेको र बोलेको । क संझन्छ, त्यस लोचनलाई ककस्तो स्वाभावको छ भन्नै नचिन्ने पनि कोही &#039; छैनन्‌ र - उसले त्यसमाथिकारबाइ चलाएर सजाय दिएकामा ठीक गरिस्‌ भन्ने पनि थुप्रै थिए तरउसलाई सताउनु पद्यो भने त्यसैलाई उठाएर पनि लगाइदैन्ये । यहाँयस्तो नीति लिएकाहरूको गणना गरेर साध्यै छैन ।&lt;br /&gt;
त्यस वखत उसले त्यसमाथि दौष लगाएर कारवाइ चलाएकामाउनीहरूले प्रशंसा गर्दा क गजक्क परेर भनेको कुरा संझन्छ । उसलेभनेको थियो “म त्यो जतिसुकै शक्तिशाली भए पनि अनुशासनहीन हुन्छभने त्यसलाई छोड्दिन । न्यायलाई बचाएर राख्ने हो भने दोषीको ठहरगरेर त्यसलाई सजाय पनि दिनसक्ने हुनपर्छ नत्र बेकस्र व्यक्तिले न्यायकहिल्यै पाउँदैन । त्यसैले न्याय दिलाउनु कठिन र जोखिम काममानिन्छ । यसको पक्षघर हुन्छु भन्ने हुनुपर्छ, आफनै ज्यान रइज्जतमा पनि आँच आउनसक्छ । तसर्थ आँट नहुनेले म अत्याचार सहनसक्तिनँ भन्न फजुलको /4:2002 ।&lt;br /&gt;
यस लोचनले गर्नसक्छ भन्ने त हामीलाइ पहिलै थाहाथियो । त्यसमा यसले यसो भन्यो यस्ढो लेख्यो भनेर व्यर्थै किन चिन्तालिने ? भन्न दिनोस्‌ त्यो भन्दा भन्दै आफै थाक्छ भनेर सुनाउनआउनेहरूलाई भन्ने गर्थ्यौ ।&lt;br /&gt;
साँच्चै, त्यस लोचनले चप लाग्नु त पप्यो नै तर सोझै बोल्न रलेख्न छौडे पनि भित्र भित्रै कँची चलाउन भने छोडेन । मेरो बारे ठाउँठाउँमा गई नराम्रो कुरा गर्दै हिड्ने एउटा त्यो पनि हो । अफसोच तकेमा लाग्छ भने यस्ता व्यक्तका भनाइलाई आधार मानेर बदिजीवीकहलाएकाहरूले जब आफूनो स्वार्थ पूर्ण गर्नपत्यो या इबी साध्न पन्योया खसाल्न पत्यो भने यिनै कुख्यात व्यक्तिहरूको प्रयोग गर्छन्‌ जसलेगर्दा यिनले प्रश्रय पाई झनउग्र रूपले धम्की दिदैं हिड्छन्‌ । यस्ताकाभनाईलाई पट्याइ दिन व्यवहारिकता र मानसिकता परेमा नियम कानुनसबैको सहारा लिन्छन्‌ । यस्ता कख्यात व्यक्तिहरूलाई पनि आवश्यकताहेरी प्रयोगमा ल्याउनसक्ने हुनाले नै कसैमाथि पनि दोष ठम्याई कारवाइगर्न पन्छने भएका उनीहरू सज्जन प्रशासक कहलाई शान्तिले नोकरीधामेर वस्न पल्केका छन्‌ । त्यसैले यहाँ न्याय हराउँदै जादै छअनुशासनहीनता बढ्दै छ, लच्चा फटाहाको अघीन र घम्की बढ्दै जाँदाजताततै दर्गति मात्र देखिन थालिदै छ । कसले समाल्नै यिनलाई ? जबसबैले थाहा पाएर कोही भाग्दैछन्‌ भनै कोही यिनैको साथ लिदै&lt;br /&gt;
११४&lt;br /&gt;
प्रजातन्त्रको अर्थ स्वच्छन्दता लगाएर मनमानी गर्दैछन्‌ अख्तियारकोदुरुपयोग गर्दैछन्‌ र प्रजातान्त्रलाई बदनाम गर्दैछन्‌ । अख्तियारको दरुपयौगगर्न र अख्तियारको प्रयोगै नगर्न दुबै प्रगतिका लागि उत्तिकै हानीकारहुन्छ ।&lt;br /&gt;
“ शिव आफनो मनसंग यति क्रा गरेपछि गौरीले लिएका धारणाप्रतियसो भन्छ “कसले के भन्छन्‌, के भन्दैनन्‌ त्यो नै सन्दै हिड्नथाल्ने होभने तिमीले आफूले लिएको इमानदार हामी छौं भन्ने धारणालाई बचाएरराख्न मुस्किल पार्छ । तिमीले टेलिफोन पनि सनेकी छ्यौ र मेराविषयमा छापेको पनि अखबारमा पढेकी नै छ्यौ । यसलाई केभन्छयौ !&amp;quot;&lt;br /&gt;
“यसलाई म त्यही भन्छु जुन तपाईंका आत्माले भनिरहेको छ ।तपाईंको आत्मासंग मेरो पनि परिचय छ । कि तपाईंकोचाहि मेरोआत्मासंग छैन ?” गौरी यसरी प्रतिप्रश्न गर्दै ती गहन विषयलाई ठट्टामालैजान खोज्छे ।&lt;br /&gt;
शिवले गौरीको मनसाय बफझछ र भन्छ, “यही त हामीलेआजसम्म गरेका उपलब्धि भएको छ । अहिले जति दःख भोग्न परे पनिमैले आफनो आत्मबल गमाएको छैन र कसैका सामन्ने नतमस्तकहुनुपरेको छैन । गौरी, हामीले यौ निष्ठा यो भावना र नीति हाम्रासन्तानहरूमा पुन्याउन सक्यौं भने यो पनि राष्ट्र को सुधार हुनेछ ।&lt;br /&gt;
औँगातले नभ्याउने इच्छा राख्ने सन्तानका सामन्नै कल्पनै ऐशआरामले लोभिएर अरू संग दाँजेर सन्तानको मन भड्काउने जस्तो कामहामीले गर्न हुँदैन । यी अल्लारेहरूले यहाँको वढ्दी आकर्षण देखेर यिनकोआँखाहरू तिरमिराए या मन चञ्चल पार्न लागे भने हामीले समाल्नपर्छ ।&lt;br /&gt;
धन छैन भने सबै सन्तान मिलेर साथमा बसी प्रकृतिले दिएकोपानी पिउँला तर कुकर्म गरेर कमाएका धनले गरिष्ट भोजन गरेरनडकारौं । भविष्यका लागि चिन्ता गर्नु पर्ने वेला तिमीहरूको आइसकेकोछ । आजसम्म त म छु तिमीहरूका साथमा हारेको त्यागिएको र समयर व्यवस्थासंग मिल्न नसक्ने भनेर कहलाइएको मुर्ख जसले अझ गर्वकासाथ आफूलाई मूर्ख हुँ भनेर स्वीकरे पनि कागजस्तो चङख छु भन्दैन ।थाहा छ होइन चतुर कहलाइने त्यस कागले कै पनि खान्छ !&lt;br /&gt;
गौरी, साधना र शिव सबै एकँसाथ हाँस्छन्‌ र साधना आफनाकोठातर्फ लाग्छे ।&lt;br /&gt;
१५५.&lt;br /&gt;
छुट्टीको दिन आज साधनालाई फुप्‌कहाँ जाने इच्छा लाग्छ । छफुप्लाई खुबै आदरको दृष्टिले हेर्छ । उसले अनुभव बटुल्छै र आफूलाईनारीहरूको समस्याहरूसंग विज्ञ भई जिजीविषा उमार्छै ।&lt;br /&gt;
उसकी फुपूले जेठा दाजज र बाबको कडा निगरानीमाथि विरोध गदैपढ्दन थालेको हो र अहिले वैदेशिक निकायमा काम गर्छै । उसकैनोकरी .. बारेमा प्रसस्त अनभव भइसकेको छ । पदोन्ततिको इच्छाआन्तरिक अतृप्त रूपमा निहित रहे पनि बाहिर विदेशमा पनि खटिएरगइसकेकी छे ।&lt;br /&gt;
दिक्क भएर जव साधनाले आफनो कुरा बताउँछे तब उसँगसंझाउदै भन्छै, “साधना, यस समाजले हामी नारी जातिले नोकरी गौहाम्रावारेमा जुन कुरा काटेको सुनिन्छ त्यसलाई हामीले हामीलाईललकारेको मान्नपर्छ । हुन त यसरी कुरा काट्तै लान्छना लाउनुकोमतलब हाम्रो मनोवल घटाउनु, हतोत्साही पार्ने र कर्तव्यबाट ००हो । तर हामीले बझन पर्ने अहिलेको स्थिति छ, यिनै सहकर्मी पुमनोविज्ञान र राख्न पर्ने लक्ष्य हो आफूलाई कर्तव्यनिष्ठ बनाउनु ।&lt;br /&gt;
मैले जवसम्म घरेल्‌ कारण देखाएर बाहिर खटिएर जान इन्काएगरें तबसम्म नारी जातिलाई यति कुरा सुनाएनन्‌ । हाकिम हुनेले समैतलै लैमा लागेर प्याच्य बोल्यो, “यी स्वास्नीमान्छेलाई नोकरीमा लिएपछियस्तै हो । बाहिर खटाएर प्रयोग गर्न पनि पाईंदैन, घरैको समस्यातेरस्याइहाल्छन्‌ । बलजफत्ती गरेर पठाउँ हल्ला हुन्छ, कस्ता निर्दयी हाकिम&lt;br /&gt;
१५६&lt;br /&gt;
भनेर । समान छौं । समान हौं भनेर यस्तो ठाउँमा नोकरी गर्नआउँछन्‌ । लौ, जाओ बाहिर भन्यो भने समानताबाट माथिउठेर विशेषताखोज्छन्‌ । यिनलाई नोकरी नै किन गर्नु पर्छ, घरमा प्रसस्त संपत्ति “छदैछ र लोग्ने पनि त्यति माथिल्ला ओहदामा काम गरि हालेका छन्‌ ।पैसाले नप॒गेपछि के लाग्छ ? यिनको लोभ हाम्रो समस्या । लौ भन्नोस्‌त, यस्तो अड्चन आइपरेपछि हामीले सबै जागिरदारहरूमाथि समानव्यवहार कसरी गर्न सक्छौं ? घरको समस्या के लोग्नेमान्छे कामदारकोहुँदैन र ? बाआमा बुढाबुढी होलान्‌ : स्कूल जाने नानीहरू होलान्‌ !&lt;br /&gt;
उनीहरूले यसरी कुरा गरेर हाँसेको सुनेर मैले पनि श्रीमानसंगसल्लाह गरैर जब बाहिर खटिएर जान तयार भाएँ, त्यसपछि पहिलेयिनीहरू आश्चर्यमा परे, त्यसपछि फेरि ताना कस्न वालै । भन्नथाले,“पैसाका लोभमा घर परिवारको माया मौह समेत त्याग्न सक्नै यौ कस्तीप्रकृतिकी आइमाई हो ? त्यसको लोग्ने कस्तो जोइटिङ्गरे रहेछ &#039;&lt;br /&gt;
म ती कुरा अनसुनीगर्दै अगाडि बढ्दै गएँ । ती पुरुषजागीरदारहरू जो विदेशमा खटिएर जान खुट्टा उचालेर वसैका थिएयिनका भाग मैले हरिदिए भन्ने सोच्तै मप्रति अरू आक्रोसित हुँदै मलाईविफल बनाउने कोशिशमा लागे । त्यहाँका कर्मचारीहरूलाई भड्काउने,उचाल्ने गर्दै मलाई काम गर्नमा केन्द्रबाट समेत असहयोग गरीअप्ठ्यारोमा पार्न थाले । भन्ने कुरा त छोडिदैक, के भने के भनेनन्‌ ।कतिसम्म पनि भन्न छोडेनन्‌ भने म सबैको सहानुभूति मतर्फ खिचियोस्‌भनेर आफूलाई लोग्ने जीवित हुँदाहुदै पनि विधवाको भेषमा उतारी लोग्नेनभएकी एक्ली स्वास्नीमान्छे म विदेशमा खटिएर बसेकी छु रे भनेरहल्ला चलाएकी छु साथै त्यहाँ नयाँ नयाँ केटाहरू समेत लिएर हिड्छु रेभनेर कुरा उठाई मेरो चरित्रहत्या गर्न पनि छोडेनन्‌ । रिस इवी हुनेलेजिब्रो काटेर पत्याए पनि मेरो उमेर र रूपले गर्दा धेरैले हो र होला रभनेर टारीदिए पनि ।&lt;br /&gt;
यो चालबाजी असफल भएपछि अफिसका काममा कुनै गल्तीगरेकी छ कि भनेर समेत खोतल्न थाले । मैले- थाहा नपाएको जस्तै गरीआफ्ना लक्ष्यमा अडिक रहेँ । कुनैले निउ खोज्दै आइ लाग्नै थाले भनेतिनीहरू प्रति जाइ लाग्न पनि छोडिन । अन्त्यमा मैले आफनो सस्वाकोब्ववधी प्रा गरेर नै फर्के । आजभोलि घाहा छ, यिनीहरूले मलाईभन्छन्‌ “फलामजस्ती दही छै, यसलाई यसैउसै ढाल्न सक्दिन ।”&lt;br /&gt;
त्यसैले म त भन्छु, आजका हामी नारीले जे जति सहन परे पनिछु “निर्भीक बनाई भोलि आउने नारीहरूका लागि फराकिलो बाटोताई दिनुपर्छ । अलिअलि घरमाराए पनि ठीक ठाउँमा खुट्टा पर्न सक्ने&lt;br /&gt;
११५७&lt;br /&gt;
स्थितिको सिर्जना गर्नुपरेको छ । मेरो त हेर न, जीवन नै संघर्षमाबित्यो भने पनि हुन्छ जन्मन पनि लडाईकै वेला जन्मेकी हँ । सातामाज्यादै रोगी भएकीले बाँच्नलाई वात्तावरण र रोगसंग लडन न्‌ पन्यो ।त्यसपछि पढ्न समाजसंग परिवारसंग आनि नोकरी थालेपछिअफिसको बाताबरण र नारीप्रतिको घारणासंग । अहिले सबै क्षेत्रबाटबिजयी भएपछि पति छटपटाइ रहेकी छु असन्तुष्ट भएकी छु । केहीगर्न चाहन्छु तर छोराछोरीहरूले माया गरेर भन्छन्‌, “तपाई अब आरामलिनोस्‌, जे जसो गर्नुपर्छ त्यौ गर्न हामी सक्षम भइसकेका छौं ।&amp;quot; मलाईभने हेर न, आफू अत्तक्त भइसके जस्तो लाग्दैन । अझ त्यतिकै फूर्तिलेत्यति नै काम गर्नसक्छु जस्तो लाग्छ । अनि म रिसाएर तीछौराछौरीहरूलाई भन्छु, “तिमीहरूले मलाई छिटै मर्दा बनाउन खोज्दै छौँ॥ मलाई उमेरले गालेको छैन ।” लाग्छ, छोराछोरीहरू पनि मसंग हैरानभइसके होलान्‌ तर मलाई भने बढ्यौली स्वीकार्न पटक्कै मन लाग्दैन ।यही नै मेरो तृष्णा भएको छ । म भन्छु, मलाई काम दैक म गर्नसक्छु॥ मैरो इच्छा छ काममा व्यस्त रहँदारहँदै मेरो जीवनको अन्त्य होस्‌ ।तिमीहरू मलाई किन आराम गर भन्छौँ । मैले काम गर्न चाहेको पैसाकमाउनलाई होइन न त नाम कमाउनलाई नै हो । त्यो वेला अबबितिसक्यो । मैले काम गर्न चाहेको यस शरीरलाई मस्तिष्कलाईक्रियाशील राख्नलाई हो । यसमा मलाई किन रोक्छौ ।&#039; &amp;quot;तर तरउनीहरू मान्दैनन्‌ र भन्छन्‌, “हामीलाई समाजले आमालाई दृःख दियोभन्छ । &amp;quot;म भन्छु, अब पनि तिमीहरू आफना लागि मेरौ प्रयोग गर्नखोज्छौ &#039;&amp;quot; उनीहरूले के बर्भे कुन्ती मसंग रिसाउँछन्‌ । मेरो भनाइकोअर्थ भने केवल यति मात्र हो, मलाई अब स्वतन्त्रले रहन देऔओ । मतिमीहरूलाई सहयोग गर्न नसकै पनि म आफूलाई पनि तिमीहरूको बोझहुन चाहन्न । मलाई आफनो जीवन बाँच्न देओ ।&lt;br /&gt;
आफनी फुपूको यी कुराहरूको संस्मरण गर्दै उसैकहाँ जान साधनातयार हुँदै थिई त्यसैवेला गौरी आइप॒ग्छे र उसलाई बाहिर निस्कनलागेकी देखेर सोध्छे, “आज छुट्टी होइन र ? फेरि कता जान तयारभएकी ? बिनोद पनि आइपुग्ने बेला भयौ &#039; दाजुसंग भैटनपर्खिन्नस्‌ !”&lt;br /&gt;
&amp;quot;ए हो त ? आज दाजु आउनुहुन्छ भन्ने कस्तो बिर्सिएकी !मलाई आजभांलि के हुन्छ के चटक्कै बिर्सिहाल्छु । ।खिस्स हाँस्तै। फुपूलाईसंझै र आज उहाँकै साथमा दिन बिताउँछु भनेर जान लागेकी । विनौददाज आउँदा म हिडीसकेकी भए के सोच्नुहुन्थ्यौ होला, भन्नोस्‌ त ?”&lt;br /&gt;
११८&lt;br /&gt;
मेचमा थ्याच्च बस्तै साधना आफनो हस्सुपना संझेर दिक्क हुन्छे ।उसलाई हेर्दै गौरीले भन्छे, &amp;quot;चिन्ता लिन थाल्यौ भने यस्तै गरी सुढिबद्धिहराउँछ यी बाबुछोरीलाई केले छोपेको हो केले ? हुटिट्याँउँने आकाशथाम्छु भने झौँ देश र समाज बनाउँछौं भन्नेमा लागेका छन्‌ । कस्तोबनाउने हुन खै म त केही पनि जान्दिनँ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
साधना पति जवाफ दिन पछि पर्दित । भन्छे, “शुरुमा बम्हालेराम्रो जनावर निकाल्छु भन्दा कँटले जन्म लिए जस्तो होला तर त्योकँट बिचित्रको निस्के पनि कति उपयोगी छ । हाम्रा लागि त्यति मात्रउपयोगी भए पुगेन र : राम्रोको मतलब उपयुक्त हुनु पनि त एकहो ? अफाप भयो प्रजातन्त्र भन्दै हिडन थालेकामा उपयोगी छ भनेरत्यसलाई मेटाई दिनसके अरू त्यस भन्दा बढी के चाहिन्छ र ? तन्त्र तहामी जनताको नै रहन्छ । आफना लागि आफैँ तन्त्र प्रजातन्त्र रस्वतन्त्रता, होइन त आमा&lt;br /&gt;
१५९&lt;br /&gt;
झण्डै तीनवर्ष सम्म अदालतमा धाउँदाधाउँदै बल्ल मद्दाको फैसलाभएको छ । बधाइ दिने र आफनै डिम्डिम पिद्नेहरू पनि आउँदै खसीव्यक्त गर्दै भन्छन्‌ “गर्नै नहुने काम गरेपछि लोप्पा आफैले खात परेन? मैले तलाई मद्दा हाल भन्दा भैगयो छोडीदै भन्थिस्‌, आखिर जित तेरोभयो कि भएन &#039; न्याय भन्ने बझिस्‌ अझ हराएको छैन ।”&lt;br /&gt;
अर्काले भन्छ, “यार, दृःख त तैले पाइस्‌ नै त्यसमा अर्को मतछैन तर अब मस्तसंग तीन वर्षसम्मको पैसा एकैबाजी कुम्ल्याउन पनिपाउने भइस्‌ । यतिन्जेल अन्त कतै काम पनि गर भन्दा मानिनस्‌ नत्रयता पनि हुने उता पनि बन्नै थियो । तेरो यो एकहोरो मिजासलेै धेरैदुःख पाइसकिस्‌ । अब भने त्यसो नगरे । हामी पनि तेरा हितैषीमध्येका&lt;br /&gt;
हौं । हाम्रो कुरा पनि सुन्ने गर ।”&lt;br /&gt;
मित्रहरूका क्रा सुनेर उसलाई नमज्जा पनि लाग्छ र भन्छ, &amp;quot;पैसाकुम्ल्याउने र पैसा कमाउने कुरा छोड्न । पैसाले कसलाई कहिले सन्तुष्टपारेको छ र ? कामका बारेमा जान्त चाहन्छस्‌ भने त्यो मैले शाएगरेकोखु या छैन त्यसको प्रचार गर्दै किन हिड्नु पर्छ ?&amp;quot; शिवका कुरा सुनेरसाथीहरूले हाँस्तै उसले गोप्य काम शुरु गरेकोमा उल्याउँछन्‌ । तिनकाती हाँसोको जवाफ हाँसेर नदिई क छिनैमा गंभीर भइदिनछु्‌ । कसंझन्छु, ती बितेका दिनहरू जुन उसले कतिको हेला सहेर, कटु शव्दसनैर आत्मग्लानिलै गर्दा घरमा अशान्ति ल्याएर, भडकेर कता कता पगेरबिताएको विष के त्यो केकी पनि होइन ? के ती, खितेका दिनहरूलाईयो तीन वर्षका तलबले मेटाउन सक्छ ः सक्दिन भन्छौ भने, “मस्तले&lt;br /&gt;
१६०&lt;br /&gt;
कुम्ल्याउने” भन्ने त्यो शब्द कसरी आउँछ ? के घाहा छ, यदि मैलेफेरि नौकरी शुरु गरे भने यस्तै परिस्थिति नआउला भन्ने&lt;br /&gt;
मैरो स्वभाव झन्‌ उग भएको छ । व्यवस्यामा सधार देखापरेकोछैन । हुनसक्छ यस जितले मलाई अरू प्रोत्साहित पारेर कर्मचारीकोपरिचय दिन वाध्य नपर्ला भन्ने : अनि&lt;br /&gt;
भावना र नियममा परिवर्तन नआएसम्म हामीले के नै गर्नसक्छौं : भ्रप्टाचार र संस्थाको हितका लागि चालेको पाइला कन होभनेर कसरी छुट्टयाउने ? बाँधिएको नियम भित्र आफू पनि बाँधिएर नैबस्ने हौ भनै पतिस्पर्धा गरी कसरी अगाडि बढ्ने जब अर्को पार्टी फुक्काछ र उ चारैतिरबाट बाँधिएको हामी माथि हान्न थाल्छ । हामीले आफैविरोधमा कराउनु भएन अनुशासनको पाला गर्नै पर्छ अख्तियारको सीमानाघेर निस्कन सक्तैनौ संस्थाको हितको लागि पनि । किनकी अविश्वासलेअख्तियारको घेरालाई ठाउँ ठाउँमा मोडिदिएको छ । गर्जेर सोझैदोषारोपण गर्दै भन्न सक्छ, “यस संस्थाको हितका लागि होइन, भ्रष्टआचरण भएकाले आफनौ व्यक्तिगत भलाईका लागि नियम छलेको हो ।&lt;br /&gt;
यस्तो अविश्वासले एकतर्फ जागिरदारलाई समयमा निर्णय लिननसक्ने निकम्मा बनाई प्रभावहीन नोकर मात्र बनाइदिएको छ भने उहीअविश्वासका आडमा लकीक्नै जागिरदारहरूले अनैतिकताको खेल खेल्नेबाटो पनि यसैबाट निकालेका छन्‌ जसले गर्दा इमान्दार र फटाहा छुट्टिननसकी भन्‌ अन्यौलको स्थिति उत्पन्न हुन थालेको छ । के यो नियमकानुन र प्रशासनको कम्जोरी होइन ? अन्तराष्ट्रिय स्तरमा समेत्‌ छिरेरकाम गर्ने थालेका हामीले अन्तराष्ट्रिय क्षेत्रमा कप्तरी जाने भनेर सहाउँदोनियम किन बन्त नसकेको ?&lt;br /&gt;
यी नियम कानुनहरू जनतामाथि विश्वास नरहँदा व्यवस्थालेनियन्त्रण गर्ने हैसियतले बनाइएको जन छ, त्यसलाई अब जनतालाईसुम्पिन पर्दा यसमा वयवस्था सहाउँदौ छपले परिवर्तन लयाई विकेन्द्रीकरणगर्दै लैजानु आवश्यक छ । प्रजातन्त्रको अर्को उद्देश्य विकेन्द्रीकरण पनितहोनि&lt;br /&gt;
शिब यसरी आफैँमा हराएको देखेर साथीहरूले उसको गभीरमद्वाकोलक्ष्य गर्दै भन्छन्‌, &amp;quot;किन तँलाई हामीले भनेको मन परेन कि कसौ ?तँलाई हँसाऔं भनेर जिस्क्यायौं, तँ त यसै चप लागिस्‌ । ठट्टा गरेकोकुरालाई लिएर चित्तनदुखा है ।&lt;br /&gt;
मैले कहाँ चित्त दुखाएको ? तिमीहरू यसरी आएर मेराघुसीमा सामेल भयौ । यसमा मलाई नराम्रो लाग्ने के कुरा छ ? मत्यति मात्र सोचिरहेको थिएँ भने मेरो यो लामो छटपट्टीको क्षतिपूर्ति यही&lt;br /&gt;
१६१&lt;br /&gt;
तीन वर्षका तलवले गर्न सक्तैन न त मैरौ यौ लडाईँ यही रकम प्राप्तिगर्नलाई मात्र हो । म भावक भएर यसो भनिरहेको छैन । यो चोटजुन ममा लागेको छ, त्यो त कहिल्यै निको हुँदैन । यो चर्केर दुःख्नथालेपछि पैसाको परवाह कसले गर्छ ?”&lt;br /&gt;
यस्तै कुरा चल्दाचल्दै चिया र खाजा लिएर गौरी आइपग्छे रकुरालाई टिप्तै भन्छे, “जुन अमुल्य छ, त्यसको मोल करी लाग्छ ।क्षतिपूर्तिको त के कुरा गर्ने ? हामीभरिको धन ल्याएर थपारिदिए पतित्यो चोटको खाल्डो पुरिन्दैन । त्यो बेचैनी, त्यो भागदौड, त्यो बेइज्जत,कसले फिर्ता लिनसक्छ जसले हाम्रो जिन्दगीनै छोटयाइ दिएको छ :हेर्नोस्‌ न छोराको पढाइ उहाँको नोकरी खोसिदा शुरु मात्र भएको थियो,अहिले क इन्जिनियर भएर फर्किसक्यो । यति लामो समय जुन हामीलेकष्टले बितायौं, त्यो उमेरको क्षण के यस जितलै फर्काउन सक्छ : त्योतिन वर्षको तलवको के कुरा गर्ने ? छोड्नोस्‌ यी कुरा । आज खुसीकोदिन छ, रमाऔँ, हाँसौं र कामना गरौं हाम्रोजस्तो दशा कसैले पनि भोग्नुनपरोस्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“पुनर्वहाली भएपछि ध्यान खुबै राखेँ । एकपटक बाघी भइ नैसकेको छस्‌ । के गर्छस्‌, हामीले नोकरी नगरी अर्को पेशा समात्नसक्तैनौ । यो १५ वर्षदेखि लागिसकेको छाप चट्ट जाँदो रहेनछ ।”&lt;br /&gt;
साथीहरूले निकै सम्झाउँछन्‌ । उसको मनभित्रको अठोट जे जस्तोभएपनि उनीहरूको मन राख्न सबै ध्यान दिएर सुन्छ र हो भन्दै समर्थनपनि गर्छु । चिया खाँदा सबै भन्दा बढी खाजामा हात बढाउने पनि कनैहुन्छ । शान्त भएको छ, शून्यमा पुगेको छ क ।&lt;br /&gt;
१६२&lt;br /&gt;
शिव खड्काको नोकरीको पनर्वहालीको पूर्जी लिन जाने आजपहिलो दिन हो । त्यसैले घरमा विशेष रौनक देखापरेको छ । पृजा पाठएकातिर चल्दै छ भने राधा पनि भजन नै गाउर बसेकी छ ।&lt;br /&gt;
गौरी चिया ल्याउनभन्दा पहिले आएर शिवलाई नुहाउन पठाउँछेमानौं यस भन्दा पहिले भोगेका दुःखहरूको लेउ जन शरीरमा टाँसिई एकअङ्ग भएका छन्‌ ती सबै परखालिएर जाउन्‌ र शरीर उडेको चङ्गासरहहलका भई बित्न थालौस्‌ । उसले लोग्नेको छटपट्टी हेर्दाहिदै धाकिसकेकीहुनाले अबका दिन शान्तिल्‌ बितुन्‌ भनेर प्रार्घना गर्दै छे । ढल्दोउमेरमा धेरै चिन्तामा डुब्न थाल्यो भने कहीं यसैले कुनै अनर्थ ल्याउनेत होइन भनेर क डराइरहेकी हुन्छे । भनछै पनि, “अब फेरि यो गर्छुत्यो गर्छु भनेर भट्करहने होइन । यही नोकरीमा होरियारीका साथरहनोस्‌ । यतिले नै हामीलाई पुग्छ । छोराछोरी हामी सबैको कमाइहाम्रोजस्तो साधारण जीवन गजार्नका लागि यथेष्ट छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
तर थाहा छैन शिव के चाहन्छ । उसले नोकरीलाई कून दृष्टिलेहेरेको छ । नोकरी मात्र होइन उसले जीवनको अर्थ र बाँच्नुलाई केमानेको छ ? क गौरीका कुरा सुनेर हाँसी दिन्छ । त्यही हँसाइलाईगौरीले उसका प्रस्तावमा लोग्नेले दिएको स्वीकृति मानेर दङ्ग परकै छै ।नोकरीमा पुन; प्रवेश सफलताले वितोस्‌ भनेर भगवानको आराधना गर्दैछे । आस्थाको आड लिएर लोग्नेलाई भन्छे, “भगवानको पुजा आजालाईअब केही भन्न पाउनुहुन्न । जति भन्नु भयो, त्यति भोगी पनि सक्नभयो । यो भक्तिको मर्यादा राख्नुपर्छ । हाम्रा पूर्वजहरूले यो प्रथा यसैनिकालेको छैन ।”&lt;br /&gt;
१६३&lt;br /&gt;
शिधिल भइसकेको शिवले पनि यस विषयमा जवाफ दिन थालेकोछ । क भन्छ, &amp;quot;“सङ्कटाको दर्शन बिहानै गर्न जान्छ र तर्कारी सस्तोताजा किनेर ल्याउँछु । के यो नै पर्याप्त छैन र ! मलाई तिमीलेशृन्यवादमा लागेको ठानेकी छौँ क्यारे : हो, म ईश्वरलाई हाम्रोधर्मानसार निराकार शक्ति नै मान्छु र भगवानूमा आस्था राख्छु आत्मविश्वास बढाउन मनको कुरा पोखेर क्षमा माग्दै शुद्धीकरण गर्न रआफूनो लक्ष्यमा सफल हुन आशीर्वाद पनि माग्छु । त्यो आशीर्वाद जसलेमलाई आँट देन्छ । यो यस्तो अदृश्य शक्ति हो जसलै हामीलाई विश्वासदिलई हौसला दिन्छ »्कर्म गराउन अगाडि सार्छ र हामी यसरी कर्मगरेर प्राप्त भएका फललाई नै भगवानको वरदान मानेर दङ्ग पर्छौं ।बास्तवमा त्यो हाम्रो आत्मविश्वास ले निकालेको परिणाम हो ।&lt;br /&gt;
यसैले हो कुकर्म गर्नेहरू पनि बाँचिरहेका छन्‌, आफना लक्ष्यमासफलता नै हासिल गर्दै छन्‌ । उनीहरू पनि भगवान्‌कहाँ गएकै हुन्छन्‌ ।हामीले भन्दा बढी अर्चना गर्छन्‌ । के त्यस्ता व्यक्तिका सफलतालाई पतिभगवानको वरदान भन्छयौ ! के त्यस्ताहरूलाई पनि भगवान्‌बाट छहारीप्राप्त गरैको मान्छयौ : होइन भने मान, भगवान्‌ ध्यानको केन्द्र हो,विश्वासको &#039; स्रोत हो, उत्साहको प्रेरणा हो । यसैले म दावीको साधभन्छु, म आस्तिक हुँ । आफनो शिर निहराएर आफना लक्ष्यमा सफलहुन शक्ति माग्छु । आफनो वेदनाहरू पोखेर शान्त हुन भगवान्‌ कहाँघाउँछु । मेरो र तिम्रो ईश्वरप्रतिको भावनामा मात्र फरक हो । आस्थाहामी दुबैका भगबान्‌मा छ । यति भनेर शिब नुहाइ धवाइ गर्न जान्छ ।गौरी प्रसाद लिएर आउँछे । शरीर शुद्ध पारेर फर्केका शिवले प्रसादग्रहण गर्दै भन्छ, “मलाई मेरा लक्ष्यमा पग्न सफलता मिलोस्‌ । कुनैकारणले पनि मेरा जर्मराउन थालेका यी पाइलाहरू नरोकिङन्‌ ।”&lt;br /&gt;
गौरी शिवले भगवान्‌संग सफलता मागेको सुनेर ढुक्क हुन्छे रचिया ल्याउन जान्छे । तौ बजेको साइत छोप्न शिवलाई अफिस पठाउनेतयारी हुन वाल्छ । ढोकामा घडा राखिएका छन्‌ । गौरी छोराछोरी सबैरमाएका छन्‌ । माधितल उक्लेको ओर्लेको आबाज आइरहन्छ । दया पतिछोरालाई लिएर बिहानै माइत आएकी छ । शिव खँड्का यत्तै यतैअल्मलिरहेको छ । क कहिले टोपी खोज्छ त कहिले मोजा पाउँदैन । यीसबै पाएपछि पनि फेरि केही हराएको जस्तो गरी आफैँलाई छामिरहन्छ ।&lt;br /&gt;
आज उसले आफैँलाई बिर्सि रहेको छ । क फेरि त्यहीअफिसमाजदैछ जहाँ तिनै हाकिमहरू छन्‌, उनै सहकर्मी छन्‌ । कता कताउसलाई असजिलो सिन लाग्न थालि हाल्छ । के गरेर अभिवादन तिनैलाईगर्ने र के भनेर मिलापका लागि अगाडि सर्ने ?&lt;br /&gt;
१६४&lt;br /&gt;
जस्तो सुकै मनस्थिति भए पनि उसलाई आज आफिस जान नै पर्नेभएकाले घरका परिवारको मन राख्न साइतमा ने घरबाट अफिसकालागि निस्कन्ट,छ ।&lt;br /&gt;
उही अफिस, त्यसशीनै बसेका जागिरदारहरू, तीन वर्ष बिताएरअफिसमा यस्ता पनि त्यहाँका स्थितिमा कुनै परिवर्तन पाउँदैन । फरकदेखिएको छ भने कामदारहरूले ठूलठूला स्वरले कुरा गर्न र हाँस्न थालेकाछन्‌ ।&lt;br /&gt;
उसलाइ यो अलि बिभझेको लागेतापनि निर्भिकता फैलिएको पाएरराम्रै मान्छ केवल मनका एक छैउमा मात्र शब्डा उठ्छ, कहीं पोनिर्भीकता, अनुशासनहीनतामा बद्लिने त होइन &#039; छोटो एक दिनकोपर्यवेक्षेणमा उसले किटान गर्न सक्तैन ।&lt;br /&gt;
साथीहरूसंग कुराकानी गर्दै हाकिमसंग भेट गर्दैमा दिन बित्छ रपाँच बजे कार्यलय बन्द भई घर फर्कदा झ बाटाभरि सोच्छ, &amp;quot;मैलेगरेको यत्रो संघर्षको उपलब्धि फेरि अफिसमा काम शुरु गर्न मात्र होत ! मैले त जान्न खोजेको थिएँ, मैले के गल्ती गरेको रहेछु र मनिस्कासित भएँ ? यो मेरो प्रश्न त अनत्तरित नै रहयो : म त फेरि&lt;br /&gt;
फर्काएर वनकाइएको 0 त्यही स्थितिमा उस्तै गरी, समयकाट्न रनौकरीको वर्ष बढाई पाको बन्न । के ममा अब पनि उस्तै घैर्यआउन सक्छ &#039;&lt;br /&gt;
उसले आज पनि साथीहरू र हाकिमहरूबाट उही पुरानाकराहरूमा केही थप भएको मात्र सन्न पाएको छ । क अझ यसमासन्दिग्ध नै छ । ती चिप्लाकुरा अरुमाथि दोष थपारेर आफू चोखिने बाटोमात्र निकालेको सुन्दासन्दै क आजित भइसकेको छ । उसको विजयमाकुन अदृश्य शक्तिलाई खुच्चिङ मारेका हुन्‌ : कुन्नि भनेका थिएँ,अब वाहा पाए, होलान्‌ वियैमा कसैलाई नोकरीबाट हटाउनाले कस्तोपरिणाम निस्कदोी रहेछ ।&amp;quot; हाकिमले समेत भनेको थियौ, “राम्रो भयो,तपाईले मृद्टा लडेर जितेर नै आउनु भयो । जागिरदारको आत्मवलबढाउने काम यसले गरेको छ । तपाईले मदट्टा हाल्नासाध हामीलेभनिसकेका थियौं तपाईं फर्केर आउनु हुन्छ । त्यसैले तपाईको परानाठाउँमा कसैलाई पनि राखेका छैनौं । तपाईंले तिन वर्ष पहिलेको रअहिलेको अफिसको वातावरणमा घेरै फरक पाउन भयो होला । दवावमाकाम गराउने यता बढ्दै छ भने उता अदबमा रहन छोड्दै छन्‌ ।अहिलेको अवस्थामा हाकिम भएर काम गर्न अतिनै गाह्रो छ । आँखाअगाडि आफू परिन्छ दुवैतर्फको मार आफूले भोग्न पर्ने हन्छ । यो कुरातपाईंहरू जस्तो विद्वान्‌ले बझि सक्नु भएको होला ।&lt;br /&gt;
१६५&lt;br /&gt;
तपाईं गएपछि शन्तको पदोन्तति भएको छ । तपाईलाईआफूसरहका साथीको मातहतमा काम गर्न सङ्गोच लाग्ला भनेर उसलाईअर्कै शाखामा सस्वा गरी दिएको छु । के गर्ने, मुद्दाको छिनफान हुनयति लामो समय लागिहाल्यो । पर्खने पनि कति, झन्नै पन्ध सोह्र महिनापर्ख्यौँ । अरूको हुन लागेको उन्नति पनि रोकि हाल्न भएन । यसमानराम्रो नमान्नु होला । अब तपाईको पनि पदोन्नति चाडैं होला ।शिवलाई हाकिमका सफाइसंग भन्दा शन्तले आफनो पदोन्ततिभएको यतिका महिना बित्ता पनि नसुनाएकाम चित्त दुख्छ । आजै पनिक उसलाई देखेर अलि पन्छिएकै थियो । सायद पदोन्नतिले उसलाईशिवको अगाडिँ पर्न लाज लाग्यौ होला । क आफैँसंग भन्छ, &amp;quot;मैले तउसको पदोन्नतिको आधार सोध्ने थिइनँ किन उतले पन्छुत परेको ? मत उसको अन्तरङ्ग मित्रपो हुँ । कै नोकरीका क्षेत्रमा भिन्नता जस्तोभावनाको कुनै अर्थ रहदैंन ! उ ज्यादै दुखी हुन्छ न्छ्‌ र भन्छ, “त्यसैलेआज मैले जुन्‌ निर्णय लिएको छु त्यसलाई मान्नै पर्छ ।&amp;quot;यस्तै गरी मनमा क्रा खेलाउँदा खेलाउँदै क घरमा पग्छ । घरमाबिहान देखि छाएको उल्लासमय वातावरण अझै यधावत्‌ नै छ । कघरभित्र पस्ता उनीहरूका खुसीमा अरू खुसी थपिने हुँदा प्रफुल्ल भइदिन्छ । कसले के भने, के गरे, अफिसको स्थिति कस्तो पायौ भन्नेजान्न उत्सक रहेका परिवारलाई रमाइलो नाटकीय शैलीमा सबैबताइदिन्छ । आफना बाबालाई त्यहा छोराछोरी सन्तृष्ट हुन्छन्‌ । सबैलेरुचाएर स्वागत गरेको बर्णन सुनेर छोराछोरी सन्तृष्ट 00 ॥ गौरीलेभने औंला ठउन्याउँदै सचेत गराउँदै भन्छे, “सबै रामै छु तर आफूकाग नबन्नु होला । अर्काका कुरा सुनेर काग/काग भनि कराउँदारोटीको टुक्रा नै भइँमा खस्ला : होशियार हुनु मूर्ख बन्नु हन ।&#039;शिव पनि उसको कुरा सुनेर दह पर्छ र एउटा गौरीलाईपढ्न दिदै भन्छ, “होशियार हुनलाई नै आजै यो चिठी दिएर आएको छु। अब कनै पनि गल्ती दोहेरिन दिनँ ।”गौरी चिठी पढ्न थाल्छे । साधना बाबाको अनुहार हेरेर खिस्सहाँस्छे । गौरीका चेहराको रङ्ग उड्न वाल्छ र चिठी शिवलाई फिर्ता दिँदैभन्छे, “बभिनसक्नको हुनुहुन्छ तपाई र तपाईकी कान्छी छोरी । एउटीलेआजदेखिनै दुइ्वर्षको छुट्टी लिएर आएकी छै भने अर्काले यत्रो संघर्ष गरेरफिर्ता लिएका नोकरीलाई राजीनामा दिएर आएको छ । नोकरी छोडन नैथियो भने यत्रो दुःख किन उठाएको : धन भनिएन, स्वास्थ्य भनिएन,चिनताग्रस्त भएर समय बिताइयौ । अन्त्यमा यौ उल्लासपूर्ण त्योबाताबरण छिनैँमा शान्त हुृछ । एक छिनसम्म कोही कसैसंग बोल्दैनन्‌ ।&lt;br /&gt;
पूल&lt;br /&gt;
त्यसपछि शिवले ने गंभिर भएर जवाफ दिन थाल्छ, &amp;quot;त्याँहाका अवस्थामाझन्‌ हास आएको पाएँ । म कर्मचारी बन्न चाहन्छु, नोकर होइन ।हामी त्याँहा मेसिनको मान्छे सरह हन्छौँ विचारहीन, भावनाहीन सम्पूर्णशक्ति केवलरिमोटका बटनमा आधारित । मलाई बन्नु छैन भृपीशेरचनकोजस्तो “घम्ने मेचमा अन्धो मान्छै ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“अनि के गर्न चाहन हुन्छ त : उस्तै गरी छटपटीमा समयबिताउने ? बितेका यी तीन वर्षले तपाईलाई कस्तो निस्क्रिय बनाइदिएछ। केही दिन त्यहाँको वातावरणसंग मिल्न कोशिस गर्न हुन्थ्यो होला ।त्यसपछि पनि सक्नु भएन भने अनि नोकरी छोड्नु हुन्थ्यो होला । आजएक दिनमा नै के थाहा पाएनु भयौ र नोकरी छोडेर आउनु भयो !यसरी भाग्नु पनि राम्रो हाइन !”&lt;br /&gt;
&amp;quot;म भागेको होइन, न त म निस्क्रियनै भएको छु । मैले चाहेकोछु स्वच्छ वातावरणको सिर्जना गर्न जहाँ प्रजातन्त्र बाँचन सकोस्‌ मानवताफस्टाउन सकोस्‌ । साधना र म सामाजिक पद्‌षण हटाई मानव एकताल्याउने अभियानमा लाग्छौं । मैले स्वतन्त्रताको अनुभव गर्न नपाए पनिमेरा आउने वंशजहरूले पाउने छन्‌ । यहाँ भावना परिवर्तनको पनिखाँचो छ । मैले परिवारतर्फको दायित्व पुरा गरिसके । तिमीहरू सबैकमाएर आफूना खुट्टामा उभिन सक्षम भइ सक्यौ । अब मेरो दायित्वदेशप्रति बाँकि छ । यस देशका नागरिकका हैसियतले मैले अब यसतर्फलाग्नु जरुरी संझैको छु ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
गौरी अलि आतिन्छे र भन्छे, &amp;quot;अनि साधनालाई किन नि ? उसकोत जीवन शुरु नै भएको छैन भने पनि, हुन्छ । म एक्ली यहाँ बसेर केगर्ने नि ? त्यसै भन्न हुन्छ भने मेरो पनि त यहाँ काम छैन ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
ग्छु यहाँ तिम्रो धेरै जिम्मा छ । यहाँ तिमीले यी छोराहकोअभिभावक भई यो घर र यी सन्तानलाई मार्गदर्शन गराउनु छ ।यिनीहरूलाई प्रगतिशील बनाउने जिम्मा हाम्रो हो । तिमी सक्षम छौरमेरी अर्घाञ्चिनी पनि हौँ । मेरो तिमीमाथि विश्वास रहेकाले ने यसरीकर्मक्षेत्रलाई बाँडेर त्यसतर्फ लाग्ने साहस गरेको हुँ । मेरो यो गृहत्यागसदाका लागि होइन । म फर्केर नआउन्जेलसम्म तिमीले हाम्रो गृहस्थीलाईएक्लो भएर चलाइराखे । घर हाम्रो सभ्यताको पचिय हो यसको जरुरतहामीलाई छ गौरी । तिमी अहिले मेरो यो लक्ष्य पुरा गर्न सहयोगीअइदैक वाघा होइन ।&lt;br /&gt;
अनि साधनालाई मैले साथमा यसैले लैजादैछु किनकि यसअभियानलाई सफल पार्न नयाँ पुस्ता र तिनका अभिभावकहरूलाईसाथसाथै संफझाई बभाई गर्दै अगाडि सार्न सकेमा मात्र नयाँ वातावरणको&lt;br /&gt;
१०७&lt;br /&gt;
सिर्जना हनसक्छ । साधनाचै आफना पृस्तासंग मिलेर अगाडि बढ्छे मउसलाई र उसका अभिभावकहरूलाई सहयोग गर्छु ।&lt;br /&gt;
गौरी छोरीको चिन्ता तिमीलाई जस्तै मलाई पनि छ । यसको पनिघर गृहस्थी बसौस्‌ भन्नै म पनि चाहन्छु । यसैले म यसलाई दुईवर्षकालागि मात्र लौजादै छु । त्यसपछि यो गृहस्थ जीवनमा प्रवेश गर्छे ।अहिले यसको विवाह गर्ने उमेर ढल्किसकेको छैन, किन व्यर्थै चिन्तालिनछयौ !&lt;br /&gt;
बाबआमाको कुरा सुनेर साधना पनि भन्छे, “आमा म अबहुर्किसके मैले आफना लागि के गर्नुपर्छ त्यो मलाई नै छोडिदिनोस्‌ ।घाबाले मलाई यस अभियानमा बलजफतिले लेजान लाग्न भएको छैन ।मेरो इच्छा र बाबाको इच्छा मिल्यो । मलाई पनि बाबा जस्तै परिपक्वव्यक्तिको जरुरत थियो । त्यसैले म पनि उहाँकै साधमा जान तयारभएकी हुँ । अलि हाँस्तै भन्छे, “तपाईं त बाबाक्का साथमा म जानलागेकीमा खुसी हुनपर््यौं &#039; मैले जहाँ गए पनि आफना अभिभावकलाईछोडेकी छैन ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
यसरी लक्ष्यमा हठ रहेका तिनीहरूलाई गौरीले कुनै उत्तर दिनसक्तिनँ । क मृक भउर उनीहरूको कुरा सुनीरहन्छे र आँसुलेडबडबाएका आँखा तल झुकाउँछे । आँसुका थोपा तपतप गरी तप्कनथाल्छन्‌ । शिवले यो के गरेकी भनेर सोध्दा आँस पुछतै भन्छे, &amp;quot;यसलाईहर्षका आँस्‌ सम्झी परवाह नगर्नोस्‌ र आफनो लक्ष्यमा लाग्नोस्‌ ।नविर्सितोस्‌, म यहाँ तपाईहरूका प्रतिक्षा गरेर बसी रहेकी हुन्छु, बहाद्रलोगेने र छोरीको स्वागत गर्न ।”&lt;br /&gt;
१६८&lt;br /&gt;
केही दिनपछि एक बिहानी ती बाढुछोरी आफनो बाटो लाग्छन ।सुर्यको राप र जमीन र रुखका पातहरूबाट उदन थालेका बाफलेउनीहरूलाई छोपेर छिनैमा अदृश्य बनाई दिन्छ । गौरी मनैमनलेउनीहरूका अभियानको सफलताका कामना गर्दै घरभित्र उनीहरूलाईबिदाइ गरी पस्छ । त्यहाँ राधाले पनि आफनो लोग्ने दिल बहाद्रलाईउठाउँदै भनीरहेकी गौरीले सुन्छ, &amp;quot;उद्नोस्‌न कति अल्छी गरेर सतीरहनभएको ! र हेर्नोस्‌ त छोरी रूँदै तपाईलाई बोलाउँदैछै । उसलाईफुल्याउनु हुन्न !&amp;quot;&lt;br /&gt;
दिलबहादर आफनो आङ तन्काउदै जरुक्क उद्छ । बिहानीभइसकेकाले क आतिन्छ र मनमनै प्रण गर्छ, अब कं पनि समयको, ख्याल राखि आफू क्रियाशिल हुन ढिलाइ गर्दैन । त्यसैवेला छोरी खैआमाबाबुलाई खोज्छे । आफनो सुरक्षाको लागि, आफनो भविष्यको लागि ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समाप्त&lt;br /&gt;
१६९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==छुटेको==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पेज -३४हरफ - २२ मा छैनन पछि&lt;br /&gt;
- भने पनि हुन्छ । अरु त के घरमा मूली आमा बुवाले पनिआफ्ना नानुहरूलाई पढ्न नगएमा भन्छन्‌ -&lt;br /&gt;
पेज -७३&lt;br /&gt;
हरफ -२६ मा नोकरी नगर भन्दा पछि&lt;br /&gt;
- मान्दै मान्दिन । के गर्ने ? आफ्‌ बाँचेर सन्तान बित्नु जस्तोचोट त कुनै हुँदो रहेनछ अहिले-&lt;br /&gt;
पेज -११३हरफ १ मा ट्ङ्गल आयो कि चिट्ठी पछि- मैरो खबर होईन बरु तेरो आफ्नै भन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==गीताकेशरी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जन्म मिति ३ १९९७,२७ आषाढ&lt;br /&gt;
जन्म स्थान ; पकनाजोल, नयाँ बजार काठमाडौँहालको ठैगाना : बिज्ञालनगर बडा नं. ४ काठमाडौंशैक्षिक योग्यता : एम.ए. राजनितिशास्त्रभ्रमण : एशिया, पुरोप, अमैरिका, अष्ट्रेलिया,ग्यानाङा आदि&lt;br /&gt;
कसिंगर उपन्यास, साका प्रकाशन - २०३४&lt;br /&gt;
सौगात उपन्यास, भारद्वाज प्रकाशन - २०४६&lt;br /&gt;
आवाज उपन्यास, भारद्वाज प्रकाशन - २०४७&lt;br /&gt;
मुक्ति उपन्यास, भारद्वाज प्रकाशन - २०४८&lt;br /&gt;
खोज उपन्यास, भारद्वाज प्रकाशन - २०५०&lt;br /&gt;
अन्तिम निम्तो उपन्यास, सेभ द चिल्ड्रेन ।यू.एस) - २०५१विश्वास उपन्यास, लेखक स्वयं - २०५२&lt;br /&gt;
खुल्ला आकाश उपन्यास्त, बाल कल्याण समाज -२०५४&lt;br /&gt;
डा कछ उठी ठुट छट उ दि दारी&lt;br /&gt;
पुरस्कारहरु१. कवि धरणिधर पुरस्कार२. लोकप्रिया पुरस्कार३. राष्ट्रिय प्रतिभा पुरस्कारयसै उपन्यासबाटकुनितिको पालना गराउन जागिरदारमाथी अनुशासनको लगाम लगाइन्छ भनेत्यो शाषण हुनजान्छ ।&lt;br /&gt;
कककमंचारी निपमावलीको कमजोर पक्षलाई समातेर उच्च पदका जागीरदारलेमातहतका कर्मचारीलाई दुःख दिने प्रबति बस्यो भने त्यौ लाचार जागिरदारनोकर हुन्छ -प्रशासनको होईन प्रशासकको ।&lt;br /&gt;
क्रसेवाका लागि स्थापित पैशा घृणित हुँदैन ।&lt;br /&gt;
क्रतपाईं छोरीलाई छोरी मात्र सम्झनु हुन्छ, सन्तान मान्नु हुन्न ? छौरी भएर जन्मेभनेर बा आमाप्रति मेरौ केही कतंव्य नै छैन र?&lt;br /&gt;
[[Category: Step 2]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%80_(%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8)&amp;diff=75</id>
		<title>नोकरी (उपन्यास)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%80_(%E0%A4%89%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8)&amp;diff=75"/>
		<updated>2024-06-10T13:22:35Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;Source file: https://nepalikitab.org/gita-kesari-nokari/&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==किताब परिचय==&lt;br /&gt;
नोकरी&lt;br /&gt;
(उपन्यास)&lt;br /&gt;
गीताकेशरी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वाणी प्रकाशन विराटनगर- १४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रकाशक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाणी प्रकाशन सहकारी संस्था लि.&lt;br /&gt;
विराटनगर-१४, मोरङ, नेपाल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संस्करण: प्रथम&lt;br /&gt;
मृयः रु. १००&lt;br /&gt;
मिति: २०५५ आषाढ&lt;br /&gt;
छापिएको प्रति: १०००&lt;br /&gt;
सर्जाधिकार;ः लेखिकाको&lt;br /&gt;
कम्प्युटर सेटिङ्ग: वाणी प्रकाशन, विराटनगर&lt;br /&gt;
मुद्वक:&lt;br /&gt;
श्री नेपाल शैक्षिक सा. उ. प्रा. लि.स्वयम्भू, काठमाडौ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रकाशकीय==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपाली उपन्यास । साहित्यका क्षेत्रमा श्रीगीताकेशरी परिचित,चर्चित र प्रशंसित व्यक्तित्व हुनुहुन्छ । तीन दशकभन्दा बढी समयदेखिउपन्यास लेखनमा सक्रिय, सबल र समर्थवान्‌ सर्जक उपन्यासकारहरूमध्येमा उहाको स्थान अग्॒गण्य नै छ । संगति र विसंगति, घात ।प्रतिघात, चारित्रिक संगठन र विगठन, पात्र।पात्राको सचरित्र र दश्चरित्र,घटना र दर्घटना, मानवीयता र संवेदना, सबलता र दर्बलताहरू उहाँकाउपन्यासका विषयहरू भई आएका छन्‌ र तिनलाई बृहत्‌ क्यान्भासमाउहाँले सबलताकासाथ प्रस्तुत गर्नुभएको छ ।&lt;br /&gt;
पुस्तुत उपन्यास &amp;quot;नौकरी&amp;quot; नेपालको २०४६ सालको राजनीतिकपरिवर्तनतपछिको यथार्ष दस्तावेज हो, जसलाई उहाँले उपन्यासकामाध्यमबाट सफलतापूर्वक उतार्नु भएको छ । राजनीतिका दृश्चक्रमा परेकोनेपालको नोकरशाही ।ब्युरोकेसी) को दःखान्त कथाका रूपमा आएकोनोकरी (उपन्यास) प्रकाशन गर्न पाउँदा वाणी प्रकाशनले खशीको अनभवगरैको छ । उहाँबाट भविष्यमा पनि यसौ शास्त्रीय,मान्य र स्तरीयउपन्यासको आग्रह गर्दछौं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिराटनगर परशु प्रधान&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२०५४।९।१० अध्यक्ष&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==&amp;quot;नोकरी! भित्र चहार्दा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपाली उपन्यास जगतमा गीताकेशरी नाउँ अपरिचित छ भन्नेमलाई लाग्दैन । २०३४ सालमै पहिलो उपन्यास &#039;कसिङ्गर&#039; साझाप्रकाशनबाट छपाएर नेपाली उपन्यास साहित्यमा नाम दर्ता गर्नैगीताकेशरीले २० वर्षभित्रै सातओटा उपन्यास लेखी छओटा प्रकाशित पनिगराइसक्नुभएको छ । २०५० सालको धरणीधर पुरस्कार प्राप्तगर्नै मुक्तिउपन्यास त आकारमा पनि ज्यादै ढव्बु छ । २०४६ सालको प्रजातान्त्रिक_ प॒नर्बहालीपछि त झन्नै डेढ वर्षका दरले एउटा उपन्यास दिएर यसविघालाई समृद्ध तुल्याउने गीताकेशरीको प्रस्तृत उपन्यास नोकरी नितान्तसघारवादी दृष्टिले लेखिएको देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस उपन्यासको प्रमख पात्र हो शिव खँड्का । शिव खँड्काएउटा कार्यालयमा काम गर्छे, स्पष्ट शव्दमा सोभैँ भनौं नोकरी गर्छ ।उसैका सेरोफेरोमा उपन्यास घुम्छ । उसकी पत्नी गौरी पनि कुनैकार्यालयकी कर्मचारी छै, काम गर्छै, नोकरी नै गर्छै । शिव खँड्काइमान्दार र हक्की कर्मचारी हो । आफना हातमा आएका टुङ्ग्याउन पर्नेकाम फत्ते नगरुन्जेल क कार्यालयबाट हिड्दैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुन त कर्मचारीप्रति जनसाधारणको सोचाइ नै शिवका विपरीतछ किनकि कर्मचारी जति सबै कामचोर हुन्छन्‌, भ्रष्ट हुन्छन्‌, घुस नखाईकामै गर्दैनन्‌ भन्ने धारणा सर्वसाधारणले पालेको पनि देखिन्छ, सुनिन्छ रनेपालीमा उखानै बनेको छ &amp;quot;सरकारको काम, कहिले जाला घाम,”&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त आचार्यका समयका कर्मचारी पनि यस्तै थिए,छन्‌ र त उनले जडे कविता ।&lt;br /&gt;
“बिन्ती डिट्ठाबिचारीसित म कति गरूँ चप्‌ रहन्छन्‌ नबोली&lt;br /&gt;
बोल्छन्‌ ता ख्याल गउ्या झैं अनि पछि दिनदिन्‌ भन्दछन्‌ भोलि भोलीकी ता सम्तीत भन्नु कि तब छिनिदिन्‌ क्यान भन्छन्‌ यी भोलीभौली भोली हुँदैमा सब घर बितिगौ बम्सियौस्‌ आज झौली &amp;quot;&lt;br /&gt;
धेरैजसो कर्मचारीको परिचय आज पनि यही हो ।&lt;br /&gt;
तर &#039;हात्ती र हात्ती छाप उस्तै उस्तै हो&amp;quot; भने झैँ सबैकार्यालयका सबै कर्मचारीलाई एक भनिहाल्न हुँदैन । इमान नछोड्ने ररातदिन घोटिएर काम गरे पनि अवकाशमा पर्ने शिव खँड्काहरू एकातिरछन्‌, भेटिन्छन्‌ भने अर्कातिर दमन जस्ता कर्मचारीहरू पनि धेरै छन्‌. जौबाहिरी आय हुने भए जेजस्तो &#039; नहुँदौ काम पनि गर्दछन्‌ । त्यसैले&amp;quot;नोकरी&amp;quot; लाई केन्द्रविन्दु बनाएर यस उपन्यासलाई उभ्याएको छु रशीर्षक पनि &amp;quot;नोकरी&amp;quot; नै छ ।&lt;br /&gt;
उपन्यासकारले नारीहरूले नोकरी गर्दा समाजले हेय ठान्नेपरम्परा हाम्रा समाजमा आज पनि उत्तिकै विद्यमान भएको प्रसङ्गसाधनाका प्रेमीले साधनाले विमान परिचारिकाको नोकरी छोडेमा मात्रबिहे गर्ने कुरा गराएबाट पस्ट पार्न भएको छ । नारीहरूको कामघरधन्दा मात्र हो । घरभित्रै रहेर परिवारको भरणपोषण गर्न नारीकोकर्तव्य हो । उनीहरूले बाहिर गएर नोकरी गर्न हुँदैन भन्ने खूढीविचारलाई यस उपन्यासले राम्रो जवाफ दिएको छ ।&lt;br /&gt;
उपन्यासकी अर्की पात्रा रेनाको जीवन पनि समान छ तरअर्कातिर आजका विकृत मस्तिष्कका यवावर्गको प्रतिनिधित्व गर्दछन्‌ सघाकालोग्नेले र संझनाका लोग्नेले । सुधाका लोग्नेले आफनी पत्नीलाई व्यापारवृद्धिका लागि मात्र प्रयोग गर्छ चाहे त्यो व्यापार अवैध वा तस्करी नैकिन नहोस्‌ । त्यस्तै सझनाका लोग्नेले संझनासङ होइन, उसकाकमाइसङ बिहे गरेको हुन्छ ।&lt;br /&gt;
यस्ता प्रसङ्घबाट उपन्यासकारले सामाजिक सघारलाई प्रम मट्दाउपन्यासमा बनाएको देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
उपन्यासको प्रारम्भसडै राजनीतिक वातावरणको उल्लेख छ ।प्रजातन्त्रको पनर्बहालीपछि कर्मचारीको सरक्षाका लागि, कर्मचारीकोसुविधाका लागि आवाज उठाउने शिव खँड्का स्वयं असरक्षित छ,सविधाहीन छ । राजनीतिका नोउँमा आफनो दनो साफयाउने नेताहरूलेकर्मचारीहरूलाई उचालेर सत्तापक्षका विरोधमा उभिन लोभ्याउँछन्‌ ।प्रलोभनले तानिएका बिच्चरा कर्मचारी होहोरैमा लागेर राजनीतिक दासतामस्तिष्कमा बोम्तछन्‌ र नेताका. निर्देशनमा : होमिन्छन्‌ तर नेताहरूलेस्चार्पूर्तिपछि गेकाक काहा प्लाम्मा दोष पन्छाएर आफू निर्दोषी र अनभिज्ञहुन्छन्‌ भन्ने प्रसङ्‌ र कय खँड्काबाट प्रस्टिन्छ ।&lt;br /&gt;
यता आएर “राजनीतिक विभेदले गर्दा सत्तापक्षीय कर्मचारीमात्र सुरक्षित हुन्छन्‌, सेवासङं मेवा पनि पाउँछन्‌ तर विपक्षी दलसङसम्बद्ध कर्मचारी असुरक्षित हुन्छन्‌ भन्ने धारणा पनि परिलक्षित भैरहकोछु । राजनीतिक परिवर्तनले देशको बिकास, कर्मचारीको उन्नति र&lt;br /&gt;
नोकरीको सुरक्षा नहुँदो रहेछ भन्ने शिव खँड्काका प्रसङ्चबाट देखाएरउपन्यासकारले नेताहरूका, हाकिमहरूका र देशवासी बा नागरिकहरूकोमानसिक परिवर्तन हुनुपर्छ, साथै देशविकास, कर्मचारीको उन्तति रनोकरीको सुरक्षा गर्नै ऐन, कानुन र नियममा पनि परिवर्तन हुनपर्छ भन्नेउपैन्यासमा देखाइएको छ । राजनीतिक दासताले भरिएका मस्तिष्कबाटदेश, जनता, कर्मचारी आदि कसैको पनि भलाइको आकाइक्षा मृगतृष्णामात्र हो भन्नै करा उपन्यास पढेपछि पाठकका मस्तिष्कमा स्पष्ट हुन्छ ।&lt;br /&gt;
उपन्यासको नाउँ &amp;quot;नौकरी&amp;quot; छ । यसभ्ित्रका सबै पात्र नोकरी गर्नैनै छन्‌ तर नोकरीका परिभाषाबाट सबै अर्नभिज्ञ छन्‌ । ११ वर्षसम्मनोकरी गर्दा पनि नोकरीको परिभाषा नजानेका शिव खड्कालाई दिलेलेआफ्‌नी पत्नी राधालाई बताइदिएका कुराबाट बोध हुन्छ । खड्का खुसीहुन्छन र &#039;यरेका&#039; भनेर उफ्रेजसतै मानसिक रूपबाट उफ्रिन पुग्छ । दिलेलेभन्छ, &amp;quot;उनीहरू सरकारका नौकर, हामी घरका नोकर, दबै धरी नोकर।&amp;quot; नोकरको परिभाषा बपछिं शिव खड्का सोच्छ, “मैले ग्रति कुराजान्त पन्ध्र वर्ष नोकरी गरेर पनि सकिनँ । यसले यति सजिलोसड कसरीअर्थ्याइदियो : म सोच्थे, म त कर्मचारी हुँ, पदाधिकारी हुँ । आदेशकोमात्र पालना गर्ने म अब होइन । मेरा पदको पनि केही दायित्व छ रयसको निर्वाह गर्न चाँहिदो हक मैले प्राप्त गर्नै पर्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
शिव खड्काका सोचाइसङ परिबर्तित प्रजातान्त्रिक व्यवस्था मिल्नसक्तैन र पदोन्नति पाउनुको सट्टा क अवकाश पाउँछ । अवकाश किनपायौ : हाकिमले माथि देखाउँछ मन्त्रीतिर अनि मन्त्रीले हाकिमतिरदेखाएर आफूलाई थाहा नभएको भन्ने जनाउँछ । एक अर्काका टाउकामादोषारोपण गरेर आफू चोखो बन्न खोज्छन्‌ । आजित क अब अदालतकाशरणमा जान्छ ।&lt;br /&gt;
उपन्यासमा न्यायव्यवस्थालाई स्वतन्त्र, निर्विवाद र जनताकोआधारस्तम्भका रूपमा लिइएको छ र अन्तमा शिव खड्काले मुद्दा जितेर.पुनर्बहाली गर्छ अनि उसै दिन राजीनामा पनि गर्छ ।.&lt;br /&gt;
प्रजातन्त्रको पुनर्बहाली त भयो तर ऐन, नियम र मानसिकताउनै भएकाले प्रजातन्त्रको स्वस्थ उपभोग जनताले गर्न पाएका छैनन्‌ ।पछिल्लो व्यवस्थाका १०५ ले पाएकोभन्दा हजारौं गुना बढ्ता आस्वादन२६५ ले पाएका छन्‌, लिएका छन्‌ । सर्वसाधारणलाई हिजो बरु सरलजीवन बाँच्न सजिलो थियो, बाली जस्तै गौली पनि नियन्त्रित थियो तरआज बोली र गोली दुवैलाई उत्तिकै स्वतन्त्रता छ । त्यसैले प्रजातन्त्रकोपुनर्बहालीपछि पनि प्रजातन्त्रत्वका राजीनामा भैसकको छ शिव खड्कालेजस्तै भन्ने कुरा प्रतीकात्मक रूपबाट स्पष्ट हुन्छ । नेताहरूका अनुहार&lt;br /&gt;
मात्र फरक छन्‌ र हिजोका नेताका ठाउँमा केही नयाँ जनुहारहरूप्रतिष्ठापित छन्‌ तर बानी, बेहोरा र मानसिकतामा केही फरक छैन&lt;br /&gt;
उपन्यासले सुधारको मार्ग पनि देखाएको छ । शिव र साघनाबाब र छोरी । बाब्ले छोरीलाई सुधारको बाटो देखाउँछ ।&lt;br /&gt;
&amp;quot;सामाजिक सेवा गर्छु भनेर तम्सने हो भने जातीय &#039;र लैङ्गिकभदेभाव राख्नु हुँदैन । समाजमा पुरुषको विक्रास भएन&#039; भने नारीकोविकास असम्भव हुन्छ । आजको नारा &#039;नारी विकास&#039; लाई बदल्न पर्छ रकेवल भन्नुपर्छ &amp;quot;मानव विकास” ।&lt;br /&gt;
“आजको समाज पुरुषप्रधान छ । पुरुषमा चेतना आउन सकेमामात्र उसले थाहा पाउनसक्छ (पुरुषको अर्को रूप &#039;नारी&#039; शोषित भएकीलेनै उसले समाजमा पहिलो स्थान ओगदन सकेको हो ।”&lt;br /&gt;
जातिसुधार, नारीसुधार, देशसधार, नोकरीसधार आदि जति पनिसुधारका कुरा छन्‌, सबै मानिसका मस्तिष्कसुघधारमा भरपर्छन्‌ । मान्नबिचारमा परिवर्तन नआई सुधारको क्रागर्न भनेको आकाशको फल झार्नजस्तै हो । यस्तै कुरा उपन्यासले देखाएको छ भन्ने मलाई लाग्छ ।&lt;br /&gt;
यस उपन्यासले आज उठेका प्रश्नलाई बाटो देखाउन सहयोगगर्छ भन्ने मलाई लाग्छ । आफूना आमाबाबका प्रति छोरामा भन्दाखछोरीमा बढ्ता कर्तव्यबोध हुन्छ भन्ने कुरा छोरी साधनाका उदाहरणबाटप्रस्ट पारिएको छ र यसरी छोरीलाई अंश दिनपर्छ भन्ने “ प्रश्नको जवाफयस उपन्यासमा पाइन्छ । छोरा र छोरीमा भेद नगरी दृवैलाई सन्तानकारूपमा हेर्ने दृष्टिकोण उपन्यासमा छ । शिव खड्काले छोरो विनोद रछोरी साधना बा प्रेरणामा कुनै पृथक्ता- वा भेद गरेको छैन । छोराकोकमाइ खान हुन्छ भने छोरीका कमाइबाट पनि पालिन हुन्छ भन्ने विचारसाधनाले विमान परिचारिकाको नौकरी गरेबाट र त्यसबाट आउनेतलबबाट घर खर्च गरी घर धानेका कुराबाट स्पष्ट पारिएको छ ।सुधारका दृष्टिले उपन्यास आदर्शमय बनेको छ ।&lt;br /&gt;
उपन्यासले भाषा, साहित्य र कला समाजका परिचायक हुन्‌,सभ्यताका परिचायक हुन्‌ भन्ने पनि देखाएको छ । यी र यसौ प्रायङ्गिककुरा उपन्यासका धेरै ठाउँबाट उद्धृत गर्न सकिन्छ तर पनि यसकोगदीचाँहि हो नारीले आफनो व्यक्तित्व विकासका लागि, जोसुकैले जेसकैसंझून्‌ वा भनून्‌, नोकरी गर्नै पर्छ । नोकरी गर्नु भनेको आर्थिक दृष्टिलेसबल हुनु हो । पुरुषका हातमा -आर्थिक नियन्त्रण वा सम्पत्तिकोहालीमुहाली हुन्‌ र नारीले आर्थिक मामलामा कमजोर हुनु हो र यो नैपरुषका नियन्त्रणमा रहन हो । आर्थिक रूपले नारीहरू सबल भएमा मात्रसमानता आउँछ । नोकरी गर्दा आइपर्ने सम्भावित दोष वा अवगुणलाई&lt;br /&gt;
दृढ भएर सामना गर्नपर्छ । नारीलै अब अबला होइन, सबला बन्नुपर्छ ।नारीमा आत्मविश्वास जगाउन यस्ता उपन्यास र साधना, पेरणा, दयाजस्ता नारीहरूको आवश्यकता छ अनि शिव खड्का जस्ता परुषहरूकोपनि आवश्यकता छ ।&lt;br /&gt;
सामाजिक सुधारका कराहरूको उल्लेख नगरै मेरो लेखाइ वाबभझाइ अपुरो हुन्छ । प्रेरणाका विवाहमा समाजमा प्रचलित देखावटी खर्चगराउने प्रथा बन्द गराइएको छ । छोरी साधनाको नोकरी, राधाकोगायनबाट आर्जन, प्रेरणाका पतिले अमेरिकामा बालसेवा गरी पत्नीकाप्रसवसमयमा स्वदेश फर्की माया गर्नु, बाबुछोरी, शिव र साधना अन्त्यमासामाजिक प्रदुषण हटाई मानवएकता ल्याउने अभियानमा लाग्ने कुराकोप्रसङ्ग ल्याई सुधारका कुरा निकालेर उपन्यासलाई पठनीय र सुधारयोग्यसमाज बनाउने प्रयास स्तृत्य छ ।&lt;br /&gt;
उपन्यासको बैचारिक पक्ष आदर्शमा अडेको छ । समस्याकोसिर्जना गरी निराकरणको बाटो पनि देखाएर उपन्यासलाई जीवन्त बनाउनैउपन्यासेकारको प्रयास सराहरीय छ । देउकीको विवाह गराएर घरबसाउनेप्रयास, ब्राबाको सबैलाई माया र स्नेह बाँडी सेवा गर्ने प्रवृत्ति आदिआदर्शका उदाहरण हुन्‌ ।&lt;br /&gt;
आफना अन्य उपन्यासमा जस्तै यस उपन्यासमा पनि उपन्यासलाईजीवनको प्रतिछाया मान्ने उपन्यासकार गीताकेशरीले परम्परागत सामाजिकमान्यता र मूल्यलाई बद्लिदो परिप्रेक्षमा हेरी नवीन सन्देश दिने प्रयासगर्नभएको छ ।&lt;br /&gt;
नारीचेतना र आधनिक बिचारको सङ्गम शिक्षा, सुखी दाम्पत्यजीवन भन्न कट्टरपन्थी विचारको विरोध र सामाजिक र कानुनी नियममापरिवर्तन गर्न मानसिक्न परिवर्तन हुनुपर्ने कुरा यसका प्रमुख मृद्दा हुन्‌ ।&lt;br /&gt;
यसरी सुधार र आदर्शका नयाँ विचार दिनै उपन्यासकारगीताकेशरीबाट भविष्यमा अझ रोचक, यगान्तकारी उपन्यासहरूको अपेक्षासमाजले गरेको छ र उहाँको कलम अझ प॒खर बन्दै तिरन्तर अग्रगामीहोस्‌ भन्ने कामना गर्न समीचीन नै होला ।&lt;br /&gt;
घटस्थापना २०५४ डा. गणेश भण्डारी“भृकुटीकुन्ज&amp;quot;&lt;br /&gt;
१०५ धर्मभक्तमार्ग,&lt;br /&gt;
विराटनगर - २&lt;br /&gt;
पाठक साथीहरूतपाईंहरू पनि जागिरै हुनुहुन्छ भने आफनो मट छामेर&lt;br /&gt;
भन्त होस्‌ कही कतै चाट लागको छ कि ! व्यवहारघाट, व्यवस्वाबाटसहुलियतबाट यतबाट या हाकिमका तजबिजबाट अधघबा आफना मातहतकाजागिरदारहरूबाट ।&lt;br /&gt;
यो उपन्यास &#039;नोकरी&#039; ले समस्त जागिरदारहरूलाइ लक्ष्य गरेतापनियसको मुख्य माध्यम मध्यमर्वागेंय जागिरदारहरूई नै बनाएकी छु रक आफना हाकिम र मातहतका व्ययक्तिहरूबाट कस्ता स्थितिमा परेकोछ त्यो नै देखाएकी छु । घर, समाज, कार्यालय र राजनीतिका सेरोफेरोभित्र व्यक्तिको व्यक्तित्व कसरी बन्दै गएको हुन्छ, कस्तो अधिकार रदायित्व यी क्षेत्रमा उसको रहेको हुन्छ भन्ने तथ्य देखाउनका साथै हालकार्यालयहरूमा हुनसक्ने स्थितिको समेत जानेबुझेसम्म वर्णन गरेकी छु ।&lt;br /&gt;
नोकरीका विशेषणलाई यथावत्‌ राखेर पूर्ण अख्तियारको भारसमालेर कार्य संचालन गर्न सक्ने, निर्भीक र कर्मठ व्यक्ति समयको मागअनुसार यर्गौ पुरानो नियम कानुनमा थपघट गरि बनाउनु पर्नेआवश्यकतालाई औंल्याएर &#039;नोकर&#039; बाट मुक्त गराई विश्वासी कर्मचारीबनाउनु पर्ने प्रजातन्त्रको आवश्यकता हो अन्नेतर्फ ध्यान आकृष्ट गर्नकासाथै न्याय जीवित राख्न भ्रष्ट र कुनीतिज्ञहरूलाई सजाय दिन चुक्न नहुनेउद्देश्य राखी बिनाकारण जागिरदारहरूलाई पदमुक्त गरी देशको प्रशासनिकव्यवस्थालाई हास्यास्पद बनाई जागिरदारहरूको मनोबल होच्याउनेतर्फलाग्नाले देशका प्रगतिमा नै सुस्त गति देखापर्न सक्छ भन्ने पनिदर्शाएकी छु ।&lt;br /&gt;
लेख्तालेख्तै के कसो लेखिन प॒गेको छ यो पाठकहरूकै जिम्मामाछ । मेरो लागि तपाईहरूको समालोचना आलोचना सबै ग्रहणीय हुनेछ ।तथ्य राय सुभावबाट अबश्य पनि उम्किन पाउदिन होला भन्नै ठानैकीछु । मैले उपन्यास लेख्ने प्रेरणा पाठकहरूबाटै पाएको हु र एक पछिअर्को पुस्तक लेख्ने श्रेय यहाँहरूमा अर्पण गर्न चाहन्छु&lt;br /&gt;
अन्त्यमा यस उपन्यासको प्रकाशन गरिदिएकोमा वाणी प्रकाशनकासंचालकवर्गमा हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापन गर्दछु र यसको पाण्डुलिपि हेरीभुमिका लेखिदिने समालोचक डा. गणेश अण्डारीलाई पनि हार्दिक धन्यवाददिन्छु ।&lt;br /&gt;
गीताकेशरीविशालनगर, काठमाडौं ।टेलिफोन नं ४३२१२०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==नोकरी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आइतबार, हप्ताको पहलो दिन, शिव खँड्दका पन्ध दिनपछि आजअफिस जदिँ छु । कामको ज्यादै बोझले गर्दा तनाउ बढ्न गएकालेउसलाई गौरीले बलजफत गरेर नै छुट्टी लिनलगाएकी थिई तर स्वभावलेलाचार शिवले कुनै दिन पनि अफिसका कामकाजहरूलाई बिर्सत सकेन ।&lt;br /&gt;
आज उसले झन्‌ ज्यादा ती कामहरू संझदैछ र कुनलाईप्राथमिकता दिएर सिध्याउन पर्ला भनैर ती थन्किएका संभावितकामहरूलाई केलाउन थाल्दै छ मनमनै । छान्दाछान्दै सबै उत्तिकै जरुरीभइसकेका पाएर त्यति लामो छुट्टी लिन कर लगाउने गौरीसंग पनि बिछडदैझौकिन्छु र अठोट गर्दछ राति अबेरसम्म बसैर भए पनि दुई चारदिनमा सबै काम समाप्त पारेर नै छोड्छ । त्यस वेला पनि किन अबेरआउनु भयो ? भन्न लागी भने अनि मैले जबाफ दिन जानेको छु भनेरमनैभित्र गौरीप्रति उठेका रिसलाई थैचारेर सन्तुष्टि लिन्छ ।&lt;br /&gt;
उसका अफिसको व्यवस्था भिन्दै प्रकारको भएकोले पनि उसलाईधेरै चिन्ता लागेको हो । त्यहाँ जो जसले छुट्टी लिए पत्ति कार्यालयमाफर्केपछि थप्रिएका कामहरू आफैँले सिध्याउन पर्छ । त्यसमाथि पनिसबैको विश्वासी सबैले एचाएकाले माथिका हाकिमदेखि मुनिकासहयोगीहरूले संमैत काम उसलाई पन्छाउने भएकाले उसका टेबलमाफाइलहरूको थुप्रो कहिल्यै छ्लुटतैन थियो । उसको -स्वभाव पनि त्यस्तै छकसैलाई “नाईँ, सक्तिनँ” अन्त नसक्ने । उसलाई कुनै मित्रले किन यसरीसबैको काम जिम्मा लिन खोज्छौ, काम बिग्रे दोष तिमीलाई आउँछ, राम्रोभए जसजति अरुमा जान्छ, भन्दा क भन्ने गर्थ्यो, &amp;quot;काम गर्नु भनेकोयस्तो कुरा हो, यसले नै हामीलाई अनभवी बनाउँछ र अनुभवी हर्नसफल हुनु पति हो । त्यसैले जस उनैले लिए पनि अनभव मेरो तखोस्न सक्तैनन्‌ । मसँग तिनीहरू जसले काम पन्छाउने गरेका छन्‌ तीअनुगृहीत त हुन्छन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
यसरी आफ्नो उपस्थिति अफिसका लागि जहरी बनाएर बसेकाव्यक्तिलाई जब गौरीले एक दिन भनी, &amp;quot;कसैको पनि कतै खाँचो धेरै दिनटिक्न सक्तैन । परिस्थितिले त्यसलाई मिलाउँदै गएको हुन्छ । तपाईं मात्रएक यस्तो हुनुहुन्छ जसले आफू नभएमा सबै डुब्छ भनेजस्तो गरी छोपौहिँड्नुहुन्छु । यो सोचाइ तपाईको भ्रम मात्र हो, अफिसको आवश्यकताहोइन”, भन्दा क कति रिप्ाएको थियो भने त्यस दिन क घरमा खाना&lt;br /&gt;
१&lt;br /&gt;
खान पनि आएन र कसैसग बोल्दा पनि बोलेन ; त्यस बेलादेखि गौरीलेउसलाई जुन वेला अफिसबाट घर फर्के पनि केही भन्दिनथीई । सोच्थी,&amp;quot;उसलाई अफिसका बारेमा केही भन्न व्यर्थ छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
मस्तिप्कमा विभिन्न कुरा खेलाउँदै शिव ठेक समयमा अफिसपुग्छ । उसलाई कामको चिन्ता लागै पनि आफिसका प्राङ्गणमा पुगेपछिखुसी लाग्छ । दश बज्ने बेला भएकाले कर्मचारीहरू चारैतिर छरिएकादेखिन्छन्‌ । कोही हस्याङ फस्याङ गर्दै आफनो कार्य कक्षतर्फ लाग्दै छन्‌अने कोही सूचना पाटीमा टौसेको खबर पढ्न झुम्मिदै छन्‌ । पदोन्ततिकोयोग्यताक्रमको स्‌ची निकाल्ने करा चलेको क संझन्छ र अड्कल पनिगर्छ, सके त्यो त्यही नै होला । उसलाई त्यहाँ त्यसरी यष्रिएर त्यो खवरपढ्न जिज्ञासु भएकाहरूलाई देख्ता भित्रभित्रै हाँस उद्छ र एक व्यक्तिसँगसोध्छ पनि, &amp;quot;ककसको नाम निस्किएछ : तपाईंको छ कि छैन ?&amp;quot; त्यसव्यक्तिले उसका प्रश्नलाई अनसुनी गर्दै यसै पन्छिन्छ । त्यस व्यक्तिकात्यस व्यवहारले उसको मन खल्लो हुन्छ र आफै त्यहाँ गएर हेर्नतम्सिन्छ । यत्तिकैमा अर्का एकले उसलाई देखाउँदै, “क माडसाहेव पनिआइपुग्नभएछ,&amp;quot; भनेको सुन्छ । शिवले प॒लुक्क उसको अनुहार हेर्दाखिस्रिक्क परेको देखेर उससँग केही सोध्दैन । संझन्छ, सायद उसको नामत्यस सूचिमा परेनछ क्यारे &#039; यस्तो पति कसरी हुनसक्छ ? उसको नामत आउनै पर्ने थियो ज्ञ काम पनि राम्रो गर्ने हो, नोकरीका वर्षले पनिपुरानो कर्मचारी नै हो, फेरि के भएछ ?” शिवलाई त्यो सूचना पढ्नअरु उत्साही गराउँछ र का अगाडि सर्छ । हाकिम नै त्यहाँ आएकोदेखेर अरु कर्मचारीहरूले उसलाई बाटो छोडिदिन्छन्‌ र क त्यो पढ्नथाल्छ ।&lt;br /&gt;
सुचनाको व्यहोरा पढ्दैमा क सननन्त हुन्छ र त्यहाँ उल्लिखितनामहरू ध्यान दिएर पढ्न थाल्छ । अन्त्यमा आफनै नाम पढेपछि कखड्गै हुन्छ । विश्वास लाग्दैन र दोहोन्याएर पढ्छ “त्यहाँ प्रष्टसँग अंङ्कितथियो शिव खँडकाको नाम ।&amp;quot; क लाजले त्यहाँ भेला भएका कसैको पनिअनुहार हेर्न सक्तैन र त्यहाँबाट फुत्केर कार्यालय बाहिर निस्कन्छ ।मनमा प्रश्न प्रतिप्श्नको आँधी चल्न थाल्छ र सोच्छ, “एक फेर तीहाकिमहरूसँग भेटेर सोध्नै पर्छ, “मेरो निष्काशन गरिनाको कारण के हो? कुन आधार अपनाउनु भयो ? कै यही हो तपाईहरूको विश्वासी भएरकाम गरेबापत मैले पाएको इनाम ! यस्तै हो भने यहाँ न्याय जीवितरहन सक्तैन ?&amp;quot; न&lt;br /&gt;
क त्यसरी ठिङ्ग उभिएर सोचिरहेकै बेलामा अर्को झजस्तै पीडितआइपुग्छ । दुवैले खिस्स हाँसेर आ।आफना वेदना पोख्छन्‌ र शिवले&lt;br /&gt;
र्‌&lt;br /&gt;
सोध्छ, &amp;quot;के हो यस्तो ? कुनै तक पाउन सम्नभयो :&amp;quot; उसले पनि खिन्नहुँदै जवाफ दिन्छ, “भन्छन्‌, पजनी हुँदा घस्नै हुन्छ रे ? अहिले मात्रहोइन, २०१५ सालमा पनि यस्तै भएको थियो रै : जनसकै व्यवस्थामापनि मार खाने हामी जागिरे नै हुन्छौं । राणाशासनदेखि आजसम्म पनियो प्रधा जान नसकेकाले डर लाग्छ, कहीं यो हामो परम्परा नै बन्ननजाओस्‌ । यस्तै हो भने हामी बलियो कहिले हुने खै : भन्‌ यो तप्रशासन व्यवस्था नै परिवर्तन भएका वेलामा भएको छ । कसलै विचारगर्ने, दोषी कोहो अनेर, व्यवस्था कि कर्मचारी ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
यति भनेर क एक छिन चप लाग्छ र चारैतिर हेर्दै असजिलोमानेर भन्छ, &amp;quot;हिँडनोस्‌ जाऔं । कै उाभएर ढोकाबाहिर बसिरहने : यौएउटा मात्र ठाउँ छ र जागिर खानलाई : आफूनौ इलम छ भने जहाँपनि यत्तिको नोकरी पाउन सकिन्छ ।&amp;quot; यस्तो भन्दै त्यस साथीले शिवलाई .लिएर अफिसका प्राङ्गणबाट नै टाडा हुन चाहे पनि क भन्न छोड्दैन“होइन, एकफेर त्यस मुख्य हाकिमसँग यसरी अकस्मात्‌ निष्काशितगराउनाको कारण नसोधेर कपरी जानै &#039; यो त हामीले बझनै पर्छ ।हिड्नोस्‌ बर हामी दुवै जाऔं र सोधौं । कूनै अर्थ त जरुर होलानि?”&lt;br /&gt;
शिवको प्रस्ताव सुनेर त्यो साथी हितक, कुन र भन्छ, “त्यसोभए तपाईं नै अनर्थमा अर्थ खोजेर बस्नौस्‌ र अनर्ष भोग्नोस्‌ , मत हिडे” भन्दै फतफताउँदै आफनो बाटो लाग्छ ।&lt;br /&gt;
शिवलाई साथीका कुराले कुनै असर पार्दैन र क भेट गर्नेनिश्चय गर्दै फेरि अफिसतर्फ फर्कन्छ । हाकिम साहव निकै व्यस्त भैकालेकेही बेर कुरेपछि मात्र भेट पाउँछ । वादविवाद निकै हुन्छ । चर्को स्वरदुवैको सुनिन्छ । केही बेरसम्म भनाभन भएपछि शिव खँड्का हाकिमकाकक्षबाट निस्केर यताउति कतै नहेरी सरासर घरतर्फ लाग्छ ।&lt;br /&gt;
नोकरी. गएको सङ.कोचले भन्दा हाकिमसँगका कुराकानीले कआकोशित भई लिभरित हुततरको नगएको छ । उसलाई लागिरहेछ कहाँ गएर केविध्वंस पारी तिनका प्रत्यत्तर दिऔं ।&lt;br /&gt;
यस्तो भरङ्ग मनस्थिति लिएर घरमा पुग्दा त्यहाँ उसलाई सान्त्वनादिने कोही: पाउंदैन । त्यस रित्ता घरले झन्‌ मनलाई चिढाउँछ । गौरीपनि नोकरी गर्थी र क पनि आजै पन्ध दिनको ब्रिदापछि अफिस गएकीछे । शिव कोठामा पस्नासाथ लगै नफुकालेर बिछ्य्याउनमा आफूलाईहुत्याउँछ र हात पछाडि लगी शिर अड्याउँदै रित्तो भित्तालाई . एकनाससँगहेर्दै मनलाई एकत्रित पार्न खोज्छ तर, कसरी शान्त हुनसक्छ त्यो मन ?&lt;br /&gt;
३&lt;br /&gt;
एकोहोरोसँग उही प्रश्न दौहोरिइरहन्छ, “किन मलाई निष्काशित गरे &#039;मैले के गरेँ त्यस्तो : त्यस हाकिमले किन कुरा खोल्दैन !&amp;quot;&lt;br /&gt;
अनुत्तरित प्रश्नले गर्दा क झन्‌ अशान्त हुँदै जान्छ र जुरुक्कउठेर तवला बजाउन थाल्छ जोडजोडले । टाउको तालकासाथमा नाच्नथाल्छ र क आँखा चिम्लेर बजाइरहन्छ ........, बजाइरहन्छ ।. औँलाहरूठोकिइरहन्छन्‌ । ती दुई तवलाले उसको आकोशको वेग म्रामेरपड्किरहन्छन्‌, सुनाइरहन्छन्‌, शिवका मनभित्र अन्धाधुन्धले चलेकोआँधी ।&lt;br /&gt;
राधा त्यस घरकी नोकर्नी । मालिकले दिउँसै अफिस छोडेर आईत्यसरी तबला बजाएको देखेर डराउँछ । लाग्थ्यो, त्यहाँ आकाशगडगडाएर बर्षा हुन लाग्दै छ । क आत्तिदै घर बाहिर निस्कन्छे रकता जा भएर चारैतिर आँखा घुमाएर हेर्न थाल्छे । दिलबहादुरलेभरखरै बिवाह गरेर पहाडबाट शहर ल्याइएकी त्यस राधालाई न तमालिकको स्वभावको राम्रो ज्ञान हुनपाएको छ, न त शहरिया वातावरणकै। उ निक्कै हडबडाई के गर भएर छटपटाइरहेका बेला टाढाबाट गौरीआइरहेकी देख्छे । ज्यानमा केही शक्ति अनुभव गर्दै मालिकनीलाईपर्खिन्छे ।&lt;br /&gt;
द्रभाष भनुँ या अरू केही, त्यस दिन गौरीलाई अफिसमा बस्नपटक्कै मन नलागेर कुनै आपत्‌ आउन लागेको जस्तो संगत भइरहेकाले,यंस्तो मनस्थिति लिएर अफिसमा बसिरहँदा के हुन्छ, के भनी, आधादिनको छुट्टी लिएर घर फर्केकी थिई । नभन्दै घरका ढोकामा आइपुग्दाराधालाई त्यस स्थितिमा देखेर सोध्छे &amp;quot;किन यसरी आत्तिएर बाहिरआएकी ? कि कतै जान लागेकी हो ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
गौरीलाई देखेर राधाले लामो सास तानेर ढुक्क हुँदै भन्छे“बल्ल तपाईं खु छ नु भयो । म त कहाँ जाउँ, कता लाग भएर बाहिरनिस्केकी । &amp;quot;यी दुई बीच कुरा चल्दा पनि तवलाको आवाज तुनिइरहन्छ। गौरी राधाको कुरा सुनेर विचलित हुँदै फेरि सोध्छ, “किन घरमा केभयो र बाहिर आएकी ! त्यो तबला बजाउने को नि ! कि दिलेले:पनि तवला किनेर ल्यायो ?”&lt;br /&gt;
“छैन उसले के किन्थ्यौ ः त्यो बजाउनै त साहब हो । अघि नैघर फर्किसक्न्‌ भयो ।” यति भनेर क चुप लाग्छै । गौरीले राधालाईघरभित्र हिंड्द भनेर साधमा लिएर जान्छै र उसलाई चिया ल्याउन अह्वाएरआफू कोठामा पस्छै । शिवले एक सुरले तवला बजाइरहेको देखेर सोध्छै&amp;quot;के सुर चल्यौ यस्ता ? आफिसै छोडेर आई यसरी एकलै तबलाबजाउनवाल्तु भएको ! कि सन्चो भएन ? अनुहार पनि अँध्यारो छ&amp;quot;&lt;br /&gt;
॥ 0&lt;br /&gt;
शिवले गौरीका प्रश्नको जवाफ नै नदिएर बजाउँदैको तवलालाई घचेटेरपन्छाइदिन्छ । एउटा तबला झयालमा ठोक्किएर फुट्छ पनि ।&lt;br /&gt;
तबला त्यसरी फुटेको देखेर गौरीले भनी, “केको रिस यसतबलामाथि घोप्टाइदिन्‌ भएको ! यो फुटेर नाश कसको भयो ! हेर,यहाँ पट्ट भएछ ।&amp;quot; तबला उठाएर हेर्दै भन्छे ।&lt;br /&gt;
शिवले पलवक गौरीलाई हेर्छ र भन्छ &amp;quot;यो तवला फुटेको जस्तोगरी म सबैलाई छयालव्याल पारिदिन्छु । मलाई यिनले चिनेकै छैनन्‌ ।&lt;br /&gt;
कसलाई त्यसो भन्नभएको ? मैले यसो भने भनेर रिसाउनभएको ? लौ हुन्छ, तपाईंलाई जे गरेर तपाईंको रिस शान्त हुन्छ त्यहीगर्नोस्‌ ।&amp;quot; गौरीलाई थाहा छ शिवले उसँग रिसाएर भनेको होइन तरकुरा ,फुत्काउन मात्र त्यपा भनेका हो । &amp;quot;छोड यी क्रा, अनि भन, तिमीकसरी आज चाँडै आयौ ? कि कसैले खबर गन्यो ? -शिव सशङ्डितहुन्छ ।॥ &amp;quot;क्रस्तो खबर : अहँ मलाई कसैले केही भनेको छैन, अलिसन्चो नहोला जस्तो भएर बेचैन भएकीले मात्र आएकी हुँ अनि तपाईं नि; अफिसमा थप्रै काम छ, तिमीले गर्दा बिनसित्ति बिदा लिन पन्यो भनीकराउने तपाईँ अहिले आफैँ अफिस छोडेर आउनु भएछ । यसपटक तमैले छिट्टै घर आउनुहोस्‌ भनेकी थिइनँ । दोप मलाई लगाउन पाउनहुन्न है :&amp;quot; खुसी पार्न जिस्काउँदै गौरीले कुरो उठाउँछै । उसलेअनमान गरेकी छ, शिव आज कक्ससँग अफिसमा रिसाएर आएको छ ।त्यसैले क शिबको ध्यान अर्कैतर्फ खिच्न र रिसजति आफूमै खनाइदिएरभए पनि शान्त होस्‌ भनेर ठट्टाका भाकामा कुरा गर्छै ।&lt;br /&gt;
ठट्टा गर्नपर्ने त शिवको पनि बानी नभएको होइन । यी दईदम्पतिमा यस्तै भाकामा संवाद चलिरहन्थ्यो । त्यसैले गौरीले यस्तो प्रश्नगरेका थिई, तर आज उसको मनस्थिति अर्कै भएकाले जवाफ दिने तरिकापनि फरक हुन्छ । सोध्छ, &amp;quot;तिमीलाई कारण जान्त पत्यो होइन &#039;सन्छयौ, म किन घर फर्के &#039;क आकोशित हुन्छ । गौरी डराउँछै ।राधाले चिया ल्याइपन्याउंछे र टेबलमाथि राखेर जान्छे । एक छिन कोहीकेही नबौलेर चिया समाउँछन्‌ । गौरीले पुलक्क शिवको अनुहार हेर्छ ।शिव केही शान्त भए पनि ठूलो स्वरमा नै त्यस स्थगित प्रश्नको जवाफयसरी दिन्छ, &amp;quot;तिम्रा लोग्नेलाई नालायक भएकाले आजदेखि नोकरीबाटनिकालिदिए, थाहा पायौ त तिमीले ः फेरि सोधौली । त्यसो भए योग्यजागिरदार कस्तो हनपर्छ भनेर ? म त्यसको जवाफ दिन सक्तिनँ । कतिमात्र म भन्नसक्छु भने म उनीहरूले लगाउने जागिरदारको परिभाषामापर्न नसकेको रहेछु । तर म यत्तिकैमा कहाँ छोड्छु र : उनीहरूको&lt;br /&gt;
शर&lt;br /&gt;
परिभाषा मात्र होइन, मेरौ आफनै परिभाषा तिनीहरूलाई सिकाइदिन्छु ।प्रजातान्त्रिक व्यवस्थामा जागिरदारहरूलाई कुन स्थानमा राखेर कामगराउन पर्छ र उनीहरूको अधिकार. र दायित्व के कस्ता हुन्छन्‌ भन्नेकुरा माथिदेखि तलसम्मका जागिरदारहरूले बझन सकेनन्‌ भने यसव्यवस्थाले नकारात्मक रूप लिन्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“भो छोडिदिनोस्‌ । कति चिन्ता तपाईं मात्र लिनुहुन्छ ः देशबनाउँछौं, हामी नेता हौं, भन्नेहरूलाई पनि राम्ररी चिनिसक्नभएको छ ।आफनो इलम र इमान भएसम्म यस्ता नौकरी जहाँ पनि पाइन्छन्‌ । बहयिनीहरूलाई नै इमान्दार कर्मचारी पाउन गाह्रो हुन्छ ! &amp;quot;मनभित्र त्योखबर सुनेर आफू दृःखी भए पनि शिवलाई सान्त्वना दिन गौरीले यसरीसंझाउँछै ।&lt;br /&gt;
शिव धेरै थाकिसकेका हुन्छ । उसको मन अशान्त भएको रआफनो प्रा शक्ति लगाएर घण्टौसम्म तबला पिटेकाले क शिथिलभइसकेको प्रस्ट देखिन्छ । गौरीका आँखा टेबुलमा फयाँकिएका चिठीमापर्छु र त्यो झिकेर पढ्दै भन्छे, &amp;quot;यस्तो पनि कही हुन्छ ? कारण योभनेर बताउन पनि त सक्नुपर्छ ! खै त्यो दिनसकैको ः जे मन लाग्योत्यही गर्ने हो भने हामीले व्यवस्था परिवर्तन गराएर के पायौं : उस्तैगरी शासित हुँदै जानपर्छ भने, व्यर्थ छ प्रजातन्त्रको नारा लगाउनु ।व्यर्थ छ हामी स्वतन्त्र भयौं भन्नू । &amp;quot;क दिक्क हुन्छे ।&lt;br /&gt;
गौरीका यस्ता कुरा सुनेपछि बल्ल शिवका अधरमा - मुस्कानआउँछ मानौं त्यस मुस्कुराहटले उसका प्रश्नको समर्थन गर्दै भनिरहेछ,&amp;quot;मैले खोजेका पनि त तिनै हुन्‌ । कसले दिन सक्छ तिम्रा हाम्रा प्रश्नकोजवाफ र बेकार छन्‌ तिम्रा प्रश्नहरू बेकार छन्‌ तिम्रा जिज्ञासा ।&lt;br /&gt;
जज&lt;br /&gt;
“नोकर भने भनेर किन पिरोलिन्छैस्‌ : हेरिल्याउने हो भनेतिनीहरू पनि हामीजस्तै नोकर हुन्‌ । नोकरी नगरेर यहाँ कसको जीविकाचलेको छ &#039; सरकारका हुन्‌ या दुनियाँदारका, हुन्‌ त नोकर नै &#039; जाभनेपछि जानुपर्ने र बस भनेसम्म झुकेर बस्नुपर्ने । अहिले साहेबले कसरीबलुपरेको छ ? &amp;quot;&lt;br /&gt;
“त्यसो भनेर कहँ हुन्छ ? हामी नोकरको पनि नोकर भएनौंर ? त्यति पनि बझन नसक्ने ठानी फकाउन थाल्नुभएको होला, हेर्नोस्‌मत ..... / पहाडकी केटी हेप्नलाई कति सजिलो भनेर नछकाउनुहोस्‌। फेरि म माइत गएर आउँदै आउन्नँ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
ती दुईका गन्धन शिवका कानमा टड्कारै पर्छ । उसलाई योनिकै घत लाग्छ र सुतेकी स्वास्नीलाई घच्घच्याउँदै सोध्छ, &amp;quot;ए गौरी, एगौरी, दिलेको कुरा सुन्यौ ः कि निदाइसम्यौ !&lt;br /&gt;
“के गरी सत्नसक्न माहुरी भनभनाएजतिकै गुन्‌ गुन गन गनचल्दै छ । कुरा पनि कति -आएको ? त्यो राधा कम्ताकी कहाँ छेर ;कस्ताकी छोरी गाउँबाट टिपेर ल्याएको हो, आफूलाई मै हुँ भन्ने ठान्छे ।सानो कुरा पूर्नु हुन्न, उसलाई पुगिहाल्छ । के भएको थियो, त्यतिनोकर्नी भन्दैमा ? म त्यसलाई नन्द भनेर पनि त मान्न सक्तिनँ नि ?बिमलाले त्यसलाई देखेर “नन्द” हो भनेर सोधेकी थिई, मैले होइननोकरी हो के भनिदिएकी थिएँ, कालो मुख लगाएर फनक्क फर्केकी त्योफेरि मैँथि उम्लिदै उक्लिन । भाडाँ पनि मलाई नै मजाई र आफूअरिङ्गालले टोकेको जस्तो मुख पारेर बसेकी बस्वै थिई । अहिले त्यहीकुरा बुट्टा भरेर लोग्नेलाई सुनाउन थालेकी छे ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“तिमीलाई पनि नोकर्नी भनेर किन भन्नपरेको नि : सहचरीभनेकी भए पनि त हुन्थ्यो । सुन्दा पनि मीठो, कसैको दिल पनिनदुख्ने । काठमाडौंमा कै के न कामे गरेर बसेको छु भनेर बिवाह गरेरल्याएको होला दिलेले, यहाँ नोकर्नी भन्दा छाना बाट खसेकी जस्तो हुनेनै भई नि । यस्तो मानसिक धक्का परेपछि सबैलाई त्यस्तै हुन्छ ।यसमा अलिकति गल्ती तिम्रो पनि भएको रहेछ । हेर्दा यिनीहरूजस्तासुकै देखिए पनि बुद्धि नभएका हुँदैनन्‌ । सुनिनौ तिमीले, त्यस दिलेलेकस्तो मार्मिक कुरा बोल्यो । ।अलि गंभीर भएर ) साँच्चै हामी नोकरै त&lt;br /&gt;
छ&lt;br /&gt;
हौं नि, सरकारी कर्मचारी कहाँ हुनपगेका रहेछौं र ? आदेशअनुसारअह्याएपराएको काम गर्नपने, आफना भनाइको सुनाइ नहुने,, आफनोसोचाइ अनुसार काम गर्न नपाइने । हाम्रो पनि घरको नोकर भन्दा अर्कैअस्तित्व के भयो र हामी नोकर होइनौं भनौं ? ठिक भनिस्‌ दिलेतैले ?&lt;br /&gt;
“त्यस्ताका कुराको समर्थन गर्दै तपाईं आफूलाई नोकर मान्नुहुन्छभने मलाई केही भन्न छैन । उसका आँखाले त सबैलाई आफूजस्तै नोकौदेख्छ । छि ....... यिनीहरूको यो गनभ्न पनि कतिबेरसम्म चल्नै हा ।यिनका लागि एउटा खुट्टै घर वनाइदिऔं भने पनि सकिने भइएन !”&lt;br /&gt;
यति भन्दै आफू कोल्टै फर्किएका र सत्नै कोसिश गर्छे रशिवलाई पति रात छिप्पिइसकेको सङ्घत दिदै सुत्ने अनुरोध गर्छैशिवलाई पटक्कै निद्रा लाग्दैन, उसका मस्तिष्कमा दिलबहाद्रले भनेको“सरकारी नौकर&amp;quot; भन्ने शब्दले हावा खौदै तहल्का मचाइरहन्छएकनाससंग ।&lt;br /&gt;
क सोच्छ, मैले यति कुरा जान्न पन्धवर्ष नोकरी गरेर पनिसकिनँ, यसले यति सजिलोसंग कसरी अर्थ्याइदियो ) म सोच्थे, म तकर्मचारी हुँ । आदेशको मात्र पालना गर्ने म अब हैन । मेरा पदकोपनि केही दायित्व छ र यत्तको निर्वाह गर्न चाहिदो हक मैले प्राप्त गर्नैपर्छु । यही सोचाइ लिएर म वादविवादमा आफूलाई पार्दै गएँ र आफनाआत्माले ठहस्याएको काम मात्र गर्नथाले । प्रजातन्त्रको पन;ःस्थापना भयोभनेर जब आम जनताले खुसियाली मच्चाको सुने जब नेताहरूले मन्त्रीकोपद समालेर प्रजातान्त्रिक राज्य घोषणा गरी शासन सञ्चालन गर्न याले,म मूर्खले पनि प्रजातान्त्रिक देशको स्वतन्त्र नागरिक मानेर आफूलेनोकरको कौचली फेरेको संझन थालेँ । कत्रो भूल गरेको रहेल्नु ।&lt;br /&gt;
अविश्वासलै भरिएका नियम कानुन तानाशाही शासनपढ्धति रहँदाजागिरदारलाई नोकरको हैसियतले मात्र प्रयोग गरी नियन्त्रगका साथ राज्यसञ्चालन गर्ने गरिन्थ्यो, तिनै नियम कानुनको अझैँ पालना गर्दै त्यसैलेतोकेका परिधिभित्र रहेर प्रशासन चलाउनु पर्ने हामीले आफूलाई कर्मचारीया पदाधिकारी भनेर मान्नु सरासर झूटो हो ? यतातिर प्रजातन्त्रकोनारा, उतातिर परानै प्रशासनिक कानुन व्यवस्था, यसले त जालीफटाहालाई बदला लिने मौका मात्र पदान गर्ने रहेछ । तसर्थ जबसम्मतन्त्र सहाउँदो व्यवस्था र व्यवस्था चलाउन सापेक्ष नियम कानुन बन्दैनन्‌एक घोषणाले मात्र सत्ता परिवर्तन भइसक्यो भन्ने ठानेर आफूलाई स्वतन्त्रछु भन्त नसृहाउँदो रहेछ । पार्टीका नेताहरू मन्त्रीका पदमा आसीन हुनसविधान निस्कनु देशव्यापी चुनाव हुन्‌ र संसदको स्थापना हुनुले मात्र&lt;br /&gt;
द्र&lt;br /&gt;
प्रजातान्त्रिक शासन जलाउनलाई कहाँ पर्याप्त हँदो रहेछ र ! लुँडोखेलका गोटीहरू दाउ पर्दा सर्केर माथि पुग्ने र सर्पका मुखमा पुग्दापुच्छरबाट निस्कनु पर्ने जस्तो, हाम्रा हाकिमहरू भएको देख्तादेछौ पनिमलाई बद्धि आएन र भन्दै गएँ &amp;quot;हिजोका दिन बितिसके । स्वतन्त्र भएकाहरेक हामीमाथि अब देशको भलाइको जिम्मेदारी आएको छ । यो तन्त्रहाम्रो आफनै हो । यस्ता धारणा लिएर म जहाँ, जसको तरटि देख्येँ,प्वाक्कै भनिदिन्थेँ र सुधार गर्न सकेजति गर्थे पनि । आफू खुलेर पबैसंगव्यवहार गर्थे र भन्थे &amp;quot;प्रजातन्त्रमा पारदर्शी पनि हुनुपर्छ । &amp;quot;त्यसैलेआफूलाई शङ्का लागेको कुनै पनि काम खोतलेर त्यसको निचोडनिकाल्न छोडिनँ ।&lt;br /&gt;
मैले उठाएका यी चालहरू धेरैलाई असहनीय भएका रहेछन्‌ रमलाई यस निष्कर्षमा ल्याएर पछारी दिए । म छक्किएँ । मैले सोच्नसकिनँ, आवना परिवर्तनका लागि भावनात्मक क्रान्ति ल्याएर मात्र हाम्रोप्रजातन्त्रमाधिका आस्थालाई दिगो बनाउन सकिन्छ र त्यस्ता कान्तिकोआहवान भएकै छैन ! हाम्रो आन्दोलन अधरो रहेको छ ।&lt;br /&gt;
प्रजातन्त्रको खिल्ली उडाउनेहरूले भन्दैछन्‌ । &amp;quot;यिनले के परिवर्तनल्याएँ भन्छन्‌ । प्रशासन चलाउने व्यक्ति पनि उही नै छन्‌ । नियमकानुन पनि उही नै छन्‌ । आयो, आयो, फर्कियौ, फर्कायौं भन्छन्‌, केआयो, के फर्कियो : के थियो, के गयो : के छ : यी सबै विरोधाभासछन्‌ । परिवर्तत प्रष्ट देखिएको भने एउटैमा छ, संविधानका फेरोभित्रराजा सुरक्षित । &amp;quot;के यति नै हो त, हामीले आन्दोलनबाट चाहेको :शासक र जनता, जनता र शासकको मध्यस्थता कायम गर्ने चौथोनिकाय भनिएको पत्रकारिताको भूमिका आफैँमा अल्मलिएको छ । पक्ष रविपक्षको द्वन्द्व लिएर आफैँमा प्रष्ट हुन नसकेका खबरले जनता अझ धेरैभ्रममा परेका छन्‌ । यहाँ पार्टीहरूका शक्तिको होडबाजी भ्रसभसेआगौसरह सल्किरहेछ । जससँग जे सौधे पनि असन्तुष्टि नै व्यक्त गर्छन्‌। भष्टाचार र विकाससम्बन्धी तारा दिन प्रतिदिन अकाशिदै छन्‌ भनेप्रजातन्त्रको परिभाषा खुलेको छैन । देश र संस्थाको हितका लागि यस्ताविरोधाभास नियमलाई समयमा नै निर्णय लिनपर्दा उलड्घन गर्नु पन्योभने पनि आरोप आइलाग्छ ।“भ्रष्टाचारको&amp;quot; । नियमकै परिधिभित्र बाँधिएरहात चलाउँदा समय फुत्किएमा पनि दोष आइलाग्छ उही जागिरदारमाथिकाम भएन भन्ने ? हुन त यस्तै अवस्थाको सिर्जना गरी आफूना भुँडीभर्नेहरू नभएका पनि होइनन्‌ तर कर्मका आधारमा न्याय हुने चलनकिन बस्न सकेको छैन ? कि नियम कानुन समय सहाउँदा, व्यवस्थाचुहाउँदो हुनु पर्यौ कि त न्याय बलियो भई हित र अहितको विश्लेषण&lt;br /&gt;
॥।&lt;br /&gt;
गरी कर्मचारीहरूको मनोवल र आस्था बढाउने प्रकारले फँसला गर्नेहुनुपर्थ्यो । यहाँ त यस्तो भएकै छैन । हामी कुन संघारमा उभिएका&lt;br /&gt;
यस्ता करा खेलाउँदै शिव छटपटाउन थाल्छ र गौरी फुसफ्‌सफेरि निदाइसकेकी देखेर घचघच्याएर -उठाउन खोज्दै भन्छ, “ए कु १कति निदाएकी !&#039; उठ, एकछिन कृरा गरौं । &amp;quot;गौरी उठ्नलाई अल्छीगर्दैभन्छे, “सत्नसक्नु भएन : यसरी नसुतेर रात बिताउन थाल्नुभयो भनेशरीर के होला ! ज्यानजस्तो ठुलो अरु कै छ : &amp;quot;केही हुँदैन तेरोलोग्नेलाई, मैले गर्नपर्ने थप्रै काम बाँकी छन्‌ । यति छिटै कै मरिहाल्यें। &amp;quot;हो, निदाउनु स्वास्थ्यका लागि जरुरी छ, पीर नगर र कहिलेकाँहीजसले पनि थोरै तृतेमा केही फरक पर्दैन । त्यसैले आज तिमी मसँगगफ गरछर्यौ र यो रात फेरि अर्को एक सुहागरात बनाएर बिताउँछयौ ।कुरा बझयौ के ? प्रेमका कुरा नभए पनि वेदना पोखेर बिताउँला । लौउठ र मतर्फ फर्क । &amp;quot;&lt;br /&gt;
गौरी त्यसै गर्छे र मनमनै भन्छे,“यो दिलेको बुद्धि कहिले आउला? भरखर नोकरीबाट निष्काशित भएर दुखेका मनमा यसले कुनै तृकैनभएको कुरा उठाएर यत्रो चोट लगाइदियो । त्यो जस्तो नोकर पनिकहीं सरकारी नौकर हुन्छ &#039; स्वास्नीसँग आफूलाई ठूलो देखाउन हामीलाईनै खसाली दियो । अब यसले उहाँको मुटु छोइसक्यो । कति दिनरातयसरी नै छटपटाएर बिताउने हो । हामीले संझाउन थाल्यौं भने झन्‌उल्टै भन्नथाल्नु हुन्छ,&amp;quot;घरमा त मैले साँचो कुरा ठुन्न पाउँ । यससभ्यताले पनि हामीलाई के बनाउने हो ? घरलाई कूटनीतिबाट टाढाराख, नत्र साँचो थाहा पाउन नसकेर के हुन्छ के, यसका खोजमा कहाँपुग्नुपर्छ, त्यो झन्‌ ठूलो आपत्‌ हुनसक्छ ?” यस्तो बोल्न याल्नभएपछिमलाई झन्‌ डर लाग्छु । के गरूँ, सहनबाहेक मेरो अर्को उपाय 0] भएन। यति मनमा कुरा खेलाउँदै शिवलाई भन्छे, “के चिन्ताले सतायोतपाईंलाई ? सक्नुहुन्छ भने तपाईका ती सबै चिन्ता मलाई दिनोस्‌ ।तिनलाई म ठिक पारेर राखिदिन्छु । तिनको टाउको उठ्नै दिन्न ।चिन्तासंग त मेरो दस्मनी छ ।&lt;br /&gt;
“अनि तिमी म हुन्छयौ र म तिमी । मैले पनि तिमीले भनेकोजस्तै भन्न वाल्नुपर्ने हुन्छ । त्यसैले त्यो भारी काम पनि त बाँडौंभनेको ? &amp;quot;बल्ल यो वाक्य बोलेपछि शिवका चेहरामा अलिकति हाँसोकोरेखा देखापर्छ । यसले गौरीलाई हौसला दिन्छ र बिजय प्राप्त गरेकोअनुभूति लिएर संझाउने भाकामा भन्छे, “दिलेको त्यति साधारण कुरालेतपाईलाई यत्रो घत पन्यो ? अनुशासित हुँदा आफू अपमानित भइन्नँ ।&lt;br /&gt;
१०&lt;br /&gt;
व्यवस्था सञ्चालन गर्नलाई नै अनशासनको जरूरत पर्छ । तह र पदकोमर्यादा राख्नुपर्छ जसमा जिम्मेदारीको भार तोकिएको हुन्छु भनेर मलाईसंफाइ, बुझाइ गर्ने तपाईं नै आज नोकरीबारे दिलेले लगाएकोपरिभाषालाई समर्थन गरेर भन्नुहुन्छ, “यसले ठिकसंग अर्थ्यायो, हामी पनिउस्तै नोकर हौं । &amp;quot;कसरी तपाईं त्यससरहको नोकर हनभयो : यस्तोअर्थ न बर्षको कुरालाई पनि समर्थन गर्ने : वोन्दाबोल्दै गौरी एक छिनचप लाग्छे र दिक्क भएर भन्छे, “यस्ता कुरालाई लिएर महत्व दिन केबहस तपाईंसँग गर्ने ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
“अहिले पनि अनुशासनहीन हुन्‌ नै कर्मचारी या पदाधिकारी हुनुहो भन्ने म मान्दिनँ । अनुशासन नभई प्रशासन नै चलाउन सक्दैन ।फरक कति मात्र छ भने अनुशासन एक कर्म हो भने नियम एकबिर्दिष्ट लक्ष्य लिएको तीति हो । कनीतिका पालना गराउन जागिरदारमाथिअनुशासनको लगाम लगाइन्छ भने त्यो शोषण हुनजान्छ अनि त्योमहत्वहीन व्यक्ति बन्छ । अहिले संविधान आइसकेको छ । यस अन्तर्गतरहेर प्रशासनिक नियमावलीलाई पजातान्त्रिक बनाउँदै कर्मचारीमाजिम्मेवारी दिएर, विश्वास गरेर बद्लिन पर्ने आवश्यकता आइसकेको छ ।&lt;br /&gt;
भ्रष्टाचार के, कसले गरेको छ भन्ने जाँचबफझ गरी अरभियक्तलाईसजाय दिलाउनलाई नै प्रजातन्त्रमा न्यायपालिका स्वतन्त्र हुन्छ । त्यसैलेस्वतन्त्रताको परिचालन गर्न दिनका लागि कार्यको जाँच व्यक्तिगत,राजनीतिगत र पक्षका आधारमा नभई स्वतन्त्र नार्गारकको हक उचितन्याय पाउन हो भन्ने उद्देश्य राखेर हुनुपर्छ भनेको । यो अहिलेसम्मकिन, हुन नसकेको ? यो सोच्ता द:ख लाग्छ र ! गौरी त्यसैले तिमीसंगगफ गरेर भए पनि शान्त छु भनेको ।&lt;br /&gt;
“तपाईंको सोचाइ जस्तै सबैको हुनुपर्छ भन्ने के छ र ? फेरिपनि त हामीलाई थाहा छैन कही उनीहरूले तपाईंले भन्नुभएजस्तै गरीसोच विचार पुच्याएर नै आदेश दिने र पालना गर्ने गरेका छन्‌ कि !यस्ता विभिन्न अर्थ लाग्नसक्ने कुरालाइ लिएर पति तपाई गन्‌गन्‌गर्नुहुन्छ ।&lt;br /&gt;
यसरी गौरीले शिवका कुराको प्रसङ्ग बदल्न प्रयास गर्छै तर कछोड्दैन । उसलाई यसै विषयमा कुरा गरेर शान्त हुनुछ । त्यसैले भन्छएउटै मात्र अर्थ लाग्ने नियम हुनुपर्छ भन्ने त मेरो भनाइ हो । नत्रकर्मचारी नियमावलिको कम्जोरी पक्षलाई समात्तैर उच्च पदका जागिरदारलेतल्लो पदका जागिरदारलाई दु:ख दिने प्रवृत्ति बस्न गयो भने त्यो लाचारशोषित जागिरदार एउटा नोकर हुन । प्रशासनको होइन प्रशासकको ।उदाहरण खोज्छयौ भने मलाई ॥ नौकर भएर बस्न सकिनँ र&lt;br /&gt;
११&lt;br /&gt;
कर्मचारी हुँ भन्दै नोकर बनिन पर्नै नियम तौड्दै हिँडैँ । म कर्मचारीभनिएकाले कर्मचारी खौसवा अभियानमा परें र जसले सरकारी नोकरैभएर रहन मन्जर गरे, ती बहाल नै रहिरहे ।”&lt;br /&gt;
“त्यसो भन्नुहुन्छ न्छ भने क्रा आफैँ खुलेन र ? तपाईंले नियमबद्धभएर रहन नचाहनु ने तपाईंको निष्काशनको कारण हुनसक्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
- &amp;quot;क्र हो, के होइन ! यो नै हो भनेर कसरी भनुँ । त्यहीकारण थाहा पाउनलाई नै मुट्टा दिडौँ कि भन्ने सोचिरहेको छु । मैलेनियमै उलङ्घन गरेको रहेछु भने पनि संस्थाका हितका लागि त्योसुहाउँदो नभएको पाएर नै गरेँ हुँला : राम्रो नै गर्ने उद्देश्य राखेर कुनैचलनलाई पन्छाएर अगाडि सर्त बेइमानी नहुनु पर्ने हो । फेरि त्यस्तोपनि कुनै गरेको जस्तो लाग्दैन । हो, म स्पष्टवक्ता भने छु तर त्यसलाईअनुशासनहीन भन्न पनि त मिल्दैन । के कुरामा कुनबेला मसंग रुष्टभएका थिए, मौका छौपिहाले । आफनो भुल धाहा नपाई यस्ता सजायमात्र भोग्नु पर्दा ज्यादै गाह्रो पर्दो रहेछ :&lt;br /&gt;
नत्र भन न, प्रजातन्त्रको पुनःस्थापनाको आन्दोलनमा भाग लिनअफिसबाट छुट्टी लिएर सघाउ पुप्याउनै म प्रजातान्त्रिक शासन चल्दानिकालिन्धे : ती हाकिमहरू पनि टेलिफोन गर्दै भन्चे, &amp;quot;लौ लौ शिवतपाईं त्यतैतिर लाग्दै गर्नोस्‌, यहाँ हामी छौं । के गर्न, हामीले देखिनेगरी लाग्नु भएन, हाम्रा तर्फबाट तपाईंलाई पुरा बल मिल्नेछ । योव्यवस्था, यस तन्त्रलाई ढाल्नै पर्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“म पनि के के न बहाद्री गरेको छु भन्ने ठान्दै सबैकुराको बिस्तार सनाउँयें तिनैलाई । प्रजातन्त्रको प॒नर्बहालीपछिअफिस जाँदा मेरो कत्रो कदर भएको थियो, मानौ म पनि विजयी नेताहुँ र समस्त जागिरदारको प्रतिनिधि हुँ ।&lt;br /&gt;
धेरै वर्षदेखि दवावमा बस्ताबस्तै सहन अभ्यस्त भएका तीजागिरदारहरूमा २०४६ साल चैत्र २६ गते पश्चात्‌ आफूहरूलाईबन्धनमक्त भएको संझदै अनुशासनलाई समैत स्वतन्त्रताको वाधक मान्दैप्रजातन्त्रका नाममा उल्कदै स्वछन्दपना देखाएर अफिसका मर्यादालाईउल्लङ्घन गर्न थाल्नेहरूको संख्या हवात्त बढ्दै जान थालेकाले ममाथि नैतिनीहरूलाई संझाई बुझाई गर्ने कामको जिम्मा थप गरिएको थियो ।त्यसबेला म नै अनुशासन र स्वतन्त्रता जान्ने भएको थिएँ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
क संफझन्छ, त्यो दिन जब उतीहरूले उसलाई हाकिमको चम्चा,प्रजातन्त्रको स्वागी भनेर जधाभावी बोलेका थिए । यस संझनाले उसकामनमा खेद हुन्छ र मनसँग आज त्यो अनुशासित चम्चा स्वतन्त्रता रस्वछन्दताको परिभाषा अर्थ्याउँदै अफिसको मर्यादा तिनीहरूलाई संझाउन&lt;br /&gt;
१२&lt;br /&gt;
खटिएको त्यो व्यक्ति प्रश्न गर्दै छु, “मैले के बिराएँ र यो सजाय पाएकोछु?&amp;quot;&lt;br /&gt;
थाहा पाउन थाल्दैछु । समय वबित्तै जाँदा मेरा ती साहसी कदम,ती प्रजातान्त्रिक भावना, उद्दैश्य सबैलाई अर्कै दृष्टिले हेन घालीएछ म पोत स्वतन्त्रतापेमीबाट उच्छिङ्खलमा गनिदै जान वालिएछु ।&lt;br /&gt;
एक दिन मलाई हाकिमले बोलाएर भनेका थिए, &amp;quot;ए शिव, होस्‌गर्नोस्‌ है, यहाँ को कांग्रेस, को काम्युनिष्ट, को पूर्वपञ्च, को राष्ट्रियप्रजातन्त्र पार्टीको पक्षधर छन्‌ भनेर छानबीन हुँदै छ रे भन्छन्‌ । केथाहा, यिनै आधार बनाएर पजनी पनि गर्छन्‌ कि ? पर्नु होला फेरि ।धेरै चम्केर नहिइनोत्‌ । म कुनै पार्टीको पनि सदस्य होइन, म तस्वतन्त्रताप्रेमी मात्र हुँ भन्नु भएर सुख पाउनु हुन्न । त्यस्तै कुनैको पनिपक्षधर नभएका लागि त निकालेर बिदा गर्न सजिलो हुन्छ । तसर्थअह्याए पराएका काम गरेर बस्नोस्‌, नत्र पछ्नुताउनु पर्ला ।”&lt;br /&gt;
मैले पनि निर्भीकताका साध भनेको थिएँ, “जे गर्छन्‌ गरून्‌ ।आफैले कर्मचारीहरूले राजनीतिमा लाग्न नपाउने, कुनै पनि पार्टीकोसदस्य हुन नपाउने भन्ने, फेरि जे मन लाग्यो त्यही दोष लगाउन पाइन्छर ? म त आफूलाई स्वतन्त्रताप्रेमी भन्न छोड्दिनँ । मेरो सबै पार्टीकानेतादेखि ल्याएर सदस्यहरूसंग एकै प्रकारको सम्बन्ध छ । मैलै चाहेकोनेपाल प्रजातान्त्रिक मुलक भएर रहिरहोस्‌ भन्ने मात्र हो । यदि योप्रजातन्त्र, जसलाई पुन:स्थापना गर्न हामीले कति मानसिक, शारीरिक दु:खभौग्यौं, त्यसैलाई धक्का लगाउने काम कुनैबाट हुन्छ भने म त्यसलाईछोडदिनँ, चाहे त्यो अन्तरङ्ग मित्र नै किन नहोस्‌ या ...... ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
सके मैलै यसो भन्नु नै उनीहरूका लागि खतरा भयो कि ?सोचे होलान्‌ ।हिजो अरूमाथि जाइलाग्ने यो आज हामीमाथि पनिआइलाग्न सक्छ । यसैले संभावनाकी जरो नै उखेलेर फँयाक्नु बेस मानीमलाई निष्काशत गरी आफू मक्त भएका पनि हुनसक्छन्‌ । यस्ताहरूलाई,स्वादै चखाउन भए पनि, मैले मद्दा हाल्ने निश्चय गरिसके । “बोल्दाबोल्दैक पुलुक्क गौरीको अनुहार हेर्छ” । गौरी निद्राले लट्टिएको स्वरमा भन्छे,“मुद्दा हाल्छु भन्नुहुन्छ अनि जितिएन भने के गर्नु दह नि ? त्यो कानुन&lt;br /&gt;
त तपाईंकै भनाइ अनुसार परिवर्तन भएको होला ! त्यसपछिन्याय खोज्न कहाँ जानुहुन्छ ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
“फैसला हुँदा लुड्काइ नै दिएछन्‌ भने पनि याहा त पाउँला,मेरो दोष के रहेछु भनेर ? एक दुई शब्द मनमा लागेको औकलेर शान्तहुन त पाइएला ! जिते भने त म नोकर होइनँ, कर्मचारीमा स्थापितहुने नै छु । यस जितले हामी जागिरदारहरूल।ई प्रोत्साहित पार्नेछ र&lt;br /&gt;
१३&lt;br /&gt;
हामीले आफूलाई कर्मचारी मानेर ओहदा - अनुसार निर्णय लिन सक्नेठान्नेछौँ । यसभन्दा बढी मैले चाहेको पनि छैन ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;मुद्दा हाल्ने निश्चय नै गर्नुभएको हो भने मैले भनेर के हुन्छुर ? तर मद्टा मामिलामा पर्त भनेको वकिललाई पोस्न हो र आफनोभएभरको समय अदालत घाउँदैमा बिताउनु हो तैपनि यसले तपाईंलाईशान्ति दिन्छ भन्ने ठान्नुभएको छ भने पछुताउने बाटो राख्नुहुन्न ।हाल्तोस्‌ मृद्दा । हामी पनि तपाईंलाई सहयोग गर्छौं ।&amp;quot; रातको चकमन्नर गहिरो विषयको शान्त छलफललाई खलबलाउँदै दिलेको आवाज सुनिन्छ। झ राधालाई खुसी पार्न उसको जाँगर र पाक्कलाको तारिफ गर्दैभनिरहेको हुन्छ, “यति रात बित्ता पनि जाँगर चलाएर यति मीठो मासुपकाएर ख्वाइस्‌, म तँलाई भोलि नै इनाम दिन्छु । एकफेर खिस्स हाँसिदेन | ए ....राधा, तेरो रिस अझ मरेको छैन कि कसो ! किन त्यसरीमुन्टो फर्काएकी : मलाई हेर त ?&amp;quot; य&lt;br /&gt;
शिव र गौरीका कुराको प्रवाह यहीं ट्रङ्टिछ । गौरी दिक्क मान्दैभन्छे, “यसले दिने इनाम त्यही सिनेमा हेर्न लैजाने त होला नि ः भौलिघ्नुड्री पारेर साथीहरू बोलाएकी थिएँ, यसले एक्लै पार्ने भयो अब ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;म हुँदाहुँदै पनि तिमी एक्लै कसरी हुन्छयौ ! व्यर्थै दिक्क किनहुन्छयौ &#039; त्यसले पनि त स्वास्नीलाई फकाउन सक्ने यति नै त छ ।जान्छन्‌ भने जानदेक्‌ । भरखर विवाह गरेर आएका छन्‌ । तिमीलेआफनो पालौ बिर्सियौ ? घरबाट माइत जान्छु भनेर आमासँग बिदालिएर हामी कहाँ काहाँ पुग्थ्यौं ? कति सिनेमा हेर्दै त्यसका मज्जामाडुब्यौं, भन त ? यिनको त्यो बाहेक जाने ठाउँ पनि कहाँ होला र ःआफनो जन्मथलो छोडेर यहाँ आएका छन्‌ । दिनभर एउटा एकातिरअर्का अर्कातिर हुन्छन्‌ ।”&lt;br /&gt;
शिवको कुरा सुनेर गौरी भन्छे, “कत्रो माया, कत्रो दया, रातठाडै पारिदिइसक्यो । बरु माया नै लागेको हो भने सम्झाइदिनोस्‌ आफनोकमाइ यसरी मोजमजामा मात्र उडाउने होइन भनेर ? बालबच्चा होलान्‌कतिसम्म अर्काको नौकर भएर बाँच्ने ?&lt;br /&gt;
१४&lt;br /&gt;
राधाको उमेर पन्ध सोह्र वर्ष मात्रको छ । उसको अनुहारकोकट निकै मिलैको छु र कुनै पनि दाग नलागैको गालाको छाला अतिकोमल देखिन्छ । सेतो वर्णकी राधाका यस्ता गालामा चढ्न थालेकागुलाबी रङ्गले उसलाई पुतली जस्तै देखाइदिएको छ । उसले हाँसी भनेत्यो गालामा पर्ने खोपिल्टाभित्र दिललाई चर्लुम्म डुबाइदिन्थी ।&lt;br /&gt;
दिलबहाद्रले राधालाई बिवाह गरेर म्याएपछि आफूलाई विजयीसंझैको छ र जुन बेला मौका पाउँछ, राधालाई जिस्काइरहेकै हुन्छ ।भन्छ, &amp;quot;ए राधा, त॑ इन्द्रपरीबाट पृथ्वीमा झरेकी होस्‌ कि पृव्वीबाट नैसीता झैँ उत्पन्त भएकी होस्‌ तर तँलाई मान्छेले जन्माएकोचाहिँ होइन ।यस अँध्यारा कोठामा पनि तेरै ती गालाका रङ्घले मलाई उज्ज्यालोदेखाइरहेछन्‌ । तेरो नाम &amp;quot;राधा&amp;quot; होइन बिजुली पो राखु कि ? लोग्नेलेस्वास्नीलाई आफूलाई मन लागेको नाम राख्न पर्छ भन्छन्‌ ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
राधा पनि लाज मान्दै भन्छे, “नाम मेरो जेसुकै राख्नोस्‌ तरआफू भने झयाउरे भएर हिड्ने होइन :? गाँउबाट शहर आएर पनियस्तो गतिछाडा भएर हिड्ने हो ? सिनेमाको हिरोजस्तो बनेर हिंड्नोस्‌ न। राम्रोमा त तपाईं पनि कमको कहाँ हुनुहुन्छ र मलाई मात्र यस्तोभन्नुहुन्छ । बस हामी पनि त्यो रानीवनमा गएर गाँउघर बिर्सने गरीगाना गाउँदै नाच्तै रमाइलो गरौं न ? भाँडा माज्दा त्यो वनआँखाअगाडि नै पर्छ । जाऔ जाँ लाग्छ तर तपाईं भने जहिले पनिआधा रात बितेपछि आउनुहुन्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
यी जोडी वास्तविकतादेखि टाढा भागेर मुखैको रमाइलामाआफूलाई यसरी नै अल्मलाइरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
दिलबहादर आमाबाबको एक्लो छोरो दुई दिदीपछि जन्मिएकोकान्छो सन्तान, बाबको मृत्यपछि स्थितिले गदा गाउँघर छोडेर पैसाकमाउन शहर पसेको तीन चार वर्षजति भइसकैर पनि फर्केर गाँउमागई बस्न पग्ने रकम जोड्न सकेको छैन । त्यसमाथि अहिले भरखरैबिवाह पनि गरेको छ । स्वास्ती छै, सानो उमेरकी धनीकी छोरी,व्यावहारिक अझ बन्नसकेकी छैन ।&lt;br /&gt;
पृ&lt;br /&gt;
उनीहरूलाई सिनेमा हेन मन लाग्छ, मीठा खाने, राम्रो लगाउनेत्यो त उमेरले नै गराउने गैहाल्या । यसैले गदा झषारपाल भएर कमाएकोपैसा र राधाले घरधन्दा गरेर पाएको पैसा सबैजसो मामु, रक्सी रसिनेमामा उड्न धालिरहेछ । उनीहरूको मोजमस्ती भन्न नै यही भएकोछ।&lt;br /&gt;
जुन बेला गाउएमा छोराका कमाइको आश गर्दै कुरेर बसिरहेकी“आमालाई खर्च पठाउन सक्तैन, त्यसबेला दिले खिन्न भएर राघालाईभन्छ, &amp;quot;राधे हेर, मेरा बाले गरीबी निम्ताएर बित्नुभयो । म पनियसभन्दा उभी लाग्न सक्छु सक्तिनँ । हाम्रा सन्तान भए भने तिनको गतिके होला : मैले वरु रातिको पालो पनि गर्छ कि ? केही त कमाउनपप्यो : आमाकहाँ पनि पैसा पढाउन सर्केको छैन । उमेर गएपछि त्योपनि गर्न नसक्ने भइएला !&amp;quot;&lt;br /&gt;
“पर्दैन, राति पगि बेपत्ता हुन । मैले भनिदिएकी छु । म एक्लैयहाँ बस्न सक्तिनँ । यी कुरा पहिले नै सोच्नुपर्थ्यो कस्तो नै नोकरीशहरमा गरेको छु जस्तोगरी गाउँमा रवाफ देखाउँदै विवाह गरेर ल्यायौँ,अच के छटपटाउँछौ !&lt;br /&gt;
“अनि, के गरर त : राम्रो जागिर खान पढेको हनुपत्यो कियस्तै नोकरी पनि लामो समयसम्म गर्नपत्यौ । त्यसै पर्दैन भनेर हुन्छ :औगात्ले पनि पन्याउन पर्छ । करा बाझिस मेरो ः&lt;br /&gt;
त्यसो हो भने हामी पनि पढ्न जाऔं न त ? पढेपछि राम्रैकाम गरौला : तलब पनि पुग्ने नै पाइएला, हुन्न &amp;quot; यति भनेरजवाफको पतीक्षा गर्छे । दिले चुप लागेकाले, फेरि सोध्छै, &amp;quot;किननबोलेका : मेरो कुरा मन परेन :&amp;quot;&lt;br /&gt;
राधाको यस्तो अल्लारै कुरा सुनेर दिलबहादुरलाई हाँसो उख्छसाथै &#039;फोक पनि चल्छ । तर भन्न केही सक्तैन किनकि क राघालाईखुब माया गर्छ । उसको चित्त दुखाउन क चाँहदैन । राधालाई पाउनउसको एउटा सफलता थियौ र गाउँ छोडेर शहर पस्त पनि त्यसैकालागि अपनाएको उपाय थियौ ।, क संधै मनैमन डराई रहन्थ्यो, “कहींराघाले मलाई छौडेर गाउँ नै त फर्किन्न !&lt;br /&gt;
पहाडमा राधाको माइत र दिलबहाद्रको घर धेरै टाढाथिएन । यी दुईको भेट भइरहन्थ्यो । दिलेलाई राधा चौपट्टै राम्री लाग्थ्योर एक दिन आमाले यसलाई अब तैले विवाह गर्नुपर्छ भन्दा मुखै फोरेरभनेको थियो, &amp;quot;आमा, मलाई विवाह गर भन्नुहुन्छ भने म राधासँग मात्रगर्छु, अरुसँग गर्दिनँ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
१६&lt;br /&gt;
छोराको यस्तो इच्छा सुनेर उदभान्त भएकी आमाले सझाउँदैभनेकी थिई, &amp;quot;“औगात हेरेर चाहना राख्नुपर्छ । तैजम्तालाई उनीहरूलेआफनी छोरी कं दिन्छन्‌ र त॑ विवाह” गर्छस्‌ : भएका जमिन सबैबन्धकमा परेको निखन्न सर्केको छैन, गाउँघरमा सबैलाई थाहा छ, हामीके खाएर कसरी दिन कारटरहैछौँ भन्ने । तेरो पढाइ मिद्धिएर राम्रोकमाइ गलांस्‌ र भ्रणमक्त हन पाउँला भनेर बाबले बाँकी छोडेकासम्पत्ति जति पनि सबै धिता राखिसकै । न त तेरो पढाइ सकिएको छ,नत बांकी दिन काटनलाई सम्पत्ति न छ । यस्ता अवस्थामा पगेकाहामीले गाउँको ठालकहाँ उसकी छोरी माग्न गर्यौ भेने के गर्लान्‌, केभन्लान्‌ : हेर, जे जस्तो दुःख भए पनि गर्ने बेलामा नातिको अनहारहेर्दै भनेर तँलाई विवाह गर भनेकी । त॑ भने आकाशकी चरी ताक्छल ।क त्यो मुडुल्लीलाई ठीक पारेकी “छु, त्यसैसंग चप लागेर बिवाहगर ।&amp;quot;- दिलबहादरले जड्ेर भनको थियो, “त्यसो गर भन्नहन्छ भने मभाग्छु र फेरि फर्केर यस गाउँमा आउँदै आउन्नै । आनि तपाईं रमडुल्ली साथै बसेर रोइरहन्‌ होला ।&lt;br /&gt;
धम्कीले लाचार भएकी दिलबहाद्रकी आमाले राघाका माइतमाबिवाहको कुरा पठाउँदा यस्तो जवाफ पाएकी थिई, “गाउँमा यसैलरबराइरहने, खान बस्नलाई समेत घौँ धौ पर्ने तिनले हामी छोरीको हातभाग्नसक्ने कत्रो ताकत &#039; हामी छोरीसंग विवाह गर्नै हो भने सनाइदिनोस्‌, पहिले उसले कमाइगरेर देखाओस्‌, क्रण मक्त होस्‌, अनि केगर्नपर्छ सोचौंला ।&lt;br /&gt;
यस्तो मार्मिक बचन सुनेपछि गाउँ छोडेर काठमाडौं पसेकोदिलबहादुरले प्रसस्त कमाइ गर्न थालेको देखाउन आफनो छाक काटेर भएपनि रातोदिन ज्यालादारी काम गरेर भए पनि घरमा पैसा पठाउनथालेको थियो । गाउँलेहरूमा उसले गरेका तरक्कीको प्रचार भएपछिढोकेकै उर्दी पोशाक लगाएर गाउँमा पस्ता पनि यसको खाइलाग्दो रूपदेखेर र शहरबाट हक भएर आएको ठानेर मान पाउन थालेकाले नैहो, राधाका बाब दुई वर्षपछि नै आफनो मन बदलेर छोरी दिन राजीभएका ।&lt;br /&gt;
नभन्दै नोकरी गरेको पहिलो वर्षदेखि नै क्राण निखन्न थालेकोविबाह गरुन्जेलसम्म झण्डै आधाआधी क्राण तिरिसकेको थियो । जबराधाका बाबले आफनो पुर्ववचन अनुसार विवाह गरिदिन तयार भएत्यसपछि उसले केही साचेन, मानौं उसको उद्देश्य प्रा भइसकेको छ ।&lt;br /&gt;
१७&lt;br /&gt;
राम्रा राम्रा सारी, आधुनिक श्रृङ्वारका सामान र झल्कने रचम्कने गहना ल्याएर विवाह गर्ने दिलेलाई आजभोलि औंल्याएर गाउँकाअल्लारे केटाहरूलाई उपमा दिन थालेको करा उसले सुन्त थालेको छ ।&lt;br /&gt;
यता राघाको फर्मायस दिन प्रतिदिन बढ्दो छ । गाउँबाटकाठमाडौं आउने पाहुनाहरू पनि त्यस्तै बढेका छन्‌ । यस्ता समस्यालेगर्दा दिले बेलाबेलामा विचलित हुन्छ र पनि क खुलेर राध्यालाई आफनोअवस्थाबारे बताउन सकिरहेको छैन । राधालाई थाहा छैन ढोके पालेभनेको कस्तो नोकरी हो । यसले साइकल चढेर घर अफिस पनि अरुलेगर्नेजस्तो गरी गर्छ । त्यही साइकलमा राखेर उसलाई घमाउँछ पनि ।कुन नोकरी ठूलो, कुन नोकरी सानो, क के जानोस्‌ ।&lt;br /&gt;
राधाले सोचेकी छै काठमाडौंमा उनीहरूको घर नभएकैले मात्रबास दिनै ती घरपटीको भाँडा माजेर उनका घरधन्दामा क सहयोगीभइदिजु परेको हो । आफना जीवीकाका लागि नोकर्नी भएकी चाहिँ होइन। यस्तो भावना लिएर काम गरिदिने गरेकी राधाले उसको परिचय जबनोकर्नी भनेर दिएको सन्छे, क झनक्क रिसाउँछु र त्यस दिन कनै नकुनै बहाना बनाई काम गर्न जान्न । क भन्छे, “मलाई यिनीहरूलेखोजेर ल्याई नोकर्नी राखेका हु र त्यसौ भन्छन्‌ : तपाईंले सकेजतिकाम सघाईदेक भनेकाले पो लौ त भनेर गरिदिएकी । यतै मालिक बन्नखोज्दा रहेछन्‌ : अब म काम सघाउन पनि जान्नै र तपाईँले पनि जाभन्न पाउनु हुन्न । त्यति पैसा चरा धागो लगा भनेर दिने गरेकामहिनावारी दिएको ठानेका होलान्‌ । त्यो पनि अबदेखि लिन्नँ ।&lt;br /&gt;
राधाको क्रा सनेर दिलेले भन्नसक्नै यति मात्र हो, “त्यति भनेरतँलाई &#039;के भयो ! यिनीहरू यतिमै खुसी हुन्छन्‌ भने तैले सनिदिएर त॑सानी हुन्नस्‌ : आफूनो कर्तव्य यसै छोड्न हुन्न । हेरिल्याएमा उनीहरूपनि कुन डयाङ्गका मूला हुन्‌ र ! उही नोकर नै त हुन्‌ । कतिसंफझाउँ तँलाई यी क्रा ।&lt;br /&gt;
राधाले चित्त बुझाएर चुप लागे पनि दिलबहादरलाई भने दुःखलागिरहन्छ । संझन्छ राधाले विवाह हुने निश्चय भएपछि पनेरामा भेटहुँदा भनेका ती कुराहरू । लाज मान्दै भनेकी थिई, &amp;quot;विवाह गरेरकाठमाडौं फर्कदा मलाई यही छोड्ने हो भनेँ म तपाईंसँग विवाह गर्दिनँ। यहाँ त अहिले पनि वसेकी नै छु । काठमाडौं शहरमा सुरुवाल कुर्तालगाएर, कपाल काटेर नाडीमा घडी लगाएर घमला भन्ने आफनौ कस्तोरहर तपाईं भने यहीँ आमाका लागि साथी छोडेर जान्छु भन्न हुन्छरे ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
१्द&lt;br /&gt;
दिलबहाद्रले पनि राधालाई मीठो भाकामा भनेको थियो, &amp;quot;तिमीलेविवाहपछि मबाट चाहेकी यतिमात्र हो : लौ लौ म तिमीलाई चिटिक्कपरेकी प॒तली बनाएर नै काठमाडौं मात्र किन भक्तप्र, पाटन शाहरैघमाउँला, भएन अब ?”&lt;br /&gt;
यति जवाफ सुनेपछि खुसी हुँदै मृग उफ्रेको जस्तो गरीउच्चालिदै भागेकी राधालाई विवाहपछि उसँग गरेका बाचा पनिदिलबहादुरलाई पुन्याउन घौँ घौ भइरहेछ । राधाले बारम्बार ती बाचाहरूकोट्याई संझाउन खोज्छ । नसुनेको झै गरी पन्छिन खोजे क आफैढुस्किन्छे, कहिले हाँस्छ त कहिले जिस्किन्छे तर ती बाचालाई लिएर भन्नछोडदिन । राधाले बिवाह गरेर चाहेकी तिनै दुई ई इच्छा प्रा गर्ने थियो ।एक दिलबहादुरलाई पाउने र अर्को शहरको तमासा रमझमहेर्ने ।&lt;br /&gt;
एक दिन राघाले निकै रहरयमय तरिकाले दिलेलाई कुरासुनाई । क भन्दै थिई, “दया मैयाको पनि बिवाह हँ भयो रे, सुन्नुभयोतपाईंले ? त्यो दुलाहा हुने केटो अर्काको देशमा धेरै वर्षदेखि काम गर्छरे र विवाह भएपछि मैयाँलाई पनि त्यहीँ लैजान्छु भन्छ रे । तर मैले तमैयाँलाई भनिदिएँ,&amp;quot; मैया, त्यस्तो टाडा गएर काम गर्नेहरूमाथि विचारपुग्याएर मात्र विवाह गर्नुहोला । कस्तो काम गर्छ कस्तो : न गौराकोजुठा भाँडा माजेर घर कुरुवा भएर पो बसेको छ कि !: त्यहाँसम्मपुगेपछि बस्नै नसकेर फर्कनु पत्यो भने विवाह नै त्यस्तासँग किन गर्ने ?हामी छोरीको त विवाहले पनि भाग्य राम्रो नराम्रो बनाइ दिन्छ । यस्ताकुरामा पहिले नै होस्‌ पुग्याउनु होला, नत्र धोखा खाइन्छ । मैले ठिकैभने होइन त !”राधाका यस्ता कुराले दिलेको मुटु छोएको थियो र उसलेराधासंग नै सोधेको थियो, “मैयौले तेरो कुरा सुनेर के भन्नुभयो त ?मलाई सिकाउन आउने नोकर्नी भनेर गाली गर्नुभयो होला, होइन ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
“किन गाली गर्नुहुन्थ्यो ? भन्नुभयो, हेर्दा यस्ती लाटीजस्ती तिमीत हुनसम्मकी बाठी रहिछौ । दिले दाइले तिमीलाई झुक्याइ दियो किकसो ?&amp;quot; उहाँको कुरा सुनेपछि पो मैले के भनेछु त्यस्तो भनेर लाजलाग्यो । अनि त के भनुँ, के भएर फरक्क फर्किहालें । कहिलेकहीं केबोलिन्छ के ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
राधाका यी कुराबाट दिलबहादुरले राधाका मनमा उसप्रति केधारणा लुकेर बसेको रहेछ भन्ने थाहा पाएको थियो ।&lt;br /&gt;
वास्तवमा दिलबहादुरले झुक्याएर राधासँग बिवाह भने गरेकोथिएन । कसैले पनि उसलाई काठमाडौंमा कस्तो नोकरी गर्छस्‌ भनेर&lt;br /&gt;
१५&lt;br /&gt;
सोधेनन्‌ त क के गरोस्‌ : त्यस वेला उसले गाउँमा आमालाई ग्रणनिखन्न पैमा पढाउनु, राम्रो लुगा लगाएर गाउँमा आउनु नै विवाहकालागि योग्य भएको ठहरियो । त्यो लगा लगाएर दिनरात, शहर गाउँ गर्नुउसको मजवरी थियो किनकि अर्को लुगा किनेर लगाउने कसँग पैसाथिएन । यसरी आवश्यकताले उसलाई ,ठूलो बनाइदियो भने उसले गरोस्‌के ॥)&lt;br /&gt;
काठमाडौंमा काम गर्ने योग्य वर पाएकी छु भन्ने सोच्ने सुनौलासपना बोकेर आएकी राधालाई सत्य कुरा बताएर चित्त दुखाउने काममात्र गर्ने उसले आँट नगरेको हा र अहिले त्यही सानी कम्जोरीले दिनप्रतिदिन उनीहरूको जीवनभरका लागि भनेर जाँडएका नातामा पनि केहुने हो भन्ने प्रश्न उठन थालेको उसलाई अनुभूति हुँदैछ । क राघालाईंआफूसँग रत्याउन पनि खुबै संझाउने र आफूले भ्याएसम्मको उसकोइच्छा प्रा गरिदिने गर्छु । जब जब गाउँबाट माइतका मान्छे राधालाईभेटन आउँछन, दिलबहादर कही राधा यिनैका पछि लागेर त जान्न भनेरडराउँछ र समपित हन्छ ।&lt;br /&gt;
एक दिन कामबाट फर्कदा राघालाई निकै दामी सुरुवाल कर्तादिलबहादरले ल्याएर दिएको थियो । राघाले पनि तरुन्तै खसी भएर लगाईर दिलेलाई देखाउँदै भनेकी थिई, “मलाई सहायो, हेनाँस त, यस्तै लुगाधेरै दिनदेखि लगाउने मन लागेको थियो, बल्ल तपाईंले ल्याउन भयो ।लुगा मिलाउँदै भनेकी थिई,&amp;quot; यौ रातो रङ्ग त मलाई अतिनै मन पर्छ ।कति पर्दो रहेछ यसको !&amp;quot;&lt;br /&gt;
पैसा भन्न नचाहेर अलमलाउने तरिका खोज्दै दिलबहादुरले भनेकोथियो, “पैसाको तिमीलाई किन चासो चाहियो : रामा लागे भड्हाल्यो नि; भौलि यही लुगा लगाएर बस्नु हामी रानीपोखरी घुम्न जाऔँला । त्यहाँगएर राम्रो गाना मात्र गाउने होइन, नाच्नु पनि पर्छ, हुन्छ !&amp;quot;&lt;br /&gt;
“तपाईसँग बिवाह गरेपछि नाच्नै बिर्सिसकै जस्तो छ । एक फेरपनि नाच्न पाएजो होइन । गाना गाइदिन्छु हुन्न ?”&lt;br /&gt;
“औँहैँ, गाना मात्र गाएर हुँदैन, ताच्नै पर्छ । त्यो दिन तैँले&amp;quot;नाचेको देख्ता त यो कम्मर च्याप्प समातिदिकँ जस्तो लागेको थियो”भनेर उसको कम्मर समात्ता छिः तपाईं त ! कस्तोसंग सासैँ फेर्न गाह्रोपर्ने गरी एँठेको, छोडनोस्‌, भन्दै सोध्छु, “तीनओटा अरू किनिदिने हो त? हरियो, र निलो रङ्ग पनि मलाई खुबै मन पर्छु । यो एउटा मात्रकति रगड्ने ?”&lt;br /&gt;
राधाको फुमाँइस्‌ सनेर झस्केको दिलबहादुर राधाका अनुहारमाटोलाएर हेरेको हेरै भएको वियो र राधाले नै के कहिल्यै नदेखेको जस्तो&lt;br /&gt;
२०&lt;br /&gt;
गरेर हेरेको, कि पैसा सिध्याउने भई भनेर वाल्ल पर्नु भएको भन्दा पोक नियन्त्रणमा आई मुखबाट सत्य कुरा फुत्कन गएको थियो, “यस्तालुगा हामीले आफना कमाईले किनेर लगाउन सक्ने हो र फेरी फेरीलगाउने इच्छा गर्छैस्‌ । मेरो साहेबनीले तलाई भनेर दिइन्‌ र पोल्याएको ।”&lt;br /&gt;
सोच्तै नसोचेको कुरा दिलबहादुरका मुखबाट निस्केकाले छक्कपरेकी राधाले घृणाले भनेकी थिई, “त्यसो भए यो जडाउरी लुगा उठाएरस्वास्नी खुसी पार्न ल्याएको : मेरो लोग्नेले कति माया गरेर आफनाकमाइबाट किनेर ल्याइदिनु भयौ भनेर म कस्तो खुसी हुँदै लगाएकी थिएँ। यो त त्यस्तो पो रहेछ : मेरा आङमा यस्तो लुगा कहिल्यै परेकोथिएन । यो के गर्नुभएको तपाईं ले ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
यसो भन्दै लगाएको सुगा फुकालेर फयांगतै खुबसँग रोएकीथिई । दिलबहाद्रले जब संझाउंदा संझाउँदा वाम्यो । त्यसपछि उसलेपनि आक्रोशित हुँदै भनेको थियौ, &amp;quot;के गर्छस्‌ त : तेरा बाबले यस्तैलाईछोरी दिएर पठाइहाले । यी हेर, यो कोट पनि तिनै मालिकले जाडामाकपिर उभिइरहेको हेर्न नसकेर दिएका हुन्‌ । मैले लगाउन हुने, तैलेनहुने ? के भएको छ, यो लुगा । नयाँ जस्तै देखिन्छ । राम्रो पनि छ ।ज्यादा जिद्दी गर्ने बानी छोड र यी लुगा खुरुक्क उठा ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“के मान्धी राधाले । उसले भनेकी थिई, “तपाईंले किन्नसक्नुहुन्न भनेको भए मैले ल्याउनुहोस्‌ पनि भन्दिन थिएँ । यस्तै जडाउरीलगाउँदा लगाउँदै राम्रो मात्र लगाउने बानी बस्यो भने कै गरी पुन्याउनुहुन्छ &#039; अहिले नै कात्त बानी बिग्रिइसक्यो । खर्च बढ्यो भनेर किन्नेनाम लिएँ कि पुरपरामा हात राख्न थाल्नुहुन्छ अनि यहाँ भने जडाउरीबट्लेर ल्याएर भए पनि राम्रो लगाउने बानी बसाउन तत्पर हुनुहुन्छ ।औगात आफूनो के छ, त्यो सोच भन्ने तपाई मलाई किन आफ्नैऔगातमा रहन ? राम्रो लगाकँ मीठो खाँ भन्ने मेरो मात्रइच्छा होइन, पनि राम्रो मैले लगाएको हेर्ने इच्छा छ । योकुरा किन लुकाउन खोज्नुहुन्छ ! म फेरि भन्छु, “राम्रो म त्यस बेलामात्र लगाउछुँ जब तपाईले आफनै कमाइले किनेर दिनसक्ने हुनहुन्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
राधाका भनाइमा केही सच्चाइ नभएको होइन । हामी मुफतमापायौ भने जे पनि बट्ल्छौं र सोच्तै नसोची प्रयोग पनि गर्छौं । दैनिकउपयोगमा यसको बानी बसेपछि क्रण काढेर पनि त्यो नकिनी नहुनेहुन्छ । यसै गरेर त&#039; हामीले आफना आवश्यकता बढाउँदै गएका हुन्छौं ।हिजोसम्म सोख मानेर प्रयोग गरिएका वस्तु आज आएर आवश्यक बनेकाहुन्छन्‌ । होइन र ?&lt;br /&gt;
२१&lt;br /&gt;
यस विवादमा दिलबहादरले नै राधासंग चपलाग्न परेको थियोकिनकि राधाको सोचाइले मुक्ति खोजेको थियो ।&lt;br /&gt;
राधाले यस्ता धेरै घटनाहरू र व्यवहारहरूबाट आफू को रहेछुर भविप्यका लागि अब उसले के गर्नपर्ने भएको छ भन्ने क्राहरूबिस्तारै बफदै जादै छे । उसका चञ्चलता, कल्पना र इच्छ्वा पनिनक पि ५०:१५ लेका छन्‌ । गाउँकी त्यो राधा जिम्वालकी छोरी राधा अबझु दिर्नादनैको परिवर्तनले शहरिया हुँदै गाउँका संस्कृतिबाट पर पर हुँदैछे । कं गाउँबाट आएका पाहुनाहरूलाई अहिले काइदा कदर सिकाउनेभइसकेकी छै । भन्छे, &amp;quot;यहाँ सबै कुरा लकाउनु पर्छ, नत्र पाख्रे भनेरहाँस्छन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
001&lt;br /&gt;
गौरी अझै नोकरी गर्दै छे । शिव खँडकाको नोकरी छुटेपछि घरखर्च घान्त परेको छ उत्तको र जेठी छोरीका कमाइले । बेलासपरकोपर्ख्यौली घलाबाट धान मकै आए पनि घरका अरु खर्च बेपत्ताकै छन्‌ ।दुई छोरी, दुई छोरामा जेठी छोरी विवाह गर्ने उमेरमा प॒गिसकेकी छेभने जेठी छोरो हिन्दस्तानमा इन्जिनियरिइ पढ्दै छ आफनै खर्चमा ।कान्छी छोरीले यसै वर्ष बि.कम. पास गर्दै छे भने कान्छा छोरो भरखरआइ.एस्पी, को प्रयम वर्षमा छ । उसको इच्छा पनि दाजुले जस्तो गरीबाहिरै गएर पढ्ने छ ।&lt;br /&gt;
शिव खड्काले अवकाश पाउँदा आएको रकम मट्टामा खर्चभइरहेछ । क भन्छ, “यस रकममा भर गरेर व्यवहार चलाउँछु भन्नेनठान । सक्छयौ भने दैनिक खर्च के कति घटाउन सकिन्छ त्यसतर्फबिचार गर र मलाई यो मुद्दा लद्दनमा सहयोग गर । यौ नै एउटामाध्यम मैले पाएको छु, आफूलाई स्वतन्त्र देशको स्वतन्त्र नागरिककोपरिचय दिने । यो मुट्ठा दिनु भनेको मैले कर्मचारीको अधिकारको मागगरेको हुँ । यस्तो भन्ने लोग्नेलाई गौरीले के भन्नै : उसको मनस्थितिबुझेर उसलाई अरु दुःख नदिन घरधन्दा चलाउनेबारे केही भन्दिन थिईभने आफना भएका गहनाहरू हरेक महिना सुनारकहाँ पठाउनु परको&lt;br /&gt;
शिवले अवकास प्राप्त गरेपछि दुनियाँलाई राम्ररी चिन्न थालेकोछ । हिजोका घनिष्ठ मित्रहरू आज उसदेखि पर पर हुन थालेका छन्‌अने कार्यालयमा आफना साथ काम गर्नेहरू र आफना मातहतमा कामगर्नेहरू पनि नयाँसडक, असन, इन्द्रचोकमा यदाकदा भेट भईहाले छ भनेपनि कुनैले देखे नदेखेको जस्तो गरी जान्छन्‌ भने कनैले औपचारिकतापुरा गरेर पन्छिहाल्छन्‌ । कुनैसँग उसैले करा गरौं भनेर अगाडि बढ्दापनि अर्कातर्फ लाग्छन्‌ । त्यसैले उसलाई शहर घुम्न, मानिसहरूकोसमुहमा जान मन लाग्दैन । उसलाई बाहिर जानै पन्यो भनै अदालतमाजान्छ कि त बेलासप्रका गाउँमा । त्यहाँ जाँदा उसलाई अभै आफूजिउँदो नै छु जस्तो लाग्छ ।&lt;br /&gt;
२३&lt;br /&gt;
, &amp;quot;एकपटक उसलाई आफना .प्राना साथीसँग भेट गर्ने इच्छा लाग्छ। त्यो साथी उसका अरू साथीभन्दा धेरै नै सम्पन्न छ । त्यसैले उससँगकुरा गर्दा कतै कतैबाट उसको घमण्डीपना झल्किएको आभास हन्छ ।शिवले उसलाई चाहने किन हो भने क धनलाई अति महत्ब दिइ कुरागर्ने गर्छ र ज्ञानलाई दौसो तहमा मात्र राख्छ । विवेकलाई अव्यावहारिकमान्दै यक्री भन्छ, “विवेक, माया, सहानुभूति भन्ने यी भाबनाहरूलेव्यक्तिलाई कम्जोर बनाइदिन्‌छन्‌, लिने र दिने दृवै पक्षलाई. । तसर्थ,सहयोग नै गर्नु छ भने पनि त्यस व्यक्तिलाई परिश्चम गराएर, मात्र दे। धन भनेको लक्ष्मी हो । यसलाई जथाभावीसंग नचाउन हुँदैन ! यहीधन जोडनलाई हामी उद्योग गछौं, पढ्छौं काम गर्छौ, परिश्रम गछौं रठग्छौं पनि । कुनै कुनै स्थितिमा त ज्यानको पनि मतलब नगरेर धनकैपछि दौडन्छौं । इज्जत नै फालेर पनि पछि लाग्नेहरू प्रसस्त छन्‌ ।यसैले धनले धिचेर मर्नु नै पत्यो भने पगि त्यस व्यक्तिलाई त्यसलेदुखाएको हुँदैन र मरिनै- गयौ भने पनि हाम्रो संस्कार कस्तो छ भनेउसलाई यी धन, सोख, आराम परलोकमा पनि पृग्याइ दिने विधिबताइदिएको छ । धनको महत्व कहिल्यै सक्दिन ।&lt;br /&gt;
मलाई आज जुन अवस्थामा देखेका छौँ त्यो मेरो पृर्घ्यौली देनहोइत र मेरो विगत पल्टाउन पनि नखोज । यति मात्र म भन्न सक्छुहाम्रो आर्थिक &#039; स्थितिको इतिहास धेरै ठाउँमा शुन्यमा पुग्दै उठेको छ रकति ठाउँमा चुलीमा प॒गेर पतन भएको पाइन्छ । शून्यमा पुग्नभन्दापहिले रै पतनतर्फ लाग्नुभन्दा पहिले आफूलाई समाल्न सक्यो भने मात्रयथास्थितिमा रहन सकिनै हुँदौ रहेछ ।&lt;br /&gt;
संझ, म शान्यमा पुन्याए आफनो भाग्यसँग लडेर जिउनलाई हुँरै आफनै प्रयासले धनको कदर गर्दै यहाँसम्म आइपुगेको छु । यो लामोदौडमा चल्दा मैले विवेक, माया, सहानुभूति जस्ता मन छुने भावनाहरूसँगराम्ररी खेल्न पाएको छु र यसको अप्तर र नतिजा पनि देखेको छु ।सायद, तिमीहरूका जीवनमा यस्तो अवस्था नै आएन होला र आदर्शकाकुरा गर्छौं । मलाई धेरैको दयालै ठाउँ ठाउँमा पोलेर नमेटिने टाटोलगाइदिएका छन्‌ । त्यसैले म यस्ता दुःख अरूलाई नहोस्‌ भनेर दयागर्दिनँ, बरु. काम मिलाइदिन सहयोग गर्छु ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
शिवलाई जीउनको सच्चइ. जुन अति तितो हुन्छ, त्यो जान्न कप्रतापकहाँ&#039; जाने गर्छ र त्यस. दिन पनि क परतापको दार्शनिक प्रवचनमात्र सुन्न गएको थिएन । उसलाई यसपटक पैसा सापट लिन पर्नेआवश्यकता पनि परेर गएको थियो । उसले सोचेको थियो, अरूलाई जेजस्तो गरे पनि मलाई भन्दैन होला ? प्रतापले निकै बेरसम्म शिवका&lt;br /&gt;
0 हु&lt;br /&gt;
माँगलाई हाँसोमा लटपटाइरहन्छ तर उसले पानि जब दोह्तोआाईं तिहयाईछोरीको विवाहका लागि सापट खोजेको बताइरहन्छ, क क्र्र भएर गर्जदैभन्छ, &amp;quot;त्यसो भए तँ पनि सन्तानलाई उस्तै शृन्यमा प्॒याउने बाटो खोज्दैछस्‌ आफू शुन्यमा पुगेर सोच, त्यहाँ पुग्दा र्कात कप्ट सहनपर्छ ।आधाभन्दा बढी जीवन तेरो त वितिसकेको छु र दृःखै भोग्न प्यो भनेपनि केही वर्षका लागि मात्र हुनेछ तर तेरा ती केटाकेटीहरूलाई त्यहाँपुन्याएर छोडिस्‌ भने तिनीहरू जीवनभर रुने छन्‌ । तेरो छोरो कसरीइन्जिनियर होला ? कान्छी छोरी र छोराले के पढ्छन्‌ : भाउजुले कतिहाड घोदने ? दिन्न जा, तँलाई म एक पैसा पनि छोरीको विवाहकालागि सापट दिन्नँ दिन्न । विवाह नै गराउन छ भने भनिदे त्यो दलाहाहुनेलाई केही पनि दाइजोमा दिन सक्तिनँ भनेर । विवाह गराउने विभिन्नतरिका छन्‌, जुन अपनाउनाले तैलाई क्राण लिनु पर्दैन । त॑ त्यसो किनगर्दैनस्‌ ? मसँग नरिसा । हेर, यस क्राणले तेरी छोरीलाई आशीबाददिँदैन, बरु पोलेर छोरीप्रतिका प्रेममा फाटौ मात्र ल्याउँछ । . छोरीलाईदेख्नासाथ तैले आफूले लिएको क्षण सोझनेछस्‌ ,। मेरी आमाले झैँहुनसक्छ छोरीलाई नै पर पर गर्न याल्नेछस्‌ ।&amp;quot; ॥&lt;br /&gt;
शिवले पनि झोक्किएर भन्छ, &amp;quot;ए आमालाई किन निठरीबनाउँछस्‌ ? सोझै भनन, &amp;quot;तेरा क्षण तिर्ने नसकेर पचाइ दिन्छु भनेरदच्चेको, जागिर खुस्किएको ममाथि तलाई विश्वास लागेन । कुराबझिहालें । तेरो निमित्त मित्रताभन्दा ठूलो धन रहेछ । दुःखसखमा साथदिनेलाई साथी भन्छन्‌ तर तँ साथी होइन रहेछस्‌ । धनले हुङ कारगरिरहेको हान्ने साँढेलाई शिव बाँध्न भनेर छुन पुगेछ । यो मैले ठूलोभूल गरेको रहेछुँ । यही भल - स्वीकारेर त॑कहाँ अब म कहिल्यै पनि&amp;quot; आउँदिनँ । धन्दा नमान्‌ु, म तँसँग पैसा त के, कुनै पनि सहायतालिन्नै । दिन भनेको सबैको एकनासको सँधै हुँदैन । हिम्मत, छ, मलाईक्रण लिए पति तिर्नसक्छु भन्ने । यस पाखुरीको बल हराएको छैन,बुझिस्‌ । इज्जत, भनेको बेलामा राख्नुपर्छ, त्यो टरे&amp;quot; पछि फर्केर आउँदैनर इज्जतै गएपछि समाजमा के गरी बाँच्नु : त॑ प्रवासीलाई, न तयहाँको समाज चाहिन्छ, न त इज्जत नै । मलाई त दुवै चाहिन्छ ।क्रण पनि लिन्छु, विवाह पनि गरिदिन्छु, त्यो क्षण तिर्छु पनि ।&amp;quot; त्यसरीरिसाएर शिवले फलाक्ता पनि क हाँसेर नै जवाफ दिन्छ, “सापट लिएकोइज्नत कति दिन टिम्नसक्छ ?” १ यु&lt;br /&gt;
यस जवाफले छेड्छ शित्रको मुट्र र क त्यहाँबाट जुरुक्क उठेरहिँडेको घरमा .प॒गेपछि गौरीले “के भयो यस्तो । कित नीलोकालोअनुहार लगाएको भनेर” सोद्धा पो बल्ल बोल्न सक्छ । क एकोहोरोसँग&lt;br /&gt;
0010&lt;br /&gt;
त्यसपछि बोलेको बोलै हुन्छ ! भन्छ, “त्यसले आज मेरो आत्मसम्मानमाघक्का लगाएको छ । त्यो नफर्काई कहाँ छोड्छु : धन मात्र मनुष्यकोसब थोक होइन । घनले किन्न नपाइने अरू पनि आवश्यकता जीवनमाहुन्छन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
यम्तो बेतालको क्रा लोग्नेले गर्न थालेकाले गौरीले सुनेर पनिकेही सोध्न सक्तिन । डराएर मनमनै भगवानसँग पार्थना गर्छे उसकालोग्नेका मनलाई शान्त पारी देक, रिस रागबाट बचाइ देक । कंचारैतिरबाट गिज्याइएको छ । उसको जिजीविषा सुर्राक्षत रहोस्‌ । जस्तैदुःख भोग्नु परे पनि सहनसक्नै शिव खँड्काको आत्मवलले उसलाई किनलाचार हुनदिन्थ्यो ? किन मृत्यलाई खोज्दै हिड्न पर्ने बनाउँथ्यो : यौगौरीको पतिप्तिको माया र कम्जोर सोचाइ मात्र थियौँ । मायालेझस्काई उत्पन्न गराएको उसको त्रास मात्र थियो । शिवले जीवन रजिउनु दुबैलाई धृणा होइन, पेमले हेर्ने गर्छ र भन्छु, &amp;quot;जिउँदो रहँदाआइपर्ने बाधाहरूले नै मलाई अनुभवी बनाउँछन्‌ र यी अनुभवहरू नै मैलेआउने प॒स्तालाई छौडेर जानसक्ने ज्ञान हुनेछ । मलाई “एकादेशमा&amp;quot;भनेर भए पनि संक्षिकन्‌ भन्ने आशा छ र मेरा यस्ता आशालाई पुरागर्ने मेरा कर्महरू हुन्‌ । तसर्थ म कर्म गर्नबाट हटतित र हरेस खाएरबेपत्ता पनि हुन्नै । तिमी नडराक, गौरी, तिम्रौ लोग्नेले संघर्ष गरी बाँच्नजानेको छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
२६&lt;br /&gt;
पैसा छैन भनेर दयाको विवाह टार्ने स्थितिमा पनि शिव छैन ।केटो राम्रो, पढेलेखको र विदेशीले समेत पत्याई नोकरीमा राखेको छ ।घर पनि सुसम्पन्न र परिवार सबै शिक्षित छन्‌ । त्यसैले शिव रगौरीले केटाका परिवारकहाँ छोटकरीमा विवाह गर्ने प्रस्ताव लिएर जानेनिश्चय गर्छन्‌ तर उनीहरूले जेठा छोराको रहरको विदाह त्यसरी गर्दैनौंभनेर मानेनन्‌ भने सुहाउँदो उपाय के गर्नुपर्ला भनेर सोचाड्गमा डुबेकाछन्‌ अनि त्यसरी नै प्रतापले साथीलाई चोट पुप्याई भगाएपछि अति दुःखीभएर बसेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
प्रतापले समाज सुधारपष्टि लिएको धारणा ज्यादै जटिल हुनुकासाधसाथै यसतर्फ अपनाएको बाटो पनि अप्रिय छ । क यस्तो धारणालिएर त्यस बाटामा कति टाढा | ५७०० छ भने क फेरि फर्कनसक्तैन । दनियाँले उसलाई कसरी छन्‌ भने क निर्दयी छ,घन खर्च गर्न कन्जुस्याइँ गर्छु र धन नै उसका लागि सर्वश्रेष्ठ छ तर,सत्य त्यो होइन । उसको सौचाइ छ, हामीले आत्मसम्मान राख्न आफनाअवस्थासँग संझौता गर्नपर्छ । आत्मनिर्भरताले नै व्यक्तित्व विकासगर्नसक्छ ।&lt;br /&gt;
तसर्थ क भन्ने गर्छ, “उद्यमी भएर धन कमाक, परिश्रम गर रधनको प्रयोग उचित लक्ष्य हासिल गर्नेतिर गर नत्र भने यही धनलेतिमीलाई नाशतर्फ धकेलिदिन्छ । स्वभाव बिगारी दिन्छ र क्रणकाखाल्डोमा निस्कन नसक्ने गरी गाडीदिन्छ । त्यसैले क्षण माग्नेलाईसहयोग गर्नु त्यसलाई पतन पार्न हुनेछ । आत्मसम्मान हराउनाले त्योअगाडि बढ्न नसक्ने हुन्छ । समयसँग, अवस्थासँग आफूलाई मिलाएरलैजान जानेन या सकेन भने त्यो व्यक्ति जतिसुकै विद्वान्‌ होस्‌, आँटिलोहोस, दःख पाउँछ । यही कारण हो, सहयोग गर्दा पनि विचार कसरीपत्याउन पर्छ भने क आत्मनिर्भर हुनबाट कम्जोर नबनोस्‌ । यसअवस्थामा सहयोग गर्नु र दया गर्नु पनि कठिन छनौट हुन्छ । मैले आजयही सिद्धान्तमा रहँदा आफनो घनिष्ठ मित्रलाई समेत गुमाउने संभावना छ&lt;br /&gt;
२७&lt;br /&gt;
॥ घाहा छ मलाई शिवले मेरो वचन सहन सक्तैन । मैले उसलाईखिज्याएको उसको अवस्थाप्रति होइन, उसले क्राण लिलुको सद्दा आफनोस्थितिसँग सम्झौता गरोस्‌ भनेर उसलाई सुझाउ दिएको मात्र हुँ । क्रणमाग्ने कर्म कस्तो हो भनेर देखाएको हुँ । उसले मेरा भनाइको अर्थ जेजस्तो लगाए पनि मकहाँ फर्केर त क अवश्य आउँदैन । सायद अरूकहाँपनि माग्न गइहाल्न अलिक सङ कोचले गर्दा हतोत्साही अवश्य होला ।यही नै मेरो विजय हो र साथीमाथिको सहयोग पनि हो ।&lt;br /&gt;
प्रतापले यसो भनेर आफूता मनलाई बझाउन खोज्छ । क सोच्छशिवले यदि मसँग कुनै काम शुरु गर्ने प्रस्ताव ल्याएर पैसा मागेको भएम त्यो दिन तयार हुन्थें । पैसा मात्र दिएर यसै बस्नै थिइनँ । काममासहयोग पनि गर्थहोला । तर क त्यसतर्फ लाग्नै खोज्दैन । अनि म केगरु ? म आफूनो सिद्धान्त छोड्न पनि त चाहन्नँ । क सफझन्छ, शिवलेखिन्न भएर एक दिन भनिरहेको थियो, &amp;quot;हेर यार, आजभोलि यो दिनकाट्न पनि कति पट्यार लाग्नै रहेछ । सबै काममा गएपछि रित्तोघरमा एक्लै माथितल गरिरहँदा अफिसमा बिताएका समयको याद आउँदोरहेछ । कत्रो फरक हुँदो रहेछ । त्यस बेलाको बेफुर्सतमा सोचिन्थ्यो कतिमेसिन चलेको जस्तो गरी काममा घोटिइरहने &#039; बिदा लिएर घरमाआराम गर्नपश्यो क्यारे । अहिले आरामै आराम पाउँदा यो छटपटी छ ।फुर्सतको मज्जा पनि व्यस्त भएकै बेलामा हुँदो रहेछ जस्तो अति दुःखमासुखको छायालै मात्र पनि कति रमाइलो गराउँछ । यस कहालिलाग्दाअवस्थाबाट बच्ने उपाय नगरी भएको छैन भन्दा प्रतापले दोहो-्याईंभनिरहन्थ्यो, &amp;quot;फेरि अरू कुनै ठाउँमा नोकरी गर्न धाल । देखाइ देक नतिमी नबिक्ने खोटो पैसा होइनौ । समयको प्रयोग गर, यौ अति अमुल्यछ । ती यर्थैमा बित्तै गएका दिनहरूसंग तिम्रो जीवनी पनि छोट्दिदैगएको हुन्छ भन्ने तथ्यलाई नभरल 1 यसै बमिरहयौ भने तिम्रा हयाउनिष्किय हुदै जान्छन्‌ अनि तिमी चाहेर पनि अगाडि बढ्न नसम्ने हृन्छौ। यस कुराको अनुभव मैले गरिसकेकाले तिमीलाई यसरी सल्लाह दिदैछु ।तिमीले अर्को नोकरी गर्नै पर्छु र यहाँ नोकरीको कमी छैन । तिमीहरूजस्ता पढेलेखेकाहरूले त नयाँ व्यवसाय पनि निकाल्न सक्छौ ।&lt;br /&gt;
यहाँ चाहनाको थप्रो बढ्दैछ । कति हिजोको मनोरन्जन आजकाजरूरत भइसकेका छन्‌ । नयाँ ज्ञान, नयाँ जरू्रत, नयाँ प्रयोगले नै नयाँव्यवसायको सिर्जना गराइरहेको हुन्छ । तिमी यसतर्फ लाग्न चाहन्छौ भनेम तिमीलाई सहयोग गर्छु भनेको पनि थिएँ ।&lt;br /&gt;
प्रतापका यस्ता क्राले उसलाई कुनै अप्तर पारेको थिएन । कभन्थ्यो, पहिले मलाई कर्मचारी, हुँ भन्ने प्रमाण प्राप्त गर्नुपरेको छ र&lt;br /&gt;
ब्‌द&lt;br /&gt;
त्यसपछि नोकरीबाट मुक्त भई व्यवसायतर्फ लाग्न सोचैँला । नोकरी गरेरफेरि म नोकर हुन भने चाहन्न । यो पेट पाल्न कुनै समम्या छैन ।समस्या छ भने समयको सद्पयोग कसरी गर्न भन्नेमा छ । यमैले मैलेप्रशासन व्यवस्थाबारे केही लेख्न थालुँ कि भन्ने पनि सोचिरहेको छु । योपनि भएन भने म नेपाल भ्रमणतर्फ लाग्छु । त्यहाँ लकेका जनजीवन,संस्कृति र व्यवसायको अध्ययन गर्छु । अनि नेपालको परिचय दिन्छु ।यसो भन्दै उसले करा ट्ङ्गाइदिने गर्थ्यो ।&lt;br /&gt;
त्यस बेला पनि मित्रको मन फर्काउन प्रतापले हाँसेर, ए त्यसोभए मन्त्री बन्ने विचार लिएको छौँ या प्रधानमन्त्री नै बन्ने इच्छाराखेका छौ : त्यसमा पनि विचार भने गर है, ती मन्त्रीहरूले पनिआफूलाई &amp;quot;जनताको नोकर&amp;quot; भनेर घोषित गरेको पढेकै छौ होला । यसोभन्दा पनि क यसरी जवाफ दिन्थ्यो, “पढेको पनि छु र भाषणमा भनेकोसुनेको पनि छु । कोही जनताको गोकर हुँ भन्दै आए पति होलान्‌ ।तर म त्यस्ता नोकर बनेकाहरूलाई कसरी कजाउन पर्छ, त्यो सिकाउनदेशका कुना कुनामा प्ग्न चाहन्छु । तिनीहरूलाई ठीक तारिकाले राख्नसकिएन भने नोकर बनेर आएका ती मालिक बन्छन्‌ र मालिकहरूनोकर । कुरा बझयौ त तिमीले ? अव पनि तिम्रो केही भन्न बाँकी छ&lt;br /&gt;
छ भने घाँटीमा नै अड्डकाएर नराख ।&lt;br /&gt;
त्यति सानो प्रश्नको यति लामो जबाफ पाएपछि प्रतापले त्यसमाअरू के थपोस्‌ &#039; हुन पनि उसले देख्नै आएको छ, कैयौ नोकरहरूलेमालिकलाई मृर्ख बनाई छक्याएका हुन्छन्‌ । सेवाको नाममा लुट गर्दैउल्टै जण्ड वनेर मालिकलाई काकाककुक्रुक पारेर आफूले रजाइ गरेरबसेका पनि छन्‌ ।&lt;br /&gt;
यस्तै गरी यी दई बीच आ।आफना विचारको प्रस्तति भइरहन्थ्यो। खुसी पनि हुन्थे, रिसाउँथे पनि र छेडछाड पनि गरिरहन्थे । जतिमनमोटाउ वादविवाद भए पनि धेरै दिन टिक्न पाउँदैनथ्यो । यी दुईखोजी खोजी फेरि भेटिहाल्धै र त्यस्तै गरी छलफल गरिरहन्थे ।&lt;br /&gt;
&#039; तर त्यस दिन चोट लागेर फर्किएको शिव प्रतापकहाँ गएकोछैन । शिवले बिर्सने प्रयास गर्दा पति मनले दोहो-्याइ हाल्छ, “सापटलिएको इज्जत कति दिन टिक्नसक्छ ।&amp;quot; उसको यौ भनाइ सत्य भएकालेनै उसलाई धेरै बिझेको छ र प्रतापले यस्तो वचन लगाएर उसलाईतिरस्कृत जानीजानी गरेको हाँ भन्ने ठानेर उसँग धेरै जङ्गिएको छ, साथैअठोट पनि गर्दै छ क छोरीको विवाह गरेर नै छोड्छ चाहे उसलाईझै लिन किन नपरोस्‌ ।&lt;br /&gt;
२९&lt;br /&gt;
छोटकरीमा विवाह गर्ने प्रस्ताव लिएर केटाकहाँ जान सङ्घ कोचलागे पनि जव उनीहरूले केटीका वाबआमाको यस्तो धारणा रहेको चालपाउँछन्‌, केटापक्षले आफनो सहमति दिई यस समस्याको हल गरिदिन्छन्‌ ।त्यसैले पनि शिव आजभोलि दङ्ग परेको छ । उसलाई लाग्न बालिरहेछयो छुटकारा प॒तापको तीतो बचनले नै दिलाएको हो । उसले हिम्मतगरेर आफनो औगात खोल्नसक्ने बनाएको नै प्रतापका व्यङ ग्यले हो ।एक मनले उसलाई धन्यवाद दिने इच्छा उठे पनि अर्का मनले क्षमासमेत दिन चाहँदैन । अझै क त्यही सोचाइमा छ, प्रतापले उसकोनोकरी नहुँदैमा असमर्थ सोफझयो । साथीमाथि गर्नपर्ने व्यवहार समेत धनमोतृजकमा गर्ने छोड्यो ।&lt;br /&gt;
३०&lt;br /&gt;
गाउँबाट आमाले पठाएको चिठी पढेर दिलबहादर ज्यादै चिन्तितभएको छ । लेखिएको छ । तिरो तिर्ने, म्याद नाधिसकैकाले रातोदिनकचकच सुन्न थालेकी छु । यस्तै दःखमा तेरी कान्छी दिदीलाई दुई जियाभएको बेला बात लगाएर घरबाट माइत लगारिदिएकाले अको चिन्ताघपिएको छ । के गर्छस्‌ बाब् त॑ एक्लो छारो भइस्‌ । दुःखका कुरानभनुँ भनै पनि अरू कुनै उपाय पाइनँ र सुताउनै पच्यो । खेतीकाउब्जनीले वर्ष धाउन्न सकिदैन । हुन त तैले पनि विवाह गरिस्‌, त्यहाँकोपनि खर्च बढेकै होला : तर के गर, बर्भेर मात्र गर्जो टर्दो रहेनछ ।सक्छस्‌ भने यही चिठी लिएर आउनेको हात केही रकम पठाइदिएमामलाई होलो हुने थियो ।&lt;br /&gt;
यो सानुको बारे म के गर्छ ? रातोदिन रोई मात्र रहन्छे ।भन्छे, &amp;quot;मेरी आमा, मैले तपाईंहरूको नाक कटाउने काम गरकी छैन ।घरबाट निकालिदिएपछि म तपाईंकहाँ नआएर कहाँ जाड ? बस्नै बास रजिउन गाँस त चाहियो । यस घरको अवस्था जे जस्तो भए पनि मतपाईंका काखमा पर्न आएकी छु । मलाई जा नभन्नु हौला । यौकोखको नानी जन्मने बेलासम्म मलाई राख्नोस्‌ । त्यसपछि म पनि केहीगरेर नै खान्छु । भाइको बोझ म हुन्नै आमा ज म भाइको सहयोगीभई सघाउ पुच्याउँछ्नु ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“सानुमाथि यस्तो अन्याय गर्न पाउँदैनौ” भनेर त्यसको घरमागएर भनिदिने पनि हाम्रो कोही छैन । गाउँलेहरूलाई कुरा गर्ने एउटाबिषय सानु भएकी छे भने क त्यसरी सबैका लागि तमासा बन्नहनु ज्यादै पिरोलिइरहन्छे । गरीब र असहाय हुनु ठूलो दोष हुँदो&lt;br /&gt;
[|&lt;br /&gt;
तेरा बाबुलाई मैले यसरी धन उडाउन थाल्नुभयो भने&lt;br /&gt;
छोरानातिले द्‌:ख पाउलान्‌, धनको इज्जत गर्नुपर्छ भन्दा ठाडौ जवाफ दिंदै&lt;br /&gt;
३१&lt;br /&gt;
भन्नुभएको थियो, &amp;quot;आफैले कमाउँछन्‌, अनि जे मन लाग्छ गर्छन्‌ ।&amp;quot;भएका राम्रा(रामा गराहरू बेचिए, सुनाचाँदी केही रहेन, न त मन्त्री बन्नसके, हामीजस्तो गाउँले किसान -ले चनावमा भएभरको संपत्ति लगाएरपनि हार्नु परेकाले त्यही नै, मृत्यको कारण बनेर आफू बित्नुभयो ।&lt;br /&gt;
आजभोलि आफूनो पेट कोक्याएको बेला ती हाम्रा बेचिएकागरामा झूलेका बालाहरू देख्ता र मैले लगाउने गरेका बाआमाले दिएकाती ढुङ,गीमुन्द्री अरूका कानमा झुण्डिएका देख्ता यो मन यतै घस्धरुरुन्छ । ती गहनाहरू बा अङ ग्रेजको फौजमा हुँदा उतै बिदेशको नमूनाल्याएर बनाएकाले नौला र निकै राम्रा थिए । आफना हातबाट गएकातिनलाई किन हेर भने पनि कसो कसो आँखा तिनैमा परिहाल्छन्‌ अनिआफूना बाआमादेखि ल्याएर सबै कुरा संझन थाल्छु । त्यस मोरीले पनिनकुच्याएर त्यही अर्काको जडौरी लगाएर के हिँड्नु परेको होला जस्तोलाग्छु । मलाई त्यस्तो लागेर के गर्नु, उसलाई त्यो देखाएर नै मलाईइख्याउने मन छ कि !&lt;br /&gt;
हामीले आफू जल्दोबल्दो हुँदा उसको भाइका लागि तेरा दिदीकोहात माग्दा “दिन्नौं” भनेका थियौं । त्यस बेला ती परिवार अलिखस्केका थिए । त्यो रिस अझैँ मरेको छैन जस्तो छ ।&lt;br /&gt;
तेरी कान्छी दिदीले अहिले दु:ख पाउनाको मुख्य. कारण पनि यहीघन हो । जेठीको विवाह जति गरगहना दिएर गरेका थियौं त्यति नैकान्छीका पालामा दिन सकेनौं । आशा लागेको थियो होला, के गर्नेत्यस वेला हामी आर्थिक सङ कटमा परिसकेका थियौं ।&lt;br /&gt;
यी दुःखका कुरा बताएर कहिल्यै अन्त्य हुँदैन । यति भए पनितैले बुझनु पर्ते आवश्यक भएकाले लेखाउन लगाएकी हुँ । दुवैतर्फ ठिक्कहुन खोज्नेले पाउनुपर्ने सजाय तेरा बाबका स्थितिमा पुग्नु रहेछ । तँ भनेकहिल्यै दुई जिब्रे नबन्न्‌ र फाइदाको खोजीमा आफै नहराउनू ।&lt;br /&gt;
अँ, बुहारीलाई कस्तो छ । दुई जिया त्यो पति भई कि भएकीछैन ! नाति हेर्ने इच्छ्ला त पुग्याइदैलास्‌ । बुहारीले नानी पाउने भई भनेयहाँ पठाइदिनू । तैले त्यहाँ कं जान्लास्‌ कुन बेला के गर्नपर्छ ?&lt;br /&gt;
राधालाई, हाम्री बुहारी हुन लेखेको रहेछ र तेरा बाले त्यसलाईसानैदेखि खुबै मनपराउनु हुन्थ्यो । तिमीहरू खेलिरहेको देखेर भन्नुहुन्थ्यो,“हेर त दिलेकी आमा, यो राधा कति राम्री छे । यसको बोली कतिमीठो छ । गाउँ घरमा जन्मी, नत्र यसले गाना गाउनेमा तालिम लिईभने निकै नाम कमाउने थिई । कोइलीको स्वर त तीखो मात्र हुन्छयप्तकोमा त मिठास छ ।” मलाई तेरा बाबले गरैको यो टीकाटिप्पणीकत्ति मन परेन र खिजाउँदै भनेकी थिएँ, “गाइनेमा नाम कमाएर कुन&lt;br /&gt;
बेर&lt;br /&gt;
ठूलो भइन्छन्‌ र ! अर्काकी छीरीलाई नानाथरी नभन्नोस्‌ है । त्यप्तकाबाबले सने भने झन्‌ हामीमाथि वैरभाव बढ्छ ।!&lt;br /&gt;
मुर्खहरूले मात्र यस्तो क्रा गर्छन्‌ । गाउने भन्दैमा सबैले सक्नेहुन्‌ र ? स्वर, शक्ति र तालिम तीनै कुरा मिल्नुपर्छ । त्यसमा पनि स्वरर शक्ति प्राकृतिक देन हो जसलाई तालिमले निखारेर सुर ल्याउन सकेमात्र पनि पारङ्गत भइन्छ । यो त कला हो, प्रतिभा हो । यसलाईसाधारण नमान ।&amp;quot; २&lt;br /&gt;
“साधारण कहाँ मानेकी छु र ? गाउँमा सबै चेलीहरूले भन्दाराम्रो यसैले गाउन जानेकी छ । खालि स्वर सुनाएर के ठूलो भइन्छभनेकी मात्र हुँ । छोरीले ठूलो स्वर समेत नगर्न भन्छन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
मैले यति के -भनेकी धिएँ तेरा बाब उफेर झण्डै मलाई हानुँलाजस्तो गरे । म वाल्ल परेँ किन रिसाएको, मैले के नचाहिने बोलें ।केही थाहा पाउन सकिनँ । ठूलो स्वरले उहाँ कराएकाले सदाको झैं मच्‌प लागेँ । अहिले त्यसको अर्थ बुझ्दै आएकी छु र एकरफेर त्यसकोस्वर सुन्ने इच्छा छ । कहिले राधालाई यहाँ पठाउने सुर गरेको छस्‌,अबेर भने नगर है मेरो, ज्यानको के भरोसा &#039; एकपल्ट नातिलाईकाखमा लिइहानुँ । नातिको मुख हेरे एक सिंढी उक्लिइन्छ भन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
हालको गर्जो टार्नलाई केही रकमको&#039; बन्दोबस्त गर्ने नै छस्‌ भन्नेआशा राखेकी छु ।&lt;br /&gt;
शुभ आशिष्‌ ।&lt;br /&gt;
चिठी सबै पढिसकेपछि रणबहादुरसंग दिलेले सोध्छ, “को चिठीलेख्ने पनि कहीं तिमी नै त होइनौँ ?”&lt;br /&gt;
“अक्षर चिन्यौं कि कसो ? यसमा मैले जे लेखेँ त्यो कुनै बट्टाबनाएर लेखेको छैन । ठूलीआमाले मनको वेदना पररर पोख्तै जानुभयोमैले त्यसैलाई टिपेर लेखिएको मात्र हो । मकहाँ आएर भन्नभयो,“ तैलेभाखा मिलाएर लेख्न जानेको छस्‌, दिलेलाई एउटा चिठी लेखिदेन भनेपछिमैले लेखेको हुँ । ज्यादै दिक्क भएर भन्नुहुँदै थियो, &amp;quot;के गर्नु आफूलेलेखपढ गर्न नजान्ताले आफूना मनका कुरा पनि आफूले अरूलाई भनेरछुन 21 हुँदो रहेछ । हाम्रो यौ कथा अरूलाई नभने है भनेर अनुरोष्&lt;br /&gt;
गर्नुभयो ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
तिम्रो यही खुवीले त हो, मलाई लोभ्याइरहेको । स्कूलमा पढ्दापति तिमीले कविता लेखेर कथा सुनाएर सबैलाई धुरुधुरु रुवाएको यियौ। यसले पछि लक्ष्मीप्रसाद देवकोटाको ठाउँ लिन्छ भन्दा म तिम्रो रित्तगर्दै लेख्ने कापी लुकाइदिन्थेँ । तिमीलाई यस कुराको संझना छ ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
३३&lt;br /&gt;
“किन नसम्झन्‌ । म पनि त त्यो खोजेर ल्याई गरूलाई भनेरतिमीलाई पिटाउँथे । &amp;quot;हेर रणे, मलाई यस्तो हुन्‌ लेखेको रहेछ । त्यसैलेसानैदेखि बुद्धि पनि त्यस्तै हुँदै गयो । बाचन्जेलसम्म त स्कूल गएको नैथिएँ । त्यस बेला पनि पढ्नमा भन्दा बढी मन यताउति चहानु, खेल्नुवन।जङ्लमा पसेर ढुकुर, चराचरुङ्डी मारेर हिड्नुले गर्दा कुनै तरक्की गर्नसकिनँ । बा बित्नभएपछि घरको मालिक बनेको मैले कसलाई टेर्ने ?पढ्नमा वाक्क लागेको मैले आमालाई हँदै जब गरुले मैले जति पढे पतिपास गारेदिँदैनन्‌, पिट्छन्‌ मात्र । अब स्कूल जादै जान्न, भनेर सुनाएँ ।उनले पनि पढाइमा म अब खर्च गर्न सक्तिनँ, नजाने भए नजा भनेरसमर्थन गरिन्‌ । त्यो माया थियो कि के थियो ? त्यसरी पढाइबाटछुट्कारा लिएको म अहिले यस रूपमा छु । केटाकेटीको भ्रविष्य बा।आमाका हातमा हुन्छ भनेको सत्य हो, रणे एक्ली मैले के मात्र हे ?अब तैले मेरा साथमा खेतीपाती गर्नपर्छ भन्नका बदलामा उहाँले एकचड्कन मलाई दिएर लौ स्कूल जान्नँ भन्‌ भन्नुभएको भए....? त्योउमेरमा हामीले के नै जानेका हुन्छौं र : त्यस बेला समाल्ने बाआमा नैहुन्‌, रणे उनै हुन्‌ ! तिमी र म नै एउटा उपमा भएका छौं । तिमीमास्टर छौं भने म नोकर । उ हाँस्छ र सोध्छ, “आजभोलि स्कूलमाकतिका केटाकेटी पढ्न आउँछन्‌ &#039; काम त प्रशस्त पाएकै छौंहोला ! &amp;quot;&lt;br /&gt;
“पाएकै छु भन्नपन्यो । राम्रो नोकरी गर्न पढ्नपर्छ भनेरतम्सिएका त घेरै छन्‌ तर ज्ञान बढाउनलाई पढ्नु भन्नेचाहि छँदैछैनन्‌, “भाग्यमा ठूलो जागिर खाने मन्त्री हुने लेखेको भए पो पढ्नजान्छन्‌ दुखै भोग्ने कर्म लिएर आएकालाई हामीले मुख दुखाएर केहुन्छ ?”&lt;br /&gt;
“उहिले उहिले पढ्नको अर्थ ज्ञानआर्जन मानिन्थ्यो । ठाउँ ठाउँमाभेला भई ज्ञानोपदेश दिन्थे । धर्मैको कित नहोस्‌, नीतिज्ञान जीवनआदर्शको कुरा सुन्न पाइन्थ्यो । अहिले यस्तो केही छैन । भेलामा सुन्नपाइने नेताको आफनो र आफनो पार्टीको बढाइचढाइ मात्र हो । सबैबदमास, सबै मुर्ख केवल आफू र आफूनो पार्टी मात्र देशभक्त भन्नेसुनाउँछन्‌ र जान्छन्‌ । यस्तो सुन्दा र तिनका गति देख्ता लाग्छ भक्ति३ त काठमाडौंमा छ र देश मात्र पूर्व मेचीदेखि पञ्चिममा महाकालीसम्मफै नएको छ । देश र भक्ति कहिले जोडिने हो र देशभक्त निस्कन्छन्‌ ?&lt;br /&gt;
दुबै हाँस्छन्‌ । राधाले खाना ठीक पार्छे । दिलबहाद्रलाई घरकोखवर सुनेर दिक्क लागे पनि रणेको सत्कारमा कुनै कमी नपार्न खल्लोहाँसो हाँसीरहन्छ । मनले भने गुन्दै हुन्छ, अब पैसा कहाँबाट ल्याउने ः&lt;br /&gt;
३४&lt;br /&gt;
दिदी र आमाको अनुहार थालमा पस्किएका भातमा देख्छु । उरुलाई लाग्नघाल्छ ती दिदी र आमालै उसंग भनिरहेका छन्‌ः एक गाँस अन्न यतापनि फयाँकी देकं, हेर हाम्रा पेट सारङ्गी जस्ता भइसके । &amp;quot;क्रणमा परेकाखेत गराहरू धेरैजसो निश्चनी सके पनि त्यसमा काम गरेर अन्नउब्जाउने कसलै : मेरा यी हाँड मक्किसकेका छन्‌ । छोरीको अवस्थाराम्रो छैन । अब तैंमाथि मात्र हाम्रो आशा छ, बाव ।&amp;quot; दिलबहादुरआफना मनले उब्जाएका यस्ता आमाका वबिलौनादेखि डराउँछ ।&lt;br /&gt;
राती सुत्ने वलामा दिलबहादुरले राधालाई चिठीको बेहोरा सबैबताउँछ । त्यस्ता मार्मिक क्रा सुनेर राधा पनि चिन्तित हुन्छे र जसक्कउठेर गई आफना भएभरका गहना ल्याएर लोग्नेलाई दिदैं भन्छे &amp;quot;यीगहना धरौटी राखेर हुन्छ या बेचेर हुन्छ, आमाकहाँ पैसा पढाइदिनोस्‌ ।कमाउँदै गयौं भने यस्ता गहना पछि बनाउँला ।&lt;br /&gt;
गहनाको पोको लिएर उभिएकी राधाको अनहार र उसकाहातका पोकालाई हेर्दै स्तम्भित भएकै दिलबहादरलाई देखेर राधा आफनोहात अगाडि बढाउँदै फेरि भन्छे, “लिनोस्त किन अन्कनाउन भएको ? योहाम्रो आफूनौ त हो ।&lt;br /&gt;
&amp;quot;तँलाई थाहा छैन राधा, यी गहना गहना मात्र हुन्‌, धनकोआवश्यकता यिनले प्रा गर्न सक्तैनन्‌&amp;quot; दिलबहादरले यति मात्र के बोलेकोथियो बीचैमा कुरा काटेर राधा भन्छे, “सक्तैन रे ? किन सम्तैन !गहना नै त हो, जरूरत परेका वेला बेचेर हुन्छ या बन्धक राखेर हुन्छ,खाँचो टार्न । यो नलगाएर म मर्दिन तर त्यहाँ पैसा नपुगे जे पनिहुनसक्छ । त्यस्तो परेको रहेछ । साँचै भन्ने हो भने मलाई गहनालगाउने सोख पनि छैन ।&lt;br /&gt;
दिलबहाद्रलाई राध्याका यस्ता पश्नले उसका घैर्यलाईखलबलाईदिन्छु र अलिकति ठूलो स्वरमा दिक्क हुँदै भन्छ, “सक्तैनभनेपछि चप लागेर थन्काउन्नस्‌ : यी पित्तलका गहना हुन्‌ ।यसबाट के पाइन्छ र बेच्छेस्‌ ः तेरो यस्तै जिह्रीले मलाई मख्चै फोर्न पर्नेपार्छ ?” यति भन्दै क अति अफशोच मानेर बस्छ ।&lt;br /&gt;
राधा पनि दिलबहादुरको कुरा सुनेर जिल्ल पर्छै र हँदै भन्छे,कति मलाई छक्याउनु हुन्छ &#039; अब त लाग्न लागिसक्यो कहीं तपाई नैपनि उही दिलबहाद्र हो कि होइन : किन तपाईंलाई यस्ता गहनाल्याएर विवाह गर्नुपर्थ्यो ? कसलाई के रवाफ देखाउनु परेको थियो ?भन्नोस्‌, तपाईले अरू पनि कुरामा मलाई ढाँद्न्‌ भएको छ भने आज मसबै सुन्न चाहन्छु ।&amp;quot; यसो भन्दै ती गहनाहरू भुङै भरी छरिदिन्छे ।&lt;br /&gt;
३&lt;br /&gt;
कोठो पहेला गहनाले सिगारिन्छ्‌ । दिलबहादुर र राधाका आँखा त्यसैमानाच्न थाल्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
दिलबहाद्र केही बेरपछि साम्य भएर संझाउँदै भन्छ, &amp;quot;के गररत, मैले पनि : तँलाई मन पराइहालैँ । तेरा बाबले गहना नल्याएरबिवाह गर्न आएँ भने छोरी नदेलान्‌ भनेर यिनै पित्तलका भए पनि लगे ।यस्ता महगीमा सुना।चाँदी कसरी जोड ः यसलाई राखी राख, यसरीफयौक्ने होइन । गाउँमा कसलाई के थाहा हुन्छु : कसीमा घोटेर जाँच्नेहोइन । हैर्दा राम्रा छँदै छन्‌ । कसले भन्न सक्छ यी पितल हुन्‌भनेर :&lt;br /&gt;
“राम्रो छ अभ लगा भन्दै हुनुहुन्छ । म त लगाउनन्न यस्ताजे पानि यस्तै दिनुहुन्छ र लगा भन्नुहुन्छ म पनि अब कमाइ गर्नथाल्छु ।रेडियो नेपाल र नेपाल टेलिभिजनमा गाना गाउँछु । कति झूठभूरुमादिन काँटने :&amp;quot; हिक्क हिक्क गर्दै रुन्छ ।&lt;br /&gt;
“ए मेरी राधा, यसरी दुखी नहो न ? के मेरो इज्जत राख्न भएपनि गाउँमा जौदाँ यी गहना लगाउन्नस्‌&amp;quot; भन्दै ती छरिएका गहनाबटुलेर दिन्छु । लोग्नेले मायाल स्वरले भनेका कुराले छिट्टै प्रभावितभइहाल्छ र ती गहना समातेर नबोले पनि टाउको हल्लाई लगाउँछु भन्नेसङ्केत दिन्छे । उसका मन्जुरीले दिलबहादुर ज्यादै खुसी हुन्छ र ढाडसदिदै संझाउँदै भन्छ, &amp;quot;कुनै वेला हाम्रो पनि राम्रो दिन आउला, अनिसक्कली गहना लगाउलिस्‌ । त्यतिन्‌जेललाई यस नक्कली समाजलाईनक्कली नै गहना लगाएर देखाइदे । म तँलाई तेरै इच्छा अनुसार गानागाउन पठाइदिन्छु । दया मैयासंग भौलि नै कुरा गरी हाल ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
राधा दिलबहादुरले त्यति भनेपछि आफूलाई समाल्न सक्तिन रबिस्तारै दिलबहादुरको नाजकै गएर ट्सक्क बस्छे । दिलबहादुरले उसलाईअड्रालामा लिएर निकै वेरसम्म संझाइरहन्छ । चित्त बुझे पनि नबुझे पनिराधा दिलबहाद्रका कुरामा फैरि पत्याएर आफूलाई सुम्पिनुभन्दा अर्कोकुनै उपाय पाउँदिन । क उज्यालो भविष्यको आशा गर्दै दिलैको सबैआश्वासनमा फेरि विश्वास गर्दै संझौता गर्दै जान्छे ।&lt;br /&gt;
नै&lt;br /&gt;
३६&lt;br /&gt;
शिव खड्काको आज पेसीको दिन छ । क अड्डा जानेतयारीमा छ । गौरीले यसपटक पनि लिएर घरमा बसेकी छै, हरेकपेसीका .दिन क घरैमा शिवलाई पी बस्छे किनाक उसलाई शिवकोस्वभाव राम्री थाहा छ; मृद्दा हारियो भने के गर्ने भन्ने कुराकोचिन्ताभन्दा बढी, उसले हार्नु पत्यो भने के गर्ने हो भन्ने सोचेर त्राहि ।त्राहि भई फैसला सुन्न पर्खिरहेकी हुन्छे ।&lt;br /&gt;
मोजा लगाउँदैको शिव मनमनै गनगुनाइरहन्छ । सोच्छ, आजमेरो जित भयो भने पहिले म त्यही मलाई फुस्काउने हाकिमकहाँ जान्छुर हारेँ भने ..... ? ती हराउनेहरूको योग्यता जाँच्न थाल्छु । कुनपानीका तहमा रहेर न्याय दिलाउँदा रहेछन्‌ भन्ने पत्ता लगाई न्यायकोपरिचय कि आफू लिन्छु कि तिनीहरूलाई बताइदिन्छु । यसका लागिजनसकै, जस्तोसकै बाटो समात्नु परे पनि म छोडदिनँ । मलाई बदमासअहिलेकाले भने पनि आउने पुस्ताले वाहा पाएर भन्नेछन्‌ &amp;quot;त्यसबेला पनिबोल्ने जिउँदो मान्छे रहेछ ।” देश मसान नभई जिउँदो नागरिकलेभरिएको बस्ती पो रहेछ । खान, लगाउन र बस्नका जरुरत पुरागरिसकेपछि पनि व्यक्तिलाई समुह जीवन यापन गर्न अर्को जरुरतन्यायको पर्दो रहेछ । उसलै इमान दिएर इज्जत खोजिरहेको हुँदोरहेछ ।&lt;br /&gt;
संझन्छ, त्यो दिन जब उसले निष्कासनको सूचना पढेर चिठीबुझेको थियो र हाकिमका कक्षमा सरासर पुगेर त्यसको अर्थ सोद्धाजवाफ पाएको थियो, &amp;quot;के गर्ने हामीले तपाईलाई बचाउन यति गरेनौं,यहि भनेनौं तर हाम्रो क्रा सुने पौ ! आखिर निर्णय अनुसार गर्नैपम्यो । हामीले तपाईंलाई त्यस वेला पनि नसंझाएका होइनौं । मान्तुन भिएन । उल्टै हाम्रो विरोध गर्दै हिडन थाल्नुभयो । हामी नोकरी गर्नेलै&lt;br /&gt;
३७&lt;br /&gt;
कन सरकार हुँदा के भन्न सक्छौँ : लगाए अह्याएको खुरक्क गर्नै पर्दोरहेछन्‌ । देशको कानुन, प्रशासनिक नियम सबैमा उनैको बौल भएकोबेला हामीले भनेर के हुन्छ : जति म्या... म्या... गरे पनि बोकाकोजन्म लिएपछि दीर्घाय हुन पाइन्छ र ः &amp;quot;&lt;br /&gt;
शिव खडकाले पनि पतिकार गर्दै यसरी भनेको थियो, &amp;quot;दैनिकगीता पाठ गर्ने तपाईको यो सोचाइ &#039; धर्मको लडाईँ गर्न उक्साउनेगन्थको पाठ गर्नाको नतिजा यस्तो निस्केको देखेर मलाई तपाईंहरूप्रतिखेद लाग्दै छ । के ज्ञान प्राप्तिका लागि, के मोक्षका लागि पाठ गर्नुहुन्छजब त्यसले बताएका चालमा चल्न सक्नुहुन्न भने : मेरो तपाईसँगकाप्रश्नको मतलव तपाईको सफाइ सुन्ने होइन । मेरो खोज मेरोनिष्कासनको आधार र भुल केहो ? तपाईले के गर्नु भयो, के भन्नु भयो,त्यो त यस नतिजाले नै देखाइसकेको छ ।&lt;br /&gt;
केही समयसम्म दुवै चुप लागेपछि शिव खड्का त्यहाँबाट फर्केरघरतर्फ लागेको थियो । घरमा पुगेर आफूलाई नियन्त्रणमा ल्याउन तवलाबजाएको र त्यसलाई घचेड्दा फुटेको सम्झेर हाँस्छ । त्यस्तै गरीसम्झन्छ, त्यस बैलकी क कोठाभित्र पस्ता छोराछोरी सबै जम्मा भएरबसेका थिए र गौरीले भन्दै थिई, “नोकरी पेशा नै यस्तो हो हुँदा पनिचैन दिँदैन र सक गा पनि आनन्द हुँदैन । तेरो बाब जस्तो समयलाई सधैँयमै खेरफाल्त हन भन्नेले अब के गर्छन्‌ कन्नि&lt;br /&gt;
शिवले त्यसै प्रश्नलाई टिपेर भनेको थियो, के क्रा गरछर्यौ तिमी२? चैन लिन आनन्द भोग्न भनेर पनि त नोकरी गरेको होइन नि ?सुन, प्रत्येक पेशामा उस्तै चिन्ता र छटपटी हुन्छ र यही बेचैनीलेउन्तति पनि गराउँछ । त्यसमा हुनुपर्ने दुई कुरा छन्‌, न्याय र इमानदारी। तेरा बाबुले यस पेशामा रहँदा इमानदारी दियो तर पाउनु पर्ने न्यायभने पाएन । त्यसैले म न्यायको धुक/धुकी अझै कतै लुकेको छ किभनेर खोज्ने प्रयास गर्छु । मलाई विश्वास छ, सत्य हराउँदैन रतिमीहरूमाधि पनि मलाई आशा छ, यस लडाइँमा साथ दिनेछौं । मबहकिएँ भने पनि समाल्नै काम तिमीहरूले गर्नुपर्छ । हाम्रो निर्दिष्ट लक्ष्ययही हो । यसलाई नबिर्सिएर परिवारको धर्म प्रा गरेँ । नोकरी गयोभनेर मलाई पीर लागेको छैन, लागेको छ भने न्याय कता गयो भन्नेमाछ । समाजभित्र रहेर बाँच्नलाई चाहिनै बन्धन नै यही न्याय हो । यसैलेअधिकारको सुरक्षा गरेको हुन्छ र कर्तव्य जन्माएको हुन्छ । यी तीनैन्याय, अधिकार र कर्तव्य हुन्‌ जसले हामीलाई पशृजगत्‌बाट छुट्याएरबेग्लै प्राणी सबैभन्दा श्रेष्ठ जीव बनाएको छ एउटा समाजको सिर्जनागरर ।&lt;br /&gt;
उद&lt;br /&gt;
बाबको मनस्थिति र उसको जीवनको परिभाषा बुझेका तीछोराछोरीले पनि &amp;quot;आफूले उसलाई सहयोग गर्नेछौँ, तपाईं निश्चिन्तहुनोस्‌&amp;quot; भनेको संफन्छ ।&lt;br /&gt;
यी सफनाले शिवलाई सन्तानमाथि गर्व गराउँछ र संझनाजगत्‌बाट जाग्रत्‌ भई फटाफट तयार हुँदै टेम्पो बिसौनीतर्फ लाग्छ ।त्यसबेला नौ बजिसकेको थियो ।&lt;br /&gt;
विक्रम टेम्पोको ट्यार्‌ ट्यार्‌ आवाज र त्यसले पछाडिबाटफूँयाकेको धुवाँ यति पिरो थियो, क नाक रगड्दै मन्त्रीसंग भेट गर्नजाँदा भएको वार्ता संझन्छ ।&lt;br /&gt;
धेरै व्यक्तिहरू मन्त्रीसंग भेट गर्न बाहिर क्रिरहेका थिए । त्यसधेरै माझ पनि उसको अनुहार देखेपछि मन्त्रीज्यूले पहिले उसलाई नैबोलाएर भित्री कोठामा लगैर त्यहाँ आउनाको कारण सोधेका थिए ।शिवले बाटाभरि मन्त्रीज्यूसंग भेटेर उसलाई निष्कासन गराउनाको कारणके हो भनेर यसरी सोध्छु भनी गुथेका कुराहरू सबै मन्त्रीज्यको शिष्टभाषा र सौहार्दपूर्ण व्यवहारले गर्दा कताकर्ता पुच्याइदिएकाले यति मात्रसोध्न सकेको थियो, “तपाईलाई धन्यवाद दिन आएको प्रजातन्त्रकोपनःस्थापनापछिको पहिलो फल हामीलाई नै चखाउनु भएकाले गर्वलाग्यो । हो, काम सिद्धिएपछि ती रित्ता ट्वाकहरूलाई यसरी नै पन्छाउनपर्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
मन्त्रीज्यले छक्कै परेर भन्नुभएको थियो, “के तिनीहरूले तपाईलाईपनि पारेछन्‌ &#039; कति वर्षको नोकरी भएको धियो : ३० वर्ष पुगेकोअवश्य थिएन होला ? यहाँ यस्तै भइरहेछ । एउटा कुरा भन्यो, अर्घकोअनर्थ लगाइदिन्छन्‌ । आ।आफूनो मतलव जताबाट पनि प॒न्याइहाल्छन्‌ रहामीलाई बदनाम गराउँछन्‌ । जब काम फत्ते भइसक्छ अनि मात्रहामीलाई थाहा हुन्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;मेरो मात्र क्रा नगर्नोस्‌ न तपाईं पनि ? जहाँ जाक आफ्नैसफाइ मात्र लिन आएको संभझन्छन्‌, नोकरीबाट झिक्न कुनै आधारचाहिन्छ र ३० वर्षको कुरा गर्नुहुन्छ ! ६७ वर्ष मात्र नोकरी गरेकापनि के निष्कासित भएका छैनन्‌ र ? फेरि यो तीस वर्षको नोकरीकोअवधि तोकेर के फाइदा हुन्छ भन्ने सोच्नु भएको छ ? यसले यतापूर्वाग्रह राखेको हो कि भन्ने झल्केको छ भने उता अनुभवी दक्षप्रशासकहरूको कमी भएको छ । जागिरदारहरूले न्याय पाएका यही होत ! मलाई निकाल्नाको के आधार हो, त्यो मलाई भन्न सक्नुहुन्छ !सक्नुहुन्न भने यसलाई पनि दमन नीति नै भन्नुपर्छ । संझनोस्‌ २०४६प्तालमा हामी जागिरदारहरूले पनि साथ नदिएको भए, के हुन्थ्यो&lt;br /&gt;
३९&lt;br /&gt;
मन्त्रीज्युले पनि अनजिलो मान्दै भनेका थिए ।“हामीले ३० वर्षकोअवधि तोकेको कुनै पूर्वागह राखेर होइन । यो पञ्चायत कालकोशासनजबधिसँग प्रसङ्ग मिल्न गएको मात्र हौ । हाम्रो कुनै उद्देश्य यसमाछैन । अलि रोषका साथमा भनेका थिए, “हेर्नोस्‌ हामीले मात्र के गर्ने ?एउटा . क्रा भन्यो अर्को, गरिदिने त छँदैछ । त्यसमाथि के कस्तो हुँदै छ,त्यो समेत भन्दैनन्‌ । अरू त के तपाईलाई निष्कासन गरेको कुरा समेतभनेका छैनन्‌. । को इमान्दार छ, को छैन भन्ने छुट्याउन सक्ने क्षमतायिनीहरूमा नभएकाले त हामीलेमाथिदेखिनै पजनी गर्नुपरेको हो ।&lt;br /&gt;
हुनु नपर्ने जे थियो, त्यो, भइहालेछ । अब केही दिन पर्खनोस्‌कुनै संस्थानमा जनरल म्यानेजर नै बनाइ दिउँला । यता तपाईले नालिसदिनोस्‌ । आफनो अधिकार यसै छोडन हुँदैन । प्रशासकहरूले मौका पाएभने हामीलाई झुक्याउन खोज्छन्‌ । त्यसै बेला भनेका थिए । हामीप्रशासनद्वारा नै बदला लिन्छौं । जागीरदारहरू : पनि थरी थरीका छन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
मन्त्रीका यस्ता कुरा सुनेपछि मनमा लागेको थियो, उसलाई- निष्कासित गर्ने मन्त्रीचाहँ नहुन सक्छ । त्यसो भए को हो त : हाकिमभन्छामाथिको आदेश भनेर माविको भनाइ यस्तो: छ : के यी सबै दोषलिनबाट उम्कन खोजी रहेकात छैन ? यस्तालाई यसै छोडन हुँदैन भनेरशिवले भझोक्किएर भनेको थियो, “जसलाई निकाल भन्नुभएको भए पनित्यो जागिरदारप्रति गरेको अपमान नै हो । भ्रष्टाचारीलाई राख्नु पनिहुँदैन र निर्दोषलाई पनि हुँदैन । त्यसैले दोषको किटान गरेरमात्र निष्कासन गर्न । प्रशासनमा सुधार ल्याउनलाई यसो गरेकोभन्नुहुन्छ भने नियम कानुन, नीति, उद्देश्यलाई समयसापेक्ष बनाउदै लैजानुजरूरी हुन्छ ।&lt;br /&gt;
ती जागिरदारहरू हिजो त्यो व्यवस्था हुँदा पनि त्यसै मुताबिकचले कै थिए र आज यौ व्यवस्था आउदा पनि सुहाउँदो छपले चलिनैहाल्छन्‌ । त्यस्ता नियमकानुनका पालकलाई चलाएर के उपलब्धि पाउनेआशा लितुहुन्छ ! बरु अनुभवीहरूको खाँचो पर्नगई प्रशासनमा सुस्तीअरू बढ्नसक्छ । : प्रशापन चलाउनुलाई , सजिलो नठान्नोस्‌ र यसलाईमहत्वहीन पनि नढान्नोस्‌ ।”&lt;br /&gt;
“आफना - तरिकाले काम चलाउने, आफूले विश्वास गर्नसक्नेब्यक्ति पनि, त ठाँउठाउँमा हुनपर्छ । जुन कुरामा पनि नियमै मात्रतेर्स्याइराख्ने प्राना शैलीमा हिंडनेलाई . राखेर पनि त काम राम्रो रछिटोसँग हुन सक्तैन । उनीहरू सक्षम र अनुभवी छन्‌ भने अहिलेहातमा पैसा परेका बेला नयाँ व्यवसायतर्फ पनि लाग्न सक्छन्‌ । हाम्रोआर्थिक नीति खुला बजारको स्थापनातर्फ छ जसअनुसार धेरै व्यवसाय&lt;br /&gt;
0&lt;br /&gt;
खुल्त सक्छन्‌ । बेरोजगारी हट्छ. र साथसाथै प्रतिपर्धा बढ्नाले देशमागुणात्मक प्रगति आउन -सक्छ । यसलाई नकारात्मक दृष्टिले हेर्नु हुँदैन ।&amp;quot;यति भनेर मन्त्रीज्यु टकटकिएका थिए ।&lt;br /&gt;
&amp;quot;ए, यस्तो घुमाउरो बाटोबाट विकास ल्याउने लक्ष्य राख्नु भएकोछ भने त्यसलाई छिटै &#039; बदल्नेतर्फ लाग्नुहोला, नत्र हामीले ल्याएको२०४६ सालका उपलब्धिलाई बाथको रोगले डल्ल्याइदैला । तपाईंहरूलाईनियम तेर्स्याउने पनि मन पर्दैन र नियम तीड्ने पनि । तपाईहरू -केचाहनु हुन्छ, त्यो आफैँलाई थाहा छैन । मलाई फेरि यस्तो नोकरी गर्नुछैन केको जनरल म्यानेजर हुने !”&lt;br /&gt;
शिवलाई यस संझनाले हाँसो उठाउँछ । विद्यार्थी युनियनकोझण्डा उठाएर उससंगसँगै पढ्ने त्यो साथी आज मन्त्रीज्युका हुँदादेखिएका फरकलाई केलाउँदै मनै संगभन्छ, “यसले राजनीतिका क्षेत्रमासमर्पित भएर पाएको उपलब्धि के यसरी बोल्न जान्ने मात्र हो ? लामोसमयसम्म राजनीतिमा निष्किय भएर रहन पर्दा उसले के सबै बिर्सिसकेछ? राजनीतिको पनि आफनै तरिकाको नैतिकता -र निष्ठा हुन्छ । कहाँगए ती सबै ? यसरी मनमा कुरा खेलाउँदाछेलाउँदै कति बजिसक्योबिसंन्छ र एउटा टेम्पोमा तछाड मछाड गर्दै पस्छ । भित्र पसेपछि थाहाहुन्छु, त्यसरी लडाईँ गर्नै नपर्ने थियो, एउटा सिट अझै खाली नै छ ।हामीमा आएको हुलदङ्गा गर्ने प्रवतिलाई संझेर क आफै विषादित हुन्छ ।&lt;br /&gt;
टेम्पो आफना गतिमा गुड्दै, थियो, एउटा यात्रीले हात उठाएररोक्ने सङ्केत गर्छ । ड्राइभरले गृड्दागददैका टेम्पोलाई ध्याच्च अडाउँछ |सहयात्रीहरू आपसमा ठोकिन्छन्‌ र कराउँछन्‌ &amp;quot;ऐया! झण्डै मारेको ! केगरेको यस्तो जथाभावीसँग ब्रेक, लगाउनु हुन्छ ? कसो पल्टैन !”&lt;br /&gt;
चढ्न पाउने यात्री शान्त छ । क टेम्पोभित्र फैलिएर बसेकायात्रीहरूलाई अगाडिसरेर पछाडिको सिट खाली पार्न भन्छ । टैम्पोड्राइभरले कराउने ती यात्रीलाई रुख्खा जवाफ दिदै भन्छ, &amp;quot;दौड्दैकोटेम्पोलाई रोक्नुपर्दा कस्तो हुन्छ भन्ने थाहा छैन कि कसो : चोट लाग्छकि भन्ने .डर लागे राम्ररी समातेर बस्नुपर्छ ।&amp;quot; यस्तो जवाफ दिदै स्टार्टरतान्छ र फेरि गति बढाउँछ ।&lt;br /&gt;
अहो! यहाँ कसैले कसैलाई पनि भूल गप्यौ भन्न नहुने भएको छ॥ उल्टो जवाफ सुनेर पनि लौ तेरो मिजासले पाएको सजाय भनेर. सबैलेमिलेर केही गर्न सक्तैनौं र उसैमाथि समर्पित भएर आफनो जरुरतपुन्याउन्‌ परेको छ । सेवाका व्यवसायमा काम गर्ने यिनीहरूको तव्यबहार यस्तो छ भने अरूमा के होला ? प्रजातन्त्रको अर्थ यिनलेलगाउन थालेका उन्‌ ।जे मन लाग्यो बोल्ने, जहाँ मन लाग्यो जाने, जे&lt;br /&gt;
गर्नलाई पनि छुट खोज्ने, आफनो मात्र हकहितको दाबी गर्ने र&amp;quot; आफनोतर्फको कर्तव्य भने विर्सने : कसले संफाउने ? को निस्कनसक्थ्यो यिनीहरूलाई संभाउन जब घेरै जसोको धारणा यस्तैतर्फ बढ्दैछ । अनुशासन बेगर कुन देशमा प्रजातन्त्र फस्टाएको छ । प्रजातन्त्रमाआत्मपरख आत्मअनुशासन हनुपर्नेमा यौ स्थिति देखा पर्दैछ &#039; यस्तोसोचिरहेका शिवका आँखा झबाटट फोहोरमैला थपारेका रासमा पर्छ ।प्लाष्टिकका यैला, खाना झिकेर फयाकेका टिनका टठवाक्रा, कहिएरमिल्किएका फलफूल, पराल, शिशी थपै के/के र त्यसमाथि मिल्किएकामरेका क्क्र, तिनलाई पन्छाउँदै खोतली जिउने साधन जम्मा पार्ठैगरेकाकेही केटाकेटीहरू : त्यो देखेर क मनमनै अरू कँडिन्छ र सोच्छ, यसदेशका भविष्यका तारा हामै देशका नागरिक यसरी हर्कदै छन्‌ । केहोलान्‌ यिनीहरू : यिनको संस्कार कस्तो बन्ला ? यसतर्फ ध्यातहामीहरूले किन दिनसकेका छैनौं : फेरि आफनै मनले भन्छ, &amp;quot;हाम्रोसोचाइको क्षेत्र त यही फोहोरमैलाको थुप्रो सडकमा फँयाकिएकाले नैबताइरहेछ्‌ भने यहाँ अरू संयक्त सोचाइको भावना कहिले जागरणहुने : हामीले जान्न थालेका छौं विभिन्न आधुनिक सामानका प्रयोगगर्नलाई, घररभित्रका फोहोर सडकमा ल्याएर फयाँम्नलाई तर फोहोरलाईत्यहाँबाट हटाउन पर्छ, सडक हामी सबैको साझा हो भन्ने अर्थ भनेजानेका छैनौ । घर ठूलठूला बनाउछौँ र त्यहाँबाट बग्ने पानी सडकमाल्याएर प्रत्येक सडकका किनारमा बनेका घरका पर्खालमा फयाँग्न हन्छ१ त्यसमा आँखा सबै निकायका परेकै छन्‌ होला तर उनीहरू त्यो बन्दगराउन सक्तैनन्‌, किनकि घर ठूलो छ । अवश्य त्यहाँ बस्नेहरू पनिठूला व्यक्तिनै होलान्‌ । जताततै थिचोमिचो छदैछ ।&lt;br /&gt;
सार्वजनिक भावनाको खाँचो जबसम्म प्रा हुँदैन र नागरिकसहभागिताको जरूरतको ज्ञान जबसम्म हामी सबै नागरिकमा आउँदैनयस्ता असामाजिक क्रिया अरू बढ्दै जाने छन्‌ । यसमा ज्ञान फैलाउनेदायित्व लिएर को अगुवा हुने : अफसोच त यसमा छ । यही स्थितिकतिसम्म लम्बिने हो&lt;br /&gt;
शिव खँड्का ठिक यसै बेला आफनो पुरानो साथीमोटरसाइकलमा गएको देख्छ । उसले हात हल्लाएर आफूलाई चिनाउँछभने त्यो साथीले हाँसेर भेटको अभिवादन गर्छ ।&lt;br /&gt;
यो अर्को उसको दु:खसुख सादने साथी थियो । दुबै एउटैअफिसमा एउटै पदमा, एउटै विभागमा काम गर्व । शन्त शर्मा शिवकादाँजामा घेरै शान्त प्रकृतिको थियो । उसको काम शिवलाई संझाई।बझाईगर्नु मात्र नभई अब के गर्नपर्छ भनेर सल्लाह दिने पनि हुन्थ्यो । दुवैको&lt;br /&gt;
र्‌&lt;br /&gt;
राय धेरैजसो मिल्थ्यो पनि केवल त्यसलाई कार्यान्वित गर्ने पद्धतिमा फरकहुन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
मन्त्रीज्यसंग भेट गरेको दिन शिव यिनै शन्त शर्माकहाँ गएकोथियो । हाकिमको भनाइ र मन्त्रीज्यको भनाइ कुनै कतै पनि नमिलेकोपाएर जङ्गिदै भनेको थियो, “कसले किन निकाल्यो त मलाई : सत्य कुरालुकाएर व्यर्थै मलाई किन छटपटी पार्छन्‌ ! म भौंतारिएको भतारिएकै&lt;br /&gt;
शन्त शमांले शिवलाई शान्त पार्न भनेको थियो, &amp;quot;कस्तोनबर्भको तिमीले ? यस्ता बेलामा बोल्ने भाषा यस्तै त हुन्छ । यतातिमीलाई त्यसरी अर्थ्याए, उता हामीलाई तिम्रै उपमा दिएर घम्क्याए ।निकाल्ने पक्कै यिनैमध्ये छन्‌ । यसलाई छोडन भने हुँदैन । उजुरी दिनैपर्छु । तिमीलाई अब केको डर : नोकरी जान्छ कि भन्ने छैन, बरुफर्कन्छ कि भन्ने आशा त छ !&amp;quot;&lt;br /&gt;
“आशा” भनेको सुनेर उसले हाँसतै भनेको थियो “ठिक भन्यौतिमीले । हामीलाई हौसला दिने पनि त यही आशा हो, होइन र शन्तै? आन्दोलनमा पिटाइ खाएको यहाँनिर अझैँ वेलाबेलामा चस्किदै छ ।त्यति बेला पनि म आशै लिएर सञ्चालित भएको थिएँ । हाकिमहुनेहरूर अहिले मन्त्री बनेकाहरूले नै उक्साउँदै भन्थे, &amp;quot;तपाईंहरू जस्ताजोशिलाहरूले नै अगाडि सर्नपछौ । तपाईंहरूलाई समर्थन गर्ने हामी छौं ।निर्धक्क हुनोस्‌ अहिले यी नोकरीको झन्झटबाट नै मुक्त पारी दिए ।कस्तो सहयोग गरे !”&lt;br /&gt;
“बल्ल तिमी लाइनमा आउन थाल्यौ । अरूलाई खाने बाघलेमलाई पनि खान्छ भन्ने सोचेर पनि निष्कासन गरेको हुनुपर्छ । नत्रतिम्रो ल्याकत, तिम्रो लगनशीलता, संस्थामाथि रहेको तिम्रो माया, तिम्रोइमानको नतिजा यो हुनुपर्दैनथ्यो । तिमीबारे थाहा नभएको कसलाईथियो र ? त्यो पनि आफूले चाहेर ल्याएका सरकारका शासनमा ?चित्रकारले प्रयोग गरी फयाँकिएको कुची पो तिमीलाई बनाइ दिए ?त्यसैले देखाइदेक तिम्रो अस्तित्व अझैँ बाँकी छ भनेर ।” शन्त शर्माकायस सल्लाहले पनि क घेरै प्रभावित भएर मृद्दा हालेको थियो । :&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
0 ।&lt;br /&gt;
बिहानीपख मधुरो स्वरमा झ्याउरे लयमा गाएको गाना सुन्दाअति मीठो लाग्छ । एउटी उमेर पुगेकी चेलीका बिलौनाले भरिएकात्यस गानालाई राधाले आफूनो सुरिलो कण्ठबाट लय मिलाएर गाउँदा रत्यस गीतको भावना र राधाका स्वरले साधना र दया. दुवैका मनलाईप्रभावित पार्छ । त्यो मधरो गीतको रसपान गर्दा उनीहरूलाई त्यस शान्तवातावरणलाई आफू. उठेर खल्वलाउन मनलाग्दैन । बिहानको उठ्ने समयबित्तै जान्छ । -&lt;br /&gt;
भान्छाबाट आमाले अझै ती उठेका छैनन्‌ भन्दा पो झस्केर उदतैसाधना भन्छे “कति मीठो झयाउरे गाना गाएकी राधाले : साँच्चै यस्कोस्वर त अति मीठो छ ?”&lt;br /&gt;
बहिनीले गरेको राधाका स्वरको टिप्पणीलाई औंल्याउँदै दयालेथप्छ, “झ्याउरे लय नै यस्तै हुन्छ । मनलाई कस्तो कस्तो पारी हाल्छ ।अझ यसमा सारङ्गी बज्यो भने त रुवाएर नै छोड्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“किन हाम्रा बाजा, गानाको लय सबै रुवाउने मात्र हने, दिदी ःके हामीले खुशी मनाउनै जानेका छैनौ । सारडी हेप्यो त्यस्तै, सनाईकोत के क्रा गर्ने स्वाउन नै बजाउँछन्‌ । मादल र तबला नहुँदा हुन्‌ त&#039;गानाको जगत्‌मा के हुन्थ्यो होला ?”&lt;br /&gt;
“यसमा धेरै विकास हुन नसकेको कारण अर्कै छ । उहिले गानागाउने, गानाबाट रमाइलो लिने व्यक्ति निकै कम हुन्थे । कि हुन्थे ठूलाबढा शौखिनहरू कि गाना गाउँदै माग्ने गाइनेहरू । यिनीहरू यस्तै सवाइकहँदै गाना गाउँदै कसैका दिलमा चोट पुन्याएर रुबाएर या कसैलाईखिज्याएर रमाउने गराएर पैसा माग्ने गर्चे । हामी जस्ता मभझौलावर्गलेगाना सुनैर रमाउनै जानेका थिएनौं भने पनि हुन्छ । २००७ सालपछिजब रेडियो नेपाल खुल्यो, त्यसपछि गाना बजानाहरूमा प्रगति देखा पन्यौर हामीजस्ताले पनि गानाको रसपान गर्न थाल्ने भयौं । अंब त के&lt;br /&gt;
101&lt;br /&gt;
टेलिभिजन आएपछि गाना मात्र कहाँ हो र नाटक र अरू ज्ञानवर्द्धकखबरहरू पति सुन्न पाइने भइसकेको छ । नत्र पुरा बिश्व एकातिर,नेपाल छुट्टै अर्कातिर जस्तो हुन्थ्यो । सबै बिकास सबै देशहरू एकादेशकाकवासरह थिए । साधनाले दयालाई क टेलिभिजनमा काम गर्ने भएकीलेजिस्म्याउँदै भन्छे, “भन्नोस्‌ न, टेलिभिजन आएपछि&#039; देखेर सुनेर छोटोसमयमा नै रमाइलो वातावरणमा रही दिमागलाई सोच्ने कष्टै नपर्ने गरीनिरक्षरहरूले पनि धेरै कुरा . जान्नसक्ने भएका छन्‌ र साहित्यकारलाईकिताब छपाउने समस्या नै नपर्ने भएको छ ।” न&lt;br /&gt;
“तिमी जस्ती पढेलेखेकीले पनि यसरी टेलिभिजनका बारेमा भन्नमिल्छ ! फेरि निरक्षरहरूले यसरी सिक्नपाउनु के नराम्रो हो र ! हो,शिक्षितवर्गले किताब पढेरभन्दा बढी यस्तै टेलिभिजनका कार्यक्रम हेरेरबिताउन थालेका समय बचाउनलाई हो या अरू कुनै अर्थले हो त्यो भनेसोचनीय छ तैपनि यो दोष टेलिभिजनलाई लगाएर साहित्य साघकहरूलाईनिरुत्साही बनाईदिएको छ भन्तचाहिँ मिल्दैन । याद गर, ती देशहरूमाजहाँ गाउँगाउँमा टेलिभिजन प्रसारण पुगेको छ, त्यहाँ पनि साहित्य क्षेत्रमात्यतिकै प्रगति भएको पाइन्छ । समयकै कुरा गर्छर्यी भने उनीहरूलेजस्तोगरी लामो समयको उपभोग हामीले कहाँ गर्त सकेका छौं र ?अझैँ पैतृक सम्पत्तिमा मोजमस्ती गरेर बसिरहेकाहरू र काम गर्न नतम्मीदिउसो पनि सुतिरहनेहरूको संख्या हामी कहाँ छँदैछ । यसरी समयबिताइरहेकाहरूलाई के भन्छयौ ?&lt;br /&gt;
दोष टैलिभिजनद्वारा कार्यक्रम प्रसारण गर्नेको छैन । छ भनेआफूनो रुचि छानेर मात्र हेर्ने नगर्नेहरूको छ । टेलिभिजनले त सबैस्तरका, सबै क्षेत्रका व्यक्तिहरूका लागि कार्यक्रम दिनुपर्छ । यो राष्ट्रियकार्यक्रम हो ।&lt;br /&gt;
“ए दिदी, तपाईंको जवाफ दिने कला त बोलिनसक्नुको छ ।आफना व्यवसायमा धक्का पुन्याएको सोच्नभयो कि कसो ? ”&lt;br /&gt;
“मेरा कार्यक्रमकाबारे कुरा गर्नै पर्दैन मैले. सुनाउने खबर हो ।त्यो सुन्ने सबैको इच्छा भइहाल्छ । मेरो व्यवसायमा तिम्रो भनाइले कुनैअसर पार्दैन ।”&lt;br /&gt;
यसरी दुबैबीच वार्ता चाल्दाचल्दै राधाले चिया ल्याइपुग्याउँछै रदुवैलाई एक एक ग्लास हातमा धमाइदिन्छे । साधनाले चिया खाँदै राधालेबिहान गाएका गानाको तारिफ गर्छे । राधा पनि ढङ्ग पर्छे आफूलेपहाडमा गाउने गरेको बताउँछै र सोध्छे, “मैयाँहरूलाई यो गाना सुनेररू रू लाग्यो कि लागेन ? यो गाना हाम्रा घरतिर सबैजसो छोरीहरूलेगाउने गर्छन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
01&lt;br /&gt;
“के त्यहाँ छोरीहरूको जिन्दगी त्यस्तै हुन्छु कि गानामा बढाईचढाई लेखिदिएका हुँन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;के बढी भनेको छ र त्यस गानामा :&#039; यसभन्दा पनि दुःखीहुन्छु गाउँका चेलीबेटीको जिन्दगी । यो त शहरकाले गाउँकाछोरीहरूलाई संझेर मात्र लेखेका हुन्‌ । यो गाना हाम्रा गाउँमा ल्याएरसुनाउँदा नरुने कोही पनि भएनन्‌ । आज मलाई त्यही गानाको यादआयो र गाउँदै घर कसिङ्गर गरेकी । सानामा पढ्लेख गर्न पाएकी भएर तपाईंका कान्छा दाइले पनि पढाइ प्रा गर्न पाएको भए हाम्रो योगतिकेही गरे पनि हुँदैनथ्यो । उनले धन नभएर पढ्न पाएनन्‌ मैले छोरीभएर जन्मिनाले पाइनँ ।&lt;br /&gt;
हजुरहरूले पत्याउनु हुन्छ, या हुन्न गाउँमा मेरा दुइटै दाजुहरूएउटा हेडमास्टर छन्‌ त अर्का मास्टर । मेरा बाबुको खेतबारी यति छ,आट हल त गोरु नै पालेका छन्‌ । घर पनि पक्की ईँटको ठूलोफराकिलो छ । २० जना हामी छोरा बुहारी छोरी, नातिनातिना गरेरछौँ । छोरीमा जेठी म नै हुँ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
राधाको कुरा नटुङ्ददै दयालाई राधामाथि दया उठ्छ र सोध्छे,“अनि तिमीलाई कान्छा दाइसंग कसरी बिबाह गराइदिए तबनपाखा जाँदा प्रीती बसेको त होइन ?”&lt;br /&gt;
भ्होइन, मैयाँ होइन । मेरो त पीती बसेको थिएन तपाईंकाकान्छा दाइको भने मैसँग मात्र बिवाह गर्छु भन्ने जिह्टी थियो । मेराबाबुले यस्तो गाउँडुलुवालाई पनि छोरी दिन्छु भनेर जङ्गेर कुरा ल्याउनेमान्छेलाई पठाएपछि त उहाँ चित्त दुखाएर गाउँनै छोडेर कमाइगर्न यहाँआउनुभएको हो । आफना बाबुले लगाएको क्रण निख्ननेर देखाएपछिपराइघर पठाउनै पर्ने छोरीलाई शहरमा नोकरी गर्न थालिसकेकोलाई छोरी. दिएपछि दुःख पाउन्त भनेर दिएका हुन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“ए, त्यसो भए कान्छा दाइले के नाकरी गर्छन्‌, कति कमाउँछन्‌भन्ने केही जानकारी नराखेर नै छोरी दिए ः&amp;quot;&lt;br /&gt;
“क्के थाहा पाउतु यहाँ ढोके पालेलाई पनि त्यस्तो उर्दीपोशाकदिदा रहेछन्‌ भन्नै ? त्यही पौशाक लगाएर डटेर गाउँमा पस्ता, खर्चपनि नडराई गर्न थालेपछि बाबाले माने होलान्‌ उहाँले राम्रै नोकरी गर्नथाल्नुभएको छ गाउँघरमा अझै बढेका छोरी घरमा भएपछि निद्रा नैपर्दैन भन्छन्‌ । तपाईंहरू गाउँका छोरी भएको भए कममा पनि तीननानीकी आमा भइसक्नुहुन्थ्यो ।”&lt;br /&gt;
पक&lt;br /&gt;
साधना र दया राधाको करा सुनेर खुबै हाँस्छन्‌ र सोध्छन्‌,“अनि तिम्रा दाइहरू त पढेलेखेका रहेछन्‌ । उनीहरूले त यमौ बझनु पर्नैनि?”&lt;br /&gt;
&amp;quot;के गर्थे उनीहरूले पनि । बाबसंग भन्दै थिए यत्तिकोलाई बाहिनीदिन नहुने म त देख्तिनँ । केटो आफनै जातको आफनै गाउँको हो ।हाम्री बहिनी भनेर हुरुक्कै भएको छ । आहिले त कमाउन पनिचालिहालेछ । कही गरी पछि दृखै पाई भने यत्रो खेतवारी हामो छँदै छलौ कमाएर खाओ भनेर दिउँला । एउटा छोरो भएको खानदानी परिवारपनि त यसै कहाँ पाइन्छ । त्यसका बाबु चुनाव जितेका भए मन्त्रीहुन्थो । हिङनभए पनि हिङबाँधेको टालो त हो ।&lt;br /&gt;
यसरी दाजुहरूले भने पछि लौ त अव तिमीहरू त्यसो भन्छौभने छोरी दिने पक्का गरौं भनिहाले नि । आमाले त भन्दै हनुहुन्थ्योअहिले बालाई उकम्साउछौ, पछि बहिनीले दु:ख पाई भने हेर विचारगर्न पन्छिन पाउदैनौ । हामी डाँडामाधिका घाम कति दिनका हौं रभन्दा त्यसमा पीर नलिनोस्‌ त भनेका छन्‌ । यति भनेर राधा आँखाभरी आस पार्दै दयालाई भन्छे, “मैयाँ, हजुरको पनि बिवाह विदेशमा कामगर्नेसंग हुनलागेको कुरा सुन्छु । आफनै देशको केटा भए पनि त्यहाँ केकस्तो काम गर्दैछ, त्यो राम्री बुझेर मात्र गर्नु होला । विवाह भएपछिकुरा अर्कै हुन्छ । तपाईं जस्ताका लागि हजार केटा यही पनिपाइन्छन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
राधाले देखाएको आत्मीयताको सर्मथन गर्दै दयाले राधाले दिएकोसल्लाह अनुसारै बुझेर मात्र विवाह गरला भन्दा क खुशी हुँदै भन्छे,&amp;quot;यहाँ आएपछि तपाईंहरू दुई दिदीबहिनीलाई देखेर नै मैले आफनो माइतबित्तँकी छु । यसरी नै हामी दिदीबहिनी कुरा गरिरहन्थ्यौँ । तपाईंहरूकोकति माया लागिरहन्छ, सत्ये नहोला !”&lt;br /&gt;
हामीलाई पनि त तिम्रो कस्तो माया लाग्छ । तिमी पढ्छयौ भनेहामी पढाइ दिन्छौं भनेर दयाले भन्दा राधाले केही ढाडस पाएको अनुभवगर्छे र अनुरोध गर्छे टेलिभिजनमा लोकगीत गाउने काम मिलाइदिने ।दयाले नोकरी मिलाउन कति गाह्रो हुन्छ भन्ने तथ्य बताउँदै कुनै बेलामौका परेमा म तिमीलाई काममा लगाउने छु तर तिमीले रियाज गर्नुपर्छर नेपाली अक्षर पढलेख गर्नसक्ने हुनुपछौ भनेर पनि आवश्यकताबताइदिन्छे । राधाले त्यति लामो समयसम्म प्रतीक्षा गर्नसक्ने धैर्य लिनसक्तिन र कुनै उपाण छ भने अहिलेदेखि नै काम शुरु गरेर पैसाकमाउनु परेको आवश्यकता बताउँछ । घरबाट दिलबहादुरका आमाले खर्चपढाउन लेखेको चिष्ठी देखि लिएर आफूले घरबाट दिएका गहना खोटो&lt;br /&gt;
छ&lt;br /&gt;
भए&#039; पनि माइतीले- दिएको ढुङग्री मन्द्री समेत बेच्न पठाएको बताउँदैभन्छे, “तपाईंका कान्छा दाइलाई निकै ठूलो सङ.कट आइपरेको छ । मैलेपनि बुहारी भएर उनलाई परेका आपत्‌मा तिनका छोरालाई साथ दिदै,सहयोग गर्नै पर्छ । छोरामाथिको बाबुआमाको इच्छा यस्तो हुन्छ भनेरहाम्रा गाउँमा भन्ने गर्छन्‌ भनेर सुनाउँछे “यो छोरा बढ्ला, . कमाइ गर्लादृधभात खान देला ।”&lt;br /&gt;
“अनि तिमीले आफनो माइतको चिनो पनि बेच्न पठाएकी कान्छादाइले उसकी आमालाई दृधभांत खुवाओस्‌ भनेर हो त :&lt;br /&gt;
राधा भन्छे , “हो त , बढी आमालाई भोकभोकै राख्नु पनि तभएन । लोग्नेको अँध्यारो. मुख हेर्दै ती गहना मैले झुण्डाएर के हुन्छ !कसलाई देखाउनु परेको छ र यो बिरानो ठाउँमा : कमाउन सकेत्यसभन्दा राम्रो लगाउँला नसके बुच्चै बसला । खुशीले हाँसीखुशी बाच्नुत पच्यो, भनेर दिएँ । मैले ठिक गरिनं त मैयाँ ?”&lt;br /&gt;
राधाका प्रश्नको जवाफ दिनुभन्दा पहिले साधना दयालाईजिस्याउदै भन्छे, &amp;quot;“सनिराख्नोस्‌ दिदी विवाह भएपछि लोग्नेको सहयोगकसरी गर्नुपर्छ । &amp;quot;दयाले लाज मान्दै बहिनीलाई थप्पड लाउन खेज्दैभन्छे, “तँ धेरै नकरा है, दिदीलाई पनि बहिनीले सिकाउँछै ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
यत्तिकैमा गौरीले माथि चोटामा बोलेको सनिनछ । क भनिरहेकीहुन्छे,  “छोरीहरूका कोठामा गएकी त फर्कनै जान्दन यो राध्रासंग पनिम वाक्क भइसके । कुन बेला पकाउने, कुन बेला ख्वाईपिलाई अफिसजाने । एक दिन होइन संघैँ अफिस जाँदा अबेर हुन्छु । कुन दिन मलाईपनि बिदा दिन्छन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“म आएँ भनेर रित्तो ग्लास लिएर राधा भान्सातिर लाग्छे ।साधना पनि आमालाई सघाउन जान्छे ।. दयाले राधाले औल्याएको बिवाहगर्दा लिनुपर्ने सतर्कपष्टि गहिरिएर सोच्न थाल्छे र निष्कर्षमा पुग्छे पनिविवाहका बन्धनलाई क्षणभङ्कुर नबनाउन र विवाहलाई पत्नुताउमा परिणतनगराउन उसले दीपेशबारे जाँचबुझ गर्नै पर्छ । यस विषयलाई लिएरदयाले प्रेरणासंग भेट्ने निश्चय गर्छ । कुरा जतिसुकै अगाडि बढे पनिसौ हेर्दा केटो बेसै प्रकृतिको देखिए पनि उसको पृष्ठभुमि के कस्तो«हैछ र त्यहा अमेरिकामा कै गर्दै छ त्यो जान्नु नितान्त जरूरी छ ।बिदेशमा जागिर खाएकोसंग बिवाह भयो भने त्यहाँ जान पाइन्छ भनेर:मोहित हुनु डलरको कमाइ छ भनेर खुवै राम्रो लोग्ने पाएँ भनेरआफूलाई सुम्पिहाल्दा धोका पनि पाइनसक्छ । अहिले के भएको छ र ?बरमाला लगाइसकेको छैन । चित्त नबुझे छोड्न पनि सकिन्छ ।&lt;br /&gt;
0001&lt;br /&gt;
फेरि अर्का मनले भन्छ, प्रेरणाले पनि न्यर्तिभत्रको क्रा के वाहा&lt;br /&gt;
पाउन सक्ती र : त्यस परिवारसंग कत्तिको सङ गत छ । मैले वावालाईयत्रा चोट परेको बेला यति अगाडि बढिसकेका प्रस्तावलाई खल्बलाई दिएभने उहाँहरूको मतस्थिति कस्तो होला ! त्यसो भए म के गत ,यति तुच्छ कुरा पनि मैले कसरी याद गरिनँ र त्यस राघाले&lt;br /&gt;
संझाइदिनुपन्यो ! धन्यको रहेछ मेरो बाद्धि&lt;br /&gt;
कता कताबाट आँट पनि पलाउँछ र सोच्छै, इन्जिनियर हुँदै हुन&lt;br /&gt;
त्यहाँ पुगे भन्दैमा ज्यामी भएका त छैन होलान्‌ । डलर कमाउने भनेरयसरी आफनो अहम्‌ पनि : त्यागेको त छैन होलान्‌ : जे पर्छ त्यहीसहुँला : आखिर जीवनको एक पक्ष परिस्थितिसग भिडेर जिउनु पनि त&lt;br /&gt;
हो 1: , .&lt;br /&gt;
आँट आए पनि मनले मान्दैन । मनले भन्छ मैले विदेशमा काम&lt;br /&gt;
गर्नेसँग नै विवाह गर्छु भनेर बाचा गरेकी पति छैन । योसंग बिवाहनभए नहोस्‌ केही दिन तनाउ होला, कुरा त्यतिमै टुङ्गी हाल्छ&lt;br /&gt;
जीवनभरको समस्या बोकेर त बस्नु पर्दैन ।साधनाले आएर उसलाई गंभीर मृद्वामा परेकी देखेर भन्छे,&amp;quot;राधाका कुराले तपाईलाई सोचमा डुवाइदियो कि क्या हो : मेरो कुराकस्ता रहेछ व्यक्तिको. स्वभाव, त्यसको संस्कारले बनेको हुन्छ,पढ्नालेख्नाले त्यसलाई परिमार्जित - मात्र पार्ने हो । कति अनपढहरूकोपनि गंहन बिचार हुन्छ, आदर्श हुन्छ, त्यस्तै विद्वान्‌&#039; कहलाइएका पनिकर्म गर्नुपर्दा अनैतिक चाल चल्छन्‌ । राधालाई नै हेर्नोस त्यो पढलेख-नगरैकी भए पनि काम गरेर खान चाहन्छे आफनो आत्मसम्मान राख्न&amp;quot; गहना: बेच्न पठाउँछै । लोग्नेलाई ढाँटेकामा क्षमा दिँदै सहयोग गर्न तत्परहुन्छु, आफ्नै मनले, कसैले. दवाब दिएर होइन । उसले चाहेकी भएत्यसरी: छक्याउने कान्छा दाइलाई छोडेर माइत जान सक्थी तर उसलेत्यसो गरिन किनकि क आफनो भन्ने कोही चाहन्छे । आशा राख्नैपरिश्चम गर्छै, सोच्छै राम्रा दिन उनीहरूको मात्र कसो नआउला ! यदियिनीहरूले साँच्चिकै परिश्रमी हुँदै समयको उचित प्रयौग गरे भने त्योकल्पेको दिन पनि आएरै छोड्छ । &amp;quot;दिदी, त्यसैले मं भन्दैछु मैले अब नोकरी गर्न शुरु गर्नु पर्छ र&#039;दाजुका पढाइमा सहयोग, प्रुच्याउनुपर्छ । तपाईं त केही दिनपछि विवाहगरेर गइहाल्नु हुन्छ । एउटी आमाका कमाइले कै गर्न सकिन्छ !दाजुलाई कुनै हालतमा पनि- यता न- उताको बनाउनु हुँदैन ; दुई &amp;quot;वर्षकोमात्र कुरा हो, त्यसपछि इन्जिनियर बनिहाल्न हुन्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;९,&lt;br /&gt;
“के भन्छे यो : विवाह भइसकेको त छैन । के थाहा अन्त्यमापुगेर पनि नहुन सक्छ &#039; हामी छोरीको भन्दा अभै छोराका रोजाइले नैविवाहमा महत्व पाउँदै छ । झोक चल्यो भने अहिले पनि म गर्दिनँभनेर खवर पठाए भने हामीले चपै लाग्नुपर्छ । म त्यहाँ कि भिमजस्तीछैन । कालो कपालको चल्छो बाँटछु, सारी लगाएर मात्र हिड्छु ।तडकभडक पटक्कै मन पर्दैन अनि ...... ?&lt;br /&gt;
“भो ... भी अब धेरै भन्नु पर्दैन । हेर्नोस्‌ त्यो दीपेशलेतपाईंलाई विबाह &#039; नगरी छोड्दैन । यो करा मलाईभन्दा बढी तपाईंलाई नैथाहा होला । स्वाड धेरै पार्न खोज्न भयो भने ठूलो भ्वाङ पर्ला है,त्यसको बरु याद गर्नोस्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
भघाहा छैन साधना, मान्‌ यो मैले स्वाङ पारेको होइन कितकिमेरा मनले यो सम्बन्ध पक्कै बांधिन्छ भन्नै मानेको छैन । देख्छुबाआमाले विवाहका लागि तैयारी गर्न थालिसक्न्‌ भएको छ । उताबाटपनि क्राको ओहोर दोहोर भइनै रहेको छ, तर मेरा भित्री मनले भनेपत्याएकै छैन । डर लाग्छ किन हो कुन्नि, म भरङ्ग हुन्छु । केहीहराउन लागेजस्तो हुन्छु र आमा, बा तिमीहरू सबैलाई संझैर छँ छलाग्छु । भनिदिकैँ म विवाह नै गर्दिनँ भन्ने लाग्छ । सोच्छु ती कलिलाउमेरमा विबाह गरेर जाने केटीहरूका मनमा कति कुरा खेल्दा होलान्‌ केगरेर मनलाई शान्त पार्लान्‌ ?&lt;br /&gt;
“तिनीहरू अशान्त नै हुँदै हुँदैनन्‌ । सोच्न सक्ने, संफन सक्नेभएपछि मात्र चिन्ता लाग्ने, पीर पर्ने, अशान्त हुने हुन्छ । केटाकेटीतिनीहरूलाई विवाह त एउटा रमाइलो खेलजस्तो लाग्छ होला तपाईंलाईजस्तो लाग्ने हो र ? लौ हिड्दनोस्‌ माथि आमाकहाँ गएर कामसघाइदिऔं । एक्लै भन्छामा रुङ्रिहन्‌ भएको छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
दयाले घडी हेर्छ र अहो साढे आठ बजिसकेछ । यो बिहान पनिकति छिटो बित्छ भन्दै जुरुक्क उठ्छे । साधनाले आफूनो स्वभाव अनुसारफेरि जिस्क्याउँदै भन्छे, “हाम्रो उमेर बितेको जस्तो गरी होइन त, दिदी ?दयाले साधनालाई पुलक्क७हेर्छै अनि |क्गेही नभनेर कोठाबाहिर जान्छे ।&lt;br /&gt;
मलाई यो केको नशा चढ्छ ? छोरीस्वास्ती नै किन नहुन्‌अफिस जाने बेला भयो भनैर जब उनीहरू तयार हुनथाल्छन्‌ मअनियन्त्रित भई त्यसै त्यसै कराउन मन लागिहाल्छ । कहीं म उनीहरूलेनोकरी गरिरहेकामा ईर्ष्या गर्न लागेको त होइन ? छि ... म केस्वभावको हुन लागें &#039; शिव खड्का यस्तै कुरा मनमा खेलाउँदै हैरानहुन्छ । ॥&lt;br /&gt;
५०&lt;br /&gt;
झ सोच्छ । दया र गौरी दुबै मजस्तै भएर घरैमा बसुन्‌ भन्नेपनि त मैले अवश्य सोचेको छैन, फेरि म किन उनीहरूलाई अल्मल्याउनखोज्छु : मेरो समय यवै -बित्तछ र पनि म उनीहरूलाई सहयोग गर्नतम्सिन्नै बरु उनीहरूलाई मै आफनो व्यक्तिगत काम पनि अह्राउँछु अनिआफैँ ठूलो भएर भन्छु, “अफिसमा काम तिमीहरूले मात्र गरेका छौँ :मैले पनि गरेको थिएँ । कति वेला घरबाट निस्कन्‌ पर्छ, त्यौ मलाईथाहा छ ।&amp;quot; शिव खँडका यसरी आत्मपारख गर्दै आफूलाई अबकाश पाप्तजीवनसँग अभ्यस्त हुन खौज्दै छ भने परिवारले उसलाई किन विरक्ततुल्याउनु भनेर नोकरीका बारे जे जसो भने पनि सहिदिने गरिरहन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
कहिलेकाही परिवारको सहनशीलतासँग पनि उसलाई हुनसम्मकोरिस उदतैन । क सुन्न चाहन्छ, तिनीहरूलाई गाली गरेका बेलामाउन्तीहरूले भनिदिकन्‌, “तपाईंले गरे जस्तो त कसले गर्नै सक्छ र ?”अनि उसले त्यसका जवाफमा भन्न पाओस्‌, &amp;quot;कसले बुझूत सके मेरोइमानदारी ।” यति भन्न सुन्न पाएमा पनि उसलाई सन्ताष लाग्नै हुँदात्यस्ता स्थितिको सिर्जनामा लागिरहन्छ । तर उसको यस्तो आशय पनिअसफल भइदिएकाले धेरैपटक अफसोच मानेर चपलाग्छ ।&lt;br /&gt;
यता मद्दाको छिनोफानो भएको छैन । उसका मनको स्थितियस्तो छ । उता छोरीको विवाह नाजिकै आइसकेको छ । घरमा विवाहकालागि सहयोग गर्न आउनेहरू बढ्दैछन्‌ र त्यसका साथसाथै शिवकोनौकरी गएका बारे चर्चा पनि चाम्कन थालेको छ । जति आउँछन्‌उनीहरूको पहिलो प्रश्न नै यही हुन्छ, “फैसला सुनायो ! बिचरालाईकसरी फसाइदिए ।&amp;quot; त्यो विचरा शब्दले उसलाई हुनसम्म दिक्क गराउँदैन। यस्तै कुरा सुन्नपर्ला भनेर बिदाको दिन आयो कि त क बाहिरैहिडिदिने गर्छ । आजभोलि क आफता गाउँमा पनि जानेआउने गर्नधालेको छ । लेखनमा अल्भाई समयको सदपयोग गर्नै मनसायले नेपालकोप्रशासन व्यवस्थाका बारै अध्ययन गर्न थालिरहेछ । यस्तै क्रममा पर्दाउसले थाहा पाउन थालैको छ, शासन प्रणालीले प्रशासनिक व्यवस्था मात्रहोइन, यसले सामाजिक स्थितिमा समैत असर पारी देशको अवस्था रजनताको मनस्थिति नै बदलिदिन्छ । तसर्थ यसलाई सृहाउँने प्रकारकोव्यवस्था बसाउन आवश्यक छ ?&lt;br /&gt;
यसै आधारमा क सोच्छ १९९५ सालदेखि पजातन्त्र ल्याउनेउद्देश्यले उठेका पाइलाहरू २००७ सालमा पगेर क्षणिक विश्राम पाएपनि ती उदतै मडारिदै गएका काला बादलले २०१७ सालमा बर्षेरप्रजातन्त्रको पहिरो नै खसाल्यो । पुनर्निमाण गरेर व्यवस्थित गराउनेचाहनाले २०४६ साल कुूर्नुप्यो । पजातन्त्र प्राप्ति र स्थापनाकालागि&lt;br /&gt;
५१&lt;br /&gt;
चलेको यस लामा अवधिमा तीतचारपटक ठूलै आधात पर्न गएर पतिकिन हामीले प्रशासनिक व्यवस्थामा शासनप्रणालीलाई सुहाउँदो रूपमासुधार ल्याउनपष्टि लागेका छैनौं : खुला बजार नीति अपनाईप्रतिस्पर्धाबाट गुणस्तर बढाउने र जनतालाई राहत दिने भनेर निकैउद्योगहरू खोल्नलाई अनुमति दिइन थालिए तर के यस खुला नीतिलेजनताले राहत र उद्यमीहरूले सुरक्षा पाएको छ त : &amp;quot;खुला&amp;quot; कोपरिभाषामा प्रजातन्त्र नै गिज्याइएको छ । सायद, यो मजस्तो चोट परेकाव्यक्तिका मस्तिष्कमा नघुसेको पो हो कि !&lt;br /&gt;
शिव खँड्का यिनै तथ्य बुझने हेतुले साथीहरूसंग छलफल गरीनिचाडमा पुग्न कोसिस गरिरहन्छ । अहिले आएर. “यो के हो&amp;quot; भनेरसोधौं भने लाज लाग्छ नसोधौं भने आफूले बभेको भ्रम हो कि भनेजस्तोहुन लागिरहेछ । के यस्ता तन्त्रहरूका परिभाषा पनि बदलिरहन्छन्‌ किकसो !&amp;quot;&lt;br /&gt;
“जनताका बौद्धिक स्तरमा आधारित हुने यस तन्त्रको परिभाषाबदलिएको होइन यसलाई कसरी जनताले बुझेको हुन्छ फरक त्यसैलेगराउछ । नैतिकता, अनुशासन, सद्भावना र दायित्वलाई स्वतन्त्रतामाथिकोरोकावट मान्न थाल्यौं भने हामी प्रजातन्त्र नबुझने मात्र होइन, उहीअवस्थामा फर्कन थालेका हुन्छौं जुन वेला हामीले समाजको स्थापना गर्नआपसमा संझौता समेत गर्न सकेका थिएनौं ।&lt;br /&gt;
सम्झौताको पहिलो ज्ञान 9२ नै बौद्धिक उदय भएको हो जसलेमनुष्यको परिचय एकले अर्कालाई हुन्छ जसबाट मिलापको भावनाबिकसित भई लडाइँ झगडा हटेर शान्तिको वातावरणको सिंजना हुनथालेको हुन्छ । विचार गर्ने हो भने यो मन यति चञ्चल छ छिनैमा योकहाँ कहाँ पुग्छ, के के गराउँ छ के के खोज्छ ज्ञ तर ती सोचाइजब कर्ममा व्यक्त भई जनसमक्ष आउन थाल्छन्‌ के ती आफै छाँटिएकाहुँदैनन्‌ र ! त्यहाँ कर लगाउने कोही पनि त हुँदैन । यसलाई छाँटनेत्यही संस्कार हो, उही सम्झौता हो, जसमा समपूर्ण जनताको र. मनुष्यजातिकै भलाइ रहेको हुन्छु । यस्ता आत्म अनुशासन नै प्रजातन्त्रकोसफलताको मुख्य आधार हो ।&lt;br /&gt;
- शिक्षा र ज्ञान्‌ सफलताका आधार हुन्‌ । सोचाइमा विवेक रबुद्धि, लगाउन र आफू स्वयंम्‌ः पनि सद्भावना र नैतिकताका बललेअनुशासित हुनैसक्नपर्छ । &#039;व्यावहारिक पक्षमा यस्तो हुन नसकेकाले भ्रमउत्पन्न हुन्‌ स्वभाविक कुरा हो । यसैले हामी सबै मिलेर नै यसलाईव्यवहारमा ल्याउन के उपाय निकाल्नु पर्छ, त्यसो गर्नपट्टि लाग्न पर्छ ।आखिर प्रजातान्त्रिक सरकार भन्नु आफनो हाम्रो सरकार हो, हाम्रो&lt;br /&gt;
श्र&lt;br /&gt;
सम्झौताबाट स्थापित सरकार हो । यसको : सफलतातर्फ लाग्नु हाम्रोदायित्व हो । &amp;quot;&lt;br /&gt;
साथीको यस्तो कुरा सुनेर शिव भन्छ । &amp;quot;यो तथ्य थाहा नपाउनेकुनै नेता छैनन्‌ होला, फेरि यस्तो किन हुँदै छैन त ? शिक्षाकोप्रतिशत निकै कम भएकाले त्यसै अनुपातमा प्रजातन्त्रको सफलता भएकोछ भन्ने तिम्रो भनाइ हो ?”&lt;br /&gt;
केही अर्थमा हो पनि । अहिलै जे जति हुँदै छ त्यो पर्याप्तछैन र यसलाई बढाउदै लैजानु पर्छ । आनै अक्षरारम्भ गर्दैमा शिक्षाकोस्तर बढी हाल्छ भन्ने पनि छैन, यसलाई जरुरी गति दिएर बढाउदैलैजानुका साथसाथै यस तन्त्रको परिचय दिँदै ज्ञान प्रवर्द्धन गराउनज्ञानोपदेश दिने व्यवस्था वसेमा या कसैले यो समालिदिएमा छिटै यो केहो भन्नै धेरैले थाहा पाउनेछन्‌ । जब सबैले थाहा पाउँछन्‌ यसलाईअमरत्व दिनसक्ने हामीले नै हो भनेर त्यसपछि मात्र जनता र सरकारदुबैको एकत्रित बल पाएर सबै कर्महरू त्यसैतर्फ लक्षित हँदै जान्छन्‌ ।यसमा धैर्य र आस्थाको निकै ठूलो भूमिका रहेकोहन्छ ।”&lt;br /&gt;
&amp;quot;ज्ञानोपदेश त दिने भन्यौ तर यो कसरी र कहाँ दिने ःनेताहरूका वक्तृत्व नसुनेका छैनन्‌ । के त्यो पनि पर्याप्त छैन भन्नेलागेको छ ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
हाल हामीले सुन्ने गरेका भाषणहरूमा पार्टीको प्रगति रिपोर्ट,अर्का पार्टीको आलोचना र तेस्रो भइहाल्यो भने बृहत्‌ देश विकासकाअकाशिएका योजनाहरू मात्र छन्‌ । यो पनि हुन्‌ केही हदसम्म आवश्यकहोला तर ती जनता, जसल्ने केही जानेकै छैनन्‌ तिनका अगाडि गएर जेभने पनि त्यसबाट के परिणाम निस्कन सक्छ ? अनि यी सबै प्रयासकेवल भोट प्राप्तिका लागि मात्र सीमित हुन्छन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“मैले दिने ज्ञानोपदेश भनेको तन्त्रबारेका ज्ञान हो जुन प्रवचनकारूपमा. ठाउँ ठाउँमा गई प्रत्यक्षरूपले जनता समक्ष गएर दिन सकिन्छ,अर्को रेडियो।टेलिभिजनबाट रोचक तरिकाले यस बिषयमा कार्यक्रम बनाएरबताउन सकिन्छ र तेस्रो पढेलेखेकाहरूको ध्यान आकर्षण गर्ने लेखहरूलेखाएर पत्रपत्रिकामा छपाएर गर्न सकिन्छ जसले गर्दा लेख्ने र पढ्नेदुवैले यसतर्फ आफूलाई फूर्तिलो बनाइ राख्न सक्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
यसरी तन्त्रबारै व्याख्या गर्दा पार्टीहरूको व्यवस्था, यिनका नीतिके कस्ता सबै थाहा हुन्छ । सबै नीति पारदर्शी हुनुपर्ने पनि आबश्यकछ । राज्यप्रणाली के कस्तो हुनुपर्छ, यो के हो, कसका लागि होभन्नेदेखि लिएर सम्झौता कै हो, नैतिकता, अधिकार, कर्तव्य, समाज केहो, अनि हाम्रो संस्कृतिले के सिकाउँछ, नेपालको विश्वमा परिचय केमा&lt;br /&gt;
१३&lt;br /&gt;
छ इत्यादि धेरै जान्न पर्ने कुरा छन्‌ र यी सबै सिक्ने उपायहरू यिनैहुन्‌ जानोपदेश, भाषण र प्रबचन अनि प्रचारका माध्यमहरू ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
अहिले, प्रबचन भन्दा धर्म प्रचारको माध्यम मात्र मानिन्छ ।हुन त पहिले धर्मबाट नै कर्तव्य, नैतिकता र आदर्शको ज्ञान , दिइनेगरिन्थ्यो र त्यसबेला यस अर्चले पनि केही फरक पार्दैनथ्यो तर अहिलेधर्मलाई दर्शतशास्त्रको रूपमा मात्र लिन थालिएकाले पृथक तरिकाले यस्ताबिभिन्न विषयहरूमा ज्ञान हासिल गर्नु पर्ने भएको हो र प्रवचनधर्मज्ञानका लागि मात्र नभई सबैको लागि प्रचारको माध्यम बनाउन पर्नेभएको छ । यति हुन सकेमा प्रजातन्त्रको सफलताको औसत निकै बढ्नेसंभावना म ठान्छु ।&lt;br /&gt;
आजका युगमा आइपुग्दा मनुष्यले थाहा पाइसकेको छ उसकाजीवनमा आधारभृत आवश्यकता बाहेक अरू धेरै आवश्यकताहरू पनिछन्‌ जसका लागि क ज्यानलाई भन्दा बढी महत्व दिएर लागिरहेको हुन्छ। यही अर्थमध्येको एक हो शहीदहरूको सख्या बढ्दै जान । ती शहीदआफना लागि भएका होइनन्‌ मानव जातिका लागि स्वच्छ वातावरणकोचाहना राखेर बिभिन्न अबरोधहरूसंग संघर्ष गर्दा ज्यान फयाँकेर भएकाहुन्‌ ।&amp;quot;.&lt;br /&gt;
स्वच्छ वातावरणको मिर्जना गर्न प्रगतिको मार्ग खोज्न हो रप्रत्येक व्यक्तको चाहना समयको गतिअनसार ज्ञानको विकास गरीपरिवर्तन ल्याउनु नै हो । एकर्फेर पछाडि फर्केर हेन्यौं भने थाहा हुन्छसमय र अवस्थाले शासनप्रणालीमा छोडेको छाप कति गहिरिएर बसेकोहुन्छ ।&lt;br /&gt;
जुन बेला जसको शक्ति उसैको राज भन्ने थियो त्यस वेलासीमा विस्तारको नीति अनुसार जो लडाकू र शक्तिशाली छ त्यो नैजमातको मुखिया हुने गध्यौं र तिनैले जब पदको स्वाद पाए त्यस पछिचलाकी गरी वंशप्रणालीको स्थापना गरी आफूनो वंशका लागि पदकोसुरक्षा, शक्तिका आधारमा गरेर एक शासक अर्को शासित दुई वर्ग खडागरे ।&lt;br /&gt;
शासक वर्गलाई शक्तिले मत्यायो र शासितले संझन थाले,उनीहरूले आपसमा संझौता गरी समाजको सिर्जना गरेका र आफूमध्येबृञ्जक पाका र शक्तिशालीलाई त्यसको मूली छानेका कुरा । त्यहीसंझौताको संस्मरण गराउँदै भन्न थाले, &amp;quot;हे, शासक हो हामीले तिम्रोशासन रुचाएको सास्ती खानका लागि होइन । व्यवस्थित शासन प्रणालीबसाएर सबैले समानरूपले अधिकार पाउन न्यायोचित तरिकालेसमस्याहरूको समाधान होस्‌ भनेर हो । यदि त्यसो गर्न सक्तैनौ भने त्यो&lt;br /&gt;
प्र&lt;br /&gt;
स्थान हामी फिर्ता लिन्छौँ र जो योग्य व्यक्ति छ र जसले हाम्रो भलाईमात्र साँचिरहन्छ त्यसैलाई छनोट गरी पाउँछौं ।&lt;br /&gt;
जनतातर्फको चेतावनी र शासकको शक्ति र पर्दालप्साले गर्दारक्तपात भई भुमि, रङ्डियो । कत्तिका सन्तान शहीद भए । आवाज उठ्योप्रजातन्त्रका लागि ।&lt;br /&gt;
आज समयको मांग भएको छ । पजातन्त्रको जस अन्तर्गत हामीस्वशासित हुन्छौँ र यसरी प्रजातन्त्रको मांग गरेर हामीले आफूलाई सक्षमभइसकेको पनि देखाएका छौं । शासन शांक्त खोसेर आफैँनै परिचालितगर्न तमसनु पनि ज्ञानोदय भएको नै मान्न पर्छ ।&amp;quot; शन्त यति भाषणगरेर एक छिन चप लाग्छ । शिव खड्काले उसको भनाइको व्याख्यायसरी गर्छु ।&lt;br /&gt;
“यसको मतलव हो पहिले मुखियातन्त्र, त्यसपछि राजतन्त्र अनिप्रजातन्त्र र त्यसोगरी पहिले सीमाना निर्धारण नीति अनि यसको बिस्तारर त्यसपछि व्यवस्थित स्थिति बन्यो : आज भोली ठाउँठाउँमा चल्नथालेका लडाइँ झगडालाई हेर्दा हामी उही विस्तार वादमा नै छौँकिजस्तो के लाग्दैन र : &amp;quot;शिवले यसमा अरू सफाइ खोज्दै प्रश्न गर्छ ।&lt;br /&gt;
“यस्तो लाग्नसक्छ तर यसमा फरक छ । यो विस्तार सीमानाकोहोइन, यो हो व्यवस्थाको विस्तार, तन्त्रको विस्तार र यस बिस्तारकोउद्देश्य हो सुरक्षा आफूले औगटैर मेरो भन्ने टाँचा लागिसकेकालाईशान्तिको साथ सुरक्षित राख्ने ।&amp;quot; छोटो जवाफ शन्तले दिदै कराटुङयाउन खोज्छ ।&lt;br /&gt;
&amp;quot;अर्थअझै हमला होला कि भन्ने त्रास छँदै छ : नत्र सुरक्षाकोप्रश्न नै उक्तैनथ्यो ? यो वैज्ञानिक युगमा आएर लडाईँ भइहाल्यो भनेयुगको अन्त्य प्रलय भयो भन्ने सोचे हुन्छ, होइन र&lt;br /&gt;
“त्यो खास यसै कहाँ हद्छ र : विस्तारवादले ल्याइरहेकै हुन्छतर लडाइँको पारा भने बेग्लै हुन्छ । यसले सीमाना ओगटनेलाई हमलागर्दैन, व्यवस्था हातमा पारी आफूता तरिकाले उनीहरूमाथि शासन त्यसदेशकै जनताबाट गराउन लगाई चालबाजी खेलिरहन्छन्‌ । रक्त युद्ध नभएपति शीत यद्ध चलिनै रहन्छ ।&lt;br /&gt;
ज्योतिपीहरूले भनिसकेका छन्‌ तेस्रो महायुद्ध हुन्छ भनेर । योलडाइँ वैज्ञानिक अस्त्र शस्त्र प्रयोग गरी खेलिने हुँदा हेर्न लायककै होला,होइन त, शिव ?”&lt;br /&gt;
“आआफूना अहम्‌ले कृत्कुत्याएर निम्त्याएको आफनै अन्त्यको खेलआफ्नै सृष्टिको अन्त्य आफैँले रचेको आत्महत्याको साथसाथै सभ्यताको। पराकाष्ठाको यो खेल हनेछ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
२३,&lt;br /&gt;
हु “त्यमैले त यी सब देख्ता कहिले सोच्छु प्रगति पनि के चक्रकाबिन्दुबाट शुरु भई त्यही पुगेर अन्त्य हुने त होइन ? यदि यस्तै हो भनेयौ सभ्यता मानव नाताको बन्धन भएर किन आयो जब उस्तै हाहाकारमच्चाउनु छ भने, उसैगरी लडाई झगडा चलिरहने हो भने ? आजरक्तयद्वबाट शीतयद्धमा उत्रिएका छौँ भने के भोलि बरफयुद्ध भन्दै अर्कोनामकरणको युद्ध निस्कदैन र : आखिर यी सबैको उपलब्धि मानव हत्यानै हो । रातदिन टि.भी.मा देखौ आएका छौं मनुष्यको हत्या मनुष्यले नैगर्दै आएका । बौलाहा कुक्रलाई मारेको जस्तो गरी मारिएका छन्‌ ।मावनताले यहाँ खिज्याउदै छ शिव ः&lt;br /&gt;
“प्रत्येक शुरुको साथ अन्त्य र प्रत्येक अन्त्यको विन्द्रबाट नयाँशुरु हुन्छ भने यस अन्त्य र शुरुका समयभित्र सदभावना राखेर चल्नसक्यौं भने पनि सायद, अन्त्यलाई पछाडि धकेल्न सक्छौं कि क्सौ,शन्त ! ु&lt;br /&gt;
“कुरा त तिम्रो ठीक हो, तर यहाँ सदभावना राखेर नै यी सबगर्दै छौं भन्छन्‌ र पो यो चिन्ताको विषय भएको छ । सुरक्षा रशान्तिका लागि नै यस तर्फका विध्वंसकारीको नाश गर्नुपर्छ, भन्नेसोचाइले नै यस्ता गराउँदै छ । यहाँ कसको कहाँ के दोष छ त्योजाँच्ने को ? एकले अर्कालाई दोष लगाउँछ र आफू उत्तम छु भनेरअर्काको नाश गर्छ। .&lt;br /&gt;
“जस्तो मलाई निकाल्दा सोचेका थिए !&amp;quot; शिव यति भनेर&lt;br /&gt;
हाँस्छ ।&lt;br /&gt;
२६&lt;br /&gt;
कस्तो सुत्न सक्छ गो : संगसंगै बहिनी खाएर कहाँ प॒गिसकीयसको भने निद्रा प॒गेको छैन ।” यति. भन्दै गौरीले मुख छोपेर सतिरहेकोविनोदको सिरक हटाईदिँदै भन्छ &amp;quot;ए, मख छोपेर सत्तैमा रात पर्छहेर बाहिर झलमल्ल घाम लागेको । के त्यहाँ पनि यति नै बेला मात्रउदथिस्‌ कि कसो&lt;br /&gt;
विनोदले आमाको करा सुनेर हाँस्तै भन्छ, &amp;quot;निदाएको ठान्तभयो :नउठेर यसै पल्टिरहेको पो । सोच्तै थिएँ म अब क्न बाटोतर्फ लागौं ।पढाइलाई यहीं नै टुङ्गयाईंदिएर नोकरी गर्न पो लागौ कि ? घरकोआर्थिक स्थिति यस्तो छ&lt;br /&gt;
“नोकरी गर्न पनि त इलमै चाहिन्छ &#039; दई बर्ष मात्र इन्जिनियरहुन बाँकी छ । यस अवस्थामा पुगेर कसरी छोड्ने : यसलाई यतिकैमाअघृरो छाडिस्‌ भने तेरा बाउलाई जागिर खस्केर लागेका आलो चोटमानुन छरेको जस्तै हुन्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
अनि मैले कसरी के गरी बिदेशमा बसेर प्रढ्ने भन्नोस्‌ त ?खर्च त्यतिकै चाहिन्छ । जे जसौ भए पनि आइ.ए.सम्म पढिसकेकै छ्नुसातोतिनो नोकरी कसो नपाइएला त ! नोकरी गर्दै विषय परिवर्तन गरेरजे पढ्न सजिलो पर्छ जति पढ्न सकिन्छ पढ्दै जान्छु । इन्जिनियर नैतपाईंको छोरो, हुनपर्छ भन्नै केही छैन ।&lt;br /&gt;
विनोदले आफनो मन यसरी उदाङ्ग पारेपछि गौरीले पनि जिह्टीकोसाथ आफनो राय व्यक्त गर्दै इन्जिनियर हुनै पर्छ भन्छे । खर्च कसरीपुग्याउने भन्ने प्रश्नमा पनि आफूले त्यसको व्यवस्था मिलाइसकेकीबताउँदै आफनो राय यसरी व्यक्त गर्छे, “परिवारमा एकले अर्कालाईजरूरत परेका बेला सहयौग गर्न सकेमा मात्र सखी शान्त परिवारहुन्छ । अहिले कसरी खर्च टारौं भन्ने तैले सोच्ने होइन, त्यस कुरामासोच हामी पुग्याउछौँ, बरु पछि भाइलाई पढाउने: जिम्मा तैले लिन्‌ ।तेरी बहिनी आज. बिहानै बाहिर गएकी नोकरीका लागि अन्तर्वार्तादिनलाई हो । दिदी त विवाह भएर जाने भइहाली त्यसको कमाइका केआश गर्नु ।. विवाह भएर गएकी छोरीको कमाइ यता ल्या भन्न पनिछु । विवाहमा केही दिन &#039; सकतैनौं भनेर पहिले नै टकटकी सकेका&lt;br /&gt;
||&lt;br /&gt;
9७&lt;br /&gt;
क्रा चल्दाचल्दै विनोदले बीचैमा प्रश्न गर्छ, &amp;quot;अनि साधनालेकहाँ नोकरी गर्न अन्तर्वार्ता दिन गएकी : हिजो त्यतिका बेरसम्म क्रागर्दा पनि मलाई बताउँदै बताइनँ ?&lt;br /&gt;
मिल्छ मिल्दैन यसै बाबादाजुलाई किन भन्ने भन्थी, शायदत्यसैले नभनेकी होली । फेरि तिमीहरूको स्वभाव पनि कस्तो छनि ?“पर्दैन&amp;quot; भन्न बैर लगाउदैनौ ।” गौरीले यति भनेर कुरा फेरि खोल्दिन ।&lt;br /&gt;
“कुरा थाहा भइहाल्यौ बि । आमाछोरीको सल्लाह नै त्यस्तोरहेछ । कुन ठाउँमा कस्तो नोकरी गर्न खोजेकी हो, राम्ररी नबग्नेरपठाउन हुन्नथियो । तपाईंलाई त थाहा होला कहाँ नोकरी खान नम्सेकी&lt;br /&gt;
एअरहोस्टेस हुने रे ? भन्छे पैसा राम्रो दिन्छन्‌ रे घरको रदाजको पढाइ खर्च दुवै पुन्याउन सकिन्छ । अनि मैले पनि खाने भएं खाभनिदिए । दर्खास्त हालेकी थिई अन्तर्वार्तामा बोलाइहालेछ ।&lt;br /&gt;
“ए आमा, तपाईंले छोराको पढाइका लागि छोरीलाईएअरहोस्टेसमा जागिर खान स्वीकृति दिनुभयो ! के म बहिनीका कमाइलेबिदेशमा बसेर पढ्छु भन्ठान्त भएको छ ? लोकले तपाईं हामीलाई केभन्छन्‌ । त्यो पनि सोच्नु भएको छ ! नोकरी पनि कस्तो रेएअरहोस्टेसको &#039; थाहा छ, यो कस्तो नोकरी हो ? हेर्नोस्‌ आमा, केहीगरी त्यो छानिइछ भने पनि एअरहोस्टेस हुन पठाउने होइन :&amp;quot; विनोदलेआवेशमा आउँदै बहिनीलाई त्यस्ता नोकरीमा नपठाउनु भन्छ । आमालाईछोराको विचार मन पर्दैन र भन्छे, “किन नपठाउने : हवाइपरिचारिकाको नोकरी गरेर के हुन्छ ! राम्रो आम्दानी हुनसक्छ, देशविदेशघम्न पाउँछे । मान्छेहरू त्यही नपाएर कति कल्पिरहेका छन्‌ । त॑ भनेनपठा भन्छस्‌ । छानिइछ भने नोकरी गर्छे । काम गरेर खान केही पनिलाज हुँदैन ।&lt;br /&gt;
“लाज हुन्छ या हुँदैन त्यो मलाई थाहा छैन तर एअरहोस्टेसकापेशालाई सम्मानजनक मानिदैन र कुलघरानाका छोरीहरूले त्यस्ता नोकरीगर्न जाँदैनन्‌, यसमा तपाईले जिह्ठी नगर्नु नै बैस हुन्छ । यति भन्दै कजुरुक्क उठ्छ र फत्‌फताउन थाल्छ घरका मुलीले नै संस्कृतिको रक्षागरेको हुन्छ भन्छन्‌ यस घरमा भने के भएको हो यस्तो : छोराकोपढाइका लागि छोरीलाई नोकरी गराउने ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“संस्कृतिका बारे जसलाई केही थाहा छैन क नै यसका बारेबोल्न थालेपछि के हुन्छ : समयसापेक्ष यसलाई पनि बनाउँदै लगेनौं भनेयो आफैँ इतिहास भएर थन्किन्छ र कोही पति यसको अतुयायी हुनसक्तैन ।”&lt;br /&gt;
पप&lt;br /&gt;
छोरी बहिनी, स्वास्नी र आमाको कमाइ खानु भन्नेले सस्कृतिलाईअहिले आएर पालना गर्छु भन्न खोज्यो भने के त्यो संभव हुन्छ : हो,उहिले स्वास्नीमान्छेलाई पढाइन्न थियो, कुनै सीप तालिम दिइन्तथ्यो, त्यसबेला उनीहरूको कमाइ खान भनेको अनैतिक काममा लगाएर घनकमाएको मानिन्थ्यो । त्यसैले सस्कृतिद्वारा नै नारीलाई शौषण हुनबाटबचाउन यसो भनिएको हो । तर अहिले नारीहरूको अवस्था त्यस्तोछैन । उनीहरू बौद्धिक स्तरमा समानरूपले काम गर्न सक्ने भइसकेकाछन्‌ ।&lt;br /&gt;
त्यसैले इमानको कमाट्र छोरीको छ भने पनि मज्जाले लिए हुन्छर यदि त्यो कमाइ छोराको छ जसमा भ्रष्टाचारको दुर्गन्ध आउँछ भनेत्यो त्याज्य हुन्छ । संस्कृतिका कट्टरवादलाई अँगालेर हामी प्रष्ट हुनसकेनौं भने लुकिलुकी हामीलाई कति अनैतिक काम गर्न पनि वाध्यताआइपर्न सक्छ । कुरा राम्ररी बझिराख ।”&lt;br /&gt;
“यहाँ पश्न बहिनीको कमाइको&#039; मात्र छैन पेशाको छ । म फेरिदोहोच्याउँदै छु, यस पेशामा म साधनालाई छिर्न केही गरे पनि दिन्नँ ।तपाईं जे जति भन्नोस्‌ । मेरो पनि बहिनीको भविष्यबारे अधिकार छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“कस्तो एकहोरो लागेको लाग्यै भएको : कुनै पनि व्यवस्थापनलेसेवाका लागि स्थापित गरेको पेशा घृणित हुँदैन । त्यस पेशामा लाग्नैव्यक्तिको व्यक्तित्व कुन स्तरको छ त्यसैमा यो निर्भर हुन्छ । मलाईबिश्वास छ जुन प्रकारले मैले त्यसको चरित्र निर्माण गरेकी छु त्यसलेआफनो नैतिकता जोगाउन राम्ररी सक्छ । यसमा तैले हामीले चिन्तालित पर्दैन । म त्यसकी आमा बोलिरहेकी छु मैले जति त्यसलाई कसलेचिनेको छ !&lt;br /&gt;
आमाछोरा बीच यस्तै गलबदी चलिरहेकै बेलामा राधा आइपुग्छेर भान्छा अझै नउठेकाले केही घन्टा लोग्नेसंग बाहिर गएर आउनअनुमति गौरीसंग माग्छे । हुन्छ, हुन्न केही भन्न नसकी गौरी राधाकोअनुहार हेर्छ । राधालाई कुरिराख्ने फुर्सत छैन क त्यति सूचन। दिएरकोठाबाट हिंडिहाल्छे ।&lt;br /&gt;
ज्यादै व्यस्त हुन्‌ परे पनि राधा आजभोलि धेरैजसो प्रसन्न मुद्रामाहुन्छे । उसलाई दयाले रेडियो नेपालमा गाना गाउने काममा लगाइदिएकीछ । यसरी आफूले पनि पैसा कमाई दिबहादुरलाई सहयोग प॒त्याउनसकेकीले क प्रफुल्ल छे भने दिलबहाद्र आफूलाई दिलोज्यानले साथ दिनेराधालाई के कसरी खुशी राखुँ भनेर प्रयत्न गरिरहेको हुन्छ । छुट्टीकादिनमा उनीहरू पनि घरघन्धा दुबै मिलेर सिध्याईं बाहिर धुम्न निस्कनेगर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
५९&lt;br /&gt;
त्यस दिन पनि घुम्त जाने योजना बनाएर पर्खदापर्खदै ।आमाछोराको गन्धन नट्ङ्गिएकाले दिलबहादुरले राधालाई छुट्टी माग्नपढाएको थियो ।&lt;br /&gt;
जब ती दुई डटेर बाहिर निस्केको गौरीले झ्यालबाट देख्छे अनिछोरालाई तिनीहरूले नोकर र नोकरीको परिभाषा लगाएको सुन्दाशिवलाई कति चोट परेको थियो भन्ने कुरा सुनाउँछे । कुराकासिलसिलामा उनीहरूले बाबासंग आफूलाई दाँजेर उनीहरू र बाबा उस्तै «नोकर त हुन्‌ मालिक कहाँ हुन्‌ र भनेको सुनेर बडबडाउँदै के भन्नथाल्नुभएको थियो त्यो सबै सनाइदिन्छै ।&lt;br /&gt;
“जेसुकै कुराको पनि यस्तै खिन्न अर्थ लगाउने बाबाको बानीबसिसकेको रहेछ । मृद्दाको फैसला नभएसम्म यो यत्तिकै भइरहन्छ ।मसंग पनि यस्तै कुरा धेरै बेरसम्म गरिरहनु भयो । उहाँमा देखा पर्नथालेको यस्तो परिवर्तनले त मलाई डरलाग्न थालिरहेछ । हामीसंग यस्तादिक्क लाग्दा क्रा गर्ने थाल्नुभयो भने हामीले हाँसोमा नै त्यसलाई उडाइदिनपर्छ ।&lt;br /&gt;
विनोदका कुरामा समर्थन गर्दै आफूले त्यस्तैगरी हँसाउने गरेकोबताउँदै भन्छे “बाबाले आफूलाई नोकर मात्र भनको सुनेर दिक्क भईमैले पनि एक. दिन भनिदिएँ तपाई आफूलाई हाकिमको आदेश मान्नुपर्नेनोकर भन्नुहुन्छ भने घरमा तपाईको र अफिसमा हाकिमको आदेश मान्नपर्ने . मलाइ तपाईं के भन्नु हुन्छ ! विनोदले हाँसेर सोध्छ, “बाबालेडब्बल नोकर त भन्नु भएन ?”&lt;br /&gt;
“कहाँ त्यसो भन्नु । भन्नुभयो तिमी कसरी नोकर हुन्छयौँ :तिमी त नीकर्नी पो त ।” उहाँसंग यस्तो कुरा गरेर कहाँ जित्न सकिन्छर्‌?&lt;br /&gt;
&amp;quot;जे होस्‌, कुरा त मिलाउनु नै भएको हो । त्यस बेलातपाईलाई कति हाँसो उठ्यो ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
“के उद्नु हाँसो ? झन्‌ झोक पो चल्यो । त्यति भनेर चप -लाग्ने हौ र ? भन्दै हुनुहुन्थ्यो सरकारी नोकरले त अफिसको ड्युटीसिध्याएपछि पनि मालिक हुन पाउदैन उसको नोकरीको तीमानै रहँदैन ।घर पस्ता पनि त्यो नोकर छाप टाँसिएर नै आएको हुन्छ । किहाम्रासाथ फाइल आएको हुन्छ कि त आदेशका लागि टेलिफोन बज्नथाल्छ .। यसरी आदेश लिने र आफूना मातहतका लागि दिने अनिहाकिमको आशय बभेर त्यसतर्फ- आफूलाई मोडदा नै हो कहिले चिप्लनेकहिले उक्सने त कहिले लुड्कने भइरहने । यसोउसो &#039;गरी कुरालाई उहीबिन्दुमा -ल्याएर राखी हाल्नुहुन्छ&#039; । हाँसो त केही छिन्‌का लागि मात्र हो&lt;br /&gt;
६७&lt;br /&gt;
। कसरी यस निराशाबाट आशावादी बनाउन भन्नेतर्फ लाग्दालाग्दै म पनिकुनै वेला हरेस खाई चिप्लि हाल्छु । मनमा एउटा कुरा, बोल्दा अर्कोकुरा गर्ने अभ्यासमा नपरेकी मेरो क्रा तेरा बाब्लाई वझ्‌न के गाह्रोपर्नु  हाँस्तै भनिहाल्नु हुन्छ, &amp;quot;सत्य कुरालाई लकाउन खीज्दैमा लक्छ र? मलाई भन्न नहच्के पनि हुन्छ । अब कुनै क्राले पनि मलाई छुँदैन ।म त्यति चाम्रो भइसकेको छु ।”&lt;br /&gt;
“बाबाको कुरा सुनाएर मलाई जति अल्मलाउन खोज्नु भए पनिसाधनाले विमान परिचालिकाको जागिर खान्न । बरु अर्को कुनै नोकरीगरोस्‌ त्यसमा म केही भन्दिनँ । यो सत्य पनि बाबाले भन्नु भएजस्तैलुकाउन नसकिने छ । मैले थाहा पाइसकेको छ्लु साधनालाई यो नोकरीगराउन पठाउनु तपाईको विवशता हौ चाहना भने पक्कै होइन, उसकोधारणाबारे विनोदले यस्तो अड्कल गरेको सुनेपछि गौरीले यस पेशामाछोरीलाई लाग्न उसले मन्जुरी दिएको विवशताते होइन, चाहनाले नै होभन्ने बताउन यस पेशालाई यसरी अर्थ्याउछे “यो पेशा सेवाम्‌लक छ रयसले देशविदेश घुमाउने हुँदा विभिन्त सोचाइ रहका यात्रीहरूसंग- एकनाशको व्यबहार गर्नु पर्ने हुँदा .र रातमा बास पनि बाहिरी मुलुकमासमेत बस्न पर्नेले गर्दा यस स्वतन्त्रतालाई लिएर तेरौजस्तो भावना भएकालेयसको बदनाम गरेका हुन्‌ । पहिले तेरा सानीमालाई एअरलाइन्समा&#039; लेखाबिभागमा काम गर्दा पनि के मात्र “ भनेनन्‌. । त्यसले आफनो चरित्रमाथिकसैले औंला उठाउन सक्ने नबनाई &#039;काम गर्दै जाँदा अहिले उसैको राम्रोतरिफ गर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
यहाँ करा काटनेको कमी छैन । यस्ता कुरा सुनेर त्यसलाईप्रोत्साहन पनि दिनु हुँदैन ।&lt;br /&gt;
साथमा बसेर काम गर्दा साथी अवश्य बनिन्छन्‌ र एकै प्रकारकोकाम हुन जाँदा एकले अर्काको सहयोग गर्नु उनीहरूको दायित्व वनेकोहुन्छ र जुन संबन्ध यसले बसाएको हु, ) शन त्यसमा अनुशासनको रेखाकोरिएको नै हुन्छ । त्यसैले मंलाई छ जबसम्म उनीहरूलेस्वुइच्छाले त्यस बन्धनलाई नाघेर अगाडि बढ्न चाहदैनन्‌ त्यसलाई पेशालेघचेद्तैन । त्यस्तै सीमा नाघदै जान चाहनेलाई नोकरीको पेशा खोज्दैहिड्नु- पति पर्दैन । घरैभित्र कडा निग्रानीमा रहेकाहरू &#039;कतिले आफूलाईचरित्रहीन बनाएका पनि छन्‌ । यो कुरा बझ्ने स्थितिमा त पुगिसकेकोछैनन्‌ । त्यसैले यस विषयमा चुप लागेर खुरुबैक्ष भात खान हिड भनेरभान्छातर्फ -लैजान्छे । र &amp;quot;०&lt;br /&gt;
६१-&lt;br /&gt;
भात पस्कदै भन्छे, “ती जोडी गइहाले कुन बेला फर्कने हुन्‌ ।यो धन्दा आफैँले गर्नुपर्छु । तेरो विवाह भएर बुहारी घरमानआउनजेलसम्म यो यतिकँले बित्ने भयो ।”&lt;br /&gt;
बिनोद पनि हाँस्तै भन्छ, “ए, त्यसौ भए तपाईलाई ट्रिपल नोकरचाहियो :&amp;quot;&lt;br /&gt;
“हेर, अहिले नै उसकी स्वास्नीलाई दुःख दिने भए भनेर भनेको; लौ त्यसलाई केही पनि भन्दिनँ भयो अब !” क हांस्तै भन्छे ।&lt;br /&gt;
“काम नलगाउनु होस्‌ भनेको हो त ? डब्बल नोकरको नोकरभएपछि ट्पिल नोकर भएन र ! त्यस अर्चले पो हाँसेको । अब तपाईंपनि बाँउठेको कुरा गर्न थाल्नुभया ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
बाँउठेको कुरा होइन, तेरी स्वास्नीलाई मैले जे गरे पनि ट्रिपलनोकर बनाउनै सक्दिनँ&lt;br /&gt;
विनोदले आमाले भनेको कुरा बुझ्छ र भन्छ, &amp;quot;ए....हो त !त्यो त भई भने पनि ट्रिपल नोकनी पो हुन्छे, होइन आमा !&amp;quot; हाँस्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
समय दिनको ११ बजेको छ । घरमा ती आमाछोरा बाहेक अरूछैन । शिव भ्रमणमा गएको छ र सबै आआफना काममा । गौरीलाईसन्चो नभएकाले छुट्टीमा घर बसेकी छे । यो घरको व्यवस्था बेग्लैप्रकारको छ । आमाबाव, छोराछोरी सबै हुर्किसकेकाले साधी जस्ता भईक्राकानी गर्छन्‌ । राख्न पर्ने मान मर्यादा आमाबाबुलाई नराख्ने होइनन्‌ ।तर हाँसखेल, ठट्टा, दुःखसुख सबै आपसमा बाडिरहेका हुन्छन्‌ । गौरीशिब दुबै भन्छन्‌ “यो घर यौ परिवार हाम रचना हो । यहाँ हामी एकछौं । एक अर्काका साथी छौं ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
कुनैले छोराछौरीसंग पनि यस्तो के व्यवहार गरेको भनेर सोधेभने भन्छे, “सानोमा पनि यी आमाकै साथमा हुन्छन्‌ र्‌ बढेर ठूलाभएपछि ती साथी हुन्छन्‌ । मैले त्यही त व्यवहार गर्दै छु । नत्र यीछोराछोरीले साथी खोज्दै कहाँ पुग्ने हुन्‌ कहाँ, आ।आफनो लक्ष्यनलागेसम्म उनीहरूको दुःखसुख सुनिदिने, अर्तीवुद्धि दिदै सुच्याउनु पर्नेक्रामा सुन्याउने र यम्थम्याउत पर्नेमा थुम्थम्याउने र त्याज्य क्रालाईछोड्ने सल्लाह त दिनुपरिहाल्छ नि । आजभोलिका छोराछोरीलाई उहिलेकोजस्तो गरी दबाएर राख्नु हुँदैन । दबावले त सन्तानको भित्रि हयाउ नैसखाप पारिदिएर समयसंग सामना गर्न अगाडि सर्नै नसक्ने बनाइदिदोरहेछ । यसले त्यसरी मनस्थितिमै घक्का पार्ने हुँदा हामीले यिनीहरूलाईमुठ्ठीमा राख्न उचित हुँदैन ।&lt;br /&gt;
देशको शासनप्रणालीले पति समाज र घरका वातावरणमा प्रभावपार्दो रहेछन्‌ जसरी दवाव नभई समझदारीमा सरकार चल्दैछ, त्यसरी नै&lt;br /&gt;
दैरे&lt;br /&gt;
छलफल गर्नु, न्याय खोज्नु जस्ता स्थिति घरघरमा ल्याउनु पर्ने हुन्छ ।घदि यस्ता करा हामीले छोराछोरीको सनिदिएनौं भने ती बिद्रोही भएरनिस्कन सक्छन्‌ । अनुशासन, मयांदा र नैतिकता हामीले घरैबाट सिकाउँदैलैजानु पर्ने कुरा हो नत्र स्वतन्त्रतालाई बुझून नसकेर घर मात्र होइन,देशै पनि बिकृतितर्फ लाग्न सक्छ । त्यसर्थ म कहिले यिनीहरूको साथीभई छलफल गर्न सिकाउँछु, त कहिले गुरु भई अर्ध्याउँदै सम्झाउँदैअवस्थाको परिचय दिन्छु । यसरी आफूले जाने बुझेको ज्ञान सन्तानसम्मपुन्याउन्‌ सकेनौं भने हामीले बिताएका समय र जीवनसङ घर्ष व्यर्यकाहुन्छन्‌ किनकि यति नै अनुभव र ज्ञान तितलाई बटुल्न हामीले जतिकैउमेर बिताउनु पर्छ । अनि प्रगति कता उन्मुख हुन्छ ! त्यसैले भनिएकोहो, “आमाबाबु नै जीवनका पहिला गुरु हुन्‌ र घर नै पहिलोपाठशाला ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
ज्ञति गम्भीर कुरा गरै पनि हाँस्नै स्वभाव उसको भएको हुँदाअन्त्यमा हँसाउन भनिहाल्छे, “आज भोलिका गुरुहरूले पनि स्कूल जाँदालदी छोडेर जान थालेका छन्‌ ।”&lt;br /&gt;
यसको प्रतिकार कसले गर्नै : यस्तो भइरहेकै छ ।&lt;br /&gt;
र&lt;br /&gt;
0&lt;br /&gt;
सौर्य मण्डलबाट उछिट्टिएको एक चोइटाले पृथ्वीको सिर्जनाभएझैं शिवगौरीका घरबाट अन्भाइएर पठाइएकी दयाले दीपेशका घरमापुगी नयाँ जीवन सृष्टितर्फ लागेकी छे । व्यवहार नयाँ, मान्छे नयाँ,तितीहरूसंगका सम्बन्धबाट उमार्नु पर्ने माया भएको हुँदा क समर्पित हुदैछे हरेक क्षेत्रमा । क चनाखो हुन सिक्ने कोसिसमा लागेकी छ । त्यसघरको व्यबहोर जुन उसका घरकोभन्दा बेग्लै छ, कतिमा क आफूलाईढाल्त सक्तिन र अल्मलिएर आदेशका लागि प्रतीक्षा गर्छे त कतिमा कअचम्मित भएर लोग्नेको सहयोग माग्छ ।&lt;br /&gt;
यस नयाँ घरमा “सरस्वतीको भन्दा लक्ष्मीको बास बढी रहेकोउसले पाएकी छै । सबै भौतिक साधनहरूले पूर्ण भएकाले त्यहाँ कमीकेहीको छैन भने जस्तौ देखिन्छ । त्यसैले त्यहाँ कोही पनि , प्रयत्नशीलरहेको देखिएन । ससराले जीवनभर नोकरी नै नगरेर बिताएका छन्‌ भनेसास्‌ घरव्यवहारमा मात्र सीमित छै । समय फुर्सतका साध बितिरहेछ ।आमाबाबु एकातिर आफना धुनमा छन्‌ भने छोराछोरी अर्कातिर । कसैलाईकेही थाहा हुँदैन को के गरिरहेको छ र त्यो जान्ने चासो पनि कसैमाछैन । .&lt;br /&gt;
अहिले मात्र नयाँ दुलही भित्रिएकीले सबैको ध्यान उसतर्फखिचिएको छ । उततलै देखाएको नयाँपनाप्रति उनीहरू पनि त्यत्तिकै मजालिदै हाँस्तै ,छन्‌ र सिकाउने, संभझाउने -गर्दै उसलाई आफना घरकोव्यवहारमा ढाल्न खोज्दै छन्‌ ।&lt;br /&gt;
सबैले घरमा उसलाई चाहेको हुनाले दया अति खुसी भएकी, र पनि बाआमाका घरलाई बिर्सन सकेकी छैन आमा, बहिनी,भाइहरूसंग टेलिफोनमा कुरा भए पनि बाबुसंग न कुरा हुनसकेको छ नत भेट नै । सङ कोच गर्दै दीपेशलाई एक दिन बाआमासंग माइतीमाभैट गर्न जाऔं भन्नै प्रस्ताव राख्ता उसले जब स्वीकार गयो त्यहदिखिझन्‌ दयाको माया र , श्रद्धा दीपेशतर्फ बढेको छ । मनमनै भन्दै छै,(मैले लोग्ने&amp;quot; भगवानका कृपाले नै यस्तो सज्जन पाएकी छु ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
द्र&lt;br /&gt;
यस्तै रमाइला दिनलाई खल्लो पार्न दीपेशको अमेरिका फर्कनेतरखर घरमा शुरु हुनथाल्छ । दयाले फकाउँदै छुट्टी बढाउन अनुरोध गर्छेतर दीपेशले उसको यस अनुरोधलाई प्रा गर्न असमर्थ रहेको बताउनअमेरिकाको नोकरी गर्नुपर्दा स्वीकार्नु पनै नियम बताउँछ । जांगरदारकोकर्तव्य के हो भन्ने बुझेकी दयाले त्यसपछि यसमा घेरै जोड गर्दिन रसौध्छै &amp;quot;तपाईंको इच्छा आफूले अवकाश प्राप्त नगरुन्जेलसम्म त्यहीनोकरी गर्ने छ कि केही वर्षपछि स्वदेशमा नै फर्कने छ । तपाईंइन्जिनियर हुनुहुन्छ । पैसाको समस्या पनि नपरेको तपाईंले त आफ्नैफर्म खोलेर यही काम गर्न थाल्नु भए पनि हुन्न र ? आफनो देशजस्तो त अरूको देश हुँदैन होला ? यहाँ जे भए पनि आफना भन्ने धेरैछन्‌ । परिवार छ, समाज छ, आखिर घन कमाउनु, यश कमाउनु पनित यिनै परिवारका र समाजका लागि हौ नि ? यिनै हुन्‌ आफनाकोमान, कदर गर्नसक्ने । त्यहाँ प्रवासीलाई भसनासरह पनि गन्दैनन्‌ रे भन्नेसुन्छु । भनाइमा कति सत्य छ, त्यो मलाई थाहा नभए पनि ज्ञानहासिल गर्न विदेशी सहयोग लिए पनि त्यसको प्रयोग स्वदेशमा नै गर्नुदेशसेवा हुन्छ कि भन्ने लाग्छ । हेर्नोस्‌ न, यही हुर्की, बढी, यहीकैअन्तपानी खाएर बाआमाको स्याहारसुसार पाएर यहाँकै शिक्ादीक्षा प्राप्तगरी हामीले आफूतो परिचय बनाउन सक्यौं । के हामीमाथि यस देशकोक्रण लागेको हुँदैन र :&lt;br /&gt;
&amp;quot;हुन्छ तर म आदर्शलाई मात्र होइन, यथार्थलाई पनि मान्छु ।यत्रो भावनामा बग्नै तिमी यति त सौचेर हेर, यो देश, तेरो र यो देश,मेरो भन्न नै गलत होइन र ? हामीले किन मान्न सकिरहेका छैनौं, योएउरा पृथ्वी हो र यहाँ बस्ने हामी सबै प्रकारका मनुष्य मात्र हौं । यहाँके फरक छ ! उस्तै छ प्राकृतिक देन एस्तैगरी बनेको छ मनुष्य शरीरर उत्तै छन्‌ बाँच्ने जाधारभृत आवश्यकताहरू । अझ सीमाना रेखाङ्नगरेका ठाउँमा गएर हेन्यौ भने लाग्छ, हाम्रो सोचाइ कति खुम्चिएकोछु ।”&lt;br /&gt;
दीपेशले आफनो मन्तव्य त्यसरी राखेपछि दयाले भन्छे, &amp;quot;यतिकुरा जानेर तपाईंले यसो भन्नु मलाई खिज्याउनु भएको त होइन ! पूरापृथ्वीलाई एक मानिन थालियो भने यहाँ कार्य विभाजन र शासनविभाजन नभएर कसैले पनि दायित्व नलिइदिदा प्रगति नै रोकिन्छ ।समष्टिगतका आधारमा हेर्नुपर्ने मानवता र मानव सभ्यता मात्र हा ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“सीमाना तोकिनु पर्ने आवश्यकता किन छु भने प्रत्येकचागरिकले आफूनो राज्य सीमानाभित्र रही आआफूनै क्षमता अनुसारआफना भलाइका लागि यिनै प्राकृतिक देनहरूबाट के उपलब्ध गर्न&lt;br /&gt;
ध्ष&lt;br /&gt;
सकिन्छ भनी बद्धि प्रयोग गरी परिश्म गर्दै जानाले नै विकासमा फरकआएको हो । त्यसैले अर्काका क्षेत्रमा पनि अर्काका विकाससंग -निर्लिप्तभई त्यही रमाइरहनुमा आफू र आफूना देशलाई आफैँले निम्न ठान्नुहुनआउँछ कि भन्ने मेरो सोचाइ मात्र बताएकी हुँ ।&lt;br /&gt;
हामीले परिश्चम गर्न सकेनौं, हाम्रो बुद्धि विकास हुन सकेन,आफनो राज्य सीमानाभित्रका प्राकतिक बनोट धनी भएर पनि यसबाटफाइदा लिन सकेनौं भनेर विदेशिनुले झन्‌ झन्‌ हामीलाई पछाडि धकेल्नेत होइन भन्ने लाग्छ ! त्यसैले मैले त्यहाँबाट ज्ञान प्राप्त गरेपछि यहीफर्कने पो हो कि भनेर प्रस्ताव राखेकी हुँ ! गाउँका शहर पस्ने,शहरका विदेशिने सबै विकासको खोजमा भन्छन्‌ । बिकास भनेभागिरहन्छ क्या रे : मृगतृष्णा जस्तै जति नजिक पुग्यो उति परपरत्यस्तै आकर्षण देखाउँदै ।”&lt;br /&gt;
दयाका कुरा निकै घतलाग्दा भए पनि दीपेश फर्केर जान नैतैयार हुँदै आफूले विदेशिनु परेका कारणको साथमाथै यहाँ योग्यताकोपारख नहुने परम्परा बस्तै आएका करा अरनीका चाइना पलायन हुनु रत्यो मरतिकार जसले पलान्चोक भगवतीको मूर्ति अति राम्रो बनाएकालेकलालाई नै मार्न हातखुट्टा दुन्क्याइदिएका उपमाहरू दिदैँ भन्छ, यहाँनोकरी योग्यताले मात्र पाइँदैन । कपावादले योग्यतालाई &#039;झुकाइदिएकालेस्वयं हामी आत्मग्लानीले भतुक्कै हुनुपर्छ । मैले पहिले यहीँ नोकरी गर्छुभनेर कोसिस नगरेका पनि होइन । आफनो देशले पत्याएन विदेशलेबोलाए पछि नाईँ जान्न म भनेर बसिरहुँ : यस्तो भने म गर्न सक्तिनँ ।&lt;br /&gt;
अहिले म एक्लै जान्छु र त्यहाँको चाँजो मिलाएपछि चिठी लेख्तैगरछला । मलाई पनि तिमीलाई छोडेर जाने मन कहाँ छ र : नोकरीछोडन सक्दिन ? म विवश खु दया ।&lt;br /&gt;
दयाले जे जति भने पनि सबैको रायअनुसार दीपेशले अमेरिकाफर्केर जानु उत्तम मानेकाले त्यसमा धेरै जिह्टी गर्न सक्तिन र आँखाभरीआस लिएर बिदा गर्दा खुसुक्क संझाउछे, “चिठी लेख्न नभुल्नु होला, मपर्खिरहन्छु ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
दीपेश गएपछि दयालाई निकै शून्य लाग्छ । माइती जान पनिमन लाग्दैन । अफिसबाट घर फर्कदा झिनो आशाले सताइरहेको हुन्छ रनन्दसंग सोधिहाल्छे, “दाजुको चिठी आयो, मैयाँ ?”&lt;br /&gt;
लोग्नेसँग यति छिटो, यति गहिरो प्रेम बसेको संझैर दयाछक्कपर्दै सोच्छु, “तिनै बाआमासंग जन्मेदेखि अहिलेसम्म रहँदै आएकामात्यस संबन्धको वियोग बिर्सेर यो नयाँ व्यक्तिप्रति ज्यादा संझना कसरी रकिन आउँदै छ ! संस्कृतिको या, धर्मको या स्वार्थको, केका शक्तिले&lt;br /&gt;
दद&lt;br /&gt;
मलाई यस्तो बनाइरहेछ : संखदःख भन्न नै लोग्ने हो, लोग्नेको सबै अबतेरो आफनो हो, भनेकाले त्यसैका मोहले ज्यादा चाहेकी त होइनआमावबाबुसंग त जीवन नै गाँसिएको छ, उनीहरू गल्तीनै भएमा पनिक्षमा दिनसबने माया र ममताको भण्डार छातीमा राखेर वसेका हुन्छन्‌ ।त्यसैले यतातर्फको चाहना बढ्नु मायाको भन्दा वढी मोहले नै हो तया छोडिदेला भन्ने डरले हो ? यस्तो प्रश्न उद्ठाएए दया आफ्नैसोचाइमा अल्मलिन्छे । यही हो भनेर ठम्याउन नसकी पेरणासंग बसेरयसबारे छलफल गर्ने निधो गर्दै मनलाई लगाम लगाउँछै ।&lt;br /&gt;
प्रेरणा दयाकी खुबै मिल्ने साथी&#039; हो ! उसको विवाह भई नानीसमेत भइसकेको र दीपेशका परिवारमंग पनि चिनारी भएकाले उसकाघरमा जाँदा कसैले पति केही नभन्ने भएकाले त्यहाँ गएर उही प्रश्नदोहोन्याउँदा प्रेरणाले भन्छे, “शुरु शुरुमा तिमीले भन्ने भैँ मोह, त्रास,स्वार्थ, सामाजिक रीति अनि धर्मले नै अङ कश हाल्छ त्यसपछि जीवनकाहरेक क्षेत्रमा साथ रहँदा माया बस्तै जान्छ । तिमीले दीपेश जस्तो लोग्नेपाउनचाहि संयोग भन्छुयौ या भाग्य यो राम्रो भएको छ । उसले कुनैकुरामा पनि कहिल्यै कुनैभन्दा कम हुन्‌ परेन । एकफेर, जागिर खानभनी अन्तर्वार्ता दिदा अनुत्तीर्ण भएको थियो र यहाँ नोकरी नै गर्दिनँ भनेरआवेशमा आई एउटा फर्म भरेर अमेरिकामा कै पठाएको थियो, तुरुन्तैबोलाइहाले । त्यसपछि पनि यसै कहाँ गएको हो र ! मलाई योचाहिन्छ त्यो चाहिन्छ भनेर लेखी पठाउँदा पति त्यो समेत दिन राजीभएर बोलायो । अहिले त नोकरी पनि पक्का भईसक्यो रे ः&lt;br /&gt;
त्यसैले तँलाई त्यहाँ लैजान उसलाई कुनै गाह्रो पर्दैन । केहीदिनको मात्र कुरा हो । अँ, त्यहाँ पुगेपछि तँ पनि काम गर्न याल्नू ।विदेशमा काम गर्दा कस्तो हुन्छ भन्ने अनुभव त लिन सकिन्छ ।&lt;br /&gt;
“मैले आफूलाई भाग्यमानी नै संझेकी छु । बिदेशमा यति लामोसमयसम्म बस्ता पनि कुलतमा नपरेर पैसा कमाई घर पठाउनु भनेकोसराहनीय नै हो । अब पीर लाग्न यालेको अर्कै कुराले छ । अब तउहाँले पहिलेको जस्तो फुक्का आफूलाई सोच्नु हुँदैन । विवाहका बन्धनलेयसतर्फको दायित्व कति संझाउने हो भन्ने छ । विवाह भएर एक महिनापनि साथ बस्न पाएका छैनौं । त्यसैले उहाँको पूर्ण स्वभाव बुझन सकेकीछैन । यहाँबाट जानु भएकै आज झण्डै १५/२० दिन भइसक्यो । न तटेलिफोन आउँछ न त चिठी नै । अमेरिका फर्कने बेलामा पनि मैरोएउटै अनुरोध “चिठी पठाउदै गर्नोस्‌ है&amp;quot; भन्ने थियो । ख्वै कुनै समाचारत्यहाँको पाउन सकेकी छैन । यता आफूनो भने .....?&amp;quot; यति भन्दै कलज्जाउँदै टक्क अडझछै ।&lt;br /&gt;
६७&lt;br /&gt;
गन्‌ भन्‌ के भयो तेरो : आँसले तक्या भिज्यो कि मनकँडिएर छियाछिया भयो ? यही हो हाम्रो । मायाका खानी हामी,यसैगरी भावनामा डुबिरहन्छौ, अन्तर्मखी भइरहन्छौ, यसलाई हामी आफनोकम्जोरी मान्ने कि नारीस्वभाव भन्ने कि संस्कारको छाप ज्ञ मलाई लाग्दैछ, दया, यो स्थिति हाम्रा छोराछोरीका पालामा पुगेर पनि जान्छ जादैनभन्न सकिदैन समय निकै अगाडि बढी सकेको छ दायित्वले ठूलो भागओगटेको छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
मेरो कुरा सबै सुन्दै नसनेर तिमीले एक्लै यति लामो कुराफलाक्यौ । मेरो अर्घ त्यो होइन । अब हामी दुई मात्र नभई तीद हुनेभयौं जस्तो भान मलाई हुन वालिरहेछ भनेर दयाले आफनो स्थितिप्रेरणालाई बताएपछि, प्ेरणा खुशी हुँदै भन्छे, “अब त झन्‌ राम्रो भयो। तिमीले समय काट्ने खेलौना जोडन थालिछ्यौ । अनि यो कुरापरिबारलाई थाहा भइसक्यो त ?”&lt;br /&gt;
“कसरी भन्नु : यो घरको काइदा कदर हाम्रो माइतको जस्तोछैन । अझै के कोसंग भन्न हुन्छ र के भन्ने वाहा पाउन सकेकीछैन । यस्तो कुरा कसलाई सुनाउने म क&lt;br /&gt;
यसरी दयाले आफनो असमर्थता बताएपछि प्रेरणा भन्छे, “गजबकीछेस्‌ त॑ ? अहिले कसैलाई पनि नबताएर पनि यो लुक्ने कुरा हो ! त्यसबेला घरकाले मात्र होइन, टोलकाहरूले समेत थाहा पाउँछन्‌ । यस्ताकुराको खबर घर परिवारलाई पहिले दिनुपर्छ । फेरि तिम्रो त लोग्ने पनियहाँ छैन । भरखर विवाह भएको छ ।”&lt;br /&gt;
“उहाँ नभएर कै भयो त ? नानी त उसैको हो, यसमा कुनैशङ्का यसै लिन कहाँ पाइन्छ :&amp;quot; दया यति भन्दै प्रेरणालाई हेर्छ र प्रेरणापनि दयाले उसले बोलेका कुरामा त्यस्तो अर्थ लगाएकाले दिक्कहुँदै भन्छै,“होइन, कसले के भन्न आएको छ : यस्तो कुरा गरेर बचाउ लिनतम्सिन्छेस्‌ । यस बेलामा स्वास्थ्य परीक्षण भइरहनु पर्छ, कसैले ध्यानदिनुपर्छ भनेर पो त मैले त्यसौ भनेकी । तिमीलाई भन्न अप्ठ्यारो लाग्छभने म नै गएर यो शुभ समाचार सुनाइदिन्छु । भयो अब ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
च्रेरणाले लिएको जिम्माबारै दयाले त्यसपछि अरू केही पनिभन्दिन बर अर्को पनि सहयोग गर्न अनुरोध गर्छे, “ए .... सक्छैस्‌ भनेउहाँको अमेरिकाको टेलिफोन नम्बर पनि लिइदेन । बाहिरैबाट भए पनिम एक्फेर कुरा गर्छु । हेर्न म कस्ती हुस्म छु । छुट्टिने नै भएपछित्यहाँको टेलिफोन नंबर माग्नु पर्दैनथ्यो ? त्यस्तो खर्च गर्ने बानी नभएकीमैले त्यस बेला यसको आवश्यकता नै बिर्सिए । अझ अचम्मको कुरा तयो छ प्रेरणा, मसंग उहाँको ठेगानासम्म पनि छैन ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
दद&lt;br /&gt;
एक दिन साह्रै सङ,कोच मानेर भए पनि नग्दसंग सुटुक्कउहाँको ठेगाना के मागेकी थिएँ क्रा उनीहरूलाई प॒गी हाल्यो । नन्दलेमैले कुनै माग्नै नहुने कुरो मागेकी जस्तो गरी हाँसेर सबैलाई सुनाउनुभयो । उनीहरूका अट्टहासको आवाज सुनेर म लाजले भतुक्क भएँ ।तैपनि न त्यो सुन्नेले न त पुनाउनेले मलाई अमेरिकाको ठेगाना दिए ।व्यवैं किन माग्न गएँछु भनेर आफैँसंग कुपित भए । लौ तँ नै भन्‌ मैलेआफूना लोग्नेको ठेगाना माग्दैमा तिनीहरूलाई त्यसरी किन हाँसेर उडाउनुपर्थ्यो ?&lt;br /&gt;
तँ लाज मान्ने भएकीले नै उनीहरूलाई जिस्क्याउन मज्जालाग्यो होला । फेरि. जिस्क्याउने पनि त भरखर विवाह भएकैलाई त होनि ? साना साना कुरालाई लिएर पनि तँ कति सोचेर बस्छैस्‌ ? यसबानीलाई छोड्नेतर्फ लाग्‌ । नत्र दुःख पाउलिस्‌ । जे भए पनि तेरो यसपटकका दुवै काम म गरिदिन्छु त्यसपछिको जिम्मा भने म लन्नँ । त्योतैले आफैँले सल्टाउनु पर्छ । तेरो काम गरिदिए बापत मलाई केदिन्छेस्‌ ?”&lt;br /&gt;
“मसंग के छ र तँलाई दिउँ : यस्तो व्यापारीको जस्तो कुरागर्न कहिलेदेखि थालिस्‌ !”&lt;br /&gt;
“यो अनुहारलाई उज्यालो पारेर एकफेर हाँसिदित त सम्छेस्‌ ?तँ धेरै दुखी भइस्‌ भने तेरो त्यो अदृश्य नानी पनि तँजस्तै चिन्ता लिनेहुन्छ । अनि के त्यसको नाम चिन्तार्माण राख्छेस्‌ ?”&lt;br /&gt;
दया पनि हांँस्तै भन्छे, “होइन, त्यसको नाम म हँसमुख राख्छु ।तिमीले हँसाइ हाल्यौ ।&amp;quot; दुवै केही छिन हाँसीखुशीले बिताउँछन्‌ र भोलिआफिसबाट फर्केपछि दयाका घरमा पस्नै बाचा गरेर पेरणाले दयालाईबिदा गर्छे । ७ १ ०&lt;br /&gt;
साधनाले जहाजका ढोकामा उभिएर जहाजभित्र छि्दैका सबैपात्रीहरुलाई हाँसेर नमस्कार गरी अभिवादन गर्छै । जब जहाजको ढोकाबन्द गरिन्छ र त्यो धावन मार्गतर्फ बढ्छ यात्रीहरू “सिटको पेटीबाँध्नोस्‌” भन्ने सङ,केत अनुसार धमाधम पेटी बाँध्न थाल्छन्‌ ।परिचारिकाहरू हातमुख पुस्ने रुमाल बाँड्दै यात्रीहरूले पेटी बाँधे तबाधेकोजाँच्तै ओहोरदोहोर गर्न थाल्छन्‌ । केही छिनमा नै जहाजले टाउकोउठाएर जमिन छोड्दै आफना पाङ गाहरू पख्रेटामुनि लुकाउँछ र निर्धारितउचाइ समात्न आफतो गति बढाउँछ । जब जहाज आफनो उचाइकोतहमा आउँछ “पेटी बाँध्नोस्‌&amp;quot; भन्ने सङ केतको “बत्ती निभ्छ ।&lt;br /&gt;
अनन्त आकाशमा बादललाई चिर्दै बढिरहेका जहाजभित्र साधनालेजीवन सुरक्षाको ज्याकेट प्रयोग गर्ने विधि&#039; बताइरहेकी छ । सबै यात्रीहरू&lt;br /&gt;
“६९&lt;br /&gt;
उसले सङ,केत गरेको ठाउँ हेर्न र पहिरन कसरी गर्नुपर्छ भनेर आफैलेलगाई सिकाउन थालेकीलेै त्यो तरिका सिक्न साधनामाथि आँखाघुमाइरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
शुरु शुरुमा साधनालाई त्यतिका यात्रीहरूलाई आफूतर्फ ध्यानआकृष्ट गराई त्यो विधि सिकाउँदा सङ कोच लागे पनि अब उ अभ्यस्तभइसकेकी छ । जब जब अर्की परिचारिकाले बताउन बाल्छै, त्यहीअनुसार उसका हातहरू चल्दै सङ केत दिन वालिहाल्छन्‌ । जहाजभित्रयात्री कक्षमा परिचारिकाहरू भान्छा र स्टोभमा खाना तताउन र मिलाउनथाल्दा खत्राकखुत्रुकको आवाजका साथसाथै खानाको बास्ना हरहर चल्नथाल्छ, एउटा यात्रीले परिचारिका बोलाउने घण्टी थिच्छ । पिलिक्क बत्तीबल्नासाथ साधना छिटोछिटो हिडेर त्यस यात्रीनौजक पग्छे र बत्तीनिभाउँदै बोलाउनको तात्पर्य सौध्छै । यात्रीबाट जवाफ अनौठो आउँछ ।क अलि त्रस्त भएर नै सोधी रहन्छ, &amp;quot;तपाईंले त्यो ज्याकेट लगाउन किनसिकाउनु भयो र कुनै आपत्‌ आएकाले बताएको त होइन ! हो भने,भन्नोस्‌ हामी अहिले नै लगाएर बसिहाल्छौँ । त्यस बेला अल्मलिएलालगाउनै पनि नजालिएला बरु ओलिँदा यसको जञ्रत परेन भने तपाईंलाईफिर्तै दिउँला :”&lt;br /&gt;
यात्रीको यस्तो प्रश्न सन्दा साधनाले के थाहा पाउछ भने कपहिलोपल्ट जहाज चढेको हौ र नग्नताको साथ भन्छे, &amp;quot;यो विधिसिकाएको आपत्‌ आइपरेको छ भनेर होइन, आपत्‌ आइपरेमा के कस्तोगर्नपर्छ भनेर उपाय मात्र सिकाएको हो । केही सङ्घ कट पर्नआएछ भनेहामी खबर गर्छौं । त्यसबेला अक्सिजन मास्क यहाँबाट आफैँ झर्छ ।हामी फेरि आएर नजान्नेका लागि लगाउन सिकाउँछौं र अरूलाईलगाउन पनि सिकाउँछौं । यो पढ्नोस्‌, यसमा पनि सिकाइएको छ भन्दैपढ्नलाई सिटका खल्तीबाट एउटा प्रति झिकेर दिन्छे । त्यसै बेला अर्कीपरिचारिकाले पेय पदार्थ र खाना बाँड्न धालेको सूचना दिएको सुनिन्छर त्यस यात्रीलाई निश्चिन्त भएर बस्न र खाना खाएपछि आरामलिनलाई के कसो चाहिन्छ त्यो भन्नलाई अनुरोध गर्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
केही थाहा नपाएको त्यस यात्रीले भनोस्‌ के : उसैलाई सोध्छ,“के के दिन सक्नुहुन्छ, त्यो थाहा पाए पो त यो चाहिन्छ भनुँ ?”&lt;br /&gt;
“कम्मल, तकिया, शिर दुख्न लागेमा र उल्टी आउन लागेमाऔषधी सबै छन्‌ । उल्टी थाप्ने यौ ब्याग भने हेर्नोस्‌ यहाँ छ भनेरदेखाइदिन्छै ।” वि&lt;br /&gt;
यतिकैमा अर्को सिष्टबाट घण्टीको आवाज सुनिन्छ । साधना त्यहाँपुग्छु र सहयोगका लागि सोध्छ । त्यस यात्रीले केवल पढ्ने लाइट&lt;br /&gt;
७०&lt;br /&gt;
बाल्नलाई बोलाएको रहेछ । त्यो सुनेर साधना खिस्स हाँस्तै बत्तिबालिदिन्छे । अर्का यात्रीले सबैकहाँ साधना पुगेकी र उसकहाँ नआएकीलेअलि रिसाउँदै भन्छ, “यहाँ खोइ, के चाहिन्छ भनेर सोध्ने चलन छैन किकसो ? म जाडाले अघिदेखि काँपिरहेछु । अन्तराष्ट्रिय क्षेत्रमा उड्नथालेपछि यस्ता कुरामा ध्यान दिनु पनि पर्छ । कसरी यिनीहरूले प्रतिर्स्पधागर्लान्‌ खै ।!&lt;br /&gt;
साधनाले, &amp;quot;सरी” भनेर कम्मल निकालेर दिदै सोध्छे, “चियाकफी या कुनै डिङ् ल्याकै !&amp;quot; उसले त्यसो भन्नाको आशय सेवामासुधार ल्याउनलाई हो भन्ने देखाउन भन्छ, “मलाई अरू केही चाहिदैन ।बरु तपाईंहरूले यात्रीहरूकहाँ बीचमा गएर के कसौ चाहिन्छ भनेर सोध्नेगर्नोस्‌ । अरू एयरलाइन्समा कस्तो हुन्छ, यहाँ भने !&amp;quot; यति भन्दै गमक्कपरेर कम्मल ओढ्छ र आँखा चिम्लिन्छ ।&lt;br /&gt;
साधनाले उससंग केही बहस गर्दिन र एकफेर केबिनको तलदेखिमाथिसम्म घुमेर सबै यात्रीहरूलाई निरीक्षण गर्छौ र कुनै कूनैलाई हाँसेर,“के ल्याऔौ&amp;quot; भनेर पनि सोध्छ । कूनै यात्री जिस्कने पाराले भन्छन्‌ पनि,“के छ तपाईसंग त्यो सबै दिनोस्‌ ।&amp;quot; यस्तो जवाफ सुनेपछि त्यहाँउभिइरहनु उचित ठान्दित र आफनै ठाउँमा फर्कन्छ ।&lt;br /&gt;
यीमध्ये एउटा यात्रीले उससँग सोध्छ, “तपाईंले यो काम गर्नथाल्नुभएको कति भयो !” साधना यात्रीको प्रश्न सुनेर स्तम्भित हुन्छै ।यात्री फेरि बोल्न थाल्छ, “यस्तो प्रश्न सोधेकामा नराम्रो नठान्नोस्‌ । मपहिले नै माफ माग्छु । त्यसपछि साधना झस्किन्छे र जवाफ दिन्छे,&amp;quot;किन नराम्रो मान्नु मेरो सेवामा केही कमी पो भयो कि ?”&lt;br /&gt;
“तपाईंले गर्नुसम्मको सेवा गरेको, भनाइ सहेको देख्तादेख्तै पनियसो भनुँला के ? तपाईंलाई देख्ता र तपाईंको स्वभाव देख्ता तपाईंकुलीन परिवारकी छोरी हो कि जस्तो लाग्यो र सोधेको अनि तपाईंकोबाबुको ताउँ के नि ? घर त काठमाण्डूमै त होला ?”&lt;br /&gt;
साधनालाई यात्रीको सबै जवाफ दिनु जरुरी संझिन्न र आफूअलि व्यस्त भएकी देखाउँदै एक छिन ल, फेरि आउँछु भनेर जान्छे रमनमनै भन्छे, “अर्काका बाबुको नाम र ठेगाना जान्न यसलाई कतिचासो परेको : सायद यसले पनि सोचेको होला, कुलीन परिवारकोछोरीले यस्तो नोकरी गर्दिन भनेर । यस नौकरीका सेवामा त्यस्तो कै छ१ यहाँ काम गर्नै नहुने : यस्ता सोचाइमा परिवर्तन कहिले आउने&lt;br /&gt;
। |&lt;br /&gt;
फेरि घण्टी बजेको सुनिन्छ । त्यसै यात्रीका सिटमाथिको बत्ती&lt;br /&gt;
पिलिक्क बलेको देखिन्छ । साधनाले सोध्छे । उसले उही अघरो प्रश्नको&lt;br /&gt;
क्ष&lt;br /&gt;
जवाफ खोज्न उसलाई बोलाएको होला । त्यसैले उसले आफना साथीलाईत्यस. यात्रीकहाँ जान अनुरोध गर्छे ।&lt;br /&gt;
बन्दना त्यहाँ प॒गेर बत्ती निभाउँदै बोलाउनको अर्थ सोध्छे । त्यसयात्रीले पनि अर्कै परिचारिका आएकाले अन्कनाउँदै चिया ल्याउनलाईप्वाक्क भन्छ ।&lt;br /&gt;
वन्दनाले साधनाको नजिक आएर भन्छे, “चिया पिउने रे, अबत्यो भने तँ नै लिएर जा, म त जान्न । त्यो बुढो मलाई त कस्तोकस्तो लाग्यो । हामीलाई हेरान पार्न के के बोल्छ के के ? मैले अरूत केही पनि बुझिनँ, &amp;quot;चिया&amp;quot; भनेको मात्र सुने र &amp;quot;हस्‌&amp;quot; भनेरआइहाले ।&lt;br /&gt;
“तिमीले अर्डर लिएर आएपछि जान्न भनेर हच्कन पाइन्छ :अहिले चिया लिएर तिमी जाक र त्यसर्पाछा बोलायो भने म जाउँला ।यात्रीहरूले जे जस्दो भने पनि आफूले प्याँच्च बोलिहाल्नु हुँदैन । यतिछोटो समयका साथले के नै हुन्छ । उनीहरूको कुरा सुनिद्रिएर यदितिनीहरू खुशी हुन्छन्‌ भने हामीले सुनिदिएर के हुन्छ !”&lt;br /&gt;
साधनाको यति कुरा सुनेपछि वन्दनालाई चिया लिएर जान करैलाग्छ । क चिया लिएर त्यहाँ पुग्छ र उसलाई दिदै भन्छे, “चिनी रदुध यसमा छ, कति चाहिन्छ मिलाएर खानु होला ।”&lt;br /&gt;
चिया समातेर दुध र चिनी मिलाउँदै यात्रीले सोध्छ, &amp;quot;दुवईबाटफयाङ्गफोर्ट पुग्न कति समय लाग्छ : प्लेनमा वस्तावस्तै कहिले पुगिएलाजस्तो लाग्दो रहेछ । तपाईंहरूलाई लाग्दैन : सँधै यसरी उड्नु पर्दा कतिपट्यार लाग्दो हौ ।”&lt;br /&gt;
“पट्यार मानेर हामीहरूलाई कहाँ पुग्छ र ? बरु तपाईलाईझर्को लागेको भए यो म्यागजीन पढ्नोस्‌, समय बितेको पत्तै लाग्दैनभनेर साङ गीला म्यागजीन पढ्न दिन्छे ।&lt;br /&gt;
म्यागजीन नसमातिकन भन्छ, &amp;quot;जहाजभित्र न त पढ्नै सक्छु नत सुत्न नै । हेर्नोस्‌ न, त्यता, यहाँ कति जना मस्तसंग निदाइरहेकाछन्‌, आफनो बानी भने यस्तै छ । मान्छेले दुःख पाउने गरेको नै आफनैस्वभावले हो ।&amp;quot; बन्दना त्यतिखेर हिडीसकेकी हुन्छे । यात्रीले आफूलेमात्र बोली रहेको थाहा पाएर चुप लाग्छ ।&lt;br /&gt;
जहाज उड्दाउड्दै बादलभित्र छिर्छ । हृप्प हुन्छन र माथि तलहुँदै वरथराउन थाल्छ, सिटको पेटी बाँध्नोस्‌ भन्ने सङ केतको बत्ती फेरिबल्छ । हबाइ परिचारिकाहरू यात्रीहरूले पेटी बाँधे नबाधेको जाँच्तैकुनैलाई बाँध्नमा सहयोग गर्दै घुम्न थाल्छन्‌ । एकफेर, जहाज उफ्रदा&lt;br /&gt;
पि&lt;br /&gt;
साधना भन्नै यात्रीमाथि परेकी थिई । सिट समातेर आफूलाई समालिहालीर पो केही भएन । ॥&lt;br /&gt;
परिचारिकाहरूको लागि सुरक्षित राखेका सिटमा पुगी । क, पतिउनीहरूसंग बसेर पेटी बौ ध्दै त्यो घटना साथीलाई बताउछ र खृवसंगसबै हाँस्छन्‌ । हाँसोले उज्ज्यालो भएको अनुहार त्यस यात्रीले पनि देख्छ। उसको ध्यान साधनातर्फ नै खिचेको खिचिएकै हुन्छ । साधना र त्यसयात्रीको आंखा जब जुष्छन्‌ साधनाले पर्दा तानेर यात्री कक्षलाईछेकिदिन्छे ।&lt;br /&gt;
केही समयपछि नै जहाज पुन: नियन्त्रणमा आउँछ । यात्रीहरूरगरगाउन थाल्छन्‌ । शौचालयतर्फ जाने, त्यस बाहिर पर्खने रसाथीहरूका सिट नजिकै गएर उभिई उभिई कुरा गर्न क्रम चल्नथाल्छ ।साधना फेरि त्यस यात्री कक्षामा घुम्दा उसले प्रश्न गरिहाल्छ ,“तपाईंमसंग साँच्चै रिसाउनु भयो जस्तो छ ? मैले तपाईंको परिवारबारे सोध्नुनपर्ने थियो, सौधिहालै, माफ गर्नोस्‌ है !&amp;quot; उसैका साथमा बसेको यात्रीटाढो भएर उसको कुरा सुनिरहेको हुन्छ । साधनाले “छैन, मलाई यतिसाता कुराले रिसै उठाउँदैन तपाईं ढुक्क हुनोस्‌&amp;quot; भन्दा त्यो यात्री दङपर्छ । अर्का यात्रीले अब फयाङफोर्ट पुग्न कति बाँकी छ भनेर सोध्छ रसाधनाले एक घण्टा मात्र बाँकी छ भन्ने जवाफ दिदा त्यो यात्री अलिगंभीर भएर भन्छ, “त्यसो भए हाम्रो छुट्टिने बेला आयो ।” एकफेरलामो स्वास तान्छ र फेरि भन्न वाल्छ, “मेरो पनि तपाईं जसौ छोरीथिई । त्यो पनि यस्तै विमान परिचारिका थिई । तपाईंसंग यहाँ भेट हुँदामेले त्यसैलाई संझिरहेँ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“अहिले तपाईकी छोरी के गर्दै हुनुहुन्छ त : यो काम छोडिदिनु भयो !&amp;quot;&lt;br /&gt;
३ “याहा छैन के गर्दै छे : घरबाट उड्न हिडेकी फेरि फर्किन ।मैले यस्तो नोकरी नगर भन्दा तपाईंहरूले यहाँ यात्रीहरूसंग गरेकोव्यवहार :र तिनीहरूलाई पुच्याएको सेवा देखेर मेरा मनले त्यस छोरीलेपति: यसै गर्थी होली भनेर कुरा खेलाइ रह । मलाई एकपटक त्योभएको जहाज चढ्ने रहर थियो । त्यो पुग्नै पाएन ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
क एकपटक भावविभोर हुन्छ । साधनालाई के भनेँ के हन्छ ।त्यस यात्रीले भन्न छोड्दैन क भन्छ, &amp;quot;तपाईंहरूजस्ता कलिला केटीहरूयसरी उडिरहेको देख्ता कस्तो कस्तो लागिहाल्छ र के के भन्न थाल्छुपत्तै पाउन्न । भगवानले त्यस्तो अन्याय कसैमाथि पनि नगरून्‌ ।साधनाको मन पति उसको कुरा सुनेर विरक्त हुन्छ र वास्तविकतासंफाउन भन्छे, “जीवन लिएपछि मर्नु त परिहाल्छ । कुनै न कुनै कुरा&lt;br /&gt;
७३&lt;br /&gt;
निमित्त भएर आउँछ नै । ङ मात्र होइन, त्यस जहाजमा चढ्ने कतिथिए सवैको त्यस्तै गति त भयो होला ? यो सबै भवितव्य हो । उड्नैर गुड्नेको त कुरा छोडी दिऔं, हिड्नेहरूलाई त कुन बेला के हुन्छुथाहा हुँदैन । यस्ता क्रा संझैर किन दु:खी हुनहुन्छ !”&lt;br /&gt;
यति भन्दै क त्यहाँबाट उम्केर फेरि आफना साथीहरू भएकाठाउँमा पुग्छे । त्यस यात्रीको क्रासनेपछि उसपति सहानुभूति लाग्नुकासावसाथधै स्नेह लाग्न थाल्छ र एउटा कागजका टुक्रामा आफनो नाम रठेगाना लेखेर उसलाई दिदै भन्छे, “काठमाडौं फर्केपछि भेटगर्न आउनुहोला । मेरा बाआमासंग पनि चिनाजानी हुन्छ । मलाई चाहनु हुन्छ भनेतपाईले &amp;quot;छोरी&amp;quot; भन्नु भएको थियो त्यही छोरी मसंग आकाशमा नै भेटभयो र क ड्युटीमा रहेका बेलामा उससंग उड्ने इच्छा थियो भन्नुभएकोपनि आज मसंग उड्दा प्रा भयौ । त्यस यात्रीले साधनाले दिएकोठेगाना लिएर छक्कपरी हेर्छु । साधनालाई अब त्यहाँ अरूबेर अड्नेफुर्सत हुँदैन । अवतरणका लागि सेवाका तयारीमा लाग्नुपर्ने बेलाभइसकेको हुन्छ ।&lt;br /&gt;
&#039; त्यस दिन होटलमा पुगेपछि साधनालाई त्यस यात्रीको निकै मायालाग्छ र उसकी छोरीबारे कल्पना गर्न थाल्छे । यो पेशा निश्चय नैज्यादै कठिन हुनुको सावसावै आकर्षक पनि छु । सरसर हेर्दा हामी सबैशान्त देखिन्छौँ । राम्रो लगाएर, श्रृङ्गारिएर हांस्तै सेवामा हाजिर हुनु,ठाडो जवाफ यात्रीलाई दिनुहुन्न भन्ने सिद्धान्तको पालना गर्दै जानु,आकाशमा उड्दा सबै यात्रीको केन्द्रविन्दु भई सहयोगी भई दिनु कत्रोकठिनको जिम्मा छ, जसलाई हामीले शीतल तरिकाले निर्वाह गर्नुपर्छ ।&lt;br /&gt;
सबै यात्री एकै प्रकारका सभ्य हुँदैनन्‌ । कुनैको दृष्टि हामीमाथिअति नै तुच्छ हुन्छ मानौं हामी सेवाका लागि होइन, यात्री मनोरन्जनकालागि त्यहाँ खटिएका छौं । त्यही भावना लिएर जिस्क्याउने, सताउने,त्यतिले चित्त बुर्भेन भने गाली गर्ने कुनैले गर्छन्‌ भने कुनैले “पैसातिरेका छौं यसै भनेका छैनौं तिम्रो एरलाइन्सलाई छानेर आउनुको मतलवयही व्यवहार पाउनलाई हो” भनेर असन्तोष व्यक्त गरेको पनि सहेरबस्नुपर्छ । सबै यात्रीले सोचेका हुन्छन्‌ उनीहरूलाई एक एकलाई समयदिएर सेवा गरून्‌ तर हमी चार पाँच परिचारिकाले छोटो समयभित्र सबैयात्रीहरूलाई त्यस रूपको सेवा पुन्याउन सक्तैनौं र तोकिएको सेवा मात्रगर्दा, छोटो जवाफ दिएर आफू काममा व्यस्त हुँदा चढेकी र बढेकी भन्नेलान्छना सुन्नपर्छ र त्यस्तै विभिन्न मौग गर्दा आफनो असमर्थता व्यक्तगर्दै “सरी” भन्यौ भने उनीहरू झन्‌ रिसाउँछन्‌ । खासगरी खाना रपेय पदार्थ दिदा कोही शाकाहारी भइदिन्छन्‌ भने कोही गुलियो नखाने,&lt;br /&gt;
छा&lt;br /&gt;
कसैलाई अमिलो पिरो चाहिने इत्यादि । तोकिएको खाना र ताकिएको पेयपदार्थ लिएर उडेका हामीले माग अनसार दिन नसक्ता आफू रएरलाइन्स बारे गाली गरेको सुनेर पचाउन पर्छ र मृसुक्क हाँसेरभावहीन भई फेरि काममा जुदनुपदा निकै मानसिक कष्ट सहनुपर्छ । योकठिनाइ हामीलाई देख्नेहरूले बुझन सक्तैनन्‌ र भन्छन्‌, &amp;quot;म्या मोज छयिनलाई ? हातभरि पैसा छ रातदिन खुट्टा देशविदेशमा पर्छन्‌ ।जोमसोमको स्याउदेखि दुवई र हड्डङको सुन भित्रयाउन पाउँछन्‌ । यस्तोबोल्दा के सौच्न बिर्सन्छन्‌ भने हामीमाथि पनि कम्पनीको नियम रसरकारी कानुन लाग्छ भनेर । हाम्रो अर्को कठिन अवस्था त त्यो वेलाआउछ जब जहाज :- उड्दाउडंदै आपतकालीन अवस्थामा पुग्छ । यात्रीहरूकोसुरक्षाको व्यवस्था गर्नु, उनीहरूको चिच्याइ, घवराहट, शुवावासी सबै कोसामना गर्दै र तिनलाई सान्तावना दिदै हौसला दिन हामीले अर्गाडबढ्नपर्छ । त्यस अखतको हाम्रो अवस्थाको ज्ञान कसैलाई पनि हुँदैन ।अरुले त भन्छन्‌,” ती परिचारिकाहरूले के गरे आफैँ सुरक्षित हुन खोज्दैथिए । हामीलाई हेर्ने को ः “&lt;br /&gt;
यस्ता कुरा मनमा खेलाउँदा खेलाउँदै त्यो दिन सभझन पुग्छे जुनबेला क आन्तरिक क्षेत्रमा उड्दै थिई । श्रावणको महिना थियो, आकाशकाला बादलले ढाकेको थियो । जहाज उडेको केही समयपछि नै मौसमअरू खराब हुँदै जानथाल्यो । हावाका झोक्काले जहाजलाई कहिले यतात कहिले उता हुत्याउन थाल्यो । जहाज फर्कने स्थितिमा पनि आउनसकेन । यात्री कक्षामा कोही बान्ता गर्न थाले भने कोही राम...रामभन्दै भगवानलाई गुहार्न थाले । कोही लौन नि अब कहाँ समाङै भनेरकराउन थाले भने एउटी आइमाई यात्रीले उसलाई नै च्याप्प समातेरभन्न लागी, &amp;quot;लौ न मेरो त पेट दुख्न थाल्यो नानी पो जन्मन्छ कि :&amp;quot;&lt;br /&gt;
भित्रभित्रै आत्तिएकी त क पनि थिई तर गरोस्‌ के आफनामनको व्यवा उसले कसैलाई पति सुनाउन सक्तिनधिई । मुखमा घैर्यल्याई यात्रीलाई ढाडस दिनु परेको थियो, “नहडबडाउनुहोस्‌ डराउनु पर्नेकेही छैन हाम्रा कप्तान साहेबहरू खली छन्‌, एकै छिनमा ठिक भइहाल्छ। यौ गडवड खाली मौसमको खराबीले मात्र भएको हो ।&amp;quot; वास्तवमात्यस वेला जहाजले आफूनौ बाटो छोडी निकै पर  हतिहाकको थियो रकप्तानहरूले ठिक बाटामा ल्याउन हरप्रयास धिए । उनीहरूकुहिरोका काग भइरहेका थिए । अवतरण भइसम्नु पर्ने समयभन्दा झण्डैआघा घण्टा बढी जहाज उडिसकेकाले त्यहाँ इन्धनको समस्या आइपर्छकि जस्तो स्थिति देखापर्न लागेको थियो । तर त्यसै बेला फेरि भयड्ररकोहावा चल्नाले जहाजै हृत्तिन थालेको थियो यात्रीहरू बेहोस हुने स्थितिमा&lt;br /&gt;
000&lt;br /&gt;
पुग्न लागैका मात्र के थिए जहाजलाई कप्तानले नियन्त्रणमा लिन सफलभए र एकँ छिनमा बादललाई छल्दै जहाज उज्ज्यालोतर्फ बढ्न थालेकोसबैले चाल पाए । बिस्तारै यात्रीहरू शान्त र सुस्त हुँदै गएका थिए रसाधनाले पनि त्यस आवस्थाबाट छुटकारा पाएर आफना सिटमा आईपिना पछुतै आफना बावआमालाई संभैकी थिई । उनीहरूका संझनालेकण्ठ रुद्ध भएको त्यस बेलाका पीडाका सेंझनाले अहिले पनि उसकाआँखा रसाउन थाल्छन्‌ । अनि संझन्छे त्यस यात्रीकी छोरीलाई उसले पनियस्तै समस्या जहाजभित्र भोगी होली । तर हामीले जस्तो आपत्‌बाटसुरक्षित भएको खबर दिन नपाएर आफैँसहित हराई ।&lt;br /&gt;
मैले यसरी आपतृबाट बचेर घरपुगेपछि आमासंग टाँसिएर रोईशान्त भएकी थिएँ तर त्यस यात्रीले छोरीलाई तातो दिएर उसको आँसुपुछीदिन नपाएर आफैँ उसका लुगाहरू समातेर कति रोयो होला ।साधनालाई यस कल्पनाले त्यस यात्रीको अनुहार संझाउछ र त्यसैकासाथसाथै उसकी छोरीको अनुहार कोर्छौं जो आत्तिएर बाआमालाई पुकार्दैहँदै भनी होली &amp;quot;मेरा बाआमा, म मरेँ भने तपाईंहरूले धेरैनलिनुहोला ?”&lt;br /&gt;
यस सोचाइले दिक्कभएकी साधना फैरि आफना मनलाई यसरीसंझाउँछे, &amp;quot;जन्मन, बाँच्नु र मर्नु जीवनका अवस्थाहरू हुन्‌ । यिनलाईपेशाले के फरक पार्छ । मरिन्छ कि भनेर भाग्ने हो भने सन्सारमा कुनैठाउँ छैन जहाँ लुक्ता मृत्युबाट बच्न सकिन्छ । घरमा बस्ने पनि तभवितव्यमा परेर मरेका छन्‌ । बरु मर्नु नै छ भने पनि अन्तिम साहसदेखाएर मर्नु नै के बेस होइन र : जसले जेसुकै भनून्‌ मलाई आफनोयस पेशासंग गर्व छ र यसलाई सबैका सोचाइमा आदर्श सेवा भन्नेपारेर छोड्छु । यस्तो अठोट मनमा लिएर क सुत्ने कोसिस गर्छे ।&lt;br /&gt;
सह&lt;br /&gt;
रात पर्न लागेपछि शिव खड्का जङ्गलको अन्त्य भागमा पृग्छ ।त्यहाँ एउटा घर देखिन्छ र झ त्यही बास बस्ने निधो गर्दै ढोकाढकढकम्याउन पुग्छ । एउटी ९/१० वर्षकी बालिका आई ढोका खोन्छे ।शिवले बासको माग गर्दा त्यस बालिकाले जवाफ दिन पाउँदा नपाउँदैमाथि चोटाबाट आवाज आउँछ, “ए नानी, वास र गाँस खोज्दै आएकाहुन्‌ भने खुरुक्क माथि ल्याएर सत्कार गर । साँझका पाहुना देवताहुन्छन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
आजको भौतिक युगमा पनि त्यस्तो सत्कारको भावना राख्ने त्यसव्यक्तिसंग भेट गर्ने इच्छाले पनि क. त्यस बालिका पछिलागैर चोटामाजान्छ । त्यहाँ प॒गेपछि बालिकाले गन्दी बिछ्याइदिदै बस्नै अनरोध गर्छै रआफू बाबाकहाँ पृजाकाठामा जान्छे । त्यहाँ क ध्यानमा लीन भइसकेकालेभान्छाकोठातर्फ लाग्छे । कतै खाने कुरा छ कि भनेर खोज्दा एक दुईकोसा केरा फेलापार्छै र त्यही पानीका साथमा ल्याएर दिदै भन्छे, “बाबाध्यानमा बसिसक्नु भएछ । एक छिन पर्खनोस्‌ ,उहाँ आएर भेट गर्नहुनेछ॥ म त्यही तलका गाउँमा गएर आउँछु भनेर दौडन्छे । शिवले उसलाईरोक्न खोज्दाखाज्दै क ओभैल भइहाल्छे । कं विस्मित भएर बसिरहन्छे ।केही बेरपछि एउटा वृद्ध हातमा फूल र नैवेद्च लिएर आइपुग्छ र त्योपाहुनालाई दिदै भन्छ, “यो प्रसाद ग्रहण गर्नोस्‌ यसलै मनलाई शान्तिदिन्छ । तपाईंले लिएका लक्ष्यलाई पुरा गर्छ । यसरी विचलित भएर&lt;br /&gt;
हुँदैन ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
र - वृद्धको कुरा सुनेर शिब उद्श्वान्त हुन्छ र झ्वाट्ट भन्छ, &amp;quot;मेरोलक्ष्यबारै तपाईंले के थाहापाउनु भयो र यसो भन्नुहुन्छ !”&lt;br /&gt;
त्यस वृद्धले पनि हाँस्तै जवाफ दिन्छन्‌, “यति मात्र थाहा छ,मनुष्य लक्ष्यविहीन जाग्रत्‌ हुनै सक्तैन र तपाईंमा जागरण आइसकेको छ। यही भ्रमणको लध््य पूरा गर्नलाई पनि त शान्ति र मनको स्थिरताचाहिन्छ नि, होइन ?”&lt;br /&gt;
शिवलाई त्यस व्यक्तिका तर्कमा. निकै सत्यता रहेको पाउँछ रभन्छ, &amp;quot;अकाद्‌्य छ तपाईंको भनाइ । मैलै त्यस्तो प्रश्न गर्नु नै मेरोअज्ञानता हो । माफ गर्त होला, बाबा !&amp;quot;&lt;br /&gt;
७७&lt;br /&gt;
बाबाले शिवको आत्मप्रशंसा सुनेर हाँस्तै भन्छन्‌, &amp;quot;तपाईंको प्रश्नमेरो भनाइले उठाएको हो । त्यसैले माफ कसलाई कसले दिने : दुईव्यक्तिको भेट भएपछि क्राको श्रृङखला बनिहाल्दछ । अरू भन्नोस्‌तपाइँको घर कहाँ हो :&lt;br /&gt;
&amp;quot;घर त मेरो काठमाडौंमा हो । अनि तपाईँ, एक्लो व्यक्ति यस्ताजङ्गलका छेउमा कसरी बस्न सक्नुभएको छ :&amp;quot;&lt;br /&gt;
शिवको कुरा सुनेर नी हाँस्छन्‌ र एक छिन चुप लागेपछिभन्छन्‌, &amp;quot;म एक्लो कहाँ छु र ! यो सन्सारको वस्ती यति ठूलो छ मकहिल्यै पनि एक्लो हुन्न । झलक्क हेर्दा यहाँ म र मेरी त्यो सानीनातिती मात्र छौ जस्तो लाग्छ र यो वास्तविक सत्यता पनि हो । तर,यदि हामीले मनलाई साँघरो र मतलबी बनाएनौं भने हामी सबै साथमारहेको पाउन सक्छौँ । आजैको कुरा गरौं तपाईं आउनु भयो र हामासाथमा हृनुहुन्छ । मलाई “वाबा&amp;quot; भन्न थाल्नुभएको छ र मैले तपाईंलाई“बाब&amp;quot; । हाम्रा बीचमा बनेको यो संबन्ध र साथमा बिताउन लागेकोयस रातले के हामीलाई “तँ एक्लो छस्‌&amp;quot; भन्छु र : संबन्ध रगतलेगाँसेको, मानवताले जोडेको र प्राणीको नाताले बनेको हुन्छ । यत्रोफैलिएको सम्बन्धलाई विखण्डित पारी यति मात्र मेरो भन्न कहाँ हन्छ र? सबै मेरा हुन्‌ र सवैको म हुँ भन्ने सोचाइ राखे एक्लो कहिल्यैभइन्न&lt;br /&gt;
अलि अकमकाउदै शिवले सोध्छ, “अनि व्यवहारमा : सिद्धान्त रव्यवहारका फरकले ल्याउने गरेका भिन्नतालाई केले हेर्नुहुन्छ ?”&lt;br /&gt;
बाबा यसपटक भने शान्त हुन्छन्‌ र भन्छन्‌, “मैले बताएकोसम्बन्धका विषयमा मात्र हौ, व्यवहारबारे केही बोलेकै छैन । व्यवहारमाभिन्नता नैतिकताले ल्याउँछ नै र त्यस नैतिकताको प्रयोग गर्न समाजलेआफूता रीति स्थितिका माध्यमबाट सिकाएको हुन्छ । समाज हाम्रोसभ्यताको परिचय हो र सभ्यता समयले ल्याएको विकास हो । यादराख्नोस्‌, समय जति अगाडि बढ्छ मनुष्यले मनष्यलाई उति नै राम्ररीचिन्दै जानेछ र त्यसका नतिजाले अटुट सम्बन्धको सिर्जना गर्नेछ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
भावानात्मक कुरा गर्नमा तल्लीन रहेका तिनको ध्यान मैनाकाप्रवेशले भङ्ग पारिदिन्छ र मैनाले डसाराले बाबालाई बोलाएर भान्छाकोठामा लैजान्छ । झोलामा चामल र केही आल मात्र ल्याएको देखाउँदैअरू बजार उठिसकेकाले नल्याएको बताउँछै । जे उपलब्ध भएको छ,त्यसैको खाना बनाउने आदेश दिएर बाबा शि्वनिर आई बस्तै फेरि कुराचाल गर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
शिवलाई बाबाप्रति भन्दा बढी ध्यान त्यस बेला त्यो सानीबालिकापट्टि खिचिन गएकाले बाबासंग अनमति लिएर मैनालाई भान्छामासहयोग गर्न तत्पर हुन्छ । वाबाले उसलाई रोक्नै मैनाको खुबीको तारिफगर्दै भन्छन्‌, “भान्छामा गएर के गर्नुहुन्छ : मैनाले तपाईंलाई छुनै दिन्न। आजभन्दा दई वर्ष पहिलेदेखि नै उसले अतिविहरूलाई पकाएर खुवाउनेगर्दै आएकी छे । गरीब र दुःखीको सन्तान भएपछि उमेरलाई उछिनेरकाम गर्नपर्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
शिवलाई बाबाको कुरा सुनेपछि के भनेँ के भनुँ हुन्छ र सोध्छ,“यहाँबाट गाउँ धेरै टाढा छैन क्या रे । थकाइ लागेपछि एक पाड्लाचाल्न पनि नपरोस्‌ जस्तो भइहाल्छ अनि घर त के खुबै पनि आलिझयाम्म परेको देखियो भने बसेँ बसुँ लागिहाल्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
शिवले उनका कुरामा विशेष चाख नलिएजस्तो मानी बावाभन्छन्‌, &amp;quot;मेरो गल्फत्तीसंग झर्को लागेर गाउँतर्फ किन बढिनँ भनेरपछनुताउन थाल्नुभयो कि कसो ! यस बेला जङ्गलका छेउछाउमा हिड्नुयात्रीहरूका लागि उचित हुँदैन । बरु म चप लागिदिन्छु । मेरोस्वभावसंग पनि म आफै आजित भइसके । कुनै पाहुना आए कि मतिनीसंग कुरा गर्दागर्दै दिक्कै लगाइदिन्छु क्यारे जौ पनि मदेखि भाग्नैखोज्छन्‌ ।”&lt;br /&gt;
“मेरा सोधाइको तात्पर्य त्यस्तो होइन, बाबा ! त्यो सानी छोरीत्यति छिटो गाउँमा पुगेर आइसकी । मैले अलिकति हिडाइ अगाडिसारेको भए बस्तीमा पुग्थेँ । यहाँ तपाईंहरूलाई यसरी दौडन्‌ पर्ने नौवतआउंदैनथ्यो भनेर मेरा अल्छिपनालाई जाँच्न मात्र मैले सोधेको हुँ, यसलाईअन्यथा नमान्न होला&amp;quot; भनैर सफाइ दिदै उहाँको ज्ञानवर्द्धक क्राहरू सुन्नअझै आफू लालायित रहेको बताउँछ ।&lt;br /&gt;
बाबालाई शिवका कुरामा विश्वास लाग्दैन र भन्छन्‌, &amp;quot;मेरोफतौरोलाई यसै ज्ञानवर्क बनाइ दिनुभयो । यो त मेरो मन यौलाहाजस्तोगरी कराइरहने भएकाले बोलिरहेको मात्र हुँ । कुनै दिन कोही पनिपाहुना भएनन्‌ भने त्यही मैनालाई मात्र भए पनि राखेर बोलेको बोल्यैहुन्छु । त्यो बिचरी सुन्दासुन्दै जब निद्राले घुप्लुक्क भई ढल्छे अनि पोग्र फसङ हुन्छु ।”&lt;br /&gt;
यस बानीलाई नराम्रो भन्त मिल्दैन । हामी सामाजिक प्राणीभएकाले हाम्रो अन्तर इच्छा नै साथी खोज्ने हुन्छ बोल्ने र बोलेको सुन्नेव्यक्तिको आवश्यकता भइरहेको हुन्छु । म पनि त त्यस बेलादेखितपाईंसँग बोलेको बोल्यै छु । मेरो पनि चप लाग्न नसक्नुको अर्थ त्यहीहो ।&lt;br /&gt;
७९&lt;br /&gt;
“राजधानीनिवासी तपाईलाई वाकपट्तामा कसले छुनसबने :. सकेपेशा पनि व्यापारी नै हो कि सन्छु, काठमाडौंमा खेतीपाती गरेर खाउँलाभन्ने नचिताए पनि हुने भइसकेको छ रे ? घरैघरले ढाकेर खुल्ला जग्गादेखिएको भन्न त्यही टुँडिखेल मात्र छ । त्यो पनि कति दिन टिक्नसक्छभन्छन्‌ ? पहिले नाङले पसलहरू जसरी ठाउँ ठाउँमा हुन्थे, अहिले तीहराएर ग्राहकहरूका सुविधाका लागि भन्दै आकाशिएका हात्ती पसारिएजस्तो फैलिएका घरहरू बनाई थप्रै विभिन्न किसिमका सामानहरू एकैथलामा पाउन सकिने गरी पसलहरू खोलिएका छन्‌ रे ? कहीं तपाईंपनि त्यहीका पसलेमध्येको एक त होइन : विदेशी सामान भित्र्याउँदैस्वदेशी र पर्यटकहरूलाई बेच्न चत्र व्यापारी : कि सरकारी नोकरीदिएर पालेकोमध्ये पर्नुभयो !&amp;quot;&lt;br /&gt;
“पैसाको खेती गर्नु भनेको व्यापार हो । खेती गरेर खान सक्नेऔगात मेरो छैन । सरकारी नौकरी दिएर पालेको हो कि भन्नै तर्क गर्नभएकामा भने&amp;quot; हो &amp;quot;म नोकरीमा थिएँ तर अहिले मलाई आफैँ गरीखाक ननेर पाल्न छोडिदिएका छन्‌ । &amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ए बु्े, त्यसैले फुर्सत पाएर देशश्चमणमा लाग्न थाल्नुभएको ?नोकरीमा रहँदा घेरै विदेशमा भ्रमण गर्नुभएको होला : आफनो देशत्यसका अगाडि कस्तो पाउँनु भएको छ : गर्काको देशको उन्नति देखेरआफनो देशलाई संझदा च्वास्स घोच्थ्यो कि घोच्दैनथ्यो :” अलि हाँस्तैभन्छन्‌, “घोचे पानि त्यो दुखाइ मेटिइ हाल्थ्यो भन्नौस्‌ न ? यही भएकोछ हाम्रो देशप्रेम ।”&lt;br /&gt;
शिवले केही जवाफ दिन नसकी शान्त हुन्छ । उनी अझै भन्दैहुन्छन्‌, “जागिर कुन अड्डामा खानुभएको थियो ! वकिल हुनुभएको तहोइन ? बेला हेरी पीपलपाते बन्नसक्ने तिनै हुनसक्छन्‌ र आँहले त्यस्तैमान्छे सबैको प्यारो बनेका पनि छन्‌ । जहाँ पनि पुगेका छन्‌ । जेजस्तो खबर बटुले पनि कसलाई के मन पर्छ, त्यसै प्रकारले रचना गरेरत्यसकहाँ पत्याउने गर्छन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“वकिललाई भन्नुभएको कि वकिलको पेशाबारे यसो भन्दै हुनुहुन्छ? कृ बक्स त्यस्ता निस्के पति यो पेशा त्यस्तो पीपलपाते हुँदैन । पक्षर दुबै दृष्टिकोणले हेरेर बहस गरेपछि मात्र साँचो कुरा पत्तालाग्न सक्ने भएकाले नै यो मही मधेजस्तो गरी मध्ने प्रधा बसाएर नौनीनिकाल्न खोजेको हो । यसरी कहिले पक्ष र कहिले विपक्षबाट बोल्नुपर्नेतिनीहरूलाई पीपलपाते भन्न खोज्नु भएको हो भने पनि न्यायलाई योपरिभाषा नल्याउनु भए बेप हुन्छ ।”&lt;br /&gt;
८०&lt;br /&gt;
शिवले अलि नराम्रो मानेको ठानेर बाबाले भन्छन्‌, &amp;quot;सबैलेजानेका छन्‌ यी वकिल डाक्टर, पुलिस र शिक्षकको पेशा देशका लागिकति जरुरी छ भनेर । यिनैले हुन्‌ न्यायोचित अधिकार दिएर आत्मबलबढाउने, ज्ञानको भण्डार उघारेर उन्नतितर्फ लम्कन बाटो देखाउने रआइपर्ने बाघाहरू हटाई सहयोग गर्ने तर त्यस बेलासम्म उपयोगीहुनसक्छन्‌ बाब; जबसम्म यस पेशामा कार्यरत व्यक्तिहरूले सेवाको महत्वबुझेर आफना निर्णयलाई व्यापारीले नाप तौल गर्ने ढक खोज्नेजस्तो गरीआर्थिक लाभका पछि लाग्दैनन्‌ ।”&lt;br /&gt;
“पेशा र त्यसमा संलग्न व्यक्तिमा फरक छ । यदि ती व्यक्तिलेपेशाको नैतिकता पालन गरेका छैनन्‌ भने त्यो गराउने जिम्मा पनियसैको व्यवस्थाले लिनुपर्छ । व्यक्तिले पेशा धमिल्याउन पाइँदैन भन्ने मेरोलाटा बद्धिले भन्छ । तर हो, तपाईंले भनेजस्तो गरी यहाँ यस्तो&lt;br /&gt;
छैन । बिश्वास गर्न अति गाह्रो हुदैछ । चोर फटाहा भनेर&lt;br /&gt;
(0240 पनि जबसम्म तपाईं प्रमाण जुटाउन सक्नुहुन्न, तपाईं केही&lt;br /&gt;
गर्न सक्नुहुन्न । विश्वासको सरकारको स्थापना भएपछि पनि यस्ताअविश्वासहरू हट्न सकिरहेका छैनन्‌ । यही त दुःखलाग्दो कुरा छ ।&lt;br /&gt;
“मलाई यस उमेरकी नातिनीको समेत डर लाग्न थालिसकेको छ। स्कूलबाट फर्कदा अबैर भयो भने मन छट्पटाउन थाल्छ । मनलेनराम्रा कुराको शङ्का उठाउँछ । धेरैले आफनो धर्म छोडिसकै । यसतर्फलाग्नु असंभव भएकै ठान्न थालिरहैछन्‌ । नैतिकताको रेखा कोर्नेहरू नैत्याज्य हुन थालेपछि मानवधर्म कता पुग्ला खै : यसतर्फ ध्यान आकर्षणगराउन पनि कोही अगाडि सर्दैनन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“तपाईंका भनाइको अर्थ पृजापाठमा लाग्नसक्नेको मात्र धर्म हुन्छ,नैतिकता हुन्छ र उसले मानवधर्म वुभझेको हुन्छ भन्ने हो कि कसो : केयसैले मानव संबन्ध सुदृढ गराउँछ ! धर्म कर्मको जरुरत यत्तिकैमाट्ीन्छ !&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;बाबाले शिवका प्रश्नलाई आफूप्रतिको वाक्य प्रहार संझेर हांस्तैभन्छन्‌, “होइन, यसको अर्घ बफन र बफाउनलाई त म तपाईंहरू जस्ताज्ञाताहरूलाई भन्दै छु । धर्म कर्मको रक्षा गर्ने जिम्मा तपाईंहरूले लिनुपर्नेजरुरी छ । आडम्बरको कुहिरो हटाई धर्मलाई चम्काउने गराउनयसतर्फको सोचाइ स्वच्छ राख्ने विधि निकाल्नोस्‌ । यो मासिदै जानुकोअर्घ हो हामीले यसलाई चिन्न सकेका छैनौं । धर्म कर्तव्य हो, धर्मआदर्श हो, धर्मले सिकाउँछ दार्शनिकता । यसको मनन गरेर आत्मश्‌द्धिगर्न सकेमा मानवधर्मको पालना हुन्छ । एकता आउँछ । अनि मनुष्यलेमनुष्य भएर बाँच्न सक्छ । यो मेरो भनाइ हो र मेरो अनुरोध छ&lt;br /&gt;
८१&lt;br /&gt;
यसलाई लोप हुने स्थितिबाट बचाई व्यावहारिक बनाउन रूढीवादी रआडम्बरलाई पन्छाउनतर्फ लागिदिनोस्‌ । म पूजापाठ गर्छु, यसकोमतलब मैले मार मानवता चिनेको छु भनेको होइन । म गलतमा छुभने मलाई बताइदिनोस्‌ ठीक के हो ! नत्र भने मान्नोस्‌, पूजापाठ गर्नउपासना हो, मनमा आत्मबल जाग्रत्‌ गर्न विश्वास उत्पन्न गर्नु हो,एक अदृश्यशक्तिप्रति अर्पित भएर जागरण ल्याउनु हो । अर्पण र जागरणअन्त्य र शुरुसरह छन्‌ ।&lt;br /&gt;
हाम्रा नयाँ पुस्ताले आफनो संस्कृति छोड्दै पलायनातिर लाग्दैछन्‌। तिनलाई बचाउनु होस्‌, बाब । धर्म हाम्रो नीतिशास्त्र हो । यसमाबैज्ञानिक तत्वज्ञान पनि छ । हाम्रो धर्म चार वेदमा आधारित छ ।यसका अठार उपनिषद्हरूले जीवनका हरेक क्षेत्रलाई छोएका छन्‌ रपथप्रदर्शकको भूमिका लिएका छन्‌ । यो पुर्खाको धरोहर सुम्पन्न 0१७ ।या सक्तिनँ भनेर मलाई डर लागिरहेछ, बाब । म यहाँ बसेरपाहुनालाई यसैगरी अनरोध गरिरहन्छु, कतैको मन छोएर केही गरि नैहाल्छन्‌ कि भन्ने आशा लिएर बसेको छु । मेरो करा बाबले कस्तोमान्नु भयो त्यो थाहा छैन तर मैले आफनो चिन्ता पोखेको हुँ ।&lt;br /&gt;
“तपाईंका कुराले प्रभावित नहुने को होला ? मेरो पनि सोचाइतपाईसंग मिल्दोजुल्दो नै छ । केवल, मैले पृजाबारे भनेको अझ मविस्तृत पार्छु र त्यसपछि तपाईंलाई सोधुँला मेरा सोचाइबारे ।”&lt;br /&gt;
म भन्छु, &amp;quot;हामीले जुन तरिकाले भगवानूको पुजा गर्दै छौं, केत्यस तरिकामा पाखण्डीपत छैन : श्रद्धाभन्दा बढी पाखण्डीपनकोप्रदर्शनको भाव छ । आँखा, मुख, नाक जताततै अबिर र केशरीलेपोतिदिन्छौं । अक्षताले हानिदिन्छौं, पैसा छुवाएर मुखैमा ठोकिदिन्छौं अनिबरदान प्राप्तिका आशाले भाकल गर्दै आफनो माग राख्छौं । हामीलेभगवानलाई पनि हामीजस्तै आशे मानेर व्यापार गर्न खोज्छौं । छैनन्‌यहाँ, तपाईंले जस्तो धारणा लिएर पृजा गर्नेहरू ? भक्ति र ज्ञान मार्गसम्झाउने शान्ति प्राप्तिका लागि लिनुपर्ने मार्ग सम्झाउने काम हामीलेहोइन तपाईं जस्ता ज्ञानी बाबाले लिनु भएमा मात्र हाम्रो संस्कृति र धर्मअमर रहन्छ ।”&lt;br /&gt;
शिवको कुरा सुनेर बाबा भन्छन्‌, “पहिले हुन्थ्यो होला तरअहिले ? यी महात्मा र हामीजस्तै फुङ्गाले धर्मको आड लिएर धेरैतर्साउने काम गरेको हुनाले धर्मबारे हामीले भनेको भन्दा तपाईंहरूलेभन्नुभएमा आजका नवयवक युवतिहरूले मान्छन्‌ । हामीहरूमाथिउनीहरूको विश्वास उठिसकेको छ ।&amp;quot; यति भन्दै उनी हाँस्छन्‌ र भन्छन्‌,&lt;br /&gt;
द२&lt;br /&gt;
“छोड्नोस्‌ वी क्रा, तपाईंलाई मेरा भनाइको बिश्वास गर्न गाह्रो परेकोछ भन्ने कुरा म 0 नि?”&lt;br /&gt;
शिवले हो, क्रेही भन्न नपाउँदै टाढाबाट स्याउलाभित्रेकोजस्तो एकनाशको आवाज आएको सनिन्छ । बाबा र शिवले कहाँबाटआवाज आएको पत्ता लगाउन ध्यान लगाएर सुन्छन्‌ । लाग्छ, कुनै हात्तीआएर त्यस स्याउलालाई माडिरहेको छ या कुनै जनावरले त्यसमाथिलडिबुडी खेल्दै आङ.को चिलाइ मारिरहेको छ । शिवलाई त्यस ठाउँमानिरीक्षण गर्न जान मनलाग्छ र सोध्छ, “केको आवाज हो ? म गएरहेरै ?”&lt;br /&gt;
“के भन्न भएको यस्तो ! यस जङ्गलमा त भालु पनि आउँछ ।यति राति यसै (हिड्नु हुँदैन । वनका छेउमा बसेपछि यस्ता सन्याकसुरुक्‌त कति सुनिन्छन्‌ कति ? कतिपल्ट जादै फर्कदै गर्नुहुन्छ । चपलागेर बस्नोस्‌ र खाना खाएर सृत्नोस्‌ । कति थाक्न भएको होला ?”&lt;br /&gt;
यसरी बाबाले त्यहाँको स्थितिको अवगत गराउँछन्‌ र मैनाले पनिखाना तयार भएको खवर दिन्छे । दुवै जना खाना खानलाई भान्छामाजान उठ्छन्‌ । शिवका आँखा झ्यालबाट बाहिर खोज्न पुग्छन्‌ । त्यहाँएउटा सेतो आकृति हिडेको देख्छ र कराउँछ, &amp;quot;हेर्नोस्‌ त बाबा, त्योजनावर होइन, कुनै मान्छे नै हिडिरहेको जस्तो छ । त्यसले राति बाटोबिरायो या त्यो कुनै सङ कटमा परेको छ त्यसलाई सहयोग गर्नु पर्छ ।लौ म त हिंड्दे भनेर ढोकातर्फ लाग्छ । बाबाले रोक्ने प्रयास गर्दा पनिझ आफनो गति बढाइरहन्छ र ढोका खोलेर बाहिर जान्छ ।&lt;br /&gt;
आवाजलाई पछ्याउदै जाँदा क यस्तो ठाउँमा पग्छ जहाँ एकनारी आकृतिले आफूनो घाँटीमा पासो लगाउन तयार भएकौ देख्छ । शिवलम्केर त्यसलाई समात्छ र यस्तका गालामा चट्काउन याल्छ । ठूलोस्वरले गाली गर्दै भन्छ, “ए लाछी आइमाई, के अधिकार छ तेरो योअमूल्य जीवनलाई नाश गर्ने हँ ? सङ घर्षदेखि भागेर के प्राप्तिको लागिमृत्य खोज्दै हिड्छेस्‌ ?&amp;quot; दवैको होस त्याहाँका स्थितिले बिर्साइ दिएको छ। एक बकबकाउदै छ भने अर्को चुप लागेर सुनिरहेकी छे । मानौं कअपराधी हो ।&lt;br /&gt;
जब शिवले बोल्न थामेर “चुप लागेर हिँड” भनेर त्यसकापाख्खरा समातेर तान्छ अनि त्यो नारी डाँको छोडेर रुन्छै र भन्छै, “कहाँलैजान हिँड भन्नुहुन्छ ? मलाई मर्ने अधिकार छैन भन्ने तपाईं को मलाईबचाउने के अधिकार छ ! हिँड भनेर कता लैजाने के अधिकार छ :छोड्नोस्‌ मलाई मैले यस्ता कुरा धेरै सुनिसकेकी छु । तपाईंले मलाईजोगाएर के पुण्य पाएँ भन्ठान्‌ भएको छ ! किन मलाई लखेट्न&lt;br /&gt;
। दाई&lt;br /&gt;
तपाईंहरू. छोड्न हुन्न । यति भन्दै आवेशलाई रोके पनि बेफवाँककोकुरा बोल्दै अरू रुवाइ बढाउँछै र लाचारीका साथ भन्छे, है भगवान्‌ मतिमीकहाँ द:ख बिसाउन, पनि आउन पाइनँ यिनले मलाई रोके किनराक &#039;&amp;quot;&lt;br /&gt;
त्यस नारीले मनमा लागेका सबै कुरा बताई रुन थालेपछिशिवले उसैको घर फर्काउने कोशिस गर्दै संफाउन थाल्छ । उसका धेरैअर्तीवद्धि सनिसकेपछि र अब उसका लागि अर्को विकल्प पनि नहुँदा त्योनारी यति भन्दै घर फर्कन तयार हन्छे, “तपाईंले मलाई लाछी त्रभनिसवन्‌ भएको छ । अब आफैँ मेरा घरमा पुगेर हेर्नोस्‌ म सङ घर्षदेखिभागेकी हुँ या थाकेर आरामका खोजीमा लागेकी हुँ । त्यहाँ पुगेर अनिबझाइदिनोस्‌ त्यहाँ रहेर बाँच्ने चाहना कताबाट पलाउन सक्छ रसङ.घर्प गर्ने साहस कसरी बटुल्न सकिन्छ । अनि तपाईंका अर्तीलाईशिरोपर गरी मलाई बचाएकामा उपकार गरेको ठानुँला नत्र तपाईं कोहो म जान्दिनँ तर यति म १५ ०१. तपाईं पापी हो, निठ्री हो र होअधर्मी पनि । मेरा सरापले सुख चैन कहिल्यै दिने छैन ।बझूत भयो त मेरा कुराको साराँश ?&lt;br /&gt;
“जति सराप दिन मन लाग्छ दिनोस्‌, मलाई यसमा विश्वास छैनर यसका डरले कर्तव्य गर्न पनि पछि पर्दिनँ । यो मेरो अधिकार नभएपनि तपाईलाई यस कुकृत्यबाट बचाई घरमा जिम्मा लगाउने मेरो धर्मभनेँ या कर्तव्य म भुल्न सक्तिनँ ।”&lt;br /&gt;
“हिडनोस्‌ त म भन्दै छु , त्यहाँ नपुगिकन तपाईंले मेरो कर्मकोअर्थ बझत हुन्न ।&amp;quot; क यति भनेर खेदको हाँसो हाँसै भन्छे, “कसैलेपनि सितिमिति आत्महत्या गर्न चाहँदैन, जीवनप्रति मायामोह नहुनेकसैलाई पनि हुँदैन । जब क जताबाट पनि हार खान थाल्छ, कुनैआशाको त्यान्द्रो कतै पाउँदैन, त्यसपछिको उपाय यही मात्र हुन आउँछ ।यस्ता अवस्थामा नपुगेका तपाईंहरूलाई के थाहा हुन्छ मर्ने निर्णय लिनपनि कति गाह्रो हुन्छ ।&lt;br /&gt;
बाटाभरि यस्तै कुरा गर्दै उनीहरू गाउँमा पुग्छन्‌ । नुरले आफनोघर देखाउँछे र शिवले निर्धक्क भएर ढोका ढकढकाउँछ । सायद, त्यतिबेलासम्म सबै निदाइसकेका थिए क्यार, ढोका उघन निकै बेर लाग्छ ।झन्नै १५ मिनेट ढकढकाएपछि एक वृद्ध आएर ढौका खोल्छ र शिवलेनुरलाई जिम्मा लगाउन खोज्दै भन्छ, “तपाईंकी यिनी को हुन्‌ झन्नैआत्महत्या गर्न लागेकी थिइन्‌, यिनलाई बचाएर ल्याइदिएको छु । फेरिअर्को के गर्छिन्‌ अलि ध्यान दितहोला ।&amp;quot; यति भन्दै क फर्कन लाग्छ ।त्यस वृद्धले एक्कासी उसलाई रोक्दै छोरा -र स्वास्नीलाई बोलाउन थाल्छ ।&lt;br /&gt;
प्र&lt;br /&gt;
उनीहरूलाई जम्मा पारेपछि कड्केर भन्न थाल्छ, &amp;quot;ए पाजी, रातभरयससंग सुखभोग गरेर यस वेला कुन मुख लिएर फिर्ता न्याउनसकिस्‌ ?तँ को होस्‌ : यस्ती बेश्येलाई मेरा घरमा यसै छोडेर जान पाउँछस्‌ ःआफैना साथ लैजान्छस्‌ कि गाउँलेलाई उठाङँ । यसले मर्न खोज्ने :पहिले हामी सबैलाई यसले मार्छे ः बेइज्जत गरेर त मारिसकी, अबअकाल मृत्य मात्र ल्याउन बाँकी छ । त्यहाँ अरू कोही पनि नबोलेरटूलुटुल हेरि मात्र रहेको देखी त्यो वृद्ध अरू कुर्लिदै भन्छ, &amp;quot;के हेरेरबसिरहछौं ः यसलाई घरभित्र हुल्छौं कि यस लुढाका साथ लगारिदिन्छौं !के गर्छौं भनिहाल, म यसको अनुहार हेर्न पनि चाहन्नँ ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
त्यस वृद्धकी स्वास्ती अगाडिसदैं भन्छै, “के भनेर राख्छन्‌ योबाइफालेलाई, यहाँ ? कुन सडकको कन सड्को हामीलाई छलेर मोज गर्नगई, अहिले त्यसैका लुठाको कुरा सुनेर म आइज बहारी भनेर घरभित्रहुल्छु के : नानीदेखिको बानी कहाँ छुट्छ भनेर त्यसै वेला यो लतमापरि सकेकीलाई राख्न हुन्न भनेकी थिएँ, आखिर त्यही भयो किभएन ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
“यत्रो ठूलो पाप नबोल्न्स्‌ न आमा । म पहिले जे थिएँ“तपाईंको बहारी भएपछि गृहधमंमा छु । उहाँसंग मेरो कुनै सम्बन्ध छैन। मैले तपाईंहरूलाई नै मबाट छुट्कारा दिलाउन आफनो हत्या गर्नलागेकी थिएँ । हेर्नोस्‌, मेरो हातको डौरी यसलाई मैले कत्रो मेहनत गरेरयसैका लागि बाटेकी थिएँ&amp;quot; भन्दै देखाउँछे । उसका यी बयानले कसैलाईपनि कुनै असर पार्दैन र शिवले नुरका लोग्नेपट्टि फर्केर सोध्छ ।उसलाई बिश्वास थियो उसले यस सत्यलाई स्वीकार्छ “तपाईंकी जहानलाईमृत्यका मुखबाट बचाएर तपाईंकहाँ जिम्मा लगाउन आएको छु । तपाईंलेत मलाई उल्टो दोष लगाएर रोक्नुहुन्न होला ? तर यस्तो अनर्थ हुँदापनि किन केही बोल्नु हुन्न : न त मृत्युबाट जोगिएर आएकीस्वास्नीलाई आत्महत्या गर्न परेको कारण सोध्नु हुन्छन ! यो के हो यस्तोक&lt;br /&gt;
“अब थाहा पाउलास्‌ यसको अर्ध । बडो जान्ने आउँदोरहेछ” भन्दै कराएर त्यस वृद्धले छिमेकीहरूलाई जम्मा थाल्छ ।ओरिपरिका छिमेकीहरू आएपछि ती बढावढीले झन्‌ कुर्लेर नुरलाई देखाउँदैभन्न वाल्छन्‌, “हेर्नोस्‌ यसलाई, यस बेला राति यो कहाँको गृण्डालाईम्रमातेर घरैमा आफनो पेशा गर्न ल्याएकी ः बुहारी भइसकी, अव पुरानाकुरा बिर्सिदिनोस्‌ भन्नुहुन्थ्यो तपाईंहरू, अब यस्तो हुन लागेपछि हामीले&lt;br /&gt;
गर्ने, लौ तपाईंहरू नै भन्नोस्‌ ? ती शहरका केटीहरू आएर यसबेश्येलाई यो घरमा के हुलेर गएका थिए, अब त यसको हिम्मत&lt;br /&gt;
दश&lt;br /&gt;
यतिसम्म बढी सकेको छ । कति कुरा त लौ भनेर सहदै गर्यौं अब योके गरी सहुँ ?” छोरापट्टि फर्केर भन्छे “क चप लागेर बस्छस्‌ त॑ !तँलाई पनि ती शहरियाले घाँडो लगाएर गएका थिए, अब त॑ पनियसैलाई यतिकाको सामन्ने जिम्मा लगाएर पन्छाइदै । तेरो बिहै यससंगपन्चै बाजा बजाएर गरेका छैनौ । यो देवकीसंग तेरो के स्वास्नीको नाताछ र मायाले भुतुक्क भई “जा&amp;quot; भन्न सकिनस्‌ । यसका लोग्ने सहस्रछन्‌ त॑ मात्र हो र : धर्मले पनि यसलाई घरमा राख्नु हुदैन । देवकीहो ..... यो देवकी ?”&lt;br /&gt;
आमाको आड पाएर जब लोग्नेले पनि जथाभावी बोल्नथाल्छनुरलाई असहनीय हुन्छ र शिवलाई भन्छे, &amp;quot;थाहा पाउनु भयो त यहाँबाँच्न कति गाह्रो रहेछ : मलाई आत्महत्या गर्ने नदिएर कसको उपकारगर्नुभयो : बरु आफैँ बद्नाममा .- पर्नुभयो । यस्ता जीवनलाई तपाईलेअमृल्य भन्नभएको होइन !”&amp;quot; सबै छिमेकीहरूलाई संबोधन गर्दै नुरलेभन्छे, &amp;quot;तपाईंहरूले, यिनीहरूले भनेका कुरामा विश्वास नगर्नोस्‌ । यीव्यक्तिले मलाई आत्महत्या गर्न लागेका वेलामा फेला पारेर मलाईसझाउँदै घर फर्काएका हुन्‌ । उनलाई मैले आफनो शारीरिक भोक पूर्णगर्न घरमा ल्याएकी होइन, यो झृ्टो हो । मलाई पन्छाउने दाउ मात्र हो। यस पेटमा यस पापीको सन्तान हुर्कदै छ । म कहाँ जाउँ ? एकफेरती दिदीहरूले मलाई यस घरमा हुलेर जानाले बाँच्नुभन्दा मृत्य रोज्नर्नेबनायो अब तपाईंले बचाएर यो कस्तो भैमरी पार्ने हुनभयो !&amp;quot; नुर रुन्छेपनि कराउँछे पनि अनि बाँच्ने उपाय वताइदिन छिमेकीहरूसंग अनरोधगर्छे । त्यहाँ कराउने र बोल्ने तिनै सास्‌ससरा अनि लोग्ने मात्र छन्‌ ।नरको रुवाइ मात्र सनिन्छ ।&lt;br /&gt;
धेरैपटक नुरलाई शिवका साथ लखेदन कराइरहेका तिनीहरूकाकर्कसा स्वर सनैर एउटा यवक छिमेकीले भन्छ, &amp;quot;किन यस्तो दौष यीव्यक्तिलाई लगाउनु हुन्छ, दाइ ? आत्महत्या गर्न लागेकी तपाईंकीस्वास्नीलाई यिनले बचाइदिएकामा स्यावासी पो दिन पर्छ झन्‌ उल्टैस्वास्नी नै उसलाई पन्छाउने दाउ पो गर्नुहुन्छ । यस्तो व्यवहार हुनलाग्योभने सन्सारबाटै दया धर्म भन्ने हराउँछ । अनि यिनलाई मात्र होइन, यहाँसबैलाई जिउन गाह्रो पर्छ । तपाईंहरूका घरको रातदिनको कलह हामीलेनसुनेका छैनौं । पहिले त्यही देवकी तपाईंका छोरालाई नभई भएन, अबत्यो स्वास्नी हुन सुहाइन ?&lt;br /&gt;
“आफू दोषी नहुँदो हो त ती शहरिया केटीहरूले तपाईंकै घरखोजेर किन जिम्मा लगाएर जान्थे र तपाईंहरूले पनि तिनीहरूले जे जति&lt;br /&gt;
पै&lt;br /&gt;
भने पनि नटेरेर घरमा राख्नुहुन्न थिया । अहिले पेट बोकेकीलाई जेपायो त्यही भनेर लगार्न कहाँ पाइन्छ :&lt;br /&gt;
ए दाइ, अब धेरै हल्लाखल्ला नगर र खुरुक्क स्वास्नीलाई घरमालैजाङ । होइन भने हामीले पनि के गर्नपर्छ त्यो गर्न जानेका छौं ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
त्यस यवकले आफना छोरालाई चेतावनी दिदै नुरलाई सकार्नभनेको सुनेर त्यो बृद्धा रोषपर्ण स्वर निकालेर कराउँदै भन्छै, &amp;quot;ए .... योभुसुनाले पनि अब हामीलाई हेप्ने, धम्की दिने भयो । के गर्नसक्छस्‌ तैभे,लौ गरेर देखा त : बिनासित्तै यो छुचन्द्रै फूर्ती देखाउँदो रहेछ ।”&lt;br /&gt;
त्यो यवक पनि जोमिदै, “के गर्न सक्तो रहेछ, हेर्ने हो&amp;quot; भन्दैसुरिएको देखेर दृवै पक्षलाई साम्य पार्न तिनै वृद्धवृद्धालाई संभाएर त्यहाँजम्मा भएका छिमेकहरूले नुरलाई घरभित्र लैजान वाध्य पार्छन्‌ । नुरलाईपनि आत्महत्या गर्न महापाप हौ । यस्तो काम कहिल्यै गर्न नर्ताम्सनूभनेर संफाउँदै समस्याको समाधान गर्छन्‌ र शिवलाई पनि छुटकारादिलाई अनर्थ हुनबाट रोक्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
त्यहाँबाट फर्केर बाबाकहाँ पुग्दा मध्यरात भइसक्छ । उसकोनिद्रा भोक दुवै यस घटनाले गर्दा मरिसकेको छ । अलिकति पानी पिएरसत्ने विचारले पानी पिउन अँखरा उठाएको मात्र के हुन्छ, बाबाले खानालिएर पर्खिरहेकी मैनालाई देखाउँदै भन्छन्‌, &amp;quot;खाना नखाई नसृत्न होला, कत्यसलाई हेर्नौस्‌ त खाना लिएर पर्खदापर्खदै त्यही निदाएकी ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
त्यसपछि शिवलाई खाने मनै नभए पनि खान्छु भन्न करै लाग्छर मैनालाई उठाएर आरामले सुत्न पठाई आफू त्यही चिसो खाना लिएरखात बस्छ । बाबाले यत्रो बेर लगाएर फर्कनाको कारण सोध्दै त्यस्तोआवाज गर्ने के रहेछ, के देख्नुभयो भनेर सोध्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
मैले देखे मात्र हाइन, बाबा, कल्पनाभन्दा टाढाको मानवसभ्यताको अर्का रूपको पति अनुभव बटुल्न पाएँ । यहाँ नारी र पुरुषकोसाथलाई किन एउटै अर्थ लगाएर हेर्ने गरिन्छ । मृत्यबाट एक नारीलाईकुनै पुरुषले बचाउँदा पनि आपत्ति आइलाग्छ भने यहाँ मानवता कतालुकेको हुन्छ ! लोग्नेस्वास्तका बीचमा प्रेम र समझदारी नभईछुट्काराका लागि उपायको खोजी हुन्छ भने तिनीहरूको जीवन कुन्‌रूपले बितिरहेका होला ? आज यिनै तथ्यलाई नजिकै पुगेर अनुभव गर्नपाएँ । यो देख्ता त मलाई लागिरहेछ, मैले जीवनका अझै कति पक्षहरूदेख्न बाँकी नै छ ।&lt;br /&gt;
बाबालाई शिवका कुराले बोल्त वाध्य तुलाउँछ । उनी भावनामाहु का “दया, माया जस्ता संवेदनशील भावनाले पनि कुनै बैला&lt;br /&gt;
दिएर बेपत्ता पारीदिन्छ । उसले वचार्दै लडाउँदै लाचार बनाएर&lt;br /&gt;
८७&lt;br /&gt;
हाम्रो परीक्षा लिन्छ । त्यसै बेला हो, तपाईंले आफूभित्र निहित दयामायालाई चिन्न सक्ने । यत्ता चिप्लेटीका खेलबाट उठेर तपाईं आफूलाईकति दरो बनाउन सक्नुहुन्छ, त्यो नै यसको मात्र हुने,छ ? मेरी मैनायसैको त उपलव्धि हो ।&lt;br /&gt;
“त्यप्षो भए मैना तपाईंका दयाको परिचय मात्र हो ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“दयाको परिचय मात्र होइन, मावनताको उपलब्धि पनि हो ।मैरो तेस्रो पृस्ताकी नातिनी भएकी छे । मैले यसलाई संरक्षण दिएको मेरोदया मात्र देखाउनलाई होइन । यो मेरा घरमा मेरी छोरीले ल्याएकीमानव नातिनी पनि हो । यो कसरी आई, त्यसले कसरी ल्याई, थाहाछैन । न त यो मैनाले जान्दछे न त हामीले नै । यो को हो भन्नेकुरा रहस्यमै छ ।&lt;br /&gt;
एक दिन केटाकेटीहरू आपसमा लुकामारी खेल्दाखेल्दै यो मैनालक्ने बहानाले पसलअगाडि रोकेका टुकभित्र पसिछ । ट्कवालाले पनिआफूनै धुनमा चलाएर यहाँ आयो । सामान खसाल्न लाग्दा पौ योत्यहाँबाट फुत्केर भागी छ । त्यसपछि रुँदै कराउँदै यताउती भड्किदै त्योबालिका यहाँ आइप॒गिछ । त्यस वखत यसको उमेर ४/५ को मात्रथियो ।&lt;br /&gt;
यस घरमा मेरी एक छोरी थिई । त्यो आफ्नी छोरीका मृत्युकोवियोगमा विरक्त भएर बसिरहेकी थिई । यसलाई देख्नासाथ घरमा ल्याईम्वाइ खाई माया गर्दै आफना साथमा टाँसेर राखी । त्यस बेलादेखि योयहीं छे । कसैले सोध्न आएका छैनन्‌ । यो पनि घर कहाँ हो, बताउनसक्तिन । यसरी पनि मान्छे यहाँ अलपत्र परेका छन्‌ र अरूकासंरक्षणमा रहनपरेको छ ।&lt;br /&gt;
यस्तो कथा बोकेकी यो मैना छे भने मेरी त्यस छोरीको जीवनअर्कै छ । म र त्यस छोरीका बीचमा बन्त गएको बन्धन झन्‌ अनौठोछु । सुन्नुहुन्छ भने भनुँ ? कि नसुन्ने भन्नोस्‌ न &amp;quot;मेरो आफनै जेठीछोरी र यो मानवी छोरीको स्थिति उस्तै थियो । मैले आफनी छोरीगुमाएका वेदनामा त्यसैबाट मलमपट्टी लगाउन पाएको थिएँ । यसैले कमेरो दयाको स्वरूप हुनुभन्दा मैले उल्टै उसको दया, माया र सेवामाआफूलाई जीवित राख्न पाएको थिएँ । अहिले त्यो छोरी पनि बितेकीलेयस नातिनीलाई लिएर परिबार बिर्सेको छु । यसैले म भन्छु सबै गुमाएपनि मानवनाताले हामीलाई एक्लो पार्दैन । यो भावनाको मात्र फरकहो । आफूले माया दिन सक्यो भने अरूबाट पनि त्यस्तै माया पाइन्छ रयो बन्धन पनि उत्तिकै बलियो राख्न सकिन्छ । । उनी आत्मकथा यसरीशुरु गर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
चक&lt;br /&gt;
हाम्रो आर्थिवा अवस्था त्यति बलियो नभएकाले तीन छोरा र तीनछोरी, बृढी आमा र स्वास्नीलाई भौतिक सुख पनि दिडै र छोराछोरीलाईउच्च र स्तरीय शिक्षा पनि दिनसक्नै गरी आर्थिक क्षमता बनाउँ भन्नेउद्देश्य राखी म केही वर्षका लागि घर सल्लाह गरेर भारतमा पसेँ ।गाउँमा रहँदा मास्टरसम्म भइसकेको भए तापनि त्यहाँ मैले खतरायक्तकाम गर्ने मजदृ्‌र भएर केही वर्ष बिताए । मैले गरेको मेहनत र मेराव्यवहारले प्रभावित भएर मलाई मजद्री गराउने मालिकले मलाई अन्यव्यापारसंम्बन्धी काममा लगाइदिए । त्यसपछि मैले स्वाध्ययन गर्ने पनिपाएँ र पैसा पनि अलि घेरै नै कमाउन वाले । एक बर्ष पनि मैलेत्यहाँ बिताउन सकिनँ । पैसा प्रसस्त कमाए पनि त्यहाँ नोकरी गर्नभावनताप्रति आधात प॒याउन थियो । त्यमैले त्यहाँ छोडेर म एकविद्धानका साथ उनका पस्तकालयमा र अध्ययन कक्षमा काम गर्न बाले ।पैसा यहाँ त्यति धेरै थिएन तर उहाँबाट जन्‌ जीवनदर्शन र घर्मप्रतिकोज्ञान पाउथे, त्यौ अमुल्य थियो । मेरा दुबै चाहना पैसा कमाउने र ज्ञानप्राप्त गर्ने, यस नोकरीबाट पाउन वालेँ । धेरै वर्ष उहाँको साथमा रहँदायत्ति आत्मीयता बढ्यो घरको संझना आए पनि त्यसमा चिन्तितछोड्दै जान थालेँ । तर यो यात्रा पनि एक्कासी चौँडयो । मेरा तीमालिक किताव हातमा लिएको लियै परलोक हुनुभयो । त्यहाँ निकैहल्लिखल्ली उहाँका मृत्यले ल्यायो । आमा, स्वास्नी, छोराछोरी सबैआइ्प॒गे र रुँदै छाती पिट्तै वेदना पोख्न थाले । कुनैले त्यस्ता अवस्थामापनि मलाई शङ कालु आँखाले हेर्न लागे । म तिनीहरूसंग अर्थ न बर्थडराउन थालें । उहाँको शव समेत जँचाइयो । हृदयाघातबाट मृत्यु भएकोभन्ने ठहर भए पनि घर तलासी प॒लिसबाट गराइयो । प॒लिसका हातमाएउटा फाइल पर्न गयौ जसमा लेखिएको विवरण पढेपछि उसले मेरोवाम लिदै यो को हो भनेर सोध्यो । म त्यस बखत त्यही नै थिएँ रधरयर काँप्दै त्यो व्यक्त म नै हुँ भनेर चिनाएँ । मालिकका छोराले पनियसमा सही थपिदिए । त्यस पुलिसले तब त्यस फाइलमा लेख्खेको पढेरसुनाए जसमा मेरा मालिकले मैले उहाँको सेवा गरें बापत्‌ पाँच लाख₹पियाँ मलाई दिनु भनेर परिवारका नाममा लेखेर छोडेका रहेछन्‌ । मपति त्यो सुनेर छक्क परें र उहाँको परिवार पनि । मेरा आँखाहरूरसाउन थाले मालिकप्रतिको द्धा र मायाले । उनीहरू शान्त रहे ।त्यहाँ मृत्युले ल्याएको शान्ति तवै मात्र देखियो ।&lt;br /&gt;
मालिकका कान्छा छोराले मेरा मख्मा हेरेर भने, &amp;quot;हामीले दिननसकेको आराम र सुख यसले दिएको रहेछ । पिताजीलाई यतिका वर्षस्याहात्यो, उहाँलाई सेवाका त्रणमुक्त पार्न भए पनि यति रकम दिएर&lt;br /&gt;
८९&lt;br /&gt;
हटाइ दिनुपर्छ । जेठा छोराले अलि चित्त भारी पारेर भने, &amp;quot;नदिएर सुखपाइयो र &#039; कागत प॒लिसका हातमा परिसक्यो । यत्तिकाले पिताजीकामहानता सनिसके । नदिएमा हामी दषप्ट हुन्छौं । मान्छेको परिवारबाट मनउठेपछि कस्तोसम्म हनसक्तो रहेछ त्यो बझियो । गल्ती हाम्रो नै हो ।यस्तो शान्तिप्रिय उहाँलाई हामीले त्यसरी कचकच गर्नै नहुने : एक्लोयहाँ आएर बस्ता पनि हामी भेटन आएनौं । परिवारका मायाको बल्छीलेतानेर ल्याउँछ भनेर पर्खेर बस्न कति दृखदायी कुरा हो । भो, यी कुराअहिले संभझेर के गर्नु &#039; आमा र बजैले त्यतिका धन महात्मामाथि लुटाएर त हामीले सहेर बस्यौं भने बाबाले यति यस सेवकलाई दिएर के खतीहाम्रो हुन्छु &#039; यसको पनि जीवन बन्छ । हाम्रा संपत्तिको पनि सदपयोगहुन्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
॥ मालिकको मृत्यपछि चलेको यस्तो कुरा र मालिकका बुढी आमार स्वास्नी रोएको देखेर जरुम्क उठेर आफनो घरतर्फ लागि हालुँजस्तोभएँ । मालिकका मृत्यमा मैले आफूनो मृत्य देख्नथालें । जे जस्तो मलाईलागे पनि अन्त्येष्टिको काम नसिध्याई र त्यहाँ भएका धनदौलतको जिम्मानलगाई भागिहाल्न उचित नहुने हुँदा मनलाई विचेर निहरी रहेँ, सही रहेँ,के के भने त्यो सुनिरहैँ । यसबाहेक म गर्न पनि केही सक्तिनथें ।&lt;br /&gt;
केही दिन यक्तिकैमा बिताएपछि त्यो बक्स भएको धन र आफनोकमाइ लिएर घर फर्के । बाटाभरि यति सुखका कल्पना गरिनँ, यतिसपना देखिनँ ज्ञ सं्झे, यति लामो समयसम्म परिवारसंग छुट्टिएर वस्नेकस्तो योजना बनाएको रहेछु, आफूलाई नै तँ कति मुर्ख रहेछस्‌ भनेरमनमनै गाली गरें पनि । तर ती दिनहरू विगत भइ सकेकाले आउनेदिनहरूमा यस धनका प्रयोगबाट के गर्न सकिन्छ भनेर सोच्तै बाटोकाट्न वाले ।&lt;br /&gt;
म घर फर्केको महिना श्रावणको थियो । आकाश पूरा कालोबादलले ढाकेको थियौ र कच्ची बाटो हिलैहिलाले खाल्डाखुल्डी परेकोथियौ । बिहानीपख बसबाट ओर्लिएर एउटा भरियालाई भारी बोकाई मआफना गाउँको बाटो लागेँ ।&lt;br /&gt;
मेरो घर पूर्वाञ्चल क्षेत्रमा थियो । कोशी नदीका छेउछाउमा नैकेही बिघा जमिन थियो र सानो एउटा घर । एक गाँस खान रशरीरलाई ओत दिन यिनै पर्ख्यौली संपत्तिले पत्याउने गर्थ्यो । मेरी जहानअतिजाँगरिली थिई । घरमा बसीबसी खसीबाख्रा पालेकी थिई । भैंसीकोदुध, घिउ र तिनै खसीबाखा वेलावेलामा बेच बिखन गरेर घर खर्चधान्थ्यो । मास्टरको मेरो कमाइ यति थोरै थियो, जहानले यस्ता कामशुरु नगरेकी भए सन्तानलाई पढाइ/लेखाइ गराउनै सकिन्नथ्यो । जीवन&lt;br /&gt;
९०&lt;br /&gt;
हाम्रो शान्तसंग रामै गरेर बित्तै थियो । केवल हामीले धन बढाउनसकेका थिएनौं र सन्तानलाई शहरमा राखेर राम्रो स्तरीय शिक्षा दिनसकेका थिएनौं । मलाई यी दैनिक क्रमबाट मुक्त भई सन्तानलाईकाठमाडौं पठाई पढाउने इच्छाले गर्दा विदेशमा बसी धन कमाएर फर्कनेचाहना बढ्न थाल्यो र त्यसै गरें पनि । त्यहाँ पगेपछि त्यहाँको स्थान रद्रीले गर्दा त्यतैतिर लामो समयसम्म भल्याइ दियो । त्यही सानो एकभूलले मेरा स्मृतिपटमा ताडना दिदै रहनेभयो । यो घाउ कहिल्यै निकोहुने भएन ।&lt;br /&gt;
अलि दुःखी हुँदै सइ.... अ गर्दै भन्छन्‌, “म जब आफनो घरनिरप्रगे त्यहाँ न त घर थियो, न त खेत नै । म त स्तम्भित भएर एकछिन ठिङ्ग उभिइरहैँ । आँखाबाट आँसु खस्न थालेछन्‌ । त्यसै वेला मैलेके देखेँ भने त्यो निर्दयी कोशीले आफना तीरको माटो काटतै एकै चोटिझवाम्म पारेर निलिदिइन्‌ । म त्यो देखेर झन्‌ विचलित भएर कराउनथालेछु । साथमा आएका भरियाले मेरो स्थिति देखेर सोध्यो, “के तपाईंपनि यही इलाकामा बस्नुहुन्थ्यो : पहिले नै मलाई भन्नुभएको भएयहाँको बस्ती सरेका ठाउँमा पुच्याइदिन्थे : केही भन्नु भएन लौ फर्कीउततैतिर ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
कुरा त त्यसले ठिकै भनेको भए तापनि सन्दा नराम्रो लाग्ने नैथियो । मनले कस्तो मुर्ख धेरै बकबक गर्नुपर्ने भने पनि मैले नमताकासाथ भनेको थिएँ, &amp;quot;यहाँको यौ गति धाहा पाएको भए यो सर्वनाश हेर्नकिन आउथे : उ हेर, त्यो कोशीका छातीमा त्यही नै मेरो सर्वस्वथियो ...... दाई मेरो सर्वस्व । कहा होलान्‌ मैरा गङ.गा, जमुनाभागीरथी ? कहाँ प्गेहोलान्‌ मेरा राम, श्याम र हरि ? ती बुढी आमा,त्यो एक्लै परेकी मेरी जहानले कसरी यस आपत्‌को सामना गरिरहेकीहोली ! म तितलाई पाउन सक्छु या सक्तिनँ भन्दै थचक्क त्यही बसेरकून कराउन थालेँ ।&lt;br /&gt;
त्यस वेला पूर्वक्षितिजलाई छोड्दै सूर्य बादलसंग लुक्तै अगाडिसर्दैगिए । शून्य चकमन्द त्यहाँ कोशीको आक्रोश बाहेक केही सुनिदैन थियो,सायद मेरो आवाज पनि त्यसैभित्र हराएको थियो ।&lt;br /&gt;
त्यो भरिया मुर्ख भए पनि मानव थियो । उसले पनि मेरासाथमा आँसु खसालेको मैले देखेँ र मलाई त्यस बस्तीमा गएर आफनोपरिवार खोज्त फैरि जोड गत्यो । मेरा लागि पत्ति यो बाहेक अर्कोउपाय थिएन । त्यसैलै त्यतैतिर लाग्यौं । बाटाभरि_ दुबैले केही बोलेनौं,त्यस भरियाले भनोस्‌ पनि के : उसले थाहा पाएको थियो, सैयौं मान्छे,&lt;br /&gt;
९१&lt;br /&gt;
१७ कोशीले निलिदिएको । त्यसमध्ये मेरा परिबार परेका छन्‌ यान्‌ ।त्यहाँ पुगेर सबै गाउँलेहरूसंग सौधखोज गर्दा उनीहरू एक पनि&lt;br /&gt;
नरहेको थाहा पाएँ । ती गाउँलेहरूले त्यस वेला हाम्रो बस्ती गुमेको कुरासुनाउँदा यस्तो दृश्य कसरी हेरेर बस्न सकिन्छ भने जस्तो लाग्ने छ ।पानीमा तैरिएको घरको छानी, साना हात उठाएर सहारा मागेकावालकहरूका हात, नानीलाई च्यापेर बगेका लाशहरू देख्न कति हृदयविदारक हुन्छ भन्नोस्‌ त म त्यहाँ भएको भए मैले पनि त्यो हेरेरआफूले केही गर्न नसकेको वेदना सहेर बस्नुपर्ने थियो ।&lt;br /&gt;
त्यही सुनेपछि म त्यहाँ टिक्न सकिनँ र म सोझै अञ्चलै छोडेरयतातिर आएँ र मालिकले बक्स भएको धनको सदुपयोग गर्न यो यात्रीविश्वामगृह बताएर बसेको छु । पात्रीहरूलाई खुवाउनु र आफूलाई खानजेनतेन मेरो पूर्व कमाइले धानिरहेको छु । अहिले यी यात्रीहरूको सन्तुष्टिनै मेरो सुख भएको छ ।&lt;br /&gt;
केही संझे झैं गरी विषय फेरेर सुनाउन थाल्छन्‌ “आफूतो गाउँछोडेर यस ठाउँमा आएपछि यस मैनाकी आमाप्रतिको स्नेह र कर्तव्यलेखिचेर मलाई यहाँबाट फुत्कन नदिएकाले नै मैले यहाँ दोस्रो बसोवासबसाए । मेरी जेठी छोरी गङगा जस्तै यसकी आमा थिई, लरखराएरहिड्थिई र मागेर खाइजीविका चलाउँथी । ए₹खमनि बस्नलाई एउटा सानोछाप्रो थियो । बस्‌, यही उसको गुजाराको बाटो थियौ । उसलाई कसैलेभन्थे, &amp;quot;यो देवकीकी छोरी हो, कसैले भन्थे, कहाँबाट आई यहाँ वाहाछैन । त्यो रामी त थिइन नै साथै स्वस्थ पनि देखिन्न थिई । थियो भनेउससंग जवानी थियो । चिधरा मागेका लुगा लगाउँथी र राम्ररी लगाउननजानेकीले कुनै कुनै वेला उसको भित्री अङ.ग पनि देखिन्थ्यो ।केटाकेटीहरू हाँस्तै त्यसलाई उल्याउँथे । उसलाई बौलाहीभन्दा बढी केहीमान्दैनथे । मलाई भने त्यसलाई देख्नासाथ लाग्न थालेको थियो, कोशीउल्टेर बगी मेरी गड गालाई यहाँ छौडेर गएछ । मैले त्यसलाई नयाँलुगा किनेर सिलाई दिएँ र खानलाई पैसा दिएर मृत गर्न थालेँ ।उसलाई त्यतै वेला आफना साथमा राख्न सक्तिनथें किनकि स्वयम्‌ म नैत्यस समयमा एउटाका घरमा पाहुना भएर बसेको थिएँ पैसा तिरेर ।&lt;br /&gt;
केही महिना त्यतिकैमा बिताएपछि मात्र यहाँ जग्गा लिएर योघर बनाएको हुँ । तलको एक कोठा बनेपछि म यही घरमा सरेँ ।त्यतिन्जेल म त्यस बस्तीमा राम्ररी नै भिजिसकेको थिएँ र सबैले मलाईबाबा भन्न थालेका थिए । यहाँ म सरेको यस्तै १०/१५ दिन मात्रभएको थियो । एक विहान बस्तीतिर जाँदा त्यस मैनाकी आमालाई&lt;br /&gt;
९२&lt;br /&gt;
आफना छाप्रोअगाडि भरखर समहरूपमा बलात्कार गरेर छोडेका अवस्थामादेखेँ । मैले सहन सकिनँ र त्यसका अस्तव्यस्त भएका शरीरलाई छोपीदिएँ उठाएर बसाए । त्यसैले पनि पहिलोपटक मलाई अँगालो हालेरखुबसंग रोई ।&lt;br /&gt;
मैले त्यसका आँसु प॒छिदिँदै अँगालोबाट आफूलाई खुटाईजोडजोडले ती अधर्मीलाई अगाडि आइज भनेर ललकारेँ । मैले ठूलठूलोस्वरले कराएको सनेर छिनैमा हुल जम्मा भयो । मैले त्यसमाथि भएकाअत्याचार बताउँदा, घाहा छ तितले के भने ? उल्टै मैमाथि आरोपलगाउँदै जथाभावी भन्न घाले । म जिल्ल परें । तिनीहरूले कतिसम्मपनि भने मैले पहिलेदेखि त्यसको माया गरेको कारण यही कर्म गर्नलाईहो रै । म पराई बस्ती सरेर आएकालाई कसले साथ दिने ? भोग्ने रदेख्ने त्यो लाटी र त्यो छाप्रो मात्र थियो । त्यस असमर्थले के बताउने१ मलाई हूल आक्रोशित भएर पिट्न आउन थाल्यो । म पनि गरेकोपाप भए पो डराउनु । निर्धक्कसंग भने, “ए अधर्मी, पापी हा, योविचरीमाथि यत्रो अत्याचार भएको छ । पुलिसलाई बोलाएर तथ्य पत्तालगाउन छोडेर यस्तो बोल्दै हुनुहुन्छ : अनर्य गर्न नतुल्नोस्‌ र सक्नुहुन्छभने यो पीडितलाई हुलमा घुमाएर अपराधी समात्न लगाउनु होस्‌ ।घरमा लुकेर बसेका कोही छन्‌ भने बाहिर निकाल्नौोस्‌ । म भन्दै छुमलाई यस्तो दोष लगाउन महापाप हो । ममाथि यसरी झुटो आरोपलगाउनु हुन्छ भने ती निदैयीहरूले अरू अपराध गर्न प्रश्नय पाउने छन्‌ रगाउँका अरू चेलीहरूले पनि दुःख भोग्न पर्ने छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
म एकोहोरो कराउँदै थिए । हलबाट लगाइएका लान्छना पनिसुन्दै थिएँ । यत्तिकैमा मैताकी आमा दौडेर हलभित्र पसी र एउटाअधबैंसे बुढालाई समातेर क्वाँ क्वाँ हँदै कराउदै पिट्न वाली । क छोड्‌भनेर पन्छिन खोज्दा पनि बिरालाले झम्टेको जस्तो गर्न वाली । बल्लहुलको ध्यान त्यतातिर मोडियो । त्यस लाटीलाई पन्छाउन अरूहरू लाग्दापनि त्यसले छोडिनँ र रूदै टोकुला जस्तो पति गरी । यिनले त्यसपछित्यस व्यक्तिलाई केर्न थाले । पोल खुल्दै गयो । दुइटा अरू जवानकेटाहरू पनि त्यसमा मछिए । पुलिसले तिनीहरूलाई समातेर करवाहीचलाउन लगेपछि मैले त्यही हललाई साक्षी राखेर छोरी बनाएर घरमाल्याएँ ।&lt;br /&gt;
केही महिनापछि त्यसले छोरी जन्माई । त्यस लाटीले पनि छोरीपाएपछि खुव रमाई । थाहा छ, त्यसले पनि कसैले नसिकाएर पनिछोरीलाई रामोसंग स्याहार्न सकी र हुर्काउन थाली । तर के गर्ने, सुखकहाँ घेरै दिन टिक्न सक्तीरहेछ्ख र ) एक दिन त्यो छोरी एकै रातका&lt;br /&gt;
९३&lt;br /&gt;
बिमारीले मरी । त्यसपछि त्यो मेरी छोरी पनि बिरामीको बिरामी नैभएर गई ।&lt;br /&gt;
मैना नाम त्यस वच्चीलाई त्यसैकी आमाले मर्नभन्दा पहिलेराखेकी थिई । एक दिन त्यसले वारीमा मलाई घमाउन लगी र त्यहाँचिरबिराईरहेका चराहरूलाइ देखाउँदै आफनी छोरीलाई देखाई । मैलेत्यसको अर्थ बुझे र धेरै चराहरूको नाम लिन थालेँ । जब मैले &amp;quot;मैना&amp;quot;भने, उसले टाउको हल्लाएर समर्थन गरी, नत्र मैले त्यसको नाम“सहज&amp;quot; राख्न खोजेको थिएँ । त्यसपछि जब त्यो नातिनी मैना मरी,त्यसैले यस नातिनीलाई यहाँ ल्याई । मैले बझिहालें त्यसले छोरीलाईसझर त्यसको माया पाउन ल्याएकी हो भनेर । तसर्थ मैले यसको नामपनि संझना स्वरूप “मैना&amp;quot; नै राखी दिएँ । बाँचनजेलसम्म त्यस छोरीलेयस मैनालाई उही काखकी छोरी जस्तै गरी माया गर्थी ।&lt;br /&gt;
यही हो, म, &amp;quot;मेरी छोरी र नातिनी मैनाको सम्बन्ध । आजभौलियो बढ्दै जान थालेकी मैनालाई देख्ता गाउँमा सबैले माया गरे पतिकसैको गिद्धे आँखा यसमा नपरोस्‌ भनेर म रातदिन भगवान्‌संग प्रार्थनागर्छु ।&amp;quot;७ यस्तो लामो वेदनापूर्ण कहानी बाबाकां, मैनाको र त्यस छोरीकोसनेपछि शिवलाई लाग्न थाल्छ, सुख र दु:ख जीवनको अंश हो । कहीसुख पाउनलाई दृःख उठाउनु परेको छ भने कही द:खले आफनो परिचयदिलाउन सुखको नाश गर्दै जाँदो रहेछ । यो सखी र यो दुःखी भनेरकसलाई छुट्याउने : कोही धनले खुशी छन्‌ भने मनले दुःखी छन्‌ ।कोही मनले आनन्दित छन्‌ भने धनले दुःखी छन्‌ । म के भनुँ । मदुःखी कि यी बाबा ?&lt;br /&gt;
यिनै कुरा मनमा खेलाउँदै उसलाई एउटा प्रश्न बाबासंग गर्नमनलाग्छ र सोध्छ पनि, “आजभोलि तपाईंले आफूलाई के सोच्नहुन्छ ?&amp;quot; शिवको प्रश्न गराइ थियो “सुखी कि दुःखी&amp;quot;? तर बाबाले हाँस्तैजवाफ दिन्छन्‌, “म केही पनि सोच्तिनँ, सबै परिस्थितिलाई सम्पिदिएको। त्यसले जुन वेला जे गराउँछ त्यही भइदिन्छु । केवल म आफूलाईमानव हुँ भन्ने चिनाउन मानव धर्म छोड्दिनँ । यस मिथ्या सन्सारमाकेलाई मेरो भनेर टाँसी रहूँ । सबै त परिवर्तन शील छन्‌ । तपाईं, मर यो मैना एक अर्काका को हौं ? कसरी एकै ठाउँमा जुट्न पुगेका छौं। कसलाई कसले कुन दृष्टिले हेर्छ, त्यसले त्यसै अनुसारको प्रतिफलपाउँछ । मन, बिचार र व्यवहार नै हो जसले हामीलाई सन्तष्टि दिन्छर सुखदायी बनाउँछ । भलै दुःखका स्रोत पनि यिनै भएका किन नहुन्‌ ?&lt;br /&gt;
९४&lt;br /&gt;
सबैको मल जड हो, आत्मशृद्धि । यस आत्मालाई मानवताकोपरिचय दिन नछोडनोस्‌ ।”&lt;br /&gt;
ति भनेपछि बाबा अरू केही बोल्दैनन्‌ । रात बित्दै जान्छ । सबैसपनाका सन्सारमा घुम्न थाल्छन्‌ । ओलिपल्ट बिहान मैनाले दैलो खोल्दाएक विक्षिप्त अबस्थामा अनहारभरि नीलडाम लिएकी एक अपरिचित नारीसुतिरहेकी देख्छे र “बाबा” भनेर जोडतोडले चिच्याउँछे ।&lt;br /&gt;
मैनाका चिच्याइले त्यो नारी पनि बिउझन्छे र शिव र बाबादुवै आइप॒ग्छन्‌ । शिवले नुरलाई चिन्छ । बाबाले पनि नुरलाई त्यसअवस्थामा प॒गेर आफना ढोकामा आई लम्पसार परेकी देखेर असमञ्जसमापर्छन्‌ । तुरले रुँदै भन्छै, &amp;quot;ए अपरिचित व्यक्ति ज्ञ तपाईंले मलाई मर्नेअधिकार त भन्नभयो, अब मेरो बाँच्ने अधिकार के छ त्या पनिबताइदिनोस्‌ । कि हाम्रो यस्तै ताडना भोग्नै मात्र अधिकार छ भन्नेमान्नु भएको छ : मलाई तपाईंको जवाफ चाहिएको छ ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
“हामीलाई देवकी वनाई हाम्रो भोग गर्दै रमाउने अधिकार कसलेयिनलाई दियो ! तिनैमध्यै एक भौगीलाई समातेर गृहस्थ जीवन बिताउँछुभन्दा मलाई तुच्छ मान्दै पन्छाउने अधिकार त्यसलाई कसले दियौ :भन्नोस्‌ बाबा, तपाईं त ज्ञानी हुनुहुन्छ । म त्यसको यो भारी कहाँ गएरबिसाडै : मलाई यति मात्र बाटो देखाइदिनौस्‌ त यो अत्याचार मसम्मपुगेर त्यहीँ अन्त्य होस्‌ र गर्भका सन्तानलाई आँच पनि नपरोस्‌ ।” करुन्छ र रुँदै आफना पाखुरीका डामहरू देखाउँदै भन्छे, “समाजले तोकेकासन्मार्गमा हामी पनि लाग्न तम्सदा भोग्नुपरेको ताडना यी यस्तो छ ।यो नै गृहस्थ जीवनमा नारीले बेहोर्न पर्ने चलन हो या हामीलाई यस्तास्थितिबाट उब्कन लगाइएको बन्देज हो । म अज्ञानीलाई संझाइदिनोस्‌बाबा ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
नुरका रोदनले पर्रिलएका बाबाले सभ्य भएर जवाफ दिन्छन्‌, &amp;quot;योकुनै पनि होइन । यो सभ्यताको विकासमा उम्रिएको असभ्यताको झयाउहो । यसलाई फौड्न संघर्ष गर्नबाट नहच्क । यसैले अत्याचारको अन्त्य,गराई अधिकार दिनेछ । जति तिम्रा शरीरमा नील डाम लाग्न थाल्छन्‌तिनलाई तिम्रो विजयको छाप भन्ने ठान । तिमीले यस शरीरलाई त्यागीतै सकेकी थियौ भने त्यस्तो त्याज्य शरीरलाई किन .माया गर्दैसुम्समाउँछयौ ! हेर, भगवान्‌ बन्नलाई त्यस ढुङ्गाले छिनाका धुप्रै चोटसहिसकेपछि मात्र त्यसमा आकार आउँछ भने छोरी, तिमीले पान संघर्षगर्नै पर्छ । तसर्थ त्यही घरमा जाक र भन, मलाई तिमीहरूले कसरीनिकाल्न सक्छौ । यो गाउँले थाहा पाएको छ म तिग्रो वंशलाई धारणागर्दै छु । भन, तिमीहरूले मलाई देवकी भन्ने जानेर नै सम्पर्क गन्यौ र&lt;br /&gt;
९&lt;br /&gt;
अहिले कसरी उम्कन सक्छौँ । अनि सुन, तिनीहरूको जवाफ । म तिगैपछि रहनेछु । अहिले माथि आङ, केही छिन आराम गर आनि भतिमीलाई त्यहाँ पन्याइदिन्छु । तिमी मर्न पाउौँदनौ । बाँच र अरूलाईपनि बाँच्न सिकाईंदिने बन ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
नुर यति सुनेपछि भइँबाट जरुक्क उठतै भन्छे, “हामीलाई धौक्रोदिन्छु भनेर झूटो आश्वासन नदिने हो भने म पानि सङ घर्ष गर्नबाटपन्छिन्नै । नैतिक पतनको छाप लगाएर छोडिदिएकाले हाम्रो शक्ति यसैलेखर्लप्प पारेर निलिदिएको छ । नबिर्सिनौस्‌ म यहाँ सहाराको खोजीमाआएकी, तपाईंको विश्वास लिएर फर्कदै छु । एकर्फर घोका पाइसकेकी मबारबार तडपिँदै हिडन नसक्ने भइसकेकी छु ।”&lt;br /&gt;
बाबाले नुरलाई आफनातर्फबाट दिन सब्नेजात सहयोग प॒थ्याउनेविश्वास दिलाउँदै ।वदा गरेपछि शिव माँध्छ, &amp;quot;के नारी विकासको नमुतायही होत ?”&lt;br /&gt;
“यो नम्‌ना होइन, यो त नारीका अवस्था मात्र हो” यत्ति भन्दैबाबा भावविभोर भएर वोल्दै जान्छन्‌, “यस अवस्थासंग सामना गरसुधार ल्याएपछि मात्र यसको नमुना निस्कन्छ । विकासका शुरुलाई नैनमूना मान्न थालियो भने विकास हर्रो भएर निस्कन्छ । मखै बाध्ने टर&lt;br /&gt;
थकथक लाग्नै ।&amp;quot;शिब हाँस्तै भन्छ, “यो मेरा भनाइ व्यड ग्य वियो, सत्यततपाईंले भन्नभएकै हो ।&amp;quot; बाबाले मैनालाई यनाउति खोज्छ । मैना&lt;br /&gt;
त्यहाँबाट वमँचामा फूल, टिप्न प॒गिसकुकी हुन्छे वाद्युकै प॒जाका लागि ।&lt;br /&gt;
घरका सबै परिबार विवाहका निम्तो मान्न गएकाले घर कुर्नेजिम्मा दयामा आइपरेको छ । त्यमैले आज क अफिस गएकी छैन ।मधुरो धृतमा नेपाली गाना कोठामा बाजरहेको छ र क किताव पढ्नमामस्त भएकी छे । उसको रुचि साहित्य अध्ययन गर्नमा झन्‌ झन्‌ बढ्दोछ । लोग्नेसंग भएका विछ्लोडको मर्म यस्तै अध्ययन गरेर र कवितालेखेर बिताउन खोज्दै छै ।&lt;br /&gt;
त्यस घरको शोभा भएका एउटा घरेलु पृत्तकालय छ जहाँ धर्म,विज्ञानदेखि लिएर साहित्य रचनाका विभिन्न किसिमका किताबहरू छन्‌ ।त्यही नै दयाको दिन काट्ने उपाय भएको छ । किताव पढ्दापढ्दै दयाटबक रोकिन्छे र सुन्न याल्छे । तल कमैले ढोका ढक्ढकाएको जस्तोलाग्छ । क त्यहाँ पग्छै र ढोका खोलेपछि देख्छे हलकाराले चिठीबझाउन ल्याएको । चिठी अमेरिकाबाट आएको थियो, उसको नाममाहोइन, दीपेशका नाममा झन्नै तीन महिनापहिले पढाएको ।&lt;br /&gt;
९६&lt;br /&gt;
चिठी बुझेर लिएपाद्ध खोल कि नखोलै भई ओकांइफर्काँईगरिरहन्छ । झवाट्व विचार आउँछ । का दीपेशकी स्वास्नी भएकीहैसियतले त्यो खोल्नसक्नै उसले आधिकार पाएकी छे । सोचाइ गलतथिएन । त्यमले क न्यो खोलेर सरसरी पढ्न वाल्छे । त्यहाँ लेखिएकाखबरहरू पढेर क तीन छक्क पर्छै । बिश्वास गर्न माँग्तनै मनप्यकोव्यवहार पति त्यस्तो हनसक्छ भनेर । दीपशको न्यो सुन्दर चेहराजसलाई उसले आफनो स्मृतिपटमा सजाएर राखेकी छे, छिनैमा त्यो कुरूपभएका पाउँछछे । दयालाई त्यो अनुहार च्यातेर ट्काटुका पारि दिडाँजस्तो लाग्छ । माया छिनैमा घणामा पाररार्तत भएका पाएर क बारबारएकै शव्द दाहोच्याउन बान्छै, &amp;quot;धोका, कत्रो धोका दिएछ ।” क्यासेटमापनि उसका मनको कुरा वझे झै गरी अर्को गानाको धुन बज्न थाल्छ ।दया लम्केर गई त्यसलाई आंल ठूलो स्वरमा बजाउँछ । गानागन्जिरहन्छ “तिम्रो माया कागजको रही चढी फूल जस्तो, तिम्रो मायाश्रावणको भलभन्दा पनि सस्तो... ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
साँच्चै दयाका लागि दीपेशको माया श्रावणको भेलभन्दा पनिसस्तो भएको पाउँछे । त्या झुटा मायामा आफू परेकी सोझिएर दयालाईसिर्कासको लाग्छ त्यसै वेला फार गानातर्फ उसको ध्यान जान्छ । त्यहाँगाना बजिरहेको थियो, &amp;quot;भगवान्‌संग फेरि तिमीलाई माग्ने छैन ।&amp;quot; आफूलेदीपेशलाई पहिलोपल्ट देख्तासको रूपर कुरा गर्ने तरिका देखेर मुग्ध भईभगवानसंग लोग्नेका रूपमा यसैलाई वरणगर्न पाउँ, भनेर मागेकी थिई ।त्यसरी त्यो लोग्ने मागेर आफूले कत्रो भूल गरेकी रहेछु भन्ने सोचेरघुरुधरु रुन्छे ।&lt;br /&gt;
चिठीका भाखाबाट दयाले थाहा पाएकी छे । दीपेशले त्यहींकीविदेशी मिमसंग विवाह गरिसकेको रहेछन र क एउटा छोरी &amp;quot;मेरी&amp;quot; कोबाबु भइसकंको छ । त्यो विदैशी केटी र आफूलाई दिएको घोका सम्झेरदयालाई लाग्छ एउटा चिठी लेख्नेर त्यस मिमका हात पर्नेगरी पठाइदिउँ ।क निणर्य लिन सक्तिनँ र प्रेरणासंग सल्लाह लिने विचार गर्छै । यसरीएक्लै छटपटाइरहेकी अवस्थामा माइतीबाट राधा आइपुग्छ । आमालेउसलाई मनपर्ने भनेर ट्रसा र मासु पकाएर पठाएकी रहिछन्‌ ।&lt;br /&gt;
आफूनी मैयौसंग भेट गर्न पाएकीले राधा खुशी भएकी छे रमैयालाई पनि खुशी पार्न सोच्छे, “ज्वाइँ साहेब, अमेरिका प॒गेको खबरआयो, मैया :”&lt;br /&gt;
दयाले उसका प्रश्नको जबाफ दिन पन्छिदै सोध्छु, &amp;quot;अहिले,आमालाई कस्तो छ : अफिस जान थाल्नुभयो ! अनि बाबा कहिलेफर्कने रे थाहा छ तिमीलाई :&amp;quot;&lt;br /&gt;
९७&lt;br /&gt;
राधाले दयाले गरेको चलाखी थाहा पाउँदिन र आफूले गरेकोप्रश्न नै बिसछि । कं दयाका प्रश्नको जवाफ दिनथाल्छे, “मालिकहरूकोकुरा हामीलाई कहाँ थाहा हुन्छ र : हजरको बिबाह भएपछि त्यो घरयति शन्य भएको छैन । साधना भैया धेरैजस्तो बाहिरै हुनुहुन्छ । साहेबघरमा त्यति बस्नै चाहन हुन्न जस्तो लाग्छ । काहले त साहेवनीले बोल्नेसाधी पनि पाउन हुन्न । म एउटीसंग के कुरा गर्ने कति गर्नु ः&amp;quot;&lt;br /&gt;
राधालाई आमाको एक्लापनावारे सनेपछि दिक्क लाग्छ र मनमनैभन्छे, &amp;quot;क गरहँ आमा, तपाईंहरूले मेरो भविप्य राम्रो होस्‌ भनेर मेरोघर वसोस्‌ भनी विवाह गरेर पठाइदिन्‌ भयो । म यता यस्तो फसादमापरेकी छु भने तपाईं त्यहाँ यसरी एक्लै पर्नभएको छ । बिरामी पर्दाएक्लो हुन्‌ कति गाह्रो हुन्छ ! मेरो हालको क्रा सुन्नुभयो भने आफनीछोरीको भविष्य सम्झेर क गर्न होला : बाबाको नोकरी गएको पीरमाथियौ थपिदा थामैर वस्न सक्नुहुन्छ :&#039; मेरी आमा कै गर्नु तपाईंहरूजस्तैलाई यस्तो दरुःख परीपरी आउँदो रहेछु । अब म तपाईंको एक्लोपनहटाउन सावी बनेर छिटै आउँदै छु । हामी दुई भएर फेरि घरथामौंला ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
आफूसंग कुरा गर्दागर्दै दया त्यसरी टोलाउन लागेकीले राधालेफेरि सोध्छे, “यसो हेदां, मैयालाईं सन्चो छैन जस्ता छ नि, होअनुहार अँध्यारो देख्छु । घरमा पनि छैन जस्तो शृन्य छ । हिंद्दनोस्‌मसंग आज उतै आमाकहाँ जाऔं । यसरी एक्लो यत्रो घरमा कसरीबस्नै&lt;br /&gt;
दयाले यसपटक पनि राधाका कुरालाई हांसेर उडाउँदै विपयबदल्दै भन्छे, “गाना गाउन जादै छ्यौ कि छोड्यौ : कान्छा दाइले पर्दैनभने पनि उसलाई फकाएर हुन्छ या के गरेर हन्छ, आफू इलममालागिसकेको यसै चट्ट नछोडन्‌ । कसलाई के थाहा हुन्छ, कुन वेला कस्तोआपत्ति भोग्नु पर्छ । त्यस बेला मद्दत गर्ने आफनो इलमले मात्र हो,बझयौ कुरा ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
मैयाले वोल्न थालेकाले राधा दङ्ग परेर भन्छै, “के छोड्थें त्यस्तोकाम । भनेजस्तो काम पाएकी छु । कान्छा दाइले पनि मलाई “नजा&amp;quot;न्नुहुन्न । बरु सुन्नौस्‌ न, मैया हिजो उसलाई के जङ चलेछ । घरफकदा मलाई हार्मानियम र आफूलाई तवला किनेर पो आइरहनु भएको। मैले हाँसेर यो कसले बजाउने भन्दा भन्नुभयो, “यो तैँले र यो मैलेबजाउने&amp;quot; भनेर हार्मोनियम र तवला देखाउनु भयो । मैले पनि हाँस्तै भनें&amp;quot;लौ लौ, तबला तपाईं बजाउनु होस्‌, यो हार्मोनियम हाम्रो यो सन्तान&lt;br /&gt;
थ्द&lt;br /&gt;
जन्मेपछि बजाउँछ । मैले कहिले फुर्सत पाएर यो बजाउने भन्दा यतिहाँस्न भएन ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
राधाका कुराबाट क गर्भवती भएकी रहिछ भन्ने बर्झेर दयालैजिस्क्याउँदै भन्छे, &amp;quot;मिठाइ खुवाउनु पलां भनेर हामीलाई आमा बन्नलागेको नबताएकी : कति महिना भयो !&amp;quot;&lt;br /&gt;
“भरखर भरखरै हो । यस्तो करा पनि आफू उत्ताउलेर कसरीप्वाक्क बोलिहाल्नु भनेर नभनेकी । अहिले कुराक्रैमा फुम्कीहालेछ ।&amp;quot; यतिभनेर क लाज मान्दै निहुरिन्छे ।&lt;br /&gt;
“हेर यसले लाज मानेकी : मेरो पनि तिमीलाई लाज लाग्छ :कान्छा दाइसंग भने लाज लागेन मसंग भने यस्तो :”&lt;br /&gt;
“छि, यो मैयाँ पनि । कति मलाई मात्र जिस्क्याउनु हुन्छ .।हजुरको कुरा पनि मैले थाहा पाएकी छु । मालिकनीले भन्दै हुनुहुन्थ्यो,“दुवै जना झण्डै साथसावै जस्तो गरी बस्ने भएछन्‌ । सत्केरी स्याहार्नकसलाई ल्याकैं भनेर पिरोलिदै हुनुहुन्थ्यो ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“आमाको पीरको पनि अन्त्य कहिल्यै हुने भएन&amp;quot; यति भन्दै दयाफेरि गंभीर हुन्छे । उसको चेहरा मलिन भएको देखेर राधालाई व्यधैंबोलेखछ्लु भन्ने लाग्छ । दया मनमनै भन्छे, &amp;quot;हाम्रो विवाहपछिको उपलब्धियही त रहेछ । पहिले समर्पण अनि नानी ।&#039;&amp;quot; &amp;quot;&lt;br /&gt;
दयाका मनमा के कुरा खेलिरहेछु त्यो राधाले कसरी वभीोस्‌ ।कति मात्र थाहा पाई भने आज उसकी मैयाँलाई निकै विरक्त लागेको छ। कुरैपिच्छै चप लागिहाल्न राम्रो लक्षण होइन । त्यसरी हाँस्ने, सबैलाईखुसी पार्न खोज्ने यस मैयालाई के भएको यस्तो ! राधा मनमा यस्तोभावना लिएर दयालाई हेरिरहन्छ ।&lt;br /&gt;
दया पनि राघाको हेराइ देखेर डराउँछ र बलजफत्तीले ओठमाहाँसो ल्याई भन्छे, “के हेरैकी मेरा मुखमा आँखा झिम्काउन बिर्सियौ किकसो ! यसरी मलाई मात्र हेरिरहयो भने मजस्तै दुःखी छोरी पाउली है,याद गरे । तिम्रो त छोरा पाउने रहर छ होला, होइन !&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;हजुरको पनि त यस्तै रहर होला नि ? कसले मात्र आफूनाड्च्छ्याले आफू जस्तै दुःखी जीवन हुने छोरो जन्माउन खोज्छ र ?बाचन्जेल आफू पनि दुःखी हुने आमा बाबुलाई पनि पारै पार्ने हुन्छछोरीको जन्म । कस्तै पढाइ लेखाइ यिनलाई गराए पनि बाआमालाईचित्ताले छोड्दो रहेनछ हजुरकै आमाले साधना मैयाँको बारे पीरगरिरहेको देख्छु ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;त्यो त आमाको बानी नै हो । भाइकै कुरा लिएर पनि चिन्तागरिनै रहनु हुन्छ । अलि केही संझेको जस्तो गरी दयाले भन्छे, “तिमीले&lt;br /&gt;
९९&lt;br /&gt;
मेरा बारेमा अड्कल काटी हाल्यौ र मात्र म सफाइ दिदैछु ! सुन, मछोरा होइन छोरी पाउन चाहन्छु । एउटी यस्ती छोरी जसले आफूलाईउपमा भएर प्रस्तत गर्न सकोस्‌ र यस दुनियाँलाई बताउन सकोस्‌छोरीमा पनि आवश्यक गुणहरू छन्‌ जसले गर्दा क त्याज्य छैन ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
राधाले दयाका भनाइको अर्ध बझदिन र उससंग दया रिसाइन्‌कि भन्ने सोचेर सोध्छे “मैले नचाहिदो तपाईंको चित्त दुख्ने कुरा बोलेकोभए माफ पाउँ । के गर्छ बोल्न थालेपछि म आफूलाई लगाम लगाउनसक्तिनँ । उहीँ गाउँको ठालुकी छोरी संझिहाल्छु&lt;br /&gt;
राधाका नमताले प्रभावित भएकी दयाले उसलाई संझाउँदै भन्छे,“तिमीले त्यस्तो केही भनेकी छैनौ । तिमीले साँचो मात्र बोलेकी छ्यौ ।लोकको सोचाइ नै यस्तो छ । कसैले लुकाउँछन्‌ त कसैले प्रष्ट बताउँछन्‌फरक यति मात्रको हो । म यस लोकका धारणालाई बदल्न चाहन्छु ।.त्यबैले छोरी होस्‌ भनेकी हुँ । म फेरि तिमीले जस्तोगरी आफू छोरीभएर जन्मेकीमा द:ख मान्दिनँ । यही जनिले हो, लोकलाई केही सीर्जनागरी दिनसक्ने । छोड यी करा, यो रुपिया लेक र मेरा तरफबाट केमीठो खान मनलाग्छ किनेर खान । फेरि छोरा त जन्मैला र्‌याले होला,अतृप्त ?”&lt;br /&gt;
राधा त्यहाँबाट बिदा लिएर गएपछि दया फेरि एक्लै हुन्छै रमनमनै वादविवाद गर्दै विवाह मात्र गरेर गएकाहरू घर नफर्केपछिप्रेरणाकहाँ गएर आफना मनको बह खोलेर सल्लाह लिने निश्चय गर्छै ।&lt;br /&gt;
धेरैपटक त्यो चिठी पढ्छे र आफना भ्रमलाई मेट्ने कतै कुनैशब्द छन्‌ कि जसले अर्थको अनर्थ लगाएको छ भनेर हरफ हरफदोहन्याई पढ्छे । आह ज्ञ यदि त्यस्तो भइदिँदो हो त ज्ञ&lt;br /&gt;
मै&lt;br /&gt;
१००&lt;br /&gt;
साधनाले नोकरी गर्न शुरु गरेपछि घरको स्थितिमा धेरै सुधारआएको छ । कान्छा भाइलाई पति हिन्द्स्थानमा पठाएर भए पनि स्तरीयशिक्षा दिनुपर्छ भन्ने सोचाइ शिव र गौरीको नभए पनि साधनालेलिनघालेकी छे । क भन्छे, “थाहा छ मलाई, तपाईंहरूले छोरीको कमाइखर्च गराउँदै भाइलाई पनि पढाउन चाहन हुन्न । तर यो सोचाइ लिएरभाइको भविष्य नबिगारिदिनोस्‌ । जागिरै खान पति जहाँ गए पनिउनीहरूले हेर्ने नै कत्तिको फुर्तिलो छ नहच्की सललल्ल अंग्रेजी बोल्नसक्छ सक्तैन, सामान्य ज्ञान कति छ खेलक्‌द, साहित्य, कलामा कस्तोरुचि राख्छ भन्ने नै हो । त्यसपछि मात्र आउँछ राजनीतिक दलमाकुनमा आस्था छ र कसको छोरो नाति हो, कहाँको जन्म हो इत्यादि ।तसर्थ व्यक्तिमा विशेष गुण ल्याउन भाइलाई बाहिरै पढाउनु पर्छ ।तपाईंलाई मैले बताएकी थिएँ । मेरो अंग्रेजी अलि कम्जोर भएकाले भन्नैनोकरी नदिन आँटेका थिए । मैले म सिक्छु, त्यसो नभन्नोस्‌ भनेपछि केलागेछ अनि मात्र दिए । आफूले भोगिसकेको कुरा जानाजानी आफूनाभाइलाई पनि भौग्न दिऔँ ? तपाईं नै भन्नोस्‌, दाजुभाइले मात्र हामीदिदीबहिनीप्रति खर्च गरे हुन्छ, हामीले हुँदैन भन्ने यस चलनले के हामीदाजभाइ र दिदीबहिनीमा फाटो ल्याउने होइन ? के तपाईं यसको समर्थनगर्नुहुन्छ अहिले दिदीभाइ, दाजुबहिनी बीच मिलाप हुन्‌ जरुरी छ ।&lt;br /&gt;
आमा छोरीकामाझ यस्ता कुरा भइरहन्थे । त्यस दिन पनि कुराचल्दाचल्दै शिव आइपृग्छ र आफनो राय यसरी व्यक्त गर्छ भाषाकाबिकासले देशको उन्नति देखाएको हुन्छ । यही भाषाका माध्यमबाटज्ञानविज्ञानको अध्ययन गर्न सक्छौ । सन्सारमा तीन भाषाले ओगटेकास्थानलाई अझै अर्को कुनले उछिन्त सकेको छ । ती तीनमा पनि पहिलोस्थान अंग्रेजीले नै लिएको लिएकै छ । भारतले अंग्रेजलाई धपाए तरप्रैगेनी भाषालाई धपाउन सकेका छैनन्‌ । आजभोलि यस्ता भाषामान्नेखिएका प॒स्तक आफना भाषामा उदित गरेर पनि राष्ट्रिय भाषामासिकाउन थालिएको छ तर हाम्रा देशलाई त्यस स्थितिमा पुग्न पनि निकै&lt;br /&gt;
१०१&lt;br /&gt;
समय कुर्नपर्छ । वास्तवमा देशलाई विश्वमा परिचय दिने&#039; माध्यम यिनैभापा, कला र साहित्य हुन्‌ ।&lt;br /&gt;
जसले जति भापा जान्दछ त्यति राम्रोसँग आफूलाई विज्ञ बनाउनसकछ तर सत्य यौ पनि छ साघना, लोकले भन्न थालिरहेछ खड्कापरिवार छोरीको कमाइ खान पल्किएको छ । हाइन हामी भन्न पानिसक्तैनौँ तेरै कमाइमा भर गरेर विनोद हिन्दस्थानमा पढ्दै छ । फेरियसलाई पनि कसरी पठाउने : फेरि तेरो यस नाोकरीलाई श्रद्धा दिएरअझै हेर्ने हाम्रो समाजले जानेको छन । एउटा व्यापारीले त मसंग मखैफोरेर पनि भन्यो । त्यस बेला मलाई कस्तो भयो, के भनेँ :”&lt;br /&gt;
“के भन्यो त्यसले : भन्यो होला यात हजार डलर पारगराइदिन लगाइदिनोस्‌, म यति पैसा दिन्छु भनेर या भन्यो होला यतिक्याप्सुल मात्र छन्‌ लिन एयरपोर्टमा आउँछन्‌ दिनलगाइदिन्‌ होला, मतपाईंलाई मालामाल बनाइदिन्छु । यिनले भन्ने र यिनले जानेका व्यापारयत्ति नै हो । यिनले हामी यस पेशामा लागेको छिटै घनी बन्नलाई भन्नेसोचेका छन्‌ । यसैले धनको लोभी हामी जे पनि गर्न तयार हुन्छौं भनेरहामीलाई प्रयोग गर्न विभिन्न- दाउ खेल्छन्‌ । यिनीहरूको सोचाइ नै कतिगरीव छ, बाबा : हाम्रा यस नोकरीमा आदर्शभन्दा बढी अनैतिकता छभन्छन्‌ । हामीलाई कप्तानको दिल बहलाउको माध्यम मानेर हँस्सी ठट्टागर्छन्‌ । देश विदेशमा नोकरीका सिलसिलामा जानुपर्ने हुँदा यात्रीहरूसंगसाँठगाँठ बाँध्छौं भनेर भन्छन्‌ । यी सत्य हुन्‌ त. बाबा ः तपाईंकीछोरीलाई तपाईंले चिन्नुभएकै छ, म के गर्दैछु : यस्ता करालाई लिएरतपाईंहरूले पनि आफनो धारणा बदल्न चाहेको हो भने मैले तपाईंहरूकोममाथिको विश्वास उठेको मान्न करै लाग्छ ः&lt;br /&gt;
यस पेशाको विकात आधृनिक भएकोले यसलाई चिन्न सकिरहेकाछैनन्‌ । यसैले तपाईंहरू दिक्क नभई तितीहरूको पेटको किरा नै मर्नेगरी जवाफ दिने गर्नुभयो भने बाबा, हामीले न्याय पाउछौं । हामीआफ्ना पेशामा निष्ठाकासाथ सफल हुनसक्छ ।”&lt;br /&gt;
“थाहा छ, यी सबै कथित हुन्‌ । त्यही पनि सुन्दा नराम्रो लाग्छर पन्छिने इच्छा भइहाल्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“किन पन्छिन खोजेर तिनीहरूलाई अरू कुरा काट्न प्रोत्साहनदिने : म यस घरको परिवारका हैसियतले टेवा दिन खोजिरहेछु, केतपाईंहरू छोरीलाई छोरी मात्र मान्नुहुन्छ, सन्तान मान्नु हुन्न : छोरीभएर जन्मे भनेर मेरो बाआमामाथि केही कर्तव्य नै ? तपाईंहरूछोरीपरतिको सामाजिक दायित्वको भार बोकेर हामीलाई आशामुखी बनाएरमगन्ते भएको हेर्ने चाहनुहुन्छ : दिदीको विवाह कुन रूपले कसरी भएको&lt;br /&gt;
१०२&lt;br /&gt;
थियो, त्यो मैले देखेकी छु । दिदीलाई दाइजोको अधिकारी मानेर मगन्तेबनाइएको मैले विसँकी छैन, बाबा :ः”&lt;br /&gt;
&amp;quot;ए आमा, तपाईं त भानादिनोस्‌, भाइ मभन्दा मानौ भएकालेउसलाई सहयोग गर्न मेरो कर्तव्य हो भनेर ? दुनियाँको गलत धारणा छुभने त्यो वर्दालदिनोस्‌ त्यसैको पछि लाग्यौं भने हामी के गरी अर्गाडसर्ने : तपाइँहरूको समर्थन हामीलाई चाहिएको छ, आमा । मलाईसन्तानको दायित्व पुरागर्ने दिनोस्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“तलाई समर्थन गरेर नै त आजसम्म तलाई नोकरीमा पठाउदैछौँ । समाजमा बसेपछि कनै करो यसै गर्छु भनेर कम्मर कस्न सकिदोरहेनछ । परम्परा, धर्म, सम्कृति र इतिहासको कम्लो बोकेर आर्धानकपरिप्रेक्षमा मिलजल गर्न खोज्दा कहाँ के भइदिन्छ भन्नै सकिदैन । त्यमैलेआफू हाँत्तोको विषयबाट उम्कन कसो कसो लोकोक्तिको पछि लाग्न मनभडकिहाल्दो रहेछ ।&lt;br /&gt;
आफना चरित्लाई नैतिकताका पर्रिधभित्र राखेर आफनायोग्यताबाट धन कमाउनमा कहिल्यै तिरस्कृत हुनुपर्दैन । तैले नोकरी गर्नजाँदा एक ठोस उद्देश्य लिएर गएकी विइस्‌ । त्यसैले तँलाई कुनै कुरालेपनि पथघ्रम पार्न सक्नैन भन्ने कुरामा म विश्वस्त छु । तेरा बाबा रदाइलाई नैले नाकरीमा प्रवेश गरी धन आर्जन गर्न लागेकामा ठेसलागेको कुरा हो हामी परुपले पो नारीलाई संरक्षण दिनुपर्छ, तिनीहरूबाटलिने होइन भन्ने भावनाले गर्दा र आफू परिवारमा ठूलो र जेठो भएरपनि आफना लक्ष्यका प्राप्तिका लागि एक सानी केटीलाई कमाइमालगाउनु शोषण त हुने होइन भनेर डराएका हुन्‌ । तँलाई सन्तान नैनमानेर भने होइन । यति भन्दै शिवपट्टि फर्केर सोध्छ, “हो कि होइन,लौ भन्नोस्‌ त हजुरले !”&lt;br /&gt;
शिव पनि हांस्तै भन्छन्‌, “एक्लो परेकामा के भनुँ : भएका दुवैछोराहरू यहाँ साथ दिने छैनन्‌ होइन त भन्नै भएन : आमाछ्लोरी साथलागेर भन्दैछौँ ।” :&lt;br /&gt;
&amp;quot;हजुरहरूसंग यसरी कुरा गर्नु मेरो धृष्टता हो । माफ पाउँ ।आवेशमा आई के के भनें के के । धेरैले यस पेशामा लागेका हामीलाईनिस्तत्साही पार्न नानाथरी भनेको सुन्दा दिक्क भइसकेकी मैले तपाईंहरूबाटपति यस्तो सुन्दा आफूलाई नियन्त्रण गर्न सकिनं । हुन त, यस पेशामालागेका सबका सबले संभाव्य विकृतिबाट आफूलाई जोगाउन सकेका छन्‌भनेर पनि म भन्दिनँ । किनकि यस्तो मति भएका व्यक्ति नभएको कुनैपैशा नै छैन । तर कुनै भइदिए रे भनेर यस पेशालाई नै दोष दिन भनेमिल्दैन । असल, खराब, राम्रो, नराम्रो भन्ने व्यक्तिको स्वभाव हो ।&lt;br /&gt;
&amp;quot; १०३&lt;br /&gt;
त्यस्ता व्यक्तिहरू जहाँ जहाँ पुगेका छन्‌, त्यहाँ त्यस्तै हुन्छ । घरमाबसेर गृहस्थ सेवामा लागे पनि यस्ता अनैतिक कामबाट रोकिएको हुदैनँ ।भन्नै नै हो भने यौ हवाइ परिचारिकाको पेशा सेवा हो । त्यहाँ कसैलेपनि यात्रीलाई सेवा पुन्याउने विपयमा वाहेक अरू व्यक्तिगत दबाबदिदैनन्‌ । यस पेशाबारे कसैले केही भने भने म जवाफ मात्र दिएरछोइदिन त्यसलाई अर्थ्याएर यो कं हो भन्ने बझाएर नै छोड्ने गरेकी छुतर यी छोरा र छारी एउटै बाआमाका सन्तान भए पनि यिनीहरूकाकर्नव्यमा रहेको भिन्नता दाजभाइप्रतिको दिदीबहिनीको दायित्वमा फरक जेछ त्यो म स्वीकार्न सक्तिनँ ! त्यसैले भाइलाई पढ्न पठाउँछु भन्दातपाईंहरूले नकारात्मक सङ,केत दिन भएको मानेर मैले आफनो अधिकारसन्तानका हैसियतले मागेकी हँ । यसमा हुन्न भनी भाइका जीवनकोउन्नति नबिगारि दिनौस्‌ । म त्यसलाई डक्टर बनाउन चाहन्छु । मज्येप्ठताका हैसियतले भाइलाई पढाउन चाहन्छु ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
भतिमी छोरीहरू माया, दया र मर्यादाका अधिकारी हौँ, बाहिरक्षेत्रमा उत्रिएर कर्तव्य गर्ने तिमीहरूको अधिकार होइन भन्नै भनाइ मेरोहोइन, समाजको हो । मेरो भनाइ के छु, त्यो आमाले अर्थ्याउलिन्‌उनैसङ सौध, म ,त गएँ” भन्दै घडी हेर्छ र शिव बाहिर निस्कन्छ ।&lt;br /&gt;
आमाले साधतालाई शिबकोा सोचाइ नारीपति राम्रो रहेकाले नैस्वयं उनले र दयाले पनि नोकरी गर्न पाएका हुन्‌ भन्ने जनाउँदै भनिन्‌पढ्न पनि छौरासरह पाएको मख्य कारण वाबाको स्वच्छ विचारघारालेगर्दा नै हो । यदि म नोकर्रामा प्रेश नगरेकी भए तिमीहरूलाई उच्चशिक्षा नदिएको भए अहिले के हुन्थ्यो : नोकरीको भरोसा हुँदो रहेनछ ।&lt;br /&gt;
तसर्थ तैले आफनो व्यक्तित्व विकास गर्दा कसले के भन्छभन्नेतर्फ नलागेर मेरो कर्तव्य के हो र यसका घेराभित्र म कतिचल्मलाउन सक्छु भन्नै सौचाइ राखेर कर्म गर्दै जानु । काममा रहँदाघरको समस्या तेर्स्याएर काम चोर हुने बानी बसाउनतर्फ लागिस्‌ भनेत्यसले तँलाई क्षणिक विजयी बनाउला तर नारी कामदारमाथि लगाउनेगरेका काला धब्बामा अरू रङ थप्ने मौका मात्र तिनले पाउँछन्‌ । हामीलेप्रगतिका पथमा उमरिएका झयाउ र काँडाहरू थप्ने होइन, तिनलाई सफागर्दै जान सकेमा मात्र आउँदा सन्ततिले छिटौ अगाडिबद्न सहयोग पाउनेछन्‌ ।, पुमाणित गर्नुपरेको छ, हामीले अधिकार समाल्त सक्ने रूपलेआफनौ व्यक्तित्व विकास गरिसकेका छौँ । त्यो तैले गरेर देखाउँदै छस्‌पनि । यसतर्फ के कस्तो सहयोग कुन बेला चाहिन्छ त्यो हामीले दिएका&lt;br /&gt;
छौँ र दिन्छौं पनि ।१०४&lt;br /&gt;
सुमार्गमा लागेर छोरीले कमाएको धन परिवारको प्रगतिका लागिलगाउन नहुने होइन, तर यहाँ आएर समाज अल्मलिएको छ केवल एकप्रश्नले । अब के छोरीलाई छोरासरह अभिभारा बोकाउन सकिन्छ त !प्रश्त उठेको छ अभिभारा बोकाउने हो भने समान अंधकार अंशमा पनित दिनुपला : त्यसैले समाज आफूले यममा लालमोहर लगाउन हाच्क्दैयसमा विभिन्न पक्षलाई आफैँले निर्णय गर्न छोडिदिएको छ । याहा छहामीलाई, यता छोरीको कमाइ खानु हुँदैन, छोरीको शोषण गर्नु हुँदैन, यीमाया, दया र मर्यादाका मूर्ति हुन्‌ भन्ने अर्कातर्फ तिनैलाई लकीलकी दहव्यापार गराएर पनि पैसा कमाउन लगाई आफनो जीवननिर्वाह गरेकोसमाज आफनै सदस्यहरूसंग डराई आफैंले बनाएका नियम र चलनलाईराम्रो पर्दाले ढ्वाकेर भित्रभित्रै भत्काइरहेका ट्चुटुल हेरिरहेछु । तीनाशकारकहरू आफूनो बेइज्जत हुने डरले सामुन्ने आउँदैनन्‌ र आफूलाईचोखो, सज्जन प्रमाणित गराउन र समाजलाई अल्मल्याउन अगाडि बढेकातिमीहरूजस्ता शृरवीर नारीहरूलाई आँखा चिम्लेर निन्दा गर्छन्‌ र आफूलेगरेका कामसंग जोड्दै खसाल्न खोज्छन्‌ । यस्तासंग नडराई आफू अगाडिबढ्दै जा, त्यसैमा तेरो मात्र हाइन, नारी जातिकै भलाइ हुन्छ । भाइलाईजे जस्ती बनाउन चाहन्छैस, गर । यसरी परिवारमा एक अर्कालाईसहयोग गर्न सके स्नेहको गाँठो अरु बलियो हुन्छ । तिमीहरूको आपसीस्नेह देखेर हामी शान्तिले जिम्मेवारीबाट पर हुन पाउँछौँ । आखिरहामीले पनि त आफनै लागि बौच्ने समय पाउनुपर्छ । व्यवहारबाट,कर्मबाट र जिम्मेवारीबाट अवकास दिलाई शान्तिले जिउने अधिकारहामीलाई दिने तिमीहरूले हो । यस्तो कर्तव्यपथधको चाल चाल्नैलाई सत्यर इमानलै सहयोग पुन्याएको हुन्छ ।&lt;br /&gt;
आमाको यस्तो ओजस्वी अर्ती सुनेर साधनालाई आफूमाआत्मबलको वृद्धि भएको अनुभूति हुन्छ । छोरीलाई दिनभरको उडानलेथकायो होला भनेर आराम गर्न भनी कोठाको ढोका ढप्काई बाहिरनिस्कन्छे । साधना लुगा फेर्दै आफनो हवाइ परिचारिकाको जीवनकेलाउन वाल्छे । ड्रेसिङ टेबुल अगाडि उभिएर कपाल कोर्छै, अनुहारलाईकपासले पुछेर कोल्ड क्किम लगाउँछै र संझन्छै भोलि डयुटीमा जाँदाउज्ज्याली हुनुपर्छ । केशहरू राम्ररी मिलाएर फूर्तिलो हुनुपर्छ । साधनालाईचिटिक्क परेर हिँड्ने रहर नभए पनि यस नोकरीले प्रभावकारी देखिनु,हँसमुख हुन्‌ र फूर्तीका साथ छरितो भई सेवा गर्नसक्ने हुन्‌ यसकाअनिवार्य गुणहरूलाई मान्नै पर्छ । दुःख, कष्ट, / चिन्ता जस्तामनोभावनालाई थिचैर किचिक्क हांस्नसक्ने हज यसको योग्यता हो । तसर्थउसले आफूलाई यस्ता कुरामा ढाल्नै हुँदा आफना इच्छालाई धेरै&lt;br /&gt;
१०५&lt;br /&gt;
महत्व नदिएर आफूलाई यसमा अभ्यस्त वनाइसकेकी छे । जस्तै बेदनालाईपनि पन्छाएर यात्रीहरूका समक्ष पगी हाँस्तै सोध्नसक्छे, “यहाँलाई कंल्याऔँ, कोल्ड डिङ् किस्की या चिया, कफी :&amp;quot; यस्तै प्रश्न उसलेहनीमून मनाएर फर्कदैका मघलाई पानि सोधेकी थिई । मेघले गौरवकासाथ आफना साथमा वमेकी श्रीमतीलाई देखाएर उसलाई कोल्ड डिङ्‌ रमलाई व्दहिस्की आल स्ट्ड है भन्दा उसले भनेकी थिई &amp;quot;निट नैन्याइदिएकी छु प॒गेन भने वोलाउन होला, यहाँ परिचारिकालाई बोलाउनेकलबेल छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
मेघसंग साधनाको सानैदेखिको सड गत वियो । दुवैले ताथै खेल्दै,पढ्दै, घुम्दै जाँदा जीवनसाथी बन्ने सोचाइमा पु॒न्याइसकेका थिए । जबशिबको नोकरी छुटयो, दयाको बिवाह हुने पक्का भयो र साघनालेघरको आर्थिक स्थितिमा सहयोग गर्ने हवाइ पाँरचारिकाको नोकरी गर्नथाली, त्यस वेलादेखि मेघ साधनादेखि परपर हुनथाल्यो । साधनाले कतिसंझाइ बझाइ गर्दा पनि मेघले आफना मनलाई फर्काउन सकेन । मेघलेप्रप्ट्संग भनिदिएको थियो, “छारीले वावआमाको घर घान्नपर्छ भन्ने छैनत्यो पनि नोकरी गरेर : स्वास्नीमान्छले नोकरी यस्ता ठाउँमा गर्नुपर्छ,जहाँ काम गर्दा इज्जत होस्‌ । तिम्रो अहिले अझैँ पढ्ने उमेर छ, पढ्दैजाक र विवाहँ पछि जे गर्न पर्छ त्यो मेरो जिम्मा हो । पैसा मात्रजोड्न जीवनको लध्व्य होइन र तिम्रा वाको एक ठाउ को नोकरी गयोभनेर आफूले अन्त काम नगर्ने र छोरीलाई यस्ता काममा लगाउनेसोचाइ पनि राम्रो होइन ।”&lt;br /&gt;
मेघको कुरा सुनेर साधनाले भनेकी थिई, “हेर मेघ, मेरोबावलाई तिमीले केही भन्न पाउदैनौं र छोरीको दायित्वबारे पनिविचारमा परिवर्तन ल्याउन सिक । लोकको भनाइ अनसार मात्र आफूलेकर्तव्य गर्दै जाने मेरो सोचाइ छैन । म मानव हूँ मेघ, घरको यस्तोअवस्था हुँदाहुदै म उच्च अध्ययनका लागि विश्वविद्यालय कुन्‌ मनस्थितिलिएर जान सकुँला : हेर, वाब्आमाले हामी छोराछोरीलाई समानरूपलेपढाए र अब्न उनीहरूलाई सहयोग गर्ने वेलामा मात्र यो दाजुभाइकोजिम्मा, मेरो त विवाह गरेर लोग्नेका घरमा गएपछि मात्र जिम्मा हुन्छभन्न सुहाउँछ : मैले कुन्‌ मुखले भनु मलाई एम.ए. सम्म पढाइ दिनोस्‌,लोग्नेका घरलाई राम्रोसंग समाल्त काम लाग्छ भनेर । यस्तो स्वार्थी कामत त्याज्य हुनुपर्छ । केही हामीले पाउन चाहन्छौं भने हामीले दिन पनिसक्नपर्छ ।&lt;br /&gt;
अब रहयो हवाइ परिचारिकाको नोकरीबारे ज्ञ चोरेर, बेइमानीगरेर, देहव्यापार गरेर धन कमाउनु पौ हुँदैन । आफनो खुबी देखाएर&lt;br /&gt;
१०६&lt;br /&gt;
यात्रीसंवा गरेर इमान्दारीपूर्वक आर्जन गरेका श्रमका मोल लिन नहुने केछ &amp;quot; केही क्षण घात्रीहरूका साथमा रहँदा उनीहरूको सेवा गर्दा कस्तोअनर्थ भइहाल्छ : जहाजभित्र सबै आआफूना काममा व्यस्त रहेकै हुन्छौंक्याप्टेन ककपिटमा र हामी केविनमा । कसलाइ फुर्मत हुन्छ नचाहिँदोकाम गरेर त्यत्रा यात्रीहरूको सामुन्ने तमासा देखाउने !&lt;br /&gt;
“ राती होटेलमा रहँदा पनि हाम्मा कोठाहरूको बेग्लाबेग्लै अफिसलेनै व्यवस्था गरिदिएको हुन्छ । हामीले आफैँले नचाहेसम्म कसैसंग पनिकुनै सम्बन्ध राख्नु जरुरी पर्दैन । तपाईंले केवल मेरो चरित्र, मेरोप्रेममाथि विश्वास गर्नोम्‌ । म ही पेशामा रहेर पनि आफूलाईअनैतिकताबाट जोगाउन सक्छु । मैले दाइ फर्केर नआउन्जेल यो नोकरी&#039;छोड्नु हुँदैन ।&lt;br /&gt;
“हेर मेघ, म साधना हुँ, एक व्यक्ति हुँ, मेरो व्यक्तित्वलाई :पेशासंग मिल्लाएर निश्खारै भएर निस्कन देक । हाम्रो प्रेमलाई : जस्तैअवस्थामा पनि बचाएर राख्न म सक्छु, यस नोकरीलाई हाम्रा बीचकोतगारो नबनाईदेक ।&amp;quot; &amp;quot;&lt;br /&gt;
जति साधनाले संझुए पनि, आश्वासन दिए पनि मेघले विभिन्नपरिचारिकाहरूको उपमा दिएर कसले कप्तानसंग प्रेम विवाह गरे रकुनले स्ट्ुबाटसंग र कसले व्यापारीसंग गरे भन्ने बताउँदै कति अबैधओसारपसारमा पक्रिए भन्ने गणना गराउँदै भनेको थियो, “तिम्रो भाबनाउच्च होला । तिमीले आफूलाई आदर्शभित्र नियन्त्रित राखौली । यसपेशालाई श्रद्धाका दृष्टिले हेर्ने बनाउन प्रयास गरौली तर तिमी यसरीरहुन्जेल एउटी योद्धा मात्र हुन्छयौ, विकृतिसंग लड्ने, विकृतिभित्र परेकीएउटी योद्धा । हेर, दलदलबाट निस्कन र त्यहाँबाट निकाल्नलाई पहिलेआफू त्यहाँ पुगेको हुनुपर्छ र म चञ्चल मनका प्रकृतिलाई राम्ररीजान्दछु जुन समय परिस्थिति हेरी परिवर्तन भइरहन्छ ।&lt;br /&gt;
एकफेर यस नोकरीमा पसेपछि यिनीहरूले आफूलाई कुनैअन्तरिक्षबाट अवतारित भएकी सोचेका । प्रशस्त पैसा उमेरमैखेलाउन पाउँदा घमण्डले चुर भएर “826 टेर्दैनन्‌ । समाजले हाम्रोपुरुषत्वलाई -नै आघात पार्ने गरी हामी तिनका सम्बन्धी भएमा परजीवीकारूपमा लिएर भन्छन्‌ । तिम्रा परिवारलाई त्यस्तो केही नलागेको भए पनिम सहन सक्तिनँ । म समाजसुधारक हुन हबाइ परिचारिकासंग विवाहगरेर इज्जत नष्ट गरी बस्न सक्तिनँ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“तपाईँले यस पेशालाई लिएर मलाई खसाल्दै लगैर पातालमापुत्याइ दिनुभयौ तर मलाई एउटा पेशा मात्र बताइदिनोस्‌ जहाँ नारीलेनोकरी गरेकामा निन्दा गर्न छोडेको छ : कुन्‌ नोकरी तपाईंले भनेजस्तो&lt;br /&gt;
१०७&lt;br /&gt;
नारीका लागि इज्जतदार छ, डक्टरी, इन्जिनियरिङ्ग, शिक्षिका हुनु,प्रशासनका क्षेत्रमा या नर्स बनेर सेवा गर्न । यी सबैमा हाकिमसंग यासहकर्मीसंग यस्तै प्रेमकथा जोडिएका हुन्छन्‌ । नारीले बाहिर कर्मक्षेत्रमाउत्रेकामा निरुत्साही पार्न यस्ता कुरा उब्जाइरहन्छन्‌ । नारी र पुरुष साथैरहेर काम गर्दा यस्ता घटनाहरू भइरहन पनि सक्छन्‌ तर यी सबै,उपमा होइनन्‌ । यो व्यक्तिको चाहना हो र आफूलाई म्यादाका घेराभित्रराख्नसक्ने नसक्ने खूबीको कुरा हो । फेरि म दोहोस्याउँछु, यस पेशालेगराएको भने पक्कै होइन । होइन, तिमी उपमा नै बट्ल्न खोज्छौ भनेराम्रो काम गरेर बसेका नारीहरू पनि छन्‌, तिनको उपमा किन दिदैनौ? हेर, म साफलाफ भनिदिन्छु, म यो नोकरी झट्ट छोडन सक्तिनँ रयदि तिमी आफनो धारणा बदल्त सक्नैनौ भने मैले आफनौ जीवनकोबाटी बदल्नुपर्छु । म यस्ता अनैतिक दोष लिएर तपाईंकी त्याज्य पेमिकाहुन्‌भन्दा म नै तपाईंलाई छोडिदिन्छु । प्रेमको अन्तिम लक्ष्य विबाह मात्रपनि होइन । लौ भन्नोस्‌, तपाईं के चाहनुहुन्छ ः&amp;quot;&lt;br /&gt;
साधनाका प्रश्नको जवाफै नदिएर हिडेको मेघले अर्की केटीसंगविवाह गरी उसैलाई ईंखाउन र उसका हातबाट आफनी स्वास्नीलाई सेवादिलाउन क त्यो जहाज छानेर चढेको थियो । यो क्रा बझेर पनिसाधनाले कुनै प्रतिक्रिया नदेखाई ती दुवैलाई चाहेजति र दिन सकेजतिसैवा दिएकी थिइ ।&lt;br /&gt;
क आत्मपरख गर्दै आफैलाई मनको गुनासो सुनाउँछे । कमनसंग सोध्छ, “के म मेघले भनेजस्तो गरी परिवर्तन भएकी छु त !नोकरी शुरु गरेको पनि एक वर्षभन्दा बढी भइसक्यो ।”&amp;quot; मनैले जवाफदिन्छे, “तँ बदलिएकी त छस्‌ नि । त यति ठूलो यति, अटल कहिलेभएकी यिइस्‌ । ? समय र परिस्थितिले तँलाई कति अनुभव दियो भनेआज तँ डटेर नोकरीसम्बन्धी आफनो राय दिनसक्ने भइस्‌ भन्न सक्नेभईस्‌ कर्मचारीको व्यक्तित्व जसले चिनाउने र इज्जत दिने गर्छु । पेशात केवल एक अवसर हो त्यसलाई हामी कसरी प्रयोग गछौं त्यो नैहाम्रो योग्यताको परिचय हो । नारीले आफनौ व्यक्तित्व विकासका लागिर आत्मनिर्भरताका लागि अरूको जे जस्तो भनाइ रहे पनि नोकरी गर्दैजानुपर्छ । नोकरीका प्रदुषणलाई हटाई स्वच्छ वातावरणको सिर्जना गर्नै&lt;br /&gt;
।”&lt;br /&gt;
नयाँ दुलहीका साथमा बसेर व्हिस्की खाँदै गरेका मेघसंगसाधनाले सोध्न चाहेकी थिई, “के तपाईंको परुषार्थको अर्घ यही नै होत? यति मलाई देखाएर तपाईंले के सन्तुष्टि पाउनु भयो ? के आनन्द&lt;br /&gt;
१०८&lt;br /&gt;
पाउनु भयो मलाई ईखाएर ! प्रश्न मनमा उठे पनि जवाफको कल्पनागर्दिन किनकि यति वेला रात निकै : बितिसकेको थियो ।&lt;br /&gt;
साधनाका आँखा झयालमा पर्छन्‌ । खुला झयालबाहिर पूर्णचन्द्रमा चम्किरहेको देख्छे मानौं त्यो आफनो पूर्ण रूपमा भौलिको दिनदेखेर हाँस्तै छ या रुँदै छ ।&lt;br /&gt;
रात छिपिदै गएकाले शान्त र शीतल छ । टाढा कता कताबाटबाँसरीको धुन बजेको सुनिन्छ । कुन विरहीले रात काट्न मुस्किल परेरबाँसरीका घुनसंग आफुलाई शान्त पार्न खोजिरहेको छ भन्ने सोच्रेरसाधना आफूलाई त्यस वादकको मनसग आफूलाई दाँज्दै सृत्ने चेप्टा गर्छे। निकै बेरसम्म छदपद्‌ भइरहन्छ । चाहेर या नचाहेर केले भनँ आजउसलाई मेघको सम्झना खुबै आइरहेछु । उसकी नयाँ दुलहीलाई देखरउसका चाहनाको अड्कल गर्छे । उसका पेशासंग नारीप्रतिको मङ्काचतभावना संझेर उससङका सम्बन्धबाट आफू उम्कन पाएकीमा छ्रुटकाराकोअनुभव गर्दै बिस्तारै निदाउन थाल्छे ।&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
१०९&lt;br /&gt;
घर फर्केर पनि प्रेरणाले बिर्सन सकिरहेकी छैन आफना अफिसकाकुराहरू । क सोच्छे, किन नारीलाई नोकरी गरेर खान अप्द्यारो पार्छन्‌? त्यस शैलीलाई अफिसमा नचाहेका बोझको स्थापना मात्र भएकोजस्तोगरी व्यवहार गर्छन्‌ । पिउनले समेत टेर्दैन । पुरुष जागिरेको त कुरैके गर्ने : सोझै भन्छन्‌, &amp;quot;यी स्वास्नीमान्छे किन जागिर खान आउँछन्‌ ।घरैमा बालबच्चा स्याहारेर बसे भैहाल्थ्यो । यहाँ बसेर पनि अफिसकोभन्दा बढी घरैको चिन्ता लिन्छन्‌ । यस्तालाई हाकिम भनेर कसरी मान्नुसबै काम हामीले नै गरिदिनुपर्छ । तलव सोहोर्न मात्र आएका हुन्छन्‌ यीआइमाईहरू ।&amp;quot; &amp;quot;&lt;br /&gt;
वास्तवमा औौली त्यस्ती छैन । पढाइमा पहिला दोस्रा मात्र भएकीछे । काम पति पन्छाउने उसको स्वभाव छैन । केवल क जवान छे,राम्री छै र साथै कसैसंग पनि झयाम्मिएर गफु मात्र गर्ने प्रवृतिकी छैन। हा हामा पैसा खर्च गर्न अलि हात कमाउँछ । यसलाई गुण भन्ने किदुर्गण : उसको आफनै विवशता पनि त हनसक्छु : यसको अर्थ कसैलेपनि सोचौनन्‌ र भन्छन्‌, &amp;quot;त्यो अति हठी छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
पुरुष जागिरे पनि भगुवा, गफी, कामचोर र पढाइमा डिग्रीप्राप्त गरेका भए पनि काम गराइमा फितलो नहुने होइनन्‌ । तरउनीहरूका यस्ता कम्जोरीहरूलाई उनीहरूको स्वभाव संझैर साधारणमानिन्छन र यस्तामा छुट पनि पाइरहेकै हुन्छन्‌ भने त्यस्तै नारी भएमाक हाँसोमा उडाइन्छे र उसले छेडछाड निकै सहतनुपर्छ । नारीकोस्वामित्व हतपती स्वीकार्न चाहँदैनन्‌ कित ! किनभने क अल्पमतमा छै,भरखर घिस्त्रन थालेकी छै । सामाजिक स्थिति र भावनामा परिवर्तनल्याउन अगाडि बढ्दै छे । पिउनदेखि हाकिमसम्म ज्यादा परुष कामदारछन्‌ । पुरुषका नाताले उनीहरू एक हुन्छन्‌ तर नारी जागिरदार त्यहाँकागका हृलमा बकुल्ला भएकी हुन्छे ।&lt;br /&gt;
क संझन्छे, शैलीले नानीका निम्ति दुध किन्न पठाएका बेलामापिउनले बोलेको भाषा र त्यस्तै एउटा पुरुष कामदारले रक्सी किनेर ल्याभनेर पठाउँदा रमाउँदै गएको । उसका मनले भन्छ, यस्तो मनस्थितिरहेकाहरूसंग जुधेर कर्मक्षेत्रमा उत्रिन पर्दा निश्चय नै हामीले आफनो&lt;br /&gt;
११०&lt;br /&gt;
स्वभावलाई बदल्नु पर्छ र उनीहरूभन्दा बढी मेहनती र सुयोग्य हुनैकोशिस हामीले गर्नपर्छ । यस्तो प्रतिस्पद्धात्मक स्थितिमा रहेर हामीले कामगर्नपर्ने हुँदा र नारी जातिलाई कृर्सीमा स्थापित गराउनु पर्ने आवश्यकतापरेकाले हामीहरू जो अहिले अगुवाका रूपमा रहेका छौँ कार्यक्षेत्रभित्रचल्दा आफूलाई निष्ठावान्‌ बनाई अनुशासित हुन्‌ अत्यावश्यक छ, नत्रनारीलाई कर्मक्षेत्रमा भित्रिएर सफल हुन यगौं कुर्न पर्नेहन्छ । अयोग्यमादर्ता आई नोकरीमा भर्नै नलिने पनि हुनसक्छ ।&lt;br /&gt;
प्रेरणा संफन घाल्छे मीरालाई, उसको बानी अफिसमा वसेरस्वेटर बनिरहने छ । आफ्नो खुबी र रुचि बुन्ने काममा रहेको देखाउँदैअर्की महिलालाई भनिरहेकी हुन्छे, &amp;quot;यो बट्टा कस्तो माग्यो &#039; मैलेअमेरिकामा श्रीमानसंग जाँदा जहाजमा एउटाले यस्तै बट्टाको स्वेटरलगाएको देखेर टिपेकी । यो कति सजिलो छ तैपनि हामीले पहिलेआफैले यस्तो बुट्टा कादन किन नजानेका ! साँचै हामी सोच्नै सम्तैनौंक्यारै । देखेपछि मात्र बृद्धि आउने । त्यसैले पति हो हामी जै कुरामापनि पिर्छड्िएका ।”&lt;br /&gt;
प्रेरणाले मीराका यस्ता कुरा सनेर आफूलाई थाम्नै नसकी त्यहीपुगेर भनेकी थिई, “हो हामी त्यस्तै छौँ । घर र अफिस कुन हो, कहाँहाम्रो कस्तो जिम्मा छ त्यति पनि सोच्ने कष्ट नगरी नारी जागिरदारकोखिल्ली उडाउने मौका दिइरहेका हुन्छौं । अमेरिकासम्म पुगेर त्यहाँनारीहरूले पनि अफिसमा डटैर कसरी काम गर्दा रहेछन्‌ भन्ने, सिकेरआएकी भए र यहाँ आई आफना साथीहरूलाई बताएकी भए एक चालप्रगतितर्फ बढ्ने थियो कि ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
प्रेरणाको पेचिलो भनाइ सुनेर मीराले भनेकी थिई, “नारी भएरतपाईँ पति खाली हामीलाई मात्र संघ्रै गाली गरिरहनु हुन्छु । क त्यतापनि हेर्नौस्‌ न, उनीहरू त्यप्त वेलादेखि चुरोट फुक्तै नयाँ सडकदेखिसिनेमाको हिरोहिरोइन, संसददेखि मन्त्रीहरूसम्म, राजनीति पार्टदिखिराजासम्मका गफ हाँकेर बसिरहेका छन्‌ त्यस्तालाई केही भन्नुहुन्न ।खाली हामीलाई मात्र साथी साथी मिलेर केही कुरा गर्न लाग्यो कि केकै न बिराएका छौं जस्तौगरी हपारिहाल्नु हुन्छ । हामीले त जस्तो भएपनि उपयौगी काम अफिसको काम सिद्धाएपछि गरेका छौँ । तिनीहरूलेजस्तोगरी फाल्त्‌ गफ गर्दै काम थपारेर समय बिताएका त छैनौं ।त्यसैले हामीले मागेका हौं, हाम्रो यहाँ पनि युनियन हुनुपर्छ । यस्तोअन्याय त सहनु पर्दैन ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
अफिसमा यस्तो काम नगर भन्दा अन्याय हुन्छ भने म अन्यायीहुन पनि तयार छु । अर्काले यसो गर्न हुने, हामीले नहुने भनेर सिक्ने नै&lt;br /&gt;
१११&lt;br /&gt;
हो भने क त्यता पनि हेर उनीहरू कति व्यरत छन्‌ भनेर देखाउँदै आफूफर्केकी मात्र के थिई, एउटीले भनेको हुन्छे, “पहिले यही ठाउँमालोग्नेमान्छे हाकिम थियौ । उसले कहिल्यै हामीलाई यस्तो भनेन । सुइटरबुनेको देखे भने त्यो नदेखेको जस्तोगरी आफै जान्थे । यसलाई जस्तोठूली कसैलाई हुनपर्दैनक ।&amp;quot; अर्कीले त्यसमा थपेकी थिई, “कसैले मनपराए पो त कुरा गरेर बस्थी । यस्ती ठाडी छै । घरको इलम केहीआउँदैन, अर्काले गरेको पनि सहँदिन । यसले लोग्नेलाई घरमा के गर्दीहो ? विचरा लोग्ने !”&lt;br /&gt;
प्रेरनालाई यस संझनाले हँसाउँछ र आफैँसंग भन्छे, “हो,स्वास्नीमान्छे नै स्वास्नीमान्छेका अवरोध हुन्छन्‌ । म तिनीहरूलाईस्वास्नीमान्छेको प्रगतिको अवरोध संभझन्छु जसले गर्दा नारी जातिलाईनालायक घोषित गर्न प्रमाण बनिदिएको छ र त्यस्तै म उनीहरूकोबाधक भएकी छु किनकि म उनीहरूलाई होसियार रहन खवरदारी गर्दै छु। मेरो खबरदारीले पछाडि ताँती लागैर बसेकाहरूलाई अगाडि सर्ने बाटोदिन्छ भनै नारी जाति काम नलाग्ने प्रमाण बट्ल्नेहरूलाई तिनीहरूकायस्ता कर्मले सहयोग गर्ने हुँदा कसैले केही बोल्दैनन्‌, रोक्न चाहदैनन्‌हेरिरहन्छन्‌, हाँसोमा उडाइरहन्छन्‌ र बेलामा औंल्याएर भन्छन्‌ पनि ,“&amp;quot;स्वास्नीमान्छे जागिरेले सात घण्टाको डयुटीमा तीन घण्टा पनि कामगर्छन्‌, गर्दैनन्‌ बहाना बनाएर गइहाल्छन्‌ । यिनले त अरू कामदारलाईभाँड्ने मात्र गर्छन्‌ । क हेर्नोस्‌, त्यो नानी बिरामी छ भनेर गई कत्यो सासुले आइज भनेकी छ, गईन भने मार्छै भनेर अगिनै गइसकीइत्यादि ।&lt;br /&gt;
प्रेणा यी सब संझैर छटपटाउँछै र अठोट गर्छ, म यसकोविरोध गर्न छोड्दिन । यसले गर्दा राम्रो जिम्मा लिएर काम गर्ने नारीहरूपनि बदनाम भएका छन्‌ र आउनेलाई पनि हाँसो भएको छ । संझाउदैजान्छु अफिसमा रहँदा जागिरदार भएर बस्नुपर्छ । हाम्रो समय पैसा दिएरअफिसले किनेको हुन्छ । स्वास्नीमान्छेको परिचय दिने ठाउँ अफिस होइन। यहाँ कुर्सीमा भेदभाव रहन नदिन व्यवहार ठीक राछ््ने उपाय हामीनारी आफैंले गर्नुपर्छ । समानता खोज्छौ भने समान हुनसक्छौँ भनेर पनिदेखाउनसक्ने हुनुपर्छ ।”&lt;br /&gt;
“कस्तो गहिरो सोचाइमा डुबेकी हुँ ? म आएर यहाँ उभिएकोउभिएकै छु, कहिले आँखा पर्ला भनेर कुर्दाकुदै आफैले भन्नुपत्यो । मआएकी छु भनेर । हेर, कुन बेलादेखि पस चियाले पनि तँलाई ताकेरसैलाइसकेछ ।&amp;quot; दया यति भनेर हाँस्तै उसैका छेउमा गएर बस्छै । उसकाहँसाइले पेरणालाई केही शान्ति दिन्छ र सोध्छ, &amp;quot; खुव दङ्गदास देखिन्छेस्‌,&lt;br /&gt;
११२:&lt;br /&gt;
के खवर छ त्यस्तो ? अमेरिकाबाट ट्ड्ल आयो कि चिठ्ठी : श्रीमान्‌कहिले फर्कते र ? यति वघोरै दिन लोग्ने साथमा नहुँदा पनि तैरौहोस्‌हवास उाडसक्यो जस्तो छ । तिमीह्ठका मायाले परेवाका जोडीलाईपनि मात गरिदिन्छु कि कसो ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ए हो त्यस्ती देखिएछु ! कहिलेकाही मलाई के हन्छ कं. यसैयसै के के सोच्न थाल्छु । अतन्तृष्ट छु क्या रे म आफू आफैँसंग ।बिद्रोह गर्न मन लाग्छ आफनै नारी कम्जोरी संग, दया, म अधुरो छ्नु ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“एउटा स्थापित परिबार आफनै भएकी तँ आफूलाई अघूरोमान्छेस्‌ भने मैले आफूलाई के संझू्‌ : तेरो हाम्रो संफझाइले कसैलाई केहीअसर पार्दैन । जीवनको गति आफनै प्रकारले चलिरहन्छ । हामी मात्रयसै चिन्तित भइरहेका हुन्छौं ।&lt;br /&gt;
“जीवनको प्रबाहसंग मिलेर चल्न नसक्नाले त म असन्तृष्ट0010 474 मान्छु । अशान्त छु म, दया लाग्छ, कहिले म आफनोनारी निकालेर विध्वंस गरी शान्ति ल्याउनपट्टि लाग ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
दया हाँस्तै भन्छै, “तर मलाई थाहा छ, त॑ त्यसो गर्नसक्तिनस्‌ । त॑ निरन्तरतामा विश्वास गर्छेस्‌ र तैमा पघैर्यको मात्रा धेरैच्या ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“अनि” &amp;quot;अनि के तँ मात्र होइन, तेरी साथी म पनि फुटेरबाहिर निस्कन सक्तिनँ । हामीमा सङ कोच छ, समाजसंग डर छ ।हामी इज्जत चाहन्छौ, प्रशम्सा सन्न मन पराउँछौं । त्यमैले हामीविद्रोहको कल्पना मात्र गर्न सक्छौं, साक्षात्कारमा उत्रन सक्नैनौं । यस्तोआँट बटुल्ने हो भने हामीले धेरै कुरा त्याग्नसक्ने हुनुपर्छ जन हामी गर्नसक्तैनौं । हामी मोहमा भूलेका छौं ।”&lt;br /&gt;
“कस्तो मोहको कुरा भनेकी ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
“यही सान्सारिक मोह ।” यति भनेर एक छिन अड्छै रप्रेरणाको अनुहार हेर्छ । क छक्क परेकी देखेर भन्छे, “तेरो र मेरोबीचको यस दोस्तीको मोह कमको छ र ! तेरो र मेरो, छोरीकाबीचको स्नेहलाई के भन्छेस्‌ : त्यस्तै तेरो र मेरो लोग्नेका बीचकोप्रैमलाई त्याग्न सक्छेस्‌ ? यस्तै असमर्थत। ल्याउने नै मोह हो ।&lt;br /&gt;
भ्म त यसले के के न भन्न लागी भनेकी त यसै फिस्स पारेरछोडी ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“यसरी मैले बेला बेलामा तँलाई धेचारिन भने त॑ त उडेको उडैहुन्छेस्‌ अनि चिया त के म पनि तेराअगाडि ठण्डा भइसकेकी हुन्छु ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
दुवै दङ्ग पर्छन्‌ र अर्को एक कम तातो चिया खाउने इच्छाराख्नै प्रेरणाले हरिलाई बोलाउँछै । केही छिनका लागि कोठा फेरि शान्त&lt;br /&gt;
११३&lt;br /&gt;
हुन्छ्‌ । दयाले सरसरी अखवार पढ्न थाल्छे र प्रेरणा आफूले फेरेकोसारी पट्याउन थाल्छै । यतिकैमा इला आइप॒ग्छे र बाहिर खेल्न जानआमासंग अनुमति माग्दै लाडिन थाल्छे ।&lt;br /&gt;
रात पर्ने वेला हुन लागेकाले चिया ल्याएपछि हरिको साथ खेल्नजाने क्रा सम्झाउँदै छोरीलाई फकाउँछै । दयाले प्रेरणाको ध्यान खिच्तैभन्छे, “यहाँ यस्तो के उल्का हुँदै छ ! हरेक दिन मान्छे हराएकोछापिएको हुन्छ । कहाँ जान्छन्‌ यी ? कसले कता लगिरहेछ !बालकबालिका, बृढाबृढी सबै उमेरका हराउन थालिरहेछन्‌ । तिनीहरूफेला पर्छन्‌ या हराएको हराएकै हुन्छन्‌ । त्यसतर्फ सरकारको ध्यानगएको छैन जस्तो लाग्छ । अहिले कति वर्ष भइसक्यो यसरी हराउनथालेको : यसको कारण के त भन्नै अभैँ पत्ता लगाएर जनचेतनाल्याउन सकेको छैन । यस अपराधबारे पनि खोजी हुनुपर्ने होइन ?”&lt;br /&gt;
“हुनु त पर्ने हो नि ? आफै भागेका भए पनि किन र कसरीभन्ने प्रश्न हुनसक्छ या कसैले लैजाने गरेको भए पनि किन र कहाँभन्ने त हुनु पर्ने हो । यसैले त मलाई साँझबिहान इलालाई एक्लै खेल्नपठाउन डर लाग्छ । हराई भने आफनो त बितेको बितेकै हुन्छ ?”&lt;br /&gt;
“उहिलेउहिले नेपालमा यस्तो कुरा पटक्कै सुनिन्नथ्यो, अहिले तयस्तो विकृति दिनदिनै बढ्दो छ । अरू त के, घर्म रै सम्प्रदायको अहंपनि फाटफुदट सुनिन वालिदै छ । हामीलाई नेपालमा एकताको जरूरतछ तर यहाँ भने यस्तो दङ्गाफसाद भित्र्याएर फूट ल्याउने तत्वहरूलेप्रश्नय पाउँदै छन्‌ । यसको नतिजा के हुने हो : राम्रो त अवश्य हुँदैनहोला&amp;quot; भन्दै दया खिन्न हुन्छे ।&lt;br /&gt;
यही हो स्वतन्त्रताप्रतिको गलत धारणा । यसले दवाइ दिन्छ किभनेर बचाउका लागि जमातको सिर्जना गर्न थालेको । यसलाई हामीलेविकास मान्ने कि फेरि फर्केर उही जातीय व्यवस्थाको आधिपत्यमा जानलागेको भन्ने । अहिले जुन किसिमले यो बढ्दै छ, यसले कुनै वेला पनिएक समूहको अर्को समूहसंग लडाईं गराउँछ । यसरी त हामीलेझगडाको बीउ रोप्तै छौं ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“त्यही त दःखको करा छ । मानव सभ्यताको यत्रो विकासभइसकेर पनि यो के देखा पर्दै छ ? के यो शक्ति र घमण्डको प्रदर्शनमात्र हो ? मानवधर्म, मानवता चिनाउने &#039; कँयौं संघ संस्थाहरू खोलिएकाछन्‌ तर यहाँ जानेका कर्महरू पनि त्यही रूपले बिर्सदैछन्‌ । बरु यस्तासमुह खौलिनुभन्दा पेशागत समूह खुल्दै गएका भए विकास हुने थियो&lt;br /&gt;
११४&lt;br /&gt;
“विकासको के कुरा गर्छेस्‌ त॑ ? हामी त अभौ विकासको रेखाछुने ठाउँमा पनि पुगेका छैनौं । त्यसैले हामीलाई अग्रेजीमा &amp;quot;अण्डरडिभेलोपिङ कन्ट्री” भन्छन्‌, डिभेलोपिङ पनि हाइन यानै यहाँ विकासकोपुर्वाधार नै अझ बन्न सकेका छैन ।&lt;br /&gt;
&amp;quot;हामी जतिसकै पढे लेखेका भए पनि हाम्रो भावना र सोचाइस्वार्चिपनाबाट पर हुनसकेका छैनन्‌ हामीले हामीजस्तै अर्का व्यक्तिको पनिउस्तै चाहना र जरूरत हुन्छ भन्ने बफन सकेका छैनौं । तसर्थ हामीअर्काका लागि र देशका लागि केही गर्न सक्तैनौं । देश कसको हाभनेर सोधियो भने नारावाजीले सिकाएको हुनाले फयाट भन्छौं, &amp;quot;हाम्रोहो” तर त्यसमा साधारण प्रश्न कसरी र किन भनेर मात्र सोधियो भनेपनि हामी अल्मलिन्छौं, थाहा पाउदैनौं किर्नकि हामीले त्यो बझने कोशिसनै गरेका छैनौं र त्यसतर्फ भावना जागृत गराउने अवसर पनि पाएकाछैनौ । देशको व्यवस्था एकातिर छ, हामी अर्कातिर छौं । हामी आफ्नैध्ननमा छौं, देशको व्यवस्वा आफनै पाराले कसको स्वार्थको लागि चल्दैछ,त्यो थाहा छैन ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
प्रेरणाको आजको उदासीपन दयासंगका वार्ताले झन्‌ प्रज्ज्वलभएको छ । क भन्छे, &amp;quot;हुन त स्वार्थमा नै देशर्भक्त, देशप्रेम, राष्ट्रियताटिकेको हुन्छ तर त्यस्तो स्वार्थ हामीले कहाँ फैलाउन सकेका छौँ ! यहाँत पढेलेखका, विद्वान्‌ कहलाएका व्यक्तिहरूले समेत स्वास्नीमाथि स्वार्थीपनाराखेर व्यवहार गर्ने गर्छन्‌ । भाषण दिन्छन्‌, नारी स्वतन्त्रता दिनुपर्छ भनेरअनि घरमा आएर तिनैले स्वास्नीलाई भन्छन्‌, “त्यस्ता नारी जागृतिहामीलाई चाहिएको छैन । हाम्रो घर, हाम्रा समाजमा भाँडभैलो हुनदिदैनौं । धेरै तिमीहरू चम्कने होइन । आफनो संस्कृति, परम्पराछोड्नयाले दु:ख पाइएला ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
दयाले पनि यसको समर्थन गर्दै भन्छे, &amp;quot;हो, त्यसो त भन्ने गर्छन्‌। तर यस्तो बोल्नेको संख्या घदतै जानुलाई पनि विकास मान्नु पर्छ ।फवाट्दै परिवर्तन ल्याउने हो भने आन्दोलन गर्न पर्दछ र आन्दोलन सबैक्षेत्रमा गर्दै जानु पनि उचित हुदैन ।” दया अलिकति आफूलाई आशावादीबनाउँछे र पेरणाले यसमा समर्थन गर्दिन र भन्छे, “पर्खने :कतिसम्म : &amp;quot;&lt;br /&gt;
दया छक्क पर्छै । प्रेरणाले गरेका कुरा सुनेर भन्छे, “किन पर्खनुपर्छु&amp;quot; भने आन्दोलन र क्रान्तिले धेरैको ज्यान लिन्छ, कति सुधार यस्ताहुन्छन्‌ जसलाई देशका कानुनले बदल्न सक्छ, त्यस्तै कति यस्ता छन्‌जसलाई व्यवहारले परिवर्तन गर्न सकिन्छ, संमफझदारीले हल गर्न सकिन्छ। आन्दोलनलाई केटाकेटीका हातमा भरेको बन्दुक दिएसरह दिनु हुँदैन ।&lt;br /&gt;
१११&lt;br /&gt;
आन्दोलन मच्चाउनु अन्तिम निर्णय हो ब्रम्हास्व जस्तै र यसको प्रयोगभीषण सङ,कट आइपर्दा मात्र गर्नुपर्छ ।”&lt;br /&gt;
“मलाई थाहा छ तँ विद्रोह चाहन्नस्‌ &amp;quot;भन्ने त्यस्तै म पनि घैर्यधारण गर्ने सक्तिनँ त॑ दया होस्‌ र म पेरणा । &amp;quot;प्रेरणाले दयासंगकोबहस यसरी ट्ङग्याउन खोज्छ तर दयाले कुरा उठाउँदै भन्छे, “त्यसोभन्छेस्‌ भने एकफेर हामी आपसमा आफना धारणा साँटेर यस समस्यालाईनिराकरण गरौं न त भनेर दीपेशको अमेरीकाबाट आएको चिठी पढ्नदिन्छे, प्रेरणा खरखरी पढ्न थाल्छे । दयाले उसका चेहरामा कस्तोपरिवर्तन देखापर्छ त्यो हेर्न थाल्छै । चिठी प्रा पढी सकेपछि प्रेरणालेत्यो दयालाई फर्काउँदै भन्छे, “जीवन छोटो नाटक त होइन, के संझैकाछन्‌ यिनीहरूले : कै उसका घरका परिवारलाई पनि यो सब याहाछ?”&lt;br /&gt;
&amp;quot;याहा होला नि । आफना छोराको करो पनि थाहा नपाउनेहुन्छ र ?”&lt;br /&gt;
“त्यसो नभन्‌ दया, थाहा नभएको पनि हुनसक्छ । नत्र कसरीतँसंग विवाह गराउँथे । विवाहमा ती कति खसी थिए । त्यो दीपेश पनितँलाई हेरेर आएका दिन यति खुसी भएको थिएन, मैले कति जिस्क्याएँ ।षदि यो कुरा वाहा थियो भने त्यस्तो खुसी आउनै सक्तैन ।&lt;br /&gt;
&#039;थाहा छ । यी सबै करा थाहा छ । यिनीहरूले कत्ति करा देख्नेनदेखेको जस्तो गरेर व्यवहार गर्नसक्छन्‌ । यिनीहरूलाई नेपाली बहारीआफनै जातको वंश धघाम्नै, पिण्ड दिने नेपालमा चाहिएको थियो ।त्यसैको लागि व्यवस्था मिलाएका हुन्‌ ।&lt;br /&gt;
यिनीहरूका घरको अर्को कुरा पनि तँलाई थाहा छैन होला ।सुन, मेरो देवर लागू पदार्थको सेवन गर्नुहुँदो रहेछ । मैले त्यो छ 2धाहा पाएर खुव संझाउँदै गाली गरेँ र सास्‌ससरालाई पनि सुनाएँ । जरोउनीहरूलाई देवरको बारे सुनाउनुको अर्ध थियो उहाँहरूले पनि देवरमधिनिगरानी राखन्‌ र यस लतबाट छुटाकन्‌ तर अचम्म ज्ञ त्यहाँ कसैलेपनि यसमा चासो राखेनन्‌ । मलाई नै त्यसपछि किन सुनाउन गएँछुभन्ने लाग्यौ र म आफैँले देवरलाई जे जसो भन्नु छ भन्न थालेँ ।एकफेर त देवर नै धरस्धरु हँदै भन्नभ्यो, “तपाईं किन पहिले नै यसघरमा आउन भएन : सायद म यस स्थितिमा पग्नै थिइनँ ॥।&#039; आहिले मन त छोड्न सक्छु, न त खानलाई नै पैसा जटाउन सक्छु । कहिले तएक सरको तान्त नपाई थरथर काँप्न थाल्दा आमाको होस्‌ या तपाईंकैघाँटीमा लगाएको तिलहरी छिनालेर लैजाङै र एक छिनलाई आनन्दितभई डङ रङ ङ लडिदिकँ जस्तो लाग्छ । के छ यस संसारमा : सबका&lt;br /&gt;
११६&lt;br /&gt;
सब मजस्तै भएर नशामा हराइरहेका छन्‌ । जागिरदार जागिरका नशाम्रा,नेताहरू राजनीतिका, व्यापारी नाफाका, उद्योगपति धन्धाका,धर्मावलम्बीहरू धर्मका र प्रेमीहरू प्रेमको नशामा त छन्‌ । माया जालहो यो संसार । नशाले लरखराएका छौं हामी सबै, । तपाईं पनि त्योचिप्ले दाजुका प्रेममा हराइरहनः भएको छ, मेजस्तै भएर । हो कि होइन,लौ भन्नोस्‌ त ?” त्यसो भनेको सुनेर म के भाएँहुँला लौ भन्‌ त ?उसले किन दीपेशलाई चिप्ले भन्यो : उसको स्वभाव थाहा रहेछ भनेरके म लख नकाटूँ त ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;खै के भन्ने ? नहुनु पर्ने कुरो तँमाथि भडहालेछ । अब हामीलेखुब सावधानीसंग व्यवहार गर्दै जानुपर्छ । यो करा तैले आफूताबाआमालाई भन्छेस्‌ ? वरु यी सासृससुरालाई पनि दीपेशको त्यो मिमसंगरहेको सम्बन्ध र दीपेश बाबु भईसकेको तिमीले थाहा पाइसके कीछयौभन्ने नबताक । उनीहरूको नाटकीय खुबी हेर्दा तँलाई समय काटनसजिलो हुनेछ र मलाई विश्वास छ एक दिन दीपेश आफैँले यो कुरातौसंग ओकल्छ । त्यस वेला तेरो विजय हृनेछ र दीपेश तँसंग झुक्नेछ। सत्य कुरा लुकाएर लुक्छ र ! तैँले दीपेशलाई लेख्तै रहन्‌ कहिलेतँलाई बोलाउने भनेर । यो पनि बताइ दिए, त॑ आमा हुने भएकी छेस्‌ ।अब प्रेमको कुरा त, यो लेख उ लेख भनेर भनुँ त्यो त॑ आफैँ जान्ने नैछस्‌ । यति मात्र म भन्छु, प्रेम घृणामा बदलिसकेको भए पनि उसलाईसजाय औओगाउनलाई नै भनेर पनि प्रेमको भाषालाई जीवित राखेस्‌ ।”&lt;br /&gt;
&amp;quot;म त्यसका स्वास्नीलाई मसंग त्यसले विवाह गरेको खवरपठाउँछु भनेर तँसंग राय लिन आएकी त त॑ यस्तो सल्लाह पो दिन्छैस्‌। मलाई समय काट्न तिनीहरूको नाटक किन हेर्नुपर्छ : ती घिनौलाचाललाई म कसरी हेरेर नहासखु ? मैले त सौचिरहेकी छु यो छोटोदाम्पत्य जविनका उपलब्धिलाई यस घरको अन्तिम चिनो मानेरछोडिदिउँ । यो दाम्पत्य जीवन के रहेछ त्यो पनि त बिनै हाले ।अब पनि केका लागि बेइज्जत सहेर बस्ने ? के पाउनका लागि : केवलउनीहरूको नाटक हेर्न या उनीहरूलाई मानसिक ताडना दिन मेरोउपस्थिति त्यहाँ रहिरहन दिनै ?&lt;br /&gt;
यसले उनीहरूलाई केही पनि गर्दैन । यसरी छक्याएर विवाहगराइदिनु नै भूल हो भन्ने लागेको छैन भने पछ्नुताउ किन हुन्छ :ःदीपेशले पनि सोचेको होला नेपालको कानुन अनुसार एउटैसंग विवाहभएको छ र त्यहाँ ? घरदैखि टाढा हुँदा दिलबहलाउ गर्ने एउटा उपायमात्र । हामी दुवैले धोका पाएका छौँ । &amp;quot;दयाले पटद्ट यति उत्तेजितभएर भन्छे ।&lt;br /&gt;
११७&lt;br /&gt;
&amp;quot;अहिले तेरो मनस्थिति कावमा छैन । त्यसैले केही दिन शान्तमनले सोच र फेरि हामी दुई भएर कुनै निर्क्यौल गरौंला । दलदलमापरिसकेपछि त्यहाँबाट उम्कदा पनि फेरि कुनै आपत्‌ नआइपरोस्‌ भनेरसोचेर मात्र काम गर्नपर्छ । यहाँको कानुन तँलाई थाहा छ, नानी ठूलोभएपछि त्यसमाथि बाबको हक लाग्छ, आमाको हुँदैन । त॑ त जन्माएरहुर्काउने मात्र होस्‌ अनि नानी उसलाई सुम्पेर बङ्गो हुनबाहेक केही उपायअर्को लाग्दैन । त्यस बखत नानीका प्रेमले तँलाई के के बनाएर छोड्छ,त्यो तलाई थाहा छैन । )&lt;br /&gt;
अर्को कुरा, यति सजिलोसंग सन्तान उसलाई दिने र आफनोसम्बन्ध उनीहरूकंगको छोड्ने गच्यो भने यसको बढी दृःख तँलाई हुन्छ,उनीहरूलाई होइन । हाम्रा देशको नारीप्रतिको व्यवस्था यस्तै छ । यसलाईसंरक्षण दिएको भन्ने कि यातना : त्यसैले यदि तिनीहरूलाई सास्ती नैदिने हो भने आफू त्यही घरमा रहेर, त्यस घरका सबै पक्षलाईविश्वासले जितैर वशमा लिनुपर्छ र ती परिवारमाथि माया नभए पनिदयाले त्यस्ताको मन जित्नपर्छ । दया मायाले दिएको सजाय चोटपटककोभन्दा गहिरो हुन्छ । स्मृतिपटमा बारबार त्यसले हानिरहन्छ । लाचारी रसमर्पण बाहेक त्यसको पत्यत्तर अर्को हुँदैन ।&lt;br /&gt;
यसरी चोट परेका तिनीहरूले जब आफनो गल्ती कबल गर्छन्‌त्यसै वेला आफनो अधिकार देखाउँदै उनीहरूकै खर्च्नेमा अलग बस्ने इच्छाव्यक्त गर्नुपर्छ । कानुनले एक तर्फबाट हामीलाई शोषण गरेको छ भनेत्यही कानूनलाई फर्काएर आफूनो सुरक्षाको आधार पनि बनाउन पर्छ ।अहिलेसम्म त हामीले शोषणमात्र सहेका छौं, त्यसको उपयौग गरीआफूलाई विजयी बनाउन जानेका छैनौं । यसरी हामी आफैले आफूलाईशोषण गराइरहेका छौं । धाहा छैन त्यसको उद्दैश्य के हो ?”&lt;br /&gt;
“उद्देश्य केही नहुन पनि सक्छ तर यो नारीभित्रकै कम्जोरीलेगराएको हुनसक्छ । पढेलेखेकी त॑ त अझै भन्दै छेस्‌ सहेर हेर, आफूलाईमानसिकरूपले मारेर तिनैमाधि दया गरेर हेर । यो नै उनीहरूलाई सजायदिएका हन भन्छौँ । यस्तै निरन्तरतावाद र सहनशीलताले हो हामी आफूआफैँ भएका ।&lt;br /&gt;
बहिनी साधानाले ठीक भन्दै थिई, दिदी तपाईं ज्यादै नरमहुनुहुन्छ । डर लाग्छ कतै कसैले तपाईंलाई माडमुड गरेर नफयाँकीदेओस्‌ । दया, माया र नग्रतालाई पनि सीमाको जरुरत छ । यसरी जेजसो भन्दा पनि लौ हुन्छ भन्नु हुँदैन । यो दीपेशका बिवाहकोप्रस्तावलाई राम्ररी सोचेर मात्र आफूनौ निर्णय दिनोस्‌ । राधाका कुरासंझनोस्‌ । अमेरिका जान पाउँछु भन्ने रहरलाई एक कुनामा छोडेर&lt;br /&gt;
११८&lt;br /&gt;
स्वछुन्यमनले सोच्नोस्‌, “किन उनीहरू तपाईंसंग नै विवाह गर्न मरिमेदतैछन्‌ । तपाईंमा त्यस्तो कै देखे, तपाईं नै उनीहरूलाई चाहियो । तपाईंकोप्रेमविवाह भएको त होइन अनि किन यत्रो त्याग यौ त्याग नभएरअरू नै केही हुन पनि सक्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
उसको कुरा सुनेर बाआमादेखि लिएर सबैले त्यसैलाई गालीगरे ।बाले भन्नभयो देशविदेश घमेर जान्नेसन्ने भएकाले सुधारको नीति तिनलागे पनि तिमीहरूलाई त्यसैमा शङ.का लाग्छ अत्ति खोज्छौ “नागीविकास ? &amp;quot;पहिले आफनो बुद्धि र सोचाइको विकास गर्न पछि बादरकोहातमा नरिवल होला !&amp;quot;&lt;br /&gt;
त्यस वेला मैले पनि साधनाका भनाइलाई अपरिपक्व मान्दैहाँसिदिएकी थिएँ । अब त्यही ठीक हुन आएपछि मैले कुन मुख लिएरत्यससंग यो सब कुरा गर्छ ! लाज लाग्दै छ मलाई आफूनै बहिनीसंगपनि । &amp;quot;&lt;br /&gt;
“यो पनि नाइँ, “क पनि नाईँ भन्ने हो भने गर्नै के : न हिजौन आजको दोसाँधमा परेका हामीले भोग्न पर्ने समस्या नै यस्तै हन्छ ।म त फेरि उही कुरा दोहोन्याउँछु उनीहरूलाई पछ्नुताउमा पारेर सत्यकोसामना गर्नसक्ने बनाइदै ।”&lt;br /&gt;
“के बन्छन्‌, के बनाउन सक्छु, त्यो त म केही जानिन । यतिभने अवश्य गर्छु “यो भारी नविसाएमम्मलाई म वैंले भनेका बाटामाचल्छु । हेरू, साक्षात्‌ नाटक हामी कसरी खेलिरहेका हुन्छौँ र तमासाबनेर देखाइरहेका हुन्छौँ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“दीपेशले तँलाई रुवाएर धेरै अधर्म गर्दै हुनुहुन्छ । उहाँले कसरीढाँदन सक्नुभयो । यो कुरा नै मैले सोच्न सकेकी छैन । दीपेश त्यसप्रकारका व्यक्ति नै थिएनन्‌ । मलाई राम्ररी थाहा छ मेरा श्रीमानूलाईसही बाटामा ल्याउने नै तेरा श्रीमान्‌ हुन्‌ । रक्सी, चुरोट्र रस्वास्नीमान्छेमा नै रमेर कुख्यात भइसकेका उहाँलाई म समान्य बनेरआँट गरी बिबाह त गरेँ तर हार खाएर पन्छिने अवस्थामा पुमलाई र उहाँलाई यही दीपेशले मिलाइ दियो र अहिले मैले उहाँलाईमेरो मात्र बनाउन सफल भएकी छु । दीपेशलाई नारी मनोबिज्ञान रवैदना थाहा छ तर कसरी यस्तो भयो ........ ? समय र वातावरणलेकत्रो परिवर्तन ल्याउन सक्तो रहेछ । यो संझैर पो म हैरान हुनघालिरहेछु । विश्वासै गर्न सकिरहेकी छैन ?&lt;br /&gt;
दया, तँ नआत्ती, तेरौ साथ दिन म तयार छु । यस जङ्गमाविजय हाम्रो नै हुनुपर्छ ।”&lt;br /&gt;
११९&lt;br /&gt;
“म रोए, दिक्क भए पनि हिम्मत गर्न पन्छिने मेरो स्वभाव छैन। चुन्छु त म एक्लै रुन्छु दुःखलाई आँसुले बगाएर फयाँबन र नयाँउत्साह बटुल्न यसै त गर्न पर्दो रहेछ । जब म रुन्छु, म खाली खाली&lt;br /&gt;
हु मस्तिष्क शान्त हुन्छ, एक छिन शून्यमा हराउँछु अनि नतामा३ रगत तात्न थाल्छ, म आँसु पुछतै उठ्छु र मनमा अठोटगर्छु । आँसको मुल पत्ता लगाई त्यसलाई त्यही नै सकाइ दिन्छुबारम्बार रोएर जीवन यात्रालाई अध्रो राख्न चाहन्न र त्यसी मेरोहिम्मत र उत्साह व्यर्थमा यस्ता समस्यामा लगाई समय खेरफाल्न पनिचाहन्न । अहो यत्रो लामो समय गफ गर्दैमा बिताएछौं । अब म घरगइहाल्छु । चाँडै आउँछु भनेर आएकी ।” दया यसो भन्दै घर जानजरुक्क उठ्छ ।&lt;br /&gt;
“पुन्याइ दिनुपर्छ भने भन्‌ म साथमा जान्छु&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;अनि त्यहाँबाट तँलाई कसले यहाँ पत्याउन आउनै नि &#039; किरातभर त॑ मकहाँ, म तैकहाँ एक अर्कालाई प॒च्याउन हिरडी राख्ने : बरुटर्च भए दे । क्याँच्च हिलामा खुट्टा पत्यो भने असाध्यै सिकसिकोलाग्छ ।”&lt;br /&gt;
केही दिन बितेपछि एक दिन दयाको टेलिफोन प्रेरणाको घरमाआउँछ । क भन्दै हुन्छे, &amp;quot;मैले सेक्सपियरका भनाइमा “यो सन्सार एउटानादयशाला हो, हामी यहाँका अभितयकर्ता हौं” भनेको अर्थ राम्ररी बझनेमौका पाइरहेकी छु र मैले पनि एउटी अभिनेत्रीको भमिका निर्बाहगरिरहेकी छु, तैले भनेअनसार । रमाइलो लाग्दो रहेछ वास्तविकता रकृत्रिमपन नमिलेर निस्केको वेढङ्गी नतिजा हेर्न । अर्को पराकाष्ठा पनिसुनिराख, दीपेशको पहिलो सन्तान जन्मन लागेकाले हरेक दिन जस्तोमलाई मन्दिरमा लिएर जान्छन्‌ र के केको हा पृजा आजा गराउँछन्‌ ।थाहा छ, त्यही घरको एउटा कोठामा आफनै छोरो नशालिएर अचेत भईलडिरहेछ्‌ । त्यो छोरो जसलाइ गर्भधारण गर्दा सायद यस्तै पृजाआजागरिएको हुँदो हो, आफूनो परम्परा अनुसार । एउटा छोरो के भन्ने,भनाइ अनुसार दोसी छौराको चाहना लिएर गर्भवती भएकी थिइन्‌ होलिन्‌ती आमा ।&lt;br /&gt;
यहाँको स्थिति हाँस्यास्पद र संवेदनशील दृबै छैनन्‌ त पेरणा !लौँ भन्‌ त॑, मलाई कुन स्थितिमा रहेकी मान्छेस्‌ ! :&lt;br /&gt;
उताबाट जबाफ आउँछ, &amp;quot;तँ । तँ, त डाँफैचरी भएकी छेस्‌,कुरो बझिस्‌, होइन त ?”&lt;br /&gt;
“बुझेँ, तर तैंले ममा अरू रङ्ग पनि थपिदिइ्रस्‌ कि कसो !&amp;quot;&lt;br /&gt;
१२०&lt;br /&gt;
हाँसो दोहोरो चल्छ । अनि दयाले भन्छे, “म यी सब हेरेररमाइरहेकी छु । आफूलाई बिर्सेर यिनीहरूलाई नै हेर्दै छु । सिक्तै छुजीवन के हो, मनोभावना के हो, सुख दुःख के हुन्‌, सबै सबै थाहापाउने मौका यही पाइरहे पनि रातमा एक्लै रुन नपर्ने स्थितिमा भनेप॒ग्नसकेकी छैन । अरू बाँकी क्रा भेटैमा गरुँला भनेर टेलिफोन राखीदिन्छे ।&lt;br /&gt;
“तिमीले आजको अखवार पढ्यौ &#039; विचरा शर्मालाई बित्यासैपारेछन्‌ ।&amp;quot; यसो भन्दै शिवले गौरीलाई गोरखापत्र पढ्न दिन्छ । गौरीपनि अखबार गढ्दै भन्छे, &amp;quot;हेर, कस्तो बेइज्जत भएको ? पैसा धेरैकमाएर के गर्न : सबैले थक्ने काम भडहालेछ्न । आफूले ठाउं छौड्नथालेपछि यस्तै के के भग्नपर्छ के के ?&lt;br /&gt;
“नियम कानुव उल्लङ घन आयो भन्नु बेग्लै कुरा हो तर नियतनै खराव रहन, घस मृद्टा लागेर जेलै जानपर्ने हुन भनेको सानो क्राहोइन ।&amp;quot; शिवले आफनो र उसको निष्कासनको फरक यसरी बताउँछ ।&lt;br /&gt;
गौरीले समर्थन - अर्कै तरिकाले गर्दै भन्छे, “कुनलाई ठूलो रकुनलाई सानो भन्ने &#039; निष्कासन हुनु नै नराम्रो हो । यहाँ कसलेलेखाजोखा गरेर भन्छ : निकालिएका जति सबैलाई एकै दृष्टिले त हेर्छन्‌नि ? यो दमनले त गर्न पनि उल्कै गरेको हो त : बाहिरबाट आएरडेरामा बसेर जीवन गुजारा गर्ने त्यो ठूलो हुँदै आफ्नै मोटर चढेरहिड्ने भयो । त्यसका छोराछोरी कोही अमेरिकामा, कोही अष्ट्रेलियामापढ्न जाने भए । स्वास्नी हुनेको फूर्ति कसले हेरिदिओस्‌ जस्तो भएकोथियो । त्यत्रो पैसा कहाँबाट आयो होला भन्ने शङ,का न मलाई पनिलागेको थियो । जसले विष खान्छ त्यसले त ओक्ल्नै पर्छ, हामीले चिन्तागरेर के गर्नै ? लौ चिया खानुहोस्‌&amp;quot; भनेर एक कप अगाडि सार्छैं ।&lt;br /&gt;
शिवले चियाको चस्की लिदै मनमनै गम्न थाल्छ, “कुनै पनिव्यक्तिको चरित्रमा त्यसका परिवारका आकाङ क्षाले प्रभाव पारेको हुँदोरहेछ । उसले संझन्छ, एक दिन दमनले दिक्क भएर भनेका कुराहरू ।“यार, मलाई तिमीहरू केही नभन । मैले यस्तो काम गर्न सक्तिनँ भन्दापति नगरी धर पाइनँ । हात हालेको छु, कति सफल हुन्छु यामिल्काइन्छु थाहा छैन । छोराछोरी पढाउनेदेखि लिएर घरजम जौडन पर्दाखर्च थामिनसक्नुको भयो । नयाँ नयाँ सौखिन सामग्रीको प्रयोगले बानीबिगार्दै गयौ । साथीभाइ, इष्टमित्रका अगाडि आफनो इज्जत राख्नै पप्यो। तलवको भरमा चल्नै के सक्ने भयो र । अति मैले पनि उपरीआम्दानी बढाउन थालेको छु । रातदिनको घरको कचकचबाट यति भयोभने मुक्त हुन त सकुँला !”&lt;br /&gt;
१२१&lt;br /&gt;
छिः परिवारको यो मोह ज्ञ यसैमा आफूलाई टाँसी राखौं भनेनिस्कने नतिजा यस्तै त रहेछ नि ? दमनले यदि आफनो आम्दानीमृताविक आफनो खर्च मिलाउन सकेको भए आकाश छुने इच्छा नराखेकोभए र आफनो सैद्धान्तिक र नैतिकताका बलले आफूलाई विजयीबनाउनपट्टि आफनो कर्तव्य संभैको भए आज त्यसको यो गति पक्कै हुनेथिएन । त्यस बेला उल्टै हामीलाई भन्न बालेको थियौ, “मौका आउंछपर्खदैन । तेपसैले मौकाको फाइदा लिइहाल्नपर्छ । छोराछोरीका शिक्षामाअहिले जे जति खर्च गर्न सकिन्छ, त्यही नै हाम्रो यिनीहरूका लागिगरेको लगानी हो । अहिले हाम्रा पालामा त काम पाउन यति गाह्रो छ,यो बढ्दो प्रतिस्पद्धलि कस्तो स्थिति ल्याउला ? हेर यार, अहिले नैहामीले यिनका लागि केही गरेनौं भने ।यनीहरू कहिल्यै शिर उठाउनसक्नेहुँदैनन्‌ । मनोबल गुमाएर हरेक क्षेत्रमा अपमानित हुनुपर्नाले अगाडि बढेरकेही गर्न नसक्ने हुन्छन्‌ । यो नोकरको जीवनबाट कहिल्यै छुटकारायिनले पाउँदैनन्‌ । एक न एकपटक परिवारमा कमै न कसैले यस्तोखतरा बोक्न नै पर्छ । सन्तानलाई यस्तामा फस्न नदिई म आफैँलेउठाएको छु । मेरो अन्त्य भएपछि यी सबै मेरो साथै जान्छन्‌,छोराछोरीहरू मुक्त भइहाल्छन्‌ ।&amp;quot;”&lt;br /&gt;
दमनका यस्ता कुराहरूका सफझनाले उसलाई जङ. चलाउँछ रमनमनैमा उसलाई हकार्न थाल्छ, “खुव गरिस्‌ तैले :ः के अब तेरासन्तानको शिर ठाडो हन्छ भन्ठानेको छस्‌ ः छोराछोरीको भविष्य बासुभनेर आँखा चिम्लेर सकेसम्म. कुम्ल्याउन थालिस्‌, अहिले त्यस कर्मलेतेरा सन्तानका भविष्यमा कहिल्यै नमेटिने कालो छाप लगाउँदै छ । जतिठूला तेरा सन्तान भए पनि भन्न छोड्दैनन्‌ यो त्यही घुस्याहाको सन्तानहो । त्यसका बाबले दुनियाँलाई मारेको थियो ।”&lt;br /&gt;
शिव एक छिन शून्य हुन्छ । उसको तातेको रगत सेलाउँछअनि व्यावहारिक रूपले सोच्छ । के गर्छ : एकफेर त्यससङ भेट गर्नजाँ कि : त्यसले अरूसंग जे जस्तो भनेर फूर्ती देखाए पनि मलाई तसाँचो कुरा पछ्नुताएर नै गर्थ्यौ । आफनो शिर झुकाएकै हुन्थ्यो । अहिलेम त्यसलाई राखेका ठाउँमा भेट गर्न गएँ भने के पो गर्ला ? त्यसकाघरका परिवारसंग भेट कसरी गर्न जाडौँ : नजाङैँ मनले मान्दैन, जाँतिनीहरूले के सोच्ने हुनै : यसरी उदाब्गिनु परेकाले पीर त परेकँहोला । यस्ता व्यक्तिहरूले हामीले देखाएको सहानुभृतिप्रति खिसीटिउरीउडाउदै हामीले जासृसी गर्न आएको पनि भन्नसम्छन्‌ या भन्छन्‌उनीहरूलाई खुच्चिङ गर्न आएको ।&lt;br /&gt;
१२२&lt;br /&gt;
है भगवान्‌ ज्ञ भगवान्‌बाट मैले कुनै वरदान पाएको रहेछु भनेमेरा परिवारलाई आफनो औगात सोच्नसक्ने शक्ति दिएका रहेछौ । मैलेविनैप्रतिका मोहमा बाँधिएर पघभ्रष्ट हुनु परेन । छन त मसग पनि केनै थियो र ? छाक टारदैमा &#039; कमाइ सिद्धिन्थ्यो । थियो भने एउटा कुराथियो । सन्तोष ।&lt;br /&gt;
“जागिर खाएर निष्ठावान्‌ रहनु र इमान्दारीपूर्वक कामगर्ने रगराउनु दुवै निकै गाह्री हुँदो रहेछ । यहाँ आफूलाई चिफ्याइदेला भन्नेडरले होसियार हुनुका साथसाथै विभिन्न किसिमका आकर्षणले हामीलाईछोप्न आउँदा त्यस्ता कर्मबाट उम्कन र आफना मातहतकालाई उम्काउनुएक जागिरदारका लागि चुनौती हो उसको निष्ठा र इमान्दारीको परीक्षणगरिने बैला हुँदो रहेछ । हे भगवान्‌ ज्ञ मेरो प्रार्थता छ, मेरा सन्तानलेसुबद्धिको आशीर्वाद पाइरहन्‌ । यिनका पेट इमान्दारीपूर्वक कमाइएकाअन्नलै मात्र भरियन्‌ ।&lt;br /&gt;
दमनका बारेमा सोच्तासौच्तै शिवले आफनो अर्का साधीलाईसंझन्छ ! उसको छोरो सबै क्षेत्रमा योग्य भएर पनि नोकरी पाउननसकेर भौतारिन परेको गुनासो थियौ, “भई नभई श्रण काढेर छोरालाईपढाएँ । ठूलो भएपछि राम्रो नोकरी पाउला, यी श्रणहरू निख्न्ला भन्नेकत्रो आशा राखेको थिएँ । अहिले नौकरीका खोजमा छोरो छटपटाइरहेछतैपनि काम पाउने यत्ति पनि आश छैन । जहाँ जाक भन्छन्‌ रे,“हामीकहाँ जागिरे धेरै भएर भरखर निकालेका छौं कसरी तपाईंलाईअहिले लिइहाल्न्‌ : ज्यालादारीमा बस्ने हो भने साना दर्जामा लिनसक्किएला तर तपाईंको योग्यता अनुसार लिन सकिदैन । लौ, भन तत्यस्तै पनि खा कसरी भनुँ ? हाकिमको जागिर खोज्दै जाँदा पिउनकोपाइन्छ । २०४६ साल यता भन्नै दुई वर्ष हुन लाग्यो त्यो लोकसेवाआयोगले पनि कर्मचारीहरू माग गरेको छैन । गोरखापत्र किन्यो, पढ्यो ।त्यतिकै भइरहेछ । फेरि अचम्म त एउटा कुरामा लागिरहेछ, एउटा मेरोआफन्त नै भन्नुपन्यो, त्यसको छोरो आइ.ए. सम्म पनि पटके भएर पासगरेको थियो । त्यसको मार्क ३३ पर्तैन्ट जति पनि छ, छैन तर त्योएउटा संस्थामा ज्यालादारीमा, जागिरै भएछ कुन्‌ ओहदामा थाहा छ ःम्यानेजमेन्ट एक्सपर्टमा रै : यस्तो छ, यहाँ ? मन कसरी बुझाउने ।हाम्रो योग्यता बाहेक अरू कस्तो गुण हुनुपर्छ जागिरे हुन, त्यो थाहापाउन सकेको छैन ।&lt;br /&gt;
बिचरा कति दुखी भएको छ क । होइन, सबैलाई सरकारीनोकरी नै किन चाहिन्छ ! आफैँ कुनै नयाँ व्यवसाय शुरु गरे चाँडै नैउठिन्थ्यो । यो जामिर खाएर पचाउन कति गाह्रो छ, त्यसको ज्ञान&lt;br /&gt;
१२:&lt;br /&gt;
यिनलाई छैन । शिवले दुवै साथीहरूका समस्यासंग आफनो मिलाएरजाँच्छ र त्यसबाट मुक्त हुन क फेरि तबला बजाउन थाल्छ एक सुरलेएक्लै । शिब त्यस्तै स्वभावको छ । उसको सङ्गीत माथिको प्रेमको पक्षअर्कै छु । क आफू बेचैन भएको बेला मनलाई काबूमा राख्नपरेमातवलावादन गर्न थाल्छ । सिरिरिर हावा कोठाभित्र पस्छ । शिवलाई केहीचङ्गा भएको अनुभूति हुन्छ । क उठेर झयालबाहिर हेर्न जान्छ । टाडाउसले स्वयंभ्‌को स्तृप देखछ । गौरीले उसलाई तवलावादन छोडेरझ्यालमा टोल्याएर हेरिरहेको देखेर सोध्छ, “तपाईंलाई पनि कति चिन्ता,के केमा लाग्ने हो : कर्मअनसार फल त कुनै बेला ओग्नै त पर्छ ।दमनले यसकौ परिणाम यस्तो पनि हुन सक्छ भन्ने थाहा पाएर नै तअगाडि बढेको होला । सायद, उसलाई यति चिन्ता लागेको छैन होलाजत्तिको तपाईंलाई लागेको म देख्तै छु । बरु आउनुहोस्‌, तपाईं तबलाबजाउनु होस्‌, म हार्मोनियम बजाउँछु ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
मैले बजाइ सकेँ । फेरि बजाउने मन छैन । हिँड, बरु घुम्नजाऔं “भन्दै गौरीलाई लुगा बदलेर आउन पठाउँछ र आफू डोटीकाबाबाका घरमा नुरलाई संझन पुग्छ ।&lt;br /&gt;
दिनभरका भ्रमणले थाकेर त्यस घरमा बास लिएर छुप्लक सुत्तछुभन्दा उसले त्यहाँ सामाजिक प्राणी मानिएका मनुष्यका जीवनलाई समाजलेनै थिचोमिचो गरी कुच्याएर निकालेका ती प्राणीहरूसंग भेट भएको थियो॥ उसले जीवनका अविस्मरणीय ती गाथाहरूलाई आफूनो अवस्थाकोभन्दाधेरै दयनीय ठानेको छ ।&lt;br /&gt;
उसका सोचाइले कोल्टै फेर्छ र आफैसंग भन्छ, “मनुष्य ज्ञतिमीले जति दुख पाएको छौँ, त्यो आफनै जातिबाट पाइरहेछौ र जति,सुखको अनुभूति हुन्छ त्यो पनि उनैबाट पाएका छौँ । हामी एकअर्काबाट टाढा किन हुन सकिरहेका छैनौं भने सुख दुःखको स्रोत नैहामी बीचको सम्बन्ध हो । यस सम्बन्धलाई चेतना र बिकले हेर्न किनसकिरहेका छैनौ ! आखिर हामी नै त चेतनशील प्राणी हौँ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
सोच्तासोच्तै शिवका मुखबाट यस्ता शब्दहरू फुत्कन वाल्छन्‌,&amp;quot;आयु काटनु नै कत्रो समस्या बनेको छ भने हामी के नै गर्न सक्नेभएका छौं ! बाँच्न सक्नु नै जीवनको ठूलौ उपलब्धि हो भन्नसुहाउनेभइ सकेको छौँ । जसलाई हेत्यो सबै आफनै दुखका बोझलेरोइरहेका मात्र छन्‌ । यी हाँस्ने र हँसाउने बुक बन नसक्लान्‌ !&amp;quot;&lt;br /&gt;
लुगा फेरेर आई टक्क उभिइरहेकी शिव एक्लै यसरीफतृफताएको सुनेर भन्छे, “सख द:ख भनेको मनको स्थिति हो । तपाईंआफैँ द:खी हनहन्छ भने तपाईंले सबैका जीवनमा दुख मात्र देख्नुहुन्छ ।&lt;br /&gt;
सुखको कि वास्ता गर्नुहुन्न कि जान्नै खोज्नुहुन्त । म त अरूलाई दुःखीहोइन, तपाईं नै किन हाँस्न नजानेको भन्छु :”&lt;br /&gt;
न्यसै हाँसेर हिड्नेलाई के भन्छन्‌ थाहा छ : सिल्ली हो, म त्योहोइन । लौ हिड, एक छिन भए पनि यस गुम्म वातावरणबाट सुक्तहोऔं ।&amp;quot; भन्दै गौरीलाई लिएर निस्कन्छ ।&lt;br /&gt;
बाटामा हिड्दै शिवले पश्चिमाञ्चल क्षेत्रमा घम्त जाँदा नुरसंगकुन अवस्थामा भेट हनगयो, त्यसपछि कुन परिस्थितिको सामना गर्नपत्योर बाबा ,र मैनाको जीवन कथा कस्तो रहेछ सबै सुनाउँदै दमन, शनतर प्रतापलाई पनि जोडेर आफ्ना मनमा उक्समकुस भएर रहेका सबैकरा गौरीलाई बताउँदै जान्छ ।&lt;br /&gt;
स्वयंभुको सिढी चढ्दै शिवले गौरीसंग सोध्छ, &amp;quot;के तिनीहरूकाकथा सुनेर पनि तिमी मलाई सुख बिर्सने प्रकृतिको भन्ने ठान्छयौ &#039; यहाँहाँसोभन्दा ज्यादा आँशु नै छ । यिततीहरूको जीवन नै हेर, यिनीहरूलेसुख के हो भनेर चिन्न पाएका छन्‌ &#039; म त भन्छु, जसले धेरै आँशृदेखेको छ, खपेको छ, त्यसले जीवन पति राम्रोसंग बुर्भको हन्छ ।सखैसखमा रङ मङ गिएर मस्त हुनेको एउटै सोचाइ हुन्छ भने दुःखमागाडिएर उक्सन खोज्नेले हरेक क्षेत्रमा सोच्तै उम्कने प्रयास गरिरहेकोहुन्छ । यिनै अट्टट प्रयासले ज्ञान: दिन्छ, सफलता ल्याउँछ र अनुभवी पनिबनाउँछ ।&lt;br /&gt;
“त्यसो हो भने दमनले दुखबाट उम्कन जन प्रयास गरे त्यसबाटके उनले. सफलता पाए भन्नुहुन्छ : यो तदुबंलता हो । जीवनलाईदिशाहीन बनाउने असफलता हो । यस सफलताका खोजमा पाएकोअसफलता हो, जन्‌ उनका प्रयासको लक्ष्य दर्बल हनाले भएको छ ।जसमा पहिलेपटक असफल हुँदा त्यसबाट उठेर फैरि सफलताका लागिप्रयास गर्ने ठाउँ रहँदैन । मुन, प्रयास भन्दैमा र सफलता भन्दैमा सबैउत्तम नै डुन्धन्‌ ॥ जबे अषट्रट प्रयास गरिन्छ त्यसको नतिजाअन्त्यमा सफलता नै हुनसक्छ । तर त्यो सफलता कति उपयुक्त छया हानिकारक छ, त्यो प्रयासका लक्ष्यमा आधारित हुन्छ । त्यसकोआधार सत्‌ या मिथ्या हुने गर्छ ।&lt;br /&gt;
सत्‌ मार्ग अपनाउनाले दुःख दिए पनि धोखा दिदैन र मिथ्यालावण्यमय भए पनि शान्ति र सुख दिदैन । तसर्थ सत्‌ प्रयासका क्रममाधेरै असफलता पनि आइपर्न सक्छन्‌ बुल 02 र्णत्य प्राप्तिका लागि अट्रूटप्रयास गर्दै जाने बाटो भने रोकिदैन मानी असफलता नै सफलताकालागि अनुभूति प्राप्त गर्ने स्रोत हो ।&lt;br /&gt;
१२१&lt;br /&gt;
हेर न, अहिले हाम्रो यो सिढी चढाइलाई नै लिऔं । हामीथाकेका छौं तैपनि माथि पुग्ने लक्ष्य नछोडी अगाडि वढ्दै छौँ । यसैलेहामी त्यहाँ पग्छौं पनि तर यदि हामी सक्नैनौँ भनेर यहीबाट फर्कियौंभने के पाउँछौं ! यी स्वाँ फ्वाँ पनि व्यर्थका हुन्छन्‌ । त्यस्ता निरुत्साहीपार्ने तत्वहरूलाई निराकरण गर्दै जानुपर्छ, आफूता आत्मबलले धिच्तैजानुपर्छ गौरी । प्रयास, लक्ष्य र नतिजाबाट नै हाम्रा जीवनमा सुखदःखआइगइरहेका हुन्छन्‌ ।: यी तीनैलाई हामीले होशियारपूर्वक बारम्बारल्याउनपर्छ ।&lt;br /&gt;
तपाईं आत्मबलको कुरा गर्नुहुन्छ । त्यो आत्मबल बढाउनलाईप्रतिस्पद्धा गर्नसक्ने गुणको प्रवर्द्धन पनि त गर्नुपर्छ । दमनजीले त्यसैलेभनेको होइन, “मेरा सन्तानले कुनै पनि क्षेत्रमा प्रतिस्परद्धा गर्दा हार खाननपरोस्‌ भनेर उच्चस्तरीय शिक्षा पाञन्‌ भनेर मैलै पैसा कमाउनपष्टि लागेँ। यौ आदर्श मात्र खोजेर हिड्यौं भने जीवनमा दुःख बाहेक के पाइँदोरहेछ र ।”&lt;br /&gt;
“अहिले त्यसले के पायौ त : आदर्श छोडेर कताटाता दौडिदाक्षणिक सुख पायौ होला तर के त्यो दाग जीवनभर मेटिने भयो र !वर्षाको भेलजस्तो सुख भोगेर आफनो अस्तित्व गुमाउन लाग्यो भने नतिजायस्तै हुन्छ । मलाई त्यसैले आफना परिवारसंग गर्व छु । तिमीहरूलेमलाई कहिल्चै यसतर्फ धकेलेनौ । इच्छा त तिमीहरूको पनि बिदेशमापढ्ने, शौखमा बस्ने थियो होला ।&lt;br /&gt;
तिमीहरूको आत्मबल पनि कसैको भन्दा कम छैन । योग्य छौँ,त्यसैले आफै कमाउँछौं । मन बलियो छ, त्यसैले अरूको पछि पतिलाग्दैनौं र आकर्षणले लोलुप पनि हुदैनौं । यही त हो आत्मबलभनेको ।&lt;br /&gt;
कसैले आएर स्वास्तीमान्छेलाई किन पढाउनु पर्छ । घर धान्त रबालकहरूको रेखदेख गर्न जान्नेसम्मको ज्ञान भए भइहाल्यो भन्छन्‌ भनेम यो घरको उपमा दिएर भन्नसक्छु, &amp;quot;यस्तो सहयोगी जीवन गृजार्नकालागि शिक्षा र बृद्धिको जरुरत सबै परिवारका लागि हुन्छ । यिनैकासुबद्धिले गर्दा आत्मसम्मानका साथ बाँच्न र शिर ठाडो गरेर हिंड्नसकको छु । मेरी अर्घाड्टिनीले पढ्लेख गरेकी हुनाले यी मेरा छोराछोरीलेशिक्षा प्राप्त गर्नमा नै प्राथमिकता पाए र आज घरमा आपत्‌ विपत्‌आइपर्दा पनि परिबार मिलेर घरका इज्जतलाई थामिरहेका छन्‌ । यदि मएक्लोमाधि सबै भार परेको भए अहिले हाम्रो के गति हुन्थ्यो !&amp;quot;&lt;br /&gt;
“यी कुरा थाहा पाउने सबै भइसकेका छन्‌ तर के गर्नुहुन्छयिनैले स्वास्नीछोरीहरूको कमाइ खान पल्केको भनेर तपाईंमाथि नामर्दको&lt;br /&gt;
१२६&lt;br /&gt;
शिरपेँच लगाइ दिन पनि छोडेका छैनन । सफझन हन्छ, तपाईं हैरानभएर के भन्नुभएको थियो !&amp;quot; न&lt;br /&gt;
“बिर्सन सक्ने कुरा हुँदौ हो त म हैरान हुने नै थिइनँ । थाहापाएर बिर्सन खोज्न र ज्ञान भएर मुर्ख बन्नु जस्तो गाह्रो के हुन्छ ?समाजलाई तिमीले चिनेकै छयौ ।&lt;br /&gt;
यौ समाज एक समुह हो, समाजका सोचाइको स्तर देशको ज्ञानक्षेत्रका विकासमा निर्भर हुन्छु र तिमीलाई थाहा छ, बिकास भनेकोपरिवर्तनका लागि रोपेको बीज मात्र हो । यो शुरुमा अन्त्यन्त सानोहुन्छ र यसले बाँच्ने र फैलिने यिनै वातावरणसंग मिलेर गर्नुपर्नेहुन्छन । जब यो बढेर ठूलो हुन्छ यसमा फल लाग्न थाल्छ, तब मात्रथाहा हुन्छ, त्यस बीजको उपयोगिता कै हो : त्यसले के दिन्छ : कस्तोस्वाद दित्छ : &amp;quot; ,&lt;br /&gt;
अहिले हामी जुन स्थितिमा पिल्सिएर बाँची रहेका छौं, जन बोलीसमाजले बोलेर बिपाक्तै पार्ने खोजीरहेछ, यसलै बीजैका अवस्थामा यसलाईमार्न तत्पर भएको हो । तर यो हलचलले नै अयोग्यलाई सडाएरहटाउँछ भने निक्खर र उपयक्तलाई मात्र हर्कत दिई विजयी बनाउँछ ।,त्यसैले नारीका उत्साह र उमङ्गहरूलाई गालेर झार्ने प्रयासमा लाग्नखोज्नेहरू अभौ बहु संख्यामा छन्‌, तिनीहरूले हामी पुरुष जातिलाईजागरण गराएर, फैलाएर आफनो स्थान नछोडन र सबै आफैँले ओगटेरनारीलाई आदर्शको संज्चा दिई पन्छाउन पुरुषहरूलाई उसका शक्ति रयोग्यताको उपेक्षा गर्दै ललकारेका हुन्‌ ।&lt;br /&gt;
त्यो म बझूदछु र यसले मलाई, मेरा विचारधारालाई डगमगाउनसक्तैन । यसो सुन्नु पर्दा नराम्रो लाग्छ नै, हैरान पनि हुन्छु तर त्योहैरानी पछ्नुताउंले ल्याएको असक्त भएर आएको म मान्दिन किनकि तीअफसोचका सुस्केराहरू हुन्‌ हाम्रो समाजप्रतिको जसलाई बुझन धेरै समयलिदैछ । बीज अङ.कुरित हुनै अनुकूल वातावरणको सिर्जनातर्फ नलागिसमय काटिरहेछ । यस्ता वाधक हामी पुरुषभन्दा ,बढी तिमी नारीहरू नैरहेकाले नै हो म धेरै दिक्क भएको । यस बिचित्रतालाई मैले बुझनसकिरहेको छैन किन नारी नै नारीका उन्नतिमा वाधक हुन्छन्‌ !&amp;quot;&amp;quot;मलाई त बुझन गाह्रो छ भने तपाईं त लोग्नेमान्छै हने नैभ्रया ?” ॥यतिन्जेलसम्म उनीहरूले सिँढी उक्लिसकेका हुन्छन्‌ रं थकाइकोसुस्केरा हाल्दै थाप्लाका सिंढीमा थचक्क विश्वाम गर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
पश्चिमको अस्तायचल आकाश शान्त र रहीच्री देखिन्छ ।स्तृपका वरिपरि राखेका माने घमासदै “३० मणि पद्य हुँ&amp;quot; भनेर एक&lt;br /&gt;
१२७&lt;br /&gt;
चित्त भई भक्तजनहरूले पाठ गर्ने थालेको सुनिन्छ त कुनैले चैत्यकाआगाडिका दियामा बत्ती बाल्नथालेको देखिन्छ । त्यहाँको वातावरण पनिशान्त र रमणीय छ ।&lt;br /&gt;
शिवले यही शान्तिलाई लक्ष्य गर्दै कुरा उठाउँछ, “हाम्रो अन्तिमचाहना पनि त यस्तै शान्ति हो । असफलता र सफलताको लामोदौडाइपछि प्राप्त अनुभूति र ज्ञानले ल्याएको यो शान्ति नै हाम्रो अन्तिमउपलब्धि हो गौरी, तिमीलाई थाहा छ कि छैन गौतम बढ्धले बुद्धत्वप्राप्त गरेपछि मात्र शान्ति चिनेका थिए । त्यसैले उहाँका उपदेशले भन्छ,“सङ ग्राममा लाखौंलाई जित्नेभन्दा आफूले आफैँलाई जित्नसक्ने नै सच्चाबिजयी हुन्‌ ।” यसैले आशीर्वाद दिदा सबैलाई भन्थे, &amp;quot;अप्प दीपो भव&amp;quot; ।आफना दर्शनहरू सबै व्यक्त गरेपछि भन्थे, &amp;quot;वत्स, म मोक्षदाता होइन,म त मार्ग दर्शक मात्र हूँ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
तसर्थ गौरी मेरो धर्म हिन्द भए पनि यी बडका आदर्शलाई मविश्वास गर्छु र मान्छु पनि । उहाँका सिद्धान्तमा व्यक्ति नै सर्वोत्कृष्टहुन्छ र यो नै यथार्थ पनि हो । शान्ति, विजय र मोक्ष प्राप्त गर्न स्वयंव्यक्ति आफैँले प्रयास गर्नपर्छ । मनुष्यभित्र सबै प्रकारका भावनाहरू हुन्छन्‌इन्द्रियहरू छन्‌ । हरेक इन्द्रियले आफूलाई सञ्चालित राख्न चाहन्छन्‌ रएक अर्कालाई निष्किय पार्न तछाड मछाड गर्न थाल्छन्‌ । पत्येकव्यक्तिभित्र नै कुरुक्षेत्रको लडाईं मच्चिरहेको हुन्छ । पाँच इन्द्रिय एकपक्षमा छन्‌ भने पाँच कर्मेन्द्रिय अर्का पक्षमा हुन्छन्‌ र दुवैलाई एकविन्दुमा ल्याउन दौडेको हुन्छ मन ।&lt;br /&gt;
यस मनलाई बल ज्यादा दिई कर्म गराउन अग्रसर पार्नलाई नैज्ञानेन्द्रियहरू लाई बढी परिचालित गराउनु आवश्यक पर्छ । विद्याआर्जनको महत्व पनि यही ज्ञानेन्द्रियलाई अतिरिक्त बल पृच्याउनलाई हो। मनुष्यका मनभित्र विभिन्न कामनाहरू उर्लन सक्छन्‌ र ती सबैकामनाहरू पुर्ण गर्नपट्टि व्यक्ति लाग्यौ भने त्यो त्यसैका थृप्रामा हराउँछ। यसको छनोटको अभिभारा ज्ञानेन्द्रियलाई दिन सक्यो भने क सफलहुनसक्छ ।&lt;br /&gt;
इच्छा अनुसार उठेका भोगलाई भोग्नाले इच्छाको पूर्ति हुन्छभन्न सकिदैन । यसले झन्‌ इच्छ्ञा भड्काउने काम मात्र गर्छ जस्तो बल्दैगरे का आगामा घिउ घप्नाले त्यो उत्तेजित हुन्छु । भोगविलासमालागेका मनुष्यले सिद्धि प्राप्ति कहिल्यै गर्न सक्तैन जस्तो हाल दमनकोभएको छ ।&lt;br /&gt;
शिवका यस्ता तथ्यज्ञान सुन्दासुन्दै गौरी भन्छे, &amp;quot;तपाईंका यीविचार र ज्ञान सुन्दा त मलाई आभास हुँदैछ, कही तपाईं त्यागी भएर&lt;br /&gt;
१२८&lt;br /&gt;
जङ्गलमा मठ खोलेर उपासक त बन्नु हुन्न &#039; रातदिन यस्तै धर्मकाप॒स्तक अध्ययन गर्नमा व्यस्त हुनुहुन्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ज्ञान पाप्त गरेपछि जङ्गलमा पस्नै होइन, त्यो ज्ञानको रसपानगराउन त मनुष्यका समृहमा पो पस्तपर्छ । फेरि म कुन ज्ञानीहुनसकेको छु र तिमीले जङ्गलतिर लाग्छु कि भनेर शङका गर्छ्यौ !&lt;br /&gt;
म त सौच्तछु, गौरी जसले म त्यागी हुँ भनेर देखाउंछ, त्योत्यागी नै होइन । क त आफनो बढाइ सन्नका लागि, बनेको हुन्छ ।त्यसको त्यो त्याग होइन, कामना लिप्सा हो ।&lt;br /&gt;
&#039;्ह्यो यो कुरा साँचै चित्त बझने भन्नुभयो । त्यागी भन्ने कतिसन्यासीहरू गार्हस्थ्य जीवनमा फर्किएका पनि छन्‌ । एउटा कुरा तपाईंलेज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय अनि मनका बारे जुन भन्नभयो, त्यसमा कति मथप्न चाहन्छु भने यी इन्द्रियहरूलाई पर्ज्वलित पार्ने, सक्रिय पार्ने कृत्यगरेको छ वातावरण र परिस्थितिले पनि । यसमा तपाईंको भनाइ केछ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
“यही बातावरण र परिस्थिति त मनुप्यको समस्या हो, गुरु होरप्रेरणा पनि हो र यसैले, निम्त्याएको छ सभ्यता पनि ।&lt;br /&gt;
अन्पतालको वतिर दिलबहाँद्र अ्वैर्य भईँ छटपटाइरहेछ मानौंराधाको प्रसृति पीडा उसलाई नै सरेको छ : क सकुशल नानी जन्मेकोसुन्न आतुर भएको छ्‌ । क संझन थाल्छ ती खबरहरू जसमा लेखिएकोथियौ रै दुई टाउके बालक जन्मेको, कसैका खुट्टा नभएको, ओठकाटिएको, तीन हात भएको या आँखा नभएको बेरूपका शिशुहरू ।उसलाई कता कता डर लाग्छ कहीं राधाले पनि कुनै त्यस्तै पाई भने&lt;br /&gt;
२&lt;br /&gt;
क संझन्छ, राधालाई पेट दृखेर जँचाउन ल्याउँदा डाक्टरलेसोधेका कुराहरू । क पछुताउँछ पनि किन उसले खुवाउन हुन्न भन्दापनि राधालाई दुई जिया भएका वेलामा पनि रक्सी खुवायो । हेर्दाहातखुट्टा सबै ठीक भए पनि लुरे लाम्रै भयो भने के गर्ने ? आफूलाईबढेसकालमा हेरचाह गर्ला भनेर सन्तान जन्माइन्छ । त्यसैलाई उल्टैस्याहारेर बस्नुपर्ने त हुँदैन !&lt;br /&gt;
यस्ती अवस्थाकी आइमाईलाई बारम्बार डाक्टर जँचाउनुपर्छ भन्दाकेको स्वाँङ हामीलाई पार्नपर्छु भनेर मानिनं, यसको फल के कस्तोदेखाउने हो । अहिलेसम्म त अप्रेसन मात्र गर्नुपर्छ भनेका छन्‌ ।त्यसपछि के के सुनाउने हुन्‌ ।”&lt;br /&gt;
मनमा यस्ता कुरा खेलाउँदा खेलाउँदै एउटी नस भित्रबाटनिस्केकी मात्र के हुन्छे, उसले सोधीहाल्छ “राधाको के भयो :” हतारमा&lt;br /&gt;
१२९&lt;br /&gt;
निस्केकी त्यस नर्सले के बेलिबिस्तार लगाएर बताउन पाउँवी, “थाहा छैन&amp;quot;भनेर जवाफ दिदै जान्छे ।&lt;br /&gt;
दिलबहाद्रलाई उसका जवाफले कृपित पार्छ र झर्कदै भन्छ,“थाहा छैन भन्ने जवाफ सन्न हामी यहाँ पर्खेर बसेका होइनौं । हाम्राजहानहरूलाई भित्र लगेको यतिका वेला भइसक्यो कै भयो भनेर सोध्दाथाहा छैन भन्ने जवाफ आउंछ । केही थाहा नै नहुने तपाईंहरूले योप्रसुति गृहमा किन नौकरी गर्नुहन्छु ः&lt;br /&gt;
क रिसाएको देखेर त्यहाँ पर्खेर बस्ने अरूहरू पनि भन्छन्‌, “खैके हो के : यहाँ पर्खेर बसेको बिहानदेखि नै हो केही भन्न आउँदैनन्‌सोधे यस्तै ठाडो जवाफ दिन्छन्‌ । मैले त आ लैजान्नै अस्पताल भनेकोधिएँ, मानेनन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
एउटी नर्स फेरि निस्कन्छे र सोध्छ, &amp;quot;श्याम भन्नै यहाँ कोहुनुहुन्छ !”&amp;quot; खवर सुन्न हतारिदै श्याम भन्ने मै हुँ भनेर क अगाडिजान्छु र सोध्छ, &amp;quot;के जन्मियो :&amp;quot; नर्सले छोरो, जन्मियो मात्र के भनेकीथिई -क खुसी हुँदै भन्नथाल्छ, “मैले पहिले नै भनेको थिएँ यसपटक छोरानै जन्मन्छ भनेर । अनि कस्तो छत्यो&lt;br /&gt;
नर्स रोक्दै भन्छे, &amp;quot;पहिले मेरो क्रा त सबै सन्नोस्‌ । त्योनानी जन्मन त जन्मियो तर त्यसलाई बचाउन भने सकिएन । तपाईंकीजहान रोएकी रोयै छन्‌ गएर फुलाउतु होस्‌ ।&lt;br /&gt;
यस्तो हृदयविदारक खबर सुनेर श्याम चप लाग्दैन । क कराउनथाल्छ, &amp;quot;तपाईंहरूले राम्रो उपचार गर्न भएन, त्यसैले त्यो मन्यो ।तपाईंहरू ज्यानमारा हो, मेरा छोरालाई मार्ने तपाईहरू हो । घरैमाग्यालग्याल्ती सात छोरी जन्माउँदा न त आमालाई कष्ट भयो, न ततानी नै मच्यो । छोरो जन्माउँछै यसले भनेर अस्पताल ल्याएँ, यो दशाभोग्नु पन्यो । यसो भन्दै छाती पिटीपिटी . क रुन थालेपछि&#039; नर्सले पनिअस्पतालमाथि लगाएको आरोप सहन सकिनँ र भन्छे, “यहाँ ल्याउनभएकाले मात्र तपाईकी जहान बाँचिन्‌ नत्र सात नानी जन्माइसकेकी त्यसउमेरकी तिनको के अवस्था हुनेथियो होला ? आपत्‌ नपरी तपाईहरूपहिले जँचाउन हुन्न अनि यस्तो उस्तो भन्नुहुन्छ । क त्यो लेखेको पढ्नसक्नु हुन्छ भने पढ्नोस्‌ र यस्तो गल्ती आफना सन्तानले कहिल्यैदोहोन्याउनु भनेर संझाउनु होला ।&lt;br /&gt;
“अव पनि त्यसले अर्को नानी पाउन सक्ली र त्यो पढी रहुँलौ, मेरो जहानलाई भेटाइ दिनोस्‌” &#039; भनेर जान्छ । श्याम गएपछि त्यहाँकुरेर बस्नेहरू त्यस नर्सले देखाएका &#039; पाटीमा हेर्न जान्छन्‌ जहाँ लेखिएको&lt;br /&gt;
१८ वर्षभन्दा कम र ३४ वर्षभन्दा बढी उमेर पगेपछि गर्भवती&lt;br /&gt;
१३०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुनुहुँदैन र प्रत्येक गर्भवती महिलाले आफूतो र नानीको स्वास्थ्यजँचाइरहनु पर्छ । पौष्टिक आहार खाने गर्नुपर्छ इत्यादि कुराहरू उनीहरूक्रमैले पढ्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
दिलबहादुरलाई श्यामका घटनाले झन्‌ छटपटी थपिदिन्छ र नर्सआउने जाने बाटोतर्फ हेरिरहन्छ । उससंग रहेका हूलमध्ये सबैजसो एकएक गरेर आआफूनो खबर सुनेर जान्छन्‌ केवल दिलबहादुर पर्खिरहेकोहुन्छु । गर्भवती महिलाहरूको प्रवेश चलिरहन्छ । उतीहरूका : साथमाआएका अभिभावकहरूका नयाँ नयाँ अनुहार थपिदै जान्छन्‌ । उस्तैछटपटी, उस्तै गरी चनाखो भएर उनीहरू . पर्खिरहेका हुन्छन्‌ । अनिरिचतसमयसम्म उपलब्धि पर्खेर बस्ता हुने मानसिक तनाउ पनि कमको हुँदैनके गर्नु जन्म र मरणमाथि कसको के लाग्छ : दिलबहाद्र अस्पतालकाएक कुनामा थुप्रिएर बस्षिरहन्छ, कुरिरहन्छ, कल्पना गरिरहन्छ, सम्भिरहन्छआफूनो गाउँ, त्यहाँको घर, आफू जन्मदा दुई दिदीहरूपछि छोरोजन्मिएकाले बाआमाले खुसी हुँदै के के गर्नु भयो होला ।&lt;br /&gt;
उहाँहरूको त्यो प्यारो चाहनाको छोरो आज आफ्नौ भन्न सबैछोडेर यस बिराना ठाउँमा आएर आफूतो भाग्यसंग यसरी जुद्धै जिइरहेछ। केका लागि : वाहा छैन बाँच्नका लागि हो या बचाउनका लागि ःझ बलभद्रलाई पनि संझन्छ, जो विदेशमा नोकरी गर्न गई धन कमाएरगाउँमा फर्केपछि ठूलो मान्छै भएर मान पाएको रवाफ देखाउँदै भन्नेगर्थ्यो। एकफेर नविदेशिएर धन कहाँबाट फल्छ : त्यसरी नै क संफन्छसेतेलाई, जो संयुक्त राष्ट्रसंघ मार्फत्‌ शान्ति स्थापना गराउने फौजमासामेल भई ती लडाइँ चलिरहेका देशहरूमा छिरी कार्यरत हुनपसेकोमगर्नी आमाको छोराको अभिलाषा पनि घन कमाई फर्कने नै छ भन्नैमेरो जस्तो ।&lt;br /&gt;
. कै पाए ती आमाबाले हामीजस्ता छोरा जन्माएर । बुढेसकालमाहामी उनीहरूको सहारा बन्न सकेका छैनौं । आफनो भविष्य बनाउनेबिचार राखैर उनीहरूलाई आफनै जीवनसंग लडेर जिउन यसै छोडिदियौंशून्य घरमा, उजाड बस्तीमा बढ्यौलीले कम्जोर भइसकेका तीआमाबाबलाई । अचम्म यो छ, तैपनि हामीले उनीहरूबाट माफ पाएकाछौँ, उनीहरूको आशीर्वाद र स्नेह रहिरहेको छ । अझै उनीहरूमा झिनोआशा छ हाम्रो सुख सम्वृद्धि र सन्तात हेर्ने । यो माया साँच्चै अनन्तछ।&lt;br /&gt;
दिलबहादुरले सोच्तासोच्तै आफनो र ती साथीहरूको जीवनीकेलाउन थाल्छ । क मनमनै भन्छ “हाँ, हामी साथै बसेर माया बाँड्ननसकै पनि बिर्सिएका छैनौं त्यो दैलानेर उभिएर बिदाइको टीका&lt;br /&gt;
१२३१&lt;br /&gt;
लगाइदिएको । घर छोडेर शहर पस्नु या विदेशिनु हाम्रो इच्छा होइनविवशता हो । यहाँ वसेर पनि हामीले के नै पाएका छौं र : कमैलेज्यान संकल्प गरेर गाउँ छोडेका छन्‌ भने कोही बिरानो देशमा एक्लैलडेर जिउन कम्मर कसेर जान तैयार भएका छन्‌ । के सुख तिनलेपाएका छन्‌ &#039; एक नोकर भएर जिइरहेका छन्‌ केवल भविष्यलाई संझैर,कल्पेर आज बिताइरहेका छन्‌ । गरिबीले ल्याएको यस विवशतालाईनिठुरीपना पनि त भन्त सक्दिन ।&lt;br /&gt;
दुखको अन्त्य पनि छिटै होला कि भन्नै पनि म देख्तिनँ ।अहिले मेरो छोरो नै जन्मियो भने पनि त्यो नोकर बाहेक अरू के होला! यौ आफनै देशमा, आफनै गाउंमा शिक्षाको र आर्थिक स्थितिको सधारनआई हदतैन ।&lt;br /&gt;
यहाँ हामी छोराहरू मात्र विदेशिएका छैनौं, गाउँबाट «शहरपसेका थप्रै छोरीहरू पनि छन्‌ जसका आँखाक्का परेलीहरू कहिल्यैओभाएका छैनन्‌ । गरिबी र समस्याका अजिइरले हामी सबैलाई निलिदिदैछ ।&lt;br /&gt;
थाहा छ, पढ्न कति जरुरी छ, ज्ञान हासिल त्ग्री केही पनिगर्न सक्तैनौं तर हामीले थाहा पाएर चाहेर पनि पढ्न पाएका छैनौं ।हामीले भविष्य होइन, आजको समस्या टार्न प्रयत्नशील हनुपरेको छ ।भोको पेट, नाङ्गो शरीर, रुखमनिको ओतले पहिलो प्रश्न यही गर्छ,“हामीलाई प्राथमिकता देक ।” यसैमा हामी रडमडगिएका छौं ।&lt;br /&gt;
गरीव हुनु कुनै अपराध होइन, गरीब हुनाको कारण भनेसोचनीय छ । वंशका कुनैले जवभावी धन उडाएर या परिश्रमी हुननसकेर नै गरिवी वढ्दै गएको हुनुपर्छ । ज्ञानको कमी, मौकाको कमी रधनको कमीले गर्दा उसले आफूलाई आन्मसंरक्षण दिन सक्तैन, अनि कंक्के हुन्छ ? जससंग यी शक्ति, यी गुण छन उनैमा समर्पित हुन्छन्‌ रउनैबाट शोषित पनि । क जानाजानी यसलाई स्वीकारी रहेको हुन्छ ।१ कम्जोरी कतै न कतै गरीव हुनमा हाम्रो आफनै हात छ ।त्यसैले भगवान्‌संग यति नै प्रार्थना छ, तिमीले मलाई छोरी दिन्छौँ याछोरो, जै भए पनि त्यौ परिश्रमी होस्‌ । मैलेभन्दा केही बढी उपलब्धिगर्नसकोस्‌ । आफूनै आउने प॒स्तालाई यस महामारीका गरिबी रोगबाटबचाउन सक्नेहोस्‌ ।&lt;br /&gt;
१३२&lt;br /&gt;
मिठाइको थाल शिवतर्फ बढाउँदै गौरी उसलाई मख मीठोबनाउन आग्रह गर्छै । शिव अकमकिन्छ र हाँस्नै भन्छ, &amp;quot;ए, न्यसा भएहामी बाजेवजै भयौं : कहिले पाई :&amp;quot;&lt;br /&gt;
“हिजो पाई, छोरी राम्री छे ।”&lt;br /&gt;
गा राम्रो भयो लक्ष्मी आइछ । अनि ज्वाइसाहेव नि &#039; कहिलेआइपुग्ने रे :&amp;quot;&lt;br /&gt;
“कस्तो थाहा नपाउनु भएको, तपाईले : दयाको सुत्केरी हुनेवेला नै भएको छैन । यो त दिलेले खुसी भएर मिठाइ खुवाएको नि ?घरमा साथै बमैपछि त्यो पति त हाम्रै परिबार मान्तपर्छ । त्यमैलेतपाईंले हामी बाजेबजै भयौं भन्दा चप लागेकी । साँच्चि नै, त्यस दिलेलेराधालाई कति माया गरेको &#039;”&amp;quot; यति रोएन त्यो । नानी पनि अप्नेसन नैगरेर निकाल्नु पच्यो । अलि ठूलो ओजनकी रही छ ।&lt;br /&gt;
शिवले मिद्राइ चपाउँदै भन्छु, &amp;quot;लोग्नेले स्वास्नीलाई माया नगरेकसलाई गर्छ : खुव अचम्मको क्रा थाहा पाए जस्तो गयौँ तिमीले त&lt;br /&gt;
बरु त्यो त राधाले छोरो पाइन भने पहाड लखेटिदिन्छु भन्थ्यो ।अहिले छोरी भएकोमा पनि मिठाइ खुवाउन तम्मेछ । कसरी त्यसले मनफर्काएछ्‌ ।&amp;quot; अर्को एक बर्फी मुखमा हाल्दै भन्छ, &amp;quot;मिठाइ पनि राम्रोछानेर ल्याएछ । तिमीले त्यसको मख हेरेर के दियौ &#039; रामे कुरा दिनूजे भए पति त्यसले हामीलाई आफनै ठान्न थालेको छ्‌ ।&lt;br /&gt;
&amp;quot;यति कुरा पनि म जान्दिनँ र तपाईंले वताउनपर्छ । मअस्पतालमै गई मुख हेरिसके । त्यसले नानी जन्माउन शत्यक्रिया गर्नपर्छभन्दा अस्पतालमा नै मनिर आएर यति रोएन, राधा बाचन भने म केगर्छ भनेको भनै थियो । त्यस्तो पो माया !”&lt;br /&gt;
“तिम्रौ र हाम मायामा पनि कहाँ कम्ती छ र : मलाई ठ्नेमौकै दिइनौ, झट्ट पाइहाल्यौ, नत्र म पनि दुई तीन हाते रुमाल भिज्नेगरी रोइदिन्वे&amp;quot; शिवलाई आज ठट्टा गर्न मन लाग्छ । झं बाहिरबाट घरफर्कदा नै प्रसन्न मृद्वामा थियो त्यसमाथि पनि मिठाइ खाएको ।&lt;br /&gt;
लोग्नेको ठट्टा सुनेर गौरीलाई लाज लागै पनि कता कतारमाइलो लाग्छ र हाँसै भन्छे, “के कुरा गर्नु तपाईसंग । लौ अरू पनिमिठाइ खानुहुन्छ भने लिनोस्‌ हामीले त खाइसक्यौँ &#039;&amp;quot;&lt;br /&gt;
शिवले अर्को एक समात्तै थालै आफनो अर्गाड नराख न भन्छ ।गौरीले थाल लिएर नै भआन्छातिर जान्छे । शिवले नुरले पनि नानिजन्माइहोली भनेर सझन्छ । न्‌र उसको संझनामा झलक्क आइरहन्छे ।&lt;br /&gt;
१३३&lt;br /&gt;
सोच्छ, नुरलाई बाबाले आफू उसको पछाडि रहिरहुँला भनेरआश्वासन दिई लोग्नेका घरमा पठाएको थियो । त्यसले उसलाई घरमाराख्यो या राखेन : फर्केर आई बाबा कहाँ नै बसेकी रहिछ भने बाबालेके गरी घानिरहेको होला : कतिलाई संरक्षण दिदै जाने ती बाबाले ःउनीसंग नै के छ र : एकपटक मृत्युको मुखबाट मैले नुरलाईजोगाएकाले मेरो केही कर्तव्य त्यसमाथि हुनपर्छ ।&lt;br /&gt;
शिवलाई यस सोचाइले च्वाँस्स घोच्छ र गौरीलाई बोलाउँछ ।गौरी दुई कप चिया लिएर आइपग्छ । एक कप शिवलाई दिदैबोलाउनको अर्थ सोध्छे । उसको हाँसी खुशी त्यति छिटै बदलिएको देखेरगौरीलाई असजिलो लाग्छ र जवाफको प्रतीक्षा गर्छे ।&lt;br /&gt;
शिवले नुरको करा उठाउँछ र गौरीसंग सोध्छ, “हामीले त्यसलाईयहाँ ल्यायौं भनेँ कै तिमीले नुर र त्यसको नानीलाई संरक्षण दिनसक्छयौं ! लोग्नेले घरबाट निकालिएकी रहेछ भने त्यो कहाँ जाओस्‌बाबालाई पनि राख्न गाह्रै हुन्छ दुई दई थपिन्छन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
झट्ट आएको पस्ताव सुनेर गौरी स्तम्भित हुन्छे र अक्मकाएरशिवको अनुहार हेर्छ । उसको अनुहारमा झल्केको दृढ संकल्पलाई जाँचेरक सोच्न थाल्छे भने शिवले सोही प्रश्नलाई विशेष जोड दिएरदोहोन्याउँछ ।&lt;br /&gt;
गौरीले त्यसपछि पनि केही नबोलेकीले शिवले संझाउने प॒कारलेभन्छ, &amp;quot;“कमार्ग छोडेर सतमार्गमा लाग्न चाहनेहरूलाई सहयोग गर्न हामोकर्तव्य हो, गौरी : त्यो अब फेरि देवकीको रूपमा रहन चाहन्न ।त्यसले. त्यो चाहेकी भए आत्महत्या गर्न तयार हुने थिइन । त्यसलेसुमार्गको स्वाद चाखिसकेकी छ तर उसलाई स्वीकारी नदिएकोले त्योआफपत्‌मा परेकी छे । तसर्थ नडराक, त्यो यहाँ आई भने हाम्रो तेस्रीछोरी भएर बस्छे । . साधनाले पनि यस पस्तावलाई नकार्ते छैन भन्नेमलाई विश्बास छ । तिमी नारीहरूले यी समाजले कुल्चिएका नारीहरूकोरक्षा गर्नुपर्छ । म पहिले त्यहाँको स्थिति बुझ्नु । त्यसपछि मात्र यहाँल्याउँला । जब मैले नुरलाई मर्न दिइन; त्यसले आक्रोशित हुँदै मलाईगाली गर्दै आफना असमर्थता जुन्‌ फलाकी र त्यसका घरमा पुग्दापरिवारले उसलाई देखेर गरेको व्यवहार जन्‌ छ त्यो म बिर्सन सकितनँ। गौरी, त्यसलाई जीवनसंग घृणा होइन, रहरले बाँच्न तिमीले सिकाइद्र ।&lt;br /&gt;
&amp;quot;भावक भएर लिएको निर्णय गलत पनि हुनसक्छ । यसलाई शान्तमनले सोचौं र के गर्न उपयक्त हुन्छ अनि त्यसै गरौला । भाग्ने रभगाउने नीति कम्जोर पनि हुनसक्छ त्यसले लक्ष्यदेखि टाडा लैजान पनि&lt;br /&gt;
१३४&lt;br /&gt;
सक्छ ।&amp;quot; यौरीले यसो भन्दै शिवको अनुहारमा यसले कस्तो प्रतिक्रियापार्छ, त्यो हेर्न खोज्छे । शिवलाई गौरीको भनाइ चित्त बझदो नलागेपनि जवाफ दिदैन र मनैमन भन्छ, “यो पनि डराई नूरदेखि पन्छिने नैयसको नियत छ । &amp;quot;देवकी&amp;quot; भन्ने चिन्नासाथ हाच्कहाल्छन्‌ चाहे त्योलोग्नेमान्छे होस्‌ या स्वास्नीमान्छे ।&lt;br /&gt;
शिव जति दिन डोटीमा बस्यो यी देवकीहरू र बदनीहरूकहाँ गईभेट गर्न छोडेन । प्रत्येक देवकीहरूको आत्मकवा बटुल्ने हो भने नारीसुधारका लागि विषयवस्त॒ आफैँ उपलब्ध हुन्छन्‌ । ती देवकीहरूपढेलेखेका त थिएनन्‌ तर तिनीहरूले जीवनको अर्को तस्बिर नजिकैबाटदेखेका हुँदा रहेछन्‌ । धेरैजसोको यस वृत्तिबाट मुक्त हुने नै चाहना हुँदारहेछन्‌ । उनीहरू भन्थे, &amp;quot;हामीलाई कहिल्यै गृहस्थी कस्तो हुन्छ,लोग्नेस्वास्नी बालबच्चा र अन्य परिवारसंग साध रहेर जिउँदा कस्तोअनुभूति हुन्छ, लोग्नेको माया कस्तो हन्छ, त्यो केही पनि थाहा छैन ।&#039;रातदिन यिनै लोग्ने मान्छेसंग हुन्छौ घीनैसंग क्रीडा गरिरहेका हुन्छौ तरलोग्नेको भृमिका के भन्ने जानेका छैनौं । ती लोग्नेमान्छेलाई सोध्छौ“तपाईंहरूको घरमा स्वास्नी छैन र यहाँ पैसा खर्च गरेर दिलबहलाउ गर्नआउनुहुन्छ भन्दा जवाफ दिन्छन्‌,” “ती घरका मली दाल बराबर भइहालेनि । उनीहरूलाई घरघन्दा गर्दैमा, नानी जमाउँदै हर्काउँदै तिनैलाई मायागर्दै स्याहार्दैमा हामीतर्फ विचार गर्नै कहाँ फुर्सत हुन्छ र !&amp;quot; जतिसन्तान बढ्दै जान्छन्‌ घरगृहस्थीमा झन्‌ झन्‌ डुब्दै जान्छन्‌ अनि स्वास्नीकहिलेकाही खाँचो टार्ने मात्र हुन्छे । हामी उनीहरूका कुरा सुनेर सोच्छौं,“यस्तो कसरी हुनसक्छ ! हामी सबैको भएर पनि तपाईंहरूलाई सन्तुष्टिदिन सक्छौं भने उनीहरू एउटा लोग्नेलाई पनि सक्तैनन्‌ ?&amp;quot; हाम्रा कुरासुनेर उनीहरू हाँस्तै भन्छन्‌ ,“तिमीहरूको जस्तो कला तिनलाई के थाहाछु? ती त मुर्ख छन्‌ ।&amp;quot; /&lt;br /&gt;
कुनैलाई त भन्यौं पनि, “किन दिनदिनै यत्रो कप्ट उठाउँदैलुकिछिपी आउनु हुन्छ । विबाह गरेर लैजानोस्‌, घरैमा म तपाईंकीएकलौटी भएर धेरै सुख दिन्छु । तँपाईँलाई एड्स सर्ला कि भन्ने डरहुँदैन भने मैले पनि स्वास्नी बन्ने रहर पुरा गर्न पाउँछु । हाम्रा कुरासुनेर उपिया फट्केजस्तो गरी फदकन खोज्दै भन्छन्‌, “गार्हस्थ्य जीबनमाके देखेका छौ र त्यसमा तिमीहरू यसरी आकर्षित भएका, यही जीवनस्वच्छन्दको छ । अधिकार र कर्तव्यको द्वन्द्वले गर्दा त्यस जीवतमा हरेकदिन रुनवाहेक केही हुँदैन । फेरि तिमीहरू भयौ देवकी ! धर्मसंगजोडिएका ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
१३५&lt;br /&gt;
के हो यो कुनचाहि ठीक, हामीले जान्नै पाएका छैनौं । एकपटकएउटा गृहस्थकी स्वास्नी आफैं आएर हामीलाई उसको लोग्ने - भाँड्ने दोषलगाउँदै भन्नुसम्म भनी आति आफैँ खुवसंग रोई । त्यो देब्रेर हामीलाईपनि खुवै माया लाग्यो । बिचरी कठै त भन्यौं तर हामीले गर्ने के ःतिनका लोग्नेहरूलाई नआउ भन्दा पनि मान्दैनन्‌ । उल्टै हामीलाई देवकीबनाएको अर्थ बताउँदै हामीले नाईं भन्न पाउदैनौं भन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
यस्तो अबस्था आफनै घरबार वालकहू भएका आइमाइलाई पनिकिन आउँछ : स्वास्नीमान्छे त्यहाँ पनि किन सताइएकी छे त्यो हामीलाईथाहा छैन । हेर्नोस्‌, न त बाव न त दाजुभाइ नै हाम्रो साथमा बमेकाछन्‌ । छन्‌ भने, आमा, दिदी, बहिनी मात्र यो वृत्ति लिएर जीविकोपार्जनगरेर बसेका छौँ । त्यस्ता हामीलाई के थाहा हुन्छ लोग्नेमान्छेकोस्वास्तीमान्छैसंगको सम्बन्ध रतीक्रीडामा मात्र सीमित नरही अरू क्षेत्रमापनि हुन्छ । हामी धेरैजसो यस वृतिबाट निस्केर अरू जीबन पनि हेर्नचाहन्छौं । अनुभव गर्न चाहदै पर्खिरहेछौ, कहिले त्यस्ता उद्दार नीतिभएका आउलान्‌ र हामीलाई सहयोग गर्लान्‌ । यहाँ हामीलाई खानलगाउन गाह्रो छैन । हाँसो, ठट्टा र मोजमस्तीमा नै जीवन गजारी रहेकाछौँ भन्नपत्यो । तर आज भोलि यी छोरीहरूको चिन्ता लाग्न धालिरहेछ। हामी यिनीहरूलाई मात्र भए पनि यसबाट उम्काउन चाहन्छौँ को छ,यहाँ यिनीहरूको जिम्मा लिइदिनै &#039; स्कूलमा पढाउन पठायौँ । तीछोरीहरू घर फर्कदा सदै आउछन्‌ र हामीसंग नै प्रश्न गर्छन, &amp;quot;आमातिमी खराब आइमाई रे हो : तिम्रो छोरी म पनि त्यसैले त्यस्तै खरावहुन्छु रे : तिमीहरूले पढेर के गर्छौ&amp;quot; भन्छन्‌ । किन आमा हामीलाईत्यसो भनेको भनेर प्रश्न गर्दै दिवकै लगाउछँन्‌ । लौ भन्नोस्‌, यस्ताप्रश्नको हामीले कै जवाफ दिनै :&amp;quot;&lt;br /&gt;
एकपटक त स्कूलको माप्टरै आएर हामीलाई धम्की दिदै भन्यो, &amp;quot;एतिमीहरूले छोरी पढाउने अरू कुनै स्कूल पाएनौ र हाम्रोमा नै पढायौ :तिम्रा कारणले गर्दा विद्यार्थीहरू दिनदिनै स्कूल छोडेर अन्तै जदि छन्‌ ।खबर पठाइसके, हामा छोराछोरीलाई कृसंगतमा लगाउन तिम्रो स्क्लमापठाउदैनौं । याद गर, भोलिदेखि छोरीहरूलाई स्कूल परायौ भने म केगर्छु ! तिमीहरूका एक दुई छोरीहरूले गर्दा गाउँका केटाकेटी सबैअनपढ हुने छाँट आइसक्यो । तिम्रा छोरीहरूले पढेर कुन्‌ अडडाअदालतजानुपर्छ र स्कूल पठाउछौँ हँ :&amp;quot;&lt;br /&gt;
हिजोको आमाको जीवनी हेछौं, आजको हाम्रो स्थिति संझन्छौँ रआउने भोलि त सपारौं भनेर यी छोरीहरूलाई स्कूल पठाउँदा यस्तोसुन्नुपर्छ । अनि हामीले के नै गर्ने सक्छौं : यो नारी जागृति र नारी&lt;br /&gt;
१३६&lt;br /&gt;
सुधार भन्ने पनि के हो : विग्रिएको कहाँ छ, त्यसमा पो सुधारल्याउनुपर्छ । सुधारमाथिको सुधार गर्न चाहन्छन्‌ हामीलाई हेर्ने हो कायता न उता पर्न थालेका हामी भएका छौं । छिर्न कसैले कतै दिदैनन्‌ ।&lt;br /&gt;
यस अवस्थामा परेका हामी आफैँ, बाँच्ने उपाय नपाएर मारिरहेकोबेला गाउँका यी बरालिएकाहरू आएर हाम्रा ती साना छोरीहरूमा पनिआँखा गाडदै जब नमीठा बोली ओकल्न थाल्छन्‌, त्यस वखत तिनलाईमन्टयाएर त्यही, जमिनमा गाडी दिऔँ कि जस्तो लाग्छ । तीघरालिएकाहरू यति साढि भइसकेका छन्‌ लाजै नमानेर झन्‌ छिल्लिनथाल्छन्‌ । लौ भन्नोस्‌ त, हामीलाई कस्तो बनाएका छन्‌ यिनले : यस्तोचलन कसले ल्याएको हो देवकी बनाउने ! धर्मको नाममा परुपलेआफूनो स्वार्थपर्तिको लागि रचेको चलन हो यो । यसमा हाम्रो के गल्तीछ, दाइ : त्यस्तै आमाले हामीलाई जन्माई क्रो त्यतिमात्र होइन र :हाम्रो आमादेखि ल्याएर हाम्रा छोरीहरूसम्मलाई देवकी बनाई मजा लुटनेयिनै मै हुँ भन्नै त हन्‌ नि । हामीमा मात्र सीमित राखी यो प्रथा&amp;quot; हटाउन” सरकारले मद्दत गर्छ कि, दाइ : कुनै बन्दोवस्त मिलाउन साक्न्छभने गरिदिनोस्‌ र यी छोरीहरूलाई बचाइदिनोस्‌ ।&#039; ॥&lt;br /&gt;
देवकी, बदिनी र झूमाका जीवन सुधारका बाटाहरू केही छन्‌ भनेबताइदिनोस्‌ &#039; कसैले यसतर्फ अगुवाइ नगरी यी छोरीहूको लुट हददैन॥ तपाईं लोग्नेमान्छेले जब्च यस्तो धार्मिक नियम, कानुन बनाउन भयो,अब यो पनि तपाईं नै मिलेर हटाउनु होस्‌ र समयको परिचय दिनोस्‌ ।यो कुन्‌ राम्रो चलन हो र यसलाई जगेडा गरेर राख्नुपर्छ । एकादेशकोक्रथा भएर बस्छ भने बसोस्‌, सुन्नेले एक दुई थोपा आँसु चहाउलान्‌ ।कुरा त्यतिमै सिद्धिन्छ ।&lt;br /&gt;
यस्ता मार्मिक व्यथा ती देवकी र बदितीहरूको र तृरको सुनेपछिशिबले संकल्प गरेको छ क यो नोकरीको फँसला भएपछि त्यसतर्फ नैलाग्ने र के योगदान दिएर उनीहरूका छोरीहरूलाई जोगाउन सकिन्छ,त्यो गर्दै जाने । नूर यसको संरक्षिका हुनेछ । साधना र म सहयोगी ।&lt;br /&gt;
शिवको संकल्प र संझनाको ताँदोलाई बाहिर बजेको मोटरकोहर्नले खलबल्याइ दिन्छ । उसको ध्यान त्यतैतिर जान्छ । साधनाको स्वरसुनिन्छ, &amp;quot;लौ त भौलि भेटौंला&amp;quot; । त्यसपछि क घरभित्र पसेकी जुत्ताकोद्वाक दवाक आवाज वढ्दै गएको बाट याहा हुन्छ ।&lt;br /&gt;
म&lt;br /&gt;
१३७&lt;br /&gt;
साधना आज धेरै खुसी भएकी छै । के कसलाई सुनाउँ जस्तो भईआमाको छेउमा जान्छे र आमाको हातबाट कादतैको आल पन्छाएरभन्छे,&amp;quot;आमा, दिदीले सड्ट पारगरिन्‌ । अब उनी खुसी छन्‌ विवाहलेल्याएको वितृष्णा गयो, आमा “गयो !&amp;quot;&lt;br /&gt;
गौरी छवकपर्दै भन्छे, “के सङ्कट परेको थियो तेरी दिदीलाई र अबगयो भनेर खुसी भएकी : ज्वाइँ साहेवसंग केही महिना छुट्टिएर बस्नपन्यो भनेर &#039; त्यो त चाँडै बोलाउँछु भनेकै थिए ।&lt;br /&gt;
साधना अलि गंभीर भएर भन्छ, “त्यो कारण होइन आमा । त्यतिनबझने हामी दिदी कहाँ छिन्‌ र । दिदीले तपाईंहरूलाई केही पनिसुनाउन भएन भन्दैमा उहाँ खुसी हुनुहुन्थ्यो भन्न सक्नुहुन्न । हाँस्ने मान्छेविवशतामा पनि हाँस्छ र आफनो दुःख लकाएर त्यसले अरूलाई दुःखीनपारोस्‌ भनेर पनि बाहिर देखावटी हाँसो निकाल्छ । हामी दिदीकोअवस्था त्यै थियो । मसंग कति हनु भएको थियो । प्रेरणा दिदीकोसल्लाह मानेर मात्र जिउ हलङ्गो नहुन्जेललाई त्यहाँ बस्न, राजी हुनुभएकोथियो । नत्र दिदी यहाँ कहिल्ब्रै घर छौडेर आइसक्नु हुन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
मलाई पनि लागेको थियो, पराइकी छोरीमाथि यी कति निठुरी हुँदारहेछन्‌ । स्वार्थले के मात्र गराउँदो रहेनछ ।&amp;quot; :&lt;br /&gt;
साधनाले अझै आमालाई तथ्य कुरा नखोलेर भूमिका मात्रबाँधिरहेकी सुनेर गौरी झर्कदै सोध्छे, &amp;quot;कुरो के हो, त्यो भन्न ? कतिलामो बखान मात्र छाँटिरहेकी । ज्वाईँबाट केही त्यसो भएको रहेछ भनेअहिले यहाँ भएकै वेलामा संझाडौँ । त्यसको जीवन यसै बिग्रत दिन तभएन ? विवाह भएपछि घर छोडेर माइत बस्न भनेको निकै गाह्रो क्राहुन्छ ।&lt;br /&gt;
साधना हाँस्तै भन्छे, &amp;quot;“भिनाजको दोसो बिबाह हाम्री दिदीसंग भएकोरहेछ । अमेरिकामा छोरी रहिछे । विवाह भएको तीन महिनाभित्रै लोग्नेकोछोरी भएको क्रा थाहा पाउनु, यता आफू आमा हुनलाग्नु, लोग्नेलेभिसाको कुरा उठाएर अमेरिका एक्लै नु र उताबाट आएका&lt;br /&gt;
१३०८&lt;br /&gt;
चिठीहरूमा प्रेमका स्वाङले मात्र भरिएको पाउन वास्तविकता कतैनलेखेको हुन्‌ के ती सबै कष्टदायी होइन्‌ र ! चिन्ताले चर्लम्म डुबेकीथिइन्‌ । हाम्री दिदीले भनोस्‌ पनि कसलाई, बदल्नसक्ने कुरै थिएन रत्यसैमा मिलौँ भने पनि मनलाई निकै निमोठनु पर्ने स्थिति भयो । उहाँकोअवस्था देख्ता हामीले नै केही दिन सहेर बस्नोस्‌ दिदी, भन्नुपर्ने थियो ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;अनि अनि : अहिले कसरी खुसी भई त ! कि ज्वाइँले आएरजाद्‌ गरिदिन भयो ? तँ पनि दिदीका त्यस्ता द:खलाई “थियो&amp;quot; माप्रत्याएर खसी हनथालिस्‌ : डमान नभएकाहरूलाई त म फुटेको आँखालेपनि हेर्न चाहन्न” भन्दै क रिसाउँछे ।&lt;br /&gt;
साधनाले आमाको रोषलाई हाँसोमा परिवर्तन गर्न हाँसौ भन्छे, “एआमा तपाइँको यो उच्लानको अर्वाध सकिडसकेको छु । फुटेको आँखाले केदेखिन्छ र हेर्दिन भन्नुहुन्छ : अब सबै कुराको रहस्य खलिसकेकालेतपाईंले चश्मा लगाएर राम्ररी हेरे पनि हन्छ । दिदीको शङका निर्मुलभइसकेकाले उहाँ खुसी हनुभएकी छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“लोग्नेले आएर क के भनेर फकायौ, त्यसैमा फुरुङ्ग परी होली ।यही त हामी नारीहरूको कम्जोरी हो । त्यस्ता चिप्लाको कुरा साँचोपनि कसरी मान्नु : राम्रोसंग वझबभझारथ गर्नुपर्छ, जीवन नै बिग्रिनेकुरा हो, यो । हाँसेर नउडाओ ।&lt;br /&gt;
&amp;quot;पीर गर्ने वेला बितिसक्यो आमा । मैले पनि भिनाजसंग भेटेरकरा गर्दा उहाँले दिदीको अगाडि भन्नभयो, “मेरी छोरी अवश्य हो तरस्वास्नी भने तिम्री दिदी मात्र हो । त्यस बालिकासंग मेरो मानवताकोनाता छ । मैले त्यहाँको सामाजिक संस्थामा पनि काम गर्नेगरेको छ्न ।त्यहाँका बालकहरू मसंग ज्यादै झयामिने गर्थे र मलाई डयाडी भन्थे ।म यहाँ आउँदा घेरै दिनसम्म तिनको साथ छुटेकाले त्यो स्याहार्ने संस्थाकीआमालाई दुःख दिइछ र तिनले चिठी लेखेर पठाएकी रहिछे । त्यहाँपुगेपछि मैले थाहा पाएको थिएँ, तितले घरमा चिठी पठाएकी छन्‌ भनेर। म चप यमैले थिएँ किर्नाक त्यो चिठी सायद घरमा प॒गेको छैन होलानत्र दयाले यसबारै केही न केही लेख््थी होली । तर तिमी दिदी साधारणअरू आइमाई जस्ती रहिनछैँ । मेरो अनुमान झूठो निस्कियो ।&lt;br /&gt;
जब मैले आफनै सन्तान जन्मनै भयो भन्ने सन, त्यसपछि म यतिखुसी भइनँ । हप्ता हप्तामा चिठी पठाउन थालें । तिम्री दिदीलाई यसोगर्नु, उसो गर्नु भनेर सिकाएर पठाउँथें । मलाई केटाकेटी अति मन पर्ने,त्यसमा पनि आफनै अंश । लौ भन त म कसरी त्यहाँ ६,७ महिना दिनगनेर बसेँ हुँला । यता भने त्यस्तो शङ.का तिम्री दिदीका मनमा पसेरहुर्किसकेको रहेछु । यसमा तिमी मलाई के दोष लगाउँछयौ : समाज&lt;br /&gt;
१३९,&lt;br /&gt;
सेवा गर्नु अधर्म हो : ती बालकहरू जसले बाबको माया पाएका छैनन्‌,त्यस्ताहरूलाई मैले माया गर्न के अनर्थ हो ? दयाजस्ती शिक्षित नारीलेयसबारे सोच्नपथ्यौं या सोधेर तथ्य पत्ता लगाउनपषट्टि लाग्नपर्थ्यो ।&lt;br /&gt;
मैले पनि दिदीको पक्ष लिएर भने, “के प्रमाण छ त्यो तपाईंकोआफनै सन्तान होइन र संस्थाको हो भन्ने : हामीले देखेका छैनौं भन्नेलेतपाईंलाई &amp;quot;ड्याडी&amp;quot; भनेकै छन्‌ ।&lt;br /&gt;
मेरो कुरा सुनेर भिनाजलै हाँस्तै दिदीलाई भन्नुभयो, “यिनले पनितिमीले जस्तो बिश्वास गर्न जानेकी रहिनछिन्‌ । लोग्नेमान्छेले तर्साएको छकि कसो : लौ दया, अब तिमी नै आफनी बहिनीलाई प्रमाण देखाएरदेङ । मैले भनेको पत्याउन्न होली ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
अनि दिदीले मलाई फोटो र भिनाजुको परिचयपत्र देखाउन भयोत्यो स्थाहार्ने आमासंग पनि टेलिफोनमा कुरा भयो । त्यो मेरी पनि अरूबालकहरूसरह संस्वाको संरक्षणमा नै रहिछे ।&lt;br /&gt;
एकले खुलस्त नभन्नु र अर्कोले शङ,का मात्र लिएर त्यसबारै खोजखवर नगर्नु दवैको सानो गल्तीले गर्दा जीवनले अर्कै मोड लिनलागिसकेको थियो । प्रेरणा दिदीका सल्लाहले बचाइदियौ र पौ आज दवैसाथमा रहन पाएका छौं ।&lt;br /&gt;
अहिले त दिदीले मलाई संझाउने पाराले भन्न हुँदै छ, &amp;quot;साधनाहेर यो दाम्पत्य जीवनको सफलता समझदारी, घैर्य र दरदर्शितामा निर्भर&lt;br /&gt;
। तैले पनि यौ करा नाविर्सन्‌ । ।अलि हाँस्तै। मानौं मैले पनिजीवन निता ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“मेरा त सन्तानै कपटी । यत्रो कुरा भइसक्ता पनि हामीलाईअत्तोपत्तो दिएको होइनन्‌, आमाबाबुले केलाई सुख र केलाई दुःख भनेरमान्छन्‌, त्यस कुराको ज्ञानै छैन । तेरो पनि मनमा के छ, भन्‌ ?विवाह गर्नपर्ने उमैर भइसक्यो : यो वेला घर्केपछि भनेजस्तो लोग्नैपाउन गाह्ठो हुन्छ । कोही तेरो मनले ठम्याएको छ भने भन्‌, नत्र हामीखोज्न याल्छौं । दाजको पनि फर्कने वेला भइसक्यो !&amp;quot; यति भनेरजवाफको प्रतीक्षा गर्छ ।&lt;br /&gt;
साधना आमासंग टाँसिदै भन्छे, “तपाईंले कान्छो ज्वाइँ कहिलेहराउनु भयो र खोज्छु भन्नुहुन्छ । त्यस्तो भगवा र लुकुवासंग मैलेकसरी जीवन निर्वाह गर्न सकुँला ! त्यसलाई लुकेर नै बस्न दिनोस्‌ रमेरो विवाह भइसकेको खबर त्यहीं सनाइदिनास्‌ ।”&lt;br /&gt;
&amp;quot;के रे &#039;विवाह भइसक्यो रे ? कोसंग कहिले विवाह गरिस्‌ ?तिमीहरूका लागि हाम्ती कोही भएनछौँ : जा मसंग टाँसिन पनि आउनपर्दैन” भनेर घचेडिदिन्छै ।&lt;br /&gt;
१४०&lt;br /&gt;
रिसाएकी आमालाई संफझाउने हेत्ले भन्छे, &amp;quot;मेरो कुरा त पुरासुनिदिनोस्‌ । अनि जै गर्न मन लाग्छ, गर्नोस्‌ । घचेड्ने मात्र होइनघरैबाट निकाले पनि निकाल्नोस्‌ । बाआमाको छहारी पाएकी थिएँ, त्योपनि हरिने भयो छोरीको जनी मानेर सहुँला ।”&lt;br /&gt;
छोरीको क्रा सुनेर गौरी शान्त हुन्छे र मनमनै भन्छे, “विवाहकोबन्धन के हो भन्ने यिनलाई थाहा छैन । लुकिश्िपी जोसंग यसो भेटभयो, केही दिन मीठा कुराहरू गन्यो, पुगीहाल्यो । के हावा चल्नथालेको&lt;br /&gt;
- यस्ता ?&lt;br /&gt;
गौरीको मनले जे जसो भनिरहेको भए पनि साधनाले आफनोविवाह भएको यसरी बताउँछै, &amp;quot;म विमान परिचालिकाको नोकरीमासमर्पित भइसकेकी छु, मेरो बिवाह यसैसंग भइसकेको छ याने । “सेवा”संग । मैले व्यक्तिसंग बिवाह गरी वैवाहिक जीवन बिताउने सपना देख्नछोडिसकेकी छु । ती हाग्ना साथीहरू जसले विवाह गरेका छन्‌, जसलेविवाहको प्रस्ताव पाएका छन्‌, ती धेरैजसोको कुरा सुन्दा हामी यसपेशामा लागेकाहरूले सेवामा नै समर्पित भई जीवन यापन गर्न श्रेयस्कर&lt;br /&gt;
जस्तो मानेका छौं । हजुरआमाले बाबालाई यसका शिरमा राजाको&lt;br /&gt;
द्र परेको छ भन्नुहुन्थ्यो । त्यस्तै नोकरी गर्नेहरूमाथि पर्ने त्यो छापहामीमा पनि लागिसकेकाले यसैसंग विवाह भइसकेको भनेकी हुँ । मैलेगल्ती भने आमा ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
“अहिले पैसा कमाएका छौं, उडेका छौँ र उमेर र समय वितेकोपत्तै हुँदैन । पछि यिनै धनको प्रयोग गरी सामाजिक सेवा गर्छु भन्नेसोचेकी छु । शिशुको रहरै लागै कि कुत्रिम गर्भधारण गर्छु कि अनाथआश्रम खोल्छु । एक मात्र होइन, बीसौं सन्तानमाथि मभित्र उम्लिएकोममता पोख्न पाउनेछु । अनि मलाई के नै चाहिन्छ र ! अहिले हेछुँ,त्यो संझनाले के पाएकी छे : जसले घरमा विरोध गर्दै बाआमासंगबोलिचाली छोडेर विवाह गरी केवल लोग्नेको माया पाउन । तर लोग्नेलेभने संझनासंग होइन, उसका कमाइसंग विवाह गरेको रहेछ । यो कुरापछि मात्र थाहापाई जब समय उसका हातबाट चिप्लिसकेको थियो ।&lt;br /&gt;
त्यस्तै छु सधाको जीवन पनि । लोग्नेले उसलाई आफनो व्यापारबढाउन प्रयोग गरिरहेको छ । कुनै दिन पनि उससंग प्यारको व्यवहारगरिएको हुँदैन रे । भन्छ रे, यसपटक यो ल्या, त्यो ल्या । समात्छ किभन्ने डर पति उसलाई छैन रे । “नाईँ” भन्ने शब्द निस्क्यो कि त&amp;quot;सहिनसक्न्‌ गरी गाली गर्छु रै । पैसाका लोभले कै कस्तौसम्म गराउँदोरहेछ भन्ने यही पैसा कमाउन थालेपछि थाहा पाउँदै छु । यो मोहमहजस्तै रहेछ जसको स्वाद लिन झिंगा झम्टेर जान्छ र त्यहीँ भनभनाई&lt;br /&gt;
१०१&lt;br /&gt;
रमाइरहन्छ । उसले त्यसभन्दा वढी आनन्द अरूमा सोच्नै सक्तैन ।कुनैको यस्तासंग संवन्ध हुनगई यस प्रकारले जिइरहेका छन्‌ भने अर्कीसाथीको प्रेमबियोग भएको छ यही नोकरीले गर्दा । उसको प्रेमीले भन्छरे, यो नोकरी छोडिस्‌ भने मात्र म तँसंग बिहे गर्छु । उसलाई योनोकरीप्रति घुणा छ रे । रेनाले यो नौकरी म त्याग्न सक्तिनँ । मैरौयोग्यताले यति पैसा कमाउनसक्ने अर्को नोकरी पाउन सक्तिनँ र यौसेवाको प्रकृति नै लावण्यमय छ । नोकरी र प्रेमको चेपामा परेकी रेनाविचलित भएकी मैले देखेकी छु । त्यसैले म विवाह गरेर समस्यामा पर्नचाहन्नँ । मलाई पनि वैवाहिक जीवनभन्दा यही नौकरी गर्नमा ज्यादाप्रसन्नता छ । म आफू भएर बाँच्न चाहन्छु । म कसैको पनि प्रयोगकालागि न त दबाब सहन सक्छु त त आफूलाई अर्पण गर्न नै । त्यस्तोस्वभावको मैले विबाह गरेर के सुख पाउँला !&amp;quot;&lt;br /&gt;
गौरीले छोरीको कुरा सुनिरहन्छे । क कहिले शान्त त कहिलेआवेगमा आउँदै बोलिरहन्छे । उसका अनुहारमा विभिन्न रङ्गहरू उलदैंभावनासंग खेल्दै उत्रन थाल्छन । हाँस्तै साधनाले उठाएका कुराको अन्त्यगंभीर स्थितिमा पुगेर प्रशनवाचक भई अड्छ । गौरीले छोरीको मनस्थितिबुर्भेर सोध्छे, “साथीहरूको कथा मात्र सुनाएकी हो कि तेरो आफनैपनि हो ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
झूटो बोदिल्त भन्ने अठोट लिएर चल्ने साधनाले पनि यसपटकबाआमाका मनको शान्तिका लागि भनिदिन्छे, “अरूको व्यथा सुनेर बेलैमासतर्क भएकी मेरो के घटना हुनसक्छ ः तपाईंहरू निश्चित हुनोस्‌, यस्तासमस्या म आफना जीवनमा आउनै दिन्नँ । त्यसैले त म संकल्पबद्ध भईभनिरहेकी छु, विवाह नै गर्दिनँ भनेर । तपाईंहरूलाई दुःख लाग्नसक्छमैले वढी कन्या रहेर नै जीवन बिताउने निश्चय गरेँ भनेर । विवाहितजीवन नै उत्तम जीवन हो भनेर भन्ने पनि केही छैन । जसरी हरेकक्षेत्रमा नयाँ नयाँ तरिका देखा पर्दैछन्‌ त्यसैगरी जिउने क्षेत्रमा पनिआउनुपर्छ । म परिवर्तन चाहन्छु, म नयाँ बाटाको कुन न&amp;quot; । मैंसाधना गर्न चाहन्छु जिन्दगी र जीवनका शैलीबारे । यसप्रतिआफनो अरुचि नदेखाई, सक्नुहुन्छ भने सहयोग गरिदिनोस्‌ । त्यसले मलाईहौसला दिनेछ । शारीरिक सम्बन्धबाट संतुष्ट हुनुभन्दा बढी नारीले खोज्नेअरू पनि छन्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
यति पररर बोलेर आँखाभरि आसु पार्दै साधना आमासंग बस्ननसकेर उठेर हिड्छै । छोरीको मनस्थितिको अड्कल काटेर गौरी सोच्छैसाधनाको जीवन उजाड पारिदिने कारण उनीहरूको आर्थिक स्थितिकोबोझ उसमा लादूनले त होइन ? यस सोचाइले गौरीलाई छोरीको&lt;br /&gt;
१४२&lt;br /&gt;
पछिलाग्नै पार्छ र उसले साधनालाई आफूर्पाट्ट फर्काई उसको आँस पछतैभन्छे “तिमीलाई दु:ख दिने हामी भयौं माफ गरिदैक छोरी ः”&lt;br /&gt;
साधनालाई आमाको क्षमायाचनाले झसङ्ग पार्छ र छिनैमा हँसिलोअनुहार पार्ने प्रयासगर्दै भन्छे, -&amp;quot;केमा क्षमा माग्नु भएको, आमाले ?तपाईंले मलाई बलजफती नोकरी गर्न लगाएको ठान्न भएको : तपाईंलेयसो भन्न थाल्नुभयो भने मेरो स्वल्प सन्तुष्टि पनि हराउँछ । मैलेआफनो कर्तव्य संझैर तपाईंहरूसंग जिट्टी गरेर जागिर खाएकी हुँ । मेरोआँखामा आँस्‌ देखेर तपाईंले मेरो मनमा चोट परेको छ भन्ने सोच्नभएको होला, कुरो त्यो होइन । गलाई अफसोच मात्र लागेको हो हाम्रोसोचाइको तह संझैर । लोग्नेस्वास्तीको नाता, बाबआमा छोरीको नाता,दाजुभाइदिदीबहितीको नातामा समेत कै भावना आउन थालेको आमा ?यसलाई विकास भन्ने कि अधोगति मान्ने ः&lt;br /&gt;
हरेक दिनको अखवार पढ्दा एक न एक खबर यस्तो छापिएकोहुन्छ जसमा नजिकका नाताले पनि नारीलाई धोखा दिएको हुन्छन्‌ । केकालागि : छिः, सोच्न पनि मन लाग्दैन । कस्तो: भौतिकवादतर्फ मोहबढ्दैछ । मृगतृष्णा लिएर भौतारी रहेछन्‌, केका प्राप्तिको लागि, थाहाछैन । त्यो सुखको लागि हो या द:खको लागि । यो पनि थाहा छैन यीसब उनीहरूले कसका लागि गर्दै छन्‌ । केवल हामा हा मिलाएरदौडिरहेछन्‌ । कसले पथप्रदर्शन गराउने : यही सोचेर रुन मन लाग्छ ।कम्जोर भएर रोएकी होइन, आमा, यो आँस बगाएर शान्त हुन मात्र&lt;br /&gt;
चाहेकी ॥।&lt;br /&gt;
“किन शान्तिको खोजीमा परिस्‌ त्यो बुझेर नै मैले भनेकी हुँ ।आँसुलाई त जे जसौ भन्‌ त्यो असमर्थताको परिचप नै हो । त॑भित्रचिन्ताको चिता जलिरहेछ, तँ त्यस अग्निलाई लुकाउने प्रयास गर्दै छेस्‌ ।पथप्रदर्शनको आवश्यकता तैलाई पनि त्यतिकै छ जत्तिको तैले अरूमादेखेकी छैस्‌ । तैले चनौती स्वीकारेर नै प्रमाणित गर्न सक्नुपर्छ कुनधारणा कसले लिएको गलत रहेछ । भागेर होइन त्यागेर होइन अपनाएरअगाडि बढ्दै जा । त्यो नै नारीको आजको जरुरत हो । सक्छैस्‌ भनेहौप्तला बट्लेर भन्न सन्नुपर्छु मैले नोकरी गरेर कुनै अकर्म गरेकीछैन । नारीले पनि बाहिरी क्षेत्रमा काम गर्नसक्छ ।”&lt;br /&gt;
साधना आमालाई हेरिरहन्छ र मनमनै भन्छे, “थाहा छ, आमातपाईंले मेरा प्रगतिमा साथ दिनुहुन्छ भनेर । त्यही विश्वास लिएर त मदही भएकी छु ।”&lt;br /&gt;
आमाछ्ोरीका सबै कुरा नसुने पनि छोरीले विवाह गर्दिन र सेवामासमर्पित हुन्छु भनेको सुनेर शिव खड्का टुप्लक त्यहाँ आइपुग्छ र&lt;br /&gt;
१४३&lt;br /&gt;
भनिहाल्छ, &amp;quot;विवाह गर्दिन, सामाजिक सेवामा लाग्छु भन्ने यो धृन तँलाईकताबाट आयो ! ए नानी सेवा नै गर्ने तेरो इच्छा छ भने विवाहलेकहिल्यै रोक्तैन । जीवनको हरेक अटालीबाट नै अर्को जीवनयात्रा शुरुहुन्छ । पुर्णत्व प्राप्तिका लागि विवाह र दाम्पत्य जीवनको पनि अनुभवचाहिन्छ । यस दनियाँमा सबै व्यक्तिको एउटै विचार हुँदैन । तेरोसामाजिक सेवा गर्न इच्छालाई प्रा गर्न तेरी आमाले मात्र होइन, मपनि तयार छु ।&lt;br /&gt;
तर वन एउटा क्रामा भने याद राख्नुपर्छ, सामाजिक सेवा गर्छुभनेर नै तम्सने हो भने जातीय भेदभाव ।पुरुष र नारी) राख्न उचितहुँदैन । समाजमा पुरुषको विकाप भएन भने नारी विकास असम्भवहुन्छ । आजको नारा “नारी विकास” लाई वदल्नु पर्छ र केवल भन्नुपर्छ“मानव विकास&amp;quot; ।&lt;br /&gt;
साधना बाबाको तर्क सुनेर केही पनि बभझिदन र सोघ्छे, “नारीविकास पुरुष विकास बेगर असम्भव रे ? किन बाबा ?”&lt;br /&gt;
शिब संभझाउने भाकाले भन्दै जान्छ, &amp;quot;आजको समाज पुरुषप्रधानछ्‌ । प॒र्षमा चेतना आउन सकेमा मात्र उसले थाहा पाउनसक्छ मानवकोअर्को छूप नारी शोषित भएकीले नै उसले समाजमा पहिलो स्थानओगद्न सकेको हो । यस्ता सोचाइले जाग्रत्‌ भएर मात्र सुधारका लागिअग्रसर हुन सकिन्छ । नत्र जे छ, त्यसैलाई औँठ्याइ राखेर सुधारलाईनिम्त्याउँदैन । बरु नारी स्वतन्त्रताप्रति घोर बिरोध गर्दै आफ्तो समाजमाप्राप्त प्रधान स्थानको सुरक्षा गर्न घाल्छ । तैले याद गरेकी हुनुपर्छ जुनघर सुसम्पन्न छ, त्यस घरका नारीहरू जतिसुकै शिक्षित भए पनिघरभित्रै रही आफनो इच्छा अनुसार आफनो व्यक्तित्व विकास गर्न पाएकाछैनन्‌ । काम गर्न बाहिरी दुनियाँमा निस्कनु केवल पैसा कमाउनलाई मात्रहो भन्ने धारणा छ । अहिलेसम्म नारी बिकासको लागि पहिलो एकपाइला मात्र उठेको छ । त्यसतर्फ चाल चल्न अझ सकेको छैन । बल्लथाहा हुन थालेको छ, छोराछोरी दुवैको लागि पढाउनु उत्तिकै आवश्यकन्छर । छोरीको विवाहको लागि योग्यता बढाउन र छोराको नोकरीनै योग्यता बढाउनलाई मात्र भन्नै संझिएको होस्‌ । &amp;quot;यति भनेर कखूबसंग हाँस्छ । गौरी र साधना यसको अर्थ राम्री नबुझैकाले एकअर्काको अनुहार हेराहेर मात्र गर्छन्‌ । शिवले फेरि क्रा उठाउँछ, &amp;quot;यस्तोपरिभाषा लिएको छ पढाइको आवश्यकताले । यो ज्यादै सङ्घीर्ण सोचाइहो तर के गर्छस्‌, घेरैको भनाइ यस्तै छ ।”&lt;br /&gt;
१४४&lt;br /&gt;
साधनाले फयाटट जवाफ दिन्छे, “ती घेरैभित्र हामी त छैनौं । मैलेपढेकी नोकरी गरेर जीविका चलाउनलाई हो, विवाह गर्नलाई योग्यताबढाएको होइन ।”&lt;br /&gt;
“फरक यति मात्र सोचिस्‌ : आफूलाई समानतामा पुन्याउन सकेमात्रले पुग्यो ! ए छोरी, त्यसभन्दा माथि उठ्नै उद्देश्य राखी सोच्नेप्रयास गर अनि मात्र तैँले थप्रै उपलब्धि पाउन सक्छेस्‌ । मलाई यतिमात्र थाहा छ शिक्षा र अध्ययन पैसा कमाउने उपाय मात्र होइनन्‌यिनले ज्ञानप्रबरद्धन गराई जिज्ञासा उत्पन्त गराउँछ जसको खोजीमा हामीक्रियाशील बनिरहेका हुन्छौं । आफनो व्यक्तित्वको विकास गरि रहेकाहुन्छौ यी नै विकासले हो आउने प॒स्ताका लागि मार्गदर्शन गराउने ।यही नै हाम्रो लक्ष्य हो मावन सभ्यताप्रतिको हाम्रो कर्तव्ययक्त योगदान हो॥ यसै सिलसिलामा उसले आफतो भ्रमणबाट प्राप्त भएका ज्ञानहरू नुरको,देदकी, बदिनीहरूको जीवनगाथा र बालबालिकाहरूको गाउँबाटैशहरतर्फको भागदौड, गाउँको स्थिति सबैवारे क्रमबद्ध तरिकाले सनाउछ रभन्छ, &amp;quot;हेर नाती, सुधारको पहिलो चाल यिनका शिशुहरूलाई संरक्षणदिएर, यो बदिनी, देवकी र झुमा प्रथा हटाएर ती जो जति अहिले छन्‌तिनीहरूलाई नयाँ जिउने उपाय बताएर अनि बालबालिकाहरू जो भड्केरदिशाहीत भएका छन्‌, तिनीहरूलाई समालेर शिक्षा र स्वास्थ्यप्रतिको ज्ञानदिनुको साथ साथै अनशासन, स्वतन्त्रता र हाम्रो संस्कृतिको बारे अर्थ्याउनअनिवार्य भएको छ । समयले बताइसकेको छ, यी प्रधा स्वार्थपूर्ण छन्‌ रयी धर्मको आडमा टिकेको शोषण नीति हो ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
तपाईले भन्नभएको मिध्या त अवश्य होइन तर मैले यसबारेसुनेकी अर्कै छ । यी बदिनी र देवकीहरूलाई यो वृत्ति छोड्छौँ भनेरसोध्दा भने रे, “किन छोड्ने र यसले हामीलाई कनै वाधा दिएको छैनबर₹ आजभौलि हामीलाई यस्ता काम गर्न नदिएर दुख दिन लागिरहेछन्‌ ।हामी यसको विरुद्धमा जुलुस निकाल्ने भएका ।&amp;quot; साधनाले आफूलेसुनेको कुरा बाबालाई बताइ उहाँबाट यसबारे सफाइको माँग गर्छे ।&lt;br /&gt;
शिवले जवाफ दिन्छ, &amp;quot;क्नैले भने पनि सबैको धारणा यस्तोछैन । जीवन घान्न सक्ने अर्को उपाय नपाएपछि भनेछन्‌ भने पनियसलाई प्रतिशोध मान्नपर्छ । यिनले परिश्वमी काम गर्न पनि सक्तैनन्‌ नत घरेल काममा नै कसैले लगाउँछन्‌, नत चाहेर स्वास्नीको रूपमारहनपाएका हुन्छन्‌ । त्यस अवस्थाका यिनले भन्छन्‌ के ! तैपनि यिनीहरूसबैजसोले आफ्नी छोरीले यस वृत्तिमा बस्नु नपरोस्‌ भनेर अनुरोध गर्दैहिड्न थालेका छन्‌ । एक प्रकारको ज्ञानज्योति उनीहरूमा उदाइसकेकोछ । तसर्थ यी हालका नारीहरू जो यस प्रथाको चेपोमा परेका , छन्‌&lt;br /&gt;
११४&lt;br /&gt;
यिनलाई पनि कुनै कामगा लगाइ बाँच्ने नयाँ आधार दियौँ भने यिनलेस्वीकार्छन्‌ भन्ने मलाई विश्वास छ । यदि उपाय बताउँदा पनि मानेनन्‌भने त्यस्तालाई संझाएर, दबाव दिएर या के गरेर हुन्छ यसबाट छुटाउनेप्रयास भने गर्दै जानुपर्छ । हामीले समय अनुसार छुटाउनपष्टि दवावदिनपनिसक्नु पर्छ । यस्तो कामलाई अत्याचार भनिदैन ।&lt;br /&gt;
बाबुआमाको छलफल र बाबले दिएको धारणा र संकल्प सुनेरसाधना मनमनै भन्छे, “यी नारीहरूको जीवन शोषणको एक भाग अवश्यहाँ । यस्ता शोषित यहाँ कँयौं छन्‌ । वाकप्रहारले छटपटाइरहे पनि संघर्षगरिरहेका छन्‌ । यहाँ आफनै छोरीलाई हेर्नोस्‌ न, मैले यो विमानपरिचालिकामा नोकरी गरेको कसलाई मन परेको छ । म जुटपत्ती खेल्दाफर्यांकिएका तासको नमिल्ने पत्ती भएकी छु, किन ? एउटै अर्थले यहाँसेवाको काम गर्नेहरू तुच्छ मानिने गरिन्छन्‌ । मेरो त्यो नर्स साथीको केबिराम छ र त्यो बदनाम भइरहेकी छे । उसको नोकरीका प्रकृति नै केकलङ् हो : यदि यही नै हो भने किन यस्ता नौकरीका लागिस्वास्नीमाछेको नै माँग हुन्छ ? के नोकरी गर्ने स्वास्नीमान्छेको सामाजिकस्थितिमा नीच तह रहनुपर्छ : नारी यसै पनि व्यवहारमा दोसो दर्जामा छेभने नोकरी गर्ने नारीलाई कुन तहमा झार्ने ?&lt;br /&gt;
यहाँ पनि स्वार्थ लुकेको छ । आफनो र अर्काको भावनानीतिशास्त्र अनसार छुट्टिन राम्रो कुरा हो तर गण र अवग्णको पारखगर्ने दृष्टिमा आफूनो र अर्काको विषयको फरक आउत स्वार्थीपत हो ।अर्काकी छोरी जेसुकै होस्‌ आफनो असल हुनुपर्छ । अर्काकी स्वास्नीजुन्‌सकै स्वभावकी होस्‌, आफनो हुने असल हुनुपर्छ इत्यादि कति छन्‌कति : याहा छैन । यसरी छनोट गर्दै र आफूनोमा अहम्ले बन्देजलगाउँदै जाँदा ती नारीहरू शोपित भई निकम्बा भइरहेका हुन्छन्‌ । मेरोआफूनै ठूला बाका छोरीहरू कुन स्थितिमा जीवन निर्वाह गरिरहेका छन्‌ ।तिनै दिदीहरू सँदै भन्छन्‌, &amp;quot;तिमी त आफ्नै खुट्टामा उभिन सकेकी छौँ,कसले के ताना सुनाउन सक्छ ! वेलैमा हामीलाई इलममा लगाउनसकेनन्‌ अहिले हातको गाँस आँखाभरि आँसु लिएर निल्नुपर्छु । घाँटीबाटजति तल निल्न खोज्छु दुःखका गाँठाले अव्याउँछ । त्यस बखत आफनोइज्जत भनेर हामीलाई लन्ठाएर राखे, अहिले हामी नै यिनका बोझभएका छौं ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
अहिलै पनि ठूलो बा घरकी आफूता छोरीलाई बिर्सेर नारीप्रगतिको महात्म्य सुनाउँदै भाषण दिंदै हिड्नुहुन्छ र साथसाथै बाबालाईभन्न पनि छोड्नुहुन्न, “कान्छा, के चाला हो तेरो : हाम्रो सन्तानले पनित्यस्तो नोकरी गर्ने ? त्यो पनि छोरीले । ताक कटाउने काम गर्दैछस्‌ तँ,&lt;br /&gt;
१०६&lt;br /&gt;
होस्‌ राखे : पैसाले पुग्दैन भन्छस्‌ भने मसंग लिए म दिन्छु तँलाई भन्‌कति चाहिन्छ : &amp;quot;यस्तो छ हाम्रो समाजको चलन ? क अफसोच मान्दैबाआमालाई आपसमा कुरा गर्न छोडेर आफनो कोठामा जान्छे रझ्यालको पर्दा खोल्दै बाहिर हेर्छे । नीलो अनन्त आकाशमा बादलकाटुकाटाक्रीलाई छुने कोशिश गर्दै एउटा च्ठा कावा खादै फरफराइरहेकोदेख्छ । त्यो क दृश्य उसलाई निकै प्रभावकारी लाग्छ । त्यहाँबाट टक्कैहद्न मन । हेदहिर्दै आफूलाई त्यही चङ्गासंग उड्दै बादल छुनेप्रयास गर्न थालेकी अनुभव गर्नयाल्छे ।&lt;br /&gt;
र&lt;br /&gt;
१४७&lt;br /&gt;
बिहानीपखको स्वच्छ वातावरण साँच्चै रमाइलो हुन्छ । चारैतीरशान्ति नै शान्ति । शिव खड्कालाई कहिले के हुन्छ के यस्तोवातावरणको आकर्षणमा फसी हाल्छ र जुरुक्क उठेर घुम्न हिँड्छ ।फर्कदा ताजासाग पातको मठा बोकेर ल्याउनै वानी नै बसिकेको छ ।&lt;br /&gt;
एक बिहानीमा यसरी नै घम्दै जाँदा उसको ध्यान त्रिचन्द्र कलेजकोभवनमा गएर अडछ । जहाँबाट उसका जीवनका मख्य मुख्य घटनाहरूशा भएका थिए । गौरी त्यही बाटो गरी पद्यकन्या कलेजमा जाने गर्थीर क गौरीलाई पर्खालबाट टाउको उठाएर छेड हानेर बोलाउने गर्थ्यो ।गौरीले आँखा तरेर रिसाएमा लम्ने गरेको देखेर साथीहरूले उसलाईहुनसम्म खिज्याउँदैनथे ।&lt;br /&gt;
एकफेर यस्तै क्रममा करा बढ्दाबढ्दै कटपीट पनि, भएको थियो ।त्यस उमैरको सोचाइ पति कस्तो कस्तो : कुनै ठोस कारणै नभएरझगडा हने र मिलाप पनि भइहाल्ने, उसले संझन्छ उसको त्यही साथीमकन्दलाई जाँचको नतिजा सुनेर दिक्क भईबसेका बेलामा आफूलाईसान्त्वना दिदै संझाउने गरेको । अनि क सोच्छ मैले जुन भावनालेउस्तलाई हेर्थे र व्यवहार गर्थे उसले मलाई ठीक त्यसको विपरीत रूपलेमाया गर्थ्यौ र संझाउदै भनेको थियो, “सफलताको खोजमा नै यस्ताअसफलताहरू आइपर्छन्‌ । यसैमा दुःखी हुँदै अल प्रयास गर्न छोड्दै गयौंभने हामी परीक्षामा मात्र होइन, जीवनको हरेक क्षेत्रमा हार्दै जान्छौं ।तिम्रो त यो असफलता पनि होइन आफूले अनुमान गरे जति भएन भन्नेमात्र हो । यति मै पढ्नै छोड्छु भनेर कुबद्धि नलेक । तिमीले पढ्नछोड्यौ भने कसको मेख मर्छ : तिमी आफैले द:ख ओग्नुपर्छ । यस्तोरिस निकालेर भविष्य नष्ट नपार ।&lt;br /&gt;
त्यस्तो सल्लाह दिनै मुकुन्द पनि अहिले हरेक क्षेत्रमा हारेरबाँचिरहेछ । यो समयको कस्तो चक्र हो ? बद्लिदो परिस्थितिसंगआफूलाई मिलाउन नसक्ने सबै यस्तै हुँदा रहेछन्‌ । मेरो हार पनि तकमको छैन । केवल मैले स्वीकारेको मात्र छैर । त्यस बेला परीक्षाफल&lt;br /&gt;
१४&lt;br /&gt;
सुनेका अवस्थामा जस्तै म हरेक नतिजामा अनुमानको विपरीत नै परेकोहुन्छु । म ठान्छु मैले राम्रो गरेको छु तर त्यो कसरी कहाँ चिप्लिन्छु म&lt;br /&gt;
छक्कपर्छु । समालिनु चिप्लनु र छक्कपर्नमा नै आधाभन्दा बढीजीवन बितिसकेको छ, अब बाँकीमा के नै गर्न सकुँला । त्यसै वेलाघण्टाघरले ट्वाङ ट्वाङ गरी सात हान्छ । उसको आखाँ घण्टाघरकोघडी हेर्दै भत्किएर जीर्ण स्थितिमा अल्पत्र परेको कलेजको दक्षिणपट्टिकोलङ्मा पर्छ । उसको सोचाइ अरू हुनी ता जान्छ र मनमनै प्रश्नगर्छ, “यही कलेजमा अध्ययन गर्ने ती अहिले देशका हर्ताकर्ताभएका छन्‌ तिनका आँखा यसमा नपरेको किन होला :&#039; या भवनको यसस्थितिले उनीहरूको मन नछोएको किन ?&lt;br /&gt;
शिव खँडका यस्तै सोचाइ र संझनाले घचेटिंदै दरबार स्कूल ररानीपोखरी तर्फ लाग्छ । उसलाई त्रिचन्द्र कलेज र सरस्वती सदनकोअवस्था देखेपछि दरवार स्कूल पनि हेर्न मनलाग्छ । जहाँ उसले प्रथमशिक्षा हासिल गरेको थियो ।&lt;br /&gt;
त्यौ दरवार स्क्ल आज भानुभक्त माध्यामिक नामाकरण भएरबाँचिरहेको छ त्यसलाई पनि त्रिचन्द्र कलेजका स्थितिमा पुग्न अब घेरैबाकी छैन । बढो हातखुट्टा मर्किएको ढाड भाँचिएको लम्पसार परेरलडिसकेको छ । कसैको ध्यान त्यसतर्फ मर्मत गर्न तर्फ गएको छैनमानौ त्यसको अस्तित्वको जरुरत अब कसैलाई पनि छैन । विद्यार्थीहरूकोसंख्या हरेक वर्ष घदतै गएकोले विस्तारै त्यस जीर्ण शरीरभित्र मृत्य पस्तैछ । यस्तै स्थिति छ सरकारी स्क्ल क्याम्पसहरू सबैको ।&lt;br /&gt;
भन्छन्‌ परम्पराको जगेर्ना गर्नपर्छ तर खोइ यी भवनहरूकोसंरक्षणप्रति ध्यान दिइएको : यी त नेपाल अधिराज्यका पहिलोविद्यालयहरू हुन्‌ जसले नेपालमा शिक्षाप्रति चेतना जागृत भएको समयकोसंझना गराउँछ । यस्ता स्कूल, क्याम्पसहरू सरकारी भएका यिनलेत देशले शिक्षाप्रति कस्तो स्तर निर्धारण गरेको छ, कस्तो लिएकोछ कस्तो शैक्षिक वातावरण खोजेको छ, आफना जनताका भविष्यकोकल्पना कुन्‌हपले गरेको छ, भन्नै बताउन नमुनाको रूपमा राख्नुपर्नेथियो । के पब्लिक स्कूल र क्याम्पसहरूभन्दा माथिल्ला स्तरमा गुणस्तरवृद्धिका लागि यिनलाई राख्न नसक्ने स्थितिमा नेपाल सरकार छ त !विभिन्न क्षेत्रमा अनुदान लिन सकिन्छ भने यिनको मर्मत र सुधारकालागि किन एक वचन कसैले पनि नबौलि दिएको &#039; थाहा नभएको रनजान्ने यहाँ कोही छैनन्‌ बरु ध्यान भने किन अन्तै अकाशिएको : हाम्रोहिजो बिगियौ भनेर कराउदै सचेत गर्नै हामीले नै आजलाई हिजो कैस्थिति तर्फ धकेल्दै छौं । भोलिको चिन्ता अभै हामीमा आउन सकेको&lt;br /&gt;
१२९&lt;br /&gt;
छैन । सडकमा बालकहरू रल्लिरहेका अझै देख्तै छौं । गाउँ, घर,पहाड, तराईतर्फ जाऔं त्यहाँ बालक बालिकाहरूका जीवनमा कुनै नौलोपरिवर्तन देखापर्ने पाएको छैन । के देशको भविष्य भन्नु नै आजका यिनै बालबालिका होइनन्‌ र ?&lt;br /&gt;
आफनो मनमा उठेको प्रश्नले शिव खँड्कालाई केही बेरसम्मजवाफको खोजीमा अल्मल्याईदिन्छ । विकासका नाममा उठेका हजारौंनाराहरूले एकै चोटि उसका स्कृतिपटमा आक्रमण गर्दा प्रश्नकर्ता कंआफैले ठम्याउन सक्तैन विकासको अर्थ नबझने क हो या अरू कुन्‌ जोदेशको भविष्य निर्माण गर्ने हौं भनेर लागेका छन्‌ । नेताहरू भनेजनताको विश्वास जित्न हाहाकार मच्चाउँदै आफनै गृणगान गर्दै छन्‌ ।&lt;br /&gt;
यस्ता सौचाइले आक्रान्त भएको शिव ठिमीलेहरूले बेच्न ल्याएकाहरिया सागपात किनेर त्यहीँबाट घर फर्कन्छ । गौरी चिया तयारपार्नलागेकी र उसलाई देख्नासाथ सोध्छै, “यति सबैरै कहाँ कहाँ पुगैरतरकारी ल्याइसक्नुभयो ! लौ, मैले पनि ठीक समय मिलाएर चियातयार पारेकी छु भन्दै एक कप शिवका अगाडि बढाउँछे ।&lt;br /&gt;
चियाको कप समाएर मेचमा बस्तै शिव भन्छ, &amp;quot;गौरी, आजबिहानै स्वच्छ मन होस्‌ भनेर घम्दै सङ.कटाको दर्शन गरेर आउँछु भनेरनिस्केको म दरवार स्कूलसम्म प॒गी यी सागपात किनेर फर्किहालेँ । दिक्कैलाग्यो त्रिचन्द्र कलेज र दरवार स्कूलको स्थिति देखेर । सबै क्षेत्रपब्लिकलाई छोडेर पतिस्पर्धा गराई गणस्तर बढाउने भन्दैमा एउटा कुनैमापदण्ड पनि नराखेर हुन्छ : कसैका आफना छोराछोरीलाई पव्लिकशिक्षालयमा पढाउन सक्ने आर्थिक क्षमता रहेनछ भने के तिनकाकेटाकेटीहरूले गुणस्तरीय शिक्षा नै नपाउनै ? यसले त गरीवअसहायहरूलाई कहिल्यै माथि उद्नसक्ने मौका दिदैन । यहाँ शिक्षाकोपनि किन बेचको व्यापार हुन थालिरहेछ ।&lt;br /&gt;
गौरीलाई शिवका चिन्ता मात्र लिने बानि देखेर वाक्कै लाग्छर भन्छे, “कति कुरामा चिन्ता लिनुहुन्छ ? सात क्लाससम्म पढाइनिःशुल्क गरिदिएकै छन्‌ । भानु माध्यामिक स्कूलमा नै त्यतिका छोराछोरीपढ्न गएकै देख्छु । अब केको पीर लिनुहुन्छ : भवन मात्र राम्रो भएर&lt;br /&gt;
पनि त “ज्यु ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
क भवन मात्र राम्रो हनपर्छ भनेको छु र ! पढाइकागुणस्तरको पनि कुरा गरेको छु । पव्लिक स्कूलमा पढ्ने र यस स्कूलमापढ्ने एउटै कक्षाका विद्यार्थीहरूलाई जाँचेर हेर, अनि थाहा हुन्छ मैलेभन्न खोजेको के रहेछ भन्नै &#039; यहाँ पैसाको आधारमा गुणस्तर रहनगएकाले भनेकी हुँ । यिनै सरकारी स्कूलमा पनि त्यस्तै प्रकारका चौतर्फी&lt;br /&gt;
1१०&lt;br /&gt;
ज्ञान बढ्ने गरी कित नपढाउने : सरकारले अझ यी पव्लिक स्कूलहरूमाभन्दा बढी सुविधा दिनसक्ने हुनुपर्ने हो । यो स्कूल भनेको सरकारलेचाहेको जस्तो गरी बालक बालिकाहरूको बौद्धिक स्तर बढाउने संस्थाहो । यसलाई साधारण कुरा मानेर यसै प्याच्च नबोलिदेक आजभोलि योखुला आर्थिक बजार नीतिले गर्दा सरकारी निकायहरू जे जति छन्‌ सबैकङ,कालको रूप मात्र लिएर बाँचिरहेका छन्‌ जसले गर्दा तल्लो आर्थिकस्तरमा भएका जनताले अरू बढी गरिबीका चपेटा सहनु परेको छ ।अरू त के स्वास्थ्य र शिक्षा समेत्‌ यस समस्याबाट उम्कन सब्नैभएकाछैनन्‌ । त्यस बीर अस्पताललाई हेर । त्यहाँ काम गर्ने डाक्टरहरूआयोग्य छैनन्‌ त्यस्तै छन्‌ यी सरकारी स्कूल क्याम्पस विश्व विद्यालयमापढाउने शिक्षकहरू पनि । दक्ष यी सबै छन्‌ तर अस्पतालमा बिरामीलेपाउनु पर्ने सेवा र विद्यालयहरूणः विद्यार्थीहरूले पाउनु पर्ने शिक्षामा भनेभिन्नता छ । किन यौ सोच्नुपर्ने विषय हो । यहाँका डाक्टर रशिक्षकहरू संग कुरा गन्यो भने थाहा हुन्छ उनीहरू पनि कतिअसन्तुष्ट छन्‌ आफूनो संस्थाको स्थिति देखेर । तलब र भत्ताले मात्रहोइन त्योभन्दा बढी अरू नै कारणहरू पनि छन्‌ । समष्टिरुपबाट हेर्नेहो भने उही नियम कानुन नै कारण हुन आउँछ ।&lt;br /&gt;
“त्यसको मतलव&amp;quot;&lt;br /&gt;
“मतलब साफ छ । मैले भन्दै आएको उही व्यवस्था परिवर्तन होयसमा आउन पर्छ प्रजातन्तको सिद्धान्त अनुसारको हेरफेर । नत्रप्रजातन्त्रको नै बदनाम हुन्छ । सुनेकी हौली, प्रजातन्त्र हामीलाई फापेनभन्न चालित्तकेका ।&lt;br /&gt;
जो सुकैले जेसुकै भनोस, हामी स्वास्नीमान्छेले भने प्रजातन्त्रआएपछि घेरै कुरामा बिकास गर्ने पाएका छौं । हामो स्वतन्त्रतानपचेकाहरूले प्रजातन्त्रलाई जथाभावी भन्दै हिडेका पनि हुन सक्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“तिमीहरू मात्र कहाँ हो र : जातभातको प्रधा हटनालेव्यवसायमा समानता आएको छ, आत्मबल बढ्न गई जो उद्यमी छन्‌तिनीहरूको आर्थिक स्थिति उद्तै छ । पैसा लगानी गर्न विभिन्नव्यवसायहरू खल्दै छन्‌ । लकाएर राखेका धनहरू देखा पर्दै उद्योगमालगनी हुँदैछ । यी सबै विकासका पर्वाधारहरू बन्दै गएको पनि हामीलेबिसैका छैनौं । केवल एउटै करामा ध्यान प॒गेको छैन भन्ने म ठान्छुत्यो हो, यसरी उठेका यी बाढीका भेललाई व्यवस्थित रूपले के, कति,कुन ठाउँमा, कतिसम्मका लागि लगायन पर्छु भन्ने योजनाबद्ध रूपदिनसकेका छैन । केमा प्राथमिकता दिनै भन्नेतर्फ ध्यान जान सकेको -छैन॥ घैरै गलियो खाएपछि नमीठी स्वाद आउँछ भने झैँ यस्ता राम्रा&lt;br /&gt;
१५१&lt;br /&gt;
पाइलाहरू चलेका भए पनि भ्रममा परेका छौं हामी सबै । विकसितदेशको नक्कल गर्न खोज्दै छौं पनि बिर्सदै छौँ ती देशहरूले पनि हालकास्थितिमा पुग्न कस्तो समस्याहरूको सामना गर्न परेको थियो । आजकोहाम्रो अवस्था ५,६ वर्षको बालकले आफनो बाको कोट लगाएर ख्ूवराम्रो भएँ भनेर दङ्ग परेको जस्तो छ यहाँ हामी र हाम्रो प्रजातन्त्र ।”&lt;br /&gt;
“ठीक छ ल, तपाईंले भनेजस्तै भएको होला रे ? अब हामीले गर्नेके त ! के गर्दा यो सुहाउने हुनसक्छ !?” , गौरीले यसरी प्रश्न शिवसङै नै गरी उसको राय बझत खोज्छै ।&lt;br /&gt;
“गर्नसक्ने धेरै छन्‌ अहिलै पख, मेरो मृद्ठाको पहिले टुङ्गो लागोस्‌अनि यस देशको नागरिकको हैसियतले मैलेँ के गर्नसम्छु त्यो गर्नेतर्फलाग्नेछु । देश बनाउने भनेको हामी एक एक जनताले आ।आफूना खुबीलेकमजोर पक्षमा सुधार ल्याएर हुने हो । भरखर व्यवस्था परिवर्तन हुँदायस्ता नमिल्दा कुरा देखापर्दै जान्छन्‌ तर सुधारको क्रम पनि साथसाथैजानुपर्छ । अनि मात्र व्यवस्था सुहाउँने हुँदै जान्छ । प्रजातन्त्र भनेकोहाम्रो आफनो शासन ही । त्यसैले प्रत्येक हामी एउटा सिङ्गो राष्ट्र हौं ।व्यक्तित्व विकास नै यहाँ राष्ट्रविकाससंग गाँसिएको हुन्छ । हामी सबैनेपालीको एकता नै यस व्यवस्थाको बल र सफलता हो ।”&lt;br /&gt;
कुराको प्रसङ्घलाई अर्कै तिर लैजान गौरीले शिवलाई भन्छै, “आजदयाका घरमा जाने निम्तो छ नि, संझन्‌ भएको छ : फेरि अस्तिकोजस्तो गरी हामीलाई कुरेको कुरै पारिदिन्‌ होला । खाना खाएर आजघरैमा आराम गर्नोस्‌ । साथीभाइकहाँ एक दिन नगएर केही हुँदैन ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
शिवले केही जवाफ दिदैन र भान्छाबाट तल कोठातर्फ लाग्छ ।कोठामा साधना अखवार पढ्दै चिया खाइरहेकी हुन्छे र बाब कोठाभित्रपसेको चाल पाएर सोध्छै, “बाबा, यहाँ हेर्नोस्‌ त तपाईले बताउनु भएकोनुरको फोटो यो त होइन !&amp;quot; भन्दै अखवार बाबलाई दिन्छु । शिवअखबार लिएर पढ्न थाल्छ । खवर न्‌रको नभए पनि एक देवकीकोहत्या र आत्महत्याबारेकै थियो । शिव खडकाले त्यो अखवार छोरीलाईफर्काउदै भन्छ, “यस्ता संस्कृतिको भने रक्षा गर्नुहुन्न । उठ, उद्‌ साधनाउठ, छोरीलाई छोरी भएर बाँच्नसक्ने बातावरणको सिर्जना गरिदे । त॑अब सक्षम भइसकिस्‌ । विद्या र धनको दुबै शक्तिलाई लिएर दुर्गा भईजागिदै ।&lt;br /&gt;
तँलाई याद छ या छैन जब त॑ सानी थिइस्‌, मैले तेरा दाइलाईपढेन भनेर पिट्तै मपछि यस घरको जिम्मा लिन पर्ने तेरो यौ चाल छ,म कसमाथि यो भार बिसाउँ, काँध थाम्न सक्नै कसरी हुन्छस्‌ भनेरकराउँदा तैले भनेकी थिड्दस्‌ “बाबा, दिदीको काँध कस्तो बलियो छ ।&lt;br /&gt;
११२&lt;br /&gt;
भाइलाई काँधमा लिएर घमाउन हुन्छ उसैका काँधमा भार बिसाउन होस्‌न ? &amp;quot;तेरो त्यस सल्लाहले मेरो रिस कता भाग्यौ कता र मैले हाँस्तैभनेको थिएँ, “छोरीका काँधमा भारी बिसाउने बेला पनि आउँदै छ ।त्यस बेला तेरो यौ काँध पनि खुव बलियो हुनुपर्छ : बलियोबनाउँछेस्‌ ?”&lt;br /&gt;
हो, त्यो बेला आहिले आएको छ । नारी जातिको भार वाम्न यसकाँधलाई उचाल, नानी । सुपुत्र छोरा मात्र हुनुपर्छ भन्ने छैन । त्योकती छोरी पनि हुनसम्छे । छोरीको जन्म पनि चाहना भएर रहनसक्ने&lt;br /&gt;
तिरस्कार भएर होइन । राधा र दिलेले झैं छोरीलाई आफनो अंशमान्नसक्ने सबैलाई संभाई बझाई गराइदै । त्यसपछि यस्ता हत्या,आत्महत्याबाट नारीहरू जोगिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
आवेशमा आई फलाकिरहेको बाबलाई साधनाले बीचैमा प्रश्न नगरीबोली रहन दिन्छे र जब क अडछ अनि भन्छे, &amp;quot;बाबा, साधना नामहजुरले मलाई जे सोचेर राख्न भएको थियो, म त्यो प्रा गर्न लाग्दै छु। जव म आफूनो लक्ष्य ठीकसंग पैल्याउन सक्छु त्यसपछि मेरा वेगलाईकसैले पनि रोक्न सक्तैन । म नारी प्रगति मात्र होइन, मानव मुक्तिकालागि लाग्छु र नारीलाई मानवको परिचय दिएर अगाडि बढाउँछ ।&lt;br /&gt;
“मानव मानवताको खोज । मानवमा या ...... १&amp;quot; खुवसंग दिलखोलेर शिव हाँस्छ साधनाले बाबाको हाँसो सुनेर भन्छे, &amp;quot;यस्तै हाँसोमाथिपहिलो खोज मेरो हुनेछ, बाबा : हांस्तैको शिव टक्क अड्छ र भन्छ,“अनुभवको खाँचो त॑ मा अझै छ । त्यो आफनो कमजोरी पनिबझिराखेस्‌ ।”&lt;br /&gt;
बाब छोरीको बीच क्रा चल्दाचल्दै गौरी आइपग्छे र भन्छे, “यीबाबछोरीको के हो यस्तो गफ ! कुनै गहन विषयकै वादविवाद तहोइन । तपाई त अब छोरीहरूसंग पनि यस्तो छलफल गर्नयाल्नेहुनुभयो !&lt;br /&gt;
“छोराछोरी ठूला भए पछि यिनीहरूसंग वसेर व्यवहार गर्नपर्छ ।यिनको राय पनि सुनिदिने गर्नुपर्छ यो प्रजातन्त्रले सिकाएको होबझयौ ! व्यवस्थाको असर घरभित्र हुने व्यवहारमा पनि परेको हुन्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“लौ, तपाईं र तपाईको चाहनाको प्रजातन्त्र अमर रहोस्‌ । हामीयही नारा लगाउँछौँ । तपाई हाँस्नोस, खुसी हनोस्‌ इमानमा रहौं इमानकोकमाइ मात्र हाम्रा पेटमा परोस्‌ यति भए हामीलाई प॒ग्छ । यी अहिलेतपाईको नोकरी गए पनि कसैले काखी बजाउँदै कुकर्मको फल भन्नसकेका त छैनन्‌ । यही हा ह।मीले पाएको इमान्दारीको फल ।&lt;br /&gt;
१५३&lt;br /&gt;
गौरीको कुरा सुनेर शिवले झवादट संझन्छ लोचनको धम्काइ ।उसले बारम्बार टेलिफोनबाट या पत्रपत्रिकाबाट उसको नियतिमा दोषलागाउँदै जथाभावी छापेको र बोलेको । क संझन्छ, त्यस लोचनलाई ककस्तो स्वाभावको छ भन्नै नचिन्ने पनि कोही &#039; छैनन्‌ र - उसले त्यसमाथिकारबाइ चलाएर सजाय दिएकामा ठीक गरिस्‌ भन्ने पनि थुप्रै थिए तरउसलाई सताउनु पद्यो भने त्यसैलाई उठाएर पनि लगाइदैन्ये । यहाँयस्तो नीति लिएकाहरूको गणना गरेर साध्यै छैन ।&lt;br /&gt;
त्यस वखत उसले त्यसमाथि दौष लगाएर कारवाइ चलाएकामाउनीहरूले प्रशंसा गर्दा क गजक्क परेर भनेको कुरा संझन्छ । उसलेभनेको थियो “म त्यो जतिसुकै शक्तिशाली भए पनि अनुशासनहीन हुन्छभने त्यसलाई छोड्दिन । न्यायलाई बचाएर राख्ने हो भने दोषीको ठहरगरेर त्यसलाई सजाय पनि दिनसक्ने हुनपर्छ नत्र बेकस्र व्यक्तिले न्यायकहिल्यै पाउँदैन । त्यसैले न्याय दिलाउनु कठिन र जोखिम काममानिन्छ । यसको पक्षघर हुन्छु भन्ने हुनुपर्छ, आफनै ज्यान रइज्जतमा पनि आँच आउनसक्छ । तसर्थ आँट नहुनेले म अत्याचार सहनसक्तिनँ भन्न फजुलको /4:2002 ।&lt;br /&gt;
यस लोचनले गर्नसक्छ भन्ने त हामीलाइ पहिलै थाहाथियो । त्यसमा यसले यसो भन्यो यस्ढो लेख्यो भनेर व्यर्थै किन चिन्तालिने ? भन्न दिनोस्‌ त्यो भन्दा भन्दै आफै थाक्छ भनेर सुनाउनआउनेहरूलाई भन्ने गर्थ्यौ ।&lt;br /&gt;
साँच्चै, त्यस लोचनले चप लाग्नु त पप्यो नै तर सोझै बोल्न रलेख्न छौडे पनि भित्र भित्रै कँची चलाउन भने छोडेन । मेरो बारे ठाउँठाउँमा गई नराम्रो कुरा गर्दै हिड्ने एउटा त्यो पनि हो । अफसोच तकेमा लाग्छ भने यस्ता व्यक्तका भनाइलाई आधार मानेर बदिजीवीकहलाएकाहरूले जब आफूनो स्वार्थ पूर्ण गर्नपत्यो या इबी साध्न पन्योया खसाल्न पत्यो भने यिनै कुख्यात व्यक्तिहरूको प्रयोग गर्छन्‌ जसलेगर्दा यिनले प्रश्रय पाई झनउग्र रूपले धम्की दिदैं हिड्छन्‌ । यस्ताकाभनाईलाई पट्याइ दिन व्यवहारिकता र मानसिकता परेमा नियम कानुनसबैको सहारा लिन्छन्‌ । यस्ता कख्यात व्यक्तिहरूलाई पनि आवश्यकताहेरी प्रयोगमा ल्याउनसक्ने हुनाले नै कसैमाथि पनि दोष ठम्याई कारवाइगर्न पन्छने भएका उनीहरू सज्जन प्रशासक कहलाई शान्तिले नोकरीधामेर वस्न पल्केका छन्‌ । त्यसैले यहाँ न्याय हराउँदै जादै छअनुशासनहीनता बढ्दै छ, लच्चा फटाहाको अघीन र घम्की बढ्दै जाँदाजताततै दर्गति मात्र देखिन थालिदै छ । कसले समाल्नै यिनलाई ? जबसबैले थाहा पाएर कोही भाग्दैछन्‌ भनै कोही यिनैको साथ लिदै&lt;br /&gt;
११४&lt;br /&gt;
प्रजातन्त्रको अर्थ स्वच्छन्दता लगाएर मनमानी गर्दैछन्‌ अख्तियारकोदुरुपयोग गर्दैछन्‌ र प्रजातान्त्रलाई बदनाम गर्दैछन्‌ । अख्तियारको दरुपयौगगर्न र अख्तियारको प्रयोगै नगर्न दुबै प्रगतिका लागि उत्तिकै हानीकारहुन्छ ।&lt;br /&gt;
“ शिव आफनो मनसंग यति क्रा गरेपछि गौरीले लिएका धारणाप्रतियसो भन्छ “कसले के भन्छन्‌, के भन्दैनन्‌ त्यो नै सन्दै हिड्नथाल्ने होभने तिमीले आफूले लिएको इमानदार हामी छौं भन्ने धारणालाई बचाएरराख्न मुस्किल पार्छ । तिमीले टेलिफोन पनि सनेकी छ्यौ र मेराविषयमा छापेको पनि अखबारमा पढेकी नै छ्यौ । यसलाई केभन्छयौ !&amp;quot;&lt;br /&gt;
“यसलाई म त्यही भन्छु जुन तपाईंका आत्माले भनिरहेको छ ।तपाईंको आत्मासंग मेरो पनि परिचय छ । कि तपाईंकोचाहि मेरोआत्मासंग छैन ?” गौरी यसरी प्रतिप्रश्न गर्दै ती गहन विषयलाई ठट्टामालैजान खोज्छे ।&lt;br /&gt;
शिवले गौरीको मनसाय बफझछ र भन्छ, “यही त हामीलेआजसम्म गरेका उपलब्धि भएको छ । अहिले जति दःख भोग्न परे पनिमैले आफनो आत्मबल गमाएको छैन र कसैका सामन्ने नतमस्तकहुनुपरेको छैन । गौरी, हामीले यौ निष्ठा यो भावना र नीति हाम्रासन्तानहरूमा पुन्याउन सक्यौं भने यो पनि राष्ट्र को सुधार हुनेछ ।&lt;br /&gt;
औँगातले नभ्याउने इच्छा राख्ने सन्तानका सामन्नै कल्पनै ऐशआरामले लोभिएर अरू संग दाँजेर सन्तानको मन भड्काउने जस्तो कामहामीले गर्न हुँदैन । यी अल्लारेहरूले यहाँको वढ्दी आकर्षण देखेर यिनकोआँखाहरू तिरमिराए या मन चञ्चल पार्न लागे भने हामीले समाल्नपर्छ ।&lt;br /&gt;
धन छैन भने सबै सन्तान मिलेर साथमा बसी प्रकृतिले दिएकोपानी पिउँला तर कुकर्म गरेर कमाएका धनले गरिष्ट भोजन गरेरनडकारौं । भविष्यका लागि चिन्ता गर्नु पर्ने वेला तिमीहरूको आइसकेकोछ । आजसम्म त म छु तिमीहरूका साथमा हारेको त्यागिएको र समयर व्यवस्थासंग मिल्न नसक्ने भनेर कहलाइएको मुर्ख जसले अझ गर्वकासाथ आफूलाई मूर्ख हुँ भनेर स्वीकरे पनि कागजस्तो चङख छु भन्दैन ।थाहा छ होइन चतुर कहलाइने त्यस कागले कै पनि खान्छ !&lt;br /&gt;
गौरी, साधना र शिव सबै एकँसाथ हाँस्छन्‌ र साधना आफनाकोठातर्फ लाग्छे ।&lt;br /&gt;
१५५.&lt;br /&gt;
छुट्टीको दिन आज साधनालाई फुप्‌कहाँ जाने इच्छा लाग्छ । छफुप्लाई खुबै आदरको दृष्टिले हेर्छ । उसले अनुभव बटुल्छै र आफूलाईनारीहरूको समस्याहरूसंग विज्ञ भई जिजीविषा उमार्छै ।&lt;br /&gt;
उसकी फुपूले जेठा दाजज र बाबको कडा निगरानीमाथि विरोध गदैपढ्दन थालेको हो र अहिले वैदेशिक निकायमा काम गर्छै । उसकैनोकरी .. बारेमा प्रसस्त अनभव भइसकेको छ । पदोन्ततिको इच्छाआन्तरिक अतृप्त रूपमा निहित रहे पनि बाहिर विदेशमा पनि खटिएरगइसकेकी छे ।&lt;br /&gt;
दिक्क भएर जव साधनाले आफनो कुरा बताउँछे तब उसँगसंझाउदै भन्छै, “साधना, यस समाजले हामी नारी जातिले नोकरी गौहाम्रावारेमा जुन कुरा काटेको सुनिन्छ त्यसलाई हामीले हामीलाईललकारेको मान्नपर्छ । हुन त यसरी कुरा काट्तै लान्छना लाउनुकोमतलब हाम्रो मनोवल घटाउनु, हतोत्साही पार्ने र कर्तव्यबाट ००हो । तर हामीले बझन पर्ने अहिलेको स्थिति छ, यिनै सहकर्मी पुमनोविज्ञान र राख्न पर्ने लक्ष्य हो आफूलाई कर्तव्यनिष्ठ बनाउनु ।&lt;br /&gt;
मैले जवसम्म घरेल्‌ कारण देखाएर बाहिर खटिएर जान इन्काएगरें तबसम्म नारी जातिलाई यति कुरा सुनाएनन्‌ । हाकिम हुनेले समैतलै लैमा लागेर प्याच्य बोल्यो, “यी स्वास्नीमान्छेलाई नोकरीमा लिएपछियस्तै हो । बाहिर खटाएर प्रयोग गर्न पनि पाईंदैन, घरैको समस्यातेरस्याइहाल्छन्‌ । बलजफत्ती गरेर पठाउँ हल्ला हुन्छ, कस्ता निर्दयी हाकिम&lt;br /&gt;
१५६&lt;br /&gt;
भनेर । समान छौं । समान हौं भनेर यस्तो ठाउँमा नोकरी गर्नआउँछन्‌ । लौ, जाओ बाहिर भन्यो भने समानताबाट माथिउठेर विशेषताखोज्छन्‌ । यिनलाई नोकरी नै किन गर्नु पर्छ, घरमा प्रसस्त संपत्ति “छदैछ र लोग्ने पनि त्यति माथिल्ला ओहदामा काम गरि हालेका छन्‌ ।पैसाले नप॒गेपछि के लाग्छ ? यिनको लोभ हाम्रो समस्या । लौ भन्नोस्‌त, यस्तो अड्चन आइपरेपछि हामीले सबै जागिरदारहरूमाथि समानव्यवहार कसरी गर्न सक्छौं ? घरको समस्या के लोग्नेमान्छे कामदारकोहुँदैन र ? बाआमा बुढाबुढी होलान्‌ : स्कूल जाने नानीहरू होलान्‌ !&lt;br /&gt;
उनीहरूले यसरी कुरा गरेर हाँसेको सुनेर मैले पनि श्रीमानसंगसल्लाह गरैर जब बाहिर खटिएर जान तयार भाएँ, त्यसपछि पहिलेयिनीहरू आश्चर्यमा परे, त्यसपछि फेरि ताना कस्न वालै । भन्नथाले,“पैसाका लोभमा घर परिवारको माया मौह समेत त्याग्न सक्नै यौ कस्तीप्रकृतिकी आइमाई हो ? त्यसको लोग्ने कस्तो जोइटिङ्गरे रहेछ &#039;&lt;br /&gt;
म ती कुरा अनसुनीगर्दै अगाडि बढ्दै गएँ । ती पुरुषजागीरदारहरू जो विदेशमा खटिएर जान खुट्टा उचालेर वसैका थिएयिनका भाग मैले हरिदिए भन्ने सोच्तै मप्रति अरू आक्रोसित हुँदै मलाईविफल बनाउने कोशिशमा लागे । त्यहाँका कर्मचारीहरूलाई भड्काउने,उचाल्ने गर्दै मलाई काम गर्नमा केन्द्रबाट समेत असहयोग गरीअप्ठ्यारोमा पार्न थाले । भन्ने कुरा त छोडिदैक, के भने के भनेनन्‌ ।कतिसम्म पनि भन्न छोडेनन्‌ भने म सबैको सहानुभूति मतर्फ खिचियोस्‌भनेर आफूलाई लोग्ने जीवित हुँदाहुदै पनि विधवाको भेषमा उतारी लोग्नेनभएकी एक्ली स्वास्नीमान्छे म विदेशमा खटिएर बसेकी छु रे भनेरहल्ला चलाएकी छु साथै त्यहाँ नयाँ नयाँ केटाहरू समेत लिएर हिड्छु रेभनेर कुरा उठाई मेरो चरित्रहत्या गर्न पनि छोडेनन्‌ । रिस इवी हुनेलेजिब्रो काटेर पत्याए पनि मेरो उमेर र रूपले गर्दा धेरैले हो र होला रभनेर टारीदिए पनि ।&lt;br /&gt;
यो चालबाजी असफल भएपछि अफिसका काममा कुनै गल्तीगरेकी छ कि भनेर समेत खोतल्न थाले । मैले- थाहा नपाएको जस्तै गरीआफ्ना लक्ष्यमा अडिक रहेँ । कुनैले निउ खोज्दै आइ लाग्नै थाले भनेतिनीहरू प्रति जाइ लाग्न पनि छोडिन । अन्त्यमा मैले आफनो सस्वाकोब्ववधी प्रा गरेर नै फर्के । आजभोलि घाहा छ, यिनीहरूले मलाईभन्छन्‌ “फलामजस्ती दही छै, यसलाई यसैउसै ढाल्न सक्दिन ।”&lt;br /&gt;
त्यसैले म त भन्छु, आजका हामी नारीले जे जति सहन परे पनिछु “निर्भीक बनाई भोलि आउने नारीहरूका लागि फराकिलो बाटोताई दिनुपर्छ । अलिअलि घरमाराए पनि ठीक ठाउँमा खुट्टा पर्न सक्ने&lt;br /&gt;
११५७&lt;br /&gt;
स्थितिको सिर्जना गर्नुपरेको छ । मेरो त हेर न, जीवन नै संघर्षमाबित्यो भने पनि हुन्छ जन्मन पनि लडाईकै वेला जन्मेकी हँ । सातामाज्यादै रोगी भएकीले बाँच्नलाई वात्तावरण र रोगसंग लडन न्‌ पन्यो ।त्यसपछि पढ्न समाजसंग परिवारसंग आनि नोकरी थालेपछिअफिसको बाताबरण र नारीप्रतिको घारणासंग । अहिले सबै क्षेत्रबाटबिजयी भएपछि पति छटपटाइ रहेकी छु असन्तुष्ट भएकी छु । केहीगर्न चाहन्छु तर छोराछोरीहरूले माया गरेर भन्छन्‌, “तपाई अब आरामलिनोस्‌, जे जसो गर्नुपर्छ त्यौ गर्न हामी सक्षम भइसकेका छौं ।&amp;quot; मलाईभने हेर न, आफू अत्तक्त भइसके जस्तो लाग्दैन । अझ त्यतिकै फूर्तिलेत्यति नै काम गर्नसक्छु जस्तो लाग्छ । अनि म रिसाएर तीछौराछौरीहरूलाई भन्छु, “तिमीहरूले मलाई छिटै मर्दा बनाउन खोज्दै छौँ॥ मलाई उमेरले गालेको छैन ।” लाग्छ, छोराछोरीहरू पनि मसंग हैरानभइसके होलान्‌ तर मलाई भने बढ्यौली स्वीकार्न पटक्कै मन लाग्दैन ।यही नै मेरो तृष्णा भएको छ । म भन्छु, मलाई काम दैक म गर्नसक्छु॥ मैरो इच्छा छ काममा व्यस्त रहँदारहँदै मेरो जीवनको अन्त्य होस्‌ ।तिमीहरू मलाई किन आराम गर भन्छौँ । मैले काम गर्न चाहेको पैसाकमाउनलाई होइन न त नाम कमाउनलाई नै हो । त्यो वेला अबबितिसक्यो । मैले काम गर्न चाहेको यस शरीरलाई मस्तिष्कलाईक्रियाशील राख्नलाई हो । यसमा मलाई किन रोक्छौ ।&#039; &amp;quot;तर तरउनीहरू मान्दैनन्‌ र भन्छन्‌, “हामीलाई समाजले आमालाई दृःख दियोभन्छ । &amp;quot;म भन्छु, अब पनि तिमीहरू आफना लागि मेरौ प्रयोग गर्नखोज्छौ &#039;&amp;quot; उनीहरूले के बर्भे कुन्ती मसंग रिसाउँछन्‌ । मेरो भनाइकोअर्थ भने केवल यति मात्र हो, मलाई अब स्वतन्त्रले रहन देऔओ । मतिमीहरूलाई सहयोग गर्न नसकै पनि म आफूलाई पनि तिमीहरूको बोझहुन चाहन्न । मलाई आफनो जीवन बाँच्न देओ ।&lt;br /&gt;
आफनी फुपूको यी कुराहरूको संस्मरण गर्दै उसैकहाँ जान साधनातयार हुँदै थिई त्यसैवेला गौरी आइप॒ग्छे र उसलाई बाहिर निस्कनलागेकी देखेर सोध्छे, “आज छुट्टी होइन र ? फेरि कता जान तयारभएकी ? बिनोद पनि आइपुग्ने बेला भयौ &#039; दाजुसंग भैटनपर्खिन्नस्‌ !”&lt;br /&gt;
&amp;quot;ए हो त ? आज दाजु आउनुहुन्छ भन्ने कस्तो बिर्सिएकी !मलाई आजभांलि के हुन्छ के चटक्कै बिर्सिहाल्छु । ।खिस्स हाँस्तै। फुपूलाईसंझै र आज उहाँकै साथमा दिन बिताउँछु भनेर जान लागेकी । विनौददाज आउँदा म हिडीसकेकी भए के सोच्नुहुन्थ्यौ होला, भन्नोस्‌ त ?”&lt;br /&gt;
११८&lt;br /&gt;
मेचमा थ्याच्च बस्तै साधना आफनो हस्सुपना संझेर दिक्क हुन्छे ।उसलाई हेर्दै गौरीले भन्छे, &amp;quot;चिन्ता लिन थाल्यौ भने यस्तै गरी सुढिबद्धिहराउँछ यी बाबुछोरीलाई केले छोपेको हो केले ? हुटिट्याँउँने आकाशथाम्छु भने झौँ देश र समाज बनाउँछौं भन्नेमा लागेका छन्‌ । कस्तोबनाउने हुन खै म त केही पनि जान्दिनँ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
साधना पति जवाफ दिन पछि पर्दित । भन्छे, “शुरुमा बम्हालेराम्रो जनावर निकाल्छु भन्दा कँटले जन्म लिए जस्तो होला तर त्योकँट बिचित्रको निस्के पनि कति उपयोगी छ । हाम्रा लागि त्यति मात्रउपयोगी भए पुगेन र : राम्रोको मतलब उपयुक्त हुनु पनि त एकहो ? अफाप भयो प्रजातन्त्र भन्दै हिडन थालेकामा उपयोगी छ भनेरत्यसलाई मेटाई दिनसके अरू त्यस भन्दा बढी के चाहिन्छ र ? तन्त्र तहामी जनताको नै रहन्छ । आफना लागि आफैँ तन्त्र प्रजातन्त्र रस्वतन्त्रता, होइन त आमा&lt;br /&gt;
१५९&lt;br /&gt;
झण्डै तीनवर्ष सम्म अदालतमा धाउँदाधाउँदै बल्ल मद्दाको फैसलाभएको छ । बधाइ दिने र आफनै डिम्डिम पिद्नेहरू पनि आउँदै खसीव्यक्त गर्दै भन्छन्‌ “गर्नै नहुने काम गरेपछि लोप्पा आफैले खात परेन? मैले तलाई मद्दा हाल भन्दा भैगयो छोडीदै भन्थिस्‌, आखिर जित तेरोभयो कि भएन &#039; न्याय भन्ने बझिस्‌ अझ हराएको छैन ।”&lt;br /&gt;
अर्काले भन्छ, “यार, दृःख त तैले पाइस्‌ नै त्यसमा अर्को मतछैन तर अब मस्तसंग तीन वर्षसम्मको पैसा एकैबाजी कुम्ल्याउन पनिपाउने भइस्‌ । यतिन्जेल अन्त कतै काम पनि गर भन्दा मानिनस्‌ नत्रयता पनि हुने उता पनि बन्नै थियो । तेरो यो एकहोरो मिजासलेै धेरैदुःख पाइसकिस्‌ । अब भने त्यसो नगरे । हामी पनि तेरा हितैषीमध्येका&lt;br /&gt;
हौं । हाम्रो कुरा पनि सुन्ने गर ।”&lt;br /&gt;
मित्रहरूका क्रा सुनेर उसलाई नमज्जा पनि लाग्छ र भन्छ, &amp;quot;पैसाकुम्ल्याउने र पैसा कमाउने कुरा छोड्न । पैसाले कसलाई कहिले सन्तुष्टपारेको छ र ? कामका बारेमा जान्त चाहन्छस्‌ भने त्यो मैले शाएगरेकोखु या छैन त्यसको प्रचार गर्दै किन हिड्नु पर्छ ?&amp;quot; शिवका कुरा सुनेरसाथीहरूले हाँस्तै उसले गोप्य काम शुरु गरेकोमा उल्याउँछन्‌ । तिनकाती हाँसोको जवाफ हाँसेर नदिई क छिनैमा गंभीर भइदिनछु्‌ । कसंझन्छु, ती बितेका दिनहरू जुन उसले कतिको हेला सहेर, कटु शव्दसनैर आत्मग्लानिलै गर्दा घरमा अशान्ति ल्याएर, भडकेर कता कता पगेरबिताएको विष के त्यो केकी पनि होइन ? के ती, खितेका दिनहरूलाईयो तीन वर्षका तलबले मेटाउन सक्छ ः सक्दिन भन्छौ भने, “मस्तले&lt;br /&gt;
१६०&lt;br /&gt;
कुम्ल्याउने” भन्ने त्यो शब्द कसरी आउँछ ? के घाहा छ, यदि मैलेफेरि नौकरी शुरु गरे भने यस्तै परिस्थिति नआउला भन्ने&lt;br /&gt;
मैरो स्वभाव झन्‌ उग भएको छ । व्यवस्यामा सधार देखापरेकोछैन । हुनसक्छ यस जितले मलाई अरू प्रोत्साहित पारेर कर्मचारीकोपरिचय दिन वाध्य नपर्ला भन्ने : अनि&lt;br /&gt;
भावना र नियममा परिवर्तन नआएसम्म हामीले के नै गर्नसक्छौं : भ्रप्टाचार र संस्थाको हितका लागि चालेको पाइला कन होभनेर कसरी छुट्टयाउने ? बाँधिएको नियम भित्र आफू पनि बाँधिएर नैबस्ने हौ भनै पतिस्पर्धा गरी कसरी अगाडि बढ्ने जब अर्को पार्टी फुक्काछ र उ चारैतिरबाट बाँधिएको हामी माथि हान्न थाल्छ । हामीले आफैविरोधमा कराउनु भएन अनुशासनको पाला गर्नै पर्छ अख्तियारको सीमानाघेर निस्कन सक्तैनौ संस्थाको हितको लागि पनि । किनकी अविश्वासलेअख्तियारको घेरालाई ठाउँ ठाउँमा मोडिदिएको छ । गर्जेर सोझैदोषारोपण गर्दै भन्न सक्छ, “यस संस्थाको हितका लागि होइन, भ्रष्टआचरण भएकाले आफनौ व्यक्तिगत भलाईका लागि नियम छलेको हो ।&lt;br /&gt;
यस्तो अविश्वासले एकतर्फ जागिरदारलाई समयमा निर्णय लिननसक्ने निकम्मा बनाई प्रभावहीन नोकर मात्र बनाइदिएको छ भने उहीअविश्वासका आडमा लकीक्नै जागिरदारहरूले अनैतिकताको खेल खेल्नेबाटो पनि यसैबाट निकालेका छन्‌ जसले गर्दा इमान्दार र फटाहा छुट्टिननसकी भन्‌ अन्यौलको स्थिति उत्पन्न हुन थालेको छ । के यो नियमकानुन र प्रशासनको कम्जोरी होइन ? अन्तराष्ट्रिय स्तरमा समेत्‌ छिरेरकाम गर्ने थालेका हामीले अन्तराष्ट्रिय क्षेत्रमा कप्तरी जाने भनेर सहाउँदोनियम किन बन्त नसकेको ?&lt;br /&gt;
यी नियम कानुनहरू जनतामाथि विश्वास नरहँदा व्यवस्थालेनियन्त्रण गर्ने हैसियतले बनाइएको जन छ, त्यसलाई अब जनतालाईसुम्पिन पर्दा यसमा वयवस्था सहाउँदौ छपले परिवर्तन लयाई विकेन्द्रीकरणगर्दै लैजानु आवश्यक छ । प्रजातन्त्रको अर्को उद्देश्य विकेन्द्रीकरण पनितहोनि&lt;br /&gt;
शिब यसरी आफैँमा हराएको देखेर साथीहरूले उसको गभीरमद्वाकोलक्ष्य गर्दै भन्छन्‌, &amp;quot;किन तँलाई हामीले भनेको मन परेन कि कसौ ?तँलाई हँसाऔं भनेर जिस्क्यायौं, तँ त यसै चप लागिस्‌ । ठट्टा गरेकोकुरालाई लिएर चित्तनदुखा है ।&lt;br /&gt;
मैले कहाँ चित्त दुखाएको ? तिमीहरू यसरी आएर मेराघुसीमा सामेल भयौ । यसमा मलाई नराम्रो लाग्ने के कुरा छ ? मत्यति मात्र सोचिरहेको थिएँ भने मेरो यो लामो छटपट्टीको क्षतिपूर्ति यही&lt;br /&gt;
१६१&lt;br /&gt;
तीन वर्षका तलवले गर्न सक्तैन न त मैरौ यौ लडाईँ यही रकम प्राप्तिगर्नलाई मात्र हो । म भावक भएर यसो भनिरहेको छैन । यो चोटजुन ममा लागेको छ, त्यो त कहिल्यै निको हुँदैन । यो चर्केर दुःख्नथालेपछि पैसाको परवाह कसले गर्छ ?”&lt;br /&gt;
यस्तै कुरा चल्दाचल्दै चिया र खाजा लिएर गौरी आइपग्छे रकुरालाई टिप्तै भन्छे, “जुन अमुल्य छ, त्यसको मोल करी लाग्छ ।क्षतिपूर्तिको त के कुरा गर्ने ? हामीभरिको धन ल्याएर थपारिदिए पतित्यो चोटको खाल्डो पुरिन्दैन । त्यो बेचैनी, त्यो भागदौड, त्यो बेइज्जत,कसले फिर्ता लिनसक्छ जसले हाम्रो जिन्दगीनै छोटयाइ दिएको छ :हेर्नोस्‌ न छोराको पढाइ उहाँको नोकरी खोसिदा शुरु मात्र भएको थियो,अहिले क इन्जिनियर भएर फर्किसक्यो । यति लामो समय जुन हामीलेकष्टले बितायौं, त्यो उमेरको क्षण के यस जितलै फर्काउन सक्छ : त्योतिन वर्षको तलवको के कुरा गर्ने ? छोड्नोस्‌ यी कुरा । आज खुसीकोदिन छ, रमाऔँ, हाँसौं र कामना गरौं हाम्रोजस्तो दशा कसैले पनि भोग्नुनपरोस्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“पुनर्वहाली भएपछि ध्यान खुबै राखेँ । एकपटक बाघी भइ नैसकेको छस्‌ । के गर्छस्‌, हामीले नोकरी नगरी अर्को पेशा समात्नसक्तैनौ । यो १५ वर्षदेखि लागिसकेको छाप चट्ट जाँदो रहेनछ ।”&lt;br /&gt;
साथीहरूले निकै सम्झाउँछन्‌ । उसको मनभित्रको अठोट जे जस्तोभएपनि उनीहरूको मन राख्न सबै ध्यान दिएर सुन्छ र हो भन्दै समर्थनपनि गर्छु । चिया खाँदा सबै भन्दा बढी खाजामा हात बढाउने पनि कनैहुन्छ । शान्त भएको छ, शून्यमा पुगेको छ क ।&lt;br /&gt;
१६२&lt;br /&gt;
शिव खड्काको नोकरीको पनर्वहालीको पूर्जी लिन जाने आजपहिलो दिन हो । त्यसैले घरमा विशेष रौनक देखापरेको छ । पृजा पाठएकातिर चल्दै छ भने राधा पनि भजन नै गाउर बसेकी छ ।&lt;br /&gt;
गौरी चिया ल्याउनभन्दा पहिले आएर शिवलाई नुहाउन पठाउँछेमानौं यस भन्दा पहिले भोगेका दुःखहरूको लेउ जन शरीरमा टाँसिई एकअङ्ग भएका छन्‌ ती सबै परखालिएर जाउन्‌ र शरीर उडेको चङ्गासरहहलका भई बित्न थालौस्‌ । उसले लोग्नेको छटपट्टी हेर्दाहिदै धाकिसकेकीहुनाले अबका दिन शान्तिल्‌ बितुन्‌ भनेर प्रार्घना गर्दै छे । ढल्दोउमेरमा धेरै चिन्तामा डुब्न थाल्यो भने कहीं यसैले कुनै अनर्थ ल्याउनेत होइन भनेर क डराइरहेकी हुन्छे । भनछै पनि, “अब फेरि यो गर्छुत्यो गर्छु भनेर भट्करहने होइन । यही नोकरीमा होरियारीका साथरहनोस्‌ । यतिले नै हामीलाई पुग्छ । छोराछोरी हामी सबैको कमाइहाम्रोजस्तो साधारण जीवन गजार्नका लागि यथेष्ट छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
तर थाहा छैन शिव के चाहन्छ । उसले नोकरीलाई कून दृष्टिलेहेरेको छ । नोकरी मात्र होइन उसले जीवनको अर्थ र बाँच्नुलाई केमानेको छ ? क गौरीका कुरा सुनेर हाँसी दिन्छ । त्यही हँसाइलाईगौरीले उसका प्रस्तावमा लोग्नेले दिएको स्वीकृति मानेर दङ्ग परकै छै ।नोकरीमा पुन; प्रवेश सफलताले वितोस्‌ भनेर भगवानको आराधना गर्दैछे । आस्थाको आड लिएर लोग्नेलाई भन्छे, “भगवानको पुजा आजालाईअब केही भन्न पाउनुहुन्न । जति भन्नु भयो, त्यति भोगी पनि सक्नभयो । यो भक्तिको मर्यादा राख्नुपर्छ । हाम्रा पूर्वजहरूले यो प्रथा यसैनिकालेको छैन ।”&lt;br /&gt;
१६३&lt;br /&gt;
शिधिल भइसकेको शिवले पनि यस विषयमा जवाफ दिन थालेकोछ । क भन्छ, &amp;quot;“सङ्कटाको दर्शन बिहानै गर्न जान्छ र तर्कारी सस्तोताजा किनेर ल्याउँछु । के यो नै पर्याप्त छैन र ! मलाई तिमीलेशृन्यवादमा लागेको ठानेकी छौँ क्यारे : हो, म ईश्वरलाई हाम्रोधर्मानसार निराकार शक्ति नै मान्छु र भगवानूमा आस्था राख्छु आत्मविश्वास बढाउन मनको कुरा पोखेर क्षमा माग्दै शुद्धीकरण गर्न रआफूनो लक्ष्यमा सफल हुन आशीर्वाद पनि माग्छु । त्यो आशीर्वाद जसलेमलाई आँट देन्छ । यो यस्तो अदृश्य शक्ति हो जसलै हामीलाई विश्वासदिलई हौसला दिन्छ »्कर्म गराउन अगाडि सार्छ र हामी यसरी कर्मगरेर प्राप्त भएका फललाई नै भगवानको वरदान मानेर दङ्ग पर्छौं ।बास्तवमा त्यो हाम्रो आत्मविश्वास ले निकालेको परिणाम हो ।&lt;br /&gt;
यसैले हो कुकर्म गर्नेहरू पनि बाँचिरहेका छन्‌, आफना लक्ष्यमासफलता नै हासिल गर्दै छन्‌ । उनीहरू पनि भगवान्‌कहाँ गएकै हुन्छन्‌ ।हामीले भन्दा बढी अर्चना गर्छन्‌ । के त्यस्ता व्यक्तिका सफलतालाई पतिभगवानको वरदान भन्छयौ ! के त्यस्ताहरूलाई पनि भगवान्‌बाट छहारीप्राप्त गरैको मान्छयौ : होइन भने मान, भगवान्‌ ध्यानको केन्द्र हो,विश्वासको &#039; स्रोत हो, उत्साहको प्रेरणा हो । यसैले म दावीको साधभन्छु, म आस्तिक हुँ । आफनो शिर निहराएर आफना लक्ष्यमा सफलहुन शक्ति माग्छु । आफनो वेदनाहरू पोखेर शान्त हुन भगवान्‌ कहाँघाउँछु । मेरो र तिम्रो ईश्वरप्रतिको भावनामा मात्र फरक हो । आस्थाहामी दुबैका भगबान्‌मा छ । यति भनेर शिब नुहाइ धवाइ गर्न जान्छ ।गौरी प्रसाद लिएर आउँछे । शरीर शुद्ध पारेर फर्केका शिवले प्रसादग्रहण गर्दै भन्छ, “मलाई मेरा लक्ष्यमा पग्न सफलता मिलोस्‌ । कुनैकारणले पनि मेरा जर्मराउन थालेका यी पाइलाहरू नरोकिङन्‌ ।”&lt;br /&gt;
गौरी शिवले भगवान्‌संग सफलता मागेको सुनेर ढुक्क हुन्छे रचिया ल्याउन जान्छे । तौ बजेको साइत छोप्न शिवलाई अफिस पठाउनेतयारी हुन वाल्छ । ढोकामा घडा राखिएका छन्‌ । गौरी छोराछोरी सबैरमाएका छन्‌ । माधितल उक्लेको ओर्लेको आबाज आइरहन्छ । दया पतिछोरालाई लिएर बिहानै माइत आएकी छ । शिव खँड्का यत्तै यतैअल्मलिरहेको छ । क कहिले टोपी खोज्छ त कहिले मोजा पाउँदैन । यीसबै पाएपछि पनि फेरि केही हराएको जस्तो गरी आफैँलाई छामिरहन्छ ।&lt;br /&gt;
आज उसले आफैँलाई बिर्सि रहेको छ । क फेरि त्यहीअफिसमाजदैछ जहाँ तिनै हाकिमहरू छन्‌, उनै सहकर्मी छन्‌ । कता कताउसलाई असजिलो सिन लाग्न थालि हाल्छ । के गरेर अभिवादन तिनैलाईगर्ने र के भनेर मिलापका लागि अगाडि सर्ने ?&lt;br /&gt;
१६४&lt;br /&gt;
जस्तो सुकै मनस्थिति भए पनि उसलाई आज आफिस जान नै पर्नेभएकाले घरका परिवारको मन राख्न साइतमा ने घरबाट अफिसकालागि निस्कन्ट,छ ।&lt;br /&gt;
उही अफिस, त्यसशीनै बसेका जागिरदारहरू, तीन वर्ष बिताएरअफिसमा यस्ता पनि त्यहाँका स्थितिमा कुनै परिवर्तन पाउँदैन । फरकदेखिएको छ भने कामदारहरूले ठूलठूला स्वरले कुरा गर्न र हाँस्न थालेकाछन्‌ ।&lt;br /&gt;
उसलाइ यो अलि बिभझेको लागेतापनि निर्भिकता फैलिएको पाएरराम्रै मान्छ केवल मनका एक छैउमा मात्र शब्डा उठ्छ, कहीं पोनिर्भीकता, अनुशासनहीनतामा बद्लिने त होइन &#039; छोटो एक दिनकोपर्यवेक्षेणमा उसले किटान गर्न सक्तैन ।&lt;br /&gt;
साथीहरूसंग कुराकानी गर्दै हाकिमसंग भेट गर्दैमा दिन बित्छ रपाँच बजे कार्यलय बन्द भई घर फर्कदा झ बाटाभरि सोच्छ, &amp;quot;मैलेगरेको यत्रो संघर्षको उपलब्धि फेरि अफिसमा काम शुरु गर्न मात्र होत ! मैले त जान्न खोजेको थिएँ, मैले के गल्ती गरेको रहेछु र मनिस्कासित भएँ ? यो मेरो प्रश्न त अनत्तरित नै रहयो : म त फेरि&lt;br /&gt;
फर्काएर वनकाइएको 0 त्यही स्थितिमा उस्तै गरी, समयकाट्न रनौकरीको वर्ष बढाई पाको बन्न । के ममा अब पनि उस्तै घैर्यआउन सक्छ &#039;&lt;br /&gt;
उसले आज पनि साथीहरू र हाकिमहरूबाट उही पुरानाकराहरूमा केही थप भएको मात्र सन्न पाएको छ । क अझ यसमासन्दिग्ध नै छ । ती चिप्लाकुरा अरुमाथि दोष थपारेर आफू चोखिने बाटोमात्र निकालेको सुन्दासन्दै क आजित भइसकेको छ । उसको विजयमाकुन अदृश्य शक्तिलाई खुच्चिङ मारेका हुन्‌ : कुन्नि भनेका थिएँ,अब वाहा पाए, होलान्‌ वियैमा कसैलाई नोकरीबाट हटाउनाले कस्तोपरिणाम निस्कदोी रहेछ ।&amp;quot; हाकिमले समेत भनेको थियौ, “राम्रो भयो,तपाईले मृद्टा लडेर जितेर नै आउनु भयो । जागिरदारको आत्मवलबढाउने काम यसले गरेको छ । तपाईले मदट्टा हाल्नासाध हामीलेभनिसकेका थियौं तपाईं फर्केर आउनु हुन्छ । त्यसैले तपाईको परानाठाउँमा कसैलाई पनि राखेका छैनौं । तपाईंले तिन वर्ष पहिलेको रअहिलेको अफिसको वातावरणमा घेरै फरक पाउन भयो होला । दवावमाकाम गराउने यता बढ्दै छ भने उता अदबमा रहन छोड्दै छन्‌ ।अहिलेको अवस्थामा हाकिम भएर काम गर्न अतिनै गाह्रो छ । आँखाअगाडि आफू परिन्छ दुवैतर्फको मार आफूले भोग्न पर्ने हन्छ । यो कुरातपाईंहरू जस्तो विद्वान्‌ले बझि सक्नु भएको होला ।&lt;br /&gt;
१६५&lt;br /&gt;
तपाईं गएपछि शन्तको पदोन्तति भएको छ । तपाईलाईआफूसरहका साथीको मातहतमा काम गर्न सङ्गोच लाग्ला भनेर उसलाईअर्कै शाखामा सस्वा गरी दिएको छु । के गर्ने, मुद्दाको छिनफान हुनयति लामो समय लागिहाल्यो । पर्खने पनि कति, झन्नै पन्ध सोह्र महिनापर्ख्यौँ । अरूको हुन लागेको उन्नति पनि रोकि हाल्न भएन । यसमानराम्रो नमान्नु होला । अब तपाईको पनि पदोन्नति चाडैं होला ।शिवलाई हाकिमका सफाइसंग भन्दा शन्तले आफनो पदोन्ततिभएको यतिका महिना बित्ता पनि नसुनाएकाम चित्त दुख्छ । आजै पनिक उसलाई देखेर अलि पन्छिएकै थियो । सायद पदोन्नतिले उसलाईशिवको अगाडिँ पर्न लाज लाग्यौ होला । क आफैँसंग भन्छ, &amp;quot;मैले तउसको पदोन्नतिको आधार सोध्ने थिइनँ किन उतले पन्छुत परेको ? मत उसको अन्तरङ्ग मित्रपो हुँ । कै नोकरीका क्षेत्रमा भिन्नता जस्तोभावनाको कुनै अर्थ रहदैंन ! उ ज्यादै दुखी हुन्छ न्छ्‌ र भन्छ, “त्यसैलेआज मैले जुन्‌ निर्णय लिएको छु त्यसलाई मान्नै पर्छ ।&amp;quot;यस्तै गरी मनमा क्रा खेलाउँदा खेलाउँदै क घरमा पग्छ । घरमाबिहान देखि छाएको उल्लासमय वातावरण अझै यधावत्‌ नै छ । कघरभित्र पस्ता उनीहरूका खुसीमा अरू खुसी थपिने हुँदा प्रफुल्ल भइदिन्छ । कसले के भने, के गरे, अफिसको स्थिति कस्तो पायौ भन्नेजान्न उत्सक रहेका परिवारलाई रमाइलो नाटकीय शैलीमा सबैबताइदिन्छ । आफना बाबालाई त्यहा छोराछोरी सन्तृष्ट हुन्छन्‌ । सबैलेरुचाएर स्वागत गरेको बर्णन सुनेर छोराछोरी सन्तृष्ट 00 ॥ गौरीलेभने औंला ठउन्याउँदै सचेत गराउँदै भन्छे, “सबै रामै छु तर आफूकाग नबन्नु होला । अर्काका कुरा सुनेर काग/काग भनि कराउँदारोटीको टुक्रा नै भइँमा खस्ला : होशियार हुनु मूर्ख बन्नु हन ।&#039;शिव पनि उसको कुरा सुनेर दह पर्छ र एउटा गौरीलाईपढ्न दिदै भन्छ, “होशियार हुनलाई नै आजै यो चिठी दिएर आएको छु। अब कनै पनि गल्ती दोहेरिन दिनँ ।”गौरी चिठी पढ्न थाल्छे । साधना बाबाको अनुहार हेरेर खिस्सहाँस्छे । गौरीका चेहराको रङ्ग उड्न वाल्छ र चिठी शिवलाई फिर्ता दिँदैभन्छे, “बभिनसक्नको हुनुहुन्छ तपाई र तपाईकी कान्छी छोरी । एउटीलेआजदेखिनै दुइ्वर्षको छुट्टी लिएर आएकी छै भने अर्काले यत्रो संघर्ष गरेरफिर्ता लिएका नोकरीलाई राजीनामा दिएर आएको छ । नोकरी छोडन नैथियो भने यत्रो दुःख किन उठाएको : धन भनिएन, स्वास्थ्य भनिएन,चिनताग्रस्त भएर समय बिताइयौ । अन्त्यमा यौ उल्लासपूर्ण त्योबाताबरण छिनैँमा शान्त हुृछ । एक छिनसम्म कोही कसैसंग बोल्दैनन्‌ ।&lt;br /&gt;
पूल&lt;br /&gt;
त्यसपछि शिवले ने गंभिर भएर जवाफ दिन थाल्छ, &amp;quot;त्याँहाका अवस्थामाझन्‌ हास आएको पाएँ । म कर्मचारी बन्न चाहन्छु, नोकर होइन ।हामी त्याँहा मेसिनको मान्छे सरह हन्छौँ विचारहीन, भावनाहीन सम्पूर्णशक्ति केवलरिमोटका बटनमा आधारित । मलाई बन्नु छैन भृपीशेरचनकोजस्तो “घम्ने मेचमा अन्धो मान्छै ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
“अनि के गर्न चाहन हुन्छ त : उस्तै गरी छटपटीमा समयबिताउने ? बितेका यी तीन वर्षले तपाईलाई कस्तो निस्क्रिय बनाइदिएछ। केही दिन त्यहाँको वातावरणसंग मिल्न कोशिस गर्न हुन्थ्यो होला ।त्यसपछि पनि सक्नु भएन भने अनि नोकरी छोड्नु हुन्थ्यो होला । आजएक दिनमा नै के थाहा पाएनु भयौ र नोकरी छोडेर आउनु भयो !यसरी भाग्नु पनि राम्रो हाइन !”&lt;br /&gt;
&amp;quot;म भागेको होइन, न त म निस्क्रियनै भएको छु । मैले चाहेकोछु स्वच्छ वातावरणको सिर्जना गर्न जहाँ प्रजातन्त्र बाँचन सकोस्‌ मानवताफस्टाउन सकोस्‌ । साधना र म सामाजिक पद्‌षण हटाई मानव एकताल्याउने अभियानमा लाग्छौं । मैले स्वतन्त्रताको अनुभव गर्न नपाए पनिमेरा आउने वंशजहरूले पाउने छन्‌ । यहाँ भावना परिवर्तनको पनिखाँचो छ । मैले परिवारतर्फको दायित्व पुरा गरिसके । तिमीहरू सबैकमाएर आफूना खुट्टामा उभिन सक्षम भइ सक्यौ । अब मेरो दायित्वदेशप्रति बाँकि छ । यस देशका नागरिकका हैसियतले मैले अब यसतर्फलाग्नु जरुरी संझैको छु ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
गौरी अलि आतिन्छे र भन्छे, &amp;quot;अनि साधनालाई किन नि ? उसकोत जीवन शुरु नै भएको छैन भने पनि, हुन्छ । म एक्ली यहाँ बसेर केगर्ने नि ? त्यसै भन्न हुन्छ भने मेरो पनि त यहाँ काम छैन ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
ग्छु यहाँ तिम्रो धेरै जिम्मा छ । यहाँ तिमीले यी छोराहकोअभिभावक भई यो घर र यी सन्तानलाई मार्गदर्शन गराउनु छ ।यिनीहरूलाई प्रगतिशील बनाउने जिम्मा हाम्रो हो । तिमी सक्षम छौरमेरी अर्घाञ्चिनी पनि हौँ । मेरो तिमीमाथि विश्वास रहेकाले ने यसरीकर्मक्षेत्रलाई बाँडेर त्यसतर्फ लाग्ने साहस गरेको हुँ । मेरो यो गृहत्यागसदाका लागि होइन । म फर्केर नआउन्जेलसम्म तिमीले हाम्रो गृहस्थीलाईएक्लो भएर चलाइराखे । घर हाम्रो सभ्यताको पचिय हो यसको जरुरतहामीलाई छ गौरी । तिमी अहिले मेरो यो लक्ष्य पुरा गर्न सहयोगीअइदैक वाघा होइन ।&lt;br /&gt;
अनि साधनालाई मैले साथमा यसैले लैजादैछु किनकि यसअभियानलाई सफल पार्न नयाँ पुस्ता र तिनका अभिभावकहरूलाईसाथसाथै संफझाई बभाई गर्दै अगाडि सार्न सकेमा मात्र नयाँ वातावरणको&lt;br /&gt;
१०७&lt;br /&gt;
सिर्जना हनसक्छ । साधनाचै आफना पृस्तासंग मिलेर अगाडि बढ्छे मउसलाई र उसका अभिभावकहरूलाई सहयोग गर्छु ।&lt;br /&gt;
गौरी छोरीको चिन्ता तिमीलाई जस्तै मलाई पनि छ । यसको पनिघर गृहस्थी बसौस्‌ भन्नै म पनि चाहन्छु । यसैले म यसलाई दुईवर्षकालागि मात्र लौजादै छु । त्यसपछि यो गृहस्थ जीवनमा प्रवेश गर्छे ।अहिले यसको विवाह गर्ने उमेर ढल्किसकेको छैन, किन व्यर्थै चिन्तालिनछयौ !&lt;br /&gt;
बाबआमाको कुरा सुनेर साधना पनि भन्छे, “आमा म अबहुर्किसके मैले आफना लागि के गर्नुपर्छ त्यो मलाई नै छोडिदिनोस्‌ ।घाबाले मलाई यस अभियानमा बलजफतिले लेजान लाग्न भएको छैन ।मेरो इच्छा र बाबाको इच्छा मिल्यो । मलाई पनि बाबा जस्तै परिपक्वव्यक्तिको जरुरत थियो । त्यसैले म पनि उहाँकै साधमा जान तयारभएकी हुँ । अलि हाँस्तै भन्छे, “तपाईं त बाबाक्का साथमा म जानलागेकीमा खुसी हुनपर््यौं &#039; मैले जहाँ गए पनि आफना अभिभावकलाईछोडेकी छैन ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
यसरी लक्ष्यमा हठ रहेका तिनीहरूलाई गौरीले कुनै उत्तर दिनसक्तिनँ । क मृक भउर उनीहरूको कुरा सुनीरहन्छे र आँसुलेडबडबाएका आँखा तल झुकाउँछे । आँसुका थोपा तपतप गरी तप्कनथाल्छन्‌ । शिवले यो के गरेकी भनेर सोध्दा आँस पुछतै भन्छे, &amp;quot;यसलाईहर्षका आँस्‌ सम्झी परवाह नगर्नोस्‌ र आफनो लक्ष्यमा लाग्नोस्‌ ।नविर्सितोस्‌, म यहाँ तपाईहरूका प्रतिक्षा गरेर बसी रहेकी हुन्छु, बहाद्रलोगेने र छोरीको स्वागत गर्न ।”&lt;br /&gt;
१६८&lt;br /&gt;
केही दिनपछि एक बिहानी ती बाढुछोरी आफनो बाटो लाग्छन ।सुर्यको राप र जमीन र रुखका पातहरूबाट उदन थालेका बाफलेउनीहरूलाई छोपेर छिनैमा अदृश्य बनाई दिन्छ । गौरी मनैमनलेउनीहरूका अभियानको सफलताका कामना गर्दै घरभित्र उनीहरूलाईबिदाइ गरी पस्छ । त्यहाँ राधाले पनि आफनो लोग्ने दिल बहाद्रलाईउठाउँदै भनीरहेकी गौरीले सुन्छ, &amp;quot;उद्नोस्‌न कति अल्छी गरेर सतीरहनभएको ! र हेर्नोस्‌ त छोरी रूँदै तपाईलाई बोलाउँदैछै । उसलाईफुल्याउनु हुन्न !&amp;quot;&lt;br /&gt;
दिलबहादर आफनो आङ तन्काउदै जरुक्क उद्छ । बिहानीभइसकेकाले क आतिन्छ र मनमनै प्रण गर्छ, अब कं पनि समयको, ख्याल राखि आफू क्रियाशिल हुन ढिलाइ गर्दैन । त्यसैवेला छोरी खैआमाबाबुलाई खोज्छे । आफनो सुरक्षाको लागि, आफनो भविष्यको लागि ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समाप्त&lt;br /&gt;
१६९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==छुटेको==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पेज -३४हरफ - २२ मा छैनन पछि&lt;br /&gt;
- भने पनि हुन्छ । अरु त के घरमा मूली आमा बुवाले पनिआफ्ना नानुहरूलाई पढ्न नगएमा भन्छन्‌ -&lt;br /&gt;
पेज -७३&lt;br /&gt;
हरफ -२६ मा नोकरी नगर भन्दा पछि&lt;br /&gt;
- मान्दै मान्दिन । के गर्ने ? आफ्‌ बाँचेर सन्तान बित्नु जस्तोचोट त कुनै हुँदो रहेनछ अहिले-&lt;br /&gt;
पेज -११३हरफ १ मा ट्ङ्गल आयो कि चिट्ठी पछि- मैरो खबर होईन बरु तेरो आफ्नै भन ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==गीताकेशरी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जन्म मिति ३ १९९७,२७ आषाढ&lt;br /&gt;
जन्म स्थान ; पकनाजोल, नयाँ बजार काठमाडौँहालको ठैगाना : बिज्ञालनगर बडा नं. ४ काठमाडौंशैक्षिक योग्यता : एम.ए. राजनितिशास्त्रभ्रमण : एशिया, पुरोप, अमैरिका, अष्ट्रेलिया,ग्यानाङा आदि&lt;br /&gt;
कसिंगर उपन्यास, साका प्रकाशन - २०३४&lt;br /&gt;
सौगात उपन्यास, भारद्वाज प्रकाशन - २०४६&lt;br /&gt;
आवाज उपन्यास, भारद्वाज प्रकाशन - २०४७&lt;br /&gt;
मुक्ति उपन्यास, भारद्वाज प्रकाशन - २०४८&lt;br /&gt;
खोज उपन्यास, भारद्वाज प्रकाशन - २०५०&lt;br /&gt;
अन्तिम निम्तो उपन्यास, सेभ द चिल्ड्रेन ।यू.एस) - २०५१विश्वास उपन्यास, लेखक स्वयं - २०५२&lt;br /&gt;
खुल्ला आकाश उपन्यास्त, बाल कल्याण समाज -२०५४&lt;br /&gt;
डा कछ उठी ठुट छट उ दि दारी&lt;br /&gt;
पुरस्कारहरु१. कवि धरणिधर पुरस्कार२. लोकप्रिया पुरस्कार३. राष्ट्रिय प्रतिभा पुरस्कारयसै उपन्यासबाटकुनितिको पालना गराउन जागिरदारमाथी अनुशासनको लगाम लगाइन्छ भनेत्यो शाषण हुनजान्छ ।&lt;br /&gt;
कककमंचारी निपमावलीको कमजोर पक्षलाई समातेर उच्च पदका जागीरदारलेमातहतका कर्मचारीलाई दुःख दिने प्रबति बस्यो भने त्यौ लाचार जागिरदारनोकर हुन्छ -प्रशासनको होईन प्रशासकको ।&lt;br /&gt;
क्रसेवाका लागि स्थापित पैशा घृणित हुँदैन ।&lt;br /&gt;
क्रतपाईं छोरीलाई छोरी मात्र सम्झनु हुन्छ, सन्तान मान्नु हुन्न ? छौरी भएर जन्मेभनेर बा आमाप्रति मेरौ केही कतंव्य नै छैन र?&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=Main_Page&amp;diff=74</id>
		<title>Main Page</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=Main_Page&amp;diff=74"/>
		<updated>2024-06-10T13:15:10Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: /* Step 1:  Scan and OCR */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;strong&amp;gt;Welcome to Nepali Kitab Editing Team.&amp;lt;/strong&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
This website is a sub-website of nepalikitab.org. Here we convert old books into Unicode text format. It is a collective effort by volunteers around the world. If you are also interested, please join the team.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
We keep here the books generated after scanning and extracting texts with OCR. It contains many errors. Our goal is to remove the errors.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==How to edit==&lt;br /&gt;
[[File:Editor-timeline.png|thumb]]&lt;br /&gt;
1. Make an account or log in.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2. Select the book of your interest.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. Click edit&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
4. Edit and clean up the errors and book format. If you are familiar with wiki syntax, you can edit the source too.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
5. Save time to time while editing&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
For details about formatting text, refer to: https://www.mediawiki.org/wiki/Help:Formatting&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 1:  Scan and OCR ==&lt;br /&gt;
*[[रामायण]] भानुभक्त आचार्य&lt;br /&gt;
* [[लेखनाथका प्रमुख कविता]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[गलबन्दी (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[नोकरी (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[९७ साल]] आनन्ददेव भट्ट&lt;br /&gt;
* [[तरुण तपसी (नव्यकाव्य)]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[नेपालको नक्सा (राजनीतिक तथा प्रशासनिक)]] नेपाल सरकार&lt;br /&gt;
* [[आदिकवि भानुभक्त (पटकथा)]] यादब खरेल&lt;br /&gt;
* [[इतिश्री (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[स्वाध्ययन सामग्रीः घरमा नै गर्न सकिने सिकाइ क्रियाकलापहरू (कक्षा ५)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[रूखको रूप]] रिन्छेन्ला लामा&lt;br /&gt;
* [[केही धार्मिक तथा साँस्कृतिक सम्पदाहरू (केही नमुना कलाकृतिहरू)]] सत्यमोहन जोशी&lt;br /&gt;
* [[रमाइला गाउँखाने कथा]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[दसैँ, पिङ र हात्ती (बालकथा-सङ्ग्रह)]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[८० दिनमा विश्‍व भ्रमण]] जुल्स वर्न,गोरखबहादुर सिंह&lt;br /&gt;
* [[बालभाका - १ (बालकविता सङ्ग्रह)]] उद्धवप्रसाद प्याकुरेल&lt;br /&gt;
* [[ताल (उपन्यास)]] यासुनारी कावाबाता&lt;br /&gt;
* [[चतुरेको चर्तिकला (कथा सङ्ग्रह)]] गोरखबहादुर सिंह&lt;br /&gt;
* [[ठूलो फुल (A Big Egg)]] Roma Pradhan, Shanta Das Manandhar&lt;br /&gt;
* [[आखिरमा टोम्मीको टोलीले जिती छाड्यो]] क्रिस्टिन स्टोन,शान्तदास मानन्धर&lt;br /&gt;
* [[शिक्षक निर्देशिका मेरो सामाजिक अध्ययन तथा सिर्जनात्मक कला कक्षा ५ (पुरानो संस्करण)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[जय भुँडी (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[मुकुन्द इन्दिरा (नाटक)]] बालकृष्ण सम&lt;br /&gt;
* [[खाल्डामा परेको भकुन्डो]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[जे छोए पनि सुन]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[खानामा पाइने पोषणहरू]] नताशा भिजकारा&lt;br /&gt;
* [[अन्तिम निम्तो]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[सूगवा]] रोशनी चौधरी&lt;br /&gt;
* [[भीमसेन थापा (ऐतिहासिक खण्डकाव्य)]] सिद्धिचरण श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[ऋतुविचार (खण्‍डकाव्य)]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[अनिवार्य नेपाली (१०६) - माध्यमिक शिक्षा परिक्षाको प्रश्न तथा उत्तरकुञ्जिका २०७४]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[छन्दका १०१ कविता]] (सङ्कलन) कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[गणित प्राविधिक शब्दकोश]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[उज्यालोको खोजीमा (उपन्यास)]] हरिहर खनाल&lt;br /&gt;
* [[सपनाको देशमा]] चन्द्रकान्त आचार्य&lt;br /&gt;
* [[महिला लक्षित शिक्षक सेवा आयोग तयारी अध्ययन सामग्री]] विष्णुप्रसाद अधिकारी&lt;br /&gt;
* [[शिक्षक पेसागत विकास तालिम (तालिम पाठ्यक्रम)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[हाम्रा लोकबाजाहरू (बालबोध - ५१)]] रामप्रसाद कँडेल&lt;br /&gt;
* [[पर्दा, समय र मान्छेहरू (कथासङ्‍ग्रह)]] झमक घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[काउकुती (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[विदुर नीति Vidura Niti [Sanskrit-English]]] (Extracted From) Mahabharata [महाभारत]&lt;br /&gt;
* [[जंगबहादुरको बेलाइती कापी]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[कति वटा रोटी]] शिल्पी प्रधान&lt;br /&gt;
* [[विश्वका प्रमुख सभ्यता तथा संस्कृति (बाल ज्ञानकोश - ३)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अस्माकम् संस्कृतम् - कक्षा १]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[प्रारम्भिक संस्कृत व्याकरण र रचना]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[गोरक्ष-साह-वंश (ऐतिहासिकं महाकाव्यम्)]] हरिप्रसाद शर्मा&lt;br /&gt;
* [[२०२ ओटा ठट्टा]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[धुमधामको घुमघाम (भक्तप्रसाद भ्यागुताको नेपालयात्रा)]] कनकमणि दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[महिलाका लागि डाक्टर नभएमा]] -&lt;br /&gt;
* [[दस औतार (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[A Perfect Match]] Ramendra Kumar&lt;br /&gt;
* [[मधुपर्क (वर्ष ४७, अंक ४, २०७१ भदौ)]] -&lt;br /&gt;
* [[सौगात (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[एक घर एक रोजगार (प्रयागदत्त तेवारीको कृषिकथा)]] मिलन बगाले&lt;br /&gt;
* [[रवीन्द्रनाथका नाटकहरू]] -&lt;br /&gt;
* [[पेसा, व्यवसाय र प्रविधि]] -&lt;br /&gt;
* [[मामा माइजु]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[म को हुँ]] पेमा डोल्मा लामा&lt;br /&gt;
* [[चनाचटपटे (बालकविता-सङ्ग्रह)]] बूँद राना&lt;br /&gt;
* [[आवाज (सामाजिक उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[स्पष्टीकरण (कथासङ्ग्रह)]] हरिभक्त कटुवाल&lt;br /&gt;
* [[स्वास्थ्य, जनसङ्ख्या तथा वातावरण शिक्षा स्वाध्ययन सामग्री (२०६७)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[दशैँको दक्षिणा (बालउपन्यास)]] गङ्गा पौडेल&lt;br /&gt;
* [[चार आर्य-सत्य (बुद्ध-शिक्षाका चार स्तम्भ)]] दोलेन्द्ररत्न शाक्य&lt;br /&gt;
* [[विजय चालिसेका बालकथाहरू]] विजय चालिसे&lt;br /&gt;
* [[सिर्जनशील विद्यालय]] अर्जुन श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[अभिभावकको सहयोगमा बालबालिकालाई घरमा नै गराउन सकिने सिकाइ क्रियाकलापहरू (कक्षा १)]] -&lt;br /&gt;
* [[दर्शन परिचय (विश्वका दर्शन र कला साहित्यिक बादहरू)]] परशुराम कोइराला&lt;br /&gt;
* [[खोज (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[अनिवार्य सामाजिक अध्ययन (१२३) - माध्यमिक शिक्षा परिक्षाको प्रश्न तथा उत्तरकुञ्जिका २०७५]] -&lt;br /&gt;
* [[बिहानीको घामसँग]] तारा पुन, शान्तदास मानन्धर&lt;br /&gt;
* [[एकादेशमा (बालकथाहरूको सँगालो)]] उषा दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[इतिहासका विम्बहरू]] पूर्णचन्द्र घिमिरे, रमेशचन्द्र घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[पन्ध्रौं योजना (२०७६७७-२०८०८१)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[नेपालको शाह तथा राणा वंशावली]] विष्णु प्रसाद श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[Aaloo-Maaloo-Kaaloo]] Vinita Krishna&lt;br /&gt;
* [[परित्याग (उपन्यास)]] माधव खनाल&lt;br /&gt;
* [[अमेरिका (उपन्यास)]] गंगा लिगल&lt;br /&gt;
* [[उखान मिलेन !]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[राष्ट्रकवि माधव घिमिरे (जीवनी, व्यक्तित्व र कृतित्वको सङ्‍क्षिप्त रेखाङ्‍कन)]] शैलेन्दुप्रकाश नेपाल&lt;br /&gt;
* [[केहि गुणकारी बोटबिरूवाहरू (बालबोध - ४१)]] डा. हरिप्रसाद&lt;br /&gt;
* [[दिवास्वप्न]] गिजुभाई, शरच्चन्द्र वस्ती&lt;br /&gt;
* [[संस्कृत, प्राकृत र नेपालीका सन्धिनियम]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[शिक्षाका ती दिन]] पुष्पराज पौडेल&lt;br /&gt;
* [[मपाईं (निबन्ध)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[Autobiography of a YOGI]] Paramhansa Yogananda&lt;br /&gt;
* [[ताराबाजी लै! लै!!]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[विश्वास (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[Akbar and Birbal Moral Stories]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[बुद्धवादका तीन आयाम]] पशुपति घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[करेसाबारीका जडिबुटीहरू]] केदार श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[काठमाडौं उपत्यका खुलास्थलहरू सम्बन्धी मानचित्र पुस्तक २०७१]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अन्ताक्षरी खेल]] ध्रुव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[साइबर बालकथा]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[कलेजी थाल]] ध्रुव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[कत्ति धुनु गधाहरूलाई (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] लक्ष्मण गाम्नागे&lt;br /&gt;
* [[गौरी (शोककाव्य)]] माधव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[आमाको माया]] रमेश चन्द्र अधिकारी&lt;br /&gt;
* [[Natural Treasures of Nepal]] Nepal Tourism Board&lt;br /&gt;
* [[नारीस्वर (महाकवि देवकोटा विशेष) - २०६६ असोज]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[चार गजलकारका उत्कृष्ट गजल (गजलसङ्ग्रह)]] मनु ब्राजाकी&lt;br /&gt;
* [[स्यालको जुक्ती]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[स्थानीय पाठ्यक्रम विकास तथा कार्यान्वयन मार्गदर्शन (मातृभाषा सहित) २०७६]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[बाँदर बन्ने रहर (बालकथा सङ्ग्रह)]] गोपीकृष्ण ढुङ्गाना&lt;br /&gt;
* [[डाढो (हास्यव्यङ्ग्यहरू)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[मध्यचन्द्रिका (नेपाली भाषाको मझौला व्याकरण)]] सोमनाथ शर्मा&lt;br /&gt;
* [[नेपाली क्रान्ति-कथा]] फणीश्वरनाथ रेणु&lt;br /&gt;
* [[डायना (महाकाव्य)]] शैलेन्दुप्रकाश नेपाल&lt;br /&gt;
* [[शङ्खे र फट्याङ्ग्रो]] अनन्तप्रसाद वाग्ले&lt;br /&gt;
* [[मोहिनीले खोसेको अमृतकलश]] अमर निराकार राई&lt;br /&gt;
* [[हिन्दू-धर्म के हो]] महात्मा गाँधी&lt;br /&gt;
* [[बालबालिकामा पढ्ने बानीको विकास]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[The Last Page of My Poem (मेरो कविताको अन्तिम पृष्ठ)]] Rajeshwor Karki&lt;br /&gt;
* [[जय भोलि !]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[संस्कृत व्याकरणको रूपरेखा]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[घरबारी बगैंचा]] बोल बहादुर थापा&lt;br /&gt;
* [[नबिर्सने यात्रा (यात्रा-कथा)]] समीर नेपाल&lt;br /&gt;
* [[समाज परिवर्तनमा संस्कृतिकर्मी]] विजय सुब्बा&lt;br /&gt;
* [[मेवालाल (बालकथा सङ्ग्रह)]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[A Helping Hand]] Payal Dhar&lt;br /&gt;
* [[आमा (कविता सङ्ग्रह)]] भक्ति दाहाल &#039;विष्फोट&#039;&lt;br /&gt;
* [[विज्ञान तथा वातावरण - कक्षा ८ (पुरानो संस्करण)]] गोपीचन्द्र पौडेल&lt;br /&gt;
* [[चप्पल]] अर्हन्त श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[मात्राहरू]] हरिहर लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[दोस्रो भाषाको रूपमा नेपाली भाषा]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अब्राहम लिंकन (१८०९-१८६५)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[घरभेटी भाउजू (कथासङ्ग्रह)]] कृष्णादेवी शर्मा&lt;br /&gt;
* [[Agreeing and Disagreeing - English Grade 10]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[शकुन्तला नाटक]] शम्भुप्रसाद ढुंग्याल&lt;br /&gt;
* [[Chunu and Munu Read]] Shanta Das Manandhar, Stephanie Wei&lt;br /&gt;
* [[अब खेल खेल्ने!]] शिल्पी प्रधान&lt;br /&gt;
* [[जनावरहरूको सभा]] ज्ञाननिष्ठ ज्ञवाली&lt;br /&gt;
* [[विश्वप्रसिद्ध पैंतिस साहित्यकार]] प्रभात सापकोटा&lt;br /&gt;
* [[कसिङ्गर (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[पंचतन्त्र कथासंग्रह]] &lt;br /&gt;
* [[अक्षर (बालकथा)]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 2: Title and heading corrections completed ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 2&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 3: Text correction completed ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 3&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
==Step 4: Proof reading completed==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 4&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[अनौठो फल]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==Step 5: Finished books==&lt;br /&gt;
पुरा भएका किताब&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 5&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%98%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A5%87_%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%9A%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A5%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A5%8B_%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%9B%E0%A5%87&amp;diff=73</id>
		<title>घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%98%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A5%87_%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%9A%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A5%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A5%8B_%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%9B%E0%A5%87&amp;diff=73"/>
		<updated>2024-06-10T13:14:26Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;Source book : https://nepalikitab.org/bhupi-sherchan-ghumne-mechmathi-andho-manche/&lt;br /&gt;
==पुस्तक परिचय==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२०२६ सालको साझा पुरस्कार प्राप्त&lt;br /&gt;
घुम्ने नेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
भूपी शेरचन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रकाशक: साफा प्रकाशन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संस्करण:&lt;br /&gt;
पहिलो, २०२६ (११०० प्रति)&lt;br /&gt;
 दोस्रो, २०२७ (११०० प्रति)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेस्रो, २०३० (२१०० प्रति)&lt;br /&gt;
चौथो, २०३५ (२१०० प्रति)&lt;br /&gt;
पाँचौं, २०३८ (२१०० प्रति)&lt;br /&gt;
छैटौं, २०४१ (२१०० प्रति)&lt;br /&gt;
सातौँ, २०४६ (२१०० प्रति)&lt;br /&gt;
आठौँ, २०४९ (३१०० प्रति)&lt;br /&gt;
नवौँ, २०५१ (३१०० प्रति)&lt;br /&gt;
दसौं, २०५५ (१०००० प्रति)&lt;br /&gt;
एघारौँ, २०६२ (५१०० प्रति)&lt;br /&gt;
बाह्रौँ, २०६४ (५१०० प्रति)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आवरणकला: टेकवीर मुखिया&lt;br /&gt;
मूल्य: रु.३४&lt;br /&gt;
मुद्रक: सामा प्रकाशनको छापाखाना, पुलचोक, ललितपुर&lt;br /&gt;
फोन : ५५२१०२३, फ्याक्स : ५५४ ४२३६1589: 978-99933-2-647-2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==समर्पण==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म पाँच वर्षको शिशु हुँदा मेरी माताको निधनभएको थियो । तर वाज्य्‌ भर्डकन पनिमलाई माता र पिता दुवैको मायादिएर हुर्काउने मेरा परमपूज्यमाहिला दाज्य्‌ सुब्बा कष्णमान सेरचनलाई म आफ्नोकनितासङ्ग्रहकोयो संस्कर्‌णासादर समर्पित गर्दछु ।&lt;br /&gt;
- भूपी शेरचन&lt;br /&gt;
२०४२ साल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रकाशकीय==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचका अन्धालाई&lt;br /&gt;
साँघुरो चोकका चौतालाई&lt;br /&gt;
वीर भएका बुूलाई&lt;br /&gt;
बुढू भएका वीरलाईहल्लै-हल्लाको देशमाचार भन्ज्याङ, यो चिसो एष्ट्रेमाउभ्याउने हामी होइनौं ।&lt;br /&gt;
केही लेख्छन्‌&lt;br /&gt;
लामो सास फेर्छन्‌&#039;यस्ता भूपी शेरचनहामीले दिक्क पारेपछिएक दिन भन्छन्‌&lt;br /&gt;
“छाप्ने भए छाप्नू, खोजेर जहाँ जे छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
भयो ।हामीले खोज्यौं, खोजायौँअनि अलिकता रोजायौं,ऐले यो संस्करणचाहिंजस्ताको तस्तै बुझायौं ।भूपीलाई फेरि पनिसाझा प्रकाशनको घेरोमनिअर्कै रूपमाअर्कै रङ्गमाउजिल्याउने हाम्रो धोको छ ।[त्यो गरिदिने उनीबाहेक अर्को को छ?त्यसैले उजूरको पोको छ ।)अनि त्यसैले शुमकामनाको डोको छ-भूपीले कलम नरोकून्‌,शुभ्र, शान्त र स्निग्धमैनबत्तीको शिखालाई नछोपून्‌ ।&lt;br /&gt;
वि. सं. २०२६&lt;br /&gt;
क. दी.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कविताक्रम==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो चोक&lt;br /&gt;
मैनबत्तीको शिखा&lt;br /&gt;
सचैँ-सचैँ मेरो सपनामाबसन्त&lt;br /&gt;
हामी&lt;br /&gt;
मेरो देश&lt;br /&gt;
मध्याहन दिन र चिसो निद्रागलत लाग्छ मलाई मेरो देशको इतिहासघुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छेघण्टाघर&lt;br /&gt;
घैँटोभित्र वटवृक्ष&lt;br /&gt;
मेरा बिगत सपनाहरू&lt;br /&gt;
ए जून!&lt;br /&gt;
शहीदहरूको सम्झनामापोखरा&lt;br /&gt;
हो-चि-मिन्हलाई चिठी&lt;br /&gt;
यो हल्लै-हल्लाको देश हो&lt;br /&gt;
ज्वरमुक्त सूर्य, जलनमुक्त आकाश र तृप्त ताल&lt;br /&gt;
मर्दैछ हामीमा हामी बाँचेको युगसाँझको नयाँ सडक जिन्दगीको जात्रा&lt;br /&gt;
नयाँ वर्ष&lt;br /&gt;
पहिरो जाने पहाडमुन्तिरतीतरा, बट्ठाई र भक्कूको राँगोका सन्तानहरूप्रतिभैरहवा&lt;br /&gt;
एक कविता&lt;br /&gt;
दुई सेता कलिला हत्केलाका परेवा : तिम्रो नमस्तेचिसो ए्ट्र&lt;br /&gt;
अभिशप्त घर&lt;br /&gt;
म&lt;br /&gt;
रात काठमाडौं प्रातःशीत-युद्धकालका बाँदरहरूबेड-ल्याम्प&lt;br /&gt;
प्रातः एक आघात&lt;br /&gt;
मानी नभएको जिन्दगानीरिक्त शय्याको स्थानबाटमेरो जीवन लेकझौं&lt;br /&gt;
&#039;भृपी&#039; शेरचन&lt;br /&gt;
असार&lt;br /&gt;
जीबनको अँध्यारो सडकमाहिंड्दा-हिंड्दै&lt;br /&gt;
दुई टुक्रा&lt;br /&gt;
मेरा साथीहरू&lt;br /&gt;
५१५३२६शद६१दहष््िदछदद&lt;br /&gt;
32£:5555&lt;br /&gt;
दरद३यशपैदछदद&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सेरो चोक==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साँघुरो गल्लीमा मेरो चोक छ ।यहाँ के छैन ? सबथोक छ।असङ्ख्य रोग छ,&lt;br /&gt;
अनन्त भोक छ,&lt;br /&gt;
असीम शोक छ,&lt;br /&gt;
केवल हर्ष छैन,&lt;br /&gt;
यहाँ त्यसमाथि रोक छ ।साँघुरो गल्लीमा मेरो चोक छ ।यहाँ के छैन ? सबधोक छ ।यो मेरो चोकमा&lt;br /&gt;
देवताले बनाएका मानिस रमानिसले बनाएका देबता&lt;br /&gt;
यी दुवैथरीको निवास छ ।&lt;br /&gt;
तर यहाँ यी दुवैथरी उदास छन्‌ ।दुबैथरी निराश छन्‌ ।&lt;br /&gt;
मानिस उदास छन्‌&lt;br /&gt;
किनकि तिनलाई यहाँरात-रात-भरि उपियाँले टोक्छ&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे / १&lt;br /&gt;
दिन-दिन-भरि रुपियाँले टोक्छर देवता उदास छन्‌&lt;br /&gt;
किनकि तिनलाई यहाँ&lt;br /&gt;
न कसैले पुज्छ, न कसैले ढोग्छत्यसैले यो चोकमा&lt;br /&gt;
देवता र मानिसलेएक-अर्कोलाई धिक्कार्दैएकसाथ पुर्पुरो ठोक्छन्‌&lt;br /&gt;
साँघुरो गल्लीमा मेरो चोक छ ।यहाँ के छैन ? सबथोक छ।&lt;br /&gt;
२ ८ घुम्ने मेचमाबि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
(२०१७-साहित्यो)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मैनबत्तीको शिखा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शुभ्र, शान्त र स्निग्धशिखा मैनबत्तीको ।मानौँ,&lt;br /&gt;
प्रथम रजस्वलापछिस्तान गरेर&lt;br /&gt;
शारदीय घाममा&lt;br /&gt;
आफ्नो कौमार्य छरेरथकित-थकित झैँचकित-चकित झैँएक्लै-एक्लै मुस्काइरहेकोअनुहार हो यो कुनैसुन्दरी नवयुवतीको ।शुम्र, शान्त, स्निग्धशिखा मैनबत्तीको ।आँखाभरि वेदनाको पानीतर, हर्षले हाँसिरहेछ आँखाको नानीमानौँ, अप्रेशनपछिहोशमा आएर&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छै .“&lt;br /&gt;
घोर पीडामा पनि&lt;br /&gt;
शिर अलिक उठाएर&lt;br /&gt;
नवजात शिशुलाई निहालिरहेकोसन्तुष्ट आँखा हो यो&lt;br /&gt;
कुनै पुत्रबतीको ।&lt;br /&gt;
शुम्र, शान्त र स्निग्ध&lt;br /&gt;
शिखा मैनबत्तीको ।&lt;br /&gt;
एकातिर धप्प-धप्प&lt;br /&gt;
बलिरहेछ अनुहार&lt;br /&gt;
अर्कातिर तप्प-तप्प&lt;br /&gt;
ढलिरहेछ अश्रुधार ।&lt;br /&gt;
मानौं यो कुनै विधवाको&lt;br /&gt;
त्यो क्षणको अनुहार हो&lt;br /&gt;
जब कि उसलाई आएछ यादएकसाथ&lt;br /&gt;
सुहागरात र स्वर्गीय पतिको ।शुभ्र, शान्त र स्निग्ध&lt;br /&gt;
शिखा मैनबत्तीको ।&lt;br /&gt;
४ / घुम्ने मेचमाथि अन्धौ&#039; मान्छे&lt;br /&gt;
(२०१६)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सधैं-सघैं मेरो सपनामा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सधैँ-सघैँ मेरो सपनामा&lt;br /&gt;
असङ्ख्य युवती आमाहरू&lt;br /&gt;
मेरो अगाडि आउँछन्‌&lt;br /&gt;
र बहुलाई झैँ&lt;br /&gt;
“अब मेरो दूधको कुनै मूल्य छैन&lt;br /&gt;
अब मेरो मातृत्वको कुनै अर्थ छैन-&#039;भन्ने गीत गाउँछन्‌&lt;br /&gt;
र मलाई देखाई-देखाईकन&lt;br /&gt;
सुँगुरका भद्दा गन्दा बच्चाहरूलाई झौंआफ्नो अतिशय दूधले गानिएकोस्तन चुसाउँछन्‌&lt;br /&gt;
अनि एक्कासि&lt;br /&gt;
छाती पिट्तै&lt;br /&gt;
कपाल लुछतै मसँग आफ्ना हराएका छोराहरू माग्न थाल्छन्‌सचैं-सचैं मेरो सपनामा&lt;br /&gt;
असङ्ख्य जीवनद्वारा लत्याइएका&lt;br /&gt;
र मृत्युद्वारा नपत्याइएका&lt;br /&gt;
जीर्ण तन वृद्धहरू&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाचि अन्यो मान्छे / १&lt;br /&gt;
र बिदीर्ण मन वृद्धाहरू&lt;br /&gt;
मेरो अगाडि आएर लम्पसार पर्छन्‌&lt;br /&gt;
र मसँग&lt;br /&gt;
आफ्नो अथाह भविष्यको सूत्र माग्छन्‌आफ्नो हराएको एक मात्र पुत्र माग्छन्‌सधैं-सचैैं मेरो सपनामा&lt;br /&gt;
असङ्ख्य युबती विधवाहरू मेरो अग्राडि आएरआफूलाई सम्पूर्ण रूपमा नङ्ग्याउँछन्‌&lt;br /&gt;
र आफ्नो हिउँजस्तो कोमल तनमादुनियाँको कामुक आँखाले पोलेकोकाला-काला डामहरू देखाउँछन्‌&lt;br /&gt;
र मसँग आफ्नो जीवनको सहारा माग्छन्‌मसँग आफ्नो यात्राको किनारा माग्छन्‌सधैं-सबैँ मेरो सपनामा&lt;br /&gt;
क्षयका कीटाणु बोकेका&lt;br /&gt;
असङ्ख्य टुहुरा केटा-केटीहरू&lt;br /&gt;
मेरो अगाडि आउँछन्‌&lt;br /&gt;
र मसँग स्कूलको फीस&lt;br /&gt;
पुस्तक किन्ने पैसा&lt;br /&gt;
क्रिकेटको बैट&lt;br /&gt;
र पिताको चुम्बन माग्छन्‌&lt;br /&gt;
र माग्छन्‌ सुरक्षा&lt;br /&gt;
र मिठो निद्राले भरिएको रात&lt;br /&gt;
यसरी नै सघैं-सघैँ मेरो सपनामामलायाका असङ्ख्य-असङ्ख्य मानिसहरूकोआँसुको एक ठूलो सागर बन्छ&lt;br /&gt;
$ . घुम्ने मेचरमाथि अन्धो मान्छ&lt;br /&gt;
जसको प्रत्येक लहरमा&lt;br /&gt;
एक लाश माथि उठ्छ&lt;br /&gt;
एक लाश तल डुन्छ&lt;br /&gt;
तर डुब्नुभन्दा अगाडि मलाई&lt;br /&gt;
प्रत्येक लाशले घुणाले हेर्छ&lt;br /&gt;
आह, मेरो सपनामा मलाई&lt;br /&gt;
मेरो बिपनाको इतिहासले घृणा गर्छ ।&lt;br /&gt;
(२०१६-शारदा)&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्यो मान्छे / ७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वसन्त==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सारा ढोका र भ्यालहरू लातले खोलेर&lt;br /&gt;
डाँकाझैं आउँछ हावा कोठाभित्र&lt;br /&gt;
र एक छिनमै दराजहरू उघारेर,&lt;br /&gt;
कागतपत्रहरू पल्टाई हेरेर&lt;br /&gt;
केही नपाउँदा रिसले रन्धनिएर&lt;br /&gt;
अरू भयालहरूबाट हाम्फालेर भाग्दछ ।आकाशको आँखा दुखेको छ&lt;br /&gt;
सित आँखा जुधाउँदा आफ्नै आँखा पीरो हुन्छ,ज्वरपीडित सूर्य सकी नसकी हिंडिरहेछ आकाशमातुवाँलो भुवाको खास्टो ओढेर&lt;br /&gt;
भ्यालमा उभिएर एक्लै,&lt;br /&gt;
म बाहिर हेरिरहेछु&lt;br /&gt;
हेरिरहेछु र सोचिरहेछु- यो कस्तो वसन्त&lt;br /&gt;
यो चैतको दिनको कस्तो उराठलाग्दो पहर हो !यो कस्तो मुर्दा शहर हो !&lt;br /&gt;
सडकका दुई किनारमा वसन्तको स्वागतार्थहरियो सारी हतार-हतार बेरेर उभिएका भयाङहरू&lt;br /&gt;
डा / घुम्ने मैचमागि अन्धौ मान्छे&lt;br /&gt;
अबीरका थाल बोकेका आरूका रूखहरू,लावाका थाल बोकेका आलुबखडाका रूखहरूअनि स्कूलका केटाकेटीहरू झैं&lt;br /&gt;
रङ्गीन झन्डाहरू हल्लाइरहेका फूलका सानासाना बोटहरूम हेरिरहेछु&lt;br /&gt;
देखिरहेछु&lt;br /&gt;
र सोचिरहेछु&lt;br /&gt;
वसन्त यहाँ किन आउँछ विदेशी पाहुनाझैँयो कस्तो औपचारिकता&lt;br /&gt;
किन आउँदैन क त्यसरी&lt;br /&gt;
यसरी युवावस्थामा जुँघारेखी आउँछ ?&lt;br /&gt;
या हर्षमा मुस्कान&lt;br /&gt;
आफैँ, अनायास र अनजान,&lt;br /&gt;
उफ्‌ यो कस्तो वसन्त हो !&lt;br /&gt;
यो कस्तो वसन्त हो !&lt;br /&gt;
जता हेस्यो उतै देखिन्छ&lt;br /&gt;
भित्र ठोस हुन छाडेर&lt;br /&gt;
बाहिरै बाहिरै मात्र बढेर अग्ला भएकाबाँसका: ठानाहरूलाई नुहेर&lt;br /&gt;
पश्चात्ताप गरिरहेका आफ्नो खोक्रोपनमाथिआफ्नो हातको बलभन्दा&lt;br /&gt;
गर्हुङ्गो रातो फूल समाएका&lt;br /&gt;
कल्कीका बोटहरूलाई&lt;br /&gt;
दुई हात तल झारेर उमिरहेका&lt;br /&gt;
यी लत्रेका हातहरूले रातो फूल समात्ने के दर्कारके अधिकार&lt;br /&gt;
टाढा-टाढासम्म उभिएका छन्‌&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाबि अन्धो मान्छौ “ ९&lt;br /&gt;
न्यास्रो अनुहार लाएका असङ्ख्य मौन घरहरूप्रत्येक घरको मुखमा झुन्डिएको छ विदेशी ताल्चा&lt;br /&gt;
भोटे ताल्चा अथबा हिन्दुस्तानी ताल्चाकुनै घरको मौलिक ओठ छैन&lt;br /&gt;
यो कस्तो वसन्त !&lt;br /&gt;
खोइ मानिसहरूले चोला फेरेका ?&lt;br /&gt;
खोइ घरहरूले बोक्रो फेरेका&lt;br /&gt;
खोइ&lt;br /&gt;
खोइ&lt;br /&gt;
खोइ&lt;br /&gt;
म चिच्याउन चाहन्छु- खोइ&lt;br /&gt;
तर खोइ मेरो आवाज किन निस्कन्न ?के भयो मेरो आवाजलाई&lt;br /&gt;
यो के हो डल्लो गुच्चाजस्तो मेरो घाँटीमाजो मैले घाँटी खोल्दा मुखमा गई अडकन्छर मुख खोल्दा घाँटी थुन्न पुग्दछ&lt;br /&gt;
अनि यस्तो लाग्छ मानौं&lt;br /&gt;
अन ममा कुनै उम्लाइ छैन&lt;br /&gt;
कुनै उत्तेजना छैन&lt;br /&gt;
कुनै आबाज छैन&lt;br /&gt;
कुनै विस्फोट छैन&lt;br /&gt;
मभित्रको मानिस मरिसक्यो&lt;br /&gt;
अब त फगत्‌ मेरो रूपमा उभिएको छ,पड्किसकेको सोडाको एक बोतल-एउटा खाली बोतल :&lt;br /&gt;
१० . धुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
(२०१७-रूपरेखा)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==हामी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हामी जतिसुकै माथि उठौँ,&lt;br /&gt;
जतिसुकै यताउति दगुरौं,&lt;br /&gt;
जतिसुकै ठूलो स्वरमा गजौँ&lt;br /&gt;
तर, हामी फगत्‌ पानीको थोपा हौंपानीका निर्बलिया थोपा&lt;br /&gt;
जो सूर्यद्वारा माथि उचालिन्छौं&lt;br /&gt;
र बादल बन्छौं,&lt;br /&gt;
हावाको इशारामा यताउति दगुछौं&lt;br /&gt;
र आफूलाई गतिशील भन्ठान्छौं,&lt;br /&gt;
अनि एक चोटि माथि पुगेपछि&lt;br /&gt;
हामी आफ्नो धरतीलाई बिर्सन्छौं&lt;br /&gt;
र आफ्नो धरतीलाई&lt;br /&gt;
खोलालाई&lt;br /&gt;
बगरलाई उपेक्षापूर्वक&lt;br /&gt;
पालिएका कुकुर&lt;br /&gt;
भयालबाट गल्लीका कुकुरहरूलाई हेरेर भुकेझौंहामी भुक्तछौँ&lt;br /&gt;
र आफ्नो कुक्रभुकाइलाई गर्जन भन्ठान्छौं&lt;br /&gt;
घुम्नै मैचमावि अन्धो मान्छे / ११&lt;br /&gt;
अनि अन्त्यमा एक दिन बसेर चकनाचूर हुन्छौंर फेरि परिणत हुन्छौं पानीका थोपाहरूमानिर्बलिया थोपाहरूमा&lt;br /&gt;
र कुनै इनार, खाडल बा पोखरीमा&lt;br /&gt;
कुहेर बिताउँछौं बाँकी जीवन&lt;br /&gt;
टरै...टर्र टर्टराउने घिनलाग्दा भ्यागुताहरू पालेर,विष नभएका साँपहरू अँगालेर&lt;br /&gt;
हामी जतिसुकै माथि उठौं&lt;br /&gt;
जतिसुकै यताउति दगुरौं&lt;br /&gt;
जतिसुकै ठूलो स्त्ररमा ग्जौं&lt;br /&gt;
तर, हामी भित्र-भित्रै खोक्रा छौं&lt;br /&gt;
हाम्रो उठाइको कनै महत्त्व छैन,&lt;br /&gt;
हाम्रो दगुराइको कुनै लक्ष्य छैन,&lt;br /&gt;
हाम्रो गर्जनकोपानीमा फालिएको अगुल्टाको &#039;छवाइयँ&#039; भन्दा बढी वजन छैन ।0 । | छ|&lt;br /&gt;
हामी बाहिरबाट जतिसुकै उच्च देखिए तापनि&lt;br /&gt;
भित्र-भित्र निरन्तर खिइँदै र घिस्सिँदै गइरहेका छौँ&lt;br /&gt;
हाम्रो बाहिरको उँचाइ झूटा हो,&lt;br /&gt;
भ्रमहो&lt;br /&gt;
अग्लो टाकुरामा उम्रेका च्याउको उँचाइभन्दा&lt;br /&gt;
यसको बर्ता महत्त्व छैन&lt;br /&gt;
वा दुइटा अग्ला बाँस खुट्टामा बाधेर हिँड्ने&lt;br /&gt;
भारतीय चटकेको उँचाइभन्दा यसको बढी विशेषता छैनअग्लो चुच्चे टोपी लगाई नाच्ने&lt;br /&gt;
१२ / घुम्ने मेचमाचि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
सर्कसको जोकरको उँचाइभन्दा- यसको बढी विशेषता छैनहामी बाहिरको उँचाइमा रमेका छौं, लट्टिएका छौं, फुलेका छौंतर, हामीले आफ्नो आस्थाको ठ्वीपमा&lt;br /&gt;
निरन्तर खिइँदै र घिस्सिदै गइरहेको कुरालाई भुलेका छौँहीनताको सानो ठ्रीपमा पछारिएर&lt;br /&gt;
हामीले आफ्नो पूर्वस्मृति गुमाइसक्यौं&lt;br /&gt;
हामीले आफ्नो विगत उँचाइलाई बिर्सिसक्यौं&lt;br /&gt;
हामीले मानिसको सामान्य उँचाइलाई बिर्सिसक्यौंहामीले सामान्य मानिसको उंचाइलाईं बिर्सिसक्यौँत्यसैले जब कुनै सामान्य मानिस&lt;br /&gt;
कथामा वर्णित “गुलिभर&#039; झैँ&lt;br /&gt;
आई पल्टन्छ हाम्रो आस्थाको द्वीपमा&lt;br /&gt;
हामी छक्क परेर उसलाई हेछौँ&lt;br /&gt;
हामी उसलाई हेरेर छक्क पछौँ&lt;br /&gt;
हामीलाई उसको उँचाइ देखेर आश्चर्य लाग्छ&lt;br /&gt;
हामीलाई आफ्नो पुड्काइ देखेर डर लाग्छ&lt;br /&gt;
र त हामी आफ्नो हीन भावनाका&lt;br /&gt;
सियो जत्रा स-साना हतियारहरूको उसमाथि&lt;br /&gt;
प्रहार गछौं&lt;br /&gt;
उसको अङ्ग-प्रत्यङ्घमा चढ्छौं&lt;br /&gt;
उफ्रन्छौं&lt;br /&gt;
टोक्छौं&lt;br /&gt;
चिमोद्छौं&lt;br /&gt;
र अन्त्यमा थकित भएर तल ओनलन्छौं&lt;br /&gt;
शान्त हुन्छौं&lt;br /&gt;
समर्पित हुन्छौं&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे / १३&lt;br /&gt;
र कुनै ठूलो चट्टानमाथि उर्लेर समुद्रको छाललेतर ओर्लेर त्यसको पाउ पखाले झैहामी पुज्न थाल्दछौं त्यो साधारण मानवलाईमहान्‌ भनेरहामी बाहिरबाट जतिसुकै उच्च देखिए तापनिभित्र-भित्रै निरन्तर खिइँदै गइरहेका छौँहामी &#039;लिलिपुट&#039; का मानव हौं ।हामी लघुमानव हौं ।पा पा खाहामी आफूखुशी कहिल्यै मिल्न नसक्नेकसैले मिलाइदिनुपर्ने,हामी आफूखुशी कहिल्यै छुट्टिन नसक्नेकसैले छुट्टयाइदिनुपर्ने,हामी आफूखुशी कहिल्यै अगाडि बढ्न नसक्नेकसैले पछाडिबाट हिर्काउनुपर्ने, हिँडाउनुपर्नेहामी रङ्ग-रोगन छुटेका,टुटेका, फुटेकापुरानो क्यारमबोर्डका गोटी हौंएउटा मनोरञ्जक खेलका सामग्री,एउटा खेलाडीमाथि आश्रित,आफ्नो गति हराएकाएउटा &#039;स्ट्राइकर&#039; द्वारा सञ्चालितहो, हामी मानिस कम र बर्ता गोटी हौं ।&lt;br /&gt;
कि) 1 बि&lt;br /&gt;
१४ / घुम्नै मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
हामी वीर छौं&lt;br /&gt;
तर बुदू छौं&lt;br /&gt;
हामी बुदू छौं&lt;br /&gt;
रतहामी वीरछौं&lt;br /&gt;
हामी बुद्ध नभईकन वीर कहिल्यै हुन सकेनौंहामी महाभारतको कथामा वर्णित एकलव्य हौंप्रत्येक पिंढीको द्रोणाचार्यले हामीलाई उपेक्षा गर्छहामीलाई ज्ञान दान गर्नबाट इन्कार गर्छइन्कार गर्छ मान्न हाम्रो योग्यतालाई,शक्तिलाई,&lt;br /&gt;
र अस्तित्वलाई&lt;br /&gt;
तर, हामी तिनै द्रोणाचार्यको मूर्ति बनाउँछौंआफ्नो झुप्रोअगाडि,&lt;br /&gt;
त्यसलाई पुज्छौं&lt;br /&gt;
ढोग्छौँ&lt;br /&gt;
निरन्तर धनुर्विद्याको अभ्यास गछौँ&lt;br /&gt;
र द्रोणाचार्यका अन्य कुलीन&lt;br /&gt;
चेलाहरूभन्दा बढी कुशलता प्राप्त गछौँ&lt;br /&gt;
तर, हाम्रो कुृशलतादेखि आश्चर्यचकित&lt;br /&gt;
र भयभीत भई&lt;br /&gt;
प्रत्येक पिंढीमा द्रोणाचार्य हामीकहाँ आउँछ&lt;br /&gt;
र गुरु-दक्षिणा माग्छ&lt;br /&gt;
र हामी सहर्ष उसको इशारामा&lt;br /&gt;
आफ्नो बूढी औंला काटेर उसलाई भेटी दिन्छौं,आफ्नो अस्तित्त्र मेटेर उसलाई समर्पित गछौँर मक्ख पछौं आफ्नो गुरुभक्तिमाथि&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे ,&#039;&lt;br /&gt;
104&lt;br /&gt;
आफ्नो आत्मशक्तिमाथि&lt;br /&gt;
त्यसैले हामी वीर त छौँ&lt;br /&gt;
तर, बुदू छौं&lt;br /&gt;
हामी बुदू छौं&lt;br /&gt;
र त हामी वीर छौं&lt;br /&gt;
हामी बुदू नभईकन वीर कहिल्यै हुन सकेनौंहामी कसैको मूर्ति स्थापना नगरीकन&lt;br /&gt;
वीर कहिल्यै हुन सकेनौँ ।&lt;br /&gt;
नि छ (1हामी पाइतला हौंकेवल पाइतला&lt;br /&gt;
र फगत पाइतलापाइतला : जसको भरमा शरीर उभिन्छपाइतला : जसको आधारमा शरीर हिँड्छपाइतला : जसको भरोसामा शरीर दगुर्छपाइतला : तर जो भन्ठान्छ कि&lt;br /&gt;
शरीरले कृपा गरेर उसलाई पालिरहेछदया गरेर उसलाई सँग-सँगै हिँडाइरहेछमक्ख पर्छ शरीरको महानतामाथि&lt;br /&gt;
र सधैँ सम्पूर्ण शरीरको भार सहन्छ&lt;br /&gt;
सधैँ शरीरको सबभन्दा तल रहन्छकहिल्यै शिर उचालेर माथि हेर्दैनसञैं-सधैं नतमस्तक रहन्छ&lt;br /&gt;
हामी पाइतला हौं&lt;br /&gt;
हामी दौडमा प्रथम हुन्छौं&lt;br /&gt;
१६ / धुम्ने मेचमाथि अन्धी मान्छे&lt;br /&gt;
र हाम्रो तिधारले टीका थाप्छ,हामी दौडमा प्रथम हुन्छौं&lt;br /&gt;
र हाम्रो घाँटीले माला लाउँछहामी दौडमा प्रथम हुन्छौं&lt;br /&gt;
र हाम्रो छातीले तक्मा टाँस्छहाम्रो टीका थाप्ने निधार अर्कै छहाम्रो माला लाउने घाँटी अर्कै छहाम्रो तक्मा टाँस्ने छाती अर्कै छ,हामी त फगत कसैको इशारामाटेक्ने, हिँड्ने र दगुर्ने पाइतला हौंकेवल पाइतला&lt;br /&gt;
र फगत पाइतला ।&lt;br /&gt;
खि (1 छ ।&lt;br /&gt;
हामी केही पनि ह्नैनौं&lt;br /&gt;
र शायद त्यसैले केही ह्वौं कि !&lt;br /&gt;
हामी कतै पनि, केही पनि छैनौं&lt;br /&gt;
र शायद त्यसैले कतै, केही छौं कि!हामी बाँचिरहेका छैनौं&lt;br /&gt;
तर शायद त्यसैले पो बाँचेका छौं कि !त्यसैले आओ ए शूत्य पूजकहरू !हामी सब मिलेर पुजौं यो शून्यतालाईहामी सब मिलेर ढोगौं यो रिक्ततालाईहाम्रो अस्तित्वको यो देवतालाई ।&lt;br /&gt;
(२०१७-रूपरेखां)&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे / १७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मेरो देश==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहाँ&lt;br /&gt;
हिउँ परेको रातमा&lt;br /&gt;
जून, धरतीलाई भेट्नहिमकणहरूको साथमामुस्कुराउँदै ओह्वालो झर्छ,&lt;br /&gt;
र धरतीलाई सर्वाङ्ग हाँसेको पाएरझन्‌ बढी मुस्कुराएर&lt;br /&gt;
आकाशमा फर्कने गर्छ,&lt;br /&gt;
जहाँ&lt;br /&gt;
आलुबखडाका हाँगा-हाँगामाफुल्दछन्‌ कुखुराका चल्लाहरू;जहाँ&lt;br /&gt;
मृगमरीचिका पछि लाग्नेहरूको यादमारुन्छन्‌ घूपी र सल्लाहरू;&lt;br /&gt;
जहाँ&lt;br /&gt;
बाह्रै महीना मानिसका गालामाफुल्दछन्‌ आरुका फूल,&lt;br /&gt;
जहाँ&lt;br /&gt;
कृ « घुम्ने मेचमावि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
मुटुको स्पन्दनझौं उफ्री-उफ्रीखेल्छन्‌ मृगशावकका हूल;जहाँ&lt;br /&gt;
पहराबाट छहराले&lt;br /&gt;
खोलामा हाम्फाल्दछ ;&lt;br /&gt;
जहाँ- रातमा पनि हिमचुलीलेआँगनमा घाम पाल्दैछ;&lt;br /&gt;
जहाँ&lt;br /&gt;
प्रत्येक पहाडको काखमा नदीछातीमा छहरा&lt;br /&gt;
र निधारमा लेक हुन्छ;&lt;br /&gt;
जहाँ&lt;br /&gt;
स-साना नदीहरूमा पनितृफानी समुद्रको बेग हुन्छ;जहाँ&lt;br /&gt;
बटुवालाई प्रत्येक भ्याङबाटभ्याउँकीरीले गिज्याउने गर्छ;प्रत्येक अँधेरी पँधेरोमाजूनकीरीले ज्योति फिजाउने गर्छ;जहाँ&lt;br /&gt;
शीतल हावामा बुई चढेरकस्त्रीको सुगन्ध डुल्दछ;जहाँ&lt;br /&gt;
एकबाजि आएर&lt;br /&gt;
घर फर्कन वसन्त भुल्दछ;जहाँ&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छै / १९&lt;br /&gt;
बटुवालाई भन्ज्याङमा रोकेरहिमाल पड्खा हम्कन्छ;&lt;br /&gt;
जहाँ&lt;br /&gt;
एक-अर्काको मुख हेरेरनीलगिरि र धवलागिरि चम्कन्छ;जहाँ&lt;br /&gt;
प्रत्येक रातमा आकाशलेमङ्गल-दीप सजाउँछ;&lt;br /&gt;
जहाँ&lt;br /&gt;
प्रत्येक भोरमा घरतीले&lt;br /&gt;
एक गोरो छोरो जन्माउँछ;&lt;br /&gt;
जहाँ&lt;br /&gt;
हरिया-हरिया पहाडका फरियाजहाँ&lt;br /&gt;
अलिक तल सारेर&lt;br /&gt;
निर्मल, स्वच्छ र न्यानो घाममाहिमालले सधैँ ढाड सेकेको हुन्छम जति टाढा भए त्यो मेरो देशसधैं मेरो मनले&lt;br /&gt;
सपनामा पाइला टेकेको हुन्छ ।&lt;br /&gt;
२० » घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
(२०१७-सङ्गम)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मध्याहन दिन र्‌ चिसो निद्रा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अखबारको &#039;बान्टेड कालम&#039;-मा&lt;br /&gt;
म आफ्ना आउने दिनहरूको अनुहार खोजिरहेछु,प्रत्येक जुल्‌स, सभा, भाषण&lt;br /&gt;
-र नयाँ योजनाका फाइलहरूमापाइला टेक्ने आधार खोजिरहेछु-- नयाँ बजेटको ओठमा&lt;br /&gt;
खोजिरहेछु आश्वासनरेडियो-घोषणासँग मागिरहेछुसान्त्वनाका दुई शब्द&lt;br /&gt;
नयाँ पे-स्केलले नापिरहेछु&lt;br /&gt;
म आफ्नो परिबारको आयु;&lt;br /&gt;
प्रत्येक खाली सीटको सूचनालेमलाई जवान बनाउँछ&lt;br /&gt;
प्रत्येक इन्टरभ्यूको परिणाम सुनेरजीवन, काखीको पसीनाझैं गन्हाउँछ,आमाको ममतामा पनि&lt;br /&gt;
कसैले नैराश्य घोल्दछ,&lt;br /&gt;
बाबुको प्रोत्साहनमा पनि&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छै ” २१&lt;br /&gt;
चिसो सुस्केरा बोल्दछ&lt;br /&gt;
कुमारी बहिनीको स्यूँदोसँग, सिन्दूर झस्केझैँ लाग्छपत्नीले थालमा सधैँ-सचैँ&lt;br /&gt;
व्यङ्ग्य पस्केझैं लाग्छ&lt;br /&gt;
एक युग बित्यो&lt;br /&gt;
म आफ्नो बिन्तिपत्रजस्तो अनुहार बोकेरभट्किरहेछु दर-दर&lt;br /&gt;
पुगिरहेछु घर-घर&lt;br /&gt;
एक चिसो निद्राले मलाई&lt;br /&gt;
छोपिरहेछ निरन्तर,&lt;br /&gt;
मलाई थाहा छ&lt;br /&gt;
यसपल्ट म निदाएँ भने&lt;br /&gt;
फेरि कहिल्यै पनि म बिउँझन सबितनँत्यसैले&lt;br /&gt;
ए झुसिल्कीराभौँ लाम लागेकाहरू !&lt;br /&gt;
ए नाराका अक्षरहरू !&lt;br /&gt;
अरू जोर-जोरसित नारा लगार&lt;br /&gt;
उफ्‌ ! म निदाउन चाहन्नँ यो दिउँसैमलाई जगाङ, मलाई जगाङ ।&lt;br /&gt;
(२०१७-खूपरेखा)&lt;br /&gt;
२२ ८ धुस्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==गलत लाग्छ मलाई मेरो देशको इतिहास==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जबमयी भोकमा डुबेका चोकहरूमा&lt;br /&gt;
यी वैलाएका कलिजस्ता गल्लीहरूमाहेर्छु एक-दुई दिन बसेर बास&lt;br /&gt;
तब मलाई गलत लाग्छ&lt;br /&gt;
मेरो देशको इतिहास&lt;br /&gt;
यो बाटोको बीचमा माटो खनेरबसेका देवताहरू&lt;br /&gt;
यो बुझेर पनि लाटो बनेर&lt;br /&gt;
बसेका मानिसहरू&lt;br /&gt;
यो भूकम्पपीडित मन्दिर&lt;br /&gt;
र&lt;br /&gt;
ढल्केका गजूरहरू&lt;br /&gt;
यी सालिक बनेर दोबाटोमाउभिएका हजूरहरू&lt;br /&gt;
जन देख्छु म यी सबलाई&lt;br /&gt;
घुम्ने सेचमाबि अन्धो मान्छौ “ २३&lt;br /&gt;
सबैँ त्यहीं- सधैँ उस्तै र&lt;br /&gt;
सधैं एकनास&lt;br /&gt;
तब मलाई गलत लाग्छ&lt;br /&gt;
मेरो हुरीको इतिहास&lt;br /&gt;
जब म&lt;br /&gt;
असङ्ख्य सीताहरूलाई सधैँबाटो-दोबाटोमा,&lt;br /&gt;
गल्ली-गल्लीमा,&lt;br /&gt;
बजार-बजारमा,&lt;br /&gt;
देश-बिदेशमा,&lt;br /&gt;
यूक्लिप्टसका रूखझौं नङ्ग्याइएको देख्छुअनि जब देख्छु असङ्ख्य भीमसेन थापाहरूलाईनिस्पन्द, निश्चल, शिथिल चृपचाप उभिएकाआफ्नो आत्माको गीत झारेर&lt;br /&gt;
कल्कीका बोटझौं&lt;br /&gt;
दुबै हात तल झारेर&lt;br /&gt;
तब मलाई गरँ-गर झौं लाग्छ&lt;br /&gt;
आफ्नै रगतको उपहास&lt;br /&gt;
जब म&lt;br /&gt;
यी भोकमा डुबेका चोकहरूमा&lt;br /&gt;
यी वैलाएका कलिजस्ता गल्लीहरूमा&lt;br /&gt;
हेर्छु एक-दुई दिन बसेर बास&lt;br /&gt;
तब मलाई गलत लाग्छ&lt;br /&gt;
मेरो देशको इतिहास&lt;br /&gt;
सुन्छु : अमरसिंह काँगडासम्म बढेको कुरासुन्छु : तेन्जिङले सगरमाथा चढेको कुरा&lt;br /&gt;
२४  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==घुम्नै मेचमाथि अन्धो मान्छे==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुन्छु : बुद्धले धरामा शान्तिको बीउ छरेको कुरासुन्छु : अर्निकोको कलाले विश्व-मन हरेको कुरासुन्छु : सधैँ सुन्छु र केवल सुन्छु&lt;br /&gt;
तर मलाई हुँदैन विश्वास&lt;br /&gt;
जब म&lt;br /&gt;
यी भोकमा डुबेका चोकहरूमा&lt;br /&gt;
यी वैलाएका कलिजस्ता गल्लीहरूमा,&lt;br /&gt;
हेर्छु एक-दुई दिन बसेर बास&lt;br /&gt;
तब मलाई गलत लाग्छ&lt;br /&gt;
मेरो देशको इतिहास&lt;br /&gt;
यो मेरो सत्य इतिहास ।&lt;br /&gt;
(२०१७-चिराक)&lt;br /&gt;
घुम्नै मेचमाबि अन्धो मान्छे / २१&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
दिनभरि&lt;br /&gt;
सुकेको बाँसझैँ&lt;br /&gt;
आफ्नो खोक्रोपनमाथि&lt;br /&gt;
उँघेर,&lt;br /&gt;
पछुताएर ;&lt;br /&gt;
दिनभरि&lt;br /&gt;
रोगी मलेवाझौँ&lt;br /&gt;
आफ्नो छाती आफ्नै चुच्चोले टुँगेर,घाउहरू कोट्टयाएर ;&lt;br /&gt;
दिनभरि&lt;br /&gt;
सल्लाघारीझैँ एकलासमा&lt;br /&gt;
अव्यक्त वेदनाले सुँक्क-सुँम्क रोएर;दिनभरि&lt;br /&gt;
पाते च्याउझौँ&lt;br /&gt;
घरती र आकाशको विशालतादेखि टाढाएउटा सानो ठाउँमा आफ्नो खुट्टा गाडेर,एउटा सानो छाताले आफूलाई ढाकेर&lt;br /&gt;
२६ ? घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
साँझमा&lt;br /&gt;
जब नेपाल खुम्चिएर काठमाडौं&lt;br /&gt;
काठमाडौं डल्लिएर नयाँ सडक&lt;br /&gt;
र नयाँ सडक- असङ्ख्य मानिसका पाउमुनि कुल्चिएर,टुक्रिएर,&lt;br /&gt;
अखबार, चिया र पानको पसल बन्छ;किसिम-किसिमका पोशाकमा&lt;br /&gt;
ओहर-दोहर गर्छन्‌ थरीथरीका हल्लाहरू&lt;br /&gt;
फुल पारेको कुखुराझैँ कराउँदै&lt;br /&gt;
हिँड्छन्‌ अखबारहरू&lt;br /&gt;
र ठाउँ-ठाउँमा अन्धकार पेटीमा उक्लिन्छमोटरहरूको प्रकाशदेखि तर्सेर&lt;br /&gt;
अनि असङ्ख्य मौरीको भुनभुन र डसाइदेखि आत्तिएरम उठ्छु&lt;br /&gt;
न्यायको दिनमा प्रेतात्माहरू उठेझौँ&lt;br /&gt;
र नपाएर विस्मृतिको &#039;लेथे&#039; नदी&lt;br /&gt;
रक्सीको गिलाँसमा हाम्फाल्छु&lt;br /&gt;
र बिर्सन्छु आफ्नो पूर्वकथालाई&lt;br /&gt;
पूर्वजुनि र मृत्युलाई&lt;br /&gt;
यसरी नै सघैँ&lt;br /&gt;
चियाको किटलीबाट एउटा सूर्य उदाउँछ,&lt;br /&gt;
सधैं रक्सीको रित्तो गिलाँसमा एउटा सूर्य अस्ताउँछघुमिरहेकै छ म बसेको पृथ्वी- पूर्ववत्‌&lt;br /&gt;
फगत म अपरिचित छु&lt;br /&gt;
वरिपरिका परिवर्तनहरूदेखि,&lt;br /&gt;
एम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे ,”&lt;br /&gt;
दृश्यहरूदेखि,रमाइलोदेखि,प्रदर्शनीको घुम्ने मेचमाथिकरले बसेको अन्धो जस्तै ।&lt;br /&gt;
[२०१८-रूपरेखा।&lt;br /&gt;
र « घुम्वे मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==घण्टाघर==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुनै फाटेर&lt;br /&gt;
कुनै मुसाले काटेर&lt;br /&gt;
कुनै छोरा-नाति&lt;br /&gt;
सँगी-साथीहरूमा बाँडेर&lt;br /&gt;
एक-एक गरीन&lt;br /&gt;
फौजका सब पुराना जर्सीहरू सिद्धिए ।&lt;br /&gt;
तर जतनसाथ बचाई राखेको&lt;br /&gt;
फौजी जीवनका दुइटा प्रिय चिह्न&lt;br /&gt;
एउटा पुरानो डिजाइनको ठूलो, गोलो जेबघडीछातीमा झुन्डचाएर,&lt;br /&gt;
अनि एउटा पुरानो टोप शिरमा लगाएरबुढेसकालका लामा र दिक्दारै दिन बिताउनेएउटा पेन्सनवाल बूढो लाहरेझौंरानीपोखरीमा बल्छी हालेर&lt;br /&gt;
तटमा उभिएर निरन्तर&lt;br /&gt;
झोक्रिइरहेछ घण्टाघर ।&lt;br /&gt;
(२०१८-रचना)&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे २९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==घैंटोभिन्र बटवृक्ष==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साँघुरो घैंटोभित्र माटो जमाएरउमारिएको बटबृक्षभैंमैले आफ्ना दुइटा हाँगाहरू फैलाएँर म ओइलाएँआफ्नो वरिपरि निसास्सिदो पर्खाल पाएरअनि मैले मुक्त वायुमा सास फेर्न ठिङ्ग उभिएकाआफ्ना पाँच नाङ्गा औँलाहरू पट्याएँप्रकाशनको खोजीमा दगुरेकाआफ्ना हस्तरेखाहरूलाई पछाडि फर्काएँर अब म आफ्नै मुट्ठीभित्र बन्द छुआफ्नै कठोरताभित्र कैद छुतर कुनै दिनतिमीले चिन्न सके आफूभित्रको बतासलाईर प्रकाशलाई तिमीलेजान्नेछौ कि बाहिरबाट जतिसुकैकठोर भए पनि भित्र-भित्रैम कोमल छुयो बन्द मु्ठीभित्र हत्केलाझैँ !(२०१८-शारदा)&lt;br /&gt;
३० ” धुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मेरा विगतका सपनाहरू==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारी ट्कमुनि थिचिएर&lt;br /&gt;
मच्यो एउटा कलिलो ठिटो&lt;br /&gt;
हत्केला खोलेर&lt;br /&gt;
उसको आयुरेखा लामो थियो&lt;br /&gt;
लामो थियो&lt;br /&gt;
मेरा विगत असफल सपनाहरू जस्तै ।&lt;br /&gt;
(२०१८--छपरेखा)&lt;br /&gt;
घुम्ने मैनमाथि अन्धो मान्छे ” ३१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ए जून !==&lt;br /&gt;
मैरो जस्तै ए जून !&lt;br /&gt;
झूटो हो तिम्रो हाँसो पनि&lt;br /&gt;
फरक छैन तिम्रो र मेरो&lt;br /&gt;
भित्र-भित्र रोएर पत्ति बाहिरबाट हाँस्ने बानीमाफरक यति मात्र छ हामी दुइटाको कहानीमाकि तिमी रुन्छौ र तिम्रो आँस्‌ शीत बन्छ&lt;br /&gt;
म रुन्छु र मेरो आँसु गीत बन्छ ।&lt;br /&gt;
(२०१९-खूपरेखा)&lt;br /&gt;
३२ / घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शाहीदहरूको सम्झनामा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुँदैन बिहान मिर्मिरेमा तारा झरेर नगए&lt;br /&gt;
बन्दैन मुलुक दुई-चार सपूत मरेर नगए&lt;br /&gt;
ओठमा हाँसो, गालामा लाली तब आउँछ जगतको&lt;br /&gt;
देशको पीरले भेटी जब वीरले चढाउँछ रगतको&lt;br /&gt;
घाँटीमा फाँसीको माला गाँसी वबीरले हाँस्ता&lt;br /&gt;
मातृभूमिको चरण ढोगी भाग्दछ दासता&lt;br /&gt;
उम्रन्न बोट कसैले बीउ छरेर नगए&lt;br /&gt;
हामीले खाने प्रत्येक गाँसमा रगत छ शहीदको&lt;br /&gt;
हामीले फेर्ने प्रत्येक सासमा रतग छ शहीदको&lt;br /&gt;
हाम्रो मुटुको प्रत्येक चालमा छ धडकन शहीदको&lt;br /&gt;
हाम्रो खुशीको प्रत्येक पलमा छ जीवन शहीदको&lt;br /&gt;
पाउने थिएनौं खुशी तिनले छाडेर नगए&lt;br /&gt;
हामीले आफ्नो कर्तव्य बिर्से इतिहासले धिक्कार्ला&lt;br /&gt;
गोली निलेका शहीदका प्यारा ती लाशले धिक्कार्ला&lt;br /&gt;
धरतीले मुख लाजले छोप्ला, आकाशले धिक्कार्ला&lt;br /&gt;
शहीद रोलान्‌ हामीले उन्नति गरेर नगए&lt;br /&gt;
हुँदैन बिहान मिमिरिमा तारा झरेर नगए&lt;br /&gt;
बन्दैन मुलुक दुई-चार सपूत मरेर नगए ![२०१९-रचता)&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छै “ ३३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पोखरा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१. उपत्यका वरिपरिका डाँडाम्युजिकल चरेयरका खेलाडीसङ्गीतमा बाँधिएकाहिंडनलाई तयारबाजा बज्ने प्रतीक्षामा उभिरहेका&lt;br /&gt;
२. कतै लुकेरकतै फुकेरएउटा गहिरो डहरबाट एक्कासि निस्केरबगिरहेछ सेती खोलाटेप-रिकर्डको फित्ताझैंएउटा मीठो धून सुसेलेर&lt;br /&gt;
३. माछापुच्छेएक बिहान हेर्छ अनुहार फेवामार मिलाउँछ शिरमासेतो-कालो टोपी सक्कले ढाकाको&lt;br /&gt;
४, हनिमूत मनाउन आएको गोरासाहेनएक बाजि हेर्छ काउँ डाँडालाईर हेर्छ विस्फारित नयनले&lt;br /&gt;
३४ / घुम्ने मैतमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
मीमसाहेबका उन्नत वक्षस्थललाईअनि हल्लिन्छ छाया लालपातीको&#039;मीम सा&#039;ब&#039; का मर्करी गलामा&lt;br /&gt;
. हवाईजहाज आइरहेका छन्‌हवाईजहाज गइरहेका छन्‌हवाईजहाज आइरहेछन्‌हनिमूतज मनाउने जोडाहरू बोकेर,हबाईजहाज गइरहेछन्‌&#039;ब्या&#039; को मोलिपल्टैकच्छमा जान डाकिएका लाहरेहरू बोकेर,हबाईजहाज आइरहेछन्‌माच्छापुच्छे हेर्न आएका टुरिष्टहरू बोकेर,हवाईजहाज गइरहेछन्‌डोको, मदुस र हलो बोकेर,चितौनमा जग्गा खौज्न जान लागेकामाछापुच्छेका सन्तानहरू बोकेर,जहाज आइरहेछन्‌जहाज गइरहेछन्‌एअरपोर्टका चौतारोमाथिएकनासगाइरहेछ एउटा अन्धा“चरीको आउँदैन दूधदुःखीको हुँदैन घरबार ।&#039;&lt;br /&gt;
(२०२२)&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छे “ ३१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==हो-चि-मिन्हलाई चिठी==&lt;br /&gt;
आशीर्वादजस्तो सिरानीमा उभिएको&lt;br /&gt;
माछापुच्छ्ने हिमालको छायामा उभिएर&lt;br /&gt;
म तिमीलाई सलामी दिन्छु&lt;br /&gt;
तिमीलाई पनि एउटा नयाँ हिमाल मानेर ।अहिले तिमीलाई यो चिठी लेख्न बस्दा&lt;br /&gt;
मेरो कोठाको मौनता&lt;br /&gt;
परिणत भएको छ कुनै बौद्ध विहारको शान्तिमाजहाँ बालेको धूपबाट निस्केका धूवाँझैबिस्तारी-बिस्तारी उठेर&lt;br /&gt;
मेरो अगाडि उभिइरहेछ&lt;br /&gt;
तिम्रो बूढो र पातलो शरीर&lt;br /&gt;
एउटा अस्पष्ट तर पवित्र अनुहार बोकेर ।&lt;br /&gt;
र मलाई अनायास याद आइरहेछ आफ्नो गाउँकोजहाँ एउटा खोला छ- &#039;लेते खोला&#039;&lt;br /&gt;
तिमीजस्तै शान्त र दुब्लो&lt;br /&gt;
तर जब त्यौ सानो खोलामा बाढी आउँछबरिपरिका ठूल्ठूला चट्टानहरूको पनि पाइला डग्मगाउँछर बाढी थामिएपछि&lt;br /&gt;
३६ ” घुम्ने सेचमायि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
त्यसलाई छेक्न खोजेका घमण्डी पहराहरूलेआफूलाई भत्केको, भास्सिएको र चोइटिएको पाउँछन्‌मेरो &#039;लेते खोला&#039; !&lt;br /&gt;
म ढुक्क छु&lt;br /&gt;
तिम्रो बाढीले पनि मिल्क्याउनेछ&lt;br /&gt;
ती डालरका कात्रो बोकेर&lt;br /&gt;
तिम्रो देशमाथि आइलागेका बर्बरहरूलाई ।भूगोलको परिधिले मलाई बाँध्चे तापनिराष्ट्रहरूको बीचमा सीमारेखाहरूले&lt;br /&gt;
मलाई तिमीसँग बेग्ल्याए तापनि&lt;br /&gt;
यी सबभन्दा माथि जहाँ चेतन छ&lt;br /&gt;
यी सबभन्दा सच्चा जहाँ मुटुको ढुकढुकी छत्यहाँ म तिमीसँग छु&lt;br /&gt;
र युद्धमा परेको छु&lt;br /&gt;
तिम्रो प्रत्येक घरको भत्काइमा म बेघर भएको छुतिम्रो प्रत्येक पुलको टुटाइमा म टुटेको छु&lt;br /&gt;
तिम्रो प्रत्येक गोल-गोल मङ्गोल अनुहार भएकीआइमाईको बेइज्जतीमा&lt;br /&gt;
मैले आफ्नी पत्ती र दिदी-बहिनीहरूलाईबाटोमा निर्वस्त्र देखेको छु&lt;br /&gt;
तिम्रो प्रत्येक बौद्ध-बिहारको विध्वंसमा&lt;br /&gt;
मैले आफ्नो स्वयम्भूको ज्ञानचक्षुमा&lt;br /&gt;
आँसु उर्लिएको देखेको छु&lt;br /&gt;
तिम्रो हनोईमाथिको बमवर्षाको छिर्का&lt;br /&gt;
मैले आफ्नो धरहरामाथि परेको अनुभव गरेको छुर बमवर्षाका रातहरू&lt;br /&gt;
घुम्ने सेचमागि अन्धो मान्छौ / २७&lt;br /&gt;
मैले पनि जागरणका ट्रेञ्चहरूमा बिताएको छु&lt;br /&gt;
को सक्छ निदाउन खरबारीमा&lt;br /&gt;
वरिपरि मुढाहरू दन्किरहेको बेलामा !&lt;br /&gt;
यी सबभन्दा बर्ता&lt;br /&gt;
यी सबभन्दा माथि&lt;br /&gt;
मैले तिम्रो प्रत्येक मृत सिपाहीबाट&lt;br /&gt;
बाँच्ने दर्शन सिकेको छु&lt;br /&gt;
जीवनको अर्थ बुझेको छु&lt;br /&gt;
र तिम्रो सानो देशको ठूलो आत्माबाट&lt;br /&gt;
मैले आफ्नो सानो आत्माभित्र&lt;br /&gt;
एउटा ठूलो ज्योति सल्केको पाएको छु&lt;br /&gt;
हनोईमाथिको बम&lt;br /&gt;
शहरमाथि होइन, मान्छेमाथि बम हो,&lt;br /&gt;
र मैले तथा मजस्तै&lt;br /&gt;
सारा मानिसहरूले ती बमहरूलाईआफूमाथि पड्केको भन्ठानेका छौं&lt;br /&gt;
मेरो कामरेड !&lt;br /&gt;
मेरो हिमाल !&lt;br /&gt;
मेरो &#039;लेते खोला&#039; !&lt;br /&gt;
विश्वास गर&lt;br /&gt;
मैले तिम्रो जीतको विश्वास गरेको छु&lt;br /&gt;
मानिस मर्छन्‌&lt;br /&gt;
जसरी डढेलोमा रूखहरू डढ्छन्‌&lt;br /&gt;
तर मानवता कहिल्यै मर्दैन&lt;br /&gt;
त्यो फेरि पलाउँछ&lt;br /&gt;
डढेलोपछि उम्रिने असङ्ख्य च्याउहरूजस्तै&#039; ।&lt;br /&gt;
झ« ” घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
आशीर्वादजस्तो सिरानीमा उभिएकोमाछापुच्छेको छायामा उभिएरप्रतिज्ञाजस्तो वरिपरि दृढ उभिएका पहाडहरूलाईहातेमालो गरेर&lt;br /&gt;
म किरिया हाल्नै सामर्थ्यमा छुजीत तिम्रो हुनेछ&lt;br /&gt;
जीत हाम्रो हुनेछ&lt;br /&gt;
अन्तरिक्षमा मर्नै कुक्रको शोकमागिर्जाघरमा रुने ढोंगी मानवताधरतीमा गरेको हत्याको पन्नुतोमाआत्महत्या गर्न बाध्य हुनेछ ।&lt;br /&gt;
(२०२३)&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छे ” ३९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==यो हल्लै हल्लाको देश हो==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कानमा इयरफोन लगाउनुपर्ने बहिराहरूजहाँ सङ्गीत प्रतियोगिताका जज हुन्छन्‌&lt;br /&gt;
र जहाँ आत्मामा पत्थर परेकाहरूकाव्यका निर्णायक मानिन्छन्‌,&lt;br /&gt;
काठका खुट्टाहरू जहाँ रेसमा विजेता हुन्छन्‌र जहाँ प्लाष्टर गरिएका हातहरूमासुरक्षाको सङ्गीन थमाइन्छ,&lt;br /&gt;
जहाँ बाटो र, अट्वालिकाहरूकाँ ढोकाअगाडिडोकोका डोको,&lt;br /&gt;
खर्पनका खर्पन,&lt;br /&gt;
ट्रकका ट्रक आत्माका मण्डी सजाइन्छ,स्टाक एक्सचेन्जका शेयरजस्तै&lt;br /&gt;
आत्मा क्रय-विक्रय गर्न सक्नेहरू&lt;br /&gt;
जहाँ नेता हुन्छन्‌&lt;br /&gt;
र जहाँ निधारभरि कर्कटपाताजस्तै&lt;br /&gt;
चाउरी परिसकेकाहरू&lt;br /&gt;
तन्नेरीहरूका अगुवा हुन्छ&lt;br /&gt;
जहाँ जतिसुकै व्यमिचारीको पनि&lt;br /&gt;
४० ” घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
इज्जतको &#039;वाश एन वियर क्रीज&#039; कहिल्यै बिग्रिन्न,जहाँ जतिसुकै पाप गरेको वेश्याको पनिअनुहारको टेरेलिनको छाला कहिल्यै खुम्चिन्न,जहाँ कृषि-मेलाहरूमा&lt;br /&gt;
दोब्बर उब्जनी हुने बीउहरूको प्रदर्शनी गरिन्छ&lt;br /&gt;
र जहाँ खडेरी र अनिकालका सम्चारले भरिन्छ,जहाँ बाग्मती र विष्णुमतीका साटोमा&lt;br /&gt;
अन बीयर र ह्विस्की बग्दछन्‌,&lt;br /&gt;
र जहाँ अब पशुपतिनाथ र स्वयम्भूनाथका मन्दिरको उपयोगतिनका प्रसाद खानमा कम, र&lt;br /&gt;
तिनका पछाडिका वनहरूमा&lt;br /&gt;
आडम इभको &#039;बर्जित फल&#039; खानमा बर्ता गरिन्छ,जहाँ चिनीको कारखानाले&lt;br /&gt;
चित्ती होइन, रक्सी मात्र बनाउँछ&lt;br /&gt;
र जहाँका स्वतन्त्र आमाहरूले&lt;br /&gt;
छोरा होइन लाहुरे मात्र जन्माउँछन्‌&lt;br /&gt;
जहाँ रिन तिर्नको लागि महाकविले&lt;br /&gt;
असमयमै मर्नुपर्दछ&lt;br /&gt;
जहाँ स्वदेशको पीरले बहुलाएको कविले&lt;br /&gt;
बिदेशी अस्पतालको शरण पर्नुपर्दछ,&lt;br /&gt;
र जहाँ सरस्वतीकी एक्ली छोरीले&lt;br /&gt;
बिनाउपचार बैँसमै कुँजएर जीवन बिताउनुपर्दछ,जहाँ गाइडले टुरिष्टलाई&lt;br /&gt;
नेपालको विदेशलाई देन सम्झाउँछ&lt;br /&gt;
र बिदाको बेलामा उससित उसको&lt;br /&gt;
बिदेशी क्यामराको देन माग्दछ,&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे / डा&lt;br /&gt;
जहाँ तन्नेरीहरू&lt;br /&gt;
किल्ला काँगडा र नालापानीको गीत गाउँदै&lt;br /&gt;
अब कवाज खेल्छन्‌&lt;br /&gt;
टाई र कोटको कलरमा खुकुरी भिरेर&lt;br /&gt;
यो देशमा मलाई भन्न कर लाग्छ&lt;br /&gt;
आफ्नो मुटु चिरेर&lt;br /&gt;
कि ए मेरा देशवासीहरू हो&lt;br /&gt;
ए मेरा देशका राष्ट्र-कविहरू हो&lt;br /&gt;
ए मेरा देशका सम्माननीय नेताहरू हो&lt;br /&gt;
भन्न मन लाग्छ भने भन मलाई&lt;br /&gt;
स्वदेशनिन्दक वा घुणाचिन्तक&lt;br /&gt;
तर यो देश तिम्रो जत्तिकै मेरो पनि देश होअंशैबण्डा गर्ने हो भने पनि यो देशका एक करोडटुक्राहरूमध्ये एउटा टुक्रामाथि&lt;br /&gt;
मेरो पनि छाप्रो हुनेछ&lt;br /&gt;
र यो देशका असङ्ख्य बगरहरूमध्ये एउटा बगरमाथिमेरो पनि चिता हुनेछ&lt;br /&gt;
यही भावनाले मलाई यो भन्न बाध्य गराउँछ रआँट दिलाउँछ यो भन्न&lt;br /&gt;
कि &#039;यो हल्लै हल्लाको देश हो&#039;&lt;br /&gt;
खनेर हेर्नै हो भने यहाँका प्रत्येक घरहरूका जगमात्यहाँ फगत हल्लै हल्ला थुप्रिएको पाइनेछ ।त्यसैले यो हल्लै हल्लाको देश हो&lt;br /&gt;
यो हल्लै हल्लामाथि उभएको देश हो&lt;br /&gt;
यो हल्लै हल्लामाथि उठेको देश हो&lt;br /&gt;
यो हल्लै हल्लाको देश हो ।(२०२४-कूपरेखा)&lt;br /&gt;
४२ ४ घुम्नै मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ज्वरमुत्कत सूर्य,जलनमुत्क्त आकाश रतृप्त ताल==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले पाएँ&lt;br /&gt;
नीलो निम्ता-पत्र&lt;br /&gt;
तिम्रा छालहरूको&lt;br /&gt;
र बादलु कछारलाई क्षितिजमाझुन्डयाएर-. मैले&lt;br /&gt;
हाम्फालें तिम्रो जलमाथिडुबुल्की मारे तिम्रोगहिव्याइभित्र आकाशजस्तैसिङ्गै आकाशजस्तै नाङ्गैसमाविष्ट गप्यौ तिमीले पनिसम्पूर्ण मलाई आफूमाआफूभित्र&lt;br /&gt;
कुहिरोहरू पन्छाएरछालजस्तै उर्लिएर&lt;br /&gt;
तालजस्तै उदाङ्गिएर&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छे उ&lt;br /&gt;
नाङ्गिएर&lt;br /&gt;
कति सन्तुष्ट हाँसो छर्दैछ अब&lt;br /&gt;
मेरो ज्वरमुक्त सूर्य तिम्रो अँगालोमाअब मलाई मेरो चट्याङ चुटुङहरूले पोल्दैनन्‌बिलाइसके तिम्रा अज्ञात कुराहर्र्भत्रतिम्रा चञ्चल माछ्ाहरू&lt;br /&gt;
अब तिम्रो शीत जललाई उनीहरूलेछिचोल्दैनन्‌ ।&lt;br /&gt;
उठेर फर्किनुपरे अनि मैले आफ्नोपूर्वस्थानमा अब म अशान्त हुन्नअसन्तुष्ट हुन्नँ,&lt;br /&gt;
कि म स्पष्ट देखिरहेछु&lt;br /&gt;
तिमीभित्र मैले कुँदेको&lt;br /&gt;
मेरो आफ्नो प्रतिविम्बचलमलाइरहेको&lt;br /&gt;
मेरो आफ्नो छाया&lt;br /&gt;
सलबलाइरहेको ।&lt;br /&gt;
४४ / घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
(२०२४--रूपरेखा)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मर्दैछ हामीमा हामी बाँचेको युग==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाँधका मुहान&lt;br /&gt;
अनि खौला नाला र तालका कुरहरूमाथापेजस्तै माछा समाउने पोडेहरूले डोका र जालहरूयो युग जसमा बानुहरूले&lt;br /&gt;
भोगपछिको जिम्मैदारीसँग बाँच्न&lt;br /&gt;
थात्पछन्‌&lt;br /&gt;
गर्भाशयतिर लम्केका आफ्नै सम्भावित सन्तानशुक्रकीटहरूलाई नष्ट गर्ने पासोहरू;&lt;br /&gt;
र आमाहरू&lt;br /&gt;
आफ्नो आनन्दलाई चिन्तामुक्त गर्छन्‌गर्भाशयको ढोकामा&lt;br /&gt;
आफ्नै सम्भावित छोरा-छोरीको प्रवेशलाईनिषेध गर्ने पालेहरू उभ्याएर&lt;br /&gt;
यौ युग जसमा&lt;br /&gt;
भाग्यवश&lt;br /&gt;
संयोगवश&lt;br /&gt;
पाए भने कसैले प्रवेश गर्भाशयभित्र&lt;br /&gt;
तीमध्ये पनि कैयन्‌ नष्ट गरिन्छन्‌&lt;br /&gt;
घुम्नै मेचमायि अन्धी मान्छे / ४४&lt;br /&gt;
आफैँ आमा-बाबुद्वारा खटाइएका&lt;br /&gt;
जिउँदो वरा मुर्दा समाउने आदेश पाएकायमदूतहरूद्वारा&lt;br /&gt;
यस युगमा&lt;br /&gt;
यस्तो युगमा जन्मेका छौँ हामीजन्मिनुअगावै मृत्युको त्रास बोकेर&lt;br /&gt;
हत्याको सुइँको पाएर&lt;br /&gt;
आएका छौं हामी यस पृथ्वीमा&lt;br /&gt;
आफ्नै निर्माताहरूको इच्छाविरुद्धउनीहरूको षडयन्त्रलाई तोडेर&lt;br /&gt;
पहिलो पटक&lt;br /&gt;
नीलो चहकिलो आकाशमुनि पहिलो पटकहरियो भरियो पृथ्वीमाथि पहिलो पटकपहिलो&lt;br /&gt;
पहिलो&lt;br /&gt;
र पहिलो पटक&lt;br /&gt;
खोल्यौं पनि त हामीले आँखा यस धरतीमापोलिनलाई ठीक भइसकेका&lt;br /&gt;
नाजी ग्याँसच्याम्बरका कैदीहरूले मूर्छा परेरअन्तिम घडीमा मुक्ति पाएर आँखा खोलेजस्तैआफूलाई मृत&lt;br /&gt;
र आँखाअगाडिको संसारलाई&lt;br /&gt;
मृत्युपछिको अर्कै लोक भन्ठानेर&lt;br /&gt;
त्यसैले हामी बाँचिरहेका छौं&lt;br /&gt;
बाँच्नुप्रति चिसो र शङ्कालु भएर&lt;br /&gt;
र हामी हर्किरहेका छौँ त्यस युगमा&lt;br /&gt;
४६ / घुम्नै मैचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
जुन युगमाहामीभित्र&lt;br /&gt;
हामी सँग-सँगै&lt;br /&gt;
हुर्किरहेको छ एउटा तीब्र अनास्थास्वयं यस युगप्रति नै&lt;br /&gt;
यस युगको अस्तित्वप्रति नै ।&lt;br /&gt;
[२०२४-खूपरेखा)&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाबि अन्धो मान्छे / ४७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==साँझको नयाँ सडक जिन्दगीको जात्रा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाह्य सुकिली नयाँ सडक, छाँट्टिएर&lt;br /&gt;
पेटीहरू ओहोर-दोहोर गर्छिन्‌ साँझमा&lt;br /&gt;
र स्लिमलेस्‌ ब्लाउजको पाखुरामुनि खिचापोखरीनिसासिन्छ गल्लीका&lt;br /&gt;
काखीका रौंजस्ता भ्वास्स उम्रेका धमिला, दुर्गन्धघरहरूका माझमा&lt;br /&gt;
पसलहरूका शो-विण्डोभित्र&lt;br /&gt;
सू-जि वाँग हाँसो हाँस्तछन्‌ हङकङ सुन्दरीमैडम टेरिउन, मिस्‌ नाइलन र सुश्री टेरेलिनहरूर सम्मोहित कुमारी लूपकुमारीहरू&lt;br /&gt;
पाखुराभरि पेन्सिलिन इन्जेक्सनको&lt;br /&gt;
यात्राका पदचिहनहरू बोकेर&lt;br /&gt;
अँध्यारा गल्लीहरूतिर लम्किन्छन्‌&lt;br /&gt;
ब्रेसरीको खर्पनमा बासी यौवनका फलहरू उचालेर&#039;ट्रीप&#039; मा मग्न हिप्पीकुमारको अँगालोमाअर्धनग्न पीताम्बर साडी-ब्लाउजमा&lt;br /&gt;
डे 7 घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
फ्लावर बेबी हिप्पी मैयाँ नयाँ सडकमा हिंड्छे&lt;br /&gt;
नयाँ सडकका तमाम आँखाहरूलाई&lt;br /&gt;
आफ्नो नाइटोमा खोपाएर&lt;br /&gt;
र बरिपरि उभिएका पीपलको बोटमा धर्मपुत्रहरूभित्र-भित्रै करुवा भइदिन्छन्‌&lt;br /&gt;
चौतारीवरिपरि उमिन्छन्‌&lt;br /&gt;
प. स. क. को डेनेजले मिल्काएका फोहरहरू&lt;br /&gt;
र कमलपित्ते आँखाले आउँदो भोलिलाई हेर्दछन्‌अखबारका खापाहरू उघारेर ।&lt;br /&gt;
एउटी माग्ने आइमाईले न्यूज सेन्टरअगाडि उभिएकोसूटेड टाटकुमार नेपाली रित्तो खल्तीको एक्सरे गरिदिन्छेपाँच पैसा मागेर&lt;br /&gt;
र टाटकुमार नेपाली&lt;br /&gt;
काठमाडौंको आकाशमा गालीको बेलून उडाएरभाग्योदय चिट्वातिर हेरेर आफूलाई थुकिदिन्छ ।&lt;br /&gt;
म&lt;br /&gt;
नयाँ सडकमाथि&lt;br /&gt;
बोकेर&lt;br /&gt;
उभनुको कुनै अर्थ पाउँदिनँ&lt;br /&gt;
र घरबार शब्दलाई एउटा अर्थ दिन&lt;br /&gt;
(दिउँसो घर र राति बार आवाद गरेर)&lt;br /&gt;
लेटेष्ट कविताको पारिश्रमिकलाई जाँड बनाएर घोक्छुर नयाँ सडकलाई नाप्छु&lt;br /&gt;
नयाँ कविताको प्लट सोच्तै&lt;br /&gt;
र अनायास टुँडिखेलतिर लम्किन्छु&lt;br /&gt;
वरिपरिका भीडहरूतिर भैरहवा सुगर मिलको हाँसो फालेर&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे / ४९&lt;br /&gt;
शहीदद्वारतिर पुगेर म अडिन पुग्छुर अन्तिम खिल्ली चारमिनारको सल्काएरम रित्तो बट्टाभित्र काठमाडौंकोरिक्तता हालेर मिल्काइदिन्छुर एक टक शहीदद्वारलाई हेरेर शहीदद्वारतिरएउटा मौन प्रश्न फाल्छुशहीदद्वार मलाई हेरेर फिस्स हाँस्छर कुहिरोभित्र हराउँछ ।&lt;br /&gt;
(२०२५-मधुपर्क)&lt;br /&gt;
४० घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==नयाँ वर्ष==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नयाँ सरुवा भई आएको हुलाकेझैँझोलामा सुर्जेको एउटा पुलिन्दा बोकेरछानामाथि वैशाख हिंडिरहेछ&lt;br /&gt;
भारी अल्छी पाइला सारेरमित्ता-घडीको लङ्गूर हाल्लिरहेछ उसकोपदचापले&lt;br /&gt;
ट्वाक्‌..... ट्वाक......द्वाक......ट्वाकनिस्तेज भई आकाश पल्टेको छ&lt;br /&gt;
न्यास्रो अनुहार पारेर&lt;br /&gt;
बेमौसमको बर्षात&lt;br /&gt;
बेला-कुबेलाको बादलको गडचाड-गुडुङआकाशलाई पखालो लागेको छबिष्णुमतीको फोहर हैजे पानी पिएरट्वाँ,&lt;br /&gt;
सहनाईको बेसुरा ध्वनिबाट निस्किरहेका छन्‌हैजाका असङ्ख्य अदृश्य कीटाणुहरूमध्याह्न दिन&lt;br /&gt;
चर्को घाम&lt;br /&gt;
धुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे / ५१&lt;br /&gt;
सारा&#039; रूखहरूले आफ्नो आङ कन्याइरहेका छन्‌फेरि एकचोटि&lt;br /&gt;
नयाँ वर्ष आएको छ&lt;br /&gt;
फेरि एकचोटि&lt;br /&gt;
भित्ताको नयाँ क्यालेण्डरमा&lt;br /&gt;
आफ्नो जीवनको मिसा झुन्डयाउनु छ&lt;br /&gt;
फेरि एकचोटि&lt;br /&gt;
सँगी साथीहरूको सूची बनाउनु छ&lt;br /&gt;
फेरि एकचोटि&lt;br /&gt;
भयानक बमहरू बोकेर, उडिरहेका हवाईजहाजर रकेटहरूमुनि बसेर&lt;br /&gt;
लेख्नु छ प्रियजनहरूको नाममा&lt;br /&gt;
सफलता, शान्ति र दीर्घायुको शुभकामना-पत्र ।&lt;br /&gt;
१२ ४ घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छे,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पहिरो जाने पहाडमुन्तिर==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनिश्चित भविष्यको आशङ्कामय पीडाखप्न नसकी&lt;br /&gt;
&#039;ेलोडोमाइड&#039; खाएकी गर्भिणी रातजन्माउँछिन्‌ लँगडा, लुला, क्‌च्चिएका बिहानहरूजब बिउँझन्छु म&lt;br /&gt;
छिप्पिन आँटेको जाँडको घैँटोजस्तोउत्तेजित टाउको उचालेर&lt;br /&gt;
अनि हेर्दैछु- ताजा अखबार :&lt;br /&gt;
चील र गिद्ध उडिरहेको आकाश&lt;br /&gt;
सिनुको गन्ध बोकेका&lt;br /&gt;
म गाड्छु दाँत टोष्टमाथि&lt;br /&gt;
र मिल्काउँछु एक टुक्रा दैलोको घामतिरअनि घाम फैलिन्छ चाउरेको विश्वमाथिबासी टोष्टमाथि पग्लिएको नौनीझैंयसरी सुरु हुन्छ एउटा नयाँ दिन&lt;br /&gt;
यसरी सुरु हुन्छ अर्को नयाँ दिन&lt;br /&gt;
अर्को...... र नयाँ दिन&lt;br /&gt;
हतार-हतार आउने र जानैघुम्ने मेचसागि अन्धो मान्छे ” ५३&lt;br /&gt;
जुवाडीको खल्तीका नौटजस्ता चाउरिएका&lt;br /&gt;
असङ्ख्य नयाँ दिनहरू&lt;br /&gt;
घुमिरहेछ पृथ्बी&lt;br /&gt;
आफ्नो धुरीमा, निरन्तर&lt;br /&gt;
तर &#039;रूलेट&#039;- को चक्काझैँ&lt;br /&gt;
जहाँ प्रत्येक व्यक्ति टन्त छ उत्तेजनाले&lt;br /&gt;
बेग्लाबेग्लै बाजीमा थापिएका सिक्काझौं&lt;br /&gt;
आकाश त्यही छ पुरानो&lt;br /&gt;
तर अब त्यहाँ&lt;br /&gt;
चुच्चोमा खर च्यापेर गुँड बनाउन लम्केकागौंधलीको साटोमा&lt;br /&gt;
उडदछन्‌ पचासौं मेगाटन बोकेका रकेटहरू&lt;br /&gt;
क्षितिज तिनै छन्‌ घाम उदाउने र अस्ताउने&lt;br /&gt;
तर त्यहाँ अब थकित सूर्य पल्टन्छ&lt;br /&gt;
अन्तरमहाद्वीपीय क्षेप्यास्त्रको, सिरानी हालेर&lt;br /&gt;
यो के भयो एक्कासि मेरो विश्वलाई !&lt;br /&gt;
यो के भयो विश्वको &#039;म&#039;-लाई ?&lt;br /&gt;
किन सक्तिनँ म &#039;स्कान अन र राक्स&#039;- मा&lt;br /&gt;
जलवबिहार गरेर आफ्नो जलनलाई मेट्न !&lt;br /&gt;
किन सक्तिनँ म आफ्ना कोमल भावनाहरूलाई कुल्चन&lt;br /&gt;
&#039;लोलिटा&#039;- लाई जस्तै;&lt;br /&gt;
किन सक्तिनँ म डुब्न,&lt;br /&gt;
&#039;बिधोवन&#039; र &#039;मोजार्ट&#039;- को सिम्फनीमा&lt;br /&gt;
किन ट्म्पेट र क्यारोनेटको मुख&lt;br /&gt;
हेदहिदै परिवर्तित हुन्छन्‌&lt;br /&gt;
तोप र बन्दूकहरूको नालमा !&lt;br /&gt;
५४ ८ घुम्ने मेच्रमायि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
आहा ! मलाई थाहा छ शान्ति कहाँ छ&lt;br /&gt;
शान्ति हेर उ: त्यहाँ भेडासिङको चौबाटोमा छ&lt;br /&gt;
तर किन म शान्त हुन सक्तिनँ&lt;br /&gt;
त्यहाँ सांढे जुफाइको माझमा&lt;br /&gt;
घाँटीको दाह्रीमा उस्तरा चलाउन दिइरहेको मान्छेजस्तै !मेरो निम्ति त शान्ति&lt;br /&gt;
जँडयाहा जन्डो मान्छेको स्वास्तीको गर्भमा छ&lt;br /&gt;
आहा ! कति क्षीण छ मेरो आशा,&lt;br /&gt;
हाम्रो आशा&lt;br /&gt;
एउटा कलिलो हँसिलो संसारको न्वारान गर्ने ।&lt;br /&gt;
(पौखरा)&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचसाथि अन्धो मान्छे “ ५१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==तीतरा, बट्टाई र भक्कको राँगोका सन्तानहरूप्रति==&lt;br /&gt;
जर्मनका धाबैमा होस्‌&lt;br /&gt;
वा बर्माको घेरामा&lt;br /&gt;
मलायाका रबडका वनमा होस्‌&lt;br /&gt;
या नेफा र लद्दाखका पराइ लडाइँमाती जो मरे&lt;br /&gt;
बिना कुनै स्वार्थ&lt;br /&gt;
विना कुनै अर्थ&lt;br /&gt;
व्यर्थ&lt;br /&gt;
तीतरा, बट्टाई र भक्कूको राँगोजस्तैअरूको हा...हा...हामा लागेर&lt;br /&gt;
अरूको थपडी र नाराले जागेरअरूले ख्वाएको जाँड र कटले मात्तिएर“आयो गोर्खाली&#039; भन्दै&lt;br /&gt;
(गोरु खालि बन्दै !)&lt;br /&gt;
युद्धमा हाम्फालेर&lt;br /&gt;
ती मरेका लोग्नेहरूको पेन्सनले&lt;br /&gt;
५६ / धुम्नै मेचमाबि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
आफ्नो छोराको पास्नी गर्ने ए अभागिनी स्वास्नीहरू !ती मरेका छोराहरूको आर्जनले आफ्नै चौरासी पूजा गर्नेए बूढा-बूढीहरू !&lt;br /&gt;
ती बितेका साथीहरूको जर्सी लगाएर&lt;br /&gt;
रोदीमा सोल्टी फकाउने ए तन्नेरी मान्छेहरू हो !&lt;br /&gt;
ती मरेका प्रेमीहरूको कोसेली चुरा लाएर&lt;br /&gt;
डोलीमा बस्नै ए ब्याहुली जेठी-कान्छीहरू हो !&lt;br /&gt;
खुपै सुहाएको छ तिम्रो छातीमा&lt;br /&gt;
सी तक्मा &#039;परम बीरचक्र&#039; र भिक्टोरिया क्रस&#039; कोतर के आउँदैन यसबाट कहिलेकाहीँ&lt;br /&gt;
ओस्सिएको गन्ध तिम्रो आफन्तहरूका लाशको !&lt;br /&gt;
(पोखरा)&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छे / ५७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भैरहवा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टाढा-टाढासम्मजता हेन्यो उतै मैलो, फुस्रो धरतीउजाड, उदाङ्ग&lt;br /&gt;
आदिदेखि अन्तसम्म एकनास&lt;br /&gt;
न कतै गर्वले उठेको छ&lt;br /&gt;
न कतै बिनम्रताले झुकेको छ&lt;br /&gt;
न कतै उन्मुक्त मनले खुलेको छ&lt;br /&gt;
न कतै जलाउँदै लुकेको छ&lt;br /&gt;
नखदेखि शिखसम्म&lt;br /&gt;
वक्ष, नितम्ब केही पनि विकसित नभएकोबाँझी तरुनीको आडजस्तो सपाट,मुश्किलले तीस-चालीस&lt;br /&gt;
घरजस्ता घर&lt;br /&gt;
बाँकी कुभिन्डोका गाँड निस्केका&lt;br /&gt;
कृप्रा झुप्राहरू, डन्डीफोरझैं&lt;br /&gt;
यताउता जथाभाबी बेढङ्गा उठेका,मानिस :&lt;br /&gt;
कोही पूर्वका&lt;br /&gt;
श्ष्द् « घुम्ने मेचमायि अन्धो माल्छे&lt;br /&gt;
कोही पश्चिमका&lt;br /&gt;
कोही पहाड काँठका&lt;br /&gt;
कोही मधेश फाँटका&lt;br /&gt;
कोही भारतका, कोही भौोटका&lt;br /&gt;
तर सब यहाँ भेला भएका छन्‌खोजीमा हरिया नोटका&lt;br /&gt;
यहाँ मानिस कानेखुशी गर्छन्‌&lt;br /&gt;
नोट गतेको कागजे आवाजमा&lt;br /&gt;
पुरानो मोहर बजाएको आवाजमायहाँ मानिस हाँस्तछन्‌&lt;br /&gt;
यहाँ घाम उदाउँछ&lt;br /&gt;
पसलहरूका ढिकभित्रबाट&lt;br /&gt;
र बहीखातामा जिल्लाझौँ राता हुन्छन्‌यहाँ घाम डुब्छ कन्तुरमा&lt;br /&gt;
र बहीखाताका पाताहरू पहेँलिन्छन्‌सन्ध्याकालीन क्षितिजझौँ&lt;br /&gt;
टाढा-टाढा देखिन्छन्‌&lt;br /&gt;
बुटवलका डाँडाहरू केर-मेर.. केर...मेरबहीखाता सिरानीमा &#039;शुभलाम&#039; लेखिएयो ठाउँ&lt;br /&gt;
एउटा यस्तो घरमा बसेजस्तो&lt;br /&gt;
जहाँ न भित्ता छन्‌&lt;br /&gt;
नखामा&lt;br /&gt;
न आँखा राख्ने भयाल छ&lt;br /&gt;
न हृदय सजाउने गमला&lt;br /&gt;
न हाँसो उमार्ने बारी छ&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
१९&lt;br /&gt;
न कतै मीठो गीत सुनिन्छ&lt;br /&gt;
न कतै मनोहर दृश्य देखिन्छ&lt;br /&gt;
सुनिन्छ त फगत&lt;br /&gt;
हावामा पौडिरहेका ट्रान्जिष्टरब्रोझ्काइटिस्‌ भएका ट्रकहरूको खोकी,बस्ने उमेरे भएको बसहरूको ध्यार्र.. घ्यार्रलाहुरेहरूको बूटको आवाज&lt;br /&gt;
र मठ्याहा नेपाली बौली- &#039;अच्छा यार&#039;र देखिन्छ त केवल&lt;br /&gt;
साँझमा&lt;br /&gt;
रिक्सा, साइकल, भट्टी र सडकमालाहरेहरू र कान्छीहरूको मांसाहारी प्यारउफ्‌ ! यो पट्याइलाग्दो ठाउँ&lt;br /&gt;
यो अत्यासलाग्दो ठाउँ,&lt;br /&gt;
जता हेत्यो उतै फुङ्ग उडेको&lt;br /&gt;
फुस्रो, न्यास्रो&lt;br /&gt;
भैरहवा&lt;br /&gt;
हिलोको तलाउबाट निस्केको&lt;br /&gt;
भैंसीको- &#039;भै&#039;&lt;br /&gt;
तावामा छुटेर जलेको रोटीको- &#039;र&#039;गालीजस्तो नरमाइलो तातो&lt;br /&gt;
हावाकौ- &#039;हबा&#039; ।&lt;br /&gt;
६० ? घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==एक कविता==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“भोक लाग्यो&#039; ठिटोप्रति&lt;br /&gt;
न गाँसको प्रबन्ध&lt;br /&gt;
न बासको ठेगाना&lt;br /&gt;
तैपनि&lt;br /&gt;
बाँचेकै छ&lt;br /&gt;
हुर्केकै छ&lt;br /&gt;
यो मगन्ते ठिटो&lt;br /&gt;
नयाँ सडकको पेटीमा&lt;br /&gt;
पेटीजस्तै सधैँ असङ्ख्य पाउमुनि कुल्चिएर&lt;br /&gt;
(1 खा&lt;br /&gt;
कसैको वासनाको द्रुतगामी रकेटमा राखेरयो ठिटो उडाइयो&lt;br /&gt;
अनजान र अनिश्चित भविष्यको अन्तरिक्षमाबिना कुनै स्पेस सूट !&lt;br /&gt;
&#039;अक्सिजन मास्क&#039;&lt;br /&gt;
र सुरक्षित सञ्चालनको&lt;br /&gt;
तर क&lt;br /&gt;
घुस्नै सेचमाथि अन्धो मान्छे “&lt;br /&gt;
ही&lt;br /&gt;
बेवारिसपनाको भारहीन अवस्थाबाटसकुशल ओर्लियो&lt;br /&gt;
नयाँ सडकको पेटीमा&lt;br /&gt;
झुत्रो प्यारासुट ओढेर&lt;br /&gt;
छि। थि ।&lt;br /&gt;
यो शिशु&lt;br /&gt;
जन्मियो यिशूजस्तै&lt;br /&gt;
कुमारी आमाको गर्भबाट&lt;br /&gt;
र बसेको छ अहिले क&lt;br /&gt;
नयाँ सडकको पेटीमाल्याम्प-पोष्टको &#039;क्रस&#039; बोकेर ।&lt;br /&gt;
कि 1&lt;br /&gt;
पुसको जाडो&lt;br /&gt;
रौं ठाडो हुने रातउदास, उजाड, फूटपाथएक कुनामा सिउरेर&lt;br /&gt;
सुतेको छ क झुत्रो बोरा र पुराना अखबार ओढेरअखबार : जसको छातीमा छापिएका छन्‌ठूला-ठूला अक्षरमा &#039;बालदिवस&#039; को समाचार&lt;br /&gt;
मन्त्रीज्यूबाट उद्घाटन,मिठाइ र पुरस्कार वितरण&lt;br /&gt;
तथा बाल-बालिकाहरूको प्रगतिको विज्ञापन&lt;br /&gt;
सुत बाबा सुतसुत ज्ञानी सुत&lt;br /&gt;
६२ ८ घुस्नै मैचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
सुत राजा सुत&lt;br /&gt;
यसरी नै निश्चिन्त भई सुत&lt;br /&gt;
एक दिन यस्तो पनि आउनेछ&lt;br /&gt;
जब तिम्रा यी अखबार र झुत्रे बौोराकालुगा पनि&lt;br /&gt;
झुन्डयाइने छन्‌- म्युजियममाकालुपाँडेजस्तै&lt;br /&gt;
कालुपाँडेको लुगासँग&lt;br /&gt;
र त्यस बेला लेख्नेछ इतिहासकारले“उहिले-उहिले&#039; को नेपालमा&lt;br /&gt;
दुई थरीका मानिस थिए&lt;br /&gt;
एक थरी&lt;br /&gt;
जो अखबारमाथि पल्टन्थे&lt;br /&gt;
हेडलाइनको सिरानी हालेर&lt;br /&gt;
महत्त्वपूर्ण खबर बनेर,&lt;br /&gt;
अर्को थरी&lt;br /&gt;
जो त्यही खबरको न्यानो ओढेरपुस-माघको जाडो काट्थे बेखबर भएर......उहिले-उहिलेको नेपाल&lt;br /&gt;
एउटा बासी अखबारजस्तो थियो ।&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छै /&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==दुई सेता कलिला हत्केलाको परेवा :तिम्रो नमस्ते==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौसीमा उभिएर लज्जानत&lt;br /&gt;
तिमीले मतिर गुलाफी हतारमा उडाएको&lt;br /&gt;
दुई सेता कलिला हत्केलाको परेवा : तिम्रो नमस्तेदिनभरि&lt;br /&gt;
मेरा आँखाको आकाशभरि&lt;br /&gt;
तिम्रो कौमार्यको सेता पखेटा फिंजाएर उाडिरहन्छसाँझभरि&lt;br /&gt;
मेरो हृदयको क्षितिजभरि&lt;br /&gt;
तिम्रो कैशोर्यको गुलाफी रङ्ग छरिरहन्छ&lt;br /&gt;
रातभरि&lt;br /&gt;
मेरो निद्राको दलिनभरि&lt;br /&gt;
तिम्रा सप्तरक्की चुराहरूको बुट्टा जडिरहन्छ&lt;br /&gt;
र सधैंभरि&lt;br /&gt;
सधैं-सचैँ सञैभरिको निम्ति&lt;br /&gt;
मेरो मुटुभरि&lt;br /&gt;
मेरो परेलाभरि&lt;br /&gt;
६४ ” घुम्बे मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
मेरो हुकढुकीभरि&lt;br /&gt;
तिम्रो एकलासपनाको अस्फुट प्रार्थना र&lt;br /&gt;
खित्काहरू भरिरहन्छ ।&lt;br /&gt;
कौसीमा उभिएर लज्जानत&lt;br /&gt;
तिमीले मतिर गुलाफी हतारमा उडाएको&lt;br /&gt;
दुई सेता कलिला हत्केलाको परेवा :तिम्रो नमस्तै ।&lt;br /&gt;
घुम्नै मैचमाचि अन्धो मान्छे ” ६१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==चिसो एष्ट्े==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ जो आउँछन्‌&lt;br /&gt;
मुटुभरि आगो, ओठभरि ज्वाला बोकेर आउँछन्‌&lt;br /&gt;
यहाँ जो बस्छन्‌&lt;br /&gt;
हत्केलाभरि खरानी र आँखाभरि धूवाँ बोकेर बस्छन्‌&lt;br /&gt;
र यहाँबाट जो जान्छन्‌&lt;br /&gt;
पोल्टाभरि निभेका विश्वासहरू र ठुटा सपनाहरू सोहोरेर जान्छन्‌यस्तो छ यो चार भन्ज्याङ खाल्टो&lt;br /&gt;
एउटा चिसो एष्ट्रेजस्तो छ&lt;br /&gt;
यो चार भन्ज्याङ खाल्टो ।&lt;br /&gt;
६६ / घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अभिशप्त घर==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब-जब बायाँ र दायाँ पट्टिका छिमेकीहरूले&lt;br /&gt;
एकार्काको छानामाथि ढुङ्गा बर्साउँछन्‌&lt;br /&gt;
यस घरको छानामा घाम ताप्न बसेकी बूढीको चश्मा रकौसीमा रमिता हेरिरहेकी दुलहीका चुराहरू फुट्छन्‌,आच्यारातमा जब छिमेकीहरूले आपस्तमा&lt;br /&gt;
जहाँबाट जे पायो त्यसैले कुटाकुट गर्छन्‌&lt;br /&gt;
भोलिपल्ट बिउँझेर यस घरको बातको रोगी बूढालेआफ्नो लौरी भाँचिएको पाउँछ ।&lt;br /&gt;
यस्तो छ अभिशप्त घर&lt;br /&gt;
डढेलोको बीचमा उम्रेको खरजस्तो छ यौ घर ।&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे “ ६७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==म==&lt;br /&gt;
१. म एक पुत्र&lt;br /&gt;
एक पति&lt;br /&gt;
र एक पिता हुँ&lt;br /&gt;
२. म एक न्वारानएक बिबाहर एक पिता हुँ&lt;br /&gt;
३. म एक होटलएक बोतलर एक प्याला हुँ&lt;br /&gt;
४. म एक श्रमएक उत्पादनर एक ज्याला हुँ&lt;br /&gt;
भर, म एक इन्टरमभ्युएक लामो क्युर एक क्यान्डिडेट्‌ हुँ&lt;br /&gt;
ईद ” घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
१०.&lt;br /&gt;
११;&lt;br /&gt;
म एक खाली बिलएक खाली विभागर एक खाली पेट हुँ&lt;br /&gt;
म एक सभाएक श्रोताएक वाह&lt;br /&gt;
र एक ताली हुँ&lt;br /&gt;
म नेताजीको एक गीतएक भाषणर एक गाली हुँ&lt;br /&gt;
म एक जुलूसएक उफ्रचाइँएक नारा&lt;br /&gt;
र एक झन्डा हुँ&lt;br /&gt;
म एक आवश्यकताएक माग&lt;br /&gt;
एक विरोध&lt;br /&gt;
र एक डण्डा हुँ&lt;br /&gt;
म केबल एक जुत्ताएक सुरुवाल&lt;br /&gt;
एक कमीज&lt;br /&gt;
र एक कोट हुँ&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छे / ६९&lt;br /&gt;
१२. बस म केवलएक क्रान्तिएक प्रजातन्त्रएक चुनाउर एक भोट हुँकेवल एक भोट हुँ।&lt;br /&gt;
७० ? घुम्ने सेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==रात काठमाडौं प्रात:==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाग्मतीपारि स्याल,&lt;br /&gt;
र वारि कुक्रहरू कराउँदा&lt;br /&gt;
सशङ्िकत पोथी कुखुराझैं&lt;br /&gt;
घिच्रो तन्काएर&lt;br /&gt;
हेर्छन्‌ देवलहरूले&lt;br /&gt;
वरिपरिका खोरहरूलाई&lt;br /&gt;
पखेटा झारेर&lt;br /&gt;
र अन्धकारले तिनलाई डोकोभित्र छोप्छ ।अज्ञात दुलोबाट निस्केर&lt;br /&gt;
डस्छ गोमनले काठमाडौंलाई&lt;br /&gt;
र बिष सर्दै-सरबै धरहराको दुप्पोनिर पुग्छ,गल्लीहरूका नसाभित्र रगत&lt;br /&gt;
कालो हुँदै जान्छ&lt;br /&gt;
एक्कासि अदृश्य कुनै धामीको&lt;br /&gt;
मन्त्रमा बाँधिएर&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे / ७१&lt;br /&gt;
मुग्ध सर्प : नयाँ सडक&lt;br /&gt;
सल्बलाउँदै आउँछ&lt;br /&gt;
आङमरि धामीले फालेका&lt;br /&gt;
मन्त्रबद्ध सेता कौडाहरू टाँसेर&lt;br /&gt;
र चुस्छ, चुसिरहन्छ रातभरि&lt;br /&gt;
बेहोश काठमाडौंको शरीरबाट आफ्नो विष&lt;br /&gt;
बल्ल-बल्ल प्रात:मा&lt;br /&gt;
चल्मलाउँछ काठमाडौं पीडामय बेहोशीबाट-बिउँमेर&lt;br /&gt;
र बोली फुट्छ अनि स्तब्ध धाराहरूका&lt;br /&gt;
र हाँस्त थाल्छन्‌ उन्मुक्त भ्याल र ढोकाहरू ।&lt;br /&gt;
७२ घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शीत-युद्धकालका बाँदरहरू==&lt;br /&gt;
हातमा फोहर लागेका&lt;br /&gt;
बाँदर सदा र सर्वत्र&lt;br /&gt;
दुर्गन्धले पीडित हुन्छ&lt;br /&gt;
सुन्तलाको घारीमा क&lt;br /&gt;
दुर्गन्धले निसासिन्छ&lt;br /&gt;
गुलाफ फुलेको देख्ता&lt;br /&gt;
उसले नाक थुन्छ&lt;br /&gt;
दूषित हात उचालेर&lt;br /&gt;
आफ्ना अङ्गहरूलाई&lt;br /&gt;
बचाउने चेष्टा गर्छ&lt;br /&gt;
घुणित स्पर्शबाट आफ्नै हातकोअनि सफलताको चीत्कार बोकेररज बन-बन दगुर्छ&lt;br /&gt;
रूख, ढुङ्गा आदिमा हात पुस्छखोला-नालाको पानीमा हात चोपेरक मुक्त हुन खोज्छ दुर्गन्धबाटतर, प्रत्येक प्रयासपछि&lt;br /&gt;
हात सुँघ्दा दुर्गन्ध&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे / ७३&lt;br /&gt;
झन्‌ बढेको पाउँछ&lt;br /&gt;
अनि बहुलाझौँ&lt;br /&gt;
रूख हाँगाहरूका साराफलफूलहरू झार्दै&lt;br /&gt;
सुगन्ध र स्वादलाई मेटेर&lt;br /&gt;
कम गर्न खोज्दछ आफ्नो&lt;br /&gt;
दुर्गन्धको प्रभावलाई&lt;br /&gt;
र अन्तमा निराश भएर&lt;br /&gt;
कुनै ठाउँमा बसेर ज बर्बरतापूर्वकघोद्न थाल्छ आफ्नो हात ख्रोढुङ्गामाथि&lt;br /&gt;
उसले ढुङ्गामा हात घोट्छ र सुँघ्छउसले आफ्नो हात सुँघ्छ र घोद्नथाल्छ र घोटि नै रहन्छ&lt;br /&gt;
तबसम्म&lt;br /&gt;
जबसम्म कि उसको हात बेकम्मा हुँदैनशङ्कालु बाँदरको जब एकचोटिहात गन्हाउँछ&lt;br /&gt;
उसले बगैँचालाई उजाड&lt;br /&gt;
र आफ्नो हातलाई लुला बनाउँछ ।&lt;br /&gt;
(रूपरेखा)&lt;br /&gt;
७४ ” घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बेड-ल्याम्प==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोरको उज्यालोमा उसलाई निभाएरसचैं-सघैँ म घरबाट निस्कन्छु&lt;br /&gt;
र दिन-दिनभरि&lt;br /&gt;
सूर्यसरि&lt;br /&gt;
यस क्षितिजबाट त्यस क्षितिजमाभट्किरहन्छु&lt;br /&gt;
मानिसहरूको बीचमा&lt;br /&gt;
अनि जब रातमा घर फर्कन्छु&lt;br /&gt;
र त्यहीं त्यसरी नै&lt;br /&gt;
निभेर झोक्रिएर बसेको हुन्छ&lt;br /&gt;
जाग्छ मनको कुनै कुनामा&lt;br /&gt;
एक अव्यक्त माया&lt;br /&gt;
र हठात्‌ म उसलाई स्पर्श गर्न पुग्छुक खुशीले धप्प बल्छ&lt;br /&gt;
उ मेरो कोठाको &#039;बेड-ल्याम्प !&#039;&lt;br /&gt;
र मेरी &#039;धर्मपत्नी&#039; ! !&#039;&lt;br /&gt;
(आधुनिक नेपाली कविता&#039; बाट)&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छै / ७५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रातः एक आघात==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रत्येक दिन&lt;br /&gt;
चोरभझौं सुटुक्क आएर&lt;br /&gt;
मलाई भोरले अलिकति निचोर्छ&lt;br /&gt;
ब्यूँझन्छु म किरणहरूको स्पर्शले&lt;br /&gt;
देख्छु प्राचिका नियमित रूपमा माभझिएकासेतासेता उज्ज्वल दाँत&lt;br /&gt;
हुन्छ मनको कुनै कुनामा&lt;br /&gt;
एक हल्का तर तीक्ष्ण आघात&lt;br /&gt;
आह ! सकिंदै गइरहेछ मेरो जीवन&lt;br /&gt;
प्रत्येक दिन एक निश्चित मात्रामा दुथपेष्टझैँ ।&lt;br /&gt;
७६ - घुस्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मानी नभएको जिन्दगानी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आउँछन्‌ जब किरण भोरका&lt;br /&gt;
भ्यालभित्र ज्वरको रापझै&lt;br /&gt;
उठ्छ चूपचाप ओछ्यानबाट&lt;br /&gt;
घाममा सुकाएको गीलो कपडाको बाफझौंहराउँछु दिन-दिनभरि घरबाहिर&lt;br /&gt;
रक्सी पिएर बिर्सेको पापझौँ&lt;br /&gt;
रातको साथमा घर फर्कन्छु&lt;br /&gt;
नशा उत्रेपछिको पश्चात्तापझैँ&lt;br /&gt;
आह ! यसरी बितिरहेछ्‌ जीवनसन्तिपातको रोगीको प्रलापझौँ ।&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
७७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==रिक्त शय्याको स्थानबाट==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शय्याको» मर्खेर रिक्त भएको स्थानबाटउठिरहेछ तातो बाफठुवाक...ठ्बाक...ठ्वाक&lt;br /&gt;
ठक...ठक...ठक्क&lt;br /&gt;
तल भन्याङमा सुनिन्छ&lt;br /&gt;
टाढा गइरहेको&lt;br /&gt;
क्रमश: क्षीण भइरहेको&lt;br /&gt;
कसैको परिचित&lt;br /&gt;
तर असन्तुलित पदचाप&lt;br /&gt;
एकछिनको निम्ति वातावरण बेहोश हुन्छपुनः सुनिन्छ कोर्राको फटकार&lt;br /&gt;
बग्गीको खड-खड, घोडाको चीत्कारबाटोको ढुङ्गा र माटोको सम्मिलित हाहाकारम भने शय्यामा पल्टिरहेर&lt;br /&gt;
निस्पन्द, निश्चल, शिथिल, चूपचापसोचिरहेछु मैले&lt;br /&gt;
एकैछिन पैले&lt;br /&gt;
७८  घुम्बे मेचमायि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
के गरें- प्रणय कि पाप!&lt;br /&gt;
पुनः सोच्छु- यो म के सोचिरहेछु&lt;br /&gt;
के यो मेरो सोचाइ मात्र ? जिज्ञासा मात्र ?&lt;br /&gt;
कि मेरो अन्तस्‌ले मसित लुकाएको पश्चात्ताप ?&lt;br /&gt;
घुम्ने मैचमाथि अन्धो मान्छे / ७९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सेरो जीवन लेकझैँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो जीवन लेकझैं बिरानो थियो&lt;br /&gt;
मेरो दुनियाँ&lt;br /&gt;
मुर्दा पोल्ने बगरझैँ सुनसान थियो&lt;br /&gt;
र म आफ्नो जीवनको लेकमा&lt;br /&gt;
चमरी गाईको गोठालोझैं एक्लो थिएँ&lt;br /&gt;
तर एक-दिन&lt;br /&gt;
तिमी मेरो जीवनमा भैँचालोझैँ अकस्मात्‌ आयौतिमीले मसित प्रीत लायौ&lt;br /&gt;
मेरो स्वरमा-स्वर मिलाएर गीत गायौ&lt;br /&gt;
मैले बधाई दिएँ आफ्नो यौवनलाई&lt;br /&gt;
अन्तमा तिमीले पनि कसैको प्रीत पायौ&lt;br /&gt;
तर&lt;br /&gt;
जस्तो कि थियौ मलाई डर&lt;br /&gt;
निरन्तर अपमानित भएको मानिसको हृदयभित्रअभिमान थाकेझैं&lt;br /&gt;
वृद्ध शरीरभित्र प्राण थाकेझैँ&lt;br /&gt;
तिमी मेरो प्यारमा थाक्यौ&lt;br /&gt;
अनि फेरि आउँला भनी&lt;br /&gt;
० ८ घुम्तै मेचमायि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
नदीको लहरमा नाचेको पातझैंभोरको प्रतीक्षामा बाँचेको रातझैंतिमी बेपत्ता भयौ&lt;br /&gt;
कुन्नि कता गयौ&lt;br /&gt;
यद्यपि मलाई थाहा थियो&lt;br /&gt;
तिमी अब कहिल्यै आउँदिनौ&lt;br /&gt;
मेरो स्वरमा स्वर मिलाएर अब तिमीलेकहिल्यै गाउँदिनौ&lt;br /&gt;
तैपनि मैले तिम्रो प्रतीक्षा गरेँअसङ्ख्य मिलनको इच्छा गरेँतिमी भने&lt;br /&gt;
कुनै अप्रसिद्ध नयाँ लेखककोप्रथम पुस्तकको दोस्रो संस्करणझौंबादा गरेर पनि कहिल्यै आइनौम भने&lt;br /&gt;
आज पनि विना कुनै आशकोविना कुनै विश्वासको&lt;br /&gt;
कुनै कुरूप बूढी कन्याको सिउँदोलेसिन्दूरलाई पर्खेझैँ&lt;br /&gt;
तिमीलाई पर्खिरहेछु&lt;br /&gt;
किनकि आज म भित्र-भित्रैहिमशिलाझौँ चर्किरहेछु ।&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाबि अन्धो मान्छे / मत&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==“भ्‌पी&#039; शेरचन==&lt;br /&gt;
(व्यङ्ग्यात्मक सेल्फ पौटेट)&lt;br /&gt;
केही लेख्छन्‌&lt;br /&gt;
यसो हेर्छन्‌&lt;br /&gt;
चित्त बुझ्दैन&lt;br /&gt;
अनि केर्छन्‌&lt;br /&gt;
पुनः लेख्छन्‌&lt;br /&gt;
पुनः हेर्छन्‌&lt;br /&gt;
लामो सास फेर्छन्‌कठैबरा, बिचरा“भूपी&#039; शेरचन !&lt;br /&gt;
२ / घुम्ने मेचमावि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==असार==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूर लाहुरबाटलामो याद&lt;br /&gt;
र छोटो बिदा बोकेर&lt;br /&gt;
प्रत्येक वर्ष&lt;br /&gt;
दसैँमा घर फर्कने लाहरेझैं&lt;br /&gt;
हृदयभरि सँगीसाथीको लागि प्यार बोकेरझोलाभरि दिदीबहिनीहरूका लागि उपहार बोकेरखल्तीभरि सोल्टिनीका लागि इन्द्रेनीको हार बोकेरगुन्टा बोक्ने भरिया बादललाई&lt;br /&gt;
फकाएर फुलाएर&lt;br /&gt;
अघि-अघि&lt;br /&gt;
छिटो-छिटो पठाएर&lt;br /&gt;
पछि-पछि आफू&lt;br /&gt;
झुम्दै-झाम्दै&lt;br /&gt;
नाच्तै गाउँदै&lt;br /&gt;
बाटोभरि मादल बजाउँदै&lt;br /&gt;
बूटको आवाजले&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे ? ५३&lt;br /&gt;
आकाश घन्काउँदै&lt;br /&gt;
हतार-हतारचुहाउँदै पसीनाको धारप्रत्येक वर्ष आउँछ असार ।&lt;br /&gt;
यड / घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जीवनको अँध्यारो सडकमा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवनको अँध्यारो सडकमा&lt;br /&gt;
सफलता&lt;br /&gt;
साइकलको डाइनेमाबाट बल्ने बत्तीझैँ लाग्छकि जबसम्म&lt;br /&gt;
गतिको पैडिलमाथि&lt;br /&gt;
मेरो खुट्टा चलिरहन्छ&lt;br /&gt;
मेरो पथमा यो बत्ती बलिरहन्छ&lt;br /&gt;
तर जसरी नै म थाक्छु&lt;br /&gt;
र मेरो खुट्टा रुक्छ&lt;br /&gt;
अन्धकार मेरो अगाडि आएर भुक्छ ।&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छै क&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==हिंडदा-हिंडदै==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिंड्दा-हिंड्दै केही सम्झेरबटुवा बाटोमा हाँसेझैँंकिसानको हृदय अन्न बनेरखेतको माटोमा हाँसेझैँ&lt;br /&gt;
तिमी हाँस्ता यस्तो लाग्छ प्रिये !तिमी मेरो साटोमा हाँसेझौँ ।&lt;br /&gt;
यई ? घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==दुई टुक्रा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जी.&lt;br /&gt;
द्र&lt;br /&gt;
जहिले पनि भर्खरकी किशोरीजस्तीसाँच्चिकै तिमी हिमालकी छोरीजस्तीकुन्नि के छ तिमीमा, जो अरूमा छैनकि तिमीलाई जति पाए पनि थोरैजस्ती&lt;br /&gt;
. एकलास तिम्रो बाटोमा रमाइलो साथ दिन सक्तिनँ म&lt;br /&gt;
तिमी धाकेर ढल्दा सहाराको हात दिन सक्तिनँ मबर्सनै नपाई डाँडा काटेको बादल मेरो यौवनचाहेर पनि ए ओइलाउँदी कली ! वर्षाद दिन सक्तिनँ म ।&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमागि अन्यो मान्छै / दछ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मेरा साथीहरू==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले पिएकोमा रिसाएका साथीहरूपिएर त हेर, पिउन झन्‌ गाह्रो छ ।मरेर शहीद हुनेहरू&lt;br /&gt;
जिएर त हेर, जिउन झन्‌ गाह्रो छ!&#039;&lt;br /&gt;
अय ८ घुम्ने मैचमागि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==साज्जा प्रकाशनका केही कविता “काव्य==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अराजक अक्षरहरूआमाको सपनाएउटी छोरीको कथाएक फूल अनेक पत्रएक्लो विजेताकठघरामा उभिएरकाँडाका फूलहरूचिसो च्‌ह्लोजीवनको लय&lt;br /&gt;
ठूलो मान्छे&lt;br /&gt;
ताराका काँचा रङदाजै ! कविता गाउँमै छधर्तीको गीतनफुलैका फूलहरूनाङ्गो तारपञ्चदशिका&lt;br /&gt;
भूपी शैरचनका कवितामुनामदनमुटुनेरीको सिस्नेरीमृत्यु-कविताराजेश्वरी&lt;br /&gt;
लक्ष्मी गीतिसङग्रहलालित्य (भाग १, २)&lt;br /&gt;
समसामयिक साक्गा कविता&lt;br /&gt;
सास्जा कविताहस्ताक्षर&lt;br /&gt;
विजय सुब्बागोपालप्रसाद रिमालकृन्दन शर्माकृष्णहरि बरालपुरुषोत्तम सुवैदीविष्णुविभु घिमिरैमनु ब्राजाकीबालकृष्ण समश्रवण मुकारुङकृष्णभक्त श्रेष्ठरत्नशमशेर थापाभूपाल राई&lt;br /&gt;
दिनेश अधिकारीक्षेत्रपताप अधिकारीशैलेन्द्र साकार&lt;br /&gt;
अनु. भरतराज पन्तसं. शिव रेग्मीलक्ष्मीप्रसाद देवकोटाशिव गौतम&lt;br /&gt;
मञ्जुल&lt;br /&gt;
माधव घिमिरैलक्ष्मीप्रसाद देवकोटालेखनाथ पौडचालसं. डा. तारानाथ शर्मासं. चूडामणि बन्धुदेवेन्द्र नेपाली&lt;br /&gt;
मुद्रक : सामा प्रकाशनको छापाखाना, पुलचोक, ललितपुर, फोन : ५५२१०२३, फ्याक्स : ५५४४२३६&lt;br /&gt;
[[category: Step 2]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%98%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A5%87_%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%9A%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A5%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A5%8B_%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%9B%E0%A5%87&amp;diff=72</id>
		<title>घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%98%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%A8%E0%A5%87_%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%9A%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A5%E0%A4%BF_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A5%8B_%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%9B%E0%A5%87&amp;diff=72"/>
		<updated>2024-06-10T13:13:32Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;Source book : https://nepalikitab.org/bhupi-sherchan-ghumne-mechmathi-andho-manche/&lt;br /&gt;
==पुस्तक परिचय==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२०२६ सालको साझा पुरस्कार प्राप्त&lt;br /&gt;
घुम्ने नेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
भूपी शेरचन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रकाशक: साफा प्रकाशन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संस्करण:&lt;br /&gt;
पहिलो, २०२६ (११०० प्रति)&lt;br /&gt;
 दोस्रो, २०२७ (११०० प्रति)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तेस्रो, २०३० (२१०० प्रति)&lt;br /&gt;
चौथो, २०३५ (२१०० प्रति)&lt;br /&gt;
पाँचौं, २०३८ (२१०० प्रति)&lt;br /&gt;
छैटौं, २०४१ (२१०० प्रति)&lt;br /&gt;
सातौँ, २०४६ (२१०० प्रति)&lt;br /&gt;
आठौँ, २०४९ (३१०० प्रति)&lt;br /&gt;
नवौँ, २०५१ (३१०० प्रति)&lt;br /&gt;
दसौं, २०५५ (१०००० प्रति)&lt;br /&gt;
एघारौँ, २०६२ (५१०० प्रति)&lt;br /&gt;
बाह्रौँ, २०६४ (५१०० प्रति)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आवरणकला: टेकवीर मुखिया&lt;br /&gt;
मूल्य: रु.३४&lt;br /&gt;
मुद्रक: सामा प्रकाशनको छापाखाना, पुलचोक, ललितपुर&lt;br /&gt;
फोन : ५५२१०२३, फ्याक्स : ५५४ ४२३६1589: 978-99933-2-647-2&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==समर्पण==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म पाँच वर्षको शिशु हुँदा मेरी माताको निधनभएको थियो । तर वाज्य्‌ भर्डकन पनिमलाई माता र पिता दुवैको मायादिएर हुर्काउने मेरा परमपूज्यमाहिला दाज्य्‌ सुब्बा कष्णमान सेरचनलाई म आफ्नोकनितासङ्ग्रहकोयो संस्कर्‌णासादर समर्पित गर्दछु ।&lt;br /&gt;
- भूपी शेरचन&lt;br /&gt;
२०४२ साल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रकाशकीय==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचका अन्धालाई&lt;br /&gt;
साँघुरो चोकका चौतालाई&lt;br /&gt;
वीर भएका बुूलाई&lt;br /&gt;
बुढू भएका वीरलाईहल्लै-हल्लाको देशमाचार भन्ज्याङ, यो चिसो एष्ट्रेमाउभ्याउने हामी होइनौं ।&lt;br /&gt;
केही लेख्छन्‌&lt;br /&gt;
लामो सास फेर्छन्‌&#039;यस्ता भूपी शेरचनहामीले दिक्क पारेपछिएक दिन भन्छन्‌&lt;br /&gt;
“छाप्ने भए छाप्नू, खोजेर जहाँ जे छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
भयो ।हामीले खोज्यौं, खोजायौँअनि अलिकता रोजायौं,ऐले यो संस्करणचाहिंजस्ताको तस्तै बुझायौं ।भूपीलाई फेरि पनिसाझा प्रकाशनको घेरोमनिअर्कै रूपमाअर्कै रङ्गमाउजिल्याउने हाम्रो धोको छ ।[त्यो गरिदिने उनीबाहेक अर्को को छ?त्यसैले उजूरको पोको छ ।)अनि त्यसैले शुमकामनाको डोको छ-भूपीले कलम नरोकून्‌,शुभ्र, शान्त र स्निग्धमैनबत्तीको शिखालाई नछोपून्‌ ।&lt;br /&gt;
वि. सं. २०२६&lt;br /&gt;
क. दी.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कविताक्रम==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो चोक&lt;br /&gt;
मैनबत्तीको शिखा&lt;br /&gt;
सचैँ-सचैँ मेरो सपनामाबसन्त&lt;br /&gt;
हामी&lt;br /&gt;
मेरो देश&lt;br /&gt;
मध्याहन दिन र चिसो निद्रागलत लाग्छ मलाई मेरो देशको इतिहासघुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छेघण्टाघर&lt;br /&gt;
घैँटोभित्र वटवृक्ष&lt;br /&gt;
मेरा बिगत सपनाहरू&lt;br /&gt;
ए जून!&lt;br /&gt;
शहीदहरूको सम्झनामापोखरा&lt;br /&gt;
हो-चि-मिन्हलाई चिठी&lt;br /&gt;
यो हल्लै-हल्लाको देश हो&lt;br /&gt;
ज्वरमुक्त सूर्य, जलनमुक्त आकाश र तृप्त ताल&lt;br /&gt;
मर्दैछ हामीमा हामी बाँचेको युगसाँझको नयाँ सडक जिन्दगीको जात्रा&lt;br /&gt;
नयाँ वर्ष&lt;br /&gt;
पहिरो जाने पहाडमुन्तिरतीतरा, बट्ठाई र भक्कूको राँगोका सन्तानहरूप्रतिभैरहवा&lt;br /&gt;
एक कविता&lt;br /&gt;
दुई सेता कलिला हत्केलाका परेवा : तिम्रो नमस्तेचिसो ए्ट्र&lt;br /&gt;
अभिशप्त घर&lt;br /&gt;
म&lt;br /&gt;
रात काठमाडौं प्रातःशीत-युद्धकालका बाँदरहरूबेड-ल्याम्प&lt;br /&gt;
प्रातः एक आघात&lt;br /&gt;
मानी नभएको जिन्दगानीरिक्त शय्याको स्थानबाटमेरो जीवन लेकझौं&lt;br /&gt;
&#039;भृपी&#039; शेरचन&lt;br /&gt;
असार&lt;br /&gt;
जीबनको अँध्यारो सडकमाहिंड्दा-हिंड्दै&lt;br /&gt;
दुई टुक्रा&lt;br /&gt;
मेरा साथीहरू&lt;br /&gt;
५१५३२६शद६१दहष््िदछदद&lt;br /&gt;
32£:5555&lt;br /&gt;
दरद३यशपैदछदद&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सेरो चोक==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साँघुरो गल्लीमा मेरो चोक छ ।यहाँ के छैन ? सबथोक छ।असङ्ख्य रोग छ,&lt;br /&gt;
अनन्त भोक छ,&lt;br /&gt;
असीम शोक छ,&lt;br /&gt;
केवल हर्ष छैन,&lt;br /&gt;
यहाँ त्यसमाथि रोक छ ।साँघुरो गल्लीमा मेरो चोक छ ।यहाँ के छैन ? सबधोक छ ।यो मेरो चोकमा&lt;br /&gt;
देवताले बनाएका मानिस रमानिसले बनाएका देबता&lt;br /&gt;
यी दुवैथरीको निवास छ ।&lt;br /&gt;
तर यहाँ यी दुवैथरी उदास छन्‌ ।दुबैथरी निराश छन्‌ ।&lt;br /&gt;
मानिस उदास छन्‌&lt;br /&gt;
किनकि तिनलाई यहाँरात-रात-भरि उपियाँले टोक्छ&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे / १&lt;br /&gt;
दिन-दिन-भरि रुपियाँले टोक्छर देवता उदास छन्‌&lt;br /&gt;
किनकि तिनलाई यहाँ&lt;br /&gt;
न कसैले पुज्छ, न कसैले ढोग्छत्यसैले यो चोकमा&lt;br /&gt;
देवता र मानिसलेएक-अर्कोलाई धिक्कार्दैएकसाथ पुर्पुरो ठोक्छन्‌&lt;br /&gt;
साँघुरो गल्लीमा मेरो चोक छ ।यहाँ के छैन ? सबथोक छ।&lt;br /&gt;
२ ८ घुम्ने मेचमाबि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
(२०१७-साहित्यो)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मैनबत्तीको शिखा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शुभ्र, शान्त र स्निग्धशिखा मैनबत्तीको ।मानौँ,&lt;br /&gt;
प्रथम रजस्वलापछिस्तान गरेर&lt;br /&gt;
शारदीय घाममा&lt;br /&gt;
आफ्नो कौमार्य छरेरथकित-थकित झैँचकित-चकित झैँएक्लै-एक्लै मुस्काइरहेकोअनुहार हो यो कुनैसुन्दरी नवयुवतीको ।शुम्र, शान्त, स्निग्धशिखा मैनबत्तीको ।आँखाभरि वेदनाको पानीतर, हर्षले हाँसिरहेछ आँखाको नानीमानौँ, अप्रेशनपछिहोशमा आएर&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छै .“&lt;br /&gt;
घोर पीडामा पनि&lt;br /&gt;
शिर अलिक उठाएर&lt;br /&gt;
नवजात शिशुलाई निहालिरहेकोसन्तुष्ट आँखा हो यो&lt;br /&gt;
कुनै पुत्रबतीको ।&lt;br /&gt;
शुम्र, शान्त र स्निग्ध&lt;br /&gt;
शिखा मैनबत्तीको ।&lt;br /&gt;
एकातिर धप्प-धप्प&lt;br /&gt;
बलिरहेछ अनुहार&lt;br /&gt;
अर्कातिर तप्प-तप्प&lt;br /&gt;
ढलिरहेछ अश्रुधार ।&lt;br /&gt;
मानौं यो कुनै विधवाको&lt;br /&gt;
त्यो क्षणको अनुहार हो&lt;br /&gt;
जब कि उसलाई आएछ यादएकसाथ&lt;br /&gt;
सुहागरात र स्वर्गीय पतिको ।शुभ्र, शान्त र स्निग्ध&lt;br /&gt;
शिखा मैनबत्तीको ।&lt;br /&gt;
४ / घुम्ने मेचमाथि अन्धौ&#039; मान्छे&lt;br /&gt;
(२०१६)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सधैं-सघैं मेरो सपनामा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सधैँ-सघैँ मेरो सपनामा&lt;br /&gt;
असङ्ख्य युवती आमाहरू&lt;br /&gt;
मेरो अगाडि आउँछन्‌&lt;br /&gt;
र बहुलाई झैँ&lt;br /&gt;
“अब मेरो दूधको कुनै मूल्य छैन&lt;br /&gt;
अब मेरो मातृत्वको कुनै अर्थ छैन-&#039;भन्ने गीत गाउँछन्‌&lt;br /&gt;
र मलाई देखाई-देखाईकन&lt;br /&gt;
सुँगुरका भद्दा गन्दा बच्चाहरूलाई झौंआफ्नो अतिशय दूधले गानिएकोस्तन चुसाउँछन्‌&lt;br /&gt;
अनि एक्कासि&lt;br /&gt;
छाती पिट्तै&lt;br /&gt;
कपाल लुछतै मसँग आफ्ना हराएका छोराहरू माग्न थाल्छन्‌सचैं-सचैं मेरो सपनामा&lt;br /&gt;
असङ्ख्य जीवनद्वारा लत्याइएका&lt;br /&gt;
र मृत्युद्वारा नपत्याइएका&lt;br /&gt;
जीर्ण तन वृद्धहरू&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाचि अन्यो मान्छे / १&lt;br /&gt;
र बिदीर्ण मन वृद्धाहरू&lt;br /&gt;
मेरो अगाडि आएर लम्पसार पर्छन्‌&lt;br /&gt;
र मसँग&lt;br /&gt;
आफ्नो अथाह भविष्यको सूत्र माग्छन्‌आफ्नो हराएको एक मात्र पुत्र माग्छन्‌सधैं-सचैैं मेरो सपनामा&lt;br /&gt;
असङ्ख्य युबती विधवाहरू मेरो अग्राडि आएरआफूलाई सम्पूर्ण रूपमा नङ्ग्याउँछन्‌&lt;br /&gt;
र आफ्नो हिउँजस्तो कोमल तनमादुनियाँको कामुक आँखाले पोलेकोकाला-काला डामहरू देखाउँछन्‌&lt;br /&gt;
र मसँग आफ्नो जीवनको सहारा माग्छन्‌मसँग आफ्नो यात्राको किनारा माग्छन्‌सधैं-सबैँ मेरो सपनामा&lt;br /&gt;
क्षयका कीटाणु बोकेका&lt;br /&gt;
असङ्ख्य टुहुरा केटा-केटीहरू&lt;br /&gt;
मेरो अगाडि आउँछन्‌&lt;br /&gt;
र मसँग स्कूलको फीस&lt;br /&gt;
पुस्तक किन्ने पैसा&lt;br /&gt;
क्रिकेटको बैट&lt;br /&gt;
र पिताको चुम्बन माग्छन्‌&lt;br /&gt;
र माग्छन्‌ सुरक्षा&lt;br /&gt;
र मिठो निद्राले भरिएको रात&lt;br /&gt;
यसरी नै सघैं-सघैँ मेरो सपनामामलायाका असङ्ख्य-असङ्ख्य मानिसहरूकोआँसुको एक ठूलो सागर बन्छ&lt;br /&gt;
$ . घुम्ने मेचरमाथि अन्धो मान्छ&lt;br /&gt;
जसको प्रत्येक लहरमा&lt;br /&gt;
एक लाश माथि उठ्छ&lt;br /&gt;
एक लाश तल डुन्छ&lt;br /&gt;
तर डुब्नुभन्दा अगाडि मलाई&lt;br /&gt;
प्रत्येक लाशले घुणाले हेर्छ&lt;br /&gt;
आह, मेरो सपनामा मलाई&lt;br /&gt;
मेरो बिपनाको इतिहासले घृणा गर्छ ।&lt;br /&gt;
(२०१६-शारदा)&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्यो मान्छे / ७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वसन्त==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सारा ढोका र भ्यालहरू लातले खोलेर&lt;br /&gt;
डाँकाझैं आउँछ हावा कोठाभित्र&lt;br /&gt;
र एक छिनमै दराजहरू उघारेर,&lt;br /&gt;
कागतपत्रहरू पल्टाई हेरेर&lt;br /&gt;
केही नपाउँदा रिसले रन्धनिएर&lt;br /&gt;
अरू भयालहरूबाट हाम्फालेर भाग्दछ ।आकाशको आँखा दुखेको छ&lt;br /&gt;
सित आँखा जुधाउँदा आफ्नै आँखा पीरो हुन्छ,ज्वरपीडित सूर्य सकी नसकी हिंडिरहेछ आकाशमातुवाँलो भुवाको खास्टो ओढेर&lt;br /&gt;
भ्यालमा उभिएर एक्लै,&lt;br /&gt;
म बाहिर हेरिरहेछु&lt;br /&gt;
हेरिरहेछु र सोचिरहेछु- यो कस्तो वसन्त&lt;br /&gt;
यो चैतको दिनको कस्तो उराठलाग्दो पहर हो !यो कस्तो मुर्दा शहर हो !&lt;br /&gt;
सडकका दुई किनारमा वसन्तको स्वागतार्थहरियो सारी हतार-हतार बेरेर उभिएका भयाङहरू&lt;br /&gt;
डा / घुम्ने मैचमागि अन्धौ मान्छे&lt;br /&gt;
अबीरका थाल बोकेका आरूका रूखहरू,लावाका थाल बोकेका आलुबखडाका रूखहरूअनि स्कूलका केटाकेटीहरू झैं&lt;br /&gt;
रङ्गीन झन्डाहरू हल्लाइरहेका फूलका सानासाना बोटहरूम हेरिरहेछु&lt;br /&gt;
देखिरहेछु&lt;br /&gt;
र सोचिरहेछु&lt;br /&gt;
वसन्त यहाँ किन आउँछ विदेशी पाहुनाझैँयो कस्तो औपचारिकता&lt;br /&gt;
किन आउँदैन क त्यसरी&lt;br /&gt;
यसरी युवावस्थामा जुँघारेखी आउँछ ?&lt;br /&gt;
या हर्षमा मुस्कान&lt;br /&gt;
आफैँ, अनायास र अनजान,&lt;br /&gt;
उफ्‌ यो कस्तो वसन्त हो !&lt;br /&gt;
यो कस्तो वसन्त हो !&lt;br /&gt;
जता हेस्यो उतै देखिन्छ&lt;br /&gt;
भित्र ठोस हुन छाडेर&lt;br /&gt;
बाहिरै बाहिरै मात्र बढेर अग्ला भएकाबाँसका: ठानाहरूलाई नुहेर&lt;br /&gt;
पश्चात्ताप गरिरहेका आफ्नो खोक्रोपनमाथिआफ्नो हातको बलभन्दा&lt;br /&gt;
गर्हुङ्गो रातो फूल समाएका&lt;br /&gt;
कल्कीका बोटहरूलाई&lt;br /&gt;
दुई हात तल झारेर उमिरहेका&lt;br /&gt;
यी लत्रेका हातहरूले रातो फूल समात्ने के दर्कारके अधिकार&lt;br /&gt;
टाढा-टाढासम्म उभिएका छन्‌&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाबि अन्धो मान्छौ “ ९&lt;br /&gt;
न्यास्रो अनुहार लाएका असङ्ख्य मौन घरहरूप्रत्येक घरको मुखमा झुन्डिएको छ विदेशी ताल्चा&lt;br /&gt;
भोटे ताल्चा अथबा हिन्दुस्तानी ताल्चाकुनै घरको मौलिक ओठ छैन&lt;br /&gt;
यो कस्तो वसन्त !&lt;br /&gt;
खोइ मानिसहरूले चोला फेरेका ?&lt;br /&gt;
खोइ घरहरूले बोक्रो फेरेका&lt;br /&gt;
खोइ&lt;br /&gt;
खोइ&lt;br /&gt;
खोइ&lt;br /&gt;
म चिच्याउन चाहन्छु- खोइ&lt;br /&gt;
तर खोइ मेरो आवाज किन निस्कन्न ?के भयो मेरो आवाजलाई&lt;br /&gt;
यो के हो डल्लो गुच्चाजस्तो मेरो घाँटीमाजो मैले घाँटी खोल्दा मुखमा गई अडकन्छर मुख खोल्दा घाँटी थुन्न पुग्दछ&lt;br /&gt;
अनि यस्तो लाग्छ मानौं&lt;br /&gt;
अन ममा कुनै उम्लाइ छैन&lt;br /&gt;
कुनै उत्तेजना छैन&lt;br /&gt;
कुनै आबाज छैन&lt;br /&gt;
कुनै विस्फोट छैन&lt;br /&gt;
मभित्रको मानिस मरिसक्यो&lt;br /&gt;
अब त फगत्‌ मेरो रूपमा उभिएको छ,पड्किसकेको सोडाको एक बोतल-एउटा खाली बोतल :&lt;br /&gt;
१० . धुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
(२०१७-रूपरेखा)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==हामी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हामी जतिसुकै माथि उठौँ,&lt;br /&gt;
जतिसुकै यताउति दगुरौं,&lt;br /&gt;
जतिसुकै ठूलो स्वरमा गजौँ&lt;br /&gt;
तर, हामी फगत्‌ पानीको थोपा हौंपानीका निर्बलिया थोपा&lt;br /&gt;
जो सूर्यद्वारा माथि उचालिन्छौं&lt;br /&gt;
र बादल बन्छौं,&lt;br /&gt;
हावाको इशारामा यताउति दगुछौं&lt;br /&gt;
र आफूलाई गतिशील भन्ठान्छौं,&lt;br /&gt;
अनि एक चोटि माथि पुगेपछि&lt;br /&gt;
हामी आफ्नो धरतीलाई बिर्सन्छौं&lt;br /&gt;
र आफ्नो धरतीलाई&lt;br /&gt;
खोलालाई&lt;br /&gt;
बगरलाई उपेक्षापूर्वक&lt;br /&gt;
पालिएका कुकुर&lt;br /&gt;
भयालबाट गल्लीका कुकुरहरूलाई हेरेर भुकेझौंहामी भुक्तछौँ&lt;br /&gt;
र आफ्नो कुक्रभुकाइलाई गर्जन भन्ठान्छौं&lt;br /&gt;
घुम्नै मैचमावि अन्धो मान्छे / ११&lt;br /&gt;
अनि अन्त्यमा एक दिन बसेर चकनाचूर हुन्छौंर फेरि परिणत हुन्छौं पानीका थोपाहरूमानिर्बलिया थोपाहरूमा&lt;br /&gt;
र कुनै इनार, खाडल बा पोखरीमा&lt;br /&gt;
कुहेर बिताउँछौं बाँकी जीवन&lt;br /&gt;
टरै...टर्र टर्टराउने घिनलाग्दा भ्यागुताहरू पालेर,विष नभएका साँपहरू अँगालेर&lt;br /&gt;
हामी जतिसुकै माथि उठौं&lt;br /&gt;
जतिसुकै यताउति दगुरौं&lt;br /&gt;
जतिसुकै ठूलो स्त्ररमा ग्जौं&lt;br /&gt;
तर, हामी भित्र-भित्रै खोक्रा छौं&lt;br /&gt;
हाम्रो उठाइको कनै महत्त्व छैन,&lt;br /&gt;
हाम्रो दगुराइको कुनै लक्ष्य छैन,&lt;br /&gt;
हाम्रो गर्जनकोपानीमा फालिएको अगुल्टाको &#039;छवाइयँ&#039; भन्दा बढी वजन छैन ।0 । | छ|&lt;br /&gt;
हामी बाहिरबाट जतिसुकै उच्च देखिए तापनि&lt;br /&gt;
भित्र-भित्र निरन्तर खिइँदै र घिस्सिँदै गइरहेका छौँ&lt;br /&gt;
हाम्रो बाहिरको उँचाइ झूटा हो,&lt;br /&gt;
भ्रमहो&lt;br /&gt;
अग्लो टाकुरामा उम्रेका च्याउको उँचाइभन्दा&lt;br /&gt;
यसको बर्ता महत्त्व छैन&lt;br /&gt;
वा दुइटा अग्ला बाँस खुट्टामा बाधेर हिँड्ने&lt;br /&gt;
भारतीय चटकेको उँचाइभन्दा यसको बढी विशेषता छैनअग्लो चुच्चे टोपी लगाई नाच्ने&lt;br /&gt;
१२ / घुम्ने मेचमाचि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
सर्कसको जोकरको उँचाइभन्दा- यसको बढी विशेषता छैनहामी बाहिरको उँचाइमा रमेका छौं, लट्टिएका छौं, फुलेका छौंतर, हामीले आफ्नो आस्थाको ठ्वीपमा&lt;br /&gt;
निरन्तर खिइँदै र घिस्सिदै गइरहेको कुरालाई भुलेका छौँहीनताको सानो ठ्रीपमा पछारिएर&lt;br /&gt;
हामीले आफ्नो पूर्वस्मृति गुमाइसक्यौं&lt;br /&gt;
हामीले आफ्नो विगत उँचाइलाई बिर्सिसक्यौं&lt;br /&gt;
हामीले मानिसको सामान्य उँचाइलाई बिर्सिसक्यौंहामीले सामान्य मानिसको उंचाइलाईं बिर्सिसक्यौँत्यसैले जब कुनै सामान्य मानिस&lt;br /&gt;
कथामा वर्णित “गुलिभर&#039; झैँ&lt;br /&gt;
आई पल्टन्छ हाम्रो आस्थाको द्वीपमा&lt;br /&gt;
हामी छक्क परेर उसलाई हेछौँ&lt;br /&gt;
हामी उसलाई हेरेर छक्क पछौँ&lt;br /&gt;
हामीलाई उसको उँचाइ देखेर आश्चर्य लाग्छ&lt;br /&gt;
हामीलाई आफ्नो पुड्काइ देखेर डर लाग्छ&lt;br /&gt;
र त हामी आफ्नो हीन भावनाका&lt;br /&gt;
सियो जत्रा स-साना हतियारहरूको उसमाथि&lt;br /&gt;
प्रहार गछौं&lt;br /&gt;
उसको अङ्ग-प्रत्यङ्घमा चढ्छौं&lt;br /&gt;
उफ्रन्छौं&lt;br /&gt;
टोक्छौं&lt;br /&gt;
चिमोद्छौं&lt;br /&gt;
र अन्त्यमा थकित भएर तल ओनलन्छौं&lt;br /&gt;
शान्त हुन्छौं&lt;br /&gt;
समर्पित हुन्छौं&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे / १३&lt;br /&gt;
र कुनै ठूलो चट्टानमाथि उर्लेर समुद्रको छाललेतर ओर्लेर त्यसको पाउ पखाले झैहामी पुज्न थाल्दछौं त्यो साधारण मानवलाईमहान्‌ भनेरहामी बाहिरबाट जतिसुकै उच्च देखिए तापनिभित्र-भित्रै निरन्तर खिइँदै गइरहेका छौँहामी &#039;लिलिपुट&#039; का मानव हौं ।हामी लघुमानव हौं ।पा पा खाहामी आफूखुशी कहिल्यै मिल्न नसक्नेकसैले मिलाइदिनुपर्ने,हामी आफूखुशी कहिल्यै छुट्टिन नसक्नेकसैले छुट्टयाइदिनुपर्ने,हामी आफूखुशी कहिल्यै अगाडि बढ्न नसक्नेकसैले पछाडिबाट हिर्काउनुपर्ने, हिँडाउनुपर्नेहामी रङ्ग-रोगन छुटेका,टुटेका, फुटेकापुरानो क्यारमबोर्डका गोटी हौंएउटा मनोरञ्जक खेलका सामग्री,एउटा खेलाडीमाथि आश्रित,आफ्नो गति हराएकाएउटा &#039;स्ट्राइकर&#039; द्वारा सञ्चालितहो, हामी मानिस कम र बर्ता गोटी हौं ।&lt;br /&gt;
कि) 1 बि&lt;br /&gt;
१४ / घुम्नै मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
हामी वीर छौं&lt;br /&gt;
तर बुदू छौं&lt;br /&gt;
हामी बुदू छौं&lt;br /&gt;
रतहामी वीरछौं&lt;br /&gt;
हामी बुद्ध नभईकन वीर कहिल्यै हुन सकेनौंहामी महाभारतको कथामा वर्णित एकलव्य हौंप्रत्येक पिंढीको द्रोणाचार्यले हामीलाई उपेक्षा गर्छहामीलाई ज्ञान दान गर्नबाट इन्कार गर्छइन्कार गर्छ मान्न हाम्रो योग्यतालाई,शक्तिलाई,&lt;br /&gt;
र अस्तित्वलाई&lt;br /&gt;
तर, हामी तिनै द्रोणाचार्यको मूर्ति बनाउँछौंआफ्नो झुप्रोअगाडि,&lt;br /&gt;
त्यसलाई पुज्छौं&lt;br /&gt;
ढोग्छौँ&lt;br /&gt;
निरन्तर धनुर्विद्याको अभ्यास गछौँ&lt;br /&gt;
र द्रोणाचार्यका अन्य कुलीन&lt;br /&gt;
चेलाहरूभन्दा बढी कुशलता प्राप्त गछौँ&lt;br /&gt;
तर, हाम्रो कुृशलतादेखि आश्चर्यचकित&lt;br /&gt;
र भयभीत भई&lt;br /&gt;
प्रत्येक पिंढीमा द्रोणाचार्य हामीकहाँ आउँछ&lt;br /&gt;
र गुरु-दक्षिणा माग्छ&lt;br /&gt;
र हामी सहर्ष उसको इशारामा&lt;br /&gt;
आफ्नो बूढी औंला काटेर उसलाई भेटी दिन्छौं,आफ्नो अस्तित्त्र मेटेर उसलाई समर्पित गछौँर मक्ख पछौं आफ्नो गुरुभक्तिमाथि&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे ,&#039;&lt;br /&gt;
104&lt;br /&gt;
आफ्नो आत्मशक्तिमाथि&lt;br /&gt;
त्यसैले हामी वीर त छौँ&lt;br /&gt;
तर, बुदू छौं&lt;br /&gt;
हामी बुदू छौं&lt;br /&gt;
र त हामी वीर छौं&lt;br /&gt;
हामी बुदू नभईकन वीर कहिल्यै हुन सकेनौंहामी कसैको मूर्ति स्थापना नगरीकन&lt;br /&gt;
वीर कहिल्यै हुन सकेनौँ ।&lt;br /&gt;
नि छ (1हामी पाइतला हौंकेवल पाइतला&lt;br /&gt;
र फगत पाइतलापाइतला : जसको भरमा शरीर उभिन्छपाइतला : जसको आधारमा शरीर हिँड्छपाइतला : जसको भरोसामा शरीर दगुर्छपाइतला : तर जो भन्ठान्छ कि&lt;br /&gt;
शरीरले कृपा गरेर उसलाई पालिरहेछदया गरेर उसलाई सँग-सँगै हिँडाइरहेछमक्ख पर्छ शरीरको महानतामाथि&lt;br /&gt;
र सधैँ सम्पूर्ण शरीरको भार सहन्छ&lt;br /&gt;
सधैँ शरीरको सबभन्दा तल रहन्छकहिल्यै शिर उचालेर माथि हेर्दैनसञैं-सधैं नतमस्तक रहन्छ&lt;br /&gt;
हामी पाइतला हौं&lt;br /&gt;
हामी दौडमा प्रथम हुन्छौं&lt;br /&gt;
१६ / धुम्ने मेचमाथि अन्धी मान्छे&lt;br /&gt;
र हाम्रो तिधारले टीका थाप्छ,हामी दौडमा प्रथम हुन्छौं&lt;br /&gt;
र हाम्रो घाँटीले माला लाउँछहामी दौडमा प्रथम हुन्छौं&lt;br /&gt;
र हाम्रो छातीले तक्मा टाँस्छहाम्रो टीका थाप्ने निधार अर्कै छहाम्रो माला लाउने घाँटी अर्कै छहाम्रो तक्मा टाँस्ने छाती अर्कै छ,हामी त फगत कसैको इशारामाटेक्ने, हिँड्ने र दगुर्ने पाइतला हौंकेवल पाइतला&lt;br /&gt;
र फगत पाइतला ।&lt;br /&gt;
खि (1 छ ।&lt;br /&gt;
हामी केही पनि ह्नैनौं&lt;br /&gt;
र शायद त्यसैले केही ह्वौं कि !&lt;br /&gt;
हामी कतै पनि, केही पनि छैनौं&lt;br /&gt;
र शायद त्यसैले कतै, केही छौं कि!हामी बाँचिरहेका छैनौं&lt;br /&gt;
तर शायद त्यसैले पो बाँचेका छौं कि !त्यसैले आओ ए शूत्य पूजकहरू !हामी सब मिलेर पुजौं यो शून्यतालाईहामी सब मिलेर ढोगौं यो रिक्ततालाईहाम्रो अस्तित्वको यो देवतालाई ।&lt;br /&gt;
(२०१७-रूपरेखां)&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे / १७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मेरो देश==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहाँ&lt;br /&gt;
हिउँ परेको रातमा&lt;br /&gt;
जून, धरतीलाई भेट्नहिमकणहरूको साथमामुस्कुराउँदै ओह्वालो झर्छ,&lt;br /&gt;
र धरतीलाई सर्वाङ्ग हाँसेको पाएरझन्‌ बढी मुस्कुराएर&lt;br /&gt;
आकाशमा फर्कने गर्छ,&lt;br /&gt;
जहाँ&lt;br /&gt;
आलुबखडाका हाँगा-हाँगामाफुल्दछन्‌ कुखुराका चल्लाहरू;जहाँ&lt;br /&gt;
मृगमरीचिका पछि लाग्नेहरूको यादमारुन्छन्‌ घूपी र सल्लाहरू;&lt;br /&gt;
जहाँ&lt;br /&gt;
बाह्रै महीना मानिसका गालामाफुल्दछन्‌ आरुका फूल,&lt;br /&gt;
जहाँ&lt;br /&gt;
कृ « घुम्ने मेचमावि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
मुटुको स्पन्दनझौं उफ्री-उफ्रीखेल्छन्‌ मृगशावकका हूल;जहाँ&lt;br /&gt;
पहराबाट छहराले&lt;br /&gt;
खोलामा हाम्फाल्दछ ;&lt;br /&gt;
जहाँ- रातमा पनि हिमचुलीलेआँगनमा घाम पाल्दैछ;&lt;br /&gt;
जहाँ&lt;br /&gt;
प्रत्येक पहाडको काखमा नदीछातीमा छहरा&lt;br /&gt;
र निधारमा लेक हुन्छ;&lt;br /&gt;
जहाँ&lt;br /&gt;
स-साना नदीहरूमा पनितृफानी समुद्रको बेग हुन्छ;जहाँ&lt;br /&gt;
बटुवालाई प्रत्येक भ्याङबाटभ्याउँकीरीले गिज्याउने गर्छ;प्रत्येक अँधेरी पँधेरोमाजूनकीरीले ज्योति फिजाउने गर्छ;जहाँ&lt;br /&gt;
शीतल हावामा बुई चढेरकस्त्रीको सुगन्ध डुल्दछ;जहाँ&lt;br /&gt;
एकबाजि आएर&lt;br /&gt;
घर फर्कन वसन्त भुल्दछ;जहाँ&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छै / १९&lt;br /&gt;
बटुवालाई भन्ज्याङमा रोकेरहिमाल पड्खा हम्कन्छ;&lt;br /&gt;
जहाँ&lt;br /&gt;
एक-अर्काको मुख हेरेरनीलगिरि र धवलागिरि चम्कन्छ;जहाँ&lt;br /&gt;
प्रत्येक रातमा आकाशलेमङ्गल-दीप सजाउँछ;&lt;br /&gt;
जहाँ&lt;br /&gt;
प्रत्येक भोरमा घरतीले&lt;br /&gt;
एक गोरो छोरो जन्माउँछ;&lt;br /&gt;
जहाँ&lt;br /&gt;
हरिया-हरिया पहाडका फरियाजहाँ&lt;br /&gt;
अलिक तल सारेर&lt;br /&gt;
निर्मल, स्वच्छ र न्यानो घाममाहिमालले सधैँ ढाड सेकेको हुन्छम जति टाढा भए त्यो मेरो देशसधैं मेरो मनले&lt;br /&gt;
सपनामा पाइला टेकेको हुन्छ ।&lt;br /&gt;
२० » घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
(२०१७-सङ्गम)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मध्याहन दिन र्‌ चिसो निद्रा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अखबारको &#039;बान्टेड कालम&#039;-मा&lt;br /&gt;
म आफ्ना आउने दिनहरूको अनुहार खोजिरहेछु,प्रत्येक जुल्‌स, सभा, भाषण&lt;br /&gt;
-र नयाँ योजनाका फाइलहरूमापाइला टेक्ने आधार खोजिरहेछु-- नयाँ बजेटको ओठमा&lt;br /&gt;
खोजिरहेछु आश्वासनरेडियो-घोषणासँग मागिरहेछुसान्त्वनाका दुई शब्द&lt;br /&gt;
नयाँ पे-स्केलले नापिरहेछु&lt;br /&gt;
म आफ्नो परिबारको आयु;&lt;br /&gt;
प्रत्येक खाली सीटको सूचनालेमलाई जवान बनाउँछ&lt;br /&gt;
प्रत्येक इन्टरभ्यूको परिणाम सुनेरजीवन, काखीको पसीनाझैं गन्हाउँछ,आमाको ममतामा पनि&lt;br /&gt;
कसैले नैराश्य घोल्दछ,&lt;br /&gt;
बाबुको प्रोत्साहनमा पनि&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छै ” २१&lt;br /&gt;
चिसो सुस्केरा बोल्दछ&lt;br /&gt;
कुमारी बहिनीको स्यूँदोसँग, सिन्दूर झस्केझैँ लाग्छपत्नीले थालमा सधैँ-सचैँ&lt;br /&gt;
व्यङ्ग्य पस्केझैं लाग्छ&lt;br /&gt;
एक युग बित्यो&lt;br /&gt;
म आफ्नो बिन्तिपत्रजस्तो अनुहार बोकेरभट्किरहेछु दर-दर&lt;br /&gt;
पुगिरहेछु घर-घर&lt;br /&gt;
एक चिसो निद्राले मलाई&lt;br /&gt;
छोपिरहेछ निरन्तर,&lt;br /&gt;
मलाई थाहा छ&lt;br /&gt;
यसपल्ट म निदाएँ भने&lt;br /&gt;
फेरि कहिल्यै पनि म बिउँझन सबितनँत्यसैले&lt;br /&gt;
ए झुसिल्कीराभौँ लाम लागेकाहरू !&lt;br /&gt;
ए नाराका अक्षरहरू !&lt;br /&gt;
अरू जोर-जोरसित नारा लगार&lt;br /&gt;
उफ्‌ ! म निदाउन चाहन्नँ यो दिउँसैमलाई जगाङ, मलाई जगाङ ।&lt;br /&gt;
(२०१७-खूपरेखा)&lt;br /&gt;
२२ ८ धुस्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==गलत लाग्छ मलाई मेरो देशको इतिहास==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जबमयी भोकमा डुबेका चोकहरूमा&lt;br /&gt;
यी वैलाएका कलिजस्ता गल्लीहरूमाहेर्छु एक-दुई दिन बसेर बास&lt;br /&gt;
तब मलाई गलत लाग्छ&lt;br /&gt;
मेरो देशको इतिहास&lt;br /&gt;
यो बाटोको बीचमा माटो खनेरबसेका देवताहरू&lt;br /&gt;
यो बुझेर पनि लाटो बनेर&lt;br /&gt;
बसेका मानिसहरू&lt;br /&gt;
यो भूकम्पपीडित मन्दिर&lt;br /&gt;
र&lt;br /&gt;
ढल्केका गजूरहरू&lt;br /&gt;
यी सालिक बनेर दोबाटोमाउभिएका हजूरहरू&lt;br /&gt;
जन देख्छु म यी सबलाई&lt;br /&gt;
घुम्ने सेचमाबि अन्धो मान्छौ “ २३&lt;br /&gt;
सबैँ त्यहीं- सधैँ उस्तै र&lt;br /&gt;
सधैं एकनास&lt;br /&gt;
तब मलाई गलत लाग्छ&lt;br /&gt;
मेरो हुरीको इतिहास&lt;br /&gt;
जब म&lt;br /&gt;
असङ्ख्य सीताहरूलाई सधैँबाटो-दोबाटोमा,&lt;br /&gt;
गल्ली-गल्लीमा,&lt;br /&gt;
बजार-बजारमा,&lt;br /&gt;
देश-बिदेशमा,&lt;br /&gt;
यूक्लिप्टसका रूखझौं नङ्ग्याइएको देख्छुअनि जब देख्छु असङ्ख्य भीमसेन थापाहरूलाईनिस्पन्द, निश्चल, शिथिल चृपचाप उभिएकाआफ्नो आत्माको गीत झारेर&lt;br /&gt;
कल्कीका बोटझौं&lt;br /&gt;
दुबै हात तल झारेर&lt;br /&gt;
तब मलाई गरँ-गर झौं लाग्छ&lt;br /&gt;
आफ्नै रगतको उपहास&lt;br /&gt;
जब म&lt;br /&gt;
यी भोकमा डुबेका चोकहरूमा&lt;br /&gt;
यी वैलाएका कलिजस्ता गल्लीहरूमा&lt;br /&gt;
हेर्छु एक-दुई दिन बसेर बास&lt;br /&gt;
तब मलाई गलत लाग्छ&lt;br /&gt;
मेरो देशको इतिहास&lt;br /&gt;
सुन्छु : अमरसिंह काँगडासम्म बढेको कुरासुन्छु : तेन्जिङले सगरमाथा चढेको कुरा&lt;br /&gt;
२४  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==घुम्नै मेचमाथि अन्धो मान्छे==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुन्छु : बुद्धले धरामा शान्तिको बीउ छरेको कुरासुन्छु : अर्निकोको कलाले विश्व-मन हरेको कुरासुन्छु : सधैँ सुन्छु र केवल सुन्छु&lt;br /&gt;
तर मलाई हुँदैन विश्वास&lt;br /&gt;
जब म&lt;br /&gt;
यी भोकमा डुबेका चोकहरूमा&lt;br /&gt;
यी वैलाएका कलिजस्ता गल्लीहरूमा,&lt;br /&gt;
हेर्छु एक-दुई दिन बसेर बास&lt;br /&gt;
तब मलाई गलत लाग्छ&lt;br /&gt;
मेरो देशको इतिहास&lt;br /&gt;
यो मेरो सत्य इतिहास ।&lt;br /&gt;
(२०१७-चिराक)&lt;br /&gt;
घुम्नै मेचमाबि अन्धो मान्छे / २१&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
दिनभरि&lt;br /&gt;
सुकेको बाँसझैँ&lt;br /&gt;
आफ्नो खोक्रोपनमाथि&lt;br /&gt;
उँघेर,&lt;br /&gt;
पछुताएर ;&lt;br /&gt;
दिनभरि&lt;br /&gt;
रोगी मलेवाझौँ&lt;br /&gt;
आफ्नो छाती आफ्नै चुच्चोले टुँगेर,घाउहरू कोट्टयाएर ;&lt;br /&gt;
दिनभरि&lt;br /&gt;
सल्लाघारीझैँ एकलासमा&lt;br /&gt;
अव्यक्त वेदनाले सुँक्क-सुँम्क रोएर;दिनभरि&lt;br /&gt;
पाते च्याउझौँ&lt;br /&gt;
घरती र आकाशको विशालतादेखि टाढाएउटा सानो ठाउँमा आफ्नो खुट्टा गाडेर,एउटा सानो छाताले आफूलाई ढाकेर&lt;br /&gt;
२६ ? घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
साँझमा&lt;br /&gt;
जब नेपाल खुम्चिएर काठमाडौं&lt;br /&gt;
काठमाडौं डल्लिएर नयाँ सडक&lt;br /&gt;
र नयाँ सडक- असङ्ख्य मानिसका पाउमुनि कुल्चिएर,टुक्रिएर,&lt;br /&gt;
अखबार, चिया र पानको पसल बन्छ;किसिम-किसिमका पोशाकमा&lt;br /&gt;
ओहर-दोहर गर्छन्‌ थरीथरीका हल्लाहरू&lt;br /&gt;
फुल पारेको कुखुराझैँ कराउँदै&lt;br /&gt;
हिँड्छन्‌ अखबारहरू&lt;br /&gt;
र ठाउँ-ठाउँमा अन्धकार पेटीमा उक्लिन्छमोटरहरूको प्रकाशदेखि तर्सेर&lt;br /&gt;
अनि असङ्ख्य मौरीको भुनभुन र डसाइदेखि आत्तिएरम उठ्छु&lt;br /&gt;
न्यायको दिनमा प्रेतात्माहरू उठेझौँ&lt;br /&gt;
र नपाएर विस्मृतिको &#039;लेथे&#039; नदी&lt;br /&gt;
रक्सीको गिलाँसमा हाम्फाल्छु&lt;br /&gt;
र बिर्सन्छु आफ्नो पूर्वकथालाई&lt;br /&gt;
पूर्वजुनि र मृत्युलाई&lt;br /&gt;
यसरी नै सघैँ&lt;br /&gt;
चियाको किटलीबाट एउटा सूर्य उदाउँछ,&lt;br /&gt;
सधैं रक्सीको रित्तो गिलाँसमा एउटा सूर्य अस्ताउँछघुमिरहेकै छ म बसेको पृथ्वी- पूर्ववत्‌&lt;br /&gt;
फगत म अपरिचित छु&lt;br /&gt;
वरिपरिका परिवर्तनहरूदेखि,&lt;br /&gt;
एम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे ,”&lt;br /&gt;
दृश्यहरूदेखि,रमाइलोदेखि,प्रदर्शनीको घुम्ने मेचमाथिकरले बसेको अन्धो जस्तै ।&lt;br /&gt;
[२०१८-रूपरेखा।&lt;br /&gt;
र « घुम्वे मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==घण्टाघर==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुनै फाटेर&lt;br /&gt;
कुनै मुसाले काटेर&lt;br /&gt;
कुनै छोरा-नाति&lt;br /&gt;
सँगी-साथीहरूमा बाँडेर&lt;br /&gt;
एक-एक गरीन&lt;br /&gt;
फौजका सब पुराना जर्सीहरू सिद्धिए ।&lt;br /&gt;
तर जतनसाथ बचाई राखेको&lt;br /&gt;
फौजी जीवनका दुइटा प्रिय चिह्न&lt;br /&gt;
एउटा पुरानो डिजाइनको ठूलो, गोलो जेबघडीछातीमा झुन्डचाएर,&lt;br /&gt;
अनि एउटा पुरानो टोप शिरमा लगाएरबुढेसकालका लामा र दिक्दारै दिन बिताउनेएउटा पेन्सनवाल बूढो लाहरेझौंरानीपोखरीमा बल्छी हालेर&lt;br /&gt;
तटमा उभिएर निरन्तर&lt;br /&gt;
झोक्रिइरहेछ घण्टाघर ।&lt;br /&gt;
(२०१८-रचना)&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे २९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==घैंटोभिन्र बटवृक्ष==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साँघुरो घैंटोभित्र माटो जमाएरउमारिएको बटबृक्षभैंमैले आफ्ना दुइटा हाँगाहरू फैलाएँर म ओइलाएँआफ्नो वरिपरि निसास्सिदो पर्खाल पाएरअनि मैले मुक्त वायुमा सास फेर्न ठिङ्ग उभिएकाआफ्ना पाँच नाङ्गा औँलाहरू पट्याएँप्रकाशनको खोजीमा दगुरेकाआफ्ना हस्तरेखाहरूलाई पछाडि फर्काएँर अब म आफ्नै मुट्ठीभित्र बन्द छुआफ्नै कठोरताभित्र कैद छुतर कुनै दिनतिमीले चिन्न सके आफूभित्रको बतासलाईर प्रकाशलाई तिमीलेजान्नेछौ कि बाहिरबाट जतिसुकैकठोर भए पनि भित्र-भित्रैम कोमल छुयो बन्द मु्ठीभित्र हत्केलाझैँ !(२०१८-शारदा)&lt;br /&gt;
३० ” धुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मेरा विगतका सपनाहरू==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारी ट्कमुनि थिचिएर&lt;br /&gt;
मच्यो एउटा कलिलो ठिटो&lt;br /&gt;
हत्केला खोलेर&lt;br /&gt;
उसको आयुरेखा लामो थियो&lt;br /&gt;
लामो थियो&lt;br /&gt;
मेरा विगत असफल सपनाहरू जस्तै ।&lt;br /&gt;
(२०१८--छपरेखा)&lt;br /&gt;
घुम्ने मैनमाथि अन्धो मान्छे ” ३१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ए जून !==&lt;br /&gt;
मैरो जस्तै ए जून !&lt;br /&gt;
झूटो हो तिम्रो हाँसो पनि&lt;br /&gt;
फरक छैन तिम्रो र मेरो&lt;br /&gt;
भित्र-भित्र रोएर पत्ति बाहिरबाट हाँस्ने बानीमाफरक यति मात्र छ हामी दुइटाको कहानीमाकि तिमी रुन्छौ र तिम्रो आँस्‌ शीत बन्छ&lt;br /&gt;
म रुन्छु र मेरो आँसु गीत बन्छ ।&lt;br /&gt;
(२०१९-खूपरेखा)&lt;br /&gt;
३२ / घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शाहीदहरूको सम्झनामा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुँदैन बिहान मिर्मिरेमा तारा झरेर नगए&lt;br /&gt;
बन्दैन मुलुक दुई-चार सपूत मरेर नगए&lt;br /&gt;
ओठमा हाँसो, गालामा लाली तब आउँछ जगतको&lt;br /&gt;
देशको पीरले भेटी जब वीरले चढाउँछ रगतको&lt;br /&gt;
घाँटीमा फाँसीको माला गाँसी वबीरले हाँस्ता&lt;br /&gt;
मातृभूमिको चरण ढोगी भाग्दछ दासता&lt;br /&gt;
उम्रन्न बोट कसैले बीउ छरेर नगए&lt;br /&gt;
हामीले खाने प्रत्येक गाँसमा रगत छ शहीदको&lt;br /&gt;
हामीले फेर्ने प्रत्येक सासमा रतग छ शहीदको&lt;br /&gt;
हाम्रो मुटुको प्रत्येक चालमा छ धडकन शहीदको&lt;br /&gt;
हाम्रो खुशीको प्रत्येक पलमा छ जीवन शहीदको&lt;br /&gt;
पाउने थिएनौं खुशी तिनले छाडेर नगए&lt;br /&gt;
हामीले आफ्नो कर्तव्य बिर्से इतिहासले धिक्कार्ला&lt;br /&gt;
गोली निलेका शहीदका प्यारा ती लाशले धिक्कार्ला&lt;br /&gt;
धरतीले मुख लाजले छोप्ला, आकाशले धिक्कार्ला&lt;br /&gt;
शहीद रोलान्‌ हामीले उन्नति गरेर नगए&lt;br /&gt;
हुँदैन बिहान मिमिरिमा तारा झरेर नगए&lt;br /&gt;
बन्दैन मुलुक दुई-चार सपूत मरेर नगए ![२०१९-रचता)&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छै “ ३३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पोखरा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१. उपत्यका वरिपरिका डाँडाम्युजिकल चरेयरका खेलाडीसङ्गीतमा बाँधिएकाहिंडनलाई तयारबाजा बज्ने प्रतीक्षामा उभिरहेका&lt;br /&gt;
२. कतै लुकेरकतै फुकेरएउटा गहिरो डहरबाट एक्कासि निस्केरबगिरहेछ सेती खोलाटेप-रिकर्डको फित्ताझैंएउटा मीठो धून सुसेलेर&lt;br /&gt;
३. माछापुच्छेएक बिहान हेर्छ अनुहार फेवामार मिलाउँछ शिरमासेतो-कालो टोपी सक्कले ढाकाको&lt;br /&gt;
४, हनिमूत मनाउन आएको गोरासाहेनएक बाजि हेर्छ काउँ डाँडालाईर हेर्छ विस्फारित नयनले&lt;br /&gt;
३४ / घुम्ने मैतमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
मीमसाहेबका उन्नत वक्षस्थललाईअनि हल्लिन्छ छाया लालपातीको&#039;मीम सा&#039;ब&#039; का मर्करी गलामा&lt;br /&gt;
. हवाईजहाज आइरहेका छन्‌हवाईजहाज गइरहेका छन्‌हवाईजहाज आइरहेछन्‌हनिमूतज मनाउने जोडाहरू बोकेर,हबाईजहाज गइरहेछन्‌&#039;ब्या&#039; को मोलिपल्टैकच्छमा जान डाकिएका लाहरेहरू बोकेर,हबाईजहाज आइरहेछन्‌माच्छापुच्छे हेर्न आएका टुरिष्टहरू बोकेर,हवाईजहाज गइरहेछन्‌डोको, मदुस र हलो बोकेर,चितौनमा जग्गा खौज्न जान लागेकामाछापुच्छेका सन्तानहरू बोकेर,जहाज आइरहेछन्‌जहाज गइरहेछन्‌एअरपोर्टका चौतारोमाथिएकनासगाइरहेछ एउटा अन्धा“चरीको आउँदैन दूधदुःखीको हुँदैन घरबार ।&#039;&lt;br /&gt;
(२०२२)&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छे “ ३१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==हो-चि-मिन्हलाई चिठी==&lt;br /&gt;
आशीर्वादजस्तो सिरानीमा उभिएको&lt;br /&gt;
माछापुच्छ्ने हिमालको छायामा उभिएर&lt;br /&gt;
म तिमीलाई सलामी दिन्छु&lt;br /&gt;
तिमीलाई पनि एउटा नयाँ हिमाल मानेर ।अहिले तिमीलाई यो चिठी लेख्न बस्दा&lt;br /&gt;
मेरो कोठाको मौनता&lt;br /&gt;
परिणत भएको छ कुनै बौद्ध विहारको शान्तिमाजहाँ बालेको धूपबाट निस्केका धूवाँझैबिस्तारी-बिस्तारी उठेर&lt;br /&gt;
मेरो अगाडि उभिइरहेछ&lt;br /&gt;
तिम्रो बूढो र पातलो शरीर&lt;br /&gt;
एउटा अस्पष्ट तर पवित्र अनुहार बोकेर ।&lt;br /&gt;
र मलाई अनायास याद आइरहेछ आफ्नो गाउँकोजहाँ एउटा खोला छ- &#039;लेते खोला&#039;&lt;br /&gt;
तिमीजस्तै शान्त र दुब्लो&lt;br /&gt;
तर जब त्यौ सानो खोलामा बाढी आउँछबरिपरिका ठूल्ठूला चट्टानहरूको पनि पाइला डग्मगाउँछर बाढी थामिएपछि&lt;br /&gt;
३६ ” घुम्ने सेचमायि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
त्यसलाई छेक्न खोजेका घमण्डी पहराहरूलेआफूलाई भत्केको, भास्सिएको र चोइटिएको पाउँछन्‌मेरो &#039;लेते खोला&#039; !&lt;br /&gt;
म ढुक्क छु&lt;br /&gt;
तिम्रो बाढीले पनि मिल्क्याउनेछ&lt;br /&gt;
ती डालरका कात्रो बोकेर&lt;br /&gt;
तिम्रो देशमाथि आइलागेका बर्बरहरूलाई ।भूगोलको परिधिले मलाई बाँध्चे तापनिराष्ट्रहरूको बीचमा सीमारेखाहरूले&lt;br /&gt;
मलाई तिमीसँग बेग्ल्याए तापनि&lt;br /&gt;
यी सबभन्दा माथि जहाँ चेतन छ&lt;br /&gt;
यी सबभन्दा सच्चा जहाँ मुटुको ढुकढुकी छत्यहाँ म तिमीसँग छु&lt;br /&gt;
र युद्धमा परेको छु&lt;br /&gt;
तिम्रो प्रत्येक घरको भत्काइमा म बेघर भएको छुतिम्रो प्रत्येक पुलको टुटाइमा म टुटेको छु&lt;br /&gt;
तिम्रो प्रत्येक गोल-गोल मङ्गोल अनुहार भएकीआइमाईको बेइज्जतीमा&lt;br /&gt;
मैले आफ्नी पत्ती र दिदी-बहिनीहरूलाईबाटोमा निर्वस्त्र देखेको छु&lt;br /&gt;
तिम्रो प्रत्येक बौद्ध-बिहारको विध्वंसमा&lt;br /&gt;
मैले आफ्नो स्वयम्भूको ज्ञानचक्षुमा&lt;br /&gt;
आँसु उर्लिएको देखेको छु&lt;br /&gt;
तिम्रो हनोईमाथिको बमवर्षाको छिर्का&lt;br /&gt;
मैले आफ्नो धरहरामाथि परेको अनुभव गरेको छुर बमवर्षाका रातहरू&lt;br /&gt;
घुम्ने सेचमागि अन्धो मान्छौ / २७&lt;br /&gt;
मैले पनि जागरणका ट्रेञ्चहरूमा बिताएको छु&lt;br /&gt;
को सक्छ निदाउन खरबारीमा&lt;br /&gt;
वरिपरि मुढाहरू दन्किरहेको बेलामा !&lt;br /&gt;
यी सबभन्दा बर्ता&lt;br /&gt;
यी सबभन्दा माथि&lt;br /&gt;
मैले तिम्रो प्रत्येक मृत सिपाहीबाट&lt;br /&gt;
बाँच्ने दर्शन सिकेको छु&lt;br /&gt;
जीवनको अर्थ बुझेको छु&lt;br /&gt;
र तिम्रो सानो देशको ठूलो आत्माबाट&lt;br /&gt;
मैले आफ्नो सानो आत्माभित्र&lt;br /&gt;
एउटा ठूलो ज्योति सल्केको पाएको छु&lt;br /&gt;
हनोईमाथिको बम&lt;br /&gt;
शहरमाथि होइन, मान्छेमाथि बम हो,&lt;br /&gt;
र मैले तथा मजस्तै&lt;br /&gt;
सारा मानिसहरूले ती बमहरूलाईआफूमाथि पड्केको भन्ठानेका छौं&lt;br /&gt;
मेरो कामरेड !&lt;br /&gt;
मेरो हिमाल !&lt;br /&gt;
मेरो &#039;लेते खोला&#039; !&lt;br /&gt;
विश्वास गर&lt;br /&gt;
मैले तिम्रो जीतको विश्वास गरेको छु&lt;br /&gt;
मानिस मर्छन्‌&lt;br /&gt;
जसरी डढेलोमा रूखहरू डढ्छन्‌&lt;br /&gt;
तर मानवता कहिल्यै मर्दैन&lt;br /&gt;
त्यो फेरि पलाउँछ&lt;br /&gt;
डढेलोपछि उम्रिने असङ्ख्य च्याउहरूजस्तै&#039; ।&lt;br /&gt;
झ« ” घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
आशीर्वादजस्तो सिरानीमा उभिएकोमाछापुच्छेको छायामा उभिएरप्रतिज्ञाजस्तो वरिपरि दृढ उभिएका पहाडहरूलाईहातेमालो गरेर&lt;br /&gt;
म किरिया हाल्नै सामर्थ्यमा छुजीत तिम्रो हुनेछ&lt;br /&gt;
जीत हाम्रो हुनेछ&lt;br /&gt;
अन्तरिक्षमा मर्नै कुक्रको शोकमागिर्जाघरमा रुने ढोंगी मानवताधरतीमा गरेको हत्याको पन्नुतोमाआत्महत्या गर्न बाध्य हुनेछ ।&lt;br /&gt;
(२०२३)&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छे ” ३९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==यो हल्लै हल्लाको देश हो==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कानमा इयरफोन लगाउनुपर्ने बहिराहरूजहाँ सङ्गीत प्रतियोगिताका जज हुन्छन्‌&lt;br /&gt;
र जहाँ आत्मामा पत्थर परेकाहरूकाव्यका निर्णायक मानिन्छन्‌,&lt;br /&gt;
काठका खुट्टाहरू जहाँ रेसमा विजेता हुन्छन्‌र जहाँ प्लाष्टर गरिएका हातहरूमासुरक्षाको सङ्गीन थमाइन्छ,&lt;br /&gt;
जहाँ बाटो र, अट्वालिकाहरूकाँ ढोकाअगाडिडोकोका डोको,&lt;br /&gt;
खर्पनका खर्पन,&lt;br /&gt;
ट्रकका ट्रक आत्माका मण्डी सजाइन्छ,स्टाक एक्सचेन्जका शेयरजस्तै&lt;br /&gt;
आत्मा क्रय-विक्रय गर्न सक्नेहरू&lt;br /&gt;
जहाँ नेता हुन्छन्‌&lt;br /&gt;
र जहाँ निधारभरि कर्कटपाताजस्तै&lt;br /&gt;
चाउरी परिसकेकाहरू&lt;br /&gt;
तन्नेरीहरूका अगुवा हुन्छ&lt;br /&gt;
जहाँ जतिसुकै व्यमिचारीको पनि&lt;br /&gt;
४० ” घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
इज्जतको &#039;वाश एन वियर क्रीज&#039; कहिल्यै बिग्रिन्न,जहाँ जतिसुकै पाप गरेको वेश्याको पनिअनुहारको टेरेलिनको छाला कहिल्यै खुम्चिन्न,जहाँ कृषि-मेलाहरूमा&lt;br /&gt;
दोब्बर उब्जनी हुने बीउहरूको प्रदर्शनी गरिन्छ&lt;br /&gt;
र जहाँ खडेरी र अनिकालका सम्चारले भरिन्छ,जहाँ बाग्मती र विष्णुमतीका साटोमा&lt;br /&gt;
अन बीयर र ह्विस्की बग्दछन्‌,&lt;br /&gt;
र जहाँ अब पशुपतिनाथ र स्वयम्भूनाथका मन्दिरको उपयोगतिनका प्रसाद खानमा कम, र&lt;br /&gt;
तिनका पछाडिका वनहरूमा&lt;br /&gt;
आडम इभको &#039;बर्जित फल&#039; खानमा बर्ता गरिन्छ,जहाँ चिनीको कारखानाले&lt;br /&gt;
चित्ती होइन, रक्सी मात्र बनाउँछ&lt;br /&gt;
र जहाँका स्वतन्त्र आमाहरूले&lt;br /&gt;
छोरा होइन लाहुरे मात्र जन्माउँछन्‌&lt;br /&gt;
जहाँ रिन तिर्नको लागि महाकविले&lt;br /&gt;
असमयमै मर्नुपर्दछ&lt;br /&gt;
जहाँ स्वदेशको पीरले बहुलाएको कविले&lt;br /&gt;
बिदेशी अस्पतालको शरण पर्नुपर्दछ,&lt;br /&gt;
र जहाँ सरस्वतीकी एक्ली छोरीले&lt;br /&gt;
बिनाउपचार बैँसमै कुँजएर जीवन बिताउनुपर्दछ,जहाँ गाइडले टुरिष्टलाई&lt;br /&gt;
नेपालको विदेशलाई देन सम्झाउँछ&lt;br /&gt;
र बिदाको बेलामा उससित उसको&lt;br /&gt;
बिदेशी क्यामराको देन माग्दछ,&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे / डा&lt;br /&gt;
जहाँ तन्नेरीहरू&lt;br /&gt;
किल्ला काँगडा र नालापानीको गीत गाउँदै&lt;br /&gt;
अब कवाज खेल्छन्‌&lt;br /&gt;
टाई र कोटको कलरमा खुकुरी भिरेर&lt;br /&gt;
यो देशमा मलाई भन्न कर लाग्छ&lt;br /&gt;
आफ्नो मुटु चिरेर&lt;br /&gt;
कि ए मेरा देशवासीहरू हो&lt;br /&gt;
ए मेरा देशका राष्ट्र-कविहरू हो&lt;br /&gt;
ए मेरा देशका सम्माननीय नेताहरू हो&lt;br /&gt;
भन्न मन लाग्छ भने भन मलाई&lt;br /&gt;
स्वदेशनिन्दक वा घुणाचिन्तक&lt;br /&gt;
तर यो देश तिम्रो जत्तिकै मेरो पनि देश होअंशैबण्डा गर्ने हो भने पनि यो देशका एक करोडटुक्राहरूमध्ये एउटा टुक्रामाथि&lt;br /&gt;
मेरो पनि छाप्रो हुनेछ&lt;br /&gt;
र यो देशका असङ्ख्य बगरहरूमध्ये एउटा बगरमाथिमेरो पनि चिता हुनेछ&lt;br /&gt;
यही भावनाले मलाई यो भन्न बाध्य गराउँछ रआँट दिलाउँछ यो भन्न&lt;br /&gt;
कि &#039;यो हल्लै हल्लाको देश हो&#039;&lt;br /&gt;
खनेर हेर्नै हो भने यहाँका प्रत्येक घरहरूका जगमात्यहाँ फगत हल्लै हल्ला थुप्रिएको पाइनेछ ।त्यसैले यो हल्लै हल्लाको देश हो&lt;br /&gt;
यो हल्लै हल्लामाथि उभएको देश हो&lt;br /&gt;
यो हल्लै हल्लामाथि उठेको देश हो&lt;br /&gt;
यो हल्लै हल्लाको देश हो ।(२०२४-कूपरेखा)&lt;br /&gt;
४२ ४ घुम्नै मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ज्वरमुत्कत सूर्य,जलनमुत्क्त आकाश रतृप्त ताल==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले पाएँ&lt;br /&gt;
नीलो निम्ता-पत्र&lt;br /&gt;
तिम्रा छालहरूको&lt;br /&gt;
र बादलु कछारलाई क्षितिजमाझुन्डयाएर-. मैले&lt;br /&gt;
हाम्फालें तिम्रो जलमाथिडुबुल्की मारे तिम्रोगहिव्याइभित्र आकाशजस्तैसिङ्गै आकाशजस्तै नाङ्गैसमाविष्ट गप्यौ तिमीले पनिसम्पूर्ण मलाई आफूमाआफूभित्र&lt;br /&gt;
कुहिरोहरू पन्छाएरछालजस्तै उर्लिएर&lt;br /&gt;
तालजस्तै उदाङ्गिएर&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छे उ&lt;br /&gt;
नाङ्गिएर&lt;br /&gt;
कति सन्तुष्ट हाँसो छर्दैछ अब&lt;br /&gt;
मेरो ज्वरमुक्त सूर्य तिम्रो अँगालोमाअब मलाई मेरो चट्याङ चुटुङहरूले पोल्दैनन्‌बिलाइसके तिम्रा अज्ञात कुराहर्र्भत्रतिम्रा चञ्चल माछ्ाहरू&lt;br /&gt;
अब तिम्रो शीत जललाई उनीहरूलेछिचोल्दैनन्‌ ।&lt;br /&gt;
उठेर फर्किनुपरे अनि मैले आफ्नोपूर्वस्थानमा अब म अशान्त हुन्नअसन्तुष्ट हुन्नँ,&lt;br /&gt;
कि म स्पष्ट देखिरहेछु&lt;br /&gt;
तिमीभित्र मैले कुँदेको&lt;br /&gt;
मेरो आफ्नो प्रतिविम्बचलमलाइरहेको&lt;br /&gt;
मेरो आफ्नो छाया&lt;br /&gt;
सलबलाइरहेको ।&lt;br /&gt;
४४ / घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
(२०२४--रूपरेखा)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मर्दैछ हामीमा हामी बाँचेको युग==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाँधका मुहान&lt;br /&gt;
अनि खौला नाला र तालका कुरहरूमाथापेजस्तै माछा समाउने पोडेहरूले डोका र जालहरूयो युग जसमा बानुहरूले&lt;br /&gt;
भोगपछिको जिम्मैदारीसँग बाँच्न&lt;br /&gt;
थात्पछन्‌&lt;br /&gt;
गर्भाशयतिर लम्केका आफ्नै सम्भावित सन्तानशुक्रकीटहरूलाई नष्ट गर्ने पासोहरू;&lt;br /&gt;
र आमाहरू&lt;br /&gt;
आफ्नो आनन्दलाई चिन्तामुक्त गर्छन्‌गर्भाशयको ढोकामा&lt;br /&gt;
आफ्नै सम्भावित छोरा-छोरीको प्रवेशलाईनिषेध गर्ने पालेहरू उभ्याएर&lt;br /&gt;
यौ युग जसमा&lt;br /&gt;
भाग्यवश&lt;br /&gt;
संयोगवश&lt;br /&gt;
पाए भने कसैले प्रवेश गर्भाशयभित्र&lt;br /&gt;
तीमध्ये पनि कैयन्‌ नष्ट गरिन्छन्‌&lt;br /&gt;
घुम्नै मेचमायि अन्धी मान्छे / ४४&lt;br /&gt;
आफैँ आमा-बाबुद्वारा खटाइएका&lt;br /&gt;
जिउँदो वरा मुर्दा समाउने आदेश पाएकायमदूतहरूद्वारा&lt;br /&gt;
यस युगमा&lt;br /&gt;
यस्तो युगमा जन्मेका छौँ हामीजन्मिनुअगावै मृत्युको त्रास बोकेर&lt;br /&gt;
हत्याको सुइँको पाएर&lt;br /&gt;
आएका छौं हामी यस पृथ्वीमा&lt;br /&gt;
आफ्नै निर्माताहरूको इच्छाविरुद्धउनीहरूको षडयन्त्रलाई तोडेर&lt;br /&gt;
पहिलो पटक&lt;br /&gt;
नीलो चहकिलो आकाशमुनि पहिलो पटकहरियो भरियो पृथ्वीमाथि पहिलो पटकपहिलो&lt;br /&gt;
पहिलो&lt;br /&gt;
र पहिलो पटक&lt;br /&gt;
खोल्यौं पनि त हामीले आँखा यस धरतीमापोलिनलाई ठीक भइसकेका&lt;br /&gt;
नाजी ग्याँसच्याम्बरका कैदीहरूले मूर्छा परेरअन्तिम घडीमा मुक्ति पाएर आँखा खोलेजस्तैआफूलाई मृत&lt;br /&gt;
र आँखाअगाडिको संसारलाई&lt;br /&gt;
मृत्युपछिको अर्कै लोक भन्ठानेर&lt;br /&gt;
त्यसैले हामी बाँचिरहेका छौं&lt;br /&gt;
बाँच्नुप्रति चिसो र शङ्कालु भएर&lt;br /&gt;
र हामी हर्किरहेका छौँ त्यस युगमा&lt;br /&gt;
४६ / घुम्नै मैचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
जुन युगमाहामीभित्र&lt;br /&gt;
हामी सँग-सँगै&lt;br /&gt;
हुर्किरहेको छ एउटा तीब्र अनास्थास्वयं यस युगप्रति नै&lt;br /&gt;
यस युगको अस्तित्वप्रति नै ।&lt;br /&gt;
[२०२४-खूपरेखा)&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाबि अन्धो मान्छे / ४७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==साँझको नयाँ सडक जिन्दगीको जात्रा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाह्य सुकिली नयाँ सडक, छाँट्टिएर&lt;br /&gt;
पेटीहरू ओहोर-दोहोर गर्छिन्‌ साँझमा&lt;br /&gt;
र स्लिमलेस्‌ ब्लाउजको पाखुरामुनि खिचापोखरीनिसासिन्छ गल्लीका&lt;br /&gt;
काखीका रौंजस्ता भ्वास्स उम्रेका धमिला, दुर्गन्धघरहरूका माझमा&lt;br /&gt;
पसलहरूका शो-विण्डोभित्र&lt;br /&gt;
सू-जि वाँग हाँसो हाँस्तछन्‌ हङकङ सुन्दरीमैडम टेरिउन, मिस्‌ नाइलन र सुश्री टेरेलिनहरूर सम्मोहित कुमारी लूपकुमारीहरू&lt;br /&gt;
पाखुराभरि पेन्सिलिन इन्जेक्सनको&lt;br /&gt;
यात्राका पदचिहनहरू बोकेर&lt;br /&gt;
अँध्यारा गल्लीहरूतिर लम्किन्छन्‌&lt;br /&gt;
ब्रेसरीको खर्पनमा बासी यौवनका फलहरू उचालेर&#039;ट्रीप&#039; मा मग्न हिप्पीकुमारको अँगालोमाअर्धनग्न पीताम्बर साडी-ब्लाउजमा&lt;br /&gt;
डे 7 घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
फ्लावर बेबी हिप्पी मैयाँ नयाँ सडकमा हिंड्छे&lt;br /&gt;
नयाँ सडकका तमाम आँखाहरूलाई&lt;br /&gt;
आफ्नो नाइटोमा खोपाएर&lt;br /&gt;
र बरिपरि उभिएका पीपलको बोटमा धर्मपुत्रहरूभित्र-भित्रै करुवा भइदिन्छन्‌&lt;br /&gt;
चौतारीवरिपरि उमिन्छन्‌&lt;br /&gt;
प. स. क. को डेनेजले मिल्काएका फोहरहरू&lt;br /&gt;
र कमलपित्ते आँखाले आउँदो भोलिलाई हेर्दछन्‌अखबारका खापाहरू उघारेर ।&lt;br /&gt;
एउटी माग्ने आइमाईले न्यूज सेन्टरअगाडि उभिएकोसूटेड टाटकुमार नेपाली रित्तो खल्तीको एक्सरे गरिदिन्छेपाँच पैसा मागेर&lt;br /&gt;
र टाटकुमार नेपाली&lt;br /&gt;
काठमाडौंको आकाशमा गालीको बेलून उडाएरभाग्योदय चिट्वातिर हेरेर आफूलाई थुकिदिन्छ ।&lt;br /&gt;
म&lt;br /&gt;
नयाँ सडकमाथि&lt;br /&gt;
बोकेर&lt;br /&gt;
उभनुको कुनै अर्थ पाउँदिनँ&lt;br /&gt;
र घरबार शब्दलाई एउटा अर्थ दिन&lt;br /&gt;
(दिउँसो घर र राति बार आवाद गरेर)&lt;br /&gt;
लेटेष्ट कविताको पारिश्रमिकलाई जाँड बनाएर घोक्छुर नयाँ सडकलाई नाप्छु&lt;br /&gt;
नयाँ कविताको प्लट सोच्तै&lt;br /&gt;
र अनायास टुँडिखेलतिर लम्किन्छु&lt;br /&gt;
वरिपरिका भीडहरूतिर भैरहवा सुगर मिलको हाँसो फालेर&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे / ४९&lt;br /&gt;
शहीदद्वारतिर पुगेर म अडिन पुग्छुर अन्तिम खिल्ली चारमिनारको सल्काएरम रित्तो बट्टाभित्र काठमाडौंकोरिक्तता हालेर मिल्काइदिन्छुर एक टक शहीदद्वारलाई हेरेर शहीदद्वारतिरएउटा मौन प्रश्न फाल्छुशहीदद्वार मलाई हेरेर फिस्स हाँस्छर कुहिरोभित्र हराउँछ ।&lt;br /&gt;
(२०२५-मधुपर्क)&lt;br /&gt;
४० घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==नयाँ वर्ष==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नयाँ सरुवा भई आएको हुलाकेझैँझोलामा सुर्जेको एउटा पुलिन्दा बोकेरछानामाथि वैशाख हिंडिरहेछ&lt;br /&gt;
भारी अल्छी पाइला सारेरमित्ता-घडीको लङ्गूर हाल्लिरहेछ उसकोपदचापले&lt;br /&gt;
ट्वाक्‌..... ट्वाक......द्वाक......ट्वाकनिस्तेज भई आकाश पल्टेको छ&lt;br /&gt;
न्यास्रो अनुहार पारेर&lt;br /&gt;
बेमौसमको बर्षात&lt;br /&gt;
बेला-कुबेलाको बादलको गडचाड-गुडुङआकाशलाई पखालो लागेको छबिष्णुमतीको फोहर हैजे पानी पिएरट्वाँ,&lt;br /&gt;
सहनाईको बेसुरा ध्वनिबाट निस्किरहेका छन्‌हैजाका असङ्ख्य अदृश्य कीटाणुहरूमध्याह्न दिन&lt;br /&gt;
चर्को घाम&lt;br /&gt;
धुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे / ५१&lt;br /&gt;
सारा&#039; रूखहरूले आफ्नो आङ कन्याइरहेका छन्‌फेरि एकचोटि&lt;br /&gt;
नयाँ वर्ष आएको छ&lt;br /&gt;
फेरि एकचोटि&lt;br /&gt;
भित्ताको नयाँ क्यालेण्डरमा&lt;br /&gt;
आफ्नो जीवनको मिसा झुन्डयाउनु छ&lt;br /&gt;
फेरि एकचोटि&lt;br /&gt;
सँगी साथीहरूको सूची बनाउनु छ&lt;br /&gt;
फेरि एकचोटि&lt;br /&gt;
भयानक बमहरू बोकेर, उडिरहेका हवाईजहाजर रकेटहरूमुनि बसेर&lt;br /&gt;
लेख्नु छ प्रियजनहरूको नाममा&lt;br /&gt;
सफलता, शान्ति र दीर्घायुको शुभकामना-पत्र ।&lt;br /&gt;
१२ ४ घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छे,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पहिरो जाने पहाडमुन्तिर==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनिश्चित भविष्यको आशङ्कामय पीडाखप्न नसकी&lt;br /&gt;
&#039;ेलोडोमाइड&#039; खाएकी गर्भिणी रातजन्माउँछिन्‌ लँगडा, लुला, क्‌च्चिएका बिहानहरूजब बिउँझन्छु म&lt;br /&gt;
छिप्पिन आँटेको जाँडको घैँटोजस्तोउत्तेजित टाउको उचालेर&lt;br /&gt;
अनि हेर्दैछु- ताजा अखबार :&lt;br /&gt;
चील र गिद्ध उडिरहेको आकाश&lt;br /&gt;
सिनुको गन्ध बोकेका&lt;br /&gt;
म गाड्छु दाँत टोष्टमाथि&lt;br /&gt;
र मिल्काउँछु एक टुक्रा दैलोको घामतिरअनि घाम फैलिन्छ चाउरेको विश्वमाथिबासी टोष्टमाथि पग्लिएको नौनीझैंयसरी सुरु हुन्छ एउटा नयाँ दिन&lt;br /&gt;
यसरी सुरु हुन्छ अर्को नयाँ दिन&lt;br /&gt;
अर्को...... र नयाँ दिन&lt;br /&gt;
हतार-हतार आउने र जानैघुम्ने मेचसागि अन्धो मान्छे ” ५३&lt;br /&gt;
जुवाडीको खल्तीका नौटजस्ता चाउरिएका&lt;br /&gt;
असङ्ख्य नयाँ दिनहरू&lt;br /&gt;
घुमिरहेछ पृथ्बी&lt;br /&gt;
आफ्नो धुरीमा, निरन्तर&lt;br /&gt;
तर &#039;रूलेट&#039;- को चक्काझैँ&lt;br /&gt;
जहाँ प्रत्येक व्यक्ति टन्त छ उत्तेजनाले&lt;br /&gt;
बेग्लाबेग्लै बाजीमा थापिएका सिक्काझौं&lt;br /&gt;
आकाश त्यही छ पुरानो&lt;br /&gt;
तर अब त्यहाँ&lt;br /&gt;
चुच्चोमा खर च्यापेर गुँड बनाउन लम्केकागौंधलीको साटोमा&lt;br /&gt;
उडदछन्‌ पचासौं मेगाटन बोकेका रकेटहरू&lt;br /&gt;
क्षितिज तिनै छन्‌ घाम उदाउने र अस्ताउने&lt;br /&gt;
तर त्यहाँ अब थकित सूर्य पल्टन्छ&lt;br /&gt;
अन्तरमहाद्वीपीय क्षेप्यास्त्रको, सिरानी हालेर&lt;br /&gt;
यो के भयो एक्कासि मेरो विश्वलाई !&lt;br /&gt;
यो के भयो विश्वको &#039;म&#039;-लाई ?&lt;br /&gt;
किन सक्तिनँ म &#039;स्कान अन र राक्स&#039;- मा&lt;br /&gt;
जलवबिहार गरेर आफ्नो जलनलाई मेट्न !&lt;br /&gt;
किन सक्तिनँ म आफ्ना कोमल भावनाहरूलाई कुल्चन&lt;br /&gt;
&#039;लोलिटा&#039;- लाई जस्तै;&lt;br /&gt;
किन सक्तिनँ म डुब्न,&lt;br /&gt;
&#039;बिधोवन&#039; र &#039;मोजार्ट&#039;- को सिम्फनीमा&lt;br /&gt;
किन ट्म्पेट र क्यारोनेटको मुख&lt;br /&gt;
हेदहिदै परिवर्तित हुन्छन्‌&lt;br /&gt;
तोप र बन्दूकहरूको नालमा !&lt;br /&gt;
५४ ८ घुम्ने मेच्रमायि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
आहा ! मलाई थाहा छ शान्ति कहाँ छ&lt;br /&gt;
शान्ति हेर उ: त्यहाँ भेडासिङको चौबाटोमा छ&lt;br /&gt;
तर किन म शान्त हुन सक्तिनँ&lt;br /&gt;
त्यहाँ सांढे जुफाइको माझमा&lt;br /&gt;
घाँटीको दाह्रीमा उस्तरा चलाउन दिइरहेको मान्छेजस्तै !मेरो निम्ति त शान्ति&lt;br /&gt;
जँडयाहा जन्डो मान्छेको स्वास्तीको गर्भमा छ&lt;br /&gt;
आहा ! कति क्षीण छ मेरो आशा,&lt;br /&gt;
हाम्रो आशा&lt;br /&gt;
एउटा कलिलो हँसिलो संसारको न्वारान गर्ने ।&lt;br /&gt;
(पौखरा)&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचसाथि अन्धो मान्छे “ ५१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==तीतरा, बट्टाई र भक्कको राँगोका सन्तानहरूप्रति==&lt;br /&gt;
जर्मनका धाबैमा होस्‌&lt;br /&gt;
वा बर्माको घेरामा&lt;br /&gt;
मलायाका रबडका वनमा होस्‌&lt;br /&gt;
या नेफा र लद्दाखका पराइ लडाइँमाती जो मरे&lt;br /&gt;
बिना कुनै स्वार्थ&lt;br /&gt;
विना कुनै अर्थ&lt;br /&gt;
व्यर्थ&lt;br /&gt;
तीतरा, बट्टाई र भक्कूको राँगोजस्तैअरूको हा...हा...हामा लागेर&lt;br /&gt;
अरूको थपडी र नाराले जागेरअरूले ख्वाएको जाँड र कटले मात्तिएर“आयो गोर्खाली&#039; भन्दै&lt;br /&gt;
(गोरु खालि बन्दै !)&lt;br /&gt;
युद्धमा हाम्फालेर&lt;br /&gt;
ती मरेका लोग्नेहरूको पेन्सनले&lt;br /&gt;
५६ / धुम्नै मेचमाबि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
आफ्नो छोराको पास्नी गर्ने ए अभागिनी स्वास्नीहरू !ती मरेका छोराहरूको आर्जनले आफ्नै चौरासी पूजा गर्नेए बूढा-बूढीहरू !&lt;br /&gt;
ती बितेका साथीहरूको जर्सी लगाएर&lt;br /&gt;
रोदीमा सोल्टी फकाउने ए तन्नेरी मान्छेहरू हो !&lt;br /&gt;
ती मरेका प्रेमीहरूको कोसेली चुरा लाएर&lt;br /&gt;
डोलीमा बस्नै ए ब्याहुली जेठी-कान्छीहरू हो !&lt;br /&gt;
खुपै सुहाएको छ तिम्रो छातीमा&lt;br /&gt;
सी तक्मा &#039;परम बीरचक्र&#039; र भिक्टोरिया क्रस&#039; कोतर के आउँदैन यसबाट कहिलेकाहीँ&lt;br /&gt;
ओस्सिएको गन्ध तिम्रो आफन्तहरूका लाशको !&lt;br /&gt;
(पोखरा)&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छे / ५७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भैरहवा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टाढा-टाढासम्मजता हेन्यो उतै मैलो, फुस्रो धरतीउजाड, उदाङ्ग&lt;br /&gt;
आदिदेखि अन्तसम्म एकनास&lt;br /&gt;
न कतै गर्वले उठेको छ&lt;br /&gt;
न कतै बिनम्रताले झुकेको छ&lt;br /&gt;
न कतै उन्मुक्त मनले खुलेको छ&lt;br /&gt;
न कतै जलाउँदै लुकेको छ&lt;br /&gt;
नखदेखि शिखसम्म&lt;br /&gt;
वक्ष, नितम्ब केही पनि विकसित नभएकोबाँझी तरुनीको आडजस्तो सपाट,मुश्किलले तीस-चालीस&lt;br /&gt;
घरजस्ता घर&lt;br /&gt;
बाँकी कुभिन्डोका गाँड निस्केका&lt;br /&gt;
कृप्रा झुप्राहरू, डन्डीफोरझैं&lt;br /&gt;
यताउता जथाभाबी बेढङ्गा उठेका,मानिस :&lt;br /&gt;
कोही पूर्वका&lt;br /&gt;
श्ष्द् « घुम्ने मेचमायि अन्धो माल्छे&lt;br /&gt;
कोही पश्चिमका&lt;br /&gt;
कोही पहाड काँठका&lt;br /&gt;
कोही मधेश फाँटका&lt;br /&gt;
कोही भारतका, कोही भौोटका&lt;br /&gt;
तर सब यहाँ भेला भएका छन्‌खोजीमा हरिया नोटका&lt;br /&gt;
यहाँ मानिस कानेखुशी गर्छन्‌&lt;br /&gt;
नोट गतेको कागजे आवाजमा&lt;br /&gt;
पुरानो मोहर बजाएको आवाजमायहाँ मानिस हाँस्तछन्‌&lt;br /&gt;
यहाँ घाम उदाउँछ&lt;br /&gt;
पसलहरूका ढिकभित्रबाट&lt;br /&gt;
र बहीखातामा जिल्लाझौँ राता हुन्छन्‌यहाँ घाम डुब्छ कन्तुरमा&lt;br /&gt;
र बहीखाताका पाताहरू पहेँलिन्छन्‌सन्ध्याकालीन क्षितिजझौँ&lt;br /&gt;
टाढा-टाढा देखिन्छन्‌&lt;br /&gt;
बुटवलका डाँडाहरू केर-मेर.. केर...मेरबहीखाता सिरानीमा &#039;शुभलाम&#039; लेखिएयो ठाउँ&lt;br /&gt;
एउटा यस्तो घरमा बसेजस्तो&lt;br /&gt;
जहाँ न भित्ता छन्‌&lt;br /&gt;
नखामा&lt;br /&gt;
न आँखा राख्ने भयाल छ&lt;br /&gt;
न हृदय सजाउने गमला&lt;br /&gt;
न हाँसो उमार्ने बारी छ&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
१९&lt;br /&gt;
न कतै मीठो गीत सुनिन्छ&lt;br /&gt;
न कतै मनोहर दृश्य देखिन्छ&lt;br /&gt;
सुनिन्छ त फगत&lt;br /&gt;
हावामा पौडिरहेका ट्रान्जिष्टरब्रोझ्काइटिस्‌ भएका ट्रकहरूको खोकी,बस्ने उमेरे भएको बसहरूको ध्यार्र.. घ्यार्रलाहुरेहरूको बूटको आवाज&lt;br /&gt;
र मठ्याहा नेपाली बौली- &#039;अच्छा यार&#039;र देखिन्छ त केवल&lt;br /&gt;
साँझमा&lt;br /&gt;
रिक्सा, साइकल, भट्टी र सडकमालाहरेहरू र कान्छीहरूको मांसाहारी प्यारउफ्‌ ! यो पट्याइलाग्दो ठाउँ&lt;br /&gt;
यो अत्यासलाग्दो ठाउँ,&lt;br /&gt;
जता हेत्यो उतै फुङ्ग उडेको&lt;br /&gt;
फुस्रो, न्यास्रो&lt;br /&gt;
भैरहवा&lt;br /&gt;
हिलोको तलाउबाट निस्केको&lt;br /&gt;
भैंसीको- &#039;भै&#039;&lt;br /&gt;
तावामा छुटेर जलेको रोटीको- &#039;र&#039;गालीजस्तो नरमाइलो तातो&lt;br /&gt;
हावाकौ- &#039;हबा&#039; ।&lt;br /&gt;
६० ? घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==एक कविता==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“भोक लाग्यो&#039; ठिटोप्रति&lt;br /&gt;
न गाँसको प्रबन्ध&lt;br /&gt;
न बासको ठेगाना&lt;br /&gt;
तैपनि&lt;br /&gt;
बाँचेकै छ&lt;br /&gt;
हुर्केकै छ&lt;br /&gt;
यो मगन्ते ठिटो&lt;br /&gt;
नयाँ सडकको पेटीमा&lt;br /&gt;
पेटीजस्तै सधैँ असङ्ख्य पाउमुनि कुल्चिएर&lt;br /&gt;
(1 खा&lt;br /&gt;
कसैको वासनाको द्रुतगामी रकेटमा राखेरयो ठिटो उडाइयो&lt;br /&gt;
अनजान र अनिश्चित भविष्यको अन्तरिक्षमाबिना कुनै स्पेस सूट !&lt;br /&gt;
&#039;अक्सिजन मास्क&#039;&lt;br /&gt;
र सुरक्षित सञ्चालनको&lt;br /&gt;
तर क&lt;br /&gt;
घुस्नै सेचमाथि अन्धो मान्छे “&lt;br /&gt;
ही&lt;br /&gt;
बेवारिसपनाको भारहीन अवस्थाबाटसकुशल ओर्लियो&lt;br /&gt;
नयाँ सडकको पेटीमा&lt;br /&gt;
झुत्रो प्यारासुट ओढेर&lt;br /&gt;
छि। थि ।&lt;br /&gt;
यो शिशु&lt;br /&gt;
जन्मियो यिशूजस्तै&lt;br /&gt;
कुमारी आमाको गर्भबाट&lt;br /&gt;
र बसेको छ अहिले क&lt;br /&gt;
नयाँ सडकको पेटीमाल्याम्प-पोष्टको &#039;क्रस&#039; बोकेर ।&lt;br /&gt;
कि 1&lt;br /&gt;
पुसको जाडो&lt;br /&gt;
रौं ठाडो हुने रातउदास, उजाड, फूटपाथएक कुनामा सिउरेर&lt;br /&gt;
सुतेको छ क झुत्रो बोरा र पुराना अखबार ओढेरअखबार : जसको छातीमा छापिएका छन्‌ठूला-ठूला अक्षरमा &#039;बालदिवस&#039; को समाचार&lt;br /&gt;
मन्त्रीज्यूबाट उद्घाटन,मिठाइ र पुरस्कार वितरण&lt;br /&gt;
तथा बाल-बालिकाहरूको प्रगतिको विज्ञापन&lt;br /&gt;
सुत बाबा सुतसुत ज्ञानी सुत&lt;br /&gt;
६२ ८ घुस्नै मैचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
सुत राजा सुत&lt;br /&gt;
यसरी नै निश्चिन्त भई सुत&lt;br /&gt;
एक दिन यस्तो पनि आउनेछ&lt;br /&gt;
जब तिम्रा यी अखबार र झुत्रे बौोराकालुगा पनि&lt;br /&gt;
झुन्डयाइने छन्‌- म्युजियममाकालुपाँडेजस्तै&lt;br /&gt;
कालुपाँडेको लुगासँग&lt;br /&gt;
र त्यस बेला लेख्नेछ इतिहासकारले“उहिले-उहिले&#039; को नेपालमा&lt;br /&gt;
दुई थरीका मानिस थिए&lt;br /&gt;
एक थरी&lt;br /&gt;
जो अखबारमाथि पल्टन्थे&lt;br /&gt;
हेडलाइनको सिरानी हालेर&lt;br /&gt;
महत्त्वपूर्ण खबर बनेर,&lt;br /&gt;
अर्को थरी&lt;br /&gt;
जो त्यही खबरको न्यानो ओढेरपुस-माघको जाडो काट्थे बेखबर भएर......उहिले-उहिलेको नेपाल&lt;br /&gt;
एउटा बासी अखबारजस्तो थियो ।&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छै /&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==दुई सेता कलिला हत्केलाको परेवा :तिम्रो नमस्ते==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कौसीमा उभिएर लज्जानत&lt;br /&gt;
तिमीले मतिर गुलाफी हतारमा उडाएको&lt;br /&gt;
दुई सेता कलिला हत्केलाको परेवा : तिम्रो नमस्तेदिनभरि&lt;br /&gt;
मेरा आँखाको आकाशभरि&lt;br /&gt;
तिम्रो कौमार्यको सेता पखेटा फिंजाएर उाडिरहन्छसाँझभरि&lt;br /&gt;
मेरो हृदयको क्षितिजभरि&lt;br /&gt;
तिम्रो कैशोर्यको गुलाफी रङ्ग छरिरहन्छ&lt;br /&gt;
रातभरि&lt;br /&gt;
मेरो निद्राको दलिनभरि&lt;br /&gt;
तिम्रा सप्तरक्की चुराहरूको बुट्टा जडिरहन्छ&lt;br /&gt;
र सधैंभरि&lt;br /&gt;
सधैं-सचैँ सञैभरिको निम्ति&lt;br /&gt;
मेरो मुटुभरि&lt;br /&gt;
मेरो परेलाभरि&lt;br /&gt;
६४ ” घुम्बे मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
मेरो हुकढुकीभरि&lt;br /&gt;
तिम्रो एकलासपनाको अस्फुट प्रार्थना र&lt;br /&gt;
खित्काहरू भरिरहन्छ ।&lt;br /&gt;
कौसीमा उभिएर लज्जानत&lt;br /&gt;
तिमीले मतिर गुलाफी हतारमा उडाएको&lt;br /&gt;
दुई सेता कलिला हत्केलाको परेवा :तिम्रो नमस्तै ।&lt;br /&gt;
घुम्नै मैचमाचि अन्धो मान्छे ” ६१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==चिसो एष्ट्े==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ जो आउँछन्‌&lt;br /&gt;
मुटुभरि आगो, ओठभरि ज्वाला बोकेर आउँछन्‌&lt;br /&gt;
यहाँ जो बस्छन्‌&lt;br /&gt;
हत्केलाभरि खरानी र आँखाभरि धूवाँ बोकेर बस्छन्‌&lt;br /&gt;
र यहाँबाट जो जान्छन्‌&lt;br /&gt;
पोल्टाभरि निभेका विश्वासहरू र ठुटा सपनाहरू सोहोरेर जान्छन्‌यस्तो छ यो चार भन्ज्याङ खाल्टो&lt;br /&gt;
एउटा चिसो एष्ट्रेजस्तो छ&lt;br /&gt;
यो चार भन्ज्याङ खाल्टो ।&lt;br /&gt;
६६ / घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अभिशप्त घर==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब-जब बायाँ र दायाँ पट्टिका छिमेकीहरूले&lt;br /&gt;
एकार्काको छानामाथि ढुङ्गा बर्साउँछन्‌&lt;br /&gt;
यस घरको छानामा घाम ताप्न बसेकी बूढीको चश्मा रकौसीमा रमिता हेरिरहेकी दुलहीका चुराहरू फुट्छन्‌,आच्यारातमा जब छिमेकीहरूले आपस्तमा&lt;br /&gt;
जहाँबाट जे पायो त्यसैले कुटाकुट गर्छन्‌&lt;br /&gt;
भोलिपल्ट बिउँझेर यस घरको बातको रोगी बूढालेआफ्नो लौरी भाँचिएको पाउँछ ।&lt;br /&gt;
यस्तो छ अभिशप्त घर&lt;br /&gt;
डढेलोको बीचमा उम्रेको खरजस्तो छ यौ घर ।&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे “ ६७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==म==&lt;br /&gt;
१. म एक पुत्र&lt;br /&gt;
एक पति&lt;br /&gt;
र एक पिता हुँ&lt;br /&gt;
२. म एक न्वारानएक बिबाहर एक पिता हुँ&lt;br /&gt;
३. म एक होटलएक बोतलर एक प्याला हुँ&lt;br /&gt;
४. म एक श्रमएक उत्पादनर एक ज्याला हुँ&lt;br /&gt;
भर, म एक इन्टरमभ्युएक लामो क्युर एक क्यान्डिडेट्‌ हुँ&lt;br /&gt;
ईद ” घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
१०.&lt;br /&gt;
११;&lt;br /&gt;
म एक खाली बिलएक खाली विभागर एक खाली पेट हुँ&lt;br /&gt;
म एक सभाएक श्रोताएक वाह&lt;br /&gt;
र एक ताली हुँ&lt;br /&gt;
म नेताजीको एक गीतएक भाषणर एक गाली हुँ&lt;br /&gt;
म एक जुलूसएक उफ्रचाइँएक नारा&lt;br /&gt;
र एक झन्डा हुँ&lt;br /&gt;
म एक आवश्यकताएक माग&lt;br /&gt;
एक विरोध&lt;br /&gt;
र एक डण्डा हुँ&lt;br /&gt;
म केबल एक जुत्ताएक सुरुवाल&lt;br /&gt;
एक कमीज&lt;br /&gt;
र एक कोट हुँ&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छे / ६९&lt;br /&gt;
१२. बस म केवलएक क्रान्तिएक प्रजातन्त्रएक चुनाउर एक भोट हुँकेवल एक भोट हुँ।&lt;br /&gt;
७० ? घुम्ने सेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==रात काठमाडौं प्रात:==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाग्मतीपारि स्याल,&lt;br /&gt;
र वारि कुक्रहरू कराउँदा&lt;br /&gt;
सशङ्िकत पोथी कुखुराझैं&lt;br /&gt;
घिच्रो तन्काएर&lt;br /&gt;
हेर्छन्‌ देवलहरूले&lt;br /&gt;
वरिपरिका खोरहरूलाई&lt;br /&gt;
पखेटा झारेर&lt;br /&gt;
र अन्धकारले तिनलाई डोकोभित्र छोप्छ ।अज्ञात दुलोबाट निस्केर&lt;br /&gt;
डस्छ गोमनले काठमाडौंलाई&lt;br /&gt;
र बिष सर्दै-सरबै धरहराको दुप्पोनिर पुग्छ,गल्लीहरूका नसाभित्र रगत&lt;br /&gt;
कालो हुँदै जान्छ&lt;br /&gt;
एक्कासि अदृश्य कुनै धामीको&lt;br /&gt;
मन्त्रमा बाँधिएर&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे / ७१&lt;br /&gt;
मुग्ध सर्प : नयाँ सडक&lt;br /&gt;
सल्बलाउँदै आउँछ&lt;br /&gt;
आङमरि धामीले फालेका&lt;br /&gt;
मन्त्रबद्ध सेता कौडाहरू टाँसेर&lt;br /&gt;
र चुस्छ, चुसिरहन्छ रातभरि&lt;br /&gt;
बेहोश काठमाडौंको शरीरबाट आफ्नो विष&lt;br /&gt;
बल्ल-बल्ल प्रात:मा&lt;br /&gt;
चल्मलाउँछ काठमाडौं पीडामय बेहोशीबाट-बिउँमेर&lt;br /&gt;
र बोली फुट्छ अनि स्तब्ध धाराहरूका&lt;br /&gt;
र हाँस्त थाल्छन्‌ उन्मुक्त भ्याल र ढोकाहरू ।&lt;br /&gt;
७२ घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शीत-युद्धकालका बाँदरहरू==&lt;br /&gt;
हातमा फोहर लागेका&lt;br /&gt;
बाँदर सदा र सर्वत्र&lt;br /&gt;
दुर्गन्धले पीडित हुन्छ&lt;br /&gt;
सुन्तलाको घारीमा क&lt;br /&gt;
दुर्गन्धले निसासिन्छ&lt;br /&gt;
गुलाफ फुलेको देख्ता&lt;br /&gt;
उसले नाक थुन्छ&lt;br /&gt;
दूषित हात उचालेर&lt;br /&gt;
आफ्ना अङ्गहरूलाई&lt;br /&gt;
बचाउने चेष्टा गर्छ&lt;br /&gt;
घुणित स्पर्शबाट आफ्नै हातकोअनि सफलताको चीत्कार बोकेररज बन-बन दगुर्छ&lt;br /&gt;
रूख, ढुङ्गा आदिमा हात पुस्छखोला-नालाको पानीमा हात चोपेरक मुक्त हुन खोज्छ दुर्गन्धबाटतर, प्रत्येक प्रयासपछि&lt;br /&gt;
हात सुँघ्दा दुर्गन्ध&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे / ७३&lt;br /&gt;
झन्‌ बढेको पाउँछ&lt;br /&gt;
अनि बहुलाझौँ&lt;br /&gt;
रूख हाँगाहरूका साराफलफूलहरू झार्दै&lt;br /&gt;
सुगन्ध र स्वादलाई मेटेर&lt;br /&gt;
कम गर्न खोज्दछ आफ्नो&lt;br /&gt;
दुर्गन्धको प्रभावलाई&lt;br /&gt;
र अन्तमा निराश भएर&lt;br /&gt;
कुनै ठाउँमा बसेर ज बर्बरतापूर्वकघोद्न थाल्छ आफ्नो हात ख्रोढुङ्गामाथि&lt;br /&gt;
उसले ढुङ्गामा हात घोट्छ र सुँघ्छउसले आफ्नो हात सुँघ्छ र घोद्नथाल्छ र घोटि नै रहन्छ&lt;br /&gt;
तबसम्म&lt;br /&gt;
जबसम्म कि उसको हात बेकम्मा हुँदैनशङ्कालु बाँदरको जब एकचोटिहात गन्हाउँछ&lt;br /&gt;
उसले बगैँचालाई उजाड&lt;br /&gt;
र आफ्नो हातलाई लुला बनाउँछ ।&lt;br /&gt;
(रूपरेखा)&lt;br /&gt;
७४ ” घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बेड-ल्याम्प==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोरको उज्यालोमा उसलाई निभाएरसचैं-सघैँ म घरबाट निस्कन्छु&lt;br /&gt;
र दिन-दिनभरि&lt;br /&gt;
सूर्यसरि&lt;br /&gt;
यस क्षितिजबाट त्यस क्षितिजमाभट्किरहन्छु&lt;br /&gt;
मानिसहरूको बीचमा&lt;br /&gt;
अनि जब रातमा घर फर्कन्छु&lt;br /&gt;
र त्यहीं त्यसरी नै&lt;br /&gt;
निभेर झोक्रिएर बसेको हुन्छ&lt;br /&gt;
जाग्छ मनको कुनै कुनामा&lt;br /&gt;
एक अव्यक्त माया&lt;br /&gt;
र हठात्‌ म उसलाई स्पर्श गर्न पुग्छुक खुशीले धप्प बल्छ&lt;br /&gt;
उ मेरो कोठाको &#039;बेड-ल्याम्प !&#039;&lt;br /&gt;
र मेरी &#039;धर्मपत्नी&#039; ! !&#039;&lt;br /&gt;
(आधुनिक नेपाली कविता&#039; बाट)&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छै / ७५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रातः एक आघात==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रत्येक दिन&lt;br /&gt;
चोरभझौं सुटुक्क आएर&lt;br /&gt;
मलाई भोरले अलिकति निचोर्छ&lt;br /&gt;
ब्यूँझन्छु म किरणहरूको स्पर्शले&lt;br /&gt;
देख्छु प्राचिका नियमित रूपमा माभझिएकासेतासेता उज्ज्वल दाँत&lt;br /&gt;
हुन्छ मनको कुनै कुनामा&lt;br /&gt;
एक हल्का तर तीक्ष्ण आघात&lt;br /&gt;
आह ! सकिंदै गइरहेछ मेरो जीवन&lt;br /&gt;
प्रत्येक दिन एक निश्चित मात्रामा दुथपेष्टझैँ ।&lt;br /&gt;
७६ - घुस्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मानी नभएको जिन्दगानी==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आउँछन्‌ जब किरण भोरका&lt;br /&gt;
भ्यालभित्र ज्वरको रापझै&lt;br /&gt;
उठ्छ चूपचाप ओछ्यानबाट&lt;br /&gt;
घाममा सुकाएको गीलो कपडाको बाफझौंहराउँछु दिन-दिनभरि घरबाहिर&lt;br /&gt;
रक्सी पिएर बिर्सेको पापझौँ&lt;br /&gt;
रातको साथमा घर फर्कन्छु&lt;br /&gt;
नशा उत्रेपछिको पश्चात्तापझैँ&lt;br /&gt;
आह ! यसरी बितिरहेछ्‌ जीवनसन्तिपातको रोगीको प्रलापझौँ ।&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
७७&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==रिक्त शय्याको स्थानबाट==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शय्याको» मर्खेर रिक्त भएको स्थानबाटउठिरहेछ तातो बाफठुवाक...ठ्बाक...ठ्वाक&lt;br /&gt;
ठक...ठक...ठक्क&lt;br /&gt;
तल भन्याङमा सुनिन्छ&lt;br /&gt;
टाढा गइरहेको&lt;br /&gt;
क्रमश: क्षीण भइरहेको&lt;br /&gt;
कसैको परिचित&lt;br /&gt;
तर असन्तुलित पदचाप&lt;br /&gt;
एकछिनको निम्ति वातावरण बेहोश हुन्छपुनः सुनिन्छ कोर्राको फटकार&lt;br /&gt;
बग्गीको खड-खड, घोडाको चीत्कारबाटोको ढुङ्गा र माटोको सम्मिलित हाहाकारम भने शय्यामा पल्टिरहेर&lt;br /&gt;
निस्पन्द, निश्चल, शिथिल, चूपचापसोचिरहेछु मैले&lt;br /&gt;
एकैछिन पैले&lt;br /&gt;
७८  घुम्बे मेचमायि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
के गरें- प्रणय कि पाप!&lt;br /&gt;
पुनः सोच्छु- यो म के सोचिरहेछु&lt;br /&gt;
के यो मेरो सोचाइ मात्र ? जिज्ञासा मात्र ?&lt;br /&gt;
कि मेरो अन्तस्‌ले मसित लुकाएको पश्चात्ताप ?&lt;br /&gt;
घुम्ने मैचमाथि अन्धो मान्छे / ७९&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सेरो जीवन लेकझैँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो जीवन लेकझैं बिरानो थियो&lt;br /&gt;
मेरो दुनियाँ&lt;br /&gt;
मुर्दा पोल्ने बगरझैँ सुनसान थियो&lt;br /&gt;
र म आफ्नो जीवनको लेकमा&lt;br /&gt;
चमरी गाईको गोठालोझैं एक्लो थिएँ&lt;br /&gt;
तर एक-दिन&lt;br /&gt;
तिमी मेरो जीवनमा भैँचालोझैँ अकस्मात्‌ आयौतिमीले मसित प्रीत लायौ&lt;br /&gt;
मेरो स्वरमा-स्वर मिलाएर गीत गायौ&lt;br /&gt;
मैले बधाई दिएँ आफ्नो यौवनलाई&lt;br /&gt;
अन्तमा तिमीले पनि कसैको प्रीत पायौ&lt;br /&gt;
तर&lt;br /&gt;
जस्तो कि थियौ मलाई डर&lt;br /&gt;
निरन्तर अपमानित भएको मानिसको हृदयभित्रअभिमान थाकेझैं&lt;br /&gt;
वृद्ध शरीरभित्र प्राण थाकेझैँ&lt;br /&gt;
तिमी मेरो प्यारमा थाक्यौ&lt;br /&gt;
अनि फेरि आउँला भनी&lt;br /&gt;
० ८ घुम्तै मेचमायि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
नदीको लहरमा नाचेको पातझैंभोरको प्रतीक्षामा बाँचेको रातझैंतिमी बेपत्ता भयौ&lt;br /&gt;
कुन्नि कता गयौ&lt;br /&gt;
यद्यपि मलाई थाहा थियो&lt;br /&gt;
तिमी अब कहिल्यै आउँदिनौ&lt;br /&gt;
मेरो स्वरमा स्वर मिलाएर अब तिमीलेकहिल्यै गाउँदिनौ&lt;br /&gt;
तैपनि मैले तिम्रो प्रतीक्षा गरेँअसङ्ख्य मिलनको इच्छा गरेँतिमी भने&lt;br /&gt;
कुनै अप्रसिद्ध नयाँ लेखककोप्रथम पुस्तकको दोस्रो संस्करणझौंबादा गरेर पनि कहिल्यै आइनौम भने&lt;br /&gt;
आज पनि विना कुनै आशकोविना कुनै विश्वासको&lt;br /&gt;
कुनै कुरूप बूढी कन्याको सिउँदोलेसिन्दूरलाई पर्खेझैँ&lt;br /&gt;
तिमीलाई पर्खिरहेछु&lt;br /&gt;
किनकि आज म भित्र-भित्रैहिमशिलाझौँ चर्किरहेछु ।&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाबि अन्धो मान्छे / मत&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==“भ्‌पी&#039; शेरचन==&lt;br /&gt;
(व्यङ्ग्यात्मक सेल्फ पौटेट)&lt;br /&gt;
केही लेख्छन्‌&lt;br /&gt;
यसो हेर्छन्‌&lt;br /&gt;
चित्त बुझ्दैन&lt;br /&gt;
अनि केर्छन्‌&lt;br /&gt;
पुनः लेख्छन्‌&lt;br /&gt;
पुनः हेर्छन्‌&lt;br /&gt;
लामो सास फेर्छन्‌कठैबरा, बिचरा“भूपी&#039; शेरचन !&lt;br /&gt;
२ / घुम्ने मेचमावि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==असार==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूर लाहुरबाटलामो याद&lt;br /&gt;
र छोटो बिदा बोकेर&lt;br /&gt;
प्रत्येक वर्ष&lt;br /&gt;
दसैँमा घर फर्कने लाहरेझैं&lt;br /&gt;
हृदयभरि सँगीसाथीको लागि प्यार बोकेरझोलाभरि दिदीबहिनीहरूका लागि उपहार बोकेरखल्तीभरि सोल्टिनीका लागि इन्द्रेनीको हार बोकेरगुन्टा बोक्ने भरिया बादललाई&lt;br /&gt;
फकाएर फुलाएर&lt;br /&gt;
अघि-अघि&lt;br /&gt;
छिटो-छिटो पठाएर&lt;br /&gt;
पछि-पछि आफू&lt;br /&gt;
झुम्दै-झाम्दै&lt;br /&gt;
नाच्तै गाउँदै&lt;br /&gt;
बाटोभरि मादल बजाउँदै&lt;br /&gt;
बूटको आवाजले&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे ? ५३&lt;br /&gt;
आकाश घन्काउँदै&lt;br /&gt;
हतार-हतारचुहाउँदै पसीनाको धारप्रत्येक वर्ष आउँछ असार ।&lt;br /&gt;
यड / घुम्ने मेचमायि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जीवनको अँध्यारो सडकमा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवनको अँध्यारो सडकमा&lt;br /&gt;
सफलता&lt;br /&gt;
साइकलको डाइनेमाबाट बल्ने बत्तीझैँ लाग्छकि जबसम्म&lt;br /&gt;
गतिको पैडिलमाथि&lt;br /&gt;
मेरो खुट्टा चलिरहन्छ&lt;br /&gt;
मेरो पथमा यो बत्ती बलिरहन्छ&lt;br /&gt;
तर जसरी नै म थाक्छु&lt;br /&gt;
र मेरो खुट्टा रुक्छ&lt;br /&gt;
अन्धकार मेरो अगाडि आएर भुक्छ ।&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छै क&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==हिंडदा-हिंडदै==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिंड्दा-हिंड्दै केही सम्झेरबटुवा बाटोमा हाँसेझैँंकिसानको हृदय अन्न बनेरखेतको माटोमा हाँसेझैँ&lt;br /&gt;
तिमी हाँस्ता यस्तो लाग्छ प्रिये !तिमी मेरो साटोमा हाँसेझौँ ।&lt;br /&gt;
यई ? घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==दुई टुक्रा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जी.&lt;br /&gt;
द्र&lt;br /&gt;
जहिले पनि भर्खरकी किशोरीजस्तीसाँच्चिकै तिमी हिमालकी छोरीजस्तीकुन्नि के छ तिमीमा, जो अरूमा छैनकि तिमीलाई जति पाए पनि थोरैजस्ती&lt;br /&gt;
. एकलास तिम्रो बाटोमा रमाइलो साथ दिन सक्तिनँ म&lt;br /&gt;
तिमी धाकेर ढल्दा सहाराको हात दिन सक्तिनँ मबर्सनै नपाई डाँडा काटेको बादल मेरो यौवनचाहेर पनि ए ओइलाउँदी कली ! वर्षाद दिन सक्तिनँ म ।&lt;br /&gt;
घुम्ने मेचमागि अन्यो मान्छै / दछ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मेरा साथीहरू==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले पिएकोमा रिसाएका साथीहरूपिएर त हेर, पिउन झन्‌ गाह्रो छ ।मरेर शहीद हुनेहरू&lt;br /&gt;
जिएर त हेर, जिउन झन्‌ गाह्रो छ!&#039;&lt;br /&gt;
अय ८ घुम्ने मैचमागि अन्धो मान्छे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==साज्जा प्रकाशनका केही कविता “काव्य==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अराजक अक्षरहरूआमाको सपनाएउटी छोरीको कथाएक फूल अनेक पत्रएक्लो विजेताकठघरामा उभिएरकाँडाका फूलहरूचिसो च्‌ह्लोजीवनको लय&lt;br /&gt;
ठूलो मान्छे&lt;br /&gt;
ताराका काँचा रङदाजै ! कविता गाउँमै छधर्तीको गीतनफुलैका फूलहरूनाङ्गो तारपञ्चदशिका&lt;br /&gt;
भूपी शैरचनका कवितामुनामदनमुटुनेरीको सिस्नेरीमृत्यु-कविताराजेश्वरी&lt;br /&gt;
लक्ष्मी गीतिसङग्रहलालित्य (भाग १, २)&lt;br /&gt;
समसामयिक साक्गा कविता&lt;br /&gt;
सास्जा कविताहस्ताक्षर&lt;br /&gt;
विजय सुब्बागोपालप्रसाद रिमालकृन्दन शर्माकृष्णहरि बरालपुरुषोत्तम सुवैदीविष्णुविभु घिमिरैमनु ब्राजाकीबालकृष्ण समश्रवण मुकारुङकृष्णभक्त श्रेष्ठरत्नशमशेर थापाभूपाल राई&lt;br /&gt;
दिनेश अधिकारीक्षेत्रपताप अधिकारीशैलेन्द्र साकार&lt;br /&gt;
अनु. भरतराज पन्तसं. शिव रेग्मीलक्ष्मीप्रसाद देवकोटाशिव गौतम&lt;br /&gt;
मञ्जुल&lt;br /&gt;
माधव घिमिरैलक्ष्मीप्रसाद देवकोटालेखनाथ पौडचालसं. डा. तारानाथ शर्मासं. चूडामणि बन्धुदेवेन्द्र नेपाली&lt;br /&gt;
मुद्रक : सामा प्रकाशनको छापाखाना, पुलचोक, ललितपुर, फोन : ५५२१०२३, फ्याक्स : ५५४४२३६&lt;br /&gt;
[[category: Step 02]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=Main_Page&amp;diff=71</id>
		<title>Main Page</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=Main_Page&amp;diff=71"/>
		<updated>2024-06-10T12:53:39Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: /* Step 1:  Scan and OCR */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;strong&amp;gt;Welcome to Nepali Kitab Editing Team.&amp;lt;/strong&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
This website is a sub-website of nepalikitab.org. Here we convert old books into Unicode text format. It is a collective effort by volunteers around the world. If you are also interested, please join the team.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
We keep here the books generated after scanning and extracting texts with OCR. It contains many errors. Our goal is to remove the errors.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==How to edit==&lt;br /&gt;
[[File:Editor-timeline.png|thumb]]&lt;br /&gt;
1. Make an account or log in.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2. Select the book of your interest.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. Click edit&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
4. Edit and clean up the errors and book format. If you are familiar with wiki syntax, you can edit the source too.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
5. Save time to time while editing&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
For details about formatting text, refer to: https://www.mediawiki.org/wiki/Help:Formatting&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 1:  Scan and OCR ==&lt;br /&gt;
*[[रामायण]] भानुभक्त आचार्य&lt;br /&gt;
* [[घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे]] भूपी_शेरचन&lt;br /&gt;
* [[लेखनाथका प्रमुख कविता]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[गलबन्दी (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[नोकरी (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[९७ साल]] आनन्ददेव भट्ट&lt;br /&gt;
* [[तरुण तपसी (नव्यकाव्य)]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[नेपालको नक्सा (राजनीतिक तथा प्रशासनिक)]] नेपाल सरकार&lt;br /&gt;
* [[आदिकवि भानुभक्त (पटकथा)]] यादब खरेल&lt;br /&gt;
* [[इतिश्री (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[स्वाध्ययन सामग्रीः घरमा नै गर्न सकिने सिकाइ क्रियाकलापहरू (कक्षा ५)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[रूखको रूप]] रिन्छेन्ला लामा&lt;br /&gt;
* [[केही धार्मिक तथा साँस्कृतिक सम्पदाहरू (केही नमुना कलाकृतिहरू)]] सत्यमोहन जोशी&lt;br /&gt;
* [[रमाइला गाउँखाने कथा]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[दसैँ, पिङ र हात्ती (बालकथा-सङ्ग्रह)]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[८० दिनमा विश्‍व भ्रमण]] जुल्स वर्न,गोरखबहादुर सिंह&lt;br /&gt;
* [[बालभाका - १ (बालकविता सङ्ग्रह)]] उद्धवप्रसाद प्याकुरेल&lt;br /&gt;
* [[ताल (उपन्यास)]] यासुनारी कावाबाता&lt;br /&gt;
* [[चतुरेको चर्तिकला (कथा सङ्ग्रह)]] गोरखबहादुर सिंह&lt;br /&gt;
* [[ठूलो फुल (A Big Egg)]] Roma Pradhan, Shanta Das Manandhar&lt;br /&gt;
* [[आखिरमा टोम्मीको टोलीले जिती छाड्यो]] क्रिस्टिन स्टोन,शान्तदास मानन्धर&lt;br /&gt;
* [[शिक्षक निर्देशिका मेरो सामाजिक अध्ययन तथा सिर्जनात्मक कला कक्षा ५ (पुरानो संस्करण)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[जय भुँडी (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[मुकुन्द इन्दिरा (नाटक)]] बालकृष्ण सम&lt;br /&gt;
* [[खाल्डामा परेको भकुन्डो]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[जे छोए पनि सुन]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[खानामा पाइने पोषणहरू]] नताशा भिजकारा&lt;br /&gt;
* [[अन्तिम निम्तो]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[सूगवा]] रोशनी चौधरी&lt;br /&gt;
* [[भीमसेन थापा (ऐतिहासिक खण्डकाव्य)]] सिद्धिचरण श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[ऋतुविचार (खण्‍डकाव्य)]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[अनिवार्य नेपाली (१०६) - माध्यमिक शिक्षा परिक्षाको प्रश्न तथा उत्तरकुञ्जिका २०७४]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[छन्दका १०१ कविता]] (सङ्कलन) कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[गणित प्राविधिक शब्दकोश]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[उज्यालोको खोजीमा (उपन्यास)]] हरिहर खनाल&lt;br /&gt;
* [[सपनाको देशमा]] चन्द्रकान्त आचार्य&lt;br /&gt;
* [[महिला लक्षित शिक्षक सेवा आयोग तयारी अध्ययन सामग्री]] विष्णुप्रसाद अधिकारी&lt;br /&gt;
* [[शिक्षक पेसागत विकास तालिम (तालिम पाठ्यक्रम)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[हाम्रा लोकबाजाहरू (बालबोध - ५१)]] रामप्रसाद कँडेल&lt;br /&gt;
* [[पर्दा, समय र मान्छेहरू (कथासङ्‍ग्रह)]] झमक घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[काउकुती (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[विदुर नीति Vidura Niti [Sanskrit-English]]] (Extracted From) Mahabharata [महाभारत]&lt;br /&gt;
* [[जंगबहादुरको बेलाइती कापी]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[कति वटा रोटी]] शिल्पी प्रधान&lt;br /&gt;
* [[विश्वका प्रमुख सभ्यता तथा संस्कृति (बाल ज्ञानकोश - ३)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अस्माकम् संस्कृतम् - कक्षा १]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[प्रारम्भिक संस्कृत व्याकरण र रचना]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[गोरक्ष-साह-वंश (ऐतिहासिकं महाकाव्यम्)]] हरिप्रसाद शर्मा&lt;br /&gt;
* [[२०२ ओटा ठट्टा]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[धुमधामको घुमघाम (भक्तप्रसाद भ्यागुताको नेपालयात्रा)]] कनकमणि दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[महिलाका लागि डाक्टर नभएमा]] -&lt;br /&gt;
* [[दस औतार (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[A Perfect Match]] Ramendra Kumar&lt;br /&gt;
* [[मधुपर्क (वर्ष ४७, अंक ४, २०७१ भदौ)]] -&lt;br /&gt;
* [[सौगात (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[एक घर एक रोजगार (प्रयागदत्त तेवारीको कृषिकथा)]] मिलन बगाले&lt;br /&gt;
* [[रवीन्द्रनाथका नाटकहरू]] -&lt;br /&gt;
* [[पेसा, व्यवसाय र प्रविधि]] -&lt;br /&gt;
* [[मामा माइजु]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[म को हुँ]] पेमा डोल्मा लामा&lt;br /&gt;
* [[चनाचटपटे (बालकविता-सङ्ग्रह)]] बूँद राना&lt;br /&gt;
* [[आवाज (सामाजिक उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[स्पष्टीकरण (कथासङ्ग्रह)]] हरिभक्त कटुवाल&lt;br /&gt;
* [[स्वास्थ्य, जनसङ्ख्या तथा वातावरण शिक्षा स्वाध्ययन सामग्री (२०६७)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[दशैँको दक्षिणा (बालउपन्यास)]] गङ्गा पौडेल&lt;br /&gt;
* [[चार आर्य-सत्य (बुद्ध-शिक्षाका चार स्तम्भ)]] दोलेन्द्ररत्न शाक्य&lt;br /&gt;
* [[विजय चालिसेका बालकथाहरू]] विजय चालिसे&lt;br /&gt;
* [[सिर्जनशील विद्यालय]] अर्जुन श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[अभिभावकको सहयोगमा बालबालिकालाई घरमा नै गराउन सकिने सिकाइ क्रियाकलापहरू (कक्षा १)]] -&lt;br /&gt;
* [[दर्शन परिचय (विश्वका दर्शन र कला साहित्यिक बादहरू)]] परशुराम कोइराला&lt;br /&gt;
* [[खोज (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[अनिवार्य सामाजिक अध्ययन (१२३) - माध्यमिक शिक्षा परिक्षाको प्रश्न तथा उत्तरकुञ्जिका २०७५]] -&lt;br /&gt;
* [[बिहानीको घामसँग]] तारा पुन, शान्तदास मानन्धर&lt;br /&gt;
* [[एकादेशमा (बालकथाहरूको सँगालो)]] उषा दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[इतिहासका विम्बहरू]] पूर्णचन्द्र घिमिरे, रमेशचन्द्र घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[पन्ध्रौं योजना (२०७६७७-२०८०८१)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[नेपालको शाह तथा राणा वंशावली]] विष्णु प्रसाद श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[Aaloo-Maaloo-Kaaloo]] Vinita Krishna&lt;br /&gt;
* [[परित्याग (उपन्यास)]] माधव खनाल&lt;br /&gt;
* [[अमेरिका (उपन्यास)]] गंगा लिगल&lt;br /&gt;
* [[उखान मिलेन !]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[राष्ट्रकवि माधव घिमिरे (जीवनी, व्यक्तित्व र कृतित्वको सङ्‍क्षिप्त रेखाङ्‍कन)]] शैलेन्दुप्रकाश नेपाल&lt;br /&gt;
* [[केहि गुणकारी बोटबिरूवाहरू (बालबोध - ४१)]] डा. हरिप्रसाद&lt;br /&gt;
* [[दिवास्वप्न]] गिजुभाई, शरच्चन्द्र वस्ती&lt;br /&gt;
* [[संस्कृत, प्राकृत र नेपालीका सन्धिनियम]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[शिक्षाका ती दिन]] पुष्पराज पौडेल&lt;br /&gt;
* [[मपाईं (निबन्ध)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[Autobiography of a YOGI]] Paramhansa Yogananda&lt;br /&gt;
* [[ताराबाजी लै! लै!!]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[विश्वास (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[Akbar and Birbal Moral Stories]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[बुद्धवादका तीन आयाम]] पशुपति घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[करेसाबारीका जडिबुटीहरू]] केदार श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[काठमाडौं उपत्यका खुलास्थलहरू सम्बन्धी मानचित्र पुस्तक २०७१]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अन्ताक्षरी खेल]] ध्रुव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[साइबर बालकथा]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[कलेजी थाल]] ध्रुव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[कत्ति धुनु गधाहरूलाई (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] लक्ष्मण गाम्नागे&lt;br /&gt;
* [[गौरी (शोककाव्य)]] माधव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[आमाको माया]] रमेश चन्द्र अधिकारी&lt;br /&gt;
* [[Natural Treasures of Nepal]] Nepal Tourism Board&lt;br /&gt;
* [[नारीस्वर (महाकवि देवकोटा विशेष) - २०६६ असोज]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[चार गजलकारका उत्कृष्ट गजल (गजलसङ्ग्रह)]] मनु ब्राजाकी&lt;br /&gt;
* [[स्यालको जुक्ती]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[स्थानीय पाठ्यक्रम विकास तथा कार्यान्वयन मार्गदर्शन (मातृभाषा सहित) २०७६]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[बाँदर बन्ने रहर (बालकथा सङ्ग्रह)]] गोपीकृष्ण ढुङ्गाना&lt;br /&gt;
* [[डाढो (हास्यव्यङ्ग्यहरू)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[मध्यचन्द्रिका (नेपाली भाषाको मझौला व्याकरण)]] सोमनाथ शर्मा&lt;br /&gt;
* [[नेपाली क्रान्ति-कथा]] फणीश्वरनाथ रेणु&lt;br /&gt;
* [[डायना (महाकाव्य)]] शैलेन्दुप्रकाश नेपाल&lt;br /&gt;
* [[शङ्खे र फट्याङ्ग्रो]] अनन्तप्रसाद वाग्ले&lt;br /&gt;
* [[मोहिनीले खोसेको अमृतकलश]] अमर निराकार राई&lt;br /&gt;
* [[हिन्दू-धर्म के हो]] महात्मा गाँधी&lt;br /&gt;
* [[बालबालिकामा पढ्ने बानीको विकास]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[The Last Page of My Poem (मेरो कविताको अन्तिम पृष्ठ)]] Rajeshwor Karki&lt;br /&gt;
* [[जय भोलि !]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[संस्कृत व्याकरणको रूपरेखा]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[घरबारी बगैंचा]] बोल बहादुर थापा&lt;br /&gt;
* [[नबिर्सने यात्रा (यात्रा-कथा)]] समीर नेपाल&lt;br /&gt;
* [[समाज परिवर्तनमा संस्कृतिकर्मी]] विजय सुब्बा&lt;br /&gt;
* [[मेवालाल (बालकथा सङ्ग्रह)]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[A Helping Hand]] Payal Dhar&lt;br /&gt;
* [[आमा (कविता सङ्ग्रह)]] भक्ति दाहाल &#039;विष्फोट&#039;&lt;br /&gt;
* [[विज्ञान तथा वातावरण - कक्षा ८ (पुरानो संस्करण)]] गोपीचन्द्र पौडेल&lt;br /&gt;
* [[चप्पल]] अर्हन्त श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[मात्राहरू]] हरिहर लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[दोस्रो भाषाको रूपमा नेपाली भाषा]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अब्राहम लिंकन (१८०९-१८६५)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[घरभेटी भाउजू (कथासङ्ग्रह)]] कृष्णादेवी शर्मा&lt;br /&gt;
* [[Agreeing and Disagreeing - English Grade 10]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[शकुन्तला नाटक]] शम्भुप्रसाद ढुंग्याल&lt;br /&gt;
* [[Chunu and Munu Read]] Shanta Das Manandhar, Stephanie Wei&lt;br /&gt;
* [[अब खेल खेल्ने!]] शिल्पी प्रधान&lt;br /&gt;
* [[जनावरहरूको सभा]] ज्ञाननिष्ठ ज्ञवाली&lt;br /&gt;
* [[विश्वप्रसिद्ध पैंतिस साहित्यकार]] प्रभात सापकोटा&lt;br /&gt;
* [[कसिङ्गर (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[पंचतन्त्र कथासंग्रह]] &lt;br /&gt;
* [[अक्षर (बालकथा)]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 2: Title and heading corrections completed ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 2&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 3: Text correction completed ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 3&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
==Step 4: Proof reading completed==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 4&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[अनौठो फल]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==Step 5: Finished books==&lt;br /&gt;
पुरा भएका किताब&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 5&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%87%E0%A4%B2%E0%A4%BE_%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%89%E0%A4%81%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87_%E0%A4%95%E0%A4%A5%E0%A4%BE&amp;diff=70</id>
		<title>रमाइला गाउँखाने कथा</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%87%E0%A4%B2%E0%A4%BE_%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%89%E0%A4%81%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87_%E0%A4%95%E0%A4%A5%E0%A4%BE&amp;diff=70"/>
		<updated>2024-06-10T04:01:21Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: Created page with &amp;quot;रमाइला गाउँखाने कथा खाने कश ग  णट्टा॥2७० 8४: साझा शिक्षा ई-पाटी७०।८६ ५६०० १४४४८,०5191:919990,018५/४/५४,०।6116091,01 ॥ पासिल१ नपुल्काल्त भापन | रमाइला गाउँखाने कथा सङ्कलन, सम्पादनडा. कपरिलदेत लामिछ्ला...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;रमाइला&lt;br /&gt;
गाउँखाने&lt;br /&gt;
कथा&lt;br /&gt;
खाने कश&lt;br /&gt;
ग&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
णट्टा॥2७० 8४:&lt;br /&gt;
साझा शिक्षा ई-पाटी७०।८६ ५६००&lt;br /&gt;
१४४४८,०5191:919990,018५/४/५४,०।6116091,01&lt;br /&gt;
॥ पासिल१ नपुल्काल्त भापन |&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखाने कथा&lt;br /&gt;
सङ्कलन, सम्पादनडा. कपरिलदेत लामिछ्लाले&lt;br /&gt;
विवेक सिर्जनशील प्रकाशन&lt;br /&gt;
काठमाडौँ&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखाने कथा&lt;br /&gt;
क्षेत्रबिधाकृतिकारसस्करण&lt;br /&gt;
प्रतिप्रकाशक&lt;br /&gt;
सर्वाधिकारआवरप/कला&lt;br /&gt;
कम्प्पुटर सेटिङ :कम्प्युटर टाइप :&lt;br /&gt;
लोकसाहित्य&lt;br /&gt;
गाउँखाने कथा&lt;br /&gt;
डा. कपिलदेव लामिछाने&lt;br /&gt;
प्रथम २०६१ साउन,&lt;br /&gt;
द्वितीय २०६७ असोज ।परिवधित)२२००&lt;br /&gt;
बिबेक सिर्जनशील प्रकाशन प्रा.लि.काठमाडौं&lt;br /&gt;
कृतिकारमा&lt;br /&gt;
के. के. कमाँचाय&lt;br /&gt;
समन श्रेप्ठ&lt;br /&gt;
विद्या लामिछाने&lt;br /&gt;
दोसो संस्करण बारे&lt;br /&gt;
म सानौ छँदा फलेको कताकति नफलेको बाक्लै, के हो? भनीबुबाले गाउँखाने कथा हालेको मलाई भरखरै जस्तो लाग्छ । फलेको कताकतिमात्र रे अनि नफलेको चाहिँ वाक्लै । कसरी जान्नु यसको उत्तर ? मथिङ्मालखियाउँदा पनि आएन र गाउँ दिएँ अनि उत्तर पाएँ - चामल र बियाँ । ढिकीमाधान कुटेपछि अन्तमा फलिन्छु । फलियो भने बियाँ रहन्नन्‌, रहे पनि एकाधरहन्छन्‌, तर फलिएन भने बियाँ छयास्छयास्ती रहेका हुन्छन्‌ । यो प्रक्रिया रप्रविधि नबुझेकाले यस्तो गाउँखाने कवाको उत्तर जान्त-बुझ्न सक्दैन । वस्तुतःगाउँखाने कथालाई बुझ्न-जान्त त्यो लोकपरम्परा र संस्कृतिलाई बुझ्नैपर्ने हुन्छ,जहाँको त्यो सिर्जना हो । म त्यसबेला अबोध . थिएँ । त्यहीँदेखि गाउँखानेकथा र लोकसाहित्यप्रति म आकर्षित भएको हुँ । शिक्षा र रोजगारीका कारणझन्डै म यसबाट टाढिन थालेको थिएँ, मलाई मेरा गुरु चूडामणि बन्धुले मेरोअन्त:स्करणलाई ब्युँझाइदिनुभयो र म पुन: यसमै स्थिर भई गाउँखाने कथाकोअध्ययन-अनुसन्धानमा लागिरहेको छु ।&lt;br /&gt;
बालपत्रिकाहरू भैद्नासाथ गाउँखाने कथाको पृष्ठ खोज्नेबालबालिकालाई देखेर मलाई थप उत्साह प्राप्त भएको हौ । यसले गर्दा यसपुस्तकको प्रचम संस्करण खासगरी बालबालिकालाई ध्यानमा राखेर तयारपारेको थिएँ । तर त्यो पुस्तक सबै उमेरसमूहका लागि उपयोगी भएको पाएँ ।बजारका सबै ठाउँमा पुग्न नपाउँदै पहिलो संस्करण सक्यो । उतिखेरै प्रकाशकविवेक सिर्जनशील प्रकाशनबाट यसको आकार बढाई पुनः छाप्नै अभिलाषाप्रकट भइरहे पति त्यस्तो अवसर बल्ल जुटेको छ ।&lt;br /&gt;
प्रस्तुत संस्करण बालोपयोगी मात्र नभएर सबैका लागि बनाइएकोछु । यहाँ आधाभन्दा बढी पहिलौ संस्करणमा नपरेका गाउँखाने कथा समावेशगरिएका छन्‌ । यसले गर्दा यसको आकार, आयाम र महत्त्व झन्‌ बढेकोछु । यो सङ्कलन फगत्‌ किताबी सङ्कलन नभएर नेपाली लोकजीवनसम्मपुगेर उनीहरूले गाउँखाने कथा हालिरहँदा रेकर्ड गरेर ल्याई जम्मा पारिएकागाउँखाने कयाहरूमध्यैबाट प्षमेत तयार पारिएको हुँदा यस संस्करणमा नेपालीलोकजीबन प्रत्यक्ष प्रतिबिम्बित हुन पुगेको छ । यहाँ नेपाली लौकसमुदायको&lt;br /&gt;
ड्ै&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखाने कथा हा!&lt;br /&gt;
भावना, बौद्धिक चातुर्य, संस्कृति र परम्परा मुखरित भएको छ । त्यसैलेप्रस्तुत संस्करण ज्ञानार्जन तथा मनोरञ्जत चाहने बालबालिका, किशोरकिशोरी,युवायुवती इ ज्येष्ठ नागरिकहरूका लागि त उपयोगी हुने नै छ, साथै नेपालीगाउँखाने कथाको अध्ययन-विश्लेषण गर्न चाहने शोधार्थीका लागि पनि त्यत्तिकैउपयोगी हुनेछ भन्ने पूर्ण विश्वास लिएको छु ।&lt;br /&gt;
मलाई गाउँखाने कथाको शोधखोज र अध्ययनमा प्रेरित गर्नुहुने. गुरुप्रा.डा. चूडामणि बन्धुप्रति हार्दिक आभार प्रकट गर्दछु । मलाई यस्ता कार्यप्रतिहुटहुटी जगाइरहने प्रा.राजेन्द्र सुवेवी, प्रा. मोहनराज शर्मा, श्री कृष्णप्रसादपराजुली, प्रा.डा. महादेव अवस्थी, प्रा. गोपीकृष्ण शर्मा, प्रा.डा. दयाराम श्रेष्ठ,प्रा.डा. मोतीलाल पराजुली, श्री चूडामणि रेग्मी, श्री बालकृष्ण भट्टराई र प्रियमित्रघुव घिमिरेप्रति कृतज्ञता ज्ञापन गर्दछु । नेपाली लोकसमुदायबाट गाउँखानेकथा प्राप्त नभएका भए प्रस्तुत संस्करण तयार हुने नै थिएन । तसर्थ मतीसम्पूर्ण लोकसमुदायप्रति कृतज्ञ छु, जहाँजहाँबाट यी गाउँखाने कथाहरू सङ्कलनगरिएका हुन्‌ । मेरो अध्ययन-अनुसन्धान र लेखन कार्यमा सघाउ पुच्याइरहनैपरिवारजनलाई धन्यावाद दिन चाहन्छु । साथै, दोस्रो परिवधिंत संस्करण तयारपार्न अत्याइरहने तथा प्रकाशन गर्न उत्साह देखाई प्रकाशनको जिम्मेवारी समेतबहन गर्ने विवेक सिर्जनशील प्रकाशन र सो प्रकाशनका खासगरी श्री विजयराजआचार्यलाई म विशेष धन्यवाद प्रकट गर्न चाहन्छु ।&lt;br /&gt;
डा. कणिलदेव लामिश्डानेसहप्राध्यापक, त्रि.वि.हाम : गाल मा25 8(00091100.८07&lt;br /&gt;
पक पुहरराराराणणालााराणाणााातमाममाणामोलयाएकाशशामाकामाहेतेाामाएयणणणणलणण्म्णल्ण्जयम्णण्णबह.. जनत जिजलिहछि&lt;br /&gt;
प्रथम संस्करणको भूमिकापफराक्कशन : बालशिक्षा र गाउँखाने कशा&lt;br /&gt;
धोरै सहरी क्षेत्रलाई छाडेर भन्ने हो भने आज पनि आम नेपालीबालबालिकाहरू “एकादेशमा एउटा ..“बाट संसारलाई बुझ्न थाल्छन्‌, “&#039;घामपानी-घामपानी स्यालको बिह्रे ..&amp;quot;बाट लय हाल्न सिक्छन्‌, &amp;quot;एक लौरो टेक ...&amp;quot;बाटगणितको ज्ञान पाउँछन्‌, &amp;quot;चिचीमाथिको पापा । के हो ? ..“बाट तर्क रकल्पनाशक्तिको विकास गर्न थाल्छन्‌ । अत: थोरै कमी आएको भए पनिलोकसाहित्य आज पनि शिक्षाको पहिलो पुस्तक रहिआएको छ ।&lt;br /&gt;
बालपत्रिका हात पर्नासाथ बालबालिकाहरूले गाउँखाने कथा स्तम्भखोजेको र केही एफ्‌.एम्‌. रेडियोबाट गाउँखाने कथासम्बन्धी, कार्यक्रम प्रसारणहुँदा त्यसरी नै रेडियोका वरिपरि झुम्मिएको मैले पाएँ । हल्लिएर हिँड्नु तथाटेलिभिजन र क्रिकेटमा &#039;झुम्मिनुभन्दा यो धेरै उत्तम काम हो भन्नै मलाई लाग्छ ।बालबालिकाको त्यो चाख र अभिर्खंच देखेर मलाई यस क्षेत्रमा काम गर्ने उत्साहर प्रेरणा प्राप्त भएको छ । प्रेरणा ठूला मान्छेबाट मात्र पाइन्छ भन्ने होइन ।&lt;br /&gt;
नेपाली गाउँखाने कथा यसअघि पनि सङ्कलन भएका छन्‌, तरआपुवर्गलाई ध्यानमा राखेर तयार पारिएको पाइन्न । त्यसैले बालबालिकाकोआयुवर्ग र आवश्यकतालाई ध्यानमा राखेर तयार पारिएको गाउँखाने कथाकोसङ्कलनको नितान्त अभाव देखिन्छ । प्रस्तुत सङ्कलन त्यही अभाव पूरा गर्नेएउटा प्रयास हो । यसबाट नेपाली बालबालिकाको बौद्धिक विकासमा थोरै भएपनि सहयोग पुगे म आफूलाई धन्य ठान्नेख्नु ।&lt;br /&gt;
गाउँखाने कथाको प्रयोगबाट बालबालिकाले मनोरञ्जन, ज्ञान वा शिक्षार सीप हासिल गर्दछन्‌ह लोकसाहित्यको उपयोगमा वृद्धि हुन्छह लोकसाहित्यसंरक्षण-सम्बर्द्नमा सघाउ पुग्छह आनोपनप्रति श्रद्धा वढ्न गई बालबालिकामाराष्ट्रिय भावना जागृत हुन्छ ।&lt;br /&gt;
खासगरी पढेर, सुनेर र गरेर हासिल गरिने व्यावहारिक र सैद्धान्तिकज्ञान, सीप र बोधलाई शिक्षा भनिन्छ । बालकबालिकालाई वालोपयोगीढङ्गले दिइने शिक्षा वालशिक्षा हो । प्रकारान्तरले भन्ने हो भने बालशिक्षाभनेको वालकवालिकाले प्राप्त गर्ने वा उनीहरूलाई दिइने शिक्षा हो । यसबाटबालबालिकाको सामाजिक, बौद्धिक र शारीरिक विकास भई भविष्यमा&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखने का राणा ५.&lt;br /&gt;
उनीहरूको नैसगिंक गुणको विकास र सामाजिक व्यक्तित्वको वृद्धि हुनुकासाथै बुझाइको स्तर पनि माथि उठ्छ । बालक जन्मदा उसको दिमाग अरबौंतन्तुहरू (1८०1015) को जालोमात्र हुन्छु र त्यो क्रियाशील भइसकेको पतिहुन्न । अनुभवका आधारमा त्यो क्रियाशील हुन्छ र त्यसको विकास हुन्छ ।यस्तो विकास हुनु भनेको नै बालमरितष्कको विकास हुनु हो । पस अवधिलाईउपयौग गरिएन भने दिमागी चक्रहरूको असीमित कर्जा वा शक्तिको एक-एकअंशबाट बालक वाज्चित हुन्छ । यही दिमागी चक्रले श्वास-प्रश्वासदेखि मुटुकोढुकढुकी, शरीरको तापकम र शरीरद्वारा अचानक गरिने कियाकलापलाई तमैतनियन्त्रण गर्छ । त्यतिमात्र होइन, बाल्यावस्थाका अनुभवले बालबालिकाकोभविष्य निर्धारण गर्छ । उमेर छिप्पिएपछि छिटो सिक्न सक्ने हुन्छ भन्ने कुरागलत सावित भएको छं । ज्ञान हासिल गर्ने भन्ने कुरा सधैँभरि चलिरहन्छ,त्यो जीवनभर निरन्तर चलिरहने प्रक्रिया (..1[2 1018 11००९५5) हो, तापनिआधारभूत कुराहरू बाल्यावस्थामै सिम्ने-सिकाउने गर्नुपर्छ । वासिङ्टनविश्वविद्यालयका प्याट्रिसिया कुहल (&amp;quot;4004 फा) का अनुसार एकबालकलाई उसको मातृभाषाभन्दा अन्य भाषा दस वर्षको उमेरपछि सिकाइयोभने उसले त्यो भाषा मातृभाषाजत्तिकै बोल्न सक्दैन । सिकागो विश्वविद्यालयकामनोचिकित्सक जेँलेन हटन्‌लकर (1क्ाटाला पएटाग्लाटा) का अनुसारबालकले जति घेरै शाब्दहरू सुन्छ, त्यति नै चाँडो उसले सिक्छ ।&lt;br /&gt;
गाउँखाने कथाले बालबालिकालाई समस्या सुल्झाउने क्षमता, सोच्ने र कल्पनागर्ने शक्ति बढाउनुका साथै आनो तर्क राख्ने र अरूको तर्कको सम्मान गर्ने प्रवृत्तिको.विकास गराउँछ । यसबाट नबोल्ने वा कम बोल्ने बालबालिका पनि बोल्ने हुनमामदत पुग्दछ । त्यसैले गाउँखाने कथामा अभ्यस्त बालक दिमाग खेलाउन खप्पिस भईगणित र ज्यामितिका कठिन समस्या (१072 €) लाई पनि सजिलै हल गर्न समर्ध हुनपुग्छ भन्ने मनोवैज्ञानिकहरूको भनाइ रहेको छ । यसबाट बालशिक्षाको विकासमागाउँखाने कथाको भूमिकालाई बुझ्न सघाउ पुग्दछ । , ।&lt;br /&gt;
समाजको हरेक उमेरसमूहका व्यक्तिलाई मनोरञ्जन वा मनोविनौदआव्रश्यक छ । मनौविनोद सबैको शंचको बिषय पनि हो । मानिसको शारीरिक-मानसिक विकासमा मनोरञ्जनको विशेष भूमिका रहेको हुन्छ । त्यसमा .पनिविकासशील उमेर भएका बालब्रालिकाको सन्तुलित विकासमा मनोरञ्जनलेमहत्त्वपूर्ण भूमिका निर्वाह गर्ने तथ्य शिक्षाविद्‌ तथा बालमनोवैज्ञानिकहरूले पुष्टिगरिसकेका छन्‌ । लोकसाहित्यका विभिन्न प्रयोजनमध्ये मनोरञ्जन पनि एक हो ।&lt;br /&gt;
को 0२27 डा“ कपित लामिछाने&lt;br /&gt;
लोकसाहित्यका विध्याहरू लोककथा, लोकगीत, लौककविता, लोकनाटक आदिलेजस्तै गाउँखाने कथाले पनि बालबालिकालाई मनग्गे वुद्धिविनोद र मनोरञ्जनदिन्छ । लोकसमाजको बौद्धिक क्रियाकलापजन्य अभ्चिव्यक्तिको मुख्न्य माध्यमलोकसाहित्य हो । लौकसमाजका व्यक्तिहरू कहिले लोककथा हालेर, कहिले गीतर गाथा गाएर, कहिले कूरैपिच्छ्ै उखान प्रयोग गरेर मनोरञ्जन गर्छुन्‌ । अलिकतिफुर्सद भए तिनीहरू गाउँखाने कथा हालेर रमाउन चुक्दैनन्‌ । लोकसाहित्यलोकसमाजको त्यस्तो अभिव्यक्ति हो, जसमा लोकसमाजका इच्छाआकाङ्क्षा रपरिस्यितिहरू अभिव्यक्त भएका हुन्छन्‌ । त्यसैले लोकसाहित्यका माध्यमबाटलोकसंस्कृति तया लोकभावना बुझ्न सकिन्छ ।&lt;br /&gt;
नेपाली लोकजीवनमा गाउँखाने कथाको -विशिष्ट भूमिका छ । दिनभरकठोर श्रम गरी धकित भएर साँझमा घर फर्केका ग्रामीण नरनारीहरू अँगेनाकोडिलमा, मझेरी, पिँडी, आँगन, घनसार बा केही मान्छे वस्न सकिने ठाउँमाजम्मा भई गाउँखाने कथाको सम्पादन वा प्रयोग गर्ने गर्दछन्‌ । ख्यालख्यालमैगाउँखाने कथा सुरु हुन्छ । एउटाले समस्या राख्छ, अर्काले फुकाउँछ । सोफुकाउन नसके गाउँ दिन्छ अनि गाउँ खाए-पाएपछि समस्या राख्नेले नै गाँठोफुकाइदिन्छ । कहिले त यो अघोषित रूपमा प्रतिस्पर्धा नै हुन्छ- तैँले अड्काउनेकि मैले अड्काउने भनेर । “हात्ती छिन्यो, पुच्छर अढ्क्यो । के हो ?&amp;quot; भन्दैएउटाले प्रश्न राख्छ, अर्काले “लुगा सिएको” भनी जवाफ दिन्छ । जवाफदिन सके गाउँ दिन्छ र प्रश्न राख्नेले नै उत्तर बताइदिन्छ । नेपाली गाउँखानेकथाको सम्पादन-प्रक्रिया यही हौ । यसबाट मनोरञ्जन, समयकटनी र वौद्धिककसरत पनि हुन्छ । त्यसैले मनोरञ्जन र बुद्धिपरीक्षालाई गाउँखाने कथाकोउत्पत्तिका कारक तत्त्व तथा मुख्य प्रयोजन पनि मानिएको छ ।&lt;br /&gt;
आज सहरबजारमा मनोरञ्जन वा मनोविनौदका थुप्रै साधन उपलब्धछन्‌ । गाउँघरमा आज पनि मनोरञ्जनका साधन पुगेका छैनन्‌ । पहिलेकोकुरै के गर्नू ? त्यस्तो अवस्थामा लोकसाहित्य मनोरञ्जनको भरपर्दी र सुलभसाधनका रूपमा रहेको थियो । लोकसाहित्यको एउटा विधाका नाताले गाउँखानेकथाले पनि लोकमानसलाई मनग्गे मनोरञ्जन र बौद्धिक खुराक प्रदान गर्दैआएको छ । लोकसाहित्यका अन्य विधाका तुलनामा गाउँखाने कथामा बौद्धिककसरत बढी हुने हुँदा यसतर्फ लोकसमाजको बढी आकर्षण पाइन्छ । यसलेलोकजीवनलाई सरत्त बनाइआएको छ । गाउँखाने कथामा वाक्चातुर्य हुने रत्यकषैबाट मनोरञ्जन पनि हुने हुँदा गाउँखाने कवालाई भाषिक कला (४८11241&lt;br /&gt;
७&lt;br /&gt;
रमाइसा गाउँखाने काका ।&lt;br /&gt;
शा) र भाषिक खेल (४९०४] 831772) पनि भन्ने गरिन्छ ।&lt;br /&gt;
मानिसहरू एकै ठाउँमा भेला भएपछि मनोरञ्जन र बौद्धिक क्रियाकलापकारूपमा क्रैकुरामा उत्तर आउने खालको समस्या राखिने र वातावरण कुतूहनपूर्णहुने अति थर्खेले आनो चुद्धिले भ्याएसम्म त्यसको उत्तर दिने झन्डै प्रश्न-उत्तरमूलक लोकसाहित्यको एउटा सशक्त विधा गाउँखाने कथा हो । बाहिरकाली कोइली, भित्र तामा चोइली । के हो ? (मसुरौ)/ नौतले घरको नभ्याल न ढोका । के हो ? ।बाँस)/ धार्नी न बिसौली, दुई हातले उचाली ।के हो ? (टोपी लगाएको)” वनतिर जाँदा घरतिर मुख, घरतिर जाँदा वनतिरमुख । के हो ? (वन्चरो/बन्दुक)/ यो मेरो टेक्ने, यो मेरो छेक्ने, परिआएकोबेलामा पुपुरो सेक्ने । क्रे हो ? (लौरो) आदि गाउँखाने कथाका केही उदाहरणहुन्‌ । गाउँ दिने र गाउँ खाने प्रचलन संस्कृत, हिन्दी, अवधी, भोजपुरी, अङ्ग्रेजीआदि भाषाका गाउँखाने कथा-प्रक्रियामा रहेको पाइन्न । यो नेपाली गाउँखानेकथाको वैशिष्ट्य हो । विभिन्न परिभाषाका सहयोगबाट नेपाली गाउँखानेकथाको परिभाषालाई एक पक्षले समस्या वा पश्न राख्ने र अर्को पक्षले त्यसकोउत्तर दिने वा उत्तर दिन नसके गाउँ दिने र्‌ प्रश्नकर्ताले नै नाउँमात्रको गाउँलिएर आफूले राखेको समस्या वा प्रश्नलाई फुकाउने लोकसाहित्यको मनौरञ्जकबौद्धिक कसरत हुने एउटा सशक्त र स्वतन्त्र विधा गाउँखाने कथा हो भनीपुनर्निर्माण गर्न सकिन्छ । गाउँखाने कधा लोकताहित्यको एक मनोरज्जनपूर्णबौद्धिक कसरतको सशक्त र स्वतन्त्र विधा हो । गाउँखाने कथा अन्य विधाभन्दायसको बौडिकता, प्रश्नात्मकता, खिरिलोपना आदिले गर्दा फरक देखिएको छ ।&lt;br /&gt;
सबै गाउँखाने कथा एकै खाले छैनन्‌, एकै ढङ्गले प्रस्तुत पनि हुँदैनन्‌ ।मुख्यतया गाउँखाने कथा प्रश्न वा प्रश्नमूलक हुन्छन्‌ । प्रश्नले समस्या खडागर्छ । प्रश्न समाधान गर्न श्रोता (दोस्रो पक्ष)ले गम्भीर भएर सोच्छ- अनुमानलगाउँछ- मथिङ्गगल खियाउँछ र उत्तर बताउँछ । मिल्यो भने स्याबासी पाउँछर मिलेन भने उसले प्रश्न सोध्ने वा पहिलो पक्षलाई गाउँ दिनुपर्ने हुन्छ । गाउँपाए वा खाएपछि पहिलो पक्षले त्यसको उत्तर बा अर्थ बताइदिन्छ । गाउँखानेकथाको प्रस्तुतिको मूल ढाँचा वा स्वरूप यस्तो भए तापनि यसैभित्र पनि अनेकजौली वा तरिका छन्‌ । केही नमुना-नमुना -१&lt;br /&gt;
पहिलो पन्न - तँ भन्दा नछोडने म भन्दा छोड्ने के हो?दास्रो पक्ष - ओठ।&lt;br /&gt;
पा “ हा कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
लमुला -२पहिलो पक्ष - एकै र मुढी जिरीको साग तेल घिउले झान नधरतीमुनि सुनको फाली त्यो क्या हो जान न!दास्रो पक्ष - एकै र मुठी जिरीको साग तेल घिउलै &#039;फान नधरतीमुनि सुनको फाली हलेदो जान न!पहिलो पक्ष - एकै र मुठी जिरीको साग तेल घिउले झान नपूर्वकी रानी पश्चिम जाने कै होला जान न !दोप्रो पक्ष - रमाइलो गर्ने कुसले बाजा ताल दिने ढोलकीपूर्वकी रानी पश्चिम जानै घामजून होला कि!नमुना -३पहिलो पक्ष - हिँड्दैछ मद्याङ्ग्रा पार्दैछअत्ती न. पत्ती नजान्ने कत्ति म्या हौ? ।यसको अर्थ केहो?।दास्रो पक्ष - बाखाले वडकौँल्याएको ।पहिलो पक्ष - स्याबास ।&lt;br /&gt;
तर दोसो पक्षले उत्तर दिन सन बा गलत उत्तर दियो भनेयसको प्रकिया यसरी लम्बिन्छ ।-&lt;br /&gt;
पहिलो पक्ष - भन्न सकेनौ भने गाउँ देकङ ।&lt;br /&gt;
दोग्रो पक्ष - लन, फलानौ गाउँ लेक !&lt;br /&gt;
पहिलो पक्ष - त्यो गाउँको सेरोफेरो जम्मै मेरोत्यहाँका राम्रा-राम्रा घर जम्मै मेराबालीविरुवा, फलफूल सवै मेरानाच्ने, गाउने राम्रा कलाकार मेरादुधालु गाई-भैँती मेरावढालु भेडा, वाख्रा मेरा !त्यहाँका गाँडा-गर्चा सबै तेरालुरे, लाग्ने, रालै, सिँगान सबै तेराठिटा-धारा गाई-भैं्ी तेरादामरा-सेप्रा भडा, बाख्रा तेरामीठा-मीठा सवै मलाई&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखाते कथा नाफा ५,&lt;br /&gt;
तीता-तीता सबै तँलाईमैले जानै तैँले जानिनस्‌ । के होरदोस्रो पक्ष- कं हो?पाँहलो पक्ष- लौ पुन, सबैले सुनराम्ररी सुन, कान थापेर सुनयसको अर्थ हो- बाख्राले वड्कौँल्याएको !दोम्रो पक्ष - ए ! यति पनि बुस्न सकिएनछ, सजिलै त रहेछ नि!गाउँखाने कथा प्रस्तुतीकरणका यस्ता थुप्रै ढाँचा भए तापनि विस्तारका भयलेयहाँ त्यसतर्फ सङ्केतमात्र गरिएको छ । सबै ढाँचाको खोजी हुनु जरुरी पनि छ ।नेपाल गाउँ नै गाउँले भरिएको मुलुक हो । कामले लखतरान परेकाबेलामा साँझ-बिहान वा दिउँसै पनि फुर्सदको क्षणमा ग्रामीण समाजकावृद्धवृद्धाहरू, युवायुवतीहरू तथा बालबालिकाहरू समेत गाउँखाने कथाकामाध्यमबाट मनग्गै मनोरञ्जन लिने गर्दछन्‌ । गाईवस्तु, भेडाबाख्रा चराउन,घाँसदाउरा काट्न र मेलापात गएका बेलामा नेपाली वयस्क बालबालिकाहरूयस्ता गाउँखाने कथा भन्ने र मनोरञ्जन लिने काममा सरिक हुने गर्दछन्‌ ।शिक्षा र सभ्यताको विकासले गर्दा यस्तो प्रचलनमा कमी आएको भए पनि योपरम्परा अद्यापि कायमै छ । अर्कातिर यो परम्परा पिँढी, चरन र वनपाखाबाटस्कुलका कक्षा कोठा वा अध्ययन कक्षमा सर्ने क्रममा रहेको पाइन्छ । ठाउँबदलिने उपक्रममा छ, तर परम्परा लौप भइहाल्नै अवस्था भने छैन ।गाउँखाने कथा लौकजीवनका हरेक आयुवर्गका व्यक्तिहरूकै विषय हो ।त्यस्तै बालबालिकाको विषय पनि हो । खासगरी पाँचछ वर्ष र त्यसभन्दा माथिकाबालबालिकाहरू बौद्धिक क्रियाकलापमा संलग्न रहने हुँदा गाउँखाने कथा पनितिनले प्रयोग गर्दछन्‌ । शैशव अवस्थाका बालबालिकाहरू भने गाउँखाने कथाउपयोग गर्न सक्दैनन्‌ । जब बालबालिकाहरू पाँचछ वर्षतिर पुग्छन्‌ अनि&amp;quot; सानोसानो रुख चढ्नाको दुख, के हो ?, चार चुच्चे मुख बुच्चे, पानी खान्छे,घाममा सुत्छे, के हो ?, चिचीमाथिको पापा, के हो ? जस्ता गाउँखानै कथाभन्न थाल्छन्‌ । तिनीहरू यस्ता गाउँखाने कथा आफू अरूबाट सोधिँदा सोचेरउत्तर दिने प्रयास गर्न थाल्छन्‌ भने आफूले जानेपछि फेरि अरूलाई आफैँ पनिसोध्न थाल्छन्‌ । यसबाट तिनमा बौद्धिक कसरत हुन्छ, सोच्ने-बुझ्नै र तर्क गर्ने,अनुमान गर्ने शक्तिसामर्ध्य बढ्छ । तिनीहरू हाँस्छन्‌-रमाउँछन्‌ । वालशिक्षा रबालविकासका दृष्टिले यो कम महत्त्वको विषय होइन ।&lt;br /&gt;
१६ पाए डा. कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
गाउँखाने कथाको प्रयोग पिँढी, चरन र वनपाखाबाट क्रमश: स्कुलतिरिसर्वै गएकाले नयाँनयाँ गाउँखाने कथा देखापर्दै आएका पनि छन्‌ । समाजनिरक्षर अए पनि अवौद्धिक थिएन भने साक्षर-शिक्षित हुँदा झन्‌ अबौद्धिक रहनेप्रश्नै उठ्दैन । अबका शिक्षित बालबालिका यसमा स्वयम्‌ सक्रिय रहनेछन्‌ ।नेपालका स्कुले पाठयक्रम र पाठ्यपुस्तकमा गाउँखाने कथालाई खासै स्थानदिएको पाइँदैन । बालशिक्षा र बालविनोदका लागि गाउँखाने कथा नै पर्याप्तछन्‌ भन्ने होइन, तापनि गाउँखाने कथा पति बालविनोद र बालशिक्षाको सहायकहुनसक्ने हुँदा यसलाई यधोचित मात्रामा पाठ्यक्रम र पाद््यपुस्तकमा समावेशगरिनु भने आवश्यक देखिन्छ । अतः स्कुलका पाठ्यक्रम, पाठ्यपुस्तकहरूनिर्माण गर्दा गाउँछाने कथाले तिनमा स्थान पाउनुपर्छ र कोठाभित्रै वसेरपनि बैद्धिक खेलका रूपमा वा बौद्धिक कसरतका रूपमा यसलाई उपयोगमाल्याएर बालबालिकाको मानसको विकासमा थप सघाउ पुन्याउनु सामयिकदेखिन्छ । गाउँखाने कथामा अभ्यस्त बालक दिमाग खेलाउन खप्पिस भईगणित र &#039;ज्यामितिका कठिन समस्यालाई पनि सजितै हल गर्न समर्थ हुने हुँदाबालशिक्षाको विकासमा गाउँखाने कथालाई समावेश गर्नु उपयुक्त देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
प्रस्तुत सङ्कलन पन्ध्र वर्षसम्मका बालबालिकालाई ध्यानमा राखेरगरिएक्रो हो । त्यसैले यसबाट बालबालिका त विशेष लाभान्वित हुने नै छन्‌ ।यसका साथै किशोर-किशोरी, वयस्क तथा वृद्वृद्धाहरूले पनि यसबाट ययोचितलाभ लिन सबनेछन्‌ ।&lt;br /&gt;
यहाँ भरिसक्के लोकसमाजमा भिजेका गाउँखानै कथालाई लिइएको छ ।साथै, ठूलो जनसमुदाय अन सहरतिर आकर्षित भइसकेको अवस्थामा सहरमाबसेर नयाँ वस्तु र प्रविधिसम्बन्धी गाउँखाने कथाको सिर्जना गर्दै, प्रयौग-प्रचलनमाल्याउँदै गरेको हुँदा यहाँ त्यस्ता गाउँखाने कवालाई पनि स्थान दिइएको छ्‌ ।यसबाट गाउँ-सहर सबै क्षेत्र लाभान्वित हुने विश्वास लिएको छु ।&lt;br /&gt;
गाउँखाने क्या लोकसमुदायका सम्पदा हुन्‌ । गाउँखाने कथामा हामीसबैको अधिकार छ । गाउँखाने कथा सबैका सामु पुन्याउनु हामी सबैकोकर्तव्य हो भने सबैले पाउनु हामी सबैको अधिकार पनि हो ।. यतिखेर विवेकसिर्जनशील प्रकाशन आनो त्यस कर्तव्यलाई पूरा गर्न कस्सिएको छ । मेरो यसप्रयासलाई साथ दिई बालबालिकाको हित र लोकसाहित्यको संरक्षण-तम्बर्द्धनकालागि काँध थापेकोमा विवेक सिर्जनशील प्रकाशन घन्यवादको हकदार रहेकोछ । म सो प्रकाशनलाई धन्यवाद दिन चाहन्छु ।&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखाने कथा णाााएएआए77) ”)&lt;br /&gt;
रमाडलागाउँखाने कशा&lt;br /&gt;
० अँजुलीभरि सुनका मुन्द्रा। के हो? न्दुनो&lt;br /&gt;
«५ अँधेरी रानीवन, गाई हरायो खौज्न जाम्‌ । के - जुम्रा हेरेको० अँध्यारामा बस्ने झत्री बढी,&lt;br /&gt;
विहानै उठेर लुटुपुटु गर्छँ। के हो? - पोतेको “पोतो० अँध्यारी ओड्वारमा सेता जन्ती । के हौ? न दाँत-. अँध्यारो कुनामा काली बढी। कं हो? हाँडी० अँध्यारो घरमा दहीका छिटा। कं हो? - चाँदीका सिक्का« अँध्यारोमा देखिन्छ, उज्यालोमा छैन,० जति कोतित्त गरै पनि टिप्न सकिँदैन । कै हो? - तारा० अँध्यारोमा वस्ने झुत्री बुढी,&lt;br /&gt;
बिहान सबेरै उडेर लुटुपुटु गर्छै। कै हो? न पौतो० अँध्यारोमा हराउँछु, उज्यालोमा आउंछु,० जना जान्छन्‌ मेरा उनी, उततैतिर घाउँछु। के हो: - छायाँ५ अकासिँदा जहाँतहाँ, पा्तलिँदा कहाँकहाँ ? के हो? - चराचरुङ्गी«० अक्षर छ, किताव होइन; गोलो छ, इनार होइन;&lt;br /&gt;
संसार डुल्छ, खुट्टा छैन। केहो? - पैसा० अमर छन्‌, पुस्तक होइन; लेख्छ, क्लम होइन;० टुकटुक घडी होइन । के हो? - टाइपराइटर2 अखैटै पखेटै गहभरि आँस, भित्र नसा वाहिर मासु । के हो? - आँप० अगाडिको काट्दा खाने चिज हुन्छ,&lt;br /&gt;
त्रीचको काटदा सुन्ने अझा वन्छ। केहो? &amp;quot; कानुन५ अगाडि शड्ख, पछाडि पड्ख। कै हो? - कुकुर५ आगाडि साइन, पुठामा लाइट । केहो? - जञनक्रिरी«० अर्गाडि हिँड्छ, पछाडि वाटो युन्छ। के द्वोः - लुगा सिएको५ अगाडि हिँड्दा, पछाडि वाटो वन्दो। केहो? &amp;quot;सियो र घागो&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखते कधा पाए&lt;br /&gt;
अगाडि &amp;quot;ऐनाछि - डुङ्गा&lt;br /&gt;
अगैनौ, चली कनै हवोट्रत अगूल्टो ल्याई ओएन्छा,&lt;br /&gt;
सफासुग्घर अनुहारमा खरानीले पोत्छन्‌ । के हो? न्एस्ट्रे&lt;br /&gt;
आलो चुलीको एउटा पाखामा एक चुँगा फूले। - नाकको फूली&lt;br /&gt;
अग्लो डाँडामा दुईबटा सुरुङ । के हो? न नाक&lt;br /&gt;
अग्लो देखिन्छ, धरहरा होइन; निहरिन्छ वेहली होइन । के हो? - बाँतत&lt;br /&gt;
आलो पहरामा एउटा खुड्किलो । के नाइटोअग्लो पहरामा गुराँस फुलेको। के हो: नटीकाआग्लो पहरामा चहै-चहै गर्ने। के हो? - लिगलिगैआलो भीरमा भैडा थुप्रिएका । के हो? - अक्षताको टीकाअग्लो रूखमा एउटा खोचे पान। केहो? - डाडुअग्लो शखमा एउटै पात। के हो? - पनिउँअघिअघि महादेव, पछिपछि जन्ती । के हो? - मौरी केरा पसाएकोअघिअघि रतुबा पछिपछि कलुवा । के हो? - डढेलो&lt;br /&gt;
अघिअघि शड्ख बज्छ, पछिपछि ध्वजा हल्लन्छ । के हो ?- कुकुर भुकेकोअधिपछि अगाउने, चाडबाडमा भोकाउने । कं हो? - मदुस&#039;ब्ाकसअघिपछि आँको आँ, खाने बेला मुख च्याप्प । के हो? - नङ्ककट/चिम्टाअघिपछि खाने चाडबाडमा भोकै । के हो? - बोक्चोअघिपछि गुटमुटिएर वस्ने,&lt;br /&gt;
पाहुनापाल्ला आए उत्तानो परेर सुत्ने। के हो? -गुन्दीअघिपछि जुँगो दाइ मुख खुम्च्याई बस्छ,&lt;br /&gt;
जुँगा उसको तान्यो भने मुख वाई हाँस्छु। के हो? - मैलीअघिपछि चिल्लो, चाडबाडमा फुग्रो। कै हो? -ढिकीअघिपछि पेटभरि खान्छ, चाडवाडमा भोकै पर्छ। के हो? - बोक्योअघिपछि लम्पसार, काम सकिना माथ नुहाउनको हतार । के हो?&lt;br /&gt;
- भाँडाकुँडा माझेकोअघि बढ्दै छ, पोको छाड्दै छ। के हो? ञ्फर्सीअगाडि दिँड्छ, पछाडि चाटो थन्छ। के हो? - लुगा सिएकोअग्ला पहरामा बह्दै चहै गर्छ। केहो? - ल्गिलिगै&lt;br /&gt;
अघि चसे कँही न कही, पाँछ बसे जेको त्यही। के हो? -शन्प&lt;br /&gt;
पा आप डा काँपल लामिछान&lt;br /&gt;
० अघि म हरियो थिएँ, पछि भएँ राती,&lt;br /&gt;
कुत बैरीका फेला परेँ कागजस्ती काली। के हो? ज्चुक. अघि हिँड्दा, पछि बीउ छर्दो। कै हो? - बाखाले वड्कौँल्याएको० अघिल्लो एक अक्षरले ल अब जार,&lt;br /&gt;
पछल्ला दुई अक्षरले खाने कुरा खाङ,&lt;br /&gt;
पूरै अक्षर मिले प्रख्यात देशको नाउँ। के हो? “जापान० अङ्ककटवबङ्ककट दस बाहाँ,&lt;br /&gt;
आँखा तेरा टुलुटुलु, मुख तेरो काहाँ: के हो? - गँगटो० अचम्मकी चरी आगोमा परी,&lt;br /&gt;
पुच्छरले पानी खाँदै ऐय्याएय्या गरी । -बत्ती र तेल० अजङ्ग बाबु जङ्ग छोरो, कालो नाति सेतो पनाति। के हो? - कटुस० अडकाम पड्काम तेरा बाबुको टुप्पी चड्काम। के हो? ० जँगा&lt;br /&gt;
० अड्धका “मसिना, जवाफ नजाने निकाल्तै पसिना,घोल्लिई सही उत्तर देङ, खस्लान्‌ कि असिना । के हो ? - गाउँखाने कथा. अड्किने ताउलीको खडकिनै आत, खारखुर पारी एकै गास। के हो?&lt;br /&gt;
- औखरन अत्ती न पत्ती पिँधमा बत्ती। के हा? न जूनकिरी० अनगन्ती खम्बामाथि घुमाउने छत,एक जनामात्र वस्ने के हो त्यसको जात? ज्मुढा० अनिकालमा सुत्छस्‌, सहकालमा ककल्ड्याइ। के हो? न्ढिकी» अन्जन न मन्जन चाकमा चन्दन । कै हो? - कसौँडीमा खरानी लगाएको५ अन्न खान्छु सानी किरी, स्यालबाट फुत्त छिरी। के हो? - घुन० अपट्ठी छोरीको फटफटी कान, छोरीले खाई कैयौं मुरी धान। के हो?ज्ढिकी० अरूका मुख्खाँ दाँत, मेरा पेटाँ दाँत। के हो? - गँगटौ /दारिम५ अरू वेला देखिने, सूर्य आए नदेखिने । कं हो? ज्तारा५ अरुले छुनासाथ लजाउने,सिङ्गो साज सिदध्याउने । के हो? - लज्जावती झार५ अल्ले देख्ने घामले नदेछ्ने । कै हा? - अँध्यारो« अरघाँतोले पाउना, फक्राई-फकाई ल्याउना, काचीकोची ख्वाउना,भाँडामा मुताउना, घुचेटेर पाउना । के हो? - उखु पेलैकौरमाइला गाउँखाने कषा ााााााााआ% .&lt;br /&gt;
अर्जुनको टुप्पोमा आगो लाग्यौ, किदी चौरमा पानीमा पस्यो,रेसुङ्गामा निस्केर मानिसका मुखभित्र पस्यो। के हो? - तमाखु स्गणकरअलङ्ककी गती पहरगा सल्छे, तुर्जेलाई देख्दा लुपुक्क लुक्छै। के हो?&lt;br /&gt;
&amp;quot; शीतअसिनी-खसिनी सिन्कामाधि वसी नि। के हो? - शीतअस्थिपञ्जर शरीर छ, बुई चढी हिँड्छ। कै हा? -डोकोअहिले कालो भए पनि पहिले थिएँ रातो,खुन आयो भने कोही उडाददिन्येँ सातो। के हो? - अँगारअहिलै फुल्न, अर्को साल फल्ने। के हो? &amp;quot;कटुसअहिल्यै छ, अहिल्यै छैन। के हो? - जुनकिरी&lt;br /&gt;
[]&lt;br /&gt;
१६ पा&amp;quot; डा. कपिल हामिछाने&lt;br /&gt;
ो)&lt;br /&gt;
आँखा काटे मर्ने, घिच्रो काटे सर्ने। के हो? ज्ड्खुआँखा छ, देख्न सक्दैन; खुट्टा छन्‌, हिँड्न सक्दैन। केहो? -चस्माआँखा छ, देख्दैन; कान छ, सुन्दैन; मान्छै हो, बोल्दैन। के हो?&lt;br /&gt;
- सालिक / तस्बिरआँखा छैन, भुइँतिर हेर्छ कान निमोद्यो, बान्ता गर्छ। के हो?- घाराआँखाजस्तो छ, आँखा होइन, पड्खा जस्तो छ, पड्खा होइन । कै हो।&lt;br /&gt;
- मुजुरको प्वाँखआँखा झिमिम्क झिम्क्यायो कि पेटभित्रै, निम्त्यायो । के हो? - क्यामराआँखा हुने एकातिरमात्र हिँड्छ, आँखा नहुने दुवैतिर हिँडछ। कै हो?&lt;br /&gt;
-सर्पर आँधोआँखा हुने तिखै उड्दै अघि बढ्छ,टाउको हुने तिखे खेतमै अद्दकेर बस्छ। कै हो? - तियौ र पिनआँखा हुने तिखे उन्दै अघि बढ्छ, टाउको हुने तिखे पहिलो खेपमै अद्द&lt;br /&gt;
किएर बस्छ। के हौ? - सियो र पिनआँखीसयाल भनौँ ख्याल होइन, जीउभरि प्वाल । कै हो? - हतासोआँखो छ, माखो रमाउँछ, न हेर्छ न देख्छ। कै हो? - खटिरो&lt;br /&gt;
आँखा छैन भुइँतिर हेर्छु, कान निमोठ्यो बान्ता गर्छैँ। के हो? - धाराआँ त आँ, चारै बाँ, आँखा टुलुटुलु मुन्टो त काँ। कै हो? - गँगटौआँसुल पाँसुला रातभरि टासँला,&lt;br /&gt;
झिसमिसैमै फुत्त निस्की आफ्नै ठाउँमा बसुँला। के हो? - आग्लौआइँकुटी-बाइँकुटी कुटीकाइँ, आंखा त ट्वालद्वाल मुन्टै नाइँ। कै हो?&lt;br /&gt;
न गँगटोआई गुजी पाई गुजी, पानी देखी डराई गुजी। के हो? &amp;quot;जुत्ताआई बूढी मच्चिदै, राई बूढी थचिँचदै । कै हो: न पिङआउँछ, जान्छ; देखिँदैन, त्यो चिता बाँचिदैन। कै हो? - हावा&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखाते काय 190&lt;br /&gt;
आउँछ, जान्छ; पर्खदैन, कहिले पनि फक्दैन, कततैसँग थर्कदैन। के हो?&lt;br /&gt;
- काल/समय&lt;br /&gt;
आउँछ, बेखित्छ, चिचप्पाचर पायो, सन्चा हुन्छ; बिलाउँछ। कै हो?- लुतौ र कनाइ&lt;br /&gt;
आउँदै आउँदैन, आएपछि जाँदै जान्त। के हो? -गाँडआउने-जानेलाई खान दिएस्‌, आफूलाई चाइने लुगा लिएस्‌ । के हो?&lt;br /&gt;
- ऐसेलु&lt;br /&gt;
आउने थाहा पनि दिन्न, आयो भने नलिई पनि जान्न । कै हो? - काल&lt;br /&gt;
आङ नानी मैरो पुठो खाक। के हो? ० पिर्काआएको थाहा पाए गयो भन्छन्‌, निस्केको देखे पसायो भन्छन्‌ । केहो?&lt;br /&gt;
- भुइँचालो र केरा&lt;br /&gt;
आएको चाल थाहा पाए गयो भन्छन्‌ । केहो? - भुइँचालो&lt;br /&gt;
आएन भने आउँछ, आयो भने आउँदैन।&#039;के हो? - खोला बढेको&lt;br /&gt;
आकार भने बडेमानको हात्तीभन्दा ठूलो,भित्र जाने सारै सानो एउटै मात्र दुलो। के हो? न्घर&lt;br /&gt;
आकाशका तारा धर्तीमा आए, घर्तीमा आउँदा मौरी रमाए। के हो?- तोरीआकाशकी रानी पातालमा खसी, सूर्यलाई देख्ता थुपुम्क वसी। के हो?&lt;br /&gt;
नशीतआकाशको आगो पातालको पानी, हातले समाई मुखले तानी। के हो?- तमाखु खाएकोआकाशको फल पातालमा झन्यौ, भर्नेवित्तिकै विलाई मन्यो। के हो?- असिनाआकाशको मैदान, रुखको बास,घर्तीको बिस्कुन चुच्चाको गास । के हो? ज्चराआकाशबाट आगो बर्सन्छु, पातालबाट पानी बसंन्छ,बीचमा मेघ जर्गन्छ। के हो? न हुककाआकाशमा आगो, पातालमा पानी,म्बाइँ खान जाँदा चिच्चाउने वानी । के हो? - तमाखु खाएको&lt;br /&gt;
आकाशमा उङ्छ, चरा होइन; जनै लगाउँछ बाहुन होइन । के हो? - चङ्गाआकाशमा उड्छ, चरा होइन; बतासमा खेल्छ पानी पर्नु हुन्न । के हो?न्चङ्कगा&lt;br /&gt;
(पन ाआाआााआाआाआ7112171 डा कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
आकाशमा उड्छ ठूलो चरी, काखमा वसाई घुमाउँछ वरिपरि । के हो?&lt;br /&gt;
- हवाइजहाजआकाशमा उड्ने-डुल्ने, बस्ने रुखमाथि,खान जाँदा धर्तीमा हुन्छन्‌ सँगीसाथी । के हो? ज्चराआकाशमा टाँगेको बाटुलो रोटी। के हो? - चन्द्रमाआकाशमा पानी, गर्भमा नानी। के हो? ज्र्क्तीआकाशमा हिँड्छ आकाशमै छ घर,बिहान हुन्छ एकातिर, साँझ अन्तै सर। के हो? “पूआगो न पानीको लल्लौरे रोटी। के हो? - मौरीको चाकोआगो न पानी, भुकभुके रोटी। के हो? - मौरीको चाकोआगौ न पानी रोटी पकाउने नानी। के हो? -मौरीआगो न गागो घुवाँमात्रै आयो। केहो? -कृहिरौआगोमा उभिएर तीन भाइ निहरेका, घाँटीमा एउटै सिक्री सिउरेका ।केहो? - ओदानआगोत्तागी कँही छैन धुवाँको मुस्लो। के हो? न कृहिरोआङ्कुडे-बाङ्ककृडे टाङ्कुडे टाइँ, आँखा त टुलटुल मुन्टो त नाइँ। केहो? - गँगटो&lt;br /&gt;
आङ्कडे-बाङ्कुडे बोकेको, छाता ओडी उभिएको । के हो? - मेवा, मेवाको बोटआजभन्दा भोलि लामो जलिभन्दा पर्सि,&lt;br /&gt;
नकाटेमा केटाकेटी डराउँछन्‌ तर्सी। के हो? - दारीआज मैले अचम्म देखेँ लामालामा पात,काटीकुटी कुद्दका खाएँ के हो त्यसको जात ? न उखुआज मैले अचम्म देखेँ लामालामा पात,पकाएको पोली खाने के हा त्यसको जात? - तमाखुआटी न पाटी तीन सय साठी। के हो? - तारा/किताबआधा पसे दुख्छ, सबै पसे दुस्दैन। के हो? - चुरा लगाएकोआन्द्रामुँडी प्यास्स भयो, टुप्पी समाई तान । के हो? - जालआपा कुचो पाप कुचौ पैला कुचो झ्याङ्-ड्याङ । के हो? नजुकाआफूचाहिँ कालो छ, रातो पानी खान्छ। के हो? जुम्राआफू चाहिँ सेता छ, काली कोट लाउँछ, रातो पानी खान्छ। के हो?- खुकुरी&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखाने कधा 777”,&lt;br /&gt;
आफू छ उत्रो, कराउंछ कत्रो। के हो? - - शङ्ख&lt;br /&gt;
आफू छ कागत, ठूलो छ तागत। केहो? न नौटआफ छ काली वाम भने रति। केहो? 0 0011आफू छ डल्ली, बीचमा छ दुलो, दुलोमा सुई लगाउँदा खुरुक्क खुल्यो ।केहो? - ताला र चाब्रीआफू छ मुढो, डाँको छठूलो। के हो? कै बन्दुकआफू जतातिर गयो उतैतिर जाने। के हो? - छायाँआफू जहाँ गयो, त्यहीँ जान्छ। के हो? - छायाँआफू पनि माले, छायाँ पनि मालै। के हो? नडोकोआफू भने कोदाको गेडाजत्रो, यल्लाई पाए पनि खान्छ,&lt;br /&gt;
उल्लाई पाए पनि खान्छ। के हो? - खपियाँआफू भने याङ्ने, घोडा चढी मार्ने। कै हो?) . - घुम/स्पाखुआफू भने माग्ने, सुनको टोपी लाउने। केहो? : - ऐसेलु“आफू भने सेतो छ, कालो कोट लाउँछ, रातो पानी खान्छ। केहो?&lt;br /&gt;
&amp;quot; &amp;quot;खुकुरी&lt;br /&gt;
आफू राजा खान्छ खाजा, झिक्छ सोला, छर्छ पीठो । के हो ?- आगोआफूले मात्र देख्न सकिने एउटा यस्तो कुरा,&lt;br /&gt;
खास अकैँ हुन्छ, हुन्न कहिल्यै पूरा के हो? &amp;quot;सपनाआफैँ बच्चा जन्माउँछ, आफैँ खान्छ। के हो? - सर्प/सर्पोंआफैँले वनाउनी, आफैँ पस्त-बस्त नपउनी । के हो? -- ज्यामी र घरआफ्ना दुवै लुला हातले आफ्नै गालाँ ठोक्छ। के हो? - डमरुआफ्नो घरमा भात पकाई अरूको घरमा तिहुन चखाई।. के हो? -आग्लोआमा आज मरी, छोरी भोलि जन्मी। कै हो? - घर छाएकोआमाका पेटमा नानी, नानीका पेटमा पाती । के हा?- कुखुरा र अन्डाआमाको पेटमा छोरी चलिरहन्छे। के हो? - ताला र साँचो&lt;br /&gt;
आमाको कलेजो-मुदु, छोरी झिम्छे सुदुसुदु । के हो? - भात पस्केकोआमा कुप्री-झुप्री, छोरी भर्खरकी सुन्दरी । कै हो? - गुलाबको फूलआमा कोप्ची “बोक्सी, छौरी सुकुमारी। के हो? - गुलाबको फूलआमाको नि मामा, मामाको नि मामा, मेरो नि माम्ा। के हो?- चन्द्रमाआमाको पेटमा : नानी, नानीको पेटमा पानी। के हा? न्रक्सीआमा खोला पारि जानु भा&#039;छ, कं आए आउनु हुन्न,&lt;br /&gt;
र 7 डा. काँपत लामिछाने&lt;br /&gt;
क नआए आउनुहुन्छ। के हो? - बाढी र मान्छैआमा गइन्‌ चारा खौज्न, वाउ गए मेला,चाउबिनाको छोरो जन्म्यो, आमा नभा&#039;को बेला । के हौँ? - कुमालकोटीआमा गइन्‌ मेलापात, बाबु गए गाउँ,ढोकामा वसे लट्टे जोगी, आफू कता जाउँ। केहो?&lt;br /&gt;
- ढोकामा ताला लगाएको&lt;br /&gt;
आमा गर्भमा, हुँदा छोरो छाता ओढाउने । के हो? - कर्कलोआमा छोरीलाई जिउ ढोग गर्छिन्‌। केहो? - गाग्री र लोटाआमा जगटे, बाबु फगटे, छोरी मिठाइ-पापा । के हो? -कदुसआमा जगल्टे, छोरी पगल्टै, नाति मट्याङ्ग्रे । कै हा? - केराउ&lt;br /&gt;
आमा जगल्टै, वाचु खपटे, छोराछोरी मिठी पापा । के हो? - नरिवल&lt;br /&gt;
आमा जङ्गा, छोरी बिजुड्गा,&lt;br /&gt;
नातिनी खुलखुले, पनातिनी पिठुङ्गे । के हो? - कटहरआमा जरै बाबु लहरे, छोरो फुलफुले, नाति दुलदुले । के हो? -फर्सीआमा फझिक्रिल्ली, छोरी कोरीबाटी। के हो? &#039;- कुरिलोआमा फझुत्री, छोरी चुच्ची। के हो? - - चुच्चेकरेलोआमा झुन्डिई, छोरी हिँडी। के हा? - ताला र चाबीआमा झुप्री, छौरी कृपी, नातिनी सलसलाउँदी । के हो? - गहतआमा छाद्‌छे, छोरी खान्छे। कै हा? - पानी सारेकोआमाबाबु उठेका, छोराछोरी सुतेका । के हो? &amp;quot; लिस्नु, भन्याङआमाबाबु दुवैको साझा पटुकी । के हो? - आग्लौआमाबाबु दुवैको एउटै पदुकी । कं हो? - आग्लो “गजबारआमा, बाबु गर्भमा, म जन्मिसकँ। के हाँ? - केराआमा बोक्सी, दिदी रिढीनी, बहिनी मिठी। के हो? - कटुसआमाभन्दा छोरी अग्ली। के हो? - उर्गल र लसीआमाभन्दा छोरी कुइरी। कै हो? - चिचिन्डौआमाभन्दा छोरी कृप्री। के हो? -निउरोआमाभन्दा छोरी चर्की। के हो? - खुसाँनीआमाभन्दा छोरी जान्ने । कै हो? - खलको बच्चाआमाभन्दा छोरी बोक्सी । के हो? - खुसाँनीआमाभित्र वच्चा छ, वच्चाभित्र अन्डा छ। के हो? - कटहर&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखने कधा-ााणण।।???ो?ो?ो? र री&lt;br /&gt;
आमामाथि छोरी ढुनुमुतु घेल्ने। के हो? - मसला पिसैको&lt;br /&gt;
आमामाथि छोरी नाच्छै। केहो? - सिलौटो र लोहोरो&lt;br /&gt;
आमामाथि छोरी लखरलखर | के हो? न मसला चिसेको&lt;br /&gt;
आमालाई झुन्ड्याएर छाडी, छौरी चाहिँ नाच्दै हिँडी। के हो?&amp;quot;ताला र चाबी&lt;br /&gt;
आमा रुपैली, बाबु झुपाइलो, छोरी फुसी । के हो ? - तिउरीक्ो फूलआयो नाठो, छिरायो गाँठो, मलाई भइहाल्यो, क गइहाल्यो। के हो?&lt;br /&gt;
- चुरा लाएकौआयो फुस्सै, गयो फुस्सै। के हो! - अपानवायु पादआयौ भन्छन्‌ देखिन्न, गयो भन्छन्‌ भेटिन्न । के हो? - भुइँचालोआयो लाउरे पैसा खसाल्यो, ख्त्रातखुत लुगा फुकाल्यो, ल्वाम्म पसाल्यो ।&lt;br /&gt;
केहो? - केरा खाएकोआरमादीको सेरोफेरो पहेँलपुरे धान, -चैतमास दुधे मकै के हौ चलन जान। के हो? - सिमलआरीभरि तितौरा एक ढिको नुन। के हो? - तारा र्‌ जूनआलु भन्छन्‌, खान हुन्न; केही होइन, फेरि पनि हेप्न हुन्न । के हो?न्खुन्ना[]&lt;br /&gt;
रे 77 डा. कपित लामिछाने&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखाने कथा आए&lt;br /&gt;
(३)&lt;br /&gt;
इउँ त इउँ, इउँ टिप्नेलाई सय रूपयाँ दिङँ। केहो?&lt;br /&gt;
- छायाँ / चन्द्रमाडङ्गेबिङ्गै तीन सिड्दग। के हो? - त्रिशूलइनारको पानी भुलभुलती आउने । के हो? - आँसुझन्ची मिन्ची खुट्टाले पाती पिन्ची। कै हो? - घानकौ बोटइन्द्रिनी खोला छिन्द्रिनी पानी, बेताले बूढीको चौलाउने वानी। के हो?&lt;br /&gt;
- पानीघट्टइलम खासै छैन केही, सधैँभरि घुम्छ,पानी पन्यो भने प्राणपखेर उड्छ। के हौ? ज्घडीडुलिमिली-इलिमिली सात रडको झिलीमिली । के हो? - इन्द्रैनीइल्सिङ मिल्सिङ, काली गाईका तीन सिङ । के हो? - ओदानइत्रिकै नानीको पित्रिके गाउँ, रक्त लिन नुवाकोट जाँ । के हो?न्जुम्रा&lt;br /&gt;
[]&lt;br /&gt;
रर&lt;br /&gt;
ङ्के&lt;br /&gt;
उँघो टिड्रिङ्ग, उँभो जिड्रिड्ग। के हो? &amp;quot; गहुँको बोट&lt;br /&gt;
उँघोबाट हाँस आयो, एक पाँजो घाँस ल्यायो। के हो? न्म्‌लाउँघोमुन्टे धामी लुगलुगी कामी । के हो? - मदानीउँघो मुरली, उँभो जुरेली। के हो? &amp;quot;गहुँउँघो लौरी उँभो चौरी। केहो? -कर्कलोउँघो सुरुक्क, उँभी फुस्क्क। के हो? न कोदाको बोट,&lt;br /&gt;
उँभौ थली उँधो नली, यौ कथा नजान्ने मेरो हली। कै हो? - कर्कलोउँभो मुजी, उँघो मुजी, माझौँ मुजी, क्या हो मुजी? म्या हो?&lt;br /&gt;
- दूध दुहैको&lt;br /&gt;
उइँठोपुइँढो चामलको गुइँछो म्वाइँ खान जाँदा चिच्चाई उद्यौ। के हो?। शङ्खउकालाँ तान्छ, औरालाँ घान्छ। कै हो? -लौरो&lt;br /&gt;
उकालो लाग्छ खुट्टा छैन, पानी पाए भुतुक्कै हुन्छ। के हौ ?- डढेलोउज्याली चरी आगोमा जली, पुच्छरले पानी खाँदै झलमल्ल बली ।&lt;br /&gt;
के हो? -दुकी/ दियोउदुरी-बुदुरी कनिकाको पुदुरी। के हो? - खनिउँउदुरो न बुटुरो, कनिकाको कुदुरो। के हो? - खनिउँउठे पनि उठेकै, बसे पनि उठेकै। के हो? - सिङ, उम्मेदवारउठै सगरसम्म, बसै गाजधम्म । के हो? - कृहिरौउठ्नेवित्तिकै मुसाका दुलामा हात। के हो? - लुगा लगाएकोउडन्ती, बुड्न्ती, चुँडन्ती। के हो? - चरो, माछो र चङ्गाउडिरहन्छ, हिँडिरन्छ, हेदखिरि देखिँदैन, दौडे पनि भेटिँदैन। के हो?&lt;br /&gt;
- हावा&lt;br /&gt;
उड्छ उफ्रन्छ पर्दैन पेट्रोल हाल्न,दुई खुट्टा छन्‌ जान्दैन पाइला चाल्न । कै हो? - भँगेरारे राफ गा. कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
उड्छ चरो होइन, जाँ मन लाग्यो, त्यहीँ बस्दैत। के हो?&lt;br /&gt;
- हवाइजहाजउड्छ चरो होइन, पुच्छर छ जनावर होइन। केहो? न्चङ्गगाउड्छ भुवा होइन, बौल्छ चील होइन। के हो? - हेबाइजहाजउपत्यकामा लडाइँ पन्यौ वमगोली बसे,ताता गोली काखमा पर्दा केटाकेटी तसैँ। के होः? -.मकै भुटेकोउफ्रन्चरी, पुच्छर छैन थ्याच्चै परी । क्या हो? - भ्यागुतोउफी-उफी हिँड्छ बाँदर होइन, रगत चुस्छ जुका होइन,रगरग घुम्छ जुम्रा होइन। के हो? - उपिपाँउभिन्डे ठेकीमा लतलते दही। के हो? - सिँगानउभिन्छु म दुई खुट्टाले हिँडन चाहिँ हुन्न,कुटुकुटु खाने गर्छु निल्न चाहिँ हुन्न । कै हो? , -चुलेँसी&lt;br /&gt;
उर्लुक्क चरी बुर्लुक्क, पुच्छर छैन ड्याच्चै। कै हो? -&#039;ढिकी कुटेकोउल्टो पढ, सुल्टो पढ, अर्थ एकै हुन्छ,&lt;br /&gt;
पकाइ खाँदा मीठो लाग्छ दाल त्यसको बन्छ। के हो? न्रहरउल्टोसुल्टो एकै हुन्छ पाँच अक्षरको नाम,&lt;br /&gt;
चढ्दो बैँसको झल्को दिन्छ गर्दा अर्धज्ञान । कै हो? - नवजीवनउत्तको मासु खान नहुने फुख्रो कालो वाना,&lt;br /&gt;
सबैभन्दा उही चनाखो एउटा आँखो काना। केहो? - कागउसले खाएकी खान नहुने, उसैले दिएको खान हुने&lt;br /&gt;
मार्न पनि नहुने, धेरै थरी काम दिने। के हो? &amp;quot;गाईउसिन्दा पाक्दैन, पोल्दा डद्छ। के हो? - कपाल&lt;br /&gt;
कमाथि क भई, दुप्पीमा समाई, मुखमा सुँघाई। के हो? - जाँतोक भए संसारै उज्यालो, क छैन दिउँसै अँध्यारो। कै हो? - सूर्यक भए रु हुन्थ्यो, क नभए क कहिले हुन्थ्यो ? के हो? - काँचुली&lt;br /&gt;
छ|&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखाने को रै&lt;br /&gt;
06 2)&lt;br /&gt;
ए आन्द्रै ! थाप्लामा बस्‌, बनबुटो गरी भुइँमा बस्‌। केहो? -नाम्लोएउटा कागजको चरो, खोल्छ दराज गर्छु करो । के हौ? - किताबएउटा काठमा कैयौं प्वाल, त्यौ होइन आँखीस्ज्याल । के हो? - हतासो&lt;br /&gt;
एउटा खम्बाले घर थेग्ने। के हो? - छाताएउटा खाई सभा बस्नु अर्को खाई बन पस्नू्‌। कै हो? - अदुवा र मूलाएउटा खाल्डोमा दुई लात। के हो? - सुस्वाल लगाएकोएउटा खुट्टा सयौँ हात, सयौँ हातमा हजारौँ पात। कै हो? -ख्खएउटा खैतमा कूलैकूलो । के हो? गुन्द्रीएउटा गजले दुईतिर वाजा बजाउने । के हो? - पुच्छरएउटा गुइँठेको माटोमुनि बास,&lt;br /&gt;
कुटीपिसी मिसाएमा तरकारीमा खास । के हो? -लसुन&lt;br /&gt;
एडटा गुरुका घेरै चेला, मुख बाउँछन्‌ खाने बेला। के हो?- धारो र घैँटा-गाग्रा&lt;br /&gt;
एउटा गोरका बत्तीस जुरा। के हो? - करेलाएउटा गोरुका सोर सिङ। के हो? न चर्खाएङटा गोर चर्दा चौरभरि वाकेको। के हो? - लेखेकोएउटा घना जङ्गलमा टक्क रात्तो वत्ती वलेको। कै हा? - सिन्दुरएउटा घरका दुईवटा ढोका। केहो? ननाक&lt;br /&gt;
एउटा घरको एडटा कोठा, त्यहाँ छैन एउटै ढोका । के हो? - मावलएउटा घरको एउटै कोठा, त्यहाँ छैन कुनै ढोका । के हौ? &amp;quot; मादलएउटा घरमा दुईवटा खोपा,&lt;br /&gt;
त्यहाँबाट निक्लन्छन्‌ फोहोरका फोका। केहो? - सिँगानएउटा घेरमा सय कोठा। के हो? - बाँसएउटा घ्याम्पामा दुईरङ्गी जाँड । के हो? &amp;quot;अन्डाएउटा चउरमा एउटै रोटी। क्रे हो? &amp;quot;सूर्य&lt;br /&gt;
न पाए डौ कमल लामिछाने&lt;br /&gt;
एउटा चडरमा लौरो गाडेको । कै हो? न घरहराएउटा चराका पाँच रङ, मुखमा हाल्दा एउटै रङ। के हो? - पान खाएको&lt;br /&gt;
एउटा चरीका तीनवटा पङ्ख । के हो? - बिजुली पड्खाएउटा चरीका दुईतिर पुच्छर । के हो? न्दुन्‌एउटा जनावरको चार थाम एक सिड। के हो? - गैँडाएउटा ख्यालखानमा चालीस चौर। के हो: - सलाई र काँटीएउटा ठुटोमा दुईबटा च्याउ,&lt;br /&gt;
यो कथा नजाने मुप्ता पोली खाङ्। के हो? न कानएउटा डोलीमा सयबटी रानी। के हो? - सस्यूँका कोसाएउटा तन्न एउटा धन्न, कैले लौलौ कैँले हुन्न । कै हो? - तबलाएउटा थालमा तीन मान्छे नाचिरहन्छन्‌ । कै हो? - घडीएउटा थालमा दुईबटा अन्डा,&lt;br /&gt;
एउटा तातो अर्को ठन्डा। के हो? - स्‌यं र चन्द्र&lt;br /&gt;
एउटा थियो क्खुरो, हिँड्दा चाम्यो बिचरो,&lt;br /&gt;
चक्कू लिई काटैँ टाउको अनि फेरि दगुस्यो। के हो? - पेन्सिल/ सिसाकलमएउटा थुम्कोमा दमाहा घोप्द्याएको । के हो? - टोपी लगाएकोएउटा दमाईले दुईतिर ढोल बज्राउँछ। के हो? &amp;quot;गाईएउटा दाम्लामा सयवटा बाच्छाबाच्छी बधिको । के हो? - खोलो र कुलोएउटा देश छ कतै तीनअक्षरी नाम,&lt;br /&gt;
पहिलो अक्षर झिके हुन्छ खाने चिजको ताम । के हो? - जापानएउटा पोको फुट्ने चार धारा छुट्ने । के हौ? - कल्चौँडो र युनएउटा पोखरीमा चार भाइ हाम फाल्छन्‌ । के हो? - दूध दुहेको&lt;br /&gt;
एउटा प्वालमा मासुको ढिस्को । के हो? जिब्रोएउटा फर्सीका सातवटा फुयालढोका । के हो? - टाउकोएउटा फर्सीका सातवटा प्वाल, पूरै लाग्दा नौबटा क्याल। के हो?&lt;br /&gt;
- टाउको र शरीर&lt;br /&gt;
एउटा बाकसमा धेरै टोपी, घरै टोपीका आफ्नै लौरी। के हो?- सलाईएडटा बढाका पन्धवटा छौरा, तीनवटा मात्र दौडिरहन्छन्‌। के हो? - घडीएउटा वृढाका सयौँ आँखा, देख्दाखेरि बिध्नै चनाखा । के हो? - डोकोएउटा बृढाको लामो पटुकी। के हा? - सियो र घागोएउटा भन्छ म लामो, अर्को भन्छु म लामो। के हो:- बाटो र खोलो&lt;br /&gt;
स्माइता गाउँखाने कमा ता&lt;br /&gt;
एउटा मान्छेको पेटमा नौवटा नानी। के हो? - बोडीको कोसोएउटा मान्छेलाई बत्तीस पुलिसले घेरैको। के हो? न्जिब्रोएउटा मुख दुईबटा पेट, तुर्क्याउँछ क, तँ तिर्खा मेट्‌। के हो?&lt;br /&gt;
- चाटटकालल्‌एउटा मुठो खरले, घौले घर छाम्ला मयाँले। कँ हो? न्बत्तीएउटा रूखमा पाँचवोटा हाँगा ।. के हो? &amp;quot;हत्केला&lt;br /&gt;
एउटा रुखमा बार हाँगा, बार हाँगाका दुई पात। के हो?- महिना, दिनरातएउटा सर्खमा बारवटा हाँगा, बारवटा हाँगामा सातवटा पात। केहो?- बर्ष, महिता र दिनएउटा रुखमा बार हाँगा, बार हाँगामा तीन सय पैसह्ी पात। के हो?&lt;br /&gt;
- वर्ष, महिना र दिनएउटा रोटीमा चारवटा प्वाल1 के हो? टाँकएउटा लासका दुईतिर सिरानी । कै हो? - झोलुङ्यौ पुलएउटा लुलेका पाँचबटा मलामी । के हो? - सिँगानएउटाले जा भन्छ, अर्कोले आ भन्छ। के हो?- केरा र बाँसको पातएउटा साँढेको सबैतिर सिङ। के हो? ण करेलाएउटा हाँगामा तीनवटा पात, सधैँ हुन्छ, शिवजीका साथ। के हो?&lt;br /&gt;
- त्रिशूल&lt;br /&gt;
एउटा हाँसाका तीनबटा पात, धेरै जसो घुम्छ जोगीका साथ। के हो?&lt;br /&gt;
- त्रिशूल&lt;br /&gt;
एउटा हातले सगर छेकेको। के हो? - छाता&lt;br /&gt;
एउटी आमा एकपल्ट ब्याउने, त्यसपछि उनले बाँच्नै नपाउने। के हो?&lt;br /&gt;
- केराको बोट&lt;br /&gt;
एउटी आमाका बत्तीस छोरा, आमालाई कुद्छन्‌ सधैँ मौरा। के हो?&lt;br /&gt;
१ -निध्रौ र दाँत&lt;br /&gt;
एडटी चरीको दुईतिर पुच्छर। के हो? न्दुनोएउटी नानी दुई घरको दीप, जता चाहियो त्यतै ठीक। के हो?&lt;br /&gt;
- कागकौ आँखाएउटी बहिनीले सातवटा पछयौरा औढेकी । कै हो? - मकैको घोगाएउटी बूढीका जीउभरि सिन्का। के हो? -सल्लो&lt;br /&gt;
शा ररििहिी डा. कपि सामिछाने&lt;br /&gt;
० एडटी बूढी कुम्लो भुइँमा छाडी रुख चढी। के हो ?- तरुल/ भ्याकुर० एउटी बूढी भुइँमा लडी, कुम्लो छाडेर रुखमा चढी। के हो?&lt;br /&gt;
- सखरखन्ड/ सुठनी५ एउटै घैँटोमा दुई रङ्गको पानी। के हो? -अन्डा५ एउटै दाम्लामा धेरै खती वाँधेको । के हो? - फर्सी र तहरा&lt;br /&gt;
५ एउटै रूप आआफ्नै, काम, उही शरीरमा भिन्नाभिन्नै नाम। कै हो?-रौँ० एउटै लिग समातेर कुदूछन्‌ दुईवटा रेल,&lt;br /&gt;
नपत्याए आफैँ कुदाएर हेर। के हो? - चेन/फस्नर० एउटै हातले दोहोरो मादल बजाउने । के हो? - पुच्छर० एक अँधेरी साथी मेरी, सधैँ पछयाउँछिन्‌ कत्ति नटेरी। के हो ?- छायाँ० एक कसौँडीमा दुई कुड्की भात। के हो? - कटुस० एक कोठामा चालीस चोर। के हो? - सलाईको डब्बा० “एक कोल बार पट्टी, हाँगा गन्दा तीन सय पैंसङ्ठी। के हो? - वर्ष दिन५ एक्खुष्टै दाइको जीउमा काँडैकाँडा। के हो? - ऐतेलुको बोट०. एक्खुट्टे गाई दैलोमा नअटाई । के हो? - छाता० एकखुट्टे धामी, भारी चोकी कुइँक्क । के हो? नडोको५ एक्खुट्टे धामी, लुगलुगी/ थरथर कामी । के हो? न्जुको१० एक्खुट्टे बोकाको तीन धार्नी बोसो। के हो? - काउली&lt;br /&gt;
० एकखुट्टे मान्छै वार धार्नी फलाम वोकेको । के हो? - केराको बौट० “एक गुरुका धेरै चेला, मुख ओबाउँछन्‌ पिउने बेला। के हो:&lt;br /&gt;
&amp;quot; लौटा/ अम्खोरा० एक गेडा सुपारी, दुईजना बेपारी। के हो? - गोन्रेकीरा५: एक गौरु सय दाम्ला, यो कथा नजाने गाम्‌ खाम्ला । के हो ?- खनुरो० एक चिम्टीका दुईबटा रौँ। के हो? - सियो र घागो५ एक जना नाच्ने, पाँच जना हेर्ने, चार जना लुक्ने । के हो?- सुर्ती माडैको० एक जना मान्छेको जीउभरि प्वाल । के हो? न्डोको० एक ठाउँबाट खान्छ, सय ठाउँबाट फाल्छ। के हो? - जाँतो० एक डल्लो धन, पोली खाङँँ कि पकाई खाउँ? के हो - आलु/पिँडालु० एक डाँडामा खती काट्यो, सय डाँडामा रगत । के हो? - घाम लागेको० एक तलाउभित्र आई, देखेँ आफूले आफैँलाई । के हो? न ऐना&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखाने कघा ना&lt;br /&gt;
एक तले घरको करेसामा लिस्नु । के हो? - घट्टको इुँड&lt;br /&gt;
एक दिन सबैले भोग्नै पर्ने, टादा नटर्नै, मार्दा नमर्नै। कै हो? - कालएक पाधी धानको लाख पाथी धान। के हो? - जन र ताराएक फेर आउँछ, मुखबाट ब्याउंछ। के हो? - केराको बोटएक बेत ब्याई, आमा मरी जाई। कै हो? - केराको बोटएक भाँडो अचार, सबैलाई विचार। के हो? न्मलएक भाइका चार खुट्टा। के हो? - खाटएक भाइका तीप्तवटा दाँत। के हो? - करौँतीएक भाइका दुईवटा मुन्द्रा। कै हो? - खड्कौँला वा कन्तीका कडाएक भाइका सय आँखा। के हो? न्डोकोएक भाइ घान हाल्ने, बत्तीस भाइ धान कुटने। कै हो? - जिब्रो र दाँतएक भाइ जान्छ, सय भाइ आउँछन्‌ । के हो? न्मकैँएक भाइ नाचेको, चार भाइ लुकेको, &#039; पाँच भाइले हेरेको। के हो?- सुर्ती माडेकोएक भाइ फुटे चार धारा छुटे। कै हो? - दुध दुहेकोएक भाइ लडे, सय भाइ बढे। के हो? न्मकैएक भाइले दुनियाँ उज्यालो पार्ने। के हो? न घामएक माना पिठामा तीन माना पानी, १दिनेलाई भन्दा खानेलाई हानि। के हो? जाँडएकमाने ताउलीमा दुई चोइली भात। के हो? - कटुसएक मान्छेका जीउभरि आँखा । के हो? -डौंकोएक मुठी खर, घुमाउने घर। केहो? - छाताएक मुढी छवालीले सवै घर छाएको। के हो? न्बत्तीएक मूलका दश धारा। केहो? - थुन र दूघ/द्धका सिर्काएक रूखका चार आँखा, बीस पात। क हो? - हातगोडाका औँलाएकसिङ्गे कलुवाका चारवटा थाम। के हो? न्जौँडाएकसिङो कलुवाका चारबटा थाम,अभर पर्दा हुन्छ कतात्तिर जाम्‌ । के हो? चौडाएकसिङ्गे गाई, जति खुवायो उति खाई। के हो: - जाँतोएकसिङ्गे गोरुको मुखमा कीलो। कं हो? - जाँताको मानीएकसिङ्गे गोरु सिङ समाए कराउँछ। के हो? - जाँतो&lt;br /&gt;
गथ नाडा उगिल लामिछने&lt;br /&gt;
एकासिङ्गै गोरु होक्काँ-होक्काँ ! के हो? - जाँतोएकातिर असिना, आर्कातिर हिउँ। कै हो? - कपास र भुवाएकातिर काटे ढुङ्ग्रो, अर्कातिर काटे पुङमाङ। कै हो? - बाँसएकादेशमहाँ अचम्म सुनियो नाङ्लाजव्रा पात,त्यही दिन सुत्ने, त्यही दिन उठ्ने, कै हो त्यसको जात? -सूर्यएकादेशमा काल्दाजै-काल्दाम्रै । के हो? - रूख काटेकोएकै छिनमा भाले एकै छिनमा पोषी, भाले र पोथीको एउटै कोठी ।के हो? - मादलएम्तै उठी जान खोज्दा आफू लड्ने डर,काखी च्यापी हिँडेदेखि पक्का हुने भर। के हो? - व्रैताखीए गाँडे । है भुन्टे, तँलाई खान्छ, मलाई लान्छ। के हो?नमूला र भिँडाए फुन्डे, के भनिस्‌ भकुन्डे म लहरामा, तँ झाङमा । केहो?- इस्कुस र फर्सीए पुड्कै उठु बेसी जाउँ, बेसीबाट तेरो मुन्टो निमेठेर ल्याकँ। के हा?- घौक्रो / थैलोक्‌ &#039;बी&#039; होइन &#039;ती&#039; अगाडि, राजा होइन रानी पछाडि । के हो?- सिरानी[!&lt;br /&gt;
रमाइता गाउँखाने कारी&lt;br /&gt;
त&lt;br /&gt;
ओक्कल-दोक्कल भुँडी खोकल। के हो? - ठैकौ पखालैकोओखल भनौँ, ओखल होइन, मूल फुदछ, कुवा होइन । के हो?- आँखाओडारबाहिर हड्डीको ताँती, यौ कथा नजान्ने बिरालोको नाति। के हो?न दाँतओडारभरि सधैँ लिरीबिरी। के हो? ॥ - लिगलिगैऔड्डारमाथि डाँडो डाँडोमाथि टार,टारमाथि रानीवनमा हिँड्न थाल्यो जार। के हो? -जुम्रौओबाना लुगा फाल्नै, भिजेका लुगा लगाउने । के हो? -टाँगोओर्काई-फर्काई चन्दन लगाई, वटार-बुदुर मुखमा हाली चबाई। के हो?- फान खाएकोऔल्द्याङ पल्टयाङ खौस्याङ । के हो? - जुठौ लोटाएको&lt;br /&gt;
औँठी लाउँछन्‌ औँठी होइन, बाहिर हुन्छ घरमा छैन। के हो:- कुशऔलको खेत, लेकको कुलो, पाँच जना बाउसे रोपाइँ गर्छन्‌ ठूलो । केहो? - कागज, मसी र पाँच औँलाले लेखेको&lt;br /&gt;
[]&lt;br /&gt;
कर पाए डा. कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
0)&lt;br /&gt;
कथा न कृुथुङ्गगी कन्डापट्टि गाँड, पो कथा नजान्ने बोक्सीको राँड ।&lt;br /&gt;
केहो? - दैलाको गाँडकथा न कृथुङ्गी कन्डापष्टरि पिलो, पिलाभित्र फेरि बडेमानको दुलो ।के हो? ( - दैलाको गाँडकन्डापट्टि कालीनाग झुन्डिएको । के हो? - कपालको चुल्ठोकपडाको छाला, फलामको हाड, खुम्चँदा लढी, खुल्दा आड । के हो? - छाताकपाल काटी सुकाइन्छ, चुल्ठो पारी बाटिन्छ। केहो? - ब्राबियो&lt;br /&gt;
कपालपुरमा ठूलौ चोर थियौ कानपुरमा पम्डियो,हस्तिनापुरीमा स्थान गरियो नङसारमा मारियो। के हो? - जप्रा मारेकोकपास, केराउ, गुराँस, काँक्रो, चारै जातको पौटै धाँको। कै हो?&lt;br /&gt;
छ _ न सिमलको रूखकम्मरमा पटुका केस नानी, जन्मदा ठूली पछि सानी । के हो?- कूचौकराए निक्लन्छ, नकराए निक्लन्न। के हो? - स्यालको सिङकराएको सुनिन्छ देख्न सकिन्न, जतात्ततै पस्छ रोक्न सकिन्न,&lt;br /&gt;
त्यो नभई फेरि बाँच्न सकिन्न। के हो? - नाडीको नसाकलिलोमा रमाई खान्थ्यो बूढो दाजु मलाई,&lt;br /&gt;
अहिले भन्छ दाँत छैन, खान्छु सातु बनाई । के हो? न्मकैँकसैले चाल्ने, कसैले फाल्ने, कोही लुट्ने, कोही लुटिने। कै हो? - काँडाकसौँडी पाक्यो, भात पाकन/काँच्चै। कै हौ? - अम्बा/बैलौँतीकसौँडीमा भात पाक्छ, बिटमा दाल पाक्छ। कै हो? - खैत र आलीकहिले कानमा, कहिले गोजीमा । के हो? - मोबाइलकहिले लुकामारी खेल्छन्‌, कहिलै साथै देखिन्छन्‌,&lt;br /&gt;
कहिले भने फयाप्पै छैकिन्छन्‌। के हो? -सूयं र चन्द्रकहिलै हुन्छ कालो, कहिले हुन्छ रातो,&lt;br /&gt;
रातो हुँदा नखुनु है तैजाला नि सातो। कै हो? -आगौ&lt;br /&gt;
रमाइला गाउंखने कषा ााएाआआएआआाआ7127 दरै&lt;br /&gt;
काँचो छउन्जेल हरियो, पाकेपछि रातो,&lt;br /&gt;
हौस गरी खानू है उडाउला ति सातो। कै हो? - खुर्सानी&lt;br /&gt;
काँचो हुँदा तरकारी, पाकेपछि फल,&lt;br /&gt;
जिउभारि कांडेकाँडा। के हो: - कटहर&lt;br /&gt;
काँधमा छिराएर कम्मरतिर झार्नु,&lt;br /&gt;
पहिलोपटक लगाउँदा कपाल जम्मै फाल्नु। कै हो? .. -जनै&lt;br /&gt;
काँधमा भिरिन्छय खकन होइन॑, सरसामान वोकाइन्छ गधा होइन। के हो?- फौला&lt;br /&gt;
काँसका वालमा हाँसका फुल। के हो? &amp;quot;चन्द्रमा&lt;br /&gt;
कागज खाने यसको जात, काम गर्छ खटेर दिनरात । के हो? - पन्चिङ मेसिनकाखमा राखे कराउने भैंमा राखे, नकराउने । के हो ? - मादल बज्ञाएकोकाटीकुटी मान्छै, बौल्छ, हिँड्छ,काम गर्छ, तर मुटुसुटु केही छैन। कै हो? क - रोबर्टकाटीकुटी हलोजस्तो काखमा राख्यो, छोरोजस्तो । के हो? - मादलकाटेकुटे टुक्रा, लिएर दगुर, जाङ बारीमा, रोप माटामा। के हो? -उखुकाट्दा काटिने, पोल्दा पोलिने, पकाउँदा भने नपाक्ने। के हो? - रौँ/कपालकाठका ठिनामिना, फलामका सोर,अघि लागे रामलक्ष्मण पछि लागे चोर। के हो? - &amp;quot; जोतेकोकाठ कारी पिर्का ताछी, यो कथा नजाने बाजी लाग्छ तीन सय साठी ।के हो? - वैदको कितावकाठकी बाच्छी ढुङ्गाकी गाई, जति दुह्यो त्यति आई। के हो?- चन्दन घोटेको&lt;br /&gt;
काठको कँची फलामको बिँड, त्यौ बिँड बोक्ने जना दुई तीन। के हो?&lt;br /&gt;
० तामदान र्‌ डोलेकाठको ठिनीमिनी काठकै सोइला,अघि लागे राम-लक्ष्मण पछि लागे पाइला । के हो? - गौठ जोतेकोकाठको ठुन्का, आँखीस्याल होइन, जीउभरि दुल्का । कै हो ?- हतातो&lt;br /&gt;
काठको डुँड, फलामको क्र। के हो? -हलो र फालीकाठको पर्खाल सिसाको द्वार, नबोली हेर्छन्‌ लगातार । के द्वो? - तस्विरकाठको फड्के, चारजना अड्के। के हो? - चर्खे पिङ&lt;br /&gt;
कारको बाच्छी ढुङ्गाकी गाई, दुहुन जाने धेरै आई। के हो? - चन्दन घोटेको&lt;br /&gt;
शशी? ड. कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
कार खाने पानी खाने, अन्नचाहिँ छुँदै नछुने। के हो) - - चनौटौकाठमाडौँमा आगो लाग्यो, तानसेनमा खल्ल-बल्ल,&lt;br /&gt;
दमकडामा थिएँ म आएँ बल्ल-बल्ल। के हो? - तमाखु खाएकोकाठमाडौँमा काठको र पिठाको लडाइँ भौ रे,&lt;br /&gt;
जाने भए जाक रे नत्र सितलपाडिन्छ रे। के हो?- ढिँडो ओडालेको छ, खान जार&lt;br /&gt;
कान तान्दा मुख खोल्छ। के हो? -बैलीकान निमोठे ह्वालहवालती छादूने। के हो? -धाराकान निमोठ्दा बान्ता गर्छ। केहो? - कलघारा&lt;br /&gt;
कानमा समाई नाकमा बस्छु, हेर्नु परै आँखै छोप्छु। के हो?- चस्माकान समाई माथि उठायौ चट्ट आगो लगायो,&lt;br /&gt;
कान समाती नाकमा तल ल्यायो रातलाई दिन बनायो । के हो? - लाल्टिनकान्छी नानी सारै साती, दिनरात खट्नै उनको वानी । के हो?- कमिलाकाम एकै भए पनि अनेक धरी नाम,&lt;br /&gt;
फोहोरको दुनियाँमा नाच्ने त्यसको काम। के हो? - साबुनक्वाम गर्दा टोपी झिक्छ, काम भ्याएपछि टोपी लाउँछ। के हो? - कलमकाम सक्किनासाथ नुहाउनैको हतार । के हो? - जुठा भाँडाकुँडा&lt;br /&gt;
कामीको छोरा, बाहुनको नाति, बस्न गयौ दैलामाधि | के हो? - तालाकाला-काला पिर्कामाथि जन्ती बसेका,&lt;br /&gt;
भोलिपल्ट हेर्दाखैरि उठी गएका । के हो? - ताराक्राला गेडा सेतो भुइँ, मुखले टिप्छ, हातले छर्छ। के हो ? - लेखेपढेकोकालीको पानी दैलातुङको खेत, पाँच भाइ बाउसे कोदाली एक। के हो?&lt;br /&gt;
- लेखेकोकालीको पानी बेसीको खेत, पाँच भाइ बाउते कोदाली एक। के हो?- लेखेकोकालीको पानी माडीको खेत, पाँच जना बाउसे, कोदाली एक। के हो?- लैखेकोकाली गङ्गा गौरी घाट, बत्तीस हाँगा एउटै पात। केहो? -जित्रोकाली गाईको पेटभरि दूध। केहो: न मासकाली चरीको सेतो पुच्छर। के हो? - सियोधागो&lt;br /&gt;
काली बूढी अँध्यारो कुनामा धुमधुम्ती बस्छ्ने। के हो? - हाँडी/खोत्या&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखाने कमा ना रै&lt;br /&gt;
काली बूढीका पेटमा तहरे वढाईँ। कै हो: हाँड्चीमा मकै भुटेको&lt;br /&gt;
काली बूढीको भान्सा मीठो। के हो? न्ठैकीरदहीकाली बुढी चाउरी परी। के हो? - मरिचकालो बूढा पुलामा लुटुपुटु। कै क्लो। -&amp;quot; जदुाएको,काली वूढी ठाडठाडै मुत्छे। केहो? -कौल&lt;br /&gt;
काली बूढी. वल्ला घर, पल्ला घर गर्छै। कै हो? - हाँडी/खोत्द्याकाली बोक्सीका पेटमा नाति, फुन्द्रुड-फुन्हुङ नाच्ने । के हो?&lt;br /&gt;
० हाँडीमा मकै भुटेकोकाली भए पनि राम्री छन्‌ आँखा तिनका जीउभरि छन्‌। के हो? - आँखीझ्याल&lt;br /&gt;
काली माईको पेटमा सेतो किक्ने मेसो। के हो? - मही पारेकोकाली वनमा बस्ने, तारे भीरमा जने,&lt;br /&gt;
हात्तीपुरमा भर्ने, नवलपुरमा मर्ने। के हो? ज्जुम्राकालो ओड्ारमा खुदो जमेको । के हो? - काम्नेगुजीकालो ओडारामा पाँच भाइ पस्नै। केहो? - खाएकोकालो औंडारमा रातो पुलित। के हो? न्जिब्रोकालो ओडारमा लहरै जन्ती। के हो? - कमिलाको ताँतीकालो ओड्धारमा सेता जन्ती। कं हो? - दाँतकाली कुकुर वनमा सुत्ने, हिर्काउँदाखेरि युक्दै उठ्ने । के हो? - बन्दुककालो खान्छु, सेतो हग्छ। केहो? - कोदो पिसेकोकालो खोलमा हुन्छु, रातो पानी छान्छु,&lt;br /&gt;
निहुँ खोज्न आउनेलाई ठाडै जवाफ दिन्छु। केहो? -खुक्रीकालो चरो, सुकिलो पुच्छर । के हो? - सियो र धागो&lt;br /&gt;
कालो छु कालै वनमा बस्छु, रातो पानी खान्छु। केहो? -जुम्राकालो ठुटामाथि सेतो चरा नाचिरहने । के हो? - टाउकोर छुरा&lt;br /&gt;
काल्लो थालमा राता अछेता। कै हो? - रातीगेडीकालो पिउरी, सेतो घागो। के हो? न्युनरदूघ्कालो मुख छु, कुक्र होइनम दुई जिव्रा छन्‌, सर्प होइन;&lt;br /&gt;
पाँचवटा पोइ छन्‌, द्रौपदी होइन । के हो? - कलमकालो मैदानमा सिपाही परेड खेल्छन्‌ । के हो? - मकैँ भुटेकोकालो मोसो दली वस्छे दुवै गाला भरि,&lt;br /&gt;
ज्ञति पिट्यो उति वढी कराउँछे मोरी। के हो? - मादल&lt;br /&gt;
शु नाडा. कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
» कालो रहमा सेती बूढी हाम फाल्ने । के हो? - सेलरोटी पकाएको&lt;br /&gt;
० कालो राख्नी, सेतो झिक्नी। केहो? - कोदो पिसेको५ कालो सर्पले सेतो सर्प निलेको । के हो? - दाप र खुकुरी० कालो हाली सेतो झिक्ने, वरिपरी लागेको झुम्राले पुछने। के हो?- कोदो पिसेको«. कि मलाई तान, कि तिमीलाई बौक्छु, रिस उठ्यो भने लात्ताले ठोक्छु ।केहो? &amp;quot;घोडा८ किन्नेले राख्दैन, पाउनेले किन्दैन। कै हो? - उपहार२ किन्नेले राख्दैन, राख्नेले किन्दैन। कै हो? - उपहार» किन्नेले लाउन्न, लाउनेले देख्न पाउन्न । कै हो? - कात्रो« किन्नेले लाउँदैन, लाउनेले किन्दैन। के हो? - कात्रो». किलो भुइँमा डाब हातमा । के हो? - ऐसेलु&lt;br /&gt;
« कुमाल गाउँमा आगो लाग्यो, माझी गाउँमा गुहार-गुहार । केहो?- तमाखु खाएको&lt;br /&gt;
» कुच्चिएको कसौँडीको मीठो खानेकुरा । के हो? - ओखर२ कुनामा बस्छ, देशविदेश घुम्छ। के हो? - हुलाक टिकट« कुनै देशको नाम, जसलाई उल्टोबाट पढ्दा पकाउन आउँछ काम ।&lt;br /&gt;
केहो? &amp;quot; इराक/कराइ« कुवाका वरिपरि ठाडा किलाका बार । के हो? न परेला&lt;br /&gt;
« कुवा, कुवामाथि डाँडो, डाँडामाथि चउर, चड्रमाथि जङ्गल,&lt;br /&gt;
जङ्गगलमाथि लुकेको छ चोर । के हो?- मुख-नाक-निधार-कपाल-जुम्रा« कुब्रेर राजा मर्दा पाँचजना मलामी। केहो? - सिँगान« कृप्री गाईले चारै फाँट चर्छे। के हो? - हँसिया, आँसी- कुपी, झुत्री बूढी बिहानै उठी लुदुपुटु गर्छैँ। के हो? - दैलौ पोतेकोकेटाकेटीले खानी, बूढावूढीले फाल्वी,&lt;br /&gt;
भरखरकाले गोजीमा राख्नी। के हो? - सिँगान&lt;br /&gt;
० कैँली गाई, अँगार खाई। के हो? - रिङाको गैडा&lt;br /&gt;
 कैली गाईका पेटमा अँगारको डल्लो। के हो? - रिठ्ठाको रोडा&lt;br /&gt;
». कँली गाईका पेटभित्र कालो मट्याङ्ग्रो। के हो? - रिङ्ठाको गैडा&lt;br /&gt;
. क्वोठाभरि कालाटाउके पुलिसको डफ्फा। के हो? - सलाई[]&lt;br /&gt;
कला गाउँखाने कामा रै?&lt;br /&gt;
(छ)&lt;br /&gt;
खटखट खटपाउ, तीन मुख दस पाउ। के हो? - हलो जोतेकोखरबारीमा दाँदे लगाएको । कै हो? - कपाल कोरेकोखरानी घसेको, थपक्क बसैको । के हो: - चुलामा बसालेको कसौँडीखर वर, खर्रे पर, खर्रे हाल्यो चारो । के हो ?- घरेलु तानमा लुगा बुनेको&lt;br /&gt;
खसी बसिरहने, दाम्लो चर्न जाने। के हो? - फर्सी र लहराखसी भित्र, दाम्लो बाहिर । के हो? - तर्ल/ भ्याकुरखस्रो छाला, मीठो बोसो, त्यहीभित्र रहेछन काठको ठोस्तो। कै हो? - तिँजुखस्रो छालाभित्र नरम गुदी, गुदीभित्र हाड। के हो? - लिचीखस्रो भ्यागुताको भुँडी नै मीठो। के हो? - कटहरखाँदा उठ्छ, भोकाउँदा तृत्ख। के हो? - कोलखाँदा मह, थुक्दा कपास, खाने रस, ओकल्ने कपास । के हो?- उखुखाँदा मुख सातो, नखाँदा झन्‌ मुख ठूलो। के हौ? ज्चिम्टाखाँदै छ, हग्दै छ। केहो? - जाँतो पिँधैको&lt;br /&gt;
खाएस्‌पिएस्‌ तेरा घर, सुत्न आएस्‌ मेरा घर। के हौ? - आग्लो,गजबार्‌खाउँ-खाकँ रोटी खाइनसक्नु, दाङँ-दाङँ बहर दाइनसक्नु,&lt;br /&gt;
टेकँ-टेकूँ लौरी टेकिनसक्नु । कै हो? - सूर्य, बाघ र सर्पखाजा खाँदाखाँदै भुँडी नै फुद्यो। के हो? - बैलुनखान जाँदा दुब्लो, खाएर आउँदा मोटो। कै हो) - पुरी पकाएकोखान त खाएँ, तर चाख्रेको छैन। कै हो? -- किरिया/कसमखान दिए नाइँ-नाइँ, थिचदिएँ मुसुक्क । के हो? - बिजुलीबत्ती&lt;br /&gt;
खान नपाईँन्जैल भोक्रिई वस्ने, खाएपछि घुमीघुमी नाच्ने। के हो? - जिब्रोखान लाग्यो मीठी, दुवै हात जुट्रो। कै हो? - उततिनैको आलु / पिँडालु&lt;br /&gt;
खानु त्त पिउनु मुन्टो जोतेको जोत्यै। के हो? -लूँडीखानु न पिउनु सधैँ हिँडिरहनु । के हो? - घडीको सुईखानु न पिउनु, पहरामात्र दिनु। के हो? - ताला /कुलुक&lt;br /&gt;
कद ला 77 फ, कपित सामिछने&lt;br /&gt;
खाने पनि नअघाउने, ख्वाउने पनि नअघाउने । कै हौँ? - जाँतोखाने वेलामा आई सानी, धालअगाडि भुन्टी नानी। के हो?- पानी खाने भाँडो&lt;br /&gt;
खान्छ अन्त, पानी छुन्न। क हो? - जाँतोखान्छ घाँस, हग्छ घागो। के हो? - रेसमकीराखान्छ, था&#039; पाउन्न। के हौ? - डाडुखान्छ मट्याङ्ग्रा छर्छ धुलो, घुम्दछ फनफन चक्का ठूलो । के. हो ?- घट्टखान्छ मुढो, बनाउँछ घुलो। के हो? -आगौखाम्‌-खाम्‌ भन्छन्‌, खान हुन्न । के हो? - खामखाली पोखरीमा फुत्तफुत्त उफ्रने। केहो? - मकै भुटेकोखिडिबिडी छ्याट्ट, पुच्छर समातेर स्याट्ट । के हो ? - तालाचाबी /कुलुकखिरिलो साँढेको जीउभरि सिडैसिङ । के हो? - तीतेकरेलाखिरिलो रुखमा एउटै पात। के हो? , &amp;quot; पनिउँखुट्टा छैन उकालो चढ्छ, पानी खाए खुत्रुवकै मर्छ। के हो? - डढेलोखुट्टा छैन हिँड्छ, पुच्छर छैन सिङ छ। केहो? - चिप्लेकीराखुट्टा छैन टाढा जान्छ, पण्डित होइन साक्षर छ, मुख ठैन कुरा गर्छ।केहो? - चिठीखुट्टा धेरै छन्‌ गन्त सकिँदैन, तर पनि पाइलो सार्न कहिल्यै होइन ।के हो? नरूखखुट्टा नभएकाले खुट्टा भएकालाई खायो, टाउको नभएकाले देख्यो। केहोर? - सर्प, भ्यागुतो र गँगटोखुट्टा नहुँदा भुइँमा हिँड्न पाएन, पखेटा नहुँदा आकाशमा उड्न पाएन ।कै हो? - माछो&lt;br /&gt;
खुड्दामा लगाए मान-सम्मान, टाउकामा लगाए अपमान । के हौं ?- जुत्ताखुट्टामुनि रहेख काले दाइको वास, सँगै हिँड्छ बोल्दैन पर्छु मेरै छाप ।&lt;br /&gt;
केहो? - छायाँखुट्टी पसार, लह्ठी मसार, कालो हाल, सेतो झिक। के हो?&lt;br /&gt;
- मात /कोदौ पिसैकोखुट्टी लुलो, फूल ठूलो, त्यसमै मन भूुल्यो। के हो? - काउलीखुट्टो छ तिघ्रो छैन, टाउको छ आँखा छैन। केहो? - च्याउखेतको चरो टवारट्वार गर्छु, पानी नपाए ठहरै पर्छ। के हो?- भ्यागुतोखोइ-खोइ बूढा ! म अघि जान्छु। कँ हो? - लौरो&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखनै काला???” रु,&lt;br /&gt;
खोक्रो पनि छैन, बोक्रो पनि छैन, मुखमा राखी टोक्दा सातुसातु वन्छ ।&lt;br /&gt;
के हो? - कसार्‌खोपाभरि राता कीरा। के हौ? - अगेताको आगोउायी, छोपीताप छोपी, घोपीमाय खेरी, खोपीमाथि ठँपी। कै हाँ?&lt;br /&gt;
- बाँसको तामाखोपो, खोपोमाथि खोपो, खोपोमाथि खोपो। के हो? &amp;quot;बाँसबेलाको पुद्लारमा वीरे दाइ नाच्छ। के हो? - न्घिट्ट&lt;br /&gt;
खोलाखाली पाखरे, भइँमा नझरे बावा ठाकुरे । के हो ? - सेल पकाएकोखोलाबाट ल्याउँदा फलाम, आगोमा हालेपछि तामा । के हो ?- गँगटो&lt;br /&gt;
खोलामा वसेको पगरी कसेको। के हो? - निउरोखोलो तरेकी राती गाई, चुली पुगी भन्ज्पाङ आई। के हो?- पोते लगाएको[]&lt;br /&gt;
६ डा. कषित लामिछाने&lt;br /&gt;
८)&lt;br /&gt;
गई-भई फुर्तिली, फर्किन नजान्ने । के हो? - पुतलीगएपछि नफर्कने। के हो? - बाण हानेकोगजमने हात्तीको पेटभरि किरा। कै हो? - घर र मान्छे&lt;br /&gt;
गजुर छ, मन्दिर होइन; बार्दली छ, घर होइन। के हो? - धरहरागजुर छ, मन्दिर होइन; पखेटा छु, चरा होइन; करङ छ, मान्छै होइन;&lt;br /&gt;
घुम्रिएको पुच्छर छ, कुक्र होइन। के हो? न छातागण्डकीको पानी माडीको खरत, पाँचजना बाउसे, कोदाली एक। के हो?- लेखेकोगणेशजीको पछाडि इनार। के हो? - पातसगधाको दाजु घोडाको भाइ, भारी बोक्न लाउँछन्‌ दाजुआाइ । के हो?- खच्चरगनगने वूढाको पिद्यँँभरि नसा। के हो? - दमाहागनगने बूढीको थाप्लामा आगौ“भुड्गो। कै हो? - हुक्का, “चिलिमगनगने बूढीको भान्सै मीठो। के हो? - मौरी र घारगनगते नानीको म्बाइँ खाने बानी,उज्यालो भएपछि पानीतिर जानी। कै हो? - लामछुट्टैगरिवलै फाल्ने, धनीले राख्ने । के हो: - सिँगानगरिबले सोरेर फ्याँक्छन्‌, धनीले खल्तीमा हाल्छन्‌ । के हो?- सिँगान पुछैकोगहतकोसै घौप्टी गाई, दिनभर चरीकन भोकै आई। के हो?&lt;br /&gt;
- - आँसी : हँसियागहिरो तलाउमा चाँदीको बार । कै हो? - दाँतगहिरो पोखरीमा चाँदीको थाल। के हो? - चन्द्रमागहिरो पोखरीमा सुनका माछा। के हो? - तारा&lt;br /&gt;
खाइता गाउँखाने काण्ड&lt;br /&gt;
गाग्राको जस्तो तामाको मानु, कुकुरको जस्तो कान,&lt;br /&gt;
भित्र हेर्दा ताँती-ताँती, यो कथा के हो जान? - दारिमजार) चाप) -यम्सछ) चक तिनी फव्रैको एउटी याँको। कै हौँ?- सिमल&lt;br /&gt;
गीत गाउँदै रातभरि वात्र्छु, एक म्वाइँ खान पाए खुसीसँग बाँच्छ। के हो?&lt;br /&gt;
छि - लामखुद्रैगुदुमुटु छैन मुटु। कै हो? न पटुकागुनिलो फल फल्ने रूखको कर्ल्याङकुर्लङ पात,न दुनु बन्ने, न टपरी बन्ने के हो त्यसको जात ? - अमलागुन्टै राजा पल्टे अरे मङ्गलेको झाइँझाइँ। कै हौ?&lt;br /&gt;
- दिसामा झिँगा भन्केकोगुन्टै राजा लडेर मरे, मङ्गनेको रजाइँ । के हो?&lt;br /&gt;
- दिसामा झिँगा भन्केकोखसी बसिरहने, दाम्लो चर्न जाने। के हो? &amp;quot;फर्सी र लहरागुन्द्रा-काम्ला लथालिङ्गै भुन्टी बज्यै भुइँमा। कै हो? न्फर्सीगुन्द्री काम्लो लदावदी, ज्वाइँनानी भुइँमा । के हो? “फर्सीगुराँस, कपास, मास, काँकरी, चारै जातको एउटै थाँकरी। के हो?&lt;br /&gt;
&amp;quot; सिमलको रुखगैडा खाने, झोल ओकल्ने। के हो? - कोल&lt;br /&gt;
गौँडा छ, जङ्गल छैन; संसार डुल्छ, खुट्टा छैन । के हो? - सयको नोटगैरीखेत टिलपिले पानी, बसिखाने चम्पै रानी। के हो?&lt;br /&gt;
त - सैलरौटी पकाएकोगैरीखेतमा बुलबुले पानी, बुलबुले पानीमा पम्फै रानी,पम्फै रानीलाई बाघले तानी। के हो? - ताईबाट रोटी क्षिकेकोगैरीबारी भुलभुले पानी, म्वाम्म खस्ता रूप फेर्ने वानी। कै हो?&lt;br /&gt;
- सैल पकाएकोगोडा छैनन्‌, टाढा जान्छ, मुख छैन कुरा गर्छ। केहो? -चिठढीगौरु फुकाउन वनमा जाँदा गोब्ने गुइँठाका दुना । के हो?- मौरीको चाकोगोरु मरेको कैले-कैले, डुक्रन थाल्यो अहिले । के हो ?- मादल दर्याङ्ग्रोगोलघरको फुयाल न ढोका। के होर न्फ्सी&lt;br /&gt;
भे पाए डौ कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
० गोला, गोलामाथि नाल, नालमाथि थाल,&lt;br /&gt;
थालमाधि सानोसानो ताल। के हौ? - पिँडालु र कर्कलो५ गौलांगौलो टाउको, मुठीभरको जीउ,&lt;br /&gt;
मोटाउने होइन कहिल्यै जति खाओस्‌ घिउ। के हो? -मदानी० गोलोगौलो नाती कम्मरमा बस्ने बानी,&lt;br /&gt;
ख्ख चढे शुख चढ्नी, &#039;खेत गए खेतै जाती। कै हो? - खुपँटो० गोलघरको एउटै छानो। केहो? - छाता५ गौलघरको स्याल न ढौका। केहो? फर्सी० गौलीमाथि नाल, नालमाथि ढाल,&lt;br /&gt;
ढालमाथि तसानो ताल। के हो? - कर्कलाको पानीन गौलौ-गौलो घरको न क्याल न ढोका। के हो? न्फ्सी० गोलो घरको एउटै छानो! के हो? - छाता&lt;br /&gt;
. गौलौ चकटीमा बस्न नहुने, बस्न खोजे ज्यानै नरहने । कै हो ?- इनार० गोलो छ, पृथ्वी होइन; सास लिन्छ, मान्छे, होइन; कत्ले छ, माछा होइन;&lt;br /&gt;
उफ्रन्छ, उपियाँ होइन । के हो? - भकुन्डौ / फुटवल५ गौलो राम्रो ठूलो फूल, लाउने होइन खाने फूल । के हो? - काउली&lt;br /&gt;
[छ।&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखाने कथा फक 1 क&lt;br /&gt;
छ)&lt;br /&gt;
घद्टमा बस्छ, घटेरो होइन; भुँभुँ गर्छ, भमरो होइन,&lt;br /&gt;
जनै लाउँछ, बाहुन होइन । कै हो?  घट्टको चरोघन्दौं हिँड्छ, जहाँको तहीँ अद्दछख। के हो? - जाँतो/घट्घरको वरिपरि लामालामा पात, पकाईकन पोली खाने के हो त्यसकोजात? - तमाखुघर गयो दैला&#039;ट, म काँ&#039;ट जाम्‌ । के हो? - ज्ञाल र माछाघर छ झुप्रो, छोराछोरीको थुप्रो। के हो? - मौरीघर छ, मान्छे छ, बोलाए बोल्दैन। के हो? - चिहान&lt;br /&gt;
घर त गयौ स्यालबाट, म जाउँ कहाँबाट ? के हो ?- जाल र्‌ माछाघर त रुयालबाट छिच्यो, म कहाँबाट छिरँ? के हो ?- जाल र माछाघरतिर जाँदा बनतिर मुख, बनतिर जाँदा घरतिर मुख । के हो ?- बन्चरोघरबाट जाँदा मरेर जाने, वनबाट बिउँती आँखा तरी आउनै। के हो?&lt;br /&gt;
न्नाम्लोघरबाट निक्लँदा भोको, भित्र पस्दा अघाउनै । के हो? न्गाग्रीघरबाहिर निस्के भुतुक्क मर्ने। के हो? - माछाघर भने झुप्रो, मान्छेको थुप्रो। के हो? &amp;quot; माहरीको घारघरभरि कपडा घरको वीरे नाङ्गै। कै हो? - थामघरभरि पाती रङ्गगीचङ्गगी रूप, तिहुन पकाई खान पाए हुन्छ मीठो&amp;quot;खुप। केहो? - माछाघरभरि मकै, वीरे छोरो भोकै । के हो? - यामघरभित्र घनसार, घनसारभित्र हार लगाएका दाउरा। के हो?- सलाई र काँटीघरभित्र पस्ता नाङ्गै जाने, बाहिर निस्कँदा लुगा लगाई आउनै। के हो?न्मकैँ&lt;br /&gt;
आए डा कपल लामिछात&lt;br /&gt;
घरमा एउटी नानी छन्‌ हेर्दा मान्छे सानी छन्‌,खानु पिउनु क्यै छैन, दिनभरि गीत गाउँछिन्‌ । के हो? - रेडियोघर मेरो खोलाखेत, नाम मेरो सुके,&lt;br /&gt;
तुलारामलाई भेट्न जाँदा नेपालसम्म पुगे । कै हो? न्सिद्राघर मेरो छैत बनमा चाहारछुँ, बच्चा काढ्नु पर्दा फुल अन्त सार्छु।के होर - कोइली&lt;br /&gt;
घरि सिकाँ, घरि ढिकाँ, कहिलेकाहीँ गर्छन्‌ च्वाइँ। कै हो? - ताईघाँटीमा कन्ठी छ मपुर होइन, सिउर छ कुखुरो होइन,&lt;br /&gt;
पुच्छर छ बाँदर होइन। के हो? - छैपारोघाँटीमा झुन्ड्याई गालामा हाने, मीठो स्वरमा वोल्दछ साने। के हो?- माइलघाम-पानी, आँधी-हुरी जे आए पनि बसिरहने, त्यौ नभई हुँदै नहुने ।केहो? न घर्‌घुम-घुम ताउली सालडाँडा जाउली, ,यो कथा नजाने मुसा पोली खाउली। कै हो? &amp;quot;टपरी खुटेकोघुमाई-घुमाई ताउली, दस ठाउँमा घाउ,यो कथा नजाने मुसा पोली खाक। के ही? न टपरी खुटेकोघुमाई-घुमाई पोखरी, नड छेड्ने घाउ, 9यो कथा नजाने मुसा पोली खाक। के हो? - टपरी गाँसेकोघुमाउने पोखरी त हात्तमा लाग्यौ घाउ,यो कथा नजानै वाँदर पोली खाक। के हो? नटपरीघुमाउने घरको एउटै खाँचो । के हो? छाताघुमाउने घरको एउटै छानो। के हो? - छाताघुमाउने घरको श्र्याल त ढोका। के हो? नटौवाघुमाउने थालको पेटभरि घाउ। के हो? -टपरीघुमाउने पोखरीमा नड्का डाम। के हो? - टपरीघुम्छ फनफनी, खान्छ मट्याङग्रा, छर्छ घुलो। के हो? न्घट्टघुम्टी गाई सात बने खाई। के हो? - इँसिया/ आँसीघुम्टो हाली झल्लर तानी, आई अंगाल्छिन एउटी राती। कै हो?- आँखारमाइला गाउँखाने का 0007 17&lt;br /&gt;
घोडाको जस्ता मुख छ घोडा होइन, उड्न सक्छ चरा होइन,&lt;br /&gt;
देखा पच्यो कि बालीनाली सखाप पार्छ। के हो? - सलहघौम्टै ठेकीमा दही जमेको । के हो? न सिँगानघराप्टे ठेकीमा लतलते दही । कै हो? - सिँगानघौडाजस्तै छ घोडा होइन, भारी घोक्छ भरिया होइन । कै हा?है 0 न्गधाघ्याप्प पाइला, ढूयाप्प कान, दुईतिर पुच्छर लौ के हो जान;“हात्तीघ्याम्पे पहाडको बीचमा सानो खाडल। के हो? &amp;quot;नाइटोघ्वाइँघ्वाइँ गर्छ, चक्का ठूलो; खान्छ मट्याङ्ग्रा, झार्छ घुलो। के हो?न्घट्ठ[।&lt;br /&gt;
क रा डा. कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखाने कथा&lt;br /&gt;
(चे)&lt;br /&gt;
चउरभरि पिठो छरेको, घाम आउँदा उडिगएको । के हो? - तुसारोचुक्का ठूलो भूँडे जीउ, डुँडको पावीले जिउँछ क। केहो? -घट्टचर्खा भौ घुम्छ धागो छैन, चार सँगै छन्‌ ढोगभेट छैन,चर्को आवाज गर्छ, तर टोक्दैन। के हो? - चर्खे पिङचचटै ! चचहै ! तारे भीरमा रमाउँछु,के के गर्छिन्‌ मेरी उनी सबै कुरा नियाल्छु। कै हो? - बुलाकीचड्कै मेरो बानी, चड्कै मेरो साथ,सात दिनमा नआए किरिया गरिराख। कै हो? - लामखुट्दैचढ्दा पनि उ-कालो छ, झर्दा पति उ-कालो छ। के हो.&lt;br /&gt;
- छायाँ कालो मान्छेचन्द्रमाचबकी बाच्छैबुट्टी, यो कथा नजान्ने स्यालखुट्टी । कै हो?&lt;br /&gt;
- मोहर ८ रुपियाँ&lt;br /&gt;
चम्कन्छ तारा होइन, मोतीजस्तो छ मोती होइन,टिप्ताखैरि बिलाउँछ फुस्सा होइन । के हौं ?- कर्कलाको पानीको थौपाचरा होइन उड्छ, बत्ती होइन वल्छ। केहो? - जुनकिरीचरीको पुच्छर दुईतिरबाट धपाउने,जसको घरमा टाउको टेम्छ त्यही लजाउने । कै हो ?- ब्याडमिन्टनको कर्कचरीचुच्चै भए पनि नाक त्यसको बुच्चै,पानीसित पौडी खेल्छु, घामसित सुत्छ । कै हो :- रुमाल घौएर सुकाएकोचरी होइन चुच्चो छ, जन्तु होइत खुट्टो छ,&lt;br /&gt;
आफू बिराम गर्दैन, परिआए पछि सर्दैन। के हो? - चुलैँतीचरी होइन, भनौँ भने उड्छ आकाशमाथि,&lt;br /&gt;
केटाकेटी रमाउँछन्‌ बनी प्यारा साधी। के हौ? न्चङ्गाचाँचुँ गर्छ, नाइँ गर्छ, ढोग गर्छ। के हो? - बाँस&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चाँदीको जगमा सुनको कौडा, हातले बटारी भुइमा दौड्दा। के हो!&lt;br /&gt;
- मकै छोडाएकोचाँदीको ठेकीमा सुनकी विर्को। के हो? - ऐँततैल्‌चादाका ठकामा स्याउनाका बिकँ। केहो? 0001चाँदीको ठेकी, सुनको खोल। के हो? &amp;quot; पाकेको केराचाँदीको, धालमा सुनको कचौरा। के हो? - गुनकेसरी फूलचाँदीको बद्दाभित्र सुनको डल्लो,। के हो? , - फुल/अन्डाचाँदीको बुट्दा, सुनको गट्टा। के हो? &amp;quot; फुल/ अन्डाचाँदीजस्तो फूल हुन्छ सुतजस्तो फल,टिप्न नजाने बगाउँछ, रगतको भल। के हो? - 7 ऐतेलुचाँदी फुल्ने, सुन फल्ने। के हो?  ऐतैलुचाकले टेक्ने, मुखले खाने। कै हौ? .- जुकोचामलभन्दा कनिका घेरै। के हो? - भाटा र्‌ खर-चार खटखट, दुई भटभट, दुई डढुवा काठ, एउटा वहुला भाट ।केन्हो? - गाईभैँसीका खुट्टा, कान, सिङ र पुच्छर .चार खम्बा खम्बै छन्‌, दुईबटा नाङ्ला चल्दै छन्‌, दाटा बत्ती बल्दैछ्न्‌ । के हो? त - हात्तीका खुट्टा, कान र आँख्अचार खुट्टा छन्‌ जन्तु होइन, मान्छे वस्छन्‌ घोडा होइन । के हो? - खाटचार खुट्टा छन्‌, न हिँड्छ, न खान्छ। कै हाँ? - खाटचार खुट्टा छन्‌ पलङ होइन, दुईतिर पुच्छर छ हात्ती होइन,पानीमा बस्छ माछो होइन। के हो? गौही&lt;br /&gt;
चार खुट्टा छन्‌ मेरा, गैमाथि थकाइ मार्छन्‌ सारा । के हो? - खाटचार खुट्टा टेकी बस्छ जन्तु भनिँदैत,&lt;br /&gt;
आँखा, कान, नाक, मुख केही देखिँदैन। के हो? -टैबुलचार खुट्टा टेकी बोक्छ भारी जीउमा,आराम दिन्छ ढसमस्स वसी एकै ठाउँमा। कै हो? न खाटचार खुट्ला भए पनि दुई खुट्टाले हिँड्ने। के हो? - कङ्गारुचारखुट्टे जीवको पुच्छर छैन, लमकलमक हिँड्न सक्दैन । के हो?&lt;br /&gt;
- भ्यागुतोचार चुच्चै छ, माटो भए पनि ढुड्दगाको काम गर्छु। केहो? -ईँटाचार चुच्चे, मुख पुच्छे। केहो? न छ्माल&lt;br /&gt;
ईय एएााा?ा?ा?ा?ा?ा?ा?ा?ा?ा?ाा।।ाा डा कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
० चारचुच्चे, मुख बुच्चे। के हो? - मदुस/बाकस» चार चुच्चे, मुख वुच्चै, पानी खान्छे, घाममा सुत्छे। के हो?त - रुमाल सुकाएको० चार चोसामा वुनिएछन्‌ कसका छोराछोरी,जता हुन्छु उतै हेर्छन्‌ कस्ता मोरामोरी। के हो? - तस्विर२० चार जात, दुई बोली, चौधवटा खुट्टा। के हो?.- मपुर, बिरालौ, हात्ती र सुँगुर० चार धाम, दुई पुच्धर। के हो? न्हात्ती० चार पाउ कुपु खाक। के हो? न्पिर्का० चार पाउकी चुप्प रानी दिनहुँ उठी नुहाउँछिन्‌,दालराटीको मर्म नबुझी काँचा रोटी बुकाउँछिन्‌ । के हो? - चकला० चार पाउ दुई बाहाँ, आँखा तेरा कुर्कुच्चामा मुन्टो तेरो कहाँ? के हो?-मैचचार पाद छन्‌ चौपाया होइन, ठूबाँ द्वाँ कराउँछ पुच्छर छैन। के हो?- भ्यागुतो० चारपाटै छ इँटा होइन, क्रा गर्छ मान्छै होइन । के हो? - रेडियो० चारपाटै रूपै छ, बस्छ जमिनमाथि,&lt;br /&gt;
गरिवको घरमा पुग्दा बन्छ प्यारो साथी। के हो? - गुन्द्री० चार भाइ एकै लडमा, एक भाइ छुट्टै। केहो? - बूढी औँला&lt;br /&gt;
० चार भाइको हेराहेर, भेट कहिल्यै नहुने । के हाँ ? - गाईभैँसीका थुन० चार भाइ गुहुमुत, चार भाइ रजपुत,दुई भाइ छन्‌ लङ्ककामा, एक भाइलाई दुख । के हाँ?- सैँस्ीका खुट्टा, युन, सिङ र पुच्छर&lt;br /&gt;
५ चार भाइ छन्‌, कहिल्यै भेट हुन्नन्‌ । के हो? न्सुर० चार भाइ लडे, सय भाइ बढे। कै हो? - मकै५ चार भाङलै एउटै पोखरीमा हाम फाल्ने। के हो? - दूध दुहेको० चार भाइले एकै ठाउँमा तारो हान्ने। के हो? &amp;quot; दुध दुहेको० चार भाइ संगै, एक भाइ छुइद। के हो? - बुढी औँलो० चार भाइ हेर्छन, एक भाइ नाच्छन्‌। के हो? - तुर्ती माड्ैको० चार मुख छ, देउता हैन; वोल्छ, मान्छे हैन । कं हा? - घन्टाघर० चारवटा झर्ना एकै ठाउँमा झर्ने। कै हो? - दूध दुहेको&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखानै कथा ४९,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चारसिङ्गे धामी, उँघो मुन्टो कामी। के हो? - मदानी&lt;br /&gt;
चारैतिर माटौ वीचमा सुनको बाटो। के हो? - हलेदोचारैतिर चाँदीका तार, बीचमा एउटा सरर ६ के हो। -क्क्रोचारै भाइ एकै ठाउँमा हाम फाल्छन्‌। के हो? - दूध दुहेकोचाल त्यसको छदकेमट्के, बसाइ त्यसको जाँतो,&lt;br /&gt;
दाँत उसको अनारदाना, माया उसको राँको। के हो? - सर्प.&lt;br /&gt;
चिच्याउने, मिम्याउने, नाइँ भन्ने, ढोग दिने। के हो?- च्वाँचे, बाख्रा, केरा, बाँस&lt;br /&gt;
चिची माथिको पापा। के हो? न्नङचिल्लो बोटको नरम फल। केहो? - केराचिल्सिङमिल्सिङ ठाडी गाईका तीन सिङ। के हो? न्चुनोचिसोतातो ठिक्क होस्‌ मीठो-मीठो खान्छु, ॥जन्तीहरू बसी हेर्छन्‌ स्वाद लिँदै जान्छु। के हो? न्जिब्रोचिसो पानी तातो पानी, तातो पानीको रातो पानी। के हो?बै - फिक्का चियाचिस्यानमा बस्नै पगरी गुत्ने, मान्छेले देखे खाउँ भनी थुत्ने। कै हौ?- च्याउचिस्यानको मुढौ न कुहिनै न सुक्नै। के हो? न्जिब्रो&lt;br /&gt;
चुइ्याँ-चुइयाँ पच चुइयाँ, चुइयाँका पुच्छरले भुइँ छुइयाँ। कै हो?&lt;br /&gt;
उँ - रौटेपिङ/चर्खे पिङचुच्चे पहाडको टुप्पोमा एउटी चूढी पिङ खेल्ने । कै हो? - बुलाकीचुच्चो छ, चरा होइन; दुई खुट्टा छन्‌, मान्छै होइन;&lt;br /&gt;
आफू बिगार गर्दैन, परिआए पछि सर्दैन। के हो? - चुलँसीचुलबुले टारमा बुरबुरे माटो, हातमा लुयुपुदु मुखमा गाँठो। के हो?&amp;quot; केसारचुल्ठाँ समात्छन्‌, ढाडाँ कादछन्‌ । कै होः - बावियोचोक्टा न चोक्टी, सेता साँप्रा खप्टी। के हो? - कैँचीजोर्न चोर होइन, गुफामा बस्छ बाघ होइन,पुलिसले लखेट्छ मान्छै होइन । के हो? -मुस्रोचौपाया त चौपाया, चारखुट्टे पुच्छर नभएको चौपाया । कै हो?- भ्यागुतो&lt;br /&gt;
३६ 7777 डा कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
० चौरासी बेन्जनको खानपान, दुईजना बस्दा बाइसवटा कान । के हो?- रावण र मन्दोदरी&lt;br /&gt;
५ च्याउँसीका मुजीमा दुईवटा रौँ। कै हो? - सियौं र घागो० च्याउँसीको पुच्छरमा दुईवटा रौँ। के हो? - सियो र घागो० चौवाको पानी, रेसुङ्गाको खेत, पाँच भाइ बाउसे, एउटा हलाले मेट ।के. हो? . ,- लेखेको५ च्याउँसीको नाकमा घाउ। के हो? - तियोको नाग्री. च्यान्टे-भुन्टे कलुवाको वनमै छ बास, जतिखेर पनि रगतकै आस ।के हो? न्जुम्रा० च्याप्प समाई भुइँमा पसारी, सल्याङमल्पाङ्ग पार्दा धुलोमैलो थुपारी ।केहो? - कचो लगाएको[।रमाइला गाउँखाने कथा&lt;br /&gt;
ता 0 ।&lt;br /&gt;
न&lt;br /&gt;
छ)&lt;br /&gt;
छ आ-आ, म केही गर्ने सक्दिन, वस खा-जा। के हो? - डिँगा र किनाछ क संसार उज्यालो, छैन क दिउँसै अंँध्यारो। कै हौ? -सा्यछ कान, चार सिङ, दस पाउ, मुख चार,विना जिब्रो रस चुसी ल्यायो खा अनि गर विचार। के हो?&lt;br /&gt;
&amp;quot; गौँठालो, गाई, बाच्छी, गबुवा र दूधछु कान, दुई पुच्छर, दस गोडा, मुख चार,&lt;br /&gt;
जुन मुखमा जिभ्रो छैन, उसैले लियो दूधको स्वाद । - दूध दुहेकोछ कान, दोन पुछडी, दस गोडा, मुख चार,&lt;br /&gt;
क्या हो पण्डित गर विचार? -दूघ दुहेकोछकालैमा उठी छोरीलाई ढोगिदिने। के हो? - गाग्रो र लोटाछ-छ पैसा भन्छ, तर पैसा होइन। के हो? हर न्रेल&lt;br /&gt;
छ जोगी वा-र बाहुन, तीन लाँक्रा उखु सिङ्गातिङौ खाकत्‌ ॥ के हो?- बाबु, बाहुन र जोगीछद्‌-छद्‌ वराज्‌ म अघि जाउँ, त्यसको मुन्टो निमौठेर खाउँ। के हो?&lt;br /&gt;
न ढिँडो खाएकोछड्‌-छड्‌ बूढा/बूढी, म अघि जान्छु। के हो? न्लौरोछड बूढी मै छ्वास। केहो? - जुत्ता लगाएकोछुँदा पनि छ, हुँदा पनि हौ, खोज्दाखेरि पाइन्त, चाहिँदा पनि चाहिन्न ।केहो? - भुइँचालो&lt;br /&gt;
छर्छन्‌ त्यो ओइरो, निस्कन्छ सुइरो, तीन महिनामा बीर भयो, ढाडैमागर्भ लियो, शिरैमा चँवर लियो, घांस दाउरा अन्नै भयो। के हो?&lt;br /&gt;
- मकैछन पनि छ, हुन पनि हो, खोज्दा पनि पाइँदैन, चाहिँदा पनि चाहिदैन। केहो? - भुइँचालो&lt;br /&gt;
हर रा&amp;quot; डा. कपित लामिछाने&lt;br /&gt;
छुन पनि छ, हुन पनि हो, देख्न पनि देखिँदैन, नभई पनि हुँदैन ।&lt;br /&gt;
केहो? - हावाछपन्न देशमा दस नाच्छन्‌, एक देशमा धिचे आकाश सँ,सैतो भुइँमा मास छर्छ। के हो? - टाइपराइटरछपरकाइँ छपरकाइँ, छपरकाइँको पुच्छर नाइँ । कै हो? - भ्य्रागृतोछ भाइको एउटै टाउको । कै हौ? - मकैको झोलीछ भाइको एउटै दुप्पी। केहो? - मकैको &#039;झोलीछयौ मुसुरो, उम्यो धतुरो, फुल्यो केराउ, पाक्यो केरा। कै हो?- भन्टाछाडे टारी बटारे पिडरी । के हो? - पान्रोछाताको आकार सियाको खिल, औँलाले थिच्ता भित्तामा मिल। के हो?- यमपिनछाताको डन्डी, अङ्गेजीको चार। के हो? - डन्डिफोरछानामाथि दुँड काटेको। के हो? &amp;quot; केराको पातछानामा बसेको खरानी घसेको। के हो? - कुभिन्डो&lt;br /&gt;
छाम्दा सिँगानजस्तो ल्यारं, हेर्दा कालीगेडीको माला । के हौ?- भ्यागुताको फुल&lt;br /&gt;
छानो छ, घर होइन; बोक्न सकिन्छ, भारी होइन । कैँ हो? - छाताछानो रुझयो, भीर पाखा भिज्यो,&lt;br /&gt;
भाँडा भने भरिँदैन त्यसलाई कसले चिन्यो। के हा? -शीतछाला काड्दा दाँत आउने। के हो? - पैन्सिल/ सिसाकलमछालाको ठेकी, काठको उजिन्डो। के हो? - निब्रुवा/ फर्सीछालाको बन्दुक, हावाको गोली, भुइँतिर हान्दा नाकमै टोली । कँ हो?- पादैकोछाला ताछे दाँत पलाउने । के हो? - सिसाकलमछालामा काँडा, त्यसभित्र मासु, मासुभित्र जाली,जालीभित्र दुईपत्रे गुदी । कै हो? - इस्कृतछालाले मुढा काटी । के हा? - दिसा गरेकोछिन्द्रिङ खुट्टी छयानाना, टुप्पी समाई तान न। के हो? - तराजुछिपछिप पानीमा भुकभ्‌कै रोटी। कै होर महको चाकोछिपछिपे पानीमा मुढा लड्घेको। के हो? न्जित्रोछिलिङङे घोतीमा जुमा। के हो? - जालमा परेको माछा&lt;br /&gt;
रमाइला गाढँछने कथा पै २ै&lt;br /&gt;
छुँदा पोल्ने, खाँदा पोस्ते। कै हो? नसिस्तोछुट्टाछुट्टै ठाम्‌, छुट्टै काम, रूप उस्तै, छुट्टाछुट्टै नाम। कै हौ? -रौँ&lt;br /&gt;
छुनुमुनु-छुनुमुनु न्याँक्क । के हो? - जुठो लोटाएकोसमुएएक च्याप, हपखबट्र सङ छुन, पुच्छर भने नए के हौ? जमातकोछुटुपुटु छुटुपुटु कुना घोस्याक्‌। के हो? 4 कुचो लगाएकोछुम्‌ भने छुन सकिन्न, दाम्‌ भने .दाउन सकिन्न,&lt;br /&gt;
बेतको लौरी टेक्न सकिन्न । के हो? - आगीौ, बाघ, तर्प&lt;br /&gt;
छैन र पो दिन्छु, ए किन दिन्येँ। के हो? - लिँडे वस्तु र डाँसछोए टट्टाउने, खाए कोक्याउने, ति&lt;br /&gt;
छाता ओडी बारीमा मोती टल्काउने। केहो? ,..-- -कर्कलो..छौटोमोटो चार अँगुलको, वरिपरि रौँ उम्या। के हो? - जौँको वालोछोटो-मौटो जीउ पुच्छर अलि लामो,&lt;br /&gt;
घोडचढीका हातको तिरमिर पाने चिनौ। के हो? - कोर्राछौड्-छोड्‌ बूढा म अघि जान्छु। केहो? - लौरोछोरी कुट्छै आमा रुन्छै। के हो? - लोहोरो र सिलौटोछौराछोरी बाहिर, बाआमा भित्र । के हो? -लिखारजुम्राछोरी माथि आमा तल। के हो? - खल र बच्चाछोरो गर्भमा छँदा बाबु: छाता ओढाउने । के हो? -कर्कलोछोरो गालामा हिर्काउने, आमा डाँडै धर्काउने। केहो? -घन्टाछोरो छ महिनाको, बाबु तीन महिनाको । कै हौ? - च्वाँचेछोरो हान्ने आमा रुने। के हो? न्घन्टा[]&lt;br /&gt;
क पालो डा कपिल छमिछने&lt;br /&gt;
(ज)&lt;br /&gt;
जग मेरो तराई, गारो पहाडको, छानो सफा हिमाल छ मेरो शरीरको ।केहो? - नैपालजङ्गल छैन हात्ती छ, रानी छैन राजा छ। कै हो? - हजारको नौटजङ्गलबाट भेडी ल्याई नहरीमा पूजा। के हो? - जुम्रा मारेकोजङ्गलमा जन्मैं-हुकैँ, जड्गलमै मरेँ,&lt;br /&gt;
गरेपछि काटी-ताछी पानीभित्र गाडिएँ। केहो? न्ड््ङ्गाजङ्गलमा बसीबसी खान्छ रातो पानी, तमानिसले देखे भने जान्छ जिन्दगानी । कै हो? -्जुम्रोजङ्गली हुँ म, बसाइ छ भीरको, तामाको ठेकीमा फलामको बिर्को केहोर - भलायोजटै जोगी रुखमा अडी, तीन आँखा छोप्छ ध्यानमा गडी। के हो?- चरिवलजता गए पनि पटुकै ओछपाएको । के हो? &amp;quot;बाटोजता पस्यो ओराली, उत्तै मन वराली। के हो? - पानीजता रोटी उतै मुख। कै हो? - सूर्यमुखी फूलजताजता हलो, उताउता चल्यो। के हो? - कार्बतपेपरजति अँध्यारो, उत्ति चहकिलो। के हो? - चन्द्रमाजति काट्यो उति लामो । के हो? - बाटोजति कुल्च्यो उति टाउको उठाउने । के हो? ज्ढिकीजति खर्च्यौ धन, उति बढ्छ झन्‌ । केहो? -्बिद्याजति खाए पनि नअघाउने । के हो? न कोलजति खान्छ उति हान्छ। कै हो? - खोलोजति खायो उति ओकल्न लायो, मुख जोती काम वनायो। के हो? - लेखकोजति घिउ खाए पनि नमोटाउने। के हो? - मदानीजति घोच्यो, उति ठूलो। के हो? - जाल बुनेको&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँछने कथा आए?” “२&lt;br /&gt;
जति झिक्यो, उत्ति बढ्नै। के हो? - खाल्डोजति टाल्यो उति चुहुने, टाल्दै नटालै चुहँदै नचुहुने । कै हौ? - ब्रादल&lt;br /&gt;
जति ठटायो, उत्ति रमाउने। केहो? - मादलजादैन फूलै कुछ) कि चुणा फाल्छ) कै हो? -बैँतिजति ताछ्यो, उति ठूलो। के हो? ज्खाल्डोजत्ति तान्छ, उति जान्छ। केहो? .. &amp;quot;सासजत्ति तान्यो,, उति सानो छोटो। के हो? &amp;quot; चुरोट खाएकोजति दौड पति ठेलो नाघ्न नसक्ने। के हो? न्घष्टजति धेरै ताते पति अडी वस्तैन, तान्न बिस छाडिदिन्छ ढिपी कस्तैन ।केहो? &amp;quot;पासजति नापै पनि एकै हात। के हो? - खलाँतीजति फाट्यो, उति राम्रो। केहो? - बादलजति बढायो, उत्ति झाँको फिँजाउने। के हो? - बराबरियोजति बाँड्यो, उति बढ्ने। के हो? - ज्ञान/विद्याजति बाहिर फाल्छ, उति भित्र जान्छ। के हो: - काठ छेड्ने वर्माजति मासु खान्छ, उति खिनौरे हुन्छ। के हो? - अचानौजति मासु खान्छ, उति मर्न आँद्छ। के हो? - अचानोजत्ति मासु खान्छ, त्यत्ति दुब्लाउँदै जान्छ। के हो? - अचातोजञति म्वाइँ खायो, उति कराउने । के हो? - शङ्ख फुकेको&lt;br /&gt;
जति लात्तो खाए पनि कत्ति डराउँदैन,लात्तौ हान्नै थाके पनि कू त थाक्ने होइन । कै हो? - भकुन्डो/फुटवल&lt;br /&gt;
जति हाल्यो उति खरानी। के हो? - आगो बालेकोजति हेर तिमी उसलाई त्यति उसले हेर्छ,&lt;br /&gt;
नहेर्नु है भने पनि कहाँ उसबे टेर्छ। कै हो? - तस्बिरजत्तिको तत्ति, तत्तिको आधा,&lt;br /&gt;
आधाको पनि आधा, एक जोडी सय। केहो? - छत्तीसजत्रो ठेकी, उतै विर्को। के हो? - जाँतोजत्री भाँडो उत्रै वि्को। के हो? - पृथ्वी र आकाशजान्छ-जान्छ, पात्ती देखी डराउँछ। कै हौ? जुत्ताजन्ती आई रातभर आँगनमा पर्खेँ,&lt;br /&gt;
बेहलाबैहुली नपाएर रित्तै हात फर्के। के हो? - आकाश र तारा&lt;br /&gt;
0 मर पमा दाल डा. कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
जन्तीको माझमा बेहुलीको हलीमली । कै हो? ञ्जिब्गोजन्म घर जल मेरो, कर्म घर धल,&lt;br /&gt;
सेबा गर्छु मानिसको प्रति पलपल । के हो? - बिजुलीवत्तीजन्गदाखेरि एकदम ठूलो हुन्छ, मस्त जवानीमा सानो हुन्छ,फेरि त्यो मर्ने अवस्थामा फेरि ठूलो हुन्छ। के हो? - छायाँ&lt;br /&gt;
जन्मदाखरि भुल्लैभुत्ला, ठूलो , हँदा खरानीका कत्ला । के हो?- कुभिन्डोजन्मदा भुत्लैभूत्ला, ठूलो भएपछि कत्तैकत्ला । के हो? - कुभिन्डो&lt;br /&gt;
जन्मदा जत्रो, मर्दा पनि त्यत्रै। के हो? - आँख्जाको नानीजन्मदा ठूलो हुन्छ, पछिपछि ,सानो हुँदै जान्छ। के हो: - कुचोजन्मदा ठूलो, मर्दा सानौ। के हो? न साबूनजञन्मदै सेतो जुँगा। के हो? - मकैको जँगा&lt;br /&gt;
जन्मन्छ वनमा त्यो मिल्छ धनमा, रुन्छ बरा बाहिरै परी,तस्बिर छैन खालि पगरी, “खुट्टा छन्‌ वरिपरि,वस्ने बेला थुचुक्क, हिँड्दा चाहिँ घौडा चढी। केहो? - डोको&lt;br /&gt;
जन्म्यो कि आमालाई नै खान्छ। के हो? - माकुरोजन्म्यो-हुर्म्यौ नाङ्गाको नाङ्गै, चूढाबाको ढाड वाङ्गाको वाङ्गै ।केहो? ज्बाँसजमिनमा घसी हिँड्ने अनौठो छ जीव,&lt;br /&gt;
त्यसको माला लागाउँछन्‌ शिब । के हाँ? न सर्पजमिनमा पनि जान्छ, बुटामा पनि चढ्छ,&lt;br /&gt;
तर पानीमा जाँदैन। कं हो? -आगौजरायो खरायो पानीदेखि डरायो। कै हो? जुत्ताजरा सबै माथि पारी टुप्पो तल झारी, झुन्डिएर बस्छे सधैँ,&lt;br /&gt;
नक्कल पार्छै काली। के हो? &amp;quot; चुल्ठो/ कपालको चुल्ठोजल छ, तलाउ छ, पाती छ, पिउनु नाइँ। कँ हो? - हिउँ&lt;br /&gt;
जलको जन्म थलको बास, त्यो नभए हुन्छ उपवास । के हो? -नुनजलमा वस्छ, जलेवा होइन; पीठो खान्छ मानिस होइन । के हो? - पानीघट्टजलैजल छ आमाको पेटभरि, उनीमुनि वस्ने म हँ गोलो पगरी ।के हो? , - बियाँजसको हात पनि छैन, खुट्ला पनि छैन, खादै हिँड्दै छ। के हो?- डढेलोजहिले पनि मानिसभन्दा एक पाइला अघि हिँड्ने । कै हो? - लौरो&lt;br /&gt;
रमाइला गाउेखाने कधाप777एएाएाएएाा2।&lt;br /&gt;
जस्तो ओइरो, उस्तै पहिरो। के हो? - फौटौकपी मेसिनजाँदाखेरि मसँगै हिँड्धथ्यो, तर फर्किँदा त्यो फर्केन। के हो?&lt;br /&gt;
- मन्दिरमा लगेर पाठी काठकोजाँदाजाँदै माथि पुग्छु, उड्दाउड्दै धर्ती सिँच्छु। के हो? - बादलजाँदा पनि उ-कालो, आउँदा पनि उ-कालो । के हौ? - कालो मान्छै&lt;br /&gt;
जाँदा फुस्रो, आउँदा चिल्लो। के हो? &amp;quot; न गाग्रीजाँदा भोकै जान्छ, आउँदा अघाएर आउँछ। के हो? “गाग्रीजाँदा सेप्रो, आउँदा भुक्क । के हो? न्पुरीजाँदा सेतो, न्बाएर आउँदा रातो। के हो? &amp;quot; सैलरौटी पकाएकोजाडामा नाङ्गै बस्ने, गर्मीमा सिरक ओढ्ने। के हो? - हिमालजाडोभरि छैन काम, गर्मी-वर्षा सँगै जाम्‌ । के हो? - छाताजान त जानु धर्तीमा जानु, खान्छ कि राख्छ म कसरी जानूँ। कै हो?&lt;br /&gt;
छ &#039; - आलु/पिँडालुजान सक्छ, आउन सक्दैन । कै हो? - खोलो&lt;br /&gt;
जाने ज्ञान नजाने नजान, दुईजना सुत्दा बाइसवटा कान । के हो?- राबणा र्‌ मन्दोदरी&lt;br /&gt;
“ जान्छ-जान्छ, किलो ठोकेर, आउँछ। के हो? - दिसा गरेकोजान्छ-जान्छ, पानी देखी डराउँछ। के हो? &amp;quot;जुत्ताजान्छ-जान्छ, फर्कन मान्दैन /जान्दैन। कै होः? - ढुङ्गा फालैकोजान्छ, दगुर्छ बेसरी फर्कन जान्दैन। केहो? - खोलो नदीजन्मदा ठूलो मर्दा सानो। के हो? हु न कुचोजिम्दौमा रातै पनि तातै पनि, मरेपछि कालै मात्र। कै हो?&lt;br /&gt;
- आगो र अँगारजिरो हाल्न, पीरो हाल मलाई - नहाली हुँदैन। कै हो? - नुन&lt;br /&gt;
जीउभन्दा टाउको ठूलो, हिँड्न लागे खुट्टी लुलो। कै हो? - काँटीजीउभरि काँडा छन्‌ अचम्मको जीव,&lt;br /&gt;
खान खोजे मौसममा तीतो हुन्छ खुप। के हो? - तीतेकरेलाजीउभरि काँडैकाँडा, ओडारमा बस्ने,&lt;br /&gt;
दिनमा बाहिर निस्कदैन, रातभरि डुल्ने । के हो? न्दुम्सीजीउभरि नसो, गालाभरि मोसो। के हो?, - मादल&lt;br /&gt;
बध एला डा, कपित लामिछाने&lt;br /&gt;
५ जीउभरि रबैँरउँ भालु होइन, हातखुट्टा चलाउँछ स्याल होइन,बच्चा च्यापी हिँड्छ मान्छै होइन, रुखमा चढ्छ विरालो होइन। के हो?&lt;br /&gt;
- बाँदर० जुँगा छ मुख छैन, लुगा लगाउँछ मान्छे होइन । के हो ? - मकैको घोगा० जुँगा तान्दा मुसुक्क हाँस्ने । के हो? -चैली&lt;br /&gt;
० जुँगा तान्दा मुसुक्क हाँस्ने, अरू बेला गुठुरी गाँस्ने । कै हो? - चैली५ जुँगा लुच्ठी लुगा च्याती धनगैडी लियो,छातीबाट मोतीका दाना चुँडाइदियो । के हो?- घौगा नङ्ग्याई मकै छोडाएको० जुँगे मामाका दाँत लामा, जङ्गल घुम्छन्‌ छेउकुना । कें हो? - बाघ. जुरो बाँध्नै मेरो तीन अक्षरको नाम,&lt;br /&gt;
पहिलो अक्षर हटाए बाघ भालुको स्थान। कै हो? - रिवन&lt;br /&gt;
० जे देख्यो, त्यही बन्छ। कै हो? &amp;quot;ऐना&lt;br /&gt;
० जोईपोइको एउटै आँखा। के हो? - चुरानो ढौका&lt;br /&gt;
० जोईपोइको एउटै पेटी। के हो? - तगारो र गरालो&lt;br /&gt;
५ ज्यामिरे चुक, जानलाई दुख। के हो? ॥ - औँतीको रात[]&lt;br /&gt;
रमाउला गउसाने का ाााााााााा9ााााा92ााा1911921191&lt;br /&gt;
02)&lt;br /&gt;
झक्कले बोकाको नक्कले कान, लौलौ बूढा बल गरी तान्‌। केहो?- मूला उखेलेको&lt;br /&gt;
झट्ट हेर्दा हाडे जैसी हिँड्छ घोडा चढी,&lt;br /&gt;
कहिले वस्छ टाउकोमा टेकी कहिले वस्छ लडी । के हो ?- डोको, खाङ्ग्र&lt;br /&gt;
झन्‌ पर जान्छे, झन्‌ आँखा तर्छे। कै होर न्डोकोझपक्क रानी, फेदैमा पानी, नपाए पानी जिन्दगानी जानी। के हो?“ - घानको बोट&lt;br /&gt;
झरिल्लो बकुल्लाको पेटै तल अंघैरौ । कै हौ? - बत्तीमनीको जमिनझारजस्तै उमन्छ बारीमा लगाई, मङ्गल हुने काममा राख्छन्‌ सजाई ।&lt;br /&gt;
के हो? नकुशंभिमिक्क आँखा झिम्क्यायो कि त भित्र सबै निम्त्यायो । के हौ?&lt;br /&gt;
न क्यामराझुत्री बूढी चुता-चुला नाच्छै। के हो? - पोतोझु्ी बूढी बिहान उठेर लुटुपुटु गर्छ। के हो? &amp;quot; पोतेको, पौतो&lt;br /&gt;
झुच्रे-झाग्ने चिल, सग्लो मान्छै सुर्लुक्क निल। के हो? - मेक्सीझुटो भनूँ झलझली देखिन्छ, साँचो भनूँ, पाउत सकिन्न । कै हौ?&lt;br /&gt;
&amp;quot;सपना&#039;झोलमाथि दुना, दुनामाथि चोक्टा । के हो? - डुङ्गा चढेका मान्छेरुपाइँकुटी-कुपाइँकुटी कयाइँ,&lt;br /&gt;
जाँदा वस्नै लोगनेमान्छै आउँदा वस्नै आइमाई । के हो? -डौली&lt;br /&gt;
सुपाल-ढोका केही छैन एककोठे घरको,&lt;br /&gt;
त्यस घरको आवाजले रनवन धर्क्यौं। केहो? २. - मादल&lt;br /&gt;
झमराल त ढ्वोका, भित्र काले कामी वसैको। के हो? न्रिठ्ठो&lt;br /&gt;
स्वाट्ट तान्दा निकै दुख्ने, च्वाट्ट काठदा दुख्तै नदुख्ने। कै हो? - कपाल[।&lt;br /&gt;
पछ एक???” हा कपिल ाँपछाने&lt;br /&gt;
८्ट)&lt;br /&gt;
५ टाउकामा छ फुर्के टोपी, पिठ्युँमा छ जुँगा,लुगा खोले दानादाना टल्किदिन्छ मुगा । के हो? - मक्कैको ब्रौट र घोगा&lt;br /&gt;
५ टाउको चिरेको, पुच्छर वेरेको। कै हो? - पेचकीला५ टाउको छ, गिदी छैन। केहो? &amp;quot; नकाँटी० टाउको छ, तरै सौच्दैन। के हो? - कलम. टाउको छ, पुच्छर छ, खुङ्ग छैन; आँखा छ, पेट छ, कान छैन।&lt;br /&gt;
केहो? र - सर्प२ टाउको खैन, पुच्छर छ, दुई खुट्टा छन्‌, काम ठूलो गर्छ। के हो? - चुलेसी० टाउको छोटो पुच्छर लामो, घोडसबारको हातको तानो। के कोर्रा० टाडको तान्दा आन्द्रा निस्कने । कै हो? ज्दुकी५ टाडको निकालेर जीउ खाने । केहो? . - ल्बाङ&lt;br /&gt;
० टाङको नुहेको, मुख छुरा, काम पाए गर्छ पूरा। के हो? - चुतैँसी- टाकुरामाथि बाक्लो घारी, त्यसलाई फाँड्छन्‌ औसर पारी। के हो?ही 1 - कपाल काटैको० टाङमुनि बस्छ पानीको भेल, पिय्यूँमा बोक्छ लामो रेल । कै हो ?- पुल५ टाढाबाट देखाउँछ बिचित्र रूप, नजिक पुगी हेदा हुन्छु फात्तफुस ।&lt;br /&gt;
के हो? - बादल२ टाठाबाट हेर्दा चाँदी टल्कने, घाम लागे आफैँ पग्लने । के हो? - हिउँ५ टाटेटे पहराँ भालु कराएको । के हो? - पार्दैको० टाटटै पहरामा ततल्यांङतुर्लुङ । के हाँ? - नह्ठै पिङ५ टाट्टै पहरामा त्रिशूल। के हो? - वैष्णवको टिको० टारी त टारी उँचो टारी, थोरै माटो फूल रोपे बारी । के हो?- गमला० टाले चुहुने, फाटे नचुहुने। के हो? - आकाश र बादल० टिँटिँ गर्ने मेरो बानी, प्याट हान्नै तिम्रो वानी,&lt;br /&gt;
एकछिन नआए किरिया गरे नानी। के हो? - लामखुटै&lt;br /&gt;
रमाझ्ला गाउँखाने कथा ७ (कजताआगततणजिलिजिलिलिणििरिी लिललललललतु 71&lt;br /&gt;
दुन्टी पुदुङ दुङ, मेरा पुढो सुङ। के हो? - खुर्पेटो&lt;br /&gt;
टुप्पामा फुल्ने, फेदमा फल्ने ।,. के हो? - बदाम / आलुटुप्पी तान्दा आन्द्रा आउने। के हो? ज्टुकीदुत जागे एकातिर, फेद अर्कालिर,आखिरमा दुवै मिल्ने एकैतिर्‌ । के हो? - पेटी लगाएकोटैकुँ-टेकूँ लौरी टेकिनसक्नू । के हौ? - सर्पटेक्दा लड्ठी, चुस्ता मिठी, थुक्दा कपास। के हो? उखुटोपी फुकाली काम गर्ने, अनि पछि टोपी लगाई आराम गर्ने। के हो?कलमटोपी फुकालेर जोत्ने काम गर्ने, टोपी लगाएर विश्वाम गर्नै। के हो?- लेखेकोटोपी लाउँछ, मान्छे होइन, सुँड छ, हात्ती होइन। केहो? .&lt;br /&gt;
&amp;quot; , 1“कित्ली/ चियादानीट्याक्क टाकुरी, बाङ्गो पाखुरी। के हो? - हुँसिया, आँतीदयाप्प-दुपुक्क, क्वाप्प-कपुक्क। के हो? &amp;quot; खाने काम&lt;br /&gt;
[]&lt;br /&gt;
हा डि. कपि लामिछाने&lt;br /&gt;
02&lt;br /&gt;
० ठाम्सैनोम्तै ठोक्रोभरि काँड, त्यहीँमाथि बस्नै गजदैउ साँढ। कै हो?&lt;br /&gt;
- भात पकाएको० ठाडी बूढी छलछली मृत्छै। के हो? - कौल० ठूलो औडारभिव्र रातो पात। केहो? न्जिब्गो० ठूलो गराको कपास टिप्न नसकिने । के हो? - तारा० ठूलो चउरमा सेतो चकटी। केहो? है चन्द्रमा० ठूलो चउरमा एउटा रोटी। केहो? चन्द्रमा० ठूलो चउरमा कनिका छरेको। के हो? - तारा० ठूलो चउरमा काँसको थाल घोप्द्याएको । के हो? - चन्द्रतर्य० ठूलो चउरमा लामो पटुका सुकाएको कै हो? ०&amp;quot; खोलो० ठूलो चउरमा लौरो गाडेको । केहो? - घरहरा० ठूलो चउरमा सेतो चकटी। के हो? &amp;quot;चन्द्रमा५ ठूलो थालमा फुरौंला/कनिका छरेको । के हो? न तारा० ठूलो वालमा बिस्कुन सुकाएको । के हो? ज्तारा&lt;br /&gt;
५ ठूलो पहरामा एउटा प्वाल, प्वालबाट खस्ता पुर्ने पाताल । के हो?- खानेकुरा खाएको&lt;br /&gt;
५० ठूलो पहाडमा एउटा गुफा। केहो? ज्‌ मुख० ठूलो पहाडमा एउटा मात्र खुड्किलो । के हो? - नाइटो० ठूलो पहाडमा सुनढिकी । के हो? न्फुली० ठूलो भीरमा एउटी बुढी चचहै गर्दै खेलेकी । कै हो? - बुलाकी५ ठूलो रमा तारा जदड्ेको। कै हो? - निधारको टीका० ठूलो भीरमा पानीका कुवा। के हो? - आँखा५ ठूलो भीरमा भेडा टाँस्सिएका । के हो? - अछैताको टीका&lt;br /&gt;
० ठूलो भीरमा रातो काम्लो ओल्लयाएको । के हो ? - पाकेको भुइँकाफल&lt;br /&gt;
र&lt;br /&gt;
बनमा गन सा 1710&lt;br /&gt;
० ठूलो रूखमा एउटामात्र पात । के हो? - पनिउँ&lt;br /&gt;
० ठूलो वनको माझमा एउटामात्र अग्लो रुख। के हा? न्टुप्पी० ठूलो बनमा कोरीबाटी गरेर वसेको । के हो? - निउरो५ ठेकी हातमा बिकको रूखमा । के हो? - ऐँसेल्‌० ट्याप्प पाइला ध्याप्प कान, साता आँखा ठूलो ज्यान। कै हो?-हात्ती[।&lt;br /&gt;
0 लि डा. कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
० डरलाग्दा आँखा छन्‌, चितुवा होइन; राघैपाटै छ, बाघ होइन;&lt;br /&gt;
लामो पुच्छर अए पनि बाँदर त्यो होइन। के हो? - बिरालो० डल्ली चरीको पेटमा कल्ली, पुच्छरमा धातु जडी अँधैरीमा बल्ली ।केहो? - बिजुलीको चिम&lt;br /&gt;
० डाँडाको नाकको दायाँ र बायाँ, रुपा र बेगनास ताल। केही?, &amp;quot;आँखा० डाँडा न आटा घुमाउने घर। कै हो? - माकुराको जालो० डाँडापाखा चिसो पाखा रगतका दुना। के हो? - लालीगुराँत० डाँडामाथि गएर घाँक्कघुँक्क गर्ने। केहो? - बन्चरो&lt;br /&gt;
« डाँडावारि डाँडापारि दुई भाइ छन्‌, भेट कहिल्यै हुँदैन। के हो?- आँखा० डुङ्गाजस्तो जीउ त्यसको पिङ खेल्नै बाती,&lt;br /&gt;
काखमा राखी झुलाइरहन्छ साना-ताना नानी। कै हो: -कोक्रो० डुल्छ वनपाखा सयवटा आँखा। के हो? न्डौको&lt;br /&gt;
० डौको, नाम्लो केही छैन, भारी बोकी हिँड्छ,सुँड यस्सो छोड्यो भने भारीभित्रै लुक्छ। कै हो: - शङ्खेकीरा० डोब आउँछ, कीलो त्यहीँ रहन्छ। के हो? - ऐँसैल्‌० डीरीको चुल्ठो, डौरीकै कान, थाप्लामा राखी गर्दछन्‌ मान । के हो?न नाम्लो&lt;br /&gt;
[|&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखाने क्या थामा रै&lt;br /&gt;
(द?&lt;br /&gt;
ढाडभरि नसो, गालाभरि मोसौ। के हो? - मादलढाड्डमा आँखा, पेटभित्र दाँत। के हो? - गँगटोढाडिएको पेट, सधैँ लडिराछ्छु आराम दिन पेटलाई माथि शिर थाप्छु ।के हो? - सिरानीढुकुर कुर्ल्यौ पारि वनमा, मुजुर नाच्यौ वारि वनमा। कै हो?&lt;br /&gt;
- बन्दुक पड्काएकोढुङ्गो न माटौ, स्वर्ग «लेख जानै बाटो । के हो? - लिस्नो/भन्याङढोका एउटा, कोठा पांच; जाडोमा चाहिन्छ, बेलैमा साँच। के हो?&lt;br /&gt;
&amp;quot;पन्जादृयाप्प पाइला घ्याप्प कान, दुईतिर पुच्छर घेरै थाम। केहो?न्हात्ती&lt;br /&gt;
[छ|&lt;br /&gt;
10 00 खन काललाई 0 :0001010101010&lt;br /&gt;
पत)&lt;br /&gt;
तँ जाँदै गर, म आउँदै गर्छु। के हो? - खापा/पाइलातँ ठडिई, म अडपाउँछु। के हो? - तौक्मातँ थाषिई, म हाल्छु। केहो? - जुत्ता लगाएको&#039;तँ&#039; भन्दा नछोइने, &#039;म&#039; भन्दा छोइने। केहो? - ओठतँलाई चुस्छन्‌, तैलाई थुक्छन्‌। के हो? न्न्ङ्यु&#039;तँलाई हेर्दा मलाई देख्छु। के हो? न ऐनातँ सुत्‌, म हाल्छु। के हो? - जुत्ता लगाएकोतँ हान, म थापिन्छु। के हो? - घन र छिनौतँ हुल, म घापिन्छु। कै होर ज्जुत्ता र खुङातनक्क-तनक्क तनक्क तान, दुईवटा पुच्छर छुवटा कान। के हो?- गौरु जोतेको&lt;br /&gt;
तनक्क-तनक्क तनक्क तान, तीनवटा मुजी छवटा कात। के हो? - जोतेकोतरकारी खाने हरियो पात, पानी अड्ने यसको जात । के हो? - कर्कलोतस्ल भन्छन्‌ खान हुन्न, इँटजस्तो छ गारो लाउन हुन्त । के हो? - नैपाल&lt;br /&gt;
तल खुदकिलो, माथि पात। केहो? - उखुतल चक्का माथि घ्याइँ यो कथा नजान्नै स्यालको ज्वाइँ। के हो२- जाँतोतल छयाड्कगा, माथि घ्याम्म। के हो? - छाता&lt;br /&gt;
तल झाङ माथि ताल, तालमाथि उक्सँदो माल । के हो ?- पुरी पाकेकोतल डाँठ माथि गाँठ, गाँठवरिपरि हरियो पात । के हो?- गाँठे गोपी&lt;br /&gt;
तलतिर कल्चौँडा माथितिर धुन । के हो? न्केरा&lt;br /&gt;
तलतिर सिधा माधितिर गाँठो, गाँठोले हान्दा धुलो हुन्छ माटो। के हो?&amp;quot; डल्लैठो&lt;br /&gt;
तल्ला घरकी वूढीको पाथीजत्रो प्वाल,&lt;br /&gt;
उपल्ला घरका बूढाले उफ्री-उफ्री हाल। के हो? - घान कटैको&lt;br /&gt;
तल धाल माथि झाल, त्यसमाथि हीरालाल । के हो? - खुर्सानी&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखाने का 50&lt;br /&gt;
तल थाल माथि नली, पो कथा नजान्ने स्यालको हली। कै हो? - तराजुतल पनि घ्वाईं माथि पति घ्वाइँ,&lt;br /&gt;
यो कथा नजन्नैलाई अगुल्टाले च्वाइँ। कै हो: न्घट्ट&lt;br /&gt;
जसय जति जपझी खपि गन्द डाक, दणे हो गाउँको विचार, केही?&lt;br /&gt;
- कुखुराको भाले&lt;br /&gt;
तल फुकेको, माथि फुकेको, बीचमा .सुकेको । कै हो? - बस्नै मुढा&lt;br /&gt;
तलबाट हाँस आयो, एक पाँजो घाँस ल्यायो । के हो? न्मूलातलमाथि करङ वीचमा छाला, वर्षामा यसले ओत देला। केहो?&lt;br /&gt;
ता घुम/ स्याखु&lt;br /&gt;
तल मादल बजाउने, माथि छमछम नाच्नै । के हो ?- लटाइ र चङ्गा&lt;br /&gt;
तल र माथि फुकेको माझमा सुकेको । के हो? - डमरु&lt;br /&gt;
तल लौरी माथि चौरी। कै हो? .  कर्कलो&lt;br /&gt;
तल बन माथि वन, बीचमा छन्‌ डुङ्गा,&lt;br /&gt;
डुड्गालै नै च्याउन छाडै काम लाग्दैन गड्गा। कै हो? - आँखातल हेर्दा थाल हुन्छ माथि हेर्दा ताल,&lt;br /&gt;
तालमाथि पौडी खेल्छ स्वादिलो छ मान । के हो ?- सेलपुरी पकाएको&lt;br /&gt;
तलाउवरिपरि ठाडा कीलाको बार। केहो? - परेलातल्तिर कल्चौँडा मास्तिर थुन, भित्र चाँदी बाहिर सुन। के हो?&lt;br /&gt;
&amp;quot; केरा पाकेको घरीताउली पाक्यो, जाउली पाकेत। के हो? - अम्बा, बैलौँतीताउलो पाक्यो, जाउलो पाकेन। के हो? - खनिउँ&lt;br /&gt;
ताछ्छदै लगे मोटाउँदै जान्छु, काट्दै लगे लामो हुन्छु। के हो? - खाल्टोतान्दा तान्न सकिन्न, बाँध्दा बाँध्न सकिन्न,&lt;br /&gt;
छुन सकिन्छ, तर फेर्न सकिन्न । केहो? - नदी खोलातान्दा दुख्छ, काट्दा दुख्दैन । कै हो? - रौँ कपालतान्ने दुई भाइ पछि ठेल्ने भाइ एक,&lt;br /&gt;
कहिले छेउ कहिले कुना, डाँडा-पाखा-लेक । के हौँ? - हलो जोतेको&lt;br /&gt;
तान्ने भए तान, नत्र झुन्डिएर मर्छु। केहो? &amp;quot; सिँगानताप दिइन्जेल रातो, छाडेपछि कालो । कै हो? - कोइला, फलामतामाको गाग्रीमा सुनको असर्फी। केहो? - पाकेको खुसाँनी&lt;br /&gt;
तामाको गिलासमाथि लामालामा स्याउला । कै हो ?- तागत्तहितको गाजर&lt;br /&gt;
पप 27 डा कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
तामाको घैँटाबाट स्वादिलो फल निस्कने । के हो? - अनारतामाको जग, माटाको गारो, पानीको छाना,&lt;br /&gt;
दिनभर पर्खिदा तीन-चार माना। केहो? - रक्सी पारेकोतामाको ठेकीमा काठको बिर्को। के हो? - खुसाँनी /फर्सीतामाको ठेकीमा फलामको विर्को। के हो? - भलायोतामाको ठेकीमा स्याउलाको निर्की। के हा? - गाजरतामाको दैलो, चाँदीको सँघार, भित्रकी नानी घुरुक्क उघार। के हो?- मुख, दाँत र जिब्रोतामे नली फलामे फली। के हो? “फापर.ताम नली फत्रक्क गली। के हो? - कालो कर्कलोतारे पहाडमा सोली घोप्द्याएको । के होर न नाकतारे भीरमा अनौठो पानी, कहिले त बरै जानी। के हो? - पसिनातारै भीरमा एउटी बूढी चहैचहै । के हो? - बुलाकीतारे भीरमा एउटै अखेटो /खुद्किलो । के हो? - &amp;quot;नाइटोतारे भीरमा अनौठो पानी, कहिलेकाँही बगेर जानी । के हो ?- पसिनातारै भीरमा पिङ झुन्ड्वयाएको। के हो? - बुलाकीतारै भीरमा मृगको साँप्रो झुन्ड्याएकी । के हो? - भौलाको टाटातारै भीरमा रगतको छिटो वटुकी। के हो: न टीका लगाएको&lt;br /&gt;
ताल, तालमाधि धागो, धागोमाथि आगो। के हो? - बत्ती बलेकोत्तिम्रा आमाछोरी र हाम्रा आमाछौरी पात टिप्न जाम्‌,तीनवटा गैडा अमिलो सिङ्गासिङ्गै खाम्‌। के हो?- आमा-छोरी र नातिनीतिमी जाफ, म आउँदै छु। के हो? - पाइलाको छापतीन अक्षरको भए पनि एक काटे &#039;चार&#039; बन्छु। के हो?) - अचारतीन अक्षरको मेरो नाम, नयाँ अर्थ दिनै काम,उल्टो-सुल्टो एक समान । कै हो? - नवीनतीन अक्षरको मेरो नाम, मान्छेको खाना,अगाडिको एक अश्षर झिके, बोटबिरुवाको खाना । के हौ? - चामलतीन अक्षरको मेरो नाम, विद्वान्‌ हुन मलाई छान्‌। के हो?&lt;br /&gt;
- कलम / किताबतीन अक्षर मिल्दा बन्छ एउटा देशको नाम,माझको अक्षर झिकिदिंदा वन्छ मीठो माम। के हो? - भारत&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखाने कधाए7772ाााा?ा?ा?ा?ो?ा?ा??ा??।””,&lt;br /&gt;
तीनअक्षरे मेरो नाम, टाउकोमा फरफर गर्छु,&lt;br /&gt;
पहिलो अक्षर हटाइदिए, नेपालको धन बन्छु। केहो? - रिबनवी गाइको एउटै पगरी । के हो? 1 औदानतीन भाइ खेल्ने एउटै आँगन। केहो? त्यही र बुट&lt;br /&gt;
तीन टाउका, छ कान, दस खुट्टा एउटै तान । के हो ?- हली र नारिएको गोरुतीन टाउका, छ ,कान, दस खुट्टा, एउटै तान। के हो? - दृध दुहेको.तीन टाउका, दस खुट्टा, काम छ चर्को-बाँझोफुद्वा । के हो ?- हलो जोतेको&lt;br /&gt;
तीन भाइको साझा पगरी एउटै फेटा। के हो? - औद्दानतीन भाइ दाइँ गर्ने, दुई भाइ चुप लागी हेर्नै। के हो? -लैख्नुतीनमहिने बालकन्ने छ महिने पेट,&lt;br /&gt;
हरभरि छोराछोरी छैन पोइसित भेट। के हो? केरा&lt;br /&gt;
तीन शिर दस पाउ, सोह्र तन्तु एक घाउ । के हो? - हलो जोतेको,तिनाउको पानी बटौलीको खेत, पाँचजना बाउसे कोदाली एक। के हो?&amp;quot; लेखेकोतुनाको यैली, सुनको पैसा। के हो? - खुसानीतेरा लागि म मरेँ, मेरा लागि तँ नमर, अझै मान्दैनस्‌ भने तँलाई मार्न पनिकोही बाहिर बसिरहेको छ। के हो? - बल्छीमा अल्झाइएको गड्यौला र माछातेरो नाम अदारे, पारि भित्ता पछ्छारे। कै हौँ? - सिँगान फालेकोत्यसैको हाँ त्यो, त्यसैको छत्यौ। केहो? - सर्पको काँचुलीत्यस्तो देश कहाँ छ, जहाँ प्राणी हुन्नन्‌,ताल-समुद्व भए पनि पानी हुन्न, माछा पाइन्नन्‌ । के हो :-नक्सा / मानचित्रत्यो कुरा आफ्नै हो, तर आफूले भन्दा अरूले धेरै चल्ती गर्छन्‌। कै हो?ज्नामत्यो घरकी एक्ली बूढी, कुम्लो छाडी रुख चढी। के हो? - तरुलत्या मलाई हेर्छु, म त्यसलाई हेर्छु म गए बाटो दिन्छ आफू भने जदैन ।के हो? - ढोका&lt;br /&gt;
[1]&lt;br /&gt;
(थ)&lt;br /&gt;
० चचक्क वसिरहने काली राँड, हग्छै हद्दडी वाम्छे जाँड । के हाँ?&lt;br /&gt;
- कोत&lt;br /&gt;
० यामजत्रो खुट्टा, सुपाजत्रौ कान, दुबैतिर पुच्छर के हो त्यस्को नाम ।केहो? &amp;quot;हात्ती&lt;br /&gt;
० थालभरि अक्षता, गनिनसक्नु चेपत्ता। कै हो? - तारा० थालभरि तितौरा खाइनसक्नु । के हो? &amp;quot;तारा५ धीलभरि फुलौरा छरैको। के हो? - तारा० थालभरि फुरौला र्‌ दुईवटा बारा। कै हो? - तारा, चन्द्रसर्य५ थालमरि मुसुरी एक ढिको नुन। के हो? तारा र जूत&lt;br /&gt;
५ धालभरि भात, बिटभरि तिहुन । कै हो ?- गरामा धान र आलीमा मास, भट्ट० घालमा भात भयो, बिटमा दाल, नाच्यौ-पाम्यौ उठाउन थाल । के हो?- गरामा धान र आलीमा मास, भट्ट० घालमा नाच्दोखेल्दो, त्यसपछि घाम ताप्दो । कै हो ?- रोटी पकाएको० धघालीमाथि वडुकी, बटुकीमा झोल, तह लाउन त्यस्को कान मोल ।&lt;br /&gt;
केहो? - कप-प्लेट० थुतुनो छ सर्पजस्तौ आगोमाधि बस्छ,मुखबाट तुर्क्याउँदै मुखैभित्र पस्छ। के हो? - कित्ली/ चियादानी&lt;br /&gt;
«० थुपुक्क बसेको, खरानी घसैको । के हो? - चुलामा बसालेको कसौँडी&lt;br /&gt;
छ&lt;br /&gt;
राणा ७१.&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखानै कथा&lt;br /&gt;
(द)&lt;br /&gt;
दगुर्न सक्छ, हिँड्न सक्दैन। के हो? - खोलो /नदीदह्ठो टाउको लामो जीउ, गिदी छैन खान्न घिउ। के हो? - मदानीदलदाल पारी लद्छारी, तीन पाथी पानी झारी,&lt;br /&gt;
टाँगिदिन्छन्‌ डोरीमा बटारेर झट्कारी । के हो ?- लुगा धोई सुकाएकोदलै टट्टाउने, निलै कोम्याउने, छाता ओढी बारीमा मोती झल्काउने ।&lt;br /&gt;
केहो? -कर्कलो&lt;br /&gt;
दल्दादल्दै खिइसकी सेतीसेती मोरी,&lt;br /&gt;
आफू मोरी अरुलाई बनाउँछै गोरी। के हो? - साबुन&lt;br /&gt;
दस औँला हाँसिरहन्छन्‌, दुईवटा सिया नाचिरहन्छन्‌ । के होर-स्विटर बुनेको&lt;br /&gt;
दस खुट्टा, छ कान, तीन मुख, दुई हात । के हो? - दूध दुहेकोदाँत धेरै छन्‌, कुकुर त्यौ होइन, जङ्गलमा हिँड्नेलाई त्यल्ले छाड्ने&lt;br /&gt;
होइन। के हो? - काइँयोदाँत बाहिर, ओठ भित्र। के हौ? - मुसलदाँती हेर्दा हीराजस्तो, जुँगा हेरै बाघ,&lt;br /&gt;
कपडाको चाडभित्र बस्नै त्यसको जात। के हो? - मकैदाइ आयो भाइ छाडी गयो। केहो? - पैतालाको छापदाइ सुत्दा भाइ उठ्छ, भाइ सुत्दा दाइ उठ्छ। के हो?&lt;br /&gt;
- गोठालो र दाम्लोदाकँ-दाकैँ बहर दाड्नसक्नु । के हो? - बाघदाजु-भाइ बेला-बेला मुख जोडी सुत्छन्‌। के हो? - परैलादाजु-भाइ सँगै हुन्छन्‌, मिल्न खौजे नासिन्छन्‌ । के हो? - बिजुलीका तारदाजु लाटो, भाइ बाठो। के हो? - घरहरा र घन्टाघर&lt;br /&gt;
दाम्ला-दाम्ली गए चर्न, भैंत्ती वसै खाल । कै हो? - फर्सी र लहरादायाँ-बायाँ दुई सुरुङ, बीचमा एउटा पहाड । कै हो? - आँखा र नाक&lt;br /&gt;
छे शी” डा कपिस लामिछाने&lt;br /&gt;
साइला गाउंखाने कथा नाई”&lt;br /&gt;
दायाँ छूपा बायाँ बेगनास, वीचमा चुच्चे डाँडा,यताउति गर्दै झिमझिम पार्दै गर्छन्‌ धेरै रमिता । के हो?- आँखा र नाकदिउँसमा लेखाउने, रातमा वाटो देखाउने । कै हो ?- चाइनिज कलम र लाइट&lt;br /&gt;
दिउँसो उल्टो, राति सुल्टो। के हो? - चमेरौबिए बढ्छ, नदिए घट्छ। के हो? - बिद्या/सीपदिदी पोल्नै, बहिनी सन्च। केहो? - घाम र जनदिदी-बहिनीको द्वेखादेख हुने, भेट कहिल्यै नहुने। के हो?- घाम र जनदिनको थाली, रातको भोकर। के हो? - मान्द्रो&lt;br /&gt;
दितभर हिँडेको हिँड्यै, चार हात मात्रै। के हो? - गुन्द्री बुनेकोदिनभरि आँखा थुन्छ जोगी, रातभरि डुल्दै बन्छ भोगी। के हो?&lt;br /&gt;
- लाटोकोसेरोदिनभरि खाली बस्छ, रातभरि बोम्छ,सुती-सुती जमिनमा चार खुट्टा टेक्छ। कै हो? - खाट/पलङदिनभरि ताकाताक, रातभरि खापाखाप। के हो? न दैलोदिनभरि दाजुभाइ मिलेर बस्छन्‌, रातभरि दाजुभाई छुट्टिएर बस्छन्‌ ।केहो? - दौराको तुनादिनभरि ध्यान गर्छु, रातभरि डुल्छ। के हो? &amp;quot;उल्लुदिनभरि भरी, राति रित्तै। के हो? - कपडा राख्ने फोकदितभरि रहमा डुब्छ, बिहानीपख पहाड चढ्छ। कै हो। - पौतौदिनभरि लाखा धुनी, रातभरि कान्लामुनि । के हो? नहलोदिनभरि लुगा लगाउने, रातभरि नाङ्यौ विताउने। के हो?- लगा सुकाउने टाँगौदिनभरि लुरीखुरी, रातभरि कान्लो क्री। कै हा? नहलोदिनभरि सुत्छ, रातभरि उठ्छ। के द्दौ? - दाम्लोदिनभरि हिँड्यो, जहाँको त्यहीँ। के हो? न कोल&lt;br /&gt;
दिनरात बाहिर बसी अरूलाई चिनाइहरने । कै हौ? - परिचयपाटीदुई अक्षरको मेरो नाम, सानौ छँदा पकाई खाम,&lt;br /&gt;
ठूलो भए घुरीमा जाम्‌ । के हो? - बाँसदुई अक्षरको मेरो नाम उल्टो सुल्टो जताबाट भन, खान पाउन्न भात,कहिले भान्छा, कहिलै गरिबको साथ,। कै हो? - लोटा र टालोदुई अक्षरका मैरो नाम, सुल्टो, हुँदा खाने गर्दछन्‌,&lt;br /&gt;
उल्टो हँदा रमिता हेर्छन्‌ । के हो? - चना“नाच&lt;br /&gt;
७३&lt;br /&gt;
दुई अक्षरको मेरो नाम, सुल्टो हुँदा खाने डाइट,&lt;br /&gt;
उल्टो हुँदा चल्छ फाइट। के हो? &amp;quot;चना र नाचदुई औौँताको भामा चल्ने एक आँखे सारस। के हो? - कँचीदुई खुट्ठाले उभिन्छ, हिँड्न सक्दैन, कमलो पाए कुटुकुटु खान्छ,निल्त सक्तैन । के हाँ? - चुलेँसीदुई ,गोठको भकारो एउटै हातले सोहोर्नै । के हो? - सिँगान फालेकोदुई गोठको मल, एकै हातले फाल। के हो? - सिँगान फालैकोदुई घरको एउटै मात्र ढोका। के हो; - साँध-सिमानादुई छेउ आमाबाबु, बीचमा छोराछोरी । कै हो? - भन्याडदुई भाइ खटाखट, दुई भाइ फटाफट, दुई सुकेका काठ, एउटा बौलाहाहात। केहो? - चैँसीका खुट्टा, युन, सिङ र पुच्छरदुईजना दाजुभाइ परेली जोडी सुत्छन्‌ । के हो? - खापा/पलेटादुईतिर खोल्सा बीचमा डाँडो। के हो? । ननाकदुईत्तिर खोल्सो, माझमा डाँडो। के हो? - नाकदुईतिर चुरीफुरी अगिल्तिर हुल, इनारका मुखमा कदमका फूल। के हो?$  ओखलमा धान कटनुदुईतिर जन्ती, माझमा डाँडो। के हो? दाँत र जिब्रोदुईतिर धार, साँधको बार। के हो? &amp;quot; केतुकेदुई दाजुभाइको एउटा धीती। केहो? - ढोकादुई दाजुभाइ छन, एउटाको आँखा छ, टाउको छैन,अर्काको टाउको छ, आँखा छैन। के हो? - सियो र पिनदुई दाजुभाइ मिली जोडिएर बस्छन्‌,काम गर्नु पन्यो भने सँगै कम्मर कस्छन्‌ । के हो? - कैँचीदुई-दुई अक्षर मिली बन्छ नाम, त्यो नभए होइन्छ ठन्डाराम । के हो?- हावापानी&amp;quot; दुई दिदी-वहिनीको एउटै मुन्द्री। के हो? ञ्चिम्टादुई दिद्दी-बहिनीको एउटै रिङ। के हो? -चिम्टादुई पखेटा दुई सिङ, हलुको जीउ फुरफुर उद्दछिन्‌ । के हो ?- पुतली:दुईपटि गाछ्ी रुख, माझमा फल। के हो? - भुइँकटहरदुई पाखे कटेरी, एउटै टाउकाले उचाली । के हो? - स्याख“घुम&lt;br /&gt;
दुई पाङ्ग्रा छन्‌ साइकल होइन, दगरर्छ मोटर होइन । के हो? - मोटरसाइकल&lt;br /&gt;
छ 0 डा कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
० दुरड भाइ उठ्ती, चार भाइ सुत्नी। कै हो? नकानर खुट्टा० दुई भाइ उद्नी, चार भाइ सुत्नी। के हो? - तगारौ र गरालो० दुई भाइका तेर्सा करङ। कं हो? - भन्माङ० दुई भाइ नाच्ने, दुई भाइ हेन, दुई भाइ दुस्स। के हो?&lt;br /&gt;
- कान, आँखा र सिङ&lt;br /&gt;
० दुई लिगमा रेल हिँड्दा लिग नै जोडिन्छन्‌ ।.कै हो? -्चेन» दुईबटा फेद र दुईवटै हाँगा । के हो? - मातित्त० दुईबटा बूढा सपाली बजाई नाच्छन्‌ । के हो? -चिम्टा० दुईवटा मान्छेको एउटै पटुका । के हो? -आग्लो२ दुईवटा सिन्का नाचिरहेका । कै हो? - स्विटर बुनेको« दुईबटी दिदीको एउटै मुन्द्री। केहो? -चिम्टा&lt;br /&gt;
« दुई सिङ चिप्लो गोरु, हाड्दै छैन कसो गरु।, के हो? - चिप्लेकीरा० दुई हातको काँकरीको तीन हातको वियाँ,राम-लछ्लमनकी लडाइ्रैमा म पनि थियाँ। के हौ? - ठैकी र मदानी&lt;br /&gt;
० दुई हात चार पाउ, काखमा लिन्छु यता आफ। केहो? -कुर्ती० दुई हात जोडेर चुलामाथि बस्ने, एकै छिनपछि सी-सी गर्ने। कै हो?&amp;quot; प्रैसर कुकर० दुई हात दस पाउ, घारघुर पारी तताई खाक। के हो?- गाईसैँसीको दुध५ दुई हातले समाती मेट्तै धोको, खुवाउँदा पनि पेट हुन्छ भाको। के हो?- शाड्डख&lt;br /&gt;
५ दुलाहा गयौ दुलही लिन, जन्ती गए किन,&lt;br /&gt;
बाउबिनाको छोरा जन्म्यो, आमा नभा&#039;को दिन। के हो? - कुमालकोटी५ दुलाहा न सुलाहा एकैदिनमा हजारौंको बिहा । के हो? - तुलसीको बिहे० दुलाहाले दुलहीको सबै कुरा देख्न सक्छ,&lt;br /&gt;
तार एउटा कुरा देख्न सक्दैन। के हो? - विधवा अवस्था० दुवै भाइ म अघि जान्छु, म अघि जान्छु भन्छन्‌। के हो? न्खुट्ठा4 दूध न दही घिउ आई, यो कथा नजान्ने कुनामा जाई। के हो? - सिँगान० दूँघै बालकले पिट्दा पनि आमा रन्छन्‌। के हो? - घन्टाको रालो० देखादेख हुने, भेट कहिल्यै नहुने। कै हो? न न्सुर० देखिन्छ खेतमा, दाँत छ पेटमा। के हो? - गँगटो&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखाने कथा नामा रै,&lt;br /&gt;
देखिन्न त्यो छ शक्तिवान्‌, छुन पुग लिन्छ ज्यान । कै हो? - करेन्ट&lt;br /&gt;
देखे भने लखेट्छन्‌ लुकिछिपी हिँड्छ,&lt;br /&gt;
गाउँ-घाका कृष्रा-पाठा देखेँ भने टिप्छु। के हो? - स्यालदेख्दा छ, समात्दा छैन। के हो? - छायाँदेख्दा लौरो, खाँदा काठ, निल्छ रस, बुक्ख कपास । के हो? - उखुदेख्दा सानो .छ डल्ले, कराउँछ वलले। के हो? - राड्छदेख्दा सोझो छ, बिरामी त्यो छैन, उचालिने र पछारिने गर्छ। के हो?ज्ढिकीदेख्नलाई नजिकै छ, होइन त्यति टाढा,भेट्न खोज्दा सकिँदैन हुन्छ टाढा-टाढा। के हो? - आकाशदेख्नको ड्ाल, खानको काल। कै हौ? - असिना, हिउँदेख्नेले बोल्दैन, बोल्नेले देख्दैन । के हो? - आँख्ला र मुखदैलामुनि सिँगारी वाखरो। के हो? -चिचिन्डौदोसल्ला ओढेको, खेतबारीमा अडेको, ओठ देखिँदैन जुँगा त गजापको ।के होर मकैरि&lt;br /&gt;
पु नाडा. कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
(घ)&lt;br /&gt;
« , घरहराको टुप्पामा सानो पोखरी, पोखरीको मास्तिर झलमल जूनकिरी ।&lt;br /&gt;
के हो? - पानत बत्ती4 घधेर्तीमुनिको कयुरे गोरु। के हो? नमुसो० घेर्तीमुनिको जगल्टै घर्ती। के हो? - भ्याक्रन घैर्तीमूनि चाँदीको फाली। के हो? - अदुवा /मूला« घेर्तीमुनि जाउँला, छाता ओढुँला। के हो? - पिँडालु० घेर्तीमृनि नबसी छातै ओढ्दिन, फूल फुलाउने काम गदै गर्दिन । के हो? - पिँडाल्‌५. घेर्तीमुनि बल्दयाङबुल्डुङ नाङ्लाजत्रा पात। के हो; - पिँडालु५ घेर्तीमुनि महको भुँडकी। के हो? - खनिउँ- घर्तीमुनि सुनको दुन्को। के हो? - हुलेदो५ घिर्तीमुनि सुनको फाली। कै हो? न हेलेदो« घानको भए पराल हुन्थ्यो, तरकारीलाई मारे,&lt;br /&gt;
पानी त्यसको सुकाउन ढुङ्ग्राभित पारे। के हो? &amp;quot; गुन्हुक&lt;br /&gt;
० घीन छ धान छु केषाभरि घान छ्‌ न आफू खान्छ न अस्लाई दिन्छ। के है?-धत्रो० धनीले खल्तीमा राख्छन्‌, गरिबले बाहिर फाल्छन्‌ । कै हो? - सिँगान० घनीले राख्छन्‌, गरिबले फाल्छन्‌, केटाकेटीले खान्छन्‌। के हो? - सिँगान० घीरिलो पिठिउँ उसको, चरीनङ्ग्री खुडी,&lt;br /&gt;
आँखा, कान केही छैन, नाकमा छ मुन्द्री। कै हो? -चुलैँती० घार्ती न बिसौंली, दुई हातले उचाली । कै हो) - टौपी लगाएको० घुरीमाथि कुलैसो काटेको । के हो? - सिउँदो,&#039;केराको पात५ घुरी मार्नै पहिले, दाँती लाउने अहिले। के हो? - घुम/स्याखु० घेरैजना जान्छन्‌, एउटालाई छोडेर आउँछन्‌ । के हो? जत्ास५ घरै दुलहीको एउटै डोली। के हो? - केराउ “बोडी२ घैरै पहिले गरिदिन्थेँ हुलाकीको काम,&lt;br /&gt;
शान्तिचरी भने पनि अघि सर्छुन्‌ खान। के हो? - परेवा&lt;br /&gt;
| छि&lt;br /&gt;
रमाइता गाउँछने कथा पा”&lt;br /&gt;
(ने)&lt;br /&gt;
नक्कले चराको शिरमा शिरफूल । कै हो? - भाले कुखुरोनखाङी भने दिनभरिको सिकार, खाँ भने कान्छाबाको अनुहार ।के हो?, - बाँदरन खान हुनी न लाउन हुनी, झिकेर खान सकिँदैन कहिल्यै,&lt;br /&gt;
त्यो अर्थ कै हौ लौ जान पण्डित पहिल्यै । के हो? न्विद्यान खान्छ न पिउँछ, दिनभरि घरको रच्छै गर्छु। कै हो? - तालान चोन्यो उस्तै न कसैलाई माच्यो, तर उसको टाउको सबैले काटे&lt;br /&gt;
केहो? - न्नङनदी मेरो गाउँ, सुकै मेरो नाउँ,&lt;br /&gt;
लौ है साथी हो परदेश घुम्न जाकँ।.के हो? न्सिद्वानदी मेरो गाउँ, सुकै मेरो नाउँ,&lt;br /&gt;
हिँड-हिँड साथी हो परदेश घुम्न जाजँ। केहो? न्सिद्वानदेखिने शक्तिवान्‌, छुन पुगे लिन्छ ज्यान। के हो? - करेन्टनपिट न भान्से बज्यै ! छैन मेरो पाप,&lt;br /&gt;
छुद्याइदिन्छु ढुङ्गोमाटो टिपी अन्तै राख। के हो? - नाङ्लोनबसम्‌ भने बसम्‌-बसम्‌ लाग्छ,&lt;br /&gt;
बसम्‌ भने सारै बेर लाग्छ। केहो? - चौतारोन बाहिर बाँक्रो, न भ्रित्र खोक्रो। के हो? &amp;quot;लड्डुन बाहिर बोक्रो न भित्र खोक्रो, मुखमा हाल्यो धुलो र पिठो ।क्केहो? - कतारन बोक्रो न बियाँ, न गुदी न सियाँ,&lt;br /&gt;
बिना रूपको फल झर्दा म त्यहीँ थियाँ। के हो? - असिनान भित्र खोक्रो न बाहिर बोक्रो। के हो? - नुनढिकीन हिँड्छ न बोल्छ, देख्दा दुरुस्तै । के हो? - तस्विरनाइँ-नाइँ भन्छ थुपुक्क ढोगिदिन्छु। के हो? &amp;quot; केराको पात&lt;br /&gt;
७६19 डा. कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
नाइटो अँड्याउँदा ट्वाल्ल हेने। के हो? &amp;quot; टर्च लाइटनाउँ कं हो, कहाँ छ बास, कताबाट आई पार्छु सत्यनाश । के हो?&lt;br /&gt;
- भुइँचालोनाउँ छ डल्ले, कराउँछ वलले। के हो? - शङ्खफुकाइनाउँ छ धरीधरी, आफू मरी, अरुलाई बनाउँछ गोरी । के हो? - साबुननाक-कानलाई बोझ, आँखालाई मोज । कै हो? ., न्चस्मानाक चुच्चे पुच्छर बुच्चे, खान्छ अन्न, पानी बन्न -बन्द । कै हो?&lt;br /&gt;
न्घुतनाकमा चढेर कानमा समात्नै । के हो? - चस्मा लगाएकोनाकमा हात जुनेली रात। केहो? - बिजुलीबत्तीनाका टेक्ने, कानाँ समाउने । के हो? ज्चस्मानाङ्लाभरि विस्कुन सुकाएको । के हो? - आकास र तारानाची-नाची एउटी आई, फूलहरूको न्याल खाई । कै हो? - पुतलीनानीका धौतीमा जुम्रा । के हो? - जाल र माछानानी त सानी जगल्टां ठूला । के हो? न्म्‌लानानी-नानी छोट्टी, उफी-उफ्री धान कट्दी। के हो? - उपियाँनामजस्तो काम छैन, झुल्छ कोठाभित्र,जात त्यसको बनस्पत्ति मानिस हुन्‌ मित्र। के हो? - मनिप्लान्ट&lt;br /&gt;
नाम त्यसको मुसले, उफ्रन्छ खुप्तले, झालमा लुकाउँछ जाहान,तरकारी भुटुबा अस्तल हुनगयो, थप्नै नपर्ने वाहान। के हो - घिरम्लौबाम नभएको मान्छै हुन्न, त्यो मान्छेको नामै छैन । कै हो ?- नवजात शिशुनाम-ख्प सानै छ ठूलो हुन्छ काम,&lt;br /&gt;
गर्नै लाग्दा बचाउँछ मानिसको ज्यान। के हो? - औख्नती&lt;br /&gt;
नाम्लो-डोकी केही छैन भारी त्यसले वोक्छ,&lt;br /&gt;
छोयो भने त्यसलाई, भित्रभित्रै लुक्छ। के हो? - शाड्खकीरा&lt;br /&gt;
नियाल्दा ढुङ्गाजस्ती उचाल्दा ढुइगो, रन्केपछि लाउँछ कामको टुङ्गो ।&lt;br /&gt;
केहो? न्ड्स्त्री&lt;br /&gt;
निर्जीव भनौँ भने पलाउँछ, सजीव भनौं भने काट्दा मर्दैन। के हो?-&amp;quot; नङ र कपाल&lt;br /&gt;
निरन्तर डुल्दै हिँड्छै देखिन्न त्यो नानी,कोहीसित ठोक्किएमा सुसाउने चानी। के हो? - हावा&lt;br /&gt;
साइला गउँखने काला”&lt;br /&gt;
नीलो दहमा ढकमक्क फूल। केहो? - तारानीलो दहमा सेता फूल। के हो? नतारानीलो पोखरीमा चाँदीको थाल। के हो? न चन्द्रमानहाईघबाईं जीउमा चन्दन लगाई । के हो ? - भाँडाछा खरानी लगापुकोनुहाउन जाँदा सेप्रो, डुबुल्की मारी आउँदा भुक्क। केहो? -पुरी&lt;br /&gt;
नेपालै भैँसीको दुईतिर पुच्छर। के हो? - हात्तीनेपाले रानी सुतिरहने बानी । के हा? - सिरानीनौतले घरको त फ्याल न ढोका। के हो? - बाँतनौतले देवलको नौवटा रुयाल। के हो? - घैरहरा&lt;br /&gt;
नौ दिनसम्म कुनामा बस्छ, दसौं दिन टाउकाँ चढ्छ। के हो? - जमरानौ दिनसम्म कोठाभित्र गुम्सिएर बस्नै,&lt;br /&gt;
दसौँ दिनमा मानिसको शिरमाथि चढ्ने। कै हो? - जमरा&lt;br /&gt;
नौ बहिनीले एउटै पछ्यौरा ओढ्छन्‌ । कै हो? - सुन्तला&lt;br /&gt;
नौरड्गी शरीर यसको बास हिमालमा,&lt;br /&gt;
राष्ट्रियताको गीत गाउँछ यसले नेपालमा । के हो? - डाँफे&lt;br /&gt;
नौवटी नानीको एउटै धोती /पछयौरी। के हो? - सुन्तला[।&lt;br /&gt;
90 9 डा. कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
(प)&lt;br /&gt;
पकाउने काम परे सुसाउने गर्छ,लोती बमाई ननिमोठे ठहरै मर्छ। के हो? - दमचुलोपकाए काँचै, पोले सखापै। कै हो? न्रौपकाएको पोलेर खाने, काँचो काँचै खाने। के हो? - तमाखु र सुर्तीपकाए नपाक्ने, उसिने नउसिनिने, आगामा हाल्दा सकिने। के हो?&amp;quot;रौँ कपालपकायो-पकायो पोलेर खायो। के हो! .- तमाखुपक्कै छ, नजिकै छ, छाम्दा &amp;amp;्वैन, समात्न सकिँदैन । के हो?- छापाँपखेटा छन्‌ चराचुरुङ्गी होइन, रड्गीविरङ्गी छ,&lt;br /&gt;
बगैँचामा दुल्छ, फूल पनि होइन । के हो: - पुतलीपखेटा छन्‌ परेवा होइन, घोप्टे सिङ छन्‌, चौपाया होइन। के हौ?- पुतली&lt;br /&gt;
पखेटा छैन आकाशमा उड्छ, बतास आए भाग्छ, घामलाई छेक्छ ।के हो? - बादलपरख्रेटा न सखेटा आकाश चाहार्ने। कै हो? - बादलपखेटा न सब्चैटा माथिमाथि उद्दने। कै हो? - बादलपखेटा भएको उड्ने घर, पर्छन्‌ मान्छे त्यसको भर। के हो?&lt;br /&gt;
- हवाइजहाजपछाडि छ आँखा अगाडि सँ, हिँड्दाहिँड्दै सृष्टि गर्छ,पशु पनि होइन, मान्छे पनि होइन। कै हो? सियोपछाडिपट्टि सर्प झुन्डिएको । के हो? - कपालको चुल्ठोपत्रैपत्रको डल्ले च्याउ, मन लागे पकाई खा । के हो ?- बन्दागोपीपत्रैपत्र छु, पण्डितका साधमा छ। के हो? - पाम्नोपन्ध्च दिन बढे पनि पन्ध दिन घट्छ,आउँदाखेरि झलमल्ल जाँदाखैरि अलमल्ल । कै हो? जून&lt;br /&gt;
साइला गाउँखाने कषा पाका ााठाकी&lt;br /&gt;
पन्ध भाइ छन्‌, बार भाइ सुत्छन्‌, तीन भाइले काम गर्छत्‌। केही?&lt;br /&gt;
- घडीपर गयो पर गयो, यहीनेर आयो। के हो? - लुगा सिएकोपराल ख्वानख्ख नस्तु होइन, न्याउनीभी बास्छ न्याउली होइन। के बो?&lt;br /&gt;
- जनाई&lt;br /&gt;
प्रखालिपछाडि मृगको साँप्रो। के हो? - रातो धागोले बाटेको चुल्ठोपर्वतमाझमा एक जोडी गुफा, गुफालाई सधैँ गरिन्छ सफा । के हो?- नाक&lt;br /&gt;
पल्टन त पल्टन दुई पल्टन, आए जति चट। के हो?- दाँत र मुखपल्लो गाउँमा कुकुर भुक्यो, मेरा हातमा पुच्छर। के हो:&lt;br /&gt;
&amp;quot; बन्दुक पड्काएकोपवित्र घरको धुरीमा सोली घोप्द्याएको । के हो? - गजुरपश्चिममा लुकेका दाइ पूर्बबाट आए,सानाठूला सबैसँग मायाप्रीति लाए। के हो? न्सूर्यपहराकी निददिनी, जगल्टामात्र देखिनी । के हो? - बावियोपहराको बीचमा हात्तीको पाइलो । के हो? - नाइटो&lt;br /&gt;
पहाड छ, ढुङ्गोमाटो छैन, नदी छ, पानी छैन,&lt;br /&gt;
जङ्गल छ, रुख छैन, सहर छ मान्छे छैन। कै हो? - तक्सा/ मानचित्रपहाडको टुप्पामा चारकोसै झाडी के हो? - कपालपहाडमाथि छेउकुता, ठाउँ-ठाउँमा रगतको दुना । के हो ? - लालीगुराँस&lt;br /&gt;
पहाडमा पहिरो गयो, हुहुराउँदो र बुर्चुराउँदो । के हो: - घट्टमा अन्न पिसेको&lt;br /&gt;
पहिले कपाल लुछछत्‌ अनि हड्डी फोर्छन्‌,&lt;br /&gt;
काटकुट पारी बाँडीचुँडी खान्छन्‌ । के हो? - नरिवलपहिले कच्याक कुचुवक भाँडाभित्र कोच्छुन्‌,अनि मलाई पकाएर घिच्छन्‌। के हो? - गुन्द्रुक&lt;br /&gt;
पहिले खान्थे दानव जाति, अहिले छान्छन्‌ मानव जाति। के हो?-रक्तीपहिले चारखुट्टै, त्यसपछि दुईखुट्टै अनि तीनखुट्टँ। के हो? -मान्छैपहिले जन्म्यौं हामी आफैँ, त्यसपछि जन्मे जेठा दाइ,&lt;br /&gt;
व्रात्रा जन्मेको हामीले देख्यौं, पछिघाट जन्मे कान्छा भाइ । कै हो?&lt;br /&gt;
- दूध, दही, मही र घिउपहिले हामी जन्म्यौँ, पछि जन्मे जेठा दाइ, वावा जन्मेको हामीले देख्यौं,पछि जन्म्यो कान्छो भाइ। के हो? - देध, दही, मोही र घिउ&lt;br /&gt;
परै र डा. कपिललामिछाने&lt;br /&gt;
० पहिले तान्छ मानिसले, पछि मानिसलाई तान्छ उसलै। के हो: - चुरोट० पहिले मलाई भिजाउँछन्‌ त्यस्त पछि कुट्छन्‌,&lt;br /&gt;
कुटेपछि मत्तसंग खाई भोक मेट्छन्‌। कै हो? - चिउरा० पहिले माया गर्छन्‌ पछि कुदछन्‌,औछयाएर फैरि मोज लुट्छन्‌। केहो? - केपासन पहिलो बेतमै माउ मर्ने। के हो? - केराको .ब्रोट५ पहेँलो सारी फरक्क पारी, कालो ओडारमा म्बाप्प हाली । कै हो?- केरा खाएको&lt;br /&gt;
५ पाँच अक्षरको मेरो नाम, उल्टो सुल्टो एउटै हुन्छ जात । के हो?- लामाको माला / नवजीवन&lt;br /&gt;
० पाँच जना हेर्नै, एक जना नाच्ने, चार जना लुक्ने। के हो?&lt;br /&gt;
&amp;quot; सुर्ती माडेको&lt;br /&gt;
० पाँच दाजुभाइको एउटै थाल। के हो? - हत्केला० पाँच भाइको एउटै आँगन। के हो: - हत्केला५ पाँच भाइको एउटै खलो। कै हो? - हत्केला५ पाँच भाइको एउटै गुफा, गुफाभित्र एउटै कोठा। केहो? -जुत्ता० पाँच भाइको एउटै पगरी। के हो? - हत्केला० पाँच भाइको एउटै बाटो। के हो? - पैताला० पाँच भाइको एउटै निकास । के हो? - हत्केला५ पाँच भाइ पस्नै एउटै ढोका, ढौकाभित्र पस्ता आफ्नै गुफा। कै हो?न्पत्जा&lt;br /&gt;
५ पाँच भाइले दिन्छन्‌ दुईभाइले हेर्छन्‌, एक भाइले खान्छ। के हो?- हात, आँखा र्‌ मुख&lt;br /&gt;
५ पाँच मानितको एउटै पेट। के हो? &amp;quot;हात० पाँचवटा मुखका दशवटा कान, पन्धरवटा आँखा पो कथा जान। केहो?- पाँच टाउके शिव&lt;br /&gt;
० पाइलौ पर्दैन, दगुर्ने छोड्दैन, जीउ छ टाउको छैन । कै हो ?- ड्ङ्गा५ पाखुरा छन्‌ पन्जा छैन, जीउ छ टाउको छैन। के हो? - दौरा«५ पाङ्ग्राविताको मोटर लुगामावि दौडन्छ। के हो? - इस्त्री लगाएको० पाटाको धरो झिलिमिली रुयाइँ, यो कवा नजान्नै लोख्र्कको ज्वाइँ ।&lt;br /&gt;
केहो? - इन्द्रेनी&lt;br /&gt;
रमाइला गाउने क्या नााााा91ाआ1आ1आ11आ1आ106 रै&lt;br /&gt;
पाटी त पाटी घर्मशालाको पाटी, खोलेर हेदा तीन सय साढी। के हो?&lt;br /&gt;
- मौरीको घारपात एकै नाइँ, हाँगाको लेखे नाइँ। के हो? - सिउँडीपात खन, रुख छैन, तर सितल दिन्छ। के हो? ला पखपातको लेख्नै नाइँ, हाँगो एकै नाइँ। के हो? - केराको बोटपातले छाप्छन्‌ करडले ढाक्छन्‌, गोलो पारी शिरमा राख्छुन्‌। कै हो?&lt;br /&gt;
न्छन्रीपातालमा खुट्टा छन्‌, टाउकामा सुँड छ,सुँड चलाइदिए ह्वालह्वालती छादछ। के हो? - टृपुबब्रेलपातैमा फल छ, पातैमा बल छ, रुख त्यसको हुँदै हुँदैन,जति खाँ-दिङँ बढ्दै जान्छ, कहिल्यै घट्दैन। कै हो? - विद्यापान सयमा किन्यो, तीन सयमा बेच्यो,जम्माजम्मी दुई सय नाफा भयो। के हो? - पानपानामुनि मलाई राखी लेख्तै जाँदा माथि,तल पनि उहीउही बनाइदिन्छु साथी। के हो? - कार्बन पेपरपानीको पुत आगाको वाउ, त्यसलाई छोए ज्यानै जाउ। क हो?&lt;br /&gt;
- बिज्ूलीबत्तीपानी छ दह होइन, रूखमा बस्छ चरो होइन। के हो? - नरिवलपानी छ, पानी छ, पिउनु नाइँ। के हो? - हिउँपानी न सानी, खाली बल्छी खेल्नी। के हो? न्बाँसपानी परै पखाली जा, माटो परे कुही जा, झगडा परे कचहरीमा जा 1केहो? &amp;quot; कागजपानी बिताको पोखरीमा माछा उफ्रन्छ। के हो? - मकै भुटेकोपानीविनाको पोखरीमा माछो पौडिएको । के हो? -नित्रोपानीबिता बल्छी खेल्छ। केहो? न्याँसपानीभित्र जन्म भयो पानीभितै बस्छु,पानीबाहिर रहँ भने आँफैलाई नास्छु। के हो? - माछापानीभित्र रमाउँछिन्‌ जलपरी होइनन्‌,सुनगौडी फलाउँछिन्‌ छ्‌ख भने होइनन्‌ । के हो? - घान रोपेकोपानीमा खेल्छ जलेवा होइन, चारो टिप्छ परेवा होइन । केटो?&lt;br /&gt;
- घान रोपेको&lt;br /&gt;
पे 7 डा. कपितलामिछाने&lt;br /&gt;
० पानीसँग खेल्ने सानी-सानी नानी,&lt;br /&gt;
पानीसँग खेल्दाखेल्दै जान्छ जिन्दगानी । के हो? - साबुन५ पारिबाट आयो रुयाप्ल्याक-श्याप्ल्याक कान,मुखबाट बिचान्यो बन्चरोले हान। के हाँ? -्केरा&lt;br /&gt;
० पारिबाट लास आयो, तँलाई कल्ले भन्यो ?&lt;br /&gt;
जसका पेटमा आन्द्रा, छैन, त्यल्लै मलाई भन्यो। कै हो ?- शङ्ख फुकेको० पारि भित्तामा कुकर भक्यो, पुच्छर मेरो हात। के हो? - बन्दुक० पारि भित्तामा कुकुर भुक्ने, मेरो मुटु दुख्ने । के हो? - बन्दुक पट्काएको&lt;br /&gt;
० पारि वनमा दहीको ठेकी झुन्ड्याएको। के हो? - भैक्याम्लो. पालिस लगाएकैँ गरिन्छ जुत्ता होइन, यताउति गर्छु खुट्ल छैन। केहो?&lt;br /&gt;
-्इस्न्री&lt;br /&gt;
० पालैपालो आउँछ, तर पाले होइन। के हो? - दिन र रात२ पाहुना आउँदा उत्तानो परेर सुत्ने, पाउना गएपछि उठ्ने । केहो?&lt;br /&gt;
- गुन्द्री / काम्लो / गतेँचा&lt;br /&gt;
० पाहना आयो घरबेटी मुसाका दुलामा हात। कं&#039;हो? न्जाँड&lt;br /&gt;
५ पिँढीक्रे चेप्टे दाइले खान्छन्‌ छिटछिटो,&lt;br /&gt;
पेट छैन अटाउने ओकल्छन्‌ पीठो। के हो? - जाँतो&lt;br /&gt;
&amp;quot;० पिलपिल गर्नै सान्नानीको पेटभरि पानी। के हौ? न्टुकी२ पिँध चुस्ने, टुप्पामा बाल्ने, मुखले च्याप्तै हावामा फाल्ने । के हो?&lt;br /&gt;
- चुरोट खाएको&lt;br /&gt;
० पिँधबाट हाल्दा कम्मर छिन्ने। के हो? - भोटेताला&lt;br /&gt;
५ पिँधमाथिको लालगैडी / रातीगैडी । के हो? न आगो&lt;br /&gt;
५ पिँध सुकेको, घाँटी लुकेको, पेट फुकेको। के हो? - करुबा- पिँध सुकेको, छाती फुकेको, टाउको न खुट्टाको । के हो? -बाल्टी५ पुच्छर छ जन्तु होइन, रेलझैं हिँड्छ रेल होइन । के हो ?- चिप्लेकीरा५ पुच्छर छ बाँदर होइन, चार पाउ छन्‌ चौपाया होइन,&lt;br /&gt;
सिउर छ कुखुरो होइन । के हो? - छैपारौ० पुच्छरमा छ पैसैपैसा, शिरमा शिरपेच हरदम,&lt;br /&gt;
त्यही नाच्व्यो वनमा पैले बादल देख्दा छमछ्नम। के हो? - मुजुरको प्वाँख२ पुच्छरमा थिच्दा जुरुक्क उठ्ने, चटक्कै छोडै चुच्चाले टेक्ने ।&lt;br /&gt;
केहो? न्हिकी&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँबाने कथा न ाणए???॒ ?»&lt;br /&gt;
पुच्छरमा थिच्दा मुन्टो उठाउने । के हो? &amp;quot;ढिकी&lt;br /&gt;
पुड्के बाहुनको सुर्के चन्दन । के हा? न मात्तपुद्दके भँडारी, नसाको भारी। के हो: - दमाहानुप्ली परी, गीत गाउँदै झरी। कै हो? - सनाई&lt;br /&gt;
पुन्टी बूढी पुन्टिला, पछ्यौरा ओढी कता जाँ। के हो? न्नुँडीपूरै पढे एउटा जिल्ला बन्छ, बीचक्को अक्षर झिके खानेकुरा बन्छु ।&lt;br /&gt;
केहो? - पाल्पापेटमा दाँत छ, शिरमा एउटा सिङ छ, ॥&lt;br /&gt;
समातेमा सिङ फनफनी रिङ्छ। के हो? - जाँतोपेट मेरो गडबड रोगी नभने, निधारमा विगुत जोगी नभने ।केहो? - हुक्का र चिलिम&lt;br /&gt;
पौकाभित्र पोटिला दाना, उधारेर हेर्दा, स्वादिलो खाना । के हो; - अनारपोखरी, पोखरीमाथि घारो, घारोमाथि तारो, तारोमाथि चौर,&lt;br /&gt;
चौरमाथि जङ्गल, जङ्गगलभिव्र चौर। कै हौ? ज्जुम्नापौखरी सुक्यो, बकुल्लो मन्यो। के हो? &amp;quot;दियो बा टुकीपौखियो कि उठाउनै नसक्नि। के हो? -बौलीपोखेको सबै चिज उठाउन हुने, एउटा चिज उठाउन नहुने ।के हो? - क्रा/बोलीपोलेको माछो खेतखेतै दगुर्ने। कै हो? - फालीपौलेको माल्लो रुख चढ्छ। के हो? - हँसिया, आँसीप्रश्न यो कि उत्तर के हो? न्दिशा[।&lt;br /&gt;
दई 77 डा कपित लामिछाने&lt;br /&gt;
क)&lt;br /&gt;
फटफरै बूढाको पेटभित्र ससाना पैसा। केहो? -फींर बियाँफतफते वूढीको तालुमा भुङ्गो। के हो? - हुँकका-चिलिमफनफन घुम्ने गर्मी याममा, चिसो हावा बेच्छे दाममा । के हो?- पड्खाफल फझत्यो भुइँभरि, रुख छैन वरिपरि । के हो? न असिनाफल झत्यो भटँभरि, रुख छैन बरिपरि, बिलाउँछु मनपरी। के हो?॥ - असिनाफल न फूल, स्याम्म पथरी। केहो? - उनिउँफल न फुल डाँठैमा भूल। केहो? . उखुफल न फूल डाँठमात्र मौटो। के हो? “ नउखुफलफूल होस्‌-नहोस्‌ पात फुल्छ,त्यही पात पूजाआजामा चल्छ। कै हो? - वरपीपल “बेलपत्र&lt;br /&gt;
फल लागे फूल लाग्दैन, फूल लागे फल हुँदैन । के हो ?- भाङको बोटफलामको करङ, कपडाको छाला,&lt;br /&gt;
बाङ्गो छ पुच्छर नाउँ के होला: केहो? - कुहिरोफलामको पाता, सुनको छाता। के हौ? - डाँडामाथि घामफलाम वर्ण पाक्ने, सुन वर्ण फुल्ने। केहो? ज्चुन्रौफलामै फली, तामे नली। के हो? - फापर&lt;br /&gt;
फलेको कताकति हुन्छ, नफलेको वाक्लै हुन्छ । कै हो? - चामल र बियाँफल्दा पनि फल्दैन, फुल्दा पनि फुल्दैन, टोकरीभरि बिक्छ। कै हो?- नुन&lt;br /&gt;
फल्दौ न फुल्दौ ख्यापस्याप्ती । के हो? - उनिउँफाटेको राम्रो एउटा, फुटेको राम्रो अर्को । के हो? - बादल र कपासफाले फाल नत्र झुन्डिएर मर्छु। केहो? - सिँगानफिस्टै चराको मासु थोरै, बोसो घेरै। के हो? न्रिड्ठोफुटालेर धुलो, चिनी-चिनी ठूलो। के हो? - बान्तो: पर्खाल&lt;br /&gt;
फुल त फुल हो, न भुजामा चल्छ न पूजामा चल्छ। के होः -लिखा&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखाने कथा ााााणाणणाााााााााााााााफफ77फ&lt;br /&gt;
फुल्दा घागौमा मुसा नाचेको । के हो? - लुगा बुनेकोफुल्दा चाँदी, पाक्दा सुन। के हा? - चुन्तलाफुल्दा चाँदी, पाक्दा सुन, टिप्न गाह्रो खाँदा गुन । के हो? - ऐसैलुकुल ति तुरपैन, &#039;ाल्यो पि फल्दैन, टोकरीमीरि निछ। केहा? -नुनफुल्दा पनि फुल्दैन फल्दा पति फल्दैन, सन्तान त्यसका धेरै छन्‌।&lt;br /&gt;
केहो? कक - उनिउँफुल्दो न फल्दो हरियो पात,&lt;br /&gt;
चन्दन दली मसला हाली मुखमा गास । के हो? - पान&#039;फूलबारीको सानी नानी, माफझको ढाड जहाँ तहाँ। के हो? - पुतलीफेद काटे मर्ने, टुप्पो काटे सर्ने। के हो? -उखुफेद टुप्पो कहाँ-कहाँ माफको ढाड जहाँको तहाँ। के हो? -बाटोफेदमा लौरी, टुप्पामा चौरी। क्रे हो? - मकैको बोट&lt;br /&gt;
फँदीबाट पानी ल्याई रानीखैत भिजाए, -&lt;br /&gt;
पाँच भाइ हली मिली लिँडे गोरु कदाए । के हो? - कलमले लेखेको&lt;br /&gt;
फ्याक्क फ्याकुली, फ्याकुलीका पेटभित्र सानासाना टिकुली। के हो?ज्फर्सी&lt;br /&gt;
फ्याक्क फ्याकुली, फ्याकुलीका पेटभित्र सानासाना पैसा । के हो?- फर्सी&lt;br /&gt;
छ|&lt;br /&gt;
पप नाडा कप्रिल लामिछाने&lt;br /&gt;
(ब)&lt;br /&gt;
त क&lt;br /&gt;
बगैँचामा आँप पाकेछ, एक भाइले देख्यो, अर्को भाइ चोर्न गयो,जानेले टिपेन, अर्कैले टिप्यो, टिप्नेले खाएन, अकँलै खायो,गाली खायौ एउटाले, कुटाइ खायो फेरि अर्कैले । के हो?&lt;br /&gt;
- आँखा, खुट्टा, हात, मुख, कान र पिठ्पूँबच्चाको साथी माउको काल, बाहिर निस्केपछि लगेर फाल। कै हो?&lt;br /&gt;
न्अम्नो&lt;br /&gt;
बजाउन हुन्छ, बाजा होइन; _लागाउन हुन्छ, झऔँठी होइन; गोलो छ, रिड पनि होइन। के हो? न्चुराबज्छ, बाजा होइन; कम्मरमा बस्छ, इँजार होइन । के हो? - खुर्पेटोबडेमानको छाती उसको, मुख छन्‌ चारवटा,&lt;br /&gt;
तीन रङको खाना खान्छ उनान्तीसवटा । के हो? - क्यारिमबोडँबत्तीस घरमा दुई थरका छन्‌ चार सिकारी दाउ हेर्छन्‌,बाँकी अठ्ठाइस जाल बुन्छन्‌। के हो? - बाघचाल&lt;br /&gt;
बत्तीस जना वारपार, माझमा एउटा सरदार । कै हो?- दाँत र जिब्रोबसाइ हेर्दा कुक्रको, बाघको जस्तो हाल,&lt;br /&gt;
चोटाकोठा डुलिहिँड्ने गजवै छ चाल। के हो? - बिरालोबस्छ, हिँड्छ, खेल्छ, तर बोल्न सक्तैन। कै हो? -भकुन्डोबस्छु, हिँड्छु बोल्न सक्तिन, दिनभरि उसलाई छाडन सम्तिन। कै हो?&lt;br /&gt;
- छापाँबस्दा थुचुकक, उठ्दा जुख्क्क। केहो? ढिकीबस्दा बस्न नसक्ने, उचाल्दा उचाल्न नसकिने । कै हो? - घन्टाघरबस्दा सानो हिँड्दा लामो। के हो? न्ज्‌का&lt;br /&gt;
बहुरडगी अम्टोपसका अनेक रूप,कहिले कान, कहिले हात, कहिले खल्तीमा खुप। के हो? - मोबाइल सेटबहिनी भन्छे आइज, दिदी भन्छै नाइँ-नाइँ । के हो ? - केरा र पीपलका पात&lt;br /&gt;
रपाइला गाउँखाने का???&amp;quot; “९&lt;br /&gt;
बाँचुन्जेल सागरमा, मरेपछि घरघरमा । के हो? - शङ्खबाँचे काद्नू, मरे पाल्नू, यो कथा नजान्नेलाई उचालेर फाल्नू । के हो?&lt;br /&gt;
न सुत्केरीलाई शी लगाएको खसीबाँध्दा मुढीभरि छ, खोल्दा ढोकाबाट छिदैन। के हो? न्छाताबाख्रापाठा बसिरहने, दाम्लो चर्न जाने। कं हो? - काँक्राफर्सीचागमती र विष्णुमती एकै ठाउँमा जोरिएको । के हो ? - सिँगान वगेकोबाघको मृख खाए पनि रातो, नखाए पनि रातो। के हो? - तामाको ताउलो&lt;br /&gt;
बाघ होइन गर्जिन्छ, धारो होइन पानी दिन्छ। के हो? - बादलबादुली नानी झल्ल बाल्छिन्‌, कहिले लुक्छिन्‌ कहिले खुल्छिन्‌। के हो?&lt;br /&gt;
&amp;quot;चन्द्रमा&lt;br /&gt;
बादुले घरको क्याल न ढोका। के हो? न्फर्सीबाटुलो बाटो चिम्द्याइलौ माटो, हातमा लुटुपुटु मुखमा गाँठो। के हो?&lt;br /&gt;
2 न कसार&lt;br /&gt;
बाटो छैन उकालो लाग्छ, पानी खाए भुतुक्कै मर्छ। के हो? - डढेलोवावाका जाँठा लुके भीरमा, म ता दुगुदै गएँ शिरमा । के हो? - गिठोबाबाका पैसा गन्न सकिन्न, आमाको धोती पट्याउन सकिन्न । कै हो?&lt;br /&gt;
- तारा र बाटौबाबाले दिएको पटुका, बाँध्दा-बाँध्दा कहिल्यै नसकिने । कै हो?&lt;br /&gt;
- लामो बाटौबाबु गर्भमै छ, छौरो छाता ओढाउँछ। के हो? - क्कलोबाबु नदेखिने छौरो धुरीमाथि । कै हाँ? -आगौ र धुवाँबाब्रु मेरा तिखेताखै आमा सुन प्याँली,कसका गोत गइछु म ता हाँडीभन्दा काली। के हो? न चुन्रोबार छौरा तेर नाति, एउटा छाता सबै माधथि। के हो?&lt;br /&gt;
५, - पिँडात्‌ र कर्कलोबा-र जोगी एक दमै जाकन्‌, तीनबटा लाँक्रा उखु सिङ्गासिङ्गैखाजन्‌। केहो? न्बा, जोगीरदमै&lt;br /&gt;
बार लाटा, तीन बाठा, एकै घरमा जोड्छन्‌ नाता । के हो? - घडीबार वर्ष पछि रुख ढले पनि त्यसको पात हरियै छनि।के हो?&lt;br /&gt;
- मुजुरको प्वाँखबार हातको लम्बा, एकै ठाउँ जम्मा। के हो? - पटुका&lt;br /&gt;
बु ना डा. कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखगौ कथा&lt;br /&gt;
बारी कमेरे, वीउ कालो, हातले तटिपी खान याल्यो। कं हो?- सेतो कागजमा लेखी पढेको&lt;br /&gt;
बारी-कान्लामा जन्मी, घर-छ्ाप्रामा सुती, घामपानीलाई छेम्तै वसी ।&lt;br /&gt;
केहो? न्खरबालापनमा सोभैँ हुन्छ, ठूलो भएपछि बाङ्गो,सानो छँदा लुगा लाउने ठूलो. भएपछि नाङ्गो । के हो? - बाँसबालापनमा हरियो, बूढो हुँदा पहेँलो) के हो? न घानबाली न बिस्वा नौ मुरी तोरी। के हो! -ताराचालो हाली पिठिममा, कुटकुट लाठी । के हो? -्ढिकीब्रास वस्छ घना बनमा, खान्छ रातो पानी,मानिसले देखै भनै जान्छ जिन्दगानी । के हौ? न्जुम्रा, ब्वाहिर काँडा भित्र गोला, त्यौ. खान पाए कति मीठा होला। के हो?- ॥ १ - कटहर“बाहिर काँडा भित्र चाँदी, त्यसभित्र काली नानी। कं हो: - लिचीबाहिर काली कोइली, भित्र तामा चोइली । के हो? &amp;quot;मुसुरोबाहिर खोलैखोल, भित्र दाँतैदाँत, टुप्पो समाई हेर्दा मुढी जुँगा हात। के हो?- मकैको घौगो&lt;br /&gt;
बाहिर खसो, भित्र ताँती, ताँतीभित्र दाँतीदाँती । कै हो ?- मकैको घोगोबाहिर खस्स्याङ खुस्झ्ङ भित्रयति कथा नजान्ने वाख्री बूढीको ताति । के हो? न्मकैबाहिर खोस्टो भित्र ताँती, पो कथा नजान्ने बाँदरको नाति। केहो -मकैँबाहिर खौस्याङ-मस्याङ भित्र लौहोरो,&lt;br /&gt;
यो कथा नजान्ने हुतीहारा छौरो। कै हो? न्मकै&lt;br /&gt;
बाहिर चाँदी भित्र फलाम। के हो? - कपास र बियाँ&lt;br /&gt;
बाहिर छ हाड, भित्र छ मासु, मासूभित्र एक गिलास आँसु। के हो?- नरिवल&lt;br /&gt;
बाहिर छाला भित्र बोसो, बोसोभित्र काठको ठोसो। के हो: - लप्तीबाहिर जगल्टा भित्र हाड, हार्डभत्र मासु, मासुभित्र आँसु । के हो?&lt;br /&gt;
- नरिवलबाहिर जाँदा अघाउने, भित्र आउँदा भोकाउने । के दो? &amp;quot;जुत्ताबाहिर जाँदा भोकाउने, भित्र आउँदा अघाउनै। के हो: ज्गाग्री&lt;br /&gt;
ना&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाहिर झुस, भित्र दुस। कै हाँ? - कटुस&lt;br /&gt;
बाहिर तामा, भिव्र सुन। के हो? - तौरीब्राहिर दाँत भित्र ओठ, मकमक्याउन्‌ परे त्यसैले ठोक। के हो?नन मुत्तलबाहिर धारो, भित्र इनार। केहो? - करुवाबाहिर बाजा, भित्र नाच। कं हो? &amp;quot;घडीबाहिर-बाहिर बिफरको घाउ, भित्रको गुदी मीठो मावी खाङ। के हो?- भुइँकटहर “दरैबाहिर बोक्रो, भित्र खोको। के हो? &amp;quot; भकन्डो फुटवलबाहिर बोक्रो भित्र खोक्रो गालामा छ लाली,त्यौ गालामा थप्पड दिँदा बज्छ मीठो ताली। के हो? - मादलबाहिर बोक्रो भित्र पानी, त्यसलाई खाने मीठो मानी। के हो?- पानीपुरी /फुल्कीबाहिर वोक्रो, भित्र वोसो, बोसोभित्र काठको ठोसो। कै हो?- लप्सी लिची /तिँज्‌बाहिर भने छयाकँछयाका देख्नमा बिफर,काटी हेर्दा भित्रचाहिँ खाउँ-खाउँ रहर। के हो? &amp;quot; भुइँकटहरबाहिर भने हाडैहाड, भित्र हेर्दा मासु। केहो? - काछुवाबाहिर सिसा भित्र सुन, खिटिक्क धिच्दा ठ्याक्कै जून। के हो?&lt;br /&gt;
- बिजुलीबत्तीबाहिर सुन, भित्र चाँदी। के हो? - केराबाहिर सुन भित्र चाँदी। के हो? - धानबाहिर सुन भित्र चाँदी, त्यसभन्दा भित्र रसिलो गिदी। के हो?&lt;br /&gt;
- निबुवा /ज्यामिरबाहिर सुन भित्र फलाम । के हो? न्रिल्लो&lt;br /&gt;
बाहिर सुन भिव फलाम, फलाम फोर्दा आउँछ चाँदी। के हो? - रिङ्गबाहिर सुन भित्र फलाम, लुगा धुन दिन्छ काम । कै हो? -खिठ्ोबाहिर सौला थित गोला, त्यो खान पाए कस्तो होला। केहो?&lt;br /&gt;
- रूखकटहरबाहिर स्याउला, भित्र चाँदीको कसौँडी । के हो? - काउलीबाहिर हाड भित्र चन्द्रमा।.कै हो? - लालटिन&lt;br /&gt;
बर 9122 डौ. कपल लामिछाने&lt;br /&gt;
बाहिर हाडैहाड, भित्र भने मासु। के हो? - कछुवाबाहिर हेरै सुनजस्तो, भित्र हेरे चाँदी,&lt;br /&gt;
सुनभन्दा महँगो छ किन होला चाँदी। कै हो? - घात र चामलबिना पाउको आकाश गयौ, विना धुनकी गाई,&lt;br /&gt;
बिना हातको दुहुन बस्यो, बिना मुन्टो च्याई। कै हो?&lt;br /&gt;
_ &amp;quot; बादल, वर्षा पृथ्वी, गँगटोब्रिनारुखको फल फल्ने, टिपेर लिए आफैँ गल्नै। के हो? - असिनाबिहानै उठेर खोपामा हात हाल्ने। कै हो? - लुगा लगाएकोबिहान उठेर फोहोर फाल्छ दिनभरि सुतेर टार्छ। कै हो? - कुचोबिहान उठेर मुसाका दुलामा हात हाल्ने । के हो? - नुगा लगाएकोबिहान चारखुट्टे, दिउँसो दुईखुट्टै र बेलुकी तीनखुट्टे । के हो ?- मानिसबिहानै उठी छोरीलाई ढोग्ने। के हो? - गाग्रो र लोटाबिहानै उठी दुई हातले उचाली आरी घोप्ट्याएको । के हो?- टोपी लगाएकोबिहानै उठी फोहर फाल्छ, अघिपछि सुतेर टार्छ। कै हो - कुचो&lt;br /&gt;
बिहानै उठेर ढुङ्ग्रामा “खोपामा हात । कै हो? - लुगा लगाएकोबीउ खौज्दा नपाइने, स्वादका निम्ति चाहिने । के हो? ज्नुनबीस तले घरमा बस्न नहुने। के हो? बाँसबीस टाउका काटिन्छन्‌, न छाला झर्छ, न दुख्छ न त रगत आउँछ ।केहो? - हातखुट्टाका नङबीसवटाका टाउका काटिए, रगत पनि आएन,&lt;br /&gt;
गर्दा पनि मरेन, कुनै न बात पनि लागेन। कै हो? ज्नङबुईमा चढ्ने सुई, कतै तीन कतै दुई। के हो? न्घडी&lt;br /&gt;
बुढावाको लन्ठ्न, समाइदिन भन्छन्‌, कालो हाल्छन्‌, सेतो झिक्छन्‌,काम सकिएपछि झुग्राले पुच्छन्‌ । कै हो: - जाँतोमा कोदो पिसेकोबुढेसकालमा छोरो पायो, बिरालाले खायो,&lt;br /&gt;
घुक्क मट्याङ गाठे बूढा, दुखमात्रै पयो। केहो? &amp;quot;केराबुलाकी समाई घन्काउने काम, लौ भन नानी मेरो नाम। कं हो?&lt;br /&gt;
न्घन्टा&lt;br /&gt;
बूढाबूढी कता गए, कालधरी गाडेको तीन दिन भए। केहो? है&lt;br /&gt;
- गुन्द्रुक हालेको&lt;br /&gt;
वूढावूढी दुवैको साझा पटुका । के हो: न आग्लौ&lt;br /&gt;
रमाइला गउँखने का?&lt;br /&gt;
बुढी मप्यो, लिँड छोड्यो, मानिसले गौड्यौ, पकायो खायो। कं हो:&lt;br /&gt;
£ - पिँडाल्‌बूढो हुँदै गएपछि गर्छन्‌ अझै माया,जाकर्माच राछ हेर्छन्‌ बन्तारकी छायाँ) कै हौ? -ञ्ज्त्ाबेडला न बेउली घरभरि बिहे। कै हो? - भ्यागुता कराएको.बैउला न बैउली घरभरि जन्ती। के हो: --कमिलाको ताँतीबेधासैथा था&#039; छैन, उचालिने र पछारिने गर्छ। केहो? - ढिकीबेलुकीपख खस्रो भाले बास्छ। के हो! - भ्यागुतो&lt;br /&gt;
बेसीमा कुलो लेकमा खेत, कतातिर टुप्पो कतातिर फेद। के हो? - डुन्दरेनी&lt;br /&gt;
बैठक कोठा ढुक्क एँग्छ, मान्छे बसै लिपिक्क हुन्छ। कै हो? - सोफा&lt;br /&gt;
बोकाको मुत्नी, दुईवटा हातले थुत्नी। के हो? - मूला उखेलेको&lt;br /&gt;
. बोकेको मेरो भाइ हो, यसको बाउ मेरो पोइ हो। के हो? - पुसाजु&lt;br /&gt;
- बोको”भैँती भने वपिरहने, दाम्लो चर्न जाने। के हो!- फर्सी र लहरा&lt;br /&gt;
बोट चारतिर फल झर्नै एकैतिर । के हो? - गाईभँसीको थुन र दूध&lt;br /&gt;
बौटमा फल पाक्यो देख्ने भाइ गएन, अर्को भाइ गयो, उसलै टिपेन,जुन भाइले टिप्यो, त्यसले खाएन, अर्कै भाइले खायो। के हो?&lt;br /&gt;
&amp;quot; आँखा, खुट्टा, हात र मुख&lt;br /&gt;
बोटमा फल्ने रतिया नानी, आँखामा राखे पनि नविभझाउनै बानी ।&lt;br /&gt;
केहो? - रातीगेडी&lt;br /&gt;
बोराभित्र थैली, धैलीभित्र सुपारी। के हो? - कटहर&lt;br /&gt;
बोलाई-घोलाई ल्याउने, कोच्याई-कोच्याई खुवाउने,&lt;br /&gt;
पञ्चमीका भोलिपल्ट छुबाउँदै पठाउने । के हो? - तीजकी चेली&lt;br /&gt;
बोलाउँदा बोल्दैन आफूमात्र बोल्छ,&lt;br /&gt;
बोल्दै जाँदा मानिसका गुहय कुरा खोल्छ। के हो? - रेडियो&lt;br /&gt;
बोल्छ मान्छै होइन, गीत गाउँछ कोइली होइन,&lt;br /&gt;
बाजा बजाउँछ दमाई पनि होइन। केहो? - रैडियो&lt;br /&gt;
ब्यौला न ब्यौली, घरभरि जन्ती । के हो? - कमिलाको ताँती[न&lt;br /&gt;
क 0 “डा. कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
८)&lt;br /&gt;
भए खान दिन्थिनँ, छैन कति खाने हो खा। के हो? - लिँडै वस्तु र डाँस&lt;br /&gt;
भए दिने थिइन, छैन खा रजा। केहो? - लिँडे जनावरभए दिन्नधैँ, छैन खाएर जा। केही? - लिँडे जनावरभकारीभरि जून लागेको । कै हो? - दहीको ठेकी&lt;br /&gt;
भन्छै ओठे माइली, सबैभन्दा मै रामी। के हौ? - घिरम्लाको चाताभन्दाखेरि छ मात्रै गन्न लागे सात, .पढ्दा-लेख्दा काम लाग्नै के हो त्यसको जात? कै हौ? - &#039;छ&#039; अक्षर&lt;br /&gt;
अन्दा छ गन्दा सात। के हो? -(छ&#039; अक्षरभन्न-भन्न भुनभुनाउँदै, पाताल छोडी आकाश धाउँदै । के हो ?- मौरी उडेकोअन्नलाई भन्छ छ-छ पैसा, तर पैसा होइन। कै हौ? नरैलभाँडो पाक्छ, चामल पाक्दैन। के हो? - अम्बा/बेलौँतीभाँडी फुट्यो, जात त्नुट्लियो । कै हो? -फुल/अन्डाभाइ बोल्छ, दाइ बोल्दैन । कै हो? - घन्टाघर र घरहराभाङग्रोजत्रो मुख छ, पिंधमा टोपी छ, जीउभरि आँखा, छैनत्‌ खुट्टी ।के हो? न डोको&lt;br /&gt;
भाटा-पगरी जीउमा टम्म, बस्दा हुन्छ पिँध हवाङ्ग । के हो?- मृढढाभात पाक्यो ताउलीमा, दाल पाक्यो बिटमा । कै हो?- खेत र आलीभित्तामा बस्छु टुलुटुलु हेर्छु, महिना दिनपछि चोली फरर्छु। केहो?&lt;br /&gt;
- भित्तैपात्रोभित्र इनार, बाहिर धारो। के हो? न करुवाभित्र इनार बाहिर धारो, यो कथा जान्न सारै गारो। के हो? - कद्वाभित्र कचपच, बाहिर छाला, यो कथा नजान्ने बाँदरको साला। के हो?&lt;br /&gt;
- खनिउँभित्र खसी, बाहिर दाम्लौ। कै हौ? - तरुल,/सखरखन्डभित्र खोक्रो पनि छैन, वाहिर बोक्रा पनि छैन। के हो? - कसार ढुङ्गो&lt;br /&gt;
&amp;quot; उमाइता गाउँखाने का???»&lt;br /&gt;
भित्र खोक्रो, वाहिर वोक्रो। के हौ? न मादलभित्र घन्टी बाहिर दौड, गर्छ समयको ठिक्क गौड। के हो? - घडीभित्र चाँदी, बाहिर सुन, तलतिर कल्चौँडो मास्तिर धुन। के हो? - केरा।भत्र छजा, भित्रि उंग्रयो, टाउकामा चढी गाउँ चाहाच्यो। के हो। -जमराभित्र छन्यो भित्रै उम्यो, आशिष पाई कानमा सिउन्यौ। कै हो? - जमाराभित्रतिर टन्त राम्रो बाना, फोरी खाँदा रसिलो दाना । के हो?- अनारभित्र पानी छ पोखरी होइन, तीन आँखा छन्‌ महादेव होइन,&lt;br /&gt;
माथि झुन्हिन्छ चमेरो होइन। के हो? - नरिवलभित्र-बाहिर लुते करङ बीचमा छ छाला,&lt;br /&gt;
पानी पर्दा-असिता झर्दा यसले काम देला। के हो? - घुम/स्याखुभित्र-बाहिर हाड, बीचमा छाला। के हो? - छात्रीभित्र हावा बाहिर छाला, बुटजुत्ताको वात खाला । के हो.?- भकुन्डोथित्र हेर्दा इनार, बाहिर हेर्दा घारो, क&lt;br /&gt;
त्यस्को नाम जान्नलाई छैन त्यत्ति गारो। कै हो? - करुवाभिराला दुई पाखा, एक पाखामा प्याँलो फूल फुलेको । के हो? - फुतीभुँडै गोरुको एउटा सिङ। के हो? - जाँतो/फर्सीभुँडे गोरुको एउटै सिङ, सबैलाई चल्छ तिहुन। के हो? - फर्सीभँडे बहरको एउटै सिङ। के हो? ज्जौँडाभँ-भुँ गर्छु भमरा होइन; काँधमा जनै बाहुन होइन । के हो ?- चर्खां/कतुवाभुँभुँ गर्छु भमरा होइन; चार खुट्टाले टेक्छु, जनावर होइन । के हो?- स्टोभभुँभुँ गर्छ, भमरो होइन; चार मुख छन्‌, ब्रहमा होइन;&lt;br /&gt;
कानमा जनै छ, बाहुन होइन। के हो? न्चर्खाभुँभुँ गर्छु, भमरा होइन; सिनु खान्छ, गिद्ध होइन; सुँड छ, हात्ती होइन ।केहो? -झिँगाभुइको डोली थिचेर खोली, भित्र हेर्दा दुई-तीन गोली । कै हो? - बदामभुटिसकेर पनि पोलेर खाने। के हो? - तमाखुभैँसी किलोमा बाँधिएको दाम्लो चर्न जान्छ। के हो? - फर्सी र लहराभैँसी पाल्दै घाँस काटेर हाल्दे, दूध तँ खा, घिउ मलाई दे। के हो?- चिउरीभैती बसिरहन्छ, दाम्लो चर्न जान्छ। केहो? - फर्सी र्‌ लहरा&lt;br /&gt;
[]&lt;br /&gt;
३ पा डा. कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
(म)&lt;br /&gt;
म तिम्रा लागि मरिसकेँ, तिमी मेरा लागि नमर, यदि तिमी मेरा लागिमप्यौ अने, तिम्रा लागि बाहिर कोही पर्खिरहेको हुनेछ। कै हो?&lt;br /&gt;
- बल्छीमा अल्झाइएको गड्यौँला र माछामन्दिरजस्तो छ, मन्दिर होइन; चार मुख छ, देवता होइन;&lt;br /&gt;
बौल्छ, मान्छै होइन। के हो? - घन्टाघरमन्दिर, तस्विर, घाँटी, लास-जताजतै सजाइने, एक-एक गरी बनाइने ।केहो, । -. , - मालाभरै पाल्नू, बाँचे काट्नू ।. के हो? - सुत्केरीलाई भनी न्याएको खसीभरेको गोठको लादी मीठो। के हो? - कटहरमरेको गोर/भँसी गाउँवेसी गर्छु। कै हो? - हेल्लुँडो/ नारामरेको गोए गाउँसहर घुम्छ/डुल्छ। के हो? ज्जुत्तामरेको गोरु डुक्ँदै हिँडछ। के हो? - दमाहामरेको गोरु रुख चढ्छ। केहो? - हल्लुँडोमरेको गोरु शुभ कार्यमा डुक्िन्छु। केहो? - दमाहा बजाएकोमरेको गोरु सास फेर्छ । केहो? - खलाँतीमरेको पनि होइन, बाँचेको पनि होइन। के हो? - फुलमरेको सिनौ गाउँबैसी गर्छु। के हो? - हेल्लुँडो/ नारामरे पाल्नू, बाँचे काट्न । कै हौ? - सुत्केरीलाई भनी ल्याएको खसीमलाई काटै दुख्छ, तँलाई काटे दुख्तैन। के हो? -मातु र नङमलाई काट्छन्‌, मै मर्छु, तँ केलाई रुन्छस्‌ ? प्याजमलाई भयो खरो, थधन्क्या बूढी धरो। कै हो? न लुगा सिएको&lt;br /&gt;
मसिनु बोटको टुप्पामा माछाको जस्तो कत्ला,कलिलो छँदै पकाई खाए गुनिलो चिज हौला। के हो? - च्याउमहिनामा आउँछ, दिनमा पनि आउँछ, बर्षमा चाँहि आउँदैन । के हो?- न&#039; अक्षर&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखाने कधा 7 “४&lt;br /&gt;
म हुँ एकखुट्टे केही नखाई जान्छु,&lt;br /&gt;
बूढा, लुला-लङ्गाडालाई सक्तो आड दिन्छु । के होर - लौरोमाउले हाड पायो, हाडले नानी; हाडभित्र हेर्दा दुईथरी पानी। के हो?न्अन्डा&lt;br /&gt;
माउको काल, बच्चाको साथी, निस्केपछि फ्याङमाथि । के हो? -अम्रोमाग्नेको. पुच्छर छैन, देख्नेको खुट्टा छैन,&lt;br /&gt;
कहाँ पुग्यो हेर्नेको आँखा छैन । कै हो? - भ्यागुतो, सर्प र गँड्यौलोमाझको टारी, उत्तानो पारी, दुई घुँडा मारी,&lt;br /&gt;
ख्यासख्यात्त पारी, दुई थोपा भरी। के हो? - चन्दन घोटेकोमाझ मर्झेरी उत्तानो पारी, दुई घुँडा मारी, ल्यासल्यात्त पारी। के हो?- मसला पिसेकोमाझ मझेरी उत्तानो पारी, दुई घुँडा मारी, ख्याँचहयाँच्च पारी। के हो?- मसला पिसेकोमाझ सागरमा कुलेसौ। कै हो? - केराको पातमाटाको जीउ मेरो पेटमा छ लालगेडी,चिसो हुँदा तताउँछु सबै काम छाडी। के हो? जमकलमाटामुनिका पेटे देउता, हातमा लियो यौटा, खान लाग्यो दुई-तीनोटा ।के हो? &amp;quot;बदामपमाटामुनिको पुड्के गोरु। के हो? नमुसौमाटामुनि बास मेरो हिँउजस्तौ रूप,केटाकेटी घेरै छन्‌ काम लाग्छु खुप। केहो? - लसुनको पोटीमाटोमुनि महको ठेकी । कै हो? - खनिजँमाटाले दिन्छ ढुङ्गाको काम, बताक तिमी त्यसको नाम। के हो?- इँटमाटोबाट बन्छ, ढुङ्गाको काम दिन्छ। के हो? नन&lt;br /&gt;
माटोमुनि बस्छ गाँठो हिउँजस्तो रूप,जति सन्तान भए पनि काम दिन्छ खुप। के हो? - लसुनको पोटीमाथि टार, टारमूनि डाँडो, डाँडामुति ओडार । के हो?&lt;br /&gt;
- निधार, नाक र मुखमाथितिर कान तलतिर तान, तानमा ठक्कर दिँदा मीठो हुन्छ गान ।कै हो? - सारङ्गीमाथि टाँगो, तल छाँंगो। के हो? जपुल&lt;br /&gt;
पु पाप??? जा कपल तामिछने&lt;br /&gt;
माथि टुलटुल, तल स्याक्स्याक्‌। के हो? - आँखा र नाक&lt;br /&gt;
माथि धरधर, तल मेरो घर, त्यो भत्केर मलाई केको डर। केहो?॥ - ककंलो&lt;br /&gt;
आधि धुलीमाटी खेली, तल फुल पार्ने। केहो? -चर्खा&lt;br /&gt;
माथिबाट आए सिँगाने राजा, तलबाट आए पाँच पाण्डव,&lt;br /&gt;
दुई भाइले लतारै र भुइँमा पछारे। के हो? . , - सिँगान फालेको&lt;br /&gt;
माथिबाट चढ्ने, लात्ताले हान्ने, कान समात्ने, लखेट्ने । के हो?&lt;br /&gt;
- मोटर साइकलमाथिबाट सिँगारे झन्यो, हस्तैले पछान्यो । कै हो? - सिँगान पुछैकोमाथि हलो चलाउनै, तल उस्तै बनाउनै । कै हो? - कार्बनपेपर&lt;br /&gt;
मनिस बोकी लहरालाई समाउँदै कुद्नेटहरो होइन, छहरो होइन, कै हो सबले बुझ्ने । क हो? - ट्रलिबसमानिसभन्दा सघैँ एक पाइला अघि हिँड्ने। केहो? - लौरोमान्छेका तीन तरकारी, उडन्ती, बुडन्ती, चुँडन्ती। के हो?&lt;br /&gt;
- चरा, माछा र सागमान्छे खान्छ, मान्छे वाक्छ, एक ठाउँ बस्दैन, हिँड्याहिँड्यै गर्छ ।&lt;br /&gt;
केहो? - बसमान्छै चढ्छ घोडा होइन, भारी वोक्छ गधा होइन,&lt;br /&gt;
खुट्टाले चलाउँछन्‌ रिक्सा होइन । के हाँ? - साइकलमान्छे छ यहाँ, हंस पोखरा। के हो? - मन&lt;br /&gt;
मामा आँ कि भन्छन्‌, भानिज नआङ भन्छन्‌ । के हो? - बाँत र केरामामा भन्छन्‌ जीउजीउ भानिज भन्छन्‌ नाइँ। के हो? - बाँस र केरामाया गरे चुपचाप एकै ठाउँ बस्छ, लात्ती हाने खुरुखुरु हिँड्छ ।के हो? - साइकलमारेर फुन्ड्याउँदा बलियो हुने, घाँटी छोई म्बाइँ खाने । के हो?- हल्लूँडोमाल किन्नुपर्दा म सँगै जान्छु आफू आउन्न माल पठाइदिन्छु। के हो?&lt;br /&gt;
- रुपियाँमात्त, कपास, गुराँस, मधुकाँकरी, सबै जातको एउटै घाँकरी। के हो?&lt;br /&gt;
- सिमलमास, गुराँस, कपास, काँक्रो, सबै थोकको एउटै थाँक्रो। केहो?&lt;br /&gt;
- सिमल&lt;br /&gt;
साइला गउँखते कमा पएााााएए7ए7777ए7ए7ए71 2.&lt;br /&gt;
मास्तिर जाँदा हात हल्लाउँदै गपो, तलतिर आउँदा एक्लै आयो ।&lt;br /&gt;
केहो? - डोरी बाटेकोमास्तिर झप्प, तलतिर टन्न। केहो? न्म्‌लामाठ्ठा खानक्रा हुन्छ उसको खोरभित्र,खानेकुरा खान जाने अकालैमा मर्छ। के हो? - मुसाको खोरमीठो छ टोक्नु हुन्न, बाँजूँ भने काट्न हुन्न । के हो? - अत्तर«व्रास्ना_मुख नभएको खल्तीमा पैसाभरि । के हो? &amp;quot; खुर्सानीमुखबाट जन्माउने मुखबाटै हुर्काउने । के हो? - भुइँकटहरमुखबाट सुर्क्याउनै, नाइटोबाट तुर्क्याउने । के हो? -कित्लीमुख भरी, पेट रित्तै। के हो? - शङ्खमुखले निल्ने मुखैले ओकल्नै, काम गर्छ त्यसले दुनियाँ भुल्ने। कै हो?छै - कलममुख लामो पुच्छर छौटो, म्वाइ खाए रुन्छ को हो त्यो। के हो? - सनईमुङ्ग्रो हल्लिँदा ढुङ्गो चल्ने । के हो? - लङ्कगुर घडीमुन्टो पकाई खाए हुन्छ, छौयो कि त पोलिदिन्छ। कै हो? - सिस्नोमुन्टो फालेर ज्यान खाने। के हो? - ल्वाङमुढठीमा अटाउने ढोकामा नअटाउने । के हो? - छातामुसीकोटे पाहुना, कोचीकोची छवाउना, घोचीघोची पठाउना । कै हो?न कोलमूल एक धारा चार। के हो? ज्युनरदूधमूलाका चाना, मौतीका बाना, यौ घर नभए अरूकहाँ जाना। के हो?- रुपियाँमेरी घरकी एउटी सात्ती, खान्न-पिउन्न भातपानी,योल्छे-गाउँछे दिनभर नानी। के हो? - रेडियोमेरो देश यही घरभित्र । कै हो? - मानचित्रमेरो भैँसी पाल्दिएस्‌, दूध फात्दिएस्‌, दही खाएस्‌, घिउ सँगाल्दिएस्‌ ।के होर - चिउरीमेरो भैँत्ती पाल्दे, दूघजति फाल्दै, दहीजति तँ खा, घिउजति मलाई दे ।कै हो? &amp;quot;चिउरीमैरो मान, मेरो सान चिन्नेहरू चिन्छन्‌,कतिले त बिनामागे छोरी पनि दिन्छन्‌ । के हो? -बैल&lt;br /&gt;
१00” गा. कपिललामिछाने&lt;br /&gt;
० मै काटिन्छु मै मर्छु, त॑ किन रुन्छस्‌। के हो? - प्याज&lt;br /&gt;
० मै खस्छु, मै उड्छु, तँलाई केको स्युस्यु । कै हो? - हिउँ० मैदानभरि कनिका छरिएको । के हो? - तारा० मैलाई चुस्छन्‌, मैलाई धुक्छन्‌ । के हो? नउखु० मैले हेरे उसले हेर्छ जे जे गयो त्यही गर्छ। के हो? एना० &amp;quot;मै सुन्दर, मै राम्रो, मै आउँदा दुस्िते। कै हो? .. नहिउँ० मोहरेको ट्याम्को एकै ठाउँमा जम्मा। के हो? - पटुका&lt;br /&gt;
५ म्याउँ-म्याउँ गर्छ, बिरालो होइन;दुड खुझ छन्‌, मानिस होइन;सर्प खान्छ, गरड होइन। के हा? न मुजुर&lt;br /&gt;
ि।&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखनै कथा ाााााााााा9ाा2ा21110%१&lt;br /&gt;
८)&lt;br /&gt;
यताबाट आङ उताबाट आउ, दाँतले दार केही खाक। के हो? - आरायताबाट ल्यायो उताबाट ल्यायो, आफ्नै मुखमा पत्तायो,&lt;br /&gt;
न हलचल न चहलपहल धुलो बनायो । कै हौ? - अगेनाको खरानीयता मुख उत्ता कान, उता मुख यता कान,&lt;br /&gt;
देख्नुसुन्नु केही छैन दुवैतिर भताभन । के हो? - टेलिफोनयता मुख उता कान, उता मुख यता कान,&lt;br /&gt;
देख्नु-सुन्नु होस्‌-नहोस्‌ दुवैतिरबाट भनाभन । के हो ?- टेलिफोनमा कूरा&lt;br /&gt;
यता वन उता वन, बीचमा एउटा बाटो। केहो? -- सिउँदोयसै पनि पेट ढाडिएको हुन्छ, त्यसमाथि धिचिदिँदा मन सारै रुन्छ।केहो? - सिरानी&lt;br /&gt;
यसैले सुखी यसैले दुखी, यो भने हिँड्छ आफूखुसी । के हो? - घनयहाँ करायो, नेपाल पुग्यो स्वर । के हो? - स्याल-हुइँया/स्याल कराएकोयहाँ छन्‌ बनियाँ बजार छैन, त्यौ खोजे पइँदैन, पाए चाहिँदैन। के हो?&lt;br /&gt;
- कुहिरोयहाँ छन्‌ वरपीपल, काशी गए जरा। के हो? - बाटोयही मेरो ढिकीजाँतो, यही मेरो कोल, हेर्ने भए मेरो काम ओटै पर्दाखोल। के हो? नदाँतयही मरो ढिकी यही मेरो कोल, यही मेरो जाँतौ किपीको खोल ।केहो? - दाँतयही लैजा यही काट र वेच,अनि नुन किनेर यसैलाई बौकाएर ले। कै हो? -भैडा र कनयो मेरो टेक्ने, यो मेरो छेक्ने, परिआएको बेलामा पृर्पुरो सेक्ने। के होः&lt;br /&gt;
- लौरो[]&lt;br /&gt;
१९ रोए डो. कपिस सामिक्ाने&lt;br /&gt;
(र)&lt;br /&gt;
रङ्गगीबिरददगी छ फूल होइन, सिङ छ चौपाया होइन । के हा? - पुतलीरन्कित पाए जे पनि खान्छ, पानी खुवाए भुतुक्कै हुन्छ। के हो?- आगोराखेको छु खोविल्टामा फलामको सियो,&lt;br /&gt;
बखतैमा चलाउनेले गर्छ खाएजियो। के हो? न्हुलोराजाकी छोरीको दयावन्ती चाउँ, शिर चढाई माइत जाकैँ। के हो?&lt;br /&gt;
१ त कलशराजाको गाई उफ्रने, सिङ समाएपछि डुक्नने। कै हो? - जाँतो&lt;br /&gt;
राजा न साजाकी रानी, रैतीका बीचमा बस्ती । कै हौ - रानीमौरीराजा बाजा टुप्पोमा झुन्डिन्छ, वजाउँ भने आफैँमाथि खनिन्छ। के हो?&lt;br /&gt;
- अरिङगालरातदिन हिँडेको हिँड्यै। केहो? . - खोलोरातभर उठ्ने, दिनभर सुत्ने। के हो? न दाम्लोरातभरि उड्ने, दिनभरि सुत्ने। के हो? नचमेरोरातभरि करायो, दक्षिणा हरायो । के हो? - घुरैकोरातभरि देखिन्छु दिनभरि देखिन्न, टिपूँटिपूँ भन्यो टिप्त सकिन्न । के हो?&lt;br /&gt;
- तारारातभरि पानीमा बस्छ, दिनभरि घाम ताप्छ। कं हो? न गुइँठारातभरि पोखरीमा बस्छ, उज्यालो भएपछि डाँडाकाँडा चढ्छ। के हो?&lt;br /&gt;
- पोतेको / पोतोरातभरि मान्नु, विहान उठ्दा जिउँदै। के हो? निद्रारातभरि हिँड्यो, बाटी चार हात मात्र। केहो? - दाइँका गोरु&lt;br /&gt;
रातमा टिमटिम वत्ती झल्काउँछ जूनकिरी होइन, उड्छ चरा पनि होइन,तीन चक्का छन्‌, टेम्पु पनि होइन, मान्छे वोक्छ घोडा होइन । के हो?- हवाइजहाज&lt;br /&gt;
रमझला गउँखते कमा पन ाााााणाणणणाणाा771फ&lt;br /&gt;
राता छन्‌, खुर्साती होइन; चार हात छन्‌, विष्णु होइन;&lt;br /&gt;
उड्छ, गरुड पनि होइन। के हो? - सलहराति उठ्ने, दिउँसो सुत्ने। के हो? न्बत्ती५ रात-राँत कराउन बानी, घरमा उसको पानी-पानी । क्कै हा ?- भ्यागुतो% राति राति गाउने बानी, घरमा उत्तको पानी पानी। के हौ? - भ्यागुतो&lt;br /&gt;
राति हुल्ने, बिहान झिक्ने! के हो? -  &amp;quot; छैस्किनी / आग्लौराती गाई आई, जे भेटायो सौ खाई। केहो? &amp;quot;डढेलोराती गाईको हरियो पुच्छर । के हो? - गाजरराती गाई लिन जाँदा कोप्री गाईले हानी। के हो? - बयरराती गाइ पानी खाएर आई, सेती गाई पानी खान गई। कै हो?- सैल पकाएको&lt;br /&gt;
राती गाई पानी खान्थी, . पानी खाँदा मरिजान्थी । के हो? - आगोराती गाई खर खान्छ, पाती खाए भुतुक्कै हुन्छ। कै हो? -आगरौराती गाई टिप्न जाँदा कोप्री गाईले हान्यो । कै हो? - बयर टिपेकोराती गेडी टिप्न जाँदा घौप्टी गाईले हानी । कै हो? - एँसेलु टिपेको&lt;br /&gt;
राती नानीको कालो टिकी। के हो? - रातीगेडीराती नानीले कालो टिकी ला&#039;की। के हो? - रत्ति/रातीगेडीरातो गोरु दाउँदा कालो हुन्छ। के हो? &amp;quot; - हाँडी&lt;br /&gt;
रातो गुदी, हरियो छाला, घाममा खाँदा सितलो होला । के हो ?- खरबजोरातो घौडामाथि सेतो घौडा । कै हो :- तल रातो र माथि सेतोले पोतेको घर&lt;br /&gt;
५ रातो घुलो, काम गर्छु ठूलो। कं हो? - सिन्दुररातो छ, खुर्सानी होइन; चार हात छन्‌, विष्णु होइन; उड्छ गरुङ होइन। केहो? - सलहराता छ धुलो, काम गर्छ ठूलो। के हो? - सिन्दुर वा अविररातो डाँकी, सेतो चैँवर, हुइँमाथि बस्यो च्यान्टे कँवर। कै हो? - फापरराती डोला, सेता जन्ती। कै हो? - गिजा र दाँत&lt;br /&gt;
रातो डोली सेतो चेँवर, त्यहाँमाथि बस्नै धनपति कुर्वैर। के हो?- फापररातो तान स्वार, आवाज आउँछ घ्वार्रे। के हो? - गाईंभैँती दुहेको&lt;br /&gt;
रात्तो चैलीभरि पैतैपैसा। कँ हो? - खुर्सानीरातो नली फलामे फली, या कथा नजान्ने मेरो हली। के हो? - फापररातो बहर दाउँदादाउँदै कालो भयो। के हो? - हाँडी/ खोत्या&lt;br /&gt;
१०7 डा. काँपल लामिछाने&lt;br /&gt;
५ रातो सिउर छ कघुरो होइन, गलामा कण्ठी छ मुजुर होइन,लामो पुच्छर छ बाँदर होइन, चार खुट्टा छन्‌ जनावर होइन। के हो?&lt;br /&gt;
- छैपारो५ रातीबनमा काल्दाइ-काल्दाइ । के हो? - सुख काटेको,&#039;वनमा दाउरा काटेको» रानीवनमा चिउरा पोखिएको । कै हो? - मिप्रालको फूल५ रानीवनमा .जन्मेयेँ, लिन मलाई गएयै, सिताराले भरैथे,तले घरमा राखेथे, अहिलै मलाई &#039;जुठेल्नाको बास। केहो?- खाएर फालेको टपरी० रानीवनमा दहीको ठेकी झुन्ड्याएको । के हो? - भक्रयाम्लो&lt;br /&gt;
«० रामजीको चमी गाई, जत्ति दुहयो उत्ति आई। के हो? - सिँगान५ रामु तल श्यामु माथि, श्यामु तल रामु माथि,यौ खेल खेल्न नजान्नेलाई भने हुन्छ लाटालाटी । के हो?&lt;br /&gt;
- ढिकीच्याउँ&lt;br /&gt;
५ रालो तान्दा स्वार, आबाज आउने घ्वार्र। कै हो? - दुध दुहेको&lt;br /&gt;
० रिउँ रिउँ चरीका दूधका आँसु । के हो: - कोइरालो५ रिङ रिङ ताउलीमा रन पस्यो घाउ,&lt;br /&gt;
मेरो कथा नजान्नेले माखा छौपी खाक । के होः - टपरी खुटेको&lt;br /&gt;
० रिङ्गो-रिङ्कगो पटरिड्गै, एउटा गोरु सोह्रसिङ्ग । के हो? - चर्खा&lt;br /&gt;
० सँदै-हाँस्दै र गम्कँदै जाने। के हो? न्बाढी&lt;br /&gt;
० रुख काटेको बार वर्ष भयो, पात जस्ताको तौ । के हो? - मुजुरको प्वाँख० रुख ढल्यो उहिले, पात हरिबै छ अहिले | के हो? - मुजुरको प्वाँख&lt;br /&gt;
० रुखको फेदैमा महकी ठैकी। केहो? - खनिउँ० रुख चिल्लो, फल मीठो। के हो? जकेरा० रूखभरि बस्छ, तर्ल्याडतुर्लुङ झुन्डिएको हुन्छ,फल हो कि भनूँ भने वच्चा जन्मिदिन्छ। के हो? -चमेरो० रुखमा तर्त्याङतुर्लुङ फलफूल होइन; बच्चा जन्माउँछ, चौपाया होड्न;रातमा डुल्छ, लाटोकोसेरो होइन । के हो? -चमैरौ० रूखमाथि फल, फलमाथि रुख। के हो? - भुइँकटहर “दरै&lt;br /&gt;
५ रूखमा वस्छ, चरो होइन; जटा छ, जोगी होइन । के हो: - नरिवलहर्कने खस्ने भ्यागुताको मुदु-कलेजो मीठो । के हो? - सलिफा«० छष एउटै भिन्नाभिन्नै काम, उही गाउँमा भिन्नाभिन्नै नाम। के हो! &amp;quot;रौँ&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखाने का”&lt;br /&gt;
रूप मेरो गोलो-गोलो सबैको छु प्यारो,&lt;br /&gt;
कुद्न भने सजिलो छ, लात खान गारो। के हो? - भकुन्डोजप मेरो बढ्टाजस्तो झिक्छु, सधैँ अक्कल,अक्कलबाटै सक्कलको गर्छु, उस्तै नस्कल। क हा: - क्यामरा&lt;br /&gt;
रूप सानै भए पनि गर्छन्‌ ठूला काम,मूर्ख पति बिद्वान्‌ हुन्छन्‌ जप्ता पिनका नाम। के हो?&lt;br /&gt;
- पुस्तक “पत्रिकारूप हेसँ बेग्लै लाग्छ, काम हेइँ उत्तै,मानिससँग दाँज्दा भने जोईपोड जस्तै । के हो? - डाडुपनिउँरेसमी मैलीमा स्पाउँघ्याउँ चल्ला तीन सय साठी। के हो? - माकुरोडैयाँ त रैयाँ पटरैयाँ, एक मुठी खरले ,घर छैयाँ। के हो? -बियौरौँ छ, कपाल होइन; पानी छ, पोखरी होइन; बुटाँ बस्छ, चरो होइन ।केहो? - नरिवल&lt;br /&gt;
[]&lt;br /&gt;
१०६0 या. कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
(ल)&lt;br /&gt;
० लगाउँछ कूचौ, चम्काउँछ चुच्चो । के हौँ? ज्बुरुस५ लगाउँदा इज्जत, खाँदा बेइज्जत । के हो? ज्जुत्ता५ लचकलचक तान, दसवटा खुट्टा चारवटा कान । के हो ?- गोरु जोतेको- लङ्यएर सुत्छ्नै सँगै, उठ्ता छैन भाग्छै कतै। के हो? न्निद्रा० लपक्ने बाख्राका झपकने कान,लौलौ बूढी बल गरेर तान्‌। के हो? - मूला उखेलेको० लवबरको नली फतक्क गली ैयति पनि नजान्ने मुसाको हली। केहो? -कर्कलो«५ लमकनै बाख्खाको झपकने कान, लौली बूढा बल गरी तान। के हो?- म्‌ला उखेलेको. लहरै आमा, पहरै बाबु, फुलन्ते दिदी, भकुन्डे भाइ। के हो?- फर्सी० लहरै आमा, फूलमती दिदी, भकुन्डे भाइ । के हो? न्फर्सी० लहरे कीला एउटा बार, लेकको झाडीबाट भेडाबाखा बैसीमा झार ।केहो? - काइँयो० लहरे नली, झेलल्ल बली। केहो? - बिजुली० लहरे नानी, झलझलती बल्दी। के हो? - बिजुलीबत्ती० लहरे बाबुको घनटाउके छौरौ। कै हो? -फर्सी० लेहरौ तान्दा पहरो घर्किने। के हो? - मही पारेको० लाउँदा इज्जत, खाँदा बेइज्जत । के हो? ज्जुत्ता० लाउनेले देख्दैन, देख्नेले लाउँदैन। के हो? - कात्रो५ लाखौँ खोरा काम न काजका, एक छोराले सब क्राम गर्ने। केहो?४ - तारा र चन्द्रमा५ लाने भए लैजा, नत्र आँखा फर्काएर मर्छु। केहो? - टिमुर» लामपाते नानीका दुईतिर दारा। के हो? - केतुकीको पात० लामा-लामा खुट्टा मेरा, उडी टोम्नै वानी,रोग सारी मानिसलाई पुन्याउँछु हानि। के हो? - लामखुट्टे&lt;br /&gt;
1111 111 1010 ता 0&lt;br /&gt;
० लामा-लामा झुत्तामा ठेकीभरि दही । के हो? - भक्याम्लो० लामौ ढाँडामा दुईवटा सुरुङ्गा । कै हो? - नाकका प्वाल० लागौ नली, फत्रम्कै गली, तेरो बाउ मेरो हली। के हो? कर्कलो५ लामा पान धेरै छैन, छैन घरै माटो,&lt;br /&gt;
कालीलाई म्वाइँ खाँदा हुँदै जान्छ छोटो। के हो? - पाटीर चक५ लामो बाटो, सानो गाउँ, तेरो थाप्लामा आगो लाङँ। केहो:&lt;br /&gt;
- हुक्का, नली र चिलिम० लामो लहराको मीठो फल। केहो? - माछ&#039;० लामो लहरामा उज्यालो छर्ने फल, त्यो फल खान कसैको पुग्दैन वलके हो? -चिम१ लामौ लहरामा फल्नै मीठौ फल, खाँदा मुखैभरि हुन्छ जतैजल ।के हो? %: - अङ्गुर५ लामो-लामो पुच्छर छ नाच्छु आकाशभरिपुच्छर राखी हातमा नाच्छु वरिपरि। के हो? न्चङ्गा० लाल छडी मैदान गडी। के हो? - गाजर० लावालस्कर लिई गयो, सबैलाई खुवायो;आफूले भने केही खाएन, घरै फर्की आयो। के हो? - गौठालौ० लाहाको बाकसभित्र मिम्रीका डल्ला। के हो? - कटहर० साहाको सन्दुकमा साँचो जोडी खोलेर हेदा मिस्री भरी। के हो?- कटहर० लि&#039;खा भन्छन्‌, खानुहुन्न। कै हो? -लिख्रा५ लिखितिखी लिखितिखी, सियोभन्दा झन्‌ तिखी। के हो? न्सिस्नो० लिखे तिखे, लिखै तिखे, तँभन्दा म तिखे। के हो? न्सिस्नौ० लिन आएको म, किन आएको तँ ? छोड्दै बाटो मलाई,लिन जान्छु तँलाई । के हो? - पानी लित जाँदा परेको पानी० लिरीबिरी लहराको चिरीबिरी पात,चिरीबिरी पातको के होला जात: के हो? - बेत५ लुगासहित जन्मे पनि बढ्दै जाँदा नाङ्गो,जति बढ्यो उति उसको रूप हुन्छ वाङ्गो। कै हो? - बाँस० लुगा न फाटौ, दगुर्छ लाटो। केहो? - खोलो /तदी० लुला खुट्टा स्याउस्पाउ पात, लम्कन्छ बूढो पचास हात। के हो?बाँस&lt;br /&gt;
पाम” डा कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
० लुलो छ लङ्गडो होइन, घोच्छ सियो होइन। केहो? -जित्रो० लेकको पानी, फाँटको खेत, पाँचजना बाउसे, कोदाली एक। के हो?&lt;br /&gt;
- लैखेको&lt;br /&gt;
५ लैकको पोखरी स्याप्प सुक्ला, त्यहाँको बकुल्लो ठहरै बित्ला। के हो?&lt;br /&gt;
- तैल तिग्रेको बत्ती&lt;br /&gt;
५ लेक जाने बाटो न ढुङ्डगौ छ, न माटो। केहो? न लिस्नोन लेकबाट भैँसी झन्यो लवरलवर कान,&lt;br /&gt;
एउटा छोरो पाएपछि खुकुरीले हान । के हो? &amp;quot;केरा&lt;br /&gt;
० लेकबँसी, पहाड-तराई सबैतिर हुन्छ,बिहान-बेलुका हलुबा पाक्छ, दिउँसो पड्किदिन्छ। के हौ? - मकै« लेैककी गाई फाँटकी बाच्छी, जति दुहयो उत्ति आई। के हो?&lt;br /&gt;
- चन्दन घोटैको५ लैकमाथि को हो को हो, फेदमा झिमझिम । के हो?- आँखा र परेला० लेख जाने बाटो, न ढुङ्गो न माटौ। के हो? - भन्याङ/लिस्नो० लेखिएको छ दुवैपष्टि किताव त्यो हैन,&lt;br /&gt;
डुल्ख फेरि जहाँतहाँ खुट्टा भने छैन। के हो? - सिक्का&lt;br /&gt;
० लोग्नेले स्वास्नीको सबै कुरा देख्छ, एउटै कुरा देख्तैन। कै हो?&amp;quot; - विधवा भएको० लौराको तौरो, तौराको झोल, झोलको खोटी, खोटीको रोटी। के हो?- जखु, रस, गुड&lt;br /&gt;
० ल्याउनेले लाउन पाउँदैन, लाउनेले देख्नै पाउँदैन। के हो? - कात्रो&lt;br /&gt;
1&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखाते कथा आए ०९&lt;br /&gt;
वनकी रानी, खुन खानी। कै हो? ज्जुकावन डढ्यो, राँटो इठेन । के हो? -बाटौबन-बगैँचामा डुल्छ राम्रो चरी, पानी पदा रमाएर नाच्छ वरिपरि ।के हो? -मुजुरवन-बगैँचामा बस्नै राम्ी चरी, पानी पर्दा रमाउँदै नाच्छे मरीमरी । केहो? ॥ -मुजुरवनभरि चिउरा पोखिएको । के हो? - मियालको फूलबनमा गयो कि साइँला दाइ, साइँला दाइ। के हो? - बन्चरोवनमा जन्मेँ, वनमा हुर्के, वनमै मेरो वास,&lt;br /&gt;
बार वर्ष जलमा डुबै अर्ब केको आस। के हो? न्डुङ्गावनमा जन्म्यो,, वनै हुर्क्यौ,&lt;br /&gt;
घरमा ल्याएर पाल्दा कैल्यै मोटाएन। के हो? - ठेकी र मदानीवनमै जन्मेँ, वनमै हुकैँ, वनमै मेरो वास,&lt;br /&gt;
बार वर्ष जलमा डुबे, अन केको आस। के हो? न्ड्ुङ्गा&lt;br /&gt;
वर चाक, पर चाक, घुँडा चाप, भुइँ चाक । के हो? - दूध दुहेकोबरतिर परतिर चारचुच्चे, कान समाउँदा हिँड्यो बुच्चे। के हो?- शमालवनतिर जाँदा घरतिर मुख, घरतिर आउँदा वनतिर मुख। कै हो?- बन्चरो&lt;br /&gt;
बरिपरि कालो बन, बीचमा बाटो। केहो? - सिउँदोवरिपरि गोटी माझमा घ्याइँ, यो कथा नजान्ने स्यालको ज्चाइँ। के हो?&lt;br /&gt;
दाँत र जिब्रोबरिपरि जिडरिङ्ङ, माझमा ठिंडरिङङ । के हो ?- केतुके“टौवाको सुइरोवरिपरि डाँडा, माझमा खौल्सो। के हो? - मुख&lt;br /&gt;
वरिपरि डिङ्का माझमा बिचारी। के हो? - दाँत र जिब्रो “पिँडाल्‌वरिपरि डिल माझमा टार, काम सकिनासाध नुहाउन हतार ।के हो? - थाल&lt;br /&gt;
११ राफ डा. कपित तामिछाने&lt;br /&gt;
० वरिपरि तितौरा बीचमा नुनढिकी, झट्ट हेर्दा लाग्ने निधारको टिकी ।&lt;br /&gt;
केहो? - जूनततारा० बरिपरि दाल, माझमा भात। केहो? - मास र धानको बोट० वरिपरि दुईवटा खयाल बीचमा खाल्टो,गाउँघरमा उमालेर बस्छु खोलेफाँडो। के हो? - कराही० बरिपरि पर्खाल तीनतिर गाँड्डा, त्यसभित्र वस्ने बोक्सीको छौँडा। के हो?- अगैनोन वरिपरि पर्खाल, माझमा जात्रु। के हो? - जैल र यनुवा० वरिपरि पर्खाल माझमा रायो, रायौ टिप्न जाँदा बाघले खापो। के हो?- अगेनो० वरिपरि पहरो, माझमा डाँडो। के हौ? नाक० वरिपरि मट्याङ्ग्रा मार्फमा घ्याइँ यो कथा नजान्ने लढ्यौरे ज्वाइँ। के हो?- तारा र चन्द्रमा० वरिपरि बिचारी, माझमा डिट्टा। के हो? - दाँत र जिब्रो० वरिपरि आटा-पगरी डयाम्म, उपरखुट्ठी लगाइन्छ पिँध हेन्यो हवाङ्ग ।के हो? न्मुडां० वरिपरि सिकारी माझमा बिचारी। के हो? - दाँत र जिब्रो० घरिपरि शाखा बीचमा मियौ, दुईतिर आरा, टुप्पामा सियो। क हो?- केतुकेन वरिपरि सेतो, बीचमा कालो। केहो? - आँखा० वर्षैभरि झुन्डिएर बस्छु, महिनामा एकचोटि अनुहार फेर्छु। के हो?- क्यालेन्डर५ वल्ला घरको नरे पल्ला घर सरे। के हो? -आग्लो&lt;br /&gt;
० वारि करङ पारि करङ, बीचमा बाउका सुते करङ। के हो? - झोलुङ्गे पुल५ वारि करङ पारि करङ, माझा लुते करङ, हिँड्ने होइन, राख्ने चलन ।&lt;br /&gt;
केहो? - भार० वारि कुकुर भुक्यो, पारि वाघ गज्यों। के हो? - बन्दुक हानेको० वारि दिदी पारि बहिनी, भेट गरौं भन्दा कहिल्यै नहुन । कै हो? - आँखा० वारिदेखि पारिसम्म लस्करै दाँत, शिरमाथि नाच्ने त्यसको जात। के हो?&lt;br /&gt;
- काइँपो० बारि फुस्स, पारि ढुवाडङ। केही? - बन्दुक&lt;br /&gt;
रमाइता गाउँखाने कारी)&lt;br /&gt;
० वारि भन्याङ पारि भन्याङ, बीचमा तेरा वाउको लुते करङ। के हो?&lt;br /&gt;
- झोलुङ्गे पुल० वारि सय पारि सय, यति पनि नजाने गाउँ छाडी गए। के हो? - स्याखु/छम० बून्दावनमा काइँला दाइ, काइँला दाइ! के हो? &amp;quot; रुख काटेको० वृन्दावनमा काग्रो नभएको पिङ । के हो? - दुइँचुल्छै कपाल० वृन्दावनमा कालो कपडा सुकाएको। के हो? - डढेलो लगाएको० बुन्दावनमा काल्दाइ-काल्दाइ भन्ने। के हो? - रुख काटैको५ वृत्दावतमा कुलैसा काटेको । के हो? सिउँदो«५ बृुन्दाबनमा गाई चरेको। के हो? न्जुम्रा० वबृन्दावनमा चहैचहै पिङ खेलेको । कै हो? - बुलाकी० वृन्दावनमा चिउरा पोखिएको । के हो? - सिमलको फूल० वृन्दावनमा चुकको मटुलो। कै हो? - मिपाल,/म्याल ।० वृन्दावनमा चौँठी झुन्ड्याएको । के हो?: - मियाल/म्याल५ बृन्दावनमा चाँचैका साँप्रा झुन्ड्याएको । के हो? टाटा५ वृन्दावनमा झाँक्रो फिँजाएर बसेको। के हो? &amp;quot; ब्ाबरियो« बृन्दावनमा दहीको ठेकी झुन्डयाएको । के हो? - दक्क्याउँली&lt;br /&gt;
० वृन्दाबनमा फल पाक्यो, देख्ने दुई जना जाँदै गएनन्‌,जाने दुई जनाले टिप्दै टिपेनन्‌, टिप्ने दुई जनाले खाँदै खाएनन्‌,&lt;br /&gt;
खाने एक भयो। के हा? - आँखा, गौँडा, हात र मुख० वृन्दावनमा धुवाँ मात्र छ, आगौ छैन। कै हो? - कुहिरो० वृन्दावनमा परक्रे चोर, हस्तितापुरमा हेरीविचारी नगरापुरमा मारे चौर ।&lt;br /&gt;
कै हो? न्जुम्रो० वृन्दावनमा पट्याँस-पट्याँस । के हो? - आँखाको झिमफ्रिम० बृन्दावनमा काँसको कचौरा घोप्टिएको । के हो? - च्याउ० वृन्दावनमा मातिस जाँदा घामी काप्ने। के हो? जुका० बुन्दावनमा लामो डोरी झुन्डिएको । के हो। , - केराको बुङ्गो५ बृून्दावनमा लोटा/ लोह्रोरो झुन्डिएको । के हो? -बैल फल५ वृन्दावनमा सेतो फुल, न भुजाँ चल्छ न पुजाँ चल्छ। केहो? -लिम्ला५ बृन्दाबनमा सोली घोप्टिएको । के हो? - नाक“देबल&lt;br /&gt;
| छि।&lt;br /&gt;
र आए आए डा कषिल लामिछाने&lt;br /&gt;
(श)&lt;br /&gt;
शरीर पनि सानै, झन्‌ सानो मुख,&lt;br /&gt;
आवाज निस्क्यो भने अरुलाई दुख। के हो? - बन्दुकशरीरभरि आँखा छन्‌ हेर्दा केही छैन,अरूलाई नवोकाई हिँड्न जान्दैन । के हो? -डोको&lt;br /&gt;
शिरकोटको सिपाही नड्घकोटमा आई मन्यो। के हो? - जुम्रा मारेकोशिरमा मेरो खरानी जोगी नभने,&lt;br /&gt;
पेट मेरो कराउँछ रोगी नभने, हातमा लौरी बूढो नभने । के हो?- हुक्काशिर पनि छैन, पाउ पनि छैन, दुई हात नभई मिलाड्जन सकिँदैन ।&lt;br /&gt;
के हो? ज्टोपीशिरमा चुल्ठो, जीउभरि आँखा । के हो? - भुइँकटहर /दरैँशिरमा ज्वाला, पुच्छरमा आहारा । के हो? , न्वत्तीशिरपुरको राजा नङपुरमा मारियौ। के हो? - जुम्रा मारेको&lt;br /&gt;
शिवपुरको राजा हस्तिनापुरमा पुगेर मन्यौ। के हाँ? - जुम्रा मारेकोशिवजीलाई मन पर्ने आफ्ना गालाँ आफैँ हान्ने। कै हो? - डमरुशुभकाममा अघि बढ्छ, मरेको गोठ डुक्रदै हिँड्छ। के हो?- दमाहाश्वीनगरको गोरु टुँडिखेलमा झन्यौ,&lt;br /&gt;
दसजना सहभागी दुईजनाले मारे। के हो? - जुम्रा मारेको&lt;br /&gt;
शीनगरमा आगो लाग्यो, टुँडिखेलमा खल्लबल्ल,&lt;br /&gt;
म यहाँ आइपुगाँ बल्लबल्ल । क्या हो? - तमाखु खाएको&lt;br /&gt;
श्रीपीच छ राजा होइन, पखेटा छन्‌ पङ्खा होइन,&lt;br /&gt;
नङ्ग्रा छन्‌ भालु होइन । के हो? - कुखुराको भाले&lt;br /&gt;
श्रीमान्ले श्रीमतीको सबै थौक देख्छ, तर एक थोक देख्दैन। के हो?- बिधवा अवस्था&lt;br /&gt;
[]&lt;br /&gt;
साइला गरउँखाने कधा पा &amp;quot;३&lt;br /&gt;
सखरखन्ड टुकुरी मूला फोक्सो, आमा चन्चले बाउ बोम्तो। के हो?&lt;br /&gt;
- मरट्टी/मरौटी&lt;br /&gt;
सखरखन्ड पोटिलो मूला फोक्सो, यो कथा नजान्ने पक्का बोक्सो। के हो?&lt;br /&gt;
- नरसिंहा/कर्नाल&lt;br /&gt;
सगरमाथाको टुप्पामा चारकोसै झाडी। के हो? - कपालसगरमाधामा आगो लाग्यो, नाम्चे बजारमा हल्ला । के हौ?&lt;br /&gt;
&amp;quot; तमाखु खाएको&lt;br /&gt;
सैँभरि झुन्डिएर हेर्छु महिना दिनमा अनुहार फेर्छु। के हो ! - भित्तेपत्रोसधैँभरि मासु खाने, जति खायो दुब्लाउँदै जानै । कै हौ? - अचानोसहैँभरि मानिसभन्दा एक पाइला आघ हिँड्छ। केहो? - लौरोसँ हुन्छु मुड्कोमाथि, टिप्न कोही सक्दैन साथी? कै हो? - कानसबेरै उठेर शिरमा आरी घोप्द्याउनै । कै हो? - टोपी लगाएकोसबैका छानामाथि सेतासैता फल,&lt;br /&gt;
ती फल खाने छैन कसैको बल। के हौ? - जञततारासबैकी लक्ष्मी साढिकी जोई, यो कथा नजान्ने लाटीको पोइ। के हो?&lt;br /&gt;
- गाईसबै कुरा भलो, एउटै नहुने हलो। कै हो? -बाँतसबैको जुँगा मुखमा, मेरो जुँगा टुप्पैमा। के हो? - मकैँको जुँगासबैको शाला। कै हो? - घर्मशालासबै घोडा चढ्छन्‌, हामी छानामा चढौँ। के हो? - फर्सी र लहरासवै थोकको एकै घोक। के हो? - खरानीसबै थोकको एकै नाम। कै हो? “छायाँतवै थोक हुने, हलौ नहुने। के हो? - बाँससबैलाई चाहिने, मरुभूमिमा नपाइने । कै हौ? - पानीसवैलाई तातै, गएपछि रातै । के हो? - घाम&lt;br /&gt;
पक हार डा. ककस सामिछाले७&lt;br /&gt;
सबै सुत्दा दाइ जाग्ने, दाइ सुत्दा सबै जाग्ने । के हो ? - चौकीदार / पालेसमुद्र छ समुद्र होइन, पहाड छ पहाड होइन, सहर छ सहर होइन ।&lt;br /&gt;
केहो? न्नक्सासराङकोटमा कुकुर भुक्यो, मेरा हाताँ पुच्छर । कै हो? - बन्दुक पड्काएकोसर फुकुटी, झिकेपछि सुकुटी । कै हो? - जालसय बहिनीको एउटै पटुकी । के.हो? - पातको मुठौसय भाइको एउटै सिरानी । के हो? - घुरी बलोसय भाइको एउटै चिहात। कै हो? - खरानीसय भाइको एउटै दुप्पी। के हो? - टौवाको सुइरोसयवटा खाँवा सयबटै दाम्ला, यौ कथा नजान्नेलाई सय बाजी लाम्ला ।केहो? न पुलसयौँ छन्‌ दाँत गजब छ जात, स्याइँस्याइँ गर्दै खान्छ काठ। के हो?- करौँती&lt;br /&gt;
सयौँ भेडाबाखा पाइलो भने छैन, झाडा-पिसाप गरेको केही देखिँदैन ।केहो? &amp;quot;कमिलासरक्क सिउँदो, निधारमा बिउँफो, पुच्छरबाटै पानी पिउँदो। के हो?- बत्ती बालेको&lt;br /&gt;
सरसर हिँड्छ सूर्य होइन, लौरो लाएमात्र हिँड्छ गौरु होइन। केहो?- कुमालेकी चाको&lt;br /&gt;
_ साँढेका जीउभरि काँद्ैकाँडा | के हो? न तीतेकरेलासात दिदी बहिनीले एउटै मजेत्रो ओढ्रेका। के हो: - सुन्तलासात दिनमा नआए किरिया गरी राखैस्‌। के हो? - लामखुद्रै&lt;br /&gt;
सानसानी नानी छेउबाट पस्छिन, सरर गाउँ घुम्छिन्‌,छेउबाट निस्कन्छिन्‌ अनि कम्मर कस्छिन्‌ । के हो? - पेटी लगाएको&lt;br /&gt;
साना आँखा ठूलो ज्यान। के हो? न्हात्तीसानामा धौती लगाउने, ठूल्लो हुँदै गए फुकाउँदै जाने। के हो? - बाँतसानासाना कद्दकुराभरि दाउरा । कै हो? - सलाईसानी कुरी, हिँड्छ धुरीधुरी। केहो? -्जुम्नासानी नानी अँध्यारोमा नुटुपुटु गर्छिन्‌ । कै हो? - जुठो लोटाएकोसानी नानीका दातिदाँत । कै हो? - काइँयो&lt;br /&gt;
सानी नानीका तीन सयवटा दाँत । कं-हो? - करौँती&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखान कामा.&lt;br /&gt;
सानी नानीको जीउभरि काँडा। के हो? &amp;quot; काइँपो&lt;br /&gt;
सानी नानीको पेट चिरिएको । के हाँ? &amp;quot;गहुँ. ज्ञाती नानीको पेट चिरिया, पेटभित्र हेर्दा सेतो फरिया । के हो? - गहुँसानी नानीको पेटमा औँला। के हो? - औँठीसानी नानीको वार हाते घोती। के हो? &amp;quot;सियो र धागो, सानी नानीको मीठो भान्छा। के हो? ति न्महसानी नानी टाउको चाहार्ने बानी। के हो? न्जुम्रासानी-सानी तिखुले नानी, लामो पुच्छर आफैँले तानी। के हो?&lt;br /&gt;
- सिपो र धागोसानी नानी पटुका बाँध्छिन्‌ । के हो? - भटमाससानी नानी, फनन्त घुम्नी। के हो? &amp;quot;भुरुङसानी नानी बुद्दुक-बुदुक गर्छिन्‌, भातका पिताले पेट भर्छिन्‌। के हो?&lt;br /&gt;
- चुलो लोटाएकोसानी नानी भुइँफुट्टी, उफ्री-उफ्री धानकुही। के हो? - उपियाँसानी नानीले सिङ्गै औँला खा&#039;की। के हौ? - औँठीसानी नानीले सिनित्त टिकी लाएकी । के हो? - सिल्टुङ/मस्याङसानी-सानी नानीको फुर्के धोती । के हो? -सियोर घागौसानी-सानती नानी गीत गाउँदै भीरबाट तल भर्छिन्‌। के हो?&lt;br /&gt;
- सल्लाको भँडीसानी-सानी नानी फुर-फुर गर्छिन्‌। कै हो? - चर्खा/कतुवा&lt;br /&gt;
सानी-सानी नानी मेरो फुर्के लायो धोती,ऐय्या पार्ला होस राख्ने मुन्द्रा लाउने लोती। कै हो? - सियो र धागोसानी-सानी तिखुलै नानी, पाँचहाते पुच्छर आफैँले तानी। कै हो?&lt;br /&gt;
हु - सियोधागौसानी-सानी नानीका हातभरि चुरा। के हो? 2 कुचोसानीतानी नानी थुतीथुती पानी खानी। केहो? - -बत्तीःर तेलसानी-सानी नानीको पेटभरि टीका। के हो? - खुानीसानी-सानी नानीको मीठो भान्छा। कै हो? - मौरी र महसानी-सानी नानी, सँदै-सँदै गयो उनको जिन्दगानी । के हो? - मैनबत्तीसानी-सानी नानीले सात पगरी गुतेकी। के हो? -कचौसानीसानी मुटुरी, कनिकाकी कुटुरी। के हो? - खनिउँ&lt;br /&gt;
क आड केल जमिछाने&lt;br /&gt;
सानी-सानी राम्री नानी, म्वाइँ खान जाँदा चिच्याउने बानी। के हो?“ - शङ्ख&lt;br /&gt;
सानी-सानी रुकुमै घैँटा जत्रो पेट,&lt;br /&gt;
कहाँ जान्छयौ रुकुमै भगवान्‌ भेट । कै हा? - कलस्यौलीको कलश&lt;br /&gt;
सानी-सानी सुकमारी घ्याम्पाजत्रो पेट,&lt;br /&gt;
कहाँ बसी मोटाइस्‌ ? भीर-पहरा-लेक।. के हो? - किर्नुसानैमा हरियो छिप्पिँदा रातो, मलाई खाने मानिसको लिन्छु सातो। के हो?- खुर्सानी&lt;br /&gt;
सानौ कसौँडीमा दुई चोइली भात। के हो? - कटुससानो खाल्टोमा देवी नाचेको। के हो? न्जिब्रोसानो घरको करेसामा लिस्नु। के होर - घट्रको डुँडसानी घरमा धैरै चोर बसेका, टाउकामा सबैले कालो घसैका। के हो?न - सलाई र काँटी&lt;br /&gt;
सानो छँदा तरकारी ठूलो भएपछि घरबारी । के हो? - बाँस&lt;br /&gt;
सानो छँदा मासु खाने, ठूलो भएपछि छाला तर्ने। के हा? - बाँससानो छँदासम्म धीती लाउने, ठूलो भएपछि बुझ्गै हुने। के हो?, - बाँससानो छँदा हरियो, पाकेपछि रातो, घेरै नखाक साथी उड्डाउला नि&lt;br /&gt;
सातो। के हो? - खुर्सानीसानो छउन्जेल चिमौदछन्‌, ठूलो भएपछि निचचोर्छन्‌ । के हो? - तोरीसानो छउन्जेल तरकारी, ठूलो भएपछि घरबारी। कै हो? - बाँस&lt;br /&gt;
सानो छउन्जेल धोती लाउँछ, ठूलो भएपछि घोती फाल्छ। के हो?- बाँससानो छउन्जेल मासु खाने, ठूलो भएपछि छाला काढ्ने। कै हो? - बाँससानो जीउ सानै मुख, उतले बोले हुन्छ ठूलै दुख। के हो। - बन्दुकसानो टाउको, पातलो जीउ, मोटो कहिल्चै भएन, जति खाए पनि घिउ ।&lt;br /&gt;
केहो? - मदानी,सातो नानीको लामौ घौती। के हो: - चिप्लेकीरासानो &#039;नावीको हातभरि बाला। केहो? - कुचोसानो पुढौ ठूलो मुख। कं हो? -्डौको&lt;br /&gt;
सानी बोटमा रातो बन्छु, सुत जोख्ता साथै हुन्छु । के हो ? - रातीगेडीसानोमा घौती लाउने, ठूलो भएपछि फुकाउँदै जाने । के हौ? - बाँससानीमा मलाई खाइथिस्‌, अब तलाई घाट लान्छु। के हो? - बाँस&lt;br /&gt;
साइला गाउँखनि कथा मामा»&lt;br /&gt;
सानोमा मासु खाने, ठूलो भएपछि रगत खाने । के हा? -तौरीसानोमा हरियो जवानीमा रातो, जसले खान्छ उस्को उड्छ सातो। के हो?&lt;br /&gt;
- खर्सानीसानो मुखको ठूलो बोली । के हो? - बन्दुक&amp;quot;सानो रुख छ चढ्न सकिन्न, पोल्छ त्यसले आगो भनिन्त। के हो?४, सिस्नोसानो लहरामा सपैंसर्प झुन्डिएको । के हो? - चिचिन्डोसानौ विश्वभित्र बारबटा देश, बारवटा देशभित्र तीन जनाको रेप्त ।केहो? - घडीसानो-सानो गाई मुलुक खाई। के हो? - खुकुरीसानौ-सानौ चिन्ते, गाउँभरि घुम्तैे। के हो? - बिरालोसानो-सानो ताउलीमा दुई कुड्की भात,&lt;br /&gt;
-बाहिरपट्टि बाक्ला काँडा घोच्ला तिम्रो हात। के हो? - कटुस&lt;br /&gt;
सानो-सानो तामाको ताउली,भित्र फलामको डिब्बा, त्यसभित्र एक पन्यूँ भात । के हो?- रिङ्ठाको गेडासानो-सानो छ फोहरमा बस्छ, मानिसलाई नराम्ररी डस्छ। के हो?- झिँगा&lt;br /&gt;
सानो-सानो दरी, कनिकाले भरी। के हो? - तिलको कोसौसानो-सानो दह, सिन्का परे नसह। केहो? - आँखासानो-सानौ नानीले घाँसको मुठा बोकेको । के हो: ज्मूलासानो-सानो पहरामा सिपाहीको लहर। कँ हो? - दाँतसानौसानौ प्याङ, प्याङभित्र दाम। के हो? : - खुर्सानी र बियाँसानो-सानो प्याङ भित्र दामैदाम । के हो? - खर्सानी&lt;br /&gt;
सानो-सानौ रूखका गढ्याङगुडुङ पात,कसले गाँस्ला दुना-टपरी, कसले खाला भात । कै हो ?- अमलाको पात&lt;br /&gt;
सानो-सानो रूख, चढ्नलाई दुख। केहो? ।। नसिस्नोसानोसानो रूखौली चढ्नाको दुखौली। के हो? -्सिस्नोसानो-सानो सेउलीमा झुन्डिएकी बरेउली, १&lt;br /&gt;
बेद्जलीको पेटभरि असर्फीको थैली। कै हो? - खुर्सानीसान्नानीका पेटभरि सिन्का। के हो? - सलाई र काँटीसान्नानी दुलहीको हातभरि चुरा। के हो? - कुचाको वालासामुन्तेको पहरामा पानी-पँधेरौ। के हो? - आँखाको आँत&lt;br /&gt;
११ ना डा. कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
० सिउनु त सिउनु घुमाई-घुमाई सिउनु,&lt;br /&gt;
सियोको दुप्पै भाँची सिउनु। के हो? - टपरी खुटैको० सिँगाने राजाका पाँचजना मलामी। के हो? - सिँगान फालेको० सिक्क गयो हातमा, प्यात्त पत्यौ पातमा । के हो? - सिँगान फालेको«५ लिङ छन्‌ गाईगोह होइन, जाँतो वोकी हिँड्छ मकै पिस्ने होइन। के हो?&lt;br /&gt;
. , - जाँतेकीरो&lt;br /&gt;
५ सिड देखाउँदै गर्ने, बाटो पोत्दै गर्ने। के हो? - चिप्लेकीरा२ सिडमा समाई घुमाए, घ्याम्पे वूढीलाई नचाए । कै हो? - जाँतो० सिङ्गी एउटा रुखमाथि तीनवटा पात,&lt;br /&gt;
सञचैँभरि बस्ने गर्छ शिवजीको साथ। के हो?० सिरकोटको भाले, नुवाकोट लगेर मारे। कै हो) - जुम्रा मारेको० सिरपुरको राजा नङपुरमा आएर मन्यो। के हो? - जुम्रा मारेको० सिरनगरको गोर₹ टुँडिखेलमा झर्यो,&lt;br /&gt;
दसजना सहभागी दुईजनाले मारे । के हो? - जुम्रा मारेको५ सिरूपातै खुकुरीको दुईतिर धार । के हो? - केतुके५ सुँड छ हात्ती होइन, हातखुट्टा छन्‌ मान्छे होइन । के हो? - गणेश२ सुइँक्क गन्यो हातमा, हुत्त गत्यो पातमा । के हो? - सिँगान फालेको० सुकाएको काँच्चै खाने, पकाएको पोलेर खाने । के हो? - सुर्ती र तमाखु&lt;br /&gt;
- त्रिशूल&lt;br /&gt;
५ सुकिलो भीरमा काला वाख्रा चरेका। के हो? - अक्षर० सुगन्धी छ डल्ले भाइ हाबा पाए उड्छ,&lt;br /&gt;
भुईमा फ्याँकिदिए सललल गुड्छ। के हो? &amp;quot;कपूर० सुटुक्क जान्छु, कुटुक्क टोक्छु, आएँ भने आइहालेँ,&lt;br /&gt;
आइन भने किरिया गर्नु। केहो? - लामखुट्टै० सुत्ने वेला&#039; घुसार्नी, उठेपछि निकाल्ती । कै हो? - आग्लो/गजबार० सत्‌ सुत्‌ बूढी, म हाल्छु। के हो? - जुत्तान सुनको खोलमा चाँदीको फल। के हो? न घन५ सुनको जाँतो, काठको हातो। के हो? ज्फर्सी&lt;br /&gt;
० सुनको बटुकी चाँदीको खिल, टपटप टिपी सुटुक्क निल । के हो ?- ऐसेलु4 सुनगेडी झिक्यो, मुढो पोल्यो। के हो? - मकै छोडाई खोयो बालैको० सुनगडीभित्र सानी नाती नाच्छे, छहराकौ पानी खाईकन बाँच्छ। के हो?&lt;br /&gt;
- आँखाको नानी&lt;br /&gt;
“रमाइला गाउँखते कथा एएए??ए???ए??॒ १९&lt;br /&gt;
सुन फुल्ने, तामा फल्नै। के हो? न्चुत्रोसुनलाई कुदता निस्क्यो चाँदी, चाँदी पकाई मुखभित्र खाँदी । के हो- भात&lt;br /&gt;
सरी फल्ने, फलाम तरी पाक्ने। के हो? ला कुलोसुन्न सकिन्छ, देख्न सकिन्न, जताजतै पस्छ, रोक्व, सकिन्न, त्यौ नभई.फेरि बाँच्न सकिन्न। के हो? ज्नसासुन &#039;साङ्ली रूप आङ्ली, पिँधबाट पानी माग्ली। के हो? : - घातसुन, सुनभित्र फलाम, फलामभित्र चाँदी। के हो? न्रिड्ठोसुनौली नानी औंलामा बस्छिन्‌, बसेपछि नछाडी माया गांस्छिन्‌। के हो?- औँठीसुरिलो बुटामा खिरिला पात, आए जन्ती खातैखात, नहाल जन्ती झुसिलाहात। कै हो? न्केरासुरिलो रूखका गाँडैगाँड । कै हो? -मैवासुरिलो रूखका सिन्का जत्रा पात, पाहुना आए केमा दिने भात ।केहो? , -सल्लोसुरिलो रूखको टुप्पामा एउटै पात। के हो? - पनिउँसुरिलो रूखको टुप्पामा पोखरी। के हो? - पानससुरिलो रूखको तीनबटा पात । कै हो? - त्रिशूलसुरिलो रुखको लामकाने पात, खात लाग्नै स्वादिलो जात । के हो? - केरासुरिलो रुखमा कूरिला गेडा। के हो? - जुनेलोसुरिलो रुखमा कोप्चे पात। कै हो? न डाड्ुसुरिलो छखमा यौटा मात्रै चरीको गुँड। के हो? न्डाडुसुरिलो रूखमा धुरिलो पात, आए जन्ती खातैखात । कै हो? -- केराको घरीसुरिलो रुखमा बारुले गुँड, जता घाम उतै मुख । के हो? - सूर्यमुखी फूलसुरुब्क सुर्के टुप्पोमा फुर्के। के हो? - कोदाको बालासुरुकक सुर्के, भीरबाट गुड्कै। कै हो? - फापर&lt;br /&gt;
सुरुवाल डढ्यौ, इँजार जस्ताको त्यस्तै । के हो?&lt;br /&gt;
- डढेलाले खाएको वन र बाटोसुरुबाल डढ्यो, इँजार रहिगयो। के हो? - वन र बाटोसुरुवाल पोलियो, इँजार बच्यो। के हो: - डढैलाको राँटो&lt;br /&gt;
बृषपूलालनाललनेलनननननबनगलनमममलमममलमम्लमन्न्नक हि? हत्त सालिकम&lt;br /&gt;
० सस्साउँनी, होक्काउनी, नाइँ भन्नै, ढौग गर्ने। कै होर- तल्लो, खोलो, केरा, बाँस&lt;br /&gt;
० सेता डल्ला आकाशको फल, भुइँमा झर्दा सबै: हुन्छ जल। के हो?&lt;br /&gt;
- असिना० सेता-सैता दाना असिना होइन,उडदा-उडदै हराउँछ बतास पनि होइन। के हो? - कपूर५ सैती गाईको पेटमा अँगार । कै हो? - कपास र बियाँ० सैती गाईको हरियो चँँवर। के हो? न्मूला५ सेती गाई पानी खान गई, राती गाई पानी खाएर आई। के हो?- सेल पकाएको० सेती बूढीको गालामा चिरैचिरा। के हो? लसुन० सैती र काली एकै ठाउँमा मिसिने । कै हो? - सिँगान० सेतो-खैरो रङ्ग यस्को, छाताजस्तो रूप,तरकारी प॒काई खाँदा मीठो हुन्छ खुप। के हो? &amp;quot;च्याउ&lt;br /&gt;
० सेतो गानु क्वाप्प खानु, पेटभित्र जाँदै नजानु। के हो? - शङ्ख० सैतो छ, तिखे छ, कालौ खोल ओढ्छ, साच्चै परे गर्दन तोड्छ ।&lt;br /&gt;
के हो? खुकुरी० सेतो ठेकीमा हरियो बिर्को। के हो? - मूला५ सैतौ ढुङ्गो उप्काउँदा रातो रगत आउने । के हो? न्दाँत० सेतो पीठोमा रातीगैडी । के हो? -्आगौँ&lt;br /&gt;
५ सेतो बारीमा कालो तोरी, हातले, छर्ने मुखले टिप्ने । कै हो? - लेखेपढेको० सेतोमाथि कालो चल्ला, बोल्दाखेरि धेरै हल्ला । के हो?- सस्वर पढेको&lt;br /&gt;
५ सेतो बनमा काला भैँसी। के हो? - अक्षर५ सेतोसेतो मुहार मेरो, माटामुनि बात,&lt;br /&gt;
छोराछोरी धेरै छन्‌, गर्छन्‌ मेरै आस। केहो? - लसुन० सेतो हिउँ ताईमा राख्दा पग्लेर जाने। क हो? - घिउ&lt;br /&gt;
० सोरसार पारी घसँन्छ, गयो भन्छन्‌ त्यहीँ हुन्छ। कै हो? - पहिरो० सेतोसेतौ खम्बामाथि रातौरातौ फूल,&lt;br /&gt;
त्यो फूल टिप्न खोज्दा हुन्छ कि त भुल। के हो? - मैनबत्ती५ स्याउँ-स्याउँ चल्ला वार गाउँ हल्ला। के हो? - मौरी&lt;br /&gt;
रमाईला गाउँखाने कधा णााणणाााााा7ा री&lt;br /&gt;
र&lt;br /&gt;
स्याउँ-स्पाउँ चल्ला, बार बीप्त दाम्ला,&lt;br /&gt;
यौँ कथा नजान्नेलाई हजार वाजी लाम्ला। के हो? -माकुरौस्पालको मामा, गणेशको काल, बाघको गुरु। के हो? - बिरालोस्वर्गकी परी रङ्गीन घुम्टो ओढी, आँसु टल्काई रुन्छन्‌ घरिघरि ।&lt;br /&gt;
के हो? - इन्द्रेनीस्वर्गको लिस्नु धर्तीको आड, आगाको कलेजो पातीको हाड। के हो?- इन्द्रैनीस्वर्ग जाने बाटो त ढुङ्गा न माटौ। के हो?) - भन्याङ/ लिस्नोस्वर्ग पुग्यो कि घर्ती छिप्यो। के हो? रुखस्वर्गमा पानी, गर्भमा नानी। केहो? - रक्सी पारेकोस्वादका निम्ति चाहिने, बीउ खोज्दा नपाइने । के हो? - नून&lt;br /&gt;
स्वादिलो मीठो तरकारी उडन्ती, बुडन्ती, चुँडन्ती। के हो?- - चरा, माछा र साग&lt;br /&gt;
1]&lt;br /&gt;
१ नाडा कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
(ड)&lt;br /&gt;
० हक्ुबा गौरु, भित्तो फोरु। के हो? । न्मुस्तो५ हेराए घाटा लाग्छ, भेटाए थाप्ला लाग्छ। के हो: न्टोपी० हरियो गाङ्छन्‌ सुन फलाउँछन्‌, सुन फ्याँकेर चाँदी तुल्याउ्छन्‌ । के हो?- घान चामल५ हेरियो चरीका दुईतिर पुच्छर । के हो? -ढुनु० हरियो चरीका बत्तीसबटा जुरा। केहो? - करेला,, हरियो चरीको वरी-थरी चुच्चो, स्वाद तीतो मुख पार्छ मीठो। के हो?- तीतेकरेला&lt;br /&gt;
. हेरियो चरी, चुच्चोमा लाली, खोली मीठो बौली। के हो? -सुगा-० हेरियो चरी मोती जडी, दोत्तल्ला ओडी, मैदानमा खडी। के हो?- मकैको बोट५ हेरियौ चरी लालमोती जडी, दोसल्ला ओडी मैदानमा खडी। के हो?मकै५ हेरियो छ त्यो गौँडा, तर त्यो जङ्गलमा पाइँदैन। कै हो? - सयको नोट० हेरियो जन्म्यो अनि भयो रातो,पछि भयो कालो, छिटो भन नत्र लिन्छु सातो। कै हो? - जामुत० हरियो झाल देख्नमा लाल, ओ मेरी आमै,&lt;br /&gt;
&#039; ओ मेरी बाबै | खाँदा जन्जाल । के हो? - खुर्सानी० हरियो पुतली सिँगार पार्दै नाच्छै। के हो? - टपरी गाँसेकौ५ हेरियो रुखमा फिरफिर पात, आए जन्ती खातैखात । कै हो? - केरा० हरेक दिन प्रयौग हुनै बजारको नौनी,&lt;br /&gt;
मुखमा पुन्याउनी, पेटमा नपुन्याक नि। के हो? -दुय पेस्ट० हेल्लने हाँगाको फक्रँदी फूल। के हो? न अफिम५ हम्तिनापुरका राजाले हेरी विचारी,&lt;br /&gt;
नवलपुरका राजाले मारी बिचारी। के हो? - जुम्रा मारेको« हाँगा एकै नाइँ, पातको लेख्नै नाइँ। के हो? &amp;quot;केरा&lt;br /&gt;
सपहता गाउँखाने कथा था एाएाए77।7।र&lt;br /&gt;
हाँगाविताको रुखमा ठूलाठूला पात। के हो? न्केरा&lt;br /&gt;
हाँडीभरि कनिका एक ढिको नुन। कै हौ? -तारा र जूनहाँडीभरि तितौरा, एक ढिको नुन। केहो? - तारा र चन्द्रमाहाँद्ै पति छ सदै पविछ। के हो? - सगसापर्तीहाँस्यो कि आँसु खसाल्यो । के हो? - मैनबत्तीहाकूरी औैँसीको काक्री सिङ। के हो? -गहतहाडछाला छैन वस्छ दुप्पोमाथि, “1माया गरै बढ्छ काट्नै पर्छ साधथी। के हो? ताङहाडभरि नसैनसा, गालाभरि मोसैमोतो। के हो? - मादलहाडमासु छँदै छैन छालामात्र सर्छ,हातखुट्टा छैनन्‌, तान्ने काम गर्छ। के हो? - हल्लुँडौहात-खुट्टा छैन रौँख्प छ, तरबारको काम गर्छ। कै हो? -बलुहातखुद्न छैन्‌ बस्छ झोलाभिव, माया गर्न जाने वन्छ सधैँ मित्र। कै हा?&lt;br /&gt;
- पुस्तकहातगोडा छैनन्‌ परपर पुग्छ, घरघर घुम्दै समाचार त्यौ फुक्छ। के हो?&lt;br /&gt;
- चिठीहात छ खुट्टा छैन, जीउ छ आँखा छैन, गर्दन छ टाउको छैन। के हो?&lt;br /&gt;
- कमिज&lt;br /&gt;
हात छ दुरुस्तै पन्जा छैन, कसकास नगरी चैन हुँदैन । के हो?- दौराहात्त छन्‌ हान्त सक्दैन, खुट्टा छन्‌ हिँड्न सक्दैन। केहो? -रुखहात छैन समाउँछ, आँखा होइन दृष्टि लगाउँछ। कैह्लो। -चस्माहात छैन त्यसको रौँरूपको, काम गर्छ तरबारको। के हो? -बलु&lt;br /&gt;
हात न खुट्टा, उखेल्दछ बुट्टा। के हो? न्पहिरोहात न खुब्न घग्नेर चल्छ, अगाडि भेटे सलक्क निल्छ। के हो? - अजिङ्कारहात न खुट्टा, देशविदेश फुत्तफुत्त । के हो? - हुलाक टिकटहात्त न खुट्टा, पिख्यूँ चढी हिँड्छ यताउता । के हो? - डोकोहात न खुट्टा, बित्ता नाप्न सिपालु । कै हो? -जुकोहात न खुट्टा रन्किदै उकालो चढ्छ। के हो? नढहैसोहात माड्छ पहलमान होइन, उड्छ चरा होइन,&lt;br /&gt;
रातो सुँड छ हात्ती होइन। कै हो? -भिँगो&lt;br /&gt;
हातमा मेरो लौरी छ, वूढो नभने; थाप्लामा खरानी छ, जोगी नभने;पेट मेरो गडयाङगुडुङ रोगी नभने । के हो? - नली, हुक्का र चिलिम&lt;br /&gt;
तरह ललल मलाममा”ोडो कफि लामिछाने&lt;br /&gt;
० हातमा लियो, प्वाड्ङ फुटायो, स्वाट्ट पियो, दुइटा दियौँ। के हो?&lt;br /&gt;
- काँचो नरिवल&lt;br /&gt;
० हातमा लाउँछन्‌, तर टिकटिक गर्दैन,“ हातमा लाउँछन्‌, तर चल्दैन। कै हो? - आलुघडी० हात मेरा माथि छन्‌, खुट्टाबाट पानी खान्छु। के हो? न्र्ख० हातले छर्ने, मुखले टिप्ने। के हो? - लेखेपढेको० हात्तीको आङमा नाङ्लो सुपो ठटाएको। के हो? - घर छाएको&lt;br /&gt;
० हात्तीको पेटमा कल्याङकुलुङ चल्ला कराएको । के हो? - घरमा मान्छे० हात्ती छ, जङ्गल छैन, संपार डुल्छु, खुट्टा छैन। के हो? - हजारको नोट&lt;br /&gt;
५ हात्ती छिल्यो, पुच्छर अड्क्यो। के हो? - लुगा सिएकोन हात्ती रुक्षयो घौडा रुस्यौ रुफै सबै जन,भाँडा ल्याए भरिँदैन गर त्यसको छ्यान। कै हो? - शीत&lt;br /&gt;
१ हात्ती होइन सुँड छ, चरा होइन उद्छ। के हो ?, - क्षिँगा/ लामखुट्टे० हात्ती होइन सुँड छ, मान्छे होइन पाखुरा ठेन्छ। केहो? -किँगा&lt;br /&gt;
० हात्ती होइन सुँड छ, मोटर होइन गुद्छ। केहो? न्घुत० हानेर हान्न नसकिने तानेर तान्न नसकिने । के हो? - पानी० हाम्मी घरकी सानी नानी, रनबत डुल्ने तिनको बानी। के हो?&lt;br /&gt;
- काइँपो० हाम्रो घर छ ढुङ्ग्रीमा, ढुङ्ग्रीभरि रूपैयाँ। कै हा? - खुर्सानी&lt;br /&gt;
० हावा खाँदा टन्न हुने, मुख बाँधी छाड्दा माथि उड्ने । के हो ?- बेलुन० हावा आउँदा हल्लाउँछ कान, मुखबाटै बच्चा पाउँछ लाम । के हो? - केरा० हावा भरिएको छालाको गानु, आफूतिर आए लात्तीले हाचूँ। के हो?&lt;br /&gt;
- भकुन्डो/बल० हाली, पौली आफैँ रित्तो। के हो? - तावा० हालीबरी टयाँस्‌-दयाँस्‌ । कै हो? - नाङ्लो० हाल्दा ठडठड, झिक्दा लतैरङ। के हो? - तराजु/तुलो० हाल्दा लुलो, क्षिक्ता दरो। के हो? न रोटी० हाल्दा सेतो, झिक्दा रातो। के हो? - सेलरोटी पकाएको० हिउँको पुदुरोभित्र काली कुटुरो। के हो? - कपास र बियाँ५ हिँडेको हिँड्दयै छ, चलाको चलैमा। कै हो? - कोल५ हिँड काली, माइत जाम्‌ । के हो? न्चौँठी० हिँड्छ खुट्टा छैन, बोल्छ मुख छैन। के हो? - खोलो नदी&lt;br /&gt;
पपाइला गाउँखाने का&lt;br /&gt;
हिँड्छ सघैँ खुख्खुह खुट्टा उसको छैन,&lt;br /&gt;
जति हिँडे पनि उसको पाइला देखिँदैन । के हो? न्ड्ुङ्गाहिँड्छ हिँड्छ जहाँको तहीँ। के हो? - कोसहिँड्दा अल्छी मानी पछि बस्छ, खाँदाखौरि अघि आउँछ। के हो?&lt;br /&gt;
- हुँसिया/ आँसीहिँड्दाबेरि बाटो बनाउँछ, छोइदिए डल्लो पर्छ । के हो ?- चिप्लेकीराहिँड्दा बुई चद्नै, वस्दा लड्ने। के हो? ज्डोकोहिँड्ददाहिँड्दै बज्छ वाजा होइन, खोलमा अद्छ दाप होइन। के हो?&lt;br /&gt;
- खुपेटो&lt;br /&gt;
हिँड्दाहिँड्दै धाकै पनि हिँड्न छाड्दैन,चुस्न केही नपाएमा सुख पाउँदैन । के हो? न्जुकाहिँड्दै छ, आँखा तर्दै छ। कै हो? - डोको बोकेकोहिँड्दै छ, कुम्लो छोड्दै छ। केहो? - फर्सी र लहरा&amp;quot; हिँड्दै छ,&#039; कुम्लो फुकाउँदै छ। के हो? न्फर्सीहिँड्दै छ, घोती सुकाउँदै छ।.के हो? - चिप्लेकीराहिँड्दै छ, पाइला मेट्दै छ। के हो? -डुङ्गाहिँड्दै छ, फुल पार्दै छ। के हो? - लुगा सिएकोहिँड्दै छ, बाटो लिप्दै छ। केहो? - चिप्तेकीराहिँड्दै, छ, चुर्की छदै छ। केहो? - बाखाले बड्कौँल्याएकोहिँड्दै छ, मदयाङ्गरा पार्दै छ। के हो? - बाख्राले बड्कौँत्याएकोहिँड्दै छ, लिखा पार्दै छ। केहो? - लुगा सिएकोहिँड पुड्की, भात खान जाउँ। के हो? - लौटाहिँड्‌ पुड्के, चुला जाउँ। के हो? - कसौँडी/सोटा&lt;br /&gt;
हिँड पुड्के, बेसी जाउँ, तेरो मुल्टौ निमौठेर ल्याैँ। के हो? - धोक्रो/मैलोहिँड्हिँड्‌ कान्छी पधेरा जाम्‌, नुहाईधुवाई गरी पानी लिएर आम्‌। के हो?&lt;br /&gt;
न्गाग्रीहिमालमाथि कालो वन। के हो? - कपालहिमालमाधिको कालो वन, त्यसलाई धनमा गन्दै नगन । कै हो? - कपालहिस्रिक्क बूढी, खिम्रिक्क दाँत। के हो? -यैली&#039;हुँन त&#039; हो, यसको उल्टो के हो? न तनहुँ.हुँ म आँखावरिपरि बस्ने तीन अक्षरकी मैयाँ, तपहिलो अक्षर किक्ता तिर्खा मेट्छन्‌ दुनियाँ। कै हो? - गाजल&lt;br /&gt;
१२६???” डा. कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
हुङचुड बराजु कोखामा सिङ। केहो? - जाँतोहुन त चौपाया नै हो, तर दुई खुट्टालै हिँड्छ। के हो? - कङ्गारुहुन त त्यो इँटा नै हो, तर त्यसबाट घरसर बन्दैन । के हो? - तासपत्तीहुन तत त्यही हो, क भए खाइहाल्थ्यो, क त होइन। कै हो?&lt;br /&gt;
- सर्पको काँचुली&lt;br /&gt;
हुन त त्यही हौ, त्यौ भए खाइहाल्थ्यो, तर त्यो होइन खाँदैन। कै हो?&amp;quot;काँचुलीहुम्ला जान्छ, जुम्ला तन्काउँछ। कै हो? - लगौँटीहेर हेर्न नसक्नि, छौजँ छन नसकिने । के हो? न्स्‌यंट्रैसँ हेर्न सकिन्न, जाड जान सकिन्न । के हौ? न्च्नू्यंहेरै तँलाई, देखेँ मलाई । के हो? - ऐनाहेरै दुईबटा, नहैरै एउटा। के हो? न्छेना. हेरै दुइटा नहेरै एउटा, हेर्‌ तँलाई देख्‌ मलाई। कै होः? -ऐताहेर्दा काली, नाम भनै राति। के हो? न रात&lt;br /&gt;
हेर्दा कालो धुलो, पकाएर खाँदा जाँगर खुल्यो । कै हो? - चिपापत्तीहेदखिरि रुबाजस्तो फुसफुस गर्ने, पहाडका चुलीतिर पत्रैपत्र पर्ने। के हो?&lt;br /&gt;
- हिउँहेर्दा छ डल्ले, कराउँछ बलले । कै हौ? &amp;quot;शङ्खहेर्दा छर्लङ्ग, हिर्काउँदा झन्यामझुरुम। कै हो? न ऐनाहेर्दा छ, समात्दा छैन। के हो? न्छायाँहेर्दा नदेखिने, बलमात्र गर्नै। केहो? “हावाहैर्‌ मलाई, देख्‌ तँलाई । के हो? &amp;quot;एनाहेर्दो ख्ख हो गानु होइन, लामा पात छन्‌ हाँगा छैन। के हो? - केराको बोटहेर्दा लह्ठी, चुस्ता कस्ती, थुम्दा कपास । कै हो? नडखुहेर्दा सङ्लो पानी, धेरै खाए ज्यानै जानी। के हो? ञ्रक्सीहेर्दा सिन्का सुँघ्दा सुवास । कै हो? - सिन्के धुप / धुपबत्ती&lt;br /&gt;
हो त्यहीँ थिँ, हो त्यहीँ थिँ। के हो? - कनाएको/ लौरो टेकेको&lt;br /&gt;
ह्याँ पनि छैन, त्याँ पनि छैन, काफल पाक्यो बौक्रै छैन। कै हो?&lt;br /&gt;
- असिना&lt;br /&gt;
ह्बाङ्कग पहराँ अखेटदै अखैटा। के हो? - भन्याङ “लिस्नो[|&lt;br /&gt;
साइला गाउँखाते कधा 77???” १२७&lt;br /&gt;
हि मनन&lt;br /&gt;
अम्यास&lt;br /&gt;
(क) साइनो सोझ्याउनुहोस्‌ ।&lt;br /&gt;
त,11&lt;br /&gt;
आमा कि मामा भन्छन्‌, मामाकी भान्जीबुहारीलाई कै भन्छन्‌ ?अर्काको स्वास्नीको काखमा अर्काको लोग्ने बस्छ,&lt;br /&gt;
उसको लोग्ने झनै पो खुसी हुन्छ। केहो?&lt;br /&gt;
एउटा मान्छे धेरै पछि पढेर घर फर्किँदै थियो । गाउँमा पस्नै बित्तिकैएक्कासी एउटी महिलासित भेट भयो । उसले चिनेचिनै जस्तो लाग्योनि भन्यो । महिलाले भनिन्‌ -चिन्नै त पर्ने हो नि ! तिम्रा मामालैमेरा मामालाई मामा भन्छन्‌ । अब भन्नुहोस्‌ ती दुईको नाती केहो? -तिमी मेरी स्वास्नी, म तिम्रो पोइ, काशी जाँदा सँगै गएतेम्‌ नि चिनेकोखोइ। के हो?&lt;br /&gt;
आमाका मामाका भान्जीज्वाइँलाई के भन्नुपर्ला खोइ ?&lt;br /&gt;
उताबाट को आए क, सेल हाल च्बाइँ, आमाका मामाका भान्जीज्वाइँ ।के हो? ०&lt;br /&gt;
बोकेको मेरो भाइ हो, यसको बाउ मेरो पोइ हो। के हो?&lt;br /&gt;
हा भाइ हा ! भरै आउँछन्‌ मेरा पोइ तेरा बा। के हो?&lt;br /&gt;
तिमी मेरो बाउ हौ, म तिम्रो छोरो होइन। के हो?&lt;br /&gt;
एउटा लोग्नेमान्छे र अर्की स्वास्नीमान्छै हिँढ्दै थिए । उताबाट आउनेले जिस्क्याउने गरी भन्यो- हैन, चरी फेला परी कि क्या हो? उसलेत्यसैगरी जवाफ दियो- पिनकी फुपूले हाम्री फुपूलाई फुपू भन्छिन्‌ ।अब तिनको नातौ भन्नुहोस्‌ कै हो?&lt;br /&gt;
पर रा डा. कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
(ख) आफूलाई नआए अस्सँग सोधखोज गरी तलका गाउँखाने कथाको उत्तर&lt;br /&gt;
लेख्नुहोस्‌ ।&lt;br /&gt;
१ जति मासु खान्छ, उति दुब्लाउँदै जान्छ। केहो?&lt;br /&gt;
२ सेती पिठीमा राती गैडी। कै हो?&lt;br /&gt;
३ अखडबखड नरसिङ्गे बाहाँ, आँखा त दुलदुल मुन्टो त काहाँ। के&lt;br /&gt;
४ कोच्याई-कोच्याई ख्वाउँछन्‌, टुप्पी समाई रिड्गाउँछन्‌ । के हो?५ टाटूटे पहरामा एउटै अखेटो। के हो?&lt;br /&gt;
६ धेरै छन्‌ खम्वा, घुमाउने छत,एकजना मात्र बस्ने क्या हो त्यसकौ जात। के हो?&lt;br /&gt;
७ आकाशको फल, भुइँमा झर्दा जल। के हो?&amp;amp; ताउलो पाक्छ, जाउलो पाम्दैन। कै हो?&lt;br /&gt;
९ आकाशमा मकै भुद्दा&#039; पातालमा फुला,खान नपाई घिलाई गए मन अन्तै भुला। के हौ?&lt;br /&gt;
१० भित्र गज्याङगुजुङ वाहिर दर्दराउँदो छाला,यो कषा नजान्ने गुमानेको साला । के हो?&lt;br /&gt;
११ फलेको कताकति, नफलेको वाक्तै। के हो?&lt;br /&gt;
१२ कुमाल गाउँमा आगो लाग्यौ, माझी गाउँमा हल्लाखल्ला । के हो?&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखाने को पाए??? र?&lt;br /&gt;
१३&lt;br /&gt;
प्‌&lt;br /&gt;
१५&lt;br /&gt;
१६&lt;br /&gt;
१७&lt;br /&gt;
१८&lt;br /&gt;
१९&lt;br /&gt;
(ग)&lt;br /&gt;
फाल्नै भए फालिहाल, नत्र झुन्डिईं मर्छु। के हो?दुध पोखियो, दही खाइयो, घिउ जत्तिको तत्ति। कै हो?बत्तीस भाइ धान कुट्ने, एउटी बूढी घान लाउने । के हो?&lt;br /&gt;
वरिपरि मट्पाङ्ग्रा माझमा घ्वाइँ,परो कथा नजान्ने लखनेको ज्वाइँ। के हो?&lt;br /&gt;
काने कसौँडीमा दुई रङ पानी। के हो?&lt;br /&gt;
एकमाने ताउलीमा दुई चोड्ली भात। के हो?&lt;br /&gt;
आमा छाद्नै छौरी खानै। के हो?&lt;br /&gt;
माउभित्र बच्चा छ, बच्चाभित्र अन्डा छ। केहो?&lt;br /&gt;
तलका खाली ठाउँमा पस सङ्ग्रहमा नपरेका र आफलै सुने-जानेसम्मका&lt;br /&gt;
गाउँखाने कथाहरू टिप्नुहोस्‌ (र आवश्यक ठाने सङ्कलककहाँ पठाउनुहोस्‌ ।]शव । बयर लोहपहा25उतु)व१००.८ा&lt;br /&gt;
१ 7070 डा. कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
सन्दर्म ग्रन्थसूची&lt;br /&gt;
- अधिकारी) रविलाल, (२०५१), &#039;लोकोक्तिका प्रकारहरू : छोटो: चर्चा&#039;पाठ्यक्रमविकास पत्रिका पूर्णाङ्क&lt;br /&gt;
५० ३९०, पू.२३-३ ।&lt;br /&gt;
«० अधिकारी, विश्वप्रेम (२०५७), आँधीखोले लोकसंस्कृति र लोकगीत स्याङ्जा: विजयकुमार अधिकारी ।&lt;br /&gt;
५ दु (२०५८), पश्चिमाज्चलका लोकगीत र परम्परा स्याङ्जा : विजयकुमारअध्चिकारी ।&lt;br /&gt;
« (२०५९), आँधीखोले लोकसाहित्य : प्रस्तुति र विश्लेषण स्याङ्जाबिजयकुमार अधिकारी ।&lt;br /&gt;
२ अनन्त, कपिल, (२०५७), गाउँखाने कथा परिचय र विश्लेषण&#039; प्रज्ञा&lt;br /&gt;
« पूर्णाङ्क ९३ (वर्ष ३१), पू. ८५-९९ ।&lt;br /&gt;
२. उपाध्याय, कृष्णदेव, सन्‌ १९७७, लोक साहित्य की भूमिका तृतीय संस्क.,“ ड्लाहावाद : साहित्य भवन प्रा.लि. ।&lt;br /&gt;
- कोइराला, कुलप्रसाद, २०५७, “नेपाली र मैथिली भाषाका उखानहरूकोतुलनात्मक अध्ययन तथा विश्लेषण”व्रि.वि., विद्यावारिधि शोधप्रबन्ध ।&lt;br /&gt;
» गिरी, जीवेन्द्रदेव, २०५७, लोकसाहित्यको अवलोकन कारुमाडौं : एकता&lt;br /&gt;
प्रकाशन ।&lt;br /&gt;
गुरुङ, गजबहादुर, (२०२३/सन्‌ १९६६), संसारमा हरीको माया, बाराणसी&lt;br /&gt;
गोर्खा पुस्तक एजेन्सी । न&lt;br /&gt;
- चालिसे, विजय, २०३९, डोटेली लोकसंस्कृति र साहित्य काठमाडौं : साझाप्रकाशन ।&lt;br /&gt;
- जोशी, सत्यमोहन, २०१४, हाम्रो लोकसंस्कृति काठमाडौं : रत्न पुस्तकभण्डार ।&lt;br /&gt;
» डन्डेस, एलान, (सन्‌ १९५१) &#039;अन द स्ट्रक्चर अफ द प्रोभर्व&#039; उल्फगङ्गागमाइडर र एलान डन्डेस (सम्पा.) दि विज्डम अफ मैनी एसेज अन दि&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखाने कथा लरी&lt;br /&gt;
प्रोभर्ब न्यूयोर्क लन्डन :&lt;br /&gt;
ग्यारिल्यान्ड एन्ड पब्लिसिङ इन्स्टिच्युट ।दोका, रिचार्ड एम., (सन्‌ १९७६), फोकलोर एन्ड फेकनोर इङ्ल्यान्डहार्वर्ड युनिभर्सिटी प्रेस ।&lt;br /&gt;
तमोट, रत्नबहादुर, २०३३, गाउँखाने कथा काठमाडौँ : बूढानीलकण्ठस्कुल ।तिमल्सिना, बालकृष्ण, (२०५८) “धादिङेली जनजीवनमा प्रचलित नेपालीगाउँखाने कथाको ॥अध्ययन &amp;quot;त्रि.वि., वीरेन्द्रबहुमुखी क्याम्पस, चितवनमा प्रस्तुत नेपाली स्नातकोत्तरशोधपत्र, (अप्.) ।तिमिल्सिना, दामोदर, (२०५९) “बागलुङ जिल्लामा प्रचलित गाउँखानेकथाको अध्ययन” त्रि.वि.,केन्द्रीय ॥नेपाली विभागमा प्रस्तुत स्नातकोत्तर शोधपत्र, त्रि.वि., (अप्र.) ।थापा, धर्मराज, (२०१४), &#039;गाउँखाने कथा&#039; डाँफेचरी रुख ४, फूल ३शिशिर, पृ.३२-३३ ।थापा, धर्मराज र हंसपुरे सुवेदी, २०४१, नेपाली लोकसाहित्यको विवेचनाकाठमाडौँ : पाठ्यकम विकासकेन्द्र ।देवकोटा, रत्नाकर,२०५८, केन्द्रीय नेपाली भाषिकाका उखान र गाउँखानेकथा काठमाडौं : साफा प्रकाशन ।नेपाल यात्री, पूर्णप्रकाश, २०४१, भेरी लोकसाहित्य काठमाडौं : नेपालराजकीय प्ज्ञाप्रतिष्ठान ।न्यौपाने, दैवज्ञराज, (प्रकाशन वर्ष उल्लेख नभएको), गाउँखाने कविताचौथो संस्क., ललितपुर : साझा प्रकाशन ।पराजुली, कृष्णप्रसाद, २०५२, रमाइला नानी २ चौधौं संस्क., काठमाडौं :सौजन्य प्रकाशन ।$् , २०५८, नेपाली उखान र गाउँखाने कथा चौयो संस्क,काठमाडौँ : रत्न पुस्तक भण्डार ।&lt;br /&gt;
५० २०४७, नेपाली लोकगीतको आलोक काठमाडौँ : वीणाप्रकाशन ।&lt;br /&gt;
कर 7” हा. कपित सामिछने&lt;br /&gt;
० पौड्याल, शिवप्रसाद, (२०६१), नेपाली गाउँखाने कथा कोश गुल्मी :सुशील पौद्धयाल र श्रद्धा पौड्याल ।० ... ... ) (२०६४), “नेपाली उखानको अध्ययन” त्रि.वि., मानविकी तथासामाजिकशास्त्र सङ्कायमा प्रस्तुत विद्यावारिधि शोधप्रबन्ध (अप्र.) ।«प्रसाईं, भरतकुमार, २०५५, हाम्रा गाउँखाने कथा काठमाडौँ : भरतकुमारप्रसाई । .&lt;br /&gt;
०. प्रसाद, दिनेश्वर, सन्‌ १९७३, लोकसाहित्य और संस्कृति इलाहावबाद :लोकभारती प्रकाशन ।&lt;br /&gt;
० पाण्डे, हुमकान्त, २०५०, हुम्लाको लोकसाहित्य पोखरा : कृतिकार स्वयं ।&lt;br /&gt;
५ बन्धु, चूडामणि, २०५८, नेपाली लोकसाहित्य काठमाडौँ : एकता प्रकाशन ।&lt;br /&gt;
० ... ... ) सिन्‌ २००७), &#039;क्वान्टिटी एन्ड चेन्ज इन नेपाली रिडल्स&#039;न्डयन फौकलोर, कङ्गोसमा प्रस्तुत कार्यपत्र (अप्र,) ।&lt;br /&gt;
«५ बाउम्यान, रिचार्ड, (सन्‌ १९७७), भर्बल आर्ट एज परफरमेन्स, प्रोस्पेक्टहाइद्स : वेभल्यान्ड प्रेस ।&lt;br /&gt;
७ भट्ट, देवदत्त, (२०५५), “बैतडेली गाउँखाने कथाको अध्ययन” नेपालीस्नातकोत्तर शोधपत्र, त्रि.वि,&lt;br /&gt;
० कीर्तिपुर (अप्र.) ।&lt;br /&gt;
५ भण्डारी, ईश्वरीप्रसाद, (२०५७), &amp;quot;गुल्मी जिल्लामा प्रचलित गाउँखाने&#039;कथाको अध्ययन” नेपालीस्तातकोत्तर शोधपत्र, त्रि.वि., कीर्तिपुर (अप्र.) ।&lt;br /&gt;
० भाइसान, बासुदेव (२०५१), डोटेली कोश (लोकोक्ति खण्ड) कञ्चनपुर :लेखक स्वयम्‌ ।&lt;br /&gt;
० महत, झनबिन्द्र, (२०६०), “गुल्मी जिल्लाको पश्चिमोत्तर क्षेत्रका लोकगीतकोअध्ययन” नेपालीस्नातकोत्तर शोधपत्र, त्रि.वि., कीर्तिपुर (अप्र.) ।&lt;br /&gt;
- रिमाल, प्रदीप, २०५३, कर्णाली लोकसंस्कृति खण्ड १ दोस्रो संस्क., काठमाडौँ: साझा प्रकाशन ।&lt;br /&gt;
«. लामिछाने, कपिल, २०४६, “गाउँखाने कथामा अश्लीलताको पुट” जुही.पूर्णाङ्क ३२)पू. ५-१० ।&lt;br /&gt;
ब्ः हलको मा । २०५२/५३ ,&#039;काली बूढी सेती बूढी&#039; जनमत पूर्णाङ्क५१,वर्ष १३,अङ्क ५-६, पृ.डन्द ।&lt;br /&gt;
रमाइला गाउँखाने कथा 0000&lt;br /&gt;
॥।&lt;br /&gt;
त , २०६०, नेपली गाउँखाने कथामा औद्योगिक उत्पादनको&lt;br /&gt;
प्रविष्टि&#039; भावना वर्ष ७,&lt;br /&gt;
अङ्क २३६, पृ.उ-ड ।&lt;br /&gt;
वनबासी, देवीप्रसाद, २०५५, आँधीखौलै लोकसंस्कृति स्याङ्जा : चित्रलेखाप्रकाशन ।&lt;br /&gt;
शमशेर, पुष्कर, ।१९९८), नेपाली उखान र टुक्काको वर्णानुक्रमानुसारीसूची र वाक्यांश, वाक्पद्धति इत्यादिको कोश (खण्ड १ र २), काठमाडौं: लेखक स्वयम्‌ ।&lt;br /&gt;
शर्मा, मोहनराज र खगेन्द्रप्रसाद लुइँटेल, (२०६३), लोकवार्ताविज्ञान रलोकसाहित्य,&lt;br /&gt;
काठमाडौं : विद्यार्थी पुस्तक भण्डार ।&lt;br /&gt;
श्रेष्ठ, तेजप्रकाश, २०४४, अछामी लोकसाहित्य काठमाडौं : रत्न पुस्तकभण्डार ।&lt;br /&gt;
हुमागाईं, जनकप्रसाद, २०४६ &#039;हाम्रो बाललोकसाहित्य परम्परा&#039; बालसाहित्यअङ्क ४, पू.र४-२६ ।&lt;br /&gt;
छि।&lt;br /&gt;
र 2 डा कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
सगरमाथा पथ, डाँडागाउँ, रुपन्देही&lt;br /&gt;
प्रशम प्रकाशित कृति&lt;br /&gt;
कविता- कामना (२०३४) कल्याणी&lt;br /&gt;
कथा- मोहभङ्ग (२०४२) मिर्मिरे, पूर्णाङ्क ५३पुस्तक- मरुभूमिका पोग्राहरु (२०४४) कथासङ्ग्रह&lt;br /&gt;
प्रकाशित पुस्तकाकार कृति&lt;br /&gt;
बालकयासङ्ग्रह ८, बालउपन्यास ३, बाललोककथासञ्झुह १ बालतित्रकया २, कथासङ्ग्रह २,लघुकयासङ्ग्रह २, गाउँखाने कथा २, लामो कविता १, समालोचना २, पत्रकारिता(सहलेखन) १, व्याकरण र अभिव्यक्ति २ गरी दुई दर्जनभन्दा बढी ।&lt;br /&gt;
पदक तथा परस्कार तथा सम्मान&lt;br /&gt;
गीता प्रथमा रजत पढक (२०३७), महेन्त्र विद्याभषणा (२०४२), मकबुल अहमद लारी स्वर्णपदक (२०५०), न्र-गङ्गा बालसाहित्य प्रतिभा पुरस्कार (२०५३), शिक्षा पुरस्कार (२०५३),जमर्को उत्कृष्ट बालसाहित्य पुरस्कार (२०५९), दीपा-जनमत सम्मान (२०५९), तन्नेरीप्रतिभा सम्मान (२०६०), जुही हास्यव्यङ्ग्य सम्मान (२०६२), शान्तिका लागि राजदूत(२०६३), सकला सिद्धार्थ बाङ्मय पुरस्कार (२०६३), सिद्धार्थ साहित्य पुरस्कार (२०६४),अलि मियौं लोकवाङ्मय सम्मान (२०६६), जुही पूर्णाङ्क ६० विशेषाङ्क प्रकाशन (२०६६),झर्रो नेपाली रत्न (२०६६) । साथै, बुटवल कला-साहित्य-संस्कृति प्रतिष्ठान, स्ववियूझैरहवा बहुमुखी क्याम्पस, रुपन्देही क्याम्पस, नागार्जुन साहित्य प्रतिष्ठान, न्यू होराइजनउच्च माध्यमिक विद्यालय तया न्य्‌ होराइजन साहित्य समाज आदिबाट सम्मानित ।&lt;br /&gt;
संघसंस्शाप्रतिको संलग्नता&lt;br /&gt;
नेपाल बालसाहित्य समाज, दायित्व वाङ्मय प्रतिष्ठान, नैपाल लोकवार्ता समाज, सिद्धार्थसाहित्य परिषद्‌, सामुदायिक सेवा समाज, ुम्विनी बृद्धसंवा आश्म, वातावरण बचाउआन्दोलन, प्रगतिशील लेखक संघ, रुपन्देही शैक्षिक तथा सामाजिक प्रतिष्ठान, रुपन्देहीक्याम्पस, स्वर्गद्वारी घाट उपभोक्ता समिति, दौसरो जनआन्दौलन राहतकोष परिचालनसमिति र जुही, जनमत आदि पत्रिका ।&lt;br /&gt;
संस्थापकशुकदेव-सुकुमाया लामिछाने बालसाहित्य पुरस्कार ।&lt;br /&gt;
विवेक सिर्जनशील प्रकाशन प्रालि. ||| ॥|&lt;br /&gt;
अदतमार्ग फोन नं. 0१-३२१८०६३&lt;br /&gt;
[91 | 8093.&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%B9%E0%A5%80_%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%A4%E0%A4%A5%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A5%82_(%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%B9%E0%A5%80_%E0%A4%A8%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A5%82)&amp;diff=69</id>
		<title>केही धार्मिक तथा साँस्कृतिक सम्पदाहरू (केही नमुना कलाकृतिहरू)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%B9%E0%A5%80_%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%A4%E0%A4%A5%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%95_%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A5%82_(%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%B9%E0%A5%80_%E0%A4%A8%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A5%82)&amp;diff=69"/>
		<updated>2024-06-10T04:00:48Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: Created page with &amp;quot;ङ सन्दर्भसामग्रीबालबोघ - ३६ (केही नमुना कलाकृतिहरू)  ८ हिल सन्दर्भसामग्री 00 |.”काबालबोध - ३६ 000“. छ0 ०२ केही घार्मिक तथासाँस्कृतिकसम्पदाहरू (केही नमुना कलाकृतिहरू) श्री ५ को सरकारशिक्ष...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;ङ सन्दर्भसामग्रीबालबोघ - ३६&lt;br /&gt;
(केही नमुना कलाकृतिहरू)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
८ हिल सन्दर्भसामग्री 00 |.”काबालबोध - ३६ 000“. छ0 ०२&lt;br /&gt;
केही घार्मिक तथासाँस्कृतिकसम्पदाहरू&lt;br /&gt;
(केही नमुना कलाकृतिहरू)&lt;br /&gt;
श्री ५ को सरकारशिक्षा तथा खेलकूद मन्त्रालयपाठ्यक्रम बिकास केन्द्र&lt;br /&gt;
्न्कि ५ को सरकारशिक्षा तथा खेलकद मन्त्रालयपाठ्यक्रम विकास केन्द्रसानोठिमी, भक्तपुर&lt;br /&gt;
प्रकाशक :&lt;br /&gt;
लेखन : सत्यमोहन जोशीचित्राइन : राजुवाबु शाक्यआवरणविन्यास : गौतम मानन्धर&lt;br /&gt;
सामग्री विकास संयोजन : हर्कप्रसाद श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
सर्वाधिकार प्रकाशकमा सुरक्षित&lt;br /&gt;
पहिलो संस्करण : २०५९ सालछपाइ प्रति : २८,०००मुद्रण : एपोलो अफसेट प्रेस, काठमाडौँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उँ&lt;br /&gt;
पाठ्यक्रम विकास केन्द्रले शिक्षाको गुणस्तर वृद्धिका लागि चलाएका विविध कार्यक्रममध्ये बालसन्दर्भसामग्रीको प्रकाशन पनि एक हो । पाठ्यपुस्तकबाट प्राप्त हुन नसकेका पाठयक्रमकाउद्देश्यलाई प्राप्त गरी आफ्नी ज्ञान, सीप वा अभिवृत्तिको विकास गर्न प्राथमिक तहकाविद्यार्थीहरू सक्षम होउन्‌ र अन्तत: व्यक्तिमा अन्तर्निहित प्रतिभाको प्रस्फुटन भइ सिर्जनशीलनागरिकको विकास हुन सकोस्‌ भन्ने यस कार्यक्रमको मूल उद्देश्य रहेको छ।&lt;br /&gt;
प्राथमिक तहका केटाकेटीका लागि जिज्ञासा पैदा गर्ने, रुचि बढाउने र चाख मानीमानी पढेरप्रेरणा लिने प्रकारको सामग्रीको खाँचोलाई पूरा गराउन पनि यो प्रकाशन-माला चलाइएकोहो । यसले पूरक पाठ्यपुस्तकको काम पनि गरोस्‌, मनोरञ्जन पनि देओस्‌, पठन प्रवृत्ति पनिबढाओस्‌ भन्ने प्रयोजन पूरा गराउने वस्तु, भाषा-शैली र प्रस्तुतिको छनोट गर्न खोजिएको छ,जसले पढ्ने चलाई बढाई विद्यार्थीहरूलाई विद्याव्यसनी बनाउन सकोस्‌ र हरेक क्षण रकामलाई शिक्षापरक ढङ्गमा हेर्ने वानी बसालोस्‌, अनि हाम्रा भोलिका नागरिक सभ्य, शिष्टर अनुशासित बनून्‌, त्यसो भएमा नै आजका प्रयत्नहरूको सार्थकता पनि रहन्छ ।&lt;br /&gt;
यसअघि विगतका वर्षहरूमा विभिन्न अद्ठाईस शीर्षकका सामग्री प्रकाशित भइसकेका छन्‌ ।यस वर्षका दस शीर्षक समेत अरव तीन दर्जन भन्दा वढी शीर्षकमा साग्रीको प्रकाशन भएकोछ। सामग्रीमा सामान्यतया कथा, कविता, जीवनी जस्ता विधाको समावेश भए पनि विविधताकालागि प्रशस्त प्रयत्न गरिएको छ र यसलाई अरू विविधतायुक्त बनाउने प्रयास पनि भइरहेकोछ।&lt;br /&gt;
हाम्रो यस प्रयासमा सामग्रीको लेखन /सम्पादन गरेर, चित्र बनाएर, सल्लाह दिएर वा अन्यप्रकारले सहयोग गर्ने सम्पूर्ण महानुभावहरूप्रति पाठ्यक्रम विकास केन्द्र हार्दिक कृतज्ञता प्रकटगर्दछ र हाम्रो यस कार्यलाई फलदायी र गुणस्तरीय पार्न यसका पाठक, लेखक तथा शिक्षक,अभिभावक, समस्त बुद्धिजीवी र शिक्षाविद्वाट सल्लाह र सुझावको अपेक्षा सदाभैँ राखेकोकुरा विनम्रतापूर्वक ज्ञापित गर्दछौँ ।&lt;br /&gt;
शिवप्रसाद सत्यालमहानिर्देशकपाठयक्रम विकास केन्द्र२०५९ सानोठिमी,भक्तपुर&lt;br /&gt;
जी&lt;br /&gt;
१. तलेजुको गगनचुम्बी देवल १२. पाटनको कृष्ण मन्दिर ॥ 1३. हिरण्यवर्ण महाविहार ७४. विष्णृविक्रान्तको अनुपम मूर्ति १०&lt;br /&gt;
भू. अशोक सतम्भ&lt;br /&gt;
६. श्वेत चैत्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तलेजुको लाला | देवल&lt;br /&gt;
नेपाल मण्डल (अहिलेकोकाठमाडौँ उपत्यका) &#039;माशासन गर्ने उहिलेका मल्लराजाहरू तलेजु भवानीलाईइृष्टदेवीको रूपमा खूबमान्थे । त्यसबेला तलेजुभवानीको मूलथलो भक्तपुरमाथियो । काठमाडौँमा तलेजुभवानीको देवल कसरी बन्योभन्ने सम्बन्धमा एउटा&lt;br /&gt;
कथा नै छ।&lt;br /&gt;
कान्तिपुरमा बस्ने राजामहेन्द्रमल्ल तलेजु भवानीकोदर्शन गर्न दिनहुँ भक्तपुरजाने गर्थे । एकदिन राजालाईसपनामा तलेजु भवानीलेभनिछन्‌, “हे राजा, तिमीले मेरो सेवा गरेको देखेर म अति प्रसन्न भएँ ।अब तिमीले धेरै दु:ख गरेर मकहाँ धाइरहन्नु पर्दैन । तिमीले आफू बसेकैकान्तिपुर (काठमाडौँ) नगरमा मेरो लागि एउटा देवल बनाउन लाउनू ।बरु त्यो नयाँ बन्ने देवल गगनचुम्बी होस्‌ । त्यहाँबाट भक्तपुर छर्लङ्गदेखिने होस्‌ ।”&lt;br /&gt;
केही धार्मिक तथा साँस्कृतिक सम्पदाहरू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सपनामा वाणी भएबमोजिम राजा महेन्द्र मल्लले मखन टोलमा तारिणीदेवीकोहोचो मन्दिरनेर तलेजु भवानीको विशाल मन्दिर बनाउन सुरु गरे । आफूनजिकैगगनचुम्बी देवल टन्न लागेको तारिणीदेवीले सहन सकिनन्‌ रे । ती देवीलेतलेजु भवानीको बन्दै गरेको देवल रातीराती भत्काइदिने गर्न लागिन्‌ ।देवलको यस्तो दुर्दशा हुने गरेको देखेर राजा र देवल बनाउने कालिगड रज्यामीहरू छक्क परे ।&lt;br /&gt;
हि 2 मनमाया विजय लमयममिममडमितागाटायाटी आतिनिनियििलिमिमििर कित धारका पात तिनका&lt;br /&gt;
पछि तारिणीदेवी रिसाउनका कारण राजाले थाहा पाए । उनले ती देवीकोहोचो मन्दिरमा २१ ओटा सुनका गजुरहरू चढाए । तारिणीदेवीको रिसशान्त भयो । त्यसपछि इ.स.१५४९ मा तलेजु भवानीको गगनचुम्बी मन्दिरतयार भयो । यस्तो अद्वितीय मन्दिर देखेपछि सबैजना हर्षले गद्गद्‌ भए ।राजाले आफ्नो नाममा वनेको चाँदीको रुपयाँ तलेजु भवानीलाई चढाए ।त्यस चाँदीको मुद्रामा &#039;काष्ठमण्डपस्याधिपति श्रीश्ीश्वी महेन्द्रमल्ल देवस्य&#039;भन्ने अभिलेख थियो ।&lt;br /&gt;
आज काठमाडौँ उपत्यकामा तलेजु भवानीको यो गगनचुम्बी देवल नेपालीवास्तुकलाको अद्वितीय नमुना भएर उभिएकै छ । नेपालको राष्ट्रिय सम्पदामायस देवलको सर्वोपरि स्थान छ । दसैँको महानवमीको दिन वर्षको एक पटकयो मन्दिर सबै जनाका लागि खुल्छ ।&lt;br /&gt;
धन्य हुन्‌, यस्तो गगनचुम्बी विशालकाय देवल बनाउन जान्ने हाम्रा तीअज्ञात कलाकार र कालिगडहरू !&lt;br /&gt;
केही धार्मिक तथा सकृतिकतम्ाहरू 0000&amp;quot;. ३&lt;br /&gt;
।&lt;br /&gt;
पाटनको कृष्णमन्दिर&lt;br /&gt;
ललितपुर सहरमा एउटा गजबको मन्दिर छ । यो मन्दिर ढुङ्गै कबनेको छ । यो श्रीकृष्ण भगवानको मन्दिर हो । यो मन्दिर मल्ल राजासिद्धिनरसिंहले बनाएका हुन्‌ । उनी धर्मात्मा राजा थिए ।&lt;br /&gt;
एकचोटि राजाले सपनामा भगवान्‌ श्रीकृष्णले बाँसुरी बजाइरहेको देखे ।सपनामा राजालाई भगवान्‌ श्रीकृष्णले भनेछन्‌, “हेर राजा, तिमी निकैधर्मात्मा रहेछौ । तिमीले मेरा लागि एउटा सुन्दर मन्दिर बनाइदिनू । मत्यसै मन्दिरमा बस्नेछु ।”&lt;br /&gt;
त्यसपछि राजा सिद्धिनरसिंहमल्लले आफ्नो दरवारकोनजिकै ढुङगै ढुङ्गाकोएउटा सुन्दर मन्दिरबनाउन लगाए । यो मन्दिरइ.स.१६३७ मा बनेको&lt;br /&gt;
हो । यो मन्दिर बनाउनसात वर्ष लागेको थियो ।त्यस ढुङ्गाको मन्दिरमा२१ ओटा सुनका गजूर छन्‌ ।मन्दिरको तल्लो तलाकोभित्तामा रामायण रमाथिल्लो तलाको भित्तामा&lt;br /&gt;
॥ 0&lt;br /&gt;
केही धार्मिक तथा साँस्कृतिक सम्पदाहरू&lt;br /&gt;
महाभारतका सम्पूर्ण लीला मूर्ति-चित्रको रूपमा कुँदिएका छन्‌ । मन्दिरकोदोस्रो तलाको मध्यभागमा भगवान्‌ श्रीकृष्णको प्रस्तर मूर्ति स्थापना गरिएकोछ । बाहिरी भागमा चारैतिर भगवान्‌ विष्णुका दस अवतारका सुन्दरमूर्तिहरू - मत्स्य, कर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, बलराम(कृष्णको ठाउँमा) बुद्ध र कल्की पनि सजाइएका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
केही धार्मिक तथा साँस्कृतिक सम्पदाहरू ररर र&lt;br /&gt;
हँ सामुन्ने चारपाटे ढुङ्गाको एउटा अग्लो खम्वा छ । त्यस खम्बाकोटुप्पोमा गरुडको ठूलो मूर्ति छ । पंक्षिराज कहलिने गरुड भगवान्‌श्रीकृष्णको अति प्यारो वाहन हो ।&lt;br /&gt;
भगवान्‌ श्रीकृष्णको यो अति सुन्दर मन्दिर बनाउन लगाउने राजासिद्धिनरसिंह मल्ल परलोक भइसकेको पनि आज ३५० वर्ष नाघिसक्यो । तरती राजाले आफ्नो सपना बमोजिम बनाएर छोडेको भगवान्‌ श्रीकृष्णको योअनौठो मन्दिर भने ललितपुरको मङगलवजारमा जस्ताको तस्तै छ ।&lt;br /&gt;
प्रत्येक वर्ष भदौ महिनामा कृष्णजन्माष्टमीका दिन पाटनमा भगवान्‌ श्रीकृष्णकोयस मन्दिरमा ठूलो मेला लाग्दछ । पूजाआजा र जात्रा हुन्छ । त्यस अवसरमाभगवान्‌ श्रीकृष्णको पूजा अर्चना र दर्शनका लागि हाम्रा राजारानीहरूकोपनि सवारी हुने परम्परा छ । असङ्ख्य भक्तजनहरू मन्दिरका पेटी रसेरोफेरोमा जम्मा हुन्छन्‌ । पूजाआजा गरी तेलवत्ती वाल्छन्‌ । भजन कीर्तनगर्छन्‌ र नाच्छन्‌ पनि ।&lt;br /&gt;
।शिखर शैलीमा बनिएको भगवान्‌ श्रीकृष्णको यो मन्दिर नेपाली प्रस्तरकलाको एउटा बेजोड नमुना भएको छ । अब त यो मन्दिर नेपालको मात्रराष्ट्रिय सम्पदा नभएर विश्वकै सम्पदा सूचीमा दर्ता भइसकेको छ। विश्वकाअनेक मुलुकहरूबाट पाटन घुम्न आउने पर्यटकहरू यो कृष्ण मन्दिरदेखेपछि मन्त्रमुग्ध हुन्छन्‌ । यसैले यो मन्दिर विश्वप्रसिद्ध छ ।&lt;br /&gt;
बु क.............””नलालनननााममनमिजििजिजिजिजजिजजिजजििजिजिलललिललिलिललिलिललिििलिििििििी केही आार्मिक तथा साँस्कृतिक सम्पदाहरू&lt;br /&gt;
हिरण्यवर्ण महाविहार&lt;br /&gt;
काठमाडौँ उपत्यकामा धेरै मन्दिर, चैत्य र विहारहरू छन्‌ । ललितपुरमाएउटा प्रसिद्ध विहार छ । यस विहारको नाम हिरण्यवर्ण महाविहार हो। योविहार राजा भास्कर वर्माले बनाएका हुन्‌ । यो विहार बन्नुपछाडिको कथायस्तो छ -&lt;br /&gt;
एकचोटि राजा भास्कर वर्मालाई सपनामा शाक्यमुनि वबुद्धबाट यस्तो आज्ञाभएछ, “हे राजा, तिमीले मेरा लागि न्हुवाहा: (नयाँ विहार) त बनाउनलगायौ तर मलाई यहाँ बस्त कति पनि मन छैन । यो ठाउँ पूजा गर्न आउनेभक्तहरूका लागि पायक परेन । त्यसैले मेरो निमित्त यस्तो ठाउँ पत्तालगाउन्‌ू जहाँ मूसाहरू देखेर बिरालाहरू भागाभाग गर्छन्‌ ।”&lt;br /&gt;
यस्तो अनौठो सपना देखेपछि राजा ज्यादै चिन्तित भए । उनले ततुरुन्तैज्योतिषीहरूसँग सल्लाह गरे । अनि मूसाहरू देखेर विरालाहरू कुलेलामठोक्ने ठाउँको खोजीमा आफ्ना मानिसहरू पठाए ।&lt;br /&gt;
संयोगवश एकदिन न्हबाहा:को सेरोफेरोमा क्काय भन्ने ठाउँमा विरालोलाईलखेटने मूसाको खोजीमा लागेका मानिसहरूले सुनौलो शरीर र हीराभैँटल्कने आँखा भएको एउटा विचित्रको मूसाले नभन्दै एउटा ढाडे विरालोलाईलखेटिरहेको देखेछन्‌ ।&lt;br /&gt;
खेरकेही धार्मिक तथा सांस्कृतिक सम्पदाहरू&lt;br /&gt;
ति ॥ 12 |&lt;br /&gt;
यो कुरो राजा भास्कर वर्माले थाहा पाएर उनी अत्यन्त हर्षित भए । उनीआफैँ पनि त्यस ठाउँमा गए । सुनौलो मुसोले ढाडे बिरालोलाई लखेटददैगरेको अद्भूतको दृश्य पनि हेरे । उनले त्यस ठाउँमा एउटा राम्रो विहारबनाउन लगाए । त्यहीँ शाक्यमुनि बुद्धको मूर्ति पनि स्थापना गरिदिए ।&lt;br /&gt;
केही धार्मिक तथा साँस्कृतिक सम्पदाहरू&lt;br /&gt;
0&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राजा भास्कर वर्माको पालामा बनेको त्यो विहार आज पनि ललितपुरक्कायमा विद्यमान. छ । यो विहार “भास्कर वर्मा संस्कारित हिरण्यवर्णमहाविहार&#039; नामले प्रसिद्ध छ । स्थानीय मानिसहरू आफ्ना मातृभाषामा यसविहारलाई &#039;काक:बाहा:&#039; भन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
संस्कृत भाषामा हिरण्य&#039; को अर्थ &#039;सुन&#039; हुन्छ । अनि &#039;हिरण्यवर्ण महाविहार&#039;भन्नाले सुनौलो रूप भएको ठूलो विहार भन्ने अर्थ आउँछ । यस विहारकोसम्बन्ध सुनौलो रूप भएको मुसासँग भएकोले यस बिहारलाई सुनौलोपारिराखेको पाइन्छ । यसैले यस महाविहारलाई (दि गोल्डेन टेम्पल&#039; पनिभन्छन्‌ । आज पनि यस महाविहारमा भगवान्‌ बुद्ध स्थापना गरिराखेकोकुटागारमा सयौँ सानाठूला मूसाहरू कसैको डरनमानी उफ्रिरहेका .रडुलिरहेका देखिन्छन्‌ । यहाँको मूसाहरूलाई समाउन र मार्न निषेधगरिराखेको छ । यो हिरण्यवर्ण महाविहारको सौन्दर्य अचम्मको छ ।&lt;br /&gt;
केही धार्मिक तथा सांस्कृतिक सम्पदाहरू&lt;br /&gt;
नेपालका पुराना राजाहरू कलाप्रेमी थिए । उनीहरू आफ्ना शासनकालमामठ, मन्दिर, चैत्य र विभिन्न मूर्तिहरू बनाउन लगाउँदै । त्यतिबेला बनेकाअति राम्रा मूर्तिमध्ये लाजिम्पाटको विष्णुविक्रान्तको मूर्ति पनि एक हो ।नेपाली कलाको इतिहासमा यस मूर्तिलाई एक अनुपम मूर्तिका रूपमालिइन्छ । यस मूर्तिका बारेमा पढौँ, है त ।&lt;br /&gt;
आजभन्दा पन्ध्रसय वर्षअघि हाम्रो देश नेपालमा धर्मदेव नाम गरेका एकजनाराजा थिए । असल स्वभाव र राम्रो विचारका राजा भएकाले सबैजना उनलाईमाया र आदर गर्थे । तर के गर्नु र, कालको ओखती छैन । एकदिन यीराजाको मृत्यु हुनेगयो । यिनकी महारानी राज्यवती विधवा भइन्‌ । उनलाई&lt;br /&gt;
पति वियोगबाट ठूलो चोट पप्यो ।१०&lt;br /&gt;
केही धार्मिक तथा साँस्कृतिक सम्पदाहरू&lt;br /&gt;
बाबुको मृत्युपछि राजा भएका मानदेवले आफ्नी आमा राज्यवतीको विरहीमनलाई शान्त पार्न राजपत्तन (आजको लाजिम्पाट) मा एउटा विशालमन्दिर बनाउन लगाए । मन्दिर बनेपछि राजाले त्यस नयाँ मन्दिरमाविष्णुविक्रान्त (भगवान्‌ विष्णुको पाँचौ अवतार वामन) को अनुपम प्रस्तरमूर्ति स्थापना गरिदिए । भव्य मन्दिर र विष्णुविक्रान्त भगवान्‌ वामनकोसुन्दर कलात्मक मूर्ति देखेपछि मुमा महारानी राज्यवतीको विरही मनशान्त हुँदै गयो ।&lt;br /&gt;
विष्णुविक्रान्तको त्यस मूर्तिसँग एउटा रोचक कथा गाँसिएको छ । धेरै पहिलेबली नाम गरेका वीर राजा थिए । एकपटक बलीले अश्वमेघ यज्ञ गर्नलागेका थिए । उनको यो वीरता थाहा पाएपछि, स्वर्गका राजा इन्द्र खुबडराए । आफ्नो सुरक्षाका लागि उनी भगवान्‌ विष्णुको शरणमा पुगे ।भगवान्‌ विष्णुबाट आज्ञा भयो, “हे देवराज इन्द्र, तपाईं नडराउनुस्‌ । राजाबलिको अश्वमेघ यञज्ञलाई म विध्वंश पार्नेछ ।” त्यसपछि भगवान्‌ विष्णूलेवामनको अवतार लिई चमत्कार देखाउन लाग्नुभयो ।&lt;br /&gt;
भगवान्‌ विष्णु एकजना बामपुडके (वामन) को भेषमा राजा बलिले अश्वमेघयज्ञ गर्न लागेका ठाउँमा आइपुगे । उनले दानी राजा बलिसँग पठनपाठनकालागि आश्रम बनाउन जम्मा तीन पाद भूमि (तीन पाइलाले टेक्दा हुनेजमिन) मागे । अनि राजा बलिले छक्क पर्दै भने, “यो बामपुडके वटुकलेकेके न माग्ला भनेर विचार गरेको त यसले तीन पाइला भूमि पो मागेछ !”त्यसपछि राजा बलिले &#039;“तथास्तु&#039; भने । तथास्तु भनेको हुन्छ दिएँभनेको हो ।&lt;br /&gt;
केही धार्मिक तथा साँक्तिक सम्पदाहरू”? 0”??? &amp;quot;११&lt;br /&gt;
वकिल&lt;br /&gt;
त्यस मूर्तिमा वामनको रूप धारण गरेको भगवान्‌ विष्णुको विक्रान्त रूपदेखाइएको छ । विष्णुले आफ्नो पहिलो पाउले सम्पूर्ण आकाश, दोस्रो पाउलेसम्पूर्ण पृथ्वी ढाकेपछि, तेस्रो पाउले दानी राजा बलिलाई नै पाताल पुग्याउनखोजेको दृश्य छ । तर राजा बलि आफूले दान पुण्य गर्दा उल्टो सजाय भोग्नुपरेता पनि कति विचलित नभएको दृश्य पनि त्यसमा देखाइएको छ । बरुउनले आफू पातालमा मात्र जानु परेपछि, भगवान्‌ विष्णुलाई पनि उतैपातालमा लाने विचार गरे । यसैले उनले विक्रान्तरूपी भगवान्‌ विष्णुकोपाउ बेसरी अव्याएर तान्न लागेको दृश्य पनि त्यहाँ देखाइएको छ ।&lt;br /&gt;
त्यस अनौठो ढुङ्गाको मूर्तिमा दानी राजा बलिलाई पातालमा नै पुग्याएको दृश्यत छैन तर त्यस मूर्तिसँग जोडिएको कथाअनुसार पातालमा पुगेका राजाबलिले विष्णुविक्रान्त भगवानूलाई पनि तानेर पातालमा नै पुन्याएका थिए ।&lt;br /&gt;
१२ केही धार्मिक तथा साँस्कृतिक सम्पदाहरू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
02 राजा बलिको पञ्जाबाट उम्किनका लागि वामन अवतार भगवान्‌विष्णुले उनीसँग सत्य वाचा गर्दै भन्नुभयो, “हे दानी राजा बलि, तिम्रो दान&lt;br /&gt;
पुण्यदेखि म अत्यन्त प्रभावित भएँ । म तिम्रो पातालको दरबारमा चारमहिनाका लागि रखवारी गर्न बस्न आउनेछु । अब मलाई तिमीले मुक्तगरिदेक ।”&lt;br /&gt;
त्यसपछि दानी राजा बलिले वामन भगवान्‌ रूपी विष्णुलाई प्रणाम गरेरनिवेदन गरे, “हे भगवान्‌, मैले हजुरको दर्शन पाएँ । म कृतार्थ भएँ ।”&lt;br /&gt;
त्यस बेलादेखि प्रत्येक वर्ष आषाढ शुल्कपक्ष एकादशीका दिन भगवान्‌ विष्णुविष्णुलोकबाट पातालमा गई राजा बलिको दरबारमा रखवारी गर्नपुग्छन्‌ । सो दिनको एकादशीलाई &#039;हरिशयनी एकादशी&#039; (भगवान्‌ विष्णुनिदाउने) भनिएको हो । र, पातालमा चार महिनासम्मको रखवारी कामसमाप्त भएपछि कार्तिक शुल्क पक्ष एकादशीको दिन भगवान्‌ विष्णु पातालबाटफेरि आफ्नै धाम विष्णुलोकमा फर्कने क्रम सुरु हुन्छ । यस दिनको एकादशीलाई“&#039;हरिबोधिनी एकादशी&#039; (भगवान्‌ विष्णु जागा हुने ) भन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
आज काठमाडौँको राजपतन (लाजिम्पाटको धोवीचौरमा रहेको ढिस्कोमा)राजा मानदेवले आफ्नी आमा राज्यवतीका लागि बनाउन लगाएको त्योविशाल भव्य मन्दिर धराशायी भइसकेको छ । हुनसक्छ, क्नैबेला आएकोमहाभूकम्पबाट त्यो मन्दिर नष्ट हुन पुग्यो होला । तर प्रस्तर (ढुङ्गा) कोत्यो अद्वितीय सुन्दर मूर्ति (विष्णुविक्रान्त वामनको) भने नाश हुन पाएन ।आजभोलि यो मूर्ति राष्ट्रिय सङग्रहालय, छाउनीमा राखिएको छ ।&lt;br /&gt;
पादपीठमा तिथिमिति र अभिलेख समेत भएको भगवान्‌ विष्णुविक्रान्तको योमूर्ति ज्यादै हेर्नलायक छ ।&lt;br /&gt;
केही धार्मिक तथा साँस्कृतिक सम्पदाहरू&lt;br /&gt;
१३&lt;br /&gt;
अशोक स्तम्भ&lt;br /&gt;
हाम्रो देश नेपालमा थुप्रैमहान्‌ व्यक्तिहरू जन्मेकाछन्‌ । विश्वमा शान्तिकोसन्देश फैलाउने महामानवगौतम बुद्ध हाम्रै देशमाजन्मेका थिए । उनीपश्चिमाञ्चल नेपालकोलुम्बिनीमा जन्मेका हुन्‌ ।आज युनेस्को (राष्ट्रसङ्घकोशैक्षिक, वैज्ञानिक रसाँस्कृतिक सङ्घ) लेगौतम बुद्धको जन्मथलोलुम्बिनी क्षेत्रलाई विश्वकैमानवमात्रको साझासम्पदाको रूपमा विश्वसम्पदा सूचीमा दर्ता गरेको छ । यसै लुम्बिनीमाएउटा अद्वितीय सम्पदा छ। यस सम्पदाको नाम हो - “अशोक स्तम्भ&#039; ।&lt;br /&gt;
आजभन्दा बाइससय वर्षअघि मगध देशका नरेश अशोक यही लुम्बिनीक्षेत्रमा तीर्थयात्रा गर्न आएका थिए । उनी भगवान्‌ बुद्धका अनुयायी थिए ।उनैले यहाँ गौतम बुद्ध जन्मेको ठाउँ पहिल्याएर सम्झनाको रूपमा एउटाशिलास्तम्भ स्थापना गर्न लगाए । यसैलाई नै अशोक स्तम्भ भनिएको हो ।&lt;br /&gt;
१४ 0000 लपभननमनकिननििडिनिटिटिलिलिलिलिलितलकिनितालिलाततकलल केही धार्मिक तथा साँस्कृतिक सम्पदाहरू&lt;br /&gt;
|  _.... तलामा&lt;br /&gt;
एउटा सिङ्गो ढुङ्गोबाट बनेको यो अशोक स्तम्भको कूल उचाइ ३० फुट१० इञ्च छ। यस मध्येको १३ फुट ६ इञ्च भाग जमिनमुनि छ । यसकोआकार गोलो परेको छ । यसको माथिल्लो भागमा चमकदार पालिस छ ।यसैले यो स्तम्भ ज्यादै शालीन र सुन्दर छ।&lt;br /&gt;
अशोक स्तम्भमा एउटा ज्यादै उल्लेखनीय अभिलेख छ । प्राचीन समयकोब्राह्मी लिपिले पाली भाषामा कुँदिएको त्यस अभिलेखमा एक ठाउँमा भनिएकाछ - “शाक्यमुनि गौतम बुद्ध जन्मेको ठाउँ यही हो ।”&lt;br /&gt;
नेपालका विभिन्न भेकमा यत्रतत्र छरिएर रहेका सम्पदाहरूको महत्त्वलाईबुझी हामीहरूले तिनीहरूको सधैँ संरक्षण गरिराख्नु पर्छ ।&lt;br /&gt;
केही धार्मिक तथा साँस्कृतिक सम्पदाहरू&lt;br /&gt;
१५&lt;br /&gt;
। श्वेत चैत्य&lt;br /&gt;
नेपाली कलाकारले नेपालमामात्र नभएर देश विदेशमा पनिआफ्नो सीप देखाएका छन्‌ ।चीनको प्रख्यात श्वेत चैत्ययसको उदाहरण हो ।आजभन्दा सातसय वर्षअघिचीनमा युआनवंशी सम्राटकाएकजना धर्मगुरु थिए । उनकोनाम &#039;“पागसपा&#039; थियो ।&lt;br /&gt;
पागसपा हाम्रै देशको सीमाना जोडिएको तिब्बतको शाक्य गुम्बामा बस्थे ।यिनैले नेपालका सिपालु कालिगडहरूलाई बोलाएर शाक्य गुम्बामा बौद्धकलाकृतिहरू निमार्ण गर्ने काममा लगाएका थिए । पछि ती कालिगडहरूकानाइकेलाई पागसपाले सम्राट कुबलाह खानका दरबारमा लगेर परिचयगराएका थिए । ती नाइकेको नाम ,अरनिको थियो । सम्राटले अरनिकोलाईआफ्नो राजधानी तातू (वर्तमान पेकिङ वा चैचिङ) मा नेपाली शैलीको&lt;br /&gt;
एउटा विशाल बौद्ध स्तूप बनाएर देखाक भने ।&lt;br /&gt;
पेकिङ महानगरको फूछमन मार्गमा नेपाली कालिगडहरूको नाइकेले बनाएकोत्यो विशाल गगनचुम्बी चैत्य आज पनि त्यहाँ शोभायमान भएर उभिएकै छ ।त्यस चैत्यको रङ सेतो भएको हुनाले त्यसको नाम नैं चिनियाँ भाषामा“पाइथा&#039; रहेको छ । पाइथाको अर्थ हो - सेतो चैत्य बा श्वेत चैत्य । चैत्य ।&lt;br /&gt;
१६ त म सिटि वर विवि विकि केही धार्मिक तथा साँस्कृतिक सम्पदाहरू&lt;br /&gt;
रु?&lt;br /&gt;
बनाउने नेपाली कालिगडहरूका नाइकेलाई चिनियाँहरू &#039;आनिक&#039; भनेरसम्बोधन गर्थे । आज त्यही आनिक&#039; भन्ने नाम &#039;कलाकार अरनिको&#039;नामबाट प्रसिद्ध भएको छ।&lt;br /&gt;
कलाकार अरनिकोले बनाएको त्यो श्वेत चैत्यको उचाइ ५० मिटर छ।त्यसको शिरोभागमा रहेको ठूलो गोलाकार छत्रको व्यास १० मिटर छ।छत्रका वरिपरि चारैतिर घण्टाहरू छन्‌ । छत्रदेखि माथिल्लो भागमा सुनकोकलश आकारको गजूर छ । कलाकार अरनिकोले त्यो श्वेत चैत्य बनाउनपूरा आठ वर्ष (सन्‌ १२७१ देखि १२७९) लगाएका थिए ।&lt;br /&gt;
त्यस श्वेत चैत्यको बारेमा&#039;हाइलान&#039; नाम गरेका एकजनाचिनियाँ विद्वानले &#039;:अरनिकोकोस्थापत्यकलासम्बन्धी नासो&#039;भन्ने लेख लेखेका छन्‌ । लेखमाउनले भनेका छन्‌ -“सात सयवर्षअघि अरनिको नाम गरेकाएकजना नेपाली युवक कालिगडहिमाल-पहाड चढी चीनकापीतनदी पार गरेर पेकिङआएका थिए । युआनवंशीसम्राटहरूका निमित्त उनीआत्मसमर्पित भएर काममा लागेर चीनमा नै उनको देहावसान&lt;br /&gt;
भयो ।” दईकेही धार्मिक तथा साँस्कृतिक सम्पदाहरू&lt;br /&gt;
१७&lt;br /&gt;
हुन त नेपाली कलाकार अरनिकोले देखेको पेकिङ र आजको पेकिङबीचधेरै फरक भइसकेको छ । तर पेकिङ महानगरको पश्चिमपट्टिको जिल्लामाउनले बनाएको श्वेत चैत्यको त्यो दृश्य भने आज पनि जस्ताको तस्तै छ ।&lt;br /&gt;
सन्‌ १९८० मा श्वेतचैत्यको पूर्ण जीर्णोद्धार गरिएको छ । अहिले त्यो श्वेतचैत्य निरीक्षण गर्न पर्यटकहरूका लागि पनि खुला गरिएको छ । चीनसरकारको राज्य परिषद्ले श्वेत चैत्यलाई अमूल्य ऐतिहासिक तथा साँस्कृतिकसम्पदाको रूपमा संरक्षण प्रदान गरेको छ ।&lt;br /&gt;
आजभन्दा ७०० वर्षअघि नेपाली कलाकार अरनिकोले बनाएको त्योबिशालकाय श्वेतचैत्य र त्यससँग जोडिएको बौद्ध महाविहार चिनियाँ रनेपाली जनताका बीचमा परम्परागत रूपमा रहिआएको मित्रता र साँस्कृतिकसम्बन्धको एउटा अनुपम प्रतीकका रूपमा युगौँसम्म रहिरहने छ ।चीनको महानगरी पेकिङमा श्वेतचैत्य बनाएर नेपालको नाम र गौरवफैलाएर जाने कलाकार अरनिकोलाई श्री ९ को सरकारले मरणोपरान्त“राष्ट्रिय विभूति&amp;quot; को उपाधिद्वारा विभूषित गरेको छ । यस्ता अमरकलाकारहरूलाई हामीले सधैँ सम्भिराख्नु पर्छ ।&lt;br /&gt;
वि न माकारयालमास्पितरपनिकनकनककककोरू तर्व रासन मज सतार&lt;br /&gt;
केही कठिन शब्द र तिनका अर्थ&lt;br /&gt;
अग्रदूत - कुनै पनि कुरामा सबभन्दा अघि बढेको व्यक्तिअर्चना - पूजा&lt;br /&gt;
अज्ञात - थाहा नभएको&lt;br /&gt;
अद्भुत - अनौठाको, उदेक लाग्दो&lt;br /&gt;
अद्वितीय - तुलना गर्ने अर्को व्यक्त नभएको, बेजोडअनुपम - उपमा नभएको&lt;br /&gt;
अनुयायी - समर्थक, भक्त&lt;br /&gt;
अभिलेख - पुरानो लेख&lt;br /&gt;
आकाशवाणी - आकाशबाट बोलिने बोली, देववाणीआत्मसमर्पित - आत्मैदेखि लागेका&lt;br /&gt;
इष्ट - आफूलाई मनपर्ने, प्रिय&lt;br /&gt;
उपाधि - पदवी, पद&lt;br /&gt;
ओजस्वी - प्रभावशाली, खाइलाग्दो&lt;br /&gt;
कृतार्थ - काम सिद्ध हुनाले खुसी भएको&lt;br /&gt;
गगनचुम्बी - धेरै अग्लो, आकाशको माथिमाथि पुगेकाचमत्कार - अचम्म, आश्चर्य&lt;br /&gt;
चैत्य - बौद्ध धर्मको स्तुप&lt;br /&gt;
जीर्णोद्धार - सजसाज गर्ने काम&lt;br /&gt;
दानी - धेरै दान गर्ने, दाता&lt;br /&gt;
दुर्दशा - आपत्‌विपत्‌&lt;br /&gt;
धराशायी - जमिनमा लडेको, ढुङ्गोमाटोमा मिलेकोनिरीक्षण - हेर्ने काम&lt;br /&gt;
निर्माण - बनाउने काम&lt;br /&gt;
निषेध - मनाही, रोक लगाउने काम&lt;br /&gt;
परलोक - मरेपछि पुगिने ठाउँ, स्वर्ग&lt;br /&gt;
परिचय - चिनजान&lt;br /&gt;
पर्यटक - घुमफिर गर्ने मानिस&lt;br /&gt;
पाताल - पृथ्वीभन्दा तलको लोक&lt;br /&gt;
केही धर्मिक ता साँक्तिक सम्दाहरूलाााा ररर -------१९&lt;br /&gt;
| - शुभ, असल&lt;br /&gt;
प्रतीक - चिह्न&lt;br /&gt;
प्रदान - दिने काम, दान, समर्पणप्रस्तर - ढुङ्गो&lt;br /&gt;
भूक्षय - जमित नासिने काममन्त्रमुग्ध - मोहित पारिएकोमरणोपरान्त - मरिसकेपछिरखबारी - देखभाल&lt;br /&gt;
रोचक - रमाइलो, आकर्षकलीला - चरित्र, खेलवटुक - बालक, केटो न १/ छी १वास्तुकला -- भवन निर्माण गर्ने शिल्प वा सीप प्र! विक्रान्त - हिम्मती, साहसी&lt;br /&gt;
बिचलित - आफ्नो लक्ष्यबाट हटेको&lt;br /&gt;
विध्वंश - नाश&lt;br /&gt;
वियोग - विछोड&lt;br /&gt;
बिरही - दुःखी&lt;br /&gt;
विहार - बौद्ध भिक्षुहरू बस्ने मठ&lt;br /&gt;
विशालकाय - ज्यादै ठूलो&lt;br /&gt;
त - शिष्टता र नम्रता भएको&lt;br /&gt;
शिखर - चुचुरो, टाक्रो&lt;br /&gt;
शैली - काम गराइको ढाँचा&lt;br /&gt;
शोभायमान - धेरै सुहाएको&lt;br /&gt;
संरक्षण - सुरक्षा&lt;br /&gt;
| सम्पदा - सम्पत्ति&lt;br /&gt;
सम्बर्द्धन - बढाउने काम&lt;br /&gt;
सर्वोपरि - सबैभन्दा माथिको, सबैभन्दा बढी&lt;br /&gt;
सौन्दर्य - राम्रोपना&lt;br /&gt;
स्थापत्यकला - घर देवालय बनाउने सीप&lt;br /&gt;
हर्षित - प्रसन्न, खुसी भएको&lt;br /&gt;
७० 7 केही वार्मिक तया सास्कृतिक सम्पदाहरू -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
८ चिन्हहरू सडक प्रयोगकर्ताहरूकै सुरक्षाका निर्माणस्थलबाट टाढा रही सुरक्षित रहीँ ।लागि राखिएका हुन्‌ ।सडक हाम्रै सम्पत्ति हो, यसको ठीक प्रयोग गरौँ ।&lt;br /&gt;
श्री ५ को सरकार /जापानी सहायता नियोग « ट्राफिक इन्जिनियरिङ तथा सुरक्षा एकाइ/सडक विभाग &amp;quot; नीप्पन को.ई. /हाजामा-ताइशि जे.भी.&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE_%E0%A4%B0_%E0%A4%B8%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BF&amp;diff=68</id>
		<title>शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE_%E0%A4%B0_%E0%A4%B8%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BF&amp;diff=68"/>
		<updated>2024-06-10T04:00:02Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: Created page with &amp;quot;2000 । 11 1111॥॥॥ रा ड्ठा्‌. मतिप्रसादढकाल 0€॥2७० 8१: ०१९(100साझा शिक्षा ई-पाटी01: ता ५४५७३०७9191:91919,010.५४५१४,०।911681291,01 माध्यमिक तहदेखि स्नातक तहसम्मका शिक्षक र विद्यार्थीका निम्तिसंस्कृत र नेपाली शब...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;2000 ।&lt;br /&gt;
11 1111॥॥॥ रा&lt;br /&gt;
ड्ठा्‌. मतिप्रसादढकाल&lt;br /&gt;
0€॥2७० 8१:&lt;br /&gt;
०१९(100साझा शिक्षा ई-पाटी01: ता&lt;br /&gt;
५४५७३०७9191:91919,010.५४५१४,०।911681291,01&lt;br /&gt;
माध्यमिक तहदेखि स्नातक तहसम्मका शिक्षक र विद्यार्थीका निम्तिसंस्कृत र नेपाली शब्दको निर्माणप्रकरिपा र सन्धि सिकाउने सन्दर्भ पुस्तक&lt;br /&gt;
शब्दनिर्माणप्रक्रिया&lt;br /&gt;
र्‌सन्धि-क-पुरुचकालस्प्क्ी खडितिजानप्का ाडि0॥/2&lt;br /&gt;
८८01&lt;br /&gt;
डा. मतिप्रसाद ढकालसहप्राध्यापकनेपाल संस्कृत बिश्वविद्यालयकालिका संस्कृत विद्यापीठ (क्याम्पस)गैँडाकोट, तवलपरासी&lt;br /&gt;
मुँडीपुराण प्रकाशन&lt;br /&gt;
शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
5190 चाका जिठात१॥ &amp;amp; 5गाणा&lt;br /&gt;
प्रकाशकभुँडीपुराण प्रकाशनबागबजार, काठमाडौँ&lt;br /&gt;
हरेरे३३१६,&#039;४२२५१ ३४८&lt;br /&gt;
10 तर्वाधिकार : लेखक&lt;br /&gt;
प्रथम संस्करणा १ २०६९&lt;br /&gt;
मूल्य £ ११००-टाइप 2. लैख्क स्वयम्‌&lt;br /&gt;
काप्पपुटर डिजाइन : भुँडीपुराण डेस्क&lt;br /&gt;
नेपाली शब्द निर्माण प्रक्रिया सिकाउनेअद्वितीय पुस्तक&lt;br /&gt;
प्रा.डा.माधव प्रसाद पोखरेल&lt;br /&gt;
नेपाली विषयमा संस्कृत भाषाका शब्दहरूको निर्माण प्रक्रिया सिकाउने रपरीक्षामा सोध्ने चलन विद्यालय तहदेखि विश्व विद्यालयका माथिल्ला तह सम्मपाइन्छ । संस्कृत व्याकरण नपढेका र संस्कृत पढेकै गुरुलाई समेत सिकाउनेबेलामा अप्ठ्यारा लाग्ने शाब्दहरूको पनि परीक्षामा व्युत्पत्ति गर्न दिइएको पाइन्छ। नैपालीमा प्रचलित संस्कृत शब्दहरूको निर्माण प्रक्रिया पाठ्य क्रममा राख्नेबैलामा पढाउने विद्यार्थीलाई अप्ठयारो पर्ला भन्ने हेक्का नराखिएको पनि देखिन्छभने, परीक्षाका लागि प्रश्न सोध्नै बेलामा विद्यार्थीलाई उत्तर दिन अप्ठ्यारो पर्लाभन्ने हेक्का नराखिएको पनि देखिन्छ । डा.मति प्रसाद ढकालको शब्द निर्माणकोयस पुस्तकले नेपाली पाठघ क्रममा भएका वा प्रश्न पत्रमा आउने संस्कृत नपढेकागुरुहरूलाई समैत अप्ठ्यारा लाग्नै शब्दहरूको व्युत्पत्ति फोर्न धेरै मात्रमासघाउला भन्ने विश्वास छ ।&lt;br /&gt;
डा.मति प्रसाद ढकालको प्रस्तुत महत्त्त्र पूर्ण अनुसन्धानात्मक ग्रन्थमा १२औँ अध्याय बाहेक अरू सबै अध्यायमा नेपाली शब्द भण्डारमा पाणिनीय संस्कृतव्याकरणको प्रयोग गरिएको छ । पाणिनिको संस्कृत व्याकरण विश्वको सबै भन्दापुरानो र आदर्श वर्णनात्मक व्याकरण हो । पेन्सिल्भैनिया विश्व विद्यालयमा१९५५ ई. मा पिएचडी गरी सक्ता नोम चोम्स्कीले जुन रूपान्तरणात्मक प्रजनकव्याकरणको जन्म दिएको घोषणा गरे, भाषा विज्ञानको त्यो नवीनतम पद्धतिकोआदर्श नमुना विश्वको कुनै व्याकरणमा देखाउन सक्नि भए, त्यो पाणिनिकोअष्टाध्यायी&#039; भन्ने व्याकरण मात्रै थियो । पाणिनिले झन्डै चार हजार ओटायान्त्रिक बीज गणितीय फर्मुलाहरूका आधारमा सम्पूर्ण वैदिक र लौकिक संस्कृतबाङ्गमयमा प्रयोग भएका संस्कृत भाषाका शान्द र वाक्यमा नुकेका नियमहरूलाईनफुत्किने गरी परिभाषित गरे । पाणिनिले बिश्वभरको अद्वितीय र उदेक लाग्दोवैज्ञानिक वर्णनात्मक व्याकरणका रूपमा प्रस्तुत गरेको संस्कृत व्याकरणकम्प्युटरलाई सिकाउन पनि एकदम सजिलो भएको कुरो कम्प्युटरकाविशेषज्ञहरुले पनि स्वीकार गरेका छन्‌ । नोम चोम्स्कीको गुरु कुलमा उनलाईपछ्याउने विशबभरमा छरिएका असङ्ख्य भाषा वैज्ञानिकहरूले र चोम्स्की आफैंलेपनि अहिले सम्म विश्वको कुनै दोस्रो भापाको व्याकरण पाणिनिको अष्टाध्यायीजस्तो पूर्ण र व्यवस्थित बनाउन सकेका छैनन्‌ । पाणिनिको संस्कृत व्याकरणविश्बभरका भापा वैज्ञानिकहरूको पूजनीय आदर्श प्रतिमा हो ।&lt;br /&gt;
संस्कृत व्याकरणका सिद्धान्त प्रयोग गरेर नेपाली भाषाको व्याकरण लेख्नेश्रेय अहिले सम्म दुई जनालाई थियो । वीरेन्द्रकेसरी अर्ज्याल र जयपृथ्वी वहादुरसिँह दुवै जनाको व्याकरणको नाम &#039;प्राकृत व्याकरण&#039; देखिन्छ । वीरेन्द्रकेसरीको&lt;br /&gt;
व्याकरणमा दुई तीन ओटा परस्पर पूरक रूपमा अपूर्ण पाण्डुलिपिहरू जयराजआचार्य र प्रेरणा खरेलले फेला पारेका छन्‌ । डा. ईश्वर बरालले पहलमान सिंहस्वारसित वीरेन्द्रकेसरीका व्याकरणको तेस्रो पाण्डुलिपि किनेको सूचना सम्मपाइएको छ, तर अहिले सम्म डा.बरालको पुस्तकालयबाट त्यो पाण्डुलिपि कसैलेपनि उद्धार गरेर सार्वजनिक गर्न सकेको छैन । जयपृथ्वी बहादुर सिंहको “प्राकृतव्याकरण&#039; १९६९ सालमा प्रकाशित भएको भए पनि त्यो किताबले स्तर रआयाममा वीरेन्द्रकेसरी अर्ज्यालका भेटिएका दुई ओटै पाण्डुलिपिको बराबरी गर्नसक्तैन । तुलना गर्दा कै कुरो अड्कल गर्न सकिन्छ भने, जयपृथ्वी बहादुर सिंहचाहिँ वीरेन्द्रकेसरी अर्ज्यालका चेला रहेछन्‌ । संस्कृत व्याकरण (विशेष गरीप्रातिशाख्य) का आधारमा नेपालीमा लेखिएको एउटा अर्को अद्वितीय उल्लेखनीयकृति शिवराज आचार्यले लेखेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
नेपाली भाषा र व्याकरणका फाँटमा लाग्ने संस्कृत व्याकरणका अच्पिल्टाविद्यार्थीहरू असङ्ख्य छन्‌ । पाणिनिको जस्तो वैज्ञानिक व्याकरण पनि बुझेर भन्दाघोकेर परीक्षा पास गर्नेहरू खालि पाणिनिका अन्ध भक्त र अन्ध विश्वासी मात्रहुन सक्ता रहेछन्‌ । पाणिनि, पतञ्जलि र भर्तृहरि जस्ता व्याकरणकारहरूकाव्याकरणमा अन्तर्निहित भाषा विज्ञान बुझेर नेपाली भाषामा त्यसको उपयोग गर्नसके, नेपाली भाषा र व्याकरणका अनुसन्धानमा त्यस ज्ञानले. अद्वितीय योगदानगर्न सक्थ्यो ।&lt;br /&gt;
डा.मति प्रसाद ढकालमा नेपाली भाषाको अनुसन्धानका क्षेत्रमा त्योखाल्डो पुर्तेल गर्न सक्ने क्षमता देखिन्छ । डा.उकालको पिएचडीको अनुसन्धानकोबिषय संस्कृत भाषाको सन्धि नियममा हो । आफ्नो शोध ग्रन्यमा उनले संस्कृतवाक्यमा नजिक नजिक आउने दुइटा शब्दका वर्णका बिचको वर्ण परिवर्तन ।अर्थात्‌ बाह्य सन्धि) का नियम मात्र नसमेटेर एउटै शान्द भित्र नजिक नजिकआउने वर्णहरूको पारस्परिक परिवर्तन (अर्थात्‌ आन्तरिक सन्धि) को अध्ययन पनिसमेटेका छन्‌, जसले गर्दा कुदन्त, तिङन्त, स्वी प्रत्यय, तद्धितान्त, समस्त शव्दआदि शाब्द निर्माणका अनेक प्रकरणहरू भित्र भएका वर्ण परिवर्तन (सन्धि) कोरौंचिरा विवेचन गरेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
डा.ढकालको यस अनुसन्धान ग्रन्थमा जम्मा दुइटा खण्ड छन्‌ । दुइटैखण्ड गरी जम्मा १२ ओटा प्रकरणहरू छन्‌ । मोटामोटी रूपमा दोस्रो खण्डमाबाह्य सन्धिसँग सम्बन्धित अध्यायहरू घेरै परेका छन्‌ भने पहिलो खण्डमाआन्तरिक सन्धिसँग सम्बन्धित अध्यायहरू बढी समेटिएका छन्‌ । पहिलोअध्यायमा नेपाली भाषाका कूदन्त शब्दमा धातुको स्वरमा हुने परिवर्तनमा के केनियम पाइन्छन्‌, पाणिनीय संस्कृत व्याकरणका आधारमा निरपेक्ष ढङ्गले त्यसकोलेखाजोखा गरिएको छ । यसरी संस्कृत भाषा बैज्ञानिक आधारमा नेपालीमा कुदन्तशव्दको निर्माण पद्धतिको व्याख्या डा.ढकालले भन्दा अगाडि कसैले पनि गरेको&lt;br /&gt;
छैन।दोस्रो अध्यायमा नेपाली भाषामा प्रयोग हुनै संस्कृत तद्धितान्त शब्दमापहिलो र अन्तिम स्वरको परिवर्तनमा के कस्तो नियम छ, त्यसको लेखाजोखा छ&lt;br /&gt;
भने तेत्रो अध्यायमा नेपाली भापामा प्रचलित संस्कृत समस्त शव्दमा नेपालीमाप्रचलित संस्कृत समस्त शव्दको निर्माण प्रक्रियाको बर्णन छ । चौयो अध्यायमानेपाली तद्भव शब्दमा स्वरहरूको परिवर्तन र स्वरको अनुनासिकता जनाउने चन्द्रबिन्दुको मीमांसा गरिएको छ । पाँचौं अध्यायमा केही नेपाली शब्दहरूको निर्वचनवा व्युत्पत्ति बारै समीक्षा गरिएको छ अनि छैटौं अध्यायमा नेपालीमा प्रचलितअपाणिनीय (अशुद्ध) तथाकथित संस्कृत शब्दहरूको शुद्ध रूप के हुनु पर्ने भन्नेनिर्णय गरिएको छ।&lt;br /&gt;
दोस्रो खण्डको सातौं अध्यायमा संस्कृत होइन, नेपाली भाषाको सन्धिकोलेखाजोखा गरिएको छ भने आठौँ अध्यायमा संस्कृत सन्धिका तुलनामा नेपालीसन्धिका विशेषताहरू ठम्याइएको छ । नवौँ अध्याय नेपाली आषाका सन्धि विग्रहवा सन्धि विच्छेदमा केन्द्रित छ । दसौं अध्यायमा वाजसनेयी प्रातिशाख्यमा सन्धिकाविषयमा बनेका सिद्धान्तहरूको परिचय छ । एघारौं अध्यायमा सस्यूत र नेपाली&lt;br /&gt;
सन्धिको अध्ययन परम्पराको बेलिबिस्तार लगाइएको छ । अध्यायमापाणितीय व्याकरणमा लोप, आगम र वर्ण विकारको छूपमा भएका सन्धिकानियमहरूको परिचय छ।&lt;br /&gt;
यसरी संस्कृत व्याकरणमा भएको भाषा विज्ञानलाई आधार मानेर नेपालीभाषामा प्रयोग हुने शब्दहरूको निर्माण प्रक्रियाको विश्लेषण र परिचय दिइएकोयस पुस्तकले नेपाली भाषा विज्ञानका फाँटमा अद्वितीय कीर्तिमान राख्न सकेको छ। खालि पाणिनीय व्याकरणका पारिभाषिक शब्दलाई पचाउने तागत चाहिँ नेपालीभाषाका निकै पाठकहरूमा नपुग्ला र पाणिनीय व्याकरणका पारिभाषिक&#039;शब्दावलीसँग परिचित नभएका पाठकलाई पाणिनीय व्याकरणका पारिभाषिकशब्दावली प्रयोगै नगरी, नेपाली भाषामा प्रचलित संस्कृत शब्दको निर्माण प्रक्रियाबा व्युत्पत्ति सिकाउने धेरै अप्ठ्यारो बाटो खोज्न सकिएला कि भनेर म संस्कृतव्याकरणका विद्वान्‌ र प्रतिभाशाली लेखकलाई प्रेरित गर्न चाहन्छु ।&lt;br /&gt;
२०६९ असार १४ साँचल मार्ग, सानेपाललितपुर ।&lt;br /&gt;
लेखकीय&lt;br /&gt;
गरिमा, नेपाली, मिर्मिरे, निशान्त र्‌ मृगतृष्णा नामक राष्ट्रियपत्रिकाहरूमा २०५७ देखि २०६५ सम्म पूर्वप्रकाशित ११ लेखहरू र समस्त शब्दसँगसम्बद्ध एउटा अप्रकाशित्त लेखलाई सभावैश गरी यस पुस्तकको सम्पादन गरिएको हो॥ दुई खण्डमा विभक्त यस्त पुस्तकको पहिलौ खण्डका प्रारम्भिक तीन लैखहरूविशेषतः तत्सम (संस्कृत) कुदन्त, तद्धितान्त र समस्त शाब्दको निर्माणप्रक्रियासँगसम्बद्ध छन्‌ । नेपाली शब्दनिर्माणप्रक्रिया वुझ्न तद्भव शब्दमा हुने परिवर्तन र्‌नेपाली शब्दको ऐतिहासिक बिकासक्रमसँग पनि परिचित हुनुपर्ने आवश्यकतातर्फयसका चौंधो र पाँचौं लेखले ध्यानाकर्षण गराएका छन्‌ भने छैटौं लेखले संस्कृतडाब्दलाई नेपालीमा प्रयोग गर्दा विशेष साबधानी अपनाउनुपर्ने कुरामा जोड दिएको छ।&lt;br /&gt;
दोस्रो खण्डका सन्धिसँग सम्बद्ध छ लेखहरूमध्येक्लो पहिलो लेख &#039;नेपालीमासन्धि भन्नु नै संस्कृत सन्धि हो, नेपालीमा मौलिक सन्धि छैन&#039; भन्ने अनुभवी अग्रजगुरुहरूको निष्कर्षात्मक भनाइले जिज्ञासा जगाएपछि खोजिएको प्रारम्भिक प्रयास हो रत्यसपछिका सन्धिसँग सम्बद्ध पाँच लेखहरू सन्धिको तिर्खा मेटाउने क्रमिक यात्रामातयार गरिएका हन्‌ ।&lt;br /&gt;
त्रिविमा नेपाली पढाउँदा मौलिक नेपाली सन्धिको अभाव खट्किएका बेलाप्रा.डा.माधबप्रसाद पोखरेल गुष्को भर्खरै बजारमा आएको &#039;ध्वनिविज्ञान र नेपालीभाषाको ध्वनि-परिचय&#039; (२०५७) पुस्तकको सन्धिशीर्षकमा रहेको अन्तिम निष्कर्षलेमलाई संस्कृत र नेपाली सन्धिको अध्ययनमा हुटहुटी नजगाएको भए यस सङ्गगाहकालेखहरू तयार हुनसम्नै थिएनन्‌ र सन्धिसँग सम्बद्ध पिएचडी अध्ययनको रुचि पनिममा जाग्नतवने थिएन । साथै प्रेरणादायी गहनतम भूमिका लेखिदिएर प्रकाशककोअन्वेषणमा उहाँले नै तत्परता नदेखाइदिएको भए तत्काल यस कृतिलाई प्रकाशमाल्याउन साब पनि थिएन । त्यसैले आफ्ना चैलालाई पारिवारिक स्नैह प्रदान गरीसंदैब जागरूक बनाइरहनुहुने प्राद:स्मरणीप गुरुवर्‌ प्रा.डा. माधवप्रसाद पोखरेलप्रतिहुदयत: कृतज्ञता व्यक्त गर्दछु । साथै यस प॒स्तकलाई यथासमयमैं प्रकाशमा ल्याइदिनेभुँडीपुराण प्रकाशनप्रति प्रि सधन्पवाद हार्दिक आभार प्रकट गर्दछु ।&lt;br /&gt;
डा.मतिप्रसाद ढकाल२०६९ असार १९ सहप्राध्यापकगुरुपूर्णिमा नेपाल संस्कृत विश्वविद्यालय&lt;br /&gt;
विषय-सूची&lt;br /&gt;
पहिलो खण्ड : शब्दनिर्माणप्रक्रिया १-१११. नेपाली कूदन्त शब्दमा घातुका स्वरको परिवर्तन १२. तत्सम नेपाली तद्धितान्त प्रातिपदिकमा आदि र अन्त्य स्वरको परिवर्तन ९३. नेपालीमा प्रयुक्त संस्कृतमूलका प्रमुख समस्त शब्दहरूको निर्माणप्रक्रिया १४४. तद्भव नेपाली शब्दमा परिवर्तित स्वर र चन्द्रविन्दुको स्थिति ३०५, केही नेपाली शब्दहरूको पुर्ख्यौली परम्परा ३६६. नेपालीमा प्रयुक्त संस्कृतमूलका अनुपयुक्त शब्दहरू ड्र&lt;br /&gt;
दोस्रो खण्ड : सन्धि ५२-१००७, नेपाली सन्धिको परिचय द्रड. नेपाली सन्धिका प्रमुख विशेषताहरू 000९, नेपाली व्याकरणमा सन्धिविच्छेदका आधारहरू 00१०. वाजसनेयी प्रातिशाख्यमा सन्धिको अध्ययन ७र्‌११. संस्कृत र नेपाली सन्धिको अध्ययन परम्परा ७७&lt;br /&gt;
१२. पाणिनीय व्याकरणमा लौप, आगम र वर्णविकार सन्धिको अध्ययन ९०सन्दर्भ कृतिसूची ९९&lt;br /&gt;
शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ १&lt;br /&gt;
| पहिलो खण्ड : शब्दनिर्माणप्रक्तिया |&lt;br /&gt;
नेपाली कृदन्त शब्दमा घातुका स्वरको परिवर्तन&lt;br /&gt;
१. विषयप्रवेश&lt;br /&gt;
समासप्रक्रिया र तद्धितप्रक्रियाकै कृत्प्रक्रिया पनि शाब्दनिर्माणको प्रमुख पद्धतिमानिन्छ । संस्कृतमा तिप्‌, तस्‌, झि आदि क्रियाको रूपनिर्माणमा प्रयोग गरिनेअठारओटा तिङ्प्रत्ययहरूबाहेकका धातुदेखि विधान गरिने अन्य सबै प्रत्ययहरूलाईकृतृप्रत्यय स्वीकारिएको छ (कृदतिङ्‌, अष्टाध्यायी,अ,. ३१।९३) । संस्कृतमा झैंनेपालीमा पनि कृतृप्रत्यय लगाई निर्माण गरिएका शब्दहरूलाई यस्त शब्दभनिन्छ । कृदन्त शब्दमा प्रकृति अर्थात्‌ आधारतत्त्वका रूपमा धातुमात्रआउँछ, प्रातिपदिक आउँदैन भने आधेयतत्त्वका रूपमा सधैँ कृतृप्रत्ययको मात्रउपस्थिति रहन्छ ।&lt;br /&gt;
क्दन्त शब्दको निर्माणप्रक्रियामा धातुसँग प्रत्ययको योग हुँदा कहीँ धातुमारहेका स्वरवर्णको परिवर्तन हुन्छ, कहीँ धातुमा रहेका व्यव्जनवर्णको परिवर्तनहुन्छ, कहीँ प्रत्ययमा रहेका व्यञ्जनवर्णको परिवर्तन हुन्छ, कहीँ नयाँ वर्णकोउपस्थिति (आगम) हुन्छ, कहीँ धातु वा प्रत्ययमा रहेका वर्णहरूको अनुपस्थिति (लोप) हुन्छ, कहीँ कुनै किसिमको परिवर्तन नै नभएको पनि पाइन्छ । नेपालीक्दन्तमा लोप एवम्‌ आगमका तुलनामा वर्णपरिवर्तन र त्यसमा पनि धातुमारहेका स्वरवर्णको परिवर्तन बढी मात्रामा हुनै गर्दछ । यस्तो परिवर्तन कहीँनियमित र कहीँ अनियमितरूपमा भएको देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
नेपाली कृदन्त शब्दहरूलाई घातुका स्वरका अनियमित परिवर्तन र नियमितपरिवर्तनका आधारमा मूलत: अतत्सम कृदन्त र तत्सम कूदन्त गरी दुई प्रकारमाविभाजन गर्न सकिन्छ । तत्समभन्दा भिन्न कुदन्त शब्दलाई अतत्सम कुदन्तभनिन्छ भने संस्कृतका कृत्‌प्रत्ययहरू लागी बनेका र नेपालीमा प्रयुक्त नेपालीकुदन्त शब्दलाई तत्सम क्दन्त भनिन्छ । प्रस्तुत आलेखमा तत्सम तथा अतत्समनेपाली कृदन्त शब्दमा धातुका स्वरको परिवर्तन केकसरी हुन्छ ? भन्ने बारेमासङ्क्षेपमा चर्चा गरिन्छ ।२. अतत्सम नेपाली कृदन्त शब्दमा धातुका स्वरको परिवर्तन&lt;br /&gt;
तत्सम नेपाली कृदन्त शब्दमा धातुका स्वरको परिवर्तन नियमित रव्यवस्थितरूपमा भएको पाइन्छ भने अतत्सम नेपाली कृदन्त शब्दमा धातुकास्वरको अनियमितरूपमा परिवर्तन भएको देखिन्छ । अतत्सम नेपाली कुदन्तशाब्दको निर्माण गर्दा मुख्यतया धातुका आकार र उकारको परिवर्तन भएकोपाइन्छ ।&lt;br /&gt;
२ ८ शन्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
२.१ धातुका आकारको परिवर्तन&lt;br /&gt;
नेपालीमा आदिमा र अन्तमा आकार हुने अतत्सम धातुहरूको सङ्ख्याअत्यन्त कम छ । आकार आदिमा हुने आउ र आँद्‌ तथा आकार अन्तमा हुने जार खा धातुदेखि आइ प्रत्ययको योग हुँदा आकारको अकारमा परिवर्तन (ह्रस्व)हुन्छ । जस्तै : आउनआइ -अवाइ, आँद्न-आइ -अँटाइ, जा--आइ -जवाइ,खान-आइ --्खबाइ ।&lt;br /&gt;
नेपालीमा आदि र अन्त्यमा व्यञ्जनवर्ण भएका र मध्यमा आकार भएकाएकाक्षरी धातुका आकारको अकारमा परिवर्तन (ह्रस्व) भएका प्रशस्त उदाहरणहरूपाइन्छन्‌ । अतत्सम नेपाली कूदन्त &amp;quot;शव्दनिर्माणमा घातुका मध्य आकारकोपरिवर्तनका प्रमुख नियम र अपवादहरू निम्नानुसार छन्‌ :&lt;br /&gt;
(१) स्वरवर्ण आदिमा हुने अनेकाक्षरी कुत्‌प्रत्यय पर भएमा धातुका आकारकोहस्व हुन्छ, जस्तै :ढाक्‌ &amp;quot; अनी - ढकनीहान्‌ १ आइ : हनाइतान्‌ - आउ ० तनाउहार्‌ &amp;quot; आउनी - हराउनीचाल्‌ ५ आन च्‌ चलानचाल्‌ 4 आनी ० चलानी गाउ - ऐया - गवैयाक जुवा न पकुवा आदि ।&lt;br /&gt;
(२) स्वरवर्ण आदिमा हुने अनेकाक्षरी कृतृप्रत्यय यदि भिन्नाभिन्नै स्वरवर्णले युक्तछैन भने घातुका आकारको अकार (हस्व) हुँदैन, जस्तै : लाग्‌-अत -्लागत,राख्‌-अन - राखन आदि ।&lt;br /&gt;
(३) भिन्नाभिन्नै स्वरवर्णले युक्त भए पनि इन्जेल, उन्जेल र एर कुतृप्रत्ययकोयोगमा घातुका आकारको अकार (हस्व) हुँदैन, जस्तै : काट्नइन्जेलसकाटिन्जेल, बाँच्‌--उन्जेल - बाँचुन्जेल, माग्‌्--एर -्मागेर आदि ।&lt;br /&gt;
(४) धातुका अन्तिम व्यञ्जनवर्णको द्वित्व भएको छ भने एकाक्षरी कृतृप्रत्यय परभएमा पनि धातुका आकारको अकार (ह्रस्व) हुन्छ, जस्तै : छान्‌तई च्छन्नी,काट्‌म्ई च्कद्टी, पाक्‌नःक -्पक्कू, काद्‌र-क चकद्‌दू । धाम्‌नई न्थामी,माग्न-अ -्माग, चालुनआ न चाला, हाँस्‌-ओ रुहाँसो आदि उदाहरणहरूमाव्यञ्जतवर्णको द्वित्व नभएको हुँदा एकाक्षरी प्रत्ययको योगमा ध्वातुकाआकारको परिवर्तन हुन नसकेको हो ।यस प्रकार स्वरवर्ण आदिमा हुने प्राय: भिन्नाभिन्नै दुई वा दुईभन्दा बढी&lt;br /&gt;
स्वरवर्णले युक्त भएका कृतप्रत्ययको योगमा र व्यञ्जनवर्णको द्वित्व भएको&lt;br /&gt;
अवस्थामा एकाक्षरी कृतृप्रत्ययको योग हुँदा घातुका अकारको आकारमा परिबर्तन&lt;br /&gt;
(हस्त) भएको देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
छान्‌ &amp;quot; ओट त छनोटहान्‌ ५ अक्कड ० हनक्कडभाग्‌ &amp;quot; अन्तै मगन्तेहाँस्‌ न आलु -« हँसालुखाँद्‌ 4 इलो ० खैँदिलो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
झन्दनिर्माणप्रक्तिया र सन्धि/ ३&lt;br /&gt;
२.३. धातुका उकारको परिवर्तन&lt;br /&gt;
नेपालीमा आदिमा र मध्यमा उकार हुने अतत्सम धातुहरू पाइए पनिकृतृप्रत्ययको योग हुँदा आदि र मध्य उकारको परिवर्तन भएको पाइँदैन, अन्त्यउकारान्त केही धातुका उकारको मात्र परिवर्तन भएको भेटिन्छ । पूजउआरी नपुजारीमा पूज्‌ घातु तत्सम भएको हुँदा त्यसको हृस्व उकारमा परिवर्तन भएकोहो । अतत्सम नेपाली कृदन्त शब्दनिर्माणमा धातुका अन्त्य उकारको परिवर्तनकाप्रमुख नियम र अपवादहरू निम्नलिखित छन्‌ :&lt;br /&gt;
(४) ई र एर कृतृप्रत्यय पर भएमा उकारान्त एकाक्षरी धातुका अन्त्य उकारकोओकार (गुण) हुन्छ, जस्तै : फु--ई न्फोई, रुनएर नरोएर, धुक्ई न घोई आदि ।&lt;br /&gt;
(६) ई र एर प्रत्ययको योगमा उकारान्त एकाक्षरी &#039;ह&#039; धातुका स्थानमा &#039;भ&#039; “आदेशहुने हुँदा धातुका उकारको ओकार हुँदैन, जस्तै : हुमई नभई, -हुनएर च भएर ।&lt;br /&gt;
(७) अत, आइ, अन्ती र ऐया प्रत्ययको योगमा उकारान्त अनेकाक्षरी धातुकाउकारका स्थानमा वकार हुन्छ, जस्तै : आउ--अत? आवब्‌--अत -्ञावत,लाउ५-आइ? लाव््‌-आइ? लब्‌--आइ त्लबाइ, धाउ-अन्ती? धघाव्‌तःअन्तीञ्यावबन्ती, गाउ--ऐया?- गाब्‌-ऐया न्ञावैया आदि । यहाँ उदाहत &#039;घाबन्ती&#039;शब्दमा आकार परिवर्तनको उपर्युक्त नियम (१) अनुसार ह्रस्व भएर धबन्तीहुनुपर्ने थियो, परन्तु नेपालीमा प्रयुक्त घाउ धातु संस्कृतको ध्वाव्‌ धातुबाटविकसित तद्‌भव धातु हो र अन्ती प्रत्ययको योग हुँदा घाउ धातुले मूलप्रकृतिको ग्रहण गरी धाव्‌ भएकाले नेपालीमा त्यसको हृस्व हुन नसकेकोहो । आइ प्रत्ययको योगमा इस्व हुने आउ धातुबाट पनि अत प्रत्ययको योगहुँदा अवत्त नभएर आवत हुन पुगेको हो ।&lt;br /&gt;
अक्कड पत्ययको योगमा उकारान्त अनेकाक्षरी पिउ धातुका उकारकास्थानमा वकार आदेश नभई यकार आदेश हुन्छ, जस्तै : पिउ--अक्कड तपियक्कड ।&lt;br /&gt;
यस प्रकार उकारान्त धातुका उकारको एकाक्षरी धातुमा ओकारका रूपमा रअनैकाक्षरी धातुमा वकार तथा यकारका रूपमा परिवर्तन हुन पुगेको पाइन्छ ।&lt;br /&gt;
(यू&lt;br /&gt;
संस्कृतमा स्वरवर्ण आदिमा हुने प्रत्यय पर भएमा इवर्ण र्‌ उबर्ण अन्तमा हुनेधातुका इकारका स्थानमा इयङ्‌ (इय्‌) र्‌ उकारका स्थानमा उवङ्‌ (उव्‌) आदेशहुन्छ (अष्टाध्यायी “अ. ६।४।७७) । नेपाली अतत्सम आइ कृत्‌प्रत्यय पर भएमाकेही धातुमा यस प्रकारको प्रवृत्ति भेटिन्छ, जस्तै : दिःआइर द्‌ इय्‌न्आइन्वंदियाइ, लि&amp;quot;-आइर? ल्‌ इयु्‌--आइ तलियाइ, घुःआइन ध्‌ उव्‌नआइ न्घुवाइ,फुनआइ? र्‌ उब्‌उआब्क ० रुवाइ आदि । उपर्युक्त दियाइ, घुवाइ आदि प्रयोगमा यूबा व्‌ को मात्र आगम स्वीकार्नुभन्दा इय्‌ र उव्‌ आदेश भएको ठान्नु उपयुक्तदेखिन्छ । जान-अत?- जा व्‌नअत -्जाबत मा भने ब्‌ आगम भएको हो ।&lt;br /&gt;
४ ४ शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
अत्तत्सम नेपाली कृतृप्रत्ययको योग हुँदा धातुका आकारको, इकारको रउकारको परिवर्तन तथा वकारको आगममात्र होइन कहीँ उकारको लोप, कहीँआउको लोप र कहीँ लकारको लोपसमेत भएको पाइन्छ, जस्तै : चुहु-आवट?चुह-आबवट »चुहाबट, चुहु--एत्रोन चुह--एत्रो च्चुहेत्रो, तुहु?-एत्रो2 तुह--एत्रोनतुहेत्रो, कुहुनएत्रोट कृहकएवरो नकूहेत्रो, गाउ--एरट गाएर &amp;quot;गाएर,चन्क्याउ- इन घन्क्या-इ च्थन्क्याइ, आउनइन आनंेड च्आइ, बिसाउन-औनाटबिस्‌ -औना -८बिसौना, ओर्ल--आलो?, ओर्‌ &amp;quot;आलो -ओरालो, उक्लन-आलो?उक्‌तआलो -उकालो ।&lt;br /&gt;
३. तत्सम नेपाली कृदन्त शब्दमा धातुका स्वरको परिवर्तन&lt;br /&gt;
नेपालीमा प्रयुक्त तत्सम कुदन्त शब्दमा धातुका स्वरको परिवर्तन संस्कृतमानियमित र व्यवस्थितरूपमा भए पनि त्यसको सरलीकृत चर्चा नेपालीमा हालसम्मभएको पाइँदैन । त्यसैले संस्कृतको पृष्ठभूमि नभएका शिक्षकहरू तत्सम नेपालीकुदन्त शब्दनिर्माणको शिक्षण गर्दा धातुका स्वरको परिवर्तन केकसरी हुन पुग्यो रतत्सम धातुको स्वरूप के हो ? भन्ने बारेमा अन्योलमा पर्न सक्छन्‌ । त्यस्तैविद्यार्थीहरूले पनि तत्सम नेपाली क्दन्त शब्दको प्रकृति र प्रत्यय छुट्टयाउँदा निकैगल्तीहरू गर्न सक्छन्‌ । यहाँ त्यसको प्रारम्भिक समाधानका उपायहरूको चर्चागरिन्छ ।&lt;br /&gt;
सँस्कृतमा कृत्‌प्रत्ययको योग हुँदा धातुको अन्त्यमा र उपधामा रहेकास्वरवर्णको परिवर्तन गर्ने नियम र अपवादहरूको व्यवस्थितरूपमा अध्ययनविश्लेषण भएको छ । त्यसमध्ये निम्नलिखित ६ सूत्रका नियम र अपवादहरूनेपालीमा प्रयुक्त तत्सम शव्दको निर्माणमा अति उपयोगी ठहरिन्छन्‌ :&lt;br /&gt;
(१ अचो ञ्शिति (अ. ७२११५)&lt;br /&gt;
यो सूजले जकार र णकारको इत्संज्ञालोप हुने प्रत्यय पर भएमा स्वरवर्णअन्त्यमा हुने अङ्ग (धातु वा प्रातिपदिक) को वृद्धि (इ ऐ, उ औं, क्र आर) गर्दछ,जस्तै :&lt;br /&gt;
(क) कुम्अणूट कुन्अरू क्‌ आर्‌नअ खकार&lt;br /&gt;
(ख) कृम्ण्पतट कृम्य? क्‌ आर्‌ज्य कार्य ।(२) अत उपधायाः (ज. जरा११६)&lt;br /&gt;
यो सुत्रले कार्‌ र णकारको इत्संज्ञचालोप हुने प्रत्यय पर भएमा धातुकोउपधा (अन्तिमभन्दा अघिल्लो वर्ण) मा रहेका अकारका ठाउँमा बृद्धि आकार)गर्दछ, जस्तै&lt;br /&gt;
(क) रम्‌तघञ्‌ट रम्‌नअर राम्‌तअ चराम&lt;br /&gt;
[ख) पठ्तण्चुल्‌- पढ्नबुर पढ्न-अक?- पाठ&amp;quot; अक तपाठक ।&lt;br /&gt;
ज्ब्दानिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ ५&lt;br /&gt;
(३) सार्वघातुकाधीधातुकपोः (अ. &#039;ज३ 5३)&lt;br /&gt;
यो सूत्रले सार्वधातुसंज्ञक तिप्‌, तस्‌, झि आदि अठार तिङ्प्रत्यय र शकारकोइत्संज्चालोप हुने शाप्‌ (अ) आदि प्रत्यय अथवा यी दुवै प्रकारका प्रत्ययदेखिबाहेकका आर्घधातुकसँज्ञक अन्य प्रत्यय पर भएमा धातुको अन्त्यमा रहेका इकार,उकार र क्रकारका ठाउँमा क्रमश: ए, ओ र अर्‌ गुण गर्दछ, जस्तै :&lt;br /&gt;
(क) वीज्तृच्‌ट नीम्तृट नेम्तृट नेतृ ज्नेता&lt;br /&gt;
दँख। श्वु&amp;quot;ल्युदरशुज्युटक्रुस्अनटश्ोजअनरशष्‌ अव्‌तअनरश्षवन सश्चषण&lt;br /&gt;
(गा) कुम्तृच्‌र कूनतुट क्‌ अर्‌जतृट कर्तु नकर्ता ।(४) पुगन्तलघुपधस्य च (अ. &#039;अश८६)&lt;br /&gt;
यो सूत्रले धातुदेखि विधान गरिने सार्बधातुकसंज्ञक र आर्धघातुकसंज्चकप्रत्ययहरू पर आएमा पुक्‌ (प्‌) प्रत्ययान्त र उपधामा इस्व हुने अङ्ग (धातु) कोगुण (ए, ओ, अर्‌) गर्दछ, जस्तै :&lt;br /&gt;
(क) लिख्‌-अनीयर्‌? लिख्‌--अनीय? लेख्‌-अनीय --्लेखनीय&lt;br /&gt;
(खो चुर्‌नअच्‌ट चुर्‌जअट चोर्‌न-अ च्चोर&lt;br /&gt;
पा) दृशुमण्वुल्‌ट दृशनवुट दुशूतंअक” दू अर्‌ शूनेअक -्दर्शक ।(४) क्किङति च (अ. ११५)&lt;br /&gt;
यौ सूत्रले ककार, गकार र डकारको इत्संज्चालोप हुने प्रत्यय पछाडि भएमाडु, उ, तरा अन्त्यमा हुने घातुको गुण र वृद्धि हुँदैन । अर्थात्‌ यो सूत्र उपर्युक्त सूत्र(१) र (३) का नियमको अपवाद हौं । जस्तै :&lt;br /&gt;
क्षी-क्त?- क्षीउत?- क्षीत -्क्षीण,&lt;br /&gt;
खुकक्तिन्‌ट श्रुष्ति न्श्वुति,&lt;br /&gt;
दुश्‌--म्यपूः- दृश्‌ज्य च्दृश्य ।(६ एचो$पबायावः (अ. ५१।७८)&lt;br /&gt;
यो सूजले स्वरवर्ण पछाडि भएमा प्रकृतिको अन्तमा रहेका ए, ओ, ऐ, औ-काठाउँमा क्रमश: अय्‌, अव्‌, आय्‌, आब्‌ आदेश गर्दछ, जस्तै :&lt;br /&gt;
(क) सिउअचुर क्षिउ्अर क्षेत्अट क्ष्‌ अप॒ज्अ न्क्षय&lt;br /&gt;
(ख) नुतअपूट नुनअट नोत-अट न्‌ अब्‌न-अ न्व्नव&lt;br /&gt;
(ग) नी-ण्वुल्‌-नी-वुर्नी-अकमनैनअकम्न्‌ आय्‌--अक च्नायक&lt;br /&gt;
(घ) भूण्वुल्‌नभून-वुरभूःअकर-भौनअक?”-भ्‌ आवन-अक --भावक ।&lt;br /&gt;
उपर्युक्त सूत्र (१) र (२) बृद्धिनियमसँग, सूत्र (३) र्‌ (४) गुणनियमसँग सूत्र५) पहिलो गुणनियमसँग तथा पहिलो वृद्धिनियमको अपवादसँग तथावृद्धिनियमबाट परिवर्तित धातुका स्वरको पुनः परिवर्तनसँग सम्बद्ध छन्‌ । उपर्युक्तवृद्धिनियमले अपेक्षा गरेका तत्सम कृत्प्रत्ययहरूमध्ये नेपालीमा विशेषतः घन्‌,ण्वुल्‌, णिनि र ण्यत्‌ गरी चार प्रत्ययहरू प्रयुक्त छन्‌ । मृज्‌ धातु [मृज्‌न-घन्‌व्मार्ग। लाई छाडेर अन्य जुन घातुको उपधामा द्वस्व इ, उ, क्र बर्ण छ, त्यसकोवृद्धि हुँदैन किन्तु अपवादका रूपमा गुण हुन्छ, जस्तै : लिख्‌-घन्‌ -्लेख,&lt;br /&gt;
६ / शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
युजतणिनि च्योगी, दृश्‌-ण्वुल्‌ च्दर्शक । धातुको उपधामा दीर्घ ई, क, क्र वर्णछन्‌ भने उपर्युक्त सूत्र (४) को नियम प्रवृत्त नहुने हुँदा त्यस्तो स्वरवर्णको परिवर्तनहुँदैन, जस्तै : दीप्‌--अच्‌ “दीप, सूद्‌--ल्युद्‌ च्सूदन । उपर्युक्त सूत (५) ले अपेक्षागरेका प्रत्ययहरूमध्ये विशेषतः अङ्‌, क्त, क्तिन्‌ र क्यप्‌ प्रत्ययहरूको प्रयोगनेपालीमा भएको पाइन्छ ।&lt;br /&gt;
उपर्युक्त सूत्रका नियम र अपवादका आधारमा धातुका स्वरको परिवर्तनभएका नेपालीमा प्रयुक्त तत्सम कृदन्त शब्दहरूको मुख्य विवरण निम्नानुसार छ :&lt;br /&gt;
सूत्र १) को नियम लागेका तत्सम कृदन्त शब्दहरूप्रक्सुतण्वुल्‌ व्प्रसारक हुनघब्‌ जहारघुतण्चुल्‌ ज्घारक कुञ्ण्यत्‌ चकार्यस्मृष्ण्वुल्‌ व्स्मारक ह-ण्यत्‌ चहार्यकृकण्वुल्‌ च्कारक घुम्ण्यत्‌ व्घार्यवितदृतण्वुल्‌ वविदारक अवनतृत्घन्‌ जअबतार्‌लकार, उपकार आदि ।&lt;br /&gt;
सत्र 1) र (६) को नियम लागेका तत्सम कृदन्त शब्दहरूचिन-घबूट चित-अर चैक्अट च्‌ आयूनअ च्चायची&amp;quot;ण्वुल्‌? नीतवुट नीनअक” नैनअक? न्‌ आय्‌--अक न््तायकभूतघजट भूनअट भौजअट भू आबुजअ चभावप्रजस्तु-घन्‌ प्रस्तु-अः- प्रस्तीनअ? प्रस्त्‌ आव्‌ःअ च्प्रस्तावशुकण्बुलूट श्रुप्बुर शुम्अक? श्रौ-अक? श्र्‌ आव्‌नअक न्श्वावकपूःण्बुल्‌टपूजबुटपूःअक?पौन-अक?-पू आवन-अक नपावक आदि ।&lt;br /&gt;
सूत्र (२) को नियम लागेका तत्सम कुदन्त शब्दहरू&lt;br /&gt;
2. च्पाठ (3 न्नाशाकनश्‌--घज्‌ त्वाश पढूनण्वुल्‌ त्पाठकपच्‌जघत्र्‌ तपाक चल्‌--ण्वुल्‌ न्चालकतप्‌जघन्‌ न्म्ताप वह-ण्वुल्‌ च्वाहकलभ्‌नःघन्‌ च्लाभ प्रम्चर्‌न-ण्वुल्‌ नप्रचारकग्रहनघज्‌ त्ग्राह त्यज्‌-णिनि -्त्यागीभज्‌--घज्‌ न्भाग हन्‌जणिनि च्घातीत्यजून-घन्‌ न्त्याग वद्नणिनि ज्वादीरञ्जनघज्‌ च्राग प्रति--गम्‌-णिनि “प्रतिगामीकम्‌जघत्र्‌ त्व्काम पद्जण्यत्‌ न्पाठययज्‌जघज्‌ व्याग पच्‌-ण्यत्‌ तपाच्यवम्‌नघन्‌ च्वाम हस्‌-ण्यत्‌ व्हास्यग्रहनण्वुल्‌ त्ग्राहक वच्‌-ण्यत्‌ च्वाच्य/वाक्य&lt;br /&gt;
१ न्न्वादक ती&amp;quot; नत्याज्य&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शन्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ ७&lt;br /&gt;
मृजल्युद्‌ व्मरण शुजतव्यत्‌ «श्रोतव्य&lt;br /&gt;
स्मृजल्युद्‌ व्स्मरण कततव्यत्‌ च्कर्तव्यइन-ल्युद्‌ च्हरण जिन्यत्‌ च्जेयस्मृ-अनीयर्‌ “स्मरणीय क्री-म्तव्यत्‌ तक्रेतव्यआनदुनअनीयर्‌ च्ञादरणीय क्रीक्तूच्‌ च्क्रैता१-कक उजागरूक आदि ।सुत्न (३) र (६) को नियम लागेका तत्सम कृदन्त शब्दहरू&lt;br /&gt;
क्षि-अच्‌ त्क्षय पूजल्युद्‌ त्पवनजि--अच्‌ जजय खु--ल्युद्‌ उश्वबणनी-अच्‌ न्नय नीज्ल्युट्‌ व्नयनरुक्अच्‌ न्सव श्वुकअनीयर्‌ न्श्ववणीयशिज्ल्युद्‌ न्शयन आदि ।&lt;br /&gt;
जहवन _सूज्र (४) को नियम लागेका तत्सम कृदन्त शब्दहरूदिब्‌-अच्‌ «दैव क्षुभ-घज्‌ त्क्षोभदिश्‌नघन्‌ च्दैश युजन-घज्‌ च्योगलिप्‌तघज्‌ ज्लैप क्रुधनघज्‌ चक्रोधलिखउ-घन्‌ -्लेख युज्‌न-ण्वुल्‌ त्योजकखिद्न-घन्‌ व्खेद शुष्‌--ण्वुल्‌ शोषकउपनदिश्‌न-घन्‌ न्उपदेश पुष्‌--ण्वुल्‌ त्पोषकलिख्‌--ण्वुल्‌ च्लेखक स्ध्‌ज्ण्वुल्‌ च्रोधकउत्‌नलिख्‌--अनीयर्‌ --उल्लेखनीय भुज्‌न-ल्युद्‌ भोजनभिद्ज्यत्‌ -मेद्य मुह--ल्युद्‌ «मोहनछिद्‌-यत्‌ च्छैदय शुच्‌-अनीयर्‌ त्शोचनीयभिदु-ण्वुल्‌ च्भैदक गुप्‌-अनीयर्‌ च्गोपनीयभुज्‌नघज्‌ न्भोग शुभ्नःअनीयर्‌ चशोभनीयकप्नःघज्‌ तकोप दुष्सणिनि च्दोषीलुप्‌--घन्‌ च्लोप द्रुह--णिति च्द्रोहीफुज्‌न-घन्‌ च्रोग युज्‌नणिनि व््योगीमुह--घञू त्मोह बुधन-ण्यत्‌ च्बोध्यदुष्क्घन्‌ व्दोष सुप्‌-्घब्‌ -्सर्पबुधनः्घन्‌ च्वोध सुज्‌ज्घन्‌ न्सर्यदृश्‌-अतीयर्‌ च्दर्शनीय दृश्‌--ण्वुल्‌ च्दर्शक&#039;नर्तक आदि ।॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२ ” ज्ब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
उपर्युक्त सूत्रका नियम र अपवादका अतिरिक्त तत्सम कुदन्त शब्दमा धातुकास्वरको परिवर्तनका लागि केही सहायक नियमहरू पनि संस्कृत व्याकरणमाव्यवस्थित छन्‌, तीमध्ये नेपाली तत्सम का शब्दका लागि उपयोगी केहीनियमहरूलाई समष्टिगतरूपमा निम्नानुसार गर्न सकिन्छ :&lt;br /&gt;
(१) ककारको इत्संज्ञालोप हुने क्त, क्तिन्‌ र क्यप्‌ प्रत्यय पछ्नाडि भएमा स्था, मार शास्‌ धातुका आकारको हृस्ब इकार हुन्छ, जस्तै : स्थान-क्त न स्थित,स्थातक्तिन्‌ ० स्थिति, मा-क्तिन्‌ त मिति, शास्‌उक्त ० शिष्ट,शास्‌--क्यप्‌ - शिष्य ।&lt;br /&gt;
(र) यत्‌ प्रत्यय पर भएमा आकारान्त धातुको दीर्घ ईकार हुन्छ (अ. ६४६५),&lt;br /&gt;
: दाज्यतूट दाम्यट दीक्यट देज्य “दैय, धैजयत्‌ट धाज्यट धीतयटधैक्य 5 घैय, पान्यत्‌ट पीत्यट पेक्य ८ पेय, गैनयत्‌र गैक्यरू गान्यटगी-यट गेकय ठ गेय, हान्यतूट हाक्त्यट हीक्यट हेय त हेय आदि ।&lt;br /&gt;
(३ कितन्‌ प्रत्यय पर भएमा भरम्‌, क्रम्‌, शस्‌ र कम्‌ धातुका अकारको आकार (दीर्घहुन्छ, जस्तै : भ्रमनक्तिन्‌? भ्रमजतिट आम्‌सति? आक्ति -श्रान्ति, क्रम्‌-क्तिन्‌टकम्‌नतिट कराम्‌जति? करांजति नक्रान्ति, शम्‌--क्तिनूर शाम्‌--तिर शाम्‌-तिट&#039;शांतति च्शान्ति, कम्‌&amp;quot;म्तिनु?- कम्‌नति? कामूनति?- कान्ति च्कान्ति ।&lt;br /&gt;
(शी क्त प्रत्यय पर भएमा ग्रह र्‌ वच्‌ धातुका रकार्‌ र्‌ वकारका स्थानमाक्रमशः सम्प्रसारणसंज्ञक क्रकार र उकार हुन्छ, जस्तै : ग्रह--क्त? ग्रहन्तरटग्रह-इद्‌ त? गृहिन्त न्गृहीत, बच््‌--क्त? बच्‌नत? उच्ज्त च्ठक्त ।&lt;br /&gt;
(५) शकारको इत्संज्चालोप हुने प्रत्ययलाई छाडेर अन्य प्रत्यपहरू पर भएमा धातुकाए, ओ, ऐ, औ का स्थानमा आकार आदेश हुन्छ (अ. ६१४), जस्तै :ध्यैतल्युटट ध्यैमयुट ध्याम्युट ध्याठअन - ध्यान, ग्लै-क्तिन्‌ट स्लैकतिटपलाक्ति «ग्लानि, गै-क्तिन्‌ गैतिः गाकति (आकारको ईंकार, अ. ६४६६) तगीति आदि ।&lt;br /&gt;
(६) गुह्‌ र मु धातुदेखि क्त प्रत्यय पर भएमा धातुका उकारको दीर्घ हुन्छ भनेतव्य र तूच्‌ प्रत्यय पर हुँदा दृश्‌ र सृज्‌ धातुका क्रकारको रकार हुन्छ, जस्तै: गृहन-क्त « गृढ, मुहनक्त 5 मूढ, दृश्‌जतव्यत्‌ 5 द्रष्टव्य, दृशुजतृच्‌ तद्रष्टा, सुज्‌ज्तृच्‌ - स्रष्टा ।&lt;br /&gt;
यस्त प्रकार तत्सम नेपाली कृदन्तमा धातुमा रहेका अ, इ, उ, क्र वर्णको वृद्धिभएमा क्रमश: आ, ऐ, औं, आर्‌ हुन्छ भने इ, उ, क्र को गुण भएर क्रमश: ए,ओ, अर्‌ हुन्छु । धातुमा रहेका वा गुण र वृद्धिद्वारा घातुको स्वरमा परिवर्तित ए,औं, ऐ र औं स्वरवर्णका स्थानमा क्रमश: अय, अव, आय्‌ र आवका रूपमापरिवर्तन हुन्छ । त्यसै आरी विभिन्न परिवेशमा धातुमा रहेका अकारको आकार,आकारको इस्व इकार र दीर्घ ईकार, रकार तथा वकारको क्रमश: क्रकार रउकार, ए, ओ, ऐ, औ का स्थानमा आकार, उकारको दीर्घ ककार र क्चकारको&lt;br /&gt;
रकारका रूपमा समैत परिवर्तन हुन पुगेको पाइन्छ ।(गरिमा, २०६५, पूर्णाङ्क : ३०८, पृ.१०८-११३)&lt;br /&gt;
ति&lt;br /&gt;
अब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ ९&lt;br /&gt;
तत्सम नेपाली तड्ितान्त प्रातिपदिकमाआदि र अन्त्यस्वरको परिवर्तन&lt;br /&gt;
१. विषयप्रवेश&lt;br /&gt;
नेपाली भाषा संस्कृत भाषाबाट विकसित भएको भाषा हो । नेपाली भाषाकोशब्दभण्डारले करिब असी प्रतिशत संस्कृत शब्दहरू तत्सम र तद्‌भव शब्दकारूपमा भित्र्याएको छ । तद्भव शब्दको संरचनात्मक बिकासप्रक्रिया नुझ्न प्राकृतर अफग्रैश व्याकरणहरूको सहयोग अपेक्षित हुन्छ भने संस्कृत व्याकरणकोसहयोग नलिईकन तत्सम शब्दको संरचना बुझ्न सकिँदैन । प्रस्तुत आलेखमातत्सम नेपाली तद्धितान्त शब्दनिर्माण-प्रक्रियाका सन्दर्भमा प्रातिपदिकको आदि रअन्तमा रहेका स्वरवर्णहरूको परिवर्तन केकसरी हुन्छ ? भन्ने बारेमा सङ्क्षिप्तचर्चा गरिन्छ।&lt;br /&gt;
२. प्रातिपदिकमा आद्यस्वरको परिवर्तन&lt;br /&gt;
पाणिनीय व्याकरणमा तद्वित शब्दहरूको निर्माण गर्दा प्रातिपदिकका आद्यस्वरकोपरिवर्तन अर्थात्‌ वृद्धि गर्न निम्नलिखित तीन प्रमुख सूवहरू पढिएका छन्‌ :(१) तढितेष्वचामादे: (अ. &#039;७२११७)&lt;br /&gt;
यो सूत्रले अकारको इत्संज्ञालोप हुने अ, अन्‌, यन्‌, ठन्‌ आदि तद्धित प्रत्ययपर भएमा वा णकारको इत्संज्चा लोप हुने ण, अणू, णस्‌, छ्‌ आदि तद्धितप्रत्यय पर भएमा प्रकृतिमा रहेका आदिस्वरको वृद्धि अर्थात्‌ अ, इ/ए, उ/ओ रकावर्णका ठाउँमा क्रमश: आ, ऐ, औं र आर्‌ हुन्छ, जस्तै : भरत- अन्‌» भरत--अरभारत्‌तअ -्भारत, शरद्धानअणूट श्रद्ुतअट श्राद्ूतअ स्श्राद्ध ।(२) किति च ।अ. ७२११८)।&lt;br /&gt;
यो सूत्रले ककारको दत्संज्ञालोप हुने त्यक्‌, ढक्‌, ठक्‌, पक्‌ आदि तद्धितप्रत्यय पर भएमा प्रकृतिमा रहेको आदिस्वरको वृद्धि गर्दछ, जस्तै : व्यवहार--ठक्‌?व्यवहारतठट व्यवहार&amp;quot; इक? व्यबहार्‌नइक?” व्याबहार्‌न-इक ० व्यावहारिक ।(३) अनुशतिकादीनां च (अ. ज।२०)&lt;br /&gt;
यो सूजले नकार, णकार र ककारको इत्संज्ञालोप हुने प्रत्यय पर भएमाअधिदैव, अधिभूत, इहलोक, परलोक, मतुभुस आदि समस्त शव्दमा रहेकापूर्वोत्तरवर्ती दुबै पदको गर्दछ, : सर्वभूमि-अण्‌? सर्वभूमितअरसर्वभूम्‌जअट सार्वभूम्‌तअर- न-अ न सार्वभौम ।&lt;br /&gt;
पाणिनीय शकरतमा वप उ तीन सूत्ले अपेक्षा गरेका नकार, णकार रककारको दत्संज्ञालोप हुने निम्नलिखित पैंतालीसओटा तद्धित प्रत्यपहरू पढिएका छन्‌ :&#039;&#039; को इत्संज्ञालोप हुने प्रत्ययहरू&lt;br /&gt;
ज, अन्‌, यज्जू, ज्य, ब्यङ्‌, प्यज्‌ु, अयद, ढम्‌, नन्‌, नान्‌, स्नन्‌, इज्‌, च्फन्‌,उकज्‌, फिञ्‌, ढकज्‌, खन्‌, प्लन्‌, वुन्‌ र आहन्‌ ।&lt;br /&gt;
15 - ज्न्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
“ण&#039; को इत्संज्ञालौप हुने प्रत्यपहरू&lt;br /&gt;
ण, अण्‌, णस्‌, ण्य, ण्यत्‌ टेण्यण्‌, छण्‌, ढण्‌ टबण्‌, डचण्‌, णिनि र समसण्‌ ।&#039;क&#039; को इत्संञ्ञालौप हुनै प्रत्ययहरू&lt;br /&gt;
यक, ईकक्‌, ढक्‌, ढूक, फक, ठक्‌, ऐरक्‌, ढिनुक, बुक, कक्‌ र त्यक्‌ ।&lt;br /&gt;
संस्कृत व्याकरणमा आद्यत्वरको परिवर्तन गर्ने आधारका रूपमा नकार,णकार र ककारको इत्संज्ञचालोप हुने गरी पढिएका उपर्युक्त सबै तद्धित प्रत्ययहरूनेपाली भाषामा प्रयुक्त छैनन्‌ । उपर्युक्त प्रत्ययहरूमध्ये नेपालीमा विशेषत: अण्‌,अञ्जु, ण, ण्य, त्यक्‌, प्यज्‌, खज्‌, ठक्‌, ठ्‌ र ढन्‌ प्रत्ययान्त शब्दहरूको प्रयोगभएको पाइन्छ । पी प्रत्ययहरूमध्ये अण्‌, अन्‌ र ण प्रत्ययको &#039;अ&#039; मात्र शेष रहन्छभने ण्य र व्यन्‌ प्रत्ययको &#039;य&#039; तथा त्यक्‌ प्रत्ययको &#039;त्य&#039; मात्र बाँकी रहन्छ । ठक्‌र ठन्‌ प्रत्ययको &#039;ठ&#039; मात्र बाँकी रहने, &#039;ठ&#039; का ठाउँमा सामान्यत: &#039;इक&#039; आदेशहुने गर्दछ (ठस्ैक:, अ.७३।५०) । त्यस्तै खज्‌ र ढज्‌ प्रत्ययको &#039;ख&#039; र &#039;ढ&#039; बोषरहने तथा यी दुवैका ठाउँमा कमश: &#039;ईन&#039; र्‌ &#039;एय&#039; आदेश हुन्छ । यसरी उपर्युक्तदश प्रत्ययहरू नेपालीमा &#039;अ, य, त्य, इक, ईन र एय&#039; प्रत्ययका रूपमा प्रयोगमाआउँछन्‌ । यसै गरी अन्‌, यत्‌, ठच्‌, ख, ढ आदि तद्वित प्रत्ययहरू पनि क्रमश:&#039;अ, य, इक, र एय&#039; का रूपमा नेपालीमा प्रयोगमा आउन सब्ने हँदा संस्कृत मूलप्रत्यपहरूको स्वरूप ठम्याउन नसम्नै शिक्षकहरूलाई आदिस्वरको कहाँ बृद्धि गर्नेर कहाँ नगर्नै भन्नै द्विविधा पर्न सक्छ । त्यसैले नेपालीमा प्रयुक्त संस्कृतमूलकाकुनकुन तद्धित प्रत्ययहरूमा &#039;अ, ण, क&#039; को लोप भएको छ, त्यो पत्ता लगाउनुजशरी छ । यदि &#039;ज, ण, क&#039; को लोप भएको प्रत्यय पर छ भने तद्धितान्तप्रातिपदिकमा आदिस्वरको वृद्धि अबश्य हुन्छ अन्यथा हुँदैन भन्ने कुरा बुझ्न र्‌बुझाउन पाणिनिका उपर्युक्त तीन स्‌त्रका नियम र संस्कृतका मूल तद्धित प्रत्ययकोज्ञान हुनु आवश्यक छ ।&lt;br /&gt;
३. प्रातिपदिकमा अन्त्यस्बरको परिवर्तन&lt;br /&gt;
पाणिनीय व्याकरणमा तद्धित शब्दहरूको निर्माण गर्दा प्रातिपदिकमाअत्यस्वरको परिवर्तनका लागि मुख्यत: निम्नलिखित तीन सूत्रहरूको उपयोगगरिएको पाइन्छ :&lt;br /&gt;
[ई) यस्यैति च (अ. ४१४८)&lt;br /&gt;
यौ सूत्रले ईकार बा तद्धित प्रत्यय पर भएमा प्रातिपदिकको अन्तमा रहेकाअ, आ, इ, ई&#039; स्वरवर्णको लोप गर्दछ, जस्तै : गुखन-ठक?- मुखन उ? मुखनडक?मुख्‌ डक” मौखु-न्डक तमौखिक ।(५) ओगुंणः (अ. क्४१४६)&lt;br /&gt;
यो सूत्रले तद्वित प्रत्यय पर भएमा प्रातिपदिकको अन्तमा रहेका उबर्ण(उ, ज) को गुण भएर &#039;ओ&#039; हुन्छ, जस्तै : मनु-अणूट मनुत्अर मनोक्अरमनव्‌न-अ?- मातव्‌न-अ च्मानव ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शब्दनिर्माणप्रत्ररिया र सन्धि? ११&lt;br /&gt;
(६) एचोप्र्यवायावः (अ. ६१७८)&lt;br /&gt;
यो सूत्रले स्वरवर्ण पर भएमा धातु बा प्रातिपदिकको अन्तमा रहेकाऐ, औं&#039; वर्णका ठाउँमा क्रमश: &#039;अयु, अव्‌, आय, आव्‌&#039; आदेश गर्दछ, जस्तैदनुन्अणूट दनुनअर दनोन-अट दन्‌ अव्‌जअट दानव्‌तअ च्दानव ।&lt;br /&gt;
यस प्रकार तद्धित प्रत्यय लगाई शब्दनिर्माण गर्दा प्रातिपदिकको अन्तमारहेका स्वरवर्णहरूमध्ये &#039;अ, आ, ३, ई&#039; को अनिवार्यरूपमा लोप हुन्छ, &#039;उ, क&#039; को&#039;ओ&#039; गुण भएर &#039;अव्‌&#039; आदेश हुन्छ । क्रकारान्त पितृष्वस्‌ र मातृप्वस्‌&#039; :प्रातिपदिकका आकारको वैकल्पिकरूपमा लोप हुन्छ भने अन्य स्वरवर्णको चाहिँप्राय: परिवर्तन भएको पाइँदैन ।&lt;br /&gt;
४. आद्यन्तस्वरको परिवर्तन भएका प्रमुख उदाहरणहरू&lt;br /&gt;
यस अध्ययनमा माथि चर्चा गरिएका संस्कृत व्याकरणका ६ सूत्रहरूकोनियमानुसार स्वरवर्णको परिवर्तन भएका प्रतिनिधिमूलक तत्सम नेपाली तद्वितान्तशब्दहरूको विबरणात्मक सूची निम्नानुसार छ :&lt;br /&gt;
(क) सुत्र (१) र (४) को नियम लागैका शब्दहरू&lt;br /&gt;
श्रबण ५ अण्‌ न श्राबणविशाखा &amp;quot; अण्‌ ८ वैशाखकृतिका - अण्‌ « कार्तिकमघा &amp;quot;. अण्‌ - माघचित्रा 4 अण्‌ -« चैत्रउचित न प्यज्‌ न औचित्यकुटिल &amp;quot; ष्यमू न कौटिल्यदुर्बल न प्यन्‌ न दौर्वल्य&lt;br /&gt;
धर ५ यन 2 वै&lt;br /&gt;
निपुण 4: ष्यन्न 5 नैपुण्य&lt;br /&gt;
- अण्‌ - पाशुपत अधुना ५ ठज्‌&lt;br /&gt;
क्ण्यन तत्काल&amp;quot;-उज्‌ च्तातपुबिवी - अन्न्‌ ८ पार्थिव समय - ठन्‌ त्सामयिकभरत &amp;quot; अन्‌ न भरत दिन त ठन्‌ न दैनिकदेव &amp;quot; अज्‌ - दैव सप्ताहन-ठन्‌- साप्ताहिकपुत्र त अन्‌ ८ पौत्र पक्ष क ठन्‌ न पाक्षिककश्यप - अज्‌ न काश्यप मास न ठन्‌ न मासिकअरद्वाज १ अन्‌ - भारद्वाज त्रिमास &amp;quot; ठन्‌ « त्रैमासिककुशिक &amp;quot;- अन्‌ - कौशिक बर्ष क ठन्‌ ० बार्षिकशिव &amp;quot; अण्‌ न शौँव अध्यात्म-ठज्‌- आध्यात्मिकरवण &amp;quot; अण्‌ - रावण ग्राम &amp;quot; खन्न उ ग्रामीणमुनि &amp;quot; अण्‌ न मौन छव्रत ण न छात्रसम्राज्य &amp;quot; अण्‌ -्साम्राज्य सर्वजननठज्‌ व्सार्वजनिकपुष ५ अण्‌ ८ पौष लोक ५ ठन्‌ - लौकिक&lt;br /&gt;
श्रद्धा &amp;quot; अण्‌ न श्राद्धकुशल -- अण्‌ - कौशलशक्ति &amp;quot; अण्‌ न शाक्तकुमार &amp;quot; अण्‌ - कौमारमिथिला - अण्‌ « मैथिलमिथुन &amp;quot; अण्‌ - मैथुनबार्ग ७ यन्‌ न गार्ग्यचणक &amp;quot; यन्न्‌ - चाणक्यशूर - ष्यन्‌ न शौर्यसुन्दर &amp;quot; प्यञ् ख्सौन्दर्यआदि ।&lt;br /&gt;
१२  शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि(ख) सुत्र (२) र्‌ (४) को नियम लागेका शब्दहरू&lt;br /&gt;
क ढक्‌ न आत्रैय&lt;br /&gt;
अगिन ३ ढक्‌ 5 आग्नेयमृकण्डु &amp;quot; ढक्‌ - मार्कण्डेयवाराणसी 4- ढक्‌ - वाराणसेयगङ्गा ५ ढक्‌ « गाङ्गौयकुन्ति &amp;quot; ढक्‌ ८ कौन्तैयविनता ३ ढक्‌ ८ बैनतेयरारा &amp;quot; ढक्‌ - राधैय&lt;br /&gt;
अतिथि ५ ढक्‌ - आतिथेयपुरस्‌ &amp;quot; त्यक्‌ 5 पौरस्त्यपश्चात्‌ । त्यक्‌ - पाश्चात्यइतिहास १ ठक्‌ - ऐतिहासिकपुराण १ ठक्‌ ८ पौराणिकबसन्त &amp;quot; ठक्‌ « वासन्तिकव्यवहार &amp;quot; ठक्‌ - व्यावहारिकवेतन २ ठक्‌ ठ वैतनिक&lt;br /&gt;
शब्द न ठक्‌ न शाब्दिकअस्ति १ ठक्‌ 5 आस्तिकनास्ति - ठक्‌ 5 नास्तिक&lt;br /&gt;
वैद त ढक्‌ न वैदिक&lt;br /&gt;
मुख 4. ठक्‌ ८ मौखिक&lt;br /&gt;
बुद्धि 1 ठक्‌ न बौद्धिक&lt;br /&gt;
धर्म - ठक्‌ न धार्मिक&lt;br /&gt;
नीति &amp;quot; ठक्‌ न नैतिक&lt;br /&gt;
समाज &amp;quot;- ठक्‌ « सामाजिकशरीर &amp;quot; ठक्‌ ठ शारीरिककल्पना &amp;quot; ठक्‌ 5 काल्पनिकतर्क २ ठक्‌ _ तार्किकअलङ्गकारन- ठक्‌ न आलङ्कारिकअङ्ग ० ठक्‌ न आङ्गिकआत्म &amp;quot; ठक्‌ - आत्मिकअधिकार -- ठक्‌ न आधिकारिकअनुमान न ठक्‌ न आनुमानिक&lt;br /&gt;
अनुवंश १ ठक्‌ विजामुदगाक [शिकअन्तर ५ ठक्‌ लू 2०:6124अपेक्षा - ठक्‌ न आपफैक्षिकअभ्यास -- ठक्‌ ८ आभ्यासिकअभ्युदय १ ठक्‌ न आभ्युदयिकअर्थ » ठक्‌ - आर्थिक&lt;br /&gt;
अबधि &amp;quot; ठक्‌ 5 आवधिकइच्छा 7 ठक्‌ 5 ऐच्छिक&lt;br /&gt;
उद्योग न ठक्‌ नउपचार 4. ठक्‌ 5 औपचारिकउपदेश १ ठक्‌ 5 औपदेशिकउपनिवेश&amp;quot; ठक्‌ - औपनिवेशिकउपन्यास 4 ठक्‌ ० औपन्यासिककर्घ्वदेह &amp;quot;- ठक्‌ - औषर्वदेहिकगृहस्थ 4 ठक्‌ ठ गाहंस्थिक&lt;br /&gt;
नाम &amp;quot; ठक्‌ न नामिक&lt;br /&gt;
परस्पर न. ठक्‌ - पारस्परिकपरिभाषा  ठक्‌ 5 पारिभाषिकपरिवार ।- ठक्‌ ० पारिबारिकघरिश्चम &amp;quot; ठक्‌ - पारिश्रमिकपुष्ट न&amp;quot; ठक्‌ ठ पौष्टिक&lt;br /&gt;
प्रतिपद &amp;quot;- ठक्‌ ८ प्रातिपदिकप्रथम १ ठक्‌ - प्राथमिक&lt;br /&gt;
प्रज्ञा उक्‌&lt;br /&gt;
प्रयोग - ठक्‌ ठ प्रायोगिकप्रबिधि ० ठक्‌ - प्राविधिकप्रश्न &amp;quot; ठक्‌ ठ प्राश्निकप्रसङ्गा १ ठक्‌ « प्रासङ्गिकमङ्गल &amp;quot;५ ठक्‌ « माङ्गलिकमध्यम । ठक्‌ न माध्यमिकमूल ५ ठक्‌ « मौलिकमुद्रा » ठेक्‌ न मौद्रिकयज्ञ 1 ठक्‌ न याञ्चिक&lt;br /&gt;
यन्त्र १ ठक्‌ - यान्त्रिकयोग -- ठक्‌ ८ यौगिकलिङ्गमा न ठक्‌ - तैद्वगिकविचार &amp;quot; ठक्‌ न वैचारिकविज्ञान न ठक्‌ - वैज्ञानिकबिदेश &amp;quot; ठक्‌ न वैदेशिकविधान २ ठक्‌ 5 वैधानिकबिबाह ५ ठक्‌ ० बैबाहिकविषय न ठक्‌ न वैषयिकशिक्षा &amp;quot; ठक्‌ ८ शैक्षिकशिक्षण त ठक्‌ न शैक्षणिकसङ्केत २ ठक्‌ - साङ्केतिकसङ्गीत &amp;quot; ठक्‌ - साङ्गीतिकसस्त्व 7 ठक्‌ 5 सात्विक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ १३&lt;br /&gt;
एकान्त २ ठक्‌ 5 ऐकान्तिक सापेक्ष २ ठक्‌ 5 सापेक्षिव&lt;br /&gt;
डृह ५ ठक्‌ ठ ऐहिक समर - ठक्‌ ट सामरिकसमुद्र &amp;quot; ठक्‌ « सामुद्विक समास &amp;quot; ठक्‌ « सामासिकसमूह १ ठक्‌ 5 सामूहिक साप गाय &amp;quot; ठक्‌ 5 सामुदायिकसम्प्रदाय 4 ठक्‌ ० साम्प्रदापिक सहित क ठक्‌ 5 साहित्यिकसर्वकाल 7 ठक्‌ - सार्वकालिक सिद्धान्त १&amp;quot; ठक्‌ 5 सैद्धान्तिक ।&lt;br /&gt;
(ग) सूत्र (३) र (४) को नियम लागेका शब्दहरूअघिदैबनठन्‌ त्आघिदैनिव&lt;br /&gt;
अधिभूतन-ठन्‌ -आधिभौतिकइहलोक--ठज “ऐहलौकिक&lt;br /&gt;
(घ]&lt;br /&gt;
जिद्रह0 |4जैहो|। ८: |श्रहीजजरपी८1&lt;br /&gt;
कुरु क भन्‌ ८ कौरब [रघु - अण्‌ ८5 राधघव [लघु &amp;quot; अण्‌ 5 लाघबबिष्णु &amp;quot; अण्‌ « वैष्णव | यदु &amp;quot; अण्‌ न यादव | शिशु &amp;quot; अण्‌ 5 शौशबमनु » अण्‌ - मानब मधु न अण्‌ « माधब | भरु &amp;quot; अण्‌ ८ म्रैरन ।&lt;br /&gt;
म्‌ न अण्‌ ८ दानब क अणु ट गौरब&lt;br /&gt;
५. उपसंहारपाणिनीय व्याकरणमा विभिन्न अर्थमा नेपालीमा प्रयोग हुनसक्ने उपर्युक्त अण्‌आदि प्रत्ययहरू विधान गर्ने सृत्रहरूको सङ्ख्या धेरै छ, जसको अध्ययन र्‌विश्लेषण यस प्रकारको सङ्क्षिप्त लेखमा सम्भव छैन । त्यसैले यस अध्ययनमातत्सम नेपाली तद्धितान्त शब्दको रचनाप्रक्रिया अवगत गराउनका लागि सामान्यदिग्दर्शनमात्र प्रस्तुत गर्ने प्रयास गरिएको हो । यहाँ चर्चा गरिएका संस्कृतकाउपर्युक्त दश तद्धित प्रत्ययहरू नेपालीमा प्रयोगमा आउँदा &#039;अ, य, त्य, इक, ईन,एय&#039; गरी ६ प्रत्ययमात्र देखिन पुगेका छन्‌ । प्रयोगावस्थाका &#039;अ&#039; आदि प्रत्ययलाई&#039;अण्‌, अन्‌, ण&#039; आदि प्रत्ययका रूपमा पढ्नुको प्रयोजन लौकिक संस्कृतमाआदिवृद्धि गर्नु हो भने वैदिक संस्कृतमा आदि उदात्त, मध्य उदात्त, अन्त उदात्तआदि स्वरनिर्धारणसमेत गर्न हो, किनकि पाणिनिले वैदिक संस्कृत र लौकिकसंस्कृत दुवैका लागि उपयोगी हुने किसिमले व्याकरणको निर्माण गरैका थिए ।फलस्वरूप नेपाली, हिन्दी, मैथिली, भोजपुरी आदि आधुनिक आर्यभाषाहरूमा प्रयोगगरिने तत्सम शब्दहरूको रचनाप्रक्रिया वुझ्न पनि लौकिक संस्कृतमा आधारितपाणिनीय सूजका नियमहरू बढी मात्रामा उपयोगी सिद्ध भएका छन्‌ । त्यसैलेनेपालीमा यस्ता सूत्रहरूको प्रायोगिक अध्ययनविशलेषण हुन सकेमा नेपालीभाषाको शव्दनिर्माणप्रकियामा देखिएका कतिपय समस्याहरूको समाधान गर्दै जानसकिने प्रबल सम्भावना देखिन्छ ।(गरिमा, २०६४, पूर्णाङ्क ; ३०४, पृ.१०२-१०५)&lt;br /&gt;
[|&lt;br /&gt;
१४ / जब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
नेपालीमा प्रयुक्त संस्कृतमूलकाप्रमुख समस्त शब्दहरूको निर्माणप्रक्किया&lt;br /&gt;
१. विषय-प्रबेश&lt;br /&gt;
बस्‌ उपसर्गपूर्वक सत्तार्थक अत धातुदेखि भावार्थक घन प्रत्यय लागी धातुकाउपान्त्य अकारको आकारका रूपमा वृद्धि (अ.७२११७) भएर समात शब्दव्युत्पन्न हुन्छ । समास शब्दले समष्टि, मेलमिलाप, सम्मिश्रण, सङ्ग्रह, पूर्णता,सङ्क्षिप्तता आदिलाई बुझाउने (आप्टे, २००७, पृ.१०७८) भए पनिव्याकरणशास्त्रमा सार्थक अनेक शब्दहरूको सम्मिश्रणलाई सगात मानिन्छ । यहाँसंस्कृत समासको वर्यीकरणसहित नेपालीमा प्रयोग गर्ने गरिएका संस्कृतमूलकाप्रमुख समस्त शब्दहरूको निर्माणप्रक्रियाका बारेमा सङ्क्षिप्त अध्ययन प्रस्तुतगरिएको छ।&lt;br /&gt;
२. समासकी वर्गीकरण&lt;br /&gt;
पदार्थप्रघानका आधारमा संस्कृत समासलाई अव्ययीभान तत्पुरुप बहुब्रीहि रक्वन्ञ्नका चामले चार प्रकारमा विभाजन गरिएको पाइन्छ ।दीक्षित, १९५२, पृ.२१६) ।तत्पुष्पको भेदविशेषलाई कर्मधारय सम्रास र कर्मघारयको भेदविशेषलाई «युयमा मानिन्छ (पूर्ववत्‌/पू., पृ.२१७) । नेपालीमा संस्कृत समासका कर्मधारय रदिए दुई उपभेदलाई पनि प्रमुख भेदकै रूपमा ग्रहण गरी नेपाली समासलाई छप्रकारमा वर्गीकरण गरिएको देखिन्छ । संस्कृतमा पदार्थप्रधानका अतिरिक्त सुवन्तर तिङन्त पूर्वपदका आधारमा समासलाई प्रमुख छ प्रकारमा समेत विभाजनगरिएको भेटिन्छ (पू.) । परन्तु पदका आधारमा वर्गीकृत संस्कृत समास्का छप्रकारहरूको संस्कृतमैँ पृथक्‌ रूपमा अध्ययन-विश्लेषण भएको पाइँदैन भने त्यसकिसिमका वर्गीकरणको प्रभाव नेपालीमा समेत परेको देखिँदैन । संस्कृतव्याकरणमा भट्टोजि दीक्षितले अलुक्‌ तमाख्लाई छुट्टै प्रकरणका रूपमा अध्ययनगरेका (सिद्वान्तकौमुदी/सि.कौ.२, पृ.२२९-२३९) र त्यसकै प्रभावमा नेपालीमासमासको सातौं भेदका रूपमा अलुक्‌ तमात स्वीकृत भएको पाइन्छ । संस्कृतकोअलुक्‌ ससातमा द्वितीयादेखि सप्तमीसम्मका विभक्तिहरूको लोपनिपेध भएकोझटिन्छ भने नेपाली अलुक्‌ समातमा पप्ठी विभक्तिका साथै तय; र आदि शब्दकोलोप भएको देखिन्छ । नेपालीमा र एवम्‌ तया शाब्दको लोप नहुनुलाई द्वन्दतमाहको निषेध पक्षका रूपमा र संस्कृत एवम्‌ नेपालीमा विभक्तिको लोपनहुनुलाई तत्युरुष समाचको निषेध पक्षका रूपमा ग्रहण गर्न सकिने भएकालेअलुक समासलाई पृवक्‌ समास मान्न उपयुक्त देखिँदैन । त्यसैले संस्कृत र नेपाली&lt;br /&gt;
शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ १९४&lt;br /&gt;
दुबै वाङ्गमयमा अव्ययीभाद तत्पृल्य करयघारय्‌ दिए बहुद्रीहि र ड्वनका नामलेसमासका प्रमुख छ भेद बहुप्रसिद्ध रहँदै आएको देख्न सकिन्छ ।&lt;br /&gt;
३. अव्ययीभाव समास&lt;br /&gt;
अव्यय शाब्दको योग्य, पुनरुक्ति, पदार्थको अतिक्रमण नगर्ने, क्रमिकता आदिअर्थमा रहेका शब्दहरूका साथमा समास हुने प्रक्रियालाई अन्ययीमाब समासमानिन्छ (अ.२१।६) । अव्ययीभाव समास भएका सबै शब्दहरू अव्ययमा परिणतहुन्छन्‌ (अ.१।१।४१), जस्तै :&lt;br /&gt;
१. शक्ति भएसम्म क» यवाशक्ति२. सम्भव भएसम्म यथासम्भव३. रूपको योग्य न अनुरूपड. दिन दिन प्रति न प्रतिदिन१, एकएक प्रति न प्रत्येक&lt;br /&gt;
६. क्रमको अनुसार क अनुक्रम७, अक्षि (आँख्ला) को प्रति (अघि) - प्रत्यक्ष५. अक्षिको पर (पछि) न परोक्ष&lt;br /&gt;
९. अक्षिको योग्य (नजिक) चन समक्ष&lt;br /&gt;
उपर्युक्त समस्त शाब्द १-७ र ९ को विग्रहमा समास गरिने शाब्दभन्दा अन्यशब्दहरू राखेर विग्रह गरिएकाले यस प्रकारको विग्रहलाई संस्कृतमा अस्वपदविग्रह मानिएको पाइन्छ (दीक्षित, पू., पृ.२१६) । विग्रहमा शक्ति आदि शब्दहरूपूर्वमा रहे पनि समासविधायक नियम (अ.२॥१।६) मा अर्थविशेषका द्योतक यथा,अनु प्रति पर र तस्‌ शब्दहरू प्रयमान्तमा रहेकाले सिनको उपहर्जन बज्चा हुने (अ.१।२१४३) हुँदा यिनीहरू समस्त शब्दको अगाडि प्रयोग (अ.२।२३८) गरिएकाहुन्‌ । समस्त शब्द ७-९ मा समासान्त टच्‌ (अ) प्रत्ययको व्यवस्था गरिएको (अ.५॥४।१०७) हुँदा त्यसलाई निमित्त मानेर अक्षि शब्दका इकारको लोप हुन्छ (अ.धाष१४५) । समासान्त टच्‌ (अ) प्रत्ययको विधान गर्नुको सामर्थ्यलेअव्ययभिन्न पर शब्दको समेत अभि शन्दका साथमा अव्ययीभाब समास प्रवृत्त (दीक्षित, पू., पृ.र८) भएर परोक्ष शब्द सिद्ध हुन्छ । समस्त शब्द १-९ मा पूर्ववर्तीयय अनु प्रति प्र र तमू शब्दको अर्थ मुख्य रहेको हुँदा यी सबै समस्तशाब्दहरूलाई पदार्थप्रघानका आधारमा अव्ययीभाव स्मात मानिएको हो ।&lt;br /&gt;
४. तत्पुरुष समास&lt;br /&gt;
पदार्थ प्रधानका आधारमा तत्पुरुष समासलाई उत्तरपदार्यप्रधान हुने समासमानिन्छ । स्बपदविग्रहात्मक विभक्तिप्रधान एवम्‌ नन्‌ माब्दप्रधान र्‌अस्वपदविग्रहात्मक उपपदप्रधानका आधारमा नेपालीमा प्रयुक्त संस्कृतमूलकतत्पुरुष समास्तलाई मुख्यतः तीन प्रकारमा विभाजन गर्न सकिन्छ : १. विभक्तितत्पुष्ष समास, २. नन्‌ तत्पुरुष समास र ३. उपपद तत्पुरुष समात् ।&lt;br /&gt;
१६ सन्दनिर्माणप्रक्तिया र सन्धि&lt;br /&gt;
४.१ विभक्ति तत्पुरुष समासप्मास गरिने पूर्ववर्ती आधार शब्द द्वितीयादेखि सप्तमी विभक्तिसम्मकोहुनसक्ने भएकाले विभफ्तिप्रधान तत्पुरुष समासलाई छ प्रकारमा बर्गीकरण गरिन्छ :१. द्वितीया तत्पुरुष समास, २. तृतीया तत्पुरुष समास,३. चतुर्थी तत्पुर्ष समास, ४. पञ्चमी तत्पुरुष समास,५, षष्ठी तत्युख्ष समास र्‌ ६. सप्तमी तत्पुश्ष समास ।&lt;br /&gt;
४.१.१ द्वितीया तत्युरुष समास&lt;br /&gt;
द्वितीया विभक्ति अन्तमा हुने शब्दको प्राप्त गत; पतित आदि शब्दकासाथमा समास हुन्छ (अ.२।१।२४), जस्तै :&lt;br /&gt;
१०. स्वर्गलाई प्राप्तञ्स्वगप्राप्त&lt;br /&gt;
११. सुखलाई प्राप्त व्सुखप्राप्त&lt;br /&gt;
माथिका समस्त शब्द १० र ११ मा द्रवितीयान्त त्वर्ग र तुख शब्दको प्राप्तशव्दका साधमा समास हुँदा द्वितीयाको लाई विभक्तिचिहनको लोप भएको छ।&lt;br /&gt;
४.१.२ तृतीया तत्पुरुष समास&lt;br /&gt;
तृतीया विभक्ति अन्तमा हुने कर्ता र करण कारकको कुदन्त शब्दका साथमासमास हुन्छ (अ. २१।३२), जस्तै :&lt;br /&gt;
१२. ईश्वरले दत्त च्ईैश्वरदत्त&lt;br /&gt;
१३. प्रकृतिले प्रदत्त चप्रकृतिप्रदत्त&lt;br /&gt;
१४, हस्तले लिखित “हस्तलिखित&lt;br /&gt;
१५, मन्त्रले मुग्ध “मन्त्रमुग्ध&lt;br /&gt;
१६. मदले उन्मत्त त्मदोन्मत्त&lt;br /&gt;
१७. वचनले बद्ध च्वचनबद्ध&lt;br /&gt;
१५. नियमले बद्ध च्नियमबद्ध&lt;br /&gt;
१९. रोगले पीडित -रोगपीडित&lt;br /&gt;
२०. तर्कले युक्त -्तर्कयुक्त&lt;br /&gt;
२१. बुद्धिले हीन च्बुद्धिहीन&lt;br /&gt;
उपर्युक्त समस्त शव्द १२-२१ मा तृतीयान्त इशकट्‌ एकृति हत्त; मन्त्र सद्‌वचन; बियस; रोग; तर्क र बृद्धि शब्दको क्त (त) कुत्प्रत्ययान्त दत एकतालिबित मुग्ध मत्त बद्ध पीडित युक्त र हीव शब्दका साथमा समास हुँदातृतीयाक्लो ले विभक्तिचहनको लोप भएको छ ।&#039;४.१.३ चतुर्थी तत्पुरुष समास&lt;br /&gt;
चतुर्थी विभक्ति अन्तमा हुने शब्दको बलि; हित आदि शब्दका साथमा समासहुन्छ (अ. २१।२६), जस्तै :&lt;br /&gt;
रर, भूतहरूका लागि बलि तभूतबलि&lt;br /&gt;
शबन्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ १७&lt;br /&gt;
२३. देवहरूका लागि बलि -्दैवबलि२४. लोकका लागि हित च्लोकहित२५. गुरुका लागि दक्षिणा -गुरुदक्षिणा&lt;br /&gt;
माथिका समस्त शब्द २२-२५ मा चतुर्य्यन्त श्रृत देव जोक र जन शब्दकोयलिः हित र दक्षिणा शब्दका साथमा समास हुँदा चतुर्थीको हरूका लागिर कालागि विभक्तिचिल्नको लोप भएको छ ।&lt;br /&gt;
४.१.४ पञ्चमी तत्पुर्ष समास&lt;br /&gt;
पञ्चमी विभक्ति अन्तमा हुने शव्दको भय (अ.२१।३७), बृत् प्रतित आदि (अ.२१।३८) शब्दका साथमा समास हुन्छ, जस्तै :&lt;br /&gt;
२६. चोरबाट भय त्चोरभय&lt;br /&gt;
२७. राजाबाट भय -«्राजभय&lt;br /&gt;
२०. दुःखबाट मुक्त च्दुःखमुक्त&lt;br /&gt;
२९, बन्धनबाट मुक्त -्बन्धनमुक्त&lt;br /&gt;
३०, पदबाट मुक्त «पदमुक्त&lt;br /&gt;
३१. पापबाट मुक्त नपापमुक्त&lt;br /&gt;
उपर्युक्त समस्त शव्द २६-३१ मा पञ्चम्यन्त चोट राज बुबा बन्धन पार एफ शब्दको भय र मुक्त शब्दका साथमा समास हुँदा पञ्चमीको बाटविभक्तिचिहनको लोप भएको छ।&lt;br /&gt;
४.१.५ षष्ठी तत्पुरुष समास&lt;br /&gt;
घप्ठी विभक्ति अन्तमा हुने शब्दको एकदेशी (अ.२।२।१) बा एकदेशिभिन्त (अ.शाराद) प्रधमान्त शब्दका साथमा समास हुन्छ, जस्तै :&lt;br /&gt;
३२. अहन्‌ (दिन) को मध्य त्मध्याह्त&lt;br /&gt;
३३. अहनूको अपर न्अपरात्टण&lt;br /&gt;
३४, भाषाको विज्ञान -भाषाविज्ञान&lt;br /&gt;
३५. समाजको शास्त्र व्समाजशास्त्र&lt;br /&gt;
३६, चरित्रको चित्रण त्चरित्रचित्रण&lt;br /&gt;
३७. सभाको पति “सभापति&lt;br /&gt;
ईद. दृष्टिको कोण दृष्टिकोण&lt;br /&gt;
३९, राष्ट्रको सेवक “राष्ट्रसेवक&lt;br /&gt;
४०. पुस्तकहरूको आलयःतपुस्तकालय&lt;br /&gt;
प्‌. विद्याको आलय -विद्यालय&lt;br /&gt;
४२. शौचको आलय तशौचालय&lt;br /&gt;
४३. हिमको आलय «हिमालय&lt;br /&gt;
४४, छात्र/छात्राहरूको आवास न्ञ्छात्रावास&lt;br /&gt;
डक, गणहरूको तन्त्र च्गणतन्त्र&lt;br /&gt;
१८ / शब्ठनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
माथिका समस्त शव्द ३२-४५ मा षष्ठ्चन्त अहदु भाषा; समाज; चरित्र तमादृष्टि राष्ट्र एस्तक विदा शौच हिम घात घाजा र गण शब्दको एक्देशी मध्यर अपर शब्द तथा एकदेशिभिन्न बिज्ञाद शास्डु चित्रण पति कोण; सेवकआलय आवास र तन्त् शब्दका साथमा समास हुँदा षष्ठीको को र हरूकोविभक्तिचिहनको लोप भएको छ।&lt;br /&gt;
४.१.६ सप्तमी तत्पुरुष समाससप्तमी विभक्ति अन्तमा हुने शब्दको कुशल तिएृण प्रवीण आदि(अ.शपा४०) र बिद्ध बन्ध् आदि (अ.२१।४१) शब्दका साथमा समास हुन्छ, जस्तै४६. व्यवहारमा कुशलन्व्यवहारकुशल४७, आचारमा निपुण -्आचारनिपुण४५. कलामा प्रवीण व्कलाप्रवीण४१, विश्वमा प्रसिद्ध त्बिश्वप्रसिद्ध&lt;br /&gt;
उपर्युक्त समस्त शब्द ४६-४९ मा सप्तम्यन्त व्यबहार आचार, कला रविश्व शन्दको कुशल; तिप्‌ण प्रवीण र प्रविद्ध शब्दका साथमा समास हुँदासप्तमीको गा विभक्तिघहनको लोप भएको छ।&lt;br /&gt;
४.२ नज्‌ तत्मुरुष समास&lt;br /&gt;
प्रथमान्त नन्‌ (न) शब्दको प्रथमान्त अन्य शब्दका साथमा समास हुने(अ.श२६) प्रक्रियालाई तन्‌ तत्पुरुष तमात भनिन्छ । नन्‌ समाच भएपछि नमूशब्दका आद्य नकारको लोप हुन्छ (अ.६।३७३) । नकारको लोप भएपछि उत्तरवर्तीशब्दको आदिमा स्वरबर्ण छ भने त्यसको अगाडि नुट्‌ (न्‌) आगम हुन्छ (अ.६३७४), जस्तै&lt;br /&gt;
| ह् न स् क. न आदर त्अनादर&lt;br /&gt;
५१. न उदार च्अनुदार ६७, न आदि तअनादि&lt;br /&gt;
५२. न उपस्थित च्अनुपस्थित ध््द, न अभ्यास न्अनभ्यास५३. न आगत न्अनागत ६१९, न आयास -्अनायधास५४. न अशन न्भनशन ७0, न आर्य उअनार्य&lt;br /&gt;
५५. न अवकाश न्अनवकाश ७१. न आवश्यक -न्अनावश्यक५६, न अद्विकत न्अनड्रिकत ७२. न आवरण -्ञअनावरण५७. न अधिकार न्अनधिकार ७३. न आस्था च्अनास्था५३४. न अधिकृत च्अनधिकृत ७४, न इच्छा च्अनिच्छा५९. न अनुनासिक-्अननुनासिक ७५, न इष्ट न्अनिष्ट&lt;br /&gt;
६०. न अन्त च्अनन्त ७६.&lt;br /&gt;
६१. न अन्तर न्अनन्तर ७७. न &#039;अनुक्त&lt;br /&gt;
६र्‌. न अन्य न्अनन्य ७५. न उत्तर च्अनुत्तर&lt;br /&gt;
६३. न अपेक्षित न्अनपेक्षित ७९, न उत्पादक अनुत्पादक६४, न अभ्रिज्ञ च्अनभिज्ञ ०. न उपकार त्अनुपकार&lt;br /&gt;
धन, न अर्थ ज्अनर्थ ८१. न उपयोगी उठ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ १९&lt;br /&gt;
क न्अनुपलब्ध ९२. न भाव न्अभावद३. न उत्तीर्ण “अनुत्तीर्ण १००. न पार न्भपारदाई, न एक नअनेक १०१. न खण्ड न्अखण्ड5५. न औचित्य न्अनौचित्य १०२. न पूर्व च्अपूर्वदई. न औपचारिकन्अनौपचारिक १०३. न व्यवस्था च्अव्यवस्था७. न सत्य च्असत्य १०४, न सहाय न्असहाययक. न नित्य न््अनित्य १०५. न विश्वास च्अविश्वास२९, न नियन्त्रित चअनियन्त्रित १०६. न चल न्अचल९०. न नियमित -अनियमित १०७. न गति न्अगति९१. न निर्धारित -अनिर्घारित १०६. न क्षय च्अक्षय९२. न निश्चित ज-अनिश्चित १०९. न खाद्य -अखाद्य९३. न नैतिक “अनैतिक ११०. त घोर --अघोर९४, न ज्ञात उ्ञज्ञात १११. न पुष्ट ज्अपुष्ट९५. न सन्तोष तअसन्तोष ११२. न पूर्ण ज्अपूर्ण९६. न स्थिर उअस्विर ११३. न प्रिय ज्अप्रिय९७. न न्याय ज्अन्याय ११४, न दृष्ट जअदृष्ट९६८. न धर्म ज्अधर्म&lt;br /&gt;
माथिका समस्त शब्द ५०-११४ मा पूर्ववर्ती न शब्दको उचित आदिउत्तरवर्ती शब्दका साथमा समास हुँदा पूर्ववर्ती न शब्दका आच्य नकारको लोप भईअकारमात्र बाँकी रहेको र ५०-०%६ शाब्दमा अबश्िष्ट अकारदेखि स्वरवर्ण आदिमाहुने उचित आदि शब्द पर भएकाले ती शब्दको अगाडि ढुद्‌ (न्‌) आगम भएको छभने ८७-११४ मा व्यञ्जनवर्ण आदिमा हुने सत्य आदि शब्द पर भएकाले तीशब्दको अगाडि नकारको आगम अप्रवृत्त भएको छ ।&lt;br /&gt;
नन्‌ तत्पुरुष समास भएका सबै शब्दले नग्देखि उत्तरवर्ती उचित आदिशब्दको विपरीत अर्थलाई बुझाउँछन्‌ । नेपाली भाषाको शब्दभण्डारलाई समृद्धतुल्याउन नञ्‌ समास भएका शाब्दहरूको महत्त्वपूर्ण योगदान छ । परन्तु नजसमास भएका शान्दको अगाडि रहने अ र अद्‌ लाई नेपालीमा पूर्वसर्ग स्वीकारगरी (पोखरेल, २०५५, पृ.१, २९; अधिकारी, २०५७, पृ.१२६) नन्‌ समास भएकाशब्दहरूलाई समस्त शब्दका रूपमा ग्रहण गरिएको पाइँदैन । अ र अन्‌ दुवैलाईसंस्कृतमा उपसर्गका रूपमा ग्रहण नगरिएको हुँदा संस्कृतमूलका यस प्रकारकासवै शब्दलाई संस्कृत व्याकरणमा झैं नेपाली व्याकरणमा पनि नन्‌ समायकाजाव्दका रूपमा अध्ययन गर्न उपयुक्त देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
४.३ उपपद तत्पुरुष समास&lt;br /&gt;
संस्कृत व्याकरणको कृदन्त प्रकरणमा कर्म, करण र्‌ अधिकरण कारकलेयुक्त शव्दपूर्वक धातुदेखि अम्‌ आदि प्रत्ययको विधान गर्ने सूहरू सप्तमीबिभक्तिमा पढिएका पाइन्छन्‌ । त्यस्ता सप्तमी विभक्तिले निर्देश गरेका कुम्भ आदिशब्दलाई एप मानिन्छ (अ.३१।९२) । उपपद मानिने त्यस्ता कुम्भ आदि&lt;br /&gt;
२० / शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
शब्दसँग तिडन्तभिन्न शब्दहरूको समास हुने (अ. २२१९) प्रक्रियालाई उप्पदतत्युहुय वसात भनिन्छ, जस्तै :&lt;br /&gt;
११५. कम्भलाई बताउने त्कुम्भकार११६, इतिहासलाई बनाउने न्हतिहासकार११७. स्वर्णलाई बनाउने न्स्वर्णकार्‌११८. चित्रलाई बनाउने चित्रकार१११, कथालाई बनाउने नंकथाकार&lt;br /&gt;
१२०. निवन्धलाई बनाउने ठनिबन्धकार१२१. आत्मालाई घात गर्ने “आत्मघाती१२२, विश्वासलाई घात गर्ने «विश्वासघाती१२३, सुविधालाई ओग गर्ने च्सुविधाभोगी&lt;br /&gt;
१२४, प्रेरणालाई दिने खप्रैरणादायी१२५. आरामलाई दिने -आारामदायी१२६, सत्तालाई धारण गर्ने व्सत्ताधारी१२७. सत्यलाई बोल्नै न्म्सत्यवादी१२५. मर्मलाई जान्ने न्मर्मज्ञ&lt;br /&gt;
१२९, शिक्षालाई जान्ने खशिक्षाविद्‌१३०. इतिहासलाई जान्ने : -च्दतिहासविद्‌१३१, आषालाई जान्ने सभाषाविद्‌१३२. भयलाई उत्पन्न गर्ने तभयङ्कर्‌१३३. सेनाहरूलाई लैजाने च्सेनानी१३४, अग्र (अगाडि) लैजाने त्अग्रणी&lt;br /&gt;
१३१, श्रमले जिउने न्न््रमजीवी१३६, बुद्धिले जिउने व्बुद्धिजीवी१३७. नगरमा वास गर्ने ज्नगरवासी१३५. ग्राममा वास गर्ने व्ग्रामबासी&lt;br /&gt;
उपर्युक्त समस्त शाव्द ११५-१३३ मध्यै ११५-१३४ मा कर्म कारकले युक्तकुम्भ इतिहात लर] चित कथा निबन्ध, आत्म विश्वात; तुवियप ऐरणाआरम पत्ता सत्य गर्मी शिम्षा डृतिहास आप भय; सेवा र अग्न उपपदसंज्ञकशब्दको कार घाती, ओोगी दायी, धारी, वादी, ज्ञ विद कर र नी शब्दका साथमासमास भएको छ भने १३५-१३६ मा करण कारकलै युक्त श्रम र बुढ्ि उपपदकोजीबी शब्दका साथमा तथा १३७-१३% मा अधिकरण कारकले युक्त नरार र आसउपपदको वाती शव्दका साथमा समास भएको छु । उपपद समास हुँदा आधारभूतउपपदसंज्ञक शब्दमा रहेका लाई, ले र मा विभक्ति चिह्नको लौप भएको हुँदायिनलाई नेपालीमा द्वितीया, तृतीया र सप्तमी तत्पुरुष समासमा राखी अध्ययनगरिएको पाइन्छ । परन्तु उपपद समास हुने शब्दको स्वपदविग्रह नगरीअस्वपदविग्रह गरिने र्‌ उपपद संज्ञाकी विशेष व्यवस्था गरिएका कारण यस&lt;br /&gt;
शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ २१&lt;br /&gt;
प्रकारका समासलाई विभक्तिप्रधान द्वितीया आदि तत्पुरुष समासका रूपमा अध्ययनगर्न उपयुक्त देखिँदैन । भाइलाई मार्ने -भाइमार; पानीले मर्ने -गावीमरुवा,बाटोमा ढुक्ने -बाटोढुकुवा आदि तत्समेतर नेपाली समासमा पनि अस्वपदविग्रहमाकर्म, करण र अधिकरण कारकले युक्त भाइ पावी र बाटो उपपदको मार, सरुवार ढुक्वा शब्दका साथमा समास भएको पाइने हुँदा यिनलाई द्वितीया, तृतीया रसप्तमी तत्पुरुषका रूपमा भन्दा संस्कृत व्याकरणमा जस्तै उपपद तत्पुरुषसमासका रूपमा ग्रहण गर्ने उपयुक्त देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
५. कर्मघारय समास&lt;br /&gt;
समास गरिने दुवै आधार शब्द समान अधिकरण अर्थात्‌ एउटै विभक्तिमारहेको तत्पुरुष समासलाई कर्मपारय ममात मानिन्छ (अ. १॥२१४२) ।समानाधिकरण कर्मधारय समासमा विशेषणवाची बा उपमानबाची शाब्दको अन्यशब्दका साथमा समास भएको पाइन्छ । त्यसैले विशेषण र उपमानका आधारमाकर्मघारय समासलाई पाँच प्रकारमा विभाजन गर्न सकिन्छ : १. विशेषण पूर्वपदकर्मघारय समास, २. विशेषण उत्तरपद कर्मघारय समास, ३. विशेषण उभयपदकर्मघधारय समास, ४. उपमान पूर्वपद कर्मधारय समास र ५. उपमान उत्तरपदकर्मघारय समास । यीमध्ये विशेषण उत्तरपद कर्मञारय समास भएकासंस्कृतमूलका शब्दहरू नेपालीमा प्रयोग भएका पाइँदैनन्‌ ।&lt;br /&gt;
भ्.१ विशेषण पूर्वपद कर्मधारय समास&lt;br /&gt;
पूर्ववर्ती विशेषण शाब्दको उत्तरवर्ती विशेष्य शब्दका साथमा समास हुने (अ. २१५७) प्रक्रियालाई विशेषण पुर्वपव कर्मघारय तस भनिन्छ । यस समासमाजित शब्द स्त्रीलिङ्ममा छ भने त्यो शब्द पुलिङ्गमा परिवर्तन हुन्छ (अ.६३४२),जस्तै :&lt;br /&gt;
१३९. नील (नीलो) छ कमल जुन 5 नीलकमल&lt;br /&gt;
१४०. शुक्ला छन्‌ पञ्चमी जुन  शुक्लपञ्चमी&lt;br /&gt;
१४१. कृष्णा छन्‌ चतुर्दशी जुन - कृष्णचतुर्दशी&lt;br /&gt;
१४२. महती छन्‌ नवमी जुन्‌ - महानवमी&lt;br /&gt;
१४३. महती छन्‌ देवी जुन - महादेवी१४४, महान्‌ छन्‌ पुरुष जुन २ महापुरुष१४५, महान्‌ छन्‌ गुह जुन न महागुरु१४६, महान्‌ छन्‌ ईश्वर जुन - महेश्वर१४७, प्रधान छन्‌ मन्त्री जुन 5 प्रधानमन्त्री१४३, प्रथम छ पुरुष जुन न प्रथमपुरुष१४९, मध्यम छ पुरुष जुन न मध्यमपुर््ष१५०. उत्तम छ पुरुष जुन « उत्तमपुरुप१५१. सत्‌ छ जन जुन न सज्जन&lt;br /&gt;
२२ ८ शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
माथिका समस्त शव्द १३९-१५१ मा पूर्ववर्ती वील; शुक्ला आदि विशेषणकोउत्तरवर्ती कमल गञ्चसी आदि विशेष्यका साथमा समास हुँदा स्त्रीलिङ्गमा रहेकाकृष्णार सहती शब्दको पुलिङ्ग कृष्ण र महत्‌ शन्दमा परिबर्तन भएको छ । समस्तशब्द १४२-१४६ मा महत्‌ शब्दका तकारको आकार (अ.६।३४६) एवम्‌ महकाअकार र आकारका वीच सवर्णदीर्घ (अ.६१।१०१) भएर सहानवसी आदि समस्तशब्द सिद्ध भएका हुन्‌ भने चवर्गीय जकारनिमित्तक कत्‌ शब्दका तकारकोजकारका रूपमा ₹खुत्ब (अ. 51४1४0) भएर समस्त शव्द १५१ सिद्ध भएको हो ।&lt;br /&gt;
१.२ विशैष्ठण उभयपद कर्मघारय समासदुवै विशेषण शब्दका बीचमा समास हुने प्रक्रियालाई विशेषण उञ्चयपदकर्मधारय समात भनिन्छ, जस्तै :&lt;br /&gt;
११२. शुद्ध छ जुन अशुद्द आगुद्धाशुद्ध१५३. कृत छ जुन अकृत व्कृताकृत१५४. चर छ जुन अचर व्चराचर&lt;br /&gt;
उपर्युक्त समस्त शब्द १५२-१५४ मा शुद्ध र अजुद्ध कृत र अकृत एवम्‌ चरर अचर दुवै प्रकारका विशेषण शाब्दहरूका बीचमा समास भएपछि पूर्वान्त अकारर पराद्य अकार दुवैको आकारका रूपमा तबर्गदीरच (अ. ६११०१) भएको छ।&lt;br /&gt;
9.३ उपमान पूर्वपद कर्मघारय समासउपमानवाची शव्दको उपमेयवाची षाब्दका साथमा समास हुने (अ. २१।५५)प्रक्रियालाई उपसान पूर्वपद कर्मधारय शमात् मानिन्छ, जस्तै :&lt;br /&gt;
१५५. घनजस्तै श्याम सघनश्याम१५६, चन्द्रजस्तै विन्दु नचन्द्रविन्दु१५७. प्राणजस्तै प्रिय न्प्राणप्रिय१५५. कमलजस्तै नयन सकमलनयन१५९, सिंहजस्तै नाद नसिँहनाद१६०. चन्द्रजस्तै मुख नचन्द्रमुख१६१. बज्जजस्तै कठोर न्व्वज्कठोर&lt;br /&gt;
माथिका समस्त शब्द १५५-१६१ मा उपमानवाची घन; चन्द्र पराग; कमल बिहचन्द्रा र वञ्ज शब्दको उपमेयवाची श्यास; विन्दु प्रिय क्यन; बाद मुब र क्ठोरजाब्दका साथमा समास भएको छु।&lt;br /&gt;
५.४ उपमान उत्तरपद कर्मधारय समासअसामान्य प्रयोग गरिएको अबस्थामा उपमेपवाचक्‌ गर आदि शब्दकोउपमैपवाचक िंह आदि शब्दका साथमा समास हुने (अ.२१।५६) प्रक्रियालाईउपयाव उत्तरपद कर्मधारय सस्रात्त भनिन्छ, जस्तै :१६२. नर सिंहजस्तै न््नरसिँह/नृसिँह१६३. मुख चन्द्रजस्तै न्ममुखचन्द्र&lt;br /&gt;
अन्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ २३&lt;br /&gt;
१६४, मुख अरविन्द (कमल) जस्तै नमुखारविन्द१६५. चरण अरविन्दजस्तै न्चरणारविन्द१६६. चरण कमलजस्तै सचरणकमल१६७. कर कमलजस्तै व्केरकमल१६८. कर पल्लवजसौ नकरपल्लव१६९, पुत्र रत्नजस्तै खपुत्ररत्न&lt;br /&gt;
उपर्युक्त समस्त शब्द १६२-१६९ मा असामान्य प्रयोग गरिएको हुँदा उपमेयबाचकनद मुख चरण कर र पुत्र शब्दको उपमेयवाचक कि चन्द्र अरबिन्द॒ कमलपल्लव र रत्न शब्दका साथमा समास भएपछि समस्त शब्द १६४-१६५ मापूर्वान्त र पराच्च दुवै अकारको आकारका रूपमा तवर्णदीर्ष (अ.६११०१) भएकोछ।&lt;br /&gt;
६. ढ्विगु समास&lt;br /&gt;
तद्वित प्रत्ययको सम्भावनामा, कुनै शाब्द पछ्नाडि भएमा र समूह अर्थनुझिएमा सङ्ब्पावाची शव्दको समानाधिकरण शब्दका साथमा समास हुन्छ (अं.र१।५१) र यस प्रकारको सङ्ख्यावाची शब्द पूर्वमा हुनै शब्दका, साथमासमास हुने प्रकियालाई द्विय समात मानिन्छ (अ.२११।५२) । समासनियमकाआधारमा द्विगु समास तीन प्रकारको सम्भव भए पनि समाहार (समूह) अर्थबुझाउने द्विण समास भएका संस्कृतमूलका समस्त शब्दहरू मात्र नेपालीमाप्रयोग भएका पाइन्छन्‌, जस्तै :&lt;br /&gt;
१७०, त्रि (तीन) भुवनहरूको समूह न व्रिमुवन१७१. त्रि फलहरूको समूह न च्िफला१७२. त्रि कोणहरूको समूह न त्रिकोण१७३. चतुर्‌ (चार) युगहरूको समूह क चतुर्युग१७४, चतुर्‌ वेदहरूको समूह न चतुर्वेद१७५, चतुर्‌ मासहरूको समूह न चतुर्मास१७६. पञ्च (पाँच) गव्यहरूको समूह न पञ्चगव्य१७७, पञ्च पात्रहरूको समूह न पञ्चपात्र१७५, षद्‌ (छ) कोणहरूको समूह न घट्कोण१७९, पद्‌ यन्त्रहरूको समूह न पड्धयन्त्र१५०. सप्त (सात) गण्डकीहरूको समूह « सप्तगण्डकी१०१. सप्त कोशीहरूको समूह न सप्तकोशीपृद्२. अष्ट (आठ) दलहरूको समूह न अष्टदल१०३. नव (नौ) रत्नहरूको समूह न नवरत्न१०४, नव रात्रहरूको समूह नबरात्र&lt;br /&gt;
पृ. दश दानहरूको समूह न दशदान१८६. दश कर्महरूको समूह न देशकर्म&lt;br /&gt;
२४ ८ शन्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
माथिका समस्त शब्द १७०-१%६ मा सङ्ख्यावाची ।क्रि ७६0 पुषहाट अष्टत्‌ नबन र ढगान्‌ पूर्बबर्ती शब्दका साथमा समाच रहेकाअवन् फल; कोण युए वेद याद गव्दू पाइ यन्डर गण्डकी कोशी ढल रत्दराक्र वान र कर्म उत्तरवर्ती शब्दको समास भएपछि नकारान्त पञ्चदु सम्तन्‌अप्टकु नबब्‌ र दशन्‌ शब्दका नकारको लोप (अ.दा२॥७) तथा षकारान्त फए्‌शब्दको डकारका रूपमा जशत्व (अ.5।२।३९) एवम्‌ ककारनिमित्तक डकारकोटकारका रूपमा चर्त्व [अ.-।४।५५) भएको देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
७. बहुव्रीहि समास&lt;br /&gt;
पदार्थप्रधानका आधारमा बहुब्रीहि समासलाई अन्य अर्थ प्रधान हुने समासमानिन्छ । समास हुने शव्दमा रहने समानविभक्ति र असमानविभक्तिका आधारमाबहुक्वीहि समासलाई मुख्यतः दुई प्रकारमा विभाजन गर्न सकिन्छ : १.समाताधिकरण बहुब्बीहि समात्त र २. व्यधिकरण बहुब्गीहि समास ।&lt;br /&gt;
७.१ समानाधिकरण बहुब्रीहि समास&lt;br /&gt;
समास गरिने दुवै शव्द प्रथमा विभक्तिमा रहने बहुव्रीहि समासलाईसमानाधिकरण नहुब्वीहि समास मानिन्छ । विभक्ति, उपमा र नब्‌ अर्थका आधारमासमानाधिकरण बहुव्रीहि समास तीन प्रकारको हुन्छ : १. विभक्यर्च बहुब्रीहिसमास, २. उपमार्थ बहुब्वीहि समास र ३. नअर्थ बहुब्वीहि समास । यीमध्ये उपमार्थबहुब्गीहि समास भएका संस्कृतमूलका गजानन, चन्द्रमुखीजस्ता सीमित शब्दहरूमात्रनेपालीमा प्रयाग गरिएका पाइन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
७.१.१ विभक्त्यर्थ बहुब्वीहि समास&lt;br /&gt;
प्रथमा विभक्तिलाई छाडेर द्वितीयादेखि सप्तमी विभक्तिसम्मका कुनै एकविभक्तिको अर्थमा प्रथमा विभक्ति अन्तमा हुने दुई वा दुईभन्दा बढी शब्दहरूकोसमास हुने (अ.२।२।२४) प्रकियालाई विभन्यर्ष बहुव्रीहि स्मात्त भनिन्छ । संस्कृतमाविभक्त्यर्थ बहुब्वीहि समास छ प्रकारको हुने भए पनि नेपालीमा तृतीया, पञ्चमी रषष्ठी वरिभक्तिको अर्थमा समास भएका संस्कृतमूलका शब्दहरू प्रयोगमा आएका&lt;br /&gt;
भैटिन्छन्‌, जस्तै :१२७. दत्त (दिएको) छ चित्त जसले न दत्तचित्त१५५. जितेको छ इन्द्रियहरू जसले ३ जितेन्द्रिय१८९, निर्गत (निस्केको) छ बल जसबाट न निर्ल१९०. निर्गत छ धन जसबाट न निर्धन१९१. विगत (गएको) छ धुर (कार्यभार) जसबाट -्विधुर१९२, बिगत छ धब (पति) जस्तको क बिधवा&lt;br /&gt;
१९३. लम्ब (लामा) छन्‌ कर्ण (कान) जसका चख्लम्बकर्ण१९४, पीत (पहेँलो) छ अम्बर (कपडा) जसको त्पीताम्बर१९५, चील (नीलो) छ कण्ठ जसको - नीलकण्ठ&lt;br /&gt;
ज्ञब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ २४&lt;br /&gt;
१९६, दश छन्‌ आनन (मुख) जसका न दशानन१९७. द्।वि (दुई) गो (गाई) छन्‌ जसका न द्विगु&lt;br /&gt;
१९५. बह (धेरै) छ ब्रीहि (धान) जसको « बहुद्ीहि१९९, लक्ष्मी छन्‌ कान्ता (श्रीमती) जसको » लक्ष्मीकान्त२००. चन्द्र छन्‌ कान्ता जसको न चन्द्रकान्त२०१. दृढ छ निश्चय जसको र दुढनिश्चय२०२. बिशाल छन्‌ अक्ष (आँखा) जसका क बिशालाक्ष२०३. समान छ वर्ण जसको न सवर्ण२००४. समान छ गोत्र जसको न्सगोत्र२०५. समान छ रूप जसको न्सरूप&lt;br /&gt;
२०६. समान छ पिण्ड जसको व्सपिण्ड&lt;br /&gt;
उपर्युक्त समस्त शब्द १5७-२०६ मध्ये १5७ र्‌ १८८ मा बत र जित शब्दकोतुतीयार्थमा रहेका चित्त र इन्द्रिय शन्दका साथमा, १९० र १९१ मा तिद्रविशब्दको पञ्चम्यर्वमा रहेका धन र धुर शब्दका साथमा तघा १९२-२०६ मा दि.लस्ब पीत वील दशा बि बढ्न लक्ष्मी चन्द्र इद्द विशाल र समात शब्दकोषष्ठ्यर्मा रहेका धक कर्ण अम्बर, कण्ठ आव गो, ब्रीह्ि कान्ता निश्चयअप वर्ण गोकु रूप र पिण्ड शन्दका साथमा समास भएको छ । समास भएपछिसमस्त शब्द १०६ मा पूर्वान्त र पराद्च अकार र इकार दुवैको एकारका रूपमागुण (अ.६१।5७); १९२ मा विघधव शब्ददेखि टाए (आ) प्रत्यय (अ. ४1१४) रसवर्णवीर्ष (अ.६१।१०१); १९६ र्‌ २०२ शब्दमा पूर्वान्त अकार र पराद्य आकारदुवैका स्थानमा आकारका रूपमा तवरणदीर्घ (अ., पू.]; १९७ शव्दमा उत्तरवर्ती गोशब्दका ओकारको उकारका रूपमा तथा १९९ र २०० शव्दमा उत्तरवर्ती कान्ताआब्दका आकारको अकारका रूपमा ह्वस्व [अ.१।२।४८) एवम्‌ २०३-२०६ शब्दमासमान शब्दका स्थानमा त शब्दको परिवर्तन भएको छ।&lt;br /&gt;
७.१.२ नअर्थ बहुत्रीहि समासनज्‌ समास भएको प्रथमान्त अविद्यमान शब्दको पप्ठी विभक्त्यर्थमा प्रथमान्तशव्दकै साथमा समाप्त हुने र विद्वयान शब्दको समेत लोप हुने [कात्यायन/का., महाभाष्य /म.भा, २२।२४।१२) प्रकियालाई वनर्य बहुब्रीलि तमासभनिन्छ, जस्तै :२०७. अविद्यमान छ पुत्र जसको नन२०. अबिद्यमान छ वल जसको ॥२०९, अविद्यमान छ द्वितीय जसको२१०. अविद्यमान छ चेत जसको२११. अविद्यमान छ नाथ (अभिभावक) जसको२१२. अविद्यमान छ उपमा जसको२१३. अविद्यमान छ सीमा जसको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२६ , झब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
माथिका समस्त शब्द २०७-२१३ मा नन्‌ समास भएको अविद्यमान शब्दकोषष्ठ्यर्षमा एक्र बल दितीय्‌ चेत चाष उपमा र सीमा शब्दका साथमा समासभएपछि विद्यमान शब्दको लोप, २०५ को अबल शाब्दमा टाप्‌ (आ) प्रत्यय रसवर्णदीर्ष तथा २१२ र २१३ को अदुफ्या र अयीमा शब्दका अन्त्य आकारकोहस्व (अ.१२।४८) भएको देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
७.२ व्यधिकरण बहुब्वीहि समास&lt;br /&gt;
संस्कृत व्याकरणमा स्पष्ट रूपमा व्यञ्चिकरण बहुद्बीहि समासको उल्लेखनगरिएको भए पनि पाणिनिप्रोक्त सूत्रनियम (अ. २३३१) मा बहुक्वीहि समासमासप्तम्पन्त शाब्दको पूर्वप्रयोग गरिने व्यवस्था भएको हुँदा त्यसैलाई आधार मानेरव्यधिकरण वहुद्रीहि समासको अस्तित्व स्वीकारिएको छ (दीक्षित, १९८२, पृ.१५०)॥व्यधिकरण बहुद्वीहि समासलाई चार प्रकारमा विभाजन गरिएको पाइन्छ [शर्म्सा,२०११, पृ.२३१-२३३) : १. सङ्ब्या बहुब्वीहि समास, २. दिगन्तराल बहुद्रीहिसमास, ३. व्यतिहार बह्ुब्रीहि समास र ४. सहार्थ बहुक्वीहि समास । यीमध्ये सहार्थबहुब्रीहि समास भएका संस्कृतमूलका शब्दहरू मात्र नेपालीमा प्रयोग गरिएकापाइन्छन्‌ । यसका अतिरिक्त सप्तमी विभक्त्यन्त शब्दसँग समास भएकासंस्कृतमूलका केही शान्दहरूसमेत नेपालीमा प्रयोग गरिन्छन्‌, जसलाई तप्तस्यन्तबहुब्रीहि समास भन्न सकिन्छ ।&lt;br /&gt;
७.२.१ सहार्य बहुव्रीहि समास -&lt;br /&gt;
सहित अर्थ बुझाउने प्रधमान्त सह शब्दको तृतीयान्त शब्दका साथमासमास हुने (अ.२।२।२८) प्रकियालाई तहार्य बहुब्वीहि समास भनिन्छ । समासनियममा प्रथमाविभक्तिमा निर्दिष्ट सह शब्दको उपसर्जन संज्ञा हुने (अ.१।२४३)भएकाले त्यसको अगाडि प्रयोग गरिन्छ (अ. रारा३७) । समस्त शब्दले विशेषणबुझाएमा सह जान्दका स्थानमा पाक्षिक रूपमा त शब्दको परिवर्तन हुन्छ ।अ.धाअदर२), जस्तै :&lt;br /&gt;
२१४. फलले सह (सहित) न्सफल२१५. कला (भाग) ले सह सकल२१६. परिवारले सह व्सपरिबार२१७, धव (पति) ले सह व्सधवा२१५. सम्मानले सह व्ससम्मान२१९. क्रियाले सह व्सक्रिय२२०. रसले सह व्सरस२२१. गुणले सह न्सगुणररर. स्वरले सह च््सस्बर&lt;br /&gt;
२२३. चित्रले सह व्सचित्र&lt;br /&gt;
शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ २७&lt;br /&gt;
२२४. चैतले सह न्सचेत२२५, चेष्टाले सह न््सचैष्ट२२६, अङ्गले सह न्त्साङ्ग२२७, बिनयले सह न्व्सविनय२२५. रूपले सह न्सरूप२२९. बलले सह ज्सबल२३०. शस्त्रले सह न््सशस्त्र&lt;br /&gt;
उपर्युक्त समस्त शब्द २१४-२३० मा सहित अर्थमा रहेको सह शव्दकोतृतीयान्त फल, कला गरिवार, थ्व सम्मान; किया; रत एण, स्वर चिक चेतचेष्टा; अङ्क विवय रूण बल र शस्त्र शब्दको समास भएपछि समस्त शाब्दलेविशेषण बुझाउने भएकाले तह शब्दका स्थानमा त शब्दको परिवर्तन भएको छ।समस्त शब्द २१४, २१९ र्‌ २२५ को विग्रहमा आएका स्त्रीलि्गी कला क्रियारचेष्टा शब्दका अन्त्य आकारको अकारका रूपमा हस्व (अ.१२।४८) तथा समस्तजाब्द २१७ मा स्त्रीत्व विवश्षामा टाप्‌ (आ) प्रत्यय (अ.४1१।४) र त्वर्णदीर् ।अ.६१।१०१) समेत भएको पाइन्छ । पहकुलपति; तहप्राथ्यापक तहप्रशाकसहचालक सहयोग आदि शब्दमा सहार्थ बहुब्रीहि समास भए पनि तिनको प्रयोगविशेषणका रूपमा नभई विशेष्यका रूपमा हुने भएकाले ती समस्त शब्दमा तहशाब्दको स शान्दमा परिवर्तन हुन नसकेको हो । बिशेषणका रूपमा प्रयोग गरिएपनि तहचटु तहकारी आदि केही समस्त शब्दहरूमा कह शब्दको क शब्दमापरिवर्तन भएको देखिँदैन । सहार्थ बहुव्रीहि समास भएका शब्दहरूको आदिमारहेका स र तह शब्दलाई नेपाली व्याकरणमा उपसर्ग मानिएको पाइन्छ (शर्मा,पू., पृ.६६; अधिकारी, पू., पृ.१२६) । परन्तु यी दुवै शब्दलाई उपसर्ग मान्ने कुनैआधार नदेखिएकाले संस्कृत व्याकरणका आधारमा यस प्रकारका समस्तशब्दहरूलाई नेपाली व्याकरणको समास प्रकरणमा सहार्थ बहुब्रीहि समासकारूपमा ग्रहण गर्न उपयुक्त देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
७.२.२ सप्तम्यन्त बहुब्वीहि समासप्रथमान्त शब्दको सप्तमी विभक्ति अन्तमा हुने शब्दका साथमा समास हुनेप्रक्रियालाई सप्तस्यन्त बहुब्रीहि समास भनिन्छ, जस्तै :२३१. दण्ड छ पाणि (हात) मा जसको ज्दण्डपाणि२३२. चक्र छ पाणिमा जप्तको क्चक्रपाणि२३३. चन्द्र छ शेखर (शिर) मा जसको च्चन्द्रशेखर&lt;br /&gt;
माथिका समस्त शाब्द २३१-२३२ मा प्रधमान्त बण्ड चक र चन्त्र शव्दकोसप्तम्पन्त पाणि र शेखर शब्दका साथमा समास भएको छ । सप्तम्यन्त बहुब्बीहिसमास भएका शब्दहरू संस्कृतमा पनि अत्यन्त न्यून रहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
२८ ४ शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
८. इन्द्र समास&lt;br /&gt;
पदार्थप्रधानका आधारमा ड्रद्व समातलाई उभय (दुवै) शब्दको अर्थ मुख्य हुनेसमास मानिन्छ । संस्कृतमा च (र) शब्दको अर्थमा रहेका सुवन्त शब्दका साथमाहुने समासलाई द्वन्द्व त्रमास मानिएको छ (अ.२।२।२९) । त्च शब्दका चार अर्थहुन्छन्‌ (दीक्षित, पू., पृ.१८३) : १. समुच्चय, २. अन्वाचय, ३. इतरेतर र ४,समाहार । वीमध्यै असमर्थ भएकाले तमुच्चय र अन्वाचय अर्थमा द्वन्द्व समासपुवुत्त नहुने (पू., पृ.१5४) भएकाले च शव्दको अर्थका आधारमा द्वन्द्व समासलाईदुई प्रकारमा विभाजन गरिन्छ : १. इतरेतर द्वन्द्व समास र्‌ २. समाहार द्वन्द्वसमास । द्वन्द्व समासका यी दुई भेदमध्ये तमाहार हन्द्व तया भएका शब्दहरूकोप्रयोग नेपालीमा भेटिँदैन ।&lt;br /&gt;
६.१ इतरेतर्‌ द्वन्द्व समास&lt;br /&gt;
दुई शाब्दका बीचमा समास भएपछि समस्त शब्दले दुवैका बीचकोपारस्परिक सम्बन्ध जनाउने समासलाई इतरेतर बन्न व्रास भनिन्छ । इन्द्रसमासमा प्रयुक्त शब्दहरूमध्यै घिसंञ्चक इकारान्त र उकारान्त शब्दको (अ. २२३२), स्वरवर्ण आदिमा हुने अकारान्त शांब्दको (अ.२।२३२), थोरै स्वरवर्णलेयुक्त भएका शब्दको (अ.२।२३४), तुलनात्मक रूपमा नढी सम्मानित शब्दको (का.,म.भा. २२३४।४) र हृस्व स्वरवर्ण भएका शब्दको (का.,म.भा. २।२।३४।५)अगाडि प्रयोग गरिन्छ, जस्तै :&lt;br /&gt;
२३४, द्वि (दुई र दश न्द्वादश&lt;br /&gt;
२३५, अष्ट (आठ) र दश उ्अष्टादश&lt;br /&gt;
२३६. त्रि (तीन) र्‌ दश च्त्रपोदश&lt;br /&gt;
२३७. माता र पिता न्मातापिता२३५. राधा र कृष्ण खराधाकृष्ण२३९, सीता र राम चसीताराम&lt;br /&gt;
२४०, उमा र शङ्कर -्उमाशङ्कर२४१. गौरी र शङ्कर च्गौरीशङ्कर२४२. लक्ष्मी र नारायण त्लक्ष्मीनारायण२४३. रीति र स्थिति खरीतिस्थिति&lt;br /&gt;
२४४, शिक्षा र दीक्षा खशिक्षादीक्षा२४५, हरि र हर न्हरिहररण्ध, हरि र कृष्ण च्हरिकृष्ण२४७, राम र्‌ कृष्ण चरामकृष्ण&lt;br /&gt;
उपर्युक्त समस्त शब्द २३४-२४७ मा ढ्वि अष्टठ्‌ ति माढु राधा चीताउम गौरी बन्य रीति शिक्षा बारि र राम पाब्दको बशन्‌ पितृ कृष्ण रामशङ्कर वारायण्‌, स्मिति दीक्षा हर र कृष्ण शब्दका साथमा समास भएको छ।समास भएपछि समस्त शब्द २३४ को ।ट्ि शब्दका इकारको र २३५ को अष्टन्‌&lt;br /&gt;
शन्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ २९&lt;br /&gt;
शब्दका नकारको आकार (अ.६३१४७); २३६ को त्रि शब्दका स्थानमा क्यत्‌(अ.धश्षदव) एवम्‌ सकारको रुत्व, उत्व र ओकारका रूपमा गुण तथा २३७ कोसातृ शब्दका त्रकारको आत्‌ (अ.भशारश) र नकारको लोप (अ.व1२७) समैतभएको देखिन्छ । पिता अर्थात्‌ पुरुषभन्दा माता अर्थात्‌ नारी हजार गुना पूजितहुन्छन्‌ भन्ने मान्यता र सम्मानित शब्दको पूर्बप्रयोग गर्ने उपर्युक्त नियमकाआधारमा समस्त शब्द २३७-२४२ मा स्त्रीवाचक यात) राधा) वीता; उमा गौरीर लक्ष्मी शब्दहरू अगाडि प्रयौग गरिएका हुन्‌ । उपर्युक्त समस्त शव्द २३७-२४७लाई संस्कृतमा द्विवचनान्त शाव्दका रूपमा प्रयोग गरिएको भए पनि नेपालीमायिनलाई एकवचनान्त शब्दका रूपमा प्रयोग गरिएको पाइन्छ ।&lt;br /&gt;
९. उपसंहार&lt;br /&gt;
नेपालीमा प्रयुक्त संस्कृतमूलका समस्त शाव्दहरूको निर्माणप्रक्रिया संस्कृतव्याकरणका नियमहरूमा आधारित छ । त्यसैले नेपाली व्याकरणमा तत्सम कृदन्तर तत्सम तब्चितान्त शब्दहरूको जस्तै तत्सम समस्त शब्दहरूको निर्माणप्रकियाकोपनि पृथक्‌ रूपमा अध्ययन-विश्लेषण गरिनु आवश्यक छ । यस आवश्यकताकोपरिपूर्ति हुन सकेमा व्य्षिकरण तत्परुण समा र उपपष तत्पुरुष तमासकाशब्दहरूको पृथक्‌ अस्तित्व स्वीकार गर्न सकिनाका साथै नन्‌ तत्एस्य यगातननर्थ बहुब्रीहि पमाव र सहार्य बहुब्रीहि समासको समेत पुथक्‌ रूपमा अस्तित्वस्वीकृत हुनसक्ने भएकाले त्यस्ता समासको आदिमा देखापर्ने . अकृत्तरतहशब्दलाई उपसर्गका रूपमा नभई समस्त शब्दको आद्यवयव शब्दका रूपमा ग्रहणगर्ने सकिने छ । फलस्वरूप नेपालीमा प्रयुक्त तत्सम समस्त शब्दहरूकोनिर्माणप्रक्रिया सरल र सुबौध हुनाका साथै तत्सम शब्दको निर्माणप्रक्रियाबाटआँशिक रूपमा प्रभावित तत्समेतर समस्त शब्दको निर्माणप्रक्रिया बुझ्न पनिसजिलो हुनसक्ने देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
[छा ।&lt;br /&gt;
३० &amp;quot; शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धिअध्याय - चार&lt;br /&gt;
तद्‌भव नेपाली शब्दमापरिवर्तित स्वर र चन्द्रविन्दुको स्थिति&lt;br /&gt;
१. विषयप्रवेश&lt;br /&gt;
संस्कृत भाषाबाट सोझै वा जस्ताको तस्तै रूपमा नभई शब्दांशमा केहीपरिवर्तन भएर नेपाली भाषामा आई चलेका वा प्रयोग भएका शब्दहरूलाई तद्‌भवनेपाली शब्द भनिन्छ । नेपाली भाषाको शब्दभण्डारलाई समृद्ध तुल्याउनमा तद्भवशब्दहरूको पनि महत्त्वपूर्ण स्थान छ्‌ । यस लेखमा नेपाली आषामा प्रयुक्त तदूभवशब्दहरूको व्युत्पत्तिको क्रममा परिवर्तित स्वर तथा चन्द्रविन्दुको रिथतिलाईठम्याउने प्रारम्भिक केही आधारहरूको रूपरेखा प्रस्तुत गर्न खोजिएको छ ।&lt;br /&gt;
२. परिवर्तित स्वर र चन्द्रबिन्दु ठम्याउने प्रमुख सूत्रहरू&lt;br /&gt;
२.१ पदादि अ इ उ क्रमशः आ ईै का आदेश, पदमध्य संयोग,आदिव्यञ्जनलोपसंस्कृत शाब्दको बीचमा कुनै दुई व्यव्जनवर्णको संयोग पाइन्छ भने त्यस्तो&amp;quot;शब्द तदुभव शब्दका रूपमा नेपाली भाषामा भित्रिँवा अघिल्लो व्यन्जनवर्णको लोपहुन्छ र पदादि ह्वस्व स्वर प्राय: दीर्घ स्वरमा परिणत हुन्छ, जस्तै :&lt;br /&gt;
अर आ आदेशलक्षर लाख भक्त? भातपक्ष? पाखो हद्‌ट? हाटतक्षण? ताछ्नु हस्तर हातनक्रट नाक अद्यट- आजभदूट? भाट लज्जार- लाजकर्तनर काट्नु सक्कु? सातुकक्षट काख कर्मरू कामपत्रश पात धर्म? धामअष्टर आठ कर्णट कानमर्दलर मादल पल्लव?” पालुवासप्त? सात पर्द? पादतप्तर तातो आदि ।इट ईं आदेशतिक्त? तीतो पित्तल?- पीतल&lt;br /&gt;
मिष्टर मीठो विश? बीस&lt;br /&gt;
शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ ३१&lt;br /&gt;
पिष्टट पीठो पिप्पल?- पीपलचिल्ल? चील शिल्प» सीपमित्रन मीत तिद्वाट नीदभिक्षार भीख आदि ।&lt;br /&gt;
उन क आदेश&lt;br /&gt;
फुल्ल? फूल कुब्जर कँजोदुगघट दूध दुर्बल दूबोपुत्रट पूत आदि ।&lt;br /&gt;
२.२ पदादि अ इ उ क्रमशः औँ इँ उँ आदेश, ङ्‌, ज्‌, ज्‌, न्‌ म्‌ लोप&lt;br /&gt;
यदि सूत्र (१) अनुसार लोप हुने व्यञ्जनवर्ण ङ्‌, ज्‌. ण्‌, न्‌, म्‌ मध्ये कुनै एकपर्दछ भने पदादि स्वरसँग चन्द्रविन्दु ( ) समेत थपिन्छ । चन्द्रविन्दु थपिनेअवामासां &#039;इ उ&#039; स्वर प्राय: ह्रस्व नै रहन्छन्‌ । &#039;अ&#039; स्वरचाहिँ प्राय: दीर्घ हुन्छ,जस्त:अर औँ आदेश&lt;br /&gt;
अञ्चल?” आँचल अङ्क? आँकअण्डर? आँड आम्रट आँपरण्डाट राँड अन्तर” आँतकण्ठ? काँठ अन्त्रर आँतअङ्गण? आँगन जङ्गघार जाँघकञ्चुक” काँचुली खण्ड? खाँडगण्ड?- गाँड षण्ढ?- साँढेटङ्क” टाँक पञ्चन” पाँचभाण्ड? भाँडो सञ्चयन? साँच्नुदन्त? दाँत भञ्जन?- भाँच्नुबन्धर बाँध अङ्कन? आँक्नुस्वङ्वग? स्वाँग कम्पन? काँप्नुभण्डनट भाँड्नु छन्दर छाँदबण्ड्न? बाँड्नु सन्धिल साँधअङ्ककुर? आँकुरो इत्यादि ।चन्द्रट चाँद&lt;br /&gt;
इन इँ आदेशपिज्जर? पिँजरा शिङ्घाण?- सिँघानसिञ्चन? सिँच्नु सिन्दूर” सिँद्र&lt;br /&gt;
द्‌पिण्डालुर पिँडालु पिण्डटपैँडो आदि ।&lt;br /&gt;
३२ ४ सन्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
उन उँ आदेशकुण्ड? कुँडो ढुण्डन” ढुँड्नुकुण्डनट कुँडिनु चुण्डन?” चुँड्नुउम्भ? उँभो शुण्ड? सुँड आदि ।&lt;br /&gt;
सूत्र (२) को अपवादअन्तर्गत निम्नलिखित शब्दमा नासिक्य व्यञ्जनवर्णकोलोप भएर पनि पदादिमा अघिल्लो स्वर दीर्घ वा चन्द्रविन्दु कुनै एक नहुने स्थितिदेखा पर्दछ । सामान्यतया यस्तो अपवाद ग्‌, ज्‌, द्‌, ध, थ्‌ व्यज्जनवर्ण पछाडिभएमा देखिन्छ, जस्तै :&lt;br /&gt;
दीर्घ नहुने&lt;br /&gt;
अङ्गार? अँगार अञ्जलि? अँजुली&lt;br /&gt;
सङ्ग? सँग अङ्गुली? अँगुली&lt;br /&gt;
अन्धकार? अँध्यारो इत्यादि ।&lt;br /&gt;
चन्द्रविन्दु नहुनेमण्डरु माडमन्धत्तरट मधथ्नुरञ्ज? राग इत्यादि ।&lt;br /&gt;
पदान्तमा चाहिँ &#039;म्‌&#039; लोप भएको अवस्थामा त्यसका ठाउँमा चन्द्रविन्दु ()सँग &#039;उ&#039; को आगम हुन्छ, जस्तै : ग्राम»-गाउँ, नाम? नाउँ, आम?-आउँ, हिम-हिउँ ।यसै गरी &#039;म्‌&#039; लोप हुँदा पदमध्यमा पनि &#039;उँ&#039; भएको पाइन्छ, जस्तै : हिमद?-हिउँद,गोमूतर-गउँत आदि ।&lt;br /&gt;
२.३ पूर्ववत्‌ चन्द्रविन्दु र्‌ च्‌ ष्‌ लोप&lt;br /&gt;
तदुभव शब्दमा रूपान्तरण हुने क्रममा संस्कृत शब्दमा नासिक्यव्यञ्जनवर्णको लोप नभए तापनि “र्‌ च्‌ प्‌&#039; मध्ये कूनै एक वर्णको लोप भएमा सूत्र(२) मा झैं &#039;औँ इँ उँ&#039; को स्थिति देखा पर्दछ । सामान्यतया यस्तो स्थिति च्‌. छ्‌पछाडि भएमा &#039;च्‌&#039; लौप हुँदा, द्‌, द्‌ पछाडि भएमा &#039;प्‌&#039; लोप हुँदा र क्‌, च्‌, प्‌. भू,स्‌ पछाडि भएमा &#039;र्‌&#039; लोप हुँदा देखिन्छ, जस्तै :&lt;br /&gt;
&amp;quot;र्‌&#039; लोप हुँदाअर्कक आँक चर्चरी? चाँचरीअधुरू आँसु श्रेणी? सिँढीअर्चिक? आँच गर्जन? गाँजसर्प? साँप कर्घ्बट उँभो आदि ।&lt;br /&gt;
कर्कटीट- काँक्रो&lt;br /&gt;
शनब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि ३३&lt;br /&gt;
&#039;्‌&#039; लोप हुँदा&lt;br /&gt;
कच्छ?- काँठ उच्चनट उँचो आदि ।&amp;quot;ज&#039; लोप हुँदा&lt;br /&gt;
इष्टकार इँटा गोविष्ठार? गुझँठोउष्टरर उँट आदि ।&lt;br /&gt;
पदान्तमा रहेको &#039;य्‌&#039; लोप हँदासमेत पदादिमा रहेको स्वर &#039;आँ&#039; मा परिणत्तहुन्छ, जस्तै : सत्य? साँचो, हास्य?&amp;quot; हाँसो आदि ।&lt;br /&gt;
२.ह चन्द्रबिन्दु आगम स्‌, त्‌, ध, गु, च्‌ पर&lt;br /&gt;
तदभवमा रूपान्तरण हुने संस्कृत शव्दमा स्‌, त्‌, ध्‌, ग्‌. च्‌ व्यन्जनवर्णहरूमध्ये कुनै एउटा वर्ण पछाडि भएमा नासिक्य व्यञ्जन वर्णहरूको लोपनभएको अवस्थामा पनि अघिल्लो स्वरसँग चन्द्रविन्द॒ थपिन्छ । यसरी थपिने वाआउने प्रक्रियालाई आगम भनिन्छ, जस्तै :&lt;br /&gt;
&#039;स्‌&#039; पछाडि भएमा&lt;br /&gt;
आशी?- आँसी काशा?” काँसघास? घाँस गास? गाँस आदि ।त्‌&#039; पछाडि भएमा&lt;br /&gt;
कातरटकाँतर किरात? किराँतवरयात्रा»बरियाँत आदि ।&lt;br /&gt;
थु, ग्‌, च्‌&#039; पछाडि भएमा&lt;br /&gt;
अघ? उँधो शूकर?- सुँगुर&lt;br /&gt;
काच? काँच इत्यादि ।&lt;br /&gt;
पदमध्यमा इ वा उ स्वरको मात्र पनि आगम भएको देखिन्छ, जस्तै : अम्ल?”अमिलो, उष्म» उछ्नुम्‌ आदि ।&lt;br /&gt;
२.५ पदादि आ, इ/क्र, औं क्रमशः अ, इ, ओ आदेश&lt;br /&gt;
तद्भव नेपाली शब्दमा रूपान्तरण हुने संस्कृत शब्दको सुकमा आ,ईवाक्राछ भने त्यसको ठाउँमा क्रमश: &#039;अ&#039; र &#039;इ&#039; आदेश हुन्छ भने &#039;औ&#039; का ठाउँमा &#039;ओ&#039;आदेश हुन्छ, जस्तै :&lt;br /&gt;
ईुँ/क्रनइ हुने : जीवन-जिउन, श्रृङ्ग?सिँग, शृङ्गगार?सिँगार इत्यादि ।&lt;br /&gt;
औँ? ओ हुने : गौर-गोरौ, यौरीटगोरी, चौर: चोर इत्यादि ।&lt;br /&gt;
सूत्र ।५) अनुसारको संस्कृतको पदादि दीर्घ स्वर तदभब नेपालीमा द्वस्व हुनेस्थितिअन्तर्गत &#039;आ?अ&#039; मा आकाश--अकास, आषाढ?-असार र &#039;फम्उ&#039; मायूका-जुका जस्ता सीमित केही शाब्दमा मात्र देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
३४ » शब्दनिर्माणप्रक्िया र सन्धि&lt;br /&gt;
२.६ पदमध्य य्‌ ब्‌ क्रमशः इ उ आदेश&lt;br /&gt;
तदूभव नेपाली शब्दमा रूपान्तरण हुने क्रममा संस्कृत शब्दका वीचमारहेको &#039;य्‌ का ठाउँमा &#039;इ&#039; र &#039;व्‌&#039; का ठाउँमा &#039;उ&#039; आदेश हुन्छ । यस्तो स्थिति हुनेप्रक्रियालाई संस्कृत व्याकरणमा &#039;सम्प्रसारण&#039; भनिन्छ, जस्तै&lt;br /&gt;
सट ब्‌ आदेश&lt;br /&gt;
गायन? गाइने, दायज?- दाइजो&lt;br /&gt;
व्यङ्कार विँगा संयात्रार साइत आदि ।बर उ आदेश&lt;br /&gt;
दिवस ?” दिउँसो श्रावण? साउन&lt;br /&gt;
देवता? देउता चत्वरटचउरणचौर&lt;br /&gt;
जीवन? जिउनु घावन? घाउनु&lt;br /&gt;
&#039;पिवन? पिउनु देवकी?” देउकी&lt;br /&gt;
देवरानी? देउरानी देबराली?- देउराली आदि ।&lt;br /&gt;
यसै गरी पदान्त &#039;ब्‌&#039; का ठाउँमा पनि &#039;उ&#039; भएको भेटिन्छ, जस्तै : हावरआउ, भाव?- भाउ, जीव? जिउ? ज्यू आदि ।&lt;br /&gt;
संस्कृतको पदादि र पदान्त &#039;य्‌&#039; चाहिँ तद्भवमा रूपान्तरण हुँदा प्राय: &#039;ज्‌&#039; मापरिणत भएको पाइन्छ, जस्तै :&lt;br /&gt;
पदादिमा : यूका?-जुका, यन्त्र» जाँतो, युक्ति- जुक्ति, यान?-जानु आदि ।&lt;br /&gt;
पदान्तमा : अद्य?- आज, कार्य? काज इत्यादि ।&lt;br /&gt;
पदान्त &#039;य्‌&#039; &#039;झ&#039; मा परिबर्तित भएका उदाहरणहरू पनि पाइन्छन्‌, जस्तै :सन्ध्या? साँझ, मध्य? माझ आदि ।&lt;br /&gt;
२.७ पदान्त परिवरतिंत स्वर प्रायः औ आ अ ए आदेशसंस्कृत शब्दको अन्तिम “अ&#039; स्वर नेपाली तद्भव शब्दको अन्तमा प्राय: &#039;ओ&#039;को स्थितिमा देखा पर्दछ । &#039;ओ&#039; नभएका केही शब्दमा आ, अ, ए स्वरको उपस्थिति&lt;br /&gt;
पाइन्छ, जस्तै :&lt;br /&gt;
अर ओ आदेश&lt;br /&gt;
दिवस? दिउँसो दायज? दाइजोयन्त्रक जाँतो गौर? गोरोमक्ष? माखो कर्णट कानोअङ्गुष्ठट औलो भाण्ड? भाँडोनङ्ग?- नाँगो ग्रन्थ? गाँठोकुब्जर- कुँजो अम्ल? अमिलोअर्गल? आग्लो ताम्रट तामोसत्य? साँचो हास्य? हाँसो&lt;br /&gt;
पिण्ड? पिँडो चिब्रुक” चिउँडो&lt;br /&gt;
शब्दनिर्माणप्रकिया र सन्धि/ ३५&lt;br /&gt;
उच्च” उँचो अन्धकार? अँध्यारोस्याल?- सालो कण्डट कुँडोलम्बर लामो तिक्त? तीतोमिष्टर मीठो रक्तट रातोपिष्टः&#039; पीठो आदि ।&lt;br /&gt;
अन आ आदेश&lt;br /&gt;
छत्ररु छाता पिञ्जर? पिँजरापल्लव? पालुवा कण्टक? काँटाधुम्रट धुँवा खड्ग? खुँडानव? नयाँ आदि ।&lt;br /&gt;
अ»- ए आदेश : षण्ड?- साँढे, गायन? गाइने आदि ।&lt;br /&gt;
केही शब्दको अन्तमा इ वा आ स्वर भए पनि त्यस्ता स्वरहरू &#039;ओ&#039; मापरित्रर्तवन भएका पाइन्छन्‌, जस्तै : अग्निशआगो, अक्षि? आँखो, दुर्वाटदूबो आदि ।&lt;br /&gt;
पदान्तमा &#039;आ&#039; स्वर हुने संस्कृत शाब्द तदुभव नेपाली शब्दका रूपमापरिवर्तन हुँदा प्राय: &#039;अ&#039; स्वरमा परिणत भएको देखिन्छु, जस्तै : संयात्रा? साइत,जङ्घारजाँघ, लज्जा?-लाज, रण्डा?राँड, निद्राटनीद द्ृत्यादि ।&lt;br /&gt;
३. उपसंहारयसरी तद्भव नेपाली शब्दको सुरुमा प्राय: आ, ई, क, इ, ओ, बीचमा इ, उर अन्तमा औ, आ, अ एवम्‌ ए परिवर्तित स्वरको स्थिति देखिन्छ भने पदादिमा अँ,झँ, उँ, पदमध्यमा इँ, उँ र पदान्तमा उँ परिवर्तित सस्वर चन्द्रैविन्दुको उपस्थितिरहन्छ भन्ने स्‌त्रात्मक रूपरेखा प्रस्तुत गरिएको यस छौटौ लेखद्वारा तद्भव नेपालीशब्दमा परिवर्तित सबै स्वर र चन्द्रविन्दुको स्थितिलाई पूर्ण रूपमा ठम्याउननसकिए पनि तदभव शब्दको व्युत्पत्तिका सन्दर्भमा प्रारम्भिक जिज्ञासा जागृतगराउन खोजिएको यस सामान्य प्रयासले दिग्भ्रान्त नेपाली व्याकरणलाईदिशानिर्देश गर्न खोज्नै विद्वान्‌ लेखक तथा प्रबुद्ध पाठकवर्गलाई यसतर्फ विशिष्टखोज, अनुसन्धान गर्नाका लागि अवश्य पन्नि यथासमयमैँ घच्घच्याउनेछ भन्नेकुरामा विश्वस्त रहन सकिन्छ ।(गरिमा, २०६४, पूर्णाङ्क : ९५, पु. १३५-१३८)&lt;br /&gt;
गछ ।&lt;br /&gt;
३६ « शन्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धिपाठ - पाँचकेही नेपाली शब्दहरूको पुख्यौंली परम्परा&lt;br /&gt;
१. विषयप्रवेश&lt;br /&gt;
आफूनो र भावी पुस्ताहरूको समेत अस्तित्व संरक्षणका लागि आफूना पूर्वजर तिनीहरूले चलाएका चालचलतहरूको खोजी गरिनु आवश्यक मानिन्छ, जसलाईहामी &#039;पुख्यौंली&#039; भन्दछौं । भापा-व्याकरणका सन्दर्भमा पनि वर्तमानमा चलिरहेकाशब्दहरूको यथार्थ ज्ञानका लागि त्यस्ता शब्दहरूको पुर्ख्यौली परम्परा पत्तालगाउनु आवश्यक हुन्छ । नेपाली भाषामा प्रयुक्त शब्दहरूको पुर्ख्यौली परम्पराके-कस्तो छ ? भन्नै बारेमा गहिरिएर विशेष चिन्तन-मनन गरी निष्कर्ष प्रस्तुतगर्ने भषाशास्व्रीहरूमध्ये महानन्द सापकोटा (१९५३-२०३५) र प्रा. बालकृष्णपोखरेल (१९९०) को योगदान अविस्मरणीय छ । “आषा-सृजनशक्ति सजीवजिब्रामा छ, निर्जीव टुँडामा छैन&amp;quot; (सापकोटा, २०२०, पू. 5२) भन्ने दृष्टिकोणराख्ने जनजिब्रोवादी महानन्द सापकोटाका निम्नलिखित कृतिहरूले नेपालीशब्दहरूको पुख्यौँली परम्परा बुझ्न विशेष सहयोग पुग्याएका छन्‌ : ध्वनिकोधन्दा (२०२०), खस र खसभाषा (२०२०), नेपाली धातु परिचय (२०२१),जनजिब्रो (२०२१), नेपाली निर्वचनको रूपरेखा (२०२७) र नेपाली शव्द परिचय (२०३४) । महानन्द सापकोटाको यो भाषाशास्त्रीय परम्परालाई प्रा. बालकृष्णपोखरेलले नेपाली निर्वचन (२०४६, २०५० र २०५९) मार्फत्‌ अफ्गै गहन रूपमाअगाडि बढाउन विशेष प्रयास गरेका छन्‌ र यस कार्यमा उनको अनुसन्धानअद्यावधि क्रियाशील पनि रहेको छ । वर्तमान समयका युवापुस्ताले पनिशाव्दहरूको पुर्ख्यौली पत्ता लगाउने किसिमका अध्ययन-अनुसन्धानहरूलाई अग्रसरगराउँदै जानुपर्ने आबश्यकता देखिएको छ । यसै सन्दर्भमा प्रस्तुत लेखमा नेपालीआपामा प्रयुक्त केही तद्भव शब्दहरूको पुर्ख्यौली परम्परा के-कस्तो छ ? भन्नेबारेमा परिचयात्मक चर्चा गर्न खोजिएको छ ।&lt;br /&gt;
२. केही शब्दहरूको पुर्ख्यौली परम्परा&lt;br /&gt;
२.१ अचेल&lt;br /&gt;
&#039;अचेल&#039; शाब्दलाई “नेपाली बृहत्‌ शवब्दकोश&#039; (२०६० : १२) ले बर्तमानसमयमा, हालसाल, हिजोआज, आजभोलि भनेर अर्थ्याएको छ । उक्त कोशलेयसको मूल साइनो संस्कृतको &#039;अद्यकल्प&#039; शव्दसँग देखाएको छ । संस्कृतमा &#039;अद्य&#039;शब्दले &#039;आज&amp;quot; लाई बुझाउँछ । आफप्टे १९९७ : २५०) ले &#039;कल्प&#039; शाब्दका ९ अर्थदिएका छन्‌, तर &#039;अचेल&#039; को सन्दर्भसँग ती कुनै पनि अर्थले मेल खाँदैनन्‌ ।संस्कृतमा &#039;कल्यम्‌&#039; भन्ने एउटा शव्द छ, जसका ५ अर्थ आफ्टे (पूर्ववत्‌, पू. २५९)ले उल्लेख गरेका छन्‌ : (१) बिहान, (२) भोलि, (३) रक्सी, ।४) बधाइ र (५)&lt;br /&gt;
ज्ञन्दनिर्माणप्रक्तिया र सन्धि/ ३७&lt;br /&gt;
शुभसमाचार । यीमध्ये दोग्रो &#039;भोलि&#039; अर्थ दिने &#039;कल्य&#039; शब्दले &#039;अच्नेल&#039;को विकासमासहयोग पुग्याएको छ । संस्कृतको &#039;अद्च&#039; शब्द प्राकृतमा &#039;अज्ज&#039; भयो भने नेपालीर हिन्दीमा &#039;आज&#039; हुनपुग्यो । त्यस्तै संस्कृतको &#039;कल्यम्‌&#039; शब्द प्रथमतः &#039;काल&#039; रत्यसपछि &#039;कल&#039; शब्दका रूपमा हिन्दीमा भित्रियो । यसरी विकसित &#039;कल&#039; शब्दलेहिन्दीमा &#039;भौलि&#039; लाई मात्र बुझाउनुपर्दथ्यो, तर &#039;हिजो&#039;लाई पनि किन र्‌ कसरीबुझाउन समर्थ भयौ ? यौ चाहिँ बुझून सकिएको छैन । नेपालीमा &#039;कल&#039; शाव्दकाचारथरी अर्थ छन्‌, तर समयवाचक अर्थसँग यी अर्थहरू असम्बद्ध देखिन्छन्‌ ।समयवाचकका रूपमा &#039;आज&amp;quot; शब्दसँग जोजिएर &#039;कल&#039; शब्दको प्रयोग भएकोभेटिन्छ (आजकल आजकाल) । &#039;आज&#039; शब्दको विकास संस्कृतबाट प्राकृत हुँदैसोझै नेपालीमा आएको मान्न सकिए पनि &#039;कल&#039; शब्दको विकास चाहिँसंस्कृतबाट प्राकृत र हिन्दी हुँदै नेपालीमा भित्रिएको हो । त्यसैले &#039;अचेल&#039;कोव्युत्पत्तिलाई यसरी उल्लेख गरिनु उपयुक्त देखिन्छ : सं. अद्यन-कल्यम्‌? प्रा.अज्जन-कल्ल? नै.हि. आज हि. &amp;quot;काल /कल?- ने. आजकल /आजकाल ०अचेल ।&#039;आजकल&#039; वा &#039;आजकाल&#039; बाट कसरी &#039;अचेल&#039; वन्यो ? योचाहिँ अनुसन्धानकैमार्गमा छ । नेपालीमा प्रयुक्त &#039;अच्नेल&#039; शब्दले संस्कृतको मूल साइनोअनुरूप&#039;आजभोलिको समयलाई मात्र बुझाउनुपर्दथ्यो, तर &#039;हिजोआज&#039;को समयलाई समेतबुझाउने गरेको छ, जुन हिन्दी हुँदै नेपालीमा भित्रिएको &#039;कल&#039; शाब्दको प्रभावहुनुपर्छ ।&lt;br /&gt;
३.२ बेसीनेपाली भापामा “बेसी&#039; शब्दको दुई अर्थमा प्रयोग भएको छ । ती दुवै शव्दलाई“नेपाली बृहत्‌ शव्दकोश&#039; (२०६० : ५२७) ले निम्नानुसार अर्थ्याएको छ :“बेसी ना.- पहाडको फेदीको मैदानी भाग, बेँसी, बिसी ।”“बेसी क्रि.वि.- (फा. वेशी) मात्रा वा आवश्यकताभन्दा धेरै, बढी,बढ्ता ।”उपर्युक्त दोस्रो &#039;वेसी&#039; क्रियाविशैपषण शब्द फारसी भाषाबाट सोझै नेपालीमाआएको र त्यसमा अन्य आगन्तुक शब्दहरूमा कँ &#039;श&#039; का ठाउँमा &#039;स&#039; र व&#039;काठाउँमा &#039;ब&#039; मात्र परिवर्तन भएको छ । तर नेपाली &#039;वेसी&#039; नाम शब्दको विकासकसरी हुन गयो ? सहजै किटान गर्न गाह्रो छु । संस्कृतमा &#039;व्यास भन्ने शब्द छ।व्यास&amp;quot; शब्द &#039;अस्‌&#039; धातुमा &#039;बि&#039; उपसर्ग र &#039;घन्ज्‌&#039; प्रत्यय लागेर बन्दछ । आफ्टे(पूर्ववत्‌, पृ.९९१ ९९२) ले संस्कृत &#039;व्यास&#039; शब्दका ११ अर्थ दिएका छन्‌ : (१)बितरण, (२) बिश्लेषण, (३) पृथकता, (४) प्रसार, (५) चौडाइ, (६) वृत्तको व्यास,(७) उच्चारणदोप, (सू) सङ्कलन, (९) सङ्कलनकर्ता, (१०) एक प्रसिद्ध क्रषिपराशरपुत्र ब्यास र (११) पुराणवाचक बाह्मण । यीमध्ये चौँथो “प्रसार&#039; अर्थमाप्रयुक्त संस्कृतको &#039;व्यास&#039; शब्दसँग नेपालीमा प्रयुक्त पहिलो &#039;वेत्ती&#039; शव्दको मूलसाइनो हुनु सम्भव छ । पहाडको फेदीको मैदानी भाग आंशिक रूपमा फैलिएकोनै हुन्छ, जसलाई नेपाली प्रयोक्ताहरूले सर्वप्रथम &#039;व्यासभूमि&#039; भन्ने गरेको हुनुपर्छ ।&lt;br /&gt;
३३ ४ जब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
नेपाली शाब्दहरूको विकासक्रम हेर्दा पदादिमा रहेका व्यञ्जनसंयुक्त शब्दहरूक्रमशः असंयुक्त व्यन्जनका रूपमा परिवर्तित भएको पाइन्छ । जस्तै : व्यवहार?बेबार, व्यापार? बेपार आदि । &#039;व्यास&#039; शव्द पनि क्रमश: व्यास?” व्यासी? ब्याँसीटबिसी? बेँसी हुँदै &#039;बेसी&#039;मा विकसित भएको हुनसक्छ । “व्यास&#039; शब्द भूमिकोविशेषणका रूपमा प्रयोग हुँदा स्वीलिङ्गी भएर &#039;व्यासी&#039; बन्न पुगे होला । यसमानाकेस्वर वा अनुनासिक कसरी आयो र कसरी आधुनिक प्रयोगमा त्यो हराउँदैगयो ? विचारणीय छ । &#039;बेसी&#039; शब्दको पहिलो अर्थमा &#039;ब्याँसी&#039; शब्दको प्रयोगइतिहास शिरोमणि बाबुराम आचार्यले &#039;पुराना कवि र कविता&#039; (२००३) को पुष्ठ३७ मा तीनपटक गरेका छन्‌ । प्राचीन सन्दर्भमा यसको प्रयोग अन्यत्र क-कसलेकहाँ कहाँ गरेका छन्‌ ? अन्वेषणीय छ । प्राचीन कालको पदमध्यगत वापदान्तको &#039;या&#039; आधुनिककालमा &#039;ए&#039;मा परिवर्तन भएको पाइन्छ । जस्तै :भन्याँच्याँ- भनेँयेँ । त्यस्तै पदमध्यगत &#039;या&#039; नै &#039;ड्&#039; मा पनि परिवर्तन भएका केहीप्रयोगहरू भेटिन्छन्‌ । जस्तै : म्यान? किन । त्यसैले &#039;व्याँसी&#039;बाट &#039;ब्‌ याँ-एँ सी&#039;?-बैँसी भएको र &#039;ब्याँसी&#039;बाटै “ब्‌ याँख्डैँ सी? बिसी शब्दको विकास भएको हुनुसम्भव छ । यसै गरी &#039;बँसी&#039; शब्दको ग्रामीण नेपाली दाजुभाइको सहज उच्चारणले&amp;quot;ए को हृस्व गरेर &#039;निँसी&#039; शब्दको विकास भएको हुनु पनि असम्भव देखिँदैन ।&lt;br /&gt;
२.३ दाजु&lt;br /&gt;
नेपाली भाषामा &#039;दाइ&#039; शब्दको मुख्यत: तीन अर्थमा प्रयोग भएको छ । &#039;दाउ&#039;धातुमा &#039;आइ&#039; प्रत्यय लागेर बनेको &#039;दाइ&#039; शब्दले &#039;दाउने क्रिया वा प्रक्रिया&#039;लाईबुझाउँछ । संस्कृत &#039;दायाद&#039; शब्दबाट तदूभव शब्दको रूपमा नेपालीमा भित्रिएको&#039;दाइ&#039; शब्दको “नेपाली बृहत्‌ शब्दकोश&amp;quot; (२०६० : ६०२) ले निम्नलिखित दुई थरीअर्थ दिएको छ : “दाजुभाइमा आफूभन्दा जेठो व्यक्ति, दाज्यू र जेठो उमेरकोअद्भकलमा भनिने कुनै पुरुष व्यक्ति ।” संस्कृतमा &#039;दायाद&#039; शाब्दका पैतृक सम्पत्तिकोएक भागको उत्तराधिकारीवाला व्यक्ति, पुत्र, कुटुम्ब आदि अर्थहरू भेटिन्छन्‌(आफप्टै, १९९७ : ४४४) । यीमध्ये &#039;पुख&amp;quot;&#039; बाहेक &#039;जेठो&#039; विशेषणसहित उक्त दुवैअर्थमा संस्कृतको &#039;दायाद&#039; शब्दले नेपालीमा तद्भव रूप घारण गरेको छ ।संस्कृतको &#039;दायाद&#039; शब्दका &#039;आद्‌&#039; को लोप भै &#039;य्‌&#039; का ठाउँमा &#039;इ&#039; आदेश भएर&#039;दाइ&#039; शब्दको निर्माण भएको हो । “दाइ&#039; शब्दमा संस्कृतको &#039;जीव&#039; शब्दबाटविकसित &#039;जी&#039; को योग हुँदा &#039;दाइजी&#039; र “यू &amp;quot;को योग हुँदा &#039;दाइज्यु&#039; शब्दकोनिर्माण भएको हो । भाषाको क्रमिक विकास हुँदै जाँदा &#039;दाइजी&#039; र &#039;दाजी&#039; शब्दमा&amp;quot;ए प्रत्यय लागी संस्कृतको यण्सन्धिको नियम लगाउँदा &#039;ई&#039; का ठाउँमा &#039;य्‌&#039;आदेश भएर &#039;दाजी-ऐट दाज्‌ ईच्य्‌-एर &#039;दाज्यै&#039; को विकास भएको हो । &#039;दाज्यू&#039;शब्दबाट चाहिँ &#039;बालाजु&#039; शव्द झैँ &#039;य&#039; को लोप र &#039;ई&#039; स्वर हृस्व भई &#039;दाजु&#039;शव्दको विकास भएको हो । वर्तमान समयमा समानार्थी भए पनि ढाजी र दाज्यूकोभन्दा &#039;दाजु&#039; शब्दको नै अत्यधिक प्रयोग भएको छ ।&lt;br /&gt;
शन्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ ३९&lt;br /&gt;
२.४ भाउज्‌&lt;br /&gt;
हाम्रो चलनमा &#039;भाउजू&#039; शब्दको अर्थ &#039;दाजुकी पत्नी&#039; भन्ने सन्दर्भमा प्रयोगभएको छ । &amp;quot;नेपाली बृहत्‌ शब्दकोश&#039; (२०६० : ९४६) ले यसको व्युत्पत्तिसंस्कृतको &#039;भ्रातृजाया&#039; र प्राकृतको &#039;भाउज्जा&#039;बाट भएको देखाएको छ । संस्कृतको&#039;आ्रातृजाया&#039; शाब्द भाइलाई बुझाउने &#039;भ्रात्‌&#039; शब्द र पत्नीलाई बुझाउने &#039;जाया&#039;शाब्दका वीचमा षष्ठी तत्पुरुप समास भएर निर्माण भएको हो । जसको नेपालीअर्थ भाइकी पत्ती अर्थात्‌ भाइबुहारी भन्ने हुन्छ । &#039;दाइ&#039; लाई बुझाउने &#039;अग्रज&#039;शाब्दबाहेक अर्को शाब्द संस्कृतमा भेटिँदैन । &#039;अग्रजजाया&#039;बाट &#039;भाउजू&#039; शाब्दकोव्युत्पत्तिक्रम देखाउनु असम्भब छ । संस्कृतको “भ्रातृ शब्दले भाइलाई मात्र नभएरसहोदर पुरुष व्यक्तिलाई पनि बुझाउँछ । त्यसैले “श्रातृजाया&#039;सँग &#039;भाउजु&#039; शब्दकोमूल साइनो गाँस्न खोज्ने प्रयासलाई पूर्णत: अस्वीकार्न सकिन्न । नेपालीमा &#039;भाइ&#039;शब्द आफूभन्दा तल्लो दर्जाका सहोदर पुरुष व्यक्तिलाई मात्र प्रयोग गरिन्छ,संस्कृत र हिन्दीमा झै आफूभन्दा माथिल्लो दर्जाका सहोदर पुर््ष व्यक्तिलाई &#039;भाइ&#039;शब्दको प्रयोग गरिँदैन । त्यसैले संस्कृतको “भ्रातृजाया&#039;बाट नेपालीमा &#039;भाउज्‌&#039;शब्दको विकास भएको हो भनेर निर्विवाद रूपमा स्वीकार्न पनि कठिन छ ।बालकृष्ण पोखरेल (२०५९ : ५६) ले पनि &#039;भाउजू&#039;को मूलका रूपमा संस्कृतका&#039;ग्रातृजाया&#039; र &#039;भ्रातुर्जाया&#039;लाई स्वीकार्न असम्भब रहेको बताएका छन्‌ । &#039;भाउजू&#039;शब्दको मूल साइनो खोज्ने क्रममा संस्कृतमा &#039;भाविनी&#039; भन्नै एउटा शब्द भेटिएकोछ । “भू&#039; घातुमा &#039;इनि&#039; र &#039;डीष्‌&#039; प्रत्यय लागेर संस्कृत &#039;भाविनी&#039; शब्दको निर्माणभएको हो । आप्टै (१९९७ : ७३९) का अनुसार भानिनी शब्दका तीन अर्य हुन्छन्‌: (१) सुन्दर स्त्री, (२) उत्तम या सज्जन महिला र (३) स्वेच्छयाचारिणी स्त्री । यीतीनवटै अर्थमा प्रयुक्त “भाविनी&#039; शब्दले &#039;स्वरी&#039;लाई नै बुझाएको छ । यीमध्ये दोस्रोउत्तम या सज्जन महिला भन्ने अर्थमा प्रयुक्त संस्कृत &#039;भाविनी&#039; शन्दसँग नेपाली“भाउजू&#039; शब्दको मूल साइनो हुनसक्छ । देवर वा नन्दका दृष्टिमा &#039;भाउजू&#039; निश्चयनै उत्तम वा पूज्य हुन्छिन्‌ । भारतमा र नेपालका कतिपय ठाउँमा देवरले&#039;भाउजू&#039;लाई खुट्टामैँ ढौगेर सम्मान प्रकट गर्ने चलन छ । मैले आफूना साथीकाभाइले &#039;भाउजू&#039;लाई खुद्टामैँ ढोगेर सम्मान प्रकट गरेको देखेको छु । संस्कृतको&#039;विनी&#039; शाब्दबाटै हिन्दीको &#039;भाउजू&#039; वाचक &#039;भाभी&#039; शव्दको विकास भएको हुनुसम्भब छ । नेपालीमा चाहिँ संस्कृतको &#039;भाविनी&#039; शव्दमा &#039;जी&#039; वा &#039;ज्यू&#039;को योगबाट&#039;आउजू&#039; शब्दको व्युत्पत्ति यस प्रकार भएको हुनसक्छ : भाविनी जीव?” भाविजीव? आउ जीउ?- भाउज्यू -भाउजू । यसरी &#039;भाउजू&#039;को विकास हुँदा “भाविनी&amp;quot;कोगरेक संरचनामा रहेको संस्कृतका &#039;इनि&#039; र &#039;डीष्‌&#039; दुवै प्रत्ययको लोप भएको&lt;br /&gt;
न्छु।&lt;br /&gt;
२.५ माइजूहामीले &#039;मामाकी पत्नी&#039;लाई &#039;माइजू&#039; भन्ने गरेका छौं । बालकृष्ण पोखरेल(२०४६ : १०5) ले यसलाई &#039;मामीज्यू&#039; हुनुपर्नेमा &#039;मि&#039;का ठाउँमा &#039;इ&#039; आदेश भएर&lt;br /&gt;
५४० ४ शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
जन्मिएको बताउँदै पुरानो “माइँजू&#039;को सरलीकरण ठहत्याएका छन्‌ । &#039;माइजू&#039;लाई&#039;माइँज्‌&#039;को सरल रूप मान्न सकिए पनि &#039;मामीजू&#039; हुनुपर्ने विचारचाहिँ अन्वेषणीयछ । नेपाली बृहत्‌ शब्दकोश&#039; (२०६० : १००३) लै भने संस्कृतको &#039;मातुली&#039; रनेपालीको &#039;ज्यू&#039;बाट &#039;माइजू&#039;को विकास भएको देखाएको छ । संस्कृतको &#039;मातुली&#039;शब्दको निर्माण &#039;मातू&#039; शब्दमा &#039;डुलच्‌&#039; र &#039;डीष्‌&#039; प्रत्यय लागेर भएको हो ।नेपालीमा &#039;माइज्‌&#039; शव्दको व्युत्प्ति यस प्रकार भएको हुनु बढी उपयुक्त ठहर्छ :मातुली जीव? मावृजीव? माइजीउ? माइज्यू माइजू । यस प्रकार &#039;भाउजू&#039;शब्दको व्युत्पत्तिमा झैँ &#039;माइजू&#039; शाब्दको व्युत्पत्तिमा पनि संस्कृतको &#039;मातुली&#039;शब्दको आन्तरिक संरचनामा रहेका &#039;डुलच्‌&#039; र &#039;डीष्‌&#039; दुवै प्रत्ययहरूको लोपभएको पाइन्छ । &#039;माइज्‌&#039; मा झैं संस्कृतको &#039;तृ&#039; बाट नेपालीमा &#039;इ&#039; को विकासभएका थप उदाहरणहरू पनि पाइन्छन्‌, जस्तै : भ्रातृुशः भाइ, मातृर माइ (देवी),जामातृर जमाइ (हिन्दी)?” ज्वाइँ इत्यादि ।&lt;br /&gt;
२.६ बालाजु&lt;br /&gt;
&#039;बालाजु&#039; शब्द काठमाडौँभित्रको एउटा प्रमुख ठाउँको नामका रूपमा प्रसिद्धछ। यस शब्दलाई “नेपाली बृहत्‌ शब्दकोश&#039; (२०६० : ९०६) ले &#039;बालाज्यू&#039; नामशाब्दका रूपमा प्रविष्टि दिएको छ । उक्त कोशले यसको अर्थ “काठमाडौँकोउत्तरपशिचिममा रहेको र बाड्गस धारा भएको एक तीर्थ वा रमणीय स्थान” भन्नेगरेको छ । &#039;बाला&#039; शव्द नेपालीमा तत्सम र तद्भव दुवै किसिमले भित्रिएको छ ।संस्कृतको &#039;वलय&#039; शब्दबाट तदूभवका रूपमा नेपालीमा भित्रिएको &#039;बाला&#039; शब्दलेनारीहरूले लगाउने चुरालाई बुझाउँछ । नेपालीमा तत्सम शब्दका शूपमा प्रयुक्त&#039;बाला&#039; शब्दले विशेषत: कन्या र पत्नीलाई बुझाउँछ । &#039;कन्या&#039; अर्थमा प्रयुक्त“बाला&#039; शब्दसँग &#039;बालाजु&#039; शब्दको मूल साइनो हुनुपर्छ । संस्कृतको आशीर्वादात्मक&#039;जीव&#039; शब्दबाट &#039;जीउ&#039; हुँदै &#039;ज्यू&#039; वा &#039;जी&#039;को विकास भएको हो । &#039;बाला&#039; शब्दमा&#039;जीव&#039; शब्दको .योगद्वारा निर्मित &#039;बालाजीब&#039; शब्दबाट बालाजीउ? बालाज्यू वाबालाजी शाब्दको बिकास भएको हुनुपर्छ । भारतमा &#039;बालाजी&#039; भगवानूको ठूलोमन्दिर छ र त्यसको दर्शन गर्न अनेकौँ नेपालीहरू आज पनि जाने गर्दछन्‌ ।नेपालमा पनि भानुभक्तको समयसम्म हालको &#039;बालाजु&#039; तीर्थ वा रमणीय स्थललाई&#039;बालाजी&#039; नै भनिन्थ्यो । भानुभक्त पहिलोपटक काठमाडौं प्रवैश गर्दा “यतिदिनपछि मैले आज बालाजि देख्याँ” भनेर कबिता रचैका थिए । यही कविताकोरचनाप्रसङ्ग उल्लेख गर्नै क्रममा बाबुराम आचार्यले पुराना कवि र कविता (२०५० :५९) मा &#039;बालाज्यू&#039; शाव्दको प्रयोग गरेका छन्‌ र यसै शब्दलाई &#039;नेपालीवृहत्‌ शब्दकोश&#039;ले समेत मान्यता दिएको छ । तर परिवर्तनशील जीवित भाषाकोस्वरूप भएकाले वर्तमान समयमा चाहिँ नेपाली भाषामा &#039;बालाज्यू&#039; शब्दका &#039;यू्‌&#039;कोलोप भई दीर्घ &#039;ङ&#039; स्वरसमेत हृस्व भएर &#039;बालाजु&#039; शाब्द बढी प्रचलनमा आएकोछु।&lt;br /&gt;
शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ ४१&lt;br /&gt;
२.७ औंजस&lt;br /&gt;
&#039;औजस&#039; को अर्थ &#039;अपयश&#039; वा &#039;अपकीर्ति&#039; भन्ने हुन्छ । यसको मूल साइनोसंस्कृतको &#039;अपयश&#039; शाब्दसँग रहेको छ । &#039;अपयश&#039; शब्दको निर्माण &#039;अप&#039; उपसर्गर कीर्तिवाचक &#039;यशस्‌&#039; शब्दका बीच समासबाट भएको हो । संस्कृतको &#039;अपयश&#039;शब्दले बदनाम, कलङ्क वा अपकीर्ति भन्नै अर्थ दिन्छ । नेपालीमा तत्सम शब्दकारूपमा समैत &#039;अपयश&#039; शब्दको प्रविष्टि &#039;नेपाली बृहत्‌ शब्दकोश&#039; (२०६० : ५३)मा भएको छ । यस कोशमा &#039;अपयश&#039; शब्दलाई अपजस, अपकीर्ति र अबगाल कारूपमा अर्थ्याइएको छ । तदुभव शब्दका रूपमा &#039;अपजस &#039; शब्दलाई पनि उक्तकोशले समेटेको छ । यसमा &#039;अपजस &#039; शब्दका दुई थरी अर्थ दिइएको छ : &amp;quot;१)बदनाम, अपकीर्ति, (२) विना कसुर आइलागेको आरोप, दोषारोपण, वथा आरोप ।&amp;quot;यहीं नै &#039;अपजसे&#039; र &#039;अपजस्याहा&#039; शब्दको “अपजस पाउने, अबजसे” भन्ने अर्थउल्लेख गरिएको छ । यस प्रकार &#039;नेपाली बृहत्‌ शब्दकोश&#039;ले संस्कृतको &#039;अपयश&#039;शब्दका तीन थरी तद्‌भव शव्दको प्रचलन नेपालीमा देखाएको छ : अपजस,अबजस र औजस । संस्कृतको &#039;अपयश&#039; शब्दबाट &#039;अपजस&#039;&amp;quot; र &#039;अबजस&#039; क्रमश:बिकसित भएका हुन्‌, तर अबजसबाट एक्कासी &#039;औजस&#039; चाहिँ भएको होइन ।&#039;अबजस&#039;बाट &#039;अउजस&#039; भएपछि &#039;औजस&#039; भएको हौ, यद्यपि &#039;अउजस&#039; शब्द लिखितनेपालीमा प्रचलित देखिँदैन, यसको उत्तरवर्ती रूप &#039;औजस&#039; चाहिँ बढी प्रचलनमाआएको छ । हाम्रा आदिकवि भानुभक्त आचार्यले &#039;प्रश्नोत्तरमाला&#039;मा &#039;औजस&#039;शाब्दको प्रयोग गरैको पाइन्छ । &#039;प्रश्नोत्तरमाला&#039;का बिभिन्न संस्करणहरू हेर्दाअपयश, अपजस, अबजस र औजस पाठमभेदहरू पाइन्छन्‌ । तर भानुभक्तलेनेपालीद्वारा सहज उच्चरण गरिने &#039;अउजस&#039; शब्दको प्रयोग पो गरेका थिए कि?यसै भन्न सकिने अवस्था छैन । जे-जस्तो भए पनि संस्कृतको &#039;अपयश&#039; शब्दकोक्रमिक बिकास नेपालीमा यसरी भएको ठहम-याउनु उपयुक्त नै देखिन्छ : अपयश?”अपजस?- अबजस?- अउजस नऔजस ।&lt;br /&gt;
३. उपसंहारयस प्रकार यहाँ नेपाली शब्द निर्वचन परम्पराका सन्दर्भमा उपर्युक्त केहीतदभव नेपाली शब्दहरूको मात्र व्युत्पादन गर्ने सामान्य प्रयासमात्र हुनसम्यो । यीशाव्दहरूको पुर्ख्यौली परम्परा पूर्णरूपमा यही नै हो भनेर निरन्तर जारीरहिरहनुपर्ने अनुसन्धानको मार्यलाई अवरुद्ध गर्न सकिँदैन । यथासम्भव आफूनोतर्फबाट गर्न सक्किएको प्रारम्भिक अध्ययनको रूपरेखालाई मात्र यहाँ उल्लेखगरिएको हो र बाँकी अनुसन्धानको मार्ग प्रशस्त गर्न भाषाविद्हरूको ध्यान अवश्यपनि आकृष्ट हुँदै जानेछ भन्ने कुरामा विश्वस्त रहन सकिन्छ ।(नेपाली, २०६४, पूर्णाड्रक : १९३, पू. १३-२०)&lt;br /&gt;
ति&lt;br /&gt;
४२ “ झन्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धिअध्याय - छ&lt;br /&gt;
नेपालीमा प्रयुक्तसंरुकृतमूलका अनुपयुक्त शब्दहरू&#039;&lt;br /&gt;
नेपाली भाषाको बिकास संस्कृत भाषाबाट भएको हो । नेपालीमा प्रयोगगरिने अधिकाँश शब्दहरूको मूलस्रौत संस्कृत नै मानिन्छ । नेपालीमा बहुपचलितसंस्कृतमूलका यस्ता केही शब्दहरूसमेत पाइन्छन्‌, जसलाई संस्कृत व्याकरणकादृष्टिले उपयुक्त ठहन्याउन सक्दैन । यस्त अध्ययनको प्रारम्भिक शृङ्खलामा त्यस्ताकेही शब्दहरूको सप्रमाण चर्चा गरिएको छ ।&lt;br /&gt;
१. अत्याधिक&lt;br /&gt;
अविर अष्षिक दुई शब्दको योग हुँदा पराद्य अकारनिमित्तक पूर्वान्त इकारकोयकार यण्‌ (अ.६१।७७) भएर अत्यधिक शब्द बन्दछ । त्यसैले अत्याचार,अत्याधुनिक आदि शब्दहरूको सादृश्यमा नेपालीमा प्रयोग गरिएको (अत्याधिकप्रज्वलनशील पेट्रोलियम पदार्थ, अत्याधिक बहुमतले विजय गराऔं...) अत्याधिकशन्द अनुपयुक्त देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
२. अन्तर्कया&lt;br /&gt;
अन्तट्‌ र कथा दुई शब्दको योग हुँदा उत्तरवर्ती शब्दका आद्य ककारलाईआधार मानेर पूर्ववर्ती शब्दका अन्त्य रकारको विसर्ग (अ. राशी) भईअन्ताःकथा शाब्द बन्दछ । त्यसैले अन्तर्गह अन्तर्मत अन्तर्वाति आदि शब्दहरूकोसादृश्यका प्रभावमा नेपालीको मानक शब्दकोशमा अन्तर्कया शब्दको प्रविष्टि (पोखरेल, २०५५, पृ.४६) र प्रयोग हुनुलाई उपयुक्त ठान्न सक्दैन्‌ ।&lt;br /&gt;
३. अन्तर्कलह&lt;br /&gt;
अन्त र कलह दुई शाब्दको योग हुँदा शब्द २ मा झैं पराच्च ककारलाईनिमित्त मानेर पुर्वान्त रकारको विसर्ग हुने भएकाले अन्त: कलह शब्द उपयुक्त रअन्तर्कलह शब्द अनुपयुक्त ठहरिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
संहकृत भाषाको बर्णबिजात विषयमा दिद्यावारिघि गर्नुभन्दा निकै अधिदेखि नै हामीलाई लेखहरू दिएर सहयोगगर्नै मतिप्रसाद ढकाल आदिकबिका जन्मवलौमा अध्यापन गर्छन्‌ । भातुभक्तको भाषामा गहिरौ अध्ययन पनिगरेका छन्‌ यितलै । त्यतै विषयमा यिनका लेन्रहरू &#039;नेपाली&#039;मा छापिएका हुन्‌ । यसपटक भने अलि फरकबिषय रोजेका छन्‌ इकालजीले । यहाँ उठाइएको विषय गएभीर छ । पाणिनीय ब्याकरणमा अशुद्ध मानिनेकरतिषग्र शच्दहरू नेपालीमा विद्वान्‌हरूले प्रयोग गर्ने गरेका छन्‌, त्यस्ता शब्दहरूलाई त्यस्तै चल्न गर्दै जानेहो क्रि सच्याउने भन्ने उनले प्रश्न गरेका छन्‌ । &#039;नेपाली&#039; त त्यलमा केही भन्न सक्तैन, अव यसवारे हाम्रावैषाकरणी अथवा भाषाशास्तरीहरूले केही निक्यौंल गरिदिनुपर्छै भन्ने हाम्रो निबेदन हो । हामीलाई के जाग्छभने ५०६० वर्षदेखि &#039;नेपाली&#039;ले चलाइसकेका प्रमोगताई त्यसै फाल्न सकिँदैन कि ? त्यस्ता शब्दलाई&#039;अड्गीकृत&#039; नेपाली शब्द वनाउन मिन्छ ? विडानूहरुले हामीलाई भनिदिनुपयौ ।&lt;br /&gt;
सम्पादक ।&#039;नेपाली&#039; चैमासिक-२०४, कमल दीज्षित)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ ४३हं. अन्तक्रिया दुअन्तर्‌ र क्रिया दुई शब्दको योग हुँदा शब्द २ र ३ मा झैं पराच्च ककारलाईनिमित्त मानेर पूर्वान्त रकारको विसर्ग हुने भएकाले अन्तक्रिया शब्द उपयुक्तठानिन्छ भने अन्तक्रिया (पोखरेल, पू.) शब्द अनुपयुक्त देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
५. अन्तर्राष्ट्रिय&lt;br /&gt;
अन्तर र राष्ट्रिय दुई शब्दको योग हुँदा पराद्य रकारनिमित्तक पूर्वान्तरकारको लोप हुने (अ.«।श१४) र रलोपनिमित्तक राष्ट्रिय शब्दलाई आधार मानेरपूर्वान्त अकारको दीर्घ हुने (अ.६।३१११) भएकाले अन्तराष्ट्रिय शब्द बन्दछ ।राष्ट्रिय शव्दसँग भि अर्थ बुझाउने अन्तर शव्दको योग हुँदा निर्माण हुने शब्दलेराष्ट्रभित्रको भन्ने मात्र अर्थ बुझाउनुपर्नेमा अन्य राष्ट्रलाई समेत बुझाएकोपाइन्छ । त्यसैले अर्थात्मक र शाब्दरचनात्मक दृष्टिले अन्तर्राष्ट्रिय शब्दको प्रयोगविचारणीय ठहरिन्छ ।&lt;br /&gt;
६. अपहरित&lt;br /&gt;
अप उपसर्गपूर्वक हु घातुमा क्त (त) प्रत्ययको योग भई अफढुत शव्दबन्दछ । हु घातु इकार आगम नहुने (अनिद्‌) घातुका रूपमा पढिएको (मिश्र,२००३, पृ.२४२) हुँदा इकारको आगम निषेध (अ.७२१०) भएकाले पठित; लिब्चितआदि शब्दका सादृश्यमा नेपालीमा प्रयुक्त अपहरित शब्द उपयुक्त देखिँदैन ।&lt;br /&gt;
७, आतिथ्यता&lt;br /&gt;
अ्तिधि शव्दमा भावार्थक ग्यन्‌ (य) प्रत्यय (अ.५।११२४) लागेपछि आद्यअकारको आकारका रूपमा वृद्धि र अन्त्य इकारको लोप भएर आतिय्य शाब्दकोरचना हुन्छ । भावार्थक प्यन्‌ प्रत्ययान्त आविय्य शाब्ददेखि पुन: भावार्थक वल्‌ (ता)प्रत्यय नलाग्ने भएको हुँदा आतिथ्यता शब्दको प्रयोग (हाम्रो आतिथ्यता स्वीकारगरी...) लाई उपयुक्त ठान्न सकिँदैन ।&lt;br /&gt;
द. उपरोक्त&lt;br /&gt;
उपरि र उक्त दुई शव्दको योग हुँदा पराद्य उकारनिमित्तक पूर्वान्तडुकारको यकारका रूपमा यग्‌ (अ.६१।७७) भई उपर्युक्त शब्दको निर्माण हुन्छ ।त्यसैले उफयोत्न शब्दको प्रयोग (उपरोक्त विषयमा सम्बन्धमा...) अनुपयुक्तदेखिन्छ ।&lt;br /&gt;
९. उल्लेखित&lt;br /&gt;
उत उपसर्गपूर्वक &#039;लिढ्‌ धातुमा क्त (त) प्रत्ययको योग हुँदा कित्‌ क्तप्रत्ययलाई आधार मानेर लिख धातुका उपान्त्य इकारको एकारका रूपमा प्राप्तगुण निषेध (अ.११।५) भएर उल्लिल्लित शब्दको रचना हुन्छ । त्यसैले लेख; लेखकआदि शब्दको सादृश्यमा अनुकरण गरिएको उल्लेखित शब्दको प्रयोगलाई उपयुक्तठान्त सकिँदैन ।&lt;br /&gt;
५४४ ४ शन्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
१०. कृतसङ्कल्पित ,&lt;br /&gt;
कृत (गरेको) छ सङ्कल्प जसले भन्ने विग्रहमा बहुब्रीहि समास ।अ.रारार४) भएर विशेषणवबाची कृतलङ्कल्प शाब्द बन्दछ । कृवसङ्कल्प शब्ददेखिइतच्‌ प्रत्यय असम्भव भएकाले कृषसङ्कल्पित शब्दको प्रयोग अनुपयुक्त देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
पृ. गरिमामय&lt;br /&gt;
गरियन्‌ प्रातिपदिक शाब्ददेखि मयट्‌ प्रत्यय लागी प्रातिपदिकान्त नकारकोलोप (अ. 5२७) भएर गरिमसय शब्दको निर्माण हुन्छ । गरिया शब्दको मूलगरिसन्‌ हो भन्ने वास्तविकतातर्फ दृष्टि नपुगेकाले नेपालीमा अनुपयुक्त गरिमामयशब्दको प्रयोग (गरिमामय उपकुलपति पदमा नियुक्त हुनुभएकामा हार्दिकबधाइ...) हुनगएको हौँ ।&lt;br /&gt;
१२. ग्रसित&lt;br /&gt;
उकारको इत्संज्ञा हुने ग्रत्‌ धातुदेखि क्त (त) प्रत्यय लागेर ग्रस्त शब्दकोरचना हुन्छ । ग्रह धातु इडागम हुने (सेट) धातुका रूपमा पढिएको (मिश्र,२००३, पृ.१३३) भए पनि प्रस्‌ धातुमा उक्कारको इत्संञ्चा अएका कारण क्तपरत्ययको इडागम निषेध हुने (अ.७२१५) भएकाले इडागमयुक्त प्रतित शव्दकोनिर्माण असम्भव देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
१. चलायमान&lt;br /&gt;
संस्कृत व्याकरणमा हल्लनु भन्नै अर्थमा रहेको चत्‌ धातु परस्मैपदी धातुकारूपमा पढिएको छ ।शर्मा, २००५, पू.१९६) । परस्मैपदी घातुदेखि शानच्‌ (आन)प्रत्यय नहुने र शत (अत) प्रत्यय मात्र हुने भएकाले चल्‌ घातुदेखि शत्‌ प्रत्ययलगाएर चलन शब्द र णिजन्त चल धातुदेखि शत्न प्रत्यय लगाएर बालयद्‌शब्दमात्र सिद्ध गर्न सकिन्छ । त्यसैले अनुपयुक्त चलायमान शब्दको सट्टाचलिरहेको भन्ने शब्दको प्रयोग गर्न उपयुक्त हुन्छ।&lt;br /&gt;
१४, जागृत&lt;br /&gt;
जाए धातुदेखि क्त (त) प्रत्यय लागेपछि क्त प्रत्ययको डट्‌ (इ) आगम रधातुका क्रकारको रपरत्वसहित झकार गुण (अ.७३५४) भएर जागरित शब्दबन्दछ । त्यसैले संस्कृतको जाग्रत्‌ शब्दबाट जागेको, ब्युँकिको आदि अर्थमाअनुपयुक्त मागृत शब्दको विकास भएको देखाइनु (पोखरेल, २०५५, पृ.४५९)अनुपयुक्त देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
शन्दनिर्माणप्रभित्रया र सन्धि ४५&lt;br /&gt;
११, त्रसित&lt;br /&gt;
ईकारको इत्संज्ञा हुने क्रत्‌ धातुदेखि क्त (त) प्रत्यय लागेर जत्त शब्दकोनिर्माण हुन्छ । बत धातु हेट्‌ धातुका रूपमा पढिएको (मिश्र, २००३, पू.४०८)भए पनि क्‌ धातुमा ईकारको इत्संज्चा गरिएको हुँदा क्त प्रत्ययको इडागम निषेधहुने (अ.७।२१४) भएकाले इडागमयुक्त बसित शब्द सिद्ध हुन नसक्ने हुँदा त्यसकोप्रयोगलाई उपयुक्त ठहन्याउन सकिँदैन ।&lt;br /&gt;
१६ विग्श्रमित&lt;br /&gt;
उकारको इत्संज्चा हुने क्षमू धातुदेखि त (त) प्रत्यय लागेर धातुका उपान्त्यअकारको ढीर्घ र अन्त्य मकारको अतुस्वार एवम्‌ परसवर्ण भएर श्रान्त शब्दकोरचना हुन्छ । रस्‌ धातु हेट धातुका रूपमा पढिएको (मिश्र, २००३, पृ.२१२) भएपनि भरम्‌ धातुमा उकारको इत्संज्ञा गरिएको हुँदा त्त प्रत्ययको इडागम निपैध हुनै[अ.७२१५) भएकाले डडागमयुक्त भ्रमित शव्द सिद्ध हुन नसकेको हो। दिक्रइड्डागमरहित आ्जान्त शब्दका बीचमा समास भएपछि ककारको गकारका रूपमाजश्त्व भएर ढिरफ्ान्ता शब्द सिद्ध हुन्छ । त्यसैले बैक र इडागमयुक्त ग्रमितशब्दको योगमा निर्माण गरिएको ,दिरक्चमित शब्द अनुपयुक्त ठहरिन्छ ।&lt;br /&gt;
१७. दुरावस्था&lt;br /&gt;
दुर र अवस्था दुई शब्दको योग भई दुरबस्था शब्द बन्दछ । दुर उपसर्गहलन्त हुन्छ भन्ने ख्याल गर्न नसकिएका कारण अनुपयुक्त टुराबस्था शब्दकोप्रयोग नेपालीमा हुनपुगेको हो ।&lt;br /&gt;
१८. खैर्षता&lt;br /&gt;
श्वीर शव्ददेखि भावार्थक प्यन्‌ (य) प्रत्यय (अ.५११२४) र घत्‌ पता)प्रत्यय (अ.ष।॥११९) लागेर कमशः बैर्य र ध्वीरता शब्दको निर्माण हुन्छ । क्षयशब्दमा नै भावार्थक प्यत् प्रत्यय भएको छ भन्ने विचार नपुच्याइएका कारण धैर्यशव्ददेखि असम्भव र निरर्थक रूपमा तल्‌ प्रत्यय लगाएर अनुपयुक्त धैर्यता शन्दकोप्रयोग नेपालीमा भएको देख्न पाइन्छ । एउटा आधार शब्दमा एउटै अर्थका अनेकप्रत्यय लाग्ने सम्भावना नरहने भएकाले एक-एक प्रत्यय लगाएर धैर्य वा ीरताशब्दको मात्र प्रयोग गरिनुपर्ने देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
१३. परम्परित&lt;br /&gt;
संस्कृत व्याकरणमा तारकादिगण (अ.५।२।२६) मा पढिएका तारक, पुष्प आदिशाब्ददेखि ड्ृतच्‌ (इत) प्रत्यय हुन्छ भने क्त प्रत्ययको आद्यवयचका रूपमा इडागमहुँदा पनि षाब्दान्तमा डत प्रत्ययको उपस्थिति भेटिन्छ । नेपालीमा कुन चाहिँ ड्तच्‌&lt;br /&gt;
४६ ४ शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
प्रत्ययको डत हो र कन चाहिँ इडागमविशिप्ट क्त प्रत्ययको इत हो भन्ने कुराकोयधार्ध ज्ञान हुन नसक्दा अधिकाँश नेपाली शब्दमा डत प्रत्यय लगाइएको पाद्न्छ ।यसै क्रममा परम्परा शाब्ददेखि इत प्रत्यय लगाएर फरस्प्रित शब्दलाई नेपालीमाप्रयोग गर्ने गरिएको छ । परन्तु यसको आधार स्पष्ट देखिँदैन । परम्परा शव्द घातुनभएकाले यसमा इडागमविशिष्ट क्त प्रत्ययबाट विकसित इत प्रत्ययको योग हुनुअसम्भव छु । संस्कृत व्याकरणको तारकादियण (अ.५।२।२६) मा ५७ शव्दहरूपढिएका पाइन्छन्‌ (शर्मा, १९४१, पृ.$९२) । ती शब्दहरूमध्ये नेपालीमा एुष्पुउच्चार प्रचार, बिचार फल्लग्‌ खण्ड मुद्रा पलक कृब उत्कण्ठ, गौरन्‌तरङ्ग गर्व हर्ष रोसाञ्च पण्डा फल अड्कृद कलड्क ग्‌र्च्छा प्रतिबिम्ब रबीक्षा शब्दमा इतच्‌ प्रत्यय लागेर निर्माण भएका शब्दहरू प्रचलनमा आएको देख्नसकिन्छ । तारकादिगणलाई आक्तियण मानिएको हुँदा अन्य शब्ददेखि समेत इतच्‌प्रत्यय सम्भव भए पनि संस्कृत वाड्रमयमा एरस्परित शब्दको प्रयोग नदेखिएकालेनेपालीमा यसल्लाई संस्कृतमूलको इतच्‌ प्रत्ययान्त शब्दका रूपमा ग्रहण गर्नसकिँदैन । त्यसैले अनुपयुक्त पटस्फरित शब्दको सट्टा परम्परागत शब्द प्रयोग गर्नउपयुक्त देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
२०. पुनरावलोकन&lt;br /&gt;
पुनर्‌ र अबलोकन दुई शब्दको योग भएर एनरवलोकत शब्दको रचनाहुन्छ । पुनर्‌ अव्यय शव्द हलन्त हुन्छ भन्ने ख्याल नगरिएका कारण अनुपयुक्तपुचयवलोकव शब्दको अत्यध्चिक प्रयोग नेपालीमा हुन गएको हौ । उपयुक्तपुनरबल्लोकव जान्दका साथ अनुपयुक्त गुनरावलोकन शब्दलाई नेपालीको मानकशब्दकोशमा प्रविष्ट गराउनु (पोखरेल, २०५५, पृ.७८७) उपयुक्त देखिँदैन ।&lt;br /&gt;
२१. पृयकीकरण&lt;br /&gt;
पु॒यक्‌ र करण दुई शब्दको योग भएर एबन्करण शब्द बन्दछ । संस्कृतव्याकरणमा कू भर अह्‌ धातुको पोगमा «वि प्रत्ययान्त प्रातिपदिकका अन्त्यअकारको मात्र इत्न हुने (अ.७४।३२) भएकाले एकीकरण तसीकरण आदिशब्दको सादृश्यका कारण नेपालीमा प्रयोग गर्ने गरिएको एभकीकरण (&lt;br /&gt;
शक्तिपृ्थकीकरणको सिद्धान्त...) शाब्द अनुपयुक्त देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
२२. बाहुल्यता&lt;br /&gt;
बहुल शाव्ददेखि भावार्षक प्यम्‌ (य) प्रत्यय (अ.५।११२४) र ल्‌ पत्ता)प्रत्यय ।अ.५।१।११९) लागेर कमश: बाहुल्य र बहुलता शब्दहरू सिद्ध हुन्छन्‌ ।बाहुल्य शब्दमा भावार्थक थ्यज्‌ प्रत्यय लागेको छ भन्ने कुरालाई विचार नगरिएकाकारण बाहुल्य शब्ददेखि असम्भब र निरर्थक रूपमा भावार्थक तल्‌ प्रत्यय लगाएर&lt;br /&gt;
गन्दानिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ ४७&lt;br /&gt;
अनुपयुक्त बाहुल्यता शब्दको प्रयोग्र नेपालीमा हुने गरेको पाइन्छ । आवार्थकप्रत्ययान्त शब्दमा पुनः भावार्थक प्रत्ययको योग हुन नसक्ने भएकाले बहुलआधार शब्दमा एउटा मात्र भावार्थक प्रत्यय लगाएर बाहुल्य वा बहुलता शब्दकोप्रयोग गर्न उपयुक्त हुन्छ ।&lt;br /&gt;
२३. मनोकामना&lt;br /&gt;
मनका (मनको) कासना भन्ने विग्रहमा सकारान्त मनचू शब्द र कामवाजान्दका बीचमा षष्ठी तत्पुष्‌ष समास (अ. २२) भएपछि पूर्वान्त सकारको ठ्त्व (अ.बारा६६) एवम्‌ ककारनिमित्तक रकारको विर्य (अ. ५३१५) भएर मनःकामबाशब्द बन्दछ । त्यसैले मनोरय मर्वोविज्ञाव आदि शब्दका सादृश्यमा नेपालीमाप्रयुक्त मवोकामबा शब्दलाई उपयुक्त ठहन्याउन सकिँदैन ।&lt;br /&gt;
२४. महानता&lt;br /&gt;
महत प्रातिपदिक शब्ददेखि भावार्थक तल्‌ (ता) प्रत्यय (अ.५1१।११९) लागेरमहत्ता शब्दको निर्माण हुन्छ । महान्‌ शब्दको मूल महत्‌ शव्द हो र महान्‌ शब्दपनि हलन्त हुन्छ भन्ने ख्याल नगरिएको हुँदा अनुपयुक्त महावता शाब्दको प्रयोगनेपालीमा हुन गएको हो।&lt;br /&gt;
२५, महिला नैत्‌&lt;br /&gt;
पुलिब्ग नेतृ शव्ददेखि स्वीलिङ्को विवक्षामा डीए (ई) प्रत्यय (अ. ४१५)भएपछि ईकारनिमित्तक पूर्वान्त क्रकारको रकारका रूपमा यण्‌ (अ. ६१७७)भएर तेत्री शब्दको रचना हुन्छ । त्यसैले महिला शब्दका साथमा पुलिङ्गी केठशब्दको प्रयोग गरिनु अनुपयुक्त देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
२६. पुवामञ्च&lt;br /&gt;
ठूनास्‌ (युवाहरूको) सञ्च भन्नै विग्रहमा नकारान्त युवन्‌ शब्द र मञ्चशब्दका बीचमा षष्ठी तत्पुच्ष समास (अ. २२८) भएपछि नकारान्त पूर्वपदकाअन्त्य नकारको लोप (अ.%५।२।७) भएर युबसञ्च शब्द सिद्ध हुन्छ । त्यसैले संस्कृतव्याकरणका दृष्टिले नेपालीमा प्रयुक्त बुवासञ्च शब्दलाई उपयुक्त ठहन्याउनसकिँदैन ।&lt;br /&gt;
२७. युवावर्ग&lt;br /&gt;
युवास्‌ (युवाहरूको) वर्ग भन्ने विग्रहमा शव्द २६ मा झैं समास र नलोपभएर युवबर्य शब्दको निर्माण हुन्छ । त्यसैले युनामम्च शन्द जस्तै डुवानवर्य शान्दपनि संस्कृत व्याकरणका आधारमा अनुपयुक्त ठहरिन्छ ।&lt;br /&gt;
४८ ४ शब्दनिर्माणप्रक्तिया र सन्धि&lt;br /&gt;
र. राजनैतिक&lt;br /&gt;
राजनीति शब्ददेखि हुने भन्ने अर्घमा ठक्‌ (इक) प्रत्यय भई आच्चय आकारकोपर्जन्यवत्‌ लक्षणका आधारमा आकारमैं बृद्कि र अन्त्य इकारको लोप भएरराजनीतिक शब्दको रचना हुन्छ । वुद्धिनिमित्तक तद्धित प्रत्यय पर भएमा इहलोकपरलोक आदि शाब्दमा उभयपदवृद्धि भएर ऐहलौकिक पारलौकिक आदि शब्दकोसिद्धि भएको देखिए पनि राजचीति शब्दको उभयपदवृद्धिको विधान रउभयपदवृद्धियुक्त राजनैतिक शब्दको प्रयोग संस्कृत वाङ्मयमा भएको नदेखिएकालेनेपालीमा प्रयुक्त उभयपदवृद्धिमूलक राजनैतिक शब्द अनुपयुक्त देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
२९, रूपायन&lt;br /&gt;
रूपहरूको अयन भन्ने विग्रहमा पष्ठी समास भएपछि पूर्वान्त र पराद्य दुवैअकारको आकारका रूपमा तवर्णदीर्घ (अ.६११०१) एवम्‌ एकपदीभूत रूपायनशब्दमा ककार, पक्ार, आकार र अकारले व्यवधान गरे पनि रकारनिमित्तकनकारका स्थानमा गत्वब (अ.बादार) भएर रूपायण शाब्द बन्दछ । त्यसैलेव्युत्पादव शब्दका सादृश्यमा नेपालीमा प्रयुक्त रूपायन शब्द संस्कृत व्याकरणकादृष्टिले उपयुक्त देखिँदैन ।&lt;br /&gt;
३०. लब्धप्रतिष्ठित&lt;br /&gt;
सम्झन (पाएको) छ प्रतिष्ठा जसले भन्नै विग्रहमा बहुब्बीहि समास(अ.२।२।२४) भएपछि उतर्जन सच्चा (अ.१।२१४४) भएको स्वीप्रत्ययान्त लन्धप्रतिष्ठाप्रातिपदिकका अन्त्य आकारको ह्वस्व (अ.१।२।४८) भएर तब्धप्रति शब्दकोनिर्माण हुन्छ । प्रति शन्दको बिशेषणका रूपमा आएको लन्ध शान्दमाभूतकालिक क्त (त) प्रत्यय भएको छ भन्नै कुरामा विचार नपुग्याइएको हुँदाप्रतिठा शब्दलाई इडागमविशिष्ट क्त प्रत्ययान्त शब्दका रूपमा ग्रहण गरेरनब्धप्रतिित शब्दको प्रयोग (लब्धप्रतिष्ठित विद्वान्‌...) नेपालीमा हुनपुगेको हो ।&lt;br /&gt;
३१. वर्चस्व&lt;br /&gt;
वर्चत्‌ शब्ददेखि स्वार्थमा कन्‌ (क) प्रत्यय (अ.५।३।९६) भएर वर्चत्क शब्दकोरचना हुन्छ । त्यसैले वास्तविक प्रत्यपको ख्याल नगरिएका कारण नेपालीमाप्रयोग गर्नै गरिएको वर्चस्व शब्द (वर्चस्व कायम गर्न सफल...) अनुपयुक्तठहरिन्छ ।३२. विद्युतीकरण&lt;br /&gt;
बिद्युत र करण दुई शब्दको योग भएर बविद्युत्करण शब्द सिद्ध हुन्छ । शब्द२१ मा फैँ विद्युत्करण शब्दमा ईत्न (अ.७४।३२) असम्भव भएकाले नेपाली&lt;br /&gt;
झन्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ ४९&lt;br /&gt;
भाषाको मानक शब्दकोशमा विद्युतीकरण शब्दको प्रविष्टि (पोखरेल, २०५४,पृ.११५१) र त्यसको प्रयोग अनुपयुक्त देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
३३. बिद्वान्‌वर्ग&lt;br /&gt;
विदुषः ।विद्वान्‌हरूको) वर्य भन्ने बिग्रहमा षष्ठी तत्पुस्ष समास (अ. २२८)भएपछि विद्रत्‌ पूर्वपदका अन्त्य सकारको दकार (अ.५1२।७२) भएर विद्वट्वर्य शब्दबन्दछ । त्यसैले समस्त शब्दका रूपमा बिश्वाट्वर्य शब्दको प्रयोगलाई उपयुक्तठान्न सकिँदैन ।&lt;br /&gt;
३४. शुभाशिर्वाद&lt;br /&gt;
वाद उत्तरपदनिमित्तक आशित्‌ पूर्वपदका अन्त्य सकारको रुत्व (अ. ५२६६)र उपान्त्य इकारको बीर्घ (अ.514७७) भएर आशीर्वाद शब्दको निर्माण हुन्छ ।शु र आशीर्वाद दुई शव्दका बीचमा समास भएपछि पूर्वान्त अकार र पराद्चआकार दुवैको आकारका रूपमा तनर्णबीर्स (अ.६ा११०१) भएर शुभाशीवदिशब्दको रचना हुन्छ । आशीबरि शब्दको ईकार दीर्घ हुन्छ भन्ने ख्याल नगरिएकाकारण अनुपयुक्त शुभाशिवादि शव्द नेपालीमा प्रयोग हुन गएको हो ।&lt;br /&gt;
३५. शोभापमान&lt;br /&gt;
शुभम्‌ घातुदेखि विहित लट्‌ प्रत्ययका स्थानमा शावच्‌ (आन) प्रत्यय (अ.झरा१२४) भएपछि शए (अ] प्रत्यय र त्यसलाई निमित्त मानेर शुक्व्‌ धातुकाउकारको ओकारका रूपमा गुण एवम्‌ आन प्रत्ययनिमित्तक अकारान्त शोश्धात्वङ्घको मुष् (म्‌) आगम भएर शोशमान शब्द सिद्ध हुन्छ भने णिजन्त शुभधातुदेखि शोशयमान शाब्दको सिद्धि सम्भव हुन्छ । त्यसैले शरभायमान शान्दनेपाली भाषाको मानक शाब्दकोशमा प्रविष्ट हुनु (पोखरेल, २०५५, पृ.११९५) रत्यक्तको प्रयोग गरिनु उपयुक्त देखिँदैन ।&lt;br /&gt;
३६. सङ्ग्रहित / सङ्ग्रहीत&lt;br /&gt;
सम्‌ उपप्र्गपूर्वक ग्रह धातुदेखि कन (त) प्रत्यय भएपछि क्त प्रत्ययकोआद्वबयबका रूपमा इट (इ) आगम (अ.७२३५), क्त प्रत्ययमा ककारको इत्संज्ञाभएकाले त्यसलाई निमित्त मानेर ग्रह धातुका रकारको क्रकारका रूपमाबम्प्रधारण ।अ.६११६), क्रक्ार र अकारको क्रकारका छूपमा पर्वरूण (अ.६१।१०८)) सासृका मकारको अतुत्वार र परतवर्ण एवम्‌ लिट्भिन्न क्तप्रत्ययनिमित्चरक इद्द आयमका इकारको दीर्घ (अ.छ२।३७) भएर सङ्गुहीत शब्दनन्द्छ । ग्रह धातुका रकारको आकारमा परिवर्तन हुन्छ भन्ने वास्तविकतातर्फदृष्टि नदिइएका कारण अनुपयुक्त सङ्ग्रहीत शव्द र डट्‌ आगमका इकारको दीर्घ&lt;br /&gt;
५० ४ शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
हुन्छ भन्ने ख्याल नगरिएका कारण अनुपयुक्त सङ्गुहित शब्दको प्रयोग नेपालीमादेखिन पुगेको हो ।&lt;br /&gt;
३७. सम्बन्धित&lt;br /&gt;
कम्‌ उपसर्गपूर्वक गन्ध धातुदेखि क्त (त) प्रत्यय लागेपछि घात्वन्तघकारनिमित्तक क्त प्रत्यपका तकारको धकारमा (अ.%५।२।४०) र प्रत्यपकोपरिवर्तित धकारलाई निमित्त मानेर धात्वन्त धकारको दकारका रूपमा जसत्ब (अ.51४1३) भएर सम्बद्ध शब्दको निर्माण हुन्छ । बन्धु धातु अनिद्‌ धातुका रूपमापढिएको (मिश्र, २००३, पृ.६०३) हुँदा क्त प्रत्ययमा इडागम अप्रवृत्त भएको हो ।त्यसैले अनुपयुक्त तस्बन्धित शब्दको सट्टा उपयुक्त तस्बद्ध शन्दको प्रयोग गर्नुपर्नेदेखिन्छ ।&lt;br /&gt;
३द. सिर्जित&lt;br /&gt;
ठृज्‌ धातुदेखि क्त (त) प्रत्यय लागेर तकारनिमित्तक धात्वन्त जकारको पृत्न(अ.५1२।३६) र धात्वन्त षकारनिमित्तक क्त प्रत्यपका तकारको टकारका रूपमाब्टुत्व (अ.51४1४१) भएर ठृष्ट शब्दको रचना हुन्छ । ठृज्‌ धातु अबिद्‌ धातुकारूपमा पढिएको (मिश्च, २००३, पृ.४४२) हुँदा क्त प्रत्यसको इडागम हुन नसकेकोहो । त्यसैले अनुपयुक्त ,विर्जित शब्दको सट्ला विर्जना गरिएको भन्नै पदावलीकोप्रयोग गर्न सकिन्छ ।&lt;br /&gt;
३९. सपरिवैक्षक&lt;br /&gt;
तुः परि र अव तीन उपसर्गपूर्वक ईक्ष घातुदेखि ण्बुल्‌ (अक) प्रत्यप भएपछिअब उपसर्गको आद्य अकारलाई निमित्त मानेर परि उपसर्गका अन्त्य इकारकोयकारका रूपमा यण्‌ (अ.६१।७७) र अव उपसर्राको अन्त्य अकार र ईक्षि धातुकोआद्य ईंकार दुवैका स्थानमा एकारका रूपमा गृण (अ. ६१5७) भएर ठुपर्यवेक्षकशब्द सिद्ध हुन्छ । अव उपसर्गको बिचार नगरिएका कारण अनुपयुक्त तुपरिबेश्षकशाब्दको प्रयोग नेपालीमा हुनपुगेको हो ।&lt;br /&gt;
४०. सुपरिवेक्षण&lt;br /&gt;
शब्द ३९. मा झै तु; परि र अव तीन उपसर्यपूर्बक ईक्‌ धातुदेखि ल्युट्‌ (अतप्रत्यय भएपछि इकारको अणु अकार र ईक्कारको गृण एवम्‌ ईक्ष धातुस्थपकारनिमित्तक अन प्रत्ययका नकारको गत्व (अ.५।४।२) भएर ठुपयविक्ञण शब्दबन्दछ । त्यसैले तुपटिबेक्षण शब्दको प्रयोग अनुपयुक्त देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
जुनसुकै भाषामा कुन चाहिँ उपयुक्त शव्द हो र कुन चाहिँ अनुपयुक्त शाब्दहो भनेर संशयनिवारणका लागि जसले पनि तर्बप्रथम पल्टाउनै भनेको शब्दकोशनै हो । नेपाली भाषाको मानक शाब्दकोशका रूपमा वहुप्रसिद्ध नेपाली कुहत्‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शन्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि ५१&lt;br /&gt;
शब्दकोश (२०४०) मा अन्तकियि) अन्तर्राष्ट्रिय चलायमाव; पुगरावलोकन,विद्युतीकरण शोभायसावजस्ता अनुपयुक्त शब्दहरूलाई संस्कृतमूल मानेर प्रविष्टगराइएका कारण नेपाली वाङ्मयमा यस प्रकारका शब्दहरू प्रयोग हुनपुगेका हुन्‌भने उफ्योक्त उल्लेखित प्रतित गरियायय, धैर्यता; बाहुल्यता, बतितः दिररमित,परस्परित एकीकरण महानता; युवामञ्च्‌ युवाबरु राजनैतिक रूपायन्‌बन्द्मप्रतिछित्‌ पिर्नित सम्बन्धित्‌ ठुपरिबेक्क ठुपरिबेक्षणजस्ता शब्दहरूसादृश्यका कारणले र विचार नपुन्याइएका कारणले प्रयोगमा आएका हुन्‌ ।नेपाली भाषाको मानक शब्दकोश नै तुटिपूर्ण रहेकाले तथा वरिष्ठ लेखककाकुतिहरूमा र सर्वाधिक पाठकहरूले मन पराइएका दैनिक पत्रिकाहरूमा समेतसंस्कृतमूलका यस प्रकारका अनुपयुक्त शब्दहरूको बारम्बार प्रयोग गरिनालेत्यसको अनुकरणात्मक प्रभाव अन्यत्र पनि स्वाभाविक रूपमा देखिँदै जाने भएकोहुँदा यसतर्फ यथासमयमैँ सचेत हुँदै संस्कृत व्याकरणका नियमहरूको सामान्यजानकारी लिएर, संस्कृत शन्दकोशकै प्रयोग गरेर बा संस्कृत व्याकरणविद्सँगआवश्यक परामर्श लिएर नेपालीमा प्रयुक्त संस्कृतमूलका अनुपयुक्त शब्दहरूकोप्रयोगलाई निराकरण गर्दै जान सकिन्छ । नेपाली भाषाका लिखित सामग्री रप्राज्ञिक जिज्ञापाबाट प्राप्त हुने यप्त प्रकारका अवशिष्ट शब्दहरूको चर्चालाईआगामी शृद्खलाहरूमा समैत निरन्तरता दिइने छ।&lt;br /&gt;
नैपाली, २०६७, पूर्णाङ्क : २०४, पू. २७-३९)&lt;br /&gt;
[छ|&lt;br /&gt;
२ ४ शन्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
अध्याय -&lt;br /&gt;
नेप्राली सम्धघिको परिचय&lt;br /&gt;
१. विषयप्रवेश&lt;br /&gt;
कूनै दुई वर्ण वा समुदायको एकआपसमा हुने सम्बन्ध, सम्झौता वा मेललाईसन्धि भनिन्छ । भाषा वा व्याकरणका सन्दर्भमा कूनै दुई नजिक रहेका ध्वनि वावर्णलाई जोड्नु सन्धि हो । वर्ण वा संवर्ण गरी सन्धि मूलत: दुई प्रकारकाहुन्छन्‌ । वर्णसन्धिलाई वर्णवैज्ञानिक सन्धि र संवर्णसन्धिलाई ध्वनिवैज्ञानिक सन्धिभनिन्छ । वर्णवैज्ञानिक र ध्वनिवैज्ञानिक सन्धि पनि कार्यप्रकृतिका आधारमा लोप,आगम, वर्णव्रिकार (आदेश) र्‌ प्रकृतिभाव गरी चार प्रकारका हुन्छन्‌ । सन्धिको योचार प्रकारको बर्गीकरणलाई पूर्वीय वाङ्मयको वाजसनेयी प्रातिशाख्यले प्राचीनसमयमा चर्चा गरिसकेको थियो भने सन्‌ १९७३ मा आएर सानफोर्ड स्क्यान ।इक्ाणिप $घागाट) नामक आधुनिक भाषाशास्ीले सन्धिका यिनै चार प्रकारलाईसमर्थन गरे । वर्तमान समयमा पनि सन्धिको वर्गीकरणमा यिनै चार प्रकारलेप्राथमिकता पाएको देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
सन्धिका नियमहरू प्रत्येक आापामा आआफूनै किसिमका हुन्छन्‌ । नेपालीभाषामा पनि सन्धिका निजी विशेषता र अस्तित्वहरू छुट्टै छन्‌ । तर नेपालीसन्धिको चर्चा गर्दा संस्कृत सन्धिले बढी ठाउँ लिएको र कतिपय सन्दर्भमा तनेपाली सन्धिहरू नै छैनन्‌ भन्ने कुराले वढी महत्त्व पाएको पनि देखिन्छ ।सन्धिका दृष्टिले नेपाली भाषाको व्यवस्थित अध्ययन नभैसकेको हुँदा नेपालीसन्धिको चर्चा अत्यन्त कम वा हुँदै नहुनु र तत्सम सन्धिको मात्र चर्चा हुनु पनिस्वाभाविक हो । तत्सम सन्धिनियम नेपालीमा पूर्णतः लागू नहुने हुँदा नेपालीसन्धिको अलग अल्तित्व र पहिचानको आवश्यकता देखिएको पाइन्छ । यसैसन्दर्भमा नेपाली सन्धिको सामान्य परिचयमा यस लेखको विषय केन्द्रित भएकोछ।&lt;br /&gt;
२. नेपाली सन्धिको परिचय&lt;br /&gt;
उपसर्ग, कृत्‌ प्रत्यय र तद्धित प्रत्यय लागेर तथा समास र ढ्रित्व भएरव्युत्पन्त नेपाली शब्दको निर्माण हुन्छ । उपसर्ग वा प्रत्यय लागेपछि र समास वाद्वित्व भएपछि दुई रूप वा शब्दलाई जोड्नुपर्दा सन्धिको प्रयोग गरिन्छ । तत्सम&lt;br /&gt;
अब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ ९३&lt;br /&gt;
नेपाली शब्दको निर्माण गर्दा तत्सम सन्धिको नै प्रयोग हुन्छ भने अन्य नेपालीशब्दको निर्माणमा नेपाली सन्धिको प्रयोग गरिन्छ । तदुभव र आगन्तुकउपसर्गद्वारा शब्दनिर्माण गर्दा प्रकृतिभ्भाव सन्धिको मात्र प्रयोग हुन्छु भने कृत्‌,तद्धित, समास र ड्वित्वद्वारा शब्दनिर्माण गर्दा प्राय: सबै नेपाली सन्धिनियमहरूलागु हुन्छन्‌ । उपर्युक्त चार प्रकारका सन्धि वर्गीकरणअनुसार नेपालीमावर्णविकार सन्धिका उदाहरणहरू प्रशस्त भेटिन्छन्‌ भने लोप र आगम सन्धिभएका शब्दहरू कम मात्रामा पाइन्छन्‌ । नेपाली सन्धिका प्रमुख सूत्रहरू, तिनकाकाम र उदाहरणहरू निम्नानुसार छन्‌ :&lt;br /&gt;
२.१ लौपसन्धिको परिचय&lt;br /&gt;
नदेखिन्‌ अथवा हराउनुलाई &#039;लोप&#039; भनिन्छ । सन्धि गर्दा कुनै वर्णकै लोपभएमा लोपसन्धि हुन्छ । कृत्‌, तद्धित, समास र ढ्वित्व प्रक्रियाद्वारा नेपाली शब्दकोनिर्माण गर्दा लोपसन्धिको प्रयोग गरिन्छ । नेपाली लोपसन्धि गर्ने मुख्य सूजहरूचारवटा छन्‌ :&lt;br /&gt;
(१) प्रकृति अन्त स्वरलोप तद्ितप्राय:&lt;br /&gt;
शाव्ददेखि लाग्ने प्रत्ययलाई तद्धित प्रत्यय भनिन्छ । यो सूत्रले प्रायः गरेरतद्धित प्रत्यय पछाडि भएमा प्रकृति (शाब्द) को अन्तमा रहेको स्वरवर्णको लोपगर्दछ । यो सूत्रको लोपसन्धि नियम प्राय: सबै तद्धितप्रत्ययद्वारा शाब्दनिर्माण गर्दालागू हुन्छ । अधिकांश शब्दमा &#039;अ, आ, ओ&#039; को र केही शब्दमा मात्र &#039;ई&#039; कोलोप हुन्छ भने अन्य स्वरको प्रायः लोप भएको पाइँदैन, जस्तै :&lt;br /&gt;
&amp;quot;अ&#039; लोप : गफनआडी ठगफाडी, दुःखन्एसो -्दुखेसो, एकतआइ च्एकाइ&lt;br /&gt;
आदि।&lt;br /&gt;
“आ&#039; लोप : पुर्खास-यौली -्पुर्ख्यौली, खुर्पा-एटो च्खुरपैटो, नगरा--ची च्नगर्चीआदि&lt;br /&gt;
“डु लोप : गुल्मीकएली च्गुल्मेली, बैतडी-एली च्बैतडेली, बाँकी&amp;quot; यौँतान्बक्यौता आदि ।&lt;br /&gt;
“औ&#039; लौप : यौलोनआइनगोलाइ, डोरो-एटो-्डोरेटो, हैरो--एनीत्सैरेनी आदि&lt;br /&gt;
यस सूत्रको अपवादमा यानी, ले, लो, दार प्रत्यय लाग्दा शब्दको अन्तिम स्वरकोलौप हुँदैन, तर दीर्घस्वर अन्तमा भए त्यसको द्वस्वचाहिँ हुन्छ, जस्तै :मोहीयानी, गाउँले, ठिमिले, मादिले, गतिलो, फुर्तिलो, मालदार, खबरदार आदि ।यसै गरी ना, पन, पत्ता, पाईं, ल, हर, ली प्रत्यय लारदा प्राय: सबै शाव्दका अन्तिमस्वरको लोप नभएको पाइन्छ, जस्तै : जपना, वालकपन, मूर्खपना, मपाईं, पोइल,खण्डहर, गतिली आदि ।&lt;br /&gt;
५५४  शन्दनिर्माणप्रकिया र सन्धि&lt;br /&gt;
(र) उलाउ लोप कृत भूतक्तिया&lt;br /&gt;
धातुदेखि लाग्ने प्रत्ययलाई कृत्‌ प्रत्यय भनिन्छ । यो पूत्रले अनेकाक्षरी धातुकोअन्तमा रहेका &#039;उ, आउ र्‌ ल&#039; को लोप गर्दछ । एकाक्षरी उ अन्त्यक धातुकोचाहिँ सूत्र (१३) र (१४) अनुसार सन्धि हुन्छ । यस सूत्रको लोपसन्धि नियम कृत्‌ज्जियकारा शव्दनिर्माण गर्दा र भूतकालिक क्रियाका रूपहरू चलाउँदा लागू हुन्छ,जस्तै :&lt;br /&gt;
&#039;उ&#039; लोप : चुहु&amp;quot;आवट च्चुहावट, आउनइन्दा चआइन्दा, कुहु-एत्रो5 कुहेत्रो आदि ।&lt;br /&gt;
&#039;आउ&#039;&amp;quot; लोप: बिसाउ-औना ठनिसौना, कमाउ-.आइ त्कमाइ,बिराउ--औटोलबिरौटो, अहाउ-ओटन्अह्रोट,&lt;br /&gt;
चिलाउ&amp;quot;आइ न चिलाइ, चोख्याउ१आन - चोख्यान,बिछ्याउन औना २ बिछ्यौना, चिच्याउ-आहट ०८चिच्याहट आदि ।&lt;br /&gt;
ध्ल्‌&#039; लोप : उक्ल-आलो ० उकालो, ओर्लजआलो ओरालो,उम्लनआल - उमाल आदि ।&lt;br /&gt;
तर नु, नी, दै, दा कृत्‌ प्रत्यय पछाडि भएमा &#039;उ&#039; र &#039;आउ&#039; को लोप हुँदैन,जस्तै : दुहुनु, विसाउनी, घाउँदा, पिउँदा आदि । भूतकालिक क्रिपाका रूपहरूचलाउँदाचाहिँ उ र आउ अन्त्यमा हुने धातुको &#039;उ&#039; मात्रको लोप हुन्छ भने &#039;ल&#039;अन्तमा हुने धातुको &#039;अ&#039; मात्रको लोप हुन्छ, जस्तै :&#039;उ&#039; लोप : दुहनएरज्दुहेर, सिएर, पिएर, जिएर, तुहेर, तुहेर, चुहेर आदि ।पढाउन्यो न्पढायो, बङ्गघायो, टिपायो, चिलायो, कमायो आदि&#039;अ&#039; लोप : उक्ल-्यो चउक्ल्यो, ओ्ल्यौ, उम्ल्यो आदि ।&lt;br /&gt;
तर आइ वा अक्कड प्रत्यय लागेमा इउ अन्त्यक अनेकाक्षरी धातुका उको ठाउँमायू वा ल्‌ तथा आउ अन्त्यक अनेकाक्षरी धातुका उको ठाउँमा &#039;व्‌&#039; आदेश हुन्छ,जस्तै : पिउ-आइ - पियाइ /पिलाइ, सियाइ “सिलाइ, पियक्कड, आउनआइ तअबाइ, गवाइ आदि ।&lt;br /&gt;
(३) आं्ढि पूर्व औन्पलोप&lt;br /&gt;
शब्दको कुनै अंशमात्र दोहोरिने प्रक्रियालाई आंशिक द्वित्व भनिन्छ । योसूजले आंशिक द्रवित्ब हुने क्रममा &#039;ओ&#039; र संयुक्त व्यञ्जनवर्णको लोप गर्दछ ।एकभन्दा बढी ब्पञ्जनवर्णको संयोग भएका शव्दमा त्यस्ता व्यञ्जनवर्ण र औदुवैको लोप हुन्छ भने व्यञ्जनसंयोग नभएका शाव्दमा &#039;ओ&#039; मात्रको लोप हुन्छ,जस्तै&lt;br /&gt;
औं&#039; लोप : बाटोज्बाटोन्बाट्बाटो, तातो--तातो “तात्तातो आदि ।&lt;br /&gt;
औव्प लोप : आफूनो-आफूनो -्आआफूनो, झझल्को, थथर्को, टुटुल्को,&lt;br /&gt;
सुसुर्को, ककसको, जजसको आदि ।&lt;br /&gt;
शब्दनिर्माणप्रचित्र्या र सन्धि/ १५&lt;br /&gt;
(४) आद्दि पूर्व व्यलोप&lt;br /&gt;
द्वित्व भएका जान्दको सुरुको ध्वनिमा परिबर्तन हुने प्रक्रियालाई आपरिवर्तितह्वित्व भनिन्छ । यसरी द्वित्व हुने क्रममा यो सूत्रले अघिल्लो शब्दका व्यञ्जनवर्णकोलोप गर्दछ, जस्तै : पैँचो-पैँचो (“पू&#039; लोप) -पँँचोपैचो । यसै गरी निर्माण गरिएकाअन्य शब्दहरूमा आलोपालो, आलेटाले, आनीबानी, अदलीबदली, अगलबगल,आनतान, औह्योरदौहोर आदि पर्दैछन्‌ ।&lt;br /&gt;
यसरी नेपाली लोपसन्धिमा मुख्यतया &#039;अ, आ, ओ, ई, उ, आउ&#039; र केहीव्यञ्जनवर्णको लोप भएको पाइन्छ । यसका अतिरिक्त &#039;हिले&#039; तद्धित प्रत्यय पछाडिभएमा यो, त्यो शब्दका ओको आ आदेशका साथै यलोप पनि हुन्छ भने जहाँतहाँ,जस्तोतस्तो, जसोतसो, तसर्थ आदि अव्ययीभाव समास भएका शब्दमा समेत &#039;प्‌&#039;लोप भएको देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
२.२ आगमसन्धिको परिचय&lt;br /&gt;
आउनु अथवा थपिनुलाई &#039;आगम&#039; भनिन्छ । सन्धि गरिने शाब्दका बीचमाकुनै नयाँ वर्ण गाँसिदा आगमसन्धि हुन्छु । नेपालीमा खो सन्धि हुँदाव्यञ्जनवर्णमात्र थपिन्छन्‌ । कृत्‌ प्रत्यय, आंशिक दित्ब र क्रियाको रूपायनकासन्दर्भमा आगमसन्धिका नियमहरू लागू हुन्छन्‌ भने तद्धित र समासमाआगमसन्धिको प्राय: प्रयोग भएको पाइँदैन । नेपालीमा आगमसन्धि गर्ने मुख्यसूत्रहरू तीनवटा छन्‌ ।&lt;br /&gt;
(५) आउ स्वकृत आगम&lt;br /&gt;
यो सूत्रले आ अथबा उ अन्तमा हुने एकाक्षरी धातुदेखि &#039;ब्‌&#039; आगम गर्दछ ।अनेकाक्षरी धातुदेखिचाटिँ उका ठाउँमा सूत्र (१३) ले &#039;व्‌&#039; आदेश हुन्छ । यो सूत्रकोआगमसन्धिनियम स्वरवर्ण आदिमा हुने कृत्‌ प्रत्ययद्वारा शब्दनिर्माण गर्दा लागूहुन्छ, जस्तै :&lt;br /&gt;
&#039;झ&#039; अन्त धातु : जातअत व्जावत, जातआइ (सूज ८ समेत) च्जनाइ,&lt;br /&gt;
खान ऐया च्खवैया, खानआइ न्खवाइ आदि ।“उ&#039; अन्त धातु : धुनंआइ च्घुवाइ, रुनआइ च्स्वाइ आदि ।&lt;br /&gt;
यसका साथै एकाक्षरी उकारान्त धातुबाट आउ प्रत्यय लगाई प्रेरणार्थक धातुबनाउँदा पनि &#039;व्‌&#039; आरम हुन्छ, जस्तै : छु--आउ -्छुबाउ, रुबाङ, धुबाउ, फुबाउआदि ।&lt;br /&gt;
[६१ अड्‌ आउ नागम यछक्रिपा&lt;br /&gt;
यस्त सूत्रले अ, आ, इ र उ अन्तमा हुने प्राय: सबै घातुदेखि &#039;न्‌&#039; आगमगर्दछ । यस सूत्रको सन्धिनियम छ्‌ वा थ्‌ वर्ण पछाडि हुने क्रियाको रूपायनकासन्दर्भमा मा लागू हुन्छ, जस्तै :&lt;br /&gt;
५६ / शन्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
&#039;अ&#039; अन्त धातु : निस्कके्छ (“न्‌&#039; आगम)त्निस्कन्छ, निस्क-थ्यो २निस्कन्ध्यो । यसै गरी &#039;अ&#039; अन्तमा हुने उफ्र, उक्ल, ओर्ल,गर्ज, तम्स, तर्क, दौड, निक्ल, निस्क, पौड, फर्क, लम्क,फैल, भत्क, उम्क, घुस्न, घिम्र, कुर्ल, जिस्क, पल्ट आदिघातुदेखि पनि &#039;न्‌&#039; आगम हुन्छ ।&lt;br /&gt;
&#039;आ&#039; अन्त धातु : जान छौँ (&#039;न्‌&#039; आगम) -जान्छौ, खा--थ्यौं च्खान्थ्यौं । यस्तैआ अन्त धातुमा ला र्‌ लैजा पर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
“डु अन्त धातु : खिइनछन्‌ (न्‌&#039; आगम) -खिइन्छन्‌, खिइ--थे -खिइन्ये ।यसै गरी &#039;इ&#039; अन्तमा हुने अन्य छुट्टि, उभि, डुक्रि, अर्थि,बल्फि, अकमकि, कहालि, कुँडि, काठे, झुक्कि, चाउरि,चोखि, खप्टि, खनि, झुन्डि, कुल्चि, लि, दि, पिल्सि, लदठि,तर्सि आदि धातुदेखि पनि न्‌ आगम हुन्छ ।&lt;br /&gt;
&amp;quot;उ अन्त धातु : रुग्छ ।न्‌&#039; आगम) - रुन्छ, सम्थैँ न रुन्थे । यस्तै &#039;न्‌&#039;आगम हुने उ अन्त्यक घातुहरूमा छु, फु, नुहु, धु, हु, तुद्ठर चुहु पर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
आउ अन्त्यक घातुदेखि चाहिँ &#039;न्‌&#039; आगम नभएर यसको सट्टा चन्द्रविन्द्ुको आगमभएको पाइन्छ । यसरी आगम हुने खण्डेतर अनुनासिक वर्णलाई बुझ्न सजिलोहोस्‌ भन्ने मनसायले सूत्र (११) मा आदेशसन्धिअन्तर्गत राखिएको छ।&lt;br /&gt;
(७) आंट्दि एक शेष रागम&lt;br /&gt;
यस सूतले द्वित्व गर्ने क्रममा पछाडि द्वित्व शब्द भएमा एकशेष अघिल्लोवर्णदेखि बीचमा &#039;र्‌&#039; आगम गर्दछ । यो नियम आंशिक ढ्ित्वमा मात्र साग हुन्छ,जस्तै : घडेरी घडेरी (आद्वि? घ र्‌ घडेरी (&#039;र्‌&#039; आगम) च्घर्घडेरी । यसै गरीछर्खिमेक, मर्मसला, सर्सल्लाह, सर्सामान, गर्गहना आदि शब्दमा पनि &#039;र&#039; आगमभएको हो। ॥&lt;br /&gt;
यक्षरी नेपाली आगमसन्धिमा मुख्य रूपमा &#039;ब्‌&#039;, “न्‌&#039; तया “र्‌&#039; आगम भएकोपाइन्छ । यसका अतिरिक्त याईं, याहा, यौली तद्धित प्रत्यय नस्वीकारिएको सन्दर्भमाआई, आहा, औली तद्धित प्रत्यय पछाडि भएमा &#039;य&#039; आगम हुन्छ । यसरी &#039;य्‌आगम हुँदा आईँ प्रत्ययमा सुह्मा उ भएका शब्ददेखि, आहा प्रत्ययमा जुनसुकै स्वरभएका शब्ददेखि पनि &#039;य्‌&#039; आगम भएको पाइन्छ, जस्तै : धूर्त--आइँ [सूत्र १ &#039;अ&#039;लोप, सूत्र ९ &#039;उ&#039; आदेश)? धुर्तु-आइँ (“यू आगम) न्घुर्त्याइँ, लुच्च्याइँ, खुन्याहा,जँडचाहा, रत्यौली, पुस्त्यौली आदि ।&lt;br /&gt;
२.३ वर्णाबिकारसन्धिको परिचय&lt;br /&gt;
वर्णमा आउने परिवर्तनलाई &#039;वर्णविकार&#039; भनिन्छ । कूनै वर्णका ठाउँमापरिवर्तन भै अर्को नयाँ वर्ण रहँदा वा थपिँदा वर्णविकारसन्धि हुन्छ ।वर्णविकारसन्धिलाई आदेश सन्धि पनि भनिन्छ । सन्धि गरिने रूप वा शब्दमा&lt;br /&gt;
श्म्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ ५७&lt;br /&gt;
लोप वा आगम नभै कुनै वर्णलाई हटाउने र त्यस्तो हटाइएको वर्णको सद्दा अर्कोनयाँ वर्ण थप्ने प्रकियाको नाम नै आदेशसन्धि हो । नेपालीमा वर्णविकारसन्धि बाआदेशसन्धिका प्रशस्त उदाहरणहरू पाइन्छन्‌ । यो सन्धि नेपाली शब्दनिर्माणकाकृत्‌, तद्वित, समास र ढ्वित्व सबै प्रक्रियामा लागू हुन्छ । त्यसैले नेपालीमालोपसन्धि र आगमसन्धिभन्दा यो सन्धि समृद्ध र मुख्य पनि रहन गएको छ्‌ ।नेपालीमा वर्णविकारसन्धि गर्ने मुख्य सूत्रहरू दशओटा छन्‌ ।&lt;br /&gt;
(६) आ तकृस अ आदेश प्रायशःयो सूत्रले स्वरवर्ण वा व्यञ्जनवर्ण पछाडि भएमा धातु वा शव्दमा रहेकोआको ठाउँमा &#039;अ&#039; आदेश गर्दछ । यत्त सूत्रको आदेशसन्धिनियम तद्धित, कृत्‌ रसमासप्रक्ियाद्वारा शब्दनिर्माण गर्दा लागू हुन्छ, जस्तै :(क) तद्वितप्रक्रियाहाँसमलो [सूत १ &#039;अ&#039; लोप)? हाँसन-इलो (आश. आदेश) तहँसिलो । यसैप्रक्रियाद्वारा निर्माण भएका अन्य शब्दहरू हुन्‌ : गँँजडी, कजाइँ, रजाइँ,लमाइ, जडाउरी, हटारु, थकाली, दङाली, लजालु, गथासो, जँडचाहा, भरिया,अधिया, बटुवा, ठड्बा, चँदुबा, हतुवा, कलुवा, रतेउली, मझौलो, पढेग्रो,गग्रेटो, केरी, मझेरी, पतेरो, पनेरो, सपेरो, रजीटा, खगौतो, सरीतो, मसौरा,घमौरा, कचौरा, कमारो, हतार, अँगालो, हटिया, वदिनी, खटिया, थलिया,भतेर, खरेल, कचौरी, हतौडी, हतासो, भत्कर आदि ।&lt;br /&gt;
उपर्युक्त सूत्अनुसार तद्धित प्रक्रियाको अपवादमा ई, औ, आली, आलु, इली,इलो, ए, दार, ओटा, ओटी, औडा, ओडी, औं आदि प्रत्यय पछाडि भएमा शब्द (प्रकृति) मा रहेको आको ठाउँमा &#039;अ&#039; आदेश हुँदैन, क्रमश: जस्तै : काखी, पातो,माझाली, मायालु, जाँगरिलो, स्वादिलो, भाते, बास्नादार, चारोटा, सातोटी, पाँचोडा,चारोडी, चारौँ आदि ।&lt;br /&gt;
(ख) कृतप्रक्रियाढाल्‌&amp;quot;-आन (आर-अ आदेश)? ढल्‌न-आन «ढलान । यसै गरी धातुमा रहेकोआको ठाउँमा &#039;अ&#039; आदेश चै निर्माण हुने शब्दहरू यस प्रकार छन्‌ : छनौट,थमौती, कटान, ढकनी, मगन्ते, खैँदिलो, हँसाइ, हकाइ, रखालो, चखुवा,मगुवा, हस्वा, हँसुवा, गँसुवा, ढँदुवा, भगन्ता, छपान, ढलाइ, छँटनी, जनाउ,तनाउ, चलान, फँडानी, लल्लार, थकाबट, छनौटो, रखाल, हँसालु, भँडाहा,कटुवा, भँडुवा, मडुबा, ढकुवा, पदुवा, हनैया, सट्टी, कट्टी आदि ।उपर्युक्त सूतअनुसार कृतप्रक्रियाको अपवादमा एको, ई, ओ, नु, आ, अ, न, दै,तै, दा, ता, ने आदि कृतृप्रत्यय पछाडि भएमा धातु (प्रकृति) को &#039;आ&#039; &#039;अ&#039; मापरिणत हुँदैन, कमशः जस्तै : टाँसेको, हाँसी, पाको, ठान्नु, छापा, मार, नाप्न,आग्दै, साँच्तै, गाड्दा, कादूता, माग्ने आदि ।&lt;br /&gt;
५० ४ रान्दनिर्माणप्रक्िया र सन्धि&lt;br /&gt;
(ग) समासप्रक्तिया&lt;br /&gt;
हातनःकडी (आ2अ आदेश)? हतनकडी च्हतकडी । यस्तै &#039;अ&#039; आदेश भएरनिर्माण हुने समासका शब्दमा कपडछान, गोडधुवा, लखपति, रतन्धो, राजहाँस,घौडचढी, राजकाज, राजदरबार, कनफट्टा, कनसुत्लो, कलमुखा, कनचिरा,कठफोरा आदि पर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
उपर्युक्त सूत्र (5) को नियम नामलाई घातु बनाउँदा पनि लागू हुन्छ, जस्तै :लाज--आउ -लजाउ आदि ।&lt;br /&gt;
(९) क ईं तद्धित उ इ आदेश प्रायशःयस सूत्रले स्वरवर्ण वा व्यज्जनवर्ण आदिमा हुने तद्धित प्रत्यय पछाडि भएमाशब्द (प्रकृति) मा रहेको दीर्घ कका ठाउँमा द्वस्व &#039;उ&#039; आदेश गर्छ भने दीर्घ ईकाठाउँमा ह्रस्व &#039;इ&#039; आदेश गर्दछ । यस सूत्रको आदेश सन्धिनियम तद्धित प्रत्ययद्वाराआब्दनिर्माण गर्दा लागू हुन्छ, जस्तै :कमउ आदैश : बूननइलो (सूत्र १ &#039;अ&#039; लोप)? नून्‌-इलो (क? उ आदेश)न्नुनिलो । यस्तै अन्य शब्दहरूमा झुसिलो, दुधिलो,पुजारी, धुलौटो, जुवाडे, चुलेत्रो, बुढेउली, धुर्त्याइँ,चुलेसी, मुर्ख्याइँ, जुनेली, जुरेली, बुढ्याइँ, ठुल्याइँ,घुन्यान आदि पर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
ईन्द्र आदेश : तीतोतऔरा (सूत्र १ &#039;ओ&#039; लोप)? तीत्‌नऔरा ।(ईट्डआदेश) न्तितौरा । यसै गरी निर्माण हुनै अन्य शब्दहरूहुन्‌ : इखालु, सिँगौरी, सिपालु, भिखारी आदि । पन रपना प्रत्यय पछ्लाडि भएमा चाहिँ ह्रस्व &#039;उ&#039; आदेश हुँदैन,जस्तै : बूढोपन, शूरोपना, धूर्तपन, मूर्खपना आदि ।&lt;br /&gt;
(१०) ओ व्य तद्वित समास अईआ आदेशयो सूत्रले व्यञ्जनवर्ण आदिमा हुने प्रत्यय वा शब्द पछाडि भएमा अघिल्लोशब्दको अन्तमा रहेको ओका ठाउँमा &#039;अ&#039;, &#039;आ&#039; र &#039;ई&#039; मध्ये कुनै एक आदेशगर्दछ । पो सन्धिनियम ओ अन्तमा हुने सर्वनाम शाब्ददेखि तद्धित प्रत्यय लगाएरशव्दनिर्माण गर्दा र कर्मधारय वा बहुब्गीहि समास भएका शब्दलाई जोड्नेसन्दर्भमा लागू हुन्छ । यस क्रममा तद्धितमा &#039;अ&#039; मात्र आदेश हुन्छ भने समासमा&#039;अ&#039;, &#039;आ&#039;, &#039;ई&#039; तीनओटै आदेश हुन सक्छन्‌, जस्तै :औष्अ आदेश (समास) ; लामोन-कान?? लामनंकान च्लामकानै । यसै गरी&#039;अ&#039; आदेश भएर निर्माण भएका समस्तशब्दहरूमा नीलडाम, नीलकमल, लामखुट्टे,लामकीरो, लामपुच्छे, कलमुखा, कलजिब्ने,गोलकाँक्री, ठाडकाने, रातमाटे आदि पर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
शाब्दनिमांणप्रन्नित्या र सन्धि/ ५९&lt;br /&gt;
औ?-अ आदेश (तद्धित) : योनता? यन्ता च्यता । यसै गरी ताका अतिरिक्तति, चो, हिले र हाँ तद्धित प्रत्यय पछ्चाडि भएमाओका ठाउँमा &#039;अ&#039; आदेश भएर निर्माण भएकाशब्दहरू यस प्रकार छन्‌ : त्यता, जता, कता,यत्रो, त्यत्रो, कत्रो, जत्रो, अहिले, तहिले, कहिले,जहिले, यहाँ, त्यहाँ, जहाँ, कहाँ आदि ।&lt;br /&gt;
तर ओ, ऐ, अरीजस्ता स्वरवर्ण आदिमा हुने तद्धित प्रत्यय पछाडि भएमाचाहिँ सार्बनामिक शव्दका ओका ठाउँमा &#039;अस्‌&#039; आदेश हुन्छ, जस्तै : जोनओ(ओ--अस्‌ आदेश) च्जसो । यसै गरी यसो, त्यसो, कसो, त्यसै, यसै, जसै, कसै,यसरी, त्यसरी, जसरी, कसरी, कस्तो, यस्तो, त्यस्तो, जस्तो, जस्तरी, यस्तरी,त्यस्तरी, कस्तरी आदि शब्दहरू निर्माण गरिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
ओरई आदेश : राततोजगौडौ? रातीजगडौ चरातीगेडी । यस्तै अन्यशब्दहरू हुन्‌ : कालीमाटी, गोलीगाँठी, लामीडाँडा,चरीनङ्ग्रै, बुचीकाने, पहँलीपात, सेतीमकै, मुसीकाने,चरीआँखे आदि ।&lt;br /&gt;
ओऔरआ आदेश : कालौ-पानी? कालानपानी च्कालापानी, माछापुच्छे,माछाकाँडे, चिसापानी, लामाचौर आदि ।&lt;br /&gt;
उपर्युक्त सूत्रको अपवादमा ओल्ोप भएर निर्माण हुने शाब्दहरूमध्ये ठूल्दाइ,सान्दाइ, लादूमी आदि पर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
(११) उ थछ्दै उँ आदेशक्तिया&lt;br /&gt;
यो सूत्ले धातुको अन्तमा उ भए त्यसका ठाउँमा &#039;उँ&#039; आदेश गर्दछ । यससूत्रको आदेशसन्धि नियम थ, छ तथा दा/दो/दै पछाडि रहने क्रियाका रूपहरूकोनिर्माण गर्दामात्र लागू हुन्छ । सूत्र नं. (६) अनुसार “न्‌&#039; आगम हुने रु, धु, फु,हु धातुको उका ठाउँमा थ र छ पछाडि भएमा &#039;उँ&#039; आदेश हुँदैन, दा/दोपछ्लाडि भएमा चाहिँ &#039;उँ&#039; आदेश हुन्छ, जस्तै :&lt;br /&gt;
थ पर भएमा : गाउन्थेँ त गाउँदै, गुमाउँथ्यो, पिउँदथ्यो,निच्छयाउँथ्यो आदि ।&lt;br /&gt;
छ पर भएमा : पढाउ-छु च्पढाउँछु, नचाउँछ, देखाउँछ, समाउँछन्‌आदि ।&lt;br /&gt;
दा/दो/दै पर भएमा : हु--दा नहुँदा, हुँदो, हुँदै, सँदै, पिउँदै, चिच्याउँदै, छँदैआदि ।&lt;br /&gt;
यसै गरी अकारान्त, आकारान्त र इकारान्त घातुदेखि पनि दा, दो, दै प्रत्ययपछाडि भएमा इका ठाउँमा &#039;इँ&#039; आदेश हुन्छ, जस्तै : लिदै तलिँदै, लिँदा, लिँदो,दिँदै, कूल्चिँदै, छुट्दा, छुट्लिँदै, पिल्सिँदा, खाँदा, उक्लँदै, जाँदै, लैजाँदा, उम्लँदाआदि ।&lt;br /&gt;
६० ४ शब्दनिर्माणप्रमित्र्या र सन्धि&lt;br /&gt;
(१२) हुजा भूतक्रिया भग आदेशयो सूत्रले हु घातुका ठाउँमा &#039;भ&#039; रजा शातुका [का ठाउँमा “ग&#039; आदेश हुन्छ । हुर जा धातुबाहेक अन्य नेपाली धातुमा यसरी पूरै परिवर्तन भएको पाइँदैन । यससूत्रको आदेश सन्धिनियम पूर्वकालिक वा भूतकालिक क्रियाको रूपायनकासन्दर्भमा लागू हुन्छ, जस्तै :हुनभ आदेश : हुम्यो नभयो । यसै गरी हु घातुमा भूतकालिक विभिन्नप्रत्यय लाग्दा भए, भयौ, भएँ, भई, भएर, भइन्‌, भएकी,भइस्‌, भएछ, भएथ्यो, भएथ्यौं आदि रूपहरू निर्माणहुन्छन्‌ ।जार्ग आदेश : जाभ्यो ठगयो । यसरी नै अन्य बिभिन्न प्रत्यय लगाएरगए, गयौं, गएँ, गई, गएर, गइन्‌, गएको, गएकी, गइस्‌,गएछ, गएथ्यो, गएथ्यौँ आदि रूपहरू पनि निर्माण गर्नसकिन्छ ।&lt;br /&gt;
यसका अतिरिक्त भविष्यत्कालिक आज्ञा वा आदेश अर्थमा पनि &#039;भ&#039; तथा “ग&#039;आदेश हुन्छ, जस्तै : हुनएस्‌ त्भएस्‌, जा--एस्‌ तगएस्‌ आदि ।(१३) इय्‌ उन्‌ आदेश स्वकृत&lt;br /&gt;
यो सूतले इका ठाउँमा &#039;य्‌&#039; आदेश गर्दछ भने उका ठाउँमा &#039;व्‌&#039; आदेशगर्दछ । यो सन्धिसूत्रको नियम स्वरवर्ण आदिमा हुने कृत्‌ प्रत्यय लगाएरशब्दनिर्माण गर्दा लागू हुन्छ, जस्तै :&lt;br /&gt;
इन््य्‌ आदेश : फझुक्कि आइ? झुबक्‌ पूनआइ त झुबक्याइ, पछयौरा,जिस्क्याइ, बढ्यामा, ठूल्यामा, माहिल्यामा, कान्छयामा,घ्यू, ज्यू, प्यूनु आदि ।&lt;br /&gt;
उनव्‌ आदेश: आउनअतर? आ वृनंअत च्आवत, गवैया, धावन्ती,&lt;br /&gt;
लबाइ, अबाइ, गवाइ आदि ।&lt;br /&gt;
यसरी उपर्युक्त &#039;पू्‌&#039; आदेशको उदाहरणमा कुदन्त शब्दका अतिरिक्तपछचौराजस्ता तद्वित शब्द र बढ्घामाजस्ता समास भएका शब्दमा पनि &#039;य्‌&#039;आदेश भएको पाइन्छ । यस सूत्रको नियम संस्कृत व्याकरणको &#039;इको यर्णचि&#039;(अ.च्१॥७७) नामक सूत्रले गर्ने यण्सन्धिसँग मिल्दछ ।&lt;br /&gt;
(बह) उ क्रिया ओ आदेश&lt;br /&gt;
यस सूजले धातुको अन्तमा रहेको उका ठाउँमा &#039;ओ&#039; आदेश गर्दछ । यससन्धिसूत्रको नियम रु, धु, फु, छुजस्ता एकाक्षरी उकारान्त धातुबाट पूर्वकालिक वाभूतकालिक र्‌ आदेश तथा सम्भावना भविष्यत्‌ कालका क्रियाको रूपायन गर्दामात्रलागू हुन्छ, जस्तै :&lt;br /&gt;
पूर्वकालिक क्रिया : रु&amp;quot; ई रोई, रोएर, धोएर, फोएर, छोएर, छोई आदि ।&lt;br /&gt;
भूतकालिक क्रिया : धुः्योत्धोयो, रोयो, रोएकी, छोयौ, फोएछ, घोए आदि&lt;br /&gt;
शब्दनिर्माणप्रक्रिया र्‌ सन्धि/ ६१&lt;br /&gt;
आदेशात्मक अर्थ : छुनएस्‌ न्छोएस्‌, रोएस्‌, फोएस्‌, घोएस्‌ आदि ।&lt;br /&gt;
सम्भावना अर्थ: फुनला फोला, होला, धोला, रोला, छोला आदि ।&lt;br /&gt;
यसै गरी इकारान्त दि, लिजस्ता एकाक्षरी धातुको इका ठाउँमा ला प्रत्ययपछ्लाडि भएको अबस्थामा &#039;ए&#039; आदेश हुन्छ, जस्तै : दिज्ला (इन्रए आदेश) नदैला,लेला आदि।&lt;br /&gt;
(१५) आद्।ि व्यपर पश्च रूप सादेशयस सूत्रले आपरिवर्तित द्वित्व हुने क्रममा पछिल्लो शब्दको आदिमाव्यञ्जनवर्ण भए त्यसका ठाउँमा &#039;स्‌&#039; आदेश गर्दछ । यो सन्धिसूत्रको नियमद्वित्वप्रक्रियामा मात्र लागू हुन्छ, जस्तै :भातनभात (भूटस्‌ आदेश) न्भातसात । यस्तै स्‌ आदेश भएका अन्यशब्दहरू यस प्रकार छन्‌ : घामसाम, पहँलोसहँलो, भरेसरे, काठसाठ, जोसो,भोलिसोलि, मातसात, पानीसानी, चियासिया, कामसाम, घरसर, बारीसारी,छातासाता, जुत्तासुत्ता, टोपीसोपी, लसुनससुत, प्याजस्याज, खेल्नुसेल्नु,देख्नुसेख्नु, डुल्नुसुन्नु आदि ।&lt;br /&gt;
यदि द्वित्व हुने शब्दको आदिमा स्वरवर्ण छ भने त्यसपछि &#039;स्‌&#039; आगम हुन्छ,आदेश हुँदैन, जस्तै :&lt;br /&gt;
एकक्एक (स्‌&#039; आगम)? एक स्‌-एक 5एकसेक, इलमश्षिलम, आँपसाँप,अचारसचार, अन्नसन्न, अम्बासम्बा, आटोसाटो, उखुसुखु आदि ।&lt;br /&gt;
(१६) आदि स्वपर आ उ आदेश&lt;br /&gt;
यौ सूजले आपरिवर्तित द्वित्व हुने क्रममा अघिल्लो शाब्दमा रहेको जुनसुकैस्वर पछिल्लो शब्दको सुरुमा पुग्दा &#039;आ&#039; अधवा “उ&#039; मा परिणत गरिदिन्छ । योसूत्रको आदेश सन्धिनियम द्वित्वप्रकरियामा मात्र लागू हुन्छ, जस्तै :&lt;br /&gt;
आ आदेश : गोद-न-गोद [ओ?-आ आदेश) न्गोदगाद । यस्तै अन्य शब्दहरूमातिरनतारन, भुटभाट, पिटपाट, थिचथाच, टिपनटापन,मिचमाच, किनकान, पिसनपासन, निफननाफन, केरकार,भैटभाट, फेरफार, थुनधान, चुनचान, पुछपाछ, भुटनभाटन,पुछ्नपाछन, सोधसाध, चोरचार, पोलपाल, खोलखाल, पोतपात,कोरकार, फोरफार, ठोकठाक आदि पर्दैछन्‌ ।&lt;br /&gt;
उ आदेश : झारत्झार !आ?-उ आदेश) नझारभुर । यसै गरी &#039;उ&#039; आदेशभएर निर्माण हुने शब्दहरू यस प्रकार छन्‌ : सारसुर, चालचुल,साँधसुँध, टालदुल, चानचुन, बाँधबुँध, साटसुट, चाटचुट,फाँडफुँड, ढाँटढुँट, फाटफुट, लाटलुट, खासखुस, पाकपुक,चाइँचुइँ, गाइँगुइँ, फाट्फुट्, घार्रघुर्र, माडमुड आदि ।&lt;br /&gt;
यसरी प्राय: गरेर आका ठाउँमा नै &#039;उ&#039; आदेश भएको देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
घ्र/ सब्दनिर्माणप्रक्तिया र्‌ सन्धि&lt;br /&gt;
1१७) अ हित्व बहुत्रीहि मध्य आ आदेशसस सूत्रले अघिल्लो शन्दको अन्तिम अका ठाउँमा &#039;आ&#039; आदेश गर्दछ । यससूजको आदेश सन्धिनियम द्रित्व र व्यतिहार बहुब्रीहि समासद्वारा शब्दनिर्माण गर्दालागू हुन्छ, जस्तै :बहुव्रीहि समास : भनेर भनेर हुन्छ जुन लडाइँ- भन-भन (अरआ आदेश)न भनाभन । यस्तै अन्य समस्त शव्दमा हानाहान,लातालात, लुछलाछ, पिटापिट, रिसारिस, काटाकाट,मारामार, मुखामुख, थुकाथुक आदि पर्दछन्‌ ।हरित्व्र : दनन-दन (अरआ आदेश) दनादन । यतै गरी निर्माणहुनै अन्य शब्दहरू यस प्रकार छन्‌ : मालामाल,जानाजान, रातारात, एकाएक, हेराहेर, फटाफट, भटाभट,खपाखप, सरासर, चटाचट, साटासाट, खचाखट आदि ।&lt;br /&gt;
यसरी नेपाली बर्णविकार सन्धिका सन्दर्भमा प्रमुख रूपमा &#039;अ, आ, इ, ईं, उ, उँ,ओ&#039; स्बर तथा &#039;ग्‌, भू. य्‌, व्‌. स्‌&#039; आदि व्यन्जनवर्णको विकार (आदेश) भएको पाइन्छ। यसका अतिरिक्त तद्धित प्रक्रियाअन्तर्गत हैरान, अचेल, घडेरी, खडेरी, वल्लो रपल्लो शव्दमा &#039;ऐ, च्‌, डू, ल्‌&#039; आदेशसमेत भएको देखिन्छ भने द्वन्द्व समासमा आउनेदुई र्‌ चार शाब्दका ठाउँमा समास भएर सन्धि हुँदा &#039;दो&#039; र &#039;चौ&#039; आदेश भएकोपाइन्छ । त्यस्तै द्वित्वप्रक्रियाद्वारा शब्दनिर्माण गर्दा &#039;ई, ए, ऐ, ढ्‌, प्‌. ब्‌, म्‌ आदिआदेश पनि हुन्छ, जस्तै : सनसनी, भटभटे, सँगसँगै, चालढाल, ढलपल, चहलपहल,सलबल, झिलिमिली, तिरमिर, गुटुमुटु, उकुसमुकुस, झलमल आदि ।&lt;br /&gt;
२.४ प्रकृतिभाब सन्धिको परिचय&lt;br /&gt;
आआफूनो रूपले रहनुलाई प्रकृतिभान भनिन्छ । कूत्‌, तद्वित, समास, द्वित्व रउपसर्यद्वारा नेपालीमा शव्दनिमाण गर्दा कुनै परिवर्तन नभै जस्तो छ त्यस्तै रूपमारहेर रूप वा शब्दहरू जोडिँदा प्रकृतिभाव सन्धि हुन्छ । यस सन्धिलाई सन्निकर्षसन्धि पनि भनिन्छ । वर्णहरू अत्यन्त नजिक रहनु सन्तिकर्ष हो र्‌ यसलाई संस्कृतव्याकरणमा &#039;पर; सन्निकर्षः संहिता&#039; (अ.१।४१०९) सूतद्वारा संहिता संज्चाभनिएको छ । वस्तुतः: यो संहिता संज्ञाले संस्कृत व्याकरणमा सन्धिका रूपमा नभैसन्धि गर्न सकिने अवस्थालाई सङ्केत गरेको हो । त्यसैले नेपाली सन्धिकासन्दर्भमा सन्निकर्ष सन्धिभन्दा प्रकतिभाव सन्धि भन्नु नै बढी सार्थक देखिन्छ । योसन्धि हुँदा लोप, आग्रम र वर्णबिकार केही पनि हुँदैन । नेपालीमा प्रकृतिभावसन्धि गर्ने मुख्य सूत एउटामात्र छ ।&lt;br /&gt;
(पद अन्यत्र प्रायः प्रकतिभाव&lt;br /&gt;
५ यस सूजले लोप, आगम र वर्णविकार सन्धिका उपर्युक्त सन्धिनियम र केहीअपवादलाई छाडेर अन्यत्र प्राय: गरेर प्रकृतिभाव सन्धि गर्दछ । यो सूत्रकोप्रकृतिभाब सन्धिनियम तदूभब तथा आगन्तुक उपसर्ग, कृत्‌, तद्धित, समास रह्वित्वद्वारा नेपाली शब्दनिर्माण गर्दा लागू हुन्छ, जस्तै :&lt;br /&gt;
शन्दनिर्माणप्रक्तिया र सन्धि? ६३&lt;br /&gt;
उपसर्गमा : बदननाम च्बदनाम, अनजान, बेकार, नाबालक, लाचार,हरघडी आदि ।&lt;br /&gt;
कृत्‌मा : भिड: अन्त ज्वभडन्त, लडाइँ, टिपन, बचत, बनावट, गन्ती,मस्वा, बोक्नु आदि ।&lt;br /&gt;
तद्वितमा : गाउँ-ले ठगाउँले, खबरदार, मूर्खपना, वूदढ्वोपन, मपाइँ,गतिलो, खण्डहर आदि ।&lt;br /&gt;
समासमा : कालो-अक्षर च्कालोअक्षर, पाठशाला, सानोठूलो, हर्ताकर्ता,सीताराम आदि ।&lt;br /&gt;
हित्वमा : जाँदा जाँदा --जाँदाजाँदा, तलतल, जहाँजहाँ, वारिवारि,भित्रभित्र, कहीँकहीँ आदि ।&lt;br /&gt;
३. उपसंहार&lt;br /&gt;
यसरी नेपाली सन्धिमा अधिकांश रूपमा स्वरवर्णहरू परिवर्तित भएका छन्‌भने अत्यन्त कम मात्रामा व्यञ्जनवर्णको परिवर्तन भएको देखिन्छ । यसै सन्दर्भमालोप र वर्णविकार सन्धिमा प्राय: सबै स्वरवर्णहरूको प्रयोग भएको पाइँदैन ।त्यस्तै आगम सन्धिमा &#039;न्‌, य्‌, च, र्‌, स्‌&#039; व्यञ्जनवर्णको मात्र प्रयोग भएको देखिन्छभने लोप एवम्‌ वर्णविकार दुवै सन्धिमा &#039;य्‌, प्‌, म्‌, ढ&#039; वर्णहरू प्रभावित हुनपुगेका छन्‌ । यसै गरी “द्‌, त्‌, द्‌&#039; लोपसन्धिमा मात्र तथा &#039;ग्‌, च्‌. ड, भू व्‌ ल्‌,स्‌&#039; वर्णविकार सन्धिमा मात्र परिवर्तित भएका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
वास्तवमा नेपाली भाषाको विकास संस्कृतबाट भएको हुँदा नेपाली सन्धिकोपरिचयात्मक चर्चा गर्दा तत्सम सन्धिको पनि उल्लेख हुनुपर्ने हो । तर यहाँनेपाली सन्धिको मात्र सङ्क्षिप्त रेखाङ्कन गर्ने मोहले संस्कृत सन्धिको सामान्यचर्चासमेत भएन । संस्कृत सन्धिका नियमहरू पूर्ण व्यवस्थित छन्‌, जसको धेरैचर्चा स्वदेशी तथा विदेशी विद्वान्‌हरूद्वारा विगतका दिनहरूमा भैसकेको छ । साथैजसको प्रयोग तत्सम शब्दनिर्माणप्रक्रिया बुझ्न चाहेको खण्डमा मात्र गछौँ ।तद्‌भव र आगन्तुक नेपाली शव्दको निर्माण गर्दा संस्कृत सन्धिनियमहरू प्रायःलागू नहुने हुँदा प्रत्यक्ष रूपमा हामीले तिनको प्रयोग गर्दैनौँ । यद्यपि यसैलेखअन्तर्गत सूत्र (१३) मा संस्कृतको यण्‌सन्धि र सूत्र (१४) मा संस्कृतकैआर्घघातुक गुणसन्धिका नियमहरू लागू भएका वलि | तर नेपालीमा यी नियमकाधैरै अपवाद देखापर्ने प्रचुर सम्भावना छँदै छ। यहाँ नेपाली सन्धिकानियमहरूलाई व्यवस्थित र सूत्रीकरण यर्न सम्भव छ भन्ने कुरालाई सङ्केतमात्गर्न खोजिएको हुँदा तत्सम सन्धिकँ नेपाली सन्धिलाई पनि नियमित र व्यवस्थितगर्ने दिशामा नेपाली भाषाशास्त्रीहरूका तर्कसम्मत विचारहरू आगामी दिनमाप्रस्तुत भइरहनेछन्‌ भन्ने कुरामा विश्वस्त रहन सकिन्छ ।(गरिमा, २०५५, पूर्णाङ्क : २२५, पृ.७६-८२)[छ|&lt;br /&gt;
६४ / शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
नेपाली सन्धिका प्रमुख विशेषताहरू&lt;br /&gt;
१. विषयप्रवेश&lt;br /&gt;
कुनै दुई सन्तिकट ध्वनि वा बर्णलाई जोड्नु सन्धि हो । प्राचीत समयमा नैसंस्कृत व्याकरणले सन्धिका बारेमा अध्ययन गरैको थियो र पाणिनि नै सन्धिलाईवैज्ञानिक दृष्टिले अध्ययन गर्ने पहिलो व्यक्ति थिए । उनको व्याकरणले वर्णलाईआधार मानेर सन्धिलाई पाँच प्रकारमा वर्गीकरण गरे पनि प्रकृतिभाव सन्धिलाईअच्सन्धिमा र्‌ विसर्ग एवम्‌ स्वादिसन्धिलाई हल्‌सन्धिमा समावेश गर्न सकिने हुँदापाणिनीय व्याकरणमा मुख्य रूपमा अच्‌ र हल्‌ गरी सन्धि दुई प्रकारका मात्रदेखिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
पाश्चात्य जगतूमा भने संस्कृतकै प्रभावमा २० औं शताग्दीमा प्रथमतःब्लुमफिल्डले सन्धिलाई अध्यपतको विषय ननाए । सन्‌ १९४९ मा बेल्स रनाइडाले ध्वनिविज्ञानका रूपमा सन्धिलाई विकसित गरै । यस क्रममा सन्धिलाईआन्तरिक र बाह्य, स्वचालित र्‌ अस्वचालित, नियमित र अनियमितका रूपमाबर्गीकरण गरियो । सन्‌ १९७३ मा 5910 $याघाट वामक विद्वानूले पूर्वीयबाङ्मयको वाजसनेयी प्रातिशाख्यमा उल्लेख गरिएका लोप, आगम, वर्णविकार रग्रकृतिभाव सन्धिलाई समर्थन गरे । नेपाली सन्धिलाई पनि यिनै चार प्रकारमावर्गीकरण गरी अध्ययन गर्नु सान्दर्भिक हुने देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
२. नेपाली सन्धिको परिचय&lt;br /&gt;
कुनै वर्णको लोष भएर हुने सन्धि लोप सन्धि हो भने कुनै नयाँ वर्ण थपिनेप्रक्रियालाई आगम सन्धि भनिन्छ । त्यस्तै सन्धि गर्ने अवस्थामा रहेका कुनैबर्णलाई हटाएर त्यसको सट्टा अर्को वर्ण राख्ने प्रक्रियालाई वर्णविकार वा आदेशसन्धि भनिन्छ । सन्धि गर्दा लोप, आग्रम, वर्णविकार केही पनि नभई जस्तो छत्यस्तै रहनुलाई प्रकृतिभाव सन्धि भनिन्छ । सन्धि गर्दा कूनै वर्ण प्रभावित हुने रनहुने आधारमा प्रकृतिभाव सन्धिलाई सामान्य सन्धि र लोप, आगम एवम्‌बर्णविकार सन्धिलाई विशिष्ट सन्धि पनि भन्न सकिन्छ ।&lt;br /&gt;
तदभव एवम्‌ आगन्तुक नेपाली शब्दको निर्माण गर्दा नेपाली सन्धिको प्रयोग&lt;br /&gt;
गरिन्छ भने तत्सम नेपाली शाब्दको निर्माण गर्दा संस्कृत सन्धिको नै प्रयोगगरिन्छ । संस्कृत सन्धि कँ नेपाली सन्धिहरू नियमित र व्यवस्थित छैनन्‌ । किनकि&lt;br /&gt;
शन्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ ६५&lt;br /&gt;
सन्धिका दृष्टिले नेपाली भाषाको अध्ययन भइसकेको छैन । तैपनि नेपाली सन्धिकासामान्य रूपरेखाहरू प्रस्तुत गर्ने प्रयासचाहिँ हुँदै आएको पाइन्छ ।&lt;br /&gt;
नेपाली सन्धिअन्तर्गत मुख्यतया अ, आ, ओऔ, इ, उ, भाउ र केहीव्यञ्जनवर्णको लोप भएका उदाहरणहरू पाइन्छन्‌ । कृत्‌, तद्वित र ह्रवित्वप्रक्रियाबाट शब्दनिर्माण गर्दा र क्रियाको रूपायनमा समेत नेपाली लोप सन्धिकोप्रयौग गरिन्छ । द्वित्वमा प्राय: व्यज्जनवर्णको लोप हुन्छ भने कृत्‌, तद्धित रक्रियाको रूपायनमा प्राय: स्वरवर्णको लोप हुन्छ । जस्तै : बानी-बाती (न्‌ लोप)आनीबानी, गफनआडी (अ लोप) -्गफाडी, चुहु-आवट (उ लोप) च्चुहावट,बिराउ&amp;quot;-औटो (आउ लोप) ठबिरौटो आदि ।&lt;br /&gt;
नेपाली आगम सन्धिअन्तर्गत मुख्य रूपमा यू, व्‌, र्‌ व्यन्जनवर्णको आगमहुन्छ । स्वरवर्णको आगम नेपालीमा भएको पाइँदैन । नेपाली आगम सन्धिकोप्रयोग कृत्‌, द्वित्व र क्रियाको रूपायनमा लागू हुन्छ । जस्तै : फर्कम-छ (न्‌ आगम)न््फर्कन्छ्ठ, जानअत (व्‌ आगम) व्जावत आदि ।&lt;br /&gt;
सबै सन्धिहरूमध्यै वर्णविकार बा आदेश सन्धि मुख्य हो । नेपाली आदेशसन्धिमा मुख्यतया अ, आ, इ, ई, उ, ओ स्वरवर्णको एवम्‌ भ्‌, ग्‌, यू. व्‌, स्‌व्यञ्जनवर्णको आदेश भएको पाइन्छ । नेपाली शाब्दनिर्माणका कृत्‌, तद्धित, समासर ढ्वित्व सबै प्रक्रियामा र क्रियाको रूपायनमा पनि नेपाली सन्धिको प्रयोगगरिन्छ । जस्तै : हुन्यो (हुरभ) न्भयो, छुनएर (उ? ओ) व्छोएर, पानीतपानी(पूः्स) -्पानीसानी, नीलोस्कमल (ओ-?-अ)त्नीलकमल, गाउनऐया [उल्वूटगाव-ऐया (आ?-अ) च्गवैया, थाक?-आली (&#039;अ&#039; लोप) थाक्‌--आली (आर अ)च्यैकाली आदि ।&lt;br /&gt;
३. नेपाली सन्धिका प्रमुख विशेषताहरू&lt;br /&gt;
नेपाली आषा संस्कृत भाषाबाट विकसित भएको हुँदा नेपालीमा संस्कृत सन्धिभएका तत्सम शब्दहरूको संख्या धेरै छ । तर सबै नेपाली शाब्दमा संस्कृतसन्धिका नियमहरू लाग्दैनन्‌, यदि संस्कृतका सबै सन्धिनियमहरू तदूभव रआगन्तुक नेपाली शब्दमा पनि लागू गर्ने हो भने त्यस्ता शाब्दले कुनै अर्थ वहनगर्न नसक्ने अवस्था समेत हुन्छ । उदाहरणका रूपमा &#039;खा&#039; धातुमा &#039;एर&#039; प्रत्ययलागेर नेपाली प्रकृतिभाव सन्धिको नियमानुसार &#039;खाएर&#039; कृदन्त शब्दनिर्माण हुन्छ ।यदि &#039;खा-एर&#039; यहाँ संस्कृतको सन्धिवियम लागू गरिने हो भने &#039;आ&#039; र &#039;ए&#039; दुवैकाखाउँमा &#039;ऐ&#039; वृद्धि भएर खैर&#039; यस्तो निरर्थक शब्द बन्दछ । त्यसैले संस्कृतसन्धिभन्दा नेपाली सन्धिको बेग्लै अस्तित्व र विशेषता रहन गएको हौँ । नेपालीसन्धिका प्रमुख विशेषताहरू निम्नानुसार रहेका छन्‌ :&lt;br /&gt;
६६ ४ शन्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
३.१ स्वरसंयोग हुनु&lt;br /&gt;
नेपालीमा अड्, आइ, उइ, एइ, ओइ, आउ, एउ, इइ, इउ, अए, आए, इए,आओ, एओ र ओए गरी मुख्यतया १५ प्रकारको स्वरसंयोग पाइन्छ, क्रमश:जस्तै : भइयो, माइजू, दुई, बेइमान, कोइली, भाउजू, एउटा, दिइयो, बिउ, गए,आए, लिए, आओ, देओ र रोए । यस प्रकारको स्वरसंयोग नेपालीमा एउटैशाव्दभित्र र वाक्यमा प्रयोग भएका दुई शव्दका बीचमा पनि पाइन्छ । संस्कृतमाचाहिँ एउटै जाब्दभित्र कहीँ पनि स्वरसंयोग हुँदैन र वाक्यमा प्रयोग भएका दुईशब्दका बीचमा पनि प्रकृतिभाब सन्धि भएका शाब्ढलाई छाडेर अन्यत्र प्राय:स्वरसंयोग भएको अवस्थामा दुवै स्वरका ठाउँमा वा अघिल्लो स्वरका ठाउँमा मात्रअर्कै तेस्रो वर्ण राखैर सन्धि गरिन्छ, जस्तै : महान-उत्सव (आन-उ?-ओ) न्महोत्सव,नैनअक (ऐटआय्‌) “नायक । तर नेपालीमा एउटै शाब्द वा दुई शब्दका बीचमाउपर्युक्त १५ प्रकारको स्वरसंयोग भए तापनि संस्कृतमा झैं लोप, आगम रवर्णविकार केही नभई प्रकृतिभाव सन्धि हुन्छ । त्यसैले स्वरसंयोग हुनु नेपालीसन्धिहरूको प्रमुख विशेषता हो ।&lt;br /&gt;
३.२ स्वरको आगम नहुनु&lt;br /&gt;
नेपालीमा सन्धि हुँदा व्‌, न्‌, र्‌ जस्ता व्यज्जनवर्णको मात्र आगम हुन्छ, तरस्वरवर्णको आगम हुँदैन । यो पनि नेपाली सन्धिको प्रमुख विशेषताभित्रै पर्दछ ।संस्कृतमा चाहिँ क्रियाको व्युत्पादनमा &#039;इ&#039; स्वरको आगम अत्यधिक रूपमा प्रयोगभएको पाइन्छ ।&lt;br /&gt;
३.३ पढादिमा हस्व हुनु&lt;br /&gt;
सन्धि भएपछि नेपाली शब्दको सुरुमा इस्व हुनु पनि नेपाली सन्धिको अर्कोप्रमुख विशेषता हो । कृत्‌, तद्धित र समासद्वारा शब्दनिर्माण गर्दा धातु वा शब्दकोसुरुमा &#039;आ&#039; भए त्यसको ठाउँमा प्राय: &#039;अ&#039; हुन्छ । जस्तै : ढालु-आइ तढलाइ,लाजनआलु -्लजालु, लाख-पति -्लखपति । यसै गरी तढित प्रत्यय लाग्दाशब्दको सुरुमा दीर्घ ई, क भए हस्व हुन्छ । जस्तै : दूधकद्धलो व्दुधिलो,तीतोनऔरा -न्तितौरा । संस्कृतमा चाहिँ यसका विपरीत क्‌, न्‌, ण्‌ वर्ण भएकातद्वित प्रत्यय लागेमा शब्दको सुश्मा रहेका ह्ृस्व अ, इ, उ का ठाउँमा बृद्धि भएरआ, ऐ, औँ हुन्छ । जस्तै : वाराणसी-ढक्‌ (एय) च्वाराणसैय, शिच-अण्‌ (अ)नशौँब, मुखन-ठक्‌ (इक) तमौखिक आदि ।&lt;br /&gt;
शन्दनिर्माणप्रन्िया र सन्धि/ ६७३.४ तद्ित प्रत्यय लगाइँ सन्धि गर्दा प्रकृतिको अन्तिम स्वरको प्राय: लोपहुनुले, लो, दार, ना, पन, पना, पाई, ल, हर, ली बाहेक अन्य सबै तद्धित प्रत्ययलाग्दा प्रकृति अर्थात्‌ शब्दको अन्तिम स्वरको लोप हुन्छ । यो पनि नेपालीसन्धिको एउटा प्रमुख विशेषता हौ । जस्तै : खुर्पाच्एटो (आ लोप) च्खुर्पेटो,गुल्मीम्एली ।ई लोप) च्गुन्मैली, गोलो-आइ (ओ लोप) च्गोलाइ । संस्कृतमाचाहिँ तद्वित प्रत्यय लाग्दा प्रकृति (शब्द) को अन्तमा रहेका  आवाइईकोमात्र लोप हुन्छ, अन्य प्राय: सबै स्वरको लोप भएको पाइँदैन ।&lt;br /&gt;
३.५ ओकारान्त सर्वनाम र विशेषण शब्दहरू अकारान्त वा इकारान्तमापरिणत हुनुसमासमा ओकारान्त विशेषण शब्दहरू प्राय: अकारान्त वा इकारान्तमा रतदवितमा ओकारान्त सर्वनाम शब्दहरू प्रायः अकारान्तमा परिणत हुन्छ, जस्तै :लामकाने, तीलकमल, रातमाटै, कालीमाटी, लामीडाँडा, कहिले, कहाँ, कता, कतिआदि ।&lt;br /&gt;
३.६ उकारान्त एकाक्षरी धातुको उ भूतकालमा ओ मा परिणत हुनु&lt;br /&gt;
उकारान्त एकाक्षरी घातुका भूतकालका रूपहरू निर्माण गर्दा धातुको अन्तिमग्ठ&#039; &#039;ओ&#039; मा परिणत हुन्छ । सम्भावना भविष्यत्‌ कालमा समेत यो प्रक्रिया लायूहुन्छ । यो पनि नेपाली सन्धिका प्रमुख विशेषताभित्रै पर्दछ । जस्तै : रोयो, छोएर,घोई, होला आदि ।&lt;br /&gt;
३.७ हु, जा र लैजा धातुको मात्र भूतकालमा भ, ग र लग्‌ आदेश हुनु&lt;br /&gt;
भूतकालमा &#039;ह&#039;, &#039;जा&#039; र &#039;लैजा&#039; धातुका ठाउँमा क्रमश: “भ&#039;, &#039;ग&#039; र &#039;लग्‌&#039;आदेश हुन्छ, जस्तै : जा-्यो “गयो, हुनए नभए, लैजाक्यो च्लग्यो । यसरी &#039;ह&#039;,&#039;जा&#039; र &#039;लैजा&#039; धातुबाहेक अन्य नेपाली धातुको कुनै पनि आदेश सन्धि भएरधातुमा पूरै परिवर्तन भएको पाइँदैन ।&lt;br /&gt;
३.८ रेफकौ संयोग हुनु&lt;br /&gt;
दुई रेफ (रकार) को संयोग पाइनु नेपाली सन्धिको अर्को प्रमुख विशीषता हौँ,जस्तै : सर्र, घर्रा, दवार्र । संस्कृतमा चाहिँ दुई रेफको संयोग भएमा अघिल्लोरेफको लोप भएर सन्निकट स्वरको दीर्घ हुन्छ, जस्तै : अन्तर्‌--राष्ट्रियटअन्तन-राष्ट्रिय ख्अन्ताराष्ट्रिय ।&lt;br /&gt;
धद ४ शब्दानिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
३.९ अनुस्वार वा आफूनै वर्गका पञ्चमवर्णको प्रयोग नहुनु&lt;br /&gt;
संस्कृतमा अघिल्लो व्यञ्जनवर्ण न्‌ वा म्‌ भए त्यसको अनुस्वार हुन्छ रत्योअनुस्वारभन्दा पछिल्लो व्यन्जनवर्ण जुन वर्गको छ, सोही वर्गको पाँचौं नासिक्यव्यज्जनमा परिणत हुन्छ । यसरी सन्धि भएका शब्दलाई नेपालीमा नासिक्यव्यञ्जनवर्णसहित वा अनुस्वारसहित दुवै रूपमा प्रयोग गर्न सकिन्छ, जस्तै :अङ्क/अंक, सम्पर्क “संपर्क, पञ्च /पंच, कण्ठ, कंठ । तर नेपालीमा नासिक्यब्यज्जन हुने शब्दलाई अनुस्वारका रूपमा प्रयोग गरिँदैन र आआफूना वर्गकापञ्चमवर्णको प्रयोग पनि गरिँदैन । नेपालीमा &#039;ङ्‌, ज्‌, ण्‌&#039; को उच्चारण नहुने हुँदा&#039;न्‌&#039; र &#039;म्‌&#039; बाट सबै वर्गका चासिक्य व्यन्जनवर्णको काम चलाउनु पर्ने हुन्छ,जस्तै : कान्छो, भान्जा, गुन्डा, चिम्टा, फन्को आदि । “कान्छो&#039; जस्ता नेपालीशब्दलाई &#039;कान्छो&#039; वा &#039;कांछो&#039; का रूपमा प्रयोग गरिँदैन । त्यसैले यो पनि नेपालीसन्धिको प्रमुख विशेषता हो ।&lt;br /&gt;
४. उपसंहारनेपाली सन्धिको चर्चा गर्दा विश्वविद्यालयस्तरका कतिपय पाद््य एवम्‌ सन्दर्भपुस्तकहरूमा संस्कृत सन्धिको मात्र चर्चा भएको र नेपाली सन्धिको चर्चा भए पनिअत्यन्त कम मात्रामा देखिएको अवस्थामा नेपाली सन्धिको बेग्लै अस्तित्वनिर्धारणका लागि उपर्युक्त केही विशेषताहरू सहयोगी हुन सक्छन्‌ । तैपति नेपालीसन्धिको पूर्णतया अलग अस्तित्व र विशेषता निर्धारणका लागि मार्गप्रशस्तगरिनुपर्ने आवश्यकताचाहिँ नेपाली भाषामा अझै खट्किरहन गएको देखिन्छ ।(मृगतृष्णा, २०५८, पूर्णाङ्क २ : पृ.ञ्छ-४०)&lt;br /&gt;
[छा ।&lt;br /&gt;
शन्दनिर्माणप्रक्षिया र सन्धि/ ६९&lt;br /&gt;
अध्याय - नो।&lt;br /&gt;
नेपाली व्याकरणमा सन्धितिच्छेदका आघारहरू&lt;br /&gt;
१. विषयप्रवेश&lt;br /&gt;
उपसर्ग, कृत्‌, तद्धित, समास र द्वित्वद्वारा व्युत्पन्न नेपाली शब्दको निर्माणहुन्छ । व्युत्पन्न षाब्दमा आधार र आधेयतत्त्च अनिवार्य रूपमा रहन्छन्‌ र तिनकाबीचमा सन्धि गरिन्छ । सन्धि गर्दा कुनै शब्दका प्रकृति बा आधार तत्त्वमा विशेषपरिवर्तन हुने गर्दछ भने कुनैमा केही पनि परिवर्तन भएको देखिँदैन । यसरी निर्मितशाब्दको प्रकृति प्रत्यय वा आधार र आधेय तत्त्व छुट्टघाउने प्रक्रियालाईसन्धिबिच्छेद भनिन्छ । सन्धि गर्दा बर्णहरू हटाइएका भए सन्धिविच्छेद गर्दा त्यस्तावर्णहरू थपिन्छन्‌ भने सन्धि गर्दा वर्णहरू थपिएका भए सन्धिचिच्छेद गर्दा त्यस्तावर्णहरू हटाइन्छन्‌ । जस्तै : &#039;अग्लो-आइ&#039; मा औं हटाई सन्धि गरेर अग्लाइबनाइन्छ भने &#039;अग्लाइ&#039; को सन्धिविच्छेद गर्दा सन्धि गर्ने अवस्थामा हटेको &#039;ओ&#039;वर्ण थपेपछि &#039;अग्लो--आइ&#039; बन्दछ । यसरी नै &#039;लजालु&#039; शन्द सन्धि हुने अबस्थामाप्रकृतिको &#039;आ&#039; का ठाउँमा &#039;अ&#039; आदेश भई अन्तिम &#039;अ&#039; को समेत लोप भएकोथियो भने सन्धिविच्छेद गर्ने अवस्थामा सन्धि गर्दा हटेको &#039;अ&#039; थपिई &#039;अ&#039; काठाउँमा &#039;आ&#039; आदेश भएर &#039;लाज--आलु&#039; हुन्छ । वस्तुतः सन्धिका दृष्टिले नेपालीभाषाको व्यापक अध्ययन नभैसकेको सन्दर्भमा नेपाली व्याकरणमा सन्धिविच्छेदकाआधारहरू निर्धारण गर्नु कठिन कार्य भए पनि यहाँ यससम्बन्धी निम्नानुसारप्रारम्भिक केही आधारहरूमात्र प्रस्तुत गर्न खोजिएको छ ।&lt;br /&gt;
२. सन्धिविच्छेदका प्रमुख आधारहरू२.१ सार्थक प्रकृति र प्रत्ययको पहिचान&lt;br /&gt;
कृत्‌ र तद्धित प्रत्यय लगाई निर्माण गरिएका शब्दहरूको सङ्ख्या नेपालीमाधैरै छ । कृदन्त शब्दको प्रकृतिमा धातु रहन्छ भने तद्धितान्त शब्दको प्रकृतिमाशब्द रहन्छ । त्यसैले प्रकृतिमा रहने धातु वा शब्द सार्थक हुनुपर्छ, निरर्घकहुनुहुँदैन । सन्धिविच्छेद गर्ने क्रममा प्रकृति पत्ता लगाइसकेपछि प्रकृतिमा धातु भएकृत्‌ प्रत्यय राख्चिन्छ र प्रकृतिमा शब्द भए तद्धित प्रत्यय राखिन्छ । यसरी राखिनेप्रत्यय कृत्‌ वा तदित प्रत्ययभिव पर्छ वा पर्दैन भन्ने बारेमा पनि विचार पुन्याउनुजरुरी हुन्छ । नेपालीमा यस्ता प्रत्ययहरूको सङ्ख्या यति नै छ भनेर किटाननगरिएको अए पनि भाषा वा व्याकरणमा प्रयोग गरिएका प्रत्ययहरू नै स्वीकार्य रसार्थक ठहरिन्छन्‌ । त्यसैले नेपालीमा सार्थक प्रकृति र प्रत्ययको पहिचान हुनुसन्धिविच्छेदको पहिलो आधार हो ।&lt;br /&gt;
७० ८ शन्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
२.२ आगम भएका व्यञ्जन वर्णहरू हटाइन्छन्‌&lt;br /&gt;
व्युत्पन्त नेपाली शब्दमा न्‌, न्‌, र्‌ जस्ता व्यन्जन वर्णको मात्र आगम हुन्छ,स्वरको आगम हुँदैन । सन्धि गरी निर्माण गरिएका यस्ता शब्दको सन्धिविच्छैदगर्दा आगम भएका त्यस्ता व्यञ्जन वर्णहरू हटाइन्छन्‌ । जस्तै : जान्छ? जा--छ,जावत?” जा--अत, गर्गहना? गहना--गहना आदि । यसै गरी सन्धिविच्छेद गर्दाजबाइ, खवैया, खवाइ, धुवाइ, स्वाइ जस्ता शव्दमा न्‌ हटाइन्छ भने अ, आ,इरउ अन्तमा हुने घातुदेखि छ्‌ वा ध्‌ पछाडि भएमा सन्धि गर्दा आगम गरिनेव्यञ्जनवर्ण न्‌ को सन्धिविच्छेद गर्ने अवस्थामा हटाइन्छ । त्यस्तै घर्घडेरी,छरछिमेक, मर्मसला, पर्सल्लाह, सर्सामान जस्ता आंशिक ड्वित्ब भई &#039;र्‌&#039; आगम भएरसन्धि भएका शब्दमा रहेको र्‌ लाई पनि सन्धिविच्छेद गर्दा हटाइन्छ ।&lt;br /&gt;
२.३ प्रकृति छुट्टयाउँदा स्वरादि प्रत्यय भए प्रकृतिको अन्तमा स्वरवर्णो थपिन्छ&lt;br /&gt;
स्वरवर्ण आदिमा हुने प्रत्यय लगाएर सन्धि गरी निर्माण गरिएका शब्दकोसन्धिबिच्छेद वा प्रकृति प्रत्यय छुट्टयाउँदा प्रकृतिको अन्तमा सन्धि गर्दा हटाद्एकोस्वरवर्ण थपिन्छ । व्यञ्जनवर्ण आदिमा हुने प्रत्यय लाग्दा भने यो आधार लागूहुँदैन । जस्तै : एकाइ” एक&amp;quot;-आइ, खुर्पेटो? खुर्पा-एटो, गुल्मेली? गुल्मी-एली,खैरेनी? खैरो--एनी, चुहावट? चुहु-आवट, बिरौटो?? बिराउ&amp;quot;औटो, पढायो?”पढाउ-यौ, सिएर?? सिउनएर आदि ।&lt;br /&gt;
२.४ प्रकृतिको आदि स्वरलाई दीर्घ गरिन्छ&lt;br /&gt;
दीर्घ स्वरलाई हृस्व गरी सन्धि गरिएका शब्दको प्रकृतिमा रहेको अघिल्लोइृस्व स्वरलाई सन्धिविच्छेद गर्दा दीर्घ नै बनाइन्छ । जस्तै : थकाली? वाक--आली,खैदिलो?- खाँदकइलो, लखपति? लाख--पति, तितौरा? तीतौ-औरा, दुधिलो?&amp;quot;दूधनडलो आदि ।&lt;br /&gt;
२.५ प्रकृतिमा रहेका अकारान्त वा ईकारान्त विशेषण वा सर्वनाम शब्दहरूओकारान्त बनाइन्छन्‌ममास र तद्वित प्रत्यय लगाएर सन्धि गरी ओकारान्त शब्दलाई अकारान्तबा ईकारान्त बनाएर शब्दनिर्माण गरिन्छ । यसरी सन्धिनियम लागी निर्माणभएका शब्दहरू सन्धिबिच्छैद गर्दा प्रकृतिलाई ओकारान्त बनाइन्छ । जस्तै :नीलकमल?- नीलोन-कमल, कहिले?- कोहिले, कता? कोन-ता आदि ।&lt;br /&gt;
२.६ ओकारान्त एकाक्षरी धातु उकारान्तमा बदलिन्छ&lt;br /&gt;
भूतकाल र सम्भावना भविष्यत्‌ कालका क्रिया शव्दको प्रकृति प्रत्ययछुट्टयाउँदा प्रकृतिमा ओकारान्त एकाक्षरी धातु भए त्यसलाई उकारान्तमा बदलिन्छ ।जस्तै : रोयो? रुम्यो, छोएर? छुन्एर, धोई? धुञ्ई, होला? हुम्ला आदि ।&lt;br /&gt;
शग्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ ७१&lt;br /&gt;
२.७ एकाक्षरी घातुका ठाउँमा आदेश भएको भ र ग क्रमशः हुरजामापरिणत हुन्छभूतकालमा क्रियाका रूपहरू निर्माण गर्दा एकाक्षरी घातुका ठाउँमा आदेशगरिएको भ हु धातुमा परिणत हुन्छ भने ग चाहिँ जा धातुमा परिणत हुन्छ ।जस्तै : भएर हुनए, गयो? जात्यो आदि ।&lt;br /&gt;
३. उपसंहारसार्थक प्रकृति र प्रत्यय बा आधार र आधेय तत्त्वको यथार्थ पहिचानकैसकेको खण्डमा सन्धिविच्छैदका आधारहरूले खासै महत्त्व राख्दैनन्‌ । त्यसैलेसामान्य नै भए पनि सन्धिविच्छैदका आधारहरूको चर्चाले नेपाली व्याकरणमाप्रबेश पाउन सकेको छैन । तैपनि नेपाली सन्धिको छुट्दै अस्तित्वबोध गर्ने सन्दर्भमासन्धिविच्छेदका उपर्युक्त प्रारम्भिक केही आधारहरूले नेपाली शब्दनिर्माणकोसामान्य प्रक्रियालाई नुझ्न केही मात्रामा सघाउने छन्‌ भन्ने कुरामा विश्वस्त रहनसकिन्छ ।(तिशान्त, २०१७, पूर्णाङ्क ७ : प.१९-२२)[|&lt;br /&gt;
७२ / झन्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
अध्याय -द&lt;br /&gt;
वाजसनैयी प्रातिशाख्यमा सन्धिको अध्ययन&lt;br /&gt;
१. विषयप्रवेश&lt;br /&gt;
वैदिक वाङ्मयका साथै लौकिक वाङ्मयमा पनि प्रातिशाख्यको विशिष्टस्यान र महत्त्व छ । वैदिक मन्त्रहरूको उच्चारण गर्दा विशेष सावधान हुनुपर्ने रमन्त्रोच्चारणमा अलिकति पनि तलमाथि हुन गएमा उच्चारित मन्त्रले विपरीतफल दिन्छ भन्नै कूरा वृत्रासुरले इन्द्रको विनाश गर्ने उद्देश्यले गरेको यज्ञमावृत्रासुरकै मृत्यु भएबाट प्रमाणित हुन्छ । यसकारण मन्त्रहरूको समुचित ढङ्गलेउच्चारण गर्न सकियोस्‌ भन्ने विचारले वर्ण, पद, सन्धि, स्वर, मात्रा आदिविषयहरूको आवश्यकता बैदिक बाङ्मयमा देखापरेको हो । त्यसै गरी आधुनिकआषाविज्ञानका क्षेत्रमा देखापर्ने समस्याहरूलाई समाधान गर्न वेदहरूको अध्ययनआवश्यक मानिएको वर्तमान समयमा वेदको अध्ययनमा सहयोग गर्ने प्रातिशाख्यग्रन्थहरूको आवश्यकता विशेष रूपमा खट्किँदै गएको छ । साथै प्रातिशाख्यग्रन्थहरूमा गरिएको ध्वनिविज्ञान र सन्धिविज्ञानको विशेष प्रकारको अध्ययनअन्यत्र नपाइनुले पनि प्रातिशाख्य ग्रन्थहरूप्रति भाषाशास्त्री एवम्‌व्याकरणविदूहरूको चाम्तो दिनानुदिन बढ्दै जानथालेको हो ।&lt;br /&gt;
चारै वेदका सन्दर्भमा धेरै प्रातिशाख्य ग्रन्थहरूको रचना भए पनिक्रग्वेदप्रातिशाख्य, वबाजसनेयिप्रातिशाख्य, तैत्तरीयप्रातिशाख्य, क्रव्तन्त्र,चतुराध्यायिका र अधर्वप्रातिशाख्यमात्र हाल उपलन्ध हुनसक्ने प्रातिशाख्र्यभित्रपर्दछन्‌ । यी प्रातिशाख्य ग्रन्थहरूको रचना कहिले अयो ? भन्ने बारेमा अन्वेषकएवम्‌ विचारकहरूमा मतैक्य नभए पनि सामान्यतया यास्कभन्दा पछि रपाणिनिभन्दा पूर्व नै यिनीहरूको रचनाकाल मानिन्छ । पाणिनिको अष्टाध्यायीसँगप्रातिशाख्यको तुलनात्मक अध्ययन गर्ने गोल्डस्टूकरबाहेक लाइनिज, मैक्समूलर,बेबर, राथ आदि बिद्वान्‌हरूले ग्रातिशाख्य ग्रन्यको रचनाकाल पाणिनिभन्दा पूर्व नैमानेका छन्‌ । यी प्रातिशाख्यहरूमध्ये वाजसनेयी प्रातिशाख्य सबैभन्दा पुरानोमानिन्छ । शुक्लयजुवेदसँग सम्बद्ध भएको हुँदा यस प्रातिशाख्यलाई शुक्लयजुर्वेदीयप्रातिशाख्य पनि भन्ने गरिन्छ र यसका रचनाकार कात्यायन हुन्‌ ।&lt;br /&gt;
२. वाजसनेयी प्रातिशाख्यमा सन्धि२.१ वाजसनेयी प्रातिशाख्यको परिचय&lt;br /&gt;
वाजसनेयी प्रातिशाख्यलाई आठ अध्यायमा विभाजन गरिएको छ । प्रत्येकअध्यायमा न्यूततम १२ देखि अधिकतम १९८ सूत्रहरू समाबेश गरिएका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ ७३&lt;br /&gt;
संस्करणगत भिन्नताका कारण यस प्रातिशाख्यअन्तर्गत सम्पूर्ण सूतहरूको सङ्ख्या७२४ देखि ७४० सम्म पाइन्छ । यस प्रातिशाख्यको पहिलो अध्यायमा शब्दकोउत्पत्ति, बेदको अध्ययन गर्ने विधि, संज्चा र्‌ परिभाषा, वर्णहरूको उच्चारण स्थानर करणको चर्चा गरिएको छ भने दोम्तो अध्यायमा स्वरसम्बन्धी नियमहरूकोउल्लेख गरिएको छ । तेस्रो अध्यायमा सन्धिनियमहरू समावेश गरिएका छन्‌ भनेचौंथो अध्यायमा पनि सन्धिनियमहरूका साथै पदपाठ र्‌ कमपाठका नियमहरूपाइन्छन्‌ । पाँचौं अध्यायमा समस्त शब्दलाई अलग्याउने प्रक्रिया अवद्रह (विग्रह)सम्बन्धी नियमनिर्धारण गर्ने सूत्रहरूको उल्लेख भएको छ भने छैटौं अध्यायमाआब्व्यात (क्रियापद) र उपसर्गसम्बन्धी स्वरनिपमका साथै पदस्वरूपका बारेमा पनिविचार गरिएको छ । यसै गरी बीचमा &#039;इति&#039; राखैर पदलाई दोहोन्याउनेप्रक्रियालाई सातौँ अध्यायमा वताइएको छ भने अन्तिम तथा आखैँ अध्यायमाबर्णसमाम्नाय, वेदको अध्ययन गर्ने विधि र त्यसको फल, वर्णका देवता,चारप्रकारका पढ र्‌ तिनको लक्षण आदिका बारेमा चर्चा गरिएको पाइन्छ ।&lt;br /&gt;
२.२ सन्धिको वर्गीकरण&lt;br /&gt;
&#039;स्वरसंस्कारयोश्छन्दसि&#039; (कात्यायन “का. १।१) वाजसनैयी प्रातिशाख्यकोपहिलो सूत्र हो । यस सूत्रानुसार वाजसनेयी प्रातिशाख्यले विशेष गरी वैदिक स्वरर संस्कारका बारेमा अध्ययन गर्दछ । यहाँ संस्कार शब्दको प्रयोग सन्धि शब्दकोपर्यायका रूपमा भएको र यस सूत्रको भाष्यमा उवटले संस्कार भन्नाले लोप,आगम, वर्णविकार र प्रकुतिभावलाई जनाउँछ भनेका छन्‌ । यस प्रकारकोसन्धिवर्गीकरणको आधारलाई संयौजनगत आधार भन्न सकिन्छ । यसै गरीबाजसनेयी प्रातिशाख्यकै &#039;पदान्तपदाद्यो: सन्धि:&#039; (का. अर) भन्ने सूत्रले सन्धि कहाँगर्ने ? भन्ने बारेमा प्रष्ट पारैको छ । जुन दुई शब्दका बीचमा सन्धि गर्नखोजिएको छ त्यसमा बायाँतर्फ रहेको पदान्त अर्थात्‌ शब्दको अन्तिम वर्ण रदायाँतर्फ रहेको पदादि अर्थात्‌ शव्दको सुरुको वर्णका वीचमा मात्र सन्धि गरिन्छ ।त्यसैले सन्धिका नियमहरू वैदिक र लौकिक संस्कृतमा पदान्त र पदादिमा नै लागूहुन्छन्‌ । नेपाली भाषामा चाहिँ एउटा शब्दभित्र पनि सन्धिकार्य स्वीकारिएकोपाइन्छ ।&lt;br /&gt;
उपर्युक्त &#039;पदान्तपदाद्यो: सन्धि:&#039; (का. ३।३) सूत्रकै भाष्पमा उवटले सन्धिकाचार प्रकारको उल्लेख गरेका छन्‌- स्वरसन्धि, व्यञ्जनसन्धि, स्वरव्यञ्जनसन्धि रव्यम्जनस्वरसन्धि । यस प्रकारको सन्धिबर्गीकरणको आधारलाई क्षेत्र बाप्रभावगत आधार मान्न सकिन्छ । दुई स्वरका वीचमा हुने सन्धि स्वरसन्धि हो भनेदुई व्यञ्जनका वीचमा हुने सन्धिलाई व्यञ्जनसन्धि भनिन्छ । त्यस्तै स्वर रव्यज्जनका बीचमा हुने सन्धिलाई स्वरव्पज्जनसन्धि भनिन्छ भने व्यञ्जन रस्वरका वीचमा सन्धि हुँदा व्यञ्जनस्वरसन्धि हुन्छ ।&lt;br /&gt;
७४ / शब्दनिमांशप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
बाजसनेयी प्रातिशाख्यअन्तर्गत तेम्रो अध्यायका सम्पूर्ण १५१ सूत्र र चौँथोअध्यायका सम्पूर्ण १९५ सूत्रमध्ये १६७ सूत्रसमेत जम्मा ३१८ वटा सूत्रमाकात्यापनले सन्धिको चर्चा गरेका छन्‌ । यसमध्ये १९ सूत्रले लोप, २२ सूतलेआगम, १६५ सूत्रले वर्णविकार र वाँकी सूत्ले प्रकृतिभावको विधान गरेका छन्‌ ।यस प्रातिशाछ््यमा लोप सन्धिअन्तर्मगत अ., आ, इ, न्‌, नि, य्‌, ब्‌, स्‌ आदि वर्णकोलोपविधानका सूत्रहरू पाइन्छन्‌ भने आगम सन्धिअन्तर्गत क्‌, च्‌, त्‌, र्‌, ल्‌, शू,प्‌, स्‌ व्यञ्जनवर्णको आगम गर्ने सूतजहरूको व्यवस्था गरिएको देखिन्छ । त्यस्तीवर्णविकार सन्धिको निपेध गरिएका नियम सूत्रहरूमा नै विशेषतः प्रकृतिभावसन्धिको अध्ययन भएको पाइन्छ । यस प्रातिशाख्यमा चर्चा गरिएका लोप, आगम,वर्णविकार र प्रकृतिभावमध्यै वर्णविकार सन्धिका नियम सूत्रहरू विस्तृत रूपमापाइन्छन्‌ । वाजसनेयी प्रातिशाछ्ल्यमा वर्णन गरिएका वर्णविकार सन्धिनियमहरूलेलौकिक संस्कृत वाङ्मयका साथै नेपाली भाषामा समेत विशेष महत्त्व राख्नसक्ने१ वर्णविकार सन्धिका केही नियमलाई सड्क्षिप्तरूपमा चर्चा गर्नु सान्दर्भिक&lt;br /&gt;
न्छु ।&lt;br /&gt;
२.३ प्रमुख वर्णविकार सन्धिहरू&lt;br /&gt;
वाजसनेयी प्रातिशाख्यमा वर्णविकार सन्धिअन्तर्गत एकीभाव, अन्तस्थीभाव,अयादिभाब, पूर्वरूपता र दीर्घीभाबजस्ता स्वरवर्णबिकारका उदाहरण भेटिन्छन्‌ भनेव्यञ्जन वर्णविकारअन्तर्गत पञ्चमवर्ण, तवर्गको चवर्ग, दन्त्यको मूर्धन्य आदिआदैशविधान गर्ने नियमसूजहरू व्यवस्थित गरिएका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
२.३.१ एकीभाव&lt;br /&gt;
पाणिनिको &#039;एकपूर्वपरयो?&#039; (पाणिनि/ पा, ६१४) सूवरझै यहाँअयैकमुत्तरश्च (का. ४५१) सूत्रको अधिकारमा पदान्तीय र पदादि स्वरवर्णकोस्थानमा एउटै स्वरवर्ण आदेश गर्ने प्रक्रियालाई एकार्थीभाव भनिएको हो रयसअन्तर्गत एघार सूजद्वारा सवर्णदीर्घ, एकार, ओकार, ऐकार, औकार, आर्‌ रआल्‌को बिधान गरिएको छ । &#039;सिं सबर्णे दीर्घम्‌ (का, ४१२), &#039;कण्ठ्यादिवर्णएकारम्‌&#039; (का. ४५४) र &#039;उवर्ण ओकारम्‌&#039; (का. ४५५) एवम्‌ &#039;सन्ध्यक्षरऐकारौकारौ&#039; (का. ४५५) सूजका कार्यहरू पाणिनीय व्याकरणका सवर्णदीर्घ, गुणर्‌ वृद्धि गर्ने &#039;अक: सवर्णे दीर्घ: (पा. ६१०१), &#039;आद्‌ गुण:&#039; (पा. ६१५७) र&#039;बृद्धिरिचि&#039; (पा, शासक) सूत्रहरूसँग तुलदीय छन्‌ । &#039;आरमृकारो५पुक्तात्‌&#039; (का.४६०) र &#039;लकारशचाल्कारम्‌&#039; (का. ४६१) सत्नले क्रमश: आर्‌ र आलूको बिधानगरेका छन्‌ अने पाणिनीय व्याकरणमा &#039;वृद्धिरिचि&#039; (पा. ६१।७७) सृजद्वारा नै यिनकोकार्य गरिनै हुँदा छुद्दै सूत्रको अध्ययन भएको पाइँदैन । वैदिक एवम्‌ लौकिकसंस्कृतका अतिरिक्त तत्सम नेपाली शब्दमा पनि उपर्युक्त सवर्णदीर्घ, गुण रवृद्धिका विद्यालय, सूर्योदय, सदैव जस्ता उदाहरणहरू पाइन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
झब्दानिर्माणप्रक्तिया र सन्धि/ ७५&lt;br /&gt;
२.३.२ अन्तस्थीभाव&lt;br /&gt;
स्वरवर्ण पछाडि भएमा अकण्ठच स्वर इ, उ का ठाउँमा अन्तस्थवर्ण य्‌, व्‌आदेश हुनुलाई अन्तस्थीभाव भनिन्छ । अन्तस्थीभाव गर्ने &#039;स्वरे भाव्यन्तस्थम्‌&#039; (का.३1४७) कात्यायनको सूज पाणिनिको यण्‌ गर्ने &#039;इको यणचि&#039; (पा. ६१।७७) सूजसँगतुलनीय छ । नेपालीमा अत्यधिक, स्वागत जस्ता अधिकाँश तत्सम शब्दमा रजिस्क्याइ, ठूल्यामा, आवत, गबैया, धावन्ती जस्ता अतत्सम शब्दमा पनिअन्तस्थीभाव सन्धिको प्रयौग भएको पाइन्छ ।&lt;br /&gt;
२.३.३ अयादिश्वाव&lt;br /&gt;
सन्ध्यक्षर अर्थात्‌ ए, ओ, ऐ र औ का स्थानमा क्रमश; अय्‌, अव्‌, आय्‌ रआव्‌ आदेश हुनुलाई अयादिआाव भनिन्छ । अयादिभाव विधान गर्ने“सन्ध्यक्षरमयवायावम्‌&#039; (का. ४1४८) सूत्रको कार्य पाणिनिको &#039;एचोप्र्यवायाव:&#039; (पा.६१७८) सूतरसँग तुलना गर्न सकिन्छ । वैदिक र लौकिक संस्कृतमा मात्र होइननायक, गायक जस्ता तत्सम नेपाली शब्दमा पनि अयादिभावको प्रयोग भएकोदेखिन्छ ।&lt;br /&gt;
३.३.४ अभिनिधानभाव&lt;br /&gt;
एकार र ओकारपछि रहेको अकार अघिल्लो वर्णमैँ मिल्नुलाईअभिनिच्यानभाव अर्थात्‌ पूर्वरूपता भनिन्छ । वाजसनेयी प्रातिशाखर्यमा पच्चीस वटासूत्रहरूमा अभिनिहित ।पूर्वरूप) सन्धिको अध्ययन भएको छ । तीमध्ये प्रमुखमानिने &#039;एदोद्भ्याँ पूर्वमकार:&#039; (का. ४६२) सूत्रको कार्य पाणिनिको &#039;एङः:पदान्तादति&#039; (पा. ६१।१०९) सूत्रसँग तुलनीय छ । यस सन्धिका उदाहरणनेपालीमा भने पाइँदैनन्‌ ।&lt;br /&gt;
३.३.५ तबर्गको विकार&lt;br /&gt;
चवर्ग पछाडि भएमा तबर्गका स्थानमा चवर्ग हुन्छ भने शकार पछाडिभएमा सकारका स्थानमा शकार हुन्छ । यस्तो कार्य गर्ने &#039;तकारवर्गशचकारवर्गेचकारबर्गम” (का. ४९६) र &#039;शाकारे च&#039; (का. ४९७) दुई सूज पाणिनिको &#039;स्तोःष्चुना शचु:&#039; (पा. न।४1४0) सूजसँग तुलनीय छन्‌ । यत्त सन्धिका उदाहरणलौकिक संस्कृत र तत्सम नेपालीमा पत्नि प्रशस्त भेटिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
२.३.६ नति&lt;br /&gt;
&#039;दन्त्यस्य मूर्घन्यापततिर्नति&#039; (का. १।४२) अर्थात्‌ दन्त्य वर्ण त्‌. थ, द, घ, न्‌,स्‌ का ठाउँमा क्रमश: ट्‌, ठु, ड, द्‌, ण्‌, पू हुनुलाई नति भनिन्छ । बाजसनेयीप्रातिशाख्यमा नतिको विधान गर्ने सूतहरूको सङ्ख्या ४० छ । नतिको कार्यपाणिनिको &#039;प्ुना प्टु:&#039; (पा. ५।४।४१) सूत्र र पत्व तथा णत्व गर्ने अन्यसूत्रहरूसँग तुलदीय छ । लौकिक संस्कृतमा नतिका प्रशस्त उदाहरणहरू&lt;br /&gt;
७ / झब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
पाइन्छन्‌ । नेपालीमा चाहिँ प्रत्यक्षकूपमा प्रयोग नभेटिए पनि तत्समशब्दनिर्माणको प्रक्रिया बुझ्ने सन्दर्भमा यसको प्रयोग अनिवार्य देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
२.३.७ पञ्चमवर्ण&lt;br /&gt;
स्पर्शवर्ण (कदेखि मसम्मका) पछाडि भएमा पूर्ववर्ती स्पर्शवर्ण परवर्तीवर्गको पञ्चमवर्णमा परिणत हुन्छ । पञ्चमवर्ण विधान गर्ने &#039;स्पर्शो परपञ्चमम्‌&#039;(का. ४१२) सूतको कार्य पाणिनिको &#039;अनुस्वारस्य यि परसवर्ण;&#039; (पा, दाड।४८)सूत्रसँग आंशिकरूपमा तुलना गर्न सकिन्छ । तत्सम नेपाली शब्दमा पनिपञ्चमवर्ण प्रयोग भएका उदाहरणहरू प्रशस्त पाइन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
३. उपसंहार&lt;br /&gt;
वास्तवमा प्रातिशाख्यग्रन्थहरू नै वैदिक व्याकरण हुन्‌ । वैदिक व्याकरणमाअध्ययन गरिएका सन्धिलगायत अन्य कतिपय पक्षहरू लौकिक संस्कृत व्याकरणहुँदै नेपाली व्याकरणसम्म आइपुग्दासमेत स्वीकार्य हुनपुगेका छन्‌ भन्ने कुरालाईउपर्युक्त सूचनात्मक अध्ययनले देखाएको छ । त्यसैले भाषा र व्याकरणकोअध्ययन अनुसन्धानका सन्दर्भमा प्रातिशाख्यहरूले विशेष महत्त्व राख्दछन्‌ ।सन्धिको आधुनिक अध्ययन तथा वर्गीकरणका सन्दर्भमा सन्फोर्ड स्क्यान नामकबिद्वानृद्वारा सन्‌ १९७३ मा आएर वाजसनेयी प्रातिशाख्यमा अध्ययन गरिएका लोप,आगम, वर्णविकार र प्रकृतिभाव सन्धिलाई नै समर्थन गर्नुले पनि सन्धिकोसमसामयिक अध्ययनका दृष्टिले प्रातिशाख्य ग्रन्यहरूमा वाजसनेयी प्रातिशाख्यको&lt;br /&gt;
विशेष स्थान र महत्त्व रहेको देखिन्छ ।[निशान्त, २०५६, पूर्णाङ्क ८ : पू. २५-३१)&lt;br /&gt;
[छ |&lt;br /&gt;
झब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि, ७७&lt;br /&gt;
अध्याय - एघार]संस्कृत र नेपाली सन्धिको अध्ययन परम्परा&lt;br /&gt;
१. विषयप्रवेश&lt;br /&gt;
संस्कृत भाषा निकै पुरानो, आफैँमा समृद्ध र धेरै भाषाहरूको जननी हो भन्नैकुरामा आजका प्राय: सबै आपाविज्ञानीहरू सहमत भएका छन्‌ । वर्तमान समयमाप्रत्यक्ष रूपमा भन्दा अप्रत्यक्ष रूपमा संस्कृत भाषाबाट विकसित भएका नेपाली,हिन्दी, मैथिलीलगायतका आधुनिक आर्य भाषाहरूमा संस्कृत भाषाले प्राणसञ्चारगरिराखेको छ । कथ्य नेपालीभन्दा स्तरीय नेपाली भाषा दिनानुदिन संस्कृतमय बन्दैगइरहेको सन्दर्भमा संस्कृत र नेपाली व्याकरणका कतिपय पक्षहरूमा तुलनात्मकअध्ययन-अनुसन्धान हुनु आवश्यक देखिँदै आएको छ ।&lt;br /&gt;
शव्दनिर्माणप्रकियाका बारेमा संस्कृत व्याकरणको वा भाषाचिन्तनकोपरम्परामा मूलत: तीन मान्यताहरू देखा पर्छन्‌ । सबै शब्द मूल हुन्‌, पढाइ,गराइजस्ता शब्दहरू धातुबाट बने पनि नाम आदिमा वर्गपरिवर्तन भएको हो भन्नैमान्यता राखी गार्ग्यले अव्युत्पन्न पक्षको समर्थन गरेको देखिन्छ भने निरुक्तकारयास्कचाहिँ सबै शब्दहरू धातुद्वारा निर्मित हुन्छन्‌, मूल भन्ने शब्द नै हुँदैन भन्नेदृष्टिकोण प्रस्तुत गर्दै व्युत्पत्ति पक्षको समर्थन गर्न पुगेको पाइन्छ । त्यस्तैपाणिनिले केही शब्द मूल र केही शव्द व्युत्पन्न हुन्‌ भन्ने मान्यता राख्दै उपर्युक्तदुबै अतिवादी दृष्टिकोणलाई समन्त्रय गर्न पुगेको देखिन्छ । समन्वयवादी दृष्टिराखेर पनि उनले पूरै व्याकरणमा बढीजसो शब्दलाई धातुको कल्पनाद्वारा सिद्धगर्ने प्रयास गरे र अन्त्यमा केही अपवाद देखिएका शब्दलाई रूढ वा मूलको संज्ञादिए । उत्तरबर्ती संस्कृत व्याकरण र संस्कृतबाट विकसित नेपाली, हिन्दीलगायतकाधेरै भाषाहरूले पनि परम्परागत रूपमा प्रायःजसो यही समन्वयबादी दृष्टिकोणप्रस्तुत गर्दै आएका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
आधुनिक भाषाविज्ञानको शाखा रूपनिज्ञानले डाब्दनिर्माणका मुख्य दुईप्रक्रियाका रूपमा व्युत्पादन र रूपायनको चर्चा गरेको छ । व्युत्पादनले शब्दकोरचना गर्दछ भने रूपायनले शब्दका रूपहरूको निर्माण गर्दछ । शब्द वा घातुमाउपसर्ग, प्रत्यय, शब्द बा डब्लिएको शब्द जोड्ने प्रक्रियालाई व्युत्पादन भनिन्छ ।शब्दको व्युत्पादनमा अनुकरण, कर्तन, सङ्क्षेप, मिश्रण, प्रतिनामीकरण आदिपद्धति पनि देखा पर्दछन्‌ तापनि सर्ग वा व्युत्पत्ति, समास र ढ्रित्व नैशान्दन्युत्पादनका प्रमुख पद्धति मानिन्छन्‌ । धातुमा प्रत्यय वा उपसर्ग र प्रत्यय दुवैजोड्दा कुदन्त शव्दको रचना हुन्छ । उपसर्गलाई पूर्वसर्ग र प्रत्ययलाईपरसर्गको संज्ञा पनि दिइने हुँदा यी सर्गद्वारा कृदन्त र तद्वितान्त शब्दनिर्माण गर्नेप्रक्रियालाई सर्गपद्धति पनि भनिन्छ । शब्द वा शब्दहरू जोडेर शब्दरचना गर्ने&lt;br /&gt;
३ ४ रब्दनिर्माणप्रकया र सन्धि&lt;br /&gt;
प्रक्रियालाई समासपद्धति भनिन्छ र यसका दुई शब्दका बीच र दुई शब्दभन्दा बढीशब्दका बीच गरी दुई प्रकारका शाब्दरचनाप्रक्रिया छन्‌ । उही शब्द डन्ल्याउने र्‌डब्लिएका शब्दलाई जोडेर शब्दरचना गर्ने प्रक्रियालाई द्वित्वपद्बति भनिन्छ रयसका पूर्ण, आंशिक र आपरिवर्तित गरी तीन प्रकारका रचनाप्रक्रिया छन्‌ ।&lt;br /&gt;
नेपाली शब्दनिर्माणका सन्दर्भमा उपर्युक्त पद्धतिहरू पूर्ण रूपमा लागू हुन्छन्‌भने संस्कृत शब्दको रचनामा पनि प्राय: यिनै पद्धतिहरूको प्रयोग गर्न सकिन्छ ।उपर्युक्त व्युत्पादन र रूपायनपद्धतिद्वारा शब्दहरूको निर्माण गर्ने क्रममा नेपाली रसंस्कृत सन्धिहरूको उपयोग कसरी हुन्छ ?, शब्दनिर्माणमा उपयोग गरिनेसन्धिका ती विशिष्ट प्रक्रियाहरू केके हुन्‌ ? भन्ने बारेमा तुलनात्मक एवम्‌विश्लेषणात्मक अध्ययनको आवश्यकता देखिएको वर्तमान सन्दर्भमा प्रस्तुत लेखमाहालसम्मको संस्कृत र नेपाली सन्धिको अध्ययनपरम्परालाई कालक्रमिक रूपमासमीक्षात्मक सङ्क्षिप्त चर्चा गर्न खोजिएको छ ।&lt;br /&gt;
२. सन्धिको अध्ययन परम्परा&lt;br /&gt;
संस्कृतमा सन्धिको अध्ययत व्यवस्थित्त रूपमा भएको पाइन्छ भने नेपालीसन्धिको अध्ययन मौलिक एवम्‌ आगन्तुक शाब्दनिर्माणलाई आधार मानी संस्कृत रनेपाली दुवै पद्धतिमा विकसित हुन खोजेको देखिन्छ । यस क्रममा पस्तुत लेखएघार जना वैयाकरण लेखकका सन्धिअध्ययनहरूमा आधारित छ । तीमध्येकात्यायन, पतञ्जति, भट्टोजिदीक्षित र वरदराजाचार्यका अध्ययनहरू संस्कृतसन्धिसँग मात्र सम्वद्ध छन्‌ भने डा. देवीप्रसाद गौतम, डा. माधवप्रसाद पोखरेल रमतिप्रसाद ढकालका सन्धिअध्ययनहरू नेपाली सन्धिसँग मात्र सम्वद्ध छन्‌ । त्यस्तैकृष्णप्रसाद पराजुली, डा. हेमाङ्गराज अधिकारी, नरेन्द्र चापागाईं र प्रा. मोहनराजशर्माका सन्धिअध्ययवहरूले नेपाली र संस्कृत दुवै सन्धिलाई समेद्न खोजेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
२. १ संस्कृत सन्धिको अध्ययन परम्परा&lt;br /&gt;
कात्यायनको कुति &#039;बाजसनेयिप्रातिशाख्पम्‌&#039; (१९७५ इ.) मा सन्धिकोपर्यायका रूपमा उल्लेख गरिएको &#039;संस्कार&#039; शब्दले लोप, आगम, बर्णबिकार रप्रकृतिभादलाई जनाउँछ भन्ने कुरा उक्त ग्रन्थको भाष्यमा उवटले व्यक्त गरेकाछन्‌ । साथ्रै &#039;पदान्तपदाच्यो: सन्धि;&#039; कात्यायनसूजको भाष्यमा उवटले स्वरसन्धि,व्यञ्जनसन्धि, स्बरव्यञ्जनसन्धि र्‌ व्यञ्जनस्वरसन्धि गरी चार प्रकारका रूपमासमेत सन्धिको उल्लेख गरेका छन्‌ । कात्यायनद्वारा रचित &#039;वाजसनेयीप्रातिशाख्य&#039;अन्तर्गत तेस्रो अध्यायंका सम्पूर्ण सूत्र १५१ र चौंथो अध्यायका सम्पूर्णसूज १९५ मध्ये १६७ सूतसमेत जम्मा ३१८ सूत्रमा सन्धिको चर्चा गरिएको छ ।यसमध्ये १९ सूत्रले लोप, २२ सूत्रले आगम, १६५ सूत्रले बर्णविकार र बाँकी सुतेप्रकृतिभाव सन्धिको विद्यान गरेका छन्‌ । यस प्रातिशाख्यमा लोपसन्धिअन्तर्गत ,अ,&lt;br /&gt;
शब्दनिर्माणप्रक्तिया र सन्धि/ ७९&lt;br /&gt;
आ, इ, न्‌, नि, यु, व्‌. स्‌ आदि व्यञ्जनवर्णको आगम गर्ने सूत्रहरूआगमसन्धिअन्तर्गत क, च, द, र्‌, त्‌, श्‌, प्‌, स्‌ व्यञ्जनवर्णको आगम गर्नेसूत्रहरूको व्यवस्था गरिएको देखिन्छ । त्यस्तै वर्णविकार सन्धिको निषेध गरिएकानियम सूतहरूमा नै विशेषत: प्रकृतिभाव सन्धिको अध्यपन भएको पाइन्छ । यसप्रातिशाख्र्यमा चर्चा गरिएका लोप, आगम, वर्णबिकार र प्रकृतिभावमध्येचर्णयिकारसन्धिका नियमसूतहरू विस्तृत रूपमा पाइन्छन्‌ । वाजसनेयीप्रातिशाल्र्यमा अध्ययन गरिएका वर्णविकार सन्धिनियमहरूले वैदिक संस्कृतकाअतिरिक्त लौकिक संस्कृत वाङ्मयका साथै नेपाली भाषामा समेत विशेष महत्त्वराख्दछन्‌ । वाजसनेयी प्रातिशाख्यमा बर्णबिकार सन्धिअन्तर्गत वर्णन गरिएकाप्रक्रियाहरूमध्ये &#039;अन्तस्थीभाव&#039; सन्धिप्रक्रियाका अत्यधिक, स्वागत, जिस्क्याइ,ठूल्यामा, आवत, गवैया, धावन्ती आदि प्रयोगहरू नेपालीमा भेटिन्छन्‌ भनेअयादिभाव, एकीभाब, नति र पञ्चमवर्ण सन्धिप्रक्रियाको प्रयोग तत्सम नेपालीशव्दको निर्माणमा भएको भेटिन्छ । यसै प्रातिशाख्यमा अध्ययन गरिएका लोप,आगम, वर्णविकार प्रकृतिभाव सन्धिलाई सन्‌ १९७३ मा आएर आधुनिकभापाशास्वरी सानफोर्ड सेन (इश्ाणिप इलागाट) ले समर्थन गरी सन्धिकोवैज्ञानिक अध्ययन-विश्लेषणलाई प्रेरित गर्नुले वाजसनेयी प्रातिशाख्यमा गरिएकोसन्धिको अध्ययनले निशेष महत्त्व राख्दछ ।&lt;br /&gt;
पत्तञ्जलि (२०२४ : ०) ले व्याकरण पढ्नुका मुख्य प्रयौजनहरूको उल्लेखगर्ने सन्दर्भमा लोप, आगम र वर्णविकारलाई जान्नेले नै बेदको राम्रोसँग रक्षा गर्नसक्ने भएकाले व्याकरण पढ्नुपर्छ भन्ने ठहर गरेका छन्‌ । शब्दनिर्माणकासन्दर्भमा कुन शब्दमा कुन वर्णको अदर्शन बा लोप हुन्छ ?, कुन शब्दमा नयाँबर्ण थपिन्छ ? र कून शब्दअन्तर्गत कुन बर्णलाई हटाएर त्यसका ठाउँमा अर्कोबर्ण राखी परिवर्तन गरिन्छ ? भन्ने कुरा व्याकरण पढेका व्यक्तिले बाहेक अरूलेजान्न पनि सक्तैन । त्यसैले जुनसुकै भाषाको शवब्दव्युत्पादनमा लोप, आगम रवर्णविकारको भूमिका महत्त्वपूर्ण रहन्छु । पतञ्जलिले लोए, आगम रवर्णविकारलाई स्पष्ट शब्दमा सन्धि नभनेको भए पनि बस्तुतः यी सन्धिकासन्दर्भमा आउने प्रमुख तीन सन्धिप्रकियाहरू हुन्‌ र यिनकै आधारमा संस्कृत तथानेपाली सन्धिहरूको अध्ययन-विश्लेषण गर्दा शब्दरचनामा सरल तथा तुगमपद्धतिको विकात्त हुनसक्ने देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
भट्टोजि दीक्षित (इ. १९५६ : ५५-१७२) लै संस्कृतका १३१ सूजद्वारा अच्‌,प्रकृतिभाव, हल्‌, स्वादि र वित्तर्ग पाँच सन्धिहरूको चर्चा गरेका छन्‌ ।बरदराजाचार्य (इ. १९८१ : १०-४१) ले ११८ सूत्रद्वारा आफूना गुरु भट्दोजिदीक्षितको उपर्युक्त पञ्चसन्धिको चर्चालाई केही छोट्ट्याएका छन्‌ भने अर्कोअध्ययनमा (२०४० : २१-४२) उनले नै १०१ सूतद्वारा अच्‌, हल्‌ र विसर्ग तीनसन्धिको मात्र उल्लेख गरेका छन्‌ । वास्तवमा केही विशेपताहरूका कारण&lt;br /&gt;
८० « शन्दनिर्माणप्रक्तिया र सन्धि&lt;br /&gt;
प्रकृतिभाच तथा सुप्‌ प्रत्ययहरूको सन्धिजन्य परिवर्तनलाई अर्कै नाम दिएरसन्धिहरूको सङ्ख्या पाँच माने पनि संस्कृत व्याकरणमा सामान्यतः अच्‌, हल्‌एवम्‌ विसर्ग तीन सन्धिमात्र पाइन्छन्‌ र संस्कृत सन्धिको चर्चा गर्दा यिनै तीनप्रकारलाई नेपाली व्याकरणविद्हरूले पनि पछ्याएका छन्‌ । वस्तुतः लोप, आगमर वर्णविकारका दृष्टिले संस्कृत सन्धिको अध्ययन हालसम्म हुन नसकेकाले भट्टोजिदीक्षितको अध्ययन र बरदराजाचार्यका दुवै अध्ययनहरू संस्कृत सन्धिको समग्रअध्ययनलाई पूर्णता दिन असमर्थ नै छन्‌ । जसका कारण संस्कृतमूलका नेपालीशब्दमा सन्धिको अध्ययन-अध्यापन जटिल बन्दै गएको छ ।&lt;br /&gt;
२.२ नेपाली सन्धिको अध्ययन परम्परा&lt;br /&gt;
पराजुली (२०४२ : ४२, ५७-९२) ले उपसर्ग, प्रत्यय, समास ह्वित्वप्रक्रियार सन्धि तथा आगमलाई व्युत्पन्न नेपाली शब्दनिर्माण गर्ने किसिमका रूपमाउल्लेख गरेका छन्‌ । शब्दनिर्माणका क्रममा सन्धिको पनि भूमिका रहने कुराकोउल्लेख गर्दै उनले नेपाली शब्दमा संस्कृतका स्वरसन्धि, व्यञ्जनसन्धि रविश्र्गसन्धिका नियमहरू लागू भएको देखाउँदै नेपाली स्वरसन्धि र व्यन्जनसन्धिमापनि लोप, आगम आदि भएको देखाएका छन्‌ । उनले सन्धिका विषयमा गरेकोचर्चा अत्यन्त छोटो छ, नेपाली शब्दमा सन्धि कम हुने नताउनुका साथै सन्धि रआगमलाई पनि भिन्न छूपमा उल्लेख गर्न खोजिएको छ । वास्तवमा सन्धि,शब्दनिर्माण गर्ने छुटै किसिम नभएर उपसर्ग, प्रत्यय, समास र ठित्वप्रक्रियामालागू हुने अनिवार्य तत्त्व हो । नेपाली शब्दमा सन्धि भएका प्रशस्त उदाहरणहरूपाइन्छन्‌ । साथै आगम पनि सन्धिभन्दा पृथक्‌ नभै सन्धिकै एउटा भेद वा विशिष्टप्रक्रिया हो ।&lt;br /&gt;
अधिकारी (२०४९ : १८७-१५९, १९५-२०१, २१८, रेरे३-२२४, २४२-२४७) ले शब्दव्युत्पादनका सन्दर्भमा तत्सम (संस्कृत) र नेपाली सन्धिहरूको चर्चागरेका छन्‌ । संस्कृत उपसर्ग लगाई शब्दनिर्माण गर्दा केही स्वरसन्धि तथाव्यञ्जनसन्धिको चर्चा गर्दै छ, स्‌ आगम पनि हुने कुराको उल्लेख गरिएको छ भनेकृत्‌ प्रत्ययद्वारा व्युत्पन्तन शवब्दनिर्माणका सन्दर्भमा वर्गपरिवर्तनजनित,स्वरपरिवर्तनजनित, प्रत्ययजनित र सन्धिजनित परिवर्तनहरू देखाइएका छन्‌ ।त्यस्तै तद्ितप्रक्रियामा आदिवृद्धि र गुणका उदाहरणहरू प्रस्तुत गर्दै आगमलाई पनिसन्धिजनित परिवर्तवभित्र राखिएको छ । यसै गरी नेपाली कृत्‌ प्रत्यय लागेपछिआधारपद र प्रत्ययका खास सन्दर्भले आ अमा र उ वूमा परिणत हुने, ब्‌, य्‌आगम हुनै तथा &#039;उ&#039; लोप हुनेजस्ता सन्धिजनित परिवर्तन देखापर्ने कुराकोसोदाहरण उल्लेख गरेका छन्‌ । तद्धितप्रक्रियामा स्वर र व्यञ्जनका साथै लोप,आगम, आदेशजस्ता सन्धिजनित परिवर्तन देखाएका छन्‌ । समासप्रक्रियामा लोप,आगम, आदेश र सन्धिका साथै क्रमपरिवर्तन पनि हुने कुराको उल्लेख गरिएको&lt;br /&gt;
शञग्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ ८१&lt;br /&gt;
छ । ढ्वित्वप्रकियामा स्वरव्यन्जनादिमा परिबर्तन र लोप एवम्‌ आगम पनि भएकाशब्दहरू प्रस्तुत गरिएका छन्‌ । शाब्दनिर्माणप्रक्रियाका क्रममै तत्सम (संस्कृत) र्‌नेपाली वर्णवैज्ञानिक सन्धिहरूको विस्तृत चर्चा गर्ने प्रयास अधिकारीले गरेकाछन्‌ । तर यो प्रयास अपूर्ण र सड्केतात्मक मात्र छ । कस्तो अवस्थामा केकसरीसन्धि हुन्छ र त्यसका अपवादहरू केकति छन्‌ ?. भन्ने वारेमा उनको दृष्टि पुग्नसकेको देखिन्न । साथै उनले समासमा हुनै क्रमपरिवर्तनलाई लोप, आगम रसन्धिका साथै क्रमपरिवर्ततका रूपमा देखाउन खोजेका छन्‌ । बास्तबमा लोप,आगम, आदेश र क्रमपरिवर्तन सन्धिका प्रकार वा विशिष्ट प्रक्रिया हुन्‌, भिन्नरूप होइनन्‌ ।&lt;br /&gt;
चापागाईं (२०४१ : २८-३८) ले सन्धिप्रक्रियालाई संस्कृत सन्धि र्‌ नेपालीसन्धिका रूपमा भिन्नाभिन्नै चिनाउने प्रयास गरेका छन्‌ । उनले संस्कृतमा दुईस्वतन्त्र एकाइ हुने खालका रूप वा शब्दका बीचमा बढी मात्रामा सन्धि भई प्रायःअक्षर प्रभावित हुन्छ भन्दै दुवैका बीचमा भिन्नता देखाएका छन्‌ । संस्कृतमा मूलतःतीन किसिमका सन्धि पाइन्छन्‌ भन्दै उनले स्वरसन्धिअन्तर्गत दीर्घ, गुण, बृद्धि,यण्‌ र अयादि सन्धिको चर्चा गरेका छन्‌ भने व्यञ्जनसन्धिअन्तर्गत सत्र रविसर्गसन्धिअन्तर्गत दशओटा सन्धिप्रक्रियाको उल्लेख गरेका छन्‌ । संस्कृतसन्धिको अध्ययनमा चापागाईंको प्रारम्भिक दृष्टिमात्र छ, वैज्ञानिक विश्लेषण हुनसकेको छैन ।&lt;br /&gt;
चापागाईं (२०५१) ले नेपाली सब्धिप्रकियामा आफूतै किसिमका विशेषताहरूरहेको बताउँदै नेपालीमा रूपसन्धि, सामासिक सन्धि, बाह्सन्धि र आन्तरिकसन्धि रहेको पनि उल्लेख गरेका छन्‌ । रूपरूप वा प्रकृति र प्रत्ययका बीच हुनेसन्धिप्रक्रियालाई रूपसन्धिप्रक्रिया भनिन्छ भन्दै उनले यसका आठमओोटाविशेषताहरू देखाएका छन्‌ । त्यस्तै शब्दशव्दका बीचमा हुने सन्धिलाई सामासिकसन्धिको संज्ञा दिँदै उनले यसका दशओटा विशेषताहरूको चर्चा गरेका छन्‌ ।प्रकृति र प्रत्ययको संयोग हुँदा प्रायशः प्रकृतिमा हुनै निकारलाई आन्तरिक सन्धिर वाम्यमा रहेका अघिल्ला र पछिल्ला पदका प्रभावमा विकार आउने प्रक्रियालाईबाह्यसन्धि भनेका छन्‌ । नेपालीमा बाह्यसन्धि नियमित नभई स्वचालितरूपमा देखापर्ने नताउँदै उनले वक्तामा निर्भर रहने बाह्यसन्धिमा आउने विकारलेख्य रूपमा नेपाली भापामा स्वीकार्य नरहेको धारणा प्रस्तुत गरैका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
चापागाईं (२०५१) ले नेपाली सन्धिका प्रकारमा लोप, आदेश, आगम रसन्निकर्षलाई लिएका छन्‌ । रूपरूपको वा शव्दशब्दको संयोग हुँदा कुनै वर्ण बाअक्षरको लोप हुने प्रक्रियाका रूपमा लोपसन्धिलाई परिभाषित गर्दै उनले &#039;उ&#039; र&#039;ओ&#039; लोप अएका उदाहरणहरू प्रस्तुत गरेका छन्‌ । त्यस्तै आदेशसन्धिलाई एकबर्ण बा अक्षरलाई हटाई अर्को बर्ण वा अक्षर रहने सन्धिप्रक्रियाका छूपमा&lt;br /&gt;
५२ ४ शन्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
परिभाषित गरी &#039;इ, उ, हु र जा&#039; का ठाउँमा क्रमश: &#039;ए, ओ, भ र ग&#039; आदेशगरेका उदाहरणहरू पेप्त गरेका छन्‌ । कुनै वर्ण वा अक्षरलाई नहटाइकन आफैंकनै वर्ण वा अक्षर थपिने प्रक्रियालाई आगमसन्धि भनी उनले यसअन्तर्गत &#039;य्‌, व्‌&#039;जस्ता वर्णको आग्म भएको देखाएका छन्‌ । नजिकनजिक रहेका वर्ण वा अक्षरमाकुनै विकार नआइकन हुने सन्धिलाई उनले सन्निकर्ष सन्धि भनेका छन्‌ । यसभित्र“फुपूसासू, दालभात&amp;quot; जस्ता उदाहरणहरू समावेश गरेका छन्‌ । यसका अतिरिक्त&#039;घिउन्ध्यू, जीउञ्ज्यू&#039; जस्ता उदाहरणहरू प्रस्तुत गर्दै उनले द्विस्वरान्त मुक्तखूपहरूको सन्धि भएको पाइनु पनि नेपाली भाषाको मौलिक विशेषता हो भन्नेठहर गरेका छन्‌ । साथै उनले नेपालीमा केकति र केकस्ता सन्धिहरू छन्‌ अथवासन्धिका दृष्टिले नेपाली भाषाको राम्रो अध्ययन हुन अझै बाँकी रहेको निष्कर्ष पनिप्रस्तुत गरेका छन्‌ । चापागाईको यसै निषप्कर्षले उनको सन्धिविषयक अध्ययनअधूरो रहेको र त्यसको अध्ययन-अनुसन्धान हुनुपर्ने दिशातर्फ प्रेरित गर्दछ ।&lt;br /&gt;
शर्मा (२०५४ : ५९-६७) ले शब्दरचनाका सबै प्रक्रिपाहरूमा सन्धिकोप्रयोग गरिने कुराको उल्लेख गर्दै नेपालीमा सन्धि भन्नाले प्राय: संस्कृतसन्धिबुझिए पनि &#039;मर्जीअनुसार, रीतिअनुसार&#039; जस्ता शब्दमा संस्कृत सन्धिको नियमलागू नहुने हुँदा नेपाली र संस्कृत सन्धिमा अन्तर रहेको देखाएका छन्‌ । सन्धिमुख्यत: सामान्य र बिशिष्ट गरी दुई प्रकारको हुन्छ भन्दै उनले कुनै ध्वनिविकारनभई &#039;देखान, चरुवा&#039; जस्ता शब्दमा हुने सन्धिलाई सामान्य सन्धि र ध्वनिविकारभएर सन्धि हुने &#039;आवत, ढकनी&#039; जस्ता शब्दलाई विशिष्ट सन्धिको उदाहरणकारूपमा पेस गरेका छन्‌ । शब्दसीमाका आधारमा एउटा शब्दभित्र हुने&#039;बहिनी--बैनी, जुबाई:-ज्वाईं&#039; शब्दलाई आन्तरिक सन्धि र दुई शब्दमा हुने&#039;गाउनऐया -्गवैया, ढाँद्नउवा तढँटुवा&#039; शब्दलाई बाह्ट्यसन्धिको संज्ञा दिँदै उनलेनेपाली सन्धिका पच्चीसओटा नियमहरूको उल्लेख गरेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
शर्मा (२०५४) लै पनि नेपालीमा प्रयोग हुने तत्सम शब्दको निर्माणमासंस्कृतका स्वर, व्यञ्जन र विसर्ग गरी तीन प्रकारका सन्धिनियमहरू नै लागू हुनेवताएका छन्‌ । उनले सन्धिका क्रममा शब्दको कुनै ध्वनि लोप हुने (लोप), कुनैनयाँ ध्वनि आउने (आगम) र कुनै ध्वनिको सद्दा अर्को ध्वनि बपिनुलाई (आदेश)सन्धिका बिशिष्ट प्रक्रियाको संज्ञा दिएका छन्‌ तर यी विशिष्ट प्रकियाहरूकाआधारमा नेपाली शब्दको बिश्लेषणचाहिँ उनको अध्ययनले गरेको छैन ।&lt;br /&gt;
शर्मा (२०५४) ले प्रस्तुत गरेका नेपाली सन्धिका पच्चीसओटानियमहरूमध्ये नियम एक र दुइमा दिइएका &#039;खुल्क्याइ, जिस्म्याहा, झुक्क्याइ,आवत र धाबन्ती&#039;मा संस्कृतको प्रचलित पाणिनीय व्याकरणअन्तर्यत यण्‌ सन्धिगर्ने &#039;इको यणचि&#039; (अ. ६१।७७) सूत्रको नियम लागू हुन्छ । &#039;क्र्म्योनी, कज्याइँ,गदैया र गँवैया&#039;मा उक्त सूत्रको नियमका साथै शर्माको आर-अ गर्ने नियम&lt;br /&gt;
ज्ञब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि प्उ&lt;br /&gt;
चौधसमेत लागु हुने देखिन्छ । शर्माले नियम दुईमा प्रस्तुत गरेका &#039;जाउ--अतव्जावत, खाउ-ऐया च्खवैया&#039; मा क्रमशः जा र खा धातुदेखि &#039;ब्‌&#039; आगमगर्नुपर्नेमा आउ धातुको साहचर्यमा जाउ, खाउ धातुको कल्पना गरी &#039;उ&#039;का ठाउँमा“व्‌&#039; आदेश गरेर &#039;जावत, खवैया&#039; सिद्ध गर्ने प्रयास गरिएको पाइन्छ । त्यस्तै नियमसोह, अठार, तेइस र पच्चीसअनुसार सन्धि हुँदा कुनै ध्वनिमा विकार नहुनेभएकाले सामान्य सन्धिका छपमा एउटै नियममा समाबेश गर्न सकिन्छ भने“आ&#039;को ठाउँमा &#039;अ&#039; आदेश गर्ने नियम सत्र र चौवीतलाई नियम चौधअन्तर्गतराख्न सकिन्छ । यसप्रसार शर्माले प्रस्तुत गरेका नेपाली सन्धिनियमहरूको सङ्ख्यासत्रमात्र हुन आउँछ र यी नियमहरू भाषावैज्ञानिक रूपमा प्रस्तुत गर्न खोजिए पनिनेपाली शाब्दनिर्माणका सबै पक्षलाई पूर्णतया समेट्न नसक्ने भएकाले अपूर्ण रव्याख्याविश्लेषणको अभावमा सङ्केतात्मकमात्र हुन गएका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
गौतम (२०५४ : १०९-११९) ले ध्वनिहरूलाई सन्तिकर्षका साथ प्रस्तुतगर्दा ध्वनिहरूमा देखापर्ने लोप, आगम, परिवर्तन आदि प्रक्रियाहरूलाई संस्कृतपरम्परामा सन्धि स्वीकारिएको र संस्कृतको यो सन्धि मोर्फोफोनोलोजी वारूपध्वनिका तुलनामा &#039;जङ्चर&#039;को नजिक देखिन्छ भन्दै नेपाली सन्धिव्यवस्थाकोआधारभूत रूपमा अध्ययन हुन बाँकी नै रहेको ठहर गरेका छन्‌ । साथै उनलैभाषाशास्त्री बल्लभमणि दाहालको विद्यावारिधि शोधप्रबन्ध ।इ. १९७४) मानेपालीको रूपरचनाका क्रममा आउने सन्धिव्यवस्थालाई प्रस्तुत गरिएको सूचितगरेका छन्‌ भने नेपाली वर्णव्यवस्था र सन्धिको शिक्षण&#039; (२०४९) विषयकआफूनै अध्ययनमा नेपाली सन्धिव्यवस्थाका शैक्षणिक विशिष्ट क्षेत्रमाथि प्रकाशपारिएको जनाएका छन्‌ । नेपाली सन्धिव्यवस्थाको विश्लेषण गर्ने संरचनात्मक,अर्थतात्विक, कोटिगत, प्रभावगत वा क्षेत्रगत र संयोजनगत पाँच आधार प्रस्तुतगर्दै उनले संयोजनगत आधारमा देखापर्ने लोप, आगम, आदेश र प्रकृतिभाव वासन्तिकर्ष सन्धिको विश्लेषणका सन्दर्भमा एघारओटा नेपाली सन्धिसूत्रहरूकोउल्लेख गरेका छन्‌ । त्यस्तै शैक्षणिक सन्दर्भमा नेपाली सन्धिव्यवस्थाका पाँचओटाबुँदाहरू देखाई नेपाली सन्धिका उल्लेखनीय विशेषताका रूपमा आठओटा बुँदामानिष्कर्षसमेत प्रस्तुत गरिएको छ ।&lt;br /&gt;
गौतम (२०५४) ले नेपाली सन्धिको संरचनात्मक आधारमा व्युत्पादननिप्ठ र्‌समासनिष्ठ दुई भेद देखाउँदै संस्कृत सन्धिव्यवस्थामा भन्दा नेपाली सन्धिव्यवस्थामापाइने केही मौलिक विशेषताहरूको उल्लेख गरेका छन्‌ । अर्थतात्विक दृष्टिमाएउटै हुनसक्ने संरचनात्मक एकाइका बीचमा मात्र सन्धि हुन्छ, स्वतन्त्रएकाइका वीच छ भनी सन्धिविश्लेषणको अर्थतास्बिक आधार उल्लेख गरिएपनि यो आधार त्यति प्रभावकारी देखिँदैन । सर्वनाम, सङ्ख्या, सामान्य भूत रपूर्णपक्षजस्ता व्याकरणात्मक कोटिमा मात्र लागू हुने सन्धिनियमलाई कोटिगतआधारमा देखाइको छ र यस आधारमैं मात्र पनि समग्र नेपाली सन्धिको पूर्णविश्लेषण सम्भव देखिँदैन । सन्धि हुँदा वर्ण वा अक्षर कुन प्रभावित हुन्छ ?&lt;br /&gt;
२५४ ८ शब्दनिमाँणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
त्यसलाई उनले प्रभावगत बा क्षेत्रगत आधारको संज्ञा दिएका छन्‌ । संस्कृतमाप्रभावको क्षेत्र वर्ण भएकालाई मात्र सन्धि मानिन्छ भने नेपालीमा सन्धिकोप्रभानक्षेत्र अक्षर देखिन्छ भन्दै उनले संस्कृतमा प्रयुक्त सन्धि शब्दले &#039;गम्‌नतिन्गति&#039; जस्ता शव्दमा भएको ध्वनिपरिवर्तनलाई नबुझाउने र शव्दनिर्माणभित्र नैयस प्रकारको ध्वनिपरिवर्तनलाई देखाएर सन्धिभित्र समावेश नगर्ने संस्कृतपरम्पराले सन्धि शब्दलाई बिशिष्ट सन्दर्भमा अर्थ्याएको बताएका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
गौतम (२०५४) ले संयोजनगत आधारमा नेपालीका सन्धिलाई लोपसन्धि,आयमसन्धि, आदेशसन्धि, प्रकृतिभाबसन्धि भनी चार प्रकारमा वर्गीकरण गरेकाछुन्‌ र यो बर्गीकरणले कात्यायन ।इ. १९७५) को वर्गीकरणसँग समानताराख्दछ । यस आधारअन्तर्गत उनले तेह्र सूत्र सङ्ख्याको उल्लेख गरे पनि छैटौं रनवौं सूतरसङ्ख्या नपाइएकाले उनको अध्ययनमा जम्मा एघारओटा सन्धिसूत्रहरूपाइन्छन्‌ । आदेशसन्धिसँग सूतसङ्ख्या १, २, २ र ४ सम्बद्ध छन्‌ । सूत१मा&#039;आन, आनी, अनी, आउ, आइ, आर, आली, उवा, औट, औटो, औटी, औती,अक्कड, अन्ते, आलु, आहा, इलो, ऐया, आइ, आइ र इङ्गर&#039; समैत एक्काइसस्बरादि प्रत्यपको योग हुँदा आकारान्त एकाक्षरी मूलको स्वर अकारान्तमापरिवर्तित हुने कुरा सोदाहरण प्रस्तुत गरेका छन्‌ । त्यस्तै सूज २ मा एकाक्षरीउकारान्त मूल रूपपछि &#039;इ, उ, ए, ओ&#039; आएमा मूलको उ ओमा परिवर्तित हुन्छभन्दै यसका &#039;रोड, रोए, रोउ, रोएँ, रोओ, हो&#039; जस्ता उदाहरणहरू उल्लेख गरिएकोछ । एकाक्षरी उकारान्त मूल रूपपछि नै स्वरादि कृदन्त क्रियाविशेषण आएमामूलको उ औमा परिणत हुन्छ भनेर सूत्र ३ लाई अर्थ्याई “रोएर, धोएर, छोएर,धोएको, छोएको&#039; उदाहरणहरू प्रस्तुत गरिएको छ । सूत्र ४ मा आउ मूलका पछिस्वरादि अन्य अक्षर आएमा आउ अवूमा परिवर्तित हुन्छ भनी &#039;गदैया र लवैया&#039;दुईमात्र उदाहरण दिइएको छ । पाँचौं सूत्र सन्निकर्ष सन्धिसँग सम्बन्धित छ रयसमा आग्‌, माग्‌, चाख्‌, हाँक्‌ आदि उदाहरण प्रस्तुत गरेर सव्यञ्जन आकारान्तएकाक्षरी मूलसित व्यञ्जनविहीन अ, आ, इ, उ, ओ आदिको योग हुँदासन्निकर्षमात्र हुने, ध्वनिपरिवर्तनचाहिँ नहुने भनेर सन्तिकर्ष सूतलाई अर्थ्याइएकोछ । लोपसन्धिअन्तर्गत सातौं, आठौँ र नवौँ तीन सूत सम्बद्ध रहेका छन्‌ । सातौँसूतमा ई, एर, एको प्रत्ययसित संयोग हुँदा संयुक्त व्यञ्जनपछि आएको अकारकोलोप हुन्छ भनी &#039;चम्केर, लम्की, गम्केको&#039; जस्ता उदाहरण देखाइएको छ ।“उकालो, ओरालो&#039; दुईमात्र उदाहरण प्रस्तुत गरी आखैँ सूत्रलाई द्विस्वरात्मक संयुक्तव्यञ्जनका रूपमा आएको &#039;ल्‌&#039;को लोप हुन्छ भनी अर्थ्याइएको छ । दसौँ सूत्रमाआउ अन्त्यक मूलपछि ई, एको स्बरादि प्रत्यपको योग भएमा मूलको &#039;उ&#039;को लोपहुनै कुरा बताई “पाई, धाई, लाई, पाएको, घाएको, लाएको&#039; उदाहरणहरू उल्लेखगरिएको छ । एघारौँ, बाह्रौँ र तेद्ठौँ तीन सूज आगमसन्धिसँग सम्बद्ध रहेका छन्‌ ।स्वरान्त मूलपछि दो, दै, दा रूपको योग भएमा अनुनासिकता (“) को आगम हुन्छआनी एघारौं सूत्रलाई अर्ध्याएर &#039;जाँदो, आउँदा, कहँदै, रहँदै, गाउँदो&#039; जस्ता&lt;br /&gt;
शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ ५५&lt;br /&gt;
उदाहरणहरू पेस गरिएको छ । बाह्रौं सूत्रमा एकाक्षरी धातुपछि छ रूपको योगहुँदा &#039;न्‌&#039; को आगम हुन्छ भनी &#039;जान्छ, खान्छ, कहन्छ, रुन्छ, दिन्छ&#039; उदाहरणदिइएको छ । यसै गरी अन्तिम तथा तेह्रौं सूजलाई आउ अन्त्यमा हुने धातुपछि छआएमा अनुनासिकताको आगम हुन्छ भनी अर्थ्याएर &#039;गाउँछ, सुताउँछ, पाउँछ&#039;जस्ता उदाहरण प्रस्तुत गरिएको छ।&lt;br /&gt;
यस प्रकार गौतमको अध्ययन (२०५४) ले आदेश सन्धिअन्तर्गत &#039;आ, उरआउ&#039;का ठाउँमा कंमश: &#039;अ, ओ र अच्‌&#039; आदेश भएको, लोप सन्धिअन्तर्गत &#039;अ, ल्‌र उ&#039;को लोप भएको, आगम सन्धिअन्तर्गत न्‌ र्‌ अनुनासिकता (&amp;quot;) को आगमभएको बारेमा वर्णन गरेको छ भने सन्निकर्ष सन्धिअन्तर्गव सामान्यऔपचारिकतामात्र प्रदर्शन गरेको देखिन्छ । उनको यो अध्ययन कृदन्त शब्द रक्रियाको रूपायनमा मात्र सीमित छ, तब्धितान्त र समस्त शब्दका साथै सुबन्तशब्दको रूपायनतर्फ अग्रसर छैन । कुदन्त र क्रियाको रूपायनकोसन्धिविश्लेषणमा पनि यो अध्ययन अपूर्ण नै छ तापनि यस अध्ययनले नेपालीसन्धिलाई व्युत्पादननिष्ठ र समासनिष्ठ दुई वर्यभित्रै लोप, आगम, आदेश रसन्निकर्ष सन्धिको चर्चा गर्नु बढी वैज्ञानिक हुने ठहन्याएको छ । नियमभन्दाउदाहरणतर्फ विशेष जोड दिन निर्देश गरेको छ । नेपाली शन्दका एकैसंरचनात्मक एकाइका बीचमा मात्र प्रायः सन्धि हुनु, समासनिष्ठ सन्धिकातुलनामा व्युत्पादननिष्ठ सन्धि बढी अनियमित रहनु, बाह्यसन्धिभन्दा आन्तरिकसन्धिमात्र हुनु, लोपसन्धि र आगमसन्धि कम देखिए पनि आदेशसन्धि रप्रकृतिभावसन्धिको स्थिति निकै उर्वर रहनु, नेपाली सन्धि अक्षरात्मक रपरिवेशमूलक रहनुजस्ता नेपाली सन्धिका विशेषताहरू प्रस्तुत गरिएका छन्‌ । साथैअध्ययनको अन्तमा उनले नेपाली धातु र कृतृप्रत्ययको सूची तयार गरी तिनकोयोग हुँदा देखिने ध्वनिपरिवर्तनका अवस्थाको व्यवस्थित अध्ययनसहित तद्धितान्त रबमस्त शाव्दको रचनाप्रक्रियाको समग्र अध्ययनविना नेपाली सन्धिनियम निर्णायकहुन नसके भएकाले नमुनाका रूपमा आफूनो अध्ययनमा प्रस्तुत गरिएकासन्धिनियमहरूमा संशोधन र परिष्कारको आवश्यकता दर्साएका छन्‌ । त्यसैलेउनको अध्ययनलाई नेपाली सन्धिको व्यबस्थित अध्ययनतर्फको अपूर्ण यात्रा मान्नसकिन्छ ।&lt;br /&gt;
पौखरैल (२०५७ : १०-११, १३५-१६५) ले ध्वनिविज्ञानको ऐतिहासिकविकासकमअन्तर्गत संस्कृत ध्वनितत्व (ध्वनिविज्ञान) को चर्चा गर्ने सन्दर्भमासंस्कृत सन्धिको पनि चर्चा गरेका छन्‌ भने नेपाली सन्धिका नियमहरू प्रस्तुत गर्नेसन्दर्भमा नेपाली ध्वनिवैज्ञानिक सन्धिका नियमहरूको सुक्ष्म विश्लेषण गरेकाछन्‌ । उनले क्रग्बेदप्रातिशाख्यमा &#039;सिँ सबर्ण दीर्घ:&#039;, &#039;आद्‌ गुण:&#039;, &#039;इको यणचि&#039;जस्ता सन्धिसूत्रहरूको उल्लेख भएको पाइनुले पाणितिलाई पनि सूत्रहरू बनाउनेप्रेरणा प्रातिशाख्यले दिएको पाइन्छ भनेका छन्‌ । उक्त प्रातिशाख्यमै कुनै स्वर वा&lt;br /&gt;
८ ८ शब्दनिर्माणप्रत्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
व्यञ्जनमा विकार नआउने सन्धिलाई &#039;अबशङ्गाम&#039; र आगम हुने सन्धिलाई&#039;अन्त:पातसंज्चा&#039; सन्धिको नाम दिइएको उल्लेख गर्दै उनलै चाजसनेयी र तैत्तिरीयप्रातिशाघ्यमा समेत ढ्वित्बलाई क्रम र द्विवर्ण भनिएको कुरा उल्लेख गोेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
नेपाली ध्वनिवैज्ञानिक सन्धिका नियमहरूको चर्चा गर्ने सन्दर्भमा पोखरेल(२०५७ : १३५-१६५) ले वर्ण र संवर्णका रूपमा सन्धिका मुख्य दुई प्रकारकोउल्लेख गर्दै बर्णसन्धिलाई वर्णबैज्ञानिक र संवर्ण सन्धिलाई ध्वनिवैज्ञानिक सन्धिकोसंज्ञा दिएका छन्‌ । त्यतै गरी उनले एउटा शाब्द वा रूपिमभित्र पाइने वर्णहरूकोनियम र व्यवस्थाका रूपमा आन्तरिक सन्धिलाई र दुई शाब्द बा रूपिम जोडिँदावर्णका उच्चारणमा हुने भेदका रूपमा बाह्यसन्धिलाई परिभाषित गरेका छन्‌ ।उनले प्रस्तुत गरेका नियमहरू मूलत: संवर्णसन्धि र्‌ बाह्यसन्धिसँग सम्बद्ध छन्‌भने वर्णसन्धि र आन्तरिक सन्धिसँग उनका सन्धिनियमहरू प्राय: असम्बद्ध छन्‌ ।उनले उल्लेख गरेअनुसार सन्धिका लोप, आगम, वर्णविकार, प्रकृतिभाव र्‌अनुलौम गरी पाँच प्रकार वा प्रक्रियाहरू छन्‌ । सन्धिका यी पाँच प्रकार वाप्रकियाहरूको छोटो चिनारी प्रस्तुत गरी स्वरसन्धि र व्यज्जनसन्धिअन्तर्गत नैयिनको विस्तृत चर्चा गरिएको छ । साथै उनले संस्कृत र नेपाली सन्धिमा फरकख्नुट्ट्याउने सन्द्रर्भमा संस्कृतमा झैं नेपालीमा सवर्णदीर्घ र गुण नहुनु, पाँचप्रकारको स्वरसंयोग पाइनुले बृद्धि पत्ति नहुनु, स्वरमध्यगत &#039;ह&#039; ध्वनिको लोप हुनु,रेफको द्वित्व हुनु, पञ्चमवर्णको प्रयोग नहुनु, पदादिमा व्यन्जनसंयोग नपाइनुजस्तानेपाली सन्धिका विशेषताहरूको उल्लेख गरेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
नेपाली ध्वनिवैज्ञानिक सन्धिका नियमहरूको सृक्ष्म अध्ययन विश्लेषण गर्नेकाम सर्वप्रथम पोखरेल (२०५७) बाटै भएको हो र नेपाली सन्धिलाई संस्कृतसम्धिबाट अलग्याउने विशेपताहरूको तुलनात्मक चर्चा पनि शार्मा (२०५४) रगौतम [२०५४) पनि यिनले नै गरेका हुन्‌ । वस्तुतः यिनले वर्णवैज्ञातिक सन्धिलाईध्वनिवैज्ञानिक सन्धिनियमको एउटा बिशिष्ट अंशअन्तर्गत पर्ने भन्दै नेपालीसन्धिनियमको चर्चालाई दुब्वचाए पनि नेपाली भाषा जस्तो बोलिन्छ, त्यस्तै नलेखिनेभएको हुँदा नेपाली व्याकरणमा वर्णबैज्ञानिक सन्धिनिषमहरूको भूमिका नैमहत्त्वपूर्ण हुने भएकाले वर्णबैज्ञानिक सन्धिनियमहरूको अध्ययन विश्लेषणकोअभावलाई पोखरेलको उक्त अध्ययनले पूर्णता दिन सकेको देखिँदैन ।&lt;br /&gt;
ढकाल (२०५० क : ७५-५२) ले नेपाली सन्धिको परिचय दिने सन्दर्भमाबाजसनेयी प्रातिशाख्य (इ. १९७५) मा चर्चित, सनफोर्ड शैन (इ. १९७३) द्वारासमर्थित एवम चापागाईं (२०५१), गौतम (२०५४) र पोखरेल (२०५७) द्वाराविश्लेषित नेपाली सन्धिका लोप, आग्रम, वर्णविकार र प्रकृतिभाव चार प्रकारलाईतै सूत्रीकरण गरी प्रस्तुत गर्ने प्रयास गरेका छन्‌ । यसै सन्दर्भमा उनले प्रस्तुतगरेका अठारओटा सन्धिसूतका नियमहरू उपसर्ग, कृत्‌, तद्वित, समास, ढ्वित्व र&lt;br /&gt;
शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ ८७&lt;br /&gt;
क्रियाको रूपायनका क्रममा प्रयोग गरिन्छन्‌ भन्ने कुरा उल्लेख गरिएको छ । कृत्‌,तद्धित र द्वित्व प्रक्रियाद्वारा नेपाली शब्दको निर्माण गर्दा लोपसन्धिको प्रयोग गरिनेबताउँदै लोपसन्धिका नियमहरूलाई सूत्र १, २, ३ र ४ मा आवद्ध गरिएको छ।सूज १ मा तद्धित प्रत्ययको योग हुँदा प्रकृतिको अन्तमा रहेका &#039;अ, आ, ई र ओ&#039;स्वरवर्णको लोप हुन्छ भन्दै उदाहरणका रूपमा &amp;quot;गफाडी, पुर्ख्यौली, बक्यौता,खैरैनी&#039; जस्ता शब्दहरू उल्लेख गरिएको छ र्‌ यसले कृत्‌ प्रत्ययको पोग हुँदाअनेकाक्षरी धातुको अन्त्यमा रहेका &#039;उ, लन र्‌ आउ&#039; को लोप गर्दछ भनेभूतकालिक क्रियाको रूपायनमा उ र आउ अन्त्यक धातुको &#039;उ&#039; मात्रको लोप हुनेर ल अन्त्यक धातुका &#039;अ&#039; मात्रको लोप हुने कुरा उल्लेख गर्दै &#039;चुहाबट, उकालो,विसौना, दुहेर, पढायो, उक्ल्यो&#039; जस्ता उदाहरणहरू पेस गरिएको छ। सूत३ र ४मा आंशिक तथा आपरिवर्तित द्वित्व भई सन्धि हुँदा ओ, ओ स्वरसहितकाव्यञ्जनवर्णको तथा द्वित्व भएका अघिल्ला शब्दको ब्यज्जनबर्णको मात्र लोप गर्नेकुरा उल्लेख गरी &#039;तात्तातो, आआफूनो, आनीवाची&#039; जस्ता शब्दलाई उदाहरणकारूपमा प्रस्तुत गरिएको छ ।&lt;br /&gt;
ढकाल (२०१५ क) कै अध्ययनले कृत्‌ प्रत्यय, आंशिक ठ्रित्व र क्रियाकोरूपायनका सन्दर्भमा आगमसन्धिको प्रयोग हुने क्रा बताउँदै सूत्र ५, ६र७माआगमसन्धिका नियमहरूको चर्चा गरेको छ । सूत्र ५ मा स्वरादि कृत्‌ प्रत्ययकोयोग हुँदा आ वा उ अन्त्यक एकाक्षरी धातुदेखि &#039;व्‌&#039; आगम हुने कुरा उल्लेख गर्दै&amp;quot;जावत, रुबाइ&#039; जस्ता उदाहरण देखाइएको छ । क्रियाको रूपायन गर्दा छबाथवर्ण पछाडि भएमा अ, आ, इ, उ अन्त्यक धातुदेखि न्‌ आगम हुन्छ भनी छैटौंसुत्रलाई अर्थ्याएर &#039;निस्कन्छ, जान्थ्यौं, खिइन्छन्‌, रुन्यै&#039; जस्ता उदाहरणहरू उल्लेखगरिएको छ । सूत्र ७ मा आंशिक ढ्रित्व हुँदा आंशिक द्रवित्व भएका वर्णपछि &#039;र&#039;आगम हुन्छ भन्दै &#039;घर्घडेरी, मर्मसला, सर्सल्लाह&#039; जस्ता शब्दलाई उदाहरणमाराखिएको छ।&lt;br /&gt;
ढकाल (२०५५ क) को अध्ययनमा नेपाली शब्दनिर्माणका कृत्‌, तद्वित,समास र द्वित्व सबै प्रक्रियामा आदेशसन्धिको प्रयोग यरिने कुरा बताउँदैआदेशसन्धिअन्तर्गत सूत्र ५ देखि १७ सम्मका दश सूत्रहरू उल्लेख गरिएको छ ।सूत्र 5 लै कूत्‌, तद्धित र समासप्रकियामा प्रकृतिको आदिमा रहेका &#039;आ&#039;को ठाउँमा&#039;अ&#039; आदेश गर्दछ भन्दै &#039;छनौट, हँसिलो, हतकडी&#039; जस्ता शब्दहरू उदाहरणकारूपमा प्रस्तुत गरिएका छन्‌ । तद्धित प्रत्ययको योग हुँदा प्रकूतिमा रहेको दीर्घ &#039;ई,क&#039;का ठाउँमा क्रमश: हृस्व &#039;इ, उ&#039; आदेश गर्ने कुरा सूत्र ९ मा उल्लेख गर्दै&#039;तितीरा, नुनिलो&#039; जस्ता शब्दलाई उदाहरणमा राखिएको छ । सूत्र १० मा सर्चनामशब्दमा तद्धित प्रत्यपको योग हुँदा र कर्मघारय वा बहुद्वीहि समासमा प्रकृति वाअघिल्लो शब्दका अन्तमा रहेको &#039;ओ&#039; का ठाउँमा &#039;अ&#039; आदेश हुने कुरा वताउँदैप्योनता च्यता, नीलो कमल च्वीलकमल, ठाड्ो--कान स्ठाडकाने&#039; जस्ता&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
३३ ४ शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
जाब्दलाई उदाहरणका रूपमा प्रस्तुत गरिएको त । सूत्र ११ मा थ, छ, दा, दो,दैप्रत्यय पछ्चाडि भएमा उ अन्त्यक धातुको रछूपायनमा &#039;उ&#039;का ठाउँमा &#039;उँ&#039; आदेशहुन्छ भनी &#039;गाउँथे, पढाउँछु, हुँदा, पिउँदो, रँदै&#039; जस्ता शब्द उदाहरणका रूपमाउल्लेख गरिएको छ । वस्तुतः सूत्र ११ को नियम आदेश नभएर आगमसन्धिअन्तर्गत नै हुनुपर्ने हो । हु र जा घातुको भूतकालिक क्रियाको रूपायनमाकमश; भ र ग आदेश हुन्छ भनी सूत्र १२ लाई अर्थ्याएर यसअन्तर्गत भयो, गयो&#039;जस्ता उदाहरण दिइएको छ । स्वरादि कृत्‌ प्रत्ययको योग हुँदा इ, उ अन्त्यकधातुका &#039;इ, उ&#039; का ठाउँमा क्रमश: &#039;यू, न्‌&#039; आदेश हुने कुरा सूत्र १३ मा उल्लेखगर्दै &#039;पछ्यौरा, गवैया&#039; जस्ता उदाहरण दिइएको छ । सूत्र १४ मा पूर्वकालिक वाभूतकालिक क्रिया र आदेश तथा सम्भावना भविष्यत्‌ कालका क्रियाको रूुपायनपर्दा एकाक्षरी उ अन्त्यक धातुको “उ&#039;का ठाउँमा &#039;ओ&#039; आदेश हुने बताउँदै &#039;रोएर,धोए, फोएस्‌, होला&#039; जस्ता उदाहरण प्रस्तुत गरिएको छ । सूत १५ मा आपरिवर्तितद्वित्वका सन्दर्भमा पछिल्लो शब्दको आदिमा व्यञ्जनवर्ण भए त्यसका ठाउँमा &#039;स्‌&#039;आदेश हुन्छ भनी &#039;आतसात, घामसाम, पानीसानी&#039; जस्ता शब्दलाई उदाहरणकारूपमा राखिएको छ । सूत्र १६ मा आपरिवर्तित ढ्वित्व हुँदा अघिल्लो शब्दकोआदिमा रहेको जुनसुकै स्वर पछिल्लो शब्दको आदिमा पुग्दा &#039;आ&#039; अथवा &#039;उ&#039;मापरिणत हुन्छ भन्दै &#039;गोदगाद, भुटभाट, ठोकठाक, झारभुर, फाटफुट, चाटचुट,गाइँगुइँ&#039; जस्ता शब्दहरूलाई उदाहरणका रूपमा प्रस्तुत गरिएको छ । सूत्र १७ माद्वित्ब र व्यतिहार बहुब्रीहि समासमा अघिल्लो शब्दको अन्तिम &#039;अ&#039;का ठाउँमा &#039;आ&#039;आदेश गर्ने कुरा उल्लेख गरी &#039;दनादन, मालामाल, भनाभन, हानाहान&#039; जस्ता शब्दउदाहरणमा दिइएका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
ढकाल (२०५५ क) को अध्ययनमा प्रस्तुत गरिएको अठारौँ सन्धिसूत्रप्रकृतिभाव सन्धिसँगर सम्बद्ध छ र यसमा लोप, आगम, वर्णविकार सन्धिका नियमर तिनका केही अपवादलाई छाडेर अन्यत्र प्राय: प्रकृतिभाव हुने कुरा उल्लेखगरिएको छ । प्रकृतिभाव सन्धिसूजको उक्त नियम उपसर्ग, कृत्‌, तद्वित, समास र्‌द्वित्वद्वारा नेपाली शब्दनिर्माण गर्दा लागू हुने वताउँदै &#039;बदनाम, भिडन्त, गाउँले,कालोअक्षर, जाँदाजाँदा&#039; जस्ता शब्दलाई उदाहरणका रूपमा लिद्दएको छ ।वास्तवमा उनको यस अध्ययनले नेपाली वर्णवैज्ञानिक सन्धिलाई व्यवस्थित एवम्‌सूत्रीकरणको सम्भावना देखाएको छ, नेपाली शब्दनिर्माणका सबै प्रक्रियालाईसमेट्न खोजिएको छ र सन्धिसूतहरूमा अपवादहरूसमैत उल्लेख गरिएको छतापनि संस्कृत (तत्सम) सन्धिको चर्चा नगर्नु, उदाहरणमा दिइएका सबैशब्दहरूको प्रकृति-प्रत्यय विश्लेषण नगरिनु, प्रस्तावित सन्धिसूञका नियममाप्रशस्त अपवाद देखा पर्नसक्ने सम्भावना रहनु आदिले गर्दा नेपाली सन्धिको समग्रअध्ययनलाई प्रस्तुत गर्न उक्त अध्ययन पनि समर्थ देखिँदैन । साथै ढकाल (२०५७:१९-२२) ले नेपाली व्याकरणमा सन्धिविच्छेदका सात आधारहरू र नेपालीसन्धिका नौओटा प्रमुख विशेषताहरूको अध्ययन (२०५८ ख : ३७-४०) प्रस्तुत&lt;br /&gt;
शग्दनिर्माणप्रक्ररिया र सन्धि/ ०९&lt;br /&gt;
गरे पनि नेपाली सन्धिव्यवश्वाको अध्ययनले पूर्णता नपाइसकेका सन्दर्भमा उनकायी आधार र विशेषताहरूले संशोधन र परिष्कारको अपेक्षा राख्नसक्ने प्रचूरसम्भावना देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
३. उपसंहार&lt;br /&gt;
संस्कृत सन्धिमा कात्यायन (इ. १९७५) को अध्ययन पूर्णवैज्ञानिक देखिन्छतर पतञ्जलि (२०२४) ले सन्धिलाई प्रकारान्तरले लोप, आगम र वर्णविकारकारूपमा उल्लेख गरे पनि तिनको छुट्टै विस्तृत चर्चा गरेको देखिँदैन भनेभट्टोजिदीक्षित (इ. १९८६) र वरदराजाचार्य (इ. १९५१, वि.सं. २०४०) ले पाँचसन्धिको छुट्टै चर्चा गरे पनि पञ्चसन्धिमा समेटिएका सूतहरूले मात्र संस्कृतसन्धिको अध्ययनलाई पूर्णता दिन सकेको पाइँदैन । पराजुली (२०४२), चापागाईं(२०५१) र शर्मा (२०५४) द्वारा नेपालीमा गरिएको संस्कृत (तत्सम) सन्धिकोचर्चा पनि वरदराजाचार्य (२०४०) को अध्ययनमा आधारित छ, यिनीहरूबाटसमेत संस्कृत सन्धिको अध्ययनमा कूनै मौलिकता थपिन सकेको देखिँदैन । जसकाकारण सरलतापूर्वक तत्सम नेपाली शब्दको व्युत्पादन गर्न सकिएको छैन ।अधिकारी (२०४९) को संस्कृत सन्धि अध्ययनमा सङ्घकेतात्मक रूपमाभाषावैज्ञानिक केही मौलिक चिन्तन पाइए पनि यसबाट समेत संस्कृत सन्धिकोअध्ययनले पूर्णता पाएको छैन । यसरी शव्दव्युत्पादन र शाब्दरूपायनमा लागू हुनेसम्पूर्ण संस्कृत सन्धिको छुट्टै विशेष चर्चा हालसम्मको संस्कृत र नेपालीविद्वानूहरूको अध्ययनमा नभएको पाइएकाले लोप, आगस, बर्णविकार, बर्णव्यत्ययर प्रकृतिभावका दृष्टिले संस्कृत सन्धिको नवीन अध्ययत-विश्लेषण गरिनुपर्नेआबश्यकता देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
पोखरेल (२०५७) द्वारा गरिएको नेपाली ध्वनिवैज्ञानिक सन्धिहरूकोअध्ययनले व्यवस्थित रूप प्राप्त गरे पनि नेपाली वर्णवैज्ञानिक सन्धिहरूकोअध्ययन भने व्यवस्थित हुन बाँकी नै छ । अधिकारी (२०४९), चापागाईं (२०५१),शर्मा (२०५४), गौतम (२०५४) र ढकाल (२०१५% क) बाट विगतमा भएकानेपाली वर्णवैज्ञानिक सन्धिअध्ययत्तका प्रारम्भिक प्रयासहरू पनि आफैँमा अधुरा,अपूर्ण र अस्पष्ट भएकाले पुनः यिनको समग्गन रूपमा अध्ययन-अनुसन्धान ₹परीक्षण गरिनु आवश्यक छ । साथै वर्णवैज्ञानिक नेपाली सन्धिको नवीनबिश्लेषणात्मक गहन अध्ययनले पूर्णता नपाएसम्म नेपाली शव्दव्युत्पादन रशाब्दरूपापनका क्षेत्रमा देखिएका जटिलताहरूले निकास पाउनसक्नै सम्भावना पनिदेखिँदैन ।&lt;br /&gt;
(गरिमा, २०६२, पुर्णाइक-२७५ : पू. १०९-१२१)[|&lt;br /&gt;
९० / शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
पाणिनीय व्याकरणकालोप, आगम र वर्णविकार सन्धिको अध्ययन&lt;br /&gt;
१. विषयप्रवेश&lt;br /&gt;
संस्कृत व्याकरणको परम्परामा महर्षि पाणिनि अद्वितीय वैयाकरण मानिन्छन्‌र उनले सूत्ररूपमा प्रवर्तन गरेको व्याकरण अष्टाध्यायीका नामले चिनिन्छ । त्यसव्याकरणका उक्त, अनुक्त र वुरुक्त पक्षहरूका बारेमा गम्भीर अध्ययन गरेरकात्यायनले सहायक नियमहरूको प्रवर्तन गरै, जसलाई वार्तिकनियम भनिन्छ ।पाणिनि र कात्यायन दुवैले प्रवर्तन गरेका नियमहरूको पतञ्जलिले अत्यन्त सरलभाषा र सरल शैलीमा व्याख्या एवम्‌ विश्लेषण गरे, जसलाई महाभाष्य भनिन्छ ।त्यसैले संस्कृत व्याकरणको परम्परामा पाणिनिद्वारा प्रवर्तित, कात्यायनद्वारासंशोधित र पतन्जलिद्ारा परिष्कृत व्याकरणको समग्रतालाई नै पाणिवीयव्याकरण मान्ने गरिएको हो । अपवादनियमलाई साथमै लिएर सामान्यनियमकाआधारमा लोकमा प्रचलित शब्दहरूको निर्माणप्रक्रियाको बोध गराउनु व्याकरणकोकाम हो, त्यसैले वैयाकरणलाई शाब्दिक पनि भन्ने गरिन्छ । शब्दकोनिर्माणप्रकरियाका क्रममा कहीँ विद्यमान कुनै वर्णको लोप हुन्छ, कतै विद्यमानवर्णलाई असर नगरीकन कुनै नयाँ वर्णको उपस्थिति हुन्छ र कहीं विद्यमान कुनैवर्ण नै हटेर त्यसका ठाउँमा अर्कै वर्णको परिवर्तन हुन्छ । त्यसैले जुनसुकैभाषाका शब्दहरूको निर्माणप्रक्रियामा लौप, आगम र वर्णविकारको आवश्यकतादेखिएको हो । भाष्यकार पतञ्जलिले महाभाष्यको प्रारम्भमैँ व्याकरण किनपढ्नुपर्छ ? भन्नै प्रयोजनको चर्चा गर्ने प्रसङ्गमा लोप, आगम र वर्णविकारकोप्रक्रिया जान्ने व्यक्तिले नै वेदको रक्षा गर्नसक्छ भनेका छन्‌ । लोप, आगम र्‌वर्णविकारको ज्ञानपूर्वक संस्कृत भाषामा निबद्ध वेदको रक्षा गर्नसक्ने व्यक्तिलेलौकिक संस्कृत भाषाका साथै व्यस्त भाषाबाट विकसित नेपाली, हिन्दी, मैथिली,भोजपुरी आदि आधुनिक आर्यभाषाहरूको पनि संरक्षण र सम्बर्द्धन गर्ने सम्भवदेखिन्छ । यही उद्देश्यले नेपाल संस्कृत विश्वविद्यालयबाट २०६७ असौजमा नोआगस र वर्णविकारका दप्टिले पाधिवीय व्याकरणका वियय र प्रयोगको सयीक्षणशीर्षकमा बिद्याबारिधिस्तरीय अनुसन्धान सम्पन्न गरिएको छ । प्रातिशाख्य,शिक्षाग्रन्य र आधुनिक भाषाशास्त्री सनफोर्ड स्क्यानले समेत लोप, आगम र्‌वर्णविकारलाई सन्धिप्रक्रियाका रूपमा स्वीकार गरेको हुँदा यस अनुसन्धानलाईसाणिवीय व्याकरणको तन्धिवैज्ञानिक अध्ययन पनि भन्न सकिन्छ । यस आलेखमात्यही अनुसन्धानको सङ्क्षिप्त परिचय र नेपाली भाषामा त्यसले पुग्याउने आंशिकयोगदानका बारेमा सङ्झैपमा प्रकाश पारिएको छ ।&lt;br /&gt;
शन्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ ९१&lt;br /&gt;
२. अनुसन्धानको परिचय&lt;br /&gt;
लोए्‌ आयम र वर्णविकारका दुष्टिले पागिवीय व्याकरणका वियम रप्रयोगको तमीक्षप शीर्षकको शोधप्रबन्ध छ परिच्छेदमा विभक्त छ । पाणिनीयव्याकरणमा प्रचलित प्रमुख मान्यत्ताका आधारमा लोप, आगम र वर्णविकारकोसैद्धान्तिक रूपरेखा निर्माण गरी त्यसकै आधारमा व्याकरणमहाआष्ए काशिकाबत्तिर बैयाकरणतिद्वाताकौमुबीमा पाइने परिवर्तनमूलक प्रत्ययलौप, पदलोप,प्रातिपदिकलोप, अनेकवर्णबिकार, द्वित्ब र पुंवदूआवबाहेकका वर्णलोप, अक्षरलोप,बर्णागम, अक्षरागम एवम्‌ एकवर्णविकारका नियम र प्रयोगहरूको समीक्षात्मकअध्ययनमा मात्र प्रस्तुत शोधकार्य सीमित रहेको छ । शोधप्रबन्धका प्रारम्भिक रअन्तिम दुई परिच्छेदलाई औपचारिक परिच्छेद मानिएको छ । त्यसमध्ये गह्निलोपरिच्छेदमा विभिन्न उपशीर्षकहरूका माध्यमले शोधप्रबन्धको परिचय दिइएको छभने उपतहार शीर्षकको अन्तिम वा छैटौं परिच्छेदमा शोधप्रबन्धको दोखेपरिच्छेब्देखि पाँकौ परिच्छ्नेद्सम्मको सारांशसहित अन्तमा समग्र शोधनिष्कर्षप्रस्तुत गरिएको छ।&lt;br /&gt;
२.१ ऐतिहासिक र सैद्धान्तिक पृष्ठभूमि&lt;br /&gt;
शोधप्रबन्धको दोसो परिच्छैदमा अति सङ्क्षिप्त रूपमा संस्कृत व्याकरणकोऐतिहासिक पृष्ठभूमि, पाणिनीय व्याकरणको संरचनात्मक स्वरूप एवम्‌ लोप,आगम र वर्णविकारको सैद्धान्तिक रूपरेखाको उल्लेख गरिएको छ ।पाणिनिपूर्ववर्ती काशकृत्स; आपिशल् आदि व्याकरण र अम्प्रातिशाब्य, तैत्तिरीयप्रातिशाख्य वाजतनेवी प्रातिशाब्य आदि प्रातिशाख्यको प्रभाव पाणिनीयव्याकरणमा परेको पाइन्छ । पाणिनिपछिका कातन्त्र व्याकरण र चान्त्रव्याकरणका केही नियमहरूको प्रभाव पनि पाणिनीय व्याकरणका काशिकावि,अक्षियाक्षौसुदी आदि ग्रन्थहरूमा परैको भेटिन्छ । पाणिनीय व्याकरणका सूतैतरनियमहरूका बारेमा मतैम्य नदेखिए पनि महाशाव् र काशिकावृत्तिलाई नै क्रमशःप्रथम प्रमाण र द्वितीय प्रमाण मानी तिनको समाधान गर्न सकिन्छ । लोप, आगमर वर्णविकारका प्रक्रियाहरू पारमार्थिक दृष्टिले काल्पनिक मानिए पनि व्यावहारिकदृष्टिले शव्दशास्त्रमा तिनको आवश्यकता देखिन्छ । विद्यमानको अभावरूपमा लोपभावरूप परिवर्तनका रूपमा वर्णबिकार र त्यसदेखि भिन्न प्रकियाका रूपमाआग्मलाई ग्रहण गरिन्छ । षष्ठी विभक्तिद्वारा स्थानी र आग्रमीको निर्देश गर्नु तथासप्तमी विभक्तिद्वारा उत्तरपरिवेशको र पञ्चमी विभक्तिद्वारा पूर्वपरिवेशको च्चोतनगर्नु पाणिनीय व्याकरणका लोप, आगम र वर्णविकारसम्बन्धी नियमहरूको मुख्यविशेषता मानिन्छ । लोप, आगम र वर्णविकारको सर्वप्रथम बर्गीकरण यास्ककृतविलुक्तबाट प्रारम्भ भएको हो भने त्यसलाई पाणिनीय व्याकरणले परिवरद्धनसहितविस्तृत तुल्याएको र आधुनिक भापाविज्ञानले समेत तिनै प्रकारहरूलाई अग्रतरगराएको पाइन्छ । प्रातिशाख्य र शिक्षाग्रन्थहरूमा सन्धिका प्रमुख प्रकारका रूपमा&lt;br /&gt;
१२ ४ शब्दनिर्माणप्रक्िया र सन्धि&lt;br /&gt;
ग्रहण गरिएको हुँदा लोप, आगम र वर्णविकारका सबै प्रक्रियाहरूलाईशन्धिएकियाका रूपमा ग्रहण गर्न सकिन्छ ।&lt;br /&gt;
२.२ पाणिनीय व्याकरणमा लोपसन्धि&lt;br /&gt;
&#039;शोधप्रबन्धको पाणिवीय व्याकरणका लोपवियम र फ्योगको चमीक्षणशीर्षकको तेस्रो परिच्छेदमा बर्णलोप र अक्षरलोपमा प्रवृत्त हुने पाणिनीयव्याकरणका लोपसन्धिसँग सम्बद्ध १३४ सूजनियम र ५६ सूजेतर नियमहरू एवम्‌तिनका प्रतिनिधिमूलक प्रमुख उदाहरणहरूको समीक्षात्मक अध्यपत प्रस्तुतगरिएको छ । पाणिनीय व्याकरणमा निम्नानुसारको स्वरवर्णलोप, व्यज्जनवर्णलोप,अयोगवबाहलोप र अक्षरलोपको&lt;br /&gt;
उपधा अन्तत्तोप [ जष | [कर ।लोप केस्वर ज्ञर । इत्साक सै वर्ण एवम्‌ | | डवर्णलोप आ अनित्तसक अ.आ,ड.__1ईउ,करमोब्यञ्जन | इत्सजक कवर, ज्‌, पू. | इत्संज्ञक सबै वर्ण एवम्‌ घात्वन्त तपबर्णालोप | चवर्ग, टवर्ग, त्‌, र र्‌ | अतित्संजञक क, ड्‌, छ, सबै ररश्र पृ एवम्‌ ज्‌, द्‌, द, ण्‌ त्‌, द्‌, न्‌, वर्ण 0अतिस्तंजक पुमवुरवुपूरल्‌तपाषुरतअपोगव । ।। | | वितर्जनीय ।;] | | | |लोष | _ छदृत्सज्ञक नि, दुर ज्‌ गवागट्तबृति । ।डु एवम्‌ अनित्तंज्ञक डु अत जत अप इत्‌द्‌, ष, न, शा. त, र, ज, डटडक्‌र कनब, स, मि, दि.मु. च, इद0 ॥&lt;br /&gt;
धातु, प्रातिपदिक, प्रत्यय एवम्‌ पदमा प्रवृत्त हुने वर्णलोपका नियमहरूलेइत्संज्ञाका रूपमा सबै स्वरवर्ण र व्यञ्जनबर्णको, आदिशेषका रूपमा सबैव्यञ्जनवर्णको ठथा इत्संज्ञाभिन्त र आदिशेषभिन्तन रूपमा ए आइड्ईजकजकर जो स्वरबर्णको तथा छदा गवद्धद्‌ र गु ठू रर त्‌ व्यज्जनवर्णकोएवम्‌ अयोगवाही वित्वर्ग (:) को लोप हुन्छ भने (टि ववर्ण र संयोग संज्ञाकोउपयोरा गरिएका पाणितीय व्याकरणका लौपनियमहरू अन्य वर्णको लोपमा समेतपवृत्त हुनत्तक्छन्‌ । विशेषत: घातु र्‌ प्रातिपदिकमा एवम्‌ अंशतः प्रत्ययमा प्रवृत्तहुनै अक्षरलोपका निपमहरूका आधारमा इत्संज्ञक नि; टु र डु घात्वाद्यक्षरकोएवम्‌ इर्‌ धात्वन्ताक्षरको तथा अनित्संज्ञक च र इदू प्रातिपदिकाद्यक्षरको, सप्रत्ययाद्यक्षरको; द एन शत द्‌ जब छ मि दि यु आदि अभ्यासभूतधात्वाद्यक्षरकको एबम्‌ गएतयदलाव अत्‌ अतू अए इतुइपर वन्‌प्रातिपदिकान्ताक्षरको लोप हुन्छ भने अभ्यात्त र टि संज्ञाको उपयोग गरिएकापाणिनीय व्याकरणका लोपनियमहरू अन्य धात्वाद्वक्षरको र अन्यप्रातिपदिकान्ताक्षरको लोपमा समेत प्रवुत्त हुनसके देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
शन्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ ९३&lt;br /&gt;
२.३ पाणिनीय व्याकरणमा आगमसन्धि&lt;br /&gt;
&#039;शोधप्रबन्धको पागिनीय व्याकरणका आगमवियस र प्रयोगको ससीक्षणशीर्षकको चौंथो परिच्छेदमा वर्णागम र अक्षरागममा प्रवृत्त हुने पाणिनीयव्याकरणका आगमसन्धिसँग सम्बद्ध २२९ सूत्रनियम र ६० सूजैतर नियमहरू एवम्‌तिनका प्रतिनिधिमूलक प्रमुख उदाहरणहरूको समीक्षातमक अध्ययन प्रस्तुतगरिएको छ । पाणिनीय व्याकरणमा निम्नानुसारका वर्णागम र अक्षरागसको प्रवृत्तिपाइन्छु :&lt;br /&gt;
आदि आगम । अन्त आगन | उपान्त आगम | । अट्‌, आाद्‌, इद, ईट्‌, शक, इत्‌, कक क रक: शो जग्‌, माम दमउद, उद, ऐरऔै रउम्‌ (भएगु डुईज ड्रग)कार द,&lt;br /&gt;
व्यञ्जनागम | हुद, गुट, वृट, वट्‌, कुक, जुकु टुक्‌, तुक बुक, दुक, जिम पुग, गुन्रघुद, नुद्‌ गद, युद, हक्‌/नुम, पुक, मुक्‌/मुभ, युक [रस्‌ छिषस्‌&lt;br /&gt;
ष्ट्‌ र सुट पिक, तुक, चुक, पुक्‌ र सक्‌शमुक्‌ | तया द्‌“ १,&lt;br /&gt;
डिग्किदयटकिजटदडुडनुपमुकु&lt;br /&gt;
गुकुट्तघा त्‌: एए्‌ क्‌ शतया स्‌: 1२)&lt;br /&gt;
१०&lt;br /&gt;
अयोौगवाहागमअक्षरागम&lt;br /&gt;
। २ | अनुस्बार ( ) | क्रयाद, पिद, तमद्‌, |प्रत्पपबत्‌ अम्‌, असुक्‌ अदुक्‌ |.यासुट, सीयुट्‌ र |आनुक्‌, आफुक, इथुक, नीक्‌, यक, णस्याद्‌ ।या; दि तम |रिके. रीक विक र तियुक्‌याहु सीय्‌ र तया . | /बग्‌ अतः अडु आनु आए इयु$४ न यररि टी बितया विय्‌ : १२&lt;br /&gt;
पाणिनीय व्याकरणको वर्णसमाम्तायमा पढिएका स्बरवर्णहरूमध्ये क्रवर्ण,लुकार, एकार र ओकारको तथा व्यञ्जनवर्णहरूमध्ये खकार, गकार, घकार,चकार, छकार, झकार, कार, ठकार, डकार, ढकार, फकार, वकार, भकार,शकार र्‌ हकारको आगम पाणिनीय व्याकरणमा प्रवृत्त भएको देखिँदैन । .वर्णात्मक, अयोगवाहात्मक र अक्षरात्मक दृष्टिले पाणिनीय व्याकरणमा आठप्रकारको स्वरारास; अठार प॒कारको व्यञ्जनागम, एउटा अयोगबाहागम र अठारप्रकारको अक्षरागम गरी जम्मा पैतालीस प्रकारका उपर्युक्त आगमहरू मात्र प्रवृत्तहुन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
२.४ पाणितीय व्याकरणमा वर्णाविकारसन्धि&lt;br /&gt;
शोधप्रबन्धको पाथिवीय व्याकरणका वर्णविक्ारतियम र प्रयोगको ससरीक्षणशीर्षकको पाँचौं परिच्द्रेदमा स्वरवर्णविकार, व्यञ्जनवर्णविकार रअयौगवाहविकारमा प्रवृत्त हुने पाणिनीय व्याकरणका वर्णविकारसन्धिसँग सम्बद्धबफ सूजनियम र्‌ १७१ सूत्रेतर नियमहरू एवम्‌ तदन्तर्गतका प्रमुखउदाहरणहरूको समीक्षात्मक अध्ययन गरिएको छ । पाणिनीय व्याकरणमा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१४ ८ शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
निम्तानुतारका विकारी एकस्बरवर्ण, द्विस्वरवर्ण, व्यञ्जनवर्ण र अयोगवाहकास्थानमा निम्बानुसारको स्वरवर्णात्मक, व्यञ्जनवर्णात्मक, अयोगवाहात्मक,अक्षरात्मक र शाब्दात्मक विकार भएको पाइन्छ :&lt;br /&gt;
(क) एकस्वरवर्णको विकार&lt;br /&gt;
04 स्वरवर्णत्मक [जिलायालक। अक्षरात्मक | शब्दत्मकएकस्वरबर्ण। विकार विकार विकार विकारतिते अकार | अ, जा, दई, उ, क, क अय्‌, आन्‌ रइस्‌एरओअआ, औँ इ,ई,उ | हा ड्न्‌ इप इस्‌रनि  इनम्‌रणआआ,इईई उ, क अन्‌, अम्‌, आन्‌, | |एर हन्‌, इयु र ओमव््ि ईंकार |अआ,इउईएरट | पप | अय्‌, इन्‌, इय्‌ र नाछि प्‌अइ,उँ,क,त्र,ओो चर्‌ उ्व्‌ तनए्औअउ,ओर औं ब्‌ व्‌ 0७, क्रकार  अजा,इईकझर द्‌ अक, अन्‌, आत्‌, र, | अररअरा१ रिएवम्‌रीजि: अबाबउरब। र्‌ 1 1 - छ१, सुकार कक (जकार सम्भव ल्ल्‌ (अन्‌ सम्भव तर नपर अनपद्यक्त)१० एकार आ,दुइरए ०११. ओकार आ,उरओ न१२. ऐकार आरद्‌ हन१३. औठ ट 1 बन हा&lt;br /&gt;
पाणिनीय व्याकरणमा उपर्युक्त तेह्र प्रकारका एकस्वरवर्णका स्थानमा चारप्रकारका सानुनासिक स्वरवर्णको,; बाह्र प्रकारका निरनुनासिक स्वरवर्णको; पाँचप्रकारका व्यञ्जनवर्णको; पन्ध प्रकारका अक्षरको तथा सात प्रकारका शब्दको गरीजम्मा त्रिचालीस प्रकारको विकार भएको पाइन्छ ।&lt;br /&gt;
(ख) द्विस्वरवर्णाको विकार&lt;br /&gt;
वाड विकारी टि ।। विकृत एकस्वरवर्णी |१. अकार -अ/आ/ब/ई/उ/क/ज/जू/ल्‌/ए/ओो/हे/जी अ.आ,इए मो, ऐेरओऔ(अर्‌ आसु आएर आए&lt;br /&gt;
२. आकारपञअ/आ/इ/ई/उ/क/ बक /ए/ओ/ऐे। आ, उ,ए,ओ, हेरदजर्‌ र आरु)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
झब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ ९५&lt;br /&gt;
३. इकार &amp;quot;अ/आ.//३/ई,/ उ /ए/:&lt;br /&gt;
६. ककार प्अ/उ/क1७, क्रकार नअ/ड/क7स. बहकार 1अ&lt;br /&gt;
कन (उ/उल्‌ सम्भव तर&lt;br /&gt;
1०. एकारक११. ओकार 1अ आरओ&lt;br /&gt;
पाणिनीय व्याकरणमा गण--ईश आाफोश जस्ता प्रयोगहरूको पूर्वान्तमा ऐकारर औकारबाहेकका जप क्त एघार प्रकारका विकारी स्वरवर्णको उपस्थितिरहनसक्ने र परादिमा सबै तेह्र प्रकारका विकारी स्वरवर्णको उपस्थिति हुनसक्नेहुँदा पूर्वान्त-पराद्य दुवै स्वरवर्णका स्थानमा तेहै प्रकारका स्वरवर्णको विकारसम्भव देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
(गा) व्यञ्जनवर्णको विकार&lt;br /&gt;
वेकारी | स्वरात्मक [ ब्यञ्जनात्मक [ अय्योगवाहात्मक [ अक्षरात्मक [ शब्दात्मकविकार विकार &#039;बिकार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
९६ ४ शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
नकार  आ | ङ्‌न्‌, छ त्‌ त्‌, | अनुस्वार ()त क 000प॒कार - र्‌ब्‌ छि फकार । - प्‌ टुवकार २ | पुमूर न&lt;br /&gt;
म्‌भकार क 040 जै । -_ ।मकार अरआ छन्‌म्‌,युँ बु | अनुस्वार।)&amp;amp; व्‌ र्‌ रस्‌गकार क इ | पुरबू&lt;br /&gt;
रकार्‌ उरका वितर्जनीय ।:]&lt;br /&gt;
र्‌ यु, र्‌ एटलकार ख् राजा |वकार अ.उ,कर | उगर | 1_ओशकार त्य वि जिका रप र ओ। - | २ ।घकार ड कछ दर्‌ न अन्‌ | |एवम्‌ स्‌&lt;br /&gt;
|| ककल | अएरऔ हुबूदन्‌ र्‌ । बन अन्‌ र अस्‌ -भा. प्रस्‌ ।हकार | ७ | घ्‌, फक द, व्‌ हा । | कप्रम क्ययस प्रकार पाणिनीय व्याकरणमा ङकार र जकारबाहेकका एकतीस प्रकारकाव्यन्जनवर्णका स्थानमा आठ प्रकारका स्वरवर्णको; तेत्तीसै प्रकारका व्यञ्जनवर्णको;&lt;br /&gt;
दुई प्रकारका अयोगवाहको; एउटा द्विवर्णको; आठ प्रकारका अक्षरको र एउटाशब्दको मात्र परिवर्तन भएको भेटिन्छ ।&lt;br /&gt;
(घ) अपौगवाहको विकार&lt;br /&gt;
॥ जार अपोगबाह [ ब्यञ्जनबणात्मिक  पनन्युनकम । अयोगचाहात्मक बिकार&lt;br /&gt;
१. (1) ब्‌ क पनत िललनकाबुलन ञ््‌, ग्‌, न र्‌ जोडि,&lt;br /&gt;
शर. ष्ि प्रस्‌ बितर्जनीय (:), जिह्वाभूलीय () र५ उपध्मानीय ( ) _&lt;br /&gt;
यस प्रकार पाणितीय व्याकरणमा दुई प्रकारका अयोगवाहको सानुनासिकआठ प्रकारका व्यञ्जनवर्णमा, निरनुनासिक दुई प्रकारका व्यञ्जनवर्णमा र तीनप्रकारका अयोगवाहमा मात्र परिवर्तन भएको देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
२.५ शोधकार्यको समग्र निष्कर्ष&lt;br /&gt;
वैयाकरण पाणिनिक्को उदय हुनुभन्दा पूर्वका गि व्याकरण र प्रातिशाख्यग्रन्थहरूमा शाब्दनिर्माण प्रक्रियासम्बन्धी नियमहरू प्रवर्तत भइसकेकाथिए । पाणिनिले अनुबन्धशैली र प्रत्याहारशैलीको अत्यश्चिक उपयोग गरी पूर्ववर्ती&lt;br /&gt;
शब्दनिर्माणप्रतर्रिया र सन्धि/ ९७&lt;br /&gt;
नियमहरूलाई र न्यूततापूरकका रूपमा नयाँ नियमहरुलाई समैत सूत्रबद्धगरिदिए भने कात्यायन र पतन्जलिले थप नियमहरू समावेश गर्दै पाणिनिकैयोगदानलाई सबल र समृद्ध छूपमा अग्रसर गराए । पाणिनीय व्याकरणपरम्पराकानियमहरूलाई आधार बनाएर कातन्त्र, चान्द्र आदि उत्तरवर्ती प्रक्रियाक्रममाआधारित व्याकरणहरू देखिए पनि पाणिनीय व्याकरणको सर्वोपरि महत्ता रव्यापकताका सामु तिनीहरू एकाङ्की र अपूर्ण ठहरिए । पाणिनीयव्याकरणपरम्परामा रुपावतारपछि थालिएको प्रक्रियाकमलेबैयाकरणबिद्वान्तकौसुबीमा आएर उत्कर्षता प्राप्त गरे पनि अष्टाध्यायीक्रम उपेक्षितभएकाले पाणिनीय व्याकरणका केही सूजनियम र अधिकांश सूतेतर नियमहरूकोसंरचनात्मक स्वरूपमा एकरूपता कायम हुन सकेको देखिँदैन भने नियमले अपेक्षागरेका सबै प्रकारका प्रयोगहरू पनि प्रक्रियाक्रमका ग्रन्थहरूमा समावेश हुनसकेका छैनन्‌ । अष्टाध्यायीक्रममा आधारित काशिकादुत्तिमा नियमापेक्षी अधिकांशप्रयोगहरू उपलब्ध भए पनि प्रत्याहार र वर्गमा आश्चित नियमका सबै प्रयोगहरूउपलब्ध हुन नसक्नु पाणिनीय सूत्नियमहरूको सीमा हो । पाणिवीय व्याकरणमालोप, आगम र वर्णविकारसँग सम्बद्ध १०३४ सूतनियम र २८७ सूत्रेतर नियमहरूगरी जम्मा १३२१ नियमहरू पाइन्छन्‌ र पाणिनीय व्याकरणकोशब्दनिर्माणप्रक्रियामा लोपनियमभन्दा आगमनियम, आगमनियमभन्दावर्णविकारनियमहरूको प्रवृत्ति बढी देखिन्छ । पाणिनीय व्याकरणमा अक्षरागमकासाथै एकवर्णका स्थानमा द्विवर्णविकृति, अक्षरविकृति र शब्दविकृतिसमेत भएकोपाइए पनि त्यस प्रकारका आगम र वर्णविकारका प्रक्रियाहरू प्रकृतिलाघव,प्रत्पपलाघब र प्रक्रियान्तरलाधवका कारण प्रवृत्त भएको हुँदा तिनलाईवर्णबैज्ञानिक आगम र वर्णबैज्ञानिक परिवर्तव मान्न नसकिए पनि अधिकांशएकवर्णात्मक आगम र एकवर्णात्मक परिवर्तनमा बर्णवैज्ञानिकता पाइन्छ ।परम्परागत रूपमा सन्धिप्रकरणमा पढिएका नियम र प्रयोगहरूलाई मात्र सन्धिमासीमित नगरी एकवर्णात्मक लोप, एकवर्णात्मक आगम र एकवर्णात्मक विकारकासबै नियम र प्रयोगहरूलाई सन्धिप्रक्रियाका रूपमा ग्रहण गर्न उपयुक्त देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
३. संस्कृत र नेपालीमा उक्त शोधकार्यले पुग्याउने योगदान&lt;br /&gt;
वर्णलोप, अक्षरलोप, वर्णागम, अक्षरागम र वर्णविकारका दृष्टिले बैदिकसंस्कृत र लौकिक संस्कृतमा प्रयुक्त शब्दहरूको निर्माणप्रक्रियाका बारेमा पूधक्‌शैलीमा अध्ययन गरिएको उक्त शोधकार्यले संस्कृत वाङ्मयको संरक्षणमा रसंस्कृत व्याकरणको प्रचलित पठन-पाठन पद्धतिको सरलीकरणमा विशेष योगदानपु्याउदै छ । साथै उपर्युक्त शीर्षकको शोधकार्यका आधारमा नेपालीमा प्रयुक्तसंस्कृतमूलका शब्दहरूमा पाइने लोप, आगम एवम्‌ वर्णपरिवर्तनसम्बन्धीप्रक्रियाहरूको जानकारी ग्रहण गर्न, अत्याधिक अन्तर्कथ) अन्तर्कनह; अन्तर्राष्ट्रियअपहरित आतिथ्यता; उपरोक्त; उल्लेखित कृतसडकल्पित्‌ गरियामब यितजागुत उषित बिनक्रमित दुएनस्ा; धैर्यता; परस्परित पुवरावलोकनः एचकीकरण,&lt;br /&gt;
५५ ” शन्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि&lt;br /&gt;
बाहुल्यता, सवोकामन सहानवा; राजनैतिक तब्च्प्रतिष्ठित वर्षत्म विद्युतीकरणविद्वातृवर्ण शुभाशिर्नाद शोभायमावः सङ्ग्रहित” तङ्ग्रहीत त्रस्बन्धित; सगरिवेक्षकछुपरिवेक्षण आदि अनुपयुक्त शब्दहरूको सद्ढा क्रमश: अत्यधिक, अन्त:कथा,अन्त:कलह, अन्ताराष्ट्रिय, अपहत, आतिथ्य, उपर्युक्त, उल्लिखित, कृतसङ्कल्प,गरिममय, ग्रस्त, जागरित, त्रस्त, दिग्भ्रान्त, दुरवस्था, चर्य/धीरता,पारम्परिक “परम्परागत, पुनरवलोकन, पृथक्करण, बाहुल्य / बहुलता, मन:कामना,महत्ता, राजनीतिक, सब्धप्रतिष्ठ, वर्चस्क, विद्युत्करण, विद्वृदूवर्ग, शुभाशीर्ाद,शोभयमान, सङ्गृहीत, सम्बद्ध, सुपर्यवेक्षक, सुपर्यवेक्षण आदि उपयुक्त शब्दस्वीकार गर्न ।हेनुँ, नेणली : पूर्णाङ्ग-२०४, पृ.२७-३९) तथा नेपाली सत्चिशीर्षकमा पठन-पाठन हुने सस्कृत पतिक्षेका प्रक्रिपाहरूलाई सरल रूपमा बुझ्नसकिने भएकाले उक्त शोधकार्यले नेपाली वाड्मयको संवर्द्धनमा आंशिक योगदान&lt;br /&gt;
दिनसक्ने देखिन्छ ।(मिर्मिरे (भाषा विशैषाङ], २०६८, पूर्णाङ्क : ३०५, पृ.१७४-१८३)&lt;br /&gt;
[|&lt;br /&gt;
ज्ञब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि/ ९९&lt;br /&gt;
सन्दर्भ कृति-स्‌ची&lt;br /&gt;
अधिकारी, हेमाङ्गराज (२०४९), समसामयिक नेपाली ब्याकरण, काठमाडौं :&lt;br /&gt;
कुञ्जल प्रकाशन ।_ (२०५७), समसामयिक सरल नेपाली व्याकरण : अभ्यास र&lt;br /&gt;
प्रपौग, काठमाडौं : विद्यार्थी पुस्तक भण्डार ।आचार्य, वरदराज (१९५१ इ.) मध्यसिद्धान्तकौमुदी, दिल्ली : मोतीलाल बनारसीदास ।&lt;br /&gt;
(२०४०) लघुसिद्धान्तकौमुदी, गोरखपुर : गीताप्रेस ।आप्टे, बामन शिवराम (२००७ इ.) संस्कृत हिन्दी कोश, दिल्ली : मोतीलालबनारसीदास ।ईश्वरचन्द्र (व्या. २००४ इ.), अष्टाध्यायी, दिल्ली ; चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान ।कात्यायन (१९७५ ड.) वाजसनैयिप्रातिशाख्यम्‌, वाराणसी : ज्ञानप्रकाश प्रतिष्ठान ।यौतम, देवीप्रसाद नेपालीमा सन्धिव्यवत्था कुज्जिनी (पूर्णाड्रक ३) पू. १०९-११९)चापागाईं, नरेन्द्र (२०५१), शब्द, वाक्य र अभ्रिब्यक्ति, काठमाडौं : रत्न पुस्तक भण्डार ।ढकाल, मतिप्रसाद [२०५८५), बेपाली तागिपिको परिचय गरिमा (वर्ष १९, अड्क ९),पु. ७५-८२।&lt;br /&gt;
(२०६७), लौप, आगम र वर्णाविकारका दृष्टिले पाणिनीयब्याकरुपाका नियम र प्रयोगको समीक्षण, काठमाडौं : नेपालसंस्कृत बिश्वविद्यालयको बिद्यावारिधिस्तरीय अप्रकाशितशोधप्रबन्ध ।&lt;br /&gt;
दीक्षित, भट्टोजि (१९५१ इ.), बैयाकरणतिद्धान्तकौमुदी (सम्पूर्ण), दिल्ली : मोतीलालबनारसीदास ।&lt;br /&gt;
पतञ्जलि (२०२४), व्याकरणमहाभाष्यम्‌ (प्रथम खण्ड), वाराणसी : चौखम्बाविद्याभ्रवन ।&lt;br /&gt;
(२००७ इ.), व्याकरणमहाभाष्यम्‌ द्वितीय खण्ड), दिल्ली :चौखम्वा संस्कृत प्रतिष्ठान ।&lt;br /&gt;
पन्ची, टीकाराम (संयो, २०५७), नेपाली वर्णाविन्यासविधयक अधिगौष्ठी २०५७,काठमाडौं : नेपाल राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठान ।&lt;br /&gt;
पराजुली, कृष्णप्रसाद (२०४२), राम्रौ रचना : मीठौ नेपाली, काठमाडौं : सहयोगीप्रेस ।&lt;br /&gt;
पोखरेल, बालकृष्ण र अन्य (सम्पा, २०४०), नेपाली बृहत्‌ शब्दकोश (पाँचौंसंस्क. २०५४), काठमाडौं : नेपात्ग राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठान ।&lt;br /&gt;
१०० “ शन्दनिमाणिप्रक्रिया र सन्धिपोखरेल, माधवप्रसाद (२०५७), ध्वतिविज्ञान र्‌ नेपाली भाषाको ध्वनिपरिचय,काठमाडौँ : नेपाल राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठान ।मिश्र, नारायण (सम्पा, १९७७ ड.), अष्टाध्यायीस्‌त्रपाठः (पाणिनिकृत व्याकरण),वाराणसी : चौखम्बा ओरियन्टालिया ।मिश्च, हरेकान्त (२००३ इ.), बृहद्धातुकुसुमाकरः, दिल्ली : चौखम्बा संस्कृतप्रतिष्ठान ।लुइँटेल, बिष्णु (२०५३), तत्सम शब्दको बर्णबिन्पास, काठमाडौं : साझा प्रकाशनशर्मा, गिरिघर र शर्मा, परमेश्वरानन्द (सम्पा., १९५१ इ.), वैयाकरणसिद्धान्त-कौमुदी (चतुर्थ भाग, दोस संस्क.], दिल्ली : मोतीलालबनारसीदास ।(१९५२ इ.), वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी (द्वितीय भाग), दिल्ली :मोतीलाल बनारसीदास ।_ (सँ. २००५ इ.), बैपाकरपासिद्धान्तकौमुदी (तृतीय भाग,आठौँ संस्क.], दिल्ली : मोतीलाल बनारसीदास ।शर्मा, मोहनराज (२०५१), शब्दरचना र वर्णविन्यास, वाक्यतत्त्व र अभ्िव्यक्ति,भाषावैज्ञानिक र प्रयोगात्मक पद्धति, काठमाडौं : नबीनप्रकाशन ।(२०५४), शब्दरचना र वर्णविन्यास, वाक्यतत्त्व, अभिव्यक्ति रपाठहरू, काठमाडौं : नबीन प्रकाशन ।शार्म्मा, सोमनाथ (२०१५), प्रतिसंस्कृतासिद्धान्तकौमुदी, काठमाडौं : नेपाल एकेडेमी||&lt;br /&gt;
आचार्य ।व्याकरण, वि.एम.ए. नेपाली, २०५५) त्रि.वि.विद्यावारिधि (व्याकरण, 2पाणिनीय व्याकरणको सच्धिवैज्ञानिक अध्यपन&#039;प्रशासनिक सेवा अनुभव :&lt;br /&gt;
9 रुरु संस्कृत क्याम्पस, रिडी, गुल्मी ।२०४%-२०४१)&lt;br /&gt;
%ने.सं.वि. केन्द्रीय कार्यालय, बेलफुन्डी, दाङ ।२०५१-२०५३)शिक्षण सेबा अनुभव :&lt;br /&gt;
७ भानु संस्कत क्याम्पस, चुँदीरम्घा, तनहुँ&lt;br /&gt;
[व्याकरण : २०५३-२०१६, २०१९-२०६७)&lt;br /&gt;
9 जनक हजारी क्याम्पस, जनकपुर [व्याकरण : २०५६-२०५९)&lt;br /&gt;
७ रारा. वहमुखी क्याम्पस, जनकपुर ।नेपाली : २०५७-२०५९)&lt;br /&gt;
% जनता क्याम्पस, बिजौरी, दाड ।व्याकरण : २०६७-२०६८)।&lt;br /&gt;
9 कालिका संस्कृत क्याम्पस, नवलपरासी ।व्याकरण : २०६5 देखि हालसम्म)&lt;br /&gt;
9 नमुना साइन्स कलेज, बैडाकोट, नवलपरासी (नेपाली : २०६९ श्राबणदेखि।&lt;br /&gt;
9 पारम्भिक संस्कृत व्याकरण र रचना (२०५६ : व्याकरण)&lt;br /&gt;
9 भानुभक्तीय रामायणका पाठमेदहरू (२०६३ : समालोचना)&lt;br /&gt;
७ मानुभक्तका लघुरचनाहरू ।२०६४ : पाठमेदीय सम्पादन)&lt;br /&gt;
9 संस्कृत, प्राकृत र नेपालीका सन्धिनियम (२०६९ : व्याकरण)&lt;br /&gt;
9 गरिमा, नेपाली, मिमिरि, मर्यादा आदि पत्रिकामा संस्कृत र नेपाली व्याकरण एवम्‌&lt;br /&gt;
भानुभक्तीय रचनासम्वन्धरी फुटकर अनुसन्धानात्मक लेखहरू प्रकाशित&lt;br /&gt;
गँडाकोट-१, विकासचोक, नवलपरासीमोबाइल नं. ; ९५४१२७९४३१/९८४५०६८०२६, फोन नं. : ०५६-६९२४९१डुमेल : पा मा)क हाम. ता&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80_(%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%99%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%B8%E0%A4%99%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B9)&amp;diff=67</id>
		<title>इतिश्री (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80_(%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%99%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%B8%E0%A4%99%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B9)&amp;diff=67"/>
		<updated>2024-06-10T03:59:17Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: Created page with &amp;quot;फष्ठाप260 80: ७१0०ने७साझा शिक्षा ई-पाटी[०11-0011 110 ५५४५४४४,[१15101(919%90,01५४४/५४४,01€21121221,01 इतिश्री उस्तै पुराणो इतिश्वी समाप्तिको स्वीकृति होइन; अध्यायान्तको जनाउ मात्र हो ।यतिन्जेलको मेरो - लरखर खा...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;फष्ठाप260 80:&lt;br /&gt;
७१0०ने७साझा शिक्षा ई-पाटी[०11-0011 110&lt;br /&gt;
५५४५४४४,[१15101(919%90,01५४४/५४४,01€21121221,01&lt;br /&gt;
इतिश्री उस्तै पुराणो&lt;br /&gt;
इतिश्वी समाप्तिको स्वीकृति होइन; अध्यायान्तको जनाउ मात्र हो ।यतिन्जेलको मेरो - लरखर खालि नेपाली लेख्न सिक्ने तरखर हो । तरयतिका वर्ष कलम घोटता पनि नेपाली जानिँदो रहेनछ, ख्बै साहित्य-सिर्जना गर्ने त कहिलेकहिले ?&lt;br /&gt;
अहिले यो पनि उस्तै भयो । इतिश्री यतिको १ध्यायः&lt;br /&gt;
२०२८।५।१३१ - भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
धन्यबादैधन्यवाद !&lt;br /&gt;
&#039;इतिश्री&#039; छाप्न दिएकोमा अर्याललाई, चिनारी लेखिदिएकोमा वासुदेवत्रिपाडीलाई, गाताचित्र बनाइदिएकोमा टेकवीर मुखियालाई धन्यवाद !किनेर पढिदिने सबैलाई धन्यवाद !धेरैको केको वादविवाद !- कौवा प्रकाशन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्यालको &#039;इतिश्री&#039; का सम्बन्धमा&lt;br /&gt;
(क) &#039;कौवा प्रकाशन&#039; बाट भैरव अर्यालको इतिश्वी छापिँदै छ।हास्यव्यङ्कग्यरचनाको यो सङ्कलन अर्यालको काहिँलो सन्तान हो । म आगामीसन्ततिका निम्ति पनि मर्यादाक्रम छोडिदिँदै भनिरहेको छु । &#039;रसमय नेपालीजीवन&#039; तिरभन्दा वा समाजका फूलबारी र बैठकभन्दा हाम्रा जीवनका साँगुराराल्ली र विकृतिका रछानतिरै रमाइरहेका अर्यालको शीर्षस्थ उपलब्धिका रूपमाइतिश्ी देखा पर्दै छ, तापनि यो उनको हास्यव्यङ्ग्य- व्यवसायको इतिश्रीनबनौस्‌ भन्ने सगुन म सर्वप्रथम टग्ग्राउँछु ।&lt;br /&gt;
म यस्तै इतिश्वीको भूमिका लेख्न पलेँटी कस्तै छु र उपयुक्त भाकाखोज्दै छु । मेरा मनमा एउटा दुबिधा देखा पर्छ- म कुन भैरव अर्यालकोहिसापकिताप गरुँ ? नेपाली हास्यव्यङ्ग्यको विकासोन्मुख मुलुकका सन्दर्भमासाह्रैसाह्कै जेहेनदार र खप्पिस देखा पर्ने भैरव अर्यालको कि हास्यव्यङ्ग्यकोअति विकसित भूभागका सापेक्षतामा अनागत र आउन बाँकी भैरव अर्यालको ?अझ प्रश्नलाई अर्को रूपमा पनि ठड्याउन सकिन्छ- उनको वर्तमानकै मतारिफ गरुँ कि, उनीजति प्रवीण र खप्पिस बन्न सके नेपाली हास्यव्यङ्ग्य-निबन्धको गजुर गगनचुम्बी होला, त्यस सम्भाव्य भविष्यका निम्ति उनलाईआमन्त्रित गर्दै उनको पूजाआजा (उनको वर्तमानलाई छेडछाड) गरे ? आजउनी भाले देखा पर्छन्‌, तर भोलिपर्सिका निम्ति उनी सेर्रा निक्लन सक्लान्‌ किनसक्लान्‌ ? त्यही मेरो दुबिधाको मुटु हो ।&lt;br /&gt;
त्यसो भए म यो भूमिका तीतोबाट थालूँ कि मीठोबाट । म. मनमनैसोचिराख्छु तीतो-मीठो, मीठो-तीतो. । &#039;मधुरबाट समाप्त गर्नु&amp;quot; कुनचाहिँ मन्त्रहो यो ? साँच्ची हामी नुनिलो-अमिलो खाइसकेपछि गुलियोबाट(भेटियो भने। भोजन समाप्त गछौँ क्यार ! तैपनि परम्परा भाँच्नु नै उपलब्धिहुने परिवेशमा म गुलियो-मीठोबाटै हास्यव्यङ्ग्यकार अर्यालको परिचर्चा गर्न&lt;br /&gt;
चाहन्छु । कुनै दिन मै पनि परम्पराको एक स्तूप बन्न पुगेँ र मैलाई पनिभाँचिदिए भने ! तर &#039;भने&#039; को सम्बन्ध आजसँग छैन, पर्सि-निकोर्सिसँग छ ।त्यसैले मेरो निम्ति यौ तात्तातो प्रश्न होइन । मैले अठोट गरेँ- म पनि आजकाव्यङ्ग्यकारलाई पहिले मसारमुसुर पार्छु अनि बेसरी &#039;पूजाआजा&#039; गर्छु ।नेपाली हास्यव्यङ्गग्यको विकासशील परम्परामा हास्यव्यङ्गग्यकार अर्यालकुन अनुहारका देखा पर्छन्‌ ? पस प्रसङ्गका निम्ति सत्सङ्ग अत्यावश्यक हुनजान्छ र म हाम्रा हास्यव्यङ्ग्य सन्तहरूको सूचीपत्र प्रस्तुत गर्ने अनुमतिमाग्दछु । समालोचना सूचीपत्र हो कि विशिष्ट प्रतिभाको परिचर्चा ? जे होस्‌,म टिपटाप र टाकनदुकन गरेर परम्पराबोधको पातलो पर्दा खडा गरेरहास्यव्यङ्ग्यकार अर्यालको निजी कोष्ठको खाका खिच्न लागिरहेको छु ।&lt;br /&gt;
।ख)। भानुभक्तदेखि वा उनीभन्दा पनि पहिल्यैदेखि कविहरू नेपालीजीवनको सरसताको बखान गर्न चम्किएका हुन्‌ र अझै चम्किदै छन्‌ । तरनेपाली समाज र जीवनका विकृतिको व्याकरण र विसङ्गतिको सङ्गीतखोज्नेतिर बाटो भुलेर मात्रै दुई-चार कविहरू लागेका छन्‌ । भानुभक्त, लेखनाथ,लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा, कुलमणि देवकोटा र भूपीका चास्सचुस्स वा छास्सछुस्सलेमात्रै काम फत्ते नहुने देखेर स्वयं कवि &#039;भीमनिधिले पुरानो भारी बिसाएरहास्यव्यङ्गग्य-कविताको नेतृत्व आफैँ लिएको दशाब्दी बितिसकेको छ । तैपनिनेपाली कविताको मुलुकमा हास्यव्यङ्ग्य-तत्त्वको धाक अझै जमिसकेको छैन,मैले जानेसुनेका होरेस, ड्राइडेन र पोपका चर्तिकला अझै देखा परेका छैनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&#039;जेजस्तो हुनुपर्ने हो&#039; र जेजस्तो छ&#039; को अन्तर्दर्शन प्राप्त नभईहास्यव्यङ्ग्यको सक्कली कलाकार कलकलाउन सक्तैन । सामान्यता,स्वाभाविकता र सत्यको अतिक्रमण भएको बोधबाटै हास्यव्यङ्गग्यकारको पदयात्राप्रारम्भ हुन्छ । यसरी आदर्श र यथार्थको अन्तर्विरीधको चेतनाबाटै हास्यव्यङ्ग्यकोबिरुबा अङ्करित हुने भए पनि आदर्श वा सत्यको सस्तो सीधा फलाक्याइँलेकामै चौपट गरिदिन्छ (हास्यव्यङ्ग्यकारको) अनि यथार्थको कोरो फोटोग्राफीवा &#039;“तस्बिर-उतारी&#039; बाट पनि हास्यव्यङ्गग्यकार करुणा-बीभत्ससँग एकोहोरोमितेरी लाउन पुग्छ । हेरिने गरिएभन्दा भिन्नै कोणबाट, स्थूलीकरण वाक्षाद्रीकरणका प्रातिभ सिसाबाट अनि उल्टो- विलक्षण प्रक्षेपबाट &#039;जेजस्तो छ&#039;लाई नवविलक्षण रूपमा प्रस्तुत गर्न सकियो र &#039;जेजस्तो हुनुपर्ने हो&#039; को सृक्ष्ममिही ध्वनि वा व्यञ्जनाको परिष्कृत वासना मुग्धवेधक रूपमा मगमगाउनसक्यो भने मात्रै हास्यव्यङ्ग्यकारको कला मूर्त हुन जान्छ । यसका निम्ति&lt;br /&gt;
समाज-गठनका विविध पाटाको सूक्ष्म पर्यवेक्षणशक्ति, मानवीय संस्कारकाबहुमुखी छायाछवि (मानसिक र बौद्धिक लोकको अन्तर्ज्ञान), भाषाका सम्भावना -सामर्थ्यको गम्भीर अवगाहन अनि शिल्प-प्रविधिका विशिष्ट-विलक्षण बान्कीकोस्फुरण-साधना हास्यव्यङ्ग्यकारका अपरिहार्य सामग्री, प्रतिभा र आराधनाठहरिन्छन्‌ । मान्छे र समाजको इयत्ताको बाँध बाँध्न नसकिए पनि आफैँलेभोगेका-जानेका र पढेगुनेका संस्कारबाटै मान्छे र समाज चिन्दै अनि आफू रआफ्ना अपरिष्कृत रागको क्रणीकरण गर्दै साधारणीकरण, सार्बभौमीकरण वाशाश्वतीकरण गर्न सक्ने स्थालीपुलाक न्यायको आचार्य हुन्छ हास्यव्यङ्ग्यकार ।बाहिरी ओठ मात्र होइन, मनका सूक्ष्म ओठसम्म स्वतः चलमलाउने गरीहास्यरसको सृष्टि गर्नु र मान्छे-समाज वितअङ्ग रहेछ भन्ने व्यङ्ग्य मनमाभने, बुद्धि सपार्ने र समाज सुधार्ने अप्रत्यक्ष बोध वा व्यञ्जनाका साथ प्रस्तुतगरेरै हास्यव्यङ्ग्यकार कृतार्थ हुन जान्छ ।&lt;br /&gt;
यस सन्दर्भमा हेर्दा नेपाली कवितामा हास्यव्यङ्ग्यको परम्पराको गोडादरिएको अनुभव हुँदैन । हास्यरस सतहकै हुनु र अन्तर्मनका ओठ-ओठ प्रकम्पितपार्न असमर्थ रहनु बा सामाजिक सेरोफेरो भ्रमण गर्न नसक्नु वा मानवीयमनोवृत्ति र चिन्तनवृत्तिलाई धुन-माभन नसक्नु बा यथार्थबोचै ज्यादा हुनु वाआदर्श चैतन्य नै-बढी ओकलिनु वा व्यङ्ग्य रहे पनि हास्य कमजोर हुनु वाहास्य भए पनि व्यङ्ग्यशक्ति तीखो नहुनु वा व्यङ्ग्य सतहकै भई व्यङ्ग्यशक्तिगुमाउनु वा व्यक्तिका रागतत््वको क्रणीकरण नहुनाले साधारणीकरण कब्जानहुनु वा हास्यव्यङ्गयका निम्ति उपयुक्त पर्याप्त शब्दचाल र शिल्पजालकोकला स्वतःस्फुरित नहुनु वा उस्तादी सामर्थ्य अविकसित हुनुजस्ता कमजोरीहाम्रो हास्यव्यङ्ग्य-कवितामा अझै बाँकी छन्‌ । भानुभक्त, मोतीराममण्डली,लेखनाथ, लक्ष्मीप्रसाद, कुलमणि, भीमनिधि, भूपी वा अन्य उत्तरवर्ती कविहरूमाहास्यव्यङ्गग्यका कतिपय तत्त्वहरू निहित भएर पनि तिनीहरूको सक्षम उपयोगर परिष्कार नभइसकेको महसुस हुन्छ । &#039;नहुनु मामाभन्दा काना मामा निको&#039;को रूपमा नेपाली हास्यव्यङ्ग्य-कविताप्रति (“छद्याकन&#039; देउता नरिसाकन्‌ !)म खुपै माया गर्छु, तर हास्यव्यङ्गय-कलाको सफल क्रियान्वयनमा गद्यकार वानिबन्धकारहरू नै मेरो सानो बिचारमा चिल्ला पात प्रतीत हुन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
नेपाली कविताले हास्यव्यङ्ग्यको जबरजस्त खुराक पचाउन नसकेकोअनुभव गर्छु म । हास्यव्यङ्ग्यको लेखुवा बन्न सजिलो छ, तर लेखक हुन गाह्रोछ क्या ? यसका निम्ति साहित्यकारमा जुन मेधाको आवश्यकता हुन्छ, त्यसलाई&lt;br /&gt;
प्राप्त गर्न हाम्रा कविहरू अनकनाएका छन्‌ । साथै मानवीय व्यक्तित्व रसमाजगठनका अन्तर्विरोधलाई यसको विस्तृततामा फुकाउने कला हाम्राहास्यव्यङ्ग्य-कविहरूले अजमाएर नभ्याएफैँ म ठान्दछु । कविता स्वभावतःभाव-संक्षिप्तमा गर्व गर्छ, अनि मूलत: एकरसताको प्रवाह-प्रभावमा रमाउँछ ।&#039;हास्यरसका&#039; देवकोटा रिसाए पनि म भनिदिन्छु- कविका सङ्गीति चैतन्य रतरल चोलामा हास्यव्यङ्ग्यको खाँदबारी वा ठोस ठेला उब्जन गाह्रो पर्छ । हो,कविका स्वीकृत-प्रचलित भूमिकालाई बिदाइ गर्दिएर होरेस, ड्राइडेन वा पोपभैँदिशान्तरको दशा कबोले कवि पर्याप्त हास्यव्यङ्ग्यकार हुन सक्छ । तर यस्तोहिम्मत गर्ने ह्याउ भीमनिधिबाहेक अरू कविले देखाएनन्‌ । &#039;यशस्बी शव&#039;सम्मको अतीतलाई ठ्याम्मै माया मारेर चोला बदल्ने भीमनिधिँको भक्तिभावहास्यव्यङ्ग्य-कबिताको बिशिष्ट घटना हो । तर समसामयिक समाजकाव्यवहारलाई व्याजोक्ति प्रदान गर्दा भीमनिधिका वैयक्तिक रन्काले अर्घल्याईगरेका छन्‌ । व्यक्तित्वको बिलयन-लीला गर्दै विषयवस्तुको सार्वजनिकीकरणभीमनिधि सिक्तै छन्‌ । तर नानीदेखि बसेको बानी बिर्सन गाह्रो हुँदो रहेछ ।विधाका मर्म र प्रविधिका दृष्टिले सिक्न-जान्न नचाहेरै त्यो विधा धानिरहनुसाहित्यकारको धर्म हो कि होइन ? हास्यव्यङ्गग्यकार भीमनिधिमा पनि योनिजत्व छँदै छ । तैपनि समसामयिक समाजका अस्तव्यस्तता र अर्थ नबर्धलाई विस्तृत रूपमा टिपिदिने र वाणी दिने हास्यव्यङ्ग्य-कविका रूपमाभीमनिधिको निकै गुन मान्नुपर्छ ।&lt;br /&gt;
अब म आशुकवि शम्भुप्रसादको पुर्ख्यौलीमा हर्किने गद्य-हास्यव्यङ्ग्यकोबंशाबलीतिर आँखा तन्काउन पुग्छु । &#039;जातीय रोगको अच्‌क औषधि&#039; खोज्नेवेदनिधि बडो मापाका छन्‌ । हाम्रो जातिमा रोग छ र औषधिको आवश्यकताछ भन्ने अनुभव गर्नु चानचुने कुरा होइन । हामी रोगी छौँ भन्ने परमज्ञान तहामीलाई प्राप्त भयो, तर यस महारोगको अचूक औषधि खोज्ने वेदनिधि बाजेहस्सू नै रहेछन्‌ । गत आधा शताब्दीमा अचूक औषधि भन्दै धेरै औषध सेवननगरिएको-नगराइएको होइन । तर औषधिचाहिँ असफल, रोगचाहिँ झन्‌झन्‌महामहा हुँदै महामहा रोग भइरहेको अनुभव छ । लक्ष्मीप्रसाद देवकोटाकाकतिपय निबन्धहरू &#039;जे हनुपर्छ&#039; र &#039;जे छ&#039; को अन्तर्विरोधको चैतन्यबाटउक्‌समुक्‌सिएर उनका कविताभैँ हास्यव्यङ्ग्यको बाटो पनि समात्छन्‌ । तरकविसुलभ चाञ्चल्य र प्रबाहले गर्दा उनको हास्यव्यङ्ग्य कलाको परिष्कार हुनपाउँदैन । उनी लोभलाग्दा आरम्भ र अलमलिएको नियति बोक्ने हास्यव्यङ्ग्यकार&lt;br /&gt;
हुन्‌ । हृदयचन्द्रको बैशिष्टच रोगान्वेषणभन्दा औषधि लेख्नुमा छ । औषधि तचर्कै दिएका हुन्‌ उनले, तर उनको पनि केही सीप लागेन । केशव पिँडालीकोखै-खै&#039; को सम्झना तात्तातै छ अफ्नै, सेलाएको छैन । हाम्रा समाजका विकृति,विसङ्गति र विडम्बनालाई उपकथाका चुटकाचुट्कीमा मिसाएर पिँडालीले[तर नकोक्म्याउने गरी) हास्यव्यङ्ग्य-पिँडालु हाम्रा रौसिला पाठकहरूलाईप्रदान गरेका हुन्‌ । उनको व्यङ्ग्यकलामा व्यङ्ग्यको शक्ति देखा परेको हो ।गोला र गोलीभन्दा व्यङ्ग्यका छर्राहरूको सञ्चार गर्ने अभिनन्दनीय व्यापारउनले थालेका हुन्‌ र केवल व्यङ्गयको गुलेली खेलाउनु पनि पौरख होइन,क्रेवल हँसाइदिने गफाडी गुरु वा विदूषकावतार पनि सब थोक होइनन्‌ । हास्यर व्यङ्ग्यको यस संयुक्त कारोबारबाट केशव पिँडालीलाई फाइदै-फाइदा हुनुपर्नेहो तर उनी घाटैघाटामा रहेछन्‌ भन्ने कुरा भर्खरै उनैका घोषणबाट थाहा हुँदैछ । तैपनि पिँडालीको घाटा-घोषणा मेरो बिषय होइन र मैले कपाल दुखाएरपनि नउकल्चिने कुरा हो । नेपाली हास्यव्यङ्ग्य साहित्य र यसको समालोचनालाईदरिलो र तागतिलो खुराक पिँडालीले दिएका छन्‌, अहिले मलाई त्यत्ति भएपुग्छ ।&lt;br /&gt;
नेपाली हास्यव्यङ्ग्यका मूल पुरुष यिनै हुन्‌ । समालोचनाका जुवामापनि विषय वा प्रसङ्गअनुसार “भारेभुरे बाद&#039; भन्नुपर्छ र म पनि भन्छु।हास्यव्यङ्ग्यकार अर्यालको समालोचनात्मक सालिक ठडयाउन यत्ति पृष्ठभूमिभए पुग्ला कि भन्ने मेरो नुझ छ। यसै सन्दर्भमा उन्तको हास्यव्यङ्ग्य-व्यवसायको लेखाजोखा तयार हुन सक्छ भन्ने मेरो अनुमान छ ।&lt;br /&gt;
हास्यव्यङ्ग्य साहित्यको इलाकामा निकैनिकै नाम र काम देखा परे पनिहास्यव्यङ्ग्य निबन्ध (जसले हास्यव्यङ्गय कलाको विकसित रूप बोकेको शिरपाउप्राप्त गरैको छ) को अखडामा देखा पर्ने प्रतिद्वन्द्धीहरू थोरै छन्‌ । पुरानो र नयाँपुस्तामा एक-एक गरी दुइटै उच्चतम मल्लहरू छान्नुपन्यो भने म केशवपिँडाली र भैरव अर्यालको पक्षमा मतदान गर्छु । अरूहरूको योग्यतामा शङ्कानगरेर पनि मत दिनुपर्ने स्थितिमा योग्यतम ठम्याउनुपर्छ, त्यही ठम्याइ होयो । केशव पिँडाली पुरानो पुस्ताको हास्यव्यङ्ग्य-सृजनाको प्रतिनिधित्व थाम्नसक्छन्‌ । ।हास्यव्यङ्ग्यकार देवकोटा, हृदयचन्द्र, अच्छा राई र प्रेमराजप्रभृतिकासाथै हास्यकथाकार कृष्णप्रसाद चापागाईंप्रति यथोचित सम्मानका साथ भनेकोहै !) नयाँ पुस्ताका (उमेर जेजस्तो भए पनि) वासुदेव लुइँटेल, श्रीधर खनाल,श्याम गोतामे, रामकुमार पाण्डे, घटोत्कच, विष्णु नबीनप्रभृति अनेकानेक&lt;br /&gt;
सष्टाको अहंभावलाई घच्चा नलागोस्‌ : भैरब अर्याल नयाँ पुस्ताका सर्वाधिकसशक्त, त्यसैले प्रतिनिधि निबन्धकारको पगरी गुथ्न सक्छन्‌ । जेठो हिमाल भएपुग्ने र माहिली, साहिँली, काहिँली, ठाहिँली आदि हिमालको महत्त्यै गुम हुनेहाम्रो संस्कार ठूलो भनिएकाको ठुल्याइँको पछि हाहामा दौडन्छ र अरूकोबेवास्ता गर्छ भने सबै साहित्यकार महानै हुन चाहन्छन्‌ । उनीहरू प्रतिनिधिछानेको र तुलना गरेको मन पराउँदैनन्‌ । सिद्धिचरण, रिमाल, घिमिरे रव्यथितमा देवकोटा ठूला भन्दा चोट पर्ने परिवेश भएको ठाउँमा पुराना र नयाँपुस्ताका हास्यव्यङ्गग्यकारका प्रतिनिधिका रूपमा पिँडाली र अर्यालको छनोटअवश्यै रुचिकर नलाग्न सक्छ, व्यक्ति साहित्यकारलाई । तर के गररसमालोचनाको धर्मले सत्य बोल्न लगाउँछ ।&lt;br /&gt;
(ग) हास्यव्यङ्ग्यकार अर्यालको आफ्नै परिपाठ छ | प्रधथमप्रथमशब्दवैचित्र्यसँग खेल्दै र समाजका पुराना-नयाँ संस्कारमा अन्तर्निहितविसङ्गतिका दुप्पादुप्पी समाउँदै उनी हास्यव्यङ्ग्यको अखडामा परिहास-परायण व्यक्तित्वको रूपमा लुस्स पसेको सम्झना आउँछ । तर सूची-प्रवेशपछिमुसलप्रबेशको उखान दोहोरिन्छ : उनी हाम्रा सामाजिक जीवनका विविधपक्षका विसङ्गति र विडम्बनालाई एक-एक गर्दै आफ्ना हास्यव्यङ्ग्य-कृतिमाटिप्तै जान्छन्‌ र जराजरा खोतल्दै जान्छन्‌ । मकाएका परम्परा र पात्तिएकोनवीनताका सङ्क्रमण-बिन्दुबाट ठाउँ न ठेगानसाथ थुप्रैथुप्रै व्यभिचार र अनाचारअनि थिचोमिचो र ढाकछोपको सन्दर्भमा हुर्कदै गएको सामाजिक चरित्रकाठुन्काठुन्की र रन्कारन्की अर्यालको हास्यव्यङ्ग्यवृत्तभित्र समाविष्ट हुँदै सिङ्गोसामाजिक अन्तर्विरोधको व्यञ्जना दिन पुग्छन्‌ । काउकुती, जय भुँडी, गलबन्दीर इतिश्लीका माध्यमबाट हाम्रो समाज-मर्मको हँस्यौलीठटयौली मात्र नभई जेजस्तो छ&#039; र &#039;जे जस्तो हुनुपर्छ&#039; का अन्तर्विरोधमय ध्वनि गुञ्जित भएकोअनुभव हुन्छ । ।&lt;br /&gt;
सामाजिक परिवेशको यसै बिस्तीर्णताले प्रथमतः हास्यव्यङ्ग्यकारअर्याललाई समसामयिक सहकर्मीहरूभन्दा माथि उचाल्छ । आधुनिक नेपालकावर्गीय, पेसागत र अभिरुचिगत विविध गतिविधिमा अन्तर्निहित विकृति-विसङ्गतिको अन्तर्मन्धनद्वारा उनले आफ्नो पाठकमण्डली आर्जित गरेका छन्‌ ।उनको समाजको बोध राष्ट्रिय घेरामै रङमङिएर पनि बेलाबेला अन्तर्राष्ट्रियक्षितिजको छेउ छुन पुग्छ । यसैलाई परिवेशको विस्तीर्णता भन्न सकिन्छ,जसअन्तर्गत कूटनीति र राजनीति, अर्थतन्त्र र प्रशासनयन्त्र, सभ्यता र समृद्धिको&lt;br /&gt;
मन्त्र, गृहस्थी र सामाजिक सम्बन्धका अङ्गभङ्ग आदिका पिरला र भयाउलाहरू&lt;br /&gt;
अनि उन्माद र अर्धङ्गीपनको व्यञ्जनात्मक चित्रण अर्यालले प्रस्तुत गरेकाछन्‌ । मलाई लाग्छ- उनले हाम्रा नाडी मात्र होइन, सामाजिक मुटुर मथिङ्गालपनि जाँचेका छन्‌ । लाटो-सुधो खालको अनुहारभित्र सामाजिक विकार रवेदना अनि दुर्बलता र अहङ्कारको यति सशक्त-सजीव बोध कसरी प्राप्त भयोहोला, अचम्म लाग्छ । म अनि लेखनाथको भाका टिपेर भनूँ कि ?&lt;br /&gt;
अदना यो चरीलाई यो स्वर्गीय सरीगम&lt;br /&gt;
सिकाउने विधाताको धन्य हो त्यो परिश्म !&lt;br /&gt;
हास्यव्यङ्ग्य कलाको अपेक्षाकृत संयत-शालीन प्रयोग पनि उनकोउपलब्धि हो । हास्यव्यङ्ग्य एउटा सशस्त्र अस्त्र हो, यसको दुरुपयोगद्वाराव्वैयक्तिक प्रतिशोध वा आत्मश्लाघा पनि गर्ने सकिन्छ । तर अर्यालले आफ्नोहास्यव्यङ्ग्य कलालाई वैयक्तिक रागको क्रणीकरण प्रदान गरेका छन्‌ । व्यक्तिबा बर उनको अस्त्रको सिकार हुँदैन बरु उसका आनीबानीको शिष्ट उधिन्याइँ&lt;br /&gt;
हन्छ अर्यालका कृतिमा । भनूँ- &#039;कमेडी अफ म्यानर&#039; वा &#039;आचरणका सुखान्तक&#039;&lt;br /&gt;
का नजिकनजिक छन्‌ अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य रचना । साथै कहीँ पनि उनीआक्रमणकर्ताको रूपमा देखा पर्दैनन्‌ र अस्त्रको रूपमा आफ्नो कलमको प्रयोगगर्दैनन्‌ । &#039;जे जस्तो छ&#039; लाई अशोभनीय वा अवाञ्छनीय देखिने कोण, प्रक्षेप बापाराबाट उदङ्ग्याइदिनु उनको हास्यव्यङ्ग्यको धर्म रहेको छ । त्यसैले उनकाहास्यव्यङ्ग्य-कृति घुयँत्रो होइनन्‌ र घातक छैनन्‌, समाजका क्षतविक्षत घाउमाचरीअमिलो हाले चहस्याउने खालका पनि होइनन्‌ । भनुँ, उनका हास्यव्यङ्ग्य-कति खास पाराका ऐना हुन्‌, जहाँ समाज आफ्नो आत्मदर्शन गर्दै आफैँआफूसँग घिनाउन र सच्चिइन कुतकृतिन्छ । न उनी छुरी रोप्छन, न धुरीउधिन्छन्‌ । तैपनि हाम्रा आन्द्राभुँडी उधिन्दै हाम्रा विकृति र विवशता अनिहीनता र निम्सरोपन औँल्याउने सामर्थ्य उनले प्राप्त गरेका छन्‌ । अर्यालशिष्ट-स्वस्थ र सजीव-सक्षम हास्यव्यङ्ग्यकलामा प्रवीण देखा पर्छन्‌ । करुणाअन्तस्तलमा बोकेर हिँड्छन्‌, उनका हास्यव्यङ्कग्य रचना ।&lt;br /&gt;
भाषाको र यसका सम्भावना तथा सामर्थ्यको मर्म छाम्दै भनाइ-बैचित्र्यवा उक्तिविलक्षणताको सन्धान गर्नमा अर्याल सापेक्ष रूपमा खप्पिस देखापर्छन्‌ । यस्तो भाषिक सामर्थ्यले उनलाई समकालिक सतीर्थ्यहरूभन्दा विशेषओज प्रदान गरेको छ । समाजबोध शब्दकै माध्यम पाएर साहित्यमा ब्यूँतिन्छभने शब्दशव्दका रखाइ र चखाइको जादुसँग उनी परिचित छन्‌ । ठीक ठाउँमा&lt;br /&gt;
ठीक शब्दको औचित्य निर्वाह भएन भने हास्यव्यङ्ग्यकार टुहरिन्छ भने अर्यालसहज ढङ्गले शब्दशय्या बुन्छन्‌ र त्यसमा आफ्नो प्रतिपाद्यलाई आरामसँगप्रतिष्ठित पारिदिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
हास्यव्यङ्ग्यकार अर्याल शिल्प र सीपका नवनवब बान्कीहरूको खोजीगरिरहन्छन्‌ र एकपछि अर्को निबन्धलाई नयाँ परिपाठ दिन तम्सिन्छन्‌ ।प्रतिपाद्यमाथिको पकड र भाषा-सक्षमता मात्र पर्याप्त हुँदैनन, शिल्प-सशक्ततापनि उत्तिकै अपेक्षित रहन्छ । प्रकृति र जीवनका बनोट एकैनासे छैनन्‌ रहास्यव्यङ्ग्यकारे पनि नयाँनयाँ बनोट र बुनौटद्वारा आफ्नो विद्याको दुनोटघोकिरहन्छ, यदि उसमा बिकास-सम्भावना अन्तर्निहित छन्‌ भने । अर्यालशिल्पसज्जाको दृष्टिले मज्जामज्जाका प्रयोग गर्ने सृजना-सुलभ सोखबाट मुक्तछैनन्‌ । यही उनको &#039;हुने बिरुवाको चिल्लो पात&#039; हो । यस दृष्टिले अर्यालआफ्ना समसामयिक सहकर्मीहरूका अगुवा प्रतीत हुन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
यिनै बुँदाहरू बटुलेर म भैरबपुराण एकछिन बिसाउन चाहन्छु । यत्तिकैमाप्रशंसा परिचर्चाको इतिश्री हुन्छ । तर तीतोबाट समाप्त गर्ने मेरो सङ्कल्पबाँकी नै छ । हास्यव्यङ्ग्यको विकासोन्मुख वर्तमानमा अर्याल खप्पिस देखा परेपनि अतिविकसित भविष्यको परिकल्पना-क्रममा उनका अप्राप्ति पनि भरभराउँदा छन्‌ र उनका दुर्बलताहरू पनि सिङ्गा-सग्ला देखिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
(घ) पुराना र नयाँ पुस्ताका प्रतिनिधि-जोडी पिँडाली र अर्याललाईपरस्पर भिडाएर तपाईं-हामीः एकछिन तमासैको आसन ग्रहण गरौँ । पिँडालीकाउनै कथालाई क्नै सङ्ककलनकर्ता निबन्धको मिसिलमा दरिदिन्छन्‌ भने अर्कालेकथाको फाँटबारीमा राखिदिएका छन्‌ । उपकथा हाल्दै निबन्ध-विस्तार गर्ने ररोचकता थप्ने कलामा पिँडाली. अपेक्षाकृत सिपालु छन्‌ । यौ कथाकौशलअर्यालले कम अच््याउन सकेको अनुभव हुन्छ । तर चित्रणशक्ति अर्यालकोकलममा ज्यादा छ । निजात्मकता र वस्तुको सामीप्यमा छामछ्लम गर्दै मातबीयप्रवृत्तिको रेखाङ्कन गर्नमा पिँडाली निकै निपुण छन्‌ । उनको निजात्मकताआत्मोपहास हुन्छ, आत्मश्लाघा रहँदैन भन्न सकिन्छ । तर अर्याल सामाजिकवस्तुतथ्यका द्रष्टा-भोक्ता बढी प्रतीत हुन्छन्‌, आत्मरेखनद्वारा आर्द्वै मानवीयनिजत्व उनले अलि कमै पोखेका छन्‌ । कहीँ प्रवाहमा बग्ने र कहीँ तानतुनमातन्किने अर्याल विस्तृतिमा नामृद छन्‌ । अझ घनलत्वले गर्दा पिँडालीकोहास्यव्यङ्कग्य कला जति परिष्कृत-परिमार्जित देखिन्छ, त्यत्तिकै सफाइ भैरवअर्यालले प्राप्त गर्न बाँकी नै रहेको छ । भनूँ, हास्यव्यङ्ग्यकार पिँडालीको&lt;br /&gt;
सुगठित कलात्मकताका तुलनामा हास्यव्यङ्गग्यकार अर्याल फैलाबटको जादुअङ्गीकार गर्छन्‌ । स्वभावतः बेधकता पिँडालीमा ज्यादा छ भने मोहकताअर्यालमा बढी । च्वास्सच्बास्स सिरुले झैँ घोच्न सक्नु पिँडालीकोहास्यव्यङ्ग्य कलाको मर्म हो भने घोचघाचभन्दा हाम्रो सामाजिक जिन्दगानीकोवर्णण-विश्लेषण घतलाग्दो र कृतकृत्याउने ढङ्गले गर्न सक्नु अर्यालकोहास्यव्यङ्ग्य कलाको वैशिष्टच । अनुप्रास वा शब्दवैचित्र्यको मिठास भर्नमाअर्याल खप्पिस छन्‌, पिँडाली शब्द तौलिएर मितव्ययितासाध काम फत्ते गर्नमासिपालु छन्‌ ।&lt;br /&gt;
सामाजिक संस्कारमा प्रवक्ताका रूपमा भैरव अर्याल निकै-निकै विस्तीर्णदेखा पर्छन्‌ । सानातिना कुरालाई लिएर हास्यव्यङ्ग्यको सृष्टि गर्ने पिँडालीमासक्ष्म-बोध भेटिन्छ भने समाजको बिस्तृत पाटोका संस्कार औँल्याउने अर्यालमाव्यापक-बोध झल्किन्छ । यसरी हेर्दा पिँडाली र अर्यालका सामग्री, पद्धतिप्रबिधि र प्रभाव समानभन्दा ज्यादा असमान भएर तेर्सिन्छन्‌ । यस्तो तुलनालाईअझै तन्काउन सकिन्छ तापनि दुवैका हास्यव्यङ्ग्य रचना हेर्दा प्राप्त मूल्यकोनिर्णय गर्नुतिर तम्सिनु नै बेस होला । ऐतिहासिक महिमा पिँडालीलाई प्राप्तछ, बिकास-सम्भावनामा अर्यालमा ज्यादा अङ्कुरित छन्‌ । हास्यव्यङ्कगयकासफल प्रयोगकर्ताका रूपमा अर्याल मात्रै पिँडालीका नजिक छन्‌ र पिँडालीमात्रै अर्यालका समीप छन्‌ । परिमाणद्वारा अर्यालले पिँडालीलाई उछिनिसकेकाछन्‌ । सम्भावनाद्वारा पिँडालीलाई हाँक दिइरहेका छन्‌ अर्याल । तैपनि पिँडालीकम अर्याल ज्यादा हास्यव्यङ्ग्य रचना लेख्तै छन्‌ । दुवैका रचनाका क्रम रप्रक्रिया थान्को नलागुन्जेल अन्तिम मूल्याङ्कन गर्नु त्यति सामयिक र सुसङ्गत ॥हँदैन कि ! दुवै चम्किएर लेखून्‌, सृजनात्मक प्रतिस्पर्धा अझ चर्कियोस्‌ अनितपाईं-हामीजस्ता रमितैका निम्ति हास्यव्यङ्ग्यको रामरमिता अझ उत्तेजक-उपयोगी बनोस्‌- यही हाम्रो मन्त्र हुनुपर्छ । यी दुवै खप्पिस र मापाकाहास्यव्यङ्ग्यकारका कानमा नपरोस्‌ नि ! सुटुक्क तपाईंहरूलाई भनेको !&lt;br /&gt;
(ङ) हास्यव्यङ्ग्यकार भैरब अर्यालको क्षौरक्रिया गर्ने साइत आइपुग्योअब सायद । हाम्रो प्रवृत्ति-दुर्बलताको अङ्कन गरिरहने हास्यव्यङ्ग्यकारकाप्रवृत्ति-दुर्बलताको चियोचर्चो गर्नु पनि रमाइलै अनुभव हो । अर्याल मूलतःसामाजिक संस्कारका हास्यव्यङ्ग्यकार देखा परेका छन्‌ । सङ्क्रमण बेलाकोहाम्रो समाजका अन्तव्यस्ततालाई नियाल्दा साहित्यमा पनि एक सिङ्गै युगव्यङ्ग्यमय भएको भए स्वागतयोग्य नै हुन्थ्यो भने अर्यालको सामाजिक संलग्नता&lt;br /&gt;
ठीकै कुरा हो । तर अर्यालले काठमाडौँ उपत्यकाबाहिरको जनजिन्दगीलाईआफ्नो हास्यव्यङ्ग्यकलाद्वारा लगभग केलाएका छैनन्‌ । यो उनको सीमा हो ।साथै ठाउँविशेष र बेलाविशेषका आनीबानीको चित्रण समसामयिक सन्दर्भमाजति महत्त्वपूर्ण भए पनि कलात्मक शाश्वतीकरणबिना हास्यव्यङ्ग्यकार स्थायीमूल्य भेट्टाउन समर्थ बन्न सक्तैन । यो कलात्मक वैशिष्टच अर्याल भर्खरभर्खरैप्राप्त गरिरहेका छन्‌ । इतिश्वी यस दृष्टिले निकै सक्षम भए पनि कलात्मकचमकको चरमोत्कर्ष अझै बाँकी देखा पर्छ । साथै सामाजिक स्तरभित्रै मानवीयस्तर प्राप्त गर्न सक्नुपर्छ, उत्कृष्ट हास्यव्यङ्ग्य रचनाले । देशकालको सीमानाघेर पनि युगयुग र देशदेशान्तरमा प्रभावशाली बन्न मान्छेका मानसिक-बौद्धिक जीवनका खासखास बा मूलभूत प्रवृत्तिसँग दृष्टि पुच्याएरै अमरहास्यव्यङ्ग्यकारहरू देखा परेका छन्‌ । यस मनोलोक र मस्तिष्कजगत्‌ वाअन्तस्करणका स्थायी विसङ्गति, बद्धता र पिरला-हुटहुटीका सजीव-सशक्तचित्राङ्कन र व्यञ्जनाद्वारा नै हास्यव्यङ्ग्यकार अर्यालको कला पनि प्रौढ हुनसक्छ । “कमेडी अफ ह्युमर&#039; वा मानवीय प्रवृत्तिको सुखान्तकको नजिकनजिकपुग्नु वाञ्छनीय देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
अर्यालको हास्यव्यङ्ग्य रचनामा &#039;जे जस्तो छ&#039; को बोध पर्याप्त भएपनि &#039;जे जस्तो हुनुपर्छ को सूक्ष्म व्यञ्जना कम छ । साथै दृष्टि-विस्तार रत्यसका काउकुती निकै प्रभावशाली भए पनि वेधकताको मात्रा अपर्याप्तपाइन्छ । आत्मदर्शन अर्यालका हास्यव्यङ्ग्यका विलक्षण दर्पणमा बेसरी गर्नसकिन्छ तर आत्मबेधनको अवसर कम उपलब्ध छन्‌ ।&lt;br /&gt;
हास्यव्यङ्कग्यकार अर्याल शाब्दिक जादुमा निकै रमाउँछन्‌ र शब्द-क्रीडाको मात्रा कतैकतै सिमाना नाघ्छ र प्रतिपाद्च अलमलिएअलमलिएझैँअनुभव कहिलेकाहीँ भइदिन्छ अनि अङ्ग्रेजी शब्दको डन्डीनियो खेल्छन्‌ ठाउँठाउँमाउनी । हाम्रा व्यावहारिक जीबनमा पनि हामी यस्तो गरिटोपल्छौँ, त्यसकोअतिरञ्जनाका सन्दर्भमा यस प्रयोगशीलतालाई स्वीकार्न पनि सकिएला । तरकेही तात्कालिक चमत्कार बढाउनकै निम्ति अङ्ग्रेजी शब्दसँग खेल्नुले चाहिँअर्यालजस्ता चोखो-मीठो नेपाली भाषामाथि असाधारण अधिकार भएकाहास्यव्यङ्ग्यकारलाई शोभा दिँदैन । &#039;भाषा अपर्याप्त छ&#039; जन देवकोटा भन्छन्‌उनी आफैँ कमजोरी ओकल्छन्‌ जस्तो अनुभव हुन्छ । हामी साहित्यकारलाईजातीय भाषाका नयाँनयाँ सम्भाव्य खोज्दै भावको बाइपङ्खी घोडालाई सम्बद्धभाषाको मुलुक-सीमामा नचाउन सक्ने पौरखी ठान्छौँ ।&lt;br /&gt;
भ्वैरव अर्यालको हास्यव्यङ्ग्यकला फाटफुट कृतिमै रलमलिएको पाइन्छ ।जीवनको विस्तृत हास्यव्यङ्ग्य अङ्कनका निम्ति प्रबन्धरचनाको शिखरसम्मलेखकले उक्लन सक्नुपर्छ । एउटा बृहत्‌ आयोजनाले बिभिन्न स्तरमा जीवनकोविराटतालाई अभिव्यक्त गर्न जुन सन्दर्भ दिन्छ, त्यसको स्वीकारबिनाहास्यव्यङ्ग्यकारले पनि चरम प्रौढता प्राप्त गर्न गाह्रो पर्छ । अनि भैरव अर्यालकोहास्यव्यङ्ग्य कलाले अधिकाधिक घनत्व, परिष्कार, परिमार्जन अनि कस्सिलोपन,सङ्घटितता ।हाम्रो शरीररचना बा बनस्पति-रचनाजस्तै) र शालीनता प्राप्तगर्नु काम्य देखा पर्छ । नेपाली हास्यव्यङ्ग्य साहित्य स्विफ्ट, डिकेन्स, कृशनचन्दरवा हरिमोहन झाको स्तरीयताभन्दा पनि माथिमाथि उखोस्‌ भन्ने परिकल्पना-क्रममा हास्यव्यङ्ग्यकार भैरव अर्याललाई आमन्त्रित गर्दा यी तीता-टर्रा टिप्पणीकोकोसेली चढाउन सकिन्छ । &#039;तीतो-टर्रोबाट समाप्त गर्छु&#039; -मेरो वाचाबन्धनभएकाले कलम-विश्वामको अनुमति माग्छु । जो आज्ञा !&lt;br /&gt;
- बासुदेव त्रिपाठीमुकाम- कीर्तिपुरइति संवत्‌ २०२८ साल भदौ १३ गते रोज १ सानो साँझ शुभम्‌ ।&lt;br /&gt;
केही राष्ट्रिय रोग : एक अनुसन्धान&lt;br /&gt;
कोही डाक्टरसाहेबहरू स्टेथोस्कोप फ्याँकेर झन्डा भिर्न कद्नुभयो,केहीचाहिँ डाक्टरी गर्नुमा भन्दा फ्याक्टरी खोल्नुमा फाइदा देख्न थाल्नुभयो ।यस्तै कसैमा प्रशासनको आकर्षण थपियो, कसैमा प्रकाशनको धुन थपियो ।डाक्टर लेख्ने लाइसेन्स पाएका तर डाक्टरी गर्ने सेन्सचाहिँ नपुगेकाडाक्टरसाहेबहरू भूतपूर्व मन्त्रीहरू बढेझैँ जतिसुकै बढे पनि के लाग्यो र,बिरामीको सङ्ख्या बेकार स्नातकभैँ दिन दोब्वर रात चौबर बढेको छ, छ ।नपत्याए निःशुल्क अस्पतालहरूमा हेर्न जानोस्‌ कक्षमा मानौँ एउटा भव्यप्रोसेसन नै चलेको हुन्छ । तै हाम्रा कतिपय डाक्टरसाहेबहरू स्टेथोस्कोपसुँघाउनासाध रोगको गन्ध पाइहाल्नुहुन्छ र मात्रै हो, नत्र गयाका पण्डाले श्राद्धगराएकैँ आएजति बिरामीलाई लस्करै राखी आफ्नोआफ्नो रोग सम्झेर ममभन्नोस्‌ है भनी सामूहिक जाँच गर्नुपर्ला भनेजस्तो भइसकेको छ । यसै तटेलिफोनको कल आयो कि दमकलभैँ कृद्नुपर्ने डाक्टरी पेसा, त्यसमाथिटोलटोलमा बिलिनिकको साइनबोर्ड &#039;झुन्डयाएर प्रतीक्षारत औषधिपसल । योअसल कि उ असल ? सबभन्दा राम्रो आफ्नै बिरामी- प॒सल । अब तपाईं नैभन्नोस्‌, यस्तो बेफुर्सदीको अवस्थामा डाक्टरसाहेबहरूबाट नयाँनयाँ रोगकोरिसर्च कसरी होला ? 2&lt;br /&gt;
त्यसैले त आजदेखि यो महत्त्वपूर्ण कार्यभार मैले लिँदै छु । मैले नैनलिई नहुने कारण अर्को के पन्यो भन्नुहुन्छ भने मेडिकल साइन्स हाम्रो विद्यानै होइन । समुद्रपारिको साइन्स पढेर टुक्चावारिपारिका रोगहरूको रिसर्चकसरी गर्ने ? मेडिकल साइन्स मात्र पढेको डाक्टरसाहेब कसैलाई एक दिनबिहान विष्णुमतीको भ्रमण गराइदिनोस्‌, त्यहाँको पोजिसनबद्ध प्रोसेसन देख्ताउहाँ पक्कै सोच्नुहुनेछ काठमाडौँमा कलेरा बढेछ । वास्तवमा त्यो कलेराहोइन, काठमाडौँ सहरको टिपिकल रोग हो भन्ने कुरा उहाँलाई कसले&lt;br /&gt;
१९८ ४ भैरव अर्यालका हात्यव्यड्ग्य&lt;br /&gt;
बताइदैओस्‌ । त्यस्तै दिन बैँसैमा कृप्रिएका कतिपय तन्नेरीलाई देख्ता डाक्टरसाहेबआत्तिँदा हुन्‌... धनुष्टङ्कारले धेरैलाई खतम पार्न लागेछ; वास्तवमा उहाँलाईकसले बताइदैओस्‌; यो धनुष्टङ्कार होइन, पौने पेटको चमत्कार हो । अधिकांशनेपालीहरू साँझबिहान घरमा पौने पेट पाने- रोटी, दिउँसो होटेलमा हाफप्लेट आलुदम खान्छन्‌ भन्ने रहस्य मेडिकल साइन्सका पुस्तकमा कहाँ लेखेकोछ र ? हामी भिँडेखोर्सानीमा भिटामिन &#039;ए&#039; पाउँछौँ, भ्यान्टामा भिटामिन &#039;भी&#039;देखि &#039;जेड&#039; सम्म; टिनका भाँडाकुँडामा परेजति पदार्थ स्वतः प्रोटिनभ्रैहाल्छन्‌; कालो भाँडामा पाकेजति सबै क्याल्सियम । त्यसैले त म भन्दै छुअब घन्वन्तरिको आयुर्वेद, हिप्पोक्रेटिसको एलोप्याथी र ह्यानिम्यानकोहोमियोप्याथी कुनैबाट पनि हाम्रो देशका खासखास रोगको पत्ता लाग्न सक्तैन !तर धन्दा नमान्नुहोस्‌, मैले शास्त्रै नयाँ आविष्कार गरेको छु- आधुनिकनेपालोप्याथी ।&lt;br /&gt;
यो नयाँ अनुसन्धान र आविष्कारमा लागेबापत मैले पनि कमसे-कमहाललाई कायममुकायम डाक्टरको दर्जा त पाउनै पर्ने हो, तर हाम्रो समाजकोआधुनिक परम्परा अलि बेग्लै छ, मैले रोगहरूको अनुसन्धान गर्न लागेकोसुइँको पाउनासाथ कतिपय डाक्टरहरू हाम्रो अधिकारमा हस्तक्षेप गत्यो भनीउजुर गर्न पाल्नुहुनेछ; कोही इृष्टमित्रचाहिँ यो छुसीले चाहिँदो- नचाहिँदोआयक्टिभिटी देखाएर हामीभन्दा माथि पुग्ने दाउ ल्यायो भनी खुट्टो तान्नथाल्नुहुनेछ । कोही बान्धव फलानाको मगज त सुइँकेछ नि भन्दै सम्भावितभैन्टल हस्पिटलको पेसेन्टलिस्टमा मेरो नाम दर्ता गराउन पुग्नुहुनेछ भने कूनैहितैषी साथीले चाहिँ फलानाको दृष्टिकोण अलि बक्र छ है भन्ने जनाउ ठाउँमापुच्याएर भद्रगोल जेलको बेटिङ लिस्टमा मेरो नाम टिपाउन सहयोग गर्नुहुनेछ ।तर जोसुकैले जेसुकै भने पनि मेरो अनुसन्धानलाई भोलिको समाजले ठीकभन्नुपर्नेछ र मरणोपरान्त एउटा ठूलो पुरस्कार मेरो नाममा पन्छाइनेछ भन्नेनिश्चित छ ।&lt;br /&gt;
दिव्य बाह्र घण्टाको अनुसन्धानपछि नेपालोप्याधीअनुसार मैले केहीनयाँ रोगहरू पत्ता लगाएको छु र यिनको भाव-प्रभाव दुभदा म के निष्कर्षमापुगेको छु भने आधुनिक नेपालका यी राष्ट्रिय महारोग हुन्‌ । यी बिसेकनभएसम्म न देश स्वस्थ हुन्छ, न देशवासीकै इच्छा पुग्छ । यो के झर्कोलाग्दोभूमिका भट्टघाइरहन्छ;. रोगै बताइदिए त भैहाल्यो नि भन्नुहोला; लौ टिप्तैजानोस्‌-&lt;br /&gt;
केही राष्ट्रिय रोग : एक अतुतन्धात ” १९९&lt;br /&gt;
नं. १- अहिलेसम्मका डाक्टरसाहेबहरूलाई जोन्डिस मात्र थाहा छ;उहाँहरू भन्नुहुन्छ- जोन्डिसमा रोगीहरूको आँखा पहेँलो हुन्छ र उसले सबै&#039;पहेँलै देख्न थाल्छ । तर नेपालोप्याथीअनुसार जोन्डिसभन्दा खतरनाकमहाजनेन्डिस भन्ने रोग हुन्छ । यो लागेपछि रोगीका आँखा साह्रै विचित्र भईबदलिन्छन्‌ र उनीहरूले आफूबाहेक अरू कसैलाई मान्छे नै देख्तैनन्‌ । धाक-रबाफ र कदु जबाफ यस रोगका प्रारम्भिक लक्षण हुन्‌; रोग बढ्दै गएपछिरोगीको हात लुलो तर जिभ्रो तीखो हुँदै जान्छ । क कसैसित मिलेर काम गर्नसक्तैन; त्यसैले एउटा आरामकुर्सीमा राखेर दिनभर आत्मपु्राण फलाकिरह्‌भनी छाडिदिनुपर्छ । महाजनेन्डिस पोज, मोज र भोजबाट फैलने रोग हो ।बेलामा उपचार हुन नसके रोगीज्यूहरू सम्झेजतिलाई सराप्तै गल्लीगल्लीभुस्याहा कुकुर घुकाएर रल्लिन थाल्नुहुन्छ । यो रोग प्रायः बुद्धिजीवीवर्गमालाग्दछ ।&lt;br /&gt;
नं. २- गनेरियाजस्तै अर्को नयाँ रोग पत्ता लागेको छ- चमेरिया । तरयो जाँघबाट होइन, जिभ्राबाट पस्ने रोग हो । यसले छुनासाथ मान्छेको जिभ्रोचिरिएर आउँछ र केही दिनपछि नै दुई फ्याक हुन्छ । एक फ्याकले “डाक्टरसाहेबनमस्ते भन्छ, अर्कोले &#039;डाक्टरसाहेब मरेस्‌&#039; । चमेरियाका रोगीको आँखा चनाखाहुन्छन्‌ । हात लामो हुन्छ । यो रोग लागेको पहिले कत्ति पनि चिनिँदैन, यसैलेरोगीले सबैका ढोकामा सम्मानसाथ प्रबेश पाउँछ, तर धोका नदिई निस्कनसक्तैन । चमेरिया अन्तिम स्थितिमा पुगेपछि रोगीको सर्वाङ्गग सिनोझैँ गह्नाउनथाल्छ तर गह्नाउनुभन्दा अघि नै रोगीले धेरैलाई आफ्नो रोगको कृप्रभावपारिदिइसकेको हुन्छ । चमेरिया भन्ने रोग राजनीतिक रन्डीबाजीबाट उत्पन्नभएको हो भन्ने कुरा उहिल्यै पत्ता लागिसकेको छ ।&lt;br /&gt;
नं. ३- खास गरी जागिरदारहरूलाई बराबर दु:ख दिने अर्को नयाँ रोगछ- पद प्रेसर । ब्लड प्रेसरजस्तै यो पनि दुई किसिमको हुन्छ- हाईपद प्रेसर,लोपद प्रेसर । हाईपद प्रेसर लागेको छ भने हरहमेसा जाँडको पुङ्गोमा डुब्नेमान्छेको खप्परबाट पनि अपुङ्गोको बास्ना आउँछ, आफ्नो नाम लेख्न जानेपछिजुनसुकै काम गर्न सकिन्छ । लो प्रेसरले सताएको छ भने कानमा भयाउँभयाउँगरेर हिँड्न-सुत्न दिँदैन । जति माथि पुग्यो उति लो प्रेसरले सताउँछ । यसलाईकरकर पनि भन्छन्‌ । तर हाई वा लो जुनसुकै प्रेसर लागे पनि नियमकानुनभनी मुख बारिरहनु पर्दैन ।&lt;br /&gt;
नं. ४- नेपालोप्याथीअनुसार अर्को एउटा चर्को रोग पत्ता लागेको छ-&lt;br /&gt;
२०० ४ भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
कन्स्‌त्ले । कहाँकहाँ कसकसले केके कुरा गरे, ती सब पहिले शान्त भएरआफ्ना कानभित्र पार्नु र जोजौसँग सम्बन्धित छ, उसउसका कानमा सुलुत्तपसालिदिनु कन्सुत्ले रोगको प्रमुख लक्षण हो । कन्सुत्ले लागेका रोगीहरूजाँचताकाका ट्युसन मास्टरभझैं अथवा सोरसरादका पुरेतबाजेझैँ अधवा भनूँदसैँका फौबन्जारफँ चौबीस घण्टामा पच्चीसतिर पुगेर कुराको लेनदेन गर्दछन्‌ ।कतै केही पाइएन भने &#039;बुभ्नुभौ फलानाज्यू, तपाईंलाई फलानाले फलान्थोकभन्थ्यो है&#039; भनी मनगढन्त क्रा सुनाएर पनि कन्सुत्लेहरू एकअर्काका बीचफाटो पारेर आफ्नो जिभ्रो कन्याउँछन्‌ । &#039;फलानाले फलानो दिन ठीक यति बजेयतिपल्ट डकात्यो; त्यसैले त्यो दिन राति उसले कतैबाट एउटा बासी पेडाखाएको हुनुपर्छ&#039; भने जस्ता अनुमान गरी त्यो पेडा ख्वाउने को होला र किनख्वायो होला भनी गम्दागम्दै रातभर ननिदाउने कन्सुत्ले रोगीहरू पनि मैले धेरैपत्ता लगाएको छु ।&lt;br /&gt;
नं. ५- बिफरजस्तै अर्को चर्को सङ्क्रामक रोग पत्ता लागेको छ- रेमेनिया । तिलजत्रो कारणबाट पहाडजत्रो सम्भावना सोची हल्ला गर्दै हल्लिनुदे&#039; नेनियाको पहिलो लक्षण हो । टाइमचोर र कामचोरलाई यस रोगले बढीआक्रमण गर्छु । नेपालेप्याथीअनुर रे&#039; मेनियाका रोगीहरूमा सोच्ने शक्ति रतर्क गर्ने क्षमता केही हुँदैन; त्यसले उनीहरू फुटपाथमा उभिएर मन्त्रिमण्डलकोसूची बनाउँछन्‌, साइकलमा गुडेर नवग्रहको निर्णय सुनाउँछन्‌ । अझमेनियाका रोगीलाई यसपालि तिम्रो पनि भाग्य खुल्ने सम्भावना छ रे भनिदिनू,उसले स्वास्नीको सारी बन्धकी राखेर एउटा आडमभान्स पार्टी बोलाउन बेरछैन ।&lt;br /&gt;
नं. ६- नेपालोप्याथीले अर्को एउटा नयाँ रोग पत्ता लगाएको छ, जसकोनाम हो नामाञ्ची । हुन त दुनियाँमा जति मान्छे जन्मन्छन्‌ सबैलाई आफ्नोनाम राख्नै धोको हुन्छ । तर जब यो सामान्यबाट असामान्यमा परिणत हुन्छ,नामाञ्चीको रोगले छोएको बुभनुपर्छ । आलुबारीको उत्खननदेखि शौचालयकोशिलान्याससम्म के गरेमा ठूला अक्षरमा नाम छापिएला भन्ने नामाञ्चीकोध्याउन्न हुन्छ । रेडियोमा दिनको पन्ध्रोटा फर्माइसी पठाएर हुन्छ कि, सागपातकेलाउने समितिको अध्यक्ष भएर हुन्छ कि, दिनको चारोटा भाषण गरेर हुन्छकि, साताको एउटा वक्तव्य प्रकाशित गरेर हुन्छ, नामाञ्चीका रोगीहरूलाईनामै चाहिन्छ । नेपालोप्याथीमा उल्लेख भएअनुसार दुनियाँको बजारमा नामकोभाउ साह्रै महँगो छ; बिनाकाम नाम आउँदैन, तर नेपालका नामाञ्चीहरूलाई&lt;br /&gt;
केही राष्ट्रिय रोग : एक अनुसन्धाव ” २०१&lt;br /&gt;
कामकुराको होइन, नामसुराको तिर्खाचाहिँ यस्तरी लाग्दछ कि कोठाको भित्ताभरिआफ्नो शुभकामना आफ्नै हस्ताक्षरमा लेखेर पनि उनीहरू तिर्खा मेदनसर्माउँदैनन्‌ ।&lt;br /&gt;
नं. ७- नेपालोप्याथीले अन्त्यमा एउटा व्यापक रोगको चर्चा गरेकोछ । अधिकांश जनतालाई बराबर दुःख दिने यस महारोगको नाम हो-पकेटोक्य्रासिस । भ्याउरे अनुहार, दाउरे जीउ र चाउरे गाला पकेटोक्ग्रासिसकालक्षण हुन्‌ । यो बढ्दै गएपछि फेमेलियोसाइटिस पनि हुन सक्छ भनी एकअनुभवीले बताएका छन्‌ । खास गरेर यो रोग शिक्षित बेकार र न्यूनबैतनिककामदारहरूमा बराबर लागेको देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
&amp;quot;अहिले पत्ता लगाएका मुख्यमुख्य रोग यिनै हुन्‌ । अनुसन्धान गर्दै जाँदाकेरिफेरि पत्ता लागेका जति फेरिफेरि बताउँदै जाउँला भन्ने उम्मेद छ; अबमलाई डाक्टरको दर्जा दिने कि नदिने त्यसबारे तपाईंहरू छलफल गर्दै गर्नुहोला ।&lt;br /&gt;
यतीबन्धु&lt;br /&gt;
२०२ “ भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
भान्सा भो हजुर ?&lt;br /&gt;
“भान्सा भो हजुर ?”&lt;br /&gt;
आँखामा सूर्यदेवको झुल्को पर्न नपाउँदै कानमा सूर्जे साहको आवाजगुञ्जिन आइपुग्छ । निद्रा भट्टीवाल्नी कान्छीभैँ हत्त न पत्त घैँटो लुकाउँदै जीउटकटक्याउँछे, सपनाहरू पुलिसको आबाज सुनेका जुवाडेहरूकैँ कोही खाटमुनिलुक्छन्‌; कोही भ्यालबाट हामफाल्छन्‌, । पिलिक्क आँखा उघार्दा मिलिक्क उहीबूढो साह महिना सुनाउन आएका बाजेभैँ बिपना सुनाउन भित्र पस्छ ।झोकको भझन्भझावातमा मगज यस्तरी झनझनाउँछ कि जुरुक्क उठेर साहृजीकाचाउरिएका गालामा चड्यामचड हिर्काउँदै जबाफ दिरँ- &#039;कौवाले समेतजलपान नगर्दै तेरा बाबुले भान्सा गर्छ लट्ठू &amp;quot; तर बोल्त नपाउँदै केटाकेटी नैउसलाई उल्ल्याउन थाल्छन्‌ । म आफ्नो &#039;फोक तकियामै बिसाएर सिरकलेगुम्लुङ्गग मुख छोपी आफू नब्यूँझेको बहाना गर्छु । किनभने एकैछिनकोध्यानदृष्टिले मलाई यो तथ्य पत्ता लगाउन गाह्ठो पर्दैन- साह्‌ अहिले भान्साभएको-नभएको सोध्न आएको किमार्थ होइन, क त अघिल्लै महिना भान्सागरेको एक मुरी चामलको उधारो उठाउने उद्देश्यले मलाई ओछ्यानैमा उठाउनआइपुगेको हो । त्यसैले देशको एउटै प्रश्नबाट नेताहरूले बेग्लाबेग्लै अर्थझिकेझैँ साहजीले एकाबिहानै सोध्न आएको “भान्सा गर्नुभो&#039; भित्र धेरैधेरै अर्थलुकेको मैले पाएँ । पहिलो त हो- उसले कति दिन मेरा भान्सा चलाइदिएकोथियो । कजस्तो अन्नदाता साहकहाँ मुखै नदेखाई अचेल म कसरी भान्सागर्छु ? न हिजोअस्ति मेरो परिवारले भान्सै गरेको छैन कि ? म एउटा जागिरजीवीअधिकृत, पसलेको उघारै नखाई महिनाभर भान्सा गर्न-गराउन सक्छु र ?उसको सोधाइको अझ सबभन्दा चुरो अर्थ के होला भने आफूले उधारो भान्सागरेबापत उसलाई तिर्नुपर्ने रुपियाँ यतिन्जेल नतिरेकोले त्यसको पनि मैलेभान्सा गरिदिएँ कि ? उच्यारो खाने पनि कुनै निश्चित समय र स्थान हुन्छ र ?&lt;br /&gt;
भ्वान्सा भो हजुर ? “ २०३&lt;br /&gt;
उधारौ, रिन, घूस, कमिसन, नाफा, नजराना भन्ने कुरा कौवाको बच्चालेजलपान नगर्दै खाए पनि हुन्छ रे, लाटाकोसेराका बच्चाले न्यासध्यातत नगर्दैसिद्ध्याए पनि हुन्छ रे । यसरी रहस्य उघार्दै जाँदा उसले एकाबिहानै भान्साकोप्रश्न उठाएबापत उठेको झोक नशाले छाडेपछिको आत्मज्ञानझैँ आत्मर्लानिमापरिणत हुन्छ । म सिरकभित्र दुम्सीले झैँ जीउ खुम्च्याएर दम्पच पारी आफूलाईलुकाउन खोज्छु, तर हिजो बेलुका गरेको काँचोकचिलो भान्साले भुँडीभित्रैबाटध्वालालल्ल गरी शौचालयको निम्ता दिन्छ ।&lt;br /&gt;
भान्साको कुरा गर्दागर्दै शौचालयको कुरा झिक्ता तपाईंलाई अलिबीभत्सताको गन्ध आउला, वास्तवमा यी दुईको सम्बन्ध टिप्पणी र आदेशकोसम्बन्धजस्तै घनिष्ठ छ । भान्सा एउटा टिप्पणी हो भने शौच एउटा आदेशहो । दार्शनिक भाषामा भान्सा भोगभूमि हो भने शौचालय त्यागतीर्थ हो ।साँच्चै भनूँ भने आजको जटिल र व्यस्त जीवनमा शौचालयजस्तो आनन्दीठाउँ अर्को कनै छैन; कारण यहाँ उधारो उठाउन आएको साहले मात्र होइन,उधारो खान बाध्य गराउने केटाकेटीकी माउले पनि झिँजोल्न पाउन्न । कमसेकमएकान्त साधना र आत्मचिन्तनको एउटा शान्त आश्रम शौचालय नै हो ।त्यसैले म आश्रमभित्र पसी आर &#039;- 7एर आत्मलीन हुँदै चिन्तन गर्न थाल्छु-मानौँ मलाई भान्सा गर्नुको अथबोध हुन लाग्छ ।&lt;br /&gt;
भान्सा गर्नु भनेको खानु हो । खानु भनेको कुनै पदार्थलाई मुखद्वारबाटप्रबेश गराई आन्द्रेमार्गद्वारा भुँडीभण्डारसम्म पुस्याउनु हो । तर खानुसित बढीमोह भएर हो कि खानुको समस्याले बढी सताएर हो नेपालीहरूले यसकोअर्थविस्तार यस्तरी गरेका छन्‌ कि तन्काउनु र सुर्क्याउनुलाई पनि खानु नैभन्तिदिन्छन्‌ । उदाहरणको लागि हामी चुरोट पनि खान्छौँ । चिया पनि खान्छौँ ।पाए रम पनि खान्छौँ, नपाए गम पनि खान्छौँ । तर अरू खानुसित त्यति चासोहुँदैन; हाम्रो खास खानु भात खानु हो । त्यसैले साँझबिहान टुप्लुक्क कोहीआइपुग्यो भने ढोगभेटपछिको दोस्रो प्रश्न हुन्छ- &#039;भात खानुभो ?&#039;&lt;br /&gt;
भात खानु भनेको ज्यूनार गर्नु, भोजन गर्नु, भान्सा गर्नु, हसुर्नु, घिच्नु रधोक्य्राउनु पनि हो । धनधान मानसानले ज्वाज्वल्यमान मानिसहरू ज्यूनारगर्छन्‌, हलो जोतेर खानुपर्ने परिश्रमीहरू सायद हसुर्छन्‌, धोक्रा बोकेर ज्यालाकमाउनेहरू सायद धोक्ग्राउँछन्‌ र साह्रै हिन्नेती ठहरिएका वा रिस उठेकामान्छेहरू घिच्छन्‌ । कमसेकम आफूलाई सन्तोष के छ भने हिजो बेलुकापानेरोटी धोक्य्राएको भए पनि, सुक्खा रोटी टोकेको भए पनि रिसाएको साहले&lt;br /&gt;
२०४ “ भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
कमसेकम यसरी त सोधिदिएन- &#039;घिच्यो बाज्या : धोक्य्रो साहेब ? हसुर्नुभोहजुर ?&#039;&lt;br /&gt;
अर्थ उही भए पनि ज्यूनार गर्नु, भान्सा गर्नु, भात खानु र घिच्नुकोध्वनिमा ठूलो अन्तर छ । ज्यूनार भन्नेबित्तिकै चौरासी व्यञ्जनका दर्जनौं-दर्जन रिकापीहरू वरिपरि सजाएर बडेमानको थालमा घिउ चुहिने दुई पन्यूँमसिनाको मसलादार भुजा पस्किएर चम्चाले एकपछि अर्को रिकापी चहारेकोदृश्य ध्वनित हुन्छ । भान्सा गर्नु भन्दा कमसेकम दालभात तरकारीको साथैट्वाक्क एक थोक अचार, चार चौटा मासु या एक गिलास दूधर एक-दुईओटाफलफूलको बास्ना आउँछ । भोजन गर्नु भन्दा निम्तालु बाहुन वा जोगी वाज्वाइँ, भानिजले निमन्त्रकको घरमा कुनै धार्मिक चाडपर्वमा दक्षिणासमेत लिईखीर, मालपुवा वा एक टपरी दहीभात बजाएको बुझिन्छ । भात खानु मात्रभन्दा सिलाबरको बा पित्ले थालमा पस्केको रातोरातो चपरी भात केही नकेही एक थोक तरल तिहनसित मुछेर गाँस हाल्नु भन्ने बुझिन्छ । अधिकांशभद्वभलादमीकहाँ भात खाँदा फलफूलको त कुरै छाडौँ दालतरकारीको पनिनियमित प्रबन्ध हुँदैन, केवल भात खाए पुग्छ । यसैले प्रायः दालतरकारी खाए-नखाएतिर वास्तै नराखी हामी सोध्ने गछौं- &#039;भात खायौ ?&#039; त्यही, भात पनिउसिनाको पस्यो वा चामलको कायममुकायम मकै, कोदो, फापर या चनालेगराउनुपन्यौ र जिभ्रामा अड्काईअड्काई निल्नुपच्यो भने त्यसलाई घिचेकोभन्नमा कुनै आपत्ति छैन । कति जनालाई रिस उठाएर वा कतिदेखि रिसाएरगर्नुपर्ने हामीजस्ताको पेट भर्ने क्रियालाई &#039;भान्सा गर्नुभो ?&#039; भनी सोध्नुसट्टा&#039;घिच्नुभो ?&#039; भनी सोधे स्वाभाविकै ठहरिएला कि भन्ने मलाई लाग्छ ।&lt;br /&gt;
त, शौचालयमा यति ज्ञान हासिल गरी जब म बाहिर निस्कन्छु, साहजीगनगनाइरहेको सुनिन्छ- “हजुरहरूले यस्तो गरिदिएपछि हामीले के खानेए ?” भनिदिङँ जस्तो लाग्छ- &#039;तिमीले नाफा खाने हामीले उधारो खाने&#039;, तरत्यसो नभनी म उसलाई आश्वासन दिन्छु- “तिम्रो पैसा हामी खाँदैनौँ साहूजी !अहिले केही दिन कम्पनीको हालत खराब भएकोले तलब आएको छैन,आउनेबित्तिकै पुस्याउन पठाउँला !” मेरो भद्र आश्वासनले साहृजी त आश्वस्तभएर जान्छ । तर भान्सा विभागकी अध्यक्षा श्रीमती देवीको लम्बै टिप्पणीआदेशार्थ प्रस्तुत हुन्छ- चामल, चिनी, चना, चम्सुर, रातो माटो, मट्टीतेल,हिङ, हलेदो, हिसाबको कापी, साबुन, साबदाना, स्टोभको वासर रसल्फागुनाइडिन । अफिसको मागफाराम हुँदो हो त म त्यसलाई यस्तरी&lt;br /&gt;
भान्सा भो हजुर ? ” २०१&lt;br /&gt;
फाइलमा कोचिदिन्थेँ कि एक महिनापछि खोज्दा खोज्नै फेरि एक महिनालागोस्‌ ! तर माग पस्यो बूढीकै; सार्दाम पन्यो भुँडीकै । जहानको समस्या पनिजनताको समस्याजस्तो टारेर टर्ने हो र ? न आश्वासनले टर्छ, न भाषणले; नयोजना बनाएर टङ्गारिन्छ, न अभियान चलाएर । मैले त तुरुन्तै आदेश मात्रैदिएर पुग्दैन, निकासा नै दिनुपर्छ नत्र एकछिनपछि &#039;भात पाक्यो ?&#039; भनी सोध्नेअधिकार पनि मेरो हुने छैन; मलाई &#039;भान्सा गर्नुभो&#039; भनी सोध्ने कर्तव्य पनिकसैको बाँकी रहने छैन । त्यसैले गिजाबाट टुथपेस्टको गाँज निकाल्दै मसम्झन थाल्छु- यस महिनामा उधारो नलिएको परिचित पसले कुनै बाँकी छकि ? या सापट नलिएका कुनै साथी वा सज्जन बाँकी छन्‌ कि ? तर तुरुन्तैसम्झनामा कोही पनि चढ्दैन । बरु यसपालि बत्ती धेरे चढेछ- छोरो भन्छ ।पानी धेरै चढेछ- छोरी भन्छे । म पनि निकै चढेको छु भनी टेलिफोनले घण्टीठोक्छ- टिन्न ।&lt;br /&gt;
आधुनिक जीवनमा घण्टीको पनि घनिष्ठता छ भन्ने कुरा मान्नै पच्यो ।प्रसूतिगृहमा आमाको गर्भबाट जब म खुत्रुक्क ओलेथेँ, नर्स दिदीले टिङ्रिङ्गघण्टी बजाई मेरो धरावतरणको सलामी दिइथिन्‌ रे ! त्यसैले स्कूल-कलेजदेखिघर-अफिससम्म नाना थरीको घण्टीले मलाई छाडेको छैन । बेला न कुबेलाकोयो घण्टीदेखि यति झोक चल्छ कि उठाउँदै नउठाइदिउँ ? तर कुनैभाग्यविधाताको घण्टी रहेछ भने के गर्ने ? त्यसैले उठाउँछु- भान्जीमैयाँकोमधुर स्वर गुञ्जिन्छ- “उहाँ हजुरको मामालाई नभेटी नहुने छ रे । दिउँसोभेट हँदैन भनेर हामी अहिले तीँ&#039; खाने गरी आउँदै छौँ, माइजूलाई भनिदिनुहोला-उहाँ हजुर तेलमा बनाको कुरा ज्यूनार हुन्न !” आफैँलाई सुन्न धौधौ परेकोसन्देश माइजूचाहिँलाई कसरी सुनाइदिने ? त्यसैले म रिसिभरको साथै कुरोबटारेर उतैतिर फर्काइदिन्छु- “होइन नानी, त्यस्तो जरुरी भए उहाँ हजुरलाईकिन दु:ख ! मेरो अहिले त्यतैपट्टि आउने काम छ, माइजू पनि भेट्नु छ भन्थी,भान्सा त्यहीँ ठीक गर्नू । तिम्रो मामालाई तेलमा बनाएको मात्रै होइन, मद्टीतेलमाबनाएको पनि मीठो लाग्छ भनी बज्यैलाई सुनाइदिनू ।” भान्जीमैयाँ खिलखिलाउँदैटेलिफोन राख्छिन्‌ । एक जोर पाहुना हटाउनुको साथै भान्जीकहाँ एक छाकभान्साको चुलेनिम्तो माग्ने नकच्चस्याइँमा आफू सफल भएकोमा मलाईटीएडीएसहितको विदेशभ्रमणको निम्तो माग्न सफल भएजस्तै खुसी लाग्यो ।&lt;br /&gt;
यही खुसीमा आरामकर्सीमा बसी म मग्नसँग कोसेली फुक्न थालेँ ।एकाएक एक जना बाजे चोकमा ठिङ्ग उभिएर ङ्याउरै स्वरमा पाती पढ्न&lt;br /&gt;
२०६ “भैरव अर्यालका हात्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
थाले- &#039;आब्रहमन्‌ ब्राह्मणो-ब्रह्मवर्च  &amp;quot; त्यसको मूल अर्थ न उनले बुझेकाहोलान्‌, न मैले बुझेको छु, तर भावार्थ भने भात खानु हो । यो हाम्रा केटाकेटीर आइमाई सबैले बुझेका छन्‌ । त्यसैले उनीहरूले चुपचाप लागी एक मुठीभात बनाउने गेडा झोलीमा थपिदिइहाले । बाजे हिँड्न नपाउँदै अर्को अवतारचोकमा अवतरित भयो, त्यो अवतार थियो- दही- दाजुको । दुई हातमाबडेबडे घैँटा झुन्ड्याएको, बीचमा घ्याम्पिएको गाँठोले सकिनसकी हिँड्नुपर्नेदहीदाजु टोलभरिको परिचित विदूषकजस्तो थियो । भ्यालमुनि घैँटा बिसाउँदैमलाई नमस्कार गरेर उसले सविनय निवेदन गन्यो- “तीनै बीस ११ वर्षखाइहालियो, अब दुई-चार वर्ष खानलाई पर्नु हम्मे पच्यो हजुर !” म सुनेकोनसुन्यै गरी उसको खानुको समस्या र आफ्नो खानुको समस्या जोर्न थाल्छु,केटाकेटीहरू उसलाई &#039;ठग बूढो, हन्डे बूढो, घ्याम्पे बूढो&#039; भन्दै गिज्याउँछन्‌ ।«दहीमा च्याउ मिलाएर ल्याउँछ&#039; भन्छन्‌ । तर क यस्ता टीकाटिप्पणीको कुनैवास्ता गर्दैन; न गिज्याइको वास्ता गर्छ, न खिज्याइको । खानको लागि यस्ताउपेक्षा र अपमानहरू पहिल्यै पचाउनुपर्छ भन्ने उसको जीवनदर्शन ७० वर्षदेखिकोअनुभवमा खारिएको दर्शन हो । सामान्य रूपमा &#039;दही चाहिँदैन बूढाबा&#039; भन्योभने एकपल्ट राम्रै भाषण गर्छ- “आज एकादशी, “भोलि आइतबार, यो दहीअघिपछिको जस्तो होइन, खावा दूधको दही, खावा दूधको ।” धेरैजसो कजित्छ हामी हाछौँ र दही किन्छौँ । थोरैजसो क हार्छ- रन्कन्छ, फन्कन्छ फेरिअर्को दिन दुप्लुक्क आइपुग्छ ।&lt;br /&gt;
दहीदाजुको प्रस्थानपछि दूधमैयाँ आइपुग्छे- एउटा फूलो परेको आँखोमतिर चढाएर निकै लजाएझैँ भित्र पस्छे र पहिल्यै आफ्नो महत्त्व गाउँछे-“आमालाई जाङँ न भनेको, तँ गए मालिकहरू खुसाउँछन्‌, धेरै दूध किन्छन्‌भन्छिन्‌ । हुन पनि क्या बज्यै, उ: त्यो टोलमा बस्ने देशीसाहेव छ नि, आमाले.लगेको बेला आधा माना दूध लिन्छ, म गएको बेला दुई माना लिन्छर दूधल्याएको ज्याला भनेर एक सुका पैसा बढ्ता पनि दिन्छ ।” दूधवाल्ती बूढीकोभान्सा गर्ने कलामा तरुनी छोरीको कति मद्दत रहेछ भन्ने बुभ्न मलाई गाह्रोपर्दैन । तर चुरोट बेस्कन तान्नसिवाय अरू केही बोल्दिनँ । दूधमैयाँ भयालमुनिबाटफेरि एक नजर मास्तिर चढाई लचकदार पैताला चाल्छे- म हेरिरहन्छ,हेरिरहन्छु । हेर्दाहरदै धुवाँको प्रवाहसित सम्झना-प्रवाह पाँज्जिन्छ- एउटा सेतोमुसो खोरमा पालेर ज्योतिष हेर्न टुँडिखेलको छेउमा बसेको पिलन्धरे युवक,बियरका थोत्रा टिन दुई-चारोटा बटुली सुकेनासले खाएको छोरालाई भझुम्रे&lt;br /&gt;
भान्सा भो हजुर ? ” २०७&lt;br /&gt;
स्तन चुसाउँदै बेच्न बसेकी पसल्नी, बागीश्वरीको जलप्रसाद बाँड्न दिनहुँअफिसअफिसमा चहार्ने बहिरा बागीश्वर पण्डित, दिनभरि होटेलको कप पखालेरसाँझ चिउरा, तरकारी चोरी स्वास्नी-छोराछोरीलाई चारा लैजाने होटेलब्वाय,छेपारा बटुलेर उसिनी हरेक रोगको औषधि भन्दै दिनभर चिच्च्याउँदै हिँड्नेमुसहर सबै उही भान्सा भगवतीका उपासक हुन्‌ । यस्ता प्रत्येक उपासकलाईदिनहुँ भेटेर कसले सोधिदिने- &#039;भान्सा भो हजुर ?&#039; बरु नेपथ्यबाट आफैँ फेरिसोधिन्छु- “भान्सा भो बाबू ?” मुन्टो बटार्दा जुम्लुङग उनै ठाहिँला बाजेकाछौरा उपस्थित देखिन्छन्‌ । म नमस्कार र प्रश्न दुबै फर्काउँदै सोध्छु- “तपाईँकोभान्सा भयो नि :” पढेगुनेका नभए पनि १२ हन्डर ५३ ठक्कर खाएका ठाहिँलाबाजेका छोरा भन्छन्‌- “भान्सा गर्न सकेको भए म बिहानबिहान बाबूलाईभिँजोलेर कतै बहिदार खाली भो कि भनी किन धाइरहन्थेँ बाबू !” अनि उनीभान्सा गर्नुको लामो कथा हाल्दै आँखाभरि आँसु पारेर भन्छन्‌- “हाम्रो मूलव्यथा नै भान्सा गर्नुको व्यथा हो बाबू ! त्यसैले जो पायो उह्दीसँग भान्सागरेको-नगरेको नसोध्नु नै राम्रो बाबू, नसौध्नु नै राम्रो !&amp;quot; त्यहाँदेखि मलाई पनित्यस्तै लाग्छ-नसोध्नु नै राम्रो !अभिव्यक्ति&lt;br /&gt;
२०८ भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
साथी, साथी र साथी&lt;br /&gt;
मेरा एक जना हिन्दुस्थानी साथी भन्यै- “अहिलेसम्म मैले दुई थरीसाथी पाएको छु- एक थरी &#039;हलो साथी&#039; र अर्को थरी &#039;चलो साथी&#039; । उनीयिनको परिभाषा यसरी गर्थे- &#039;हलो साथी&#039; भनेका त्यस्ता साथी हुन्‌, जोबाटाघाटामा भेट हुँदा &#039;हलो हलो&#039; भन्छन्‌; न भलो गर्छन्‌, न कुभलो गर्छन्‌ ।&#039;चलो साथी&#039; ती हुन्‌, जो आफ्नो गोजीमा केही छ भन्ने चाल पाउनासाथ &#039;चलोयार&#039; भन्दै कहिले क्यासिनोमा तान्छन्‌, कहिले बार लान्छन्‌ । अर्थात्‌ “&#039;चलोसाथी&#039; का प्रत्येक &#039;चलो&#039; मा चलिदिने हो भने दिनरात त खुबै रमाइलोसितबित्छन्‌, साँझबिहान भने बराबर बै बस्नुपर्छ ।” हिन्दुस्थानी साथीकासाथीसम्बन्धी प्रकार र परिभाषा सुनेपछि म थप्धेँ- “तर मैले त &#039;हलो साथी&#039;र &#039;चलो साथी&#039; को साथै केही &#039;भलो साथी&#039; पनि पाएको छु । तिमी मेरो यत्रोभलाइ सोच्छौँ भने के तिमी मेरो भलो साथी हुन सक्तैनौ र ?” तर परिस्थितिलेजब उसलाई मोटरमा गुडाउन थाल्यो, मलाई पैदलपन्थीको थमौती दियो,अनि हामी पनि &#039;हलो साथी&#039; का हलो साथी भयौँ । देखादेख हुँदा म एउटा हातउठाउएर हलो भनिदिन्छु, क दाँत देखाएर डिच्स गर्छ । हाम्रो साथीपन नविकसित हुन्छ, न मर्छ ।&lt;br /&gt;
जिन्दगी एउटा जात्रा न हो ! प्रत्येक बसमा, प्रत्येक बासमा र प्रत्येकअडान-उडान र लडानमा हामी कैयौँ नयाँ साथी कमाउँछौँ, कैयौँ कमाइसकेकासाथीहरूलाई गुमाउँछौँ । एक पटक म पटनामा हल्लँदै थिएँ, एक जना &#039;हलोसाथी&#039; ट्वाक्क भेट भए । बेलिबिस्तारपछि उनले प्वाक्क भनि पनि हाले-“चलो यार दिल्ली ।&amp;quot; आफू हल्लन्तम्‌ भएकोले कुनै नयाँ भाग्य अजमाउनपाइन्छ कि भनी म कसिइहालेँ । उनले रेलको टिकट किने, मैले भोजनालयकोबिल तिरेँ । हामी पाँच-छ घण्टाभित्रै यति घनिष्ठतम भयौँ कि आफ्नोआफ्नोजवानीका राम्रा-नराम्रा कहानी बेटिङ रुममा बसेर सबै एकले अर्कालाई&lt;br /&gt;
साथी, साथी र साथी ” २०९&lt;br /&gt;
सुनाइसम्यौँ । रेल आयो; सँगै सङ्घर्ष गन्यौँ, भित्र पस्यौँ । दुइटा वर्थ रिजर्भथिए- सुत्नको लागि । तर जब सुत्ने तरखर भयो, माथ्लोमा को र तल्लोमाको भन्ने प्रश्न निकै गम्भीर भएर दुवै जनाको मन मडारिन थाल्यो । मुखले“जो माथि गए पनि के भो र&#039; भनी जतिसुकै मिलनसारिता देखाए पनि मास्तिरम्रै उक्लन पाए हुन्थ्यो भन्ने मलाई नलागेको त होइन, तर साथीको पनि यहीआशय बुझेकोले मैले खुरुक्क तल्लैमा ओछ्यान लगाएँ । साथी माथि गएरमलाई गुन्टा पुग्न देक न भन्न थाले, दिएँ । उनको सुटकेस मागे, दिएँ ।उनको लुगा मागे, दिएँ । यसै गरी उनी माथि बसेर अर्डर गर्दै जान्थे, मतलबाट पुग्न दिँदै गएको थिएँ, एकाएक अर्डर आयो, जुत्ताको । “त्यो मेरोजुत्ता पनि एक फेरा मलाई पुग्न दिनोस्‌ त !”&lt;br /&gt;
यस अनुरोधले भने मेरो कन्सिरी बल्दो हिटरसित ठोक्किन पुगेझैँ गरीरन्क्यो र उसको जुत्ता टिपेर पहिले उसकै टाउकामा दिउँ जस्तो पनि लाग्यो ।तर साथीको हैसियतले त्यस्तो उग्र प्रतिक्रिया नजनाई खालि जबाफ दिएँ-“जुत्तासुत्ता आफैँ ओर्लेर लैजानोस्‌ बा !” उनी रातो मुख लगाएर ओली जुत्तालिएर उक्ले र नचिनेको सहयात्रीकँ निकैबेरसम्म चुपचाप रहे.। भोलिपल्टबिहान सबभन्दा पहिले उनको टिकट किन्दा लागेको खर्च मागे, दिएँ । हिजोदिनभरिमा दुई बट्टा चुरोट खर्च भएको छ, त्यसको आधा पैसा लेक भने, त्योपनि दिएँ । तैपनि हामी त्यस बेलासम्म साथी नै रह्यौँ, जहाँसम्म टिकटजाँचकी आएको थिएन । उनले एउटा टिकटै दबाएर मेरो बारेमा थाहा छैनभनिदिएकोले मैले दिल्लीमा खाने खर्च जरिमानामा सिद्ध्याएर सिल्ली हुनुपस्यो ।&lt;br /&gt;
जब म यो घटना आद्ोपान्त सम्झन्छु, साथीत्वका पाँच प्रकार हुँदारहेछन्‌ जस्तो लाग्छ । एउटा कहिलेकाहीँको &#039;हलो साथी&#039; पटनामा भेट भएपछि&#039;चलो साथी&#039; भयो । रेल नचढुन्जेल क &#039;भलो साथी&#039; देखियो त्यसपछि क जुत्ताबोकाएर मेरो &#039;दलो साथी&#039; हुन खोज्यो । उसका सत्र अनुरोध मानेको कुनै मानेनै रहेन, अठारौँ अनुरोधमा आनाकानी गर्दा क &#039;ढलो साथी&#039; हुन पुग्यो र कसरीयसलाई ढालेर तमासा हेरूँ भन्ने ध्याउन्नामै मेरो साथी व्यस्त रह्यो ।&lt;br /&gt;
त्यसैले अचेल नयाँ साथी बनाउँदा र आफूलाई कसैको साथी भनाउँदायो साथीपन कस्तो प्रकारको हुने हो भन्ने मलाई साह्रै उत्सुकता लाग्छ । योउत्सुकता जगाउन मलाई अर्को एउटा रमाइलो घटनाले पनि मद्दत गरेको छ ।उनीहरूको कानमा नपरोस्‌, तपाईंलाई भन्न के भो र हगि ?&lt;br /&gt;
म वर्षौंको बेकारीपछि बल्लबल्ल खरदार भएको उपलक्ष्यमा एक जना&lt;br /&gt;
२१० “भैरव अर्यालका हात्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&#039;भलो साथी&#039; बधाई दिन घरै आइपुगेछन्‌ । साथीको खुसीमा खुसी हुनु साथीकोकर्तव्य हो । मेरी स्वास्नीले बल्लतल्ल एक कप चिया खान दिइन्‌, तर साथीलेभने- “यत्रो खुसीयालीमा एक कप चिया खुवाएर टार्ने ? भ्याट चाहिन्छभ्याट ।” उनले अलिकति सुर्क्याएरै आएका रहेछन्‌ भन्ने हामीलाई बुभन धेरैबेरलागेन । बरु गम्भीर साथीको यो ठट्यौलोपनमा साह्रै मजा लाग्यो । मैलेभनेँ- “तिमीलाई एक बोतल भ्याट ख्वाउने पैसा भए त केटाकेटीलाई एकमहिना भात ख्वाउँथेँ नि !” “तेरो कोट बेचेर पनि म आज नखाई छाडदिनँ”भन्दै उनी कीलाको कोट झिकेर लमलम हिँडिदिए । हामी मरीमरी हाँस्यौँ ।&lt;br /&gt;
बाटामा अर्को साथीले उनलाई व्यङ्ग्य गरेछ- “क्या हो डब्बल कोटलगाएछ नि, रङ त डबल परेन ?” उनले जबाफ दिएछन्‌- “त्यो छुसी रामजीखरदार भएपछि झन्‌ मात्तिएछ । मेरो अलिकति सापट लगेको, कहिल्यै तिरेनर आज त मोराको कोटै खोसेर ल्याएँ ।&amp;quot; कुरा कताकता सुसाउँदै मेरै कानमापनि पस्यो । फक त चलेको हो तर मुख झमभझमाएको बेला मान्छेले केभन्छ के भन्दैन भनी मैले यसलाई पनि हाँसोमै उडाइदिएँ । आइतबार अफिसपुग्नासाथ हाकिमले सोधे- “आज किन कोट नलगाईकन आउनुभयो ?” मैलेसजिलै उत्तर दिएँ- “गर्मी चढ्न थालेछ, बुर्सट, पैन्ट नै हल्का होला भनेर कोटछाडिदिएँ ।” उनले च्याँड्ठिएर भने- “यही चरित्रले त जागिर खाइन्न है ।” मजिल्ल परेँ । पछि बुझ्दा थाहा पाइयो कुनै &#039;भलो साथी&#039; ले उनको कानमागढन्त कुरो सुटुक्क छिराइदिइसकेको रहेछ- “राम खरदारले हिजो कुन्नि कुनभट्टीमा जाँड खाँदाखाँदा कोटै बेचेर खाएछ ।” म स्तम्भित भएँ- भात खाँदादाल, तरकारी, अचार सबै थोक खानु परेभझैँ जागिर खाँदा गाली, चुक्ली,छुल्याइँ, झुल्याइँ सबै थोक खानुपर्दो रहेछ भन्ने लाग्यो । तैपनि भोलि कोटलगाएर आएपछि आरोप स्वतः खण्डित भइहाल्छ भन्ने ठानेर मैले कसैसितकुनै वादविवाद गरिनँ । अफिस छुटेपछि सरासर कोट लैजाने साथीकहाँ गएँ ।साथी आइपुगेका रहेनछन्‌, साथीकी श्रीमतीले भनिन्‌- “कोटसोटको कुरामलाई थाहा छैन । मेरो लोग्नेलाई अहिलेसम्म ससुरालीले पुन्याएदिएका छन्‌,कसैको जडौरी लाउनु पनि परेको छैन !” उनी भुट्न लागेको मकै भटभटाएझैँकेके भटभटाउँदै थिइन्‌- म दुई हात दुइटा काखीमा लुकाएर लस्केँ ।&lt;br /&gt;
फेरि म कोट माग्न पनि गइनँ, पुन्याउन पनि ल्याएनन्‌ । एउटा कोटसाथीले लियो या हरायो यसमा केही थिएन, एकैछिनको रमाइलोमा एउटाहिजोसम्मको &#039;भलो साथी&#039; &#039;ढलो। साथी&#039; मा परिणत भइसकेको देख्ता नेपाली&lt;br /&gt;
साथी, साथी र साथी ” २११&lt;br /&gt;
साथीत्वको क्षणभङ्गुरतामा अत्यन्तै बिस्मात लाग्यो । घरै नगई म नयाँकोटको तर्जुमा गर्न आफ्नो पुरानो एउटा साथीकहाँ पुगेँ । क राणाजीको छोरोथियो । हुन त हाम्रो न वर्ग मिल्थ्यो, न वर्ण; तर पनि केटाकेटीदेखि नै मनमिलेको थियो । मलाई उसकहाँ पुगेर सपना नसुनाई ब्यूँझेजस्तो लाग्दैनथ्यो ।क पनि राम नआईकन घाम लाग्छ र ? भन्दै म नपुगुन्जेल औछचानछाड्दैनथ्यो । अलि ठूलो भएपछि सिकार खेल्त जाँदा र साथीको हैसियतलेमलाई छाड्दैनथ्यो; म साथीको हैसियतले बन्दुक बोक्थेँ । क जथाभाबी पैसाउडाउँथ्यो, म उसका बाबुआमाको गाली खान्थेँ । क बिराउँथ्यो, म थानामागई माफी माग्थेँ । छोटकरीमा भनूँ भने म उसको &#039;दलो साथी&#039; नै हुँ ।उसकहाँ पुगेर कोटको हर्जा देखाउँदै मैले कसँग एक सय रुपियाँ कर्जामागेँ । उसले दार्शनिकभझैँ भाषण गत्यौ- “हेर राम, साथीलाई कर्जा दिनुभनेको साथी गुमाउनु हो । नमागूँ साधीकै पैसो त हो नि भन्छस्‌, तँ छिटोतिर्दैनस्‌, मागूँ सय रुपियाँको निम्ति खरी धस्नै भन्छस्‌, उल्टो मैदेखि रिसाउँछस्‌ ।त्यसैले साथीको हैसियतले म प्राण दिन सक्छु पैसो दिन सक्तिनँ बा!” योसुन्दा मैले झट्ट गँजडीहरूको मित्रता सम्झैँ । गाँजा खाउन्जेल उनीहरू यतिघनिष्ठ हुन्छन्‌ रे कि भोलिदेखि स्वास्नी साटासाट गर्ने सल्लाह पनि उनीहरूकोचल्छ रे ! यो अलौकिक त्यागको सल्लाह चल्दाचल्दै एउटाले अर्कोसँग &#039;एउटाचुरोट झिक्‌ न भाइ&#039; भन्यो भने अर्को त्यागी साथी भन्छ रे- “त्योचाहिँ नभनबा ! यो एक खिल्लीको चार पैसा पर्ने चुरोट मैले बाँड्ने गरेकै छैन ।” यसोभनेर मैले आफ्नो राणा साथीलाई गँजडीसित अवमूल्यन गर्न खोजेको किमार्थहोइन, मित्रता, आदर्श राख्न मित्रको सङ्कटमा पनि आँखा चिम्लन सन्नुपर्दोरहेछ भन्ने &#039;दलो साथी&#039; को दर्शन तपाईंलाई बताइदिन खोजेको मात्रै हो ।नढाँटीकन भनूँ भने आफ्नो निम्ति साथीभाइलाई दल्नुसम्म दल्ने र उनीहरूलाईपरेको बखत तीनोटा सिरक ओढेर छल्ने रोग कहिलेकाहीँ आफैँलाई पनिलाग्छ । पाईपत्यसैले राणा साथीसितका अनुनयविनय विफल भएपछि कोटको लागिएकपछि अर्को उपाय सोच्तै म राति घर पुगेँ । घरमा एउटा साथी सपरिवारआएर पर्खिरहेको रहेछ । पोहोरसम्म त क मेरो &#039;भलो साथी&#039; थियो, तर अचेलमेरो बदख्वाइँ गर्दै हिँड्छ रे भनी मलाई अर्को साथीले सुनाएकोले झप्रति मेरोराम्रो धारणा भएन । बाटाघाटामा देखादेख हुँदा क निकै नजिकझैँ भएर कुरागर्न खोज्थ्यो, म अघिल्तिरको आधी दाँत देखाएर अर्कातिर तर्कन्थेँ । एक&lt;br /&gt;
२१२ ” भैरव अर्यालका हात्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
शब्दमा मैले उसलाई मनमनै &#039;भलो साथी&#039; बाट एक नम्बरको &#039;ढलो साथी&#039; माडिमोसन गरिसकेको थिएँ, त्यसैले उसको अनुहार देख्ता पनि मलाई रिसउदथ्यो । त्यस्तो मान्छेलाई स्वास्तीसहित आफ्नो घरमा आएर जमिरहेकोदेख्ता मलाई तुरुन्त तगाराको नोल झिकेर ठटाईठटाई लगारुँ जस्तो लाग्यो ।तर शिष्टाचारबश त्यो गर्न सकिनँ । भलाकुसारी भए । उसले भन्यो- “तैँलेमेरो जतिसुकै बदख्वाइँ गर्दै हिँड पनि म त तेरो &#039;भलो साथी&#039; नै हुँ ।&amp;quot; मैलेभनेँ- “मेरो लास बेपत्ता पार्छु भन्थिस्‌ रे, आज यो ढाँचा देखाएर मेरो लासलिन आएको होस्‌ कि ?” विवाद गर्दागर्दै के पत्तो लाग्यो भने मलाई जुनसाथीले क मेरो बदख्वाइँ गर्दै हिँड्छ भन्ध्यो, उसैले उसलाई चाहिँ म उसकोबदख्वाइँ गर्दै हिँड्छ भनिदिएको रहेछ । हाम्रो साथीत्व पुनर्जागृत भयो, मैलेआफो मर्का बताएँ । क कसरी मद्ृत गरुँ भनी छटपटाउँदै थियो । श्रीमतीचाहिँलेलगाइरहेको तिलहरी फुकाल्दै भनिन्‌- “अहिले यही राखेर काम चलाउनेसाथीसाथीका बीच बसेर षड्यन्त्र खेल्ने साथीलाई कुन प्रकारमा राख्नेभन्नै प्रश्नले मलाई रातभर पिरोलिरह्यो । बिहान आफू नउठ्तै मेरो कोट जुनह्याङ्गरबाट झिकेको थियो, त्यसैमा झुन्डचाउँदै मेरो कोट लैजाने साथीभनिरहेको थियो- “हेर्‌ न अस्ति ससुराली जानु थियो, आफूसित उनीहरूलेदिएका कोट मात्र छन्‌ । सधैँ उही कोट लगाएर के जानु भनी तेरो कोटमाठाँड्टिएर गएको नि ! हिजोअस्ति खाँचो भो कि ?” यो साथीको चर्तिकलालेमगज चक्करायो । उसको समस्या पनि हाँसो उठ्तो, समाधान पनि हाँसोउठ्तो ! उसले कोट लगेको कुरा पहिले कताबाट लिक भयो, कसकसलै किनत्यसको नयाँनयाँ अर्थ कल्पे, कसले मैरो हाकिमकहाँ त्यस्तो रिपोर्ट लग्यो- यीसबै केलाएर केलाइनसक्नु छ । मैले &#039;ढलो साथी&#039; भन्ने विशेषण दिन खोजेकोयस्तै षड्यन्त्रकारीलाई हो । त्यसैले साथी बनाउँदा या आफूलाई कसैको साथीभनाउँदा हामीले यो ख्याल राख्नै पर्छ कि त्यो साथी- &#039;हलो साथी&#039; हो कि“चलो साथी&#039; हो; &#039;दलो साथी&#039; हो वा &#039;ढलो साथी&#039; हो । यिनमध्ये पछिल्लोबाहेकसबै &#039;भलो साथी&#039; हुन सक्छन्‌ तर जसको मनमा यो ढलोस्‌ भन्ने ईर्ष्या जाग्नथाल्छ, त्यो &#039;हलो साथी&#039; हुन सक्छ, &#039;चलो साथी&#039; हुन सक्छ तर &#039;भलो साथी&#039;कहिल्यै हुन सक्तैन ।कलियुग&lt;br /&gt;
साथी, साथी र साथी “ २१३&lt;br /&gt;
विकृति प्रतियोगिताको आयोजक समिति&lt;br /&gt;
नेपालमा पनि सौन्दर्य प्रतियोगिता हुने भएको छ भन्ने सुन्दा नेपालीसुन्दरसुन्दरीहरू दसैँ पेस्की मिनाहा पाउने हल्ला सुनेका कर्मचारीभझैँ भित्रैदेखिप्रफुल्ल भएका थिए । तर, सो नहुने भन्ने सुन्नासाथ अघिल्लो दिन नम्बर&#039;निस्केर भोलिपल्ट संशोधनमा परी फेल भएका विद्यार्थीझँ एकै पटकखड्प्याङ्खुङ्रुङ भइहाले । स्वास्नीलाई “नेपाल-सुन्दरी&#039; बनाउन पाए आफूपनि “नेपाल-सुन्दर&#039; भएर हङकङदेखि हलिउडसम्म घुमौँला भन्ने कतिश्रीमान्‌हरूको योजना त्यसै गरी भत्कियो, जसरी त्यति काम गरिदिन पाएएउटा बङ्गला बनाउन पाइन्थ्यो भनी कसिएका कर्मचारीको सपना एक्कासिखोसुवा पुर्जी पाउँदा भत्किन्छ । सौन्दर्य प्रतियोगिता नहुने भन्नासाथ मलाईपनि मेरो भाउजूले भन्नुभयो- “के गर्नु बाबू, कमसेकम तपाईं पनि नेपाल-सुन्दरीको देवर भनेर आफ्नो ख्याति फैलाउन त पाउनुहुन्थ्यो । तर, के लाग्योपाइएन । बढ्नै आँटेको ख्याति खोसिँदा कसलाई खिन्नता नलाग्ला र ?” यस्तैखिन्नता मनाउँदामनाउँदै दुई-चार जना बुज्रुग साथीले प्रस्ताव ल्याए- “हेर्नोस्‌गणेशज्यू, सौन्दर्य प्रतियोगिता त धेरै देशमा भएको थोत्रो कुरा हो, हामी कसैलेअहिलेसम्म कहीँ नगरेको एउटा नयाँ प्रतियोगिता गरौँ ।” कुरो राम्रो हो ।“अहिलेसम्म कतै नभएको त एउटा विकृति प्रतियोगिता छ । त्यही गर्ने कि ?”सबैले ताली दिएर सहमति जनाए । अन उक्त प्रतियोगितामा कस्तालाई भागलिन दिने त भन्ने छानबिन गर्ने र पहिला-दोस्रा छुट्टयाउने कामको लागिकमिटी बन्यो । देशमा दिनको सत्रोटा कमिटी बन्दा पनि आफूलाई सदस्यसम्महुन नपाएको &#039;फोकले मलाई पनि साह्रै रिस उठिरहेको थियो । यसैले विकृतिप्रतियोगिता कमिटीको अध्यक्षमा मैले आफ्नै नाम प्रस्तुत गरेँ ।&lt;br /&gt;
सरकारी सहयोग वा विदेशी सहायता पाउने भएको भए मैले अध्यक्ष तके अध्यक्षको पी. ए. पनि बन्न पाउने थिइनँ । सके उम्मेदवार-उम्मेदवारमा&lt;br /&gt;
२१४ / भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
कुस्ताकुस्ती र भुत्लाभुत्ली नै परेर कान्तिपुरबाट भकुन्डिएको टाउको क्रान्तिपुरमापुगी छघालब्याल हुन्थ्यो, उति नभए पनि गल्लीगल्लीमा गालीगलौजको हिलालेसयौँको मुख विकृत हुन्थ्यो । तर, विकृति प्रतियोगिताको लागि विदेशी सहायतापाउने त आसै थिएन, सरकारी सहयोग पाउने छाँट पनि कमै देखिन्थ्यो ।एउटै मात्र सम्भावना के थियो भने प्रस्तावित प्रतियोगितामा आफ्नो मान्छेकोही पहिला गराउन सकियो भने उसलाई विदेशबाट निम्तो आउँथ्यो र आफूपनि पछि लाग्न पाइन्थ्यो । तर, अपसोच ! विकृति प्रतियोगितामा भाग लिनेयोग्यता पुगेका मान्छे आफ्नो भन्नु कोही थिएन । त्यसैले पनि होकि त मनिर्बिरोध अध्यक्ष भएँ ।&lt;br /&gt;
अध्यक्ष त भइयो, तर कामको जिम्मेवारी पनि थाप्लोभरि परिहाल्यो ।अध्यक्षले काम गर्नु पर्दैन भन्ने चलनअनुसार मैले पनि मेचमा मात्र बस्ननखोजेको त होइन, तर कामको जिम्मेदारीजति जम्मै मैलाई सुम्पी सदस्यहरूकता लागे कता ! तलबभत्ता पाइने भएको भए मैले पनि नजानेको त कहाँथिएँ र मिटिङ गर्दागर्दै पाँच वर्ष बिताइदिन्थेँ- विधान कमिटी बनाई मस्यौदागर, पास गर, नियम बनाक, सबतिर सम्पर्क राख, देशमा विकृतहरूकोसङ्ख्या कति छ तथ्याङ्क लेक, तिनमा केकस्ता विकृति छन्‌ परीक्षण गर,वर्गीकरण गर, विज्ञापन गर, लिखित मौखिक अन्तर्वार्ता गर, पाल किन्ने टेन्डरदेक, दरी किन्न कलकत्ता पुग, टिकट छाप्न बेलाइत पुग, कति काम छन्‌कति । विश्वमा सबभन्दा पहिले हुन लागेको विकृति प्रतियोगिता भएकोलेकुनकुन देशबाट कस्ताकस्ता पर्यवेक्षक बोलाउनुपर्ने हो- त्यो पति विचारगर्नुपत्यो र सबभन्दा ठूलो काम चन्दासङ्कलन गर्नुपन्यो । तर, तलब नभत्ताको अध्यक्ष भएकोले काम लम्ब्याएर पनि आफूलाई कुनै फाइदा थिएन ।त्यसैले भोलिपल्ट बिहानैदेखि म कस्ताकस्ता विकृत चरित्रलाई प्रतियोगितामाभाग लिन दिने भनी घोत्लिन थालेँ । धालेको मात्र के थिएँ, एक जना भद्रभलादमीबाहिरदेखि चिच्च्याउँदै पस्नुभयो- “बधाई अध्यक्षज्यू, बधाई ! तपाईं कमिटीकोअध्यक्ष हुनुभएको कुरा सुन्दा मलाई मुटुको जरैदेखि खुसी लागेको छ । अहिलेसम्मदेशमा हजार थरी कमिटी बने होलान्‌ तर यहाँजस्तो योग्य अध्यक्षचाहिँ कुनैकमिटीले कहिल्यै पनि पाएको थिएन । मैले त आजभन्दा ठीक दस वर्षअघि,जुन दिन तपाईंको र मेरो कुमारीचोक अह्कामा भेटघाट भएको थियो, त्यसै दिनतपाईंको निधारको कोठी देखेर मलाई लागेको थियो- एक न एक दिन तपाईंठूलो मान्छे हुनुहुन्छ, नभन्दै भइहाल्नुभयो ।” दस वर्षअघि एक पटक चुरोट&lt;br /&gt;
बिकृति प्रतियोगिताको आयोजक समिति ? २११&lt;br /&gt;
सल्काउँदा चिनेका मान्छेले दस बर्षपछि एकाएक घरैमा आएर त्यत्रो खुसीप्रकट गरेको देख्ता मलाई पनि ठूलै मान्छे भएछु कि भनेजस्तो लाग्यो रपम्भीरतासाथ उनलाई भनेँ- “अब तपाईंको सहयोग पाउनुपर्छ ।” उनलेभने- &amp;quot;त्यही सहयोग गर्ने मौका मिल्छ कि भनेर त म आएको । सबै कामअध्यक्षले मात्र गरेर साध्यै हुँदैन, महासचिव चाहिएला । मजस्तो महासचिबभए तपाईंलाई पनि सुबिस्तै हुन्थ्यो ।”&lt;br /&gt;
पच्चीस आना फटाहा कुरालाई पचास आना दुरुस्त पार्दै चिप्लो घसेरमहासचिव माग्न आउने उनी कम योग्यताका थिएनन्‌ । मैले सामान्य आश्वासनदिइपठाएँ । त्यस दिनदेखि मकहाँ दरखास्तको ओइरो चल्त थाल्यो, दर्शनार्थीकोधुइरो चल्न थाल्यो । कोही सचिवको पद माग्थे त कोही प्रोम्योरमेन्ट अफिसरको;कसैले कोषाध्यक्षको पद मागे त कसैले एकाउन्टेन्टको । मेरो घर नयाँ खुलेकोकर्पोरेसनजस्तै भयो । भनूँ भने ठूलाबडाको इन्सल्ट हुने डरले मात्र नभनेको,नत्र एक जना मन्त्रीज्यूले समेत फोन गरेर आफ्नो एक जना मान्छेलाई मेरोपियन भर्ना गरिदिए हुन्थ्यो भन्ने आशय पनि प्रकट गरे ।&lt;br /&gt;
कमिटीको उद्देश्य कता, लक्ष्य कता । जताबाट हेरे पनि पदैको माग । पदत जति भने पनि बनाइदिनु हुन्थ्यो, तलब दिने कताबाट ? मजस्ता हरिलम्फूबेकार को थिए र बिनातलबभत्ता समाजसेवाको लागि खटिन्थे ? तलब दिनेजागिर मसँग छैन भन्नासाथ मेरा सबै आवेदक र आगन्तुकहरू त्यसै गरी नैभागे, जसरी मन्त्री खोसिएपछि उनकहाँ दिनहुँ धुइरिरहने मान्छे आफ्नोआफ्नोबाटो लाग्छन्‌ । चिठी आदानप्रदान गर्नेसम्म मान्छे नपाएर मैले आफ्नै भतिजालाईलगाउनुपप्यो । यस्तैमा एक दिन भतिजाले विदेशबाट आएको एउटा चिठील्याएर साथीभाइहरूको &#039;मुखिन्जेल मेरो अगाडि राखिदियो । “ल हेर, अध्यक्ष हुनुकता छ कता, बिदेश-भ्रमणको निम्ता आइसक्यो&amp;quot; भनी एक जनाले प्वाक्क भन्योपनि । तर, वास्तवमा चिठी मेरो हो कि होइन- मलाई सन्दैहै थियौ । विदेशबाटचिठी लेख्ने मेरो इष्टमित्र कोही पनि छैनन्‌ भनेर साथीहरूको अगाडि पुङमाङकिन भइहालूँ भन्ने ठानी मैले चिठी खोल्ने हतपतचाहिँ गरिनँ ।&lt;br /&gt;
भोलिपल्ट अखरबारमा निस्कियो- &#039;विकृत प्रतियोगिता कमिटीकाअध्यक्षलाई फलानो देशको फलानो सस्थाबाट निम्ता ।&#039; म अध्यक्ष भएकोमामुटुको जरैदेखि खुसी भएर बधाई टक्य्राउन आउने उनै परम मित्रले भोलिपल्टदुई हात लामो वक्तव्य निकालेर भने- “त्यो अध्यक्ष चोर हो, त्यसले नातावादगरेर आफ्नै भतिजालाई महासचिव राखेको छ” इत्यादि ।&lt;br /&gt;
२१६ ” भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
अर्कोले टिप्पणी गत्यो- “विकृत प्रतियोगिता कमिटीमा अविकृतमनोवृत्तिको मान्छे अध्यक्ष हुनु पच्चीसै आना अयोग्य हो । त्यसैले उसलाईतुरुन्त निकालेर अर्को अध्यक्ष राख्नुपर्छ ।&amp;quot; यस्तो टीकाटिप्पणी चल्दाचल्दै एकदिन अखबारमा विज्ञापन निस्क्यो- “विशुद्ध विकृतहरूको प्रतियोगिता गराउनेउद्देश्यले श्री शक्नी शर्माको अध्यक्षतामा एउटा नयाँ कमिटी गठित भएको छ,जसको सदस्यमा सर्वश्वी गालीबहादुर पाण्डे, मूढेवीर डङ्गोल, कुत्ताकाजीप्रधान, मूर्खराज गुरुङ र कन्सुत्सलासिंह कायस्थ पनि हुनुहुन्छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
यो सुनेपछि समाजसेवा गरेर ख्याति कमाउन अध्यक्ष भएको म स्वयंलेआफूसित रहेको त्यो महत्त्वपूर्ण विदेशी चिठी नयाँ अध्यक्षलाई बुझाइदिएँ, जुनबास्तबमा मेरो नभई मेरो नाम भएको अरू कसैको थियो र भित्र लेखिएकोथियो- “तपाईंसँग आलमुनियम कम्पनीको दुई हजार रु. बाँकी भई अहिलेसम्मनतिरेकोले तुरुन्त पठाइदिनुहोला ।”&lt;br /&gt;
बडो विकृत अनुहारले पत्र च्याप्तै नयाँ अध्यक्षले विकृत प्रतियोगिताकमिटीको पदभार ग्रहण गर्नुभयो । म ढाक्रेको ढाक्रे नै रहेँ ।&lt;br /&gt;
रमझम&lt;br /&gt;
बिकृति प्रतियोगिताको आयोजक समिति ” २१७&lt;br /&gt;
उन्नतिको शिखरतिर&lt;br /&gt;
“सगरमाथाको शिखर अग्लो कि उन्नतिको शिखर अग्लो ?” अचानकएउटा केटोले मसित प्वाक्क सोध्यो । हुन पनि उसको खुलदुली गजबकोथियो- “पुस्तकमा सबभन्दा अग्लो शिखर सगरमाथा भनिएको छ, तर भाषणगर्नेहरूचाहिँ सघैँ हामीले उन्नतिको शिखरमा पुग्नुपर्छ भन्छन्‌ । सगरमाथाकोशिखरमा उहिल्यै पुग्न सक्नेले उन्नतिको शिखरमा अहिलेसम्म किन नपुगेको ?&amp;quot;उसको खुलदुली सुनेर केही बुज्जुक केटाहरू हल्ल हाँसे तर आफ्नो सम्झनाकोरोलचाहिँ फन्न घुमेर मामाघर पुग्यो किनभने सबभन्दा पहिले उन्नतिकोशिखरतिर पुन्याइदिन्छु भन्ने व्यक्ति मेरौ निम्ति मेरा मान्यवर मामा नै थिए ।&lt;br /&gt;
मेरो मामाको नाम सुन्नुभयो भने तपाईंहरू मेरो जन्मँदै नजन्मेकोछोरालाई आफ्नी छोरी दिन कसिनुहुन्छ, किनभने मान्छे उनी अपारकै थिए ।भनाइको मतलब के भने जीवनमा उनले गरेको उन्नति पार नपाइसक्नुथियो । मान्छे भन्थे उनी सुर्तीउद्योगदेखि मूर्तिवाणिज्यसम्म पोख्त छन्‌ ।पण्डित्याइँमा उनी रुसो र रस्सेललाई नाकका पोराभित्र घुसार्न सम्छु भन्छन्‌,प्रशासनमा टेबुल चपाएर फाइल थुक्नसम्म खप्पिस .छन्‌ । त्यसैले उनकोसरसङ्घात गरेर सुद्धिबुद्धि बढाउन खोज्नेहरूको धुइरो उनीकहाँ त्यसै गरीलाग्थ्यो, जसरी नाइट क्लब या क्याबरेमा धनीमानी र सन्मानीहरूको लर्कोचल्छ । सबैको अगाडि मामाको एउटै सल्लाह हुन्थ्यो- “जसरी भए पनिहामीले उन्नतिको शिखरमा पुग्नै पर्छ ।” तर पुग्ने कसरी त्योचाहिँ जसतसलाईउनले बताएका थिएनन्‌ । आफू केटाकेटी भएकोले उनका अगाडि राम्ररीबोल्त सकिँदैनथ्यो, तापनि उन्नतिको शिखर कस्तो हुन्छ भन्ने उत्सकुताआफूलाई त्यत्तिकै थियो, जत्तिको अहिले मेरो विद्यार्थी केटालाई छ । त्यसैलेएक दिन एकान्त पारी मैले विनम्रतापूर्वक मामासित प्रश्न गरेँ- “उन्नतिकोशिखर कति अग्लो हुन्छ मामा ? के हामी पनि कुनै दिन त्यहाँ पुग्न सकौँला ?”&lt;br /&gt;
२१५ » भैरव अर्यालका हात्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&amp;quot;किन नसक्नु ! पन्ध्र-बीस हजार रुपियाँ कतैबाट बटुल्न सक्छौ भने उन्नतिकोशिखरैमा नपुगे पनि पुग्ने ठीक बाटोसम्म त भोलि नै देखाइदिन&#039; सक्छु ।&amp;quot; तरमैले विद्यार्थी केटालाई त्यसै गरी जबाफ दिन सकिनँ; बरु क्लास छाडेर लागेँघरतिर ।&lt;br /&gt;
हो, त्यो दिन-&lt;br /&gt;
बाबुको गुठुरीदेखि आमाको गहनासम्म लटरपटर पारी बटुलेका आठ-नौओटा हजारी भित्री गोजीमा घुसारेर म मामाको मर्सिडिजमा ठाँटसँग बसेँ ।उन्नतिको शिखरतिर जान लागेकोले मेरो नाक पनि चुलिँदाचुलिँदा एउटासानौसानो शिखर भएजस्तो मनमा लागिरहेको थियो । म आफ्नो चिरप्रतीक्षिताप्रेमिकालाई लिन हिँडेको दुलहाझैँ मक्ख परेर चुपचाप थिएँ । मामाचाहिँमलाई सिकाउँदै हुनुहुन्थ्यो- “बनुभयौ भान्जा ! उन्नतिको शिखरतिर लाग्दालाज, घिन, धक, पाप इत्यादि कुनै कुराको पर्बाह गर्नु हुन्न नि!” मैलेअसजिलो लाग्दालाग्दै पनि मुन्टो हल्लाएर &#039;हस्‌&#039; भनेँ ।&lt;br /&gt;
हाम्रो कार एउटा विशाल पोखरीको किनारमा गएर टक्क अडियो ।रातोरातो पानीको त्यो विचित्र पोखरी देखाउँदै मामाले भन्नुभयो- “त्योउन्नति सागर हो, दुनियाँभरिका दरिद्र र बुद्धहरूको रगत निचोरेर बनाएको योसागर कति रमणीय र रोमान्टिक छ हेर त ! उन्नतिको शिखर यसैबाटजानुपर्छ ।” मामाले मलाई घिच्च्याएर किनारैमा लग्नुभयो र घाटको एउटास्विच धिच्नुभयो । जादुको ढोकाजस्तै गरी घाटको एउटा सानू भाग सर्रभासिँदै गयो । हामी पल्लापट्टि पुगेका हौँ कि तल्लापट्टि पुगेका हौं, त्यो मैले- ठम्याउन सकिनँ; सर्र भएको एकैछिनपछि मैले आफ्ना मामा-भान्जालाई एउटाअत्यन्त अग्लो भवनको प्राङ्गणमा उभिन पुगेको पाएँ । माथिल्लो भाग बादललेछोपेकोले भवनको धुरी कहाँ पुगेको छ बुभन साक्न्तथ्यो, तुवालोले यसकोचौडाइ पनि आँक्न दिँदैनथ्यो ।&lt;br /&gt;
“लौ भान्जा, नोट झिक, प्रवेशपत्र नलिई यहाँभित्र पस्नै पाइँदैन, उन्नतिकोशिखर जाने बाटाको यो पहिलो चौकी हो ।&amp;quot; मैले यन्त्रबत्‌ भई नोटको ब्यागैमामाको हातमा राखिदिएँ, मामा नैवेद्य थुतेर उफ्रेको बाँदरझैं एकै निमेषमाकता पसे कता ! म जागिर माग्न मन्त्रीको चाकडीमा पुगेको स्नातकझैं चारघण्टासम्म चोक ढुकिरहेँ, तर न मामा आए, न प्रवेशपत्र । बरु सम्झनामामामाको दिव्यबाणी आयो- &#039;उन्नतिको शिखरतिर लाग्दा लाज, घिन, धक,पाप कुनै कुराको पर्बाह गर्नु हुन्न भान्जा ।&#039; त्यसैले म पनि लाज पचाउँदै&lt;br /&gt;
उन्नतिको शिखरतिर ” २१९&lt;br /&gt;
बिनाअनुमति भवनभित्र पसेँ । त्यहाँ मेचैमेच लस्कर लागेर सजिएका थिए,कोही साना, कोही ठूला, कोही गद्दादार र कोही घुमन्ते मेचहरू । पस्नेबित्तिकैकामेको स्वरमा बिनम्रतापूर्वक भनेँ - &amp;quot;उन्नतिको शिखर हेर्न जान लागेको,मामाले धोका दिए, प्रवेशपत्र पाउँछु कि ?” मेचहरू हल्ल हाँसे । एउटा ठूलोमेचले अलि गम्भीर भएर सोध्यो- &amp;quot;तिमी कसको मान्छे ?” म अकमकिएँ ।ब्रह्माजीको मान्छे भनूँ कि नेपालको मान्छे भनूँ कि ? या यो नभनेर अरूथोकैको मान्छे भन्नुपर्ने हो कि ? वास्तवमा आजसम्म मैले सोचेकै थिइनँ- मकसको मान्छे हुँ । अर्को मेचले फेरि सोध्यो- “तिम्रो कुनै मेचसँग सम्बन्धछ ? छ भने सिफारिस लेराक, बिनासिफारिस उन्नतिको लोकतिर लाग्नपोको चाहिन्छ पोको ।” नभन्दै त्यहाँ मजस्तै एउटा सर्बसाधारण मान्छे एउटाझलभझले पोको च्यापेर भित्र पस्यो । सब मेचको ध्यान उतैतिर आकृष्ट भयो ।उसलाई सबै आफैँतिर तान्ने बल गरिरहेका थिए । म ट्वालट्वालती हेरेकोहेस्यै थिएँ । मेचहरू आआफैँ टक्कराउन थाले, मान्छे पोको छाडेर बेपत्ताभयो । मेचमेचको सङ्घर्ष झन्‌ मच्चियो । एउटा मझौला मेचले वरिपरिकातीन-चारोटा मेचलाई फालिदियो । ससाना मेचहरू ठूलाठूला मेचका मुनिछिर्न थाले, कुनैक्नै मेचले बुद्रुक्क उफ्रेर ठूलाठूला मेचको बुई चढेको पनिदेखियो । साँढेको जुधाइ बाच्छाको मिचाइ होला भन्ने ठानेर म धक चपाउँदैमाथ्लो तलामा उक्लिएँ ।&lt;br /&gt;
म माथ्लो तलामा उक्लिदा साँझ परिसकेको थियो । अघि देखेकाकतिपय ठूलठूला मेचहरू बड्डेबडे घैँटामा स्टयान्ड भइरहेका थिए 1 वल्लोछेउदेखि पल्लो छेउसम्म घैँटैघैँटा, पारदर्शी घैँटा, अपारदर्शी घैँटा, मानौँ योलोकै घैँटैचेँटाको जस्तो; मानौँ सबै भद्रभलादमी मरेर घैँटाको जुनि फेरेजस्तो ।म ढोकामा उभिरहेको देखेर एउटा मुखभरि फीँज भएको घैँटाले भन्यो-.“एबेकृफ फुच्चा, के हेरिरहेको ?&amp;quot; म के जबाफ दिरुँ के जबाफ दिङँ भनीअकमकाउँदै थिएँ, अर्को घैँटाले छर्चाल्किएर भन्यो- “जसले जेसुकै हेरोस्‌, तँपुङ्गालाई के वास्ता ?” पहिलो घैँटो छर्चल्किएर गर्ज्यो- &amp;quot;कसलाई पुङ्गोभनिस्‌ घ्याम्पा ?”&lt;br /&gt;
दोसो घैँटो फीँज पोख्दै चर्कियो- &amp;quot;तेरा बाबुलाई घ्याम्पो भन्छस्‌ ? कोदेखेको छस्‌ मलाई ? तेरो मुख फुटाइदिउँ ?” हेर्दाहेर्दै घैँटाघँटाको बीचगुटहरू बने; गुटगुटका बीच छचल्काछचल्की चल्यो, उफ्राउफ्री चल्यो,घम्साघम्सी चल्यो । कुनै घैँटाको मुख फुटेर फीँज पोखियो, कुनैको पीँध प्वाल&lt;br /&gt;
२२० » भैरव अर्यालका हात्यव्यडङ्ग्य&lt;br /&gt;
परेर धारो लाग्यो । म छक्क परेँ । तैपनि उन्नतिको शिखरतिर बढ्नु त छँदैथियो, घिन पचाएर मास्तिर लागेँ ।&lt;br /&gt;
त्यो कक्ष झन्‌ विचित्र थियो । पस्नेबित्तिकै &#039;हलो&#039; भन्दै एउटा सुमधुरस्वरले मेरो स्वागत गस्यो । स्वर मलाई आफ्नै मामाकी छोरीको जस्तो लाग्योतर उनलाई भने त्यहाँ देखिनँ । त्यहाँ त सबै जाँच्चैजाँघ र टाँगैटाँग मात्र थिए ।&lt;br /&gt;
“मेरो नाम कुमारी जङ्घा हो ।&amp;quot; एउटा जाँघ मनिर सर्दै टाँस्सिनआयो । मैले मुस्क्राइदिएँ । डलर र गिनीका झम्का हालेको उक्त जाँघबाल्जको धुनसँगै फनझनाएर नाच्न थाल्यो । दुर्भाग्यवश अचानक फ्युजगएफझैँ बत्ती भ्याप्प निभ्यो; कून जाँघ कता कोल्टिन पुग्यो; कुन टाँग कताजोल्टिन पुग्यो मैले देख्नै पाइनँ । मेरा खल्ती र खोकिलामा कुन्नि कसकसकाहात घुसँदै थिए, सबैलाई झड्कारेर म मास्तिरै लागेँ ।&lt;br /&gt;
माथ्लो कक्षमा आँखाले भ्याएसम्म यताउति निहारेँ, मान्छे कोही थिएन ।तर बीचबीचमा &#039;मारामारा&#039; को सामूहिक स्वरले कक्षा गुञ्जायमान थियो ।एकटकले सुनिरहनुसिवाय अर्को केही उपाय सुझैन । सुन्दासुन्दै &#039;मारामारा&#039;को आवाज &#039;मात्योमात्यो&#039; मा परिणत भयो । म डराएर भौँतारिँदाभौँतारिँदैकताकता एउटा स्विचमा ठक्कर दिन पुगेछ्नु, घ्याराक्क ढोका उघ्चियो, ह्वास्सगन्ध आयो, भयास्स आँखा पर्दा कोठाभरि मान्छेका टाउका र गिँडहरू अलपत्रमिर्किरहेको देखेँ । मलाई झस्स डर लाग्यो; कता भागूँ जस्तो भएर जीउकाम्यो; हत्तपत्त निस्कन लागेको कताकताबाट म एउटा झुन्डिरहेको लासमाठोक्किन पुगेँ । यसो हेर्छु त लास तिनै साहको थियो, जो हिजो मात्र मोटरएक्सिडेन्टमा परे रे भन्ने हल्ला मैले मामाघरतिर सुनेको थिएँ । मेरो होसउड्लाउड्ला जस्तो भयो, रोक्तारोक्तै म आँखा चिम्लेर चिच्च्याउन पुगेँ- “उन्नतिकोशिखर भनेको यही हो मामा ?” आँखा खोल्दा मामा पिस्तोल सोभ्याउँदै मेरोअगाडि उभिरहेका थिए । उनका आँखा ज्वालाम्य थिए; दाह्वा किटकिटायमानथिए, मुखाकृति यमदूतको जस्तै थियो, एक पाइलो अझ अघि सर्दै उनी गर्जे-“हल्ला नगरी फर्कन्छस्‌ कि सूट गरिदिउँ ।&amp;quot; मैले विनम्रतापूर्वक हात जोडेरभनेँ- “फर्कन्छु मामा ! फर्कन्छु । तपाईंले देखाएको उन्नतिको शिखर पुग्ने बाटोमैले देखेँ तर मैले हेर्न खोजेको उन्नतिको शिखर यस्तो थिएन ।”&lt;br /&gt;
अब तपाईं नै भन्नुहोस्‌, म आफ्नो विद्यार्थी केटोलाई कसरी बतारैँसगरमाथाको शिखर अग्लो हुन्छ कि उन्नतिको शिखर अग्लो ?&lt;br /&gt;
रारा&lt;br /&gt;
उन्नतिको शिखरतिर / २२१&lt;br /&gt;
कवि चम्नेलजी : एक शब्दचित्र&lt;br /&gt;
चम्रेल कविले एकाएक जिभ्रो टोकेको देख्ता मलाई यति खुसी लाग्योकि पाएको भए यस खुसीमा काँचै खसीको कान टोकेर “चम्रेलको मृत्युजिन्दावाद&#039; भन्दै चार पटक चोकमा उफन्धेँ । तर आफ्नो खल्तीमा खसीकोकुरै छाडौँ, एउटा फर्सी किन्ने पैसा पनि थिएन, न त आफ्नो घरवरिपरि टेक्नहुने चोक थियो । त्यसैले भोजको रूपमा एउटा सुक्खा पुरी र एक गिलासफिक्क्रा चिया खाएर हत्तपत्त मलामी गएँ । उनको अर्धसामयिक निधनमा शोकप्रकट गर्नुको साटो हर्ष प्रकट गरेको सुन्दा चम्रेल कविसित यसको भयानकशत्रुता रहेछ भन्ने तपाईँलाई पक्कै लाग्यो होला; तर तपाईं मारी हत्ते, उनीसँगसतिबयरको गेडाजति पनि मेरो कहिल्यै शत्रुता थिएन । बरु उनी मेरा कन्धनीलगाउने बेलादेखिका दौँतरी, कट्टु लाउन जानेदेखिका साथी र दोसल्लाओढ्ने साइतदेखिका मित्र थिए । मित्रता बाहिरी मात्र होइन, अन्तरड्गै थियो ।कति अन्तरङ्ग भने उनको पेटमा कतिका चिया अटाउँछ-.त्यो मेरो घरकाबूढाबूढीदेखि केटाकेटीसम्म कण्ठै थियो; मकहाँ कुन बेला के पाक्छ, त्यो पनिउनका घरका केटाकेटीदेखि बृढाबूढीसम्म बताइरहनु पर्दैनथ्यो । मान्छे मरेपनि गुन मर्दैन भन्छन्‌ । जिन्दगीमा उनले मलाई जति कबिता सुनाए त्यति तचन्द्रशमशेरलाई उनका हजुरियाले बिन्तीपत्र पनि सुनाएनन्‌ होला ।&lt;br /&gt;
मेरो क्रै छाडिदिङँ, चिनेजानेको कोही पनि कहीँ भेटियो भने सामान्यरहेछ भने “सुन्नोस्‌ सुन्नोस्‌, मैले भर्खर लेखेको सुन्दिहाल्नोस्‌&amp;quot; भन्दै उनीभट्टयाउन सुरु गरिहाल्थे । सन्मान्य रहेछ भने दस गज परदेखि साइकलबाटओर्लिएर नमस्ते गर्दै पियनले हाकिमसित पेस्कीको निवेदन गरेझैँ टाउकोकन्याएर घरमा भेट्ने समय मागिहाल्थे । हाटमा मिले हाटैमा, घाटमा मिलेघाटैमा सन्मान्य व्यक्तिहरूलाई कविताश्रवण गराएर स्याबासी ग्रहण गर्ने कविचम्रेलको ठूलो सोख थियो । दिनु-ख्बाउनु पत्ति त्यति पर्दैनथ्यो, खालि सूनिदिए&lt;br /&gt;
२२२ ” भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
पुग्थ्यो अर्थात्‌ कुरा के भने ध्यान दिन नसके कान मात्र दिए पनि पुग्थ्यो, कानपनि दिन नसके उनले अलि लेच्यो लहस्याएको ठाउँमा “कै रे के रे फेरिभन्नोस्‌” भनेर आफूलाई निकै घत लागेजस्तो सङ्केत मात्र दिइदिनुपर्थ्यो,अहिलेसम्मको गान्धार स्वर तुरुन्तै धैवतमा उचाल्दै उनी हातमा हात मिलाउनल्याउँथै र दोहोस्याउनू भनेका फाँकी तेहन्याएर पढ्थे । उनका आनीबानीपाउनेहरू कविताबाट झर्को लाग्यो भने “मान्छेको मुटु खाने कवि तपाईंबाहेककोही छैन” भनिदिन्थे, अनि त के चाहियो र ? कविजी जुरुक्क उठेर “कविताबुभ्ने भनेको तपाईबाहेक अरू कोही देखिनँ” भनिहाल्थे ! उनले यसो भन्दापहिलेपहिले त कविता बुभ्ने भनेको मै मात्र रहेछु क्यारे भनी म पनि गरुडकोजत्रो नाक पारी फुल्थेँ, तर एक दिन मेरै अगाडि होटेलको एउटा लठ्यौरोबेरालाई पनि “कविता बुभ्ने भनेको तिमी नै रहेछौ भाइ” भनी धाप दिएकोसुनेपछि मेरो गरुडको जत्रो नाक मुखमा हालेको गोलगप्पासँगै स्यापसुप्पनिलाएर झन्डै मुसाको जत्रो भएको । हत्त न पत्त खल्तीबाट रुमाल झिकीअँठ्याएरे अडघाइछाडेँ ।&lt;br /&gt;
कवितापाठको बयान गर्दागर्दै आफ्नो नाकको मोटाइ-दुब्लाइ नाप्नपुगेकोमा माफ राख्नुहोला, के लाग्छ, कुनै दिन मैले यही नाक ठोक्किएर रगतबहाउँदै रन्धनिएको बेला पनि चम्रेल कविको कविता नसुनी सुख पाएकोथिइनँ ।&lt;br /&gt;
यतिका कुरा बताइदिएपछि चम्रेल कविसँग मेरो दुस्मनी थियो कि भन्नेतपाईंहरूको शङ्का त पक्कै समाधान भयो होला । तर अर्को भ्रम के पर्नसक्छ भने कबिता सुनाईसुनाई,फर्काउने भएकोले उनले जिभ्रो टोकेकोमा मैलेहर्ष प्रकट गरेको हुँ कि ? यो झन्‌ पच्चीसै आना होइन । जिन्दगीमा कतिकाकचकच सुन्नुपर्छ, गनगन सुन्नुपर्छ, गाली सुन्नुपर्छ, सराप सुन्नुपर्छ भनेएउटा कविको कविता सुनिदिनुमा केको झर्कोफर्को ? म पनि कवि हुँदो हुँ तसायद चम्रेल कविजस्तै आज फलानाज्यूकहाँ कविता सुनाउन जानु छ भन्दैपुसको जाडामा बिहान सातै बजे सात ठाउँमा साइकलको जन्जिर खुस्काउँदै-हाल्दै दगुर्थे कि ? त्यसैले कुनै झर्कोफकोको कुरा हुँदै होइन ।&lt;br /&gt;
वास्तवमा चम्रेल कविको माया मलाई आफ्नो घरको गाईको भन्दा बढीलाग्थ्यो । उनी सज्जन थिए । भुराभुरीले भिँज्याए पनि झोकिन्नथे, ठिटाठिटीलेगिज्याए पनि रन्कन्नधे । समाजमा उनको रिस थियो भने जम्मा पाँच वर्गकामान्छेसित मात्र थियो । एक सम्पादकवर्ग- जो उनले लेखेजति जम्मै छापिँदैनथे,&lt;br /&gt;
कावि चग्नेलजी : एक शब्बचित्र ? २२३&lt;br /&gt;
दोस्रो समालोचकवर्ग- जो कविहरूको चर्चा गर्दा उनको त्यति लामो नामैबिसिंदिन्थे, तेस्रो जाँचकीवर्ग- जो कहिल्यै पनि उनलाई त्रिभुवन पुरस्कार रमदन पुरस्कारको लागि छान्दैनथे, चौथो प्रकाशकवर्ग- जो उनी आएकोटाढैबाट देख्नासाथ आफू दराजले छेकिएर नोकरलाई उहाँ हुनुहुन्न भन्नलगाउँथे र पाँचौँ पाठकवर्ग- जो उनको किताब किन्न त परै जाओस्‌, उपहारदिँदा पनि पढिदिँदैनथे । म यी कुनै वर्गका पनि पर्दिनथैँ । उनको कवित्वमाशङ्का उठाएर उनले स्वयं पाइरहेको तृप्ति तित्याइदिन वास्तवमा म चाहँदिनथैँ ।कारण काव्यधन्दा छुटाएर अर्को धन्दा लेक भनूँ भने अब चोला-परिवर्तनकोबेलामा पेसा-परिवर्तन के गर भन्नु ? लेखिराख भनूँ भने महाकाव्य लेखिसक्नासाथत्यो छपाउन घर बेच्छु भन्थे । उनको यो दुस्साहस सुन्दा झसङ्ग भएर केहीदिनअघि मैले हप्काएको थिएँ- “घर भए कमसेकम एउटा भकारीमा किताबकापीमोरेर यो धानको भकारी है भनी केटाकेटी ढाँद्न त पाइन्छ ! काव्यसाधनाभन्दाभन्दै कोठाको गलैँचादेखि आलु रोप्ने बगैँचासम्म सिद्ध्याउनुभयो, अबत्यही चुहुने घर पनि स्वाहा पार्नोस्‌ ।” हुन पनि यहाँ कोर्स न फोर्सका पुस्तककसले पढ्छ ए किनेर ? मलाई खुसी लाग्नाको मुख्य कुरा के भने उनी प्वाक्कमरिदिएकोले अब उनका जहान-छोराछोरीले पाटी र पेटी खोजिरहन परेन ।लाउनु न खानुका रिनमा जाकिनु परेन ।&lt;br /&gt;
चम्रेल कविको पूरा नाम मार्कण्डेयबहादुर चम्रेल हो । तर जिउँदाकोनाम लेख्ता &#039;श्री&#039; को शिर र &#039;जी&#039; को पुच्छर छाड्नु हुन्न भन्ने उनको सिद्धान्तथियो । सकेसम्म &#039;श्री&#039; को अघिल्तिर कबि र &#039;जी&#039; को पछिल्तिर &#039;कोकिल&#039; भन्नेउपनाम पनि जोड्ने उनको सोख थियो । त्यसैलै उनका पुस्तक, कापीकापत्रपत्रमा २४ प्वाइन्टका अक्षरले रबरछाप मारिएको हुन्थ्यो- कविश्रीमार्कण्डेयबहादुर चम्रेलजी &#039;कोकिल&#039; । तर त्यसपछि जोर्ने डिग्रीसिग्री भनेउनले केही जोर्न सकेका थिएनन्‌ ।&lt;br /&gt;
उमेरले सेत्याउन खोजे पनि चुरोट तमाखुले खैच्याएका जुँघामनि खुँडेलेनयाँ बान्की दिएको माथ्लो ओठ र त्यही खटप्वालबाट टल्कने एउटा सुनकोदाँतले कवि चम्रेलको अनुहारमा एउटा दिव्य शोभा झल्काउँथे । उनकाशिरको भादगाउँले टोपी सधैँ कपालसितको सङ्गतले जस्तै कालोपन छाडेरसेत्याइँतिर अघि बढिरहेको प्रतीत हुन्थ्यो । जतिजति उनी आफूमा कवित्वलम्बिदै गएको ठान्थे, उतिउति दाह्दी लम्ब्याउने उनको सोख थियो । यहीलम्बाइको मोहले हो कि, यता केही वर्षदेखि उनी वर्षाभरि सेता टाँक टलक्क&lt;br /&gt;
२२४ ” भैरब अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
टल्कने कालो शेरमानीले आफ्नो कोमल कविकलेवर ढाक्ये भने हिउँदभरखरानी रङ्गको भव्य ओभरकोटले !&lt;br /&gt;
धौत्रै भए पनि ह्यान्डिलको एकापट्टि ऐना र अर्कापट्टि काँचको फूलसजाइएको साइकल उनका जवानी र जागिरे जीवनको ठूलो स्मृतिचिह्नथियो । महिनाको एक पक्ष उनी त्यही साइकलमा फूलसमेत फिरफिराएरगुडिरहेका देखिन्थे भने अर्को पक्ष एउटा ब्याग काखी च्यापी लुइँलुइँ लम्किरहेकाभेटिन्धे । हिँडिरहेको बेला कसैले &#039;साइकल खोइ नि&#039; भनी सोधिदियो भनेचम्रेल कवि टक्क अडिएर पन्ध्र दिनअगाडि फलानो सर्दारकहाँ कविता सुनाउनगएको बेलादेखि साइकलले दिएको धोकाको नालीबेली लगाउँदै अब पन्ध्र दिनपैदलै हिँड्ने बिचार लिएको घोषणा गर्थ । यथार्थमा चम्रेल कविको साइकलठोटरीजस्तै थियो, महिनाको पहिलो पक्ष उनको पास रहे दोस्रो पक्ष गुप्तवासपुग्थ्यो । तै पहिले पक्ष भएकोले उनलाई यो स्वामीभक्त साइकलले छाडेकोरहेनछ, पहिले साइकलको बिक्रीसंस्कार सकेर उनको दाहसंस्कार गर्न पाइयो,मलाई खुसी लाग्नको यो पनि अर्को कारण हो ।&lt;br /&gt;
चम्ेल कविलाई आफ्नो कबिजीवनको प्रारम्भ महाकवि देवकोटासँगैभएकोमा ठूलो गर्व थियो । गुनासोचाहिँ एउटा के थियो भने देवकोटा बाठाथिए, लेखेजति खटाखट छपाएर उनले महाकवि पड्काइहाले, चम्षेल कविलेपहिलेपहिले छाप्नमा भन्दा ढोकाढीका पुगेर सुनाउनमा मन लगाए, अहिलेसबै हेप्न खोज्छन्‌ तर लेखनाथको जिउँदैको रथयात्रा सम्झँदा र देवकोटाकोगरेपछिको सालिक देख्ता उनमा पनि त्यो नामको प्यास मर्नको बदला झन्‌झन्‌उर्लेको थियो । अहिले छुल्याहाफुल्याहाले बाधा पारेको भए पनि उनलाईविश्वास थियो एक दिन बाध्य भएर सबैले उनलाई मान्नै पर्छ । त्यसैले उनकीश्रीमती कहिलेकाहीँ हामीसित गुनासो गर्थिन्‌- “व्यवहारका कुरा गर भनेउहाँ देबकोटाको सालिक देखाएर &#039;नरोक कविनीज्यू ! तिम्रा लोग्नेको पनित्यस्तै सालिक बन्छ&#039; भन्नुहुन्छ । नरोउँ भने सालिकज्यूलाई एक तुर्को चियाचढाउने हबिगत पनि अब भएन । हुन पनि उनी घरमा सालिकजस्तै थिए ।कोही सिकिस्त बिरामी भयो भने औषधिउपचार जेसुकै होस्‌, उनलाई चाहिँकविता फुर्थ्यौ ।”&lt;br /&gt;
अँ, अघि मैले भन्नै बिर्सेछु । कवि चम्रेललाई दुइटा अनौठा रोग थिए-सपनामा घुर्ने र बिपनामा फुर्ने । सपनामा त जतिसुकै घुरून्‌, कसैको वास्ताथिएन, तर बिपनामा फुर्ने रोगले भने उनलाई मात्र होइन, उनको सङ्गत गर्ने&lt;br /&gt;
काबि चग्रेलजी : एक शब्बचित्र ” २२१&lt;br /&gt;
अरूलाई समेत बराबर सताउँथ्यो । कविता सुनाउँदासुनाउँदै होस्‌ वा कामगर्दागर्दै होस्‌, दुई-चार जना मान्छे देख्यो कि कविज्यू &#039;फुम्योफुत्यो&#039; भन्दैघोत्लिन थालिहाल्थै । यो फुर्ने रोगले सबभन्दा बढी सताएको उनको बिहाकैदिन हो । कन्यादानको साइत भयौ भनी जब पण्डितबाजेहरू मङ्गल पढ्नथालेका थिए, दुलहासाहेब &#039;फुप्यो फुस्यो&#039; भन्दै उफ्रन थालेछन्‌ । मैले सङ्कल्पबिराएछ्ु कि भनी पुरेत घोरिएछन्‌, गोडधुवा सानो भयो कि भनी दुलहीका बानुघोत्लिएछन्‌, दुलहा सन्काहा परेछन्‌ कि भनी दर्शक महिलाहरू खिलखिलाउनथालेछन्‌, विष्णुसित बिहा हुन थाल्यो भनेको त धतुराबाज महादेवकहाँ पोपरिछु कि भनी दुलही पिलपिलाउन लागिछन्‌ । हत्त न पत्त म पुग्दा तसाइतको वातावरण नै निस्तब्ध रहेछ । केवल दुलहाज्यू &#039;ए लौन फुप्यो, फुन्यो&#039;भन्दै छटपटाइरहेका । मलाई देख्नासाथ उनले त्यसै गरी सान गरे, जसरीभाषणको कापी ल्याउन बिर्सेका मन्त्रीज्यूले माइकअगाडि उभिएर भएभरकाखल्ती छामछुम पार्दै सेक्रेटरीलाई सान गर्छन्‌ । ठाउँ न कुठाउँको उनको स्वाङदेख्ता एक मुठी चड्कनचिउरा गालामा फुराइदिउँ कि जस्तो मलाई पनिलागेथ्यो, तर पस्यो कन्यादानको बेला । त्यसैले मिजाससाथ अनुरोध गरेँ- “योलगनको बेलामा कहाँ कविता लेख्ने कविजी ! फुरेको भए अहिले मनमनैफुराइराख्नोस्‌ । पछि लेख्नुहोला ।” तै बिचराले तुरुन्त अनुरोध मानेर कन्यादानकोलागि हात तेर्स्याइदिए । सक्कली कविको चरणोदक पान गर्न पाएछौँ भनेरहोला, दुलहीका आमाबाबुसमेत सबै मुखामुख गरेर मुसुक्क हाँसे । पछि जग्गेमाचाहिँ दुई-तीन पटक कलमकापी लिएर घोत्लिरहेको देखेथेँ ।&lt;br /&gt;
चम्रेल कवि धर्मले मात्र होइन, स्बभाबले पनि सनातनी थिए र भावलेपनि सनातनी । कसैले “जमानाअनुसार अलिकति बदलिनुपर्छ कि कविजी&amp;quot;भन्यो भने उनी रन्किएर जबाफ दिन्थे- “मलाई के अवसरवादी कवि ठान्यौ ?”त्यसैले उनको कवित्वबारे टीकाटिप्पणी गर्नु बेकार थियो । तर एउटा कुरोपक्कै हो- उनका कवितामा केटाकेटीले पनि छर्लङ्ग नुभने प्रसादगुण हुन्थ्यो ।उनी जुनसुकै वार्णिक छन्दलाई पनि आफ्नो मुखजबानीले टाकटुक्क मिलाउनसक्थे । मात्रिक छन्द मातृजातिको छन्द हो र भयाउरे भनेको कवितामा उम्रेकोभ्याउ हो भन्ने उनको विश्वास थियो । अन्त्यानुप्रास मिलाउनु त उनकोनिम्ति हजामलाई छुरी मिलाउनुजस्तै थियो । उनी कहिले तन्नेरीलाई सम्बोधनगर्दै जनाउ दिन्थे-&lt;br /&gt;
आन्द्रा खत हुन्छ सुपारि खाए&lt;br /&gt;
२२६ ८ भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
कहिले तरुनीलाई सम्बोधन गर्दै चैतावनी दिन्थे-, चिप्लिन्छ सारी त सिलीक लाए&lt;br /&gt;
हुन त उनको किलिप-कवबच छापिन सकेको भए युवतीहरूलाई किलिपकिन्न क्याटलग पल्टाइरहनुपर्ने नै थिएन ! तर शृङ्गारी कवितामा भन्दाराष्ट्रवादी कवितामा उनको प्रतिभा आशु गतिले पोखिन्थ्यो । जम्मा पच्चीसओटाशब्दले पचासओटा कविता बनाउन सक्नु उनको कवित्वको अर्को विशेषताहो । नेपालपछि विशाल, विशालपछि कमाल, कमालपछि हिमाल, हिमालपछिमुनाल, मुनालपछि टुँडाल, टुँडालपछि फेरि नेपाल ! यी शब्द गोरखापत्रकोराशिफलझैँ कहिले तल कहिले मीथ पारी उनी पङ्क्तिमा चालिरहन्थे । हावापानीशुद्ध, सीता र बुद्ध, अमरसिंहको गाथा, सगरमाथा- यी पनि उनका अनुप्रासमिलाउने साबिकका साँचा हुन्‌ । बीररस बहाउने जोसिला कवितामा उनीबित्पातै छन्‌ भन्ने कुरा त उनले आफ्ना जेठानलाई कवितामै दिएको जबाफबाटमैले पहिल्यै बुझिसकेथेँ । उन्ती गर्जेथे-&lt;br /&gt;
चाम्रै छु थर चम्रेले पनि बुझेँके दब्येँ जेठान्‌सित,नदेखाक गोरखालिकासँग कवैत्यो मक्बान्प्रे रित,&lt;br /&gt;
एक दिन कुनै पोखरीमा पुगेर उनले टिन्न साइकलको घण्टी दिँदापोखरीका पाखापाखामा पाहार तापेर बसेका सारा भ्यागुता थर्कमान भएर एकैपटक पोखरीमा हामफालेको वर्णन अत्यन्तै सजीव छ । यो सुन्दा मैले उनलाईसच्चा सुझाब दिएको थिएँ- “तपाईं लेखाइमा जति ज्यान फाल्तुहुन्छ, त्यसकोएक चौथाइ परिश्रम अरूको कृतिमा पनि खर्चिनुभयो भने राम्रै कवि हुनुहुन्थ्योकि ?” सुझावको जबाफमा उनले भनेका थिए- “अरू भासभुसेहरूले केलेखेका छन्‌ र पढ्नु ?” उनको अनेपाली भाषामा पहुँच थिएन भन्ने क्रा तमलाई राम्रै थाहा थियो तर भन्थे- कुन्नि कसले हो उनलाई शेक्सपियर रकालिदासको प्रभाव पच्यो भनेर सुनाइदिए रे, त्यहाँदेखि उनले आफ्नो बाहेककसैको कृति झुक्किएर पनि पढ्नेछैन भनी जनै छोएर किरिया हालेका छन्‌ रे ।त्यसैले मौलिकतामा उनीप्रति शङ्का उठाउनु गाह्रै पर्थ्यो ।&lt;br /&gt;
चम्रेलज्यूको लामो कविजीवनमा ठूलाठूला बाधाव्यवधानहरू परे, तरहरुवा जुबाडीले कौडाका दाँती गन्न नछाडेभझँ उनले शब्दका पङ्क्ति जोर्नछाडेनन्‌ । उनले समाजलाई के दिए र समाजले उनलाई के दियो त्यसको&lt;br /&gt;
कवि चग्नेलजी : एक शब्दचित्र ? २२७&lt;br /&gt;
हरहिसाब गर्नेहरूले गर्दै गर्लान्‌ । मेरा चर्मचक्षुले देख्ता त उनले कवि बनेरजिन्दगीभरमा कमाएको एउटा धन एक तोलाको सुवर्ण पदक थियो जो घरबसुन्जेल पारदर्शक प्लास्टिकको खोलमा उनको सिरानमाथि झुन्डिरहेको हुन्थ्यो,बाहिर निस्कँदा शेरमानी वा ओभरकोटको भित्री बगलीमा जतनसित घुसारीनिस्कन्ये । यसो भन्दा तपाईंहरू सम्झनुहोला- उनलाई जहान-छोराछोरीकोविश्वास थिएन कि ? तर क्रा यो मात्र होइन, सन्जोगले कुनै ठूलो मान्छेभेटियो भने प्रसङ्गग मिलाई आफ्नो नामाङ्कित सुवर्ण पदक देखाएर कवित्वकोपक्की प्रमाणपत्र प्रस्तुत गर्ने धोको उनको कहिल्यै सेलाएन । यो सुवर्ण पदकपनि उनको जीवनको एउटा महत्त्वपूर्ण निर्णायक अङ्ग थियो, जो २००८सालमा चित्लाङमा भएको कविसम्मेलनमा उनले कुन्नि कुन मन्त्रीको बाहुलीबाटवैद्वन पाएका थिए । बराबर सङ्कट पर्दा जहान-छोराछौरीहरू सिरानमाथिझुन्डिएको उनको सुवर्ण पदकमा ट्वाल ट्वालती हेर्थे, तर उनी भन्थे- &amp;quot;पख,अर्को कविसम्मेलनमा म एउटा हीरक पदक जितेर ल्याउँ, अनि यो मासेरतिमीहरूलाई गहना बनाइदिउँला । यो सुन्दा ससाना छोरीहरू मबख पर्थे; तरठूली छोरीले भने .अब पत्याउन छाडिसकेकी थिई । त्यो पदक लुकाएर कविनीलेमङ्लसूत्र बनाउने दाउ पनि गरेकी थिइन्‌ रे तर उनले थाहा पाइहालेछन्‌, होयताका १९ वर्षभित्र उनको सुवर्ण पदक ९९ पटक बन्धकी बस्यो होला, तरमासिनै भनी पुगेको चाहिँ अस्ति मात्रै । जब चम्रेल कवि धेरै गल्दै गए,एक्सरेपछि एक्सरे गर्नुपप्यो अनि बन्धकी राख्नै निहुँले श्रीमतीले उनको सुवर्णपदक बेचिदिने अठोट गरिछन्‌ । चम्रेल कविले यसपालि हुँदैन त भन्न सकेनन्‌तर आइमाईलाई ठगिदिन्छन्‌ भनी सकीनसकी रिक्सा चढेर आफू पनि बाँडाकहाँनगई छाडेनछन्‌ । सन्जोगले म पनि त्यो दिन कहाँबाट त्यहीँ पुगेछु । बाँडाजतिजति सुवर्ण पदक घोद्थ्यो उनी उतिउति आफ्नो मुटु घोटिएजस्तो गरीमुख बिगार्दै गइरहेका थिए । दस-पन्ध्र मिनेटको परीक्षणपछि जब बाँडालेपदक एक तोलाको भए पनि खास सुनचाहिँ एक मासा मात्रै रहेछ भन्नेसुनाएको थियो चम्रेल कवि बाँडाकै ज्यासलमा घुप्लुक्क घोप्टिहाले । हत्त नपत्त उनलाई अस्पताल पुस्याइयो तर अब चम्नेल कविको निम्ति गर्न सकिनेउपचार पनि बाँकी थिएन, गर्नुपर्ने उपकार पनि बाँकी थिएन । बेसै भयोबिचरा नमरेको भए आफ्नो नामको प्यासलाई कति दिन भ्रमको प्यालालेमेटाउन सक्ये होलान्‌ त ? कतै आत्महत्या गरिदिए भने. ...।&lt;br /&gt;
रचना&lt;br /&gt;
२२६ ४ भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
&#039;हराम पाँडे हजुर&#039;&lt;br /&gt;
घरबाट स्ट्रेचरमा भ्याइँकृटी पार्दै कुदाएको सम्झन्छु, त्यसपछि कसले,कुन बाटो कसरी कहाँ पुन्याए भन्न सक्तिनँ । एक्कासि चित्रगुप्तको रिसेप्सनअफिसमा पुग्दा पो बोधार्थ पाइयो- म मरिसकेछु ।&lt;br /&gt;
एउटा बिरालो मर्दा त कति नरमाइलो लाग्छ भने मलाई आफू मर्दाकस्तो लाग्यो होला, तपाईं नै सोच्नोस्‌ ! तर जतिसुकै दुःख लागे पनि मर्दाआफैँ रुन नपाइने संसारको कानुन ! रोईकराई मरेको लोग्ने फिर्त्याइछाडनेसावित्रीको फोर्स पनि आफूसँग थिएन, लक्ष्मीको तर्फबाट विष्णुमा बिन्तीपु्याई जीवन थामिने कुनै सोर्स पनि आफूसँग थिएन । त्यसैले विशेष पुलिसकोकचहरीमा पुन्याइएको वनपालेझैँ कारिन्दालाई तीन पटक नमस्ते गरी थरथरकाम्दै थुचुक्क एउटा त्रिपाईमा बसेँ । कारिन्दाले नमस्तेसम्म नफर्काई टर्रोआवाजमा भझर्केर सोध्यो- “नाम क्या हो ?” मैले काम्दो स्वरमा हात जोड्दैबताएँ- &amp;quot;राम पाँडे हजुर !” कारिन्दाले नाम टिप्यो र पुर्जीको लागि “भोलिआङ” भन्यो । मैले छक्क पर्दै सोधेँ- “म आजै मरिसकेको मान्छे, भोलि त दुईदिन हुन्छ हजुर ! छोराले ढिकुरामा पिण्ड दिइसक्छ । आज कहाँ जाँ र भोलिफेरि यहाँ आउँ त ?”&lt;br /&gt;
कारिन्दा एकछिन जिल्ल पन्यो र पछि झस्केभँ गरी बोल्यो- “एसाँच्ची त, तिमी मरेर आएको हगि ?” मैले सही थापेँ- “हो, हजुर !”&lt;br /&gt;
उसले भन्यो- “म पनि डिल्लीबजार अड्डामा कारिन्दागिरी गर्दागर्दैमरेकोले यहाँ कारिन्दैमा परेको त हुँ नि ? खोइ क्राइभेन कोसेली केही ल्याएनौ !यहाँ आएपछि चुरोटसमेत पाएको छैन ।”&lt;br /&gt;
मैले भनेँ- &amp;quot;ख्बै हजुर, एक त मलाई यति छिटै मरिएला भन्ने नैलागेको थिएन । दोस्रो मरिसकेपछि पनि अड्डाखाना धाउनुपर्छ भन्ने थाहाथिएन । कारिन्दाले एउटा खाली पुजामा किरिङमिरिङ अक्षर लेखी मलाई “भित्र&lt;br /&gt;
हराम पाँडे हजुर&amp;quot; “ २२९&lt;br /&gt;
जाक” भन्यो । भित्र रिकर्डकीपर बूढाहरू खाता पल्टाएर घोस्लिदै रहेछन्‌ !मैले बाह्र राजा एकै स्वस्ति गरेँ । तर कोही बोलेनन्‌- नबोलेको मात्र होइन,कसैले मुन्टो उठाएर हेर्नसम्म हेरेन । निकैबेर उभिएर खुट्ल गलेपछि मैले पुर्जादेखाउँदै एउटा टेबुलको छैउमा पुगी भनेँ- “मेरो रिकर्ड हेरिदिनुहुन्थ्यो कि ?”&lt;br /&gt;
उसले टाउकै नउठाई अर्कै टेबुलमा जाने सङ्केत गय्यो ।&lt;br /&gt;
उहाँ गएर भनेँ- “मेरो रिकर्ड हेरिदिनुहुन्थ्यो कि ?” उसले पनि अर्कोटेबुल देखायो । यही क्रमले एकपछि अर्को भित्ताको टेनुलमा पुगेपछि त्यहाँकोअफिसरले मेरो हातको पुर्जा लियो र पढ्यो- नाम- &amp;quot;राम पाँडे हजुर&#039; ।लिङ्का-पुरुष । वर्ष ४२ । ठेगाता- का. जि. जुँगानगर, नेपाल । पुर्जामा पुण्यर पापको रिकर्ड भर्नुपर्ने दुई कोठा खाली नै थिए । अनि उसले खाता खोलेरनिकैबेर खोजी पल्टाउँदै मलाई भन्यो- “राम पाँडे हजुर&#039; भन्नेको नाम त यहाँछैन । &#039;हराम पाँडे छ, श्रीराम खनाल छ, विराम गजुरेल छ, तर राम पाँडे हजुरभन्ने कुनै बाँचेको पनि देखिँदैन, मरेको पनि देखिँदैन ।” “लौ बित्यास परेछ&amp;quot;-मैले भनेँ- “नाम त मेरो राम पाँडे नै हो । जीबनमा केही वर्ष म हवलदार पनिथिएँ, त्यस बेला ह. राम पाँडे भनी आफ्नो दर्जा जनाउने पनि गर्थे, सायदचित्रगुप्तको कार्यालयमा त्यसै बेलाको रिकर्ड लेखिन गएछ कि ? सु. कुलबहादुरकोबीचको बिन्दु छुट्ता सुकुलबहादुर भएझैँ ह. राम पाँडेको हराम पाँडे हुन केबेर ! आखिर कारिन्दे अक्षर न हुन्‌ ।” मैले नम्रतापूर्वक निवेदन गरेँ ।&lt;br /&gt;
उनले रिसाएर भने- “लिखितम्‌को अगाडि बकितम्‌ चल्दैन बुभ्यौ ?यो चित्रगृप्तको रिकर्ड अड्डा हौ, गुइँठा करपोरेसनको जथाभाबी अफिस होरतिमीले जे भन्यौ म त्यही पत्याउँ ? पुर्जामा- &#039;राम पाँडे हजुर&#039; छ रिकर्डमा&#039;हराम पाँडे&#039; छ, कसरी कारबाई गर्ने ?”&lt;br /&gt;
मैले डराईडराई सुझाव टक्ग्राएँ- “कि रिकर्डमा पछि थोप्लो थपेरसच्याउनुपच्यो, कि पुर्जामा नामअघि दर्जा जनाई सच्याउनुपत्यौ । म आफैँकारिन्दाकहाँ गई दर्जा जनाएर ल्याकँ कि ?”&lt;br /&gt;
श्रीमान्‌ फेरि जङ्गिए- “यो के कुनै निर्वाचन आयोग हो र नामसच्याईसच्याई मिलाउनुपर्ने ? तिमी आज कारिन्दाकहाँ नाम सच्याउँछु भन्छौ,भोलि पुरेतकहाँबाट सच्याएर ल्याउँछु भनौला, पर्सि ज्योतिषीकहाँबाट सच्याउँछुभनौला । त्यस्तो पाइँदैन बुभ्यौ ? तिम्रो रिकर्ड लेख्ने अफिसर उहिल्यै वैतरिणीकोघाटे चौकीमा सरुबा भै गैसक्यो ।” मैले विनम्रतापूर्वक सोधेँ- “त्यसो भएकहाँ जाँ त श्रीमान्‌ ?”&lt;br /&gt;
२३० ० भैरव अर्यालका हात्यब्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
बूढाले च्याँद्िदै पुर्जामा रातो मसीले लेखिदिए- &#039;यो नाउँको मान्छेखातामा नभएकोले कारबाई गर्न नमिल्ने ।&lt;br /&gt;
म पर्जा लिई पालेले रोक्तारोक्तै पनि चित्रगुप्तकै मूल अफिसमा पुगेँ रभनेँ- “बाँचुन्जेल त अड्डाअड्डा घुम्नु पन्योपन्यो मरेपछि, पनि पुर्जामा यस्तोतोक लागेर अलपत्र पर्नुपस्यो श्रीमान्‌ !”&lt;br /&gt;
चित्रगप्तजीले पुर्जा र तोक हेरी हरियो मसीले अर्को तोक लगाइदिँदैभने- “मृत व्यक्तिको तीनपुस्ते बुझ्न पुस्ता विभागलाई एउटा चिठी पठाउनूर आर्यघाटको घाटे चौकीलाई पनि तार गरेर एक पटक सोध्न्‌ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
तर उत्तर नआउन्जेल मैले कसरी पर्खने भन्ने बारेचाहिँ उनले पनिकेही लेखेनन्‌ ।&lt;br /&gt;
चित्रगुप्त कार्यालय चौबीसै घण्टा खुला हुने र कर्मचारीको सिफट मात्रबराबर बदलिइरहने भएकोले म बाह् दिन त्यतै अलमलिएँ, दिनभर यो अफिसर उ अफिस घुम्दै आफ्नो नाम तहकिकात गर्ने काम छँदै थियो, चार पहर रातढोकैमा उभिएर बिताइदिन्थेँ । बाह्रौँ दिनको दिन एउटा अर्को समस्या आइलाग्यो-मेरो शुद्धिशान्तिमा छोराले मेरो नाममा दान गरेको ओढ्ने-ओछ्याउने, भाँडाकुँडार लुगाफाटो कहाँ पुच्याउने भनी धर्म मन्त्रालयअन्तर्गतको दानप्रदान बन्दोबस्तअङ्डाले चित्रगुप्त कार्यालयलाई सोधिपठाएछ । चित्रगुप्तने चिटचिट पसिनानिकाल्दै मलाई बोलाएर सोधे- “तिम्रो नामको तहकिकात हुँदै छ, नहुन्जेलतिम्रो अन्तरिम व्यवस्था गर्नुपत्यो । नढाँटीकन भन, तिमीले कुनै पाप गरेकाथियौ कि थिएनौ ?” मैले भनेँ- &amp;quot;पाप गरेको त थिइनँ श्रीमान्‌ !” उनले सोधे-“के कुनै पुण्य गरेका थियौ त ?” मैले भनेँ- “नभएको धाक लगाउनु हुँदैन,मैले कनै धर्म पनि गर्न सकेको थिइनँ श्रीमान्‌ !”&lt;br /&gt;
चित्रगुप्त अकमक्क परे । उनको असिस्टेन्टले गर्जिएर मलाई झाँट्यो-“ध्वर्म पनि गरेको छैन रे, पाप पनि गरेको छैन रे ! बयालीसबयालीस वर्ष केगरेर बसिस्‌ त ?”&lt;br /&gt;
मैले भनेँ- “बस्न त कहाँ पाएँ र हजुर, कहिले चाकरी गरेँ, कहिलेनोकरी गरेँ, कहिले मुद्दा गरेँ, कहिले सुर्ता गरेँ, कहिले बिहा गरेँ, कहिले तलाकगरेँ, आखिर जीवनभर जेजति गरेँ दुःखै गरेँ श्रीमान्‌ !”&lt;br /&gt;
&amp;quot; चित्रगुप्तले मलाई आवेशमा नआउने सल्लाह दिँदै फकाए- “हैन,पाँडेजी जिन्दगीभर केही न केही धर्म त अवश्य गर्नुभो होला, सम्झनोस्‌ न ।”मैले भनेँ- “मैले बाँचुन्जेल गरेका कुरा प्राय: बताइहालेँ । तिनैमध्ये कुनै काम&lt;br /&gt;
&#039;हराम पाँडे हजुर&#039; “ २३१&lt;br /&gt;
धर्मको थियो कि पापको थियो श्रीमानूले नै छुट्टयाइदिनुपर्छ ।&amp;quot; मेरो जबाफसुनेपछि चित्रगुप्तजी निकै घोरिए र असिस्टैन्टलाई बताउन थाले- “यिनलेगरेका सम्पूर्ण कामहरू नोट गर र तिनमध्ये कुनै धर्मभित्र या पापभित्र पर्छन्‌कि निरूपण गरी पठाइदिनुपच्यो भनी &#039;पापपुण्य प्रमाण प्रतिष्ठान&#039; लाई तुरुन्तलेखिपठाक । जबाफ नआउन्जेल यिनको गुन्टागुठुरी कतै नपठाउनू भनीदानप्रदान बन्दोबस्त अड्डालाई बोधार्थ पठाइदेक ।”&lt;br /&gt;
तदनुरूप टिप्पणी लेखिए, चिठी लेखिए, म अझै त्यहीँको त्यहीँ भएँ ।&lt;br /&gt;
सात दिनपछि म फेरि चित्रगुप्तको बैठकमा बोलाइएँ । उनले भने-«आर्यघाट चौकीले &#039;हराम पाँडे हजुर&#039; भन्ने कुनै मान्छेलाई यहाँबाट पठाइएकोछैन भन्ने जबाफ पठाएको छ । तीनपुस्ते बुझ्दा &#039;पाँडे हजुर&#039; भन्ने कुनै थरनेपालमा नभएकोले र जात, धर्म र सम्प्रदाय नख्नुट्टयाई पापपुण्यको विवेचनागर्न मिल्दैन भनी पापपुण्य प्रतिष्ठानले लेखिपठाएकोले तिमी हिन्दू हौ किहोइनौ भन्ने शङ्का उठेको छ । तिमीसित हिन्दूत्वको कुनै पक्का प्रमाण छ&lt;br /&gt;
मैले जनै देखाएँ । दुपी देखाएँ ।&lt;br /&gt;
चित्रगुप्तले भने- “जनै र दुपी विधर्मी हिप्पीहरूले पनि राख्न थालेकालेअचेल यिनको प्रमाण लाग्दैन । हिन्दूमा पनि सम्प्रदाय धेरै छन्‌, जात धेरै छन्‌ ।तिमी ठ्याहा हौ कि मठ्याहा हौ ।”&lt;br /&gt;
मलाई अत्यन्त रिस उठ्यो र चर्किएँ- “मेरो नाम राम पाँडेहोरमविशुद्ध हिन्दू हुँ त भन्दै छु, पत्याइदिए त यो झन्झट तपाईंलाई पनि पर्दैनथ्योमलाई पनि पर्दैनथ्यो ।” चित्रगुप्तले सुस्केरा हालेर असिस्टेन्टलाई भने- “पाँडेहजुर भन्ने थर छ कि छैन र त्यो हिन्दू हो कि होइन बुझी सात दिनभित्रप्रतिवेदन पेस गर्न स्वर्गका बशिष्ठ पण्डितलाई बोलाई उनको अध्यक्षतामाएउटा कमिसत्त बत्ताइदिनू र त्यस कमिसनमा थधर-गोत्रावलीका लेखकशिंखरनाथलाई पनि सदस्य राख्नू ।&amp;quot; असिस्टेन्टले चिठीहरूको मस्यौदा गरे । मफेरि बसेको बस्यै भएँ । तै मरिसकेकोले खानपिनको झन्झट थिएन र मात्रै,जिउँदै भएको भए त्यहाँ कुर्दाकरदै सिलटिम्मुर चपाइसक्थेँ । रमाइलो एउटा केथियो भने दिनहँ थुप्रै मरेका मान्छे ल्याइन्थे । उनीहरू रिकर्ड हेरी स्वर्ग र नरककहाँ जाने हो चलानी- पुर्जी लिन्थे, हिँड्थे । आफू मात्रै न यता न उताभइरहेको थिएँ ।&lt;br /&gt;
चैँतालीस दिनपछि एक दिन मलाई बोलाएर चित्रगुप्तले भने- “सबै&lt;br /&gt;
२३२ / भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
बुभ्दाबिचार्दा तिम्रो नाम राम पाँडे नै भन्ने र धर्म हिन्दू नै भन्ने ठहरिए तापनिरिकर्डमा तिम्रो पाप केही नभएकोले नरकमा नपठाउनू भनी यमराजलेलेखिपठाएको र धर्म केही नगरेको हुँदा स्वर्गमा सिट नपाइने बुझिएकोले तिम्राछोराले दान दिएको गुन्टागुठुरी बाहुनले नै पाउने गरी फिर्ता गरिएको छ ।साथै कि धर्म कि पाप नगरी मर्दा स्वर्ग वा नरक कतैतिर पनि सिट नमिल्नेभएकोले हाल तिमीलाई संसारमै फिर्ता पठाइदिने निधो भएको छ ।”&lt;br /&gt;
चित्रगुप्तको विचित्र कुरा सुन्दा म छक्क परेँ । एक मन फेरि बाँच्नपाइने भयो भनी खुसी पनि लाग्यो, अर्को मन फेरि दुःख भोगन त्यही साँगुरोगल्लीको अँध्यारो छिँडीमा पुग्नुपत्यो भनी पीर पनि लाग्यो । नढाँटीकन भनूँभने खुसीभन्दा पीर बढी लाग्यो र चित्रगुप्तसित भनेँ- “त्यो साँगुरो गल्लीमाभन्दा त नरकको गल्लीमा डेरा सस्तो पाइन्थ्यो कि श्रीमान्‌ !” चित्रगुप्तलेहाँस्तै आश्वासन दिए- “ल, ल, सकेसम्म मोज गरेर मरी आर न, म तुरुन्तैनरक पठाइदिउँला, अहिलेलाई चुपचाप लागेर फर्क !&amp;quot;&lt;br /&gt;
चित्रगुप्तको अर्डर हुनासाथ मलाई पालेले घोक्य्राइदिड्हाल्यो । भित्तामाबजारिएर मुन्टो दुख्यो । म ऐँया भन्दै कराएको मात्र के थिएँ झल्याँस्सब्यूँझेछु । ब्यूँझैदा मेरो अगाडि डाक्टर, नर्सहरू उभिएर भन्दै थिएँ- “बधाईपाँडेजी बधाई ! तपाईंको अपरेसन सफल भयो । अब तपाईं होसमा पनि&lt;br /&gt;
आउनुभयो बधाई !”खर्पन&lt;br /&gt;
&#039;हराम पाँडे हजुर&amp;quot; ” २३३&lt;br /&gt;
आधा घण्टा&lt;br /&gt;
बस आएन ।&lt;br /&gt;
आफूलाई बेर भएको दिन बसले झन्‌ अबेर गरिदिन्छ । बेर र अबैरकोअर्थ कसरी एउटै हुन्छ ? &#039;अ&#039; लागेपछि अर्थ उल्टनुपर्ने । भाषा पनि ठाउँठाउँमारक्स्याहाझँ बाटो न घाटो दगुरिदिन्छ । अस्ति राति पिङ्गलप्रसादले साफरक्सी पिएछ । भन्थ्यो रे अब सडकमा हिँड्ने होइन, सुत्ने गरौँ । कुरा उसकोपनि कम छैन । हुनेहरू बेस्करी कार कुदाएर उपयोग गरून्‌, नहुनेहरू जुत्ताकोसमेत भार नदिई हलुकासँग उपयोग गर्न चाहन्छन्‌ तर पैदलयात्रीहरूलाईनिषेध गरेर पेटीमा घोक्ग्राइदिने किन ? सायद यही असमानताको विरुद्धरक्स्याहा क्रान्ति गर्छ- सडकभरिभरि भएर सडकको उपयोग गर्छ । तन्द्रङ्गसडकमै सुतेर स्वतन्त्र सपनाको उपभोग गर्छ । मोटर मात्र होइन, रङ्गीचङ्गगीरकेटैमा शयर गर्छ ।&lt;br /&gt;
सपना भनेको रक्सी हो कि रकेट हो, त्यो मलाई थाहा छैन- तरसपनामा यस्तो यातायात समस्या हुँदैन । आजै राति सपनामा म घरबिदालिएर आफ्नो घर गएछु । तनहुँको एउटा डाँडामा चिटिक्क परेको एउटाबङ्गला रहेछ, ग्यारेजमा मेरो एउटा हरियो टोयटा कार पनि रहेछ । स्वास्नीचाहिँमाइत गएकी ओखलढुङ्गामा । म आफैँ कार हाँक्तै हिमालको फेदीफेदीनाम्चेबजार पुगेछु र स्वास्नीलाई फोन गरेर आफू आएको जनाउ दिएछ ।ससुराली पुग्नासाथ स्वास्नीले स्टकहोमबाट भर्खर आएको टेलिग्राम देखाएरमुस्कुराउँदै मलाई गाली गरी- “पर्सि नोबेल पुरस्कार लिन जानु छ, हजुरचाहिँआज सबारी हुने ?”; “लौत जाऔँ” भनी ठाडै खुट्टाले म कार मोड्न थालेँ ।स्वास्ती र छोरा पति कारमा पसे । चाँडै पुग्नुपर्ने हुनाले मेरो गाडी यस्तरीकुदेछ कि पानीमा छ्यापल्याङ्ग हुँदा पो समुद्र आयो भन्ने थाहा पाइएछ ।कारभरि पानी पानी, स्वास्नीको सारी पनि भिजेको आफ्नो सुट पनि । छोरो त&lt;br /&gt;
२३४ / भैरव अर्यालका हात्यव्यङ्रय&lt;br /&gt;
झन्‌ निध्रुक्कै । अब जमिनमा फर्की लुगा फेर्नुपन्यो भनेर मैले कार मोड्नथालेको मात्र के थिएँ झस्याङ्गा ब्यूँझेछु । सँगै सुतेको सानु छोराले स्‌ गरेरमेरो कट्टु र आमाचाहिँको पेटीकोटसमेत भिजाइदिइसकेछ ।&lt;br /&gt;
त्यो सपनाको जीवन सम्झँदा कुम्भकर्ण भएर छ महिना निदाउन पाएहुन्थ्यो जस्तो लाग्छ कहिलेकाहीँ । सायद यस्तै रङ्गीन सपनाहरूको स्वादलिन अचेल एल्‌, एस्‌, डी, को प्रयोग बढेको होला ।&lt;br /&gt;
घ्यार्र गस्यो नि, बस आयो क्यारे ?&lt;br /&gt;
सपनामा त्योविधि दगुर्ने मान्छेले बिपनामा थोत्रो बस कुर्नुपर्छ । तरवैज्ञानिकहरूले कति क्रामा त सपना र बिपनालाई एकछत्त पारिदिइसके बा !अस्ति कृ्‌ष्ण भन्थ्यो- कून्ति कहाँ हो तलमाथि लिफ्टजस्तै वरपर गर्ने &#039;स्विफ्ट&#039;पनि चल्न धाल्यो रे ! यहाँ पनि चलाउन पाए महाराजगन्जबाट बटन थिच्योसर्र शहीदगेट, त्यहाँबाट अर्को बटन थिच्यो सर्र सिंहदरबार । बटनको कुरागर्दा अस्ति एउटा पत्रिकामा पढेको चर्चा सम्झिन्छु । अचेल कतिसम्म हुनथाल्यो रे भने बिहान उठेर सिरानमाथिको बटन थिचिदिएपछि कम्प्युटर कान्छालेपल्लो कोठाबाट आफैँ चिया पकाएर ल्याउँछ रे ! टेबुलसमैत आफैँ तानीकपप्लेट सजाएर टक्ग्राकटुक्रक चाहिने कुरा सब सजाइदिन्छ रे ! यसै गरीचिया खाने एउटी युवतीको गुनासो थियो- “यो बटन दाउने झन्झट मान्छेलाईकहिल्यै छुटेन । स्विच थिच्नै नपरी कम्प्युटर कान्छामा चिया खान दिने बुद्धिकहिले आउला ?&#039;&lt;br /&gt;
खोइ त बस के मर्थ्यो ?&lt;br /&gt;
सके कतै बिग्रिएर अन्मरिएको होला । के भर यी ठाँडा मेसिनको ।अस्ति फिलिपिन्समा एउटा जेट गोली लागेको गिद्धझैँ फ्यात्त एरोड्ममै खसेरचर्ल्यमचुर्लुम्म भयो रे ! सुविधा खोज्दाखोज्दै मान्छेले बटन थिच्नै नपरीकनकम्प्युटरले एक दिन भएजति बम भरै पड्काइदिए भने ! बमै पड्काइदिए तकेही थिएन । सुनिन्छ अब अफिसको काम उसको जिम्मा दिने रे ! एउटाकम्प्युटर डाइरेक्टर, दुई-चारओटा क्लर्क, दुई-चारओटा पियन- कामै खतम ।मेरो ठाउँमा पनि मलाई खोसी एउटा कम्प्युटरै भर्ना गरियो भने ? झन्‌मज्जा, दिनभरि रङ्गरमिता गन्यो, बस्यो । न हाजिरको पीर न हजुरको ।चौबीसै घण्टा फुर्सत पाए म के गर्थे त ! यो यान्त्रिकताको विरुद्ध क्रान्ति गर्थे-मामको बन्दोबस्त नगरी मान्छेको काम खोस्न पाइन्छ त ? अनि मान्छे रकम्प्युटर कृस्ताकुस्ती हुन्थ्यो । संसार पूरै हिरोशिमा पल्टन्थ्यो । हिरोशिमा&lt;br /&gt;
आधा घण्टा ” २३१&lt;br /&gt;
भन्दा मैले हिरोमामाको कुरा सम्झैँ । मेरा मामाका गाउँको एउटा बौलाहा छनि, हो त्यसैलाई हामी हिरोमामा भन्थ्यौँ, क सधैँ कराइरहन्थ्यो- “ए घरनबनाओ, भत्किन्छ । घर नबनाओ, भत्किन्छ ।&amp;quot; कसैको घर बनाउने कुरासुन्यो कि त हिरोमामा गएर सत्याग्रह गर्थ्यौ- “खबरदार ! घर नबनाओ,भत्किन्छ, भत्किन्छ ।” उसको कुरा सम्झँदा म फेरि एउटा कविता सम्झनपुग्छु&amp;quot;&lt;br /&gt;
“काला केश नबाट है पुबतिहो फुस्किन्छ रे जोबन&#039;&lt;br /&gt;
घर नबनाओ भन्ने बौलाहा र कपाल नकोर भन्ने कविमा के फरक ?गीताले भनेको मान्छे मर्दैन रे !&lt;br /&gt;
बस पनि मर्दैन ।&lt;br /&gt;
यसको मतलब मरेपछि पनि यसै गरी बस पर्खनुपर्ला त ! पण्डितहरूभन्छन्‌- “मर्त्यलोकदेखि यमलोकसम्म साह्रै यातना सहेर पैदैलै हिँड्नुपर्छ रे ।तर हामी मरुन्जेल पनि त्यहाँ बससेवा चलिसकोइन त ?” वैतरणीमा सकेपक्की नसके झोलुङ्गो पुल त पक्कै बनेको होला ! सापद एक दिन यमराजलेझोलुङ्गे पुलको उद्घाटन गर्दै भाषण गरिसके होलान्‌- &#039;मान्छेहरूले युगौँदेखिपाएको दुःख घटाउने उद्देश्यले कुबेरलोकको आर्थिक सहायताबाट स्वर्गकोसुप्रसिद्ध प्राविधिज्ञ विश्वकर्मालाई समेत यहीँ बोलाई उनकै निर्देशनमा योबैतरणी पुलको निर्माण गरिएको हो ।&#039; साधै नरकमा एउटा नयाँ नोटिस पनिटाँसियो होला- पुल बनेकोले वैतरणीमा अब गाई नै दान गर्नुपर्छ भन्ने केहीछैन- एउटा मोटो बँदेल वा राँगो दान गरे पनि हुन्छ । रोडशेष पनि सत्रपैसादेखि हैसियत हेरी एजेन्टबाजेहरूलाई बुझाइदिए हुन्छ ।&lt;br /&gt;
बैतरणीम्ा पुल हालेदेखि रौरव र कम्भीपाकका बीच पनि बससेवाचलेको होला, स्वर्ग र नरकका बीच सोझै हवाई यातायात पनि चल्दो हो ।कनै दिन स्वर्गबाट नरक जान लागेको विमान मान्छेले अपहरण गरेर हाम्रोत्रिभुवन विमानघाटमा ओराल्न लगाउने हुन्‌ कि ? स्वर्ग र नरकको अस्तित्वछ र त्यहाँ मरेका मान्छेहरूको आबादी छ भने ज्यूँदाले त जाल, जासुसी रजघन्यता गर्ने जमानामा मरेकाले नगर्दा हुन्‌ भन्ने के ग्यारेन्टी ? मरेपछि हामीहुन्नौँ भने हाम्रा वेदनाहरू पनि हुन्नन्‌, सम्भावनाहरू पनि हुन्नन्‌ । वास्तवमामलाई पिरेको मर्नुको पिरलोले हैन, सम्भावना नहुनुको पिरलोले पो त&lt;br /&gt;
आज बस नआउनेनैहोकित?&lt;br /&gt;
पाँच-दस मिनेट अझ पर्खूँ । सेकेन्ड सुई घुमिरहेको छ- फनफन&lt;br /&gt;
२३६ ” भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
हवामिलको एरियलकँ । ्ँ&#039; मात्र होइन- प्रत्येक सेकेन्ड एउटा एरियल होचेतनाको । वशिष्ठहरू बसीबसी भूत भविष्य वर्तमानको सबै क्रा थाहापाउँथे रे । नारद ध्यानदृष्टिले एकै पटंक विश्वमा कहाँ के भइरहेछ, तुरुन्तैबुभ्थे रे । उः त्यो नीलो सुटले नारदजीलाई अहिले भेट्यो भने के सोध्ला ?सायद मेरो प्रमोसन कहिले हुने हो भनी सोध्ला । त्यो रातो सारीले लोग्ने रछोराछोरीको भविष्य सोध्ली ! उ: त्यो ज्यापूदाइले सोध्ला- “अहिलेको वर्षपानी कत्तिको पर्ला त बाज्या !” तर मैले नारदलाई भेट्न पाएँ भने दुपीअँठ्याएर भन्ने थिएँ- “बाजे ! आफूचाहिँ खराउको भरमा घरी सत्यलोक घरीमर्त्यलोक पुग्ने, हामी तिम्रै सन्तानले चाहिँ जोरपाटीबाट नयाँसडक जानघण्टौँ थोत्रो बस कुर्नुपर्ने ? खोइ त्यो तिम्रो पालाको ध्यानदृष्टि, खोइ त्योमन्त्रशक्ति ? सब आफैँले मासेर सिद्ध्यायौ ? शाखा-सन्तानलाई केही जेथाछाडिदिनुपर्दैनथ्यो ?&#039;&lt;br /&gt;
त्यो मान्त्रिक जेथा पाएको भए यो यान्त्रिक दुनियाँमा किन हबिगतखानुपर्थ्यो ? मनको जुन गति छ त्यसको सयकडा पच्चीस मात्रै पनि तनमासार्न पाए मैले जान्याथ्यो ।&lt;br /&gt;
खोड्‌ त आएन बस !&lt;br /&gt;
म लुइँलुइँ हिँडेर गएको भए पनि यस बेला महांकाल पुगिसक्थेँ ।महांकाल, भाटभटेनी पनि उड्थे रे बाबै ! स्वतन्त्रसँगै उड्न दिँदा बमवर्षकविमानले झैँ जथाभाबी बिगो गर्लान्‌ भनेर बडे सिक्रीले बाँधेका रे तान्त्रिकहरूले ।भाटभटेनी कहिल्यै भैँमा खुट्टा नृटेक्ने रे; बाँध्दा पनि क एक हात माथि तन्द्रङ्गगखुट्टा झुन्डघाएर उभिइरहिछ । महर्षिसँग मन्त्र माग्नु र वैज्ञानिकसँग यन्त्रमाग्नुभन्दा आफ्नै तन्त्रको विकास गर्न पाए कसो होला ? खोइ ! जामुनागुभाजू ? बाह्वर्षे इनार खोलखाल पार्नुपन्यो, केही जन्त्रतन्त्र लुकाइदिइराखेकोछ कि ? तान्त्रिक दुनियाँ फेरि आयो भने म के बस कुरिरहँदो हुँ ?”&lt;br /&gt;
भात खाएर लुगासुगा लगाई एउटा तन्त्र जप्तै कलम टिप्थेँ; बिर्कोउघारिनसक्तै अफिसको हाजिरकापी अगाडि पर्थ्यो । हाजिरकक्षमा उभिएरकापीमा नाम लेखिसक्न नपाउँदै तीन तलामाथिकी टाइपिस्टले नमस्ते गरिसक्थी ।तैपनि एक सेकेन्ड किन अबेर गरिस्‌ भनेर मलाई चड्कन दिन हाकिमले हातउठाए भने उनको हात गालामा नपर्दै म तान्त्रिकयानमा पेरिस पुगिसक्थेँ ।चड्कन पर्न आँटेको गालामा मेरीशाँको चुम्बन पो परिराखेको हुन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
बाटाघाटा जम्मै शून्य ! सडकमा त मुटुका बिस्कुन हालिराखेका ! किन&lt;br /&gt;
आधा घण्टा ” २३७&lt;br /&gt;
रे भने बूढाबूढीका मुटुहरू बराबर ओसिन्छन्‌, त्यसैले दिउँसो घाममा रन्नतताएर बेलुका जड्दै सुत्ने रे । यसरी सुकाउँदा कसैको मुटु चीलले लगिदियोभने ? समस्या त त्यहाँ पनि बाँकी रहन्छ के समस्या ?&lt;br /&gt;
अर्को मान्छै चीलै भएर उडी मुटु खोसेर ल्याउन सक्तो हो नि ! युद्धपनि तान्त्रिक हुन्थ्यो । एउटा नेताले अर्को नेतालाई ठाडै सुकाएर सत्ता हत्याउँदोहो, एक देशको राजधानीमा फूमन्तर गरेर अर्को देशमा भैँचालो ल्याइँदो हो ।यस्तैमा एक दिन पृथ्वीलाई नै फुक्ता फुक्ता फुक्ता सानो गुज्जाजत्रो पारेरसमुद्वका छालभित्र फुत्त फालिदिन्थ्यो कि कूनै तान्त्रिकले ? केही बेरै छैन ।फेरि कसैले बराहको अबतार लिई दाह्वामा पृथिबी च्यापेर नयाँ इतिहासको सुरुगर्नुपर्ने पो हो कि ? घुम्दो पृथिवीको इतिहास फेरि घुम्न के बेर ? साह्रै बेर भो,बस आएन ।&lt;br /&gt;
अफिसमा हाकिम खोज्दै होलान्‌- “हरिप्रसाद खोइ त ? अझ आइपुगेकोछैन ?” गर्जदा हुन्‌- “ठोक गयल त्यसलाई । के अह्डा भनेको कर्मचारीकोससुराली हो :” उनको पनि ससुराली जानुपर्छ क्यारे आज । सालीको बिहाभन्थे । सालीचाहिँ त राम्रै हो, उसको मस्याकमुसुक मोनालिसाको जस्तै छ ।रोममा त्यो मेरी गाइड थिई नि एउटी, क भन्थी मोनालिसा कुनै आइमाईकोहोइन, जिन्दगीकै चित्र हो । तर भिन्सी अब पुरानो भैसक्यो रे । साँच्ची&lt;br /&gt;
&amp;quot; नारदको टुपी, आइन्स्टानइको टाउको, पिकासोका आँखा, घण्टाकर्णको कान,&lt;br /&gt;
हनुमानको चिउँडो, आर्मस्ट्रेङ्को ओठ, उर्वशीको गाला, सोक्रेटसको नाक,काफ्‌काको कन्चट, लेनिनको दाह्री, कामदेवको रूप, बर्नार्ड शाको रङ, जामुनागुभाजूको जन्तर, भानुभक्तको टोपी सबै मिलाएर एउटै चित्र बनाउनु निकस्तो होला ? मान्छेकै चित्र बनाउने हो भने म त भन्छु- “टाउको टेकेरकृद्ने, खुट्टा टेकेर पर्खने मान्छेको चित्र बनाउनुपर्ला कि ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
उः बस आयो ।&lt;br /&gt;
हिमालनीबर्सेनि&lt;br /&gt;
२३६ ” भैरब अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
सम्भावित दुनियाँ (?)&lt;br /&gt;
&#039;कलि&amp;quot; भन्ने शब्द सुन्नासाथ आर्यघाटमा कम्मरसम्म गाडिइरहेकोबिरूपाक्षको सालिक सम्झिन्छु त्यस मूर्तिबारेका अनेकौँ किंवदन्ती सम्झिइन्छन्‌,क आफ्नै आमासित सल्केको पापले त्यसरी गाडिएको रे; त्यसले खुट्टा टेक्नासाथसंसारमा प्रलय हुन्छ रे ! केटाकेटीमा बुढियाहरू भन्थे- प्रलय हुनुअघि मध्यकलिआउँछ रे, र त्यस बेला मान्छे खिइँदा खिइँदा खिइँदा बड्कौँलामा अडेसा लाग्नेजत्रो भइसकेको हुन्छ रे !&lt;br /&gt;
बड्कौँलामा अडेसा लाग्ने मान्छे कत्रो होला ? बोका-बाखाका बडकौँलासम्भिइन्छन्‌ । बड्कौँला मात्र भनेर पनि कहाँ हुन्छ र ? इजरायली बाखाको,लमकन्ना खसीको र सानो पाठाको कुनचाहिँको बड्कौँला ? सम्झौं- नेपालीबूढी बाखीकै बड्कौँला ? सरदर बदामको एउटा गेडाजत्रो बडकौँला; लभन्नोस्‌ त्यसमा अडेसा लाग्ने मान्छे कत्रो होला ? केटाकेटी बेलाको योकुतूहल अहिले पनि कहिलेकाहीँ आएर जिस्क्याउँछ । यो चन्द्रमाको दैलोखोलिएको युग; मङ्गलतिर पखेटा चालेको जमाना अनि शुक्रतिरको बाटोखोज्दै रहेको बेला मान्छे र उसका संसारको विशालताबारे सोच्नुपर्ने : कताबाटयो निराधार किंबदन्ती सम्झन पुगेको ? मध्यकलिमा मान्छे बडकौँलामा अडेसालाग्नै हुन्छन्‌ रे ?- सम्भावना किन यसरी खुम्चेको ?&lt;br /&gt;
सम्भावना हो र ? मन खुम्चेको !&lt;br /&gt;
मन खुम्चँदै गएपछि संसार जतिसुकै विस्तार हुँदै जाओस्‌ मान्छे खिइँदैजान के असम्भव ? के असम्भव :- सोच्तासोच्तै अघिल्तिर स्बिटर वुनिर्टेकीआफ्नै स्वास्नी खुम्चिदै पानीको गाग्रीजत्रै देखिन्छे, म झस्किएर आँखा माडद्-क तीनमाने कसौँडीजत्रै थेप्चिन्छे, कूचोजत्रै दाउरिन्छै । म जतिजति झस्किदेहेर्छु उतिउति मेरी स्वास्नी खुम्चिदैखुम्चिदै लोरोजत्री र लोरीजत्री हुँदैहँदैचुस्ताचुस्तै चाउरिएको आफ्नै दूधको मुन्टोजत्री हुन्छे र एउटा बड्कौँलामा&lt;br /&gt;
सम्भावित दुनियाँ 121 “ २३९&lt;br /&gt;
अडेसा लागेर मुसुक्क हाँस्छे । केटीकेटीहरू झिँगा भएर झुम्मिन्छन्‌; काखकोबच्चा घिउकमिलाजत्रो भएर दृध खान थाल्छ । म यसौ वरपर हेर्छु- भ्यालतालको प्लालजत्रै देखिन्छ । पाँच जना सुत्न पुग्ने बडे पलङ एउटा भिँगटीजत्रो;टेबुल पाटन औद्योगिक क्षेत्रबाट बनेको सलाईको बट्टाजत्रो, भित्ताको ऐनाबालुबाको एउटा सानो पारोजत्रो । झस्याङ्ग भएर हेर्छु आफू त आशाचुरोटको आधा अमलको ठुटोजत्रो भएर तीन छेस्का सलाईको त्रिपाई बनाईआस्ट्रेजत्रो कोठामा मग्नसित पल्टिरहेको !&lt;br /&gt;
&#039;टिक्‌, ए टिक्‌&#039;- म उड्छु । पेन टर्चको गुलुबजत्रो मेरो साथी &#039;टिपलिक्‌&#039;“सिकार खेल्न जान्छस्‌ ?” भन्दै भित्र पस्छ । मेरी स्वास्नी उसलाई अडेसालाग्न एउटा ठूलो बड्कौँला राखिदिन्छे । टिपलिक्‌ बस्तै गीतको आधा फाँकीगुनगुनाउँछ-&lt;br /&gt;
कनिके आँखा ननिका ज्यादै.........&lt;br /&gt;
टिपलिक्‌ निकै लहडी मान्छे हो- सिकारमा उसको ठूलो सोख छ।हामी करेसातिर गयौँ । त्यहाँ एउटा अजङको भन्टाको रूख थियो । टिपलिक्‌त्यही रूख चढ्यो र हाँगामा लुकेर फित्कौलीको एकै फायरमा उसले दुइटापुतली खसाल्यो । तर मेरो यो च्याम्पटीजत्रो बडेमानको भुँडीले रूख चढ्नैअप्ठ्यारो पार्छ । त्यसैले मैले भनेँ- “टिपलिक, म रूख चढ्न सक्तिनँ, सधैँपुतलीकै सिकार खेल्नुपर्छ भन्ने के छ र ? आज चिप्लेकीरा नै हानूँ न, खतरापनि कम मासु पनि थुप्रै !”&lt;br /&gt;
हामी मासु पोलेर खाँदै थियौँ, एकछिनपछि एउटी सेतै फुलेकी फर्सीकोबियाँजत्री बुढिया भित्र पसिन्‌ । एउटा भुसुनोजत्रो बच्चालाई तुनाको एकछेउजत्रो डसनामा गुटमुटघाएर मलाई देखाउँदै भनिन्‌- “नाति नै जन्म्योटिक, हेर हेर कति गतिलो छ । लौ टिपलिक्‌ नानी पनि यहीँ रहेछन्‌ !”&lt;br /&gt;
“नाति पाएकोमा बधाई आमै । ओहो ! तपाईं त निकै फुलिसक्नुभएछ ?नदेखेको पनि पाँच दिन भैसक्यो क्यारे ?”- टिपलिक्‌ एकै सासमा भन्छ । हामीउनलाई बस्नौस्‌ भनी ठाउँ खन्याइदिन्छौँ । तर उनी हाम्रो खाटतिर नआई भुइँमाओछ्याइराखेको भोगटेको पातमा थचक्क बस्तै भन्छिन्‌- “ले न दुलही एउटाबड्कौँलो; अब त सकिँदैन बा अडेसा नलागी । टिपलिक्‌ बाबू मलाई सेतै फुलिछभन्छ । अब के नफुलूँ, उमेर पनि त ४९ दिन १० घण्टा ३ मिनेट खाइसकियो ।”उनी बड्कौँलाको अडेसामा सजिलोसित बसेर बच्चा काखमा राख्नै भन्छिन्‌-“हाम्रा उमेराँ त तिमरू उठ्नै सक्तैनौ नानीहो ! काल खिइँदै जान्छ ।”&lt;br /&gt;
२४० ० भैरव अर्यालका हात्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
“क्काल खिइने होइन आमा, मान्छे खिइँदै जान्छ”- टिपलिक्‌ भन्छ ।&lt;br /&gt;
“मान्छे खिइने होइन आमा, मन खिइन्छ”- म संशोधन गर्छु । बुढियाउसिनेको सामाको गेडो चिमोटेर नातिको मुखमा हालिदिन्छिन्‌ । शिशु मुसुक्कहाँस्छ । “मरेँ बाबा” भन्दै मेरी स्वास्नी पिलिक्क आँखा पल्टाउँछे । सबैजव्याकजुरुक्क उठेर राम राम भन्छन्‌ । म उसको नाडी र छाती छामछुमपार्छु । कुन सड्का कुन सङ्का एउटा भझुसिल्कीराले उसको खुट्टामा डसिसकेछ ।उसले एक थोपा पानी पनि खान पाइन । राम राम राम राम ! घिच्च्याउँदैहामीले उसलाई बाहिर निकालेका मात्र के थियौँ एउटा कौवा आएर टप्प लासटिपी भुर्र उड्यो । “बिचरीको बैकुण्ठबास होस्‌ ?”- बुढिया अन्तिम आसिकदिँदै हिँडिन्‌ । करेसाको कुलिसानिर एउटा जोडी आपसमा छिल्लिदै थियो ।सायद टिपलिकले मेरी छोरी लगेछ क्यारे ? आमा सरेको बेला छोरीले केरोमान्स गर्न थालेकी होला ! दुनियाँको अजिब ताल देखेर म घोत्लन थालेँ ।&lt;br /&gt;
“ए टिक, के घोत्लिइराखेको ?” मेरो छिमेकी कि्कलिंक्‌ आत्तिँदै आइपुग्छ-“थाहा पाइनस्‌ कालेल्यान्डका सिपाहीले हाम्रा भन्टाका बोटमा झटारो हानेछन्‌,एउटा हाँगै भाँचिएको छ ।”&lt;br /&gt;
म जुरमुराउँदै उठ्छु ।&lt;br /&gt;
दुबै जना छवालीका एकोटा लौरा लिएर निस्कन्छौँ । नभन्दै कालेल्यान्डकादस जनाजति सिपाही हाम्रो बोटबाट एउटा भन्टा झारेर नोल लगाई कुदाउँदैरहेछन्‌ । हामी हल्लाखल्ला गर्छौं; धेरै जम्मा हन्छौँ; सिपाहीहरू भन्टा त्यहीँछाडी जाइलाग्छन्‌ । घमासान लडाइँ हुन्छ- दुबै पक्षका सयौँ मान्छे सोत्र्याम्मेहुन्छन्‌ । केही दिनपछि किकलिक्‌ सुनाउँछ यो ऐतिहासिक भन्टा युद्धमा इक्‌देशका प्रधानमन्त्री ग्यास्टिकको ठूलो विजय भयो । यस विजयले इक्‌ देशकोठूलो सान रहेको छ । प्रधानमन्त्री श्री ग्यास्टिक गुह्येकीराको हौदामाथि काँक्राकाफूलको बडो टोप र सानो च्याउको छातामा निकै फुर्तिला देखिन्छन्‌ । बलेसीनेरकोआमसभामा हामी उनको स्वागत गछौं । उनी भाषण गर्छन्‌- “अब पञ्चदिवसीययोजना सफल भएपछि पाँच-पाँच अङ्गुल लुगा प्रत्येक नागरिकले सुपथमूल्यमा कोटामा पाउनेछ ।” उनले भाषण गर्दागर्दै भयानक आँधी आउँछ,असिना पर्छ, पानी आउँछ, बाढी आउँछ, इक्‌ देश खोलाले बगाउँछ; मयताउता छाम्छु-आफू अडेसा लागिराखेको बड्कौँलो पन्त बगाइसकेको हुन्छ ।सम्भावना सम्झनामा पल्टन्छ ।&lt;br /&gt;
के त्यो दुनियाँ सम्भव छ ?&lt;br /&gt;
सम्भावित दुनियाँ (2) “ २४१&lt;br /&gt;
मान्छे खिइएपछि बड्कौँला किन उत्रै ? के बड्कौँला पार्ने बाखो खिइन्न ?मेरी स्वास्नीलाई डस्ने झुसिल्कीरो खिइन्न ?- इत्यादि प्रश्नका साथ चेतनाजुरमुराउँछ । म त्यस मध्यकलिको बड्कौँलामा अडेसा लाग्ने दुनियाँबाटफर्केर चन्द्रलोकमा मोटर कुदाउने आजकै दुनियाँमा आउँछु । तर एउटा प्रश्नसँगै आउँछ- मान्छे खिइएपछि बड्कौँलो किन खिइएन ? सायद पशु मान्छेजस्तोनबरालिएकोले उसको मन खिइँदैन होला; बाख्रो बाख्रैजत्रो रहला, झुसिल्कीरोझुसिल्कीरोजस्तै । मान्छे मात्रै खुम्चिएर बड्कौँलामा अडेसा लार्नेजत्रो होला ?बाखाको खोर खोरजत्रै होला, मान्छेको घर मात्र पिँजडाजत्रो होला। के योअसम्भव छ?कलियुग&lt;br /&gt;
२४२ ” भैरब अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
कन्जुस&lt;br /&gt;
दिने-खाने कुरा पर्नासाथ जसको दाँतबाट खलखली पसिना बग्छ, त्यस्तामान्छेलाई नेपाली भाषाले थुप्रै विशेषण दिएको देखिन्छ । नपत्याए पानिहेर्नोस्‌-कन्जुस, मक्खीचुस, कृपणी, किरन्टोकी, खुनी, खोटी, चुइँया, चिम्टा इत्यादि ।तर नेपाली शब्दकोशले जतिसुकै विशेषण दिए पनि कन्जुसको शब्दकोशमाभने &#039;दिनु&#039; अर्थको कुनै क्रियापद त हुँदै हुँदैन, उपभोगको अर्थको शब्दै पनिपाउन मुस्किल; मानौँ उनीहरूमा एउटा महत्त्वपूर्ण तन्तु जड्दन प्रकृतिले न्नैबिसेको हुन्छ । त्यसैले जतिसुकै विद्वान्‌, बुद्धिमान्‌, धनबान्‌ र रूपवान्‌ भए पनिती दानतन्तु नभएकाहरू आमाको काखदेखि आर्यघाटसम्म कन्जुसको कन्जुसनै रहन्छन्‌ । हाम्रो एक जना साथी भन्थे- उनको टोलमा एउटा यस्तै कन्जुसलखपति थियो । घरमा स्वास्नी, छोराछोरी जो बिरामी भए पनि क सर्वप्रथमकलमकापी लिएर हिसाब गर्न थाल्थ्यो रे औषधि गर्न थोरै खर्च लाग्छ किकिरिया गर्न । उसलाई त मैले चिनेको छैन तर ढुकुटी खोल्नाको गाह्रोलेऔषधि किन्न नकसेर कात्रो किन्न दगुर्ने किरन्टोकीहरूचाहिँ मैले पनि दर्जनौँचिनेको छु । यस्तै किरन्टोक्याइँमा खली खाएका एक जना साहूजी मसँगभन्थे- “डाक्टर &#039;टर&#039; मात्रै हो बाबु, &#039;टार&#039; होइन । डाक्यो, गाल मात्र टर्छ, कालटार्न सक्तैन; त्यसैले डाक्टरलाई ख्वाउने पैसाले बरु पोल्ने दाउरा टर्छ ।”उनको तर्वभन्दा हाम्रो स्कूलको सभापतिको तर्क मलाई रमाइलो लाग्छ, आफ्नैस्कूलको एउटा विद्यार्थी मर्दा सद्गति गर्न हामी चन्दा माग्दै उनकहाँ गएकाथियौँ- हामीले कुरा कोट्टयाउनै नपाई उनले भाषण भट्टयाए- “हेर बावुहो !मेरो सिद्धान्त के छ भने सम्पत्ति भन्ने जात शुभजात हो । अशुभ कार्यमालगायो भने यसले सराप दिन्छ; त्यसैले मुर्दा पोल्ने जस्तो अशुभ कार्यमा मबाटएक पैसा पनि भर्दैन ।” अनि उनले आफ्नो एउटा रोचक संस्मरण सुनाउँदैभने- &amp;quot;त्यसैले पोहोरका वर्ष आफ्नो छोराको सद्गति गर्न पनि मैले आफ्नो&lt;br /&gt;
कन्जुस ” २४२३&lt;br /&gt;
सेफबाट एक पैसा नभझिकी छोराको लासै मृत्यु संस्कार संस्थालाई बुझाइदिएँ ।”उनको दृढ सिद्धान्त बुझेपछि हामी फरक्क फर्केका थियौँ । तर यसपालिसरस्वतीपूजामा सभापतिज्यूलाई निमन्त्रणा दिने र शुभकार्य भएकोले चन्दापनि माग्ने भनी फेरि हामीले उनकहाँ पुग्नुपत्यो । निमन्त्रणापत्रमा उनलेहार्दिक स्वीकृति दिए । तर चन्दाको कुरा कोट्टघाउँदाचाहिँ झसङ्ग भएझैँ गरीभने- “हत्तेरी बाबुहो ! पहिले नै भन्नुपर्दैनथ्यो, मैले निमन्त्रणा स्वीकार गरिसकेँ,मेरो सिद्धान्त के छ भने आफूले दान गरेको आफैँले नखानु । अन अहिले चन्दादिएर भोलि म कसरी खान आउँ ?” हाम्रो एउटा उटुङा साथीले प्वाक्कभनिहाल्यो- “सभापतिज्यू, बरु तपाईं नखाए नखानुहोला । चन्दा त दिनै पन्योबा !” “सरस्वतीको प्रसाद खान्न कसरी भन्नु नि ?”, भन्दै उनले हामीलाईसम्झाए- “मेरो सिद्धान्त के छ भने बाबुहो ! बोलाएको ठाउँमा नगई हुँदैन,गएको ठाउँमा नखाई हुँदैन ।”&lt;br /&gt;
“खालास्‌ बूढा” भन्दै हामी फर्क्यौं; तर भोलिपल्ट उनले नखाई केछाड्थे ।&lt;br /&gt;
कन्जुसहरू नखाने त कहाँ हुन्‌ र ? मुखले नभ्याए नाकले तान्छन्‌ भन्नेकथन छ । तर आफ्नो खर्चमा भने उनीहरू सकेसम्म कम खान्छन्‌ । खानेकुरागर्दा म आफ्नो टोलका सुब्बालाई झलझली सम्झन्छु । भन्सार- अह्डाकासुब्बा भएकोले उनी रुपियाँ मोरेको तकिया र नोट तगेको डस्नामा सुत्छन्‌भन्थे; तर प्रत्येक दिन बिहान उदठ्नासाथ चियामा चिनी धेरै हालौला नि भन्दैएक पटक नसम्झाई छाड्दैनथे । खाने बेलामा उनकहाँ पुग्यो भने पथ्यापथ्यकोलामो व्याख्या छाँट्तै उनी भनिहाल्थे- “दालमा पथ्य मुसुराको खोस्टे, तरकारीमापथ्य रायोको साग ।” यसरी पथ्यापथ्यको साह्रै छ्यानबिछान गर्ने हुनालेउनको जहान-छोराछोरीलाई सुकेनासबाहैक अरू कुनै रोगले सताउनपाउँदैनथ्यो । कसैलाई केही भइहाले पनि उनी प्राकृतिक चिकित्सामा विश्वासगर्ने हुनाले पहिले पेटै ठीक पार्नुपर्छ भनी उपवास बसाउँथे र केही नलागे मात्रधन्बन्तरिको जप गर्दै बागबजारको बहिरो वैद्यकहाँ पुगेर पुरिया पारेको धूलोलेराउँथे । जे होस्‌, मलाई भेट्नासाथ खल्तीबाट एउटा &#039;आशा&#039; चुरोट झिकेरट्ग्राउँदै भन्थे- “ल, सल्काउनोस्‌, दोइ जना बाँडेर खाऔँ ।”&lt;br /&gt;
कन्जुस भएर पनि चुरोट खाने मान्छे देखेको मैले उनलाई मात्र हो, नत्रप्राय: कन्जुसहरू चुरोट, चिया, तमाखु, बियर केही खाँदैनन्‌, कन्जुस्याइँको योप्रभाव भने साह्रै प्रशंसनीय छ । तर पोहोर गोसाईंथान जाँदा मैले एउटा&lt;br /&gt;
२४४ ” भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
गँजडी कन्जुस भेटेको थिएँ । क मलाई गाँजा नखाई निद्रा आउँदैन भन्थ्यो; तरकाठमाडौँबाट लगेको दस पैसाको सुर्ती एक सय चिलिम गाँजामा मिलाएरपनि आधा उसले काठमाडौँ नै ल्याइपुन्यायो । सुर्तीको सट्टा क कहिले गुन्द्रुकमिसाउँथ्यो, कहिले जिम्बु; तर गाँजाचाहिँ घण्टैपिच्छै नतानी छाड्दैनथ्यो ।त्यहीँदेखि मैले थाहा पाएको हुँ- कन्जुसले कुनै नशाको लत लगाउँदै लगाउँदैन,लागिहाल्यो भने पनि त्यो लतलाई आफ्नो कन्जुस्याइँले कन्ट्रोल गर्न सजिलैसितसक्छ । त्यसैले चिया चुरोटको आफ्नो लत देख्ता आफू कन्जुस हुन नपाएकोमामलाई पनि दु:ख लाग्छ ।&lt;br /&gt;
तर हाम्रो जेठो मुखियालाई सम्भ्यो कि त्यो दुःख त्यसै भाग्छ । मान्छेभन्थे- क माखाको पित्त झिकेर साहको चित्त बुझाउँछ । माखाको बोसोऔषधि लाग्छ भन्ने क मसँग पनि बराबर कूरा गर्थ्यो । बोसोचाहिँ भझिक्थ्यो-झिक्तैनथ्यो, दैव जानोस्‌, मैले जानेको चाहिँ यत्ति हो- क एउटा सच्चाकन्जुस थियो ! मैले देखेसम्म दसैँमा बाहेक उसले सुकिलो लुगा लगाएन । कभन्ने गर्थ्यो- “एक त लुगा घोएपछि साबुनले काटेर पातलिन्छ र चाँडै फाट्छ,दोस्रो, साबुन स्वयं अपवित्र चीज भएकोले यो दलेको लुगा लगाउँदा जीउअपवित्र हुन्छ ।” साथै क जुत्ता लगाए पृथ्वीलाई भार पर्छ भनी नाङ्गै खुट्टालेनौ गाउँ चहारी गाईको व्यापार गर्थ्यौ । उसको किरन्टोक्याइँले आजित भएरएक दिन उसकी स्वास्नी बेपत्ता भइछ । क गाउँमा रुँदै भन्थ्यो- “स्वास्नी तहिँडी, अनिकालको खच जोगियो तर झन्डै पाँच सयको लुगा-गहना लिएरहिँडिदिई पापिनीले ।” सायद यही पीरमा सुक्तै क मप्यो । मर्ने बेलामा दसदान गर्न उसको जनैको साँचो बलात्कार झिकेर छोराचाहिँले बाकस खोलेकोत हरिया-हरिया गैँडा मात्र बीस हजारका रहेछन्‌, खुद्रा नोट र रुपियाँपैसा गन्दै- गनिएन ।&lt;br /&gt;
यी सबै प्रत्यक्ष प्रमाणबाट म के निष्कर्षमा पुगेँ भने कन्जुसहरूकोजीवनदर्शन उपभोगमा होइन सञ्चितामा निर्भर गर्छ । उनीहरूमा माया,ममता र दयाले परिलहाल्ने पिलन्धरे चित्त हुँदैन । त्यसैले पुराणले कन्जुस्याइँकाकथाहरू जति सुनाइरहोस्‌, नीतिले दानपुण्यको माहात्म्य जतिसुकै भट्याइरहोस्‌कन्जुसहरू आर्जन र सञ्चितामा यति विश्वस्त हुन्छन्‌ कि उनीहरूलाईउपभोगको वास्तै हुँदैन । तर वास्तवमा सम्पत्तिलाई चञ्चला लक्ष्मी मानौँ वाव्यवहारको माध्यममुद्रा मानौँ उसले उपभोगको एउटा न एउटा बाटोखोजिहाल्छ । त्यसैले हामी देख्छौँ, कुनै कन्जुसको कमाइ छोराले क्यासिनोमा&lt;br /&gt;
कन्जुत ” २४५&lt;br /&gt;
खर्चिदिन्छ, कुनै कन्जुसको कमाइ छोरीले पिकनिकमा सिदध्याइदिन्छै । अपुतोकन्जुस छ भने अपुतालीवालाको तालुमा भोगटे जत्रो आलु फलिहाल्छ । यसकारणकन्जुस्याइँलाई म एउटा रोग ठान्छु तर के गर्नु, कन्जुसहरू मोजीहरूकोउडन्त्याइलाई झन्‌ महारोग ठानिदिन्छन्‌ । त्यसैले कन्जुस र उडन्तेका बीचकोमित्रता भट्टीको मित्रताजस्तो मात्र हो, त्यो शत्रुतामा परिणत हुन कति पनि बेरमान्दैन, किनभने उडन्तेलाई पैसाको फिटफिटीले कहिले छाड्ने होइन, कन्जुसआफ्नो कन्तुरमा परेको पैसा कहिल्यै निकाल्ने होइन । कथंकदाचित्‌ दुई जनामाआदानप्रदान भइहाल्यो भने पहिल्यै किस्तमा आपसमा मित्रता सिकिस्त भइहाल्छ ।जे होस्‌, आफ्नो कुनै क्लब र क्यासिनोमा हाजिर नभई नहुने मोजीसाथी पनि छैन, परेको बेला आफूसित छ भने पाँच-दस रुपियाँ पैँचो दिनदाँतबाट पसिना तर्काउने कन्जुस साधी पनि छैन, त्यसैले उक्त पीर त मलाईछँदै छैन, एउटै दु:ख के छ भने आफूलाई अपुताली पर्ने खालको कुनै कन्जुसपनि आफ्नो नातागोतामा अहिलेसम्म कोही थिएन ।अर्पण&lt;br /&gt;
२४६ ” भैरव अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
असनको डबली&lt;br /&gt;
“चामल पाथीको दस रुपियाँ ! दस रुपियाँ ? अब पनि भात खाएरसाध्य भयो त ? कृषिप्रधान देशमा अन्नको यो अनिकाल !”&lt;br /&gt;
“औँ, अन्तपूर्णाको दर्शन गर्न आएको; भाकल थियो । अरूभन्दा मलाईयिनै देवीको विश्वास लाग्छ । यी साक्षात्‌ देवी हुन्‌ ।”&lt;br /&gt;
&amp;quot;देवी त देवी टुँडालदेवीको मूर्ति पनि झन्डै चोरिएको रे । कस्तोकाल ! हामी केही नचोरियोस्‌ भनी देवता पुकाछौँ, देवता स्वयं चोरिन्छन्‌ हेरन......”&lt;br /&gt;
“हेरिसकेँ मैले, त्यही बेलबटम्‌वाली होइन ? निकै नखरमाउली रहिछ ।”&lt;br /&gt;
-जवाना भी यिनका जवानी भी यिनकी- बुझिनस्‌ ?”&lt;br /&gt;
“नुझैँ हजुर ! रुपियाँको पाँच मुठा भयो, भयो लगिबक्स्योस्‌- पातराम्रो छ । विग्रेको रहेछ भने म मोरीले यो जोवन भन्नै नपार । हजुरहरूलाईके थाहा छ, यति पात टिप्न कस्तो......।”&lt;br /&gt;
“मलाई सब थाहा छ- उसको सम्बन्ध अचेल कतातिर छ भन्ने ।अघिअघि सिद्धाकोः दशा लाग्यो भने आजको सुदामा भोलि कुबेर हुन्छ भन्थे,अचेल सिद्‌ (0110) मात्र हुन सके आजका बेकारको भोलि तिनोटा कार&lt;br /&gt;
“सरकारी कारलाई साइड दिनुपर्छ भन्ने तँलाई थाहा छैन ? दुई दिनटोयौटा चलाउन पाएँ भन्दैमा टुप्पिएको छुसी, तै, फुच्चाको खुट्टो मात्र किचिएछ,ज्यान गएको भए.....।”&lt;br /&gt;
५ ज्यानको मूल्य मामुली भन्ने कि अमामुली ? एकातिर गैसकेकोज्यानलाई मुटु फेरेर पनि जोगाइन्छ;, अर्कातिर बम बर्साएर हजारौँ ज्यानकोएक चिहान पर्छ ।”&lt;br /&gt;
“परे आफ्नो उपकार नपरे परोपकार । भाग्योदय चिट्ठा किन्नुहोस्‌&lt;br /&gt;
अतनको डबली ? २४७&lt;br /&gt;
भाग्योदय, -पहिला १ के एक लाख पच्चीस हजार ।”&lt;br /&gt;
“जति कुरा गरे पनि युग हजार र हजुरकै घेरोमा सेरोफेरो गरिरहेकोछ । पेन्सेन खाने बेलामा कारिन्दाले मोहोर तानेजस्तो कारबार यो के व्यापार !मैले त हङकङ नै ताकेँ, चालीस-पचास हजार भनेको के हो र...?”&lt;br /&gt;
“दुइटा पैसा पनि हाम्रो निम्ति लाखजस्तै हो मालिक ! भारी पनि त ठूलैछ नि; जो पायो उही भरिया लाउनु पनि हुन्न अचेल; हामी भनेका रैथानेभरिया; मालिकजस्ताको भारी बोक्ताबोक्तै ३२ बर्ख बितिसके, बेइमानी भनेकोबाह् दामको गरिएको छैन ।”&lt;br /&gt;
“डरमानदारी र बुद्धपनको सीमारेखा कहाँनेर पर्छ कुन्नि ? २० वर्षजागिर खाएँ बीस पैसा खाइन, अहिले जाउलो खान नसकेको देखेर सबै मलाईबुद्ध भन्छन्‌, तपाईं नै भन्नोस्‌ वास्तवमा म के हुँ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
“म भन्नु नै आत्मा हो । आत्मा नचिनी परमात्मासित साक्षात्कार हुनसक्तैन । भरे चार बजे यहीँ अध्यात्म प्रबचन हुने भएको छ । महिला तथासज्जनबुन्द......!”&lt;br /&gt;
“ महिलाले लूप लगाएर बा चक्की खाएर, पुरुषले भ्याक्सेटोमी गरेरवा कन्डम लगाएर । परिवार नियोजन युगको माग हो ।”&lt;br /&gt;
थ्यो युग पनि मगन्ते युग हो ॥कतै श्रम र चन्दा माग्यो; कतै शास्त्र रसैनिक माग्यो, कतै अन्न र पैसा माग्यो; कतै स्वतन्त्रता र अधिकार माग्यो,कतै बाटो र गौँडो माग्यो; जता हेच्यो मागामाग छ ।”&lt;br /&gt;
“हाम्रो माग पूरा नभए हडताल गर्ने योजना छ ।”&lt;br /&gt;
“योजना त तपाईंको राम्रै हो; तर कुनै पनि योजनाले स्थायी शान्तिल्याउला भनेजस्तो मलाई लाग्दैन । शान्तिकी लागि कति धनको खर्च भो,कति जनको खर्च भो, कति जोबनको खर्च भो, कति चिन्तनको खर्च भो, कतिजीबनको खर्च-: तर यतिका खर्चको उपलब्धिके)&amp;quot;&lt;br /&gt;
“के भन्नुहोला यो सर्वरोगहारी तेल हो । कान पाकेको भए दुई थोपाहाल्नोस्‌, आँखा दुखेको भए गाजलझैँ लगाउनोस्‌, भिरुङ्गी भएको छ भनेमालिस गर्नोस्‌- चार दिनमा चमत्कार.....।”&lt;br /&gt;
“चन्द्रलोक यात्रा चमत्कारै हो विज्ञानको । तर मानवता र विश्व-शान्तिमा यसको के भूमिका होला ?”&lt;br /&gt;
“शान्तिस्वस्तिको सारदाम किन्न आएको, तपाईं कता नि ? आरामछ ? अलि उता जाँ, बाटो पेल्ने मेसिन आयो. ...।”&lt;br /&gt;
२४३ ४ चैरब अर्यालका हास्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
“यी मेसिनहरूले पनि आजकाल...”&lt;br /&gt;
“दमकल दमकल !...... कहाँ दमकल हुन्थ्यो घण्टीवाल गाई- सागकोमुठै लिएर दौडिएछ, उ: साँढे पनि ।”&lt;br /&gt;
“कति आत्तिएर दौडादौड गरेका यी मान्छेहरू, मानौँ यहाँ एउटा युद्ध नैआउँदै छ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;यहाँ यस्तै भीड हुन्छ पर्यटक ! यो काठमाडौँ सहरको मुटु हो-असनको डबली, उः त्यो भ्यालको कला हेर्नोस्‌ त ! कस्तो लाग्यो ?&lt;br /&gt;
“मलाई त यो पाउडर राम्रो लागेन । बास्ना पनि कस्तो गल्लीगल्लीगनाउने छ्या; दुई स्टिक लिपस्टिक दिनोस्‌ त गुलाबी होइन, फुस्रोचाहिँ...।&amp;quot;&lt;br /&gt;
श्यी फुस्रा हिप्पीहरू आनन्द खोज्न आएका रे ! गाँजा र रक्सीमालब्टिएर पाइने आनन्द पनि कुनै आनन्द हो ?......”&lt;br /&gt;
“पख्नोस्‌ न आनन्देजी, म पनि हिँडिहालेँ । रानीपोखरीतिरबाट जानेहोइन त?”&lt;br /&gt;
“...डुब्या रै ! रानीपोखरीमै हामफालेछ ।”&lt;br /&gt;
“कल्ले फालेछ यो अलबम्‌, हेर्नोस्‌ हेर्नोस्‌, कस्ताकस्ता तस्बिर रहेछन्‌;ठिटीको हो कि ठिटाको ? पैसा पनि छकि ?”&lt;br /&gt;
“एक बरफको दस-दस पैसा, एक बरफको दस-दस.....!&amp;quot;&lt;br /&gt;
“के यो डबलीमा ट्वाल्ल परेर उभिइरहेको ए मिस्टर ?”&lt;br /&gt;
प्रगति&lt;br /&gt;
अतनको डबली ” २४१&lt;br /&gt;
आस्थाको फाइल&lt;br /&gt;
संसार विभागका निर्देशक श्री ईश्वरदेव उमेरको हदम्याद पुगी खोसुवामापरे । खाईपाई आएको आस्था अर्चनाको एक लक्षांश उनले निवृत्तभरणकोरूपमा पाउने भए ।&lt;br /&gt;
निर्देशकको पद खाली हुनासाथ रोल मेरो भनी अन्धविश्वासले दानागन्यो । धर्म धुमधुमती पस्यो, कर्म कनपारो कन्याउन थाल्यो । भाग्यले भगवानूकोसाक्खे भाइ म हुँ भनी किरिया खायो । ज्ञान गनगन गर्दै थियो, विज्ञानलेसबैका दाबी निराधार हुन्‌ भनी एक-एकको पर्दाफास गप्यो । बुद्धि खितितित्तहाँसी, बिबेक ट्वा-ल पस्यो । भ ., गी संसार विभागको निर्देशकमा मान्छेस्वयं मनोनीत घोषित भयो ।&lt;br /&gt;
आफू निर्देशक हुनासाथ मान्छेले पापधर्मको कानुन संशोधन गरी नरकअड्डाखारेज गरिदियो । मान्छेलाई धेरै शासन दिएको अभियोगमा यमराज सस्पेन्डभए; अमृत र अप्सरामा लम्पट भएको अभियोगमा देवताहरू कार्यभारमुक्तभए । भाग्यको ठाउँमा पुरुषार्थ र अन्धविश्वासको ठाउँमा शिक्षा भर्ना भए ।&lt;br /&gt;
एउटा हातमा शक्तिको डृम अर्को हातमा एटम बम लिएर विज्ञानसल्लाहकार भयो मान्छेक्रो । संसार विभागको हर्ताकर्ता स्वयं भएकोमा गजक्कफुली टेबुलमा थ्याच्च बसेर मान्छे गर्ज्यो- “संसार विभागका सहायिकाहरूको को छन्‌, लौ यहाँ आओ !”&lt;br /&gt;
मेच छँदाछँदै टेबुलमा बसेको निर्देशकलाई देख्ता मर्यादाले नमस्कारैनगरी मुन्टो बटारी । मान्छेले उसलाई अनुशासन नभएकी बूढी भनी तुरुन्तैनिकालिदियो । अर्की सहायिकाले थर्र कामेर हात जोड्दै भनी- “म नैतिकताहुँ ।&amp;quot; मान्छे च्याँद्टिएर गर्ज्यो- &amp;quot;यस्ती लुली सहायिका लिएर म यत्रो विभागचलाउन सक्छु ?” तेस्री सहायिका सद्भावनाले भनी- “म आफ्नो कार्यभारबाटराजीनामा गर्न चाहन्छु ।” मान्छेले मर्यादाको ठाउँमा उच्छुङ्खलतालाई,&lt;br /&gt;
२४० ४ भैरव अर्यालका हात्यव्यङ्ग्य&lt;br /&gt;
नैतिकताको ठाउँमा स्वच्छन्दतालाई र सद्भावनाको ठाउँमा सङ्कीर्णतालाईभर्नौ गच्यो ।&lt;br /&gt;
पुनर्गठनपछि केही नयाँ ऐन बने । सत्ता, शक्ति, सम्पत्ति र बिलासकोसाधनामा धेरैले सुविधा पाए । संसार बिभागले सांसारिक विधिबन्धनहेरूमाधेरै स्वतन्त्रता ल्यायो । तर अंपसोच ! केही दिनपछि संसार विभागमा साह्रैगोलमाल चल्यो । कसैले कसैलाई टेर्न छाड्यो । बिभागभित्रै अनाचार,व्यभिचारहरू बढ्न थाले । रिसारिस, भुत्लाभुत्ली र पिटापिट चल्त थाले ।&lt;br /&gt;
हत्या, अपहत्या र आत्महत्याका टेलिफोन आउन थाले ।&lt;br /&gt;
विस्फोट, युद्ध र महायुद्धका आकाशवाणी आउन थाले ।&lt;br /&gt;
मान्छे केहिले बौलाएजस्तो भई टेबुलमा उफ्रन्थ्यो, कहिले &#039;झझोक्राएजस्तोगरी भुइँमा पसारिन्थ्यो । कहिले तमाम कर्मचारीलाई भेला गरेर सोध्थ्यो-“आस्थाको फाइल खोइ ?” कहिले तमाम कर्मचारी सँग सोध्ये- “विश्वासकोफाइल खोइ ?” खोइखोइको डाँको भित्तामा ठोक्किएर प्रतिध्वनित हुन्थ्यो-&lt;br /&gt;
“खोइ खोइ !”बान्की&lt;br /&gt;
असनको डबली । २४१&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AD%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4_(%E0%A4%AA%E0%A4%9F%E0%A4%95%E0%A4%A5%E0%A4%BE)&amp;diff=66</id>
		<title>आदिकवि भानुभक्त (पटकथा)</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%AD%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4_(%E0%A4%AA%E0%A4%9F%E0%A4%95%E0%A4%A5%E0%A4%BE)&amp;diff=66"/>
		<updated>2024-06-10T03:58:53Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: Created page with &amp;quot;णड्टा॥7९० 80: ८0०७साझा शिक्षा ई-पाटी0 0 पता ५४५४५५४,१5191:919%90,010५४४/५४,०।€1120291,01 |॥ आदिकवि आनुभ ॥पटकथा यादव खरेल भानु जन्मस्थल विकास समितिचुँवीरम्घा तनहुँवि.सं. २०५६ लेखक: प्रकाशक; प्रकाशन मिति...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;णड्टा॥7९० 80:&lt;br /&gt;
८0०७साझा शिक्षा ई-पाटी0 0 पता&lt;br /&gt;
५४५४५५४,१5191:919%90,010५४४/५४,०।€1120291,01&lt;br /&gt;
|॥ आदिकवि आनुभ ॥पटकथा&lt;br /&gt;
यादव खरेल&lt;br /&gt;
भानु जन्मस्थल विकास समितिचुँवीरम्घा तनहुँवि.सं. २०५६&lt;br /&gt;
लेखक:&lt;br /&gt;
प्रकाशक;&lt;br /&gt;
प्रकाशन मितिः&lt;br /&gt;
संस्करण:&lt;br /&gt;
आवरण:&lt;br /&gt;
प्रकाशित संख्या:&lt;br /&gt;
सर्वाधिकार:&lt;br /&gt;
मल्यः&lt;br /&gt;
मृद्वक:&lt;br /&gt;
यादव खरेल&lt;br /&gt;
भानु जन्मस्थल विकास समितिचुँदीरम्घा, तनहुँ&lt;br /&gt;
२०१६ भानु जयन्ती&lt;br /&gt;
प्रथम&lt;br /&gt;
भानु-घांसी सम्बाद(चलचित्र &#039;आदिकवि भानुभक्त&#039;बाट।&lt;br /&gt;
११००&lt;br /&gt;
लेखकमा सुरक्षित&lt;br /&gt;
रु. २००।-&lt;br /&gt;
जगदम्बा प्रेसपाटनढोका, ललितपुर,फोन नं. ५२१३९३, ५४३०१७&lt;br /&gt;
प्रकाशकीय&lt;br /&gt;
“भानु जन्मस्थल विकास समिति&#039; नेपाली भाषाका आदिकवि एवराष्ट्रिय विभूति भानुभक्त आचार्यको जन्मस्थल चुँदी रम्घा, तनहुँलाईसाहित्यिक तीर्थस्थलका रूपमा बिकसित गर्ने उद्देश्यले श्री ५ कोसरकारद्वारा बिकास समिति ऐन २०१३ ले दिएको अधिकार प्रयोग गरीगठन गरिएको संस्था हो । समितिद्वारा तयार पारिएको गुख्योजना प्रस्तावकोखण्ड क-४।क।मा भानुभक्तका देनलाई राष्ट्रिय तथा अन्तर्राष्ट्रियस्तरसम्म प्रचार-प्रसार गर्न आदिकविको जीवनीमा आधारित श्रव्य-दृष्यसामग्री निर्माण गर्ने लक्ष्य निर्धारण गरिएको छ र सोही उट्टेश्यअनुरुपसमितिले बरिष्ठ चलचित्र निर्देशक यादब खरेलको निर्देशनमा एतिहासिकनेपाली कथानक चलचित्र “आदिकवि भानुभक्त” को निर्माण गरेको छ ।&lt;br /&gt;
प्रस्तुत पुस्तक त्यही चलचित्रको पटकथा हो । यसका लेखक पनियादव खरेल नै हुनुहुन्छ । यसमा भानभक्तको अक्षरारम्भदेखिदेहावसानसम्मका घटनाहरूलाई कमबद्धता दिई जीवतीलाई सिङ्गो रसग्लो रूप प्रदान गरिएको छ । अनुसन्धान समितिको सहयोगमा घटना,पात्र, तिथिमिति, स्थल आदि बिषयको निर्धारण गरी तिनलाई कथानककोढाँचामा आबद्ध गरी रचना गरिएको पो कृति भानुभक्तलाई समगमा बुरुनचाहने सामान्य पाठकदेखि लिएर अनुसन्धाताहरूका निम्ति पनि उपयोगीबन्नसक्ने देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
यसको अर्को विशेषता हो- सचित्र प्रकाशन । यसका लेखक स्त्रयचलचित्रका निर्देशक पनि हुनुभएको हँदा उहाँले चलचित्रको छायाङ्कनकाक्रममा पटकथाको मर्मअनुखूप वास्तविक परिवेश सृजना गरी तिनैपरिवेशमा खिचिएका चित्रहरू प्रत्येक दृश्यमा दिनु भएको छ ।&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
यसप्रकार परिवेशलाई सचित्र प्रस्तुत गरिनाले चलचित्र हेर्न नपाएका,नभ्याएका पाठकहरूका निम्ति पनि यो पुस्तक रोचक र आकर्षक बन्नसक्ने देखिन्छ । परिशिष्टअन्तर्गतका सामग्रीले चलचित्र जगतसँग सम्बन्धितअन्‌सन्धाताहरुका निम्ति पनि यो पृस्तक उपयोगी बन्न सक्ने देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
यो पुस्तक &#039;भानु जन्मस्थल विकास समिति&#039; को पहिलो प्रकाशनहो । गुरूयोजनाको खण्ड क- ३ ।ख) मा उल्लेख भए बमोजिम भानुभक्तसँगसम्बन्धित सामग्रीहरू प्रकाशन गर्दैजाने सिलसिलामा यो पुस्तक प्रकाशतगर्न लागिएको हौं । यप्तबाट भानुभक्तको जीवनगाथा सरल र रोचकढङ्गमा पाठकसम्म पुग्न सक्ने आशा समितिले लिएको छ । यो पुस्तकसंभवत: नेपाली चलचित्रका पटकथाहरुको पहिलो प्रकाशन पनि हो ।यसैले पठन-पाठनका क्षेत्रका पनि यो प्स्तक उपयोगी हुन सक्नेछ ।&lt;br /&gt;
अन्त्यमा, यो पुस्तक &#039;भानु जन्मस्थल विकास समिति&#039;लाई प्रकाशनगर्ने अवसर दिनु भएकोमा लेखकलाई धेरै धेरै धन्यवाद ।&lt;br /&gt;
१५६ औं भानु जयन्ती भानु जन्मस्थल बिकास समितिचुँदी रम्घा, तनहुँ&lt;br /&gt;
भूमिका&lt;br /&gt;
यादव खरेलले आदिकवि भानुभक्तको चलचित्रमा पटकधाकोरचना र त्यसको निर्देशन गरेर राष्ट्रिय विभूतिषति अगाध सम्मान प्रस्तुतगर्नुभएको छ । खरेल आफैँ पनि एक प्रतिभाशाली कबि हनुहुन्छ रआफूले वोलेको भाषामा राष्ट्रको मर्मलाई कसरी मुखरित गर्न सकिन्छत्यसको ममंदेखि वहाँ परिचित हुनुहुन्छ । यस दृष्टिले भानुभक्तजस्ताराष्ट्रिय चरित्रको पटकथा लेखन र त्यसको निर्देशनका लागि यादवखरेल आधिकारिक व्यक्ति मानिनुहुन्छ ।&lt;br /&gt;
चलचित्रका क्षेत्रमा यादव खरेलले लामो अनुभव बढुल्नुभएकोछ । विद्युतीय सञ्चारका माध्यमबाट यस क्षेत्रमा प्रवेश गर्नुभएकाखरेलले नेपाली चलचित्र जगत्‌मा पनि आफ्नो सिर्जनात्मक भूमिका स्थापितगरिसक्नुभएको छ । वाणीको मिठास, मर्म छुने अभिव्यक्त र आफ्नोसाधनाप्रतिको निष्ठा नै यादव खरेललाई सफलताको शिखर चढाउनेसिँढी हुन्‌ भन्नमा सङ्कोच मान्नुपर्दैन । प्रस्तुत चलचित्र &#039;आदिकविभानुभक्त&#039; मा पनि खरेलका तिनै सीप, साधन र प्रतिभा स्पष्ट प्रतिबिम्बितहुनपुगेको अनुभव हुन्छ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्तलाई सम्मान गर्नु भनेको राष्ट्रलाई सम्मान गर्नु हो ।भानुभक्तले आफ्नो भाषामा राष्ट्रको मौलिकता र पहिचान मुखरितगराउँदै नेपालीलाई राष्ट्रियताको एक सूत्रमा उनेका थिए र आफू पनिराष्ट्रको ढुकढुकीसँग एकात्म हुन पुगेका थिए । नेपालबाहिरका नेपालीहरूलेसमेत नेपाली जातिलाई एकताको सूत्रमा उन्ने जातीय कविका रूपमाभानुभक्तलाई आदर गर्दछन्‌ । नेपाली भाषा समस्त नेपालीको साफा भाषाबन्नुमा भानुभक्तीय प्रतिभाको स्पर्श प्राप्त गर्नु पनि एक मुख्य कारणथियो । आफ्ना पुर्खाहरूबाट उत्तराधिकारका रूपमा पाएको नेपाली भाषालाईभानुभक्तले आफ्नो अभिव्यक्तिमा ढालेर सगरमाथाको उचाइमा पुग्याएका&lt;br /&gt;
गा&lt;br /&gt;
हुन्‌ । त्यतैले गर्दा &#039;रामायण&#039; जस्तो महाकाव्य यस भाषामा लेखिनसक्यो । कुपडीदेखि महलसम्म पुगेर उनले बोलेको भाषाले नेपाली जातीय-जीवनलाई छुनसक्यो । यस दृष्टिले भानुभक्तको भाषा-साधना राष्ट्रनिर्माणकोएक हिस्सा हुनपुगेको छ । प्रस्तुत चलचित्र &#039;आदिकवि भानुभक्त&#039; त्यहीभाषा-साधनाको अथवा उनको काव्यपाव्राको श्रृङ्खलाबद्ध गाथाका रूपमादृश्याड्गित हनआएको छ ।&lt;br /&gt;
यस चलचित्रको पटकथा लेखनमा यादव खरेलले मोतीराम भट्टलेलेखेको भानुभक्तको जीवनचरित्रलाई नै मूल आधार मान्नुभएको छ ।तापनि मोतीराम पछि विभिन्न विद्वान्‌हरूद्वारा लेखिएका र चलचित्र निर्माणटोलीद्वारा सत्यका निकट छन्‌ भनी ठहर गरिएका घटना र तिथिमितिलाईपनि बहाँले आबश्यक ठाउँमा प्रयोग, गर्नुभएको देखिन्छ । भानुभक्तकोजीवनी मरणोपरान्त लेखिएको थियो; त्यसैले कतिपय उनका जीवनकाघटना विवादास्पद रहेका पनि पाइन्छन्‌ । यादव खरेलले त्यस्ता प्रसङ्गलाईंकत्ति नबिराउने पाराले यहाँ संयोजन गर्नुभएको छ । त्यो वहाँको प्रतिभाजन्यकौशल हो । कतिपय कल्पित प्रसङ्घ पनि भानुभक्तका ठोस कार्यलाईअगाडि ल्याउन सहायक थिए । त्यसैले बालकृष्ण समको &#039;भक्त -भानुभक्त&#039;नाटकबाट पनि केही त्यस्ता कल्पित दृश्यहरूलाई वहाँले यहाँ साभारउद्धत गर्नुभएको छ । घाँसी वा शशिनाथ जस्ता पात्रसँग सबद्ध घटना रत्यस्ता व्यक्त कल्पित बा अयधार्थ हुन सक्छन्‌ । त्यस्तै तिनका नाम, ठाउँर समय पनि कल्पित हुन सक्छन्‌ तर घाँस कटुवा गोठालाले भानुभक्तलाईदिएको अर्ति कल्पित हुन सक्तैन । त्यस्तै शशिनाधसंगको संवाद र वहसकल्पित हुनसक्छ तर अध्यात्मरामायण जस्तो पवित्र ग्रन्थलाई जनसामान्यकोचोलीमा उदाङ्ड पारिदिने व्यक्तिमाथि त्यसप्रकारको लाञ्छना लाग्नु तत्कालीनसन्दर्भमा अस्वाभाविक थिएन । जुन शशिनाथ-संवद्ध दृश्यमा देखिन्छ ।वास्तव्रमा कुनै पनि ऐतिहासिक पात्रका घटना र तिथिमिति सबै ठाउँमाठ्याक्कै मिलेका हुन्छन्‌ भन्न सकिन्न । हामीले आफ्नै जीवनमा पनिजीवनको धारलाई नै फर्काइदिने कतिपय त्यस्ता अपत्याशित घटना रअविस्मरणीय अनुभव सँगालेका हुन्छौं तर तिनको कार्यकारण श्रृङ्खला रतिथिमितिको सायदै हामीले पर्वाह राख्दछौं । घटना, पात्र र तिथिमितिको&lt;br /&gt;
घ&lt;br /&gt;
संयोजनमा विश्वसनीय तालमेल नदेखिए पनि तिनले बास्तविक सत्य बावस्तृयथार्थलाई त सङ्गत गरकै हुन्छन । कवि भानुभक्तको रचनाप्रक्रियाकासन्दर्भमा पनि विवादास्पद मानिने घाँसी, जलखाना, गजाधर सोतीकीघरबूढी आढि परसङ्गलाई यस्तै परिपेक्ष्यमा हेरिनुपर्दछ ।&lt;br /&gt;
पटकथाका आधारमा यो चलचित्र यथार्थको सहज वाताबरणबाटअगाडि बढेको छ । भानुभक्त केवल एउटा घाँसीकै अर्ति उपदेशबाटरातारात कवि वनेका छैनन्‌ । गाउँको एउटा सुशिक्षित पण्डित कूलकोकुमार केटोले जुन परिवेश, सङ्गत र व्यक्तित्वको विकास गर्ने अवसरपाउन सक्तछ त्यही पृष्ठभूमिमा भानुभक्तको वातावरण, शिक्षादीक्षा रव्यक्तित्वको विकास गर्दै पटकथाकार यादव खरेलले भानुभक्तमा सानैदेखिलोकपद्यतिर आकर्षण वढेको, देखेका क्नै पनि क्रालाई तत्कालै तुकबन्दीर छन्दोबद्ध गर्ने गरेको र अन्ताक्षरीमा रूचि राख्दै कविता साधनामानिरन्तर अगाडि वढ्न थालेको क्षमता देखाएर उतको कवबितायात्रालाईसहज र विश्वसनीय बनाउनुभएको छ । बिकासबादी अवधारणाका दृष्टिलेपनि उनको यो क्रमिक उत्थान स्वाभाविक छ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्तलाई &#039;आदिकवि&#039; को उपाधि दिएकोमा कसैलाई त्यो अपचहुन सक्तछ । वास्तविकता के हो भने भानुभक्त नेपाली कविताका खुद्राकवि थिएनन्‌ थोक कवि थिए । चैते रुरी लाग्दैमा कसैले वर्षा लाग्योभन्दैन, वर्षा लाग्नलाई त मनसुन आउनै पर्छ । भानुभक्त नेपाली कविताकापहिला मनसुन थिए । त्यसैले उनी “आदिकवि” मानिए । यस्ता विषयमामीनमेष निकाल्नुको कनै अर्थ देखित्त ।&lt;br /&gt;
अहिलेको युगमा गुणको कदर गर्ने मानिस साह्रै दुलंभ छन्‌ । यादबखरेल त्यस्तै दुर्लभ व्यक्तिमध्येमा एक पर्नुहुन्छ । वहाँले एउटा कविकोयोगदानलाई सानोतिनो वृत्तचित्रमा मात्र सीमित नराखी पूर्ण चलचित्रकारूपमा रूपान्तर गरिदिनुभएको छ र आफैँले पटकथा लेखनदेखि लिएरत्यसको निर्देशनसम्मको यावत्‌ अभिभारा काँधमा लिई चलचित्रले पूर्णआकार नपाउञ्जेलसम्म यस कार्यमा अहोरात्र जुदनुभएको छ । योवहाँको निष्ठापूर्ण कृतित्वको नमूना हो । एउटा कबिको जीवनमाआधारित यो चलचित्र यस क्षेत्रकै एउटा नमूना पनि हुनसक्छ । यही&lt;br /&gt;
डड&lt;br /&gt;
३&lt;br /&gt;
निप्ठा र इमान्दारीले गर्दा नै वहाँले यस चलचित्रको निर्माणमा देशकाख्यातिषाप्त लेखक, साहित्यकार र कलाकारहरूबाट पूर्ण सहयोग प्राप्तगर्न सक्नुभएको छ । यस निम्ति यो क्षेत्र वहाँदेखि कृतज्ञ रहनेछ ।अहिले म वहाँको यस रचनात्मक योगदानको हार्दिक प॒शसागर्दछ र भानुभक्तलाई चिनाउने मोतीराम, सूर्यत्रिक्रम ज्ञवाली आदिकापड्क्तिमा यादव खरेललाई स्थापित गर्न चाहन्छु ।&lt;br /&gt;
ठाक्र पराजुलीआपाढ २४, २०५६नेपाली केन्द्रीय बिभाग,त्रिभुवन विश्वविद्यालय, कीर्तिपुर ।&lt;br /&gt;
मेरो भन्नु&lt;br /&gt;
राष्ट्रिय विभृति भानुभक्त आदिकवि मात्र नभएर नेपाली मूलकामानिसहरूका जातीय कवि तथा चेतनाका सम्वबाहक पनि हुन्‌ । नेपालीसाहित्यको जग बसाल्ने भानुभक्तद्वारा भाषिक र साँस्कृतिक फाँटमाराष्ट्रिय एकताको लागि अभिनीत अहम्‌ भूमिकाले गर्दा नै उनी राष्ट्रकोगौरव र विभूति वन्नप्गेका हुन्‌ । यस्ता मूर्धन्य व्यक्तित्वका बारे भानुजन्मस्थल विकास समितिको नेतृत्वमा राष्ट्रिय एकताका पक्षधर तथासाहित्यानुरागी केही व्यक्तिहरूले चलचित्र निर्माणको जमरकौ गरियो ।त्यही जमर्कोको प्रतिफल &#039;आदिकवि भानुभक्त: पटकथा&#039; को जन्म भयो ।&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्तवारे वृत्तचित्र निर्माण गर्ने निर्णयबाट सुरू भएकोप्रयास कथानक चलचित्रको निर्माणमा गएर टुङ्गियो । त्यसैकारणलेसुरूको वत्तचित्रको लेखनको ढाँचामा परिवर्तन हुनु पनि स्वाभाविकथियो । भानुभक्त नेपाली सन्दर्भमा सबभन्दा जनप्रिय, सवभन्दा बढीपढिएका र सुनिएका मात्र नभएर सबभन्दा वढी विवादास्पद स्रष्टा पनिरहेछन्‌ भन्ने क्राको अनुभूति यो किताब तेख्ने क्रममा हुनगयो ।भानुभक्तको जन्म मितिदेखि लिएर उनका सृजनाहरूको कालकम, उनीसँगसम्बद्ध विविध घटनाहरूका साथै उनका कतिपय रचनाहरूमा भएकाथपघट र व्याख्याका विविधताहरूले गर्दा आदिकवि भानुभक्तबारे प्रामाणिकर आधिकारिक रूपमा केही लेख्नु भनेको अत्यन्त दृष्कर कार्य रहेछ भन्नेमैले अनुभव गरेँ । चलचित्रका लागि लेखनकार्य गर्दा भानुभक्तकासृजनाहरूलाई पछ्याउँदै उनका जीवनका प्रमुख घटनालाई कथाक्रममाउन्दै र बुन्दै जानु आवश्यक थियो । त्यति मात्र नभएर भानुभक्तलाईकेन्द्रविन्दु वनाएर त्यति बेलाको सामाजिक, भाषिक तथा साँस्कृतिकवस्तुस्थिति पनि चलचित्रमा प्रतिबिम्बित होस्‌ भन्ने आग्रह राखिएकोथियो । अफ अर्को थप कुरा, चलचित्रका माध्यमबाट आम-दर्शक समक्ष&lt;br /&gt;
छ&lt;br /&gt;
प्रस्तुत गरिने विषय भएको हुनाले यो सरल र आकर्षक हुनु पनिजरूरी थियो ।&lt;br /&gt;
भानुभक्तका कतिपय सृजनाहरूका स्थापित सन्दर्भ थिएनन्‌ । तरचलचित्रका लागि लेख्दा यस्ता सृजनाहरूलाई सन्दर्भ दिएर कथा-उपकथामाउन्नु अनिवार्य भएको हुनाले ठाउँठाउँमा यथार्थको नजिक हुन खोज्दैपहिलो पटक नयाँ सन्दर्भहरू दिइएका छन्‌ । तर पनि अधिकांश लेखनक्रममाभानुभक्तबारे अग्रजहरूले लेखेका कृतिहरूलाई नै आधार मानिएको छ ।विशेषतः मोतीराम भट्टको “कवि भानुभक्तको जीवन चरित्र&#039; र बालकृष्णसमको &#039;भक्तभानुभक्त&#039; उल्लेखनीय छन्‌ । समजीको भक्त भानुभक्तकाकेही दृश्यहरूबाट सम्बाद समेत साभार गरिएको छ ।&lt;br /&gt;
चलचित्रको पटकथा लेख्दा दृश्यहरूको छायाङ्न प्रक्रिया, सम्पादनर ध्वनिका अन्तरसम्बन्धहरू स्पष्ट हने गरी प्राविधिक किसिमले लेखिएकोहुन्छ । विशेषत: प्रत्येक सटको विभाजन क्यामराको गति र त्यसकोकलाकारहरूको गतिविधिसँगको अन्तरसम्बन्ध समेतलाई स्पष्टयाउनेगरी लेखिएको हुन्छ । यसरी प्रस्तुत गर्दा सामान्य पाठकका निम्तिपट्यार लाग्दो र ज्यादै नै प्राविधिक ढाँचाको हुनजाने हुनाले &#039;आदिकविभानुभक्त: पटकथा&#039; मा प्राविधिक पक्षलाई गौण राखी प्रकाशित कृतिलाईनाटकको ढाँचामा प्रस्तुत गर्ने जमर्को गरिएको छ । यो कृति सचित्रप्रकाशित हुने हुनाले यसमा परिवेश, पात्र र भेषभूषाका बारेमा भनेविशेष विवरण दिइएको छैन ।&lt;br /&gt;
राष्ट्रिय बिभूति आदिकवि भानुभक्तपति श्रद्धा-सुमन समर्पणको योएउटा जमर्को मात्र हो यसमा धेरै त्रुटि हुन सक्दछन्‌, जसलाई विद्वान्‌हरूलेऔंल्याइदिन्‌ भयो भने पछिल्ला सस्करणका निम्ति परिष्कार रपरिमार्जनको बाटो खुल्न जानेछ ।&lt;br /&gt;
यो पुस्तक चलचित्रको निर्माण सँगसँगै प्रकाशित गर्ने उत्सुकतादेखाएकोमा म भान्‌ जन्मस्थल विकास समितिप्रति आभार व्यक्त गर्दछु ।भानुभक्तका बारेमा बिविध पक्षका विविध मतमतान्तरलाईआधिकारिक रूपमा निर्क्यौल गर्ने काम चलचिव निर्माण समिति र विशेषत:अन्वेषण समितिको मार्गदर्शन बिना सम्भव थिएन, जसका लागि म उक्त&lt;br /&gt;
जज&lt;br /&gt;
समितिहरूप्रति आभार व्यक्त गर्न चाहन्छु । साथै, पुस्तकको भूमिकालेखिदिन्‌ भएकोमा त्रिभुवन विश्वविद्यालय, नेपाली केन्द्रीय विभागकाप्रमुख ठाक्रप्रसाद पराजुलीप्रति कृतज्ञता व्यक्त गर्दछु । यसैगरी पुस्तककोशृद्धाशुडि लगायत छपाइको सम्पूर्ण अभिभारा लिइदिनु भएकोमा डाव्रतराज आचार्यप्रति पनि आभार व्यक्त गर्दछु । त्यस्तै कम्प्युटर टाइप गर्नेगोपालप्रसाद शर्मा र आकर्षक छपाइ गरिदिने जगदम्बा प्रेस परिवारलाईपति धन्यवाद ज्ञापत गर्दछु ।&lt;br /&gt;
अन्त्यमा, आदिकवि भानुभक्तलाई उदघाटित गर्ने मोतीराम भट्टकोकबितामा मेरो भाबना पनि प्रतिविम्बित भएको हुँदा त्यसैलाई उद्धत गर्दैआफ्नो भनाइ यहीं दङ्ग्याउने अनुमति चाहन्छ-&lt;br /&gt;
स्वस्ति श्रीयुत भानुभक्त कविका जीवन्‌ कया जो थिया ।भाषाका अन्रागि जन्‌हरू सबै जानुन्‌ भनी लेखिया ॥यस्‌मा उँच र नीच केही छ भन्या सज्जन्‌ सबै माफ गरुन्‌ ।इन्‌का जीवनको कथा पढि सबै आनन्द सागर्‌ परुन्‌ ॥१॥&lt;br /&gt;
७ उह प्र&lt;br /&gt;
अस्तु 0५&lt;br /&gt;
१०&lt;br /&gt;
११:१२.&lt;br /&gt;
विषय-सूची&lt;br /&gt;
प्रकाशकीय&lt;br /&gt;
भूमिका&lt;br /&gt;
मेरो भन्नु&lt;br /&gt;
प्राककधन&lt;br /&gt;
पटकथा-दृश्य १ देखि १२० सम्म&lt;br /&gt;
परिशिप्ट-१, पात्र र कलाकार&lt;br /&gt;
परिशिष्ट-२, दृश्यहरूको संक्षिप्त टिपोटपरिशिष्ट-३, पूर्वस्बराङ्गन गरिएका गीत / कबितापरिशिष्ट-४, रिल, दृश्य र अवधि&lt;br /&gt;
परिशिष्ट-५, चलचित्र निर्माणसँग सम्बन्धित समितिहरूपरिशिष्ट-६, प्राविधिकहरू&lt;br /&gt;
परिशिष्ट-७, आधार गन्थहरू&lt;br /&gt;
ग&lt;br /&gt;
छु&lt;br /&gt;
२-२४२रेड२५०२६८&lt;br /&gt;
२७०&lt;br /&gt;
२७२२७३&lt;br /&gt;
प्राक्क थन&lt;br /&gt;
: पदांमा कवि मो खेल्दैछ तस्बिरमाथि कविताको&lt;br /&gt;
लेखोट नेपथ्यबाट&lt;br /&gt;
७ स्वस्ति श्रृभाषाकायसमा उँच,&lt;br /&gt;
म ॥ 4 लेखियाछ न्‌ भनी लेखिया ॥धन्या सुज्जन्‌ सबै माफ गरुन्‌ ।&lt;br /&gt;
&#039; आत्तन्द सागर्‌ परुन्‌ ॥१॥&#039;&lt;br /&gt;
- मोतीराम भट्ट&lt;br /&gt;
० भान जन्मस्थल विकास समितिको प्रस्तृतिआदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
: उक्त लेखोटपछि यस चलचित्रमा काम गर्ने विभिन्न कलाकाहरू,प्राविधिकहरू, नेखक-कविहरू र चलचित्र निर्माण परिवारका सम्पूर्णसदस्यहरूको नाम पर्दामा कमश: देखिदै जान्छ । यसैक्रममा नेपथ्यबाटनिम्नलिखित उद्घोषण आइरहन्छ :&lt;br /&gt;
० आदिकवि भानुभक्त नेपालका ती राष्ट्रिय विभूतिको कथा हो,जसले आधुनिक नेपाली साहित्यको जग बसाले । नेपाली भाषाकोसमुन्नति र सम्बृद्धिमा अह भूमिका खेल्ने भानभक्तले संस्कृत भापाकोआधिपत्य भएको त्यस समयमा नेपाली भाषाका पक्षमा आन्दोलनकोशइखनाद गरेका थिए ।वाइसे, चौवीसेलगायत अनेकौ भुरे-टाकुरे राज्यहरूमा विभाजितनेपाललाई श्री ५ बडामहाराजाधिराज पृथ्वीनारायण शाहलेचारवर्ण छत्तीस जातको एउटा सुन्दर फूलबारीका रूपमा एकीकरण&lt;br /&gt;
“मोतीराम भट्टको भानुभक्तको जीवन चरित्रबाट&lt;br /&gt;
पटकथा १&lt;br /&gt;
गरे भने आदिकवि भानुभक्तले भाषिक, साहित्यिक र साँस्कृतिकरूपमा एक सूत्रमा बाँध्ने काम गरे । भानुभक्त नेपालका मात्र नभएरसम्पूर्ण नेपालीका जातीय कवि हुन्‌ ।यो चलचित्र यिनै नेपाली विभूतिको जीवनी र यिनका सिर्जनाकोकथा हो । भानुभक्तलाई केन्द्रबिन्दु बनाएर फण्डै दुई शताब्दीअगाडिकोनेपालको सामाजिक, साँस्कृतिक, साहित्यिक र भाषिक यथार्थलाईयसमा प्रस्तृत गर्ने जमर्को गरिएको छ ।भानुभक्त विलक्षण प्रतिभायुक्त पुरुष थिए । उनले औपचारिक शिक्षाबाजे श्रीकृ्‌ष्णबाट हासिल गरे भने आमजनजीवन, लोक-साहित्य रलोक-संस्कृतिबाट धेरै उजाँ प्राप्त गरै । भानुभक्त कनै पनि समयमाकनै पनि विषयमा तत्काल कविता रच्न सक्दये । आफ्नो जीवनकालमाभानुभक्तले थुप्रै फुटकर कविताहरूबाहेक प्रश्नोत्तरी, बध्‌शिक्षा,भक्तमालालगायत रामायणको रचना र उल्था गरे र नेपाली भाषार साहित्यलाई सम्बृद्ध पारे । भानुभक्तीय-रामायणको लोकप्रियतानेपाली साहित्यिक कृतिहरूमा अतुलनीय छ ।तनहँ-रम्घामा जन्मेका भानुभक्त बाजे श्रीकृ्‌ष्णसँगै काशी गए रत्यहाँ आफ्नो अध्ययन जारी राखे । श्रीकृष्णको देहान्तपछि नेपालफर्केका भानुभक्तले घांसीलाई भेटेपछि उनकै प्रेरणाबाट रामायणकोउल्था गर्ने कामको सुरुवात भयो ।भानुभक्तका पिता धनञ्जय आचार्य पाल्पा-गौंडामा खर्दारको पदमाकार्यरत थिए । धनञ्जयको मृत्युपछि उनैले गरेको कारोबारकोसिलसिलामा भानुभक्त कुमारीचोक अडडामा थुनामा परे । रामायणकोधेरै अंश भानुभक्तले क्‌मारीचोकमै बन्दी अवस्थामा लेखेका हुन्‌ ।रामगीताको लेखनको समाप्तिसँगै राष्ट्रिय बिभूति भानुभक्तको पार्थिकशरीरको पनि अन्त्य हुन्छ तर नेपाली जाति रहञ्जेल कहिल्यैननिभ्ने भाषिक, साहित्यिक र साँस्कृतिक चेतनाको पुल्ठो बालेर...स्तुत छ- ॥ आदिकवि भानुभक्त ॥श्रेयसूचि ।क्रेडिट टाइटल) का साथसाथै उद्घोषण पनि समाप्तहुन्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभत्त&lt;br /&gt;
बिसं.स्थातसमयपात्रहरू&lt;br /&gt;
१८७६&lt;br /&gt;
रम्घा, शिखरकटेरीको आँगन&lt;br /&gt;
बिहान&lt;br /&gt;
शीकष्ण, भानभक्त, सत्यप्रिया, धर्मावती, काशीनाथबिक्रमसंवत्‌ १८७६ चुँदी रम्घा, शिखरकटैरी लेखिएको लेखोटपर्दामा दखापर्छ ।&lt;br /&gt;
मिरमिरे बिहानीमा टाढा पहाडको चुचुरो पछ्लाडिबाट पूर्यमृस्क्राउदै चिह्ाउँछ । पहाडमृनिको वेसी फाट कृहिरो ओढेरनिदाइरहेको छ । चराहरू चिरबिराइरहेका छन्‌ । पृष्ठभूमिमाशङ्खध्वति गृञ्जिरहेको छ । अलौकिक प्राकृतिक छटालाईसमेटदै क्यामरा घम्छ र श्रीकृष्ण आचार्यको शिखरकटेरीकोघर-आगन देखापर्छ ।&lt;br /&gt;
आँगनको एक छेउमा तृलसी मठसँगै मरस्वतीको मूर्ति स्थापनागरिएको छ । छेउमा घुलौटो राखिएको छ । पूर्तिको अगाडिश्रीकृष्ण, भानुभक्त, धर्मावती, तथा तत्यप्रिया बसेका छन्‌ ।काका काशीवाध पिँढीबाट हेरिरहेका छन्‌ । भानृभक्तलाई&lt;br /&gt;
पटकया&lt;br /&gt;
३&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण&lt;br /&gt;
शीकृष्ण&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
श्रीकृष्णभानुभक्त&lt;br /&gt;
भानुभक्तश्रीकृष्णभानुभक्त&lt;br /&gt;
श्रीकृष्णभानुभक्तश्रीकृष्णभानुभक्तश्रीकृष्ण&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण&lt;br /&gt;
अक्षर चिनाउने सुरसार हुदैछ ।&lt;br /&gt;
शङ्ख फुक्न छोडी भावुपट्टि फर्केर- आज श्री पञ्चमी,अक्षर आरम्भ्न गर्न्या साइतकौ दिन हौं ।&lt;br /&gt;
बुहारीलाई हेर्दै- लौ बुहारी, यता बसेर भानुलाई काखमालिउ त !&lt;br /&gt;
: धर्माबती अगाडि सरेर भानुलाई काखमा लिन्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
क क» % -&lt;br /&gt;
भातुको हातमा फूल दिदै- लौ, हात जोडेर माता सरस्वतीकोप्रार्थना गर्‌ । मैले जे जे भन्छु तँ पनि त्यही त्यही भन्न्यागर्‌ ।&lt;br /&gt;
हस्‌।&lt;br /&gt;
फूल लिएर हात जोड्दै आखा चिम्लन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
श्री गणोशाय नमः&lt;br /&gt;
श्री गणेशाय नमः&lt;br /&gt;
सरस्वती मया दृष्टा&lt;br /&gt;
सरस्वती मया दृष्टा&lt;br /&gt;
वीणा पुस्तक धारिणी ।&lt;br /&gt;
बीणा पुस्तक घारिणी ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त बिस्तारै आँखा उघारेर आमातिर हेरी मुस्क्राउँछनधर्मावती पनि मुस्कुराउँछिन्‌ ।&lt;br /&gt;
हस-वाहन-संगुक्ता&lt;br /&gt;
हंस-बाहन-संगुक्ता&lt;br /&gt;
विद्यादान करोत्‌ु मे ॥&lt;br /&gt;
विद्यादाने करोतु मे ॥&#039;&lt;br /&gt;
लौ, फूल सरस्वतीको पाउमा चढाएर ढोग्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त त्यसै गर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
धुलौटो उठाउदै- यता आएर बस्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त श्रीकृष्णको काखमा गएर बस्छन्‌ । श्रीकृष्ण हातसमातेर भानुभक्तलाई धुलौटोमा &#039;अ&#039; लेखाउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
“सरस्वती बन्दना ।&lt;br /&gt;
रड&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
श्रीकृष्णभानभक्त&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
यो हो &#039;अ&#039; । लौ, भन्‌ त &#039;अ&#039;।&lt;br /&gt;
अ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त आमालाई हेरेर मुस्कुराउँछन्‌ । आमा पनिमुस्क्राउँछिन्‌ ।&lt;br /&gt;
लौ, आजदेखि हाम्रो भानुको अक्षरारम्भ भयो ।&lt;br /&gt;
भानु हाँस्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
लौ, धुलौटो राम्रोसँग राख्‌ है !&lt;br /&gt;
भानुभक्त धृलौटोलाई ढोग्छन्‌ अनि बाजेलाई ढोग्छुन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
वि.सं. १८७६&lt;br /&gt;
स्थान रम्घा, शिखरक टेरीको मङ्ेरी&lt;br /&gt;
समय साँफ&lt;br /&gt;
पात्रहरू श्रीकृष्ण, भानुभक्त, सत्यप्रिया, धर्मावतीवर्णमालाको किताबबाट दृश्य खुल्दैजान्छ र सम्पूर्ण भान्छालाईसमेद्दछ । अँगेनोमाथिको मृलओछयातमा वसेर श्रीकृष्णभानुभक्तलाई अक्षर सिकाइरहेका छन्‌ । सत्यप्रिया अँगेनोमादृध तताइरहेकी छिन्‌ र धर्माक्ती भान्छामा भात पकाउनलागेकी छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण &amp;quot; कपुरी &#039;क&#039;&lt;br /&gt;
भानुभक्त &amp;quot;“ कपुरी &#039;क&#039;&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण &amp;quot; भित्र बाटुलो &#039;ख&#039;&lt;br /&gt;
भानुभक्त &amp;quot; भित्र बाटुलो &#039;ख&#039;&lt;br /&gt;
शीकृष्णा &amp;quot; गाई गोडे &#039;ग&#039;&lt;br /&gt;
भानुभक्त &amp;quot; गाई गाडै &#039;ग&#039;&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण &amp;quot; घर जस्तो &#039;घ&#039;&lt;br /&gt;
६ आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
भानुभक्त ”श्रीकृष्ण ”भानुभक्त &amp;quot;श्रीकृष्ण ”भानुभक्त &amp;quot;&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण&lt;br /&gt;
भानुभक्त &amp;quot;&lt;br /&gt;
घर जस्तो &#039;घ&#039;&lt;br /&gt;
लौ, जम्मै सुना त,&lt;br /&gt;
कपुरी &#039;क&#039;, भित्र बाटुलो &#039;ख&#039;, गाई गोडे &#039;ग&#039;, घर जस्तो &#039;घ&#039;धृलौटो दिदै- लौ, अब लेखेर देखा त ।&lt;br /&gt;
धुलौटोमा क.ख.ग.घ लेखेर श्रीकृष्णलाई देखाइसकेपछि- जिबा,अब सुत्न जाउँ ?&lt;br /&gt;
भानुले लेखेको हेर्छन्‌ । &#039;ग&#039; उल्टो लेखिएको हुन्छ- पख,लेख्याको अलि मिल्या&#039; छैन, यता बस्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त बाजेको काखमा गएर बस्छन्‌ । श्रीकृष्ण हात समाएरभानुलाई शुद्ध &#039;ग&#039; लेखाउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त मुस्कुराउदै बज्यैलाई हेर्घन्‌ । दूध चलाउँदै गरेकीबज्यै पनि मुस्कराउँछिन्‌ ।&lt;br /&gt;
आङ्‌ बटारी हाइ गर्दै- जीबा, अब सुत्न जाउँ ?&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण &amp;quot; लौ, जा । पाटी राम्ररी राख्‌ ।&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
भानुभक्त धुलौटोलाई ढोग्छन्‌, बाजेलाई ढोग्छन्‌ अनि कितावर धुलौटो बोकेर परिदश्यबाट बाहिरिन्छुन्‌ । श्रीकृष्ण अँगेनोकोनजिक सरेर आगो ताप्न थाल्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
१८७६&lt;br /&gt;
पाल्पा गौँडा, उजिरसिंहको कचहरीदिउसो&lt;br /&gt;
: कर्नेल उजिरसिंह थापा, खर्दार धनञ्जय आचार्य, कारिन्दा&lt;br /&gt;
र हुक्के&lt;br /&gt;
पाल्पा गौंडा कचहरीको कक्षमा कर्नेल उजिरलिंह थापा ठूलोगहामाथि बसेका छन्‌ । उनले जड्डी पोशाक र कल्की लगाएकाछुन्‌ । छेउमै भोटो र कछ्लाड लगाएको हुक्के उभिएको छ ।कर्नेलका अघिल्तिर चादतोडा लगाएका खर्दार धनञ्जय रपगरी लगाएका कारिन्दा बसेका छन्‌ । कोठाको कुनामासदुसमाथि कागजका पोकाहरू मिलाएर राखिएका छन्‌ ।हृक्का गृडग्डाएको आवाजसँगै कर्तेलको कल्कीबाट दृश्यखुल्दैजान्छ र सम्पूर्ण कोठा उदाड्रिन्छ । उजिरलिंह तमाखुतानी सिध्याएपछि हुवकेको हातमा हुक्का दिन्छन्‌ र खर्दारधनञ्जयतर्फ हेर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
आबिकबि भान्‌भत्तक&lt;br /&gt;
उजिरसिंहघनञ्जयउजिरसिंह&lt;br /&gt;
धनञ्जय&lt;br /&gt;
उजिरसिंह &amp;quot;&lt;br /&gt;
कारिन्दा&lt;br /&gt;
उजिरसिंह&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
क्यारे नाम ?&lt;br /&gt;
भानभक्त ।&lt;br /&gt;
त्यसो भया भानुभक्तलाई अक्षर चिन्याउन्या काम सुरुभयोहैन त?&lt;br /&gt;
हजुर, श्रीपञ्चमीको साइत पारेर बाले सुरु गराउनुभयाछ ।&lt;br /&gt;
अँ, जो हो साइतको कुरा गर्दा, धनञ्जय गुरुलाई पनिज्योतिषीको राम्रो दखल छ नि।&lt;br /&gt;
कारिन्दातर्फ हेर्दै- याहा छ&lt;br /&gt;
हात जोरदैं- हजुर, चिना त ठ्याम्मै मिलाउनु हुन्छ ।&lt;br /&gt;
- धनञ्जय हास्दै हात जोड्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
तिमीलाई थाहा नै छैन । ७१ सालमा जितगढीको लडाइँकोबेलामा मैले धनञ्जय गुरुलाई सोध्याँ- गुरु, साइत हेर्नोस्‌त, चुरेको आड गरी लड्दा हाम्रो जित हुन्या जोग पन्याकोछ कि छैत भनेर, धनञ्जय गुरुले पति साइत ज्राएर&#039;हाम्रौ जित शत्रुको नास हुन्या आयो&#039; भने ।&lt;br /&gt;
: सवै उत्सुकतावाथ सुतिरहेका छन्‌ । धनञ्जय हांत्दै हात&lt;br /&gt;
जोडदछन्‌ ।नभन्दै त्यस्तै भयो ।&lt;br /&gt;
: धननज्जय खुसीमा टाउको हल्लाउँछन्‌ ।उजिरसिंह&lt;br /&gt;
अनि क्र्या भो भन्या, मेजर उडको नेतृत्वमा चारकोतेकाडीबाट अङग्रेजको पल्टन ग्बारग्बारती पस्या ।&lt;br /&gt;
: धनञ्जय र कारिन्दा सास रोकेर सुन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
हामीले पनि जो हौ, गढीको थुम्काबाट ड्याड कि डयाड्‌तोप हान्यापछि त अङ्ग्रेजका सिपाहीहरू र अफिसरहरू तखुजुक्कै ।&lt;br /&gt;
उजिरसिंहलाई साथ दिदै सबैजना विजयोल्लासमा हाँस्नथाल्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
मेजर उड त भाग्यो, छार्तोस ठोकेर ।&lt;br /&gt;
हांसोको क्रम फेरि दोहोरिन्छ&lt;br /&gt;
उजिरसिंह ” अङ्ग्रेजसँग लडाइँमा जित्याकाले त्यो गढीको नाम जितगढीरह्याको हो, बुझ्यौ त ?&lt;br /&gt;
कारिन्दा &amp;quot;” हात जोडदै- हजुर, बुझ्याँ ।&lt;br /&gt;
उजिरसिंह &amp;quot; अँ क्यारे, त्यो जितगढीलाई लडाइँले पुन्यापाको नौक्सानीकौमर्मत क्या कस्तो भयाको छ, त्यसको फेहरिस्त लिएर आउन्‌ ।&lt;br /&gt;
धनञ्जय &amp;quot; हस्‌, हज्र ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
१० आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
बि.संस्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
भानुभक्तश्रीकृष्ण&lt;br /&gt;
भानुभक्तश्रीकृष्ण&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
१८७७&lt;br /&gt;
रम्घा, शिखरकटेरीको आँगन&lt;br /&gt;
बिहान&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण, भानुभक्त, गौठालो र उसकी जहान&lt;br /&gt;
आँगनको मध्य भागमा श्रीकृष्ण र भानुभक्त राडीमाथि बसेकाछन्‌ । भानुको अगाडि चण्डीको किताब छ । आँगनकोपरिचिमपट्टि गोठालो दाउरा चिर्दैछ र पूर्वपट्टि उसकी जहानगुन्द्री बुनिरहेकी छे ।&lt;br /&gt;
श्रीकृष्णले भानुलाई चण्डी पढाउन लागेको दृश्य खुल्दछ ।श्रीकृष्ण सुनिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
चण्डी मार्कण्य पुराणको एक भाग हो । यसमा डेबीकोचरित्रको वर्णन छ ।&lt;br /&gt;
यसलाई दुगाँ सप्तशती किन भन्याको ? भन्‌ त ।&lt;br /&gt;
पसमा दुर्गाको वर्णन भयाका सातसय श्लोक छन्‌, त्यसैले ।हो । टाउको हल्लाउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
दुर्गा कवचमा के के हुन्छ?&lt;br /&gt;
११&lt;br /&gt;
भानुभक्तश्रीकृष्णभानुभक्त&lt;br /&gt;
श्रीकृष्णभानुभक्तश्रीकृष्णभानुभक्तश्रीकृष्णभानुभक्तश्रीकृष्णभातभक्तश्रीकृष्णभानुभक्तश्रीकृष्णभानुभक्तश्रीकृष्णभानुभक्तश्रीकृष्णभातुभकत्तश्रीकृष्णभानुभक्तश्रीकृष्णभानुभक्त&lt;br /&gt;
“दुर्गाकवचबाट ।&lt;br /&gt;
हो??? ररर&lt;br /&gt;
१र&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
यसमा दुर्गाको कबच, अर्गला र कीतक हुन्छन्‌ ।पहिला, सुरुका दुई श्लोकको अर्थ भन्‌ त।संसारभरमा जुन गुह्य छ, जसले सबै मानिसहरूको रक्षागर्दछ र जुन हजुरले अहिलेसम्म कसैलाई पनि भन्नुभयाकोछैन, त्यस्तो चिज मलाई भन्नु हवस्‌ भन्दा ब्रह्माले मार्कण्यक्रषिलाई यो दुर्गा कवच ब्रताउनु भयाको हो ।लौ, अब यसको संस्कृत श्लोक पढ्‌ ।हस्‌ ।नमश्चण्डिकायै ।नमश्चण्डिकायै ।ग्रद्‌ गृह्ययद्‌ ग्ट्यपरमं लोकेपरमं लोकेसर्बरक्षासर्वरक्षाकर नृ्‌णाम्‌ ।कर नणाम्‌ ।यन्न कस्ययन्न कस्यचिदाख्यातंचिदाख्यातंतन्मे ब्रृहितन्मे ब्रृहिपितामह ॥पितामह ॥&amp;quot;भानुभक्तमा गएर क्यामरा स्थिर हुन्छ ।दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
आविकबि भानुभक्त&lt;br /&gt;
पृदछछ&lt;br /&gt;
स्थान चेँदी, भगवती स्थान&lt;br /&gt;
समय बिहान&lt;br /&gt;
पात्र श्रीकृष्ण, भानुभक्त र भक्तजनभानुभक्तले दुर्गासप्तशतीको अध्ययन समाप्त गरिसकेकाछन्‌ । उनी अब दुर्गासप्तशती कण्ठाय्र भन्न सक्ने भइसकेकाछन्‌ । बाजे श्रीकृष्णसँग देवीको स्थानमा भानुभक्तले दुर्गासप्तशती पाठ गर्दैगरेको दृश्य देखापर्छ । अन्य भक्तहरू पनिपाठ गरिरहेका छुन्‌ ।&lt;br /&gt;
समूहस्वर &amp;quot; या देवी सर्व भूतेषु चिति रुपेणा संस्थिता ।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमोनम: ॥&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्तदगासप्तशवीबाटपटकथा १३&lt;br /&gt;
विसं. १८७७&lt;br /&gt;
स्थान रम्घा, शिखरकटेरीको पिँढी&lt;br /&gt;
समय बिहान&lt;br /&gt;
पात्र शीकृष्ण र भानुभक्तश्रीकृष्ण भानुभक्तलाई अमरकोषको अध्ययन प्रारम्भगराउंदैछन्‌ । भावृभक्तको अगाडि अमरकोषको कितावराखिएको छ । दुबैजना पिढीमा वसेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
श्वीकृष्णा » कविता लेख्न शब्द-ज्ञात्न हुनुपर्दछ । शब्दहरूको भण्डारबाटठीकठीक शब्दको चयन गरी उचित ठाउँमा प्रयोग गर्नजान्नुपर्दछ ।भानुभक्त एकाग्र भएर सुनिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
० यिनै शब्दहरूको भण्डार भयाको पुस्तक हो- अमरकोष&lt;br /&gt;
: भानुभक्त अमरकोषपट्टि हेर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
» जस्तै, हेर्‌ - पृथ्वीलाई बुराउन्या तेत्तीस शब्दहरू छन्‌ ।भानुभक्त &amp;quot;» तेत्तीस्‌ ? जिबा, मलाई त सातगोटा मात्र आउँछ ।श्रीकृष्ण ० कुन कुन आउँछ, भन्‌ त।&lt;br /&gt;
१४ आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
भानुभक्तश्रीकृष्णभानुभक्तश्रीकृष्णभानुभक्त&lt;br /&gt;
५ भ्‌, भमि, अचला, अनन्ता, रसा, विश्वम्भरा, स्थिरा ।५ लौ, अब अगाडि पढ्‌ ।० हस्‌ ।० घरा घरित्री घरणी क्ष्योणीर्ज्या काश्यपी क्षिति: ॥० दोहोर्‌याउँछन्‌-घरा धरित्री धरणी क्ष्योणीर्ज्या काश्यपी क्षिति: ॥&amp;quot;: श्रीकृष्ण नातिले पढेको सुन्दै मुस्कुराउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
&#039;अमरकोपबाट ।&lt;br /&gt;
पटकया&lt;br /&gt;
११&lt;br /&gt;
दृश्य ७&lt;br /&gt;
वि.सं. ; १द७७&lt;br /&gt;
स्थान : रम्घा, शिखरकटेरीको मम्ेरी ।समय ; साफ&lt;br /&gt;
पात्र : भानुभक्त र धर्मावती&lt;br /&gt;
धमाविती अँगेवोमा मकै भुटिरहेकी छिन्‌ । भानुभक्तअँगेनोमाथिको मूलओल्यानमा ओहोरदोहोर गर्दै अमरकोषघोकिरहेका छन्‌ ।भानुभक्त ०» सबंसहा वसुमती वसुधोर्वी वसुन्धरा ।गोत्रा क्‌ः पृथिवी पृथ्वी क्ष्मावनिर्मेदिनी मही ॥&amp;quot;“: धर्मागती छोरालाई हेर्दै बड्ग पर्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“अमरकोषबाट&lt;br /&gt;
१६ आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
दृश्य क&lt;br /&gt;
“सरस्वती बन्दना&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
१८७७&lt;br /&gt;
: रम्घा, प्‌जा, चौकी&lt;br /&gt;
बिहान&lt;br /&gt;
भानुभक्त र देवी सरस्वती&lt;br /&gt;
देबी सरस्वतीको मुर्ति अगाडि राखेर भानृभक्त प्रार्थतागरिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
या कृन्देन्दु-तृषारहार-धवला या शभ्वस्त्रावता ।&lt;br /&gt;
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्यासना ॥&lt;br /&gt;
या ब्रट्माच्यतशङ्डरप्रभृतिभिर्दैवै: सदा वन्दिता ।&lt;br /&gt;
सा मां पात्‌ सरस्वती भगवती तिःशेष जाड्यापहा ॥&#039;सरस्वती-वन्दवाको अन्त्यमा भातृभत्त टाउको उठाएर अगाडिहेछ्खन्‌ । वीणा हातमा लिएकी, सेतो वच्त्र लगाएकी, कमलमाविराजमान देवी सरस्वती प्रत्यक्ष देखापर्दछित्‌ । भावृभक्तझुकेर नमस्कार गर्छन्‌ । देवी सरस्वती हात उठाएर भानुभक्तलाईआशीवबाँद दिन्छिन्‌ । देबी सरस्वतीका करकमलबाट किरणप्रबाहित हँदै भानुभक्त सम्म आइपृग्दछ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
१७&lt;br /&gt;
बि.सं.स्थातसमयपात्र&lt;br /&gt;
उजिरसिंहकेशव&lt;br /&gt;
उजिरसिंह&lt;br /&gt;
केशवउजिरसिंहधनञ्जय&lt;br /&gt;
१०&lt;br /&gt;
दृश्य ९,&lt;br /&gt;
: पैद्धजदद&lt;br /&gt;
: पाल्पा गौंडा, उजिरसिंहको कचहरी&lt;br /&gt;
$ दिउसो&lt;br /&gt;
: क.उजिरसिंह, धनञ्जय, केशव गुरुङ र कारिन्दाहरू&lt;br /&gt;
: उजिरसिहको कचहरीमा धनञ्जय, केशव गुरुङ र दुईजना&lt;br /&gt;
कारिन्दा वृत्ताकारमा बसेका छन्‌ । मध्यभागमा अरलो गद्दामाउनजिरसिह बसेका छन्‌ । छलफलको कम चलिरहेको छ ।काँगडाको लडाइँको बेला केशव गुरुङले बनायाको नक्सालेठूलो काम दियो ।&lt;br /&gt;
: हात जोड्दै- हजुर ।&lt;br /&gt;
अब तिमीले फेरि बाटो-घाटो, भीर, जड्ल, गौंडा सबैखुल्न्या गरेर पाल्पा गौंडा मातहत जतिको नक्सा तयारगर्नुपन्यो ।&lt;br /&gt;
मर्जी भयापछि म दुरुस्त निकालिहाल्छु नि ।&lt;br /&gt;
लडाइँमा भत्क्याका किल्लाहरूको पनि मर्मत भै सक्यो ।हात जोड्दै- ख्वामितले तर्जुमा गर्नुभयाको जङ्गी तथा निजामतीकर्मचारीहरूको तालिम दिन्या बन्दोबस्ती पुस्तकको पनिसाफी गरेर सिध्याउन आँट्याको छु ।&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
उजिरसिंह&lt;br /&gt;
उजिरसिंह&lt;br /&gt;
केशव&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
ठीक गन्यौ ।&lt;br /&gt;
दुवै कारिन्दा धनञ्जयलाई हेर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
सबैलाई सम्बोधन गर्दै- अब हामीले सड्डठन गर्नुपर्छ । मेराक्रा राम्ररी सन । बडामहाराजा पृथ्वीनारायण शाहलेत्यत्रा दुख्खले आर्ज्याको चारवर्ण छत्तीस जातको फूलबारीहो । फिरड्डीहरूलाई पस्न दिनुहुँदैन ।&lt;br /&gt;
कारिन्बाहरू सहमतिमा टाउको हल्लाउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
केशव गुरुङ ! लौ, तिमीले नक्साको काम सुरू गरिहाल ।यसले लडाइँमा ठूलो काम दिन्याछ ।&lt;br /&gt;
हात जोड्दै- प्रभु, म काममा लागिहाल्ब्याछु ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
१९&lt;br /&gt;
वि.सं. : पैदजदस्थान : चुँदी बेसी, चउरसमय : दिउसोपात्र : भानुभक्त, चिबे, हरि, भीमे र बिर्खेपर्दामा चुवीरम्घा बेसी १५७८ भन्ने लेखोट देखिन्छ । जङ्गलकोछेउको चउरमा गाई-गोरू चरिरहेका छन्‌ । भानुभक्त, हरि रभीमे एक छेउमा बसेर करा गर्दैछन्‌ । चिवे र बिर्खे दौडदै भानु,हरि र भीमे भएका ठाउँमा आएर बस्छन्‌ ।भानुभक्त ०» ए चिबे ? तेरो गाईको नाउ क्यारे ?चिबे ५ कालो गाईको नाम काली ।- सबै गोठाला हाँस्छन्‌ ।हरि ५ गाई नै गाईको नाम हालेर कसले सिलोक हाल्न सक्छ ?- सबै गोठाला मुखामुख गर्छन्‌ ।चिब्रै ० कसैले पनि सक्दैन | गाई नै गाईको पनि सिलोक हुन्छ कहीँ ?भातभत्त ” क्यान हुँदैन ? म सक्छु । मैले सक्याँ भन्या क्या दिन्या ?चिब्रे ० लौ बाज्ञी ठोकौं । तैले सकिस्‌ भन्या म गाईकै जसरी हिंडेर२० आदिकवि भानुमत्त&lt;br /&gt;
हरि&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
ह्रि&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
हरि&lt;br /&gt;
“लोक पच्च&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
गाईकै जसरी कराउन्याछु । सकिनस्‌ भन्या तैँले पनि त्यसैगर्नुपर्न्याछ ।&lt;br /&gt;
हुन्छ । लौ, बाजी भो ।&lt;br /&gt;
आनुभक्त वरिपरि चरिरहेका गाईहरूतिर हेर्छन्‌ । गोठालाहरूउत्युकतापूर्वक आपसमा हेराहेर गर्छन्‌ । भानुभक्त भाकाफिराएर सिलोक भन्दछन्‌&lt;br /&gt;
काली कैली कलाँखु गोठ्‌ भँगेरी आर्सी त काली पुँडी ।&lt;br /&gt;
: चिबे ट्वाल्ल पर्छ ।&lt;br /&gt;
दर्माली रचनी तिलौरी बेलौरी रुप्सी रुपाङ्गी चिब्‌ ॥&amp;quot;गोठालाहरू रमाइलो मान्दै हाँस्छन्‌ ।उफ्रदै - भानुभक्तले जित्यो, जित्यो ।&lt;br /&gt;
: चिने बाल्ल परेर हेर्छ ।&lt;br /&gt;
लौ अब गाईको जसरी हिड्त्या र कराउन्दा काम गर्‌ ।चिबे, लौ गाई करा ।&lt;br /&gt;
- चिबे उठेर अलि पर जान्छ र गाईको जतरी घाँस चर्दै&lt;br /&gt;
गाईको जसरी कराउँछ । गोठालाहरू हाँस्छन्‌ । चरिरहेकोगराई आवाज सुनेर अगाडि बढ्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
चिबे&lt;br /&gt;
वासुदेवभानुभक्तवासुदेव&lt;br /&gt;
२२&lt;br /&gt;
१८७८&lt;br /&gt;
रम्घा, गाउँको बाटो&lt;br /&gt;
दिउसो&lt;br /&gt;
भानुभक्त, चिबे, वासुदेव र बट्वाहरू&lt;br /&gt;
टाढाबाट घोडा चढ्दै आइरहेका बासुदेवबाट दृश्य प्रारस्भहुन्छ । अर्को दिशाबाट भानुभक्त र चिबे आइरहेका छन्‌ ।दुवैथरीको जस्काभेट हुन्छ ।&lt;br /&gt;
वासुदेव ठूलोबा, प्रणाम ।&lt;br /&gt;
बासुदेव टाउको हल्लाएर अभिवादन स्वीकार गर्छन्‌ ।खुट्टामा ढोगेँ भन्या घोडामा हुनुहन्छ ।&lt;br /&gt;
कहाँ जानलाग्या ?&lt;br /&gt;
तल्लो रम्घामा श्वाध्दको निम्तो भन्न जानलाग्या ।&lt;br /&gt;
ए,&lt;br /&gt;
घोडालाई एडी लगाउँछन्‌ । घोडा अगाडि बढ्छ । भातृ र चिबेपनि हिड्छन्‌ । खर्पेठ्याक्‌ भिरेका दुईजना बटुवा मास्तिर&lt;br /&gt;
आदिकवि भातुभत्त&lt;br /&gt;
चिब्रे&lt;br /&gt;
भानभक्त&lt;br /&gt;
चिबे&lt;br /&gt;
चिबे&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
लाग्छन्‌ । भानु र चिबे तलतिर ओर्लन्छन्‌ ।हिंड्बा हिड्दै - ए भानु, ल बासुदेव ठूलोबा र घोडाकोसिलोक हाल्‌ त।&lt;br /&gt;
- भानुभक्त एकछिन बिचार गर्छन्‌ र बासुदेव ठूलोबा गएको&lt;br /&gt;
दिशातर्फ हेर्छन्‌ । घोड्डा हिडिरहेको हुन्छ ।&lt;br /&gt;
: भाका फिराएर -&lt;br /&gt;
हरे मुरारे बसुदेबका छोरा&lt;br /&gt;
म जान्छु दरबार्‌ कितिदैउ त घोडा ।&lt;br /&gt;
घोडाको मोल तिन सय साठी&lt;br /&gt;
घोडा चढ्तुभन्दा पैदल्‌ हिड्त्‌ जाती ॥&amp;quot;&lt;br /&gt;
गीतको अन्त्यमा घोडा उकालो चढ्न सक्तैन र बासुदेवठूलोबा घोडाबाट खत्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
हिंड्दै भाका फिराउँछ- &#039;घोडा चढ्नु भन्दा पैदल हिड्नुजाति &#039; ल हिँड पैदल ।&lt;br /&gt;
- दुबैजना अँगालो मार्दै अगाडि बढ्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
तँ पनि वित्पातको गीताङ्के भइस्‌ । जेको पनि सिलोकहालिहाल्छस्‌ । बुरिस्‌ भानु, सिलौकमा त यो गाउँमा तँलाईकसैले पनि जित्न सक्दैन ।&lt;br /&gt;
दुवैजना हाँस्दै परिद्श्यबाट बाहिरिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
२२३&lt;br /&gt;
वि.सं.&lt;br /&gt;
स्थानसमय&lt;br /&gt;
पात्र&lt;br /&gt;
चिबे १भानुभक्त »चिबे ७&lt;br /&gt;
रड&lt;br /&gt;
पद्ज्दचुँदी ब्रेसी, चउर&lt;br /&gt;
भानुभक्त, चिबै, हरि, भीमै र बिर्खे ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त, चिबे, हरि, मीमे र बिर्खे चउरको मध्यभागमाहातमा लड्ठी लिएर उभिएका छन्‌ । यत्रतत्र गाई-बस्तुचरिरहेका छन्‌ । बीच-बीचमा गाइं-बस्तुको रालो र घण्टीकोमधुर आवाज आइरहन्छ । पृष्ठभूमिको हरियो जङ्गलबाटचराहरू चिरबिराइरहेको सुनिन्छ । चिबेको अनुहारबाट दृश्यखुल्दै जान्छ र पृष्ठभूमिको नङ्गलका साथै चउरका गाईयस्तृ र गोठालाहरू देखापर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
रोपपूर्ण मृद्वामा- अस्ति त भानुले रेल गरेर मलाई गाईकराउन लगायो ।&lt;br /&gt;
प्रतिबाद गर्दै- मैते क्या रेल गच्याँ ?&lt;br /&gt;
पन्द्रगोटा गाईको नाम हालेर सिलोक त भन्यो तर यसलेआफूले रच्याको होइन र&#039;छनित।&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
हरिचिबे&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
चिबे&lt;br /&gt;
बिर्खे&lt;br /&gt;
हरि&lt;br /&gt;
चिबे&lt;br /&gt;
भानभक्त&lt;br /&gt;
भान्‌क्षक्त&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
आफैंले रच्याको सिलौक भन्नुपर्छ भनेर बाजी थाप्या&lt;br /&gt;
हो र ? कसरी सेल गत्या भन्न पाइन्छ ?&lt;br /&gt;
हात्त नचाउँदै - केल गर्‌या भन्न पाइन्न ।&lt;br /&gt;
लौ, त्यो त भैगो । तँ सक्छस भन्या आफैले रच्याको&lt;br /&gt;
सिलोक हाल्न त ।&lt;br /&gt;
केको सिलोक हात्न्या ?&lt;br /&gt;
चिबे सोच्दै हातले कञ्चट, कपाल, कान छाम्दै जान्छ ।&lt;br /&gt;
हरि उत्सुकतापूर्वक हेरिरहन्छ ।&lt;br /&gt;
कपाल, कान, कञ्चट पस्तो &#039;क&#039; बाट उठन्या शरीरका&lt;br /&gt;
अड्को सिलोक हाल्न सक्छन्‌ भन्या ?&lt;br /&gt;
हरि, चिबे र भानुभक्त दुवैलाई पालैपालो हेर्छ ।&lt;br /&gt;
हेरुँ, &#039;क&#039; बाट उठ्न्या कतिगौटा भन्न सक्छस्‌ ।&lt;br /&gt;
भावृभक्त सोचमग्न हन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुले सक्यो भन्या चिबेले फेरि गाई कराउन पर्छ नि।&lt;br /&gt;
गाइ त अस्ति कराइहाल्यो नि, अब त स्याल कराउनुपर्छ ।&lt;br /&gt;
चिबे विचार गर्छ ।&lt;br /&gt;
भानुले दशगोटा &#039;क&#039; बाट उठन्या शरीरको भागको सिलोक&lt;br /&gt;
हाल्यौ भन्या चिबेले स्याल कराउनुपर्छ ।&lt;br /&gt;
दश त हैन, पन्द्रगोटा भन्न सक्यो भन्या चैं म स्याल&lt;br /&gt;
कराउन्याछु । लौ, बाजी भयो ।&lt;br /&gt;
देब्रे मुढीमाथि दाहिने हातले हान्दै बाजी थापेको भाउ लाउँछ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त गुनगुवाउन थाल्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
चिबे उत्सृकतापूर्वक हेर्छ ।&lt;br /&gt;
भाका फिराएर गाउँछन्‌&lt;br /&gt;
केश्‌ कञ्चेट्‌ कृहन्‌ कपाल र कलिजो काखी करड्‌ कत्सिरी ।&lt;br /&gt;
आनुभक्तबाहेक अरु तीनजना चउरमा बस्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
कान्यागुजि र कर्कुचा काटि र कान्‌&lt;br /&gt;
चिबे कान, कुर्कुचा र कम्मर छाम्दै जिब्रो काड्छ ।कम्मर्‌ र कापा पनी ॥&lt;br /&gt;
२५&lt;br /&gt;
हरि “बिर्खेचिबे&lt;br /&gt;
हरि&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
हरि औँला भाच्दै गन्नथाल्छ ।कान्छी औंली र काँध कम्‌ पनि भया कण्डो र कोखोसमेत्‌ ।&lt;br /&gt;
- बिर्खे मुस्कुराउँछ ।&lt;br /&gt;
कपारो, जियमा &#039;क&#039; देखि उठन्या बिस्‌ थोक यिनै हुन्‌ बुफ ॥&amp;quot;कराउदै उठ्छन्‌ - यो चिबेले फेरि हान्यो ।&lt;br /&gt;
पन्द्रगोटा भन्या त बीसगोटा पो पुन्यायो । अब म योसँगसिलोकमा बाजी याप्दिन ।&lt;br /&gt;
; भानुभक्त मुस्कुराउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
चिबे, लौ स्याल करा ।&lt;br /&gt;
: चिबे अनकनाउँछ ।&lt;br /&gt;
बाजी हारेपछि त कराउनै पत्यो नि।&lt;br /&gt;
: चिबे स्याल कराउँछ- हृइड्य.... हुडइय।: क्यामरा चिबेको वाजिक नजिक हुँदैजान्छ र चिबेको अनुहार&lt;br /&gt;
मा गएर स्थिर हुन्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“भानुभक्तको फुटकर कविता&lt;br /&gt;
र्‌&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
दृश्य १३&lt;br /&gt;
वि.सं. ; पृद्छद&lt;br /&gt;
स्थान : रम्घा, शिखरकटैरीको मेरीसमय : बेलुकी&lt;br /&gt;
पात्र : श्रीकृष्ण र भानुभक्त&lt;br /&gt;
भानुभक्तको हातमा रहेको अमरकोपको किताबबाट दृश्यखुल्दैजान्छ । अँगैनामाधिको मूलजोछ्यानमा श्रीकृष्ण र भानुभक्तदेखापर्छन्‌ । छेउमा डिविया बलिरहेको छ ।&lt;br /&gt;
भानभक्त ” जिब्रा, अमरकौष त पढेर सिध्यायाँ, अब क्या पढ्याउन्या&lt;br /&gt;
यै हो?&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण &amp;quot; तैंले अब लघुसिध्दान्तकौमुदी पढ्नुपर्छ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त » स्वीकृतिमा टाउको हल्लाउंदै- हस्‌ ।&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण कौमुदी भन्याको व्याकरण हो | व्याकरणको ज्ञान नभईकन&lt;br /&gt;
भाषा शृद्धसँग बोल्न र लेख्न जानिदैन ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त एकाग्र भएर सुनिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
साहित्य-साधनाको लागि त व्याकरणा जान्न्‌ अनिवार्य छ,&lt;br /&gt;
अमर कोषको ज्ञानले मात्र पुग्दैन ।&lt;br /&gt;
भातुभक्त &amp;quot; ए,&lt;br /&gt;
पटकथा २७&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण ० लघुसिध्दान्तकौमृदीको मडलाचरणबाट पढाइ आरम्भ गर्‌ ।- कौमुदीको किताब भानुभक्तलाई दिन्छन्‌ । भानुभक्त किताबलाईढोग्छन्‌ र पल्टाएर हेर्छन्‌ ।श्रीकृष्ण ० मड्लाचरण पढेर सुना त ।भानुभक्त « हात जोडेर सस्वर पढ्दछन्‌-नत्वा सरस्वती देवी शृद्दा गृण्यां करोम्यहम्‌ ।पाणिनीय प्रवेशाय लघुसिध्दान्तकौमुदीम्‌ ॥“&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
७ ७&lt;br /&gt;
द्‌द आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
स्थानसमयपात्रहरू&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
१८७८&lt;br /&gt;
चुँबीबेसी, बिबाह घर&lt;br /&gt;
: दिउसो&lt;br /&gt;
भानुभक्त, चिबे, बेहला-बेहली, जन्तीहरू, घरबेटीहरू, सिलोकेहरू,&lt;br /&gt;
पण्डितहरू, दमाईहरू, डोतेहरू, गाउँलेहरू र मागल्तीहरू&lt;br /&gt;
गाउँमा विवाहको रमरुम छ । नौमती बाजा घन्किरहेकोछ। खरले छाएका घरहरूका बीच-बीचमा तीन अलग अलग आँगनछन्‌ । ठूलो घरको आंगनको मध्यभागमा जरिगया सिंगारिएको छ ।जरिगयाको बीचमा होमको आगो बलिरहेको छु । पण्डितहरू विवाहकामन्त्र पढ्दै हवन गरिहरेका छन्‌ । बेहुला-बेहली जरिगयाको पूर्वपटिबसेका छन्‌ । भानुभक्त र चिबे पण्डितहरूको पछाडि उभिएर विवाहहेरिरहेका छन्‌ । घरको कौसीमा बसेका अत्वाहरू खुसीले हासिरहेकाछन्‌ । पिँढीमा किरफूलसहित गहनाले फकिफुकाउ भएर बसेकासहिलाहरूको समुह मादल लिएर मागल गाउन कस्सिएका घन्‌। लाबाहोम्ने काम सकिएपछि बेहलीलाई अघि लगाएर बेहुला लगतगछो समाउै जरिगया घुम्नथाल्छ । मागल्नीहरू मादल ठोक्दै समूहस्वरमा गाउछन्‌ ।&lt;br /&gt;
२९&lt;br /&gt;
मागल्तीहरू &amp;quot; अघि लागिन्‌ भमरी पछि लाग्यौ भमरो ।&lt;br /&gt;
&amp;quot;मागल&lt;br /&gt;
३०&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
भमरीले घुमाई-फिराईं ल्याइन्‌ आफ्नै देश ॥&lt;br /&gt;
पण्डितहरू मन्त्र पढिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
मागल गायन चलिरहेको छ।&lt;br /&gt;
अघि लागिन्‌ भमरी पछि लाग्यौ भमरौ ।&lt;br /&gt;
भमरीले घुमाई-फिराई ल्याइन्‌ आफ्नै देश ॥&lt;br /&gt;
बेहुला-बेहुली जरिगया घुम्बैधन्‌ ।&lt;br /&gt;
मागल्नीहरू गाइरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
अघि लागिन्‌ भमरी पछि लाग्यो भमरो ।&lt;br /&gt;
भमरीले घुमाई-फिराईं ल्याइन्‌ आफ्नै देश ॥&#039;&lt;br /&gt;
मागल गायनको अन्त्यमा चिबे भानुभक्तलाई &#039;जाउँ&#039; भन्नेइसारा गर्छ र दुबैजना जरिगयाको छेउबाट अर्को आँगनतर्फलाग्छन्‌ । जरिगयामा बिवाहको काम चलिरहन्छ ।&lt;br /&gt;
दोख्नो आँगनमा जन्ती र घरबेटीतर्फका तिलोकेहरू सम्मृख भएरउभिएका छन्‌ । उनीहरूका बीच अन्ताक्षरीको प्रतिस्पर्धा चलि-रहेको छ । महिलाहरू पिढीमा वेर सिलोक सृतिरहेका छन्‌ ।पृष्ठभूमिमा नौमती बाजाको मधुर आवाज आइरहेको छ ।&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
सिलोके&lt;br /&gt;
बेहुलीपट्टिका दुईजना तिलोके भाका फिराएर गाउँछन्‌ ।बाउँ काँध उपर्‌ बिसाइ चिउँडो बाँके गरी भूतयन्‌ ।घरबेटी सिलोके सृनिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
पैह्वी मोर मुकुट रतन्‌ मणि जडित्‌ कुण्डल्‌ श्रबण्‌पर्‌ धरी ॥भानुभक्त र चिबे पति सृनिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
कोमल्‌ अङ्गुलि चालि-चालि मुरली राखी अधर्‌मा भली ।बाजी कृष्ण जहाँ बिडी सँगिनी हो ज्यन्‌ कसोरी अब ॥&#039;सिलोक सकिएपछि घरबेटीपड्टिका सिलोके मुखामुख गर्छन्‌ ।ब्ब&#039; मा बस्यो, लौ &#039;ब बाट उठाङ ।&lt;br /&gt;
: घरबेटी सिलोके टाउको निहराउँछन्‌ । अन्ताक्षरीको सिलोक&lt;br /&gt;
सिलोके-१०&lt;br /&gt;
भानुभक्तसिलोके-१&lt;br /&gt;
भानुभक्तकाका&lt;br /&gt;
भानुभक्तसिलोके-१&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
&#039;अ&#039; बाट फर्काउन सक्दैनन्‌ ।&lt;br /&gt;
पिलोके र जन्तीहरू हाँत्न थाल्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
चिबे भानुभक्तलाई उग्त्याउँछ ।&lt;br /&gt;
लौ, बेहुलीपट्टिकाले सक्यानन्‌ । हान्या ।&lt;br /&gt;
सबै गललल्ल हाँस्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
चिबे भावृभक्तलाई कोट्याउँछ ।&lt;br /&gt;
घरबेटी सिलोकेसँग- म भनूँ काका ?&lt;br /&gt;
&#039;आच्छिउँ खायाँ, बाच्छिउँ खायाँ झुस्या बारुलो, ठूला-ठूलाले त सक्यानन्‌, अब यी नानीले क्या सक्लान्‌ ?&lt;br /&gt;
सवै हाँस्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
: म भनूँ काका ?&lt;br /&gt;
सक्छस्‌ ? लौ भन्‌ ।&lt;br /&gt;
जन्तीपट्टिका सिलोकेलाई- आखिरी पंक्ति भन्नुस्‌ ता फेरि ।बाजी कृष्ण जहाँ बिी सँगिनी हो ज्यन्‌ कसोरी अब ॥अभिमान गर्दै- &#039;ब&#039; मा बस्यो; लौ उठाङ नानी, सक्छौ भनेब्र बाट।&lt;br /&gt;
: अन्ताक्षरीको सिलोकलाई &#039;ब&#039; बाटै जबाफ फर्काउँदै सस्बर&lt;br /&gt;
गाउँछन्‌-बाजा ताल मृदङ्ग शडख मुरली भेरी अनी बाँसुरी ।कर्नाल डम्फु र ञ्यालि बेस मजिरा सीतार्‌ बिना खैजडी ॥&lt;br /&gt;
&amp;quot;विद्यारण्यकेशरीको कबिता&lt;br /&gt;
पटकया&lt;br /&gt;
एक्‌ तारा र सितार ढोलकसमेत्‌ रागी त्रागी जति ।उद्यापन्‌ हरिको नुवारन हुँदा बाजा बजे नौमती ॥&#039;जन्तीपड्टिका सिलोके मृन्टो निहुराउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
चिबे ०» भाका फिराउंछ- बाजा बजे नौमती ...साथै फूर्ति गर्छौं&#039; भन्ने भावसहित छ्वाती तन्काएर बेहुलीपट्टिकाजन्तीलाई हकार्छ ।नौमती बाजा घन्किन्छ । अर्को आँगनमा इमाइहरूले बजाइरहेकोजोर नरलिड्ठाबाट दृश्य ओलदै जान्छ र आँगनमा नौमती बाजाकोघन्काइ र दमाई-वाचको छमछम हेर्दै बसेका युवतीहरूको समूहलाईउद्घाटित गर्छ । दमाई नाचको फन्को चर्कदै जान्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“बसन्त शर्माको कविता&lt;br /&gt;
३२ आदिकनि भानुभक्त&lt;br /&gt;
बि.सं. : पदछ&lt;br /&gt;
स्थान : रम्घा, शिखरकटेरीको आँगनसमय ; बिहानपात्र : भानुभक्त र धर्मावती&lt;br /&gt;
भानुभक्त आँगनमा बसेर लेखिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
: धर्माचती एक हातमा फूल टिप्ने तामाको छाप्री र अर्कोहातमा पूजा सामानसहितको थाली लिएर घरभिचबाटनिस्कन्छिन्‌ । भ्यामरा धर्मावतीलाई पछ्खयाउँदै जान्छ । धमावितीआँगनमा ओर्लेर भानुभक्तलाइ छाप्री दिदै अन्छिन्‌-&lt;br /&gt;
धर्मावती ० आज गणेशचौधी हो । बारीबाट गणोशलाई चढाउन्या फूलटिपेर त्या त भानु ।भानुभक्त » हस्‌ ।&lt;br /&gt;
- छाप्री लिएर बाहिरिन्छन्‌ । धर्मावती तुलपीमठमा गएर पृजा-सामानको थाली राख्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
पटकया डेड&lt;br /&gt;
विसं : १ैदछद८&lt;br /&gt;
स्थान ; रम्घा, शिखरकटेरीको फूलबारीसमय : बिहान&lt;br /&gt;
पात्र ३ भान्‌भक्त&lt;br /&gt;
भानुभक्त गुनगुनाउदै सयपत्री टिपिरहेका छन्‌ । फूल टिप्दैछाप्रीमा हाल्दै भानुभक्त गुनगुनाउँन थाल्दछन्‌- हं...हाँ... हा...&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
ड्ड आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
बि.सं ; पैदछद&lt;br /&gt;
स्थान : रम्घा, शिखरकटेरीको आँगन&lt;br /&gt;
समय : बिहान&lt;br /&gt;
पात्र : भानुभक्त र धर्मावतीधर्मावती तुलसीमठको अगाडि फूलको प्रतीक्षामा उभिएकीछिन्‌ ।भानुभक्त फूल लिएर आउँछुन्‌ र फूलको छाप्री आमालाईदिदै सोध्छन्‌-&lt;br /&gt;
भानुभक्त » आमा, गणेशचौथीको दिनमा गणोशलाई कतिगौटा फूलचढाउन्‌ पर्छ, याहा छ?&lt;br /&gt;
धमांबती “ फुल चढाउंदै- जतिगौटा मन लाग्यो उतिगोटा ।फेरि फूल चढाउन धाल्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त ” एक्काईस्‌गौटा ब्रुरुनु भौ, एक्काईस्‌गौटा । कुन कुन फूल,थाहा छ?&lt;br /&gt;
घर्मावती » फुक्दै- जा, आफ्नो काम गर्‌ ।भानुभक्त आफ्नै स्थानमा फर्कन्छन्‌ र लेख्न थाल्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
पटकथा ३५&lt;br /&gt;
धर्मावती पूजा सकेर फर्किन्छिन्‌ । म्यामरा धर्मावतीलाईप्च्छुयाउँछ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त « लेख्न छाडेर आफूनो नजिक आइपुगेकी आमालाई भन्छन्‌-आमा, मैले एउटा कविता लेख्याँ । सुन्नुहुन्छ ?&lt;br /&gt;
धर्मावती » मैले सुनेर क्या बुझ्छु र ? बेसीमा गएर जिबालाई सुना न ।घरभित्र पर्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
३६ आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
दुश्य १८&lt;br /&gt;
विसं.स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
शीकृष्ण&lt;br /&gt;
भानुभक्तश्रीकृष्ण&lt;br /&gt;
१८७८: चुँदीबेसी, पुरानोडिहीको घरको कोठा: बिहानश्रीकृष्ण र भानुभक्त: श्रीकृष्ण पटुका कस्दै पंप्कृतको एउटा श्लोक पाठ गर्दैछन्‌-५ ततो जगन्मङ्घल मड्डलात्मनाविहाय रामायण की्तिमुत्तमाम्‌ ।आखीरुयालबाट घरबाहिर भानुभक्त देखिन्छन्‌ । उनी हातमालिएको कागजलाई दड्ड परेर हेर्छन्‌ । कोठाभित्र श्रीकृष्णकोपाठ गर्ने कम जारी छ ।० चचार पूर्वाचरितं रघुत्तमोराजषिं वर्यैरभिसेवित यथा ॥भानभक्त निबाको अगाडि हातमा लेखोट लिएर उभिन्छन्‌ ।श्रीकृष्ण आँखामा प्रश्नवाचक चिन्ह लिएर भावुलाई हेर्दछन्‌ ।० जिबा, मैले एउटा कविता कथ्याको छु, सताउँ ?५» आशचयं मान्दै- तैँले कविता रच्याको ?&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
३७&lt;br /&gt;
भानुभक्त हास्छुन्‌ ।&lt;br /&gt;
श्री कृष्ण ” के विषयमा कथिस्‌ ?&lt;br /&gt;
भानुभक्त » गणेश चौयीमा गणेशलाई चढाउन्या एक्काईसथरी फूलकाबारेमा कथ्याको छु।&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण &amp;quot;» लौ, सुना त।&lt;br /&gt;
भानुभक्त » सस्वर कविता सुवाउँछन्‌-मास्‌ भृङ्गी बेल द्बो बयर र धतुरो तूलसीका अपाङ्झ ।बी्हीका पात्‌ समीका करबिर असड आँक गुम्पातिका पात्‌ ॥श्रीकृष्ण खुसी र आश्चर्य मिश्रित भावतहित सुनिरहन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
: विष्णुकान्ता र दारिम्‌ सुर तरु र्‌ कुरो सिन्दुन्याका जयन्ती ।&lt;br /&gt;
फूलका गीदिरिका पात्‌ लिन्‌ बट्लि गणेश्‌ चौथिका दीनमा साथ्‌ ॥&amp;quot;&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण ० प्रसन्न हुँदै भानुको हातबाट लेख्रोट लिएर- शुभ दिनमा शुभकराको साइत गरिस्‌ । तैँले लेख्न नछोड्न्‌ भान्‌ । तैंले ठूलोनाम गर्न्याछस्‌ ।भावबिभोर भएर भानुलाई छातीमा टास्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
“भानुभक्तको फुटकर कबिता ।&lt;br /&gt;
ड्द आदिकवि भातभत्त&lt;br /&gt;
विसंस्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
घर्मावती&lt;br /&gt;
पटकया&lt;br /&gt;
१८७८&lt;br /&gt;
: रम्घा, शिखरकटेरीको पिंढी र्‌ आँगन: बिहान&lt;br /&gt;
घर्मावती र्‌ भानुभक्त&lt;br /&gt;
घरको मूल ढोकाबाट हातमा सानो पोको लिएर निस्कदैगरेकी धर्मावतीबाट दृश्य सुरु हन्छ । मानुभक्त पिंढीमा वसेरलेखिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
छोरा बजिकै गएर हातको पाको र चिना दिदै- यो तेरोचिना, तेर्सेपानी पण्डित बाजेलाई लगेर देखा र तेरो व्रतबन्धकोसाइत निकालिदिनुस्‌ भन्‌ । यसमा चामल, दुबो, सुपारी रभैटी पनि छ । यो पनि बिन्‌।&lt;br /&gt;
३९&lt;br /&gt;
भानुभक्त ० आमाले दिएको चिता र पोको लिदै- हस्‌ ।जान्छन्‌ ।धर्मावती » जाँदै गरेको मागुलाई लक्ष गरेर- ब्रतबन्ध गर्न्या बेलाभइसक्यो । यसले कहिले कमाएर बाब्‌ आमालाई पाल्त्याहो?भानुभक्त हिंड्दाहिँड्दै आमाको कुरा सृनेर रोकिन्छन्‌ रआमापट्टरि फर्केर गालामा हात लगाउँदै भाका फिराएर गाउँछन्‌-भानुभक्त ० यो छोरो पढला, कमाइ गरला,दुध्‌ भात दैला मलाई ॥धर्मावती हास्दै उठ्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“लोक पद्य ।&lt;br /&gt;
४० आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
दृश्य र»&lt;br /&gt;
घनञ्जनय&lt;br /&gt;
उजिरसिंह :&lt;br /&gt;
घनञ्जय&lt;br /&gt;
पटकया&lt;br /&gt;
१ १पद्छ्द&lt;br /&gt;
: पाल्पा गौँडा, उजिरसिंहको कचहरीदिउसोधनञ्जय र कर्नेल उजिरसिंहकर्नेल उजिरतिह थापा र खर्दार धनञ्जय आचार्यकाबीचकुराकानी हुँदैछ । उजिरसिह दाया-बायाँ बालिष्ठराखेर रइ्टीमा उपरखुट्टी लगाएर वसेका छन्‌ । धनञ्जयमुडमा चकलामाथि हातमा चिठी लिएर बसेका छन्‌ । दृश्यधवञ्जयबाट खुल्दैजान्छ्न र उजिरतिहलाई पनि तमेददछ ।&lt;br /&gt;
५ छोराको ब्रतबन्धका लागि बाले डाकिपठाउनु भयाकोरहयाछ ।उजिरसिंह सुनिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
५ हिजोमात्रै पत्र हात पर्‌यो ।&lt;br /&gt;
टाउको हल्लाउदै - ए।&lt;br /&gt;
० कपाल कन्याउदै- बिदाको लागि बिन्ती बिसाउँ भनेर ।&lt;br /&gt;
११&lt;br /&gt;
उजिरसिंह « छोराको व्रतबन्ध गर्नाका लागि बिदा नमिल्त्या त कुरैभयान नि । कहिलेको साइत जुन्याको रहयाछ ?धनञ्जय ” यही श्रीपञ्चमीमा जुन्याको रहयाछ ।उजिरसिंह ० लौ, छोराको व्रतबन्ध राम्ररी सकेर चाँडै फर्कन्‌ ।: क्यामरा उजिरसिहको नजिक हुँदै जान्छ र अनुहारमा गाएरस्थिर हुन्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
र आदिकनबि भानुभक्त&lt;br /&gt;
दृश्य २१&lt;br /&gt;
विसंस्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
१४७८&lt;br /&gt;
चुँदीबेसी, पुरानोडिहीको घर-आँगन&lt;br /&gt;
बिहान&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण, भानुभक्त, धनञ्जय, भातुका काकाहरू, सत्यप्रिया,घर्मावती, जयलाल, चिबे, इष्टमित्र, नातेदारहरू, दमैहरू,भिक्षादान गर्न आएका महिलाहरू, प्रेतहरू आदि&lt;br /&gt;
घरबाट क्यामरा तल सर्दै जान्छ र पञ्चैबाजा बजाइरहेकादमाईहरूलाई तमेट्दछ । बातावरण पञ्चैनाजाको ध्वनिलेउल्लासमय बनेको छ ।&lt;br /&gt;
आँगनको मध्यभागमा जरिगया बनाइएको छ । जरिगयाकोबीचमा हबनको आगो बलिरहेको छ । मानिसहरू आँगनमायत्रतत्र छरिएर बसेका छन्‌ । जरिगयामा व्रतबन्धको कर्सचलिरहेको छ ।&lt;br /&gt;
पञ्चैबाजासँगै पण्डितहरूको मन्त्रवाचन सुनिन्छ । जरिगयाकोदक्षिणपट्टि श्रीकृष्ण बसेका छन्‌ र उचीतँगै हातमा लाबालिएर लगौँटीमात्र लगाएका, कपाल मुण्डन गरेका भानुभक्तउभिएका छन्‌ । क्यामरा जरिगयालाई प्रदक्षिणा गर्दै घम्छ ।&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
प्रोहितले उच्चारण गरेका मन्त्र भानुभक्त दोहन्याउदै जान्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
पुरोहित &amp;quot; ३०भानुभक्त ० ३८पुरोहित &amp;quot; अग्नेभानुभक्त &amp;quot; अग्नेपुरोहित &amp;quot; सुश्चवःभानुभक्त &amp;quot; सृुश्चवःपुरोहित &amp;quot; सौश्चवसंभानुभक्त » सौश्चवसंपुरोहित » माक्रुभानुभक्त ० माकुरुपुरोहित &amp;quot; स्वाहाभानुभक्त &amp;quot; स्वाहा: हातको लाबा आगोमा होम्दछन्‌ ।: फुकिरुकाउ भएर सिंगारिएका बुहारीहरू आँगनको एक भागमागफ गर्दै पात गाँतिरहेका छन्‌ ।पण्डितहरू जरिगयाको बिधिविधानमा व्यत्त छन्‌ ।वृढापाकाहरू पिढीबाट व्रतबन्ध हेरिरहेका छन्‌ ।ब्वतबन्धको कममा बटुकलाई जनै धारण गराउने बेला भएकोछ । श्रीकृष्ण दुवै हातले जनै समाएर मन्त्रोच्चारण गर्दछन्‌-श्रीकृष्णा ० यज्ञो पबीतम्‌ परम पबित्र प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्‌ ।आयृष्यमग्य्रे प्रतिमुञ्च शुभ्रे पज्ञोपवीतं बलमस्तुजेज: ॥&amp;quot;मन्त्रोच्चारण सकिएपछि श्रीकृष्ण भानुभक्तलाई जनैलगाइदिन्छन्‌ ।पिढीको एक भागमा तीवजना आमैहरू सेल पकाउनामाव्यस्तछन्‌ ।: श्रीकृष्ण आचमनीले भानुभक्तको हातमा जल राखिदिन्छन्‌ रमन्त्रोच्चारण गराउँदै भानुभक्तलाई हातको जल आचमनगराउँछन्‌ ।श्रीकृष्ण ० माधवाय नमः“ब्रतबन्ध पद्धतिबाट&lt;br /&gt;
डी&lt;br /&gt;
आदिकवि भातुभत्त&lt;br /&gt;
श्री कृष्ण » केशबाय नमः&lt;br /&gt;
भानु भक्त&lt;br /&gt;
» गौविन्दाय नम:० नारायाणाय नम:चिबे भानुभक्तको पछ्लाडि उभिएर हेरिरहेको छ्‌ ।श्रीकृष्ण र भानुभक्तको टाउकोमाथि रामनामी कपडालेढाकिन्छ । श्रीकृष्ण भानुभक्तलाई मन्त्र सुवाउन थाल्दछन्‌ ।वृद्ध मानिसहरू पिढीमा बसेर वात मारिरहेका छन्‌ ।भानुभक्त दुबै हातले आफूवा दुई कान समातेर श्रीकृष्णकोखुट्टामा ढोगिदिन्छुन्‌ । श्रीकृष्ण वातिलाई आशीर्वाद दिन्छन्‌-आयुष्मान्‌ भव; सौम्य ।भावृभक्त कोलीतृम्बा लिएर मलघरको ढोकाअगाडि जान्छन्‌ ।मामा जयलाल सोली बोकेर भानिजको पछिपछि लाग्दछन ।आमा र बज्यैको अगाडि पुगेर भानुभक्त भिक्षा माग्दछन्‌ ।भवती भिक्षान देही, भवती भिक्षान्‌ देही ।आमा र बज्यैले भानुभक्तको कोलीमा भिक्षा हालिदिन्छन्‌ ।लाम लागेर भिक्षावान गर्ने उभिएका महिलाहरू सामु भानुभक्तपालैपालो भिक्षा माग्दै हिड्छन्‌ ।भवती भिक्षान देहीमामा जयलाल सोलीमा भिक्षा जम्मा गर्दै पछिपछिहिँड्छन्‌ । पञ्चैबाजाको आवाज र भवती भिक्षान्‌ देहीकोआवाज मधुरो हदै जान्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्थातसमयपात्र&lt;br /&gt;
श्रीकृष्णभानुभक्तश्रीकृष्ण&lt;br /&gt;
भानभत्त&lt;br /&gt;
00&lt;br /&gt;
१७८&lt;br /&gt;
रम्घा, शिखरकटेरीको आँगन&lt;br /&gt;
: बिहान&lt;br /&gt;
श्वीकृष्ण र भानुभक्त&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण र भानुभक्त तुलसीमठवजिक आँगनमा बसेका छुन्‌ ।भानुभक्तको अगाडि श्क्लयजूर्बेदको किताब पल्टाइएकोछ । श्रीकृष्ण भानुभक्तलाई रुद्दी पढाउने तयारीमा छन्‌ ।वेदको कितावबाट दृश्य प्रारम्भ हन्छ ।&lt;br /&gt;
यसमा आठ अध्याय छन्‌ ।&lt;br /&gt;
जिबा, यो रुद्री ध्वनिसँग पनि सम्बन्धित छ ?&lt;br /&gt;
तैंले ठीक भनिस्‌। उदात्त, अनुवात्त, स्बरित; तीन किसिमकाध्वनि प्रकारहरू छन्‌ ।&lt;br /&gt;
: भानुभक्त &#039;बुरेँ भन्ने अर्थमा टाउको हल्लाउँघन्‌ ।&lt;br /&gt;
ध्वतिको मात्र होइन, शब्दको उच्चारण गर्दा हस्व, दीर्घअनि शुध्दाशुध्दिको पनि ख्याल गर्नुपर्दछ ।&lt;br /&gt;
जिवा, यो हद्वी कसरी पढ्न्या र अर्थ पनि क्या हो ? दुवैक्रा सिकाइदिनुहोस्‌ ।&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण ० अब म जसो जसो गर्छु, तँ पनि त्यसै त्यसै गर्‌ ।दाहिने हातको कहिनो देव्च हातको हत्केलामा टेकाउछन्‌,भानुभक्त पनि बाजेकै अनुसरण गर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
७ हरि: उँ ॥&lt;br /&gt;
भानुभक्त ० हरि: 5०॥&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण ० गणानान्त्वा&lt;br /&gt;
भानुभक्त » गणातान्त्वा&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण ० गणपति ट्ट&lt;br /&gt;
भातभत्त » गणपति ट्ट&lt;br /&gt;
श्रीकृष्णा &amp;quot; हबामहे&lt;br /&gt;
भानुभक्त » हवामहे&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण » प्रियणन्त्बा&lt;br /&gt;
भानुभक्त » प्रियणन्त्वा&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण &amp;quot; प्रियपति टर&lt;br /&gt;
भानुभक्त »« प्रियपति ट्ट&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण ० हवामहे&lt;br /&gt;
भानुभक्त ० हवामहेश्रीकृष्णले रुद्री पाठ गर्दै जादा हातलाई उठाउने, थचार्ने दायाबाँया हल्लाउने र स्थिर रा्ने गर्दछन्‌ । भान्‌भत्त पनि बाजेकैअनुसरण गरेर पाठ दोहो-आउँछन्‌ । पाठको कम चलिरहन्छ ।आवाज क्रमश: मध्रो र टाढा टाढा हँदै जान्छ ।&lt;br /&gt;
दुश्य समाप्त&#039;शुक्लयजुबेदबाट&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
त ॥.]&lt;br /&gt;
स्थान : रम्घा, शिखरकटेरीको पूजाचौकी&lt;br /&gt;
समय : बिहान&lt;br /&gt;
पात्र ; भानुभक्त र घर्मावतीभानुभक्त पूजाचौकीमा बसेर पाञ्चायन देवताको पुजा गरिरहेका छन्‌ । धर्मावती भान्छामा भात पकाइरहेकी छिन्‌ ।त्रिखुट्टीमा राखिएको जलाहारीबाट अराध्यदेब शिबमा खसिरहेको जलघधाराबाट दृश्य उघरंदै जान्छ । मन्त्र पाठ गरिरहेकाभानुभक्त र भात पकाइरहेकी धर्माबती दृश्यमा समेटिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त &amp;quot;» ३० नमः शम्भवायच मयो भवायचनम: शङ्डरायच मयस्करायचनमः शिवाय च शिवतरापच ॥धर्माबती मन्त्रपाठको अन्त्यमा छोरालाई हेरेर आत्मसन्तृष्टिमामुस्कराउँदिछन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
&#039;शुक्लपजवेदबा&lt;br /&gt;
कप&lt;br /&gt;
0001 आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
विसस्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण&lt;br /&gt;
इन्द्रविलास »&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
: 1१5०&lt;br /&gt;
: चेँदी बेसी, पुरानो डिहीको घर-आँगन&lt;br /&gt;
: बिहान&lt;br /&gt;
: श्रीकृष्ण, भानुभक्त, पडानाभ, गड्गादत्त र इन्द्रविलास&lt;br /&gt;
आँगनको मध्यभागमा श्रीकृष्ण र भानुभक्त बसेका छन्‌ ।गड्टादत्त पर्खालमा छन्‌ । इन्द्रविलास पिढीमा बसेर जनैकोधागो मिलाउने र जनै वनाउने काम गरिरहेका छन्‌ । छेउमैउभिएर पड्ानाम कतुवामा जर्नैको धागो बाददैछन्‌ ।घुमिरहेको कतुवाबाट दृश्य खुल्दै जान्छ र सम्पूर्ण पात्र, घरर आँगन देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्तलाई - सँस्कृतका सबभन्दा दुला कबि कालिदासहुन्‌ । तिनले रचना गन्याका महाकाव्यहरूमध्ये रघुवंश साह्रैउत्तम ग्रन्य छ । तैंले अब यो पढ्नु पर्छ।&lt;br /&gt;
रघुवश महाकाव्यतर्फ डङ्रित्‌ गर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
रघुबंश जस्तो कृतिको अध्ययनले भानुलाई कविताकोरचनामा पति मद्दत पुर्‌याउन्याछ ।&lt;br /&gt;
९&lt;br /&gt;
श्रीकृष्णगड्गादत्त&lt;br /&gt;
न्हो।» रघुवंशको त्यो श्लोक मलाई सबभन्दा राम्रो लाग्छ, क्यारे ...श्रीकृष्ण कुन हो भन्ने भावमा इसारा गर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
जवाफमा सस्बर गाँउछन्‌-&lt;br /&gt;
सञ्चारिणी दीप शिखेव रात्रौ यं यं व्यतीयाय पतिवरा सा ।नरेन्द्रमार्गाट्ठ इब प्रपेदै बिवर्णाभाबं स स भूमिपालः ॥&amp;quot;&lt;br /&gt;
इुन्द्रविलास ०&amp;quot; शब्दार्थका हिसावले मलाई त तेट्रौ सर्गको प्रथम श्लोक&lt;br /&gt;
असाध्यै मन पर्छ- &#039;अथात्मन: शब्दगुणं गुणज्ञ:...&amp;quot;एकचित्त भएर सुनिरहेका भानुभक्त किताबतर्फ हेर्छन्‌ ।रघवंश महाकाव्यम्‌ मा राएर म्यासरा स्थिर हुन्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“रघुवंशमहाकाव्पबाट,&lt;br /&gt;
प्र्ष&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
दृश्य २५&lt;br /&gt;
वि.सं. 2 पैदय०&lt;br /&gt;
स्यान : रम्घा, शिखरकटेरीको सुत्नै कोठासमय : राति&lt;br /&gt;
पात्र : भानुभक्त&lt;br /&gt;
कोठामा बलिरहेको ठडयौरोबाट दृश्य खुल्दै जान्छ । पृठभागसामधुसमाथि किताबका पोकाहरू देखिन्छन्‌ । अग्रभागमा काठकोखटियामाथि रघुवंश महाकाव्यम्‌ लेखिएको किताब राखेरभानुभक्त सस्वर पढिरहेका छन्‌-&lt;br /&gt;
भानुभक्त : अथ प्रजानामधिप: प्रभातेजायाप्रतिग्राहितगन्धमाल्याम्‌ ।वनाय पीतप्रतिबद्धवत्सांयशोधनो धेनुमुषेर्मुमोच ॥&#039;&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“रघुवंश महाकाव्यवाट&lt;br /&gt;
पटकया ५१&lt;br /&gt;
वि.सं.स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
इन्द्रविलास &amp;quot;&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
शर&lt;br /&gt;
: पृदद२&lt;br /&gt;
: कान्तिपुर, महाबौद्धको घरको कोठा: राति&lt;br /&gt;
: घनञ्जय र्‌ इन्द्रविलास&lt;br /&gt;
कर्नेल उजिरसिहलाई जलाश्रय लगेका बखत दान गरी बकसकारुपमा प्राप्त भएको कान्तिप्र । महाबौद्धको घरको कोठामाधनज्जय खाटमा र इन्द्रविलात खाटमुनिको लम्पटमा बसेरडिवियाको उज्यालोमा बकसपत्रको कागज वाँच्दैछन्‌ । धनञ्जयसुनिरहेका छन्‌ । इन्त्रविलासबाट दृश्य खुल्छ ।स्वस्तिध्रीगिरिराजचक्रचडामणिनरनारायणोत्यादिविविधविरुदावली वि राजमानमानो न्नतश्री मन्महाराजधिराजश्रीश्वीश्वीमहाराजराजेन्द्वविक्रमसाह बहादुरसम्शेरजड्देवानांसदासमरविजयीनाम्‌ ............&lt;br /&gt;
धनञ्जय सुविरहेका छन्‌-&lt;br /&gt;
आगे तनहुँ वस्न्या षर्दार धनंजय उपाध्या अचार्जके कर्णेलउजीरसिंह थापालाई विरामी भरै श्रीपसुपतिमा लैजादा संकल्पगरि दान गर्नकन वक्स्याको घर १. अघि श्रीवडा&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
जिज्यवाज्याज्य्‌ नेपाल प्रबेश हुदा महाबौद्ध ढोका छेउकाजैमुग सिं ज्यापहरूका घरपाताल हरि लछिमन्‌ षवासहरूलाईवास दि राख्याको माहाबौद ढोका छेउका घरपाताल तस्कोसाध जैमुगसिं ज्यापुका घर र धालापात पौको वारिपातालदेषि पश्चिम: कपृतान प्रसादसिंह वस्न्यातले चर्च्याकोबारिका पर्षालदेषि उत्तरः थाकसिं ज्यापुको घर र वारिपातालदेषि पूर्व: वाटोका जिमी र जैमुगसिं ज्यापृका पौकोदेषिदछिन येति साधभित्र घर षा २ हात १८ अंगुल २२ पातालघा ११ हात २० अंगुल १२ लछिमन्‌ षवासहरूको वास हानिविर्ता गरिवक्स्यौं. पेस्‌ घरको छैडिमा श्री लुचुभुलुका षतराषन दिन्‌पर्छ यो विर्ता साध लाउंदा सधियार जयदेउ पंठ.मोदनाथ अर्ज्याल गोकुल षनाल, दलसुर बोहोरा डिठाकालीदास कर्मिनायक बिंनरसिं गौपाल भानारान नहृपतिजन्‌धंतसिं संतान दर संतान प्रज्यन्त बिर्ता जानी भौग्य गरईँति सम्वत्‌ १८८२ साल मिति चैत्र सृदि ३ रोज २ शुभम्‌ ।इन्द्रविलास कागज पल्टाउँदै फेरि पढ्छन्‌-&lt;br /&gt;
» मार्फत्‌- भक्तवीर यापामार्फत्‌- कालीदासमार्फत्‌- दलभञ्जन पांडेमार्फत्‌- प्राण साहमार्फत्‌- भीमसेन यापामार्फत्‌- प्रसादसिंह वस्न्यात&lt;br /&gt;
मार्फत्‌- उदय गिरि&lt;br /&gt;
मार्फत्‌- रणोच्चात शाह&lt;br /&gt;
धत्तञ्जय एकाग भएर सृतिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
कर्णौल उजीरसिं थापालाई दाजुले साह्रै रिसाउनु भयाकोरहयाछ । मर्ने बेलामा घरै दात दिया । मानिस ठुलै चित्तभयाका रहयाछन्‌ ।&lt;br /&gt;
&amp;quot;लालमोहरको सक्कल प्रतिबाट&lt;br /&gt;
पटकया १३&lt;br /&gt;
घनञ्जय »इन्द्रविलास »घनञ्जय ०»&lt;br /&gt;
इन्द्रविलास »&lt;br /&gt;
घनञ्जप »&lt;br /&gt;
बहुतै असल मानिस हुनुहुन्थ्यो । काबिल पनि त्यतिकै ।उमेर त अलि कच्चै हो ।&lt;br /&gt;
उमेर कच्चा भएर क्या गर्नु ? बृद्धि त पक्का थियो नि ।उन्नाईंस वर्षका उमेरमा त पाल्पा गौंडाका हाकिमभइसक्याका थिया । उनन्तीस वर्षको उमेरमा त बितिहाल्न्‌भयो नि।&lt;br /&gt;
मुल्‌कको पनि सधै भलो चिताउन्या गर्नु हुन्थ्यो रे, भन्त्यासुन्याका थियौ हामीले । कसो हो दाजु ?&lt;br /&gt;
ठीकै सुन्याको रहयाछस्‌ कान्छा- तैँले । “नेपाल भन्याकोबडा महाराजा प॒थ्वीतारायण शाहले ठूला दुखले अर्ज्याको“चार बर्णा छत्तीस जातको फूलबारी&#039; हो । यसलाई हामीसबै मिलेर रक्षा गर्नु पर्छ । फिरङ्गडीलाई मृलुकमा पस्नदिनुहुँदैन” भन्या गर्नु हुन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
: इन्द्रविलास सुनिरहन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
इन्द्रविलास »घनञजय ०»&lt;br /&gt;
प्र&lt;br /&gt;
क्या गर्नु ? अब त्यस्तो हाकिम कहाँ पाउनु ?&lt;br /&gt;
पाल्पा गौंडामा को गया त हाकिम भएर ?&lt;br /&gt;
बखतसिं थापा गयाका छन्‌ । मलाई पनि हाजिर हुन आउन्‌भनेर खबर भयाको छ। म भोलि नै पाल्पातर्फ जान्छु। योघरको सप्पै बन्दोबस्त मिलाएर मात्रै तँ रम्घा गएस्‌ हैकान्छा ।&lt;br /&gt;
क्यामरा धनञ्जयको नजिक-नजिक हुँदैजान्छ र सम्वाद समाप्तहँदा अनुहारमा स्थिर हन्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
स्थान&lt;br /&gt;
पात्र&lt;br /&gt;
इन्द्रविलास&lt;br /&gt;
गड्रादत्त&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
पद८२&lt;br /&gt;
चुँदी बेसी, पुरानो डिहीको घर-आँगन&lt;br /&gt;
दिउसो&lt;br /&gt;
श्षीकष्ण, भानुभक्त, गड्डादत्त र इन्द्रबिलास&lt;br /&gt;
आगनमा वसेर इन्द्रचिलास र गड्रादत्त मक खोसल्दै छन्‌ ।पिडीमा श्रीक्णण तमाख तान्दै छन र भानुभक्त जिबासंगैबसका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
मकै खोसल्दै - भानुलाई बाले घेरै बिद्या पढाइसक्नु भयो ।अब्र ज्योतिष विद्या पनि पढाउनुपर्त्या ।&lt;br /&gt;
इन्द्र भाइले मनासिब भन्या । ज्योतिष त जान्नै पर्छ, कसोब्वा?&lt;br /&gt;
तमाख्‌ तान्न छाडी - तिमीले ठीक भन्यौ । अब भानुकोज्योतिष पढ्न्या बेला आयो ।&lt;br /&gt;
भानुतिर हेर्दै - बैदको अन्तिम अङ्ग ज्योतिष हो । ज्योतिषशास्त्र भन्याको आँखा हो । यो नजानी विद्या पूर्णा हुँदैन ।अब्र तैंले ज्योतिष पढ्न्‌पर्छ ।&lt;br /&gt;
00०&lt;br /&gt;
भानुभक्तगङ्गादत्त&lt;br /&gt;
इन्द्रविलास&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
५६&lt;br /&gt;
जिब्राले जसो भन्नुहुन्छ । कहिलेदेखि आरम्भ गर्न्या ?ज्योतिष पढ्न त कास्कीको गुरुकुलमै पठाउनु बेस होइन र्‌बा ? काशी कि कास्की भन्न्या चलन छ।&lt;br /&gt;
कास्कीको त पाडाले पनि ज्योतिष विद्या जान्या हुन्छ भन्त्यात उखानै छ नि दाइ ।&lt;br /&gt;
गङ्कादत्त र इन्द्रविलास दुवैजना हाँस्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
काशीपछि ज्योतिष बिद्याका लागि कास्की नै हो।&lt;br /&gt;
भानु सुतिरहन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुपड्टि फर्कदै - कास्कीको गुरुकुलमा गएर ज्योतिष बिद्याराम्ररी सिक्‌ । यहाँ आउँदा मृहर्तचिन्तामणि राम्ररीखारेर आइज ।&lt;br /&gt;
हस्‌ जिबा ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
विसं : पृद्दउ&lt;br /&gt;
स्यान : कास्की, गुरुकुलसमय : दिउसोपात्र : आचार्य, भानुभक्त र विद्यार्थीहरू&lt;br /&gt;
गुरुकुलको परिसरमा १४-२० जना विद्यार्थीहरू वृत्ताकारसाबस्चेका छन्‌ । मध्य भागमा भानुभक्त छन्‌ । मृहर्तीचिन्तामणिकोकिताब हातमा लिएर गुरु पढाइरहेका छन्‌ र विद्यार्थीहरूध्यानमग्न भएर सुनिरहेका छन्‌ । पृष्ठभागमा एउटी गाईचरिरहेकी छिन्‌ । गुरुको द्वातमा रहेको मृहर्तचिन्तामणिकोकिताबबाट दृश्य खुल्दै जान्छ ।&lt;br /&gt;
आचार्य »&amp;quot; न पूर्वदेशि शकभे न विधु सौरि वारे तथा ।न चाज पदभे गुरौ यमदिशीनदैत्येज्ययो ॥भानुभक्तसहित अरु विद्यार्थीहरू सुनिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
० न पाशिदिशि धात्‌भै कजवुधेर्यमर्क्े तथा,&lt;br /&gt;
न सौम्य ककुभिव्रजेत्‌ स्वजयजीवितार्थी बुध; ॥&lt;br /&gt;
“महर्तचिन्तामणिबाट&lt;br /&gt;
पटकथा ७&lt;br /&gt;
श्ष्द&lt;br /&gt;
सस्कृत श्लोकको अर्थ लगाउदै - जेष्ठा नक्षत्र, सोमबार रशनिबार पूर्व दिशा जानू हुँदैन ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त ध्यानमग्त भएर सुन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
पूर्वाभाद्र नक्षत्र र बिहिबारमा दक्षिण दिशा जान्‌ हुँदैन ।रोहिणी नक्षत्रमा र आइतबार र शुक्रबार पश्चिम दिशाजानु हुँदैन ।&lt;br /&gt;
विद्यार्थीहरू सृनिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
उत्तरफाल्गुनी नक्षत्रमा, मङ्लबार र बुधबार उत्तर दिशामाजानु हुँदैन । बार शूल र नक्षत्र शूल पर्दछ ।&lt;br /&gt;
गुरुको आवाज मधुरो हुँदैजान्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
आविकबि भानुभत्त&lt;br /&gt;
दृश्य २९,&lt;br /&gt;
बि.सं. ; पेददइ&lt;br /&gt;
स्थान : चुँदी, बाटोको चौतारीसमय ; दिउसौ&lt;br /&gt;
पात्र : भानुभक्त, चिवे र महिला&lt;br /&gt;
उकालो बाटोमा हातमा ठेकी रुण्ड्याएर डोको बोकेकीमहिला उक्लंदै गरेकी छिन्‌ ।बरपीपलको चौतारीमा बसेर भानुभक्त र चिने बाँसको सुत्लोलेहम्कदै माथि आउंदै गरेकी महिलालाई हेरिरहेका छुन्‌ । भानुभक्तपहेलो पोकोबाट चिना रिक्घन्‌ र फुकाएर हेर्न थाल्छन्‌ ।महिला चौतारीमा आइपुग्छिन्‌ र डोको बिसाउँछिन्‌ ।भानुभक्त ० कताबाट आइपुग्नु भयो, काकी ?महिला &amp;quot; बेसीबाट आयाकी, गाउँ पुग्न अझै २,३ घडी लाग्छ ।चिबे ० किन नलाग्नु त । उकालैउकालो छ । अब हामी ओरालोञ्न्यालाई त चुँदी बेसी पुग्न अरु एक घडी लाग्छ ।महिला » भानुको हातको चिनातर्फ हेदैं - भानुभक्त नानी त यस्तै चिना&lt;br /&gt;
पटकथा ५९,&lt;br /&gt;
बनयाउन्या विद्या सिक्न कास्की गयाको भन्न्या सुन्याथेँ ।कहिले आयौ त ?&lt;br /&gt;
भानुभक्त » आउँदैछु काकी ।&lt;br /&gt;
महिला ० कसको चिना हेर्न लाग्यौ त बाटोमा ?भानुभक्त » आफ्नै चिना हेन्याको ।&lt;br /&gt;
महिला »” ल, मतगएँ।&lt;br /&gt;
: डोको बोकेर ठेकी मुण्ड्याउँदै उकालो लारिछन्‌ ।&lt;br /&gt;
- भानुभक्त पहेंलो पोकोबाट कलम र मती रिक्छन्‌ र बाँसकोसुप्लोमा लेख्न थाल्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
चिबे ० तेरौ फेरि सिलोक ब्याउन लाग्यो हैन ? ठाउँ न ठहरबुढीको रहर, लौ म त हिडेँ।&lt;br /&gt;
: चिबे ओरालो लाग्छ ।भानुभक्त आफ्नो चिना हेर्दै सुप्लोमा लेखिरहन्घन्‌ । चिने तलपुगेर फर्की भानुभक्तलाई हेर्छ । भानु पनि चिबेलाई हेर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
० ए भानु, आइज भन्या ।&lt;br /&gt;
: भानभक्त लेखिसिध्याउँछन्‌ । कलम, मसिदानी र चिना पहेलोपोकोभित्र हाल्छन्‌ । सुप्लो हातमै लिन्छन्‌ र पोको झुण्ड्याएरपरिदृश्यबट बाहिरिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त६० आदिकवि भातुभत्त&lt;br /&gt;
दृश्य ३०&lt;br /&gt;
; पैपप३: चैँदी बेसी -पुरानोडिही, श्रीकृष्णको सुत्ने कोठा; श्रीकृष्ण र भानुभक्त&lt;br /&gt;
- श्रीकृष्ण खाटमा र भानुभक्त खाटमुनि राडीमा बसेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
भानुभक्त बाँसको सुप्लोमा लेखेको आफ्नै चिनाको कविताबाजेलाई सुनाइरहेका छन्‌ । श्रीकृष्णबाट दृश्य खुल्दै जान्ध ।&lt;br /&gt;
: कविता पढ्दै -&lt;br /&gt;
ति शालीवाहन्‌का समय षडकत्रिशत्‌ भइकन ।&lt;br /&gt;
अनी आषाढ मास्‌को दिन पनि उनन्तीस्‌ गइकन ।&lt;br /&gt;
घडी एकतीस्‌माहाँ विघटी पनि बत्तिस्‌ परिकन ।&lt;br /&gt;
नवांशक्‌ कण्ठीरव्‌ घनुष परि जो बेस लगन ॥१॥&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण उत्सुकता, प्रशंपा र आश्चर्यमिश्रित भावसहित मर्नभएर कविता सृतिरहन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त कविता वाचनको कमलाई अगाडि बढाउँछन्‌ -मियुन्‌मा सूयैं छन्‌ गुरुलिलय मीन्‌का विधु अनी ।&lt;br /&gt;
महीसुत्‌ बुध्‌ राह शशिसदनका यी तिन पनी ॥&lt;br /&gt;
पटकया&lt;br /&gt;
६१&lt;br /&gt;
गुरु भाग्यस्थान्‌का रबिभवनमा गैकन बस्या ।भग्‌्जी ता आफ्नै सदन वृषमा गैकन पस्या ॥२॥&lt;br /&gt;
मकर्‌मा सौरी छन्‌ ध्वजसहितका स्वगृहि यहाँ ।&lt;br /&gt;
बतायाका कम्‌ले ग्रहहरू बस्या कण्डलिमहाँ ॥&lt;br /&gt;
टोलाउदै - खै, त्यो लै त।&lt;br /&gt;
भानुभक्त लेखोट दिन्छन्‌ । श्रीकृष्ण कविता हेर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
भाव विभोर हुदै - यस्तो गाह्रो विषयमा पनि कति राम्रो रसरल कविता लेखिछस्‌ ।&lt;br /&gt;
श्रीकृष्णको स्वर हर्पले अवरुद्ध हुन खोज्छ । स्वर काँप्दै जान्छ ।तेरो .. तेरो लक्षण साह्रै राम्रो छ । आफ्नो भाषा रसाहित्यको सेवा गर्न नछोड्यास्‌ । एक दिन तैंले आचार्यकुलको नाम राख्न्या छस्‌ ।&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण हर्पका आस बगाउँछन्‌ । भानुभक्त आफ्नो शिरबाजेको पाउमा राखिदिन्छन्‌ । नातिको टाउको युमधुस्याउदैहर्पविभोर भएर श्रीकृष्ण रुन्छन्‌ । क्यामरा नजिकिदै भानुभक्तकोशिरमा गएर स्थिर हुन्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“आनुभक्तको फुटकर कविता&lt;br /&gt;
ध्र&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
; पैद्पई&lt;br /&gt;
: रम्घाको बाटो: भानुभक्त, चिबे, दमाईहरू, डोलेहरू र जन्तीहरू&lt;br /&gt;
पञ्चैबाजा बजाउदै डोली बोकेर जन्तीको लर्के ताँती पहाडकोबाटो ओर्लदै छ । तलतिरबाट भानुभक्त र चिबे जन्तीओर्लेको हेरिरहेका छन्‌ । पञ्चैबाजा बजाउँदै दमैहरू, कल्स्यौली,मड्यौली, बेहुलीलाई डोलीमा बोकेका डोलेहरू र खंड्कला,गागी र दाइजोका अन्य सामान बोकेका जन्तीहरूतथा बेहुलो र उत्तका ताथीहरू भानुभक्त र चिबेकोनजिकैबाट ओरालो लाग्छन्‌ । जन्तीलाई लक्ष गरेर भानुभक्तभाका फिराउँछन्‌ -&lt;br /&gt;
भात्‌ खाने तसला तिहुन्‌ त मसला खुर्सानी खान्‌ जिरे ।&lt;br /&gt;
हे राम्‌ राम्‌ शिवका ति जन्ति हिजोका ब्यौली लिएरै फिरे॥जन्ती तल फेदीमा पुगिसकेका हुन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&amp;quot;लोक पद्य&lt;br /&gt;
पटकया&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
% आनुभक्तलाई जिस्क्याउंदै - भानु, तिम्रो पनि त मानुड जन्तीजान्या, अनि यसरी गीत गाउन्या-भात खाने तसला तिहुन्‌ त मसला खुर्सानी खान्‌ जिरे ।हे राम्‌ राम्‌ शिवका ति जन्ति भातृका ब्यौली लिएरै फिरे ॥: भानुभक्त हाँस्दै चिबेलाई पिदन खोज्दछन्‌ । चिबे भाग्दछ,भनु लखेददै परिदृश्यवाट बाहिरिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
चिबे&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
दई आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
वि.सं पदा&lt;br /&gt;
स्थात : मानुङ, चौतारी&lt;br /&gt;
समय : बिउसौ&lt;br /&gt;
पात्र भानुभक्त, गाउँलेहरू र केटाकेटीमानुङको डाँडो आखाको नजिक सर्दै-सर्दै आउँछ । पृष्ठभूमिमापञ्चैनाजा बजिरहेको हुन्छ । टाढाबाट चहेचहैको आवाजआइरहेको हुन्छ ।बरपीपलको चौतारी तामु केटाहरू रोटेपिङमा मचिचिदै आनन्दमानेर कराइरहन्छन्‌ - चहै चहैँ .....दुइजना तन्नेरीहरू रोटेपिङ मच्चाइरहेका छन्‌ ।तलतिर केटाकेटीहरू रमाइलो मानेर रोटेपिङ्ग मच्चिएकोहेरिरहेका छन्‌ ।बरपीपलको चौतारीमा भानुभक्त र तीतजना गाउँले बसेरगफ गरिरहेका छन्‌ । दुईजना गाउँले डुलो-चकमकबाट आगोनिकालेर कक्कड सल्काउँदै क्राकानी सुतिरहेका छन्‌ ।पृष्ठभूमिमा रोटेपिङ मच्चिरहेको छ । गाउँलेहरूबाट दृश्य&lt;br /&gt;
पटकथा ध्श्‌&lt;br /&gt;
गाउँले १ »&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
गाउँले २&lt;br /&gt;
खुल्दैजान्छ र समग चौतारी उदाड्रिन्छ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्तसित - अब, मानुडकी छोरी बिहे गन्यापछि, मानुड्‌गाउँकै ज्वाइँ भरयापछि चाइनजो, हाम्रो पनि ज्वाईं, कसोज्वाईं नारन्‌ ?&lt;br /&gt;
ठीक भन्नुभो ।&lt;br /&gt;
: सबैजना हाँस्छन्‌&lt;br /&gt;
गाउँले १ &amp;quot;भातुभत्त ०»गाउँले ३&lt;br /&gt;
भानुभक्त «&lt;br /&gt;
गाउँले १०&lt;br /&gt;
भानुभक्त »गाउँले ३&lt;br /&gt;
भानुभक्त ”&lt;br /&gt;
0 &amp;quot;०&lt;br /&gt;
ज्वाइँ नारन्‌लाई चाइनजो, मानुड्‌ गाउँ कस्तो लाग्यो त ?साह्रै राम्रो लाग्यो मलाई त, रम्घाभ्न्दा पनि राम्रो ।ससुराली भयापछि राग्नो त लाग्न्या भो नि कसो ज्वाईं नारन्‌ ?सबैजना हाँस्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
ससुराली भएर मात्रै राम्रो लाग्याको होइन, हेर्नोस्‌ न,उत्तरमा हिमालय खुल्छ, बाराही र माहेन्द्रीको मन्दिर छ।सफा, स्वच्छ, हराभरा, सारै राम्रो गाउँ छ - मानुङ ।ज्वाई नारन्‌ त कविता कथ्न, सिलोक हाल्तमा पनि चाइनजो,खुबै सिपालु हुनुहुन्छ भन्न्या सुनिन्छ, हाम्रो मानुङ गाउँकोपनि चाइन्‌जो, एउटा सिलोक बनाइदिन्‌पन्यो ।&lt;br /&gt;
हिजो बेलुकी हावा खान जाँदा यसो घुम्दाघुम्दै लेख्याको छु ।सुनैँ न त हामी पनि ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त पटुकामा घुततारेको कागज फिकेर सस्बर पढ्दछन्‌ ।सवैजवा रमाइलो मातेर सृन्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
मानुङको सरि गाउँ उत्तम दुलो तागैन काहीँ पनी ।बस्तामा छ रमाइलो अति चिसो आउँछ हावा पती ॥घर्‌मा नै बसि फेर्‌ हिमालयजिको बाराहिजीको पनी ।बाराहीको मूर्ति देखापर्छ ।&lt;br /&gt;
शुक्ला दक्षिणतर्फ उत्तर दिशा माहेन्द्रि दर्शन्‌ पनी ॥&amp;quot;&lt;br /&gt;
: कबिताको अन्त्यमा मादी र सेतीको सङ्भमलाई पछ्याउँदै&lt;br /&gt;
क्यामरा अगाडि घुम्छ । नदीको कलकल ध्वनि बढ्दैजान्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“भानुभक्तको फुटकरकबिता&lt;br /&gt;
६६&lt;br /&gt;
आदिकवि भातृम्षत्त&lt;br /&gt;
घेंसिनीहरू »&lt;br /&gt;
दद&lt;br /&gt;
गाउँको बाटो&lt;br /&gt;
: दिउसो&lt;br /&gt;
भानुभक्त, चिबे र घँसिनीहरू&lt;br /&gt;
बारीको पाखामा दुईजना घतिनी घांस काद्दैछन्‌ । दृबैजनाबाटोतिर हेर्दघन्‌ । भानुभक्त र चिबे बाटैबाटो जाँदैछन्‌ । दूवैघौसिनी आखाले आपसमा इसारा गर्छुन्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त र चिबे अलि वर आइपृरछन्‌ ।&lt;br /&gt;
दुबै घसिनी भानुभक्त र चिबेलाई लक्ष गरेर अचारे भाकाफिराउँछन्‌ -&lt;br /&gt;
काठँ भन्छु जति फैलिदिन्छ उति यो बेसीको राम्रो घाँस,भानुभक्त र चिबे हिँड्दाहिँड्दै रोकिन्छन्‌ र घँसिनीहरूलाईहेर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
मासँ भन्छु जति फैलिदिन्छ उति यो बैँसको चाम्रो आस ॥&#039;&lt;br /&gt;
“चालकृष्ण समको भक्त भानभक्तबाट साभार&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
चछ&lt;br /&gt;
चिबे&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
चिब्रे&lt;br /&gt;
० ए भानु, सिलोकमै जवाफ दे त, हेरेँ कत्तिको सक्दो&lt;br /&gt;
रहयाछस्‌ ।&lt;br /&gt;
: भानुभक्त सोच्न थाल्दछन्‌ ।- दुवै घौँसिनी मुखामुख गरेर हास्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
भानुभक्त गालामा हात लगाएर भाका फिराउँछन्‌ -&lt;br /&gt;
हे नानी तिमी ता पहुँलीपातली दन्तैमा लाउने ब्रिरी ।&lt;br /&gt;
आफना जियको सम्भार गरन्‌ आवैन जोवन्‌ फिरी ॥&amp;quot;दुबै घौँसिती मस्केर हातको घाँसले भानुभक्तलाई हान्दछन्‌ ।लामो लेयो तानेर भाका फिराउँछ - आवैन जौवन्‌ फिरी ...चिबे र भानु दुवै अगाडि बढ्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“बालकृष्ण समको “भाक्त भानुभक्त&amp;quot;बाट साभार&lt;br /&gt;
दद&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
बि.सं.स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण&lt;br /&gt;
; वीदपश&lt;br /&gt;
: चुँदी बेसी, पुरानो डिहीको घर-आँगन&lt;br /&gt;
: बिहान&lt;br /&gt;
: श्रीकृष्ण, सत्यप्रिया, धनञ्जय, पद्यनाभ, काशीनाथ,तुलसीराम, गझ्झदत्त, इन्द्रविलास र भानुभक्त&lt;br /&gt;
: श्रीकृष्ण कल्पवासका लागि काशी जानुअघि चुँदी बेसीकोघर-आंगनमा आफ्ना ई भाइ छोराहरूलाई राखेर घरसल्लाहगर्दैछन्‌ । पिढीमा बसेकी मत्यप्रिया लुगा पट्याउँदै बाब्‌ रघोराहरू बीचको सम्वाद तुनिरहेकी छिन्‌ । श्रीकृष्णबाट दृश्यखुल्दैजान्छ र ६ भाइ छोराहरूसमेतलाई समेट्दै वृत्ताकारमाब्यासरा घुस्दैजान्छ । पृष्ठभागमा मकैको कुनियो देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
० भो भो, भान्‌ यहीं बसोस्‌ । मैले उसलाई काशी लैजानपढायाको होइन ।&lt;br /&gt;
इन्द्रविलास ०&amp;quot; तर बा, भात त जिबालाई छाड्दैछाड्दिन भन्थ्यो ।तुलसीराम ० भानुलाई उहाँ लगैर अरु पढाउनुभया कसो होला बा ?&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
० भानुलाई त्यसरी पढाउन्या मेरो विचार छैन । लगानी&lt;br /&gt;
६९&lt;br /&gt;
गड्डादत्त&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण&lt;br /&gt;
धनञ्जय&lt;br /&gt;
काशीनाथश्रीकृष्ण&lt;br /&gt;
काशीनाथघनञ्जय&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण&lt;br /&gt;
लगाएर ब्याज बढाउन्या किसिमको हैन, दान गरेर साउँउजिल्याउन्या खालको विद्या मैले उसलाई दिय्याको छु ।कहाँ, आजकल त क भाषा-श्लोकतिर पो लाग्याकोरत्याछ । कहिले क्या लेख्छ, कहिले क्या लेख्छ ।&lt;br /&gt;
लेख्न दे। भानुले मलाई पनि एकदुई श्लोक देखाउन त्यायाकोथियो, मलाई त राम्रो लाग्यो ।&lt;br /&gt;
छोराहरू प्रसन्न मुद्रामा चुनिरहन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
उसमा प्रतिभा छ । कसलाई याहा छ, उसबाट पनि देशकोकल्याण हुन्‌ छ कि । पछि घरघरमा उसको भक्ति भजनफैलिन के बेर्‌ । हाम्रो देशमा शिक्षाको प्रकाश ल्याउन्याप्रथम भानु नै हाम्रो भान्‌ भइदिन्छ कि । उसका एकदुईफुटकर श्लोकमा मलाई त पूर्बरङ्कको औठाछाप लागेजस्तोलाग्यो ।&lt;br /&gt;
आत्म सन्तुष्टिमा हाँस्दै - बालाई त्यस्तो लाग्यापछि हामीलेक्यान आश नगर्नु ?&lt;br /&gt;
भानुले हाम्रो कुलै उज्यालो गर्न बेर छैन ।&lt;br /&gt;
भानु उदायो भन्या हाम्रो घरमा मात्र घाम लाग्दैन, देशैकुलमल्ल हुन्याछ । त्यो किरणले देशलाई पनि नाघन्याछ ।&lt;br /&gt;
ईश्वरले यस्तै पारुन्‌ ।&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण मुस्क्राउँछन्‌&lt;br /&gt;
प्रसङ्ग बदल्दै - बाले अब हामीहरूमा कसकसलाई लैजान्‌हुन्छ त काशी ?&lt;br /&gt;
कल्पवासलाई काशी जान लाग्याको, बुढेस कालकी बढीलाईछाड्न्या करै भयान ।&lt;br /&gt;
सत्याप्रिया हास्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
काशीनाथलाई सम्बोधन गर्दै - माहिला घरै बस्‌, तेरो नामैकाशी, तँ जहाँ बस्छस्‌ काशी त्यहीं हुन्छ ।&lt;br /&gt;
पद्मनाभ, गड्रादत्त र इन्द्रविलाललाई औँलाले देखाउँदै-साहिँला,ठाहिँला र तँ तीनजनाले यहाँ बसेर घर-गोठ खेतीपाती हेर्न ।धरनञ्जयतर्फ हेर्दै- जेठा खर्दार भइइहालिस्‌, तँ गएर&lt;br /&gt;
आदिकवि भातुभत्त&lt;br /&gt;
घनञ्जयश्रीकृष्ण&lt;br /&gt;
तुलसीराम&lt;br /&gt;
श्रीकृष्णभानुभक्त&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण&lt;br /&gt;
राम्रोसँग सरकारकै काम गरेर बस्‌ ।&lt;br /&gt;
हस्‌ वबा।&lt;br /&gt;
ऐले तुलसीराम मसँग जान्या ।&lt;br /&gt;
हस्‌ ।&lt;br /&gt;
बाहिरबाट आउदै गरेका भानुभक्तको कानमा श्रीकृष्णकोबोली पर्दछ ।&lt;br /&gt;
भानुलाई पनि म काशी लान्न, क यहीं बसोस्‌ ।&lt;br /&gt;
जिबाको तजिकै बस्दै रुञ्चे स्वरमा- म त ज्यान गए पतिजिबालाई छोड्दिन, सँगसँगै काशी जान्छु ।&lt;br /&gt;
: धनञ्जय अब बाले के भन्नुहुन्छ ? भन्ने उत्सुकता लिएर&lt;br /&gt;
हेरिरहन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्तलाई सम्झाउँदै - मसँग गएर क्या गर्छस्‌ ? यहीराम्रोसँग पढ्‌, घरब्यबहार हेर्‌ ।&lt;br /&gt;
ढिपी गर्दै - नाइँ, म त जिबासँगै जान्छु ।&lt;br /&gt;
अगाडि सरेर खुट्टा मिच्दै जिबालाई फकाउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
काशीमा जिब्ाको सेवा गर्छु, खुट्टा मिच्छु, तमाखु हालिदिल्छअनि दिउसो दिउसौ पढ्छु ।&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण असमन्जसमा पर्छन्‌ र धनज्जयतर्फ हेर्छन्‌ ।धनञ्जय हाँस्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
मायाले द्रवीभृत भएर नातिको कममा हात राख्दै - लौ, तैँलेजितिस्‌ म हारेँ।&lt;br /&gt;
सत्यपिया पनि हाँस्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
धनञ्जयतर्फ हेर्दै - अब यो नाति पनि म संगसँगै काशीजान्या भो ।&lt;br /&gt;
आनुभक्त बाजेको छातीमा टांसिन्छन्‌ । ग्यामरा बाजे रनातिको नजिक हुँदै स्थिर हुन्छ&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
सम्बाद बालकृष्ण समको भक्त भानुभक्तबाट साभार ।&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
दृश्य ३&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण&lt;br /&gt;
७२&lt;br /&gt;
१८५काशी, श्रीकृष्णको कोठाबिहानश्रीकृष्ण, तुलसीराम, भानुभक्त र सत्यप्रियाकोठामा त्‌लसीराम र भानुभक्त श्रीकृष्णका कुरा ध्यानपूर्वकसुनिरहेका छन्‌ । श्रीकृष्ण खाटमा, तुलसीराम बेञ्चीमा रभानुभक्त भूइँमा ओछ्याएको दरीमा बतेका छन्‌ । भित्तामाकाठको तख्तामा केही धार्मिक किताबहरू रङ्ठीन कपडामापोको पारेर टाब्लिएका छन्‌ । भानभक्त युवा भइसकेका छन्‌ ।उनको जिउडाल र अनुहारमा पनि परिवर्तन आइसकेको छ ।श्रीकृष्णको अनुहारबाट क्यामरा फुम्दैजान्छ्न र वृत्ताकारपारेर घुम्दै तुलसीराम र भानुभक्तलाई परिद्श्यमा समेद्दछ ।० भानुलाई - तँ विद्याको खानीमा आइपुग्याको छस्‌ । काशीभन्याको पवित्र तीर्थस्थल मात्र होइन, विद्याको केन्द्रविन्दुपनि हो।भानुभक्त बुझेको अर्थमा टाउको हल्लाउँछन्‌ ।० दार्शनिक, कवि, अनि प्रकाण्ड विद्वानुहरूको जमघट हुन्या&lt;br /&gt;
आदिकबि भानुभक्त&lt;br /&gt;
तुलसीराम «&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण&lt;br /&gt;
सत्यप्रिया&lt;br /&gt;
पटकया&lt;br /&gt;
थलो हो- काशी । यहाँ तैले धेरै कूरा सिक्नसक्न्याछस्‌ ।भानुले दिउसो त पाठशाला जानैपत्यो । बुबाले भन्नुभयाजस्तो बिहान, बेलुकीको समय सत्सड्गमा लगाउनुपर्छ ।भानुभक्त सुनिरहन्छन्‌&lt;br /&gt;
(दुध-दही मखनको- आवाज बाहिरबाट आउँछ र टाढाटाढा हुँदै जान्छ। ।&lt;br /&gt;
तैंले ठीक भनिस्‌ तुलसी ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त बाजेपट्टि टाउको घुमाउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
बिद्वानुहरूले शास्त्रार्थ गर्न्या थलोमा, कवि सम्मेलनहरूमाफुर्सदको समय मिलाएर भानुले भाग लिन्या गर्नुपर्छ ।भाग लिन्या त मलाई पनि इच्छा छ जिबा, तर मेरोचिनाजानी छैन।&lt;br /&gt;
बिस्तारै चिनाजानी भइहाल्छ नि । क्यान चिन्ता गर्छस्‌ ।नेपालक्रा ठलाठला विद्वान्‌हरू पनि कल्पवास गर्न काशीमाबस्याका छन्‌ । म चिनाइदिउँला ।&lt;br /&gt;
सत्यप्रिया कोठामा प्रवेश गर्छिन्‌ र चारैतिर हेर्छिन्‌ । सबैकोध्यान सत्यप्रियातर्फ जान्छ ।&lt;br /&gt;
: छोरा, नाति भएर कोठा त अर्कै बनाइसक्याछौ । भान्छा&lt;br /&gt;
तयार भयो, भन्न आयाकी ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
0&lt;br /&gt;
धनञ्जयगाउँलेघनञ्ज्जयगाउँले&lt;br /&gt;
॥ 1) हु&lt;br /&gt;
३ पृदयद५्‌: रम्घा, चौतारी: घनञ्जय र गाउँलेहरू&lt;br /&gt;
रम्घाको बरपीपलको चौतारीमा बसेर दुइजना गाउँलेसँगधनञ्जय बात मारिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
बाहरू सञ्चो सुविस्ताका साथ पुग्नुभयाछ- काशी ।कसोगरी पाउन्‌ भयो त खबर ?&lt;br /&gt;
हिजो त्यो कान्छो हुलाकीले ल्यायाछ चिठी ।&lt;br /&gt;
ए, होला होला । कान्छा हुलाकीलाई मैले चुँदी बेसीमाभेटेको थियाँ । काँ जान्छस्‌ भनेर सोध्दा खर्दार बाजे कहाँचिठी पुन्याउन जानु छ भनेर भन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
धनञ्जय सहमतिमा टाउको हल्लाउछन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
आदिकवि भ्वानुशक्त&lt;br /&gt;
श्रीकृष्णशिब शर्मा&lt;br /&gt;
श्रीकृष्णभानुभक्त&lt;br /&gt;
शिव शर्माश्रीकृष्ण&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
१८८७&lt;br /&gt;
काशी, श्रीकृष्णको कोठा&lt;br /&gt;
दिउसो&lt;br /&gt;
शिब शर्मा, श्रीकृष्ण, भानुभक्त र सत्यप्रिया&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण किताव अगाडि राखेर भृईओछयानमा बपेका छन्‌ ।छेउमै वसेकी सत्यप्रिया तरकारी केलाउँदै छिन्‌ । सामुन्नेकोचकलामा शिव शर्मा र त्यस्को विपरीत दिशामा भानुभक्तबसेका छन्‌ । श्रीकृष्णको सम्वादबाट दृश्य आरम्भ हुन्छ ।शिव शर्मासँग - कताबाट आयौ ?&lt;br /&gt;
पाठशालाबाट फर्कदै थियाँ । यसो भेटघाट गरेर जाँभनेर ।&lt;br /&gt;
भानुभक्तपट्रि फर्कदै - शिब शर्मा बाबु पनि हाम्रो उतै चुँदीरम्घाकै हो । अहिले काशीमा अध्ययन गर्दैछन्‌ ।&lt;br /&gt;
सुखद आश्चर्यसहित -ए, रम्घाकै ?&lt;br /&gt;
चुँदी रम्घाबाट डेड कोष उत्तरमा पर्छ, वसन्तपुर युममा ।करा थप्दै न मकर्‌न्द पण्डितका छोरा,&lt;br /&gt;
भानुभक्तलाई देखाउँदै - यो चाहिँ मेरो नाति भानुभक्त ।&lt;br /&gt;
७&lt;br /&gt;
भानुभक्त र शिव शर्मा हाँसो साटासाट गर्छन्‌० बाबुको पढाइ कस्तो चलिराख्याको छ ?शिव शर्मा &amp;quot; राम्रै छ।श्रीकृष्ण ० बिततत्‌ मण्डलीहरूमा, साहित्यिक जमघटहरूमा बाबुले कत्तिकोजान्या गन्याको छ ?शिव शर्मा « बेलाबेलामा जान्या गत्याको छु ।श्रीकृष्णा ० यो भानुभक्तलाई पनि बाबुले त्यस्ता जमघटहरूमा लान्यागर्नुपन्यो ।शिव शर्मा » किन नहुनु भइहाल्छ नि ।भानुभक्त र शिव शर्मा एकअर्कालाई हेरेर मुस्कुराउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
समाप्त&lt;br /&gt;
७ आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
बि.सं.स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
पदद७&lt;br /&gt;
काशी, शास्त्रार्थ गर्ते थलो&lt;br /&gt;
दिउसो&lt;br /&gt;
भानुभक्त, शिव शर्मा, मलपण्डित, भवातीशङ्डरर, नेपालीतया भारतीय विद्वानुहरू र विद्यार्थीहरू&lt;br /&gt;
चारैतिर रातो रङ्गका अद्टालिकाहरूका बीच भागमा ठूलोचोक छ, जसमा केही अग्ला वृक्षहरू छन्‌ । चोकको मध्यभागमाविद्वान्‌हरू वस्नका लागि पहेलो कपडाले छोपेका चौकीकाआक्षनहरू दुई मागमा विभक्त गरेर राखिएका छन्‌ । बीचमारङ्डीन चटाइहरू ओछ्याइएका छन्‌ । चौकीहरूको अग्रभागमामूलपण्डितका लागि ठूलो सिंहासत जस्तो कुर्सी राखिएकोछ । आसनका छेउछेउका गमलामा सानासाना वृक्षहरूलेसजाइएको छ । जमघट स्थलको एक कुनामा ठूलो रुखकोछायामा भानुभक्त, शिवशर्मा, एकजना विद्वान्‌ र केहीविद्यार्थीहरू उभिएका छन्‌ । बिद्वान्‌जनबाट दृश्य खुल्दैजान्छर परिदृश्यमा अरु पात्रहरू पनि समेटिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
पण्डित-५ ” भानुभक्तलाई इड्िग गर्दै शिव शर्मासँग - अस्य परिचय क; ?&lt;br /&gt;
पटकया&lt;br /&gt;
॥ |&lt;br /&gt;
(यिनको परिचय के हो ?)शिव शर्मा » नेपालत: समायात एषः(उनी नेपालबाट आएका हुन्‌)पण्डित-५ २» अस्य पूर्ण परिचय दीयताम्‌ ।(यिनको पूर्ण परिचय दिनुहोस्‌)भानुभक्त र शिब शर्मा हेराहेर गर्दछन्‌ । पण्डित भानुभक्तलाईहेर्दछन्‌ ।भानुभक्त ” आफ्नो परिचय सस्बर कवितामै दिन्छन्‌ -&lt;br /&gt;
; पाहाड्को अतिबेश देश्‌ तनहुँमा श्रीकृष्ण व्राह्मण्‌ थिया ।खुप्‌ उच्चाकुल आर्यवंशि हुन गै सत्कर्ममा मन्‌ दिया ॥विद्यामा पनि जो घुरन्धर भई शिक्षा मलाई दिया ।उन्‌को नाति म भानुभक्त भनी हुँ यो जानि चीनी लिया ॥&#039;&lt;br /&gt;
पण्डित-५ ” हाँस्दै -नानीले कवितामै परिचय दियाको राम्रो लाग्यौ ।ज्ञमघट स्थलको पूर्वभागबाट मूलपण्डित र अर्का एकजवाबिद्वान्‌जन आउदै गरेका देखिन्छन्‌ । मूलपण्डित, विद्वान्‌हरू,शिव शमाँ, भानुभक्त एन विद्यार्थीहरू आ-आफ्नो स्थानमागएर वत्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
मृलपण्डित ० भ्वन्त: स्व-स्व स्थान उपबिसन्तु ।&lt;br /&gt;
(सबै महानुभाव आ-आफ्नो आततमा बह्नुहोस्‌ ।&lt;br /&gt;
सबै विद्वान्‌ आ-आफ्नो चौकीमा बस्छन्‌ । अग्रभागमा मूलपण्डित&lt;br /&gt;
बस्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
अतपर शास्त्रार्थः प्रारभ्यते । सबै सावधाना भवन्त्‌ ।&lt;br /&gt;
(अब शास्त्रार्थ प्रारम्भ हुन्छ । सबै सावधान हुनुहोस्‌ ) ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त, शिवशर्मा र विद्यार्थीहरू सुनिरहेका हुन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
अद्य: शास्त्रार्थ निर्धारितो विषय वेदवैदान्तयो: सम्वन्ध: ।&lt;br /&gt;
(आज शास्त्रार्थका लागि निधाँरित गरिएको विषय छ -&lt;br /&gt;
बेद र्‌ वेदान्तको सम्बन्ध) ।&lt;br /&gt;
० शात्त्रार्थ प्रारम्भ हुन्छ- एकजना बिद्वान्‌ प्रश्त गर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
“भानुभक्तको फुटकर कविता ।&lt;br /&gt;
2-----4949444441111111119111110011पममिििणणि 7?”&lt;br /&gt;
छ आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
बिद्दान्‌ १&lt;br /&gt;
पटकया&lt;br /&gt;
श्वीमन्त:, बेद-बेदान्तयो सम्बन्ध: कीदृशः ?&lt;br /&gt;
।महान भावहरू, वेद र वेदान्तको सम्बन्ध कस्तौ छ ?)अर्का बित्वान्‌ प्रश्नको उत्तर दिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
विद्वातृहरूको छलफललाई सितारको धनले बिस्तारैछोप्दैजान्छ । एकपछि अर्का विद्वात्‌ले प्रश्न गर्ने, उत्तर दिने,प्रतिवाद गर्वे कम चलिरहन्छ । भानुभक्तले शाच्त्रार्थ श्रबणगरिरहेको चिन्दमा गएर क्यामरा स्थिर हन्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बि.सं.&lt;br /&gt;
स्थानसमयपात्रपद्ननाभ ०»घनञ्जय &amp;quot;गड्डादत्त &amp;quot;घलकजय ०इन्द्रबिलास &amp;quot;&lt;br /&gt;
०&lt;br /&gt;
पदद७&lt;br /&gt;
चुँदी बेसी, पुरानोडिही घर-आँगन&lt;br /&gt;
दिउसो&lt;br /&gt;
धनञ्जय, पदानाभ, काशीनाथ, गड्रादत्त र इन्द्रबिलासध्वनञ्जय पिढीमा बसी हातमा चिठी लिएर बाचिरहेकाछन्‌ । गड्डादत धनञ्जयसँगै बसेका छुन्‌ । पग्ननाभ. काशीनाथर इन्द्रबिलास आँगनमा बसेर उत्मुकतापूर्वक ध्नञ्जयतर्फड्रेरिरहेका छन्‌ । चिठीबाट दृश्य खुल्दैजान्छ र म्यामरा घुमेरसबै पात्रहरूलाई उद्घाटित गर्दै प्रवाभको नजिक हुदै स्थिरहन्छ ।&lt;br /&gt;
चिठी पढ्दैगरेका धनञ्जयसंग- क्या रहयाछ त काशीकोहाल खचर्‌ ?&lt;br /&gt;
चिठी पढ्न छाड्दै - सबै कुरा बेसै रहयाछ ।&lt;br /&gt;
बालाई, आमालाई, भानुलाई, दाइलाई सञ्चो-बिसञ्चोक्या कस्तो रहपाछ त ?&lt;br /&gt;
सबैलाई निकानन्दै छ भनेर लेख्नु भयाको रह्याछ ।भानुको पढाइ कस्तो चल्याको रहयाछ ?&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
धनञ्जय &amp;quot; दिउसो-दिउसो पढ्न जान्या गन्या रहयाछ । बीचबीचमाबिद्वान्‌हरूको सभामा पनि जान्छ रे।&lt;br /&gt;
इन्द्रबिलास &amp;quot; खृसी हुदै -ए।&lt;br /&gt;
काशीनाथ » बाहरूको दिन कसरी बित्दोरहयाछ त ?&lt;br /&gt;
घनञजय ० अब कसरी बित्न भन्न नि । कल्पवास गर्न गयाको मानिस;बिहान गड्डाजीको स्नान, त्यसपछि विश्वनाथको दर्शन, बाँकीसमय हरिभजनमा कटछ भनेर लेख्न्‌ भयाको छ।क्यामरा धनज्जयको नजिक हंदैजान्छ र सम्वादको समाप्तिसँगै&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
पटकया | |&lt;br /&gt;
बि.सं.स्यानसमयपात्र&lt;br /&gt;
प्रे&lt;br /&gt;
: १८८७&lt;br /&gt;
: काशी, श्रीकृष्णको कोठा&lt;br /&gt;
: दिउसो&lt;br /&gt;
: खीकृष्ण, भवानीशङ्डर र भानुभक्त&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण खाटमा र भवानीशङ्गर बेञ्चीमाथिको गलैँचामापलेटी मारेर वसेका छन्‌ । भानुभक्त भृईँओच्यानमा बसेरदुबैज्ञनाको वार्तालाप पुनिरहेका छन्‌ । भवानीशङ्करलेश्रीकृष्णको कुरा सुनिरहेको दृश्य देखापर्छ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्तलाई भवानीशङ्करको परिचय गराउँदै - उहाँभवानीशड्र पौड्याल, सँस्कृत पाठशालामा पढाउनु हुन्छ ।उहाँको यहाँ ठूलाठूला विद्वानहरूसँग सङ्गत छ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त र भवातीशङ्रर एक-अर्कालाई हेराहेर गर्छन्‌ ।कच्चा उमेर भयाकाले मैले यसलाई दर्शन साधारण मात्रपढायाको छु । यसले वेदान्त दर्शन अध्ययन गन्याको छैन ।तपाईँले यसलाई मद्दत गर्नुपन्यो ।&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
भबानी ” भइहाल्छ नि।भानुभक्त मृस्क्राउँछन्‌ ।० मसँग पाठशालामा दर्शन पढाउन्या गुरुसँग म बाबुलाई भेटगराइदिउँला ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
वि.सं.स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
गाउँले १गाउँले २गाउँले १घनञ्जय&lt;br /&gt;
0 1&lt;br /&gt;
: पप्य्छ&lt;br /&gt;
: चुँदी बेसी, पुरानो डिहीको घर-आँगन&lt;br /&gt;
: दिउसोधनञ्जय, काशीनाथ, पद्यनाभ, गड्गादत्त, इन्द्रविलास रगाउँलेकाशीमा श्रीकृष्णको देहान्त भएको खबर पाएपछि पाँच भाइछोरा चुँदी बेतीमा कोरामा वसेका छन्‌ । सहानुभूति प्रकटगर्ने जम्मा भएका गाउँलेहरू बरिपरि छरिएर बसेका छन्‌ ।किरियापुत्रीहरूको छेउमा बलिरहेको बत्तीबाट दृश्य खुल्दैजान्छर क्यामरा गाउँलेहरूको फेरो लगाउदै धनञ्जयको अगाडिआएर स्थिर हन्छ ।&lt;br /&gt;
५ मरण त सारै राम्रो तेख्याको रहयाछ ।% तिथि पति राम्रो भेट्टाउनुभयो ।&lt;br /&gt;
“ धर्मात्मा मान्छेको मरणा राम्रो हुन्या नै भयो नि।० राम ताम लिंदालिदै प्राण त्याग्नुभयाछ ।गङ्गावत्त टाउको निहुराउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभत्त&lt;br /&gt;
गाउँले १&lt;br /&gt;
तुलसीराम र भातको क्या खबर छ ति ?&lt;br /&gt;
धनञ्जय &amp;quot; क्या हुनु, यस्तो दुखको बेलामा । मणिकर्णिंका घाटमा&lt;br /&gt;
गाउँले २घनञ्जय&lt;br /&gt;
गाउँले ३धनञ्जय&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
दाहसंस्कार गत्याछन्‌ । काजकिरिया पनि राम्ररी नैसिध्यायाछन्‌ ।&lt;br /&gt;
अब पैंतालीस्‌ दिन सकिएपछि भाइ त यतै आउनु हुन्छ किकसो ?&lt;br /&gt;
अहिलेसम्म यता फिर्न्या कुरा त छैन।&lt;br /&gt;
भानुभक्त तानी नि ?&lt;br /&gt;
उ पनि काशी मै छ। पढाइ सकियापछि मात्र यता आउँछ ।&lt;br /&gt;
: क्यामरा धनञ्जयको नजिक हुँदैजान्छ र सम्वादको समाप्तिसँगै&lt;br /&gt;
स्थिर हुन्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
यश&lt;br /&gt;
दृश्य ४२&lt;br /&gt;
वि.सं. ; पृद्दद&lt;br /&gt;
स्थान ; काशी, श्रीकृष्णको कोठासमय : बिहान&lt;br /&gt;
पात्र : भानुभक्त&lt;br /&gt;
: रित्तो कोठामा एक्ला भातृभक्त घुँडामा चिउँडो अड्याईकोक्राएर बसेका छन्‌ । कोठाभरि वेदना छरपस्ट छरिएकोछु।बीणाको बिरही धुनसँगै भानुभक्त टाउको उठाएर भित्तामाटाँगिएको श्रीकृष्णको तस्बिरलाई अश्रुपूर्ण आखाले हेर्छन्‌ ।क्यामरा श्रीकृष्णको तस्बिरनजिक सर्दैजान्छ र श्रीकृष्णलेशङ्कराचार्यको मणिरत्नमालाको श्लोक पाठ गरिरहेको आबाजप्रतिध्वतित हन्छ ।&lt;br /&gt;
श्रीकृष्णा ० अपार संसार समुद्रमध्ये ...&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
स्‌ आदिकवि भ्रानुभत्त&lt;br /&gt;
बि.सं. : पृदजद&lt;br /&gt;
स्थान : रम्घा, शिखरकटैरीको मरुरीसमय : दिउसो&lt;br /&gt;
पात्र : श्रीकृष्ण र भानुभक्त&lt;br /&gt;
दृश्य परिवर्तत हुन्छ । किशोर भानुभक्त अंगेतोसगैकोओछ्यानमा बत्तीको उज्यालोमा केही लेखिरहेका छन्‌ । श्रीकृष्णअगेनोनजिक बसेर शङ्कराचार्यको मणिरत्तमालाको श्लोककोअगाडिको पृक्ति सस्बर बाचन गरिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण » ........ समज्जतो मे शरण किमस्ति ॥भानुभक्त लेख्न छाडी ध्यानमग्न भएर सुन्छन्‌ ।श्रीकृष्णको बाचतकम चलिरहन्छ -&lt;br /&gt;
० गुरोः कृपालो कृपया बदैतद्‌ विश्वेश: पादाम्वुज दीर्घ नौका॥&amp;quot;भानुभक्त शोचमरत हुन्छन्‌ । श्रीकृष्ण किताब पद्याएरराखिदिन्छन्‌ र नातिलाई हेर्छन्‌ ।भानुभक्त सोचाइमा हराइरहेका हुन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
“शङ्कराचार्यकी प्रश्नोत्तर मणिरत्नमालाबाट&lt;br /&gt;
पटकथा पछ&lt;br /&gt;
» भानु, तँ सोचमग्न छस्‌ । क्या विचार गरिराख्याको ?भानुभक्त » जिबा प्रश्नोत्तर मणिरलमाला भाषामै लेखियाको भयाकति राम्रो हुन्थ्यो हगि ? भाषामै लेखियाको भया सारालोकले पढ्न र सुन्न पाउन्या थिया ।श्रीकृष्णा ० भानु, तेरो बिचार अतिउत्तम छ । तँमाथि सरस्वती माताकोकृपा छ, तैँले आफ्नो अध्ययन प्रा गन्यापछि शङ्डराचार्यकोप्रश्नोत्तर मणिरत्नमाला भाषामा उल्या गन्यास्‌ । यसबाटतेरो पनि सुताम हुन्याछ ...वाक्य पूरा नहुँदै दृश्य बीचमै काटिन्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
पद आदिकवि भातृभकत्त&lt;br /&gt;
विसंस्थान&lt;br /&gt;
पात्र&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
९ पद्दद&lt;br /&gt;
: काशी, श्रीकृष्णको कोठा&lt;br /&gt;
: बिहान&lt;br /&gt;
: श्रीकृष्ण र भानुभक्त&lt;br /&gt;
: कोकाएर बसेका भानुभक्तमाथि श्रीकृष्णको दृश्य ४३ को&lt;br /&gt;
अधुरो वाक्यको अन्तिम अंश प्रतिध्वनित हुन्छ -... लोकको पनि कल्याण हुन्याछ ।&lt;br /&gt;
: भानुभक्त बित्तारै टाउको घुमाउँछन्‌ । खाटमा श्रीकृष्ण&lt;br /&gt;
बसिरहेका छन्‌ । भानुभक्त हुन्छन्‌ र बाजेको चरणमा शिरराखिदिन्छन्‌ । श्रीकृष्ण हातले वातिको टाउकोमा छोएरआशीर्वाद दिन्छन्‌ र अन्तर्ध्यान हुन्छन्‌ । भानुभक्त शिरउठाएर हेर्छन्‌ । खाट खाली र शून्य छ । मात्तिर हेर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
: श्रीकृष्णको तरिबर हांपिरहेको हुन्छ । भानुभक्त दुवै हात जोडेर&lt;br /&gt;
तस्बिरलाई तमस्कार गर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
: तढ््तामा राखेको कागज, कलम र मसी उठाउँछन्‌ र प्रश्नोत्तर&lt;br /&gt;
८९&lt;br /&gt;
मणिरत्नमाला पढ्दै त्यसको नेपालीमा अनुवाद गर्न धाल्दछन्‌ ।: श्रीकृष्ण तरिबरबाट हेरिरहेका हुन्छन्‌ ।भानुभक्त &amp;quot;० आफूले लेखेको कविता सस्वर बाचन गर्छन्‌ -अपार संसार समुद्रमाहाँ ।डब्याँ शरण्‌ कुन्‌ छ मलाइ याहाँ ॥चाँडो कृपाले अहिले बताङ ।श्रीरामको पाउ छ मुख्य नाउ ॥&amp;quot;: क्यामरा भानुभक्तको नजिक हुँदैजान्छ र कविताको अन्त्यसँगैस्थिर हुन्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“भानुभक्तको प्रश्नोत्तरीबाट&lt;br /&gt;
९० आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
बि.सं.स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
घनञ्जप&lt;br /&gt;
गाउँले १धनञ्जयगाउँते २घनञ्जय&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
; १८८९&lt;br /&gt;
: रम्घा, चर&lt;br /&gt;
: घनञ्जय र्‌ गाउँलेहरू&lt;br /&gt;
- धनञ्जय गाउँलेहरूलाई वरिपरि राखेर पाल्पा गौँडाको आफूनो&lt;br /&gt;
“ अड्डा र कामका बारेमा गफ गरिरहेका छुन्‌ । धनञ्जयकोअनुहारबाट दृश्य खुल्दैजान्छ र क्यामरा फन्को लगाउँदैगफ गर्न बसेका सबै गाउँलेलाई दृश्यमा समेद्दछ ।पृष्ठभूमिमा तनहुतुरको डाँडो देखापर्छ ।&lt;br /&gt;
» हास्दै - राजाले सप्पै बन्दोबस्त मिलायाका छन्‌ नि। फौजलाईजग्गा नै दियाका छन्‌- खान्कीमा । त्यही जगगाबाट उठ्याकोबाली खान्छन्‌- फौजले ।&lt;br /&gt;
० त्यही उठ्याको बालीलाई तनखा भन्नु पत्यो हैन त ?&lt;br /&gt;
» ठीक भन्नु भो।&lt;br /&gt;
० हैन, फौजको बातीको उठतीपुदती कसले गरिदिन्छ त ?&lt;br /&gt;
» त्यो काम त हाम्रै अड्डाको हो नि। फौजको उठतीपुठूती&lt;br /&gt;
९१&lt;br /&gt;
गाउँले २धनञ्जय&lt;br /&gt;
गाउँले ३धनञ्जयगाउँले ३गाउँले १धनञ्जय&lt;br /&gt;
गाउँले १घनञजय&lt;br /&gt;
गाउले ४घनञ्जय&lt;br /&gt;
गरिदिन्या, पजनी गर्न्या सप्पै काम हाम्रै अड्डाले गरिदिन्छनि।&lt;br /&gt;
खरदार बाजेको अड्डाले अरु क्या क्या काम गर्छ त ?परिआयाको बेलामा फौजलाई रसदपानी पठाउन्या, हात्ती-घोडा पठाउन्या काम पनि गर्नुपर्छ अड्डाले । सुगौलीसन्धिअगाडि हाम्रै अड्डाले पनि पठायाको थियो ।&lt;br /&gt;
अरु मुद्दामामिला हेर्नुपर्दैन ?&lt;br /&gt;
मुद्दामामिला पनि हेर्नुपर्छ । फौजदारी मुद्दा पनि छिन्नैपर्छ ।खर्दार बाज्याले पनि कति धेरै काम गर्नु पर्न्या रहयाछ ।त्यसै लाउन पाइन्छ तनि चाँदतोडा ?&lt;br /&gt;
हाँस्दै बिर्के टोपी मिलाउछन्‌ र सगर्व भन्छन्‌ - सरकारकोसिन्दुर पन्यापछि खटायाको काम त गर्नै पन्यो क्यार ।हैन, बिदा त सकिनै लाग्यो क्यारे ति, कहिले जानृहन्छपाल्पा ?&lt;br /&gt;
हिड्त्या साइत पर्सिको जन्याको छ क्यारे ।&lt;br /&gt;
हैन, महापुराण भन्न गयाका छोरासँग भैेटै नगरी जान्या त ?क्या गर्नु, हेर त । अड्डाबाट हाजिर हुन आउन्‌ भन्त्याखबर आइसक्यो । उता भानु बनारसबाट फिर्न्या बित्तिकैजेठान जयलाल कप्तानले प्राण भन्न भनेर भोर्लेटारदौडाइहाल्नु भयो ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
९२&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभत्कत&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
१ १दद९&lt;br /&gt;
भोर्लेटार, सप्ताह मण्डप&lt;br /&gt;
: बिहान&lt;br /&gt;
भानुभक्त, उपवाचक, द्वारपालहरू, गणौश, जयलाल,मणिराम, माइज्यू, पण्डितहरू, महिला तथा पुरुषभ्क्तजनहरूको समृह ।&lt;br /&gt;
भोर्लेटारमा कप्तान जयलाल पौडेलको घर-आँगनछेउकोबिहारे डिहीमा सप्ताह प्राणको सुन्दर मण्डप बनाइएकोछ। व्यासासनमा भानुभक्त र दायाँ-बार्या गणेश र उपवाचकपीताम्बर तथा रातो बस्त्र धारण गरेर बचेका छन्‌ । भानुभक्तकोअगाडि श्रीमद्भागवत्‌ प्राणको वृहत्‌ किताब राखिएको छ ।मण्डपअगाडि पुराण श्रवणका लागि महिला तथा पुरुषभक्तजनहरूको भिड गृत्द्री र परालमा बसेका छन्‌ । भानुभक्तलेफूल लिएर हात जोड्दै सस्बर मद्लाचरण गरेको प्रसड्घबाटदृश्य खुल्दै जान्छ र सम्पूर्ण सण्डप तथा भक्तजनहरूलाईपरिद्श्यमा समेददछ ।&lt;br /&gt;
९३&lt;br /&gt;
भानुभक्त ०&lt;br /&gt;
भक्तजन »भानुभक्त ०भक्तजन ”भानुभक्त ०भक्तहरु ”भानुभक्त »भक्तजन »भानुभक्त »भक्तजन ”उपवाचक »&lt;br /&gt;
सच्चिदातन्द रुपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे ।&lt;br /&gt;
तापत्रय विनाशाय श्रीकृ्‌ष्णाय वयं नुम: ॥&#039;&lt;br /&gt;
भक्तजन हात जोडी बसेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
३ नमो भगवते वासुदेवाय ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त कितावमा फूल चढाउँछन्‌ । उपबाचक र गणेशपनि त्यतै गर्छन्‌ । भक्तजनहरू पनि फूल चढाउँछन्‌ ।ठूलो खरले - बिध्न हर्ता गणेशजीको ...&lt;br /&gt;
जय ।&lt;br /&gt;
भगवान्‌ श्रीकृष्णको ...&lt;br /&gt;
जप ।&lt;br /&gt;
महर्षि वेदव्यासको ....&lt;br /&gt;
जय ।&lt;br /&gt;
व्यासपुत्र शुकदेव स्वामीको ...&lt;br /&gt;
जय ।&lt;br /&gt;
श्वीमद्भागवत्‌ महाप्राणको ....&lt;br /&gt;
जप।&lt;br /&gt;
हात उठाउँदै -सर्वै श्रोतार: सावधाना भ्वन्तु । सबै श्रोतागणासावधान भएर सुन्या काम गर्नुहोला ।&lt;br /&gt;
उपबाचकको उद्घोषणसगै दृश्य समाप्त हन्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
&amp;quot;ध्रीमद्भागवत्‌्बाट&lt;br /&gt;
00&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
गाउँले १गाउँले २गाउँले ३गाउँले ४गाउँले १गाउँले २&lt;br /&gt;
गाउँले १&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
; १८९; भोर्लेटार, गाउँको बाटो: बिहान&lt;br /&gt;
: गाउँलेहरू&lt;br /&gt;
टाढाबाट चारजना भक्त टपरीमा फूल-प्रसाद लिएर गफगर्दै आउंदैगरेका देखिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
सप्ताह सुरु भइसक्यो होला । आउँदाआउँदै अबेर भयो ।मलाई पनि ढिला भयो । बिहान त मिलिक्कै जान्छ ।भानुभक्तले भन्या रे पुराण ।&lt;br /&gt;
त्यै त, कति सानै उमेरमा भागवत्‌ फुक्याको |&lt;br /&gt;
कस्ताका नाति; श्रीकृष्ण पण्डितका त नाति ।&lt;br /&gt;
रम्घा, चदीबेसी, करापुटार्‌, भोर्लेटार वरिपरि सेरोफेरोमाभानुभक्तका जोडा छैनन्‌ भन्छन्‌ नि त गाउँघरमा ।संकतका मात्रै विद्वान्‌ हुन्‌ र | जे देख्यो त्यसैको सिलोकपनि कथिदिन्छन्‌ रै - भाषामा ।&lt;br /&gt;
00&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
समूहस्वर&lt;br /&gt;
कुरा गर्दागर्दै चारैजना दृश्यबाट बाह्रिरिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
: चारैज्ञना मण्डपमा आइपुरछ्न्‌ । पुराण वाचन-कम&lt;br /&gt;
चलिरहेको हुन्छ ।&lt;br /&gt;
सस्वर -&lt;br /&gt;
निगम कत्पतरोर्गलितं फलम्‌ ।&lt;br /&gt;
शुकमुखादमृत द्रव संगुतम्‌: ।&lt;br /&gt;
क्यामरा मण्डप र भानुभक्तको वरिपरि घुम्छ ।पिवत भागवतं रसमालयं ।&lt;br /&gt;
कर्ताहरू भागवत्‌ श्रवण गरिरहेका छन्‌ ।मुहरहाँ रसिका भुविभावुका: ॥&lt;br /&gt;
: मण्डपबाट केही टाढा मान्द्रोले फेद बेरिएको घुन्धुकारी&lt;br /&gt;
(सातवटा आँछ्लो भएको बाँस) को टुप्पोबाट फेवसम्मक्यामरा ओर्लन्छ । नेपध्यमा हावा चलेको आवाज आइरहेकोहुन्छ । भागवत्‌ वाचनको कम चलिरहेको छ । भानुभक्तसंगसँगै भक्तहरू समूह स्वरमा गाउँछन्‌ -&lt;br /&gt;
भक्ति सुतौ तौ तरुणौ गृहीत्वा ।&lt;br /&gt;
प्रैमैकरूपा सहसा विरासीत्‌ ॥&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे ।&lt;br /&gt;
नाथेति नामालि मृहुर्वदन्ति ॥&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण गोविन्द हरे म्रारे ।नायेति नामानि मुहुर्बदन्ति ॥&amp;quot;&lt;br /&gt;
भानुभक्त ”» अब म प्रथम अध्यायको कयासार वर्णन गर्न्याछु ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“धीमद्भागवत्‌बाट&lt;br /&gt;
९६&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
स्थान ; भौलेटार, जयलालको घर-आँगन&lt;br /&gt;
समय ; अपराह्नपात्र : माइज्यू र महिलाहरूकप्तात जयलालको गोठमा केराको पातमा अर्सा बेल्ते कामहुवैछ । तीनजना महिला रोटी पथार्ने र पकाउने कार्यमा व्यस्तछन्‌ । पृष्ठभ्मिमा सप्ताह मण्डप देखापर्छ । मण्डपतर्फबाटमाइज्यू अर्ता पकाइरहेको ठाउँमा आउँछिन्‌ ।माइज्य्‌ ” कति पाक्यो ? सबै भक्तलाई पुग्छ कि पुग्दैन अर्सा ?महिला १ ०» पाकिसक्न आँट्यो । पुग्छ होला ।माइज्य्‌ सप्ताह मण्डपतर्फ फर्किन्छिन्‌ । अर्या पकाउने कमजारिरहन्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
पटकथा ९७&lt;br /&gt;
स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
चट&lt;br /&gt;
६ पृद्ददर: भोर्लेटार, सप्ताह मण्डप&lt;br /&gt;
; मध्याह्न: दृश्य ४७ वमोजिम&lt;br /&gt;
पुराण वाचनको अर्को दिन कथा वाचन र श्रवणको कमचलिरहेको हुन्छ । बाँसमा झुण्ड्याइएको रुण्डाबाट दृश्यखुल्दैजान्छ र सम्पूर्ण मण्डप तथा श्रोताहरू परिदृश्यमादेखापर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
बन्दाबनमा श्रीकृष्णको बाँसुरीको गीत-सङ्घीत सुतेर दौडुँदैआयाका गोपिनीहरू श्रीकृष्णसँगको मधुर रासलीलामा व्यस्तथिया । यसैबीच एक्कासी श्रीकृष्ण अन्तर्ध्यान हुन्‌भयो ।भक्तहरू एकचित्त भएर सुनिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
त्यसपछि गोपिनीहरू भगवान श्रीकृष्णको स्तृति गर्नलाग्या ।यो स्तुति गौपी-गीतको नामले प्रसिद्ध छ ।&lt;br /&gt;
क्यामरा दर्शकतिरबाट घुम्दै मण्डपलाई अर्धप्रदक्षिणा गर्दछ ।यो स्तुति संस्कृत भाषामा छ, तर हाम्रा भाषाका कविइन्दिरसले पनि यही गोपी-गीतलाई भाषामा लेख्नु भयाको&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
॥॥ । जुत म तपाईहरूलाई कहन्छु ।उपबाचक हार्मोनियम बजाउँछुन्‌ । दर्शकहरू एकचित्त भएरसुन्दछन्‌ ।भानुभक्त सस्बर गाउ्छन्‌ -ब्रजञ त बेस्‌ बन्यो तिम्रि जन्मले ।लक्ष्मी छन्‌ जहाँ तिम्रि प्रीतिले ॥: भानुभक्तको स्बरमा अरुहरूले पनि स्बर छोप्छन्‌ -समहस्वर &amp;quot; ब्रज त बेस्‌ बन्यो तिम्रि जन्मलेलक्ष्मी छन्‌ जहाँ तिम्रि प्रीतिले ॥भानुभक्त एकल स्वरमा गाउँछन्‌ -भानुभक्त &amp;quot; प्रिय निहार है प्राण धर्दछन्‌ ।तिमरी हुन्‌ सबै खोजि गर्दछन्‌ ॥&amp;quot;बयामराले भग्तजनसहित सम्पूर्ण मण्डपको परिकमा गर्दछ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“डुन्दिरसको कविताबाट&lt;br /&gt;
पटकथा ९९&lt;br /&gt;
छ सं. ; १दद९&lt;br /&gt;
स्थान : भोर्लेटार, सप्ताह मण्डपसमय : मध्यान्हपात्र : दृश्य ४७ बमोजिम&lt;br /&gt;
सप्ताहको अन्तिम दिन । वासको टुप्पोमा फहराइरहेकोरुण्डाबाट दृश्य खुल्दै, ओलंबै जान्छ र सम्पूर्ण मण्डपलाईबिहड्डम रुपमा उद्घाटित गर्छ । पुराण भन्ने र सुन्ने कमचलिरहेको हुन्छ । नेपथ्यमा बजिरहेको बाँसुरीको धुनलेवातावरणलाई ढाक्दछ ।&lt;br /&gt;
सप्ताह भन्ने कम सकिनासाथै म्यामरा धुन्धकारीको प्रतीककारूपमा क्नामा ठड्याइएको बासको नजिक हँदै पाथिमाथिसर्दै जान्छ । बासको प्रत्येक आँख्ख्ला फुटेको हुन्छ । एष्ठभूमिमाहावा चलेको र हावा फुस्केको ध्वत्ति प्रतिध्वनित हुन्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभत्त&lt;br /&gt;
हा : १ददर९स्थान : भोर्लैटार, दाईको खलौसमय : मध्याह्नपात्र : खेतलाहरू&lt;br /&gt;
खलोमा एकजना गाउँले नाङ्ग्लोबाट धान शार्ने र अर्कोगाउँले वाडलोले हम्केर भृस बत्ताउने काम गरिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
गाउँले-१ &amp;quot; मृत बत्ताउन छोडेर - आज त सप्ताह लगायाको पनि सातदिन भयौ ।&lt;br /&gt;
गाउँले-२ ० आज त दक्षिणा चढाउन्या दिन ।&lt;br /&gt;
गाउँले-१ » श्रीमद्भागबत्‌ पुराण सुनेर परीक्षित महाराज रधुन्धुकारीले जसरी मोक्ष प्राप्त गरे, त्यवैगरी आज कर्ताकापितृहरू पनि मोक्ष हुन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
गाउँले-२ » आज त बालुन पनि नाच्छन्‌ ति हैन ?&lt;br /&gt;
गाउँले-१ ” हो, साड्ेका राति बालन नाच्न्या त प्रानै चलन हो नि।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जज सं.&lt;br /&gt;
स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
दृश्य ५२&lt;br /&gt;
पद्दर&lt;br /&gt;
भो्लेटार, पुराण मण्डपसँगैको चउर / बगैँचा&lt;br /&gt;
राति&lt;br /&gt;
भानुभक्त, जयलाल, माइज्यू, बालुनेहरू, भक्तजनहरू,गाउँलेहरू आदि ।&lt;br /&gt;
सप्ताहको साड्केका दिन राति पुराण सुन्ने भक्तजनहरू,महिलाहरू बालक तथा गाउँलेहरू बालुन वाच हेर्न जस्माभएका छन्‌ । चउरको बीचमा पूर्सुङ्के, बालुनेहरू र भानुभक्तउभिएका छन्‌ । एकापट्टि महिलाहरू लहरै उभिएका छन्‌ ।चउरको अर्को भागमा बालकहरूको फुण्ड र वयस्कअबतजनहरू तथा कर्ता र उपबाचक नाचको प्रतीक्षामाछन्‌ । अर्कोपट्टि सिंढीमा भक्त महिलाहरूको समूह लहरमामिलेर बब्चेका छन्‌ । चउरको चारैतिर बाँचमा बाँधिएकाराँकोहरू बलिरहेका छन्‌ । बालुनेहरू हातको खैजडीबजाउँदै बालुनको श्रीगणेश गर्दछन्‌ । भागुभक्त गाउँछन्‌ रबालुनेहरू नाच्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुश्क्त&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
॥ ३ ७» हो..हो..जनिकम्प जनिकम्प घरती माता,&lt;br /&gt;
हामी खेल्छौं रामावतार ॥&lt;br /&gt;
पृष्ठभुमिमा भ्तजनहरू बालुनको तालमा ताल मिलाउँदैटाउको हल्लाइरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
जनिकम्प जनिकम्प धरती माता,&lt;br /&gt;
हामी खेल्छौं रामावतार ॥&lt;br /&gt;
समृह स्वर ० जनिकम्प जनिकम्प घरती माता,हामी खेल्छौं रामावतार ॥जनिकम्प जनिकम्प धरती माता,हामी खेल्छौं रामावतार ।६ जना बालुनेहरूको एक समूह नाइकेसहित बालुनको तालमाखैजडी बजाएर नाच्दै अगाडि आउँछ ।: बयस्क भक्तजन तालमा फुल्दै थपडी बजाउँछन्‌ ।बालुनेहरु : जमिनलाई ढोरदै -जनिकम्प जनिकम्प धरती माता,हामी खेल्छौं रामावतार ॥माइज्यू पनि भावविभोर देखिन्छिन्‌ ।दृवैतर्फका बालुनेहरू समूह स्वरमा गाउँदै नान्दछन्‌ -जलिकम्प जनिकम्प घरती माता,हामी खैल्छौं रामावतार ।बालकहरू पति कुम्दछन्‌ ।दुबै समूहका बालुनेहरू नाच्दछन्‌, भानुभक्त गाउछन्‌ -भानुभक्त &amp;quot; हो ... हो .. पहिलो वाण दानवले हान्यो,रथको ठँडी फुकाल्यो ॥साथमा थिइन्‌ कैकयी रानी,अडगुली हाली रथ थामिन्‌ ॥हो..हो.. जत्तिकम्प जतिकम्प धरती माता,हामी खेल्छौं रामाबतार ।महिला भक्तहरू भावविभोर भएर कुलिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
॥ |&lt;br /&gt;
पटकथा १०३&lt;br /&gt;
। ० हो... हो.. पहिलो वाण दानवले हान्यो,रथको ढैँडी फुकाल्यो ॥सायमा थिइन्‌ कैंकयी रानी,अड्गुली हाली रथ थामिन्‌ ॥समूह स्वर २ हौ..हो.. जनिकम्प जनिकम्प धरती माता,हामी खेल्छौं रामावतार ॥: महिला भक्तहरू गायनको तालमा फुलिरहेका छन्‌ ।2: बालुनेहरू वृत्ताकारमा नाच्दै हन्छन्‌ ।० हो.. हो.. पहिलो वाण दानबले हान्यो,रथको ठेँडी फुकाल्यो ॥साथमा थिइन्‌ कैकयी रानी,अङ्गुली हाली रथ थामिन्‌ ॥बालुतेहरू जमिनलाई ढोग्दै ताल फेरेर नाच्दछन्‌ ।हो..हो.. जनिकम्प जनिकम्प घरती माता,हामी खेल्छौं रामावतार ॥: सबै बालुने जमिनमा बसेर ढोरदछन्‌ ।भानुभक्त » हो..हो.. दोसरौ बाण दशरयले हाने,दानबको रथ छिन्नभिन्न पारे ॥: भानृभक्त बालुनेहरूको बीचमा बस्दै -० हो..हो.. जनिकम्प जनिकम्प धरती माता,हामी खेल्छौं रामावतार ॥बालुनेहरु : समूह स्वरमा -० हो..हो.. दौसरो बाण दशरयते हाने,दानबको रय छिन्नभिन्न पारे ॥हो हो.. जनिकम्प जनिकम्प धरती माता,हामी खेल्छौं रामावतार ।हो हो. दोसरो बाण दशरथले हाने,दानवको रथ छिन्नभिन्न पारें ॥हो. हो.. जनिकम्प जनिकम्प घरती माता,हामी खेल्छौं रामावतार ॥&lt;br /&gt;
आदिकबि भानुभक्त&lt;br /&gt;
भानुभक्त &amp;quot; हो,.,हो.. तेसरो वाण राजाले हाने,। हृदय बिदारे ॥अकन्टक राज्य इन्द्रलाई सुम्पी,दशरथ आयोध्या फिरे ॥&amp;quot;सबै श्रोता र बालुनेहरू भावबिभोर भएर फुम्दछन्‌ ।: आवाज मधुरो हुँदैजान्छ ।&lt;br /&gt;
समाप्त&lt;br /&gt;
“लोकगीत बालुन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हज चर्‌&lt;br /&gt;
वि.सं.स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
कालजैसी&lt;br /&gt;
१ १८९०&lt;br /&gt;
: चुँबी-ओकलाड, कालु जैसीको घर-आँगन ।&lt;br /&gt;
: दिउसो&lt;br /&gt;
: भानुभक्त, कालु जैसी र कालु जैसीकी जहात&lt;br /&gt;
: कालु जैसी आगनमा बसेर डोको बुन्दैछन्‌ र उनकी जहानपिढीमा मकै खोस्ल्याउँदैछिन्‌ ।&lt;br /&gt;
- छ्ैँजको घरको डेउढीबाट भानुभक्त आउँदैछन्‌ । क्यामराभानुभक्तलाई लिएर अगाडि हिड्छ ।&lt;br /&gt;
५ ए, पण्डितजी पो पाल्नु भयाछ ।&lt;br /&gt;
जहानतर्फ हेर्दै - ए गुन्द्री ल्या त ।&lt;br /&gt;
- जहान गुन्द्री लिन घरभित्र पस्छिन्‌&lt;br /&gt;
० ढोगौं।भानुभक्त एउटा खुद्ठाको जुत्ता फुकालेर खुट्टा उचाल्छन्‌,कालुजैँसी खुट्टामा ढोगिदिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
- कालु जैसीकी जहान गुन्द्री ल्याएर पिंढीमा ओछयाइदिन्छिन्‌र दुनै हात जोडेर भातुभक्तलाई नमस्कार गर्खन्‌ । भानुभक्त&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क फर्काउँछन्‌ र जुत्ता फुकालेर गुन्द्रीमा बस्छन्‌ ।ए, खाजासाजा क्या छ हेर्न ? पाहुनालाई त्यसै पठाउन तभयान नि।८ जहान घरभित्र पचब्छित्‌ ।« भानुभक्तसित - कति कामले पाल्नु भयाको हो कुन्नि ?भानुभक्त &amp;quot; क्रणाको भाका पनि नाघ्यो । त्यही बाह रुपियाँ त्ररण सम्काउँभनेर ।कालु जैसी « त्यति जाबो क्रणका लागि पनि पण्डितजीले क्याको दुखपाउन्‌ पर्थ्यो ? खबर पठायाको भया म आफै आइहाल्थ्याँनि।भानुभक्त » पैसैको लागि मात्र होइन । पारि गाउँमा काम पनि थियो ।बाटोमा पर्न्या भयाकाले यसो तिमी कहाँ पनि पस्याको ।कालु जैसी « वैशाख निक्लँदो म साँबाब्याज दुवै लिएर हाजिर हुन्याछु ।भानुभक्त » भइहाल्छ नि।कालुकी जहान घरभित्रबाट थालमा भुटेको मकै र गिलासमापानी लिएर निस्कन्छिन्‌ र भानुभक्तको अगिल्तिर राख्चिदिन्छिन्‌ ।भानुभक्त धालको मकै र गिलाँसको पानीलाई हेर्छन्‌ ।कालु जैसी ० लिङँ, पण्डित जी ।भानुभक्त अप्रसन्न मुद्रामा मुख बिगारेर कालु जैतीलाईहेर्छन ।काल्जैसी जिल्ल पर्छन्‌ ।भानुभक्त फेरि थालतर्फ हेर्छन्‌ र कल्पनामा थालमा सुग्रेकेरा र सेता मूला देख्छन्‌ । गिलास हेर्छन्‌, पानी मोहीमापरिवर्तन हुन्छ । भानुभक्त दङ्ग पर्दै कालु जैतीलाई हेर्दछन्‌ ।कालु जैसी रुन्‌ जिल्लिन्छन्‌ ।भानुभक्त फेरि थालतिर हेर्छन्‌ । थालको मृग्रे केरा र मूलाअचानक हराउँछ । गिनाँसमा हेर्छन्‌, मोही पानीमापरिवर्तित हन्छ । भानुभक्त भरखरैको घटनालाई कवितामास्वर दिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भानुभक्त ” असल मुग्रे केरा कि त महि हवस्‌ बेस अमिलो ।कि ता सेता मूला कि त बरु हवस्‌ साग उसको ॥कालु जैसी र जहान दवाल्ल परेर सुनिरहन्छन्‌ ।असल्‌ हुन्थ्यो धुप्मा नतर यसरी खानु कसरी ?भुटी त्यायौ थालमा मकइ तिमिले क्यान यसरी ?कविताको अन्तमा कालुकी जहान टाउको निहराउँछिन्‌ ।&lt;br /&gt;
 । समाप्त&lt;br /&gt;
“भात्नुभक्तको फुटकर कविता&lt;br /&gt;
१०द आदिकबि भानुभक्त&lt;br /&gt;
विचारी&lt;br /&gt;
घनञ्जयविचारी&lt;br /&gt;
घनञ्जय&lt;br /&gt;
विचारी&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
१ १८९१/९४: पाल्पा गौंडा, घनञ्जयको कचहरी: दिउसो&lt;br /&gt;
घनञ्ज्जय, विचारी र्‌ कारिन्दा&lt;br /&gt;
पाल्पा गौँडा कचहरीको एक कक्षमा खर्दार धनञ्जय, बिचारीरकारिन्दा वचेर क्राकानी गर्दैछन्‌ । बिचारीको अनुहारबाट दृश्यखुल्दैजान्छ र धनञ्जयको पषठभाग देखापर्छ ।&lt;br /&gt;
रामदल पाँडे पहाँको हाकिम भएर आउन्या भन्ने सुन्या निमैले गाँडगँद; क्या हो, तपाइँलाई थाहा छ ?&lt;br /&gt;
सुन्न त मैले पनि सुन्याँ ...&lt;br /&gt;
पाँडै हाकिम भएर आया भन्या त जागिरमा टिक्न गाह्रोपर्छ कि क्या हो ?&lt;br /&gt;
कारिन्दा सुनिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
कर्मचारी भन्याका राजाका सिन्द्र पन्याका मान्छे हुन्‌ ।जौ हाकिम भया पनि क्या फरक पर्छ र ?&lt;br /&gt;
त्यसो भनेर क्या गर्नु ? थापाका मान्छेलाई पाँडेले नसहन्या,पाँडेका मान्छेलाई थापाले नसहन्या । तपाइलाई पनि त&lt;br /&gt;
१०९&lt;br /&gt;
घतञ्जप&lt;br /&gt;
विचारी&lt;br /&gt;
घनञ्जय&lt;br /&gt;
विचारीकारिन्दा&lt;br /&gt;
घनञ्जय&lt;br /&gt;
११०&lt;br /&gt;
थापापट्टिका मान्छे भनेर भन्दा रहयाछन्‌ कन्ना पछाडि ।&lt;br /&gt;
धवञ्जय र कारिन्दा सुनिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
त्यै त हेर न । साँढेको जुधाइ, बाच्छाको मिचाइ भन्याको यही&lt;br /&gt;
हो । ठूलाठलाको पेचापेचमा सानातिना कर्मचारी पिसिन्या ।&lt;br /&gt;
५ हैन, साच्चि नै पाँडे काजी हाकिम भएर आया भन्या क्या&lt;br /&gt;
गर््या ?&lt;br /&gt;
न्‌नको सौरौ चिताएर काम गन्याँ, त्यति गर्दा पनि सहयानन्‌&lt;br /&gt;
भन्या घर फर्केर खेती किसान गर्न्या ।&lt;br /&gt;
: विचारी र कारिन्दा सुनिरहन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
घर लड्याको छैन वन डढ्याको छैन, क्याको पिर ?&lt;br /&gt;
: हुनत हो।&lt;br /&gt;
प्रसङ्क बदल्दै - अहिले त भानुभक्तले खेतीपाती राम्ररी&lt;br /&gt;
चलाउन्‌ भयाको छ, हैन ?&lt;br /&gt;
: चलाउन त चलायाकै छ । तर खेती किसानीभन्दा सिलोककथ्नमै बल गर्छ ।&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
बि.सं.स्थानसमपपात्र&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
चेला&lt;br /&gt;
पटकमा&lt;br /&gt;
१८९५ ९६रम्घा दैबघाटदिउसोभानुभक्त गुरु, शिष्य र भक्तजनहरूकाशीमा सुरु गरेको शड्टराचार्यको प्रश्नोत्तरी मणिरत्तमालाकोमापानुबाद-क्रमलाई अधि बढाउँदै भानुभक्त रम्घाको आफ्नोघर-पिढीमा वसेर लेखिरहेका छन्‌ ।० कुन्‌ हो सदा बन्धनमा पन्याको ।जस्‌ले त यो मन्‌ स्‌खमा धन्याको ॥&lt;br /&gt;
भानुथक्तको प्रश्नोत्तरी जनजिब्रोमा फैलिइसकेको हुन्छ ।देवघाट नदी किवारमा गुरु चेलाका बीचमा सम्वादचलिरहेको छ । चेलाले पश्न गर्ने र गुरुले त्यसको समाधानगरिदिने कम जारी छ । भक्तहरू प्रश्वोत्तरीको गरु चलाकोसम्बाद श्रवण गरिरहेकाछन्‌ ।&lt;br /&gt;
० अपार संसार समुद्र माहाँ ।डब्याँ शरण्‌ कुन्‌ छ मलाई याहाँ ॥&lt;br /&gt;
१११&lt;br /&gt;
गुर्‌&lt;br /&gt;
चेलागुरु&lt;br /&gt;
चेलागुरु&lt;br /&gt;
चेलागुरुचेला&lt;br /&gt;
गुरु&lt;br /&gt;
चेला&lt;br /&gt;
चेलागुरु&lt;br /&gt;
चेलागुरु&lt;br /&gt;
चाँडो कृपाले अहिले बताउ ।० श्रीरामको पाउ छ मुख्य नार ॥&lt;br /&gt;
दरिद्द नाउँ नरमा छ कस्‌को ?बिशाल तृष्णा घरमा छ जस्‌को ॥&lt;br /&gt;
कुन्‌ हो धनी सब्‌ नरले कहयाको ?सन्तोषले जो छ खुसी रहयाको ॥&lt;br /&gt;
ज्पूँदै मत्याको भनि नाम्‌ त कस्‌को ?० उद्याम्‌बिना बित्तछ काल जस्‌को ॥&lt;br /&gt;
० अमृतसरी कुन्‌ छ भन्या ?ती निराशा ।&lt;br /&gt;
पासा कउन हुन्‌ ?न ममतै छ पासा ॥&lt;br /&gt;
कौनै बखत्‌मा पनि क्या नगर्नु ?पापमा अगाडी कहिल्यै नसर्न ॥&lt;br /&gt;
विद्वान्‌ पुरुष्ले कति काम गर्न ?&lt;br /&gt;
» स्वघर्म यामीकन शास्त्र पढ्न्‌ ॥&amp;quot;&lt;br /&gt;
प्रश्वोत्तरीको कम चलिरहन्छ । दृश्य टाढाटाढा हुँदै जान्छरविहङ्कम भएर स्थिर हुन्छ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“भानुभक्तको प्रश्नोत्तरीबाट&lt;br /&gt;
बीर&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुश्चक्त&lt;br /&gt;
स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
भानुभक्तघाँसी&lt;br /&gt;
घाँसी&lt;br /&gt;
: १९८&lt;br /&gt;
: कर्लुड्‌ बेसी, चौतारी: मध्याहन&lt;br /&gt;
: घाँसी र भानुभक्त&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
कर्लुङ्‌ बेसीमा बर-पीपलको बोटमूनि चौतारीमा बसेर भानुभक्तबाँसको सृप्तोले पड्खा हम्कदैद्वन्‌ । चौतारीमाथि बारीकोकान्लामा एकजना घाँसी घाँस काटिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
घाँस काट्दाकाट्दै भानृभक्तलाई हेर्दै सोध्छन्‌ - भानुभक्तबाजे, कताबाट पाल्नु भो ?&lt;br /&gt;
मलाई तिमीले चिन्याका छौ ? मैले त चिनिन नि तिमीलाई ।मलाई चिन्नुभा रै&#039;नछ । मैले त चिन्याको छु बाजेलाई ।श्रीकृष्ण पण्डित बाजेको नाति हैन ? गाउँको घर रम्घामाछ, बेसीको घर चेँदीबेसीको पुरानो डिहीमा ।&lt;br /&gt;
तिमीलाई मैरा बारेमा सब कुरा थाहा रहयाछ । तिम्रो घरकता ति ?&lt;br /&gt;
हातले टाढा देखाउँदै - क त्यै पारित होनि।&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
११३&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
भानु भक्त&lt;br /&gt;
भातृभक्तघाँसी&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
११४&lt;br /&gt;
क्या काम गर्छौतनि?&lt;br /&gt;
काटेको घाँस हातमा लिई बारीको कान्लोबाट तलतिरफ्दै - देखिहाल्न्‌ भो नि । घाँस काट्न्या काम गर्छु ।घाँस दिन सक्या गाई पनि खुसि हुन्या । गाई भन्याकीनक्ष्मी हुन्‌ ।&lt;br /&gt;
लक्ष्मी खुसी पारेर धन पनि त निकै जम्मा गर्‌याका होउलानि?&lt;br /&gt;
क्या जम्मा गन्याँ भन्नु खै, सुख-दुख गुजारा चल्याकै छ ।बचाएर अलिकति घन जम्मा गर्‌याको थियाँ । त्यो पनिघर्मको कार्यमा लगायौ ।&lt;br /&gt;
- भानुभक्त टोलाएर सुनिरहन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
घाँसी तलतिर ओलंदै - मरेर जाँदा कतैले श्रीसम्पत्ति आफूसँगलाँदो रै&#039;नछ । मरेपछि आफूसँग जान्या त यही पाप रपुण्य । जति धन भया पति क्या गर्नु, राम्रो काममालगाउन नसक्या ?&lt;br /&gt;
क्या काममा लगायौ त कमायाको धन ?&lt;br /&gt;
डोको लिएर ओलंदै - गाउँको नजिकै बटुबाहरू हिड्न्याबाटो पारेर एउटा कवा खनायाँ । बाटो हिड्त्या बट्वाहरूलेयाक्या बेलामा प्यास लागेर त्यौ कुवाको पानी सिकेर खाँदामलाई कसो नसम्कलान्‌ त ? धर्मको ठाउँमा धर्म, नामकोठाउँमा नाम ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त एकाग्र भएर सुनिरहन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
घाँसी डोको बोकेर चौतारीतिर आउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
म मरेर गयापछि पत्ति त्यो कुवा छउञजेल मेरो नाम कसोनलेलान्‌ त ? नाम बाँचिञ्जेल मान्छेलाई मत्यो भन्नु हुन्न ।आफू मरेर गयापछि पनि आफ्नो नाम रहिरहोस्‌ भन्न्याचाहना हुँदो रह्याछ मानिसलाई । मेरो कुरा कस्तो लाग्योत बाजेलाई ?&lt;br /&gt;
टोलाउँदै - मनासिब भन्यौ । तिमीले कति पढ्याका छौ ?कत्ति न कत्ति । यही घाँस, दाउरा; यही हो हामीले पढ्याको ।&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
भानुभक्तघाँसीभानुभक्तघाँसी&lt;br /&gt;
भानुभक्तघाँसीभानुभक्तघाँसी&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
नपढ्याको भया यति कुरा कसरी जान्यौ त ?&lt;br /&gt;
तपाईं जस्ता पढ्या-लेख्याका मानिसहरूको कुरा सुनेर ।तिमीले नपढेर क्या गर्नु, मलाई पढायौ ।&lt;br /&gt;
घांक्ती जिल्ल पर्छ ।&lt;br /&gt;
आफू मरेर गयापछि पनि पछिसम्म कीर्ति रहन्या काम&lt;br /&gt;
गर्नुपर्छ भनेर सिकायौ ।&lt;br /&gt;
चौतारीमा भानुभक्तको छेउमै बस्दै- अब बाजे त्यस्तो क्याकाम गर्नुहुन्छ त ?&lt;br /&gt;
तिमी नै भन न क्या गरेँ ?&lt;br /&gt;
तपाईं कति वर्ष ?&lt;br /&gt;
२७ वर्ष ।&lt;br /&gt;
कतिसम्म पढ्न्‌ भयाको छ ? तपाईंका बाजेलाई त पण्डितहरूगणपतिकै अवतार भन्थ्या ।&lt;br /&gt;
मैले संस्कृत अतिअलि पढ्याको छु ।&lt;br /&gt;
पुराण खुल्याको छ कि छैन ?&lt;br /&gt;
दुईचारचोटि बाँच्याको छु ।&lt;br /&gt;
उसौ भया, एउटा काम गर्नुहोस्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त प्रश्नतृचक चिन्ह अनुहारमा लिएर घाँतीलाई हेर्छन्‌ ।धर्मशास्त्रका करा, नीतिका करा, पुराणका क्रा सबैसँस्कृतमा लेख्याका छन्‌ । हामी जस्ताले बुस्दैनौं । पण्डितजीजस्तै पढ्या-लेख्याका मानिसहरूले मात्रै बुझ्न्या ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त सुनिरहन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
हामीजस्ता नपढ्याका मानिसहरूले पनि बृञ्न्या गरेरराम्राराम्रा सिलोक भय्ाको, सजिलो कथा पनि भयाको,अर्ती, शिक्षा पनि भयाको, धर्म पनि हुन्या, भाषा सिलोकमायौटा राम्रो पुस्तक लेख्नुस्‌ । तपाईंको पनि नाम हुन्याछ,दुनियाको पनि भलो हुन्याछ ।&lt;br /&gt;
: भानुभक्त स्तव्ध र किकर्तव्यविमूढ भएर सुनिरहन्छन्‌ र सोच&lt;br /&gt;
मग्न हुन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
: घाँसी घाँसको भारी उठाउछ । भानुभक्त डोको उचालिदिन्छुन्‌ ।&lt;br /&gt;
११५&lt;br /&gt;
घाँसी बाटो बारछ । भानुभक्त आफूनो भावना सस्बर व्यक्तगर्छन्‌ -भानुभक्त » भर्‌जन्म घाँसतिर मन्‌ दिइ धन्‌ कमायो ।नाम्‌ क्यै रहोस्‌ पछि भनेर कृवा खनायो ॥घाँसी दरिद्रि घरको तर बृद्धि कस्तो ।म भानुभक्त धनि भ्रैकन आज यस्तो ॥१॥।भानुभक्त गाउँदा गाउँदै चौतारीको छेउको ढुङ्गामा बस्चन्‌ रसोचमरन हुन्छन्‌ । फेरि गाउँछन्‌ -मेरा इनार न त सत्तल पाटि क्यै छन्‌ ।जे धन्‌ र्‌ चीजहरू छन्‌ घरभित्र नै छन्‌ ॥घाँसी पारिपड्डि उकालो चढिरहेको हुन्छ र भानुभक्तगाइरहेकै हुन्छन्‌ ।यस्‌ घाँसीले कसरी आज दिएछ अर्ती ।धिक्कार हो मकन बस्नु नराखि कीर्ती ॥२।&#039;गीतको अन्तिम पाउ गाउँदै भानुभक्त परिद्श्यबाटबाहिरिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“भानुभक्तको फुटकर कबिता,सम्बाद बालकृष्ण समको भक्त भानुभक्तबाट साभार ।&lt;br /&gt;
११६ आदिकवि भातृभक्त&lt;br /&gt;
दृश्य ५७&lt;br /&gt;
। || त&lt;br /&gt;
वि.सं. ! पैदश्‌द&lt;br /&gt;
स्थान : रम्घा, शिखरकटेरीको सुत्ने कोठासमय : राति&lt;br /&gt;
पा : भानुभक्त र चन्द्रकला&lt;br /&gt;
कोठामा दुईवटा खाट छन्‌ । एउटामा भाब्‌भक्त र अर्कोमाचन्द्रकला सुतेकी छिन्‌ । आखी रुयालबाट चन्द्रमाको मधुरोप्रकाश कोठाभित्र छिरेको छ । बाहिर श्याउकिरीहरूकराएको आवाज एकनात्तले भाइरहन्छ । चन्द्रकलानिदाइसकेकी छिन्‌ । भानुभक्त भने निदाउन तक्दैनन्‌ । छटपटीभई ओल्टे-कोल्टे गर्छन्‌ र फेरि उत्तानो परेर दलिनतिरहेर्छन्‌ । क्यामरा भानुभक्तको नजिक-नजिक हुँदै जान्छ,भानुभक्तको कानमा घांसीको आवाज प्रतिध्वनित हुन्छ -&lt;br /&gt;
“हामीजस्ता नपढ्याका मानिसहरूले पनि बुरुत्या गरेरराम्राराम्रा सिलोक भयाको, सजिलो कथा पनि भयाको,अर्ती, शिक्षा पनि भयाको, धर्म पनि हुन्या, भाषा सिलोकमायौटा राम्रो पुस्तक लेख्नुस्‌ । तपाईँको पनि नाम हुन्याछ,&lt;br /&gt;
पटकया ११७&lt;br /&gt;
११८&lt;br /&gt;
दुनियाको पनि भलो हुन्याछ ।”&lt;br /&gt;
भानुभक्त उठेर खाटमा बस्छन र पूराना कुरा सम्झन्छन्‌ ।क्यामरा उनको अनुहारमा केन्द्रित हुँदै जान्छ । नेपथ्यबाटबाजे श्रीकृणको आवाज आउँछ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
आबिकबि भानुभक्त&lt;br /&gt;
विसं : पददद१&lt;br /&gt;
स्थान : रम्घा, चौतारीसमय : दिउसोपात्न : श्रीकृष्ण र किशोर भानुभक्त&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण चौतारीको रुखमा अडेस नागेर आध्यात्म रामायणकाकिताब पढ्दैछन्‌ । भानुभक्त एकाचत्त भएर बाजेले पढेकोसनिरहेका छन्‌ ।श्ीकषण &amp;quot; ततोराम स्वयं प्राह: हनुमन्तमुपस्थितम्‌ ।श्रृणृतत्व प्रवक्षामि हयात्मानात्म परात्मनाम्‌ ॥भानुभक्त गालामा हात लाएर सृनिरहछन्‌ ।० आध्यात्स रामायणतर्फ डड्ति गर्दै - मयाँदा पुरुषोत्तम श्रीरामकोपावन गाथा, यसले भक्ति-मार्गतर्फ डोच्याउन्याछ ।भानुभक्त &amp;quot;० जिबा, यस्तो उत्तम कृति त भाषामै लेखिन्‌ पर्न्या ।श्रीकृष्ण ” ठूलो भय्यापछि तैंले कोसिस गर्नू । मह्दायज्ञ गन्या सरह ... ।वाक्य प्रा नहुँदै दश्य समाप्त हन्छ ।दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
र&lt;br /&gt;
आध्यात्म रामायणच्राट&lt;br /&gt;
पटकथा ११९&lt;br /&gt;
वि.संस्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
१२०&lt;br /&gt;
दृश्य ५९&lt;br /&gt;
बद्च्द्&lt;br /&gt;
रम्घा, सृत्नेकोठा&lt;br /&gt;
राति&lt;br /&gt;
भानुभक्त र चन्द्रकला&lt;br /&gt;
भानुभक्त पृनःयधास्थितिमा फर्कन्धधन्‌ । उनको कानमा दृश्य५८ मा श्रीकृष्णले बोल्दै गरेको वाक्यको अन्तिम अंशगृञ्जन्छ ।&lt;br /&gt;
..-पुण्य हुन्याछ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त फेरि सुत्दछन्‌ । नेपथ्यमा क्र्याउँकिरीको एकोहोरोआवाज आइरहन्छ । भानुभक्त निदाउँछन्‌ । म्यामरा वजिकिदैज्ञान्छ र भानुभक्तको अनुहारमा गएर स्थिर हुन्छ ।सपनामा भानुभक्तले भगवान्‌ श्रीराम र तीता माईलाईदेख्छन्‌ । राम र सीताले मन्दम्‌स्कानसहित हात उठाएरआशीचबाँद दिन्छन्‌ । भानुभक्त निदाइरहेका हुन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
आदिकवि भातुभक्त&lt;br /&gt;
वि.सं.स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
१; पैपशद&lt;br /&gt;
: रम्घा, शिखरकटेरी&lt;br /&gt;
2: बिहान&lt;br /&gt;
: भानुभक्त, चन्द्रकला र्‌ गोठालो&lt;br /&gt;
मिरमिरे बिहानीमा रस्घाका डाँडाकाँडा र जङ्खलका साथैकुइरोले ढाकेको बेसीफाँटलाई फन्को लगाउँदै क्यामराघुम्छ । चराहरू चिरबिराइरहेका छन्‌ । भानुभक्तको आवाजमाअध्व्यात्म रामायणको श्लोक प्रतिध्वनित हुन्छ -कदाचिन्नारदो योगी परानुग्रह काङ्क्षया ।&lt;br /&gt;
: क्षालको रुखका पातहरूको कापकापबाट सूर्यकिरण चिहाउँछ&lt;br /&gt;
भानुभक्त ”»&lt;br /&gt;
र कुहिरोमा बुँदा पार्दै तरदैजान्छ । वित्तारै भानुभक्तको शिखरकटेरीको घर-आँगन देखापर्छ । आँगनको अग्रभागमा चन्द्रकलातुलसीको पूजा गरिरहेकी छिन्‌ । पिढीमा भानुभक्त आध्यात्मरामायण सस्बर पढदैछन्‌ -&lt;br /&gt;
पर्यटन्‌ सकलान्‌ लोकान्‌ सत्यलोकमुपागमत्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त आध्यात्म रामायणको भापादुवाद गर्वथाल्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&amp;quot;आध्यात्म रामायणबाट&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
१२१&lt;br /&gt;
क्यामरा नजिकिवै जान्छ । भानुभक्त लेख्न थाल्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
गोठालो आँगनको एक छेउमा दाउरा चिरिरहेको हुन्छ ।&lt;br /&gt;
चन्द्रकला पूजा सकेर घरतर्फ फर्कित्छित्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त भरखरै लेखिसिध्याएको रामायणको श्लोक पढ्दछन्‌ -भानुभक्त ० एकदिन्‌ तारद सत्यलोक्‌ पृगिगया लोकको गरेँ हित्‌ भनी ।&lt;br /&gt;
चन्द्रकला उभिएर रामायण बाचन सून्छिन्‌ । भानुभक्त पढ्छन्‌ -&lt;br /&gt;
« ब्रहमा ताहिँ थिया पन्या चरणमा खसी गराया पनि ॥चन्द्रकला घरभित्र पस्छिन्‌ । भानुभक्तको वाचनकस&lt;br /&gt;
जारिरहन्छ -क्या सोध्छौ तिमी सोध भन्छु म भनी मर्जी भयाथ्यो जसै ।ब्रह्माको करुणा बुझेर क्रषिले बिन्ती गन्या यो तसै ॥१॥&amp;quot;भानुभक्त फेरि लेख्न थाल्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“आनुभक्त रामायणबाट&lt;br /&gt;
१२२ आविकवबि भानुभक्त&lt;br /&gt;
बि.सं : पैदश्द&lt;br /&gt;
स्थान : रम्घा, चौतारीसमप : दिउसोपात्र : भानुभक्त&lt;br /&gt;
आफ्नो किशोरावस्थामा ।दुश्य न ४८ मा) श्रीकृष्णले आध्यात्मरामायण सुनाएको चौतारीको रुखसुनि बसेर भानुभक्तबालकाण्ड लेढ्ने कमलाई अगाडि बढाइरहेका छन्‌ । अगिल्तिरपहेंलो कपडामा आध्यात्म रामायणको मूल प्रति तथा भानुलेभाषान्‌वाद गर्दैगरेको बालकाण्ड राखिएको छ । हातमाबालकाण्डको एउटा पातो छ । रुखको मध्यभागबाटक्यामरा तर्दै जान्छ र बिहङ्डम भएर बालकाण्ड पाठगरिरहेका भानुभक्तलाई समेट्दछ ।भातुभत्त &amp;quot; हे ब्रह्मा जति हुन्‌ शृभाशुभ सबै स्‌नी रहयाछु कछु ।बाँकी छैन तथापि सुन्न अहिले इच्छा म यो गर्दछु ॥आकङला जबर यो कली बखतमा प्राणी दुराचार्‌ भई ।गर्न्याछन्‌ सब पाप अनेक तरहका नीचका मतीमा गई ॥&amp;quot;&lt;br /&gt;
॥ भानुभक्तको रामायणबाट&lt;br /&gt;
पटकथा १२३&lt;br /&gt;
साँचो बात गरैन कोही अरुकै गर्नन्‌ त निन्दा पनि ।अर्काको धन खानलाई अभ्चिलाष गर्नन्‌ असल्‌ हो भनी ॥&lt;br /&gt;
: एकान्त र निर्जन बनको बीचमा भानुभक्तको आवाजसँगै&lt;br /&gt;
कोइलीको कहकह र चराहरूको चिरबिरी मिलिदै जान्छ ।भानुभक्त रुखमुनिबाट उठ्दछन्‌ र हातमा लेखोट लिएर अगाडिसस्वर पढ्दछुन्‌ -&lt;br /&gt;
कोही जन्‌ त परस्त्रिमा रत हनन्‌ कोही त हिंसामहाँ ।देहैलाई त आत्म जानी रहनन्‌ नास्तिक पश्‌ झै तहाँ ॥&#039;&lt;br /&gt;
: रेलोकको अन्तमा भानुभक्त परिद्श्यबाट बाहिरिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“भानुभक्तको रामायणबाट&lt;br /&gt;
१२४&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
वि.सं.स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
चन्द्रकला&lt;br /&gt;
१८९८&lt;br /&gt;
रम्घा, शिखरकटेरीको सुत्ने कोठा: रातिभानुभक्त र चन्द्रकलाबालकाण्ड लेखनको अन्त्यमा भावृभक्त आफूले लेखेको श्लोकसस्वर पढ्दैछन्‌ । भुईओछ्यानमा बतेकी चन्द्रकला बत्तीकात्दै सुतिरहेकी छित्‌ ।सीताराम्‌ अघि तप्‌ गरिन्‌ र त यहाँ छौरा बुहारी भया ।चन्द्रकला भान्‌भक्ततर्फ हेर्दछिन्‌ ।कौसल्याकन ता मिल्यो अदितिको शोभा सबै ताप्‌ गया ॥सीताराम्‌ पति लोकमा सकलको आनन्द मड्डल्‌ गरी ।चेष्टा मानिसको गरीकन रहया त्रैलोक्यका नाथ हरी ॥&#039;भानुभक्त पूनः लल्ख्न थाल्दछन्‌ ।० बत्ती कात्न छोडेर - अङ्गै सकियान ?&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
“आनुभक्तको रामायणबाट&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
१२५&lt;br /&gt;
भानुभक्त चन्द्रकलातर्फ हेर्दछन्‌ ।» आधा रात भै सक्यो ।भानुभक्त ० अन्तिम शब्द लेख्दै- इतिश्वी बालकाण्डभाषा सम्पूर्णम्‌ शुभम्‌ ।बालकाण्डको लेखोटको अन्तिम पानो देखिन्छ ।% वल्ल बालकाण्ड सकियो ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
१२६ आविकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
दृश्य ६३&lt;br /&gt;
वि.सं. १९०१&lt;br /&gt;
स्थान तारुका, गजाधरको घर-आँगन&lt;br /&gt;
समय राति&lt;br /&gt;
पात्र भानुभक्त, भरिया, गजाधरकी घरबुढी र बुहारीभरियालाई पछि लगाएर भावुभक्त टाढाबाट राजाधर सोतीकोघरतर्फ आउँदै गरेको दृश्य खुल्छ । घरको नजिक आइपुगेपछिभानुभक्त उभिएर अगिल्तिर हेर्छन्‌ ।गजाधरको घर देखिन्छ । चकमन्न बातावरणमाफ्या्उकिरी कराएको एकोहोरो आवाज आइरहन्छ । घरकोमृलढोकाबाट बत्तीको मधुरो प्रकाश पिंढीसम्म छरिएकोछ । चन्द्रमाको उज्यालोमा बाहिरको सबै दृश्य देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त » भरियासँग - यै हैन त घर ?&lt;br /&gt;
भरिया &amp;quot; घरतिर हेर्दै - हो हजुर, यही हो ।दुवैजना अगाडि बढ्दछन्‌ ।भरिया पिढीमा भारी बिसाउँछ । भानुभक्त दौराको फेरलेप॒सिना पृछ्न थाल्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
पटकथा १२७&lt;br /&gt;
बुहारीभानुभक्तघरबुढीबुहारी&lt;br /&gt;
घरबुढी&lt;br /&gt;
घरबुढीभानुभक्तघरबढीभानुभक्तघरबढी&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
घरबृढीभरिया&lt;br /&gt;
घरबुढी&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
१२८&lt;br /&gt;
 &amp;quot;-&lt;br /&gt;
आगनको विपरीत दिशाबाट बुहारी हातमा फर्सीको कैँडोलिएर आउँदै हुन्छिन्‌ । नचिनेको मानिसलाई देखेर बुहारीअलमल्ल पछिंन्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त बसेको ठाउँबाट उठ्छन्‌ र बुहारीतर्फ हेर्छन्‌ ।कहाँबाट आउन्‌ भयाको ?&lt;br /&gt;
चँदीबेसीबाट आयाको ।&lt;br /&gt;
घरभित्रबाट - को हँ, त्यहाँ बाहिर ?&lt;br /&gt;
ढोकातिर मुख फर्काएर- यहाँ बाहिर पाहता आउन्‌ भयाको छ।घरबृढी घरबाहिर निरिकन्छिन्‌ र बुहारीतर्फ हेर्दै सोध्छिन्‌ -को पाहुना यो साँरुको बेलामा ?&lt;br /&gt;
: बृहारीबाट उत्तर नआएपछि अर्कोतिर फर्कन्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त उभिएका देखिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्तसँग -तपाईं को ? कहाँबाट आउनु भयाको ?गजाधरज्य्‌ हुनुहुन्छ ?&lt;br /&gt;
हुनुहुन्न ।&lt;br /&gt;
छोरा शिवलाल नि ?&lt;br /&gt;
क पनि बाबसँगै गयाको छ । भोलिमात्रै आइपुग्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
ए, यताबाट जाँदा बाटो नकाटनु है, म कहाँ बस्नुपर्छ भन्नुभयाको थ्यो- गजाधरज्यूले । उहाँहरू हुनुहुँदौ रहयानछ ।आज एक रातलाई यहीँ बास बस्नपाया हुन्या थियो ।चिन्नु न जान्नु, क्याको बास ?&lt;br /&gt;
अगाडि बढेर - कास्तो नचिन्नु भा&#039; बज्यैले । उहाँ भानुभक्तबाजे क्या, रम्घा-चुँदीबेसीका श्रीकृष्ण पण्डितका नाति ।श्रीकृष्णका नाति हुन्‌ कि विष्ण्‌का नाति हुन्‌ । मैले चिन्याकोपनि छैन । जहाँ चिन्याको छ उही जान्‌ माग्न बास ।भानुभक्त सोचमग्न हुन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
: बुहारी पनि केही बोल्न सक्दिनन्‌ ।&lt;br /&gt;
यही पिंढीमा भया पनि बस्छौं आज एकरातलाई ।खाने करा हामी आफैंले त्यायाका छौ । एक अडखोरापानी र एउटा गुन्द्री दिनु भया पुग्छ ।&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
घरबृढी&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
बुहारी&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
भरिया&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
हात नचाउँदै - क्र्यान बस्दैनथ्यौ त पिंढीमा ? चिन्नु नजात्न्‌ घचेडिमाग्नु । आइमाई मात्र भयाको घरमा कस्लेदिन्छ त बास तिमीहरू जस्ता लाठेहरूलाई ? ल, गै हाल ...,गै हाल ।&lt;br /&gt;
अप्ठ्यारो अनुहार लगाउँदै भरियासँग - जाउँ हिड्‌ ।भरिया भारी उठाउँछ ।&lt;br /&gt;
सासू घरभित्र प॒सितकेपछि भानुभक्तसंग -आज एकरातलाईक पर ढिकीको छाप्रोमा बस्नोस्‌ न । बरु हल्ला चाहिँनगर्नुहोला ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त सुनिरहन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
भोलि सबेरै जानुहोला ।&lt;br /&gt;
आनुभक्त &#039;हस्‌&#039; भन्ने अर्थमा टाउको हल्लाउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
यस्तै हो, सास्‌ अलि कचक्चे हुनुहुन्छ । म एकछिनपछिपानी र गुन्द्री ल्याइदिउँला ।&lt;br /&gt;
बुहारी भरभित्र पर्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
भरिया भारी बोक्दै पोको उठाउँछ र दुबैजना ढिकी भएकोछाप्रोतर्फ लारदछुन्‌ ।&lt;br /&gt;
: ढिकी भएको छाप्रोमा दुवैज्ञवा पस्दछन्‌ । भरिया ढिकीको&lt;br /&gt;
छेउमै डोको बिसाउँछ ।&lt;br /&gt;
सुइय...&#039; गरेर छेउको काठमा बस्दै- सारै थकाइलाग्यो ।ग्रस्तैमा भया पनि निन्द्रा त लाग्ला । ल, काम्लो ओछ््या ।हातले डोको समाएर - गजाधघर बाजे भयाको भया कत्रोसम्मान हुन्थ्यो । चिउरा र छोप छ, त्यही खानु पर्ला । बरुनानीले पानी पो कहिले ल्याइदिन्या हुन्‌ ।&lt;br /&gt;
डोको सार्ने खोज्दा डोको ढल्छ र ढिकीको पृच्छ्रमालाग्छ । ढिकीको मुसल भएको अंग्रभाग उचालिन्छ ।ढिकी उचालिएकाले भानुभक्त आत्तिएर उठ्छन्‌ । उचालिएकोढिकीको मुसल तलतिर ओखलमा खसेर बजारिन्छ र &#039;ढवाड्रठूलो आवाज आजउ्छ ।&lt;br /&gt;
भरिया र भानुभक्त डरले &#039;बित्याम पच्यो, अब के गर्ने ?&#039;&lt;br /&gt;
१२९&lt;br /&gt;
भरियाघरब्‌ढी&lt;br /&gt;
घरबढी&lt;br /&gt;
भरिया&lt;br /&gt;
घरब्‌ढी&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
१२०&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
भन्ने भावसहित मुखामुख गर्छन्‌ ।मार्ने भईं बुढीले ।घरभित्रबाट आवाज आउँछ -को हँ, बाहिर ?&lt;br /&gt;
: भानुभक्त र भरिया मृखासख गर्छन्‌ ।: हातमा दुकी लिएर घरब्‌ढी घरभिव्रबाट निस्किन्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
बुहारी पनि पछिपछि आउँछिन्‌ ।&lt;br /&gt;
: भानृभक्त र भरियाको अनुहारमा बिस्तारै दकीको उज्यालो&lt;br /&gt;
बढ्दैजान्छ । भानुभक्त डराउँदै बिस्तारै टाउको फर्काएरहेर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
- रौत्र रूप लिएर घरबुढी अगाडि उभिएकी हुन्छिन्‌ ।- भानुभक्त र भरिया टाउको निहराउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
घरबुढी आंखा तर्दै, ओठ कमाउदै हेर्छिन्‌ ।: भानुभक्त टाउको उठाएर हेर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
बृहारीपट्टि फर्किएर - यितीहरू ठीक मान्छे हैनन्‌ भन्त्यामलाई अगि नै लागिसक्याथ्यो ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त सूनिरहन्छुन्‌ ।&lt;br /&gt;
ल हेर, कसो रैछ त ? असल मान्छै भ्याका भया अर्काकोघरमा हुँदैन भन्यापछि यसरी चोर लक्याको जसरी बस्थ्या त ?प्रतिवाद गर्दै - आज एक रात हामी यहाँ बसेर तपाईंकोक्या बिग्रन्थ्यो त ? भोलि बिहान त गै हाल्थ्यौं नि।भरियालाई दपेट्दै - अफ बढ्ता बोल्छस्‌ । आइमाईमात्रभयाको घरमा बस्न दिन्न भन्यापछि तेरो क्या को कर ?तेरो सम्पत्ति हो कि क्या हो ? गइहाल्‌ । अहिल्यै गइहाल्‌ ।भरियापड्टि फर्कदै - भैगो, हिड्‌ जाउँ ।&lt;br /&gt;
: घरबुढी रित्ताएर दुबैलाई हेरिरहन्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
भरिया भारी बोग्छ ।भानुभक्त पोको उठाउँदै गजाधरकी घरबुढीसँग - बस्नोस्‌ है ?&lt;br /&gt;
- भानुभक्त र भरिया दुवै परिदृश्यबाट बाहिरिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
वि.सं.स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
पटकया&lt;br /&gt;
१९०१&lt;br /&gt;
तारुका, चौतारी&lt;br /&gt;
बिहान&lt;br /&gt;
भातृभक्त, भरिया, काशीनाथ र तीतजना केटा&lt;br /&gt;
भोलिपल्ट बिहान भानुभक्तले रात बिताएको चौतारीकोपीपलको रुखबाट दृश्य ओलदैजान्छ र सम्पूर्ण चौतारीलाईविहड्डम रूपमा समेददछ । भरिया ओखछ्यान बेर्दै हुन्छ ।भानृभक्त कागजमा केही लेखिरहेका हन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
चारजना बालक अलि परको रुखमुनि हातेमालो गरेरवृत्ताकारमा घुम्दै खेलिरहेका हुन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त लेखिसिध्याएर बालकहरूतर्फ हेर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
बालकहरू खेलिरहेकै हुन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त हातको इसाराले बालकहरूलाई डाक्दछन्‌ ।बालकहरू खेल्न छोडेर भानुभक्तलाई हेर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त हातको इसाराले फेरि डाक्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
बालकहरू भानुभक्ततर्फ दगुर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
भरिया भारी कस्दै हुन्छ ।&lt;br /&gt;
१२१&lt;br /&gt;
१२३२&lt;br /&gt;
बालकहरू दगुदैं भानुभक्तको अगाडि आएर उभिन्छन्‌ ।बालकहरू भानुभक्तलाई हेर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त केही क्रा पढ्दछन्‌ । बालकहरू दोहो-्याउँछन्‌ ।बाजाले छोपेको हुनाले भानुभक्तले सिकाएको र बालकहरूलेतिकेको क्रा सुनिदैन ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त सिकाइरहन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
बालकहरू बोहोजयाउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त फेरि सिकाउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
: बालकहरू भानुभक्तले सिकाएको कुरा दोहो-्याउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त काशीवाथलाई आफूले विकाएको कागजको लेखोटदिन्छन्‌ र अर्को कागज उत्को भोटोको तनोमा बाँचीभरियाको पछिपछि बाटो लाग्दछन्‌ । बालकहरू पनि कागजहेर्दै परिद्ष्यबाट बाहिरिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभत्त&lt;br /&gt;
वि.सं.&lt;br /&gt;
१९०१स्थान : तारुका, गजाधरको घर-आँगनसमय ; बिहानपात्र : गजाधर, घरबृढी, शिवलाल, काशीनाथ र तीनजना केटाहरूढिकीको छाप्रोसँगैको टौबामा अड्याइएको लिस्नोमा चढेरकाशीनाध भानुभक्तले दिएको लेखोट हेर्दै सस्वर गाउँछन्‌-काशीनाय ०” गजाधर्‌ सोतीकी घरबुढि अलच्छिन्‌कि रहिछन्‌ ।केटाहरू दोहोच्याउ्छन्‌ -» गजाघर्‌ सोतीकी घरबृद्धि अलच्छिन्‌कि रहिछन्‌ ॥हात तेस्याँउदै घरतर्फ देखाउँछन्‌ -काशीनाथ » नरक जानालाई सबसित बिदाबादि भइछन्‌ ।केटाहरू &amp;quot; नरक्‌ जानालाई सबसित बिदाबादि भइछन्‌ ।घरभित्र अंगेवामा मकै भृटिरहेकी घरबुढी कविता सुतेरकान ठाडाठाडा पार्छिन्‌ ।काशीनाथ : टौवाबाट ओर्लेर घरतिर अगाडि बढ्दै -० पुग्यौं साँस्मा तिन्‌का घरपिंढिमहाँ बास गरियो ।साथीहरूलाई पनि अगाडि बढ्ने इतारा गर्छ ।पटकथा १३३&lt;br /&gt;
केटाहरूकाशीनाथकेटाहरू&lt;br /&gt;
समहस्वर&lt;br /&gt;
समूहस्वर&lt;br /&gt;
घरबृढी&lt;br /&gt;
गाजाधरघरबृढी&lt;br /&gt;
काशीनाथ&lt;br /&gt;
घरबुढी&lt;br /&gt;
» पुग्यौं साँझ्मा तिनका घरपिढिमहाँ बास गरियो ।&lt;br /&gt;
» निकालिन्‌ साँझ्ैमा अलिक पर गुज्चान गरियो ।&lt;br /&gt;
निकालिन्‌ साँझैमा अलिक पर गृज्ञान गरियो ॥&lt;br /&gt;
मकै भुटीरहेकी घरबृढी काशीनाथ र केटाहरुले गाएको&lt;br /&gt;
सुन्छिन्‌ र मकै भृदन छोड्रेर कान ठाडाठाडा पार्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
» गजाधर्‌ सोतीकी घरबृद्धि अलच्छिन्‌कि रहिछन्‌ ।काशीनाथ र केटाहरू घरतिर हेर्दै आँगनमा आइरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
- घरबृढी हातमा लठ्ठी लिएर बाहिर पिढीमा निस्कन्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
» नरक जानालाई सबसित बिदाबादि भइछन्‌ ।&lt;br /&gt;
गजाधर र शिवलाल बारीको डिलैडिल घरतर्फ आउँदैछन्‌ ।&lt;br /&gt;
गीत उनीहरूको कानमा पर्छ ।&lt;br /&gt;
नरकै जानालाई.... ।&lt;br /&gt;
: बालकहरू घरब्‌ढीलाई देखेर जिस्क्याउँदै गाउँछन्‌ -&lt;br /&gt;
ष सबसित बिदावादी भइछन्‌ ॥&amp;quot;&lt;br /&gt;
: शिवलाल वाल्ल परेर तमासा हेर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
० लठ्ठी उठाएर बालकहरूलाई नखेददै - मलाई पोसत्तोसराप गर्दा रहयाछन्‌ । नमारी छोड्दिन ।&lt;br /&gt;
2 बालकहरूलाई लखेद्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
भारदैगरेको काशीनाधलाई समातेर जगल्ट्याउदै - ए मोरा,&lt;br /&gt;
कस्ले सिकायो यो सिलोक तँलाई ?&lt;br /&gt;
» ए, भो भो नगर नातिलाईं, क्या भो ? क्यान बौलाएकी ?&lt;br /&gt;
नातिलाई छोडिदिदै - म बौलाएँ कि यिनीहरू बौलायाका&lt;br /&gt;
हुन्‌ । मेरै सिलौोक जौडीजोडीकन मलाई गाली गर्न पाउँछन्‌&lt;br /&gt;
त यी मोराहरूले ?&lt;br /&gt;
: शिवलाल अमिलो मुख लगाएर आमालाई हेर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
० नातिलाई - भन्‌ ए मोरा, कस्ले सिकायो तँलाई ?&lt;br /&gt;
० क तल पिपलबोटमुनि बस्न्या मान्छैले सिकायाको त होति। कस्तो राम्रो छ।&lt;br /&gt;
५ हुन्छ मोरा राम्रौ । तेरी बज्यचैकौ सराध्ये गन्या&#039;छ ।&lt;br /&gt;
“भानुभक्तको फुटकर कविता ।&lt;br /&gt;
१२४&lt;br /&gt;
आदिकवि भातुभत्त&lt;br /&gt;
गजाधर&lt;br /&gt;
घरबुढी&lt;br /&gt;
७&lt;br /&gt;
पाजाघर्‌&lt;br /&gt;
गजाघर्‌&lt;br /&gt;
घरबुढी&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
गजाधर उत्सुकता जाहेर गर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
: काशीवाध तुवामा झून्ड्याएको चिठी गजाधरलाई दिन्छ ।&lt;br /&gt;
गजाधर चिठी पढ्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
घरब्ढी मत गपरेको अनुहार लगाएर हेर्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
चिठी पढिसकेपछि घरबुढीलाई सम्बोधन गर्दै - भानुभक्तआचार्य आयाका थिया ?&lt;br /&gt;
कुन्नि, भानुभक्त हो कि सानुभक्त हो, हिजो राति आयाकाथिया । स्वास्नीमानिसमात्र भयाका घरमा कस्ले बास दिन्छती लाढेलाई, निकालिदियाँ मैले त ।&lt;br /&gt;
शिवलाललाई सम्बोधन गर्दै - हेर, विचरा भानुभक्तकलाधरलाई गायत्रीको मन्त्र सुनाउन भोर्लेटारतिर जानलाग्यारहयाछन्‌, तेरी आमाले बासै नदिई घपाइबिइछ ।&lt;br /&gt;
घरबुढी रिसाएको अनुहार लिएर सुनिरहन्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
अनि रातभरि पिपलको रुखमुनि बास बसेर गयाछन्‌ ।कस्ती दुष्ट तेरी आमा ।&lt;br /&gt;
: घरब्‌ढी सुनिरहन्छिन्‌ ।- शिवलाल कुनै प्रतिक्रिया जनाउन सक्दैनन्‌ ।&lt;br /&gt;
आइमाईमात्र भयाका घरमा कस्ले बास दिन्छ त त्यस्ताभुस्तिघेहरूलाई । ज्ञे गरेँ, ठीक्कै गरेँ ।फन्किएर परिद्श्यबाट बाहिरिन्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
१२२&lt;br /&gt;
वि.सं : १९०६&lt;br /&gt;
स्थान : पाल्पा, घनञ्जयको कोठासमय : रातिपात्र : घनञ्जय र वीरमान&lt;br /&gt;
: वीरमान चिलिसमा आगो फूक्दैछ । धनञ्जय चिठी कागजमा बेदैछन्‌।घनञ्जय » औँ, यो चिठी लिएर तँ रम्घा जा ।वीरमान ० हस्‌ ।धनञ्जय ० अनि ८६ सालमा रड्डनाथ गुर्ज्यूसँग हामीले लियाको बिर्ता छ नि?वीरमान &amp;quot; त्यही चेँदी फाँटको खेत हैत त ?धनञ्जय » हो । त्यही कागज आगलागीमा पत्यो । अब नयाँ कागजबनाउन्‌ पन्यो । भानुभक्तलाई नेपाल गएर कर्नेल शिवशड्र्‌घिमिरेलाई भेटी सल्लाह गर्नु भनेर...: बीरमान सुनिरहेको छ ।०... पत्रमा लेख्याको छु। यो चिठी भानुभक्तकै हातमा दिनु नि ।बीरमानलाई चिठी दिन्छन्‌ ।वीरमान ० हस्‌, म भोलि बिहानै भालेको डाँकमै जान्छु ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
१३६ आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
बि.सं.स्थातसमयपात्र&lt;br /&gt;
भानभक्त&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
१९०६&lt;br /&gt;
कान्तिपुर, बालाज्‌&lt;br /&gt;
दिउसो&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
पहिलो पटक कान्तिपृर आउने सिलतिलामा भानुभक्त बालाजुआइप्‌रदा प्राकृतिक सौन्दर्यबाट मर्ध हन्छन्‌ र ढुङ्टे धाराकोपानी टाउकोमा छकदै बाइस घाराबाट अगाडि बढ्दछन्‌ ।बालाजुको बाइसे धाराबाट दृश्य सुरुवात हन्छ ।&lt;br /&gt;
चराहरू चिरबिराइरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त फुलैफूलका पोध्चाहरूको बीचबाट हिड्दै सस्बरगाउँछन्‌-&lt;br /&gt;
यति दिन पछि मैले आज ब्रालाजि देख्याँ ।&lt;br /&gt;
पृथिवितल भरीमा स्वगं हो जानि लेख्याँ ॥&lt;br /&gt;
बालाजीको मूर्ति देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त बालाजीलाई नमस्कार गर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
झरना जङ्गलको बीचबाट हामफालिरहेको हुन्छ ।&lt;br /&gt;
१२३७&lt;br /&gt;
कुइरोले ढाकेको लहरै लहरा भएको जङ्गलमा चराहरूचिरबिराइरहेका हुन्छन्‌ ।० वरिपरि लहरामा कूलि बस्न्या चरा छन्‌ ।मधुर वचन बोली मन्‌ लिंदा क्या सुरा छन्‌ ॥भानुभक्त हिंड्दै पानी बगिहरेको तानो खहरेछेउ ढुड्टामाबस्दछन्‌ र गालामा हात लाउँदै मन्त्रम्‌ग्ध भएर गाउँछन्‌ -» यहाँ बसेर कविता यदि गर्न पाउँ ।यसदेखि सोख अरु थोक म के चिताउँ ?&amp;quot;भानुभक्त पट्कामा सिउरेको कागज र कलम रिक्ने उपकसगर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“भानुभक्तको फुटकर कविता&lt;br /&gt;
१२३८ आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
जहान&lt;br /&gt;
शिवशड्डरजहानशिवशड्डरजहानशिवशड्डरजहान&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
१९०६कान्तिपुर, कर्नेल शिवशङ्डरको बैठकदिउसो&lt;br /&gt;
कर्नेल शिवशङ्डर र उनकी जहात्त&lt;br /&gt;
कर्नेल शिबशङ्कर उर्दीको पोसाक फुकाल्ने कममा चाँदतोडाउतारिरहेका छन्‌ । दृश्य चादितोडाबाट खुल्दै र फुक्दै जान्छर उनकी श्रीमतीसमेतलाई परिदृश्यमा समेदबछ् ।शिबशङ्करबाट चादतोडा हातमा लिदै - दिउसो भानुभक्तआउनु भयाको रहयाछ । म पनि घरमा थिइन । जुठे मात्रैथियो घरमा ।&lt;br /&gt;
को भानुभक्त ?&lt;br /&gt;
उही रम्घाका खर्दार घनञ्जयका छोरा ।&lt;br /&gt;
ए, किन आयाका रहयाछन्‌ ?&lt;br /&gt;
पाल्पाबाट धनञ्जयको चिठी लिएर आयाका थिया रे।ए,&lt;br /&gt;
रइनाथ गुर्जुसँग भोगबन्धकी लियाको रम्घाको बिर्ताकोबारेमा कुरा गर्नु छ भन्थ्या भनेर जठेले स्‌नायाको मलाई ।&lt;br /&gt;
१२९&lt;br /&gt;
शिवशड्डर » खै त, धनञ्जयको चिठी ?जहान ० त्यो चिठी त छाड्यानछन्‌ । फेरि पछि आउँछु भन्याका छन्‌रे । आफूले चार हरप लेखेर छाड्याका रहयाछन्‌ ।&lt;br /&gt;
: चिठी दिन्छिन्‌ । शिवशङ्कर चिठी हेर्दछन्‌ । भानुभक्तकोआवाजमा चिठीको व्यहोरा गृञ्जन्छ -आयाध्यौँ मनका कुरा चरणमा रींजो गरौँ क्यै भनी ।: जहान उत्मुकताका साथ शिवशब्ररको हातको चिठीतर्फहेर्दछिन्‌ ।दशंन्‌ पाइन फर्किजान्छु अहिले हाँजिर्‌ जनाई अनि ॥: शिवशङ्गर मनमनै चिठी पढिरहेकै हुन्छन्‌ -» हीँडे घरतिर आज ता घर पुगी फर्कैर आई तब ।चिठीको लेखोट देखापर्छ -गन्थन्‌ पी मनका क्रा चरणमा बिन्ती गरौंला सब ॥&#039;&amp;quot;चिठी पढिसिध्याएपछि कर्नेल &#039;ए...&#039; भन्ने भावमा टाउकोहल्लाउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“भानुभक्तको फुटकर कबिता&lt;br /&gt;
पृष्ट आदिकवि भानुश्क्त&lt;br /&gt;
वि.सं : १९०६&lt;br /&gt;
स्थान : कान्तिपुर, बिभिन्न स्थानसमय : दिउसोपान्न : भानुभक्त, किशोरीहरू, भक्तजनहरु, जोगीहरू, कृषकहरू,&lt;br /&gt;
सिपाहीहरू तथा घोडचढीहरू&lt;br /&gt;
भानुभक्त रमणीय कान्तिपुरी नगरीलाई हेदैं घुमिरहेकाछन्‌ । कृमारीको कलात्मक घरबाट दृश्य ओलेदै रसदै जान्छ । भानुभक्त अगाडि बढ्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
डवलीबाट बिलम्बगतिमा परेवाहरू उँड्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
चारैतिर बिटमा चंद्ुबा फहराइरहेको मन्दिरको पाचतलेभवन देखापर्छ । त्यसको अगाडिबाट भानुभक्त बढ्दछन्‌ ।कलात्मक मन्दिरैमन्विरहरूको छानाबाट विलम्बगतिमा सयौँपरेवा उँड्दछन्‌ । भातृभक्त डबलीमा किनारबाट भित्रिन्छन्‌र खम्बातर्फ लाग्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त मन्त्रम्‌रध भएर टाउको घुमाएर हेर्दछन्‌ ।तलेज्‌को मन्दिरबाट दृश्य ओर्लन्छ र पर्खालबाहिरपाट्टि ढक्कीर छाप्रीमा पूजा सामान बोकेर मन्दिर जान हिडेका ६ जना&lt;br /&gt;
पटकथा १४१&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
१४२&lt;br /&gt;
किशोरी सुन्दरीलाई यमेददछ ।भानुभक्तको आवाज किशोरीहरूको प्रशसामा गुञ्जिन्छ -&lt;br /&gt;
चपला अवलाहरू एक सुरमा ||&lt;br /&gt;
किशोरीहरू कालमैरवअग्राडि पुरदछन्‌ । उनीहरूले केशफ्छाडिघुसारेको गृनकेशरीको फूल देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
गुनकेसरिको फूल ली शिरमा ॥&lt;br /&gt;
मन्दिर र घरहरूको सामुन्ने हँदै किशोरीहरू हिंड्दछन्‌ ।पृष्ठभागबाट भानुभक्त गाइरहेका हन्छन्‌ -&lt;br /&gt;
हिँडन्या सखि लीकन ओरिपरि ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त डबलीमा उभिएर गाउँछन्‌ -&lt;br /&gt;
अमरावति कान्तिपुरी नगरी ॥&lt;br /&gt;
किशोरीहरू शिव-पार्वतीको मन्दिरबाट अगाडि बढ्दछन्‌ ।चपला अवलाहरू एक सुरमा ।&lt;br /&gt;
अर्को मन्दिरको पेटीमा उक्लदै -&lt;br /&gt;
गुनकेसरिको फुल ली सिरमा ॥&lt;br /&gt;
हिडन्या सखि लीकन ओरिपरि ।&lt;br /&gt;
वसन्तपुर दरवारको अग्रभागमा उभिएर चोरैतिर टाउकोघुमाएर हेर्दै गाउँछन्‌ -&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
० अमरावती कान्तिपुरी नगरी ॥हर्षविभोर भएर काष्ठमण्डपलाई हेर्दै अगाडि बढ्दछन्‌ ।मन्दिर आकारको कलात्मक छानो देखापर्छ ।भानुभक्त आत्मविभोर भएर घ्ृमिरहन्छन्‌ ।बसन्तपृरको ठूलो घण्ट देखापछ ।काठका कलात्मक रुयालहरूलाई क्यामराले फन्कोलगाउँछ । एउटा स्यालमा गहनाले रुक्िरुकाउ भएकी बृद्धाहातिरहेकी हन्छिन्‌ । भानुभक्त गाउछन्‌-&lt;br /&gt;
५ यति छन्‌ भनि गन्नु कहाँ धनियाँ ।डवलीमा हिड्दै गाउँछन्‌-&lt;br /&gt;
० खुसि छन्‌ मनमा बहुतै दुनियाँ ॥जनकी यसरि सुखकी सगरी ।स्यालमा वृद्धा हासिरहेकी हुन्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
० अलकापुरी कान्तिपुरी नगरी ॥गरुज्यूको पल्टन बाजा बजाउँदै हिडिरहेको देखेर भानुभक्तदङ्क पर्दछन्‌ ।घौडचडीहरूको समूह तरबार, खुँडा, खुकुरी र बन्दुकभिरेर विलम्ब-गतिमा अगाडि बढिरहेको हन्छ । भानुभक्तगाइरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
» तरवार कटार खुँडा खक्री ।पिसतोल र बन्दुकसम्म भिरी ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१४४&lt;br /&gt;
घोडचडीहरू सहरको वाकावाट अगाडि बढ्छन्‌ । भावृभक्तपृष्ठभागमा बसेर गाइरहेका हुन्छन्‌ -&lt;br /&gt;
अति श्र र्‌ वीरभरी नगरी ।&lt;br /&gt;
छ त कुन्‌ सरि कान्तिप्री नगरी ॥&lt;br /&gt;
स्वयम्भूको मन्दिर बरिपरि भानुभक्त घुमिरहेका छन्‌ ।दुईजना भक्त स्वयम्भुको &#039;माने&#039; घुमाउँदै हिँडिरहेका छन्‌,पछाडि भानुभक्त देखापर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
तीनजना भक्त पशुपति मन्दिरको सिंढीबाट ओर्लिरहेका छन्‌ ।रिस राग कपट छल छैन जहाँ ।&lt;br /&gt;
तीनजना भक्त टपरीमा पूजासामान लिएर शिवमन्दिरकोछेउबाट हिँडिरहेका छन्‌ र भानुभक्त पछाडिबाट गाइरहेकाछ्न्‌ -&lt;br /&gt;
पशुपतिको मन्दिर देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
पशुका पति छन्‌ रखबारि गरी ।&lt;br /&gt;
शिवालयको वरिपरि जोगीहरू ध्यानमरन छन्‌ ।&lt;br /&gt;
शिवकी पुरि कान्तिपुरी नगरी ॥&lt;br /&gt;
बरिपरि घरहरू भएको बहालमा दुईजना महिला ओखलमाचिउरा कट्दैछन्‌ । एकजना बृद्धा धान भद्दैछिन्‌ र अर्कीचिउरा निफन्दैछिन्‌ । पृष्ठभागमा एकजना अधबैंसे पुरुषतमाखु तानिरहेका छन्‌ । भानुभक्त चिउरा कुटेको हेर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुथक्त&lt;br /&gt;
शहरको मध्यभागनाट एकजना ज्यापू खर्पतमा एकातिर बच्चार अर्कोतिर सामानहरू राखेर अगाडिजगाडि हिडिरहेका छन्‌ ।पश्चिपछि उनकी जहान एउटा पोको बोकेर संगै हिडिरहेकीछिन्‌ । पछिपछि चारजना किशोरी कटो कोदालो र डल्याँठोबोकेर ढुड्डाका सिंडीहरूबाट ओलंदैछन्‌ । सबभन्दा पछाडिसत्तलमा उभिएर भानुभक्त गाइरहेका छन्‌ -चपला अबलाहरू एक सुरमा ।गुनकेसरिको फूल ली शिरमा ॥: हिडिरहेका किशोरीहरू फर्केर भानुभक्तलाई हेर्दछन्‌ -० हिँडन्या सखि लीकन ओरिपरि ।&lt;br /&gt;
अमराबति कान्तिपुरी नगरी ॥&amp;quot;&lt;br /&gt;
किशोरीहरू विढी ओलंदै परिदश्यबाट बाहिरिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
पटकथा १४५&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
१ण्६&lt;br /&gt;
: १९१०: चुँदी बेसी, पुरानो डिहीको घर-आँगन&lt;br /&gt;
: दिउसो&lt;br /&gt;
: भानुश्क्त, गड्डादत्त, इन्द्रबिलास, हुलाकी र गाउँलेहरू&lt;br /&gt;
: खरदार धतञ्जयको देहात्तपछि कमारी चोक अड्डाले&lt;br /&gt;
भावुभक्तका वाउँमा पकाउ पूर्जी पठाउँछ । भानुभक्त चुँदी-बेसी, पृरातो डिहीको घरको पर्खालमा बतेर तोही चिठीपढदैद्वन्‌ । छेउमै हुलाकी उभिएको छ । गड्गादत्त भानुतँगैपर्खालमा बसेका छन्‌ । इन्द्रविलास अगिल्तिर मेवाको रुखमाअडेस लागेर उभिएका छन्‌ । तीनजना गाउँले पनि बरपरबसेका छन्‌ । वातावरण गम्भीर छ । पूर्जी पढ्दैगरेकाभानुभक्तबाट दृश्य खुल्दैजान्छ र सबै पात्रहरू परिदृश्यमासमेटिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
पुर्जी पढ्दै - जि. तनहुँ मौंजे रम्घा बस्न्याँ श्रीकृष्ण आचार्यकोनाति धनञ्जय आचार्यको छोरा वर्ष ३९ को भानुभक्तआचार्यका नाउँमा जारी भयाको सात दिने पुर्जी -&lt;br /&gt;
- भानुभक्त चिठी पढ्न छाडेर इन्द्रविलासलाई हेर्छन्‌ ।2 इन्द्रविलास चिन्तामग्न देखिन्छन्‌ ।- भानुभक्त फेरि पुर्जी पढ्दछन्‌ -&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
मौजे रम्घा बस्न्याँ श्रीकृष्ण आचार्यको नाति घनञ्जयआचार्यको छोरा वर्ष ३९ को भानुभक्त आचार्य आगे तिम्रापिताजी खर्दार घनञ्जय आचार्यले पटकपटक गरी अड्डाकोकामकाजको लागि लियाको रकमहरूको हरहिसाबफर-फारक नगरी बाँकी राख्याको र निजका हक खान्याछोरा तिमी भानुभक्त आचार्य भयाका हुनाले आजका मितिलेबाटाका म्यादबाहेक सात दिनभित्र यस कुमारीचोक अड्डामाउपस्थित भै सो पूरै हरहिसाब फर-फारक गर्नाको लागियो पुर्जी जारी गरियाको छ...&lt;br /&gt;
: गङ्गादत्त, इन्द्रनिलास र गाउँले गम्भीर मुद्रामा पुर्जीको&lt;br /&gt;
व्यहोरा सुन्दछन्‌ ।.... अटेर गरी नआयामा ऐनसवाल बमोजिम हुन्याछ ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
- भानुभक्त गड्कादत्ततर्फ हेर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
: गङ्गादत्त अलमल्ल पर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
- भावुभक्त इन्त्रबिलासतर्फ दृष्टि घुमाउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
: इन्द्रविलास चिउँडोमा हात राख्दै सोच्नथाल्दछुन्‌ ।: भानुभक्त फेरि पूर्जीमा हेर्वघन्‌ ।&lt;br /&gt;
: हुलाकी भावुभक्तलाई हेरिरहेको हन्छ ।&lt;br /&gt;
इन्द्रविलास »&lt;br /&gt;
गड्डादत्त &amp;quot;&lt;br /&gt;
खर्दार धर्मदत्त जर्नेल कृ्‌ष्णबहादुरका खासिया छन्‌ । उनीहाम्रा पनि आफ्नै मान्छे हुन्‌ । त्यतै उसले भानुभक्त नेपालगएर धर्मदत्तसँग सल्लाह गर्नुपर्छ ।&lt;br /&gt;
जो हो, सरकारी पुर्जी आयापछि जान त जानै पन्यो ।&lt;br /&gt;
- भानुभक्त घोरिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“पुँजीको बेहोरा पुननिर्माण गरिएको हो ।&lt;br /&gt;
पटकया&lt;br /&gt;
पृष्७&lt;br /&gt;
बि.सं.स्थातसमयपात्र&lt;br /&gt;
घर्मदत्त »०&lt;br /&gt;
भानुभक्त ०»&lt;br /&gt;
घर्मदत्त&lt;br /&gt;
१४८&lt;br /&gt;
£ पृर११: कान्तिप्र, धर्मदत्तको कोठा; बिउसो&lt;br /&gt;
घर्मदत्त र्‌ भातृभत्तक&lt;br /&gt;
धर्मवत्त मनमनै कुमारीचोकको पुर्जी पढिरहेका छन्‌ ।पुर्जीको लेखोट देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
आनुभक्त चिन्ता र उत्सुकता लिएर धर्मदत्तलाई हेरिरहेकाछन्‌ ।&lt;br /&gt;
पुर्जी पढिसकेपछि - पुर्जीको म्यादभित्र अडडामा त हाजिरहुन्ैपन्यो ति ।&lt;br /&gt;
अड्डा-अदालत भन्याको कैले नटेक्याको मानिस, फेरिआफूले गत्याको हर-हिसाब पनि होइन । खोइ, मलाई तकताकता डर लागिरहया&#039; छ।&lt;br /&gt;
डराउन पर्दैन । सेस्ता मिलान गर्न्यांसम्म न हो । नबिराउनुनडराउनु, भन्छन्‌ । आफूले गल्ती नगन्याको कुरामा क्यानडन्याउन्या ?&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
भानुभक्त &amp;quot; तैपनि ..., मलाई त तपाइंले बाटो देखाइदिनु पन्यो ।&lt;br /&gt;
धर्मदत्त &amp;quot;” एकैछिन बिचार गरेपछि - म..., तपाईंलाई कृष्णबहादुरजर्साब कहाँ चाकडीमा लैजान्छु । त्यस्तो केही परिहाल्योभन्या उहाँबाट मद्टत हुनसक्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
पटकथा १४९&lt;br /&gt;
वि.सं.स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
११४०&lt;br /&gt;
१ पैरैप१&lt;br /&gt;
: कान्तिपुर, कृष्णबहादुर राणाको दरवार&lt;br /&gt;
: दिउसो&lt;br /&gt;
: कृष्णबहादुर, धर्मदत्त, भानुभ्वक्त र चाकडीबाजहरू&lt;br /&gt;
जर्नेल कृष्णबहादुर राणाको दरबारको बल्कोनी देखापर्दछ ।चाकडी गर्नआएका मानितहरूलँगै भानुभक्त पनि पटाड्रिनीमाउभिएर बल्कोनीतर्फ हेरिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
हत्तारिदै आएका धर्मदत्त वल्कोनीमा देखापर्छन्‌ र सबारीहँदैछ भनेर इसारा गर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त आफ्नो लुगा मिलाउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
उर्दीको पोसाकमा जर्नेल कृष्णबहादुर बल्कोनीमा देखापर्छन्‌र चाकडी गर्व पटाङ्डितीमा उभिएकाहरूलाई हेर्दछन्‌ ।भानुभक्तलगायत सबै चाकडीबाजहरू कृणबहादुरलाई &#039;स्वस्ति&#039; गर्दछन्‌।कृष्णबहादुर टाउको हल्लाएर अभिवादन स्वीकार गर्दछन्‌ ।भानुभक्त फेरि दोहस्याएर &#039;स्वस्ति&#039; गर्दछन्‌ ।कृष्णबहादुरको फिर्ती सबारी हुन्छ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त दङ्ग पर्दै परिदृश्यबाट बाहिरिन्घन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
वि.सं. द पुष&lt;br /&gt;
स्थान : कान्तिपुर, कृष्णबहादुरको भुई बैठकसमय : दिउसौपात्र : ज. कृष्णबहादुर, धर्मदत्त र भानुभक्त&lt;br /&gt;
चाकडीको कममा धर्मदत्त भानुभक्तलाई लिएर ज.कृष्णवहादुरको दरबारको भुइँतलामा प्रवेश गर्दछन्‌ र केहीकुरा भन्दछन्‌ । अनि आफू सिडी उक्लिएर माथिल्लो तलातर्फलारदछन्‌ ।&lt;br /&gt;
तल्लो तलामै प्रतीक्षा गरिरहेका भानुभक्तको आखा भित्तामाझुण्ड्याइएको बाघको टाउकोमा पर्दछ । भानुभक्त रुस्कन्छन्‌र आफ्नो रुस्काइमा आफैँ हाँस्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त कोठाको भित्ताभरि टाँगिएका बिभिन्न जनाबरकाटाउका र सीङ हेर्दै कोठामा फन्को लगाउँछन्‌ ।बारसिङ्गेको टाउको देखेर भानुभक्त पनि टाउको बङ्ग्याएरउत्चलाई आखा तर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
पटकथा १५१&lt;br /&gt;
१५२&lt;br /&gt;
:: धर्मदत्त सिढीको छेउमा आएर भानुभक्तलाई तवारी हुनलारयो&lt;br /&gt;
भन्ने इसारा गर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
- भानुभक्त लुगा मिलाउँछन्‌ ।: सिङ्गमरमरको सिढीको मध्यभागमा ओछयाइएको रातो&lt;br /&gt;
बरातबाट हिंड्दै जड्डीपोशाकमा ज. कृष्णबहादुर ओर्लन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
- भानुभक्त टाढैबाट कृष्णबहाद्रलाई &#039;स्वस्ति&#039; गर्दछन्‌ ।: धर्मदत्त कृष्णबहादुरलाई केही कुरा जाहेर गर्छन्‌ । कृष्णबहादुर&lt;br /&gt;
टाउको हल्लाउँदै भानुभक्ततर्फ हेर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
- भानुभक्त फेरि &#039;स्वस्ति&#039; गर्दछन्‌ ।: कृष्णबहादुर टाउको हल्लाउँदै अगाडि बढ्दछन्‌ र परिदृश्यबाट&lt;br /&gt;
बाहिरिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
आदिकवि भान्‌भक्त&lt;br /&gt;
स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
% पैषको&lt;br /&gt;
: कान्तिपुर, कृ्‌ष्णबहादुरको दरबारको बल्कोनीअपराह्नज. कृष्णबहादुर, धर्मदत्त र भानुभक्तज. कृष्णबहाद्रको चाकडीको सिलसिलामा धर्सदत्तलेभानुभक्तलाई पटाड्रिनीबाट बल्कोनीसम्म पुच्याइसकेकाछन्‌ । ज. कृष्णबहादुर बल्कोनीमा टहलिइरहेका छन्‌ ।ध्वर्मदत्त पछाडि पछाडि हिंडेका छन्‌ । भानुभक्त कुनामाउभिएका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
कृष्णबहादुर” बाबुकै पालाको भया पनि छोराले हरहिसाब त फर-फारक&lt;br /&gt;
धर्मदत्त&lt;br /&gt;
गर्नै पन्यो ।० हात जोड्दै - प्रभु ।भानृभक्त सम्वाद सुनिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
कृष्णबहादुर” हाल दाइ महाराज होइ&#039;सिनुभन्दा पनि अगाडिदेखि बन्याको&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
ऐन-नियमको मैले पनि ठाडै बर्खिलाप गर्नु भयान ।&lt;br /&gt;
१५३&lt;br /&gt;
घर्मदत्त &amp;quot;० हात जोड्दै - प्रभु, त्यसो त भयान ।- भानुभक्त निर्णय सुन्ने प्रतीक्षामा तनाबद्रस्त देखिन्छन्‌ ।कृष्णबहादुर” भानुभक्ततर्फ फर्कदै - ऐलेलाई कुमारी चोक गएर म्रेस्तामिलान गरी हिसाब गर्न्या काम गर ।भानुभक्त » प्रभु।: हात जोड्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
१५४ आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
गाउँले १&lt;br /&gt;
पटकया&lt;br /&gt;
: १९११: चुँदी-बेसी, बारी&lt;br /&gt;
अपराह्नकोसपेत्ने गाउँलेहरू&lt;br /&gt;
काठको कोलमा उबु पेल्दैगरेको दृश्य खुल्दै र फुक्दैजान्छ रचुँदी बेसीको बारीमा उखु पेल्न लागेका सबै पात्रहरूलाईउद्घाटित गर्दछ । दुईजना गाउँले कोल घृमाइरहेका छन्‌ ।कोलसुनि बपेर एकजना गाउँले मानेमा उखुका टुक्राहरूकोघान हाल्दैछन्‌ । बारीको आँठो नजिकै बपेर एकजना गाउँलेउखु गिँड्दै छन्‌ भने अर्का चाहि गिँडहरू डोकामा राख्दैछन्‌ ।छेउमै उभिएर एकजना बृद्ध उखुको ढांक सफा गरेर छेउमाफाल्दैछन्‌ । अलिपर कान्लाको डिलको रसेटोमा दुईजना आगोबाल्ने र खुदो पकाउने काम गर्दैछन्‌ । कोल चलेको एकनाससँगआवाज आइरहन्छ - कुइयेँ ....कुड्यँ.... ।&lt;br /&gt;
कोल पेल्दापेल्दै रोकिएर - होइन काका, भानुभक्त त थुनामापत्या रे नि भेउ पाउन्‌ भो ?&lt;br /&gt;
१५५&lt;br /&gt;
गाउँले २ &amp;quot;० सुन्न त मैलै पनि सुन्याथ्याँ । हैन, क्यान थुन्या रहयाछ ?गाउँले १ ० धनञ्जयले जागिर खायाको बेलाको हिसाब्-किताब मिलानगर्न नसक्याकोले कमारी चोक भन्त्या अड्डाले थुत्याको रे।गाउँले २ » त्यस्ता इमान्दार कुल-घरानका मान्छेले पनि दशा लाग्यापछिथुनामा बस्नु पर्दो रहयाछ हगि ?गाउँले ३ &amp;quot; दिन-दशा भन्या कैले कसरी लाग्दोरहयाछ, केही भन्नसकिदो रहयानछ ।: बृद्ध गाउँलेको सम्वाद संगसँगै दृश्य समाप्त हुन्छ ।&lt;br /&gt;
समध्यान्तर&lt;br /&gt;
१५६ आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
बि.सं.&lt;br /&gt;
समग्रपात्र&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
राति&lt;br /&gt;
१९११कान्तिप्र, कूमारी चोकको रूयालखाना&lt;br /&gt;
भानुभक्त र सिपाही&lt;br /&gt;
पालोमा बसेको सिपाहीको छायाँ देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
बत्द कोठामा भानुभक्तको छायाँ ओहोर दोहोर गरिरहेकोहुन्छ।&lt;br /&gt;
सिपाहीको छायाँ भानुभक्तपट्टि फर्केर हेर्छ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्तको छायाँ चिउँडोमा हात राखेर सोच्दछ ।&lt;br /&gt;
कुनै सम्वाद सृनिदैन । बेलाको बिरही धुनले वातावरणलाईगरुङ्गो र विषादपूर्ण गराउँछ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
११७&lt;br /&gt;
बि.सं.स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
१ प1&lt;br /&gt;
- कान्तिपुर, कृष्णबहादुर राणाको खोपी&lt;br /&gt;
: अपराह्न&lt;br /&gt;
: कृष्णबहादुर, धर्मदत्त, कारिन्दा र सहायक&lt;br /&gt;
: ज. कृष्णबहादुर कालो तगुवा नबेदा-सुरुवाल लगाएर सोफामा&lt;br /&gt;
घर्मदत्त ”&lt;br /&gt;
१५८&lt;br /&gt;
बसेका छन्‌ । अगाडि बाघको शाला ओछ्ठयाइएको छ ।किनारमा धर्मदत्त रातो बस्ता लिएर उभिएका छन्‌ । तामुन्नेमाकारिन्दा फाइल अगाडि राखेर घुँडा टेकेर बसेको छरउत्चको सहायक मिसिलको कागज लिएर उभिएको छ ।धवर्मदत्तको अनुहारबाट दृश्य फुम्दैजान्छ र परिदृश्यमा सबैपात्रहरू समेटिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
अन्याय पन्यो ख्वामित ।&lt;br /&gt;
कारिन्दा बुनिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
हिसाब-किताब, अड्डा-अवालत कैले नगन्याको मान्छे ।फेरि बाबुको पालाको हिसाब-किताब । मिलान गर्न सक्यानन्‌ख्वामित ।&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
कृष्णबहादुर टाउको अर्कोतर्फ फर्काउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्तले खापाको, बिरायाको त हैन ख्वामित । धनञ्जय&lt;br /&gt;
पत्ति बेइमान मान्छे त हैनन्‌ । छ्वामितमा जाहेरै छ।&lt;br /&gt;
कृष्णबहावुर” त्यसो त हैनन्‌, मलाई थाहा छ। पाल्पामा छँदा मेरै मातहतमाकाम गत्याका मातिस ।&lt;br /&gt;
घर्मदत्त ”&amp;quot; प्रभु, ख्वामितको निगाहा भया बाहुनचरीको उपकार हुन्या&lt;br /&gt;
थियो ।कृष्णबहादुर» मैले पनि ठाडै ऐन-नियमको बर्खिलाप गर्नु भयान । तिमीलेबुरुयाकै छौ ।घधर्मदत्त २» प्रभु।कृष्णबहादुर” भानुभक्तलाई कस्तो छ ? मैले सोध्याको छ भन्दिन्‌ ।घर्मदत्त » प्रभु।: पछाडि हट्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
: कारिन्दा आंखा घुमाएर धर्मदत्त गएकोतर्फ हेर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
पटकथा १५९&lt;br /&gt;
बि.सं.स्थातसमयपात्र&lt;br /&gt;
धर्मदत्तभानुभक्तघर्मदत्त&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
धर्मदत्तभानुभक्त&lt;br /&gt;
१६०&lt;br /&gt;
१९११&lt;br /&gt;
कान्तिपुर, कुमारी चोकको रुयालखात्ता&lt;br /&gt;
अपराह्न&lt;br /&gt;
भानुभक्त र घर्मदत्त&lt;br /&gt;
भानुभक्त कुमारी चोक अड्डाको छिंडीमा थुनिएका छन्‌ ।भूइँओछयातमा पामुन्नेमा बसेका धर्मदत्त र भानुभक्तका बीचसम्वाद हुँदैछ । भानुभक्तले कुरा सुनिरहेको दृश्य खुल्छ ।“मैले सोध्या छ भनिदिन्‌&#039; मर्जी भा&#039;छ प्रभूले ।&lt;br /&gt;
प्रभुको निगाह ।&lt;br /&gt;
न आत्तिन्‌स्‌ । मेरो तरफबाट हुन्यासम्म कोसिस गरि राख्याछु । प्रभु कहाँ तपाईँको क्रा पान्याको छु।&lt;br /&gt;
हजुरकै भर त हो । मेरो आफ्नो भन्न्या पहुँच भ्याकोमानिस हजुर बाहेक को छर ?&lt;br /&gt;
तपाईंको समय कसरी कट्छ ?&lt;br /&gt;
कसरी भनूँ ? रामनाम भज्यो बस्यो ।&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
धर्मदत्त ० रामनाम भनज्त्या मात्र होइन । लेख्न्या काम पि गर्नुहोस्‌ ।५ पहेलो पोको भानुभक्तलाई दिदै - यी, आध्यात्म रामायणकोकिताब ल्याइदिएको छु।भानुभक्त किताव लिन्छन्‌ ।» बालकाण्ड रम्घामै लेखिसक्न्‌ भयाको थियो । अब अगाडिलैख्न्या काम गर्नुस्‌ ।भानुभक्त &amp;quot; हस्‌&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
पटकथा १६१&lt;br /&gt;
वि.सं.स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
वीरबहादुर &amp;quot;भानुभक्त »&lt;br /&gt;
१६२&lt;br /&gt;
१९११कान्तिपुर, कुमारी चोकको रुयालखाना&lt;br /&gt;
अपराह्न&lt;br /&gt;
भानुभक्त र दुई सिपाही&lt;br /&gt;
कमारी चोकको छिंडीमा भातुभक्त रामायणको अयोध्याकाण्डलेख्नमा व्यस्त छन्‌ । नेपध्यबाट आएको सितारको मधुरध्वनिले वातावरणलाई गम्भीर र स्निग्ध बनाएको छ। ट्कीकोउज्यालोबाट दृश्य उघदै जान्छ र लेखिरहेका भानुभक्तलाईपरिदृश्यमा समेटद्दछ । लेष्ने काम सकर भानुभक्त हाततन्काउँछन्‌ । लेखेका पानाहरूलाई मिलाएर पट्याउँछन्‌ ।माथिल्लो पानामा “अयोध्याकाण्ड” लेखिएको हुन्छ ।पाण्डुलिपि लिएर उठ्छन्‌ र आङ्‌ मर्काउछन्‌ ।&lt;br /&gt;
पालोमा बस्ने सिपाही बीरवहाद्र कोठामा पस्छ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त अनुहारमा प्रश्नववाचक चिन्ह लिएर सिपाहीलाई हेर्छन्‌ ।पण्डित बाज्या, अझै सुत्नु भयाको छैन ?&lt;br /&gt;
अयोध्याकाण्ड सकौं भनेर बल गत्याको, समय बित्याकोपत्तै भयान ।&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभत्त&lt;br /&gt;
वीरबहादुर »भानुभक्त &amp;quot;वीरबहादुर ”&lt;br /&gt;
भानुभक्त ०»&lt;br /&gt;
सिध्याउनु भयौ त ?&lt;br /&gt;
बल्ल सिद्धियो ।&lt;br /&gt;
पण्डित बाज्याले लेख्नु भयाको, त्यसमाथि पनि रामायण;चार हरप भया पनि सुनेर मात्रै पालो बदल्न पाया हुन्थ्यो ।भानुभक्त फेरि आफ्नै ठाउंमा बस्दछन्‌ र भन्दछन्‌ -मन्यराको सल्लाहबमोजिम रानी कैकयीले दशरथ राजालाईवचनबद्ध गराएर आफ्नो वर मागिन्‌ ।&lt;br /&gt;
वीरबहादुर ध्याव दिएर सुनिरहेको छ ।&lt;br /&gt;
रामलाई १४ वर्षको वनवास र भरतलाई राज्य । योकुरा थाहा पायापछि श्रीराम माता कौशल्यालाई क्या कहनु&lt;br /&gt;
हुन्छ भन्या -&lt;br /&gt;
सिपाही ०&lt;br /&gt;
भानुभक्त ०&lt;br /&gt;
बीरबहादुर उत्सुकतासँग सुनिरहेको छ ।&lt;br /&gt;
भानृभक्त सस्वर गाउँछन्‌-&lt;br /&gt;
गयौ खान्या बैता मकन त मिल्यो राज्य वनको ।वीरबहादुर बस्दै गालामा हात लाउँछ ।&lt;br /&gt;
भरत्‌ले राज्‌ पाया यहिँ बसि गरुन्‌ राज्य जनको ॥&lt;br /&gt;
बिदा बक्स्या जावस्‌ खुसिसित म जान्या छ वनमा ।&lt;br /&gt;
म चाँडै फिर्न्याठ्‌ विरह न हबस्‌ कत्ति मनमा ॥२५॥&lt;br /&gt;
अर्को सिपाही कोठाभित्र पस्छ र बस्छ । भातभक्त फर्किएरहेछन्‌ ।&lt;br /&gt;
पण्डित्‌ बाजे, वीरबहादुरका लागि चार हरप सुनाइदिन्‌भयो, अब मेरा लागि चार हरप ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त फेरि सस्वर गाउँछन्‌ -&lt;br /&gt;
सुन्यौ भाइ संसारमा शरिर अति कच्चा छ जनको ।शरिर्‌ कच्चा जानी नगर तिमि रिस्‌ कत्ति मतको ॥सिपाही आनन्दमा टाउको हल्लाउँछ ।&lt;br /&gt;
सबै भोग्‌ चञ्चल्‌ छन्‌ बिजुलि सरि एकछिन्‌ नरहन्या ।&lt;br /&gt;
विचार्‌ यस्तो राखी सहु तिमि बडो हुन्छ सहन्या ॥३०॥&amp;quot;&lt;br /&gt;
“भानुभक्तको रामायणबाट&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
१६२३&lt;br /&gt;
सिपाही “ कसरी लेख्नुहुन्छ पण्डित बाजेले यस्तो मनै पगाल्न्यागरी । पण्डित बाजे कुमारी चोकमा बसुञ्ज्याल आफ्नोपालो नबदलिदिया हुन्थ्यो ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
१६४ आदिकवि भ्चानुश्चक्त&lt;br /&gt;
बि.सं.स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
दृश्य 5०&lt;br /&gt;
ददनाकाताततातानकामाणाताामाधामामाामममल॥ङकक””&amp;quot;०””००००&amp;quot;&lt;br /&gt;
।&lt;br /&gt;
१९११कान्तिपुर, कमारी चोकको ञ्यालखाना&lt;br /&gt;
: बिहान / दिउँसो “राति&lt;br /&gt;
भानुभक्त / सिपाहीहरू&lt;br /&gt;
भानुभक्तको रामायण लेख्ने कम जारी छ । उनी कुमारीचोकको रुयालखानासा बपेर रामायणको अरण्यकाण्डलेखिरहेका छुन्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त सोचमरन भएर ओहोरदोहोर गरिरहन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
समय बित्तै जान्छ । बिहान, दिन अनि रात हुन्छ । बत्तीबल्छ । एउटै दृश्यमाथि अर्को दृश्य खप्टिएर देखापर्छ ।भानुभक्त बसेर लेखिरहेका हुन्छन्‌ । नेपथ्यमा सितारकोमधुर धुन बजिरहेको हुन्छ ।&lt;br /&gt;
बत्तीको उज्यालोबाट फेरि दृश्य खुल्दै जान्छ र लेल्नमाव्यस्त भानुभक्तलाई समेट्दछ । भानुभक्त लेखोटको पानालाईहेरेर भुइँमा राख्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
पटकया&lt;br /&gt;
१६५&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
: सिपाहीहरू बन्दुक हस्तान्तरण गरेर पालो चाटाताट गर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
बाहिरबाट रुयाउँकिरीको एकनासको आवाज आइरहन्छ ।भानुभक्तले अरण्यकाण्ड लेखिसिब्याउन लागेका छन्‌ । उनीअरण्यकाण्डको अन्तिम श्लोक सस्बर पढ्दछन्‌ -&lt;br /&gt;
हे लोक हो रघुनाथका चरणको भक्ती छ मुक्ति दिन्या ।कलम्‌ मसीमा चोप्दछन्‌ र अगाडि लेख्दै पढ्दछन्‌ -&lt;br /&gt;
यो जातीकन कामधेन्‌ सरिका राम्‌ हुन्‌ मन्तैमा लिन्या ॥बया गर्छौं अरु मन्त्र तन्त्रहरुलै छोडैर सब्‌ राममा ।पालोमा बसेको सिपाही बाहिरबाट सुनिरहेको छ ।&lt;br /&gt;
तन्‌मन्‌ लाइ अवस्य जान मनले तार्‌ मिल्छ यै काममा ॥१२२।&lt;br /&gt;
भानुभक्त लेखोटको अन्तिम व्यहोरा पढ्दछन्‌ ।इतिश्वी आध्यात्मरामायणो अरण्यकाण्डे भाषा श्लोकसमाप्तम्‌ शुभम्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“भानुभक्तको रामायणबाट&lt;br /&gt;
१६६&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
१९११&lt;br /&gt;
कान्तिपुर, कुमारी चोकको रुयालखाना&lt;br /&gt;
राति&lt;br /&gt;
भानुभक्त र सिपाही&lt;br /&gt;
जङ्गीपोताकमा जर्नेल कृष्णबहादुरको भित्तामा टाँगिएको तस्बिरदेखिन्छ ।&lt;br /&gt;
खाटमाथि बसेका भानुभक्त मुख बिगारेर तस्बिरलाईहेरिरहेका छन्‌ । भानुभक्तको अनुहारमा एकाएकभाव परिवर्तन हुन्छ । काननजिकै लासखुद्टे कराएको आवाजआउँछ । उनी सतर्क हुन्छन्‌ । बिस्तारै हात उठाएरलामखुट्टे मार्न आफ्नै कानमा हान्छन्‌ । लाखखुट्टे फेला पर्दैन ।हात खोलेर हेर्छन्‌, हात खाली छ । आँखा तरेर जर्नेलकृष्णबहादुरको तस्बिरलाई हेर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
कृष्णबहादुर तस्बिरमा हासषिरहेका हुन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
लामखुट्टेले फेरि दायाँ कानतर्फ हसला गर्छ । लामखुट्टेकोआबाजलाई पहिल्याउँदै बिस्तारै हात उठाएर ।लामढुट्ेलेथाहा पाउला भनेर) कानमा प्याट्ट हान्छन्‌ । यसपाली भने&lt;br /&gt;
१६७&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
लामखुट्टे मर्दछ । औंलामा मरेको लामखुट्टे तेर्सिएको हुन्छ ।&lt;br /&gt;
: हेतिमा मरेको लामखुट्टे लिएर भानुभक्त जर्नेल&lt;br /&gt;
कृष्णबहादुरको तस्बिरलाई हेर्दछन्‌ । सुब्बा धर्मभक्तको आवाजउन्को कानमा प्रतिष्वववित हुन्छ - “मैले सौध्या&#039;छ भन्दिनु,मर्जी भा&#039;छ प्रभुले ।”&lt;br /&gt;
: भानुभक्त एकाएक मुख बिगारेर आफ्नो तिघातर्फ हेर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
तिघ्रामा प्याट्ट हान्छन्‌ र धोती उठाएर हेर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
: एउटा उडुस मरेको हुन्छ ।: मरेको उँडुत्त औंलामा च्यापेर कृ्‌ष्णबहादुरको तस्बिरलाई&lt;br /&gt;
देखाउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
- फेरि केही कुराले टोम्छ । दुखाइमा बिचिकदै मुख निगार्छन्‌ र&lt;br /&gt;
टोकेको ठाउँमा औलाले चिच्छुन्‌ । उपियाँ उफ्रेर सुकुलतिरपुगिसकेको हुन्छ ।&lt;br /&gt;
2 भानुभक्त हानिएर सुकुलको उपियाँलाई छोप्न खोज्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
सुकुलमा औँलाले बेस्करी थिच्छन्‌ र औंलामा टिप्छन्‌ । औलोखोलेर हेर्दा केही पनि हँदैन । उपियाँ फड्किसकेको हन्छ ।&lt;br /&gt;
: बिस्तारै उठ्छन्‌, पाखुरा कन्याउँछन्‌, सन्दुसमाथिबाट कागज&lt;br /&gt;
टिप्छन्‌ र बत्तीअगाडि कलम समाएर लेख्न बस्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
- कृष्णबहादुर तस्बिरबाट हेरिरहेका हुन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
भानुभक्त गुनगुनाउन थाल्दछन्‌ ।रोज रोज्‌ दर्शन पाउँछु चरणको ताप्‌ छैन मन्‌मा कछु।&lt;br /&gt;
: लेख्न थाल्दछन्‌ ।: बीरबहादुर बाहिर पालोमा उभिएको हुन्छ ।- भानुभक्त लेखी सिध्याएर वीरबहाद्र भएका ठाउँमा आउँछन्‌&lt;br /&gt;
र भन्छन्‌ -धर्मभक्त खर्दार बाजे कहाँ भोलि यो मेरो चिठी लगिदिनोस्‌न । उहाँले चिफसाहेबको ढोकामा यो लगिदिन्‌ हुन्याछ ।&lt;br /&gt;
: चिठी बीरबहाद्रलाई दिन्छन्‌ । बीरबहादुर चिठी समाउँछ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
१६८&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
वि.सं.स्थान&lt;br /&gt;
पात्र&lt;br /&gt;
: १९११: कान्तिपुर, कृष्णबहादुरको बैठक; भानुभक्त, कृष्णाबहावुर र धर्मदत्त&lt;br /&gt;
: कृष्णबहाद्रले भातृभक्तको चिठी समाउन लागेको दृश्य&lt;br /&gt;
खुल्छ ।&lt;br /&gt;
: कृष्णबहादुर चिठी फुकाउदै बसेको सोफाबाट उठ्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
धर्मदत्त दुनै हात जोड्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
कृ्‌ष्णनहादुर चिठी पढ्न धाल्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
रोज्‌ रोज्‌ दर्शन पाउँछु चरणाको ताप्‌ छैन मन्‌मा कछ।धर्मदत्त निहरिबै हात जोड्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
रातभर्‌ नाच पनि हेर्छु खर्च नगरी ठूला चयनमा म छु ॥&lt;br /&gt;
: चिठीको लेखोट देखापर्छ ।&lt;br /&gt;
लामखुट्टया उपियाँ उँडुस्‌ यि सँगि छन्‌ यिनकै लहडमा बसी ।लाम्खुद्वयाहरू गाउँछन्‌ यि उपियाँ नाच्छन्‌ म हेर्छु बसी ॥&lt;br /&gt;
“भानुभक्तको फुटकर कविता&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
१६९&lt;br /&gt;
१७०&lt;br /&gt;
: भानुभक्तले कबितामै लेखेको चिठी पढेर कृष्णबहादुर हाँस्न&lt;br /&gt;
थाल्दछन्‌ । हास्दा हास्दै हल्पी ऐनाको अगाडि पुग्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
- धर्मदत्त कृरा नबुरेर वाल्ल पर्छन्‌ ।: ऐनाबाट धर्मदत्तले जिल्लिएर आफूलाई हेरिरहेको देखेपछि&lt;br /&gt;
कृ्‌ष्णबहादुरले फर्केर उनलाई हेर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
- धर्मदत्त आत्तिएर लुसुबक परिदृश्यबाट बाहिरिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
१९११कान्तिप्र, कमारी चोकको क्यालखानादिउसो&lt;br /&gt;
भानुभक्त र दुई सिपाही&lt;br /&gt;
भानुभक्त दृईजञना सिपाहीलाई आफ्नोअगाडि राखेर सस्बररामायणको किष्किन्धा काण्ड सृनाइरहेका छन्‌ -&lt;br /&gt;
वाण्‌ बज्ग्रो जब बालिका हृदयमा सर्बाङ्क बाधा गरी ।पृथ्वी कम्प गराइ रुट्‌ तहिं गित्या बाली त मृर्छा परी ॥मूर्छा दुइ घडी पस्ग्रापछि अलिक चैतन्य आयो जसै ।देख्या श्रीरघुनाथलाई खुसि भै साम्तै बस्याका ततै ॥४७॥&lt;br /&gt;
भन्छन्‌ श्री रघुनाथलाई रघुनाथ्‌ ......वीरबहादुर अगाडिको दृश्य कल्पना गर्न थाल्दछ ।&lt;br /&gt;
बीरबहादुरको अनुहार धमिलो हुँदैजान्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“भानुभक्तको रामापणबाट&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
१७१&lt;br /&gt;
वि.सं.स्थाततसमयपात्र&lt;br /&gt;
१९११&lt;br /&gt;
: जड्डल&lt;br /&gt;
अपराहन&lt;br /&gt;
श्वीराम, बाली, सुग्रीव र वीरबहादुर&lt;br /&gt;
घना जङ्गलका बीचमा छातीमा श्रीरामको बाण लागेर घाइते&lt;br /&gt;
भएका बाली श्रीरामलाई सम्बोधन गरेर सस्बर भन्दछन्‌ -..,तिम्रो बिराम्‌ क्या गन्याँ ?&lt;br /&gt;
धर्मै छोडि लुकेर आज तिमिले मात्यौ म ऐल्हे मन्याँ ॥&lt;br /&gt;
श्रीरास हाँसेर बालीका बचन सुनिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
य्रो क्या क्षत्रिय धर्म हो लकिलुकी वीर्‌ वाण छोड्छन्‌ कही ?&lt;br /&gt;
क्षत्री भैकन धर्म छोडि लडन्या एक आज देख्याँ यहीं ॥ ४८।॥&lt;br /&gt;
खीराम बालीका अगाडि उभिएर सुनिरहन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
सामने भैकन वाण छोडि तिमिले माथ्यौं त खब्‌ यश्‌ थियो ।&lt;br /&gt;
गदा लिएका र घाँटीमा माला लगाएर छैउमै उभिएका सुग्रीव&lt;br /&gt;
मुस्कुराउँदै रामलाई नमस्कार गर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
सुग्रिव हो कति साख्‌ म हुँ कति कुसाख्‌ हा दैव क््या मन्‌ दियो।&lt;br /&gt;
सीता रावणले हन्यो भनि बहत्‌ सन्ताप मन्‌ले गरी ।&lt;br /&gt;
१७२&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
सग्रीवलाई सहाय ली मकन ता लुकेर चोर्‌ झैं गरी ॥४९॥सुग्रीव विजयभावले बालीलाई हेर्दछन्‌ ।श्रीराम मृसुमुतु हाँसिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
५ मान्यौ यो अति चुक्‌ भयो गरुँ कसो बाँच्थ्याँ त याहीँ बसी ।रावणलाई कुलैसमेत्‌ सहजमा सिकिथ्याँ म पाता कसी ॥बालीको अन्तिम शब्दको ध्वतितरङ्ग भानुभक्तकोअगाडि बसेर किष्किन्धाकाण्ड सुनिरहेको वीरबहादुरसम्मआइपुग्छ । बीरबहाद्रको कल्पना भङ्ग हुन्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“भानुभक्तको रामायणबाट&lt;br /&gt;
पटकया १७३&lt;br /&gt;
विसं&lt;br /&gt;
१९११&lt;br /&gt;
स्थान : काठमाण्डौ, कुमारी चोकको ञ्यालखानासमय : बैलुकीपात्र भानुभक्त र वीरबहादुरकुमारीचोकको छिँडीमा पालो बसेको सिपाही र भानुभक्तवात मारिरहेका छन्‌ ।वीरबहादुर &amp;quot; तपाईं जस्तो विद्वान्‌, धर्मात्मा मानिसले पनि थुनामा बस्नुपन्योहगि ?भानुभक्त निर्लिप्त भावमा सुनिरहेका छन्‌ ।० ग्रहदशा बिग्ग्राको बेलामा खाँदैनखायाको विष पनि लाग्दोरहयाछ ।भानुभत्त ० भगवानले जे गर्नु हुन्छ, भलै गर्नुहुन्छ ।वीरबहादुर ० यस्तो पनि भलो हुन्छ ?भानुभक्त ० यसलाई पनि भलो नै भन्नुपर्छ ।बीरबहादुर चित्त नबुरुको भाब अनुहारबाट व्यक्त गर्दछ ।१७४ आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
भानुभक्त ” हेर न, रामायणको बालकाण्ड लेख्यापछि पतिका वर्षसम्मअगाडि लेख्न सक्याको थिइन । कुमारीचौकमा थुनियाको३,४ महिनामै अयो ध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड,किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड लेखेर सिध्यायाँ ।&lt;br /&gt;
वीरबहादुर « पण्डित बाज्या, यो पछाडि लेख्न्‌ भयाको सुन्दरकाण्ड मलाईपनि सारिदित्‌स्‌ न ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त ” रामाय्रणाको कथामा तिमीलाई मन पर्न्या अंश कुन हो भनत। म त्यही चैं सारेर दिउँला ।&lt;br /&gt;
वीरबहादुर ” राम्रो त रामायणको सप्पै राम्रो छ, तर मलाई चाहिँहनुमानूले त्यो चारसय कोसको समृद्र उफेर नाध्याको हातलेउफ्रेको भाउ लगाउँदै- बयान सबभन्दा राम्रो लाग्छ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त &amp;quot; हुन्छ, म भरे तिमीलाई सारेर दिन्छु ।&lt;br /&gt;
सस्वर गुनगुनाउँन थाल्छन्‌ -&lt;br /&gt;
तर्छ क्षार समृद्व आज सहजै भन्त्या इरादा धरी । ....&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
पटकथा १७५&lt;br /&gt;
विसंस्थातसमयपात्र&lt;br /&gt;
वीरबहादुर »सिपाही &amp;quot;०&lt;br /&gt;
वीरबहादुर «&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
सिपाही&lt;br /&gt;
“भानुभक्तको रामायणबाट&lt;br /&gt;
१७६&lt;br /&gt;
£- १९११: कान्तिपुर, कुमारी चोकको रुयालखाना१ राति&lt;br /&gt;
: वीरबहादुर र अर्को सिपाही&lt;br /&gt;
भानुभक्तले सारेर दिएको सुन्दरकाण्डको प्रतिलिपि हातमालिएर दुवैजना सिपाही भाका फिराएर गाउँदैछन्‌ ।वीरबहादुरको गायनबाट दृश्य खुल्दैजात्छ र बोश्रो ढोकामापालो बत्तेको अर्को सिपाहीलाई पनि परिदृश्यमा समेद्वछ ।तर्छु क्षार समृद्व आज सहजै भन्न्या इरादा धरी ।शीरामका चरणारविन्द मतले अत्यन्त चिन्तन्‌ गरी ॥भन्छन्‌ वीर्‌हरूलाई ताही हनमान्‌ हे वीर हो पार्‌ तरी ।सीताजीकन भेटदछु म अहिले जान्छ बडो बेग्‌ घरी ॥१॥पापी जन्‌ पनि रामका स्मरणले संसार पार्‌ तर्छ ता ।राम्‌कै काम निमित्त औंठी सँग ली जान्छु दुतै हँ म ता॥क्या डर्‌ क्षार समुद्र तन सहजै पौँचन्छु लझ भनी ।&lt;br /&gt;
चारै पाउ जमिन्‌विषे धसि कृद्या हेर्दै तमासा पनि ॥२॥।&amp;quot;&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
आदिकवि भातृभत्त&lt;br /&gt;
वि.सं.स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
वीरबहादुर&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
वीरबहादुर&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
: १९११&lt;br /&gt;
: कान्तिपुर, कुमारी चोकको रुयालखाना: दिउसो&lt;br /&gt;
: भानुभक्त र वीरबहादुर&lt;br /&gt;
भानुभक्त कुमारीचोकको छिडीमा दिक्दार र चिन्ताग्रस्त मृद्रमाबसिरहेका छन्‌ । सिपाही वीरबहादुर भिर पस्छ ।&lt;br /&gt;
पण्डित बाज्यालाई सञ्चो भ्यान कि ? सारै मलिन देखिन्‌हुन्छ ।&lt;br /&gt;
दिक्क भएर- क्या गर्नु, हेरन वीरबहादुर, घरमा आठ वर्षकोछोरा छ, उसको व्रतबन्ध गर्न्या बेला भैसक्यो । आफ्‌ भनेयहाँ छु । चाँडै छुट्न्या छाँट पनि छैन । उसको व्रतबन्धकोकुराले दिक्दार छु।&lt;br /&gt;
आफ्ना सबै कुरा खुलाएर जर्साबलाई बिन्तीपत्र लेख्नौस्‌ न ।भानुभक्त सोच्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
म भोलि धर्मदत्त खर्दार बाजेकहाँ पुन्याइदिन्याछु । उहाँलेजाहेर गरिदिन्‌ हुन्याछ ।&lt;br /&gt;
१७७&lt;br /&gt;
- वीरबहादुर पालोतर्फ फर्कन्छ ।भानुभक्त &amp;quot; लेख्दै गाउँछन्‌ -० चालिस्‌ वर्ष भरयाँ म पुत्र पति एक्‌ मात्रै छ आठ वर्षको ।भानुभक्तलाई तुनिरहेको बीरबहादुरको घायाँ देखिन्छ ।५ आयो काल्‌ व्रतबन्धको गरुँ कसो बेला त हो हर्षको ॥&#039;&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“भानुभक्तको फुटकर कबिता&lt;br /&gt;
म त त छ त त त१७८ आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
बिसं.स्थानसमयपान्न&lt;br /&gt;
: १९११&lt;br /&gt;
: कान्तिपुर, कृ्‌ष्णबहादुरको खोपी: अपराहन&lt;br /&gt;
: कृष्णबहादुर, धर्मदत्त र कारिन्दा&lt;br /&gt;
: कृष्णबहादुर भानुभक्तले लेखेको बिन्तीपत्र हातमा लिएर मनमनै&lt;br /&gt;
पढ्दैछन्‌ । छेउमा धर्मदत्त र अगाडि कारिन्दा उभिएका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्तको आवाज सस्बर गुञ्जन्छ -&lt;br /&gt;
क्यास नाथ पन्यौं म ता फजितिमा एक्लो यहीँ छ फगत्‌ ।&lt;br /&gt;
कुन्‌ पाठले व्रतबन्ध पार्‌ गरुँ भनी देख्छ अँध्यारो जगत्‌ ॥१।बिन्तीपत्रको लेखोट देखापर्छ । भानुभक्तको आवाज गृन्जिरहन्छ -&lt;br /&gt;
गापत्री दिनु बाबुको छ अधिकार भिक्षा दिन्‌ माइको ।&lt;br /&gt;
- कारिन्दा जर्नेललाई हेरिरहन्छन्‌ ।: फेरि बिन्तीपत्रको नेखोट देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
बालकले पनि वेद्‌ पढीकन सुसार गर्नू गुरु गाइको ॥&lt;br /&gt;
: धर्मदत्त टाउको फुकाउँछन्‌ ।: कृष्णबहादुर अगाडि पढ्दघन्‌ -&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
१७९&lt;br /&gt;
यस्तो मुख्य बखत्‌ छ यो अरु छ कुन्‌ काम्‌ पार्‌ लगाई दिन्या ।धेरै बिन्ति कती गरेँ चरणमा एकै क्राले छिन्या ॥२॥ख्वामित्‌ आज हजुर्‌हरू पृथिविमा मालिक छँदामा पनि ।ब्राटमण्‌को व्रतबन्ध अड्कन तयार्‌ देख्यौं र मालिक भनी ॥&lt;br /&gt;
- धर्मदत्त कृ्‌ष्णबहादुरको प्रतिक्रियालाई पर्खिरहेका छन्‌ ।: कृष्णबहादुर अगाडि पढ्दछन्‌ -&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
जाहीरात गन्याँ प्रभ्‌ चरणमा जो मर्जि होला भनी ।&lt;br /&gt;
कण्डैसित्‌ भनि मर्जि हुन्छ त भन्याँ क्यासँ सहन्छु पनि ॥&amp;quot;कृष्णबहादुर बिन्तीपत्र पढिसिध्याएपछि घोरिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
2 धवर्मदत्त निर्णयको प्रतीक्षामा छन्‌ ।&lt;br /&gt;
कृष्णबहादुर »घर्मदत्त ०कृष्णबहादुर”कारिन्दा २०कृष्णबहादुर «कारिन्दा »”घर्मदत्त ०कृष्णबहादुर ०घर्मदत्त ०&lt;br /&gt;
बाहुन्‌का छोराको व्रतबन्धै रोकियापछि भातभ्रक्तलाई मर्कात पक्कै पन्या जस्तो छ ।&lt;br /&gt;
उत्साहित हुँदै - प्रभु, ठुलै मर्का पन्याछ ।&lt;br /&gt;
कारिन्दातर्फ फर्कदै - ए, हेर्‌।&lt;br /&gt;
हात जोडेर निहुरिदै - प्रभु ।&lt;br /&gt;
हिसाब पछि मिलान गर्न्या गरी अहिलेलाई भानुभक्तलाईरिहा गरिदिन्‌ ।&lt;br /&gt;
हातजोड्दै - जो मर्जी प्रभु ।&lt;br /&gt;
खुत्ी हुँदै ठूलो स्वरमा - प्रभुको जय होस्‌ । जय होस्‌ प्रभुको ।रम्घा जानुअघि एकचोटि भानुभक्तलाई मकहाँ लिएर आङ ।प्रभु, म हाँजिर गन्याउन्याछु ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“भानुभक्तको फुटकर कविता&lt;br /&gt;
१८०&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभत्त&lt;br /&gt;
वि.सं.स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
शशिनाय&lt;br /&gt;
धर्मदत्त&lt;br /&gt;
पटकया&lt;br /&gt;
१९११कान्तिपुर, कृष्णबहादुरको दरवार&lt;br /&gt;
: बिहान&lt;br /&gt;
: कृष्णबहादुर, शशिनाथ, धर्मदत्त र बैठकेशशिनाथ कृष्णबहादुरलाई बरण्डामा मुखारी गराउँदैछन्‌ ।चाँदीको करुवाले वैठके पानी हालिदिदैछ्ध । पछाडिपड्दिपुजारी चनौटोमा चन्दन घोटदैछ । कृ्‌ष्णबहाद्र मुख घबैछन्‌र शशिवाध पाठ गर्दैछन्‌ ।&lt;br /&gt;
० हर गङ्रे, हरहर गड्रे, हरहर गड्रे, हर,&lt;br /&gt;
७ ३० भागीरथी गङ्गे काशी काशी गड्टे हरहर ।मुखारी समाप्त हुन्छ । बैठके रुमाल टक्याउँछ अनि कृष्णबहाद्रमुख पृछन थाल्छन्‌ ।धर्मदत्त प्रबेश गर्दछन्‌ र झुकेर कृष्णबहादुरलाई &#039;स्वस्ति&#039;गर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
» स्वस्ति ।&lt;br /&gt;
१५१&lt;br /&gt;
: कृष्णबहादुर प्रश्नसूचक मुद्रामा हेर्दछन्‌ ।धर्मदत्त ० प्रभु, तल भानुभक्त हाँजिर भयाका छन्‌ ।कृष्णबहादुर” बैठकमा राख । (धर्मदत्त &amp;quot; प्रभु,: धर्मदत्त पछाडिपछ्लाडि हददै परिदश्यबाट बाहिरिन्छन्‌ ।पुजारी चन्दन घोटिरहेको हन्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“सम्बाद बालकृष्ण समको भक्तभानुभक्तबाट साभार ।&lt;br /&gt;
पृष्र आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
बि.सं.स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
भान्‌ /घर्म »कृष्णबहादुर»&lt;br /&gt;
भानुभक्त ०&lt;br /&gt;
कृष्णबहादुर »&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
: १९११&lt;br /&gt;
: कान्तिपुर, कृ्‌ष्पाबहादुरको बैठक&lt;br /&gt;
: बिहान&lt;br /&gt;
: कृष्णबहादुर, भानुभक्त, धर्मदत्त, शशिनाथ र वैठके&lt;br /&gt;
भानुभक्तलाई पछ्चाडि लगाएर धर्मदत्त घुमाउरो भरेड्‌ चढ्दैहुन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
सोफासा कृष्णबहादुर र भुईँसा शशिवाध बसेका छन्‌ ।धर्मदत्त भानुभक्तसहित प्रवेश गर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
एकैसाथ - स्वस्ति .&lt;br /&gt;
लौ बस ।&lt;br /&gt;
धर्मकत्त बस्वछ्न्‌, भानुभक्त उभिएकै हुन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
हात जोडेर निहरिटै - प्रभुको जय होस्‌, प्रभुको निगाहलेछुद्याँ ।&lt;br /&gt;
: बत्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
कविता त तिमी राम्रो लेख्दारहयाछौ । तिमीले कवितामैलेख्याको बिन्तीपत्र पति मलाई रमाइलो लाग्यो ।&lt;br /&gt;
१५३&lt;br /&gt;
भानुभक्त ”धर्मदत्त &amp;quot;&lt;br /&gt;
कृ्‌ष्णाबहादुर »&lt;br /&gt;
ख्वामितको निगाह ।&lt;br /&gt;
उत्साहित हँदै - आध्यात्म रामायण पनि धैरै लेखिसक्नुभयाको छ- भाषामै ।&lt;br /&gt;
थाहा पायाँ । निकै राम्रो लेख्याका छन्‌ रे । राम्रो लागेर नैपालोमा बस्न्या सिपाहीहरूले पनि टपक्कै टिप्याछन्‌ ।&lt;br /&gt;
: शशिनाय ईष्यापूर्ण दृष्टि भानुभक्ततर्फ फ्याक्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
कृष्णबहादुर”भानुभक्त ०शशिनाथ ०»&lt;br /&gt;
तिमीले त अचम्मै गन्यौ भानुभक्त ।&lt;br /&gt;
अनुगृहित हुँदै हात जोडेर - छ्वामित ।&lt;br /&gt;
भानुभक्तको प्रशंसा सहन नसकेपछि - ओ हो, अचम्मैगरिदिनु भयो पण्डितजीले । वाल्मीकि मुनिको टाउकोमाआफ्नो चरण राखिदिन्‌ भयो । अब हामी किन चाहियो ?धन्य... धन्य... । रामको पवित्र चरित्रलाई अदना केटाकेटीकोजाब्रो खेल बनाइदिनु के योग्य कुरा भोत?&lt;br /&gt;
भानुभक्त सुनिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
भन्नोस्‌ त, उस्तै दिन पारी, कत्रो विधिसित हुँ, पूर्वाङ्कगरी, गणोश थापी हुँ, कसरी सुनिबक्सनु पर्न्या कुराकोहेर्नोस्‌ त दुर्गति ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त मुस्कुराएर तुनिरहन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
तपाईंलाई त सनातन धर्मको बिरोधी भन्छौ हामी, बरुन्‌ भो?भातुभक्तबाट कुनै प्रतिक्रिया आउँदैन ।&lt;br /&gt;
अब के उपनिषद्का मन्त्रैमन्त्रले भरियाकी श्वीरामगीताजीलाईपनि भाषा-भैँडिनीमा अनुवाद गरेर बजारमा उफार्न्या सुरछ कि कसो ? राम... राम... राम... राम... राम...&lt;br /&gt;
- कृष्णबहादुर भानुभक्ततर्फ हेर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
कृष्णबहादुर”भानुभक्त ०&lt;br /&gt;
: भानुभक्त कुनै प्रतिक्रिया जनाउँदैनन्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त, क्यान बोत्दैनौ ? तिम्रो केही भन्नु छैन ?पहिले पण्डितजीले भाषालाई भँडिनी भनेर पापको फलामैमुकुट कमाउनु भयो । किनकि भाषा सरस्वतीकै नाम हो ।&lt;br /&gt;
: शशितवाध निधार खुम्च्याउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
१८४&lt;br /&gt;
ब्राहमी तु भारती भाषा गीर्वाक बाणी सरस्वती ॥ ..&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
शशिनाथभानभक्त&lt;br /&gt;
शशिनाथ&lt;br /&gt;
घर्मदत्त&lt;br /&gt;
शशिनाथ&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
शशिताय&lt;br /&gt;
फेरि मलाई रामायण आँच्‌ भन्नुभयो, भाषा रामायणा पनिता बाँचिन्छ, मारिदैन ।&lt;br /&gt;
कृष्णबहाद्र सहमतिमा टाउको हल्लाउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
उसो भया क्या त सँस्कृत र भाषा समान भयो ?&lt;br /&gt;
यहाँ समानको क्रा छैन, सम्मानको कुरा छ । सँस्कृतभाषाले यी नेपाली प्राकृत भाषालाई जन्म दिइन्‌, त्यतैलेसरस्वती पुत्री पनि सम्मानपात्री छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
शशिनाध समन नपरेको भाव व्यक्त गर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
हाम्रा शशिनाथ बाजेको मातृभाषा पति नेपाली नै हो, मलाईथाहा छ।&lt;br /&gt;
शशिनाथ असजिलो मानेर आंखा फर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
सँस्कृत बज्यैकहाँ तपाईँलाई डौन्याएर लगिदिन्या यै मातृभाषाहैन ? &#039;जलम&#039; माने &#039;पानी&#039; भनेर धोक्नु भयाको बिर्सनु भो? पानीले डोन्याएर बा बगाएर जलम्‌ कहाँ पुन्यायाकोबिर्सन भो ।&lt;br /&gt;
कृ्‌ष्णबहादर हास्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
: कृष्णबहाद्रको हाँसोलाई धर्मदत्त पनि साथ दिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
धर्मवत्तलाई हकारदै - ज्योतिषी बाजे, यो हाँस्त्या मृहर्त होत ? प्रश्न विचार गरेर हाँस्नु भो कि त्यसै खुस्कनु भो ?प्रश्न बिचार गरेर खुस्किन, उत्तर विचार गरेर खुस्क्याँ ।कृष्णबहादुर अफ जोडले हांत्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
भै हाल्यो, उसो भया अग्र पुराण नै किन लाउनु पन्यो ?घरघरमा यस्ता भाषा रामायण भन्त्या अनेक शुक चरानिस्क्यापछि शुकदेवनै किन चाहियो ?&lt;br /&gt;
पुराण सँस्कृतमै बाचेर पनि त्यस्को अर्थ त भाषामा नैगर्नुहोला तपाईं ?&lt;br /&gt;
छि... छि... छि... छि..., अर्थ गर्नु बेग्लै हो, अनर्थ हुनु बेग्तैहो । अर्थ गरुन्जेल त मूलको प्रतिष्ठा रहन्छ, मलै भाषा भयापछि फेरि सँस्कृतको प्रतिष्ठा खोइ ?&lt;br /&gt;
भानुभक्त ० तपाईं आफ्नो प्रतिष्ठा चाहन्‌ हुन्छ भन्या बेग्लै हो, तर&lt;br /&gt;
पटकया&lt;br /&gt;
१८५&lt;br /&gt;
शशिनाथ&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
कृष्णबहादुर»&lt;br /&gt;
शशिनाथ&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
१०६&lt;br /&gt;
सँस्कृत त सब्धप्रतिष्ठित छ । सँस्कृतमा बिशेष गुण छभन्या भाषाको प्रकाशले सँस्कृतलाई डर किन ?&lt;br /&gt;
बृ पचाउन नखोज्नोस्‌, अजीर्ण होला । सँस्कृत दैव भाषाहो भन्न्या कुरा थाहा छैन ? सँस्कृतमा पाठ गरेर हुन्या पुण्यभाषा पाठ गर्दा होला ?&lt;br /&gt;
सँस्कृत मात्रै देवताको भाषा हो भनेर कसरी भनूँ ? केपशृपतिनाथ नेपाली भाषा बुम्नु हुन्न र ?&lt;br /&gt;
शशिनाथ अप्ठ्यारो परेको भावमा भुईँतिर हेर्छन्‌ ।नेपालीहरू हामी त उहाँसित भाषामै प्रार्थना गर्छौ ।कृष्णबहादुर हादिछुन्‌ ।&lt;br /&gt;
भाषामा जातिपाति हुन्छ भन्न्या कुरा पनि मलाई ठीकलाग्दैन । जरेतायुगमा रामायणका धोबिनीले पनि सँस्कृतमाबातचित गत्याका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
शशिनाध असजिलो मानेर छटपटी गर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
कलीयुगका शशिनाथ पण्डित बाजे र पण्डित्नी बज्यैसमेत&lt;br /&gt;
नेपाली भाषामा कुराकानी गर्नहन्छ ।&lt;br /&gt;
कृष्णबहादुर तिघ्रा ठटाएर हाँस्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
शशिताध असमन्जसमा पर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
साच्चि भनुँ भन्या, तपाईं सँस्कृतमै बुझ्नु हुन्न, भाषामाबृफ्न्‌ हुन्छ । अक स्पष्टसित भनेँ भन्या यहाँले आजसम्मसँस्कृतमा विचार गर्नुभयाको छैन होला ।&lt;br /&gt;
कसो शशि ?&lt;br /&gt;
चर्कदै - म सधैँ सँस्कृतमा नै बिचार गर्छु । पचासौंपटकसँस्कृतमा सपना देख्याको छु । तपाईं अन्धो हनुभयो भनेरजगतैलाई अन्धो तुल्याउन खोज्न हुन्छ ?&lt;br /&gt;
राम-चरित्र सँस्कतमा तलुकाएर भाषामा उदाड्र पारी देखाउनुनै अरुलाई अन्धो तुल्याउनु हौ भन्या मैले खोज्याको त्यहीहो।&lt;br /&gt;
प्रतिक्रिया जान्न शशिनाथ कृष्णबहादुरलाई हेर्दछन्‌ ।कृष्णबहादुर भानुभक्तसंग सहमति जवाउँंदै टाउको हल्लाउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
2 धर्मदत्त पनि कृ्‌ष्णबहादुरतर्फ हेरिरहेका हन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
कृष्णबहादुर&amp;quot;भानुभक्त ०&lt;br /&gt;
भानुभक्त, भन त सँस्कृतको कुन स्थान होस्‌, भाषाको कुन ?ख्वामित्‌ यो छुद्व भिक्षुकको विचारमा त सँस्कृतलाई अबहामीले पुस्तक-मन्दिरमा राखी नित्य पूजा गर्नुपर्छ । उनकोआरतीमा बल्याको दीप ननिभाई त्यै उज्यालोमा हामीलेसमस्त संसार पढ्नु पर्छ ।&lt;br /&gt;
: शशिनाथ अमिलो अनुहार लगाएर कर्के आखाले भानुभक्तलाई&lt;br /&gt;
हेर्दै सुनिरहेका छन्‌ ।उनको आरतीमा बज्याका शब्दहरूले हाम्रो शब्दलाई शुद्धपार्नुपर्छ, उनको दर्शनले दार्शतिक बनाउन्‌पर्छ ।&lt;br /&gt;
: कृष्णबहादुर चित्त बुझेको अर्थमा टाउको हल्लाउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
कृष्णबहादुर»&lt;br /&gt;
भानुभक्त ०&amp;quot;&lt;br /&gt;
कृष्णबहादुर»&lt;br /&gt;
हाम्रो अविच्छिन्न ध्यानले यो नेपाली प्राकृत भाषालाई सँस्कारगर्दै कालान्तरमा पसैलाई सँस्कृत बनाउनुपर्छ ।&lt;br /&gt;
शशिनाध आखा तरेर हेर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
तर सँस्कृतलाई पनि मातृभाषा बनाउन खोजेर नेपाली भाषाकोविकास रोक्न्‌ प्राचीन इतिहास पढ्न्या विद्यार्थीले आफैँलाईबिर्सनु जस्तै हौ ।&lt;br /&gt;
ढीक भन्यौ । तिम्रो कुराले मेरो चित्त बुझ्यो ।&lt;br /&gt;
शशिनाथ कर्के आखा लगाएर कृष्णबहादुर र भानुभक्तलाईपालैपालो हेर्दघन्‌ ।&lt;br /&gt;
हजुरमा आएर यतिका करा बोल्याँ, उचनीच क्षमा बिन्तीगर्छु ।&lt;br /&gt;
तिमीले अन्‌चित केही बोलेनौ । दुवैजनाको विवाद राम्रोलाग्यौ, भानुभक्तको वाद मन पन्यो ।&lt;br /&gt;
: भानुभक्त प्रसन्न मुद्रामा हात जोड्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
कृष्णबहादुर»&lt;br /&gt;
भानुभक्त ०कृष्णबहावुर”&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
शशिनाध मुख बिगार्न ।&lt;br /&gt;
अब म पन्ति तिम्रो रामायण पाठ गर्छु । एक प्रति सारेर दिएहै?&lt;br /&gt;
हात जोड्दै - प्रभु, टक्रयाउँछ ।&lt;br /&gt;
म सिरानीमा राखिछोड्छु ।&lt;br /&gt;
१८७&lt;br /&gt;
शशिनाध कर्के आखाले कृ्‌ष्णबहाद्रलाई हेर्छन्‌ ।कृष्णबहादुर» मलाई पनि नबृकर पाठ गर्नु भन्दा बुकेरै पाठ गर्नुमा विशेषधर्म होला जस्तो लाग्छ ।शशिवाध थाप्लोमा हात लगाउँछन्‌ र पराजयमा टाउकोझुकाउँछन्‌ ।कृष्णबहादुर हातले डसारा गर्दछन । बैठके किस्तीमा रुपियाँकोरातो पोको लिएर प्रवेश गर्छ ।कृष्णबहादुर» रातो पोको भान्‌भक्तलाई दिदै - लेक, छोराको व्रतबन्धराम्ररी गर ।भानुभक्त पैसाको पोको हातमा थाप्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
सम्बाद बालकृष्ण समको भ्रक्तभानुभक्तबाट साभार ।&lt;br /&gt;
0 मि रापृद्धद आदिकवि भानुभत्त&lt;br /&gt;
दृश्य ९१&lt;br /&gt;
विसं.स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
कुलचक्रभानुभक्तकुलचक्र&lt;br /&gt;
भानुभक्तकलचक्र&lt;br /&gt;
भानुभक्तकुलचक्र&lt;br /&gt;
१९१९कान्तिपुर, कुलचक्रकेशरीको कोठा&lt;br /&gt;
बिहान&lt;br /&gt;
कुलचक्रकेशरी र भानुभक्त&lt;br /&gt;
कुमारी चोकबाट छुटेपछि भानुभक्त भिनाजु कुलचक्रकेशरीकाघरमा भेटगर्न जान्छन्‌ । कुलचक्रकेशरीबाट दश्य खुल्दै जान्छ रअगाडि बसेका भानुभक्तलाई पनि समेट्दछ&lt;br /&gt;
अस्ति छुद्यौ होइन ?&lt;br /&gt;
हजुर ।&lt;br /&gt;
जर्नेल कृ्‌ष्णबहादुरले पनि मद्दत गर्नु भयो भन्न्या स्‌न्याकोथियाँ नि!&lt;br /&gt;
हो, धर्मदत्त खर्दारले पनि निकै गर्नुभयो ।&lt;br /&gt;
मुख्य क्रा त खायाको विष पो लाग्छ, नखायाको क्यानलाग्थ्यो । तिमीले अधर्म गन्याकै थिएनौ, त्यचैले छुट्यौ ।तर पनि तारिखमा छुटयाको छु ।&lt;br /&gt;
त्यो पनि आफैं ठीक हुन्न्याछ, समय आउन देउ ।सम्बादकै कममा भानृभक्तको आँखा कोठामा राखेको&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
१०५९&lt;br /&gt;
भानुभक्त «&lt;br /&gt;
कलचक्र ०&lt;br /&gt;
खुकरीमा पर्दछ ।&lt;br /&gt;
खुकुरीबाट आँखा हटाएर - छोराको ब्रतबन्धका लागि भोलिरम्घा जान लाग्याको ।&lt;br /&gt;
दौराको खल्तीबाट निम्ताको निड्रो सुपारी झिक्दै - व्रतबन्धकोनिम्ता टक्रयाउँ भनेर ।&lt;br /&gt;
तिम्ताको सुपारी समाउँदै - ओहो, यस्तो शुभकार्यमा क्याननआउन्‌ । फुर्सद मिलाएर म आउ्य्राछु ।&lt;br /&gt;
: भानुभक्त फेरि कर्के आखा लगाएर खुकूरीलाई हेर्दछन्‌ ।- भानुभक्तले खुक्रीलाई हेरेको देखेपछि क्लचक्र आँखाको&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
गुलचमा ”भानुभक्त &amp;quot;«&lt;br /&gt;
इसाराले &#039;कम्या हो ?&#039; भनेर सोध्दछन्‌ ।सस्वर कवितामै आफूना करा भन्दछन्‌ -बिद्वान्‌ जन्‌ले लोहलाइ बेच्नु छैन ।भन्न्या सुन्यैं यो कुरा हो कि होइन ?हो।हास्दै-&lt;br /&gt;
लौहा बैची मोल क्या तीनु होला ।&lt;br /&gt;
: कलचक्र जिल्ल पर्दछन्‌ ।- भानुभक्त हाँस्दै -&lt;br /&gt;
कुलचक्र ०»&lt;br /&gt;
योग्यै जानी यो उसै दीन्‌ होला ॥&amp;quot;&lt;br /&gt;
रमाइलो मानेर हास्दै - तिमीले कवितामै खुकुरी माग्यापछि कसरी नदिन्‌ ?&lt;br /&gt;
टेबलको खुकुरी फिकेर दिदै- यो मेरो चिनो तिमीलाई -खुकुरी ।&lt;br /&gt;
: क्यामरा खुकुरीको नजिक गाएर स्थिर हुन्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“भानुभक्तको फुटकर कविता&lt;br /&gt;
१९०&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
वि.सं.स्थानसमयपात्रकृष्णबहादुर»कारिन्दा ०»कृष्णबहादुरघर्मदत्त »कृष्णबहादुर»घर्मदत्त ”पटकथा&lt;br /&gt;
१ १६१२: कान्तिपुर, कृष्णबहादुरको बैठक&lt;br /&gt;
: अपराह्न: कृष्णबहादुर, धर्मदत्त, कारिन्दा र सहयोगी&lt;br /&gt;
कृष्णबहादुर सोफामा बचेका छन्‌ । अगिल्तिर एकापट्टि धवर्मदत्ततथा अर्कापड्टि कारिन्दा र उनका सहयोगी मिसिल लिएरउभिएका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
कारिन्दालाई -क्या भन्न आयौ ?&lt;br /&gt;
प्रभु, ज्यातमुद्दाको साक्षीको बयान जाहेर गर्नु थियो ।धर्मवत्ततिर फर्केर - अँ, तिम्रोनि?&lt;br /&gt;
प्रभु, भानभक्तले रम्घाबाट बिन्तीपत्र टक्रयाणाका रहयाछन्‌ ।कुमारी चोकमा हाजिर हुन्या बेला भयो क्यार, हैन ?प्रभ्‌... भयो । घरमा पुगेर छोराको व्रतबन्धपछि बिरामीपन्याछन्‌ । त्यसैले बेलामा हाजिर हुन सक्यानन्‌ । पाउमाबिन्ती चढाइदिनुपन्यो भनेर मलाई पत्र तैख्याका थिया ।&lt;br /&gt;
१९१&lt;br /&gt;
कष्णबहादुर” बिन्तीपत्र पति कवितामै लेख्याका होलान्‌, हैन ?धर्मदत्त ” हि..हि...हि...हि...कृष्णबहाद्र” खै लेक त।धर्मवत्त चिठी दिएर पछाडि हटदघन्‌ र आफ्नै ठाउँमा उभिन्छन्‌ ।: कारिन्दा र सहयोगी सतर्क हुन्छन्‌ ।: कृष्णबहादुर बिन्तीपत्र फुकाएर मनमनै पढ्न थाल्छन्‌ ।- भानुभक्तको स्वरमा कविता गुन्जन्छ -शरिर छ अति कच्चा अन्न जलले रह्याको ।बिनति कति गरेँ यो देहमा जो भयाको ॥बहुत फजिति पायौँ रोगले ग्रस्त पारी ।शरिर हुन गयो ठिक पूर्व झैँ फेरि भारी ॥: धर्मदत्त र कारित्दा कृष्णबहादुरलाई हेरिरहेका छन्‌ ।कृष्णबहादुर बिन्तीपत्र पढ्दै सोफाबाट उठ्दछन्‌ ।० व्यर्नैमा म कुमारि चोक युनियाँ वाहीं बिरामी भई ।आयाध्याँ घरमा बिराम्‌ अति बढ्यो ठूलो बिपत्ती सही ॥- धर्मदत्त हात जोड्दछन्‌ ।- कृष्णबहादुर बिन्तीपत्र पढिरहेकै हुन्छन्‌ ।० काटयाँ दिन्‌ अब सन्च भो अरु पनि थुन्छन्‌ त मेरो गती ।अर्को छैन दया रहोस्‌ हजुरको मेरा त ख्वामित्‌ पती ॥कृष्णबहादुर» बिन्तीपत्र पट्याउँदै - निक्कै दुख पाया भानुभक्तले । म हेरेँ,क्या गर्न सकिन्छ ।: धर्मदत्त हात जोड्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“भानुभक्तको फुटकर कविता&lt;br /&gt;
१९२ आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
वि.सं. : १९१२&lt;br /&gt;
स्थान : रम्घा/चुँदी बेसीसमय : बिहानपात्र : भानुभक्त, इन्द्रविलास, गाउँलेहरू र भगवान्‌ विष्णु&lt;br /&gt;
रम्घामा बरपीपलको चौतारीमा बसेर भानुभक्त भक्तमाला&lt;br /&gt;
लेखिरहेका छन्‌ । लेखिसकेपछि स्वर गाउँछन्‌ -भ्नानुभ्रक्त &amp;quot; प्रतिज्ञा मैले यो यमसित गन्याँ जन्मि अब ता ।&lt;br /&gt;
सिताराम्‌ भज्न्याछु विषयहरूमा छोडि ममता ॥&lt;br /&gt;
प्रतिज्ञा सो बिर्सीकन जनधनै खोजि भुलियो ।&lt;br /&gt;
सिताराम्‌ भज्न्या हो शिव शिव उसै आज भुलियो ॥&lt;br /&gt;
गायनको अन्त्यमा लेखोट उठाएर नजिकै लैजान्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
श्री भक्तमाला शीर्षकमा गएर क्यामरा स्थिर हुन्छ ।&lt;br /&gt;
उद पद ॥ 1&lt;br /&gt;
दृश्य परिवर्तन हुन्छ । श्री भक्तमाला लेखिएको लेखोटबाट दृश्य&lt;br /&gt;
फुक्दैजान्छ र रम्घाको अर्को चौतारीमा भन्तजनहरूलाई वरिपरि&lt;br /&gt;
राखेर भक्तमाला गाइरहेका इन्द्रबिलासलाई उद्घाटित गर्दछ ।इन्द्रबविलास ० गयो बालक्‌ कालको वय पनि उतै बालरसले ।&lt;br /&gt;
यसै रीत्‌ले यौवन्‌ पनि बिति गयो मोहबसले ॥&lt;br /&gt;
उ तीडिसि््ििि्विवि्् वि तम वविता&lt;br /&gt;
पटकथा १९३&lt;br /&gt;
भयो बृद्धावस्था अफ पनि भजीदैन मनले ।कसो गर्नन्‌ छख्वबामित्‌ मकन यमका दूतहरूले ॥३॥&lt;br /&gt;
पट गददृश्य परिवर्तन हुन्छ । सानो पीपलको रुखमुनि ढुड्टामा बसेरइन्द्रविलास एकलै भक्तमालाको अगाडिका हरफहरू सस्वरपढिरहेका छन्‌ ।पष्ठभूमिसा हिसश्चङ्खला देखिन्छन्‌भजौंला भन्दैमा कति कति बित्यो जन्म जनको ।मरौंला भन्नाको अरु पनि विचार्‌ छैन मनको ॥अहो दैवी माया बडि वलवती जानि मनले ।बिचार्‌ गर्दै गर्दै हरि भजिलिन्‌ भक्त जनले ॥१०॥।&lt;br /&gt;
पट पददृश्य परिवर्तत हुन्छ । खेतमा दाइ भइरहेको छ । दुईजनापुरुष र एकजना महिला धानको बिटा फकाउने र मृठाफुकाएर छिरल्ते काम गर्दैछन्‌ । अर्को एकजना पुरुष मियोकोवारिपरि गोरुहरूलाई धपाउंदैछ । छेउनै परालमाथि बचेरइन्द्रविलास भक्तमाला गाइरहेका छन्‌ । पृष्ठभूमिमा दाईकोकाम चलिरहन्छ ।&lt;br /&gt;
&amp;quot;भानुभक्तको भक्तमालाबाट&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
० अवीवेकी मृढो त्रिभुवनविषे को छ मसरी ?बितायाँ व्यर्थै यस्‌ विषय-रसमा जन्म पसरी ॥: गोरुहरू मियो वरिपरि घृमिरहेका छन्‌ ।० कउन्‌ ठुलो चिज्‌ हो विषयरस यस्‌ पाजि रसमा ।दियाँ मैले यो मन्‌ बृफ्िबुकि पन्याँ मोह बसमा ॥२०॥दै ॥&lt;br /&gt;
दृश्य परिवर्तन हुन्छ । आफ्नो पूजा कोठामा इन्द्रविलासभगवान्‌ विष्णुको मूर्तिलाई हात जोडी प्रार्थना गर्दैछन्‌ -&lt;br /&gt;
» कटीको पीताम्वर्‌ करकमलका कड्डणाहरू ।किरीट्‌ कण्डल्‌ कौस्तुभ्‌ तुलसी वनमालाहरू अरु ॥बलैले सम्झन्छु दृढ नरहन्या एकक्षण पलक्‌ ।काउन्‌ दिनमा देख्छु प्रभु हजुरको सुन्दर कुलक्‌ ॥२२।&#039;&amp;quot;भजनको अन्त्यमा हातिरहेका भगवान्‌ बिष्णु देखापर्दछन्‌ ।इन्द्रबिलास भगबानूलाई शीर झुकाएर नमत्कार गर्दछन्‌ ।भगवान्‌ बिष्णु हात उठाएर आशीर्वाद दिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
पटकथा १९५&lt;br /&gt;
दृश्य ९४४&lt;br /&gt;
विसंस्थानसमयपात्रगाउँले ०»इन्द्रविलास »गाउँले नड्न्द्रविलास »&lt;br /&gt;
१९६&lt;br /&gt;
: १९१२&lt;br /&gt;
: रम्घा, बारी&lt;br /&gt;
: बिहान&lt;br /&gt;
: इन्द्रविलास र गाउँलेहरू&lt;br /&gt;
इन्द्रबिलास बारीमा तीनजना बयस्क र बृद्धसँग बसेरकुराकानी गरिरहेका छन्‌ । भम्तसालाको लेखोटबाट दृश्यखुल्दैजान्छ र सबै पात्रहरूलाई परिद्श्यमा समेददछ ।हे्दैगरेको लेखोटलाई पद्याउंदै - यस्ता भक्तिका सिलोक तचाइने, सँस्कृतमा मात्रै लेखिन्थ्या, अब त भाषामा पनिलेल््न थाल्या । कसले कथ्याको हौ यो?&lt;br /&gt;
भानुभक्तले कथ्याको हो यो ।&lt;br /&gt;
ए,&lt;br /&gt;
लौरोको भर गरेर बततेका बृद्ध जिल्ल परेर हेर्दछन्‌ ।बिहात-बेलकी पाठ गर्त भक्तिरसको भजत बताइदे न भनेरभन्याको थियौँ, भानुले बनाइदियाछ । बिहान-बेलुकी म यैभक्तमालाको पाठ गर्छु आनन्द लाग्छ । भगवानको दर्शन्‌ हुन्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
आदिकवि भातुभकत्त&lt;br /&gt;
वि.सं. ; १९१६स्थान : चुँदी रम्घा, चौतारीसमय : दिउसोपात्र : भानुभक्त र गाउँलेहरू&lt;br /&gt;
भानुभक्त बरपीपलको चौतारीमा बसेर गारउलेहरूलाईरामायणको युद्धकाण्ड गाएर सुनाइरहेका छन्‌ । पृष्ठभूमिमावढी र हिमश्चखला देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त ” भन्छन्‌ श्री रघुनाथ अहो यी हनुमानले खुब्‌ ठूलो काम्‌ गस्या ।एक्लै गैकन रावणादि विरको सेखी यित्तैले हन्या ॥पन्रो क्षार समुद्व कुँदिकन फेर्‌ खाग गर्नु लड्डा अनी ।को सक्ला सब डर्दछन्‌ यी जति छन्‌ इन्द्रादि द्यौता पनि ॥&amp;quot;भक्तजन भावविह्वल भएर सुनिरहन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“भानुभक्तको रामायणबाट&lt;br /&gt;
पटकया १९७&lt;br /&gt;
स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
चन्द्रकलाभानुभक्त&lt;br /&gt;
१९१७रम्घा, शिखरकटेरीको सुत्ने कोठा: रातिभानुभक्त, चन्द्रकलाभानुभक्तले रामायणको युध्दकाण्ड लेखिसिध्याएर चन्द्रकलालाईसुनाउँदै गरेको दृश्य खुल्बछ् । खाटमा बसेर भानुभक्तयुध्दकाण्डको अन्तिम श्लोक सस्वर पढ्दैछन्‌ -» शम्भूले सब बेद मन्थन गत्या श्रीरामको नाम्‌ सरी ।अर्को तत्व मिलेन केहि र लिगा साह्रै पियारो गरी ॥चन्द्रकला आनन्द मानेर सुनिरहेकी छिन्‌ ।सोही तत्व त पार्वतीकन दिया अध्यात्म रूप्ले गरीजसले प्रेम गरि स्‌न्छ यो सहज त्यो उत्रन्छ संसार्‌ तरी ॥३०८१॥कविताको अन्तिम श्लोक सकेर भानुभक्त मृस्क्राउँछन्‌ ।० कति मिठो रै&#039;छ । अकै सुनाउनोस्‌ न।» यत्ति हो । युद्धकाण्ड सकियो ।भानुभक्त किताब पट्याउँछन्‌ । म्यामरा किताबनजिक सर्दैजान्छ र युद्धकाण्ड लेखिएको लेखोटमा गएर स्थिर हन्छ ।दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“भानुभक्तको रामायणबाट&lt;br /&gt;
१९८&lt;br /&gt;
आविकबि भानुभक्त&lt;br /&gt;
समूह स्वर «&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
१९१८चँदी वेसी, बगौँचाको देवी मन्दिरबिउसो&lt;br /&gt;
भानुभक्त, इन्द्रविलास, पण्डित, भक्तजन, महिला तया प्रुषहरूरम्घाको एउटा रमणीय बगैँचामा रामकीर्तन भइरहेको छ ।वगैँचाको मध्यभागमा सानो मण्डप बताइएको छ; जसमा भानुभक्त,इन्द्रविलास, पण्डित र एकजना वयोबद्ध बसेका छन्‌ । मण्डपवरिपरि डोरी र फूलको तोरण टाँगिएको छ । पृष्ठभूमिमा केरा,मेवा आदि फलफूलका वृक्षहरू देखिन्छन्‌ । भक्तजन मण्डपवरिपरि वृत्ताकारमा वसेका छन्‌ । इन्द्रविलासले हार्मोनियमबजाउँदै सुरु गरेको रामकीर्तनमा भक्तजन समूह ब्वरमा साथदिन्छन्‌ । इन्द्रनिलासबाट दृश्य खुल्दैनान्छ र मण्डप तथाभक्तजवलाई उद्घाटित गर्दै अर्घवृत्ताकार भएर घुम्छ ।हरेराम हरेराम राम राम हरे हरे ।&lt;br /&gt;
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥&lt;br /&gt;
१९९&lt;br /&gt;
: क्यासरा मण्डपमा बसेका इन्द्रविलास, भानुभक्त, पण्डित रवृद्धजनको नजिक हँदै गएर स्थिर हुन्छ । रामकीर्तनचलिरहेको हुन्छ ।&lt;br /&gt;
हरेराम हरेराम राम राम हरे हरे।&lt;br /&gt;
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरै ॥&lt;br /&gt;
क्यामरा अर्धवृत्ताकारमा मण्डपलाई प्रदक्षिणा गर्छ ।हरेराम हरेराम राम राम हरे हरे ।&lt;br /&gt;
रामकीर्तव स्थलको बिहङ्म दृश्य देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥&lt;br /&gt;
हरेराम हरेराम राम राम हरे हरे ।एउटी भक्त महिला उठेर नाच्न थाल्दछिन्‌ ।हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥&lt;br /&gt;
हरेराम हरेराम राम राम हरे हरे ।&lt;br /&gt;
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥&lt;br /&gt;
अर्की बृद्ध महिला पति भावविभोर भएर हरिकीर्तनको तालमानाच्न थाल्दछिन्‌ ।&lt;br /&gt;
इन्द्रविलास » हार्मोनियम बजाउन बन्दगर्दै - अब केहीबेरको लागि&lt;br /&gt;
भक्त-१भानुभक्त&lt;br /&gt;
मध्याहनको बिश्रान्ति हुन्छ ।० यो रामकीर्तनले पनि अलौकिक आनन्द दिन्छ ।» ठीक भन्नुभयो पण्डितजीतै ।&lt;br /&gt;
इन्द्रविलास ” यो राम भजनको क्रा गर्दा मलाई त अध्यात्म रामायणभन्दा&lt;br /&gt;
भक्त-१&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
२००&lt;br /&gt;
पनि भानुले लैख्याको रामायण बाचन गर्दा बढी आनन्दआउँछ ।&lt;br /&gt;
० य्रुध्यकाण्डसम्म त मैले पनि पढ्याको छु। मूल रामायणाभन्दाघेरै मिठो लाग्यो मलाई पति ।&lt;br /&gt;
: भानुभक्त विनयमा टाउको निहुराउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
» हैन सबै लेखिसिध्याउन्‌ भयो र ?&lt;br /&gt;
० छैन। उत्तरकाण्ड लेख्न सुरु गच्याको छु। किञ्चित्‌ नेपालमै&lt;br /&gt;
आदिकवि भातृभत्त&lt;br /&gt;
भक्त-२ &amp;quot;भानभत्त «&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
“भानुभक्तको रामायणबाट&lt;br /&gt;
लेखिसिध्यायाको थियाँ ।&lt;br /&gt;
दुईचार श्लोक भया पनि सुनँ न ।&lt;br /&gt;
भक्ततर्फ फकदै पच्चर गाउँछन्‌ -&lt;br /&gt;
शम्भूका मुखदेखि राज्य अभिषेक राम्‌को सुनीथिन्‌ जसै ।सोधिन्‌ पार्वतिले सदाशिवजि थ्रैं लीला पछीका तसै ॥पृथ्बीमा कति बर्ष राज्‌ हुनगयो लीला तहाँ कुन्‌ भया ।कस्ता रीत्‌सित राज्य छोडि रघुनाथ बैकुण्ठ धाममा गया ॥१॥भक्तजन तन्मयका साध सूनिरहन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
शम्भो श्रीरघुनाथका जति त छन्‌ लीला कृपाले गरी ।आजा आज हवस्‌ म सुन्छु भगवन्‌ विन्ती छ पाक परी ॥&#039;कविताको अन्तिम पाउमा पुगेर ग्यामरा भानुभक्तकोअनुहारमा स्थिर हुन्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
२०१&lt;br /&gt;
वि.सं.स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
चन्द्रकलारमानाथहुलाकी&lt;br /&gt;
रमानाथ&lt;br /&gt;
२०२&lt;br /&gt;
: १९१९: चुँदी बेसी, मोहोरियाको घर-आँगन: चन्द्रकला, रमानाथ र हुलाकी&lt;br /&gt;
आँगनको मध्यभागमा रमानाध हातमा चिठी लिएर मनमनैपढ्दैछन्‌ । हुलाकी पिढीमा बसेको छ । चन्द्रकला छेउमै एकडालो मकै राखेर जाँतोमा पिध्न बसेकी छित्‌ । रमाताधबाटदृश्य खुल्दैजान्छ्ध र सम्पूर्ण घर-आँगन र पात्रहरूलाईपरिद्श्यमा समेद्छ ।&lt;br /&gt;
कसलै पठायाको चिठी रह्‌याछ ?&lt;br /&gt;
चिठी पढ्न छोडेर - नेपालबाट बालै पठाउन्‌ भ्याको,उठ्दै- भञ्ज्याङको दामोदर पण्डित बाजेको पनि चिठीपुन्याउन्‌ पर्व्याछ । लौ, त म गर्यौ ।&lt;br /&gt;
हुन्छ।&lt;br /&gt;
हुलाकी जान्छ ।&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
चन्द्रकला » के लेख्नु भा&#039;रै&#039;छ ? पढेर सुना न, कैले आउन्या रे ?रमानाथ : चिठी पढ्दै - स्वस्तिश्वी सकल मंगलालय श्रीनानी रमानायशर्मणि श्री भानभक्त शर्मण: शुभाशिष: सन्तु उप्रान्त:यैतिञ्ज्यालमा म घर आइपुग्न्या थिज्जा. उत्तरकाण्डरामायण केहि बाँकी बनाउनु रहयाको थियो र सभैइष्टमित्रले, त्यो रामायण समाप्ति गरिजानुभया, लोकलेगाउन्या छ.चन्द्रकला सृनिरहेकी छिन्‌ ।..-तपाम्रिलाई पनी जो हुनु सिद्धि यतैबाट हुन्याछ. सिद्धगराइ जाउ भनी बडाबडाले पती भन्दा. बेस्‌ हो भनी, त्यैसिद्ध गराउन लागिरहयाछु, सय-डेढसय सिलोक वनाउनबाँकि छ. त्यो सिद्ध गराई भरिवैशाषमा. अवस्य. आइपुग्छ।चन्द्रकला ० रोपयुक्त स्वरमा- नेपाल गयापछि त घरपरिवार सबैलाईचटक्क बिर्सनु हुन्छ । श्लोक कथ्न पाया पुग्यो ।: मकै पिध्न थाल्दाछिन्‌ । जाँतोको घुमाइ सँगसँगै क्यामरा जाँतोकोवजिक हुँदैजान्छ । मकै पिधेको आवाज बढ्दैजान्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“भानुभक्तको सक्कल पत्रबाट उद्धृत&lt;br /&gt;
पटकथा २०३&lt;br /&gt;
वि.सं : १९१९&lt;br /&gt;
स्थान : तारापतिको घरको कोठा&lt;br /&gt;
समय : राति&lt;br /&gt;
पात्र भानुभक्त र तारापतितारापति र भानुभक्त सुत्ने कोठाको भुईंओघयानमा नपेरबात मारिरहेका छुन्‌ । कुराकानीको अन्त्यमा भानुभक्तकोसम्वादबाट दृश्य सुरु हुन्छ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त &amp;quot; हो, रम्घा भोलि नै पुग्छु ।&lt;br /&gt;
तारापति » सुख्ख दुख्खको धेरै बात मारियो । लामो बाटो हिडेर पाल्नुभयाको, यकाइ पनि लाग्यो होला, अब सृत्नुहोस्‌, भोलिबिहानै भेटौंला ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त &amp;quot; हस्‌तारापति कोठाबाहिर जान्छन्‌ । म्यामरा तारापतिलाईपछुयाउँछ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त२०४ आबिकबि भानुभक्त&lt;br /&gt;
दृश्य १००&lt;br /&gt;
बि.संस्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
सास्‌&lt;br /&gt;
बुहारी&lt;br /&gt;
पटकया&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
१९१९&lt;br /&gt;
तारापतिको घरको जुठ्यान&lt;br /&gt;
राति&lt;br /&gt;
सास्‌ र बुहारी&lt;br /&gt;
तारापतिकी जहान र बुहारीका बीच पकाएका र खाएकाभाँड्डा कसले मास्ने भन्ने बिषयमा वादविवाद चलिरहेकोछ । जुठ्यानमा भाँड्डाहरू थृप्प्राइएका छ्न्‌ । सासू र्‌बुहारी आमनेसामने उभिएर बिवाद गर्दैछन्‌ । बुहारीबाटदृश्य खुल्दैजान्छ र तालु पनि परिद्श्यमा देखापर्छिन्‌ ।ठूलो स्वरमा - जुठोचुलो पनि म एक्तैलै गर्नुपर्न्या, पकायाकार खायाका भाँडा पनि म एक्लैले माम्नुपर्न्या । हैन, क्याकोरिन खायाकी छु हुँ, मैले यौ घरको ?&lt;br /&gt;
बुहारीको भन्दा चर्को व्वरमा- तैँले नमाम्या कस्ले माफुछ एबजिनी ? कि. कमारी ले&#039;र आयाकी थिइस्‌ माइतीबाटभाँडा माफ्न ?&lt;br /&gt;
क्याको मेरा माइती उड्कनु हुन्छ ? कतिगोटी कमारीकालर्के ताँती लाइदियाका थ्या तपाईका माइतीले चाहिँ ?&lt;br /&gt;
२०५&lt;br /&gt;
सासू ० चकदै - अङ युतुनौ लाग्छैस्‌ बजिनी, खुरुक्क भाँडा नमाडेर ।: जूठा भाँडा बुहारीपट्टि सारिदिन्छिन्‌ ।बृहारी &amp;quot; भाँडा सासूपट्टि पार्दै -सप्पै भाँडा त ज्यान गया पनिमाझिदिन । आधा भाँडा त आफैँले मार्र्या पनि हुन्छ ।सास्‌ ५ हेर त, कसरी नमाफ्दी र छस्‌ ।- भाँडा फेरि बुहारीपट्टि सारिदिन्छिन्‌ ।: बुहारी जुठा भाँडा उठाएर घरतिर फाल्नलाई मच्चाउँछिन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
२०६ आदिकवि भातुभकत्त&lt;br /&gt;
वि.सं. ; १९१९&lt;br /&gt;
स्थान : तारापतिको घरको सुत्लै कोठासमय १ राति&lt;br /&gt;
पात्र : भानुभक्त&lt;br /&gt;
बृहारीले फालेको भाँडाको ठूलो आवाज आउँछ । आवाजसंगैआनुभक्त तर्चेर ओब्लयावबाट उठ्छन्‌ र ध्यान दिएर सुन्छन्‌ ।आवाज आउन बन्द हुन्छ । भावृभक्त तिरक ओढेर सृत्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
पटकथा २०७&lt;br /&gt;
दृश्य १०२&lt;br /&gt;
वि.सं.स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
सास्‌&lt;br /&gt;
बुहारी&lt;br /&gt;
२०८&lt;br /&gt;
: १९१९&lt;br /&gt;
: तारापतिको घरको जुद्यान: राति&lt;br /&gt;
: सास्‌ र बुहारी&lt;br /&gt;
भाडा मार्ने विषयलाई लिएर सासू र बुहारीका बीचमारुगडा चलिरहेको छ।&lt;br /&gt;
पाखरा सृकदै- फोड्‌ फोड्‌, सप्पै भाँडा फोड्‌ । तेरा बाबुलेदाइजोमा दियाका भनिठान्याकी छस्‌ कि क्या हो, ए कुकुरनी ?आफैँ कुकुर्ी होला नि । तपाईंकै दाइजो भया, आफैलेमाझेर मर्नु नि भाँडा ।&lt;br /&gt;
जुठा भाँडा हन्ड्याड्हन्डङ्‌ पार्दै सातृपट्टि सारिदिन्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
बिसं.स्यानसमपपात्र&lt;br /&gt;
सास्‌बुहारीसास्‌&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
; १९१९.&lt;br /&gt;
तारापतिको घररातिभानुभक्त, सास्‌ र बुहारी&lt;br /&gt;
: खाटमा सुतिरहेका भानुभक्त भाँडाकुँडा बजारेको आवाजले&lt;br /&gt;
तर्सिन्छन्‌ र तिरकले मुख छोप्छन्‌ । भाँडाकुँडा बजारेको रफालेको आवाज बरोबर आइरहन्छ । भानुभक्त मुख बिगार्छन्‌र कान यृन्दछन्‌ । भाँडा बजार्ते आवाजको कम तरोकिएपछि सिरक हटाएर बिस्तारै उठेर र्याल खोली हेर्छन्‌ । तलसासू बुहारीको फागडा चलिरहेकै हुन्छ ।&lt;br /&gt;
हेरौँ त, क्यान माझ्दिनस्‌ जुठा भाँडा ?&lt;br /&gt;
माम्दिन भन्यापछि एक माम्दिन, दुई माम्रिदित तीन माम्दिन ।हाततको भाउ लाउँदै- तेरा जगल्टा उखेल्न सकिन भन्याबाबुकी छौरी हैन ।&lt;br /&gt;
भावृभक्त फगडा सुनेर अमिलो मुख लगाउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
तासूभन्दा चर्केर- हेरँ त, जगल्टा उखेल्याको । मेरो हातमा&lt;br /&gt;
२०९&lt;br /&gt;
पनि दही जमायाको छैन । यी तिम्रा भाँडा ...&lt;br /&gt;
भुइैको जुठो कसौँडी टिपेर घरतिर मच्चाएर फाल्छित्‌ ।भानुभक्त हत्तरपत्त रुयाल लगाउँछन्‌ । कयौँडी स्र्यालमाठोकिन्छ । भानुभक्त ड्रोरीमा टाँगेको आफ्नो लबेदाबाट कागज,कलम र मसी रिम्दछन्‌, खोपामा राखेको टुकी फरिकेर भूइँमाराख्दछन्‌ र बधूशिक्षा लेख्न याल्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
२१०&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
बि.सं.स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
पटकया&lt;br /&gt;
१९१९&lt;br /&gt;
तारापतिको घर-आँगन&lt;br /&gt;
बिहान&lt;br /&gt;
भानुभक्त, तारापति, सास्‌ र बुहारी&lt;br /&gt;
सासू घरको सिकुवाबाट ठेकी फिम्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
गोठतिरबाट दूधको गबुवा झुन्ड्याएर तारापति घरतर्फ आउँदैहुन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
बृहारी बारीमा मास उखेल्दै हुन्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
सासू मोही पार्व थाल्छिन्‌, तारापति घरअगाडि आइपुग्छन्‌,भानुभक्त घर भित्रबाट निस्कन्छन्‌ । तारापति र भानुभक्तकोज्ञम्काभेट हुन्छ ।&lt;br /&gt;
तारापतिलाई सम्बोधन गर्दै छन्दमा गाउँछन्‌ -&lt;br /&gt;
० एकयोक्‌ भन्छु नमान दुख्ख मनमा हे मित्र तारापती ।&lt;br /&gt;
सासू भानुभक्तपट्टि हेर्दछिन्‌ ।भानुभक्त बुहारीलाई इड्डित गर्दै गाउँछन्‌ -&lt;br /&gt;
२११&lt;br /&gt;
तिम्रा यी जति छन्‌ जहानहरू ता नर्न्या रह्याछन्‌ अती ॥सन्याँ दन्तबकान आज घरको कर्‌कर्‌ गन्याको उत्तै ।भर्‌रात्‌ जाग्रत झैँ भयो मकन ता लागेन आँखा कसै ॥&lt;br /&gt;
: सासू मोही पार्दै भानुभक्तलाई घुरेर हेर्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
घन्‌ इज्जत्‌ घरबार देख्छु बढिया छैनन्‌ कुनै चिज्‌ कमी ।ब्रृहारी यदि कर्कशा हुनगया क्या घर्‌ गरौला तिमी ॥&lt;br /&gt;
2 बसेर मास उखेल्दै गरेकी बुहारी उठ्छिन्‌ र हातको मात&lt;br /&gt;
रिसले फाल्दै भानुभक्तलाई आँखा तरेर हेर्छित्‌ ।&lt;br /&gt;
2 तारापति टाउको निहराउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
साह्ै काँक उठ्यो मलाइ र वधूशिक्षा बनायाँ पनि ।&lt;br /&gt;
: क्यामरा भानुभक्तले पढुकामा घृप्ारिराखेको लेखोटको नजिक&lt;br /&gt;
हुँदै जान्छ र स्थिर हुन्छ।यस्ले पत्नि बुहारि छोरिहरूको तालिम्‌ गरौला भनी ।&lt;br /&gt;
- सातू &#039;ए, त्यसो पो&#039; भन्ने भाबसहित टाउको हल्लाउँछिन्‌ ।: बुहारी मृख बिच्क्याउँछिन्‌ ।- भानुभक्त बधूशिक्षाको लेखोट हातमा लिएर -&lt;br /&gt;
घर चतुन्याइँ गर्छन्‌ बृद्धिमान्‌ले अगाडि ।बखत चुकि दिँदामा हुन्छ हानी पछाडि ॥&#039;&lt;br /&gt;
- तारापतिलाई बधूशिक्षाको लेखोट दिन्छन्‌ र तारापतिकी&lt;br /&gt;
जञहावलाई नमस्कार गरी भानुभक्त परिद्श्यबाटबाहिरिन्छन्‌ । जहान मोही पार्न छोडेर रिसाएर तारापतिलाईहेर्छिन्‌ । म्यामरा उनको नजिक हुँदै स्थिर हुन्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“भानुभक्तको वधुशिक्षाबाट&lt;br /&gt;
२१२&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
वि.संस्थानसमय&lt;br /&gt;
पात्रभानुभक्त &amp;quot;हरि साइँलो»भानुभक्त ”वीरभब्र »भानुभक्त »मोहीर२ &amp;quot;भानुभ्रक्त »पटकथा&lt;br /&gt;
; १९२१&lt;br /&gt;
: चुँदी बेसी, मोहोरियाको घर-आँगन&lt;br /&gt;
: दिउसो&lt;br /&gt;
: भानुभक्त, इन्दविलास, वीरभद, हरि साइँलो,&lt;br /&gt;
श्रीधर उपाध्याय, श्रीप्रसाद अर्याल तथा बराहाका मोहीहरूभानुभक्तको मुख्यौलीमा बराहा कुलोका मोहीहरूको सभाबलेको छ । भानुभक्तबाट दृश्य प्रारम्भ हुन्छ ।&lt;br /&gt;
टाउको घुमाएर सबै मोहीलाई हेर्दै - बराहाका सप्पै मोहीआया त?&lt;br /&gt;
सप्पै आयाका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
गिरिधारीलाई सभामा बसेका मोहीहरूको ससूहमानदेखेपछि - गिरिघारी रानाभाट खै त?&lt;br /&gt;
बा आउन पाउनु भयान । बाको साँटो म आयाको छु।चुँदी खोलाले बराहाको बाँध र कुलो भत्कायाको कुरा तसबैलाई याह छ।&lt;br /&gt;
क्यान नहुन्‌ । बिहान श्रीधर, श्रीप्रसाद, हरि साइँलो हामी सप्पैगएर हेरेर आयाका थियौ । बराहा बाँध स्वात्तै बगायाको छ ।कुलो भत्क्यापछि सोह-सत्र खेत खतम्‌ हुन्या भो ।&lt;br /&gt;
२१३&lt;br /&gt;
श्रीप्रसाद&lt;br /&gt;
भानुभक्तइन्द्रविलास&lt;br /&gt;
साइँलो&lt;br /&gt;
मोही ३भानुभक्त&lt;br /&gt;
मोही १साइँलो&lt;br /&gt;
मोही ४भानुभक्तदुवैभानुभक्तवीरभद्रभानभक्त&lt;br /&gt;
हुन्या नै भो नि । हिउँदमा सुल्खाले सक्न्या भो । बर्खामाडुबानमा पर्न्या भो ।&lt;br /&gt;
अब श्या गर्न्या त ? मोहीहरूको क्या राय छ?&lt;br /&gt;
सबै मोहीहरूलाई सम्वोधन गर्दै - ल, भन्नुस्‌ है आफूआफूलाईमनमा लाग्याका कुरा । पछि फेरि हामीसँग सल्लाहै गन्यानन्‌भन्न पाइन्न ।&lt;br /&gt;
चाइन्‌जो, कुरो प्रष्टै छ नि । बाढीले बाँध पनि भत्कायो,कुलो पनि भत्कायो, खेत पनि डुबायो । अब चाइन्‌जो, फेरिबाँध बाँधेर कुलो काटतपन्यो । चाइन्‌जो, कसो हो ? ए,लौ भन्नुस्‌ हऐै।&lt;br /&gt;
सही थाप्दै - कुरा ठीक हो।&lt;br /&gt;
बाँध बाध्न्याभन्दा पनि बाँध कहाँबाट बाँध्न्या भन्न्या चाहिँमुघ्य कुरा हो।&lt;br /&gt;
मोहीहरू मुनिरहन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
पहितैकै ठाउँमा बाँध बाध्न सकिँदैन ।&lt;br /&gt;
चुँदी खोलाको त्यो बेगमा बाँध बाध्न कस्का बाउको तागत ?मेरो विचारमा त चाइन्‌जो, श्रीधर उपाध्याय, गिरिघारीरानाभाट र श्रीप्रसाद अर्ज्यालको खेत काटेर कुलो चलाउन्यागरी बाँध बाध्न्‌ पर्छ ।&lt;br /&gt;
काकाको कुरा ठीक हो।&lt;br /&gt;
यसमा श्रीधर र श्रीप्रसादको क्या राय छ ?&lt;br /&gt;
एकै स्वरमा - हाम्रो मञ्जुरी छ ।&lt;br /&gt;
बीरभद्रको क्या राय छनि?&lt;br /&gt;
गाउँमा सबैको एउटै राय भयापछि मेरो पनि त्यै राय छ।त्यसो भया, भोलि बिहान बराहाका मोही जति घरलौरीएक-एकजना बाँध बाध्न आउन्या ।&lt;br /&gt;
: क्यामरा सम्पूर्ण मोहीबाट भानुभक्तको वजिक हुँदैजान्छ र संवादको&lt;br /&gt;
समाप्तिसँगै भानुभक्तको अनुहारमा गएर स्थिर हुन्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
१९२१&lt;br /&gt;
चुँदी फाँट, बराहा कुलो&lt;br /&gt;
बिहान&lt;br /&gt;
भातभक्त, दन्द्रविलास, र बराहाका मोहीहरू&lt;br /&gt;
बराहाका मोह्ीहरू कलो खन्त र मर्मत गर्व व्यस्त छन्‌ ।दुईजना मोही कलोको हिलो माटो कोदालीले फाल्न लागेकोदृश्य देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
दुईजना मोही ढुड्टा फाल्दैछन्‌ ।&lt;br /&gt;
दुईजवा बद्ध मोही कुलोको निरीक्षण गर्दैछन्‌ ।&lt;br /&gt;
दुईजना मोही माटो काटेर पन्छाउँदै छन्‌ ।&lt;br /&gt;
दुईजना मोही दुड्टा किनारा लगाउँदै घन्‌ ।&lt;br /&gt;
इन्द्रविलास र भानुभक्त कलोको निरीक्षण गर्दैछन्‌ ।&lt;br /&gt;
वयाँ काटेको सुख्खा कुलोबाट बिस्तारै पानी बग्दै आउँछ रपानीको बेग तथा ध्वनि बढ्दैजान्छ । मोहीहरू किनारामाउभिएर कुलो हेर्दै बड्दास पर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
क्यामरा कुलोको पानी सँगसँगै तलतिर लाग्छ र स्थिरहुन्छ । कुलोको कल-कल ध्ववि बढ्दै जान्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
२११&lt;br /&gt;
श्ीप्रसादसाइँलो&lt;br /&gt;
श्रीप्रसादसाइँलो&lt;br /&gt;
श्रीप्रसाद&lt;br /&gt;
: १९२२: चेँदीबेसी, श्रीप्रसादको गोठ&lt;br /&gt;
: बिहान&lt;br /&gt;
श्मीप्रसाद र्‌ हरि साइँलो&lt;br /&gt;
परालको टौवा छेउबाट हरि सालो संगसंगै श्यासरा अगाडिबढ्छ र वृत्ताकारमा घुमेर गाईलाई कृँडो खुवाउन लागेकोश्रीप्रसादलाई परिदृश्यमा समेटदछ ।&lt;br /&gt;
हारि साइलोपट्टि फर्कदै - हैन, कताबाट आइस्‌ ए साइँला ?चाइन्‌जो, तार्कुबाट दौडाहा आयाकोले बराहा कुलोका सव्रैमोहीहरूलाई चाइन्‌जो, चुँदी फाँटमा भोलि भेलागराउन्‌ भनेर भानुभक्तते भन्नु भयाकोते चाइन्‌जौ, मखबर गर्न आगय्याको ।&lt;br /&gt;
० हैन, तार्कुबाट दौडाहा कैले आइपुग्याछ त ?&lt;br /&gt;
दौडाहा त आजै आइपृग्याको हो । चाइन्‌जो, भोलि नै मृद्दाहेर्न्या भनेर उदी गन्याका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
» क्या क्या क्राको न्याय-निसापका लागि आयाको रह्याछ&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
२१६&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
साइँलो&lt;br /&gt;
शीप्रसादसाइँलो&lt;br /&gt;
पटकया&lt;br /&gt;
त दौडाहा ?&lt;br /&gt;
चाइन्‌जो, पोहोर साल बराहा कुलो काट्दा आफ्नो जग्गाबिगारिदिया भनेर गिरिधारी भाटले बराहाका मुखियाभानुभक्तका नाउँमा तार्कुघाटमा उजुरी दियाका थिया ।&lt;br /&gt;
- श्रीप्रसाद सुनिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
मोहीहरूका तर्फबाट भानुभक्तले प्रतिवादी दच्याका थिया ।त्यही बारेमा न्याय-निसाफ गर्न आयाको हो दौडाहा ।&lt;br /&gt;
ए, त्यसो पो रह्याछ ?&lt;br /&gt;
लौ, अब म गयाँ । चाइन्‌जो, अरु मोहीहरूलाई पनि खबरगर्नुछ ।&lt;br /&gt;
: हरि साइँलो उठेर जान्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
२१७&lt;br /&gt;
वि.सं.स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
हाकिम »०&lt;br /&gt;
गिरिघारी »&lt;br /&gt;
१: ११२२&lt;br /&gt;
: चुँबी फाँट, पिप्लेको चौतारी&lt;br /&gt;
: दिउसो&lt;br /&gt;
: दौडाहाका हाकिम, कारिन्दा, भानुभक्त, गिरिधारी रानाभाट&lt;br /&gt;
र बराहाका मोहीहरू&lt;br /&gt;
चुढी फाटको मध्यभागमा अबस्थित पिप्लेको ठूलो चौतारीमाइजलास बसेको छ । राडीमाथि हाकिस र उनको साम्‌साकागज, कलम र रातो बस्ता लिएर कारिन्दा बसेका छन्‌ ।वरिपरि बराहाका मोहीहरू र बादी-प्रतिबादी उभिएकाछुन्‌ । टाढाबाट इजलासको विहङ्कम दृश्य देखिन्छ । बहसचलिरहेको छ तर आवाज सुनिदैन ।&lt;br /&gt;
गिरिधारी रानाभाटतर्फ फकदै - अँ, बादी पक्षको उजुरीमालेख्याका क्राबाहेक अरु क्यै भन्नु छ?&lt;br /&gt;
छैन छ्वामित, मेरो त एउटै जिरह छ । मेरा खेतकाब्रीचबाट कलो काटी..&lt;br /&gt;
२१८&lt;br /&gt;
आदिकवि भातृभक्त&lt;br /&gt;
हाकिम&lt;br /&gt;
कारिन्दा&lt;br /&gt;
हाकिम&lt;br /&gt;
हाकिम&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
हाकिम सुनिरहेका छन्‌-&lt;br /&gt;
...मेरो खेत नै बिगारिदियाका हुनाले ऐनसवालबमोजिमसजायँ गरी मेरो नोक्सानी भराइपाउँ ।&lt;br /&gt;
कारिन्दापट्टि हेर्दै- अड्डामा चढायाको फिरादपत्रमा प्रतिवादीलेक्या जिकिर गत्याका छन्‌ त ?&lt;br /&gt;
भानुभक्तले इन्कारी गन्याका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
- कारिन्दा उठेर फिरादपत्र हाकिसलाई दिन्छन्‌ । हाकिम&lt;br /&gt;
फिरादपत्र पढ्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
: गिरिधारी रानाभाट रिसाएर हाकिमतर्फ हेर्दछन्‌ ।: हाकिम फिरादपत्र पढिसकेर राढीमा राखी भानुभक्तलाई&lt;br /&gt;
सम्बोधन गर्दै -&lt;br /&gt;
भानुभक्तको क्या राय छत?&lt;br /&gt;
“२१ साल असारका दिन ८ जाँदासम्म कुलामा पानी चल्याकोथियान, बाँध लाइराख्याको थियो । असारका दिन नौ जाँदाचुँदी खोलामा ठूलो बाढी जाँदा बाँधै पनि बग्यो, खोलो पनिठूलो भयो बाँध लाउन सकिएन ।&amp;quot;&lt;br /&gt;
: दौँडाहाका हाकिम ध्यान दिएर सुनिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
“खख्जेत बिग्रन र बाँञ्िन लाग्यो र बराहा बाँधका सप्पै मोहीजम्मा भई बसी बाँध कहाँ लाउँ भनी सल्लाह गर्दा श्रीधरउपाध्याय, वीरभद्र राना, श्रीप्रसाद अर्ज्याल यी तीन मोहीकाखेत काटिन्या गरी यस ठाउँमा कुलो काटी बाँध लाई पानीचलाया कसैको केही विगँदैन, सबैका खेत बन्छन्‌, श्रीधरउपाध्याय, बीरभव्र राना, श्रीप्रसाद अर्ज्याल यी तीनैजनासामेल छौं भनी सल्लाह दिय्या र सल्लैसित बाँध लाउन्या रकुलो काट्न्या काम गच्याको हो ।”&amp;quot;&lt;br /&gt;
गिरिधारीतर्फ फर्कदे- सल्लैसँग कुलो काट्याको भन्छन्‌ नित। क्या हो ए गिरिधारी ?&lt;br /&gt;
गिरिधारी » प्रतिवाद गर्दै- यो सुट्टा कुरा हो ख्वामित । म घरमै नभयाका&lt;br /&gt;
“भानुभक्तको फिरादपतको सक्कल प्रतिबाट उद्धृत&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
२१९&lt;br /&gt;
हाकिम&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
हाकिम&lt;br /&gt;
कारिन्दाहाकिम&lt;br /&gt;
२२०&lt;br /&gt;
बेलामा मेरो मञ्जुरी नै नलिकन, बाह्रै महिना पानी लाग्न्यालहलह धान फल्त्या मेरो खेत बेमाख गरिदिया ।भावुभक्ततर्फ फर्कदै - अर्काको सम्पत्ति त्यसरी बेमाख गर्नत नहुन्या । क्या हो ए भानुभक्त ?&lt;br /&gt;
हातजोड्दै - बुस्बिक्स्या, करुणानिधान हामी अनाथका दुखछुद्ता हुन्‌ ।&lt;br /&gt;
कारिन्दा बयानको टिपोट गरिरहेका हुन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
बुरुन त म सप्पै कुरा बुरुछु। मैले दुवैतर्फको जिरह सुन्याँ ।कारिन्दालाई अराउँदै- अँ तिमी दुवैतर्फको साक्षी-प्रमाणबुरुन्या काम गर ।&lt;br /&gt;
हस्‌ ।&lt;br /&gt;
म भोलि कुलो काट्याको ठाउँमा पनि गएर हेर्न्याछु ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
दृश्य १०९&lt;br /&gt;
वि.सं.स्थातसमयपात्र&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
१९२२चेँदी फाँट, बराहा कुलो&lt;br /&gt;
; दिउसो&lt;br /&gt;
दौडाहाका हाकिम, कारिन्दा, भानुभक्त, गिरिधारी रबराहाका मोहीहरू&lt;br /&gt;
: दौडाहाका हाकिम बराहा कुलोको निरीक्षण गर्दैछन्‌ । मोहीहरू&lt;br /&gt;
पनि अगिपछि उभिएका छन्‌ ।भानुभक्त गिरिधारीलाई हेर्दघन्‌ ।&lt;br /&gt;
: गिरिधारी भानुभक्तलाई हेर्दछुन्‌ ।&lt;br /&gt;
दौडाहाका हाकिम चँदी फाँटमा आखा घमाउँघन्‌ ।क्यामरा चुँदीफाँटलाई अरधंचन्द्राकारमा फन्को लगाउँछ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
२२१&lt;br /&gt;
विसंस्थानतमपपात्र&lt;br /&gt;
हाकिमकारिन्दा&lt;br /&gt;
ररर&lt;br /&gt;
: १९२२&lt;br /&gt;
: चुँदी बेसी, पिप्लेको चौतारी&lt;br /&gt;
: दिउसो&lt;br /&gt;
; दौडाहाका हाकिम, कारिन्दा, भानुभक्त, गिरिधारी,इन्द्रबिलास, बराहाका मोहीहरू तथा गाउँलेहरू&lt;br /&gt;
- बरपीपलको चौतारीमा इजलास कायम गरिएको छ । बादी-प्रतिवादीका साथै बराहाका मोहीहरू र गाउँलेहरू यत्रतत्रछरिएर कोही उभिएका र कोही बल्ेका छन्‌ । हाकिमकोपछाडि सिपाही लौरो लिएर उभिएको छ । हाकिमको अनुहारबाट दृश्य खुल्दैजान्छ । भानुभक्त तथा गिरिधारी पति परिदृश्यमा तमेटिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
० दुवैतर्फको साक्षी-प्रमाण बुरुदा क्या देखियो त ?&lt;br /&gt;
० बराहाका सबै मोहीहरू अनि श्रीप्रसाद अर्ज्याल र श्रीधरउपाध्यायसमेतको मञ्जुरीबाट कूलो काट्याको देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
: भानुभक्त दङ्ग पर्दै मुस्कराउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
: गिरिधारी कृद्ध अनुहार लगाएर हाकिमलाई हेर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
आविकबि भानुभक्त&lt;br /&gt;
हाकिम ०&amp;quot; वादीको मञ्ज्री छ कि छैन ?कारिन्दा « वादीको तभया पनि वादीको छोराको मञ्जुरी देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
हाकिम&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
गिरिधारीलाई सम्बोधन गर्दै- एकाघरका आफ्नै छोरालेमञ्जुरी दियापछि मेरो मञ्जुरीबिना कुलो काट्यो भन्न्यातिम्रो जिरह तग्दैन ।&lt;br /&gt;
गिरिधारी अनुहारमा असन्तुष्टि रुल्काएर प्रतिकृया व्यक्तगर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
कारिन्दासग- त्यसैले यो मुद्दा भानुभक्त आचार्यलाई जिताउन्यागरी फैसला लेख्न्‌ ।&lt;br /&gt;
: भागुभक्त दङ्ग पर्दै गिरिधारीलाई हेर्दछन्‌ ।: गिरिधारी टाउको निहराउँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
इन्द्रबिलाससहित बराहाका मोहीहरू हाँस्दै बसेको ठाउँबाट&lt;br /&gt;
उठ्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
रेरे३&lt;br /&gt;
विसं.स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
दृश्य १११&lt;br /&gt;
; १९२३&lt;br /&gt;
: चुँदीबेसी, हरि साइँलाको घर-आँगन&lt;br /&gt;
: हरि साइँलो, बराहाका मोही, मानबहादुर, हर्कमान र गोविन्द- पिँढीमा बराहाका मोही, हरि साइँलो र गोबिन्द बतेका&lt;br /&gt;
छन्‌ । परालको कुनियोमा बल्नेर मानबहादुर र हर्कमानमुह्टाको बारेमा कुरा गर्दैछन्‌ । मानबहादुरको अनुहारबाटदृश्यखुल्दै जान्छ । आँगन, पिँढी र सबै पात्र देखिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
मानबहादुर “ हैन, फेरि गिरिधारी भाटले त ठोक्याछन्‌ नि त मृद्दा, थाहा&lt;br /&gt;
मोही&lt;br /&gt;
हर्कमानसाइँला&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
पाइयो ?&lt;br /&gt;
क्यान थाहा नपाउनु नि । तार्कुबाट दौडाहा आएरबराहाका मोहीहरूलाई मृद्दा जितायाको क्रा ।&lt;br /&gt;
त्यो मुद्दा त हारिहाल्या नि गिरिधारी भाटले ।&lt;br /&gt;
चाइन्‌जो, तार्कुको अड्डाले मृद्दा हरायापछि गिरिधारीतैनेपालको अड्डामा फेरि उजुरी गन्याछन्‌ नि त ।&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
मानबहादुर ० हैन, एकपटक मृद्दा हारिसक्यापछि पनि फेरि उज्री गर्न&lt;br /&gt;
साइँलो&lt;br /&gt;
पाइन्छ र ?&lt;br /&gt;
चाइन्‌जो, तार्कुको अड्डाले गन्याको न्यायमा चित्त नबुञ्यापछित्योभन्दा उपल्लो नेपालको अड्डामा फेरि उज्री गर्नपाइन्या रै&#039;छ नि त । त्यसैले गिरिधारी भाटले अर्को मुद्दाठोक्याछन्‌ । बराहाका मुखिया भानुभक्त तारिखखैपिराख्याछन्‌ - नैपालमा ।&lt;br /&gt;
तम्वाद सँगसँगै क्यामरा हरि साइँलोको नजिक हुँदै जान्छरसम्वाद सकिँदा अनुहारमा स्थिर हुन्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
२२५&lt;br /&gt;
दृश्य ११२&lt;br /&gt;
वि.सं.स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
; १९२४; कान्तिपुर, अदालतको कच्रहरी: डिढ्ठा, विचारी, भानुभक्त र तारिखे&lt;br /&gt;
: बराहाको बाँध र कुलोसम्बन्ध्ी गिरिधारी भाटसँगको मुद्राको&lt;br /&gt;
भानुभक्त ०&lt;br /&gt;
सिलसिलामा भानुभक्त कान्तिप्रको अदालतमा विचारीसाम्‌हात जोड्दैछन्‌ ।धेरै दिन घाइसक्याँ, अब त छिनिदिनै पस्यो ।&lt;br /&gt;
: डिठ्ठा भागुभक्तलाई हेरेर टाढैबाट हाँत्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
विचारी&lt;br /&gt;
भोलि आउ, भोलि ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त उठ्छन्‌ बिचारीलाई नमत्कार गर्छन्‌, एकछिनअकमकाउँछन्‌ र अँध्यारो मुख लगाएर बित्तारै परिदृश्यबाटबाहिरिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
: भोलिपल्ट पनि भानुभक्त डिङ्ठाको अगाडि दुवैहात जोडेर&lt;br /&gt;
२२६&lt;br /&gt;
केही भनिरहेका हुन्छन्‌ । डिठठा भानुभक्तलाई बास्ता गर्दैनन्‌र आफ्नै धुनमा केही पढिरहेका हुन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
 विचारी भानुभक्तको चाला देखेर टाढैबाट हास्छन्‌ ।भानुभक्त ० डिठ्ठातँग हात जोड्दै - मुद्दा छिन्न साह्रै ढिला भयो ।डिदृठा &amp;quot; बेवास्तासहित - भौलि ... भौलिभानुभक्त : दिवक मानेर उठ्छन्‌, डिठ्ठालाई नमस्कार गर्छन्‌ रपरिद्श्यबाट बाहिरिन्छन्‌ ।: भोलिपल्ट पति तारिखे विचारीतँग कुरा गरिरहेको हुन्छ ।तारिखे ” पक्का हुन्या भौ त मैरौ काम ?बिचारी » मैले बोल्यापछि भोलिलाई फरकै पर्दैन नि ।: तारिखे विचारीलाई नमस्कार गरेर बाहिरिन्छ, भानुभक्तभित्रिन्छन्‌ र विचारीसामु घुँडा टेकेर हात जोड्छन्‌ ।- भानुभक्तले केही पनि भन्न नपाउदै- ल, तिम्रो पनि भ्वोलि ।: भानुभक्त हान्विएर डिठ्ठाको सामु गएर हात जोड्छन्‌ ।डिठ्ठा &amp;quot; सुनिहाल्यौ नि। भोलि आउनु, भोलि ।- भानुभक्त त्यहाँबाट पनि हान्तिएर व्यायाधीश कहाँ जानपरिवृश्यबाट बाहिरिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
पटकया २२७&lt;br /&gt;
दृश्य ११३&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
२२०&lt;br /&gt;
१९२४; कान्तिपुर, न्यायाधीशको कचहरी: दिउसोन्यायाधीश र भानुभक्तन्यायाधीश सेतो तन्ना कसिएको ठूलो गहामा बसेका छन्‌ ।दायाँ बाँया गोलो बालिष्ट राखिएको छ । उनी रातो रङ्गकोढड्डा लिएर पढिरहेका छन्‌ । चादितोडाको कल्कीबाट दृश्यखुल्दैजान्छ, न्यायाधीश भानुभक्तलाई प्रश्ववूचक आखालेह्वे्वछन्‌ ।आफ्नो गुनासो न्यायाधीशलाई सस्बर कबितामै पोख्दछन्‌ -५ बिन्ती डिठठा विचारीसित म कति गरुँ चुप्‌ रहन्छन्‌ नबोली ।न्यायाधीश रातो ढड्डा गद्दामा राख्दै ध्यान दिएर सृत्दछन्‌ ।५ बोल्छन्‌ ता ख्याल्‌ गत्या कै अनि पछि दिनदिन्‌ भन्दछन्‌ भोलिभोली॥न्यायाधीश सुनिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
न्यायाधीश&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
न्यायाधीशभानुभक्त&lt;br /&gt;
की ता सक्दिन भन्नु कि तब छिनिदिन्‌ क्यान भन्छन्‌ यि भोली।&lt;br /&gt;
न्यायाधीश ध्यानमग्त हन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
भौलीभौली हुँदैमा सब घर बितिगो बक्सियोस्‌ आज रोली ॥बक्सियोस्‌ आज छोली ॥&lt;br /&gt;
- फिरादपत्र कवितामै सुनेपछि न्यायाधीश हाँच्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
भावुभक्त प्रतिक्रिया बुर्न न्यायाधीशतर्फ हेर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
डिठ्ठा र विचारीले तिमीलाई साह्रै दुःख दियाछन्‌ । तिम्रोमुद्दा म छिनिदिउँला ।&lt;br /&gt;
हात जोड्दै टाउको हल्लाउँछन्‌ र माया लाग्दो आवाजमासोध्छन्‌ - कैले ?&lt;br /&gt;
एकछिन्‌ गम खादै - अं ..., भोलि,&lt;br /&gt;
रुस्कदै - हँ&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
“भानुभक्तको फुटकर कबिता&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
रेर९&lt;br /&gt;
दृश्य ११४&lt;br /&gt;
वि.सं. ; १९२४&lt;br /&gt;
स्थान : कान्तिपुर, धर्मदत्तको कौठा&lt;br /&gt;
समय : बिहान&lt;br /&gt;
पात्र घर्मदत्त र भानुभक्तगिरिधारी माटसँगको मुद्दाको टुड्डो लागेपछि रम्घा फर्कनुअघिभानृभक्त धर्मदत्त जवाली कहाँ भेटघाट गर्न जान्छन्‌ ।धर्मदत्तको सृत्ने कोठाको भुइँओल्लयानमा बसेर दुवैजना बातमारिरहेका छन्‌ । पृष्ठभारमा खाटमाथि चंदुवा हालेको पोकेझुल कसिएको छ । फुलको चंदुवाबाट दृश्य खुल्दै तलतिरसर्दैजान्छ र कोठाको आधा भाग उदाइिन्छ ।&lt;br /&gt;
धर्मदत्त ० ढिलो भया पनि राम्रो भयो । गिरिधारी रानाभाटले मृद्दाहास्यो, तपाईंले जित्नु भ्यो ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त ० तपाइँहरू सबैको सहयोगले हो । तपाईंको क्रण त मैले यसजुनीमा तिरेर सक्दिन ।&lt;br /&gt;
घर्मदत्त » तिर्न्या एउटा उपाय छ।&lt;br /&gt;
२३० आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
धर्मदत्तभानुभक्तघर्मदत्तभानुभक्त&lt;br /&gt;
घर्मदत्तभानुभक्त&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
: भानुभक्त प्रश्वसूचक अनुहारले ध्वर्मवत्तलाई हेर्खन्‌ ।&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
भनूँ ?&lt;br /&gt;
भन्नुस्‌ न । मेरो बर्कतले भ्र्यायासम्म गर्त्याछु ।त्यसो भया, रामगीता पनि भाषामा लेख्नोस्‌ ।मेरो मनको क्रा भन्नु भो।&lt;br /&gt;
: धर्मवत्त हाँस्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
यो त झन्‌ मलाई क्रण थप्न्या कुरा गर्नु भो । म रम्घाफर्कन्या बित्तिकै लेख्न सुरु गर्न्याछु ।&lt;br /&gt;
कैले फर्कनु हुन्छ रम्घा ?&lt;br /&gt;
भोलि नै जान्या विचार गय्या&#039;छ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
२२१&lt;br /&gt;
दृश्य ११५&lt;br /&gt;
बि.सं.स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
वैद्यचन्द्रकला&lt;br /&gt;
वैद्यरमानाथ&lt;br /&gt;
वैद्य&lt;br /&gt;
चन्द्रकला&lt;br /&gt;
ररर&lt;br /&gt;
: १९२५&lt;br /&gt;
: रम्घा, शिखरकटेरीको पिँढी र आँगन&lt;br /&gt;
; दिउसो&lt;br /&gt;
: चन्द्रकला, इन्द्रविलास, बैद्य र रमानाय&lt;br /&gt;
2 पर्दामा &#039;वि.सं १९२४ चुँदी रम्घा, शिखरकटेरी&#039; भन्ने लेखोटदेखापर्छ ।&lt;br /&gt;
: कान्तिपुरबाट रम्घा फर्केपछि भानुभक्त बिरासी पर्दछन्‌ ।औषधीले छुँदैत, भानृभक्तको व्यधा बढ्दै जान्छ । घरकोबाहिरपढ्टि भानुभक्तको अबस्थाबारे चर्चा चलिरहेको छ ।&lt;br /&gt;
७ चन्द्रकलासँग - हिजो दियाको औषधीले कम भयान ?&lt;br /&gt;
% रुदै - हिजोदेखि त डन्‌ ज्वरो बढ्यो । हिजो &#039;मलाई कालज्वरहो&#039; भन्नु भो ।&lt;br /&gt;
० को जान्दछ ?, व्ययाले आत्तिन्‌ भयो ।&lt;br /&gt;
५ निन्द्रा पटक्कै छैन, रुचि बन्द छ।&lt;br /&gt;
० महेर्छ।&lt;br /&gt;
: घरभित्र पस्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
० रुँदै, रमानाथसँग - रम्‌, तँ एकछिन्‌ सुत्दैनस्‌ ? सृत्‌ । फेरि&lt;br /&gt;
आविकबि भानुभक्त&lt;br /&gt;
र्‌मानाय २चन्द्रकला &amp;quot;रमानाय &amp;quot;०&lt;br /&gt;
हिजो जस्तै राति अबेरसम्म गीता लेखाइरहनु हुन्छ । कतिसिद्धियो ?&lt;br /&gt;
रुन्चे त्वरमा -अब सिद्धितै लाग्यो ।&lt;br /&gt;
मलाई किनकिन गीता नसिडिए हुन्थ्यो जस्तो लाग्छ - रामु ।मलाई पनि आमा ।&lt;br /&gt;
रमानाध रुदै उठ्छन्‌ र घरभित्र पत्वछन्‌ ।&lt;br /&gt;
- इन्द्रविलास आउदै हुन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
इन्द्रविलास ०चन्द्रकला »इन्द्रविलास ०चन्द्रकला »&lt;br /&gt;
इन्द्रविलासवैद्य ७&lt;br /&gt;
इन्द्रविलास »वैद्य ७डुन्द्रविलास २»वैद्य नइन्द्रविलास »वैद्य ॥&lt;br /&gt;
चन्द्रकलानेर आइप्गेपछि - भानुलाई कस्तो छ?हिजोको भन्दा निकै साह्रो छ।&lt;br /&gt;
भित्र को छ?&lt;br /&gt;
बैद्य बा र ठाइँला नानी हुनुहुन्छ ।&lt;br /&gt;
वैद्य भित्रबाट निस्कन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
हेर्नु भो?&lt;br /&gt;
हेरेँ&lt;br /&gt;
चन्द्रकलातर्फ फर्केर - तपाईँ भित्र जानोस्‌ ।चन्द्रकला घरभित्र पस्दाछिन्‌ ।&lt;br /&gt;
कस्तो मान्न भो ?&lt;br /&gt;
दुई-तीन दिन यता त केही होला जस्तो ताग्दैन ।त्यस्तो अवस्था भै सक्यो ?&lt;br /&gt;
मलाई त त्यस्तै लाग्छ ।&lt;br /&gt;
अब ..., अब केही उपाय छैन ?&lt;br /&gt;
मलाई त छैन जस्तो लाग्छ ।&lt;br /&gt;
आकासतिर हेर्दै - हरि इच्छा ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
सम्बाद बालकृष्ण समको भक्त भानुभक्तबाट साभार ।&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
२३३&lt;br /&gt;
गाउँले १गाउँले २गाउँले १गाउँले २गाउँले १&lt;br /&gt;
२३४&lt;br /&gt;
दृश्य ११%&lt;br /&gt;
६ १९२५&lt;br /&gt;
: चुँदी बेसी, बारीको बाटो&lt;br /&gt;
: दिउसो&lt;br /&gt;
; गाउँलेहरू&lt;br /&gt;
: एकजना गाउँले हृखमा चढेर घात काट्वै छन्‌ ।&lt;br /&gt;
: दुईजना गाउँले बाटोमा कूरा गर्दै हिडिरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
रुखबाटै - हैन, कता जान लाग्यौ नारिएर ?&lt;br /&gt;
: रोकिदै - धर्मशाला जान लाग्याको ।&lt;br /&gt;
क्यान जान लाग्या ?भानुभक्त सारै छन्‌ रे, हेर्न जान लाग्या ।एक्कैछिन पखन त, म पनि जान्छु ।&lt;br /&gt;
- रुखबाट ओर्लन थाल्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
आविकबि भानुभक्त&lt;br /&gt;
दृश्य ११७&lt;br /&gt;
बि.सं.स्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
१९२५&lt;br /&gt;
रम्घा, शिखरकटैरीको मरेरी&lt;br /&gt;
दिउसो&lt;br /&gt;
भानुभक्त, इन्द्रविलास, रमानाथ, बैद्य र चन्द्रकलाभृईतलाको अंगेनोमाथिको मृूलओछयानमा बिरामी भान्‌भक्तसिरक ओढेर भित्तामा अडेस लागेर सुतेका छन्‌ । छेउमैइन्द्रविलास बसेका छन्‌ । भानृभक्तलाई निकै सारो भएकोछ । अँगेनोसँगै बैद्य खतलमा औषधीका गोलीहरूलाई पिधेरधुलो बताउँदै छन्‌ । भानुभक्तको छेउमै भृईंसा रमानाधहरिताल लगाएको पहेँलो नेपाली मडुवा कागजमा रामगीतालेख्दैछन्‌ । भानुभक्त अड्की अड्की बिस्तारै मधुरो स्वरमाछोरालाई रामगीता लेखाउँदै छन्‌ । ढोकापट्टिको थाममा अडेसलागेर अश्वृपूर्ण आँखाले चन्द्रकला सबै दृश्य हेरिरहेकीछिन्‌ । खल-बच्चाबाट दृश्य उघ्दै जान्छ र अर्धवत्ताकारमाघुमेर सम्पूर्ण मजेरी र पात्रहरूलाई उद्घाटित गर्दै भानुभक्तकोनजिक पृगेर क्यामरा स्थिर हुन्छ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त » लेखिरहेका रमानाधलाई - कहाँ पुग्यौ, भन्‌ त?&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
२३५&lt;br /&gt;
रमात्ाय&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
भानुभक्तरमानाथ&lt;br /&gt;
भानुभक्त&lt;br /&gt;
रमानाथभानुभक्त&lt;br /&gt;
रमानाथ&lt;br /&gt;
० लेख्न छोडेर भानुभक्तलाई हेर्दछन्‌ र फेरि लेखोटपट्दि दृष्टिफर्काउँदै रामगीता सस्बर पढ्दछन्‌ -श्रद्धा भक्ति रहोस्‌ गुर्चरणमा मेरा बचन्‌मा पनी ।भावृभक्त सुतिरहेका छन्‌ ।यस्‌लाई श्रुति-सार्‌ बुसीकन पढोस्‌ मूल्‌ तत्व यै हौ भनी ॥: वैद्य पनि रामगीता सुन्दछन्‌ ।: रमानाथ रोकिई रोकिई पढ्दछन्‌ -यस्ता रितृसित यो भन्यो पनि भन्या ...टाउको छोरापाट्टि फर्काउंदै - पख्‌,: रमानाध भातुभक्तलाई हेर्दछुन्‌ ।“भन्यो पनि भन्या&#039;... हैन, &#039;पढ्यो पनि भन्या... गर्‌ ।: रमानाथ सोहीअनुसार सुधार्दघन्‌ ।० भयो?» भयो।चन्द्रकला सुक्कसबक गर्छिन्‌ ।सुना त।यस्ता रितृसित यो पढ्यो पनि भन्या अज्ञानको नास्‌ गरी ।अगाडि लेखाउँदै -मेरै रुप्‌ बनिजान्छ जान्छ सहजै संसार-सागर्‌ तरी ।- रमानाध लेख्दछन्‌ ।: इन्द्रविलाय भनृभक्तलाई हेर्दछन्‌ ।० सुनात।- सस्वर पढ्दछन्‌ -» यस्ता रित्‌्सित यो पढ्यो पनि भन्या अज्ञानको नास्‌ गरी ।मेरै रुप्‌ बन्तिजान्छ जान्छ सहजै संसार-सागर्‌ तरी ॥: गायनको अन्त्यमा रमानाध आँखा चिम्लिएर आँसु कार्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
७० % क दन क&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
&amp;quot;भानुभक्तको रामायणबाटसम्वाद वालकृष्ण तमको भक्त भातुभक्तबाट साभार&lt;br /&gt;
२२६&lt;br /&gt;
आदिकवि भातृभत्त&lt;br /&gt;
विसंस्थानसमयपात्र&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
: १९२५&lt;br /&gt;
; रम्घा, शिखरकटेरीको घर-आँगन&lt;br /&gt;
: दिउसो&lt;br /&gt;
: चुँदी रम्घाका गाउँलेहरू तथा भानुभक्तका आफन्तहरू&lt;br /&gt;
भानुभक्तलाई जलाश्रय लानका लागि दुईजना गाउँले डोलाकस्दैछन्‌ । कोही गाउँले पर्खालमा बसेर हेरिरहेका छन्‌ ।कोही गाउँले आँगनमा उभिएर आपसमा कुराकानी गर्दैछन्‌ ।वातावरण गम्भीर देखिन्छ । गाउँलेहरू आंगतमाचरिएर उत्सुकतापूर्वक हेरिरहेका हुन्छन्‌ । डोला कस्नेकाम वाकिन्छ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
२३७&lt;br /&gt;
दृश्य ११९&lt;br /&gt;
बि.सं. १९२५&lt;br /&gt;
स्थान रम्घा, शिखर कटैरीको मजेरी&lt;br /&gt;
समय दिउतौ&lt;br /&gt;
पात्र भानभक्त, रमानाथ, इन्द्रविलास, वैद्य र चन्द्रकलाभानुभक्तलाई व्ययाले च्याप्दै ल्याएको छ । रामगीता लेखाउनेकमको पनि अन्त्य भएको छ । पृष्ठमूमिमा बजिरहेकोसितारको धृनले वातावरणलाई गम्भीर र वेदनायक्त बनाएकोछ । भानुभक्तको स्वास र घ्यारघ्यार बढ्दै गएको छ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त ० रमानाथलाई - सिद्धियौ रमु ?&lt;br /&gt;
रमानाथ &amp;quot;० कोठिकिएको आवाजमा - सिद्धियो ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त ० तैंले आज पितृक्रण चकाइस्‌ । अब जति दिन्याछत्‌ त्यो तबिशेष तर्पण हुन्या छ ।रमानाथध मुख छोपेर रुन थाल्दछन्‌ । भानुभक्त कामेको हातलेरमानाधको टाउकोमा धपधपाउँछन्‌ ।खम्बाको आडमा उभिएकी चन्द्रकला पनि रुन्छिन्‌ ।भानुभक्त रमानाथको टाउकोबाट सुस्तरी हात हटाउँछन्‌ रचन्द्रकलातर्फ हेर्दै रोकिकर्ड रोकिकिई बोल्छन्‌ -&lt;br /&gt;
देउ आदिकवि भानुभत्त&lt;br /&gt;
भानुभक्त »&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
इन्त्रबितास »&lt;br /&gt;
भानुभक्त ०&lt;br /&gt;
भानुभक्त »&lt;br /&gt;
थाहा पायौ ? रामगीता पनि भर्खरै सिद्धियो ।&lt;br /&gt;
चन्द्रकला लोगनेका करा सुनेर रुन्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
त्यही हेरेर बस ।&lt;br /&gt;
भानुभक्तलाई बोल्न गारो हुँदै आउंछ । स्वाँ स्वाँ बढ्दै जान्छ ।अब त करैसित यसको जीवसित मेरो जीव सँगै साटियो ।चन्द्रकलाको रुवाइ बढ्न ।&lt;br /&gt;
म गयापछि पनि तिमीसित यो बसिरहन्याछ ।&lt;br /&gt;
रमानाध पड्टि फर्कदै -रमु, आमालाई पनि एक थान सारेरदिएस्‌ है बा।&lt;br /&gt;
रमानाथ रुन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
चन्द्रकला बेस्करी रुन्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
रमु, आमालाई नरुन्‌ भन्‌ ।&lt;br /&gt;
रमानाध आमालाई अशुपूर्ण आँखाले हेर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
चन्द्रकला कोम्किएर रुन्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
रमानाथ पति मृख छोपेर रुत थाल्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
अहितै कस्तो छ वैद्य बा?&lt;br /&gt;
वैद्य भानुभक्तको नारी हेर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
स्वाँ स्वाँ र घ्यार घ्यार बढेर आउँछ । रोकिई रोकिई कप्टसाथभन्छन्‌ - कस्तो हुन्‌ ? अब जान्या बेला भयो ।&lt;br /&gt;
चन्द्रकला घटपटि गर्दै हुन्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
क्षीण आवाजमा - त्यो वनको अलिकति आगो, चुँदी खोलाकोअलिकति पानी, रम्घा गाउँको अलिकति माटो, चुँदी बेसीकोअलिकति हावा, तनहुँको अलिकति आकाश भएर मजसरी आयाँ, अब भरेभोलि उसैगरी जान्याछु ।&lt;br /&gt;
बोल्दा बोल्दै अशक्त भएर आँखा चिम्लन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
चन्द्रकला कोबिकई-कोविकई रोइरहेकी छन्‌ ।&lt;br /&gt;
मरणलाई ... सतिघाट ... भेदन पाया ... हुन्थ्यो ।चन्द्रकला डाँको छोडेर रुदै परिदृश्यबाट बाहिरिन्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य समाप्त&lt;br /&gt;
सम्बाद बालकृष्ण समको भक्त भानभक्तबाट साभार ।&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
२३९&lt;br /&gt;
बृद्धनाति&lt;br /&gt;
नाति&lt;br /&gt;
२४०&lt;br /&gt;
दृश्य १२०&lt;br /&gt;
:? १९२५: मर्स्याडदी किनार / चौतारी: दिउसो&lt;br /&gt;
भानुभक्त, रमानाथ, इन्द्रबिलास, वैद्य र गाउँलेहरूमर्त्याड्दी नदीको किनारैकिवार भानुभक्तलाई डोलीमाहालेर राम... राम... को उच्चारणसहित दौडाएरजलाश्चयतर्फ लगिदैछ । पछाडिपछाडि गाउँलेहरूको ठूलोसमूह दौडिरहेको छ ।&lt;br /&gt;
मर्स्याङ्दी नदीको छेउको छाप्रोमा एकजना वृद्ध मानिस बपेकाछुन्‌ । नजिकै उनको नाति उभिएर भानुभक्तलाई घाटतर्फलगेको हेरिरहेको छ ।&lt;br /&gt;
वातिसँग - कस्लाई लग्याको ?&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण आचार्यका नाति भानुभक्तलाई सतिघाट लान लाग्याको।क्या उही रामायण नेछ्न्या भानुभक्त हो ?&lt;br /&gt;
हो।&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
पटकथा&lt;br /&gt;
बृद्ध मानिस श्रद्धालेनिहुरिएर दुबै हात जोडी |भानृभक्तलाई वमस्कारगर्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्तलाई मस्याड्दीबदीतर्फ ओरालिँदैछ ।रासनामको समूहस्वरलेवातावरण बोफ्लो बनेको ॥श।&lt;br /&gt;
बृद्ध मानिस भानुभक्तलाईढोगी नै रहेका छन्‌ ।भानुभक्तलाई मर्त्याड्दी नदीमा पानीमा खुट्टा डुब्ने गरीराख्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
गाउँलेहरू ठूलो ठूलो स्वरले राम .. राम... रामभनिरहेका हुन्छन्‌ । रमानाथ मुख छोपेर रोइरहेका हुन्छन्‌ ।पण्डित आचमतीले भानुभक्तको मुखमा पानिहालिदिन्छन्‌ । पानी ओठ बाहिर बगेर जान्छ ।&lt;br /&gt;
रमानाध डाँको छोडेर रोइरहेका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
भानुभक्त हिक्क... हिक्क... गर्छन्‌ र उनको टाउको दाहिनेपट्टिलत्रिन्छ । एउटा महामानबको पार्थिक शरीरको अन्त्यहुन्छ । रामनामको आबाज एकाएक रोकिन्छ ।&lt;br /&gt;
मत्याँड्दी नदी एकोहोरो तुताइरहेकी हुन्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
इन्द्रविलास रोइरहेका हन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
मत्याड्दी किनारमा चिता सजाइएको छ । चिताको बीचमापीतास्वर ओडाइएको भान्‌भक्तको पार्थिक शरीर महातिन्द्रमालमतन्न परेर सुतेको छ ।&lt;br /&gt;
मत्याड्दीको कलकलसँगै तेपथ्यबाट समूहगानको आवाजआउँछ । भानुभक्तको अनुहारबाट दृश्य खुल्दै सम्पूर्ण चितालाईउद्घाटित गर्छ ।&lt;br /&gt;
२४१&lt;br /&gt;
रामायण्‌ छ अगम्‌ इ सँस्कृतमहाँ पुग्दैन सबका गति ।इन्द्रविलासका अश्रुपूर्ण आखा चितामा केन्द्रित छन्‌ ।&lt;br /&gt;
भाषा श्लोक बनाइदिन्छु र पढ्न्‌ लागोस्‌ हरीमा मति ॥क्यामरा अर्धवत्ताकारमा चितालाई घुम्दै भावुभक्तको अनुहारवजिक गएर स्थिर हुन्छ ।&lt;br /&gt;
ग्रस्तो सुर्‌ गरि भानुभक्त कविले भाषा बनाई दिया ।बिहड्डम दृश्यमा चितासहित बगरमा बसेका सम्पूर्ण मलामीहरूउद्घाटित हन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
» थर्‌ आचार्य छ घर्‌ त हो तनहुँमा सारै दयाल्‌ थिया ॥भानुभक्तको चिता बलिरहेको विहङ्गम दृश्य देखिन्छ ।इन्द्रविलास आगोको ज्वाला पछ्चाडिबाट चितालाई हेरिरहेकाहुन्छन्‌ । मस्यांङ्ढी एक नासले सुसाइरहन्छ ।&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
२४२ आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
परिशिष्टहरू&lt;br /&gt;
परिशिष्ट-१&lt;br /&gt;
[क) सम्बादयुक्त कलाकार&lt;br /&gt;
पात्रभानुभक्त आचायं1९७१-१९२५&lt;br /&gt;
चन्द्रकला आचायंभौकृष्ण आचागं१३१%००१५८७ अनुसत्यप्रिया आचार्यधनञ्जय आचार्य१६४०-१००६ अनु&lt;br /&gt;
घर्माबती आचार्यकाशीनाध आचार्य१२ ४२०१९०० अनुप्रद्यनाभ आचार्य4८ 4३०१ जन्‌तुलसीराम आचार्य&lt;br /&gt;
१७४६-१११४ अन्‌&lt;br /&gt;
गङ्गादत्त आचार्य१८२०-११९१२ अनुरमानाथ आचार्य११०५-११९६८&lt;br /&gt;
चिबे&lt;br /&gt;
वासुदेव&lt;br /&gt;
पुरोहित&lt;br /&gt;
पुरोहितसिलोके-१सिलोके-२&lt;br /&gt;
२४४&lt;br /&gt;
पात्र र कलाकार&lt;br /&gt;
संक्षिप्त परिचय उमेरजुही रम्घाका घर्दार धनञ्जयका १५-१४छोरा, श्रीकृष्ण आचार्यका नाति, ७-१४नेपाली साहित्यका आदिकवि, ५-६नेपालका राष्ट्रिय विभूतिभानुभक्तकी पत्नी २२-४५भानुभक्तका बाजे, तनहुका ध्६-छउठूला विद्वान्‌&lt;br /&gt;
भानुभक्तकी बज्यै, थ्रीकृष्णकी पटनी ५०-६१भानुभक्तका बाबु, १5७१ भन्दा अघि ३५-६६देखि अन्त्याव्रस्थासम्म पाल्पा गौडामा&lt;br /&gt;
खर्दार पदमा बहाल&lt;br /&gt;
भानुभक्तकी आमा, धनञ्जयकी पत्नी ३०-३३भानुभक्तका माहिला काका, गृहस्थ ३६-४५&lt;br /&gt;
कलाकारद्विलीप रायमाडीविक्की शाहअनिता मिलवाल&lt;br /&gt;
हिउँघाला गौतमकमल दीक्षित&lt;br /&gt;
अञ्जु दीक्षित&lt;br /&gt;
रवीन्द्र खडका&lt;br /&gt;
रमा वपलियाहरिनाथ आचार्य&lt;br /&gt;
भानुभक्तका साहिँला क्राका, गृहस्थ ३५-४४ वुदिसागर आचायं&lt;br /&gt;
भानुभक्तका काहिंला काका, ३२-४७ चिश्वम्भर चञ्चल&lt;br /&gt;
प्रा्थामिक कालीन काँब विद्यारण्पकेशरी र उनका भाइ कुलचक्ककेशरीका ससरा&lt;br /&gt;
भानुभक्तका ठाहिँला काका, ज्योतिप २८-६० कुण्णमुरारी ढुइेल&lt;br /&gt;
र व्याकरणका बिद्ान्‌&lt;br /&gt;
भानुनक्तका छारा १४-२०भानुभक्तको वालसखा ६१०चुँदी रम्घाका गाउँले श्रत्रिवाह मण्डप ६०भानुको व्रतबन्ध ५५&lt;br /&gt;
बिवाह मण्डपमा जन्तीतर्फका सिलाकै ३८बिवाह मण्डपमा जन्तीतर्फका सिलोकै ३५&lt;br /&gt;
भूषण पोखरेल&lt;br /&gt;
गोपाल नेपालशम्पा उपाध्यायसूयनाव ढकालविश्वनाथ आचार्यआम्जिका भट्टराईबिन्दु ढकाल&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
काका बिबाह मण्डपमा घरबैटीतर्फका ३६ सुरेन्द्र भट्टसिलोक्रे, भानुका गाउँले काका&lt;br /&gt;
हरि आनभक्तको बालसखा ८ १० अनड्डार आत्रैयबिर्खे भानुभक्तको वालसखा ८:१० राजु बिकआचार्य कास्की गुरुकुलमा पढाउने व्यक्ति ५१५ रामेश्वर पौडेलगाउँले-१ मानुङको चौतारोमा बस्ने भलादमी दुद मुक्तिनाथ आचार्यगाउँले-२ मानुडको चौतारोमा वस्ने अथलादमी २५६ लक्ष्मीराज आचार्यगाउँले-३ मानुडको चौतारोमा बस्ने भलादमी ६० प्रयागदत्त आचार्यघँसिनी-१ असारे गीत गाउने युवती १५ सिर्जना पन्थघँसतनी-२ असारे गीत गाउने युवती १६ प्रजु ढकालमहिला चँदी रम्घामा डोको बोकी उकालो ४ आर्य आत्रैयलाग्ने महिलाशिब शर्मा तनहँ बसन्तपुरका मकरन्द ३७ घनश्याम खतिबडा&lt;br /&gt;
वेमहक-बैदु०रनु पण्डितका छोरा, वि.स. १८९० माप्रयागमा बसी बासुदेव रसानन्द ग्रन्थलेख्ने पण्डित, वनारसमा भानुभक्तलाईबिद्दत्‌ सभामा लाने व्याक्ति&lt;br /&gt;
भवानीशंकर पौडेल चुँदी-रम्घा घर भई काशीको ५१ डा.त्रतराज आचायं१८३६-१९००अन्‌ पाठशालामा पढाउने पण्डितमूलपण्डित काशीका विशिप्ट विद्वान्‌ ७५ तीर्वराज आचार्यपण्डित-१ काशीका विद्वान्‌ १३ रामचन्द्र शर्मा पौडेलपण्डित-२ काशीका विद्वान्‌ ६० डा.दीघराज घिमिरेपण्डित-३ काशीका बिद्रान्‌ ५६ डा. वासुदेव तिपाठीपण्डित-४ काशीका विद्वान्‌ ७० पा. सोमनाथ पौडेलपण्डित-५ काशीका बिद्वान्‌ डर उैबज्ञराज न्यौपानेपण्डित-६ काशीका विद्वान्‌ धर डा. वीरेन्द्र मिश्रपण्डित-७ काशीका बिद्वान्‌ ५२ डा रामदयाल राकेशपण्डित-८ काशीका विद्वान्‌ ५५ घटराज भट्टराइपण्डित-९ काशीका चित्रान्‌ ४द डा. जयराज आचायंपण्डित-१० काशीका विद्वान्‌ ७२ सूर्यनाथ आचायंजयलाल पौडेल भानुभक्तका मामा, लमजुइ ईद गोपालप्रसाद शमांभौर्लेटारका बासिन्दा, कप्तानमाइजू भानुभक्तकी माइजु, जयलालकी पत्नी ४५ रमा शर्मागाउँले-१ सप्ताहमा आउने भोर्लेटारका घासिन्दा ५४ अच्युतरमण अधि&lt;br /&gt;
परिशिष्ट २४५&lt;br /&gt;
गाउँले-२गाउँले-३&lt;br /&gt;
गाउँले-४उपवाचकमहिला&lt;br /&gt;
कालु जैसी&lt;br /&gt;
उजिरसिंह वापा१८५--१८०१&lt;br /&gt;
केशव गुरुङ&lt;br /&gt;
बिचारीकारिन्दागाउँले-१गाउँले-२गाउँले-३गुरु&lt;br /&gt;
चेलाघाँसी&lt;br /&gt;
बीरमानगजाधर सोती&lt;br /&gt;
घरबूढी&lt;br /&gt;
बुहारीकाशीनाथ सोतीबालक-१बालक-२बालक-३&lt;br /&gt;
भरिया&lt;br /&gt;
रे&lt;br /&gt;
सप्ताहमा आउने र खलोमा ध्यानबत्ताउनै भौलैटारका वासिन्दासप्ताहमा आउने र खलोमा धानवत्ताउनै भौलैटारका बासिन्दा&lt;br /&gt;
सप्ताहमा आउने भीलँटारका बासिन्दा&lt;br /&gt;
सप्ताह मण्डपमा बस्ने उपव्राचकसप्ताहमा असा पक्राउनेभोलेटारकी बासिन्दा&lt;br /&gt;
चुँदी ओकलाइका गाउँले,भानुका असामी&lt;br /&gt;
नयनसिह थापाका छोरा,&lt;br /&gt;
भीमतैन थापाका भतिजा,&lt;br /&gt;
बि.रा. १३७१-११८१ सम्मपाल्पा गौँडाका कमाण्डर&lt;br /&gt;
पाल्पा गौँडाका कारिन्दा,&lt;br /&gt;
४२ प्रदीप काफ्लेढेड कृष्ण खनाल४० प्रकाश हडखोले४५ चेतनाथ खतिवडा&lt;br /&gt;
३ लक्ष्मी पौडेल&lt;br /&gt;
ई कृष्णचन्द्र ढकाल&lt;br /&gt;
२४-२६ सुमन रिमाल&lt;br /&gt;
छठ गोपाल भुटानी&lt;br /&gt;
नक्सा बनाउन सिपालु ऐतिहासिक पात्र&lt;br /&gt;
घान्पा गौँड्ञाका कारिन्दापाल्पा गौँडाका कारिन्दाकोरामा कुरा गर्ने गाउँलेकोरामा क्रा गर्ने गाउँलेकोरामा कुरा गर्नै गाउँलेप्रश्वोत्तोरी पाठगनेँ गुरु&lt;br /&gt;
प्रश्नोत्तारी पाठगनेँ चेला&lt;br /&gt;
तनहुँ कलुँइ गाउँका पन्थ ब्रह्मण,&lt;br /&gt;
भानुभक्तलाई प्रेरणा दिनै व्यक्तिपान्पामा धनञ्जयको कामदारतनहुँ तारूकाका वासिन्दा,हलाकी, भानुभक्तका परिचितगजाधर सोतीकी जहानगजाधर सोतीकी बुहारीगजाघर सोतीको नातिकाशीनाधको साथीकाशीनाबको साथीकाशीनाथको साथीभानुभक्तको भारी भोक्नै व्याक्त&lt;br /&gt;
ड० नरेन्द्रराज प्रसाई५० शोरद्चन्द्र शर्मा६२ ग्रपिभक्त ढकाल९० विष्गुदत्त ढकाल॥ /71 लक्ष्मी आचायं७० दिलराज शर्मा२५ उमेश मायालु५० राजपाल थापा&lt;br /&gt;
३८ मैनकमार अधिकारी५० वि्णुराज आत्रैय&lt;br /&gt;
डद शान्ता शमाश्द डुन्दिरा आचायं५४१० जयप्रकाश मैनाली५०१० योगेश नेपाल५४१० गोपाल नेपाल५/१० सुशील ढकाल४० रामबहादुर घर्ती&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
शिबशङ्खर घिमिरे&lt;br /&gt;
१६६०-११३० अन्‌&lt;br /&gt;
शिवशङ्गरकी जहानघर्मदत्त ज्ञवाली&lt;br /&gt;
जन्प पदद०&lt;br /&gt;
कृष्णबहादुर राणा&lt;br /&gt;
१००००१११९,&lt;br /&gt;
तनहँ म्यग्दै घर भई कान्तिपुरमा&lt;br /&gt;
कर्णैल पदमा वहाल व्यक्ति, ४६ पूर्णबहादुर रानाभाटभानुभक्तका नातेदारकर्णेल शिवशङ्रकी थ्वीमती ३ भूवन चन्द&lt;br /&gt;
पाल्पाका बासिन्दा, भानुभक्तका मित्र, ३१-४४ मोहन निरौलाकृष्णबहादुर राणाका मातद्रतमा पहिले&lt;br /&gt;
खर्दार र पछि सुव्वा&lt;br /&gt;
श्री ३ महाराज जड्वहादुरका भाइ, २१-३३ विनोद प्याक्रेल१९०३ देखि १९०७ सम्म पाल्पामा&lt;br /&gt;
कमाण्डार, पछि काठमाण्डौ सरुवा, १९११&lt;br /&gt;
भन्दा अघि नै कमाण्डार इञ्चिफ भइसकेका,&lt;br /&gt;
भानुभक्तका अश्पदाता &#039;प्रशसक&lt;br /&gt;
शाशिनाय पण्डित कृष्णबहादुरका दरवारिया पण्डित १० सिड्घान्तराम जोशीसंस्कृत भाषाका हिमायती&lt;br /&gt;
कारिन्दा कृ्‌ष्णबहादुरका कारिन्दा ५० विष्णुभक्त फर्याल&lt;br /&gt;
वीरबहादुर कुमारीचोकको पहरेदार रद युवराज लामा&lt;br /&gt;
सिपाही कुमारीचोकको पहरेदार ३० भीमवबरसिंह थापा&lt;br /&gt;
कुलचक्रकैशरी भानुभक्तका साहिंला काकाका डु निष्ण्‌ तिबारीछोरी ज्वाईं, कवि विद्यारण्यकेशरीका भाइ&lt;br /&gt;
गाउँले-१ घनन्जयका साव चौतारो र चजरमा ६५ केशवराज आचार्यकुरा गर्ने गाउँले&lt;br /&gt;
गाउँले-२ घनन्जयका साथ चउरमा ५५ मेदिनीशमां पण्डितकरागर्ने गाउँले&lt;br /&gt;
गाउँले-३ धनन्जयका साथ चौतारोमा कुरा र कृष्ण लामागर्ने गाउँले&lt;br /&gt;
गाउँले-४ श्रनन्जपका साथ चउरमा ३१ ग्यामभत्त आचार्यकुरागर्ने गाउंले&lt;br /&gt;
गाउँले इन्द्रविलासका साथ खरवारीमा १ तीोयनाथ पोखरेलकुरा गर्नै गाउँले&lt;br /&gt;
गिरिधारी रानाभाट चुँदी तामाकोटका वासिन्दा, ५३ दीपक क्षेतीभानुभक्तका कर्गाडया&lt;br /&gt;
वीरभद्र रानाभाट गिरिधारी रानाभाटको छोरा १८ प्रदीप आचार्य&lt;br /&gt;
हरिताइँलो बराहा कुलोका मोही सद राजेन्द्र खनाल&lt;br /&gt;
श्रीप्रसाद वराहा कुलोका मोही २५ मनहरि न्यौपाने&lt;br /&gt;
मानबहादुर बराहा कुलौका मोही ३५ रामक्‌मार श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
परिशिष्ट २४७&lt;br /&gt;
मोही-१मोही-२मोही-३मोही-४न्यायाधीश&lt;br /&gt;
डिद्ठाविचारीतारिखेहाकिमकारिन्दागाउँले-१गाउँले-२गाउँले-३तारापतिसासूबुहारीहुलाकीभक्त-१भक्त-२बैद्गाउँले-१गाउँले-२नाति&lt;br /&gt;
बुद्ध&lt;br /&gt;
रब्द&lt;br /&gt;
बराहा कूलोका मोही&lt;br /&gt;
वराहा कलोका मोही&lt;br /&gt;
घराह्रा कलोका मोही&lt;br /&gt;
चराहरा कलोका मोही&lt;br /&gt;
नेपाल अदालतका प्रमुखव्रिष्णप्रसाद गुरुघराना&lt;br /&gt;
नेपाल अदालतका कमचारीनपाल अदालतका कमचारीतारिख लिन आउँने व्याक्ति&lt;br /&gt;
तार्कु अदालतबाट आएका दौडाहातारक अदालतबाट आएका दौडाहाचंदी रम्घामा काल पेन्नै व्याक्तचंदी ग्म्घामा कोल पेल्ने व्याक्तचुँदी रम्घामा कोल पेल्ने व्याक्तिअनभक्तका मित्र, ऐतिहासिक पात्रनारापतिकी जहान&lt;br /&gt;
तारापतिकी बुहारी&lt;br /&gt;
चटी बैसीमा भानुभक्तको चिट्टीपुग्याउने य्याक्त&lt;br /&gt;
राम कीतनका भक्त&lt;br /&gt;
गाम कीर्ततका भक्तअन्त्यावस्थामा भानलाई हर्ने बैद्यरुखमा चढी करागरने गाउँलेरुखमा जढ्न व्यक्तिसंग करा गर्नैभानुलाई जलाश्चय लाँदा वृद्धमंगकुगागर्ने गाउँले&lt;br /&gt;
भानुलाई जलाखय लांदा ढोग गर्नेवृद्ध व्याक्त&lt;br /&gt;
५५ शिवलाल रानागाट&lt;br /&gt;
्् म्‌क्ति आचार्य१५० जाफरदिन मियाँ२५, कृष्णहरि पन्ध२३ यादब खरेल&lt;br /&gt;
१० रामबाबु सुवेदी४५ डा रामप्रसाद उद्चती६५ भद्रबीर अधिकारी५० गश न्यौपाने04 हरिहर शमाँ३६ प्रमोदराज ढकाल६२ ट्धृश्वरीदत्त तिवारी&lt;br /&gt;
डर कपिराम पन्थ५१ डा शेपराज आचायंड्र सबिता गुरुड्&lt;br /&gt;
२० सङ्गम भण्डारी५५ बमबहादुर रानाभाट&lt;br /&gt;
५४ केदारभक्त आचार्य२० कुणाभक्त आचार्य६० दुगाभक्त ढकाल३ बिनोद ढकाल३७ पघर्मप्रकाश आचार्य३२ शऔषराज सुवैदी&lt;br /&gt;
९१५ प्रेमदत्त िपाडी&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
(ख) देवी-देवता&lt;br /&gt;
भगवान्‌ विष्णु भक्तमाला पाठ गर्दा इन्द्रचलासलाई रु प्रशान्त उप्ेतीदशान दिने देवता&lt;br /&gt;
भगवान्‌ रामचन्द्र रामायण लेखनरआघ भानुलाई न राकेश खडकाआशीचाद दिने देवता&lt;br /&gt;
भगवती सीता रामायण लेखनअघि भानुलाई न. हिमाली दीक्षितआशीव्रांद दिने देवी&lt;br /&gt;
माता सरस्वती वालक अवस्थामा भानलाईं न तृष्णा राणाआशीवाँद दिने देवी&lt;br /&gt;
बाली रामायणको पात्र थर भीमसैन थापा&lt;br /&gt;
(ग) बालुन नृत्यका कलाकारदिनेश अधिकारी, अच्युत नेपाल, दीप थेप्ठ, विनोद थापा, अनिल कोइराला, राजु लामा,रबि राना, जीत्रन राना, बूर्य श्रेष्ठ, महेश वराल, पूर्ण खतिबडा, श्याम वस्नेत ।&lt;br /&gt;
(घ) दमै नाचइंश्वरपबन घिमिरे ।&lt;br /&gt;
(ड) मागल गाउने कलाकारमञ्जु पौडेल, सभद्रा उपाध्याप, कमला पन्थ, राममाया कार्की, गीता आचार्य, सावित्राआचार्य, कमला पौडेल, उपा श्रेष्ठ, सपना श्रप्ठ, क्रेशरी खतिवडा ।&lt;br /&gt;
(च) अतिथि कलाकारध्रर्मराज थापा, कमार वस्नैत, यदुनाथ खनाल, माध्रबप्रसाद घिमिरे, विष्णुप्रताप शाह,विएप्रमाद थिताल, तिलबिक्रम नेम्बाइ ।वैरागी काँइला।, उपा शेरचन आदि ।&lt;br /&gt;
(छ) पुन: स्वराङ्गन गर्ने कलाकार&lt;br /&gt;
उमेश मायालु दिव्यचन्द्र आचायं, समीर भण्डारी, प्रकाश वावु निरौला, शेष पीडेल,शेखर शाण्डिल्य, ज्ञानप्साद आचापं, सुरेश पौडेल &#039;बसन्त&#039;, सरोज के.सी.. दिनेशअधिकारी, नारायणप्रसाद भट्टराई, माधवप्रसाद शमा आचार्य, जगदीश पौडेल, पीपलर्माणसिग्दैल, शिबहार भट्ट &#039;टाइगर&#039;, दामोदरप्रसाद दाल &#039;उदासी&#039;, केशव कोडराला &#039;गरीब&#039;,देवीराम पराजुली, नेमबहादुर तामाङ, मञ्ज्‌ पौडेल, वट्ठी आचार्य, गणेश सापकोटा,मुकुन्द सुवेदी, सुधा न्यौपाने, दीपक श्रेष्ठ, दीपेन्द्र पाठक, रामचन्द्र शर्मा पौडेल, राजेशमहजंन, हरिवंश आचार्य, इन्दिरा प्रसाईं, वृद्ध शाक्य ।&lt;br /&gt;
परिशिष्ट २४९&lt;br /&gt;
परिशिष्ट-२&lt;br /&gt;
दृश्यहरूको संक्षिप्त टिपोट&lt;br /&gt;
दृश्य १सन्दर्भ :- अक्षरारम्भ स्थान :- रम्घाबि.सं. :- पद७६ अवधि :- २ मि. ४६ सेकेण्डश्रीकृष्ण आचार्यले पाच वर्षका भानुभक्तलाई सरस्वती मया दृष्टा भन्नै सरस्वती बन्दनाबाचन गर्ने लगाउदै &amp;quot;अ&amp;quot; बाट शिक्षा आरम्भ गराएको ।&lt;br /&gt;
दृश्य २सन्दभ॑ :- बर्णमाना स्थान :-रम्घावि.सं. :- १द७६ अवधि :- १ मि. ४३ सेकेण्डथीकप्णले भानुभक्तलाई नक&amp;quot; “ख&amp;quot; ग&amp;quot; “घ&amp;quot;” बाट वर्णमाला सिकाउन&lt;br /&gt;
घारम्भ गरेको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ३सन्दर्भ :- अक्षरारम्भको चर्चा स्थान :- पाल्पा गाँडावि.सं ;- १८७६ अवधि :- २ मि. ३ सेकेण्डपाल्पा गौडामा कर्णैल उजिरसिह थापा र खर्दार धनम्जयबीच भानुको अक्षरारम्भ भएकोचारै कराकानी ।&lt;br /&gt;
दृश्य ४सन्दभ :- दुगाँकवच स्थान :- रम्घाबि.सं. :- पदछ अवधि :- १ मिनेट ३२ सेकेण्डश्रीकृष्णले भानुभक्तलाई दुर्गाकबच पढाएको - यदगृहयं परमंलोके ... ।&lt;br /&gt;
दृश्य ५सन्दभ॑ :- दुगाकिवच पाठ स्थान :- भगवती मन्दिरविल. :- १८७७ अवधि :- १३ सेकेण्ड&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण र भानुभक्तले अरु भक्तजनसहित देवीको मन्दिरमा दुर्गा कवच पाठ गरेको -या देवी सव भृतेष्‌.. ।&lt;br /&gt;
दृश्य ६सन्दर्भ :- अमभरकोष स्थान :- चुँदी-रप्घाबि.सं. :- १८७७ अबधि :- ५६ सेकेण्डभानुभक्तलाई धीकृष्णले अमरकोप पढाइरहेको - भ्‌ः, भूमि, अचला ... ।&lt;br /&gt;
२५० आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
दृश्य ७&lt;br /&gt;
सन्दर्भ :- अमरकोष स्थान :- भान्छा कोठावि.स. :- १८७७ अवधि :- १७ सेकेण्डभानुभक्तले अमरकोप घोकिरहेको - सर्बसहा वसुमती.... ।&lt;br /&gt;
दृश्य ८सन्दर्भ :- सरस्वती वन्दना स्थान :- प्‌जा कोठाविसं. :- १८७७ अबधि :- ५४ सेकेण्ड&lt;br /&gt;
भानुभक्तले याकुन्दैन्दु ... भन्ने सरस्वती बन्दना गाउँदै सरस्वती माताको आशीर्वाद प्राप्तगरेको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ९सन्दर्भ :- लडाइँको चर्चा स्थान :- पाल्पा गौँडावि.सं. :- १दछद अवधि :- १ मिनेटकर्नेल उजिरसिह, धनञ्जय र केशव गुरुङडबीच काँगडाको लडाड र नक्सा बनाउनेवारे छलफल ।&lt;br /&gt;
दृश्य १०सन्दर्भ :- लोक पद्य स्थान :- चुँदी-बेसीबि.सं. :- १८७८ अवधि :- २ मिनेट १२ सै.गोठालाहरुसंगको ठोकाद्वोकमा भानुभक्तले काली कैली कलाँख भन्ने लोकपद्य सुनाएरबाजी जितेको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ११सन्दर्भ :- लोक परा स्थान :- रम्घावि.सं. :- १दज्द अवधि :- १ मिनेट २८ सेघोडा चढेर आएका वासुदेव ठुलोवालाई हेरेर भानुभक्तले हरे मुरारे वसुदेव्का छोराभन्ने लोक पत्च भनेको ।&lt;br /&gt;
दृश्य १२सन्दर्भ :- भानुको प्रथम कविता स्थान :- चँदी-बेसीबि.स. :- १४६ अवधि :- २ मिनेट २५ से.भानुभक्तले केश कञ्चेट कहुन्‌ भन्ने शरीरको अङ्कप्रत्यङ्वको कविता रचना गरी चिबेसँगबाजी जितेको ।&lt;br /&gt;
परिशिष्ट २५१&lt;br /&gt;
दृश्य १३सन्दर्भ :- कौमुदी स्थान :- रम्घाबिस. :- १८७८ अवधि :-ईद सेकेण्डश्रीकणले लघसिद्धान्त कौमुढीको महत्व ब्याख्या गर्दै मड्लाचरणबाट भानुभक्तलाईपढाउन सुरु गरेको - नत्वा सरस्वती देवी .. ।&lt;br /&gt;
दृश्य १४सन्दर्भ :- मागल र अन्ताक्षरी स्थान :- चँदी-बेसीविसं :- १८७८ अर्वाध :- ३ मिनेट ४० सेकेण्डगाउमा भएको विवाहका अवसरमा भानभक्तल अघि लागिन्‌ भमरी भन्ने मागलसुन्नुका साथै सिलाकमै भएको अन्ताक्षरी प॒तिस्पधामा बाउँ काँध उपर्‌ भन्ने सिलोकलाईबाजा ताल मृदड भन्ने सिलाकले जवाफ दिइ अन्ताक्षरी जितको ।&lt;br /&gt;
दृश्य १५सन्दर्भ :- गणोशचौथी स्थान :- रम्घाबिस्त :- १८७८ अवधि :- १५ सेकेण्डभानमक्तलाई आमाले गणेश चौचीका दिन फुल टिन अराएको ।&lt;br /&gt;
दृश्य १६सन्दभ॑ :- गणैशचौथी स्थान ;- फूलबारीविसं. :- १८७८ अर्वाधि :- २० सैकेण्डमानभक्तले फूल टिप्दाटिप्दै कविता गुनगुनाएको ।&lt;br /&gt;
दृश्य १७सन्दभ॑ :- गणेशचौयीको कविता स्यान :- रम्घाविस :- १८जद८ अर्वाध :- ५० लैकेण्ड&lt;br /&gt;
भानुभक्तले गणोश चौधीमा गणेशलाई चढाउने एक्काईसथरी फूलको कावता लेखीआमालाई सुनाउन खोज्दा आमाले जिबालाई सुनाउने सल्लाह दिएको ।&lt;br /&gt;
दृश्य १८सन्दर्भ :- गणोश चौथीको कविता स्थान :- चुँदी-बेसीबि.स. :- १८७८ अवधि :- १ मिनेट ५६ सेकेण्डभानभक्तले श्रीकृष्णलाई मास्‌ भुड्ठी बल दबो भन्नै गणेश चौधीमा चढाउनै फुलहरूकोकबिता सुनाउंदा श्रीकृष्णले आशीबाँद दिएको ।&lt;br /&gt;
र्‌५२ आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
दृश्य १९सन्दभ॑ :- लोकपद्य स्थान :- रम्घावि.सं. :- पृदञद अवधि :- हड सेकेण्डआमाले मानुलाई व्रतबन्धको लागि चिना देखाउन पठाउँदा भानुले यो छोरो पढला भन्नेलोक पद्य गाउदै हिँडेको ।&lt;br /&gt;
दृश्य २०&lt;br /&gt;
सन्दर्भ :- थानको व्रतबन्धको चर्चा स्थान :- पाल्पा गौँडा&lt;br /&gt;
वि.सं. :- पृदछद अर्वाध :- ३० सेकेण्ड&lt;br /&gt;
छोरा भानुभक्तको व्रतबन्धकालागि खर्दार धनञ्जयले कर्नेल उजिरसिद्संग विदा मागेको ।दृश्य २१&lt;br /&gt;
सन्दर्भ :- भातको व्रतबन्ध स्थात :- चेँदी-बेसी&lt;br /&gt;
बिस :- १८७८ अर्वाध :- २ मिनेट ५ सेकेण्ड&lt;br /&gt;
भानुभक्तको व्तवन्धमा श्रीकृष्णले मन्त्रदान गरैकौ आमाले भिक्षादान गरको ।दृश्य २२&lt;br /&gt;
सन्दर्भ :- सुढी पढाएको स्थान :- रम्घा&lt;br /&gt;
बि.सं. :- पदछ अवधि :- १ मिनेट&lt;br /&gt;
रुढ्टी पढाउने सन्दर्भमा श्रीकृष्णले आनुभक्तलाई हरि ३० गणानान्त्बाबाट पढाइरहेका ।दृश्य २३&lt;br /&gt;
सन्दर्भ :- पाञ्चायन प॒जा स्थान :- रम्घा&lt;br /&gt;
विसं. :- १८७९, अर्वाध -- २२ सेकेण्ड&lt;br /&gt;
भानुभक्तले रुद्री पढिसकेपछि नम: शम्भवायच मन्त्र पाठसहित पाञ्चायनको पूजा गरेक्रो ।दृश्य स४&lt;br /&gt;
सन्दर्भ :- रघ्वश महाकाव्य स्थान :- चुँदी-बेसी&lt;br /&gt;
वि.सं. :- १८८० अबधि :- १ मिनेट द सैकेण्ड&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण, इन्द्राबलास र गड्डादत्ततीच रघबश महाकाव्यबारै चचाँ तथा भानुभक्तलाईरघुबश पढाउन पर्ने बारे कराकानी ।&lt;br /&gt;
दृश्य २५सन्दर्भ :- रघुवंश महाकाव्य स्थान :- रम्घावि.सं. :- १दद० अवधि :- २१ सेकेण्डभानुभक्तले रघुवश महाकाव्य पढिरहेको - अथ प्रजानामाथिप ।&lt;br /&gt;
परिशिष्ट र३&lt;br /&gt;
दृश्य २६सन्दभ॑ :- बकसको घर स्थान :- कान्तिप्रबिसं :- १८८२ अबधि :- ३ मिनेट ५ सेकेण्डकर्नेल उजिरसिंह थापाले मर्नुआघ धनञ्जपलाई घर यकस दिएको तथा पाल्पा गौंडामामुल्तियार वर्दालएको बारै धनस्जप र इन्दावलासवीचको कुराकानी ।&lt;br /&gt;
दृश्य २७सन्दभ॑ :- ज्योतिष अध्ययन स्थान :- चैँदी-बेसीवि.सं. : १८८२ अवधि :- १ मिनेट ३ सेकेण्डखीकण्ण, डन्दावलास र गड्ठादत्तवीच भानुलाई कास्क्रीमा ज्यातिप पढ्न पठाउनेबारैछलफल ।&lt;br /&gt;
दृश्य २८सन्दर्भ :- ज्योतिष अध्ययन स्थान ;- कास्कीवि.सं :- १८द३ अवधि :- ३४ सेकेण्डकास्कीको गुरुकलमा भानुभक्तले ज्योतिप शास्वको अध्ययन गरिरहेको ।दृश्य २९सन्दभ॑ :- चिनाको कविता स्थान :- चुँदीबि.सं. :- पददाउ अवधि :- १ मिनेट ४५ सेकेण्ड&lt;br /&gt;
कास्की गुरुकुलबाट फकंदा बाटोमा भानुभक्तले वासको सुप्लोमा आफ्नै चिनाको कबितालेखेको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ३०सन्दर्भ :- चिनाको कविता स्थान :- चेँबी-बेसीबि.सं. :- १८३ अबधि :- २ मिनेट १० सेकेण्डभानुभक्तले थीकृष्णलाई चिनाको काबता ति शालीवाहन्‌का सुनाएको र श्रीकृष्णलेभार्वाबह्वल भएर आशीबांद दिएको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ३१सन्दर्भ :- लोक पद्य स्थान :- चेँदी रम्घावि.सं. :- पददड अवधि :- १ मिनेट ४४ सेकेण्डबाटोमा जन्ती जदिगरेको देखेर भानुले भात्‌ खानै तसला भन्नै लोक पद्य भनेको रचिवेले /मानुडमा भानुको जन्ती जानै प्रसञ्घ उठाएर जिस्क्याएको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ३२सन्दर्भ :- मानुडकौ कविता स्थान :- मानुडबि.स. ;- १बबाई अबधि :- २ मिनेट १ सेकेण्डभनुले बिवाहउपरान्त मानुङको चौतारीमा वसेर मान्डूको सरि गाउँ कविता सुनाएको ।&lt;br /&gt;
रब आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
दृश्य ३३सन्दर्भ :- घाँसे गीत स्थान :- कनै गाउँको बाटोबि.सं. :- १ददाई अबधि :- १ मिनेट १६ सेकेण्डघसिनीहरूको काटुँ भन्छु जति भन्ने असारे गीतलाई भातुले हे नानी तिमी ता भन्नै लोकगीतमै जबाफ दिएको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ३४सन्दभ॑ :- काशी जाने सल्लाह स्यान :- चैँदी-बेसीबि.सं. ;- पदप्द अबधि :- २ मिनेट ४४ सेकेण्डश्रीकृष्णले कत्पवासका लागि काशी जानुअघि सबै छोराहरूलाई राखेर घरसल्लाहगरैकौ तथा भानुभक्तलाई पनि सँगै लाने निर्णप गरेको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ३५सन्दर्भ :- विद्वत्‌ मण्डलीबारे चर्चा स्थान :- काशीवि.सं. :- १८८ अर्वाध :- १ मिनेट ७ सेकेण्डश्रीकष्णले भानुभक्तलाई काशीको विद्वत्‌ मण्डलीमा भाग लिन र विद्वातहरूसँग सङ्गत गर्नसल्लाह दिएको ।&lt;br /&gt;
दुश्य ३६सन्दर्भ :- काशी पुगेको पत्र स्थान :- रम्घाबि.सं. :- १८५ अवधि :- १६ सेकेण्डधनञ्जसले बाबु, भाई र छोरा सुविस्तासाथ काशी पुगेको पत्र प्राप्त भएको करागाउँलेहरुलाई सुनाएको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ३७सन्दर्भ :- शिवशर्मासँगको परिचय स्थात :- काशीवि.सं. :- १८८७ अवधि :- ४७ सेकेण्डश्रीकृष्णले शिवशर्मासँग भानुलाई परिचय गराउदै बिद्त मण्डलीमा संगै तैज्ञान अनुरोधगरेको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ३८सन्दभ॑ :- बिद्दत सभा स्थान :- काशीबि.सं. :- पद्य अवधि :- ३ मिनेट ७ सेकेण्डबनारसको विद्वृत्‌ मण्डलीका सदस्यहरुलाई भानुले कवितामै आफ्नो परिचय दिई पाहाडकोअति बेल देश्‌ कविता भनेको र शास्त्रार्थ सुनेको ।&lt;br /&gt;
परिशिष्ट २५५&lt;br /&gt;
दृश्य ३९&lt;br /&gt;
सन्दर्भ :- काशीको चिठी स्थान :- चेँदी-बेसी&lt;br /&gt;
विसं :- १८पछ अबधि :- ५८ सेकेण्ड&lt;br /&gt;
खीकप्णले काशीबाट पठाएको चिठी धनञ्जयसै भाइहरूलाई पढेर सुनाएको ।दृश्य ४०&lt;br /&gt;
सन्दर्भ :- भवानीशडर स्थान :- काशी&lt;br /&gt;
विसं. :- १८७ अबधि :- २५ सेकेण्ड&lt;br /&gt;
खीकप्णले अध्यापक अवानीशड्र पौडेलसंग पारचय गराउदै भानुलाई दर्शत पढाउनमद्दत गर्ने अन्रोध गरको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ४१सन्दर्भ :- कोरा बसेको स्थान :- चेँदी बेसीवि.सं. :- १टदछ अवधि :- १ मिनेट २ सेकेण्डचनारसमा श्रीकृष्णको देहान्तर्पाछ छोराहरु चुँदी बेसीमा कोरामा बसेको ।दृश्य ४२सन्दर्भ :- श्रीकृष्णको संझना स्थान :- काशीबिसं :- १८पद अवधि :- १७ सेकेण्डश्रीकृष्णको तस्बिर हेदै काशीमा भानुभक्तले पुराना करा सम्झैको ।दृश्य ४३सन्दभ :- श्रीकृष्णको सम्झना स्थान ;- रम्घावि.सं, ;- १८७८ अबधि :- १ मिनेट २ सेकेण्ड&lt;br /&gt;
श्वीक्णले शकराचांको प्रश्नोत्तरी पञ्चाशिकाको पाट गर्दै आनअक्तलाई नेपाली भाषामाउन्धा गर्न प्रेरित गरेको प्रसङ्क भानुले सम्कैको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ४४सन्दभ॑ :- प्रश्नोत्तरी लेखन स्थान :- काशीविस. :- १दडद अवधि :- १ मिनेट ५० सेकेण्डभानुभक्तले बाजेलाई गृह मान्दै प्रश्नोत्तरी पञ्चाशिका नेपाली भाषानुवाद गर्नथालेको - अपार संसार समदमाहौँ ।&lt;br /&gt;
दृश्य ४५&lt;br /&gt;
सन्दर्भ :- भानले प्राण भनेको चर्चा स्थान :- रम्घा&lt;br /&gt;
वि.सं :- १८८९ अवधि :- १ मिनेट २८ सेकेण्डधनज्जयले भानु वनासरवाट फर्कने बित्तिकै भौलैटार गएको र आफ्‌ पानि पाल्पा जानेकरा गाउलेहरूलाई भनेको ।&lt;br /&gt;
२५६ आदिकवि भानुशक्त&lt;br /&gt;
दृश्य ४६&lt;br /&gt;
सन्दर्भ :- पुराण वाचन स्यान :- भौलैटार&lt;br /&gt;
वि.सं. :- पददर्‌ अबधि :- डद सेकेण्ड&lt;br /&gt;
भानुभक्तले मोर्लेटार मामाको घरमा भागवत बाचन प्रारम्भ गरेको सच्चिदानन्द छूपाय...1दृश्य ४७&lt;br /&gt;
सन्दभ॑ :- पुराण बाचन स्थान :- भोर्लेटार&lt;br /&gt;
वि.सं. :- पप्दर अवधि :- १ मितेट ५१ सेकेण्ड&lt;br /&gt;
भानुको योग्यताको प्रशसा गर्दै भक्तजन सप्ताह मण्डपमा आइपुगेको, निगमकल्पतरोर्‌...वाचन भइरहेको&lt;br /&gt;
दृश्य ४८सन्दर्भ :- अर्सा पकाएको स्थान :- भोर्लेटारबि.सं. :- १८८९ अबधि :- १७ सेकेण्डसप्ताहको वेलामा असाँ पकाइरहेको ठाउंमा गएर माइजूले हेरेको ।दृश्य ४९सन्दर्भ :- पुराण वाचन स्थान :- भोर्लेटारबि.सं. :- १८३९ अबधि :- १ मिनेट २२ सेकेण्ड&lt;br /&gt;
पुराणको कथा वाचन चलिरहेको र भानुले इन्दिरसको गोपी गीत ब्रज त बेस्‌ बन्योस्‌नाएको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ५०सन्दर्भ :- पुराण वाचन स्थान :- भोर्लेटारवि.सं. :- १८प्९ू अर्वाध :- १४ सेकेण्डपुराणको अन्तिम दिन वाचन चलिरहेको र धुन्धुकारीले मोक्ष प्राप्त गरेको ।दृश्य ५१सन्दर्भ :- बालुनको चर्चा स्थान :- भौर्लेटारवि.स. :- १८८९ अवधि :- २१ सैकेण्डसप्ताहको अन्तिम दिन भएकाले बेलुकी बालन नाच्ने कुरा गाउँलेहरूले गरेको ।दृश्य ५२सन्दर्भ :- बालन नाच स्थान :- भोर्लेटारवि.सं. :- पदद९ अवि :- ४ मिनेट ४७ सेकेण्ड&lt;br /&gt;
बालुन नाच - जनिकम्प, जतिकम्प..... ।&lt;br /&gt;
परिशिष्ट २५७&lt;br /&gt;
दृश्य ५३सन्दर्भ॑ :- मुग्रेकेराको कविता स्थान :- चँदी ओकलाङ्‌बि.सं :- १६१० अबधि :- २ मिनेट ३० सेकेण्डकाल जैसीका घरमा भटेको मकै माचर खान दिएपछि भानुभक्तले असल्‌ मुगरेकेरा कवितानन्काल सनाएको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ५४सन्दभ॑ :- नेपालको राजनीति स्थान :- पाल्पा गौंडाबि.स. :- १८९१-९४ अवधि :- १ मिनेट १४ सेकेण्डप्रनञ्जय र कारिन्दाहरू वीच रामपाल पाण्डे पाल्पाको बडाहाकिम भएर आउने भएकालेटिक्न गारो छ आदि क्राकानी भएको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ५५सन्द्भ॑ :- प्रश्नोत्तरी लेखन : गायन स्थान :- रम्घा - देवघाटवि.सं. -- १८९५-९६ अर्वाध :- २ मिनेट २४ सेकेण्डकाशीवाट रम्घा फर्केपछि भानुभक्तले प्रश्नोत्तरी लेइ्ने कम जारी राखेको- कुन हो सदाबन्धनमा... तथा गुरु चेला वीच नदी किनारमा प्रश्नोत्तरी गायन चलिरहेको - अपारसंसार. ।&lt;br /&gt;
दृश्य ५६सन्दर्भ :- घाँसीसँगको भेट स्थान :- कलंड बेसीवि.सं. :- १८९८ अबधि :- ६ मिनेट ३६ सेकेण्डभानभक्तको घांसीसंग भेटघाट तया भरजन्म घाँसतिर कविताको रचना ।&lt;br /&gt;
दृश्य ५७सन्दर्भ :- घाँसीको सम्झना स्थान :- रम्घाविस :- १८९८ अवधि :- ५१ सेकेण्ड&lt;br /&gt;
भानुभक्त सुत्न नसकेको, घांसीको उपदेश प्रतिध्वनित भइरहेको र पुराना कुरासम्झेको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ५८सन्दर्भ ;- श्रीकृष्णको सम्झना स्थान :- रम्घावि.सं :- १दद१ अवधि :- २९ सेकेण्डथ्री कृष्णले आध्यात्म रामायणको ततौ राम पाठ गरेको तया नेपालीमा उल्था गर्नेउत्प्रेरित गरेको घटना भानुभक्तले सम्झेको ।&lt;br /&gt;
२४८ आदिकवि भातृभत्त&lt;br /&gt;
दृश्य ५९&lt;br /&gt;
सन्दर्भ :- रामसीता दर्शन स्थान :- रम्घाविसं :- १८९८ अवधि :- २७ सेकेण्डभानुभक्तले सपनामा रामसीताबाट आशीबाँद प्राप्त गरेको ।दृश्य ६०सन्दर्भ :- रामायण बालकाण्ड लेखन स्थान :- रम्घावि.स. :- १६९ अबधि :- १ मिनैट १९ सेकेण्डभानुभक्ततै रामायण बालकाण्ड लेख्न प्रारम्भ गरेको- एकदित्‌ नारद.....।दृश्य ६१सन्दर्भ :- रामाग्रण बालकाण्ड लेखन स्थान :- रम्घावि.सं. :- १८९द अबधि :- ४६ सेकेण्ड&lt;br /&gt;
जङ्कलको चौतारीमा वसेर भानुभक्तले रामायण चालकाण्ड लड्ने कम जारी राखैको- हेब्रह्मा जति छन्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य ६२सन्दभ २&amp;quot; रामायणा बालकाण्डु समाप्ति स्थात :- रम्घाबिसं :- १८९८ अर्वाध :- १ मिनेट १० सेकेण्डभानुभक्तले रामायण वालकाण्ड लेखिसिध्याएर आन्तिम श्लोक सीताराम्‌ अघि तप्‌गरिन्‌ पत्नीलाई सुनाएको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ६३सन्दर्भ :- गजाधर सौतीकी घरबढी स्थान :- तारूकावि.सं. :- १९०१ अवधि :- डं मिनेट २० सेकेण्डसांफुमा बास माग्न पुगेका भानुभक्तलाई गजाधर सोतीकी घरबुढीले वास नदिएको रडिकीको छाप्रोवाट पनि निकालेको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ध्ङसन्दर्भ :- गजाधर सोतीकी घरबढीको कविता श्यात :- तारुकावि.सं. :- १९०१ अवध :- १ मिनेट ४३ सेकेण्डसुखमनि रात विताएका भानभक्तलै कविता लेखैर बच्चाहरूलाई सिकाएको र बाटोलागेको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ६५सन्दभ॑ :- गजाघर सोतीकी घरबढीको कविता स्थान :- तारूकाबि.सं. :- १९०१ अवधि :- २ मिनेट ४७ सेकेण्डबच्चाहरुले गजा घर्‌ सोतीकी कविता पढेर बढीलाई जिस्क्याएको र गजाधरले भानुभक्तलेबास नपाएको कुरा थाहा पाएका ।&lt;br /&gt;
परिज्चिष्ट २५९&lt;br /&gt;
दृश्य ६६सन्दभ॑ :- कान्तिप्र जानै प्रसङ् स्थान :- पात्पाबिसं. :- १९०६ अवधि :- ३द सेकेण्डजग्गावापतको कामको लागि कान्तिपुर गएर कर्णेल शिवशड्डर घिमिरेलाई भेदनभानभक्तलाई चिठी लेखी रम्घा पुत्याउन धनञ्जपले नोकरलाई अह्वाएको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ६७सन्दरभ॑ :- बालाजुको कविता स्थान :- कान्तिपुरबि.सं :- १९०६ अबधि :- १ मिनेट ३३ सेकेण्डपहिलापटक कान्तिपुर जाँदा बालाजुको सौन्दर्यबाट प्रभावित भएर भानभक्तले कवितालेखेको - यति दिन पछि मैले... ।&lt;br /&gt;
दृश्य ६८सन्दभ॑ :- आय्याथ्यौँ मनका कुरा कविता स्थान :- कान्तिपुरवि.सं. :- १९०६ अवधि :- १ मिनेट ३१ सेकेण्डकर्नेल शिवशङ्गर धिमिरसँग भेट नभएपछि भानुभक्तले आयाथ्याँ मतका कुरा ...कवितालेखेर छाडेको करा कर्नेल्नीले सुनाएकी ।&lt;br /&gt;
दृश्य ६९सन्दर्भ :- कान्तिप्री कविता स्थान :- कान्तिपुरबिसं, :- १९०६ अबधि :- २ मिनेट ४६ सेकेण्डकान्तिप्रीको सौन्दर्यबाट प्रभावित भई भानुभक्तले चपला अवला कविता लेखेको ।दृश्य ७०सन्दभ॑ :- कमारीचोकको परर्जी स्थान :- चुँदी बेसीविसं. :- १९१० अबधि :- १ मिनेट ३४ सेकेण्ड&lt;br /&gt;
भानुभक्तले कुमारीचोकको पुर्जी पाप्त गरेको र काकाहरूले धर्मदत्तको मद्दत लिनेसल्लाह दिएको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ७१सन्दर्भ :- सुब्बा धर्मदत्त स्थान :- कान्तिपुरबि.सं. :- १९११ अबधि :- ५९ सेकेण्डभानुभक्त कान्तिपुरमा खर्दार धर्मदत्त कहाँ गई कमारी चोकको पुर्जीवारै सल्लाह लिएकोर धर्मदत्तले जर्नेल कष्णवहादुर राणा कहाँ भानलाई चाकडीमा लैजाने बिचार व्यक्तगरका ।&lt;br /&gt;
२६० आदिकवि भानुभत्त&lt;br /&gt;
दृश्य ७२सन्दर्भ :- कृष्णब्रहादुरको चाकडी स्थान :- कान्तिपुरविस. :- १९११ अवधि :- ४० सेकेण्डभनभक्तले पटाड्रनीमा उभिएर ज.कृाषणबहाद्रको चाकडी गरेको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ७३सन्दभ॑ :- ज.कृ्‌ष्णवहादुरको चाकडी स्थान :- कान्तिपुरवि.सं. :- १९११ अवधि :- १ मिनेट २४ सेकेण्डतल्लो वैदकबाट भानुभक्तले ज.कृष्णबहादुरको चाकडी गरेको ।दृश्य ७४सन्दभ॑ :- हिसाब बुराउने सल्लाह स्थान :- कान्तिपुरवि.स. :- १९११ अवधि -- ३२ सेकेण्डज.कृ्‌ष्णवहादुरले भानुभक्तलाई कुमारीचोकको हिसाव बुराउने सल्लाह दिएको ।दृश्य ७५सन्दर्भ :- भानु थुनिएको चर्चा स्थान :- चुँदी रम्घाबिसं. :- १९११ अबधि :- १ मिनेट १ सेकेण्ड&lt;br /&gt;
भनभक्तले कुमारीचोकको हिसाव वुकाउन नसकेको हुनाले थुनामा परेको बारे चुँदीमाउख पेलिरहेका गाउँलेवीच चर्चा ।&lt;br /&gt;
मध्यान्तर&lt;br /&gt;
दृश्य ७६सन्दर्भ :- भानु कुमारीचोकमा थुनिएको स्थान :- कान्तिपुरबि.सं :- १९११ अबधि :- १४ सेकेण्डभानुभक्त कुमारी चोकको थुनामा ओहोर दोहोर गरिरहेको छागा ।&lt;br /&gt;
दृश्य ७७सन्दर्भ :- जेलमक्तिको सिफारिस स्यान :- कान्तिपुरवि.सं. :- पर्व अवधि :- ४५ सेकेण्डखर्दार धमंदत्तले ज.कृष्णवहादुर कर्हा गएर भानुभक्तलाई जेलमुक्त गर्ने सिफारिस गरेको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ७८सन्दर्भ :- रामायणा लेख्ने सुराव स्यान :- कान्तिपुरविसं :- १९११ अवधि :- ४५ सोकेण्ड&lt;br /&gt;
कमारीचोकमा धर्मदत्तले भानुभक्तलाई सान्त्त्रना दिँदै आध्पात्म रामायण उन्था गर्नैसुझाब दिएको ।&lt;br /&gt;
परिशिष्ट २६१&lt;br /&gt;
दृश्य ७९सन्दभ॑ :- रामाप्ण अयोध्याकाण्ड लेखन स्थान :- कान्तिपुरबि.स. :- १९११ अवधि :- ३ मिनेट १४ सेकेण्डकमारीचोकमा अपोध्याकाण्ड लेखिसिध्याएपछि भानुभक्तले सिपाहीहरूलाई सुनाएको -गयो खान्या बेला, सुन्यौ भाइ संसारमा ।&lt;br /&gt;
दृश्य ८०सन्दभ॑ :- रामायण अरण्यकाण्ड लेखन स्थान :- कान्तिपुरवि.स :- १९११ अबधि : १ मिलेट ३३ सेकेण्डभानुभक्तले रामायण लेहुने कम जारी राहदै अरण्पकाण्ड लेखिसिध्याएर हे लोक्‌ होमनाएको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ८१सन्दर्भ :- &#039;रोज्‌ रोज्‌ दशन&#039; कविता स्थान :- कान्तिपुरबिस :- १९११ अवधि :- २ मिनेट ४२ सेकेण्डभानभक्तलाई लामखुट्टे, उँपयाँ र उडसले टोकेको र पसैबारै व्यडग्य कात्रता लेखैरजं कृष्णबहादुर कहाँ पुस्याउन सिपाहीलाई दिएको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ८२सन्दभ॑ :- &#039;रौज रोज दशन&#039; कविता स्थान :- कान्तिपुरबि.सं. :- १९११ अवधि :- १ मिनेट १० सैकेण्डज कणबहादुरले भानभक्तले लेखेको कविता पढेको - रोज्‌ रोज्‌ दशंन... ।दृश्य द३सन्दर्भ :- रामायण किष्किन्ध्याकाण्ड गायन स्थान :- कान्तिपुरविस :- १९११ अवधि :- ३९ सेकेण्डभाननक्तते सिपाहीहरूलाई किप्किन्धाकाण्ड सुनाएको - वाण्‌ बज्य्रो जव ।दृश्य पढसन्दर्भ :- रामायण किस्किन्ध्याकाण्ड गायन स्थान :- जडलवि.स. :- १९११ अवधि :- १ मिनेट १८ सेकेण्ड&lt;br /&gt;
बालीलाई रामचन्द्रको वाण लागेपछि बालीले रामचन्द्रलाई भनेका श्तोकहरु सिपाहीलेकल्पनामा सम्रेको ।&lt;br /&gt;
दृश्य द्‌सन्दर्भ :- रामायण सुन्दरकाण्ड लेखन स्थान :- कान्तिप्रविस :- १९११ अवधि :- १ मिनेट २१ सेकेण्डभानभक्तसग सिपाहीले सृन्दर काण्डका तछुँ क्षार समृद भन्ने प्रसङ् सारिदिने अनुरोधगरको ।&lt;br /&gt;
रष्र आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
दृश्य ८६&lt;br /&gt;
सन्दभ॑ :- रामायण सुन्दरकाण्ड गापन स्थान :- कान्तिपुरबि.सं. :- १९११ अवधि :- १ मिनेट २२ सेकेण्डदुडु सिपाहीले सुन्दरकाण्ड पालैपालो गाएको ।दृश्य प७सन्वभ॑ :- &#039;चालीस्‌ बर्ष भयौँ कबिता स्थान :- कान्तिप्रवि.सं :- १९११ अवधि :- १ मिनैट द सैकेण्ड&lt;br /&gt;
छवाराको ब्तवन्ध गर्ने नपाएको कारणले विरक्तिएका भानुभक्तलाई सिपाहीले बिन्तीपत्रलेन सल्लाह दिएको र भानुभक्तले कृष्णवहादरलाई चालिस्‌ वर्ष भ्रया कवितामै बिन्तीपत्रलेखेको ।दृश्य ददसन्दर्भ :- चालीस्‌ वर्ष भयौँ&amp;quot; कविता स्थात :- कान्तिपुरविसं. :- १९११ अर्व :- २ मिनेट ४ सेकेण्डज कृष्पाबहादुरले कविता पढ्दै छोराको व्रतबन्धरका लागि भानुभक्तलाई थुनाबाट मक्तगर्ने आदेश दिएको ।दृश्य द९सन्दर्भ :- मुखारी स्थान :- कान्तिपुरवि.सं. :- १९११ अवश्चि :- ३६ सेकेण्डकृष्णवहादरको मुखारीको वेला प॒शाशिनायले हर हर गड्ड भनेको र भानुभक्त हाजिरभएको कुरा घमंदत्तले जाहेर गरेको ।दृश्य ९०सन्दर्भ :- भाषा विवाद स्थान :- कान्तिपुरवि.सं ;- १९११ अवधि :- ६ मिनेट ४७ सेकेण्डभानुभक्त धर्मदत्तसंगै भरेड्‌ उक्लेर वैठकमा गएको, प शशीनाथ र भानुभक्त बीचकोसस्कृत र नेपाली भाषा सम्वन्धी विवाद सुनेर कृष्णवहादुरले भानुभक्तको पक्ष लिएको ।दृश्य ९१सन्दर्भ :- खुकुरीको कविता स्थान :-कान्तिपुरवि.सं :- १९११ अर्व :- १ मिनेट २५ सेकेण्डकलचक्रकेशरी कहाँ खुक्री देखैपछि- विद्वान्‌ जनले कवितामा खुकरी मागेर भानुभक्तलेखुकरी प्राप्त गरेकोदृश्य ९२सन्दभ॑ :- &#039;शरिर छ अतिकच्चा&#039; कविता स्थान :- कान्तिपुरबिसं. :- १९१२ अवधि ;- १ मिनेट ५७ सेकेण्डरम्घावाट भानुभक्तले शरिर छ अति कच्चा कवितामै कृ्‌ष्णवहादरलाई जाहरी पठाएको ।&lt;br /&gt;
परिशिष्ट २६३&lt;br /&gt;
दृश्य ९३सन्दर्भ :- भक्तमाला स्थान :- रम्घा &#039; चुँदीबेसीविसं. :- १९१२ अबधि :- डं मिनेट ४३ सेकेण्डभानभक्तले चौतरामा बसी भक्तमाला लेखिसिध्याएपछि इन्द्रविलासले चौतारीमा, दाइंमार प्॒जाकोठामा भक्तमालाको पाठ गरेको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ६४सन्दभ॑ :- भक्तमाला स्थान :- चेँदी बेसीविसं. :- १९१२ अबधि :- ३२ सेकेण्डबिहान-बेलुकी पाठ गर्न आफूनो अनुरोधमा भानुभक्तले भक्तमाला लेखिदिएको कुराडुन्द्रविलासले गाउँलेहरूलाई भनेको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ९५सन्दश्र :- रामायण युद्धकाण्ड च्यान :- रम्घाबि.सं. :- १९१६ अवधि :- ३६ सेकेण्डभानुभक्तले चौतारीमा बली रामायण युद्धकाण्ड लेखिरहेको - भन्छन्‌ श्री रघुनाथ्‌.... ।&lt;br /&gt;
दृश्य ९६&lt;br /&gt;
सन्दर्भ :- रामायण पुद्धकाण्ड स्यान :- रम्घा&lt;br /&gt;
बि.सं. :- १९१७ अवधि :- १ मिनेट २७ सेकेण्ड&lt;br /&gt;
भानुभक्तते युद्दकाण्ड लेखिसिध्याएर चन्द्रकलालाई सुनाएको- शम्भूले सब वैद...।दृश्य ९७&lt;br /&gt;
सन्दर्भ :- रामकीर्तन र उत्तरकाण्ड स्थान :- चेँदी बेसी&lt;br /&gt;
वि.सं. :- १९१८ अबधि :- १ मिनेट २२ सेकेण्ड&lt;br /&gt;
रामकीर्तन चलिरहेका ठाउँमा भानुभक्तले उत्तरकाण्ड सुनाएको - शम्भृका मुख देखि...दृश्य ९८&lt;br /&gt;
सन्दर्भ :- रामायण उत्तरकाण्ड स्थान :- चुँदी बेसी&lt;br /&gt;
विसं. :- १९१९. अर्वाचि :- १ मिनेट १७ सेकेण्ड&lt;br /&gt;
बानभक्तले काठमाण्डौबाट चिठी पठाएर छोरा रमानाथलाई उत्तर काण्ड लेख्दैगरेको रलेड्न सकिएपछि रम्घा आउने कुरा भनेको ।दृश्य ९९सन्दर्भ :- तारापति स्थान :- तारापतिको घरविस. :- १९१९ अवधि :- २२ सेकेण्डतारापति र भानुभक्तबीचको कुराकानी ।&lt;br /&gt;
रक्ष आदिकवि भानुभत्क&lt;br /&gt;
दृश्य १००सन्दर्भ :- सास बहारीको कुगडा स्थान :- तारापतिको घरबि.सं. :- १९१९ अवधि :- इड सेकेण्डतारापतिको आंगनमा सास्‌-बुहारी जुठाभाडा मारुने विषयलाई लिएर सुगडागरिरहेको ।&lt;br /&gt;
दृश्य १०१सन्दभ॑ :- सास्‌-बृहारीको रुगडा स्थान :- तारापतिको घर्‌बि.स. :- १९१९ अर्व :- २३ सेकेण्डनिदाउन नागेका भानभक्त भांडा ठुटाएको आवाजले तसिएको ।&#039; दृश्य १०२सन्दर्भ :- सास्‌-बृहारीको कगडा स्थान :- तारापतिको आँगनवि.सं. :- १९१९ अवधि :- १२ सेकेण्डसास्‌-बुहारीको झगडा चलिरहेको ।दृश्य १०३सन्दर्भ :- बधुशिक्षा लेखन स्थान :- तारापतिको घरवि.सं. :- १९१९ अबधि :- १ मिनेट ३४ सेकेण्डसास्‌-बुहारीको झगडा सुनेर भानुले रुयात खौतेर हेरी वर्धाशक्षा लेठन चालेको ।दृश्य १०४सन्दभ॑ :- बधशिक्षा स्थान :- तारापतिको घर-आँगनवि.स. ;- १९१९ अबधि :- २ मिनेट ४३ सेकेण्ड&lt;br /&gt;
आफूले लेखेको वधृशिक्षाको भूमिका-कविता एक्‌ योक्‌ भन्छु- भोलिपल्ट विहानतारापतिका जहानलाई सुनाएर उक्त लेखोट तारापतिलाई दिइ भानु वाटो लागेको ।दृश्य १०५सन्दर्भ :- बराहा कुलो स्थान :- चुँदी बेसीबि.सं. :- १९२१ अर्वाध :- १ मिनेट ४४ सेकेण्डभानुभक्तको अध्यक्षतामा बाराहाका मौहीहरूको बैठक बेसी बाँध सारेर नयाँ कुलो काटीपानी चलाउनै निणँय गरैको ।दृश्य १०६सन्दर्भ :- बराहा कलो स्थान :- चुँदी फाँटबि.सं. :- १९२१ अवधि :- ५६ सेकेण्डबराहाका मौटीहरू मिलेर कुलो काटी पानी चलाएको ।&lt;br /&gt;
परिशिष्ट २६५&lt;br /&gt;
दृश्य १०७सन्दभ॑ :- बराहा कलोको मृद्टा स्थान :- रम्घाबि.सं. :- १९२२ अबधि :- १ मिनेट ७ सेकेण्डगिरिधारी भाटले दिएको उजुरी र भानुभक्तले दिएको प्रतिवादीपछि ताकबाट दौडाहाआएकोले वराहाका माहीहरूलाई हाँजर हुन खवर गरको ।&lt;br /&gt;
दृश्य १०८सन्दर्भ :- बराहा कतोको मट्टा स्थान :- चैँदी फाँटबि.स. :- १९२२ अबधि :- २ मिनेट १० सेकेण्डवार्कुबाट आएको दौडाहासाम्‌ भानुभक्त र गिरिधारीने आ-आफ्नो जिरह प्रस्तुन गरैको ।दृश्य १०९सन्दर्भ ;- बराहाकलोको मृट्टा स्यान :- चैँदी फाँटबि.सं. :- १९२२ अबधि :- १७ सेकेण्डदौडाहाका हाकिमले विवादास्पद कलो र खेतका निरीक्षण गरेको ।दृश्य ११०सन्दर्भ :- बराहा कलोको मृद्दा स्थान :- चेँदी फाँटविसं. :- १९२२ अर्वाध :- ३९ सेकेण्डदौडाहाका हाकिमले भानभक्तको पक्षमा फैसला गरेको ।दृश्य १११सन्दर्भ :- बराहा कुलोको महा स्थान :- रम्घाविस. :- १९२४ अबधि :- ४५ सैकेण्ड&lt;br /&gt;
गिरीधारीले कान्तिपुर अदालतमा प॒नरावेदन दिएको र भानुभक्तले वराहाका मोहीहरुकोतर्फबाट तारिख खेपिरहेको चचां गाउँलेहरुले गरको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ११२सन्दर्भ :- अड्डाले झूलाएको म्यान :- कान्तिपुरबि.सं. :- १९२४ अवधि :- १ मिनेट १६ सेकेण्डभानुभक्तलाई नेपाल भ्रदालतले भोलि, भोलि भनेर रुलाएको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ११३सन्दभ॑ :- &#039;बिन्ती डिट्ठा विचारी&#039; कविता स्थान :- कान्तिपुरविसं :- १९२४ अवधि :- १ मिनेट ४ सेकेण्डन्यायाधीश विष्गुप्रसाद गुरुघरानालाई भानुभक्तले बिन्ती डिट्ठा बिचारी काबतामैउजरी गरेको र न्यापाधीशतै पनि मुद्दा भौलि छिन्नै क्रा भनेको ।&lt;br /&gt;
२६६ आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
दृश्य ११४तन्दर्थ :- रामगीता तेछन अनुरोध स्थान :- कान्तिप्रवि.सं. :- १९२४ अवधि :- ४१ सेकेण्डगिरिधारी आटसंगको मृट्टा जितेर्पाछ भानुभक्तले धमंदत्तलाई भद्दा रामगीता लेख्नअनुरोध गरेको ।&lt;br /&gt;
दृश्य ११५सन्दर्भ :- अन्त्यावस्था स्थान :- रम्घाबि.सं. :- १९२५ अवधि :- १ मिनेट ४७ सेकेण्डडुन्द्रविलास, रमानाथ, चन्द्रकला र वैद्य वीच आनुभक्तको स्वास्थ-स्थिति र उपचारवारैकराकानी ।&lt;br /&gt;
दृश्य ११६सन्दभ॑ :- अन्त्यावस्था स्यान :- रम्घावि.सं. :- १९२५ अवधि :- २३ सेकेण्डगाउँलेहरु भानभक्त गम्भीर विरामी भएको चरचां गर्दै भानुकहा जान लागेकोदृश्य ११७सन्दभ॑ -- रामगीता लेखन स्थान :- रम्घाबिस. :- १९२५ अर्वाध :- २ मिनेट ५ सेकेण्ड&lt;br /&gt;
भानुभक्तले मत्यशैयप्यामा छौरा रमानाधलाई रामगीता लैखाइरहेको -श्रद्धाभक्तिरहोस्‌ ।&lt;br /&gt;
दृश्य ११८सन्द्भ॑ :- डोलाको तयारी स्यान !- रम्घाबि.सं :- १९२५ अवधि :- १० सेकेण्डगाउँलेहरुले भानुभक्तलाई जलाश्वाय लान डोाला तयार गरिरहेको ।दृश्य ११९सन्दर्भ :- रामगीता समाप्ति ख्यान :- रम्घावि.सं :- १९२५ अवधि :- ३ मिनेट ८ सेकेण्डभानुभक्तले छोरा रमानाथलाई लेन लगाएर रामगीता सिध्याएको ।दृश्य १२०सन्दर्भ :- देहावसान स्थान :- सतिघाटवि.सं. ;- १९२५ अवधि :- २ मिनेट ५ सेकेण्ड&lt;br /&gt;
भानुभक्तलाई सतिघाट लगेको देखी बद्ध गाउँलेले श्रद्धापूर्वक ढोगेको, भानुभक्तलाईजलाश्चायमा राखिएको र दाह्न सस्कार गरिएको ।&lt;br /&gt;
समाप्त&lt;br /&gt;
परिशिष्ट २६७&lt;br /&gt;
परिशिष्ट-३&lt;br /&gt;
पूर्व स्वाराड्रन गरिएका गीत : कबिता&lt;br /&gt;
गीत कविताको बोल लेख्चक :सन्दभ॑ गापक दृश्य अवधि/मिनेटमा)स्वस्ति खीपत भानुभक्त मोतीराम दीपक खरेल प्राक्वय १मरस्वती मया दृप्टा सरस्वती बन्दना रुपकमल क्षेत्री १ |पा देवी सबंभूतेपु दुर्गा सप्तशती समूह स्वर ॥ नैमबंमहा वमुमती अमर कोष ज्पकमल क्षेत्री ७ १६या कुन्दैन्दु तुषार सरस्वती वन्दना श्पकमत क्षेत्री ८ श्र्डकाली केली कलांखु लोक पद्य रूपकमत क्षेती १० ||हो मुरारे लोक पद्य रूपकमल क्षेती ११ रेकेश्‌ कञ्चेट कहुन्‌ भानुभक्त शिशिर पौडेल १२ श्रनत्वा सरस्वती दैवी लधघुसिद्दान्तकोमुदी रुपकमल &amp;amp;ेत्री १३ पृजआघि लागिन्‌ भमरी मागल लोचन सपनाधी १४ कुरबाउँ काघ उपर्‌ विद्यारण्य केशरी समूह स्वर १४ ३३बाजा ताल मृदड् बसन्द्र शमा शिशिर पौडेत १४ ३मास्‌ भट्टी बेल दूवो भानुभक्त रुूपकमन क्षेत्री १८ 000यो छोरो पढ्ला लोक पद्य रूपकमल क्षेत्री १९ १३हरि ३» गणनान्त्वा शुक्लयजुर्वेद शिाँशर पौडेत २२ खेनम: शम्भवायच शुक्लयजुवैंद शिशिर पौडेल २२ ड्सञ्चारिणी दीप रधुवश मुदेश शर्मा रङ 0]अय पज्ञानामधिप रघवश शिशिर पोइल २५ नसति शालीवाहन्‌का भानुभक्त शिशिर पौडेल ३० १.३७भात खाने तसला लोक पद्य रूपकमल क्षेत्री ३१ ॥)।मानउकौ सरि गाउँ भानुभक्त शिशिर पौडेल ३२ ३७काद्‌ भन्छु जति बालकृष्ण सम सुपकमल क्षेत्री ३३ रेहै नानी तिमी ता बालकृष्ण सम श्पकमल क्षेत्री ३३ स्पाहाड्को अतिवैश देश्‌ भानुभक्त रामकृष्ण ३ ४०अपार समार समुद्रमध्ये शकङ्काराचायं चन्द्रराज ४२/४३ २अपार ससार समद्रमाहाँ मानमक्त रामकृणा 0 ५२४सच्चिदातन्द छूपाय श्रीमद्भागवत रामकृणा ६ १५निगमकल्पतरोर्‌ श्रीमद्भागवत रामकृष्ण 0 र्‌भक्ति युतौ तौ श्रीमद्भागवत रामकृष्ण र अल ४७ डडबज त बेस बन्यो डान्दरिस रामकृष्ण र अर ४९ डर&lt;br /&gt;
२६८ आदिकबि भानुभक्त&lt;br /&gt;
जनिकम्पअसल मुग्ने केराअपार ससार समद्रमाहाँ&lt;br /&gt;
भरजन्म घांमतिरकदाचिन्तारदोयोगीएक दिन्‌ नारदसीताराम्‌ आधिगजांधर सोतीकीयति दिन पछि मैलेआयाध्याँ मनका कुराचपला अबलाहरूगयो खान्या बेला&lt;br /&gt;
हे लोक्‌ हो रघुनाथकारोज्‌ रोज्‌ दशंन&lt;br /&gt;
वाण्‌ वज्य्रो जव&lt;br /&gt;
तछ्नू क्षार र समुद्र&lt;br /&gt;
चालीस बर्ष भयाँविद्वान्‌ जनले&lt;br /&gt;
शरिर छु अति कच्चाप्रतिज्ञा मैले योभन्छन्‌ श्री रघुनाय्‌शम्भूते सब बेद&lt;br /&gt;
हरे राम हेर रामशम्भूका मुखदेखिएक योक्‌ भन्छुबिन्ती डिठ्टा बिचारीश्वद्वाभक्ति रहोस्‌रामायण्‌ छ आगम्‌&lt;br /&gt;
परिशिष्ट&lt;br /&gt;
वातभानुभक्तभानुभक्त&lt;br /&gt;
भानुभक्तअध्यात्मरामायणभानुभक्तभानुभक्तभानुभक्तभानुभक्तभानुभक्तभानुभक्तभानुभक्तभानुभक्तभानुभक्तभानुभक्तभानुभक्त&lt;br /&gt;
भानुभक्तभानुभक्तभानुभक्तभानुभक्तभानुभक्तभानुभक्तभजन&lt;br /&gt;
भानुभक्तभानुभक्तभानुभक्तभानुभक्तअज्ञात&lt;br /&gt;
रामकृष्ण र अरुरामकृष्णदीपक खरेलरामकृष्णरामकृणारामकृष्णरामकृष्णरामकृष्णरुपकमल र अरूदीपक खरेलरामकृष्णरामकृष्णरामकृष्णरामकृष्णमदेश शर्माराम्रकृष्णकुमार बस्नेत,भीम लामारामकृष्णरामकृष्णरामकृष्णदीपक खरेलरामकृष्णरामकृष्णसमूह स्वररामकृष्णरामकृष्णरामकृष्णसुदेश शर्मासमूह स्वर&lt;br /&gt;
१२षक१४&lt;br /&gt;
101&lt;br /&gt;
६० ६१&lt;br /&gt;
प्दै/ पद&lt;br /&gt;
दु. दद११001१३00९६९७&lt;br /&gt;
ष्ट१&lt;br /&gt;
१०४११३११७०&lt;br /&gt;
१२०&lt;br /&gt;
४,४७७ड्ड&lt;br /&gt;
कसैन्री१.२९नद१.३६१.३३0२.४६-डदेनजतह१.४६१२२&lt;br /&gt;
१.१२५२६१.३&lt;br /&gt;
डडड&lt;br /&gt;
२वृतर&lt;br /&gt;
१.२२&lt;br /&gt;
२६९&lt;br /&gt;
परिशिष्ट-४&lt;br /&gt;
रिल, दृश्य र अवधि&lt;br /&gt;
रिलन दृश्यन अवधि (मिनेटमा)प्‌ धन्यवाद, प्रस्तावना, श्रेयसूचि, दृश्य न. १.२ ड, २९२ दृश्य न. ३-११ १०.३५३ दृश्य न. १२-१९ १०६॥ दृश्य न २०८ १०.२८५ दृश्य न. २१-३३ दश17 दृश्य त ३४-४१ १०.२८॥.) दृश्य न्‌ ४२-५० ९.१६द् दृश्य न. ५१-५५ ९.९&amp;amp;१ दृश्य न. ५६-६१ १०.२४१० दृश्य न. ६२-६६ १०.३११ दृश्य न ६७-७१५ १२१२ दश्य न्‌ उद्नप२ १० २३१३. द््श्य न ३०८९ ८२८१ दढ्श्य न. ९०-९२ १०.९१४ दृश्य न, ९२-९७ ५.४११६ दृश्य न. ९६५-१०७ १०.५२१७ दृश्य न. १०६८-११७ ११.७१८ दृश्य न. १८०१२० ५.२३कुल दृश्य १२० २ घण्टा ५२ मिनेट २४ सेकेण्ड२७० आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
परिशिष्ट-५&lt;br /&gt;
चलचित्र निर्माणसँग सम्बन्धित समितिहरू(क) भान जन्मस्थल व्रिकास समितिअध्यक्ष- रामचन्् शर्मा पौडेलमनोनित सदस्य- ड्ञा. वासुदेब त्रिपाठीमनोनित सबस्य- डा बतराज आचार्यमनोनित सदस्य- तक्ष्मी आचार्यपदेन सदस्य&amp;quot; सासद, शत्र न. १, तनहुपढेन सदस्य- सभापति जितिय, तनहुँपदेन सदस्य- प्रजिअ, तनहुँपदेन सदस्य- मालपौत प्रमुख, तनहुपदेन सदस्थ- प्रतिनिधि, युवा खेलकद तथा सस्कृति मन्चालयपदेन सदत्य- अध्यक्ष, भानु गाविस, तनहुँपदेन सदस्य- अध्यक्ष, बरमञ्ज्याड गाविस, तनहुँपदेन सदस्य- अध्यक्ष, तनहँतुर गाविस तनर्हसदस्यसचिब- शम्पा उपाध्याय&lt;br /&gt;
(ख) आदिकवि भानुभक्त चलचित्र निर्माण समितिसयोजक- कमन उीक्षितसदस्य- रामचन्द्र शमा पौडेलसबत्य- डा. बासृदेव त्रिपाठीसदस्य- यादब खरेलसदस्य- प्रा. रमा शमाँसदस्य- दैबजराज न्यौपानेसबदस्य- घटराज भट्टराइसदत्य- दगामिक्त ढकालसदस्य- बैरागी काईलातदत्य- डा. क्रतराज आचार्यसदस्य- नरेन्त्रराज प्रसाईसदस्प- डा रामदयाल राकेशसदस्प- प्रतिनिधि, युबा खेलक्दै वथा सस्कृति मन्त्रालयसदत्य- प्रतिनिधि, जिल्ला प्रशासन कार्यालय, काठमाण्डौसदस्य- प्रतिनिधि, जिल्ला प्रशासन कार्यालय, तनहुँसदस्य सचिव- शम्पा उपाम्यायकायालय सचिव- प्रमोदराज हकाल&lt;br /&gt;
[ग) अन्वेषण समितिकमल दीक्षित, डा. वासुदेव त्रिपाठी, डा व्रतराज आचार्य, रामचन्द्र शर्मा पौडेल, यादव खरेल&lt;br /&gt;
पा िििििलललिलिलिललििलििजजजिजजजििजिजजजजजजजजजिजजजजजजजजिजिजजिजजजजजििजिि&lt;br /&gt;
परिशिष्ट र्‌&lt;br /&gt;
परिशिष्ट-६&lt;br /&gt;
प्राविधिकहरू&lt;br /&gt;
लेखन तया निर्देशन- यादव खरेल&lt;br /&gt;
निम्रांण नियन्त्रक- गोपालप्रसाद शर्मा&lt;br /&gt;
तत्य- बसन्तजड् रायमाजी, वसन्त श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
सङ्गीत- चन्द्रराज शमा&lt;br /&gt;
मुख्यसहायक निर्देशक - प्रदीप श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
छायाड्रन- रामशाइर प्रधान&lt;br /&gt;
प्रकाश- नरेन्द्र प्रधान&lt;br /&gt;
सैट निर्माण- गोपाल भटानी&lt;br /&gt;
भेषभषषा सल्लाहकार - प्रचण्ड मल्ल&lt;br /&gt;
भेषभषा- कप्ण लामा&lt;br /&gt;
धड्डार- अशोक रोक्का&lt;br /&gt;
केश श्रृङ्ार- पार्वती पौडेल&lt;br /&gt;
सम्पादन- नरेन्द्र खडका&lt;br /&gt;
सह-सम्पादन- अनील गौतम&lt;br /&gt;
ध्वनि- पुष्कर लामिछाने, थ्रुव थापा&lt;br /&gt;
पुनः स्वराड्रन- किरण बसी&lt;br /&gt;
ध्वनि संमिश्चण- श्याम नेपालीसहाधकहरू&lt;br /&gt;
सहादक निर्देशक: ओमप्रकाश निरौला&lt;br /&gt;
व्यवस्थापन सहायक; राजनविक्रम वापा&lt;br /&gt;
व्यवस्थापन सहायक: आँम्चकाप्रसाद भट्टराई&lt;br /&gt;
ब्यवस्थापन सहायक: कष्णहरि पन्त&lt;br /&gt;
व्यवस्थापन सहायक: कप्णराज रेग्मी&lt;br /&gt;
व्यवस्थापन सहायक: मेघनाथ पौडेल&lt;br /&gt;
छायाडुन सहायक: सहदेव पौडेल&lt;br /&gt;
भेषभुषा सहायक: भाजवहादुर लामा&lt;br /&gt;
भ्ड्डार सहापक: लक्ष्मण रोक्का&lt;br /&gt;
पुनः स्वराइन: श्यामक श्रेष्ठ, सहद्‌ चौधरी&lt;br /&gt;
२७२&lt;br /&gt;
प्रकाश सहयोगी :गणश श्रेष्ठ, सञ्जप लामारामलाल श्रेष्ठ, शपराज सुवेदीमुकन्द सुवेदी, राजु कार्की&lt;br /&gt;
भान्छाः&lt;br /&gt;
श्रतबहादुर श्रेष्ठ ।प्रमख।नानीकान्छा के.सी., गोविन्द भण्डारीशप्पाम थेप्ठ, ससेर लामा, बलराम श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
प्रयोगशाला, उपकरण तथा प्रशोधननेपाल चलचित्र विकास क.लि&lt;br /&gt;
गीत रेकर्डिँडःम्पजिक नेपालसिम्फोनिक:क्ष्यासेट तया ती डीमास्टर रेर्क्डिँडकम्प्युटर णाफिक्सजीवेश योञ्जनलिपि उतारप्रकाश बाबु निरौलागोपाल रिजाल&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त&lt;br /&gt;
परिशिष्ट-७&lt;br /&gt;
आधार गन्थहरू&lt;br /&gt;
मोतीराम भट्ट:कवि आनुभक्तको जीवन-चरिव बि.स. १९४८, काशी&#039;&lt;br /&gt;
सर्यंविक्रम ज्ञवाली (सं):भानुभक्त स्मारक गन्य (वि स १९९५ दार्जीलिङ,&lt;br /&gt;
विष्णुमाया:भानुभक्त मणिमाला ।विस् १९९८, काठमाण्डौ&lt;br /&gt;
बाबराम आचार्य:पुराता कवि र कविता ।वि स. २००३, काठमाण्डौ!&lt;br /&gt;
भक्त भानुभक्त:बालकृष्ण सम (विस. २००३ काठमाण्डौ!&lt;br /&gt;
नरनाथ आचार्य:आदिकवि भानुभक्त आचार्यको सच्चा जीवन-चरिव&lt;br /&gt;
(विसं. २०१५ २०३७ काठमाण्डौं।&lt;br /&gt;
जुननाथ शर्मा पण्डित (सं):भानुका लघु कृति बिस. २०२३ काठमाण्डौं।&lt;br /&gt;
मुक्तिनाथ आचार्य;आदिकवि मातुभत्त आचार्यको खोजपूर्ण जीबनी (बि.सं. २०४२)&lt;br /&gt;
काशीनाथ तमोट, हरिहर भट्टराई, डा. ब्रतराज आचार्य आदिका लेख-रचनाहरू&lt;br /&gt;
परिशिष्ट २७३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
-नासो- आदिकवि मानुमक्त&lt;br /&gt;
आदिकवि भानुभक्त नेपालका ती हाष्ट्रिय विभ्ूतिकोकथा डो, नसले आधुनिक नेपाली साहित्यको नग बसाले ।&lt;br /&gt;
नेपाली भाषाको समुन्नति र मदिना अहँ भूमिकासमयमा पक्षमा आन्दोलनको ग्रङ्खबादगरेका थिए ।&lt;br /&gt;
बाड्लि, चौबीलेलगायत क दलित -दाकुरे हान्यड्रुमा&lt;br /&gt;
विभागित नेपाललाई पृथ्वीबाटायणशाहले चाए वर्ण छत्तीश नातको गुउटा यल यता टीकोरूपमा एकीकरण गरे भने आद्किवि भआषिक,&lt;br /&gt;
थक ह हांह्कृतिक रूपमा एक कूत्रमा बाँध्ने काम।&lt;br /&gt;
समष्ठिमा हु॥:4४ नेपालका मात्र नभगुर सम्पूर्ण&lt;br /&gt;
नेपालीका नातीय कावि हुन्‌ ।माग्छ सेप्क&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=Main_Page&amp;diff=65</id>
		<title>Main Page</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=Main_Page&amp;diff=65"/>
		<updated>2024-06-09T12:34:25Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: /* Step 2: Title and heading corrections */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;strong&amp;gt;Welcome to Nepali Kitab Editing Team.&amp;lt;/strong&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
This website is a sub-website of nepalikitab.org. Here we convert old books into Unicode text format. It is a collective effort by volunteers around the world. If you are also interested, please join the team.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
We keep here the books generated after scanning and extracting texts with OCR. It contains many errors. Our goal is to remove the errors.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==How to edit==&lt;br /&gt;
[[File:Editor-timeline.png|thumb]]&lt;br /&gt;
1. Make an account or log in.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2. Select the book of your interest.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. Click edit&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
4. Edit and clean up the errors and book format. If you are familiar with wiki syntax, you can edit the source too.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
5. Save time to time while editing&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
For details about formatting text, refer to: https://www.mediawiki.org/wiki/Help:Formatting&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 1:  Scan and OCR ==&lt;br /&gt;
*[[रामायण]] भानुभक्त आचार्य&lt;br /&gt;
* [[उन्माद]] ललिता_दोषी&lt;br /&gt;
* [[घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे]] भूपी_शेरचन&lt;br /&gt;
* [[लेखनाथका प्रमुख कविता]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[गलबन्दी (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[नोकरी (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[९७ साल]] आनन्ददेव भट्ट&lt;br /&gt;
* [[तरुण तपसी (नव्यकाव्य)]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[नेपालको नक्सा (राजनीतिक तथा प्रशासनिक)]] नेपाल सरकार&lt;br /&gt;
* [[आदिकवि भानुभक्त (पटकथा)]] यादब खरेल&lt;br /&gt;
* [[इतिश्री (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[स्वाध्ययन सामग्रीः घरमा नै गर्न सकिने सिकाइ क्रियाकलापहरू (कक्षा ५)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[रूखको रूप]] रिन्छेन्ला लामा&lt;br /&gt;
* [[केही धार्मिक तथा साँस्कृतिक सम्पदाहरू (केही नमुना कलाकृतिहरू)]] सत्यमोहन जोशी&lt;br /&gt;
* [[रमाइला गाउँखाने कथा]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[दसैँ, पिङ र हात्ती (बालकथा-सङ्ग्रह)]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[८० दिनमा विश्‍व भ्रमण]] जुल्स वर्न,गोरखबहादुर सिंह&lt;br /&gt;
* [[बालभाका - १ (बालकविता सङ्ग्रह)]] उद्धवप्रसाद प्याकुरेल&lt;br /&gt;
* [[ताल (उपन्यास)]] यासुनारी कावाबाता&lt;br /&gt;
* [[चतुरेको चर्तिकला (कथा सङ्ग्रह)]] गोरखबहादुर सिंह&lt;br /&gt;
* [[ठूलो फुल (A Big Egg)]] Roma Pradhan, Shanta Das Manandhar&lt;br /&gt;
* [[आखिरमा टोम्मीको टोलीले जिती छाड्यो]] क्रिस्टिन स्टोन,शान्तदास मानन्धर&lt;br /&gt;
* [[शिक्षक निर्देशिका मेरो सामाजिक अध्ययन तथा सिर्जनात्मक कला कक्षा ५ (पुरानो संस्करण)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[जय भुँडी (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[मुकुन्द इन्दिरा (नाटक)]] बालकृष्ण सम&lt;br /&gt;
* [[खाल्डामा परेको भकुन्डो]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[जे छोए पनि सुन]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[खानामा पाइने पोषणहरू]] नताशा भिजकारा&lt;br /&gt;
* [[अन्तिम निम्तो]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[सूगवा]] रोशनी चौधरी&lt;br /&gt;
* [[भीमसेन थापा (ऐतिहासिक खण्डकाव्य)]] सिद्धिचरण श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[ऋतुविचार (खण्‍डकाव्य)]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[अनिवार्य नेपाली (१०६) - माध्यमिक शिक्षा परिक्षाको प्रश्न तथा उत्तरकुञ्जिका २०७४]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[छन्दका १०१ कविता]] (सङ्कलन) कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[गणित प्राविधिक शब्दकोश]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[उज्यालोको खोजीमा (उपन्यास)]] हरिहर खनाल&lt;br /&gt;
* [[सपनाको देशमा]] चन्द्रकान्त आचार्य&lt;br /&gt;
* [[महिला लक्षित शिक्षक सेवा आयोग तयारी अध्ययन सामग्री]] विष्णुप्रसाद अधिकारी&lt;br /&gt;
* [[शिक्षक पेसागत विकास तालिम (तालिम पाठ्यक्रम)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[हाम्रा लोकबाजाहरू (बालबोध - ५१)]] रामप्रसाद कँडेल&lt;br /&gt;
* [[पर्दा, समय र मान्छेहरू (कथासङ्‍ग्रह)]] झमक घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[काउकुती (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[विदुर नीति Vidura Niti [Sanskrit-English]]] (Extracted From) Mahabharata [महाभारत]&lt;br /&gt;
* [[जंगबहादुरको बेलाइती कापी]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[कति वटा रोटी]] शिल्पी प्रधान&lt;br /&gt;
* [[विश्वका प्रमुख सभ्यता तथा संस्कृति (बाल ज्ञानकोश - ३)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अस्माकम् संस्कृतम् - कक्षा १]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[प्रारम्भिक संस्कृत व्याकरण र रचना]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[गोरक्ष-साह-वंश (ऐतिहासिकं महाकाव्यम्)]] हरिप्रसाद शर्मा&lt;br /&gt;
* [[२०२ ओटा ठट्टा]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[धुमधामको घुमघाम (भक्तप्रसाद भ्यागुताको नेपालयात्रा)]] कनकमणि दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[महिलाका लागि डाक्टर नभएमा]] -&lt;br /&gt;
* [[दस औतार (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[A Perfect Match]] Ramendra Kumar&lt;br /&gt;
* [[मधुपर्क (वर्ष ४७, अंक ४, २०७१ भदौ)]] -&lt;br /&gt;
* [[सौगात (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[एक घर एक रोजगार (प्रयागदत्त तेवारीको कृषिकथा)]] मिलन बगाले&lt;br /&gt;
* [[रवीन्द्रनाथका नाटकहरू]] -&lt;br /&gt;
* [[पेसा, व्यवसाय र प्रविधि]] -&lt;br /&gt;
* [[मामा माइजु]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[म को हुँ]] पेमा डोल्मा लामा&lt;br /&gt;
* [[चनाचटपटे (बालकविता-सङ्ग्रह)]] बूँद राना&lt;br /&gt;
* [[आवाज (सामाजिक उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[स्पष्टीकरण (कथासङ्ग्रह)]] हरिभक्त कटुवाल&lt;br /&gt;
* [[स्वास्थ्य, जनसङ्ख्या तथा वातावरण शिक्षा स्वाध्ययन सामग्री (२०६७)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[दशैँको दक्षिणा (बालउपन्यास)]] गङ्गा पौडेल&lt;br /&gt;
* [[चार आर्य-सत्य (बुद्ध-शिक्षाका चार स्तम्भ)]] दोलेन्द्ररत्न शाक्य&lt;br /&gt;
* [[विजय चालिसेका बालकथाहरू]] विजय चालिसे&lt;br /&gt;
* [[सिर्जनशील विद्यालय]] अर्जुन श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[अभिभावकको सहयोगमा बालबालिकालाई घरमा नै गराउन सकिने सिकाइ क्रियाकलापहरू (कक्षा १)]] -&lt;br /&gt;
* [[दर्शन परिचय (विश्वका दर्शन र कला साहित्यिक बादहरू)]] परशुराम कोइराला&lt;br /&gt;
* [[खोज (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[अनिवार्य सामाजिक अध्ययन (१२३) - माध्यमिक शिक्षा परिक्षाको प्रश्न तथा उत्तरकुञ्जिका २०७५]] -&lt;br /&gt;
* [[बिहानीको घामसँग]] तारा पुन, शान्तदास मानन्धर&lt;br /&gt;
* [[एकादेशमा (बालकथाहरूको सँगालो)]] उषा दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[इतिहासका विम्बहरू]] पूर्णचन्द्र घिमिरे, रमेशचन्द्र घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[पन्ध्रौं योजना (२०७६७७-२०८०८१)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[नेपालको शाह तथा राणा वंशावली]] विष्णु प्रसाद श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[Aaloo-Maaloo-Kaaloo]] Vinita Krishna&lt;br /&gt;
* [[परित्याग (उपन्यास)]] माधव खनाल&lt;br /&gt;
* [[अमेरिका (उपन्यास)]] गंगा लिगल&lt;br /&gt;
* [[उखान मिलेन !]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[राष्ट्रकवि माधव घिमिरे (जीवनी, व्यक्तित्व र कृतित्वको सङ्‍क्षिप्त रेखाङ्‍कन)]] शैलेन्दुप्रकाश नेपाल&lt;br /&gt;
* [[केहि गुणकारी बोटबिरूवाहरू (बालबोध - ४१)]] डा. हरिप्रसाद&lt;br /&gt;
* [[दिवास्वप्न]] गिजुभाई, शरच्चन्द्र वस्ती&lt;br /&gt;
* [[संस्कृत, प्राकृत र नेपालीका सन्धिनियम]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[शिक्षाका ती दिन]] पुष्पराज पौडेल&lt;br /&gt;
* [[मपाईं (निबन्ध)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[Autobiography of a YOGI]] Paramhansa Yogananda&lt;br /&gt;
* [[ताराबाजी लै! लै!!]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[विश्वास (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[Akbar and Birbal Moral Stories]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[बुद्धवादका तीन आयाम]] पशुपति घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[करेसाबारीका जडिबुटीहरू]] केदार श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[काठमाडौं उपत्यका खुलास्थलहरू सम्बन्धी मानचित्र पुस्तक २०७१]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अन्ताक्षरी खेल]] ध्रुव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[साइबर बालकथा]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[कलेजी थाल]] ध्रुव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[कत्ति धुनु गधाहरूलाई (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] लक्ष्मण गाम्नागे&lt;br /&gt;
* [[गौरी (शोककाव्य)]] माधव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[आमाको माया]] रमेश चन्द्र अधिकारी&lt;br /&gt;
* [[Natural Treasures of Nepal]] Nepal Tourism Board&lt;br /&gt;
* [[नारीस्वर (महाकवि देवकोटा विशेष) - २०६६ असोज]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[चार गजलकारका उत्कृष्ट गजल (गजलसङ्ग्रह)]] मनु ब्राजाकी&lt;br /&gt;
* [[स्यालको जुक्ती]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[स्थानीय पाठ्यक्रम विकास तथा कार्यान्वयन मार्गदर्शन (मातृभाषा सहित) २०७६]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[बाँदर बन्ने रहर (बालकथा सङ्ग्रह)]] गोपीकृष्ण ढुङ्गाना&lt;br /&gt;
* [[डाढो (हास्यव्यङ्ग्यहरू)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[मध्यचन्द्रिका (नेपाली भाषाको मझौला व्याकरण)]] सोमनाथ शर्मा&lt;br /&gt;
* [[नेपाली क्रान्ति-कथा]] फणीश्वरनाथ रेणु&lt;br /&gt;
* [[डायना (महाकाव्य)]] शैलेन्दुप्रकाश नेपाल&lt;br /&gt;
* [[शङ्खे र फट्याङ्ग्रो]] अनन्तप्रसाद वाग्ले&lt;br /&gt;
* [[मोहिनीले खोसेको अमृतकलश]] अमर निराकार राई&lt;br /&gt;
* [[हिन्दू-धर्म के हो]] महात्मा गाँधी&lt;br /&gt;
* [[बालबालिकामा पढ्ने बानीको विकास]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[The Last Page of My Poem (मेरो कविताको अन्तिम पृष्ठ)]] Rajeshwor Karki&lt;br /&gt;
* [[जय भोलि !]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[संस्कृत व्याकरणको रूपरेखा]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[घरबारी बगैंचा]] बोल बहादुर थापा&lt;br /&gt;
* [[नबिर्सने यात्रा (यात्रा-कथा)]] समीर नेपाल&lt;br /&gt;
* [[समाज परिवर्तनमा संस्कृतिकर्मी]] विजय सुब्बा&lt;br /&gt;
* [[मेवालाल (बालकथा सङ्ग्रह)]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[A Helping Hand]] Payal Dhar&lt;br /&gt;
* [[आमा (कविता सङ्ग्रह)]] भक्ति दाहाल &#039;विष्फोट&#039;&lt;br /&gt;
* [[विज्ञान तथा वातावरण - कक्षा ८ (पुरानो संस्करण)]] गोपीचन्द्र पौडेल&lt;br /&gt;
* [[चप्पल]] अर्हन्त श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[मात्राहरू]] हरिहर लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[दोस्रो भाषाको रूपमा नेपाली भाषा]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अब्राहम लिंकन (१८०९-१८६५)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[घरभेटी भाउजू (कथासङ्ग्रह)]] कृष्णादेवी शर्मा&lt;br /&gt;
* [[Agreeing and Disagreeing - English Grade 10]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[शकुन्तला नाटक]] शम्भुप्रसाद ढुंग्याल&lt;br /&gt;
* [[Chunu and Munu Read]] Shanta Das Manandhar, Stephanie Wei&lt;br /&gt;
* [[अब खेल खेल्ने!]] शिल्पी प्रधान&lt;br /&gt;
* [[जनावरहरूको सभा]] ज्ञाननिष्ठ ज्ञवाली&lt;br /&gt;
* [[विश्वप्रसिद्ध पैंतिस साहित्यकार]] प्रभात सापकोटा&lt;br /&gt;
* [[कसिङ्गर (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[पंचतन्त्र कथासंग्रह]] &lt;br /&gt;
* [[अक्षर (बालकथा)]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 2: Title and heading corrections completed ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 2&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 3: Text correction completed ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 3&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
==Step 4: Proof reading completed==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 4&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[अनौठो फल]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==Step 5: Finished books==&lt;br /&gt;
पुरा भएका किताब&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 5&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=MediaWiki:Gadget-HotCat.js&amp;diff=64</id>
		<title>MediaWiki:Gadget-HotCat.js</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=MediaWiki:Gadget-HotCat.js&amp;diff=64"/>
		<updated>2024-06-09T12:24:09Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: Created page with &amp;quot;importScriptURI(&amp;#039;//commons.wikimedia.org/w/index.php?title=MediaWiki:Gadget-HotCat.js&amp;amp;action=raw&amp;amp;ctype=text/javascript&amp;#039;);&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;importScriptURI(&#039;//commons.wikimedia.org/w/index.php?title=MediaWiki:Gadget-HotCat.js&amp;amp;action=raw&amp;amp;ctype=text/javascript&#039;);&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%89%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A6&amp;diff=63</id>
		<title>उन्माद</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%89%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A6&amp;diff=63"/>
		<updated>2024-06-09T12:18:49Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: /* परिचय */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;Source book: https://nepalikitab.org/lalita-doshi-unmad/&lt;br /&gt;
==पुस्तक परिचय==&lt;br /&gt;
उन्माद&lt;br /&gt;
उपन्यास&lt;br /&gt;
लेखिका:&lt;br /&gt;
ललिता &#039;दोषी&#039;&lt;br /&gt;
प्रकाशक&lt;br /&gt;
डीकुरा पब्लिकेशन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृति: उन्माद&lt;br /&gt;
लेखक: ललिता &#039;दोषी&lt;br /&gt;
संस्करण: प्रथम, २०६६&lt;br /&gt;
मूल्य: रू. ९५/-&lt;br /&gt;
प्रकाशक : डीकुरा पब्लिकेशन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पत्रचार जर्ने ठेजाना :&lt;br /&gt;
डीकुरा पब्लिकेशनपो.ब.नं. २१७३२, काठमाडौँ, नेपालफोन : ०१-२०४४३७९, ९८४१५२१८९२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपत्यकाको लाणि वित्तरण :&lt;br /&gt;
एभरेष्ट बुक डिस्ट्रीब्यूटर्स&lt;br /&gt;
फोन : ९८४१४५२६०६&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==समर्पण आमालाई==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आदर्शकी प्रतिमूर्ति कोमल मनकी धनी&lt;br /&gt;
गाएर सकिन्न कठै ! तिम्रो त्यो जीवनी&lt;br /&gt;
तिमी बाँच अझै बाँच देक आशिषका घडा&lt;br /&gt;
तिम्रो कोखको लाज राखूँ बनी माटो उर्वर !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उन्माद उपन्यासमा ड्बुल्की मार्दा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;उन्माद&#039; ललिता दोषीद्वारा लिखित शिक्षा र सन्देशले भरिएको उपन्यासहो । आदर्शवादी रोमाण्टिक धाराको यस उपन्यासमा उपन्यासकारलै आफूनौउद्देश्य प्राप्त गर्नमा सफलता हासिल गरेकी छन्‌ । आजको उच्च वा उच्चमध्यमवर्गीय तथाकथित अभिजात समाजका विकृतिहरूलाई ललिता दोषीलेभावुक र मार्मिक बनाएर प्रस्तुत गरेकी छन्‌ । त्यस वर्गबाट बिभिन्त नमुनापात्रहरूको संकलन गरेर उपन्यासमा तिनलाई पात्र बनाई तिनको चरित्रचित्रण गरेकी छिन्‌ । आदर्श र अनादर्श पात्रको चित्रण गर्नु, तिनको द्वन्द्व प्रस्तुतगर्नु, तितका आडम्बरी जीबनको प्रस्तुति र अन्त्पमा ती सबै पात्रहरूको आ-आफूनो कर्मअनुसारको अन्त्य उपन्यासमा कौतुहलतापूर्वक प्रस्तुत गरिएकोछ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपन्यासमा शालु, कान्छी र आकाश जस्ता आदर्शबाट कहिल्यै च्युतनहुने पात्र छन्‌ भनै निमेष, मौमसी, फिरोज आदिजस्ता बाटो बिराउने पात्रपनि छन्‌ । लेखिकाको उद्देश्य भने प्रत्येक पात्रभित्र रहेको मानवीय आदर्शकोखोजी गर्नु रहेको छ । यो लेखिकाको सामाजिक दृष्टिले एक दायित्वपूर्ण कार्यहौ र सराहनीय पनि । सामाजिक अध्ययनका दृष्टिले पनि यौ उपन्यास उपयोगीहुन सक्छ । अन्त्यमा असल पात्र त आफूतो असलपनले प्रभावकारी रहिरहेकैँहुन्छ, खराव पात्रलाई पनि उपन्यासकारले असल परिणतिमा पुन्याएकी छन्‌ ।तिनीहरूले आफूनौ अज्ञानमय पूर्वजीवनप्रति पश्चाताण गर्दछन्‌ र भविष्यमाअसल जीवनतर्फ डोहोरिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपन्यास परम्परागत शैलीमा लेखिए पनि कथावस्तुको संयोजन चरित्रचित्रण सहज प्रस्तुतिले गर्दा आजको एक खास वर्गको जीवनको चित्रण गर्नसफल छ । तथाकथित अभिजात बर्ग र तिनका सामन्ती सोचले गर्दा उत्पन्नभएका बिकृति एकातिर यसको विषय बनेको छ भने अर्कोतिर सुरासुन्दरी रलागु पदार्थको दुर्व्यसनले समाजलाई कति जर्जर तुल्याउँछ भन्ने कुराकोमार्मिक चित्रण गरिएको छ । ठाउँठाउँमा भाबुकताको आधिपत्यका कारणपाठकसमैत भावुकताको प्रभावमा बगेर आँखा रसाउन बाध्य हुन्छ । उपन्यासयस रूपमा निकै सफल भएको छ । यसका अन्य सफलता पनि छन्‌ । यसकोभाषा सरल छ । सिनेमा हेरेझैं, कवानक प्रवाहमय बनेर गएको छ । पाठकलेकथामा अल्मलिनु पर्दैन, कथानकले पाठकलाई तानेर लान्छ । थालनीदेखिअन्त्यसम्म उपन्यास रोचक छ । बौद्धिकताको भारी नवोकेर यसले सरसकौतुहलमय ढङ्गबाट आफूनो कुरा भन्छ । उपन्यासमा कुलतका विरुद्ध एकअभियान जस्तै चलाइएको छ । त्यसैगरी पुरुषले गर्ने नारीको शौषण पनि&lt;br /&gt;
प्रमुख मुहाका रूपमा उठाइएको छ । त्यति मात्र होइन आजका कतिपयनारीहरू आफूना क्रियाकलापद्वारा भ्रमवश र विवशतावश पनि दुव्यसन रपुरुष अन्यायको शिकार हुन पुग्छन्‌, जसले उनीहरूको जीवन विवोलिन्छ,अवसादभ्रष्ट बनाइदिन्छ । तीमध्ये प्रायः परिस्थितिसित मुकाबला गर्दै नयाँजीवन थाल्दछन्‌ । यसले नारीवादी सन्देश पनि रामरी दिएको छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेखिकाको सबभन्दा बलियो पक्ष कै छ भने, आज एउटा अपसंस्कृतिलाईअँगालेर वाँच्दा जुन खोक्रो गर्वको देखावटीपन छ, त्यसप्रति उपन्यास सहमतछैन । प्रेम र त्यसको खोक्रोपन, संस्कृति र विलासिता अनि पी सबका नाउँमाहुने विभिन्न प्रकारका शोषणहरू विरुद्ध आवाज उठाइएको छ, यिनको वास्तविकतार भ्रमलाई छुद्याएर देखाइएको छ । अनि भ्रममा बाँच्नेहरूको दुःखद परिणामपनि छर्लङ्ग पारिएको छ । एउटा पाठकले यसबाट घेरै क्रा सिक्न सक्छ, धेरैसन्देश लिन सक्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अभिजात बर्गका यी पात्रको खोक्रोपन र हिलोमा कमल फुलेझैँ &#039;शालु&#039;जस्ता पात्रको आदर्श, शान्त र सफल जीवनको तुलना गरेर लेखिकाले जीवनकाआडम्बरहरू क्षणिक हुन्छन्‌ भन्ने सन्देश दिएकी छन्‌ । विलासिता पेम होइनयरो हामी यस पुस्तकमा पाउँछौं भने, वास्तविक प्रेमले मानिसलाई वर्दालनेतागत पनि राख्दछ भन्ने सन्देश पनि हामी यसै उपन्यासद्वारा गृहण गर्दछौं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस अर्थमा &#039;उन्माद&#039; एक निश्छल, निःस्वार्थ, त्याग, बलिदान र आत्मिकअनि आदर्श प्रेमको पक्षमा रहेको उपन्यास हो । त्यसकारण यसलाई प्रेमकाबिभिन्न रूप दर्शाउने, प्रेम-त्रिकोणको उपन्यास पनि भन्न सकिन्छ । फिरोज,आकाश र शालुको सम्बन्धलाई नमुनाका रूपमा हेर्न सकिन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपन्यासले एउटा खास समुदायको जीवनका विभिन्न पक्षहरू प्रस्तुतगरेको छ, जसबाट कति पाठक अनभिज्ञ पनि रहेका हुन सक्छन्‌ । यस अर्थमायसले एक वर्गको जीवनको ज्ञान हामीलाई जानकारी दिएको छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सरल र बगेको शैलीले गर्दा अनि कथावस्तुको राम्रो विकासका कारणउपन्यास लोकप्रिय बन्ने आशा गर्न सकिन्छ । यो उपन्यासको कथा अत्यन्तरोचक हुनाले यसमा एक सफल फिल्म वा टेलिश्रृङ््खला पनि वन्न सक्छ भन्नेमलाई बिश्वास छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्त्यमा पाठकमा यो उपन्यास एकदम लोकप्रिय हुनेछ भन्ने शुभकामनादिन चाहन्छु । यो उपन्यास, नरौकिएर पढिसिध्याएँ । अन्य पाठकले पनियसैगरी पढ्नै कामना गर्दछु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डा: घुबचन्द्र गौतम२०६५/११/२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आफनो भनाइ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवनका विविध घुम्तीहरू पार गर्दै म यहाँहरूसामु आफूनो आठौँ कृति&amp;quot;उन्माद लिएर उपस्थित भएकी छु । आशा छ, मेरा प्रिय पाठकवृन्दहरूले,मैरो अन्य कृतिलाई जस्तै यस उपन्यासलाई पनि अवश्य माया गर्नुहुनेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले यो उपन्यास युवावर्गकै लागि लेखेकी हुँ । आफूले देखेसुनेकाघटनाहरूलाई मैले टपक्कै टिप्न खोजेको छु । कथालाई सिगार्ने क्रममाकतै-कतै काल्पनिक शब्द भएपनि यी घटनाहरू धेरैजसो वास्तविक नै हुन्‌ ।ती पात्रहरूको कथाव्यथालाई उतार्न म कतिसम्म सफल भएँ या भइनँयसको जिम्मा लगाउने काम प्रिय पाठकहरूलाई नै सुम्पेकी छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दोषी&#039; उपनामलाई लिएर उठने प्रश्नहरूको सवालमा चाहिँ म यति नैभन्छु, मैले थाहा पाएदेखि आफूनो स्वार्थको लागि अरूको खुसी रेटेभौँ पटक्कैलाग्दैन । आफूले प्रचण्ड गर्मी सहेर अरूलाई छहारी दिँदा पनि भोग्नुपरेकापीडाहरू आफूनै ठासँमा छन्‌ । यही पीडाहरू पोख्ने क्रममा नै म प्रियपाठकहरूको प्रिय लेखिका बन्न पुगेछु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन भनेकी यस्तै हो । प्रत्येकको जीवनमा उकाली ओरालीहरूआइरहन्छन्‌ । आज भने मैले सगरमाथा टेकेको अनुभूत गरेकी छु, किनकिमैले आफ्नो उपन्यासको पानामा वरिष्ठ साहित्य साधक डा. ध्रुवचन्द्रगौतमलाई सजाउन पाएकी छु । म यति विग्न खुसी छु जसको लेखा जोखानै छैन । मेरो बच्चादेखिकै रहर थियो वहाँलाई नै उपन्यासमा भूमिकालेखाउने वहाँले मेरो रहरलाई सहर्ष स्वीकार गर्नु भयो । म वहाँको योगुणलाई आजन्म भुल्ने छैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले जति नै अगाडि पाइला चाले पनि म आफूनो प्रथम पाइला टेकाउनेवरिष्ठ साहित्य साधकज्यूहरूमा कृष्णप्रसाद पराजुली, डा. ओमवीर सिंहबस्न्यात र इन्दिरा प्रसाईलाई कदाचित भुल्नेछैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मलाई प्रेरणा दिने यति विघ्न साहित्य साधकज्यूहरू हुनुहुन्छ । मघर्म संकटमा छु कसको नाम लेखौँ कसको नाम छोडौं | त्यसैले मैलेएकपाटो रोज्न बाध्य भएँ । मेरो साहित्य रूपी सन्तानलाई सही मार्गदेखाउदै भूमिका र समीक्षा लेखिदिँदै मलाई हौसला प्रदान गर्नुहुने वरिष्ठ&lt;br /&gt;
साहित्य साधकज्यूहरूमा रमेश विकल, जनकवि केसरी धर्मराज थापा,गोपिकृष्ण शर्मा, केशव सुवेदी, चुडामणी रेग्मी, मुक्तिनाथ शर्मा (नेउपाने)कलाघधर काफूले, ज्ञानुवाकर पौडेल, मोहन ढुवाल, श्री ओम श्रेष्ठ रोदन,ब्रहमप्रिय प्रेमस्वरूप, श्यामप्रसाद अर्याल, डा. खगेन्द्र प्रसाद लुइटेल, तिलकप्रसादलुइटेल, अर्याल ,अर्जुन विरक्ति, यादव भट्टराई, नवराज रिजाल, बी. केपाल्पाली, अरुण खत्री नदी, विजयराज आचार्य, विश्व सिग्देल, छवीरमणसिल्वाल, दिपेश चौलागाई, ज्ञानेन्द्र विवश यहाँहरू सम्पूर्णप्रति म हार्दिकआमार व्यक्त गर्न चाहन्छु ।&lt;br /&gt;
साहित्य लेखनका लागि मलाई हरक्षण साथ दिने स्व बाबा कुलबहादुर(गजुरेल) क्षेत्री, आमा सूर्यकुमारी क्षेत्री, श्रीमान टेकबहादुर (खरेल) खत्री,बाबु गंगा खरेल, सम्पूर्ण दिज्यूहरू, दाज्यूहरू, नेत्रबहादुर क्षेत्री, डा. राजक्षेत्री, सुरेश क्षेत्री, डा. दिनेश क्षेत्री (भाइ), गोविन्द सुवेदी, शेरबहादर केसी,भाष्कर सुवेदी, पुरेन्द्र शर्मा (भिनाज्यूहरू), छोराहरू आकाश खरेल, क्षितिजखरेल, सम्पूर्ण आफन्तहरूप्रति र नेत्रहीन साथीहरू सुरेश राजभण्डारी,ओमप्रकाश बञ्जाड्े, उन्माद उपन्यासलाई सम्पादन गर्नुहुने कृष्ण पौडेल,कम्प्युटर गर्नुहुने प्रवीण बुढाथोकी, लक्ष्मी श्रेष्ठ, आवरण गर्नुहुने हरिकृष्णबस्ताकोटी, कुश्माखर पाण्डेय, गोपाल गैरै सबैप्रति र प्रकाशनको जिम्मालिएर तपाईंको हातसम्म पुस्तक प््याउने डीकुरा प्रकाशनका प्रति हार्दिककृतज्ञ छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
र, हरेक पक्षमा अपनत्व र सदभावनाका साथ गम्भीरतापूर्वक सल्लाह रसुझाव दिनुहुने बहुचर्चित साहित्यकार पुण्यप्रसाद प्रसाईका प्रति हार्दिकआमार ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्त्यमा पाठकको मायामा नै आफनो अस्तित्व जोगिने हुँदा यहाँहरूकोयस्तै मायाको अपेक्षा गर्दछु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म यो पुस्तक मेरी ममतामयी आमा सूर्यकुमारी क्षेत्रीमा समर्पण गर्दछु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- ललिता &#039;दोषी&#039;&lt;br /&gt;
बुद्धनगर, काठमाडौं&lt;br /&gt;
मिति : २०६४ पुस २३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==एक==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कारको हर्न सुनेपछि मस्त निद्रामा परेकी कान्छी जन्याकजुरुक उठेर गेटमापुगिन्‌ । गेट खोलेपछि कार घरभित्र पस्यो । कार घरभित्र पसेको धेरैबेरभइसक्दा पनि शालु सघैँझैँ दिदी भन्दै बुर्लुक्क उफ्रैँदै निस्किनन्‌ । मालिक रमालिक्नी कारबाट बाहिर निस्कँदै लर्बराएको स्वरमा भने, &#039;हेर कान्छी, अबहाम्री शालु पनि ठूली भइन्‌ । आजदेखि त पिउन पनि सिकिन्‌ । नपत्याएरआफैँ हेर&#039; भन्दै उन्मत्त हाँसो हाँस्तै घरभित्र पसे । मालिक र मालिक्नीकोकुराले कान्छीको हृदय नै छिन्नभिन्न भयो । आँखाबाट बर्बरी आँसु झार्दैमूर्तिकैँ उभ्भिरहिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;शानु मैयाँसापलाई झिक&#039; भन्ने ड्राइभर चन्द्रकान्तको बोलीले झसङ्गभई कान्छीले शालुलाई कारबाट बाहिर निकालिन्‌ । शालुले कान्छीलाई अङ्गालोहाल्दै भनिन्‌, &#039;दिदी टाउको दुख्यो । खुट्टा पनि टेकिँदैन, अब के गरौं ?&#039; कान्छीलेचुपचाप शालुलाई डोच्याउँदै कोठामा ल्याएर पलङमा सुताइन्‌ । शालुको जुत्ताखोलेर कोठाबाहिर राखिदिइन्‌ । कान्छीको आँखाबाट झरेको आँसु रोकिएकोथिएन । शालुले &#039;ऐया, टाउको दुख्यो&#039; भन्दै लामो सुस्केर हालिन्‌ । कान्छीलेपलडमा वसेर शालुको टाउको आफनो काखमा राखेर मिचिदिइन्‌ । तर ओठचल्न सकेन । शालुले दिदी नबोल्नुको कारण बुझेर भनिन्‌, &#039;दिदी तपाई त कुरानै नबुझी रिसाउनुभयो ।&#039; आफनो हात दिदीको आँखामा पुस्साउँदै भनिन्‌,“अहो ! रुनु पनि भएछ । साँच्चि मैले रक्सी पिएकी होइन । कसले मेरोखानेकुरामा के मिसाइदिएछ । मलाई पत्तो छैन । दिदी नरुनोस्‌, साह्रै गाह्रोभएको छ, बत्ती निभाएर जानोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी बत्ती निभाएर आफनो कोठामा आई, डङ्ग्रङ्ग ओछ्यानमा पछारिइन्‌ । आफूलाई थाम्त नसकेर घुँक्क-घुँक्क गरी रोइन्‌ । आँखामा विगत र वर्तमानचलचित्रभैँ नाचिरहयो । आफूलाई घरबाट निकालेपछि फूपूले बच्चा स्याहारगर्न र घरको काम गर्न भनेर दीपक र उर्मिलाको घरमा ल्याएर छोडिदिइन्‌ ।त्यतिखेर शालु अठार दिनकी मात्र थिइन्‌ भने कान्छी बीस-बाईस वर्षकीथिइन्‌ । शालु तीन पुगेर चार वर्षमा लाग्दा उर्मिलाले सुजनलाई जन्माइन्‌ ।शालु र सुजन दुवै कान्छीकै पोल्टामा हुर्कदै गए । कपण्डोलमा टन्न पुर्ख्यौलीसम्पत्ति भएका दीपकले सानै उमेरमा अधिकृत पास गरेको भए पनि अधिकृतकोजागिर छोडी व्यापारमा लागे । व्यापारमा लागेपछि उनको रहनसहन,बोलीचालीमा विस्तारै परिवर्तन आउन थाल्यो । व्यापारमा राम्रो फाइदा भएकोलेचाबहिल र कुलेश्वरमा जग्गा किनी भाडामा लगाउनकैँ लागि घर बनाए ।घरभाडा मात्रै मासिक चालिस-पचास हजार आउने भएकोले उनीहरूलाई पैसाको कमी थिएन । त्यसमाथि व्यापारबाट आउने पैसा छुड्दै थियौ । दीपककावावु-आमा सानैमा मरेका हुनाले दीपक, उर्मिला नै पूर्ण स्वतन्त्र थिए । उनीहरूलेसाँझको खाना घरमा खाएको त्यति याद छैन कान्छीलाई । होटेल, रेष्टुराँ, पार्टीआदिमै आधारात बित्व्यो र बित्छ पनि । मनलाग्दा घर आउँछन्‌ त मननलाग्दा घर आउदैनन्‌ । शालु र सुजन सानौमा बिरामी पर्दा कान्छीले कतिरात आँखा झिमिक्कै नगरी पनि बिताइन्‌, त्यो आफ्नै ठाउँमा छ। सबैपरिवारको तुलनामा ज्यादै संवेदनशील छिन्‌ । शालु र सुजन दुवैलाईकान्छीले हुर्काएकी आए पि कान्छी शालुलाई आफनै मुटुझौँ प्यारो गर्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु कान्छीकै मायालु काखमा ह्किन्‌, बढिन्‌ । बाबु सम्पन्न भएको हुँदाउनले अभाव देख्नुसम्म पनि परेन । अभाव र पीडा भनेको के हो, उनलेकान्छीदिदीले भनेका कथाहरूमा मात्र सुनिन्‌ । शालु कथाका पात्रहरूको दुःखसुन्दा पनि चिन्तित हुनै भएकीले कान्छीले उनलाई दुःखका कथाहरू सुनाउनपनि छोडिन्‌ । शालुको सानो मस्तिष्कले केवल यही सोच्यो । संसार त धेरैसुन्दर रहेछ । सबै सम्पन्न र खुसी रहेछन्‌ । मानव आर्ततादको त पत्तै भएनशालुलाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँसम्म कि आफ्नै घरमा बसेकी, सुन्दर आँखा र बान्की परेको अनुहारभएकी आफूलाई आफनै मुटुभौँ ठान्ने कान्छीदिदीको विगतसँग पनि अनविज्ञथिइन्‌ शाल्‌ । उनले यति मार बुझेकी थिइन्‌- कान्छीदिदी आफूलाई असाध्यैमाया गर्छिन्‌ । आफनो मायाको कारण तै यहाँ वसेकी हुन्‌ । म नै दिदीकोसम्पूर्ण हुँ । जसरी मलाई ठेसलाग्दा दिदीलाई दुख्छ, त्यस्तै दिदीलाई ठेस लाग्दामलाई दुखैन भने म जन्मनुको अर्थ छैन । हो अर्थ .... ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==दुई==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीलाई उठ्नै मन लागेको थिएन । शालुलाई ब्रेकफास्ट दिनकै लागिनसकी-वसकी उठिन्‌ । अण्डा र दूध लिएर शालुको कोठामा पुगिन्‌ । त्यतिखेरसम्मशालुलै स्कुल जानका लागि जुत्ता, मोजा लगाइसकैकी थिइन्‌ । शालुले डराई-डराई कान्छीको अनुहारमा हेरिन्‌ । कान्छीको आँखा रातो र औठ-मुख पनिसुन्निएको साथै मौन थिइन्‌ उनी । शालुले कान्छीदिदीको गालामा म्याइँ खाँदैभनिन्‌, &#039;दिदी नबोल्नै भए म स्कुल नै जान्त के, दिदी त्यत्तिकै पीर गर्नुहुन्छ मबिग्रिन्न भनेपछि बिग्रिन्त ल तपाईंलाई गाड्रो भए जस्तो छ गएर सुत्नोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले कुनै प्रतिक्रिया नजनाई एकोहोरो शालुको अनुहारमा हेरिरहिन्‌ ।गोरो अनुहार, ठूलाठूला निर्मल र सुन्दर आँखाहरू, मिलेको दाँत, पृष्ट छाती,होचो-होचो मोटोमोटो शरीर । शालुले हाँस्तै भनिन्‌, &#039;दिदी मलाई हेरेर कहिलेपनि अघाउनुहुन्न भन्या, साँच्चै दिदी म अप्सराजस्तै छु र ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुको शब्दले कान्छीको आँखा भरियो । शालुले कान्छीदिदीको आखाकोआँसु पुच्छदै भनिन्‌, &#039;मलाई थाहा छ, म दिदीका लागि अप्सराभन्दा पन्ति सुन्दरीछु । म दिदीलाई माया गर्नकै लागि स्वर्गबाट &#039;झरेकी हुँ, म फूल हुँ रे, म जूनहुँ रे, दिदीले सानोमा भन्ने गरेको शव्दहरू अझै विर्सेकी छैन । नरुनोस्‌,आजदेखि दिदीले जे भन्नुहुन्छ त्यही गर्छ,&#039; भन्दै शालु स्कुलतिर लागिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी शालुकै ओछ्यानमा थचक्क बसिन्‌ । आँखामा शालुकै मायालुअनुहार नाचिरहयो । मनमनै सङ्ककल्प गरिन्‌- म मेरी शालुलाई सन्त्रासमयबातावरणभित्र निशास्सिँदै मर्न दिने छैन । मेरी शालु अग्निकण्डमा पर्दा मस्वयम्‌ जल्नेछु । सम्पूर्ण पाएर पनि पसार शालुले आदर्श बाबु-आमा पाउनसकिनन्‌ । शालुकी आमाले आफनो नविसिँदिएकी भए सायद मैले त्योउलंदो बैंसलाई किच्नु, मिच्नु र थिच्नु पर्दैनथ्यो । बैंसलाई थेग्नुपर्दाको कष्टसम्झेर कान्छीको मन भक्कानिएर आयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उमिंलाले शालुको कोठाको ढोका खोल्दै कर्कसा स्वरमा भनिन्‌, &#039;फैरि केभयो तिमीलाई ? किन मुख फुलाएर बसेकी ? शालुले हिजो के अलिकति पिएरआएकी थिइन्‌, यिनको शिरमाथि पहाडै टुट्यो । मेरी छौरीलाई तिमी योजमानामा पनि आफूजस्तै वनाउन चाहन्छयौ : थाहा छ तिमीलाई ? अस्तिडा. पुष्करकी श्रीमतीले मेरो पिउने बानी छैन भन्दा सबै पेट मिचिमिची हाँसे ।डा. पुष्करले कहाँबाट गोबर टिपेछ भन्दै थिए । त्यति मात्र हो र यो जमानामापरिचय गर्दा नमस्कार पो गर्छै । त्यसको हात छुँदैमा त्यो सानी हुन्थी र ! सधैँमै हँ भन्ने डा. पुष्कर त स्वास्नीको गँवारपन देखेर नीलो र कालो भयौ । मेरीशालुलाई अहिलेदेखि नै सभ्य समाजमा रहने तरिका सिकाउँछु बुझ्यौ !?पाइलटको छोरा गान्टै, प्रभाते छ नि त्यो शालुसँग डराउँदो रहेछ । मलाईअन्टी शालुलाई यो गिफ्ट दिनु भनेर दियो । छान्न कति जानेको गान्टैले, फ्रकपनि यति राम्रो ल्याएछ कि ठ्याक्कै हिरोनीहरूले लाउने जस्तो छ भन्या !शालुको पापा भनिसिन्थ्यो- त्यो फ्रक त होलसेलमा नै निक्कै महँगो पर्छ रे !आज त्यही फ्रक लगाएर पार्टीमा लैजान्छु । गान्टे दङ्ग पर्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाको कुराले कान्छीलाई भाउन्त होला जस्तो भयो । कान्छीको मगजलेकेही सोच्नै सकेन । उनी हेरेको हेरै भइन्‌ । भर्खर चौध पुगेर पन्ध लागेकीछोरी नशामा &#039;फुम्दा रमाउने र छोरीकै लागि गिफट ल्याउने आमा पनिहुँदारहेछन्‌ । कान्छी भित्रभित्रै दाह्वा किट्दै कोठाबाट बाहिरिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;ओ डार्लिङ तिम्रो फोन ।&#039; दीपक उर्मिलालाई कडलेस दिएर ट्वाइलेटपस्चै । उर्मिलाले हलो गर्दै भनिन्‌, &#039;हैन किन विहानबिहानै सम्झनुभयो उमाजी? आज खाल त्यहीँ जम्ने होइन र ? त्यहाँ क्यान्सिल भयो रे, किन ? ए कान्छीसास्‌ आउने ? हो भन्या, पाख्रेहरूले त टाउकै खान्छन्‌ । दुई-चार महिनाभएको छैन गएको फेरि किन अन्मरिनु पन्या होला ? त्यसौ भए तपाईँ आज आउनुहुन्त । जचाउनु जानु छ भनेर आज, रै ! हुन्छ, हुन्छ आउनुहोस्‌ ।पाख्रेहरूको फतौरे गफ सुनेर दिन काटन गाह्रै पर्छ । प्रेमाको घरको खान्कीत्यति मीठोचाहिँ हँदैन । छुच्ची मोरी रेडलेबलमा सस्तो रक्सी मिसाउँछै जस्तोछ, जति पेग खाए पनि छुँदैन । बर्गर, पिजा, सेकुवा सबै बाहिरैबाट मगाउनुभन्नु अस्तिनैको जस्तो &#039;झरेष्ट नपरोस्‌ । तासमा धैरै पैसा जित्नै पनि त्यही,खान दिन कन्जुस गर्ने पनि त्यही । मलाई त प्रेमाको व्यवहार पटक्कै मनपर्दैन । आज्ञ त रेडलेबल हाम्रै अगाडि खोल भन्नुपर्छ । हुन्छ म पनि दसै वजेआउँला । फेरि भरे पार्टीका लागि चाँडै फर्किनुपन्यो ति ! मनीषा ब्युटिपार्लरराम्रो छ रे, हुन्छ त्यसो भए म पनि त्यहीँ जान्छु । राम्री त हुनैपन्यो नत्रवूढाहरूले के ठान्लान्‌ ? ल-ल राख्छु । दस बजे नै आउँला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फोन गरिसकेर भान्सामा आई डाइनिङ टेबुल ठटाउँदै भनिन्‌, &#039;हरे शिव !यो कान्छीलाई कालले घिसार्ने बैला भयो कि कसो ? अझै ग्यास सल्काएकीछैन, कहाँ मरी होला ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले भान्साको ढोकामा आई भनिन्‌, &#039;सापनी ! आज साह्रै गाह्रो भएकोछ चन्द्रकान्तलाई काम गर्नु भनिस्यो । उनैले सबै काम गर्छन्‌, फ्रिजमा फ्राइमासु, अचार सबै छ । चिया र भुजा पकाउने त हो नि!&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिला चिच्याइन्‌, “ओहो ! अब त यो राँडको जिव्रो पनि कर्दझौँ भइसक्यो ।शालुलाई माया गर्दिन भनौं भने पनि त्यत्रो जवानी नै बलि चढाई । माया गर्छभनौं भने शालुले लाए, खाएको देखिसहन्न । हामी सगुल्लै बाबु-आमा हुँदाहुँदैयसलाई केको टाउको दुखाउनुपर्दो हो कुन्नि ? हिजो शालुले पिएर आएपछियसको होस हराएको छ । न यो घरबाट निस्की भन्दा निस्कन्छे । कुन जुनीकोपाप आइलाग्यो ।&#039; उर्मिला फतफताउँदै चन्द्रकान्तलाई बोलाउँछिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाको वाणरूपी शब्दहरू सुत्दासुन्दै अचानो भइसकेकी कान्छीको छातीमाउर्मिलाको गालीले त्यति दुखैन । हिजौकौ शालुको दृश्य सम्झेर भने तरक्कआँसु झारिन्‌ । &#039;अन्न फारो गर्नु हुँदादेखि छोराछोरी बानी लाउनु कुनादेखि&#039;भन्ने उखान सम्झिन्‌ । आफूले जति चोट सहन परे पनि शालुलाई सपार्छु ।&#039;अन्त्य राम्रो त सबै राम्रो&#039; यस्तै मनमा करा खेलाएर ओछ्यानमा छटपटाइरहिन्‌कान्छी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==तीन==&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले कान्छी सुतेको कोठामा गएर बोलाए, &#039;कान्छी खान आरु,साप-सापनीको सबारी भयो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले विरक्त स्वरमा भनिन्‌, &#039;तिमी खाक म पछि खान्छु ।&#039; चन्द्रकान्तले सम्झाए, &#039;तिमी भोकभोकै बस्दैमा समस्याको समाधान हुन्छत ! तिम्रो गाँठी क्रा मैले पनि बुझेको छु । म पनि शालु मैयाँसापलाई मायापर्छुनि ! आक खाँदै शालु मैयाँसापलाई सर्पको डसाइबाट कसरी टाढा राख्नेहो दुवै मिलेर सल्लाह गरौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तको कुरा सुनेर कान्छी उठिन्‌ र चुपचाप चन्द्रकान्तको पछिपछिभान्सामा आइन्‌ । चन्द्रकान्त मेचमा बसे । कान्छीले चन्द्रकान्तनजिकैको मेचमाबस्दै भनिन्‌- &#039;चन्द्रकान्त ! शालु मैयाँसाप त मैले रक्सी पिएकै होइन भनिसिन्छनि ! उहाँले यो उमेरमा आएर पहिलोपल्ट मसँग &#039;फूटो बोलिस्यो बुझ्यौ ?त्यसैले हृदयमा उठेको हुरीको &#039;फोक्का मत्थर हुँदै भएन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले लामो श्वास फेर्दै उत्तर दिए- “मैयाँसापले भनेको करा ठीकहो । तिमी कुरा नै नबुझी मन सानो बनाउँछयौ । मैयाँसाप र अरू केटाकेटीहिन्दी गीतमा डान्स गर्दै थिए । सबैले मैयाँसापको डान्स र सौन्दर्यको तारिफपनि गरिरहेका थिए । मैयाँसाप गाह्रो भो भन्दै म नजिकै आएर बस्नु भो । त्योगान्टेले सिँगै फेन्टाको बोतल मैयाँसापलाई दे भनेर इसारा गरेको मैले झट्टदेखेँ । मैयाँसापले फेन्टा लिएर घुदघुट पिइस्यो । फेन्टा पिएको केहीबेरमै झुल्नथालिस्यो । मेरो सातोपुत्लो गयो । म मैयांसापलाई समातेर बसिरहेँ । सालेगान्टेको मनशाय बुझन थाहा नपाएझैँ गरी त्यसलाई हेरैँ । त्यो सिकार खानआतुर भएको सिंहभौँ थियो । त्यसको त्यौ रूप सम्झँदा अहिले पनि मुदुढुकढुक हुन्छ । दीपक साप र उर्मिला मैयाँसापलाई छोराछोरीको केही वास्ताछैन । पिउन र अश्लील कुरा गर्न पाए केही चाहिँदैन । आज पार्टीमा मनभएको भए शालु मैयाँसापको जीबन तहसनहस हुन्थ्यो होला । कान्छी, अबशालु मैयाँसापका लागि केही गर नत्र तिम्रो सपना टुक्रिन्छ । प्रभाते जस्ताकोगिद्दै दृष्टिबाट कहिलेसम्म बचाउन सकिन्छ र ? पार्टीमा भएकोले पौ म सँगैथिएँ । होटेल, रेस्टुराँमा त टन्न भात खाएर आई कारमै मुर्दालाई ढुकेझँ साप-सापनीलाई ढुक्न हो । होटेल रेस्टुराँमा यो दर्घटना घटेको भए के हुन्थ्यो होला,आफैँ सोच त । त्यो गान्टे देख्दा मात्र सानो हो । केटीहरू फेरी-फेरी कारमाडुलाएको मैले कतिपल्ट देखेको छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तको कुराले कान्छी होस हराएझैँ भइन्‌ । कान्छीको भोकप्यासकता भाग्यो-भाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले करा थपे, &#039;कान्छी तिमीलाई थाहा छ ? त्यो जँडपाहा पूर्णेकीछोरी मोनाको अस्ति राति सम्साँझैमा बलात्कार भएछ नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले आत्तिँदै भनिन्‌, &#039;होइन के भनेको तिमीले ? अस्ति बिहानै त होमैले भेटेकी ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ल कस्तो बिश्वास गर्दिनौ तिमी, अस्ति बेलुका नै बलात्कार भएको रे ।आज बिहान दूध लिन जाँदा सबै त्यही कुरा गर्दै थिए । बलात्कार पनि एक-दुईजनाले हो र चार-छ जनाले गरेका रे । कस्तो समय आयो, त्यत्रि कोपिलालाईपनि बाँकी राखेनन्‌ यौनप्यासीहरूले । मोनाको उमेर त वाह् वर्षको थियो होलाहोइन र?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तको कुराले कान्छीलाई काटेको घाउमा नुनचूक दलेझैँ असहयभयो । कान्छी केही नबोली चुप नै रहिन्‌ । आँखामा मोनाको मायालु अनुहारर खुट्टा खोच्याङ-खोच्याङ गर्दै हिँडेको दृश्यहरू नै आइरहयो । कान्छीको आँखाबाटपुनः आँसुको वर्षा भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले सम्झाए, &#039;भौ अब नरोक । तिमी धेरै कोमल छ्यौ, त्यसैलेदुःखका कुराहरू नै गर्न मन लाग्दैन । बरु मोनालाई हेर्न जञाक । उनलाईशान्तभवनमा राखेको छ रे । विचरीको आफन्त भन्नु नै को छ र ! बाबु-आमालौकल ठर्रामा फुल्दै होलान्‌ । ल म गएँ, तिमी पीर नगरी बस&#039; भन्दै चन्द्रकान्तहिँडे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी बस्नै नसकी फेरि ओछ्यानमा गएर पल्टिन्‌ । उनको मनमा नानातर्क-विर्तक खेलिरहयो । कहिले मोना त कहिले शालु कान्छीको आँखामानाचिरहै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;ममी, दिदी त हुनुहुन्न कहाँ जानुभएछ ?&#039; शालुले स्कुलबाट आएर सोधिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उमिंलाले साडी मिलाउँदै भनिन्‌, &#039;ए, कान्छी बाहिर गइन्‌, शालु बेटा योफ्रक लगाएर हेर त, आज यही फ्रक लगाएर पार्टीमा जानुपर्छ, फ्रकमा तिमीसाँच्चिकै परीझैँ देखिन्छयौ । तिमीलाई प्रकाशे कस्तो लाग्छ ? क त तिम्रो खुवतारिफ गर्दै थियो ।&#039; ,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले अलि रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;ममी त्यस्ताको कुरा नै नगरिस्यो । कान्छीदिदीलेसघैँ भन्नुहुन्छ, &#039;म त राजकमारी जस्तै छु रे । राजकमारीले त धेरै पढ्नुपर्छरे।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;भो, बढी कुरा नगर । फ्रक लगाएर निस्क । मआइहाल्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
शालु फ्रक टिपेर कोठामा गइन्‌ । उर्मिलाले मनमनै सोचिन्‌, &#039;शालु छिटोफ्रक लगाएर बाहिर निस्किहाले हुन्थ्यो । कान्छीलाई ओछ्यानमा सुतेको देखिन्‌भने अर्को आपत आइपर्छ । बल्ल-बल्ल अलिअलि सभ्यता सिक्दैछिन्‌ । कान्छीशालु सभ्य भएको हेर्न सक्दिन । क शालुलाई आफूजस्तै गँबार बनाउनखोज्छे । छोटोको सङ्गत गन्यो भने मान्छै छोटै हुन्छ भनेको ठीकै रहेछ । शालुर कान्छीको बोल्ने शैली एकै छ। त्यो राँड यो घरबाट निस्कीभन्दा पनिनिस्किन मान्दिन । हरै भगवान्‌ ! कुन साइतमा यसलाई भित्र्याएका रहेछौं ।अहिले निल्नु न ओकाल्नु भएर घाँटीमा अड्की ।&#039;&lt;br /&gt;
शाल्नु फ्रक लगाएर आमासामु गइन्‌ । उमिला खुसी हुँदै चिच्याइन्‌, &#039;बाऊ ! कति सुन्दरी देखिएकी तिमी, फ्रकको कलरले पत्ति कति म्याच गरेको ।&#039;आमाको क्राले शालु पनि खुसी भइन्‌ । उर्मिलाका क्राहरू सुनेर कान्छीकोमुटुको ढुकढुकी भने बढ्यो । उनी जुरुक्क उठेर ट्वाइलेट गइन्‌ । दुवाइलेटगाएको केही समयपछि उनी चिच्याइन्‌, &#039;ऐया, म मरें, म मरें मैयाँसाप !&#039;कान्छीको आवाज सुनेर शालु दौडंँदै दवाइलेटमा पुगिन्‌ । र, कान्छीदिदीकोनिधार समात्दै भनिन्‌, &#039;ल छिटो हिंँड्नुस्‌ डक्टरकोमा जाँ । निधार धेरैफुटेजस्तो छ ।&#039;&lt;br /&gt;
उर्मिला रिसाउँदै कोठाबाहिर निस्केर भनिन्‌, &#039;फैरि कै भयो यसलाई : छोरी हिँडआज बाबाले नै कार चलाइसिन्छ । चन्द्रकान्तले कान्छीलाई डक्टरकोमा लैजान्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले रिसाउँदै उत्तर दिइन्‌, &#039;यहाँ दिदीको निधार फुटेको छ । 0401 डुपार्टीको वास्ता छ । देखिसेन निधारबाट रगत वगेको । हजुरहरू गै सो मनैदिदीलाई डक्टरकोमा लैजान्छु ।&#039; शालुको शब्दले कान्छीको मन केही ढुक्कभयौ।&lt;br /&gt;
“हामीभन्दा त्यसकी वजै ठूली भई&#039; भन्दै मनमनै फतफताउँदै उर्मिलाघरबाट निस्किइन्‌ । कान्छीलाई निधारमा लागेको चोटको कनै बास्ता थिएन ।शालुलाई रोक्न सकेकोमा नै उनी खुसी थिइन्‌ । निधारबाट शालुको हातहटाएर ऐनामा निधारको घाउ हेरिन्‌ । रगत भल्ल वग्यो । कान्छीले सोचेकोभन्दा घाउ ठूलो नै रहेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले आँखा चिम्लेर भनिन्‌, &#039;दिदी, दिदी घाउ छोप्नुहोस्‌ न मलाई ढरलाग्यौ ।&#039; हौ&lt;br /&gt;
कान्छीले कपासले घाउ छोप्दै भनिन्‌, &#039;शान्तभवन नै जाउँ न त मैयाँ ।त्यहाँ मोनालाई पनि भेटौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;मोनालाई कै भएको छ र ?&#039; शालुले प्रश्न गरिन्‌ ।&lt;br /&gt;
“सबै त्यहीँ गएपछि थाहा हुन्छ, जाउँ ।&#039; कान्छी र शालु शान्तभवन जानकालागि ट्याक्सी चढे । ट्याक्सीले शान्तभवनको मोड लिँदै गुड्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==चार‍‍==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समय साँझसाँझको थियो । शान्तभवन पुगी ओर्लिन नपाउँदै एउटा युवकशालुनजिकै आएर भन्यौ, &#039;ओ ! च्वाँक देखिएकीछयौ छ च्चाक !&#039; केही पाइलाचालैपछि अर्को युवकले कुरा थप्यो, “ओ यार ! प्लिज एक किस मात्र भए पनिदेक, म स्वर्ग पुगेझैँ हुन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीलाई च्याप्प समातिन्‌, कान्छी सुनेको नसुनै गरी हिँडिरहिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले चार-पाँचजना युवाको नजिकँबाट शालुलाई हिँडाइन्‌ । त्यहां शालुलेकेही सुन्नुपरेन । कान्छीले पुनः चार-छजना युवा भएको नजिक गएर ब्यागखौतलखातल गरेझै गरी शालुलाई अड्त बाध्य गराइन्‌ । एउटा युवकले अर्कोयुवकलाई कोट्याउँदै भन्यो, “क हेर ।&#039; अर्को युवकले शालुतिर हेर्दै भन्यो, &#039;मैयाँफ्रक अलि लामो भएछ । थोरै छोटो भएको भए झनै सुहाउँथ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
अर्कोले टक्क ओठ बजाउँदै भन्यो, &#039;म पनि यस्तै कपडा किनिदिउँला,तिमीसँगसंगै हिँडिदिउँला ।&#039;&lt;br /&gt;
अर्काले हाँस्दै कुरा थप्यो, तिमीहरू के-के किनिदिन्छौ किन रानीवन घुम्नचाहिँमसँग हिँड ।&#039; शालुले कान्छीलाई चिमोट्दै भनिन्‌, &#039;दिदी यहाँबाट छिटो जाकैँ ।&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीले निधारमा टाँका लगाउँदा शालुलाई सँगै राखिन्‌ । डक्टरको ध्यानकान्छीमा भन्दा आफूमा बढी केन्द्रित पाइन्‌ शालुले । शालु मनमनै रिसाउँदैटाँका लगाउन लगेको ठाउँबाट वाहिर निस्किन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु बाहिर ढोकामा के उभिएकी मात्र थिइन्‌, एउटा अधबैंसे पुरुषलेशालुलाई धक्का मार्दै हिँड्यो । केही बेरपछि एउटा साठी-बैसट्टी वर्षको बूढोलेशालुको कान नजिकै गएर भन्यो, &#039;तिमीलाई देखेपछि त आफू बूढो भएकैबिसेँछ नानी !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिका सति [ शब्दहरू सुनैर शालु थरधर काम्न थालिन्‌ । कान्छी बाहिर&lt;br /&gt;
कै शालुले कान्छीलाई च्याप्प समातेर भनिन्‌, &#039;दिदी छिटो घर&lt;br /&gt;
जाँ । मैरो त प्राण नै जान लागिसक्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले शालुलाई ट्वाइलेटनजिकै लगेर हातमा झोला थमाउँदै भनिन्‌,&#039;ल ट्वाइलेटमा गएर यौ कपडा फेरैर आइस्यो सब ठीक हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालु दबाइलेटमा गएर कान्छीदिदीले जन्मदिनका दिन दिएको कर्या-सुरुवाल लग्राएर वाहिर निस्किन्‌ । कान्छीले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;अब हजुरले कसैकोअपशब्द सुन्तुपर्ैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रुन्चै स्वरमा सौधिन्‌, &#039;दिदी म उत्ताउली छु र : प्रत्येकले मलाईनराम्रै दृष्टिले हेरे । साँच्चि कति टाँका लगाउनुपत्यो ? दुख्यो पनि हौला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;चार टाँका लगाउनुपःयो । नदुछ्ने सुई दिएकाले दुखेको त्यति पत्तो भएन ।हजुर बिलकलै उत्ताउलो होइसिन्न । त्यौ फ्रकले गर्दा नै मान्छेहरूले हजुरलाईत्यस्तो ठानेका हुन्‌ । एउटा चरित्रवान्‌ मान्छेले त्यस्तो कपडा कहिल्यै पनिलाउँदैनन्‌ । कत्तिको बलात्कार त कपडाले गर्दा पनि हुन्छ । प्रत्येक कुराहरूमैले भन्नुभन्दा पनि आफैँले जान्नुपर्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले ठुस्किँदै भनिन्‌, &#039;दिदीले घरमै यो कपडा नलगाउनु भनेको भए मलगाउँदिनथेँ नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“उमिंला मैयांसापले कपडाको राम्रो तारिफ गरेको सुनेपछि बोल्ने आँट नैआएन । अर्को कुरा कपडाको आधारमा मानिसले हजुरको मूल्याङ्कन कसरीगर्दारहेछन्‌, आफैँले अनुभव गरिसिन्छ जस्तो पनि लाग्यो, त्यसैले कर्था-स्‌रुवालबोकेर आएकी नि !&#039;&lt;br /&gt;
शालुले भनिन्‌, &#039;यो फ्रकलाई ममीकँ अगाडि च्यातेर टुक्राटुका पार्छु ।&#039;शालुको कुरा सुनेर कान्छीको मत खुसीले गद्गद्‌ भयो । कान्छी र शालुक्याबिन तं. १०५ मा पुगै । कोही आएको चाल पाएपछि मोनाले पुलुक्क आँख्चाखोलिन्‌ । कान्छी र शालुलाई देखेपछि मोनाको आँखाबाट आँसुको मूल फुट्यो ।गला अवरुद्ध भयो । शालु र कान्छीका आँखाहरू पनि रसाए । शालुले मोनाकोकपाल मुसार्दै भनिन्‌, &#039;के भयो तिमीलाई :&#039;&lt;br /&gt;
मौनाले कान्छी र शालुलाई स्टुलमा बस्न आग्रह गर्दै भनिन्‌, &#039;दिदीहरूलाईथाहा छैन कि क्या हो ? म त बर्बाद भएँ । मैरो त बलात्कार भयो नि !&#039;&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीलाई हेर्दै भनिन्‌, &#039;के भनेको मोनाले, मैले त कुरै बुझिर्न ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाले घुँक्कघुँगक रुँदै भनिन्‌, हेर्नोस्‌ शालुदिदी मलाई पाँच-छजनालेबलात्कार गरे । बलात्कार गर्दा मरेकी भए पनि हुन्थ्यो । किन बाँचे हुँला ? तर,बाँचेको पनि ठीकै छ । आफूले थाहा पाएदेखि नै पेटभरि खान नपाए पनिअबदैखि पेटभरि खान पाउने भएँ ।&#039; मोनाको अनुहारमा केही खुसीका रेखाहरूकोरिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;कसरी पेटभरि खात पाउने भयौ !&#039; कान्छीले जिज्ञासा राखिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;मोनाले केही हाँसेझैँ गरी भनिन्‌, &#039;मलाई अस्ति बचाउने मालिक-मालिकनीलेलैजान्छ भन्नुभएको छ । उहाँहरूले लैजान्छु नभनेको भए म यही हस्पिटलकोछतवाठै हामफालेरै भए पनि मर्थे, तर त्यो नर्कजस्ता घरमा म फर्कंदैनथैँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु मोनाको क्राले एकोहोरी भइन्‌ । केहीबेरपछि आँखाको आँसु पुछ्दैसोधिन्‌, &#039;तिमीमाथि वलात्कारचाहिँ कसरी भयो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौनाले गहभरि आँसु पार्दै भनिन्‌, &#039;दिदी खुट्टामा नराम्रोसँग सिसाले काटेकोहुँदा हिँडनै नसकेर ओछ्यानमा पाल्टरहेकी थिएँ । बाबुले कराउँदै भन्यो, &#039;मोनाछिटो तल मौर, रक्सी लिन जानुपर्छ भनेर खुट्टा दुखेको बहाना गर्छेस्‌ ?&#039; आमामैरो नजिकै थिइन्‌ । मैले आमालाई भने, &#039;आमा, मलाई भट्टीमा जानै मनलाग्दैन । रक्सी खान आएका पुरुषहरूले कै-के भनेर जिस्क्याउँछन्‌ । त्यसमाथिरात पनि परिसक्यो । खुट्टा पनि काटेको छ, म हिँड्न सक्दिनँ ।। आमा चुपलागिन्‌ । बाबु तलबाट हँसिया बोकेर माथि आयो अनि हँसिया उठाउँदै भन्यो,“खुरुक्क रक्सी लिन जान्छेस्‌ कि यही हँसियाले छिनालुँ ?&#039; बाबु मलाई काट्नअघि सत्यो । म पिटाइबाट बच्न खुट्टा खोच्याउँदै भट्टीमा गएँ । कृष्ण साहुलाईसिसी दिँदै भने, &#039;एक लिटर रक्सी दिनोस्‌ रे पैसा भोलि दिने रे ।&#039; भट्टीमा युवा वृद्धा सबै थिए उनीहरूले हास्दै भने, &#039;यस्ती राम्री छोरी नै पठाएपछि पैसा किनचाहियो ?; हेर्दा-हेर्दै यो त तरुनी पो भई । आइजौ भुटन-चिउरा खा !&#039; भुटनचिउरा देखेपछि मेरो मुखबाट पाती आयो । मैले भने, &#039;छिटो रक्सी दिनोस्‌,मलाई बेर भइसक्यो । साहुले रक्सी दियो, रम्पी लिएर दस-वीस पाइला मात्रके सारैकी थिएँ, एउटाले मलाई च्याप्प समात्यो । अर्कोले मुखमा कपडाकोच्यो । अरू दुई-तीनजनाले घिच्याउँदै मलाई खेतमा लगेर मेरा शरीरमाथिखेल्न याले । म केहीबेर पीडाले छदपटाएं, त्यसपछि के भयो पत्तै भएन । मबाटोमा मिल्किरहैकी देखेर उहाँहरूले यहाँ ल्याउनुभएको रे । साहृ-साहुनीदयालु जस्तै हुनुहुन्छ ।&#039; मोनाले उज्यालो अनुहार लगाएर कुरा थपिन्‌, &#039;दिदीमैले आज टन्त भातमासु पनि खान पाएँ नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुलै अचम्म मान्दै भनिन्‌, &#039;यसभन्दा अगाडि तिमीले टन्त भात्तमासुखाएकी थिएनौँ त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;पेटभरि ढिंडो-पिठो त खान पाएकी छैन । मासुभातको क्रै छोडौं । वाहाछ दिदी मेरो बाबु-आमा टन्न मासु-रक्सी खाँदा मलाई एक टुक्रा मासु खाभनेर दिँदैनथे । भोलिपल्ट बिहान भाँडा माँझदा उनीहरूले फयाँकेको हड्डीचुस्थँ । कहिलेकाहीँचाहिँ उनीहरूले नखाएर फूयांकेको छाला खान्थे । अबभनै... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाह-तेद वर्षकी मोनाको कुरा सुनेर शालुको जीउभरि काँडा उम्नैमौँ भयो ।उनी केही बोल्न नसकेर चुपचाप भइन्‌ । त्यत्तिकैमा मौनाकी आमा भीमाआएर अचम्म मान्दै भन्तिन्‌, &#039;अहो ! शालु नानी र कान्छी पनि आइछिन्‌ । हेर्नोस्‌न शालुमैयाँ यो हैजाले दिनु दुःख दिई । आफनो जीवन पनि बेर्ध पारी । हाम्रोपनि बद्नाम गरी । अब यस्तालाई कसलै पो विवाह गर्ला ? यसका दिदीहरूपनि उमेर नपुग्दै पोई चाहिएर हिँडे । यौ पनि भट्टीका केटाहरूसँग छिल्लीहोला अनि के वाँकी राख्ये, होइन त ! हिजो बिहान एक्कासि यो हस्पिटलमाछे भन्ने खबर आउँदा त सातै गयो भन्या ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु र कान्छीले नै &#039;भीमाको अनुहारमा हेरै । उसको अनुहारमा दुःखकोएक कण पनि थिएन । शालुले गह्रौँ मन पारेर सोधिन्‌, &#039;अस्ति राति मोना घरनआएपछि कहाकिहाँ खोज्नुभयो नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;मोना नआएपछि यसका बाबु फतफताउँदै भट्टीतिर गएका थिए ।“त्यहीँबाटफेरि रक्सी बोकेर आएछन्‌ । मेरो जीउ साह्रै दुखेको हुनाले अलिकति रक्सीपिएकी त भुसुक्कै निदाएँछु । कान्छीको तिधारमा के भयो : हजुरचाहिँ कताबाटनि?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&#039;दिद्वीलाई घाउ लागेकोले टाँका लगाउन आएका थियौं । एकपल्ट मौनालाईहेर्न मन लाग्यो । अनि यहाँ पसेका हौं । मोना तिमी हिँडडुल गर्न सम्छ्यौ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दिउँसोदेखि अलिअलि हिँडे । मेरो डिस्चार्ज पनि भइसक्यो । अहिले साहु-साहुनी मैरा लागि कपडा लिन जानुभएको छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमाले अलि हड्बडाउँदै भनिन्‌, &#039;कुनवैला आउने हुन्‌ साहृ-साहनी, घरढ्विलो गयो भने बूढाले महाभारत गर्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमाको त्यो क्रूर रूप देखेर कान्छी र शालु नै मौन भई उनलाई हेरिरहे ।केहीबेरपछि हातमा कपडाको पोको बोकेर अधबैंसे लोग्ने-स्वास्ती मोनासामुआए । अधबैंसे आइमाईले भनिन्‌, &#039;हिँड बिस्तारै दवाइलेट गएर लुगा फेरौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कपडा लिँदै भनिन्‌, &#039;हजुर यहीँ बसिस्यो, म कपडा फेराइदिन्छु ।&#039;यति भनी शालु मोनालाई लिएर ट्वाइलेटतर्फ लागिन्‌ । मोना पाइलैपिच्छेऐया-ऐया गर्दै टबाइलेटमा पुगिन्‌ । विहान फेरेको कपडामा रगतका केहीटाटाहरू रहेछन्‌ । मोनाले कपडा फेर्न खुद्ठा उचात्दा दाह्रा किटेर ऐया गरिन्‌ रआँसु &#039;भररिन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालुले मोनाको पुरानो कपडा ब्यागमा हाल्दै भनिन्‌, &#039;मोना, दुई-चार दिनयहीँ बसेको भए हुन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
मोनाले लामो श्वास फेर्दै भनिन्‌, &#039;अस्ति बेलुका एघार बजे हस्पिटलल्याएदेखि मालिबनी सापले एकछिन पनि छोडनुभएको छैन । उहाँ पनि रोगीहुनुहँदौरहेछ । हातखुट्टा सुन्निएर आयो, कुर्ने कोही नहुँदा मालिककै घर जानपत्यो ।&#039; शालुलाई मान्छेहरूको विभिन्त रूप देखेर खुसी र दुःख दुबै लाग्यौ ।सबैजना विस्तारै गेट बाहिर निस्कै । शालुले मौनालाई कारभित्रसम्म पुन्याइन्‌ ।कारमा बस्दा पनि मोना ऐया भन्दै बसिन्‌ । भीमाले साह-साहनीतिर हेरैभनिन्‌, &#039;हजुर पैसाचाहिँ एक गते नै चाहिन्छ है । हिज्ञो भनेको भन्दा एक पैसानघटाउनुहोला । फेरि एक गतेभन्दा उता नजाओस्‌ नि ! कार गुड्दा मोनाखिसिक्क हाँसिन्‌ । शालु र कान्छीले पनि हात हल्लाएर बिदाइ गरे । भीमालेकार टाढा पुग्दासम्म त्यही शब्द दोहो-्याइन्‌ । हजुर म एक गते नै पैसा लिनआउँछु । एक गते ........ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पाँच==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;प्रभाते सधैँ-सघैँ सोध्छ । आन्टी शालु किन आउँदिनन्‌ भनेर । खाने मुखलाईजुँगाले छैक्दैन । एक-दुई घन्टा त यसो मुड फ्रेस पनि गर्नुपर्छ । अरू केटीहरूप्रभातै भनेपछि मर्ने खोज्छन्‌, प्रभातेचाहिँ तिम्रो दिवाना बनेजस्तो छ । तिम्रोभाग्य बलेकै छ कि क्या हो ?&#039; उर्मिलाले क्रा चुहाइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रिसाउँदै जवाफ दिइन्‌, &#039;ममी आइन्दा मलाई यस्ता फाल्तु करानगरिसेला । मैरो मुडअफ हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;त्यौ राँडले के-के क्रा गरेर तिम्रो कानमा फुकिहोला, अनि मेरो कुरालेमुडअफ भयो होइन तिमीलाई ! कान्छीले तिमीलाई भड्घालोमा पार्दा थाहापाउली । स्व्रास्तीको गँवारपनले डा. भट्ट अहिले कसैको अगाडि मुख देखाउनसक्दैनन्‌ । तिमीले पनि आफनो लोग्नेको त्यही चाल गराउँछयौँ, मैले देखिसकेँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;ममी हामीबीच किन दिदीलाई ल्याइसिन्छ ? यो जमानामा एकपेट खाएरसम्पूर्ण काम गर्ने मान्छै पाउँदा पनि हजुर खुसी होइसिन्त !&#039;&lt;br /&gt;
उर्मिला चर्किन्‌, &#039;त्यस राँडलाई कसले बस भनेको छ र : पैसा पाउनेठाउँमा मर भनेको त हो नि ! त्यसैको बाबुको पेवाझैं ठानेकी छे यस घरलाई ।आमा-छोरीको सम्बन्धमा नै विष घोल्ने त्यो राँडलाई निकाल्न सकिनँ भने मेरोनाम उर्मिला होइन बुझयौ !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीलाई निकाल्ने करो गरेपछि शालु झसङ्ग भइन्‌ र आमाको रिसशान्त गर्नु श्रेय ठानिन्‌ । ज्यादै नम्र स्वरमा भनिन्‌, &#039;ममी पनि त्यसै रिसाइसिन्छ ।सबै सरमिसहरू भन्नुहुन्छ । मेरो पढाइ ज्यादै कमजोर छ रे, त्यसैले पो होटेल,पार्टीतिर जान छोडेकी । हजुरलाई थाहा नै छ अस्ति नशा पिउँदा म झन्डैबैहोस भएकी ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;ल-ल चेपारो घस्नुपर्दैन । आमाको मन राखिदिनक्रहिलेकाहीँ जाँदा कति नै पढाइ बिग्रिन्थ्यो र ? लाटी, पहिला-पहिला रक्सीपिउँदा मलाई पत्ति कम गाह्रो पर्दैनथ्यो । बिस्तारै पिउँदै जाँदा अहिले म रक्सीनभई बाँच्नै सक्दिनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु आमाको कुरा सुनेर मनमनै रोइन्‌ । कान्छीदिदी अनेकौं घृणा सहँदैआफनो घरमा बस्नुको रहस्य बुझिन्‌ । ममीले तारिफ गरेको कपडा लगाउँदासहनुपरेको अपमान सम्झिन्‌ । कान्छीदिदीले दिएको कपडा लगाउँदा मोनालाईलैजाने साहुनीले भनेको पनि सम्झिन्‌ । त्यो साहनीले बडो सभ्य भाषामाभनेकी थिइन्‌, &#039;नानी हेर्दा त ठूलै खान्दानकी जस्ती छ्यौ । धैरै चरित्रवान्‌बनाएका रहेछन्‌ बाबु-आमाले । न लगाइमा उच्छुङ्खलता न व्यवहारमा नै ।के हो नानी तिम्रो नाम र बाब्‌-आमाकी नाम ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमाले बीचैमा भनेथिन्‌, &#039;हो हजुर शालु रानीको सम्पत्तिको गणना गरेरसाध्य छैन, तर शालु रानीकै निम्ति यही कान्छीले सारा जीवन अर्पिन्‌ । त्यसैलेछरछिमैकीहरू यिनलाई शालुको पहिला जन्मको आमा हनुपर्छ भन्छन्‌ । मालिक-मालिक्नीले त सयौँपल्ट निकाल्न खोजेका थिए, शालु रानीकै मायाले त्योघरमा अडेकी छिन्‌ यिनी ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाको मालिक्नीले खुसी हुँदै कान्छीलाई विस्तारै दुईपल्ट घाप मारिन्‌ ।शालुको आँखामा त्यो दृश्य पनि नाच्यो ।&lt;br /&gt;
“लौ कहाँ हरायौ शालु ? आमाको शब्दले शालु झसङ्ग भइन्‌ र भनिन्‌,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;ममी हजुरको सुन्दर रूप देखैर टोलाएकी । साँच्चै हजुरहरूको ग्रुपमा हजुर नैरामो होइसिन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;हेरन फुर्क्याएकी । यो रातो लिपिस्टिक लाउँदासुहाउँछ कि, गुलाफी लिपिस्टिक लाउँदा सुहाउँछ भन त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हजुरलाई दुबै लिपिस्टिक सूहाउँछ, तर गुलाफीले चाहिँ सौभर देखिन्छ,&#039;शालुले उत्तर दिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिम्रा पापाले त रातै मनपराइसिन्छ भन्या । त्यसैले रातै लिपिस्टिक लगाउँछुहै? फेरि आज हामी दस-बाह?जनालाई मात्र बर्मा सापले बोलाएका छन्‌ ।त्यसैले पापाले कार हांँक्नुहुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दिदी यो टीका लगाउनोस्‌, ममीले त सधैँ यस्तै टीका लागाइसिन्छ । अनिमात्र दिदीसँग तरकारी किन्त जान्छु ।&#039; कान्छीले टीका हेर्दै जिब्रो काढ्दै भनिन्‌,“उमिंला मैसापले थाहा पाउनुभयो भने मार्नुहुन्छ । जे होस्‌, हजुरलाई मनपर्नेहुनाले लगाइदिन्छु ।&#039; कान्छीले आफूले लगाएको टीका खोलेर शालु दिएकोटीका लगाएर तरकारी किन्त हिँडिन्‌ । बाटोभरि चिनैकाले कान्छीको मुखमाहेरेर हाँस्दै भने, &#039;होइन कान्छी तिमी त बहुलाउन लाग्यौ किक्याहो? योधोतीमा त्यस्तो टीका कहीँ सुहाउँछ ! बैँस धान्यौ, बुढ्यौली धान्न सक्दिनौजस्तो छ अब, तिमीलाई तिधारै ढाक्ने लामो टीकाभन्दा सानै टीका सुहाउँछ ।&#039;कान्छीले कसैको कुरा पनि वास्ता गरिनन्‌ । घरमा आएपछि शालुले लामोटीका झिकेर सात्रै टीका लग्राइदिइन्‌ । तीन-घार वर्षअगाडिको कुरा सम्झैरशालुलाई नमज्जा लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रातो लिपिस्टिक लगाएर पुनः सोधिन्‌ उर्मिलाले, &#039;भन त नानु म कस्तीभएँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ममी ज्यादै राम्रो भइस्यो । म जान्छु है&#039; भन्दै शालु आफनो कोठामापसिन्‌ । ओछ्यानमा पल्टेर दिदीले गाली खाँदाको त्यो क्षण पनि सम्झिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिदी आज पनि हिजो काकाको घर जाँदा लगाएको त्यही साडी लगाउनौस्‌ ।त्यो साडीले तपाईलाई साह्रो सुहाउँछ । कान्छीले त्यही साडी लगाएपछि शालुरमाइन्‌ । सधैँ साँझमा मात्र घर फर्किने उर्मिला बैंकको चैक लिन घर आइन्‌ ।कान्छीलाई नयाँ साडीमा देखेपछि कान्छीलाई कहाँ गएर आएको भनेर सोधिन्‌ ।कान्छीले कहीँ पनि गएकी छैन भनेपछि चिच्याइन्‌, &#039;मलाई ढाँद्छेस्‌ नकचरी,बाहिर जाने साडी लगाएकी छे, सोझो करा गर्दिन । सधैं म नभएको मौकापारैर बाहिर मर्दी पो रहिछे ।&#039; (कान्छी चुप लागिन्‌)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;मुसुमुन्द्रे रा जे भने पनि एक कानबाट सुनेरअर्को कानबाट उडाउँछै । भन्‌ कहाँ मरेकी थिइस्‌ ? कोसँग पल्केकी छस्‌ हं ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले आफनो कोठाबाट निस्केर भनिन्‌, &#039;किन दिदीलाई गाली गरिस्या ममी : कुरा नै नबुझी गाली गर्नै हौ ? मैले दिदी हिजो लगाएको साडीलगाउनुहोस्‌ तपाईंलाई सुहाउँछ भनेर जिट्टी गरेपछि, बल्ल उहाँले लगाउनुभएकोहो । हजुरले त सघैँ राम्रो-राम्रो साडी लगाइसिन्छ । दिदीले एक दिन पनि राम्रोसाडी लगाउन हुँदैन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;गालु तिमी पनि अचम्मकी छ्यौ । घरको काम गर्दा साडी लगाएर कामगर्न गाह्रो हुन्छ । यस्ती बच्चीले जे भन्यो त्यही गर्ने यो पनि कम्तीकी छे?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुलाई अतीत सम्झेर मनमा कता-कता नमज्जा लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साँझ-साँझ परेपछि उमिला र दीपक कारमा बाहिर गए । कान्छी भान्साकोकाम गर्दै थिइन्‌ । शालुले कान्छीको नजिक वस्दै भनिन्‌, &#039;दिदी के गर्नलाग्नुभएको ? तपाइँको कामचाहिँ म गरिदिन्छु । मैले भनेको कुराको उत्तरचाहिँतपाईंले दिनुहोस्‌ नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हजुरले अलि-अलि कामचाहिँ सिक्नुपर्छ, तर अलिपछि मात्र, अहिलेको कामभनेकै पढ्ने हो । गइस्यो कोठामा बसेर पढिस्यो, म तातो दूघ लेराइदिन्छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन, आज के कुरा हुँदैछ, आमाछोरीको, हामी पति सुनौं न !&#039; चन्द्रकान्तठट्यौली गर्दै भान्सामा पसे ।&lt;br /&gt;
“के हुनु नि तिम्रै कुरा गरेको, हामी दुईजनालाई भए तरकारी पकाउनुपर्दैनथ्यो । तिमी हलीले खाने जति तरकारी खान्छौ त्यसैले तरकारी कादनलागेकी&#039;, कान्छीले उत्तर दिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमीलाई दुःख हुने भए बाहिरै खाउँला नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;ल हेर चन्द्रकान्त त रुतै थाले । सानौ करामा पनि चित्त दुखाउँछ्‌ यिती । जाबोतरकारी पकाउन के गाह्रो ? मारी बोबनुपनै होइन ।&#039; कान्छीले उत्तर दिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले चन्द्रकान्ततिर हेर्दै भनिन्‌, &#039;बस्नोस्‌ न दाइ । म दिदीलाई यहाँ किनआउनुभयो, फेरि यत्रो वर्षसम्म किन यहीँ बस्नुभयो त्यही कुरा बुझत दिदीलाईफकाइरहेछु ।&#039; -&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले शालुको कुरामै सही मिलाउँदै भने, &#039;भन न कान्छी हामी पनिसूनौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले काट्दै गरेको तरकारी पर सार्दै भनिन्‌, &#039;त्यसो भए चन्द्रकान्तलेथोरै तरकारीमा चित्त बुझाक है त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमीले मागे त यो प्राण नै दिन्थेँ । जाबो तरकारी त के, तिमीले मनकोकुरा बुझिनौ र पो मात्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले हाँस्दै भनिन्‌, “यो चन्द्रकान्त दाइलाई ठट्टा गर्ने कसले सिकाओस्‌,होइन दिदी ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले आँखामा टल्पल आँसु पार्दै भने, &#039;मोरिजाकँ मैयाँ ढाँटेकोहोइन । यो घरमा पसेपछि कान्छीले हजुरलाई माया गरेको देखेपछि म मेरोटुहुरो छोरोलाई यही आमा दिन्छु भनेर क्रैँ । कुर्दाकर्दै कपाल फल्न लाग्यो ।यिनले मेरो आखाको भाषा बुझ्दै वुझिनन्‌ । अव त छौरो पनि आठ-दसबर्षको भइसक्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले अलि रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;मैयांसापसँग पनि चाहिँदो-नचाहिँदो कुरागर्ने हो ? हेरिस्यो मैयाँसाप यिनी मभन्दा तीन-चार वर्ष कान्छा छन्‌ । म यहीपुसमा पैंतीस पुगेर छत्तीस लाग्छु । वास्तवमा चन्द्रकान्तले स्वास्नीको मायालेकतै बिवाह नगरी वसेका हुन्‌ । एकान्तमा रोएको दुई-चारपटक त मैले पनिदेख्लेकोचाहिँ छु । मैले कति सम्झाइसके विवाह गर भनेर यिनी पटक्कै मान्दैनन्‌ ।म जस्तोको कुरा के खान्थे ?&#039;&lt;br /&gt;
वर्षौँवर्षदेखि बाँधेको बाँध एकैचोटि भत्केझै गरी चन्द्रकान्त घुँक्कघुक्क गर्दैरुन थाले ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी र शालुलाई नै चन्द्रकान्तको पीडा देखेर साह्रै नमज्जा लाग्यो ।दुबैले सोचै- चन्द्रकान्त स्वास्नीलाई सम्झेर भक्कानिए । कान्छीले चन्द्रकान्तकोकुरा मोड्दै पलङमा वसेर आनन्दले कूरा गर्ने बताएपछि तीनैजना शालुकोपलङ्गमा बसेर गफ गर्ने थाले । कान्छीले लामो श्वास फेर्दै भनिन्‌, &#039;शालुमैयाँसापको मायाले गर्दा सबै कुरा भुनिसकेकी थिएँ । पुनः मैयाँसापको आग्रहलेअतीत काट्याउँदै छु- मलाई याद छ, म पनि सानोमा हजुरजस्तै चञ्चलथिएँ । त्यसैले होला आमा मलाई चञ्चली भन्दै बौलाउन्हुन्थ्यो । बा-आमा रम अति नै हाँसीखुसीका साथ दिनहरू बिताइरहेका थियौँ । म पढ्नमा तेजभएकी हुँदा एक कक्षादेखि नै प्रथम भएँ । म प्रथम हुँदा बाले प्रत्येक वर्ष खसीढाल्नुहुन्थ्यो रे । म पांच कक्षामा हुँदा खसी काटेर सबै गाउँलेलाई भोज खानदिएको त मलाई अझै याद छ । हाम्रो खुसीमाथि दैवलाई इर्ष्या भएरै होला वावुआफुभन्दा बाह्र वर्ष कान्छी अत्यधिक राम्री इन्दुको मायामा फसेछन्‌ । त्यसपछिघरमा सधैँ रडाको मच्चिन थाल्यो । बाले मेरी गंगाजस्ती आमालाई विभिन्नपुरुषहरूको बात लगाउन थाले । मलाई पनि त मेरी छोरी नै होइन भन्दैबिनाकारण कुट्न थाले । एकरात मेरी आमालाई अहिले निस्किनस्‌ भने आजकोरात काट्न दिन्न भनेपछि आमा मलाई छलेर मामाघर गइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रुन्चे स्बरमा सोधिन्‌, &#039;दिदी रात कादन दिन्न भनेकोचाहिँ के होनि? फेरि तपाईंलाई किन छाडनुभएको नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले पनि आफनो रसिलो आँखालाई धोतीका टुप्पौले पुछ्दै शालुकोप्रश्नको उत्तर दिइन्‌- &#039;रात काट्न दिन्न भनेको तलाईं मार्छु भनेको हो । मलाईघरमै छोड्नुको कारणचाहिँ छोरीले पेटभरि खान पाउली भनेर हुनुपर्छ । किनकिमेरो बाबु प्रशस्त पुँजीवाल थिए । मामाघरमा पेटभरि खान साह्रै गाह्रो थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मामाघरमा माइजूले आमालाई अति नै हेला गर्न थालेपछि फुपूले आमाको दुःखहेर्न नसकी स्बास्नी मरेको तीन छोराछोरीको बानु बूढो-बूढो पुलिससंग टीका-टाला गरेर पठाइदिनुभएछ । पछि पैले आमाको बारैमा सोध्दा भन्नुहुन्थ्यो,“तानी, तेरी आमालाई लोग्नेलगायत सौतेला छोराछोरीले पनि असाध्यै मायागर्छन्‌ । जाँदा तँलाई पनि लैजान्छु, त्यो तर्कमा छोरी राख्दिनचाहिँ भनेकी हो ।हामीले नै तँलाई उससँग पठाउन उचित ठानेनौँ । आमाले पठाएको पैसा-कपडाचाहिँ बेलाबेलामा फपूले लेराइदिनुहुन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले बीचैमा सोधिन्‌, &#039;तपाइँकी आमा गएपछि तपाईंको बाबुले के गरे ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बर आँसु खसाउँदै कान्छीले भनिन्‌, &#039;बानुले आमा गएको रात नै अलिठूलो भुँडी भएकी साह्टै रामी पुतलीजस्ती सानीआमा इन्दुलाई घरमा भिच्रायाए ।सानीआमाले मलाई शङ्ककाल्‌ आँखाले हेरेपछि बाबुले हाँस्दै भने, &#039;यसलाईछोडेर मरिछै । हुन्देक तिम्रो स्याहारसुसार गर्ने काम लाग्छ । तिम्रो फलजस्तोतरम हात्तले काम गरैको म हेर्न सक्दिनँ । नभन्दै त्यसै दिनदेखि बानुले त्योपुतलीजस्ती सानीआमाको खुट्टा मिच्नदेखि लिएर सम्पूर्ण काम गर्ने लगाए ।बाबुले घरमा ल्याएको चार महिनामै सानीआमाले सुन्दर छोरो पाइन्‌ । त्यसपछित झन्‌ बाबुको खुट्टा भुइँमा नै भएन । छिमेकीहरूले “कै हौ रामे चार महिनामैछोरो पायौ नि&#039; भनेर भन्दा बावु जँगा मुसार्दै भन्थे, &#039;हाम्रो भेट भएको त एक-दुई वर्ष भइसकेको थियो । जेठी घरमा हुँदाहुँदै कान्छी भित्रायाउनु मनले मानेनजेठी हिँडेपछि बल्ल मैले यिनलाई भित्रयाएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छिमेकीहरू उत्तर दिन्थे, &#039;किन क्रो चपाउँछौ, रामे, जेठी ननिकाली कान्छीआउन्न भनिन्‌, त्यसैले जेठीलाई निकालेँ भनन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाबु हाँस्दै भन्थे, &#039;ल भन्नोस्‌ मैले जेठीलाई कुटेर निकालेको हो त!अघिपछि यस्तो कृटपिट भयौ होला अर्कै क्रा, त्यस दिन छोएकोसम्म पनि छैनमरिजाकँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;बचनले कृट्यौ होला तत्र घर नै छोड्नेखालकी थिइनन्‌ कान्छीकी आमा ।जे होस्‌, बुढेसकालमा कान्छीकी आमालाई सम्झी-सम्झौ नरोएस्‌ । छिमेकीहरूसबै त्यसै भन्थे ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाबुले उन्मत्त हाँसो हाँस्दै ठाडो उत्तर दिन्थे, &#039;मेरी कान्छीलाई देखेपछिडाहा नगर्ने मान्छै नै देखिनँ ।&#039; बाबुको कराले छिमेकीहरूको मुख बन्द हुन्थ्यो । मेरोपीडा मसँगै थियो । बिहान चार बजेदेखि उठेर घरको सम्पूर्ण काम गर्थे ।भाइको दिसाको थाङ्ना घुनदेखि लिएर तेल लगाइदिने जिम्मा पनि मेरै थियो ।गाई-भैंसी चराउने, भकारो सोत्तर गर्ने, भात पकाउने गर्दा पनि कहिल्यै जसर पेटभरि खान पाउँदिनँथैँ । म मर्नु-बाँच्नुको दोसाँधमा दिन घिसारिरहेकीथिएँ । आमाले पठाइदिने गरेको कपडा र खानेकुरा सानीआमाले खोसेर माइतीपठाइदिन्थिन्‌ । एकदिनको कुरो हौ । म साह्ै भौकाएर गौठालाबाट घर आएँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अँगेनामा फुक्क फुलेको चामलको रोटी देखेँ, भोक खै नसकेर एउटा रोटीचोरेर भाग्दै थिएँ । भाइले रोटी चोरेको देखैछ । आमालाई क्रा लगाइहाल्यौ ।आमा चौटावाट दौडेर आई मलाई लछादै अँगेनामा लगेर तातो भुङ्ग्रोमा हातघुसादै भनिन्‌, &#039;यही होइन तेरो रोटी चोर्ने हात, अब पनि चो्छस्‌ कि : म पीडासहन नसकेर चिच्याएँ । एकैछिनमा हातमा ठूलाठूला फोका उठे । साउनकोमहिना थियो, म पोलेको पीडा सहन नसकेर मर्न भनी खोलातिर दौडँदै थिएँ ।काकीले समातेर ल्याई घाउमा घ्यूकुमारी लगाइदिनुभयो । वेलुका वाबु आएरमेरो घाउ हेर्नुको साटो चोर्नी रण्डीको बान भन्दै मेरो कपाल जगल्द्याएरथाममा ठोक्काइदिए । म पुनः मर्लान्त भएर पछारिएँ । त्यो पोलेको हातले पनिशान्ति पाएन । बेलुका भाँडा माझ । सबैजना हात कुहिएर झर्छ भन्थे । तरझरेन, महिनौं पछि हात निको भयो । दाग भने अझै छ। कान्छीले शालु रचन्द्रकान्तलाई दाहिने हात बढाएर हातको दाग देखाइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु र चन्द्रकान्तका आँखाबाट आँसुहरू बग्न थाल्यो । कान्छीले पनिआफनो आँखाको आँसु पुछ्दै भनिन्‌, &#039;हजुर रुने भए अब म करै गर्दिनँ ।&#039;शालुले रत्चे स्वरमा भनिन्‌, &#039;दिदी अव साँच्चै रुन्न ल सबै कूरा भन्नौस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले कूरा बताइन्‌, &#039;मासु पकाएका दिनहरूमा भने मलाई चाँडै सृत्नपठाउँथे । भाइहरू सुतेका छन्‌ भने पनि भाइहरूलाई उठाएर मासु खुवाउँयै ।म थाहा पाएर पनि थाहा नपाएझौँ गरी रुँदै सुत्थैँ । भोलिपल्ट थुप्रिएकाभाँडाहरू माझ्दा ठीक मोनाले भनेझैँ म पनि हड्डी र छालाहरू चपाउँथैँ ।यसरी अति नै कष्ट सहेर अठार वर्ष बित्यो । गाउँकै पढेलेखेका भावेन्द्रले मेरोदुःख हेर्न नसकी मागी मलाई मन्दिरमा लगैर सिन्दूर हालै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्त कान ठाडो पार्दै भने, &#039;कान्छी तिम्रो कुरा भोलि सुनौँला । तलकारको हर्न लाग्यो ।&#039; चन्द्रकान्त गेट खोल्न गए । शालु खाना खान्न भन्दैओछयाचमा पल्टिन्‌ । चन्द्रकान्तले पनि खानै इच्छा छैन भने । कान्छी पनिभोकै सुतिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==छ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्कुलबाट आएपछि कपडा पनि नखोली कान्छीसामु गएर उनको हात मुसादैंशालुले भनिन्‌, &#039;दिदी आज ममी-पापा मात्र बाहिर जाने कुरा सुनेकी थिएँ ।चन्द्रकान्त दाइ पनि हुनुहुन्छ । अस्तिको बाँकी तपाईंको कथा भन्नुस्‌ है ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले विरक्त स्वरमा भनिन्‌, &#039;अब म हजुरलाई केही करा गर्दिनँ । मैरोकुरा सुनेपछि हजुर र चन्द्रकान्तले कति दिन खान खाइसेन । बितेको कुरासम्झँदै मन दुखाएर कहीं काम लाग्छ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीको गालामा म्वाइ खाँदै फकाइन्‌, &#039;ल आज साँच्चि पीरगर्दैनौं । मलाई त कहिले वाँकी कुरा सुनौं जस्तो भइसक्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीले मुसुक्क हास्दै भनिन्‌, &#039;हजुरको कुरा कसले पो टार्न सक्ला र?जिरी गरेपछि गस्यो, गस्यौ । त्यसौ भए आजचाहिँ खाना खाइवरी बसौंला है ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले खुसी हुँदै झ्यालबाट फूलबारीमा पानी हाल्दै गरेको चन्द्रकान्तलाईबोलाइन्‌ । चन्द्रकान्त फूलमा पानी हालिसकेर आए । त्यतिखेरसम्म कान्छीलेकुकरमै खाना बसाइन्‌ । खाना पाक्न बेर नै लागेन । तीनैजनाले बिहानकैँतरकारी र अचारसँग खाना खाए । कान्छीले भान्सा पुछपाछ गरिन्‌ । चन्द्रकान्तलेभाँडा माझ । शालुले भाँडा घोप्ट्याइन्‌ । चाँडै काम सकेर तीनैजना कोठामागए । पलङमा सञ्जिलोसँग बसे । कान्छीले शालुतिर हेर्दै भनिन्‌, &#039;हजुरलाई क्रासुन्न पाएपछि पढ्न पनि पर्दैन ? जाँच बिग्रियो भने मचाहिँ रिसाउंछु नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(दिदी पनि, एकैछिन नपढ्दैमा कहीँ पढाइ विगिन्छ र ? म पढ्छु । साँच्चैराञ्चैसँग पढ्छु । ल भन्नोस्‌ । भावेन्द्रसँग विबाह भएपछि के भयो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले भावुक हुँदै कुरा बढाइन्‌, “भाबेन्द्रसँग विवाह भएपछि मैले भावेन्द्रर उसको घरपरिवारको भरपूर माया पाएँ । मेरो विवाह गरेको तीन-चारमहिना पनि नवित्दै बाबुलाई एकदिन बेलुका धानमा पाती लगाउन गएकोमौका पारी कसैले दाउराको चिर्पटले टाउकोमै बजारेछन्‌ । बाबु चोट सहननसकी त्यहीँ बेहोस भएछन्‌ । हान्ने मान्छलेचाहिँ बाबुलाई मन्यो भनेरै छोडेकोहोला, संयोग बाबु उत्तानो परेर ढलेको हुँदा पानीमा मुख गाडिएको रहेनछ ।भोलिपल्ट खेतमा जानेहरूले देखेपछि हस्पिटल पुन्याएछन्‌, हस्पिटल लगेर होसखुल्ने सुई दिएपछि होस खुल्यो रे ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“दिदी कसले किन हानेको रहेछ त्यो पापीलाई ? तपाईं हेर्न जानुभयो त !&#039;शालुले जिज्ञासा राखिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठूलोबुबाको जेठो छोरो र सानीआमाबीचको नरामो सम्बन्ध मलाई घेरैपहिलादेखि नै थाहा थियो । उनीहरू मलाई त मान्छे नै गन्दैनथे । कहिलेकाहीँम घरभित्र छु भने दाइ आएर भन्धे, &#039;वानी, बाहिर जा, म घरबाटनिस्कन्धें । सानीआमा र दाइको हाँसोठट्टा भने बाहिरैसम्म सुनेकीथिएँ । बालै आफनी प्राणप्यारी स्वास्नी र छोरोकै बीचको सम्बन्ध थाहापाएपछि आमालाई गाली गरे रे भन्ने सुनेकीचाहिँ हुँ । आमा र दाइकै मिलेमतोमाबाबुलाई मार्न खोजेको हुनुपर्छ भन्ये छिमेकीहरू, तथ्य कुरा उनीहरूलाई नैथाहा हौला । दाउराले हानेपछि बाबुको मुन्टो केही हल्लिन थाल्यो । चालीस-पचास हजार खर्च गरेर टाउकोको अप्नेसन गरे सफल पति हुत सक्छ, असफलपनि हुन सक्छ भन्दा सानीआमा अप्रेसन गर्न तयार भइनछन्‌ । मेरो लोग्नेलाईकेही भयो भने कसले जिम्बा लिन्छ भन्दै बाजिन्‌ रै भन्ने सुनेकी थिएँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुलाकको सुब्बासम्म भएका बाबुलाई पेन्सन नपाकी अफिसबाट काम गर्नसक्दैनस्‌ भनी निकालिदिएछन्‌ । बाबुको मुखबाट बेलाबेलामा -्याल निस्किनथालेपछि कान्छीआमा बाबुलाई पिँढीमा भात दिन्थिन्‌ रै भन्ने हल्ला सुनेकीसम्महुँ । म त्यो निर्दयी बाबुलाई हेर्नसम्म गइनँ । त्यौ पतिङ्गर मलाई र आमालाईसम्झौर धेरै रुन्थ्यो रे । त्यसै भन्थे छिमेकीहरू ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले फेरि प्रश्न गरिन्‌, &#039;त्यो अहिले जिउँदै छ कि मम्यो दिदी !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;त्यौ पापी यति छिट्टै के मर्ध्यौ ? कान्छीआमाको गोठालो भएर बसेको छरे । ठूलोबुबाको छोराले स्वास्नी बिबाह गरे पनि सातीआमालाई पनि छोडेकाछैनन्‌ रे । फुपू त्यसै भन्नुहुन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु र चन्द्रकान्तकै अनुहारमा खुसी छायो । शालुले मुसुक्क हाँस्दै भनिन्‌,&#039;दिदी तपाइंको सानीआमा र जातुला दई काट्न म नै जान्छु भन्ने सोचेकी थिएँ ।दैवले नै काटेछ त्यस निचलाई मैले केही गर्नुपरेन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले सम्झाइन्‌, &#039;मैयाँसाप हामीले रिसलाई बडो कन्ट्रोल गर्नुपर्छ, ।कहिलेकाहीको रिसले मान्छेको सिङ्गो जीवन नै तहस-नहस हुन्छ । हजुरलेबुझिराख्नुपर्ने कुरा यही हो । मेरो बाबु-आमा, मोनाको बाबुजस्ता मान्छेहरू तरक्कयानसरह हुन्‌ । उनीहरू जस्तालाई चलाउँदा आफनै मुखमा छिटा पर्छ ।&#039;२&amp;quot; &#039;ल ल अब चाँडै रिसाउँदिन तपाईं र भावेन्द्रबीचको क्रा गर्नुहोस्‌ । त्यतिमाया गर्नै भावेन्द्रले तपाइँलाई किन छोडे ?&#039;&lt;br /&gt;
के भनौं मैयाँ मैरो भाग्यमै खुसी लेखेको रहेनछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले मुटुमा गाँठो पारेर भने, &#039;शालु मैयाँसाप, म कान्छीलाई सक्दोखुसी दिन तयार थिएँ र छु पनि यिनलाई आफनो खुसीको मलतब नै छैन ।विनको प्राण त केवल हजुरमै अड्को छ । हजुरले भन्ठानिस्यौ होला अस्तिकान्छी चिप्लेर लडिन्‌, त्यौ होइन हजुरलाई पार्टीमा जानबाट रोक्नकै लागियिनले जानीजानी आफनो टाउको फुटाएकी हन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“चुप लाग चन्द्रकान्त नत्र म तिमीसँग बोल्दिनँ । हैन, त्यसो हैन मैयाँसापचन्द्रकान्त &#039;फूट हुन्‌ । यिनको वनावटी कुरामा विश्वास नगरिसेला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले आफनो आँखाको आँसु हातले फुड ओभानो पार्दै भने, &#039;होमैयाँसाप हजुर झुल्दै आएको देख्दा यिनको होस नै गुम भयो । यिनी रातभरिहजुरकै पीरले सुत्न सकिनन्‌ । भोलिपल्ट मसँग शालु मैयाँसापले रक्सी पिएकैहो त भनेर सोधिन्‌ । मैले मैयाँसापले रक्सी पिइस्या होइन । त्यो प्रभातेले नैफेन्टामा केही हालेर मैयाँसापलाई दिन पठाएको हुनुपर्छ । त्यो प्रमातेको चरित्रराम्नैँ छैन, मैले धैरै केटीहरूसँग देखेको छु । मैले मैयांसापको रक्षा नगरेको भएके हुन्थ्यो होला&#039; भनेपछि यिनले भनिन्‌, “चन्द्रकान्त तिम्रो गुण म कहिल्यैबिर्सने छैन । अनदेखि मेरो मैयाँसापलाई त्यस्ता प्रभातेहरूको आँखाबाट टाढा राख्न सकिनँ भने म आफनो जन्मलाई धिक्कार ठान्छु । म मोर्छु चन्द्रकान्तशालु मैयाँलाई केही भयो भने म त मोर्छु भन्दै थिइन्‌ । उमिंला मैयांसापलेदीपकसापसँग कुरा गरेपछि पौ म झसङ्ग भएँ। उमिंला मैयाँसाप भन्दैहोइसिन्ध्यो- हेरिस्यौ हजुर, त्यो कहीँ नभएकी लवस्तरीले आज शालुलाई रोकेरैछौडी । शालुलाई दिदी छैन वाहिर गएकी छिन्‌ भनेर &#039;झुक्काइसकेकी थिएँ ।हत्तनपत्त दवाइलेटमा गएर टाउको पो फटाएर मरिछे । शालुले त्यसको निधारमाकँ रगत देखी उसलाई पुगिहाल्यो, मसंग आउन किन मान्ची । साह्रै घटियाआइमाई रहिछै त्यो । 0 01014 [लाई त्यसको सङ्गतबाट छुटाएन भने हामी कहीँमुख देखाउन लायक हुँदैनौं । कम्की छे त्यो राँड शालुमाधि सम्पूर्ण अधिकारमेरै छ जस्तो गर्छ । बिहानदेखि एक थोपा पानी पनि मुखमा हालेकी छैनत्यसले । अब शालुलाई दुई-चार दिन बाहिर पठाएर त्यसलाई निकाल्नैपन्यो ।त्यो हुँदासम्म शालु हाम्रो कुरा भन्दा त्यसैको करा सुन्छिन्‌ । सधैँ कमारीकँजीत कति सहनु ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डीपकसापले नराम्रो केही भन्नुभएन । उमिंला मैयाँसापलाई सम्झाउनुभयो,हेर उर्मी, कुवाको पानी सिदिएपछि मात्र कुबाको महत्व थाहा हुन्छ । कान्छीनपढेकै भए पति समझदार छै । शालुलाई हानि हुने कुरा क सोच्न पनिसबिदन । बस हामीमै कतै खोट भएर शालु कान्छीकै क्रामा विश्वास गर्छिन्‌कि सोच त । दीपकसापले के त्यति मात्र भन्नुभएको थियो उर्मिला मैयाँसाप तसिंहिनीझौ गरी गर्जिन थाल्नुभयो । त्यसो भए म नै नजाती हँ । अब म मरेपनि भयो होइन ? दीपकसापले सम्झाउँदै भन्नुभयो- &#039;उमिला चुप लाग मतनदुख्लाक । म शालुलाई दुई-चार दिनका लागि बाहिर घुम्त लैजान्छु । तिमीकरसंगरी भए पनि कान्छीलाई घरबाट निकाल । त्यसको कारणले घरमा धेरैअशान्ति भयो । मैले उहाँहरूले गरेको कुरा कान्छीलाई आएर भने ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले बडो सरल रूपमा नै भनिन्‌, &#039;यो घरबाट मेरो लाश निस्किन परेपनि म यो घर छोड्दै छोडदिनँ । म भइनँ भने मेरो शालु मैयाँसापको जीवनभत्किन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कान्छी चिच्याइन्‌- कति बकवास ओकन्छौ चन्द्रकान्त तिमी, मेरो करासुन्न बसेको कि आफनो भाषण सुनाउन ? चुप लाग्लान्‌ भन्यो, :&lt;br /&gt;
चुप त लाग्नै नै होइन तिमीलाई झूट ओकल्न कसले सिकायो हँ ? सँगैबसेपछि कहिलेकाहीँ ठूली मैयाँसापले गाली गरिस्यो &#039;होला तर उहाँ तिमीलेभनेभौँ कठोर होइसिन्न ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले केही दिनअगाडि मात्र आफनी आमाले भनेको कुरा सम्झिन्‌ । शालुबेटा, तिम्रो पापाले तिमीलाई एक-दुई दिन घुमाउन लाने कुरा गरिस्या छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;किन म मात्र हजुर पनि जाँ न एक्लै बोर हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाको जवाफ थियो यहाँ व्यापारमा अलि किचलो भएको छ, म जानमिल्दैन । पौखरा पुगेपछि तिम्रो साथी सिर्जना छँदैछिन्‌ नि । सिर्जनाले तिमीलाईहेर्न मन गरेकी छिन्‌ रे क्या । पापाको फुर्सद हुनेबित्तिकै पापाले तु लगिसिन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले शालुको हात समातेर मुसार्दै भनिन्‌, &#039;हेर यो चन्द्रकान्तको झुटोकुराले गर्दा मैयाँसापको मन दुख्यो । यो मगरको जात एकोहोरो पो हँदोरहेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“चन्द्रकान्त ! शालुलाई बचाएकोमा तिम्मौ गुण कहिल्यै बिर्सन्न भन्नै पनित्यही मुख, आज अनेक थरी भन्नै पनि त्यही मुख । जे कुरा पनि शालुमैयाँसापलाई केही नभन है म बिन्ती गर्छु भन्छिन्‌ । आज पोल खोलिदिएँ बोलेबोल न बौले नबोल । कहिले पो तिमीले मेरो हृदय चिहाएकी छौ र ? शालुमैयाँसाप एकान्तमा म स्वास्तीको मायाले होइन यिनको मायाले रुन्छु । आजसम्मम विवाह नगरी यिनकै मायाले बसेको हँ । स्वास्नीको माया लाग्छ, नलाग्नेहोइन । मैले उनलाई पाठेघरको क्यान्सरबाट बचाउन सारा सम्पत्ति सिध्याएँतर केही लागेन, मरेकी स्वास्नीको खुसीका लागि त्यो टुहुरो छोरोलाई यहीआमा दिन्छु भनेर बसें, आज त यस्तो &#039;फुटो उस्तो &#039;फुटो पो भन्छिन्‌ । काजीसापको के काम नमिलेर मात्र शालु मैयाँसापलाई पोखरातिर लगिस्या छैनत्यसपछि थाहा पाउली के होला ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कुरा मोद्धनु नै उचित ठानिन्‌ र भनिन्‌, “चन्द्रकान्त दाइ अब सबैकुरा छोडेर दिदी र भावेन्द्रको कुरा सुनौँ, तपाईंहरू दुवैजना चुप लाग्नुहोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले उठ्दै भने, &#039;म यित्तको एउटा कुरा पति सुन्दिन । कै नै कुराहोला र लोग्नेकै खुसीका लागि फेरि बलि भइ्टहोलिन्‌ र यो तर्कमा आइन्‌ ।&#039;यति भन्दै चन्द्रकान्त रिसाउँदै हिँडे । कान्छी र शालु हेरेको हेरै भए । दुवैलेचन्द्रकान्त रिसाएको पहिलोपल्ट देखेका थिए ।&lt;br /&gt;
कान्छीले भनिन, &#039;चन्द्रकान्तले जे भने त्योचाहिँ सोड्रैञाना ठीक हो । मबाटचार वर्षसम्म वच्चा नभएपछि घरपरिवारले मलाई साह्रै हैला गर्न थाले ।भावेन्द्रले मलाई घरमा नबसी हामी हङकङ जाँ, उतै गएर राम्रो औषधिगरौँला भनेका थिए । मैले उनको क्रा मानिनँ । तपाईंबाट बच्चा हुन्छ भनेविवाह गर्नुहोस्‌ भनेर जि्दी गरें । उनले सबैको करमा परेर विवाह गरे । विवाहगरेपछि पनि उनमा धैरै परिवर्तन आएको थिएन । सौताले बच्चा पाउनेभएपछि भने थोरै परिवर्तन आयो । भन्थे, &#039;कान्छी तिमीले विवाह गर्नु भनेरठीक गन्यौ । तिम्रै बाटो कुरेको भए सन्तानको मुख नै नदेख्ने पो रहेछु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मलाई पनि उनको खुसी देख्दा लाग्थ्यो । सऔौताको जात न हो कभावेन्द्रलाई मैरो नजिकसम्म पर्न थी । सबै परिबार कान्छीकै पक्षमाथिए । एक रात भावेन्द्र मेरो कोठामा सुत्न आएको निहँमा घरमा महाभारतमच्चियो । भोलिपल्ट भाबेन्द्र अफिसतिर गएपछि सौतालगायत सासूससुरामिलेर मलाई मलाई घिच्चाई-मुन्टाई गरी घरबाट बाहिर निकाले । सौताले त घरबाट निस्किन मानिनस्‌ भने अहिल्यै पेटको बच्चा मारिदिन्छु भनी । त्यसपछित्यहाँबाट निस्केर फपूकोमा गएँ । फूपूले भोलिपल्ट यहाँ लेराइदिनुभयो । हजुरलाईदेखेपछि विस्तारै आफनौ पीडा भुल्दै गएँ । साँच्चै मैयाँसाप अहिले त मलाई तीक्षणहरू सबै सपनाजस्तो लाग्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले सोधिन्‌, &#039;भावेन्द्र तपाईंलाई फेरि कहिल्यै भेदत आएनन्‌ त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मलाई छोडेको पाँच-छ वर्षपछि यहीँ मलाई भेट्न आएका थिए । उर्मिलामैयाँसापले जाने भए जाङ भन्दा हजुरले मेरौ फरियाँ समातैर रुँदै भनिस्यौ,“दिदी जाने भए म पनि सँगै जान्छु । म हजुरलाई समातैर घुँक्कघुँक्क गर्नपुगेछु, भाबेन्द्र कै भन्न खोज्दै थिए, अलमल्ल परे । त्यसपछि &#039;भाबेन्द्र केहीनबोली रुदै हिँडे । त्यसको केही दिनपछि नै काकाले एउटा चिठी र जग्गाकोलालपूर्जा मेरो हातमा थमाएर जानुभयो । यो क्रा आजै हजुरलाई मात्रखोल्दैछु । चिठी पनि अझै छ ल आफैंले पढिस्यो ।&#039; कान्छीले लाजपूर्जा र चिठीनै शालुलाई दिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालुले लालपूर्जा हेर्दै भनिन्‌, &#039;लालपूर्जा जस्तो कुरा पनि यसरी राख्ने हो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो त सम्पूर्ण सम्पत्ति भनेकै हजुर हो । यो सम्पत्तिको कै काम ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीको कुराले शालुको मुटु नै फुट्लाझै भएको थियौ तर मन बाचेरलालपूर्जालाई जतनशाथ आफनै दराजमा राखेर आई चिठी पढ्नि । चिठीमालेखिएको थियो- प्यारी कान्छी सम्झना सधैँको ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी जिन्दगी यस मोडमा आउला भन्ने पत्तै थिएन । हेर त हत्तिँदै तिमीकहाँ पुग्यौ म कहाँ पुगेँ । तिमीलाई सबै खुसी दिन्छु भनेर बिबाह गरै तर आँसुसिवाय केही दिइनँ । तिम्रो सिमल भुवाजस्तै मन पलपल फाट्यो । मैले पनितिम्रो ती निर्बाध आँखालाई धेरै रुबाए । हुन त म त्यहाँ तिम्रो मायाले भनौं यास्वार्थले तिमीलाई लिन नै आएको थिएँ । मबाट बच्चा नहुने थाहा पाएकी भएतिमी पुनः मसँग आउँथ्यौ पनि होला तर शालुप्रतिको तिम्रो अगाध प्रेम देखेरमैले फेरि एकपल्ट तिम्रो खुसी खोस्न चाहिनँ । कुरा के भने कान्छी श्रीमतिलेपाएको बच्चा मैरो होइन । तिमीबाट बच्चा हुन्छ, त्यसैले तिमी विवाह गर ।तिमीलाई जिन्दगीभरि खान पुग्ने सम्पत्ति मैले तिम्रो नाममा जम्मा गरिदिएकोछु । पछिका लागि एउटा जीवनसाथी रोज । तिमीले अर्को बिवाह गन्यौ भने मपनि शान्तिले निदाउनेछु । अर्को जन्म भए भगवानले तिमीसँगै भेट गराऔस्‌ ।म तिम्रो काकाको सल्लाहअनुसार तिम्रै काकाको विधवा छोरी र छोरालाईलिएर हङ्कङ गएँ । बाबु-आमा, श्रीमती बिनुले आफनो कुकर्मको फल भौगून्‌ ।अरू के भनौं । मेरै खुसीका लागि भए पनि अन्तै बिवाह गरै । तिमीले विबाहगन्यौ भने मलाई शान्ति मिल्छ । तिम्रो जवानी निशास्सिँदै, छट्पटिँदै, कल्पिँदैनबितोस्‌ । म यहीँ चाहन्छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उही भाबेन्द्र&lt;br /&gt;
चिट्ठी पढिसकेपछि शालुले आफनो आँखालाई दुःख दिइन्‌ । एकोहोरो दिदीलाईहेरिन्‌ । उनलाई यस्तो लाग्यो, दिदीको शिरमाथि सिङ्गै सगरमाथा पो अडिएकोरहेछ । दिदीको भूल यही न हो उहाँले केवल मेरो खुसी चाहनुभयो । अब मैलेदिदीको खुसीका लागि केही गर्नैपर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैयाँ यस्ता कुराहरू त घेरैको जीवनमा घटेको छ । पटक्कै पीर नगरिसेला ।हजुरको उमेर पुगेपछि त्यो जग्गा हजुरकै नाममा पास गरिदिने घोको छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले त्योभन्दा बढ्ता कुरा सुन्न सकिनन्‌ । जुरुक्क उठेर भान्सामागइन्‌ । कान्छी आफनो कोठामा गइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सात==&lt;br /&gt;
कान्छीको जीवनकथा सुनेपछि शालुको धेरै दिनसम्म भोकनिद्रा हरायो ।उत्ती स्कुलमा पनि एकोहोरिन थालिन्‌ । शालुका एकदम नै मिल्ने साथीरोहिणीले शालुलाई चिन्ताको कारण सोधिन्‌ । शालुले सबै कुरा एकएक गरीरोहिणीलाई बताइन्‌ । रोहिणीले मैरौ ममीपापालाई गएर सबै कुरा भनिस्‌ भनेसमस्या समाधान हन्छ भनी सम्झाइन्‌ । शालु रोहिणीको घरमा गएर रोहिणीकोबाबुआमालाई दिदीको सबै कथा सुनाइन्‌ । चन्द्रकान्त दाइले कान्छीलाई मायागरेका कुराहरू पनि बताइन्‌ । दुई छोरी मात्र भएका रोहिणीका बाबुआमालेकान्छी र चन्द्रकान्तजस्ता मान्छै पाए आफूले छोराबुहारीकै दर्जा दिने कुराबताएपछि शालुको हृदयमा बलिरहेको आगो केही मत्वर भयो । शालुलाईरोहिणीको बाबुआमा साक्षात्‌ भगवान्‌ जस्तै लाग्यो । शालु खुसी हुँदै घरआइन्‌ । दिदीलाई देखेपछि आँखा भरिएर आयौ । उनी आफनो कोठामा पस्दैथिइन्‌ । ममीले वौलाएपछि ममीकै कोठाभित्र पस्दै भनिन्‌, &#039;कित बोलाइस्याममी, खास कुरो केही थियो कि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“पोखरा जानका लागि पापाले पर्सिको टिकट बुक गर्छु भन्दै होइसिन्थ्यो ।नयाँ केही किन्नु छ भने पैसा लग भन्न बोलाएकी ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ मलाई पैसाचाहिँ दिसेला तर पोखराचाहिँ चार-छ दिनपछि जान्छु ।अहिले त क्लास टेस्ट चलिरहेको छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले औठ चेप्राउँदै भनिन्‌, &#039;आ तिमी पनि, क्लास टेस्ट लिँदा पनि किनरोक्कितुपर्छ र त्यो नम्बर पछि जोडिने होइन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(हेर भोलि क्लास टेस्ट भन्नु पति छ फेरि क्यारेम खेलौं पनि भनिसिन्छ । लअहिले थपक्क पढ्न बसिस्यो, क्लास टेस्ट सिद्धिएपछि हजुरले जे-जै भनिसिन्छत्यहीत्यही खेल्छु ।&#039; दिदीको कुरा सम्झेर भित्र कतै दुख्यो शालुलाई, शालुले मनमनै सोचिन्‌, &#039;ककरलाई घ्यू नपचैको भनेको यही हो । दिदी गएपछि यो घरमस्ानमा परिणत हुँदा बल्ल चाल पाउँछयौँ तिमी, तिमीले एक्का र बास्साभन्दै तास खेल्न पाएकी दिदीले गर्दा नै त हो नि! यत्रो घर र हामीलाई दिदीलेबडो इमानदारिताका साथ नसम्हालिदिएको भए तिमी स्वतन्त्र आकाशमाकावा खान पार्उीधनौ । सिङ्गै आकाशमा उड्न पाउँदा पनि तिमीलाई आकाशपनि साँगुरो भयो होइन ? दिदीको दोष त्यही हो उनीभित्र स्वार्थको एक कणपनि छैन । उनी अर्काको सन्तानलाई सही मार्ग देखाउन हरपल कटिवद्धछिन्‌ । तिमी आफनो सन्तानलाई आधुनिकताको नाममा नशामा झुलाउनकटिबढ छयौं । मेरो त सम्पूर्ण दिदी हुन्‌ दिदी, उनी नभएकी भए म जीवन केहो नबुझदै झर्दोरहेछु । मलाई जनको मूलत [त्य सिकाउने मेरी प्राणप्यारी दिदीलाईनिकाल्न कति हतार छ्यौ तिमी म छु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन थुप्रै बेर पोखराको सौन्दर्य सम्झेर त्यहीँ हरायौ कि क्या हो:मूर्तिजस्तै भयौ नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;ममी हजुरको खुसीका लागि म पोखरा जाउँला तर मेरो जाँच सिढिनदिस्यो । पोखरा मैले धेरैपल्ट हेरिसकेकी छु । प्रकृतिले का दिएर पनिहामीले त्यसको सदुपयौग गर्न जानेनौं । फेवातालको नजिकै सानै घर होस्‌ तरअति आकर्षक होस्‌, त्यो छैन । पाताले छांगाकै वरिपरि मनै लोभ्याउने फूलबारीहोस्‌ । बाराही मन्दिरमा पनि टलबकै टन्कनै सिङ्गमर्मर होस्‌ । विदेशले योप्राकृतिक छटा पाएको भए कस्तो बनाउँथ्यो होला । नेपालीले हीराको मूल्यलाईकीरा सम्झिरहेका छन्‌ । राम्री र नराम्रो छुट्याउने तागत हामीमा छैन ममी ।&lt;br /&gt;
उर्मिलाले हांस्दै भनिन्‌, &#039;तिमी त बडो तर्क दिन सक्ने पनि भइछौँ, मलाईत पत्तै थिएन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हजुरले मसँग कति समय नै विताइस्या छ र ममी, पापाले अस्ति मात्रभनेपछि पो थाहा पाएँ । मलाई त अठार दिनदेखि नै दिदीले सुताउनुभएको होरे । पापा भनिसिन्थ्यो- हजुर त धेरै सुध्यरी होइसिन्छ रे, एकपल्ट मैले हजुरकोकाखमा दिसा गर्दा टाउकोमै गोली लागेभँ गरी चिच्याइस्यो रे । मैले दिसागरेको साडी अब कहिल्चै लाउँदिनँ भनेर फमाँकिस्या रे होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“उफ ! तिम्रो पापा पनि यस्ता झिना-मसिना कुराहरू पनि के छोरीसँगगरिस्या होला । जाक कपडा फेर, त्यसो भए चार-छ दिनपछिकँ टिकट बुकगर्नुपर्ला हुन्न ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हजुरलाई जे मन लाग्छ त्यही गरिस्यो&#039; भन्दै शालु आफनो कोठामापसिन्‌ । ममीको कोठामा चन्द्रकान्तको आबाज सुनेपछि शालु ममीकै कोठातर्फलागिन्‌ । चन्द्रकान्त कार नबनेको कुरा बताउँदै थिए । शालु चन्द्रकान्तको कुरासुनेर दङ्ग परिन्‌ र भनिन्‌- &#039;दाइ मलाई फूलको प्रोजेबटवर्क ननाउनु छ ।बगैँचामा हिँड्नुस्‌ र मलाई फूलको नामहरू बताइदिनोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले भान्सावाटै कराइन्‌, &#039;मैयाँ, यिनलाई सवै फूलहरूको नाम आएपो, म हजुरको सहयोग गर्छु । यिनले खाना पकाउँछन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले हांस्दै भनिन्‌, &#039;दिदी पनिर-प॒कौडा त दाइलाई बनाउन आउँदैनहोला नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसो भए हजुरले फूलहरू लेराइस्यो म फूलहरूको नाम वताइदिइहाल्छुनि!”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले कान्छीतिर हरेर दाह्रा किटै । शालु र चन्द्रकान्त दुवै बगैँचामागए । शालुले बस्न आग्रह गर्दै भनिन्‌, &#039;अझै दिदीसँग बोलेको देख्दिन॑ नि, तपाईत साँच्चै रिसाउनुभयो कि बया हो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बन्द्रकान्तले बस्दै भने, &#039;हो, मैयाँसाप, अब म यहाँ वस्दिनँ । कान्छीकोआश गर्दागर्दै दाहीजुँगा फुल्न आँटिसक्यो । तिनलाई देख्यो भने मुटु जल्छ माअब कति मुटु जलाउनु ? तिनी त पत्थर हुन्‌ शालु मैयाँसाप पत्थर, तिनलाईराम्रोसँग वाहा छ, म तिनकै मायाले रुन्छु । अब कति रुन्‌ मैयाँसाप, रुँदारुदाआँखाहरू थाकिसके ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले बडो नम्र स्वरमा भनिन्‌, “मप्रतिको अत्यधिक मायाले गर्दा दिदीलेकहीँकतै देख्नु नै भएको छैन । म दिदीको त्यो नाजुक हृदयलाई तोड्छु, तपाईंमलाई साथ दिनोस्‌ । दिदीले मेरा लागि देख्नुभएको जुन सपना छ म त्यो पनिपूरा गर्छु । मेरै आँखाअगाडि मेरो मुदुभन्दा पनि प्यारी दिदीको अपमान अबसहन सक्दिनँ । तपाईँले भनेभौँ मलाई पोखरा पठाउन यौजना बनिसकेकोरहेछ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन मैले त केही कुरै बुझिनँ नि मैयाँसाप ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले सबै करा बताइन्‌ । तपाईँ अहिले नै रोहिणीको घर हेरेर आउनोस्‌ ।दिदीलाई तपाईँ नै चाहिन्छ हो तपाईं । यी कुराहरू बिर्सेर पति दिदीलाईनबताउनु होला । दिदीको घुणा म जीवनभर सहन तयार छु तर अँहँमउहांको आँखामा आँसु हेर्न सबिदिनँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले आँखाभरि आँसु पार्दै भने, &#039;हजुरले ठीक सोचिस्यो । तिनी तसिमल हुन्‌ आफू जाडो सहेर अरूलाई तातो दिनै । तिनलाई हामीले खुसीदिएनौं भने हामीले पनि आफूलाई माफ दिन सम्बैनौं । हुन्छ म अहिले नैरोहिणीको घर पुगेर आइहाल्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ल अनि खोई त फूल लिएर आइसेको ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिदीको शब्दले शालुको मुटु घाँटीमै अद्दकेझै भयो । बडो कष्टसँग जवाफदिइन्‌, &#039;तपाईंले रातमा फूल टिप्न हुन्न भनेको सम्झेर नटिपी आएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ म भोलि बिहानै फूल टिपेर फूलको नाम पनि भनिदिन्छु । अस्तिकोझरे&lt;br /&gt;
जस्तो चार्टपेपरमा टाँस्ने त होला नि ! कहाँकहाँ टाँस्ने अहिले बताइदिस्यो, मअस्तिको जस्तै मिलाएर टांसिदिन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले आँसु लुकाउँदै भनिन्‌, &#039;ल हेर्नोस्‌ अब त म तपाइंजत्री भइसके ।अबदेखि मेरो पीर नगर्नोस्‌ । तपाईंले मलाई जस्तो बताउन चाहनुभएको थियोम त्यस्तै बन्छु । तपाईंको कसम, म बिग्रिन्न, साँच्चै बिग्रिन्त । तपाईँ जस्तोकर्म दिने दिदी पाएपछि पनि बिग्रन्छुर म?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;रैयाँसापलाई ठूलो-ठूलो कुरा गर्न आइसक्यो । ल तातोतातो पकौडा खाइस्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दिदीको शब्द सुनेर शालु रुँदै कोठामा पसिन्‌ र ओछ्यानमा पछारिँदैरोइन्‌ । कान्छी फत्‌पताइन्‌- होइन कै भएको होला मैयाँसापलाई आज, खानपनि खोजिस्या छैन । मुख पनि उज्यालो छैन । सानो हुँदा पो सबै कुराभनिसिन्थ्यो र बुझिन्थ्यो, ठूलो भएपछि केही भन्ने हैन । आफूले मनको कुराबुझन सकिँदैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले मन सम्हालेर दराज खौलखाल पारिन्‌ । कान्छीले पढ्दै पनिरपकौडा खाइड्टस्यो भनेर शालुको कोद्ामा छोडेर गइन्‌ । शालुले हतारहतार त्योपनिर पकौड्ालाई प्लास्टिकको &#039;फोलामा हालेर पोको पारेर दराजको मुनिराखिन्‌ । मुखले चाहिँ पकौडा मीठो रहेछ आजलाई पुग्यो भनिन्‌ । कान्छीलेआफूले पनिर पकौडा भौलिसम्मलाई हुनेगरी प॒काइदिएको कुरा बताइन्‌ ।चन्द्रकान्त आएर शालुको कोठामा पसे । दुवैले आँखाकै इसारामा करा गरे ।त्यसपछि साह्रै मीठो बास्ता आयो भन्दै चन्द्रकान्त भान्सामा पसै तर, कान्छीलेदिएको पकौडा खान सकेनन्‌ । आफूलाई टाउको दुखेको छ भनेर ढाटिदिए ।कान्छीले मुसुक्क कक हाँस्दै भनिन्‌, &#039;तिम्रो रिस त अझै मरेको छैन जस्तो छ । तिमीरिसाएको त मेले पहिलीपल्ट नै देखेँ । म तिमीसँग कहिल्यै रिसाउँदिनँ चन्द्रकान्त ?तिमीले मेरो पोल्टाभरि खुसी नै खुसी दिएका छौँ । आफनो बाबुकैँ बनेर शालुमैयाँसापको रक्षा गथ्यौ ।&#039; चन्द्रकान्तले चुपचाप कान्छीको कुराहरू सुनिरहैमात्र ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कोठाभित्रबाट चिच्याइन्‌, &#039;दिदी, म पकौडाले नै अघाएँ । तपाईंहरूमात्र खाना खानोस्‌ । आज म दिदीसंगै सुत्छु । मलाई राजकुमारको कथा सुन्नुछ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;भर्खरै भनिसिन्थ्यो दिदी म ठूली भएँ। भर्खरैभनिसिन्छ- राजकुमारको कथा सुन्ने ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्त म शालु मैयाँसापको बिवाह भएपछि बाँच्न सक्छु होला जस्तैलाग्दैन । चन्द्रकान्त कान्छीको क्रा सुन्न नसकी उडेर हिँडे ।&lt;br /&gt;
शानु पहिला नै कान्छीको पलङमा गएर सुतिरहेकी थिइन्‌ । कान्छी खानाखाइबरी हात पुच्दै कोठामा पस्दै भनिन्‌, &#039;शालु मैयाँसाप मैले भनिदिएकी छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोलिदेखि पढाइ छल्नका लागि अनेक बहाना चन्दैन । होइन किन घौप्टोपरिसेको ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले देब्रे कोल्टै फर्केर आँसु पुच्दै भनिन्‌, &#039;म त निदाउन पो लागिसेकीरहेछ दिदी ! चन्द्रकान्त दाई पनि बस्वोस्‌ ।&#039; चन्द्रकान्त पलङमुतिको मुढामाबसे । शालु र कान्छी पलङमा बसे । कान्छी बसेपछि शालुले कान्छीको काखलाईसिरानी वनाइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले शालुको कापल मुसार्दै भनिन, &#039;मैयाँ, दिदीको काखभन्दा पनिप्यारो अहिलेलाई पढाइ हो । मैले धेरै दिनदेखि हजुरले पढेको देखेकी छैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दिदी तपाइँलाई मेरो भविष्यको मात्र चिन्ता छ। त्यस्तै मलाई पनितपाईंको भविष्यको चिन्ता छ । दिदी, मैले पनि तपाईंका लागि चन्द्रकान्त दाइजस्तै राजकुमार खोजिदिएकी छु । त्यो राजकुमारले तपाईंलाई धेरैधेरै खुसीदिन्छन्‌ । तपाईँको आफनो स्बर्गजस्तै घर हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीले वीचैमा कुरा काददै भनिन्‌, &#039;ए, हजुरले मेरो अर्को जन्मको करागरिस्या ? हुन्छ, हुन्छ अर्को जन्ममा म चन्द्रकान्तसँगै विवाह गर्छु । अनि हजुरलाई छोरीको रूपमा जन्माउँछ । निस्फिक्री माया गर्छु । उर्मिला मेयाँसापहुँदा त हजुरसँग बोल्न डर लाग्छ भन्या । उर्मिला मैयाँसापले हजुरको कोरामागएको देख्यो कि बिरालोको जत्रो आँखा पल्टाइसिन्छ । उहाँले आफनो मर्यादानभुलेको भए मलाई यति चिन्ता हँदैन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीको हात मुसार्दै भनिन्‌, &#039;दिदी तपाईंले मन नदुखाउनुहोस्‌ ।मेरो चिन्ता गर्न चटक्क छौडिदिनोस्‌ । तपाईंले मैरा लागि जुन त्याग गर्नु भोत्यो कसै-कसैले गर्नै सक्दैन । दिदी तपाईंले जाडोमा न्यायो घाम दिनुभयो,गर्मीमा छहारी दिनुभयो, तपाईं भने सधैँ घाम-जाड्ो सहँदै आउनुभएको छ ।त्यो मैले देखेकै छु । अब म स्वयम्‌ चिसो र तातोबाट वच्न सक्छु । तपाईँलाईचिसो र तातोबाट बचाउनु मेरौ कर्तव्य हो । कुरा गर्दागर्दै बाहिर गेटमा बेललाग्यो, शालु हतार-हतार कान्छी र चन्द्रकान्तलाई एउटै कोठामा बन्द गरेर,तल रुँदै ओर्लिन्‌ र गेट खोल्दै भनिन्‌, &#039;ममी, पापा म यो घरमा वस्नै नसक्नेभएँ चन्द्रकान्त र दिदीको राम्रो सम्बन्ध छैन । आज त हजुरहरूलाई देखाउनमैल्ले चन्द्रकान्त र दिदीलाई एउटै ओछ्यानमा देखेपछि ढोकामा लक गरिदिएकीछु। छिटो माथि आइस्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
दीपक उर्मिला नै रक्सीको नशामा हल्लँदै सास न बास भएर कान्छीकोकोठानजिक आए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कोठाभित्रबाट आवाज आइरहेको थियो । मैयाँसाप किन ढोका थुनेको छिटोखोलिस्यो । उमिलाले ढोका खोल्दै चिच्याइन्‌, &#039; ए रण्डा, रण्डी हो तिमीहरूलेयो घरलाई कोठी नै बनायौँ होइन ! देखिस्यो हजुरले सती सावित्री ठानेकी कान्छीको हाल । मैलै भनेकै हुँ वैंसको उन्मादलाई थेग्त कसैले सक्दैन भनेर,दुबैले किन बिवाह गरेनन्‌ भनेको त कुरा यस्तो पो रहेछ । दूध खान पाउँदापाउँदैगाई पाल्नु किन ! शालुलाई माया गरेको स्वाङ रचेर बिनापैसा बस्नुको कारणत मस्ती लुद्त पो रहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले रुँदै जबाफ फर्काइन्‌, &#039;आफ्‌ मात्र बोलिसिन्छ कि मलाई पनिबोल्न दिइसिन्छ हँ : चुप लागिस्यो मुखमा जे आयो त्यही नबोलिस्यो । शालुञैयाँसापलाई थाहा छ हामी के गर्दै थियौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रुँदै भनिन्‌, “हो ममी यिनीहरूको विचार राम्रो छैन । कान्छी त झन्‌हजुरको विरुद्ध भड्काउँछिन्‌ । मैले के माया गरेजस्तो गरेकी थिएँ उनले तआफनै छोरी ठातिन्‌ । यसो गर, उसो गर भनेको सुन्दा म त पागलै हुनलागिसकेँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले घरै थर्कने गरी चिच्याइन्‌, &#039;नाइँ, शालु मैयाँसाप त्यसो नभनिस्योममर्छु।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रुँदै भनित,- &#039;मोर अहिले मौर, कसले रोकेको छ र? न रहरलाएको लाउन दिन्छे, न खानै दिन्छे कुन जन्मको शत्रु रहिछे यो ।&#039;&lt;br /&gt;
उर्मिलाले कान्छीको कपाल भुत्ल्याउँदै भनिन्‌, &#039;धेरै तमासा नदेखा, खुरुक्कघरबाट निस्किहाल । नत्र अहिल्ै पुलिसलाई डाक्छ बुझ्यौ ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;कान्छी आफैँलाई भूत्ल्याउँदै चिच्याइन्‌, &#039;शालु मैयाँसाप तोलाको बचनखोलामा नहालिस्यो, म हजुर बिग्रेको हेन सक्दिनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले कान्छीको हात समात्दै भने, &#039;देख्वा सोझी रहिछिन्‌ मैयाँसापभित्र त कर्द रहिछन्‌ कर्द ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हो-हो म कर्द नै हुँ त्तिस्क, निस्किहाल पापी हो । मेरो जन्म दिने आमाभन्दाठुली कोही छैन बुझ्यौ ? जाओ, जाओ छिटो जाऔ । अझैँ रमिता देखाउँछौँ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले चन्द्रकान्त र कान्छीलाई नै नजिकैको कूचोले हान्दै भनिन्‌, &#039;छिटोतिस्कन्छौ कि पुलिस नै बौलाउँ हँ ?&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले कूचो समाउँदै भने, &#039;कान्छी तिमीले आफनो स्वार्थ हेरेकी भएआज पो दिन देख्न पर्दैनथ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
दीपकले कुरा थपे, &#039;अझ बढी बोल्छस्‌ चन्द्रै, यो सुँगुर्नीलाई छिटो यहाँबाटलगिहाल्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;शालु मैयाँसाप मेरो यहाबाट लास जाला म यहाँबाट जान्न । म हजुरलाईछोडन सक्दिनँ,&#039; कान्छीले भुइँमा बजारिँदै भनिन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीको मुखमा वुक्दै भनिन्‌, &#039;थुक्क नकचरी, पागल, कति अपमान&lt;br /&gt;
सहन सक्छेस्‌ त॑ : मौर तँ जस्ता मान्छै त मर्नु नै पर्छ । विष दिकँ याकौसीबाट फालहालेर मोर्छेस्‌ ) चन्द्रकान्त यसलाई बागमतीमा लगेरफयाँकिदैक । अनि यसले शान्ति पाउँछै ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले रण्डी, फुँडी, बेश्या भन्दै कान्छी र चन्द्रकान्तमाथि क्चो वर्षाइरहेकीथिइन्‌ भने दीपकले दुवैलाई लात्ती प्रहार गरिरहेका थिए । चन्द्रकान्तले कान्छीलाईघिच्याउँदै भन्याङ ओराले । कान्छीले घर नै थर्किनेगरी शालु मैयाँसाप भन्दैचिच्याइन्‌ । डेरामा वसेका र छिमेकीहरू झयाल-झयालबाट र ढोकाबाहिरैबाटत्यो बीभत्स दृश्य हेरिरहेका थिए । शालु आफनो कोठाको ढोका थुनेर मुर्दाझैँलम्पसार परिन्‌ । कानमा भनै कान्छीदिदीकै शालु शव्द नै गुञ्जिरह्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिला र दीपक नरभक्षी बाघकै सिकार गरेझैं गरी प्रफुल्ल हुँदै काठोमापसे । उमिंलाले भनिन्‌, &#039;देखिस्यौ हजुर बैंसको तिखा थाम्न त्यो मोरीले पनिसकेकी रहिनछ । हात्तीको खाने दाँत र देखाउने दाँत जस्तो तिनीहरूका पनिदुईवटा दाँत रहेछ, होइन ? आज त कति हाइसन्चो भयो क्चोले बढार्नुपर्नेफोहोर हावाले उडायो हा...हा । शालुले नै काम तमाम गरिदिइन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
दीपकले पलङमा पल्टिँदै लर्बराएको स्वरमा भने, &#039;उर्मी, वनले नचिनेकोबाघ होइन, वाघले नचिनेको वन होइन । शालुले पूर्ण सोचनिचार नगरीकान्छीलाई घरबाट निकालिन्‌ जस्तो मलाई लाग्दैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हजुर पनि चाहिनै-नचाहिन कुरा सोचिसिन्छ । कुकर्मले डाँडा काटेपछिकति सहन्छै शालुत्ते ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यो त हो, दीपकले उमिलाकै कुरामा साथ दिए । कान्छीको त्यो दर्दनाकदृश्य उनीहरूका लागि मनोरञ्जन बन्यो । दुबै राव्रिकीडामा लीन भए ।&lt;br /&gt;
रोहिणीको घरमा पुग्दासम्म कान्छीले पूर्ण रूपमा होस गुमाइसकँकी थिइन्‌ ।रोहिणीको बाबु केशवले फेमेली डा. राजलाई बोलाए । डा. राजको सक्दोप्रयासबाट कान्छीको होस त आयो तर उनले आफूलाई बिसिंसकेकी थिइन्‌ ।उनको ओठमा केबल शालुकै नाम थियौ । भन्थिन्‌ क... क शालु मैयाँत्यहीँबाट गइस्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हा... हा शालु मैयाँसापले त कपाल बाटिसेछ । पर्खिंस्यो म रिविनमिलाइदिन्छु । सधैँ दिदी हजुर नि खानोस्‌ भन्नु छ । म त खाइहाल्छु नि !, मेरीशालु मैयाँसाप त परी हो बुझ्यौ परी हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीको त्यो विजोग देखेर सबैको आँखाबाट आँसु झन्यो । डा. राजलेमानसिक विशेषज्ञ डा. दिनेशलाई बोलाए । डा. दिनेश पनि रातको चकमन्नतालाईतौड्दै कैशवको घरमा आइपुगे । सम्पूर्ण घटना सुनेपछि डा. दिनेशको पतिआँखा रसायो । जति खर्च लागे पनि घरमा नै कान्छीको उपचार गर्ने निर्णयभएपछि कान्छीलाई दिनेशले लठ्याउने सुई दिए । उनी जिउँदो मुर्दामा परिणत भइन्‌ । कान्छीको सम्पूर्ण स्याहारसुसार चन्द्रकान्तले गरे । डा. राज र डा.दिनेश कान्छीको उपचारमा कटिबद्ध भए । केशव र पीताम्बराले मानवीयसहयोग गरे । तहौं दिनको दिउँसो एक बजेतिर कान्छीले आँखा खौलेर चारैतिरहेरिन्‌ । आफूलाई सुन्दर चिटिक्क परेको कोठामा सँगै चन्द्रकान्त भित्तामाशालुको सुन्दर तस्बिर झुन्ड्याइरहेको देखेपछि अचम्म मान्दै सोधिन्‌, “चन्द्रकान्तयो सब के हो ? मेरो अर्को जन्म त भएको होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले खुसीको आँसु झार्दै भने, &#039;हो कान्छी तिम्रो अर्को जन्म नैभएको हो । तिमीले असाध्यै माया गर्ने बावु-आमा पाएकी छ्यौ । डा. राजरडा. दिनेश जस्तो डा. पायौ । सुरेश क्षेवरीजञस्तो बिरामी पर्दा सहयोग गर्ने दाइपायौ । सबै-सबै पायौ । तिमीले बस्‌ आफूलाई सम्हाल सबै ठीक हुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी बिस्तारै उठ्दै भनिन्‌, &#039;खोई बाबु-आमा ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले बोलाएपछि केशव र पीताम्बरा नै आए । कान्छीलाई उठेकोदेखेर हर्षित हुँदै भने, &#039;नानी अहिले उठेर जरक-मरक नगर ।&#039;&lt;br /&gt;
उनीहरूको कुरा सुनेर कान्छी टोलाइरहिन्‌ । चन्द्रकान्तले दुधमा हलिंक्सफिटेर कान्छीलाई दिँदै भने, &#039;हर्लिक्स खाएर सुत ।&#039; कान्छीले हर्लिक्स पिइन्‌ ।चन्द्रकान्तले औषधि खान दिएपछि फेरि कान्छी गहिरो निद्रामा परिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आाठ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले चौधौं दिनको मध्यरातमा पनि आँखा खोलिन्‌ । चारैतिर हेरिन्‌,आफनो पलङभन्दा पर चन्द्रकान्तलाई निदाइरहेको देखेर केही धक मान्दैभनिन्‌, &#039;चन्द्रकान्त... चन्द्रकान्त ।&#039;कान्छीको बोली सुनेर चन्द्रकान्त झसङ्ग हँदै उठेर मर्करी बाल्दै कान्छीकोनजिकै गएर भने, &#039;के भयो कान्छी, के भयो !&#039;कान्छी धेरैबेर मौन भएपछि भनिन, &#039;मैले थाहा पाएँ हिजो मैयाँले आफनोघरबाट निकालेपछि हामी यहाँ आयौं, मैले आँखा खोल्नेबित्तिकै त्यही मैयाँकोफोटोमा आँखा पन्यो, त्यो फोटो निकालिदेक । किन त्यो फोटो राखेकोचन्द्रकान्त ?&#039;चन्द्रकान्तले उत्तर दिए, &#039;तिमीले मैयाँ-मैयाँ भनेपछि त्यो फोटो राखिदिएको। तिमीले झिक भन्छ्यौ भने झिक्छु । तिम्रो मुख सुकेको छ भने पानीकै ?&#039;&amp;quot;अं पानी दैक म आफूलाई सम्हालिहाल्थें नि । तिमीलै पसरी एउटै कोठामा सुत्न नहुने थियो । चन्द्रकान्त तिमीले यो फोटो झिक्दिक । अव्र म पत्धरमापरिणत हुन्छु । मैलै यौ उमेरसम्म कोही मानवीय मूल्य भएको त मान्छे नै देखिनँ ।&#039;चन्द्रकान्तले शालुको फोटो निकालेर घोप्टो पारेर ठहस्याए ।कान्छीले रुन्चे स्वरमा भनिन्‌- &#039;होस्‌-होस्‌ फोटो झुन्ह्याइदेक, भोलि मआफैँ त्यो फोटोलाई झिकेर फयाकुँला । फोटोमा अलि धूलो लागैजस्तौ छसफा कपडाले पुछिदेक ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले चुपचाप सफा कपडाले फोटो फुछे । रातको समयमा औषधिदिने वेला भएकोले औषधि खुवाए । औषधि खुवाएको केही बेरपछि, कान्छी कुरागर्दागर्दै निदाइन्‌ । चन्द्रकान्त पनि मनमा कुरा खेलाउँदै निदाए । क्रमशः दिनबित्दै गयो । कान्छी विस्तार पानी सार्न, ट्वाइलेट जान सक्नै भइन्‌ । तर उनीसोच्चिन्‌- आफूमाथि बज्च परेको क्षण हिजो नै हो । एक्काइसौं दिनको दिनकान्छी उठिन्‌, आफैँ नुहाइधुवाई गरिन्‌ । बडो राम्रैसँग मिलाएर राखेको कपडाझिक्दै भनिन्‌, &#039;हिजो मैले मैयाँसापका लागि पकौडा राखिदिएकी थिएँ, देखिस्योकि देखिसेन होला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;कान्छी तिमीले उनको नाम नै नलेक । क बावु-आमा पनि आउनुभयो ।एकछिन बसेर कुरा गर । म औषधि सिद्धिएको छ लिएर आउँछु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्बरा र केशवले कोठाभिर पसेर सोफामा बस्दै भने, &#039;आफैँले आजनुहाएजस्तो छ नि हो : तिमीलाई यो रूपमा देख्दा साह्ै खुसी लाग्यौ ।तिमीलाई यस रूपमा देखेपछि पर्सि नै सत्यनारायणको पूजा लगाङँझै लाग्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ लगाउनुहोस्‌, हिजौ अलि धूलो-मैलोमा बजारिएकीले आज नुहाएकीहुँ। अघि यसौ बगैँचा र फूलबारी हेर्न मन लागेर गएकी थिएँ । व्यवस्थिततरिकाबाट केही लगाएकै छैन । दुबोमा पनि घाँसैघाँस उम्रिएको रहेछ । आँगनमापनि फोहोरैफौहोर छ । फोहोर देखैपछि त मैरो टाउको नै घुम्छ । न धुपीहरूकैकटिड गरेको छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्बराले करा चुहाइन्‌- अलिअलि त काम गरिन्थ्यो । तिमी बिरामीभएर आएपछि वगैँचाभन्दा पनि ध्यान तिमीमा गयौं । फेरि काम गर्न आउनेमान्छेलाई दस घर भ्याउनुपर्छ, के राम्रो काम गर्थे ? खैर आँगन, बगैँचाकोकुरा छोडौं अब तिम्रौ र चन्द्रकान्तको बारेमा कुरा गरौं ।&lt;br /&gt;
&#039;ए चन्द्रकान्त, उनी र म पहिला सँगै बस्थ्यौं । त्यहाँबाट निकालेपछिचन्द्रकान्तले यहाँ लिएर आएछन्‌ । विश्वास गर्नोस्‌, हाम्रो सम्बन्ध केही नराम्रोछैन, हिजै मात्र हो उनले मलाई छोएका । हिजो उनले नसम्हाको भएचाहिँ मबाँच्दैनथैँ हुँला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्बराले कान्छीको हात समातेर भनिन्‌, &#039;लाटी, तिम्री यहाँ आएकी तठीक एक्काईस दिन भयो । एक्काईस दिनसम्म तिनै चन्द्रकान्तले तिमीलाई दिसा, पिसाव गराउने, दिसा धुने, नुहाइदिने, कपडा फेर्ने तिम्रो कपडा धुनेकाम गरे । उनले स्याहार नगरेको भए र डा. राज र डा. दिनेश र सुरेशचभएको भए तिमी यहाँ होइन अहिले सडकमा हुन्थ्यौ । त्यसैले हामीले तिमीहरूकोबिबाह गर्न सत्यनारायणको पूजा राख्न खोजेका हौं ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले विश्वास गरिनन्‌ र नजिकै रहेको क्यालेन्डरमा पल्टाएर हेरिन्‌,&amp;quot;उफ मङ्सिरको १२ गते पो रहेछ । उनी थचक्क बसिन्‌ । आँखाबाट आँसुझारिन्‌ मात्र ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्बराले सम्झाइन्‌, &#039;फौरि पनि पीर गयौँ भने तिमी विरामी हुन्छ्यौ ।पीर नगर । हाम्रो विवाह हुँदा उहाँ पच्चीस वर्षको र म बीस वर्षकी थिएँ ।विवाह चाँडै भए पनि बच्चाचाहिँ बयालीस वर्षमा भयौ, तिमीहरूको त उमेरैछ । कुनै पनि सुकार्य गर्न ढिलो गर्नुहुन्न । हामीले तिमीहरूको विवाहका लागिगहना, कपडा सबै तयार परिसक्यौं । तिमी होसमा आउने प्रतीक्षामा थियौं ।समाजमा विवाह नगरी एक्कै ठाउँमा सुतेका छन्‌ भन्नै किन पानु ः तिमीहरूकोचाँडै विवाह गरिदिन पाए आनन्दै हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीलाई घोर अचम्म लाग्यो । केही रिंगटा चलेजस्तो पनि भयो उनीसोफामै मो अड्याएर चिम्म आँखा चिम्लिइन्‌ । केशवले नम स्वरमा भने,“कान्छी, मैले चन्द्रकान्तजस्तो पुरुष त संसारमै देखेको छैन । तिमी बिरामीहुँदा उनले तीन दिन तीन रात आंखा भझिमिक्कै गरेनन्‌ । चौथो दिन कमजोरीलेहोला मूछां नै परे । डाक्टरसापहरूले के-के सुई दिएपछि सत्र-अठार मिनेटमाआँखा खोले । आँखा खोल्दा कान्छीले औषधि खाइन्‌ कि खाइनन्‌ भन्दै थिए ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले क्रा सुन्न अलि भझिँजो मानेजस्तो गरैपछि पीताम्बरा र कैशवउठेर गए । आँखा खोल्दा कान्छीको आँखा शालुको तस्बिरमा पत्यो । मनमनैसोचिन्‌ । मलाई मृत्युको मुखमा छोड्नेको के अनुहार हेर्नु ? साँच्चि चन्द्रकान्तलेमैरो घरजग्गाको लालपूर्जा देखेर त माया गरेको होइन ? शालुजस्ती त त्यस्तीभएर निस्केपछि चन्द्रकान्तको त के विश्वास : फेरि शालुकै फोटोमा आँखापरेपछि कान्छीलाई रिस उद््यौ । उनले शालुको फोटो झिकेर केहीबैर घोप्द्याएरभित्रै राखिन्‌, शान्ति भएन र वाहिर राखिन्‌ । अझै शालुले घरवाट निकालिदिँदाकोक्षण सम्झेपछि फोटो गेटबाहिर राखेर आइन्‌ । औषधि लिएर आउँदै गरेकोचन्द्रकान्तको आँखा फोटोमा पस्यो । फोटो भित्र लगेर पीताम्बरालाई जिम्मादिँदै आफनो कोदामा पसे । कान्छी टोलाएर सुतिरहेकी थिइन्‌ । चन्द्रकान्तआएको चाल पाउनेबित्तिकै उठेर बसिन्‌ । कान्छीलाई चन्द्रकान्तसँग कताकतालाज-लाज पति लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले औषधि र पाती दिँदै भने, &#039;ल अब औषधि खाएर सुत । अनारछोडाएको छ खाङ है भनेर गएको थिएँ, यत्तिकै छ । म पनि उस्तै खान दिएरजानुपर्ने रहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले औषधि निल्दै भनिन्‌, &#039;चन्द्रकान्त जग्गाको लालपूर्जा कहाँ राख्यौ ?चिदठी पनि सँगै थियो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन तिमी फेरि बेसुरको करा गर्न लाग्यौ । कस्तो लालपूर्जा, केकोलालपूर्जा, कसको चिट्ठी मलाई केही थाहा छैन । ल सृतिहाल पछि कुरागरौली ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले मनमनै भनिन्‌- &#039;ओ ! मैयाँलाई त्यही जग्गामा आँखा लागेछ क्यार,मैले त उनकै नाममा गरिदिन्छु भनेकी थिएँ । पहिल्यै निकालिन्‌ । लिकन्‌तिनलाई दाइजो नै भयो । चन्द्रकान्तको प्रेम त निस्वार्थ पो रहेछ । उनी सुन्दर रमायालु छन्‌, उनले त कुमारी केटी नै पनि पाउन सक्थे । उनी मलाई प्रेम गर्छन्‌भन्ने थाहा थियो तर यतिबिध्न माया गर्छन्‌ भन्नै थाहा थिएन । सोच्दासोच्दैकान्छीको आँखा लष्टिन थाल्यो । उनी केही बेरमा निदाइन्‌ पनि ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोलिपल्ट बिहानै कान्छीले आँगन बढारिरहेको देखेर केशवले नजिकै आएरभने, &#039;नानी ! आँगन नबढार, तिमीलाई अहिले त्यति ठीक भएकै छैन । वरुआमासँग गएर केही कुरा गर । उनलाई साथी हुन्छ । मचाहिँ यस्सो घुमेरआउँछु ।&#039; कान्छी पूरै आंगन बढारेर पीताम्बरासामु पुगिन्‌ । पीताम्बराले बढोराम्रो पाराले सम्झाएपछि कान्छीले चन्द्रकान्तसँग बिवाह गर्नै कुरा नकार्नसकिनन्‌ । भौलिपल्ट नै कान्छी र चन्द्रकान्तको सत्यनारायणको पूजा लगाएरत्यहीँ सिन्दूर राख्ने काम पनि गरियो । विवाहमा कान्छीको काकालगायत अरूकेही आफन्त पनि जम्मा भए । सबैले कान्छी र चन्द्रकान्तको बैवाहिक जीवनसुखद्‌ होस्‌ भती शुभकामना दिए । बेलुका चन्द्रकान्त र कान्छीको सुत्नेओछ्यानमा फूल छरिएको थियौ । दुवै विगत भुलेर बर्तमानमा रमाइरहे ।चन्द्रकान्तको मायालु आलिङ्गतमा कान्छीले संसार बिर्सिन्‌ । त्यस्तै कान्छीकोमायालु आलिङ्गनमा चन्द्रकान्तले .... ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विवाहको भोलिपल्ट कान्छी र चन्द्रकान्तको शिर लाजले झुक्यो । त्यसमाथिचाँडै घोत्ले छोरो पाउनू भनी पीताम्बराले कान्छीलाई, केशवले चन्द्रकान्तलाईजिस्क्याउन बाँकी राखेनन्‌ । बिस्तारै कान्छीको आँखाबाट शालु दिनप्रतिदिनझर्दै गइन्‌ । कान्छीको आँखामा शालुको त्यो क्रूर दृश्य ताचिरहन्ध्यो । त्यसमाथिचन्द्रकान्त शालुको नराम्रो पक्षको मात्र कुरा गरिदिन्थे । कान्छीले मानसिकरोगको औषधि खाए पनि पूर्ण रूपमा आफूलाई सम्हालेकी थिइन्‌ । पीताम्बरालाईखाना पकाउन सघाउनदेखि लिएर सबै काम गर्थिन्‌ । चन्द्रकान्त कैशवकोघरकै भाडाको ट्याक्सी चलाउँथे । एकदिन केशबले कान्छीतिर लालपुर्जाबढाउँदै भने, &#039;कान्छी म पनि कस्तो ह्स्सु ॥ तिम्रो यो कागज एउटा नानीलेदिनु है भनेर छोडेर गएको पहिल्यै हो, दिनै बिसँछु । धेरै वर्ष भएछ, जग्गाकोतिरो नतिरेको, चन्द्रकान्तलाई तिर्न पठाउनू ।&#039; कान्छी लालपूर्जा देखेर मौनभइन्‌ । ए लालपूर्जा त लैराइदिछे त्यसले, रामै भयो दुःख हुँदा काम लाग्ला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लालपूर्जाको बारेमा केशवले चन्द्रकान्तसँग शालुले भनेका क्राहरू जस्ताकोतस्तै भनेपछि चन्द्रकान्तले तुरुक्क आँसु खसाते । लालपूर्जा पाएको दिनचन्द्रकान्तको मुड ठीक नभए पनि कान्छी भने साह्रै प्रशन्न थिइन्‌ । सुत्नैसमयमा चन्द्रकान्तको छातीमा टाउको राखेर कान्छीले भनिन्‌, &#039;चन्द्रकान्त,आज दुईवटा खुसी एकँचोटि मिल्यो । जग्गाको लालपूर्जा अनि मेरो पेटमा पनिबच्चा छ रे, म र आमा जचाउन गएका थियौं ।&#039; चन्द्रकान्तले खुसी हँदै भने,“कान्छी हामीले स्वर्ग नै पायौं हगि : अस्ति भर्खर गाउँबाट ठूलो छोरा पनिआयो । आज तिमी यौ खुसीको करा सुचाउँदै छयौ । बाबुआमा पनि पायौं ।रोहिणी र रोष्मा मैयाँसाप पनि पायौं । हामी त कति भाग्यमानी । न हामीसंगपैसाक्को कमी छ । यौ पेटको बच्चाचाहिँ छोरी होस्‌ । त्यो पनि शालुमैयाँजस्ती ।&#039;कान्छी चिच्याइन्‌, &#039;चन्द्रकान्त, त्यस पापिनीको नाम लिएर मलाई फेरि पागलगाराउन चाहन्छौ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले कान्छीको कपाल मायालु पारले मुसार्दै भने, &#039;कान्छी तिमीलेआफूलाई कठोर बनाएको पटक्कै सुहाउँदैन । कुरा अर्कै छ । शालु मैयाँलेकसम खुवाएकोले आजसम्म चुप थिएँ । अब छातीमा कति पत्थर राखेरबाँचौं ? तिमीले हरपल शालु मैयाँको घुणा गरेको कति सहुँ ? हेर शालुमैयाँसापले तिमीलाई खुसी दिनका लागि सबै नाटक गरिस्या हो। हामी तउहाँले बनाएको नाटकमा सहभागी भएका हौँ । तर, हामी सबैको प्रेम बनाबटीहोइन । शालु मैयाँको तिमीप्रतिको घृणा मात्र बनावटी हो । लालपुर्जा दिँदाभनिस्याथियो रै दिदीलाई तब मात्र लालपूर्जा दिनु जब दिदीले चन्द्रकान्तदाइको वास्तविक प्रेम बुझनुहुन्छ । चन्द्रकान्त दाइलाई लालपूर्जाको बारेमा आपनि नगर्नुहोस्‌ । लाटी, बुबाले लालपूर्जा जस्तो कुरा पनि बिसंनुहुन्छ त ?उहाँले शालुकै कुरा मान्नुभएको हो । मैयाँसापले नै यहाँ बस्नै बन्दोबस्तमिलाउनुभएको हो । हामीले शालु मैयाँसापलाई तिमी बिरामी भएको क्राढाँट्दा पनि उहाँ दुईपल्ट स्कुलमा मूर्छा परिसक्नुभयो रे । हाम्रो विवाह भयोभनेपछिचाहिँ साह्टै खुसी हुनुहुन्छ रे । रोहिणी मैयाँसाप र शालु मैयाँसाप साथी-साथी हनुहुन्छ । साँचो करा यही हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तको कुरा सुनेपछि कान्छी धेरैबेर रोइन्‌ । उनको मनमा शालुलेभनेका शब्दहरू एकपछि अर्को गर्दै औहोर-दौहोर गरिरहे । “तपाईँलाईचन्द्रकान्तजस्तै राजकुमार खोजिदिन्छु । दिदी म ठूली भइसके, स तपाईंलेदेखाएको बाटोमा हिँड्छ । आज भोक लागेको छैन, तपाईंहरू मात्र खानाखानोस्‌, तपाईंक्रो पनि स्वर्गजस्तो घर हुन्छ आदिआदि ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले कान्छीको आँखाबाट बगिरहेको आँस्‌ पुछ्दै भने, &#039;नरोक कान्छी,नरौक । शालु मैयाँसापले भनिस्याध्यो, &#039;दाइ मेरी दिदीको आँखाबाट एकथोपाआँसु नखसौस्‌ । मेरी दिदीलाई सधैँ डालीमा लटरम्म फुलेको फूलझौँ देख्नपाङी । दिदी खुसी हुँदा म स्वयम्‌ खुसी हुन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले चन्द्रकान्तको औठ वन्द गर्दै भनिन्‌, &#039;अब यसभन्दा वढी नभन ।चन्द्रकान्त मैले आफूलाई चिने । हामी दुईमा त आकाश-पातालको अन्तररहेछ । म त पापिनी हुँ । त्यसैले आफनैअगाडि भएको हीरालाई चिन्न सकिनँ ।शालु मैयाँसापले मलाई सम्पूर्ण खुसी दिस्यो । मैले उहाँलाई केबल घुणा गरेबुझौं घुणा ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;आफूलाई सम्हाल कान्छी सम्हाल । तुलना गर्दा दुवैको त्याग बराबरी छ ।तिमीहरू दुवैले कनै पल आफनो स्वार्थ हेरेका छैनौ । तिमीहरू बनेको नै एक-अर्काका लागि हौ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;चन्द्रकान्त शालु मैयांसापलाई भोलि नै डाकिदेक । नत्र म मर्छु म बाँच्नसक्दिनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकात्तले आश्वासन दिए, &#039;पीर नगर म भोलि नै शालु मैयाँसापलाईयहाँ बोलाइदिन्छु । हामी सबैको चाहना नै यही त हो नि । तिमी र मैयाँसापकोओठमा पुनः पहिलाको जस्तै खुसी आओस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी केही बोल्न सकिनन्‌ । आँखामा भने शालुको तस्बिर नाचिरहयो ।रातको थुप्रै पल बितेपछि मात्र कान्छी निदाइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोलिपल्ट बिहानको छ पनि नवज्दै शालु आएर रुँदै ओछ्यानमा पल्टिरहेकोकान्छीको आँखा छोपिन्‌ । शालुको हातमा कान्छीको तातो आँसु लागेपछिशालुको आँखा पनि रसाए । कान्छी हात झिक्दै जुरुक्क उठेर शालुतिर फर्किन्‌ ।दुबै एक-अर्काको अङ्गालोमा बाँधिएर थुप्रैवेर रोए । चन्द्रकान्त उनीहरू रोएकोदृश्य हेरेर बसिरहे । धैरैवेरपछि शालुले अङ्गालोवाट छुट्टिएर कान्छीको आँखाकोआँसु पुछ्दै भनिन्‌, &#039;दिदी, पेटमा बच्चा हुँदा रुन हुँदैन रे । दाइले मलाई बिहानलिन जाँदा सबै कुरा वताइसक्नुभएको छ । दिदी, मैले जुन सपना देखेकीथिएँ । त्यो सबै साकार भयो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीको रुवाइ अझैँ थामिएको थिएन । घुँक्कघुँक्क रुँदै भनिन्‌, &#039;मैलेहजुरलाई कति नराम्रो सोचेँ, मलाई माफ गर्नुहोस्‌ । म त हजुरको अगाडि केहीपति होइन रहेछु । म त पापिनी रहेछु मैयाँसाप पापिनी ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीको मख छोपिदिँदै भनिन्‌, &#039;तपाईंले आफूलाई पापिनी ठान्नुभयोभने यो संसारमा को घर्मात्मा होला ! मैले त तपाईंलाई घरबाट निकाल्नसानो नाटक मात्र गरेकी हुँ । तपाईंले मेरा लागि सिङ्गो जीवन नै बलिदानगर्नुभयो । ममीको त्यो तिरस्कार हाँसोमा उडाइदिनुहुन्थ्यो । केवल मैरो खुसीकालागि आफूलाई पलपल मा्नुहुन्थ्यो । यहाँसम्म कि आफूलाई नै भुल्नुभयो ।दिदी, ममी तपाईंलाई निकाल्न धेरै आतुर हुनुहुन्थ्यो । मैले नै तपाईंलाईनिकालेपछि उहाँ स्वर्ग पाएजस्तै खुसी पत्ति हुनुभयो । त्यति मात्र होइन,भोलिपल्टै होटलमा भोज पनि दिनुभयो । तपाईँलाई वेश्या सावित गर्नुभयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छरछिमेकले पनि तपाईंलाई राम्रै वेश्यामा परिणत गरै । म सवैको कुरा सुन्नबाध्य भएँ । अहिले तीन-चार महिनामा तीन-चारवटा काम गर्नै फेर्दा पनिममीको चित बुझेको छैन । फूलवारी र करेसाबारीमा केवल घाँसैघाँस उम्रिएकोछ । घर लथालिङ्ग छ । काम गर्नेहरू दिनभरि टी.भी. हेर्दै बस्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;हजुरलाई बेलामा खान दिन्छन्‌ होइन ?&#039; कान्छीले सोधिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले हाँस्दै उत्तर दिइन्‌, &#039;मेरो त पीर नै नगर्नुहोस्‌ । म उनीहरूले नदिएआफैँ बनाएर खाइहाल्छु ति ! साँच्चि गाउँबाट आएको छोरो कत्तिको ज्ञानीछ्न्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले प्रशन्न स्वरमा भनिन्‌, &#039;मैयाँ बाती-व्यबहार ठ्याक्कै चन्द्रकान्तकोजस्तो छ । मैले त कल्पनासम्म पनि गरेकी थिइनँ । उनी त्यति मायालु होलान्‌भन्ने, तर साह्रै असल छन्‌ । आमा भनेको छ, वरिपरि लुटुपुदु गरेको छ, मलाईपेटमा बच्चा आओस्‌ भन्नेसम्म पनि रहर थिएन । हजुरको मायामाझौँ वीरुकोमायामा डुबिसकेकी छु । बाबु-आमा रोहिणी मैयाँसाप, रेष्मा मैयाँसापले पनिहामीलाई आफनै परिवारझौँ ठानिसिन्छ । अस्ति त आमाले भण्डारको चावी नैमेरो हातमा थमाउनुभयो । मलाई आफनो कर्तव्य पूरा गर्न नसकीँला कि भन्नेपो पीर लागेको छ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले दङ्ग पर्दै भनिन्‌, &#039;रोहिणी पनि भन्दै थिइन्‌, बाबु-आमा तपाईं रदाइ भनेपछि हुरुक्कै गर्नुहुन्छ रे । तपाईंहरूलाई चिनेरै उहाँहरूले सांचोसुम्पनुभयो । त्यही त हो &#039;जान्नेलाई श्रीखण्ड नजान्नेलाई खुर्पाको बिंड&#039; भनेको ।ममीहरूले तपाईँको मूल्य बुझनुभएन । रोहिणीको बाबु-आमा बडो पारखीहुनाले तपाईंलाई चिन्न बैर लगाउनुभएन ।&#039; परिणाम ममीपापाले सम्पूर्णगुमाउनुभयो । रोहिणीको ममीपापाले सम्पूर्ण पाउनुभयो । दिदी त्यो पनौतिकोघरजग्गा बैचैर यतै नजिकै जग्गा किनेर राखिदिनु होला, यहाँ भए आजकोभौलि नै जग्गाको भाउ बढ्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हजुरले ठीक भनिस्यौ । अब घर सल्लाह गरेर त्यसै गरौंला, मैयाँसाप,भवेन्द्र पनि मैरौ विवाह भयो भन्नै सुनेर साह्रै खुसी छन्‌ रे । काका त्यही खबरलिएर आउनुभएको थियो । हजुरले पति आफनो ख्याल राखिसेला । दुब्लाएरआँखा पनि गडेछन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीको हात मुसार्बै भनिन्‌, &#039;हुन्छ म आफनो ख्याल राखतपाइँले पनि आफनो ख्याल राख्नुहोला । कान्छी आँखाभरि आँसु पारेररहिन्‌ । शालु सबैलाई भेटी खुसी हुँदै घर फर्किन्‌ । कान्छीको सुखी जीवनदेख्दा शालुलाई सिङ्कौ बसन्त पाएझौँ लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==नौ==&lt;br /&gt;
शालु कान्छीलाई भेटेर आएपछि यतिविध्त खुसी थिइन्‌ । आफ्नो खुसी पोख्नउनले घर नै थर्कने गरी क्यासेट खोलिन्‌ । त्यही म्यासेटको तालमा नाचिन्‌ ।क्यासेटको गीतमा स्वर मिलाएर गीत गाइन्‌ । शालुको त्यो क्रियाकलाप देखेरटाउको दुखेर सूतिरहेका दीपकले उर्मिलातिर फर्कदै भने, हेर उर्मी आज म योकेसुन्दैछु हामीले क्यासेट सुन्दा सानो पारेर बजाए हुन्छ भन्ने मान्छेले आज आफै....&#039;&lt;br /&gt;
सधैँ आदशं ओकेल्नै मैयाँसापलाई पनि अब वैंसले कृत्कृत्याएजस्तो छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपकले कुरा थपे, &#039;उर्मी मैले भन्दै थिएँ । शालु सिम्पल भइन्‌ भनेर पीरनगर । बैँस आएपछि उनमा आफसेआफ परिवर्तन आउँछ । पख न अबबिस्तारै उनी तिम्रो इच्छाभन्दा पति माथि उदछिन्‌ । अनि हाम्री छोरीलाई छुनकसले सक्नै ? तर आज भने मलाई यो धुन अलि बढी नै भयो । धुन अलि कमगर्न लगाइदै ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले दीपकको गालामा म्वाइँ खाँदै भनिन्‌, &#039;प्लिज डार्लिङ चुप लागिस्यो ।छोरीको यो रूप देख्दा म ज्यादै खुसी छु । म मात्र के हजुर पनि त खुसी होइसिन्छति, हैन भन्िस्यौ त ? उफ ! आज हजुरलाई टाउको दुखेकोले फिरोजको डान्समिस भयो । आज कस्ता-कस्ता तरुनी लिएर आउँथ्यो कुन्नि ! होइन त्यसलेत्यत्रा युवतीहरू कहाँ पाउँदो होला ? मलाई त अचम्मै लाग्छ भन्या । मोरोआफू पनि कारिगरले कुँदेको ढुङ्गाको मूर्ति जस्तै छ । गंगा र रमण त त्यतिराम्रा होइनन्‌ त्यो कसरी पूर्ण चन्द्रफै जन्म्यो कुन्नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो उर्मी, तिमीले ठीक भन्यौ । बाबु-आमा त खासै राम्रा होइनन्‌ । क भनेअलगौ रहेछ । सबै भन्थे दार्जिलिङ पढ्न वस्दासम्म साह्रै असल थियो रे ।बाबु-आमाले चार-छपल्ट के पार्टीमा ल्याएका थिए । त्यसपछि उसले शिखरचढिहाल्यो । बानु-आमालाई नै माथ गर्ने गरी पिउँछ बा !&lt;br /&gt;
रमण भन्दै थिए, &#039;फिरोज स्टुडेन्ट भिस्सामा अमेरिका जाँदैछ । फेरि किनअमैरिका गएन छ कुन्नि ? आजकाल किन गंगा रमण पनि देखिँदैनन्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपालमा अरू कुरामा विकसित हुनु त्यत्तिकै हो । छाडापन भने राम्ररीसप्रेको छँदैछ । घन्टा-घन्टामै केटीहरू फेर्न पाएपछि किन जाओस्‌ अमेरिकासमेरिका । संचिवनी उमा भन्दै थिडन्‌- &#039;गंगा र रमणको त हाड र छाला मात्रैछ रे । पहिला मेरोजस्तो छोरो संसारमा नै छैन भनेर नाक फुलाउँथे । अहिलेछँडौलीहरूको पछि लागेर घरमा बास नै हुँदैन रे । वाबु-आमासँग मुखमुखैलागेर भन्छ रे तिमीहरूले जुन बाटो देखायौ त्यतै हिँडे के बिराम गरे हँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपकले लामो श्वास फेदै भने, &#039;त्यसो भए तिमीलाई लाग्दैन ? जे छिन्‌हाम्री शालु ठीक छिन्‌ भनेर ।&#039;&lt;br /&gt;
हो ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उमिंलाले टाउकोमा हात राख्दै भनिन्‌, &#039;फिरोजजस्तो पो हुनुभएन तसमयअनुसारको त हुनैपन्यो नि । हाम्री शालु त सत्ययुगकी सीताजस्ती छै ।उसलाई यो युगमा कसले गन्छ शालुको पापा : देखिसेन, सुब्वा-सुव्विनीकोजोडीलाई, चट्ट वाइन समाई दुई पेग मात्र खाई । सबैसंग हात मिलाएर हिँडी,सबैले उसलाई राम्रै माने । हाम्री शालुचाहिँ डा. पुष्कर भट्टको श्रीमतीभन्दाकम हुन्न । न लाउनको सोख न खानको ।&#039;&lt;br /&gt;
दीपकले थुक घुटुक्क निल्दै भने, &#039;हो उमी त्यो सुब्विनीको हात पिउरीजस्तैनरम थियो । अहिले सम्झँदा पनि जीड नै सिरिङ्ग हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;उमिंलाले अलि ठुस्कँदै भनिन्‌, &#039;भर्खर विवाह गरेर ल्याउँदा म पनि तिनीभन्दाकम थिइनँ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाको कुरा सुनेर दीपक ठूलो स्वरमा हाँसे । अनि सोचिरहे- &#039;साथीकोविवाहमा जन्त जाँदा रूप राम्रो देखेर विवाह गर्छु भनिहालें । विवाह गरेरल्याएको राति फुटेका हात खुट्टाले शरीरमा कोरेको अझैँ बिर्सिएका थिएनन्‌उनले । मनमनै भने, &#039;मैले विवाह गरेर नल्याएको भए कहाँ दाउराघाँसगरिरहेकी हुन्थिन्‌ यतिखेर । धादिङबाट बिबाह गरेर ल्याउँदा बोल्नसम्म ढङ्गथिएन । स्पष्ट बोल्न नजानेर कत्रो हत्य । चम्चा उचाल्नसमेत आउँदैनथ्यो ।तिमीलाई मान्तैपर्नै कुराचाहिँ तिमीले आफूलाई चाँडै नै सहरीया साँचोमाढाल्यौ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;होइन के सोचिस्या ? म सुब्विनी जस्तो थिइन त ?&#039; चेप्रिँदै बोलिन्‌उर्मिला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
थियौ बाबा थियौ । तिम्रो रूपले मोहनी लगाएरै त हो नि त्यो डाँडाबाटयहाँसम्म ल्याएको । तिमीलाई आफनो चालढालमा ढाल्न गाह्रो हुन्छ भन्नेलागेको थियो, तिमी त उपियाँ उफ्रेझै मभन्दा पहिला उफ्रियौ । अहिले तिमीलाईकसले भन्छ घादिङकी भनेर ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले मख्ख हँदै कुरा थपिन्‌, &#039;अब हाम्रो गुप्र नै नृत्य सिक्न जाने भएकाछ। जीउ पनि बन्ने कला पनि सिकिने ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपकले भने, &#039;अबचाहिँ योभन्दा माथि नगए राम्रो । जे पनि पच्ने गरीखाएको राम्रो हुन्छ । तिम्रो गुप अलि माथि नै गइसक्यो, अब कति माथि जानेमन छहँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;सबैले नाच सिक्ने. भनेपछि म मात्र कौवाको बथानमा बकुल्लौ हुनु भएन ।हजुर हल्का भुजा, दाल तरकारी खाइस्यो । म भने मासुसँग अलिकति सुइँक्याउँछु ।हेरिस्यो नखाई त निद्रा नै पर्दैन । शालु पनि नाच्दानाच्दा थाकेर सुतिन्‌जस्तो छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नभन्दै शालु थाकेर ओछ्यानमा पल्टेकी थिइन्‌ । यता शालु उता कान्छीकोमन नै खुसीले नाचिरहेको थियो । कान्छीले शालुको तस्बिरलाई पहिलाकै किलामा &#039;झुन्ड्रयाइन्‌ । शालुसँगको भेट हुँदाको खुसीले गर्दा कान्छीलाई खानपनि मन लागेन । राति चन्द्रकान्तको छातीमा सृतेर आँसु वगाइरहिन्‌ ।चन्द्रकान्तले कान्छीको मनको करा बुझेर कान्छीलाई दुई वर्षको बालकलाईझैमाया गरेर सुमसुम्याइरहे । कान्छी रुँदारुँदै निदाइन्‌ । चन्द्रकान्तले वडो मायालुपाराले कान्छीको टाउको तकियामा राखेर आफू पनि सुते ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुजन कोठामा पसेपछि शालुको एकाग्र भङ्ग भयौ । सुजनलै दिक्क मान्दैभने, &#039;हेरन शालु आज पापालाई टाउको दुखेर पार्टीमा जान पाइनँ । हिजो त्योफिरोज भन्नेले डान्स गरेको अझै आँखामा झल्झली आइरहेको छ । सेमतिम्रोजस्तै डान्स गर्दोरहेछ । त्यो प्रकाशेलाई त अहिले कसैले वास्ता नैगर्दोरहेनछन्‌ । हेर शालु, फिरोजलाई देखेपछि युवतीहरू त हाम फालेरआउँदारहेछन्‌ । म पनि ठूलो भएपछि फिरोज जस्तै बन्छु । डान्सचाहिँ तिमीलेसिकाइदिनुपर्छ नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले सुजनको हात समातेर मुसार्दै भनिन्‌, &#039;डान्सचाहिँ म सिकाइदिउँलातर फिरोजजस्तै बन्छुचाहिँ नभन. फिरोज भनेको बेलुनमा हाबा भरेको जस्तैहौ । केही समयपछि आपसैआफ फुट्छ त्यो । जीवन नबुझनेहरूमा गनिन्छत्यो । त्यसको चर्चा ममीको मुखबाट पनि धेरैपल्ट सुनेकी हुँ मैले । ममीहरूजस्ताको मात्र पारखी हो त्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दिदी तिमी त आफूलाई निक्कै ठूली भएँ भन्नै ठान्छयौ कि क्या हो ? मान्छेकति-कति पढ्दा त ठूलो हँदैनन्‌ तिमीले त बल्ल एस्‌ एल्‌ सी. दिएकी छ्यौ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कान्छु मैले सानोमा नै दिदीबाट घेरै कुरा सिक्ने मौका पाएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमीले नै दाइ र दिदीको नराम्रो विचार रहेछ भनेर निकालिदिएको होइनर ? फेरि कसरी उनीहरू राम्रा भए ?&#039;&lt;br /&gt;
शालुले तुरुक्क आँसु झार्दै भनिन्‌, &#039;तिमी अहिले सानै छौ कुरा बुझदैनौ ।डान्स म सिकाइदिउँला । मान्छेले सबै क्रा जान्नुपर्छ तर सबैभन्दा ठूलोचाहिँपढाइ नै हौ । कहिलेदैखि पढाइ सुरु हुन्छ तिम्रो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुजनले हाई गर्दै भने, &#039;पसिंदेखि हुन्छ । दिदी हुँदा कहिले घरको खानाखाक जस्तै हुन्थ्यो । अहिले जतिपल्ट घर आउँछ उतिपल्ट काम गर्नेहरूफेरिएका हुन्छन्‌ । होस्टेलको भन्दा पनि खाना मीठो हुँदैन । अहिले पनि मैलेभुजा खानै सकिनँ । तिमीले खायौ ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;आज मलाई खान मन नलागेर त्यसै सुतेकी थिएँ । भोलि बिहान म खानापकाउँला, दिद्दीले जस्तो पकाउन त सक्दिनँ, तीर्थले भन्दाचाहिँ मीठो नैपकाउँछु ।&#039; हुन्छ भन्दै सुजन आफूनौ कोठातिर लागै । शालु दिदीको सम्झनामाआँसु झार्दै सुतिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==दस==&lt;br /&gt;
क्याम्पस आएको पहिलो दिनदेखि नै आफनौ हाउभाउ र सुन्दरतालेकक्षाकोठाको मर्यादालाई नै हलचल पारेकी थिइन्‌ मौसमीले । केही बनौँलाभनेर विज्ञान विषय लिएर पढेका युवाहरूको ध्यान पढाइमा भन्दा मौसमीकोरूपमा केन्द्रित थियो । शालुलाई मौसमीको चालढाल देखेर अत्यन्त रिसउद्यो । केही दिन त शालु मौन नै रहिन्‌ । जब कक्षामै मर्यादाभन्दा बाहिरगएर हात हालाहाल गरी चलेको देखेपछि शालुले मौसमीलाई एकान्तमा गएरसम्झाइन्‌, “मौसमी, तिमी कुन बिषय लिई पढ्दैछूयौँ थाहा त छ, होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले हाँस्दै उत्तर दिइन्‌, &#039;शालु, तिमीले भन्न खोजेको कुरा मैलेबुझिसकेँ । हेर म यहाँ आफनो खुसीले भर्ना भएकी हुँ भन्ने ठानेकी छौँ?जिल्लामा सरहरूले नै चिट चोराएकाले गर्दा राम्चै फस्ट डिभिजन आएछ ।बिचरो मेरौ सोझो बाबुलाई छौरीले रामो नम्बर ल्याएकी छ, साइन्स पढा,भौलि डाक्टर हुन्छै भनेर उचालिदिएछन्‌ । हो न हो छोरी डाक्टर बन्छे भन्नेसपना देखेर मलाई यो क्याम्पसमा ल्याएर कोचेर पो गए । हेर, बाबु-आमाभनेको त पढेलेखेको चाहिने रहेछ बुझयौ ? मैले हजारपल्ट भने- बुबा मसाइन्स पढ्न सक्दिनँ । मेरो कुरा मरे सुनेको भए पो । अझ अर्को कुरासुन्छयौँ ? वसमा मान्छेहरूले कहाँ जान लाग्नु भो भन्दा भन्धे- मेरी छोरीलेएस्‌.एल्‌ सी.मा बोर्ड ल्याएकीले काठमाडौंमा डाक्टर पढाउन हिँडेको । भकारोसोने बाबुलाई फस्ट डिभिजन र बौर्डफस्टको अन्तरसम्म थाहा छैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मलाई पो लाज लागेर, उता बूढाको खुट्टा भुइँमा छैन । अब म लबुदुलेडाक्टर बनेर उनको छाती दुखेको निको पार्ने रै, उफ कर्म !, बाबुको करासम्झँदा पनि कहिले एक्लै हाँस्छु कहिले एक्लै रुन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले मुसुक्क हाँस्दै भनिन्‌, &#039;बडो हँसायौ तिमीले, बिचरो, तिम्रो बाबु बडोसिधासादा हुनुहँदोरहेछ । कहाँबाट आएकी नि !&#039;&lt;br /&gt;
मौसमीले निदारमा हात राख्दै भनिन्‌, &#039;राम्रो ठाउँबाट आएकी भए यो दशाकिन भोग्नुपर्व्यो ? पर्वतबाट आएकी बानु डाक्टर बन है छोरी भनेर नाकफुलाएर गएका छन्‌ । तेत्रो पढेलेखेका घरबैटीलाई यसो भने- &#039;ए हजुर, योछोरीले डाक्टर पढ्दै छे कहिलेकाहीँ घरबाट भाडा आउन ढिलो भए केहीनभन्नु होला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घरबेटी बुवाले मेरो बाबुको कुरा सुनेर मुसुक्क हाँस्दै मुन्टो हल्लाउनुभयो ।मैले कतिपल्ट डाक्टर बन्न सजिलो छैन भनेर सम्झाएँ, मेरो कुरा सुनै पौ ।उल्टै भन्धै- &#039;तिमीले मलाई मूर्ख बनाउन नखोज है छोरी, &#039;म पनि देश खाएर सेस भएको मान्छे&#039; अहिलेसम्म त वाबुले गाउँमा मेरी छोरी डाक्टर बनेरआउँछै भन्दै हल्ला पिटे होला । हेर शालु, मेरो बाबुलाई डाक्टर बन्नु भनेकोगुन्द्रुकमात खानझै सजिलो हुन्छ झैँ लाग्छ क्यारे ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीको कराले शालुले हाँसो रोक्नै सकिनन्‌ । केहीवैर हांसैर भनिन्‌,“मौसमी मान्छेले चाहेमा जे पनि गर्ने सक्छ । तिमीले दिलोज्यान दिएर पढ, यीभवराहरूको भुनभुनबाट ज्यादै टाढा रहँ । जसरी भमराहरू फूलको रस पाउन्जेलमात्र फूलमा बस्छन्‌ । यी युवकहरू पनि त्यस्तै हुन्‌, तिमीले आमाको त करैगरेनौ नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आमा त म तीन वर्षकी हुँदा बित्नुभयो रे । आमाको त सम्झना नै छैन ।बाबुले नै थि भयो । हामीलाई दुःख देली भनेर अर्को बिबाहसम्म गर्नुभएन ।आमा मर्दा बाबु पैतीस-चालीसको मात्र हनुहुन्थ्यो रे । दाइ र दिदीले एस्‌.एल्‌.सी.पास गर्न सकेनन्‌ । मैले फस्ट डिभिजन ल्याएको उनलाई के-के न भयो । वावुभन्दै थिए, &#039;नानी तँलाई डाक्टर बनाउन चालीस-पचास हजार पर्ने टाँडी खेतनै बेचिदिन्छु ।&#039; बाबुको कुरा सुनेर म झन्डै पागल भएं । सम्झाउन खोज्दाउल्टै बौल्न दिने हो र । भन्थे- &#039;तिमी खुरुक्क पढ मात्र अरू कुरा मलाई थाहाछैन । त्यो खेत बेच्दा पनि पैसा नपुगे माझा पाटो पनि बेचिदिउँला । डाक्टरबनेर पहिला पोस्टिङ गाउँमा नै मिलाए है नानी ...। अँ साँच्चि शालु, मसँगतिमी सबै कुरा गर तर भमरा र फूलको कुरा नगर । म बैंसका उन्मादहरूलाईबसमा राखेर तद्वपिन चाहन्न । म आफूलाई कुण्ठित पारेर बाँच्दित पति । मउड्न चाहन्छु बुझ्यौ ? तिमीले बगैँचामा गएर कोपिलाहरूलाई नफुल भनेरगाली गर्दैमा फुल्दैन र त्यो ? फुलेपछि भगरा लाग्नु प्रकृतिको नियम हो । त्योप्राकृतिक नियमविरुद्ध हिँड्नु नै पाप हो । सक्छयौ भने प्राकृतिक नियमविरुद्धतिमी पनि नहिँड । यी क्षण हामीबाट बगेपछि बग्यो शालु । हामी बुढेसकालमाचाहेर पनि यो खुसी पाउन सक्दैनौँ । म तिमीलाई अन्तिमपटक भन्दैछ, मेरोओठको हांसो नखोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले बडो नम्र स्वरमा भनिन्‌, &#039;मौसमी, तिम्रा बाबुको सपनासँग तिमीलाईकनै सरोकार नै छैन त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले उत्तर दिइन्‌, &#039;सपना देख्नेले पनि अलि सार्थक हुने सपना पोदेख्नुपयो नि ! हुट्टिट्याउँले आकाश थामेको सपना देख्नेले देखिरहुन्‌ । मलाईकुनै चासो छैन । एक-दुई वर्ष यसो क्याम्पसमा हल्लिन्छु । त्यसपछि गाँठवालापट्याउँछ र विवाह गर्छु । सुन्दरी छँदैछु, मान्छेले हेर्ने सुन्दरता नै हो । मान्छयौभने तिमीले पनि आफूतौ सुन्दरतामा ध्यात दिने गर, साँच्चि शालु तिमीलाईपो युवकहरूले कुन गाउँबाट आएकी भनेर मसँग सौध्दै थिए । कमसेकमकाठमाडौंको त इज्जत राख । उनीहरूले मात्र होइन । मैले पनि तिमीलाईगँवार नै सोचेकी थिएँ । यस्तै हो भने तिम्रो भविष्य अन्धकार छ बालिके ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीको करा सुनेर शालु एकैछिन मौन रहिन्‌ र भनिन्‌, &#039;मौसमी, भीरखोज्ने गोरुलाई रामराम मात्र भन्न सकिन्छ काँध नै थाम्न त सकिँदैन । मैलेजीवन्त के हौ नबुझेकी भए म किन तिमीसँग राम्रो वाटो रोज भनेर हातजौद्यैं । तिमी र म एकै उमेरका हौँ । कै तिमीलाई वैंसले कृतकत्याउँदा मलाईबैंसले छोड्छ होला र ? तर, ठूलो त मन हो । तिमीलाई आफूनै आँसु पियाएरहुर्काउने बाबुभन्दा तिम्रो बैँस ठूलो होइन । टाढा किन जान्छौ । तिम्रो बाबुलेनै तिमीहरूको खुसीका लागि आफूनो खुसी बन्धकी राख्नुभयो । तिमी साइन्सपढ्न सम्दिन भन्छ्यौ भने अर्को विषय पट, समय छँदैछ । बरु सक्दो सहयोगम नै गर्छु । प्लिज मौसमी तिमीले आफूलाई सत्व नठान । अहिलेसम्म तिमीबहुमूल्य रत्न हौँ । तलमाथि केही भयो भने तिमीलाई मान्छेहरूले फुटेकोभाँडोसँग पनि दाँज्दैनन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;शालु, तिमीलाई मेरो रूपको त्यत्रो डाह छ भनेकाटेर लेक । तिमीलाई युबकहरूले पछ्याएनन्‌ अनि मेरो डाह गर्छ्यौं, तिम्रोमनको कुरा गैले बुझिसकेँ । भमरा &#039;झुम्मिँदा पनि बास्नादार फूलमा &#039;झुम्मिन्छन्‌याद गर । तिमी र झरेका फूलमा कुनै अन्तर छैन । अनि को पछि लागोस्‌तिम्रो ? सक्छयौ भने एकजना युबकलाई मात्र पछि लगाउन सक&#039; भन्दैमौसमी भुतभुताउँदै उठेर आफ्नो कक्षाकोठामा प्रवेश गरिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले मनमनै सोचिन्‌, &#039;भगवान्‌ मौसमीको जीवनमा आँधी नआओस्‌ ।उनले जीबनको मूल्य बुझून्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले ढोकाबाट चिहाउँदै भनिन्‌, “मोरी, म तँलाई खोज्दाखोज्दा हैरानभैसके । कै सौचैर बसेकी ? कतै तैँले अरिङ्गालको गौलामा हात हाल्नै कामगरिनस्‌ ; मौसमी पनि कक्षामा फतफताउँदै पसेकी थिइन्‌ । तँ किन प्रेमलाईघणा गर्छेस्‌ भत्त त ? मौसमीले भन्दा बढ्ता उच्छुड्खल हामीले प्रत्येक क्षणसडकपेटी र गल्लीहरूमा हिँड्ने प्रेमी-प्रेमिकाहरू देख्दै आएका छौँ । यसरी तँभाबुक नबन, खुरुबक क्लासमा हिँड । तँ सधैँ यही भन्छेस्‌, “वास्तबिक प्रेममात्याग हुन्छ, प्रेममा लज्जा हुन्छ, बास्नाभन्दा बढी प्रेम हुन्छ केवल प्रेम ? त्यस्तोप्रेम गर्ने भए तैँले र मैले मात्र गरौँला अरूबाट तैँले यस्तो प्रेम गर्लान्‌ भन्नेआश नगरै पनि हुन्छ । तँ परिस्‌ प्रेमको सख्त विरोधी । मैले कसैसँग प्रेम गरेँभने तैँले सोचेभौँ प्रेम गर्छु । अब त हाँस ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीको कुराले शालु फिस्स हाँसिन्‌ र वसेको ठाउँबाट उठ्दै भनिन्‌,“रोहिणी, त्यो गाउँले केटी आफ्नै आँखासामु बिग्रिन्‌ भने मचाहिँ हेर्न सक्दिन ।यसो जानेबुझेको कुराहरू भन्दा राम्रै हौला भनेर भनेकी थिएँ । तैँले भनेझैँअरिङ्गालको गोलामै हात हालेँछ । उनी बाहिरको मात्र सुन्दरी रहिछिन्‌ ।मलाई त उनको बाबुको माया लाग्यो । छोरी ठूलो वन्ली भन्ने ठूलो सपनादेखेका रहेछन्‌ । छोरीको ताल भन्ने देखिहाल्यौ । त्यो श्रीराम सरको ताल पनि के हो ? मौसमीबाट उनको आँखा टाढा जाँदै जाँदैन । बूढो भएर पनि पात्तैकोमोरो । त्यस्तै ताल हो भने हामीले राम्रो शिक्षा पाउने आश नगरे पनि हुन्छ ।पुरानो क्याम्पस भनेर अमृत साइन्समा नै आइयो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;मोरी पीर नगर । पढाइ राम्रै होला नत्र आकाश किन यहाँ आउँथे ? मैलेझुलुक्क उनलाई देखेकी थिएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“औं आकाश पत्ति यहाँ, उनी त ए सेक्सनमै होलान्‌ । आकाश यहाँ आएकाछन्‌ भनेपछि त म ढुक्क भएँ ।&#039; शालुको आँखामा खुसी छरियो ।&lt;br /&gt;
रोहिणीले भनिन्‌, &#039;शालु तिमी आकाशको नाम सुन्नैबित्तिकै सधैँ हषितदेखिन्छयौ कित ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले हाँस्दै उत्तर दिइन्‌, &#039;रोहिणी कुरा हामी सबैलाई थाहा नै भएको हो ।आकाशजस्तो चरित्रवान्‌ त यहाँ जन्मेकै छैनन्‌ होला । उनी सम्पूर्ण गुणले पूर्णछन्‌ । यदि भगवान्‌ले कुनै मान्छेको सृष्टि गर्नु छ भने आकाशजस्तो व्यक्तिकैसृष्टि गरोस्‌ । म आकाशलाई कुन उपमा दि उनलाई दिने त्यस्तो उपमा नैभेटेकी छैन मैले ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“क मैयाँसाप, भखंरसम्म प्रमको खिलापमा थिई, फेरि भावनामा बगी, तँकतै आकाशलाई प्रेम त गर्दिनस्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले उत्तर दिइन्‌, &#039;रोहिणी आकाशलाई प्रेम गर्नु भनेको चन्द्रमा छुनुजत्तिकैहो । उनलाई प्रेम गर्नेले पहिला आफनो अनुहार पनि त हेर्नुपत्यो । म उनलाईपूजाचाहिँ गर्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;तँ नरिसाउनै भए म एउटा करा गर्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले हाँस्दै भनिन्‌, &amp;quot;भन न काली किन रिसाउनु : ? नरिसाउने क्रा गरिस्‌भने रिसाउँदै रिसाउन्न, रिसाउने कुराचाहिँ नगर, दिदी-दाइको बारेमा तहोइन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;ल हेर आत्तैकी, तेरा दिदीदाइले त हाम्रो घरलाई स्वर्ग नै बनाएका छन्‌ ।साँच्चै शालु, आफू बूढेसकालकी छोरी, मलाई घरको साह्रै पीर थियो । अहिलेभैरो टाउकोबाट कसैले सिङ पहाड झिक्िदिए जस्तै भएको छ । तेरौ यो गृणम कहिल्यै बिर्सने छैन । ममी-वाबा पनि सधैँ तेरो करा गरिरहनुहुन्छ । दाजु,दिदी पति तेरै कुरा गर्नुहुन्छ । तैले आँसु पिएर कान्छीदिदीलाई मेरो घरमापठाइस्‌ । हामीले सम्पूर्ण पायौं, तैँले सम्पूर्ण गुमाइस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले बीच्चैमा कुरा काट्दै भनिन्‌, &#039;तँ एक्लै बौलिरहेन्छस्‌ कि मलाई पनिवोल्न दिन्छेस्‌ काली : पाउनु मात सबै होइन, आत्मा सन्तुष्टि नै सबै हो ।&#039;दिदीले सबै पाउनुभयो । तैंले सहयोग नगरेको भए न तैले सम्पूर्ण खुसीपाउँथिस्‌, न मैले, हामी सबै एक-अर्काका खुसीमा रमाएका छौँ भने पाउनु र गुमाउनुको त प्रश्नै रहेन । तेरा बूढा ममी-बाबाको ओठमा खुसी देखेपछि तमैरो हर्षको सीमा नै रहेन । तेरो घरको खुसीमा कसैको आँखा नलागोस्‌ । तैँलेके भन्न खोजेकी विइस्‌ कुन्नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;शालु मलाई लाग्छ आकाश तँलाई प्रेम गर्छन्‌ । एकपल्ट त मैरो कुरामाबिश्वास गर । आकाश तेरो लागि नै जन्मेको हुनुपर्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले रोहिणीको कुरालाई हाँसोमा उडाउँदै भनिन्‌, &#039;ल अब तेरो दिमागत्वुस्कियो । प्रेम त्यो पनि आकाशले मसँग । त्यस्तो कुरा मनमा लिनु पनि पापहो । आइन्दा प्रेमसिरेमका क्रा मसँग गरिस्‌ भनेचाहिँ म साँच्चै रिसाउँछु त॑पनि कसैसँग प्रेम नगर है मैले भनिदिएकी छु ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीलाई चुप लाग्न करै लाग्यो । पढाइ सिध्याएर वाहिर निस्कँदै गर्दाबिनुले मौसमीलाई कोट्याउँदै भनिन्‌, “के हो मौसमी ठूलै माछा जालमा पार्नलाग्यौ कि कसो : श्रीराम सर त तिमीलाई देखेर लट्टेजस्तो छ नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले शालुतिर हेर्दै भनिन्‌- &#039;हे्दै जाक न कति माछा जालमा पार्छु ।प्रकृतिले नठगेपछि मान्छेले डाह गरेर के लाग्छ : यो क्याम्पसमा त मेरो डाहगर्ने धेरै छन्‌ बुझ्यौ ? कतै तिमीलाई पति मेरो डाह लागेको त होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;छ्या के को डाह नि, त्यो पति बूढो ढेडुको, आफू त पहिल्यै रिजापमा छु ।&#039;बिनुले उत्तर दिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालु र रोहिणीले उनीहरूको करा सुने पनि नसुनेकोझौँ गरी क्याम्पसबाट बाहिरिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==एघार==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु ओछ्यानमा सुतिन्‌ । खुसीले गर्दा होला आँखामा निद्रा परेन । आँखामाकान्छीदिदीले जन्माएको तीन किलोको सुन्दर शिशु आइरहयो । बाह्र-तेहर वर्षकोचीरुदेखि लिएर रोहिणीका सम्पूर्ण परिवार त्यो शिशु र ढिदीको स्याहारमाकटिबद्ध थिए । सबैको अनुहारमा गुराँस फुलेको थियो । दिदीलाई स्याहारगर्नका सागि खु आइमाई राखेको रहेछ । पीताम्बरा अरूले स्याहार पुन्याउँदैनन्‌नातिलाई सेकताप गर्छु भनेर सुर्रिएकी थिइन्‌ । दिदी र दाइ प्रसन्नमुद्रामा नवजात शिशुलाई हेरेर टोलाइरहेका थिए । मलाई देख्नेबित्तिकै दिदीसम्पूर्ण खुसी विर्सेर रुनुभयो । त्यसपछि एकैछिन र वातावरण नै स्तब्ध भयो ।मैले सबैलाई वधाई दिएर त्यो सानो र सुन्दर शिशुलाई काखमा लिएपछि भनेपुनः रमणीय वातावरण छायो । दिदीलाई बच्चा पाउन चिरफार गर्नुपर्छ किभन्ने पीर थियो । त्यो पनि हट्यो । रोहिणी पनि कम वाठी छैन, पैले पीर गर्छुभनेर एकैपल्ट बच्चा पाएर घर ल्याएपछि डाकी । दिदीलाई अरूलाई भन्दा केही गाह्रो त भयौ होला, तर दिदीले मैयाँ धेरै गाह्रो भएन भनेर ढाँदनुभयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीकी आमाले पनि दिदीकै कुरामा सही मिलाउनुभयो । शाल्‌ दिउँसोकोसबै कुरा सम्झँदै ओल्टैकोल्टै परिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
होइन मैयाँसाप आज पनि खाना नखाई सुत्नै कि क्या हो ? आफभन्दा दुई-चार वर्ष जेठो तीर्वले ढोकामा आई बोलेर्पाछ पो शालुले आफू भोकै भएकोकरा याहा पाइन्‌ र ओछ्यानबाटै भनिन्‌, &#039;तपाईँ खानोस्‌ म खान्न ।&#039; तीर्थेलेआफनै सुरमा के भन्यो बुझितन्‌ शालुले ।&lt;br /&gt;
केहीबेरपछि नशामा गुनगुनाउँदै आएको पापाको स्वर भने शालुले राम्ररीबुझिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले हाँस्दै भनिन्‌, “बुढ्यौली लागेर पनि अझैँ बैँस गएको छैन । मोरोतीर्थ र शालुले गीत सुन्लान्‌ नि फेरि । शालुको पापा म पो अबदेखि रमफझमबाटविमुख हुने भएँ । यो तीर्वेले पनि यो घर होइन, आफनै पेट मात्र सम्हाल्नेभयो । मेरो घर भत्कियो पापा भत्कियो । म बर्बाद भएँ । कान्छीलाई आजैलेराइदिस्यो आजै ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपक चिच्याए, &#039;उर्मी, चूप लाग आज तिमीलाई धेरै नशा लागेजस्तो छ ।त्यौ कान्छी चकलेट हो र तिमीले भन्दैमा किनेर ल्याउने । कान्छी बस्तासम्मआजै निकालौं भोलि निकालौँ भन्दै दिमाग खान्थ्यौ । अहिले फेरि, कान्छील्याइदिनु पो भन्छिन्‌ । होसमा बोलेकी हो कि बेहीसमा यो आइमाईको बोलीकोभर नै छैन।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म होसमै छु भन्दै कपडा नै नखोली पलङमा पल्टिन्‌ र कान्छी-कान्छी भन्दैनिदाइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपक पनि उमिलाले कान्छीको नाम लिएको सुनेर केही रिसाउँदै सुते ।शालु ममी र पापाको शब्दहरू सुनेर मनमनै रोइन्‌, &#039;तिमीहरू जस्ता पापीलेगर्दा नै मैले दिदीको काखबाट टाढा हुनुपन्यौ । तिमीहरू गतिला भएको भएत्यो भाइ आज यो घरमा हुन्थ्यो । माल पाएर चाल नपाउनेहरू रोओ, अवकति रुन्छौ । शालु दिदीलाई सम्झँदै निदाइन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन तीर्थ दाइ किन झोलासोला बौकेर हिँडेको :&#039;&lt;br /&gt;
तीर्थले आँखा पल्टाउँदै भन्यो, &#039;म त पहिलाकै घरमा जान्छु । त्यहाँ तमैयाँसापसँग हाँस्न र ठट्टा गर्न पाइन्थ्यो । जति पैसा मागे पनि दिन्थे । यहाँआएपछि न हाँसोठट्टा गर्न पाइन्छ न त पैसा नै दिन्छन्‌ । पैसा दिनुपन्यो भनेदाँतबाट पसिना निकाल्छन्‌ । कान्छीले यसो गर्थी, उसो गर्थी भनेर उल्टैरामायण सुनाउँछन्‌ । यो कलियुगमा को कान्छी भन्नै जन्तु रहिछै नविना पैसाकाम गर्ने । उहाँकी मैयाँसाप म रिसाएँ भने मलाई काउकृति लगाएर हँसाइसिन्ध्यो । हजुरकै उमेको भए पनि वढो रसिलो होइसिन्थ्यो । म भनेपछिहुरुक्कै होइसिन्ध्यो । यहाँ हजुर पनि यस्तै होला भनेर आएको त हजुरले तहाँस्तसम्म जानेको छैन रहेछ । अरू कुरा त परै जाओस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालु तीर्थैंको कुरा सुनेर डराइन्‌ र आफनो रिसलाई कन्ट्रोल गर्दै भनिन्‌,&#039;दाइ तपाईं जानोस्‌, यहाँ अर्को काम गर्ने ल्याउने कुरा भइरहेको छ बरुबाटोखर्च छैन भने म दिन्छु।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीर्घले झकिँदै भन्यो, &#039;बिहान आफनो तलब मागिसकेको छु । जति कामगर्ने ल्याए पनि यो घरमा को टिक्ला र ? ल म गएँ । यही तलब पर्खेर बसेकाथिए तत्र अस्ति नै गइसक्यें । मति बिग्रेका यहाँ आएँ, अहिले उहीँ फर्कनुपन्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फौनमा उहाँको साहु-साहनी र मैयाँसापले अन्त बसेर चेतिस्‌ होला,आउँछस्‌ भने आइज भन्नुभएको छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीर्थे ठूलो-ठूलो फड्को मार्दै बाटो लाग्यो । शालुले तीर्थेको नियति बुझेपछिक निकाल्नु नै श्रेय ठानिन्‌ । तीथेंले बाटो लाग्दा उसको अनुहारमा पनि कुनैहीनताबोध थिएन । क खुसीले उन्मत्त थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन, तीर्थे कहाँ मन्यो र तिमी गेट खौल्न आएकी ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अरू काम गर्ने सात-आठजना मरेजस्तो क पनि भन्यो । तीर्थको कराभोलि गरौंला, अहिले हजुर नशामा होइसिन्छ सुतिस्यो ।&lt;br /&gt;
दीपकले भने, &#039;बिहानसम्म त उसले जाते क्रै निकालेको थिएन । एक्कासिकिन हिँड्यो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“भन्दै थियो काम गरेको तलब नदिएर पो वसेको नत्र म यो घरमा किनबस्थेँ ? पैसा माग्यौ कि सधैं कान्छीको कुरा गर्छन्‌ । भन्दै हिँड्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले विरक्त स्वरमा भनिन्‌, &#039;शालु हामी बिहानदेखि बेलुकासम्म बाहिरैहुन्छौँ । काम गर्न के नै गाह्रो छ र, काम गर्नेहरू किन टिक्दैनन्‌ ? न बगैँचार करेसाबाहिरै काम गरेका हुन्छन्‌ । घिच्नु र टी.भी. हेर्नुबाहेक अरू काम छैनर पनि यिनीहरूलाई के मात लाग्दो हो कुन्नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ममी हजुर सबैलाई कान्छीदिदीसँग तुलना गर्न खोजिसिन्छ । अनि कसकोचित बुझछ हँ ? हेर, कान्छीले यति मासु तीन छाकलाई पुन्याउँथी । कान्छीलेयति आलुले हप्ता दिन पुन्याउँथी, चामलले महिना दिन पुग्याउँची, तेलले यतिदिन, ग्यासले यति दिन, त्यसमाथि कान्छी त ज्याला लिँदैनथी । कपडा कहिल्यैमाग्दैनथी । हजुरको यौ भाषण प्रत्येक दित सुनेपछि कसरी टिक्छन्‌ मान्छेअब चुप लागेर सुतिस्यौ । पकाउने, खाने काम म आफैँ गरौंला, काम गर्नेमान्छे राख्नै पर्दैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपकले उर्मिलालाई कोठामा लग्दै भने, &#039;अब चुप लाग, कान्छीलाई निकाल्न अनेकौं बहाना बनाएको फल वल्ल भोग्दैछयौ । कान्छीले सिक्री चोरी, औँठीचोरी भन्दै घोच्च्यौ, हेर्दै जाक अब के-के हुन्छ । तिम्रो घरलाई स्वर्गजस्तैसुन्दर भन्नेहरू आजकाल यहाँ आउन मन गर्दैनन्‌ भन्दै आफैँ बेसुरमावर्वराउँछयौँ । तिमीलाई थाहै छ । शालु कान्छीलाई सानोभन्दा सानौ चौटलाग्दा पनि दुखित हुन्थिन्‌ । त्यस्ती शालुले आफैँले कान्छीलाई निकालिन्‌, त्योपनि चन्द्रकान्तको आरोप लगाएर त्यसमा ठूलै रहस्य होला । उमिलाले पलङमापल्टँदै भतिन्‌, &#039;हजुर पनि नाता शङ्का-उपशङ्का गरिसिन्छ । कस्ताले कस्तालेत बैँस थेग्न सक्दैनन्‌ । त्यो मोरीले सक्छे ? हामी कोही घरमा नहुँदा ती दुईकैरजाइँ हुन्थ्यो । कान्छी बारीमा गए पनि सँगै जान्थ्यो । त्यसले कान्छीलाई मायागर्छफौँ मलाई पहिल्यै लागेको थियो । त्यसैले त त्यो पनि पैसाको त्यति वास्तागर्दैनथ्यो । अहिलेको काले स्वाठ देखिसिन्न कस्तो छ । मैले अस्ति भाइ त्यतिफूलमा पाती हालिदैउन्‌ भनेकी थिएँ ठाड्चै जबाफ दियो- &#039;मैल आजसम्मकसैको घरमा काम गरेको छैन, हजुरहरूको बाहिर जाने भए फोन गर्नु भन्दैटिम्किँदै हिँड्यो । चन्द्रकान्तलाई कहिल्यै काम अह्ाउनु पर्दैनथ्यो । आफनैतलबबाट फूल ल्याएर कुन फूल कहाँ लगाउने कान्छीलाई सोधी-सोधीलगाउँथ्यौ । तरकारी लगाउँदा पनि त्यस्तै गर्थ्यौ । जसरी कान्छीले यो घरलाईआफनो सम्झन्धी त्यसैगरी चन्द्रकान्तले पनि यो घरलाई आफनै सम्झिन्थ्यो ।यो सबै गर्नुको पछाडि चन्द्रकान्त पति कान्छी यो घरबाट निस्कन चाहँदैन्थ्मोबुझनु भौ ? शालुले यो घरमा बस्नुको बास्तविकता नबुझेरै निकालेकी हुन्‌मलाई थाहा छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमीले जे सोचे पनि मेरो भित्री मनले भन्छ- &#039;शालुले कान्छीको कहिल्यैकमलो चिताउँदिनन्‌ । कान्छीलाई तिमीले निकाल्न लागेको योजना थाहापाएपछि शालु आफैँले कान्छीलाई निकालिन्‌ । कान्छी गएपछि कति दिनसम्मशालुले राम्रोसँग खाना खाइनन्‌ । आजभोलि भने उनको अनुहारमा अलिकचमक छ याद गरेकी छ्यौ ? त्यौ चमक तिग्रो र मेरो कारणले होइन,कान्छीको कारणले आएको हुनुपर्छ । कान्छी गएदेखि शालुले न मीठो खानाखाएकी छिन्‌ न समयमै खाता खाएकी छिन्‌ । फूल भनेपछि हुरुक्क हुने शालुलेन बगैँचा सुन्दर देख्न पाएकी छिन्‌ । त्यति हुँदा पनि उनी खुसी छिन्‌ । आखिरकिन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“भो-भो चुप लागिस्यो हजुर, नशाको सुरमा जे पनि भनिसिन्छ । हजुरकोकुरा सुनेर त मेरो टाउको फुट्ला जस्तो भयो । अब एक पेग नवपी निद्वानपर्ला जस्तो छ । उमिलाले वाइन खन्याएर गिलासमा हालिन्‌ । पानी पनिनथपी वाइन्‌ घट्घटी पिएर सुतिन्‌ । दीपकले पनि सिसीमै ठाडो घाँटी पारेरघट्घद्‌ वाइन पिई सुते । शालुको आँखामा दिदी, त्यो अबौध शिशु र सबैकोहर्षित अनुहार नाचिरहयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बार्ह==&lt;br /&gt;
लौ, यो युवकले बिहानै-बिहानै पिएर आएछ क्यार, क झुल्न पो लाग्यो ।अर्कोले कुरा थप्यो, &#039;कहाँ पिएको हुनु, यो र म सँगै लगनखेलमा बस चढेकाहौँ । कुसुन्तीसम्म आउँदा ठीक नै थियो, अहिले पो &#039;झुल्दैछन्‌ । अर्को यात्रुलेठूलो स्वरमा भने, &#039;ए ड्राइभर बस रोक कहाँ यो छारे रोगीलाई बसमाहालेको ? म &amp;quot;झर्छु । मलाई छारे रोग सार्नुछैन ।&#039; सबै यात्रुले एक्कै स्वरमाचिच्याए, &#039;हो ... हो, बस रोक कस्तो वेसाइतमा हिँडिएछ । छारे रोगी चढेकोबसमा । वस रोकेर ड्वाइभर र कन्डक्टरले केही बौल्न नपाउँदै सबै फुतफुतबसबाट ओलेर हिँडे । त्यही बसमा आएकी रोहिणी हेरेको हेरै भइन्‌ । रोहिणीलेहतारहतार &#039;फुल्दै गरेको युवकलाई समातेर भनिन्‌, &#039;द्वाइभर साप छिटो हस्पिटलहिँड्नोस्‌ न । तपाईंलाई जति पैसा चाहिन्छ म दिन्छु ।&#039; रोहिणीको कुरा सुनेरड्राइभरले केही खुसीको स्वरमा भन्यो, &#039;हुन्छ हजुर यहाँबाट नजिक वीर अस्पतालैहोला त्यही जाँ है ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले स्वीकृति दिइन्‌ तर युवक मुर्दाझै भएपछि रोहिणीको सातोपुत्लोगयो । ड्राइभर र कन्डक्टर दुवै डराए । ड्राइभरले रोहिणीलाई केही सान्त्वनादिँदै भन्यो, &#039;बहिनी नडराउनुहोस्‌ । यो केटो मूर्छौ मात्रै परेको हो । मरेकैचाहिँछैन । रोहिणी र कन्डक्टरले दुईतिरबाट च्याप्प समातेर वीर हस्पिटल पुन्याईइमर्जेन्सीमा लगै । डाक्टरले जाँच गरेर स्लाइनपानी चढाए । घोरै स्लाइनपानीसकिएपछि युवकले आँखा खोले ।&lt;br /&gt;
ड्वाइभरले झिनो स्वरमा भने, &#039;अब यो युवक मर्दैन । हामी जान्छौं पनि,तपाईंको इच्छाले जति पैसा दिए पनि हामी खुसी हुन्छौं । पैसा छैन भने नदिएपन्ति हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले पर्स खोल्दै भनिन्‌, &#039;तपाईंहरूले ठूलो सहयोग गर्नुभयो त्यसकालागि धन्यवाद, डाक्टरलाई पनि दिनुपर्छ होला, सय लिनोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
ड्राइभरले पैसा समाउँदै भन्यो, &#039;मैले त यति पैसाको आश नै गरेको थिइनँ ।तपाइँलाई पनि धन्यवाद जान्छौं पनि ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीले मुन्टो हल्लाएर ड्राइभर र कन्डक्टरलाई विदा गरिन्‌ । अब के गर्ने,के नगर्ने भन्ने सोचेर उभिइरहेकी थिइन्‌ । सिस्टरलै शालु नजिक आएर भनिन्‌,&#039;तपाईंलाई डाक्टरले बोलाउनुभएको छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणी सिस्टरपछि लागेर इमर्जेन्सीमा पुगिन्‌ । डाक्टरले रौहिणीतिर हेर्दैभने, &#039;तपाईंले अब बिरामीलाई घर लगे हुन्छ । उहाँ ब्लडप्रेसर लौ भएर मूर्छापर्नुभएको रहेछ । अहिले अनारको जुस ल्याएर खान दिनुहोस्‌, घरमा लगेरहड्डीको सुप, मुगुको सुप, खसीको खुड्डाको सुप प्रशस्त दिनु होला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टरको कराले रोहिणी र युवक रातो न पिरो भए । युवकले केही वोल्ननपाउँदै रोहिणीले भनिन्‌, “तपाईं बस्दै गर्नोस्‌ म अनारको जुस लिएर आउँछु ।त्यसपछि घर जाउँला ।&#039; रौहिणी बाहिर निस्केर गएपछि काउन्टरमा पैसातिरिन्‌ र अनारको जुर लिएर आई युवकतिर बढाउँदै भनिन्‌, &#039;क्‌पया जुसपिउनोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युवकले जुस समातेर रोहिणीतिर हेर्दै भन्यो, &#039;धन्यवाद, मलाई चक्करलागेकोसम्म केही याद छ त्यसपछि के भयो पत्तै पाइनँ । तपाईंले यहाँल्याउनुभएको रहेछ नत्र म मैं होला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;सानो सहयोग गरेकी हुँ, बढी केही गरेकी छैन । जुस पिउनुहोस्‌ अनि मतपाईंको घरसम्म छोडिदिन्छु । स्वास्थ्यकोचाहिँ अलि ख्याल राख्नु होला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युवकले अप्ठ्यारो मान्दै भने, “तपाईँले मेरा लागि यति घेरै कष्टउठाउनुभएकोमा धेरै-धेरै धन्यवाद, अब म आफैँ जान सक्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
“फेरि बाटोमा केही भयो भने गाह्रो होला, घरसम्म पुच्याइदिएँ भने मलाईपति सन्तोष हुन्छ, कुरा त्यति मात्र हो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीको कुरा सुनेर युवक अनकनाउँदै उठे । दुवै वीर हस्पिटलको गैटबाहिरपुगेपछि रोहिणीले दयाक्सी रोकिन्‌ । ट्याक्सी गुद्धयो । द्याम्सी गुडेको केहीसमयपछि युवकले झिनो स्वरमा भने, “मेरो नाम प्रशन्न हो । घर खोटाङ, यहाँपढ्न बसेको हुँ । आईएस्सी सिद्धिएको पति दुई वर्ष भयो, इन्जितियर पढ्नजानका लागि कोसिस गर्दैछु । दुईपल्ट प्लान जान नाम निकालेको पनि हुँ, तरइन्टरभ्युमा फरयाँकिएँ । घरमा आमा मात्र हनुहुन्छ, बाबु सानैमा हामीलाईछोडेर मुग्लान पस्नुभयो । घरबाट खेत बेचेर आमाले यतिसम्म त पढाउनुभयो ।तर, मैले केही गर्ने सकिनँ&#039; भन्दै युवकले गहभरि आँसु पारे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले सम्झाइन्‌, “भैगो पीर तगर्तोस्‌ । कोसिस गरेपछि एक दिन न एकदिन सफल भइहालिन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युवकले आँखाको आँस्‌ पुछ्दै भने, &#039;रोहिणीजी पेटले खान नमागे त ठिकैथियो, खान माग्छ । उता आमाले पति अर्काको काम गर्दै पेट पाल्नुभएको छ ।जागिर खाउँ कसैले जागिर दिँदैनन्‌ । जहाँ पनि आफनै मान्छै चाहिन्छ, यहाँआफूनो मान्छे कोही छैन । मान्छे रहरले होइन बाध्यताले चोर बन्दोरहेछ ।बुझनु भो बाध्यताले ... । मैले खाना नखाएको तीन छाक भयो । म पनि चोर्छुर पेट भर्छु यही सोचेर बस चढेको बेहोस पो भएँछु ।&#039; रोहिणीलाई प्रशन्नकोकरा कथाजस्तै लाग्यो । रोहिणीले शिर उठाएर प्रशन्नतिर हेरिन्‌ । निन्याउरोअनुहार, जिङ्ग्रिङ परेको कपाल, मैलो सर्ट, चप्पल, अहँ पटक्कै पढेझौँ देखिँदैनथेप्रशन्न । रोहिणीले मतमनै सोचिन्‌- मैले अबश्य यो युवकको उद्धार गर्नुपर्छ ।नत्र म जन्मनुको कूनै अर्थ नै रहँदैन । उफ ! के सोचेकी होला मैले, कतै यिनैसँग प्रेम बस्यौ भने मैरो जिन्दगी वर्वाद हुन्छ । वास्तवमै प्रेम गर्नेहरू कतित डुन्छन्‌ भन्थिन्‌ शालु । म डुवेँ भने मेरो ममीवावाको सपना चकनाचुरहुन्छ । सायद म यिनको प्रेमले गर्दा यहाँसम्म आएकी त होइन ?) उफ्‌! यो केभयो मलाई ? अब म डुब्न त डुब्दितँ ? यदि मैले प्रशन्तलाई प्रेम नगर्ने भएमझघारमा नै छोड्नुपर्छ । के म प्रशन्नलाई मझघारमै छौडूँ । अब म के गरौं ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन के सोच्नुभएको रोहिणीजी, तपाइँजस्ता सहर-बजारमा जन्मेकोमान्छेलाई पीडा ओकलेर भूल गरेँ, माफ गर्नोस्‌ । तपाईंले मेरो कुराको विश्वासगर्नुभएन जस्तो छ । मेरो डेरामा पुगेपछि आफ्नै आँखाले मेरो गरिवी हेरेरफर्कनुहोला । सक्नुहुन्छ भने खोटाडसम्म पुग्ने गाडी भाडा दिनोस्‌, म भोलि नैयो सहर छोड्छु र गाउँ गएर मेलापात गरी पेटभरि खोले भए पनि खान्छ ।अब इन्जिनियर बन्नै सपना देख्न छौडिसकें मैले । मलाई पेटभरि खोले भएपुग्छ खोले ... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;सहरमा वस्नेहरूको दिल नै हुँदैन भन्नेचाहिँ नसम्झनोस्‌ । मैले तपाईंकोकुरालाई विश्वास गरेकी छु । तपाईं भोकले नै ढल्नुभयो, त्यो पनि प्रत्यक्ष देखेरैयहाँसम्म आएकी हुँ । तपाईँ आवेशमा आएर गाउँ जान्छु भन्दै हुनुहुन्छ ।त्योचाहिँ मलाई त्यति ठीक लागेन । म आफनोतर्फबाट सक्दो सहयोग गरौँला,त्यसलाई नराम्रो नठान्नु होला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुरा गर्दागर्दै प्रशन्नको डेरा पनि आयो । द्याक्सीबाट दुवै ओर्लेर कोठाभित्रपसे । त्यो कोठाको अवस्था देखेर रोहिणीको हृदय छियाछिया भयो । कोठाकोभित्तामा झुन्ड्याएको थोत्रो र मैलो दुईवटा सर्ट । सानो पलङ, पलङमाथि गुन्द्रीर कपडाको सानौ डसना, च्यातिएर तीनचार ठाउँमा सिएको तन्ना र थोत्रोकम्बल । पलङभन्दा थोरै पर सानो स्टोभ, थोत्रो दुईवटा डेक्वी, एउटा थाल,एउटा पत्त्यौं, एउटा बाल्टिन र थोत्रो कप । केही गेडा उर्मिएको आलु । पलङकोसिरानपट्टि &#039;भुइँमा मिलाएर राखिएको किताबको चाङ । अँध्यारो र कालो भित्ताभएको कोठा दक्षिणपट्टिको भगयालबाट छिरेको थोरै उज्यालो । ती सबै दृश्यदेखेर राहिणीको आँखाबाट आँसुमात्र फर्न सकेन । रोहिणीले आफनो घरमात्यसै रहेको दुईवटा कोठा सम्झिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्न बोल्न सकेनन्‌, आँखाबाट आँसु मात्र झरिरहे । रोहिणीले मन बाँधेरभनिन्‌, &#039;प्रशन्नजी तपाईँ जस्तो अनन्त उडान लिएको मान्छे पनि रुने हो?तपाईंले कमाएपछि मलाई ब्याजसहित यौ पैसा दिनुहोला, अहिले मसँग भएकोपाँच सय राख्नोस्‌ । म ममी-बाबासँग कुरा गरेर तपाईंका लागि कै गर्नसकिन्छ सोधौँला र चाँडै निर्णय दिउँला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्नले आबेशमा आएर रोहिणीको खुट्टा समाउँदै भने, &#039;म तपाईंको गुणकहिल्यै बिर्सने छैन । म त पोख्छी नै सकेको थिएँ तपाईँले उठाउनुभयो,तपाईंलाई म के भनौं ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले खुट्टा सादै भनिन्‌, &#039;मैगो नरुनोस्‌ वरु केही किनेर खाइहाल्नोस्‌ ।अहिलेलाई म गएँ ।&#039; रोहिणी प्रशन्तको कोठाबाट निस्केर घरतिर आइन्‌ ।प्रशन्नलाई रोहिणीको खुट्टा छोएकोमा कुनै पछुतो लागेन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनले त रोहिणीजस्ती पुवती जीवनमा पहिलोपल्ट नै देखेका थिए । प्रशन्नकाआफन्तहरू प्रशन्नले देखे भने पैसा माग्छ कि भनी टाढैबाट भाग्थै । युवतीहरूप्रशन्नसँग पन्छिएर हिंँद्दथै । प्रशन्नका कुनै साथीहरू थिएनन्‌ । प्रशन्नले यत्रोठूलो सहरमा आफनो मर्म बुझने एक मात्र युवती रोहिणी भेटेका थिए ।रोहिणी प्रशन्नका लागि साक्षात्‌ देवीसरह थिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणी मनमा नाना तर्क-वितर्क खेलाउँदै घरमा पुगिन्‌ । आँखामा प्रशन्तकोदयनीय अवस्था, उनको निर्बौध आँखाहरू र बान्की परेको अनुहार नै नाचिरहयो ।रोहिणीलाई केही खान मन लागेन, उनी धुमधुम्ती कोठामै बसिरहिन्‌ । पीताम्बरालेरोहिणीको कोठामा पस्दै भनिन्‌, &#039;वीरु र सौजनलाई कस्तो कपडा ल्यायौ :पैसा त पुग्यो ?&#039; रोहिणीले जस्ताको तस्तै प्रशन्नको सबै घटना आमालाईसुनाइन्‌ । पीताम्बराले भनिन्‌, &#039;आज पैसा लगेको ढीक भएछ । कपडा त भौलिकिने पनि हुन्छ । दुःख पर्दा सहयोग गर्नु हामी सबैको कर्तव्य हो । तर, उतलाईघरमा नै राख्नु त्यति राम्रो त नहोला । म तिम्री बाबासँग सौध्छु, उहाँले केभन्नुहुन्छ । छौरा-बुहारीको पनि सल्लाह लिनुपन्यौ । तिम्रो बावालाई बाहिरकोमान्छे घरमा बसेको मन नपर्ने भएर त तला नबढाएको तिमीलाई थाहा नैछ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रौहिणी आमाको कूरा सुनेर चुप भइन्‌ । पीताम्बरा कोठाबाट निस्किन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हेलौ ! रोहिणी तँ किन क्याम्पस नआएकी ? त्यहाँ सबैलाई सञ्चै त छहोइन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“सबैलाई सञ्चै छ, शालु पीर नगर । मलाई आज टाउको दुखेर पढ्ननआएकी हुँ । पढाइ राम्रै भयो त ?&#039;“अं राम्रै भयो, अहिले कस्तो छ तँलाई ? भोलि आउँछेस्‌ क्याम्पस ?&#039;&#039;अहिले ठीकै छ भोलि आउँछ ।&#039;र हसतिला सम्झना नमस्कार भनी दै है। ल बाई ।&#039; भन्दै शालुले फोनराखिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ बाई भन्दै रोहिणीले पनि फोन राखिन्‌ । शालुसँग वास्तविकता ढाँद्दारोहिणीलाई तरमाइली त लाग्यो नै । रोहिणीले शालुलाई सत्य नभन्नुको एउटैकारण थियो । रोहिणी प्रशन्नलाई केही माया गर्न लागिसकेकी थिइन्‌ । शालुभने प्रेम गर्नेलाई त्यति राम्रो ठान्दैनथिन्‌ ।&lt;br /&gt;
रोहिणीले नचाही-तचाही थोरै खाता खाइन्‌ । र, टेबुलमा बसेर किलाब पल्टाइन्‌ पत्ति तर आँखामा प्रशन्न नै झल्झली आइरहे । उनी किताव बन्दगरेर औछ्लयानमा पल्टिइन्‌ । प्रशन्नको बारेमा सोच्दासोच्दै धेरैबेर पछि निद्रापन्यो रोहिणीलाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==तेर्ह==&lt;br /&gt;
&#039;ल बास्सा ट्रायल भन्दै उर्मिलाले तास फ्याँकिन्‌ । उमाले मुख बिगारदैभनिन्‌- कलर त मलाई पनि परेको थियो । प्रतीक्षाले भनिन्‌- दुक्की जुट तमलाई पनि परेको थियो । दुक्कीले कहिल्यै छोडेन । मेरा दहल टप सिन्धुलेहाँस्दै तास फ्याँकिन्‌ । सिन्धुलाई त मैले जितेकी रहिछु । मेरो मिस्सी टप भन्दैशोभाले पति तास फ्याँकिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले तास फिददै भनिन्‌, &#039;सबैँ फरास मात्र कति खेल्नु ?) घरु यसोकलब्रेक खेलौं न, कलब्गेकमा समय गएको पत्तै पाइन्त । पैसा पनि ढिलैजान्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिन्धुले रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;पहिलो हात पैसा सोरेर पनि नानाथरी कुरानगर । थपक्क बाँड ल प्रतीक्षा तास काट । कलब्रेकमा दुई ग्रुप बन्नुपर्छ । फेरिझन्झट खेल । बरु चल्ती फरास खेल्नै भएचाहिँ ओके !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कति दिनमा बल्ल एक हात खाएकी छ्‌ । नत्र पैसा स्वाहा गन्यो, हिँड्यो ।तिम्रौ जस्तो एक्का टप भए पनि चल्ती फरास खेल्ने साहस भए पो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिन्धु &#039;मैले एक्का टपमा चल्ती फरास खेले । गंगाले दहल टपमा ल चल्तीफरास खेल्छु भनी सुरिएकी बिर्सैक !&#039; हामीले बूढ्धीलाई एक्का टायल नै परेछकि भन्दै डराएर प्याक गन्यौं आखिर बूढीको त दहल टप पो रहेछ । त्यो दिनबडा मज्जाले हँसाइन्‌ गंगाले । साँच्चि गंगाको बूढाबढी नै एक्कासि बेपत्ताभए । न घरको फोनै उठ्छ । किन एकाएक सम्पर्कमा आउन छौडे ? आजकालसबै ठाउँमा बाबुको प्रतिनिधित्व पनि फिरोजले नै गर्छ । त्यो मोरोसँग सोधौँभने त्यसका आसेपासे गुलियोमा कमिला टाँसिएझैं टाँसिइरहेका हुन्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शोभाले लामो श्वास फेर्दै भनिन्‌, &#039;अब गंगाको कुरै नगरे पनि हुन्छ । उनीत अर्कै जन्म लिएझैँ फेरिइछिन्‌ । म अस्ति उनको घरको बाटो परेकोले यसोपसैकी त उनको फतौरे क्रा सुनेर कहिले उनलाई छोडेर भागौं जस्तो भएँ ।कर दुस्सासा व्लाएर रूभै सिद्धेछ । रुँदै भन्दै थिइन्‌, &#039;शोभा हामीले हिँड्नै जानेकाउन । हामीले छौराछोरीलाई सही बाटो देखाइदिएनौँ । हेर, बेलैमा विचारगर, तिमीहरूका छोराछोरी पनि फिरोजझैं तहस-नहस होलान्‌ । फिरौजलाईराम्रो संस्कार दिन नसक्ने हामी नै हौं । हामीले नै उसलाई चक्रब्युहमाफसायौँ । त्यही पश्चात्तापले हामी मर्दो न बाँच्दो भएका छौं । खोई के-के हुन्‌, हन्‌ तिनका करा । म त तिनको त्यो परिवर्तत देखेर महाअचम्म परेँ । तिनकोकुरा सुन्दा-सुन्दा झयाउ लागेर फुत्त निस्केर हिँडे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“बूढी भए पनि भर्खर यौवन चढेको युवतीझैँ गर्थिन्‌ । फेरि मेकअप गर्नेदेखिलिएर पिउन, खेल्न जैमा पनि खप्पीस थिइन्‌ । ठट्यौली पनि कति जानेकी,एकछिन मुख बिसाउन दिन्थिनन्‌ । उनमा कतै परिवर्तन आउला भन्नै त मैलेसोचेकीसम्म पनि थिइनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“साँच्चै उनी परिवर्तन भएकी नै हुन्‌ त&#039;, सिन्धुले सोधिन्‌ । उमाले तासदेखाउँदै भनिन्‌, &#039;यो हात मैले खाएजस्तो छ सत्ता, अट्टा, नहल, रन छ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हो-हो तिमीले नै खायौ,&#039; सबैले एक्कै स्वरमा भने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डमालै तास फिट्दै भनिन्‌, &#039;शोभाले भनेको कुरा ठीक हो, मैले पनिगंगालाई भेटेकी थिएँ । उनी त हावा खुस्केझैँ भएकी छिन्‌ । त्यो भर्भराउँदोअनुहार कहाँ गयो होला ? उनी आफूमाथि प्रलय पन्यो भन्दै थिइन्‌ । शोभालेभनेको ठीक हो, म पनि उनको कुरा सुनेर वाक्कैदिक्कै परेँ । हामीलाई सहीबाटोमा हिँड भनेर अर्ती दिन्थिन्‌ । हामीले तिनलाई आङ नानी भनेर डाकेकोहोइन क्यारे । दुई दिनको जिन्दगीमा पनि रमाइलो नगरे कहिले रमाइलो गर्नुभनेर उक्साउने तिनै हन्‌ । हामीले आफनो मर्यादा कहाँ छोडेका छौं त : यसोरमाइलो गर्न एक, दुई पेग लगाइन्छ । तिनी नै सित्तै खान पाएपछि त कम्ताखान्थिनन्‌ ? सेकुवाले त तिनको पेट कहिल्यै भरिन्यैन । मेरो श्रीमान्ले अझैभन्दै हुनुहुन्छ- उमा म त गंगाले सेकुवा खाएको देखेर छक्कै परे, अहिले बडोअर्ती दिन्छिन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;उनले असहय पीडा भएरै त पोख्न खोजिन्‌ होला । यो काठमाडौँमायुवतीहरू पति असित्ता बर्षेझैँ वर्षेका छन्‌ । फिरोजजस्तो सुन्दर हुने-खानेकोछोरो पाएपछि युवतीहरूलाई कै चाहियो ? उसको एक नजर परेपछि युवतीहरूआगोमा 0000 पग्लन्छन्‌ । उसको डान्स र हाउभाउ देखेपछि आफ्नैजीउत हुन्छ&#039; उर्मिलाले उत्तर दिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शोभाले कुरा थपिन्‌, &#039;कुरा त ठीकै हो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उमाले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;लौ अब पेग पनि लगाक छिटो जानुछ । लन्डनबाटबूढाका साथीहरू आउँछन्‌ रे ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;तिमरो बूढा गएको बीस, बाईस दिन त भयो होइन ?&#039; शोभाले सोधिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“लन्डनमा आफनै मान्छैहरू भएकोले के-कसौ गरी पच्चीस दिनकारिसक्नुभयो&#039; उमाले भनिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;तिम्रो लोग्ने उतै बिवाह गरेर बसे जस्तो छ है उमानव भिस्सा सिद्धिएपछि त्यहाँ बस्न पाइन्थ्यो र ?&#039;&lt;br /&gt;
सिन्धुले उमालाई बिस्तारै पिट्दै भनिन्‌, हेर, उमाले रातोकालो मुख पारेकी ।उफ ! त्यति ठूलो मान्छेले केही मिलाए होला ति ! भैगो पीर नगर ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमीहरूले एउटा सानो करा पायौ भने आकाश-पाताल छुवाउँछौँ । पर्सिआउँदै हुनुहुन्छ । ल खानेकुरा पनि आयो । चिकेन चिल्ली त सिन्धुले बनाएजस्तोछैन है,&#039; उमाले भनिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;चिकेन चिल्ली मात्र हो र यिनलाई त केही पनिबनाउन आउँदैन । वी सब होटलबाट ल्याएकी हुन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिन्धुले उत्तर दिइन्‌, &#039;तिमीलेचाहिँ खुबै मीठो पकाउँछयौँ ? कान्छी गएपछितिम्रो घरमा खाना सबै वर्डकिलासको हुन्छ । किन तिम्रो मन दुखाउनु भनेरचुप लाग्छौं हामी । आइन्दा तिम्रो घरमा पति होटलकै खाना हुनुपर्छ, । थुक्नु ननिल्नुजस्तो खानेकुराले टार्न पाइँदैन नि !&#039;&lt;br /&gt;
सबैले रक्सीको गिलास ढोक्काएर चेस भने । प्रतीक्षाले खिन्न स्वरमाभनिन्‌, &#039;साँच्चै नरिसाक उमिंला कान्छी गएपछि त तिम्रो घर मसानघाटजस्तैभएछ । कान्छीले बत्ताएको सबै खानेकुरा आयातीतभन्दा पनि स्वादिलो हुन्थ्यो ।मलाई त तिम्रो घरमा पस्यो कि झट्ट कान्छीकै झल्को लाग्छ । उसले पकाएकोमृगको सुकुटी सम्झँदा अहिले पति मुखबाट पानी आउँछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;अँ साँच्चै, त्यो मृगको सुकुटीको स्वाद त मैले पनि बिर्सेकी छैन । त्यस्तैबनाउन लाख कोसिस गरेँ, कहाँ बनाउन सक्नु ? जादु नै थियो कान्छीकोहातमा जादु,&#039; शौंभाले पनि कुरा थपिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रतीक्षाले भनिन्‌, &#039;मैगो ! कान्छीको क्रै छोड । उसको चरित्रले गर्दा त होनि उर्मीले निकाल्न बाध्य भएकी नत्र किन निकालिन्थिन्‌ ? सबै खानेक्राहोटलबाट ल्याउने गर्दागर्दै डाडु पन्यौं नै चलाउन बिसिंएला । कहिलेकाहीँयसो मान्छै आउने भनेको दिनमा मात्र भान्सामा पसिन्थ्यो, त्यो पनि छोड्यौँभनै खोई के काम गर्नु ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले हस्कीमा पानी थप्दै भनिन्‌, &#039;मलाई माया गर्ने यही प्रतीक्षा छिन्‌ ।जे-जे भन्छौ भन सहनै पम्यो । सधैँ कान्छी-कान्छी भन्छौँ तिमीहरूको घरमाभएको भए कान्छी दुई दिन टिम्दैनथी होला, मेरो घरमा पन्ध्र-सीह् वर्ष बसीत्यो कम भयो तिमीहरूलाई ? घरलाई नै कोठी सम्झेपछि के गर्नु त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शोभाले प्याच्च भनिन्‌, &#039;अहिले त तिम्रो घरमा काम गर्नेहरू फेर्नुपरेको छैनहोला हगि ?&#039; मोरी थाहा नपाएझै गछयौ । कान्छी र शालुको सम्बन्ध हामीलाईथाहा नभएको हो र ! तोतेबोली नफुटेदेखि नै शालुलाई कसको माया लाग्छभनेर सोध्यो भने दिदीको माया लाग्छ भन्थिन्‌ । त्यही शालुको मायाले अल्झेकीहुन्‌ कान्छी । यदि तिम्रो इशारामा शालु हिँड्ने भए शालु तिम्रोपछि लागेरआउँथिनन्‌ ? बुझने भएदेखि एक दिन शालु पार्टीमा आएकी छिन्‌ ? हेर हाम्राछोराछोरीहरूले कहिले हामीलाई छोड्छन्‌ ?&#039; उर्मिलाले स्वादै हवीस्की तानिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रतीक्षाले शोभातिर हेर्दै भनिन्‌, &#039;यी शोभा, नशा लागेपछि बढी कुरा गर्छिन्‌ । मेरो छोरो पनि त तिमीलाई कसको माया लाग्छ भनेर सोध्यो भनेसाहिँला दाइको माया लाग्छ भन्छ नि ! त्यस्तो सानो क्रालाई लिएर के करागरेकी ? ल उठौँ पनि ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबैले फोनमा आफनो-आफनो ड्राइभरलाई बोलाए । ड्ञाइभर कार लिईआएपछि आ-आफनो घरतर्फ लागे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==चौघ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाई मौसमी, कति लेट गरेकी ? यति ढिलो गर्छर्यौ भन्नै थाहा पाएको भएतिम्रो डेरामा नै आउँदै ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले कारमा बस्दै भनिन्‌- &#039;मैले कहिल्यै ढिलो गरेकी थाहा छ ! बाटोजाम भएपछि कसको के लाग्छ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हेन क्रिन बाटो जाम भएछ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साइकललाई बसले हान्यो भन्थे हो कि होइन पत्तो छैन । तपाईंलाई तकालो चस्माले पनि साह्रै राम्रो पो देखिँदोरहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषले मौसमीको गाला मुसादै भन्यो, &#039;मैगो नफुर्क्याक । तिमीलाई भेटेपछिम चैनले कनै रात निदाउन पाएको छैन, तिमीले त मन मुटु सवै लग्यौ यार! मलाई त आफू रित्तै भएजस्तो लाग्छ । अँ, भन आज कहाँ जाने ? तिमी जहाँभन्छयौ त्यहीँ जान यो ज्यान हाजिर छ।&#039;&lt;br /&gt;
“तपाईँलाई कुरा गर्न कसले सिकाओस्‌ ? यस्ता शव्दहरू मलाई मात्र भन्नेहौ कि अरूलाई पनि भनिन्छ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषले नशालु हाँसो हाँस्दै भन्यो, &#039;कतिपल्ट भनौं जैले तिमीजस्ती अप्सराभेटेकै छैन भनेर । तिमीजस्ती राम्री अर्को भेटेको भएचाहिँ कै भन्थेँ भन्नसक्दिनँ, अव भने मैले मेरा सारा जीवन तिमीलाई न्यौछावर गरिसके । अबमल्हम लगाक या चिथोर तिम्रो जिम्मा । भन यार कता जाने आज पनिनगरकोट नै जाने कि अन्तै ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ त्यतै जाकँ, गाउँमै देखेकाजस्ता डाँडाकाँडा हेरेर अस्तिको जस्तोदुई-चार दिनचाहिँ वस्न सक्दिनँ नि ! भोलि नै फर्कने भए नगरकोट नै ठीकछ । घरमा विवाहको कुराचाहिँ चाँड्धै गर्नोस्‌ है । फेरि छोराछोरी पाइसकैपछिबिबाह गरौँला भन्नुहोला नि ! हाम्रो भेट भएको पनि वर्ष दिन हुन लागिसक्यो ।कति लुकिछिपी एक-अर्कामा हराउनु, विवाह गरे सबैको मुखमा बुझो लाग्थ्यो ।अरूभन्दा पनि त्यो ७014 हाम्रो प्रेम फल हुन्छ भन्ने एकरत्ति पनि विश्वासगरेकी छैन । भन्छै &amp;quot; तिमीले आफनो अस्तित्वलाई बिकाउन नहुने थियो वुझयौ !&#039; उसको कुरा सुनेर म छक्क परेँ । उसले हामीवीचको सम्बन्धकसरी थाहा पाई ? मैले उषासंग तपाईँसँग कसरी भेट भयो भन्ने मात्र कुरागरेकी थिएँ । उषाले नै शालुसँग क्रा गरेकी हुनुपर्छ । उषा पनि कम्ता डारेछैन । रोहिणी भने आजकाल प्रेमको सपोर्ट गर्छिन्‌ । रोहिणीले शालुसँग हाम्रोभेटलाई आकस्मिक घटना नै हो भनेर जिह्री गरिन्‌ । शालु भन्दै थिई- त्योआकस्मिक घटना होइन, मौसमीलाई जानी-जानी त्यो युवकले धक्का दिएकोहो । मौसमी लडेपछि मौसमीलाई उठाएर कारमा लग्यो होला, माफ माग्यो होलाअनि यिनीहरूको प्रेमप्रसङ्घग सुरु भयो होला, ल हो कि होइन भन मौसमी ! मउसको कुरा सुनेर तीनछक्क परेँ । वास्तवमा हाम्रो प्रेमप्रसङ्ग त्यसरी नै सुरुभएको थियौ होइन त ? मलाई खासै ठूलो घाउ लागेको थिएन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले भनिन्‌- &#039;शालुले प्रेमसँग खेल्नेहरू मात्र धेरै देखेकी हुनाले यसलाईसबै प्रेम गर्नेहरूसंग घृणा लाग्छ । कुरा पत्ति हो । शालुले तिम्रो नराम्रोचिताएकीचाहिँ पक्कै होइन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले नम्र स्वरमा भनिन्‌, &#039;वास्तवमै प्रेम गर्नेहरू विवाहअगाडि वास्नामारम्दैनन्‌ । योचाहिँ वास्तविकता हो । तिमी अहिले पनि कुमारी नै छ्यौ भनेतिम्रो प्रेम सफल हुन्छ अन्यथा... भन्दै हिँडी । भन्नोस्‌ निमेष तपाईँ झूट होकि, शालु &#039;झुटी हो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषले कोधित स्वरमा भन्यो, &#039;कुनचाहिँ रहिछे त्यौ शालु भन्ने । त्यसलाईबीचवाटोमा तमासा गरिदिन्छु, अनि खान्छे । हेर, सबै मान्छेको कुनै न कुनैशात्रु हुन्छन्‌ । क तिम्रो गरु हो । तिमी गाउँबाट आएकी मान्छेले काठमाडौंमैघर भएको कार भएको केटा पाउँदा त्यसलाई जलन भयो हौला । त्यस्ताकोकुरामा होइन मैयाँ, मेरो कुरामा विश्वास गर । मबाट धौका हुँदैन भनेपछिहँदैन ।&#039; निमेषले कारको ब्रेक लगाएर मौसमीलाई चुप्पा खायो र फेरि कारगुडायौ । मौसमीले निमेषलाई समातेर पसुुतक [कक म्‌स्क्राई । कार गन्तव्य भेट्नगुडेकै थियो । मौसमीले धेरैबेर मौन रहेपछि भनी, &#039;मलाई डक्टर बन्नु भनेरछोडेर गएका थिए बावुले, मैले भाग्यले तपाइँलाई भेटेँ । बाबु तपाईंजस्तोज्वाइँ पाउँदा घेरै खुसी हुनुहुन्छ । तपाईंको बानु-आमाले मलाई के भन्नेहोला ? हुन त मेरो बुबाले मेरो खुसीका लागि माझपाटोमा घरवारी सबै बेच्नसन्नुहुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषले हाँस्दै भन्यो, &#039;त्यो क्रा तिमीले धन्दा नै नमान । तिम्रोतर्फबाटसम्पूर्ण खर्च म नै गरौंला । म पनि काठमाडौंबाहिरकै भएको हुँदा तिम्रो पीडाबुमाख। पहिला हामीलै पनि त्यही खोले सिस्नो त खाएका हौं नि ! बाबुले काठमाडौंमा &#039;फरेर घरजग्गाको कारोबार गर्नुभएकोले तिमीलाई कारमा हुइँम्याउन पाएको छु । यही कारले गर्दा त तिमी पनि मसँग छ्यौ नत्र तिमीलेमलाई के गन्धेक ! होइन भन त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;उफ ! फेरि त्यही करा । हजुरको कारले गर्दा होइन महाशय, हजुरकोमायाले गदा आफलाई सम्पेकी ह । मत्त पराउन त गाउँदेखि यौ सहरसम्ममलाई मन नपाउने मान्छे छैन भने पनि हुन्छ ।&#039; हाम्रो क्याम्पसमा एउटाआकाश भन्ने केटो छ क भने कुनै केटीको रूप नै हेर्दैन । तपाईंले पनिमेरोबाहेक अरूको रूप नहेरे हुन्थ्यो नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमेषले हाँस्दै भन्यो, &#039;तिमीचाहिँ कसले मलाई हेर्छ, कसले मलाई हेर्दैनभनी विचार गर्नै रे, मचाहिँ तिम्रो मात्र रूप हेर्नै ? ल बाबा ल अबदेखि अरूकेटीहरूलाई देख्यो भने म आँखा चिम्लेर हिँड्छ, हुन्छ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषको कुराले मौसमी हाँसी मात्र ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषले कुरा बढायो । मैपाँ नेपालमा घम्नै ठाउँज्ञति घुमिसकियो । तिमीएक रातभन्दा दुई रात एउटै ठाउँमा बस्न मान्दिनौ । यसो इण्डियाको दार्जिलिङनैनितालतिर पो जाने हो कि ! घुम्नलाई मौसम पनि ठीक छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले खुसीले बुरुक्क उफ्रंदै भनिन्‌, &#039;हुन्छ त्यसै गरौँला । बरु कहिलेजाने चाँडै कुरा मिलाउनोस्‌ वाबु छाती-छाती के-के दुखेर काठमाडौँ आउँदैछन्‌रे । उनी आएपछि जचाउँदा, रिपोर्ट लिँदा चार-छ दिन लागिहाल्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यसो भए अर्को हप्ता जाउँला । तिमीलाई अरू केही गहनाहरू चाहिन्थ्योकि ? आजकाल गहनाको करै गर्दिनौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
तीच-चार सेट गहनाहरू भइसके के गहनाको कुरा गर्नु : अब सबैगहनाको रहर पुग्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
अब भने मैयाँले पैसा बचाउने भइन्‌ । तिम्रो नाममा दुई-घार रोपनी जग्गाकिनौं भनेको हेरन राम्रो जग्गा नै पाएको छैन । ल जग्गाको करा छोडौं । तिम्रैसौन्दर्यको करा गरौँ । तिमीलाई यो टिसर्टले भन्दा हल्का गुलाबी टिसर्टले अफआकर्षित देखिन्थ्यो । मलाई टाइट फिटिङभन्दा अलि गला खुल्ला भएको कपडामन पर्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वतन्त्र हुन्छयौ कि के हुन्छयौ त्यो त गेस्टहाउसमै गएपछि थाहा होलाप्राण प्यारी । पिउनचाहिँ अहिले नै हल्का पिउने कि बेलुका मात्र त्यो तिम्रोमर्जी । अव नगरकोट पनि आइहाल्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले निमेषलाई हल्का चिमाट्दै भनिन्‌, &#039;पिएपछि तपाईंलाई के हुन्छथाहा नपाएकी हो र ? अस्ति त्यत्रो मान्छेको सामू ........... । रोष्टुराँका सबैमान्छैको आँखा हामीतिरै थियो । म त लाजले पानी-पानी भएँ । मान्छेको सामुकेही भन्नु पनि कसरी ?&#039;&lt;br /&gt;
तिमी गाउँबाट भर्खर आएकीले केही असजिलो लागेको हो । देख्दिनौ,बाटा-घाटामा लिसो टाँसिएझैँ टाँस्सिँदै हिँडेका । अब हात समातेर नहिँद&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चुम्मा-सुम्मा नगरे त पूरा असभ्य ठहरिन्छ । हामी त हुनेवाला श्रीमान्‌-श्रीमतीहौँ । जे-जे गरे पनि चल्छ । प्लिज थोरै पिछ है । वरु बाहिर ननिस्किउँलाहामी गोठालेले नगरकोटको जस्तो दृश्य कति देखेका हौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले निमैषको कुरामा स्वीकृति दिई विल रेस्दुरेन्टाभत्र पसैर पहिलाबस्नै रूमको व्यवस्था मिलाए । अनि खानाका आए । त्यहाँ खाने मौसमीकोजोडी मात्र होइन बैँसको उन्मान्दमा रम्नेहरू अरू तीन जोडी पनि आएकारहेछन्‌ । निमेषले उनीहरूनजिकँ गएर भने, &#039;तपाईँंहरू आज यतै बस्नुहुन्छ किफर्कनुहुन्छ ? कहाँबाट आउनुभएको ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्को गुपको एउटा युवकले भन्यो- &#039;हामी वुटवलदेखि आएका हौँ । एक-दुईदिन मात्रै बस्छौं होला । तपाईंहरू कहाँबाट नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हामी त काठमाडौंबाट आएका हौं । हामी दुईजना मात्र छौं । तपाईंको ग्रुपदेखेर साह्टै रमाइलो लाग्यो र सोधेको हँ ।&#039;&lt;br /&gt;
बुटवलबाट आएको अर्को युवकले भन्यो, &#039;हुन्छ तपाईंहरू पनि हाम्रै ग्रुपमाआउनुहोस्‌ । आखिर हामी सबै अविवाहित नै हौं । हामी सबैको कुरा मिलिहाल्छ ।वस्नोस्‌ कुरा थोरै फरक छ, तपाईंले मुन टिप्नुभएछ, हामीले जून अरू याबत्‌कुराहरू त उस्तै-उस्तै हुन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
निमेषले हात समातेर मौसमीलाई बसाउँदै भने, &#039;महाशय, तपाईँ त कविपो हनुहँदौरहेछ- ल अरू पनि सायरी सुनौँ न ।&#039;&lt;br /&gt;
बुटवलबाट आएको अर्को युवकले मुख बिगार्दै भन्यो, &#039;हेर्नोस्‌ यसको एक-दुई अरू सायरी सुन्नुभयो भने तपाइँ अर्कै रेस्द्रेन्ट जानुहोला । बरु परिचयगरौं खाकँ-पिङँ अनि घुम्न जाकँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबैले आ-आफूनो परिचय दिए । तीन जोडी प्रेमी-प्रमिकाचाहिँ बुटवलक्याम्पसमा नै पढ्ने रहेछन्‌ । कवि युवाको भरपाहि जुलजला [टवल सुब्कानगरमा नैरहेछ भने अरू बुटवलमा डेरा गरी पढ्ने रहेछन्‌ । गर प्रेम परेको छ-सातमहिना त कसैको प्रेम परेको वीस-बाइस दिन मात्र भएको रहेछ । त्यस ग्रुपमामौसमी र निमेषको प्रेम परेको धेरै भएको रहेछ । सबैको कुरा सुनेपछिबुटबलको कविले हात हल्लाउँदै भन्यो-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तपाईंहरू आलि पाको,&lt;br /&gt;
हामी अलि काँचो,&lt;br /&gt;
बिहे गर्नु पहिले नै&lt;br /&gt;
हनिमुन मनाउन आको ।&lt;br /&gt;
हनिमुनपछि डोकौँला&lt;br /&gt;
बिहेको पञ्चे बाजा&lt;br /&gt;
भौक लागेको छ अहिलेचाहिँ&lt;br /&gt;
खाँ मागी खाजा ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बुटवलको कविको कुरा सुनेर सबै मरी-मरी हाँसे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषले हाँस्दै भन्यो, &#039;तपाड्गै त आँसुकवि नै हुनुहुँदौरहेछ, कुत साइतलेहामी सचैको भेट भयौ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बुटबलको कविले फेरि भन्यो, &#039;कालो-कालो सर्ट लाको, नीलो रहेछ पेन्ट ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबैजना उस्तै खुसी हुँदा हाम्रो भेट । ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्कोले हाँस्दै भन्यो, &#039;चुप लाग जप, तिम्रो कविता सुन्दा-सुन्दा वाक्क भएरव्यन्द्राले पनि छोडलिन नि फेरि ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषले हांस्दै भन्यो, &#039;ल .. ल वाहा भयो हामीभन्दा त तपाईहरू नै पाकोहुनुहुँदो रहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जयले हाँस्दै भन्यो, &#039;उनले अन्तै बिहे गरिन्‌ । झन्डै पागल भाको, चन्द्राकोमायाले नै नगरकोट घुम्न आ&#039;को । ल... ल अब यो हँसिमज्ञाक छोडौँ केहीखाकँ । विवाहपछि चन्द्राले कवि बन्तोस्‌ भनिन्‌ भने म अवश्य कवि बन्छु ।यति भनी जयले ओठ बन्द गौ ।&lt;br /&gt;
अर्कोलै भन्यौ, &#039;भो ... भो कवि हुने सपना नदेख । फेरि भएको घरखेतजाला र चन्द्राको बिजोक होला । यो जमानामा कबिलाई कसले मान्ने ? हेरमति विग्रैर कवि भयो भन्छन्‌ । खेत बेचेर कबिता छपायो भन्छन्‌ । अलि..अलितिमी कबिचाहिँ हौ । तर आइन्दा कविता लेख्ने भूलचाहिँ नगर है । बरु खेतकोगड्दा किन, घरको तला थप कविचाहिँ नबन । यो राष्ट्रले साहित्यको मूल्यबुझ्दैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जय- &amp;quot;ले ... ल अब कवि र कविताको कुरा छोडौं । पेटको क्रा गरौं ।अहिलै तातो-चिसौ केही पिउने कि नपिउने ? मेरी चन्द्राचाहिँ पिउँदिनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषले हाँस्दै भन्यो, &#039;हेर-हेर अहिलेदेखि अधिकार जमाएको यो त भएतहर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो-हो यौ भएन भन्दै सबैले एवकै स्वरमा भने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्राले भनिन्‌, &#039;मेरो अलि पिउने वानी छैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबैले भने, &#039;थोरै त पिउनैपर्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;चन्द्राले सबैको कुरालाई स्वीक्कार गरिन्‌, केटाहरू बाईस-चौबीस वर्षका रकेटीहरू अठार, बीस वर्षजतिका थिए । भोलिलाई बिर्सेर सबै नशामा र एक-अर्काको अङ्गालोमा रमाइरहेका थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बैटरले मनमनै सोच्यो- &#039;कठै ! कहिलेसम्म धानको वालामा चराले वयलीखेलेजस्तै एक-अर्कांसँग खेलेका छन्‌ तर यी केटीहरूको जिन्दगी चाँडै टुक्रिनेछ। मैले थाहा पाएर पनि के गर्नु ? यी युवतीहरूको बृद्धिमा कीरा परेपछि ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पन्ध्र==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रौहिणीतिर हेर्दै भनिन्‌, &#039;रोहिणी तिमीले आजकाल पढाइमा त्यतिध्यान दिएजस्तो लाग्दैन मलाई । तिमीले त तपस्या गरेरै बाबु-आमा पाएकीछयौ । उनीहरूको सपना साकार गर्नुपर्छ नि । हामी जहाँ डाक्टर पढे पति सँगैपढ्ने है ? दिदीको अन्तिम इच्छा पनि त्यही छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले उत्तर दिइन, &#039;पढ्नै कोसिस त गर्दैछु । मलाई डाक्टर बन्छु जस्तोलाग्दैन । किताब पल्टाउँछु मलाई त चक्कर नै लागेर आउँछ । ल पढाइकोकुरा छोड, आशाको कुरा गर, आशाले प्रेम गरेको क्रा याहा पाउँदा-पाउँदैतिमीले उनको प्रेममा त कुनै प्रतिक्रिया नै जनाइनौ नि ! अबचाहिँ तिमीलेअरूको भविष्यको चिन्ता गर्न छोडिछयौ, रामै लाग्यौ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले गम्भीर भएर भनिन्‌, &#039;रोहिणी तिमी पनि, मैले यहाँ सच्चा प्रेमगर्नेहरू छँदै छैनन्‌ भनेकी कहाँ छु र ? सच्चा प्रेम गर्नेहरू हिजी थिए । आजपनि छन्‌, भोलि पनि हुनैछन्‌ । म प्रेमकै विरोधीचाहिँ होइन । आशक्त अङ्गालोमाप्रेमभन्दा वास्ना वढी हुन्छ भन्न खोजेकी मात्र हुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;प्रेम मात्र भयो वास्ता नै भएन भने पनि जीवन तहसनहस हुन्छ होइन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“रोहिणी, तिमीले मेरो क्राको आसय नै बुझिनौ । विवाहपछि सुखानुभूतिकालागि सबै चाहिन्छ । मैले बिवाहपछिको त कुरै गरेकी छैन । विबाहअगाडिकुमारीत्व नगुमाउन्‌, मेरो सोचाइ यति मात्र हो । तिमीले आशाको प्रेमको कुरागा्यौ। आशाको प्रेम फूल र भमराको जस्तो प्रेम होइन, मलाई थाहा छउनीहरूको प्रेम सफल पनि हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणी शालुको कुराले हर्षित भइन्‌ । तर, रोहिणीलाई आफू र प्रशन्तवीचकोकुरा शालुलाई भन्नै आँट नै आएन । रोहिणी शालुसँग बिदा भएर क्याम्पसबाटघर आइन्‌ । कौठामा पसेर सोचिरहिन्‌- &#039;शालुले भनेको क्रा ठीक हो । विवाहपहिला नै कमारीत्व गुमाएपछि सुहागरात्तको त महत्व नै रहेन । रौहिणीलैप्रशन्तको सम्झनामा डुबुल्की मारिन्‌, प्रशन्न थुप्रैपन्टको भैटमा पनि आफूसँगबोल्न डराउँथै । हृदपभरि प्रेम भएर पनि पोख्न धक मान्थे । मैले तपाईंबिनाबाँच्न सक्दिन भनेपछि बल्ल हर्षको आँसु झारे । त्यो क्षण हिजोजस्तै लाग्छ तरमहिनौँ भएछ । शालुको हृदयमा कसैले बास नगरेको भएर नै क पढ्न सम्छै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर म कसरी पढौं : जव किताव-कपि खोल्छु म प्रत्येक अक्षर- अक्षरहरूमाकेवल प्रशन्नलाई नै देख्छु । ममी र बाबाले प्रशन्नलाई मन नपराउनुभएकोभए सायद म मधे होला । प्रशन्न आफनो असल व्यक्तित्वले गदा सबैकोआँखामा अटाइहाले । उनी पढ्न गए भने म कसरी बाँच्नु ? प्रशन्नको पनि धेरैपढ्ने रहर छ । एक दिन नदेख्दा त मलाई यति छटपटी हन्छ भने वर्षौंसम्मनदेख्दा के गरौँली ? कल्पना गर्दा मात्र पनि रोहिणीको आँसु झन्यो । उनीधेरैबेर रोइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्बराले कोठाभित्र पस्दै भनिन्‌, &#039;वानी कुन बेला आयौ : तिमीलाईभौक-प्यास केही लाग्दैन कि क्या हो ? आजकाल खाना त खोज्दै खोज्दिनौ ।हामीले सवै बुझेका छौं । तिमी प्रशन्न बाबुकै चिन्तामा डुबिरहन्छुयौ । तिमीहरूकोमाया देल्लेर आज बिहान हामी सबैजना बसी एउटा निष्कर्ष निकाल्यौँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;कस्तो निष्कर्ष ममी ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्वराले सोफामा सजिलोसँग वस्दै भनिन्‌, &#039;हेर अहिले नै तिमीहरूकोविवाह गरिदिङँ मने त्यो मिल्ने कुरै भएन । प्रशन्तबाबुले बाहिर पढ्न जानपाङ्चलात्‌ भनेर कुरैर बसौं भनै पाउने हो कि नपाउनै हो । केटाहरूले त जतिवर्षमा विवाह गरे पनि फरक पर्दैन । केटीहरूलाई वाईस-चौबीस वर्ष काटेपछिबूढीकन्या भन्न थाल्छन्‌ । त्यसैले प्रशन्तबाबुलाई चाँडैभन्दा चाँडै पढ्नपठाउनुपत्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले दिक्दार स्वरमा भनिन्‌, &#039;हामीसँग त्यति घैरै पैसा कहाँछत?हामीलाई कसले सापट दिन्छ र !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परीताम्बराले सम्झाइन्‌, &#039;अहिलेलाई पठाउन मात्र कान्छीको घरजग्गा बेचेरआएको पैसा रहेछ । त्यसैले पुगिहाल्छ । हाम्रो कार व्यथैं वन्केको छ । यहीबेचेर पछि चन्द्रकान्तहरूले घर बनाउनेछन्‌ यही सल्लाह भयो । पछि पैसापठाउन त ट्याक्सी चलाएको पैसाले पुगिहाल्छ । त्यसमाथि पेन्सन छँदैछ ।पछि यो घरको चाहिँ तिमीले आश नगर, यो घर रेष्माको हुन्छ । बाँकी चार-छ आना जग्गा फूलबारी र करेसाबारीले ओगटेको छ । त्योचाहिँ हामी मरेपछिजे-जे गछौँ गर । अहिलेसम्मको हाम्रो सौचचाहिँ हामी बूढा-बढी चन्द्रकान्तहरूसँगबस्छौं । उनीहरूको पनि यही इच्छा छ । हेर्दै जाउँ के हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आमाको कुराले रोहिणी धेरैबेरसम्म मौन रहिन्‌ र भनिन्‌- &#039;तपाईंहरूले जेसोच्नुभयो हामीहरूको भलाइका लागि सोच्नुभयो । म हजुरको कुरामा ज्यादैखुसी छ । दाजु-दिदीदेखि लिएर हामी सबैको जीवन हाँसी-खुसी वितोस्‌ । अरूके नै चाहिन्छ र ।&#039;&lt;br /&gt;
पीताम्बराले भनिन्‌, &#039;हुन्छ त प्रश्नलाई आज यतै खाना खान बोलाक ।कहाँ पढ्न जाने हो उहाँको इच्छा पनि त बुझनुपन्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“साँच्चि प्रशन्तको आमालाई कस्तो छ रे : मैले त सोध्नै विसँछु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अँ ममी, अहिले त राम्रै छ रे, हामीले पठाएको पैसाले घरबारी निखन्तदेखिभैँसी कित्नसम्म पैसा पुग्यो रे । अहिले त प्रशन्तको आमा ज्यादै खुसी हुनुहुन्छरै । हुन्छ त म प्रशन्नजीलाई खाना खान डाक्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;आउनुहोस्‌ प्रशन्नबाबु ! हामी सबै तपाईँको प्रतीक्षामा वसेका थियौँ,&#039;केशवले बडो सभ्य भाषामा भने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्नले सबैलाई नमस्कार गरेर सोफामा बस्दै भने, &#039;सबैलाई सञ्चै छ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केशवले उत्तर दिए, &#039;सञ्चै छ बाबु, आज एउटा सल्लाह गरौं भनेरबाबुलाई बोलाएका हौं । हामी रोहिणीको खुसीलाई आफूनै खुसी मान्छौं ।रोहिणीलगायत हामी सबैको इच्छा छ, तपाईँलाई इन्जिनियर पढ्न पठाउने ।जहाँ पढ्न जाँदा राम्रो हुन्छ त्यहीँ पढ्न जानोस्‌ । हामीले राहिणी अंशभागभनौँ या जे भनौं त्यो तपाईँको पढाइमा लगाउने भयौं । रोहिणीले पनि त्यहीभनिन्‌ । कनै पनि कुराको पहिले नै विचार पुग्याउनु राम्रो हुन्छ, तपाईँ पनिसोच्नोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केशवको कुराले प्रशन्नको आँखाबाट आँसु नभारी छोडेन । प्रशन्नलाईरौहिणीलाई भेट्नु, रोहिणीले प्रेम प्रस्ताव राख्नु सबै सपनाजस्तै लागिरहेकोथियो । पैसा नै लगानी गरेर पढ्ने कुरा त उनले कनै क्षण कत्पनासम्म पनिगरेका थिएनन्‌ । प्रशन्नले आँसु पुछ्दै भने, &#039;खोई म के भनौँ : रोहिणीलाईपाउनु मेरो ठूलो सौभाग्य थियो । यहाँहरूले मजस्तो गरिबलाई यति धेरैविश्वास गर्नुहोला भन्ने सोचेको थिइनँ । इन्जिनियर बन्छु भनेर दिलोज्यानदिएर पढेकै हुँ । आफूभन्दा थोरै पसेन्ट ल्याउनेहरूले जान पाए । आफू भने... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्बराले भनिन्‌, &#039;बाबनु ! हामी मतको गरिबलाई मात्र गरिब भन्छौँ ।हामीसँग पनि कै नै छ र ? बिहान-बैलुका हाँसीहाँसी एक पेट खान पायो भनेत्यो नै सुख हो । त्यो सुखचाहिँ भगवानले हामीलाई दिएकै छ भनौँ । हामीलाईरोहिणी डाक्टर बन्लिन्‌ भन्ने ठूलो आश थियो । हजुरसँग भेट भएदेखि रोहिणीलेखान पढ्न सबै वि्सेकी छिन्‌ । खोई कसरी डाक्टर बन्लिन्‌ उनी ? सबैभन्दाराम्रो कुराचाहिँ हजुर नै चाँडै पढ्न गए हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
आमाको कुराले रोहिणी लाजले निहरिन्‌ । प्रशन्तले पनि केही लजाउँदै भने,“कहाँ पढ्दा राम्रो हुन्छ, सबै कुरा बुझौँला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्तको कुराले सबै खुसी भए । रोहिणीको त झन्‌ खुसीको सीमा नैरहेन । प्रशन्नले पनि आफनो जन्मलाई घन्य ठाने । सबैले हाँसीखुसीका साथखाना खाए । खाना खाएपछि सबैसँग बिदा भएर प्रशन्त आफतो डेरातर्फ लागेभने रोहिणी आफनो कोठातर्फ लागिन्‌ र पलङ्गमा पल्टिन्‌ । आँखामा त्यो क्षणआयो प्रशन्तलाई आफूले नयाँ डेरामा लग्दा प्रशन्नले त्यो घरलाई रोहिणीकै घर सम्झे । त्यो कोठालाई रोहिणीकै कोठा सम्झेर भने, &#039;रोहिणी पति राम्रोकोठा यति राम्रो घर रहेछ । मजस्तो गाउँले यस घरमा आउँदा तिम्रो बाबालेके भन्नुहोला ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले हाँस्दै भनिन्‌, भविष्यको इन्जिनियर साप यो घर मेरो होइन । योतपाईंको डेरा हो । तपाईंले नाइँ-नास्ती गर्नुहोला भन्ने सम्झी हामीले तपाईंलाईनभनी यो सजावट गरेका हौँ । सानो खाना पकाउने किच्नेन भित्र छ । यहाँबसेर पढ्नै, मलाई सम्झने वस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
प्रशन्नले कोठाको वरिपरि आँखा डुलाए । वक्सखाले पलङ, ठूलो खानदानीमानिस सुत्नेजस्ता ओछ्यान, सोफा, मेच, टेबुल काठकै बडौ सुन्दर दराज ।करियकरिव कोठा नै ढाको जत्रो नेपाली गलैँचा ओछ्याएको । अटयाज बाथरुम ।त्यो सबै हेरेर टाउको समात्दै प्रशन्नले भने, &#039;रोहिणी यो के गरेकी तिमीले ?कतिन्जैल यो थारो गाईलाई घाँस हालद्व्यौ ? म कहिलेसम्म तिमीहरूकोआदर्श परिवारलाई दुःख दिकँ !&#039;&lt;br /&gt;
&#039;आँटी छोरालाई बाघले खाँदैन&#039; भन्ने उखान छ नि ! पख्नोस्‌ पछि तपाईंकोकमाई भएपछि म एकएक गरेर सवै पैसा असुलिहाल्छु नि । अहिले भन्ने हाम्रोखुसीका लागि हामीले जे भन्छौँ बिन्ती मानिदितोस्‌ । यो कोठा ममी आफैँलेमान्छे लगाएर खोज्न लगाउनुभएको हो । तपाईं निरास हुनुभयो भने उहाँकोपनि मन दुख्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्न मन थाम्न नसकेर रोए । रोहिणीले लोग्नेमान्छे त्यसरी रोएकोपहिलोपल्ट नै देखेकी थिइन्‌ । रोहिणीलै सम्झाइन्‌, &#039;तपाईंले रुनुपर्ने त करैछैन । म तपाईँका लागि त प्राण नै दिन सक्छु । यदि म छिँडीमा सुतेकी हुन्थेभनै कै तपाईँ मलाई त्यही अवस्थामा छोडनुहुन्थ्यो त ? अबश्य सक्नुहुन्थेन ।मैले तपाईंलाई दुःख पर्दा यति पनि गरिनँ भने प्रेमको अर्थ नै के भयो र ?&#039;&lt;br /&gt;
प्रशन्नले आँस्‌ पुत्छदै भने, &#039;रोहिणी, तिम्रो ममीबाबाले मलाई यति मायागर्नुको पर्छाडि कुनै कारण त अवश्य छ । उहाँहरूको पनि प्रेमविवाह हुनुपर्छ,हो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;त्यो त होइन, क्रा के रहेछ भने मेरो बाबाको मामाधरनजिकै मेरीआमाको माइती रहेछ । मेरो हजुरआमा मरेपछि मेरो हजुरबावबाले सम्पूर्णसम्पत्ति रक्सी र सुन्दरीका लागि स्त्राहा पार्दै जानुभएछ । ममीको चारजनादाजुहरू बिवाह गरेर घर छौडी गएपछि मेरो हजुरबुबाको &#039;झन्‌ मनोमानीचलेछ । रक्सी खान पैसा नभएपछि मेरो हजुरबुबाले बाँचुन्जेल रक्सी खानदिनुपर्ने सर्तमा राधै साहुलाई सत्र बर्षकी ममी दिने कुरा गर्नुभएछ । पचास-पचपन्न वर्षको राधे साहले हुन्छ नभन्ने त कुरै थिएत । हजुरबुबाको सल्लाहमैक एक रात ममीलाई बलात्कार गर्न आएछ । मेरी ममी रोइकराई गर्दै राधे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साहबाट बचेर बाबाको मामाघरमा आउनुभएछ । संजोक मैरो वावा पनि त्यहीदिन मामाघर बज्रबाराही जानुभएको रहेछ । बाबाको हजुरआमाले मेरो ममीकोबारैमा सबै कुरा बताएपछि बाबालाई ममीको धेरै माया लागेछ । त्यही दिनराति नै कसैको कुरा नसुनी ममीले नाइँ जान्त भन्दाभन्दै घिस्याउँदै आफनोघर ल्याउनुभयो रे । घर ल्याएपछि हजुरवा हजुरआमाले माहिलाले हाम्रा नाककाट्यो भनी धेरै चित्त दुखाउनुभयो रे । पछि हजुरवा र हजुरआमालाई ठूलौममीर आन्टीले धैरै हेला गरेपछि हाम्रै ममीवाबासँग आएर बस्नुभयो रे । हजुरबा,हजुरआमाले भनेको म अलिअलि थाहा पाउँछु । उहाँहरू पनि भन्नुहुन्थ्यो- &#039;मनसाचो हुने मान्छे मात्र गरिब हो नाती, पीताम्बरालाई हामीले चिन्न भूल गप्यौँ ।आज पछुतो लाग्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्तले सोधे, &#039;अहिले तिम्रो घरको हजुरबुबा, हजुरआमा, मामाघरकोहजुरबुबा खोई त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;घरको हजुरबा, हजुरआमा म सानौ छँदैमा बित्नुभयो । मामाघरको हजुरबापनि म दस-वाह्र वर्षकी छँदा एकाविहानै रक्सी खाएर आर्यघाटमा नुहाउँछुभनेर जानुभएछ र असार महिनाको उर्लिरहेको आर्यघाटमा पस्नुभएछ । बाढीलेकता पुन्यायो पत्तै भएन रे ! मेरो ममी र बाबाबाट विबाह गरेको पन्ध-सोहबर्षसम्म पति बच्चा नभएपछि हजुरबा, हजुरआमाले बच्चा पाकन्‌ भनेरडाक्टर वैद्य आदिका लागि धेरै पैसा खर्च गर्नुभयो रे । हामी जन्मेपछि उहाँहरूज्यादै खुसी हुनुहुन्थ्यो रै । म जन्मैकै साल बाबा प्रशासन अधिकत हनुभएकोरे, त्यसैले मलाई छोरी भाग्यमानी छै भन्नुहुन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्नले भने, &#039;उहाँहरूको जीवनमा पति दुःख परेकै रहेछ । तिमीलाई चाहिँके भाग्यमानी भन्नु मजस्तो... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;इलम भनेको लाख हो, धन भनेको खाक हो&#039; मेरो बावाममी सधैँ यहीभन्नुहुन्छ । तपाइंको इलम देखेरै तपाईंलाई मन पराउनुभएको हो । धनी तकाठमाडौंमा जति छन्‌ तर इलमी भने कम । मेरो ममीबाबालाई बाबुआमाकोसम्पत्तिमा रजाइँ गर्ने मान्छे त्यति मन पर्दैन ।&#039;&lt;br /&gt;
“मचाहिँ कसको सम्पत्तिमा रजाइँ गर्दैछु ? के म लाछी होइन !?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;फेरि त्यही कुरा, मेहनत गर्दागर्दै नभएपछिकसको के लाग्छ ? हेर्नोस्‌ न म पछि फस्ट क्लास इन्जिनियरकँ श्रीमतीबन्छु।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्नले भने, “रोहिणी, म तिम्रो हर सपना साकार पार्छु । तिम्रो आँखाबाटएक थोपा दुःखको आँसु &#039;फर्न दिन्न । यो मेरो प्रतीज्ञा नै भयौ ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीले प्रशन्तकै कुरा सम्झेर आधा रात बिताइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सोर्ह==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;मौसमी फेरि पनि आउन ढिला गन्यौ, आज पनि जाम थियो कि ;&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले कारमा बसेर लामो सास फेदै भनी, हेर्नोस्‌ न कस्तो बोर हिँड्नैलागेकी थिएँ, बाबु टुप्लुक्क आइपुगे । मलाई र कोठालाई देखेर ज्यादै खुसी हँदैभने, &#039;नानी, राम्रै जागिर पायौँ कि क्या हो ? यो कोठा र तिमी नै नचिनिनेभइछौ । मलाई ज्यादै खुसी लाग्यो, मैले देखेको सपना सबै साकार हुने भयो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले भने, &#039;हो बा राम्रै जागिर पाएकी छु । चाँडै अफिस पुग्नुपर्छ, भाँडाहरूमाभात, तरकारी छ झिकेर खानु, म गएँ, भरे क्रा गरौँला भन्दै फुत्किएर आएँ ।बाबु करौनी, घ्यूको कुरा गर्दै थिए म भरे सुनौला भन्दै टाप कसे । आज हामीकहाँ जाने त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमैषले मुख बिगार्दै, कारलाई थानकोटतर्फ मोड्दै भने, &#039;पहीँ जानुपर्छभन्ने के छ र, बूढा पनि कस्तो साइतमा आएछन्‌ ? अब हामी पर्सि नजाने त ?बूढालाई कसैगरी भए पति घर पठाइदै पर्सि त जानैपर्छ । बुटवलकाकविवाहेक दुई ग्रुपचाहिँ हामीसँगै जाने रै । कविचाहिँ नजाने रे । त्यो च्याखुरेकवि त आफनै प्रेमिकाको कुरा हार्न नसकेर पो नगरकोट आएको रहेछ ।कविता सुहागरातको गरे पनि प्रेमिकालाई छोएकै रहेनछ । देखिनौ, त्यसकोप्रेमिकाको मुड कस्तो थियो । मोरा लाछीले प्रेमिकाको रहर पनि पुग्याएनछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;ए हो, तिनी किन रिसाइन्‌ भनेको त कारण त्यो पौ रहेछ, तपाइँहरूभने... । ल त्यो कुरा छोडौं, बाबुको पीर नगर्नोस्‌ । आउन त औषध-सौषधिके-के गर्न आएका रे, आजफैँ बहाना बनाई भौलि नै गाउँ पठाइदिन्छु । भोलिवेलुका उनीहरू बुटवलबाट आएपछि सँगै होटलमा बस्नुपर्छ है । साह्रै रमाइलाछन्‌ मोरामोरीहरू, धेरै हँसाउने त कबि हो त्यही नपुड्सक परेछ, नत्र किनमुखमा आएको फल छोडथ्यो । केटी मुर्मुरिइरहेकी थिई । अब कविलाई त्यसकेटीले पनि छोड्छे । बडो आदर्श बन्न खोज्दो हो मोरो, अब आदर्शको फलराम्रै चाख्छ त्यसले । अब इन्डियातिर घुमेर आएपछि चाहिँ हामी पनि विबाहगरौँ है ? अस्ति घरबेटी बाले भन्थे, &#039;तिमी छोरीजस्ती भएर भनेको आजकालतिम्रो रूपरङ्गग अर्कै छ । आफूलाई सम्हाल बा, नबु&#039;फी हिँड्दा अगाडि खोलोपछाडि भड्खालो होला ।&#039; सचैसबैले हाम्रो प्रेमलाई अङ्गगालोको माया भङ्गालोकोपानी नै सम्झैका छन्‌ । अबचाहिँ म सबैको घृणा सहन सब्दिनँ है ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषले मौसमीको गाला चिमोट्दै भने, &#039;हुन्छ मैयाँ अबचाहिँ विवाह गर्नेसमय आयो । इन्डियाबाट फर्केको पर्सिपल्टै झयाइँकुटी ठोकौंला । तिमीसँगटाढा बस्न कहाँ मन छ र ? तिमी तै मेरो सर्वस्व हौ । तिमी नभई एकक्षणपनि काद्न गाह्रो हुन थाल्यौ मलाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म पनि त तपाईँ भनेपछि ज्यान नै दिन्छु नि ! नत्र बाबुलाई ढाँटीढाँटी किनआउँथे ? साँच्चि अहिले त दार्जिलिङमा जाडो निक्कै होला, राम्रो कोट छैनकिनिदित्तोस्‌ । बुटवलकाहरू कस्ताकस्ता भएर आउलान्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;अक्कवरी सुनलाई कसी लाउनुपर्दैन ।&#039; तिमी त्यसै राम्री नै छ्यौ, उनीहरूलेजत्ति राम्रो लगाए पनि अनुहार त्यही हो । एउटी नाक चुच्ची, अर्की भ्यातुल्लीकाली तिमी उनीहरूका अगाडि त साँच्चै के भनौँ र भखरै फुलेको फूल जस्तैदेखिन्छयौ । कबिले तिम्रो बखान गर्दै थियो । म सोच्चेँ कवि त छदटु होला तरगर्जने बाघले खाँदैन भनेको सोह्रेआना ठीक रहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले कुरा थपी, &#039;कविहरू त अरूको भाबना बुझ्छन्‌ भन्थे । उसलेयहाँसम्म ल्याएर पेमिकाको भाबना नै बुझनेछ र त्यो सिकारु कवि भएर होलाहोइन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मौसमी त्यो त के सिकारु कबि हुन्थ्यो, राम्चै कबि हो रे। आफन्त कोहीनभएर पो पछाडि परेको रहेछ मोरो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“साहित्यमा अगाडि बढ्न पनि आफन्त चाहिन्छ त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमी जहाँ पनि आफन्तै चाहिन्छ रे । कवि त्यसै भन्थ्यो । कविले प्रेमिकाकोसाथचाहिँ पाउने भएन, अब कविले कविता लेखेरै मरोस्‌ । जाँ, के-के किन्नेहो । मलाई पनि राम्रो ज्याकेट छानिदेक, घुम्न जाँदा तिमीले नै छानेकोज्याकेट लाउँछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमी फुरुङ्ग भएर हाँसी । निमेषले कार फर्कायो । दुवै कपडा पसलतर्फपसै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ढोकामा आवाज आएपछि मौसमीको बानु 4004 ढोका खोल्दै भने,&#039;छौरी किन छिट्टै आयौँ ? अफिस छुदने समय त अझै भएको छैन क्या रे ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;मौसमीले कपडाहरू सोफामा राख्दै भनी हेर्नोस्‌ न बा, अपर्झट मलाईपर्सि नै अफिसबाट काजमा जानुपर्ने भयो, त्यसैले कपडाहरू किनेर ल्याएकी ।विष्णुराजले चिप्रा लागेका आँखाहरू पुछ्दै भने, &#039;नानी, सहनै नसक्ने गरी छातीबुख्ने गरेको तँलाई थाहा नै छ । हिजोआज त झन्‌ अचाक्ली छाती दुख्न थाल्योबा ! छोरा, बुहारीले नै पीडा कति सहन्छौ, एकपल्ट काठमाडौँ जँचाएर आउनुभनेर पठाएका हुन्‌ । नत्र पौ मइसिरमासमा यहाँ किन आउँथे ? आएपछिनजँचाई फर्किँदा के भन्लान्‌ ? तिमी कहाँ जान्छु भन्छयौ, म बूढोलाई कोसंगजचाउनुपर्छ थाहा छैन । तिमीलाई क्याम्पस भर्ना गर्न सहयोग गर्ने इन्द्रै पनिअरब गएछ, अब के गर्नु ल ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले भनी, &#039;अलिक दिनका लागि म छाती दुख्दा कम हुने औषधिकिनेर ल्याइदिन्छु त्यही लिएर जानु फेरि पछि आउनु अनि म राम्रोसँगजँचाइदिउँला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विष्णुराजले आँखाभरि आँसु पार्वै भने, &#039;ठीकै छ केही समयका लागि औषधिलेकाम चलाउँला । जागिर भन्नै कुरो आफूले चाहँदैमा पाइँदैन । मैलै गर्दाजागिरबाट हात धुनुपत्यौ भने नमज्जै हुन्छ । म भोलि नै घर जाउँला । घ्यू,सिरौंला, भागौ ल्याइदिएको छु राख । मलाई तातो दुई गाँस भात खान देक ।म त भोकले मर्न लागेँ बा !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले राइसकुकर हेर्दै भनी, &#039;भात खानु त भनेकै थिएँ नि, किननखाएको त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिउँजस्तो चिसो भात, त्यसमाथि दाल, तरकारी कहाँ थे केही मेसो पाइनँ ।भात त देखेकै हँ । तताउनै ढङ्ग भएन ।&lt;br /&gt;
मौसमीले स्वीच अन गर्दै भनी, &#039;ल म भात तताइदिन्छु हात घौएर आउनोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;भात त आगोमा नै तताइदेक, चिसो खाने भए त अघि नै खाइहाल्थे ति !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले दाल तरकारी ओभनमा राखेर तताई, भात राइसकुकरमै तताई ।केही क्षणमै तातोतातो दाल, तरकारी भात पस्केको देखेर बूढाले तीन छक पर्दैभने, “नानी ! तैँले के जादु गरिस्‌ हँ  बिनाआगो सबै खानेकुरा हेर्दाहेर्दै तताइस्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले करेन्टबाट सब्रै पाक्छ, तात्छ भनेर सम्झाएपछि कृ्‌ष्णराजको मनकेही शान्त भयो । उनलै खपाखप भात खाए । आफनी छोरीको प्रगति देखेरकृ्‌ष्णराजले सवै पीडा भुले । छोरीतिर हेर्दै भने, &#039;यज्रो सहरमा तिमीलाई एक्लैछाडेर जाँदा तिम्रो पीरले कति दिनसम्म त उद्नै सकिनँ । आज भने मनहलुङ्गो भयो । तिमीलाई यतै दिन पाए म सौझै स्वर्ग पुग्थैँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मेरो चिन्ता नै नगर्नोस्‌ । सवै राम्रै हुन्छ । दाइको छोराछोरी, दिदी, दिदीकोछौराछोरीलाई त राम्रै होला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबैलाई राम्रै छ । मलाई भात लागेजस्तो छ, म सुत्छु । छाती दुख्दा खाने औषधिर नाति-तातिनालाई केही कपडा ल्याइदैक, पैसा इस्टकोटको खल्तीमा छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमी औषधि र कपडा लिन वाहिर निस्की । कृष्णराज प्रशन्न मुद्रामासोफामा सुते । मौसमी ब्रुफिनको दस «पन्ध्र पत्ता र कपडाहरू लिएर आई, सबैबाबुलाई देखाई । कृष्णराज खुसी भए । औषधिको पत्ता भने इस्टकोटकोखल्तीमै राखे । भोलि बिहान घर जानका लागि मौसमीले ल्याइदिएको कपडामिलाएर राखे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सत्र==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हेलो ! रोहिणी किन फोन गरेकी, त्यहाँ सबैलाई त सञ्चै छ?&amp;quot;&#039;अं सबैलाई सञ्चै छ । तँ अहिले विहानको खाना खाने गरेर यतै आइज ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले तसँंग माफ पनि माग्नु छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;होइन के भन्छे यो, किन माफ माग्नुप्यो : छिटो भन्‌, कोही विरामीपरेको त होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
“सत्य कोही विरामी छैन । दिदी तँ आउने भनेर खुसी हँदै तँलाई मनपर्नेखाना बनाउँदै हुनुहुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ए हो, त्यसो भए म आइहालेँ । ल भेटेरै कुरा गरौँला, बाई ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीले पनि बाई भन्दै फोन राखिन्‌ । शालु हतारहतार कपडा लगाएररोहिणीको घरतर्फ लागिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&#039;शालु दिदी&#039; भन्दै सौजन्यलाई खेलाइरहेको वीरु चिच्यायो । शालुले वीरु रसौजन्यलाई ठूलो क्याटबरी दिइन्‌ । दुवैको गालामा म्वाइँ खाइन्‌, भर्खर टुकुदुकहिँड्न थालेको सौजन्यलाई केहीबेर बोकेर बगैँचा वरिपरि घुमाइन्‌ । वीरुलेशालुको अनुहारतिर हेदै भने, &#039;दिदी तपाईं जहिले पति सौजन्यलाई देख्नेबित्तिकैकिन आँस्‌ भार्नुहन्छ ?&#039;&lt;br /&gt;
शालुले आफनो आँखामा भरिएको आँसु पुच्छदै भनिन्‌, &#039;तिमीहरू दुवैकोखुसी देखेर रोएकी नि ! ल भन वीरु तिम्रो पढाइ कस्तो छ ?&#039;&lt;br /&gt;
“पढाइ राम्रै छ ममीले बिहान-बिहान ट्युसन पढ्न पढाउनुहुन्छ । आजशनिबार भएकोले बिदा छ । शालु दिदी, म पनि तपाईँको नामबाट नै मेरो नामराख्छु क्या !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“होइन के भनेको तिमीले, मैले त कुरै बुझिनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चीरुले अँध्यारो मुख लगाउँदै भने- &#039;औं बुझिने रे, ममीले भनेको तपाईंकोनामसँग मिल्नै नाम भाइलाई राखैको रे, तपाईँ शालु भाइ सौजन्य मलाई सबैथाहा क्या ! तपाईंको जस्तो नाम राख्यो भने मान्छे ज्ञानी हुन्छन्‌ रे । बाजेलेभाइको नाम अर्कै राखेका थिए रै ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु जिल्ल परिन्‌ । उनले त नाममा त्यति चासो दिएकी थिइनन्‌ ।शालुको मत खुसीले फुरुङ्ग भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वीरुले शालुलाई हल्लाउँदै भने, &#039;दिद्दी मेरो ताम पति फेर्ने, ममीलाईभनिदिनोस्‌ ।&#039; ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले गहभरि आँसु पार्दै भनिन्‌, &#039;वीरु दिदीले मेरो माया लागैर मलाईराम्रो भन्नुभएको हो । बीरु नाम कहाँ नराम्रो नाम हो र, तिमी धेरै पढ, ज्ञानीहोक, तिमीलाई पनि सबैले माया गर्छत्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वीरुले खिन्न हँदै भने, &#039;तपाईं सौजन्यलाई मात्र माया गर्नुहँद्ोरहेछ, त्यसैलेमेरो नाम फेर्नु चाहनुभएन ।&#039; ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले वीरुको गाला मुसार्दै भनिन्‌, &#039;वीरु म दुबैलाई माया गर्छु । तिमीलाईबीरु नाम मन पर्दैन भने दिदीलाई कुरा गछु, हुन्छ ?&#039;&lt;br /&gt;
चीरु दङ्ग परै । शालु सिधै भान्सामा पसेर कान्छीको आँखा छोपिन्‌ ।कान्छीले हात झिक्दै भनिन्‌, &#039;हेर हातको के गति पारेको : हजुरको छाया मात्रदेखे पनि हजुरलाई चिन्छु, बुझिस्यो ? ल वसिस्यो, पहिला दूध र पनिर पकौडानै खाइस्यो अनि कुरा गरौँला ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले दूध पिउँदै वीरुले भनेको कुरा सुनाइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले आँखाभरि आँसु पार्दै भनिन्‌, &#039;वीरुले धेरैपल्ट नाम फेर्ने कुरा गरेकाथिए । मैले वास्तै नगरेपछि हजुरलाई भनेछन्‌ । ल भन्नोस्‌ उसको नाम केराखिदिने ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले केहीबेर सोचेर भनिन्‌, &#039;सौरभ राख्दा हुँदैन !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ भइहाल्छ नि ! उनलाई &#039;श&#039;बाट नै आउने नाम चाहिएको हो । सौरभनाम साह्रै राम्रो छ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन, यो मौरी कुन बेला आएकी ? आफनो आमाछोरी भएपछि त हामीकिन चाहियो ? दिदीको पलिताई कहिलेकाहीँ आफनो प्रशंसा सुनौँ भन्योकहिल्यै पाइएको होइन । सधैँ मेरो शालु मैयाँसाप यस्तो, मेरो शालु मैयाँसापउस्तो भन्नुहुन्छ भन्या । यो मोरी पनि त्यस्तै छे, फोन गत्यो कि पहिलै भन्छे-रोहिणी घरमा सबैलाई सञ्चै त छ ? तँलाई कस्तो छ ? भनेर सोधेको त मैलेसुनेकी नै छैन । ल दिदी हामी कोठामा गयौं ।&#039; शालु र रोहिणी नै कोठाभित्रपसे । कान्छी हाँसिन्‌ मात्र ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रोहिणीसँगै सोफामा बस्दै भन्तिन्‌, &#039;रोहिणी तँ यतिबिध्न खुसी छस्‌,कुरा के हो भन्त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;पहिला तैँ रिसाउन्न भनेर कसम खा अनि मात्र भन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;तँसँग म किन रिसाउनु ? म सधैँ तेरो फोटोलाई हेरेर भन्छु, भगवान्‌ यदिअर्को जन्म हुने भए मलाई रोहिणी नै साथीको रूपमा पठाइदैङ । तेरोकारणले त मैले सबैको सुख देख्न पाएकी छु । दिदीलाई केही तराम्रो भएकोभए म कसरी बाँच्यें होला ? ल सबै कुरा छोडौं, भन्‌ कुरा के हो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले शालुको हात समात्दै प्रशन्नसँग भेट भएदेखिको सबै कुरा बताइन्‌ ।विवाहका लागि करा छिनेर स्वयम्बर गरैर मात्र अर्को हप्ता पाकिस्तान इन्जिनियरपढ्न जानै कुरा पनि बताइन्‌ । स्वयम्बरमा डाक्नुपर्ने मान्छेहरूको लिस्ट लामैदेखाइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीको कुराले एकैछिन त शालुलाई आफू सपनामै छु जस्तो लाग्यो,शालु टोलाइरहिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले मसिनो स्वरमा भनिन्‌, &#039;विन्ती नरिसा शालु, मैले कतिपल्ट तँसँगआफनो प्रेमको बारेमा भन्न चाहेँ तर सक्दै सकिने । तँ भन्धिस्‌ ति सबैको प्रेमविषाक्त हुँदैन भनेर, विश्वास गर हाम्रो प्रेम पनि बिषाक्त होइन । हामी एक-अर्काच्रिना बाँच्न पनि सक्दैनौं त्यसैले सबैको सल्लाहले उहाँ स्वयम्बर गरेरज्ञान लाग्नुभएको हो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;त॑ मलाई पनि बोल्न दिन्छेस्‌ कि आफूमात्र बोल्छैस्‌हं ? तैँले जे गरिस्‌ राम्ै गरिस्‌ । म त सञैँ तेरो खुसी नै चाहन्थेँ । तेरो प्रेममासमर्पण छ । रोहिणी, प्रेममा त्याग होस्‌, स्वार्थ नहोस्‌ । मैले तँलाई माने,लैलामजनुको प्रेमभन्दा तिमीहरूको प्रेम कम छैन । सबै प्रेमी-प्रेमिका तिमीहरूजस्तै हुँदाहुन्‌ त म किन टाउको दुखाउँथैँ ? तँलाई बधाई छ रोहिणी बधाई छ ।आफू डुबेर तैँले प्रेमीलाई उत्तारिस्‌, त्यसो भए तँ फेल हुनुको रहस्य मैले बुझैं ।दुवैजनालाई पढाउन बाबुआमाले सक्नुहुन्न भनेर तँ जानीजानी फेल भइस्‌,नत्र तँ फेल नै चाहिँ हुन्थिनस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले शालुको मुख छोप्दै भनिन्‌, &#039;शालु तँ पनि, हेर पो वास्तविकताममी-बाबाले थाहा पाउनुभयो भने साह्रै मन दुखाउनुहुन्छ । यो कुरा त॑ र ममामात्र सीमित रहोस्‌ । म के गरौँ तँ नै भन्‌ उहाँलाई पढ्न पठाउनका लागि तकार नै विक्री गर्नुपर्ने भयो । जस्ट पास मात्र भए पनि हामी तिमीलाई डाक्टरनै पढ्न पठाउँछौँ भन्त वाल्नुभयो, त्यसैले...&#039; भन्दै रोहिणी रोइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“उफ ! रोहिणी तेरो प्रत्येक करा मान्ने ममी-बाबाले तेरो त्यो इच्छालाईपनि त पूरा गरिदिनुहुन्थ्यो होला नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;शालु तँलाई थाहा छैन, उहाँहरूले हाम्रो प्रेमलाई स्वीकार गर्नु भए पनिपढाइको प्रथम प्राधथमिकताचाहिँ मलाई नै दिनुभएको थियो । मैरो रिजल्टबिग्रेपछि बल्ल प्रशन्नलाई बाहिर पठाउने कुरा उठाउनुभयो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तँ पीर नगर अर्को वर्ष म रामौसँग फेल भएको विषय पास गर्छु । ल अबयी क्रा यहीँ छोडौं । भत क्याम्पसको साथी कति जनालाई बोलाउने !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;सोचेर बौलाए भइहाल्छ । म भने तेरो ममीपापालाई भेटेर आउँछु&#039; भन्दैशालुले पहिला रोहिणीको बाबुलाई भैटिन्‌ । सबै कुरा भएपछि आमासँग भेटिन्‌,पीताम्बरा प्रशत्नको कुरा गरेर हर्षित भइन्‌ । करा गर्दागर्दै प्रशन्न पनि टुप्लुक्कआइपुगे । पीताम्बराले नै शालुको परिचय गराइन्‌ । रोहिणीको मुखबाट पनिथुप्रैपल्ट शालुको नाम सुनेको वताए प्रशन्तले । प्रशन्न आएको गन्ध पाउनेबित्तिकैरोहिणी कोठामा आइन्‌ । प्रशन्नलाई देख्नेबित्तिकै रोहिणीको आँखामा आँसुछर्चाल्कयो । उनी केही बोल्त नसकी बैठककोठामै बसिन्‌ । रोहिणीको त्योचाल देखेर सबै एकैछिन मौन रहे । खाना खाने बेला पनि भएकोले सबैभान्सातिर लागे । शालुले दिदीलाई खाना दिन सघाइन्‌ । रोहिणीले दुई-चार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गाँस बल्लबल्ल खाएर उठिन्‌ । पुनः सबैजना बैठककोठामा जम्मा भए ।रोहिणी र प्रशन्तको अनुहार भने उदास थियौ । स्वयम्बर गदा पार्टी दिनेविषयमा छलफल भइरहेको थियौ । त्यति नै खेर फोन आयो, फोन नजिकैबसैका रोहिणीको बाबुले फोन उठाए । हलो ! को बोलेको, प्रमोद, ओ लन्डनबाटपौ, ल भन्‌ ममीडेडी सबैलाई सञ्चै छ ? लौ भाइ मन्यो रे, कसरी ? हस्पिटललग्दालग्दै ? एपेन्डिसाइटको शङ्का गरै सबैले ? ल बाबुआमालाई पीर नगर्नुभन्नु । अरू के भनौं ल ल राख बाबु, राख ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्बराले डराउँदै सोधिन्‌, &#039;होइन के भयो !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;के हुनु, काकाको कान्छो नाति तरुण हिज्ञो मरेछन्‌, त्यसैले खवर गरेकाहुन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्बराले च्ब ! च्व ! गर्दै भनिन्‌, &#039;नाति जन्मेको त वाहा नै थिएन कसरीमरेछन्‌ रे ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फएपेन्डिसाइटले मरै भन्ने शङ्का छ रे&amp;quot; केशबले जवाफ दिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अहो ! त्यसो भए स्बयम्बर रोकियो त ?&#039; पीताम्बरा झस्किन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ला ! हो त ! स्वयम्बर त रोकियो नि !&#039; केशवले कुरा टुङ्ग्याउन नपाउँदैअँध्यारो मुख लगाइरहेकी रोहिणी रुन पो थालिन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालुले रोहिणीको हात समाउँदै भनिन्‌, &amp;quot;रोहिणी पीर गर्नुपर्ने त कुरै छैन ।स्वयम्बर गर्वैमा तिमीहरूको माया वढ्ने र नगर्दैमा तिमीहरूको माया घट्नेहोइन । तिमीहरू एक-अर्कालाई विश्वास गर्छौ, त्यही नै ठूलो हो, होइन तप्रशन्नजी !&#039; (न&lt;br /&gt;
“हो, शालुले ठीक भन्नुभयो । माया नै ठूलौ हो ।&#039; प्रशन्नले पनि शालुकोकरामा नै समर्थन गरै ।&lt;br /&gt;
सबैले विश्वास र मायाभन्दा ठूलो केही पनि हुँदैन भन्नै कुराको पुष्टि गरे ।रोहिणी र प्रशन्न दुबैले मन बुझाउन करै लाग्यो । शालु दिनभरि बसेरसाँझसाँझ घर आइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रहँदा-वस्दा प्रशन्न पाकिस्तान पढ्न जानै दिन पनि आयो । कान्छीदिदीलेसाइत गरेर पडाउने भएकोले प्रशन्न पाकिस्तान जाने अघिल्लो दिन रोहिणीकैमाबसे । रोहिणी एक्लै कोठामा रोइरहेको देखेपछि केशवले नै प्रशन्तलाई सम्झाउनुभनी आग्रह गरे । रोहिणीको त्यो अवस्था देखेर प्रशन्नलाई पनि नमज्जालाग्यो । उनले कोठा बन्द गरी रोहिणीको नजिक बस्दै सम्झाए, हेर रोहिणीतिम्रो पीरले गर्दा घरमा सबैले चिन्ता मानेका छन्‌, तिमी जेटीबाठी छोरी,तिमीले पो सबैलाई सम्झाउनुपर्छ त ! म लडाइँमा नै त जान लागेको होइन ।प्रत्येक कालो रातपछि दिन आउँछ भन्ने कुरा हामीले भुल्नुहँदैन । मायाको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गहिराइमा डुविसकेपछि जिउन गाह्रो हुँदोरहेछ । त्यसो भन्दैमा कर्तव्य पनिभुल्नु भएन । केही समय पीडा सहेपछि हामी सदाका लागि पीडामुक्त हुन्छौं ।तिमीले आफूलाई सम्हाल्यौं भने म सन्तोषको सास फेर्छु, तिमी चिन्तामा डुव्यौभने म कसरी पढ्न सक्छ भन त ?”&lt;br /&gt;
रोहिणी रोइन्‌ मात्र, प्रशन्नले भने, &#039;रोहिणी तिमी यसरी विलाप गर्छ्यौं भनेम पढ्न नै जान्न ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणी केही बोल्न नसकी आफनो कोठामा आइन्‌ । प्रशन्नले अनेकौँसहानुभूतिका शब्दहरू खन्याए पनि रोहिणीको हृदय प्रशन्नको मायाले जलि नैरहयो । रौहिणी पटक्कै निदाउन सकिनन्‌ । रोहिणी जति छट्पटाए पनि समयलेआफनो गति लिई नै रहयो । भोलिपल्ट बिहान रोहिणी र प्रशन्नले नै एक-अर्कोलाई हेर्न र बोल्न सकेनन्‌ । कान्छीदिदीले साइतको टीकामाला लगाएरबिदाइ गरिन्‌ । एयरपोर्टमा रोहिणी जान सकिनन्‌ । केशब, पीताम्बरा र चन्द्रकान्तमात्र गए । केशवले प्रशन्नलाई बिदा गर्नुअरगाडि &#039;हामीले तपाईंलाई आफनैछोरा सम्झेका छौँ । हाम्रो विश्वासलाई नटुकयाउनुहोला । रोहिणीलाई तपाईंलेचिन्नुभएकै छ, त्यसैले सक्दो चांडो फोन गर्नुहोला&#039; भन्त भुलैनन्‌ ।&lt;br /&gt;
प्रशन्नले पनि विश्वास नटुक्रयाउने, मन लगाएर पढ्ने, चाँड्धै फोन गर्नेकरा बताएर बिदा भए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अठार==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ढोकाको घन्टी लागैपछि शालुले ढोका खोलिन्‌ र त्यो घन्टी लगाउनेलाईकेहीबेर हेरेर भनिन्‌, &#039;तिमी मोना होइनौँ ?&#039;&lt;br /&gt;
मोनाले हो भन्ने सङ्केत गर्दै मुन्टो हल्लाइन्‌ । शालुले मोनालाई कोठामाडाकेर सोफामा बस्न आग्रह गर्दै भनिन्‌, &#039;बसन मोना, तिमी त ज्यादै ठूली पोभइछौ । पहिलाकै घरमा छौ कि अन्तै छौँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाले गहभरि आँसु पार्दै भनिन्‌, &#039;दिदी आज नै त्यो घर छाडेर आएँ ।तपाईंले नै मेरो मर्म बुझिदिनुहुन्छ भनेर यहाँ छिरेकी हँ ? कान्छीदिदीलाई योसमाजले चरित्रहीन नै ठहन्याएछन्‌ नि होइन ? मेरी आमा त्यसै भन्धिन्‌ । मैरोमनले अफ्गै पनि भन्छ उनी त मायाको सागर हुन्‌, चरिहीन होइनन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले फिस्स हाँस्दै भनिन्‌, &#039;मौना तिमी र मजस्ता यो समाजमा कति नैजन्मन्छन्‌ र ? तिमी र म जस्ताको कुरा फेरि कसले ७0 ? तिमी असभ्यजँड्याहाकी छोरी म सभ्य जँड्याहाकी । पर्न त हामी दुवै जँड्ययाहाकी छोरी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पज्यौँ । फरक यति छ, मान्छेहरू तिम्रोअगाडि नै क्रा कादछन्‌ भने मेरोचाहिँपर्छाडि कुरा काट्छन्‌ । आखिर कुरा त कादछन्‌ नै । तिमीले किन घर छोड्यौत?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाले केहीबेर मौन रहेपछि रुँदै बोली फुटाइन्‌, &#039;दिदी मालिक्नी योसंसारमा हुनुहुन्न, उहाँ मारिनुभयो, त्यो पनि आफनै लोग्नेबाट ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले आश्चर्य मान्दै भनिन्‌, &#039;मौना तिमी भ्रममा पस्यौ कि ! देख्दा तत्यस्तो पापीकैँ लाग्दैनथ्यो क ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के भ्रममा हुनु नि दिदी, मैले भोलिपल्ट विहान आफनै आँखाले दुईटातकियामा रगत देखेकी हुँ । उसले अवश्य निदाएको बेलामा तकियाले थिचेरमारेको हनुपर्छ । मैले यो कुरा पुलिसलाई पनि भनेँ तर पुलिसले त ब्लडप्रेसरहाई भएर मरेको मुचुल्का तयार पासो ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;होइन मानैपर्ने कारणचाहिँ कै धियौ र !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के हुन्थ्यो र दिदी, बूढी मालिक्नीबाट त्यो यौनप्यासी सन्तुष्ट हुँदैनथ्यो ।मालिक्नीलाई मारेर क स्वतन्त्र हुन चाहन्थ्यो । उसको आँखा म पापितीमाथिथियो । क मलाई सम्पूर्ण सम्पत्ति दिन्छु भनेर बेलाबेलामा फकाउँथ्यो । मउसको कुरा एक कानबाट सुनेर अर्को कानवाट उडाइदिन्थे । मालिक्नी मेरोचरित्रले गर्दा मलाई असाध्यै माया गर्नुहुन्थ्यो । म पनि उहाँलाई असाध्यै मायागर्थेँ । त्यस घरमा गएको दुई-चार वर्ष त म त्यसको गिह्दै आँखाबाट बचे ।मालिक्नीसापको आमा मरेकोले उहाँ महाराजगन्ज माइत जानुभयो, त्यस रातत्यो अधर्मीले ज्वरो आएको निहुँ पारी मलाई तातो पानी लिएर आउनु भनीआफनौ कोठामा डाक्यौ । म डराउँदैडराउँदै कोठामा पसेँ । कोठामा पसेपछिहतारहतार ढोका पो लगायो ! मैले डरले चिच्याउँदै भनेँ, &#039;मलाई छोइस्‌ मात्रभने पनि तँलाई जिउँदै मारिदिन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मालिक भइखाको अच्युतले एक गिलास तातौपानी मैरो जिउमा छयाप्दैभन्यो, &#039;कत्तित कमारी केटीफ्रै गरेर नखरा पार्छै । म सिकारी भन्ने त तलाईथाहै छ होइन ? यो कोठाबाट एक पाइला मात्र सारिस्‌ भने तँलाई बन्दुकलेउडाइदिन्छु । तँलाई शिरदेखि पाउसम्म गहनाले पूर्छ भन्दा पनि मात लाग्योभाग्ने ?&#039; भन्दै उसले मलाई झम्टन खोज्यो । मलाई पानीले पोलेको पनि यादभएन । मृत्युको त चिन्तै भएन । मैलै चिच्याउँदै &#039;मार्ने भए मार, म मर्छै तरमेरो मालिक्नीको विश्वास तोड्दिनँ&#039; भन्दै ढोकामा पुगेर ढोका खोल्न लागेँ,उसले पछाडिबाट बन्दुकको नालले जोरले टाउकोमा हान्यो । म रन्थनिँदैभुइँमा ढलेँ । हातखुट्टा लुलो भयौ, उसले मेरो शरीरमाथि एक्लौटी जमायो रभन्यो, &#039;मौना तेरा लागि त सारा त्याग्न सक्छु । मोना आवेशमा जे गरे पनिनरिसा है । म जस्तो पाउँदा के चाहिन्छ त तँलाई ?&#039; म धेरै वेरपछि घिसिँदै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफनो कोठामा आएँ । त्यो रात छट्पटाउँदै बिताएँ । भोलिपल्ट मालिक्नीलेमाइतीबाट फोन गर्नुभएको थियो । आमा मरेको चौटमाथि अको चोट कित01 भनेर मन सम्हालेर करा गरेँ । आमा मरेको पाँच दिनको दिन मालिक्नी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुव्लाएर घरभित्र मात्र के पस्नुभएको थियो । मैले चाहंदा-चाहँदै पनिआफूलाई बाँध्न सकिनछ्ु र रुन पुगेछु । मालिक्नीले मेरो आँसु पुर्छिदिँदै भन्नुभयो,“जै नहोस्‌ भन्ने सोचेकी थिएँ त्यही भएछ । त गरिबनीको उद्धार गर्छु भनेरल्याएकी त &#039;झन्‌... । यति भन्दै मालिक्नी पनि मसँगै रुन थाल्नुभयो । हामीदुवैजना धेरैबेर रोएपछि मालिक्नीले भन्नुस, , &#039;नानी नरो तँ मलाई छोडेरनजा । तँ मेरो खुसी हेर्न चाहन्छैस्‌ भने तैँले उहाँको रहर पुस्याइदै ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले अचम्म परेर मालिक्नीको मुख हेदै भनेँ, &#039;हजुरले के भन्नुभएको त्यस्तोम अब यहाँ बस्तिनँ मालिक्नीसाप बरु मागेर खान्छु तर... ।&#039;&lt;br /&gt;
मालिक्नीलै मेरो कपाल मुसार्दै भन्नुभयो, &#039;हुन त तँलाई कुनै इमानदारकेटा खोजेर आफैँ कन्यादान दिन्छु भन्ठानेकी थिएँ । पुन: तेरो इमानदारितामाथिअर्को दाग लगायो यस पापीले । मैले मेरो स्वार्थका लागि मात्र होइन तेरालागि पनि भनेकी हुँ, तँ पनि कहाँ जान्छेस्‌ ? बाबुआमा तिनै हुन्‌ । महिना मर्नपाएको छैन पैसा लिन आउंछै । एक वचन नानी तँलाई अर्काको घरमा गाह्रैहोला भनेर कहिले सोधेकी छै, तँ नै भन्‌ त ? ममाथि पहाड दुद्दा पनिअसत्तीलाई प्यास नै ठूलो भयो । के गरौं पीडा सहने बानी तै परिसक्यो बा !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले मालिक्नी सापलाई भनेँ, &#039;आजै अदालत जाउँ, म साँचो क्रा बताइदिन्छु,यस्तो पतीतसँग नबस्नोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मालिक्तीले तुरुक्क आँसु झार्दै भन्नुभयो, &#039;नानी, वाहा छ मलाई पनि,अपराध गर्नुभन्दा अपराध सहनु पाप हो । तर यो कानुन अन्धो छ बा ! हामीअदालतमा गयौं भने तेरो मालिक होइन तँ पो अपराधी हुन्छैस्‌ । फेरि प्रत्येकस्वास्वीमान्छेहरू आफनो स्वार्थको लागि मात्र कहाँ बाँचेका हुन्छन्‌ त ? कुनैस्वास्नीमान्छैले लोग्नेको अत्याचारको पराकाष्ठा नाघेपछि झिनो आफूनो स्वार्थहेरेर पन्छयो भने यो समाजका आड्गमाईले नै उसलाई वेश्या साबित गर्छन्‌ ।पाइतैपिच्छे काँडा विल्लयाउँछन्‌ । म आफना लागि मात्र बाँचेकी भए केही गर्नत सक्थैँ नै होला तर म कहिल्यै आफूता लागि बाँचनै बुझिस्‌ ? म एउटालेपीडा लुकाउँदा मेरा सम्पूर्ण आफन्तहरू खुसी हुन्छन्‌ भने पीडा गुङाउन ततैचैसभैँ लाग्छ । म मेरा आफन्तको आँखामा आँसु देख्न सक्दिनँ । मोना,देखिहालिस्‌, मेरा छोराछोरी अमेरिकामा कति खुसी छन्‌ । &#039; बुङवाबु हुनुहुन्छ ।मलाई माया गर्ने दाजुभाइ, दिदीबहिनीहरू छन्‌ । म ती सवैलाई कसरी चोटदिन सक्छु भन त : त्यसैले चुपचाप बगर भएर बाँचेकी छु । फेरि तैँले सोचिस्‌होला तेरो मालिकले यो चोट मलाई अहिले मात्र दिएका हुन्‌ । तँजस्ती सफाहृदय भएकी बच्ची त मैले पहिलोपल्ट नै देखेँ । यहाँ करिब आधा दर्जन जति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटीहरू अहिलेसम्म बसै होला, ती प्रत्येकमा लालच थियो । उनीहरू आफनोवैसका उन्मादहरूलाई: थेग्न सक्दैनथे । तेरो मालिकको पैसामा र मायामालट्टिन्थे उनीहरू । कुन सड्का आफूनो आँख्चा छलेर प्यास मैद्थै«मेटाउँथे मैलेपत्तै पाउँदैनथेँ । जब मलाई नै सौताको व्यवहार गर्न थाल्दा पो वास्तविकताबुझथेँ । चुपचाप आँसु पिएर सबै सहनु नै श्रेय ठान्थेँ । मालिकबाट केपाउँदैनथै कुन्नि अलिक दिनको रमझमपछि अरू नै केटा टिप्थे, हिँड्थे । सबैलेछोडेपछि मालिक आक्कलझुक्कल मसंग आउँथे । भैगो यो कुरै छोडौं, तँ पापीहोइनस्‌ । कुनै राम्रो ओत लाग्ने ठाउँ नपाउन्जेल तँ यहाँबाट नजा ।&#039; उहाँलेत्यसै भत्ती सम्झाउनुभयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले पनि मालिक्नीको कुरा ठीकै ठानेँ । मालिक्नीलै बलात्कार हुनुको कारणपनि सोध्नुभयो । मैले सबै बताएँ । उहाँले टाउकोमा हेर्दै &#039;टाउको नै नफुटे पनिटाउकोमा पीप-रगत जमेको छ&#039; भनेर मेडिकलमा लगी मेरो घाउ देखाउनुभयो ।नभन्दै डाक्टरले घाउ निचोदा एकमुठीभन्दा बढी पीप-टगत आयो । पीप-रगतनिचोरेपछि टाउको हलुको भयो । मालिक्नीले थाहा पाएर पनि केही थाहानपाएझैँ गरी मालिकलाई सम्पूर्ण आकाश स्वतन्त्रपूर्वक डड्त दितुभयो । मउसकी सिकारमा परिरहन्थेँ । मालिक्नी चुपचाप सहिरहनुहुन्थ्यो । मेरो रमालिक्नीको सम्बन्ध अझै गाडा बन्दै गयो । दिन बितेकै थियो । केही दिनअगाडिदिउँसोको तीन-चार जति बजेको हुँदो हो । मेरी आमा आएर मेरी सोझीमालिक्नीसँग हाँक दिँदै भतिछिन्‌- “मीनालाई यो घरबाट लगेर अन्तै राख्छु ।अन्त बढी पैसा दिन्छु भनेका छन्‌ ।&#039; मालिक्नीले रिसको झोकमा भन्नुभएछ-“सक्छयौ भने मोनालाई अहिले लग, मलाई मोना चाहिँदैन ।&#039; मालिक्नी र मेरी &#039;आमाचीचको क्रा सुनेर मालिक रिसाउँदै बाहिर निस्केछन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म कोठामा कै गलफती हुँदैछ भनेर पसेँ । आमा र मालिक्नीबीचको सबैकुरा बुझेँ । मैले रिस थाम्न सकिनँ । आमालाई कपाल भुत्ल्याएर घिसार्दै भनेँ-&amp;quot;तँ कृकर्ती मेरौ मोल राख्न आएकी : आइन्दा तँ यस घरमा छिरिस्‌ मात्र भनेकुकुर फुकाएर टोकाउँछु । जा छिटो निस्की- निस्किहाल ।&#039; मालिक्नी मेरो हातरोक्न खोज्दै हुनुहुन्थ्यो । मेरौ आँखामा आफू बलात्कार हुँदाका क्षणहरू नाच्यो ।मैले मैरौ जिन्दगी बर्बाद गर्ने त्यही आमा नै हो भन्ठानेँ । ममा भूत सवारभयो । मेरो होस त्यतिबेला मात्र आयो जब मालिक्नीले मैरो गालामा दुईथप्पड मार्नुभयो र भन्नुभयो- &#039;मोना अव तँ जेलमा जाकिने भइस्‌ तेरी आमामरी । मैले यसो आँखा खोलेर आमातिर हेरेँ । आमा रुन पनि नसक्नै गरेरभुइँमा पछारिरहेकी रहिछिन्‌ । मैले उनलाई सकिनसकी सडकमा पुन्याएरदयाक्सी रोक्दै हातमा दुई सय रुपैयाँ दिएर भनेँ, &#039;आइन्दा तैँले यो घरमा पाइलाटेकिस्‌ भने यो घरबाट तेरो लास जान्छ, याद गर ।&#039; आमा चु पनि बोल्ननसकी गइन्‌ । मैले त्यो दिन ठूलै पराक्रम गरेकी सम्झ । मालिक्नीले भन्नुभयो,“नानी तेरो रिस देखेर म छक्क परेँ । मैले तँलाई नपिटेको भए तैँले आमालाई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मा्नै थिइस्‌ । जे गरिस्‌ ठीक गरिस्‌ । अव तेरो महिनैपिच्छेको पैसाले सुनकैकेही सामान वनाइदिउंला, दुःख पर्दा काम लाग्छ । त्यही दिन मलाई सिक्री,औंठी र टप दिँदै भन्नुभयो, &#039;अपराध धेरै भएपछि ढुङ्गा पनि विस्फोट हुँदोरहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
मैले भने, &#039;खोई त हजुर पनि विस्फोट भएको ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उहाँले मेरो गाला मुसादै भन्नुभयो, &#039;नानी तँ पनि धैरै कुरा जान्ने भइस्‌ । मआकाशमा गएपछि विस्फोट होउँला । तँ आज साह्रै थाकेकी छस्‌, म खानापक्राउँछु । तँलाई एकछिन नदेख्दा पनि म आत्तिन्छु तँ साबीचाहिँ बस्नुपर्छ नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले हाँस्दै भने, &#039;खाना हजुरले पकाएको मालिकसापले थ्वाहा पाउनुभयोभने एउटानएउटा खोट लगाउनुहुन्छ । खाना म नै पकाउँछ । हजुर थपक्कबस्नोस्‌ । मलाई त दुखाइको पत्तै छैन ।&#039; हामीले त्यो रात हाँसीखुसी सुख,दुःखका कुरा गयौँ । भोलिपल्ट बिहान हतारहतार दुईवटा रगत लागेकोतकिया फोहोर लिन आउनेलाई बोरामा हालेर दिएको देखेँ । म आँच्तिदै कोठामापुग । मेरी मालिक्नी सदाका लागि मलाई छोडेर निदाइसक्नुभएको रहेछ । मकेही बोक्न नसकी भुइँमा थ्याच्च बसेँ । त्यो पापीले कुटिल हाँसो हांस्दै भन्यो,“मोना हामीबीचको काँडा हट्यो । तँलाई थाहा छैन होला यो असत्तीनीलेतँलाई यहाँबाट पठाउने कुरा गर्दै थिई त्यसैले यसलाई सखाप पारेँ । अव यहाँतेरो र मेरी राज्य हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
मैले जुरुक उठेर त्यसको कठालौमा समातेर थुक्दै भनेँ, &#039;युक्क पापी ! मयहाँ छु त केबल मालिक्नीले गर्दा छु । नत्र म उहिल्यै यो घरबाट निस्किसक्थैँ ।तैँले सोचिस्‌ होला मालिक्नीलाई हामीबीचको सम्बन्ध थाहा छैन । मालिक्तीलाईत प्रत्येक काम गर्नेहरूसँगको तेरो सम्बन्ध थाहा थियो । तँलाई हिँड्नका लागिसिङ्गै मूलबाटो छौड्ेर आंफू तरबारको धारमा हिँड्नुहुन्थ्यो । मेरी मालिक्नीकोहत्या गर्ने त्यो पाषी हातले मलाई छोइस्‌ माव भने पनि म आफनो हत्या आफैँगछ |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले चिच्याउँदै भन्यो, &#039;चुप लाग्‌ मोना, मैले तँलाई लैजा भनेको मेरैकानले सुनेको छु बुझिस्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले काप्दै भनेँ, &#039;मबाट घेरै पैसा असुल्ने सुर गरेपछि रिसले सक्छेस्‌ भनेमोनालाई लैजा भन्नुभएको हो अधर्मी । तैँले सोचिस्‌ होला आजसम्म तैँलेदिएकै पैसामा बसेकी छु । मेरी साहुनीले पैसा थपीथपी मेरी आमाको मुखमाफयाँकेर तेरो लागि मलाई यहाँ राख्दै आउनुभएको थियो । मालिक्नीको सोफझोपनकोफाइदा उठाएर पैसा बढाउन खोजेपछि मलाई लैजा मात्र के भन्नुभएको थियोतेरो कालो मतमा नाता शङ्का उठ्यो होइन : अनि निष्पाप मन भएकीसाहुनीलाई सिध्याइस्‌ । म तँलाई नङ्याएरै छोड्छु पापी नङ्स्याएरै ।&#039; तरदिदी, मैरो कुरा स्वयम्‌ मालिक्नीका छोराछोरीले वास्ता गरेनन्‌, उल्टै भने,&#039;छोटोलाई टाउकोमा चढाएपछि के-के भन्छन्‌ भन्छन्‌ । तँ हाम्रो खानदानी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिवारमा तमासा खडा नगर । उनीहरूले मेरा मुख नै वन्द गरे । मेरीमालिक्नीले छोराछोरी र आफन्तका लागि गरेको त्यागको परिणाम आफनैआँखाले देखेँ । अमेरिकाबाट आएको छोरा जेनतेन किरिया बसे । छोरीहरूलेचाहिँ तीन दिनमै नुन खाए । मैले तेह्र दिन त्यहीँ वसेर नुन वारी आजैत्यहाँबाट निस्केर यहाँ आएँ । मालिक्नीका छोराबुहारी, छोरी सबै अव बाबुकोस्याहार गर्ने जिम्मा मोनाको हो भन्थे । मालिकले मालिक्नीको गुणहरू सम्झेरैहोला तेह्र दिनसम्म मलाई छुने आँट गरेन । म त्यसैले पनि तेह्र दिन त्यहाँअडैँ । आज म भोकै छु शालु दिदी भोकै...&#039; मोना रोइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाको कुराले शालुको आँखाहरू पति रसाए । दुबै भान्सामा गए । शालुलेआफूलाई बेलुकाका लागि राखेको दाल, भात, तरकारी, अचार सवै तताएरदिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाले खपाखप भात खाएर भनिन्‌, &#039;मैले बुझ यहाँ कोही काम गर्नेरहेनछन्‌ । त्यसैले तपाईंले आफना लागि बिहान नै बेलुकाका लागि भातपकाउन्ुहुँदोरहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;तिमीले ठीक नै सोच्यौ मोना, तिम्रो पेट त भरियो खानाले ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;आरियो दिदी म टन्नै भएँ । अव म कहाँ बस्ने दिदी : आमासँग त मर्नैपरेपनि जान्न&#039; भन्दै रुत थालिन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालुले कंहीबेर सोचेर भनिन्‌, &#039;मोना तिमीजस्ती बहादुर युवती पनि रुन्छन्‌ ?जीवन क्रममा सबैले क्नै न कुनै पीडाको सामना त गरेकै हँदारहेछन्‌ ।तिमीले र कान्छीदिदीले सानै उमेरमा कल्पनै गर्न नसक्ने पीडाको सामतागस्यौ । अहिले कान्छीदिदीको जिन्दगीमा केवल बहारैबहार छ । तिम्रो जीवनपनि हामी नरक हुन दिँदैनौं । चन्द्रकान्त दाइको भाइको व्यवहार ठीक चन्द्रकान्तदाइको जस्तै छ तर दाहिने गालाको पाटामा पूरै कालो धब्बा भएकोले उहाँतीस-बत्तीस वर्षको उमेरसम्म पनि अविवाहित हुनुहुन्छ । भाडाको टयाक्सीचलाउनुहुन्छ । डेराचाहिँ दिदीको घरभन्दा केही पर छ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाले रुँदै भनिन्‌, &#039;मलाई माया मात्र भए पुग्छ । म रूप नै चाट्ने खालकीछैन दिदी ! मेरो पनि सबै यथार्थ बताइदिनुहोला ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ मोना, हामी सबै कुरा राख्छौं । आजलाई यहीँ बस म पनि एक्लै छु।भौलि बिहानसम्म सबै कुराको टुङ्गो लाग्छ । चन्द्रकान्त दाइको भाइकोनामचाहिँ रोमाकान्त हो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोना चुप लागिन्‌ । शालुले कान्छीदिदीलाई फोन गरेर सबै कुरा बताइन्‌ ।कान्छीदिदीले सल्लाह गरेर फोन गर्ने कुरा सुनाइन्‌ । शालु र मोना नै मोनाकोमालिक्नी गोमाको सम्झनामा हराइरहे । शालुलै केहीबेरपछि, मोनातिर हेर्दैभनिन्‌, &#039;तिम्री मालिक्नीको फौटौ छ मोना ? म ती देवीलाई हेर्न चाहन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौनाले ब्याग खोलेर फोटो देखाउँदै भनिन्‌, &#039;यही हो मालिक्नी । जूनहाँसेजस्तै हुनुहुन्थ्यो । मोनाका आँखा पुनः भरिएर आए । शालुको आँखा पनिनरसाई छोडेन । दुवैले फोटो हेरेर धेरैबेर मौत रहे । मोनाले शालुको ममीपापाकहाँ जानुभएको भत्ती मौनतालाई तोडिन्‌ । शालुले काठमाडौँभत्रकै होटेललजमा बस्नै होला, पूरा थाहा छैन भनेर वास्तविकता ओकलिन्‌ । साँझझमक्कै पन्यौ, आकाशमा पूर्ण चन्द्र र ताराहरू पनि उदाए । मोना र शालुआ-आफ्नै सोचमा दुवैका थिए । शालुको आँखामा गोमाको तस्बिर नाचिरहेकोथियो । गोमाजस्ता नारीलाई कायर भन्ने कि आदर्श भन्ने शालु त्यही सोचमाडुबेकी थिइन्‌ । फोनमा आएको घन्टीले शालुको एकाग्रपन टुट्यो, फोन उठाउँदैभनिन्‌, &#039;अँ, भन्नोस्‌, ए सबैजना राजी भए । भोलि विहान सात बजे पशुपतिमाविवाह गर्ने सल्लाह भयो । हन्छ हामी सात बजे नै आउँछौँ भन्दै फोन राखिन्‌ ।मोनालाई पनि सबै भोलि सात बजे पशुपतिमा विवाह गर्न आउने कुरा सुनाइन्‌ ।मोना लाजले शर्माइन्‌ । शालुले लामो श्वास फेदै भनिन्‌, &#039;मोना समय अझै पनिछ, केही भन्छयौ भने भत । हन त तिमीले रोमाकान्तभन्दा धेरै सुन्दर र भर्खरकोयुबक पनि पाउन सक्छ्यौ, यो साँचो हो । हामीले चाहिँ तिमीलाई जीवनकोअन्तिम क्षणसम्म साथ दिने, तिमीलाई माया ढिने, गुणी युवक खोजेका हौँ ।रोमाकान्त दाइ भट्ट हेर्दा पटक्कै राम्रोचाहिँ हुनुहुन्न मोना ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तपाईं त त्यसै मन पकाउनुहुन्छ । रूप र सम्पत्तिलाई ठूलो ठान्ने मए आजम यहाँ किन आउँथै ? माया भएपछि जस्तोसुकै कुरूप मान्छे पनि आफसेआफसुन्दर बन्दै जाने रहेछ । मालिक्नीसापकैँ करा गर्दा पनि त सबैले उहाँलाई दाँतउछिट्टेकी थसुल्ली भन्थे । तर मलाई उहाँजति राम्री कोही नै लाग्दैनथ्यो ।उहाँको प्रत्येक क्रियाकलाप मनपर्थ्यौ मलाई । उहाँको आँखा राम्रो, मुख राम,हिँडाइ राम्रो, बसाइ राम्रो, सबैका सबै राम्रो लाग्थ्यो ।&#039; मोनाको कुरा गर्दागर्दैमुटु भक्कानिएर आयो, उनी चुप भइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले एकोहोरो मोनालाई हेरिन्‌ । गोमालाई सम्झिँदा शालुको मन पनिभरिएर आयो । आफनै पहिचान बिर्सेर अरूकै अस्तित्व बचाउन हरपल जलिरहेकीगोमाजस्ता नारीलाई पनि अकालमै चिरनिद्वामा पुग्नुपत्यो । हामीले त एउटागोमाको पीडा देख्यौ, एउटै गोमाको हत्या सुन्यौं । यौ समाजमा कति गोमाजस्ताविवश नारीहरू होलान्‌ । कसले तिनीहरूलाई आफनो अस्तित्वबोध गराउने ?गोमाजस्ता पढेलेखेको सभ्य समाजकी नारीले त त्यो दुर्गति भोग्नुपर्छ भनेअरूको के हालत होला :&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दिदी, मैले तपाईंलाई दुःख पुच्याएँ हगि ? तपाईँले त केही खानुभएकै छैन,भौक पनि लाग्यो होला, म केही बनाइदिन्छु । मालिक्नी वितेको तीन दिनसम्मत मैलै रात कसरी बित्यो, दिन कसरी बित्यो पत्तै पाइनँ । मान्छेलाई जति नैचोट परे पनि सम्हालिनुपर्ने रहेछ । मो तपाईं पनि पीर नगर्नोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले मोनातिर फर्कदै भनिन्‌, “मैले तिमी आउनुअगाडि टन्न नास्तागरेकी थिएं, त्यसैले भोक पटक्कै छैन, तिमी केही खान्छयौ भने बनाक नत्रपर्दैन । हिंसक बाघहरूलै जस्तै गरी मान्छेले मान्छेको आलो रगत पिएको देख्दामन त दुख्ने रहेछ । तर, जीवन जिउनका लागि सवै भुल्नु पनि पर्दोरहेछ ।तिमीले टेक्ने घरातलमा चाहिँ अब रगतका छिर्कासम्म हुँदैनन्‌, गरिवसँग केहीसम्झौता गर्न भनेचाहिँ पर्ला !&#039;&lt;br /&gt;
&#039;दिदी पनि, मेरो कति चिन्ता गर्नुहुन्छ ! मेरो हातगोडा सद्दै छन्‌ । यो केकामका लागि ! मैरो पटक्कै पीर नगर्नोस्‌ । ल अव सुतौँ । बिहान चाँडै उठेरनुहाइघुवाई पनि गर्नु छ ।&#039; दुबै सुते तर दुवैको आँखामा धेरै रात जाँदासम्मनिद्रादेवीले बास गरिनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोलिपल्ट शालु मोना पशुपतिमा पुगेको केहीबेरपछि नै केशब, पीताम्बरा,कान्छी, चन्द्रकान्त, रोमाकान्तलगायत अरू दस-बाह्रजना आए । कान्छीदिदीलेबुलहीमा लाउने कपडा पहिन्याएर गहना लगाउँदा त मोनाको रूप घप्पबल्लाजस्तै भयो । सबैले मोनाको रूपको तारिफ गरे । दुलहीको पहिरनमासबैसामु आएपछि रोमाकान्तलगायत सबैले मोनालाई हेरेको हँरै भए । रोमाकान्तलेकुनै क्षण कल्पनासम्म गरेका थिएनन्‌ । त्यो बलात्कृत मोना हीराको टुक्राजस्तैछिन्‌ । सबैसबैले घुणा गरेर फयाँकेको मसँग उनले कसरी सारा जिन्दगीबिताउलिन्‌ ? रोमाकान्त त्यस्तै सोचे । बाजेले अब पशुपतिको मन्दिरअगाडिजाँ दुवैले लाउने माला, औँठी, सिकी सबै ठिक्क पारी हिँड्नु भनेपछि सवैपशुपतिको मन्दिरअगाडि पुगे । बाजेले मन्तर पढेर रोमाकान्तले मोनालाईमाला पहिराउनु भनेर माला के पहिराउन लागेका थिए एउटा समाजसेवीभनाउँदी माथिमाथि साडी उचालेर आई । रोमाकान्तको हात उछिट्याउँदैचिच्याई, &#039;ए सबैजनाले यहाँ पैसाको लोभमा एउटी सुक्‌मारीकोबिबाह एउटा कुरूप अध गर्दैछन्‌ । यौ विवाह हामीले रोक्नुपर्छ ।महिलामाथिको अत्याचार हामीले सहनुहन्न ।&#039; सवै मान्छेहरू हवारहवार्ती जम्माहुँदै भने, &#039;यो विवाह गराउनेलाई कारबाही गर्नैपर्छ ।&#039; बरु हामी गछौँ त्योयुवतीसँग बिबाह भन्नेहरू पनि निस्के । रोमाकान्तलगायत सबैजना रातो-पीरो भएर हेरेको हेरै भए । समाजसेवीले मोनालाई अङ्गालो मार्दै भनिन्‌,“नानी ! तिमी यी पापीहरूको बहकाउमा नआक, तिमीले जोडा मित्नै केटापाउँछ्यौ, तिमीलाई ललाइफकाई गर्नेलाई जैलमा जाक्नुपर्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाले समाजसैवीको हात जोडले &#039;झट्कालेर रिसले आगो हुँदै चिच्याइन्‌,(तपाईँ के बोल्दै हुनुहुन्छ : बुझो न सुझो त्यसै मुखमा जे आयो त्यही बोल्नपाइन्छ ? यो मेरो प्रेमविवाह हो । तपाईंले उहाँको बाहिरी आकृति देख्नुभयो ।मैले उहाँको भित्री रूप देखेकी छु । आइन्दा उहाँको बारेमा एक शब्द बोल्नुभयोभने तपाईं नै जेल जानुहुन्छ । म तपाडँहरूजस्तालाई समाजको कलड्क भन्छु,बुझनुभो, कलङ्क... ।&#039;दद ।&lt;br /&gt;
मोनाको शब्द सुनेपछि, वरिपरि &#039;झफुम्मिएकाहरूले समाजसेवी भनाउँदीलाईगाली गर्दै भने, &#039;ए दिदी, बुझ्दैनवुझी अर्कामाथि त्यसै हात हाल्ने हो?तँजस्ती ककर्नीको पछि लाग्दा हाम्रो पनि बेइज्जत भयो । तेरो मुखसुखफुटाइदिङँ ?&#039; भन्दै समाजसेवीलाई हप्की र दप्की गरे ।&lt;br /&gt;
सबैको कुरा सुनेर कत्तिन आफूलाई समाजसेबी ठान्ने आइमाई लज्जितभई, केही बोल्न नसकी कुलेलम ठोकी । अनि आफनो रूपवान्‌ लोग्नेलेनजिकैको बहिनी पर्नेलाई भगाएर लगेको तेह्र वर्ष वितेको कुरा सम्झेर तुरुक्कआँसु खसाती । ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यता आिगाकी दारा सुको करा सुनेर पुरेतबाजे, रोमाकान्तदेखि लिएर सबैको मन हर्षितभयो । बाजेले स्यावास दिँदै विवाहको सानोतिनो रीति पुच्याए ।विवाह सकिएपछि सबैजना केशवकै घरमा जम्मा भए । कैशवको घरमा करिबसयजना जतिको लागि भोज तयार थियो । भोजमा केशवको धेरै नजिककालाई,कान्छीका धेरै नजिकलाई मात्र बोलाइएको थियो । मोना र रोमाकान्तले नैआफूलाई संसारका सबैभन्दा भाग्यमाती नारीपुरुष सम्झैका थिए । सबैलेमोनालाई उपहार दिनुको साथै सुखी वैवाहिक जीवनको कामना पनि गरे ।चार बजेतिर सम्पूर्ण आफन्तहरू भोज खाएर गइसकेपछि शालुलगापतकान्छीदिदीले मोना र रोमाकान्तलाई राम्रोसँग जीवन काटन्‌ भनी डेरामाछोडेर आफनो घर आए ।&lt;br /&gt;
मङ्सिरको छोटो दिन, छ बजे नै झमक्क साँझ पस्यो । रोमाकान्तले दूधतताएर ल्याई मोनालाई दिँदै भने, &#039;मोना दूध पेक, अघि तिमीले धेरै खानेकुराखाएकी छैनौ, भोक पनि लाग्यो होला, अरू केही खानेकुरा वनाड कि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाले मधुर स्वरमा भनिन्‌, &#039;भौक लागेको छैन । खासै दूध पनि खाने मनथिएन, तपाईंले भनेपछि, यतिचाहिँ खान्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
रोमाकान्तले मोनानजिक बस्दै भने, &#039;मोना तिमी त फूलजस्तै रहिछौँ ।पशुपतिमा त्यो आइमाईले अनुमान गरेको कुरा पनि ठीकै हो । मजस्तोसँगसिङ्गै जीवन काट्न सक्छयौ त !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाले जवाफ फर्काइन्‌, &#039;मेरो उमेर मात्र सानो हो । मैले सुखदुःखका सबैपाटाहरू राम्रोसँग बुझेकी छु । शालु दिदी र कान्छीदिदीले मेरो मायाले गर्दा नैतपाईंलाई नै रोज्नुभएको हो । मैले तपाईंलाई पाउनु मेरो पनि ठूलो सौभाग्यहो।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोमाकान्तले मोनालाई हेर्दै भने, &#039;मोना तिमीले मेरो मन नै हलुको पान्यौ ।म सधैँ भगवानलाई किन यस्तो रूप दिड्स्‌ भन्दै गाली गर्थे । आज मैले बुझेँ,तिमीसँग भेट गराउनकँ लागि यस्तो रूप दिएका रहेछन्‌ । धन्य छ भगवानलाई ।मोना म तिम्रो बिशाल हृदयमा कहिल्यै चोट पुन्याउने छैन ।&#039; मोना चुपचाप&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लागिन्‌ । रात ढस्किसकेकोले दुवै ओछ्यानमा गई भविष्यको मीठामीठा कुरागरे । रोमाकान्तले मौनालाई मामाले सुम्सुम्याए, मायाका चुम्वनहरू वर्षाए ।मोना र रोमाकान्त नै एक-अर्कालाई भुलेर एक-अर्काको अङ्गालोमा हराइरहे,बस्‌ हराइरहे... ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उन्नाईस==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;आज यति रमाइलो क्षणमा पनि तिमीलाई कोठै प्यारो भयो होइन ! केसोचेर बसेकी : दिदी हिँड न बाहिर ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले सुजनको हात मुसादै भनिन्‌, &#039;सुजन यतिखेर भने म तिम्रै भविष्यकोबारेमा सोचिरहेछु । म पनि चाँडै होस्टेल जाँदैछु । तिमी घर आयौँ । तिमीमासाँचो र झुटो बुझने बेला पनि छैन । दिदी भन्नुहुन्थ्यो- फिरोजलाई गुहेखाल्डोमा धकेल्ने फिरोजकै बाबुआमा हुन्‌ रै । आजकाल फिरोजका बाबुआमाछोरो बिग्रिएको पश्चात्तापले जल्दैछन्‌ रे ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“शालु के भन्न खोजेकी तिमीले ? बल्ल कँदमुक्त भएर आएको छु। मैलेअहिले नैं जीवनको वारेमा सोच्न थालेँ भने म कहिले हाँसौँ तिमी नै भन त ?तिमी घरमै वस्यौ, ममी, पापा र कान्छीदिदीको मायामा चुर्लुम्म डब्यौ । मैलेत खुसी के हो बुझनै पाइनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु भाइलाई जीवन के हौ भनेर सम्झाउन मात्र के लागेकी थिइन्‌उर्मिलाले ढोका खोल्दै चिच्याइन्‌, &#039;शालु यो रमझममा पनि भाइलाई कोठाभित्रराखेर के कुराले कान भर्दैछयौ हँ ? तिमी त हामीसँग भएर पनि कहिल्यै हामीहुन सकिनी । सुजनको हामीप्रतिको मायाचाहिँ नखोस ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डीपकले उर्मिलाको कुरामा सही थप्दै ढोकाबाटै भने, &#039;शालु, उर्मी जेभन्दैछिन्‌ ढीक भन्दैछिन्‌ । अरूका छोराछोरी वाबुआमासँग टाँस्सिएर हिँडेकोदेख्दा पनि हामीलाई त्यसै गर्न रहर लाग्थ्यो । तिमीले हाम्रो त्यो रहर कहिल्यैपूरा गरिनौ । सुतालाई तिमीले हामीबाट टाढा राख्न नखोज । तिमीलाईडाक्टर पढाउन पैसा लगानी गरेजस्तै हामी सृजनलाई पनि पैसा लगानी गरेरठूलै मान्छे बनाउँछौँ । तिमीले चिन्तै नगर ।&#039;&lt;br /&gt;
बाबुआमाको कुराले शालुलाई कताकता नरमाइलो त लाग्यो नै शालु केहीबोल्न नसकी चुप भइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले सुजनलाई हातमा समातेर तान्दै भनिन्‌, &#039;सुजन वावु, जारुतिम्रा साथीहरू आइसके होला ।&#039; सुजनले केही कुरा बुझे केही कुरा बुझेनन्‌पनि । सोझ्ौँ जन्मदिन मनाउँदै गरेको सुजन हाँस्दै पार्टीको रमफझममा मिसिए ।शालु भने सुजतको चिन्ताले यताउता छटपटाइरहिन्‌ । मनमनै सोचिन्‌, “कहिले मेरो ममीपापाको बृद्धिका घैँटामा घाम लाग्नै होला ? मैले सुजनलाई सहीबाटो देखाइन भने उनी भत्किन्छन्‌ । म नेपाल मेडिकल कलेज जान अझएक-डेढ महिना छ, त्यो बेलासम्म केही उपाय गरौँला ।&#039; शालु के-के सोच्दैथिइन्‌ ढोकाबाहिरबाट आएको आवाजले ध्यान त्यतै गयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काकाकी छोरी प्रकृत्तिले भनिन, &#039;शालु दिदी, ढोका खोलिस्थो त म हजुरलाईके दिन्छु।&#039;शालुले ढोका खौल्दै भनिन्‌, &#039;के दिने नानु !&#039;&lt;br /&gt;
प्रकृतिले वालउपन्यास नीलकमल शालुतिर बढाउँदै भनिन्‌, &#039;हजुरलाईकथा, उपन्यास धेरै मनपर्छ भनेर यो उपन्यास हजुरलाई ल्याइदिएकी छु। योहेरिस्यो भने हजुर त रोइसिन्छ बाचै ! मेरा धैरै साथीहरू रोए रे म पनि रोएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले प्रकृतिको गालामा निमोट्दै भनिन्‌, &#039;धन्यवाद ! मेरी गुडियालाई मपनि बोर भएर बसेकी थिएँ, साइतमै किताब ल्याइदिडछौ हुन्छ म किताबपढ्छु, तिमी जाक ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१२-१३ वर्षकी प्रकृति हाँस्दै गइन्‌ । शालु किताबमा के रहेछ भनेर हेर्नथालिन्‌ । शालुलाई नीलकमल पढेपछि समय गएको त पत्तै भएन । पुनःसुजनले ढोका खोलेपछि पो झसङ्ग भइन्‌, सुजनले शालुतिर हेदैं बडो नम्रस्वरमा भने, &#039;दिदी बिन्ती, आज मेरो चुकाका लागि डान्स गरिदेक, म तिमीलेजे भने पनि मान्छु ।&#039; त्यो फिरोजले मैले डान्स गरेको देखेर मरिमरी हाँस्दैभन्यो, हेर यो फुच्चे, भ्यागुतो उफ्रेझैँ उफ्रेको, यस्तालाई पनि डान्स गर्ने सोखहा..हा... । कसँगै बसेका चार-पाँच युवतीले पनि मेरो खिल्ली उडाउँदै हांसे ।&#039;शालुले उत्तर दिन नपाउँदै सुजनले शालुलाई तान्दै भने, &#039;तिमीले आज डान्सगरिनौ भनै म तिमीसँग. कहिल्तै पनि बोल्दिनँ ।&#039; शालुलाई भाइसँग पार्टीमाजान कर नै लाग्यो । सुजनले क्यासेटको चक्का फेर्दै भने, &#039;अब मेरी दिदीलेडान्स गर्छिन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
सुजनको क्रा सुनेर-सबैले बप्पडी पिट्दै हाँसे । फिरोजले जबर्जस्ती हाँसोरोकेर भन्यो, &#039;भ्यागुता-भ्यागुती एकैचोटि उफ्रिने कि छुट्टाछुट्टै उफ्रिने हँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युवतीहरूले कुरा थपे, “गेटअप त हेरन, पहाडबाट बल्ल ओलेंकी जस्तीछ । यो सुजनले बनाएकोचाहिँ दिदी होला ।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले युवतीहरूको गालामा म्वाइँ खाँदै भन्यो, &#039;ओ परीहरू, वतचरीलाईउडाएर वनैमा पुन्याइदेऔ । कस्ताकस्ता कहाँ गए मुसाको छाउरा दरबार,यस्तीले डान्स गर्ने रे, डान्स कुन चराको नाम हो थाहा छ ? झयाउँकिरीलाई ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;्हा...हा... झयाउँकिरी&#039; भन्दै युवतीहरू खित्का छाडेर हाँस्दा पनि शालुचुप नै लागेको देखेर सुजनलाई साह्रो रिस उड्यो । सुजनले शालुलाई मनपर्नेगीतको क्यासेट बजाएपछि शालु डान्स गर्न थालिन्‌ । शालुले डान्स गरेको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देखेपछि बरिपरि तितरबितर भएका मान्छेहरू एकत्रित भए । पार्टीको माहोल नैअर्कै भयौ । फिरोज र उसका आसेपासेहरू हेरेको हेरै भए । शालुले डान्सगरिसकेपछि सबै वान्समोर &#039;वान्समोर&#039; भन्दै चिच्याउन थाले । शालुले गीतगाउँछु भनेर आनन्द कार्कीले गाएको &#039;यो कस्तो नियति, यो कस्तो जलन&#039;बोलको गीत गाउन थालेपछि सबैले विनको धुनमा सर्प लट्टिएकैँ लट्टिएर गीतसुने । गीत सिद्धिसकेपछि सबैले शालुको डान्स र स्वरकै तारिफ गरे । सुजनहर्षले फुरुङ्ग भएर आफनो साथीहरूलाई शालुसँग परिचय गराए । फिरोजलेयुवतीको अङ्गालो छोडेर शालुसाम्‌ आई &#039;शालुजी, मलाई माफ गर्नोस्‌, मैलेजै भने केही तशोची भनेँ, आउनौस्‌ तपाईँ र म डान्स गरौं&#039; भन्दै फिरोजलेहात शालुतिर बढायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले पर हट्दै उत्तर दिइन्‌, हेर्नोस्‌, आज मैले मेरो भाइको खुसीका लागिमात्र डान्स गरैकी हुँ । म पेसेवर डान्सर होइन ।&#039; यति भन्दै शालु पार्टीकोमाहोलबाट बाहिरिइन्‌ । सुजनले मनमनै भने, “साले फिरोज, तेरो घमण्ड बल्लचकनाचुर भयो । हामीलाई भ्यागुता-भ्यागुती भन्थिस्‌ अव के भन्दोरहेछस्‌ भन्‌मोरा !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोज नजिकै रहेको बेन्चमा बस्यो र सोच्यो, &#039;आजसम्म मैले मेरो एकइसारामा नै मप्रति भुतुक्क हुनै युवतीहरू भेटेको थिएँ । कति त मसँग बोल्नपाउनु पनि आफनो सौभाग्य सम्झिन्ये । यसले मेरो रूप देखिन होला, त्यसैलेमसँग डान्स गर्न इन्कार गरी । केक काट्ने बेलामा त अबश्य आउँछै नै होला,म जसरी भए पनि त्यसलाई मेरो रूप हेर्न बाध्य गराउँछ । मेरो रूप देखेपछि,चित खान्छे । मान्छे जे-जस्तो हौस्‌, त्यसको स्वरलाई र त्यसको डान्सलाईचाहिँ मान्नैपर्छ बा ! मलाई एक नजर देखेपछि मैन पस्लेझैँ परिलिन्छे त्यो । अनिमैले त्यसलाई के गर्नुपर्छ जानेको छु । यति धेरै तड्पाउँछु कि तड्पीतड्पी मर्छै,त्यो । मचाहिँ नयाँनयाँ फूलहरूमा रमाइरहन्छु ॥:004 एक-दुई वचन बोलेर प्रेमकोनाटकचाहिँ गर्नैपर्छ ।&#039; यस्तै कुराहरू मनमा थियो । युवतीहरूलेयथार्थ बोध गराए- &#039;फिरोज हेर कति गीतहरू खेर गइसक्यो उठ डान्स गरौँ ।नपत्याउने खोलाले वगाउँछ भन्थे ठीक रहेछ । भ्यागुतीले डान्स त कमालकैगरी, फेरि गीत पनि राम्रै गाई ।&#039; फिरोजले उठेर बुगतीहरुलाई अङ्गालोमाबेबै भन्यो, &#039;अब केही दिनका लागि त्यो पनि यसरी र अङ्गालोमा बेरिन्छै । मउसलाई तिमीहरूको जस्तै पहिरन लगाउन बाध्य गराउँछु । तिमीहरूकोजस्तो पहिरन र तिमीहरूको जस्तो शृङ्गगारमा सुहाउँदै देखिएली, होइन त ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;नाइँ फिरोज, नाइँ हामी तिमीलाई केही दिनका लागि पनि छोड्न सक्दैनौं,पाँचैजना युवतीले एकै स्वरमा भने ।&lt;br /&gt;
फिरोजले भेटघाटको समय फरक पार्ने तर तिमीहरूलाई नछौड्ने भनीवचन दियो । त्यसपछि युवतीहरू ढुक्क भए । पुनः केहीबेर डान्स चल्यो । केक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काट्ने बेलामा सबै एकब्रित भए । शालु केकमा गाड्ने मैनबत्ती र चक्क्‌ लिएरहल्का गुलाफी कुर्ता-सलवारमा आइन्‌ । फिरोजले मनमनै सङ्कल्प गर्दै भन्यो,&#039;तेरो यौ कूर्ता-सलवार चार दिनमा उतार्छँ म ।&#039; केक काटने काम पनि सुरुभयो । दीपक र उमिंलाले सुजनको हात समाते, सुजनले केक काटै । बाबुआमालेसुजनलाई केक खुबाएपछि सबैले ताली बजाए । सुजनले बाबुआमा र दिदीलाईकेक खुवाएपछि, कमशः सबैलाई केक बाँड्न सुरु गरै । शालुले कैक काटनमासहयोग गरिन्‌ । फिरोज भने कसरी शालुलाई आफनो रूप देखाउने भन्नैघुनमा थियो । फिरोजले गिफट दिँदा शालुको प्रशंसा गर्दै भन्यो, &#039;मलाईतपाईंको डान्स र गीत नै साह्रै मत्त प्यो ।&#039; शालुले मुसुक्क हाँस्दै जबाफदिइन्‌, &#039;धन्यवाद !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले शिर झुकाएरै भन्यो, &#039;मलाई माफ त दिनुहुन्छ हैन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;तपाईंले जे देख्नुभयो त्यही मन्ुस्ी भयौ । मान्छैले आँखाले देखेको कुरा भन्नैन हो । माफ मान्नुपर्ने कुनै कारण नै छैन ।&#039; फिरोज कुरा बढाउन चाहन्थ्यो ।शालुले फिरोजको अनुहारतिर हेर्दै भनिन्‌, &#039;कृपया पछि कुरा गर्नुहोला, अहिलेलाईम काममा व्यस्त छु।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोज अँध्यारो मुख लगाएर त्यहाँबाट हट्यो । उसले चित खायो, आफनोसुन्दर अनुहार र सुन्दर जिउडाल देख्दा पनि शालुले कुनै प्रतिक्रिया नजनाएकोदेख्दा । सुजन भनै मनमनै फिरौजको आकृति देखेर रमाउँदै सोचिरहेका थिए,“सँ म जस्तो कोही छैन भनेर घमण्ड गर्थिस्‌ । देखिस्‌ तँ जस्तालाई मेरीदिदीले कसरी आफूबाट टाढा भगाइन्‌ । अब त तेरो सेखी फप्यो होला नि !तैँले मेरी दिदीलाई अरू जस्तै तेरो रूप देख्नेबित्तिकै लट्टिने भन्ठानेको थिइस्‌होला, देखिस्‌ हैन ? मेरी दिदीको व्यवहार मुल्ला फिरोजे ।&lt;br /&gt;
&#039;किन फिरोज तिमी त चूक घोप्टाएजस्तै अनुहार लिएर आयौ । भ्यागुतीलेपत्याइन कि कसो ?&#039; युवतीहरूले फिरोजको बरिपरि झुम्मिँदै भने ।&lt;br /&gt;
फिरोजले रिसाएको स्वरमा भन्यौ, &#039;चुप लाग, कति दिन यो फिरोजेकोअगाडि चुरीफुरी देखाउँदिरहिछे हेरौँला नि । आमाबाबुको ताल त्यही हो । नशालागेपछि पेटिकोट खुस्केको पनि पत्ता हुँदैन, छोरी भने मै हँ भन्छे । म त्यसलाईकाँच्चै चपाउन पाए पनि चपाइदिन्थेँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;जाकैँ आज तपाईंलाई धेरै पीर परेको छ। अफिमको नशामा रमाङैँ ।अफिम त छ होइन ? तपाईँको घरको खाली कोठामा मान्छे आए कि आएनन्‌नत्र अस्तिझैँ त्यहीँ बसौंला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले दाह्रा किटदै भन्यो, &#039;प्लिज मलाई एकछिन एकान्तमा छौडिदैक ।म त्यसलाई पासोमा पारेर बजार्ने उपाय सोच्छु । बजार्न पनि यसरी बजार्छु किठहरै पार्छु राँडलाई । हेरन हाँसेको कट हाँसेजस्तो, मुख हेरन राँडको हकिचिलको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जस्तो, अझ मै हुँ भन्छे । हेरन भनेकी पेसेवर डान्सर होइन । मैले त्यसलाईपेसेवर डान्सर बनाइन भने त मेरो नाम पनि फिरोज होइन ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;फिरोज तिमी पनि के एउटै धुनमा लागेको हँ ? आफूलाई सम्हाल ।तिमीले जति पिए पनि तिम्रो नशा बन्न हामी तयार छौँ । भूल त्यसलाई, किडान्स गरौं कि गएर अफिममा &#039;फुलौं । कि रक्सीमै झुलौं, रक्सी पनि आउँदैछ,&#039; युवतीहरूले फिरोजलाई सम्झाए । फिरोज भने शालुलाई हेर्दै दाह्रा किटिरहेकैथियौ । सबैलाई केक बाँडेपछि शालु केही खानेकुरा र एक ग्लास फेन्टा लिएरघरभित्र पसिन्‌ । फिरौजले शालुको सबै क्रियाकलाप नियालिरहेको थियो । करक्सी पिउँदै शालु वाहिर आउने प्रतीक्षामा थियो । तर, शालु सबैले डिनरखाइवरी गाइसम्दा पनि निस्किनन्‌ । उता शालु भने फेन्टा, आलुचिप्स आदिखाई पढ्न बाँकी रहेको बालउपन्यास नीलकमल पढ्दापढ्दै निदाइन्‌ । प्राय:सबै पाहना गइसकेपछि फिरोज नशामा लह्विँदै कार चलाएर घर पुग्यो । छोरासुधने आश नै मारिसकेका गंगा र रमणले छोरा आएको चाल पाए पनि चालनै नपाएफैँ गरी सुते । फिरोजले शालुको अपमान विर्सिन अफिम पियो, तरअहँ अफिमको नशामा पनि शालुलाई भुल्न सकेन । अझै अफिम पियो र मुडालडेकैँ लड्यो । भोलिपल्ट बिहान होसमा आएपछि पनि फिरोजले शालुलेआफनो वास्ता नगरेको सम्झयो । फिरोजलाई शालुको कुराले साट्दै चोटपर्नुको कारण थियौ, &#039;क जीवनमा पहिलोपल्ट नै कुनै साधारणरूपकी युवतीबाटअपमानित भएको थियो । ज्यादै सुन्दरी युवतीहरूलाई आफनौ इसारामा नचाएकोफिरोजलाई शालुको अपमात सहय भएन । गंगाले फिरोजतिर दूध बढाउँदैभनिन्‌, &amp;quot; तिमीले अब राति कहीँ जाँदा कार लिएरचाहिँ नजानू, वरुट्याक्सी चढे जानू । हिजो अगाडिको हेडलाइट फुटेछ । कार केही कुच्चिएकोपनि छ । तिम्रो प्रियसीहरूको ब्याग, पर्स, मोबाइल भने कारभित्र रहेछन्‌ ।तिमी होसमा नभए पनि तिम्रा मायालुहरू हिजो होसमा रहेछन्‌ र दुर्घटना हुनपाएन होला होइन !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आमाको बोलीले फिरोज झसङ्ग भएर सम्झयो- मैले त नशामा &#039;झुल्दैगरेका ती युवतीहरूलाई त्यहीँ छोडेर आएँछु । उफ ! मलाई के भएको होला,कसरी डेरामा पुगे होलान्‌ उनीहरू भनी तुरुन्तै फोन गरेर बुझ्यो । दीपककोड्राइभरले नै डेरामा पन्याइदिएको थाहा पायो । फिरोजको मस्तिष्कबाट शालुअफै नहटेकोले आमासँग शालुको बारेमा सोध्यो ।&lt;br /&gt;
गांगालै लामो श्वास फेर्दै भनिन्‌, &#039;ए उर्मिलाकी छौरी शालुको कुरा गरेकोतिमीले, कहाँ शालु कहाँ तिमीहरू, उनको कूरै नगर । तिमीले अरूहरू मुबतीहरूजस्तै सम्झेका होलाक शालुलाई, उनले बुझेकी छिन्‌ हीरालाई कीराले पनिबिगार्छ भन्ने कुरा । हामीले तिमीलाई जातीनजानी बिगान्यौँ । उर्मिला रदीपकको लहैलहैमा लागेकी भए शालुको पनि तिम्रै हाल हुन्थ्यो होला । उनकै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रमा बस्ने कान्छीले शालुलाई सही बाटो देखाइन्‌ । शालुले स्वयम्‌ वाबुआमालेदेखाएको बाटो छोडी कान्छीले देखाएकै बाटोमा हिँडिन्‌ । नेपाल मेडिकलकलैज जोरपाटीमा ड्वाक्टर पढ्न नाम निकालेकी छिन्‌ रे भन्ने सुनेकी थिएँ ।अव त पढ्न जाने बेला पनि हुन लाग्यो होला । भाइ बिग्रन्छ कि भन्ने अबएउटै चिन्ता छ भन्थिन्‌ रे । कृपा क्या कृपा छिमेकी नरेन्द्रबावुकी छोरी उनैकीसाथी हुन्‌ । कृपाले नै सबै भनेकी हुन्‌ मलाई । उनी सानो छँदा त सधैँबाबुआमासँग आउँथिन्‌ पार्टीहरूमा, ठूली भएपछि चट्ट बाबुआमाको साथ नैछोडिन्‌ । तिमीजस्तो अबुझलाई शालुको करा किन भन्नु ? म गएँ, भन्दै गंगाभान्सातिर प॒सिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;मेरो गोरुको वाह्रै टक्का&#039; भन्ने स्वभावको फिरोज आमाको कुरा सुनेरओइलाएको फूलझैँ भयो । सेट भन्दै मुडकीले भुइँमा हान्यो । जतिजति शालुकोसम्झनामा गहिरिँदै गयो, उत्तिउति शालुको हिजो बोलेका सबै शव्दहरू मीठोलाग्यो । शालुको आँखा-नाक-मुख-जीउडाल सबै सम्झयो । शालुको सबैचिज सुन्दर लाग्न थाल्यो फिरौजलाई । फिरोज जुरुक्क उठेर आमासामु पुग्दैशालुको करा कोट्याउन चाहयो । गंगाले फिरोजको कुराको आशय बुझेरभनिन्‌, &#039;फिरोज, तिमी ध्रर्तीमा बसेर चन्द्रमा छुने आँट नगर । शालुजस्तानारीहरू रूपलाई र घनलाई भन्दा चरित्रलाई हेर्छन्‌ । तिमी त शालुको आँखामापतिङ्गर नै हौँ । त्यो कुरा तिमीले हिजो नै विचार गन्यौ होला । शालुको सपनादेख्न छोड, हातमुख धोएर खाना खान आफ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजलाई आमाको कुरा बेठीक लागेन तर शालुलाई भुल्न पनि सकेन ।सोच्यो &#039;म शालुलाई पाउन जे पनि गर्न तयार छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बीस==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले महिनौं-महिनासम्म शालुको पिछा गर्दा पनि शालुले कुनै प्रतिक्रियादेखाइनन्‌ । घरपरिवारका मान्छेहरू र फिरोजका सुन्दरीहरू फिरोजमा एक्कासिआएको परिवर्तन देखेर आश्चर्यमा पर्नु स्वाभाविकै थियो । फिरोजका सुन्दरीहरूलेफिरोजलाई लाख सम्झाएर पहिलेकै बाटोमा आउन आग्रह गरे तर अहँफिरोजले सुन्दरीहरूको क्रा पटक्कै टेरेन । उल्टै सुन्दरीहरूलाई आफनोसामुनपर्नु भनी कडा चेतावनी दियौ । फिरोजका सुन्दरीहरू अर्कै बाटो मोड्नबाध्य भए । गंगा र रमण फिरोज एउटा खाल्डोबाट उत्रेर अर्को खाल्डोमापसेकोमा चिन्तित नै थिए । फिरोज शालुलाई नपाए आफू नबाँच्ने भनीअन्तिम 7000 थियौ । त्यसैले क एकदिन आँट गरेर शालुको सामुपुग्यो र हात भन्यो, &#039;शालु, मलाई एकपल्ट सुधिने मौका देक। मतिमीबिना बाँच्न सक्दिनँ । म तिमीले जै भन्छयौ त्यही मान्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले सम्झाइन्‌, &#039;हेनौंस्‌ फिरोजजी तपाईंजस्तो होनहार व्यक्ति बिग्रिएकोदेख्दा मलाई पन्ति पीर अवश्य लागेको थियो । तपाईं सृन्दर र सम्पन्न हुनुहुन्छ ।तपाइँले मजस्ता सयौँ युवती पाउनुहुन्छ । तपाईं कूनै आदर्श युवतीसँग विवाहगर्नोस्‌ । मलाईचाहिँ अहङ्कारी भन्नोस्‌ या जे भन्नोस्‌ । म प्रेम शब्दसंग नैघृणा गर्छु । तपाईँ लाख कोसिस गर्नोस्‌ एक हातले ताली चज्दैन । बिन्ती,आइन्दा प्रेम भन्नै शव्द मैरोसामु बिर्सेर पनि नओकल्नुहोला&#039; भन्दै रिसाउँदैशालु आफनो घरतिर आइन्‌ । फिरोज हेरेको हेरै भयो । आँखाबाट बलिन्द्रधाराआँस्‌ झार्दै घाइते सिंहझैं भई घर आयो । आफू बिग्रिनुको जिम्मेवार स्वयम्‌आफैँलाई नै ठहस्यायौ । बाँकी जिन्दगी कसरी काट्ने सोच्नै सकेन । फिरोजखानु न खुदनु इन्तु न चिन्तु प्यो । गंगा एकपल्ट शालुलाई सम्झाउने निर्णयलिँदै शालुको घरमा पुगिन्‌ । शालुले गंगालाई बैठकमा वस्न आग्रह गर्दै भनिन्‌,&amp;quot;हजुरले यसो फोन गरेर आइस्या भए हुन्थ्यो । ममीपापा होइसिन्त ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गंगाले भरिएको आँखालाई ओमभातौ पार्दै भनिन्‌, &#039;म तिमीलाई नै एउटाबिन्ती गरौं भनेर आएकी हँ । के गरौं म छोराको मायाले अलि स्वार्थी भएँ ।फिरौज नशा, सुन्दरी सवैलाई छोडेर तिम्रो मायामा तड्पिन थालेको छ, । थुप्रैदिन भयो उसले एक गेडा अन्त पनि निलेको छैन । नानी ! त्यो हाम्रो एकमात्रटेक्ने वैशाखी हामीलाई दान देक । नफुली नै ओइलिसकेको फिरोज पुनः फुल्नैरहर बटुल्दै छ । साँच्चै भन्दा यहाँ आउने आँट त थिएन । फिरोजको बाबुलेपनि एकपल्ट शालुसँग फिरीजको जीवन माग भनेर पठाउनुभयो, त्यसैलेआउन बाध्य भएँ&amp;quot; भन्दै गंगा रुन पौ थालिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु अलमल्ल परिन्‌ र मनमनै सोचिन्‌, &#039;त्यो डालीडाली चहार्ने भमरामलाई चार-पाँच वर्ष पर्खिन अवश्य सक्दै-सक्दैन । मेरो सानो झूटले गर्दायिनीहरू खुसी हुन्छन्‌ भने झुट बौल्नु कुनै अपराध हुँदैन भन्ने सम्झी भनित,&#039;आन्डी नरोइस्यो, यदि फिरोज मलाई साँच्चै माया गर्छन्‌ भने म डाक्टर पढेरआउँदा उनले पढ्दापढ्दै छाडेको इन्जिनियर पूरा गर्नुपर्छ भनिदिसैला । अर्कोकरा प्रेममा छोइछाई, ख्यालठट्टा, भेटघाट मलाई मन नपर्ने कुराहरू हुन्‌, त्योपनि भनिदिसेला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गंगाले खुसी हुँदै भनिन्‌, &#039;नानी ! म तिम्रो यो गुन कहिन्यै भुल्ने छैन ।मलाई जहाँसम्म लाग्छ फिरोजले तिम्रा सारा सर्त मान्नेछन्‌ । अन मेरो घरपनि स्वर्ग हुन्छ । नानी, सबैजना खुच्चिङ भन्दै थप्पडी मार्थे । अब मैले पनिशिर ठाडो गरेर हेर्न पाउने भएँ । सायद तिम्रो जन्म नभएको भए हामी जिउँदैगर्ने थियौं । म तिमीलाई सधैँ पूजा गर्छु शालु सघैँ पूजा... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हजुरले मलाई त्यति माथि नउटाइस्यो । फिरोज केही गरी राम्रो हुनुभयोभने मात्र मलाई धन्यवाद दिसेला । म पर्सि नै होस्टेल जाँदैछु, किताबहरू अफ्ैकिन्नु नै छ । हजुर आएर मात्र म रोक्किएकी हुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गंगाले चिया पिउँदै भनिन्‌, &#039;चिया ल्याइहाल्यौ, चिया पिएर संगै निस्कौंलाहुन्न ?&#039; शालु स्वीकृतिसूचक मुन्टो हल्लाएर कपडा लाउन गइन्‌ । कपडालाएपछि गंगा र शालु नै घरबाट निस्के । गंगा खुसीले फुरुङ्ग हुँदै घरतिरलागिन्‌ भने शालु पुस्तक पसलतर्फ लागिन्‌ । किताव किनेर घर फर्केको केहीक्षणमै फोन आयो, शालुले फोन उठाइन्‌, फोन फिरोजकै थियो । फिरोजलेबडो हर्षित स्वरमा &#039;आफू पढ्नै र सात जन्म पनि तिमीलाई कूर्न सक्छु शालु&#039;भन्यो । आफनो ममीपापा र आफू नै खुसीले रमाइरहेको कुरा बतायो । शालुलेआफू पनि खुसी छु भनी पुनः अर्को झूट बोलेर फोन राखिदिइन्‌ । फोनराखेपछि मतमत्तै सोचिन्‌, मैले जे गरें ढीक गरेँ, सर्प पति मर्ने लट्ठी पतिनभाँच्चिने । जवानीकै माया गर्ने त्यो निच प्यासीले पनि प्रेम गर्ने रे । उफ !प्रेम शब्दलाई फिरोजजस्ताले ज्यादै सस्तो बनाइदिए । सुजन आजसम्म पनिफर्केनन्‌ । उन्ती बिग्रिए भनै म कसरी बाचौँला ? ममीपापाको भित्री मनशायसुजनलाई आफनो रङ्गीचङ्घगी दुनियाँसँग घुलमिल गराउनु हो । उनीहरूसोच्छन्‌ पैसाले छोरालाई ठूलो मान्छे बनाउन सकिन्छ । ममीपापाले सुजनलाईआफूहरूबाट अलग्याउँछै भन्ने सोचेर जानीजानी घर नफर्किनुभएको हो ।जन्मदिनको भोलिपल्ट नै अलइन्डिया टुरमा जाने क्रा रहेछ, त्यो कुरा नभाइलाई थाहा थियो न मलाई नै । सुजनलाई ममीपापाले मेरोसामु पर्नसम्मदिनुभएन । उहाँहरूलाई भाइको जिन्दगीभन्दा आफ्नै स्वार्थ प्यारो भयौ । शालुकेही कुरा सोच्न नसकी लम्पसार परेर सुतिन्‌ । अँघ्यारोलाई चिर्दै मुख ढाकेरविभिन्न परिकारहरू लिई आफूतो कोठामा पसेकी कान्छीदिदीलाई देखेपछिशालु कान्छीको काखमा पल्टेर धेरैबेर रोइन्‌ । कान्छी पनि रोइन्‌ । कान्छीलेशालुलाई मायाले कपाल सुम्सुम्याउँदै भनिन्‌, &#039;अव नरोइस्यो, हामी सबैलेदेखेको सपना साकार भयो । बरु छिटो खाना खाइस्यो । दाइले ट्याक्सीमैमलाई पर्खिनुभएको छ । दाइ, मोनालगापत सबैलै हजुरलाई सम्झेका छन्‌ ।रोहिणी मैयाँसापचाहिँ भोलि हजुर जाने बैलामा आइसिन्छ रै ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले आँसु पुछ्दै सबैलाई सोधित्‌ । कान्छीले सबैको हालखबर राम्रैभएको बताइन्‌ । वीरुले नाम फेरेर सौरभ राखेको क्रा बताइन्‌ । रौमाकान्त रमोनाको सुखी जीवनबारे पनि बताइन्‌ । प्रशन्नको राम्रै खबर छ भनेर पनिबताइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु उठेर कान्छीको हात मुसार्दै भनिन्‌, &#039;दिदी मलाई अब एउटै चिन्तासुजनको छ । उसलाई ममीपापाले बिगारेरै छोडनुहन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
“मैयाँसाप हजुरले पीर नगरिस्यो । फिरोजको त्यो ताल देखेपछि सबैलेछोराछोरीलाई बढी पुलपुल्याउनु हुँदैन भनेर चेतिसके । डाक्टर पुष्कर भट्टकोक्रा पनि उनीहरूलाई थाहा नै होला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;कस्तो कुरा दिदी ?&#039; शालुले प्रश्न गरिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हजुरलाई थाहा छैन ? विवाह गरेकी श्रीमती सभ्य भइन भनेर कुन चाहिलाईफेरि विबाह गरेछ । आफनो सरुवा भएको ठाउँमा त्यसैलाई लिएर गएछ । त्योआइमाई प्रोजेक्टका लागि आएको अस्ट्रेलियनसँग अस्ट्रेलिया भागेपछि, अहिलेपहिली श्रीमतीसंगै छ, छौरा पनि दुई-तीन वर्षकै भइसकेछ । डा. भट्टकीश्रीमती भन्दै थिइन्‌, &#039;डा. भट्टले रक्सी, पार्टीसाटी सबै छोडे रे । उनलाई पनिअसाध्यै माया गर्छन्‌ रे ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले सन्तोषको हाँसो हाँस्दै भनिन्‌, &#039;भट्टकी श्रीमतीको कुरा सुन्दा साह्रैखुसी लाग्यो । दिदी तपाईं नै भन्नोस्‌ त अरू खुसी हुन्छन्‌ भने झूट बोल्नु हुन्छहोइन ? तपाईं पनि मलाई खुसी पार्न धेरै &#039;फूट बोल्नुहन्थ्यो । ममीले गालीगरेर शँदा आंखामा धूलो परेर आँसु झारेकी भन्नुहुन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले अलि डराउँदै भनिन्‌, &#039;फेरि हजुरले कोसँग &#039;फूट वोलिस्यो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले गंगा घरमा आएको फिरोजले आफूलाई प्रेस गर्छु भनेको सबै कुराकान्छीलाई बेलिबिस्तार लगाइन्‌ र शालुले आफूले फिरोजलाई माया गर्छु भनेरझूट बोलेको कुरा पनि बताइन्‌ । कान्छी शालुको कुरा लु खडो चिन्तितबनिन्‌ । शातुताई ई के भन्नै के नभन्ने सोच्नै सकिनन्‌ । थुप्रे हिउँद बिताएकीकान्छीले अनुमान गरिन्‌ । फिरोजले वास्तवमै प्रेमको मूल्य बुझेकैहुनुपर्छ । शालु मैयाँसापलाई फिरोजको माया साँचो हो भनौँ भने चोट पर्ला ।फिरोजको माया झुटो हो भनेर पनि कसरी भनौँ !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दिदीले कै सोच्नुभएको ? फिरोजको बारेमा सोच्नुभएको हो भने अहिल्यैत्यौ फिरोजेको करालाई मस्तिष्कबाट निकालिदिनुभए हुन्छ । त्यो गुन्डोलाईतपाईंले मैले चिनेकै हौँ । मैले त बिचरी गंगा आन्टीको आँसुको मान मात्रराखिदिएकी हुँ । त्यस्ता लफङ्गाले प्रेमको मूल्य बुझ्यो भने त यो पृथ्वी नैपल्टिन्छ हैन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले हांसेजस्तो गरी भनिन्‌, &#039;हजुरले ठीक नै सोचिस्यो । त्यो प्रेमी हुनैसक्दैन तर हजुरले कसैलाई मन पराउन लाइस्यो भने पहिला मलाई भनिसेलानत्र म रिसाउँछु । हात्तीको चपाउने दाँत बेग्तै, देखाउने दांत वेग्लै हुन्छ ।मान्छेलाई पनि बाहिरबाट चिन्न सकिँदैन । अझ अर्को कुरा, हजुरले आफनोविवाहका लागि केटा खोज्ने जिम्मा मलाई नै दिस्यो भनै म झनै खुसी हुन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीको गालामा म्वाइँ खाँदै भनिन्‌, &#039;ल मैले त्यो जिम्मा तपाईंलाईनै दिएँ। म दिदीले जोसँग भन्नुहुन्छ त्यहीसँग विवाह गर्छु नत्र कुमारी नैबस्छु।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“&#039;शालुको कुराले कान्छीको आँखाबाट हर्षको आँसु झन्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले ढोका खोलेर पलङ्गमा बस्दै भनिन्‌, &#039;ल हैर यी आमाछोरीकोरुवाबासी । तपाईंहरूको के कुरा हुँदै थियो ? म कवाफमा हड्डी त बनिन ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले आँस्‌ पुछ्दै भनिन्‌, &#039;हजुरसँग लुकाउनुपर्ने करै के छ र ? हजुरलेभौलि जान्छु भनिसेकोले म एक्लै आएकी ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रौहिणीले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;दिदीले मीठोमीठो पकाएर ल्याएको थाहा पाएपछिदौडिहालेँ । हेर मोरी तैँले गर्दा हाम्रो घरमा पनिर पाक्दैन । आलुको अचार प्राय:बन्दैन । दिदी भन्नुहुन्छ, आलुको अचार र पनिर देख्यो भने मलाई शालुमैयाँको याद आउँछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीको कुराले शालुको मन भरिएर आयौ । पुन: एकैछिन वातावरणमौन भयो । रोहिणीले भनिन्‌, &#039;दिदी दाइ त बाहिर ट्याक्सीमा आनन्दलेनिदाउनुभएको छ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले उठ्दै भनिन्‌, &#039;शालु मैयाँ राम्रोसँग पढिसेला, आफनो स्वास्थ्यकोख्याल राखिसेला म गएँ पनि ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु कान्छीको पछिपछि गेटसम्म आइन्‌ तर दुवैको औठ चल्त सकेन ।कान्छी रुँदै बाटो लागिन्‌, शालु रुँदै कोठामा आइन्‌ । रोहिणीले बडो गम्भीरभएर भनिन्‌, &#039;साँच्चै माया भनेको गजबकैँ हुँदोरहेछ, । त्यसैले त मान्छेहरूभन्दारहेछन्‌- संसार प्रेममै अड्भेको छ । कान्छीदिदीकी तँप्रतिकौ माया त झन्‌अपारकैँ छ । अरूले चिन्लान्‌ कि भनेर मुख छौँपेरै भए पनि आउनुभयो । दिदीभन्दै हुनुहुन्थ्यो- शालु मैयाँसापको घरको काम गर्ने अहिले घर गएको छ रे ।म दिदीको कुरा सुनेर छक्क परेँ, सोचेँ शालुको घरमा को काम गर्ने आएछफेरि ? पछि बूझिहालेँ तैँले दिदीले पीर गर्नुहुन्छ भनेर घरमा काम गर्ने छभनेकी होस्‌ । भाँडा माझने, घर पुछ्ने त आउँछिन्‌ नै होला होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;अँ आउँछिन्‌ । आज बिहान भने दुध तताएर पनि दिइन्‌ । खाना पकाउनजाँगर लागेन, एउटा चाउचाउ उमालेर खाएँ । छोड्दे सानातिना क्रा, भन्‌प्रशन्नजीको हालखबर के छ ! तैँले आज केही हाँसेजस्तो गरिस्‌ मलाई ज्यादैखुसी लाग्यो ।&#039; त&lt;br /&gt;
“तैँले भनेकी होइनस्‌ हेर रोहिणी, तँ अरूको खुसीको लागि पनि हाँस्‌ । तेरोबाबुआमाले केवल तेरो खुसीका लागि अर्काको छोरामाथि ठूलो लगानी लगाएकाछन्‌ । त्यस्ता बाबुआमाको मन नदुखा । हामीलाई पनि तेरो अँध्यारो अनुहारदेख्दा पीर पर्छ भनेकीले हाँसेजस्तो गरेकी छु । नत्र तेरो लम्बेचौड्े भाषण सुन्नपरिहाल्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ल तैँले जे गरिस्‌ राञ्चै गरिस्‌ । अब हामी सबैको खुसीका लागि कुनै पनिएक विषयमा डिग्री गरिदिक मैयाँ । अलिकति मोटाइदेङ त्यति भए पुग्छहामीलाई । आजकाल तँ बाबुआमाको अगाडि मुर्दाजस्तै हुन्नस्‌ होला नि कि&lt;br /&gt;
कैले सम्झाएपछि आजकाल मैले आफूलाई वाँधैकी छु । मलाई खुसीझैँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देखेर ममीवावा पनि खुसी नै हुनुहुन्छ । कति पत माल मेरो त्यसको तलेखाजोखा नै छैन शालु । कसरी चार-पाँच वर्ष वताउनु सम्झँदा मात्र पनिअत्यास लाग्छ । तैँले प्रेम नगरेर ठीक नै गरिस्‌ । प्रेमको पीडाले त मान्छेलाईसखापै पार्दारहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
“प्रेम गर्नेहरू सबै तँजस्ता कहाँ हुन्छन्‌ त ? देखिनस्‌ मौसमीको प्रेम कसधैँ प्रफुल्ल देखिन्थी । तँ भने सधैँ मरेको विरालो काखी च्यापेर थिमी जानेबाटो कता भन्ने जस्ती छैस्‌ । तैँले पढाइमा ध्यान दिइस्‌ भनेचाहिँ समयबिताउन सजिलो हुन्छ । अर्को कुरा तँ इन्जिनियर सापको श्रीमती बन्न लायकहनुपप्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले शालुको कुरामा सहमति जनाइन्‌ । दुवै मीठोसँग खानेकुरा खाईसुत्न भनेर लागेका थिए । फौन आयो । शालुले फोन उठाइन्‌ । केही बेरकोकराकावीपछि फोन राखिदिइन्‌ । उर्मिलाले होस्टेल जाँदा डेरामा यस्नैलाईढोकाको चावी छोड्नु भन्नका लागि फोन गरेकी रहिछिन्‌ । शालुकी ममीकोकुरा सुनेपछि रोहिणीलाई ज्यादै नमज्जा लाग्यो । रोहिणीले महसुस गरिन्‌- मैलेतपस्या गरेरै बाबुआमा पाएकी रहेछु । गाइन ई भने आमाको कराले खासैदुःखेन । चुगगको भने चिन्ता लाग्यो । कूरा गर्दै निदाए । भोलिपल्टरोहिणीले नै शालुलाई होस्टैलसम्म पुन्याएर गड्न्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==एक्काईस==&lt;br /&gt;
“आकाश तिमीले त महाराजगन्जमा पनि नाम निकाल्न सक्ने मान्छे, फेरियहाँ किन पढ्न आएको ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(तिमी यहाँ पढ्दैछयौ भन्ने बाहा पाएर मैले पनि यहीँ पढेको हुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले हांस्बै भनिन्‌, &#039;तिमीलाई जोक गर्न त कसले सिकाओस्‌ ? तिमीलाईयहाँ देखैरचाहिँ साह्रै खुसी लाग्यो, प्राय: सबै काठमाडौंबाहिरकै रहेछन्‌ । हामीलाईत मान्छे गन्दैनन्‌ । हामीले राम्रो पढेर काठमाडौंको इज्जत राख्नैपर्छ, नत्र हेप्नुहेप्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आकाश केही बोल्न नसकी आफनो रुमतिर लागे । शालु आफनो रुममाआइन्‌ । क्रमश: दिनहरू बित्दै गयो । शालु र आकाशको भेट हुन्थ्यो । पढाइकैवारेमा कुरा हुन्थ्यो र टुड्गिन्थ्यो । शालुलै डाक्टर पढ्न थालेको पनि तेस्रो वर्षपूरा भएर वर्षमा लाग्यो । कलेजमा प्रेम गर्नेहरूको लहर नै चलेकोधियो । शालु आफू निष्फिक्री भएकोमा दङ्ग थिइन्‌ । अरू साथीहरू भनेशालुलाई नपुड्सकको सङ्जञा दिँदै भन्थे, &#039;शालु हामी पनि तँजस्तै नपुड्सक हुनपाएको भए हुन्थ्यौ । न त तँलाई कनै केटाको चासो छ । त॑ नपुङ्सक भएरै धेरै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पढ्न सकेकी होस्‌ । नपृड्सकहरूलाई त वैंसले पनि कुनै असर नगर्ने रहेछहगि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गालु साथीहरूको कुरालाई हाँसोमा उडाइदिन्थित्‌ । शालुले नपुड्सक भन्दापनि कुनै खण्डन नगरेकी हुनाले साँच्चै शालुलाई सवैले नपुड्सक नै ठान्तथाले । शालु नपुड्सक भन्ने कुरा एक कान दुद कान गर्दै सबै केटाहरूले पनिथाहा पाए । शालुलाई मन पराउने दुई-चार केटाहरू त आफसेजफ सावधानभए । आकाशको हृदयमा भने गहिरो चोट लाग्यो । आकाश शालुलाई स्कूलेजीवनदेखि नै मन पराउँथे । शालुकै लागि सप्तरङ्गी सपनाहरू सजाउँथै ।शालुकै मायामा एक्लैएक्लै रुन्ये । तर शालुसामु पुगेपछि भने प्रेमका क्राहरूगर्न सक्दैनयै । त्यसैत्यसै डराउँथे आकाश । आकाशको भित्री मनले सोच्ये-एकदिन न एकदिन शालुले मेरो आँखाको भाषा बुझिछन्‌ । आकाशको त्यो रहररहरमै सीमित भयो । आकाशले पनि यही सोचे- शालुले मेरो वास्ता नगर्नुकोकारण त उनी नपुइ्सक भएरै पो रहेछ । कठै मैरी शालु, एक्लो जिन्दगी कसरीकाटछिन्‌ ? म शालुबिनाको जिन्दगी कसरी काटौँ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आकाशले शालुकै बारेमा सोच्दासोच्दै मनलाई बसमा राख्न नसकेर धेरैसमय बेचैन वने । सबै विद्यार्थी भने शालुलाई देखेपछि मुखामुख गर्थे । शालुलाईआफनो अपमात गरेकोमा पटक्कै चिन्ता थिएन । उनी चिन्तित हुन्थिन्‌ तकेबल सुजन र रोहिणीको पीरले ।&lt;br /&gt;
यता दौलतको विशाल समुद्रमा छलाङ मारिरहेको सुजनले पढ्नुलाई बोफखन्दै गए । सुजन पहिला रक्सीको नशामा रमाउन थाले । विस्तारै सङ्गतडुग्स खाने जमातसँग भयौ । रामै डुगिस्ट बने । ठूलो समुद्वबाट एक लोटापानी झिक्दा पत्ता नपाएझँ दीपक उर्मिलाले पनि दराजबाट पैसा हराएकोचाल नै पाएनन्‌ । एक दिन डुृग्स खान पैसा नपाएपछि सुजनले आमाको दुईतोलाको सुनको चुरा नै चौरै । चुरा चोरीको दोष उमिंला र दीपकले एक्काईसवर्षको घरमा काम गर्ने कान्छालाई लगाए । कान्छाले आफू चोर नभएको दावीगर्दा पति साफसँग पिटी घरबाट निकालिदिए । विनादोष नै सजाय पाएपछिघरमा कोही नभएको मौका पारी आई त्यही कान्छाले पन्धर-बीस तोला सुनकागहना र करिव पाँच सात लाख रुपैयाँ सबै चोरी इन्डियातर्फ टाप कस्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आधा रातमा रक्सीको नशामा झुम्दै आएका उर्मिला र दीपकले पहिला तसबै ढोकाहरू सृजनले नै खोलेको ठाने । कोठामा पसेपछि दुवैको सातो गयो ।दुवैले खोलिरहेको दराजलाई देखेपछि चोरी भएको ठहर गरे । डेरामा बस्नेहरूसँगसोधखोज गरे । कसैले पनि कसले कन बेला चोच्यो भन्नै कुरा थाहा नभएकोभन्ती बताए । चौरी भएको क्रा हल्लीखल्ली भयो । पुलिसहरू पनि आए, चोरपत्ता लगाउन आश्वासन दिएर गए । जीवनमा पहिलोपल्ट परेको चोट दीपकर उमिलालाई नै सहन गर्न गाह्रो भइरहेको थियो । त्यत्तिकैमा आश्वासन दिन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आएकामध्यै एउटा छिमेकीले प्वाक्क भन्यो, &#039;सर ! चोर वाहिरको नभई घरभित्रकैपनि हुन सक्छ । या कि सुजन वाव्‌... ।&#039;&lt;br /&gt;
छिमेकीको क्रा सुनैर दीपकले सातो खाउँलाझैँ गरी भने, &#039;मुख सम्हालेरबोल्नोस्‌, दामौदरजी, मेरो छोरा लाखमा एक छ, बुझनुभो ? क भोलिकोपाइलट हो, पाइलट... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दामोदरले व्यङ्ग्य हाँसो हाँस्दै भने, &#039;चङ्गा उडाउनै पाइलट कि प्लेनउडाउने पाइलट हँ ? तपाईँले साँच्चै थाहा नपाउनुभएको हो कि बुझपचाउनुभएको हो ? सुजनवाबुले त झन्डै मेरो छोरालाई पनि बिगारिसकेकाथिए । म पनि खान्दानी मान्छेको छोरा त्यसमाथि शालु जस्तोको भाइ राम्रैहोलान्‌ भनेर मख्ख थिएँ । धन्न मैले बेलैमा थाहा पाएर सुजनको सङ्गतछुटाइहालेँ । दिदी भने पण्डित भाइ भने महाखण्डित पो रहेछन्‌ । देखैजानेकोभनिदिएँ रिसाउनीस्‌ या खुसाउनोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दामोदरको करा सुनेर सबै छिमेकीहरू शिर झुकाएर निहुरिरहे । सबैलेजिउहजुर भन्ने छिमेकीको अगाडि आफू अपमानित हुनुपर्दा उर्मिला र दीपकरिसले आगो भए । उमिंलाले दामोदरलाई खाउँलाझैँ गरी भनिन्‌, &#039;तँ पाजी दुईपैसेले काठमाडौंमा एउटा झुपडी बनाइस्‌, तँलाई के-कै न भयो होइन ? यस्तोदुःखको बेलामा तँ यही भन्न यहाँ मरेको ? जा गइहाल्‌ मेरो सुधो गाईज्ञस्तोछोरामाथि झुटो आरोप लगाउने पाजी ।&#039;&lt;br /&gt;
पबाएको विष पो लाग्छ, नखाएको विष त लाग्दैन&#039; भन्दै दामोदर हिँडै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दामोदर गएपछि जम्मा भएका छिमेकीहरूले दामोदरलाई नै गाली गरीखनखाँचोमा काम लाग्ने दीपककै पक्ष लिए । दीपकले मनमनै दामोदरकोउठिबास लगाउँछु भनी सङ्कल्प गरै । अनि छिमेकीहरूलाई आफनो छोरी रछोरा दुवै समाजको प्रतिष्ठित व्यक्ति हुनेछन्‌ भन्ने कुरा गर्दै थिए । सुजनपाइ्लै बर टेक्न नसक्ने गरी हल्लँदै आएर लर्खराएको स्वरमा भने, &#039;ममीपापा केभयो ? किन मान्छेको भीड हँ ?&#039;&lt;br /&gt;
सुजनलाई देखेपछि दीपक र उर्मिलाकै होस उड्डयो । छिमेकीहरूले अबदीपकको घरमा बस्न ठीक छैन भन्ने ठानी अब जान्छौँ भनी सबै आ-आफूनोघरतर्फ लागे । सुजनको चरित्र राम्रो छैन भन्ने थाहा पाउँदापाउँदै पनि सुजनलाईराम्रो छ भनी चैपारो घस्नेहरूको मनमा केही नराम्रो त लाग्यो नै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यता दीपक र उर्मिलाले सुजनको त्यो हाल देखेर आफनो भाग्यलाईधिक्कारे । दीपकले आँसु पुछ्दै भने, &#039;तिमी त हामीसँग हिँड भन्दा भन्थ्यौँ-पापा म पाइलट बन्छु । त्यसैले राति अबेरसम्म ट्युसन पढ्न जान्छु । यही होतिमी ट्युसन पढेर आएको ?&#039;&lt;br /&gt;
सुजनले उभिन नसकी भुइँमा थ्याच्च वस्दै भने, &#039;कुल, पापा कुल, हजुरहरूले&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अलिआलि पिउने बानी लगाइदिस्यो । आज मैले अलि धेरै पिएँछु माफ गरिसेला ।घरमा चाहिँ किन भीडभाड थियो हँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले रुँदै भनिन्‌, &#039;घरको सम्पूर्ण नगद, सुन चोरी भएछ । यत्रो चोटपरेको दिन तिम्रो यो हालत देख्दा... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;ममीपापा हजुरहरूले दिदीलाई ननिकालेको भए यो दिन देख्नै पर्दैनथ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिला चिच्याइन्‌, &#039;हामीले निकालेका हौँ र तेरीवजैलाई, त्यही शालुलेनिकालेकी हो । शालुले ननिकालेक्की भए त्यो कहाँ निस्किन्धी र ?&#039;&lt;br /&gt;
सुजन जबर्जस्ती उठ्दै भने, &#039;हत्‌ ममी पनि, हजुरले साह्रो बदनाम गरेरनिकाल्ने योजना बनाएको थाहा पाएरै शालुले दिदीलाई निकालेकी हुन्‌ । शालुचाहन्थिन्‌ दिदी खुसी होकन्‌ । उनी आफनो मायामा नतडपिजन्‌ । चन्द्रकान्तदाइसँगै विवाह गरून्‌ । ती सब त बनिबनाक नाटक थियो । थाहा छ दिदीलेत चन्द्रकान्त दाइसँग विवाह गरेर छौरा पाइसक्नुभयो । दिदी शालुकै साथीरोहिणीको घरमा बुहारीझैं भएर बस्नुभएको छ । दिदीले मलाई हेर्न मन लाग्योभनेर डाक्नुभएकोले म र शालु गएका थियौँ । अँ साँच्चि, मामाघरको हजुरआमापनि भनिसिन्ध्यो- बाबु, तेरी आमाले ककरकाटी बिरालोलाई पोस्नै कामगरिन्‌ । कान्छीको पछुतो लाग्छ बा, यो जमानामा कान्छीजस्ती मान्छे कहाँपाउनु ?&#039; सुजन नशाको सुरमा सबै यथार्थ बकी लर्खराउँदै आफनो कोठाभित्रपसे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपक र उर्मिला पनि केही बोल्न नसकी कोठाभित्र पसे । आंखाबाटबलिन्द्रधारा आँसु &#039;फारे । दुवैको आँखामा कान्छी नाचिरहिन्‌ ।&lt;br /&gt;
दीपकले धेरैबेर रोएपछि भने, &#039;उर्मी, दालमा केही कालो छ भन्ने त मलाईपहिल्यै थाहा थियो । हुन पनि तिमीले कान्छीलाई शत्रुलाई नगर्ने व्यबहारगन्यौ । आज यो दुर्दिन देख्नुपन्यो । धन, पैसा त चौरी भयो केही थिएन पछिपनि कमाउन सकिएला, दामोदरले भनेझैँ सुजन मक्किसकेछन्‌, तिमी आमाभएर पनि थाहा पाइनौ ? उर्मी तिमी कस्ती आमा हौँ हँ : आज दामोदरजस्तोभुसुनाले पनि हामीलाई लात माय्यो । यत्रा छिमेकीहरूको अगाडि शिरझुकाउनुपच्यो । भोलिदेखि यही समाजमा कसरी आफनो रूप देखाउनु : तिम्रैकारणले गर्दा मैले आफनै छोरीलाई पनि शत्रु ठाने । सायद शालु सुजनलाईजीवन के हो बुझाउन चाहन्थिन्‌ । हामीले शालु र सुजनलाई भेट्नसम्म नदिईबार लगायौ । म तिम्रो लहैलहैमा लागेँ । अब सुजनलाई के बनाउने तिम्रोजिम्मा । सुजन बिग्रिएको म हेर्न सक्दिनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले ओछ्यानमा पन्टँदै भनिन्‌, &#039;हजुर पढलेखेको मान्छेले नै उसलाईतह लगाइस्यो । मैले भनेको उनी टेदैनन्‌ । छोरीलाई मैले ज्ञानी बनाएँ, अबछोरालाई सपार्ने जिम्मा हजुरको ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपकले लोप्पा खुवाउँदै भने, &#039;इस्‌ तिमीले शालुलाई राम्रो बनायौँ !&#039; &#039;कामगर्ने कालु जस पाउने ढेडु ।&#039; कान्छी नभएको भए शालुको गति पनि सुजनकोजस्तै हुनेरहेछ । अव सुजनलाई कलतबाट छुटायौ भने तिमीले शालुलाईबनाएको ठहर्छ नत्र ..... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;कै नत्रसत्र त्यो मेरो मात्र छोरो हो र : यो घरमा म मात्र थिएँ र ?&#039; उमिंलाच्याट्टिन्‌ ।&lt;br /&gt;
दीपक सिङ्गै बोतलको रक्सी तन्काउँदै कूर्लिए, “चुप लाग पाखिती, घरमाकोही छैन भन्ने थाहा पाएपछि खाल बस्न नगएको भए घरमा चोरी हुँदैनथ्यो ।आमा मैखाकीले छोरो कुनबेला कुन हालतमा घर आउंछ भनेर कहिले हेरिस्‌ ?अझ मुखमखै लाग्छेस्‌ ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिबाह गरेर ल्याएको वीसौं वर्षपछि पहिलोपल्ट नै दीपकले गाली गरेकाथिए । त्यसैले उर्मिलाको हृदयमा दीपकको गाली बज्चको वाण लागेझौँ भयो ।उमिंला रक्यीको बोतल समातेर रुँदै बैठक कोठामा आई घटघट रक्सी पिईछटपटाउन थालिन्‌ । दीपक र उर्मिलाले सारा रात छटपटाउँदै रुँदै सिरानीभिजाउँदै कटाएँ । भोलिपल्ट बिहान दुवै सकिनसकी उद । दीपक र उर्मिलाएक-अर्कासंग बोल्न सकेनन्‌ । उर्मिलालाई नजानिँदो पाराले चक्कर लागिरहेकोथियो । दीपक विहान खाली पेटमा नै रब्सी पिई के सुरमा कान्छीलगायत युप्रैकाम गर्नेहरू सुतेको कोठामा पसे । आँखा टिनको बाकसमा पस्यो । के रहेछवाकसमा भनी बाकस खोलेर हेरै । वाकसमा शालु र सुजन बिरामी हुँदाजँचाएको कागजको चाङले लगभग बाकस भरिएको थियो । त्यतिमात्र नभईफलानो समय फलानो बाँणाको बन्दकी राखेको औंठीको विल, फलानो समयमाफलानो बाँणाको बन्दकी राखेको तिलहरीका बिलहरू पत्ति प्रसस्तै थिए ।दीपकले क्राकै प्रसङ्गमा उमिंलाले आफनो साथीहरूसँग छाँद्ने गरेको गफसम्झै । &#039;तिमीहरू आफनो बच्चालाई त्यति ध्यान दिँदैनौ होला अनि बिरामीपरिरहन्छ नि । मैरौ शालु र सुजन त विरामी भएको पत्तै छैन । उनीहरूबिरामी भए भनेर आजसम्म एक रुपैयाँ खर्च भएको छैन हगि हजुर ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हो उर्मीले ठीक भनिन्‌ । आजसम्म विरामीका लागि चाहिँ बजेटछुट्याउनुपरेको छैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतीतका कुरा सम्झेर भक्कानिएर रुदै बाकस नै बोकी उर्मिलाको सामुबाकस लगेर फयाँक्दै भने, &#039;हेर पखिती, तैरा छोराछौरी विरामी भएका रहेछन्‌कि रहेनछन्‌ थुक्क ! तँलाई त बच्चा बिरामी भएकोसम्म पत्तो रहेनछ । त॑डोकेले के बुझथिस्‌ कान्छीले सयौं पटक आफनो गहनाहरू वन्दकी राख्दै शालुर सुजनको औषधि गरेकी रहिछन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उमिलाले छरपस्ट भएका पोस्खिएको चाङ कागज देखिन्‌ र टोलाइरहिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपकले पागलभैँ हुँदै बाकसलाई लात्तीले हानेर सबै प्रेस्क्रिप्सनहरू छरपस्टपार्दै भने, तैले ठानेथिस्‌ तेरा छोराछोरी त्यत्तिकै हुर्के, प्रमाण देखिस्‌ होइनपापिनी ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिला पनि चिच्याइन्‌, &#039;आज आएर मलाई तँ-तँ र म-म पापिनी भन्छस्‌ ?म तेरो पछाडि लागेर आएकी हँ र : त॑ नै माग्न गएको होस्‌ । आधुनिकबन्नुपर्छ भनी तैँले नै रक्सी धिच्त सिकाइस्‌, मेरो के दोष हँ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;तास खेल्न मर, ब्ल्लु फिल्म हेर्न जा भनेर पनि मैलै नै सिकाएको थिएँहोला, होइन ?&#039; दीपकले भने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुबैको हल्लाखल्लाले सुजनको निद्रा ब्युँफियो । डेरामा बस्नेहरू पनि कानठाडो पारीपारी सुन्न थाले । सुजनले उठेर आई बाहिर निस्कदै भने, &#039;विहान-बिहानै के महाभारत हँ ? कि ममी-पापाले पार्टीमा जस्तै जुहारी खेलेको हँ ।बिहान-बिहानैं पनि जुहारी खेल्छन्‌ ! फेरि पापाले बिलनिक पो खोल्नुभयो किक्या हो : बिरामी जाँचेको प्रेसिक्रिप्सन नै ल्याइसेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपकले हकारे, “चुप लाग पाजी, हामीले तँलाई स्वतन्त्रता दिएको यही दिनदेख्नका लागि हो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाबुको मुखबाट पहिलोचोटि गाली सुनेर सुजनलाई गाली गरेको हो याठट्टा गरेको थाहा नै भएन । त्यसमाथि डुग्सले राम्जैसँग छाडेको थिएन ।सुजनले भने, “पापा, हजुर सुतिस्यो । बेलुकी नै भनेर बिहानै पिसेछ क्यार अनिकराइसिन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुजनको कुराले दीपकलाई झन्‌ काटेको घाउमा नुनचूक लगाएजस्तो भयो ।दीपक आवेशमा आएर चिच्याए, “चुप लाग मूर्ख, तैले गर्दा हामीलाई समाजकोआँखाबाट &#039;झर्नुपयो । तँलाई हामीले के दिएका थिएनौं र त॑ कृसङ्गतमा लागिस्‌ हँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुजनले अब भने बास्तविकता बुझे, थपक्क कोठातर्फ लागे । उमिंला केहीबोल्न सकिनन्‌ । दीपक एक्तै फतफताइरहे । दीपकको स्वर्गजस्तै घर पूर्णरूपमा&lt;br /&gt;
मसानमा परिणत भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाईस==&lt;br /&gt;
&#039;शालु नरिसाक है एउटा कुरा भन्छु ।&#039; प्रभाले शालुनजिकै सर्दै भनिन्‌ । पुसमहिना भएकाले अरू थुप्रै विद्यार्थी पनि चौरभरि टन्न घाम तापेर बसेका थिए ।शालुले भनिन्‌, &#039;भनन प्रभा तिमीले अहिलेसम्म के भन्त बाँकी राखेकी छ्यौ र ।पहिला त तिमीले नपुङ्सक भनी हल्ला फिँजाएकोमा तिमीलाई धेरैधेरै धन्यवादछ । तिमीले गर्दा म धेरैका पापी नजरबाट वर्चेँ । अँ साँच्चि के भन्दै थियौकुन्नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रभाले सोध्न लागेको प्रश्न थियो- नपुङ््सकको त जुँगा आउँछ भन्थे तरतिम्रो जुँगा किन आएन ? भनेर सौध्न चाहेकी थिइन्‌ । शालुको कुराले प्रभाअनकनाइन्‌ । प्रभा नबोलेपछि शालुले हाँस्दै भनिन्‌, हैन किन चुप लागेकीप्रभा । कै म साँच्चै, नपुड्दसक जस्तै छु र ! मेरी दिदी सधैं भन्नुहुन्थ्यो, &#039;मआकाशबाट झरेकी परी जस्तै छु रे । दिदी यो पनि भन्नुहुन्थ्यो मेरा लागि योपृष्वीमा राजकुमारजस्तै सुन्दर व्यक्ति जन्मेको हुनुपर्छ रे । का आकाशजस्तैसुन्दर हुन्छ रे । शालुले करा टुङ्ग्याउन नपाउँदै प्रभाले पेट मिचिमिची हाँस्दैभनिन्‌, &#039;हेर साथी हो, शालु परीजस्तै छिन्‌ रे सुन्यौ ? त्यतिमात्र कहाँ होरउनलाई विवाह गर्ने युवक राजकुमारजस्तै हुन्छ रे ।&#039; प्रभाको कुरा सुनेपछि सबैहा....हा गर्दै धेरैबेर हाँसे । धेरैबेरको हाँसोपछि प्रभाले भनिन्‌, &#039;ल, ल छ, छहाम्रो पियन राजकुमारसँग तिम्रो ठ्याक्कै जोडा मिल्छ । वा ! तिमीले ठूलैसपना देखेको रहिछौ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्नालाई वर्षौं अगाडिदेखि हेर्न आउने युवक देख्यौ भने त मूछां नै पर्छ्यौंहोला । भन्लिन्‌, क त्यही हो मेरो सपनाको राजकमार !&#039;&lt;br /&gt;
अन्नाले शालुतिर हेर्दै भनिन्‌, &#039;हेर शालु, मेरो हृदयश्वर देखेर सबै डाहलेमर्न लागिसके । तिमीले अझै मेरो राजकुमार देखेकी छैनौ कि क्या हो?राजकुमार पाउन त मेरोजस्तो रूप लिएर जन्मनुपर्छ बुझ्यौ ? फेरि तिमी तनपुङ्सक भनेको होइन र ? के उल्का नपुड्सकलाई पनि राजकुमारको रहर ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्नाको कुराले सबैजना चौर नै धर्किने गरी हाँसे । शालु रछयानलाईचलायो भने आफ्नै मुखमा छिटा पर्छ भन्ने सम्झी जुरुक्क उठिन्‌ । प्रभाले च्व! च्व ! गर्दै भनिन्‌, &#039;हामी शालुजीलाई पियन राजकुमारजीको याद आएजस्तोम यहीं बोलाइदिउँकी ?&#039; साथीहरूको कुराले शालुलाई चक्कर लागेजस्तै भयो ।शालु टाउको समात्दै यचक्क बसिन्‌ ! त्यत्तिकैमा एउटा युवक हस्याड-फस्याङगर्दै आएर भन्यो, &#039;शालु के भयो तिमीलाई ? तिमी ठीक 4021 ?&#039;त्योयुवकलाई देखेपछि सबै युवती हेरैको हेरै भए । शालु टाउको चुपचापलागिरहिन्‌ । युवकले रुन्छ स्वरमा भने, &#039;शालु तिमीलाई चक्कर लागेजस्तो छहिँड डावटरकोमा जाङुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबै युवती युवकको मुखबाट शालुको नाम सुनेर चित खाइरहेका थिए ।शालु युवकको क्राको वास्तै तगरी उडेर हिँड्न लागेकी थिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
फिरोजले हात जोड्दै भन्यो, &#039;शालु बिन्ती, तरिसाउ म तिमो प्राक्टिकलसिद्धिएपछि मात्र तिम्रोसामु देखापर्ने पक्षमा थिएँ । तिमीलाई चक्कर लागेकोदेखेपछि आफूलाई थाम्न सकिनँ, आएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले &#039;को हो तपाईं” भन्दै युवकतिर हेरिन्‌ । अति नै सुन्दर युवकलाईदेखेपछि भनिन्‌, &#039;तपाईंलाई मैरो नाम कसरी थाहा भयो ? तपाईंले अन्नालाईसौध्नुभएको हो ? अन्ना उनी हुन्‌ ।&#039;बठ्ड।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युवकले आँखा ओभानो पार्दै भने, &#039;शालु, विर्सेक म फिरोज हुँ । शालुलेयुवकलाई तलदेखि माथिसम्म हेर्दै भनिन्‌, &#039;ओ फिरोजजी पो, यहाँ किनआउनुभएको कोही विरामी ल्याएको छ कि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले नम्र हुँदै भन्यो, &#039;म तिमीलाई हेर्न आक्कल-झुलुक्क यहाँ आइरहन्छुआज तिमी इल्न ...।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजको कुरा सुनेपछि सबै रातोपिरो हुँदै आफनो बाटो लागे । शालुलेचुझिन्‌ सबै युवतीले फिरोजको पौ क्रा गरेका रहेछन्‌ । मैले फिरोजको साथनदिए पनि यी दुष्टहरूको भने मेख मप्यो । घन्त फिरोज साइतमा नै आएछौँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लु कै सोचेकी तिमीले ? म तिमीले भनेझैँ इन्जिनियर पढ्दैछु । चार-छ महिनापछि त कोर्स पनि पूरा हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजको कुराले अब भने शालुको प्राणपखेरु नै उड्लाजस्तो भयो शालुलेदुखित हँदै भनिन्‌, &#039;फिरोजजी, मलाई माफ गर्नोस्‌ । मैले त तपाईंको आमाकोआँसु हेर्न नसकी झूटमुट बोलिदिएकी हुँ । फेरि तपाईं सुधनुहोला भन्ने तशङ्कासमेत लागेको थिएन । तपाईं सुधनुभएछ । धेरै खुसी लाग्यो । बल्लअङ्कलआन्टीको आँखाको आँसु पनि छुट्यो होला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले रुँदै भन्यो, &#039;शालु तिमीले क्रा फेन्यौ भने म जिउँदो रहने छैन,बिन्ती शालु तिमीले जीवन दिएर फेरि जीवन नलेक ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले धेरैबेर सोचेर भनिन्‌, &#039;फिरोजजी, यो कुरा मसँग होइन मेरी दिदीसँगगर्नोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले मुसुक्क हाँस्दै भने, &#039;न शालु त्यसो भए म ढुक्क भएँ । मैले तिम्रोदिदीसँग मागेर तिमी सानो छँदादेखि लिएर यो उमेरसम्मको थुप्रै तस्बिरहरूकोआर्ट गरैको छु । दिदीले तिम्रा लागि खोजेको राजकुमार म नै हुँ । नपत्याएदिदीसँग सोध ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“शालुले दिदीको कुरा सम्झिन्‌ । &#039;हजुरको राजकुमार म आफैँ खोज्छु&#039; भनेरभन्नुभएको मतलब दिदीलाई फिरोज सप्रन्छ भन्ने थाहा रहेछ । मैले फिरोजकोकुरा गरेपछि मात्र दिदीले राजकुमार खोज्ने कुरा गर्नुभएको थियो । सानोमादिदी हजुरको विबाह राजकुमारजस्तै युबकसँग हुन्छचाहिँ भन्नुहुन्थ्यो तर मनैराजकुमार खोज्छुचाहिँ कहिल्यै भन्नुहुन्नथ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु हाम्रो घरमा सघं तिम्रो गुणगान हुन्छ । ममी भन्नुहुन्छ, &#039;शालु तहिलोमा फूलेकी कमल हो । म पनि भन्छु तिमी कमल नै हौ&#039;, फिरोजलेनिसङ्कोच भने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले उत्तर दिइन्‌, &#039;राम्रो मान्छेले अरूलाई पनि राम्रै देख्छ । मलाई तत्यस्तै लाग्छ । तपाईंलाई यो रूपमा देख्दा भने मलाई ज्यादै खुसी लाग्यो । पर्सि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो लास्ट प्राक्टिकल, पर्सि नै म घर जात्छु । हुन्छ त । अहिलेलाई जान्छु&#039; भन्दैकक्षकोठातर्फ आइन्‌ ।&lt;br /&gt;
फिरोज पनि शालुसँग बिदा भएर खुसी हुँदै घरतर्फ गए । शालुका साथीहरूलेशालुलाई शिर ठाडो गरेर हेन सकेनन्‌ । अन्ना त झन्‌ हंसले ठाउं छोडेभैँभई । अन्ताले त्यो सुन्दर युवक आफूलाई नै हेर्न आएको हो भन्ने भ्रममा परीआफनौ पहिलो प्रेमीलाई छोडिसकेकी थिई । एकतर्फी प्रेममा अल्झिएकी अन्नाडाको छोडेर रुत मात्र सकेकी थिइनँ । शालुको खौड्रो खन्नै प्रभा पश्चत्तापलेजलेकी थिड्टै । शालुलाई भने यावत्‌ घटनाहरू नाटकभी लागिरहेको थियौ ।कता-कता खुसी र कता-कता पीर लागिरहेको थियो । पीर र खुसी दुवै वाँड्नेसाथी आकाश नै थिए । शालु आकाशलाई खोज्दै क्यान्टिनमा पुगिन्‌ । आकाशचिया पिउँदै रहेछन्‌ । शालुले आकाशसामु बस्दै भन्तिन्‌, &#039;आकाश म तिमीलाईखोज्दै यहीँ आएकी हुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुको कुराले आकाश दङ्ग परै । आकाशले सोच्ने सायद शालुले मैले प्रेमगर्छु भन्ने कुरा बुझिन्‌ होला । शालुले पनि अवश्य मलाई भिर्वाभत्र मायागर्छिन्‌ होला । उनले माया गरै पति नगरै पनि आजचाहिँ उनको सामु हृदयखोल्छु नै । उनी नपुङ्सक नै भए पनि म उनीविना बाँच्न सबिदिनँ । तर केभन्ने कसरी भन्ने : आकाश टोलाइरहे । शालुले करा कोद्याइन्‌, &#039;आकाशहामी वचपनदेखि सँगै पढ्दै आएका छौं । सबैलाई प्रेमको हावाले छोयो तरहामीलाई भने छौएन तर आज मलाई अचम्म लागिरहेछ ।&#039; आकाशले बीच्चैमाकरा काददै भने, &#039;सायद तिमीले आज मात्र बुफ्‌यौ म तिमीलाई माया गर्छुभन्ने कुरा ) म तिमीप्रतिको प्रेमले गर्दा नै आज यहाँसम्म आएँ। म ततिमीलाई बिद्यार्थी जीवनदेखि नै माया गर्थे । तर, भन्ने साहस नै भएन, जेहोस्‌, तिमीलाई पाउनै सपना साकार भयो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आकाशको कुराले शालुलाई मङ्सिर-पुसको जाडोमा पनि चिटचिट पसिनाआयो । शालुले गहुङ्डगौ मन लिएर भनिन्‌, &#039;के भनेको आकाश तिमीले ?तिमीले मलाई माया गर्ने ? भो नजिस्क है म त मर्छु।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हो शालु म किन ढाँद्थेँ । हृदयमा परेका असङ्ख्य घाँजाहरू तिमीले देख्नेभए म देखाइदिन्थेँ । शालु तिमीले मेरो मनचाहिँ नभाँच नि म जिउँदो रहनेछैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले आँसु झादैं भनिन्‌, &#039;मलाई थाहा छ, तिमी फूलभन्दा पनि नाजुकछौ । किन आकाश तिमीले यति गहिरो कुरा मनभित्र लुकाई अर्थहीन रुवाईरोयौ ? तिमी करोडौँ-करोडौँमा एक छौ । तिमीले एक बचन मात्र शालु मतिमीलाई प्रेम गर्छु मनेको भए म ज्यादै खुसी हुन्थेँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आकाशले अत्तिँदै भने, &#039;होइन के भन्न खोजेकी शालु तिमीले ? तिमीतनाबमा पो आयौ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु घुँक्करघुँक्क रोइन्‌ मात्र । शालु रोएपछि आकाशलाई शालुको मतकोकुरा बुझन बेरै लागेन । आकाशले हातले विस्तारै टेबुल ठटाउँदै भने, &#039;हेरहेर रोएकी तिमीले के भन्दिरहिछौ भनेर मन चोरेको मात्र हँ । तिमीजस्तीपोक्चीलाई पनि कसैले प्रेम गर्छ ? हेरन कलेजभरि प्रेम गर्नहरूको ताल,सबैको प्रेम देखैर मलाई त वाक्कै लागिसक्यो भन्या ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;तिम्रो कुरा सुनेर सासै उड्लाजस्तो भयो । मजाकगर्नु पति हद हुन्छ नि ! अबदेखि बोल्दिन म तिमीसँग ।&#039;&lt;br /&gt;
आकाशले सम्झाए, &#039;ल अन कान समातेँ, वरिसाक मैले आज प्रेमको कूरानगरेको भए तिम्रो प्रेमकहानी सुन्न पाउँदैनथैं ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले लामो श्वास फेर्दै भनिन्‌, &#039;खोई कै भनौं आकाश, म आफैँ तअचम्ममा परेकी छु । एउटा डुृगिस्ट, त्यसमाथि चरि्हीन फिरोजले त मेरालागि पहिचान नै वदलेछन्‌ । त्यति मात्र होइन, उनी मेरो मायाले यहाँसम्मआउँदारहेछन्‌ । आज मलाई चक्कर लागेर ढल्न लागेको देखेपछि बल्ल देखापरे ।मैले त उनकी आमाको खुसीका लागि उनी सफ्रिन्छन्‌ भने प्रेम गर्छु भनेर झूटबालेकी थिएँ । उनी सुध्नेलान्‌ भन्ने त कल्पनासम्म गरेकी थिइनँ । म त्यही कुरागर्न तिम्रोसामु आएकी हुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आकाशले बनाबटी हाँसो हाँस्दै भने, &#039;तिमीजस्ती पोक्चीका लागि त्याग गर्नेमूर्ख नै रहेछन्‌ उनी । सायद अन्नाजस्ती केटीहरू नदेखेर तिम्रो मायामा फसेहोला नत्र ... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;अन्नाहरूले त फिरोजलाई कलेजमा आएको देखेका रहेछन्‌ । सबैले फिरोजअन्नालाई हेर्न आएको हो भन्नै ठानेका रहेछन्‌ । फिरोजका लागि अन्नालैभूतपूर्व प्रेमी छौडिछन्‌ ।&#039; शालुले यथार्थ औकलिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आकाशले एकोहोरो शालुलाई हेरै र मनमनै भने, &#039;कस्तुरीलाई आफनैबास्ना थाहा नभएझैँ तिमीलाई पनि आफनौ मूल्य थाहा छैन । फिरोजलै तिम्रोमूल्य बुझे । फिरोजको आँखामा तिमी अन्नाभन्दा लाखौँ गुना सुन्दरी छ्यौ ।मलाई पनि त पहिला तिमी कहाँ राम्री लाग्थ्यो र माया लाग्दै गएपछि तिमीसंसारकी सबैभन्दा सुन्दरी लाग्न थाल्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
होइन के सोचेको तिमीले मेरो कुराको विश्वास लागेन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुको क्राले आकाशको मौनता तोडियो । आकाशले भने, &#039;तिमी यतिमीठो कुरा गर्छयौं, तिम्रो कुराको किन विश्वास नलाग्नु ? तिमीलाई फिरोजकस्तो लाग्छ नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;खोई किन क भनेपछि युवतीहरू मरिमेदछन्‌ । मलाई थाहा छैन । तरमलाईचाहिँ तिमी सुन्दर लाग्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आकाशले मन बाँधेर उद्दै भने, &#039;तिमीले फिरोजलाई राम्रोसँग हेरेकीछैनौ । अनि म राम्रो लाग्यौ होला । अव तिमीलाई फिरोज नै संसारमासवैभन्दा सुन्दर लाग्छ । तिमीहरूको भविष्य अवश्य सुन्दर हुन्छ । यसमाशङ्का नै छैन । ल म जान्छु पनि&#039; भन्दै आकाश गए । शालु पनि आफूनोरुमतर्फ आइन्‌ । आकाशसँग कुरा गरेर शालुको मन भने हलुङ्गो भयो ।आकाश भने छट्पटाउँदै आफनो बेडमा डड्ग्रहा पछारिए । उनलाई सम्पूर्णपृथ्वी नै घुमेजस्ता भयो । एक मनलै सौचै घटघटी विष पिएर शान्ति लिउँतर आँखामा शालुको कार्रुणक दृश्यहरू पनि ताचिरहयो । सोचे यदि मैलैशालुलाई एक बचन प्रेम गर्छु भनेको भए आज त्यौ दुदिन देख्नु पर्दैनथ्यो । अबकसरी पो उनको सम्झनालाई फयाँकैँ ? म नराम्रोसँग हारेँ । शालु, नराम्रोसँग..... । चिन्ताले गर्दा आकाशको भोक तिर्खा सबै हरायो । उनले आफनोभाग्यलाई बार-बार धिक्कारे ।बुक रुम पार्टनर अन्ना, प्रभा, दया केही बोल्न नसकी नुन खाएकोसर &#039;फोक्राइरहे । शालुले छरपष्ट भएको किताबहरू मिलाइन्‌ । किन-किन वकाई लागेजस्तो भयो । ओछ्यानमा पाल्टिन्‌ । आँखा लाग्न मात्र केलाएको थियो । आया दिदी आएर शालुलाई सार्जिकल बार्ड बेड नं. 5४ कोविरामीले बोलाएको कुरा बताइन्‌ । शालु हतार-हतार उठेर दौडिँदै सर्जिकलबार्डमा पुगिन्‌ । बेड नं. ८४ मा हेरिन्‌ आफूले चिनेको मान्छेझैँ लागेन र बेडनं. «४ मा सुकेको काठजस्तै नामको मानव आकृति थियो । शालुलै बैडनजिकैगएर हेरिन्‌ जिङ्ग्रङ्गग कपाल, भित्र गडेका आँखाहरू सिन्काजस्तै हात-खुट्टाशालु त्यो मानब आकृति देखेर डराइन्‌ पनि । शालु अलि हच्केको देखेर त्योकङ्गालभौँ आकृतिबाट आवाज आयौ, &#039;वसन शालु, बस ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले स्टुलमा बस्दै भनिन्‌, &#039;तपाईं को हो मैले चिनिनँ नि ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;म सब बताउँछु अनि चिनिहाल्छयौ नि, अब त तिम्रो पढाइ पनि सिद्धिनलाग्यो भन्दै थिइन्‌ रेष्मा ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले अलि खुसी हुँदै भनिन्‌, &#039;ए तपाईंले रेष्मालाई पनि चिन्नुभएको छ ?तपाईंको स्वास्थ्य बडो नाजुक देखिन्छ । । डाक्टरले बढी खोल्न मनाही तगरेको छैन ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भैगो मेरो चिन्ता नै नलेक तिमीले अझै पनि प्रेम गरेकी छैनौ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हरोइन तपाईं को हुनुहुन्छ ? मेरो सबै नालीबेली थाहा रहेछ । मैलै त प्रेमगरेकी थिइनँ तर मर्यादा ननाघी प्रेम गर्नेहरू पनि हुँदारहेछन्‌ भन्नेचाहिँ मैलेबुझेँ ।&#039; &#039;त्यसो भए उनी आकाश नै होलान्‌ होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिरामीको क्रा सुनेर शालु झन्‌ आश्चर्यमा परिन्‌ र भनिन्‌, &#039;भन्नोस्‌ हामीसबैलाई चिन्ने तपाईं को हुनुहुन्छ नत्र म क्रै गर्दिनँ,&#039; शालु उठिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बस न त्यसै नरिसाक, भोलि भनेको क्या हो बया हो कसो हो । तिमीसँगबेथा पोख्नका लागि त यो मेडिकल कलेजमा भनां भएकी नत्र यहाँ किनआउँदै । मैरो उत्तरको जवाफ नै दिइनौ त्यो युवक आकाश नै होलान्‌ होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले वस्दै भनिन्‌, &#039;तपाईंले ठीक नै सोच्नुभयो । आकाशको चरित्र पनिराम्रो छ तर मैले त फिरोज भन्नेको कुरा गरेकी । उनले मलाई माया गर्छन्‌भन्ने कुरा आजै थाहा पाएँ । हेर्नोस्‌, तर मलाई प्रेमको आभाससम्म छैन । अबविवाहपछि नै प्रेमको आभास हौला । तर, तपाइँ ... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;शालु अभौ चिनिनौ, चिन्थ्यौ पनि कसरी, म मौसमी हँ मौसमी ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले आत्तिँदै भनिन्‌, &#039;ओ, मौसमी तिमी, यौ हुनै सक्दैन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यति छिट्टै तिमी यो अवस्थामा पुग्यौ ? खोई मौसमी तिम्रो त्यौ झःफराउँदोरूप ? मैले त तिमीलाई भनेकै थिएँ । आशक्त अङ्गालोमा प्रेम हुँदैन भनेरतिमीले मानिनौ । तिमीलाई मौसमीभन्दा कसले पत्याउला ? तर, पीर नगरतिमीलाई सञ्चो भएपछि तिमी पुन: पहिलेकै मौसमी हुन्छयौँ । अव त तिमीलेदुनियाँ कस्तो छ देख्यौ, बुझौ होला । भन तिमी कसरी यस अवस्थामापुग्यौ । तिम्रो यो अवस्था देख्दा तिम्रो बाबुको के हाल भयो होला ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले गहभरि आँसु पार्दै भनिन्‌, &#039;शालु बाबुलाई त धेरै पहिल्यै खाइसके ।त्यसैले बाबुको पीर छैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन कसरी मर्नुभयो तिम्रो बावु ? देख्दा त हट्टाकट्टा नै हुनुहुन्थ्योहोइन र ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हो शालु, हट्टाकट्टा नै हनुहुन्थ्यौ । उहाँलाई मुदु दुख्नै व्यथा थियो । जचाउनकँलागि काठमाडौं पनि आउनुभएको थियो । म बैंसको उन्मादले र निमेषकोबनावटी मायाले कहीं कतै केही नदेख्ने भइसकेकी थिएँ । जचाउन आएकोबाबुलाई मेरौ अफिसबाट काजमा जानु छ, पछि आउनोस्‌ । दुख्दा मोज खानुहोला भनी ब्रुफिनको चाङ पठाइदिएकी थिएँ । काठमाडौंबाट पठाएको भोतिसहनै नसक्ने गरी मुटु दुखेछ । बानुले दुखाई कम गर्न थुप्नै औषधि खाएछन्‌ ।औषधि खाएपछि बेहोस भएछन्‌ । वेहोसको बेहोस नै भोलिपल्ट मरेछन्‌ ।यसरी मैले बाचुलाई खाएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;मौसमीको कुराले शालुको आँखा रसायो । शालु चुपचाप भइन्‌ । आँखामामौसमीको हट्टाकट्टा बाबु खुसी हुँदै क्याम्पसमा यताउता नियालेको याद आयो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले सम्झाइ्न्‌, &#039;नरौक शालु हुने हुनामी भइसक्यो । बाबु मेरो योरूप देख्नुभन्दा अगाडि नै मरे राम्रै भयो । उनले मेरो यो हालत देखेको भए ।झन्‌ कसरी आफूलाई सम्हाल्थे होला । उनलाई मारेर राम्रै गरिछु । अब मेरोपीरमा रुनै कोही छैनन्‌ । दाजुदिदीले त एडसरोगी घरमा वस्न पर्दैन भनीनिकालेर नै यहाँ आएकी हुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;तिमीलाई एद्दस छ ! त्यो कसरी ? निमेषले छोडेपछि पनि तिम्रो वुद्धिफर्केन मौसमी ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;निमेषले मलाई एक्कैचोटि कोठीमा लगेर छोडिदियो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन के भनेकी तिमीले क कारसम्म भएको ध्वनी युवक नै थियौ होइन र ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हो शालु क धनी त म जस्ता थुप्रै युवती बेचेर भएको रहेछ । पछि पोबुझेँ । डुङ्गा डुबिसकेपछि चेत आएर के लाग्यो र ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;तिमी पढेलेख्रेकी मान्छे, केही अन्दाजसम्म काटिनौ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले शालुको हात समातेर सिरानीको अडेसा लगाई वस्दै भनिन्‌,“शङ्का गर्ने त सात्तो आँखी झयालसम्म राखेनन्‌ चुतियाहरूले, म मात्र होरमसँग अरू पढेलेखेका दुई युवतीसमेत बेच्रिए । उनीहरू एड्स लागे पनि केहीहृष्टपृष्ट भएकाले अझै कोठीमा नै होलान्‌ । मलाई भने युवक वृद्धहरूलेपत्याउन छोडेपछि निक्लिन्न भन्दाभन्दै पनि निकालिदिए ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;तिमीहरू तीनैजनालाई निमेषले नै वेच्यो त ?&#039; शालुले प्रश्न गरिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले केहीबेर रोक्किएपछि पुनः ओठ खोलिन्‌, &#039;उनीहरूलाई पनि प्रेमीहरूलेनै बेचे । उनीहरूसँग हाम्रो भेट नगरकोटमा भएको थियो । उनीहरूको तीनवटाजोडी बुटवलबाट नगरकोट घुम्न भनी आएका रहेछन्‌ । हामी सबै उस्तैउस्तोकरा मिलिहाल्यो । हामी सबैले छ-सात दिन नै नगरकोट बसेर खुव रमाइलोगन्यौं । जय भन्ने एउटा साह्रै हँसाउने कवि थिए । उनकी प्रेमीका भने केहीउदास देखिन्थिन्‌ । उनको उदासपन देखेर हामीलाई अझै हाँस्ने बहाना मिल्थ्यो ।हामी कविलाई अलि हृष्टपुष्ट हुनुपत्यो भन्दै उल्याउँथ्यौं । कवि हाँस्दै धेरैखानेकुरा खान्थे । र, कुनै न कनै निता शुनाइहा ल्थै । नगरकोट गएको तेस्रोदिन हामीले साह्रै गिज्याएपछि कविले कविता भनेको अझै याद छ।&lt;br /&gt;
तपाईंहरू आज हाँस्तोस्‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोलि हाम्रो पालो&lt;br /&gt;
मेरी मैयाँलाई थाहा छैन&lt;br /&gt;
के मायाको जालो ।&lt;br /&gt;
बहमचारी बन्दा म&lt;br /&gt;
यिनलाई पप्यो गाह्रो ।&lt;br /&gt;
सबै टुद्दा यिनी जुदछिन्‌ ।&lt;br /&gt;
नभन्नोस्‌ आज साह्रो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसपछि निमेषलगायत हामी सवैको मुख रातोरातो भयो । कसैले केहीबोल्न सकेनौँ । कविले हामीलाई नराम्रो पर्ला भनेर करा मोडिहाले । हामीलेअझ केही दिन नगरकोट बस्ने इच्छा व्यक्त गरेपछि कवि बावु विरामी भएछन्‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भन्ने वहाना बनाई हामीसँग फुत्किएर बुटवल आए । हामी सारा संसार भुलेरएक-अर्काको बाहपासोमा रमाइरहयौं । नगरकौटमै हाम्रौ तीन गुप्रको अलइन्डियाटुरमा जाने योजना बन्यो । कविका प्रेमी-प्रेमिकाहरूलाई सम्झाएर लैजानेसल्लाह पनि गत्यौं। पछि निमेषहरूले कविको भित्री मनशाय बुझेछन्‌ ।कविको प्रेम वास्तव्रमै साँचो प्रेम हो भन्ने बुझेरै होला निमेषहरूले कविलाईआफ्‌संग नलैजाने सल्लाह गरे । हामी बैँसले कृत्कत्याएर आ-आफनो प्रेमीकोअङ्गालोमा मस्त हँदै इन्डियाको ट्रका लागि निस्कियौं । इन्डियाबाट फर्कनेवित्तिकैविवाहवन्धनमा वांधिने सल्लाह पनि भयो । हामी तीनैजना युवतीले विबाहभएको मीठो सपना पनि देख्यौं । दार्जिलिङ, आसाम, बर्साङदेखि आग्रासम्मकोयात्रा भयो । हाम्रो खुसीको कुनै ठेगान नैं थिएन । यहाँसम्म आएपछि मुम्बैकिन नजाने भन्ने कुरा भयो । हामी सल्लाहले नै मुम्बै पुग्यौं । मुम्बैको भव्यहोटलमा पुगेपछि हामी छ जनाले नै एउटै कोठामा डिनर गन्यौं । डिनरसँगैहिवस्की, बाण्डी सघ्वैँ पिइन्थ्यो । त्यो दिन पनि पिएर आ-आफनो प्रेमीकोकाखमा निर्धक्कसँग सुतेर जिस्किँदै भविष्यको मीठो सपना देख्दै थियौं । निमेपलेमलाई गालामा म्बाइँ खाँदै भन्यौ, “मेरी प्यारी, कृपया एकछिन काख छोड,हामीहरू सुत्ने रुमको व्यवस्था गरेर आउँछौं ।&#039; उनीहरू तीनैजना रुमकोव्यवस्था गरेर आउँछौँ भनी हिँडे । हामी तीनजना बचेखुचेको रक्सी पिएरमस्तले रमाइरहयौँ । साँझको आठ बजेतिर हामी त्यहाँ पुगेर डिनर गरेकाथियौं । उन्तीहरू रुम खोज्छौं भनी निस्किँदा करिव नौ, सवा नौ जति बजेकोथियो होला । उनीहरू एक घन्टासम्म नआउँदा त हामी त्यति अत्तिएनौँ ।बिस्तारै एक डेढ घन्टा जति समय बित्दै गयौ । त्यसपछि हामी डराउनथाल्यौं । यत्रो ठूलो होटल, उनीहरूले रुम पो विर्सेछन्‌ कि भनी हामी ढोकामापुगी ढोका खोल्न लाग्दा ढोका बन्द रहेछ । हामीले घन्टी बजाउन थालेपछिएउटा अधबैंसे आइमाईले भित्र पस्दै भनी, &#039;किन घन्टी बजाएको तिमीहरूले :तिमीहरूले आफनो लभरहरू खोजेको हो ?हामीले &#039;हो, उहाँहरू किन फर्कनुभएन&#039; भनेर सोध्यौं । त्यो आइमाईलेविदेशी भए पनि राम्रै नेपाली बुझने र बोल्न जान्ने रहिछै । उसले बडो मीठोहाँस्दै भनी, &#039;पीर नगर, हामी तिमीहरूका लागि घन्टा-घन्टामा छुट्टै-छुट्टै लभरहरूपठाइदिन्छौं । तिम्रा लभरहरू भने तिमीहरूलाई यहाँ बेचेर टाप कसिसकै ।तिमीहरूलाई यहाँसम्म ल्याउन उनीहरूको पनि धैरै पैसा खर्च भएछ । यसपालित्यति नाफा भएन भन्थ्यो निमेष ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसैको मेहरवानले गर्दा यो कोठी राम्रोसँग चलेको छ । मौसमी तिमी हैनौ ?तिम्रो फोटो त पहिले नै आएको हो, मोलमोलाई नमिलेपछि उसले ल्याउनैमानेन । तिम्रो कारणले म पनि अलि घाटामा नै गएकी छु । तर, केही छैन तिमीलेचाँडै नै पैसा उठाउँछयौ । तिम्रो फोटो बडेबडे खान्दानकोमा पुगेको छ ।&#039;आइमाईको कुरा सुनेर हामी थरथर काम्न थाल्यौँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले रिसाउँदै भनी, &#039;किन डराएका छौ : तिमीहरू कमारी केटी हौँ र?बडिया-बडिया खाना खान र बडिया-बडिया लोग्नेमान्छे पाइहाल्छौ ।&#039;&lt;br /&gt;
हामी तीनैजनाले रुँदै उसको पाउ समातेर भन्यौं, &#039;हामी यहाँ वस्दैनौं ।हामी तपाईंको पैसा जसरी पनि चुक्ता गर्छौं ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले सातो खाउँला जस्तै गरी रिसाउँदै भनी, &#039;चुप लाग्‌, गएर बस्‌ ।सबैलाई पहिलोपल्ट तह लगाउन गाह्रौ हुन्छ । हामीले भनेको चुपचाप मानेनौभने चुरोटको ठुटोले पोल्छौं । तातो फलामले पोल्छौं । त्यसपछि हामी वोल्नसकेनौं । तीनजनाले रोएरै त्यो रात कटायौं । भोलिपल्टदेखि हामीलाई छुट्टाछुट्टैकोठामा बन्द गरी धन्दा गर्ने लगाई । पहिला-पहिला त घेरै नाइँनास्ती गयौं ।तर, केही नचलेपछि बोल्नु वेकारझौँ लाग्यो । निमेषले नै धेरैको सङ्ख्यामा केटीबेचेको रहेछ । तिम्रो कुरा मानेकी भए आज यो दुर्दिन देख्न पर्दैनथ्यो । मतिमीलाई प्रत्येक दिन सम्झन्थेँ । पश्चात्ताप गर्दै रुन्थे । एड्स लागेर असक्तभएपछि बाईले गाउँमै जानु भनी पुग्ने बाटाखर्च दिएर पराई । म त्यो पापीनिमेषलाई जेल जाक्छु भनी सिधै काठमाडौँ आएँ । प्रहरी कार्यालयमा उसकोफोटो देखाएर सबै क्रा वताएँ । प्रहरी निरीक्षकले सिधै भने, &#039;तिमीहरूजस्तादुईपैसेलाई नबेचेर कसलाई बेच्छन्‌ त : तिमीहरूजस्ता दुई-चार अक्षरपढेलेखेकाहरूले आफनो मर्यादा विर्सेपछि नै यस्ता दलालहरूले मोटाउनेमौका पाएका छन्‌ । हामी त खोजखवर गरेर यहाँसम्म लेराइदिउँला । यहांलेराएको भोलिपल्ट नै यहांबाट निकाल्न बाध्य हनुपर्छ । उनीहरूको पहुँच धैरैमाथिसम्म हुन्छ । बरु सक्छ्यौ भने तिमी नै कूनै सजाय देक । जसले गर्दाउसले अरूलाई बेच्न नसकोस्‌ । त्यसपछि पुलिसले निमेषलाई जेलमा तकोच्यौ तर प्रहरीले भनेझैँ केही दिनमा नै जेलबाट निस्कियो पनि ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले मौसमीको कुरा बीचैमा काट्दै भनिन्‌, &#039;मौसमी, मलाई तिम्रो कुरासुन्न त कुनै आपत्ति छैन तर तिमीलाई चाहिँ ज्यादै गाह्रो भएजस्तो छ नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले फिस्स हाँस्दै भनिन्‌, &#039;शालु मलाई गाह्रो भएको छैन । म यो क्षणयतिविग्न खुसी छु कि क्रै छोड बरु मेरो कुरा सुन । म तिमीलाई पीडा बाडेरहलुको हन चाहन्छु&#039; भन्दै मौसमीले कुरा बढाइन्‌, &#039;आफनो साथमा केही पैसाभएको हँदा मलाई वस्न, खानचाहिँ गाह्रो भएन । एक मन लाग्यो वरु मछुँ तरभित्री आत्माले मर्न पनि मानेन । म यताउता भौँतारिँदै दिनहरू बिताइरहेकीथिएँ एक दिन न्यूरोडमा गहना पसलतिर जाँदै गरेको निमेष र एउटी युवतीलाईदेख । म उनीहरूको पछिपछि लागें । औंठी किनेर निस्केपछि निमेष युवतीलाईयहीँ बसिराख म मोटरसाइकल लिएर आउँछु भनी मोटरसाइकल पा्किङतिरलाग्यो । मैले त्यो युवतीलाई च्याप्प समातेर निमेषको फोटो देखाउँदै निमेषकोबारेमा मौटामोटी कुरा भने । युवती बडो बुझकी रहिछिन्‌ । मलाई धन्यवाददिँदै भनिन्‌, &#039;च्याङ्कयु म बच्चेँ । तपाईँ यही बस्नोस्‌ म केही बहानाले उसबाट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फृत्केर आउँछ । मेरो घरमा नै गएर सबै कुरा गरौंला भनिन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
म उनको विश्वास गरेर त्यहीँ बसेँ । नभन्दै उनी केहीबेरपछि नै आइन्‌ ।द्याक्सी लिई हामी उनको घर वौद्धतिर लाग्यौं । डोल्मा मगर जातकी रहिछन्‌ ।ट्याक्सीमा बसेपछि उनी केहीबेर बोल्न सकिनन्‌ । केहीवेरपछि मुटुमा गाँठोपार्दै भनिन्‌, &#039;दिदी तपाईंलाई नभेटेकी भए आज हामी डिनरको लागि होटेलसौल्टीमा जानै प्लान थियो । सहतै नसक्ने गरी पेट दुख्यो दयाक्सीमै घर जान्छुभोलि भेटौंला भनी फुत्किएर आएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले सोधेँ, &#039;तपाईंहरूको भेट कहिले कसरी भयो : शारीरिक सम्वन्ध भयोकि भएको छैत ?&#039; उत्ले आफतो भेट पच्चीस-तीस दितअगाडि बौद्धजयत्तीकोदिन बौद्धको गुम्बामा भएको र शारीरिक सम्बन्ध भने नभएको बताइन्‌ । कुरागर्दागर्दै हामी उनको घरमा पुग्यौँ । उनको बाबु-आमा आफनो पुर्ख्यौली घरधरान भएकोले उनी एक्लै रहिछिन्‌ । उनी पदाकन्या क्याम्पसमा बी.ए. पढ्दैरहिछिन्‌ । दुई फल्याट घर भाडामा दिएको रहेछ । खाना, डेरा वस्ने एउटीदिदीले पकाएर ल्याइदिइन्‌ । खाना खाएपछि मैले उनलाई आफनो सम्पूर्णकुराहरू एकएक गरी बताएँ । उनले मैरो सबै कुराहरू सुनित्‌ । त्यसपछिउनले एकएक गरी आफनो योजना सुनाइन्‌ । मैले उनको कुरा खुसी साथमञ्जुर गरेँ, हाम्रो सोजना बनिसकेपछि निमेषको फोत आयो । डोल्माले आफनोघरमा कोही नभएकोले भोलिको डिनर यहीँ गर्न आनुहोस्‌, मलाई अलि पेटदुखेकै छ भनिन्‌ । उसले डोल्माको कुरा खुसीसाथ स्वीकार गन्यो । राईकोछोरी हक्की र निहर स्वभावकी । त्यसमाथि मामा प्रहरी इन्स्पेक्टर रहेछन्‌ ।हामी भौलिको योजना सफल नै पार्ने प्रतीक्षा गरेर सुत्यौँ । यौजना सफल हुन्छकि हुँदैन भन्ने केही डर त थियो नै । भोलिपल्ट साँझ सात बजेतिर डोल्माआफैँ गएर निमेषलाई घरमा ल्याइन्‌ । उनीहरू कोठामै बसे, मैले खानेक्राओसार्नै काम गरेँ । डोल्मा राईकी छौरी, पहिलेदेखि नै पिउने भएकीले पिउनकुनै आपत्ति थिएन । निमेषले डोल्माको रूपको र आफूले किनिदिएको औंठीलाउँदा सुहाएको हातको प्रशंसा गयो । रक्सी लाग्दै गएपछि उनीहरू एक-अर्कासँग हात हालाहाला गरी चल्न थालै । रात पनि छिप्पँदै गयो । मैलेपूर्वपोजनाअनुसार मेन स्विचबाटै बत्ती अफ गरिदिएँ । वत्ती गएको चालपाएपछि निमैषले खुसी हुँदै भन्यो, &#039;डोल्मा बत्तीले पनि हाम्रो भावना बुझयो&#039;भन्दै नशामा ढुनमुनिँदै बेडमा पुग्यो र डोल्मा सुटुक्क कोठाबाट वाहिरिन्‌ । मडराउँदै बेडमा पुगें । उसलाई आफनो बसमा पारेँ । क नशामा डोल्मा-डोल्माभन्दै मग्न भयौ । बेलुका दुईपत्ट उसलाई बलात्कार गरेपछि मलाई आफूलेसंसारै जितेजस्तो लाग्यो । म त्यहीँ आनन्दले निदाएँछ्‌ । भोलिपल्ट बिहानडोल्मा-डोल्मा भन्दै छामेपछि म ब्युँझे । त्यो पापीलाई हेरेर हाँस्दै भने, &#039;निच,पापी, म मौसमी हँ । मौसमी आँखा खोल । हेर, मैले पनि तँ जस्तो निचलाईपतन गराएँ । तँलाई एड्स सारिदिएँ हो एड्स ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
का आत्तिँदै उठेर चिच्यायो, “तँ को होस्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
डोल्माले ढोका खोल्दै भनिन्‌, &#039;चिनिनस्‌ गधा उनी मौसमी हुन्‌ । तैँलेमुम्बईमा बैचेकी मौसमी । तैंले गर्दा उनलाई एड्स लागेको छ । त्यो एड्सतँलाई पनि उपहार दिन चाहिन्‌ । मैल्ले उनक्रो पूर्ण सहयोग गरेँ । तँजस्तापापीलाई यसरी नै मार्नुपर्छ बुझिस्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
निमेष मु्दाजस्तै भयो र डोल्माले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;अव खुरुक्क यो घरबाटनिस्की, नत्र पुलिस डाकेर जेलमा कोचिदिन्छु । बुझ असत्ती चोट आफूलाईपर्दा कति असैहय हुँदोरहेछ । अब केका लागि वेच्छस्‌ केटी, तेरो त मृत्युनिश्चित छ।&#039;&lt;br /&gt;
मैले थुक्दै गाली गरेपछि निमेषले रुँदै भन्यो, &#039;चुप लाग वेश्या, मैले तैरोबलात्कार गरेको हुँ ? म त्यस्ती केटीको खोजीमा थिएँ, जसलाई प्रेमको मूल्यथाहा होस्‌ । मैले तँ जस्तै पैसामा बिक्ने र यौवनकै माया गर्नेलाई वेचेँ त केपाप गरेँ हँ ? तैलेजस्तै अन्योलमा पारेर कसैको वलात्कार गरेको छैन । हो,डोल्मा म तिम्रो व्यबहार देखेर तिमीलाई साँच्चै माया गर्न लागिसकेको थिएँ,तिमीले पनि डिनरका लागि जान्छु भनेपछि म एकपल्ट रोएँ । तिमीले औँठीसहजै स्वीकार गौ । मैले बुझौं तिमी पनि सुनलाई प्रेम गछयौं । अझ के-केलाई प्रेम गर्थेक बुझन बाँकी नै थियो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डोल्माले भनिन्‌, &#039;तिमीले सोह्रैआना ठीक कुरा नगरे पनि केही हदसम्मठीक कुरा गन्यौ । चाहे जे होस्‌, तिमीले केटी बेच्नेचाहिँ नहुने थियो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले भने, “साले तैँले पनि त जीबनको सही अर्थ बुझाउन सक्थिस्‌ । जसरीकबिले आफूली प्रेमिकालाई बुझायो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमैषले आँसु पुछ्दै भन्यो, &#039;चुप लाग आफनै बाबुलाई मार्ने हत्यारा । तँजस्तालाई प्रेमको अर्थ बुझाउने ? कविले प्रेमीलाई नछुँदा क कति रिसाएकीथिई । तैँले आफनै आँखाले देखेकी होइनस्‌ : कवि युवतीलाई प्रेमको मूल्यबुझाउन होइन तिमी मेरो प्रेमी बन्न लायक छैनौ भन्न घर गए । पहिलोप्रेमीलाई पनि यौग्य नभएर कवि आफैँले छोडेका थिए । उनले तिमीहरूजस्ताको यौनइच्छा पूरा गरेनन्‌ । मैले पूरा गरे&#039; भन्दै निमेष रुँदै बाहिरियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले र डोल्माले मुखामुख गरी एक-अर्कालाई हेन्यौं । हामी दुवैलाई आफ्नैछायासँग केही मात्रामा घृणा लाग्यो नै । म त्यही क्षण डोल्माको घर छोडीगाउँतिर गएँ । गाउँमा एड्स लागेको थाहा पाएपछि सबैले छी:छी: र दुरदुरगरे । पछि काठमाडौं नै फर्किएँ । यहाँ आएपछि थाहा पाएँ, निमेषले विष सेवनगरी आत्महत्या गरेछ । म भने आत्महत्या गर्दिनँ । बरु बाँचुञ्जेल एड्सबारेमाचेतना फैलाउने काम गर्छु । धन्य तिमी, तिमीले फिरोजजस्तालाई नयाँ जन्मदियौ । मैले निमेषको दर्दनाक हत्या गरेँ ।&#039; मौसमीले सुँक्कसुँक्क गरी रुँदै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भनिन्‌, &#039;निमेषलाई मारेकोमा मलाई गर्वचाहिँ छैन । खासै पछुतो पनि छैन ।नढाँटी भन्दा मैले उसको बलात्कार गरेँ । उसले मेरो बलात्कार गरेकोचाहिँहोइन । तिमीसँग सम्पूर्ण क्राहरू गरी माफ माग्ने ठूलो इच्छा थियो । म तिम्रो,खोजीमा भौंतारिरहेकी थिएँ । अस्ति रोहिणी भनेर बोलाएको त रेष्मा पोरहिछिन्‌ । उनले तिमी यहाँ पढ्छयौ भनेपछि यहाँ आएकी हुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले मौसमीलाई मायालु पाराले हेर्दै भनिन्‌, &#039;घर जलेपछि इनार खन्नुकोऔचित्य छैन । तर तिमीले चार-छ जनालाई मात्र भए पनि बाटो देखाउनसक्यौ भने उनीहरू भयावह धापबाट मुक्ति पाउन सक्नेछन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म पनि त्यही सोच्दैछु । मैले तिम्रो निद्रा बिगारैं होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मौसमी, जाबो निद्राको चिन्ता नगर, तिमीले मलाई सम्झेर यहांसम्मआयौ । त्यो भन्दा ठूलो मेरा लागि केही छैन । ल अब जान्छु । मर्नु त एकदिनसबैले छँदैछ । ढिलो-चाँडो न हो । पीर नगर ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;मलाई मृत्युको पटक्कै चिन्ता छैन । मेरो पीरनगर ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु मौसमीसँग बिदा भएर सर्जिकल वार्डबाट बाहिरिन्‌ । मौसमीले एकोहोरोशालु गएतिर हेरिरहिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==तेईस==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्नले पढाइ सिध्याएर आएपछि रोहिणीको जीबनमा बसन्तको बहारआएझौं भयो । पीताम्बरा, कैशव, चन्द्रकान्त, कान्छी, शालु सबैसबै खुसीथिए । विवाहको दिन पनि तय गरियो । विबाहका लागि आमालाई लिएरआउँछु भनी गएको प्रशन्न नफर्केपछि सबैको मनमा सातो गयो । सवैले आ-आफनो अनुमान गरे । इन्जिनियरसम्म भइसकेको प्रशन्न एकैपल्ट दुलही लिनआउने सुर गरे होला । निम्ता बांड्नेदेखि लिएर विबाहको सम्पूर्ण तयारी भयो ।प्रशन्तको भने अत्तोपत्तो भएन । यता रोहिणीलगायत सबैको सातो गयो ।प्रशन्नको खोजखबर गर्दा प्रशन्न घरमा नै नपुगेको करा पत्ता लाग्यो । रोहिणीप्रशन्तको चिन्ताले गर्दा मूर्दामा परिणत भइन्‌ । छिमेकीहरूले काखी बजाउनेठाउँ पाए । रोहिणीको चरित्रमाथि आक्षेप लगाउँदै भने, &amp;quot;पहिले छाडा सांढेजस्तैछोडेका थिए, बल्ल चाल पाए । त्यो वूढी कन्यालाई इन्जिनियरजस्तो केटाले केविवाह गरोस्‌ ? बैंसलाई थेग्न नसकेर मोजमस्तीचाहिँ गन्यो, विबाहचाहिँ केगर्थ्यौ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युबाहरू रोहिणीको विवाह भएन भने आफूहरूले रोहिणीमाथिको अधिकारजमाउने कुरा गर्दै जुंगामा ताउ लगाउँथे । यसरी समाजले रोहिणीलाई पूर्ण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूपमा वेश्यामा परिणत गयो । रोहिणीका परिवारचाहिँ प्रशन्तमाथि कनैदुर्घटना नै भयो भन्ने पीरले व्याकुल भए । रोहिणीको हृदयमा लागैको आगोनिभाउन कसैले सकेनन्‌ । यता शालु रोहिणीको र सुजनको चिन्ताले विचलितभएपछि फिरोज पनि प्रशन्नको खोजीमा लागे । केही दिनमै फिरोजले वास्तविकतापत्ता लगाएरै छोडे । बास्तव्रिकताचाहिँ प्रशत्नले करोडपति सचिब तिरञ्जतकोबीसबर्षे पौडसी छोरी नर्मदासँग रोहिणीको बिबाह गर्ने भनेकै दिन बिबाह गरेरहनिमुन मनाएर पनि आइसकेछ । फिरोजको क्रा सुनेर केहीक्षण त शालुलेआफूलाई सम्हाल्नै सकिनन्‌ । रोहिणी र उसको उदार दिल भएका बाबुआमालाईप्रशन्नको वास्तविकता ओकेल्न तागत नभएपछि यो जिम्मा शालुले फिरोजलाईसुम्पिइन्‌ । फिरोजले वास्तविकता बताउँदा घरमा मान्छे मरेजस्तै रुवावासीभयो । रोहिणी मूर्छा परिन्‌ । डाक्टर आएर स्लाइनपानी दिएको दस-पन्धरमिनेटपछि रोहिणीको होस खुल्यो । होस खुलेपछि स्लाइनको तार चुतैर फयाँग्दैरोहिणी चिच्याउन थालिन्‌, &#039;पापी फिरोज तैँले झूट बोलिस्‌ । शालु तँ पनिपापिनी होस्‌ । प्रशन्त मलाई केबल मलाई मात्र प्रेम गर्छन्‌ बुझिस्‌ ? तिमीहरूलेत के स्वयम्‌ भगवान्‌ नै आएर प्रशन्नले तँलाई धोका दियो भने पनि मगत्याउँदिनँ । बरु भन्‌ मेरो प्रशन्नलाई के सङ्कट परेको छ : तेरो फिरोजजस्तोहोइन मेरो प्रशन्त क देबता हो देबता ... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रोहिणीको गालामा दुई &#039;फापड दिँदै भनिन्‌, &#039;चुप लाग सुंगुर्ती, कतिरेदछैस्‌ दैवजस्तो बाबु-आमालाई । तेरो तमासा हेर्न छिमेकीहरू बसिरहेकाछन्‌ । त्यसका लागि मर्ने चाहन्छेस्‌ होइन ? म तँलाई विष दिन्छु तँ मर । तेरोबाबु-आमाले तेरो यो हालत देख्न त पर्दैन । तँ जस्तो स्वार्थी बाच्नु व्यर्थ छ ।तैँले त कनाले त्यत्रो त्यागको बदला के दिइस्‌ ? केवल आँसु र जलनदिड्स्‌ गा&lt;br /&gt;
मेरो प्रशन्त मलाई छोड्न सक्दैनन्‌, मैले बुझ उसबाट मलाई छटाउनेषड्यन्त्र हो तिमीहरूको, क गरिब छ त के भो मन छ सँग । मलाई धनकोलालच छैन म अहिल्यै उसलाई भेद्छु हो अहिल्यै .. ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुलै भनिन्‌, &#039;रौहिणीलाई प्रशन्नको बास्तविक रूप देखाउनैपर्छ । उनीपागल हुन्छिन्‌ तर प्रशन्न नराम्री हो भन्ने क्रामा विश्वास गर्दिनन्‌ । समाजलेजे भनोस्‌ एकपल्ट रोहिणीलाई प्रशन्नसँग भेटाउनैपर्छ, ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुको कुरा सबैलाई ठीक लाग्यो । फिरोज रोहिणीलाई लिएर प्रशन्नबसेको भव्य महल कालिमाटीमा पुगे । कार रोकी घरमा कोही भएको-नभएकोकुरा बुझे । संयोग घरमा प्रशन्न मात्र रहेछ । फिरोजले रोहिणीलाई डोच्याउँदैप्रशन्तको कोठामा पुसाउँदा प्रशन्न झसङ्ग भएर उड्यो । रोहिणीले प्रशन्नलाईदेखेपछि गर्लम्म अङ्गालो हाल्दै भनिन्‌, &#039;प्रशन्त यिनीहरू सन &#039;फुटा हुन्‌ ।यिनीहरूले तिमीलँई पापी भने । प्रशन्न तिमी पापी होइनौ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्तले आफनो मजबुत हातले जवर्जस्ती रोहिणीलाई समातेर भुइँमापछादैं भन्यौ, &#039;ए, बूढीकन्या, तँ यहाँ किन ? तैले पढाउँदा लागेको दोब्बर पैसाभोलि नै म त्यरौ मुखमा फयाँक्छ । निस्की, निस्किहाल, के सम्झेर तँ यहाँआइस्‌ ? तेरो बैंस निखिसक्यो । तैँले मलाई पैसाले किन्न खोजेकी होइनस्‌ ?&#039;अब गाडावालालाई किनेर विवाह गर, नत्र अरूले पत्याउंदैनन्‌ । हेर मेरीप्यारीको तस्बिर भन्दै स्वास्नीको फोटो रोहिणीको आँखामा तेर्स्यायो र रोहिणीलाईघिसारेर ढोकाबाहिर फयाँक्दै फिरौजतिर हेर्दै भन्यो, &#039;तैँले किन यस वेश्यालाईयहाँ ल्याइस्‌ हँ ? यो कोठीको मात्र रौनक बन्न सक्छै । घरको रौनक बन्नसक्दिन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले रोहिणीलाई उठाउँदै भने, &#039;रोहिणीजस्तीको प्रेमलाई लत्याएकोछस्‌ । तँ कुनै दिन घरको न घाटको हुन्छस्‌ ।&#039;&#039;जञा-जा तँ नै विबाह गर यसलाई बडो गाली गर्दोरहेछ साले ... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले मूर्दाजस्तै भएकी रोहिणीलाई डौच्याउँदै कारमा हालै । रोहिणीलाईविश्वास नै लागेन कि मान्छे त्यति धेरै गिर्छ । रोहिणीको आँखामा प्रशन्न,बेहोस भएको दृश्य, उसको कोठाको दृश्य, आफूलाई घिसारेको दृश्य आँखामाएकपछि अर्को गर्दै नाचिरहयो । यता घरमा सबैज्ञना रोहिणी र फिरोज आउनेप्रतीक्षामा थिए । रोहिणी र फिरोज आएपछि शालुले डोच्याएर कोठामा लगिन्‌ ।रोहिणीलाई तकियामा अडेस लगाउन लगाई ओठल्लयानमा बसाइन्‌ । रोहिणीलेसबैलाई एक-एक गरी हेरेर बर्बर आँसु झारिन्‌ । शालुले आँसु पुर्छिदिँदै भनिन्‌,&#039;रोहिणी किन रुन्छेस्‌ भन्‌ त ? हामी सबैलाई हेर । हामी सबै तेरो खुसीकालागि जे पनि गर्ने तयार छौं । भन अव हामीले के गर्नुपन्यो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले आँसु पुछ्दै भनिन्‌, &#039;शालु त कति महान्‌ छेस्‌ । त्यसैले त सबैकोप्रिय छेस्‌ । तँलाई मैले त्यत्रो गाली गरेँ, तैँले त्यो पनि विर्सिस्‌ ? आज मलाईथाहा भयो । मेरो स्वयम्बर तैंले नै रोकेकी होस्‌ । तँ मलाई हरबाघाबाट मुक्तिगराउन चाहन्थिस्‌ । तर, मैले तँलाई के-के सोचेँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केशवले आँखाको आँसु पुछ्दै भने, &#039;तिमीले ठीक भन्यौ छोरी, तिम्रो स्वयम्बररोक्ने कुरा शालुले नै गरेकी थिइन्‌ । अझ स्वयम्बर भइसकेको भए योसमाजले के भन्थ्यो होला । यो कुरा मलाई र शालुलाई मात्र वाहा छ । अब जेहुनु भैगो पीर नगर ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले जुस ल्याएर दिँदै भनिन्‌, &#039;अब बिस्तारै जुस खा । तिमी धेरैथाकेकी छयौ । हामी एक भयौं भने जस्तोसुकै बिकराल हुरीको पनि सामनागर्न सम्छौं । तिमीले हिम्मत हान्यौ भने हामी सबै टुदछौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले गहभरि आँसु पार्दै भनिन्‌, &#039;अब म हिम्मत हार्दिनँ शालु, ममी,बाबा, दिदी, दाइ, तँ कसैले पनि मेरो पीर गर्नुपर्दैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीको कुरा सुनेर सबैको मुख उज्याले भयो । शालु र फिरोजलाई नैसबैले धन्यवाद दिए । मोनाले सबैलाई च्रिया बाँड्दै भनिन्‌, &#039;शालु दिदी, मैलेपत्ति कान्छीदिदीले जस्तै गरेँ नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन के कान्छी दिदीजस्तो गज्यौ ? मैले त कुरा नै बुझिनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;मैले आफनो छौराछोरीको नाम तपाईंकै नामबाटराखेँ, सागर संकिना ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाको क्रा सुनेर सबैजना हाँसे । म पनि तैरै नामबाट ..... । भन्दाभन्दैरोहिणीको आबाज बीचैमा रोकियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीको क्राले सबैको आँखामा आँसु भरियो । कोठामा केहीबेर सन्नाटाछायो । कान्छीदिदीले क्रा मोडिन्‌, &#039;आजचाहिँ म रोहिणी मैयाँसापलाई मनपर्नेखाना बनाउंछु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीको कराले रोहिणीले सबै करा बिर्सेर हाँस्दै भनिन्‌, “मैले शालुको डाहगर्छु भनेर होला भो-भो गर्दिनँ । शालुलाई मन पर्ने चिज नै बनाउनुहोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले घडी हेर्दै भनिन्‌, &#039;ल दिदी यही कालीलाई मनपर्ने चिज नै बनाउनुहोस्‌ । म जान्छु पनि, सुजनको कुरा हामी सबैलाई थाहा नै छ । अस्तिदेखिअलि चाँडो घर आउन थालेका छन्‌ । म घरमा भइनँ भने उनी झन्‌ मनोमानीगर्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबैले शालुलाई घर जान आग्रह गरे । शालु र फिरोज बिदा भएर आफूनो-आफनो घरतर्फ लागे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीको केही परिवर्तित व्यवहारले रोहिणीको परिवार त केही खुसी भयोतर रोहिणी प्रशन्नले हानेको बञ्जको चोट सम्झँदा क्षण-क्षणमा रन्धनिन्थिइन्‌ ।त्यसमाथि समाजले रोहिणीको परिवारको खोइरो खन्न कनै कसर बाँकी राखेन ।भन्थे, &#039;बुढेसकालमा छौरी पाएँ भनेर मैमत्त भएका थिए । छोरीले नाकमा दिसालगाई हाली । रोहिणीजस्ती सन्तान जन्मतुभन्दा त नजन्मिदिएको भए हाइसन्चौहुन्थ्यो । आज यो दिन देख्न पर्दैनथ्यो । कतिबटा बच्चा फयाँकी कुन्नि ? अवकसले बिवाह गर्छ, त्यस्तालाई । छौरो नभएको घर बूढीकन्या बस्ने भई, राम्रैभयो।&#039;&lt;br /&gt;
कोही छिमेकी सद्भावना देखाउँदै स्वास्नी मरेको, छोराछोरी भएकाहरूकोकुरा लिएर आई भन्थे, हेर्नोस्‌ माटाको भाँडो फुटेपछि फुदयो-फुदपो । फलानोस्वास्नी मरेकोले त्यस्तै केटी भए पनि हुन्छ भनेको छ । थपक्क आँखा चिम्लेरदिनोस्‌ । त्यही पनि गुम्यो भने फेरि झन्‌ फसाद पर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कोही विवाह गरेर छोराछोरी नभएकाहरूको कुरा लिएर आई भन्थये- &#039;फलानालेबिवाह गरेको बीस वर्ष हुँदा पनि बच्चा भएन रै । रोहिणीले बच्चा फयाँकेकी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुनाले उनीबाट बच्चा हुन्छ भन्नै निश्चय छ, त्यसैले मार रोहिणीलाई माग्नपठाएका छन्‌ । दिनोस्‌, रोहिणीको भाग्य वन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
युवाहरू रोहिणीको घरनजिकै आएपछि यस्ता गीतहरू गाउँदै हिँड्थे ।गेट खुल्लै राख मैयाँ&lt;br /&gt;
भयाल खुल्लै राख&lt;br /&gt;
अरूलाई डाकेजस्तै&lt;br /&gt;
हामीलाई पति डाक&lt;br /&gt;
हौ .. हो हामीलाई पनि डाक ।&lt;br /&gt;
ओरालो लागेको मृगलाई बाच्छाले पनि खेद्छ भनेझैँ रोहिणीको आदर्शपरिवारलाई टिक्नै नसक्ने गरी बद्नाम गरे । रोहिणीको परिबार चुपचाप सवैघृणा पिउन विबश भए । सबैको दुर्बाच्य सुन्न नसकेपछि एक दिन केशवलेकान्छीसँग रुँदै भने, &#039;कान्छी, अव हामी यो समाजमा बाँच्न सक्दैनौं । हामीपलपल मर्नु साटो एकैपल्ट मछौं । हामी चारजना सुतेको बेला घरमा आगोलगाइदेङ, तिमीलाई धर्म हुन्छ । अब यो समाजले रोहिणी र रेष्माको विवाहहुन दिँदैनन्‌ । उनीहरूको आँसु पनि कति हेर्नु ?&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीले सम्झाइन्‌, &#039;बावा हजुरजस्तो मान्छेले यस्तो भन्त सुहाउँदैन ।कालो रात सधैँ रहँदैन । म शालु मैयाँसँग सल्लाह गर्छु, केही उपाय निस्कन्छकि।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कंशवले सुस्केरा हाल्दै भने, &#039;त्यो फूलजस्ती बच्चीलाई कति चोट दिनु ?सुजनको पीरले जलेको बेला ।&#039;&lt;br /&gt;
&amp;quot;सुजनमा धेरै परिवर्तन आइसक्यो रे पीर गर्नुपर्दैन भन्दै होइसिन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमीले पीर गर्छर्यौ भनेर ढाँटिन्‌ होला । कै परिवर्तन हुन्थ्यो यति छिटो,हुन्देक शालुलाई केही नभन&#039; भन्दै केशव कोठाभित्र पसे ।&lt;br /&gt;
कान्छी केशाबको कुरा सुनेपछि झसङ्ग भइन्‌ र सोचिन्‌- उफ ! मैले पनिउहाँको बानी भुलेछु । मलाई चोट पर्छ भनेरै उहाँले ढाँद्नुभएको हो । कान्छीगर्दागर्दैको काम छोडेर कपडा पति नफेरी कृपण्डोल पुगिन्‌ । मनमा पीर भएरहोला उनलाई कसैको डर लागेन । शालु र सुजनको मात्र माया लाग्यो ।कान्छी सरासर भित्र पसिन्‌ । बिहानको समय उनले समय पनि भुलिछिन्‌ ।उर्मीलालाई देखेपछि पो &#039;झस्किन्‌ र बरण्डामै रोक्किइन्‌ ।&lt;br /&gt;
उमिंलाले हात जोड्दै भनिन्‌, &#039;कान्छी तिमी आयौ अब यो घर छोडेर कहीँनजाक, हामी बर्बाद भयौं कान्छी बर्बाद ... ।&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीको नाम सुन्नेबित्तिकै दीपक पनि हतारहतार औछ्लयानबाट उठेर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आई हात जौडदै भने, &#039;कान्छी तिमी फर्कियौ ? बिन्ती तिमी अब यहाँबाटनजाक । पहिलेको जस्तै यो घरलाई मन्दिर बना ।&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीले उनीहरूको कुराको जवाफ नै नदिई भनिन्‌, &#039;म यहाँ सुजनबावुलाईहेर्ने आएकी हुँ ।&#039; उर्मिलाले नम्र स्वरमा भनिन्‌, &#039;शालु आजकाल सुजनकैकोठामा सुत्छित्‌ । तिमी नजाक है कान्छी यहीँ वस ।&#039;&lt;br /&gt;
उर्मिलाको करा नसुनी कान्छी सुजनको कोठामा पसिन्‌ । कान्छीलाई देखेपछिशाल्‌ अलि डराइन्‌ । कान्छीले भनिन्‌, &#039;भो नडराइस्यो । कस्तो छ सुजनबाबुलाई :&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीलाई आफनो कोठामा लगेर भनिन्‌, &#039;हेर, कपडा पनि नफेरीआउनुभएको । दिदी त्यो लत छुटाउन त साह्रै गाह्रो हुँदोरहेछ । डुक्स नखाएपछिहातखुट्टा थरथर काम्ने रहेछन्‌ । उनी रातभरि छट्पटाएर निदाउन सकेनन्‌ ।अहिले एकैछिन भयो निदाएका । भन्नोस्‌ रोहिणीलाई कस्तो छ !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणी मैयाँको कुरा छोडिस्यो । सुजनबावुको मनमा म खराब बाटोमाहिँडेको रहेछु भन्ने चैत आयो कि आएन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;आयौ दिदी आयो । उनी आफूलाई नियन्त्रण गर्न सक्दो कोसिस पनिगर्दैछन्‌ । उनको अवस्था देख्दा त मलाई नै डर लाग्छ । कत्मना गर्नौस्‌,फिरोजले ड्रक्स र युवती एक्कँपल्ट कसरी छोडे होला !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गाँगा भन्नुहुन्थ्यो, &#039;फिरोज छटपटाउन थाल्दा हजुरको तस्बिरलाई छातीमाराखैर मुद्ठी बाँध्नुहुन्थ्यो रे, कहिले ओठ टोकेर रगत निकाल्नुहुन्थ्यो रे, कहिलेहात टोकेर आफूलाई सम्हाल्नुहुन्थ्यो रे, कहिले हजुरको आर्ट गदै बस्नुहुन्थ्योरे॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;शालुले भावविभोर भएर भनिन्‌- &#039;दिदी, सुजन र रोहिणीको समस्या समाधानभए हामी कति खुसी हन्थ्यौँ हगि ?&#039; दिदी फिरोज, तपाईंले कथामा भनेकोराजकमारजस्तै छन्‌ । तपाईंले त पहिल्यै फिरोज सफ्रिन्छ भन्ने थाहा पाउनुभएकोरहेछ । मलाईचाहिँ किन केही नभन्नुभएकौ ? फिरोजले तिम्रो दिदीले खोजेकोराजकुमार मै हुँ भन्दा म त हेरेको हेरै भएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“वाहा थियो मैयाँसाप, राम्रै थाहा थियो । त्यसैले राजकुमार खोज्ने कुरा गरेकि नि ।&#039; कुरा गर्दागर्दै उर्मिलाले चिया र दूध लिएर भित्र पस्दै भनिन्‌, &#039;कान्छीचिया लेक ।&#039; शालुतिर हेर्दै भनिन्‌, &#039;शालु अब दिदीलाई तपदाङ है । कान्छीयहीँ बस्छिन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले हांस्दै भनिन्‌, &#039;के भनिस्या ममी हजुरले, दिदी यहीँ वस्ने रे?दिदीको स्वगंजस्तै परिबार छ । दुईवटा छौरा, लोग्ने सासूससुरा, चन्द सबैसवैछन्‌ । दिदीलाई त्यो घरमा सबैले आफनै मुटुजस्तै गर्छन्‌ । दिदीको छुट्टैसिनामंगलमा दुईतले घर छ । रोहिणीको बाबाले सुजनलाई सञ्चो छैन भनेपछि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुजनको मायाले कपडा नै नफेरी यहाँ आउनुभएको हा । दिदीको आफनैट्याक्सी छ । देवर-देउरानी सबै-सबै छन्‌ दिदीको ।&#039; उामेलाले शिर झुकाएरभनिन्‌, &#039;सुजनले नशाको सुरमा भन्न त भनेका थिए । दिदीको घर छ भनेर .. ।राम्रै भयो तिमीले यहाँ साह्रै दुःख पाएकी थियौँ । पापले डुबाउँछ, धर्मलेउठाउँछ भन्ने कुरा सोच्न सक्किएन । नभन्दै साँचो रहेछ । बच्चाहरू कव्रा-कवाछन्‌ नि?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठूलो त अठार वर्षका भए । होटेल मेनेजमेन्ट पढ्दैछन्‌ । कान्छा सातवर्षका भए । तीन क्लासमा पढ्दैछन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“सौझोको साथ दैव भन्छन्‌ । त्यसैले तिम्रो राम्रो भयो । तिमी यहाँ आउँदैगर, हाम्रो भूललाई माफ गर ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन मैयाँसाप त्यसो नभनिस्यो । सँगै वस्दा सानोतिनो गल्ती भइहाल्छ ।&#039;उमिंला आफूले गरेको अत्याचार सम्झेर वोल्न नसकी कोठाबाट बाहिरिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“दिदी ममीपापा आफूले खनेको खाल्डोमा आफैँ परेपछि बल्ल चेत्नुभएकोछ । आजकाल घरमा रक्सीको गन्ध छैन । उहाँहरूको शिर झुकेको छ,&#039; शालुलेभनिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले थाहा पाएं, अघि नै दुबैले मसँग माफी मागेर हात जोडिस्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यसो भए दिदी कहिलेकाहीँचाहिँ आउँदै गर्नुहोस्‌ । भन्नोस्‌ न दिदी रोहिणीकोकै हाल छ ? सुजनको पीरले कहीँ जान मन लाग्दैन । अस्पतालबाट सिधै घरआउँछु ।&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीले विहान केशबले भनेको क्रा जस्ताको तस्तै भनिन्‌ । छिमेकीहरूलेओकल्ने गरेको दुर्वाच्य शव्दहरूका बारेमा बताइन्‌ । दिदीको कुरा सुन्दा शालुलाईज्यादै नमज्जा लाग्यो । सृजन उठेको थाहा पाएपछि दुबै सृजतको कोठमापुगे । सुजनले कान्छीलाई देखेपछि अड्दगालो हालेर रुँदै भने, &#039;दिदी तपाईं यहाँभएको भए म विंग्रिन पाउंदैन ये । दिदी म चाहेर पनि सम्हालिन सकेको छैन ।बस मर्ने सजिलो होला तर नशा ... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुजनको कराले कान्छी र शालुकै आँखाबाट आँसु &#039;फत्यो । कान्छीले सुजनलाईपलङमा वसाएर मायालु पाराले कपाल मसादै भनिन्‌, &#039;तपाईंलाई सन्चो नभईकनम यहाँबाट जान्न । मोनालाई फोन गरेर हाम्रो घरमा जानु भन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिदीको कुराले शालु र सुजन खुसी भए । सुजनले दिदीको गालामा म्वाइखाँदै भने, &#039;म दिदीकै हातबाट वनाएको खानेक्रा खान्छु । बच्चामा सुतेजस्तैगरी दिदीको काखमा सृत्छ्नु ।&#039; कान्छीले रुँदै भनिन्‌, &#039;म हजुरको सम्पूर्ण इच्छापूरा गर्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिदीको कूरा सुनेर शालु र सुजन खुसी हुँदै हाँसे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==चौबीस==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हेलो, मुमा नमस्कार&#039; &#039;ओ शालु नाती भाग्यमानी भए । के छ, बा हालखबर ?ठीकै छयौ हेन ? सुजनलाई कस्तो छ ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;ठीक छु मुमा, अहिले सुजनको कुलत छुटाउन दिदीहरू सबैजना यतैबस्नुभएको छ । सुजनले लक्ष्य प्राप्त नगरेसम्म दिदीहरू यहाँबाट जानुहुन्त रे ।मुमा, मलाई अब सुजनको कुनै चिन्ता छैन । दिदीले सुताउनुहुन्छ, दिदीलेउठाउनुहन्छ । दिदीले नै खुवाउनुहुन्छ । सुजनलाई सानैदेखि गीत-सङ्गीत मनपर्ने भएकोले फुर्सदको समयमा सङ्गीत सिक्‌न्‌ भनेर सङ्गीत टिचर राख्नैसल्लाह भइरहेको छ ।&#039;&lt;br /&gt;
“नानु, त्यस भए तिमी सधैँको लागि यहाँ आए हुन्न र?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले अनकनाउँदै भनिन्‌, &#039;दिदीको पनि त्यही इच्छा छ । शायद दिदीआज त्यहीँ आउनुहुन्छ होला :&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गंगाले हाँस्दै भनिन्‌, “ल.. ल अब हाम्रो घर पनि स्वर्ग हुने भयो । साह्रैखुसीको कुरा सुनायौ । फोन फिरोजलाई दिउँ । उनी पनि साह्रै खुसी हुन्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;क्ैगो फोन दिनुपर्दैन दुई बजेतिर कान्ति अस्पतामै जानु भनिदिसेला । अरूकुराहरू पनि गर्नुछ । हस्‌ फोन राख्छु पनि नमस्कार ।&#039;&lt;br /&gt;
गंगाले नमस्कार भन्दै फोन राखिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्ति अस्पतालको चौरमा बसिरहेका फिरोजसामु पुगी शालुले बस्दैभनिन्‌, &#039;वस्दाबस्दा तपाईँलाई कहिल्यै पट्यार लाग्दैन हगि ? मैले हजुरलाईएक बजे होइन । दुई बजे यहाँ बोलाएकी थिएँ । ड्युटी गर्दागर्दै यसो हेरेकोदसुम्क चौरमा बसेको देख्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले हाँस्दै शालुतिर हेरेर भने, &#039;यो अस्पतालको भित्ताभित्तामा तिमीलाईदेखेर तिमीसँगै मौन वार्ता गरिरहेको थिएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले भनिन्‌, &#039;माया पनि ठिक्क गर्नुपर्छ रे, अति धैरै माया गन्यो भौ चाँडैबिछोड हन्छ रे, म चाँडै आकाशमा गएँ भने नि !&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले रिसाउँदै भने, &#039;त्यस्तो अपशब्द मुखबाट निकाल्दै ननिकाल ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले हाँस्दै मनिन्‌, हेर, हेर रिसाएको, रिसाउँदा त झनै सुहाउँदो पोरहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले हाँस्दै भने, &#039;शालु तिमी पनि, ल भन, विशेष कुरा केही छकि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“भरे घरमा गएर सुन्ने कि मेरै मुखबाट सुन्ने ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;तिम्रै मुखबाट सुन्ने छिटो भनन शालु करा केहो?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शानुले भनित्‌, &#039;दिदीले भन्नुभएको हाम्रो बिह गर्ने उमेर भयो रे ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;त्यो त मलाई पनि थाहा छ नि, कै नौलो क्रा भयो, सुजनलै लक्ष्य प्राप्तिनगरी रोहिणीले विबाह नगरी हाम्रो पालो आउँदैन क्यारे ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;तपाईं पूरा क्रा नसुनी वीचमा प्याच्च बोल्नुहुन्छ । । विचरी दिदी हाम्रोखुसीका लागि हरपीडाहरू सहनुहुन्छ । दिदीहरू हाम्रै घरमा आइसक्नुभयो ।रोहिणीको घरमा मोना र रोमाकान्त दाइ हुनुहुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;उनीहरूलाई विपत परेको बेला दिदी यता आउँदा केही भन्नुभएन ?&#039;&#039;दिदीले नै सबैलाई सम्हाल्नुभएको थियो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;सबै विपत टरिसक्यो । सबैको सल्लाहले नै दिदी यहाँ आउनुभएको हो ।थाहा छ रोहिणीको विवाह हँदैछ । डा. आकाशसँग, तपाईंले चिन्नुभएको छैन ।डा. आकाश बस्न्यात । हामीसँगै पढेका हुन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले अत्तिँदै भने, &#039;को आकाश बस्न्यातको करा गरेकी ? कतै बाबु-आमा अमेरिकामा भएको आकाशको त कुरा गरेकी होइनौ :&#039;&lt;br /&gt;
“ला कसरी चिन्नुभयो तपाईंले ? हो, त्यही आकाश त हुन्‌ नि ! रोहिणीकोपरिवार र स्वयम्‌ रोहिणी पनि साह्रै खुसी छिन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजलै भने, &#039;शालु तिमी होसमा त छ्यौ ! आकाशको क्रा तिमीलाईथाहा नै रहेनछ क्यार, आकाश मैरौ कान्छी फफको भान्जा हुन्‌ । उनी कसरीरोहिणीसँग विवाह गर्न सक्छन्‌ ? तिमी फझुक्कियी 1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;फिरोज म होइन तपाईं नै झुक्किनुभयो । आकाशलाई रोहिणीका लागिप्रस्ताप राख्नै त मै हुँ। ल भन्तोस्‌ को होसमा छैन ? मैलै आकाशलाईरोहिणीको जीवनमा घटैका सबै घटना सुनाएँ । रोहिणीको बाबाले समाजकोघृणा सहन नसकेर दिदीसँग भन्तुभएछ, &#039;कान्छी हामी चारजना सुतेपछि घरमाआगौ लगाइदैक । सबैले घर जलेर मन्यौ भन्छन्‌ । हामीलाई पनि शान्तिमिल्छ ।&#039; दिदीको कुरा सुनेर म धेरै दिन बिचलित भएँ, भट्ट आकाशलाईसम्झेर आकाशको मामाघरमा पुगेँ । सबै करा जस्ताको जस्तै आकाशलाईसुनाउँदै रोएँ । आकाशले भने, &#039;शालु तिमी नरोक, म तिम्रो खुसीका लागि जेगर्न पनि तयार छु । उनलै मैरो एउटा पनि करा काटेनन्‌ । विवाह गर्ने कुरापक्का भयो । रोहिणीको डाक्टरसँग विवाह हुँ हुँदैछ भन्ने सुनेपछि रोहिणीलाईवेश्या भन्ने छिमेकीहरू शिर &#039;झकाई हिँड्छन्‌ रे । झन्‌ आकाशलाई देखेपछि केगर्लान्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुको कुराले फिरोजको मुटु फुट्लाजस्तो भयो । कानमा केही वर्षअगाडिफुपूले भनेको शब्दहरू नै ओहौर-दौहोर गच्यो । आज ज्वाइँ अमेरिकाबाट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बना&lt;br /&gt;
काठमाडौं आउँदै हुनुहुन्छ । आकाशलाई अमेरिका जाकै भनी फकाउन आउनेत होला, तर के जान मान्थे आकाश ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो प्रश्न थियो, &#039;किन फुपू आकाश अमेरिका नगई यहाँ बसेको ! बाबुआमासबै छोडेर ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;बाबु तिमीले शालुलाई प्रेम गरेजस्तै उनी पनि कसैलाई प्रेम गर्छन्‌ ।मलाई सबै थाहा छ । भन्न त माइजूको मायाले बसेको भन्छन्‌ तर भित्री कराअर्कै छ । उनले स्कुलमा पढ्दादेखि नै कसैलाई मन पराएका छन्‌ । उनैकोमायाले यहां बसेका हुन्‌ । सबै क्राहरू सम्झेर फिरोज पागलजस्तै भए ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म खुसीका कुराहरू गर्दैछु, तपाईं किन चुपचाप हुनुभयो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले बनावढी हाँसो हाँस्दै भने, &#039;शालु म घेरै खुसी छु। घाममाबसेकोले होला टाउको पनि दुख्न लागेजस्तो छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ त्यसौ भए घरमा गएर आराम गर्नोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;फिरोज बोल्न पनि नसकी हाँसेजस्तो गरी शालुसँग बिदा भए । शालुअस्पतालभिव्र गइन्‌ । फिरोज वाण लागेको सिंहझैँ छटपछाउँदै फुपूको घरमापुगी । सिधै आकाशकी कोठामा पसे । कोही आएको चालपछि आकाशले तान्दैगरेको चुरोटलाई थाहा नपाउन्‌ भनेर हातले किचिमिची पारेर आत्तिँदै भने,&#039;फिरोज कतै पश्चिमबाट घाम त फल्केन ? कसरी यहाँ आयौँ : तिमीनआएको दुई-चार वर्ष नै हुन लागिसक्यो, बसन के छ खवर ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;फिरोजले आँसु झार्दै भने, हेरन पानीमाथिको ओभानो बनेको, तिमीलाईमेरो हालखबर वाहै छैन !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यार, तिमी कहिल्मै आउने भए पो हालखबर थाहा हुन्छ । तिमी इन्जिनियरबन्यौ रे भन्नेचाहिँ सुनेको हुँ । मेरो खुसीको कुरा सुन्छौ भने म बिवाह गर्दैछु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले आँखा ओभानो पार्दै भने, &#039;आक्राश, यो के गज्यौ तिमीले ? केगन्यौ ? तिमी डाक्टर मान्छेले चुरोट पिउन थाल्यौँ ? हेर, अहिलेसम्म केहीबिग्रिएको छैन । तिमी शालुसँग विवाह गर । तर यसरी जीवत बर्बाद नगर ।शालु तिम्ै निम्ति जन्मेकी हुन्‌ । शालुलाई तिमीजस्तै आदर्श पति चाहिन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;मार तिमी किन यहाँ आयौ भनेको त त्यो पोक्चीको पो कुरा गर्न आएको ?त्यस्ता सयौं पोक्चीलाई म औंलामा नचाउन सक्छु बुझ्यौ !?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;कुरो र कुलो त जता लगे पनि जान्छ तर तिम्रो आँखाको भाबलाई म केसंज्ञा दिकै र चुरोट पिउनुको रहस्य म के बुझौं ? तिमीले सयौँ शालुहरूभेट्वाउँथ्यौ भने रोहिणीसँग किन विबाह गर्न लाग्यौ ?&#039; आकाशले चुरोट किच्रिमिच्ीपारी कागजमा राख्दै भने, &#039;तिमी पत्रकार हौ कि क्या हो, तिमीलाई सबै कुराभन्नुपर्ने ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;तिमीलै भन या नभन मैले सबै कुरा बुझिसके । तिमी शालुको पीडा देख्नसक्दैनौ । शालु रोहिणीको पीरले चिन्तित भएको देखेपछि तिमीले रोहिणीसंगविवाह गर्ने कुरा स्वीकार गथ्यौ । यही नै साँचो हो आकाश, यही नै साँचो हो ।तिमी र शालु पढेको स्कुल एउटै हो, फपू भन्नुहुन्थ्यो तिमीले महारागञ्जमानाम निकालेका थियौ रे, त्यहाँ किन नपढेको तिमी ? शालुका लागि तिमीलेधेरै त्याग गरेका छौ । त्यतिमात्र होइन, सम्पूर्ण आफन्त छोड्यौ । यहाँसम्म किआफूनी मायालु आमासम्मलाई छोड्यौ । तिम्री आमाले त आकाश यहीँ बस्छन्‌भने म पनि यहीँ बस्छु भन्नुभएको थियौ रे ।&#039; यी पनि &#039;फुटो हुन्‌ त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“चुप लाग फिरोज, अतीत कोट्याएर बलेको आगोमा घ्यू नथप । जोडीभगवानले नै बनाएर पठाउँछन्‌ रे । नत्र तिम्रो भेट कसरी शालुसँग हुन्थ्यो ?तिमी त सयौंको बाहुमा झूलेको मान्छे । शालुलाई देखेपछि किन मोहितभयौ : डृक्स युवतीहरूले तिमीलाई तान्त सकेनन्‌ किन ? माइजू भन्नुहुन्थ्यो-भान्जाबाबु फिरोजले त जुनी नै फेत्यो । प्रेममा त्यौ तागत हुँदोरहेछ ढुङ्गालाईनै देउता बनाउँदोरहेछ । दाजु-भाउजूले फिरोजलाई मूर्दा साबित गर्नुभएकोधियो । भन्नुहुन्थ्यो- मैयाँ फिरोज बरु मरिदिए हुन्थ्यो । कहिले त विष दिएरआफू पनि विष सेवन गरौं जस्तो लाग्छ । त्यस्तो अवस्थामा पुगेका तिमीलेशालुलाई पाउनका लागि जुन कष्ट उठायौ त्यो कष्ट म नाथेचाहि उठाउनसकिदिनथैँ ? शालुलाई तिम्रो प्रेमको विश्बास थिएन । तिमीले विश्वासको दियोबाल्यौ । उनी मेरौ प्रेममा बिश्बास गर्थिन्‌ । मैले उनलाई विश्वास दिलाउनसकिनँ । शालु तिमी पाउँदा कति खुसी छिन्‌ । उनको ओठको त्यो 044 छिनिभने मेरो प्रेमको के अर्थ ? प्रेममा समर्पण हुन्छ । तिमी शालुलाई प्रेमगर्छौ र यहाँसम्म आयौ । तिमीले सोच्यौ मैलेभन्दा बढ्ता प्रेम आक्राशलेगर्छन्‌ । तिम्रौ प्रेममा एक कण मात्र स्वार्थ भएको भए पनि तिमी यहाँआउँदैनथ्यौ । तिमीले सोच्यौ म आँसु पिएर पनि शालुको खुसी हेर्छु । मैले पनित्यही सोचेँ- शालु हाँसुन्‌ । तिमी आफैँ भन शालुले वास्तविकता थाहा पाइन्‌भने के गर्तिन्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले रुँदै भने, &#039;आकाश तिमी त्यसको चिन्ता नै नगर, म शालुलाईनराम्रोसँग तोडिदिन्छु । जसले गर्दा मप्रति घुणा जन्मिन्छ र उनी निर्धक्कहाँस्छिन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;त्यसौ भए म तिमीलाई रुवाऔँ ? के चाहिने-नचाहिने कुरा गर्छौ तिमी ?हेर, जब मैले रोहिणीलाई बिवाह गर्छ भने उनी यत्ति खुसी भइन्‌ कि के वर्णनगरौं । लाग्यो म उनको खुसीका लागि भए पनि काम लागें । फेरि शालुलेरोहिणीको विवाह मसँग गराउन खोज्नुको कारण उनलाई थाहा छ, रोहिणीआकाशलाई खुसी राख्न सक्छिन्‌ । मैले शालुले के भन्दिरहिछिन्‌ भनेर नेपालमेडिकल कलेजमा पढ्दा अन्नाको प्रसंशा गरेको थिएँ । उनले सम्झाएकीथिइन्‌- आकाश, जिन्दगी भनेको धेरै लामो छ । जै काम गर्दाखेरि पनि बडो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हौस्‌ पुच्याएर गर्नुपर्छ । म तिम्रो ओठमा सधैं हाँसो देख्न चाहन्छु । उनले ज्यादैखिन्न भएर भनेकी थिइन्‌ । आज रोहिणीको कुरा गर्दा उती भन्थिन्‌- आकाशम धेरै सोचेर यहाँ आएकी हँ । मलाई तिम्रो पनि पीर थियौ । यो स्वार्थीदुनियाँमा तिमीले कस्ती केटी पाउँछौ भन्ने । रोहिणीलाई तिर्मीले चिनेकै छौ ।तिमीहरू दुबैको जीवन हाँसीखुसीमा बित्छ । मैले तिम्रो खुसी हेर्न नचाहेकोभए तिमीले अन्नाको कुरा गर्दा किन मौन हुन्थें र ! म मनमनै भगवानसँगप्राथना गर्थे- &#039;भगवान्‌ आकाशलाई अन्नाको मोहिनी आँखाबाट टाढा राख । मआकाश टुटेको हेर्न सक्दिनँ । आज म खुसी छु रोहिणीजस्ती निष्पाप मनभएकी केटी पायौ । तिमीहरूको जीवन सधैँसधैँ हराभरा हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले सुस्केरा हाल्दै भने, &#039;त्यसो भए किन चुरोट पिउँछौँ ? तिमीलेचुरोट पिएको देखे शालु कै खुसी होलिन्‌ त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छोडछ फिरोज, के गरौं, कसो गरौं लागेर मात्र चुरोट पिएको हँ । फिरोजतिमीले जीवनभर शालुलाई मैले प्रेम गर्थे भन्ने कुरा बिर्सेर पनि नबाताउ है! तिमीले जस्तै मैले पनि शालुको फौटोहरूको आर्ट गरेको छु । तिमीले आजैलग । विवाहपछि हामी लगतै अमेरिका जान्छौं होला । तिमीले बेला-बेलामातिमीहरूको हालखबर वताइरहनु है । फिरोज अर्को जन्म भए म अर्को जन्ममाचाहिँ शालु तिम्रो हुन दिन्न नि!&lt;br /&gt;
फिरोजले बर्रै आँस्‌ &#039;झारे । आकाशको पनि आँखा रसायो । दुवैका ओठहरूकेहीबेर मौन रहे । फिरोजकी फुपू रमा कोठाभित्र पस्दै भनिन्‌, &#039;ओहो ! कुनबेला आएको तिमी, भर्खरै दाइले फोन गर्नुभएको थियो बधाई छ तिमीलाई ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कैको बचाई फुपू ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केको हुनु तिम्रै विवाह नि, कान्छीले हेराइजुराइ गरी मङ्सिर एक्काईस गतेलगन राम्रो छ भन्न आएकी थिइन्‌ रे । दाइले खुसी हुँदै भन्नुहुन्थ्यो- फिरोज तशालुलाई अझ दुई तीन बर्ष कर्नुपर्छ भन्थे । कान्छीको क्रालै हामी घैरै खुसीभयौं । बेलुका आफान्तहरूलाई तिम्रो विवाह हुने खुसीयालीमा सातो पार्टी दिनेरे। फुपूको कुराले फिरोज न खुसीले हाँस्न सकै न रुन नै।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आकाशले हाँस्दै भने, &#039;ल यार बधाई छ । तिमी मभन्दा दुई दिनअगाडिहुलाहा हने भयौ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रमा ( फुपु ) ले भनिन्‌, &#039;हामी त आकाशलाई देखेर छक्क पस्यौं । अघिल्लोदिनसम्म भन्दै हुनुहुन्थ्यो अब अमेरिका जान्छु । विवाह नै गर्दिनँ । भोलिपल्टशालु आएर के-कै भनेर सम्झाइन्‌, विवाह गर्न राजी भइहाल्नुभयो । म अचम्मैपर्छु किन सबैजना शालुको कुराको कदर गर्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माइजू, शालु सबैको भलाड्गका लागि कुरा गर्छिन्‌ । त्यसैले सबैजना उनलाईमन पराउँछन्‌ । फिरोजतिर फर्किदै- जाक फिरोज तिम्रो घरमा सबैजना तिमो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रतीक्षामा होलान्‌ । रमाले पनि आकाशको कुरामा नै समर्थन गरिन्‌ । आकाशलेहाँसे गरी भने- अर्को जन्ममा चाहिँ चिटिङ चल्दैन नि !&lt;br /&gt;
फिरोज बोल्नै सकेनन्‌ । फुपू र आकाशसँग बिदा भएर फिरोज घर गए ।घरको उल्लासमय वातावरणले पनि फिरोजलाई त्यति तान्न सकेन । फिरोजगएपछि आकाश धेरैबेर रोए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपक र उर्मिला सबै वास्तविकतासँग अनविज्ञ नै थिए । कान्छीले फिरोजकोघर विवाहको कुरा लिएर जानुअगाडि सबै कुरा भनिन्‌- फिरोजको घर जानदीपक र उर्मिलालाई अनुरोध गरिन्‌ । दीपक र उर्मिलाले खुसी हुँदै भने-हामीले त केवल जन्म मात्र दिएका हौं । जन्म दिनेभन्दा कर्म दिने नै ठूलोहुन्छ । शालु र सुजतका लागि तिमीले जे भने, जे गरै पनि हामीलाई मञ्जुरछ । हामीले मसान बनाइसकेको घरलाई तिमीले स्वर्गमा परिणत गन्यौ ।त्यतिमात्र होइन, हामी लोग्ने-स्वास्तीको सम्बन्ध दुटिसकेको थियौ । तिमीलेजोडिदियौ । तिमीले नै हामीलाई जिन्दगीको सही अर्घ बुझायौ । मायाको अर्थबुझायौ । तिमीले गर्दा तै आज हामी समाजको अगाड्धि शिर ठाद्घो गरेर हिँड्नसक्ने भएका छौँ । सम्पूर्ण अधिकार तिम्रै हो भनी पुनः शिर झकाए । सुजनकलेजबाट आएर कान्छीलाई अङ्गालो मार्दै भने- को हिँड्न सम्ने भयो ममी,पापा?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कसको हुन्थ्यो हामीले आफन्तै क्रा गरेका हौं । शालुको विवाह यही मङ्सिर२१ गते हुँदैछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;फिरोज दाइ भनिरहेको वानी, अब कसरी भिनाजु भन्ने होला, मलाई तलाजै लाग्छ भन्या । आज एघार गते भइसक्यो । दिदी आजै जाँ सुटको अर्डरगर्न । मलाई सुट छान्न आउँदैन । तपाईंले नै सुट छानिदिनुहोला । सौरब रसौजन्यले हिजो भन्दै थिए । हामीलाई हजुरबुबाले रोहिणी दिदीको विवाहकालागि भनेर सुट सिलाइदिइसक्नु भयो । म पनि उनीहरूको कलरसँग म्याचिङहुने कलरकै सुट लाउँछु ।&#039;&lt;br /&gt;
“हुन्छ बाबा हन्छ, पहिला खाजा त खाइस्यो त्यसपछि हामी सबै जाने ।&#039;उर्मिलातिर हेदैं 0414. मैयाँसाप र सापले पनि कपडा फेरिस्यो । चाहिनेसामानहरू फटाफट किन्न सुरु गर्नुपर्छ । नभए भ्याइँदैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपकले भने, &#039;ठीकै भन्यौ तिमीले, ल उर्मी तयार होक । कान्छी तिमी पत्तितयार होक, आज सुजनले आफैँ झिकेर खाजा खान्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&amp;quot;प्लिज पापा मलाई दिदीको मुख नहेरी नास्ता खायो भने नास्ता खाएकोजस्तो लाग्दैन । बरु म छिटोछिटो खान्छु ।&#039; सुजनको कुराले दीपक र उमिलादुवै हाँसे । कान्छी र सुजन भान्सातिर लागे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पच्चीस==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आन्टी, नमस्कार, उहाँ प्रशन्त अंकलको आमा हनुहुन्छ ।&#039; भनी गोकललेपरिचय गराएर काम छ भनी प्रशन्नको घरबाट निस्के ।&lt;br /&gt;
प्रशन्नकी श्रीमती वर्षाले गोकुलको नमस्कार फर्काएर प्रशन्नकी आमाप्रमिलाको खुट्टा ढोगिन्‌ । प्रमलाले सौभाग्य रहनू भन्ने आशिष दिँदै भनिन,“रोहिणी बाबा, तिमी त मैले कल्पत्ता गरेको भन्दा पनि सुन्दरी रहिछ्यौ । प्रशन्नकहाँ गए त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्षा आफूलाई रोहिणी नामले सम्बोधन गरेको सुनेर केही आश्चार्य पारित्‌र भनिन्‌, &amp;quot;बुटवलमा ठूलो होटल बन्दैछ । उहाँलाई त्यो होटलको नक्साबनाउने जिम्मा दिएको हुनाले होटल बनाउने ठाउँ निरीक्षण गर्न जानु भएकोछ । एक-दुई दिनपछि फर्किनुहुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“बाबा ! विवाहमा मलाई किन नबोलाएको त ? गोकुलले अंकलले विवाहगर्नुभयो भन्न गएपछि हामफाल्दै आएकी ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“वर्षा प्रमिलाको कुराले छक्क परिरहेकी थिइन्‌ । वर्षा ठूलौ खान्दानमाहुर्किन्‌, बढिन्‌ । बैँस उनलाई पनि चढ्यो । तर वर्षातको खहरेझैँ उर्लिचन्‌उनी । वर्षा मायालु, दयालु र सुन्दरी थिइन्‌ । प्रशन्न धन, दौलत र वर्षाकोमायामा छलाङ मारिरहेको थियो । क आफूलाई संसारकै भाग्यमानी पतिसम्फझन्ध्यो । वर्षा पनि प्रशन्तलाई आदर्श पतिको रूपमा सम्झिन्थिन्‌ । त्यसैलेअस्ट्रेलियाबाट वर्षालाई भिसा आइसक्दा पनि प्रशन्नको मायाले अस्ट्रेलियागएकी थिइनन्‌ । प्रशन्तलाई पनि अस्ट्रेलिया लैजाने प्रोसेस चलिरहेको थियो ।प्रमिलाको क्राले भने वर्षा केही अल्मलिरहेकी थिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रमिलाले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;रोहिणी बाबा, किन मौन रहेकी अब तिमीलाईनलिई गाउँ जाँदै जान्त । गाउँलेहरू तिमीलाई हेर्न ज्यादै उत्सुक छन्‌ । थाहाछ । तिमीलाई ? मैले तिम्रो नाममा एउटा भैंसी र दुईवटा बाख्खा पेवा पालिदिएकीथिएं । पहिलो बैतमै एउटा बाखीले तीनवटा पाठापाठी पायो । अर्कोले दुईवटापाठा पायो । गोठभरि तिम्रो पेवाका पाठापाठी छन्‌ । भैंसीले पनि बिहान-बेलुका गरेर झन्डै एक पाथी दूध दिन्छ । पहिला-पहिला त घ्यू, क्राउनीपठाएका सामानहरू पर्काउँथ्यौ, चिठी पनि लेख्ब्यौ । धेरै भयो तिमीले चिठीपनि नपठाएकी, पछिल्लो पालाको क्यान फर्काइनौ । विवाहमा पनि चोलाइनौ ।कतै मसंग रिसाएकी त छैनौ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रमिलाको क्राले वर्षालाई भाउन्न होलाजस्तै भयौ । वर्षाले मनमनै सोचिन्‌ ।को रहिछिन्‌ घ्यू कुराउनी खाने रोहिणी, आफू रोहिणी नै भएर वास्तविकताबुझनुपस्यो । वर्षाले हाँसेफै गरी भनिन्‌, &#039;हेनोस्‌ आमा, हतारमा विवाह गरियो,हजुरलाई बोलाउने भन्दाभन्दै बोलाउनै पाइएन । अब क्यानहरू हामीसँगैजाँदा लैजाउँला हुन्न र ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले साक्षात लक्ष्मी बुहारी भनौँ या छोरी भनौं तिमीलाई पाएपछि नाथैक्यानको त चिन्ता छैन तर यहाँ मिल्किएको भाँडो गाउँमा काम लाग्छ भनेरमात्रै हो । लाक यो क्राउनी सम्धी-सम्धिनीका लागि, योचाहिँ तिम्रो र बाबुकोलागि । झोला खोलेर कपडाको पोको फुकाउँदै भनिन्‌, &#039;ल हेर बाबा मैले तिम्रैपेवाको खसी, बाखा बेचेर सुनको दुईबटा चुरा बनाइदिएकी छु । तिमीलेपद्धाइदिएको चुराकौ साइजमै छ यो। आफ म लगाइदिन्छु । वर्षाको हातमागिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बर्षलि हात्त दिइन्‌ । बर्षाको हातमा त्यौ चुरा साह्रै ठूलो देखिएपछि रिसाउँदैवाणालाई गाली गरिन्‌, &#039;त्यो च्याङ्ग्रे मोराले त मैले दिएको नापमा चुरी नैबनाएनछ । पखोस्‌ त्यसलाई गाउँ गएपछि मार हपाछु र अर्को चुरीको तज्याला नदिई बनाउँछ । बाबा ! त्यो चुरा फुकाल फेरि हराउला । गाउँ गएपछित्यही बज्याले तिम्रो नापमा चुरा वनाउँछ । नानु, यो कोठाहरूको बहाल कतितिर्नुपछ नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आमा यो हाम्रो आफनै घर हो । हजुरलाई भोक लाग्यो होला के-केबनाकँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“रोहिणी बाबा, तिमीलाई देखेपछि भोक, प्यास, वकाई सवै हट्यो । नानु,प्रशन्न पढेर आएको पाँच-छ महिनामै यत्रो घर कसरी बन्यो त? बाबुतभन्व्यो- रोहिणीको बाबुआमाले मलाई पढाउनका लागि पैसा नपुगेर घरकोकारसमेत बेचिदिनुभयो । फेरि यति ठूलो महल कहाँबाट आयो ? कतै तिमीलेबाबुआमाको साझौपनको फाइदा धैरै त उठाइनौँ ? अर्काको छोराको विश्वासगरेर त्यत्रो इन्जिनियर हो कि क्या हो पढाइदितुभयो फेरि उहाँहरूलाई नङ्ग्याएरयौ घर पनि माग्यौ ? रोहिणी, तिमी यति कठोर छयौ भन्नै मलाई पटक्कैलागेको थिएन । मलाई सम्धी-सम्धिनासँग भैटाइदेक म उहाँहरूलाई साफगाली गर्छु । प्रशन्न अलि लाल्ची छ भन्ने त मलाई बाहा भएकै हो तर तिमीपनि कम रहिनछयौँ । अन तिमी रिसाए रिसाक खुसाए खुसाक यौ घरको एकगैडा अन्न पनि नखाई घर फर्किन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
मायालु बर्षालाई सबै कुरा सपनाजस्तै लाग्यो । सोचिन्‌- बाबुबिनाकोपर्द,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गरिब गाउँले कसरी त्यत्रो पैसा खर्च गरी इन्जिनियर बने होला भनेको त कुरायति गहिरो पो रहेछ । यो चुरा रोहिणीको नापकै चुरा हो । आमालाई पनिनबोलाई हतारहतार विवाह गर्नुको रहस्य त यस्तो पो रहेछ । भगवान्‌ अब मकसरी बाचौं ? रोहिणी भन्नेको हृदयमा कति चोट परेको होला । मभन्दा अर्कोघानी र राम्री पायो भने प्रशन्नले मलाई पनि छोड्छ । म बर्बाद भएँ भन्नैसम्झेर वर्षालाई सहिनसक्नु भयो । उनी एक तमासकी भइन्‌ । आँसु तप्पतप्पगालाको बाटो हँदै कथामा &#039;झन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रमिलाले वर्षातिर हेन सम्झाइन्‌, &#039;बावा, नरोक, तिमी अलि काँची नैरहिछौँ । मैते त यति मात्र भन्न खोजेकी हुँ, औँला दिँदा डुडुल्नो नै निल्नुहँदैन ।कतै घर माग्न प्रशन्नले नै दबाब त दिएनन्‌ ? उसको शरीरमा मेरो मात्रहोइन उसको बाबुको पनि रगत छ । पढेर आएको यति छोटो समयमा यत्रोदरबारजस्तौ घर बनाउने पैसा कमाए त प्रशन्नले ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्षाले आँसु पुछुदै भनिन्‌, &#039;आमा तपाईं मेरो माइतीको पीर नगर्नोस्‌ ।उहाँहरूले दितत सक्ने भएरै यत्रो घर दाइजोमा दिनुभएको हो । दाइ अस्ट्रेलियामाहुनुहुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमीहरू दुई बहिनीमात्र होइन र ? फेरि दाइ कहाँबाट आए ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्षाको मुटु ढुक्क भयो । उनले कुरा बनाइहालिन्‌, &#039;हामी दुईवटी छोरीभएकोले एउटा धर्मदाइ बनाएका थियौँ, उहाँले नै हाम्रो सहयोग गर्नुहुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रमिलाले गहभरि आँसु पार्दै भनिन्‌, &#039;यो जमात्तामा पनि सहयोग गर्नेतिमीजस्तै अर्को मान्छे तिम्रो धर्मदाइको पनि जन्म भएको रहेछ, खुसी लाग्यो ।रोहिणी वाबा ! तिमीलाई देख्ने पनि साह्रो रहर थियो । तिमीलाई देख्दा साक्षातदेवीलाई देखेजस्तै भयो । तिमीले प्रशन्नलाई त जीवनदान दियौँदियौ मलाईपनि जीबनदान दियौ । तिमीले पठाइदिएको पैसाले त ठूलै काम गप्यो ।धनवीरे साहुले त्यत्रो जग्गा पचाउन खोजेको थियो । ब्याजको स्याजसम्मलिएर बलैले जग्गा छोड्यौ । घरमा नातिनी त छँदैछे एउटा टुहुरो कुमालकोछोरोलाई पनि पालेकी छ्‌ । तिम्रो पेवा बाखापाठाहरूले बाली खाएर बिगारगन्यौ भने गाउँलेहरू भन्छन्‌- यो रोहिणीको भैँसी बाख्राले त अचाक्ली गत्यो ।कोही गाउँलेहरू त तिम्रो नाममा बाखा पाल्न तैजान्छन्‌ । तिम्रो नामकोबाख्राले पाठापाठी पाएपछि पाठापाठी बेचेर आएको पैसा आधा टक्रक्क दिन्छन्‌ ।कोही त मलाई रोहिणीकी आमा भनेर पनि बोलाउँछन्‌ । सबैको ओठमा तिम्रैनाम छ । काठमाडौँका केटा-केटी राम्रा हुँदैनन्‌ भन्थे, तिमीले त सिङ्गै काठमाडौंकोलाज राख्यौ । तिमीले विवाहबारे थाहा नदिँदा भने साह्दै मन रोयो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रमिलाको क्राले वर्षाको आँखाबाट एकनास आँस्‌ बग्यो । के भन्ने कै नभन्नेसोच्नै सक्किनन्‌ र पनि भनिन्‌, &#039;आमा ! अब चिन्ता नै नगर्नौस्‌ । मलाई पनि तपाईँकोअभाबमा बिवाह गर्न मन नै थिएन । अपर्झट बिवाह गर्न परेर मात्र हो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले त तिमीलाई चिनेकै छु । गाउँलेहरूले भन्ने ठाउँ पाए । भन्थे मेरीबुहारी साक्षात लक्ष्मी हो भन्थेक खोई विवाह जस्तोमा पनि बौलाएनन्‌ । खैरछोड सानातिना कुरा, सत्यचाहिँ म मेरी अपमान सहन सक्छु तिम्रो अपमानसहन सक्दिनँ । गाउँलेले तिमीले पठाइदिएको जस्तै ग्यास्टिकको वैद्य औषधिलेराइदिनु भनेका छन्‌ । त्यौ औषधि खाएपछि, मलाई छाती पोल्न धेरै कमभयो । फेरि म गाउँमा हिलो-धूलोसँग खेल्नेलाई अनाहकमा पैसा खर्च गरीगरीमहँगो-महंगौ सारी किन पठाएकी ? मैले ती सारीहरू केही त छोरीलाई दिएँ,केही तिम्रै लागि राखिदिएकी थिएँ त्यो पनि लेराइदिएकी छु । लाङ&#039; भन्दैवर्षाको हातमा सारी वमाउँदै भनिन्‌, &#039;यसको सट्टा मलाई दुई-चार सुतीकोधोती किनिदेक ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्षाले आँखा ओभानो पार्दै भनिन्‌, &#039;हुन्छ आमा म हजुरले जे-जे भन्नुहुन्छत्यही किनिदिन्छु । सम्धी-सम्धिनी भेट गर्नुपर्यो । म ममीड्याडीलाई हजुरआउनुभएको क्रा वताउँछु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ बाबा हुन्छ, मलाई पनि त उहाँहरूलाई भेदनै साह्ै रहर छ । मैलेतिमीलाई धेरै अलमलाएँ । झोलामा आँपको अचार, सिलाम, भागो, चुक, घ्यूछ, सबै राख । वसमा कच्याङकचुङ के-कै खाइयो । मुख सुकेको छ एकगिलास तातोपानी देक अनि चिया खाउँला ।&#039;&lt;br /&gt;
वर्षा झोला बोकेर भान्सातिर लागिन्‌ । उनी आफूलाई सम्हाल्त नसकीछद्पटाउन थालिन्‌ । प्रमिलालाई पानी, चिया दिएपछि आफनो बाबुआमालाईछोटकरीमा सबै कुरा बताइन्‌ । बर्षाको कुरा सुनेर वर्षाको बाबुआमा पनिछांगाबाट खसेजस्तै भए । आफ्नी सुशील र मायालु छोरीमाथि परेको बज्जलेवर्षाका आमाबानुलाई मर्माहत पात्यो नै । वर्षाले भनेझैँ रोहिणीकै बाबुआमाबनेर सम्घीभेट गर्नुपर्ने हुँदा कम कस्टकर परिस्थिति थिएन । सम्पन्न व्यक्तिहरूभएको हुँदा झरिझुट्ट सम्धिनी भेट गर्नपर्तै सामान किनेर वर्षाको घरमा आए ।बाजेले मन्त्र पढेर सम्धी भेट गराए । सम्धिनी भेटमा दिएको सामान लिँदैप्रमिलाले भनिन्‌, &#039;हजुरहरूले पहिल्यै परिपूर्ण पारिसकेपछि फेरि आज धेरैसामान दिई दुःख किन गर्नुपत्यो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्षाकी आमा बबिता त केही बोल्न सकिनन्‌ । जितेन्द्रले भने “धेरै केहीगरेका छैनौँ&#039; भनी कुरा टार्न खोजै । प्रमिलाले हात जोडेर भनिन्‌, &#039;यदि रोहिणी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वाबा नजन्मिदिएको भए हामी उहिल्यै मेजँ होला । हजुरहरू जस्तो बाबुआमापनि यो संसारमा हुँदारहेछन्‌ । हजुरहरूले प्रशन्तलाई पढाउन आफ्नो जायजेथाबेचेपछि यो घर नदिनुपर्ने थियो । त्यत्रो पढेर आएपछि प्रशन्नले नै दुईजनालाईखान पुग्ने पैसा कमाइहाल्छन्‌ होला नि ! खोई त रेप्मा नानी आउनुभएन ?उहाँको लागि पनि केही सम्पत्ति राखिदिनुभएको भए हुन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हजुरले पीर नगर्नुहोला, रेष्माका लागि पनि हामीले सबै राखिदिएका छौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यहाँबाट कति टाढा छ र घोबीघाट बोलाउनुभए हुन्थ्यो । अहिले त आइन्‌पनि होला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसो भए रोहिणीको घर घोबीघाट पो रहेछ । वास्तविक कुरा के रहेछवुझनैपन्यो भनी रेष्मालाई लिन जान्छु भनी निस्कैका जितेन्द्र घोबीघाट पुगे ।कहाँ सोध्नु, कसलाई सौध्ने, कै भनेर सोध्ने अन्योलमा परेर एउटा किरानापसलनिरै उभिइरहेका थिए । फेरि झमक्क साँझ पनि परिसकेको थियो ।उनले झट्ट आफनो अफिसमा सँगै काम गरैको रिटायर अधिकृतलाई सम्झीउनको नाम सोध्दै त्यौ घरमै पुगै । घरमा विवाहको धुमधाम तयारी भइरहेकोथियो । जितेन्द्रलाई देख्नेवित्तिकै केशवले बडो स्वागत साध बैठकमा लग्दै भने,&#039;हजुर आज यहाँ कताबाट पाल्नुभयो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जितेन्द्रले भने, हेर्नोस्‌, तपाईँलाई के ढाँदनु ? हामी कसैको जालमा परेछौँ ।मेरी छोरीको जिन्दगी एउटा डाकाले बर्बाद गन्यो । आज केटाको आमाआएपछि पो सबै कुरा थाहा पायौँ । त्यौ डाकाले पहिला नै विवाह गरेको थियोचा प्रेममाव गरैको थियो त्योचाहिँ बुझून सकिएन ।&#039;&lt;br /&gt;
केशवले लामो सुस्केरा हाल्दै भने, &#039;ममात्र फसेछ्ठु भनेको त हजुर पनिफस्नुभएछ । यो संसार नै चौरी र फटाइँ गर्नेहरूका लागि बनेको हौ ।हामीजस्ता सीधासाधाका लागि त यहाँ बाँच्नसम्म मुस्किल छ । सीधा-साधालाईभगवान्‌ले कतै न कतैबाट पारचाहिँ लगाउँदारहैँछन्‌ । तपाईंकी छोरीलाई पनिपार लगाउलान्‌ । गाँठी कुरा नवुझीकनै म भावनामा पो बगेँ । भन्नोस्‌ हजुर,उसले विवाह गरेर छौडिदियो कि क्या हो !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;विवाह गरेरै छोडिसकेको त होइन तर उसको नियति राम्रो छैन रहेछ ।उसको आमाको भनाइअनुसार उसले मेरो छोरीसँग रूप र धनको लोभमाविवाह गरेको हुनुपर्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;विवाह नहुनु भइसकेपछि हामी छोरीहरूको बाबुले जे पनि त सहतुपर्छ नि! तत्र यो समाज यही हौ, समाजका मान्छेहरू यही हुन्‌ । घाउ कोट्याइकोट्याईं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नुन-खौसांनी दल्न पछि नपर्दारहेछन्‌ मान्छेहरू । हेर्नोस्‌, मैले एउटा पापिप्टलाईभुइँबाट उठाएर आकाशमा पुग्याइदिएँ । छोरी रोहिणीले पनि उनलाई त्यत्तिकैविश्वास गरिन्‌ । हामी सबैले विश्वासकैँ भरमा घरको जायजेथा यहाँसम्मकीघरको कारसम्म बेचेर आकिटेक इन्जिनियर पढायौँ । त्यतिमात्र होइन, उसकोआमाको क्राण चुक्ता गरिदियौँ । त्यो निचले मेरी छौरीलाई धोका दियो ।समाजले त मेरी छोरीलाई वेश्या नै सावित गरे ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छोरीको साथीले गर्दा पाउन त त्योभन्दा लाखौँ गुना असल केटा पायौं ।यदि अहिलेको केटाले विवाह नगरेको भए मेरी छोरी जिन्दगीभर कुमारीवस्नुपर््यौ । सायद यो समाजले उसलाई बाँच्न पनि दिन्थेन होला । खान नपाईबसमा बैहोस भएको कङ्गालले शिखर छोएपछि आफू उभिएको धरातल नैबिर्सियो । समयको अगाडि घुँडा टेक्नबाहेक हामीले केही गर्न सकेनौं ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केशवको कुराले जितेन्द्र टोलाइरहे । जितेन्द्रले बुझे, ओहो ! यो रोहिणीभन्ने त केशवकै छोरी पो रहिछिन्‌ । अब के गरौं ? केशवको खाटा लागिसकेकोघाउ उक्काउनुभन्दा थाहा नपाएझैँ गरी जानु नै वेश हुन्छ। तर एउटाकुराचाहिँ सोध्छु नै । जितेन्द्रले उफ ! गर्दै भने, &#039;कसरी बसमा बेहोस भएछन्‌ ?कसरी तपाईंहरूले उसमाथि ठूलो बिश्वास गर्नुभयो त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;भनिहालैँ नि जितेन्द्रजी, प्रशन्न गरिबको छोरा रहेछ । पढ्नमा चाहिँहोनहार नै रहेछ । आमाले अलिआलि भएको सम्पत्ति वैचेर बन्धकी राखेरछोरालाई पढाइछिन्‌ । घरबाट केही पठाउन नसकेपछि त्यो स्वार्थी भौकै परेछर वसमै बेहोस भएछ । बसमा भएकाहरू सबै छारेरोगी भनेर भागैछन्‌, मेरीछोरीले उनलाई हस्पिटल पुन्याएर उपचार गराइछिन्‌ । आमा-छोरी भएरउसको खाने-वस्ने व्यवस्था पनि मिलाएछन्‌ । भेटघाट गर्दागर्दै उनीहरूको प्रेमपरेछ । मेरी छोरी साइन्समा बाइलोजी लिएर पढेकी मान्छे । दुईजनालाई पढ्नपैसा लगानी गर्ने सकिँदैन भनी बुझेर आफू जानीजानी फेल भइछन्‌ । कारणउनले प्रशन्तलाई इन्जिनियर बनाउन चाहेकी रहिछिन्‌ । उसलाई इन्जिनियरपढाएर हामीले सम्पत्ति स्वाहा गच्यौँ । इन्जिनियर पढेर आएपछि त क सिय्रोबाटहात्तीमा परिणत भयो । विवाहका लागि आमा लिन जान्छु भतेर बिबाह पोगरेछ । हामी भने क हरायो भनेर कति तडपियौँ । बिचरी रोहिणी त बेहोस नैभइन्‌ । अरू भनैको भए त ठीकै थियो । त्यो पापीका लागि बैंस बेगेद बस्नेमेरी छोरीलाई वेश्या संज्ञा दियो त्यसले । ठीकै छ, त्यसको भलो होस्‌ । मेरीछोरीमा छलकपट थिएन, त्यसैले उसले त्यो पापीभन्दा कयौं गुना असल डा.पति पाइन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबै कुरा बुझेपछि जितेन्द्र केशवसंग विदा भएर घर आई श्रीमती रछोरीलाई सबै कुरा बताए । वर्षाले आफू प्रशन्नजस्तो स्वार्धीसँग नवस्ने निर्णयगरिन्‌ । वर्षाको आमाबाबुले पति प्रशन्तलाई थाहा नै नदिई कालिमाटीको घरबैचिदिने र वर्षालाई अस्ट्रेलिया पठाउने निर्णय गरे । जितेन्द्रले गर्दा नै होटेलकोनक्सा बनाउने काम साथीहरूद्वारा दिलाएको हुँदा जितेन्द्रले साथीहरूलाईलगाई हप्ता-दस दिनका लागि प्रशन्नलाई बुटवलतिर काममा व्यस्त गर्नुभने । अस्ट्रेलियाबाट भिसा आइसकेको हुँदा टिकटको मात्र क्रा थियो । जितेन्द्रलेअस्ट्रेलिया पठाउन टिकट लिए । प्रमिलालाई वास्तविकता भनी मन दुखाउनचाहेनन्‌ । अझै प्रशन्न दस-बाह्र दिन नआउने भनिदिए । प्रमिलाले आफूयतिखेर बुहारीकै मुख हेर्न आएको बताइन्‌ । आफू नहुँदा घरमा डामाडोलहुन्छु भनी खुसीसाथ घर गइन्‌ । वर्षाको बाबुआमाले सबै सोधपुछ गरी उनलेल्याएको सुनको चुरीको हिसाव गरी रोहिणीकै नाममा गाउँमा एक टुका खैतकिन्नु भनी केही हजार दिएर पठाए । प्रमिलाले पैसा लिन साफ इन्कारचाहिँगरेकी थिइन्‌ । धेरै सम्झाएपछि प्रमिलाले पैसा लिइन्‌ र जाने बैलामा भनिन्‌,&amp;quot;चाँडै घर आउनू, यौ पैसाले तिम्रै नाममा खैतको गरा किनिदिन्छु । त्यही धानकुटेर चामल पठाइदिन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रमिलाको सरल हृदय देखेर वर्षालगायत वर्षाको आमाबाबुको पनि परेलीरुझयो । प्रमिला पनि बुहारीसँग छुट्टिनुपर्दाको पीरले रुँदैरुँदै घर गइन्‌ । वर्षालगायतवर्षाको बाबुआमालाई पनि उनलाई पनि छल गर्नुपर्दा त नरमाइलै लाग्यो ।कुनै सानोतिनो गल्ती गरेको भए त वर्षाको बाबुआमा र वर्षाले नै माफ दिन्यैतर, प्रशन्नको अपराध माफी दिन लायक सम्झेतत्‌ उनीहरूले । वर्षालाईअस्ट्रेलियातर्फ उडाए । कालिमाटीको घर बैची वर्षाकै नाममा पैसा बैंकमाराखिदिए । भविष्यको मीठो सपना बुनेको प्रशन्त जब आफनी मायालुलाईभेद्न कालिमाटी पुग्यो त्यहाँ सबैको नौलो अनुहार देखेर चित खायो । घरबेचेको थाहा पाएपछि ससुराली पुग्यो । जितेन्द्रले वर्षाले दिएको डिभोर्सकोकागज दिँदै भने, &#039;बाबु प्रशन्न लाङ तिमीलाई दिन हामीसँग यो चिर्कटोबाहेककेही छैत ।&#039; कागाज हेरेर प्रशन्न चिच्यायो, &#039;यो के हो ? यो सब कै हो?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्षाकी आमा त देखै परिनन्‌ । जितेन्द्रले आँसु झार्दै भने, “यौ तिम्रो पापकोसज्ञाय हो । सत्यलाई कहिलेसम्म छुपाउँछस्‌ तँ ? तैँले मेरी छोरीको विश्वासर रोहिणीकै विश्वासमा गला घोटिस्‌ । तँलाई मैले सोधेकै थिएँ । कसैलाई प्रेमगर्छस्‌ कि गर्दैनस्‌ भनेर तैँले महाझूट बोलिछस्‌ । जाक्न त जेलमा जागनुपर्नैहो तँलाई तर चुपचाप गइहाल । नत्र राम्रो हुनेछैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्नले बोल्ने कुनै ठाउँ नै थिएन । क चुपचाप रन्थनिंदै वर्षाको माइतीबाटनिस्क्यो । रोहिणी र वर्षा दुवैको आँखा सम्झयो । दुवैको आँखामा रत्तिभर पापथिएन । दुवैको मन गंगाजस्तै पवित्र थियो । प्रशन्न सडकको पेटीमा बसेरधेरैबेर वर्षा र रोहिणीकँ मायाले रोयो । स्वार्थले गर्दा आफू घर न घाटकोभएको सम्झयो । त्यही रात नाइटमा घर गयौं । घरमा आमालगायत सबैछिमेकीहरूले रोहिणी खोई भनेर सोधे ? प्रशन्नको अनुहार देखेर सबैले रोहिणीमरेकै अनुमान गरे । प्रमिलाले कैयौँ दिन रोएर बिताइन्‌ । प्रशन्न आफूले गरेकोपापले भित्रभित्रै जल्दै गयो । रोहिणीको टाडी खेत, रोहिणीको बाखा, रोहिणीकोभैँसी हेरेर प्रमिलाले मन बुझाउन बाध्य भइन्‌ । प्रशन्न सहर पस्न सकन ।गाउँकै स्कूलमा मास्टरी जागिर खायो । गाउँकै केटी बिवाह गच्यौ तर जतिसमयले फेरो मारे पनि रोहिणी र वर्षा उसको आँखाबाट कहिल्यै ओझेल हुनसकेनन्‌ । कहिल्यै ..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==छब्बीस==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोज र शालुको विव्राह भएलगत्तै आकाश र रोहिणीको बिवाह पनिभयो । विवाहको केही समयपछि नै आकाश र रोहिणी अमेरिका गए । फिरोजर शालुले फ्रान्स जान भिसा पाए पनि रमण र गंगा र कान्छी दिदीले विदेशजान जरुरत नभएको बताएपछि उनीहरू खुसीखुसी नै नेपालमा बस्ने निर्णयगरे । शालु र फिरोजको जीवनमा र रोहिणी र आकाशको जीवनमा कहिल्यैपनि सानो आँधी आएन । उनीहरू हरक्षण डालीमा लटरम्म फुलेको फूलहरूजस्तैभए । शालुले दुईटा छोरा र रोहिणीले एक छोरा एक छोरीको जन्म दिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीदिदीको जेठो छोरा सौरभलाई दीपकले नै होटेल म्यानेजमेन्ट गर्नबाहिर पठाई पैसा लगानी गरे पनि सुजन स्टुडेन्ट भिसामा लन्डन पढ्नगएपछि उर्मिला र दीपकको त्यो वैभबलाई छोडी कान्छी केशवकै घरमाफर्किन्‌ । सबैले अनुमान गरै, कान्छी शालुको उमेरमै विवाह होस्‌ । शालुलेभाइको जिम्मेवारी बोक्न नपरोस्‌ भनी शालुको जिम्मेवारी बोक्न नै दीपककोघरमा फर्केकी थिइन्‌ । आफनो जिम्मेबारी पूरा गरैपछि उर्मिला र दीपकलेलाख बिन्ती गर्दा पनि कुपण्डोल बस्न नमानी केशवकै घरमा फर्किन्‌ । पीताम्बरार केशवले कान्छीको आगमनलाई सहर्ष स्वीकार गरे । रोमाकान्त र मोनालेटीकाथलीमा तीन कोठाको घर बनाई त्यतै सरे । रेष्माले प्रेमलाई सधैँ घुणा गरेपनि रेष्मालाई एकतर्फी मन पराउने नरेशले रेष्माको घरमै आई मागी विवाह&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गरे । नरेश प्रोफेसर थिए । रूपमती डा. अन्नाले स्बास्नी भएको पाइलटसँगजानीजानी विवाह गरिन्‌ । लोग्नेले जेठी स्वास्नीसँग रात बिताएको थाहापाएपछि रिसले विष सेवन गर्दा मृत्युवरण गरिन्‌ । मोनाको वलात्कारी मालिकलेआफनो स्वास्नीको वास्तविक रूप मोनाबाट थाहा पाएपछि भित्रभित्र स्वास्नीलाईमारेको पश्चात्ताप गर्दै सारा जीवन विताए । उनले &#039;मूलको पानी र कुलकोछौरी&#039; उखानको वास्तविकता बुझे । थुपैले योगेन्द्र साहुसँग विवाह गर्न प्रस्तावल्याए पनि उसले बिवाह गर्न मानेनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौनाले बाबुआमा दुवै गर्दा पनि माइतीमा खुट्टा टेकिनन्‌ भने कान्छीआफनो वावु मरेपछि माइती गइन्‌ । मौसमीलै एड्सबारेमा केही भए पनिचेतना फैलाइन्‌ । आफूजस्तै पछिको बाटो नहेरी वैँसको उन्मादलाई मात्रसर्वस्व ठान्नेलाई आफनै उदाहरण दिएर केही हदसम्म सचेत गराइन्‌ । मर्नुभन्दाअगाडि शालुको सम्झना गरी बोलाए पनि शालु वीर हस्पिटल पुग्दा उनीमरिसकेकी थिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु खल्लो मन गरी घर फर्किन्‌ । आँखामा भने मौसमीकै सुन्दर अनुहारनाचिरहेको थियो । शालुको निराश अनुहार देखेर फिरोज पेन्टिङ गर्ने सबैसामान लिएर आई शालुतिर हेर्दै भने, &#039;शालु तिमी यही पोजमा बस । तिमीउदास हुँदाको तिम्रो तस्विर मैले बनाएकै छैन ।&#039; गंगा र रमणले पनि फिरोजकोकुराको समर्थन गर्दै भने, &#039;हो बाबु, हाम्री शालु उदास हुँदा पनि राम्रै देखिनेरहिछन्‌, उनी उदास हुँदाको फोटो उतारेरै छोड ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबैको क्रा सुनेर शालु फिस्स हाँसिन्‌ । सँगसँगै रमण र गंगा तथा फिरोजर शालुका छोराहरू सुलभ र संयोग पनि हाँसे । हा...हा...हा... ।&lt;br /&gt;
अस्तु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाम : “ ललिता &#039;दोषी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जन्म : २०२५।०७।१६, इमाडोल, ललितपुर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घर : लु, अ. गुल्मी, अर्ज&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा : एम.ए.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रकाशित कृति:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- प्रेमको परिभाषा (कथासंग्रह) २०५६- भत्किएका किनारा (कथासंग्रह) २०५७- बुद्ध रोएझै लाग्छ (कवितासंग्रह) २०५८- दुखेको घाउ (कथासंग्रह) २०६०- मानिस नै देवता (बालकथासंग्रह) २०६३- नीलकमल (बालउपन्यास) २०६४- डुन्द्रैनी (बालकविता) २०६५पुरस्कार, सम्मानः&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
-. भानुमोती पुरस्कार २०५९- महेन्द्र प्रकृति संरक्षण कोष पुरस्कार २०६२-. गुञ्जन नव प्रतिभा पुरस्कार २०६२- मानचित्र सम्मान २०६३- आमा सम्मान २०६५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
...सरल र बगेको शैलीले गर्दा अनि कथावस्तुको राम्रो विकासका कारणउपन्यास लोकप्रिय बन्ने आशा गर्न सकिन्छ । यो उपन्यासको कथा अत्यन्तरोचक हुनाले यसमा एक सफल फिल्म वा टेलिफिल्म पनि बन्न सक्छ भन्नेमलाई विश्वास छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डा: धुवचन्द्र गौतम&lt;br /&gt;
[[Category: Step 2]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%89%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A6&amp;diff=62</id>
		<title>उन्माद</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%89%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A6&amp;diff=62"/>
		<updated>2024-06-09T12:18:07Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: /* बाईस */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;Source book: https://nepalikitab.org/lalita-doshi-unmad/&lt;br /&gt;
==पुस्तक परिचय==&lt;br /&gt;
उन्माद&lt;br /&gt;
उपन्यास&lt;br /&gt;
लेखिका:&lt;br /&gt;
ललिता &#039;दोषी&#039;&lt;br /&gt;
प्रकाशक&lt;br /&gt;
डीकुरा पब्लिकेशन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृति: उन्माद&lt;br /&gt;
लेखक: ललिता &#039;दोषी&lt;br /&gt;
संस्करण: प्रथम, २०६६&lt;br /&gt;
मूल्य: रू. ९५/-&lt;br /&gt;
प्रकाशक : डीकुरा पब्लिकेशन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पत्रचार जर्ने ठेजाना :&lt;br /&gt;
डीकुरा पब्लिकेशनपो.ब.नं. २१७३२, काठमाडौँ, नेपालफोन : ०१-२०४४३७९, ९८४१५२१८९२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपत्यकाको लाणि वित्तरण :&lt;br /&gt;
एभरेष्ट बुक डिस्ट्रीब्यूटर्स&lt;br /&gt;
फोन : ९८४१४५२६०६&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==समर्पण आमालाई==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आदर्शकी प्रतिमूर्ति कोमल मनकी धनी&lt;br /&gt;
गाएर सकिन्न कठै ! तिम्रो त्यो जीवनी&lt;br /&gt;
तिमी बाँच अझै बाँच देक आशिषका घडा&lt;br /&gt;
तिम्रो कोखको लाज राखूँ बनी माटो उर्वर !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उन्माद उपन्यासमा ड्बुल्की मार्दा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;उन्माद&#039; ललिता दोषीद्वारा लिखित शिक्षा र सन्देशले भरिएको उपन्यासहो । आदर्शवादी रोमाण्टिक धाराको यस उपन्यासमा उपन्यासकारलै आफूनौउद्देश्य प्राप्त गर्नमा सफलता हासिल गरेकी छन्‌ । आजको उच्च वा उच्चमध्यमवर्गीय तथाकथित अभिजात समाजका विकृतिहरूलाई ललिता दोषीलेभावुक र मार्मिक बनाएर प्रस्तुत गरेकी छन्‌ । त्यस वर्गबाट बिभिन्त नमुनापात्रहरूको संकलन गरेर उपन्यासमा तिनलाई पात्र बनाई तिनको चरित्रचित्रण गरेकी छिन्‌ । आदर्श र अनादर्श पात्रको चित्रण गर्नु, तिनको द्वन्द्व प्रस्तुतगर्नु, तितका आडम्बरी जीबनको प्रस्तुति र अन्त्पमा ती सबै पात्रहरूको आ-आफूनो कर्मअनुसारको अन्त्य उपन्यासमा कौतुहलतापूर्वक प्रस्तुत गरिएकोछ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपन्यासमा शालु, कान्छी र आकाश जस्ता आदर्शबाट कहिल्यै च्युतनहुने पात्र छन्‌ भनै निमेष, मौमसी, फिरोज आदिजस्ता बाटो बिराउने पात्रपनि छन्‌ । लेखिकाको उद्देश्य भने प्रत्येक पात्रभित्र रहेको मानवीय आदर्शकोखोजी गर्नु रहेको छ । यो लेखिकाको सामाजिक दृष्टिले एक दायित्वपूर्ण कार्यहौ र सराहनीय पनि । सामाजिक अध्ययनका दृष्टिले पनि यौ उपन्यास उपयोगीहुन सक्छ । अन्त्यमा असल पात्र त आफूतो असलपनले प्रभावकारी रहिरहेकैँहुन्छ, खराव पात्रलाई पनि उपन्यासकारले असल परिणतिमा पुन्याएकी छन्‌ ।तिनीहरूले आफूनौ अज्ञानमय पूर्वजीवनप्रति पश्चाताण गर्दछन्‌ र भविष्यमाअसल जीवनतर्फ डोहोरिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपन्यास परम्परागत शैलीमा लेखिए पनि कथावस्तुको संयोजन चरित्रचित्रण सहज प्रस्तुतिले गर्दा आजको एक खास वर्गको जीवनको चित्रण गर्नसफल छ । तथाकथित अभिजात बर्ग र तिनका सामन्ती सोचले गर्दा उत्पन्नभएका बिकृति एकातिर यसको विषय बनेको छ भने अर्कोतिर सुरासुन्दरी रलागु पदार्थको दुर्व्यसनले समाजलाई कति जर्जर तुल्याउँछ भन्ने कुराकोमार्मिक चित्रण गरिएको छ । ठाउँठाउँमा भाबुकताको आधिपत्यका कारणपाठकसमैत भावुकताको प्रभावमा बगेर आँखा रसाउन बाध्य हुन्छ । उपन्यासयस रूपमा निकै सफल भएको छ । यसका अन्य सफलता पनि छन्‌ । यसकोभाषा सरल छ । सिनेमा हेरेझैं, कवानक प्रवाहमय बनेर गएको छ । पाठकलेकथामा अल्मलिनु पर्दैन, कथानकले पाठकलाई तानेर लान्छ । थालनीदेखिअन्त्यसम्म उपन्यास रोचक छ । बौद्धिकताको भारी नवोकेर यसले सरसकौतुहलमय ढङ्गबाट आफूनो कुरा भन्छ । उपन्यासमा कुलतका विरुद्ध एकअभियान जस्तै चलाइएको छ । त्यसैगरी पुरुषले गर्ने नारीको शौषण पनि&lt;br /&gt;
प्रमुख मुहाका रूपमा उठाइएको छ । त्यति मात्र होइन आजका कतिपयनारीहरू आफूना क्रियाकलापद्वारा भ्रमवश र विवशतावश पनि दुव्यसन रपुरुष अन्यायको शिकार हुन पुग्छन्‌, जसले उनीहरूको जीवन विवोलिन्छ,अवसादभ्रष्ट बनाइदिन्छ । तीमध्ये प्रायः परिस्थितिसित मुकाबला गर्दै नयाँजीवन थाल्दछन्‌ । यसले नारीवादी सन्देश पनि रामरी दिएको छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेखिकाको सबभन्दा बलियो पक्ष कै छ भने, आज एउटा अपसंस्कृतिलाईअँगालेर वाँच्दा जुन खोक्रो गर्वको देखावटीपन छ, त्यसप्रति उपन्यास सहमतछैन । प्रेम र त्यसको खोक्रोपन, संस्कृति र विलासिता अनि पी सबका नाउँमाहुने विभिन्न प्रकारका शोषणहरू विरुद्ध आवाज उठाइएको छ, यिनको वास्तविकतार भ्रमलाई छुद्याएर देखाइएको छ । अनि भ्रममा बाँच्नेहरूको दुःखद परिणामपनि छर्लङ्ग पारिएको छ । एउटा पाठकले यसबाट घेरै क्रा सिक्न सक्छ, धेरैसन्देश लिन सक्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अभिजात बर्गका यी पात्रको खोक्रोपन र हिलोमा कमल फुलेझैँ &#039;शालु&#039;जस्ता पात्रको आदर्श, शान्त र सफल जीवनको तुलना गरेर लेखिकाले जीवनकाआडम्बरहरू क्षणिक हुन्छन्‌ भन्ने सन्देश दिएकी छन्‌ । विलासिता पेम होइनयरो हामी यस पुस्तकमा पाउँछौं भने, वास्तविक प्रेमले मानिसलाई वर्दालनेतागत पनि राख्दछ भन्ने सन्देश पनि हामी यसै उपन्यासद्वारा गृहण गर्दछौं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस अर्थमा &#039;उन्माद&#039; एक निश्छल, निःस्वार्थ, त्याग, बलिदान र आत्मिकअनि आदर्श प्रेमको पक्षमा रहेको उपन्यास हो । त्यसकारण यसलाई प्रेमकाबिभिन्न रूप दर्शाउने, प्रेम-त्रिकोणको उपन्यास पनि भन्न सकिन्छ । फिरोज,आकाश र शालुको सम्बन्धलाई नमुनाका रूपमा हेर्न सकिन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपन्यासले एउटा खास समुदायको जीवनका विभिन्न पक्षहरू प्रस्तुतगरेको छ, जसबाट कति पाठक अनभिज्ञ पनि रहेका हुन सक्छन्‌ । यस अर्थमायसले एक वर्गको जीवनको ज्ञान हामीलाई जानकारी दिएको छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सरल र बगेको शैलीले गर्दा अनि कथावस्तुको राम्रो विकासका कारणउपन्यास लोकप्रिय बन्ने आशा गर्न सकिन्छ । यो उपन्यासको कथा अत्यन्तरोचक हुनाले यसमा एक सफल फिल्म वा टेलिश्रृङ््खला पनि वन्न सक्छ भन्नेमलाई बिश्वास छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्त्यमा पाठकमा यो उपन्यास एकदम लोकप्रिय हुनेछ भन्ने शुभकामनादिन चाहन्छु । यो उपन्यास, नरौकिएर पढिसिध्याएँ । अन्य पाठकले पनियसैगरी पढ्नै कामना गर्दछु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डा: घुबचन्द्र गौतम२०६५/११/२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आफनो भनाइ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवनका विविध घुम्तीहरू पार गर्दै म यहाँहरूसामु आफूनो आठौँ कृति&amp;quot;उन्माद लिएर उपस्थित भएकी छु । आशा छ, मेरा प्रिय पाठकवृन्दहरूले,मैरो अन्य कृतिलाई जस्तै यस उपन्यासलाई पनि अवश्य माया गर्नुहुनेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले यो उपन्यास युवावर्गकै लागि लेखेकी हुँ । आफूले देखेसुनेकाघटनाहरूलाई मैले टपक्कै टिप्न खोजेको छु । कथालाई सिगार्ने क्रममाकतै-कतै काल्पनिक शब्द भएपनि यी घटनाहरू धेरैजसो वास्तविक नै हुन्‌ ।ती पात्रहरूको कथाव्यथालाई उतार्न म कतिसम्म सफल भएँ या भइनँयसको जिम्मा लगाउने काम प्रिय पाठकहरूलाई नै सुम्पेकी छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दोषी&#039; उपनामलाई लिएर उठने प्रश्नहरूको सवालमा चाहिँ म यति नैभन्छु, मैले थाहा पाएदेखि आफूनो स्वार्थको लागि अरूको खुसी रेटेभौँ पटक्कैलाग्दैन । आफूले प्रचण्ड गर्मी सहेर अरूलाई छहारी दिँदा पनि भोग्नुपरेकापीडाहरू आफूनै ठासँमा छन्‌ । यही पीडाहरू पोख्ने क्रममा नै म प्रियपाठकहरूको प्रिय लेखिका बन्न पुगेछु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन भनेकी यस्तै हो । प्रत्येकको जीवनमा उकाली ओरालीहरूआइरहन्छन्‌ । आज भने मैले सगरमाथा टेकेको अनुभूत गरेकी छु, किनकिमैले आफ्नो उपन्यासको पानामा वरिष्ठ साहित्य साधक डा. ध्रुवचन्द्रगौतमलाई सजाउन पाएकी छु । म यति विग्न खुसी छु जसको लेखा जोखानै छैन । मेरो बच्चादेखिकै रहर थियो वहाँलाई नै उपन्यासमा भूमिकालेखाउने वहाँले मेरो रहरलाई सहर्ष स्वीकार गर्नु भयो । म वहाँको योगुणलाई आजन्म भुल्ने छैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले जति नै अगाडि पाइला चाले पनि म आफूनो प्रथम पाइला टेकाउनेवरिष्ठ साहित्य साधकज्यूहरूमा कृष्णप्रसाद पराजुली, डा. ओमवीर सिंहबस्न्यात र इन्दिरा प्रसाईलाई कदाचित भुल्नेछैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मलाई प्रेरणा दिने यति विघ्न साहित्य साधकज्यूहरू हुनुहुन्छ । मघर्म संकटमा छु कसको नाम लेखौँ कसको नाम छोडौं | त्यसैले मैलेएकपाटो रोज्न बाध्य भएँ । मेरो साहित्य रूपी सन्तानलाई सही मार्गदेखाउदै भूमिका र समीक्षा लेखिदिँदै मलाई हौसला प्रदान गर्नुहुने वरिष्ठ&lt;br /&gt;
साहित्य साधकज्यूहरूमा रमेश विकल, जनकवि केसरी धर्मराज थापा,गोपिकृष्ण शर्मा, केशव सुवेदी, चुडामणी रेग्मी, मुक्तिनाथ शर्मा (नेउपाने)कलाघधर काफूले, ज्ञानुवाकर पौडेल, मोहन ढुवाल, श्री ओम श्रेष्ठ रोदन,ब्रहमप्रिय प्रेमस्वरूप, श्यामप्रसाद अर्याल, डा. खगेन्द्र प्रसाद लुइटेल, तिलकप्रसादलुइटेल, अर्याल ,अर्जुन विरक्ति, यादव भट्टराई, नवराज रिजाल, बी. केपाल्पाली, अरुण खत्री नदी, विजयराज आचार्य, विश्व सिग्देल, छवीरमणसिल्वाल, दिपेश चौलागाई, ज्ञानेन्द्र विवश यहाँहरू सम्पूर्णप्रति म हार्दिकआमार व्यक्त गर्न चाहन्छु ।&lt;br /&gt;
साहित्य लेखनका लागि मलाई हरक्षण साथ दिने स्व बाबा कुलबहादुर(गजुरेल) क्षेत्री, आमा सूर्यकुमारी क्षेत्री, श्रीमान टेकबहादुर (खरेल) खत्री,बाबु गंगा खरेल, सम्पूर्ण दिज्यूहरू, दाज्यूहरू, नेत्रबहादुर क्षेत्री, डा. राजक्षेत्री, सुरेश क्षेत्री, डा. दिनेश क्षेत्री (भाइ), गोविन्द सुवेदी, शेरबहादर केसी,भाष्कर सुवेदी, पुरेन्द्र शर्मा (भिनाज्यूहरू), छोराहरू आकाश खरेल, क्षितिजखरेल, सम्पूर्ण आफन्तहरूप्रति र नेत्रहीन साथीहरू सुरेश राजभण्डारी,ओमप्रकाश बञ्जाड्े, उन्माद उपन्यासलाई सम्पादन गर्नुहुने कृष्ण पौडेल,कम्प्युटर गर्नुहुने प्रवीण बुढाथोकी, लक्ष्मी श्रेष्ठ, आवरण गर्नुहुने हरिकृष्णबस्ताकोटी, कुश्माखर पाण्डेय, गोपाल गैरै सबैप्रति र प्रकाशनको जिम्मालिएर तपाईंको हातसम्म पुस्तक प््याउने डीकुरा प्रकाशनका प्रति हार्दिककृतज्ञ छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
र, हरेक पक्षमा अपनत्व र सदभावनाका साथ गम्भीरतापूर्वक सल्लाह रसुझाव दिनुहुने बहुचर्चित साहित्यकार पुण्यप्रसाद प्रसाईका प्रति हार्दिकआमार ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्त्यमा पाठकको मायामा नै आफनो अस्तित्व जोगिने हुँदा यहाँहरूकोयस्तै मायाको अपेक्षा गर्दछु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म यो पुस्तक मेरी ममतामयी आमा सूर्यकुमारी क्षेत्रीमा समर्पण गर्दछु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- ललिता &#039;दोषी&#039;&lt;br /&gt;
बुद्धनगर, काठमाडौं&lt;br /&gt;
मिति : २०६४ पुस २३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==एक==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कारको हर्न सुनेपछि मस्त निद्रामा परेकी कान्छी जन्याकजुरुक उठेर गेटमापुगिन्‌ । गेट खोलेपछि कार घरभित्र पस्यो । कार घरभित्र पसेको धेरैबेरभइसक्दा पनि शालु सघैँझैँ दिदी भन्दै बुर्लुक्क उफ्रैँदै निस्किनन्‌ । मालिक रमालिक्नी कारबाट बाहिर निस्कँदै लर्बराएको स्वरमा भने, &#039;हेर कान्छी, अबहाम्री शालु पनि ठूली भइन्‌ । आजदेखि त पिउन पनि सिकिन्‌ । नपत्याएरआफैँ हेर&#039; भन्दै उन्मत्त हाँसो हाँस्तै घरभित्र पसे । मालिक र मालिक्नीकोकुराले कान्छीको हृदय नै छिन्नभिन्न भयो । आँखाबाट बर्बरी आँसु झार्दैमूर्तिकैँ उभ्भिरहिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;शानु मैयाँसापलाई झिक&#039; भन्ने ड्राइभर चन्द्रकान्तको बोलीले झसङ्गभई कान्छीले शालुलाई कारबाट बाहिर निकालिन्‌ । शालुले कान्छीलाई अङ्गालोहाल्दै भनिन्‌, &#039;दिदी टाउको दुख्यो । खुट्टा पनि टेकिँदैन, अब के गरौं ?&#039; कान्छीलेचुपचाप शालुलाई डोच्याउँदै कोठामा ल्याएर पलङमा सुताइन्‌ । शालुको जुत्ताखोलेर कोठाबाहिर राखिदिइन्‌ । कान्छीको आँखाबाट झरेको आँसु रोकिएकोथिएन । शालुले &#039;ऐया, टाउको दुख्यो&#039; भन्दै लामो सुस्केर हालिन्‌ । कान्छीलेपलडमा वसेर शालुको टाउको आफनो काखमा राखेर मिचिदिइन्‌ । तर ओठचल्न सकेन । शालुले दिदी नबोल्नुको कारण बुझेर भनिन्‌, &#039;दिदी तपाई त कुरानै नबुझी रिसाउनुभयो ।&#039; आफनो हात दिदीको आँखामा पुस्साउँदै भनिन्‌,“अहो ! रुनु पनि भएछ । साँच्चि मैले रक्सी पिएकी होइन । कसले मेरोखानेकुरामा के मिसाइदिएछ । मलाई पत्तो छैन । दिदी नरुनोस्‌, साह्रै गाह्रोभएको छ, बत्ती निभाएर जानोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी बत्ती निभाएर आफनो कोठामा आई, डङ्ग्रङ्ग ओछ्यानमा पछारिइन्‌ । आफूलाई थाम्त नसकेर घुँक्क-घुँक्क गरी रोइन्‌ । आँखामा विगत र वर्तमानचलचित्रभैँ नाचिरहयो । आफूलाई घरबाट निकालेपछि फूपूले बच्चा स्याहारगर्न र घरको काम गर्न भनेर दीपक र उर्मिलाको घरमा ल्याएर छोडिदिइन्‌ ।त्यतिखेर शालु अठार दिनकी मात्र थिइन्‌ भने कान्छी बीस-बाईस वर्षकीथिइन्‌ । शालु तीन पुगेर चार वर्षमा लाग्दा उर्मिलाले सुजनलाई जन्माइन्‌ ।शालु र सुजन दुवै कान्छीकै पोल्टामा हुर्कदै गए । कपण्डोलमा टन्न पुर्ख्यौलीसम्पत्ति भएका दीपकले सानै उमेरमा अधिकृत पास गरेको भए पनि अधिकृतकोजागिर छोडी व्यापारमा लागे । व्यापारमा लागेपछि उनको रहनसहन,बोलीचालीमा विस्तारै परिवर्तन आउन थाल्यो । व्यापारमा राम्रो फाइदा भएकोलेचाबहिल र कुलेश्वरमा जग्गा किनी भाडामा लगाउनकैँ लागि घर बनाए ।घरभाडा मात्रै मासिक चालिस-पचास हजार आउने भएकोले उनीहरूलाई पैसाको कमी थिएन । त्यसमाथि व्यापारबाट आउने पैसा छुड्दै थियौ । दीपककावावु-आमा सानैमा मरेका हुनाले दीपक, उर्मिला नै पूर्ण स्वतन्त्र थिए । उनीहरूलेसाँझको खाना घरमा खाएको त्यति याद छैन कान्छीलाई । होटेल, रेष्टुराँ, पार्टीआदिमै आधारात बित्व्यो र बित्छ पनि । मनलाग्दा घर आउँछन्‌ त मननलाग्दा घर आउदैनन्‌ । शालु र सुजन सानौमा बिरामी पर्दा कान्छीले कतिरात आँखा झिमिक्कै नगरी पनि बिताइन्‌, त्यो आफ्नै ठाउँमा छ। सबैपरिवारको तुलनामा ज्यादै संवेदनशील छिन्‌ । शालु र सुजन दुवैलाईकान्छीले हुर्काएकी आए पि कान्छी शालुलाई आफनै मुटुझौँ प्यारो गर्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु कान्छीकै मायालु काखमा ह्किन्‌, बढिन्‌ । बाबु सम्पन्न भएको हुँदाउनले अभाव देख्नुसम्म पनि परेन । अभाव र पीडा भनेको के हो, उनलेकान्छीदिदीले भनेका कथाहरूमा मात्र सुनिन्‌ । शालु कथाका पात्रहरूको दुःखसुन्दा पनि चिन्तित हुनै भएकीले कान्छीले उनलाई दुःखका कथाहरू सुनाउनपनि छोडिन्‌ । शालुको सानो मस्तिष्कले केवल यही सोच्यो । संसार त धेरैसुन्दर रहेछ । सबै सम्पन्न र खुसी रहेछन्‌ । मानव आर्ततादको त पत्तै भएनशालुलाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँसम्म कि आफ्नै घरमा बसेकी, सुन्दर आँखा र बान्की परेको अनुहारभएकी आफूलाई आफनै मुटुभौँ ठान्ने कान्छीदिदीको विगतसँग पनि अनविज्ञथिइन्‌ शाल्‌ । उनले यति मार बुझेकी थिइन्‌- कान्छीदिदी आफूलाई असाध्यैमाया गर्छिन्‌ । आफनो मायाको कारण तै यहाँ वसेकी हुन्‌ । म नै दिदीकोसम्पूर्ण हुँ । जसरी मलाई ठेसलाग्दा दिदीलाई दुख्छ, त्यस्तै दिदीलाई ठेस लाग्दामलाई दुखैन भने म जन्मनुको अर्थ छैन । हो अर्थ .... ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==दुई==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीलाई उठ्नै मन लागेको थिएन । शालुलाई ब्रेकफास्ट दिनकै लागिनसकी-वसकी उठिन्‌ । अण्डा र दूध लिएर शालुको कोठामा पुगिन्‌ । त्यतिखेरसम्मशालुलै स्कुल जानका लागि जुत्ता, मोजा लगाइसकैकी थिइन्‌ । शालुले डराई-डराई कान्छीको अनुहारमा हेरिन्‌ । कान्छीको आँखा रातो र औठ-मुख पनिसुन्निएको साथै मौन थिइन्‌ उनी । शालुले कान्छीदिदीको गालामा म्याइँ खाँदैभनिन्‌, &#039;दिदी नबोल्नै भए म स्कुल नै जान्त के, दिदी त्यत्तिकै पीर गर्नुहुन्छ मबिग्रिन्न भनेपछि बिग्रिन्त ल तपाईंलाई गाड्रो भए जस्तो छ गएर सुत्नोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले कुनै प्रतिक्रिया नजनाई एकोहोरो शालुको अनुहारमा हेरिरहिन्‌ ।गोरो अनुहार, ठूलाठूला निर्मल र सुन्दर आँखाहरू, मिलेको दाँत, पृष्ट छाती,होचो-होचो मोटोमोटो शरीर । शालुले हाँस्तै भनिन्‌, &#039;दिदी मलाई हेरेर कहिलेपनि अघाउनुहुन्न भन्या, साँच्चै दिदी म अप्सराजस्तै छु र ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुको शब्दले कान्छीको आँखा भरियो । शालुले कान्छीदिदीको आखाकोआँसु पुच्छदै भनिन्‌, &#039;मलाई थाहा छ, म दिदीका लागि अप्सराभन्दा पन्ति सुन्दरीछु । म दिदीलाई माया गर्नकै लागि स्वर्गबाट &#039;झरेकी हुँ, म फूल हुँ रे, म जूनहुँ रे, दिदीले सानोमा भन्ने गरेको शव्दहरू अझै विर्सेकी छैन । नरुनोस्‌,आजदेखि दिदीले जे भन्नुहुन्छ त्यही गर्छ,&#039; भन्दै शालु स्कुलतिर लागिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी शालुकै ओछ्यानमा थचक्क बसिन्‌ । आँखामा शालुकै मायालुअनुहार नाचिरहयो । मनमनै सङ्ककल्प गरिन्‌- म मेरी शालुलाई सन्त्रासमयबातावरणभित्र निशास्सिँदै मर्न दिने छैन । मेरी शालु अग्निकण्डमा पर्दा मस्वयम्‌ जल्नेछु । सम्पूर्ण पाएर पनि पसार शालुले आदर्श बाबु-आमा पाउनसकिनन्‌ । शालुकी आमाले आफनो नविसिँदिएकी भए सायद मैले त्योउलंदो बैंसलाई किच्नु, मिच्नु र थिच्नु पर्दैनथ्यो । बैंसलाई थेग्नुपर्दाको कष्टसम्झेर कान्छीको मन भक्कानिएर आयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उमिंलाले शालुको कोठाको ढोका खोल्दै कर्कसा स्वरमा भनिन्‌, &#039;फैरि केभयो तिमीलाई ? किन मुख फुलाएर बसेकी ? शालुले हिजो के अलिकति पिएरआएकी थिइन्‌, यिनको शिरमाथि पहाडै टुट्यो । मेरी छौरीलाई तिमी योजमानामा पनि आफूजस्तै वनाउन चाहन्छयौ : थाहा छ तिमीलाई ? अस्तिडा. पुष्करकी श्रीमतीले मेरो पिउने बानी छैन भन्दा सबै पेट मिचिमिची हाँसे ।डा. पुष्करले कहाँबाट गोबर टिपेछ भन्दै थिए । त्यति मात्र हो र यो जमानामापरिचय गर्दा नमस्कार पो गर्छै । त्यसको हात छुँदैमा त्यो सानी हुन्थी र ! सधैँमै हँ भन्ने डा. पुष्कर त स्वास्नीको गँवारपन देखेर नीलो र कालो भयौ । मेरीशालुलाई अहिलेदेखि नै सभ्य समाजमा रहने तरिका सिकाउँछु बुझ्यौ !?पाइलटको छोरा गान्टै, प्रभाते छ नि त्यो शालुसँग डराउँदो रहेछ । मलाईअन्टी शालुलाई यो गिफ्ट दिनु भनेर दियो । छान्न कति जानेको गान्टैले, फ्रकपनि यति राम्रो ल्याएछ कि ठ्याक्कै हिरोनीहरूले लाउने जस्तो छ भन्या !शालुको पापा भनिसिन्थ्यो- त्यो फ्रक त होलसेलमा नै निक्कै महँगो पर्छ रे !आज त्यही फ्रक लगाएर पार्टीमा लैजान्छु । गान्टे दङ्ग पर्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाको कुराले कान्छीलाई भाउन्त होला जस्तो भयो । कान्छीको मगजलेकेही सोच्नै सकेन । उनी हेरेको हेरै भइन्‌ । भर्खर चौध पुगेर पन्ध लागेकीछोरी नशामा &#039;फुम्दा रमाउने र छोरीकै लागि गिफट ल्याउने आमा पनिहुँदारहेछन्‌ । कान्छी भित्रभित्रै दाह्वा किट्दै कोठाबाट बाहिरिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;ओ डार्लिङ तिम्रो फोन ।&#039; दीपक उर्मिलालाई कडलेस दिएर ट्वाइलेटपस्चै । उर्मिलाले हलो गर्दै भनिन्‌, &#039;हैन किन विहानबिहानै सम्झनुभयो उमाजी? आज खाल त्यहीँ जम्ने होइन र ? त्यहाँ क्यान्सिल भयो रे, किन ? ए कान्छीसास्‌ आउने ? हो भन्या, पाख्रेहरूले त टाउकै खान्छन्‌ । दुई-चार महिनाभएको छैन गएको फेरि किन अन्मरिनु पन्या होला ? त्यसौ भए तपाईँ आज आउनुहुन्त । जचाउनु जानु छ भनेर आज, रै ! हुन्छ, हुन्छ आउनुहोस्‌ ।पाख्रेहरूको फतौरे गफ सुनेर दिन काटन गाह्रै पर्छ । प्रेमाको घरको खान्कीत्यति मीठोचाहिँ हँदैन । छुच्ची मोरी रेडलेबलमा सस्तो रक्सी मिसाउँछै जस्तोछ, जति पेग खाए पनि छुँदैन । बर्गर, पिजा, सेकुवा सबै बाहिरैबाट मगाउनुभन्नु अस्तिनैको जस्तो &#039;झरेष्ट नपरोस्‌ । तासमा धैरै पैसा जित्नै पनि त्यही,खान दिन कन्जुस गर्ने पनि त्यही । मलाई त प्रेमाको व्यवहार पटक्कै मनपर्दैन । आज्ञ त रेडलेबल हाम्रै अगाडि खोल भन्नुपर्छ । हुन्छ म पनि दसै वजेआउँला । फेरि भरे पार्टीका लागि चाँडै फर्किनुपन्यो ति ! मनीषा ब्युटिपार्लरराम्रो छ रे, हुन्छ त्यसो भए म पनि त्यहीँ जान्छु । राम्री त हुनैपन्यो नत्रवूढाहरूले के ठान्लान्‌ ? ल-ल राख्छु । दस बजे नै आउँला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फोन गरिसकेर भान्सामा आई डाइनिङ टेबुल ठटाउँदै भनिन्‌, &#039;हरे शिव !यो कान्छीलाई कालले घिसार्ने बैला भयो कि कसो ? अझै ग्यास सल्काएकीछैन, कहाँ मरी होला ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले भान्साको ढोकामा आई भनिन्‌, &#039;सापनी ! आज साह्रै गाह्रो भएकोछ चन्द्रकान्तलाई काम गर्नु भनिस्यो । उनैले सबै काम गर्छन्‌, फ्रिजमा फ्राइमासु, अचार सबै छ । चिया र भुजा पकाउने त हो नि!&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिला चिच्याइन्‌, “ओहो ! अब त यो राँडको जिव्रो पनि कर्दझौँ भइसक्यो ।शालुलाई माया गर्दिन भनौं भने पनि त्यत्रो जवानी नै बलि चढाई । माया गर्छभनौं भने शालुले लाए, खाएको देखिसहन्न । हामी सगुल्लै बाबु-आमा हुँदाहुँदैयसलाई केको टाउको दुखाउनुपर्दो हो कुन्नि ? हिजो शालुले पिएर आएपछियसको होस हराएको छ । न यो घरबाट निस्की भन्दा निस्कन्छे । कुन जुनीकोपाप आइलाग्यो ।&#039; उर्मिला फतफताउँदै चन्द्रकान्तलाई बोलाउँछिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाको वाणरूपी शब्दहरू सुत्दासुन्दै अचानो भइसकेकी कान्छीको छातीमाउर्मिलाको गालीले त्यति दुखैन । हिजौकौ शालुको दृश्य सम्झेर भने तरक्कआँसु झारिन्‌ । &#039;अन्न फारो गर्नु हुँदादेखि छोराछोरी बानी लाउनु कुनादेखि&#039;भन्ने उखान सम्झिन्‌ । आफूले जति चोट सहन परे पनि शालुलाई सपार्छु ।&#039;अन्त्य राम्रो त सबै राम्रो&#039; यस्तै मनमा करा खेलाएर ओछ्यानमा छटपटाइरहिन्‌कान्छी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==तीन==&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले कान्छी सुतेको कोठामा गएर बोलाए, &#039;कान्छी खान आरु,साप-सापनीको सबारी भयो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले विरक्त स्वरमा भनिन्‌, &#039;तिमी खाक म पछि खान्छु ।&#039; चन्द्रकान्तले सम्झाए, &#039;तिमी भोकभोकै बस्दैमा समस्याको समाधान हुन्छत ! तिम्रो गाँठी क्रा मैले पनि बुझेको छु । म पनि शालु मैयाँसापलाई मायापर्छुनि ! आक खाँदै शालु मैयाँसापलाई सर्पको डसाइबाट कसरी टाढा राख्नेहो दुवै मिलेर सल्लाह गरौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तको कुरा सुनेर कान्छी उठिन्‌ र चुपचाप चन्द्रकान्तको पछिपछिभान्सामा आइन्‌ । चन्द्रकान्त मेचमा बसे । कान्छीले चन्द्रकान्तनजिकैको मेचमाबस्दै भनिन्‌- &#039;चन्द्रकान्त ! शालु मैयाँसाप त मैले रक्सी पिएकै होइन भनिसिन्छनि ! उहाँले यो उमेरमा आएर पहिलोपल्ट मसँग &#039;फूटो बोलिस्यो बुझ्यौ ?त्यसैले हृदयमा उठेको हुरीको &#039;फोक्का मत्थर हुँदै भएन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले लामो श्वास फेर्दै उत्तर दिए- “मैयाँसापले भनेको करा ठीकहो । तिमी कुरा नै नबुझी मन सानो बनाउँछयौ । मैयाँसाप र अरू केटाकेटीहिन्दी गीतमा डान्स गर्दै थिए । सबैले मैयाँसापको डान्स र सौन्दर्यको तारिफपनि गरिरहेका थिए । मैयाँसाप गाह्रो भो भन्दै म नजिकै आएर बस्नु भो । त्योगान्टेले सिँगै फेन्टाको बोतल मैयाँसापलाई दे भनेर इसारा गरेको मैले झट्टदेखेँ । मैयाँसापले फेन्टा लिएर घुदघुट पिइस्यो । फेन्टा पिएको केहीबेरमै झुल्नथालिस्यो । मेरो सातोपुत्लो गयो । म मैयांसापलाई समातेर बसिरहेँ । सालेगान्टेको मनशाय बुझन थाहा नपाएझैँ गरी त्यसलाई हेरैँ । त्यो सिकार खानआतुर भएको सिंहभौँ थियो । त्यसको त्यौ रूप सम्झँदा अहिले पनि मुदुढुकढुक हुन्छ । दीपक साप र उर्मिला मैयाँसापलाई छोराछोरीको केही वास्ताछैन । पिउन र अश्लील कुरा गर्न पाए केही चाहिँदैन । आज पार्टीमा मनभएको भए शालु मैयाँसापको जीबन तहसनहस हुन्थ्यो होला । कान्छी, अबशालु मैयाँसापका लागि केही गर नत्र तिम्रो सपना टुक्रिन्छ । प्रभाते जस्ताकोगिद्दै दृष्टिबाट कहिलेसम्म बचाउन सकिन्छ र ? पार्टीमा भएकोले पौ म सँगैथिएँ । होटेल, रेस्टुराँमा त टन्न भात खाएर आई कारमै मुर्दालाई ढुकेझँ साप-सापनीलाई ढुक्न हो । होटेल रेस्टुराँमा यो दर्घटना घटेको भए के हुन्थ्यो होला,आफैँ सोच त । त्यो गान्टे देख्दा मात्र सानो हो । केटीहरू फेरी-फेरी कारमाडुलाएको मैले कतिपल्ट देखेको छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तको कुराले कान्छी होस हराएझैँ भइन्‌ । कान्छीको भोकप्यासकता भाग्यो-भाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले करा थपे, &#039;कान्छी तिमीलाई थाहा छ ? त्यो जँडपाहा पूर्णेकीछोरी मोनाको अस्ति राति सम्साँझैमा बलात्कार भएछ नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले आत्तिँदै भनिन्‌, &#039;होइन के भनेको तिमीले ? अस्ति बिहानै त होमैले भेटेकी ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ल कस्तो बिश्वास गर्दिनौ तिमी, अस्ति बेलुका नै बलात्कार भएको रे ।आज बिहान दूध लिन जाँदा सबै त्यही कुरा गर्दै थिए । बलात्कार पनि एक-दुईजनाले हो र चार-छ जनाले गरेका रे । कस्तो समय आयो, त्यत्रि कोपिलालाईपनि बाँकी राखेनन्‌ यौनप्यासीहरूले । मोनाको उमेर त वाह् वर्षको थियो होलाहोइन र?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तको कुराले कान्छीलाई काटेको घाउमा नुनचूक दलेझैँ असहयभयो । कान्छी केही नबोली चुप नै रहिन्‌ । आँखामा मोनाको मायालु अनुहारर खुट्टा खोच्याङ-खोच्याङ गर्दै हिँडेको दृश्यहरू नै आइरहयो । कान्छीको आँखाबाटपुनः आँसुको वर्षा भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले सम्झाए, &#039;भौ अब नरोक । तिमी धेरै कोमल छ्यौ, त्यसैलेदुःखका कुराहरू नै गर्न मन लाग्दैन । बरु मोनालाई हेर्न जञाक । उनलाईशान्तभवनमा राखेको छ रे । विचरीको आफन्त भन्नु नै को छ र ! बाबु-आमालौकल ठर्रामा फुल्दै होलान्‌ । ल म गएँ, तिमी पीर नगरी बस&#039; भन्दै चन्द्रकान्तहिँडे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी बस्नै नसकी फेरि ओछ्यानमा गएर पल्टिन्‌ । उनको मनमा नानातर्क-विर्तक खेलिरहयो । कहिले मोना त कहिले शालु कान्छीको आँखामानाचिरहै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;ममी, दिदी त हुनुहुन्न कहाँ जानुभएछ ?&#039; शालुले स्कुलबाट आएर सोधिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उमिंलाले साडी मिलाउँदै भनिन्‌, &#039;ए, कान्छी बाहिर गइन्‌, शालु बेटा योफ्रक लगाएर हेर त, आज यही फ्रक लगाएर पार्टीमा जानुपर्छ, फ्रकमा तिमीसाँच्चिकै परीझैँ देखिन्छयौ । तिमीलाई प्रकाशे कस्तो लाग्छ ? क त तिम्रो खुवतारिफ गर्दै थियो ।&#039; ,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले अलि रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;ममी त्यस्ताको कुरा नै नगरिस्यो । कान्छीदिदीलेसघैँ भन्नुहुन्छ, &#039;म त राजकमारी जस्तै छु रे । राजकमारीले त धेरै पढ्नुपर्छरे।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;भो, बढी कुरा नगर । फ्रक लगाएर निस्क । मआइहाल्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
शालु फ्रक टिपेर कोठामा गइन्‌ । उर्मिलाले मनमनै सोचिन्‌, &#039;शालु छिटोफ्रक लगाएर बाहिर निस्किहाले हुन्थ्यो । कान्छीलाई ओछ्यानमा सुतेको देखिन्‌भने अर्को आपत आइपर्छ । बल्ल-बल्ल अलिअलि सभ्यता सिक्दैछिन्‌ । कान्छीशालु सभ्य भएको हेर्न सक्दिन । क शालुलाई आफूजस्तै गँबार बनाउनखोज्छे । छोटोको सङ्गत गन्यो भने मान्छै छोटै हुन्छ भनेको ठीकै रहेछ । शालुर कान्छीको बोल्ने शैली एकै छ। त्यो राँड यो घरबाट निस्कीभन्दा पनिनिस्किन मान्दिन । हरै भगवान्‌ ! कुन साइतमा यसलाई भित्र्याएका रहेछौं ।अहिले निल्नु न ओकाल्नु भएर घाँटीमा अड्की ।&#039;&lt;br /&gt;
शाल्नु फ्रक लगाएर आमासामु गइन्‌ । उमिला खुसी हुँदै चिच्याइन्‌, &#039;बाऊ ! कति सुन्दरी देखिएकी तिमी, फ्रकको कलरले पत्ति कति म्याच गरेको ।&#039;आमाको क्राले शालु पनि खुसी भइन्‌ । उर्मिलाका क्राहरू सुनेर कान्छीकोमुटुको ढुकढुकी भने बढ्यो । उनी जुरुक्क उठेर ट्वाइलेट गइन्‌ । दुवाइलेटगाएको केही समयपछि उनी चिच्याइन्‌, &#039;ऐया, म मरें, म मरें मैयाँसाप !&#039;कान्छीको आवाज सुनेर शालु दौडंँदै दवाइलेटमा पुगिन्‌ । र, कान्छीदिदीकोनिधार समात्दै भनिन्‌, &#039;ल छिटो हिंँड्नुस्‌ डक्टरकोमा जाँ । निधार धेरैफुटेजस्तो छ ।&#039;&lt;br /&gt;
उर्मिला रिसाउँदै कोठाबाहिर निस्केर भनिन्‌, &#039;फैरि कै भयो यसलाई : छोरी हिँडआज बाबाले नै कार चलाइसिन्छ । चन्द्रकान्तले कान्छीलाई डक्टरकोमा लैजान्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले रिसाउँदै उत्तर दिइन्‌, &#039;यहाँ दिदीको निधार फुटेको छ । 0401 डुपार्टीको वास्ता छ । देखिसेन निधारबाट रगत वगेको । हजुरहरू गै सो मनैदिदीलाई डक्टरकोमा लैजान्छु ।&#039; शालुको शब्दले कान्छीको मन केही ढुक्कभयौ।&lt;br /&gt;
“हामीभन्दा त्यसकी वजै ठूली भई&#039; भन्दै मनमनै फतफताउँदै उर्मिलाघरबाट निस्किइन्‌ । कान्छीलाई निधारमा लागेको चोटको कनै बास्ता थिएन ।शालुलाई रोक्न सकेकोमा नै उनी खुसी थिइन्‌ । निधारबाट शालुको हातहटाएर ऐनामा निधारको घाउ हेरिन्‌ । रगत भल्ल वग्यो । कान्छीले सोचेकोभन्दा घाउ ठूलो नै रहेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले आँखा चिम्लेर भनिन्‌, &#039;दिदी, दिदी घाउ छोप्नुहोस्‌ न मलाई ढरलाग्यौ ।&#039; हौ&lt;br /&gt;
कान्छीले कपासले घाउ छोप्दै भनिन्‌, &#039;शान्तभवन नै जाउँ न त मैयाँ ।त्यहाँ मोनालाई पनि भेटौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;मोनालाई कै भएको छ र ?&#039; शालुले प्रश्न गरिन्‌ ।&lt;br /&gt;
“सबै त्यहीँ गएपछि थाहा हुन्छ, जाउँ ।&#039; कान्छी र शालु शान्तभवन जानकालागि ट्याक्सी चढे । ट्याक्सीले शान्तभवनको मोड लिँदै गुड्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==चार‍‍==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समय साँझसाँझको थियो । शान्तभवन पुगी ओर्लिन नपाउँदै एउटा युवकशालुनजिकै आएर भन्यौ, &#039;ओ ! च्वाँक देखिएकीछयौ छ च्चाक !&#039; केही पाइलाचालैपछि अर्को युवकले कुरा थप्यो, “ओ यार ! प्लिज एक किस मात्र भए पनिदेक, म स्वर्ग पुगेझैँ हुन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीलाई च्याप्प समातिन्‌, कान्छी सुनेको नसुनै गरी हिँडिरहिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले चार-पाँचजना युवाको नजिकँबाट शालुलाई हिँडाइन्‌ । त्यहां शालुलेकेही सुन्नुपरेन । कान्छीले पुनः चार-छजना युवा भएको नजिक गएर ब्यागखौतलखातल गरेझै गरी शालुलाई अड्त बाध्य गराइन्‌ । एउटा युवकले अर्कोयुवकलाई कोट्याउँदै भन्यो, “क हेर ।&#039; अर्को युवकले शालुतिर हेर्दै भन्यो, &#039;मैयाँफ्रक अलि लामो भएछ । थोरै छोटो भएको भए झनै सुहाउँथ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
अर्कोले टक्क ओठ बजाउँदै भन्यो, &#039;म पनि यस्तै कपडा किनिदिउँला,तिमीसँगसंगै हिँडिदिउँला ।&#039;&lt;br /&gt;
अर्काले हाँस्दै कुरा थप्यो, तिमीहरू के-के किनिदिन्छौ किन रानीवन घुम्नचाहिँमसँग हिँड ।&#039; शालुले कान्छीलाई चिमोट्दै भनिन्‌, &#039;दिदी यहाँबाट छिटो जाकैँ ।&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीले निधारमा टाँका लगाउँदा शालुलाई सँगै राखिन्‌ । डक्टरको ध्यानकान्छीमा भन्दा आफूमा बढी केन्द्रित पाइन्‌ शालुले । शालु मनमनै रिसाउँदैटाँका लगाउन लगेको ठाउँबाट वाहिर निस्किन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु बाहिर ढोकामा के उभिएकी मात्र थिइन्‌, एउटा अधबैंसे पुरुषलेशालुलाई धक्का मार्दै हिँड्यो । केही बेरपछि एउटा साठी-बैसट्टी वर्षको बूढोलेशालुको कान नजिकै गएर भन्यो, &#039;तिमीलाई देखेपछि त आफू बूढो भएकैबिसेँछ नानी !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिका सति [ शब्दहरू सुनैर शालु थरधर काम्न थालिन्‌ । कान्छी बाहिर&lt;br /&gt;
कै शालुले कान्छीलाई च्याप्प समातेर भनिन्‌, &#039;दिदी छिटो घर&lt;br /&gt;
जाँ । मैरो त प्राण नै जान लागिसक्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले शालुलाई ट्वाइलेटनजिकै लगेर हातमा झोला थमाउँदै भनिन्‌,&#039;ल ट्वाइलेटमा गएर यौ कपडा फेरैर आइस्यो सब ठीक हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालु दबाइलेटमा गएर कान्छीदिदीले जन्मदिनका दिन दिएको कर्या-सुरुवाल लग्राएर वाहिर निस्किन्‌ । कान्छीले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;अब हजुरले कसैकोअपशब्द सुन्तुपर्ैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रुन्चै स्वरमा सौधिन्‌, &#039;दिदी म उत्ताउली छु र : प्रत्येकले मलाईनराम्रै दृष्टिले हेरे । साँच्चि कति टाँका लगाउनुपत्यो ? दुख्यो पनि हौला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;चार टाँका लगाउनुपःयो । नदुछ्ने सुई दिएकाले दुखेको त्यति पत्तो भएन ।हजुर बिलकलै उत्ताउलो होइसिन्न । त्यौ फ्रकले गर्दा नै मान्छेहरूले हजुरलाईत्यस्तो ठानेका हुन्‌ । एउटा चरित्रवान्‌ मान्छेले त्यस्तो कपडा कहिल्यै पनिलाउँदैनन्‌ । कत्तिको बलात्कार त कपडाले गर्दा पनि हुन्छ । प्रत्येक कुराहरूमैले भन्नुभन्दा पनि आफैँले जान्नुपर्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले ठुस्किँदै भनिन्‌, &#039;दिदीले घरमै यो कपडा नलगाउनु भनेको भए मलगाउँदिनथेँ नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“उमिंला मैयांसापले कपडाको राम्रो तारिफ गरेको सुनेपछि बोल्ने आँट नैआएन । अर्को कुरा कपडाको आधारमा मानिसले हजुरको मूल्याङ्कन कसरीगर्दारहेछन्‌, आफैँले अनुभव गरिसिन्छ जस्तो पनि लाग्यो, त्यसैले कर्था-स्‌रुवालबोकेर आएकी नि !&#039;&lt;br /&gt;
शालुले भनिन्‌, &#039;यो फ्रकलाई ममीकँ अगाडि च्यातेर टुक्राटुका पार्छु ।&#039;शालुको कुरा सुनेर कान्छीको मत खुसीले गद्गद्‌ भयो । कान्छी र शालुक्याबिन तं. १०५ मा पुगै । कोही आएको चाल पाएपछि मोनाले पुलुक्क आँख्चाखोलिन्‌ । कान्छी र शालुलाई देखेपछि मोनाको आँखाबाट आँसुको मूल फुट्यो ।गला अवरुद्ध भयो । शालु र कान्छीका आँखाहरू पनि रसाए । शालुले मोनाकोकपाल मुसार्दै भनिन्‌, &#039;के भयो तिमीलाई :&#039;&lt;br /&gt;
मौनाले कान्छी र शालुलाई स्टुलमा बस्न आग्रह गर्दै भनिन्‌, &#039;दिदीहरूलाईथाहा छैन कि क्या हो ? म त बर्बाद भएँ । मैरो त बलात्कार भयो नि !&#039;&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीलाई हेर्दै भनिन्‌, &#039;के भनेको मोनाले, मैले त कुरै बुझिर्न ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाले घुँक्कघुँगक रुँदै भनिन्‌, हेर्नोस्‌ शालुदिदी मलाई पाँच-छजनालेबलात्कार गरे । बलात्कार गर्दा मरेकी भए पनि हुन्थ्यो । किन बाँचे हुँला ? तर,बाँचेको पनि ठीकै छ । आफूले थाहा पाएदेखि नै पेटभरि खान नपाए पनिअबदैखि पेटभरि खान पाउने भएँ ।&#039; मोनाको अनुहारमा केही खुसीका रेखाहरूकोरिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;कसरी पेटभरि खात पाउने भयौ !&#039; कान्छीले जिज्ञासा राखिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;मोनाले केही हाँसेझैँ गरी भनिन्‌, &#039;मलाई अस्ति बचाउने मालिक-मालिकनीलेलैजान्छ भन्नुभएको छ । उहाँहरूले लैजान्छु नभनेको भए म यही हस्पिटलकोछतवाठै हामफालेरै भए पनि मर्थे, तर त्यो नर्कजस्ता घरमा म फर्कंदैनथैँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु मोनाको क्राले एकोहोरी भइन्‌ । केहीबेरपछि आँखाको आँसु पुछ्दैसोधिन्‌, &#039;तिमीमाथि वलात्कारचाहिँ कसरी भयो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौनाले गहभरि आँसु पार्दै भनिन्‌, &#039;दिदी खुट्टामा नराम्रोसँग सिसाले काटेकोहुँदा हिँडनै नसकेर ओछ्यानमा पाल्टरहेकी थिएँ । बाबुले कराउँदै भन्यो, &#039;मोनाछिटो तल मौर, रक्सी लिन जानुपर्छ भनेर खुट्टा दुखेको बहाना गर्छेस्‌ ?&#039; आमामैरो नजिकै थिइन्‌ । मैले आमालाई भने, &#039;आमा, मलाई भट्टीमा जानै मनलाग्दैन । रक्सी खान आएका पुरुषहरूले कै-के भनेर जिस्क्याउँछन्‌ । त्यसमाथिरात पनि परिसक्यो । खुट्टा पनि काटेको छ, म हिँड्न सक्दिनँ ।। आमा चुपलागिन्‌ । बाबु तलबाट हँसिया बोकेर माथि आयो अनि हँसिया उठाउँदै भन्यो,“खुरुक्क रक्सी लिन जान्छेस्‌ कि यही हँसियाले छिनालुँ ?&#039; बाबु मलाई काट्नअघि सत्यो । म पिटाइबाट बच्न खुट्टा खोच्याउँदै भट्टीमा गएँ । कृष्ण साहुलाईसिसी दिँदै भने, &#039;एक लिटर रक्सी दिनोस्‌ रे पैसा भोलि दिने रे ।&#039; भट्टीमा युवा वृद्धा सबै थिए उनीहरूले हास्दै भने, &#039;यस्ती राम्री छोरी नै पठाएपछि पैसा किनचाहियो ?; हेर्दा-हेर्दै यो त तरुनी पो भई । आइजौ भुटन-चिउरा खा !&#039; भुटनचिउरा देखेपछि मेरो मुखबाट पाती आयो । मैले भने, &#039;छिटो रक्सी दिनोस्‌,मलाई बेर भइसक्यो । साहुले रक्सी दियो, रम्पी लिएर दस-वीस पाइला मात्रके सारैकी थिएँ, एउटाले मलाई च्याप्प समात्यो । अर्कोले मुखमा कपडाकोच्यो । अरू दुई-तीनजनाले घिच्याउँदै मलाई खेतमा लगेर मेरा शरीरमाथिखेल्न याले । म केहीबेर पीडाले छदपटाएं, त्यसपछि के भयो पत्तै भएन । मबाटोमा मिल्किरहैकी देखेर उहाँहरूले यहाँ ल्याउनुभएको रे । साहृ-साहुनीदयालु जस्तै हुनुहुन्छ ।&#039; मोनाले उज्यालो अनुहार लगाएर कुरा थपिन्‌, &#039;दिदीमैले आज टन्त भातमासु पनि खान पाएँ नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुलै अचम्म मान्दै भनिन्‌, &#039;यसभन्दा अगाडि तिमीले टन्त भात्तमासुखाएकी थिएनौँ त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;पेटभरि ढिंडो-पिठो त खान पाएकी छैन । मासुभातको क्रै छोडौं । वाहाछ दिदी मेरो बाबु-आमा टन्न मासु-रक्सी खाँदा मलाई एक टुक्रा मासु खाभनेर दिँदैनथे । भोलिपल्ट बिहान भाँडा माँझदा उनीहरूले फयाँकेको हड्डीचुस्थँ । कहिलेकाहीँचाहिँ उनीहरूले नखाएर फूयांकेको छाला खान्थे । अबभनै... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाह-तेद वर्षकी मोनाको कुरा सुनेर शालुको जीउभरि काँडा उम्नैमौँ भयो ।उनी केही बोल्न नसकेर चुपचाप भइन्‌ । त्यत्तिकैमा मौनाकी आमा भीमाआएर अचम्म मान्दै भन्तिन्‌, &#039;अहो ! शालु नानी र कान्छी पनि आइछिन्‌ । हेर्नोस्‌न शालुमैयाँ यो हैजाले दिनु दुःख दिई । आफनो जीवन पनि बेर्ध पारी । हाम्रोपनि बद्नाम गरी । अब यस्तालाई कसलै पो विवाह गर्ला ? यसका दिदीहरूपनि उमेर नपुग्दै पोई चाहिएर हिँडे । यौ पनि भट्टीका केटाहरूसँग छिल्लीहोला अनि के वाँकी राख्ये, होइन त ! हिजो बिहान एक्कासि यो हस्पिटलमाछे भन्ने खबर आउँदा त सातै गयो भन्या ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु र कान्छीले नै &#039;भीमाको अनुहारमा हेरै । उसको अनुहारमा दुःखकोएक कण पनि थिएन । शालुले गह्रौँ मन पारेर सोधिन्‌, &#039;अस्ति राति मोना घरनआएपछि कहाकिहाँ खोज्नुभयो नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;मोना नआएपछि यसका बाबु फतफताउँदै भट्टीतिर गएका थिए ।“त्यहीँबाटफेरि रक्सी बोकेर आएछन्‌ । मेरो जीउ साह्रै दुखेको हुनाले अलिकति रक्सीपिएकी त भुसुक्कै निदाएँछु । कान्छीको तिधारमा के भयो : हजुरचाहिँ कताबाटनि?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&#039;दिद्वीलाई घाउ लागेकोले टाँका लगाउन आएका थियौं । एकपल्ट मौनालाईहेर्न मन लाग्यो । अनि यहाँ पसेका हौं । मोना तिमी हिँडडुल गर्न सम्छ्यौ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दिउँसोदेखि अलिअलि हिँडे । मेरो डिस्चार्ज पनि भइसक्यो । अहिले साहु-साहुनी मैरा लागि कपडा लिन जानुभएको छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमाले अलि हड्बडाउँदै भनिन्‌, &#039;कुनवैला आउने हुन्‌ साहृ-साहनी, घरढ्विलो गयो भने बूढाले महाभारत गर्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमाको त्यो क्रूर रूप देखेर कान्छी र शालु नै मौन भई उनलाई हेरिरहे ।केहीबेरपछि हातमा कपडाको पोको बोकेर अधबैंसे लोग्ने-स्वास्ती मोनासामुआए । अधबैंसे आइमाईले भनिन्‌, &#039;हिँड बिस्तारै दवाइलेट गएर लुगा फेरौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कपडा लिँदै भनिन्‌, &#039;हजुर यहीँ बसिस्यो, म कपडा फेराइदिन्छु ।&#039;यति भनी शालु मोनालाई लिएर ट्वाइलेटतर्फ लागिन्‌ । मोना पाइलैपिच्छेऐया-ऐया गर्दै टबाइलेटमा पुगिन्‌ । विहान फेरेको कपडामा रगतका केहीटाटाहरू रहेछन्‌ । मोनाले कपडा फेर्न खुद्ठा उचात्दा दाह्रा किटेर ऐया गरिन्‌ रआँसु &#039;भररिन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालुले मोनाको पुरानो कपडा ब्यागमा हाल्दै भनिन्‌, &#039;मोना, दुई-चार दिनयहीँ बसेको भए हुन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
मोनाले लामो श्वास फेर्दै भनिन्‌, &#039;अस्ति बेलुका एघार बजे हस्पिटलल्याएदेखि मालिबनी सापले एकछिन पनि छोडनुभएको छैन । उहाँ पनि रोगीहुनुहँदौरहेछ । हातखुट्टा सुन्निएर आयो, कुर्ने कोही नहुँदा मालिककै घर जानपत्यो ।&#039; शालुलाई मान्छेहरूको विभिन्त रूप देखेर खुसी र दुःख दुबै लाग्यौ ।सबैजना विस्तारै गेट बाहिर निस्कै । शालुले मौनालाई कारभित्रसम्म पुन्याइन्‌ ।कारमा बस्दा पनि मोना ऐया भन्दै बसिन्‌ । भीमाले साह-साहनीतिर हेरैभनिन्‌, &#039;हजुर पैसाचाहिँ एक गते नै चाहिन्छ है । हिज्ञो भनेको भन्दा एक पैसानघटाउनुहोला । फेरि एक गतेभन्दा उता नजाओस्‌ नि ! कार गुड्दा मोनाखिसिक्क हाँसिन्‌ । शालु र कान्छीले पनि हात हल्लाएर बिदाइ गरे । भीमालेकार टाढा पुग्दासम्म त्यही शब्द दोहो-्याइन्‌ । हजुर म एक गते नै पैसा लिनआउँछु । एक गते ........ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पाँच==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;प्रभाते सधैँ-सघैँ सोध्छ । आन्टी शालु किन आउँदिनन्‌ भनेर । खाने मुखलाईजुँगाले छैक्दैन । एक-दुई घन्टा त यसो मुड फ्रेस पनि गर्नुपर्छ । अरू केटीहरूप्रभातै भनेपछि मर्ने खोज्छन्‌, प्रभातेचाहिँ तिम्रो दिवाना बनेजस्तो छ । तिम्रोभाग्य बलेकै छ कि क्या हो ?&#039; उर्मिलाले क्रा चुहाइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रिसाउँदै जवाफ दिइन्‌, &#039;ममी आइन्दा मलाई यस्ता फाल्तु करानगरिसेला । मैरो मुडअफ हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;त्यौ राँडले के-के क्रा गरेर तिम्रो कानमा फुकिहोला, अनि मेरो कुरालेमुडअफ भयो होइन तिमीलाई ! कान्छीले तिमीलाई भड्घालोमा पार्दा थाहापाउली । स्व्रास्तीको गँवारपनले डा. भट्ट अहिले कसैको अगाडि मुख देखाउनसक्दैनन्‌ । तिमीले पनि आफनो लोग्नेको त्यही चाल गराउँछयौँ, मैले देखिसकेँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;ममी हामीबीच किन दिदीलाई ल्याइसिन्छ ? यो जमानामा एकपेट खाएरसम्पूर्ण काम गर्ने मान्छै पाउँदा पनि हजुर खुसी होइसिन्त !&#039;&lt;br /&gt;
उर्मिला चर्किन्‌, &#039;त्यस राँडलाई कसले बस भनेको छ र : पैसा पाउनेठाउँमा मर भनेको त हो नि ! त्यसैको बाबुको पेवाझैं ठानेकी छे यस घरलाई ।आमा-छोरीको सम्बन्धमा नै विष घोल्ने त्यो राँडलाई निकाल्न सकिनँ भने मेरोनाम उर्मिला होइन बुझयौ !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीलाई निकाल्ने करो गरेपछि शालु झसङ्ग भइन्‌ र आमाको रिसशान्त गर्नु श्रेय ठानिन्‌ । ज्यादै नम्र स्वरमा भनिन्‌, &#039;ममी पनि त्यसै रिसाइसिन्छ ।सबै सरमिसहरू भन्नुहुन्छ । मेरो पढाइ ज्यादै कमजोर छ रे, त्यसैले पो होटेल,पार्टीतिर जान छोडेकी । हजुरलाई थाहा नै छ अस्ति नशा पिउँदा म झन्डैबैहोस भएकी ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;ल-ल चेपारो घस्नुपर्दैन । आमाको मन राखिदिनक्रहिलेकाहीँ जाँदा कति नै पढाइ बिग्रिन्थ्यो र ? लाटी, पहिला-पहिला रक्सीपिउँदा मलाई पत्ति कम गाह्रो पर्दैनथ्यो । बिस्तारै पिउँदै जाँदा अहिले म रक्सीनभई बाँच्नै सक्दिनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु आमाको कुरा सुनेर मनमनै रोइन्‌ । कान्छीदिदी अनेकौं घृणा सहँदैआफनो घरमा बस्नुको रहस्य बुझिन्‌ । ममीले तारिफ गरेको कपडा लगाउँदासहनुपरेको अपमान सम्झिन्‌ । कान्छीदिदीले दिएको कपडा लगाउँदा मोनालाईलैजाने साहुनीले भनेको पनि सम्झिन्‌ । त्यो साहनीले बडो सभ्य भाषामाभनेकी थिइन्‌, &#039;नानी हेर्दा त ठूलै खान्दानकी जस्ती छ्यौ । धैरै चरित्रवान्‌बनाएका रहेछन्‌ बाबु-आमाले । न लगाइमा उच्छुङ्खलता न व्यवहारमा नै ।के हो नानी तिम्रो नाम र बाब्‌-आमाकी नाम ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमाले बीचैमा भनेथिन्‌, &#039;हो हजुर शालु रानीको सम्पत्तिको गणना गरेरसाध्य छैन, तर शालु रानीकै निम्ति यही कान्छीले सारा जीवन अर्पिन्‌ । त्यसैलेछरछिमैकीहरू यिनलाई शालुको पहिला जन्मको आमा हनुपर्छ भन्छन्‌ । मालिक-मालिक्नीले त सयौँपल्ट निकाल्न खोजेका थिए, शालु रानीकै मायाले त्योघरमा अडेकी छिन्‌ यिनी ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाको मालिक्नीले खुसी हुँदै कान्छीलाई विस्तारै दुईपल्ट घाप मारिन्‌ ।शालुको आँखामा त्यो दृश्य पनि नाच्यो ।&lt;br /&gt;
“लौ कहाँ हरायौ शालु ? आमाको शब्दले शालु झसङ्ग भइन्‌ र भनिन्‌,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;ममी हजुरको सुन्दर रूप देखैर टोलाएकी । साँच्चै हजुरहरूको ग्रुपमा हजुर नैरामो होइसिन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;हेरन फुर्क्याएकी । यो रातो लिपिस्टिक लाउँदासुहाउँछ कि, गुलाफी लिपिस्टिक लाउँदा सुहाउँछ भन त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हजुरलाई दुबै लिपिस्टिक सूहाउँछ, तर गुलाफीले चाहिँ सौभर देखिन्छ,&#039;शालुले उत्तर दिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिम्रा पापाले त रातै मनपराइसिन्छ भन्या । त्यसैले रातै लिपिस्टिक लगाउँछुहै? फेरि आज हामी दस-बाह?जनालाई मात्र बर्मा सापले बोलाएका छन्‌ ।त्यसैले पापाले कार हांँक्नुहुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दिदी यो टीका लगाउनोस्‌, ममीले त सधैँ यस्तै टीका लागाइसिन्छ । अनिमात्र दिदीसँग तरकारी किन्त जान्छु ।&#039; कान्छीले टीका हेर्दै जिब्रो काढ्दै भनिन्‌,“उमिंला मैसापले थाहा पाउनुभयो भने मार्नुहुन्छ । जे होस्‌, हजुरलाई मनपर्नेहुनाले लगाइदिन्छु ।&#039; कान्छीले आफूले लगाएको टीका खोलेर शालु दिएकोटीका लगाएर तरकारी किन्त हिँडिन्‌ । बाटोभरि चिनैकाले कान्छीको मुखमाहेरेर हाँस्दै भने, &#039;होइन कान्छी तिमी त बहुलाउन लाग्यौ किक्याहो? योधोतीमा त्यस्तो टीका कहीँ सुहाउँछ ! बैँस धान्यौ, बुढ्यौली धान्न सक्दिनौजस्तो छ अब, तिमीलाई तिधारै ढाक्ने लामो टीकाभन्दा सानै टीका सुहाउँछ ।&#039;कान्छीले कसैको कुरा पनि वास्ता गरिनन्‌ । घरमा आएपछि शालुले लामोटीका झिकेर सात्रै टीका लग्राइदिइन्‌ । तीन-घार वर्षअगाडिको कुरा सम्झैरशालुलाई नमज्जा लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रातो लिपिस्टिक लगाएर पुनः सोधिन्‌ उर्मिलाले, &#039;भन त नानु म कस्तीभएँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ममी ज्यादै राम्रो भइस्यो । म जान्छु है&#039; भन्दै शालु आफनो कोठामापसिन्‌ । ओछ्यानमा पल्टेर दिदीले गाली खाँदाको त्यो क्षण पनि सम्झिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिदी आज पनि हिजो काकाको घर जाँदा लगाएको त्यही साडी लगाउनौस्‌ ।त्यो साडीले तपाईलाई साह्रो सुहाउँछ । कान्छीले त्यही साडी लगाएपछि शालुरमाइन्‌ । सधैँ साँझमा मात्र घर फर्किने उर्मिला बैंकको चैक लिन घर आइन्‌ ।कान्छीलाई नयाँ साडीमा देखेपछि कान्छीलाई कहाँ गएर आएको भनेर सोधिन्‌ ।कान्छीले कहीँ पनि गएकी छैन भनेपछि चिच्याइन्‌, &#039;मलाई ढाँद्छेस्‌ नकचरी,बाहिर जाने साडी लगाएकी छे, सोझो करा गर्दिन । सधैं म नभएको मौकापारैर बाहिर मर्दी पो रहिछे ।&#039; (कान्छी चुप लागिन्‌)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;मुसुमुन्द्रे रा जे भने पनि एक कानबाट सुनेरअर्को कानबाट उडाउँछै । भन्‌ कहाँ मरेकी थिइस्‌ ? कोसँग पल्केकी छस्‌ हं ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले आफनो कोठाबाट निस्केर भनिन्‌, &#039;किन दिदीलाई गाली गरिस्या ममी : कुरा नै नबुझी गाली गर्नै हौ ? मैले दिदी हिजो लगाएको साडीलगाउनुहोस्‌ तपाईंलाई सुहाउँछ भनेर जिट्टी गरेपछि, बल्ल उहाँले लगाउनुभएकोहो । हजुरले त सघैँ राम्रो-राम्रो साडी लगाइसिन्छ । दिदीले एक दिन पनि राम्रोसाडी लगाउन हुँदैन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;गालु तिमी पनि अचम्मकी छ्यौ । घरको काम गर्दा साडी लगाएर कामगर्न गाह्रो हुन्छ । यस्ती बच्चीले जे भन्यो त्यही गर्ने यो पनि कम्तीकी छे?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुलाई अतीत सम्झेर मनमा कता-कता नमज्जा लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साँझ-साँझ परेपछि उमिला र दीपक कारमा बाहिर गए । कान्छी भान्साकोकाम गर्दै थिइन्‌ । शालुले कान्छीको नजिक वस्दै भनिन्‌, &#039;दिदी के गर्नलाग्नुभएको ? तपाइँको कामचाहिँ म गरिदिन्छु । मैले भनेको कुराको उत्तरचाहिँतपाईंले दिनुहोस्‌ नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हजुरले अलि-अलि कामचाहिँ सिक्नुपर्छ, तर अलिपछि मात्र, अहिलेको कामभनेकै पढ्ने हो । गइस्यो कोठामा बसेर पढिस्यो, म तातो दूघ लेराइदिन्छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन, आज के कुरा हुँदैछ, आमाछोरीको, हामी पति सुनौं न !&#039; चन्द्रकान्तठट्यौली गर्दै भान्सामा पसे ।&lt;br /&gt;
“के हुनु नि तिम्रै कुरा गरेको, हामी दुईजनालाई भए तरकारी पकाउनुपर्दैनथ्यो । तिमी हलीले खाने जति तरकारी खान्छौ त्यसैले तरकारी कादनलागेकी&#039;, कान्छीले उत्तर दिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमीलाई दुःख हुने भए बाहिरै खाउँला नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;ल हेर चन्द्रकान्त त रुतै थाले । सानौ करामा पनि चित्त दुखाउँछ्‌ यिती । जाबोतरकारी पकाउन के गाह्रो ? मारी बोबनुपनै होइन ।&#039; कान्छीले उत्तर दिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले चन्द्रकान्ततिर हेर्दै भनिन्‌, &#039;बस्नोस्‌ न दाइ । म दिदीलाई यहाँ किनआउनुभयो, फेरि यत्रो वर्षसम्म किन यहीँ बस्नुभयो त्यही कुरा बुझत दिदीलाईफकाइरहेछु ।&#039; -&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले शालुको कुरामै सही मिलाउँदै भने, &#039;भन न कान्छी हामी पनिसूनौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले काट्दै गरेको तरकारी पर सार्दै भनिन्‌, &#039;त्यसो भए चन्द्रकान्तलेथोरै तरकारीमा चित्त बुझाक है त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमीले मागे त यो प्राण नै दिन्थेँ । जाबो तरकारी त के, तिमीले मनकोकुरा बुझिनौ र पो मात्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले हाँस्दै भनिन्‌, “यो चन्द्रकान्त दाइलाई ठट्टा गर्ने कसले सिकाओस्‌,होइन दिदी ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले आँखामा टल्पल आँसु पार्दै भने, &#039;मोरिजाकँ मैयाँ ढाँटेकोहोइन । यो घरमा पसेपछि कान्छीले हजुरलाई माया गरेको देखेपछि म मेरोटुहुरो छोरोलाई यही आमा दिन्छु भनेर क्रैँ । कुर्दाकर्दै कपाल फल्न लाग्यो ।यिनले मेरो आखाको भाषा बुझ्दै वुझिनन्‌ । अव त छौरो पनि आठ-दसबर्षको भइसक्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले अलि रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;मैयांसापसँग पनि चाहिँदो-नचाहिँदो कुरागर्ने हो ? हेरिस्यो मैयाँसाप यिनी मभन्दा तीन-चार वर्ष कान्छा छन्‌ । म यहीपुसमा पैंतीस पुगेर छत्तीस लाग्छु । वास्तवमा चन्द्रकान्तले स्वास्नीको मायालेकतै बिवाह नगरी वसेका हुन्‌ । एकान्तमा रोएको दुई-चारपटक त मैले पनिदेख्लेकोचाहिँ छु । मैले कति सम्झाइसके विवाह गर भनेर यिनी पटक्कै मान्दैनन्‌ ।म जस्तोको कुरा के खान्थे ?&#039;&lt;br /&gt;
वर्षौँवर्षदेखि बाँधेको बाँध एकैचोटि भत्केझै गरी चन्द्रकान्त घुँक्कघुक्क गर्दैरुन थाले ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी र शालुलाई नै चन्द्रकान्तको पीडा देखेर साह्रै नमज्जा लाग्यो ।दुबैले सोचै- चन्द्रकान्त स्वास्नीलाई सम्झेर भक्कानिए । कान्छीले चन्द्रकान्तकोकुरा मोड्दै पलङमा वसेर आनन्दले कूरा गर्ने बताएपछि तीनैजना शालुकोपलङ्गमा बसेर गफ गर्ने थाले । कान्छीले लामो श्वास फेर्दै भनिन्‌, &#039;शालुमैयाँसापको मायाले गर्दा सबै कुरा भुनिसकेकी थिएँ । पुनः मैयाँसापको आग्रहलेअतीत काट्याउँदै छु- मलाई याद छ, म पनि सानोमा हजुरजस्तै चञ्चलथिएँ । त्यसैले होला आमा मलाई चञ्चली भन्दै बौलाउन्हुन्थ्यो । बा-आमा रम अति नै हाँसीखुसीका साथ दिनहरू बिताइरहेका थियौँ । म पढ्नमा तेजभएकी हुँदा एक कक्षादेखि नै प्रथम भएँ । म प्रथम हुँदा बाले प्रत्येक वर्ष खसीढाल्नुहुन्थ्यो रे । म पांच कक्षामा हुँदा खसी काटेर सबै गाउँलेलाई भोज खानदिएको त मलाई अझै याद छ । हाम्रो खुसीमाथि दैवलाई इर्ष्या भएरै होला वावुआफुभन्दा बाह्र वर्ष कान्छी अत्यधिक राम्री इन्दुको मायामा फसेछन्‌ । त्यसपछिघरमा सधैँ रडाको मच्चिन थाल्यो । बाले मेरी गंगाजस्ती आमालाई विभिन्नपुरुषहरूको बात लगाउन थाले । मलाई पनि त मेरी छोरी नै होइन भन्दैबिनाकारण कुट्न थाले । एकरात मेरी आमालाई अहिले निस्किनस्‌ भने आजकोरात काट्न दिन्न भनेपछि आमा मलाई छलेर मामाघर गइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रुन्चे स्बरमा सोधिन्‌, &#039;दिदी रात कादन दिन्न भनेकोचाहिँ के होनि? फेरि तपाईंलाई किन छाडनुभएको नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले पनि आफनो रसिलो आँखालाई धोतीका टुप्पौले पुछ्दै शालुकोप्रश्नको उत्तर दिइन्‌- &#039;रात काट्न दिन्न भनेको तलाईं मार्छु भनेको हो । मलाईघरमै छोड्नुको कारणचाहिँ छोरीले पेटभरि खान पाउली भनेर हुनुपर्छ । किनकिमेरो बाबु प्रशस्त पुँजीवाल थिए । मामाघरमा पेटभरि खान साह्रै गाह्रो थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मामाघरमा माइजूले आमालाई अति नै हेला गर्न थालेपछि फुपूले आमाको दुःखहेर्न नसकी स्बास्नी मरेको तीन छोराछोरीको बानु बूढो-बूढो पुलिससंग टीका-टाला गरेर पठाइदिनुभएछ । पछि पैले आमाको बारैमा सोध्दा भन्नुहुन्थ्यो,“तानी, तेरी आमालाई लोग्नेलगायत सौतेला छोराछोरीले पनि असाध्यै मायागर्छन्‌ । जाँदा तँलाई पनि लैजान्छु, त्यो तर्कमा छोरी राख्दिनचाहिँ भनेकी हो ।हामीले नै तँलाई उससँग पठाउन उचित ठानेनौँ । आमाले पठाएको पैसा-कपडाचाहिँ बेलाबेलामा फपूले लेराइदिनुहुन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले बीचैमा सोधिन्‌, &#039;तपाइँकी आमा गएपछि तपाईंको बाबुले के गरे ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बर आँसु खसाउँदै कान्छीले भनिन्‌, &#039;बानुले आमा गएको रात नै अलिठूलो भुँडी भएकी साह्टै रामी पुतलीजस्ती सानीआमा इन्दुलाई घरमा भिच्रायाए ।सानीआमाले मलाई शङ्ककाल्‌ आँखाले हेरेपछि बाबुले हाँस्दै भने, &#039;यसलाईछोडेर मरिछै । हुन्देक तिम्रो स्याहारसुसार गर्ने काम लाग्छ । तिम्रो फलजस्तोतरम हात्तले काम गरैको म हेर्न सक्दिनँ । नभन्दै त्यसै दिनदेखि बानुले त्योपुतलीजस्ती सानीआमाको खुट्टा मिच्नदेखि लिएर सम्पूर्ण काम गर्ने लगाए ।बाबुले घरमा ल्याएको चार महिनामै सानीआमाले सुन्दर छोरो पाइन्‌ । त्यसपछित झन्‌ बाबुको खुट्टा भुइँमा नै भएन । छिमेकीहरूले “कै हौ रामे चार महिनामैछोरो पायौ नि&#039; भनेर भन्दा बावु जँगा मुसार्दै भन्थे, &#039;हाम्रो भेट भएको त एक-दुई वर्ष भइसकेको थियो । जेठी घरमा हुँदाहुँदै कान्छी भित्रायाउनु मनले मानेनजेठी हिँडेपछि बल्ल मैले यिनलाई भित्रयाएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छिमेकीहरू उत्तर दिन्थे, &#039;किन क्रो चपाउँछौ, रामे, जेठी ननिकाली कान्छीआउन्न भनिन्‌, त्यसैले जेठीलाई निकालेँ भनन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाबु हाँस्दै भन्थे, &#039;ल भन्नोस्‌ मैले जेठीलाई कुटेर निकालेको हो त!अघिपछि यस्तो कृटपिट भयौ होला अर्कै क्रा, त्यस दिन छोएकोसम्म पनि छैनमरिजाकँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;बचनले कृट्यौ होला तत्र घर नै छोड्नेखालकी थिइनन्‌ कान्छीकी आमा ।जे होस्‌, बुढेसकालमा कान्छीकी आमालाई सम्झी-सम्झौ नरोएस्‌ । छिमेकीहरूसबै त्यसै भन्थे ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाबुले उन्मत्त हाँसो हाँस्दै ठाडो उत्तर दिन्थे, &#039;मेरी कान्छीलाई देखेपछिडाहा नगर्ने मान्छै नै देखिनँ ।&#039; बाबुको कराले छिमेकीहरूको मुख बन्द हुन्थ्यो । मेरोपीडा मसँगै थियो । बिहान चार बजेदेखि उठेर घरको सम्पूर्ण काम गर्थे ।भाइको दिसाको थाङ्ना घुनदेखि लिएर तेल लगाइदिने जिम्मा पनि मेरै थियो ।गाई-भैंसी चराउने, भकारो सोत्तर गर्ने, भात पकाउने गर्दा पनि कहिल्यै जसर पेटभरि खान पाउँदिनँथैँ । म मर्नु-बाँच्नुको दोसाँधमा दिन घिसारिरहेकीथिएँ । आमाले पठाइदिने गरेको कपडा र खानेकुरा सानीआमाले खोसेर माइतीपठाइदिन्थिन्‌ । एकदिनको कुरो हौ । म साह्ै भौकाएर गौठालाबाट घर आएँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अँगेनामा फुक्क फुलेको चामलको रोटी देखेँ, भोक खै नसकेर एउटा रोटीचोरेर भाग्दै थिएँ । भाइले रोटी चोरेको देखैछ । आमालाई क्रा लगाइहाल्यौ ।आमा चौटावाट दौडेर आई मलाई लछादै अँगेनामा लगेर तातो भुङ्ग्रोमा हातघुसादै भनिन्‌, &#039;यही होइन तेरो रोटी चोर्ने हात, अब पनि चो्छस्‌ कि : म पीडासहन नसकेर चिच्याएँ । एकैछिनमा हातमा ठूलाठूला फोका उठे । साउनकोमहिना थियो, म पोलेको पीडा सहन नसकेर मर्न भनी खोलातिर दौडँदै थिएँ ।काकीले समातेर ल्याई घाउमा घ्यूकुमारी लगाइदिनुभयो । वेलुका वाबु आएरमेरो घाउ हेर्नुको साटो चोर्नी रण्डीको बान भन्दै मेरो कपाल जगल्द्याएरथाममा ठोक्काइदिए । म पुनः मर्लान्त भएर पछारिएँ । त्यो पोलेको हातले पनिशान्ति पाएन । बेलुका भाँडा माझ । सबैजना हात कुहिएर झर्छ भन्थे । तरझरेन, महिनौं पछि हात निको भयो । दाग भने अझै छ। कान्छीले शालु रचन्द्रकान्तलाई दाहिने हात बढाएर हातको दाग देखाइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु र चन्द्रकान्तका आँखाबाट आँसुहरू बग्न थाल्यो । कान्छीले पनिआफनो आँखाको आँसु पुछ्दै भनिन्‌, &#039;हजुर रुने भए अब म करै गर्दिनँ ।&#039;शालुले रत्चे स्वरमा भनिन्‌, &#039;दिदी अव साँच्चै रुन्न ल सबै कूरा भन्नौस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले कूरा बताइन्‌, &#039;मासु पकाएका दिनहरूमा भने मलाई चाँडै सृत्नपठाउँथे । भाइहरू सुतेका छन्‌ भने पनि भाइहरूलाई उठाएर मासु खुवाउँयै ।म थाहा पाएर पनि थाहा नपाएझौँ गरी रुँदै सुत्थैँ । भोलिपल्ट थुप्रिएकाभाँडाहरू माझ्दा ठीक मोनाले भनेझैँ म पनि हड्डी र छालाहरू चपाउँथैँ ।यसरी अति नै कष्ट सहेर अठार वर्ष बित्यो । गाउँकै पढेलेखेका भावेन्द्रले मेरोदुःख हेर्न नसकी मागी मलाई मन्दिरमा लगैर सिन्दूर हालै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्त कान ठाडो पार्दै भने, &#039;कान्छी तिम्रो कुरा भोलि सुनौँला । तलकारको हर्न लाग्यो ।&#039; चन्द्रकान्त गेट खोल्न गए । शालु खाना खान्न भन्दैओछयाचमा पल्टिन्‌ । चन्द्रकान्तले पनि खानै इच्छा छैन भने । कान्छी पनिभोकै सुतिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==छ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्कुलबाट आएपछि कपडा पनि नखोली कान्छीसामु गएर उनको हात मुसादैंशालुले भनिन्‌, &#039;दिदी आज ममी-पापा मात्र बाहिर जाने कुरा सुनेकी थिएँ ।चन्द्रकान्त दाइ पनि हुनुहुन्छ । अस्तिको बाँकी तपाईंको कथा भन्नुस्‌ है ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले विरक्त स्वरमा भनिन्‌, &#039;अब म हजुरलाई केही करा गर्दिनँ । मैरोकुरा सुनेपछि हजुर र चन्द्रकान्तले कति दिन खान खाइसेन । बितेको कुरासम्झँदै मन दुखाएर कहीं काम लाग्छ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीको गालामा म्वाइ खाँदै फकाइन्‌, &#039;ल आज साँच्चि पीरगर्दैनौं । मलाई त कहिले वाँकी कुरा सुनौं जस्तो भइसक्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीले मुसुक्क हास्दै भनिन्‌, &#039;हजुरको कुरा कसले पो टार्न सक्ला र?जिरी गरेपछि गस्यो, गस्यौ । त्यसौ भए आजचाहिँ खाना खाइवरी बसौंला है ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले खुसी हुँदै झ्यालबाट फूलबारीमा पानी हाल्दै गरेको चन्द्रकान्तलाईबोलाइन्‌ । चन्द्रकान्त फूलमा पानी हालिसकेर आए । त्यतिखेरसम्म कान्छीलेकुकरमै खाना बसाइन्‌ । खाना पाक्न बेर नै लागेन । तीनैजनाले बिहानकैँतरकारी र अचारसँग खाना खाए । कान्छीले भान्सा पुछपाछ गरिन्‌ । चन्द्रकान्तलेभाँडा माझ । शालुले भाँडा घोप्ट्याइन्‌ । चाँडै काम सकेर तीनैजना कोठामागए । पलङमा सञ्जिलोसँग बसे । कान्छीले शालुतिर हेर्दै भनिन्‌, &#039;हजुरलाई क्रासुन्न पाएपछि पढ्न पनि पर्दैन ? जाँच बिग्रियो भने मचाहिँ रिसाउंछु नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(दिदी पनि, एकैछिन नपढ्दैमा कहीँ पढाइ विगिन्छ र ? म पढ्छु । साँच्चैराञ्चैसँग पढ्छु । ल भन्नोस्‌ । भावेन्द्रसँग विबाह भएपछि के भयो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले भावुक हुँदै कुरा बढाइन्‌, “भाबेन्द्रसँग विवाह भएपछि मैले भावेन्द्रर उसको घरपरिवारको भरपूर माया पाएँ । मेरो विवाह गरेको तीन-चारमहिना पनि नवित्दै बाबुलाई एकदिन बेलुका धानमा पाती लगाउन गएकोमौका पारी कसैले दाउराको चिर्पटले टाउकोमै बजारेछन्‌ । बाबु चोट सहननसकी त्यहीँ बेहोस भएछन्‌ । हान्ने मान्छलेचाहिँ बाबुलाई मन्यो भनेरै छोडेकोहोला, संयोग बाबु उत्तानो परेर ढलेको हुँदा पानीमा मुख गाडिएको रहेनछ ।भोलिपल्ट खेतमा जानेहरूले देखेपछि हस्पिटल पुन्याएछन्‌, हस्पिटल लगेर होसखुल्ने सुई दिएपछि होस खुल्यो रे ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“दिदी कसले किन हानेको रहेछ त्यो पापीलाई ? तपाईं हेर्न जानुभयो त !&#039;शालुले जिज्ञासा राखिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठूलोबुबाको जेठो छोरो र सानीआमाबीचको नरामो सम्बन्ध मलाई घेरैपहिलादेखि नै थाहा थियो । उनीहरू मलाई त मान्छे नै गन्दैनथे । कहिलेकाहीँम घरभित्र छु भने दाइ आएर भन्धे, &#039;वानी, बाहिर जा, म घरबाटनिस्कन्धें । सानीआमा र दाइको हाँसोठट्टा भने बाहिरैसम्म सुनेकीथिएँ । बालै आफनी प्राणप्यारी स्वास्नी र छोरोकै बीचको सम्बन्ध थाहापाएपछि आमालाई गाली गरे रे भन्ने सुनेकीचाहिँ हुँ । आमा र दाइकै मिलेमतोमाबाबुलाई मार्न खोजेको हुनुपर्छ भन्ये छिमेकीहरू, तथ्य कुरा उनीहरूलाई नैथाहा हौला । दाउराले हानेपछि बाबुको मुन्टो केही हल्लिन थाल्यो । चालीस-पचास हजार खर्च गरेर टाउकोको अप्नेसन गरे सफल पति हुत सक्छ, असफलपनि हुन सक्छ भन्दा सानीआमा अप्रेसन गर्न तयार भइनछन्‌ । मेरो लोग्नेलाईकेही भयो भने कसले जिम्बा लिन्छ भन्दै बाजिन्‌ रै भन्ने सुनेकी थिएँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुलाकको सुब्बासम्म भएका बाबुलाई पेन्सन नपाकी अफिसबाट काम गर्नसक्दैनस्‌ भनी निकालिदिएछन्‌ । बाबुको मुखबाट बेलाबेलामा -्याल निस्किनथालेपछि कान्छीआमा बाबुलाई पिँढीमा भात दिन्थिन्‌ रै भन्ने हल्ला सुनेकीसम्महुँ । म त्यो निर्दयी बाबुलाई हेर्नसम्म गइनँ । त्यौ पतिङ्गर मलाई र आमालाईसम्झौर धेरै रुन्थ्यो रे । त्यसै भन्थे छिमेकीहरू ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले फेरि प्रश्न गरिन्‌, &#039;त्यो अहिले जिउँदै छ कि मम्यो दिदी !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;त्यौ पापी यति छिट्टै के मर्ध्यौ ? कान्छीआमाको गोठालो भएर बसेको छरे । ठूलोबुबाको छोराले स्वास्नी बिबाह गरे पनि सातीआमालाई पनि छोडेकाछैनन्‌ रे । फुपू त्यसै भन्नुहुन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु र चन्द्रकान्तकै अनुहारमा खुसी छायो । शालुले मुसुक्क हाँस्दै भनिन्‌,&#039;दिदी तपाइंको सानीआमा र जातुला दई काट्न म नै जान्छु भन्ने सोचेकी थिएँ ।दैवले नै काटेछ त्यस निचलाई मैले केही गर्नुपरेन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले सम्झाइन्‌, &#039;मैयाँसाप हामीले रिसलाई बडो कन्ट्रोल गर्नुपर्छ, ।कहिलेकाहीको रिसले मान्छेको सिङ्गो जीवन नै तहस-नहस हुन्छ । हजुरलेबुझिराख्नुपर्ने कुरा यही हो । मेरो बाबु-आमा, मोनाको बाबुजस्ता मान्छेहरू तरक्कयानसरह हुन्‌ । उनीहरू जस्तालाई चलाउँदा आफनै मुखमा छिटा पर्छ ।&#039;२&amp;quot; &#039;ल ल अब चाँडै रिसाउँदिन तपाईं र भावेन्द्रबीचको क्रा गर्नुहोस्‌ । त्यतिमाया गर्नै भावेन्द्रले तपाइँलाई किन छोडे ?&#039;&lt;br /&gt;
के भनौं मैयाँ मैरो भाग्यमै खुसी लेखेको रहेनछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले मुटुमा गाँठो पारेर भने, &#039;शालु मैयाँसाप, म कान्छीलाई सक्दोखुसी दिन तयार थिएँ र छु पनि यिनलाई आफनो खुसीको मलतब नै छैन ।विनको प्राण त केवल हजुरमै अड्को छ । हजुरले भन्ठानिस्यौ होला अस्तिकान्छी चिप्लेर लडिन्‌, त्यौ होइन हजुरलाई पार्टीमा जानबाट रोक्नकै लागियिनले जानीजानी आफनो टाउको फुटाएकी हन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“चुप लाग चन्द्रकान्त नत्र म तिमीसँग बोल्दिनँ । हैन, त्यसो हैन मैयाँसापचन्द्रकान्त &#039;फूट हुन्‌ । यिनको वनावटी कुरामा विश्वास नगरिसेला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले आफनो आँखाको आँसु हातले फुड ओभानो पार्दै भने, &#039;होमैयाँसाप हजुर झुल्दै आएको देख्दा यिनको होस नै गुम भयो । यिनी रातभरिहजुरकै पीरले सुत्न सकिनन्‌ । भोलिपल्ट मसँग शालु मैयाँसापले रक्सी पिएकैहो त भनेर सोधिन्‌ । मैले मैयाँसापले रक्सी पिइस्या होइन । त्यो प्रभातेले नैफेन्टामा केही हालेर मैयाँसापलाई दिन पठाएको हुनुपर्छ । त्यो प्रमातेको चरित्रराम्नैँ छैन, मैले धैरै केटीहरूसँग देखेको छु । मैले मैयांसापको रक्षा नगरेको भएके हुन्थ्यो होला&#039; भनेपछि यिनले भनिन्‌, “चन्द्रकान्त तिम्रो गुण म कहिल्यैबिर्सने छैन । अनदेखि मेरो मैयाँसापलाई त्यस्ता प्रभातेहरूको आँखाबाट टाढा राख्न सकिनँ भने म आफनो जन्मलाई धिक्कार ठान्छु । म मोर्छु चन्द्रकान्तशालु मैयाँलाई केही भयो भने म त मोर्छु भन्दै थिइन्‌ । उमिंला मैयांसापलेदीपकसापसँग कुरा गरेपछि पौ म झसङ्ग भएँ। उमिंला मैयाँसाप भन्दैहोइसिन्ध्यो- हेरिस्यौ हजुर, त्यो कहीँ नभएकी लवस्तरीले आज शालुलाई रोकेरैछौडी । शालुलाई दिदी छैन वाहिर गएकी छिन्‌ भनेर &#039;झुक्काइसकेकी थिएँ ।हत्तनपत्त दवाइलेटमा गएर टाउको पो फटाएर मरिछे । शालुले त्यसको निधारमाकँ रगत देखी उसलाई पुगिहाल्यो, मसंग आउन किन मान्ची । साह्रै घटियाआइमाई रहिछै त्यो । 0 01014 [लाई त्यसको सङ्गतबाट छुटाएन भने हामी कहीँमुख देखाउन लायक हुँदैनौं । कम्की छे त्यो राँड शालुमाधि सम्पूर्ण अधिकारमेरै छ जस्तो गर्छ । बिहानदेखि एक थोपा पानी पनि मुखमा हालेकी छैनत्यसले । अब शालुलाई दुई-चार दिन बाहिर पठाएर त्यसलाई निकाल्नैपन्यो ।त्यो हुँदासम्म शालु हाम्रो कुरा भन्दा त्यसैको करा सुन्छिन्‌ । सधैँ कमारीकँजीत कति सहनु ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डीपकसापले नराम्रो केही भन्नुभएन । उमिंला मैयाँसापलाई सम्झाउनुभयो,हेर उर्मी, कुवाको पानी सिदिएपछि मात्र कुबाको महत्व थाहा हुन्छ । कान्छीनपढेकै भए पति समझदार छै । शालुलाई हानि हुने कुरा क सोच्न पनिसबिदन । बस हामीमै कतै खोट भएर शालु कान्छीकै क्रामा विश्वास गर्छिन्‌कि सोच त । दीपकसापले के त्यति मात्र भन्नुभएको थियो उर्मिला मैयाँसाप तसिंहिनीझौ गरी गर्जिन थाल्नुभयो । त्यसो भए म नै नजाती हँ । अब म मरेपनि भयो होइन ? दीपकसापले सम्झाउँदै भन्नुभयो- &#039;उमिला चुप लाग मतनदुख्लाक । म शालुलाई दुई-चार दिनका लागि बाहिर घुम्त लैजान्छु । तिमीकरसंगरी भए पनि कान्छीलाई घरबाट निकाल । त्यसको कारणले घरमा धेरैअशान्ति भयो । मैले उहाँहरूले गरेको कुरा कान्छीलाई आएर भने ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले बडो सरल रूपमा नै भनिन्‌, &#039;यो घरबाट मेरो लाश निस्किन परेपनि म यो घर छोड्दै छोडदिनँ । म भइनँ भने मेरो शालु मैयाँसापको जीवनभत्किन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कान्छी चिच्याइन्‌- कति बकवास ओकन्छौ चन्द्रकान्त तिमी, मेरो करासुन्न बसेको कि आफनो भाषण सुनाउन ? चुप लाग्लान्‌ भन्यो, :&lt;br /&gt;
चुप त लाग्नै नै होइन तिमीलाई झूट ओकल्न कसले सिकायो हँ ? सँगैबसेपछि कहिलेकाहीँ ठूली मैयाँसापले गाली गरिस्यो &#039;होला तर उहाँ तिमीलेभनेभौँ कठोर होइसिन्न ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले केही दिनअगाडि मात्र आफनी आमाले भनेको कुरा सम्झिन्‌ । शालुबेटा, तिम्रो पापाले तिमीलाई एक-दुई दिन घुमाउन लाने कुरा गरिस्या छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;किन म मात्र हजुर पनि जाँ न एक्लै बोर हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाको जवाफ थियो यहाँ व्यापारमा अलि किचलो भएको छ, म जानमिल्दैन । पौखरा पुगेपछि तिम्रो साथी सिर्जना छँदैछिन्‌ नि । सिर्जनाले तिमीलाईहेर्न मन गरेकी छिन्‌ रे क्या । पापाको फुर्सद हुनेबित्तिकै पापाले तु लगिसिन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले शालुको हात समातेर मुसार्दै भनिन्‌, &#039;हेर यो चन्द्रकान्तको झुटोकुराले गर्दा मैयाँसापको मन दुख्यो । यो मगरको जात एकोहोरो पो हँदोरहेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“चन्द्रकान्त ! शालुलाई बचाएकोमा तिम्मौ गुण कहिल्यै बिर्सन्न भन्नै पनित्यही मुख, आज अनेक थरी भन्नै पनि त्यही मुख । जे कुरा पनि शालुमैयाँसापलाई केही नभन है म बिन्ती गर्छु भन्छिन्‌ । आज पोल खोलिदिएँ बोलेबोल न बौले नबोल । कहिले पो तिमीले मेरो हृदय चिहाएकी छौ र ? शालुमैयाँसाप एकान्तमा म स्वास्तीको मायाले होइन यिनको मायाले रुन्छु । आजसम्मम विवाह नगरी यिनकै मायाले बसेको हँ । स्वास्नीको माया लाग्छ, नलाग्नेहोइन । मैले उनलाई पाठेघरको क्यान्सरबाट बचाउन सारा सम्पत्ति सिध्याएँतर केही लागेन, मरेकी स्वास्नीको खुसीका लागि त्यो टुहुरो छोरोलाई यहीआमा दिन्छु भनेर बसें, आज त यस्तो &#039;फुटो उस्तो &#039;फुटो पो भन्छिन्‌ । काजीसापको के काम नमिलेर मात्र शालु मैयाँसापलाई पोखरातिर लगिस्या छैनत्यसपछि थाहा पाउली के होला ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कुरा मोद्धनु नै उचित ठानिन्‌ र भनिन्‌, “चन्द्रकान्त दाइ अब सबैकुरा छोडेर दिदी र भावेन्द्रको कुरा सुनौँ, तपाईंहरू दुवैजना चुप लाग्नुहोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले उठ्दै भने, &#039;म यित्तको एउटा कुरा पति सुन्दिन । कै नै कुराहोला र लोग्नेकै खुसीका लागि फेरि बलि भइ्टहोलिन्‌ र यो तर्कमा आइन्‌ ।&#039;यति भन्दै चन्द्रकान्त रिसाउँदै हिँडे । कान्छी र शालु हेरेको हेरै भए । दुवैलेचन्द्रकान्त रिसाएको पहिलोपल्ट देखेका थिए ।&lt;br /&gt;
कान्छीले भनिन, &#039;चन्द्रकान्तले जे भने त्योचाहिँ सोड्रैञाना ठीक हो । मबाटचार वर्षसम्म वच्चा नभएपछि घरपरिवारले मलाई साह्रै हैला गर्न थाले ।भावेन्द्रले मलाई घरमा नबसी हामी हङकङ जाँ, उतै गएर राम्रो औषधिगरौँला भनेका थिए । मैले उनको क्रा मानिनँ । तपाईंबाट बच्चा हुन्छ भनेविवाह गर्नुहोस्‌ भनेर जि्दी गरें । उनले सबैको करमा परेर विवाह गरे । विवाहगरेपछि पनि उनमा धैरै परिवर्तन आएको थिएन । सौताले बच्चा पाउनेभएपछि भने थोरै परिवर्तन आयो । भन्थे, &#039;कान्छी तिमीले विवाह गर्नु भनेरठीक गन्यौ । तिम्रै बाटो कुरेको भए सन्तानको मुख नै नदेख्ने पो रहेछु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मलाई पनि उनको खुसी देख्दा लाग्थ्यो । सऔौताको जात न हो कभावेन्द्रलाई मैरो नजिकसम्म पर्न थी । सबै परिबार कान्छीकै पक्षमाथिए । एक रात भावेन्द्र मेरो कोठामा सुत्न आएको निहँमा घरमा महाभारतमच्चियो । भोलिपल्ट भाबेन्द्र अफिसतिर गएपछि सौतालगायत सासूससुरामिलेर मलाई मलाई घिच्चाई-मुन्टाई गरी घरबाट बाहिर निकाले । सौताले त घरबाट निस्किन मानिनस्‌ भने अहिल्यै पेटको बच्चा मारिदिन्छु भनी । त्यसपछित्यहाँबाट निस्केर फपूकोमा गएँ । फूपूले भोलिपल्ट यहाँ लेराइदिनुभयो । हजुरलाईदेखेपछि विस्तारै आफनौ पीडा भुल्दै गएँ । साँच्चै मैयाँसाप अहिले त मलाई तीक्षणहरू सबै सपनाजस्तो लाग्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले सोधिन्‌, &#039;भावेन्द्र तपाईंलाई फेरि कहिल्यै भेदत आएनन्‌ त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मलाई छोडेको पाँच-छ वर्षपछि यहीँ मलाई भेट्न आएका थिए । उर्मिलामैयाँसापले जाने भए जाङ भन्दा हजुरले मेरौ फरियाँ समातैर रुँदै भनिस्यौ,“दिदी जाने भए म पनि सँगै जान्छु । म हजुरलाई समातैर घुँक्कघुँक्क गर्नपुगेछु, भाबेन्द्र कै भन्न खोज्दै थिए, अलमल्ल परे । त्यसपछि &#039;भाबेन्द्र केहीनबोली रुदै हिँडे । त्यसको केही दिनपछि नै काकाले एउटा चिठी र जग्गाकोलालपूर्जा मेरो हातमा थमाएर जानुभयो । यो क्रा आजै हजुरलाई मात्रखोल्दैछु । चिठी पनि अझै छ ल आफैंले पढिस्यो ।&#039; कान्छीले लाजपूर्जा र चिठीनै शालुलाई दिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालुले लालपूर्जा हेर्दै भनिन्‌, &#039;लालपूर्जा जस्तो कुरा पनि यसरी राख्ने हो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो त सम्पूर्ण सम्पत्ति भनेकै हजुर हो । यो सम्पत्तिको कै काम ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीको कुराले शालुको मुटु नै फुट्लाझै भएको थियौ तर मन बाचेरलालपूर्जालाई जतनशाथ आफनै दराजमा राखेर आई चिठी पढ्नि । चिठीमालेखिएको थियो- प्यारी कान्छी सम्झना सधैँको ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी जिन्दगी यस मोडमा आउला भन्ने पत्तै थिएन । हेर त हत्तिँदै तिमीकहाँ पुग्यौ म कहाँ पुगेँ । तिमीलाई सबै खुसी दिन्छु भनेर बिबाह गरै तर आँसुसिवाय केही दिइनँ । तिम्रो सिमल भुवाजस्तै मन पलपल फाट्यो । मैले पनितिम्रो ती निर्बाध आँखालाई धेरै रुबाए । हुन त म त्यहाँ तिम्रो मायाले भनौं यास्वार्थले तिमीलाई लिन नै आएको थिएँ । मबाट बच्चा नहुने थाहा पाएकी भएतिमी पुनः मसँग आउँथ्यौ पनि होला तर शालुप्रतिको तिम्रो अगाध प्रेम देखेरमैले फेरि एकपल्ट तिम्रो खुसी खोस्न चाहिनँ । कुरा के भने कान्छी श्रीमतिलेपाएको बच्चा मैरो होइन । तिमीबाट बच्चा हुन्छ, त्यसैले तिमी विवाह गर ।तिमीलाई जिन्दगीभरि खान पुग्ने सम्पत्ति मैले तिम्रो नाममा जम्मा गरिदिएकोछु । पछिका लागि एउटा जीवनसाथी रोज । तिमीले अर्को बिवाह गन्यौ भने मपनि शान्तिले निदाउनेछु । अर्को जन्म भए भगवानले तिमीसँगै भेट गराऔस्‌ ।म तिम्रो काकाको सल्लाहअनुसार तिम्रै काकाको विधवा छोरी र छोरालाईलिएर हङ्कङ गएँ । बाबु-आमा, श्रीमती बिनुले आफनो कुकर्मको फल भौगून्‌ ।अरू के भनौं । मेरै खुसीका लागि भए पनि अन्तै बिवाह गरै । तिमीले विबाहगन्यौ भने मलाई शान्ति मिल्छ । तिम्रो जवानी निशास्सिँदै, छट्पटिँदै, कल्पिँदैनबितोस्‌ । म यहीँ चाहन्छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उही भाबेन्द्र&lt;br /&gt;
चिट्ठी पढिसकेपछि शालुले आफनो आँखालाई दुःख दिइन्‌ । एकोहोरो दिदीलाईहेरिन्‌ । उनलाई यस्तो लाग्यो, दिदीको शिरमाथि सिङ्गै सगरमाथा पो अडिएकोरहेछ । दिदीको भूल यही न हो उहाँले केवल मेरो खुसी चाहनुभयो । अब मैलेदिदीको खुसीका लागि केही गर्नैपर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैयाँ यस्ता कुराहरू त घेरैको जीवनमा घटेको छ । पटक्कै पीर नगरिसेला ।हजुरको उमेर पुगेपछि त्यो जग्गा हजुरकै नाममा पास गरिदिने घोको छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले त्योभन्दा बढ्ता कुरा सुन्न सकिनन्‌ । जुरुक्क उठेर भान्सामागइन्‌ । कान्छी आफनो कोठामा गइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सात==&lt;br /&gt;
कान्छीको जीवनकथा सुनेपछि शालुको धेरै दिनसम्म भोकनिद्रा हरायो ।उत्ती स्कुलमा पनि एकोहोरिन थालिन्‌ । शालुका एकदम नै मिल्ने साथीरोहिणीले शालुलाई चिन्ताको कारण सोधिन्‌ । शालुले सबै कुरा एकएक गरीरोहिणीलाई बताइन्‌ । रोहिणीले मैरौ ममीपापालाई गएर सबै कुरा भनिस्‌ भनेसमस्या समाधान हन्छ भनी सम्झाइन्‌ । शालु रोहिणीको घरमा गएर रोहिणीकोबाबुआमालाई दिदीको सबै कथा सुनाइन्‌ । चन्द्रकान्त दाइले कान्छीलाई मायागरेका कुराहरू पनि बताइन्‌ । दुई छोरी मात्र भएका रोहिणीका बाबुआमालेकान्छी र चन्द्रकान्तजस्ता मान्छै पाए आफूले छोराबुहारीकै दर्जा दिने कुराबताएपछि शालुको हृदयमा बलिरहेको आगो केही मत्वर भयो । शालुलाईरोहिणीको बाबुआमा साक्षात्‌ भगवान्‌ जस्तै लाग्यो । शालु खुसी हुँदै घरआइन्‌ । दिदीलाई देखेपछि आँखा भरिएर आयौ । उनी आफनो कोठामा पस्दैथिइन्‌ । ममीले वौलाएपछि ममीकै कोठाभित्र पस्दै भनिन्‌, &#039;कित बोलाइस्याममी, खास कुरो केही थियो कि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“पोखरा जानका लागि पापाले पर्सिको टिकट बुक गर्छु भन्दै होइसिन्थ्यो ।नयाँ केही किन्नु छ भने पैसा लग भन्न बोलाएकी ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ मलाई पैसाचाहिँ दिसेला तर पोखराचाहिँ चार-छ दिनपछि जान्छु ।अहिले त क्लास टेस्ट चलिरहेको छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले औठ चेप्राउँदै भनिन्‌, &#039;आ तिमी पनि, क्लास टेस्ट लिँदा पनि किनरोक्कितुपर्छ र त्यो नम्बर पछि जोडिने होइन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(हेर भोलि क्लास टेस्ट भन्नु पति छ फेरि क्यारेम खेलौं पनि भनिसिन्छ । लअहिले थपक्क पढ्न बसिस्यो, क्लास टेस्ट सिद्धिएपछि हजुरले जे-जै भनिसिन्छत्यहीत्यही खेल्छु ।&#039; दिदीको कुरा सम्झेर भित्र कतै दुख्यो शालुलाई, शालुले मनमनै सोचिन्‌, &#039;ककरलाई घ्यू नपचैको भनेको यही हो । दिदी गएपछि यो घरमस्ानमा परिणत हुँदा बल्ल चाल पाउँछयौँ तिमी, तिमीले एक्का र बास्साभन्दै तास खेल्न पाएकी दिदीले गर्दा नै त हो नि! यत्रो घर र हामीलाई दिदीलेबडो इमानदारिताका साथ नसम्हालिदिएको भए तिमी स्वतन्त्र आकाशमाकावा खान पार्उीधनौ । सिङ्गै आकाशमा उड्न पाउँदा पनि तिमीलाई आकाशपनि साँगुरो भयो होइन ? दिदीको दोष त्यही हो उनीभित्र स्वार्थको एक कणपनि छैन । उनी अर्काको सन्तानलाई सही मार्ग देखाउन हरपल कटिवद्धछिन्‌ । तिमी आफनो सन्तानलाई आधुनिकताको नाममा नशामा झुलाउनकटिबढ छयौं । मेरो त सम्पूर्ण दिदी हुन्‌ दिदी, उनी नभएकी भए म जीवन केहो नबुझदै झर्दोरहेछु । मलाई जनको मूलत [त्य सिकाउने मेरी प्राणप्यारी दिदीलाईनिकाल्न कति हतार छ्यौ तिमी म छु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन थुप्रै बेर पोखराको सौन्दर्य सम्झेर त्यहीँ हरायौ कि क्या हो:मूर्तिजस्तै भयौ नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;ममी हजुरको खुसीका लागि म पोखरा जाउँला तर मेरो जाँच सिढिनदिस्यो । पोखरा मैले धेरैपल्ट हेरिसकेकी छु । प्रकृतिले का दिएर पनिहामीले त्यसको सदुपयौग गर्न जानेनौं । फेवातालको नजिकै सानै घर होस्‌ तरअति आकर्षक होस्‌, त्यो छैन । पाताले छांगाकै वरिपरि मनै लोभ्याउने फूलबारीहोस्‌ । बाराही मन्दिरमा पनि टलबकै टन्कनै सिङ्गमर्मर होस्‌ । विदेशले योप्राकृतिक छटा पाएको भए कस्तो बनाउँथ्यो होला । नेपालीले हीराको मूल्यलाईकीरा सम्झिरहेका छन्‌ । राम्री र नराम्रो छुट्याउने तागत हामीमा छैन ममी ।&lt;br /&gt;
उर्मिलाले हांस्दै भनिन्‌, &#039;तिमी त बडो तर्क दिन सक्ने पनि भइछौँ, मलाईत पत्तै थिएन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हजुरले मसँग कति समय नै विताइस्या छ र ममी, पापाले अस्ति मात्रभनेपछि पो थाहा पाएँ । मलाई त अठार दिनदेखि नै दिदीले सुताउनुभएको होरे । पापा भनिसिन्थ्यो- हजुर त धेरै सुध्यरी होइसिन्छ रे, एकपल्ट मैले हजुरकोकाखमा दिसा गर्दा टाउकोमै गोली लागेभँ गरी चिच्याइस्यो रे । मैले दिसागरेको साडी अब कहिल्चै लाउँदिनँ भनेर फमाँकिस्या रे होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“उफ ! तिम्रो पापा पनि यस्ता झिना-मसिना कुराहरू पनि के छोरीसँगगरिस्या होला । जाक कपडा फेर, त्यसो भए चार-छ दिनपछिकँ टिकट बुकगर्नुपर्ला हुन्न ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हजुरलाई जे मन लाग्छ त्यही गरिस्यो&#039; भन्दै शालु आफनो कोठामापसिन्‌ । ममीको कोठामा चन्द्रकान्तको आबाज सुनेपछि शालु ममीकै कोठातर्फलागिन्‌ । चन्द्रकान्त कार नबनेको कुरा बताउँदै थिए । शालु चन्द्रकान्तको कुरासुनेर दङ्ग परिन्‌ र भनिन्‌- &#039;दाइ मलाई फूलको प्रोजेबटवर्क ननाउनु छ ।बगैँचामा हिँड्नुस्‌ र मलाई फूलको नामहरू बताइदिनोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले भान्सावाटै कराइन्‌, &#039;मैयाँ, यिनलाई सवै फूलहरूको नाम आएपो, म हजुरको सहयोग गर्छु । यिनले खाना पकाउँछन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले हांस्दै भनिन्‌, &#039;दिदी पनिर-प॒कौडा त दाइलाई बनाउन आउँदैनहोला नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसो भए हजुरले फूलहरू लेराइस्यो म फूलहरूको नाम वताइदिइहाल्छुनि!”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले कान्छीतिर हरेर दाह्रा किटै । शालु र चन्द्रकान्त दुवै बगैँचामागए । शालुले बस्न आग्रह गर्दै भनिन्‌, &#039;अझै दिदीसँग बोलेको देख्दिन॑ नि, तपाईत साँच्चै रिसाउनुभयो कि बया हो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बन्द्रकान्तले बस्दै भने, &#039;हो, मैयाँसाप, अब म यहाँ वस्दिनँ । कान्छीकोआश गर्दागर्दै दाहीजुँगा फुल्न आँटिसक्यो । तिनलाई देख्यो भने मुटु जल्छ माअब कति मुटु जलाउनु ? तिनी त पत्थर हुन्‌ शालु मैयाँसाप पत्थर, तिनलाईराम्रोसँग वाहा छ, म तिनकै मायाले रुन्छु । अब कति रुन्‌ मैयाँसाप, रुँदारुदाआँखाहरू थाकिसके ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले बडो नम्र स्वरमा भनिन्‌, “मप्रतिको अत्यधिक मायाले गर्दा दिदीलेकहीँकतै देख्नु नै भएको छैन । म दिदीको त्यो नाजुक हृदयलाई तोड्छु, तपाईंमलाई साथ दिनोस्‌ । दिदीले मेरा लागि देख्नुभएको जुन सपना छ म त्यो पनिपूरा गर्छु । मेरै आँखाअगाडि मेरो मुदुभन्दा पनि प्यारी दिदीको अपमान अबसहन सक्दिनँ । तपाईँले भनेभौँ मलाई पोखरा पठाउन यौजना बनिसकेकोरहेछ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन मैले त केही कुरै बुझिनँ नि मैयाँसाप ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले सबै करा बताइन्‌ । तपाईँ अहिले नै रोहिणीको घर हेरेर आउनोस्‌ ।दिदीलाई तपाईँ नै चाहिन्छ हो तपाईं । यी कुराहरू बिर्सेर पति दिदीलाईनबताउनु होला । दिदीको घुणा म जीवनभर सहन तयार छु तर अँहँमउहांको आँखामा आँसु हेर्न सबिदिनँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले आँखाभरि आँसु पार्दै भने, &#039;हजुरले ठीक सोचिस्यो । तिनी तसिमल हुन्‌ आफू जाडो सहेर अरूलाई तातो दिनै । तिनलाई हामीले खुसीदिएनौं भने हामीले पनि आफूलाई माफ दिन सम्बैनौं । हुन्छ म अहिले नैरोहिणीको घर पुगेर आइहाल्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ल अनि खोई त फूल लिएर आइसेको ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिदीको शब्दले शालुको मुटु घाँटीमै अद्दकेझै भयो । बडो कष्टसँग जवाफदिइन्‌, &#039;तपाईंले रातमा फूल टिप्न हुन्न भनेको सम्झेर नटिपी आएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ म भोलि बिहानै फूल टिपेर फूलको नाम पनि भनिदिन्छु । अस्तिकोझरे&lt;br /&gt;
जस्तो चार्टपेपरमा टाँस्ने त होला नि ! कहाँकहाँ टाँस्ने अहिले बताइदिस्यो, मअस्तिको जस्तै मिलाएर टांसिदिन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले आँसु लुकाउँदै भनिन्‌, &#039;ल हेर्नोस्‌ अब त म तपाइंजत्री भइसके ।अबदेखि मेरो पीर नगर्नोस्‌ । तपाईंले मलाई जस्तो बताउन चाहनुभएको थियोम त्यस्तै बन्छु । तपाईंको कसम, म बिग्रिन्न, साँच्चै बिग्रिन्त । तपाईँ जस्तोकर्म दिने दिदी पाएपछि पनि बिग्रन्छुर म?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;रैयाँसापलाई ठूलो-ठूलो कुरा गर्न आइसक्यो । ल तातोतातो पकौडा खाइस्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दिदीको शब्द सुनेर शालु रुँदै कोठामा पसिन्‌ र ओछ्यानमा पछारिँदैरोइन्‌ । कान्छी फत्‌पताइन्‌- होइन कै भएको होला मैयाँसापलाई आज, खानपनि खोजिस्या छैन । मुख पनि उज्यालो छैन । सानो हुँदा पो सबै कुराभनिसिन्थ्यो र बुझिन्थ्यो, ठूलो भएपछि केही भन्ने हैन । आफूले मनको कुराबुझन सकिँदैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले मन सम्हालेर दराज खौलखाल पारिन्‌ । कान्छीले पढ्दै पनिरपकौडा खाइड्टस्यो भनेर शालुको कोद्ामा छोडेर गइन्‌ । शालुले हतारहतार त्योपनिर पकौड्ालाई प्लास्टिकको &#039;फोलामा हालेर पोको पारेर दराजको मुनिराखिन्‌ । मुखले चाहिँ पकौडा मीठो रहेछ आजलाई पुग्यो भनिन्‌ । कान्छीलेआफूले पनिर पकौडा भौलिसम्मलाई हुनेगरी प॒काइदिएको कुरा बताइन्‌ ।चन्द्रकान्त आएर शालुको कोठामा पसे । दुवैले आँखाकै इसारामा करा गरे ।त्यसपछि साह्रै मीठो बास्ता आयो भन्दै चन्द्रकान्त भान्सामा पसै तर, कान्छीलेदिएको पकौडा खान सकेनन्‌ । आफूलाई टाउको दुखेको छ भनेर ढाटिदिए ।कान्छीले मुसुक्क कक हाँस्दै भनिन्‌, &#039;तिम्रो रिस त अझै मरेको छैन जस्तो छ । तिमीरिसाएको त मेले पहिलीपल्ट नै देखेँ । म तिमीसँग कहिल्यै रिसाउँदिनँ चन्द्रकान्त ?तिमीले मेरो पोल्टाभरि खुसी नै खुसी दिएका छौँ । आफनो बाबुकैँ बनेर शालुमैयाँसापको रक्षा गथ्यौ ।&#039; चन्द्रकान्तले चुपचाप कान्छीको कुराहरू सुनिरहैमात्र ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कोठाभित्रबाट चिच्याइन्‌, &#039;दिदी, म पकौडाले नै अघाएँ । तपाईंहरूमात्र खाना खानोस्‌ । आज म दिदीसंगै सुत्छु । मलाई राजकुमारको कथा सुन्नुछ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;भर्खरै भनिसिन्थ्यो दिदी म ठूली भएँ। भर्खरैभनिसिन्छ- राजकुमारको कथा सुन्ने ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्त म शालु मैयाँसापको बिवाह भएपछि बाँच्न सक्छु होला जस्तैलाग्दैन । चन्द्रकान्त कान्छीको क्रा सुन्न नसकी उडेर हिँडे ।&lt;br /&gt;
शानु पहिला नै कान्छीको पलङमा गएर सुतिरहेकी थिइन्‌ । कान्छी खानाखाइबरी हात पुच्दै कोठामा पस्दै भनिन्‌, &#039;शालु मैयाँसाप मैले भनिदिएकी छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोलिदेखि पढाइ छल्नका लागि अनेक बहाना चन्दैन । होइन किन घौप्टोपरिसेको ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले देब्रे कोल्टै फर्केर आँसु पुच्दै भनिन्‌, &#039;म त निदाउन पो लागिसेकीरहेछ दिदी ! चन्द्रकान्त दाई पनि बस्वोस्‌ ।&#039; चन्द्रकान्त पलङमुतिको मुढामाबसे । शालु र कान्छी पलङमा बसे । कान्छी बसेपछि शालुले कान्छीको काखलाईसिरानी वनाइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले शालुको कापल मुसार्दै भनिन, &#039;मैयाँ, दिदीको काखभन्दा पनिप्यारो अहिलेलाई पढाइ हो । मैले धेरै दिनदेखि हजुरले पढेको देखेकी छैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दिदी तपाइँलाई मेरो भविष्यको मात्र चिन्ता छ। त्यस्तै मलाई पनितपाईंको भविष्यको चिन्ता छ । दिदी, मैले पनि तपाईंका लागि चन्द्रकान्त दाइजस्तै राजकुमार खोजिदिएकी छु । त्यो राजकुमारले तपाईंलाई धेरैधेरै खुसीदिन्छन्‌ । तपाईँको आफनो स्बर्गजस्तै घर हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीले वीचैमा कुरा काददै भनिन्‌, &#039;ए, हजुरले मेरो अर्को जन्मको करागरिस्या ? हुन्छ, हुन्छ अर्को जन्ममा म चन्द्रकान्तसँगै विवाह गर्छु । अनि हजुरलाई छोरीको रूपमा जन्माउँछ । निस्फिक्री माया गर्छु । उर्मिला मेयाँसापहुँदा त हजुरसँग बोल्न डर लाग्छ भन्या । उर्मिला मैयाँसापले हजुरको कोरामागएको देख्यो कि बिरालोको जत्रो आँखा पल्टाइसिन्छ । उहाँले आफनो मर्यादानभुलेको भए मलाई यति चिन्ता हँदैन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीको हात मुसार्दै भनिन्‌, &#039;दिदी तपाईंले मन नदुखाउनुहोस्‌ ।मेरो चिन्ता गर्न चटक्क छौडिदिनोस्‌ । तपाईंले मैरा लागि जुन त्याग गर्नु भोत्यो कसै-कसैले गर्नै सक्दैन । दिदी तपाईंले जाडोमा न्यायो घाम दिनुभयो,गर्मीमा छहारी दिनुभयो, तपाईं भने सधैँ घाम-जाड्ो सहँदै आउनुभएको छ ।त्यो मैले देखेकै छु । अब म स्वयम्‌ चिसो र तातोबाट वच्न सक्छु । तपाईँलाईचिसो र तातोबाट बचाउनु मेरौ कर्तव्य हो । कुरा गर्दागर्दै बाहिर गेटमा बेललाग्यो, शालु हतार-हतार कान्छी र चन्द्रकान्तलाई एउटै कोठामा बन्द गरेर,तल रुँदै ओर्लिन्‌ र गेट खोल्दै भनिन्‌, &#039;ममी, पापा म यो घरमा वस्नै नसक्नेभएँ चन्द्रकान्त र दिदीको राम्रो सम्बन्ध छैन । आज त हजुरहरूलाई देखाउनमैल्ले चन्द्रकान्त र दिदीलाई एउटै ओछ्यानमा देखेपछि ढोकामा लक गरिदिएकीछु। छिटो माथि आइस्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
दीपक उर्मिला नै रक्सीको नशामा हल्लँदै सास न बास भएर कान्छीकोकोठानजिक आए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कोठाभित्रबाट आवाज आइरहेको थियो । मैयाँसाप किन ढोका थुनेको छिटोखोलिस्यो । उमिलाले ढोका खोल्दै चिच्याइन्‌, &#039; ए रण्डा, रण्डी हो तिमीहरूलेयो घरलाई कोठी नै बनायौँ होइन ! देखिस्यो हजुरले सती सावित्री ठानेकी कान्छीको हाल । मैलै भनेकै हुँ वैंसको उन्मादलाई थेग्त कसैले सक्दैन भनेर,दुबैले किन बिवाह गरेनन्‌ भनेको त कुरा यस्तो पो रहेछ । दूध खान पाउँदापाउँदैगाई पाल्नु किन ! शालुलाई माया गरेको स्वाङ रचेर बिनापैसा बस्नुको कारणत मस्ती लुद्त पो रहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले रुँदै जबाफ फर्काइन्‌, &#039;आफ्‌ मात्र बोलिसिन्छ कि मलाई पनिबोल्न दिइसिन्छ हँ : चुप लागिस्यो मुखमा जे आयो त्यही नबोलिस्यो । शालुञैयाँसापलाई थाहा छ हामी के गर्दै थियौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रुँदै भनिन्‌, “हो ममी यिनीहरूको विचार राम्रो छैन । कान्छी त झन्‌हजुरको विरुद्ध भड्काउँछिन्‌ । मैले के माया गरेजस्तो गरेकी थिएँ उनले तआफनै छोरी ठातिन्‌ । यसो गर, उसो गर भनेको सुन्दा म त पागलै हुनलागिसकेँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले घरै थर्कने गरी चिच्याइन्‌, &#039;नाइँ, शालु मैयाँसाप त्यसो नभनिस्योममर्छु।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रुँदै भनित,- &#039;मोर अहिले मौर, कसले रोकेको छ र? न रहरलाएको लाउन दिन्छे, न खानै दिन्छे कुन जन्मको शत्रु रहिछे यो ।&#039;&lt;br /&gt;
उर्मिलाले कान्छीको कपाल भुत्ल्याउँदै भनिन्‌, &#039;धेरै तमासा नदेखा, खुरुक्कघरबाट निस्किहाल । नत्र अहिल्ै पुलिसलाई डाक्छ बुझ्यौ ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;कान्छी आफैँलाई भूत्ल्याउँदै चिच्याइन्‌, &#039;शालु मैयाँसाप तोलाको बचनखोलामा नहालिस्यो, म हजुर बिग्रेको हेन सक्दिनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले कान्छीको हात समात्दै भने, &#039;देख्वा सोझी रहिछिन्‌ मैयाँसापभित्र त कर्द रहिछन्‌ कर्द ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हो-हो म कर्द नै हुँ त्तिस्क, निस्किहाल पापी हो । मेरो जन्म दिने आमाभन्दाठुली कोही छैन बुझ्यौ ? जाओ, जाओ छिटो जाऔ । अझैँ रमिता देखाउँछौँ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले चन्द्रकान्त र कान्छीलाई नै नजिकैको कूचोले हान्दै भनिन्‌, &#039;छिटोतिस्कन्छौ कि पुलिस नै बौलाउँ हँ ?&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले कूचो समाउँदै भने, &#039;कान्छी तिमीले आफनो स्वार्थ हेरेकी भएआज पो दिन देख्न पर्दैनथ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
दीपकले कुरा थपे, &#039;अझ बढी बोल्छस्‌ चन्द्रै, यो सुँगुर्नीलाई छिटो यहाँबाटलगिहाल्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;शालु मैयाँसाप मेरो यहाबाट लास जाला म यहाँबाट जान्न । म हजुरलाईछोडन सक्दिनँ,&#039; कान्छीले भुइँमा बजारिँदै भनिन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीको मुखमा वुक्दै भनिन्‌, &#039;थुक्क नकचरी, पागल, कति अपमान&lt;br /&gt;
सहन सक्छेस्‌ त॑ : मौर तँ जस्ता मान्छै त मर्नु नै पर्छ । विष दिकँ याकौसीबाट फालहालेर मोर्छेस्‌ ) चन्द्रकान्त यसलाई बागमतीमा लगेरफयाँकिदैक । अनि यसले शान्ति पाउँछै ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले रण्डी, फुँडी, बेश्या भन्दै कान्छी र चन्द्रकान्तमाथि क्चो वर्षाइरहेकीथिइन्‌ भने दीपकले दुवैलाई लात्ती प्रहार गरिरहेका थिए । चन्द्रकान्तले कान्छीलाईघिच्याउँदै भन्याङ ओराले । कान्छीले घर नै थर्किनेगरी शालु मैयाँसाप भन्दैचिच्याइन्‌ । डेरामा वसेका र छिमेकीहरू झयाल-झयालबाट र ढोकाबाहिरैबाटत्यो बीभत्स दृश्य हेरिरहेका थिए । शालु आफनो कोठाको ढोका थुनेर मुर्दाझैँलम्पसार परिन्‌ । कानमा भनै कान्छीदिदीकै शालु शव्द नै गुञ्जिरह्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिला र दीपक नरभक्षी बाघकै सिकार गरेझैं गरी प्रफुल्ल हुँदै काठोमापसे । उमिंलाले भनिन्‌, &#039;देखिस्यौ हजुर बैंसको तिखा थाम्न त्यो मोरीले पनिसकेकी रहिनछ । हात्तीको खाने दाँत र देखाउने दाँत जस्तो तिनीहरूका पनिदुईवटा दाँत रहेछ, होइन ? आज त कति हाइसन्चो भयो क्चोले बढार्नुपर्नेफोहोर हावाले उडायो हा...हा । शालुले नै काम तमाम गरिदिइन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
दीपकले पलङमा पल्टिँदै लर्बराएको स्वरमा भने, &#039;उर्मी, वनले नचिनेकोबाघ होइन, वाघले नचिनेको वन होइन । शालुले पूर्ण सोचनिचार नगरीकान्छीलाई घरबाट निकालिन्‌ जस्तो मलाई लाग्दैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हजुर पनि चाहिनै-नचाहिन कुरा सोचिसिन्छ । कुकर्मले डाँडा काटेपछिकति सहन्छै शालुत्ते ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यो त हो, दीपकले उमिलाकै कुरामा साथ दिए । कान्छीको त्यो दर्दनाकदृश्य उनीहरूका लागि मनोरञ्जन बन्यो । दुबै राव्रिकीडामा लीन भए ।&lt;br /&gt;
रोहिणीको घरमा पुग्दासम्म कान्छीले पूर्ण रूपमा होस गुमाइसकँकी थिइन्‌ ।रोहिणीको बाबु केशवले फेमेली डा. राजलाई बोलाए । डा. राजको सक्दोप्रयासबाट कान्छीको होस त आयो तर उनले आफूलाई बिसिंसकेकी थिइन्‌ ।उनको ओठमा केबल शालुकै नाम थियौ । भन्थिन्‌ क... क शालु मैयाँत्यहीँबाट गइस्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हा... हा शालु मैयाँसापले त कपाल बाटिसेछ । पर्खिंस्यो म रिविनमिलाइदिन्छु । सधैँ दिदी हजुर नि खानोस्‌ भन्नु छ । म त खाइहाल्छु नि !, मेरीशालु मैयाँसाप त परी हो बुझ्यौ परी हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीको त्यो विजोग देखेर सबैको आँखाबाट आँसु झन्यो । डा. राजलेमानसिक विशेषज्ञ डा. दिनेशलाई बोलाए । डा. दिनेश पनि रातको चकमन्नतालाईतौड्दै कैशवको घरमा आइपुगे । सम्पूर्ण घटना सुनेपछि डा. दिनेशको पतिआँखा रसायो । जति खर्च लागे पनि घरमा नै कान्छीको उपचार गर्ने निर्णयभएपछि कान्छीलाई दिनेशले लठ्याउने सुई दिए । उनी जिउँदो मुर्दामा परिणत भइन्‌ । कान्छीको सम्पूर्ण स्याहारसुसार चन्द्रकान्तले गरे । डा. राज र डा.दिनेश कान्छीको उपचारमा कटिबद्ध भए । केशव र पीताम्बराले मानवीयसहयोग गरे । तहौं दिनको दिउँसो एक बजेतिर कान्छीले आँखा खौलेर चारैतिरहेरिन्‌ । आफूलाई सुन्दर चिटिक्क परेको कोठामा सँगै चन्द्रकान्त भित्तामाशालुको सुन्दर तस्बिर झुन्ड्याइरहेको देखेपछि अचम्म मान्दै सोधिन्‌, “चन्द्रकान्तयो सब के हो ? मेरो अर्को जन्म त भएको होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले खुसीको आँसु झार्दै भने, &#039;हो कान्छी तिम्रो अर्को जन्म नैभएको हो । तिमीले असाध्यै माया गर्ने बावु-आमा पाएकी छ्यौ । डा. राजरडा. दिनेश जस्तो डा. पायौ । सुरेश क्षेवरीजञस्तो बिरामी पर्दा सहयोग गर्ने दाइपायौ । सबै-सबै पायौ । तिमीले बस्‌ आफूलाई सम्हाल सबै ठीक हुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी बिस्तारै उठ्दै भनिन्‌, &#039;खोई बाबु-आमा ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले बोलाएपछि केशव र पीताम्बरा नै आए । कान्छीलाई उठेकोदेखेर हर्षित हुँदै भने, &#039;नानी अहिले उठेर जरक-मरक नगर ।&#039;&lt;br /&gt;
उनीहरूको कुरा सुनेर कान्छी टोलाइरहिन्‌ । चन्द्रकान्तले दुधमा हलिंक्सफिटेर कान्छीलाई दिँदै भने, &#039;हर्लिक्स खाएर सुत ।&#039; कान्छीले हर्लिक्स पिइन्‌ ।चन्द्रकान्तले औषधि खान दिएपछि फेरि कान्छी गहिरो निद्रामा परिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आाठ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले चौधौं दिनको मध्यरातमा पनि आँखा खोलिन्‌ । चारैतिर हेरिन्‌,आफनो पलङभन्दा पर चन्द्रकान्तलाई निदाइरहेको देखेर केही धक मान्दैभनिन्‌, &#039;चन्द्रकान्त... चन्द्रकान्त ।&#039;कान्छीको बोली सुनेर चन्द्रकान्त झसङ्ग हँदै उठेर मर्करी बाल्दै कान्छीकोनजिकै गएर भने, &#039;के भयो कान्छी, के भयो !&#039;कान्छी धेरैबेर मौन भएपछि भनिन, &#039;मैले थाहा पाएँ हिजो मैयाँले आफनोघरबाट निकालेपछि हामी यहाँ आयौं, मैले आँखा खोल्नेबित्तिकै त्यही मैयाँकोफोटोमा आँखा पन्यो, त्यो फोटो निकालिदेक । किन त्यो फोटो राखेकोचन्द्रकान्त ?&#039;चन्द्रकान्तले उत्तर दिए, &#039;तिमीले मैयाँ-मैयाँ भनेपछि त्यो फोटो राखिदिएको। तिमीले झिक भन्छ्यौ भने झिक्छु । तिम्रो मुख सुकेको छ भने पानीकै ?&#039;&amp;quot;अं पानी दैक म आफूलाई सम्हालिहाल्थें नि । तिमीलै पसरी एउटै कोठामा सुत्न नहुने थियो । चन्द्रकान्त तिमीले यो फोटो झिक्दिक । अव्र म पत्धरमापरिणत हुन्छु । मैलै यौ उमेरसम्म कोही मानवीय मूल्य भएको त मान्छे नै देखिनँ ।&#039;चन्द्रकान्तले शालुको फोटो निकालेर घोप्टो पारेर ठहस्याए ।कान्छीले रुन्चे स्वरमा भनिन्‌- &#039;होस्‌-होस्‌ फोटो झुन्ह्याइदेक, भोलि मआफैँ त्यो फोटोलाई झिकेर फयाकुँला । फोटोमा अलि धूलो लागैजस्तौ छसफा कपडाले पुछिदेक ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले चुपचाप सफा कपडाले फोटो फुछे । रातको समयमा औषधिदिने वेला भएकोले औषधि खुवाए । औषधि खुवाएको केही बेरपछि, कान्छी कुरागर्दागर्दै निदाइन्‌ । चन्द्रकान्त पनि मनमा कुरा खेलाउँदै निदाए । क्रमशः दिनबित्दै गयो । कान्छी विस्तार पानी सार्न, ट्वाइलेट जान सक्नै भइन्‌ । तर उनीसोच्चिन्‌- आफूमाथि बज्च परेको क्षण हिजो नै हो । एक्काइसौं दिनको दिनकान्छी उठिन्‌, आफैँ नुहाइधुवाई गरिन्‌ । बडो राम्रैसँग मिलाएर राखेको कपडाझिक्दै भनिन्‌, &#039;हिजो मैले मैयाँसापका लागि पकौडा राखिदिएकी थिएँ, देखिस्योकि देखिसेन होला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;कान्छी तिमीले उनको नाम नै नलेक । क बावु-आमा पनि आउनुभयो ।एकछिन बसेर कुरा गर । म औषधि सिद्धिएको छ लिएर आउँछु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्बरा र केशवले कोठाभिर पसेर सोफामा बस्दै भने, &#039;आफैँले आजनुहाएजस्तो छ नि हो : तिमीलाई यो रूपमा देख्दा साह्ै खुसी लाग्यौ ।तिमीलाई यस रूपमा देखेपछि पर्सि नै सत्यनारायणको पूजा लगाङँझै लाग्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ लगाउनुहोस्‌, हिजौ अलि धूलो-मैलोमा बजारिएकीले आज नुहाएकीहुँ। अघि यसौ बगैँचा र फूलबारी हेर्न मन लागेर गएकी थिएँ । व्यवस्थिततरिकाबाट केही लगाएकै छैन । दुबोमा पनि घाँसैघाँस उम्रिएको रहेछ । आँगनमापनि फोहोरैफौहोर छ । फोहोर देखैपछि त मैरो टाउको नै घुम्छ । न धुपीहरूकैकटिड गरेको छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्बराले करा चुहाइन्‌- अलिअलि त काम गरिन्थ्यो । तिमी बिरामीभएर आएपछि वगैँचाभन्दा पनि ध्यान तिमीमा गयौं । फेरि काम गर्न आउनेमान्छेलाई दस घर भ्याउनुपर्छ, के राम्रो काम गर्थे ? खैर आँगन, बगैँचाकोकुरा छोडौं अब तिम्रौ र चन्द्रकान्तको बारेमा कुरा गरौं ।&lt;br /&gt;
&#039;ए चन्द्रकान्त, उनी र म पहिला सँगै बस्थ्यौं । त्यहाँबाट निकालेपछिचन्द्रकान्तले यहाँ लिएर आएछन्‌ । विश्वास गर्नोस्‌, हाम्रो सम्बन्ध केही नराम्रोछैन, हिजै मात्र हो उनले मलाई छोएका । हिजो उनले नसम्हाको भएचाहिँ मबाँच्दैनथैँ हुँला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्बराले कान्छीको हात समातेर भनिन्‌, &#039;लाटी, तिम्री यहाँ आएकी तठीक एक्काईस दिन भयो । एक्काईस दिनसम्म तिनै चन्द्रकान्तले तिमीलाई दिसा, पिसाव गराउने, दिसा धुने, नुहाइदिने, कपडा फेर्ने तिम्रो कपडा धुनेकाम गरे । उनले स्याहार नगरेको भए र डा. राज र डा. दिनेश र सुरेशचभएको भए तिमी यहाँ होइन अहिले सडकमा हुन्थ्यौ । त्यसैले हामीले तिमीहरूकोबिबाह गर्न सत्यनारायणको पूजा राख्न खोजेका हौं ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले विश्वास गरिनन्‌ र नजिकै रहेको क्यालेन्डरमा पल्टाएर हेरिन्‌,&amp;quot;उफ मङ्सिरको १२ गते पो रहेछ । उनी थचक्क बसिन्‌ । आँखाबाट आँसुझारिन्‌ मात्र ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्बराले सम्झाइन्‌, &#039;फौरि पनि पीर गयौँ भने तिमी विरामी हुन्छ्यौ ।पीर नगर । हाम्रो विवाह हुँदा उहाँ पच्चीस वर्षको र म बीस वर्षकी थिएँ ।विवाह चाँडै भए पनि बच्चाचाहिँ बयालीस वर्षमा भयौ, तिमीहरूको त उमेरैछ । कुनै पनि सुकार्य गर्न ढिलो गर्नुहुन्न । हामीले तिमीहरूको विवाहका लागिगहना, कपडा सबै तयार परिसक्यौं । तिमी होसमा आउने प्रतीक्षामा थियौं ।समाजमा विवाह नगरी एक्कै ठाउँमा सुतेका छन्‌ भन्नै किन पानु ः तिमीहरूकोचाँडै विवाह गरिदिन पाए आनन्दै हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीलाई घोर अचम्म लाग्यो । केही रिंगटा चलेजस्तो पनि भयो उनीसोफामै मो अड्याएर चिम्म आँखा चिम्लिइन्‌ । केशवले नम स्वरमा भने,“कान्छी, मैले चन्द्रकान्तजस्तो पुरुष त संसारमै देखेको छैन । तिमी बिरामीहुँदा उनले तीन दिन तीन रात आंखा भझिमिक्कै गरेनन्‌ । चौथो दिन कमजोरीलेहोला मूछां नै परे । डाक्टरसापहरूले के-के सुई दिएपछि सत्र-अठार मिनेटमाआँखा खोले । आँखा खोल्दा कान्छीले औषधि खाइन्‌ कि खाइनन्‌ भन्दै थिए ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले क्रा सुन्न अलि भझिँजो मानेजस्तो गरैपछि पीताम्बरा र कैशवउठेर गए । आँखा खोल्दा कान्छीको आँखा शालुको तस्बिरमा पत्यो । मनमनैसोचिन्‌ । मलाई मृत्युको मुखमा छोड्नेको के अनुहार हेर्नु ? साँच्चि चन्द्रकान्तलेमैरो घरजग्गाको लालपूर्जा देखेर त माया गरेको होइन ? शालुजस्ती त त्यस्तीभएर निस्केपछि चन्द्रकान्तको त के विश्वास : फेरि शालुकै फोटोमा आँखापरेपछि कान्छीलाई रिस उद््यौ । उनले शालुको फोटो झिकेर केहीबैर घोप्द्याएरभित्रै राखिन्‌, शान्ति भएन र वाहिर राखिन्‌ । अझै शालुले घरवाट निकालिदिँदाकोक्षण सम्झेपछि फोटो गेटबाहिर राखेर आइन्‌ । औषधि लिएर आउँदै गरेकोचन्द्रकान्तको आँखा फोटोमा पस्यो । फोटो भित्र लगेर पीताम्बरालाई जिम्मादिँदै आफनो कोदामा पसे । कान्छी टोलाएर सुतिरहेकी थिइन्‌ । चन्द्रकान्तआएको चाल पाउनेबित्तिकै उठेर बसिन्‌ । कान्छीलाई चन्द्रकान्तसँग कताकतालाज-लाज पति लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले औषधि र पाती दिँदै भने, &#039;ल अब औषधि खाएर सुत । अनारछोडाएको छ खाङ है भनेर गएको थिएँ, यत्तिकै छ । म पनि उस्तै खान दिएरजानुपर्ने रहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले औषधि निल्दै भनिन्‌, &#039;चन्द्रकान्त जग्गाको लालपूर्जा कहाँ राख्यौ ?चिदठी पनि सँगै थियो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन तिमी फेरि बेसुरको करा गर्न लाग्यौ । कस्तो लालपूर्जा, केकोलालपूर्जा, कसको चिट्ठी मलाई केही थाहा छैन । ल सृतिहाल पछि कुरागरौली ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले मनमनै भनिन्‌- &#039;ओ ! मैयाँलाई त्यही जग्गामा आँखा लागेछ क्यार,मैले त उनकै नाममा गरिदिन्छु भनेकी थिएँ । पहिल्यै निकालिन्‌ । लिकन्‌तिनलाई दाइजो नै भयो । चन्द्रकान्तको प्रेम त निस्वार्थ पो रहेछ । उनी सुन्दर रमायालु छन्‌, उनले त कुमारी केटी नै पनि पाउन सक्थे । उनी मलाई प्रेम गर्छन्‌भन्ने थाहा थियो तर यतिबिध्न माया गर्छन्‌ भन्नै थाहा थिएन । सोच्दासोच्दैकान्छीको आँखा लष्टिन थाल्यो । उनी केही बेरमा निदाइन्‌ पनि ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोलिपल्ट बिहानै कान्छीले आँगन बढारिरहेको देखेर केशवले नजिकै आएरभने, &#039;नानी ! आँगन नबढार, तिमीलाई अहिले त्यति ठीक भएकै छैन । वरुआमासँग गएर केही कुरा गर । उनलाई साथी हुन्छ । मचाहिँ यस्सो घुमेरआउँछु ।&#039; कान्छी पूरै आंगन बढारेर पीताम्बरासामु पुगिन्‌ । पीताम्बराले बढोराम्रो पाराले सम्झाएपछि कान्छीले चन्द्रकान्तसँग बिवाह गर्नै कुरा नकार्नसकिनन्‌ । भौलिपल्ट नै कान्छी र चन्द्रकान्तको सत्यनारायणको पूजा लगाएरत्यहीँ सिन्दूर राख्ने काम पनि गरियो । विवाहमा कान्छीको काकालगायत अरूकेही आफन्त पनि जम्मा भए । सबैले कान्छी र चन्द्रकान्तको बैवाहिक जीवनसुखद्‌ होस्‌ भती शुभकामना दिए । बेलुका चन्द्रकान्त र कान्छीको सुत्नेओछ्यानमा फूल छरिएको थियौ । दुवै विगत भुलेर बर्तमानमा रमाइरहे ।चन्द्रकान्तको मायालु आलिङ्गतमा कान्छीले संसार बिर्सिन्‌ । त्यस्तै कान्छीकोमायालु आलिङ्गनमा चन्द्रकान्तले .... ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विवाहको भोलिपल्ट कान्छी र चन्द्रकान्तको शिर लाजले झुक्यो । त्यसमाथिचाँडै घोत्ले छोरो पाउनू भनी पीताम्बराले कान्छीलाई, केशवले चन्द्रकान्तलाईजिस्क्याउन बाँकी राखेनन्‌ । बिस्तारै कान्छीको आँखाबाट शालु दिनप्रतिदिनझर्दै गइन्‌ । कान्छीको आँखामा शालुको त्यो क्रूर दृश्य ताचिरहन्ध्यो । त्यसमाथिचन्द्रकान्त शालुको नराम्रो पक्षको मात्र कुरा गरिदिन्थे । कान्छीले मानसिकरोगको औषधि खाए पनि पूर्ण रूपमा आफूलाई सम्हालेकी थिइन्‌ । पीताम्बरालाईखाना पकाउन सघाउनदेखि लिएर सबै काम गर्थिन्‌ । चन्द्रकान्त कैशवकोघरकै भाडाको ट्याक्सी चलाउँथे । एकदिन केशबले कान्छीतिर लालपुर्जाबढाउँदै भने, &#039;कान्छी म पनि कस्तो ह्स्सु ॥ तिम्रो यो कागज एउटा नानीलेदिनु है भनेर छोडेर गएको पहिल्यै हो, दिनै बिसँछु । धेरै वर्ष भएछ, जग्गाकोतिरो नतिरेको, चन्द्रकान्तलाई तिर्न पठाउनू ।&#039; कान्छी लालपूर्जा देखेर मौनभइन्‌ । ए लालपूर्जा त लैराइदिछे त्यसले, रामै भयो दुःख हुँदा काम लाग्ला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लालपूर्जाको बारेमा केशवले चन्द्रकान्तसँग शालुले भनेका क्राहरू जस्ताकोतस्तै भनेपछि चन्द्रकान्तले तुरुक्क आँसु खसाते । लालपूर्जा पाएको दिनचन्द्रकान्तको मुड ठीक नभए पनि कान्छी भने साह्रै प्रशन्न थिइन्‌ । सुत्नैसमयमा चन्द्रकान्तको छातीमा टाउको राखेर कान्छीले भनिन्‌, &#039;चन्द्रकान्त,आज दुईवटा खुसी एकँचोटि मिल्यो । जग्गाको लालपूर्जा अनि मेरो पेटमा पनिबच्चा छ रे, म र आमा जचाउन गएका थियौं ।&#039; चन्द्रकान्तले खुसी हँदै भने,“कान्छी हामीले स्वर्ग नै पायौं हगि : अस्ति भर्खर गाउँबाट ठूलो छोरा पनिआयो । आज तिमी यौ खुसीको करा सुचाउँदै छयौ । बाबुआमा पनि पायौं ।रोहिणी र रोष्मा मैयाँसाप पनि पायौं । हामी त कति भाग्यमानी । न हामीसंगपैसाक्को कमी छ । यौ पेटको बच्चाचाहिँ छोरी होस्‌ । त्यो पनि शालुमैयाँजस्ती ।&#039;कान्छी चिच्याइन्‌, &#039;चन्द्रकान्त, त्यस पापिनीको नाम लिएर मलाई फेरि पागलगाराउन चाहन्छौ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले कान्छीको कपाल मायालु पारले मुसार्दै भने, &#039;कान्छी तिमीलेआफूलाई कठोर बनाएको पटक्कै सुहाउँदैन । कुरा अर्कै छ । शालु मैयाँलेकसम खुवाएकोले आजसम्म चुप थिएँ । अब छातीमा कति पत्थर राखेरबाँचौं ? तिमीले हरपल शालु मैयाँको घुणा गरेको कति सहुँ ? हेर शालुमैयाँसापले तिमीलाई खुसी दिनका लागि सबै नाटक गरिस्या हो। हामी तउहाँले बनाएको नाटकमा सहभागी भएका हौँ । तर, हामी सबैको प्रेम बनाबटीहोइन । शालु मैयाँको तिमीप्रतिको घृणा मात्र बनावटी हो । लालपुर्जा दिँदाभनिस्याथियो रै दिदीलाई तब मात्र लालपूर्जा दिनु जब दिदीले चन्द्रकान्तदाइको वास्तविक प्रेम बुझनुहुन्छ । चन्द्रकान्त दाइलाई लालपूर्जाको बारेमा आपनि नगर्नुहोस्‌ । लाटी, बुबाले लालपूर्जा जस्तो कुरा पनि बिसंनुहुन्छ त ?उहाँले शालुकै कुरा मान्नुभएको हो । मैयाँसापले नै यहाँ बस्नै बन्दोबस्तमिलाउनुभएको हो । हामीले शालु मैयाँसापलाई तिमी बिरामी भएको क्राढाँट्दा पनि उहाँ दुईपल्ट स्कुलमा मूर्छा परिसक्नुभयो रे । हाम्रो विवाह भयोभनेपछिचाहिँ साह्टै खुसी हुनुहुन्छ रे । रोहिणी मैयाँसाप र शालु मैयाँसाप साथी-साथी हनुहुन्छ । साँचो करा यही हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तको कुरा सुनेपछि कान्छी धेरैबेर रोइन्‌ । उनको मनमा शालुलेभनेका शब्दहरू एकपछि अर्को गर्दै औहोर-दौहोर गरिरहे । “तपाईँलाईचन्द्रकान्तजस्तै राजकुमार खोजिदिन्छु । दिदी म ठूली भइसके, स तपाईंलेदेखाएको बाटोमा हिँड्छ । आज भोक लागेको छैन, तपाईंहरू मात्र खानाखानोस्‌, तपाईंक्रो पनि स्वर्गजस्तो घर हुन्छ आदिआदि ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले कान्छीको आँखाबाट बगिरहेको आँस्‌ पुछ्दै भने, &#039;नरोक कान्छी,नरौक । शालु मैयाँसापले भनिस्याध्यो, &#039;दाइ मेरी दिदीको आँखाबाट एकथोपाआँसु नखसौस्‌ । मेरी दिदीलाई सधैँ डालीमा लटरम्म फुलेको फूलझौँ देख्नपाङी । दिदी खुसी हुँदा म स्वयम्‌ खुसी हुन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले चन्द्रकान्तको औठ वन्द गर्दै भनिन्‌, &#039;अब यसभन्दा वढी नभन ।चन्द्रकान्त मैले आफूलाई चिने । हामी दुईमा त आकाश-पातालको अन्तररहेछ । म त पापिनी हुँ । त्यसैले आफनैअगाडि भएको हीरालाई चिन्न सकिनँ ।शालु मैयाँसापले मलाई सम्पूर्ण खुसी दिस्यो । मैले उहाँलाई केबल घुणा गरेबुझौं घुणा ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;आफूलाई सम्हाल कान्छी सम्हाल । तुलना गर्दा दुवैको त्याग बराबरी छ ।तिमीहरू दुवैले कनै पल आफनो स्वार्थ हेरेका छैनौ । तिमीहरू बनेको नै एक-अर्काका लागि हौ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;चन्द्रकान्त शालु मैयांसापलाई भोलि नै डाकिदेक । नत्र म मर्छु म बाँच्नसक्दिनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकात्तले आश्वासन दिए, &#039;पीर नगर म भोलि नै शालु मैयाँसापलाईयहाँ बोलाइदिन्छु । हामी सबैको चाहना नै यही त हो नि । तिमी र मैयाँसापकोओठमा पुनः पहिलाको जस्तै खुसी आओस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी केही बोल्न सकिनन्‌ । आँखामा भने शालुको तस्बिर नाचिरहयो ।रातको थुप्रै पल बितेपछि मात्र कान्छी निदाइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोलिपल्ट बिहानको छ पनि नवज्दै शालु आएर रुँदै ओछ्यानमा पल्टिरहेकोकान्छीको आँखा छोपिन्‌ । शालुको हातमा कान्छीको तातो आँसु लागेपछिशालुको आँखा पनि रसाए । कान्छी हात झिक्दै जुरुक्क उठेर शालुतिर फर्किन्‌ ।दुबै एक-अर्काको अङ्गालोमा बाँधिएर थुप्रैवेर रोए । चन्द्रकान्त उनीहरू रोएकोदृश्य हेरेर बसिरहे । धैरैवेरपछि शालुले अङ्गालोवाट छुट्टिएर कान्छीको आँखाकोआँसु पुछ्दै भनिन्‌, &#039;दिदी, पेटमा बच्चा हुँदा रुन हुँदैन रे । दाइले मलाई बिहानलिन जाँदा सबै कुरा वताइसक्नुभएको छ । दिदी, मैले जुन सपना देखेकीथिएँ । त्यो सबै साकार भयो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीको रुवाइ अझैँ थामिएको थिएन । घुँक्कघुँक्क रुँदै भनिन्‌, &#039;मैलेहजुरलाई कति नराम्रो सोचेँ, मलाई माफ गर्नुहोस्‌ । म त हजुरको अगाडि केहीपति होइन रहेछु । म त पापिनी रहेछु मैयाँसाप पापिनी ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीको मख छोपिदिँदै भनिन्‌, &#039;तपाईंले आफूलाई पापिनी ठान्नुभयोभने यो संसारमा को घर्मात्मा होला ! मैले त तपाईंलाई घरबाट निकाल्नसानो नाटक मात्र गरेकी हुँ । तपाईंले मेरा लागि सिङ्गो जीवन नै बलिदानगर्नुभयो । ममीको त्यो तिरस्कार हाँसोमा उडाइदिनुहुन्थ्यो । केवल मैरो खुसीकालागि आफूलाई पलपल मा्नुहुन्थ्यो । यहाँसम्म कि आफूलाई नै भुल्नुभयो ।दिदी, ममी तपाईंलाई निकाल्न धेरै आतुर हुनुहुन्थ्यो । मैले नै तपाईंलाईनिकालेपछि उहाँ स्वर्ग पाएजस्तै खुसी पत्ति हुनुभयो । त्यति मात्र होइन,भोलिपल्टै होटलमा भोज पनि दिनुभयो । तपाईँलाई वेश्या सावित गर्नुभयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छरछिमेकले पनि तपाईंलाई राम्रै वेश्यामा परिणत गरै । म सवैको कुरा सुन्नबाध्य भएँ । अहिले तीन-चार महिनामा तीन-चारवटा काम गर्नै फेर्दा पनिममीको चित बुझेको छैन । फूलवारी र करेसाबारीमा केवल घाँसैघाँस उम्रिएकोछ । घर लथालिङ्ग छ । काम गर्नेहरू दिनभरि टी.भी. हेर्दै बस्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;हजुरलाई बेलामा खान दिन्छन्‌ होइन ?&#039; कान्छीले सोधिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले हाँस्दै उत्तर दिइन्‌, &#039;मेरो त पीर नै नगर्नुहोस्‌ । म उनीहरूले नदिएआफैँ बनाएर खाइहाल्छु ति ! साँच्चि गाउँबाट आएको छोरो कत्तिको ज्ञानीछ्न्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले प्रशन्न स्वरमा भनिन्‌, &#039;मैयाँ बाती-व्यबहार ठ्याक्कै चन्द्रकान्तकोजस्तो छ । मैले त कल्पनासम्म पनि गरेकी थिइनँ । उनी त्यति मायालु होलान्‌भन्ने, तर साह्रै असल छन्‌ । आमा भनेको छ, वरिपरि लुटुपुदु गरेको छ, मलाईपेटमा बच्चा आओस्‌ भन्नेसम्म पनि रहर थिएन । हजुरको मायामाझौँ वीरुकोमायामा डुबिसकेकी छु । बाबु-आमा रोहिणी मैयाँसाप, रेष्मा मैयाँसापले पनिहामीलाई आफनै परिवारझौँ ठानिसिन्छ । अस्ति त आमाले भण्डारको चावी नैमेरो हातमा थमाउनुभयो । मलाई आफनो कर्तव्य पूरा गर्न नसकीँला कि भन्नेपो पीर लागेको छ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले दङ्ग पर्दै भनिन्‌, &#039;रोहिणी पनि भन्दै थिइन्‌, बाबु-आमा तपाईं रदाइ भनेपछि हुरुक्कै गर्नुहुन्छ रे । तपाईंहरूलाई चिनेरै उहाँहरूले सांचोसुम्पनुभयो । त्यही त हो &#039;जान्नेलाई श्रीखण्ड नजान्नेलाई खुर्पाको बिंड&#039; भनेको ।ममीहरूले तपाईँको मूल्य बुझनुभएन । रोहिणीको बाबु-आमा बडो पारखीहुनाले तपाईंलाई चिन्न बैर लगाउनुभएन ।&#039; परिणाम ममीपापाले सम्पूर्णगुमाउनुभयो । रोहिणीको ममीपापाले सम्पूर्ण पाउनुभयो । दिदी त्यो पनौतिकोघरजग्गा बैचैर यतै नजिकै जग्गा किनेर राखिदिनु होला, यहाँ भए आजकोभौलि नै जग्गाको भाउ बढ्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हजुरले ठीक भनिस्यौ । अब घर सल्लाह गरेर त्यसै गरौंला, मैयाँसाप,भवेन्द्र पनि मैरौ विवाह भयो भन्नै सुनेर साह्रै खुसी छन्‌ रे । काका त्यही खबरलिएर आउनुभएको थियो । हजुरले पति आफनो ख्याल राखिसेला । दुब्लाएरआँखा पनि गडेछन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीको हात मुसार्बै भनिन्‌, &#039;हुन्छ म आफनो ख्याल राखतपाइँले पनि आफनो ख्याल राख्नुहोला । कान्छी आँखाभरि आँसु पारेररहिन्‌ । शालु सबैलाई भेटी खुसी हुँदै घर फर्किन्‌ । कान्छीको सुखी जीवनदेख्दा शालुलाई सिङ्कौ बसन्त पाएझौँ लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==नौ==&lt;br /&gt;
शालु कान्छीलाई भेटेर आएपछि यतिविध्त खुसी थिइन्‌ । आफ्नो खुसी पोख्नउनले घर नै थर्कने गरी क्यासेट खोलिन्‌ । त्यही म्यासेटको तालमा नाचिन्‌ ।क्यासेटको गीतमा स्वर मिलाएर गीत गाइन्‌ । शालुको त्यो क्रियाकलाप देखेरटाउको दुखेर सूतिरहेका दीपकले उर्मिलातिर फर्कदै भने, हेर उर्मी आज म योकेसुन्दैछु हामीले क्यासेट सुन्दा सानो पारेर बजाए हुन्छ भन्ने मान्छेले आज आफै....&#039;&lt;br /&gt;
सधैँ आदशं ओकेल्नै मैयाँसापलाई पनि अब वैंसले कृत्कृत्याएजस्तो छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपकले कुरा थपे, &#039;उर्मी मैले भन्दै थिएँ । शालु सिम्पल भइन्‌ भनेर पीरनगर । बैँस आएपछि उनमा आफसेआफ परिवर्तन आउँछ । पख न अबबिस्तारै उनी तिम्रो इच्छाभन्दा पति माथि उदछिन्‌ । अनि हाम्री छोरीलाई छुनकसले सक्नै ? तर आज भने मलाई यो धुन अलि बढी नै भयो । धुन अलि कमगर्न लगाइदै ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले दीपकको गालामा म्वाइँ खाँदै भनिन्‌, &#039;प्लिज डार्लिङ चुप लागिस्यो ।छोरीको यो रूप देख्दा म ज्यादै खुसी छु । म मात्र के हजुर पनि त खुसी होइसिन्छति, हैन भन्िस्यौ त ? उफ ! आज हजुरलाई टाउको दुखेकोले फिरोजको डान्समिस भयो । आज कस्ता-कस्ता तरुनी लिएर आउँथ्यो कुन्नि ! होइन त्यसलेत्यत्रा युवतीहरू कहाँ पाउँदो होला ? मलाई त अचम्मै लाग्छ भन्या । मोरोआफू पनि कारिगरले कुँदेको ढुङ्गाको मूर्ति जस्तै छ । गंगा र रमण त त्यतिराम्रा होइनन्‌ त्यो कसरी पूर्ण चन्द्रफै जन्म्यो कुन्नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो उर्मी, तिमीले ठीक भन्यौ । बाबु-आमा त खासै राम्रा होइनन्‌ । क भनेअलगौ रहेछ । सबै भन्थे दार्जिलिङ पढ्न वस्दासम्म साह्रै असल थियो रे ।बाबु-आमाले चार-छपल्ट के पार्टीमा ल्याएका थिए । त्यसपछि उसले शिखरचढिहाल्यो । बानु-आमालाई नै माथ गर्ने गरी पिउँछ बा !&lt;br /&gt;
रमण भन्दै थिए, &#039;फिरोज स्टुडेन्ट भिस्सामा अमेरिका जाँदैछ । फेरि किनअमैरिका गएन छ कुन्नि ? आजकाल किन गंगा रमण पनि देखिँदैनन्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपालमा अरू कुरामा विकसित हुनु त्यत्तिकै हो । छाडापन भने राम्ररीसप्रेको छँदैछ । घन्टा-घन्टामै केटीहरू फेर्न पाएपछि किन जाओस्‌ अमेरिकासमेरिका । संचिवनी उमा भन्दै थिडन्‌- &#039;गंगा र रमणको त हाड र छाला मात्रैछ रे । पहिला मेरोजस्तो छोरो संसारमा नै छैन भनेर नाक फुलाउँथे । अहिलेछँडौलीहरूको पछि लागेर घरमा बास नै हुँदैन रे । वाबु-आमासँग मुखमुखैलागेर भन्छ रे तिमीहरूले जुन बाटो देखायौ त्यतै हिँडे के बिराम गरे हँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपकले लामो श्वास फेदै भने, &#039;त्यसो भए तिमीलाई लाग्दैन ? जे छिन्‌हाम्री शालु ठीक छिन्‌ भनेर ।&#039;&lt;br /&gt;
हो ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उमिंलाले टाउकोमा हात राख्दै भनिन्‌, &#039;फिरोजजस्तो पो हुनुभएन तसमयअनुसारको त हुनैपन्यो नि । हाम्री शालु त सत्ययुगकी सीताजस्ती छै ।उसलाई यो युगमा कसले गन्छ शालुको पापा : देखिसेन, सुब्वा-सुव्विनीकोजोडीलाई, चट्ट वाइन समाई दुई पेग मात्र खाई । सबैसंग हात मिलाएर हिँडी,सबैले उसलाई राम्रै माने । हाम्री शालुचाहिँ डा. पुष्कर भट्टको श्रीमतीभन्दाकम हुन्न । न लाउनको सोख न खानको ।&#039;&lt;br /&gt;
दीपकले थुक घुटुक्क निल्दै भने, &#039;हो उमी त्यो सुब्विनीको हात पिउरीजस्तैनरम थियो । अहिले सम्झँदा पनि जीड नै सिरिङ्ग हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;उमिंलाले अलि ठुस्कँदै भनिन्‌, &#039;भर्खर विवाह गरेर ल्याउँदा म पनि तिनीभन्दाकम थिइनँ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाको कुरा सुनेर दीपक ठूलो स्वरमा हाँसे । अनि सोचिरहे- &#039;साथीकोविवाहमा जन्त जाँदा रूप राम्रो देखेर विवाह गर्छु भनिहालें । विवाह गरेरल्याएको राति फुटेका हात खुट्टाले शरीरमा कोरेको अझैँ बिर्सिएका थिएनन्‌उनले । मनमनै भने, &#039;मैले विवाह गरेर नल्याएको भए कहाँ दाउराघाँसगरिरहेकी हुन्थिन्‌ यतिखेर । धादिङबाट बिबाह गरेर ल्याउँदा बोल्नसम्म ढङ्गथिएन । स्पष्ट बोल्न नजानेर कत्रो हत्य । चम्चा उचाल्नसमेत आउँदैनथ्यो ।तिमीलाई मान्तैपर्नै कुराचाहिँ तिमीले आफूलाई चाँडै नै सहरीया साँचोमाढाल्यौ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;होइन के सोचिस्या ? म सुब्विनी जस्तो थिइन त ?&#039; चेप्रिँदै बोलिन्‌उर्मिला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
थियौ बाबा थियौ । तिम्रो रूपले मोहनी लगाएरै त हो नि त्यो डाँडाबाटयहाँसम्म ल्याएको । तिमीलाई आफनो चालढालमा ढाल्न गाह्रो हुन्छ भन्नेलागेको थियो, तिमी त उपियाँ उफ्रेझै मभन्दा पहिला उफ्रियौ । अहिले तिमीलाईकसले भन्छ घादिङकी भनेर ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले मख्ख हँदै कुरा थपिन्‌, &#039;अब हाम्रो गुप्र नै नृत्य सिक्न जाने भएकाछ। जीउ पनि बन्ने कला पनि सिकिने ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपकले भने, &#039;अबचाहिँ योभन्दा माथि नगए राम्रो । जे पनि पच्ने गरीखाएको राम्रो हुन्छ । तिम्रो गुप अलि माथि नै गइसक्यो, अब कति माथि जानेमन छहँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;सबैले नाच सिक्ने. भनेपछि म मात्र कौवाको बथानमा बकुल्लौ हुनु भएन ।हजुर हल्का भुजा, दाल तरकारी खाइस्यो । म भने मासुसँग अलिकति सुइँक्याउँछु ।हेरिस्यो नखाई त निद्रा नै पर्दैन । शालु पनि नाच्दानाच्दा थाकेर सुतिन्‌जस्तो छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नभन्दै शालु थाकेर ओछ्यानमा पल्टेकी थिइन्‌ । यता शालु उता कान्छीकोमन नै खुसीले नाचिरहेको थियो । कान्छीले शालुको तस्बिरलाई पहिलाकै किलामा &#039;झुन्ड्रयाइन्‌ । शालुसँगको भेट हुँदाको खुसीले गर्दा कान्छीलाई खानपनि मन लागेन । राति चन्द्रकान्तको छातीमा सृतेर आँसु वगाइरहिन्‌ ।चन्द्रकान्तले कान्छीको मनको करा बुझेर कान्छीलाई दुई वर्षको बालकलाईझैमाया गरेर सुमसुम्याइरहे । कान्छी रुँदारुँदै निदाइन्‌ । चन्द्रकान्तले वडो मायालुपाराले कान्छीको टाउको तकियामा राखेर आफू पनि सुते ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुजन कोठामा पसेपछि शालुको एकाग्र भङ्ग भयौ । सुजनलै दिक्क मान्दैभने, &#039;हेरन शालु आज पापालाई टाउको दुखेर पार्टीमा जान पाइनँ । हिजो त्योफिरोज भन्नेले डान्स गरेको अझै आँखामा झल्झली आइरहेको छ । सेमतिम्रोजस्तै डान्स गर्दोरहेछ । त्यो प्रकाशेलाई त अहिले कसैले वास्ता नैगर्दोरहेनछन्‌ । हेर शालु, फिरोजलाई देखेपछि युवतीहरू त हाम फालेरआउँदारहेछन्‌ । म पनि ठूलो भएपछि फिरोज जस्तै बन्छु । डान्सचाहिँ तिमीलेसिकाइदिनुपर्छ नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले सुजनको हात समातेर मुसार्दै भनिन्‌, &#039;डान्सचाहिँ म सिकाइदिउँलातर फिरोजजस्तै बन्छुचाहिँ नभन. फिरोज भनेको बेलुनमा हाबा भरेको जस्तैहौ । केही समयपछि आपसैआफ फुट्छ त्यो । जीवन नबुझनेहरूमा गनिन्छत्यो । त्यसको चर्चा ममीको मुखबाट पनि धेरैपल्ट सुनेकी हुँ मैले । ममीहरूजस्ताको मात्र पारखी हो त्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दिदी तिमी त आफूलाई निक्कै ठूली भएँ भन्नै ठान्छयौ कि क्या हो ? मान्छेकति-कति पढ्दा त ठूलो हँदैनन्‌ तिमीले त बल्ल एस्‌ एल्‌ सी. दिएकी छ्यौ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कान्छु मैले सानोमा नै दिदीबाट घेरै कुरा सिक्ने मौका पाएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमीले नै दाइ र दिदीको नराम्रो विचार रहेछ भनेर निकालिदिएको होइनर ? फेरि कसरी उनीहरू राम्रा भए ?&#039;&lt;br /&gt;
शालुले तुरुक्क आँसु झार्दै भनिन्‌, &#039;तिमी अहिले सानै छौ कुरा बुझदैनौ ।डान्स म सिकाइदिउँला । मान्छेले सबै क्रा जान्नुपर्छ तर सबैभन्दा ठूलोचाहिँपढाइ नै हौ । कहिलेदैखि पढाइ सुरु हुन्छ तिम्रो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुजनले हाई गर्दै भने, &#039;पसिंदेखि हुन्छ । दिदी हुँदा कहिले घरको खानाखाक जस्तै हुन्थ्यो । अहिले जतिपल्ट घर आउँछ उतिपल्ट काम गर्नेहरूफेरिएका हुन्छन्‌ । होस्टेलको भन्दा पनि खाना मीठो हुँदैन । अहिले पनि मैलेभुजा खानै सकिनँ । तिमीले खायौ ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;आज मलाई खान मन नलागेर त्यसै सुतेकी थिएँ । भोलि बिहान म खानापकाउँला, दिद्दीले जस्तो पकाउन त सक्दिनँ, तीर्थले भन्दाचाहिँ मीठो नैपकाउँछु ।&#039; हुन्छ भन्दै सुजन आफूनौ कोठातिर लागै । शालु दिदीको सम्झनामाआँसु झार्दै सुतिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==दस==&lt;br /&gt;
क्याम्पस आएको पहिलो दिनदेखि नै आफनौ हाउभाउ र सुन्दरतालेकक्षाकोठाको मर्यादालाई नै हलचल पारेकी थिइन्‌ मौसमीले । केही बनौँलाभनेर विज्ञान विषय लिएर पढेका युवाहरूको ध्यान पढाइमा भन्दा मौसमीकोरूपमा केन्द्रित थियो । शालुलाई मौसमीको चालढाल देखेर अत्यन्त रिसउद्यो । केही दिन त शालु मौन नै रहिन्‌ । जब कक्षामै मर्यादाभन्दा बाहिरगएर हात हालाहाल गरी चलेको देखेपछि शालुले मौसमीलाई एकान्तमा गएरसम्झाइन्‌, “मौसमी, तिमी कुन बिषय लिई पढ्दैछूयौँ थाहा त छ, होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले हाँस्दै उत्तर दिइन्‌, &#039;शालु, तिमीले भन्न खोजेको कुरा मैलेबुझिसकेँ । हेर म यहाँ आफनो खुसीले भर्ना भएकी हुँ भन्ने ठानेकी छौँ?जिल्लामा सरहरूले नै चिट चोराएकाले गर्दा राम्चै फस्ट डिभिजन आएछ ।बिचरो मेरौ सोझो बाबुलाई छौरीले रामो नम्बर ल्याएकी छ, साइन्स पढा,भौलि डाक्टर हुन्छै भनेर उचालिदिएछन्‌ । हो न हो छोरी डाक्टर बन्छे भन्नेसपना देखेर मलाई यो क्याम्पसमा ल्याएर कोचेर पो गए । हेर, बाबु-आमाभनेको त पढेलेखेको चाहिने रहेछ बुझयौ ? मैले हजारपल्ट भने- बुबा मसाइन्स पढ्न सक्दिनँ । मेरो कुरा मरे सुनेको भए पो । अझ अर्को कुरासुन्छयौँ ? वसमा मान्छेहरूले कहाँ जान लाग्नु भो भन्दा भन्धे- मेरी छोरीलेएस्‌.एल्‌ सी.मा बोर्ड ल्याएकीले काठमाडौंमा डाक्टर पढाउन हिँडेको । भकारोसोने बाबुलाई फस्ट डिभिजन र बौर्डफस्टको अन्तरसम्म थाहा छैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मलाई पो लाज लागेर, उता बूढाको खुट्टा भुइँमा छैन । अब म लबुदुलेडाक्टर बनेर उनको छाती दुखेको निको पार्ने रै, उफ कर्म !, बाबुको करासम्झँदा पनि कहिले एक्लै हाँस्छु कहिले एक्लै रुन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले मुसुक्क हाँस्दै भनिन्‌, &#039;बडो हँसायौ तिमीले, बिचरो, तिम्रो बाबु बडोसिधासादा हुनुहँदोरहेछ । कहाँबाट आएकी नि !&#039;&lt;br /&gt;
मौसमीले निदारमा हात राख्दै भनिन्‌, &#039;राम्रो ठाउँबाट आएकी भए यो दशाकिन भोग्नुपर्व्यो ? पर्वतबाट आएकी बानु डाक्टर बन है छोरी भनेर नाकफुलाएर गएका छन्‌ । तेत्रो पढेलेखेका घरबैटीलाई यसो भने- &#039;ए हजुर, योछोरीले डाक्टर पढ्दै छे कहिलेकाहीँ घरबाट भाडा आउन ढिलो भए केहीनभन्नु होला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घरबेटी बुवाले मेरो बाबुको कुरा सुनेर मुसुक्क हाँस्दै मुन्टो हल्लाउनुभयो ।मैले कतिपल्ट डाक्टर बन्न सजिलो छैन भनेर सम्झाएँ, मेरो कुरा सुनै पौ ।उल्टै भन्धै- &#039;तिमीले मलाई मूर्ख बनाउन नखोज है छोरी, &#039;म पनि देश खाएर सेस भएको मान्छे&#039; अहिलेसम्म त वाबुले गाउँमा मेरी छोरी डाक्टर बनेरआउँछै भन्दै हल्ला पिटे होला । हेर शालु, मेरो बाबुलाई डाक्टर बन्नु भनेकोगुन्द्रुकमात खानझै सजिलो हुन्छ झैँ लाग्छ क्यारे ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीको कराले शालुले हाँसो रोक्नै सकिनन्‌ । केहीवैर हांसैर भनिन्‌,“मौसमी मान्छेले चाहेमा जे पनि गर्ने सक्छ । तिमीले दिलोज्यान दिएर पढ, यीभवराहरूको भुनभुनबाट ज्यादै टाढा रहँ । जसरी भमराहरू फूलको रस पाउन्जेलमात्र फूलमा बस्छन्‌ । यी युवकहरू पनि त्यस्तै हुन्‌, तिमीले आमाको त करैगरेनौ नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आमा त म तीन वर्षकी हुँदा बित्नुभयो रे । आमाको त सम्झना नै छैन ।बाबुले नै थि भयो । हामीलाई दुःख देली भनेर अर्को बिबाहसम्म गर्नुभएन ।आमा मर्दा बाबु पैतीस-चालीसको मात्र हनुहुन्थ्यो रे । दाइ र दिदीले एस्‌.एल्‌.सी.पास गर्न सकेनन्‌ । मैले फस्ट डिभिजन ल्याएको उनलाई के-के न भयो । वावुभन्दै थिए, &#039;नानी तँलाई डाक्टर बनाउन चालीस-पचास हजार पर्ने टाँडी खेतनै बेचिदिन्छु ।&#039; बाबुको कुरा सुनेर म झन्डै पागल भएं । सम्झाउन खोज्दाउल्टै बौल्न दिने हो र । भन्थे- &#039;तिमी खुरुक्क पढ मात्र अरू कुरा मलाई थाहाछैन । त्यो खेत बेच्दा पनि पैसा नपुगे माझा पाटो पनि बेचिदिउँला । डाक्टरबनेर पहिला पोस्टिङ गाउँमा नै मिलाए है नानी ...। अँ साँच्चि शालु, मसँगतिमी सबै कुरा गर तर भमरा र फूलको कुरा नगर । म बैंसका उन्मादहरूलाईबसमा राखेर तद्वपिन चाहन्न । म आफूलाई कुण्ठित पारेर बाँच्दित पति । मउड्न चाहन्छु बुझ्यौ ? तिमीले बगैँचामा गएर कोपिलाहरूलाई नफुल भनेरगाली गर्दैमा फुल्दैन र त्यो ? फुलेपछि भगरा लाग्नु प्रकृतिको नियम हो । त्योप्राकृतिक नियमविरुद्ध हिँड्नु नै पाप हो । सक्छयौ भने प्राकृतिक नियमविरुद्धतिमी पनि नहिँड । यी क्षण हामीबाट बगेपछि बग्यो शालु । हामी बुढेसकालमाचाहेर पनि यो खुसी पाउन सक्दैनौँ । म तिमीलाई अन्तिमपटक भन्दैछ, मेरोओठको हांसो नखोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले बडो नम्र स्वरमा भनिन्‌, &#039;मौसमी, तिम्रा बाबुको सपनासँग तिमीलाईकनै सरोकार नै छैन त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले उत्तर दिइन्‌, &#039;सपना देख्नेले पनि अलि सार्थक हुने सपना पोदेख्नुपयो नि ! हुट्टिट्याउँले आकाश थामेको सपना देख्नेले देखिरहुन्‌ । मलाईकुनै चासो छैन । एक-दुई वर्ष यसो क्याम्पसमा हल्लिन्छु । त्यसपछि गाँठवालापट्याउँछ र विवाह गर्छु । सुन्दरी छँदैछु, मान्छेले हेर्ने सुन्दरता नै हो । मान्छयौभने तिमीले पनि आफूतौ सुन्दरतामा ध्यात दिने गर, साँच्चि शालु तिमीलाईपो युवकहरूले कुन गाउँबाट आएकी भनेर मसँग सौध्दै थिए । कमसेकमकाठमाडौंको त इज्जत राख । उनीहरूले मात्र होइन । मैले पनि तिमीलाईगँवार नै सोचेकी थिएँ । यस्तै हो भने तिम्रो भविष्य अन्धकार छ बालिके ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीको करा सुनेर शालु एकैछिन मौन रहिन्‌ र भनिन्‌, &#039;मौसमी, भीरखोज्ने गोरुलाई रामराम मात्र भन्न सकिन्छ काँध नै थाम्न त सकिँदैन । मैलेजीवन्त के हौ नबुझेकी भए म किन तिमीसँग राम्रो वाटो रोज भनेर हातजौद्यैं । तिमी र म एकै उमेरका हौँ । कै तिमीलाई वैंसले कृतकत्याउँदा मलाईबैंसले छोड्छ होला र ? तर, ठूलो त मन हो । तिमीलाई आफूनै आँसु पियाएरहुर्काउने बाबुभन्दा तिम्रो बैँस ठूलो होइन । टाढा किन जान्छौ । तिम्रो बाबुलेनै तिमीहरूको खुसीका लागि आफूनो खुसी बन्धकी राख्नुभयो । तिमी साइन्सपढ्न सम्दिन भन्छ्यौ भने अर्को विषय पट, समय छँदैछ । बरु सक्दो सहयोगम नै गर्छु । प्लिज मौसमी तिमीले आफूलाई सत्व नठान । अहिलेसम्म तिमीबहुमूल्य रत्न हौँ । तलमाथि केही भयो भने तिमीलाई मान्छेहरूले फुटेकोभाँडोसँग पनि दाँज्दैनन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;शालु, तिमीलाई मेरो रूपको त्यत्रो डाह छ भनेकाटेर लेक । तिमीलाई युबकहरूले पछ्याएनन्‌ अनि मेरो डाह गर्छ्यौं, तिम्रोमनको कुरा गैले बुझिसकेँ । भमरा &#039;झुम्मिँदा पनि बास्नादार फूलमा &#039;झुम्मिन्छन्‌याद गर । तिमी र झरेका फूलमा कुनै अन्तर छैन । अनि को पछि लागोस्‌तिम्रो ? सक्छयौ भने एकजना युबकलाई मात्र पछि लगाउन सक&#039; भन्दैमौसमी भुतभुताउँदै उठेर आफ्नो कक्षाकोठामा प्रवेश गरिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले मनमनै सोचिन्‌, &#039;भगवान्‌ मौसमीको जीवनमा आँधी नआओस्‌ ।उनले जीबनको मूल्य बुझून्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले ढोकाबाट चिहाउँदै भनिन्‌, “मोरी, म तँलाई खोज्दाखोज्दा हैरानभैसके । कै सौचैर बसेकी ? कतै तैँले अरिङ्गालको गौलामा हात हाल्नै कामगरिनस्‌ ; मौसमी पनि कक्षामा फतफताउँदै पसेकी थिइन्‌ । तँ किन प्रेमलाईघणा गर्छेस्‌ भत्त त ? मौसमीले भन्दा बढ्ता उच्छुड्खल हामीले प्रत्येक क्षणसडकपेटी र गल्लीहरूमा हिँड्ने प्रेमी-प्रेमिकाहरू देख्दै आएका छौँ । यसरी तँभाबुक नबन, खुरुबक क्लासमा हिँड । तँ सधैँ यही भन्छेस्‌, “वास्तबिक प्रेममात्याग हुन्छ, प्रेममा लज्जा हुन्छ, बास्नाभन्दा बढी प्रेम हुन्छ केवल प्रेम ? त्यस्तोप्रेम गर्ने भए तैँले र मैले मात्र गरौँला अरूबाट तैँले यस्तो प्रेम गर्लान्‌ भन्नेआश नगरै पनि हुन्छ । तँ परिस्‌ प्रेमको सख्त विरोधी । मैले कसैसँग प्रेम गरेँभने तैँले सोचेभौँ प्रेम गर्छु । अब त हाँस ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीको कुराले शालु फिस्स हाँसिन्‌ र वसेको ठाउँबाट उठ्दै भनिन्‌,“रोहिणी, त्यो गाउँले केटी आफ्नै आँखासामु बिग्रिन्‌ भने मचाहिँ हेर्न सक्दिन ।यसो जानेबुझेको कुराहरू भन्दा राम्रै हौला भनेर भनेकी थिएँ । तैँले भनेझैँअरिङ्गालको गोलामै हात हालेँछ । उनी बाहिरको मात्र सुन्दरी रहिछिन्‌ ।मलाई त उनको बाबुको माया लाग्यो । छोरी ठूलो वन्ली भन्ने ठूलो सपनादेखेका रहेछन्‌ । छोरीको ताल भन्ने देखिहाल्यौ । त्यो श्रीराम सरको ताल पनि के हो ? मौसमीबाट उनको आँखा टाढा जाँदै जाँदैन । बूढो भएर पनि पात्तैकोमोरो । त्यस्तै ताल हो भने हामीले राम्रो शिक्षा पाउने आश नगरे पनि हुन्छ ।पुरानो क्याम्पस भनेर अमृत साइन्समा नै आइयो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;मोरी पीर नगर । पढाइ राम्रै होला नत्र आकाश किन यहाँ आउँथे ? मैलेझुलुक्क उनलाई देखेकी थिएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“औं आकाश पत्ति यहाँ, उनी त ए सेक्सनमै होलान्‌ । आकाश यहाँ आएकाछन्‌ भनेपछि त म ढुक्क भएँ ।&#039; शालुको आँखामा खुसी छरियो ।&lt;br /&gt;
रोहिणीले भनिन्‌, &#039;शालु तिमी आकाशको नाम सुन्नैबित्तिकै सधैँ हषितदेखिन्छयौ कित ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले हाँस्दै उत्तर दिइन्‌, &#039;रोहिणी कुरा हामी सबैलाई थाहा नै भएको हो ।आकाशजस्तो चरित्रवान्‌ त यहाँ जन्मेकै छैनन्‌ होला । उनी सम्पूर्ण गुणले पूर्णछन्‌ । यदि भगवान्‌ले कुनै मान्छेको सृष्टि गर्नु छ भने आकाशजस्तो व्यक्तिकैसृष्टि गरोस्‌ । म आकाशलाई कुन उपमा दि उनलाई दिने त्यस्तो उपमा नैभेटेकी छैन मैले ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“क मैयाँसाप, भखंरसम्म प्रमको खिलापमा थिई, फेरि भावनामा बगी, तँकतै आकाशलाई प्रेम त गर्दिनस्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले उत्तर दिइन्‌, &#039;रोहिणी आकाशलाई प्रेम गर्नु भनेको चन्द्रमा छुनुजत्तिकैहो । उनलाई प्रेम गर्नेले पहिला आफनो अनुहार पनि त हेर्नुपत्यो । म उनलाईपूजाचाहिँ गर्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;तँ नरिसाउनै भए म एउटा करा गर्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले हाँस्दै भनिन्‌, &amp;quot;भन न काली किन रिसाउनु : ? नरिसाउने क्रा गरिस्‌भने रिसाउँदै रिसाउन्न, रिसाउने कुराचाहिँ नगर, दिदी-दाइको बारेमा तहोइन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;ल हेर आत्तैकी, तेरा दिदीदाइले त हाम्रो घरलाई स्वर्ग नै बनाएका छन्‌ ।साँच्चै शालु, आफू बूढेसकालकी छोरी, मलाई घरको साह्रै पीर थियो । अहिलेभैरो टाउकोबाट कसैले सिङ पहाड झिक्िदिए जस्तै भएको छ । तेरौ यो गृणम कहिल्यै बिर्सने छैन । ममी-वाबा पनि सधैँ तेरो करा गरिरहनुहुन्छ । दाजु,दिदी पति तेरै कुरा गर्नुहुन्छ । तैले आँसु पिएर कान्छीदिदीलाई मेरो घरमापठाइस्‌ । हामीले सम्पूर्ण पायौं, तैँले सम्पूर्ण गुमाइस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले बीच्चैमा कुरा काट्दै भनिन्‌, &#039;तँ एक्लै बौलिरहेन्छस्‌ कि मलाई पनिवोल्न दिन्छेस्‌ काली : पाउनु मात सबै होइन, आत्मा सन्तुष्टि नै सबै हो ।&#039;दिदीले सबै पाउनुभयो । तैंले सहयोग नगरेको भए न तैले सम्पूर्ण खुसीपाउँथिस्‌, न मैले, हामी सबै एक-अर्काका खुसीमा रमाएका छौँ भने पाउनु र गुमाउनुको त प्रश्नै रहेन । तेरा बूढा ममी-बाबाको ओठमा खुसी देखेपछि तमैरो हर्षको सीमा नै रहेन । तेरो घरको खुसीमा कसैको आँखा नलागोस्‌ । तैँलेके भन्न खोजेकी विइस्‌ कुन्नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;शालु मलाई लाग्छ आकाश तँलाई प्रेम गर्छन्‌ । एकपल्ट त मैरो कुरामाबिश्वास गर । आकाश तेरो लागि नै जन्मेको हुनुपर्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले रोहिणीको कुरालाई हाँसोमा उडाउँदै भनिन्‌, &#039;ल अब तेरो दिमागत्वुस्कियो । प्रेम त्यो पनि आकाशले मसँग । त्यस्तो कुरा मनमा लिनु पनि पापहो । आइन्दा प्रेमसिरेमका क्रा मसँग गरिस्‌ भनेचाहिँ म साँच्चै रिसाउँछु त॑पनि कसैसँग प्रेम नगर है मैले भनिदिएकी छु ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीलाई चुप लाग्न करै लाग्यो । पढाइ सिध्याएर वाहिर निस्कँदै गर्दाबिनुले मौसमीलाई कोट्याउँदै भनिन्‌, “के हो मौसमी ठूलै माछा जालमा पार्नलाग्यौ कि कसो : श्रीराम सर त तिमीलाई देखेर लट्टेजस्तो छ नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले शालुतिर हेर्दै भनिन्‌- &#039;हे्दै जाक न कति माछा जालमा पार्छु ।प्रकृतिले नठगेपछि मान्छेले डाह गरेर के लाग्छ : यो क्याम्पसमा त मेरो डाहगर्ने धेरै छन्‌ बुझ्यौ ? कतै तिमीलाई पति मेरो डाह लागेको त होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;छ्या के को डाह नि, त्यो पति बूढो ढेडुको, आफू त पहिल्यै रिजापमा छु ।&#039;बिनुले उत्तर दिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालु र रोहिणीले उनीहरूको करा सुने पनि नसुनेकोझौँ गरी क्याम्पसबाट बाहिरिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==एघार==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु ओछ्यानमा सुतिन्‌ । खुसीले गर्दा होला आँखामा निद्रा परेन । आँखामाकान्छीदिदीले जन्माएको तीन किलोको सुन्दर शिशु आइरहयो । बाह्र-तेहर वर्षकोचीरुदेखि लिएर रोहिणीका सम्पूर्ण परिवार त्यो शिशु र ढिदीको स्याहारमाकटिबद्ध थिए । सबैको अनुहारमा गुराँस फुलेको थियो । दिदीलाई स्याहारगर्नका सागि खु आइमाई राखेको रहेछ । पीताम्बरा अरूले स्याहार पुन्याउँदैनन्‌नातिलाई सेकताप गर्छु भनेर सुर्रिएकी थिइन्‌ । दिदी र दाइ प्रसन्नमुद्रामा नवजात शिशुलाई हेरेर टोलाइरहेका थिए । मलाई देख्नेबित्तिकै दिदीसम्पूर्ण खुसी विर्सेर रुनुभयो । त्यसपछि एकैछिन र वातावरण नै स्तब्ध भयो ।मैले सबैलाई वधाई दिएर त्यो सानो र सुन्दर शिशुलाई काखमा लिएपछि भनेपुनः रमणीय वातावरण छायो । दिदीलाई बच्चा पाउन चिरफार गर्नुपर्छ किभन्ने पीर थियो । त्यो पनि हट्यो । रोहिणी पनि कम वाठी छैन, पैले पीर गर्छुभनेर एकैपल्ट बच्चा पाएर घर ल्याएपछि डाकी । दिदीलाई अरूलाई भन्दा केही गाह्रो त भयौ होला, तर दिदीले मैयाँ धेरै गाह्रो भएन भनेर ढाँदनुभयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीकी आमाले पनि दिदीकै कुरामा सही मिलाउनुभयो । शाल्‌ दिउँसोकोसबै कुरा सम्झँदै ओल्टैकोल्टै परिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
होइन मैयाँसाप आज पनि खाना नखाई सुत्नै कि क्या हो ? आफभन्दा दुई-चार वर्ष जेठो तीर्वले ढोकामा आई बोलेर्पाछ पो शालुले आफू भोकै भएकोकरा याहा पाइन्‌ र ओछ्यानबाटै भनिन्‌, &#039;तपाईँ खानोस्‌ म खान्न ।&#039; तीर्थेलेआफनै सुरमा के भन्यो बुझितन्‌ शालुले ।&lt;br /&gt;
केहीबेरपछि नशामा गुनगुनाउँदै आएको पापाको स्वर भने शालुले राम्ररीबुझिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले हाँस्दै भनिन्‌, “बुढ्यौली लागेर पनि अझैँ बैँस गएको छैन । मोरोतीर्थ र शालुले गीत सुन्लान्‌ नि फेरि । शालुको पापा म पो अबदेखि रमफझमबाटविमुख हुने भएँ । यो तीर्वेले पनि यो घर होइन, आफनै पेट मात्र सम्हाल्नेभयो । मेरो घर भत्कियो पापा भत्कियो । म बर्बाद भएँ । कान्छीलाई आजैलेराइदिस्यो आजै ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपक चिच्याए, &#039;उर्मी, चूप लाग आज तिमीलाई धेरै नशा लागेजस्तो छ ।त्यौ कान्छी चकलेट हो र तिमीले भन्दैमा किनेर ल्याउने । कान्छी बस्तासम्मआजै निकालौं भोलि निकालौँ भन्दै दिमाग खान्थ्यौ । अहिले फेरि, कान्छील्याइदिनु पो भन्छिन्‌ । होसमा बोलेकी हो कि बेहीसमा यो आइमाईको बोलीकोभर नै छैन।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म होसमै छु भन्दै कपडा नै नखोली पलङमा पल्टिन्‌ र कान्छी-कान्छी भन्दैनिदाइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपक पनि उमिलाले कान्छीको नाम लिएको सुनेर केही रिसाउँदै सुते ।शालु ममी र पापाको शब्दहरू सुनेर मनमनै रोइन्‌, &#039;तिमीहरू जस्ता पापीलेगर्दा नै मैले दिदीको काखबाट टाढा हुनुपन्यौ । तिमीहरू गतिला भएको भएत्यो भाइ आज यो घरमा हुन्थ्यो । माल पाएर चाल नपाउनेहरू रोओ, अवकति रुन्छौ । शालु दिदीलाई सम्झँदै निदाइन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन तीर्थ दाइ किन झोलासोला बौकेर हिँडेको :&#039;&lt;br /&gt;
तीर्थले आँखा पल्टाउँदै भन्यो, &#039;म त पहिलाकै घरमा जान्छु । त्यहाँ तमैयाँसापसँग हाँस्न र ठट्टा गर्न पाइन्थ्यो । जति पैसा मागे पनि दिन्थे । यहाँआएपछि न हाँसोठट्टा गर्न पाइन्छ न त पैसा नै दिन्छन्‌ । पैसा दिनुपन्यो भनेदाँतबाट पसिना निकाल्छन्‌ । कान्छीले यसो गर्थी, उसो गर्थी भनेर उल्टैरामायण सुनाउँछन्‌ । यो कलियुगमा को कान्छी भन्नै जन्तु रहिछै नविना पैसाकाम गर्ने । उहाँकी मैयाँसाप म रिसाएँ भने मलाई काउकृति लगाएर हँसाइसिन्ध्यो । हजुरकै उमेको भए पनि वढो रसिलो होइसिन्थ्यो । म भनेपछिहुरुक्कै होइसिन्ध्यो । यहाँ हजुर पनि यस्तै होला भनेर आएको त हजुरले तहाँस्तसम्म जानेको छैन रहेछ । अरू कुरा त परै जाओस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालु तीर्थैंको कुरा सुनेर डराइन्‌ र आफनो रिसलाई कन्ट्रोल गर्दै भनिन्‌,&#039;दाइ तपाईं जानोस्‌, यहाँ अर्को काम गर्ने ल्याउने कुरा भइरहेको छ बरुबाटोखर्च छैन भने म दिन्छु।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीर्घले झकिँदै भन्यो, &#039;बिहान आफनो तलब मागिसकेको छु । जति कामगर्ने ल्याए पनि यो घरमा को टिक्ला र ? ल म गएँ । यही तलब पर्खेर बसेकाथिए तत्र अस्ति नै गइसक्यें । मति बिग्रेका यहाँ आएँ, अहिले उहीँ फर्कनुपन्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फौनमा उहाँको साहु-साहनी र मैयाँसापले अन्त बसेर चेतिस्‌ होला,आउँछस्‌ भने आइज भन्नुभएको छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीर्थे ठूलो-ठूलो फड्को मार्दै बाटो लाग्यो । शालुले तीर्थेको नियति बुझेपछिक निकाल्नु नै श्रेय ठानिन्‌ । तीथेंले बाटो लाग्दा उसको अनुहारमा पनि कुनैहीनताबोध थिएन । क खुसीले उन्मत्त थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन, तीर्थे कहाँ मन्यो र तिमी गेट खौल्न आएकी ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अरू काम गर्ने सात-आठजना मरेजस्तो क पनि भन्यो । तीर्थको कराभोलि गरौंला, अहिले हजुर नशामा होइसिन्छ सुतिस्यो ।&lt;br /&gt;
दीपकले भने, &#039;बिहानसम्म त उसले जाते क्रै निकालेको थिएन । एक्कासिकिन हिँड्यो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“भन्दै थियो काम गरेको तलब नदिएर पो वसेको नत्र म यो घरमा किनबस्थेँ ? पैसा माग्यौ कि सधैं कान्छीको कुरा गर्छन्‌ । भन्दै हिँड्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले विरक्त स्वरमा भनिन्‌, &#039;शालु हामी बिहानदेखि बेलुकासम्म बाहिरैहुन्छौँ । काम गर्न के नै गाह्रो छ र, काम गर्नेहरू किन टिक्दैनन्‌ ? न बगैँचार करेसाबाहिरै काम गरेका हुन्छन्‌ । घिच्नु र टी.भी. हेर्नुबाहेक अरू काम छैनर पनि यिनीहरूलाई के मात लाग्दो हो कुन्नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ममी हजुर सबैलाई कान्छीदिदीसँग तुलना गर्न खोजिसिन्छ । अनि कसकोचित बुझछ हँ ? हेर, कान्छीले यति मासु तीन छाकलाई पुन्याउँथी । कान्छीलेयति आलुले हप्ता दिन पुन्याउँथी, चामलले महिना दिन पुग्याउँची, तेलले यतिदिन, ग्यासले यति दिन, त्यसमाथि कान्छी त ज्याला लिँदैनथी । कपडा कहिल्यैमाग्दैनथी । हजुरको यौ भाषण प्रत्येक दित सुनेपछि कसरी टिक्छन्‌ मान्छेअब चुप लागेर सुतिस्यौ । पकाउने, खाने काम म आफैँ गरौंला, काम गर्नेमान्छे राख्नै पर्दैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपकले उर्मिलालाई कोठामा लग्दै भने, &#039;अब चुप लाग, कान्छीलाई निकाल्न अनेकौं बहाना बनाएको फल वल्ल भोग्दैछयौ । कान्छीले सिक्री चोरी, औँठीचोरी भन्दै घोच्च्यौ, हेर्दै जाक अब के-के हुन्छ । तिम्रो घरलाई स्वर्गजस्तैसुन्दर भन्नेहरू आजकाल यहाँ आउन मन गर्दैनन्‌ भन्दै आफैँ बेसुरमावर्वराउँछयौँ । तिमीलाई थाहै छ । शालु कान्छीलाई सानोभन्दा सानौ चौटलाग्दा पनि दुखित हुन्थिन्‌ । त्यस्ती शालुले आफैँले कान्छीलाई निकालिन्‌, त्योपनि चन्द्रकान्तको आरोप लगाएर त्यसमा ठूलै रहस्य होला । उमिलाले पलङमापल्टँदै भतिन्‌, &#039;हजुर पनि नाता शङ्का-उपशङ्का गरिसिन्छ । कस्ताले कस्तालेत बैँस थेग्न सक्दैनन्‌ । त्यो मोरीले सक्छे ? हामी कोही घरमा नहुँदा ती दुईकैरजाइँ हुन्थ्यो । कान्छी बारीमा गए पनि सँगै जान्थ्यो । त्यसले कान्छीलाई मायागर्छफौँ मलाई पहिल्यै लागेको थियो । त्यसैले त त्यो पनि पैसाको त्यति वास्तागर्दैनथ्यो । अहिलेको काले स्वाठ देखिसिन्न कस्तो छ । मैले अस्ति भाइ त्यतिफूलमा पाती हालिदैउन्‌ भनेकी थिएँ ठाड्चै जबाफ दियो- &#039;मैल आजसम्मकसैको घरमा काम गरेको छैन, हजुरहरूको बाहिर जाने भए फोन गर्नु भन्दैटिम्किँदै हिँड्यो । चन्द्रकान्तलाई कहिल्यै काम अह्ाउनु पर्दैनथ्यो । आफनैतलबबाट फूल ल्याएर कुन फूल कहाँ लगाउने कान्छीलाई सोधी-सोधीलगाउँथ्यौ । तरकारी लगाउँदा पनि त्यस्तै गर्थ्यौ । जसरी कान्छीले यो घरलाईआफनो सम्झन्धी त्यसैगरी चन्द्रकान्तले पनि यो घरलाई आफनै सम्झिन्थ्यो ।यो सबै गर्नुको पछाडि चन्द्रकान्त पति कान्छी यो घरबाट निस्कन चाहँदैन्थ्मोबुझनु भौ ? शालुले यो घरमा बस्नुको बास्तविकता नबुझेरै निकालेकी हुन्‌मलाई थाहा छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमीले जे सोचे पनि मेरो भित्री मनले भन्छ- &#039;शालुले कान्छीको कहिल्यैकमलो चिताउँदिनन्‌ । कान्छीलाई तिमीले निकाल्न लागेको योजना थाहापाएपछि शालु आफैँले कान्छीलाई निकालिन्‌ । कान्छी गएपछि कति दिनसम्मशालुले राम्रोसँग खाना खाइनन्‌ । आजभोलि भने उनको अनुहारमा अलिकचमक छ याद गरेकी छ्यौ ? त्यौ चमक तिग्रो र मेरो कारणले होइन,कान्छीको कारणले आएको हुनुपर्छ । कान्छी गएदेखि शालुले न मीठो खानाखाएकी छिन्‌ न समयमै खाता खाएकी छिन्‌ । फूल भनेपछि हुरुक्क हुने शालुलेन बगैँचा सुन्दर देख्न पाएकी छिन्‌ । त्यति हुँदा पनि उनी खुसी छिन्‌ । आखिरकिन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“भो-भो चुप लागिस्यो हजुर, नशाको सुरमा जे पनि भनिसिन्छ । हजुरकोकुरा सुनेर त मेरो टाउको फुट्ला जस्तो भयो । अब एक पेग नवपी निद्वानपर्ला जस्तो छ । उमिलाले वाइन खन्याएर गिलासमा हालिन्‌ । पानी पनिनथपी वाइन्‌ घट्घटी पिएर सुतिन्‌ । दीपकले पनि सिसीमै ठाडो घाँटी पारेरघट्घद्‌ वाइन पिई सुते । शालुको आँखामा दिदी, त्यो अबौध शिशु र सबैकोहर्षित अनुहार नाचिरहयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बार्ह==&lt;br /&gt;
लौ, यो युवकले बिहानै-बिहानै पिएर आएछ क्यार, क झुल्न पो लाग्यो ।अर्कोले कुरा थप्यो, &#039;कहाँ पिएको हुनु, यो र म सँगै लगनखेलमा बस चढेकाहौँ । कुसुन्तीसम्म आउँदा ठीक नै थियो, अहिले पो &#039;झुल्दैछन्‌ । अर्को यात्रुलेठूलो स्वरमा भने, &#039;ए ड्राइभर बस रोक कहाँ यो छारे रोगीलाई बसमाहालेको ? म &amp;quot;झर्छु । मलाई छारे रोग सार्नुछैन ।&#039; सबै यात्रुले एक्कै स्वरमाचिच्याए, &#039;हो ... हो, बस रोक कस्तो वेसाइतमा हिँडिएछ । छारे रोगी चढेकोबसमा । वस रोकेर ड्वाइभर र कन्डक्टरले केही बौल्न नपाउँदै सबै फुतफुतबसबाट ओलेर हिँडे । त्यही बसमा आएकी रोहिणी हेरेको हेरै भइन्‌ । रोहिणीलेहतारहतार &#039;फुल्दै गरेको युवकलाई समातेर भनिन्‌, &#039;द्वाइभर साप छिटो हस्पिटलहिँड्नोस्‌ न । तपाईंलाई जति पैसा चाहिन्छ म दिन्छु ।&#039; रोहिणीको कुरा सुनेरड्राइभरले केही खुसीको स्वरमा भन्यो, &#039;हुन्छ हजुर यहाँबाट नजिक वीर अस्पतालैहोला त्यही जाँ है ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले स्वीकृति दिइन्‌ तर युवक मुर्दाझै भएपछि रोहिणीको सातोपुत्लोगयो । ड्राइभर र कन्डक्टर दुवै डराए । ड्राइभरले रोहिणीलाई केही सान्त्वनादिँदै भन्यो, &#039;बहिनी नडराउनुहोस्‌ । यो केटो मूर्छौ मात्रै परेको हो । मरेकैचाहिँछैन । रोहिणी र कन्डक्टरले दुईतिरबाट च्याप्प समातेर वीर हस्पिटल पुन्याईइमर्जेन्सीमा लगै । डाक्टरले जाँच गरेर स्लाइनपानी चढाए । घोरै स्लाइनपानीसकिएपछि युवकले आँखा खोले ।&lt;br /&gt;
ड्वाइभरले झिनो स्वरमा भने, &#039;अब यो युवक मर्दैन । हामी जान्छौं पनि,तपाईंको इच्छाले जति पैसा दिए पनि हामी खुसी हुन्छौं । पैसा छैन भने नदिएपन्ति हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले पर्स खोल्दै भनिन्‌, &#039;तपाईंहरूले ठूलो सहयोग गर्नुभयो त्यसकालागि धन्यवाद, डाक्टरलाई पनि दिनुपर्छ होला, सय लिनोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
ड्राइभरले पैसा समाउँदै भन्यो, &#039;मैले त यति पैसाको आश नै गरेको थिइनँ ।तपाइँलाई पनि धन्यवाद जान्छौं पनि ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीले मुन्टो हल्लाएर ड्राइभर र कन्डक्टरलाई विदा गरिन्‌ । अब के गर्ने,के नगर्ने भन्ने सोचेर उभिइरहेकी थिइन्‌ । सिस्टरलै शालु नजिक आएर भनिन्‌,&#039;तपाईंलाई डाक्टरले बोलाउनुभएको छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणी सिस्टरपछि लागेर इमर्जेन्सीमा पुगिन्‌ । डाक्टरले रौहिणीतिर हेर्दैभने, &#039;तपाईंले अब बिरामीलाई घर लगे हुन्छ । उहाँ ब्लडप्रेसर लौ भएर मूर्छापर्नुभएको रहेछ । अहिले अनारको जुस ल्याएर खान दिनुहोस्‌, घरमा लगेरहड्डीको सुप, मुगुको सुप, खसीको खुड्डाको सुप प्रशस्त दिनु होला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टरको कराले रोहिणी र युवक रातो न पिरो भए । युवकले केही वोल्ननपाउँदै रोहिणीले भनिन्‌, “तपाईं बस्दै गर्नोस्‌ म अनारको जुस लिएर आउँछु ।त्यसपछि घर जाउँला ।&#039; रौहिणी बाहिर निस्केर गएपछि काउन्टरमा पैसातिरिन्‌ र अनारको जुर लिएर आई युवकतिर बढाउँदै भनिन्‌, &#039;क्‌पया जुसपिउनोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युवकले जुस समातेर रोहिणीतिर हेर्दै भन्यो, &#039;धन्यवाद, मलाई चक्करलागेकोसम्म केही याद छ त्यसपछि के भयो पत्तै पाइनँ । तपाईंले यहाँल्याउनुभएको रहेछ नत्र म मैं होला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;सानो सहयोग गरेकी हुँ, बढी केही गरेकी छैन । जुस पिउनुहोस्‌ अनि मतपाईंको घरसम्म छोडिदिन्छु । स्वास्थ्यकोचाहिँ अलि ख्याल राख्नु होला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युवकले अप्ठ्यारो मान्दै भने, “तपाईँले मेरा लागि यति घेरै कष्टउठाउनुभएकोमा धेरै-धेरै धन्यवाद, अब म आफैँ जान सक्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
“फेरि बाटोमा केही भयो भने गाह्रो होला, घरसम्म पुच्याइदिएँ भने मलाईपति सन्तोष हुन्छ, कुरा त्यति मात्र हो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीको कुरा सुनेर युवक अनकनाउँदै उठे । दुवै वीर हस्पिटलको गैटबाहिरपुगेपछि रोहिणीले दयाक्सी रोकिन्‌ । ट्याक्सी गुद्धयो । द्याम्सी गुडेको केहीसमयपछि युवकले झिनो स्वरमा भने, “मेरो नाम प्रशन्न हो । घर खोटाङ, यहाँपढ्न बसेको हुँ । आईएस्सी सिद्धिएको पति दुई वर्ष भयो, इन्जितियर पढ्नजानका लागि कोसिस गर्दैछु । दुईपल्ट प्लान जान नाम निकालेको पनि हुँ, तरइन्टरभ्युमा फरयाँकिएँ । घरमा आमा मात्र हनुहुन्छ, बाबु सानैमा हामीलाईछोडेर मुग्लान पस्नुभयो । घरबाट खेत बेचेर आमाले यतिसम्म त पढाउनुभयो ।तर, मैले केही गर्ने सकिनँ&#039; भन्दै युवकले गहभरि आँसु पारे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले सम्झाइन्‌, “भैगो पीर तगर्तोस्‌ । कोसिस गरेपछि एक दिन न एकदिन सफल भइहालिन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युवकले आँखाको आँस्‌ पुछ्दै भने, &#039;रोहिणीजी पेटले खान नमागे त ठिकैथियो, खान माग्छ । उता आमाले पति अर्काको काम गर्दै पेट पाल्नुभएको छ ।जागिर खाउँ कसैले जागिर दिँदैनन्‌ । जहाँ पनि आफनै मान्छै चाहिन्छ, यहाँआफूनो मान्छे कोही छैन । मान्छे रहरले होइन बाध्यताले चोर बन्दोरहेछ ।बुझनु भो बाध्यताले ... । मैले खाना नखाएको तीन छाक भयो । म पनि चोर्छुर पेट भर्छु यही सोचेर बस चढेको बेहोस पो भएँछु ।&#039; रोहिणीलाई प्रशन्नकोकरा कथाजस्तै लाग्यो । रोहिणीले शिर उठाएर प्रशन्नतिर हेरिन्‌ । निन्याउरोअनुहार, जिङ्ग्रिङ परेको कपाल, मैलो सर्ट, चप्पल, अहँ पटक्कै पढेझौँ देखिँदैनथेप्रशन्न । रोहिणीले मतमनै सोचिन्‌- मैले अबश्य यो युवकको उद्धार गर्नुपर्छ ।नत्र म जन्मनुको कूनै अर्थ नै रहँदैन । उफ ! के सोचेकी होला मैले, कतै यिनैसँग प्रेम बस्यौ भने मैरो जिन्दगी वर्वाद हुन्छ । वास्तवमै प्रेम गर्नेहरू कतित डुन्छन्‌ भन्थिन्‌ शालु । म डुवेँ भने मेरो ममीवावाको सपना चकनाचुरहुन्छ । सायद म यिनको प्रेमले गर्दा यहाँसम्म आएकी त होइन ?) उफ्‌! यो केभयो मलाई ? अब म डुब्न त डुब्दितँ ? यदि मैले प्रशन्तलाई प्रेम नगर्ने भएमझघारमा नै छोड्नुपर्छ । के म प्रशन्नलाई मझघारमै छौडूँ । अब म के गरौं ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन के सोच्नुभएको रोहिणीजी, तपाइँजस्ता सहर-बजारमा जन्मेकोमान्छेलाई पीडा ओकलेर भूल गरेँ, माफ गर्नोस्‌ । तपाईंले मेरो कुराको विश्वासगर्नुभएन जस्तो छ । मेरो डेरामा पुगेपछि आफ्नै आँखाले मेरो गरिवी हेरेरफर्कनुहोला । सक्नुहुन्छ भने खोटाडसम्म पुग्ने गाडी भाडा दिनोस्‌, म भोलि नैयो सहर छोड्छु र गाउँ गएर मेलापात गरी पेटभरि खोले भए पनि खान्छ ।अब इन्जिनियर बन्नै सपना देख्न छौडिसकें मैले । मलाई पेटभरि खोले भएपुग्छ खोले ... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;सहरमा वस्नेहरूको दिल नै हुँदैन भन्नेचाहिँ नसम्झनोस्‌ । मैले तपाईंकोकुरालाई विश्वास गरेकी छु । तपाईं भोकले नै ढल्नुभयो, त्यो पनि प्रत्यक्ष देखेरैयहाँसम्म आएकी हुँ । तपाईँ आवेशमा आएर गाउँ जान्छु भन्दै हुनुहुन्छ ।त्योचाहिँ मलाई त्यति ठीक लागेन । म आफनोतर्फबाट सक्दो सहयोग गरौँला,त्यसलाई नराम्रो नठान्नु होला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुरा गर्दागर्दै प्रशन्नको डेरा पनि आयो । द्याक्सीबाट दुवै ओर्लेर कोठाभित्रपसे । त्यो कोठाको अवस्था देखेर रोहिणीको हृदय छियाछिया भयो । कोठाकोभित्तामा झुन्ड्याएको थोत्रो र मैलो दुईवटा सर्ट । सानो पलङ, पलङमाथि गुन्द्रीर कपडाको सानौ डसना, च्यातिएर तीनचार ठाउँमा सिएको तन्ना र थोत्रोकम्बल । पलङभन्दा थोरै पर सानो स्टोभ, थोत्रो दुईवटा डेक्वी, एउटा थाल,एउटा पत्त्यौं, एउटा बाल्टिन र थोत्रो कप । केही गेडा उर्मिएको आलु । पलङकोसिरानपट्टि &#039;भुइँमा मिलाएर राखिएको किताबको चाङ । अँध्यारो र कालो भित्ताभएको कोठा दक्षिणपट्टिको भगयालबाट छिरेको थोरै उज्यालो । ती सबै दृश्यदेखेर राहिणीको आँखाबाट आँसुमात्र फर्न सकेन । रोहिणीले आफनो घरमात्यसै रहेको दुईवटा कोठा सम्झिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्न बोल्न सकेनन्‌, आँखाबाट आँसु मात्र झरिरहे । रोहिणीले मन बाँधेरभनिन्‌, &#039;प्रशन्नजी तपाईँ जस्तो अनन्त उडान लिएको मान्छे पनि रुने हो?तपाईंले कमाएपछि मलाई ब्याजसहित यौ पैसा दिनुहोला, अहिले मसँग भएकोपाँच सय राख्नोस्‌ । म ममी-बाबासँग कुरा गरेर तपाईंका लागि कै गर्नसकिन्छ सोधौँला र चाँडै निर्णय दिउँला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्नले आबेशमा आएर रोहिणीको खुट्टा समाउँदै भने, &#039;म तपाईंको गुणकहिल्यै बिर्सने छैन । म त पोख्छी नै सकेको थिएँ तपाईँले उठाउनुभयो,तपाईंलाई म के भनौं ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले खुट्टा सादै भनिन्‌, &#039;मैगो नरुनोस्‌ वरु केही किनेर खाइहाल्नोस्‌ ।अहिलेलाई म गएँ ।&#039; रोहिणी प्रशन्तको कोठाबाट निस्केर घरतिर आइन्‌ ।प्रशन्नलाई रोहिणीको खुट्टा छोएकोमा कुनै पछुतो लागेन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनले त रोहिणीजस्ती पुवती जीवनमा पहिलोपल्ट नै देखेका थिए । प्रशन्नकाआफन्तहरू प्रशन्नले देखे भने पैसा माग्छ कि भनी टाढैबाट भाग्थै । युवतीहरूप्रशन्नसँग पन्छिएर हिंँद्दथै । प्रशन्नका कुनै साथीहरू थिएनन्‌ । प्रशन्नले यत्रोठूलो सहरमा आफनो मर्म बुझने एक मात्र युवती रोहिणी भेटेका थिए ।रोहिणी प्रशन्नका लागि साक्षात्‌ देवीसरह थिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणी मनमा नाना तर्क-वितर्क खेलाउँदै घरमा पुगिन्‌ । आँखामा प्रशन्तकोदयनीय अवस्था, उनको निर्बौध आँखाहरू र बान्की परेको अनुहार नै नाचिरहयो ।रोहिणीलाई केही खान मन लागेन, उनी धुमधुम्ती कोठामै बसिरहिन्‌ । पीताम्बरालेरोहिणीको कोठामा पस्दै भनिन्‌, &#039;वीरु र सौजनलाई कस्तो कपडा ल्यायौ :पैसा त पुग्यो ?&#039; रोहिणीले जस्ताको तस्तै प्रशन्नको सबै घटना आमालाईसुनाइन्‌ । पीताम्बराले भनिन्‌, &#039;आज पैसा लगेको ढीक भएछ । कपडा त भौलिकिने पनि हुन्छ । दुःख पर्दा सहयोग गर्नु हामी सबैको कर्तव्य हो । तर, उतलाईघरमा नै राख्नु त्यति राम्रो त नहोला । म तिम्री बाबासँग सौध्छु, उहाँले केभन्नुहुन्छ । छौरा-बुहारीको पनि सल्लाह लिनुपन्यौ । तिम्रो बावालाई बाहिरकोमान्छे घरमा बसेको मन नपर्ने भएर त तला नबढाएको तिमीलाई थाहा नैछ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रौहिणी आमाको कूरा सुनेर चुप भइन्‌ । पीताम्बरा कोठाबाट निस्किन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हेलौ ! रोहिणी तँ किन क्याम्पस नआएकी ? त्यहाँ सबैलाई सञ्चै त छहोइन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“सबैलाई सञ्चै छ, शालु पीर नगर । मलाई आज टाउको दुखेर पढ्ननआएकी हुँ । पढाइ राम्रै भयो त ?&#039;“अं राम्रै भयो, अहिले कस्तो छ तँलाई ? भोलि आउँछेस्‌ क्याम्पस ?&#039;&#039;अहिले ठीकै छ भोलि आउँछ ।&#039;र हसतिला सम्झना नमस्कार भनी दै है। ल बाई ।&#039; भन्दै शालुले फोनराखिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ बाई भन्दै रोहिणीले पनि फोन राखिन्‌ । शालुसँग वास्तविकता ढाँद्दारोहिणीलाई तरमाइली त लाग्यो नै । रोहिणीले शालुलाई सत्य नभन्नुको एउटैकारण थियो । रोहिणी प्रशन्नलाई केही माया गर्न लागिसकेकी थिइन्‌ । शालुभने प्रेम गर्नेलाई त्यति राम्रो ठान्दैनथिन्‌ ।&lt;br /&gt;
रोहिणीले नचाही-तचाही थोरै खाता खाइन्‌ । र, टेबुलमा बसेर किलाब पल्टाइन्‌ पत्ति तर आँखामा प्रशन्न नै झल्झली आइरहे । उनी किताव बन्दगरेर औछ्लयानमा पल्टिइन्‌ । प्रशन्नको बारेमा सोच्दासोच्दै धेरैबेर पछि निद्रापन्यो रोहिणीलाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==तेर्ह==&lt;br /&gt;
&#039;ल बास्सा ट्रायल भन्दै उर्मिलाले तास फ्याँकिन्‌ । उमाले मुख बिगारदैभनिन्‌- कलर त मलाई पनि परेको थियो । प्रतीक्षाले भनिन्‌- दुक्की जुट तमलाई पनि परेको थियो । दुक्कीले कहिल्यै छोडेन । मेरा दहल टप सिन्धुलेहाँस्दै तास फ्याँकिन्‌ । सिन्धुलाई त मैले जितेकी रहिछु । मेरो मिस्सी टप भन्दैशोभाले पति तास फ्याँकिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले तास फिददै भनिन्‌, &#039;सबैँ फरास मात्र कति खेल्नु ?) घरु यसोकलब्रेक खेलौं न, कलब्गेकमा समय गएको पत्तै पाइन्त । पैसा पनि ढिलैजान्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिन्धुले रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;पहिलो हात पैसा सोरेर पनि नानाथरी कुरानगर । थपक्क बाँड ल प्रतीक्षा तास काट । कलब्रेकमा दुई ग्रुप बन्नुपर्छ । फेरिझन्झट खेल । बरु चल्ती फरास खेल्नै भएचाहिँ ओके !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कति दिनमा बल्ल एक हात खाएकी छ्‌ । नत्र पैसा स्वाहा गन्यो, हिँड्यो ।तिम्रौ जस्तो एक्का टप भए पनि चल्ती फरास खेल्ने साहस भए पो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिन्धु &#039;मैले एक्का टपमा चल्ती फरास खेले । गंगाले दहल टपमा ल चल्तीफरास खेल्छु भनी सुरिएकी बिर्सैक !&#039; हामीले बूढ्धीलाई एक्का टायल नै परेछकि भन्दै डराएर प्याक गन्यौं आखिर बूढीको त दहल टप पो रहेछ । त्यो दिनबडा मज्जाले हँसाइन्‌ गंगाले । साँच्चि गंगाको बूढाबढी नै एक्कासि बेपत्ताभए । न घरको फोनै उठ्छ । किन एकाएक सम्पर्कमा आउन छौडे ? आजकालसबै ठाउँमा बाबुको प्रतिनिधित्व पनि फिरोजले नै गर्छ । त्यो मोरोसँग सोधौँभने त्यसका आसेपासे गुलियोमा कमिला टाँसिएझैं टाँसिइरहेका हुन्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शोभाले लामो श्वास फेर्दै भनिन्‌, &#039;अब गंगाको कुरै नगरे पनि हुन्छ । उनीत अर्कै जन्म लिएझैँ फेरिइछिन्‌ । म अस्ति उनको घरको बाटो परेकोले यसोपसैकी त उनको फतौरे क्रा सुनेर कहिले उनलाई छोडेर भागौं जस्तो भएँ ।कर दुस्सासा व्लाएर रूभै सिद्धेछ । रुँदै भन्दै थिइन्‌, &#039;शोभा हामीले हिँड्नै जानेकाउन । हामीले छौराछोरीलाई सही बाटो देखाइदिएनौँ । हेर, बेलैमा विचारगर, तिमीहरूका छोराछोरी पनि फिरोजझैं तहस-नहस होलान्‌ । फिरौजलाईराम्रो संस्कार दिन नसक्ने हामी नै हौं । हामीले नै उसलाई चक्रब्युहमाफसायौँ । त्यही पश्चात्तापले हामी मर्दो न बाँच्दो भएका छौं । खोई के-के हुन्‌, हन्‌ तिनका करा । म त तिनको त्यो परिवर्तत देखेर महाअचम्म परेँ । तिनकोकुरा सुन्दा-सुन्दा झयाउ लागेर फुत्त निस्केर हिँडे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“बूढी भए पनि भर्खर यौवन चढेको युवतीझैँ गर्थिन्‌ । फेरि मेकअप गर्नेदेखिलिएर पिउन, खेल्न जैमा पनि खप्पीस थिइन्‌ । ठट्यौली पनि कति जानेकी,एकछिन मुख बिसाउन दिन्थिनन्‌ । उनमा कतै परिवर्तन आउला भन्नै त मैलेसोचेकीसम्म पनि थिइनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“साँच्चै उनी परिवर्तन भएकी नै हुन्‌ त&#039;, सिन्धुले सोधिन्‌ । उमाले तासदेखाउँदै भनिन्‌, &#039;यो हात मैले खाएजस्तो छ सत्ता, अट्टा, नहल, रन छ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हो-हो तिमीले नै खायौ,&#039; सबैले एक्कै स्वरमा भने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डमालै तास फिट्दै भनिन्‌, &#039;शोभाले भनेको कुरा ठीक हो, मैले पनिगंगालाई भेटेकी थिएँ । उनी त हावा खुस्केझैँ भएकी छिन्‌ । त्यो भर्भराउँदोअनुहार कहाँ गयो होला ? उनी आफूमाथि प्रलय पन्यो भन्दै थिइन्‌ । शोभालेभनेको ठीक हो, म पनि उनको कुरा सुनेर वाक्कैदिक्कै परेँ । हामीलाई सहीबाटोमा हिँड भनेर अर्ती दिन्थिन्‌ । हामीले तिनलाई आङ नानी भनेर डाकेकोहोइन क्यारे । दुई दिनको जिन्दगीमा पनि रमाइलो नगरे कहिले रमाइलो गर्नुभनेर उक्साउने तिनै हन्‌ । हामीले आफनो मर्यादा कहाँ छोडेका छौं त : यसोरमाइलो गर्न एक, दुई पेग लगाइन्छ । तिनी नै सित्तै खान पाएपछि त कम्ताखान्थिनन्‌ ? सेकुवाले त तिनको पेट कहिल्यै भरिन्यैन । मेरो श्रीमान्ले अझैभन्दै हुनुहुन्छ- उमा म त गंगाले सेकुवा खाएको देखेर छक्कै परे, अहिले बडोअर्ती दिन्छिन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;उनले असहय पीडा भएरै त पोख्न खोजिन्‌ होला । यो काठमाडौँमायुवतीहरू पति असित्ता बर्षेझैँ वर्षेका छन्‌ । फिरोजजस्तो सुन्दर हुने-खानेकोछोरो पाएपछि युवतीहरूलाई कै चाहियो ? उसको एक नजर परेपछि युवतीहरूआगोमा 0000 पग्लन्छन्‌ । उसको डान्स र हाउभाउ देखेपछि आफ्नैजीउत हुन्छ&#039; उर्मिलाले उत्तर दिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शोभाले कुरा थपिन्‌, &#039;कुरा त ठीकै हो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उमाले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;लौ अब पेग पनि लगाक छिटो जानुछ । लन्डनबाटबूढाका साथीहरू आउँछन्‌ रे ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;तिमरो बूढा गएको बीस, बाईस दिन त भयो होइन ?&#039; शोभाले सोधिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“लन्डनमा आफनै मान्छैहरू भएकोले के-कसौ गरी पच्चीस दिनकारिसक्नुभयो&#039; उमाले भनिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;तिम्रो लोग्ने उतै बिवाह गरेर बसे जस्तो छ है उमानव भिस्सा सिद्धिएपछि त्यहाँ बस्न पाइन्थ्यो र ?&#039;&lt;br /&gt;
सिन्धुले उमालाई बिस्तारै पिट्दै भनिन्‌, हेर, उमाले रातोकालो मुख पारेकी ।उफ ! त्यति ठूलो मान्छेले केही मिलाए होला ति ! भैगो पीर नगर ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमीहरूले एउटा सानो करा पायौ भने आकाश-पाताल छुवाउँछौँ । पर्सिआउँदै हुनुहुन्छ । ल खानेकुरा पनि आयो । चिकेन चिल्ली त सिन्धुले बनाएजस्तोछैन है,&#039; उमाले भनिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;चिकेन चिल्ली मात्र हो र यिनलाई त केही पनिबनाउन आउँदैन । वी सब होटलबाट ल्याएकी हुन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिन्धुले उत्तर दिइन्‌, &#039;तिमीलेचाहिँ खुबै मीठो पकाउँछयौँ ? कान्छी गएपछितिम्रो घरमा खाना सबै वर्डकिलासको हुन्छ । किन तिम्रो मन दुखाउनु भनेरचुप लाग्छौं हामी । आइन्दा तिम्रो घरमा पति होटलकै खाना हुनुपर्छ, । थुक्नु ननिल्नुजस्तो खानेकुराले टार्न पाइँदैन नि !&#039;&lt;br /&gt;
सबैले रक्सीको गिलास ढोक्काएर चेस भने । प्रतीक्षाले खिन्न स्वरमाभनिन्‌, &#039;साँच्चै नरिसाक उमिंला कान्छी गएपछि त तिम्रो घर मसानघाटजस्तैभएछ । कान्छीले बत्ताएको सबै खानेकुरा आयातीतभन्दा पनि स्वादिलो हुन्थ्यो ।मलाई त तिम्रो घरमा पस्यो कि झट्ट कान्छीकै झल्को लाग्छ । उसले पकाएकोमृगको सुकुटी सम्झँदा अहिले पति मुखबाट पानी आउँछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;अँ साँच्चै, त्यो मृगको सुकुटीको स्वाद त मैले पनि बिर्सेकी छैन । त्यस्तैबनाउन लाख कोसिस गरेँ, कहाँ बनाउन सक्नु ? जादु नै थियो कान्छीकोहातमा जादु,&#039; शौंभाले पनि कुरा थपिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रतीक्षाले भनिन्‌, &#039;मैगो ! कान्छीको क्रै छोड । उसको चरित्रले गर्दा त होनि उर्मीले निकाल्न बाध्य भएकी नत्र किन निकालिन्थिन्‌ ? सबै खानेक्राहोटलबाट ल्याउने गर्दागर्दै डाडु पन्यौं नै चलाउन बिसिंएला । कहिलेकाहीँयसो मान्छै आउने भनेको दिनमा मात्र भान्सामा पसिन्थ्यो, त्यो पनि छोड्यौँभनै खोई के काम गर्नु ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले हस्कीमा पानी थप्दै भनिन्‌, &#039;मलाई माया गर्ने यही प्रतीक्षा छिन्‌ ।जे-जे भन्छौ भन सहनै पम्यो । सधैँ कान्छी-कान्छी भन्छौँ तिमीहरूको घरमाभएको भए कान्छी दुई दिन टिम्दैनथी होला, मेरो घरमा पन्ध्र-सीह् वर्ष बसीत्यो कम भयो तिमीहरूलाई ? घरलाई नै कोठी सम्झेपछि के गर्नु त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शोभाले प्याच्च भनिन्‌, &#039;अहिले त तिम्रो घरमा काम गर्नेहरू फेर्नुपरेको छैनहोला हगि ?&#039; मोरी थाहा नपाएझै गछयौ । कान्छी र शालुको सम्बन्ध हामीलाईथाहा नभएको हो र ! तोतेबोली नफुटेदेखि नै शालुलाई कसको माया लाग्छभनेर सोध्यो भने दिदीको माया लाग्छ भन्थिन्‌ । त्यही शालुको मायाले अल्झेकीहुन्‌ कान्छी । यदि तिम्रो इशारामा शालु हिँड्ने भए शालु तिम्रोपछि लागेरआउँथिनन्‌ ? बुझने भएदेखि एक दिन शालु पार्टीमा आएकी छिन्‌ ? हेर हाम्राछोराछोरीहरूले कहिले हामीलाई छोड्छन्‌ ?&#039; उर्मिलाले स्वादै हवीस्की तानिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रतीक्षाले शोभातिर हेर्दै भनिन्‌, &#039;यी शोभा, नशा लागेपछि बढी कुरा गर्छिन्‌ । मेरो छोरो पनि त तिमीलाई कसको माया लाग्छ भनेर सोध्यो भनेसाहिँला दाइको माया लाग्छ भन्छ नि ! त्यस्तो सानो क्रालाई लिएर के करागरेकी ? ल उठौँ पनि ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबैले फोनमा आफनो-आफनो ड्राइभरलाई बोलाए । ड्ञाइभर कार लिईआएपछि आ-आफनो घरतर्फ लागे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==चौघ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाई मौसमी, कति लेट गरेकी ? यति ढिलो गर्छर्यौ भन्नै थाहा पाएको भएतिम्रो डेरामा नै आउँदै ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले कारमा बस्दै भनिन्‌- &#039;मैले कहिल्यै ढिलो गरेकी थाहा छ ! बाटोजाम भएपछि कसको के लाग्छ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हेन क्रिन बाटो जाम भएछ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साइकललाई बसले हान्यो भन्थे हो कि होइन पत्तो छैन । तपाईंलाई तकालो चस्माले पनि साह्रै राम्रो पो देखिँदोरहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषले मौसमीको गाला मुसादै भन्यो, &#039;मैगो नफुर्क्याक । तिमीलाई भेटेपछिम चैनले कनै रात निदाउन पाएको छैन, तिमीले त मन मुटु सवै लग्यौ यार! मलाई त आफू रित्तै भएजस्तो लाग्छ । अँ, भन आज कहाँ जाने ? तिमी जहाँभन्छयौ त्यहीँ जान यो ज्यान हाजिर छ।&#039;&lt;br /&gt;
“तपाईँलाई कुरा गर्न कसले सिकाओस्‌ ? यस्ता शव्दहरू मलाई मात्र भन्नेहौ कि अरूलाई पनि भनिन्छ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषले नशालु हाँसो हाँस्दै भन्यो, &#039;कतिपल्ट भनौं जैले तिमीजस्ती अप्सराभेटेकै छैन भनेर । तिमीजस्ती राम्री अर्को भेटेको भएचाहिँ कै भन्थेँ भन्नसक्दिनँ, अव भने मैले मेरा सारा जीवन तिमीलाई न्यौछावर गरिसके । अबमल्हम लगाक या चिथोर तिम्रो जिम्मा । भन यार कता जाने आज पनिनगरकोट नै जाने कि अन्तै ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ त्यतै जाकँ, गाउँमै देखेकाजस्ता डाँडाकाँडा हेरेर अस्तिको जस्तोदुई-चार दिनचाहिँ वस्न सक्दिनँ नि ! भोलि नै फर्कने भए नगरकोट नै ठीकछ । घरमा विवाहको कुराचाहिँ चाँड्धै गर्नोस्‌ है । फेरि छोराछोरी पाइसकैपछिबिबाह गरौँला भन्नुहोला नि ! हाम्रो भेट भएको पनि वर्ष दिन हुन लागिसक्यो ।कति लुकिछिपी एक-अर्कामा हराउनु, विवाह गरे सबैको मुखमा बुझो लाग्थ्यो ।अरूभन्दा पनि त्यो ७014 हाम्रो प्रेम फल हुन्छ भन्ने एकरत्ति पनि विश्वासगरेकी छैन । भन्छै &amp;quot; तिमीले आफनो अस्तित्वलाई बिकाउन नहुने थियो वुझयौ !&#039; उसको कुरा सुनेर म छक्क परेँ । उसले हामीवीचको सम्बन्धकसरी थाहा पाई ? मैले उषासंग तपाईँसँग कसरी भेट भयो भन्ने मात्र कुरागरेकी थिएँ । उषाले नै शालुसँग क्रा गरेकी हुनुपर्छ । उषा पनि कम्ता डारेछैन । रोहिणी भने आजकाल प्रेमको सपोर्ट गर्छिन्‌ । रोहिणीले शालुसँग हाम्रोभेटलाई आकस्मिक घटना नै हो भनेर जिह्री गरिन्‌ । शालु भन्दै थिई- त्योआकस्मिक घटना होइन, मौसमीलाई जानी-जानी त्यो युवकले धक्का दिएकोहो । मौसमी लडेपछि मौसमीलाई उठाएर कारमा लग्यो होला, माफ माग्यो होलाअनि यिनीहरूको प्रेमप्रसङ्घग सुरु भयो होला, ल हो कि होइन भन मौसमी ! मउसको कुरा सुनेर तीनछक्क परेँ । वास्तवमा हाम्रो प्रेमप्रसङ्ग त्यसरी नै सुरुभएको थियौ होइन त ? मलाई खासै ठूलो घाउ लागेको थिएन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले भनिन्‌- &#039;शालुले प्रेमसँग खेल्नेहरू मात्र धेरै देखेकी हुनाले यसलाईसबै प्रेम गर्नेहरूसंग घृणा लाग्छ । कुरा पत्ति हो । शालुले तिम्रो नराम्रोचिताएकीचाहिँ पक्कै होइन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले नम्र स्वरमा भनिन्‌, &#039;वास्तवमै प्रेम गर्नेहरू विवाहअगाडि वास्नामारम्दैनन्‌ । योचाहिँ वास्तविकता हो । तिमी अहिले पनि कुमारी नै छ्यौ भनेतिम्रो प्रेम सफल हुन्छ अन्यथा... भन्दै हिँडी । भन्नोस्‌ निमेष तपाईँ झूट होकि, शालु &#039;झुटी हो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषले कोधित स्वरमा भन्यो, &#039;कुनचाहिँ रहिछे त्यौ शालु भन्ने । त्यसलाईबीचवाटोमा तमासा गरिदिन्छु, अनि खान्छे । हेर, सबै मान्छेको कुनै न कुनैशात्रु हुन्छन्‌ । क तिम्रो गरु हो । तिमी गाउँबाट आएकी मान्छेले काठमाडौंमैघर भएको कार भएको केटा पाउँदा त्यसलाई जलन भयो हौला । त्यस्ताकोकुरामा होइन मैयाँ, मेरो कुरामा विश्वास गर । मबाट धौका हुँदैन भनेपछिहँदैन ।&#039; निमेषले कारको ब्रेक लगाएर मौसमीलाई चुप्पा खायो र फेरि कारगुडायौ । मौसमीले निमेषलाई समातेर पसुुतक [कक म्‌स्क्राई । कार गन्तव्य भेट्नगुडेकै थियो । मौसमीले धेरैबेर मौन रहेपछि भनी, &#039;मलाई डक्टर बन्नु भनेरछोडेर गएका थिए बावुले, मैले भाग्यले तपाइँलाई भेटेँ । बाबु तपाईंजस्तोज्वाइँ पाउँदा घेरै खुसी हुनुहुन्छ । तपाईंको बानु-आमाले मलाई के भन्नेहोला ? हुन त मेरो बुबाले मेरो खुसीका लागि माझपाटोमा घरवारी सबै बेच्नसन्नुहुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषले हाँस्दै भन्यो, &#039;त्यो क्रा तिमीले धन्दा नै नमान । तिम्रोतर्फबाटसम्पूर्ण खर्च म नै गरौंला । म पनि काठमाडौंबाहिरकै भएको हुँदा तिम्रो पीडाबुमाख। पहिला हामीलै पनि त्यही खोले सिस्नो त खाएका हौं नि ! बाबुले काठमाडौंमा &#039;फरेर घरजग्गाको कारोबार गर्नुभएकोले तिमीलाई कारमा हुइँम्याउन पाएको छु । यही कारले गर्दा त तिमी पनि मसँग छ्यौ नत्र तिमीलेमलाई के गन्धेक ! होइन भन त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;उफ ! फेरि त्यही करा । हजुरको कारले गर्दा होइन महाशय, हजुरकोमायाले गदा आफलाई सम्पेकी ह । मत्त पराउन त गाउँदेखि यौ सहरसम्ममलाई मन नपाउने मान्छे छैन भने पनि हुन्छ ।&#039; हाम्रो क्याम्पसमा एउटाआकाश भन्ने केटो छ क भने कुनै केटीको रूप नै हेर्दैन । तपाईंले पनिमेरोबाहेक अरूको रूप नहेरे हुन्थ्यो नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमेषले हाँस्दै भन्यो, &#039;तिमीचाहिँ कसले मलाई हेर्छ, कसले मलाई हेर्दैनभनी विचार गर्नै रे, मचाहिँ तिम्रो मात्र रूप हेर्नै ? ल बाबा ल अबदेखि अरूकेटीहरूलाई देख्यो भने म आँखा चिम्लेर हिँड्छ, हुन्छ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषको कुराले मौसमी हाँसी मात्र ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषले कुरा बढायो । मैपाँ नेपालमा घम्नै ठाउँज्ञति घुमिसकियो । तिमीएक रातभन्दा दुई रात एउटै ठाउँमा बस्न मान्दिनौ । यसो इण्डियाको दार्जिलिङनैनितालतिर पो जाने हो कि ! घुम्नलाई मौसम पनि ठीक छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले खुसीले बुरुक्क उफ्रंदै भनिन्‌, &#039;हुन्छ त्यसै गरौँला । बरु कहिलेजाने चाँडै कुरा मिलाउनोस्‌ वाबु छाती-छाती के-के दुखेर काठमाडौँ आउँदैछन्‌रे । उनी आएपछि जचाउँदा, रिपोर्ट लिँदा चार-छ दिन लागिहाल्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यसो भए अर्को हप्ता जाउँला । तिमीलाई अरू केही गहनाहरू चाहिन्थ्योकि ? आजकाल गहनाको करै गर्दिनौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
तीच-चार सेट गहनाहरू भइसके के गहनाको कुरा गर्नु : अब सबैगहनाको रहर पुग्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
अब भने मैयाँले पैसा बचाउने भइन्‌ । तिम्रो नाममा दुई-घार रोपनी जग्गाकिनौं भनेको हेरन राम्रो जग्गा नै पाएको छैन । ल जग्गाको करा छोडौं । तिम्रैसौन्दर्यको करा गरौँ । तिमीलाई यो टिसर्टले भन्दा हल्का गुलाबी टिसर्टले अफआकर्षित देखिन्थ्यो । मलाई टाइट फिटिङभन्दा अलि गला खुल्ला भएको कपडामन पर्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वतन्त्र हुन्छयौ कि के हुन्छयौ त्यो त गेस्टहाउसमै गएपछि थाहा होलाप्राण प्यारी । पिउनचाहिँ अहिले नै हल्का पिउने कि बेलुका मात्र त्यो तिम्रोमर्जी । अव नगरकोट पनि आइहाल्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले निमेषलाई हल्का चिमाट्दै भनिन्‌, &#039;पिएपछि तपाईंलाई के हुन्छथाहा नपाएकी हो र ? अस्ति त्यत्रो मान्छेको सामू ........... । रोष्टुराँका सबैमान्छैको आँखा हामीतिरै थियो । म त लाजले पानी-पानी भएँ । मान्छेको सामुकेही भन्नु पनि कसरी ?&#039;&lt;br /&gt;
तिमी गाउँबाट भर्खर आएकीले केही असजिलो लागेको हो । देख्दिनौ,बाटा-घाटामा लिसो टाँसिएझैँ टाँस्सिँदै हिँडेका । अब हात समातेर नहिँद&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चुम्मा-सुम्मा नगरे त पूरा असभ्य ठहरिन्छ । हामी त हुनेवाला श्रीमान्‌-श्रीमतीहौँ । जे-जे गरे पनि चल्छ । प्लिज थोरै पिछ है । वरु बाहिर ननिस्किउँलाहामी गोठालेले नगरकोटको जस्तो दृश्य कति देखेका हौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले निमैषको कुरामा स्वीकृति दिई विल रेस्दुरेन्टाभत्र पसैर पहिलाबस्नै रूमको व्यवस्था मिलाए । अनि खानाका आए । त्यहाँ खाने मौसमीकोजोडी मात्र होइन बैँसको उन्मान्दमा रम्नेहरू अरू तीन जोडी पनि आएकारहेछन्‌ । निमेषले उनीहरूनजिकँ गएर भने, &#039;तपाईँंहरू आज यतै बस्नुहुन्छ किफर्कनुहुन्छ ? कहाँबाट आउनुभएको ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्को गुपको एउटा युवकले भन्यो- &#039;हामी वुटवलदेखि आएका हौँ । एक-दुईदिन मात्रै बस्छौं होला । तपाईंहरू कहाँबाट नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हामी त काठमाडौंबाट आएका हौं । हामी दुईजना मात्र छौं । तपाईंको ग्रुपदेखेर साह्टै रमाइलो लाग्यो र सोधेको हँ ।&#039;&lt;br /&gt;
बुटवलबाट आएको अर्को युवकले भन्यो, &#039;हुन्छ तपाईंहरू पनि हाम्रै ग्रुपमाआउनुहोस्‌ । आखिर हामी सबै अविवाहित नै हौं । हामी सबैको कुरा मिलिहाल्छ ।वस्नोस्‌ कुरा थोरै फरक छ, तपाईंले मुन टिप्नुभएछ, हामीले जून अरू याबत्‌कुराहरू त उस्तै-उस्तै हुन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
निमेषले हात समातेर मौसमीलाई बसाउँदै भने, &#039;महाशय, तपाईँ त कविपो हनुहँदौरहेछ- ल अरू पनि सायरी सुनौँ न ।&#039;&lt;br /&gt;
बुटवलबाट आएको अर्को युवकले मुख बिगार्दै भन्यो, &#039;हेर्नोस्‌ यसको एक-दुई अरू सायरी सुन्नुभयो भने तपाइँ अर्कै रेस्द्रेन्ट जानुहोला । बरु परिचयगरौं खाकँ-पिङँ अनि घुम्न जाकँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबैले आ-आफूनो परिचय दिए । तीन जोडी प्रेमी-प्रमिकाचाहिँ बुटवलक्याम्पसमा नै पढ्ने रहेछन्‌ । कवि युवाको भरपाहि जुलजला [टवल सुब्कानगरमा नैरहेछ भने अरू बुटवलमा डेरा गरी पढ्ने रहेछन्‌ । गर प्रेम परेको छ-सातमहिना त कसैको प्रेम परेको वीस-बाइस दिन मात्र भएको रहेछ । त्यस ग्रुपमामौसमी र निमेषको प्रेम परेको धेरै भएको रहेछ । सबैको कुरा सुनेपछिबुटबलको कविले हात हल्लाउँदै भन्यो-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तपाईंहरू आलि पाको,&lt;br /&gt;
हामी अलि काँचो,&lt;br /&gt;
बिहे गर्नु पहिले नै&lt;br /&gt;
हनिमुन मनाउन आको ।&lt;br /&gt;
हनिमुनपछि डोकौँला&lt;br /&gt;
बिहेको पञ्चे बाजा&lt;br /&gt;
भौक लागेको छ अहिलेचाहिँ&lt;br /&gt;
खाँ मागी खाजा ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बुटवलको कविको कुरा सुनेर सबै मरी-मरी हाँसे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषले हाँस्दै भन्यो, &#039;तपाड्गै त आँसुकवि नै हुनुहुँदौरहेछ, कुत साइतलेहामी सचैको भेट भयौ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बुटबलको कविले फेरि भन्यो, &#039;कालो-कालो सर्ट लाको, नीलो रहेछ पेन्ट ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबैजना उस्तै खुसी हुँदा हाम्रो भेट । ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्कोले हाँस्दै भन्यो, &#039;चुप लाग जप, तिम्रो कविता सुन्दा-सुन्दा वाक्क भएरव्यन्द्राले पनि छोडलिन नि फेरि ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषले हांस्दै भन्यो, &#039;ल .. ल वाहा भयो हामीभन्दा त तपाईहरू नै पाकोहुनुहुँदो रहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जयले हाँस्दै भन्यो, &#039;उनले अन्तै बिहे गरिन्‌ । झन्डै पागल भाको, चन्द्राकोमायाले नै नगरकोट घुम्न आ&#039;को । ल... ल अब यो हँसिमज्ञाक छोडौँ केहीखाकँ । विवाहपछि चन्द्राले कवि बन्तोस्‌ भनिन्‌ भने म अवश्य कवि बन्छु ।यति भनी जयले ओठ बन्द गौ ।&lt;br /&gt;
अर्कोलै भन्यौ, &#039;भो ... भो कवि हुने सपना नदेख । फेरि भएको घरखेतजाला र चन्द्राको बिजोक होला । यो जमानामा कबिलाई कसले मान्ने ? हेरमति विग्रैर कवि भयो भन्छन्‌ । खेत बेचेर कबिता छपायो भन्छन्‌ । अलि..अलितिमी कबिचाहिँ हौ । तर आइन्दा कविता लेख्ने भूलचाहिँ नगर है । बरु खेतकोगड्दा किन, घरको तला थप कविचाहिँ नबन । यो राष्ट्रले साहित्यको मूल्यबुझ्दैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जय- &amp;quot;ले ... ल अब कवि र कविताको कुरा छोडौं । पेटको क्रा गरौं ।अहिलै तातो-चिसौ केही पिउने कि नपिउने ? मेरी चन्द्राचाहिँ पिउँदिनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषले हाँस्दै भन्यो, &#039;हेर-हेर अहिलेदेखि अधिकार जमाएको यो त भएतहर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो-हो यौ भएन भन्दै सबैले एवकै स्वरमा भने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्राले भनिन्‌, &#039;मेरो अलि पिउने वानी छैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबैले भने, &#039;थोरै त पिउनैपर्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;चन्द्राले सबैको कुरालाई स्वीक्कार गरिन्‌, केटाहरू बाईस-चौबीस वर्षका रकेटीहरू अठार, बीस वर्षजतिका थिए । भोलिलाई बिर्सेर सबै नशामा र एक-अर्काको अङ्गालोमा रमाइरहेका थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बैटरले मनमनै सोच्यो- &#039;कठै ! कहिलेसम्म धानको वालामा चराले वयलीखेलेजस्तै एक-अर्कांसँग खेलेका छन्‌ तर यी केटीहरूको जिन्दगी चाँडै टुक्रिनेछ। मैले थाहा पाएर पनि के गर्नु ? यी युवतीहरूको बृद्धिमा कीरा परेपछि ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पन्ध्र==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रौहिणीतिर हेर्दै भनिन्‌, &#039;रोहिणी तिमीले आजकाल पढाइमा त्यतिध्यान दिएजस्तो लाग्दैन मलाई । तिमीले त तपस्या गरेरै बाबु-आमा पाएकीछयौ । उनीहरूको सपना साकार गर्नुपर्छ नि । हामी जहाँ डाक्टर पढे पति सँगैपढ्ने है ? दिदीको अन्तिम इच्छा पनि त्यही छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले उत्तर दिइन, &#039;पढ्नै कोसिस त गर्दैछु । मलाई डाक्टर बन्छु जस्तोलाग्दैन । किताब पल्टाउँछु मलाई त चक्कर नै लागेर आउँछ । ल पढाइकोकुरा छोड, आशाको कुरा गर, आशाले प्रेम गरेको क्रा याहा पाउँदा-पाउँदैतिमीले उनको प्रेममा त कुनै प्रतिक्रिया नै जनाइनौ नि ! अबचाहिँ तिमीलेअरूको भविष्यको चिन्ता गर्न छोडिछयौ, रामै लाग्यौ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले गम्भीर भएर भनिन्‌, &#039;रोहिणी तिमी पनि, मैले यहाँ सच्चा प्रेमगर्नेहरू छँदै छैनन्‌ भनेकी कहाँ छु र ? सच्चा प्रेम गर्नेहरू हिजी थिए । आजपनि छन्‌, भोलि पनि हुनैछन्‌ । म प्रेमकै विरोधीचाहिँ होइन । आशक्त अङ्गालोमाप्रेमभन्दा वास्ना वढी हुन्छ भन्न खोजेकी मात्र हुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;प्रेम मात्र भयो वास्ता नै भएन भने पनि जीवन तहसनहस हुन्छ होइन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“रोहिणी, तिमीले मेरो क्राको आसय नै बुझिनौ । विवाहपछि सुखानुभूतिकालागि सबै चाहिन्छ । मैले बिवाहपछिको त कुरै गरेकी छैन । विबाहअगाडिकुमारीत्व नगुमाउन्‌, मेरो सोचाइ यति मात्र हो । तिमीले आशाको प्रेमको कुरागा्यौ। आशाको प्रेम फूल र भमराको जस्तो प्रेम होइन, मलाई थाहा छउनीहरूको प्रेम सफल पनि हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणी शालुको कुराले हर्षित भइन्‌ । तर, रोहिणीलाई आफू र प्रशन्तवीचकोकुरा शालुलाई भन्नै आँट नै आएन । रोहिणी शालुसँग बिदा भएर क्याम्पसबाटघर आइन्‌ । कौठामा पसेर सोचिरहिन्‌- &#039;शालुले भनेको क्रा ठीक हो । विवाहपहिला नै कमारीत्व गुमाएपछि सुहागरात्तको त महत्व नै रहेन । रौहिणीलैप्रशन्तको सम्झनामा डुबुल्की मारिन्‌, प्रशन्न थुप्रैपन्टको भैटमा पनि आफूसँगबोल्न डराउँथै । हृदपभरि प्रेम भएर पनि पोख्न धक मान्थे । मैले तपाईंबिनाबाँच्न सक्दिन भनेपछि बल्ल हर्षको आँसु झारे । त्यो क्षण हिजोजस्तै लाग्छ तरमहिनौँ भएछ । शालुको हृदयमा कसैले बास नगरेको भएर नै क पढ्न सम्छै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर म कसरी पढौं : जव किताव-कपि खोल्छु म प्रत्येक अक्षर- अक्षरहरूमाकेवल प्रशन्नलाई नै देख्छु । ममी र बाबाले प्रशन्नलाई मन नपराउनुभएकोभए सायद म मधे होला । प्रशन्न आफनो असल व्यक्तित्वले गदा सबैकोआँखामा अटाइहाले । उनी पढ्न गए भने म कसरी बाँच्नु ? प्रशन्नको पनि धेरैपढ्ने रहर छ । एक दिन नदेख्दा त मलाई यति छटपटी हन्छ भने वर्षौंसम्मनदेख्दा के गरौँली ? कल्पना गर्दा मात्र पनि रोहिणीको आँसु झन्यो । उनीधेरैबेर रोइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्बराले कोठाभित्र पस्दै भनिन्‌, &#039;वानी कुन बेला आयौ : तिमीलाईभौक-प्यास केही लाग्दैन कि क्या हो ? आजकाल खाना त खोज्दै खोज्दिनौ ।हामीले सवै बुझेका छौं । तिमी प्रशन्न बाबुकै चिन्तामा डुबिरहन्छुयौ । तिमीहरूकोमाया देल्लेर आज बिहान हामी सबैजना बसी एउटा निष्कर्ष निकाल्यौँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;कस्तो निष्कर्ष ममी ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्वराले सोफामा सजिलोसँग वस्दै भनिन्‌, &#039;हेर अहिले नै तिमीहरूकोविवाह गरिदिङँ मने त्यो मिल्ने कुरै भएन । प्रशन्तबाबुले बाहिर पढ्न जानपाङ्चलात्‌ भनेर कुरैर बसौं भनै पाउने हो कि नपाउनै हो । केटाहरूले त जतिवर्षमा विवाह गरे पनि फरक पर्दैन । केटीहरूलाई वाईस-चौबीस वर्ष काटेपछिबूढीकन्या भन्न थाल्छन्‌ । त्यसैले प्रशन्तबाबुलाई चाँडैभन्दा चाँडै पढ्नपठाउनुपत्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले दिक्दार स्वरमा भनिन्‌, &#039;हामीसँग त्यति घैरै पैसा कहाँछत?हामीलाई कसले सापट दिन्छ र !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परीताम्बराले सम्झाइन्‌, &#039;अहिलेलाई पठाउन मात्र कान्छीको घरजग्गा बेचेरआएको पैसा रहेछ । त्यसैले पुगिहाल्छ । हाम्रो कार व्यथैं वन्केको छ । यहीबेचेर पछि चन्द्रकान्तहरूले घर बनाउनेछन्‌ यही सल्लाह भयो । पछि पैसापठाउन त ट्याक्सी चलाएको पैसाले पुगिहाल्छ । त्यसमाथि पेन्सन छँदैछ ।पछि यो घरको चाहिँ तिमीले आश नगर, यो घर रेष्माको हुन्छ । बाँकी चार-छ आना जग्गा फूलबारी र करेसाबारीले ओगटेको छ । त्योचाहिँ हामी मरेपछिजे-जे गछौँ गर । अहिलेसम्मको हाम्रो सौचचाहिँ हामी बूढा-बढी चन्द्रकान्तहरूसँगबस्छौं । उनीहरूको पनि यही इच्छा छ । हेर्दै जाउँ के हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आमाको कुराले रोहिणी धेरैबेरसम्म मौन रहिन्‌ र भनिन्‌- &#039;तपाईंहरूले जेसोच्नुभयो हामीहरूको भलाइका लागि सोच्नुभयो । म हजुरको कुरामा ज्यादैखुसी छ । दाजु-दिदीदेखि लिएर हामी सबैको जीवन हाँसी-खुसी वितोस्‌ । अरूके नै चाहिन्छ र ।&#039;&lt;br /&gt;
पीताम्बराले भनिन्‌, &#039;हुन्छ त प्रश्नलाई आज यतै खाना खान बोलाक ।कहाँ पढ्न जाने हो उहाँको इच्छा पनि त बुझनुपन्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“साँच्चि प्रशन्तको आमालाई कस्तो छ रे : मैले त सोध्नै विसँछु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अँ ममी, अहिले त राम्रै छ रे, हामीले पठाएको पैसाले घरबारी निखन्तदेखिभैँसी कित्नसम्म पैसा पुग्यो रे । अहिले त प्रशन्तको आमा ज्यादै खुसी हुनुहुन्छरै । हुन्छ त म प्रशन्नजीलाई खाना खान डाक्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;आउनुहोस्‌ प्रशन्नबाबु ! हामी सबै तपाईँको प्रतीक्षामा वसेका थियौँ,&#039;केशवले बडो सभ्य भाषामा भने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्नले सबैलाई नमस्कार गरेर सोफामा बस्दै भने, &#039;सबैलाई सञ्चै छ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केशवले उत्तर दिए, &#039;सञ्चै छ बाबु, आज एउटा सल्लाह गरौं भनेरबाबुलाई बोलाएका हौं । हामी रोहिणीको खुसीलाई आफूनै खुसी मान्छौं ।रोहिणीलगायत हामी सबैको इच्छा छ, तपाईँलाई इन्जिनियर पढ्न पठाउने ।जहाँ पढ्न जाँदा राम्रो हुन्छ त्यहीँ पढ्न जानोस्‌ । हामीले राहिणी अंशभागभनौँ या जे भनौं त्यो तपाईँको पढाइमा लगाउने भयौं । रोहिणीले पनि त्यहीभनिन्‌ । कनै पनि कुराको पहिले नै विचार पुग्याउनु राम्रो हुन्छ, तपाईँ पनिसोच्नोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केशवको कुराले प्रशन्नको आँखाबाट आँसु नभारी छोडेन । प्रशन्नलाईरौहिणीलाई भेट्नु, रोहिणीले प्रेम प्रस्ताव राख्नु सबै सपनाजस्तै लागिरहेकोथियो । पैसा नै लगानी गरेर पढ्ने कुरा त उनले कनै क्षण कत्पनासम्म पनिगरेका थिएनन्‌ । प्रशन्नले आँसु पुछ्दै भने, &#039;खोई म के भनौँ : रोहिणीलाईपाउनु मेरो ठूलो सौभाग्य थियो । यहाँहरूले मजस्तो गरिबलाई यति धेरैविश्वास गर्नुहोला भन्ने सोचेको थिइनँ । इन्जिनियर बन्छु भनेर दिलोज्यानदिएर पढेकै हुँ । आफूभन्दा थोरै पसेन्ट ल्याउनेहरूले जान पाए । आफू भने... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्बराले भनिन्‌, &#039;बाबनु ! हामी मतको गरिबलाई मात्र गरिब भन्छौँ ।हामीसँग पनि कै नै छ र ? बिहान-बैलुका हाँसीहाँसी एक पेट खान पायो भनेत्यो नै सुख हो । त्यो सुखचाहिँ भगवानले हामीलाई दिएकै छ भनौँ । हामीलाईरोहिणी डाक्टर बन्लिन्‌ भन्ने ठूलो आश थियो । हजुरसँग भेट भएदेखि रोहिणीलेखान पढ्न सबै वि्सेकी छिन्‌ । खोई कसरी डाक्टर बन्लिन्‌ उनी ? सबैभन्दाराम्रो कुराचाहिँ हजुर नै चाँडै पढ्न गए हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
आमाको कुराले रोहिणी लाजले निहरिन्‌ । प्रशन्तले पनि केही लजाउँदै भने,“कहाँ पढ्दा राम्रो हुन्छ, सबै कुरा बुझौँला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्तको कुराले सबै खुसी भए । रोहिणीको त झन्‌ खुसीको सीमा नैरहेन । प्रशन्नले पनि आफनो जन्मलाई घन्य ठाने । सबैले हाँसीखुसीका साथखाना खाए । खाना खाएपछि सबैसँग बिदा भएर प्रशन्त आफतो डेरातर्फ लागेभने रोहिणी आफनो कोठातर्फ लागिन्‌ र पलङ्गमा पल्टिन्‌ । आँखामा त्यो क्षणआयो प्रशन्तलाई आफूले नयाँ डेरामा लग्दा प्रशन्नले त्यो घरलाई रोहिणीकै घर सम्झे । त्यो कोठालाई रोहिणीकै कोठा सम्झेर भने, &#039;रोहिणी पति राम्रोकोठा यति राम्रो घर रहेछ । मजस्तो गाउँले यस घरमा आउँदा तिम्रो बाबालेके भन्नुहोला ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले हाँस्दै भनिन्‌, भविष्यको इन्जिनियर साप यो घर मेरो होइन । योतपाईंको डेरा हो । तपाईंले नाइँ-नास्ती गर्नुहोला भन्ने सम्झी हामीले तपाईंलाईनभनी यो सजावट गरेका हौँ । सानो खाना पकाउने किच्नेन भित्र छ । यहाँबसेर पढ्नै, मलाई सम्झने वस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
प्रशन्नले कोठाको वरिपरि आँखा डुलाए । वक्सखाले पलङ, ठूलो खानदानीमानिस सुत्नेजस्ता ओछ्यान, सोफा, मेच, टेबुल काठकै बडौ सुन्दर दराज ।करियकरिव कोठा नै ढाको जत्रो नेपाली गलैँचा ओछ्याएको । अटयाज बाथरुम ।त्यो सबै हेरेर टाउको समात्दै प्रशन्नले भने, &#039;रोहिणी यो के गरेकी तिमीले ?कतिन्जैल यो थारो गाईलाई घाँस हालद्व्यौ ? म कहिलेसम्म तिमीहरूकोआदर्श परिवारलाई दुःख दिकँ !&#039;&lt;br /&gt;
&#039;आँटी छोरालाई बाघले खाँदैन&#039; भन्ने उखान छ नि ! पख्नोस्‌ पछि तपाईंकोकमाई भएपछि म एकएक गरेर सवै पैसा असुलिहाल्छु नि । अहिले भन्ने हाम्रोखुसीका लागि हामीले जे भन्छौँ बिन्ती मानिदितोस्‌ । यो कोठा ममी आफैँलेमान्छे लगाएर खोज्न लगाउनुभएको हो । तपाईं निरास हुनुभयो भने उहाँकोपनि मन दुख्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्न मन थाम्न नसकेर रोए । रोहिणीले लोग्नेमान्छे त्यसरी रोएकोपहिलोपल्ट नै देखेकी थिइन्‌ । रोहिणीलै सम्झाइन्‌, &#039;तपाईंले रुनुपर्ने त करैछैन । म तपाईँका लागि त प्राण नै दिन सक्छु । यदि म छिँडीमा सुतेकी हुन्थेभनै कै तपाईँ मलाई त्यही अवस्थामा छोडनुहुन्थ्यो त ? अबश्य सक्नुहुन्थेन ।मैले तपाईंलाई दुःख पर्दा यति पनि गरिनँ भने प्रेमको अर्थ नै के भयो र ?&#039;&lt;br /&gt;
प्रशन्नले आँस्‌ पुत्छदै भने, &#039;रोहिणी, तिम्रो ममीबाबाले मलाई यति मायागर्नुको पर्छाडि कुनै कारण त अवश्य छ । उहाँहरूको पनि प्रेमविवाह हुनुपर्छ,हो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;त्यो त होइन, क्रा के रहेछ भने मेरो बाबाको मामाधरनजिकै मेरीआमाको माइती रहेछ । मेरो हजुरआमा मरेपछि मेरो हजुरबावबाले सम्पूर्णसम्पत्ति रक्सी र सुन्दरीका लागि स्त्राहा पार्दै जानुभएछ । ममीको चारजनादाजुहरू बिवाह गरेर घर छौडी गएपछि मेरो हजुरबुबाको &#039;झन्‌ मनोमानीचलेछ । रक्सी खान पैसा नभएपछि मेरो हजुरबुबाले बाँचुन्जेल रक्सी खानदिनुपर्ने सर्तमा राधै साहुलाई सत्र बर्षकी ममी दिने कुरा गर्नुभएछ । पचास-पचपन्न वर्षको राधे साहले हुन्छ नभन्ने त कुरै थिएत । हजुरबुबाको सल्लाहमैक एक रात ममीलाई बलात्कार गर्न आएछ । मेरी ममी रोइकराई गर्दै राधे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साहबाट बचेर बाबाको मामाघरमा आउनुभएछ । संजोक मैरो वावा पनि त्यहीदिन मामाघर बज्रबाराही जानुभएको रहेछ । बाबाको हजुरआमाले मेरो ममीकोबारैमा सबै कुरा बताएपछि बाबालाई ममीको धेरै माया लागेछ । त्यही दिनराति नै कसैको कुरा नसुनी ममीले नाइँ जान्त भन्दाभन्दै घिस्याउँदै आफनोघर ल्याउनुभयो रे । घर ल्याएपछि हजुरवा हजुरआमाले माहिलाले हाम्रा नाककाट्यो भनी धेरै चित्त दुखाउनुभयो रे । पछि हजुरवा र हजुरआमालाई ठूलौममीर आन्टीले धैरै हेला गरेपछि हाम्रै ममीवाबासँग आएर बस्नुभयो रे । हजुरबा,हजुरआमाले भनेको म अलिअलि थाहा पाउँछु । उहाँहरू पनि भन्नुहुन्थ्यो- &#039;मनसाचो हुने मान्छे मात्र गरिब हो नाती, पीताम्बरालाई हामीले चिन्न भूल गप्यौँ ।आज पछुतो लाग्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्तले सोधे, &#039;अहिले तिम्रो घरको हजुरबुबा, हजुरआमा, मामाघरकोहजुरबुबा खोई त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;घरको हजुरबा, हजुरआमा म सानौ छँदैमा बित्नुभयो । मामाघरको हजुरबापनि म दस-वाह्र वर्षकी छँदा एकाविहानै रक्सी खाएर आर्यघाटमा नुहाउँछुभनेर जानुभएछ र असार महिनाको उर्लिरहेको आर्यघाटमा पस्नुभएछ । बाढीलेकता पुन्यायो पत्तै भएन रे ! मेरो ममी र बाबाबाट विबाह गरेको पन्ध-सोहबर्षसम्म पति बच्चा नभएपछि हजुरबा, हजुरआमाले बच्चा पाकन्‌ भनेरडाक्टर वैद्य आदिका लागि धेरै पैसा खर्च गर्नुभयो रे । हामी जन्मेपछि उहाँहरूज्यादै खुसी हुनुहुन्थ्यो रै । म जन्मैकै साल बाबा प्रशासन अधिकत हनुभएकोरे, त्यसैले मलाई छोरी भाग्यमानी छै भन्नुहुन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्नले भने, &#039;उहाँहरूको जीवनमा पति दुःख परेकै रहेछ । तिमीलाई चाहिँके भाग्यमानी भन्नु मजस्तो... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;इलम भनेको लाख हो, धन भनेको खाक हो&#039; मेरो बावाममी सधैँ यहीभन्नुहुन्छ । तपाइंको इलम देखेरै तपाईंलाई मन पराउनुभएको हो । धनी तकाठमाडौंमा जति छन्‌ तर इलमी भने कम । मेरो ममीबाबालाई बाबुआमाकोसम्पत्तिमा रजाइँ गर्ने मान्छे त्यति मन पर्दैन ।&#039;&lt;br /&gt;
“मचाहिँ कसको सम्पत्तिमा रजाइँ गर्दैछु ? के म लाछी होइन !?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;फेरि त्यही कुरा, मेहनत गर्दागर्दै नभएपछिकसको के लाग्छ ? हेर्नोस्‌ न म पछि फस्ट क्लास इन्जिनियरकँ श्रीमतीबन्छु।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्नले भने, “रोहिणी, म तिम्रो हर सपना साकार पार्छु । तिम्रो आँखाबाटएक थोपा दुःखको आँसु &#039;फर्न दिन्न । यो मेरो प्रतीज्ञा नै भयौ ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीले प्रशन्तकै कुरा सम्झेर आधा रात बिताइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सोर्ह==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;मौसमी फेरि पनि आउन ढिला गन्यौ, आज पनि जाम थियो कि ;&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले कारमा बसेर लामो सास फेदै भनी, हेर्नोस्‌ न कस्तो बोर हिँड्नैलागेकी थिएँ, बाबु टुप्लुक्क आइपुगे । मलाई र कोठालाई देखेर ज्यादै खुसी हँदैभने, &#039;नानी, राम्रै जागिर पायौँ कि क्या हो ? यो कोठा र तिमी नै नचिनिनेभइछौ । मलाई ज्यादै खुसी लाग्यो, मैले देखेको सपना सबै साकार हुने भयो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले भने, &#039;हो बा राम्रै जागिर पाएकी छु । चाँडै अफिस पुग्नुपर्छ, भाँडाहरूमाभात, तरकारी छ झिकेर खानु, म गएँ, भरे क्रा गरौँला भन्दै फुत्किएर आएँ ।बाबु करौनी, घ्यूको कुरा गर्दै थिए म भरे सुनौला भन्दै टाप कसे । आज हामीकहाँ जाने त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमैषले मुख बिगार्दै, कारलाई थानकोटतर्फ मोड्दै भने, &#039;पहीँ जानुपर्छभन्ने के छ र, बूढा पनि कस्तो साइतमा आएछन्‌ ? अब हामी पर्सि नजाने त ?बूढालाई कसैगरी भए पति घर पठाइदै पर्सि त जानैपर्छ । बुटवलकाकविवाहेक दुई ग्रुपचाहिँ हामीसँगै जाने रै । कविचाहिँ नजाने रे । त्यो च्याखुरेकवि त आफनै प्रेमिकाको कुरा हार्न नसकेर पो नगरकोट आएको रहेछ ।कविता सुहागरातको गरे पनि प्रेमिकालाई छोएकै रहेनछ । देखिनौ, त्यसकोप्रेमिकाको मुड कस्तो थियो । मोरा लाछीले प्रेमिकाको रहर पनि पुग्याएनछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;ए हो, तिनी किन रिसाइन्‌ भनेको त कारण त्यो पौ रहेछ, तपाइँहरूभने... । ल त्यो कुरा छोडौं, बाबुको पीर नगर्नोस्‌ । आउन त औषध-सौषधिके-के गर्न आएका रे, आजफैँ बहाना बनाई भौलि नै गाउँ पठाइदिन्छु । भोलिवेलुका उनीहरू बुटवलबाट आएपछि सँगै होटलमा बस्नुपर्छ है । साह्रै रमाइलाछन्‌ मोरामोरीहरू, धेरै हँसाउने त कबि हो त्यही नपुड्सक परेछ, नत्र किनमुखमा आएको फल छोडथ्यो । केटी मुर्मुरिइरहेकी थिई । अब कविलाई त्यसकेटीले पनि छोड्छे । बडो आदर्श बन्न खोज्दो हो मोरो, अब आदर्शको फलराम्रै चाख्छ त्यसले । अब इन्डियातिर घुमेर आएपछि चाहिँ हामी पनि विबाहगरौँ है ? अस्ति घरबेटी बाले भन्थे, &#039;तिमी छोरीजस्ती भएर भनेको आजकालतिम्रो रूपरङ्गग अर्कै छ । आफूलाई सम्हाल बा, नबु&#039;फी हिँड्दा अगाडि खोलोपछाडि भड्खालो होला ।&#039; सचैसबैले हाम्रो प्रेमलाई अङ्गगालोको माया भङ्गालोकोपानी नै सम्झैका छन्‌ । अबचाहिँ म सबैको घृणा सहन सब्दिनँ है ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषले मौसमीको गाला चिमोट्दै भने, &#039;हुन्छ मैयाँ अबचाहिँ विवाह गर्नेसमय आयो । इन्डियाबाट फर्केको पर्सिपल्टै झयाइँकुटी ठोकौंला । तिमीसँगटाढा बस्न कहाँ मन छ र ? तिमी तै मेरो सर्वस्व हौ । तिमी नभई एकक्षणपनि काद्न गाह्रो हुन थाल्यौ मलाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म पनि त तपाईँ भनेपछि ज्यान नै दिन्छु नि ! नत्र बाबुलाई ढाँटीढाँटी किनआउँथे ? साँच्चि अहिले त दार्जिलिङमा जाडो निक्कै होला, राम्रो कोट छैनकिनिदित्तोस्‌ । बुटवलकाहरू कस्ताकस्ता भएर आउलान्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;अक्कवरी सुनलाई कसी लाउनुपर्दैन ।&#039; तिमी त्यसै राम्री नै छ्यौ, उनीहरूलेजत्ति राम्रो लगाए पनि अनुहार त्यही हो । एउटी नाक चुच्ची, अर्की भ्यातुल्लीकाली तिमी उनीहरूका अगाडि त साँच्चै के भनौँ र भखरै फुलेको फूल जस्तैदेखिन्छयौ । कबिले तिम्रो बखान गर्दै थियो । म सोच्चेँ कवि त छदटु होला तरगर्जने बाघले खाँदैन भनेको सोह्रेआना ठीक रहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले कुरा थपी, &#039;कविहरू त अरूको भाबना बुझ्छन्‌ भन्थे । उसलेयहाँसम्म ल्याएर पेमिकाको भाबना नै बुझनेछ र त्यो सिकारु कवि भएर होलाहोइन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मौसमी त्यो त के सिकारु कबि हुन्थ्यो, राम्चै कबि हो रे। आफन्त कोहीनभएर पो पछाडि परेको रहेछ मोरो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“साहित्यमा अगाडि बढ्न पनि आफन्त चाहिन्छ त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमी जहाँ पनि आफन्तै चाहिन्छ रे । कवि त्यसै भन्थ्यो । कविले प्रेमिकाकोसाथचाहिँ पाउने भएन, अब कविले कविता लेखेरै मरोस्‌ । जाँ, के-के किन्नेहो । मलाई पनि राम्रो ज्याकेट छानिदेक, घुम्न जाँदा तिमीले नै छानेकोज्याकेट लाउँछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमी फुरुङ्ग भएर हाँसी । निमेषले कार फर्कायो । दुवै कपडा पसलतर्फपसै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ढोकामा आवाज आएपछि मौसमीको बानु 4004 ढोका खोल्दै भने,&#039;छौरी किन छिट्टै आयौँ ? अफिस छुदने समय त अझै भएको छैन क्या रे ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;मौसमीले कपडाहरू सोफामा राख्दै भनी हेर्नोस्‌ न बा, अपर्झट मलाईपर्सि नै अफिसबाट काजमा जानुपर्ने भयो, त्यसैले कपडाहरू किनेर ल्याएकी ।विष्णुराजले चिप्रा लागेका आँखाहरू पुछ्दै भने, &#039;नानी, सहनै नसक्ने गरी छातीबुख्ने गरेको तँलाई थाहा नै छ । हिजोआज त झन्‌ अचाक्ली छाती दुख्न थाल्योबा ! छोरा, बुहारीले नै पीडा कति सहन्छौ, एकपल्ट काठमाडौँ जँचाएर आउनुभनेर पठाएका हुन्‌ । नत्र पौ मइसिरमासमा यहाँ किन आउँथे ? आएपछिनजँचाई फर्किँदा के भन्लान्‌ ? तिमी कहाँ जान्छु भन्छयौ, म बूढोलाई कोसंगजचाउनुपर्छ थाहा छैन । तिमीलाई क्याम्पस भर्ना गर्न सहयोग गर्ने इन्द्रै पनिअरब गएछ, अब के गर्नु ल ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले भनी, &#039;अलिक दिनका लागि म छाती दुख्दा कम हुने औषधिकिनेर ल्याइदिन्छु त्यही लिएर जानु फेरि पछि आउनु अनि म राम्रोसँगजँचाइदिउँला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विष्णुराजले आँखाभरि आँसु पार्वै भने, &#039;ठीकै छ केही समयका लागि औषधिलेकाम चलाउँला । जागिर भन्नै कुरो आफूले चाहँदैमा पाइँदैन । मैलै गर्दाजागिरबाट हात धुनुपत्यौ भने नमज्जै हुन्छ । म भोलि नै घर जाउँला । घ्यू,सिरौंला, भागौ ल्याइदिएको छु राख । मलाई तातो दुई गाँस भात खान देक ।म त भोकले मर्न लागेँ बा !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले राइसकुकर हेर्दै भनी, &#039;भात खानु त भनेकै थिएँ नि, किननखाएको त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिउँजस्तो चिसो भात, त्यसमाथि दाल, तरकारी कहाँ थे केही मेसो पाइनँ ।भात त देखेकै हँ । तताउनै ढङ्ग भएन ।&lt;br /&gt;
मौसमीले स्वीच अन गर्दै भनी, &#039;ल म भात तताइदिन्छु हात घौएर आउनोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;भात त आगोमा नै तताइदेक, चिसो खाने भए त अघि नै खाइहाल्थे ति !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले दाल तरकारी ओभनमा राखेर तताई, भात राइसकुकरमै तताई ।केही क्षणमै तातोतातो दाल, तरकारी भात पस्केको देखेर बूढाले तीन छक पर्दैभने, “नानी ! तैँले के जादु गरिस्‌ हँ  बिनाआगो सबै खानेकुरा हेर्दाहेर्दै तताइस्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले करेन्टबाट सब्रै पाक्छ, तात्छ भनेर सम्झाएपछि कृ्‌ष्णराजको मनकेही शान्त भयो । उनलै खपाखप भात खाए । आफनी छोरीको प्रगति देखेरकृ्‌ष्णराजले सवै पीडा भुले । छोरीतिर हेर्दै भने, &#039;यज्रो सहरमा तिमीलाई एक्लैछाडेर जाँदा तिम्रो पीरले कति दिनसम्म त उद्नै सकिनँ । आज भने मनहलुङ्गो भयो । तिमीलाई यतै दिन पाए म सौझै स्वर्ग पुग्थैँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मेरो चिन्ता नै नगर्नोस्‌ । सवै राम्रै हुन्छ । दाइको छोराछोरी, दिदी, दिदीकोछौराछोरीलाई त राम्रै होला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबैलाई राम्रै छ । मलाई भात लागेजस्तो छ, म सुत्छु । छाती दुख्दा खाने औषधिर नाति-तातिनालाई केही कपडा ल्याइदैक, पैसा इस्टकोटको खल्तीमा छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमी औषधि र कपडा लिन वाहिर निस्की । कृष्णराज प्रशन्न मुद्रामासोफामा सुते । मौसमी ब्रुफिनको दस «पन्ध्र पत्ता र कपडाहरू लिएर आई, सबैबाबुलाई देखाई । कृष्णराज खुसी भए । औषधिको पत्ता भने इस्टकोटकोखल्तीमै राखे । भोलि बिहान घर जानका लागि मौसमीले ल्याइदिएको कपडामिलाएर राखे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सत्र==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हेलो ! रोहिणी किन फोन गरेकी, त्यहाँ सबैलाई त सञ्चै छ?&amp;quot;&#039;अं सबैलाई सञ्चै छ । तँ अहिले विहानको खाना खाने गरेर यतै आइज ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले तसँंग माफ पनि माग्नु छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;होइन के भन्छे यो, किन माफ माग्नुप्यो : छिटो भन्‌, कोही विरामीपरेको त होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
“सत्य कोही विरामी छैन । दिदी तँ आउने भनेर खुसी हँदै तँलाई मनपर्नेखाना बनाउँदै हुनुहुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ए हो, त्यसो भए म आइहालेँ । ल भेटेरै कुरा गरौँला, बाई ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीले पनि बाई भन्दै फोन राखिन्‌ । शालु हतारहतार कपडा लगाएररोहिणीको घरतर्फ लागिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&#039;शालु दिदी&#039; भन्दै सौजन्यलाई खेलाइरहेको वीरु चिच्यायो । शालुले वीरु रसौजन्यलाई ठूलो क्याटबरी दिइन्‌ । दुवैको गालामा म्वाइँ खाइन्‌, भर्खर टुकुदुकहिँड्न थालेको सौजन्यलाई केहीबेर बोकेर बगैँचा वरिपरि घुमाइन्‌ । वीरुलेशालुको अनुहारतिर हेदै भने, &#039;दिदी तपाईं जहिले पति सौजन्यलाई देख्नेबित्तिकैकिन आँस्‌ भार्नुहन्छ ?&#039;&lt;br /&gt;
शालुले आफनो आँखामा भरिएको आँसु पुच्छदै भनिन्‌, &#039;तिमीहरू दुवैकोखुसी देखेर रोएकी नि ! ल भन वीरु तिम्रो पढाइ कस्तो छ ?&#039;&lt;br /&gt;
“पढाइ राम्रै छ ममीले बिहान-बिहान ट्युसन पढ्न पढाउनुहुन्छ । आजशनिबार भएकोले बिदा छ । शालु दिदी, म पनि तपाईँको नामबाट नै मेरो नामराख्छु क्या !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“होइन के भनेको तिमीले, मैले त कुरै बुझिनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चीरुले अँध्यारो मुख लगाउँदै भने- &#039;औं बुझिने रे, ममीले भनेको तपाईंकोनामसँग मिल्नै नाम भाइलाई राखैको रे, तपाईँ शालु भाइ सौजन्य मलाई सबैथाहा क्या ! तपाईंको जस्तो नाम राख्यो भने मान्छे ज्ञानी हुन्छन्‌ रे । बाजेलेभाइको नाम अर्कै राखेका थिए रै ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु जिल्ल परिन्‌ । उनले त नाममा त्यति चासो दिएकी थिइनन्‌ ।शालुको मत खुसीले फुरुङ्ग भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वीरुले शालुलाई हल्लाउँदै भने, &#039;दिद्दी मेरो ताम पति फेर्ने, ममीलाईभनिदिनोस्‌ ।&#039; ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले गहभरि आँसु पार्दै भनिन्‌, &#039;वीरु दिदीले मेरो माया लागैर मलाईराम्रो भन्नुभएको हो । बीरु नाम कहाँ नराम्रो नाम हो र, तिमी धेरै पढ, ज्ञानीहोक, तिमीलाई पनि सबैले माया गर्छत्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वीरुले खिन्न हँदै भने, &#039;तपाईं सौजन्यलाई मात्र माया गर्नुहँद्ोरहेछ, त्यसैलेमेरो नाम फेर्नु चाहनुभएन ।&#039; ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले वीरुको गाला मुसार्दै भनिन्‌, &#039;वीरु म दुबैलाई माया गर्छु । तिमीलाईबीरु नाम मन पर्दैन भने दिदीलाई कुरा गछु, हुन्छ ?&#039;&lt;br /&gt;
चीरु दङ्ग परै । शालु सिधै भान्सामा पसेर कान्छीको आँखा छोपिन्‌ ।कान्छीले हात झिक्दै भनिन्‌, &#039;हेर हातको के गति पारेको : हजुरको छाया मात्रदेखे पनि हजुरलाई चिन्छु, बुझिस्यो ? ल वसिस्यो, पहिला दूध र पनिर पकौडानै खाइस्यो अनि कुरा गरौँला ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले दूध पिउँदै वीरुले भनेको कुरा सुनाइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले आँखाभरि आँसु पार्दै भनिन्‌, &#039;वीरुले धेरैपल्ट नाम फेर्ने कुरा गरेकाथिए । मैले वास्तै नगरेपछि हजुरलाई भनेछन्‌ । ल भन्नोस्‌ उसको नाम केराखिदिने ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले केहीबेर सोचेर भनिन्‌, &#039;सौरभ राख्दा हुँदैन !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ भइहाल्छ नि ! उनलाई &#039;श&#039;बाट नै आउने नाम चाहिएको हो । सौरभनाम साह्रै राम्रो छ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन, यो मौरी कुन बेला आएकी ? आफनो आमाछोरी भएपछि त हामीकिन चाहियो ? दिदीको पलिताई कहिलेकाहीँ आफनो प्रशंसा सुनौँ भन्योकहिल्यै पाइएको होइन । सधैँ मेरो शालु मैयाँसाप यस्तो, मेरो शालु मैयाँसापउस्तो भन्नुहुन्छ भन्या । यो मोरी पनि त्यस्तै छे, फोन गत्यो कि पहिलै भन्छे-रोहिणी घरमा सबैलाई सञ्चै त छ ? तँलाई कस्तो छ ? भनेर सोधेको त मैलेसुनेकी नै छैन । ल दिदी हामी कोठामा गयौं ।&#039; शालु र रोहिणी नै कोठाभित्रपसे । कान्छी हाँसिन्‌ मात्र ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रोहिणीसँगै सोफामा बस्दै भन्तिन्‌, &#039;रोहिणी तँ यतिबिध्न खुसी छस्‌,कुरा के हो भन्त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;पहिला तैँ रिसाउन्न भनेर कसम खा अनि मात्र भन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;तँसँग म किन रिसाउनु ? म सधैँ तेरो फोटोलाई हेरेर भन्छु, भगवान्‌ यदिअर्को जन्म हुने भए मलाई रोहिणी नै साथीको रूपमा पठाइदैङ । तेरोकारणले त मैले सबैको सुख देख्न पाएकी छु । दिदीलाई केही तराम्रो भएकोभए म कसरी बाँच्यें होला ? ल सबै कुरा छोडौं, भन्‌ कुरा के हो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले शालुको हात समात्दै प्रशन्नसँग भेट भएदेखिको सबै कुरा बताइन्‌ ।विवाहका लागि करा छिनेर स्वयम्बर गरैर मात्र अर्को हप्ता पाकिस्तान इन्जिनियरपढ्न जानै कुरा पनि बताइन्‌ । स्वयम्बरमा डाक्नुपर्ने मान्छेहरूको लिस्ट लामैदेखाइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीको कुराले एकैछिन त शालुलाई आफू सपनामै छु जस्तो लाग्यो,शालु टोलाइरहिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले मसिनो स्वरमा भनिन्‌, &#039;विन्ती नरिसा शालु, मैले कतिपल्ट तँसँगआफनो प्रेमको बारेमा भन्न चाहेँ तर सक्दै सकिने । तँ भन्धिस्‌ ति सबैको प्रेमविषाक्त हुँदैन भनेर, विश्वास गर हाम्रो प्रेम पनि बिषाक्त होइन । हामी एक-अर्काच्रिना बाँच्न पनि सक्दैनौं त्यसैले सबैको सल्लाहले उहाँ स्वयम्बर गरेरज्ञान लाग्नुभएको हो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;त॑ मलाई पनि बोल्न दिन्छेस्‌ कि आफूमात्र बोल्छैस्‌हं ? तैँले जे गरिस्‌ राम्ै गरिस्‌ । म त सञैँ तेरो खुसी नै चाहन्थेँ । तेरो प्रेममासमर्पण छ । रोहिणी, प्रेममा त्याग होस्‌, स्वार्थ नहोस्‌ । मैले तँलाई माने,लैलामजनुको प्रेमभन्दा तिमीहरूको प्रेम कम छैन । सबै प्रेमी-प्रेमिका तिमीहरूजस्तै हुँदाहुन्‌ त म किन टाउको दुखाउँथैँ ? तँलाई बधाई छ रोहिणी बधाई छ ।आफू डुबेर तैँले प्रेमीलाई उत्तारिस्‌, त्यसो भए तँ फेल हुनुको रहस्य मैले बुझैं ।दुवैजनालाई पढाउन बाबुआमाले सक्नुहुन्न भनेर तँ जानीजानी फेल भइस्‌,नत्र तँ फेल नै चाहिँ हुन्थिनस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले शालुको मुख छोप्दै भनिन्‌, &#039;शालु तँ पनि, हेर पो वास्तविकताममी-बाबाले थाहा पाउनुभयो भने साह्रै मन दुखाउनुहुन्छ । यो कुरा त॑ र ममामात्र सीमित रहोस्‌ । म के गरौँ तँ नै भन्‌ उहाँलाई पढ्न पठाउनका लागि तकार नै विक्री गर्नुपर्ने भयो । जस्ट पास मात्र भए पनि हामी तिमीलाई डाक्टरनै पढ्न पठाउँछौँ भन्त वाल्नुभयो, त्यसैले...&#039; भन्दै रोहिणी रोइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“उफ ! रोहिणी तेरो प्रत्येक करा मान्ने ममी-बाबाले तेरो त्यो इच्छालाईपनि त पूरा गरिदिनुहुन्थ्यो होला नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;शालु तँलाई थाहा छैन, उहाँहरूले हाम्रो प्रेमलाई स्वीकार गर्नु भए पनिपढाइको प्रथम प्राधथमिकताचाहिँ मलाई नै दिनुभएको थियो । मैरो रिजल्टबिग्रेपछि बल्ल प्रशन्नलाई बाहिर पठाउने कुरा उठाउनुभयो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तँ पीर नगर अर्को वर्ष म रामौसँग फेल भएको विषय पास गर्छु । ल अबयी क्रा यहीँ छोडौं । भत क्याम्पसको साथी कति जनालाई बोलाउने !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;सोचेर बौलाए भइहाल्छ । म भने तेरो ममीपापालाई भेटेर आउँछु&#039; भन्दैशालुले पहिला रोहिणीको बाबुलाई भैटिन्‌ । सबै कुरा भएपछि आमासँग भेटिन्‌,पीताम्बरा प्रशत्नको कुरा गरेर हर्षित भइन्‌ । करा गर्दागर्दै प्रशन्न पनि टुप्लुक्कआइपुगे । पीताम्बराले नै शालुको परिचय गराइन्‌ । रोहिणीको मुखबाट पनिथुप्रैपल्ट शालुको नाम सुनेको वताए प्रशन्तले । प्रशन्न आएको गन्ध पाउनेबित्तिकैरोहिणी कोठामा आइन्‌ । प्रशन्नलाई देख्नेबित्तिकै रोहिणीको आँखामा आँसुछर्चाल्कयो । उनी केही बोल्त नसकी बैठककोठामै बसिन्‌ । रोहिणीको त्योचाल देखेर सबै एकैछिन मौन रहे । खाना खाने बेला पनि भएकोले सबैभान्सातिर लागे । शालुले दिदीलाई खाना दिन सघाइन्‌ । रोहिणीले दुई-चार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गाँस बल्लबल्ल खाएर उठिन्‌ । पुनः सबैजना बैठककोठामा जम्मा भए ।रोहिणी र प्रशन्तको अनुहार भने उदास थियौ । स्वयम्बर गदा पार्टी दिनेविषयमा छलफल भइरहेको थियौ । त्यति नै खेर फोन आयो, फोन नजिकैबसैका रोहिणीको बाबुले फोन उठाए । हलो ! को बोलेको, प्रमोद, ओ लन्डनबाटपौ, ल भन्‌ ममीडेडी सबैलाई सञ्चै छ ? लौ भाइ मन्यो रे, कसरी ? हस्पिटललग्दालग्दै ? एपेन्डिसाइटको शङ्का गरै सबैले ? ल बाबुआमालाई पीर नगर्नुभन्नु । अरू के भनौं ल ल राख बाबु, राख ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्बराले डराउँदै सोधिन्‌, &#039;होइन के भयो !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;के हुनु, काकाको कान्छो नाति तरुण हिज्ञो मरेछन्‌, त्यसैले खवर गरेकाहुन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्बराले च्ब ! च्व ! गर्दै भनिन्‌, &#039;नाति जन्मेको त वाहा नै थिएन कसरीमरेछन्‌ रे ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फएपेन्डिसाइटले मरै भन्ने शङ्का छ रे&amp;quot; केशबले जवाफ दिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अहो ! त्यसो भए स्बयम्बर रोकियो त ?&#039; पीताम्बरा झस्किन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ला ! हो त ! स्वयम्बर त रोकियो नि !&#039; केशवले कुरा टुङ्ग्याउन नपाउँदैअँध्यारो मुख लगाइरहेकी रोहिणी रुन पो थालिन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालुले रोहिणीको हात समाउँदै भनिन्‌, &amp;quot;रोहिणी पीर गर्नुपर्ने त कुरै छैन ।स्वयम्बर गर्वैमा तिमीहरूको माया वढ्ने र नगर्दैमा तिमीहरूको माया घट्नेहोइन । तिमीहरू एक-अर्कालाई विश्वास गर्छौ, त्यही नै ठूलो हो, होइन तप्रशन्नजी !&#039; (न&lt;br /&gt;
“हो, शालुले ठीक भन्नुभयो । माया नै ठूलौ हो ।&#039; प्रशन्नले पनि शालुकोकरामा नै समर्थन गरै ।&lt;br /&gt;
सबैले विश्वास र मायाभन्दा ठूलो केही पनि हुँदैन भन्नै कुराको पुष्टि गरे ।रोहिणी र प्रशन्न दुबैले मन बुझाउन करै लाग्यो । शालु दिनभरि बसेरसाँझसाँझ घर आइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रहँदा-वस्दा प्रशन्न पाकिस्तान पढ्न जानै दिन पनि आयो । कान्छीदिदीलेसाइत गरेर पडाउने भएकोले प्रशन्न पाकिस्तान जाने अघिल्लो दिन रोहिणीकैमाबसे । रोहिणी एक्लै कोठामा रोइरहेको देखेपछि केशवले नै प्रशन्तलाई सम्झाउनुभनी आग्रह गरे । रोहिणीको त्यो अवस्था देखेर प्रशन्नलाई पनि नमज्जालाग्यो । उनले कोठा बन्द गरी रोहिणीको नजिक बस्दै सम्झाए, हेर रोहिणीतिम्रो पीरले गर्दा घरमा सबैले चिन्ता मानेका छन्‌, तिमी जेटीबाठी छोरी,तिमीले पो सबैलाई सम्झाउनुपर्छ त ! म लडाइँमा नै त जान लागेको होइन ।प्रत्येक कालो रातपछि दिन आउँछ भन्ने कुरा हामीले भुल्नुहँदैन । मायाको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गहिराइमा डुविसकेपछि जिउन गाह्रो हुँदोरहेछ । त्यसो भन्दैमा कर्तव्य पनिभुल्नु भएन । केही समय पीडा सहेपछि हामी सदाका लागि पीडामुक्त हुन्छौं ।तिमीले आफूलाई सम्हाल्यौं भने म सन्तोषको सास फेर्छु, तिमी चिन्तामा डुव्यौभने म कसरी पढ्न सक्छ भन त ?”&lt;br /&gt;
रोहिणी रोइन्‌ मात्र, प्रशन्नले भने, &#039;रोहिणी तिमी यसरी विलाप गर्छ्यौं भनेम पढ्न नै जान्न ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणी केही बोल्न नसकी आफनो कोठामा आइन्‌ । प्रशन्नले अनेकौँसहानुभूतिका शब्दहरू खन्याए पनि रोहिणीको हृदय प्रशन्नको मायाले जलि नैरहयो । रौहिणी पटक्कै निदाउन सकिनन्‌ । रोहिणी जति छट्पटाए पनि समयलेआफनो गति लिई नै रहयो । भोलिपल्ट बिहान रोहिणी र प्रशन्नले नै एक-अर्कोलाई हेर्न र बोल्न सकेनन्‌ । कान्छीदिदीले साइतको टीकामाला लगाएरबिदाइ गरिन्‌ । एयरपोर्टमा रोहिणी जान सकिनन्‌ । केशब, पीताम्बरा र चन्द्रकान्तमात्र गए । केशवले प्रशन्नलाई बिदा गर्नुअरगाडि &#039;हामीले तपाईंलाई आफनैछोरा सम्झेका छौँ । हाम्रो विश्वासलाई नटुकयाउनुहोला । रोहिणीलाई तपाईंलेचिन्नुभएकै छ, त्यसैले सक्दो चांडो फोन गर्नुहोला&#039; भन्त भुलैनन्‌ ।&lt;br /&gt;
प्रशन्नले पनि विश्वास नटुक्रयाउने, मन लगाएर पढ्ने, चाँड्धै फोन गर्नेकरा बताएर बिदा भए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अठार==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ढोकाको घन्टी लागैपछि शालुले ढोका खोलिन्‌ र त्यो घन्टी लगाउनेलाईकेहीबेर हेरेर भनिन्‌, &#039;तिमी मोना होइनौँ ?&#039;&lt;br /&gt;
मोनाले हो भन्ने सङ्केत गर्दै मुन्टो हल्लाइन्‌ । शालुले मोनालाई कोठामाडाकेर सोफामा बस्न आग्रह गर्दै भनिन्‌, &#039;बसन मोना, तिमी त ज्यादै ठूली पोभइछौ । पहिलाकै घरमा छौ कि अन्तै छौँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाले गहभरि आँसु पार्दै भनिन्‌, &#039;दिदी आज नै त्यो घर छाडेर आएँ ।तपाईंले नै मेरो मर्म बुझिदिनुहुन्छ भनेर यहाँ छिरेकी हँ ? कान्छीदिदीलाई योसमाजले चरित्रहीन नै ठहन्याएछन्‌ नि होइन ? मेरी आमा त्यसै भन्धिन्‌ । मैरोमनले अफ्गै पनि भन्छ उनी त मायाको सागर हुन्‌, चरिहीन होइनन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले फिस्स हाँस्दै भनिन्‌, &#039;मौना तिमी र मजस्ता यो समाजमा कति नैजन्मन्छन्‌ र ? तिमी र म जस्ताको कुरा फेरि कसले ७0 ? तिमी असभ्यजँड्याहाकी छोरी म सभ्य जँड्याहाकी । पर्न त हामी दुवै जँड्ययाहाकी छोरी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पज्यौँ । फरक यति छ, मान्छेहरू तिम्रोअगाडि नै क्रा कादछन्‌ भने मेरोचाहिँपर्छाडि कुरा काट्छन्‌ । आखिर कुरा त कादछन्‌ नै । तिमीले किन घर छोड्यौत?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाले केहीबेर मौन रहेपछि रुँदै बोली फुटाइन्‌, &#039;दिदी मालिक्नी योसंसारमा हुनुहुन्न, उहाँ मारिनुभयो, त्यो पनि आफनै लोग्नेबाट ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले आश्चर्य मान्दै भनिन्‌, &#039;मौना तिमी भ्रममा पस्यौ कि ! देख्दा तत्यस्तो पापीकैँ लाग्दैनथ्यो क ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के भ्रममा हुनु नि दिदी, मैले भोलिपल्ट विहान आफनै आँखाले दुईटातकियामा रगत देखेकी हुँ । उसले अवश्य निदाएको बेलामा तकियाले थिचेरमारेको हनुपर्छ । मैले यो कुरा पुलिसलाई पनि भनेँ तर पुलिसले त ब्लडप्रेसरहाई भएर मरेको मुचुल्का तयार पासो ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;होइन मानैपर्ने कारणचाहिँ कै धियौ र !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के हुन्थ्यो र दिदी, बूढी मालिक्नीबाट त्यो यौनप्यासी सन्तुष्ट हुँदैनथ्यो ।मालिक्नीलाई मारेर क स्वतन्त्र हुन चाहन्थ्यो । उसको आँखा म पापितीमाथिथियो । क मलाई सम्पूर्ण सम्पत्ति दिन्छु भनेर बेलाबेलामा फकाउँथ्यो । मउसको कुरा एक कानबाट सुनेर अर्को कानवाट उडाइदिन्थे । मालिक्नी मेरोचरित्रले गर्दा मलाई असाध्यै माया गर्नुहुन्थ्यो । म पनि उहाँलाई असाध्यै मायागर्थेँ । त्यस घरमा गएको दुई-चार वर्ष त म त्यसको गिह्दै आँखाबाट बचे ।मालिक्नीसापको आमा मरेकोले उहाँ महाराजगन्ज माइत जानुभयो, त्यस रातत्यो अधर्मीले ज्वरो आएको निहुँ पारी मलाई तातो पानी लिएर आउनु भनीआफनौ कोठामा डाक्यौ । म डराउँदैडराउँदै कोठामा पसेँ । कोठामा पसेपछिहतारहतार ढोका पो लगायो ! मैले डरले चिच्याउँदै भनेँ, &#039;मलाई छोइस्‌ मात्रभने पनि तँलाई जिउँदै मारिदिन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मालिक भइखाको अच्युतले एक गिलास तातौपानी मैरो जिउमा छयाप्दैभन्यो, &#039;कत्तित कमारी केटीफ्रै गरेर नखरा पार्छै । म सिकारी भन्ने त तलाईथाहै छ होइन ? यो कोठाबाट एक पाइला मात्र सारिस्‌ भने तँलाई बन्दुकलेउडाइदिन्छु । तँलाई शिरदेखि पाउसम्म गहनाले पूर्छ भन्दा पनि मात लाग्योभाग्ने ?&#039; भन्दै उसले मलाई झम्टन खोज्यो । मलाई पानीले पोलेको पनि यादभएन । मृत्युको त चिन्तै भएन । मैलै चिच्याउँदै &#039;मार्ने भए मार, म मर्छै तरमेरो मालिक्नीको विश्वास तोड्दिनँ&#039; भन्दै ढोकामा पुगेर ढोका खोल्न लागेँ,उसले पछाडिबाट बन्दुकको नालले जोरले टाउकोमा हान्यो । म रन्थनिँदैभुइँमा ढलेँ । हातखुट्टा लुलो भयौ, उसले मेरो शरीरमाथि एक्लौटी जमायो रभन्यो, &#039;मौना तेरा लागि त सारा त्याग्न सक्छु । मोना आवेशमा जे गरे पनिनरिसा है । म जस्तो पाउँदा के चाहिन्छ त तँलाई ?&#039; म धेरै वेरपछि घिसिँदै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफनो कोठामा आएँ । त्यो रात छट्पटाउँदै बिताएँ । भोलिपल्ट मालिक्नीलेमाइतीबाट फोन गर्नुभएको थियो । आमा मरेको चौटमाथि अको चोट कित01 भनेर मन सम्हालेर करा गरेँ । आमा मरेको पाँच दिनको दिन मालिक्नी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुव्लाएर घरभित्र मात्र के पस्नुभएको थियो । मैले चाहंदा-चाहँदै पनिआफूलाई बाँध्न सकिनछ्ु र रुन पुगेछु । मालिक्नीले मेरो आँसु पुर्छिदिँदै भन्नुभयो,“जै नहोस्‌ भन्ने सोचेकी थिएँ त्यही भएछ । त गरिबनीको उद्धार गर्छु भनेरल्याएकी त &#039;झन्‌... । यति भन्दै मालिक्नी पनि मसँगै रुन थाल्नुभयो । हामीदुवैजना धेरैबेर रोएपछि मालिक्नीले भन्नुस, , &#039;नानी नरो तँ मलाई छोडेरनजा । तँ मेरो खुसी हेर्न चाहन्छैस्‌ भने तैँले उहाँको रहर पुस्याइदै ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले अचम्म परेर मालिक्नीको मुख हेदै भनेँ, &#039;हजुरले के भन्नुभएको त्यस्तोम अब यहाँ बस्तिनँ मालिक्नीसाप बरु मागेर खान्छु तर... ।&#039;&lt;br /&gt;
मालिक्नीलै मेरो कपाल मुसार्दै भन्नुभयो, &#039;हुन त तँलाई कुनै इमानदारकेटा खोजेर आफैँ कन्यादान दिन्छु भन्ठानेकी थिएँ । पुन: तेरो इमानदारितामाथिअर्को दाग लगायो यस पापीले । मैले मेरो स्वार्थका लागि मात्र होइन तेरालागि पनि भनेकी हुँ, तँ पनि कहाँ जान्छेस्‌ ? बाबुआमा तिनै हुन्‌ । महिना मर्नपाएको छैन पैसा लिन आउंछै । एक वचन नानी तँलाई अर्काको घरमा गाह्रैहोला भनेर कहिले सोधेकी छै, तँ नै भन्‌ त ? ममाथि पहाड दुद्दा पनिअसत्तीलाई प्यास नै ठूलो भयो । के गरौं पीडा सहने बानी तै परिसक्यो बा !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले मालिक्नी सापलाई भनेँ, &#039;आजै अदालत जाउँ, म साँचो क्रा बताइदिन्छु,यस्तो पतीतसँग नबस्नोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मालिक्तीले तुरुक्क आँसु झार्दै भन्नुभयो, &#039;नानी, वाहा छ मलाई पनि,अपराध गर्नुभन्दा अपराध सहनु पाप हो । तर यो कानुन अन्धो छ बा ! हामीअदालतमा गयौं भने तेरो मालिक होइन तँ पो अपराधी हुन्छैस्‌ । फेरि प्रत्येकस्वास्वीमान्छेहरू आफनो स्वार्थको लागि मात्र कहाँ बाँचेका हुन्छन्‌ त ? कुनैस्वास्नीमान्छैले लोग्नेको अत्याचारको पराकाष्ठा नाघेपछि झिनो आफूनो स्वार्थहेरेर पन्छयो भने यो समाजका आड्गमाईले नै उसलाई वेश्या साबित गर्छन्‌ ।पाइतैपिच्छे काँडा विल्लयाउँछन्‌ । म आफना लागि मात्र बाँचेकी भए केही गर्नत सक्थैँ नै होला तर म कहिल्यै आफूता लागि बाँचनै बुझिस्‌ ? म एउटालेपीडा लुकाउँदा मेरा सम्पूर्ण आफन्तहरू खुसी हुन्छन्‌ भने पीडा गुङाउन ततैचैसभैँ लाग्छ । म मेरा आफन्तको आँखामा आँसु देख्न सक्दिनँ । मोना,देखिहालिस्‌, मेरा छोराछोरी अमेरिकामा कति खुसी छन्‌ । &#039; बुङवाबु हुनुहुन्छ ।मलाई माया गर्ने दाजुभाइ, दिदीबहिनीहरू छन्‌ । म ती सवैलाई कसरी चोटदिन सक्छु भन त : त्यसैले चुपचाप बगर भएर बाँचेकी छु । फेरि तैँले सोचिस्‌होला तेरो मालिकले यो चोट मलाई अहिले मात्र दिएका हुन्‌ । तँजस्ती सफाहृदय भएकी बच्ची त मैले पहिलोपल्ट नै देखेँ । यहाँ करिब आधा दर्जन जति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटीहरू अहिलेसम्म बसै होला, ती प्रत्येकमा लालच थियो । उनीहरू आफनोवैसका उन्मादहरूलाई: थेग्न सक्दैनथे । तेरो मालिकको पैसामा र मायामालट्टिन्थे उनीहरू । कुन सड्का आफूनो आँख्चा छलेर प्यास मैद्थै«मेटाउँथे मैलेपत्तै पाउँदैनथेँ । जब मलाई नै सौताको व्यवहार गर्न थाल्दा पो वास्तविकताबुझथेँ । चुपचाप आँसु पिएर सबै सहनु नै श्रेय ठान्थेँ । मालिकबाट केपाउँदैनथै कुन्नि अलिक दिनको रमझमपछि अरू नै केटा टिप्थे, हिँड्थे । सबैलेछोडेपछि मालिक आक्कलझुक्कल मसंग आउँथे । भैगो यो कुरै छोडौं, तँ पापीहोइनस्‌ । कुनै राम्रो ओत लाग्ने ठाउँ नपाउन्जेल तँ यहाँबाट नजा ।&#039; उहाँलेत्यसै भत्ती सम्झाउनुभयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले पनि मालिक्नीको कुरा ठीकै ठानेँ । मालिक्नीलै बलात्कार हुनुको कारणपनि सोध्नुभयो । मैले सबै बताएँ । उहाँले टाउकोमा हेर्दै &#039;टाउको नै नफुटे पनिटाउकोमा पीप-रगत जमेको छ&#039; भनेर मेडिकलमा लगी मेरो घाउ देखाउनुभयो ।नभन्दै डाक्टरले घाउ निचोदा एकमुठीभन्दा बढी पीप-टगत आयो । पीप-रगतनिचोरेपछि टाउको हलुको भयो । मालिक्नीले थाहा पाएर पनि केही थाहानपाएझैँ गरी मालिकलाई सम्पूर्ण आकाश स्वतन्त्रपूर्वक डड्त दितुभयो । मउसकी सिकारमा परिरहन्थेँ । मालिक्नी चुपचाप सहिरहनुहुन्थ्यो । मेरो रमालिक्नीको सम्बन्ध अझै गाडा बन्दै गयो । दिन बितेकै थियो । केही दिनअगाडिदिउँसोको तीन-चार जति बजेको हुँदो हो । मेरी आमा आएर मेरी सोझीमालिक्नीसँग हाँक दिँदै भतिछिन्‌- “मीनालाई यो घरबाट लगेर अन्तै राख्छु ।अन्त बढी पैसा दिन्छु भनेका छन्‌ ।&#039; मालिक्नीले रिसको झोकमा भन्नुभएछ-“सक्छयौ भने मोनालाई अहिले लग, मलाई मोना चाहिँदैन ।&#039; मालिक्नी र मेरी &#039;आमाचीचको क्रा सुनेर मालिक रिसाउँदै बाहिर निस्केछन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म कोठामा कै गलफती हुँदैछ भनेर पसेँ । आमा र मालिक्नीबीचको सबैकुरा बुझेँ । मैले रिस थाम्न सकिनँ । आमालाई कपाल भुत्ल्याएर घिसार्दै भनेँ-&amp;quot;तँ कृकर्ती मेरौ मोल राख्न आएकी : आइन्दा तँ यस घरमा छिरिस्‌ मात्र भनेकुकुर फुकाएर टोकाउँछु । जा छिटो निस्की- निस्किहाल ।&#039; मालिक्नी मेरो हातरोक्न खोज्दै हुनुहुन्थ्यो । मेरौ आँखामा आफू बलात्कार हुँदाका क्षणहरू नाच्यो ।मैले मैरौ जिन्दगी बर्बाद गर्ने त्यही आमा नै हो भन्ठानेँ । ममा भूत सवारभयो । मेरो होस त्यतिबेला मात्र आयो जब मालिक्नीले मैरो गालामा दुईथप्पड मार्नुभयो र भन्नुभयो- &#039;मोना अव तँ जेलमा जाकिने भइस्‌ तेरी आमामरी । मैले यसो आँखा खोलेर आमातिर हेरेँ । आमा रुन पनि नसक्नै गरेरभुइँमा पछारिरहेकी रहिछिन्‌ । मैले उनलाई सकिनसकी सडकमा पुन्याएरदयाक्सी रोक्दै हातमा दुई सय रुपैयाँ दिएर भनेँ, &#039;आइन्दा तैँले यो घरमा पाइलाटेकिस्‌ भने यो घरबाट तेरो लास जान्छ, याद गर ।&#039; आमा चु पनि बोल्ननसकी गइन्‌ । मैले त्यो दिन ठूलै पराक्रम गरेकी सम्झ । मालिक्नीले भन्नुभयो,“नानी तेरो रिस देखेर म छक्क परेँ । मैले तँलाई नपिटेको भए तैँले आमालाई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मा्नै थिइस्‌ । जे गरिस्‌ ठीक गरिस्‌ । अव तेरो महिनैपिच्छेको पैसाले सुनकैकेही सामान वनाइदिउंला, दुःख पर्दा काम लाग्छ । त्यही दिन मलाई सिक्री,औंठी र टप दिँदै भन्नुभयो, &#039;अपराध धेरै भएपछि ढुङ्गा पनि विस्फोट हुँदोरहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
मैले भने, &#039;खोई त हजुर पनि विस्फोट भएको ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उहाँले मेरो गाला मुसादै भन्नुभयो, &#039;नानी तँ पनि धैरै कुरा जान्ने भइस्‌ । मआकाशमा गएपछि विस्फोट होउँला । तँ आज साह्रै थाकेकी छस्‌, म खानापक्राउँछु । तँलाई एकछिन नदेख्दा पनि म आत्तिन्छु तँ साबीचाहिँ बस्नुपर्छ नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले हाँस्दै भने, &#039;खाना हजुरले पकाएको मालिकसापले थ्वाहा पाउनुभयोभने एउटानएउटा खोट लगाउनुहुन्छ । खाना म नै पकाउँछ । हजुर थपक्कबस्नोस्‌ । मलाई त दुखाइको पत्तै छैन ।&#039; हामीले त्यो रात हाँसीखुसी सुख,दुःखका कुरा गयौँ । भोलिपल्ट बिहान हतारहतार दुईवटा रगत लागेकोतकिया फोहोर लिन आउनेलाई बोरामा हालेर दिएको देखेँ । म आँच्तिदै कोठामापुग । मेरी मालिक्नी सदाका लागि मलाई छोडेर निदाइसक्नुभएको रहेछ । मकेही बोक्न नसकी भुइँमा थ्याच्च बसेँ । त्यो पापीले कुटिल हाँसो हांस्दै भन्यो,“मोना हामीबीचको काँडा हट्यो । तँलाई थाहा छैन होला यो असत्तीनीलेतँलाई यहाँबाट पठाउने कुरा गर्दै थिई त्यसैले यसलाई सखाप पारेँ । अव यहाँतेरो र मेरी राज्य हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
मैले जुरुक उठेर त्यसको कठालौमा समातेर थुक्दै भनेँ, &#039;युक्क पापी ! मयहाँ छु त केबल मालिक्नीले गर्दा छु । नत्र म उहिल्यै यो घरबाट निस्किसक्थैँ ।तैँले सोचिस्‌ होला मालिक्नीलाई हामीबीचको सम्बन्ध थाहा छैन । मालिक्तीलाईत प्रत्येक काम गर्नेहरूसँगको तेरो सम्बन्ध थाहा थियो । तँलाई हिँड्नका लागिसिङ्गै मूलबाटो छौड्ेर आंफू तरबारको धारमा हिँड्नुहुन्थ्यो । मेरी मालिक्नीकोहत्या गर्ने त्यो पाषी हातले मलाई छोइस्‌ माव भने पनि म आफनो हत्या आफैँगछ |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले चिच्याउँदै भन्यो, &#039;चुप लाग्‌ मोना, मैले तँलाई लैजा भनेको मेरैकानले सुनेको छु बुझिस्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले काप्दै भनेँ, &#039;मबाट घेरै पैसा असुल्ने सुर गरेपछि रिसले सक्छेस्‌ भनेमोनालाई लैजा भन्नुभएको हो अधर्मी । तैँले सोचिस्‌ होला आजसम्म तैँलेदिएकै पैसामा बसेकी छु । मेरी साहुनीले पैसा थपीथपी मेरी आमाको मुखमाफयाँकेर तेरो लागि मलाई यहाँ राख्दै आउनुभएको थियो । मालिक्नीको सोफझोपनकोफाइदा उठाएर पैसा बढाउन खोजेपछि मलाई लैजा मात्र के भन्नुभएको थियोतेरो कालो मतमा नाता शङ्का उठ्यो होइन : अनि निष्पाप मन भएकीसाहुनीलाई सिध्याइस्‌ । म तँलाई नङ्याएरै छोड्छु पापी नङ्स्याएरै ।&#039; तरदिदी, मैरो कुरा स्वयम्‌ मालिक्नीका छोराछोरीले वास्ता गरेनन्‌, उल्टै भने,&#039;छोटोलाई टाउकोमा चढाएपछि के-के भन्छन्‌ भन्छन्‌ । तँ हाम्रो खानदानी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिवारमा तमासा खडा नगर । उनीहरूले मेरा मुख नै वन्द गरे । मेरीमालिक्नीले छोराछोरी र आफन्तका लागि गरेको त्यागको परिणाम आफनैआँखाले देखेँ । अमेरिकाबाट आएको छोरा जेनतेन किरिया बसे । छोरीहरूलेचाहिँ तीन दिनमै नुन खाए । मैले तेह्र दिन त्यहीँ वसेर नुन वारी आजैत्यहाँबाट निस्केर यहाँ आएँ । मालिक्नीका छोराबुहारी, छोरी सबै अव बाबुकोस्याहार गर्ने जिम्मा मोनाको हो भन्थे । मालिकले मालिक्नीको गुणहरू सम्झेरैहोला तेह्र दिनसम्म मलाई छुने आँट गरेन । म त्यसैले पनि तेह्र दिन त्यहाँअडैँ । आज म भोकै छु शालु दिदी भोकै...&#039; मोना रोइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाको कुराले शालुको आँखाहरू पति रसाए । दुबै भान्सामा गए । शालुलेआफूलाई बेलुकाका लागि राखेको दाल, भात, तरकारी, अचार सवै तताएरदिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाले खपाखप भात खाएर भनिन्‌, &#039;मैले बुझ यहाँ कोही काम गर्नेरहेनछन्‌ । त्यसैले तपाईंले आफना लागि बिहान नै बेलुकाका लागि भातपकाउन्ुहुँदोरहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;तिमीले ठीक नै सोच्यौ मोना, तिम्रो पेट त भरियो खानाले ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;आरियो दिदी म टन्नै भएँ । अव म कहाँ बस्ने दिदी : आमासँग त मर्नैपरेपनि जान्न&#039; भन्दै रुत थालिन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालुले कंहीबेर सोचेर भनिन्‌, &#039;मोना तिमीजस्ती बहादुर युवती पनि रुन्छन्‌ ?जीवन क्रममा सबैले क्नै न कुनै पीडाको सामना त गरेकै हँदारहेछन्‌ ।तिमीले र कान्छीदिदीले सानै उमेरमा कल्पनै गर्न नसक्ने पीडाको सामतागस्यौ । अहिले कान्छीदिदीको जिन्दगीमा केवल बहारैबहार छ । तिम्रो जीवनपनि हामी नरक हुन दिँदैनौं । चन्द्रकान्त दाइको भाइको व्यवहार ठीक चन्द्रकान्तदाइको जस्तै छ तर दाहिने गालाको पाटामा पूरै कालो धब्बा भएकोले उहाँतीस-बत्तीस वर्षको उमेरसम्म पनि अविवाहित हुनुहुन्छ । भाडाको टयाक्सीचलाउनुहुन्छ । डेराचाहिँ दिदीको घरभन्दा केही पर छ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाले रुँदै भनिन्‌, &#039;मलाई माया मात्र भए पुग्छ । म रूप नै चाट्ने खालकीछैन दिदी ! मेरो पनि सबै यथार्थ बताइदिनुहोला ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ मोना, हामी सबै कुरा राख्छौं । आजलाई यहीँ बस म पनि एक्लै छु।भौलि बिहानसम्म सबै कुराको टुङ्गो लाग्छ । चन्द्रकान्त दाइको भाइकोनामचाहिँ रोमाकान्त हो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोना चुप लागिन्‌ । शालुले कान्छीदिदीलाई फोन गरेर सबै कुरा बताइन्‌ ।कान्छीदिदीले सल्लाह गरेर फोन गर्ने कुरा सुनाइन्‌ । शालु र मोना नै मोनाकोमालिक्नी गोमाको सम्झनामा हराइरहे । शालुलै केहीबेरपछि, मोनातिर हेर्दैभनिन्‌, &#039;तिम्री मालिक्नीको फौटौ छ मोना ? म ती देवीलाई हेर्न चाहन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौनाले ब्याग खोलेर फोटो देखाउँदै भनिन्‌, &#039;यही हो मालिक्नी । जूनहाँसेजस्तै हुनुहुन्थ्यो । मोनाका आँखा पुनः भरिएर आए । शालुको आँखा पनिनरसाई छोडेन । दुवैले फोटो हेरेर धेरैबेर मौत रहे । मोनाले शालुको ममीपापाकहाँ जानुभएको भत्ती मौनतालाई तोडिन्‌ । शालुले काठमाडौँभत्रकै होटेललजमा बस्नै होला, पूरा थाहा छैन भनेर वास्तविकता ओकलिन्‌ । साँझझमक्कै पन्यौ, आकाशमा पूर्ण चन्द्र र ताराहरू पनि उदाए । मोना र शालुआ-आफ्नै सोचमा दुवैका थिए । शालुको आँखामा गोमाको तस्बिर नाचिरहेकोथियो । गोमाजस्ता नारीलाई कायर भन्ने कि आदर्श भन्ने शालु त्यही सोचमाडुबेकी थिइन्‌ । फोनमा आएको घन्टीले शालुको एकाग्रपन टुट्यो, फोन उठाउँदैभनिन्‌, &#039;अँ, भन्नोस्‌, ए सबैजना राजी भए । भोलि विहान सात बजे पशुपतिमाविवाह गर्ने सल्लाह भयो । हन्छ हामी सात बजे नै आउँछौँ भन्दै फोन राखिन्‌ ।मोनालाई पनि सबै भोलि सात बजे पशुपतिमा विवाह गर्न आउने कुरा सुनाइन्‌ ।मोना लाजले शर्माइन्‌ । शालुले लामो श्वास फेदै भनिन्‌, &#039;मोना समय अझै पनिछ, केही भन्छयौ भने भत । हन त तिमीले रोमाकान्तभन्दा धेरै सुन्दर र भर्खरकोयुबक पनि पाउन सक्छ्यौ, यो साँचो हो । हामीले चाहिँ तिमीलाई जीवनकोअन्तिम क्षणसम्म साथ दिने, तिमीलाई माया ढिने, गुणी युवक खोजेका हौँ ।रोमाकान्त दाइ भट्ट हेर्दा पटक्कै राम्रोचाहिँ हुनुहुन्न मोना ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तपाईं त त्यसै मन पकाउनुहुन्छ । रूप र सम्पत्तिलाई ठूलो ठान्ने मए आजम यहाँ किन आउँथै ? माया भएपछि जस्तोसुकै कुरूप मान्छे पनि आफसेआफसुन्दर बन्दै जाने रहेछ । मालिक्नीसापकैँ करा गर्दा पनि त सबैले उहाँलाई दाँतउछिट्टेकी थसुल्ली भन्थे । तर मलाई उहाँजति राम्री कोही नै लाग्दैनथ्यो ।उहाँको प्रत्येक क्रियाकलाप मनपर्थ्यौ मलाई । उहाँको आँखा राम्रो, मुख राम,हिँडाइ राम्रो, बसाइ राम्रो, सबैका सबै राम्रो लाग्थ्यो ।&#039; मोनाको कुरा गर्दागर्दैमुटु भक्कानिएर आयो, उनी चुप भइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले एकोहोरो मोनालाई हेरिन्‌ । गोमालाई सम्झिँदा शालुको मन पनिभरिएर आयो । आफनै पहिचान बिर्सेर अरूकै अस्तित्व बचाउन हरपल जलिरहेकीगोमाजस्ता नारीलाई पनि अकालमै चिरनिद्वामा पुग्नुपत्यो । हामीले त एउटागोमाको पीडा देख्यौ, एउटै गोमाको हत्या सुन्यौं । यौ समाजमा कति गोमाजस्ताविवश नारीहरू होलान्‌ । कसले तिनीहरूलाई आफनो अस्तित्वबोध गराउने ?गोमाजस्ता पढेलेखेको सभ्य समाजकी नारीले त त्यो दुर्गति भोग्नुपर्छ भनेअरूको के हालत होला :&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दिदी, मैले तपाईंलाई दुःख पुच्याएँ हगि ? तपाईँले त केही खानुभएकै छैन,भौक पनि लाग्यो होला, म केही बनाइदिन्छु । मालिक्नी वितेको तीन दिनसम्मत मैलै रात कसरी बित्यो, दिन कसरी बित्यो पत्तै पाइनँ । मान्छेलाई जति नैचोट परे पनि सम्हालिनुपर्ने रहेछ । मो तपाईं पनि पीर नगर्नोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले मोनातिर फर्कदै भनिन्‌, “मैले तिमी आउनुअगाडि टन्न नास्तागरेकी थिएं, त्यसैले भोक पटक्कै छैन, तिमी केही खान्छयौ भने बनाक नत्रपर्दैन । हिंसक बाघहरूलै जस्तै गरी मान्छेले मान्छेको आलो रगत पिएको देख्दामन त दुख्ने रहेछ । तर, जीवन जिउनका लागि सवै भुल्नु पनि पर्दोरहेछ ।तिमीले टेक्ने घरातलमा चाहिँ अब रगतका छिर्कासम्म हुँदैनन्‌, गरिवसँग केहीसम्झौता गर्न भनेचाहिँ पर्ला !&#039;&lt;br /&gt;
&#039;दिदी पनि, मेरो कति चिन्ता गर्नुहुन्छ ! मेरो हातगोडा सद्दै छन्‌ । यो केकामका लागि ! मैरो पटक्कै पीर नगर्नोस्‌ । ल अव सुतौँ । बिहान चाँडै उठेरनुहाइघुवाई पनि गर्नु छ ।&#039; दुबै सुते तर दुवैको आँखामा धेरै रात जाँदासम्मनिद्रादेवीले बास गरिनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोलिपल्ट शालु मोना पशुपतिमा पुगेको केहीबेरपछि नै केशब, पीताम्बरा,कान्छी, चन्द्रकान्त, रोमाकान्तलगायत अरू दस-बाह्रजना आए । कान्छीदिदीलेबुलहीमा लाउने कपडा पहिन्याएर गहना लगाउँदा त मोनाको रूप घप्पबल्लाजस्तै भयो । सबैले मोनाको रूपको तारिफ गरे । दुलहीको पहिरनमासबैसामु आएपछि रोमाकान्तलगायत सबैले मोनालाई हेरेको हँरै भए । रोमाकान्तलेकुनै क्षण कल्पनासम्म गरेका थिएनन्‌ । त्यो बलात्कृत मोना हीराको टुक्राजस्तैछिन्‌ । सबैसबैले घुणा गरेर फयाँकेको मसँग उनले कसरी सारा जिन्दगीबिताउलिन्‌ ? रोमाकान्त त्यस्तै सोचे । बाजेले अब पशुपतिको मन्दिरअगाडिजाँ दुवैले लाउने माला, औँठी, सिकी सबै ठिक्क पारी हिँड्नु भनेपछि सवैपशुपतिको मन्दिरअगाडि पुगे । बाजेले मन्तर पढेर रोमाकान्तले मोनालाईमाला पहिराउनु भनेर माला के पहिराउन लागेका थिए एउटा समाजसेवीभनाउँदी माथिमाथि साडी उचालेर आई । रोमाकान्तको हात उछिट्याउँदैचिच्याई, &#039;ए सबैजनाले यहाँ पैसाको लोभमा एउटी सुक्‌मारीकोबिबाह एउटा कुरूप अध गर्दैछन्‌ । यौ विवाह हामीले रोक्नुपर्छ ।महिलामाथिको अत्याचार हामीले सहनुहन्न ।&#039; सवै मान्छेहरू हवारहवार्ती जम्माहुँदै भने, &#039;यो विवाह गराउनेलाई कारबाही गर्नैपर्छ ।&#039; बरु हामी गछौँ त्योयुवतीसँग बिबाह भन्नेहरू पनि निस्के । रोमाकान्तलगायत सबैजना रातो-पीरो भएर हेरेको हेरै भए । समाजसेवीले मोनालाई अङ्गालो मार्दै भनिन्‌,“नानी ! तिमी यी पापीहरूको बहकाउमा नआक, तिमीले जोडा मित्नै केटापाउँछ्यौ, तिमीलाई ललाइफकाई गर्नेलाई जैलमा जाक्नुपर्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाले समाजसैवीको हात जोडले &#039;झट्कालेर रिसले आगो हुँदै चिच्याइन्‌,(तपाईँ के बोल्दै हुनुहुन्छ : बुझो न सुझो त्यसै मुखमा जे आयो त्यही बोल्नपाइन्छ ? यो मेरो प्रेमविवाह हो । तपाईंले उहाँको बाहिरी आकृति देख्नुभयो ।मैले उहाँको भित्री रूप देखेकी छु । आइन्दा उहाँको बारेमा एक शब्द बोल्नुभयोभने तपाईं नै जेल जानुहुन्छ । म तपाडँहरूजस्तालाई समाजको कलड्क भन्छु,बुझनुभो, कलङ्क... ।&#039;दद ।&lt;br /&gt;
मोनाको शब्द सुनेपछि, वरिपरि &#039;झफुम्मिएकाहरूले समाजसेवी भनाउँदीलाईगाली गर्दै भने, &#039;ए दिदी, बुझ्दैनवुझी अर्कामाथि त्यसै हात हाल्ने हो?तँजस्ती ककर्नीको पछि लाग्दा हाम्रो पनि बेइज्जत भयो । तेरो मुखसुखफुटाइदिङँ ?&#039; भन्दै समाजसेवीलाई हप्की र दप्की गरे ।&lt;br /&gt;
सबैको कुरा सुनेर कत्तिन आफूलाई समाजसेबी ठान्ने आइमाई लज्जितभई, केही बोल्न नसकी कुलेलम ठोकी । अनि आफनो रूपवान्‌ लोग्नेलेनजिकैको बहिनी पर्नेलाई भगाएर लगेको तेह्र वर्ष वितेको कुरा सम्झेर तुरुक्कआँसु खसाती । ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यता आिगाकी दारा सुको करा सुनेर पुरेतबाजे, रोमाकान्तदेखि लिएर सबैको मन हर्षितभयो । बाजेले स्यावास दिँदै विवाहको सानोतिनो रीति पुच्याए ।विवाह सकिएपछि सबैजना केशवकै घरमा जम्मा भए । कैशवको घरमा करिबसयजना जतिको लागि भोज तयार थियो । भोजमा केशवको धेरै नजिककालाई,कान्छीका धेरै नजिकलाई मात्र बोलाइएको थियो । मोना र रोमाकान्तले नैआफूलाई संसारका सबैभन्दा भाग्यमाती नारीपुरुष सम्झैका थिए । सबैलेमोनालाई उपहार दिनुको साथै सुखी वैवाहिक जीवनको कामना पनि गरे ।चार बजेतिर सम्पूर्ण आफन्तहरू भोज खाएर गइसकेपछि शालुलगापतकान्छीदिदीले मोना र रोमाकान्तलाई राम्रोसँग जीवन काटन्‌ भनी डेरामाछोडेर आफनो घर आए ।&lt;br /&gt;
मङ्सिरको छोटो दिन, छ बजे नै झमक्क साँझ पस्यो । रोमाकान्तले दूधतताएर ल्याई मोनालाई दिँदै भने, &#039;मोना दूध पेक, अघि तिमीले धेरै खानेकुराखाएकी छैनौ, भोक पनि लाग्यो होला, अरू केही खानेकुरा वनाड कि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाले मधुर स्वरमा भनिन्‌, &#039;भौक लागेको छैन । खासै दूध पनि खाने मनथिएन, तपाईंले भनेपछि, यतिचाहिँ खान्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
रोमाकान्तले मोनानजिक बस्दै भने, &#039;मोना तिमी त फूलजस्तै रहिछौँ ।पशुपतिमा त्यो आइमाईले अनुमान गरेको कुरा पनि ठीकै हो । मजस्तोसँगसिङ्गै जीवन काट्न सक्छयौ त !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाले जवाफ फर्काइन्‌, &#039;मेरो उमेर मात्र सानो हो । मैले सुखदुःखका सबैपाटाहरू राम्रोसँग बुझेकी छु । शालु दिदी र कान्छीदिदीले मेरो मायाले गर्दा नैतपाईंलाई नै रोज्नुभएको हो । मैले तपाईंलाई पाउनु मेरो पनि ठूलो सौभाग्यहो।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोमाकान्तले मोनालाई हेर्दै भने, &#039;मोना तिमीले मेरो मन नै हलुको पान्यौ ।म सधैँ भगवानलाई किन यस्तो रूप दिड्स्‌ भन्दै गाली गर्थे । आज मैले बुझेँ,तिमीसँग भेट गराउनकँ लागि यस्तो रूप दिएका रहेछन्‌ । धन्य छ भगवानलाई ।मोना म तिम्रो बिशाल हृदयमा कहिल्यै चोट पुन्याउने छैन ।&#039; मोना चुपचाप&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लागिन्‌ । रात ढस्किसकेकोले दुवै ओछ्यानमा गई भविष्यको मीठामीठा कुरागरे । रोमाकान्तले मौनालाई मामाले सुम्सुम्याए, मायाका चुम्वनहरू वर्षाए ।मोना र रोमाकान्त नै एक-अर्कालाई भुलेर एक-अर्काको अङ्गालोमा हराइरहे,बस्‌ हराइरहे... ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उन्नाईस==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;आज यति रमाइलो क्षणमा पनि तिमीलाई कोठै प्यारो भयो होइन ! केसोचेर बसेकी : दिदी हिँड न बाहिर ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले सुजनको हात मुसादै भनिन्‌, &#039;सुजन यतिखेर भने म तिम्रै भविष्यकोबारेमा सोचिरहेछु । म पनि चाँडै होस्टेल जाँदैछु । तिमी घर आयौँ । तिमीमासाँचो र झुटो बुझने बेला पनि छैन । दिदी भन्नुहुन्थ्यो- फिरोजलाई गुहेखाल्डोमा धकेल्ने फिरोजकै बाबुआमा हुन्‌ रै । आजकाल फिरोजका बाबुआमाछोरो बिग्रिएको पश्चात्तापले जल्दैछन्‌ रे ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“शालु के भन्न खोजेकी तिमीले ? बल्ल कँदमुक्त भएर आएको छु। मैलेअहिले नैं जीवनको वारेमा सोच्न थालेँ भने म कहिले हाँसौँ तिमी नै भन त ?तिमी घरमै वस्यौ, ममी, पापा र कान्छीदिदीको मायामा चुर्लुम्म डब्यौ । मैलेत खुसी के हो बुझनै पाइनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु भाइलाई जीवन के हौ भनेर सम्झाउन मात्र के लागेकी थिइन्‌उर्मिलाले ढोका खोल्दै चिच्याइन्‌, &#039;शालु यो रमझममा पनि भाइलाई कोठाभित्रराखेर के कुराले कान भर्दैछयौ हँ ? तिमी त हामीसँग भएर पनि कहिल्यै हामीहुन सकिनी । सुजनको हामीप्रतिको मायाचाहिँ नखोस ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डीपकले उर्मिलाको कुरामा सही थप्दै ढोकाबाटै भने, &#039;शालु, उर्मी जेभन्दैछिन्‌ ढीक भन्दैछिन्‌ । अरूका छोराछोरी वाबुआमासँग टाँस्सिएर हिँडेकोदेख्दा पनि हामीलाई त्यसै गर्न रहर लाग्थ्यो । तिमीले हाम्रो त्यो रहर कहिल्यैपूरा गरिनौ । सुतालाई तिमीले हामीबाट टाढा राख्न नखोज । तिमीलाईडाक्टर पढाउन पैसा लगानी गरेजस्तै हामी सृजनलाई पनि पैसा लगानी गरेरठूलै मान्छे बनाउँछौँ । तिमीले चिन्तै नगर ।&#039;&lt;br /&gt;
बाबुआमाको कुराले शालुलाई कताकता नरमाइलो त लाग्यो नै शालु केहीबोल्न नसकी चुप भइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले सुजनलाई हातमा समातेर तान्दै भनिन्‌, &#039;सुजन वावु, जारुतिम्रा साथीहरू आइसके होला ।&#039; सुजनले केही कुरा बुझे केही कुरा बुझेनन्‌पनि । सोझ्ौँ जन्मदिन मनाउँदै गरेको सुजन हाँस्दै पार्टीको रमफझममा मिसिए ।शालु भने सुजतको चिन्ताले यताउता छटपटाइरहिन्‌ । मनमनै सोचिन्‌, “कहिले मेरो ममीपापाको बृद्धिका घैँटामा घाम लाग्नै होला ? मैले सुजनलाई सहीबाटो देखाइन भने उनी भत्किन्छन्‌ । म नेपाल मेडिकल कलेज जान अझएक-डेढ महिना छ, त्यो बेलासम्म केही उपाय गरौँला ।&#039; शालु के-के सोच्दैथिइन्‌ ढोकाबाहिरबाट आएको आवाजले ध्यान त्यतै गयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काकाकी छोरी प्रकृत्तिले भनिन, &#039;शालु दिदी, ढोका खोलिस्थो त म हजुरलाईके दिन्छु।&#039;शालुले ढोका खौल्दै भनिन्‌, &#039;के दिने नानु !&#039;&lt;br /&gt;
प्रकृतिले वालउपन्यास नीलकमल शालुतिर बढाउँदै भनिन्‌, &#039;हजुरलाईकथा, उपन्यास धेरै मनपर्छ भनेर यो उपन्यास हजुरलाई ल्याइदिएकी छु। योहेरिस्यो भने हजुर त रोइसिन्छ बाचै ! मेरा धैरै साथीहरू रोए रे म पनि रोएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले प्रकृतिको गालामा निमोट्दै भनिन्‌, &#039;धन्यवाद ! मेरी गुडियालाई मपनि बोर भएर बसेकी थिएँ, साइतमै किताब ल्याइदिडछौ हुन्छ म किताबपढ्छु, तिमी जाक ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१२-१३ वर्षकी प्रकृति हाँस्दै गइन्‌ । शालु किताबमा के रहेछ भनेर हेर्नथालिन्‌ । शालुलाई नीलकमल पढेपछि समय गएको त पत्तै भएन । पुनःसुजनले ढोका खोलेपछि पो झसङ्ग भइन्‌, सुजनले शालुतिर हेदैं बडो नम्रस्वरमा भने, &#039;दिदी बिन्ती, आज मेरो चुकाका लागि डान्स गरिदेक, म तिमीलेजे भने पनि मान्छु ।&#039; त्यो फिरोजले मैले डान्स गरेको देखेर मरिमरी हाँस्दैभन्यो, हेर यो फुच्चे, भ्यागुतो उफ्रेझैँ उफ्रेको, यस्तालाई पनि डान्स गर्ने सोखहा..हा... । कसँगै बसेका चार-पाँच युवतीले पनि मेरो खिल्ली उडाउँदै हांसे ।&#039;शालुले उत्तर दिन नपाउँदै सुजनले शालुलाई तान्दै भने, &#039;तिमीले आज डान्सगरिनौ भनै म तिमीसँग. कहिल्तै पनि बोल्दिनँ ।&#039; शालुलाई भाइसँग पार्टीमाजान कर नै लाग्यो । सुजनले क्यासेटको चक्का फेर्दै भने, &#039;अब मेरी दिदीलेडान्स गर्छिन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
सुजनको क्रा सुनेर-सबैले बप्पडी पिट्दै हाँसे । फिरोजले जबर्जस्ती हाँसोरोकेर भन्यो, &#039;भ्यागुता-भ्यागुती एकैचोटि उफ्रिने कि छुट्टाछुट्टै उफ्रिने हँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युवतीहरूले कुरा थपे, “गेटअप त हेरन, पहाडबाट बल्ल ओलेंकी जस्तीछ । यो सुजनले बनाएकोचाहिँ दिदी होला ।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले युवतीहरूको गालामा म्वाइँ खाँदै भन्यो, &#039;ओ परीहरू, वतचरीलाईउडाएर वनैमा पुन्याइदेऔ । कस्ताकस्ता कहाँ गए मुसाको छाउरा दरबार,यस्तीले डान्स गर्ने रे, डान्स कुन चराको नाम हो थाहा छ ? झयाउँकिरीलाई ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;्हा...हा... झयाउँकिरी&#039; भन्दै युवतीहरू खित्का छाडेर हाँस्दा पनि शालुचुप नै लागेको देखेर सुजनलाई साह्रो रिस उड्यो । सुजनले शालुलाई मनपर्नेगीतको क्यासेट बजाएपछि शालु डान्स गर्न थालिन्‌ । शालुले डान्स गरेको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देखेपछि बरिपरि तितरबितर भएका मान्छेहरू एकत्रित भए । पार्टीको माहोल नैअर्कै भयौ । फिरोज र उसका आसेपासेहरू हेरेको हेरै भए । शालुले डान्सगरिसकेपछि सबै वान्समोर &#039;वान्समोर&#039; भन्दै चिच्याउन थाले । शालुले गीतगाउँछु भनेर आनन्द कार्कीले गाएको &#039;यो कस्तो नियति, यो कस्तो जलन&#039;बोलको गीत गाउन थालेपछि सबैले विनको धुनमा सर्प लट्टिएकैँ लट्टिएर गीतसुने । गीत सिद्धिसकेपछि सबैले शालुको डान्स र स्वरकै तारिफ गरे । सुजनहर्षले फुरुङ्ग भएर आफनो साथीहरूलाई शालुसँग परिचय गराए । फिरोजलेयुवतीको अङ्गालो छोडेर शालुसाम्‌ आई &#039;शालुजी, मलाई माफ गर्नोस्‌, मैलेजै भने केही तशोची भनेँ, आउनौस्‌ तपाईँ र म डान्स गरौं&#039; भन्दै फिरोजलेहात शालुतिर बढायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले पर हट्दै उत्तर दिइन्‌, हेर्नोस्‌, आज मैले मेरो भाइको खुसीका लागिमात्र डान्स गरैकी हुँ । म पेसेवर डान्सर होइन ।&#039; यति भन्दै शालु पार्टीकोमाहोलबाट बाहिरिइन्‌ । सुजनले मनमनै भने, “साले फिरोज, तेरो घमण्ड बल्लचकनाचुर भयो । हामीलाई भ्यागुता-भ्यागुती भन्थिस्‌ अव के भन्दोरहेछस्‌ भन्‌मोरा !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोज नजिकै रहेको बेन्चमा बस्यो र सोच्यो, &#039;आजसम्म मैले मेरो एकइसारामा नै मप्रति भुतुक्क हुनै युवतीहरू भेटेको थिएँ । कति त मसँग बोल्नपाउनु पनि आफनो सौभाग्य सम्झिन्ये । यसले मेरो रूप देखिन होला, त्यसैलेमसँग डान्स गर्न इन्कार गरी । केक काट्ने बेलामा त अबश्य आउँछै नै होला,म जसरी भए पनि त्यसलाई मेरो रूप हेर्न बाध्य गराउँछ । मेरो रूप देखेपछि,चित खान्छे । मान्छे जे-जस्तो हौस्‌, त्यसको स्वरलाई र त्यसको डान्सलाईचाहिँ मान्नैपर्छ बा ! मलाई एक नजर देखेपछि मैन पस्लेझैँ परिलिन्छे त्यो । अनिमैले त्यसलाई के गर्नुपर्छ जानेको छु । यति धेरै तड्पाउँछु कि तड्पीतड्पी मर्छै,त्यो । मचाहिँ नयाँनयाँ फूलहरूमा रमाइरहन्छु ॥:004 एक-दुई वचन बोलेर प्रेमकोनाटकचाहिँ गर्नैपर्छ ।&#039; यस्तै कुराहरू मनमा थियो । युवतीहरूलेयथार्थ बोध गराए- &#039;फिरोज हेर कति गीतहरू खेर गइसक्यो उठ डान्स गरौँ ।नपत्याउने खोलाले वगाउँछ भन्थे ठीक रहेछ । भ्यागुतीले डान्स त कमालकैगरी, फेरि गीत पनि राम्रै गाई ।&#039; फिरोजले उठेर बुगतीहरुलाई अङ्गालोमाबेबै भन्यो, &#039;अब केही दिनका लागि त्यो पनि यसरी र अङ्गालोमा बेरिन्छै । मउसलाई तिमीहरूको जस्तै पहिरन लगाउन बाध्य गराउँछु । तिमीहरूकोजस्तो पहिरन र तिमीहरूको जस्तो शृङ्गगारमा सुहाउँदै देखिएली, होइन त ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;नाइँ फिरोज, नाइँ हामी तिमीलाई केही दिनका लागि पनि छोड्न सक्दैनौं,पाँचैजना युवतीले एकै स्वरमा भने ।&lt;br /&gt;
फिरोजले भेटघाटको समय फरक पार्ने तर तिमीहरूलाई नछौड्ने भनीवचन दियो । त्यसपछि युवतीहरू ढुक्क भए । पुनः केहीबेर डान्स चल्यो । केक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काट्ने बेलामा सबै एकब्रित भए । शालु केकमा गाड्ने मैनबत्ती र चक्क्‌ लिएरहल्का गुलाफी कुर्ता-सलवारमा आइन्‌ । फिरोजले मनमनै सङ्कल्प गर्दै भन्यो,&#039;तेरो यौ कूर्ता-सलवार चार दिनमा उतार्छँ म ।&#039; केक काटने काम पनि सुरुभयो । दीपक र उमिंलाले सुजनको हात समाते, सुजनले केक काटै । बाबुआमालेसुजनलाई केक खुबाएपछि सबैले ताली बजाए । सुजनले बाबुआमा र दिदीलाईकेक खुवाएपछि, कमशः सबैलाई केक बाँड्न सुरु गरै । शालुले कैक काटनमासहयोग गरिन्‌ । फिरोज भने कसरी शालुलाई आफनो रूप देखाउने भन्नैघुनमा थियो । फिरोजले गिफट दिँदा शालुको प्रशंसा गर्दै भन्यो, &#039;मलाईतपाईंको डान्स र गीत नै साह्रै मत्त प्यो ।&#039; शालुले मुसुक्क हाँस्दै जबाफदिइन्‌, &#039;धन्यवाद !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले शिर झुकाएरै भन्यो, &#039;मलाई माफ त दिनुहुन्छ हैन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;तपाईंले जे देख्नुभयो त्यही मन्ुस्ी भयौ । मान्छैले आँखाले देखेको कुरा भन्नैन हो । माफ मान्नुपर्ने कुनै कारण नै छैन ।&#039; फिरोज कुरा बढाउन चाहन्थ्यो ।शालुले फिरोजको अनुहारतिर हेर्दै भनिन्‌, &#039;कृपया पछि कुरा गर्नुहोला, अहिलेलाईम काममा व्यस्त छु।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोज अँध्यारो मुख लगाएर त्यहाँबाट हट्यो । उसले चित खायो, आफनोसुन्दर अनुहार र सुन्दर जिउडाल देख्दा पनि शालुले कुनै प्रतिक्रिया नजनाएकोदेख्दा । सुजन भनै मनमनै फिरौजको आकृति देखेर रमाउँदै सोचिरहेका थिए,“सँ म जस्तो कोही छैन भनेर घमण्ड गर्थिस्‌ । देखिस्‌ तँ जस्तालाई मेरीदिदीले कसरी आफूबाट टाढा भगाइन्‌ । अब त तेरो सेखी फप्यो होला नि !तैँले मेरी दिदीलाई अरू जस्तै तेरो रूप देख्नेबित्तिकै लट्टिने भन्ठानेको थिइस्‌होला, देखिस्‌ हैन ? मेरी दिदीको व्यवहार मुल्ला फिरोजे ।&lt;br /&gt;
&#039;किन फिरोज तिमी त चूक घोप्टाएजस्तै अनुहार लिएर आयौ । भ्यागुतीलेपत्याइन कि कसो ?&#039; युवतीहरूले फिरोजको बरिपरि झुम्मिँदै भने ।&lt;br /&gt;
फिरोजले रिसाएको स्वरमा भन्यौ, &#039;चुप लाग, कति दिन यो फिरोजेकोअगाडि चुरीफुरी देखाउँदिरहिछे हेरौँला नि । आमाबाबुको ताल त्यही हो । नशालागेपछि पेटिकोट खुस्केको पनि पत्ता हुँदैन, छोरी भने मै हँ भन्छे । म त्यसलाईकाँच्चै चपाउन पाए पनि चपाइदिन्थेँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;जाकैँ आज तपाईंलाई धेरै पीर परेको छ। अफिमको नशामा रमाङैँ ।अफिम त छ होइन ? तपाईँको घरको खाली कोठामा मान्छे आए कि आएनन्‌नत्र अस्तिझैँ त्यहीँ बसौंला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले दाह्रा किटदै भन्यो, &#039;प्लिज मलाई एकछिन एकान्तमा छौडिदैक ।म त्यसलाई पासोमा पारेर बजार्ने उपाय सोच्छु । बजार्न पनि यसरी बजार्छु किठहरै पार्छु राँडलाई । हेरन हाँसेको कट हाँसेजस्तो, मुख हेरन राँडको हकिचिलको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जस्तो, अझ मै हुँ भन्छे । हेरन भनेकी पेसेवर डान्सर होइन । मैले त्यसलाईपेसेवर डान्सर बनाइन भने त मेरो नाम पनि फिरोज होइन ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;फिरोज तिमी पनि के एउटै धुनमा लागेको हँ ? आफूलाई सम्हाल ।तिमीले जति पिए पनि तिम्रो नशा बन्न हामी तयार छौँ । भूल त्यसलाई, किडान्स गरौं कि गएर अफिममा &#039;फुलौं । कि रक्सीमै झुलौं, रक्सी पनि आउँदैछ,&#039; युवतीहरूले फिरोजलाई सम्झाए । फिरोज भने शालुलाई हेर्दै दाह्रा किटिरहेकैथियौ । सबैलाई केक बाँडेपछि शालु केही खानेकुरा र एक ग्लास फेन्टा लिएरघरभित्र पसिन्‌ । फिरौजले शालुको सबै क्रियाकलाप नियालिरहेको थियो । करक्सी पिउँदै शालु वाहिर आउने प्रतीक्षामा थियो । तर, शालु सबैले डिनरखाइवरी गाइसम्दा पनि निस्किनन्‌ । उता शालु भने फेन्टा, आलुचिप्स आदिखाई पढ्न बाँकी रहेको बालउपन्यास नीलकमल पढ्दापढ्दै निदाइन्‌ । प्राय:सबै पाहना गइसकेपछि फिरोज नशामा लह्विँदै कार चलाएर घर पुग्यो । छोरासुधने आश नै मारिसकेका गंगा र रमणले छोरा आएको चाल पाए पनि चालनै नपाएफैँ गरी सुते । फिरोजले शालुको अपमान विर्सिन अफिम पियो, तरअहँ अफिमको नशामा पनि शालुलाई भुल्न सकेन । अझै अफिम पियो र मुडालडेकैँ लड्यो । भोलिपल्ट बिहान होसमा आएपछि पनि फिरोजले शालुलेआफनो वास्ता नगरेको सम्झयो । फिरोजलाई शालुको कुराले साट्दै चोटपर्नुको कारण थियौ, &#039;क जीवनमा पहिलोपल्ट नै कुनै साधारणरूपकी युवतीबाटअपमानित भएको थियो । ज्यादै सुन्दरी युवतीहरूलाई आफनौ इसारामा नचाएकोफिरोजलाई शालुको अपमात सहय भएन । गंगाले फिरोजतिर दूध बढाउँदैभनिन्‌, &amp;quot; तिमीले अब राति कहीँ जाँदा कार लिएरचाहिँ नजानू, वरुट्याक्सी चढे जानू । हिजो अगाडिको हेडलाइट फुटेछ । कार केही कुच्चिएकोपनि छ । तिम्रो प्रियसीहरूको ब्याग, पर्स, मोबाइल भने कारभित्र रहेछन्‌ ।तिमी होसमा नभए पनि तिम्रा मायालुहरू हिजो होसमा रहेछन्‌ र दुर्घटना हुनपाएन होला होइन !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आमाको बोलीले फिरोज झसङ्ग भएर सम्झयो- मैले त नशामा &#039;झुल्दैगरेका ती युवतीहरूलाई त्यहीँ छोडेर आएँछु । उफ ! मलाई के भएको होला,कसरी डेरामा पुगे होलान्‌ उनीहरू भनी तुरुन्तै फोन गरेर बुझ्यो । दीपककोड्राइभरले नै डेरामा पन्याइदिएको थाहा पायो । फिरोजको मस्तिष्कबाट शालुअफै नहटेकोले आमासँग शालुको बारेमा सोध्यो ।&lt;br /&gt;
गांगालै लामो श्वास फेर्दै भनिन्‌, &#039;ए उर्मिलाकी छौरी शालुको कुरा गरेकोतिमीले, कहाँ शालु कहाँ तिमीहरू, उनको कूरै नगर । तिमीले अरूहरू मुबतीहरूजस्तै सम्झेका होलाक शालुलाई, उनले बुझेकी छिन्‌ हीरालाई कीराले पनिबिगार्छ भन्ने कुरा । हामीले तिमीलाई जातीनजानी बिगान्यौँ । उर्मिला रदीपकको लहैलहैमा लागेकी भए शालुको पनि तिम्रै हाल हुन्थ्यो होला । उनकै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रमा बस्ने कान्छीले शालुलाई सही बाटो देखाइन्‌ । शालुले स्वयम्‌ वाबुआमालेदेखाएको बाटो छोडी कान्छीले देखाएकै बाटोमा हिँडिन्‌ । नेपाल मेडिकलकलैज जोरपाटीमा ड्वाक्टर पढ्न नाम निकालेकी छिन्‌ रे भन्ने सुनेकी थिएँ ।अव त पढ्न जाने बेला पनि हुन लाग्यो होला । भाइ बिग्रन्छ कि भन्ने अबएउटै चिन्ता छ भन्थिन्‌ रे । कृपा क्या कृपा छिमेकी नरेन्द्रबावुकी छोरी उनैकीसाथी हुन्‌ । कृपाले नै सबै भनेकी हुन्‌ मलाई । उनी सानो छँदा त सधैँबाबुआमासँग आउँथिन्‌ पार्टीहरूमा, ठूली भएपछि चट्ट बाबुआमाको साथ नैछोडिन्‌ । तिमीजस्तो अबुझलाई शालुको करा किन भन्नु ? म गएँ, भन्दै गंगाभान्सातिर प॒सिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;मेरो गोरुको वाह्रै टक्का&#039; भन्ने स्वभावको फिरोज आमाको कुरा सुनेरओइलाएको फूलझैँ भयो । सेट भन्दै मुडकीले भुइँमा हान्यो । जतिजति शालुकोसम्झनामा गहिरिँदै गयो, उत्तिउति शालुको हिजो बोलेका सबै शव्दहरू मीठोलाग्यो । शालुको आँखा-नाक-मुख-जीउडाल सबै सम्झयो । शालुको सबैचिज सुन्दर लाग्न थाल्यो फिरौजलाई । फिरोज जुरुक्क उठेर आमासामु पुग्दैशालुको करा कोट्याउन चाहयो । गंगाले फिरोजको कुराको आशय बुझेरभनिन्‌, &#039;फिरोज, तिमी ध्रर्तीमा बसेर चन्द्रमा छुने आँट नगर । शालुजस्तानारीहरू रूपलाई र घनलाई भन्दा चरित्रलाई हेर्छन्‌ । तिमी त शालुको आँखामापतिङ्गर नै हौँ । त्यो कुरा तिमीले हिजो नै विचार गन्यौ होला । शालुको सपनादेख्न छोड, हातमुख धोएर खाना खान आफ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजलाई आमाको कुरा बेठीक लागेन तर शालुलाई भुल्न पनि सकेन ।सोच्यो &#039;म शालुलाई पाउन जे पनि गर्न तयार छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बीस==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले महिनौं-महिनासम्म शालुको पिछा गर्दा पनि शालुले कुनै प्रतिक्रियादेखाइनन्‌ । घरपरिवारका मान्छेहरू र फिरोजका सुन्दरीहरू फिरोजमा एक्कासिआएको परिवर्तन देखेर आश्चर्यमा पर्नु स्वाभाविकै थियो । फिरोजका सुन्दरीहरूलेफिरोजलाई लाख सम्झाएर पहिलेकै बाटोमा आउन आग्रह गरे तर अहँफिरोजले सुन्दरीहरूको क्रा पटक्कै टेरेन । उल्टै सुन्दरीहरूलाई आफनोसामुनपर्नु भनी कडा चेतावनी दियौ । फिरोजका सुन्दरीहरू अर्कै बाटो मोड्नबाध्य भए । गंगा र रमण फिरोज एउटा खाल्डोबाट उत्रेर अर्को खाल्डोमापसेकोमा चिन्तित नै थिए । फिरोज शालुलाई नपाए आफू नबाँच्ने भनीअन्तिम 7000 थियौ । त्यसैले क एकदिन आँट गरेर शालुको सामुपुग्यो र हात भन्यो, &#039;शालु, मलाई एकपल्ट सुधिने मौका देक। मतिमीबिना बाँच्न सक्दिनँ । म तिमीले जै भन्छयौ त्यही मान्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले सम्झाइन्‌, &#039;हेनौंस्‌ फिरोजजी तपाईंजस्तो होनहार व्यक्ति बिग्रिएकोदेख्दा मलाई पन्ति पीर अवश्य लागेको थियो । तपाईं सृन्दर र सम्पन्न हुनुहुन्छ ।तपाइँले मजस्ता सयौँ युवती पाउनुहुन्छ । तपाईं कूनै आदर्श युवतीसँग विवाहगर्नोस्‌ । मलाईचाहिँ अहङ्कारी भन्नोस्‌ या जे भन्नोस्‌ । म प्रेम शब्दसंग नैघृणा गर्छु । तपाईँ लाख कोसिस गर्नोस्‌ एक हातले ताली चज्दैन । बिन्ती,आइन्दा प्रेम भन्नै शव्द मैरोसामु बिर्सेर पनि नओकल्नुहोला&#039; भन्दै रिसाउँदैशालु आफनो घरतिर आइन्‌ । फिरोज हेरेको हेरै भयो । आँखाबाट बलिन्द्रधाराआँस्‌ झार्दै घाइते सिंहझैं भई घर आयो । आफू बिग्रिनुको जिम्मेवार स्वयम्‌आफैँलाई नै ठहस्यायौ । बाँकी जिन्दगी कसरी काट्ने सोच्नै सकेन । फिरोजखानु न खुदनु इन्तु न चिन्तु प्यो । गंगा एकपल्ट शालुलाई सम्झाउने निर्णयलिँदै शालुको घरमा पुगिन्‌ । शालुले गंगालाई बैठकमा वस्न आग्रह गर्दै भनिन्‌,&amp;quot;हजुरले यसो फोन गरेर आइस्या भए हुन्थ्यो । ममीपापा होइसिन्त ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गंगाले भरिएको आँखालाई ओमभातौ पार्दै भनिन्‌, &#039;म तिमीलाई नै एउटाबिन्ती गरौं भनेर आएकी हँ । के गरौं म छोराको मायाले अलि स्वार्थी भएँ ।फिरौज नशा, सुन्दरी सवैलाई छोडेर तिम्रो मायामा तड्पिन थालेको छ, । थुप्रैदिन भयो उसले एक गेडा अन्त पनि निलेको छैन । नानी ! त्यो हाम्रो एकमात्रटेक्ने वैशाखी हामीलाई दान देक । नफुली नै ओइलिसकेको फिरोज पुनः फुल्नैरहर बटुल्दै छ । साँच्चै भन्दा यहाँ आउने आँट त थिएन । फिरोजको बाबुलेपनि एकपल्ट शालुसँग फिरीजको जीवन माग भनेर पठाउनुभयो, त्यसैलेआउन बाध्य भएँ&amp;quot; भन्दै गंगा रुन पौ थालिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु अलमल्ल परिन्‌ र मनमनै सोचिन्‌, &#039;त्यो डालीडाली चहार्ने भमरामलाई चार-पाँच वर्ष पर्खिन अवश्य सक्दै-सक्दैन । मेरो सानो झूटले गर्दायिनीहरू खुसी हुन्छन्‌ भने झुट बौल्नु कुनै अपराध हुँदैन भन्ने सम्झी भनित,&#039;आन्डी नरोइस्यो, यदि फिरोज मलाई साँच्चै माया गर्छन्‌ भने म डाक्टर पढेरआउँदा उनले पढ्दापढ्दै छाडेको इन्जिनियर पूरा गर्नुपर्छ भनिदिसैला । अर्कोकरा प्रेममा छोइछाई, ख्यालठट्टा, भेटघाट मलाई मन नपर्ने कुराहरू हुन्‌, त्योपनि भनिदिसेला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गंगाले खुसी हुँदै भनिन्‌, &#039;नानी ! म तिम्रो यो गुन कहिन्यै भुल्ने छैन ।मलाई जहाँसम्म लाग्छ फिरोजले तिम्रा सारा सर्त मान्नेछन्‌ । अन मेरो घरपनि स्वर्ग हुन्छ । नानी, सबैजना खुच्चिङ भन्दै थप्पडी मार्थे । अब मैले पनिशिर ठाडो गरेर हेर्न पाउने भएँ । सायद तिम्रो जन्म नभएको भए हामी जिउँदैगर्ने थियौं । म तिमीलाई सधैँ पूजा गर्छु शालु सघैँ पूजा... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हजुरले मलाई त्यति माथि नउटाइस्यो । फिरोज केही गरी राम्रो हुनुभयोभने मात्र मलाई धन्यवाद दिसेला । म पर्सि नै होस्टेल जाँदैछु, किताबहरू अफ्ैकिन्नु नै छ । हजुर आएर मात्र म रोक्किएकी हुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गंगाले चिया पिउँदै भनिन्‌, &#039;चिया ल्याइहाल्यौ, चिया पिएर संगै निस्कौंलाहुन्न ?&#039; शालु स्वीकृतिसूचक मुन्टो हल्लाएर कपडा लाउन गइन्‌ । कपडालाएपछि गंगा र शालु नै घरबाट निस्के । गंगा खुसीले फुरुङ्ग हुँदै घरतिरलागिन्‌ भने शालु पुस्तक पसलतर्फ लागिन्‌ । किताव किनेर घर फर्केको केहीक्षणमै फोन आयो, शालुले फोन उठाइन्‌, फोन फिरोजकै थियो । फिरोजलेबडो हर्षित स्वरमा &#039;आफू पढ्नै र सात जन्म पनि तिमीलाई कूर्न सक्छु शालु&#039;भन्यो । आफनो ममीपापा र आफू नै खुसीले रमाइरहेको कुरा बतायो । शालुलेआफू पनि खुसी छु भनी पुनः अर्को झूट बोलेर फोन राखिदिइन्‌ । फोनराखेपछि मतमत्तै सोचिन्‌, मैले जे गरें ढीक गरेँ, सर्प पति मर्ने लट्ठी पतिनभाँच्चिने । जवानीकै माया गर्ने त्यो निच प्यासीले पनि प्रेम गर्ने रे । उफ !प्रेम शब्दलाई फिरोजजस्ताले ज्यादै सस्तो बनाइदिए । सुजन आजसम्म पनिफर्केनन्‌ । उन्ती बिग्रिए भनै म कसरी बाचौँला ? ममीपापाको भित्री मनशायसुजनलाई आफनो रङ्गीचङ्घगी दुनियाँसँग घुलमिल गराउनु हो । उनीहरूसोच्छन्‌ पैसाले छोरालाई ठूलो मान्छे बनाउन सकिन्छ । ममीपापाले सुजनलाईआफूहरूबाट अलग्याउँछै भन्ने सोचेर जानीजानी घर नफर्किनुभएको हो ।जन्मदिनको भोलिपल्ट नै अलइन्डिया टुरमा जाने क्रा रहेछ, त्यो कुरा नभाइलाई थाहा थियो न मलाई नै । सुजनलाई ममीपापाले मेरोसामु पर्नसम्मदिनुभएन । उहाँहरूलाई भाइको जिन्दगीभन्दा आफ्नै स्वार्थ प्यारो भयौ । शालुकेही कुरा सोच्न नसकी लम्पसार परेर सुतिन्‌ । अँघ्यारोलाई चिर्दै मुख ढाकेरविभिन्न परिकारहरू लिई आफूतो कोठामा पसेकी कान्छीदिदीलाई देखेपछिशालु कान्छीको काखमा पल्टेर धेरैबेर रोइन्‌ । कान्छी पनि रोइन्‌ । कान्छीलेशालुलाई मायाले कपाल सुम्सुम्याउँदै भनिन्‌, &#039;अव नरोइस्यो, हामी सबैलेदेखेको सपना साकार भयो । बरु छिटो खाना खाइस्यो । दाइले ट्याक्सीमैमलाई पर्खिनुभएको छ । दाइ, मोनालगापत सबैलै हजुरलाई सम्झेका छन्‌ ।रोहिणी मैयाँसापचाहिँ भोलि हजुर जाने बैलामा आइसिन्छ रै ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले आँसु पुछ्दै सबैलाई सोधित्‌ । कान्छीले सबैको हालखबर राम्रैभएको बताइन्‌ । वीरुले नाम फेरेर सौरभ राखेको क्रा बताइन्‌ । रौमाकान्त रमोनाको सुखी जीवनबारे पनि बताइन्‌ । प्रशन्नको राम्रै खबर छ भनेर पनिबताइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु उठेर कान्छीको हात मुसार्दै भनिन्‌, &#039;दिदी मलाई अब एउटै चिन्तासुजनको छ । उसलाई ममीपापाले बिगारेरै छोडनुहन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
“मैयाँसाप हजुरले पीर नगरिस्यो । फिरोजको त्यो ताल देखेपछि सबैलेछोराछोरीलाई बढी पुलपुल्याउनु हुँदैन भनेर चेतिसके । डाक्टर पुष्कर भट्टकोक्रा पनि उनीहरूलाई थाहा नै होला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;कस्तो कुरा दिदी ?&#039; शालुले प्रश्न गरिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हजुरलाई थाहा छैन ? विवाह गरेकी श्रीमती सभ्य भइन भनेर कुन चाहिलाईफेरि विबाह गरेछ । आफनो सरुवा भएको ठाउँमा त्यसैलाई लिएर गएछ । त्योआइमाई प्रोजेक्टका लागि आएको अस्ट्रेलियनसँग अस्ट्रेलिया भागेपछि, अहिलेपहिली श्रीमतीसंगै छ, छौरा पनि दुई-तीन वर्षकै भइसकेछ । डा. भट्टकीश्रीमती भन्दै थिइन्‌, &#039;डा. भट्टले रक्सी, पार्टीसाटी सबै छोडे रे । उनलाई पनिअसाध्यै माया गर्छन्‌ रे ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले सन्तोषको हाँसो हाँस्दै भनिन्‌, &#039;भट्टकी श्रीमतीको कुरा सुन्दा साह्रैखुसी लाग्यो । दिदी तपाईं नै भन्नोस्‌ त अरू खुसी हुन्छन्‌ भने झूट बोल्नु हुन्छहोइन ? तपाईं पनि मलाई खुसी पार्न धेरै &#039;फूट बोल्नुहन्थ्यो । ममीले गालीगरेर शँदा आंखामा धूलो परेर आँसु झारेकी भन्नुहुन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले अलि डराउँदै भनिन्‌, &#039;फेरि हजुरले कोसँग &#039;फूट वोलिस्यो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले गंगा घरमा आएको फिरोजले आफूलाई प्रेस गर्छु भनेको सबै कुराकान्छीलाई बेलिबिस्तार लगाइन्‌ र शालुले आफूले फिरोजलाई माया गर्छु भनेरझूट बोलेको कुरा पनि बताइन्‌ । कान्छी शालुको कुरा लु खडो चिन्तितबनिन्‌ । शातुताई ई के भन्नै के नभन्ने सोच्नै सकिनन्‌ । थुप्रे हिउँद बिताएकीकान्छीले अनुमान गरिन्‌ । फिरोजले वास्तवमै प्रेमको मूल्य बुझेकैहुनुपर्छ । शालु मैयाँसापलाई फिरोजको माया साँचो हो भनौँ भने चोट पर्ला ।फिरोजको माया झुटो हो भनेर पनि कसरी भनौँ !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दिदीले कै सोच्नुभएको ? फिरोजको बारेमा सोच्नुभएको हो भने अहिल्यैत्यौ फिरोजेको करालाई मस्तिष्कबाट निकालिदिनुभए हुन्छ । त्यो गुन्डोलाईतपाईंले मैले चिनेकै हौँ । मैले त बिचरी गंगा आन्टीको आँसुको मान मात्रराखिदिएकी हुँ । त्यस्ता लफङ्गाले प्रेमको मूल्य बुझ्यो भने त यो पृथ्वी नैपल्टिन्छ हैन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले हांसेजस्तो गरी भनिन्‌, &#039;हजुरले ठीक नै सोचिस्यो । त्यो प्रेमी हुनैसक्दैन तर हजुरले कसैलाई मन पराउन लाइस्यो भने पहिला मलाई भनिसेलानत्र म रिसाउँछु । हात्तीको चपाउने दाँत बेग्तै, देखाउने दांत वेग्लै हुन्छ ।मान्छेलाई पनि बाहिरबाट चिन्न सकिँदैन । अझ अर्को कुरा, हजुरले आफनोविवाहका लागि केटा खोज्ने जिम्मा मलाई नै दिस्यो भनै म झनै खुसी हुन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीको गालामा म्वाइँ खाँदै भनिन्‌, &#039;ल मैले त्यो जिम्मा तपाईंलाईनै दिएँ। म दिदीले जोसँग भन्नुहुन्छ त्यहीसँग विवाह गर्छु नत्र कुमारी नैबस्छु।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“&#039;शालुको कुराले कान्छीको आँखाबाट हर्षको आँसु झन्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले ढोका खोलेर पलङ्गमा बस्दै भनिन्‌, &#039;ल हैर यी आमाछोरीकोरुवाबासी । तपाईंहरूको के कुरा हुँदै थियो ? म कवाफमा हड्डी त बनिन ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले आँस्‌ पुछ्दै भनिन्‌, &#039;हजुरसँग लुकाउनुपर्ने करै के छ र ? हजुरलेभौलि जान्छु भनिसेकोले म एक्लै आएकी ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रौहिणीले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;दिदीले मीठोमीठो पकाएर ल्याएको थाहा पाएपछिदौडिहालेँ । हेर मोरी तैँले गर्दा हाम्रो घरमा पनिर पाक्दैन । आलुको अचार प्राय:बन्दैन । दिदी भन्नुहुन्छ, आलुको अचार र पनिर देख्यो भने मलाई शालुमैयाँको याद आउँछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीको कुराले शालुको मन भरिएर आयौ । पुन: एकैछिन वातावरणमौन भयो । रोहिणीले भनिन्‌, &#039;दिदी दाइ त बाहिर ट्याक्सीमा आनन्दलेनिदाउनुभएको छ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले उठ्दै भनिन्‌, &#039;शालु मैयाँ राम्रोसँग पढिसेला, आफनो स्वास्थ्यकोख्याल राखिसेला म गएँ पनि ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु कान्छीको पछिपछि गेटसम्म आइन्‌ तर दुवैको औठ चल्त सकेन ।कान्छी रुँदै बाटो लागिन्‌, शालु रुँदै कोठामा आइन्‌ । रोहिणीले बडो गम्भीरभएर भनिन्‌, &#039;साँच्चै माया भनेको गजबकैँ हुँदोरहेछ, । त्यसैले त मान्छेहरूभन्दारहेछन्‌- संसार प्रेममै अड्भेको छ । कान्छीदिदीकी तँप्रतिकौ माया त झन्‌अपारकैँ छ । अरूले चिन्लान्‌ कि भनेर मुख छौँपेरै भए पनि आउनुभयो । दिदीभन्दै हुनुहुन्थ्यो- शालु मैयाँसापको घरको काम गर्ने अहिले घर गएको छ रे ।म दिदीको कुरा सुनेर छक्क परेँ, सोचेँ शालुको घरमा को काम गर्ने आएछफेरि ? पछि बूझिहालेँ तैँले दिदीले पीर गर्नुहुन्छ भनेर घरमा काम गर्ने छभनेकी होस्‌ । भाँडा माझने, घर पुछ्ने त आउँछिन्‌ नै होला होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;अँ आउँछिन्‌ । आज बिहान भने दुध तताएर पनि दिइन्‌ । खाना पकाउनजाँगर लागेन, एउटा चाउचाउ उमालेर खाएँ । छोड्दे सानातिना क्रा, भन्‌प्रशन्नजीको हालखबर के छ ! तैँले आज केही हाँसेजस्तो गरिस्‌ मलाई ज्यादैखुसी लाग्यो ।&#039; त&lt;br /&gt;
“तैँले भनेकी होइनस्‌ हेर रोहिणी, तँ अरूको खुसीको लागि पनि हाँस्‌ । तेरोबाबुआमाले केवल तेरो खुसीका लागि अर्काको छोरामाथि ठूलो लगानी लगाएकाछन्‌ । त्यस्ता बाबुआमाको मन नदुखा । हामीलाई पनि तेरो अँध्यारो अनुहारदेख्दा पीर पर्छ भनेकीले हाँसेजस्तो गरेकी छु । नत्र तेरो लम्बेचौड्े भाषण सुन्नपरिहाल्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ल तैँले जे गरिस्‌ राञ्चै गरिस्‌ । अब हामी सबैको खुसीका लागि कुनै पनिएक विषयमा डिग्री गरिदिक मैयाँ । अलिकति मोटाइदेङ त्यति भए पुग्छहामीलाई । आजकाल तँ बाबुआमाको अगाडि मुर्दाजस्तै हुन्नस्‌ होला नि कि&lt;br /&gt;
कैले सम्झाएपछि आजकाल मैले आफूलाई वाँधैकी छु । मलाई खुसीझैँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देखेर ममीवावा पनि खुसी नै हुनुहुन्छ । कति पत माल मेरो त्यसको तलेखाजोखा नै छैन शालु । कसरी चार-पाँच वर्ष वताउनु सम्झँदा मात्र पनिअत्यास लाग्छ । तैँले प्रेम नगरेर ठीक नै गरिस्‌ । प्रेमको पीडाले त मान्छेलाईसखापै पार्दारहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
“प्रेम गर्नेहरू सबै तँजस्ता कहाँ हुन्छन्‌ त ? देखिनस्‌ मौसमीको प्रेम कसधैँ प्रफुल्ल देखिन्थी । तँ भने सधैँ मरेको विरालो काखी च्यापेर थिमी जानेबाटो कता भन्ने जस्ती छैस्‌ । तैँले पढाइमा ध्यान दिइस्‌ भनेचाहिँ समयबिताउन सजिलो हुन्छ । अर्को कुरा तँ इन्जिनियर सापको श्रीमती बन्न लायकहनुपप्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले शालुको कुरामा सहमति जनाइन्‌ । दुवै मीठोसँग खानेकुरा खाईसुत्न भनेर लागेका थिए । फौन आयो । शालुले फोन उठाइन्‌ । केही बेरकोकराकावीपछि फोन राखिदिइन्‌ । उर्मिलाले होस्टेल जाँदा डेरामा यस्नैलाईढोकाको चावी छोड्नु भन्नका लागि फोन गरेकी रहिछिन्‌ । शालुकी ममीकोकुरा सुनेपछि रोहिणीलाई ज्यादै नमज्जा लाग्यो । रोहिणीले महसुस गरिन्‌- मैलेतपस्या गरेरै बाबुआमा पाएकी रहेछु । गाइन ई भने आमाको कराले खासैदुःखेन । चुगगको भने चिन्ता लाग्यो । कूरा गर्दै निदाए । भोलिपल्टरोहिणीले नै शालुलाई होस्टैलसम्म पुन्याएर गड्न्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==एक्काईस==&lt;br /&gt;
“आकाश तिमीले त महाराजगन्जमा पनि नाम निकाल्न सक्ने मान्छे, फेरियहाँ किन पढ्न आएको ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(तिमी यहाँ पढ्दैछयौ भन्ने बाहा पाएर मैले पनि यहीँ पढेको हुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले हांस्बै भनिन्‌, &#039;तिमीलाई जोक गर्न त कसले सिकाओस्‌ ? तिमीलाईयहाँ देखैरचाहिँ साह्रै खुसी लाग्यो, प्राय: सबै काठमाडौंबाहिरकै रहेछन्‌ । हामीलाईत मान्छे गन्दैनन्‌ । हामीले राम्रो पढेर काठमाडौंको इज्जत राख्नैपर्छ, नत्र हेप्नुहेप्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आकाश केही बोल्न नसकी आफनो रुमतिर लागे । शालु आफनो रुममाआइन्‌ । क्रमश: दिनहरू बित्दै गयो । शालु र आकाशको भेट हुन्थ्यो । पढाइकैवारेमा कुरा हुन्थ्यो र टुड्गिन्थ्यो । शालुलै डाक्टर पढ्न थालेको पनि तेस्रो वर्षपूरा भएर वर्षमा लाग्यो । कलेजमा प्रेम गर्नेहरूको लहर नै चलेकोधियो । शालु आफू निष्फिक्री भएकोमा दङ्ग थिइन्‌ । अरू साथीहरू भनेशालुलाई नपुड्सकको सङ्जञा दिँदै भन्थे, &#039;शालु हामी पनि तँजस्तै नपुड्सक हुनपाएको भए हुन्थ्यौ । न त तँलाई कनै केटाको चासो छ । त॑ नपुङ्सक भएरै धेरै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पढ्न सकेकी होस्‌ । नपृड्सकहरूलाई त वैंसले पनि कुनै असर नगर्ने रहेछहगि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गालु साथीहरूको कुरालाई हाँसोमा उडाइदिन्थित्‌ । शालुले नपुड्सक भन्दापनि कुनै खण्डन नगरेकी हुनाले साँच्चै शालुलाई सवैले नपुड्सक नै ठान्तथाले । शालु नपुड्सक भन्ने कुरा एक कान दुद कान गर्दै सबै केटाहरूले पनिथाहा पाए । शालुलाई मन पराउने दुई-चार केटाहरू त आफसेजफ सावधानभए । आकाशको हृदयमा भने गहिरो चोट लाग्यो । आकाश शालुलाई स्कूलेजीवनदेखि नै मन पराउँथे । शालुकै लागि सप्तरङ्गी सपनाहरू सजाउँथै ।शालुकै मायामा एक्लैएक्लै रुन्ये । तर शालुसामु पुगेपछि भने प्रेमका क्राहरूगर्न सक्दैनयै । त्यसैत्यसै डराउँथे आकाश । आकाशको भित्री मनले सोच्ये-एकदिन न एकदिन शालुले मेरो आँखाको भाषा बुझिछन्‌ । आकाशको त्यो रहररहरमै सीमित भयो । आकाशले पनि यही सोचे- शालुले मेरो वास्ता नगर्नुकोकारण त उनी नपुइ्सक भएरै पो रहेछ । कठै मैरी शालु, एक्लो जिन्दगी कसरीकाटछिन्‌ ? म शालुबिनाको जिन्दगी कसरी काटौँ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आकाशले शालुकै बारेमा सोच्दासोच्दै मनलाई बसमा राख्न नसकेर धेरैसमय बेचैन वने । सबै विद्यार्थी भने शालुलाई देखेपछि मुखामुख गर्थे । शालुलाईआफनो अपमात गरेकोमा पटक्कै चिन्ता थिएन । उनी चिन्तित हुन्थिन्‌ तकेबल सुजन र रोहिणीको पीरले ।&lt;br /&gt;
यता दौलतको विशाल समुद्रमा छलाङ मारिरहेको सुजनले पढ्नुलाई बोफखन्दै गए । सुजन पहिला रक्सीको नशामा रमाउन थाले । विस्तारै सङ्गतडुग्स खाने जमातसँग भयौ । रामै डुगिस्ट बने । ठूलो समुद्वबाट एक लोटापानी झिक्दा पत्ता नपाएझँ दीपक उर्मिलाले पनि दराजबाट पैसा हराएकोचाल नै पाएनन्‌ । एक दिन डुृग्स खान पैसा नपाएपछि सुजनले आमाको दुईतोलाको सुनको चुरा नै चौरै । चुरा चोरीको दोष उमिंला र दीपकले एक्काईसवर्षको घरमा काम गर्ने कान्छालाई लगाए । कान्छाले आफू चोर नभएको दावीगर्दा पति साफसँग पिटी घरबाट निकालिदिए । विनादोष नै सजाय पाएपछिघरमा कोही नभएको मौका पारी आई त्यही कान्छाले पन्धर-बीस तोला सुनकागहना र करिव पाँच सात लाख रुपैयाँ सबै चोरी इन्डियातर्फ टाप कस्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आधा रातमा रक्सीको नशामा झुम्दै आएका उर्मिला र दीपकले पहिला तसबै ढोकाहरू सृजनले नै खोलेको ठाने । कोठामा पसेपछि दुवैको सातो गयो ।दुवैले खोलिरहेको दराजलाई देखेपछि चोरी भएको ठहर गरे । डेरामा बस्नेहरूसँगसोधखोज गरे । कसैले पनि कसले कन बेला चोच्यो भन्नै कुरा थाहा नभएकोभन्ती बताए । चौरी भएको क्रा हल्लीखल्ली भयो । पुलिसहरू पनि आए, चोरपत्ता लगाउन आश्वासन दिएर गए । जीवनमा पहिलोपल्ट परेको चोट दीपकर उमिलालाई नै सहन गर्न गाह्रो भइरहेको थियो । त्यत्तिकैमा आश्वासन दिन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आएकामध्यै एउटा छिमेकीले प्वाक्क भन्यो, &#039;सर ! चोर वाहिरको नभई घरभित्रकैपनि हुन सक्छ । या कि सुजन वाव्‌... ।&#039;&lt;br /&gt;
छिमेकीको क्रा सुनैर दीपकले सातो खाउँलाझैँ गरी भने, &#039;मुख सम्हालेरबोल्नोस्‌, दामौदरजी, मेरो छोरा लाखमा एक छ, बुझनुभो ? क भोलिकोपाइलट हो, पाइलट... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दामोदरले व्यङ्ग्य हाँसो हाँस्दै भने, &#039;चङ्गा उडाउनै पाइलट कि प्लेनउडाउने पाइलट हँ ? तपाईँले साँच्चै थाहा नपाउनुभएको हो कि बुझपचाउनुभएको हो ? सुजनवाबुले त झन्डै मेरो छोरालाई पनि बिगारिसकेकाथिए । म पनि खान्दानी मान्छेको छोरा त्यसमाथि शालु जस्तोको भाइ राम्रैहोलान्‌ भनेर मख्ख थिएँ । धन्न मैले बेलैमा थाहा पाएर सुजनको सङ्गतछुटाइहालेँ । दिदी भने पण्डित भाइ भने महाखण्डित पो रहेछन्‌ । देखैजानेकोभनिदिएँ रिसाउनीस्‌ या खुसाउनोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दामोदरको करा सुनेर सबै छिमेकीहरू शिर झुकाएर निहुरिरहे । सबैलेजिउहजुर भन्ने छिमेकीको अगाडि आफू अपमानित हुनुपर्दा उर्मिला र दीपकरिसले आगो भए । उमिंलाले दामोदरलाई खाउँलाझैँ गरी भनिन्‌, &#039;तँ पाजी दुईपैसेले काठमाडौंमा एउटा झुपडी बनाइस्‌, तँलाई के-कै न भयो होइन ? यस्तोदुःखको बेलामा तँ यही भन्न यहाँ मरेको ? जा गइहाल्‌ मेरो सुधो गाईज्ञस्तोछोरामाथि झुटो आरोप लगाउने पाजी ।&#039;&lt;br /&gt;
पबाएको विष पो लाग्छ, नखाएको विष त लाग्दैन&#039; भन्दै दामोदर हिँडै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दामोदर गएपछि जम्मा भएका छिमेकीहरूले दामोदरलाई नै गाली गरीखनखाँचोमा काम लाग्ने दीपककै पक्ष लिए । दीपकले मनमनै दामोदरकोउठिबास लगाउँछु भनी सङ्कल्प गरै । अनि छिमेकीहरूलाई आफनो छोरी रछोरा दुवै समाजको प्रतिष्ठित व्यक्ति हुनेछन्‌ भन्ने कुरा गर्दै थिए । सुजनपाइ्लै बर टेक्न नसक्ने गरी हल्लँदै आएर लर्खराएको स्वरमा भने, &#039;ममीपापा केभयो ? किन मान्छेको भीड हँ ?&#039;&lt;br /&gt;
सुजनलाई देखेपछि दीपक र उर्मिलाकै होस उड्डयो । छिमेकीहरूले अबदीपकको घरमा बस्न ठीक छैन भन्ने ठानी अब जान्छौँ भनी सबै आ-आफूनोघरतर्फ लागे । सुजनको चरित्र राम्रो छैन भन्ने थाहा पाउँदापाउँदै पनि सुजनलाईराम्रो छ भनी चैपारो घस्नेहरूको मनमा केही नराम्रो त लाग्यो नै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यता दीपक र उर्मिलाले सुजनको त्यो हाल देखेर आफनो भाग्यलाईधिक्कारे । दीपकले आँसु पुछ्दै भने, &#039;तिमी त हामीसँग हिँड भन्दा भन्थ्यौँ-पापा म पाइलट बन्छु । त्यसैले राति अबेरसम्म ट्युसन पढ्न जान्छु । यही होतिमी ट्युसन पढेर आएको ?&#039;&lt;br /&gt;
सुजनले उभिन नसकी भुइँमा थ्याच्च वस्दै भने, &#039;कुल, पापा कुल, हजुरहरूले&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अलिआलि पिउने बानी लगाइदिस्यो । आज मैले अलि धेरै पिएँछु माफ गरिसेला ।घरमा चाहिँ किन भीडभाड थियो हँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले रुँदै भनिन्‌, &#039;घरको सम्पूर्ण नगद, सुन चोरी भएछ । यत्रो चोटपरेको दिन तिम्रो यो हालत देख्दा... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;ममीपापा हजुरहरूले दिदीलाई ननिकालेको भए यो दिन देख्नै पर्दैनथ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिला चिच्याइन्‌, &#039;हामीले निकालेका हौँ र तेरीवजैलाई, त्यही शालुलेनिकालेकी हो । शालुले ननिकालेक्की भए त्यो कहाँ निस्किन्धी र ?&#039;&lt;br /&gt;
सुजन जबर्जस्ती उठ्दै भने, &#039;हत्‌ ममी पनि, हजुरले साह्रो बदनाम गरेरनिकाल्ने योजना बनाएको थाहा पाएरै शालुले दिदीलाई निकालेकी हुन्‌ । शालुचाहन्थिन्‌ दिदी खुसी होकन्‌ । उनी आफनो मायामा नतडपिजन्‌ । चन्द्रकान्तदाइसँगै विवाह गरून्‌ । ती सब त बनिबनाक नाटक थियो । थाहा छ दिदीलेत चन्द्रकान्त दाइसँग विवाह गरेर छौरा पाइसक्नुभयो । दिदी शालुकै साथीरोहिणीको घरमा बुहारीझैं भएर बस्नुभएको छ । दिदीले मलाई हेर्न मन लाग्योभनेर डाक्नुभएकोले म र शालु गएका थियौँ । अँ साँच्चि, मामाघरको हजुरआमापनि भनिसिन्ध्यो- बाबु, तेरी आमाले ककरकाटी बिरालोलाई पोस्नै कामगरिन्‌ । कान्छीको पछुतो लाग्छ बा, यो जमानामा कान्छीजस्ती मान्छे कहाँपाउनु ?&#039; सुजन नशाको सुरमा सबै यथार्थ बकी लर्खराउँदै आफनो कोठाभित्रपसे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपक र उर्मिला पनि केही बोल्न नसकी कोठाभित्र पसे । आंखाबाटबलिन्द्रधारा आँसु &#039;फारे । दुवैको आँखामा कान्छी नाचिरहिन्‌ ।&lt;br /&gt;
दीपकले धेरैबेर रोएपछि भने, &#039;उर्मी, दालमा केही कालो छ भन्ने त मलाईपहिल्यै थाहा थियो । हुन पनि तिमीले कान्छीलाई शत्रुलाई नगर्ने व्यबहारगन्यौ । आज यो दुर्दिन देख्नुपन्यो । धन, पैसा त चौरी भयो केही थिएन पछिपनि कमाउन सकिएला, दामोदरले भनेझैँ सुजन मक्किसकेछन्‌, तिमी आमाभएर पनि थाहा पाइनौ ? उर्मी तिमी कस्ती आमा हौँ हँ : आज दामोदरजस्तोभुसुनाले पनि हामीलाई लात माय्यो । यत्रा छिमेकीहरूको अगाडि शिरझुकाउनुपच्यो । भोलिदेखि यही समाजमा कसरी आफनो रूप देखाउनु : तिम्रैकारणले गर्दा मैले आफनै छोरीलाई पनि शत्रु ठाने । सायद शालु सुजनलाईजीवन के हो बुझाउन चाहन्थिन्‌ । हामीले शालु र सुजनलाई भेट्नसम्म नदिईबार लगायौ । म तिम्रो लहैलहैमा लागेँ । अब सुजनलाई के बनाउने तिम्रोजिम्मा । सुजन बिग्रिएको म हेर्न सक्दिनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले ओछ्यानमा पन्टँदै भनिन्‌, &#039;हजुर पढलेखेको मान्छेले नै उसलाईतह लगाइस्यो । मैले भनेको उनी टेदैनन्‌ । छोरीलाई मैले ज्ञानी बनाएँ, अबछोरालाई सपार्ने जिम्मा हजुरको ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपकले लोप्पा खुवाउँदै भने, &#039;इस्‌ तिमीले शालुलाई राम्रो बनायौँ !&#039; &#039;कामगर्ने कालु जस पाउने ढेडु ।&#039; कान्छी नभएको भए शालुको गति पनि सुजनकोजस्तै हुनेरहेछ । अव सुजनलाई कलतबाट छुटायौ भने तिमीले शालुलाईबनाएको ठहर्छ नत्र ..... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;कै नत्रसत्र त्यो मेरो मात्र छोरो हो र : यो घरमा म मात्र थिएँ र ?&#039; उमिंलाच्याट्टिन्‌ ।&lt;br /&gt;
दीपक सिङ्गै बोतलको रक्सी तन्काउँदै कूर्लिए, “चुप लाग पाखिती, घरमाकोही छैन भन्ने थाहा पाएपछि खाल बस्न नगएको भए घरमा चोरी हुँदैनथ्यो ।आमा मैखाकीले छोरो कुनबेला कुन हालतमा घर आउंछ भनेर कहिले हेरिस्‌ ?अझ मुखमखै लाग्छेस्‌ ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिबाह गरेर ल्याएको वीसौं वर्षपछि पहिलोपल्ट नै दीपकले गाली गरेकाथिए । त्यसैले उर्मिलाको हृदयमा दीपकको गाली बज्चको वाण लागेझौँ भयो ।उमिंला रक्यीको बोतल समातेर रुँदै बैठक कोठामा आई घटघट रक्सी पिईछटपटाउन थालिन्‌ । दीपक र उर्मिलाले सारा रात छटपटाउँदै रुँदै सिरानीभिजाउँदै कटाएँ । भोलिपल्ट बिहान दुवै सकिनसकी उद । दीपक र उर्मिलाएक-अर्कासंग बोल्न सकेनन्‌ । उर्मिलालाई नजानिँदो पाराले चक्कर लागिरहेकोथियो । दीपक विहान खाली पेटमा नै रब्सी पिई के सुरमा कान्छीलगायत युप्रैकाम गर्नेहरू सुतेको कोठामा पसे । आँखा टिनको बाकसमा पस्यो । के रहेछवाकसमा भनी बाकस खोलेर हेरै । वाकसमा शालु र सुजन बिरामी हुँदाजँचाएको कागजको चाङले लगभग बाकस भरिएको थियो । त्यतिमात्र नभईफलानो समय फलानो बाँणाको बन्दकी राखेको औंठीको विल, फलानो समयमाफलानो बाँणाको बन्दकी राखेको तिलहरीका बिलहरू पत्ति प्रसस्तै थिए ।दीपकले क्राकै प्रसङ्गमा उमिंलाले आफनो साथीहरूसँग छाँद्ने गरेको गफसम्झै । &#039;तिमीहरू आफनो बच्चालाई त्यति ध्यान दिँदैनौ होला अनि बिरामीपरिरहन्छ नि । मैरौ शालु र सुजन त विरामी भएको पत्तै छैन । उनीहरूबिरामी भए भनेर आजसम्म एक रुपैयाँ खर्च भएको छैन हगि हजुर ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हो उर्मीले ठीक भनिन्‌ । आजसम्म विरामीका लागि चाहिँ बजेटछुट्याउनुपरेको छैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतीतका कुरा सम्झेर भक्कानिएर रुदै बाकस नै बोकी उर्मिलाको सामुबाकस लगेर फयाँक्दै भने, &#039;हेर पखिती, तैरा छोराछौरी विरामी भएका रहेछन्‌कि रहेनछन्‌ थुक्क ! तँलाई त बच्चा बिरामी भएकोसम्म पत्तो रहेनछ । त॑डोकेले के बुझथिस्‌ कान्छीले सयौं पटक आफनो गहनाहरू वन्दकी राख्दै शालुर सुजनको औषधि गरेकी रहिछन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उमिलाले छरपस्ट भएका पोस्खिएको चाङ कागज देखिन्‌ र टोलाइरहिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपकले पागलभैँ हुँदै बाकसलाई लात्तीले हानेर सबै प्रेस्क्रिप्सनहरू छरपस्टपार्दै भने, तैले ठानेथिस्‌ तेरा छोराछोरी त्यत्तिकै हुर्के, प्रमाण देखिस्‌ होइनपापिनी ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिला पनि चिच्याइन्‌, &#039;आज आएर मलाई तँ-तँ र म-म पापिनी भन्छस्‌ ?म तेरो पछाडि लागेर आएकी हँ र : त॑ नै माग्न गएको होस्‌ । आधुनिकबन्नुपर्छ भनी तैँले नै रक्सी धिच्त सिकाइस्‌, मेरो के दोष हँ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;तास खेल्न मर, ब्ल्लु फिल्म हेर्न जा भनेर पनि मैलै नै सिकाएको थिएँहोला, होइन ?&#039; दीपकले भने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुबैको हल्लाखल्लाले सुजनको निद्रा ब्युँफियो । डेरामा बस्नेहरू पनि कानठाडो पारीपारी सुन्न थाले । सुजनले उठेर आई बाहिर निस्कदै भने, &#039;विहान-बिहानै के महाभारत हँ ? कि ममी-पापाले पार्टीमा जस्तै जुहारी खेलेको हँ ।बिहान-बिहानैं पनि जुहारी खेल्छन्‌ ! फेरि पापाले बिलनिक पो खोल्नुभयो किक्या हो : बिरामी जाँचेको प्रेसिक्रिप्सन नै ल्याइसेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपकले हकारे, “चुप लाग पाजी, हामीले तँलाई स्वतन्त्रता दिएको यही दिनदेख्नका लागि हो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाबुको मुखबाट पहिलोचोटि गाली सुनेर सुजनलाई गाली गरेको हो याठट्टा गरेको थाहा नै भएन । त्यसमाथि डुग्सले राम्जैसँग छाडेको थिएन ।सुजनले भने, “पापा, हजुर सुतिस्यो । बेलुकी नै भनेर बिहानै पिसेछ क्यार अनिकराइसिन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुजनको कुराले दीपकलाई झन्‌ काटेको घाउमा नुनचूक लगाएजस्तो भयो ।दीपक आवेशमा आएर चिच्याए, “चुप लाग मूर्ख, तैले गर्दा हामीलाई समाजकोआँखाबाट &#039;झर्नुपयो । तँलाई हामीले के दिएका थिएनौं र त॑ कृसङ्गतमा लागिस्‌ हँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुजनले अब भने बास्तविकता बुझे, थपक्क कोठातर्फ लागे । उमिंला केहीबोल्न सकिनन्‌ । दीपक एक्तै फतफताइरहे । दीपकको स्वर्गजस्तै घर पूर्णरूपमा&lt;br /&gt;
मसानमा परिणत भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाईस==&lt;br /&gt;
&#039;शालु नरिसाक है एउटा कुरा भन्छु ।&#039; प्रभाले शालुनजिकै सर्दै भनिन्‌ । पुसमहिना भएकाले अरू थुप्रै विद्यार्थी पनि चौरभरि टन्न घाम तापेर बसेका थिए ।शालुले भनिन्‌, &#039;भनन प्रभा तिमीले अहिलेसम्म के भन्त बाँकी राखेकी छ्यौ र ।पहिला त तिमीले नपुङ्सक भनी हल्ला फिँजाएकोमा तिमीलाई धेरैधेरै धन्यवादछ । तिमीले गर्दा म धेरैका पापी नजरबाट वर्चेँ । अँ साँच्चि के भन्दै थियौकुन्नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रभाले सोध्न लागेको प्रश्न थियो- नपुङ््सकको त जुँगा आउँछ भन्थे तरतिम्रो जुँगा किन आएन ? भनेर सौध्न चाहेकी थिइन्‌ । शालुको कुराले प्रभाअनकनाइन्‌ । प्रभा नबोलेपछि शालुले हाँस्दै भनिन्‌, हैन किन चुप लागेकीप्रभा । कै म साँच्चै, नपुड्दसक जस्तै छु र ! मेरी दिदी सधैं भन्नुहुन्थ्यो, &#039;मआकाशबाट झरेकी परी जस्तै छु रे । दिदी यो पनि भन्नुहुन्थ्यो मेरा लागि योपृष्वीमा राजकुमारजस्तै सुन्दर व्यक्ति जन्मेको हुनुपर्छ रे । का आकाशजस्तैसुन्दर हुन्छ रे । शालुले करा टुङ्ग्याउन नपाउँदै प्रभाले पेट मिचिमिची हाँस्दैभनिन्‌, &#039;हेर साथी हो, शालु परीजस्तै छिन्‌ रे सुन्यौ ? त्यतिमात्र कहाँ होरउनलाई विवाह गर्ने युवक राजकुमारजस्तै हुन्छ रे ।&#039; प्रभाको कुरा सुनेपछि सबैहा....हा गर्दै धेरैबेर हाँसे । धेरैबेरको हाँसोपछि प्रभाले भनिन्‌, &#039;ल, ल छ, छहाम्रो पियन राजकुमारसँग तिम्रो ठ्याक्कै जोडा मिल्छ । वा ! तिमीले ठूलैसपना देखेको रहिछौ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्नालाई वर्षौं अगाडिदेखि हेर्न आउने युवक देख्यौ भने त मूछां नै पर्छ्यौंहोला । भन्लिन्‌, क त्यही हो मेरो सपनाको राजकमार !&#039;&lt;br /&gt;
अन्नाले शालुतिर हेर्दै भनिन्‌, &#039;हेर शालु, मेरो हृदयश्वर देखेर सबै डाहलेमर्न लागिसके । तिमीले अझै मेरो राजकुमार देखेकी छैनौ कि क्या हो?राजकुमार पाउन त मेरोजस्तो रूप लिएर जन्मनुपर्छ बुझ्यौ ? फेरि तिमी तनपुङ्सक भनेको होइन र ? के उल्का नपुड्सकलाई पनि राजकुमारको रहर ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्नाको कुराले सबैजना चौर नै धर्किने गरी हाँसे । शालु रछयानलाईचलायो भने आफ्नै मुखमा छिटा पर्छ भन्ने सम्झी जुरुक्क उठिन्‌ । प्रभाले च्व! च्व ! गर्दै भनिन्‌, &#039;हामी शालुजीलाई पियन राजकुमारजीको याद आएजस्तोम यहीं बोलाइदिउँकी ?&#039; साथीहरूको कुराले शालुलाई चक्कर लागेजस्तै भयो ।शालु टाउको समात्दै यचक्क बसिन्‌ ! त्यत्तिकैमा एउटा युवक हस्याड-फस्याङगर्दै आएर भन्यो, &#039;शालु के भयो तिमीलाई ? तिमी ठीक 4021 ?&#039;त्योयुवकलाई देखेपछि सबै युवती हेरैको हेरै भए । शालु टाउको चुपचापलागिरहिन्‌ । युवकले रुन्छ स्वरमा भने, &#039;शालु तिमीलाई चक्कर लागेजस्तो छहिँड डावटरकोमा जाङुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबै युवती युवकको मुखबाट शालुको नाम सुनेर चित खाइरहेका थिए ।शालु युवकको क्राको वास्तै तगरी उडेर हिँड्न लागेकी थिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
फिरोजले हात जोड्दै भन्यो, &#039;शालु बिन्ती, तरिसाउ म तिमो प्राक्टिकलसिद्धिएपछि मात्र तिम्रोसामु देखापर्ने पक्षमा थिएँ । तिमीलाई चक्कर लागेकोदेखेपछि आफूलाई थाम्न सकिनँ, आएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले &#039;को हो तपाईं” भन्दै युवकतिर हेरिन्‌ । अति नै सुन्दर युवकलाईदेखेपछि भनिन्‌, &#039;तपाईंलाई मैरो नाम कसरी थाहा भयो ? तपाईंले अन्नालाईसौध्नुभएको हो ? अन्ना उनी हुन्‌ ।&#039;बठ्ड।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युवकले आँखा ओभानो पार्दै भने, &#039;शालु, विर्सेक म फिरोज हुँ । शालुलेयुवकलाई तलदेखि माथिसम्म हेर्दै भनिन्‌, &#039;ओ फिरोजजी पो, यहाँ किनआउनुभएको कोही विरामी ल्याएको छ कि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले नम्र हुँदै भन्यो, &#039;म तिमीलाई हेर्न आक्कल-झुलुक्क यहाँ आइरहन्छुआज तिमी इल्न ...।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजको कुरा सुनेपछि सबै रातोपिरो हुँदै आफनो बाटो लागे । शालुलेचुझिन्‌ सबै युवतीले फिरोजको पौ क्रा गरेका रहेछन्‌ । मैले फिरोजको साथनदिए पनि यी दुष्टहरूको भने मेख मप्यो । घन्त फिरोज साइतमा नै आएछौँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लु कै सोचेकी तिमीले ? म तिमीले भनेझैँ इन्जिनियर पढ्दैछु । चार-छ महिनापछि त कोर्स पनि पूरा हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजको कुराले अब भने शालुको प्राणपखेरु नै उड्लाजस्तो भयो शालुलेदुखित हँदै भनिन्‌, &#039;फिरोजजी, मलाई माफ गर्नोस्‌ । मैले त तपाईंको आमाकोआँसु हेर्न नसकी झूटमुट बोलिदिएकी हुँ । फेरि तपाईं सुधनुहोला भन्ने तशङ्कासमेत लागेको थिएन । तपाईं सुधनुभएछ । धेरै खुसी लाग्यो । बल्लअङ्कलआन्टीको आँखाको आँसु पनि छुट्यो होला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले रुँदै भन्यो, &#039;शालु तिमीले क्रा फेन्यौ भने म जिउँदो रहने छैन,बिन्ती शालु तिमीले जीवन दिएर फेरि जीवन नलेक ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले धेरैबेर सोचेर भनिन्‌, &#039;फिरोजजी, यो कुरा मसँग होइन मेरी दिदीसँगगर्नोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले मुसुक्क हाँस्दै भने, &#039;न शालु त्यसो भए म ढुक्क भएँ । मैले तिम्रोदिदीसँग मागेर तिमी सानो छँदादेखि लिएर यो उमेरसम्मको थुप्रै तस्बिरहरूकोआर्ट गरैको छु । दिदीले तिम्रा लागि खोजेको राजकुमार म नै हुँ । नपत्याएदिदीसँग सोध ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“शालुले दिदीको कुरा सम्झिन्‌ । &#039;हजुरको राजकुमार म आफैँ खोज्छु&#039; भनेरभन्नुभएको मतलब दिदीलाई फिरोज सप्रन्छ भन्ने थाहा रहेछ । मैले फिरोजकोकुरा गरेपछि मात्र दिदीले राजकुमार खोज्ने कुरा गर्नुभएको थियो । सानोमादिदी हजुरको विबाह राजकुमारजस्तै युबकसँग हुन्छचाहिँ भन्नुहुन्थ्यो तर मनैराजकुमार खोज्छुचाहिँ कहिल्यै भन्नुहुन्नथ्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु हाम्रो घरमा सघं तिम्रो गुणगान हुन्छ । ममी भन्नुहुन्छ, &#039;शालु तहिलोमा फूलेकी कमल हो । म पनि भन्छु तिमी कमल नै हौ&#039;, फिरोजलेनिसङ्कोच भने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले उत्तर दिइन्‌, &#039;राम्रो मान्छेले अरूलाई पनि राम्रै देख्छ । मलाई तत्यस्तै लाग्छ । तपाईंलाई यो रूपमा देख्दा भने मलाई ज्यादै खुसी लाग्यो । पर्सि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो लास्ट प्राक्टिकल, पर्सि नै म घर जात्छु । हुन्छ त । अहिलेलाई जान्छु&#039; भन्दैकक्षकोठातर्फ आइन्‌ ।&lt;br /&gt;
फिरोज पनि शालुसँग बिदा भएर खुसी हुँदै घरतर्फ गए । शालुका साथीहरूलेशालुलाई शिर ठाडो गरेर हेन सकेनन्‌ । अन्ना त झन्‌ हंसले ठाउं छोडेभैँभई । अन्ताले त्यो सुन्दर युवक आफूलाई नै हेर्न आएको हो भन्ने भ्रममा परीआफनौ पहिलो प्रेमीलाई छोडिसकेकी थिई । एकतर्फी प्रेममा अल्झिएकी अन्नाडाको छोडेर रुत मात्र सकेकी थिइनँ । शालुको खौड्रो खन्नै प्रभा पश्चत्तापलेजलेकी थिड्टै । शालुलाई भने यावत्‌ घटनाहरू नाटकभी लागिरहेको थियौ ।कता-कता खुसी र कता-कता पीर लागिरहेको थियो । पीर र खुसी दुवै वाँड्नेसाथी आकाश नै थिए । शालु आकाशलाई खोज्दै क्यान्टिनमा पुगिन्‌ । आकाशचिया पिउँदै रहेछन्‌ । शालुले आकाशसामु बस्दै भन्तिन्‌, &#039;आकाश म तिमीलाईखोज्दै यहीँ आएकी हुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुको कुराले आकाश दङ्ग परै । आकाशले सोच्ने सायद शालुले मैले प्रेमगर्छु भन्ने कुरा बुझिन्‌ होला । शालुले पनि अवश्य मलाई भिर्वाभत्र मायागर्छिन्‌ होला । उनले माया गरै पति नगरै पनि आजचाहिँ उनको सामु हृदयखोल्छु नै । उनी नपुङ्सक नै भए पनि म उनीविना बाँच्न सबिदिनँ । तर केभन्ने कसरी भन्ने : आकाश टोलाइरहे । शालुले करा कोद्याइन्‌, &#039;आकाशहामी वचपनदेखि सँगै पढ्दै आएका छौं । सबैलाई प्रेमको हावाले छोयो तरहामीलाई भने छौएन तर आज मलाई अचम्म लागिरहेछ ।&#039; आकाशले बीच्चैमाकरा काददै भने, &#039;सायद तिमीले आज मात्र बुफ्‌यौ म तिमीलाई माया गर्छुभन्ने कुरा ) म तिमीप्रतिको प्रेमले गर्दा नै आज यहाँसम्म आएँ। म ततिमीलाई बिद्यार्थी जीवनदेखि नै माया गर्थे । तर, भन्ने साहस नै भएन, जेहोस्‌, तिमीलाई पाउनै सपना साकार भयो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आकाशको कुराले शालुलाई मङ्सिर-पुसको जाडोमा पनि चिटचिट पसिनाआयो । शालुले गहुङ्डगौ मन लिएर भनिन्‌, &#039;के भनेको आकाश तिमीले ?तिमीले मलाई माया गर्ने ? भो नजिस्क है म त मर्छु।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हो शालु म किन ढाँद्थेँ । हृदयमा परेका असङ्ख्य घाँजाहरू तिमीले देख्नेभए म देखाइदिन्थेँ । शालु तिमीले मेरो मनचाहिँ नभाँच नि म जिउँदो रहनेछैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले आँसु झादैं भनिन्‌, &#039;मलाई थाहा छ, तिमी फूलभन्दा पनि नाजुकछौ । किन आकाश तिमीले यति गहिरो कुरा मनभित्र लुकाई अर्थहीन रुवाईरोयौ ? तिमी करोडौँ-करोडौँमा एक छौ । तिमीले एक बचन मात्र शालु मतिमीलाई प्रेम गर्छु मनेको भए म ज्यादै खुसी हुन्थेँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आकाशले अत्तिँदै भने, &#039;होइन के भन्न खोजेकी शालु तिमीले ? तिमीतनाबमा पो आयौ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु घुँक्करघुँक्क रोइन्‌ मात्र । शालु रोएपछि आकाशलाई शालुको मतकोकुरा बुझन बेरै लागेन । आकाशले हातले विस्तारै टेबुल ठटाउँदै भने, &#039;हेरहेर रोएकी तिमीले के भन्दिरहिछौ भनेर मन चोरेको मात्र हँ । तिमीजस्तीपोक्चीलाई पनि कसैले प्रेम गर्छ ? हेरन कलेजभरि प्रेम गर्नहरूको ताल,सबैको प्रेम देखैर मलाई त वाक्कै लागिसक्यो भन्या ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;तिम्रो कुरा सुनेर सासै उड्लाजस्तो भयो । मजाकगर्नु पति हद हुन्छ नि ! अबदेखि बोल्दिन म तिमीसँग ।&#039;&lt;br /&gt;
आकाशले सम्झाए, &#039;ल अन कान समातेँ, वरिसाक मैले आज प्रेमको कूरानगरेको भए तिम्रो प्रेमकहानी सुन्न पाउँदैनथैं ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले लामो श्वास फेर्दै भनिन्‌, &#039;खोई कै भनौं आकाश, म आफैँ तअचम्ममा परेकी छु । एउटा डुृगिस्ट, त्यसमाथि चरि्हीन फिरोजले त मेरालागि पहिचान नै वदलेछन्‌ । त्यति मात्र होइन, उनी मेरो मायाले यहाँसम्मआउँदारहेछन्‌ । आज मलाई चक्कर लागेर ढल्न लागेको देखेपछि बल्ल देखापरे ।मैले त उनकी आमाको खुसीका लागि उनी सफ्रिन्छन्‌ भने प्रेम गर्छु भनेर झूटबालेकी थिएँ । उनी सुध्नेलान्‌ भन्ने त कल्पनासम्म गरेकी थिइनँ । म त्यही कुरागर्न तिम्रोसामु आएकी हुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आकाशले बनाबटी हाँसो हाँस्दै भने, &#039;तिमीजस्ती पोक्चीका लागि त्याग गर्नेमूर्ख नै रहेछन्‌ उनी । सायद अन्नाजस्ती केटीहरू नदेखेर तिम्रो मायामा फसेहोला नत्र ... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;अन्नाहरूले त फिरोजलाई कलेजमा आएको देखेका रहेछन्‌ । सबैले फिरोजअन्नालाई हेर्न आएको हो भन्नै ठानेका रहेछन्‌ । फिरोजका लागि अन्नालैभूतपूर्व प्रेमी छौडिछन्‌ ।&#039; शालुले यथार्थ औकलिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आकाशले एकोहोरो शालुलाई हेरै र मनमनै भने, &#039;कस्तुरीलाई आफनैबास्ना थाहा नभएझैँ तिमीलाई पनि आफनौ मूल्य थाहा छैन । फिरोजलै तिम्रोमूल्य बुझे । फिरोजको आँखामा तिमी अन्नाभन्दा लाखौँ गुना सुन्दरी छ्यौ ।मलाई पनि त पहिला तिमी कहाँ राम्री लाग्थ्यो र माया लाग्दै गएपछि तिमीसंसारकी सबैभन्दा सुन्दरी लाग्न थाल्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
होइन के सोचेको तिमीले मेरो कुराको विश्वास लागेन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुको क्राले आकाशको मौनता तोडियो । आकाशले भने, &#039;तिमी यतिमीठो कुरा गर्छयौं, तिम्रो कुराको किन विश्वास नलाग्नु ? तिमीलाई फिरोजकस्तो लाग्छ नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;खोई किन क भनेपछि युवतीहरू मरिमेदछन्‌ । मलाई थाहा छैन । तरमलाईचाहिँ तिमी सुन्दर लाग्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आकाशले मन बाँधेर उद्दै भने, &#039;तिमीले फिरोजलाई राम्रोसँग हेरेकीछैनौ । अनि म राम्रो लाग्यौ होला । अव तिमीलाई फिरोज नै संसारमासवैभन्दा सुन्दर लाग्छ । तिमीहरूको भविष्य अवश्य सुन्दर हुन्छ । यसमाशङ्का नै छैन । ल म जान्छु पनि&#039; भन्दै आकाश गए । शालु पनि आफूनोरुमतर्फ आइन्‌ । आकाशसँग कुरा गरेर शालुको मन भने हलुङ्गो भयो ।आकाश भने छट्पटाउँदै आफनो बेडमा डड्ग्रहा पछारिए । उनलाई सम्पूर्णपृथ्वी नै घुमेजस्ता भयो । एक मनलै सौचै घटघटी विष पिएर शान्ति लिउँतर आँखामा शालुको कार्रुणक दृश्यहरू पनि ताचिरहयो । सोचे यदि मैलैशालुलाई एक बचन प्रेम गर्छु भनेको भए आज त्यौ दुदिन देख्नु पर्दैनथ्यो । अबकसरी पो उनको सम्झनालाई फयाँकैँ ? म नराम्रोसँग हारेँ । शालु, नराम्रोसँग..... । चिन्ताले गर्दा आकाशको भोक तिर्खा सबै हरायो । उनले आफनोभाग्यलाई बार-बार धिक्कारे ।बुक रुम पार्टनर अन्ना, प्रभा, दया केही बोल्न नसकी नुन खाएकोसर &#039;फोक्राइरहे । शालुले छरपष्ट भएको किताबहरू मिलाइन्‌ । किन-किन वकाई लागेजस्तो भयो । ओछ्यानमा पाल्टिन्‌ । आँखा लाग्न मात्र केलाएको थियो । आया दिदी आएर शालुलाई सार्जिकल बार्ड बेड नं. 5४ कोविरामीले बोलाएको कुरा बताइन्‌ । शालु हतार-हतार उठेर दौडिँदै सर्जिकलबार्डमा पुगिन्‌ । बेड नं. ८४ मा हेरिन्‌ आफूले चिनेको मान्छेझैँ लागेन र बेडनं. «४ मा सुकेको काठजस्तै नामको मानव आकृति थियो । शालुलै बैडनजिकैगएर हेरिन्‌ जिङ्ग्रङ्गग कपाल, भित्र गडेका आँखाहरू सिन्काजस्तै हात-खुट्टाशालु त्यो मानब आकृति देखेर डराइन्‌ पनि । शालु अलि हच्केको देखेर त्योकङ्गालभौँ आकृतिबाट आवाज आयौ, &#039;वसन शालु, बस ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले स्टुलमा बस्दै भनिन्‌, &#039;तपाईं को हो मैले चिनिनँ नि ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;म सब बताउँछु अनि चिनिहाल्छयौ नि, अब त तिम्रो पढाइ पनि सिद्धिनलाग्यो भन्दै थिइन्‌ रेष्मा ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले अलि खुसी हुँदै भनिन्‌, &#039;ए तपाईंले रेष्मालाई पनि चिन्नुभएको छ ?तपाईंको स्वास्थ्य बडो नाजुक देखिन्छ । । डाक्टरले बढी खोल्न मनाही तगरेको छैन ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भैगो मेरो चिन्ता नै नलेक तिमीले अझै पनि प्रेम गरेकी छैनौ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हरोइन तपाईं को हुनुहुन्छ ? मेरो सबै नालीबेली थाहा रहेछ । मैलै त प्रेमगरेकी थिइनँ तर मर्यादा ननाघी प्रेम गर्नेहरू पनि हुँदारहेछन्‌ भन्नेचाहिँ मैलेबुझेँ ।&#039; &#039;त्यसो भए उनी आकाश नै होलान्‌ होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिरामीको क्रा सुनेर शालु झन्‌ आश्चर्यमा परिन्‌ र भनिन्‌, &#039;भन्नोस्‌ हामीसबैलाई चिन्ने तपाईं को हुनुहुन्छ नत्र म क्रै गर्दिनँ,&#039; शालु उठिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बस न त्यसै नरिसाक, भोलि भनेको क्या हो बया हो कसो हो । तिमीसँगबेथा पोख्नका लागि त यो मेडिकल कलेजमा भनां भएकी नत्र यहाँ किनआउँदै । मैरो उत्तरको जवाफ नै दिइनौ त्यो युवक आकाश नै होलान्‌ होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले वस्दै भनिन्‌, &#039;तपाईंले ठीक नै सोच्नुभयो । आकाशको चरित्र पनिराम्रो छ तर मैले त फिरोज भन्नेको कुरा गरेकी । उनले मलाई माया गर्छन्‌भन्ने कुरा आजै थाहा पाएँ । हेर्नोस्‌, तर मलाई प्रेमको आभाससम्म छैन । अबविवाहपछि नै प्रेमको आभास हौला । तर, तपाइँ ... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;शालु अभौ चिनिनौ, चिन्थ्यौ पनि कसरी, म मौसमी हँ मौसमी ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले आत्तिँदै भनिन्‌, &#039;ओ, मौसमी तिमी, यौ हुनै सक्दैन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यति छिट्टै तिमी यो अवस्थामा पुग्यौ ? खोई मौसमी तिम्रो त्यौ झःफराउँदोरूप ? मैले त तिमीलाई भनेकै थिएँ । आशक्त अङ्गालोमा प्रेम हुँदैन भनेरतिमीले मानिनौ । तिमीलाई मौसमीभन्दा कसले पत्याउला ? तर, पीर नगरतिमीलाई सञ्चो भएपछि तिमी पुन: पहिलेकै मौसमी हुन्छयौँ । अव त तिमीलेदुनियाँ कस्तो छ देख्यौ, बुझौ होला । भन तिमी कसरी यस अवस्थामापुग्यौ । तिम्रो यो अवस्था देख्दा तिम्रो बाबुको के हाल भयो होला ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले गहभरि आँसु पार्दै भनिन्‌, &#039;शालु बाबुलाई त धेरै पहिल्यै खाइसके ।त्यसैले बाबुको पीर छैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन कसरी मर्नुभयो तिम्रो बावु ? देख्दा त हट्टाकट्टा नै हुनुहुन्थ्योहोइन र ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हो शालु, हट्टाकट्टा नै हनुहुन्थ्यौ । उहाँलाई मुदु दुख्नै व्यथा थियो । जचाउनकँलागि काठमाडौं पनि आउनुभएको थियो । म बैंसको उन्मादले र निमेषकोबनावटी मायाले कहीं कतै केही नदेख्ने भइसकेकी थिएँ । जचाउन आएकोबाबुलाई मेरौ अफिसबाट काजमा जानु छ, पछि आउनोस्‌ । दुख्दा मोज खानुहोला भनी ब्रुफिनको चाङ पठाइदिएकी थिएँ । काठमाडौंबाट पठाएको भोतिसहनै नसक्ने गरी मुटु दुखेछ । बानुले दुखाई कम गर्न थुप्नै औषधि खाएछन्‌ ।औषधि खाएपछि बेहोस भएछन्‌ । वेहोसको बेहोस नै भोलिपल्ट मरेछन्‌ ।यसरी मैले बाचुलाई खाएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;मौसमीको कुराले शालुको आँखा रसायो । शालु चुपचाप भइन्‌ । आँखामामौसमीको हट्टाकट्टा बाबु खुसी हुँदै क्याम्पसमा यताउता नियालेको याद आयो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले सम्झाइ्न्‌, &#039;नरौक शालु हुने हुनामी भइसक्यो । बाबु मेरो योरूप देख्नुभन्दा अगाडि नै मरे राम्रै भयो । उनले मेरो यो हालत देखेको भए ।झन्‌ कसरी आफूलाई सम्हाल्थे होला । उनलाई मारेर राम्रै गरिछु । अब मेरोपीरमा रुनै कोही छैनन्‌ । दाजुदिदीले त एडसरोगी घरमा वस्न पर्दैन भनीनिकालेर नै यहाँ आएकी हुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;तिमीलाई एद्दस छ ! त्यो कसरी ? निमेषले छोडेपछि पनि तिम्रो वुद्धिफर्केन मौसमी ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;निमेषले मलाई एक्कैचोटि कोठीमा लगेर छोडिदियो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन के भनेकी तिमीले क कारसम्म भएको ध्वनी युवक नै थियौ होइन र ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हो शालु क धनी त म जस्ता थुप्रै युवती बेचेर भएको रहेछ । पछि पोबुझेँ । डुङ्गा डुबिसकेपछि चेत आएर के लाग्यो र ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;तिमी पढेलेख्रेकी मान्छे, केही अन्दाजसम्म काटिनौ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले शालुको हात समातेर सिरानीको अडेसा लगाई वस्दै भनिन्‌,“शङ्का गर्ने त सात्तो आँखी झयालसम्म राखेनन्‌ चुतियाहरूले, म मात्र होरमसँग अरू पढेलेखेका दुई युवतीसमेत बेच्रिए । उनीहरू एड्स लागे पनि केहीहृष्टपृष्ट भएकाले अझै कोठीमा नै होलान्‌ । मलाई भने युवक वृद्धहरूलेपत्याउन छोडेपछि निक्लिन्न भन्दाभन्दै पनि निकालिदिए ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;तिमीहरू तीनैजनालाई निमेषले नै वेच्यो त ?&#039; शालुले प्रश्न गरिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले केहीबेर रोक्किएपछि पुनः ओठ खोलिन्‌, &#039;उनीहरूलाई पनि प्रेमीहरूलेनै बेचे । उनीहरूसँग हाम्रो भेट नगरकोटमा भएको थियो । उनीहरूको तीनवटाजोडी बुटवलबाट नगरकोट घुम्न भनी आएका रहेछन्‌ । हामी सबै उस्तैउस्तोकरा मिलिहाल्यो । हामी सबैले छ-सात दिन नै नगरकोट बसेर खुव रमाइलोगन्यौं । जय भन्ने एउटा साह्रै हँसाउने कवि थिए । उनकी प्रेमीका भने केहीउदास देखिन्थिन्‌ । उनको उदासपन देखेर हामीलाई अझै हाँस्ने बहाना मिल्थ्यो ।हामी कविलाई अलि हृष्टपुष्ट हुनुपत्यो भन्दै उल्याउँथ्यौं । कवि हाँस्दै धेरैखानेकुरा खान्थे । र, कुनै न कनै निता शुनाइहा ल्थै । नगरकोट गएको तेस्रोदिन हामीले साह्रै गिज्याएपछि कविले कविता भनेको अझै याद छ।&lt;br /&gt;
तपाईंहरू आज हाँस्तोस्‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोलि हाम्रो पालो&lt;br /&gt;
मेरी मैयाँलाई थाहा छैन&lt;br /&gt;
के मायाको जालो ।&lt;br /&gt;
बहमचारी बन्दा म&lt;br /&gt;
यिनलाई पप्यो गाह्रो ।&lt;br /&gt;
सबै टुद्दा यिनी जुदछिन्‌ ।&lt;br /&gt;
नभन्नोस्‌ आज साह्रो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसपछि निमेषलगायत हामी सवैको मुख रातोरातो भयो । कसैले केहीबोल्न सकेनौँ । कविले हामीलाई नराम्रो पर्ला भनेर करा मोडिहाले । हामीलेअझ केही दिन नगरकोट बस्ने इच्छा व्यक्त गरेपछि कवि बावु विरामी भएछन्‌&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भन्ने वहाना बनाई हामीसँग फुत्किएर बुटवल आए । हामी सारा संसार भुलेरएक-अर्काको बाहपासोमा रमाइरहयौं । नगरकौटमै हाम्रौ तीन गुप्रको अलइन्डियाटुरमा जाने योजना बन्यो । कविका प्रेमी-प्रेमिकाहरूलाई सम्झाएर लैजानेसल्लाह पनि गत्यौं। पछि निमेषहरूले कविको भित्री मनशाय बुझेछन्‌ ।कविको प्रेम वास्तव्रमै साँचो प्रेम हो भन्ने बुझेरै होला निमेषहरूले कविलाईआफ्‌संग नलैजाने सल्लाह गरे । हामी बैँसले कृत्कत्याएर आ-आफनो प्रेमीकोअङ्गालोमा मस्त हँदै इन्डियाको ट्रका लागि निस्कियौं । इन्डियाबाट फर्कनेवित्तिकैविवाहवन्धनमा वांधिने सल्लाह पनि भयो । हामी तीनैजना युवतीले विबाहभएको मीठो सपना पनि देख्यौं । दार्जिलिङ, आसाम, बर्साङदेखि आग्रासम्मकोयात्रा भयो । हाम्रो खुसीको कुनै ठेगान नैं थिएन । यहाँसम्म आएपछि मुम्बैकिन नजाने भन्ने कुरा भयो । हामी सल्लाहले नै मुम्बै पुग्यौं । मुम्बैको भव्यहोटलमा पुगेपछि हामी छ जनाले नै एउटै कोठामा डिनर गन्यौं । डिनरसँगैहिवस्की, बाण्डी सघ्वैँ पिइन्थ्यो । त्यो दिन पनि पिएर आ-आफनो प्रेमीकोकाखमा निर्धक्कसँग सुतेर जिस्किँदै भविष्यको मीठो सपना देख्दै थियौं । निमेपलेमलाई गालामा म्बाइँ खाँदै भन्यौ, “मेरी प्यारी, कृपया एकछिन काख छोड,हामीहरू सुत्ने रुमको व्यवस्था गरेर आउँछौं ।&#039; उनीहरू तीनैजना रुमकोव्यवस्था गरेर आउँछौँ भनी हिँडे । हामी तीनजना बचेखुचेको रक्सी पिएरमस्तले रमाइरहयौँ । साँझको आठ बजेतिर हामी त्यहाँ पुगेर डिनर गरेकाथियौं । उन्तीहरू रुम खोज्छौं भनी निस्किँदा करिव नौ, सवा नौ जति बजेकोथियो होला । उनीहरू एक घन्टासम्म नआउँदा त हामी त्यति अत्तिएनौँ ।बिस्तारै एक डेढ घन्टा जति समय बित्दै गयौ । त्यसपछि हामी डराउनथाल्यौं । यत्रो ठूलो होटल, उनीहरूले रुम पो विर्सेछन्‌ कि भनी हामी ढोकामापुगी ढोका खोल्न लाग्दा ढोका बन्द रहेछ । हामीले घन्टी बजाउन थालेपछिएउटा अधबैंसे आइमाईले भित्र पस्दै भनी, &#039;किन घन्टी बजाएको तिमीहरूले :तिमीहरूले आफनो लभरहरू खोजेको हो ?हामीले &#039;हो, उहाँहरू किन फर्कनुभएन&#039; भनेर सोध्यौं । त्यो आइमाईलेविदेशी भए पनि राम्रै नेपाली बुझने र बोल्न जान्ने रहिछै । उसले बडो मीठोहाँस्दै भनी, &#039;पीर नगर, हामी तिमीहरूका लागि घन्टा-घन्टामा छुट्टै-छुट्टै लभरहरूपठाइदिन्छौं । तिम्रा लभरहरू भने तिमीहरूलाई यहाँ बेचेर टाप कसिसकै ।तिमीहरूलाई यहाँसम्म ल्याउन उनीहरूको पनि धैरै पैसा खर्च भएछ । यसपालित्यति नाफा भएन भन्थ्यो निमेष ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसैको मेहरवानले गर्दा यो कोठी राम्रोसँग चलेको छ । मौसमी तिमी हैनौ ?तिम्रो फोटो त पहिले नै आएको हो, मोलमोलाई नमिलेपछि उसले ल्याउनैमानेन । तिम्रो कारणले म पनि अलि घाटामा नै गएकी छु । तर, केही छैन तिमीलेचाँडै नै पैसा उठाउँछयौ । तिम्रो फोटो बडेबडे खान्दानकोमा पुगेको छ ।&#039;आइमाईको कुरा सुनेर हामी थरथर काम्न थाल्यौँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले रिसाउँदै भनी, &#039;किन डराएका छौ : तिमीहरू कमारी केटी हौँ र?बडिया-बडिया खाना खान र बडिया-बडिया लोग्नेमान्छे पाइहाल्छौ ।&#039;&lt;br /&gt;
हामी तीनैजनाले रुँदै उसको पाउ समातेर भन्यौं, &#039;हामी यहाँ वस्दैनौं ।हामी तपाईंको पैसा जसरी पनि चुक्ता गर्छौं ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले सातो खाउँला जस्तै गरी रिसाउँदै भनी, &#039;चुप लाग्‌, गएर बस्‌ ।सबैलाई पहिलोपल्ट तह लगाउन गाह्रौ हुन्छ । हामीले भनेको चुपचाप मानेनौभने चुरोटको ठुटोले पोल्छौं । तातो फलामले पोल्छौं । त्यसपछि हामी वोल्नसकेनौं । तीनजनाले रोएरै त्यो रात कटायौं । भोलिपल्टदेखि हामीलाई छुट्टाछुट्टैकोठामा बन्द गरी धन्दा गर्ने लगाई । पहिला-पहिला त घेरै नाइँनास्ती गयौं ।तर, केही नचलेपछि बोल्नु वेकारझौँ लाग्यो । निमेषले नै धेरैको सङ्ख्यामा केटीबेचेको रहेछ । तिम्रो कुरा मानेकी भए आज यो दुर्दिन देख्न पर्दैनथ्यो । मतिमीलाई प्रत्येक दिन सम्झन्थेँ । पश्चात्ताप गर्दै रुन्थे । एड्स लागेर असक्तभएपछि बाईले गाउँमै जानु भनी पुग्ने बाटाखर्च दिएर पराई । म त्यो पापीनिमेषलाई जेल जाक्छु भनी सिधै काठमाडौँ आएँ । प्रहरी कार्यालयमा उसकोफोटो देखाएर सबै क्रा वताएँ । प्रहरी निरीक्षकले सिधै भने, &#039;तिमीहरूजस्तादुईपैसेलाई नबेचेर कसलाई बेच्छन्‌ त : तिमीहरूजस्ता दुई-चार अक्षरपढेलेखेकाहरूले आफनो मर्यादा विर्सेपछि नै यस्ता दलालहरूले मोटाउनेमौका पाएका छन्‌ । हामी त खोजखवर गरेर यहाँसम्म लेराइदिउँला । यहांलेराएको भोलिपल्ट नै यहांबाट निकाल्न बाध्य हनुपर्छ । उनीहरूको पहुँच धैरैमाथिसम्म हुन्छ । बरु सक्छ्यौ भने तिमी नै कूनै सजाय देक । जसले गर्दाउसले अरूलाई बेच्न नसकोस्‌ । त्यसपछि पुलिसले निमेषलाई जेलमा तकोच्यौ तर प्रहरीले भनेझैँ केही दिनमा नै जेलबाट निस्कियो पनि ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले मौसमीको कुरा बीचैमा काट्दै भनिन्‌, &#039;मौसमी, मलाई तिम्रो कुरासुन्न त कुनै आपत्ति छैन तर तिमीलाई चाहिँ ज्यादै गाह्रो भएजस्तो छ नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले फिस्स हाँस्दै भनिन्‌, &#039;शालु मलाई गाह्रो भएको छैन । म यो क्षणयतिविग्न खुसी छु कि क्रै छोड बरु मेरो कुरा सुन । म तिमीलाई पीडा बाडेरहलुको हन चाहन्छु&#039; भन्दै मौसमीले कुरा बढाइन्‌, &#039;आफनो साथमा केही पैसाभएको हँदा मलाई वस्न, खानचाहिँ गाह्रो भएन । एक मन लाग्यो वरु मछुँ तरभित्री आत्माले मर्न पनि मानेन । म यताउता भौँतारिँदै दिनहरू बिताइरहेकीथिएँ एक दिन न्यूरोडमा गहना पसलतिर जाँदै गरेको निमेष र एउटी युवतीलाईदेख । म उनीहरूको पछिपछि लागें । औंठी किनेर निस्केपछि निमेष युवतीलाईयहीँ बसिराख म मोटरसाइकल लिएर आउँछु भनी मोटरसाइकल पा्किङतिरलाग्यो । मैले त्यो युवतीलाई च्याप्प समातेर निमेषको फोटो देखाउँदै निमेषकोबारेमा मौटामोटी कुरा भने । युवती बडो बुझकी रहिछिन्‌ । मलाई धन्यवाददिँदै भनिन्‌, &#039;च्याङ्कयु म बच्चेँ । तपाईँ यही बस्नोस्‌ म केही बहानाले उसबाट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फृत्केर आउँछ । मेरो घरमा नै गएर सबै कुरा गरौंला भनिन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
म उनको विश्वास गरेर त्यहीँ बसेँ । नभन्दै उनी केहीबेरपछि नै आइन्‌ ।द्याक्सी लिई हामी उनको घर वौद्धतिर लाग्यौं । डोल्मा मगर जातकी रहिछन्‌ ।ट्याक्सीमा बसेपछि उनी केहीबेर बोल्न सकिनन्‌ । केहीवेरपछि मुटुमा गाँठोपार्दै भनिन्‌, &#039;दिदी तपाईंलाई नभेटेकी भए आज हामी डिनरको लागि होटेलसौल्टीमा जानै प्लान थियो । सहतै नसक्ने गरी पेट दुख्यो दयाक्सीमै घर जान्छुभोलि भेटौंला भनी फुत्किएर आएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले सोधेँ, &#039;तपाईंहरूको भेट कहिले कसरी भयो : शारीरिक सम्वन्ध भयोकि भएको छैत ?&#039; उत्ले आफतो भेट पच्चीस-तीस दितअगाडि बौद्धजयत्तीकोदिन बौद्धको गुम्बामा भएको र शारीरिक सम्बन्ध भने नभएको बताइन्‌ । कुरागर्दागर्दै हामी उनको घरमा पुग्यौँ । उनको बाबु-आमा आफनो पुर्ख्यौली घरधरान भएकोले उनी एक्लै रहिछिन्‌ । उनी पदाकन्या क्याम्पसमा बी.ए. पढ्दैरहिछिन्‌ । दुई फल्याट घर भाडामा दिएको रहेछ । खाना, डेरा वस्ने एउटीदिदीले पकाएर ल्याइदिइन्‌ । खाना खाएपछि मैले उनलाई आफनो सम्पूर्णकुराहरू एकएक गरी बताएँ । उनले मैरो सबै कुराहरू सुनित्‌ । त्यसपछिउनले एकएक गरी आफनो योजना सुनाइन्‌ । मैले उनको कुरा खुसी साथमञ्जुर गरेँ, हाम्रो सोजना बनिसकेपछि निमेषको फोत आयो । डोल्माले आफनोघरमा कोही नभएकोले भोलिको डिनर यहीँ गर्न आनुहोस्‌, मलाई अलि पेटदुखेकै छ भनिन्‌ । उसले डोल्माको कुरा खुसीसाथ स्वीकार गन्यो । राईकोछोरी हक्की र निहर स्वभावकी । त्यसमाथि मामा प्रहरी इन्स्पेक्टर रहेछन्‌ ।हामी भौलिको योजना सफल नै पार्ने प्रतीक्षा गरेर सुत्यौँ । यौजना सफल हुन्छकि हुँदैन भन्ने केही डर त थियो नै । भोलिपल्ट साँझ सात बजेतिर डोल्माआफैँ गएर निमेषलाई घरमा ल्याइन्‌ । उनीहरू कोठामै बसे, मैले खानेक्राओसार्नै काम गरेँ । डोल्मा राईकी छौरी, पहिलेदेखि नै पिउने भएकीले पिउनकुनै आपत्ति थिएन । निमेषले डोल्माको रूपको र आफूले किनिदिएको औंठीलाउँदा सुहाएको हातको प्रशंसा गयो । रक्सी लाग्दै गएपछि उनीहरू एक-अर्कासँग हात हालाहाला गरी चल्न थालै । रात पनि छिप्पँदै गयो । मैलेपूर्वपोजनाअनुसार मेन स्विचबाटै बत्ती अफ गरिदिएँ । वत्ती गएको चालपाएपछि निमैषले खुसी हुँदै भन्यो, &#039;डोल्मा बत्तीले पनि हाम्रो भावना बुझयो&#039;भन्दै नशामा ढुनमुनिँदै बेडमा पुग्यो र डोल्मा सुटुक्क कोठाबाट वाहिरिन्‌ । मडराउँदै बेडमा पुगें । उसलाई आफनो बसमा पारेँ । क नशामा डोल्मा-डोल्माभन्दै मग्न भयौ । बेलुका दुईपत्ट उसलाई बलात्कार गरेपछि मलाई आफूलेसंसारै जितेजस्तो लाग्यो । म त्यहीँ आनन्दले निदाएँछ्‌ । भोलिपल्ट बिहानडोल्मा-डोल्मा भन्दै छामेपछि म ब्युँझे । त्यो पापीलाई हेरेर हाँस्दै भने, &#039;निच,पापी, म मौसमी हँ । मौसमी आँखा खोल । हेर, मैले पनि तँ जस्तो निचलाईपतन गराएँ । तँलाई एड्स सारिदिएँ हो एड्स ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
का आत्तिँदै उठेर चिच्यायो, “तँ को होस्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
डोल्माले ढोका खोल्दै भनिन्‌, &#039;चिनिनस्‌ गधा उनी मौसमी हुन्‌ । तैँलेमुम्बईमा बैचेकी मौसमी । तैंले गर्दा उनलाई एड्स लागेको छ । त्यो एड्सतँलाई पनि उपहार दिन चाहिन्‌ । मैल्ले उनक्रो पूर्ण सहयोग गरेँ । तँजस्तापापीलाई यसरी नै मार्नुपर्छ बुझिस्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
निमेष मु्दाजस्तै भयो र डोल्माले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;अव खुरुक्क यो घरबाटनिस्की, नत्र पुलिस डाकेर जेलमा कोचिदिन्छु । बुझ असत्ती चोट आफूलाईपर्दा कति असैहय हुँदोरहेछ । अब केका लागि वेच्छस्‌ केटी, तेरो त मृत्युनिश्चित छ।&#039;&lt;br /&gt;
मैले थुक्दै गाली गरेपछि निमेषले रुँदै भन्यो, &#039;चुप लाग वेश्या, मैले तैरोबलात्कार गरेको हुँ ? म त्यस्ती केटीको खोजीमा थिएँ, जसलाई प्रेमको मूल्यथाहा होस्‌ । मैले तँ जस्तै पैसामा बिक्ने र यौवनकै माया गर्नेलाई वेचेँ त केपाप गरेँ हँ ? तैलेजस्तै अन्योलमा पारेर कसैको वलात्कार गरेको छैन । हो,डोल्मा म तिम्रो व्यबहार देखेर तिमीलाई साँच्चै माया गर्न लागिसकेको थिएँ,तिमीले पनि डिनरका लागि जान्छु भनेपछि म एकपल्ट रोएँ । तिमीले औँठीसहजै स्वीकार गौ । मैले बुझौं तिमी पनि सुनलाई प्रेम गछयौं । अझ के-केलाई प्रेम गर्थेक बुझन बाँकी नै थियो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डोल्माले भनिन्‌, &#039;तिमीले सोह्रैआना ठीक कुरा नगरे पनि केही हदसम्मठीक कुरा गन्यौ । चाहे जे होस्‌, तिमीले केटी बेच्नेचाहिँ नहुने थियो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले भने, “साले तैँले पनि त जीबनको सही अर्थ बुझाउन सक्थिस्‌ । जसरीकबिले आफूली प्रेमिकालाई बुझायो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमैषले आँसु पुछ्दै भन्यो, &#039;चुप लाग आफनै बाबुलाई मार्ने हत्यारा । तँजस्तालाई प्रेमको अर्थ बुझाउने ? कविले प्रेमीलाई नछुँदा क कति रिसाएकीथिई । तैँले आफनै आँखाले देखेकी होइनस्‌ : कवि युवतीलाई प्रेमको मूल्यबुझाउन होइन तिमी मेरो प्रेमी बन्न लायक छैनौ भन्न घर गए । पहिलोप्रेमीलाई पनि यौग्य नभएर कवि आफैँले छोडेका थिए । उनले तिमीहरूजस्ताको यौनइच्छा पूरा गरेनन्‌ । मैले पूरा गरे&#039; भन्दै निमेष रुँदै बाहिरियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले र डोल्माले मुखामुख गरी एक-अर्कालाई हेन्यौं । हामी दुवैलाई आफ्नैछायासँग केही मात्रामा घृणा लाग्यो नै । म त्यही क्षण डोल्माको घर छोडीगाउँतिर गएँ । गाउँमा एड्स लागेको थाहा पाएपछि सबैले छी:छी: र दुरदुरगरे । पछि काठमाडौं नै फर्किएँ । यहाँ आएपछि थाहा पाएँ, निमेषले विष सेवनगरी आत्महत्या गरेछ । म भने आत्महत्या गर्दिनँ । बरु बाँचुञ्जेल एड्सबारेमाचेतना फैलाउने काम गर्छु । धन्य तिमी, तिमीले फिरोजजस्तालाई नयाँ जन्मदियौ । मैले निमेषको दर्दनाक हत्या गरेँ ।&#039; मौसमीले सुँक्कसुँक्क गरी रुँदै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भनिन्‌, &#039;निमेषलाई मारेकोमा मलाई गर्वचाहिँ छैन । खासै पछुतो पनि छैन ।नढाँटी भन्दा मैले उसको बलात्कार गरेँ । उसले मेरो बलात्कार गरेकोचाहिँहोइन । तिमीसँग सम्पूर्ण क्राहरू गरी माफ माग्ने ठूलो इच्छा थियो । म तिम्रो,खोजीमा भौंतारिरहेकी थिएँ । अस्ति रोहिणी भनेर बोलाएको त रेष्मा पोरहिछिन्‌ । उनले तिमी यहाँ पढ्छयौ भनेपछि यहाँ आएकी हुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले मौसमीलाई मायालु पाराले हेर्दै भनिन्‌, &#039;घर जलेपछि इनार खन्नुकोऔचित्य छैन । तर तिमीले चार-छ जनालाई मात्र भए पनि बाटो देखाउनसक्यौ भने उनीहरू भयावह धापबाट मुक्ति पाउन सक्नेछन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म पनि त्यही सोच्दैछु । मैले तिम्रो निद्रा बिगारैं होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मौसमी, जाबो निद्राको चिन्ता नगर, तिमीले मलाई सम्झेर यहांसम्मआयौ । त्यो भन्दा ठूलो मेरा लागि केही छैन । ल अब जान्छु । मर्नु त एकदिनसबैले छँदैछ । ढिलो-चाँडो न हो । पीर नगर ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;मलाई मृत्युको पटक्कै चिन्ता छैन । मेरो पीरनगर ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु मौसमीसँग बिदा भएर सर्जिकल वार्डबाट बाहिरिन्‌ । मौसमीले एकोहोरोशालु गएतिर हेरिरहिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==तेईस==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्नले पढाइ सिध्याएर आएपछि रोहिणीको जीबनमा बसन्तको बहारआएझौं भयो । पीताम्बरा, कैशव, चन्द्रकान्त, कान्छी, शालु सबैसबै खुसीथिए । विवाहको दिन पनि तय गरियो । विबाहका लागि आमालाई लिएरआउँछु भनी गएको प्रशन्न नफर्केपछि सबैको मनमा सातो गयो । सवैले आ-आफनो अनुमान गरे । इन्जिनियरसम्म भइसकेको प्रशन्न एकैपल्ट दुलही लिनआउने सुर गरे होला । निम्ता बांड्नेदेखि लिएर विबाहको सम्पूर्ण तयारी भयो ।प्रशन्तको भने अत्तोपत्तो भएन । यता रोहिणीलगायत सबैको सातो गयो ।प्रशन्नको खोजखबर गर्दा प्रशन्न घरमा नै नपुगेको करा पत्ता लाग्यो । रोहिणीप्रशन्तको चिन्ताले गर्दा मूर्दामा परिणत भइन्‌ । छिमेकीहरूले काखी बजाउनेठाउँ पाए । रोहिणीको चरित्रमाथि आक्षेप लगाउँदै भने, &amp;quot;पहिले छाडा सांढेजस्तैछोडेका थिए, बल्ल चाल पाए । त्यो वूढी कन्यालाई इन्जिनियरजस्तो केटाले केविवाह गरोस्‌ ? बैंसलाई थेग्न नसकेर मोजमस्तीचाहिँ गन्यो, विबाहचाहिँ केगर्थ्यौ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युबाहरू रोहिणीको विवाह भएन भने आफूहरूले रोहिणीमाथिको अधिकारजमाउने कुरा गर्दै जुंगामा ताउ लगाउँथे । यसरी समाजले रोहिणीलाई पूर्ण&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रूपमा वेश्यामा परिणत गयो । रोहिणीका परिवारचाहिँ प्रशन्तमाथि कनैदुर्घटना नै भयो भन्ने पीरले व्याकुल भए । रोहिणीको हृदयमा लागैको आगोनिभाउन कसैले सकेनन्‌ । यता शालु रोहिणीको र सुजनको चिन्ताले विचलितभएपछि फिरोज पनि प्रशन्नको खोजीमा लागे । केही दिनमै फिरोजले वास्तविकतापत्ता लगाएरै छोडे । बास्तव्रिकताचाहिँ प्रशत्नले करोडपति सचिब तिरञ्जतकोबीसबर्षे पौडसी छोरी नर्मदासँग रोहिणीको बिबाह गर्ने भनेकै दिन बिबाह गरेरहनिमुन मनाएर पनि आइसकेछ । फिरोजको क्रा सुनेर केहीक्षण त शालुलेआफूलाई सम्हाल्नै सकिनन्‌ । रोहिणी र उसको उदार दिल भएका बाबुआमालाईप्रशन्नको वास्तविकता ओकेल्न तागत नभएपछि यो जिम्मा शालुले फिरोजलाईसुम्पिइन्‌ । फिरोजले वास्तविकता बताउँदा घरमा मान्छे मरेजस्तै रुवावासीभयो । रोहिणी मूर्छा परिन्‌ । डाक्टर आएर स्लाइनपानी दिएको दस-पन्धरमिनेटपछि रोहिणीको होस खुल्यो । होस खुलेपछि स्लाइनको तार चुतैर फयाँग्दैरोहिणी चिच्याउन थालिन्‌, &#039;पापी फिरोज तैँले झूट बोलिस्‌ । शालु तँ पनिपापिनी होस्‌ । प्रशन्त मलाई केबल मलाई मात्र प्रेम गर्छन्‌ बुझिस्‌ ? तिमीहरूलेत के स्वयम्‌ भगवान्‌ नै आएर प्रशन्नले तँलाई धोका दियो भने पनि मगत्याउँदिनँ । बरु भन्‌ मेरो प्रशन्नलाई के सङ्कट परेको छ : तेरो फिरोजजस्तोहोइन मेरो प्रशन्त क देबता हो देबता ... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रोहिणीको गालामा दुई &#039;फापड दिँदै भनिन्‌, &#039;चुप लाग सुंगुर्ती, कतिरेदछैस्‌ दैवजस्तो बाबु-आमालाई । तेरो तमासा हेर्न छिमेकीहरू बसिरहेकाछन्‌ । त्यसका लागि मर्ने चाहन्छेस्‌ होइन ? म तँलाई विष दिन्छु तँ मर । तेरोबाबु-आमाले तेरो यो हालत देख्न त पर्दैन । तँ जस्तो स्वार्थी बाच्नु व्यर्थ छ ।तैँले त कनाले त्यत्रो त्यागको बदला के दिइस्‌ ? केवल आँसु र जलनदिड्स्‌ गा&lt;br /&gt;
मेरो प्रशन्त मलाई छोड्न सक्दैनन्‌, मैले बुझ उसबाट मलाई छटाउनेषड्यन्त्र हो तिमीहरूको, क गरिब छ त के भो मन छ सँग । मलाई धनकोलालच छैन म अहिल्यै उसलाई भेद्छु हो अहिल्यै .. ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुलै भनिन्‌, &#039;रौहिणीलाई प्रशन्नको बास्तविक रूप देखाउनैपर्छ । उनीपागल हुन्छिन्‌ तर प्रशन्न नराम्री हो भन्ने क्रामा विश्वास गर्दिनन्‌ । समाजलेजे भनोस्‌ एकपल्ट रोहिणीलाई प्रशन्नसँग भेटाउनैपर्छ, ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुको कुरा सबैलाई ठीक लाग्यो । फिरोज रोहिणीलाई लिएर प्रशन्नबसेको भव्य महल कालिमाटीमा पुगे । कार रोकी घरमा कोही भएको-नभएकोकुरा बुझे । संयोग घरमा प्रशन्न मात्र रहेछ । फिरोजले रोहिणीलाई डोच्याउँदैप्रशन्तको कोठामा पुसाउँदा प्रशन्न झसङ्ग भएर उड्यो । रोहिणीले प्रशन्नलाईदेखेपछि गर्लम्म अङ्गालो हाल्दै भनिन्‌, &#039;प्रशन्त यिनीहरू सन &#039;फुटा हुन्‌ ।यिनीहरूले तिमीलँई पापी भने । प्रशन्न तिमी पापी होइनौ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्तले आफनो मजबुत हातले जवर्जस्ती रोहिणीलाई समातेर भुइँमापछादैं भन्यौ, &#039;ए, बूढीकन्या, तँ यहाँ किन ? तैले पढाउँदा लागेको दोब्बर पैसाभोलि नै म त्यरौ मुखमा फयाँक्छ । निस्की, निस्किहाल, के सम्झेर तँ यहाँआइस्‌ ? तेरो बैंस निखिसक्यो । तैँले मलाई पैसाले किन्न खोजेकी होइनस्‌ ?&#039;अब गाडावालालाई किनेर विवाह गर, नत्र अरूले पत्याउंदैनन्‌ । हेर मेरीप्यारीको तस्बिर भन्दै स्वास्नीको फोटो रोहिणीको आँखामा तेर्स्यायो र रोहिणीलाईघिसारेर ढोकाबाहिर फयाँक्दै फिरौजतिर हेर्दै भन्यो, &#039;तैँले किन यस वेश्यालाईयहाँ ल्याइस्‌ हँ ? यो कोठीको मात्र रौनक बन्न सक्छै । घरको रौनक बन्नसक्दिन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले रोहिणीलाई उठाउँदै भने, &#039;रोहिणीजस्तीको प्रेमलाई लत्याएकोछस्‌ । तँ कुनै दिन घरको न घाटको हुन्छस्‌ ।&#039;&#039;जञा-जा तँ नै विबाह गर यसलाई बडो गाली गर्दोरहेछ साले ... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले मूर्दाजस्तै भएकी रोहिणीलाई डौच्याउँदै कारमा हालै । रोहिणीलाईविश्वास नै लागेन कि मान्छे त्यति धेरै गिर्छ । रोहिणीको आँखामा प्रशन्न,बेहोस भएको दृश्य, उसको कोठाको दृश्य, आफूलाई घिसारेको दृश्य आँखामाएकपछि अर्को गर्दै नाचिरहयो । यता घरमा सबैज्ञना रोहिणी र फिरोज आउनेप्रतीक्षामा थिए । रोहिणी र फिरोज आएपछि शालुले डोच्याएर कोठामा लगिन्‌ ।रोहिणीलाई तकियामा अडेस लगाउन लगाई ओठल्लयानमा बसाइन्‌ । रोहिणीलेसबैलाई एक-एक गरी हेरेर बर्बर आँसु झारिन्‌ । शालुले आँसु पुर्छिदिँदै भनिन्‌,&#039;रोहिणी किन रुन्छेस्‌ भन्‌ त ? हामी सबैलाई हेर । हामी सबै तेरो खुसीकालागि जे पनि गर्ने तयार छौं । भन अव हामीले के गर्नुपन्यो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले आँसु पुछ्दै भनिन्‌, &#039;शालु त कति महान्‌ छेस्‌ । त्यसैले त सबैकोप्रिय छेस्‌ । तँलाई मैले त्यत्रो गाली गरेँ, तैँले त्यो पनि विर्सिस्‌ ? आज मलाईथाहा भयो । मेरो स्वयम्बर तैंले नै रोकेकी होस्‌ । तँ मलाई हरबाघाबाट मुक्तिगराउन चाहन्थिस्‌ । तर, मैले तँलाई के-के सोचेँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केशवले आँखाको आँसु पुछ्दै भने, &#039;तिमीले ठीक भन्यौ छोरी, तिम्रो स्वयम्बररोक्ने कुरा शालुले नै गरेकी थिइन्‌ । अझ स्वयम्बर भइसकेको भए योसमाजले के भन्थ्यो होला । यो कुरा मलाई र शालुलाई मात्र वाहा छ । अब जेहुनु भैगो पीर नगर ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले जुस ल्याएर दिँदै भनिन्‌, &#039;अब बिस्तारै जुस खा । तिमी धेरैथाकेकी छयौ । हामी एक भयौं भने जस्तोसुकै बिकराल हुरीको पनि सामनागर्न सम्छौं । तिमीले हिम्मत हान्यौ भने हामी सबै टुदछौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले गहभरि आँसु पार्दै भनिन्‌, &#039;अब म हिम्मत हार्दिनँ शालु, ममी,बाबा, दिदी, दाइ, तँ कसैले पनि मेरो पीर गर्नुपर्दैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीको कुरा सुनेर सबैको मुख उज्याले भयो । शालु र फिरोजलाई नैसबैले धन्यवाद दिए । मोनाले सबैलाई च्रिया बाँड्दै भनिन्‌, &#039;शालु दिदी, मैलेपत्ति कान्छीदिदीले जस्तै गरेँ नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन के कान्छी दिदीजस्तो गज्यौ ? मैले त कुरा नै बुझिनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;मैले आफनो छौराछोरीको नाम तपाईंकै नामबाटराखेँ, सागर संकिना ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाको क्रा सुनेर सबैजना हाँसे । म पनि तैरै नामबाट ..... । भन्दाभन्दैरोहिणीको आबाज बीचैमा रोकियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीको क्राले सबैको आँखामा आँसु भरियो । कोठामा केहीबेर सन्नाटाछायो । कान्छीदिदीले क्रा मोडिन्‌, &#039;आजचाहिँ म रोहिणी मैयाँसापलाई मनपर्नेखाना बनाउंछु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीको कराले रोहिणीले सबै करा बिर्सेर हाँस्दै भनिन्‌, “मैले शालुको डाहगर्छु भनेर होला भो-भो गर्दिनँ । शालुलाई मन पर्ने चिज नै बनाउनुहोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले घडी हेर्दै भनिन्‌, &#039;ल दिदी यही कालीलाई मनपर्ने चिज नै बनाउनुहोस्‌ । म जान्छु पनि, सुजनको कुरा हामी सबैलाई थाहा नै छ । अस्तिदेखिअलि चाँडो घर आउन थालेका छन्‌ । म घरमा भइनँ भने उनी झन्‌ मनोमानीगर्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबैले शालुलाई घर जान आग्रह गरे । शालु र फिरोज बिदा भएर आफूनो-आफनो घरतर्फ लागे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीको केही परिवर्तित व्यवहारले रोहिणीको परिवार त केही खुसी भयोतर रोहिणी प्रशन्नले हानेको बञ्जको चोट सम्झँदा क्षण-क्षणमा रन्धनिन्थिइन्‌ ।त्यसमाथि समाजले रोहिणीको परिवारको खोइरो खन्न कनै कसर बाँकी राखेन ।भन्थे, &#039;बुढेसकालमा छौरी पाएँ भनेर मैमत्त भएका थिए । छोरीले नाकमा दिसालगाई हाली । रोहिणीजस्ती सन्तान जन्मतुभन्दा त नजन्मिदिएको भए हाइसन्चौहुन्थ्यो । आज यो दिन देख्न पर्दैनथ्यो । कतिबटा बच्चा फयाँकी कुन्नि ? अवकसले बिवाह गर्छ, त्यस्तालाई । छौरो नभएको घर बूढीकन्या बस्ने भई, राम्रैभयो।&#039;&lt;br /&gt;
कोही छिमेकी सद्भावना देखाउँदै स्वास्नी मरेको, छोराछोरी भएकाहरूकोकुरा लिएर आई भन्थे, हेर्नोस्‌ माटाको भाँडो फुटेपछि फुदयो-फुदपो । फलानोस्वास्नी मरेकोले त्यस्तै केटी भए पनि हुन्छ भनेको छ । थपक्क आँखा चिम्लेरदिनोस्‌ । त्यही पनि गुम्यो भने फेरि झन्‌ फसाद पर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कोही विवाह गरेर छोराछोरी नभएकाहरूको कुरा लिएर आई भन्थये- &#039;फलानालेबिवाह गरेको बीस वर्ष हुँदा पनि बच्चा भएन रै । रोहिणीले बच्चा फयाँकेकी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुनाले उनीबाट बच्चा हुन्छ भन्नै निश्चय छ, त्यसैले मार रोहिणीलाई माग्नपठाएका छन्‌ । दिनोस्‌, रोहिणीको भाग्य वन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
युवाहरू रोहिणीको घरनजिकै आएपछि यस्ता गीतहरू गाउँदै हिँड्थे ।गेट खुल्लै राख मैयाँ&lt;br /&gt;
भयाल खुल्लै राख&lt;br /&gt;
अरूलाई डाकेजस्तै&lt;br /&gt;
हामीलाई पति डाक&lt;br /&gt;
हौ .. हो हामीलाई पनि डाक ।&lt;br /&gt;
ओरालो लागेको मृगलाई बाच्छाले पनि खेद्छ भनेझैँ रोहिणीको आदर्शपरिवारलाई टिक्नै नसक्ने गरी बद्नाम गरे । रोहिणीको परिबार चुपचाप सवैघृणा पिउन विबश भए । सबैको दुर्बाच्य सुन्न नसकेपछि एक दिन केशवलेकान्छीसँग रुँदै भने, &#039;कान्छी, अव हामी यो समाजमा बाँच्न सक्दैनौं । हामीपलपल मर्नु साटो एकैपल्ट मछौं । हामी चारजना सुतेको बेला घरमा आगोलगाइदेङ, तिमीलाई धर्म हुन्छ । अब यो समाजले रोहिणी र रेष्माको विवाहहुन दिँदैनन्‌ । उनीहरूको आँसु पनि कति हेर्नु ?&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीले सम्झाइन्‌, &#039;बावा हजुरजस्तो मान्छेले यस्तो भन्त सुहाउँदैन ।कालो रात सधैँ रहँदैन । म शालु मैयाँसँग सल्लाह गर्छु, केही उपाय निस्कन्छकि।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कंशवले सुस्केरा हाल्दै भने, &#039;त्यो फूलजस्ती बच्चीलाई कति चोट दिनु ?सुजनको पीरले जलेको बेला ।&#039;&lt;br /&gt;
&amp;quot;सुजनमा धेरै परिवर्तन आइसक्यो रे पीर गर्नुपर्दैन भन्दै होइसिन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमीले पीर गर्छर्यौ भनेर ढाँटिन्‌ होला । कै परिवर्तन हुन्थ्यो यति छिटो,हुन्देक शालुलाई केही नभन&#039; भन्दै केशव कोठाभित्र पसे ।&lt;br /&gt;
कान्छी केशाबको कुरा सुनेपछि झसङ्ग भइन्‌ र सोचिन्‌- उफ ! मैले पनिउहाँको बानी भुलेछु । मलाई चोट पर्छ भनेरै उहाँले ढाँद्नुभएको हो । कान्छीगर्दागर्दैको काम छोडेर कपडा पति नफेरी कृपण्डोल पुगिन्‌ । मनमा पीर भएरहोला उनलाई कसैको डर लागेन । शालु र सुजनको मात्र माया लाग्यो ।कान्छी सरासर भित्र पसिन्‌ । बिहानको समय उनले समय पनि भुलिछिन्‌ ।उर्मीलालाई देखेपछि पो &#039;झस्किन्‌ र बरण्डामै रोक्किइन्‌ ।&lt;br /&gt;
उमिंलाले हात जोड्दै भनिन्‌, &#039;कान्छी तिमी आयौ अब यो घर छोडेर कहीँनजाक, हामी बर्बाद भयौं कान्छी बर्बाद ... ।&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीको नाम सुन्नेबित्तिकै दीपक पनि हतारहतार औछ्लयानबाट उठेर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आई हात जौडदै भने, &#039;कान्छी तिमी फर्कियौ ? बिन्ती तिमी अब यहाँबाटनजाक । पहिलेको जस्तै यो घरलाई मन्दिर बना ।&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीले उनीहरूको कुराको जवाफ नै नदिई भनिन्‌, &#039;म यहाँ सुजनबावुलाईहेर्ने आएकी हुँ ।&#039; उर्मिलाले नम्र स्वरमा भनिन्‌, &#039;शालु आजकाल सुजनकैकोठामा सुत्छित्‌ । तिमी नजाक है कान्छी यहीँ वस ।&#039;&lt;br /&gt;
उर्मिलाको करा नसुनी कान्छी सुजनको कोठामा पसिन्‌ । कान्छीलाई देखेपछिशाल्‌ अलि डराइन्‌ । कान्छीले भनिन्‌, &#039;भो नडराइस्यो । कस्तो छ सुजनबाबुलाई :&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीलाई आफनो कोठामा लगेर भनिन्‌, &#039;हेर, कपडा पनि नफेरीआउनुभएको । दिदी त्यो लत छुटाउन त साह्रै गाह्रो हुँदोरहेछ । डुक्स नखाएपछिहातखुट्टा थरथर काम्ने रहेछन्‌ । उनी रातभरि छट्पटाएर निदाउन सकेनन्‌ ।अहिले एकैछिन भयो निदाएका । भन्नोस्‌ रोहिणीलाई कस्तो छ !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणी मैयाँको कुरा छोडिस्यो । सुजनबावुको मनमा म खराब बाटोमाहिँडेको रहेछु भन्ने चैत आयो कि आएन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;आयौ दिदी आयो । उनी आफूलाई नियन्त्रण गर्न सक्दो कोसिस पनिगर्दैछन्‌ । उनको अवस्था देख्दा त मलाई नै डर लाग्छ । कत्मना गर्नौस्‌,फिरोजले ड्रक्स र युवती एक्कँपल्ट कसरी छोडे होला !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गाँगा भन्नुहुन्थ्यो, &#039;फिरोज छटपटाउन थाल्दा हजुरको तस्बिरलाई छातीमाराखैर मुद्ठी बाँध्नुहुन्थ्यो रे, कहिले ओठ टोकेर रगत निकाल्नुहुन्थ्यो रे, कहिलेहात टोकेर आफूलाई सम्हाल्नुहुन्थ्यो रे, कहिले हजुरको आर्ट गदै बस्नुहुन्थ्योरे॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;शालुले भावविभोर भएर भनिन्‌- &#039;दिदी, सुजन र रोहिणीको समस्या समाधानभए हामी कति खुसी हन्थ्यौँ हगि ?&#039; दिदी फिरोज, तपाईंले कथामा भनेकोराजकमारजस्तै छन्‌ । तपाईंले त पहिल्यै फिरोज सफ्रिन्छ भन्ने थाहा पाउनुभएकोरहेछ । मलाईचाहिँ किन केही नभन्नुभएकौ ? फिरोजले तिम्रो दिदीले खोजेकोराजकुमार मै हुँ भन्दा म त हेरेको हेरै भएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“वाहा थियो मैयाँसाप, राम्रै थाहा थियो । त्यसैले राजकुमार खोज्ने कुरा गरेकि नि ।&#039; कुरा गर्दागर्दै उर्मिलाले चिया र दूध लिएर भित्र पस्दै भनिन्‌, &#039;कान्छीचिया लेक ।&#039; शालुतिर हेर्दै भनिन्‌, &#039;शालु अब दिदीलाई तपदाङ है । कान्छीयहीँ बस्छिन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले हांस्दै भनिन्‌, &#039;के भनिस्या ममी हजुरले, दिदी यहीँ वस्ने रे?दिदीको स्वगंजस्तै परिबार छ । दुईवटा छौरा, लोग्ने सासूससुरा, चन्द सबैसवैछन्‌ । दिदीलाई त्यो घरमा सबैले आफनै मुटुजस्तै गर्छन्‌ । दिदीको छुट्टैसिनामंगलमा दुईतले घर छ । रोहिणीको बाबाले सुजनलाई सञ्चो छैन भनेपछि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुजनको मायाले कपडा नै नफेरी यहाँ आउनुभएको हा । दिदीको आफनैट्याक्सी छ । देवर-देउरानी सबै-सबै छन्‌ दिदीको ।&#039; उामेलाले शिर झुकाएरभनिन्‌, &#039;सुजनले नशाको सुरमा भन्न त भनेका थिए । दिदीको घर छ भनेर .. ।राम्रै भयो तिमीले यहाँ साह्रै दुःख पाएकी थियौँ । पापले डुबाउँछ, धर्मलेउठाउँछ भन्ने कुरा सोच्न सक्किएन । नभन्दै साँचो रहेछ । बच्चाहरू कव्रा-कवाछन्‌ नि?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठूलो त अठार वर्षका भए । होटेल मेनेजमेन्ट पढ्दैछन्‌ । कान्छा सातवर्षका भए । तीन क्लासमा पढ्दैछन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“सौझोको साथ दैव भन्छन्‌ । त्यसैले तिम्रो राम्रो भयो । तिमी यहाँ आउँदैगर, हाम्रो भूललाई माफ गर ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन मैयाँसाप त्यसो नभनिस्यो । सँगै वस्दा सानोतिनो गल्ती भइहाल्छ ।&#039;उमिंला आफूले गरेको अत्याचार सम्झेर वोल्न नसकी कोठाबाट बाहिरिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“दिदी ममीपापा आफूले खनेको खाल्डोमा आफैँ परेपछि बल्ल चेत्नुभएकोछ । आजकाल घरमा रक्सीको गन्ध छैन । उहाँहरूको शिर झुकेको छ,&#039; शालुलेभनिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले थाहा पाएं, अघि नै दुबैले मसँग माफी मागेर हात जोडिस्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यसो भए दिदी कहिलेकाहीँचाहिँ आउँदै गर्नुहोस्‌ । भन्नोस्‌ न दिदी रोहिणीकोकै हाल छ ? सुजनको पीरले कहीँ जान मन लाग्दैन । अस्पतालबाट सिधै घरआउँछु ।&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीले विहान केशबले भनेको क्रा जस्ताको तस्तै भनिन्‌ । छिमेकीहरूलेओकल्ने गरेको दुर्वाच्य शव्दहरूका बारेमा बताइन्‌ । दिदीको कुरा सुन्दा शालुलाईज्यादै नमज्जा लाग्यो । सृजन उठेको थाहा पाएपछि दुबै सृजतको कोठमापुगे । सुजनले कान्छीलाई देखेपछि अड्दगालो हालेर रुँदै भने, &#039;दिदी तपाईं यहाँभएको भए म विंग्रिन पाउंदैन ये । दिदी म चाहेर पनि सम्हालिन सकेको छैन ।बस मर्ने सजिलो होला तर नशा ... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुजनको कराले कान्छी र शालुकै आँखाबाट आँसु &#039;फत्यो । कान्छीले सुजनलाईपलङमा वसाएर मायालु पाराले कपाल मसादै भनिन्‌, &#039;तपाईंलाई सन्चो नभईकनम यहाँबाट जान्न । मोनालाई फोन गरेर हाम्रो घरमा जानु भन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिदीको कुराले शालु र सुजन खुसी भए । सुजनले दिदीको गालामा म्वाइखाँदै भने, &#039;म दिदीकै हातबाट वनाएको खानेक्रा खान्छु । बच्चामा सुतेजस्तैगरी दिदीको काखमा सृत्छ्नु ।&#039; कान्छीले रुँदै भनिन्‌, &#039;म हजुरको सम्पूर्ण इच्छापूरा गर्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिदीको कूरा सुनेर शालु र सुजन खुसी हुँदै हाँसे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==चौबीस==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हेलो, मुमा नमस्कार&#039; &#039;ओ शालु नाती भाग्यमानी भए । के छ, बा हालखबर ?ठीकै छयौ हेन ? सुजनलाई कस्तो छ ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;ठीक छु मुमा, अहिले सुजनको कुलत छुटाउन दिदीहरू सबैजना यतैबस्नुभएको छ । सुजनले लक्ष्य प्राप्त नगरेसम्म दिदीहरू यहाँबाट जानुहुन्त रे ।मुमा, मलाई अब सुजनको कुनै चिन्ता छैन । दिदीले सुताउनुहुन्छ, दिदीलेउठाउनुहन्छ । दिदीले नै खुवाउनुहुन्छ । सुजनलाई सानैदेखि गीत-सङ्गीत मनपर्ने भएकोले फुर्सदको समयमा सङ्गीत सिक्‌न्‌ भनेर सङ्गीत टिचर राख्नैसल्लाह भइरहेको छ ।&#039;&lt;br /&gt;
“नानु, त्यस भए तिमी सधैँको लागि यहाँ आए हुन्न र?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले अनकनाउँदै भनिन्‌, &#039;दिदीको पनि त्यही इच्छा छ । शायद दिदीआज त्यहीँ आउनुहुन्छ होला :&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गंगाले हाँस्दै भनिन्‌, “ल.. ल अब हाम्रो घर पनि स्वर्ग हुने भयो । साह्रैखुसीको कुरा सुनायौ । फोन फिरोजलाई दिउँ । उनी पनि साह्रै खुसी हुन्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;क्ैगो फोन दिनुपर्दैन दुई बजेतिर कान्ति अस्पतामै जानु भनिदिसेला । अरूकुराहरू पनि गर्नुछ । हस्‌ फोन राख्छु पनि नमस्कार ।&#039;&lt;br /&gt;
गंगाले नमस्कार भन्दै फोन राखिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्ति अस्पतालको चौरमा बसिरहेका फिरोजसामु पुगी शालुले बस्दैभनिन्‌, &#039;वस्दाबस्दा तपाईँलाई कहिल्यै पट्यार लाग्दैन हगि ? मैले हजुरलाईएक बजे होइन । दुई बजे यहाँ बोलाएकी थिएँ । ड्युटी गर्दागर्दै यसो हेरेकोदसुम्क चौरमा बसेको देख्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले हाँस्दै शालुतिर हेरेर भने, &#039;यो अस्पतालको भित्ताभित्तामा तिमीलाईदेखेर तिमीसँगै मौन वार्ता गरिरहेको थिएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले भनिन्‌, &#039;माया पनि ठिक्क गर्नुपर्छ रे, अति धैरै माया गन्यो भौ चाँडैबिछोड हन्छ रे, म चाँडै आकाशमा गएँ भने नि !&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले रिसाउँदै भने, &#039;त्यस्तो अपशब्द मुखबाट निकाल्दै ननिकाल ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले हाँस्दै मनिन्‌, हेर, हेर रिसाएको, रिसाउँदा त झनै सुहाउँदो पोरहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले हाँस्दै भने, &#039;शालु तिमी पनि, ल भन, विशेष कुरा केही छकि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“भरे घरमा गएर सुन्ने कि मेरै मुखबाट सुन्ने ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;तिम्रै मुखबाट सुन्ने छिटो भनन शालु करा केहो?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शानुले भनित्‌, &#039;दिदीले भन्नुभएको हाम्रो बिह गर्ने उमेर भयो रे ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;त्यो त मलाई पनि थाहा छ नि, कै नौलो क्रा भयो, सुजनलै लक्ष्य प्राप्तिनगरी रोहिणीले विबाह नगरी हाम्रो पालो आउँदैन क्यारे ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;तपाईं पूरा क्रा नसुनी वीचमा प्याच्च बोल्नुहुन्छ । । विचरी दिदी हाम्रोखुसीका लागि हरपीडाहरू सहनुहुन्छ । दिदीहरू हाम्रै घरमा आइसक्नुभयो ।रोहिणीको घरमा मोना र रोमाकान्त दाइ हुनुहुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;उनीहरूलाई विपत परेको बेला दिदी यता आउँदा केही भन्नुभएन ?&#039;&#039;दिदीले नै सबैलाई सम्हाल्नुभएको थियो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;सबै विपत टरिसक्यो । सबैको सल्लाहले नै दिदी यहाँ आउनुभएको हो ।थाहा छ रोहिणीको विवाह हँदैछ । डा. आकाशसँग, तपाईंले चिन्नुभएको छैन ।डा. आकाश बस्न्यात । हामीसँगै पढेका हुन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले अत्तिँदै भने, &#039;को आकाश बस्न्यातको करा गरेकी ? कतै बाबु-आमा अमेरिकामा भएको आकाशको त कुरा गरेकी होइनौ :&#039;&lt;br /&gt;
“ला कसरी चिन्नुभयो तपाईंले ? हो, त्यही आकाश त हुन्‌ नि ! रोहिणीकोपरिवार र स्वयम्‌ रोहिणी पनि साह्रै खुसी छिन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजलै भने, &#039;शालु तिमी होसमा त छ्यौ ! आकाशको क्रा तिमीलाईथाहा नै रहेनछ क्यार, आकाश मैरौ कान्छी फफको भान्जा हुन्‌ । उनी कसरीरोहिणीसँग विवाह गर्न सक्छन्‌ ? तिमी फझुक्कियी 1&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;फिरोज म होइन तपाईं नै झुक्किनुभयो । आकाशलाई रोहिणीका लागिप्रस्ताप राख्नै त मै हुँ। ल भन्तोस्‌ को होसमा छैन ? मैलै आकाशलाईरोहिणीको जीवनमा घटैका सबै घटना सुनाएँ । रोहिणीको बाबाले समाजकोघृणा सहन नसकेर दिदीसँग भन्तुभएछ, &#039;कान्छी हामी चारजना सुतेपछि घरमाआगौ लगाइदैक । सबैले घर जलेर मन्यौ भन्छन्‌ । हामीलाई पनि शान्तिमिल्छ ।&#039; दिदीको कुरा सुनेर म धेरै दिन बिचलित भएँ, भट्ट आकाशलाईसम्झेर आकाशको मामाघरमा पुगेँ । सबै करा जस्ताको जस्तै आकाशलाईसुनाउँदै रोएँ । आकाशले भने, &#039;शालु तिमी नरोक, म तिम्रो खुसीका लागि जेगर्न पनि तयार छु । उनलै मैरो एउटा पनि करा काटेनन्‌ । विवाह गर्ने कुरापक्का भयो । रोहिणीको डाक्टरसँग विवाह हुँ हुँदैछ भन्ने सुनेपछि रोहिणीलाईवेश्या भन्ने छिमेकीहरू शिर &#039;झकाई हिँड्छन्‌ रे । झन्‌ आकाशलाई देखेपछि केगर्लान्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुको कुराले फिरोजको मुटु फुट्लाजस्तो भयो । कानमा केही वर्षअगाडिफुपूले भनेको शब्दहरू नै ओहौर-दौहोर गच्यो । आज ज्वाइँ अमेरिकाबाट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बना&lt;br /&gt;
काठमाडौं आउँदै हुनुहुन्छ । आकाशलाई अमेरिका जाकै भनी फकाउन आउनेत होला, तर के जान मान्थे आकाश ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो प्रश्न थियो, &#039;किन फुपू आकाश अमेरिका नगई यहाँ बसेको ! बाबुआमासबै छोडेर ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;बाबु तिमीले शालुलाई प्रेम गरेजस्तै उनी पनि कसैलाई प्रेम गर्छन्‌ ।मलाई सबै थाहा छ । भन्न त माइजूको मायाले बसेको भन्छन्‌ तर भित्री कराअर्कै छ । उनले स्कुलमा पढ्दादेखि नै कसैलाई मन पराएका छन्‌ । उनैकोमायाले यहां बसेका हुन्‌ । सबै क्राहरू सम्झेर फिरोज पागलजस्तै भए ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“म खुसीका कुराहरू गर्दैछु, तपाईं किन चुपचाप हुनुभयो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले बनावढी हाँसो हाँस्दै भने, &#039;शालु म घेरै खुसी छु। घाममाबसेकोले होला टाउको पनि दुख्न लागेजस्तो छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ त्यसौ भए घरमा गएर आराम गर्नोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;फिरोज बोल्न पनि नसकी हाँसेजस्तो गरी शालुसँग बिदा भए । शालुअस्पतालभिव्र गइन्‌ । फिरोज वाण लागेको सिंहझैँ छटपछाउँदै फुपूको घरमापुगी । सिधै आकाशकी कोठामा पसे । कोही आएको चालपछि आकाशले तान्दैगरेको चुरोटलाई थाहा नपाउन्‌ भनेर हातले किचिमिची पारेर आत्तिँदै भने,&#039;फिरोज कतै पश्चिमबाट घाम त फल्केन ? कसरी यहाँ आयौँ : तिमीनआएको दुई-चार वर्ष नै हुन लागिसक्यो, बसन के छ खवर ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;फिरोजले आँसु झार्दै भने, हेरन पानीमाथिको ओभानो बनेको, तिमीलाईमेरो हालखबर वाहै छैन !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यार, तिमी कहिल्मै आउने भए पो हालखबर थाहा हुन्छ । तिमी इन्जिनियरबन्यौ रे भन्नेचाहिँ सुनेको हुँ । मेरो खुसीको कुरा सुन्छौ भने म बिवाह गर्दैछु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले आँखा ओभानो पार्दै भने, &#039;आक्राश, यो के गज्यौ तिमीले ? केगन्यौ ? तिमी डाक्टर मान्छेले चुरोट पिउन थाल्यौँ ? हेर, अहिलेसम्म केहीबिग्रिएको छैन । तिमी शालुसँग विवाह गर । तर यसरी जीवत बर्बाद नगर ।शालु तिम्ै निम्ति जन्मेकी हुन्‌ । शालुलाई तिमीजस्तै आदर्श पति चाहिन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;मार तिमी किन यहाँ आयौ भनेको त त्यो पोक्चीको पो कुरा गर्न आएको ?त्यस्ता सयौं पोक्चीलाई म औंलामा नचाउन सक्छु बुझ्यौ !?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;कुरो र कुलो त जता लगे पनि जान्छ तर तिम्रो आँखाको भाबलाई म केसंज्ञा दिकै र चुरोट पिउनुको रहस्य म के बुझौं ? तिमीले सयौँ शालुहरूभेट्वाउँथ्यौ भने रोहिणीसँग किन विबाह गर्न लाग्यौ ?&#039; आकाशले चुरोट किच्रिमिच्ीपारी कागजमा राख्दै भने, &#039;तिमी पत्रकार हौ कि क्या हो, तिमीलाई सबै कुराभन्नुपर्ने ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;तिमीलै भन या नभन मैले सबै कुरा बुझिसके । तिमी शालुको पीडा देख्नसक्दैनौ । शालु रोहिणीको पीरले चिन्तित भएको देखेपछि तिमीले रोहिणीसंगविवाह गर्ने कुरा स्वीकार गथ्यौ । यही नै साँचो हो आकाश, यही नै साँचो हो ।तिमी र शालु पढेको स्कुल एउटै हो, फपू भन्नुहुन्थ्यो तिमीले महारागञ्जमानाम निकालेका थियौ रे, त्यहाँ किन नपढेको तिमी ? शालुका लागि तिमीलेधेरै त्याग गरेका छौ । त्यतिमात्र होइन, सम्पूर्ण आफन्त छोड्यौ । यहाँसम्म किआफूनी मायालु आमासम्मलाई छोड्यौ । तिम्री आमाले त आकाश यहीँ बस्छन्‌भने म पनि यहीँ बस्छु भन्नुभएको थियौ रे ।&#039; यी पनि &#039;फुटो हुन्‌ त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“चुप लाग फिरोज, अतीत कोट्याएर बलेको आगोमा घ्यू नथप । जोडीभगवानले नै बनाएर पठाउँछन्‌ रे । नत्र तिम्रो भेट कसरी शालुसँग हुन्थ्यो ?तिमी त सयौंको बाहुमा झूलेको मान्छे । शालुलाई देखेपछि किन मोहितभयौ : डृक्स युवतीहरूले तिमीलाई तान्त सकेनन्‌ किन ? माइजू भन्नुहुन्थ्यो-भान्जाबाबु फिरोजले त जुनी नै फेत्यो । प्रेममा त्यौ तागत हुँदोरहेछ ढुङ्गालाईनै देउता बनाउँदोरहेछ । दाजु-भाउजूले फिरोजलाई मूर्दा साबित गर्नुभएकोधियो । भन्नुहुन्थ्यो- मैयाँ फिरोज बरु मरिदिए हुन्थ्यो । कहिले त विष दिएरआफू पनि विष सेवन गरौं जस्तो लाग्छ । त्यस्तो अवस्थामा पुगेका तिमीलेशालुलाई पाउनका लागि जुन कष्ट उठायौ त्यो कष्ट म नाथेचाहि उठाउनसकिदिनथैँ ? शालुलाई तिम्रो प्रेमको विश्बास थिएन । तिमीले विश्वासको दियोबाल्यौ । उनी मेरौ प्रेममा बिश्बास गर्थिन्‌ । मैले उनलाई विश्वास दिलाउनसकिनँ । शालु तिमी पाउँदा कति खुसी छिन्‌ । उनको ओठको त्यो 044 छिनिभने मेरो प्रेमको के अर्थ ? प्रेममा समर्पण हुन्छ । तिमी शालुलाई प्रेमगर्छौ र यहाँसम्म आयौ । तिमीले सोच्यौ मैलेभन्दा बढ्ता प्रेम आक्राशलेगर्छन्‌ । तिम्रौ प्रेममा एक कण मात्र स्वार्थ भएको भए पनि तिमी यहाँआउँदैनथ्यौ । तिमीले सोच्यौ म आँसु पिएर पनि शालुको खुसी हेर्छु । मैले पनित्यही सोचेँ- शालु हाँसुन्‌ । तिमी आफैँ भन शालुले वास्तविकता थाहा पाइन्‌भने के गर्तिन्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले रुँदै भने, &#039;आकाश तिमी त्यसको चिन्ता नै नगर, म शालुलाईनराम्रोसँग तोडिदिन्छु । जसले गर्दा मप्रति घुणा जन्मिन्छ र उनी निर्धक्कहाँस्छिन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;त्यसौ भए म तिमीलाई रुवाऔँ ? के चाहिने-नचाहिने कुरा गर्छौ तिमी ?हेर, जब मैले रोहिणीलाई बिवाह गर्छ भने उनी यत्ति खुसी भइन्‌ कि के वर्णनगरौं । लाग्यो म उनको खुसीका लागि भए पनि काम लागें । फेरि शालुलेरोहिणीको विवाह मसँग गराउन खोज्नुको कारण उनलाई थाहा छ, रोहिणीआकाशलाई खुसी राख्न सक्छिन्‌ । मैले शालुले के भन्दिरहिछिन्‌ भनेर नेपालमेडिकल कलेजमा पढ्दा अन्नाको प्रसंशा गरेको थिएँ । उनले सम्झाएकीथिइन्‌- आकाश, जिन्दगी भनेको धेरै लामो छ । जै काम गर्दाखेरि पनि बडो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हौस्‌ पुच्याएर गर्नुपर्छ । म तिम्रो ओठमा सधैं हाँसो देख्न चाहन्छु । उनले ज्यादैखिन्न भएर भनेकी थिइन्‌ । आज रोहिणीको कुरा गर्दा उती भन्थिन्‌- आकाशम धेरै सोचेर यहाँ आएकी हँ । मलाई तिम्रो पनि पीर थियौ । यो स्वार्थीदुनियाँमा तिमीले कस्ती केटी पाउँछौ भन्ने । रोहिणीलाई तिर्मीले चिनेकै छौ ।तिमीहरू दुबैको जीवन हाँसीखुसीमा बित्छ । मैले तिम्रो खुसी हेर्न नचाहेकोभए तिमीले अन्नाको कुरा गर्दा किन मौन हुन्थें र ! म मनमनै भगवानसँगप्राथना गर्थे- &#039;भगवान्‌ आकाशलाई अन्नाको मोहिनी आँखाबाट टाढा राख । मआकाश टुटेको हेर्न सक्दिनँ । आज म खुसी छु रोहिणीजस्ती निष्पाप मनभएकी केटी पायौ । तिमीहरूको जीवन सधैँसधैँ हराभरा हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले सुस्केरा हाल्दै भने, &#039;त्यसो भए किन चुरोट पिउँछौँ ? तिमीलेचुरोट पिएको देखे शालु कै खुसी होलिन्‌ त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छोडछ फिरोज, के गरौं, कसो गरौं लागेर मात्र चुरोट पिएको हँ । फिरोजतिमीले जीवनभर शालुलाई मैले प्रेम गर्थे भन्ने कुरा बिर्सेर पनि नबाताउ है! तिमीले जस्तै मैले पनि शालुको फौटोहरूको आर्ट गरेको छु । तिमीले आजैलग । विवाहपछि हामी लगतै अमेरिका जान्छौं होला । तिमीले बेला-बेलामातिमीहरूको हालखबर वताइरहनु है । फिरोज अर्को जन्म भए म अर्को जन्ममाचाहिँ शालु तिम्रो हुन दिन्न नि!&lt;br /&gt;
फिरोजले बर्रै आँस्‌ &#039;झारे । आकाशको पनि आँखा रसायो । दुवैका ओठहरूकेहीबेर मौन रहे । फिरोजकी फुपू रमा कोठाभित्र पस्दै भनिन्‌, &#039;ओहो ! कुनबेला आएको तिमी, भर्खरै दाइले फोन गर्नुभएको थियो बधाई छ तिमीलाई ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कैको बचाई फुपू ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केको हुनु तिम्रै विवाह नि, कान्छीले हेराइजुराइ गरी मङ्सिर एक्काईस गतेलगन राम्रो छ भन्न आएकी थिइन्‌ रे । दाइले खुसी हुँदै भन्नुहुन्थ्यो- फिरोज तशालुलाई अझ दुई तीन बर्ष कर्नुपर्छ भन्थे । कान्छीको क्रालै हामी घैरै खुसीभयौं । बेलुका आफान्तहरूलाई तिम्रो विवाह हुने खुसीयालीमा सातो पार्टी दिनेरे। फुपूको कुराले फिरोज न खुसीले हाँस्न सकै न रुन नै।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आकाशले हाँस्दै भने, &#039;ल यार बधाई छ । तिमी मभन्दा दुई दिनअगाडिहुलाहा हने भयौ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रमा ( फुपु ) ले भनिन्‌, &#039;हामी त आकाशलाई देखेर छक्क पस्यौं । अघिल्लोदिनसम्म भन्दै हुनुहुन्थ्यो अब अमेरिका जान्छु । विवाह नै गर्दिनँ । भोलिपल्टशालु आएर के-कै भनेर सम्झाइन्‌, विवाह गर्न राजी भइहाल्नुभयो । म अचम्मैपर्छु किन सबैजना शालुको कुराको कदर गर्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माइजू, शालु सबैको भलाड्गका लागि कुरा गर्छिन्‌ । त्यसैले सबैजना उनलाईमन पराउँछन्‌ । फिरोजतिर फर्किदै- जाक फिरोज तिम्रो घरमा सबैजना तिमो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रतीक्षामा होलान्‌ । रमाले पनि आकाशको कुरामा नै समर्थन गरिन्‌ । आकाशलेहाँसे गरी भने- अर्को जन्ममा चाहिँ चिटिङ चल्दैन नि !&lt;br /&gt;
फिरोज बोल्नै सकेनन्‌ । फुपू र आकाशसँग बिदा भएर फिरोज घर गए ।घरको उल्लासमय वातावरणले पनि फिरोजलाई त्यति तान्न सकेन । फिरोजगएपछि आकाश धेरैबेर रोए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपक र उर्मिला सबै वास्तविकतासँग अनविज्ञ नै थिए । कान्छीले फिरोजकोघर विवाहको कुरा लिएर जानुअगाडि सबै कुरा भनिन्‌- फिरोजको घर जानदीपक र उर्मिलालाई अनुरोध गरिन्‌ । दीपक र उर्मिलाले खुसी हुँदै भने-हामीले त केवल जन्म मात्र दिएका हौं । जन्म दिनेभन्दा कर्म दिने नै ठूलोहुन्छ । शालु र सुजतका लागि तिमीले जे भने, जे गरै पनि हामीलाई मञ्जुरछ । हामीले मसान बनाइसकेको घरलाई तिमीले स्वर्गमा परिणत गन्यौ ।त्यतिमात्र होइन, हामी लोग्ने-स्वास्तीको सम्बन्ध दुटिसकेको थियौ । तिमीलेजोडिदियौ । तिमीले नै हामीलाई जिन्दगीको सही अर्घ बुझायौ । मायाको अर्थबुझायौ । तिमीले गर्दा तै आज हामी समाजको अगाड्धि शिर ठाद्घो गरेर हिँड्नसक्ने भएका छौँ । सम्पूर्ण अधिकार तिम्रै हो भनी पुनः शिर झकाए । सुजनकलेजबाट आएर कान्छीलाई अङ्गालो मार्दै भने- को हिँड्न सम्ने भयो ममी,पापा?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कसको हुन्थ्यो हामीले आफन्तै क्रा गरेका हौं । शालुको विवाह यही मङ्सिर२१ गते हुँदैछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;फिरोज दाइ भनिरहेको वानी, अब कसरी भिनाजु भन्ने होला, मलाई तलाजै लाग्छ भन्या । आज एघार गते भइसक्यो । दिदी आजै जाँ सुटको अर्डरगर्न । मलाई सुट छान्न आउँदैन । तपाईंले नै सुट छानिदिनुहोला । सौरब रसौजन्यले हिजो भन्दै थिए । हामीलाई हजुरबुबाले रोहिणी दिदीको विवाहकालागि भनेर सुट सिलाइदिइसक्नु भयो । म पनि उनीहरूको कलरसँग म्याचिङहुने कलरकै सुट लाउँछु ।&#039;&lt;br /&gt;
“हुन्छ बाबा हन्छ, पहिला खाजा त खाइस्यो त्यसपछि हामी सबै जाने ।&#039;उर्मिलातिर हेदैं 0414. मैयाँसाप र सापले पनि कपडा फेरिस्यो । चाहिनेसामानहरू फटाफट किन्न सुरु गर्नुपर्छ । नभए भ्याइँदैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपकले भने, &#039;ठीकै भन्यौ तिमीले, ल उर्मी तयार होक । कान्छी तिमी पत्तितयार होक, आज सुजनले आफैँ झिकेर खाजा खान्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&amp;quot;प्लिज पापा मलाई दिदीको मुख नहेरी नास्ता खायो भने नास्ता खाएकोजस्तो लाग्दैन । बरु म छिटोछिटो खान्छु ।&#039; सुजनको कुराले दीपक र उमिलादुवै हाँसे । कान्छी र सुजन भान्सातिर लागे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पच्चीस==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आन्टी, नमस्कार, उहाँ प्रशन्त अंकलको आमा हनुहुन्छ ।&#039; भनी गोकललेपरिचय गराएर काम छ भनी प्रशन्नको घरबाट निस्के ।&lt;br /&gt;
प्रशन्नकी श्रीमती वर्षाले गोकुलको नमस्कार फर्काएर प्रशन्नकी आमाप्रमिलाको खुट्टा ढोगिन्‌ । प्रमलाले सौभाग्य रहनू भन्ने आशिष दिँदै भनिन,“रोहिणी बाबा, तिमी त मैले कल्पत्ता गरेको भन्दा पनि सुन्दरी रहिछ्यौ । प्रशन्नकहाँ गए त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्षा आफूलाई रोहिणी नामले सम्बोधन गरेको सुनेर केही आश्चार्य पारित्‌र भनिन्‌, &amp;quot;बुटवलमा ठूलो होटल बन्दैछ । उहाँलाई त्यो होटलको नक्साबनाउने जिम्मा दिएको हुनाले होटल बनाउने ठाउँ निरीक्षण गर्न जानु भएकोछ । एक-दुई दिनपछि फर्किनुहुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“बाबा ! विवाहमा मलाई किन नबोलाएको त ? गोकुलले अंकलले विवाहगर्नुभयो भन्न गएपछि हामफाल्दै आएकी ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“वर्षा प्रमिलाको कुराले छक्क परिरहेकी थिइन्‌ । वर्षा ठूलौ खान्दानमाहुर्किन्‌, बढिन्‌ । बैँस उनलाई पनि चढ्यो । तर वर्षातको खहरेझैँ उर्लिचन्‌उनी । वर्षा मायालु, दयालु र सुन्दरी थिइन्‌ । प्रशन्न धन, दौलत र वर्षाकोमायामा छलाङ मारिरहेको थियो । क आफूलाई संसारकै भाग्यमानी पतिसम्फझन्ध्यो । वर्षा पनि प्रशन्तलाई आदर्श पतिको रूपमा सम्झिन्थिन्‌ । त्यसैलेअस्ट्रेलियाबाट वर्षालाई भिसा आइसक्दा पनि प्रशन्नको मायाले अस्ट्रेलियागएकी थिइनन्‌ । प्रशन्तलाई पनि अस्ट्रेलिया लैजाने प्रोसेस चलिरहेको थियो ।प्रमिलाको क्राले भने वर्षा केही अल्मलिरहेकी थिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रमिलाले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;रोहिणी बाबा, किन मौन रहेकी अब तिमीलाईनलिई गाउँ जाँदै जान्त । गाउँलेहरू तिमीलाई हेर्न ज्यादै उत्सुक छन्‌ । थाहाछ । तिमीलाई ? मैले तिम्रो नाममा एउटा भैंसी र दुईवटा बाख्खा पेवा पालिदिएकीथिएं । पहिलो बैतमै एउटा बाखीले तीनवटा पाठापाठी पायो । अर्कोले दुईवटापाठा पायो । गोठभरि तिम्रो पेवाका पाठापाठी छन्‌ । भैंसीले पनि बिहान-बेलुका गरेर झन्डै एक पाथी दूध दिन्छ । पहिला-पहिला त घ्यू, क्राउनीपठाएका सामानहरू पर्काउँथ्यौ, चिठी पनि लेख्ब्यौ । धेरै भयो तिमीले चिठीपनि नपठाएकी, पछिल्लो पालाको क्यान फर्काइनौ । विवाहमा पनि चोलाइनौ ।कतै मसंग रिसाएकी त छैनौ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रमिलाको क्राले वर्षालाई भाउन्न होलाजस्तै भयौ । वर्षाले मनमनै सोचिन्‌ ।को रहिछिन्‌ घ्यू कुराउनी खाने रोहिणी, आफू रोहिणी नै भएर वास्तविकताबुझनुपस्यो । वर्षाले हाँसेफै गरी भनिन्‌, &#039;हेनोस्‌ आमा, हतारमा विवाह गरियो,हजुरलाई बोलाउने भन्दाभन्दै बोलाउनै पाइएन । अब क्यानहरू हामीसँगैजाँदा लैजाउँला हुन्न र ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले साक्षात लक्ष्मी बुहारी भनौँ या छोरी भनौं तिमीलाई पाएपछि नाथैक्यानको त चिन्ता छैन तर यहाँ मिल्किएको भाँडो गाउँमा काम लाग्छ भनेरमात्रै हो । लाक यो क्राउनी सम्धी-सम्धिनीका लागि, योचाहिँ तिम्रो र बाबुकोलागि । झोला खोलेर कपडाको पोको फुकाउँदै भनिन्‌, &#039;ल हेर बाबा मैले तिम्रैपेवाको खसी, बाखा बेचेर सुनको दुईबटा चुरा बनाइदिएकी छु । तिमीलेपद्धाइदिएको चुराकौ साइजमै छ यो। आफ म लगाइदिन्छु । वर्षाको हातमागिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बर्षलि हात्त दिइन्‌ । बर्षाको हातमा त्यौ चुरा साह्रै ठूलो देखिएपछि रिसाउँदैवाणालाई गाली गरिन्‌, &#039;त्यो च्याङ्ग्रे मोराले त मैले दिएको नापमा चुरी नैबनाएनछ । पखोस्‌ त्यसलाई गाउँ गएपछि मार हपाछु र अर्को चुरीको तज्याला नदिई बनाउँछ । बाबा ! त्यो चुरा फुकाल फेरि हराउला । गाउँ गएपछित्यही बज्याले तिम्रो नापमा चुरा वनाउँछ । नानु, यो कोठाहरूको बहाल कतितिर्नुपछ नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आमा यो हाम्रो आफनै घर हो । हजुरलाई भोक लाग्यो होला के-केबनाकँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“रोहिणी बाबा, तिमीलाई देखेपछि भोक, प्यास, वकाई सवै हट्यो । नानु,प्रशन्न पढेर आएको पाँच-छ महिनामै यत्रो घर कसरी बन्यो त? बाबुतभन्व्यो- रोहिणीको बाबुआमाले मलाई पढाउनका लागि पैसा नपुगेर घरकोकारसमेत बेचिदिनुभयो । फेरि यति ठूलो महल कहाँबाट आयो ? कतै तिमीलेबाबुआमाको साझौपनको फाइदा धैरै त उठाइनौँ ? अर्काको छोराको विश्वासगरेर त्यत्रो इन्जिनियर हो कि क्या हो पढाइदितुभयो फेरि उहाँहरूलाई नङ्ग्याएरयौ घर पनि माग्यौ ? रोहिणी, तिमी यति कठोर छयौ भन्नै मलाई पटक्कैलागेको थिएन । मलाई सम्धी-सम्धिनासँग भैटाइदेक म उहाँहरूलाई साफगाली गर्छु । प्रशन्न अलि लाल्ची छ भन्ने त मलाई बाहा भएकै हो तर तिमीपनि कम रहिनछयौँ । अन तिमी रिसाए रिसाक खुसाए खुसाक यौ घरको एकगैडा अन्न पनि नखाई घर फर्किन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
मायालु बर्षालाई सबै कुरा सपनाजस्तै लाग्यो । सोचिन्‌- बाबुबिनाकोपर्द,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गरिब गाउँले कसरी त्यत्रो पैसा खर्च गरी इन्जिनियर बने होला भनेको त कुरायति गहिरो पो रहेछ । यो चुरा रोहिणीको नापकै चुरा हो । आमालाई पनिनबोलाई हतारहतार विवाह गर्नुको रहस्य त यस्तो पो रहेछ । भगवान्‌ अब मकसरी बाचौं ? रोहिणी भन्नेको हृदयमा कति चोट परेको होला । मभन्दा अर्कोघानी र राम्री पायो भने प्रशन्नले मलाई पनि छोड्छ । म बर्बाद भएँ भन्नैसम्झेर वर्षालाई सहिनसक्नु भयो । उनी एक तमासकी भइन्‌ । आँसु तप्पतप्पगालाको बाटो हँदै कथामा &#039;झन्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रमिलाले वर्षातिर हेन सम्झाइन्‌, &#039;बावा, नरोक, तिमी अलि काँची नैरहिछौँ । मैते त यति मात्र भन्न खोजेकी हुँ, औँला दिँदा डुडुल्नो नै निल्नुहँदैन ।कतै घर माग्न प्रशन्नले नै दबाब त दिएनन्‌ ? उसको शरीरमा मेरो मात्रहोइन उसको बाबुको पनि रगत छ । पढेर आएको यति छोटो समयमा यत्रोदरबारजस्तौ घर बनाउने पैसा कमाए त प्रशन्नले ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्षाले आँसु पुछुदै भनिन्‌, &#039;आमा तपाईं मेरो माइतीको पीर नगर्नोस्‌ ।उहाँहरूले दितत सक्ने भएरै यत्रो घर दाइजोमा दिनुभएको हो । दाइ अस्ट्रेलियामाहुनुहुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमीहरू दुई बहिनीमात्र होइन र ? फेरि दाइ कहाँबाट आए ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्षाको मुटु ढुक्क भयो । उनले कुरा बनाइहालिन्‌, &#039;हामी दुईवटी छोरीभएकोले एउटा धर्मदाइ बनाएका थियौँ, उहाँले नै हाम्रो सहयोग गर्नुहुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रमिलाले गहभरि आँसु पार्दै भनिन्‌, &#039;यो जमात्तामा पनि सहयोग गर्नेतिमीजस्तै अर्को मान्छे तिम्रो धर्मदाइको पनि जन्म भएको रहेछ, खुसी लाग्यो ।रोहिणी वाबा ! तिमीलाई देख्ने पनि साह्रो रहर थियो । तिमीलाई देख्दा साक्षातदेवीलाई देखेजस्तै भयो । तिमीले प्रशन्नलाई त जीवनदान दियौँदियौ मलाईपनि जीबनदान दियौ । तिमीले पठाइदिएको पैसाले त ठूलै काम गप्यो ।धनवीरे साहुले त्यत्रो जग्गा पचाउन खोजेको थियो । ब्याजको स्याजसम्मलिएर बलैले जग्गा छोड्यौ । घरमा नातिनी त छँदैछे एउटा टुहुरो कुमालकोछोरोलाई पनि पालेकी छ्‌ । तिम्रो पेवा बाखापाठाहरूले बाली खाएर बिगारगन्यौ भने गाउँलेहरू भन्छन्‌- यो रोहिणीको भैँसी बाख्राले त अचाक्ली गत्यो ।कोही गाउँलेहरू त तिम्रो नाममा बाखा पाल्न तैजान्छन्‌ । तिम्रो नामकोबाख्राले पाठापाठी पाएपछि पाठापाठी बेचेर आएको पैसा आधा टक्रक्क दिन्छन्‌ ।कोही त मलाई रोहिणीकी आमा भनेर पनि बोलाउँछन्‌ । सबैको ओठमा तिम्रैनाम छ । काठमाडौँका केटा-केटी राम्रा हुँदैनन्‌ भन्थे, तिमीले त सिङ्गै काठमाडौंकोलाज राख्यौ । तिमीले विवाहबारे थाहा नदिँदा भने साह्दै मन रोयो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रमिलाको क्राले वर्षाको आँखाबाट एकनास आँस्‌ बग्यो । के भन्ने कै नभन्नेसोच्नै सक्किनन्‌ र पनि भनिन्‌, &#039;आमा ! अब चिन्ता नै नगर्नौस्‌ । मलाई पनि तपाईँकोअभाबमा बिवाह गर्न मन नै थिएन । अपर्झट बिवाह गर्न परेर मात्र हो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैले त तिमीलाई चिनेकै छु । गाउँलेहरूले भन्ने ठाउँ पाए । भन्थे मेरीबुहारी साक्षात लक्ष्मी हो भन्थेक खोई विवाह जस्तोमा पनि बौलाएनन्‌ । खैरछोड सानातिना कुरा, सत्यचाहिँ म मेरी अपमान सहन सक्छु तिम्रो अपमानसहन सक्दिनँ । गाउँलेले तिमीले पठाइदिएको जस्तै ग्यास्टिकको वैद्य औषधिलेराइदिनु भनेका छन्‌ । त्यौ औषधि खाएपछि, मलाई छाती पोल्न धेरै कमभयो । फेरि म गाउँमा हिलो-धूलोसँग खेल्नेलाई अनाहकमा पैसा खर्च गरीगरीमहँगो-महंगौ सारी किन पठाएकी ? मैले ती सारीहरू केही त छोरीलाई दिएँ,केही तिम्रै लागि राखिदिएकी थिएँ त्यो पनि लेराइदिएकी छु । लाङ&#039; भन्दैवर्षाको हातमा सारी वमाउँदै भनिन्‌, &#039;यसको सट्टा मलाई दुई-चार सुतीकोधोती किनिदेक ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्षाले आँखा ओभानो पार्दै भनिन्‌, &#039;हुन्छ आमा म हजुरले जे-जे भन्नुहुन्छत्यही किनिदिन्छु । सम्धी-सम्धिनी भेट गर्नुपर्यो । म ममीड्याडीलाई हजुरआउनुभएको क्रा वताउँछु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ बाबा हुन्छ, मलाई पनि त उहाँहरूलाई भेदनै साह्ै रहर छ । मैलेतिमीलाई धेरै अलमलाएँ । झोलामा आँपको अचार, सिलाम, भागो, चुक, घ्यूछ, सबै राख । वसमा कच्याङकचुङ के-कै खाइयो । मुख सुकेको छ एकगिलास तातोपानी देक अनि चिया खाउँला ।&#039;&lt;br /&gt;
वर्षा झोला बोकेर भान्सातिर लागिन्‌ । उनी आफूलाई सम्हाल्त नसकीछद्पटाउन थालिन्‌ । प्रमिलालाई पानी, चिया दिएपछि आफनो बाबुआमालाईछोटकरीमा सबै कुरा बताइन्‌ । बर्षाको कुरा सुनेर वर्षाको बाबुआमा पनिछांगाबाट खसेजस्तै भए । आफ्नी सुशील र मायालु छोरीमाथि परेको बज्जलेवर्षाका आमाबानुलाई मर्माहत पात्यो नै । वर्षाले भनेझैँ रोहिणीकै बाबुआमाबनेर सम्घीभेट गर्नुपर्ने हुँदा कम कस्टकर परिस्थिति थिएन । सम्पन्न व्यक्तिहरूभएको हुँदा झरिझुट्ट सम्धिनी भेट गर्नपर्तै सामान किनेर वर्षाको घरमा आए ।बाजेले मन्त्र पढेर सम्धी भेट गराए । सम्धिनी भेटमा दिएको सामान लिँदैप्रमिलाले भनिन्‌, &#039;हजुरहरूले पहिल्यै परिपूर्ण पारिसकेपछि फेरि आज धेरैसामान दिई दुःख किन गर्नुपत्यो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्षाकी आमा बबिता त केही बोल्न सकिनन्‌ । जितेन्द्रले भने “धेरै केहीगरेका छैनौँ&#039; भनी कुरा टार्न खोजै । प्रमिलाले हात जोडेर भनिन्‌, &#039;यदि रोहिणी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वाबा नजन्मिदिएको भए हामी उहिल्यै मेजँ होला । हजुरहरू जस्तो बाबुआमापनि यो संसारमा हुँदारहेछन्‌ । हजुरहरूले प्रशन्तलाई पढाउन आफ्नो जायजेथाबेचेपछि यो घर नदिनुपर्ने थियो । त्यत्रो पढेर आएपछि प्रशन्नले नै दुईजनालाईखान पुग्ने पैसा कमाइहाल्छन्‌ होला नि ! खोई त रेप्मा नानी आउनुभएन ?उहाँको लागि पनि केही सम्पत्ति राखिदिनुभएको भए हुन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“हजुरले पीर नगर्नुहोला, रेष्माका लागि पनि हामीले सबै राखिदिएका छौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“यहाँबाट कति टाढा छ र घोबीघाट बोलाउनुभए हुन्थ्यो । अहिले त आइन्‌पनि होला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसो भए रोहिणीको घर घोबीघाट पो रहेछ । वास्तविक कुरा के रहेछवुझनैपन्यो भनी रेष्मालाई लिन जान्छु भनी निस्कैका जितेन्द्र घोबीघाट पुगे ।कहाँ सोध्नु, कसलाई सौध्ने, कै भनेर सोध्ने अन्योलमा परेर एउटा किरानापसलनिरै उभिइरहेका थिए । फेरि झमक्क साँझ पनि परिसकेको थियो ।उनले झट्ट आफनो अफिसमा सँगै काम गरैको रिटायर अधिकृतलाई सम्झीउनको नाम सोध्दै त्यौ घरमै पुगै । घरमा विवाहको धुमधाम तयारी भइरहेकोथियो । जितेन्द्रलाई देख्नेवित्तिकै केशवले बडो स्वागत साध बैठकमा लग्दै भने,&#039;हजुर आज यहाँ कताबाट पाल्नुभयो ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जितेन्द्रले भने, हेर्नोस्‌, तपाईँलाई के ढाँदनु ? हामी कसैको जालमा परेछौँ ।मेरी छोरीको जिन्दगी एउटा डाकाले बर्बाद गन्यो । आज केटाको आमाआएपछि पो सबै कुरा थाहा पायौँ । त्यौ डाकाले पहिला नै विवाह गरेको थियोचा प्रेममाव गरैको थियो त्योचाहिँ बुझून सकिएन ।&#039;&lt;br /&gt;
केशवले लामो सुस्केरा हाल्दै भने, &#039;ममात्र फसेछ्ठु भनेको त हजुर पनिफस्नुभएछ । यो संसार नै चौरी र फटाइँ गर्नेहरूका लागि बनेको हौ ।हामीजस्ता सीधासाधाका लागि त यहाँ बाँच्नसम्म मुस्किल छ । सीधा-साधालाईभगवान्‌ले कतै न कतैबाट पारचाहिँ लगाउँदारहैँछन्‌ । तपाईंकी छोरीलाई पनिपार लगाउलान्‌ । गाँठी कुरा नवुझीकनै म भावनामा पो बगेँ । भन्नोस्‌ हजुर,उसले विवाह गरेर छौडिदियो कि क्या हो !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;विवाह गरेरै छोडिसकेको त होइन तर उसको नियति राम्रो छैन रहेछ ।उसको आमाको भनाइअनुसार उसले मेरो छोरीसँग रूप र धनको लोभमाविवाह गरेको हुनुपर्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;विवाह नहुनु भइसकेपछि हामी छोरीहरूको बाबुले जे पनि त सहतुपर्छ नि! तत्र यो समाज यही हौ, समाजका मान्छेहरू यही हुन्‌ । घाउ कोट्याइकोट्याईं&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नुन-खौसांनी दल्न पछि नपर्दारहेछन्‌ मान्छेहरू । हेर्नोस्‌, मैले एउटा पापिप्टलाईभुइँबाट उठाएर आकाशमा पुग्याइदिएँ । छोरी रोहिणीले पनि उनलाई त्यत्तिकैविश्वास गरिन्‌ । हामी सबैले विश्वासकैँ भरमा घरको जायजेथा यहाँसम्मकीघरको कारसम्म बेचेर आकिटेक इन्जिनियर पढायौँ । त्यतिमात्र होइन, उसकोआमाको क्राण चुक्ता गरिदियौँ । त्यो निचले मेरी छौरीलाई धोका दियो ।समाजले त मेरी छोरीलाई वेश्या नै सावित गरे ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छोरीको साथीले गर्दा पाउन त त्योभन्दा लाखौँ गुना असल केटा पायौं ।यदि अहिलेको केटाले विवाह नगरेको भए मेरी छोरी जिन्दगीभर कुमारीवस्नुपर््यौ । सायद यो समाजले उसलाई बाँच्न पनि दिन्थेन होला । खान नपाईबसमा बैहोस भएको कङ्गालले शिखर छोएपछि आफू उभिएको धरातल नैबिर्सियो । समयको अगाडि घुँडा टेक्नबाहेक हामीले केही गर्न सकेनौं ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केशवको कुराले जितेन्द्र टोलाइरहे । जितेन्द्रले बुझे, ओहो ! यो रोहिणीभन्ने त केशवकै छोरी पो रहिछिन्‌ । अब के गरौं ? केशवको खाटा लागिसकेकोघाउ उक्काउनुभन्दा थाहा नपाएझैँ गरी जानु नै वेश हुन्छ। तर एउटाकुराचाहिँ सोध्छु नै । जितेन्द्रले उफ ! गर्दै भने, &#039;कसरी बसमा बेहोस भएछन्‌ ?कसरी तपाईंहरूले उसमाथि ठूलो बिश्वास गर्नुभयो त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;भनिहालैँ नि जितेन्द्रजी, प्रशन्न गरिबको छोरा रहेछ । पढ्नमा चाहिँहोनहार नै रहेछ । आमाले अलिआलि भएको सम्पत्ति वैचेर बन्धकी राखेरछोरालाई पढाइछिन्‌ । घरबाट केही पठाउन नसकेपछि त्यो स्वार्थी भौकै परेछर वसमै बेहोस भएछ । बसमा भएकाहरू सबै छारेरोगी भनेर भागैछन्‌, मेरीछोरीले उनलाई हस्पिटल पुन्याएर उपचार गराइछिन्‌ । आमा-छोरी भएरउसको खाने-वस्ने व्यवस्था पनि मिलाएछन्‌ । भेटघाट गर्दागर्दै उनीहरूको प्रेमपरेछ । मेरी छोरी साइन्समा बाइलोजी लिएर पढेकी मान्छे । दुईजनालाई पढ्नपैसा लगानी गर्ने सकिँदैन भनी बुझेर आफू जानीजानी फेल भइछन्‌ । कारणउनले प्रशन्तलाई इन्जिनियर बनाउन चाहेकी रहिछिन्‌ । उसलाई इन्जिनियरपढाएर हामीले सम्पत्ति स्वाहा गच्यौँ । इन्जिनियर पढेर आएपछि त क सिय्रोबाटहात्तीमा परिणत भयो । विवाहका लागि आमा लिन जान्छु भतेर बिबाह पोगरेछ । हामी भने क हरायो भनेर कति तडपियौँ । बिचरी रोहिणी त बेहोस नैभइन्‌ । अरू भनैको भए त ठीकै थियो । त्यो पापीका लागि बैंस बेगेद बस्नेमेरी छोरीलाई वेश्या संज्ञा दियो त्यसले । ठीकै छ, त्यसको भलो होस्‌ । मेरीछोरीमा छलकपट थिएन, त्यसैले उसले त्यो पापीभन्दा कयौं गुना असल डा.पति पाइन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबै कुरा बुझेपछि जितेन्द्र केशवसंग विदा भएर घर आई श्रीमती रछोरीलाई सबै कुरा बताए । वर्षाले आफू प्रशन्नजस्तो स्वार्धीसँग नवस्ने निर्णयगरिन्‌ । वर्षाको आमाबाबुले पति प्रशन्तलाई थाहा नै नदिई कालिमाटीको घरबैचिदिने र वर्षालाई अस्ट्रेलिया पठाउने निर्णय गरे । जितेन्द्रले गर्दा नै होटेलकोनक्सा बनाउने काम साथीहरूद्वारा दिलाएको हुँदा जितेन्द्रले साथीहरूलाईलगाई हप्ता-दस दिनका लागि प्रशन्नलाई बुटवलतिर काममा व्यस्त गर्नुभने । अस्ट्रेलियाबाट भिसा आइसकेको हुँदा टिकटको मात्र क्रा थियो । जितेन्द्रलेअस्ट्रेलिया पठाउन टिकट लिए । प्रमिलालाई वास्तविकता भनी मन दुखाउनचाहेनन्‌ । अझै प्रशन्न दस-बाह्र दिन नआउने भनिदिए । प्रमिलाले आफूयतिखेर बुहारीकै मुख हेर्न आएको बताइन्‌ । आफू नहुँदा घरमा डामाडोलहुन्छु भनी खुसीसाथ घर गइन्‌ । वर्षाको बाबुआमाले सबै सोधपुछ गरी उनलेल्याएको सुनको चुरीको हिसाव गरी रोहिणीकै नाममा गाउँमा एक टुका खैतकिन्नु भनी केही हजार दिएर पठाए । प्रमिलाले पैसा लिन साफ इन्कारचाहिँगरेकी थिइन्‌ । धेरै सम्झाएपछि प्रमिलाले पैसा लिइन्‌ र जाने बैलामा भनिन्‌,&amp;quot;चाँडै घर आउनू, यौ पैसाले तिम्रै नाममा खैतको गरा किनिदिन्छु । त्यही धानकुटेर चामल पठाइदिन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रमिलाको सरल हृदय देखेर वर्षालगायत वर्षाको आमाबाबुको पनि परेलीरुझयो । प्रमिला पनि बुहारीसँग छुट्टिनुपर्दाको पीरले रुँदैरुँदै घर गइन्‌ । वर्षालगायतवर्षाको बाबुआमालाई पनि उनलाई पनि छल गर्नुपर्दा त नरमाइलै लाग्यो ।कुनै सानोतिनो गल्ती गरेको भए त वर्षाको बाबुआमा र वर्षाले नै माफ दिन्यैतर, प्रशन्नको अपराध माफी दिन लायक सम्झेतत्‌ उनीहरूले । वर्षालाईअस्ट्रेलियातर्फ उडाए । कालिमाटीको घर बैची वर्षाकै नाममा पैसा बैंकमाराखिदिए । भविष्यको मीठो सपना बुनेको प्रशन्त जब आफनी मायालुलाईभेद्न कालिमाटी पुग्यो त्यहाँ सबैको नौलो अनुहार देखेर चित खायो । घरबेचेको थाहा पाएपछि ससुराली पुग्यो । जितेन्द्रले वर्षाले दिएको डिभोर्सकोकागज दिँदै भने, &#039;बाबु प्रशन्न लाङ तिमीलाई दिन हामीसँग यो चिर्कटोबाहेककेही छैत ।&#039; कागाज हेरेर प्रशन्न चिच्यायो, &#039;यो के हो ? यो सब कै हो?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्षाकी आमा त देखै परिनन्‌ । जितेन्द्रले आँसु झार्दै भने, “यौ तिम्रो पापकोसज्ञाय हो । सत्यलाई कहिलेसम्म छुपाउँछस्‌ तँ ? तैँले मेरी छोरीको विश्वासर रोहिणीकै विश्वासमा गला घोटिस्‌ । तँलाई मैले सोधेकै थिएँ । कसैलाई प्रेमगर्छस्‌ कि गर्दैनस्‌ भनेर तैँले महाझूट बोलिछस्‌ । जाक्न त जेलमा जागनुपर्नैहो तँलाई तर चुपचाप गइहाल । नत्र राम्रो हुनेछैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्नले बोल्ने कुनै ठाउँ नै थिएन । क चुपचाप रन्थनिंदै वर्षाको माइतीबाटनिस्क्यो । रोहिणी र वर्षा दुवैको आँखा सम्झयो । दुवैको आँखामा रत्तिभर पापथिएन । दुवैको मन गंगाजस्तै पवित्र थियो । प्रशन्न सडकको पेटीमा बसेरधेरैबेर वर्षा र रोहिणीकँ मायाले रोयो । स्वार्थले गर्दा आफू घर न घाटकोभएको सम्झयो । त्यही रात नाइटमा घर गयौं । घरमा आमालगायत सबैछिमेकीहरूले रोहिणी खोई भनेर सोधे ? प्रशन्नको अनुहार देखेर सबैले रोहिणीमरेकै अनुमान गरे । प्रमिलाले कैयौँ दिन रोएर बिताइन्‌ । प्रशन्न आफूले गरेकोपापले भित्रभित्रै जल्दै गयो । रोहिणीको टाडी खेत, रोहिणीको बाखा, रोहिणीकोभैँसी हेरेर प्रमिलाले मन बुझाउन बाध्य भइन्‌ । प्रशन्न सहर पस्न सकन ।गाउँकै स्कूलमा मास्टरी जागिर खायो । गाउँकै केटी बिवाह गच्यौ तर जतिसमयले फेरो मारे पनि रोहिणी र वर्षा उसको आँखाबाट कहिल्यै ओझेल हुनसकेनन्‌ । कहिल्यै ..&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==छब्बीस==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोज र शालुको विव्राह भएलगत्तै आकाश र रोहिणीको बिवाह पनिभयो । विवाहको केही समयपछि नै आकाश र रोहिणी अमेरिका गए । फिरोजर शालुले फ्रान्स जान भिसा पाए पनि रमण र गंगा र कान्छी दिदीले विदेशजान जरुरत नभएको बताएपछि उनीहरू खुसीखुसी नै नेपालमा बस्ने निर्णयगरे । शालु र फिरोजको जीवनमा र रोहिणी र आकाशको जीवनमा कहिल्यैपनि सानो आँधी आएन । उनीहरू हरक्षण डालीमा लटरम्म फुलेको फूलहरूजस्तैभए । शालुले दुईटा छोरा र रोहिणीले एक छोरा एक छोरीको जन्म दिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीदिदीको जेठो छोरा सौरभलाई दीपकले नै होटेल म्यानेजमेन्ट गर्नबाहिर पठाई पैसा लगानी गरे पनि सुजन स्टुडेन्ट भिसामा लन्डन पढ्नगएपछि उर्मिला र दीपकको त्यो वैभबलाई छोडी कान्छी केशवकै घरमाफर्किन्‌ । सबैले अनुमान गरै, कान्छी शालुको उमेरमै विवाह होस्‌ । शालुलेभाइको जिम्मेवारी बोक्न नपरोस्‌ भनी शालुको जिम्मेवारी बोक्न नै दीपककोघरमा फर्केकी थिइन्‌ । आफनो जिम्मेबारी पूरा गरैपछि उर्मिला र दीपकलेलाख बिन्ती गर्दा पनि कुपण्डोल बस्न नमानी केशवकै घरमा फर्किन्‌ । पीताम्बरार केशवले कान्छीको आगमनलाई सहर्ष स्वीकार गरे । रोमाकान्त र मोनालेटीकाथलीमा तीन कोठाको घर बनाई त्यतै सरे । रेष्माले प्रेमलाई सधैँ घुणा गरेपनि रेष्मालाई एकतर्फी मन पराउने नरेशले रेष्माको घरमै आई मागी विवाह&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गरे । नरेश प्रोफेसर थिए । रूपमती डा. अन्नाले स्बास्नी भएको पाइलटसँगजानीजानी विवाह गरिन्‌ । लोग्नेले जेठी स्वास्नीसँग रात बिताएको थाहापाएपछि रिसले विष सेवन गर्दा मृत्युवरण गरिन्‌ । मोनाको वलात्कारी मालिकलेआफनो स्वास्नीको वास्तविक रूप मोनाबाट थाहा पाएपछि भित्रभित्र स्वास्नीलाईमारेको पश्चात्ताप गर्दै सारा जीवन विताए । उनले &#039;मूलको पानी र कुलकोछौरी&#039; उखानको वास्तविकता बुझे । थुपैले योगेन्द्र साहुसँग विवाह गर्न प्रस्तावल्याए पनि उसले बिवाह गर्न मानेनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौनाले बाबुआमा दुवै गर्दा पनि माइतीमा खुट्टा टेकिनन्‌ भने कान्छीआफनो वावु मरेपछि माइती गइन्‌ । मौसमीलै एड्सबारेमा केही भए पनिचेतना फैलाइन्‌ । आफूजस्तै पछिको बाटो नहेरी वैँसको उन्मादलाई मात्रसर्वस्व ठान्नेलाई आफनै उदाहरण दिएर केही हदसम्म सचेत गराइन्‌ । मर्नुभन्दाअगाडि शालुको सम्झना गरी बोलाए पनि शालु वीर हस्पिटल पुग्दा उनीमरिसकेकी थिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु खल्लो मन गरी घर फर्किन्‌ । आँखामा भने मौसमीकै सुन्दर अनुहारनाचिरहेको थियो । शालुको निराश अनुहार देखेर फिरोज पेन्टिङ गर्ने सबैसामान लिएर आई शालुतिर हेर्दै भने, &#039;शालु तिमी यही पोजमा बस । तिमीउदास हुँदाको तिम्रो तस्विर मैले बनाएकै छैन ।&#039; गंगा र रमणले पनि फिरोजकोकुराको समर्थन गर्दै भने, &#039;हो बाबु, हाम्री शालु उदास हुँदा पनि राम्रै देखिनेरहिछन्‌, उनी उदास हुँदाको फोटो उतारेरै छोड ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबैको क्रा सुनेर शालु फिस्स हाँसिन्‌ । सँगसँगै रमण र गंगा तथा फिरोजर शालुका छोराहरू सुलभ र संयोग पनि हाँसे । हा...हा...हा... ।&lt;br /&gt;
अस्तु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिचय==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नाम : “ ललिता &#039;दोषी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जन्म : २०२५।०७।१६, इमाडोल, ललितपुर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घर : लु, अ. गुल्मी, अर्ज&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शिक्षा : एम.ए.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रकाशित कृति:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- प्रेमको परिभाषा (कथासंग्रह) २०५६- भत्किएका किनारा (कथासंग्रह) २०५७- बुद्ध रोएझै लाग्छ (कवितासंग्रह) २०५८- दुखेको घाउ (कथासंग्रह) २०६०- मानिस नै देवता (बालकथासंग्रह) २०६३- नीलकमल (बालउपन्यास) २०६४- डुन्द्रैनी (बालकविता) २०६५पुरस्कार, सम्मानः&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
-. भानुमोती पुरस्कार २०५९- महेन्द्र प्रकृति संरक्षण कोष पुरस्कार २०६२-. गुञ्जन नव प्रतिभा पुरस्कार २०६२- मानचित्र सम्मान २०६३- आमा सम्मान २०६५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
...सरल र बगेको शैलीले गर्दा अनि कथावस्तुको राम्रो विकासका कारणउपन्यास लोकप्रिय बन्ने आशा गर्न सकिन्छ । यो उपन्यासको कथा अत्यन्तरोचक हुनाले यसमा एक सफल फिल्म वा टेलिफिल्म पनि बन्न सक्छ भन्नेमलाई विश्वास छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डा: धुवचन्द्र गौतम&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%89%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A6&amp;diff=61</id>
		<title>उन्माद</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%89%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A6&amp;diff=61"/>
		<updated>2024-06-09T12:11:13Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;Source book: https://nepalikitab.org/lalita-doshi-unmad/&lt;br /&gt;
==पुस्तक परिचय==&lt;br /&gt;
उन्माद&lt;br /&gt;
उपन्यास&lt;br /&gt;
लेखिका:&lt;br /&gt;
ललिता &#039;दोषी&#039;&lt;br /&gt;
प्रकाशक&lt;br /&gt;
डीकुरा पब्लिकेशन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृति: उन्माद&lt;br /&gt;
लेखक: ललिता &#039;दोषी&lt;br /&gt;
संस्करण: प्रथम, २०६६&lt;br /&gt;
मूल्य: रू. ९५/-&lt;br /&gt;
प्रकाशक : डीकुरा पब्लिकेशन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पत्रचार जर्ने ठेजाना :&lt;br /&gt;
डीकुरा पब्लिकेशनपो.ब.नं. २१७३२, काठमाडौँ, नेपालफोन : ०१-२०४४३७९, ९८४१५२१८९२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपत्यकाको लाणि वित्तरण :&lt;br /&gt;
एभरेष्ट बुक डिस्ट्रीब्यूटर्स&lt;br /&gt;
फोन : ९८४१४५२६०६&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==समर्पण आमालाई==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आदर्शकी प्रतिमूर्ति कोमल मनकी धनी&lt;br /&gt;
गाएर सकिन्न कठै ! तिम्रो त्यो जीवनी&lt;br /&gt;
तिमी बाँच अझै बाँच देक आशिषका घडा&lt;br /&gt;
तिम्रो कोखको लाज राखूँ बनी माटो उर्वर !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उन्माद उपन्यासमा ड्बुल्की मार्दा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;उन्माद&#039; ललिता दोषीद्वारा लिखित शिक्षा र सन्देशले भरिएको उपन्यासहो । आदर्शवादी रोमाण्टिक धाराको यस उपन्यासमा उपन्यासकारलै आफूनौउद्देश्य प्राप्त गर्नमा सफलता हासिल गरेकी छन्‌ । आजको उच्च वा उच्चमध्यमवर्गीय तथाकथित अभिजात समाजका विकृतिहरूलाई ललिता दोषीलेभावुक र मार्मिक बनाएर प्रस्तुत गरेकी छन्‌ । त्यस वर्गबाट बिभिन्त नमुनापात्रहरूको संकलन गरेर उपन्यासमा तिनलाई पात्र बनाई तिनको चरित्रचित्रण गरेकी छिन्‌ । आदर्श र अनादर्श पात्रको चित्रण गर्नु, तिनको द्वन्द्व प्रस्तुतगर्नु, तितका आडम्बरी जीबनको प्रस्तुति र अन्त्पमा ती सबै पात्रहरूको आ-आफूनो कर्मअनुसारको अन्त्य उपन्यासमा कौतुहलतापूर्वक प्रस्तुत गरिएकोछ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपन्यासमा शालु, कान्छी र आकाश जस्ता आदर्शबाट कहिल्यै च्युतनहुने पात्र छन्‌ भनै निमेष, मौमसी, फिरोज आदिजस्ता बाटो बिराउने पात्रपनि छन्‌ । लेखिकाको उद्देश्य भने प्रत्येक पात्रभित्र रहेको मानवीय आदर्शकोखोजी गर्नु रहेको छ । यो लेखिकाको सामाजिक दृष्टिले एक दायित्वपूर्ण कार्यहौ र सराहनीय पनि । सामाजिक अध्ययनका दृष्टिले पनि यौ उपन्यास उपयोगीहुन सक्छ । अन्त्यमा असल पात्र त आफूतो असलपनले प्रभावकारी रहिरहेकैँहुन्छ, खराव पात्रलाई पनि उपन्यासकारले असल परिणतिमा पुन्याएकी छन्‌ ।तिनीहरूले आफूनौ अज्ञानमय पूर्वजीवनप्रति पश्चाताण गर्दछन्‌ र भविष्यमाअसल जीवनतर्फ डोहोरिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपन्यास परम्परागत शैलीमा लेखिए पनि कथावस्तुको संयोजन चरित्रचित्रण सहज प्रस्तुतिले गर्दा आजको एक खास वर्गको जीवनको चित्रण गर्नसफल छ । तथाकथित अभिजात बर्ग र तिनका सामन्ती सोचले गर्दा उत्पन्नभएका बिकृति एकातिर यसको विषय बनेको छ भने अर्कोतिर सुरासुन्दरी रलागु पदार्थको दुर्व्यसनले समाजलाई कति जर्जर तुल्याउँछ भन्ने कुराकोमार्मिक चित्रण गरिएको छ । ठाउँठाउँमा भाबुकताको आधिपत्यका कारणपाठकसमैत भावुकताको प्रभावमा बगेर आँखा रसाउन बाध्य हुन्छ । उपन्यासयस रूपमा निकै सफल भएको छ । यसका अन्य सफलता पनि छन्‌ । यसकोभाषा सरल छ । सिनेमा हेरेझैं, कवानक प्रवाहमय बनेर गएको छ । पाठकलेकथामा अल्मलिनु पर्दैन, कथानकले पाठकलाई तानेर लान्छ । थालनीदेखिअन्त्यसम्म उपन्यास रोचक छ । बौद्धिकताको भारी नवोकेर यसले सरसकौतुहलमय ढङ्गबाट आफूनो कुरा भन्छ । उपन्यासमा कुलतका विरुद्ध एकअभियान जस्तै चलाइएको छ । त्यसैगरी पुरुषले गर्ने नारीको शौषण पनि&lt;br /&gt;
प्रमुख मुहाका रूपमा उठाइएको छ । त्यति मात्र होइन आजका कतिपयनारीहरू आफूना क्रियाकलापद्वारा भ्रमवश र विवशतावश पनि दुव्यसन रपुरुष अन्यायको शिकार हुन पुग्छन्‌, जसले उनीहरूको जीवन विवोलिन्छ,अवसादभ्रष्ट बनाइदिन्छ । तीमध्ये प्रायः परिस्थितिसित मुकाबला गर्दै नयाँजीवन थाल्दछन्‌ । यसले नारीवादी सन्देश पनि रामरी दिएको छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेखिकाको सबभन्दा बलियो पक्ष कै छ भने, आज एउटा अपसंस्कृतिलाईअँगालेर वाँच्दा जुन खोक्रो गर्वको देखावटीपन छ, त्यसप्रति उपन्यास सहमतछैन । प्रेम र त्यसको खोक्रोपन, संस्कृति र विलासिता अनि पी सबका नाउँमाहुने विभिन्न प्रकारका शोषणहरू विरुद्ध आवाज उठाइएको छ, यिनको वास्तविकतार भ्रमलाई छुद्याएर देखाइएको छ । अनि भ्रममा बाँच्नेहरूको दुःखद परिणामपनि छर्लङ्ग पारिएको छ । एउटा पाठकले यसबाट घेरै क्रा सिक्न सक्छ, धेरैसन्देश लिन सक्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अभिजात बर्गका यी पात्रको खोक्रोपन र हिलोमा कमल फुलेझैँ &#039;शालु&#039;जस्ता पात्रको आदर्श, शान्त र सफल जीवनको तुलना गरेर लेखिकाले जीवनकाआडम्बरहरू क्षणिक हुन्छन्‌ भन्ने सन्देश दिएकी छन्‌ । विलासिता पेम होइनयरो हामी यस पुस्तकमा पाउँछौं भने, वास्तविक प्रेमले मानिसलाई वर्दालनेतागत पनि राख्दछ भन्ने सन्देश पनि हामी यसै उपन्यासद्वारा गृहण गर्दछौं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस अर्थमा &#039;उन्माद&#039; एक निश्छल, निःस्वार्थ, त्याग, बलिदान र आत्मिकअनि आदर्श प्रेमको पक्षमा रहेको उपन्यास हो । त्यसकारण यसलाई प्रेमकाबिभिन्न रूप दर्शाउने, प्रेम-त्रिकोणको उपन्यास पनि भन्न सकिन्छ । फिरोज,आकाश र शालुको सम्बन्धलाई नमुनाका रूपमा हेर्न सकिन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपन्यासले एउटा खास समुदायको जीवनका विभिन्न पक्षहरू प्रस्तुतगरेको छ, जसबाट कति पाठक अनभिज्ञ पनि रहेका हुन सक्छन्‌ । यस अर्थमायसले एक वर्गको जीवनको ज्ञान हामीलाई जानकारी दिएको छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सरल र बगेको शैलीले गर्दा अनि कथावस्तुको राम्रो विकासका कारणउपन्यास लोकप्रिय बन्ने आशा गर्न सकिन्छ । यो उपन्यासको कथा अत्यन्तरोचक हुनाले यसमा एक सफल फिल्म वा टेलिश्रृङ््खला पनि वन्न सक्छ भन्नेमलाई बिश्वास छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्त्यमा पाठकमा यो उपन्यास एकदम लोकप्रिय हुनेछ भन्ने शुभकामनादिन चाहन्छु । यो उपन्यास, नरौकिएर पढिसिध्याएँ । अन्य पाठकले पनियसैगरी पढ्नै कामना गर्दछु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डा: घुबचन्द्र गौतम२०६५/११/२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आफनो भनाइ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवनका विविध घुम्तीहरू पार गर्दै म यहाँहरूसामु आफूनो आठौँ कृति&amp;quot;उन्माद लिएर उपस्थित भएकी छु । आशा छ, मेरा प्रिय पाठकवृन्दहरूले,मैरो अन्य कृतिलाई जस्तै यस उपन्यासलाई पनि अवश्य माया गर्नुहुनेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले यो उपन्यास युवावर्गकै लागि लेखेकी हुँ । आफूले देखेसुनेकाघटनाहरूलाई मैले टपक्कै टिप्न खोजेको छु । कथालाई सिगार्ने क्रममाकतै-कतै काल्पनिक शब्द भएपनि यी घटनाहरू धेरैजसो वास्तविक नै हुन्‌ ।ती पात्रहरूको कथाव्यथालाई उतार्न म कतिसम्म सफल भएँ या भइनँयसको जिम्मा लगाउने काम प्रिय पाठकहरूलाई नै सुम्पेकी छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दोषी&#039; उपनामलाई लिएर उठने प्रश्नहरूको सवालमा चाहिँ म यति नैभन्छु, मैले थाहा पाएदेखि आफूनो स्वार्थको लागि अरूको खुसी रेटेभौँ पटक्कैलाग्दैन । आफूले प्रचण्ड गर्मी सहेर अरूलाई छहारी दिँदा पनि भोग्नुपरेकापीडाहरू आफूनै ठासँमा छन्‌ । यही पीडाहरू पोख्ने क्रममा नै म प्रियपाठकहरूको प्रिय लेखिका बन्न पुगेछु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन भनेकी यस्तै हो । प्रत्येकको जीवनमा उकाली ओरालीहरूआइरहन्छन्‌ । आज भने मैले सगरमाथा टेकेको अनुभूत गरेकी छु, किनकिमैले आफ्नो उपन्यासको पानामा वरिष्ठ साहित्य साधक डा. ध्रुवचन्द्रगौतमलाई सजाउन पाएकी छु । म यति विग्न खुसी छु जसको लेखा जोखानै छैन । मेरो बच्चादेखिकै रहर थियो वहाँलाई नै उपन्यासमा भूमिकालेखाउने वहाँले मेरो रहरलाई सहर्ष स्वीकार गर्नु भयो । म वहाँको योगुणलाई आजन्म भुल्ने छैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले जति नै अगाडि पाइला चाले पनि म आफूनो प्रथम पाइला टेकाउनेवरिष्ठ साहित्य साधकज्यूहरूमा कृष्णप्रसाद पराजुली, डा. ओमवीर सिंहबस्न्यात र इन्दिरा प्रसाईलाई कदाचित भुल्नेछैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मलाई प्रेरणा दिने यति विघ्न साहित्य साधकज्यूहरू हुनुहुन्छ । मघर्म संकटमा छु कसको नाम लेखौँ कसको नाम छोडौं | त्यसैले मैलेएकपाटो रोज्न बाध्य भएँ । मेरो साहित्य रूपी सन्तानलाई सही मार्गदेखाउदै भूमिका र समीक्षा लेखिदिँदै मलाई हौसला प्रदान गर्नुहुने वरिष्ठ&lt;br /&gt;
साहित्य साधकज्यूहरूमा रमेश विकल, जनकवि केसरी धर्मराज थापा,गोपिकृष्ण शर्मा, केशव सुवेदी, चुडामणी रेग्मी, मुक्तिनाथ शर्मा (नेउपाने)कलाघधर काफूले, ज्ञानुवाकर पौडेल, मोहन ढुवाल, श्री ओम श्रेष्ठ रोदन,ब्रहमप्रिय प्रेमस्वरूप, श्यामप्रसाद अर्याल, डा. खगेन्द्र प्रसाद लुइटेल, तिलकप्रसादलुइटेल, अर्याल ,अर्जुन विरक्ति, यादव भट्टराई, नवराज रिजाल, बी. केपाल्पाली, अरुण खत्री नदी, विजयराज आचार्य, विश्व सिग्देल, छवीरमणसिल्वाल, दिपेश चौलागाई, ज्ञानेन्द्र विवश यहाँहरू सम्पूर्णप्रति म हार्दिकआमार व्यक्त गर्न चाहन्छु ।&lt;br /&gt;
साहित्य लेखनका लागि मलाई हरक्षण साथ दिने स्व बाबा कुलबहादुर(गजुरेल) क्षेत्री, आमा सूर्यकुमारी क्षेत्री, श्रीमान टेकबहादुर (खरेल) खत्री,बाबु गंगा खरेल, सम्पूर्ण दिज्यूहरू, दाज्यूहरू, नेत्रबहादुर क्षेत्री, डा. राजक्षेत्री, सुरेश क्षेत्री, डा. दिनेश क्षेत्री (भाइ), गोविन्द सुवेदी, शेरबहादर केसी,भाष्कर सुवेदी, पुरेन्द्र शर्मा (भिनाज्यूहरू), छोराहरू आकाश खरेल, क्षितिजखरेल, सम्पूर्ण आफन्तहरूप्रति र नेत्रहीन साथीहरू सुरेश राजभण्डारी,ओमप्रकाश बञ्जाड्े, उन्माद उपन्यासलाई सम्पादन गर्नुहुने कृष्ण पौडेल,कम्प्युटर गर्नुहुने प्रवीण बुढाथोकी, लक्ष्मी श्रेष्ठ, आवरण गर्नुहुने हरिकृष्णबस्ताकोटी, कुश्माखर पाण्डेय, गोपाल गैरै सबैप्रति र प्रकाशनको जिम्मालिएर तपाईंको हातसम्म पुस्तक प््याउने डीकुरा प्रकाशनका प्रति हार्दिककृतज्ञ छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
र, हरेक पक्षमा अपनत्व र सदभावनाका साथ गम्भीरतापूर्वक सल्लाह रसुझाव दिनुहुने बहुचर्चित साहित्यकार पुण्यप्रसाद प्रसाईका प्रति हार्दिकआमार ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्त्यमा पाठकको मायामा नै आफनो अस्तित्व जोगिने हुँदा यहाँहरूकोयस्तै मायाको अपेक्षा गर्दछु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म यो पुस्तक मेरी ममतामयी आमा सूर्यकुमारी क्षेत्रीमा समर्पण गर्दछु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- ललिता &#039;दोषी&#039;&lt;br /&gt;
बुद्धनगर, काठमाडौं&lt;br /&gt;
मिति : २०६४ पुस २३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==एक==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कारको हर्न सुनेपछि मस्त निद्रामा परेकी कान्छी जन्याकजुरुक उठेर गेटमापुगिन्‌ । गेट खोलेपछि कार घरभित्र पस्यो । कार घरभित्र पसेको धेरैबेरभइसक्दा पनि शालु सघैँझैँ दिदी भन्दै बुर्लुक्क उफ्रैँदै निस्किनन्‌ । मालिक रमालिक्नी कारबाट बाहिर निस्कँदै लर्बराएको स्वरमा भने, &#039;हेर कान्छी, अबहाम्री शालु पनि ठूली भइन्‌ । आजदेखि त पिउन पनि सिकिन्‌ । नपत्याएरआफैँ हेर&#039; भन्दै उन्मत्त हाँसो हाँस्तै घरभित्र पसे । मालिक र मालिक्नीकोकुराले कान्छीको हृदय नै छिन्नभिन्न भयो । आँखाबाट बर्बरी आँसु झार्दैमूर्तिकैँ उभ्भिरहिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;शानु मैयाँसापलाई झिक&#039; भन्ने ड्राइभर चन्द्रकान्तको बोलीले झसङ्गभई कान्छीले शालुलाई कारबाट बाहिर निकालिन्‌ । शालुले कान्छीलाई अङ्गालोहाल्दै भनिन्‌, &#039;दिदी टाउको दुख्यो । खुट्टा पनि टेकिँदैन, अब के गरौं ?&#039; कान्छीलेचुपचाप शालुलाई डोच्याउँदै कोठामा ल्याएर पलङमा सुताइन्‌ । शालुको जुत्ताखोलेर कोठाबाहिर राखिदिइन्‌ । कान्छीको आँखाबाट झरेको आँसु रोकिएकोथिएन । शालुले &#039;ऐया, टाउको दुख्यो&#039; भन्दै लामो सुस्केर हालिन्‌ । कान्छीलेपलडमा वसेर शालुको टाउको आफनो काखमा राखेर मिचिदिइन्‌ । तर ओठचल्न सकेन । शालुले दिदी नबोल्नुको कारण बुझेर भनिन्‌, &#039;दिदी तपाई त कुरानै नबुझी रिसाउनुभयो ।&#039; आफनो हात दिदीको आँखामा पुस्साउँदै भनिन्‌,“अहो ! रुनु पनि भएछ । साँच्चि मैले रक्सी पिएकी होइन । कसले मेरोखानेकुरामा के मिसाइदिएछ । मलाई पत्तो छैन । दिदी नरुनोस्‌, साह्रै गाह्रोभएको छ, बत्ती निभाएर जानोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी बत्ती निभाएर आफनो कोठामा आई, डङ्ग्रङ्ग ओछ्यानमा पछारिइन्‌ । आफूलाई थाम्त नसकेर घुँक्क-घुँक्क गरी रोइन्‌ । आँखामा विगत र वर्तमानचलचित्रभैँ नाचिरहयो । आफूलाई घरबाट निकालेपछि फूपूले बच्चा स्याहारगर्न र घरको काम गर्न भनेर दीपक र उर्मिलाको घरमा ल्याएर छोडिदिइन्‌ ।त्यतिखेर शालु अठार दिनकी मात्र थिइन्‌ भने कान्छी बीस-बाईस वर्षकीथिइन्‌ । शालु तीन पुगेर चार वर्षमा लाग्दा उर्मिलाले सुजनलाई जन्माइन्‌ ।शालु र सुजन दुवै कान्छीकै पोल्टामा हुर्कदै गए । कपण्डोलमा टन्न पुर्ख्यौलीसम्पत्ति भएका दीपकले सानै उमेरमा अधिकृत पास गरेको भए पनि अधिकृतकोजागिर छोडी व्यापारमा लागे । व्यापारमा लागेपछि उनको रहनसहन,बोलीचालीमा विस्तारै परिवर्तन आउन थाल्यो । व्यापारमा राम्रो फाइदा भएकोलेचाबहिल र कुलेश्वरमा जग्गा किनी भाडामा लगाउनकैँ लागि घर बनाए ।घरभाडा मात्रै मासिक चालिस-पचास हजार आउने भएकोले उनीहरूलाई पैसाको कमी थिएन । त्यसमाथि व्यापारबाट आउने पैसा छुड्दै थियौ । दीपककावावु-आमा सानैमा मरेका हुनाले दीपक, उर्मिला नै पूर्ण स्वतन्त्र थिए । उनीहरूलेसाँझको खाना घरमा खाएको त्यति याद छैन कान्छीलाई । होटेल, रेष्टुराँ, पार्टीआदिमै आधारात बित्व्यो र बित्छ पनि । मनलाग्दा घर आउँछन्‌ त मननलाग्दा घर आउदैनन्‌ । शालु र सुजन सानौमा बिरामी पर्दा कान्छीले कतिरात आँखा झिमिक्कै नगरी पनि बिताइन्‌, त्यो आफ्नै ठाउँमा छ। सबैपरिवारको तुलनामा ज्यादै संवेदनशील छिन्‌ । शालु र सुजन दुवैलाईकान्छीले हुर्काएकी आए पि कान्छी शालुलाई आफनै मुटुझौँ प्यारो गर्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु कान्छीकै मायालु काखमा ह्किन्‌, बढिन्‌ । बाबु सम्पन्न भएको हुँदाउनले अभाव देख्नुसम्म पनि परेन । अभाव र पीडा भनेको के हो, उनलेकान्छीदिदीले भनेका कथाहरूमा मात्र सुनिन्‌ । शालु कथाका पात्रहरूको दुःखसुन्दा पनि चिन्तित हुनै भएकीले कान्छीले उनलाई दुःखका कथाहरू सुनाउनपनि छोडिन्‌ । शालुको सानो मस्तिष्कले केवल यही सोच्यो । संसार त धेरैसुन्दर रहेछ । सबै सम्पन्न र खुसी रहेछन्‌ । मानव आर्ततादको त पत्तै भएनशालुलाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँसम्म कि आफ्नै घरमा बसेकी, सुन्दर आँखा र बान्की परेको अनुहारभएकी आफूलाई आफनै मुटुभौँ ठान्ने कान्छीदिदीको विगतसँग पनि अनविज्ञथिइन्‌ शाल्‌ । उनले यति मार बुझेकी थिइन्‌- कान्छीदिदी आफूलाई असाध्यैमाया गर्छिन्‌ । आफनो मायाको कारण तै यहाँ वसेकी हुन्‌ । म नै दिदीकोसम्पूर्ण हुँ । जसरी मलाई ठेसलाग्दा दिदीलाई दुख्छ, त्यस्तै दिदीलाई ठेस लाग्दामलाई दुखैन भने म जन्मनुको अर्थ छैन । हो अर्थ .... ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==दुई==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीलाई उठ्नै मन लागेको थिएन । शालुलाई ब्रेकफास्ट दिनकै लागिनसकी-वसकी उठिन्‌ । अण्डा र दूध लिएर शालुको कोठामा पुगिन्‌ । त्यतिखेरसम्मशालुलै स्कुल जानका लागि जुत्ता, मोजा लगाइसकैकी थिइन्‌ । शालुले डराई-डराई कान्छीको अनुहारमा हेरिन्‌ । कान्छीको आँखा रातो र औठ-मुख पनिसुन्निएको साथै मौन थिइन्‌ उनी । शालुले कान्छीदिदीको गालामा म्याइँ खाँदैभनिन्‌, &#039;दिदी नबोल्नै भए म स्कुल नै जान्त के, दिदी त्यत्तिकै पीर गर्नुहुन्छ मबिग्रिन्न भनेपछि बिग्रिन्त ल तपाईंलाई गाड्रो भए जस्तो छ गएर सुत्नोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले कुनै प्रतिक्रिया नजनाई एकोहोरो शालुको अनुहारमा हेरिरहिन्‌ ।गोरो अनुहार, ठूलाठूला निर्मल र सुन्दर आँखाहरू, मिलेको दाँत, पृष्ट छाती,होचो-होचो मोटोमोटो शरीर । शालुले हाँस्तै भनिन्‌, &#039;दिदी मलाई हेरेर कहिलेपनि अघाउनुहुन्न भन्या, साँच्चै दिदी म अप्सराजस्तै छु र ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुको शब्दले कान्छीको आँखा भरियो । शालुले कान्छीदिदीको आखाकोआँसु पुच्छदै भनिन्‌, &#039;मलाई थाहा छ, म दिदीका लागि अप्सराभन्दा पन्ति सुन्दरीछु । म दिदीलाई माया गर्नकै लागि स्वर्गबाट &#039;झरेकी हुँ, म फूल हुँ रे, म जूनहुँ रे, दिदीले सानोमा भन्ने गरेको शव्दहरू अझै विर्सेकी छैन । नरुनोस्‌,आजदेखि दिदीले जे भन्नुहुन्छ त्यही गर्छ,&#039; भन्दै शालु स्कुलतिर लागिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी शालुकै ओछ्यानमा थचक्क बसिन्‌ । आँखामा शालुकै मायालुअनुहार नाचिरहयो । मनमनै सङ्ककल्प गरिन्‌- म मेरी शालुलाई सन्त्रासमयबातावरणभित्र निशास्सिँदै मर्न दिने छैन । मेरी शालु अग्निकण्डमा पर्दा मस्वयम्‌ जल्नेछु । सम्पूर्ण पाएर पनि पसार शालुले आदर्श बाबु-आमा पाउनसकिनन्‌ । शालुकी आमाले आफनो नविसिँदिएकी भए सायद मैले त्योउलंदो बैंसलाई किच्नु, मिच्नु र थिच्नु पर्दैनथ्यो । बैंसलाई थेग्नुपर्दाको कष्टसम्झेर कान्छीको मन भक्कानिएर आयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उमिंलाले शालुको कोठाको ढोका खोल्दै कर्कसा स्वरमा भनिन्‌, &#039;फैरि केभयो तिमीलाई ? किन मुख फुलाएर बसेकी ? शालुले हिजो के अलिकति पिएरआएकी थिइन्‌, यिनको शिरमाथि पहाडै टुट्यो । मेरी छौरीलाई तिमी योजमानामा पनि आफूजस्तै वनाउन चाहन्छयौ : थाहा छ तिमीलाई ? अस्तिडा. पुष्करकी श्रीमतीले मेरो पिउने बानी छैन भन्दा सबै पेट मिचिमिची हाँसे ।डा. पुष्करले कहाँबाट गोबर टिपेछ भन्दै थिए । त्यति मात्र हो र यो जमानामापरिचय गर्दा नमस्कार पो गर्छै । त्यसको हात छुँदैमा त्यो सानी हुन्थी र ! सधैँमै हँ भन्ने डा. पुष्कर त स्वास्नीको गँवारपन देखेर नीलो र कालो भयौ । मेरीशालुलाई अहिलेदेखि नै सभ्य समाजमा रहने तरिका सिकाउँछु बुझ्यौ !?पाइलटको छोरा गान्टै, प्रभाते छ नि त्यो शालुसँग डराउँदो रहेछ । मलाईअन्टी शालुलाई यो गिफ्ट दिनु भनेर दियो । छान्न कति जानेको गान्टैले, फ्रकपनि यति राम्रो ल्याएछ कि ठ्याक्कै हिरोनीहरूले लाउने जस्तो छ भन्या !शालुको पापा भनिसिन्थ्यो- त्यो फ्रक त होलसेलमा नै निक्कै महँगो पर्छ रे !आज त्यही फ्रक लगाएर पार्टीमा लैजान्छु । गान्टे दङ्ग पर्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाको कुराले कान्छीलाई भाउन्त होला जस्तो भयो । कान्छीको मगजलेकेही सोच्नै सकेन । उनी हेरेको हेरै भइन्‌ । भर्खर चौध पुगेर पन्ध लागेकीछोरी नशामा &#039;फुम्दा रमाउने र छोरीकै लागि गिफट ल्याउने आमा पनिहुँदारहेछन्‌ । कान्छी भित्रभित्रै दाह्वा किट्दै कोठाबाट बाहिरिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;ओ डार्लिङ तिम्रो फोन ।&#039; दीपक उर्मिलालाई कडलेस दिएर ट्वाइलेटपस्चै । उर्मिलाले हलो गर्दै भनिन्‌, &#039;हैन किन विहानबिहानै सम्झनुभयो उमाजी? आज खाल त्यहीँ जम्ने होइन र ? त्यहाँ क्यान्सिल भयो रे, किन ? ए कान्छीसास्‌ आउने ? हो भन्या, पाख्रेहरूले त टाउकै खान्छन्‌ । दुई-चार महिनाभएको छैन गएको फेरि किन अन्मरिनु पन्या होला ? त्यसौ भए तपाईँ आज आउनुहुन्त । जचाउनु जानु छ भनेर आज, रै ! हुन्छ, हुन्छ आउनुहोस्‌ ।पाख्रेहरूको फतौरे गफ सुनेर दिन काटन गाह्रै पर्छ । प्रेमाको घरको खान्कीत्यति मीठोचाहिँ हँदैन । छुच्ची मोरी रेडलेबलमा सस्तो रक्सी मिसाउँछै जस्तोछ, जति पेग खाए पनि छुँदैन । बर्गर, पिजा, सेकुवा सबै बाहिरैबाट मगाउनुभन्नु अस्तिनैको जस्तो &#039;झरेष्ट नपरोस्‌ । तासमा धैरै पैसा जित्नै पनि त्यही,खान दिन कन्जुस गर्ने पनि त्यही । मलाई त प्रेमाको व्यवहार पटक्कै मनपर्दैन । आज्ञ त रेडलेबल हाम्रै अगाडि खोल भन्नुपर्छ । हुन्छ म पनि दसै वजेआउँला । फेरि भरे पार्टीका लागि चाँडै फर्किनुपन्यो ति ! मनीषा ब्युटिपार्लरराम्रो छ रे, हुन्छ त्यसो भए म पनि त्यहीँ जान्छु । राम्री त हुनैपन्यो नत्रवूढाहरूले के ठान्लान्‌ ? ल-ल राख्छु । दस बजे नै आउँला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फोन गरिसकेर भान्सामा आई डाइनिङ टेबुल ठटाउँदै भनिन्‌, &#039;हरे शिव !यो कान्छीलाई कालले घिसार्ने बैला भयो कि कसो ? अझै ग्यास सल्काएकीछैन, कहाँ मरी होला ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले भान्साको ढोकामा आई भनिन्‌, &#039;सापनी ! आज साह्रै गाह्रो भएकोछ चन्द्रकान्तलाई काम गर्नु भनिस्यो । उनैले सबै काम गर्छन्‌, फ्रिजमा फ्राइमासु, अचार सबै छ । चिया र भुजा पकाउने त हो नि!&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिला चिच्याइन्‌, “ओहो ! अब त यो राँडको जिव्रो पनि कर्दझौँ भइसक्यो ।शालुलाई माया गर्दिन भनौं भने पनि त्यत्रो जवानी नै बलि चढाई । माया गर्छभनौं भने शालुले लाए, खाएको देखिसहन्न । हामी सगुल्लै बाबु-आमा हुँदाहुँदैयसलाई केको टाउको दुखाउनुपर्दो हो कुन्नि ? हिजो शालुले पिएर आएपछियसको होस हराएको छ । न यो घरबाट निस्की भन्दा निस्कन्छे । कुन जुनीकोपाप आइलाग्यो ।&#039; उर्मिला फतफताउँदै चन्द्रकान्तलाई बोलाउँछिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाको वाणरूपी शब्दहरू सुत्दासुन्दै अचानो भइसकेकी कान्छीको छातीमाउर्मिलाको गालीले त्यति दुखैन । हिजौकौ शालुको दृश्य सम्झेर भने तरक्कआँसु झारिन्‌ । &#039;अन्न फारो गर्नु हुँदादेखि छोराछोरी बानी लाउनु कुनादेखि&#039;भन्ने उखान सम्झिन्‌ । आफूले जति चोट सहन परे पनि शालुलाई सपार्छु ।&#039;अन्त्य राम्रो त सबै राम्रो&#039; यस्तै मनमा करा खेलाएर ओछ्यानमा छटपटाइरहिन्‌कान्छी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==तीन==&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले कान्छी सुतेको कोठामा गएर बोलाए, &#039;कान्छी खान आरु,साप-सापनीको सबारी भयो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले विरक्त स्वरमा भनिन्‌, &#039;तिमी खाक म पछि खान्छु ।&#039; चन्द्रकान्तले सम्झाए, &#039;तिमी भोकभोकै बस्दैमा समस्याको समाधान हुन्छत ! तिम्रो गाँठी क्रा मैले पनि बुझेको छु । म पनि शालु मैयाँसापलाई मायापर्छुनि ! आक खाँदै शालु मैयाँसापलाई सर्पको डसाइबाट कसरी टाढा राख्नेहो दुवै मिलेर सल्लाह गरौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तको कुरा सुनेर कान्छी उठिन्‌ र चुपचाप चन्द्रकान्तको पछिपछिभान्सामा आइन्‌ । चन्द्रकान्त मेचमा बसे । कान्छीले चन्द्रकान्तनजिकैको मेचमाबस्दै भनिन्‌- &#039;चन्द्रकान्त ! शालु मैयाँसाप त मैले रक्सी पिएकै होइन भनिसिन्छनि ! उहाँले यो उमेरमा आएर पहिलोपल्ट मसँग &#039;फूटो बोलिस्यो बुझ्यौ ?त्यसैले हृदयमा उठेको हुरीको &#039;फोक्का मत्थर हुँदै भएन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले लामो श्वास फेर्दै उत्तर दिए- “मैयाँसापले भनेको करा ठीकहो । तिमी कुरा नै नबुझी मन सानो बनाउँछयौ । मैयाँसाप र अरू केटाकेटीहिन्दी गीतमा डान्स गर्दै थिए । सबैले मैयाँसापको डान्स र सौन्दर्यको तारिफपनि गरिरहेका थिए । मैयाँसाप गाह्रो भो भन्दै म नजिकै आएर बस्नु भो । त्योगान्टेले सिँगै फेन्टाको बोतल मैयाँसापलाई दे भनेर इसारा गरेको मैले झट्टदेखेँ । मैयाँसापले फेन्टा लिएर घुदघुट पिइस्यो । फेन्टा पिएको केहीबेरमै झुल्नथालिस्यो । मेरो सातोपुत्लो गयो । म मैयांसापलाई समातेर बसिरहेँ । सालेगान्टेको मनशाय बुझन थाहा नपाएझैँ गरी त्यसलाई हेरैँ । त्यो सिकार खानआतुर भएको सिंहभौँ थियो । त्यसको त्यौ रूप सम्झँदा अहिले पनि मुदुढुकढुक हुन्छ । दीपक साप र उर्मिला मैयाँसापलाई छोराछोरीको केही वास्ताछैन । पिउन र अश्लील कुरा गर्न पाए केही चाहिँदैन । आज पार्टीमा मनभएको भए शालु मैयाँसापको जीबन तहसनहस हुन्थ्यो होला । कान्छी, अबशालु मैयाँसापका लागि केही गर नत्र तिम्रो सपना टुक्रिन्छ । प्रभाते जस्ताकोगिद्दै दृष्टिबाट कहिलेसम्म बचाउन सकिन्छ र ? पार्टीमा भएकोले पौ म सँगैथिएँ । होटेल, रेस्टुराँमा त टन्न भात खाएर आई कारमै मुर्दालाई ढुकेझँ साप-सापनीलाई ढुक्न हो । होटेल रेस्टुराँमा यो दर्घटना घटेको भए के हुन्थ्यो होला,आफैँ सोच त । त्यो गान्टे देख्दा मात्र सानो हो । केटीहरू फेरी-फेरी कारमाडुलाएको मैले कतिपल्ट देखेको छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तको कुराले कान्छी होस हराएझैँ भइन्‌ । कान्छीको भोकप्यासकता भाग्यो-भाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले करा थपे, &#039;कान्छी तिमीलाई थाहा छ ? त्यो जँडपाहा पूर्णेकीछोरी मोनाको अस्ति राति सम्साँझैमा बलात्कार भएछ नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले आत्तिँदै भनिन्‌, &#039;होइन के भनेको तिमीले ? अस्ति बिहानै त होमैले भेटेकी ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ल कस्तो बिश्वास गर्दिनौ तिमी, अस्ति बेलुका नै बलात्कार भएको रे ।आज बिहान दूध लिन जाँदा सबै त्यही कुरा गर्दै थिए । बलात्कार पनि एक-दुईजनाले हो र चार-छ जनाले गरेका रे । कस्तो समय आयो, त्यत्रि कोपिलालाईपनि बाँकी राखेनन्‌ यौनप्यासीहरूले । मोनाको उमेर त वाह् वर्षको थियो होलाहोइन र?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तको कुराले कान्छीलाई काटेको घाउमा नुनचूक दलेझैँ असहयभयो । कान्छी केही नबोली चुप नै रहिन्‌ । आँखामा मोनाको मायालु अनुहारर खुट्टा खोच्याङ-खोच्याङ गर्दै हिँडेको दृश्यहरू नै आइरहयो । कान्छीको आँखाबाटपुनः आँसुको वर्षा भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले सम्झाए, &#039;भौ अब नरोक । तिमी धेरै कोमल छ्यौ, त्यसैलेदुःखका कुराहरू नै गर्न मन लाग्दैन । बरु मोनालाई हेर्न जञाक । उनलाईशान्तभवनमा राखेको छ रे । विचरीको आफन्त भन्नु नै को छ र ! बाबु-आमालौकल ठर्रामा फुल्दै होलान्‌ । ल म गएँ, तिमी पीर नगरी बस&#039; भन्दै चन्द्रकान्तहिँडे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी बस्नै नसकी फेरि ओछ्यानमा गएर पल्टिन्‌ । उनको मनमा नानातर्क-विर्तक खेलिरहयो । कहिले मोना त कहिले शालु कान्छीको आँखामानाचिरहै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;ममी, दिदी त हुनुहुन्न कहाँ जानुभएछ ?&#039; शालुले स्कुलबाट आएर सोधिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उमिंलाले साडी मिलाउँदै भनिन्‌, &#039;ए, कान्छी बाहिर गइन्‌, शालु बेटा योफ्रक लगाएर हेर त, आज यही फ्रक लगाएर पार्टीमा जानुपर्छ, फ्रकमा तिमीसाँच्चिकै परीझैँ देखिन्छयौ । तिमीलाई प्रकाशे कस्तो लाग्छ ? क त तिम्रो खुवतारिफ गर्दै थियो ।&#039; ,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले अलि रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;ममी त्यस्ताको कुरा नै नगरिस्यो । कान्छीदिदीलेसघैँ भन्नुहुन्छ, &#039;म त राजकमारी जस्तै छु रे । राजकमारीले त धेरै पढ्नुपर्छरे।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;भो, बढी कुरा नगर । फ्रक लगाएर निस्क । मआइहाल्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
शालु फ्रक टिपेर कोठामा गइन्‌ । उर्मिलाले मनमनै सोचिन्‌, &#039;शालु छिटोफ्रक लगाएर बाहिर निस्किहाले हुन्थ्यो । कान्छीलाई ओछ्यानमा सुतेको देखिन्‌भने अर्को आपत आइपर्छ । बल्ल-बल्ल अलिअलि सभ्यता सिक्दैछिन्‌ । कान्छीशालु सभ्य भएको हेर्न सक्दिन । क शालुलाई आफूजस्तै गँबार बनाउनखोज्छे । छोटोको सङ्गत गन्यो भने मान्छै छोटै हुन्छ भनेको ठीकै रहेछ । शालुर कान्छीको बोल्ने शैली एकै छ। त्यो राँड यो घरबाट निस्कीभन्दा पनिनिस्किन मान्दिन । हरै भगवान्‌ ! कुन साइतमा यसलाई भित्र्याएका रहेछौं ।अहिले निल्नु न ओकाल्नु भएर घाँटीमा अड्की ।&#039;&lt;br /&gt;
शाल्नु फ्रक लगाएर आमासामु गइन्‌ । उमिला खुसी हुँदै चिच्याइन्‌, &#039;बाऊ ! कति सुन्दरी देखिएकी तिमी, फ्रकको कलरले पत्ति कति म्याच गरेको ।&#039;आमाको क्राले शालु पनि खुसी भइन्‌ । उर्मिलाका क्राहरू सुनेर कान्छीकोमुटुको ढुकढुकी भने बढ्यो । उनी जुरुक्क उठेर ट्वाइलेट गइन्‌ । दुवाइलेटगाएको केही समयपछि उनी चिच्याइन्‌, &#039;ऐया, म मरें, म मरें मैयाँसाप !&#039;कान्छीको आवाज सुनेर शालु दौडंँदै दवाइलेटमा पुगिन्‌ । र, कान्छीदिदीकोनिधार समात्दै भनिन्‌, &#039;ल छिटो हिंँड्नुस्‌ डक्टरकोमा जाँ । निधार धेरैफुटेजस्तो छ ।&#039;&lt;br /&gt;
उर्मिला रिसाउँदै कोठाबाहिर निस्केर भनिन्‌, &#039;फैरि कै भयो यसलाई : छोरी हिँडआज बाबाले नै कार चलाइसिन्छ । चन्द्रकान्तले कान्छीलाई डक्टरकोमा लैजान्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले रिसाउँदै उत्तर दिइन्‌, &#039;यहाँ दिदीको निधार फुटेको छ । 0401 डुपार्टीको वास्ता छ । देखिसेन निधारबाट रगत वगेको । हजुरहरू गै सो मनैदिदीलाई डक्टरकोमा लैजान्छु ।&#039; शालुको शब्दले कान्छीको मन केही ढुक्कभयौ।&lt;br /&gt;
“हामीभन्दा त्यसकी वजै ठूली भई&#039; भन्दै मनमनै फतफताउँदै उर्मिलाघरबाट निस्किइन्‌ । कान्छीलाई निधारमा लागेको चोटको कनै बास्ता थिएन ।शालुलाई रोक्न सकेकोमा नै उनी खुसी थिइन्‌ । निधारबाट शालुको हातहटाएर ऐनामा निधारको घाउ हेरिन्‌ । रगत भल्ल वग्यो । कान्छीले सोचेकोभन्दा घाउ ठूलो नै रहेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले आँखा चिम्लेर भनिन्‌, &#039;दिदी, दिदी घाउ छोप्नुहोस्‌ न मलाई ढरलाग्यौ ।&#039; हौ&lt;br /&gt;
कान्छीले कपासले घाउ छोप्दै भनिन्‌, &#039;शान्तभवन नै जाउँ न त मैयाँ ।त्यहाँ मोनालाई पनि भेटौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;मोनालाई कै भएको छ र ?&#039; शालुले प्रश्न गरिन्‌ ।&lt;br /&gt;
“सबै त्यहीँ गएपछि थाहा हुन्छ, जाउँ ।&#039; कान्छी र शालु शान्तभवन जानकालागि ट्याक्सी चढे । ट्याक्सीले शान्तभवनको मोड लिँदै गुड्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==चार‍‍==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समय साँझसाँझको थियो । शान्तभवन पुगी ओर्लिन नपाउँदै एउटा युवकशालुनजिकै आएर भन्यौ, &#039;ओ ! च्वाँक देखिएकीछयौ छ च्चाक !&#039; केही पाइलाचालैपछि अर्को युवकले कुरा थप्यो, “ओ यार ! प्लिज एक किस मात्र भए पनिदेक, म स्वर्ग पुगेझैँ हुन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीलाई च्याप्प समातिन्‌, कान्छी सुनेको नसुनै गरी हिँडिरहिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले चार-पाँचजना युवाको नजिकँबाट शालुलाई हिँडाइन्‌ । त्यहां शालुलेकेही सुन्नुपरेन । कान्छीले पुनः चार-छजना युवा भएको नजिक गएर ब्यागखौतलखातल गरेझै गरी शालुलाई अड्त बाध्य गराइन्‌ । एउटा युवकले अर्कोयुवकलाई कोट्याउँदै भन्यो, “क हेर ।&#039; अर्को युवकले शालुतिर हेर्दै भन्यो, &#039;मैयाँफ्रक अलि लामो भएछ । थोरै छोटो भएको भए झनै सुहाउँथ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
अर्कोले टक्क ओठ बजाउँदै भन्यो, &#039;म पनि यस्तै कपडा किनिदिउँला,तिमीसँगसंगै हिँडिदिउँला ।&#039;&lt;br /&gt;
अर्काले हाँस्दै कुरा थप्यो, तिमीहरू के-के किनिदिन्छौ किन रानीवन घुम्नचाहिँमसँग हिँड ।&#039; शालुले कान्छीलाई चिमोट्दै भनिन्‌, &#039;दिदी यहाँबाट छिटो जाकैँ ।&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीले निधारमा टाँका लगाउँदा शालुलाई सँगै राखिन्‌ । डक्टरको ध्यानकान्छीमा भन्दा आफूमा बढी केन्द्रित पाइन्‌ शालुले । शालु मनमनै रिसाउँदैटाँका लगाउन लगेको ठाउँबाट वाहिर निस्किन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु बाहिर ढोकामा के उभिएकी मात्र थिइन्‌, एउटा अधबैंसे पुरुषलेशालुलाई धक्का मार्दै हिँड्यो । केही बेरपछि एउटा साठी-बैसट्टी वर्षको बूढोलेशालुको कान नजिकै गएर भन्यो, &#039;तिमीलाई देखेपछि त आफू बूढो भएकैबिसेँछ नानी !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिका सति [ शब्दहरू सुनैर शालु थरधर काम्न थालिन्‌ । कान्छी बाहिर&lt;br /&gt;
कै शालुले कान्छीलाई च्याप्प समातेर भनिन्‌, &#039;दिदी छिटो घर&lt;br /&gt;
जाँ । मैरो त प्राण नै जान लागिसक्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले शालुलाई ट्वाइलेटनजिकै लगेर हातमा झोला थमाउँदै भनिन्‌,&#039;ल ट्वाइलेटमा गएर यौ कपडा फेरैर आइस्यो सब ठीक हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालु दबाइलेटमा गएर कान्छीदिदीले जन्मदिनका दिन दिएको कर्या-सुरुवाल लग्राएर वाहिर निस्किन्‌ । कान्छीले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;अब हजुरले कसैकोअपशब्द सुन्तुपर्ैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रुन्चै स्वरमा सौधिन्‌, &#039;दिदी म उत्ताउली छु र : प्रत्येकले मलाईनराम्रै दृष्टिले हेरे । साँच्चि कति टाँका लगाउनुपत्यो ? दुख्यो पनि हौला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;चार टाँका लगाउनुपःयो । नदुछ्ने सुई दिएकाले दुखेको त्यति पत्तो भएन ।हजुर बिलकलै उत्ताउलो होइसिन्न । त्यौ फ्रकले गर्दा नै मान्छेहरूले हजुरलाईत्यस्तो ठानेका हुन्‌ । एउटा चरित्रवान्‌ मान्छेले त्यस्तो कपडा कहिल्यै पनिलाउँदैनन्‌ । कत्तिको बलात्कार त कपडाले गर्दा पनि हुन्छ । प्रत्येक कुराहरूमैले भन्नुभन्दा पनि आफैँले जान्नुपर्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले ठुस्किँदै भनिन्‌, &#039;दिदीले घरमै यो कपडा नलगाउनु भनेको भए मलगाउँदिनथेँ नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“उमिंला मैयांसापले कपडाको राम्रो तारिफ गरेको सुनेपछि बोल्ने आँट नैआएन । अर्को कुरा कपडाको आधारमा मानिसले हजुरको मूल्याङ्कन कसरीगर्दारहेछन्‌, आफैँले अनुभव गरिसिन्छ जस्तो पनि लाग्यो, त्यसैले कर्था-स्‌रुवालबोकेर आएकी नि !&#039;&lt;br /&gt;
शालुले भनिन्‌, &#039;यो फ्रकलाई ममीकँ अगाडि च्यातेर टुक्राटुका पार्छु ।&#039;शालुको कुरा सुनेर कान्छीको मत खुसीले गद्गद्‌ भयो । कान्छी र शालुक्याबिन तं. १०५ मा पुगै । कोही आएको चाल पाएपछि मोनाले पुलुक्क आँख्चाखोलिन्‌ । कान्छी र शालुलाई देखेपछि मोनाको आँखाबाट आँसुको मूल फुट्यो ।गला अवरुद्ध भयो । शालु र कान्छीका आँखाहरू पनि रसाए । शालुले मोनाकोकपाल मुसार्दै भनिन्‌, &#039;के भयो तिमीलाई :&#039;&lt;br /&gt;
मौनाले कान्छी र शालुलाई स्टुलमा बस्न आग्रह गर्दै भनिन्‌, &#039;दिदीहरूलाईथाहा छैन कि क्या हो ? म त बर्बाद भएँ । मैरो त बलात्कार भयो नि !&#039;&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीलाई हेर्दै भनिन्‌, &#039;के भनेको मोनाले, मैले त कुरै बुझिर्न ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाले घुँक्कघुँगक रुँदै भनिन्‌, हेर्नोस्‌ शालुदिदी मलाई पाँच-छजनालेबलात्कार गरे । बलात्कार गर्दा मरेकी भए पनि हुन्थ्यो । किन बाँचे हुँला ? तर,बाँचेको पनि ठीकै छ । आफूले थाहा पाएदेखि नै पेटभरि खान नपाए पनिअबदैखि पेटभरि खान पाउने भएँ ।&#039; मोनाको अनुहारमा केही खुसीका रेखाहरूकोरिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;कसरी पेटभरि खात पाउने भयौ !&#039; कान्छीले जिज्ञासा राखिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;मोनाले केही हाँसेझैँ गरी भनिन्‌, &#039;मलाई अस्ति बचाउने मालिक-मालिकनीलेलैजान्छ भन्नुभएको छ । उहाँहरूले लैजान्छु नभनेको भए म यही हस्पिटलकोछतवाठै हामफालेरै भए पनि मर्थे, तर त्यो नर्कजस्ता घरमा म फर्कंदैनथैँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु मोनाको क्राले एकोहोरी भइन्‌ । केहीबेरपछि आँखाको आँसु पुछ्दैसोधिन्‌, &#039;तिमीमाथि वलात्कारचाहिँ कसरी भयो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौनाले गहभरि आँसु पार्दै भनिन्‌, &#039;दिदी खुट्टामा नराम्रोसँग सिसाले काटेकोहुँदा हिँडनै नसकेर ओछ्यानमा पाल्टरहेकी थिएँ । बाबुले कराउँदै भन्यो, &#039;मोनाछिटो तल मौर, रक्सी लिन जानुपर्छ भनेर खुट्टा दुखेको बहाना गर्छेस्‌ ?&#039; आमामैरो नजिकै थिइन्‌ । मैले आमालाई भने, &#039;आमा, मलाई भट्टीमा जानै मनलाग्दैन । रक्सी खान आएका पुरुषहरूले कै-के भनेर जिस्क्याउँछन्‌ । त्यसमाथिरात पनि परिसक्यो । खुट्टा पनि काटेको छ, म हिँड्न सक्दिनँ ।। आमा चुपलागिन्‌ । बाबु तलबाट हँसिया बोकेर माथि आयो अनि हँसिया उठाउँदै भन्यो,“खुरुक्क रक्सी लिन जान्छेस्‌ कि यही हँसियाले छिनालुँ ?&#039; बाबु मलाई काट्नअघि सत्यो । म पिटाइबाट बच्न खुट्टा खोच्याउँदै भट्टीमा गएँ । कृष्ण साहुलाईसिसी दिँदै भने, &#039;एक लिटर रक्सी दिनोस्‌ रे पैसा भोलि दिने रे ।&#039; भट्टीमा युवा वृद्धा सबै थिए उनीहरूले हास्दै भने, &#039;यस्ती राम्री छोरी नै पठाएपछि पैसा किनचाहियो ?; हेर्दा-हेर्दै यो त तरुनी पो भई । आइजौ भुटन-चिउरा खा !&#039; भुटनचिउरा देखेपछि मेरो मुखबाट पाती आयो । मैले भने, &#039;छिटो रक्सी दिनोस्‌,मलाई बेर भइसक्यो । साहुले रक्सी दियो, रम्पी लिएर दस-वीस पाइला मात्रके सारैकी थिएँ, एउटाले मलाई च्याप्प समात्यो । अर्कोले मुखमा कपडाकोच्यो । अरू दुई-तीनजनाले घिच्याउँदै मलाई खेतमा लगेर मेरा शरीरमाथिखेल्न याले । म केहीबेर पीडाले छदपटाएं, त्यसपछि के भयो पत्तै भएन । मबाटोमा मिल्किरहैकी देखेर उहाँहरूले यहाँ ल्याउनुभएको रे । साहृ-साहुनीदयालु जस्तै हुनुहुन्छ ।&#039; मोनाले उज्यालो अनुहार लगाएर कुरा थपिन्‌, &#039;दिदीमैले आज टन्त भातमासु पनि खान पाएँ नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुलै अचम्म मान्दै भनिन्‌, &#039;यसभन्दा अगाडि तिमीले टन्त भात्तमासुखाएकी थिएनौँ त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;पेटभरि ढिंडो-पिठो त खान पाएकी छैन । मासुभातको क्रै छोडौं । वाहाछ दिदी मेरो बाबु-आमा टन्न मासु-रक्सी खाँदा मलाई एक टुक्रा मासु खाभनेर दिँदैनथे । भोलिपल्ट बिहान भाँडा माँझदा उनीहरूले फयाँकेको हड्डीचुस्थँ । कहिलेकाहीँचाहिँ उनीहरूले नखाएर फूयांकेको छाला खान्थे । अबभनै... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाह-तेद वर्षकी मोनाको कुरा सुनेर शालुको जीउभरि काँडा उम्नैमौँ भयो ।उनी केही बोल्न नसकेर चुपचाप भइन्‌ । त्यत्तिकैमा मौनाकी आमा भीमाआएर अचम्म मान्दै भन्तिन्‌, &#039;अहो ! शालु नानी र कान्छी पनि आइछिन्‌ । हेर्नोस्‌न शालुमैयाँ यो हैजाले दिनु दुःख दिई । आफनो जीवन पनि बेर्ध पारी । हाम्रोपनि बद्नाम गरी । अब यस्तालाई कसलै पो विवाह गर्ला ? यसका दिदीहरूपनि उमेर नपुग्दै पोई चाहिएर हिँडे । यौ पनि भट्टीका केटाहरूसँग छिल्लीहोला अनि के वाँकी राख्ये, होइन त ! हिजो बिहान एक्कासि यो हस्पिटलमाछे भन्ने खबर आउँदा त सातै गयो भन्या ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु र कान्छीले नै &#039;भीमाको अनुहारमा हेरै । उसको अनुहारमा दुःखकोएक कण पनि थिएन । शालुले गह्रौँ मन पारेर सोधिन्‌, &#039;अस्ति राति मोना घरनआएपछि कहाकिहाँ खोज्नुभयो नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;मोना नआएपछि यसका बाबु फतफताउँदै भट्टीतिर गएका थिए ।“त्यहीँबाटफेरि रक्सी बोकेर आएछन्‌ । मेरो जीउ साह्रै दुखेको हुनाले अलिकति रक्सीपिएकी त भुसुक्कै निदाएँछु । कान्छीको तिधारमा के भयो : हजुरचाहिँ कताबाटनि?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&#039;दिद्वीलाई घाउ लागेकोले टाँका लगाउन आएका थियौं । एकपल्ट मौनालाईहेर्न मन लाग्यो । अनि यहाँ पसेका हौं । मोना तिमी हिँडडुल गर्न सम्छ्यौ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दिउँसोदेखि अलिअलि हिँडे । मेरो डिस्चार्ज पनि भइसक्यो । अहिले साहु-साहुनी मैरा लागि कपडा लिन जानुभएको छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमाले अलि हड्बडाउँदै भनिन्‌, &#039;कुनवैला आउने हुन्‌ साहृ-साहनी, घरढ्विलो गयो भने बूढाले महाभारत गर्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमाको त्यो क्रूर रूप देखेर कान्छी र शालु नै मौन भई उनलाई हेरिरहे ।केहीबेरपछि हातमा कपडाको पोको बोकेर अधबैंसे लोग्ने-स्वास्ती मोनासामुआए । अधबैंसे आइमाईले भनिन्‌, &#039;हिँड बिस्तारै दवाइलेट गएर लुगा फेरौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कपडा लिँदै भनिन्‌, &#039;हजुर यहीँ बसिस्यो, म कपडा फेराइदिन्छु ।&#039;यति भनी शालु मोनालाई लिएर ट्वाइलेटतर्फ लागिन्‌ । मोना पाइलैपिच्छेऐया-ऐया गर्दै टबाइलेटमा पुगिन्‌ । विहान फेरेको कपडामा रगतका केहीटाटाहरू रहेछन्‌ । मोनाले कपडा फेर्न खुद्ठा उचात्दा दाह्रा किटेर ऐया गरिन्‌ रआँसु &#039;भररिन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालुले मोनाको पुरानो कपडा ब्यागमा हाल्दै भनिन्‌, &#039;मोना, दुई-चार दिनयहीँ बसेको भए हुन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
मोनाले लामो श्वास फेर्दै भनिन्‌, &#039;अस्ति बेलुका एघार बजे हस्पिटलल्याएदेखि मालिबनी सापले एकछिन पनि छोडनुभएको छैन । उहाँ पनि रोगीहुनुहँदौरहेछ । हातखुट्टा सुन्निएर आयो, कुर्ने कोही नहुँदा मालिककै घर जानपत्यो ।&#039; शालुलाई मान्छेहरूको विभिन्त रूप देखेर खुसी र दुःख दुबै लाग्यौ ।सबैजना विस्तारै गेट बाहिर निस्कै । शालुले मौनालाई कारभित्रसम्म पुन्याइन्‌ ।कारमा बस्दा पनि मोना ऐया भन्दै बसिन्‌ । भीमाले साह-साहनीतिर हेरैभनिन्‌, &#039;हजुर पैसाचाहिँ एक गते नै चाहिन्छ है । हिज्ञो भनेको भन्दा एक पैसानघटाउनुहोला । फेरि एक गतेभन्दा उता नजाओस्‌ नि ! कार गुड्दा मोनाखिसिक्क हाँसिन्‌ । शालु र कान्छीले पनि हात हल्लाएर बिदाइ गरे । भीमालेकार टाढा पुग्दासम्म त्यही शब्द दोहो-्याइन्‌ । हजुर म एक गते नै पैसा लिनआउँछु । एक गते ........ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पाँच==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;प्रभाते सधैँ-सघैँ सोध्छ । आन्टी शालु किन आउँदिनन्‌ भनेर । खाने मुखलाईजुँगाले छैक्दैन । एक-दुई घन्टा त यसो मुड फ्रेस पनि गर्नुपर्छ । अरू केटीहरूप्रभातै भनेपछि मर्ने खोज्छन्‌, प्रभातेचाहिँ तिम्रो दिवाना बनेजस्तो छ । तिम्रोभाग्य बलेकै छ कि क्या हो ?&#039; उर्मिलाले क्रा चुहाइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रिसाउँदै जवाफ दिइन्‌, &#039;ममी आइन्दा मलाई यस्ता फाल्तु करानगरिसेला । मैरो मुडअफ हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;त्यौ राँडले के-के क्रा गरेर तिम्रो कानमा फुकिहोला, अनि मेरो कुरालेमुडअफ भयो होइन तिमीलाई ! कान्छीले तिमीलाई भड्घालोमा पार्दा थाहापाउली । स्व्रास्तीको गँवारपनले डा. भट्ट अहिले कसैको अगाडि मुख देखाउनसक्दैनन्‌ । तिमीले पनि आफनो लोग्नेको त्यही चाल गराउँछयौँ, मैले देखिसकेँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;ममी हामीबीच किन दिदीलाई ल्याइसिन्छ ? यो जमानामा एकपेट खाएरसम्पूर्ण काम गर्ने मान्छै पाउँदा पनि हजुर खुसी होइसिन्त !&#039;&lt;br /&gt;
उर्मिला चर्किन्‌, &#039;त्यस राँडलाई कसले बस भनेको छ र : पैसा पाउनेठाउँमा मर भनेको त हो नि ! त्यसैको बाबुको पेवाझैं ठानेकी छे यस घरलाई ।आमा-छोरीको सम्बन्धमा नै विष घोल्ने त्यो राँडलाई निकाल्न सकिनँ भने मेरोनाम उर्मिला होइन बुझयौ !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीलाई निकाल्ने करो गरेपछि शालु झसङ्ग भइन्‌ र आमाको रिसशान्त गर्नु श्रेय ठानिन्‌ । ज्यादै नम्र स्वरमा भनिन्‌, &#039;ममी पनि त्यसै रिसाइसिन्छ ।सबै सरमिसहरू भन्नुहुन्छ । मेरो पढाइ ज्यादै कमजोर छ रे, त्यसैले पो होटेल,पार्टीतिर जान छोडेकी । हजुरलाई थाहा नै छ अस्ति नशा पिउँदा म झन्डैबैहोस भएकी ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;ल-ल चेपारो घस्नुपर्दैन । आमाको मन राखिदिनक्रहिलेकाहीँ जाँदा कति नै पढाइ बिग्रिन्थ्यो र ? लाटी, पहिला-पहिला रक्सीपिउँदा मलाई पत्ति कम गाह्रो पर्दैनथ्यो । बिस्तारै पिउँदै जाँदा अहिले म रक्सीनभई बाँच्नै सक्दिनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु आमाको कुरा सुनेर मनमनै रोइन्‌ । कान्छीदिदी अनेकौं घृणा सहँदैआफनो घरमा बस्नुको रहस्य बुझिन्‌ । ममीले तारिफ गरेको कपडा लगाउँदासहनुपरेको अपमान सम्झिन्‌ । कान्छीदिदीले दिएको कपडा लगाउँदा मोनालाईलैजाने साहुनीले भनेको पनि सम्झिन्‌ । त्यो साहनीले बडो सभ्य भाषामाभनेकी थिइन्‌, &#039;नानी हेर्दा त ठूलै खान्दानकी जस्ती छ्यौ । धैरै चरित्रवान्‌बनाएका रहेछन्‌ बाबु-आमाले । न लगाइमा उच्छुङ्खलता न व्यवहारमा नै ।के हो नानी तिम्रो नाम र बाब्‌-आमाकी नाम ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमाले बीचैमा भनेथिन्‌, &#039;हो हजुर शालु रानीको सम्पत्तिको गणना गरेरसाध्य छैन, तर शालु रानीकै निम्ति यही कान्छीले सारा जीवन अर्पिन्‌ । त्यसैलेछरछिमैकीहरू यिनलाई शालुको पहिला जन्मको आमा हनुपर्छ भन्छन्‌ । मालिक-मालिक्नीले त सयौँपल्ट निकाल्न खोजेका थिए, शालु रानीकै मायाले त्योघरमा अडेकी छिन्‌ यिनी ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाको मालिक्नीले खुसी हुँदै कान्छीलाई विस्तारै दुईपल्ट घाप मारिन्‌ ।शालुको आँखामा त्यो दृश्य पनि नाच्यो ।&lt;br /&gt;
“लौ कहाँ हरायौ शालु ? आमाको शब्दले शालु झसङ्ग भइन्‌ र भनिन्‌,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;ममी हजुरको सुन्दर रूप देखैर टोलाएकी । साँच्चै हजुरहरूको ग्रुपमा हजुर नैरामो होइसिन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;हेरन फुर्क्याएकी । यो रातो लिपिस्टिक लाउँदासुहाउँछ कि, गुलाफी लिपिस्टिक लाउँदा सुहाउँछ भन त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हजुरलाई दुबै लिपिस्टिक सूहाउँछ, तर गुलाफीले चाहिँ सौभर देखिन्छ,&#039;शालुले उत्तर दिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिम्रा पापाले त रातै मनपराइसिन्छ भन्या । त्यसैले रातै लिपिस्टिक लगाउँछुहै? फेरि आज हामी दस-बाह?जनालाई मात्र बर्मा सापले बोलाएका छन्‌ ।त्यसैले पापाले कार हांँक्नुहुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दिदी यो टीका लगाउनोस्‌, ममीले त सधैँ यस्तै टीका लागाइसिन्छ । अनिमात्र दिदीसँग तरकारी किन्त जान्छु ।&#039; कान्छीले टीका हेर्दै जिब्रो काढ्दै भनिन्‌,“उमिंला मैसापले थाहा पाउनुभयो भने मार्नुहुन्छ । जे होस्‌, हजुरलाई मनपर्नेहुनाले लगाइदिन्छु ।&#039; कान्छीले आफूले लगाएको टीका खोलेर शालु दिएकोटीका लगाएर तरकारी किन्त हिँडिन्‌ । बाटोभरि चिनैकाले कान्छीको मुखमाहेरेर हाँस्दै भने, &#039;होइन कान्छी तिमी त बहुलाउन लाग्यौ किक्याहो? योधोतीमा त्यस्तो टीका कहीँ सुहाउँछ ! बैँस धान्यौ, बुढ्यौली धान्न सक्दिनौजस्तो छ अब, तिमीलाई तिधारै ढाक्ने लामो टीकाभन्दा सानै टीका सुहाउँछ ।&#039;कान्छीले कसैको कुरा पनि वास्ता गरिनन्‌ । घरमा आएपछि शालुले लामोटीका झिकेर सात्रै टीका लग्राइदिइन्‌ । तीन-घार वर्षअगाडिको कुरा सम्झैरशालुलाई नमज्जा लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रातो लिपिस्टिक लगाएर पुनः सोधिन्‌ उर्मिलाले, &#039;भन त नानु म कस्तीभएँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ममी ज्यादै राम्रो भइस्यो । म जान्छु है&#039; भन्दै शालु आफनो कोठामापसिन्‌ । ओछ्यानमा पल्टेर दिदीले गाली खाँदाको त्यो क्षण पनि सम्झिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिदी आज पनि हिजो काकाको घर जाँदा लगाएको त्यही साडी लगाउनौस्‌ ।त्यो साडीले तपाईलाई साह्रो सुहाउँछ । कान्छीले त्यही साडी लगाएपछि शालुरमाइन्‌ । सधैँ साँझमा मात्र घर फर्किने उर्मिला बैंकको चैक लिन घर आइन्‌ ।कान्छीलाई नयाँ साडीमा देखेपछि कान्छीलाई कहाँ गएर आएको भनेर सोधिन्‌ ।कान्छीले कहीँ पनि गएकी छैन भनेपछि चिच्याइन्‌, &#039;मलाई ढाँद्छेस्‌ नकचरी,बाहिर जाने साडी लगाएकी छे, सोझो करा गर्दिन । सधैं म नभएको मौकापारैर बाहिर मर्दी पो रहिछे ।&#039; (कान्छी चुप लागिन्‌)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;मुसुमुन्द्रे रा जे भने पनि एक कानबाट सुनेरअर्को कानबाट उडाउँछै । भन्‌ कहाँ मरेकी थिइस्‌ ? कोसँग पल्केकी छस्‌ हं ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले आफनो कोठाबाट निस्केर भनिन्‌, &#039;किन दिदीलाई गाली गरिस्या ममी : कुरा नै नबुझी गाली गर्नै हौ ? मैले दिदी हिजो लगाएको साडीलगाउनुहोस्‌ तपाईंलाई सुहाउँछ भनेर जिट्टी गरेपछि, बल्ल उहाँले लगाउनुभएकोहो । हजुरले त सघैँ राम्रो-राम्रो साडी लगाइसिन्छ । दिदीले एक दिन पनि राम्रोसाडी लगाउन हुँदैन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;गालु तिमी पनि अचम्मकी छ्यौ । घरको काम गर्दा साडी लगाएर कामगर्न गाह्रो हुन्छ । यस्ती बच्चीले जे भन्यो त्यही गर्ने यो पनि कम्तीकी छे?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुलाई अतीत सम्झेर मनमा कता-कता नमज्जा लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साँझ-साँझ परेपछि उमिला र दीपक कारमा बाहिर गए । कान्छी भान्साकोकाम गर्दै थिइन्‌ । शालुले कान्छीको नजिक वस्दै भनिन्‌, &#039;दिदी के गर्नलाग्नुभएको ? तपाइँको कामचाहिँ म गरिदिन्छु । मैले भनेको कुराको उत्तरचाहिँतपाईंले दिनुहोस्‌ नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हजुरले अलि-अलि कामचाहिँ सिक्नुपर्छ, तर अलिपछि मात्र, अहिलेको कामभनेकै पढ्ने हो । गइस्यो कोठामा बसेर पढिस्यो, म तातो दूघ लेराइदिन्छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन, आज के कुरा हुँदैछ, आमाछोरीको, हामी पति सुनौं न !&#039; चन्द्रकान्तठट्यौली गर्दै भान्सामा पसे ।&lt;br /&gt;
“के हुनु नि तिम्रै कुरा गरेको, हामी दुईजनालाई भए तरकारी पकाउनुपर्दैनथ्यो । तिमी हलीले खाने जति तरकारी खान्छौ त्यसैले तरकारी कादनलागेकी&#039;, कान्छीले उत्तर दिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमीलाई दुःख हुने भए बाहिरै खाउँला नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;ल हेर चन्द्रकान्त त रुतै थाले । सानौ करामा पनि चित्त दुखाउँछ्‌ यिती । जाबोतरकारी पकाउन के गाह्रो ? मारी बोबनुपनै होइन ।&#039; कान्छीले उत्तर दिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले चन्द्रकान्ततिर हेर्दै भनिन्‌, &#039;बस्नोस्‌ न दाइ । म दिदीलाई यहाँ किनआउनुभयो, फेरि यत्रो वर्षसम्म किन यहीँ बस्नुभयो त्यही कुरा बुझत दिदीलाईफकाइरहेछु ।&#039; -&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले शालुको कुरामै सही मिलाउँदै भने, &#039;भन न कान्छी हामी पनिसूनौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले काट्दै गरेको तरकारी पर सार्दै भनिन्‌, &#039;त्यसो भए चन्द्रकान्तलेथोरै तरकारीमा चित्त बुझाक है त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमीले मागे त यो प्राण नै दिन्थेँ । जाबो तरकारी त के, तिमीले मनकोकुरा बुझिनौ र पो मात्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले हाँस्दै भनिन्‌, “यो चन्द्रकान्त दाइलाई ठट्टा गर्ने कसले सिकाओस्‌,होइन दिदी ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले आँखामा टल्पल आँसु पार्दै भने, &#039;मोरिजाकँ मैयाँ ढाँटेकोहोइन । यो घरमा पसेपछि कान्छीले हजुरलाई माया गरेको देखेपछि म मेरोटुहुरो छोरोलाई यही आमा दिन्छु भनेर क्रैँ । कुर्दाकर्दै कपाल फल्न लाग्यो ।यिनले मेरो आखाको भाषा बुझ्दै वुझिनन्‌ । अव त छौरो पनि आठ-दसबर्षको भइसक्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले अलि रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;मैयांसापसँग पनि चाहिँदो-नचाहिँदो कुरागर्ने हो ? हेरिस्यो मैयाँसाप यिनी मभन्दा तीन-चार वर्ष कान्छा छन्‌ । म यहीपुसमा पैंतीस पुगेर छत्तीस लाग्छु । वास्तवमा चन्द्रकान्तले स्वास्नीको मायालेकतै बिवाह नगरी वसेका हुन्‌ । एकान्तमा रोएको दुई-चारपटक त मैले पनिदेख्लेकोचाहिँ छु । मैले कति सम्झाइसके विवाह गर भनेर यिनी पटक्कै मान्दैनन्‌ ।म जस्तोको कुरा के खान्थे ?&#039;&lt;br /&gt;
वर्षौँवर्षदेखि बाँधेको बाँध एकैचोटि भत्केझै गरी चन्द्रकान्त घुँक्कघुक्क गर्दैरुन थाले ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी र शालुलाई नै चन्द्रकान्तको पीडा देखेर साह्रै नमज्जा लाग्यो ।दुबैले सोचै- चन्द्रकान्त स्वास्नीलाई सम्झेर भक्कानिए । कान्छीले चन्द्रकान्तकोकुरा मोड्दै पलङमा वसेर आनन्दले कूरा गर्ने बताएपछि तीनैजना शालुकोपलङ्गमा बसेर गफ गर्ने थाले । कान्छीले लामो श्वास फेर्दै भनिन्‌, &#039;शालुमैयाँसापको मायाले गर्दा सबै कुरा भुनिसकेकी थिएँ । पुनः मैयाँसापको आग्रहलेअतीत काट्याउँदै छु- मलाई याद छ, म पनि सानोमा हजुरजस्तै चञ्चलथिएँ । त्यसैले होला आमा मलाई चञ्चली भन्दै बौलाउन्हुन्थ्यो । बा-आमा रम अति नै हाँसीखुसीका साथ दिनहरू बिताइरहेका थियौँ । म पढ्नमा तेजभएकी हुँदा एक कक्षादेखि नै प्रथम भएँ । म प्रथम हुँदा बाले प्रत्येक वर्ष खसीढाल्नुहुन्थ्यो रे । म पांच कक्षामा हुँदा खसी काटेर सबै गाउँलेलाई भोज खानदिएको त मलाई अझै याद छ । हाम्रो खुसीमाथि दैवलाई इर्ष्या भएरै होला वावुआफुभन्दा बाह्र वर्ष कान्छी अत्यधिक राम्री इन्दुको मायामा फसेछन्‌ । त्यसपछिघरमा सधैँ रडाको मच्चिन थाल्यो । बाले मेरी गंगाजस्ती आमालाई विभिन्नपुरुषहरूको बात लगाउन थाले । मलाई पनि त मेरी छोरी नै होइन भन्दैबिनाकारण कुट्न थाले । एकरात मेरी आमालाई अहिले निस्किनस्‌ भने आजकोरात काट्न दिन्न भनेपछि आमा मलाई छलेर मामाघर गइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रुन्चे स्बरमा सोधिन्‌, &#039;दिदी रात कादन दिन्न भनेकोचाहिँ के होनि? फेरि तपाईंलाई किन छाडनुभएको नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले पनि आफनो रसिलो आँखालाई धोतीका टुप्पौले पुछ्दै शालुकोप्रश्नको उत्तर दिइन्‌- &#039;रात काट्न दिन्न भनेको तलाईं मार्छु भनेको हो । मलाईघरमै छोड्नुको कारणचाहिँ छोरीले पेटभरि खान पाउली भनेर हुनुपर्छ । किनकिमेरो बाबु प्रशस्त पुँजीवाल थिए । मामाघरमा पेटभरि खान साह्रै गाह्रो थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मामाघरमा माइजूले आमालाई अति नै हेला गर्न थालेपछि फुपूले आमाको दुःखहेर्न नसकी स्बास्नी मरेको तीन छोराछोरीको बानु बूढो-बूढो पुलिससंग टीका-टाला गरेर पठाइदिनुभएछ । पछि पैले आमाको बारैमा सोध्दा भन्नुहुन्थ्यो,“तानी, तेरी आमालाई लोग्नेलगायत सौतेला छोराछोरीले पनि असाध्यै मायागर्छन्‌ । जाँदा तँलाई पनि लैजान्छु, त्यो तर्कमा छोरी राख्दिनचाहिँ भनेकी हो ।हामीले नै तँलाई उससँग पठाउन उचित ठानेनौँ । आमाले पठाएको पैसा-कपडाचाहिँ बेलाबेलामा फपूले लेराइदिनुहुन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले बीचैमा सोधिन्‌, &#039;तपाइँकी आमा गएपछि तपाईंको बाबुले के गरे ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बर आँसु खसाउँदै कान्छीले भनिन्‌, &#039;बानुले आमा गएको रात नै अलिठूलो भुँडी भएकी साह्टै रामी पुतलीजस्ती सानीआमा इन्दुलाई घरमा भिच्रायाए ।सानीआमाले मलाई शङ्ककाल्‌ आँखाले हेरेपछि बाबुले हाँस्दै भने, &#039;यसलाईछोडेर मरिछै । हुन्देक तिम्रो स्याहारसुसार गर्ने काम लाग्छ । तिम्रो फलजस्तोतरम हात्तले काम गरैको म हेर्न सक्दिनँ । नभन्दै त्यसै दिनदेखि बानुले त्योपुतलीजस्ती सानीआमाको खुट्टा मिच्नदेखि लिएर सम्पूर्ण काम गर्ने लगाए ।बाबुले घरमा ल्याएको चार महिनामै सानीआमाले सुन्दर छोरो पाइन्‌ । त्यसपछित झन्‌ बाबुको खुट्टा भुइँमा नै भएन । छिमेकीहरूले “कै हौ रामे चार महिनामैछोरो पायौ नि&#039; भनेर भन्दा बावु जँगा मुसार्दै भन्थे, &#039;हाम्रो भेट भएको त एक-दुई वर्ष भइसकेको थियो । जेठी घरमा हुँदाहुँदै कान्छी भित्रायाउनु मनले मानेनजेठी हिँडेपछि बल्ल मैले यिनलाई भित्रयाएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छिमेकीहरू उत्तर दिन्थे, &#039;किन क्रो चपाउँछौ, रामे, जेठी ननिकाली कान्छीआउन्न भनिन्‌, त्यसैले जेठीलाई निकालेँ भनन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाबु हाँस्दै भन्थे, &#039;ल भन्नोस्‌ मैले जेठीलाई कुटेर निकालेको हो त!अघिपछि यस्तो कृटपिट भयौ होला अर्कै क्रा, त्यस दिन छोएकोसम्म पनि छैनमरिजाकँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;बचनले कृट्यौ होला तत्र घर नै छोड्नेखालकी थिइनन्‌ कान्छीकी आमा ।जे होस्‌, बुढेसकालमा कान्छीकी आमालाई सम्झी-सम्झौ नरोएस्‌ । छिमेकीहरूसबै त्यसै भन्थे ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाबुले उन्मत्त हाँसो हाँस्दै ठाडो उत्तर दिन्थे, &#039;मेरी कान्छीलाई देखेपछिडाहा नगर्ने मान्छै नै देखिनँ ।&#039; बाबुको कराले छिमेकीहरूको मुख बन्द हुन्थ्यो । मेरोपीडा मसँगै थियो । बिहान चार बजेदेखि उठेर घरको सम्पूर्ण काम गर्थे ।भाइको दिसाको थाङ्ना घुनदेखि लिएर तेल लगाइदिने जिम्मा पनि मेरै थियो ।गाई-भैंसी चराउने, भकारो सोत्तर गर्ने, भात पकाउने गर्दा पनि कहिल्यै जसर पेटभरि खान पाउँदिनँथैँ । म मर्नु-बाँच्नुको दोसाँधमा दिन घिसारिरहेकीथिएँ । आमाले पठाइदिने गरेको कपडा र खानेकुरा सानीआमाले खोसेर माइतीपठाइदिन्थिन्‌ । एकदिनको कुरो हौ । म साह्ै भौकाएर गौठालाबाट घर आएँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अँगेनामा फुक्क फुलेको चामलको रोटी देखेँ, भोक खै नसकेर एउटा रोटीचोरेर भाग्दै थिएँ । भाइले रोटी चोरेको देखैछ । आमालाई क्रा लगाइहाल्यौ ।आमा चौटावाट दौडेर आई मलाई लछादै अँगेनामा लगेर तातो भुङ्ग्रोमा हातघुसादै भनिन्‌, &#039;यही होइन तेरो रोटी चोर्ने हात, अब पनि चो्छस्‌ कि : म पीडासहन नसकेर चिच्याएँ । एकैछिनमा हातमा ठूलाठूला फोका उठे । साउनकोमहिना थियो, म पोलेको पीडा सहन नसकेर मर्न भनी खोलातिर दौडँदै थिएँ ।काकीले समातेर ल्याई घाउमा घ्यूकुमारी लगाइदिनुभयो । वेलुका वाबु आएरमेरो घाउ हेर्नुको साटो चोर्नी रण्डीको बान भन्दै मेरो कपाल जगल्द्याएरथाममा ठोक्काइदिए । म पुनः मर्लान्त भएर पछारिएँ । त्यो पोलेको हातले पनिशान्ति पाएन । बेलुका भाँडा माझ । सबैजना हात कुहिएर झर्छ भन्थे । तरझरेन, महिनौं पछि हात निको भयो । दाग भने अझै छ। कान्छीले शालु रचन्द्रकान्तलाई दाहिने हात बढाएर हातको दाग देखाइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु र चन्द्रकान्तका आँखाबाट आँसुहरू बग्न थाल्यो । कान्छीले पनिआफनो आँखाको आँसु पुछ्दै भनिन्‌, &#039;हजुर रुने भए अब म करै गर्दिनँ ।&#039;शालुले रत्चे स्वरमा भनिन्‌, &#039;दिदी अव साँच्चै रुन्न ल सबै कूरा भन्नौस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले कूरा बताइन्‌, &#039;मासु पकाएका दिनहरूमा भने मलाई चाँडै सृत्नपठाउँथे । भाइहरू सुतेका छन्‌ भने पनि भाइहरूलाई उठाएर मासु खुवाउँयै ।म थाहा पाएर पनि थाहा नपाएझौँ गरी रुँदै सुत्थैँ । भोलिपल्ट थुप्रिएकाभाँडाहरू माझ्दा ठीक मोनाले भनेझैँ म पनि हड्डी र छालाहरू चपाउँथैँ ।यसरी अति नै कष्ट सहेर अठार वर्ष बित्यो । गाउँकै पढेलेखेका भावेन्द्रले मेरोदुःख हेर्न नसकी मागी मलाई मन्दिरमा लगैर सिन्दूर हालै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्त कान ठाडो पार्दै भने, &#039;कान्छी तिम्रो कुरा भोलि सुनौँला । तलकारको हर्न लाग्यो ।&#039; चन्द्रकान्त गेट खोल्न गए । शालु खाना खान्न भन्दैओछयाचमा पल्टिन्‌ । चन्द्रकान्तले पनि खानै इच्छा छैन भने । कान्छी पनिभोकै सुतिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==छ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्कुलबाट आएपछि कपडा पनि नखोली कान्छीसामु गएर उनको हात मुसादैंशालुले भनिन्‌, &#039;दिदी आज ममी-पापा मात्र बाहिर जाने कुरा सुनेकी थिएँ ।चन्द्रकान्त दाइ पनि हुनुहुन्छ । अस्तिको बाँकी तपाईंको कथा भन्नुस्‌ है ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले विरक्त स्वरमा भनिन्‌, &#039;अब म हजुरलाई केही करा गर्दिनँ । मैरोकुरा सुनेपछि हजुर र चन्द्रकान्तले कति दिन खान खाइसेन । बितेको कुरासम्झँदै मन दुखाएर कहीं काम लाग्छ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीको गालामा म्वाइ खाँदै फकाइन्‌, &#039;ल आज साँच्चि पीरगर्दैनौं । मलाई त कहिले वाँकी कुरा सुनौं जस्तो भइसक्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीले मुसुक्क हास्दै भनिन्‌, &#039;हजुरको कुरा कसले पो टार्न सक्ला र?जिरी गरेपछि गस्यो, गस्यौ । त्यसौ भए आजचाहिँ खाना खाइवरी बसौंला है ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले खुसी हुँदै झ्यालबाट फूलबारीमा पानी हाल्दै गरेको चन्द्रकान्तलाईबोलाइन्‌ । चन्द्रकान्त फूलमा पानी हालिसकेर आए । त्यतिखेरसम्म कान्छीलेकुकरमै खाना बसाइन्‌ । खाना पाक्न बेर नै लागेन । तीनैजनाले बिहानकैँतरकारी र अचारसँग खाना खाए । कान्छीले भान्सा पुछपाछ गरिन्‌ । चन्द्रकान्तलेभाँडा माझ । शालुले भाँडा घोप्ट्याइन्‌ । चाँडै काम सकेर तीनैजना कोठामागए । पलङमा सञ्जिलोसँग बसे । कान्छीले शालुतिर हेर्दै भनिन्‌, &#039;हजुरलाई क्रासुन्न पाएपछि पढ्न पनि पर्दैन ? जाँच बिग्रियो भने मचाहिँ रिसाउंछु नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(दिदी पनि, एकैछिन नपढ्दैमा कहीँ पढाइ विगिन्छ र ? म पढ्छु । साँच्चैराञ्चैसँग पढ्छु । ल भन्नोस्‌ । भावेन्द्रसँग विबाह भएपछि के भयो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले भावुक हुँदै कुरा बढाइन्‌, “भाबेन्द्रसँग विवाह भएपछि मैले भावेन्द्रर उसको घरपरिवारको भरपूर माया पाएँ । मेरो विवाह गरेको तीन-चारमहिना पनि नवित्दै बाबुलाई एकदिन बेलुका धानमा पाती लगाउन गएकोमौका पारी कसैले दाउराको चिर्पटले टाउकोमै बजारेछन्‌ । बाबु चोट सहननसकी त्यहीँ बेहोस भएछन्‌ । हान्ने मान्छलेचाहिँ बाबुलाई मन्यो भनेरै छोडेकोहोला, संयोग बाबु उत्तानो परेर ढलेको हुँदा पानीमा मुख गाडिएको रहेनछ ।भोलिपल्ट खेतमा जानेहरूले देखेपछि हस्पिटल पुन्याएछन्‌, हस्पिटल लगेर होसखुल्ने सुई दिएपछि होस खुल्यो रे ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“दिदी कसले किन हानेको रहेछ त्यो पापीलाई ? तपाईं हेर्न जानुभयो त !&#039;शालुले जिज्ञासा राखिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठूलोबुबाको जेठो छोरो र सानीआमाबीचको नरामो सम्बन्ध मलाई घेरैपहिलादेखि नै थाहा थियो । उनीहरू मलाई त मान्छे नै गन्दैनथे । कहिलेकाहीँम घरभित्र छु भने दाइ आएर भन्धे, &#039;वानी, बाहिर जा, म घरबाटनिस्कन्धें । सानीआमा र दाइको हाँसोठट्टा भने बाहिरैसम्म सुनेकीथिएँ । बालै आफनी प्राणप्यारी स्वास्नी र छोरोकै बीचको सम्बन्ध थाहापाएपछि आमालाई गाली गरे रे भन्ने सुनेकीचाहिँ हुँ । आमा र दाइकै मिलेमतोमाबाबुलाई मार्न खोजेको हुनुपर्छ भन्ये छिमेकीहरू, तथ्य कुरा उनीहरूलाई नैथाहा हौला । दाउराले हानेपछि बाबुको मुन्टो केही हल्लिन थाल्यो । चालीस-पचास हजार खर्च गरेर टाउकोको अप्नेसन गरे सफल पति हुत सक्छ, असफलपनि हुन सक्छ भन्दा सानीआमा अप्रेसन गर्न तयार भइनछन्‌ । मेरो लोग्नेलाईकेही भयो भने कसले जिम्बा लिन्छ भन्दै बाजिन्‌ रै भन्ने सुनेकी थिएँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुलाकको सुब्बासम्म भएका बाबुलाई पेन्सन नपाकी अफिसबाट काम गर्नसक्दैनस्‌ भनी निकालिदिएछन्‌ । बाबुको मुखबाट बेलाबेलामा -्याल निस्किनथालेपछि कान्छीआमा बाबुलाई पिँढीमा भात दिन्थिन्‌ रै भन्ने हल्ला सुनेकीसम्महुँ । म त्यो निर्दयी बाबुलाई हेर्नसम्म गइनँ । त्यौ पतिङ्गर मलाई र आमालाईसम्झौर धेरै रुन्थ्यो रे । त्यसै भन्थे छिमेकीहरू ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले फेरि प्रश्न गरिन्‌, &#039;त्यो अहिले जिउँदै छ कि मम्यो दिदी !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;त्यौ पापी यति छिट्टै के मर्ध्यौ ? कान्छीआमाको गोठालो भएर बसेको छरे । ठूलोबुबाको छोराले स्वास्नी बिबाह गरे पनि सातीआमालाई पनि छोडेकाछैनन्‌ रे । फुपू त्यसै भन्नुहुन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु र चन्द्रकान्तकै अनुहारमा खुसी छायो । शालुले मुसुक्क हाँस्दै भनिन्‌,&#039;दिदी तपाइंको सानीआमा र जातुला दई काट्न म नै जान्छु भन्ने सोचेकी थिएँ ।दैवले नै काटेछ त्यस निचलाई मैले केही गर्नुपरेन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले सम्झाइन्‌, &#039;मैयाँसाप हामीले रिसलाई बडो कन्ट्रोल गर्नुपर्छ, ।कहिलेकाहीको रिसले मान्छेको सिङ्गो जीवन नै तहस-नहस हुन्छ । हजुरलेबुझिराख्नुपर्ने कुरा यही हो । मेरो बाबु-आमा, मोनाको बाबुजस्ता मान्छेहरू तरक्कयानसरह हुन्‌ । उनीहरू जस्तालाई चलाउँदा आफनै मुखमा छिटा पर्छ ।&#039;२&amp;quot; &#039;ल ल अब चाँडै रिसाउँदिन तपाईं र भावेन्द्रबीचको क्रा गर्नुहोस्‌ । त्यतिमाया गर्नै भावेन्द्रले तपाइँलाई किन छोडे ?&#039;&lt;br /&gt;
के भनौं मैयाँ मैरो भाग्यमै खुसी लेखेको रहेनछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले मुटुमा गाँठो पारेर भने, &#039;शालु मैयाँसाप, म कान्छीलाई सक्दोखुसी दिन तयार थिएँ र छु पनि यिनलाई आफनो खुसीको मलतब नै छैन ।विनको प्राण त केवल हजुरमै अड्को छ । हजुरले भन्ठानिस्यौ होला अस्तिकान्छी चिप्लेर लडिन्‌, त्यौ होइन हजुरलाई पार्टीमा जानबाट रोक्नकै लागियिनले जानीजानी आफनो टाउको फुटाएकी हन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“चुप लाग चन्द्रकान्त नत्र म तिमीसँग बोल्दिनँ । हैन, त्यसो हैन मैयाँसापचन्द्रकान्त &#039;फूट हुन्‌ । यिनको वनावटी कुरामा विश्वास नगरिसेला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले आफनो आँखाको आँसु हातले फुड ओभानो पार्दै भने, &#039;होमैयाँसाप हजुर झुल्दै आएको देख्दा यिनको होस नै गुम भयो । यिनी रातभरिहजुरकै पीरले सुत्न सकिनन्‌ । भोलिपल्ट मसँग शालु मैयाँसापले रक्सी पिएकैहो त भनेर सोधिन्‌ । मैले मैयाँसापले रक्सी पिइस्या होइन । त्यो प्रभातेले नैफेन्टामा केही हालेर मैयाँसापलाई दिन पठाएको हुनुपर्छ । त्यो प्रमातेको चरित्रराम्नैँ छैन, मैले धैरै केटीहरूसँग देखेको छु । मैले मैयांसापको रक्षा नगरेको भएके हुन्थ्यो होला&#039; भनेपछि यिनले भनिन्‌, “चन्द्रकान्त तिम्रो गुण म कहिल्यैबिर्सने छैन । अनदेखि मेरो मैयाँसापलाई त्यस्ता प्रभातेहरूको आँखाबाट टाढा राख्न सकिनँ भने म आफनो जन्मलाई धिक्कार ठान्छु । म मोर्छु चन्द्रकान्तशालु मैयाँलाई केही भयो भने म त मोर्छु भन्दै थिइन्‌ । उमिंला मैयांसापलेदीपकसापसँग कुरा गरेपछि पौ म झसङ्ग भएँ। उमिंला मैयाँसाप भन्दैहोइसिन्ध्यो- हेरिस्यौ हजुर, त्यो कहीँ नभएकी लवस्तरीले आज शालुलाई रोकेरैछौडी । शालुलाई दिदी छैन वाहिर गएकी छिन्‌ भनेर &#039;झुक्काइसकेकी थिएँ ।हत्तनपत्त दवाइलेटमा गएर टाउको पो फटाएर मरिछे । शालुले त्यसको निधारमाकँ रगत देखी उसलाई पुगिहाल्यो, मसंग आउन किन मान्ची । साह्रै घटियाआइमाई रहिछै त्यो । 0 01014 [लाई त्यसको सङ्गतबाट छुटाएन भने हामी कहीँमुख देखाउन लायक हुँदैनौं । कम्की छे त्यो राँड शालुमाधि सम्पूर्ण अधिकारमेरै छ जस्तो गर्छ । बिहानदेखि एक थोपा पानी पनि मुखमा हालेकी छैनत्यसले । अब शालुलाई दुई-चार दिन बाहिर पठाएर त्यसलाई निकाल्नैपन्यो ।त्यो हुँदासम्म शालु हाम्रो कुरा भन्दा त्यसैको करा सुन्छिन्‌ । सधैँ कमारीकँजीत कति सहनु ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डीपकसापले नराम्रो केही भन्नुभएन । उमिंला मैयाँसापलाई सम्झाउनुभयो,हेर उर्मी, कुवाको पानी सिदिएपछि मात्र कुबाको महत्व थाहा हुन्छ । कान्छीनपढेकै भए पति समझदार छै । शालुलाई हानि हुने कुरा क सोच्न पनिसबिदन । बस हामीमै कतै खोट भएर शालु कान्छीकै क्रामा विश्वास गर्छिन्‌कि सोच त । दीपकसापले के त्यति मात्र भन्नुभएको थियो उर्मिला मैयाँसाप तसिंहिनीझौ गरी गर्जिन थाल्नुभयो । त्यसो भए म नै नजाती हँ । अब म मरेपनि भयो होइन ? दीपकसापले सम्झाउँदै भन्नुभयो- &#039;उमिला चुप लाग मतनदुख्लाक । म शालुलाई दुई-चार दिनका लागि बाहिर घुम्त लैजान्छु । तिमीकरसंगरी भए पनि कान्छीलाई घरबाट निकाल । त्यसको कारणले घरमा धेरैअशान्ति भयो । मैले उहाँहरूले गरेको कुरा कान्छीलाई आएर भने ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले बडो सरल रूपमा नै भनिन्‌, &#039;यो घरबाट मेरो लाश निस्किन परेपनि म यो घर छोड्दै छोडदिनँ । म भइनँ भने मेरो शालु मैयाँसापको जीवनभत्किन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कान्छी चिच्याइन्‌- कति बकवास ओकन्छौ चन्द्रकान्त तिमी, मेरो करासुन्न बसेको कि आफनो भाषण सुनाउन ? चुप लाग्लान्‌ भन्यो, :&lt;br /&gt;
चुप त लाग्नै नै होइन तिमीलाई झूट ओकल्न कसले सिकायो हँ ? सँगैबसेपछि कहिलेकाहीँ ठूली मैयाँसापले गाली गरिस्यो &#039;होला तर उहाँ तिमीलेभनेभौँ कठोर होइसिन्न ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले केही दिनअगाडि मात्र आफनी आमाले भनेको कुरा सम्झिन्‌ । शालुबेटा, तिम्रो पापाले तिमीलाई एक-दुई दिन घुमाउन लाने कुरा गरिस्या छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;किन म मात्र हजुर पनि जाँ न एक्लै बोर हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाको जवाफ थियो यहाँ व्यापारमा अलि किचलो भएको छ, म जानमिल्दैन । पौखरा पुगेपछि तिम्रो साथी सिर्जना छँदैछिन्‌ नि । सिर्जनाले तिमीलाईहेर्न मन गरेकी छिन्‌ रे क्या । पापाको फुर्सद हुनेबित्तिकै पापाले तु लगिसिन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले शालुको हात समातेर मुसार्दै भनिन्‌, &#039;हेर यो चन्द्रकान्तको झुटोकुराले गर्दा मैयाँसापको मन दुख्यो । यो मगरको जात एकोहोरो पो हँदोरहेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“चन्द्रकान्त ! शालुलाई बचाएकोमा तिम्मौ गुण कहिल्यै बिर्सन्न भन्नै पनित्यही मुख, आज अनेक थरी भन्नै पनि त्यही मुख । जे कुरा पनि शालुमैयाँसापलाई केही नभन है म बिन्ती गर्छु भन्छिन्‌ । आज पोल खोलिदिएँ बोलेबोल न बौले नबोल । कहिले पो तिमीले मेरो हृदय चिहाएकी छौ र ? शालुमैयाँसाप एकान्तमा म स्वास्तीको मायाले होइन यिनको मायाले रुन्छु । आजसम्मम विवाह नगरी यिनकै मायाले बसेको हँ । स्वास्नीको माया लाग्छ, नलाग्नेहोइन । मैले उनलाई पाठेघरको क्यान्सरबाट बचाउन सारा सम्पत्ति सिध्याएँतर केही लागेन, मरेकी स्वास्नीको खुसीका लागि त्यो टुहुरो छोरोलाई यहीआमा दिन्छु भनेर बसें, आज त यस्तो &#039;फुटो उस्तो &#039;फुटो पो भन्छिन्‌ । काजीसापको के काम नमिलेर मात्र शालु मैयाँसापलाई पोखरातिर लगिस्या छैनत्यसपछि थाहा पाउली के होला ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कुरा मोद्धनु नै उचित ठानिन्‌ र भनिन्‌, “चन्द्रकान्त दाइ अब सबैकुरा छोडेर दिदी र भावेन्द्रको कुरा सुनौँ, तपाईंहरू दुवैजना चुप लाग्नुहोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले उठ्दै भने, &#039;म यित्तको एउटा कुरा पति सुन्दिन । कै नै कुराहोला र लोग्नेकै खुसीका लागि फेरि बलि भइ्टहोलिन्‌ र यो तर्कमा आइन्‌ ।&#039;यति भन्दै चन्द्रकान्त रिसाउँदै हिँडे । कान्छी र शालु हेरेको हेरै भए । दुवैलेचन्द्रकान्त रिसाएको पहिलोपल्ट देखेका थिए ।&lt;br /&gt;
कान्छीले भनिन, &#039;चन्द्रकान्तले जे भने त्योचाहिँ सोड्रैञाना ठीक हो । मबाटचार वर्षसम्म वच्चा नभएपछि घरपरिवारले मलाई साह्रै हैला गर्न थाले ।भावेन्द्रले मलाई घरमा नबसी हामी हङकङ जाँ, उतै गएर राम्रो औषधिगरौँला भनेका थिए । मैले उनको क्रा मानिनँ । तपाईंबाट बच्चा हुन्छ भनेविवाह गर्नुहोस्‌ भनेर जि्दी गरें । उनले सबैको करमा परेर विवाह गरे । विवाहगरेपछि पनि उनमा धैरै परिवर्तन आएको थिएन । सौताले बच्चा पाउनेभएपछि भने थोरै परिवर्तन आयो । भन्थे, &#039;कान्छी तिमीले विवाह गर्नु भनेरठीक गन्यौ । तिम्रै बाटो कुरेको भए सन्तानको मुख नै नदेख्ने पो रहेछु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मलाई पनि उनको खुसी देख्दा लाग्थ्यो । सऔौताको जात न हो कभावेन्द्रलाई मैरो नजिकसम्म पर्न थी । सबै परिबार कान्छीकै पक्षमाथिए । एक रात भावेन्द्र मेरो कोठामा सुत्न आएको निहँमा घरमा महाभारतमच्चियो । भोलिपल्ट भाबेन्द्र अफिसतिर गएपछि सौतालगायत सासूससुरामिलेर मलाई मलाई घिच्चाई-मुन्टाई गरी घरबाट बाहिर निकाले । सौताले त घरबाट निस्किन मानिनस्‌ भने अहिल्यै पेटको बच्चा मारिदिन्छु भनी । त्यसपछित्यहाँबाट निस्केर फपूकोमा गएँ । फूपूले भोलिपल्ट यहाँ लेराइदिनुभयो । हजुरलाईदेखेपछि विस्तारै आफनौ पीडा भुल्दै गएँ । साँच्चै मैयाँसाप अहिले त मलाई तीक्षणहरू सबै सपनाजस्तो लाग्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले सोधिन्‌, &#039;भावेन्द्र तपाईंलाई फेरि कहिल्यै भेदत आएनन्‌ त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मलाई छोडेको पाँच-छ वर्षपछि यहीँ मलाई भेट्न आएका थिए । उर्मिलामैयाँसापले जाने भए जाङ भन्दा हजुरले मेरौ फरियाँ समातैर रुँदै भनिस्यौ,“दिदी जाने भए म पनि सँगै जान्छु । म हजुरलाई समातैर घुँक्कघुँक्क गर्नपुगेछु, भाबेन्द्र कै भन्न खोज्दै थिए, अलमल्ल परे । त्यसपछि &#039;भाबेन्द्र केहीनबोली रुदै हिँडे । त्यसको केही दिनपछि नै काकाले एउटा चिठी र जग्गाकोलालपूर्जा मेरो हातमा थमाएर जानुभयो । यो क्रा आजै हजुरलाई मात्रखोल्दैछु । चिठी पनि अझै छ ल आफैंले पढिस्यो ।&#039; कान्छीले लाजपूर्जा र चिठीनै शालुलाई दिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालुले लालपूर्जा हेर्दै भनिन्‌, &#039;लालपूर्जा जस्तो कुरा पनि यसरी राख्ने हो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो त सम्पूर्ण सम्पत्ति भनेकै हजुर हो । यो सम्पत्तिको कै काम ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीको कुराले शालुको मुटु नै फुट्लाझै भएको थियौ तर मन बाचेरलालपूर्जालाई जतनशाथ आफनै दराजमा राखेर आई चिठी पढ्नि । चिठीमालेखिएको थियो- प्यारी कान्छी सम्झना सधैँको ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी जिन्दगी यस मोडमा आउला भन्ने पत्तै थिएन । हेर त हत्तिँदै तिमीकहाँ पुग्यौ म कहाँ पुगेँ । तिमीलाई सबै खुसी दिन्छु भनेर बिबाह गरै तर आँसुसिवाय केही दिइनँ । तिम्रो सिमल भुवाजस्तै मन पलपल फाट्यो । मैले पनितिम्रो ती निर्बाध आँखालाई धेरै रुबाए । हुन त म त्यहाँ तिम्रो मायाले भनौं यास्वार्थले तिमीलाई लिन नै आएको थिएँ । मबाट बच्चा नहुने थाहा पाएकी भएतिमी पुनः मसँग आउँथ्यौ पनि होला तर शालुप्रतिको तिम्रो अगाध प्रेम देखेरमैले फेरि एकपल्ट तिम्रो खुसी खोस्न चाहिनँ । कुरा के भने कान्छी श्रीमतिलेपाएको बच्चा मैरो होइन । तिमीबाट बच्चा हुन्छ, त्यसैले तिमी विवाह गर ।तिमीलाई जिन्दगीभरि खान पुग्ने सम्पत्ति मैले तिम्रो नाममा जम्मा गरिदिएकोछु । पछिका लागि एउटा जीवनसाथी रोज । तिमीले अर्को बिवाह गन्यौ भने मपनि शान्तिले निदाउनेछु । अर्को जन्म भए भगवानले तिमीसँगै भेट गराऔस्‌ ।म तिम्रो काकाको सल्लाहअनुसार तिम्रै काकाको विधवा छोरी र छोरालाईलिएर हङ्कङ गएँ । बाबु-आमा, श्रीमती बिनुले आफनो कुकर्मको फल भौगून्‌ ।अरू के भनौं । मेरै खुसीका लागि भए पनि अन्तै बिवाह गरै । तिमीले विबाहगन्यौ भने मलाई शान्ति मिल्छ । तिम्रो जवानी निशास्सिँदै, छट्पटिँदै, कल्पिँदैनबितोस्‌ । म यहीँ चाहन्छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उही भाबेन्द्र&lt;br /&gt;
चिट्ठी पढिसकेपछि शालुले आफनो आँखालाई दुःख दिइन्‌ । एकोहोरो दिदीलाईहेरिन्‌ । उनलाई यस्तो लाग्यो, दिदीको शिरमाथि सिङ्गै सगरमाथा पो अडिएकोरहेछ । दिदीको भूल यही न हो उहाँले केवल मेरो खुसी चाहनुभयो । अब मैलेदिदीको खुसीका लागि केही गर्नैपर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैयाँ यस्ता कुराहरू त घेरैको जीवनमा घटेको छ । पटक्कै पीर नगरिसेला ।हजुरको उमेर पुगेपछि त्यो जग्गा हजुरकै नाममा पास गरिदिने घोको छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले त्योभन्दा बढ्ता कुरा सुन्न सकिनन्‌ । जुरुक्क उठेर भान्सामागइन्‌ । कान्छी आफनो कोठामा गइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सात==&lt;br /&gt;
कान्छीको जीवनकथा सुनेपछि शालुको धेरै दिनसम्म भोकनिद्रा हरायो ।उत्ती स्कुलमा पनि एकोहोरिन थालिन्‌ । शालुका एकदम नै मिल्ने साथीरोहिणीले शालुलाई चिन्ताको कारण सोधिन्‌ । शालुले सबै कुरा एकएक गरीरोहिणीलाई बताइन्‌ । रोहिणीले मैरौ ममीपापालाई गएर सबै कुरा भनिस्‌ भनेसमस्या समाधान हन्छ भनी सम्झाइन्‌ । शालु रोहिणीको घरमा गएर रोहिणीकोबाबुआमालाई दिदीको सबै कथा सुनाइन्‌ । चन्द्रकान्त दाइले कान्छीलाई मायागरेका कुराहरू पनि बताइन्‌ । दुई छोरी मात्र भएका रोहिणीका बाबुआमालेकान्छी र चन्द्रकान्तजस्ता मान्छै पाए आफूले छोराबुहारीकै दर्जा दिने कुराबताएपछि शालुको हृदयमा बलिरहेको आगो केही मत्वर भयो । शालुलाईरोहिणीको बाबुआमा साक्षात्‌ भगवान्‌ जस्तै लाग्यो । शालु खुसी हुँदै घरआइन्‌ । दिदीलाई देखेपछि आँखा भरिएर आयौ । उनी आफनो कोठामा पस्दैथिइन्‌ । ममीले वौलाएपछि ममीकै कोठाभित्र पस्दै भनिन्‌, &#039;कित बोलाइस्याममी, खास कुरो केही थियो कि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“पोखरा जानका लागि पापाले पर्सिको टिकट बुक गर्छु भन्दै होइसिन्थ्यो ।नयाँ केही किन्नु छ भने पैसा लग भन्न बोलाएकी ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ मलाई पैसाचाहिँ दिसेला तर पोखराचाहिँ चार-छ दिनपछि जान्छु ।अहिले त क्लास टेस्ट चलिरहेको छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले औठ चेप्राउँदै भनिन्‌, &#039;आ तिमी पनि, क्लास टेस्ट लिँदा पनि किनरोक्कितुपर्छ र त्यो नम्बर पछि जोडिने होइन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(हेर भोलि क्लास टेस्ट भन्नु पति छ फेरि क्यारेम खेलौं पनि भनिसिन्छ । लअहिले थपक्क पढ्न बसिस्यो, क्लास टेस्ट सिद्धिएपछि हजुरले जे-जै भनिसिन्छत्यहीत्यही खेल्छु ।&#039; दिदीको कुरा सम्झेर भित्र कतै दुख्यो शालुलाई, शालुले मनमनै सोचिन्‌, &#039;ककरलाई घ्यू नपचैको भनेको यही हो । दिदी गएपछि यो घरमस्ानमा परिणत हुँदा बल्ल चाल पाउँछयौँ तिमी, तिमीले एक्का र बास्साभन्दै तास खेल्न पाएकी दिदीले गर्दा नै त हो नि! यत्रो घर र हामीलाई दिदीलेबडो इमानदारिताका साथ नसम्हालिदिएको भए तिमी स्वतन्त्र आकाशमाकावा खान पार्उीधनौ । सिङ्गै आकाशमा उड्न पाउँदा पनि तिमीलाई आकाशपनि साँगुरो भयो होइन ? दिदीको दोष त्यही हो उनीभित्र स्वार्थको एक कणपनि छैन । उनी अर्काको सन्तानलाई सही मार्ग देखाउन हरपल कटिवद्धछिन्‌ । तिमी आफनो सन्तानलाई आधुनिकताको नाममा नशामा झुलाउनकटिबढ छयौं । मेरो त सम्पूर्ण दिदी हुन्‌ दिदी, उनी नभएकी भए म जीवन केहो नबुझदै झर्दोरहेछु । मलाई जनको मूलत [त्य सिकाउने मेरी प्राणप्यारी दिदीलाईनिकाल्न कति हतार छ्यौ तिमी म छु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन थुप्रै बेर पोखराको सौन्दर्य सम्झेर त्यहीँ हरायौ कि क्या हो:मूर्तिजस्तै भयौ नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;ममी हजुरको खुसीका लागि म पोखरा जाउँला तर मेरो जाँच सिढिनदिस्यो । पोखरा मैले धेरैपल्ट हेरिसकेकी छु । प्रकृतिले का दिएर पनिहामीले त्यसको सदुपयौग गर्न जानेनौं । फेवातालको नजिकै सानै घर होस्‌ तरअति आकर्षक होस्‌, त्यो छैन । पाताले छांगाकै वरिपरि मनै लोभ्याउने फूलबारीहोस्‌ । बाराही मन्दिरमा पनि टलबकै टन्कनै सिङ्गमर्मर होस्‌ । विदेशले योप्राकृतिक छटा पाएको भए कस्तो बनाउँथ्यो होला । नेपालीले हीराको मूल्यलाईकीरा सम्झिरहेका छन्‌ । राम्री र नराम्रो छुट्याउने तागत हामीमा छैन ममी ।&lt;br /&gt;
उर्मिलाले हांस्दै भनिन्‌, &#039;तिमी त बडो तर्क दिन सक्ने पनि भइछौँ, मलाईत पत्तै थिएन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हजुरले मसँग कति समय नै विताइस्या छ र ममी, पापाले अस्ति मात्रभनेपछि पो थाहा पाएँ । मलाई त अठार दिनदेखि नै दिदीले सुताउनुभएको होरे । पापा भनिसिन्थ्यो- हजुर त धेरै सुध्यरी होइसिन्छ रे, एकपल्ट मैले हजुरकोकाखमा दिसा गर्दा टाउकोमै गोली लागेभँ गरी चिच्याइस्यो रे । मैले दिसागरेको साडी अब कहिल्चै लाउँदिनँ भनेर फमाँकिस्या रे होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“उफ ! तिम्रो पापा पनि यस्ता झिना-मसिना कुराहरू पनि के छोरीसँगगरिस्या होला । जाक कपडा फेर, त्यसो भए चार-छ दिनपछिकँ टिकट बुकगर्नुपर्ला हुन्न ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हजुरलाई जे मन लाग्छ त्यही गरिस्यो&#039; भन्दै शालु आफनो कोठामापसिन्‌ । ममीको कोठामा चन्द्रकान्तको आबाज सुनेपछि शालु ममीकै कोठातर्फलागिन्‌ । चन्द्रकान्त कार नबनेको कुरा बताउँदै थिए । शालु चन्द्रकान्तको कुरासुनेर दङ्ग परिन्‌ र भनिन्‌- &#039;दाइ मलाई फूलको प्रोजेबटवर्क ननाउनु छ ।बगैँचामा हिँड्नुस्‌ र मलाई फूलको नामहरू बताइदिनोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले भान्सावाटै कराइन्‌, &#039;मैयाँ, यिनलाई सवै फूलहरूको नाम आएपो, म हजुरको सहयोग गर्छु । यिनले खाना पकाउँछन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले हांस्दै भनिन्‌, &#039;दिदी पनिर-प॒कौडा त दाइलाई बनाउन आउँदैनहोला नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसो भए हजुरले फूलहरू लेराइस्यो म फूलहरूको नाम वताइदिइहाल्छुनि!”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले कान्छीतिर हरेर दाह्रा किटै । शालु र चन्द्रकान्त दुवै बगैँचामागए । शालुले बस्न आग्रह गर्दै भनिन्‌, &#039;अझै दिदीसँग बोलेको देख्दिन॑ नि, तपाईत साँच्चै रिसाउनुभयो कि बया हो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बन्द्रकान्तले बस्दै भने, &#039;हो, मैयाँसाप, अब म यहाँ वस्दिनँ । कान्छीकोआश गर्दागर्दै दाहीजुँगा फुल्न आँटिसक्यो । तिनलाई देख्यो भने मुटु जल्छ माअब कति मुटु जलाउनु ? तिनी त पत्थर हुन्‌ शालु मैयाँसाप पत्थर, तिनलाईराम्रोसँग वाहा छ, म तिनकै मायाले रुन्छु । अब कति रुन्‌ मैयाँसाप, रुँदारुदाआँखाहरू थाकिसके ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले बडो नम्र स्वरमा भनिन्‌, “मप्रतिको अत्यधिक मायाले गर्दा दिदीलेकहीँकतै देख्नु नै भएको छैन । म दिदीको त्यो नाजुक हृदयलाई तोड्छु, तपाईंमलाई साथ दिनोस्‌ । दिदीले मेरा लागि देख्नुभएको जुन सपना छ म त्यो पनिपूरा गर्छु । मेरै आँखाअगाडि मेरो मुदुभन्दा पनि प्यारी दिदीको अपमान अबसहन सक्दिनँ । तपाईँले भनेभौँ मलाई पोखरा पठाउन यौजना बनिसकेकोरहेछ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन मैले त केही कुरै बुझिनँ नि मैयाँसाप ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले सबै करा बताइन्‌ । तपाईँ अहिले नै रोहिणीको घर हेरेर आउनोस्‌ ।दिदीलाई तपाईँ नै चाहिन्छ हो तपाईं । यी कुराहरू बिर्सेर पति दिदीलाईनबताउनु होला । दिदीको घुणा म जीवनभर सहन तयार छु तर अँहँमउहांको आँखामा आँसु हेर्न सबिदिनँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले आँखाभरि आँसु पार्दै भने, &#039;हजुरले ठीक सोचिस्यो । तिनी तसिमल हुन्‌ आफू जाडो सहेर अरूलाई तातो दिनै । तिनलाई हामीले खुसीदिएनौं भने हामीले पनि आफूलाई माफ दिन सम्बैनौं । हुन्छ म अहिले नैरोहिणीको घर पुगेर आइहाल्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ल अनि खोई त फूल लिएर आइसेको ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिदीको शब्दले शालुको मुटु घाँटीमै अद्दकेझै भयो । बडो कष्टसँग जवाफदिइन्‌, &#039;तपाईंले रातमा फूल टिप्न हुन्न भनेको सम्झेर नटिपी आएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ म भोलि बिहानै फूल टिपेर फूलको नाम पनि भनिदिन्छु । अस्तिकोझरे&lt;br /&gt;
जस्तो चार्टपेपरमा टाँस्ने त होला नि ! कहाँकहाँ टाँस्ने अहिले बताइदिस्यो, मअस्तिको जस्तै मिलाएर टांसिदिन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले आँसु लुकाउँदै भनिन्‌, &#039;ल हेर्नोस्‌ अब त म तपाइंजत्री भइसके ।अबदेखि मेरो पीर नगर्नोस्‌ । तपाईंले मलाई जस्तो बताउन चाहनुभएको थियोम त्यस्तै बन्छु । तपाईंको कसम, म बिग्रिन्न, साँच्चै बिग्रिन्त । तपाईँ जस्तोकर्म दिने दिदी पाएपछि पनि बिग्रन्छुर म?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;रैयाँसापलाई ठूलो-ठूलो कुरा गर्न आइसक्यो । ल तातोतातो पकौडा खाइस्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दिदीको शब्द सुनेर शालु रुँदै कोठामा पसिन्‌ र ओछ्यानमा पछारिँदैरोइन्‌ । कान्छी फत्‌पताइन्‌- होइन कै भएको होला मैयाँसापलाई आज, खानपनि खोजिस्या छैन । मुख पनि उज्यालो छैन । सानो हुँदा पो सबै कुराभनिसिन्थ्यो र बुझिन्थ्यो, ठूलो भएपछि केही भन्ने हैन । आफूले मनको कुराबुझन सकिँदैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले मन सम्हालेर दराज खौलखाल पारिन्‌ । कान्छीले पढ्दै पनिरपकौडा खाइड्टस्यो भनेर शालुको कोद्ामा छोडेर गइन्‌ । शालुले हतारहतार त्योपनिर पकौड्ालाई प्लास्टिकको &#039;फोलामा हालेर पोको पारेर दराजको मुनिराखिन्‌ । मुखले चाहिँ पकौडा मीठो रहेछ आजलाई पुग्यो भनिन्‌ । कान्छीलेआफूले पनिर पकौडा भौलिसम्मलाई हुनेगरी प॒काइदिएको कुरा बताइन्‌ ।चन्द्रकान्त आएर शालुको कोठामा पसे । दुवैले आँखाकै इसारामा करा गरे ।त्यसपछि साह्रै मीठो बास्ता आयो भन्दै चन्द्रकान्त भान्सामा पसै तर, कान्छीलेदिएको पकौडा खान सकेनन्‌ । आफूलाई टाउको दुखेको छ भनेर ढाटिदिए ।कान्छीले मुसुक्क कक हाँस्दै भनिन्‌, &#039;तिम्रो रिस त अझै मरेको छैन जस्तो छ । तिमीरिसाएको त मेले पहिलीपल्ट नै देखेँ । म तिमीसँग कहिल्यै रिसाउँदिनँ चन्द्रकान्त ?तिमीले मेरो पोल्टाभरि खुसी नै खुसी दिएका छौँ । आफनो बाबुकैँ बनेर शालुमैयाँसापको रक्षा गथ्यौ ।&#039; चन्द्रकान्तले चुपचाप कान्छीको कुराहरू सुनिरहैमात्र ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कोठाभित्रबाट चिच्याइन्‌, &#039;दिदी, म पकौडाले नै अघाएँ । तपाईंहरूमात्र खाना खानोस्‌ । आज म दिदीसंगै सुत्छु । मलाई राजकुमारको कथा सुन्नुछ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;भर्खरै भनिसिन्थ्यो दिदी म ठूली भएँ। भर्खरैभनिसिन्छ- राजकुमारको कथा सुन्ने ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्त म शालु मैयाँसापको बिवाह भएपछि बाँच्न सक्छु होला जस्तैलाग्दैन । चन्द्रकान्त कान्छीको क्रा सुन्न नसकी उडेर हिँडे ।&lt;br /&gt;
शानु पहिला नै कान्छीको पलङमा गएर सुतिरहेकी थिइन्‌ । कान्छी खानाखाइबरी हात पुच्दै कोठामा पस्दै भनिन्‌, &#039;शालु मैयाँसाप मैले भनिदिएकी छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोलिदेखि पढाइ छल्नका लागि अनेक बहाना चन्दैन । होइन किन घौप्टोपरिसेको ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले देब्रे कोल्टै फर्केर आँसु पुच्दै भनिन्‌, &#039;म त निदाउन पो लागिसेकीरहेछ दिदी ! चन्द्रकान्त दाई पनि बस्वोस्‌ ।&#039; चन्द्रकान्त पलङमुतिको मुढामाबसे । शालु र कान्छी पलङमा बसे । कान्छी बसेपछि शालुले कान्छीको काखलाईसिरानी वनाइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले शालुको कापल मुसार्दै भनिन, &#039;मैयाँ, दिदीको काखभन्दा पनिप्यारो अहिलेलाई पढाइ हो । मैले धेरै दिनदेखि हजुरले पढेको देखेकी छैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दिदी तपाइँलाई मेरो भविष्यको मात्र चिन्ता छ। त्यस्तै मलाई पनितपाईंको भविष्यको चिन्ता छ । दिदी, मैले पनि तपाईंका लागि चन्द्रकान्त दाइजस्तै राजकुमार खोजिदिएकी छु । त्यो राजकुमारले तपाईंलाई धेरैधेरै खुसीदिन्छन्‌ । तपाईँको आफनो स्बर्गजस्तै घर हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीले वीचैमा कुरा काददै भनिन्‌, &#039;ए, हजुरले मेरो अर्को जन्मको करागरिस्या ? हुन्छ, हुन्छ अर्को जन्ममा म चन्द्रकान्तसँगै विवाह गर्छु । अनि हजुरलाई छोरीको रूपमा जन्माउँछ । निस्फिक्री माया गर्छु । उर्मिला मेयाँसापहुँदा त हजुरसँग बोल्न डर लाग्छ भन्या । उर्मिला मैयाँसापले हजुरको कोरामागएको देख्यो कि बिरालोको जत्रो आँखा पल्टाइसिन्छ । उहाँले आफनो मर्यादानभुलेको भए मलाई यति चिन्ता हँदैन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीको हात मुसार्दै भनिन्‌, &#039;दिदी तपाईंले मन नदुखाउनुहोस्‌ ।मेरो चिन्ता गर्न चटक्क छौडिदिनोस्‌ । तपाईंले मैरा लागि जुन त्याग गर्नु भोत्यो कसै-कसैले गर्नै सक्दैन । दिदी तपाईंले जाडोमा न्यायो घाम दिनुभयो,गर्मीमा छहारी दिनुभयो, तपाईं भने सधैँ घाम-जाड्ो सहँदै आउनुभएको छ ।त्यो मैले देखेकै छु । अब म स्वयम्‌ चिसो र तातोबाट वच्न सक्छु । तपाईँलाईचिसो र तातोबाट बचाउनु मेरौ कर्तव्य हो । कुरा गर्दागर्दै बाहिर गेटमा बेललाग्यो, शालु हतार-हतार कान्छी र चन्द्रकान्तलाई एउटै कोठामा बन्द गरेर,तल रुँदै ओर्लिन्‌ र गेट खोल्दै भनिन्‌, &#039;ममी, पापा म यो घरमा वस्नै नसक्नेभएँ चन्द्रकान्त र दिदीको राम्रो सम्बन्ध छैन । आज त हजुरहरूलाई देखाउनमैल्ले चन्द्रकान्त र दिदीलाई एउटै ओछ्यानमा देखेपछि ढोकामा लक गरिदिएकीछु। छिटो माथि आइस्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
दीपक उर्मिला नै रक्सीको नशामा हल्लँदै सास न बास भएर कान्छीकोकोठानजिक आए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कोठाभित्रबाट आवाज आइरहेको थियो । मैयाँसाप किन ढोका थुनेको छिटोखोलिस्यो । उमिलाले ढोका खोल्दै चिच्याइन्‌, &#039; ए रण्डा, रण्डी हो तिमीहरूलेयो घरलाई कोठी नै बनायौँ होइन ! देखिस्यो हजुरले सती सावित्री ठानेकी कान्छीको हाल । मैलै भनेकै हुँ वैंसको उन्मादलाई थेग्त कसैले सक्दैन भनेर,दुबैले किन बिवाह गरेनन्‌ भनेको त कुरा यस्तो पो रहेछ । दूध खान पाउँदापाउँदैगाई पाल्नु किन ! शालुलाई माया गरेको स्वाङ रचेर बिनापैसा बस्नुको कारणत मस्ती लुद्त पो रहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले रुँदै जबाफ फर्काइन्‌, &#039;आफ्‌ मात्र बोलिसिन्छ कि मलाई पनिबोल्न दिइसिन्छ हँ : चुप लागिस्यो मुखमा जे आयो त्यही नबोलिस्यो । शालुञैयाँसापलाई थाहा छ हामी के गर्दै थियौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रुँदै भनिन्‌, “हो ममी यिनीहरूको विचार राम्रो छैन । कान्छी त झन्‌हजुरको विरुद्ध भड्काउँछिन्‌ । मैले के माया गरेजस्तो गरेकी थिएँ उनले तआफनै छोरी ठातिन्‌ । यसो गर, उसो गर भनेको सुन्दा म त पागलै हुनलागिसकेँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले घरै थर्कने गरी चिच्याइन्‌, &#039;नाइँ, शालु मैयाँसाप त्यसो नभनिस्योममर्छु।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रुँदै भनित,- &#039;मोर अहिले मौर, कसले रोकेको छ र? न रहरलाएको लाउन दिन्छे, न खानै दिन्छे कुन जन्मको शत्रु रहिछे यो ।&#039;&lt;br /&gt;
उर्मिलाले कान्छीको कपाल भुत्ल्याउँदै भनिन्‌, &#039;धेरै तमासा नदेखा, खुरुक्कघरबाट निस्किहाल । नत्र अहिल्ै पुलिसलाई डाक्छ बुझ्यौ ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;कान्छी आफैँलाई भूत्ल्याउँदै चिच्याइन्‌, &#039;शालु मैयाँसाप तोलाको बचनखोलामा नहालिस्यो, म हजुर बिग्रेको हेन सक्दिनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले कान्छीको हात समात्दै भने, &#039;देख्वा सोझी रहिछिन्‌ मैयाँसापभित्र त कर्द रहिछन्‌ कर्द ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हो-हो म कर्द नै हुँ त्तिस्क, निस्किहाल पापी हो । मेरो जन्म दिने आमाभन्दाठुली कोही छैन बुझ्यौ ? जाओ, जाओ छिटो जाऔ । अझैँ रमिता देखाउँछौँ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले चन्द्रकान्त र कान्छीलाई नै नजिकैको कूचोले हान्दै भनिन्‌, &#039;छिटोतिस्कन्छौ कि पुलिस नै बौलाउँ हँ ?&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले कूचो समाउँदै भने, &#039;कान्छी तिमीले आफनो स्वार्थ हेरेकी भएआज पो दिन देख्न पर्दैनथ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
दीपकले कुरा थपे, &#039;अझ बढी बोल्छस्‌ चन्द्रै, यो सुँगुर्नीलाई छिटो यहाँबाटलगिहाल्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;शालु मैयाँसाप मेरो यहाबाट लास जाला म यहाँबाट जान्न । म हजुरलाईछोडन सक्दिनँ,&#039; कान्छीले भुइँमा बजारिँदै भनिन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीको मुखमा वुक्दै भनिन्‌, &#039;थुक्क नकचरी, पागल, कति अपमान&lt;br /&gt;
सहन सक्छेस्‌ त॑ : मौर तँ जस्ता मान्छै त मर्नु नै पर्छ । विष दिकँ याकौसीबाट फालहालेर मोर्छेस्‌ ) चन्द्रकान्त यसलाई बागमतीमा लगेरफयाँकिदैक । अनि यसले शान्ति पाउँछै ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले रण्डी, फुँडी, बेश्या भन्दै कान्छी र चन्द्रकान्तमाथि क्चो वर्षाइरहेकीथिइन्‌ भने दीपकले दुवैलाई लात्ती प्रहार गरिरहेका थिए । चन्द्रकान्तले कान्छीलाईघिच्याउँदै भन्याङ ओराले । कान्छीले घर नै थर्किनेगरी शालु मैयाँसाप भन्दैचिच्याइन्‌ । डेरामा वसेका र छिमेकीहरू झयाल-झयालबाट र ढोकाबाहिरैबाटत्यो बीभत्स दृश्य हेरिरहेका थिए । शालु आफनो कोठाको ढोका थुनेर मुर्दाझैँलम्पसार परिन्‌ । कानमा भनै कान्छीदिदीकै शालु शव्द नै गुञ्जिरह्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिला र दीपक नरभक्षी बाघकै सिकार गरेझैं गरी प्रफुल्ल हुँदै काठोमापसे । उमिंलाले भनिन्‌, &#039;देखिस्यौ हजुर बैंसको तिखा थाम्न त्यो मोरीले पनिसकेकी रहिनछ । हात्तीको खाने दाँत र देखाउने दाँत जस्तो तिनीहरूका पनिदुईवटा दाँत रहेछ, होइन ? आज त कति हाइसन्चो भयो क्चोले बढार्नुपर्नेफोहोर हावाले उडायो हा...हा । शालुले नै काम तमाम गरिदिइन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
दीपकले पलङमा पल्टिँदै लर्बराएको स्वरमा भने, &#039;उर्मी, वनले नचिनेकोबाघ होइन, वाघले नचिनेको वन होइन । शालुले पूर्ण सोचनिचार नगरीकान्छीलाई घरबाट निकालिन्‌ जस्तो मलाई लाग्दैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हजुर पनि चाहिनै-नचाहिन कुरा सोचिसिन्छ । कुकर्मले डाँडा काटेपछिकति सहन्छै शालुत्ते ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यो त हो, दीपकले उमिलाकै कुरामा साथ दिए । कान्छीको त्यो दर्दनाकदृश्य उनीहरूका लागि मनोरञ्जन बन्यो । दुबै राव्रिकीडामा लीन भए ।&lt;br /&gt;
रोहिणीको घरमा पुग्दासम्म कान्छीले पूर्ण रूपमा होस गुमाइसकँकी थिइन्‌ ।रोहिणीको बाबु केशवले फेमेली डा. राजलाई बोलाए । डा. राजको सक्दोप्रयासबाट कान्छीको होस त आयो तर उनले आफूलाई बिसिंसकेकी थिइन्‌ ।उनको ओठमा केबल शालुकै नाम थियौ । भन्थिन्‌ क... क शालु मैयाँत्यहीँबाट गइस्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हा... हा शालु मैयाँसापले त कपाल बाटिसेछ । पर्खिंस्यो म रिविनमिलाइदिन्छु । सधैँ दिदी हजुर नि खानोस्‌ भन्नु छ । म त खाइहाल्छु नि !, मेरीशालु मैयाँसाप त परी हो बुझ्यौ परी हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीको त्यो विजोग देखेर सबैको आँखाबाट आँसु झन्यो । डा. राजलेमानसिक विशेषज्ञ डा. दिनेशलाई बोलाए । डा. दिनेश पनि रातको चकमन्नतालाईतौड्दै कैशवको घरमा आइपुगे । सम्पूर्ण घटना सुनेपछि डा. दिनेशको पतिआँखा रसायो । जति खर्च लागे पनि घरमा नै कान्छीको उपचार गर्ने निर्णयभएपछि कान्छीलाई दिनेशले लठ्याउने सुई दिए । उनी जिउँदो मुर्दामा परिणत भइन्‌ । कान्छीको सम्पूर्ण स्याहारसुसार चन्द्रकान्तले गरे । डा. राज र डा.दिनेश कान्छीको उपचारमा कटिबद्ध भए । केशव र पीताम्बराले मानवीयसहयोग गरे । तहौं दिनको दिउँसो एक बजेतिर कान्छीले आँखा खौलेर चारैतिरहेरिन्‌ । आफूलाई सुन्दर चिटिक्क परेको कोठामा सँगै चन्द्रकान्त भित्तामाशालुको सुन्दर तस्बिर झुन्ड्याइरहेको देखेपछि अचम्म मान्दै सोधिन्‌, “चन्द्रकान्तयो सब के हो ? मेरो अर्को जन्म त भएको होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले खुसीको आँसु झार्दै भने, &#039;हो कान्छी तिम्रो अर्को जन्म नैभएको हो । तिमीले असाध्यै माया गर्ने बावु-आमा पाएकी छ्यौ । डा. राजरडा. दिनेश जस्तो डा. पायौ । सुरेश क्षेवरीजञस्तो बिरामी पर्दा सहयोग गर्ने दाइपायौ । सबै-सबै पायौ । तिमीले बस्‌ आफूलाई सम्हाल सबै ठीक हुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी बिस्तारै उठ्दै भनिन्‌, &#039;खोई बाबु-आमा ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले बोलाएपछि केशव र पीताम्बरा नै आए । कान्छीलाई उठेकोदेखेर हर्षित हुँदै भने, &#039;नानी अहिले उठेर जरक-मरक नगर ।&#039;&lt;br /&gt;
उनीहरूको कुरा सुनेर कान्छी टोलाइरहिन्‌ । चन्द्रकान्तले दुधमा हलिंक्सफिटेर कान्छीलाई दिँदै भने, &#039;हर्लिक्स खाएर सुत ।&#039; कान्छीले हर्लिक्स पिइन्‌ ।चन्द्रकान्तले औषधि खान दिएपछि फेरि कान्छी गहिरो निद्रामा परिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आाठ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले चौधौं दिनको मध्यरातमा पनि आँखा खोलिन्‌ । चारैतिर हेरिन्‌,आफनो पलङभन्दा पर चन्द्रकान्तलाई निदाइरहेको देखेर केही धक मान्दैभनिन्‌, &#039;चन्द्रकान्त... चन्द्रकान्त ।&#039;कान्छीको बोली सुनेर चन्द्रकान्त झसङ्ग हँदै उठेर मर्करी बाल्दै कान्छीकोनजिकै गएर भने, &#039;के भयो कान्छी, के भयो !&#039;कान्छी धेरैबेर मौन भएपछि भनिन, &#039;मैले थाहा पाएँ हिजो मैयाँले आफनोघरबाट निकालेपछि हामी यहाँ आयौं, मैले आँखा खोल्नेबित्तिकै त्यही मैयाँकोफोटोमा आँखा पन्यो, त्यो फोटो निकालिदेक । किन त्यो फोटो राखेकोचन्द्रकान्त ?&#039;चन्द्रकान्तले उत्तर दिए, &#039;तिमीले मैयाँ-मैयाँ भनेपछि त्यो फोटो राखिदिएको। तिमीले झिक भन्छ्यौ भने झिक्छु । तिम्रो मुख सुकेको छ भने पानीकै ?&#039;&amp;quot;अं पानी दैक म आफूलाई सम्हालिहाल्थें नि । तिमीलै पसरी एउटै कोठामा सुत्न नहुने थियो । चन्द्रकान्त तिमीले यो फोटो झिक्दिक । अव्र म पत्धरमापरिणत हुन्छु । मैलै यौ उमेरसम्म कोही मानवीय मूल्य भएको त मान्छे नै देखिनँ ।&#039;चन्द्रकान्तले शालुको फोटो निकालेर घोप्टो पारेर ठहस्याए ।कान्छीले रुन्चे स्वरमा भनिन्‌- &#039;होस्‌-होस्‌ फोटो झुन्ह्याइदेक, भोलि मआफैँ त्यो फोटोलाई झिकेर फयाकुँला । फोटोमा अलि धूलो लागैजस्तौ छसफा कपडाले पुछिदेक ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले चुपचाप सफा कपडाले फोटो फुछे । रातको समयमा औषधिदिने वेला भएकोले औषधि खुवाए । औषधि खुवाएको केही बेरपछि, कान्छी कुरागर्दागर्दै निदाइन्‌ । चन्द्रकान्त पनि मनमा कुरा खेलाउँदै निदाए । क्रमशः दिनबित्दै गयो । कान्छी विस्तार पानी सार्न, ट्वाइलेट जान सक्नै भइन्‌ । तर उनीसोच्चिन्‌- आफूमाथि बज्च परेको क्षण हिजो नै हो । एक्काइसौं दिनको दिनकान्छी उठिन्‌, आफैँ नुहाइधुवाई गरिन्‌ । बडो राम्रैसँग मिलाएर राखेको कपडाझिक्दै भनिन्‌, &#039;हिजो मैले मैयाँसापका लागि पकौडा राखिदिएकी थिएँ, देखिस्योकि देखिसेन होला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;कान्छी तिमीले उनको नाम नै नलेक । क बावु-आमा पनि आउनुभयो ।एकछिन बसेर कुरा गर । म औषधि सिद्धिएको छ लिएर आउँछु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्बरा र केशवले कोठाभिर पसेर सोफामा बस्दै भने, &#039;आफैँले आजनुहाएजस्तो छ नि हो : तिमीलाई यो रूपमा देख्दा साह्ै खुसी लाग्यौ ।तिमीलाई यस रूपमा देखेपछि पर्सि नै सत्यनारायणको पूजा लगाङँझै लाग्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ लगाउनुहोस्‌, हिजौ अलि धूलो-मैलोमा बजारिएकीले आज नुहाएकीहुँ। अघि यसौ बगैँचा र फूलबारी हेर्न मन लागेर गएकी थिएँ । व्यवस्थिततरिकाबाट केही लगाएकै छैन । दुबोमा पनि घाँसैघाँस उम्रिएको रहेछ । आँगनमापनि फोहोरैफौहोर छ । फोहोर देखैपछि त मैरो टाउको नै घुम्छ । न धुपीहरूकैकटिड गरेको छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्बराले करा चुहाइन्‌- अलिअलि त काम गरिन्थ्यो । तिमी बिरामीभएर आएपछि वगैँचाभन्दा पनि ध्यान तिमीमा गयौं । फेरि काम गर्न आउनेमान्छेलाई दस घर भ्याउनुपर्छ, के राम्रो काम गर्थे ? खैर आँगन, बगैँचाकोकुरा छोडौं अब तिम्रौ र चन्द्रकान्तको बारेमा कुरा गरौं ।&lt;br /&gt;
&#039;ए चन्द्रकान्त, उनी र म पहिला सँगै बस्थ्यौं । त्यहाँबाट निकालेपछिचन्द्रकान्तले यहाँ लिएर आएछन्‌ । विश्वास गर्नोस्‌, हाम्रो सम्बन्ध केही नराम्रोछैन, हिजै मात्र हो उनले मलाई छोएका । हिजो उनले नसम्हाको भएचाहिँ मबाँच्दैनथैँ हुँला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्बराले कान्छीको हात समातेर भनिन्‌, &#039;लाटी, तिम्री यहाँ आएकी तठीक एक्काईस दिन भयो । एक्काईस दिनसम्म तिनै चन्द्रकान्तले तिमीलाई दिसा, पिसाव गराउने, दिसा धुने, नुहाइदिने, कपडा फेर्ने तिम्रो कपडा धुनेकाम गरे । उनले स्याहार नगरेको भए र डा. राज र डा. दिनेश र सुरेशचभएको भए तिमी यहाँ होइन अहिले सडकमा हुन्थ्यौ । त्यसैले हामीले तिमीहरूकोबिबाह गर्न सत्यनारायणको पूजा राख्न खोजेका हौं ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले विश्वास गरिनन्‌ र नजिकै रहेको क्यालेन्डरमा पल्टाएर हेरिन्‌,&amp;quot;उफ मङ्सिरको १२ गते पो रहेछ । उनी थचक्क बसिन्‌ । आँखाबाट आँसुझारिन्‌ मात्र ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्बराले सम्झाइन्‌, &#039;फौरि पनि पीर गयौँ भने तिमी विरामी हुन्छ्यौ ।पीर नगर । हाम्रो विवाह हुँदा उहाँ पच्चीस वर्षको र म बीस वर्षकी थिएँ ।विवाह चाँडै भए पनि बच्चाचाहिँ बयालीस वर्षमा भयौ, तिमीहरूको त उमेरैछ । कुनै पनि सुकार्य गर्न ढिलो गर्नुहुन्न । हामीले तिमीहरूको विवाहका लागिगहना, कपडा सबै तयार परिसक्यौं । तिमी होसमा आउने प्रतीक्षामा थियौं ।समाजमा विवाह नगरी एक्कै ठाउँमा सुतेका छन्‌ भन्नै किन पानु ः तिमीहरूकोचाँडै विवाह गरिदिन पाए आनन्दै हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीलाई घोर अचम्म लाग्यो । केही रिंगटा चलेजस्तो पनि भयो उनीसोफामै मो अड्याएर चिम्म आँखा चिम्लिइन्‌ । केशवले नम स्वरमा भने,“कान्छी, मैले चन्द्रकान्तजस्तो पुरुष त संसारमै देखेको छैन । तिमी बिरामीहुँदा उनले तीन दिन तीन रात आंखा भझिमिक्कै गरेनन्‌ । चौथो दिन कमजोरीलेहोला मूछां नै परे । डाक्टरसापहरूले के-के सुई दिएपछि सत्र-अठार मिनेटमाआँखा खोले । आँखा खोल्दा कान्छीले औषधि खाइन्‌ कि खाइनन्‌ भन्दै थिए ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले क्रा सुन्न अलि भझिँजो मानेजस्तो गरैपछि पीताम्बरा र कैशवउठेर गए । आँखा खोल्दा कान्छीको आँखा शालुको तस्बिरमा पत्यो । मनमनैसोचिन्‌ । मलाई मृत्युको मुखमा छोड्नेको के अनुहार हेर्नु ? साँच्चि चन्द्रकान्तलेमैरो घरजग्गाको लालपूर्जा देखेर त माया गरेको होइन ? शालुजस्ती त त्यस्तीभएर निस्केपछि चन्द्रकान्तको त के विश्वास : फेरि शालुकै फोटोमा आँखापरेपछि कान्छीलाई रिस उद््यौ । उनले शालुको फोटो झिकेर केहीबैर घोप्द्याएरभित्रै राखिन्‌, शान्ति भएन र वाहिर राखिन्‌ । अझै शालुले घरवाट निकालिदिँदाकोक्षण सम्झेपछि फोटो गेटबाहिर राखेर आइन्‌ । औषधि लिएर आउँदै गरेकोचन्द्रकान्तको आँखा फोटोमा पस्यो । फोटो भित्र लगेर पीताम्बरालाई जिम्मादिँदै आफनो कोदामा पसे । कान्छी टोलाएर सुतिरहेकी थिइन्‌ । चन्द्रकान्तआएको चाल पाउनेबित्तिकै उठेर बसिन्‌ । कान्छीलाई चन्द्रकान्तसँग कताकतालाज-लाज पति लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले औषधि र पाती दिँदै भने, &#039;ल अब औषधि खाएर सुत । अनारछोडाएको छ खाङ है भनेर गएको थिएँ, यत्तिकै छ । म पनि उस्तै खान दिएरजानुपर्ने रहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले औषधि निल्दै भनिन्‌, &#039;चन्द्रकान्त जग्गाको लालपूर्जा कहाँ राख्यौ ?चिदठी पनि सँगै थियो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन तिमी फेरि बेसुरको करा गर्न लाग्यौ । कस्तो लालपूर्जा, केकोलालपूर्जा, कसको चिट्ठी मलाई केही थाहा छैन । ल सृतिहाल पछि कुरागरौली ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले मनमनै भनिन्‌- &#039;ओ ! मैयाँलाई त्यही जग्गामा आँखा लागेछ क्यार,मैले त उनकै नाममा गरिदिन्छु भनेकी थिएँ । पहिल्यै निकालिन्‌ । लिकन्‌तिनलाई दाइजो नै भयो । चन्द्रकान्तको प्रेम त निस्वार्थ पो रहेछ । उनी सुन्दर रमायालु छन्‌, उनले त कुमारी केटी नै पनि पाउन सक्थे । उनी मलाई प्रेम गर्छन्‌भन्ने थाहा थियो तर यतिबिध्न माया गर्छन्‌ भन्नै थाहा थिएन । सोच्दासोच्दैकान्छीको आँखा लष्टिन थाल्यो । उनी केही बेरमा निदाइन्‌ पनि ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोलिपल्ट बिहानै कान्छीले आँगन बढारिरहेको देखेर केशवले नजिकै आएरभने, &#039;नानी ! आँगन नबढार, तिमीलाई अहिले त्यति ठीक भएकै छैन । वरुआमासँग गएर केही कुरा गर । उनलाई साथी हुन्छ । मचाहिँ यस्सो घुमेरआउँछु ।&#039; कान्छी पूरै आंगन बढारेर पीताम्बरासामु पुगिन्‌ । पीताम्बराले बढोराम्रो पाराले सम्झाएपछि कान्छीले चन्द्रकान्तसँग बिवाह गर्नै कुरा नकार्नसकिनन्‌ । भौलिपल्ट नै कान्छी र चन्द्रकान्तको सत्यनारायणको पूजा लगाएरत्यहीँ सिन्दूर राख्ने काम पनि गरियो । विवाहमा कान्छीको काकालगायत अरूकेही आफन्त पनि जम्मा भए । सबैले कान्छी र चन्द्रकान्तको बैवाहिक जीवनसुखद्‌ होस्‌ भती शुभकामना दिए । बेलुका चन्द्रकान्त र कान्छीको सुत्नेओछ्यानमा फूल छरिएको थियौ । दुवै विगत भुलेर बर्तमानमा रमाइरहे ।चन्द्रकान्तको मायालु आलिङ्गतमा कान्छीले संसार बिर्सिन्‌ । त्यस्तै कान्छीकोमायालु आलिङ्गनमा चन्द्रकान्तले .... ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विवाहको भोलिपल्ट कान्छी र चन्द्रकान्तको शिर लाजले झुक्यो । त्यसमाथिचाँडै घोत्ले छोरो पाउनू भनी पीताम्बराले कान्छीलाई, केशवले चन्द्रकान्तलाईजिस्क्याउन बाँकी राखेनन्‌ । बिस्तारै कान्छीको आँखाबाट शालु दिनप्रतिदिनझर्दै गइन्‌ । कान्छीको आँखामा शालुको त्यो क्रूर दृश्य ताचिरहन्ध्यो । त्यसमाथिचन्द्रकान्त शालुको नराम्रो पक्षको मात्र कुरा गरिदिन्थे । कान्छीले मानसिकरोगको औषधि खाए पनि पूर्ण रूपमा आफूलाई सम्हालेकी थिइन्‌ । पीताम्बरालाईखाना पकाउन सघाउनदेखि लिएर सबै काम गर्थिन्‌ । चन्द्रकान्त कैशवकोघरकै भाडाको ट्याक्सी चलाउँथे । एकदिन केशबले कान्छीतिर लालपुर्जाबढाउँदै भने, &#039;कान्छी म पनि कस्तो ह्स्सु ॥ तिम्रो यो कागज एउटा नानीलेदिनु है भनेर छोडेर गएको पहिल्यै हो, दिनै बिसँछु । धेरै वर्ष भएछ, जग्गाकोतिरो नतिरेको, चन्द्रकान्तलाई तिर्न पठाउनू ।&#039; कान्छी लालपूर्जा देखेर मौनभइन्‌ । ए लालपूर्जा त लैराइदिछे त्यसले, रामै भयो दुःख हुँदा काम लाग्ला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लालपूर्जाको बारेमा केशवले चन्द्रकान्तसँग शालुले भनेका क्राहरू जस्ताकोतस्तै भनेपछि चन्द्रकान्तले तुरुक्क आँसु खसाते । लालपूर्जा पाएको दिनचन्द्रकान्तको मुड ठीक नभए पनि कान्छी भने साह्रै प्रशन्न थिइन्‌ । सुत्नैसमयमा चन्द्रकान्तको छातीमा टाउको राखेर कान्छीले भनिन्‌, &#039;चन्द्रकान्त,आज दुईवटा खुसी एकँचोटि मिल्यो । जग्गाको लालपूर्जा अनि मेरो पेटमा पनिबच्चा छ रे, म र आमा जचाउन गएका थियौं ।&#039; चन्द्रकान्तले खुसी हँदै भने,“कान्छी हामीले स्वर्ग नै पायौं हगि : अस्ति भर्खर गाउँबाट ठूलो छोरा पनिआयो । आज तिमी यौ खुसीको करा सुचाउँदै छयौ । बाबुआमा पनि पायौं ।रोहिणी र रोष्मा मैयाँसाप पनि पायौं । हामी त कति भाग्यमानी । न हामीसंगपैसाक्को कमी छ । यौ पेटको बच्चाचाहिँ छोरी होस्‌ । त्यो पनि शालुमैयाँजस्ती ।&#039;कान्छी चिच्याइन्‌, &#039;चन्द्रकान्त, त्यस पापिनीको नाम लिएर मलाई फेरि पागलगाराउन चाहन्छौ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले कान्छीको कपाल मायालु पारले मुसार्दै भने, &#039;कान्छी तिमीलेआफूलाई कठोर बनाएको पटक्कै सुहाउँदैन । कुरा अर्कै छ । शालु मैयाँलेकसम खुवाएकोले आजसम्म चुप थिएँ । अब छातीमा कति पत्थर राखेरबाँचौं ? तिमीले हरपल शालु मैयाँको घुणा गरेको कति सहुँ ? हेर शालुमैयाँसापले तिमीलाई खुसी दिनका लागि सबै नाटक गरिस्या हो। हामी तउहाँले बनाएको नाटकमा सहभागी भएका हौँ । तर, हामी सबैको प्रेम बनाबटीहोइन । शालु मैयाँको तिमीप्रतिको घृणा मात्र बनावटी हो । लालपुर्जा दिँदाभनिस्याथियो रै दिदीलाई तब मात्र लालपूर्जा दिनु जब दिदीले चन्द्रकान्तदाइको वास्तविक प्रेम बुझनुहुन्छ । चन्द्रकान्त दाइलाई लालपूर्जाको बारेमा आपनि नगर्नुहोस्‌ । लाटी, बुबाले लालपूर्जा जस्तो कुरा पनि बिसंनुहुन्छ त ?उहाँले शालुकै कुरा मान्नुभएको हो । मैयाँसापले नै यहाँ बस्नै बन्दोबस्तमिलाउनुभएको हो । हामीले शालु मैयाँसापलाई तिमी बिरामी भएको क्राढाँट्दा पनि उहाँ दुईपल्ट स्कुलमा मूर्छा परिसक्नुभयो रे । हाम्रो विवाह भयोभनेपछिचाहिँ साह्टै खुसी हुनुहुन्छ रे । रोहिणी मैयाँसाप र शालु मैयाँसाप साथी-साथी हनुहुन्छ । साँचो करा यही हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तको कुरा सुनेपछि कान्छी धेरैबेर रोइन्‌ । उनको मनमा शालुलेभनेका शब्दहरू एकपछि अर्को गर्दै औहोर-दौहोर गरिरहे । “तपाईँलाईचन्द्रकान्तजस्तै राजकुमार खोजिदिन्छु । दिदी म ठूली भइसके, स तपाईंलेदेखाएको बाटोमा हिँड्छ । आज भोक लागेको छैन, तपाईंहरू मात्र खानाखानोस्‌, तपाईंक्रो पनि स्वर्गजस्तो घर हुन्छ आदिआदि ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले कान्छीको आँखाबाट बगिरहेको आँस्‌ पुछ्दै भने, &#039;नरोक कान्छी,नरौक । शालु मैयाँसापले भनिस्याध्यो, &#039;दाइ मेरी दिदीको आँखाबाट एकथोपाआँसु नखसौस्‌ । मेरी दिदीलाई सधैँ डालीमा लटरम्म फुलेको फूलझौँ देख्नपाङी । दिदी खुसी हुँदा म स्वयम्‌ खुसी हुन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले चन्द्रकान्तको औठ वन्द गर्दै भनिन्‌, &#039;अब यसभन्दा वढी नभन ।चन्द्रकान्त मैले आफूलाई चिने । हामी दुईमा त आकाश-पातालको अन्तररहेछ । म त पापिनी हुँ । त्यसैले आफनैअगाडि भएको हीरालाई चिन्न सकिनँ ।शालु मैयाँसापले मलाई सम्पूर्ण खुसी दिस्यो । मैले उहाँलाई केबल घुणा गरेबुझौं घुणा ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;आफूलाई सम्हाल कान्छी सम्हाल । तुलना गर्दा दुवैको त्याग बराबरी छ ।तिमीहरू दुवैले कनै पल आफनो स्वार्थ हेरेका छैनौ । तिमीहरू बनेको नै एक-अर्काका लागि हौ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;चन्द्रकान्त शालु मैयांसापलाई भोलि नै डाकिदेक । नत्र म मर्छु म बाँच्नसक्दिनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकात्तले आश्वासन दिए, &#039;पीर नगर म भोलि नै शालु मैयाँसापलाईयहाँ बोलाइदिन्छु । हामी सबैको चाहना नै यही त हो नि । तिमी र मैयाँसापकोओठमा पुनः पहिलाको जस्तै खुसी आओस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी केही बोल्न सकिनन्‌ । आँखामा भने शालुको तस्बिर नाचिरहयो ।रातको थुप्रै पल बितेपछि मात्र कान्छी निदाइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोलिपल्ट बिहानको छ पनि नवज्दै शालु आएर रुँदै ओछ्यानमा पल्टिरहेकोकान्छीको आँखा छोपिन्‌ । शालुको हातमा कान्छीको तातो आँसु लागेपछिशालुको आँखा पनि रसाए । कान्छी हात झिक्दै जुरुक्क उठेर शालुतिर फर्किन्‌ ।दुबै एक-अर्काको अङ्गालोमा बाँधिएर थुप्रैवेर रोए । चन्द्रकान्त उनीहरू रोएकोदृश्य हेरेर बसिरहे । धैरैवेरपछि शालुले अङ्गालोवाट छुट्टिएर कान्छीको आँखाकोआँसु पुछ्दै भनिन्‌, &#039;दिदी, पेटमा बच्चा हुँदा रुन हुँदैन रे । दाइले मलाई बिहानलिन जाँदा सबै कुरा वताइसक्नुभएको छ । दिदी, मैले जुन सपना देखेकीथिएँ । त्यो सबै साकार भयो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीको रुवाइ अझैँ थामिएको थिएन । घुँक्कघुँक्क रुँदै भनिन्‌, &#039;मैलेहजुरलाई कति नराम्रो सोचेँ, मलाई माफ गर्नुहोस्‌ । म त हजुरको अगाडि केहीपति होइन रहेछु । म त पापिनी रहेछु मैयाँसाप पापिनी ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीको मख छोपिदिँदै भनिन्‌, &#039;तपाईंले आफूलाई पापिनी ठान्नुभयोभने यो संसारमा को घर्मात्मा होला ! मैले त तपाईंलाई घरबाट निकाल्नसानो नाटक मात्र गरेकी हुँ । तपाईंले मेरा लागि सिङ्गो जीवन नै बलिदानगर्नुभयो । ममीको त्यो तिरस्कार हाँसोमा उडाइदिनुहुन्थ्यो । केवल मैरो खुसीकालागि आफूलाई पलपल मा्नुहुन्थ्यो । यहाँसम्म कि आफूलाई नै भुल्नुभयो ।दिदी, ममी तपाईंलाई निकाल्न धेरै आतुर हुनुहुन्थ्यो । मैले नै तपाईंलाईनिकालेपछि उहाँ स्वर्ग पाएजस्तै खुसी पत्ति हुनुभयो । त्यति मात्र होइन,भोलिपल्टै होटलमा भोज पनि दिनुभयो । तपाईँलाई वेश्या सावित गर्नुभयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छरछिमेकले पनि तपाईंलाई राम्रै वेश्यामा परिणत गरै । म सवैको कुरा सुन्नबाध्य भएँ । अहिले तीन-चार महिनामा तीन-चारवटा काम गर्नै फेर्दा पनिममीको चित बुझेको छैन । फूलवारी र करेसाबारीमा केवल घाँसैघाँस उम्रिएकोछ । घर लथालिङ्ग छ । काम गर्नेहरू दिनभरि टी.भी. हेर्दै बस्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;हजुरलाई बेलामा खान दिन्छन्‌ होइन ?&#039; कान्छीले सोधिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले हाँस्दै उत्तर दिइन्‌, &#039;मेरो त पीर नै नगर्नुहोस्‌ । म उनीहरूले नदिएआफैँ बनाएर खाइहाल्छु ति ! साँच्चि गाउँबाट आएको छोरो कत्तिको ज्ञानीछ्न्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले प्रशन्न स्वरमा भनिन्‌, &#039;मैयाँ बाती-व्यबहार ठ्याक्कै चन्द्रकान्तकोजस्तो छ । मैले त कल्पनासम्म पनि गरेकी थिइनँ । उनी त्यति मायालु होलान्‌भन्ने, तर साह्रै असल छन्‌ । आमा भनेको छ, वरिपरि लुटुपुदु गरेको छ, मलाईपेटमा बच्चा आओस्‌ भन्नेसम्म पनि रहर थिएन । हजुरको मायामाझौँ वीरुकोमायामा डुबिसकेकी छु । बाबु-आमा रोहिणी मैयाँसाप, रेष्मा मैयाँसापले पनिहामीलाई आफनै परिवारझौँ ठानिसिन्छ । अस्ति त आमाले भण्डारको चावी नैमेरो हातमा थमाउनुभयो । मलाई आफनो कर्तव्य पूरा गर्न नसकीँला कि भन्नेपो पीर लागेको छ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले दङ्ग पर्दै भनिन्‌, &#039;रोहिणी पनि भन्दै थिइन्‌, बाबु-आमा तपाईं रदाइ भनेपछि हुरुक्कै गर्नुहुन्छ रे । तपाईंहरूलाई चिनेरै उहाँहरूले सांचोसुम्पनुभयो । त्यही त हो &#039;जान्नेलाई श्रीखण्ड नजान्नेलाई खुर्पाको बिंड&#039; भनेको ।ममीहरूले तपाईँको मूल्य बुझनुभएन । रोहिणीको बाबु-आमा बडो पारखीहुनाले तपाईंलाई चिन्न बैर लगाउनुभएन ।&#039; परिणाम ममीपापाले सम्पूर्णगुमाउनुभयो । रोहिणीको ममीपापाले सम्पूर्ण पाउनुभयो । दिदी त्यो पनौतिकोघरजग्गा बैचैर यतै नजिकै जग्गा किनेर राखिदिनु होला, यहाँ भए आजकोभौलि नै जग्गाको भाउ बढ्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हजुरले ठीक भनिस्यौ । अब घर सल्लाह गरेर त्यसै गरौंला, मैयाँसाप,भवेन्द्र पनि मैरौ विवाह भयो भन्नै सुनेर साह्रै खुसी छन्‌ रे । काका त्यही खबरलिएर आउनुभएको थियो । हजुरले पति आफनो ख्याल राखिसेला । दुब्लाएरआँखा पनि गडेछन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीको हात मुसार्बै भनिन्‌, &#039;हुन्छ म आफनो ख्याल राखतपाइँले पनि आफनो ख्याल राख्नुहोला । कान्छी आँखाभरि आँसु पारेररहिन्‌ । शालु सबैलाई भेटी खुसी हुँदै घर फर्किन्‌ । कान्छीको सुखी जीवनदेख्दा शालुलाई सिङ्कौ बसन्त पाएझौँ लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==नौ==&lt;br /&gt;
शालु कान्छीलाई भेटेर आएपछि यतिविध्त खुसी थिइन्‌ । आफ्नो खुसी पोख्नउनले घर नै थर्कने गरी क्यासेट खोलिन्‌ । त्यही म्यासेटको तालमा नाचिन्‌ ।क्यासेटको गीतमा स्वर मिलाएर गीत गाइन्‌ । शालुको त्यो क्रियाकलाप देखेरटाउको दुखेर सूतिरहेका दीपकले उर्मिलातिर फर्कदै भने, हेर उर्मी आज म योकेसुन्दैछु हामीले क्यासेट सुन्दा सानो पारेर बजाए हुन्छ भन्ने मान्छेले आज आफै....&#039;&lt;br /&gt;
सधैँ आदशं ओकेल्नै मैयाँसापलाई पनि अब वैंसले कृत्कृत्याएजस्तो छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपकले कुरा थपे, &#039;उर्मी मैले भन्दै थिएँ । शालु सिम्पल भइन्‌ भनेर पीरनगर । बैँस आएपछि उनमा आफसेआफ परिवर्तन आउँछ । पख न अबबिस्तारै उनी तिम्रो इच्छाभन्दा पति माथि उदछिन्‌ । अनि हाम्री छोरीलाई छुनकसले सक्नै ? तर आज भने मलाई यो धुन अलि बढी नै भयो । धुन अलि कमगर्न लगाइदै ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले दीपकको गालामा म्वाइँ खाँदै भनिन्‌, &#039;प्लिज डार्लिङ चुप लागिस्यो ।छोरीको यो रूप देख्दा म ज्यादै खुसी छु । म मात्र के हजुर पनि त खुसी होइसिन्छति, हैन भन्िस्यौ त ? उफ ! आज हजुरलाई टाउको दुखेकोले फिरोजको डान्समिस भयो । आज कस्ता-कस्ता तरुनी लिएर आउँथ्यो कुन्नि ! होइन त्यसलेत्यत्रा युवतीहरू कहाँ पाउँदो होला ? मलाई त अचम्मै लाग्छ भन्या । मोरोआफू पनि कारिगरले कुँदेको ढुङ्गाको मूर्ति जस्तै छ । गंगा र रमण त त्यतिराम्रा होइनन्‌ त्यो कसरी पूर्ण चन्द्रफै जन्म्यो कुन्नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो उर्मी, तिमीले ठीक भन्यौ । बाबु-आमा त खासै राम्रा होइनन्‌ । क भनेअलगौ रहेछ । सबै भन्थे दार्जिलिङ पढ्न वस्दासम्म साह्रै असल थियो रे ।बाबु-आमाले चार-छपल्ट के पार्टीमा ल्याएका थिए । त्यसपछि उसले शिखरचढिहाल्यो । बानु-आमालाई नै माथ गर्ने गरी पिउँछ बा !&lt;br /&gt;
रमण भन्दै थिए, &#039;फिरोज स्टुडेन्ट भिस्सामा अमेरिका जाँदैछ । फेरि किनअमैरिका गएन छ कुन्नि ? आजकाल किन गंगा रमण पनि देखिँदैनन्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपालमा अरू कुरामा विकसित हुनु त्यत्तिकै हो । छाडापन भने राम्ररीसप्रेको छँदैछ । घन्टा-घन्टामै केटीहरू फेर्न पाएपछि किन जाओस्‌ अमेरिकासमेरिका । संचिवनी उमा भन्दै थिडन्‌- &#039;गंगा र रमणको त हाड र छाला मात्रैछ रे । पहिला मेरोजस्तो छोरो संसारमा नै छैन भनेर नाक फुलाउँथे । अहिलेछँडौलीहरूको पछि लागेर घरमा बास नै हुँदैन रे । वाबु-आमासँग मुखमुखैलागेर भन्छ रे तिमीहरूले जुन बाटो देखायौ त्यतै हिँडे के बिराम गरे हँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपकले लामो श्वास फेदै भने, &#039;त्यसो भए तिमीलाई लाग्दैन ? जे छिन्‌हाम्री शालु ठीक छिन्‌ भनेर ।&#039;&lt;br /&gt;
हो ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उमिंलाले टाउकोमा हात राख्दै भनिन्‌, &#039;फिरोजजस्तो पो हुनुभएन तसमयअनुसारको त हुनैपन्यो नि । हाम्री शालु त सत्ययुगकी सीताजस्ती छै ।उसलाई यो युगमा कसले गन्छ शालुको पापा : देखिसेन, सुब्वा-सुव्विनीकोजोडीलाई, चट्ट वाइन समाई दुई पेग मात्र खाई । सबैसंग हात मिलाएर हिँडी,सबैले उसलाई राम्रै माने । हाम्री शालुचाहिँ डा. पुष्कर भट्टको श्रीमतीभन्दाकम हुन्न । न लाउनको सोख न खानको ।&#039;&lt;br /&gt;
दीपकले थुक घुटुक्क निल्दै भने, &#039;हो उमी त्यो सुब्विनीको हात पिउरीजस्तैनरम थियो । अहिले सम्झँदा पनि जीड नै सिरिङ्ग हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;उमिंलाले अलि ठुस्कँदै भनिन्‌, &#039;भर्खर विवाह गरेर ल्याउँदा म पनि तिनीभन्दाकम थिइनँ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाको कुरा सुनेर दीपक ठूलो स्वरमा हाँसे । अनि सोचिरहे- &#039;साथीकोविवाहमा जन्त जाँदा रूप राम्रो देखेर विवाह गर्छु भनिहालें । विवाह गरेरल्याएको राति फुटेका हात खुट्टाले शरीरमा कोरेको अझैँ बिर्सिएका थिएनन्‌उनले । मनमनै भने, &#039;मैले विवाह गरेर नल्याएको भए कहाँ दाउराघाँसगरिरहेकी हुन्थिन्‌ यतिखेर । धादिङबाट बिबाह गरेर ल्याउँदा बोल्नसम्म ढङ्गथिएन । स्पष्ट बोल्न नजानेर कत्रो हत्य । चम्चा उचाल्नसमेत आउँदैनथ्यो ।तिमीलाई मान्तैपर्नै कुराचाहिँ तिमीले आफूलाई चाँडै नै सहरीया साँचोमाढाल्यौ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;होइन के सोचिस्या ? म सुब्विनी जस्तो थिइन त ?&#039; चेप्रिँदै बोलिन्‌उर्मिला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
थियौ बाबा थियौ । तिम्रो रूपले मोहनी लगाएरै त हो नि त्यो डाँडाबाटयहाँसम्म ल्याएको । तिमीलाई आफनो चालढालमा ढाल्न गाह्रो हुन्छ भन्नेलागेको थियो, तिमी त उपियाँ उफ्रेझै मभन्दा पहिला उफ्रियौ । अहिले तिमीलाईकसले भन्छ घादिङकी भनेर ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले मख्ख हँदै कुरा थपिन्‌, &#039;अब हाम्रो गुप्र नै नृत्य सिक्न जाने भएकाछ। जीउ पनि बन्ने कला पनि सिकिने ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपकले भने, &#039;अबचाहिँ योभन्दा माथि नगए राम्रो । जे पनि पच्ने गरीखाएको राम्रो हुन्छ । तिम्रो गुप अलि माथि नै गइसक्यो, अब कति माथि जानेमन छहँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;सबैले नाच सिक्ने. भनेपछि म मात्र कौवाको बथानमा बकुल्लौ हुनु भएन ।हजुर हल्का भुजा, दाल तरकारी खाइस्यो । म भने मासुसँग अलिकति सुइँक्याउँछु ।हेरिस्यो नखाई त निद्रा नै पर्दैन । शालु पनि नाच्दानाच्दा थाकेर सुतिन्‌जस्तो छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नभन्दै शालु थाकेर ओछ्यानमा पल्टेकी थिइन्‌ । यता शालु उता कान्छीकोमन नै खुसीले नाचिरहेको थियो । कान्छीले शालुको तस्बिरलाई पहिलाकै किलामा &#039;झुन्ड्रयाइन्‌ । शालुसँगको भेट हुँदाको खुसीले गर्दा कान्छीलाई खानपनि मन लागेन । राति चन्द्रकान्तको छातीमा सृतेर आँसु वगाइरहिन्‌ ।चन्द्रकान्तले कान्छीको मनको करा बुझेर कान्छीलाई दुई वर्षको बालकलाईझैमाया गरेर सुमसुम्याइरहे । कान्छी रुँदारुँदै निदाइन्‌ । चन्द्रकान्तले वडो मायालुपाराले कान्छीको टाउको तकियामा राखेर आफू पनि सुते ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुजन कोठामा पसेपछि शालुको एकाग्र भङ्ग भयौ । सुजनलै दिक्क मान्दैभने, &#039;हेरन शालु आज पापालाई टाउको दुखेर पार्टीमा जान पाइनँ । हिजो त्योफिरोज भन्नेले डान्स गरेको अझै आँखामा झल्झली आइरहेको छ । सेमतिम्रोजस्तै डान्स गर्दोरहेछ । त्यो प्रकाशेलाई त अहिले कसैले वास्ता नैगर्दोरहेनछन्‌ । हेर शालु, फिरोजलाई देखेपछि युवतीहरू त हाम फालेरआउँदारहेछन्‌ । म पनि ठूलो भएपछि फिरोज जस्तै बन्छु । डान्सचाहिँ तिमीलेसिकाइदिनुपर्छ नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले सुजनको हात समातेर मुसार्दै भनिन्‌, &#039;डान्सचाहिँ म सिकाइदिउँलातर फिरोजजस्तै बन्छुचाहिँ नभन. फिरोज भनेको बेलुनमा हाबा भरेको जस्तैहौ । केही समयपछि आपसैआफ फुट्छ त्यो । जीवन नबुझनेहरूमा गनिन्छत्यो । त्यसको चर्चा ममीको मुखबाट पनि धेरैपल्ट सुनेकी हुँ मैले । ममीहरूजस्ताको मात्र पारखी हो त्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दिदी तिमी त आफूलाई निक्कै ठूली भएँ भन्नै ठान्छयौ कि क्या हो ? मान्छेकति-कति पढ्दा त ठूलो हँदैनन्‌ तिमीले त बल्ल एस्‌ एल्‌ सी. दिएकी छ्यौ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कान्छु मैले सानोमा नै दिदीबाट घेरै कुरा सिक्ने मौका पाएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमीले नै दाइ र दिदीको नराम्रो विचार रहेछ भनेर निकालिदिएको होइनर ? फेरि कसरी उनीहरू राम्रा भए ?&#039;&lt;br /&gt;
शालुले तुरुक्क आँसु झार्दै भनिन्‌, &#039;तिमी अहिले सानै छौ कुरा बुझदैनौ ।डान्स म सिकाइदिउँला । मान्छेले सबै क्रा जान्नुपर्छ तर सबैभन्दा ठूलोचाहिँपढाइ नै हौ । कहिलेदैखि पढाइ सुरु हुन्छ तिम्रो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुजनले हाई गर्दै भने, &#039;पसिंदेखि हुन्छ । दिदी हुँदा कहिले घरको खानाखाक जस्तै हुन्थ्यो । अहिले जतिपल्ट घर आउँछ उतिपल्ट काम गर्नेहरूफेरिएका हुन्छन्‌ । होस्टेलको भन्दा पनि खाना मीठो हुँदैन । अहिले पनि मैलेभुजा खानै सकिनँ । तिमीले खायौ ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;आज मलाई खान मन नलागेर त्यसै सुतेकी थिएँ । भोलि बिहान म खानापकाउँला, दिद्दीले जस्तो पकाउन त सक्दिनँ, तीर्थले भन्दाचाहिँ मीठो नैपकाउँछु ।&#039; हुन्छ भन्दै सुजन आफूनौ कोठातिर लागै । शालु दिदीको सम्झनामाआँसु झार्दै सुतिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==दस==&lt;br /&gt;
क्याम्पस आएको पहिलो दिनदेखि नै आफनौ हाउभाउ र सुन्दरतालेकक्षाकोठाको मर्यादालाई नै हलचल पारेकी थिइन्‌ मौसमीले । केही बनौँलाभनेर विज्ञान विषय लिएर पढेका युवाहरूको ध्यान पढाइमा भन्दा मौसमीकोरूपमा केन्द्रित थियो । शालुलाई मौसमीको चालढाल देखेर अत्यन्त रिसउद्यो । केही दिन त शालु मौन नै रहिन्‌ । जब कक्षामै मर्यादाभन्दा बाहिरगएर हात हालाहाल गरी चलेको देखेपछि शालुले मौसमीलाई एकान्तमा गएरसम्झाइन्‌, “मौसमी, तिमी कुन बिषय लिई पढ्दैछूयौँ थाहा त छ, होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले हाँस्दै उत्तर दिइन्‌, &#039;शालु, तिमीले भन्न खोजेको कुरा मैलेबुझिसकेँ । हेर म यहाँ आफनो खुसीले भर्ना भएकी हुँ भन्ने ठानेकी छौँ?जिल्लामा सरहरूले नै चिट चोराएकाले गर्दा राम्चै फस्ट डिभिजन आएछ ।बिचरो मेरौ सोझो बाबुलाई छौरीले रामो नम्बर ल्याएकी छ, साइन्स पढा,भौलि डाक्टर हुन्छै भनेर उचालिदिएछन्‌ । हो न हो छोरी डाक्टर बन्छे भन्नेसपना देखेर मलाई यो क्याम्पसमा ल्याएर कोचेर पो गए । हेर, बाबु-आमाभनेको त पढेलेखेको चाहिने रहेछ बुझयौ ? मैले हजारपल्ट भने- बुबा मसाइन्स पढ्न सक्दिनँ । मेरो कुरा मरे सुनेको भए पो । अझ अर्को कुरासुन्छयौँ ? वसमा मान्छेहरूले कहाँ जान लाग्नु भो भन्दा भन्धे- मेरी छोरीलेएस्‌.एल्‌ सी.मा बोर्ड ल्याएकीले काठमाडौंमा डाक्टर पढाउन हिँडेको । भकारोसोने बाबुलाई फस्ट डिभिजन र बौर्डफस्टको अन्तरसम्म थाहा छैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मलाई पो लाज लागेर, उता बूढाको खुट्टा भुइँमा छैन । अब म लबुदुलेडाक्टर बनेर उनको छाती दुखेको निको पार्ने रै, उफ कर्म !, बाबुको करासम्झँदा पनि कहिले एक्लै हाँस्छु कहिले एक्लै रुन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले मुसुक्क हाँस्दै भनिन्‌, &#039;बडो हँसायौ तिमीले, बिचरो, तिम्रो बाबु बडोसिधासादा हुनुहँदोरहेछ । कहाँबाट आएकी नि !&#039;&lt;br /&gt;
मौसमीले निदारमा हात राख्दै भनिन्‌, &#039;राम्रो ठाउँबाट आएकी भए यो दशाकिन भोग्नुपर्व्यो ? पर्वतबाट आएकी बानु डाक्टर बन है छोरी भनेर नाकफुलाएर गएका छन्‌ । तेत्रो पढेलेखेका घरबैटीलाई यसो भने- &#039;ए हजुर, योछोरीले डाक्टर पढ्दै छे कहिलेकाहीँ घरबाट भाडा आउन ढिलो भए केहीनभन्नु होला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घरबेटी बुवाले मेरो बाबुको कुरा सुनेर मुसुक्क हाँस्दै मुन्टो हल्लाउनुभयो ।मैले कतिपल्ट डाक्टर बन्न सजिलो छैन भनेर सम्झाएँ, मेरो कुरा सुनै पौ ।उल्टै भन्धै- &#039;तिमीले मलाई मूर्ख बनाउन नखोज है छोरी, &#039;म पनि देश खाएर सेस भएको मान्छे&#039; अहिलेसम्म त वाबुले गाउँमा मेरी छोरी डाक्टर बनेरआउँछै भन्दै हल्ला पिटे होला । हेर शालु, मेरो बाबुलाई डाक्टर बन्नु भनेकोगुन्द्रुकमात खानझै सजिलो हुन्छ झैँ लाग्छ क्यारे ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीको कराले शालुले हाँसो रोक्नै सकिनन्‌ । केहीवैर हांसैर भनिन्‌,“मौसमी मान्छेले चाहेमा जे पनि गर्ने सक्छ । तिमीले दिलोज्यान दिएर पढ, यीभवराहरूको भुनभुनबाट ज्यादै टाढा रहँ । जसरी भमराहरू फूलको रस पाउन्जेलमात्र फूलमा बस्छन्‌ । यी युवकहरू पनि त्यस्तै हुन्‌, तिमीले आमाको त करैगरेनौ नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आमा त म तीन वर्षकी हुँदा बित्नुभयो रे । आमाको त सम्झना नै छैन ।बाबुले नै थि भयो । हामीलाई दुःख देली भनेर अर्को बिबाहसम्म गर्नुभएन ।आमा मर्दा बाबु पैतीस-चालीसको मात्र हनुहुन्थ्यो रे । दाइ र दिदीले एस्‌.एल्‌.सी.पास गर्न सकेनन्‌ । मैले फस्ट डिभिजन ल्याएको उनलाई के-के न भयो । वावुभन्दै थिए, &#039;नानी तँलाई डाक्टर बनाउन चालीस-पचास हजार पर्ने टाँडी खेतनै बेचिदिन्छु ।&#039; बाबुको कुरा सुनेर म झन्डै पागल भएं । सम्झाउन खोज्दाउल्टै बौल्न दिने हो र । भन्थे- &#039;तिमी खुरुक्क पढ मात्र अरू कुरा मलाई थाहाछैन । त्यो खेत बेच्दा पनि पैसा नपुगे माझा पाटो पनि बेचिदिउँला । डाक्टरबनेर पहिला पोस्टिङ गाउँमा नै मिलाए है नानी ...। अँ साँच्चि शालु, मसँगतिमी सबै कुरा गर तर भमरा र फूलको कुरा नगर । म बैंसका उन्मादहरूलाईबसमा राखेर तद्वपिन चाहन्न । म आफूलाई कुण्ठित पारेर बाँच्दित पति । मउड्न चाहन्छु बुझ्यौ ? तिमीले बगैँचामा गएर कोपिलाहरूलाई नफुल भनेरगाली गर्दैमा फुल्दैन र त्यो ? फुलेपछि भगरा लाग्नु प्रकृतिको नियम हो । त्योप्राकृतिक नियमविरुद्ध हिँड्नु नै पाप हो । सक्छयौ भने प्राकृतिक नियमविरुद्धतिमी पनि नहिँड । यी क्षण हामीबाट बगेपछि बग्यो शालु । हामी बुढेसकालमाचाहेर पनि यो खुसी पाउन सक्दैनौँ । म तिमीलाई अन्तिमपटक भन्दैछ, मेरोओठको हांसो नखोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले बडो नम्र स्वरमा भनिन्‌, &#039;मौसमी, तिम्रा बाबुको सपनासँग तिमीलाईकनै सरोकार नै छैन त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले उत्तर दिइन्‌, &#039;सपना देख्नेले पनि अलि सार्थक हुने सपना पोदेख्नुपयो नि ! हुट्टिट्याउँले आकाश थामेको सपना देख्नेले देखिरहुन्‌ । मलाईकुनै चासो छैन । एक-दुई वर्ष यसो क्याम्पसमा हल्लिन्छु । त्यसपछि गाँठवालापट्याउँछ र विवाह गर्छु । सुन्दरी छँदैछु, मान्छेले हेर्ने सुन्दरता नै हो । मान्छयौभने तिमीले पनि आफूतौ सुन्दरतामा ध्यात दिने गर, साँच्चि शालु तिमीलाईपो युवकहरूले कुन गाउँबाट आएकी भनेर मसँग सौध्दै थिए । कमसेकमकाठमाडौंको त इज्जत राख । उनीहरूले मात्र होइन । मैले पनि तिमीलाईगँवार नै सोचेकी थिएँ । यस्तै हो भने तिम्रो भविष्य अन्धकार छ बालिके ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीको करा सुनेर शालु एकैछिन मौन रहिन्‌ र भनिन्‌, &#039;मौसमी, भीरखोज्ने गोरुलाई रामराम मात्र भन्न सकिन्छ काँध नै थाम्न त सकिँदैन । मैलेजीवन्त के हौ नबुझेकी भए म किन तिमीसँग राम्रो वाटो रोज भनेर हातजौद्यैं । तिमी र म एकै उमेरका हौँ । कै तिमीलाई वैंसले कृतकत्याउँदा मलाईबैंसले छोड्छ होला र ? तर, ठूलो त मन हो । तिमीलाई आफूनै आँसु पियाएरहुर्काउने बाबुभन्दा तिम्रो बैँस ठूलो होइन । टाढा किन जान्छौ । तिम्रो बाबुलेनै तिमीहरूको खुसीका लागि आफूनो खुसी बन्धकी राख्नुभयो । तिमी साइन्सपढ्न सम्दिन भन्छ्यौ भने अर्को विषय पट, समय छँदैछ । बरु सक्दो सहयोगम नै गर्छु । प्लिज मौसमी तिमीले आफूलाई सत्व नठान । अहिलेसम्म तिमीबहुमूल्य रत्न हौँ । तलमाथि केही भयो भने तिमीलाई मान्छेहरूले फुटेकोभाँडोसँग पनि दाँज्दैनन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;शालु, तिमीलाई मेरो रूपको त्यत्रो डाह छ भनेकाटेर लेक । तिमीलाई युबकहरूले पछ्याएनन्‌ अनि मेरो डाह गर्छ्यौं, तिम्रोमनको कुरा गैले बुझिसकेँ । भमरा &#039;झुम्मिँदा पनि बास्नादार फूलमा &#039;झुम्मिन्छन्‌याद गर । तिमी र झरेका फूलमा कुनै अन्तर छैन । अनि को पछि लागोस्‌तिम्रो ? सक्छयौ भने एकजना युबकलाई मात्र पछि लगाउन सक&#039; भन्दैमौसमी भुतभुताउँदै उठेर आफ्नो कक्षाकोठामा प्रवेश गरिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले मनमनै सोचिन्‌, &#039;भगवान्‌ मौसमीको जीवनमा आँधी नआओस्‌ ।उनले जीबनको मूल्य बुझून्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले ढोकाबाट चिहाउँदै भनिन्‌, “मोरी, म तँलाई खोज्दाखोज्दा हैरानभैसके । कै सौचैर बसेकी ? कतै तैँले अरिङ्गालको गौलामा हात हाल्नै कामगरिनस्‌ ; मौसमी पनि कक्षामा फतफताउँदै पसेकी थिइन्‌ । तँ किन प्रेमलाईघणा गर्छेस्‌ भत्त त ? मौसमीले भन्दा बढ्ता उच्छुड्खल हामीले प्रत्येक क्षणसडकपेटी र गल्लीहरूमा हिँड्ने प्रेमी-प्रेमिकाहरू देख्दै आएका छौँ । यसरी तँभाबुक नबन, खुरुबक क्लासमा हिँड । तँ सधैँ यही भन्छेस्‌, “वास्तबिक प्रेममात्याग हुन्छ, प्रेममा लज्जा हुन्छ, बास्नाभन्दा बढी प्रेम हुन्छ केवल प्रेम ? त्यस्तोप्रेम गर्ने भए तैँले र मैले मात्र गरौँला अरूबाट तैँले यस्तो प्रेम गर्लान्‌ भन्नेआश नगरै पनि हुन्छ । तँ परिस्‌ प्रेमको सख्त विरोधी । मैले कसैसँग प्रेम गरेँभने तैँले सोचेभौँ प्रेम गर्छु । अब त हाँस ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीको कुराले शालु फिस्स हाँसिन्‌ र वसेको ठाउँबाट उठ्दै भनिन्‌,“रोहिणी, त्यो गाउँले केटी आफ्नै आँखासामु बिग्रिन्‌ भने मचाहिँ हेर्न सक्दिन ।यसो जानेबुझेको कुराहरू भन्दा राम्रै हौला भनेर भनेकी थिएँ । तैँले भनेझैँअरिङ्गालको गोलामै हात हालेँछ । उनी बाहिरको मात्र सुन्दरी रहिछिन्‌ ।मलाई त उनको बाबुको माया लाग्यो । छोरी ठूलो वन्ली भन्ने ठूलो सपनादेखेका रहेछन्‌ । छोरीको ताल भन्ने देखिहाल्यौ । त्यो श्रीराम सरको ताल पनि के हो ? मौसमीबाट उनको आँखा टाढा जाँदै जाँदैन । बूढो भएर पनि पात्तैकोमोरो । त्यस्तै ताल हो भने हामीले राम्रो शिक्षा पाउने आश नगरे पनि हुन्छ ।पुरानो क्याम्पस भनेर अमृत साइन्समा नै आइयो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;मोरी पीर नगर । पढाइ राम्रै होला नत्र आकाश किन यहाँ आउँथे ? मैलेझुलुक्क उनलाई देखेकी थिएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“औं आकाश पत्ति यहाँ, उनी त ए सेक्सनमै होलान्‌ । आकाश यहाँ आएकाछन्‌ भनेपछि त म ढुक्क भएँ ।&#039; शालुको आँखामा खुसी छरियो ।&lt;br /&gt;
रोहिणीले भनिन्‌, &#039;शालु तिमी आकाशको नाम सुन्नैबित्तिकै सधैँ हषितदेखिन्छयौ कित ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले हाँस्दै उत्तर दिइन्‌, &#039;रोहिणी कुरा हामी सबैलाई थाहा नै भएको हो ।आकाशजस्तो चरित्रवान्‌ त यहाँ जन्मेकै छैनन्‌ होला । उनी सम्पूर्ण गुणले पूर्णछन्‌ । यदि भगवान्‌ले कुनै मान्छेको सृष्टि गर्नु छ भने आकाशजस्तो व्यक्तिकैसृष्टि गरोस्‌ । म आकाशलाई कुन उपमा दि उनलाई दिने त्यस्तो उपमा नैभेटेकी छैन मैले ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“क मैयाँसाप, भखंरसम्म प्रमको खिलापमा थिई, फेरि भावनामा बगी, तँकतै आकाशलाई प्रेम त गर्दिनस्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले उत्तर दिइन्‌, &#039;रोहिणी आकाशलाई प्रेम गर्नु भनेको चन्द्रमा छुनुजत्तिकैहो । उनलाई प्रेम गर्नेले पहिला आफनो अनुहार पनि त हेर्नुपत्यो । म उनलाईपूजाचाहिँ गर्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;तँ नरिसाउनै भए म एउटा करा गर्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले हाँस्दै भनिन्‌, &amp;quot;भन न काली किन रिसाउनु : ? नरिसाउने क्रा गरिस्‌भने रिसाउँदै रिसाउन्न, रिसाउने कुराचाहिँ नगर, दिदी-दाइको बारेमा तहोइन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;ल हेर आत्तैकी, तेरा दिदीदाइले त हाम्रो घरलाई स्वर्ग नै बनाएका छन्‌ ।साँच्चै शालु, आफू बूढेसकालकी छोरी, मलाई घरको साह्रै पीर थियो । अहिलेभैरो टाउकोबाट कसैले सिङ पहाड झिक्िदिए जस्तै भएको छ । तेरौ यो गृणम कहिल्यै बिर्सने छैन । ममी-वाबा पनि सधैँ तेरो करा गरिरहनुहुन्छ । दाजु,दिदी पति तेरै कुरा गर्नुहुन्छ । तैले आँसु पिएर कान्छीदिदीलाई मेरो घरमापठाइस्‌ । हामीले सम्पूर्ण पायौं, तैँले सम्पूर्ण गुमाइस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले बीच्चैमा कुरा काट्दै भनिन्‌, &#039;तँ एक्लै बौलिरहेन्छस्‌ कि मलाई पनिवोल्न दिन्छेस्‌ काली : पाउनु मात सबै होइन, आत्मा सन्तुष्टि नै सबै हो ।&#039;दिदीले सबै पाउनुभयो । तैंले सहयोग नगरेको भए न तैले सम्पूर्ण खुसीपाउँथिस्‌, न मैले, हामी सबै एक-अर्काका खुसीमा रमाएका छौँ भने पाउनु र गुमाउनुको त प्रश्नै रहेन । तेरा बूढा ममी-बाबाको ओठमा खुसी देखेपछि तमैरो हर्षको सीमा नै रहेन । तेरो घरको खुसीमा कसैको आँखा नलागोस्‌ । तैँलेके भन्न खोजेकी विइस्‌ कुन्नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;शालु मलाई लाग्छ आकाश तँलाई प्रेम गर्छन्‌ । एकपल्ट त मैरो कुरामाबिश्वास गर । आकाश तेरो लागि नै जन्मेको हुनुपर्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले रोहिणीको कुरालाई हाँसोमा उडाउँदै भनिन्‌, &#039;ल अब तेरो दिमागत्वुस्कियो । प्रेम त्यो पनि आकाशले मसँग । त्यस्तो कुरा मनमा लिनु पनि पापहो । आइन्दा प्रेमसिरेमका क्रा मसँग गरिस्‌ भनेचाहिँ म साँच्चै रिसाउँछु त॑पनि कसैसँग प्रेम नगर है मैले भनिदिएकी छु ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीलाई चुप लाग्न करै लाग्यो । पढाइ सिध्याएर वाहिर निस्कँदै गर्दाबिनुले मौसमीलाई कोट्याउँदै भनिन्‌, “के हो मौसमी ठूलै माछा जालमा पार्नलाग्यौ कि कसो : श्रीराम सर त तिमीलाई देखेर लट्टेजस्तो छ नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले शालुतिर हेर्दै भनिन्‌- &#039;हे्दै जाक न कति माछा जालमा पार्छु ।प्रकृतिले नठगेपछि मान्छेले डाह गरेर के लाग्छ : यो क्याम्पसमा त मेरो डाहगर्ने धेरै छन्‌ बुझ्यौ ? कतै तिमीलाई पति मेरो डाह लागेको त होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;छ्या के को डाह नि, त्यो पति बूढो ढेडुको, आफू त पहिल्यै रिजापमा छु ।&#039;बिनुले उत्तर दिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालु र रोहिणीले उनीहरूको करा सुने पनि नसुनेकोझौँ गरी क्याम्पसबाट बाहिरिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==एघार==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु ओछ्यानमा सुतिन्‌ । खुसीले गर्दा होला आँखामा निद्रा परेन । आँखामाकान्छीदिदीले जन्माएको तीन किलोको सुन्दर शिशु आइरहयो । बाह्र-तेहर वर्षकोचीरुदेखि लिएर रोहिणीका सम्पूर्ण परिवार त्यो शिशु र ढिदीको स्याहारमाकटिबद्ध थिए । सबैको अनुहारमा गुराँस फुलेको थियो । दिदीलाई स्याहारगर्नका सागि खु आइमाई राखेको रहेछ । पीताम्बरा अरूले स्याहार पुन्याउँदैनन्‌नातिलाई सेकताप गर्छु भनेर सुर्रिएकी थिइन्‌ । दिदी र दाइ प्रसन्नमुद्रामा नवजात शिशुलाई हेरेर टोलाइरहेका थिए । मलाई देख्नेबित्तिकै दिदीसम्पूर्ण खुसी विर्सेर रुनुभयो । त्यसपछि एकैछिन र वातावरण नै स्तब्ध भयो ।मैले सबैलाई वधाई दिएर त्यो सानो र सुन्दर शिशुलाई काखमा लिएपछि भनेपुनः रमणीय वातावरण छायो । दिदीलाई बच्चा पाउन चिरफार गर्नुपर्छ किभन्ने पीर थियो । त्यो पनि हट्यो । रोहिणी पनि कम वाठी छैन, पैले पीर गर्छुभनेर एकैपल्ट बच्चा पाएर घर ल्याएपछि डाकी । दिदीलाई अरूलाई भन्दा केही गाह्रो त भयौ होला, तर दिदीले मैयाँ धेरै गाह्रो भएन भनेर ढाँदनुभयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीकी आमाले पनि दिदीकै कुरामा सही मिलाउनुभयो । शाल्‌ दिउँसोकोसबै कुरा सम्झँदै ओल्टैकोल्टै परिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
होइन मैयाँसाप आज पनि खाना नखाई सुत्नै कि क्या हो ? आफभन्दा दुई-चार वर्ष जेठो तीर्वले ढोकामा आई बोलेर्पाछ पो शालुले आफू भोकै भएकोकरा याहा पाइन्‌ र ओछ्यानबाटै भनिन्‌, &#039;तपाईँ खानोस्‌ म खान्न ।&#039; तीर्थेलेआफनै सुरमा के भन्यो बुझितन्‌ शालुले ।&lt;br /&gt;
केहीबेरपछि नशामा गुनगुनाउँदै आएको पापाको स्वर भने शालुले राम्ररीबुझिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले हाँस्दै भनिन्‌, “बुढ्यौली लागेर पनि अझैँ बैँस गएको छैन । मोरोतीर्थ र शालुले गीत सुन्लान्‌ नि फेरि । शालुको पापा म पो अबदेखि रमफझमबाटविमुख हुने भएँ । यो तीर्वेले पनि यो घर होइन, आफनै पेट मात्र सम्हाल्नेभयो । मेरो घर भत्कियो पापा भत्कियो । म बर्बाद भएँ । कान्छीलाई आजैलेराइदिस्यो आजै ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपक चिच्याए, &#039;उर्मी, चूप लाग आज तिमीलाई धेरै नशा लागेजस्तो छ ।त्यौ कान्छी चकलेट हो र तिमीले भन्दैमा किनेर ल्याउने । कान्छी बस्तासम्मआजै निकालौं भोलि निकालौँ भन्दै दिमाग खान्थ्यौ । अहिले फेरि, कान्छील्याइदिनु पो भन्छिन्‌ । होसमा बोलेकी हो कि बेहीसमा यो आइमाईको बोलीकोभर नै छैन।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म होसमै छु भन्दै कपडा नै नखोली पलङमा पल्टिन्‌ र कान्छी-कान्छी भन्दैनिदाइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपक पनि उमिलाले कान्छीको नाम लिएको सुनेर केही रिसाउँदै सुते ।शालु ममी र पापाको शब्दहरू सुनेर मनमनै रोइन्‌, &#039;तिमीहरू जस्ता पापीलेगर्दा नै मैले दिदीको काखबाट टाढा हुनुपन्यौ । तिमीहरू गतिला भएको भएत्यो भाइ आज यो घरमा हुन्थ्यो । माल पाएर चाल नपाउनेहरू रोओ, अवकति रुन्छौ । शालु दिदीलाई सम्झँदै निदाइन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन तीर्थ दाइ किन झोलासोला बौकेर हिँडेको :&#039;&lt;br /&gt;
तीर्थले आँखा पल्टाउँदै भन्यो, &#039;म त पहिलाकै घरमा जान्छु । त्यहाँ तमैयाँसापसँग हाँस्न र ठट्टा गर्न पाइन्थ्यो । जति पैसा मागे पनि दिन्थे । यहाँआएपछि न हाँसोठट्टा गर्न पाइन्छ न त पैसा नै दिन्छन्‌ । पैसा दिनुपन्यो भनेदाँतबाट पसिना निकाल्छन्‌ । कान्छीले यसो गर्थी, उसो गर्थी भनेर उल्टैरामायण सुनाउँछन्‌ । यो कलियुगमा को कान्छी भन्नै जन्तु रहिछै नविना पैसाकाम गर्ने । उहाँकी मैयाँसाप म रिसाएँ भने मलाई काउकृति लगाएर हँसाइसिन्ध्यो । हजुरकै उमेको भए पनि वढो रसिलो होइसिन्थ्यो । म भनेपछिहुरुक्कै होइसिन्ध्यो । यहाँ हजुर पनि यस्तै होला भनेर आएको त हजुरले तहाँस्तसम्म जानेको छैन रहेछ । अरू कुरा त परै जाओस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालु तीर्थैंको कुरा सुनेर डराइन्‌ र आफनो रिसलाई कन्ट्रोल गर्दै भनिन्‌,&#039;दाइ तपाईं जानोस्‌, यहाँ अर्को काम गर्ने ल्याउने कुरा भइरहेको छ बरुबाटोखर्च छैन भने म दिन्छु।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीर्घले झकिँदै भन्यो, &#039;बिहान आफनो तलब मागिसकेको छु । जति कामगर्ने ल्याए पनि यो घरमा को टिक्ला र ? ल म गएँ । यही तलब पर्खेर बसेकाथिए तत्र अस्ति नै गइसक्यें । मति बिग्रेका यहाँ आएँ, अहिले उहीँ फर्कनुपन्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फौनमा उहाँको साहु-साहनी र मैयाँसापले अन्त बसेर चेतिस्‌ होला,आउँछस्‌ भने आइज भन्नुभएको छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीर्थे ठूलो-ठूलो फड्को मार्दै बाटो लाग्यो । शालुले तीर्थेको नियति बुझेपछिक निकाल्नु नै श्रेय ठानिन्‌ । तीथेंले बाटो लाग्दा उसको अनुहारमा पनि कुनैहीनताबोध थिएन । क खुसीले उन्मत्त थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन, तीर्थे कहाँ मन्यो र तिमी गेट खौल्न आएकी ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अरू काम गर्ने सात-आठजना मरेजस्तो क पनि भन्यो । तीर्थको कराभोलि गरौंला, अहिले हजुर नशामा होइसिन्छ सुतिस्यो ।&lt;br /&gt;
दीपकले भने, &#039;बिहानसम्म त उसले जाते क्रै निकालेको थिएन । एक्कासिकिन हिँड्यो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“भन्दै थियो काम गरेको तलब नदिएर पो वसेको नत्र म यो घरमा किनबस्थेँ ? पैसा माग्यौ कि सधैं कान्छीको कुरा गर्छन्‌ । भन्दै हिँड्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले विरक्त स्वरमा भनिन्‌, &#039;शालु हामी बिहानदेखि बेलुकासम्म बाहिरैहुन्छौँ । काम गर्न के नै गाह्रो छ र, काम गर्नेहरू किन टिक्दैनन्‌ ? न बगैँचार करेसाबाहिरै काम गरेका हुन्छन्‌ । घिच्नु र टी.भी. हेर्नुबाहेक अरू काम छैनर पनि यिनीहरूलाई के मात लाग्दो हो कुन्नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ममी हजुर सबैलाई कान्छीदिदीसँग तुलना गर्न खोजिसिन्छ । अनि कसकोचित बुझछ हँ ? हेर, कान्छीले यति मासु तीन छाकलाई पुन्याउँथी । कान्छीलेयति आलुले हप्ता दिन पुन्याउँथी, चामलले महिना दिन पुग्याउँची, तेलले यतिदिन, ग्यासले यति दिन, त्यसमाथि कान्छी त ज्याला लिँदैनथी । कपडा कहिल्यैमाग्दैनथी । हजुरको यौ भाषण प्रत्येक दित सुनेपछि कसरी टिक्छन्‌ मान्छेअब चुप लागेर सुतिस्यौ । पकाउने, खाने काम म आफैँ गरौंला, काम गर्नेमान्छे राख्नै पर्दैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपकले उर्मिलालाई कोठामा लग्दै भने, &#039;अब चुप लाग, कान्छीलाई निकाल्न अनेकौं बहाना बनाएको फल वल्ल भोग्दैछयौ । कान्छीले सिक्री चोरी, औँठीचोरी भन्दै घोच्च्यौ, हेर्दै जाक अब के-के हुन्छ । तिम्रो घरलाई स्वर्गजस्तैसुन्दर भन्नेहरू आजकाल यहाँ आउन मन गर्दैनन्‌ भन्दै आफैँ बेसुरमावर्वराउँछयौँ । तिमीलाई थाहै छ । शालु कान्छीलाई सानोभन्दा सानौ चौटलाग्दा पनि दुखित हुन्थिन्‌ । त्यस्ती शालुले आफैँले कान्छीलाई निकालिन्‌, त्योपनि चन्द्रकान्तको आरोप लगाएर त्यसमा ठूलै रहस्य होला । उमिलाले पलङमापल्टँदै भतिन्‌, &#039;हजुर पनि नाता शङ्का-उपशङ्का गरिसिन्छ । कस्ताले कस्तालेत बैँस थेग्न सक्दैनन्‌ । त्यो मोरीले सक्छे ? हामी कोही घरमा नहुँदा ती दुईकैरजाइँ हुन्थ्यो । कान्छी बारीमा गए पनि सँगै जान्थ्यो । त्यसले कान्छीलाई मायागर्छफौँ मलाई पहिल्यै लागेको थियो । त्यसैले त त्यो पनि पैसाको त्यति वास्तागर्दैनथ्यो । अहिलेको काले स्वाठ देखिसिन्न कस्तो छ । मैले अस्ति भाइ त्यतिफूलमा पाती हालिदैउन्‌ भनेकी थिएँ ठाड्चै जबाफ दियो- &#039;मैल आजसम्मकसैको घरमा काम गरेको छैन, हजुरहरूको बाहिर जाने भए फोन गर्नु भन्दैटिम्किँदै हिँड्यो । चन्द्रकान्तलाई कहिल्यै काम अह्ाउनु पर्दैनथ्यो । आफनैतलबबाट फूल ल्याएर कुन फूल कहाँ लगाउने कान्छीलाई सोधी-सोधीलगाउँथ्यौ । तरकारी लगाउँदा पनि त्यस्तै गर्थ्यौ । जसरी कान्छीले यो घरलाईआफनो सम्झन्धी त्यसैगरी चन्द्रकान्तले पनि यो घरलाई आफनै सम्झिन्थ्यो ।यो सबै गर्नुको पछाडि चन्द्रकान्त पति कान्छी यो घरबाट निस्कन चाहँदैन्थ्मोबुझनु भौ ? शालुले यो घरमा बस्नुको बास्तविकता नबुझेरै निकालेकी हुन्‌मलाई थाहा छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमीले जे सोचे पनि मेरो भित्री मनले भन्छ- &#039;शालुले कान्छीको कहिल्यैकमलो चिताउँदिनन्‌ । कान्छीलाई तिमीले निकाल्न लागेको योजना थाहापाएपछि शालु आफैँले कान्छीलाई निकालिन्‌ । कान्छी गएपछि कति दिनसम्मशालुले राम्रोसँग खाना खाइनन्‌ । आजभोलि भने उनको अनुहारमा अलिकचमक छ याद गरेकी छ्यौ ? त्यौ चमक तिग्रो र मेरो कारणले होइन,कान्छीको कारणले आएको हुनुपर्छ । कान्छी गएदेखि शालुले न मीठो खानाखाएकी छिन्‌ न समयमै खाता खाएकी छिन्‌ । फूल भनेपछि हुरुक्क हुने शालुलेन बगैँचा सुन्दर देख्न पाएकी छिन्‌ । त्यति हुँदा पनि उनी खुसी छिन्‌ । आखिरकिन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“भो-भो चुप लागिस्यो हजुर, नशाको सुरमा जे पनि भनिसिन्छ । हजुरकोकुरा सुनेर त मेरो टाउको फुट्ला जस्तो भयो । अब एक पेग नवपी निद्वानपर्ला जस्तो छ । उमिलाले वाइन खन्याएर गिलासमा हालिन्‌ । पानी पनिनथपी वाइन्‌ घट्घटी पिएर सुतिन्‌ । दीपकले पनि सिसीमै ठाडो घाँटी पारेरघट्घद्‌ वाइन पिई सुते । शालुको आँखामा दिदी, त्यो अबौध शिशु र सबैकोहर्षित अनुहार नाचिरहयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बार्ह==&lt;br /&gt;
लौ, यो युवकले बिहानै-बिहानै पिएर आएछ क्यार, क झुल्न पो लाग्यो ।अर्कोले कुरा थप्यो, &#039;कहाँ पिएको हुनु, यो र म सँगै लगनखेलमा बस चढेकाहौँ । कुसुन्तीसम्म आउँदा ठीक नै थियो, अहिले पो &#039;झुल्दैछन्‌ । अर्को यात्रुलेठूलो स्वरमा भने, &#039;ए ड्राइभर बस रोक कहाँ यो छारे रोगीलाई बसमाहालेको ? म &amp;quot;झर्छु । मलाई छारे रोग सार्नुछैन ।&#039; सबै यात्रुले एक्कै स्वरमाचिच्याए, &#039;हो ... हो, बस रोक कस्तो वेसाइतमा हिँडिएछ । छारे रोगी चढेकोबसमा । वस रोकेर ड्वाइभर र कन्डक्टरले केही बौल्न नपाउँदै सबै फुतफुतबसबाट ओलेर हिँडे । त्यही बसमा आएकी रोहिणी हेरेको हेरै भइन्‌ । रोहिणीलेहतारहतार &#039;फुल्दै गरेको युवकलाई समातेर भनिन्‌, &#039;द्वाइभर साप छिटो हस्पिटलहिँड्नोस्‌ न । तपाईंलाई जति पैसा चाहिन्छ म दिन्छु ।&#039; रोहिणीको कुरा सुनेरड्राइभरले केही खुसीको स्वरमा भन्यो, &#039;हुन्छ हजुर यहाँबाट नजिक वीर अस्पतालैहोला त्यही जाँ है ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले स्वीकृति दिइन्‌ तर युवक मुर्दाझै भएपछि रोहिणीको सातोपुत्लोगयो । ड्राइभर र कन्डक्टर दुवै डराए । ड्राइभरले रोहिणीलाई केही सान्त्वनादिँदै भन्यो, &#039;बहिनी नडराउनुहोस्‌ । यो केटो मूर्छौ मात्रै परेको हो । मरेकैचाहिँछैन । रोहिणी र कन्डक्टरले दुईतिरबाट च्याप्प समातेर वीर हस्पिटल पुन्याईइमर्जेन्सीमा लगै । डाक्टरले जाँच गरेर स्लाइनपानी चढाए । घोरै स्लाइनपानीसकिएपछि युवकले आँखा खोले ।&lt;br /&gt;
ड्वाइभरले झिनो स्वरमा भने, &#039;अब यो युवक मर्दैन । हामी जान्छौं पनि,तपाईंको इच्छाले जति पैसा दिए पनि हामी खुसी हुन्छौं । पैसा छैन भने नदिएपन्ति हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले पर्स खोल्दै भनिन्‌, &#039;तपाईंहरूले ठूलो सहयोग गर्नुभयो त्यसकालागि धन्यवाद, डाक्टरलाई पनि दिनुपर्छ होला, सय लिनोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
ड्राइभरले पैसा समाउँदै भन्यो, &#039;मैले त यति पैसाको आश नै गरेको थिइनँ ।तपाइँलाई पनि धन्यवाद जान्छौं पनि ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीले मुन्टो हल्लाएर ड्राइभर र कन्डक्टरलाई विदा गरिन्‌ । अब के गर्ने,के नगर्ने भन्ने सोचेर उभिइरहेकी थिइन्‌ । सिस्टरलै शालु नजिक आएर भनिन्‌,&#039;तपाईंलाई डाक्टरले बोलाउनुभएको छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणी सिस्टरपछि लागेर इमर्जेन्सीमा पुगिन्‌ । डाक्टरले रौहिणीतिर हेर्दैभने, &#039;तपाईंले अब बिरामीलाई घर लगे हुन्छ । उहाँ ब्लडप्रेसर लौ भएर मूर्छापर्नुभएको रहेछ । अहिले अनारको जुस ल्याएर खान दिनुहोस्‌, घरमा लगेरहड्डीको सुप, मुगुको सुप, खसीको खुड्डाको सुप प्रशस्त दिनु होला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टरको कराले रोहिणी र युवक रातो न पिरो भए । युवकले केही वोल्ननपाउँदै रोहिणीले भनिन्‌, “तपाईं बस्दै गर्नोस्‌ म अनारको जुस लिएर आउँछु ।त्यसपछि घर जाउँला ।&#039; रौहिणी बाहिर निस्केर गएपछि काउन्टरमा पैसातिरिन्‌ र अनारको जुर लिएर आई युवकतिर बढाउँदै भनिन्‌, &#039;क्‌पया जुसपिउनोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युवकले जुस समातेर रोहिणीतिर हेर्दै भन्यो, &#039;धन्यवाद, मलाई चक्करलागेकोसम्म केही याद छ त्यसपछि के भयो पत्तै पाइनँ । तपाईंले यहाँल्याउनुभएको रहेछ नत्र म मैं होला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;सानो सहयोग गरेकी हुँ, बढी केही गरेकी छैन । जुस पिउनुहोस्‌ अनि मतपाईंको घरसम्म छोडिदिन्छु । स्वास्थ्यकोचाहिँ अलि ख्याल राख्नु होला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युवकले अप्ठ्यारो मान्दै भने, “तपाईँले मेरा लागि यति घेरै कष्टउठाउनुभएकोमा धेरै-धेरै धन्यवाद, अब म आफैँ जान सक्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
“फेरि बाटोमा केही भयो भने गाह्रो होला, घरसम्म पुच्याइदिएँ भने मलाईपति सन्तोष हुन्छ, कुरा त्यति मात्र हो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीको कुरा सुनेर युवक अनकनाउँदै उठे । दुवै वीर हस्पिटलको गैटबाहिरपुगेपछि रोहिणीले दयाक्सी रोकिन्‌ । ट्याक्सी गुद्धयो । द्याम्सी गुडेको केहीसमयपछि युवकले झिनो स्वरमा भने, “मेरो नाम प्रशन्न हो । घर खोटाङ, यहाँपढ्न बसेको हुँ । आईएस्सी सिद्धिएको पति दुई वर्ष भयो, इन्जितियर पढ्नजानका लागि कोसिस गर्दैछु । दुईपल्ट प्लान जान नाम निकालेको पनि हुँ, तरइन्टरभ्युमा फरयाँकिएँ । घरमा आमा मात्र हनुहुन्छ, बाबु सानैमा हामीलाईछोडेर मुग्लान पस्नुभयो । घरबाट खेत बेचेर आमाले यतिसम्म त पढाउनुभयो ।तर, मैले केही गर्ने सकिनँ&#039; भन्दै युवकले गहभरि आँसु पारे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले सम्झाइन्‌, “भैगो पीर तगर्तोस्‌ । कोसिस गरेपछि एक दिन न एकदिन सफल भइहालिन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युवकले आँखाको आँस्‌ पुछ्दै भने, &#039;रोहिणीजी पेटले खान नमागे त ठिकैथियो, खान माग्छ । उता आमाले पति अर्काको काम गर्दै पेट पाल्नुभएको छ ।जागिर खाउँ कसैले जागिर दिँदैनन्‌ । जहाँ पनि आफनै मान्छै चाहिन्छ, यहाँआफूनो मान्छे कोही छैन । मान्छे रहरले होइन बाध्यताले चोर बन्दोरहेछ ।बुझनु भो बाध्यताले ... । मैले खाना नखाएको तीन छाक भयो । म पनि चोर्छुर पेट भर्छु यही सोचेर बस चढेको बेहोस पो भएँछु ।&#039; रोहिणीलाई प्रशन्नकोकरा कथाजस्तै लाग्यो । रोहिणीले शिर उठाएर प्रशन्नतिर हेरिन्‌ । निन्याउरोअनुहार, जिङ्ग्रिङ परेको कपाल, मैलो सर्ट, चप्पल, अहँ पटक्कै पढेझौँ देखिँदैनथेप्रशन्न । रोहिणीले मतमनै सोचिन्‌- मैले अबश्य यो युवकको उद्धार गर्नुपर्छ ।नत्र म जन्मनुको कूनै अर्थ नै रहँदैन । उफ ! के सोचेकी होला मैले, कतै यिनैसँग प्रेम बस्यौ भने मैरो जिन्दगी वर्वाद हुन्छ । वास्तवमै प्रेम गर्नेहरू कतित डुन्छन्‌ भन्थिन्‌ शालु । म डुवेँ भने मेरो ममीवावाको सपना चकनाचुरहुन्छ । सायद म यिनको प्रेमले गर्दा यहाँसम्म आएकी त होइन ?) उफ्‌! यो केभयो मलाई ? अब म डुब्न त डुब्दितँ ? यदि मैले प्रशन्तलाई प्रेम नगर्ने भएमझघारमा नै छोड्नुपर्छ । के म प्रशन्नलाई मझघारमै छौडूँ । अब म के गरौं ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन के सोच्नुभएको रोहिणीजी, तपाइँजस्ता सहर-बजारमा जन्मेकोमान्छेलाई पीडा ओकलेर भूल गरेँ, माफ गर्नोस्‌ । तपाईंले मेरो कुराको विश्वासगर्नुभएन जस्तो छ । मेरो डेरामा पुगेपछि आफ्नै आँखाले मेरो गरिवी हेरेरफर्कनुहोला । सक्नुहुन्छ भने खोटाडसम्म पुग्ने गाडी भाडा दिनोस्‌, म भोलि नैयो सहर छोड्छु र गाउँ गएर मेलापात गरी पेटभरि खोले भए पनि खान्छ ।अब इन्जिनियर बन्नै सपना देख्न छौडिसकें मैले । मलाई पेटभरि खोले भएपुग्छ खोले ... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;सहरमा वस्नेहरूको दिल नै हुँदैन भन्नेचाहिँ नसम्झनोस्‌ । मैले तपाईंकोकुरालाई विश्वास गरेकी छु । तपाईं भोकले नै ढल्नुभयो, त्यो पनि प्रत्यक्ष देखेरैयहाँसम्म आएकी हुँ । तपाईँ आवेशमा आएर गाउँ जान्छु भन्दै हुनुहुन्छ ।त्योचाहिँ मलाई त्यति ठीक लागेन । म आफनोतर्फबाट सक्दो सहयोग गरौँला,त्यसलाई नराम्रो नठान्नु होला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुरा गर्दागर्दै प्रशन्नको डेरा पनि आयो । द्याक्सीबाट दुवै ओर्लेर कोठाभित्रपसे । त्यो कोठाको अवस्था देखेर रोहिणीको हृदय छियाछिया भयो । कोठाकोभित्तामा झुन्ड्याएको थोत्रो र मैलो दुईवटा सर्ट । सानो पलङ, पलङमाथि गुन्द्रीर कपडाको सानौ डसना, च्यातिएर तीनचार ठाउँमा सिएको तन्ना र थोत्रोकम्बल । पलङभन्दा थोरै पर सानो स्टोभ, थोत्रो दुईवटा डेक्वी, एउटा थाल,एउटा पत्त्यौं, एउटा बाल्टिन र थोत्रो कप । केही गेडा उर्मिएको आलु । पलङकोसिरानपट्टि &#039;भुइँमा मिलाएर राखिएको किताबको चाङ । अँध्यारो र कालो भित्ताभएको कोठा दक्षिणपट्टिको भगयालबाट छिरेको थोरै उज्यालो । ती सबै दृश्यदेखेर राहिणीको आँखाबाट आँसुमात्र फर्न सकेन । रोहिणीले आफनो घरमात्यसै रहेको दुईवटा कोठा सम्झिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्न बोल्न सकेनन्‌, आँखाबाट आँसु मात्र झरिरहे । रोहिणीले मन बाँधेरभनिन्‌, &#039;प्रशन्नजी तपाईँ जस्तो अनन्त उडान लिएको मान्छे पनि रुने हो?तपाईंले कमाएपछि मलाई ब्याजसहित यौ पैसा दिनुहोला, अहिले मसँग भएकोपाँच सय राख्नोस्‌ । म ममी-बाबासँग कुरा गरेर तपाईंका लागि कै गर्नसकिन्छ सोधौँला र चाँडै निर्णय दिउँला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्नले आबेशमा आएर रोहिणीको खुट्टा समाउँदै भने, &#039;म तपाईंको गुणकहिल्यै बिर्सने छैन । म त पोख्छी नै सकेको थिएँ तपाईँले उठाउनुभयो,तपाईंलाई म के भनौं ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले खुट्टा सादै भनिन्‌, &#039;मैगो नरुनोस्‌ वरु केही किनेर खाइहाल्नोस्‌ ।अहिलेलाई म गएँ ।&#039; रोहिणी प्रशन्तको कोठाबाट निस्केर घरतिर आइन्‌ ।प्रशन्नलाई रोहिणीको खुट्टा छोएकोमा कुनै पछुतो लागेन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनले त रोहिणीजस्ती पुवती जीवनमा पहिलोपल्ट नै देखेका थिए । प्रशन्नकाआफन्तहरू प्रशन्नले देखे भने पैसा माग्छ कि भनी टाढैबाट भाग्थै । युवतीहरूप्रशन्नसँग पन्छिएर हिंँद्दथै । प्रशन्नका कुनै साथीहरू थिएनन्‌ । प्रशन्नले यत्रोठूलो सहरमा आफनो मर्म बुझने एक मात्र युवती रोहिणी भेटेका थिए ।रोहिणी प्रशन्नका लागि साक्षात्‌ देवीसरह थिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणी मनमा नाना तर्क-वितर्क खेलाउँदै घरमा पुगिन्‌ । आँखामा प्रशन्तकोदयनीय अवस्था, उनको निर्बौध आँखाहरू र बान्की परेको अनुहार नै नाचिरहयो ।रोहिणीलाई केही खान मन लागेन, उनी धुमधुम्ती कोठामै बसिरहिन्‌ । पीताम्बरालेरोहिणीको कोठामा पस्दै भनिन्‌, &#039;वीरु र सौजनलाई कस्तो कपडा ल्यायौ :पैसा त पुग्यो ?&#039; रोहिणीले जस्ताको तस्तै प्रशन्नको सबै घटना आमालाईसुनाइन्‌ । पीताम्बराले भनिन्‌, &#039;आज पैसा लगेको ढीक भएछ । कपडा त भौलिकिने पनि हुन्छ । दुःख पर्दा सहयोग गर्नु हामी सबैको कर्तव्य हो । तर, उतलाईघरमा नै राख्नु त्यति राम्रो त नहोला । म तिम्री बाबासँग सौध्छु, उहाँले केभन्नुहुन्छ । छौरा-बुहारीको पनि सल्लाह लिनुपन्यौ । तिम्रो बावालाई बाहिरकोमान्छे घरमा बसेको मन नपर्ने भएर त तला नबढाएको तिमीलाई थाहा नैछ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रौहिणी आमाको कूरा सुनेर चुप भइन्‌ । पीताम्बरा कोठाबाट निस्किन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हेलौ ! रोहिणी तँ किन क्याम्पस नआएकी ? त्यहाँ सबैलाई सञ्चै त छहोइन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“सबैलाई सञ्चै छ, शालु पीर नगर । मलाई आज टाउको दुखेर पढ्ननआएकी हुँ । पढाइ राम्रै भयो त ?&#039;“अं राम्रै भयो, अहिले कस्तो छ तँलाई ? भोलि आउँछेस्‌ क्याम्पस ?&#039;&#039;अहिले ठीकै छ भोलि आउँछ ।&#039;र हसतिला सम्झना नमस्कार भनी दै है। ल बाई ।&#039; भन्दै शालुले फोनराखिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ बाई भन्दै रोहिणीले पनि फोन राखिन्‌ । शालुसँग वास्तविकता ढाँद्दारोहिणीलाई तरमाइली त लाग्यो नै । रोहिणीले शालुलाई सत्य नभन्नुको एउटैकारण थियो । रोहिणी प्रशन्नलाई केही माया गर्न लागिसकेकी थिइन्‌ । शालुभने प्रेम गर्नेलाई त्यति राम्रो ठान्दैनथिन्‌ ।&lt;br /&gt;
रोहिणीले नचाही-तचाही थोरै खाता खाइन्‌ । र, टेबुलमा बसेर किलाब पल्टाइन्‌ पत्ति तर आँखामा प्रशन्न नै झल्झली आइरहे । उनी किताव बन्दगरेर औछ्लयानमा पल्टिइन्‌ । प्रशन्नको बारेमा सोच्दासोच्दै धेरैबेर पछि निद्रापन्यो रोहिणीलाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==तेर्ह==&lt;br /&gt;
&#039;ल बास्सा ट्रायल भन्दै उर्मिलाले तास फ्याँकिन्‌ । उमाले मुख बिगारदैभनिन्‌- कलर त मलाई पनि परेको थियो । प्रतीक्षाले भनिन्‌- दुक्की जुट तमलाई पनि परेको थियो । दुक्कीले कहिल्यै छोडेन । मेरा दहल टप सिन्धुलेहाँस्दै तास फ्याँकिन्‌ । सिन्धुलाई त मैले जितेकी रहिछु । मेरो मिस्सी टप भन्दैशोभाले पति तास फ्याँकिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले तास फिददै भनिन्‌, &#039;सबैँ फरास मात्र कति खेल्नु ?) घरु यसोकलब्रेक खेलौं न, कलब्गेकमा समय गएको पत्तै पाइन्त । पैसा पनि ढिलैजान्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिन्धुले रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;पहिलो हात पैसा सोरेर पनि नानाथरी कुरानगर । थपक्क बाँड ल प्रतीक्षा तास काट । कलब्रेकमा दुई ग्रुप बन्नुपर्छ । फेरिझन्झट खेल । बरु चल्ती फरास खेल्नै भएचाहिँ ओके !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कति दिनमा बल्ल एक हात खाएकी छ्‌ । नत्र पैसा स्वाहा गन्यो, हिँड्यो ।तिम्रौ जस्तो एक्का टप भए पनि चल्ती फरास खेल्ने साहस भए पो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिन्धु &#039;मैले एक्का टपमा चल्ती फरास खेले । गंगाले दहल टपमा ल चल्तीफरास खेल्छु भनी सुरिएकी बिर्सैक !&#039; हामीले बूढ्धीलाई एक्का टायल नै परेछकि भन्दै डराएर प्याक गन्यौं आखिर बूढीको त दहल टप पो रहेछ । त्यो दिनबडा मज्जाले हँसाइन्‌ गंगाले । साँच्चि गंगाको बूढाबढी नै एक्कासि बेपत्ताभए । न घरको फोनै उठ्छ । किन एकाएक सम्पर्कमा आउन छौडे ? आजकालसबै ठाउँमा बाबुको प्रतिनिधित्व पनि फिरोजले नै गर्छ । त्यो मोरोसँग सोधौँभने त्यसका आसेपासे गुलियोमा कमिला टाँसिएझैं टाँसिइरहेका हुन्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शोभाले लामो श्वास फेर्दै भनिन्‌, &#039;अब गंगाको कुरै नगरे पनि हुन्छ । उनीत अर्कै जन्म लिएझैँ फेरिइछिन्‌ । म अस्ति उनको घरको बाटो परेकोले यसोपसैकी त उनको फतौरे क्रा सुनेर कहिले उनलाई छोडेर भागौं जस्तो भएँ ।कर दुस्सासा व्लाएर रूभै सिद्धेछ । रुँदै भन्दै थिइन्‌, &#039;शोभा हामीले हिँड्नै जानेकाउन । हामीले छौराछोरीलाई सही बाटो देखाइदिएनौँ । हेर, बेलैमा विचारगर, तिमीहरूका छोराछोरी पनि फिरोजझैं तहस-नहस होलान्‌ । फिरौजलाईराम्रो संस्कार दिन नसक्ने हामी नै हौं । हामीले नै उसलाई चक्रब्युहमाफसायौँ । त्यही पश्चात्तापले हामी मर्दो न बाँच्दो भएका छौं । खोई के-के हुन्‌, हन्‌ तिनका करा । म त तिनको त्यो परिवर्तत देखेर महाअचम्म परेँ । तिनकोकुरा सुन्दा-सुन्दा झयाउ लागेर फुत्त निस्केर हिँडे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“बूढी भए पनि भर्खर यौवन चढेको युवतीझैँ गर्थिन्‌ । फेरि मेकअप गर्नेदेखिलिएर पिउन, खेल्न जैमा पनि खप्पीस थिइन्‌ । ठट्यौली पनि कति जानेकी,एकछिन मुख बिसाउन दिन्थिनन्‌ । उनमा कतै परिवर्तन आउला भन्नै त मैलेसोचेकीसम्म पनि थिइनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“साँच्चै उनी परिवर्तन भएकी नै हुन्‌ त&#039;, सिन्धुले सोधिन्‌ । उमाले तासदेखाउँदै भनिन्‌, &#039;यो हात मैले खाएजस्तो छ सत्ता, अट्टा, नहल, रन छ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हो-हो तिमीले नै खायौ,&#039; सबैले एक्कै स्वरमा भने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डमालै तास फिट्दै भनिन्‌, &#039;शोभाले भनेको कुरा ठीक हो, मैले पनिगंगालाई भेटेकी थिएँ । उनी त हावा खुस्केझैँ भएकी छिन्‌ । त्यो भर्भराउँदोअनुहार कहाँ गयो होला ? उनी आफूमाथि प्रलय पन्यो भन्दै थिइन्‌ । शोभालेभनेको ठीक हो, म पनि उनको कुरा सुनेर वाक्कैदिक्कै परेँ । हामीलाई सहीबाटोमा हिँड भनेर अर्ती दिन्थिन्‌ । हामीले तिनलाई आङ नानी भनेर डाकेकोहोइन क्यारे । दुई दिनको जिन्दगीमा पनि रमाइलो नगरे कहिले रमाइलो गर्नुभनेर उक्साउने तिनै हन्‌ । हामीले आफनो मर्यादा कहाँ छोडेका छौं त : यसोरमाइलो गर्न एक, दुई पेग लगाइन्छ । तिनी नै सित्तै खान पाएपछि त कम्ताखान्थिनन्‌ ? सेकुवाले त तिनको पेट कहिल्यै भरिन्यैन । मेरो श्रीमान्ले अझैभन्दै हुनुहुन्छ- उमा म त गंगाले सेकुवा खाएको देखेर छक्कै परे, अहिले बडोअर्ती दिन्छिन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;उनले असहय पीडा भएरै त पोख्न खोजिन्‌ होला । यो काठमाडौँमायुवतीहरू पति असित्ता बर्षेझैँ वर्षेका छन्‌ । फिरोजजस्तो सुन्दर हुने-खानेकोछोरो पाएपछि युवतीहरूलाई कै चाहियो ? उसको एक नजर परेपछि युवतीहरूआगोमा 0000 पग्लन्छन्‌ । उसको डान्स र हाउभाउ देखेपछि आफ्नैजीउत हुन्छ&#039; उर्मिलाले उत्तर दिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शोभाले कुरा थपिन्‌, &#039;कुरा त ठीकै हो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उमाले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;लौ अब पेग पनि लगाक छिटो जानुछ । लन्डनबाटबूढाका साथीहरू आउँछन्‌ रे ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;तिमरो बूढा गएको बीस, बाईस दिन त भयो होइन ?&#039; शोभाले सोधिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“लन्डनमा आफनै मान्छैहरू भएकोले के-कसौ गरी पच्चीस दिनकारिसक्नुभयो&#039; उमाले भनिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;तिम्रो लोग्ने उतै बिवाह गरेर बसे जस्तो छ है उमानव भिस्सा सिद्धिएपछि त्यहाँ बस्न पाइन्थ्यो र ?&#039;&lt;br /&gt;
सिन्धुले उमालाई बिस्तारै पिट्दै भनिन्‌, हेर, उमाले रातोकालो मुख पारेकी ।उफ ! त्यति ठूलो मान्छेले केही मिलाए होला ति ! भैगो पीर नगर ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमीहरूले एउटा सानो करा पायौ भने आकाश-पाताल छुवाउँछौँ । पर्सिआउँदै हुनुहुन्छ । ल खानेकुरा पनि आयो । चिकेन चिल्ली त सिन्धुले बनाएजस्तोछैन है,&#039; उमाले भनिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;चिकेन चिल्ली मात्र हो र यिनलाई त केही पनिबनाउन आउँदैन । वी सब होटलबाट ल्याएकी हुन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिन्धुले उत्तर दिइन्‌, &#039;तिमीलेचाहिँ खुबै मीठो पकाउँछयौँ ? कान्छी गएपछितिम्रो घरमा खाना सबै वर्डकिलासको हुन्छ । किन तिम्रो मन दुखाउनु भनेरचुप लाग्छौं हामी । आइन्दा तिम्रो घरमा पति होटलकै खाना हुनुपर्छ, । थुक्नु ननिल्नुजस्तो खानेकुराले टार्न पाइँदैन नि !&#039;&lt;br /&gt;
सबैले रक्सीको गिलास ढोक्काएर चेस भने । प्रतीक्षाले खिन्न स्वरमाभनिन्‌, &#039;साँच्चै नरिसाक उमिंला कान्छी गएपछि त तिम्रो घर मसानघाटजस्तैभएछ । कान्छीले बत्ताएको सबै खानेकुरा आयातीतभन्दा पनि स्वादिलो हुन्थ्यो ।मलाई त तिम्रो घरमा पस्यो कि झट्ट कान्छीकै झल्को लाग्छ । उसले पकाएकोमृगको सुकुटी सम्झँदा अहिले पति मुखबाट पानी आउँछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;अँ साँच्चै, त्यो मृगको सुकुटीको स्वाद त मैले पनि बिर्सेकी छैन । त्यस्तैबनाउन लाख कोसिस गरेँ, कहाँ बनाउन सक्नु ? जादु नै थियो कान्छीकोहातमा जादु,&#039; शौंभाले पनि कुरा थपिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रतीक्षाले भनिन्‌, &#039;मैगो ! कान्छीको क्रै छोड । उसको चरित्रले गर्दा त होनि उर्मीले निकाल्न बाध्य भएकी नत्र किन निकालिन्थिन्‌ ? सबै खानेक्राहोटलबाट ल्याउने गर्दागर्दै डाडु पन्यौं नै चलाउन बिसिंएला । कहिलेकाहीँयसो मान्छै आउने भनेको दिनमा मात्र भान्सामा पसिन्थ्यो, त्यो पनि छोड्यौँभनै खोई के काम गर्नु ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले हस्कीमा पानी थप्दै भनिन्‌, &#039;मलाई माया गर्ने यही प्रतीक्षा छिन्‌ ।जे-जे भन्छौ भन सहनै पम्यो । सधैँ कान्छी-कान्छी भन्छौँ तिमीहरूको घरमाभएको भए कान्छी दुई दिन टिम्दैनथी होला, मेरो घरमा पन्ध्र-सीह् वर्ष बसीत्यो कम भयो तिमीहरूलाई ? घरलाई नै कोठी सम्झेपछि के गर्नु त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शोभाले प्याच्च भनिन्‌, &#039;अहिले त तिम्रो घरमा काम गर्नेहरू फेर्नुपरेको छैनहोला हगि ?&#039; मोरी थाहा नपाएझै गछयौ । कान्छी र शालुको सम्बन्ध हामीलाईथाहा नभएको हो र ! तोतेबोली नफुटेदेखि नै शालुलाई कसको माया लाग्छभनेर सोध्यो भने दिदीको माया लाग्छ भन्थिन्‌ । त्यही शालुको मायाले अल्झेकीहुन्‌ कान्छी । यदि तिम्रो इशारामा शालु हिँड्ने भए शालु तिम्रोपछि लागेरआउँथिनन्‌ ? बुझने भएदेखि एक दिन शालु पार्टीमा आएकी छिन्‌ ? हेर हाम्राछोराछोरीहरूले कहिले हामीलाई छोड्छन्‌ ?&#039; उर्मिलाले स्वादै हवीस्की तानिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रतीक्षाले शोभातिर हेर्दै भनिन्‌, &#039;यी शोभा, नशा लागेपछि बढी कुरा गर्छिन्‌ । मेरो छोरो पनि त तिमीलाई कसको माया लाग्छ भनेर सोध्यो भनेसाहिँला दाइको माया लाग्छ भन्छ नि ! त्यस्तो सानो क्रालाई लिएर के करागरेकी ? ल उठौँ पनि ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबैले फोनमा आफनो-आफनो ड्राइभरलाई बोलाए । ड्ञाइभर कार लिईआएपछि आ-आफनो घरतर्फ लागे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==चौघ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाई मौसमी, कति लेट गरेकी ? यति ढिलो गर्छर्यौ भन्नै थाहा पाएको भएतिम्रो डेरामा नै आउँदै ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले कारमा बस्दै भनिन्‌- &#039;मैले कहिल्यै ढिलो गरेकी थाहा छ ! बाटोजाम भएपछि कसको के लाग्छ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हेन क्रिन बाटो जाम भएछ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साइकललाई बसले हान्यो भन्थे हो कि होइन पत्तो छैन । तपाईंलाई तकालो चस्माले पनि साह्रै राम्रो पो देखिँदोरहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषले मौसमीको गाला मुसादै भन्यो, &#039;मैगो नफुर्क्याक । तिमीलाई भेटेपछिम चैनले कनै रात निदाउन पाएको छैन, तिमीले त मन मुटु सवै लग्यौ यार! मलाई त आफू रित्तै भएजस्तो लाग्छ । अँ, भन आज कहाँ जाने ? तिमी जहाँभन्छयौ त्यहीँ जान यो ज्यान हाजिर छ।&#039;&lt;br /&gt;
“तपाईँलाई कुरा गर्न कसले सिकाओस्‌ ? यस्ता शव्दहरू मलाई मात्र भन्नेहौ कि अरूलाई पनि भनिन्छ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषले नशालु हाँसो हाँस्दै भन्यो, &#039;कतिपल्ट भनौं जैले तिमीजस्ती अप्सराभेटेकै छैन भनेर । तिमीजस्ती राम्री अर्को भेटेको भएचाहिँ कै भन्थेँ भन्नसक्दिनँ, अव भने मैले मेरा सारा जीवन तिमीलाई न्यौछावर गरिसके । अबमल्हम लगाक या चिथोर तिम्रो जिम्मा । भन यार कता जाने आज पनिनगरकोट नै जाने कि अन्तै ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ त्यतै जाकँ, गाउँमै देखेकाजस्ता डाँडाकाँडा हेरेर अस्तिको जस्तोदुई-चार दिनचाहिँ वस्न सक्दिनँ नि ! भोलि नै फर्कने भए नगरकोट नै ठीकछ । घरमा विवाहको कुराचाहिँ चाँड्धै गर्नोस्‌ है । फेरि छोराछोरी पाइसकैपछिबिबाह गरौँला भन्नुहोला नि ! हाम्रो भेट भएको पनि वर्ष दिन हुन लागिसक्यो ।कति लुकिछिपी एक-अर्कामा हराउनु, विवाह गरे सबैको मुखमा बुझो लाग्थ्यो ।अरूभन्दा पनि त्यो ७014 हाम्रो प्रेम फल हुन्छ भन्ने एकरत्ति पनि विश्वासगरेकी छैन । भन्छै &amp;quot; तिमीले आफनो अस्तित्वलाई बिकाउन नहुने थियो वुझयौ !&#039; उसको कुरा सुनेर म छक्क परेँ । उसले हामीवीचको सम्बन्धकसरी थाहा पाई ? मैले उषासंग तपाईँसँग कसरी भेट भयो भन्ने मात्र कुरागरेकी थिएँ । उषाले नै शालुसँग क्रा गरेकी हुनुपर्छ । उषा पनि कम्ता डारेछैन । रोहिणी भने आजकाल प्रेमको सपोर्ट गर्छिन्‌ । रोहिणीले शालुसँग हाम्रोभेटलाई आकस्मिक घटना नै हो भनेर जिह्री गरिन्‌ । शालु भन्दै थिई- त्योआकस्मिक घटना होइन, मौसमीलाई जानी-जानी त्यो युवकले धक्का दिएकोहो । मौसमी लडेपछि मौसमीलाई उठाएर कारमा लग्यो होला, माफ माग्यो होलाअनि यिनीहरूको प्रेमप्रसङ्घग सुरु भयो होला, ल हो कि होइन भन मौसमी ! मउसको कुरा सुनेर तीनछक्क परेँ । वास्तवमा हाम्रो प्रेमप्रसङ्ग त्यसरी नै सुरुभएको थियौ होइन त ? मलाई खासै ठूलो घाउ लागेको थिएन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले भनिन्‌- &#039;शालुले प्रेमसँग खेल्नेहरू मात्र धेरै देखेकी हुनाले यसलाईसबै प्रेम गर्नेहरूसंग घृणा लाग्छ । कुरा पत्ति हो । शालुले तिम्रो नराम्रोचिताएकीचाहिँ पक्कै होइन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले नम्र स्वरमा भनिन्‌, &#039;वास्तवमै प्रेम गर्नेहरू विवाहअगाडि वास्नामारम्दैनन्‌ । योचाहिँ वास्तविकता हो । तिमी अहिले पनि कुमारी नै छ्यौ भनेतिम्रो प्रेम सफल हुन्छ अन्यथा... भन्दै हिँडी । भन्नोस्‌ निमेष तपाईँ झूट होकि, शालु &#039;झुटी हो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषले कोधित स्वरमा भन्यो, &#039;कुनचाहिँ रहिछे त्यौ शालु भन्ने । त्यसलाईबीचवाटोमा तमासा गरिदिन्छु, अनि खान्छे । हेर, सबै मान्छेको कुनै न कुनैशात्रु हुन्छन्‌ । क तिम्रो गरु हो । तिमी गाउँबाट आएकी मान्छेले काठमाडौंमैघर भएको कार भएको केटा पाउँदा त्यसलाई जलन भयो हौला । त्यस्ताकोकुरामा होइन मैयाँ, मेरो कुरामा विश्वास गर । मबाट धौका हुँदैन भनेपछिहँदैन ।&#039; निमेषले कारको ब्रेक लगाएर मौसमीलाई चुप्पा खायो र फेरि कारगुडायौ । मौसमीले निमेषलाई समातेर पसुुतक [कक म्‌स्क्राई । कार गन्तव्य भेट्नगुडेकै थियो । मौसमीले धेरैबेर मौन रहेपछि भनी, &#039;मलाई डक्टर बन्नु भनेरछोडेर गएका थिए बावुले, मैले भाग्यले तपाइँलाई भेटेँ । बाबु तपाईंजस्तोज्वाइँ पाउँदा घेरै खुसी हुनुहुन्छ । तपाईंको बानु-आमाले मलाई के भन्नेहोला ? हुन त मेरो बुबाले मेरो खुसीका लागि माझपाटोमा घरवारी सबै बेच्नसन्नुहुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषले हाँस्दै भन्यो, &#039;त्यो क्रा तिमीले धन्दा नै नमान । तिम्रोतर्फबाटसम्पूर्ण खर्च म नै गरौंला । म पनि काठमाडौंबाहिरकै भएको हुँदा तिम्रो पीडाबुमाख। पहिला हामीलै पनि त्यही खोले सिस्नो त खाएका हौं नि ! बाबुले काठमाडौंमा &#039;फरेर घरजग्गाको कारोबार गर्नुभएकोले तिमीलाई कारमा हुइँम्याउन पाएको छु । यही कारले गर्दा त तिमी पनि मसँग छ्यौ नत्र तिमीलेमलाई के गन्धेक ! होइन भन त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;उफ ! फेरि त्यही करा । हजुरको कारले गर्दा होइन महाशय, हजुरकोमायाले गदा आफलाई सम्पेकी ह । मत्त पराउन त गाउँदेखि यौ सहरसम्ममलाई मन नपाउने मान्छे छैन भने पनि हुन्छ ।&#039; हाम्रो क्याम्पसमा एउटाआकाश भन्ने केटो छ क भने कुनै केटीको रूप नै हेर्दैन । तपाईंले पनिमेरोबाहेक अरूको रूप नहेरे हुन्थ्यो नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमेषले हाँस्दै भन्यो, &#039;तिमीचाहिँ कसले मलाई हेर्छ, कसले मलाई हेर्दैनभनी विचार गर्नै रे, मचाहिँ तिम्रो मात्र रूप हेर्नै ? ल बाबा ल अबदेखि अरूकेटीहरूलाई देख्यो भने म आँखा चिम्लेर हिँड्छ, हुन्छ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषको कुराले मौसमी हाँसी मात्र ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषले कुरा बढायो । मैपाँ नेपालमा घम्नै ठाउँज्ञति घुमिसकियो । तिमीएक रातभन्दा दुई रात एउटै ठाउँमा बस्न मान्दिनौ । यसो इण्डियाको दार्जिलिङनैनितालतिर पो जाने हो कि ! घुम्नलाई मौसम पनि ठीक छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले खुसीले बुरुक्क उफ्रंदै भनिन्‌, &#039;हुन्छ त्यसै गरौँला । बरु कहिलेजाने चाँडै कुरा मिलाउनोस्‌ वाबु छाती-छाती के-के दुखेर काठमाडौँ आउँदैछन्‌रे । उनी आएपछि जचाउँदा, रिपोर्ट लिँदा चार-छ दिन लागिहाल्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“त्यसो भए अर्को हप्ता जाउँला । तिमीलाई अरू केही गहनाहरू चाहिन्थ्योकि ? आजकाल गहनाको करै गर्दिनौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
तीच-चार सेट गहनाहरू भइसके के गहनाको कुरा गर्नु : अब सबैगहनाको रहर पुग्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
अब भने मैयाँले पैसा बचाउने भइन्‌ । तिम्रो नाममा दुई-घार रोपनी जग्गाकिनौं भनेको हेरन राम्रो जग्गा नै पाएको छैन । ल जग्गाको करा छोडौं । तिम्रैसौन्दर्यको करा गरौँ । तिमीलाई यो टिसर्टले भन्दा हल्का गुलाबी टिसर्टले अफआकर्षित देखिन्थ्यो । मलाई टाइट फिटिङभन्दा अलि गला खुल्ला भएको कपडामन पर्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वतन्त्र हुन्छयौ कि के हुन्छयौ त्यो त गेस्टहाउसमै गएपछि थाहा होलाप्राण प्यारी । पिउनचाहिँ अहिले नै हल्का पिउने कि बेलुका मात्र त्यो तिम्रोमर्जी । अव नगरकोट पनि आइहाल्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले निमेषलाई हल्का चिमाट्दै भनिन्‌, &#039;पिएपछि तपाईंलाई के हुन्छथाहा नपाएकी हो र ? अस्ति त्यत्रो मान्छेको सामू ........... । रोष्टुराँका सबैमान्छैको आँखा हामीतिरै थियो । म त लाजले पानी-पानी भएँ । मान्छेको सामुकेही भन्नु पनि कसरी ?&#039;&lt;br /&gt;
तिमी गाउँबाट भर्खर आएकीले केही असजिलो लागेको हो । देख्दिनौ,बाटा-घाटामा लिसो टाँसिएझैँ टाँस्सिँदै हिँडेका । अब हात समातेर नहिँद&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चुम्मा-सुम्मा नगरे त पूरा असभ्य ठहरिन्छ । हामी त हुनेवाला श्रीमान्‌-श्रीमतीहौँ । जे-जे गरे पनि चल्छ । प्लिज थोरै पिछ है । वरु बाहिर ननिस्किउँलाहामी गोठालेले नगरकोटको जस्तो दृश्य कति देखेका हौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले निमैषको कुरामा स्वीकृति दिई विल रेस्दुरेन्टाभत्र पसैर पहिलाबस्नै रूमको व्यवस्था मिलाए । अनि खानाका आए । त्यहाँ खाने मौसमीकोजोडी मात्र होइन बैँसको उन्मान्दमा रम्नेहरू अरू तीन जोडी पनि आएकारहेछन्‌ । निमेषले उनीहरूनजिकँ गएर भने, &#039;तपाईँंहरू आज यतै बस्नुहुन्छ किफर्कनुहुन्छ ? कहाँबाट आउनुभएको ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्को गुपको एउटा युवकले भन्यो- &#039;हामी वुटवलदेखि आएका हौँ । एक-दुईदिन मात्रै बस्छौं होला । तपाईंहरू कहाँबाट नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हामी त काठमाडौंबाट आएका हौं । हामी दुईजना मात्र छौं । तपाईंको ग्रुपदेखेर साह्टै रमाइलो लाग्यो र सोधेको हँ ।&#039;&lt;br /&gt;
बुटवलबाट आएको अर्को युवकले भन्यो, &#039;हुन्छ तपाईंहरू पनि हाम्रै ग्रुपमाआउनुहोस्‌ । आखिर हामी सबै अविवाहित नै हौं । हामी सबैको कुरा मिलिहाल्छ ।वस्नोस्‌ कुरा थोरै फरक छ, तपाईंले मुन टिप्नुभएछ, हामीले जून अरू याबत्‌कुराहरू त उस्तै-उस्तै हुन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
निमेषले हात समातेर मौसमीलाई बसाउँदै भने, &#039;महाशय, तपाईँ त कविपो हनुहँदौरहेछ- ल अरू पनि सायरी सुनौँ न ।&#039;&lt;br /&gt;
बुटवलबाट आएको अर्को युवकले मुख बिगार्दै भन्यो, &#039;हेर्नोस्‌ यसको एक-दुई अरू सायरी सुन्नुभयो भने तपाइँ अर्कै रेस्द्रेन्ट जानुहोला । बरु परिचयगरौं खाकँ-पिङँ अनि घुम्न जाकँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबैले आ-आफूनो परिचय दिए । तीन जोडी प्रेमी-प्रमिकाचाहिँ बुटवलक्याम्पसमा नै पढ्ने रहेछन्‌ । कवि युवाको भरपाहि जुलजला [टवल सुब्कानगरमा नैरहेछ भने अरू बुटवलमा डेरा गरी पढ्ने रहेछन्‌ । गर प्रेम परेको छ-सातमहिना त कसैको प्रेम परेको वीस-बाइस दिन मात्र भएको रहेछ । त्यस ग्रुपमामौसमी र निमेषको प्रेम परेको धेरै भएको रहेछ । सबैको कुरा सुनेपछिबुटबलको कविले हात हल्लाउँदै भन्यो-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तपाईंहरू आलि पाको,&lt;br /&gt;
हामी अलि काँचो,&lt;br /&gt;
बिहे गर्नु पहिले नै&lt;br /&gt;
हनिमुन मनाउन आको ।&lt;br /&gt;
हनिमुनपछि डोकौँला&lt;br /&gt;
बिहेको पञ्चे बाजा&lt;br /&gt;
भौक लागेको छ अहिलेचाहिँ&lt;br /&gt;
खाँ मागी खाजा ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बुटवलको कविको कुरा सुनेर सबै मरी-मरी हाँसे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषले हाँस्दै भन्यो, &#039;तपाड्गै त आँसुकवि नै हुनुहुँदौरहेछ, कुत साइतलेहामी सचैको भेट भयौ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बुटबलको कविले फेरि भन्यो, &#039;कालो-कालो सर्ट लाको, नीलो रहेछ पेन्ट ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबैजना उस्तै खुसी हुँदा हाम्रो भेट । ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्कोले हाँस्दै भन्यो, &#039;चुप लाग जप, तिम्रो कविता सुन्दा-सुन्दा वाक्क भएरव्यन्द्राले पनि छोडलिन नि फेरि ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषले हांस्दै भन्यो, &#039;ल .. ल वाहा भयो हामीभन्दा त तपाईहरू नै पाकोहुनुहुँदो रहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जयले हाँस्दै भन्यो, &#039;उनले अन्तै बिहे गरिन्‌ । झन्डै पागल भाको, चन्द्राकोमायाले नै नगरकोट घुम्न आ&#039;को । ल... ल अब यो हँसिमज्ञाक छोडौँ केहीखाकँ । विवाहपछि चन्द्राले कवि बन्तोस्‌ भनिन्‌ भने म अवश्य कवि बन्छु ।यति भनी जयले ओठ बन्द गौ ।&lt;br /&gt;
अर्कोलै भन्यौ, &#039;भो ... भो कवि हुने सपना नदेख । फेरि भएको घरखेतजाला र चन्द्राको बिजोक होला । यो जमानामा कबिलाई कसले मान्ने ? हेरमति विग्रैर कवि भयो भन्छन्‌ । खेत बेचेर कबिता छपायो भन्छन्‌ । अलि..अलितिमी कबिचाहिँ हौ । तर आइन्दा कविता लेख्ने भूलचाहिँ नगर है । बरु खेतकोगड्दा किन, घरको तला थप कविचाहिँ नबन । यो राष्ट्रले साहित्यको मूल्यबुझ्दैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जय- &amp;quot;ले ... ल अब कवि र कविताको कुरा छोडौं । पेटको क्रा गरौं ।अहिलै तातो-चिसौ केही पिउने कि नपिउने ? मेरी चन्द्राचाहिँ पिउँदिनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषले हाँस्दै भन्यो, &#039;हेर-हेर अहिलेदेखि अधिकार जमाएको यो त भएतहर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो-हो यौ भएन भन्दै सबैले एवकै स्वरमा भने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्राले भनिन्‌, &#039;मेरो अलि पिउने वानी छैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबैले भने, &#039;थोरै त पिउनैपर्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;चन्द्राले सबैको कुरालाई स्वीक्कार गरिन्‌, केटाहरू बाईस-चौबीस वर्षका रकेटीहरू अठार, बीस वर्षजतिका थिए । भोलिलाई बिर्सेर सबै नशामा र एक-अर्काको अङ्गालोमा रमाइरहेका थिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बैटरले मनमनै सोच्यो- &#039;कठै ! कहिलेसम्म धानको वालामा चराले वयलीखेलेजस्तै एक-अर्कांसँग खेलेका छन्‌ तर यी केटीहरूको जिन्दगी चाँडै टुक्रिनेछ। मैले थाहा पाएर पनि के गर्नु ? यी युवतीहरूको बृद्धिमा कीरा परेपछि ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पन्ध्र==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रौहिणीतिर हेर्दै भनिन्‌, &#039;रोहिणी तिमीले आजकाल पढाइमा त्यतिध्यान दिएजस्तो लाग्दैन मलाई । तिमीले त तपस्या गरेरै बाबु-आमा पाएकीछयौ । उनीहरूको सपना साकार गर्नुपर्छ नि । हामी जहाँ डाक्टर पढे पति सँगैपढ्ने है ? दिदीको अन्तिम इच्छा पनि त्यही छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले उत्तर दिइन, &#039;पढ्नै कोसिस त गर्दैछु । मलाई डाक्टर बन्छु जस्तोलाग्दैन । किताब पल्टाउँछु मलाई त चक्कर नै लागेर आउँछ । ल पढाइकोकुरा छोड, आशाको कुरा गर, आशाले प्रेम गरेको क्रा याहा पाउँदा-पाउँदैतिमीले उनको प्रेममा त कुनै प्रतिक्रिया नै जनाइनौ नि ! अबचाहिँ तिमीलेअरूको भविष्यको चिन्ता गर्न छोडिछयौ, रामै लाग्यौ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले गम्भीर भएर भनिन्‌, &#039;रोहिणी तिमी पनि, मैले यहाँ सच्चा प्रेमगर्नेहरू छँदै छैनन्‌ भनेकी कहाँ छु र ? सच्चा प्रेम गर्नेहरू हिजी थिए । आजपनि छन्‌, भोलि पनि हुनैछन्‌ । म प्रेमकै विरोधीचाहिँ होइन । आशक्त अङ्गालोमाप्रेमभन्दा वास्ना वढी हुन्छ भन्न खोजेकी मात्र हुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;प्रेम मात्र भयो वास्ता नै भएन भने पनि जीवन तहसनहस हुन्छ होइन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“रोहिणी, तिमीले मेरो क्राको आसय नै बुझिनौ । विवाहपछि सुखानुभूतिकालागि सबै चाहिन्छ । मैले बिवाहपछिको त कुरै गरेकी छैन । विबाहअगाडिकुमारीत्व नगुमाउन्‌, मेरो सोचाइ यति मात्र हो । तिमीले आशाको प्रेमको कुरागा्यौ। आशाको प्रेम फूल र भमराको जस्तो प्रेम होइन, मलाई थाहा छउनीहरूको प्रेम सफल पनि हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणी शालुको कुराले हर्षित भइन्‌ । तर, रोहिणीलाई आफू र प्रशन्तवीचकोकुरा शालुलाई भन्नै आँट नै आएन । रोहिणी शालुसँग बिदा भएर क्याम्पसबाटघर आइन्‌ । कौठामा पसेर सोचिरहिन्‌- &#039;शालुले भनेको क्रा ठीक हो । विवाहपहिला नै कमारीत्व गुमाएपछि सुहागरात्तको त महत्व नै रहेन । रौहिणीलैप्रशन्तको सम्झनामा डुबुल्की मारिन्‌, प्रशन्न थुप्रैपन्टको भैटमा पनि आफूसँगबोल्न डराउँथै । हृदपभरि प्रेम भएर पनि पोख्न धक मान्थे । मैले तपाईंबिनाबाँच्न सक्दिन भनेपछि बल्ल हर्षको आँसु झारे । त्यो क्षण हिजोजस्तै लाग्छ तरमहिनौँ भएछ । शालुको हृदयमा कसैले बास नगरेको भएर नै क पढ्न सम्छै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर म कसरी पढौं : जव किताव-कपि खोल्छु म प्रत्येक अक्षर- अक्षरहरूमाकेवल प्रशन्नलाई नै देख्छु । ममी र बाबाले प्रशन्नलाई मन नपराउनुभएकोभए सायद म मधे होला । प्रशन्न आफनो असल व्यक्तित्वले गदा सबैकोआँखामा अटाइहाले । उनी पढ्न गए भने म कसरी बाँच्नु ? प्रशन्नको पनि धेरैपढ्ने रहर छ । एक दिन नदेख्दा त मलाई यति छटपटी हन्छ भने वर्षौंसम्मनदेख्दा के गरौँली ? कल्पना गर्दा मात्र पनि रोहिणीको आँसु झन्यो । उनीधेरैबेर रोइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्बराले कोठाभित्र पस्दै भनिन्‌, &#039;वानी कुन बेला आयौ : तिमीलाईभौक-प्यास केही लाग्दैन कि क्या हो ? आजकाल खाना त खोज्दै खोज्दिनौ ।हामीले सवै बुझेका छौं । तिमी प्रशन्न बाबुकै चिन्तामा डुबिरहन्छुयौ । तिमीहरूकोमाया देल्लेर आज बिहान हामी सबैजना बसी एउटा निष्कर्ष निकाल्यौँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;कस्तो निष्कर्ष ममी ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्वराले सोफामा सजिलोसँग वस्दै भनिन्‌, &#039;हेर अहिले नै तिमीहरूकोविवाह गरिदिङँ मने त्यो मिल्ने कुरै भएन । प्रशन्तबाबुले बाहिर पढ्न जानपाङ्चलात्‌ भनेर कुरैर बसौं भनै पाउने हो कि नपाउनै हो । केटाहरूले त जतिवर्षमा विवाह गरे पनि फरक पर्दैन । केटीहरूलाई वाईस-चौबीस वर्ष काटेपछिबूढीकन्या भन्न थाल्छन्‌ । त्यसैले प्रशन्तबाबुलाई चाँडैभन्दा चाँडै पढ्नपठाउनुपत्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले दिक्दार स्वरमा भनिन्‌, &#039;हामीसँग त्यति घैरै पैसा कहाँछत?हामीलाई कसले सापट दिन्छ र !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परीताम्बराले सम्झाइन्‌, &#039;अहिलेलाई पठाउन मात्र कान्छीको घरजग्गा बेचेरआएको पैसा रहेछ । त्यसैले पुगिहाल्छ । हाम्रो कार व्यथैं वन्केको छ । यहीबेचेर पछि चन्द्रकान्तहरूले घर बनाउनेछन्‌ यही सल्लाह भयो । पछि पैसापठाउन त ट्याक्सी चलाएको पैसाले पुगिहाल्छ । त्यसमाथि पेन्सन छँदैछ ।पछि यो घरको चाहिँ तिमीले आश नगर, यो घर रेष्माको हुन्छ । बाँकी चार-छ आना जग्गा फूलबारी र करेसाबारीले ओगटेको छ । त्योचाहिँ हामी मरेपछिजे-जे गछौँ गर । अहिलेसम्मको हाम्रो सौचचाहिँ हामी बूढा-बढी चन्द्रकान्तहरूसँगबस्छौं । उनीहरूको पनि यही इच्छा छ । हेर्दै जाउँ के हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“आमाको कुराले रोहिणी धेरैबेरसम्म मौन रहिन्‌ र भनिन्‌- &#039;तपाईंहरूले जेसोच्नुभयो हामीहरूको भलाइका लागि सोच्नुभयो । म हजुरको कुरामा ज्यादैखुसी छ । दाजु-दिदीदेखि लिएर हामी सबैको जीवन हाँसी-खुसी वितोस्‌ । अरूके नै चाहिन्छ र ।&#039;&lt;br /&gt;
पीताम्बराले भनिन्‌, &#039;हुन्छ त प्रश्नलाई आज यतै खाना खान बोलाक ।कहाँ पढ्न जाने हो उहाँको इच्छा पनि त बुझनुपन्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“साँच्चि प्रशन्तको आमालाई कस्तो छ रे : मैले त सोध्नै विसँछु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अँ ममी, अहिले त राम्रै छ रे, हामीले पठाएको पैसाले घरबारी निखन्तदेखिभैँसी कित्नसम्म पैसा पुग्यो रे । अहिले त प्रशन्तको आमा ज्यादै खुसी हुनुहुन्छरै । हुन्छ त म प्रशन्नजीलाई खाना खान डाक्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;आउनुहोस्‌ प्रशन्नबाबु ! हामी सबै तपाईँको प्रतीक्षामा वसेका थियौँ,&#039;केशवले बडो सभ्य भाषामा भने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्नले सबैलाई नमस्कार गरेर सोफामा बस्दै भने, &#039;सबैलाई सञ्चै छ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केशवले उत्तर दिए, &#039;सञ्चै छ बाबु, आज एउटा सल्लाह गरौं भनेरबाबुलाई बोलाएका हौं । हामी रोहिणीको खुसीलाई आफूनै खुसी मान्छौं ।रोहिणीलगायत हामी सबैको इच्छा छ, तपाईँलाई इन्जिनियर पढ्न पठाउने ।जहाँ पढ्न जाँदा राम्रो हुन्छ त्यहीँ पढ्न जानोस्‌ । हामीले राहिणी अंशभागभनौँ या जे भनौं त्यो तपाईँको पढाइमा लगाउने भयौं । रोहिणीले पनि त्यहीभनिन्‌ । कनै पनि कुराको पहिले नै विचार पुग्याउनु राम्रो हुन्छ, तपाईँ पनिसोच्नोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केशवको कुराले प्रशन्नको आँखाबाट आँसु नभारी छोडेन । प्रशन्नलाईरौहिणीलाई भेट्नु, रोहिणीले प्रेम प्रस्ताव राख्नु सबै सपनाजस्तै लागिरहेकोथियो । पैसा नै लगानी गरेर पढ्ने कुरा त उनले कनै क्षण कत्पनासम्म पनिगरेका थिएनन्‌ । प्रशन्नले आँसु पुछ्दै भने, &#039;खोई म के भनौँ : रोहिणीलाईपाउनु मेरो ठूलो सौभाग्य थियो । यहाँहरूले मजस्तो गरिबलाई यति धेरैविश्वास गर्नुहोला भन्ने सोचेको थिइनँ । इन्जिनियर बन्छु भनेर दिलोज्यानदिएर पढेकै हुँ । आफूभन्दा थोरै पसेन्ट ल्याउनेहरूले जान पाए । आफू भने... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्बराले भनिन्‌, &#039;बाबनु ! हामी मतको गरिबलाई मात्र गरिब भन्छौँ ।हामीसँग पनि कै नै छ र ? बिहान-बैलुका हाँसीहाँसी एक पेट खान पायो भनेत्यो नै सुख हो । त्यो सुखचाहिँ भगवानले हामीलाई दिएकै छ भनौँ । हामीलाईरोहिणी डाक्टर बन्लिन्‌ भन्ने ठूलो आश थियो । हजुरसँग भेट भएदेखि रोहिणीलेखान पढ्न सबै वि्सेकी छिन्‌ । खोई कसरी डाक्टर बन्लिन्‌ उनी ? सबैभन्दाराम्रो कुराचाहिँ हजुर नै चाँडै पढ्न गए हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
आमाको कुराले रोहिणी लाजले निहरिन्‌ । प्रशन्तले पनि केही लजाउँदै भने,“कहाँ पढ्दा राम्रो हुन्छ, सबै कुरा बुझौँला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्तको कुराले सबै खुसी भए । रोहिणीको त झन्‌ खुसीको सीमा नैरहेन । प्रशन्नले पनि आफनो जन्मलाई घन्य ठाने । सबैले हाँसीखुसीका साथखाना खाए । खाना खाएपछि सबैसँग बिदा भएर प्रशन्त आफतो डेरातर्फ लागेभने रोहिणी आफनो कोठातर्फ लागिन्‌ र पलङ्गमा पल्टिन्‌ । आँखामा त्यो क्षणआयो प्रशन्तलाई आफूले नयाँ डेरामा लग्दा प्रशन्नले त्यो घरलाई रोहिणीकै घर सम्झे । त्यो कोठालाई रोहिणीकै कोठा सम्झेर भने, &#039;रोहिणी पति राम्रोकोठा यति राम्रो घर रहेछ । मजस्तो गाउँले यस घरमा आउँदा तिम्रो बाबालेके भन्नुहोला ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले हाँस्दै भनिन्‌, भविष्यको इन्जिनियर साप यो घर मेरो होइन । योतपाईंको डेरा हो । तपाईंले नाइँ-नास्ती गर्नुहोला भन्ने सम्झी हामीले तपाईंलाईनभनी यो सजावट गरेका हौँ । सानो खाना पकाउने किच्नेन भित्र छ । यहाँबसेर पढ्नै, मलाई सम्झने वस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
प्रशन्नले कोठाको वरिपरि आँखा डुलाए । वक्सखाले पलङ, ठूलो खानदानीमानिस सुत्नेजस्ता ओछ्यान, सोफा, मेच, टेबुल काठकै बडौ सुन्दर दराज ।करियकरिव कोठा नै ढाको जत्रो नेपाली गलैँचा ओछ्याएको । अटयाज बाथरुम ।त्यो सबै हेरेर टाउको समात्दै प्रशन्नले भने, &#039;रोहिणी यो के गरेकी तिमीले ?कतिन्जैल यो थारो गाईलाई घाँस हालद्व्यौ ? म कहिलेसम्म तिमीहरूकोआदर्श परिवारलाई दुःख दिकँ !&#039;&lt;br /&gt;
&#039;आँटी छोरालाई बाघले खाँदैन&#039; भन्ने उखान छ नि ! पख्नोस्‌ पछि तपाईंकोकमाई भएपछि म एकएक गरेर सवै पैसा असुलिहाल्छु नि । अहिले भन्ने हाम्रोखुसीका लागि हामीले जे भन्छौँ बिन्ती मानिदितोस्‌ । यो कोठा ममी आफैँलेमान्छे लगाएर खोज्न लगाउनुभएको हो । तपाईं निरास हुनुभयो भने उहाँकोपनि मन दुख्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्न मन थाम्न नसकेर रोए । रोहिणीले लोग्नेमान्छे त्यसरी रोएकोपहिलोपल्ट नै देखेकी थिइन्‌ । रोहिणीलै सम्झाइन्‌, &#039;तपाईंले रुनुपर्ने त करैछैन । म तपाईँका लागि त प्राण नै दिन सक्छु । यदि म छिँडीमा सुतेकी हुन्थेभनै कै तपाईँ मलाई त्यही अवस्थामा छोडनुहुन्थ्यो त ? अबश्य सक्नुहुन्थेन ।मैले तपाईंलाई दुःख पर्दा यति पनि गरिनँ भने प्रेमको अर्थ नै के भयो र ?&#039;&lt;br /&gt;
प्रशन्नले आँस्‌ पुत्छदै भने, &#039;रोहिणी, तिम्रो ममीबाबाले मलाई यति मायागर्नुको पर्छाडि कुनै कारण त अवश्य छ । उहाँहरूको पनि प्रेमविवाह हुनुपर्छ,हो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;त्यो त होइन, क्रा के रहेछ भने मेरो बाबाको मामाधरनजिकै मेरीआमाको माइती रहेछ । मेरो हजुरआमा मरेपछि मेरो हजुरबावबाले सम्पूर्णसम्पत्ति रक्सी र सुन्दरीका लागि स्त्राहा पार्दै जानुभएछ । ममीको चारजनादाजुहरू बिवाह गरेर घर छौडी गएपछि मेरो हजुरबुबाको &#039;झन्‌ मनोमानीचलेछ । रक्सी खान पैसा नभएपछि मेरो हजुरबुबाले बाँचुन्जेल रक्सी खानदिनुपर्ने सर्तमा राधै साहुलाई सत्र बर्षकी ममी दिने कुरा गर्नुभएछ । पचास-पचपन्न वर्षको राधे साहले हुन्छ नभन्ने त कुरै थिएत । हजुरबुबाको सल्लाहमैक एक रात ममीलाई बलात्कार गर्न आएछ । मेरी ममी रोइकराई गर्दै राधे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साहबाट बचेर बाबाको मामाघरमा आउनुभएछ । संजोक मैरो वावा पनि त्यहीदिन मामाघर बज्रबाराही जानुभएको रहेछ । बाबाको हजुरआमाले मेरो ममीकोबारैमा सबै कुरा बताएपछि बाबालाई ममीको धेरै माया लागेछ । त्यही दिनराति नै कसैको कुरा नसुनी ममीले नाइँ जान्त भन्दाभन्दै घिस्याउँदै आफनोघर ल्याउनुभयो रे । घर ल्याएपछि हजुरवा हजुरआमाले माहिलाले हाम्रा नाककाट्यो भनी धेरै चित्त दुखाउनुभयो रे । पछि हजुरवा र हजुरआमालाई ठूलौममीर आन्टीले धैरै हेला गरेपछि हाम्रै ममीवाबासँग आएर बस्नुभयो रे । हजुरबा,हजुरआमाले भनेको म अलिअलि थाहा पाउँछु । उहाँहरू पनि भन्नुहुन्थ्यो- &#039;मनसाचो हुने मान्छे मात्र गरिब हो नाती, पीताम्बरालाई हामीले चिन्न भूल गप्यौँ ।आज पछुतो लाग्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्तले सोधे, &#039;अहिले तिम्रो घरको हजुरबुबा, हजुरआमा, मामाघरकोहजुरबुबा खोई त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;घरको हजुरबा, हजुरआमा म सानौ छँदैमा बित्नुभयो । मामाघरको हजुरबापनि म दस-वाह्र वर्षकी छँदा एकाविहानै रक्सी खाएर आर्यघाटमा नुहाउँछुभनेर जानुभएछ र असार महिनाको उर्लिरहेको आर्यघाटमा पस्नुभएछ । बाढीलेकता पुन्यायो पत्तै भएन रे ! मेरो ममी र बाबाबाट विबाह गरेको पन्ध-सोहबर्षसम्म पति बच्चा नभएपछि हजुरबा, हजुरआमाले बच्चा पाकन्‌ भनेरडाक्टर वैद्य आदिका लागि धेरै पैसा खर्च गर्नुभयो रे । हामी जन्मेपछि उहाँहरूज्यादै खुसी हुनुहुन्थ्यो रै । म जन्मैकै साल बाबा प्रशासन अधिकत हनुभएकोरे, त्यसैले मलाई छोरी भाग्यमानी छै भन्नुहुन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्नले भने, &#039;उहाँहरूको जीवनमा पति दुःख परेकै रहेछ । तिमीलाई चाहिँके भाग्यमानी भन्नु मजस्तो... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;इलम भनेको लाख हो, धन भनेको खाक हो&#039; मेरो बावाममी सधैँ यहीभन्नुहुन्छ । तपाइंको इलम देखेरै तपाईंलाई मन पराउनुभएको हो । धनी तकाठमाडौंमा जति छन्‌ तर इलमी भने कम । मेरो ममीबाबालाई बाबुआमाकोसम्पत्तिमा रजाइँ गर्ने मान्छे त्यति मन पर्दैन ।&#039;&lt;br /&gt;
“मचाहिँ कसको सम्पत्तिमा रजाइँ गर्दैछु ? के म लाछी होइन !?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;फेरि त्यही कुरा, मेहनत गर्दागर्दै नभएपछिकसको के लाग्छ ? हेर्नोस्‌ न म पछि फस्ट क्लास इन्जिनियरकँ श्रीमतीबन्छु।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रशन्नले भने, “रोहिणी, म तिम्रो हर सपना साकार पार्छु । तिम्रो आँखाबाटएक थोपा दुःखको आँसु &#039;फर्न दिन्न । यो मेरो प्रतीज्ञा नै भयौ ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीले प्रशन्तकै कुरा सम्झेर आधा रात बिताइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सोर्ह==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;मौसमी फेरि पनि आउन ढिला गन्यौ, आज पनि जाम थियो कि ;&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले कारमा बसेर लामो सास फेदै भनी, हेर्नोस्‌ न कस्तो बोर हिँड्नैलागेकी थिएँ, बाबु टुप्लुक्क आइपुगे । मलाई र कोठालाई देखेर ज्यादै खुसी हँदैभने, &#039;नानी, राम्रै जागिर पायौँ कि क्या हो ? यो कोठा र तिमी नै नचिनिनेभइछौ । मलाई ज्यादै खुसी लाग्यो, मैले देखेको सपना सबै साकार हुने भयो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले भने, &#039;हो बा राम्रै जागिर पाएकी छु । चाँडै अफिस पुग्नुपर्छ, भाँडाहरूमाभात, तरकारी छ झिकेर खानु, म गएँ, भरे क्रा गरौँला भन्दै फुत्किएर आएँ ।बाबु करौनी, घ्यूको कुरा गर्दै थिए म भरे सुनौला भन्दै टाप कसे । आज हामीकहाँ जाने त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमैषले मुख बिगार्दै, कारलाई थानकोटतर्फ मोड्दै भने, &#039;पहीँ जानुपर्छभन्ने के छ र, बूढा पनि कस्तो साइतमा आएछन्‌ ? अब हामी पर्सि नजाने त ?बूढालाई कसैगरी भए पति घर पठाइदै पर्सि त जानैपर्छ । बुटवलकाकविवाहेक दुई ग्रुपचाहिँ हामीसँगै जाने रै । कविचाहिँ नजाने रे । त्यो च्याखुरेकवि त आफनै प्रेमिकाको कुरा हार्न नसकेर पो नगरकोट आएको रहेछ ।कविता सुहागरातको गरे पनि प्रेमिकालाई छोएकै रहेनछ । देखिनौ, त्यसकोप्रेमिकाको मुड कस्तो थियो । मोरा लाछीले प्रेमिकाको रहर पनि पुग्याएनछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;ए हो, तिनी किन रिसाइन्‌ भनेको त कारण त्यो पौ रहेछ, तपाइँहरूभने... । ल त्यो कुरा छोडौं, बाबुको पीर नगर्नोस्‌ । आउन त औषध-सौषधिके-के गर्न आएका रे, आजफैँ बहाना बनाई भौलि नै गाउँ पठाइदिन्छु । भोलिवेलुका उनीहरू बुटवलबाट आएपछि सँगै होटलमा बस्नुपर्छ है । साह्रै रमाइलाछन्‌ मोरामोरीहरू, धेरै हँसाउने त कबि हो त्यही नपुड्सक परेछ, नत्र किनमुखमा आएको फल छोडथ्यो । केटी मुर्मुरिइरहेकी थिई । अब कविलाई त्यसकेटीले पनि छोड्छे । बडो आदर्श बन्न खोज्दो हो मोरो, अब आदर्शको फलराम्रै चाख्छ त्यसले । अब इन्डियातिर घुमेर आएपछि चाहिँ हामी पनि विबाहगरौँ है ? अस्ति घरबेटी बाले भन्थे, &#039;तिमी छोरीजस्ती भएर भनेको आजकालतिम्रो रूपरङ्गग अर्कै छ । आफूलाई सम्हाल बा, नबु&#039;फी हिँड्दा अगाडि खोलोपछाडि भड्खालो होला ।&#039; सचैसबैले हाम्रो प्रेमलाई अङ्गगालोको माया भङ्गालोकोपानी नै सम्झैका छन्‌ । अबचाहिँ म सबैको घृणा सहन सब्दिनँ है ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निमेषले मौसमीको गाला चिमोट्दै भने, &#039;हुन्छ मैयाँ अबचाहिँ विवाह गर्नेसमय आयो । इन्डियाबाट फर्केको पर्सिपल्टै झयाइँकुटी ठोकौंला । तिमीसँगटाढा बस्न कहाँ मन छ र ? तिमी तै मेरो सर्वस्व हौ । तिमी नभई एकक्षणपनि काद्न गाह्रो हुन थाल्यौ मलाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म पनि त तपाईँ भनेपछि ज्यान नै दिन्छु नि ! नत्र बाबुलाई ढाँटीढाँटी किनआउँथे ? साँच्चि अहिले त दार्जिलिङमा जाडो निक्कै होला, राम्रो कोट छैनकिनिदित्तोस्‌ । बुटवलकाहरू कस्ताकस्ता भएर आउलान्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;अक्कवरी सुनलाई कसी लाउनुपर्दैन ।&#039; तिमी त्यसै राम्री नै छ्यौ, उनीहरूलेजत्ति राम्रो लगाए पनि अनुहार त्यही हो । एउटी नाक चुच्ची, अर्की भ्यातुल्लीकाली तिमी उनीहरूका अगाडि त साँच्चै के भनौँ र भखरै फुलेको फूल जस्तैदेखिन्छयौ । कबिले तिम्रो बखान गर्दै थियो । म सोच्चेँ कवि त छदटु होला तरगर्जने बाघले खाँदैन भनेको सोह्रेआना ठीक रहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले कुरा थपी, &#039;कविहरू त अरूको भाबना बुझ्छन्‌ भन्थे । उसलेयहाँसम्म ल्याएर पेमिकाको भाबना नै बुझनेछ र त्यो सिकारु कवि भएर होलाहोइन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मौसमी त्यो त के सिकारु कबि हुन्थ्यो, राम्चै कबि हो रे। आफन्त कोहीनभएर पो पछाडि परेको रहेछ मोरो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“साहित्यमा अगाडि बढ्न पनि आफन्त चाहिन्छ त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमी जहाँ पनि आफन्तै चाहिन्छ रे । कवि त्यसै भन्थ्यो । कविले प्रेमिकाकोसाथचाहिँ पाउने भएन, अब कविले कविता लेखेरै मरोस्‌ । जाँ, के-के किन्नेहो । मलाई पनि राम्रो ज्याकेट छानिदेक, घुम्न जाँदा तिमीले नै छानेकोज्याकेट लाउँछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमी फुरुङ्ग भएर हाँसी । निमेषले कार फर्कायो । दुवै कपडा पसलतर्फपसै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ढोकामा आवाज आएपछि मौसमीको बानु 4004 ढोका खोल्दै भने,&#039;छौरी किन छिट्टै आयौँ ? अफिस छुदने समय त अझै भएको छैन क्या रे ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;मौसमीले कपडाहरू सोफामा राख्दै भनी हेर्नोस्‌ न बा, अपर्झट मलाईपर्सि नै अफिसबाट काजमा जानुपर्ने भयो, त्यसैले कपडाहरू किनेर ल्याएकी ।विष्णुराजले चिप्रा लागेका आँखाहरू पुछ्दै भने, &#039;नानी, सहनै नसक्ने गरी छातीबुख्ने गरेको तँलाई थाहा नै छ । हिजोआज त झन्‌ अचाक्ली छाती दुख्न थाल्योबा ! छोरा, बुहारीले नै पीडा कति सहन्छौ, एकपल्ट काठमाडौँ जँचाएर आउनुभनेर पठाएका हुन्‌ । नत्र पौ मइसिरमासमा यहाँ किन आउँथे ? आएपछिनजँचाई फर्किँदा के भन्लान्‌ ? तिमी कहाँ जान्छु भन्छयौ, म बूढोलाई कोसंगजचाउनुपर्छ थाहा छैन । तिमीलाई क्याम्पस भर्ना गर्न सहयोग गर्ने इन्द्रै पनिअरब गएछ, अब के गर्नु ल ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले भनी, &#039;अलिक दिनका लागि म छाती दुख्दा कम हुने औषधिकिनेर ल्याइदिन्छु त्यही लिएर जानु फेरि पछि आउनु अनि म राम्रोसँगजँचाइदिउँला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विष्णुराजले आँखाभरि आँसु पार्वै भने, &#039;ठीकै छ केही समयका लागि औषधिलेकाम चलाउँला । जागिर भन्नै कुरो आफूले चाहँदैमा पाइँदैन । मैलै गर्दाजागिरबाट हात धुनुपत्यौ भने नमज्जै हुन्छ । म भोलि नै घर जाउँला । घ्यू,सिरौंला, भागौ ल्याइदिएको छु राख । मलाई तातो दुई गाँस भात खान देक ।म त भोकले मर्न लागेँ बा !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले राइसकुकर हेर्दै भनी, &#039;भात खानु त भनेकै थिएँ नि, किननखाएको त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हिउँजस्तो चिसो भात, त्यसमाथि दाल, तरकारी कहाँ थे केही मेसो पाइनँ ।भात त देखेकै हँ । तताउनै ढङ्ग भएन ।&lt;br /&gt;
मौसमीले स्वीच अन गर्दै भनी, &#039;ल म भात तताइदिन्छु हात घौएर आउनोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;भात त आगोमा नै तताइदेक, चिसो खाने भए त अघि नै खाइहाल्थे ति !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले दाल तरकारी ओभनमा राखेर तताई, भात राइसकुकरमै तताई ।केही क्षणमै तातोतातो दाल, तरकारी भात पस्केको देखेर बूढाले तीन छक पर्दैभने, “नानी ! तैँले के जादु गरिस्‌ हँ  बिनाआगो सबै खानेकुरा हेर्दाहेर्दै तताइस्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले करेन्टबाट सब्रै पाक्छ, तात्छ भनेर सम्झाएपछि कृ्‌ष्णराजको मनकेही शान्त भयो । उनलै खपाखप भात खाए । आफनी छोरीको प्रगति देखेरकृ्‌ष्णराजले सवै पीडा भुले । छोरीतिर हेर्दै भने, &#039;यज्रो सहरमा तिमीलाई एक्लैछाडेर जाँदा तिम्रो पीरले कति दिनसम्म त उद्नै सकिनँ । आज भने मनहलुङ्गो भयो । तिमीलाई यतै दिन पाए म सौझै स्वर्ग पुग्थैँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मेरो चिन्ता नै नगर्नोस्‌ । सवै राम्रै हुन्छ । दाइको छोराछोरी, दिदी, दिदीकोछौराछोरीलाई त राम्रै होला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सबैलाई राम्रै छ । मलाई भात लागेजस्तो छ, म सुत्छु । छाती दुख्दा खाने औषधिर नाति-तातिनालाई केही कपडा ल्याइदैक, पैसा इस्टकोटको खल्तीमा छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमी औषधि र कपडा लिन वाहिर निस्की । कृष्णराज प्रशन्न मुद्रामासोफामा सुते । मौसमी ब्रुफिनको दस «पन्ध्र पत्ता र कपडाहरू लिएर आई, सबैबाबुलाई देखाई । कृष्णराज खुसी भए । औषधिको पत्ता भने इस्टकोटकोखल्तीमै राखे । भोलि बिहान घर जानका लागि मौसमीले ल्याइदिएको कपडामिलाएर राखे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सत्र==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हेलो ! रोहिणी किन फोन गरेकी, त्यहाँ सबैलाई त सञ्चै छ?&amp;quot;&#039;अं सबैलाई सञ्चै छ । तँ अहिले विहानको खाना खाने गरेर यतै आइज ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले तसँंग माफ पनि माग्नु छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;होइन के भन्छे यो, किन माफ माग्नुप्यो : छिटो भन्‌, कोही विरामीपरेको त होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
“सत्य कोही विरामी छैन । दिदी तँ आउने भनेर खुसी हँदै तँलाई मनपर्नेखाना बनाउँदै हुनुहुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ए हो, त्यसो भए म आइहालेँ । ल भेटेरै कुरा गरौँला, बाई ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीले पनि बाई भन्दै फोन राखिन्‌ । शालु हतारहतार कपडा लगाएररोहिणीको घरतर्फ लागिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&#039;शालु दिदी&#039; भन्दै सौजन्यलाई खेलाइरहेको वीरु चिच्यायो । शालुले वीरु रसौजन्यलाई ठूलो क्याटबरी दिइन्‌ । दुवैको गालामा म्वाइँ खाइन्‌, भर्खर टुकुदुकहिँड्न थालेको सौजन्यलाई केहीबेर बोकेर बगैँचा वरिपरि घुमाइन्‌ । वीरुलेशालुको अनुहारतिर हेदै भने, &#039;दिदी तपाईं जहिले पति सौजन्यलाई देख्नेबित्तिकैकिन आँस्‌ भार्नुहन्छ ?&#039;&lt;br /&gt;
शालुले आफनो आँखामा भरिएको आँसु पुच्छदै भनिन्‌, &#039;तिमीहरू दुवैकोखुसी देखेर रोएकी नि ! ल भन वीरु तिम्रो पढाइ कस्तो छ ?&#039;&lt;br /&gt;
“पढाइ राम्रै छ ममीले बिहान-बिहान ट्युसन पढ्न पढाउनुहुन्छ । आजशनिबार भएकोले बिदा छ । शालु दिदी, म पनि तपाईँको नामबाट नै मेरो नामराख्छु क्या !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“होइन के भनेको तिमीले, मैले त कुरै बुझिनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चीरुले अँध्यारो मुख लगाउँदै भने- &#039;औं बुझिने रे, ममीले भनेको तपाईंकोनामसँग मिल्नै नाम भाइलाई राखैको रे, तपाईँ शालु भाइ सौजन्य मलाई सबैथाहा क्या ! तपाईंको जस्तो नाम राख्यो भने मान्छे ज्ञानी हुन्छन्‌ रे । बाजेलेभाइको नाम अर्कै राखेका थिए रै ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु जिल्ल परिन्‌ । उनले त नाममा त्यति चासो दिएकी थिइनन्‌ ।शालुको मत खुसीले फुरुङ्ग भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वीरुले शालुलाई हल्लाउँदै भने, &#039;दिद्दी मेरो ताम पति फेर्ने, ममीलाईभनिदिनोस्‌ ।&#039; ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले गहभरि आँसु पार्दै भनिन्‌, &#039;वीरु दिदीले मेरो माया लागैर मलाईराम्रो भन्नुभएको हो । बीरु नाम कहाँ नराम्रो नाम हो र, तिमी धेरै पढ, ज्ञानीहोक, तिमीलाई पनि सबैले माया गर्छत्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वीरुले खिन्न हँदै भने, &#039;तपाईं सौजन्यलाई मात्र माया गर्नुहँद्ोरहेछ, त्यसैलेमेरो नाम फेर्नु चाहनुभएन ।&#039; ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले वीरुको गाला मुसार्दै भनिन्‌, &#039;वीरु म दुबैलाई माया गर्छु । तिमीलाईबीरु नाम मन पर्दैन भने दिदीलाई कुरा गछु, हुन्छ ?&#039;&lt;br /&gt;
चीरु दङ्ग परै । शालु सिधै भान्सामा पसेर कान्छीको आँखा छोपिन्‌ ।कान्छीले हात झिक्दै भनिन्‌, &#039;हेर हातको के गति पारेको : हजुरको छाया मात्रदेखे पनि हजुरलाई चिन्छु, बुझिस्यो ? ल वसिस्यो, पहिला दूध र पनिर पकौडानै खाइस्यो अनि कुरा गरौँला ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले दूध पिउँदै वीरुले भनेको कुरा सुनाइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले आँखाभरि आँसु पार्दै भनिन्‌, &#039;वीरुले धेरैपल्ट नाम फेर्ने कुरा गरेकाथिए । मैले वास्तै नगरेपछि हजुरलाई भनेछन्‌ । ल भन्नोस्‌ उसको नाम केराखिदिने ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले केहीबेर सोचेर भनिन्‌, &#039;सौरभ राख्दा हुँदैन !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ भइहाल्छ नि ! उनलाई &#039;श&#039;बाट नै आउने नाम चाहिएको हो । सौरभनाम साह्रै राम्रो छ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन, यो मौरी कुन बेला आएकी ? आफनो आमाछोरी भएपछि त हामीकिन चाहियो ? दिदीको पलिताई कहिलेकाहीँ आफनो प्रशंसा सुनौँ भन्योकहिल्यै पाइएको होइन । सधैँ मेरो शालु मैयाँसाप यस्तो, मेरो शालु मैयाँसापउस्तो भन्नुहुन्छ भन्या । यो मोरी पनि त्यस्तै छे, फोन गत्यो कि पहिलै भन्छे-रोहिणी घरमा सबैलाई सञ्चै त छ ? तँलाई कस्तो छ ? भनेर सोधेको त मैलेसुनेकी नै छैन । ल दिदी हामी कोठामा गयौं ।&#039; शालु र रोहिणी नै कोठाभित्रपसे । कान्छी हाँसिन्‌ मात्र ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रोहिणीसँगै सोफामा बस्दै भन्तिन्‌, &#039;रोहिणी तँ यतिबिध्न खुसी छस्‌,कुरा के हो भन्त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;पहिला तैँ रिसाउन्न भनेर कसम खा अनि मात्र भन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;तँसँग म किन रिसाउनु ? म सधैँ तेरो फोटोलाई हेरेर भन्छु, भगवान्‌ यदिअर्को जन्म हुने भए मलाई रोहिणी नै साथीको रूपमा पठाइदैङ । तेरोकारणले त मैले सबैको सुख देख्न पाएकी छु । दिदीलाई केही तराम्रो भएकोभए म कसरी बाँच्यें होला ? ल सबै कुरा छोडौं, भन्‌ कुरा के हो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले शालुको हात समात्दै प्रशन्नसँग भेट भएदेखिको सबै कुरा बताइन्‌ ।विवाहका लागि करा छिनेर स्वयम्बर गरैर मात्र अर्को हप्ता पाकिस्तान इन्जिनियरपढ्न जानै कुरा पनि बताइन्‌ । स्वयम्बरमा डाक्नुपर्ने मान्छेहरूको लिस्ट लामैदेखाइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीको कुराले एकैछिन त शालुलाई आफू सपनामै छु जस्तो लाग्यो,शालु टोलाइरहिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले मसिनो स्वरमा भनिन्‌, &#039;विन्ती नरिसा शालु, मैले कतिपल्ट तँसँगआफनो प्रेमको बारेमा भन्न चाहेँ तर सक्दै सकिने । तँ भन्धिस्‌ ति सबैको प्रेमविषाक्त हुँदैन भनेर, विश्वास गर हाम्रो प्रेम पनि बिषाक्त होइन । हामी एक-अर्काच्रिना बाँच्न पनि सक्दैनौं त्यसैले सबैको सल्लाहले उहाँ स्वयम्बर गरेरज्ञान लाग्नुभएको हो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;त॑ मलाई पनि बोल्न दिन्छेस्‌ कि आफूमात्र बोल्छैस्‌हं ? तैँले जे गरिस्‌ राम्ै गरिस्‌ । म त सञैँ तेरो खुसी नै चाहन्थेँ । तेरो प्रेममासमर्पण छ । रोहिणी, प्रेममा त्याग होस्‌, स्वार्थ नहोस्‌ । मैले तँलाई माने,लैलामजनुको प्रेमभन्दा तिमीहरूको प्रेम कम छैन । सबै प्रेमी-प्रेमिका तिमीहरूजस्तै हुँदाहुन्‌ त म किन टाउको दुखाउँथैँ ? तँलाई बधाई छ रोहिणी बधाई छ ।आफू डुबेर तैँले प्रेमीलाई उत्तारिस्‌, त्यसो भए तँ फेल हुनुको रहस्य मैले बुझैं ।दुवैजनालाई पढाउन बाबुआमाले सक्नुहुन्न भनेर तँ जानीजानी फेल भइस्‌,नत्र तँ फेल नै चाहिँ हुन्थिनस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले शालुको मुख छोप्दै भनिन्‌, &#039;शालु तँ पनि, हेर पो वास्तविकताममी-बाबाले थाहा पाउनुभयो भने साह्रै मन दुखाउनुहुन्छ । यो कुरा त॑ र ममामात्र सीमित रहोस्‌ । म के गरौँ तँ नै भन्‌ उहाँलाई पढ्न पठाउनका लागि तकार नै विक्री गर्नुपर्ने भयो । जस्ट पास मात्र भए पनि हामी तिमीलाई डाक्टरनै पढ्न पठाउँछौँ भन्त वाल्नुभयो, त्यसैले...&#039; भन्दै रोहिणी रोइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“उफ ! रोहिणी तेरो प्रत्येक करा मान्ने ममी-बाबाले तेरो त्यो इच्छालाईपनि त पूरा गरिदिनुहुन्थ्यो होला नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;शालु तँलाई थाहा छैन, उहाँहरूले हाम्रो प्रेमलाई स्वीकार गर्नु भए पनिपढाइको प्रथम प्राधथमिकताचाहिँ मलाई नै दिनुभएको थियो । मैरो रिजल्टबिग्रेपछि बल्ल प्रशन्नलाई बाहिर पठाउने कुरा उठाउनुभयो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तँ पीर नगर अर्को वर्ष म रामौसँग फेल भएको विषय पास गर्छु । ल अबयी क्रा यहीँ छोडौं । भत क्याम्पसको साथी कति जनालाई बोलाउने !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;सोचेर बौलाए भइहाल्छ । म भने तेरो ममीपापालाई भेटेर आउँछु&#039; भन्दैशालुले पहिला रोहिणीको बाबुलाई भैटिन्‌ । सबै कुरा भएपछि आमासँग भेटिन्‌,पीताम्बरा प्रशत्नको कुरा गरेर हर्षित भइन्‌ । करा गर्दागर्दै प्रशन्न पनि टुप्लुक्कआइपुगे । पीताम्बराले नै शालुको परिचय गराइन्‌ । रोहिणीको मुखबाट पनिथुप्रैपल्ट शालुको नाम सुनेको वताए प्रशन्तले । प्रशन्न आएको गन्ध पाउनेबित्तिकैरोहिणी कोठामा आइन्‌ । प्रशन्नलाई देख्नेबित्तिकै रोहिणीको आँखामा आँसुछर्चाल्कयो । उनी केही बोल्त नसकी बैठककोठामै बसिन्‌ । रोहिणीको त्योचाल देखेर सबै एकैछिन मौन रहे । खाना खाने बेला पनि भएकोले सबैभान्सातिर लागे । शालुले दिदीलाई खाना दिन सघाइन्‌ । रोहिणीले दुई-चार&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गाँस बल्लबल्ल खाएर उठिन्‌ । पुनः सबैजना बैठककोठामा जम्मा भए ।रोहिणी र प्रशन्तको अनुहार भने उदास थियौ । स्वयम्बर गदा पार्टी दिनेविषयमा छलफल भइरहेको थियौ । त्यति नै खेर फोन आयो, फोन नजिकैबसैका रोहिणीको बाबुले फोन उठाए । हलो ! को बोलेको, प्रमोद, ओ लन्डनबाटपौ, ल भन्‌ ममीडेडी सबैलाई सञ्चै छ ? लौ भाइ मन्यो रे, कसरी ? हस्पिटललग्दालग्दै ? एपेन्डिसाइटको शङ्का गरै सबैले ? ल बाबुआमालाई पीर नगर्नुभन्नु । अरू के भनौं ल ल राख बाबु, राख ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्बराले डराउँदै सोधिन्‌, &#039;होइन के भयो !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;के हुनु, काकाको कान्छो नाति तरुण हिज्ञो मरेछन्‌, त्यसैले खवर गरेकाहुन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्बराले च्ब ! च्व ! गर्दै भनिन्‌, &#039;नाति जन्मेको त वाहा नै थिएन कसरीमरेछन्‌ रे ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फएपेन्डिसाइटले मरै भन्ने शङ्का छ रे&amp;quot; केशबले जवाफ दिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अहो ! त्यसो भए स्बयम्बर रोकियो त ?&#039; पीताम्बरा झस्किन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ला ! हो त ! स्वयम्बर त रोकियो नि !&#039; केशवले कुरा टुङ्ग्याउन नपाउँदैअँध्यारो मुख लगाइरहेकी रोहिणी रुन पो थालिन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालुले रोहिणीको हात समाउँदै भनिन्‌, &amp;quot;रोहिणी पीर गर्नुपर्ने त कुरै छैन ।स्वयम्बर गर्वैमा तिमीहरूको माया वढ्ने र नगर्दैमा तिमीहरूको माया घट्नेहोइन । तिमीहरू एक-अर्कालाई विश्वास गर्छौ, त्यही नै ठूलो हो, होइन तप्रशन्नजी !&#039; (न&lt;br /&gt;
“हो, शालुले ठीक भन्नुभयो । माया नै ठूलौ हो ।&#039; प्रशन्नले पनि शालुकोकरामा नै समर्थन गरै ।&lt;br /&gt;
सबैले विश्वास र मायाभन्दा ठूलो केही पनि हुँदैन भन्नै कुराको पुष्टि गरे ।रोहिणी र प्रशन्न दुबैले मन बुझाउन करै लाग्यो । शालु दिनभरि बसेरसाँझसाँझ घर आइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रहँदा-वस्दा प्रशन्न पाकिस्तान पढ्न जानै दिन पनि आयो । कान्छीदिदीलेसाइत गरेर पडाउने भएकोले प्रशन्न पाकिस्तान जाने अघिल्लो दिन रोहिणीकैमाबसे । रोहिणी एक्लै कोठामा रोइरहेको देखेपछि केशवले नै प्रशन्तलाई सम्झाउनुभनी आग्रह गरे । रोहिणीको त्यो अवस्था देखेर प्रशन्नलाई पनि नमज्जालाग्यो । उनले कोठा बन्द गरी रोहिणीको नजिक बस्दै सम्झाए, हेर रोहिणीतिम्रो पीरले गर्दा घरमा सबैले चिन्ता मानेका छन्‌, तिमी जेटीबाठी छोरी,तिमीले पो सबैलाई सम्झाउनुपर्छ त ! म लडाइँमा नै त जान लागेको होइन ।प्रत्येक कालो रातपछि दिन आउँछ भन्ने कुरा हामीले भुल्नुहँदैन । मायाको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गहिराइमा डुविसकेपछि जिउन गाह्रो हुँदोरहेछ । त्यसो भन्दैमा कर्तव्य पनिभुल्नु भएन । केही समय पीडा सहेपछि हामी सदाका लागि पीडामुक्त हुन्छौं ।तिमीले आफूलाई सम्हाल्यौं भने म सन्तोषको सास फेर्छु, तिमी चिन्तामा डुव्यौभने म कसरी पढ्न सक्छ भन त ?”&lt;br /&gt;
रोहिणी रोइन्‌ मात्र, प्रशन्नले भने, &#039;रोहिणी तिमी यसरी विलाप गर्छ्यौं भनेम पढ्न नै जान्न ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणी केही बोल्न नसकी आफनो कोठामा आइन्‌ । प्रशन्नले अनेकौँसहानुभूतिका शब्दहरू खन्याए पनि रोहिणीको हृदय प्रशन्नको मायाले जलि नैरहयो । रौहिणी पटक्कै निदाउन सकिनन्‌ । रोहिणी जति छट्पटाए पनि समयलेआफनो गति लिई नै रहयो । भोलिपल्ट बिहान रोहिणी र प्रशन्नले नै एक-अर्कोलाई हेर्न र बोल्न सकेनन्‌ । कान्छीदिदीले साइतको टीकामाला लगाएरबिदाइ गरिन्‌ । एयरपोर्टमा रोहिणी जान सकिनन्‌ । केशब, पीताम्बरा र चन्द्रकान्तमात्र गए । केशवले प्रशन्नलाई बिदा गर्नुअरगाडि &#039;हामीले तपाईंलाई आफनैछोरा सम्झेका छौँ । हाम्रो विश्वासलाई नटुकयाउनुहोला । रोहिणीलाई तपाईंलेचिन्नुभएकै छ, त्यसैले सक्दो चांडो फोन गर्नुहोला&#039; भन्त भुलैनन्‌ ।&lt;br /&gt;
प्रशन्नले पनि विश्वास नटुक्रयाउने, मन लगाएर पढ्ने, चाँड्धै फोन गर्नेकरा बताएर बिदा भए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अठार==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ढोकाको घन्टी लागैपछि शालुले ढोका खोलिन्‌ र त्यो घन्टी लगाउनेलाईकेहीबेर हेरेर भनिन्‌, &#039;तिमी मोना होइनौँ ?&#039;&lt;br /&gt;
मोनाले हो भन्ने सङ्केत गर्दै मुन्टो हल्लाइन्‌ । शालुले मोनालाई कोठामाडाकेर सोफामा बस्न आग्रह गर्दै भनिन्‌, &#039;बसन मोना, तिमी त ज्यादै ठूली पोभइछौ । पहिलाकै घरमा छौ कि अन्तै छौँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाले गहभरि आँसु पार्दै भनिन्‌, &#039;दिदी आज नै त्यो घर छाडेर आएँ ।तपाईंले नै मेरो मर्म बुझिदिनुहुन्छ भनेर यहाँ छिरेकी हँ ? कान्छीदिदीलाई योसमाजले चरित्रहीन नै ठहन्याएछन्‌ नि होइन ? मेरी आमा त्यसै भन्धिन्‌ । मैरोमनले अफ्गै पनि भन्छ उनी त मायाको सागर हुन्‌, चरिहीन होइनन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले फिस्स हाँस्दै भनिन्‌, &#039;मौना तिमी र मजस्ता यो समाजमा कति नैजन्मन्छन्‌ र ? तिमी र म जस्ताको कुरा फेरि कसले ७0 ? तिमी असभ्यजँड्याहाकी छोरी म सभ्य जँड्याहाकी । पर्न त हामी दुवै जँड्ययाहाकी छोरी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पज्यौँ । फरक यति छ, मान्छेहरू तिम्रोअगाडि नै क्रा कादछन्‌ भने मेरोचाहिँपर्छाडि कुरा काट्छन्‌ । आखिर कुरा त कादछन्‌ नै । तिमीले किन घर छोड्यौत?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाले केहीबेर मौन रहेपछि रुँदै बोली फुटाइन्‌, &#039;दिदी मालिक्नी योसंसारमा हुनुहुन्न, उहाँ मारिनुभयो, त्यो पनि आफनै लोग्नेबाट ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले आश्चर्य मान्दै भनिन्‌, &#039;मौना तिमी भ्रममा पस्यौ कि ! देख्दा तत्यस्तो पापीकैँ लाग्दैनथ्यो क ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के भ्रममा हुनु नि दिदी, मैले भोलिपल्ट विहान आफनै आँखाले दुईटातकियामा रगत देखेकी हुँ । उसले अवश्य निदाएको बेलामा तकियाले थिचेरमारेको हनुपर्छ । मैले यो कुरा पुलिसलाई पनि भनेँ तर पुलिसले त ब्लडप्रेसरहाई भएर मरेको मुचुल्का तयार पासो ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;होइन मानैपर्ने कारणचाहिँ कै धियौ र !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“के हुन्थ्यो र दिदी, बूढी मालिक्नीबाट त्यो यौनप्यासी सन्तुष्ट हुँदैनथ्यो ।मालिक्नीलाई मारेर क स्वतन्त्र हुन चाहन्थ्यो । उसको आँखा म पापितीमाथिथियो । क मलाई सम्पूर्ण सम्पत्ति दिन्छु भनेर बेलाबेलामा फकाउँथ्यो । मउसको कुरा एक कानबाट सुनेर अर्को कानवाट उडाइदिन्थे । मालिक्नी मेरोचरित्रले गर्दा मलाई असाध्यै माया गर्नुहुन्थ्यो । म पनि उहाँलाई असाध्यै मायागर्थेँ । त्यस घरमा गएको दुई-चार वर्ष त म त्यसको गिह्दै आँखाबाट बचे ।मालिक्नीसापको आमा मरेकोले उहाँ महाराजगन्ज माइत जानुभयो, त्यस रातत्यो अधर्मीले ज्वरो आएको निहुँ पारी मलाई तातो पानी लिएर आउनु भनीआफनौ कोठामा डाक्यौ । म डराउँदैडराउँदै कोठामा पसेँ । कोठामा पसेपछिहतारहतार ढोका पो लगायो ! मैले डरले चिच्याउँदै भनेँ, &#039;मलाई छोइस्‌ मात्रभने पनि तँलाई जिउँदै मारिदिन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मालिक भइखाको अच्युतले एक गिलास तातौपानी मैरो जिउमा छयाप्दैभन्यो, &#039;कत्तित कमारी केटीफ्रै गरेर नखरा पार्छै । म सिकारी भन्ने त तलाईथाहै छ होइन ? यो कोठाबाट एक पाइला मात्र सारिस्‌ भने तँलाई बन्दुकलेउडाइदिन्छु । तँलाई शिरदेखि पाउसम्म गहनाले पूर्छ भन्दा पनि मात लाग्योभाग्ने ?&#039; भन्दै उसले मलाई झम्टन खोज्यो । मलाई पानीले पोलेको पनि यादभएन । मृत्युको त चिन्तै भएन । मैलै चिच्याउँदै &#039;मार्ने भए मार, म मर्छै तरमेरो मालिक्नीको विश्वास तोड्दिनँ&#039; भन्दै ढोकामा पुगेर ढोका खोल्न लागेँ,उसले पछाडिबाट बन्दुकको नालले जोरले टाउकोमा हान्यो । म रन्थनिँदैभुइँमा ढलेँ । हातखुट्टा लुलो भयौ, उसले मेरो शरीरमाथि एक्लौटी जमायो रभन्यो, &#039;मौना तेरा लागि त सारा त्याग्न सक्छु । मोना आवेशमा जे गरे पनिनरिसा है । म जस्तो पाउँदा के चाहिन्छ त तँलाई ?&#039; म धेरै वेरपछि घिसिँदै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आफनो कोठामा आएँ । त्यो रात छट्पटाउँदै बिताएँ । भोलिपल्ट मालिक्नीलेमाइतीबाट फोन गर्नुभएको थियो । आमा मरेको चौटमाथि अको चोट कित01 भनेर मन सम्हालेर करा गरेँ । आमा मरेको पाँच दिनको दिन मालिक्नी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुव्लाएर घरभित्र मात्र के पस्नुभएको थियो । मैले चाहंदा-चाहँदै पनिआफूलाई बाँध्न सकिनछ्ु र रुन पुगेछु । मालिक्नीले मेरो आँसु पुर्छिदिँदै भन्नुभयो,“जै नहोस्‌ भन्ने सोचेकी थिएँ त्यही भएछ । त गरिबनीको उद्धार गर्छु भनेरल्याएकी त &#039;झन्‌... । यति भन्दै मालिक्नी पनि मसँगै रुन थाल्नुभयो । हामीदुवैजना धेरैबेर रोएपछि मालिक्नीले भन्नुस, , &#039;नानी नरो तँ मलाई छोडेरनजा । तँ मेरो खुसी हेर्न चाहन्छैस्‌ भने तैँले उहाँको रहर पुस्याइदै ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले अचम्म परेर मालिक्नीको मुख हेदै भनेँ, &#039;हजुरले के भन्नुभएको त्यस्तोम अब यहाँ बस्तिनँ मालिक्नीसाप बरु मागेर खान्छु तर... ।&#039;&lt;br /&gt;
मालिक्नीलै मेरो कपाल मुसार्दै भन्नुभयो, &#039;हुन त तँलाई कुनै इमानदारकेटा खोजेर आफैँ कन्यादान दिन्छु भन्ठानेकी थिएँ । पुन: तेरो इमानदारितामाथिअर्को दाग लगायो यस पापीले । मैले मेरो स्वार्थका लागि मात्र होइन तेरालागि पनि भनेकी हुँ, तँ पनि कहाँ जान्छेस्‌ ? बाबुआमा तिनै हुन्‌ । महिना मर्नपाएको छैन पैसा लिन आउंछै । एक वचन नानी तँलाई अर्काको घरमा गाह्रैहोला भनेर कहिले सोधेकी छै, तँ नै भन्‌ त ? ममाथि पहाड दुद्दा पनिअसत्तीलाई प्यास नै ठूलो भयो । के गरौं पीडा सहने बानी तै परिसक्यो बा !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले मालिक्नी सापलाई भनेँ, &#039;आजै अदालत जाउँ, म साँचो क्रा बताइदिन्छु,यस्तो पतीतसँग नबस्नोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मालिक्तीले तुरुक्क आँसु झार्दै भन्नुभयो, &#039;नानी, वाहा छ मलाई पनि,अपराध गर्नुभन्दा अपराध सहनु पाप हो । तर यो कानुन अन्धो छ बा ! हामीअदालतमा गयौं भने तेरो मालिक होइन तँ पो अपराधी हुन्छैस्‌ । फेरि प्रत्येकस्वास्वीमान्छेहरू आफनो स्वार्थको लागि मात्र कहाँ बाँचेका हुन्छन्‌ त ? कुनैस्वास्नीमान्छैले लोग्नेको अत्याचारको पराकाष्ठा नाघेपछि झिनो आफूनो स्वार्थहेरेर पन्छयो भने यो समाजका आड्गमाईले नै उसलाई वेश्या साबित गर्छन्‌ ।पाइतैपिच्छे काँडा विल्लयाउँछन्‌ । म आफना लागि मात्र बाँचेकी भए केही गर्नत सक्थैँ नै होला तर म कहिल्यै आफूता लागि बाँचनै बुझिस्‌ ? म एउटालेपीडा लुकाउँदा मेरा सम्पूर्ण आफन्तहरू खुसी हुन्छन्‌ भने पीडा गुङाउन ततैचैसभैँ लाग्छ । म मेरा आफन्तको आँखामा आँसु देख्न सक्दिनँ । मोना,देखिहालिस्‌, मेरा छोराछोरी अमेरिकामा कति खुसी छन्‌ । &#039; बुङवाबु हुनुहुन्छ ।मलाई माया गर्ने दाजुभाइ, दिदीबहिनीहरू छन्‌ । म ती सवैलाई कसरी चोटदिन सक्छु भन त : त्यसैले चुपचाप बगर भएर बाँचेकी छु । फेरि तैँले सोचिस्‌होला तेरो मालिकले यो चोट मलाई अहिले मात्र दिएका हुन्‌ । तँजस्ती सफाहृदय भएकी बच्ची त मैले पहिलोपल्ट नै देखेँ । यहाँ करिब आधा दर्जन जति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केटीहरू अहिलेसम्म बसै होला, ती प्रत्येकमा लालच थियो । उनीहरू आफनोवैसका उन्मादहरूलाई: थेग्न सक्दैनथे । तेरो मालिकको पैसामा र मायामालट्टिन्थे उनीहरू । कुन सड्का आफूनो आँख्चा छलेर प्यास मैद्थै«मेटाउँथे मैलेपत्तै पाउँदैनथेँ । जब मलाई नै सौताको व्यवहार गर्न थाल्दा पो वास्तविकताबुझथेँ । चुपचाप आँसु पिएर सबै सहनु नै श्रेय ठान्थेँ । मालिकबाट केपाउँदैनथै कुन्नि अलिक दिनको रमझमपछि अरू नै केटा टिप्थे, हिँड्थे । सबैलेछोडेपछि मालिक आक्कलझुक्कल मसंग आउँथे । भैगो यो कुरै छोडौं, तँ पापीहोइनस्‌ । कुनै राम्रो ओत लाग्ने ठाउँ नपाउन्जेल तँ यहाँबाट नजा ।&#039; उहाँलेत्यसै भत्ती सम्झाउनुभयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले पनि मालिक्नीको कुरा ठीकै ठानेँ । मालिक्नीलै बलात्कार हुनुको कारणपनि सोध्नुभयो । मैले सबै बताएँ । उहाँले टाउकोमा हेर्दै &#039;टाउको नै नफुटे पनिटाउकोमा पीप-रगत जमेको छ&#039; भनेर मेडिकलमा लगी मेरो घाउ देखाउनुभयो ।नभन्दै डाक्टरले घाउ निचोदा एकमुठीभन्दा बढी पीप-टगत आयो । पीप-रगतनिचोरेपछि टाउको हलुको भयो । मालिक्नीले थाहा पाएर पनि केही थाहानपाएझैँ गरी मालिकलाई सम्पूर्ण आकाश स्वतन्त्रपूर्वक डड्त दितुभयो । मउसकी सिकारमा परिरहन्थेँ । मालिक्नी चुपचाप सहिरहनुहुन्थ्यो । मेरो रमालिक्नीको सम्बन्ध अझै गाडा बन्दै गयो । दिन बितेकै थियो । केही दिनअगाडिदिउँसोको तीन-चार जति बजेको हुँदो हो । मेरी आमा आएर मेरी सोझीमालिक्नीसँग हाँक दिँदै भतिछिन्‌- “मीनालाई यो घरबाट लगेर अन्तै राख्छु ।अन्त बढी पैसा दिन्छु भनेका छन्‌ ।&#039; मालिक्नीले रिसको झोकमा भन्नुभएछ-“सक्छयौ भने मोनालाई अहिले लग, मलाई मोना चाहिँदैन ।&#039; मालिक्नी र मेरी &#039;आमाचीचको क्रा सुनेर मालिक रिसाउँदै बाहिर निस्केछन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म कोठामा कै गलफती हुँदैछ भनेर पसेँ । आमा र मालिक्नीबीचको सबैकुरा बुझेँ । मैले रिस थाम्न सकिनँ । आमालाई कपाल भुत्ल्याएर घिसार्दै भनेँ-&amp;quot;तँ कृकर्ती मेरौ मोल राख्न आएकी : आइन्दा तँ यस घरमा छिरिस्‌ मात्र भनेकुकुर फुकाएर टोकाउँछु । जा छिटो निस्की- निस्किहाल ।&#039; मालिक्नी मेरो हातरोक्न खोज्दै हुनुहुन्थ्यो । मेरौ आँखामा आफू बलात्कार हुँदाका क्षणहरू नाच्यो ।मैले मैरौ जिन्दगी बर्बाद गर्ने त्यही आमा नै हो भन्ठानेँ । ममा भूत सवारभयो । मेरो होस त्यतिबेला मात्र आयो जब मालिक्नीले मैरो गालामा दुईथप्पड मार्नुभयो र भन्नुभयो- &#039;मोना अव तँ जेलमा जाकिने भइस्‌ तेरी आमामरी । मैले यसो आँखा खोलेर आमातिर हेरेँ । आमा रुन पनि नसक्नै गरेरभुइँमा पछारिरहेकी रहिछिन्‌ । मैले उनलाई सकिनसकी सडकमा पुन्याएरदयाक्सी रोक्दै हातमा दुई सय रुपैयाँ दिएर भनेँ, &#039;आइन्दा तैँले यो घरमा पाइलाटेकिस्‌ भने यो घरबाट तेरो लास जान्छ, याद गर ।&#039; आमा चु पनि बोल्ननसकी गइन्‌ । मैले त्यो दिन ठूलै पराक्रम गरेकी सम्झ । मालिक्नीले भन्नुभयो,“नानी तेरो रिस देखेर म छक्क परेँ । मैले तँलाई नपिटेको भए तैँले आमालाई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मा्नै थिइस्‌ । जे गरिस्‌ ठीक गरिस्‌ । अव तेरो महिनैपिच्छेको पैसाले सुनकैकेही सामान वनाइदिउंला, दुःख पर्दा काम लाग्छ । त्यही दिन मलाई सिक्री,औंठी र टप दिँदै भन्नुभयो, &#039;अपराध धेरै भएपछि ढुङ्गा पनि विस्फोट हुँदोरहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
मैले भने, &#039;खोई त हजुर पनि विस्फोट भएको ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उहाँले मेरो गाला मुसादै भन्नुभयो, &#039;नानी तँ पनि धैरै कुरा जान्ने भइस्‌ । मआकाशमा गएपछि विस्फोट होउँला । तँ आज साह्रै थाकेकी छस्‌, म खानापक्राउँछु । तँलाई एकछिन नदेख्दा पनि म आत्तिन्छु तँ साबीचाहिँ बस्नुपर्छ नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले हाँस्दै भने, &#039;खाना हजुरले पकाएको मालिकसापले थ्वाहा पाउनुभयोभने एउटानएउटा खोट लगाउनुहुन्छ । खाना म नै पकाउँछ । हजुर थपक्कबस्नोस्‌ । मलाई त दुखाइको पत्तै छैन ।&#039; हामीले त्यो रात हाँसीखुसी सुख,दुःखका कुरा गयौँ । भोलिपल्ट बिहान हतारहतार दुईवटा रगत लागेकोतकिया फोहोर लिन आउनेलाई बोरामा हालेर दिएको देखेँ । म आँच्तिदै कोठामापुग । मेरी मालिक्नी सदाका लागि मलाई छोडेर निदाइसक्नुभएको रहेछ । मकेही बोक्न नसकी भुइँमा थ्याच्च बसेँ । त्यो पापीले कुटिल हाँसो हांस्दै भन्यो,“मोना हामीबीचको काँडा हट्यो । तँलाई थाहा छैन होला यो असत्तीनीलेतँलाई यहाँबाट पठाउने कुरा गर्दै थिई त्यसैले यसलाई सखाप पारेँ । अव यहाँतेरो र मेरी राज्य हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
मैले जुरुक उठेर त्यसको कठालौमा समातेर थुक्दै भनेँ, &#039;युक्क पापी ! मयहाँ छु त केबल मालिक्नीले गर्दा छु । नत्र म उहिल्यै यो घरबाट निस्किसक्थैँ ।तैँले सोचिस्‌ होला मालिक्नीलाई हामीबीचको सम्बन्ध थाहा छैन । मालिक्तीलाईत प्रत्येक काम गर्नेहरूसँगको तेरो सम्बन्ध थाहा थियो । तँलाई हिँड्नका लागिसिङ्गै मूलबाटो छौड्ेर आंफू तरबारको धारमा हिँड्नुहुन्थ्यो । मेरी मालिक्नीकोहत्या गर्ने त्यो पाषी हातले मलाई छोइस्‌ माव भने पनि म आफनो हत्या आफैँगछ |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसले चिच्याउँदै भन्यो, &#039;चुप लाग्‌ मोना, मैले तँलाई लैजा भनेको मेरैकानले सुनेको छु बुझिस्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले काप्दै भनेँ, &#039;मबाट घेरै पैसा असुल्ने सुर गरेपछि रिसले सक्छेस्‌ भनेमोनालाई लैजा भन्नुभएको हो अधर्मी । तैँले सोचिस्‌ होला आजसम्म तैँलेदिएकै पैसामा बसेकी छु । मेरी साहुनीले पैसा थपीथपी मेरी आमाको मुखमाफयाँकेर तेरो लागि मलाई यहाँ राख्दै आउनुभएको थियो । मालिक्नीको सोफझोपनकोफाइदा उठाएर पैसा बढाउन खोजेपछि मलाई लैजा मात्र के भन्नुभएको थियोतेरो कालो मतमा नाता शङ्का उठ्यो होइन : अनि निष्पाप मन भएकीसाहुनीलाई सिध्याइस्‌ । म तँलाई नङ्याएरै छोड्छु पापी नङ्स्याएरै ।&#039; तरदिदी, मैरो कुरा स्वयम्‌ मालिक्नीका छोराछोरीले वास्ता गरेनन्‌, उल्टै भने,&#039;छोटोलाई टाउकोमा चढाएपछि के-के भन्छन्‌ भन्छन्‌ । तँ हाम्रो खानदानी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परिवारमा तमासा खडा नगर । उनीहरूले मेरा मुख नै वन्द गरे । मेरीमालिक्नीले छोराछोरी र आफन्तका लागि गरेको त्यागको परिणाम आफनैआँखाले देखेँ । अमेरिकाबाट आएको छोरा जेनतेन किरिया बसे । छोरीहरूलेचाहिँ तीन दिनमै नुन खाए । मैले तेह्र दिन त्यहीँ वसेर नुन वारी आजैत्यहाँबाट निस्केर यहाँ आएँ । मालिक्नीका छोराबुहारी, छोरी सबै अव बाबुकोस्याहार गर्ने जिम्मा मोनाको हो भन्थे । मालिकले मालिक्नीको गुणहरू सम्झेरैहोला तेह्र दिनसम्म मलाई छुने आँट गरेन । म त्यसैले पनि तेह्र दिन त्यहाँअडैँ । आज म भोकै छु शालु दिदी भोकै...&#039; मोना रोइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाको कुराले शालुको आँखाहरू पति रसाए । दुबै भान्सामा गए । शालुलेआफूलाई बेलुकाका लागि राखेको दाल, भात, तरकारी, अचार सवै तताएरदिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाले खपाखप भात खाएर भनिन्‌, &#039;मैले बुझ यहाँ कोही काम गर्नेरहेनछन्‌ । त्यसैले तपाईंले आफना लागि बिहान नै बेलुकाका लागि भातपकाउन्ुहुँदोरहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;तिमीले ठीक नै सोच्यौ मोना, तिम्रो पेट त भरियो खानाले ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;आरियो दिदी म टन्नै भएँ । अव म कहाँ बस्ने दिदी : आमासँग त मर्नैपरेपनि जान्न&#039; भन्दै रुत थालिन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालुले कंहीबेर सोचेर भनिन्‌, &#039;मोना तिमीजस्ती बहादुर युवती पनि रुन्छन्‌ ?जीवन क्रममा सबैले क्नै न कुनै पीडाको सामना त गरेकै हँदारहेछन्‌ ।तिमीले र कान्छीदिदीले सानै उमेरमा कल्पनै गर्न नसक्ने पीडाको सामतागस्यौ । अहिले कान्छीदिदीको जिन्दगीमा केवल बहारैबहार छ । तिम्रो जीवनपनि हामी नरक हुन दिँदैनौं । चन्द्रकान्त दाइको भाइको व्यवहार ठीक चन्द्रकान्तदाइको जस्तै छ तर दाहिने गालाको पाटामा पूरै कालो धब्बा भएकोले उहाँतीस-बत्तीस वर्षको उमेरसम्म पनि अविवाहित हुनुहुन्छ । भाडाको टयाक्सीचलाउनुहुन्छ । डेराचाहिँ दिदीको घरभन्दा केही पर छ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाले रुँदै भनिन्‌, &#039;मलाई माया मात्र भए पुग्छ । म रूप नै चाट्ने खालकीछैन दिदी ! मेरो पनि सबै यथार्थ बताइदिनुहोला ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ मोना, हामी सबै कुरा राख्छौं । आजलाई यहीँ बस म पनि एक्लै छु।भौलि बिहानसम्म सबै कुराको टुङ्गो लाग्छ । चन्द्रकान्त दाइको भाइकोनामचाहिँ रोमाकान्त हो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोना चुप लागिन्‌ । शालुले कान्छीदिदीलाई फोन गरेर सबै कुरा बताइन्‌ ।कान्छीदिदीले सल्लाह गरेर फोन गर्ने कुरा सुनाइन्‌ । शालु र मोना नै मोनाकोमालिक्नी गोमाको सम्झनामा हराइरहे । शालुलै केहीबेरपछि, मोनातिर हेर्दैभनिन्‌, &#039;तिम्री मालिक्नीको फौटौ छ मोना ? म ती देवीलाई हेर्न चाहन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौनाले ब्याग खोलेर फोटो देखाउँदै भनिन्‌, &#039;यही हो मालिक्नी । जूनहाँसेजस्तै हुनुहुन्थ्यो । मोनाका आँखा पुनः भरिएर आए । शालुको आँखा पनिनरसाई छोडेन । दुवैले फोटो हेरेर धेरैबेर मौत रहे । मोनाले शालुको ममीपापाकहाँ जानुभएको भत्ती मौनतालाई तोडिन्‌ । शालुले काठमाडौँभत्रकै होटेललजमा बस्नै होला, पूरा थाहा छैन भनेर वास्तविकता ओकलिन्‌ । साँझझमक्कै पन्यौ, आकाशमा पूर्ण चन्द्र र ताराहरू पनि उदाए । मोना र शालुआ-आफ्नै सोचमा दुवैका थिए । शालुको आँखामा गोमाको तस्बिर नाचिरहेकोथियो । गोमाजस्ता नारीलाई कायर भन्ने कि आदर्श भन्ने शालु त्यही सोचमाडुबेकी थिइन्‌ । फोनमा आएको घन्टीले शालुको एकाग्रपन टुट्यो, फोन उठाउँदैभनिन्‌, &#039;अँ, भन्नोस्‌, ए सबैजना राजी भए । भोलि विहान सात बजे पशुपतिमाविवाह गर्ने सल्लाह भयो । हन्छ हामी सात बजे नै आउँछौँ भन्दै फोन राखिन्‌ ।मोनालाई पनि सबै भोलि सात बजे पशुपतिमा विवाह गर्न आउने कुरा सुनाइन्‌ ।मोना लाजले शर्माइन्‌ । शालुले लामो श्वास फेदै भनिन्‌, &#039;मोना समय अझै पनिछ, केही भन्छयौ भने भत । हन त तिमीले रोमाकान्तभन्दा धेरै सुन्दर र भर्खरकोयुबक पनि पाउन सक्छ्यौ, यो साँचो हो । हामीले चाहिँ तिमीलाई जीवनकोअन्तिम क्षणसम्म साथ दिने, तिमीलाई माया ढिने, गुणी युवक खोजेका हौँ ।रोमाकान्त दाइ भट्ट हेर्दा पटक्कै राम्रोचाहिँ हुनुहुन्न मोना ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तपाईं त त्यसै मन पकाउनुहुन्छ । रूप र सम्पत्तिलाई ठूलो ठान्ने मए आजम यहाँ किन आउँथै ? माया भएपछि जस्तोसुकै कुरूप मान्छे पनि आफसेआफसुन्दर बन्दै जाने रहेछ । मालिक्नीसापकैँ करा गर्दा पनि त सबैले उहाँलाई दाँतउछिट्टेकी थसुल्ली भन्थे । तर मलाई उहाँजति राम्री कोही नै लाग्दैनथ्यो ।उहाँको प्रत्येक क्रियाकलाप मनपर्थ्यौ मलाई । उहाँको आँखा राम्रो, मुख राम,हिँडाइ राम्रो, बसाइ राम्रो, सबैका सबै राम्रो लाग्थ्यो ।&#039; मोनाको कुरा गर्दागर्दैमुटु भक्कानिएर आयो, उनी चुप भइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले एकोहोरो मोनालाई हेरिन्‌ । गोमालाई सम्झिँदा शालुको मन पनिभरिएर आयो । आफनै पहिचान बिर्सेर अरूकै अस्तित्व बचाउन हरपल जलिरहेकीगोमाजस्ता नारीलाई पनि अकालमै चिरनिद्वामा पुग्नुपत्यो । हामीले त एउटागोमाको पीडा देख्यौ, एउटै गोमाको हत्या सुन्यौं । यौ समाजमा कति गोमाजस्ताविवश नारीहरू होलान्‌ । कसले तिनीहरूलाई आफनो अस्तित्वबोध गराउने ?गोमाजस्ता पढेलेखेको सभ्य समाजकी नारीले त त्यो दुर्गति भोग्नुपर्छ भनेअरूको के हालत होला :&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दिदी, मैले तपाईंलाई दुःख पुच्याएँ हगि ? तपाईँले त केही खानुभएकै छैन,भौक पनि लाग्यो होला, म केही बनाइदिन्छु । मालिक्नी वितेको तीन दिनसम्मत मैलै रात कसरी बित्यो, दिन कसरी बित्यो पत्तै पाइनँ । मान्छेलाई जति नैचोट परे पनि सम्हालिनुपर्ने रहेछ । मो तपाईं पनि पीर नगर्नोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले मोनातिर फर्कदै भनिन्‌, “मैले तिमी आउनुअगाडि टन्न नास्तागरेकी थिएं, त्यसैले भोक पटक्कै छैन, तिमी केही खान्छयौ भने बनाक नत्रपर्दैन । हिंसक बाघहरूलै जस्तै गरी मान्छेले मान्छेको आलो रगत पिएको देख्दामन त दुख्ने रहेछ । तर, जीवन जिउनका लागि सवै भुल्नु पनि पर्दोरहेछ ।तिमीले टेक्ने घरातलमा चाहिँ अब रगतका छिर्कासम्म हुँदैनन्‌, गरिवसँग केहीसम्झौता गर्न भनेचाहिँ पर्ला !&#039;&lt;br /&gt;
&#039;दिदी पनि, मेरो कति चिन्ता गर्नुहुन्छ ! मेरो हातगोडा सद्दै छन्‌ । यो केकामका लागि ! मैरो पटक्कै पीर नगर्नोस्‌ । ल अव सुतौँ । बिहान चाँडै उठेरनुहाइघुवाई पनि गर्नु छ ।&#039; दुबै सुते तर दुवैको आँखामा धेरै रात जाँदासम्मनिद्रादेवीले बास गरिनन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोलिपल्ट शालु मोना पशुपतिमा पुगेको केहीबेरपछि नै केशब, पीताम्बरा,कान्छी, चन्द्रकान्त, रोमाकान्तलगायत अरू दस-बाह्रजना आए । कान्छीदिदीलेबुलहीमा लाउने कपडा पहिन्याएर गहना लगाउँदा त मोनाको रूप घप्पबल्लाजस्तै भयो । सबैले मोनाको रूपको तारिफ गरे । दुलहीको पहिरनमासबैसामु आएपछि रोमाकान्तलगायत सबैले मोनालाई हेरेको हँरै भए । रोमाकान्तलेकुनै क्षण कल्पनासम्म गरेका थिएनन्‌ । त्यो बलात्कृत मोना हीराको टुक्राजस्तैछिन्‌ । सबैसबैले घुणा गरेर फयाँकेको मसँग उनले कसरी सारा जिन्दगीबिताउलिन्‌ ? रोमाकान्त त्यस्तै सोचे । बाजेले अब पशुपतिको मन्दिरअगाडिजाँ दुवैले लाउने माला, औँठी, सिकी सबै ठिक्क पारी हिँड्नु भनेपछि सवैपशुपतिको मन्दिरअगाडि पुगे । बाजेले मन्तर पढेर रोमाकान्तले मोनालाईमाला पहिराउनु भनेर माला के पहिराउन लागेका थिए एउटा समाजसेवीभनाउँदी माथिमाथि साडी उचालेर आई । रोमाकान्तको हात उछिट्याउँदैचिच्याई, &#039;ए सबैजनाले यहाँ पैसाको लोभमा एउटी सुक्‌मारीकोबिबाह एउटा कुरूप अध गर्दैछन्‌ । यौ विवाह हामीले रोक्नुपर्छ ।महिलामाथिको अत्याचार हामीले सहनुहन्न ।&#039; सवै मान्छेहरू हवारहवार्ती जम्माहुँदै भने, &#039;यो विवाह गराउनेलाई कारबाही गर्नैपर्छ ।&#039; बरु हामी गछौँ त्योयुवतीसँग बिबाह भन्नेहरू पनि निस्के । रोमाकान्तलगायत सबैजना रातो-पीरो भएर हेरेको हेरै भए । समाजसेवीले मोनालाई अङ्गालो मार्दै भनिन्‌,“नानी ! तिमी यी पापीहरूको बहकाउमा नआक, तिमीले जोडा मित्नै केटापाउँछ्यौ, तिमीलाई ललाइफकाई गर्नेलाई जैलमा जाक्नुपर्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाले समाजसैवीको हात जोडले &#039;झट्कालेर रिसले आगो हुँदै चिच्याइन्‌,(तपाईँ के बोल्दै हुनुहुन्छ : बुझो न सुझो त्यसै मुखमा जे आयो त्यही बोल्नपाइन्छ ? यो मेरो प्रेमविवाह हो । तपाईंले उहाँको बाहिरी आकृति देख्नुभयो ।मैले उहाँको भित्री रूप देखेकी छु । आइन्दा उहाँको बारेमा एक शब्द बोल्नुभयोभने तपाईं नै जेल जानुहुन्छ । म तपाडँहरूजस्तालाई समाजको कलड्क भन्छु,बुझनुभो, कलङ्क... ।&#039;दद ।&lt;br /&gt;
मोनाको शब्द सुनेपछि, वरिपरि &#039;झफुम्मिएकाहरूले समाजसेवी भनाउँदीलाईगाली गर्दै भने, &#039;ए दिदी, बुझ्दैनवुझी अर्कामाथि त्यसै हात हाल्ने हो?तँजस्ती ककर्नीको पछि लाग्दा हाम्रो पनि बेइज्जत भयो । तेरो मुखसुखफुटाइदिङँ ?&#039; भन्दै समाजसेवीलाई हप्की र दप्की गरे ।&lt;br /&gt;
सबैको कुरा सुनेर कत्तिन आफूलाई समाजसेबी ठान्ने आइमाई लज्जितभई, केही बोल्न नसकी कुलेलम ठोकी । अनि आफनो रूपवान्‌ लोग्नेलेनजिकैको बहिनी पर्नेलाई भगाएर लगेको तेह्र वर्ष वितेको कुरा सम्झेर तुरुक्कआँसु खसाती । ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यता आिगाकी दारा सुको करा सुनेर पुरेतबाजे, रोमाकान्तदेखि लिएर सबैको मन हर्षितभयो । बाजेले स्यावास दिँदै विवाहको सानोतिनो रीति पुच्याए ।विवाह सकिएपछि सबैजना केशवकै घरमा जम्मा भए । कैशवको घरमा करिबसयजना जतिको लागि भोज तयार थियो । भोजमा केशवको धेरै नजिककालाई,कान्छीका धेरै नजिकलाई मात्र बोलाइएको थियो । मोना र रोमाकान्तले नैआफूलाई संसारका सबैभन्दा भाग्यमाती नारीपुरुष सम्झैका थिए । सबैलेमोनालाई उपहार दिनुको साथै सुखी वैवाहिक जीवनको कामना पनि गरे ।चार बजेतिर सम्पूर्ण आफन्तहरू भोज खाएर गइसकेपछि शालुलगापतकान्छीदिदीले मोना र रोमाकान्तलाई राम्रोसँग जीवन काटन्‌ भनी डेरामाछोडेर आफनो घर आए ।&lt;br /&gt;
मङ्सिरको छोटो दिन, छ बजे नै झमक्क साँझ पस्यो । रोमाकान्तले दूधतताएर ल्याई मोनालाई दिँदै भने, &#039;मोना दूध पेक, अघि तिमीले धेरै खानेकुराखाएकी छैनौ, भोक पनि लाग्यो होला, अरू केही खानेकुरा वनाड कि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाले मधुर स्वरमा भनिन्‌, &#039;भौक लागेको छैन । खासै दूध पनि खाने मनथिएन, तपाईंले भनेपछि, यतिचाहिँ खान्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
रोमाकान्तले मोनानजिक बस्दै भने, &#039;मोना तिमी त फूलजस्तै रहिछौँ ।पशुपतिमा त्यो आइमाईले अनुमान गरेको कुरा पनि ठीकै हो । मजस्तोसँगसिङ्गै जीवन काट्न सक्छयौ त !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाले जवाफ फर्काइन्‌, &#039;मेरो उमेर मात्र सानो हो । मैले सुखदुःखका सबैपाटाहरू राम्रोसँग बुझेकी छु । शालु दिदी र कान्छीदिदीले मेरो मायाले गर्दा नैतपाईंलाई नै रोज्नुभएको हो । मैले तपाईंलाई पाउनु मेरो पनि ठूलो सौभाग्यहो।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोमाकान्तले मोनालाई हेर्दै भने, &#039;मोना तिमीले मेरो मन नै हलुको पान्यौ ।म सधैँ भगवानलाई किन यस्तो रूप दिड्स्‌ भन्दै गाली गर्थे । आज मैले बुझेँ,तिमीसँग भेट गराउनकँ लागि यस्तो रूप दिएका रहेछन्‌ । धन्य छ भगवानलाई ।मोना म तिम्रो बिशाल हृदयमा कहिल्यै चोट पुन्याउने छैन ।&#039; मोना चुपचाप&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लागिन्‌ । रात ढस्किसकेकोले दुवै ओछ्यानमा गई भविष्यको मीठामीठा कुरागरे । रोमाकान्तले मौनालाई मामाले सुम्सुम्याए, मायाका चुम्वनहरू वर्षाए ।मोना र रोमाकान्त नै एक-अर्कालाई भुलेर एक-अर्काको अङ्गालोमा हराइरहे,बस्‌ हराइरहे... ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उन्नाईस==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;आज यति रमाइलो क्षणमा पनि तिमीलाई कोठै प्यारो भयो होइन ! केसोचेर बसेकी : दिदी हिँड न बाहिर ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले सुजनको हात मुसादै भनिन्‌, &#039;सुजन यतिखेर भने म तिम्रै भविष्यकोबारेमा सोचिरहेछु । म पनि चाँडै होस्टेल जाँदैछु । तिमी घर आयौँ । तिमीमासाँचो र झुटो बुझने बेला पनि छैन । दिदी भन्नुहुन्थ्यो- फिरोजलाई गुहेखाल्डोमा धकेल्ने फिरोजकै बाबुआमा हुन्‌ रै । आजकाल फिरोजका बाबुआमाछोरो बिग्रिएको पश्चात्तापले जल्दैछन्‌ रे ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“शालु के भन्न खोजेकी तिमीले ? बल्ल कँदमुक्त भएर आएको छु। मैलेअहिले नैं जीवनको वारेमा सोच्न थालेँ भने म कहिले हाँसौँ तिमी नै भन त ?तिमी घरमै वस्यौ, ममी, पापा र कान्छीदिदीको मायामा चुर्लुम्म डब्यौ । मैलेत खुसी के हो बुझनै पाइनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु भाइलाई जीवन के हौ भनेर सम्झाउन मात्र के लागेकी थिइन्‌उर्मिलाले ढोका खोल्दै चिच्याइन्‌, &#039;शालु यो रमझममा पनि भाइलाई कोठाभित्रराखेर के कुराले कान भर्दैछयौ हँ ? तिमी त हामीसँग भएर पनि कहिल्यै हामीहुन सकिनी । सुजनको हामीप्रतिको मायाचाहिँ नखोस ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डीपकले उर्मिलाको कुरामा सही थप्दै ढोकाबाटै भने, &#039;शालु, उर्मी जेभन्दैछिन्‌ ढीक भन्दैछिन्‌ । अरूका छोराछोरी वाबुआमासँग टाँस्सिएर हिँडेकोदेख्दा पनि हामीलाई त्यसै गर्न रहर लाग्थ्यो । तिमीले हाम्रो त्यो रहर कहिल्यैपूरा गरिनौ । सुतालाई तिमीले हामीबाट टाढा राख्न नखोज । तिमीलाईडाक्टर पढाउन पैसा लगानी गरेजस्तै हामी सृजनलाई पनि पैसा लगानी गरेरठूलै मान्छे बनाउँछौँ । तिमीले चिन्तै नगर ।&#039;&lt;br /&gt;
बाबुआमाको कुराले शालुलाई कताकता नरमाइलो त लाग्यो नै शालु केहीबोल्न नसकी चुप भइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले सुजनलाई हातमा समातेर तान्दै भनिन्‌, &#039;सुजन वावु, जारुतिम्रा साथीहरू आइसके होला ।&#039; सुजनले केही कुरा बुझे केही कुरा बुझेनन्‌पनि । सोझ्ौँ जन्मदिन मनाउँदै गरेको सुजन हाँस्दै पार्टीको रमफझममा मिसिए ।शालु भने सुजतको चिन्ताले यताउता छटपटाइरहिन्‌ । मनमनै सोचिन्‌, “कहिले मेरो ममीपापाको बृद्धिका घैँटामा घाम लाग्नै होला ? मैले सुजनलाई सहीबाटो देखाइन भने उनी भत्किन्छन्‌ । म नेपाल मेडिकल कलेज जान अझएक-डेढ महिना छ, त्यो बेलासम्म केही उपाय गरौँला ।&#039; शालु के-के सोच्दैथिइन्‌ ढोकाबाहिरबाट आएको आवाजले ध्यान त्यतै गयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काकाकी छोरी प्रकृत्तिले भनिन, &#039;शालु दिदी, ढोका खोलिस्थो त म हजुरलाईके दिन्छु।&#039;शालुले ढोका खौल्दै भनिन्‌, &#039;के दिने नानु !&#039;&lt;br /&gt;
प्रकृतिले वालउपन्यास नीलकमल शालुतिर बढाउँदै भनिन्‌, &#039;हजुरलाईकथा, उपन्यास धेरै मनपर्छ भनेर यो उपन्यास हजुरलाई ल्याइदिएकी छु। योहेरिस्यो भने हजुर त रोइसिन्छ बाचै ! मेरा धैरै साथीहरू रोए रे म पनि रोएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले प्रकृतिको गालामा निमोट्दै भनिन्‌, &#039;धन्यवाद ! मेरी गुडियालाई मपनि बोर भएर बसेकी थिएँ, साइतमै किताब ल्याइदिडछौ हुन्छ म किताबपढ्छु, तिमी जाक ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१२-१३ वर्षकी प्रकृति हाँस्दै गइन्‌ । शालु किताबमा के रहेछ भनेर हेर्नथालिन्‌ । शालुलाई नीलकमल पढेपछि समय गएको त पत्तै भएन । पुनःसुजनले ढोका खोलेपछि पो झसङ्ग भइन्‌, सुजनले शालुतिर हेदैं बडो नम्रस्वरमा भने, &#039;दिदी बिन्ती, आज मेरो चुकाका लागि डान्स गरिदेक, म तिमीलेजे भने पनि मान्छु ।&#039; त्यो फिरोजले मैले डान्स गरेको देखेर मरिमरी हाँस्दैभन्यो, हेर यो फुच्चे, भ्यागुतो उफ्रेझैँ उफ्रेको, यस्तालाई पनि डान्स गर्ने सोखहा..हा... । कसँगै बसेका चार-पाँच युवतीले पनि मेरो खिल्ली उडाउँदै हांसे ।&#039;शालुले उत्तर दिन नपाउँदै सुजनले शालुलाई तान्दै भने, &#039;तिमीले आज डान्सगरिनौ भनै म तिमीसँग. कहिल्तै पनि बोल्दिनँ ।&#039; शालुलाई भाइसँग पार्टीमाजान कर नै लाग्यो । सुजनले क्यासेटको चक्का फेर्दै भने, &#039;अब मेरी दिदीलेडान्स गर्छिन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
सुजनको क्रा सुनेर-सबैले बप्पडी पिट्दै हाँसे । फिरोजले जबर्जस्ती हाँसोरोकेर भन्यो, &#039;भ्यागुता-भ्यागुती एकैचोटि उफ्रिने कि छुट्टाछुट्टै उफ्रिने हँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युवतीहरूले कुरा थपे, “गेटअप त हेरन, पहाडबाट बल्ल ओलेंकी जस्तीछ । यो सुजनले बनाएकोचाहिँ दिदी होला ।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले युवतीहरूको गालामा म्वाइँ खाँदै भन्यो, &#039;ओ परीहरू, वतचरीलाईउडाएर वनैमा पुन्याइदेऔ । कस्ताकस्ता कहाँ गए मुसाको छाउरा दरबार,यस्तीले डान्स गर्ने रे, डान्स कुन चराको नाम हो थाहा छ ? झयाउँकिरीलाई ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;्हा...हा... झयाउँकिरी&#039; भन्दै युवतीहरू खित्का छाडेर हाँस्दा पनि शालुचुप नै लागेको देखेर सुजनलाई साह्रो रिस उड्यो । सुजनले शालुलाई मनपर्नेगीतको क्यासेट बजाएपछि शालु डान्स गर्न थालिन्‌ । शालुले डान्स गरेको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देखेपछि बरिपरि तितरबितर भएका मान्छेहरू एकत्रित भए । पार्टीको माहोल नैअर्कै भयौ । फिरोज र उसका आसेपासेहरू हेरेको हेरै भए । शालुले डान्सगरिसकेपछि सबै वान्समोर &#039;वान्समोर&#039; भन्दै चिच्याउन थाले । शालुले गीतगाउँछु भनेर आनन्द कार्कीले गाएको &#039;यो कस्तो नियति, यो कस्तो जलन&#039;बोलको गीत गाउन थालेपछि सबैले विनको धुनमा सर्प लट्टिएकैँ लट्टिएर गीतसुने । गीत सिद्धिसकेपछि सबैले शालुको डान्स र स्वरकै तारिफ गरे । सुजनहर्षले फुरुङ्ग भएर आफनो साथीहरूलाई शालुसँग परिचय गराए । फिरोजलेयुवतीको अङ्गालो छोडेर शालुसाम्‌ आई &#039;शालुजी, मलाई माफ गर्नोस्‌, मैलेजै भने केही तशोची भनेँ, आउनौस्‌ तपाईँ र म डान्स गरौं&#039; भन्दै फिरोजलेहात शालुतिर बढायो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले पर हट्दै उत्तर दिइन्‌, हेर्नोस्‌, आज मैले मेरो भाइको खुसीका लागिमात्र डान्स गरैकी हुँ । म पेसेवर डान्सर होइन ।&#039; यति भन्दै शालु पार्टीकोमाहोलबाट बाहिरिइन्‌ । सुजनले मनमनै भने, “साले फिरोज, तेरो घमण्ड बल्लचकनाचुर भयो । हामीलाई भ्यागुता-भ्यागुती भन्थिस्‌ अव के भन्दोरहेछस्‌ भन्‌मोरा !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोज नजिकै रहेको बेन्चमा बस्यो र सोच्यो, &#039;आजसम्म मैले मेरो एकइसारामा नै मप्रति भुतुक्क हुनै युवतीहरू भेटेको थिएँ । कति त मसँग बोल्नपाउनु पनि आफनो सौभाग्य सम्झिन्ये । यसले मेरो रूप देखिन होला, त्यसैलेमसँग डान्स गर्न इन्कार गरी । केक काट्ने बेलामा त अबश्य आउँछै नै होला,म जसरी भए पनि त्यसलाई मेरो रूप हेर्न बाध्य गराउँछ । मेरो रूप देखेपछि,चित खान्छे । मान्छे जे-जस्तो हौस्‌, त्यसको स्वरलाई र त्यसको डान्सलाईचाहिँ मान्नैपर्छ बा ! मलाई एक नजर देखेपछि मैन पस्लेझैँ परिलिन्छे त्यो । अनिमैले त्यसलाई के गर्नुपर्छ जानेको छु । यति धेरै तड्पाउँछु कि तड्पीतड्पी मर्छै,त्यो । मचाहिँ नयाँनयाँ फूलहरूमा रमाइरहन्छु ॥:004 एक-दुई वचन बोलेर प्रेमकोनाटकचाहिँ गर्नैपर्छ ।&#039; यस्तै कुराहरू मनमा थियो । युवतीहरूलेयथार्थ बोध गराए- &#039;फिरोज हेर कति गीतहरू खेर गइसक्यो उठ डान्स गरौँ ।नपत्याउने खोलाले वगाउँछ भन्थे ठीक रहेछ । भ्यागुतीले डान्स त कमालकैगरी, फेरि गीत पनि राम्रै गाई ।&#039; फिरोजले उठेर बुगतीहरुलाई अङ्गालोमाबेबै भन्यो, &#039;अब केही दिनका लागि त्यो पनि यसरी र अङ्गालोमा बेरिन्छै । मउसलाई तिमीहरूको जस्तै पहिरन लगाउन बाध्य गराउँछु । तिमीहरूकोजस्तो पहिरन र तिमीहरूको जस्तो शृङ्गगारमा सुहाउँदै देखिएली, होइन त ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;नाइँ फिरोज, नाइँ हामी तिमीलाई केही दिनका लागि पनि छोड्न सक्दैनौं,पाँचैजना युवतीले एकै स्वरमा भने ।&lt;br /&gt;
फिरोजले भेटघाटको समय फरक पार्ने तर तिमीहरूलाई नछौड्ने भनीवचन दियो । त्यसपछि युवतीहरू ढुक्क भए । पुनः केहीबेर डान्स चल्यो । केक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काट्ने बेलामा सबै एकब्रित भए । शालु केकमा गाड्ने मैनबत्ती र चक्क्‌ लिएरहल्का गुलाफी कुर्ता-सलवारमा आइन्‌ । फिरोजले मनमनै सङ्कल्प गर्दै भन्यो,&#039;तेरो यौ कूर्ता-सलवार चार दिनमा उतार्छँ म ।&#039; केक काटने काम पनि सुरुभयो । दीपक र उमिंलाले सुजनको हात समाते, सुजनले केक काटै । बाबुआमालेसुजनलाई केक खुबाएपछि सबैले ताली बजाए । सुजनले बाबुआमा र दिदीलाईकेक खुवाएपछि, कमशः सबैलाई केक बाँड्न सुरु गरै । शालुले कैक काटनमासहयोग गरिन्‌ । फिरोज भने कसरी शालुलाई आफनो रूप देखाउने भन्नैघुनमा थियो । फिरोजले गिफट दिँदा शालुको प्रशंसा गर्दै भन्यो, &#039;मलाईतपाईंको डान्स र गीत नै साह्रै मत्त प्यो ।&#039; शालुले मुसुक्क हाँस्दै जबाफदिइन्‌, &#039;धन्यवाद !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले शिर झुकाएरै भन्यो, &#039;मलाई माफ त दिनुहुन्छ हैन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;तपाईंले जे देख्नुभयो त्यही मन्ुस्ी भयौ । मान्छैले आँखाले देखेको कुरा भन्नैन हो । माफ मान्नुपर्ने कुनै कारण नै छैन ।&#039; फिरोज कुरा बढाउन चाहन्थ्यो ।शालुले फिरोजको अनुहारतिर हेर्दै भनिन्‌, &#039;कृपया पछि कुरा गर्नुहोला, अहिलेलाईम काममा व्यस्त छु।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोज अँध्यारो मुख लगाएर त्यहाँबाट हट्यो । उसले चित खायो, आफनोसुन्दर अनुहार र सुन्दर जिउडाल देख्दा पनि शालुले कुनै प्रतिक्रिया नजनाएकोदेख्दा । सुजन भनै मनमनै फिरौजको आकृति देखेर रमाउँदै सोचिरहेका थिए,“सँ म जस्तो कोही छैन भनेर घमण्ड गर्थिस्‌ । देखिस्‌ तँ जस्तालाई मेरीदिदीले कसरी आफूबाट टाढा भगाइन्‌ । अब त तेरो सेखी फप्यो होला नि !तैँले मेरी दिदीलाई अरू जस्तै तेरो रूप देख्नेबित्तिकै लट्टिने भन्ठानेको थिइस्‌होला, देखिस्‌ हैन ? मेरी दिदीको व्यवहार मुल्ला फिरोजे ।&lt;br /&gt;
&#039;किन फिरोज तिमी त चूक घोप्टाएजस्तै अनुहार लिएर आयौ । भ्यागुतीलेपत्याइन कि कसो ?&#039; युवतीहरूले फिरोजको बरिपरि झुम्मिँदै भने ।&lt;br /&gt;
फिरोजले रिसाएको स्वरमा भन्यौ, &#039;चुप लाग, कति दिन यो फिरोजेकोअगाडि चुरीफुरी देखाउँदिरहिछे हेरौँला नि । आमाबाबुको ताल त्यही हो । नशालागेपछि पेटिकोट खुस्केको पनि पत्ता हुँदैन, छोरी भने मै हँ भन्छे । म त्यसलाईकाँच्चै चपाउन पाए पनि चपाइदिन्थेँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;जाकैँ आज तपाईंलाई धेरै पीर परेको छ। अफिमको नशामा रमाङैँ ।अफिम त छ होइन ? तपाईँको घरको खाली कोठामा मान्छे आए कि आएनन्‌नत्र अस्तिझैँ त्यहीँ बसौंला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले दाह्रा किटदै भन्यो, &#039;प्लिज मलाई एकछिन एकान्तमा छौडिदैक ।म त्यसलाई पासोमा पारेर बजार्ने उपाय सोच्छु । बजार्न पनि यसरी बजार्छु किठहरै पार्छु राँडलाई । हेरन हाँसेको कट हाँसेजस्तो, मुख हेरन राँडको हकिचिलको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जस्तो, अझ मै हुँ भन्छे । हेरन भनेकी पेसेवर डान्सर होइन । मैले त्यसलाईपेसेवर डान्सर बनाइन भने त मेरो नाम पनि फिरोज होइन ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;फिरोज तिमी पनि के एउटै धुनमा लागेको हँ ? आफूलाई सम्हाल ।तिमीले जति पिए पनि तिम्रो नशा बन्न हामी तयार छौँ । भूल त्यसलाई, किडान्स गरौं कि गएर अफिममा &#039;फुलौं । कि रक्सीमै झुलौं, रक्सी पनि आउँदैछ,&#039; युवतीहरूले फिरोजलाई सम्झाए । फिरोज भने शालुलाई हेर्दै दाह्रा किटिरहेकैथियौ । सबैलाई केक बाँडेपछि शालु केही खानेकुरा र एक ग्लास फेन्टा लिएरघरभित्र पसिन्‌ । फिरौजले शालुको सबै क्रियाकलाप नियालिरहेको थियो । करक्सी पिउँदै शालु वाहिर आउने प्रतीक्षामा थियो । तर, शालु सबैले डिनरखाइवरी गाइसम्दा पनि निस्किनन्‌ । उता शालु भने फेन्टा, आलुचिप्स आदिखाई पढ्न बाँकी रहेको बालउपन्यास नीलकमल पढ्दापढ्दै निदाइन्‌ । प्राय:सबै पाहना गइसकेपछि फिरोज नशामा लह्विँदै कार चलाएर घर पुग्यो । छोरासुधने आश नै मारिसकेका गंगा र रमणले छोरा आएको चाल पाए पनि चालनै नपाएफैँ गरी सुते । फिरोजले शालुको अपमान विर्सिन अफिम पियो, तरअहँ अफिमको नशामा पनि शालुलाई भुल्न सकेन । अझै अफिम पियो र मुडालडेकैँ लड्यो । भोलिपल्ट बिहान होसमा आएपछि पनि फिरोजले शालुलेआफनो वास्ता नगरेको सम्झयो । फिरोजलाई शालुको कुराले साट्दै चोटपर्नुको कारण थियौ, &#039;क जीवनमा पहिलोपल्ट नै कुनै साधारणरूपकी युवतीबाटअपमानित भएको थियो । ज्यादै सुन्दरी युवतीहरूलाई आफनौ इसारामा नचाएकोफिरोजलाई शालुको अपमात सहय भएन । गंगाले फिरोजतिर दूध बढाउँदैभनिन्‌, &amp;quot; तिमीले अब राति कहीँ जाँदा कार लिएरचाहिँ नजानू, वरुट्याक्सी चढे जानू । हिजो अगाडिको हेडलाइट फुटेछ । कार केही कुच्चिएकोपनि छ । तिम्रो प्रियसीहरूको ब्याग, पर्स, मोबाइल भने कारभित्र रहेछन्‌ ।तिमी होसमा नभए पनि तिम्रा मायालुहरू हिजो होसमा रहेछन्‌ र दुर्घटना हुनपाएन होला होइन !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आमाको बोलीले फिरोज झसङ्ग भएर सम्झयो- मैले त नशामा &#039;झुल्दैगरेका ती युवतीहरूलाई त्यहीँ छोडेर आएँछु । उफ ! मलाई के भएको होला,कसरी डेरामा पुगे होलान्‌ उनीहरू भनी तुरुन्तै फोन गरेर बुझ्यो । दीपककोड्राइभरले नै डेरामा पन्याइदिएको थाहा पायो । फिरोजको मस्तिष्कबाट शालुअफै नहटेकोले आमासँग शालुको बारेमा सोध्यो ।&lt;br /&gt;
गांगालै लामो श्वास फेर्दै भनिन्‌, &#039;ए उर्मिलाकी छौरी शालुको कुरा गरेकोतिमीले, कहाँ शालु कहाँ तिमीहरू, उनको कूरै नगर । तिमीले अरूहरू मुबतीहरूजस्तै सम्झेका होलाक शालुलाई, उनले बुझेकी छिन्‌ हीरालाई कीराले पनिबिगार्छ भन्ने कुरा । हामीले तिमीलाई जातीनजानी बिगान्यौँ । उर्मिला रदीपकको लहैलहैमा लागेकी भए शालुको पनि तिम्रै हाल हुन्थ्यो होला । उनकै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रमा बस्ने कान्छीले शालुलाई सही बाटो देखाइन्‌ । शालुले स्वयम्‌ वाबुआमालेदेखाएको बाटो छोडी कान्छीले देखाएकै बाटोमा हिँडिन्‌ । नेपाल मेडिकलकलैज जोरपाटीमा ड्वाक्टर पढ्न नाम निकालेकी छिन्‌ रे भन्ने सुनेकी थिएँ ।अव त पढ्न जाने बेला पनि हुन लाग्यो होला । भाइ बिग्रन्छ कि भन्ने अबएउटै चिन्ता छ भन्थिन्‌ रे । कृपा क्या कृपा छिमेकी नरेन्द्रबावुकी छोरी उनैकीसाथी हुन्‌ । कृपाले नै सबै भनेकी हुन्‌ मलाई । उनी सानो छँदा त सधैँबाबुआमासँग आउँथिन्‌ पार्टीहरूमा, ठूली भएपछि चट्ट बाबुआमाको साथ नैछोडिन्‌ । तिमीजस्तो अबुझलाई शालुको करा किन भन्नु ? म गएँ, भन्दै गंगाभान्सातिर प॒सिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;मेरो गोरुको वाह्रै टक्का&#039; भन्ने स्वभावको फिरोज आमाको कुरा सुनेरओइलाएको फूलझैँ भयो । सेट भन्दै मुडकीले भुइँमा हान्यो । जतिजति शालुकोसम्झनामा गहिरिँदै गयो, उत्तिउति शालुको हिजो बोलेका सबै शव्दहरू मीठोलाग्यो । शालुको आँखा-नाक-मुख-जीउडाल सबै सम्झयो । शालुको सबैचिज सुन्दर लाग्न थाल्यो फिरौजलाई । फिरोज जुरुक्क उठेर आमासामु पुग्दैशालुको करा कोट्याउन चाहयो । गंगाले फिरोजको कुराको आशय बुझेरभनिन्‌, &#039;फिरोज, तिमी ध्रर्तीमा बसेर चन्द्रमा छुने आँट नगर । शालुजस्तानारीहरू रूपलाई र घनलाई भन्दा चरित्रलाई हेर्छन्‌ । तिमी त शालुको आँखामापतिङ्गर नै हौँ । त्यो कुरा तिमीले हिजो नै विचार गन्यौ होला । शालुको सपनादेख्न छोड, हातमुख धोएर खाना खान आफ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजलाई आमाको कुरा बेठीक लागेन तर शालुलाई भुल्न पनि सकेन ।सोच्यो &#039;म शालुलाई पाउन जे पनि गर्न तयार छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बीस==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिरोजले महिनौं-महिनासम्म शालुको पिछा गर्दा पनि शालुले कुनै प्रतिक्रियादेखाइनन्‌ । घरपरिवारका मान्छेहरू र फिरोजका सुन्दरीहरू फिरोजमा एक्कासिआएको परिवर्तन देखेर आश्चर्यमा पर्नु स्वाभाविकै थियो । फिरोजका सुन्दरीहरूलेफिरोजलाई लाख सम्झाएर पहिलेकै बाटोमा आउन आग्रह गरे तर अहँफिरोजले सुन्दरीहरूको क्रा पटक्कै टेरेन । उल्टै सुन्दरीहरूलाई आफनोसामुनपर्नु भनी कडा चेतावनी दियौ । फिरोजका सुन्दरीहरू अर्कै बाटो मोड्नबाध्य भए । गंगा र रमण फिरोज एउटा खाल्डोबाट उत्रेर अर्को खाल्डोमापसेकोमा चिन्तित नै थिए । फिरोज शालुलाई नपाए आफू नबाँच्ने भनीअन्तिम 7000 थियौ । त्यसैले क एकदिन आँट गरेर शालुको सामुपुग्यो र हात भन्यो, &#039;शालु, मलाई एकपल्ट सुधिने मौका देक। मतिमीबिना बाँच्न सक्दिनँ । म तिमीले जै भन्छयौ त्यही मान्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले सम्झाइन्‌, &#039;हेनौंस्‌ फिरोजजी तपाईंजस्तो होनहार व्यक्ति बिग्रिएकोदेख्दा मलाई पन्ति पीर अवश्य लागेको थियो । तपाईं सृन्दर र सम्पन्न हुनुहुन्छ ।तपाइँले मजस्ता सयौँ युवती पाउनुहुन्छ । तपाईं कूनै आदर्श युवतीसँग विवाहगर्नोस्‌ । मलाईचाहिँ अहङ्कारी भन्नोस्‌ या जे भन्नोस्‌ । म प्रेम शब्दसंग नैघृणा गर्छु । तपाईँ लाख कोसिस गर्नोस्‌ एक हातले ताली चज्दैन । बिन्ती,आइन्दा प्रेम भन्नै शव्द मैरोसामु बिर्सेर पनि नओकल्नुहोला&#039; भन्दै रिसाउँदैशालु आफनो घरतिर आइन्‌ । फिरोज हेरेको हेरै भयो । आँखाबाट बलिन्द्रधाराआँस्‌ झार्दै घाइते सिंहझैं भई घर आयो । आफू बिग्रिनुको जिम्मेवार स्वयम्‌आफैँलाई नै ठहस्यायौ । बाँकी जिन्दगी कसरी काट्ने सोच्नै सकेन । फिरोजखानु न खुदनु इन्तु न चिन्तु प्यो । गंगा एकपल्ट शालुलाई सम्झाउने निर्णयलिँदै शालुको घरमा पुगिन्‌ । शालुले गंगालाई बैठकमा वस्न आग्रह गर्दै भनिन्‌,&amp;quot;हजुरले यसो फोन गरेर आइस्या भए हुन्थ्यो । ममीपापा होइसिन्त ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गंगाले भरिएको आँखालाई ओमभातौ पार्दै भनिन्‌, &#039;म तिमीलाई नै एउटाबिन्ती गरौं भनेर आएकी हँ । के गरौं म छोराको मायाले अलि स्वार्थी भएँ ।फिरौज नशा, सुन्दरी सवैलाई छोडेर तिम्रो मायामा तड्पिन थालेको छ, । थुप्रैदिन भयो उसले एक गेडा अन्त पनि निलेको छैन । नानी ! त्यो हाम्रो एकमात्रटेक्ने वैशाखी हामीलाई दान देक । नफुली नै ओइलिसकेको फिरोज पुनः फुल्नैरहर बटुल्दै छ । साँच्चै भन्दा यहाँ आउने आँट त थिएन । फिरोजको बाबुलेपनि एकपल्ट शालुसँग फिरीजको जीवन माग भनेर पठाउनुभयो, त्यसैलेआउन बाध्य भएँ&amp;quot; भन्दै गंगा रुन पौ थालिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु अलमल्ल परिन्‌ र मनमनै सोचिन्‌, &#039;त्यो डालीडाली चहार्ने भमरामलाई चार-पाँच वर्ष पर्खिन अवश्य सक्दै-सक्दैन । मेरो सानो झूटले गर्दायिनीहरू खुसी हुन्छन्‌ भने झुट बौल्नु कुनै अपराध हुँदैन भन्ने सम्झी भनित,&#039;आन्डी नरोइस्यो, यदि फिरोज मलाई साँच्चै माया गर्छन्‌ भने म डाक्टर पढेरआउँदा उनले पढ्दापढ्दै छाडेको इन्जिनियर पूरा गर्नुपर्छ भनिदिसैला । अर्कोकरा प्रेममा छोइछाई, ख्यालठट्टा, भेटघाट मलाई मन नपर्ने कुराहरू हुन्‌, त्योपनि भनिदिसेला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गंगाले खुसी हुँदै भनिन्‌, &#039;नानी ! म तिम्रो यो गुन कहिन्यै भुल्ने छैन ।मलाई जहाँसम्म लाग्छ फिरोजले तिम्रा सारा सर्त मान्नेछन्‌ । अन मेरो घरपनि स्वर्ग हुन्छ । नानी, सबैजना खुच्चिङ भन्दै थप्पडी मार्थे । अब मैले पनिशिर ठाडो गरेर हेर्न पाउने भएँ । सायद तिम्रो जन्म नभएको भए हामी जिउँदैगर्ने थियौं । म तिमीलाई सधैँ पूजा गर्छु शालु सघैँ पूजा... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हजुरले मलाई त्यति माथि नउटाइस्यो । फिरोज केही गरी राम्रो हुनुभयोभने मात्र मलाई धन्यवाद दिसेला । म पर्सि नै होस्टेल जाँदैछु, किताबहरू अफ्ैकिन्नु नै छ । हजुर आएर मात्र म रोक्किएकी हुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गंगाले चिया पिउँदै भनिन्‌, &#039;चिया ल्याइहाल्यौ, चिया पिएर संगै निस्कौंलाहुन्न ?&#039; शालु स्वीकृतिसूचक मुन्टो हल्लाएर कपडा लाउन गइन्‌ । कपडालाएपछि गंगा र शालु नै घरबाट निस्के । गंगा खुसीले फुरुङ्ग हुँदै घरतिरलागिन्‌ भने शालु पुस्तक पसलतर्फ लागिन्‌ । किताव किनेर घर फर्केको केहीक्षणमै फोन आयो, शालुले फोन उठाइन्‌, फोन फिरोजकै थियो । फिरोजलेबडो हर्षित स्वरमा &#039;आफू पढ्नै र सात जन्म पनि तिमीलाई कूर्न सक्छु शालु&#039;भन्यो । आफनो ममीपापा र आफू नै खुसीले रमाइरहेको कुरा बतायो । शालुलेआफू पनि खुसी छु भनी पुनः अर्को झूट बोलेर फोन राखिदिइन्‌ । फोनराखेपछि मतमत्तै सोचिन्‌, मैले जे गरें ढीक गरेँ, सर्प पति मर्ने लट्ठी पतिनभाँच्चिने । जवानीकै माया गर्ने त्यो निच प्यासीले पनि प्रेम गर्ने रे । उफ !प्रेम शब्दलाई फिरोजजस्ताले ज्यादै सस्तो बनाइदिए । सुजन आजसम्म पनिफर्केनन्‌ । उन्ती बिग्रिए भनै म कसरी बाचौँला ? ममीपापाको भित्री मनशायसुजनलाई आफनो रङ्गीचङ्घगी दुनियाँसँग घुलमिल गराउनु हो । उनीहरूसोच्छन्‌ पैसाले छोरालाई ठूलो मान्छे बनाउन सकिन्छ । ममीपापाले सुजनलाईआफूहरूबाट अलग्याउँछै भन्ने सोचेर जानीजानी घर नफर्किनुभएको हो ।जन्मदिनको भोलिपल्ट नै अलइन्डिया टुरमा जाने क्रा रहेछ, त्यो कुरा नभाइलाई थाहा थियो न मलाई नै । सुजनलाई ममीपापाले मेरोसामु पर्नसम्मदिनुभएन । उहाँहरूलाई भाइको जिन्दगीभन्दा आफ्नै स्वार्थ प्यारो भयौ । शालुकेही कुरा सोच्न नसकी लम्पसार परेर सुतिन्‌ । अँघ्यारोलाई चिर्दै मुख ढाकेरविभिन्न परिकारहरू लिई आफूतो कोठामा पसेकी कान्छीदिदीलाई देखेपछिशालु कान्छीको काखमा पल्टेर धेरैबेर रोइन्‌ । कान्छी पनि रोइन्‌ । कान्छीलेशालुलाई मायाले कपाल सुम्सुम्याउँदै भनिन्‌, &#039;अव नरोइस्यो, हामी सबैलेदेखेको सपना साकार भयो । बरु छिटो खाना खाइस्यो । दाइले ट्याक्सीमैमलाई पर्खिनुभएको छ । दाइ, मोनालगापत सबैलै हजुरलाई सम्झेका छन्‌ ।रोहिणी मैयाँसापचाहिँ भोलि हजुर जाने बैलामा आइसिन्छ रै ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले आँसु पुछ्दै सबैलाई सोधित्‌ । कान्छीले सबैको हालखबर राम्रैभएको बताइन्‌ । वीरुले नाम फेरेर सौरभ राखेको क्रा बताइन्‌ । रौमाकान्त रमोनाको सुखी जीवनबारे पनि बताइन्‌ । प्रशन्नको राम्रै खबर छ भनेर पनिबताइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु उठेर कान्छीको हात मुसार्दै भनिन्‌, &#039;दिदी मलाई अब एउटै चिन्तासुजनको छ । उसलाई ममीपापाले बिगारेरै छोडनुहन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
“मैयाँसाप हजुरले पीर नगरिस्यो । फिरोजको त्यो ताल देखेपछि सबैलेछोराछोरीलाई बढी पुलपुल्याउनु हुँदैन भनेर चेतिसके । डाक्टर पुष्कर भट्टकोक्रा पनि उनीहरूलाई थाहा नै होला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;कस्तो कुरा दिदी ?&#039; शालुले प्रश्न गरिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हजुरलाई थाहा छैन ? विवाह गरेकी श्रीमती सभ्य भइन भनेर कुन चाहिलाईफेरि विबाह गरेछ । आफनो सरुवा भएको ठाउँमा त्यसैलाई लिएर गएछ । त्योआइमाई प्रोजेक्टका लागि आएको अस्ट्रेलियनसँग अस्ट्रेलिया भागेपछि, अहिलेपहिली श्रीमतीसंगै छ, छौरा पनि दुई-तीन वर्षकै भइसकेछ । डा. भट्टकीश्रीमती भन्दै थिइन्‌, &#039;डा. भट्टले रक्सी, पार्टीसाटी सबै छोडे रे । उनलाई पनिअसाध्यै माया गर्छन्‌ रे ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले सन्तोषको हाँसो हाँस्दै भनिन्‌, &#039;भट्टकी श्रीमतीको कुरा सुन्दा साह्रैखुसी लाग्यो । दिदी तपाईं नै भन्नोस्‌ त अरू खुसी हुन्छन्‌ भने झूट बोल्नु हुन्छहोइन ? तपाईं पनि मलाई खुसी पार्न धेरै &#039;फूट बोल्नुहन्थ्यो । ममीले गालीगरेर शँदा आंखामा धूलो परेर आँसु झारेकी भन्नुहुन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले अलि डराउँदै भनिन्‌, &#039;फेरि हजुरले कोसँग &#039;फूट वोलिस्यो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले गंगा घरमा आएको फिरोजले आफूलाई प्रेस गर्छु भनेको सबै कुराकान्छीलाई बेलिबिस्तार लगाइन्‌ र शालुले आफूले फिरोजलाई माया गर्छु भनेरझूट बोलेको कुरा पनि बताइन्‌ । कान्छी शालुको कुरा लु खडो चिन्तितबनिन्‌ । शातुताई ई के भन्नै के नभन्ने सोच्नै सकिनन्‌ । थुप्रे हिउँद बिताएकीकान्छीले अनुमान गरिन्‌ । फिरोजले वास्तवमै प्रेमको मूल्य बुझेकैहुनुपर्छ । शालु मैयाँसापलाई फिरोजको माया साँचो हो भनौँ भने चोट पर्ला ।फिरोजको माया झुटो हो भनेर पनि कसरी भनौँ !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दिदीले कै सोच्नुभएको ? फिरोजको बारेमा सोच्नुभएको हो भने अहिल्यैत्यौ फिरोजेको करालाई मस्तिष्कबाट निकालिदिनुभए हुन्छ । त्यो गुन्डोलाईतपाईंले मैले चिनेकै हौँ । मैले त बिचरी गंगा आन्टीको आँसुको मान मात्रराखिदिएकी हुँ । त्यस्ता लफङ्गाले प्रेमको मूल्य बुझ्यो भने त यो पृथ्वी नैपल्टिन्छ हैन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले हांसेजस्तो गरी भनिन्‌, &#039;हजुरले ठीक नै सोचिस्यो । त्यो प्रेमी हुनैसक्दैन तर हजुरले कसैलाई मन पराउन लाइस्यो भने पहिला मलाई भनिसेलानत्र म रिसाउँछु । हात्तीको चपाउने दाँत बेग्तै, देखाउने दांत वेग्लै हुन्छ ।मान्छेलाई पनि बाहिरबाट चिन्न सकिँदैन । अझ अर्को कुरा, हजुरले आफनोविवाहका लागि केटा खोज्ने जिम्मा मलाई नै दिस्यो भनै म झनै खुसी हुन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीको गालामा म्वाइँ खाँदै भनिन्‌, &#039;ल मैले त्यो जिम्मा तपाईंलाईनै दिएँ। म दिदीले जोसँग भन्नुहुन्छ त्यहीसँग विवाह गर्छु नत्र कुमारी नैबस्छु।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“&#039;शालुको कुराले कान्छीको आँखाबाट हर्षको आँसु झन्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले ढोका खोलेर पलङ्गमा बस्दै भनिन्‌, &#039;ल हैर यी आमाछोरीकोरुवाबासी । तपाईंहरूको के कुरा हुँदै थियो ? म कवाफमा हड्डी त बनिन ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले आँस्‌ पुछ्दै भनिन्‌, &#039;हजुरसँग लुकाउनुपर्ने करै के छ र ? हजुरलेभौलि जान्छु भनिसेकोले म एक्लै आएकी ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रौहिणीले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;दिदीले मीठोमीठो पकाएर ल्याएको थाहा पाएपछिदौडिहालेँ । हेर मोरी तैँले गर्दा हाम्रो घरमा पनिर पाक्दैन । आलुको अचार प्राय:बन्दैन । दिदी भन्नुहुन्छ, आलुको अचार र पनिर देख्यो भने मलाई शालुमैयाँको याद आउँछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीको कुराले शालुको मन भरिएर आयौ । पुन: एकैछिन वातावरणमौन भयो । रोहिणीले भनिन्‌, &#039;दिदी दाइ त बाहिर ट्याक्सीमा आनन्दलेनिदाउनुभएको छ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले उठ्दै भनिन्‌, &#039;शालु मैयाँ राम्रोसँग पढिसेला, आफनो स्वास्थ्यकोख्याल राखिसेला म गएँ पनि ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु कान्छीको पछिपछि गेटसम्म आइन्‌ तर दुवैको औठ चल्त सकेन ।कान्छी रुँदै बाटो लागिन्‌, शालु रुँदै कोठामा आइन्‌ । रोहिणीले बडो गम्भीरभएर भनिन्‌, &#039;साँच्चै माया भनेको गजबकैँ हुँदोरहेछ, । त्यसैले त मान्छेहरूभन्दारहेछन्‌- संसार प्रेममै अड्भेको छ । कान्छीदिदीकी तँप्रतिकौ माया त झन्‌अपारकैँ छ । अरूले चिन्लान्‌ कि भनेर मुख छौँपेरै भए पनि आउनुभयो । दिदीभन्दै हुनुहुन्थ्यो- शालु मैयाँसापको घरको काम गर्ने अहिले घर गएको छ रे ।म दिदीको कुरा सुनेर छक्क परेँ, सोचेँ शालुको घरमा को काम गर्ने आएछफेरि ? पछि बूझिहालेँ तैँले दिदीले पीर गर्नुहुन्छ भनेर घरमा काम गर्ने छभनेकी होस्‌ । भाँडा माझने, घर पुछ्ने त आउँछिन्‌ नै होला होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;अँ आउँछिन्‌ । आज बिहान भने दुध तताएर पनि दिइन्‌ । खाना पकाउनजाँगर लागेन, एउटा चाउचाउ उमालेर खाएँ । छोड्दे सानातिना क्रा, भन्‌प्रशन्नजीको हालखबर के छ ! तैँले आज केही हाँसेजस्तो गरिस्‌ मलाई ज्यादैखुसी लाग्यो ।&#039; त&lt;br /&gt;
“तैँले भनेकी होइनस्‌ हेर रोहिणी, तँ अरूको खुसीको लागि पनि हाँस्‌ । तेरोबाबुआमाले केवल तेरो खुसीका लागि अर्काको छोरामाथि ठूलो लगानी लगाएकाछन्‌ । त्यस्ता बाबुआमाको मन नदुखा । हामीलाई पनि तेरो अँध्यारो अनुहारदेख्दा पीर पर्छ भनेकीले हाँसेजस्तो गरेकी छु । नत्र तेरो लम्बेचौड्े भाषण सुन्नपरिहाल्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ल तैँले जे गरिस्‌ राञ्चै गरिस्‌ । अब हामी सबैको खुसीका लागि कुनै पनिएक विषयमा डिग्री गरिदिक मैयाँ । अलिकति मोटाइदेङ त्यति भए पुग्छहामीलाई । आजकाल तँ बाबुआमाको अगाडि मुर्दाजस्तै हुन्नस्‌ होला नि कि&lt;br /&gt;
कैले सम्झाएपछि आजकाल मैले आफूलाई वाँधैकी छु । मलाई खुसीझैँ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देखेर ममीवावा पनि खुसी नै हुनुहुन्छ । कति पत माल मेरो त्यसको तलेखाजोखा नै छैन शालु । कसरी चार-पाँच वर्ष वताउनु सम्झँदा मात्र पनिअत्यास लाग्छ । तैँले प्रेम नगरेर ठीक नै गरिस्‌ । प्रेमको पीडाले त मान्छेलाईसखापै पार्दारहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
“प्रेम गर्नेहरू सबै तँजस्ता कहाँ हुन्छन्‌ त ? देखिनस्‌ मौसमीको प्रेम कसधैँ प्रफुल्ल देखिन्थी । तँ भने सधैँ मरेको विरालो काखी च्यापेर थिमी जानेबाटो कता भन्ने जस्ती छैस्‌ । तैँले पढाइमा ध्यान दिइस्‌ भनेचाहिँ समयबिताउन सजिलो हुन्छ । अर्को कुरा तँ इन्जिनियर सापको श्रीमती बन्न लायकहनुपप्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोहिणीले शालुको कुरामा सहमति जनाइन्‌ । दुवै मीठोसँग खानेकुरा खाईसुत्न भनेर लागेका थिए । फौन आयो । शालुले फोन उठाइन्‌ । केही बेरकोकराकावीपछि फोन राखिदिइन्‌ । उर्मिलाले होस्टेल जाँदा डेरामा यस्नैलाईढोकाको चावी छोड्नु भन्नका लागि फोन गरेकी रहिछिन्‌ । शालुकी ममीकोकुरा सुनेपछि रोहिणीलाई ज्यादै नमज्जा लाग्यो । रोहिणीले महसुस गरिन्‌- मैलेतपस्या गरेरै बाबुआमा पाएकी रहेछु । गाइन ई भने आमाको कराले खासैदुःखेन । चुगगको भने चिन्ता लाग्यो । कूरा गर्दै निदाए । भोलिपल्टरोहिणीले नै शालुलाई होस्टैलसम्म पुन्याएर गड्न्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==एक्काईस==&lt;br /&gt;
“आकाश तिमीले त महाराजगन्जमा पनि नाम निकाल्न सक्ने मान्छे, फेरियहाँ किन पढ्न आएको ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(तिमी यहाँ पढ्दैछयौ भन्ने बाहा पाएर मैले पनि यहीँ पढेको हुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले हांस्बै भनिन्‌, &#039;तिमीलाई जोक गर्न त कसले सिकाओस्‌ ? तिमीलाईयहाँ देखैरचाहिँ साह्रै खुसी लाग्यो, प्राय: सबै काठमाडौंबाहिरकै रहेछन्‌ । हामीलाईत मान्छे गन्दैनन्‌ । हामीले राम्रो पढेर काठमाडौंको इज्जत राख्नैपर्छ, नत्र हेप्नुहेप्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आकाश केही बोल्न नसकी आफनो रुमतिर लागे । शालु आफनो रुममाआइन्‌ । क्रमश: दिनहरू बित्दै गयो । शालु र आकाशको भेट हुन्थ्यो । पढाइकैवारेमा कुरा हुन्थ्यो र टुड्गिन्थ्यो । शालुलै डाक्टर पढ्न थालेको पनि तेस्रो वर्षपूरा भएर वर्षमा लाग्यो । कलेजमा प्रेम गर्नेहरूको लहर नै चलेकोधियो । शालु आफू निष्फिक्री भएकोमा दङ्ग थिइन्‌ । अरू साथीहरू भनेशालुलाई नपुड्सकको सङ्जञा दिँदै भन्थे, &#039;शालु हामी पनि तँजस्तै नपुड्सक हुनपाएको भए हुन्थ्यौ । न त तँलाई कनै केटाको चासो छ । त॑ नपुङ्सक भएरै धेरै&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पढ्न सकेकी होस्‌ । नपृड्सकहरूलाई त वैंसले पनि कुनै असर नगर्ने रहेछहगि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गालु साथीहरूको कुरालाई हाँसोमा उडाइदिन्थित्‌ । शालुले नपुड्सक भन्दापनि कुनै खण्डन नगरेकी हुनाले साँच्चै शालुलाई सवैले नपुड्सक नै ठान्तथाले । शालु नपुड्सक भन्ने कुरा एक कान दुद कान गर्दै सबै केटाहरूले पनिथाहा पाए । शालुलाई मन पराउने दुई-चार केटाहरू त आफसेजफ सावधानभए । आकाशको हृदयमा भने गहिरो चोट लाग्यो । आकाश शालुलाई स्कूलेजीवनदेखि नै मन पराउँथे । शालुकै लागि सप्तरङ्गी सपनाहरू सजाउँथै ।शालुकै मायामा एक्लैएक्लै रुन्ये । तर शालुसामु पुगेपछि भने प्रेमका क्राहरूगर्न सक्दैनयै । त्यसैत्यसै डराउँथे आकाश । आकाशको भित्री मनले सोच्ये-एकदिन न एकदिन शालुले मेरो आँखाको भाषा बुझिछन्‌ । आकाशको त्यो रहररहरमै सीमित भयो । आकाशले पनि यही सोचे- शालुले मेरो वास्ता नगर्नुकोकारण त उनी नपुइ्सक भएरै पो रहेछ । कठै मैरी शालु, एक्लो जिन्दगी कसरीकाटछिन्‌ ? म शालुबिनाको जिन्दगी कसरी काटौँ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आकाशले शालुकै बारेमा सोच्दासोच्दै मनलाई बसमा राख्न नसकेर धेरैसमय बेचैन वने । सबै विद्यार्थी भने शालुलाई देखेपछि मुखामुख गर्थे । शालुलाईआफनो अपमात गरेकोमा पटक्कै चिन्ता थिएन । उनी चिन्तित हुन्थिन्‌ तकेबल सुजन र रोहिणीको पीरले ।&lt;br /&gt;
यता दौलतको विशाल समुद्रमा छलाङ मारिरहेको सुजनले पढ्नुलाई बोफखन्दै गए । सुजन पहिला रक्सीको नशामा रमाउन थाले । विस्तारै सङ्गतडुग्स खाने जमातसँग भयौ । रामै डुगिस्ट बने । ठूलो समुद्वबाट एक लोटापानी झिक्दा पत्ता नपाएझँ दीपक उर्मिलाले पनि दराजबाट पैसा हराएकोचाल नै पाएनन्‌ । एक दिन डुृग्स खान पैसा नपाएपछि सुजनले आमाको दुईतोलाको सुनको चुरा नै चौरै । चुरा चोरीको दोष उमिंला र दीपकले एक्काईसवर्षको घरमा काम गर्ने कान्छालाई लगाए । कान्छाले आफू चोर नभएको दावीगर्दा पति साफसँग पिटी घरबाट निकालिदिए । विनादोष नै सजाय पाएपछिघरमा कोही नभएको मौका पारी आई त्यही कान्छाले पन्धर-बीस तोला सुनकागहना र करिव पाँच सात लाख रुपैयाँ सबै चोरी इन्डियातर्फ टाप कस्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आधा रातमा रक्सीको नशामा झुम्दै आएका उर्मिला र दीपकले पहिला तसबै ढोकाहरू सृजनले नै खोलेको ठाने । कोठामा पसेपछि दुवैको सातो गयो ।दुवैले खोलिरहेको दराजलाई देखेपछि चोरी भएको ठहर गरे । डेरामा बस्नेहरूसँगसोधखोज गरे । कसैले पनि कसले कन बेला चोच्यो भन्नै कुरा थाहा नभएकोभन्ती बताए । चौरी भएको क्रा हल्लीखल्ली भयो । पुलिसहरू पनि आए, चोरपत्ता लगाउन आश्वासन दिएर गए । जीवनमा पहिलोपल्ट परेको चोट दीपकर उमिलालाई नै सहन गर्न गाह्रो भइरहेको थियो । त्यत्तिकैमा आश्वासन दिन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आएकामध्यै एउटा छिमेकीले प्वाक्क भन्यो, &#039;सर ! चोर वाहिरको नभई घरभित्रकैपनि हुन सक्छ । या कि सुजन वाव्‌... ।&#039;&lt;br /&gt;
छिमेकीको क्रा सुनैर दीपकले सातो खाउँलाझैँ गरी भने, &#039;मुख सम्हालेरबोल्नोस्‌, दामौदरजी, मेरो छोरा लाखमा एक छ, बुझनुभो ? क भोलिकोपाइलट हो, पाइलट... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दामोदरले व्यङ्ग्य हाँसो हाँस्दै भने, &#039;चङ्गा उडाउनै पाइलट कि प्लेनउडाउने पाइलट हँ ? तपाईँले साँच्चै थाहा नपाउनुभएको हो कि बुझपचाउनुभएको हो ? सुजनवाबुले त झन्डै मेरो छोरालाई पनि बिगारिसकेकाथिए । म पनि खान्दानी मान्छेको छोरा त्यसमाथि शालु जस्तोको भाइ राम्रैहोलान्‌ भनेर मख्ख थिएँ । धन्न मैले बेलैमा थाहा पाएर सुजनको सङ्गतछुटाइहालेँ । दिदी भने पण्डित भाइ भने महाखण्डित पो रहेछन्‌ । देखैजानेकोभनिदिएँ रिसाउनीस्‌ या खुसाउनोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दामोदरको करा सुनेर सबै छिमेकीहरू शिर झुकाएर निहुरिरहे । सबैलेजिउहजुर भन्ने छिमेकीको अगाडि आफू अपमानित हुनुपर्दा उर्मिला र दीपकरिसले आगो भए । उमिंलाले दामोदरलाई खाउँलाझैँ गरी भनिन्‌, &#039;तँ पाजी दुईपैसेले काठमाडौंमा एउटा झुपडी बनाइस्‌, तँलाई के-कै न भयो होइन ? यस्तोदुःखको बेलामा तँ यही भन्न यहाँ मरेको ? जा गइहाल्‌ मेरो सुधो गाईज्ञस्तोछोरामाथि झुटो आरोप लगाउने पाजी ।&#039;&lt;br /&gt;
पबाएको विष पो लाग्छ, नखाएको विष त लाग्दैन&#039; भन्दै दामोदर हिँडै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दामोदर गएपछि जम्मा भएका छिमेकीहरूले दामोदरलाई नै गाली गरीखनखाँचोमा काम लाग्ने दीपककै पक्ष लिए । दीपकले मनमनै दामोदरकोउठिबास लगाउँछु भनी सङ्कल्प गरै । अनि छिमेकीहरूलाई आफनो छोरी रछोरा दुवै समाजको प्रतिष्ठित व्यक्ति हुनेछन्‌ भन्ने कुरा गर्दै थिए । सुजनपाइ्लै बर टेक्न नसक्ने गरी हल्लँदै आएर लर्खराएको स्वरमा भने, &#039;ममीपापा केभयो ? किन मान्छेको भीड हँ ?&#039;&lt;br /&gt;
सुजनलाई देखेपछि दीपक र उर्मिलाकै होस उड्डयो । छिमेकीहरूले अबदीपकको घरमा बस्न ठीक छैन भन्ने ठानी अब जान्छौँ भनी सबै आ-आफूनोघरतर्फ लागे । सुजनको चरित्र राम्रो छैन भन्ने थाहा पाउँदापाउँदै पनि सुजनलाईराम्रो छ भनी चैपारो घस्नेहरूको मनमा केही नराम्रो त लाग्यो नै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यता दीपक र उर्मिलाले सुजनको त्यो हाल देखेर आफनो भाग्यलाईधिक्कारे । दीपकले आँसु पुछ्दै भने, &#039;तिमी त हामीसँग हिँड भन्दा भन्थ्यौँ-पापा म पाइलट बन्छु । त्यसैले राति अबेरसम्म ट्युसन पढ्न जान्छु । यही होतिमी ट्युसन पढेर आएको ?&#039;&lt;br /&gt;
सुजनले उभिन नसकी भुइँमा थ्याच्च वस्दै भने, &#039;कुल, पापा कुल, हजुरहरूले&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अलिआलि पिउने बानी लगाइदिस्यो । आज मैले अलि धेरै पिएँछु माफ गरिसेला ।घरमा चाहिँ किन भीडभाड थियो हँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले रुँदै भनिन्‌, &#039;घरको सम्पूर्ण नगद, सुन चोरी भएछ । यत्रो चोटपरेको दिन तिम्रो यो हालत देख्दा... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;ममीपापा हजुरहरूले दिदीलाई ननिकालेको भए यो दिन देख्नै पर्दैनथ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिला चिच्याइन्‌, &#039;हामीले निकालेका हौँ र तेरीवजैलाई, त्यही शालुलेनिकालेकी हो । शालुले ननिकालेक्की भए त्यो कहाँ निस्किन्धी र ?&#039;&lt;br /&gt;
सुजन जबर्जस्ती उठ्दै भने, &#039;हत्‌ ममी पनि, हजुरले साह्रो बदनाम गरेरनिकाल्ने योजना बनाएको थाहा पाएरै शालुले दिदीलाई निकालेकी हुन्‌ । शालुचाहन्थिन्‌ दिदी खुसी होकन्‌ । उनी आफनो मायामा नतडपिजन्‌ । चन्द्रकान्तदाइसँगै विवाह गरून्‌ । ती सब त बनिबनाक नाटक थियो । थाहा छ दिदीलेत चन्द्रकान्त दाइसँग विवाह गरेर छौरा पाइसक्नुभयो । दिदी शालुकै साथीरोहिणीको घरमा बुहारीझैं भएर बस्नुभएको छ । दिदीले मलाई हेर्न मन लाग्योभनेर डाक्नुभएकोले म र शालु गएका थियौँ । अँ साँच्चि, मामाघरको हजुरआमापनि भनिसिन्ध्यो- बाबु, तेरी आमाले ककरकाटी बिरालोलाई पोस्नै कामगरिन्‌ । कान्छीको पछुतो लाग्छ बा, यो जमानामा कान्छीजस्ती मान्छे कहाँपाउनु ?&#039; सुजन नशाको सुरमा सबै यथार्थ बकी लर्खराउँदै आफनो कोठाभित्रपसे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपक र उर्मिला पनि केही बोल्न नसकी कोठाभित्र पसे । आंखाबाटबलिन्द्रधारा आँसु &#039;फारे । दुवैको आँखामा कान्छी नाचिरहिन्‌ ।&lt;br /&gt;
दीपकले धेरैबेर रोएपछि भने, &#039;उर्मी, दालमा केही कालो छ भन्ने त मलाईपहिल्यै थाहा थियो । हुन पनि तिमीले कान्छीलाई शत्रुलाई नगर्ने व्यबहारगन्यौ । आज यो दुर्दिन देख्नुपन्यो । धन, पैसा त चौरी भयो केही थिएन पछिपनि कमाउन सकिएला, दामोदरले भनेझैँ सुजन मक्किसकेछन्‌, तिमी आमाभएर पनि थाहा पाइनौ ? उर्मी तिमी कस्ती आमा हौँ हँ : आज दामोदरजस्तोभुसुनाले पनि हामीलाई लात माय्यो । यत्रा छिमेकीहरूको अगाडि शिरझुकाउनुपच्यो । भोलिदेखि यही समाजमा कसरी आफनो रूप देखाउनु : तिम्रैकारणले गर्दा मैले आफनै छोरीलाई पनि शत्रु ठाने । सायद शालु सुजनलाईजीवन के हो बुझाउन चाहन्थिन्‌ । हामीले शालु र सुजनलाई भेट्नसम्म नदिईबार लगायौ । म तिम्रो लहैलहैमा लागेँ । अब सुजनलाई के बनाउने तिम्रोजिम्मा । सुजन बिग्रिएको म हेर्न सक्दिनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले ओछ्यानमा पन्टँदै भनिन्‌, &#039;हजुर पढलेखेको मान्छेले नै उसलाईतह लगाइस्यो । मैले भनेको उनी टेदैनन्‌ । छोरीलाई मैले ज्ञानी बनाएँ, अबछोरालाई सपार्ने जिम्मा हजुरको ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपकले लोप्पा खुवाउँदै भने, &#039;इस्‌ तिमीले शालुलाई राम्रो बनायौँ !&#039; &#039;कामगर्ने कालु जस पाउने ढेडु ।&#039; कान्छी नभएको भए शालुको गति पनि सुजनकोजस्तै हुनेरहेछ । अव सुजनलाई कलतबाट छुटायौ भने तिमीले शालुलाईबनाएको ठहर्छ नत्र ..... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;कै नत्रसत्र त्यो मेरो मात्र छोरो हो र : यो घरमा म मात्र थिएँ र ?&#039; उमिंलाच्याट्टिन्‌ ।&lt;br /&gt;
दीपक सिङ्गै बोतलको रक्सी तन्काउँदै कूर्लिए, “चुप लाग पाखिती, घरमाकोही छैन भन्ने थाहा पाएपछि खाल बस्न नगएको भए घरमा चोरी हुँदैनथ्यो ।आमा मैखाकीले छोरो कुनबेला कुन हालतमा घर आउंछ भनेर कहिले हेरिस्‌ ?अझ मुखमखै लाग्छेस्‌ ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बिबाह गरेर ल्याएको वीसौं वर्षपछि पहिलोपल्ट नै दीपकले गाली गरेकाथिए । त्यसैले उर्मिलाको हृदयमा दीपकको गाली बज्चको वाण लागेझौँ भयो ।उमिंला रक्यीको बोतल समातेर रुँदै बैठक कोठामा आई घटघट रक्सी पिईछटपटाउन थालिन्‌ । दीपक र उर्मिलाले सारा रात छटपटाउँदै रुँदै सिरानीभिजाउँदै कटाएँ । भोलिपल्ट बिहान दुवै सकिनसकी उद । दीपक र उर्मिलाएक-अर्कासंग बोल्न सकेनन्‌ । उर्मिलालाई नजानिँदो पाराले चक्कर लागिरहेकोथियो । दीपक विहान खाली पेटमा नै रब्सी पिई के सुरमा कान्छीलगायत युप्रैकाम गर्नेहरू सुतेको कोठामा पसे । आँखा टिनको बाकसमा पस्यो । के रहेछवाकसमा भनी बाकस खोलेर हेरै । वाकसमा शालु र सुजन बिरामी हुँदाजँचाएको कागजको चाङले लगभग बाकस भरिएको थियो । त्यतिमात्र नभईफलानो समय फलानो बाँणाको बन्दकी राखेको औंठीको विल, फलानो समयमाफलानो बाँणाको बन्दकी राखेको तिलहरीका बिलहरू पत्ति प्रसस्तै थिए ।दीपकले क्राकै प्रसङ्गमा उमिंलाले आफनो साथीहरूसँग छाँद्ने गरेको गफसम्झै । &#039;तिमीहरू आफनो बच्चालाई त्यति ध्यान दिँदैनौ होला अनि बिरामीपरिरहन्छ नि । मैरौ शालु र सुजन त विरामी भएको पत्तै छैन । उनीहरूबिरामी भए भनेर आजसम्म एक रुपैयाँ खर्च भएको छैन हगि हजुर ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हो उर्मीले ठीक भनिन्‌ । आजसम्म विरामीका लागि चाहिँ बजेटछुट्याउनुपरेको छैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतीतका कुरा सम्झेर भक्कानिएर रुदै बाकस नै बोकी उर्मिलाको सामुबाकस लगेर फयाँक्दै भने, &#039;हेर पखिती, तैरा छोराछौरी विरामी भएका रहेछन्‌कि रहेनछन्‌ थुक्क ! तँलाई त बच्चा बिरामी भएकोसम्म पत्तो रहेनछ । त॑डोकेले के बुझथिस्‌ कान्छीले सयौं पटक आफनो गहनाहरू वन्दकी राख्दै शालुर सुजनको औषधि गरेकी रहिछन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उमिलाले छरपस्ट भएका पोस्खिएको चाङ कागज देखिन्‌ र टोलाइरहिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपकले पागलभैँ हुँदै बाकसलाई लात्तीले हानेर सबै प्रेस्क्रिप्सनहरू छरपस्टपार्दै भने, तैले ठानेथिस्‌ तेरा छोराछोरी त्यत्तिकै हुर्के, प्रमाण देखिस्‌ होइनपापिनी ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिला पनि चिच्याइन्‌, &#039;आज आएर मलाई तँ-तँ र म-म पापिनी भन्छस्‌ ?म तेरो पछाडि लागेर आएकी हँ र : त॑ नै माग्न गएको होस्‌ । आधुनिकबन्नुपर्छ भनी तैँले नै रक्सी धिच्त सिकाइस्‌, मेरो के दोष हँ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;तास खेल्न मर, ब्ल्लु फिल्म हेर्न जा भनेर पनि मैलै नै सिकाएको थिएँहोला, होइन ?&#039; दीपकले भने ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दुबैको हल्लाखल्लाले सुजनको निद्रा ब्युँफियो । डेरामा बस्नेहरू पनि कानठाडो पारीपारी सुन्न थाले । सुजनले उठेर आई बाहिर निस्कदै भने, &#039;विहान-बिहानै के महाभारत हँ ? कि ममी-पापाले पार्टीमा जस्तै जुहारी खेलेको हँ ।बिहान-बिहानैं पनि जुहारी खेल्छन्‌ ! फेरि पापाले बिलनिक पो खोल्नुभयो किक्या हो : बिरामी जाँचेको प्रेसिक्रिप्सन नै ल्याइसेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपकले हकारे, “चुप लाग पाजी, हामीले तँलाई स्वतन्त्रता दिएको यही दिनदेख्नका लागि हो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाबुको मुखबाट पहिलोचोटि गाली सुनेर सुजनलाई गाली गरेको हो याठट्टा गरेको थाहा नै भएन । त्यसमाथि डुग्सले राम्जैसँग छाडेको थिएन ।सुजनले भने, “पापा, हजुर सुतिस्यो । बेलुकी नै भनेर बिहानै पिसेछ क्यार अनिकराइसिन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुजनको कुराले दीपकलाई झन्‌ काटेको घाउमा नुनचूक लगाएजस्तो भयो ।दीपक आवेशमा आएर चिच्याए, “चुप लाग मूर्ख, तैले गर्दा हामीलाई समाजकोआँखाबाट &#039;झर्नुपयो । तँलाई हामीले के दिएका थिएनौं र त॑ कृसङ्गतमा लागिस्‌ हँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुजनले अब भने बास्तविकता बुझे, थपक्क कोठातर्फ लागे । उमिंला केहीबोल्न सकिनन्‌ । दीपक एक्तै फतफताइरहे । दीपकको स्वर्गजस्तै घर पूर्णरूपमा&lt;br /&gt;
मसानमा परिणत भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाईस==&lt;br /&gt;
&#039;शालु नरिसाक है एउटा कुरा भन्छु ।&#039; प्रभाले शालुनजिकै सर्दै भनिन्‌ । पुसमहिना भएकाले अरू थुप्रै विद्यार्थी पनि चौरभरि टन्न घाम तापेर बसेका थिए ।शालुले भनिन्‌, &#039;भनन प्रभा तिमीले अहिलेसम्म के भन्त बाँकी राखेकी छ्यौ र ।पहिला त तिमीले नपुङ्सक भनी हल्ला फिँजाएकोमा तिमीलाई धेरैधेरै धन्यवादछ । तिमीले गर्दा म धेरैका पापी नजरबाट वर्चेँ । अँ साँच्चि के भन्दै थियौकुन्नि ?&#039;&lt;br /&gt;
१०३.&lt;br /&gt;
प्रभाले सोध्न लागेको प्रश्न थियो- नपुङ््सकको त जुँगा आउँछ भन्थे तरतिम्रो जुँगा किन आएन ? भनेर सौध्न चाहेकी थिइन्‌ । शालुको कुराले प्रभाअनकनाइन्‌ । प्रभा नबोलेपछि शालुले हाँस्दै भनिन्‌, हैन किन चुप लागेकीप्रभा । कै म साँच्चै, नपुड्दसक जस्तै छु र ! मेरी दिदी सधैं भन्नुहुन्थ्यो, &#039;मआकाशबाट झरेकी परी जस्तै छु रे । दिदी यो पनि भन्नुहुन्थ्यो मेरा लागि योपृष्वीमा राजकुमारजस्तै सुन्दर व्यक्ति जन्मेको हुनुपर्छ रे । का आकाशजस्तैसुन्दर हुन्छ रे । शालुले करा टुङ्ग्याउन नपाउँदै प्रभाले पेट मिचिमिची हाँस्दैभनिन्‌, &#039;हेर साथी हो, शालु परीजस्तै छिन्‌ रे सुन्यौ ? त्यतिमात्र कहाँ होरउनलाई विवाह गर्ने युवक राजकुमारजस्तै हुन्छ रे ।&#039; प्रभाको कुरा सुनेपछि सबैहा....हा गर्दै धेरैबेर हाँसे । धेरैबेरको हाँसोपछि प्रभाले भनिन्‌, &#039;ल, ल छ, छहाम्रो पियन राजकुमारसँग तिम्रो ठ्याक्कै जोडा मिल्छ । वा ! तिमीले ठूलैसपना देखेको रहिछौ ।&#039;&lt;br /&gt;
अन्नालाई वर्षौं अगाडिदेखि हेर्न आउने युवक देख्यौ भने त मूछां नै पर्छ्यौंहोला । भन्लिन्‌, क त्यही हो मेरो सपनाको राजकमार !&#039;&lt;br /&gt;
अन्नाले शालुतिर हेर्दै भनिन्‌, &#039;हेर शालु, मेरो हृदयश्वर देखेर सबै डाहलेमर्न लागिसके । तिमीले अझै मेरो राजकुमार देखेकी छैनौ कि क्या हो?राजकुमार पाउन त मेरोजस्तो रूप लिएर जन्मनुपर्छ बुझ्यौ ? फेरि तिमी तनपुङ्सक भनेको होइन र ? के उल्का नपुड्सकलाई पनि राजकुमारको रहर ?&#039;&lt;br /&gt;
अन्नाको कुराले सबैजना चौर नै धर्किने गरी हाँसे । शालु रछयानलाईचलायो भने आफ्नै मुखमा छिटा पर्छ भन्ने सम्झी जुरुक्क उठिन्‌ । प्रभाले च्व! च्व ! गर्दै भनिन्‌, &#039;हामी शालुजीलाई पियन राजकुमारजीको याद आएजस्तोम यहीं बोलाइदिउँकी ?&#039; साथीहरूको कुराले शालुलाई चक्कर लागेजस्तै भयो ।शालु टाउको समात्दै यचक्क बसिन्‌ ! त्यत्तिकैमा एउटा युवक हस्याड-फस्याङगर्दै आएर भन्यो, &#039;शालु के भयो तिमीलाई ? तिमी ठीक 4021 ?&#039;त्योयुवकलाई देखेपछि सबै युवती हेरैको हेरै भए । शालु टाउको चुपचापलागिरहिन्‌ । युवकले रुन्छ स्वरमा भने, &#039;शालु तिमीलाई चक्कर लागेजस्तो छहिँड डावटरकोमा जाङुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
सबै युवती युवकको मुखबाट शालुको नाम सुनेर चित खाइरहेका थिए ।शालु युवकको क्राको वास्तै तगरी उडेर हिँड्न लागेकी थिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
फिरोजले हात जोड्दै भन्यो, &#039;शालु बिन्ती, तरिसाउ म तिमो प्राक्टिकलसिद्धिएपछि मात्र तिम्रोसामु देखापर्ने पक्षमा थिएँ । तिमीलाई चक्कर लागेकोदेखेपछि आफूलाई थाम्न सकिनँ, आएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले &#039;को हो तपाईं” भन्दै युवकतिर हेरिन्‌ । अति नै सुन्दर युवकलाईदेखेपछि भनिन्‌, &#039;तपाईंलाई मैरो नाम कसरी थाहा भयो ? तपाईंले अन्नालाईसौध्नुभएको हो ? अन्ना उनी हुन्‌ ।&#039;बठ्ड।&lt;br /&gt;
युवकले आँखा ओभानो पार्दै भने, &#039;शालु, विर्सेक म फिरोज हुँ । शालुलेयुवकलाई तलदेखि माथिसम्म हेर्दै भनिन्‌, &#039;ओ फिरोजजी पो, यहाँ किनआउनुभएको कोही विरामी ल्याएको छ कि !&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले नम्र हुँदै भन्यो, &#039;म तिमीलाई हेर्न आक्कल-झुलुक्क यहाँ आइरहन्छुआज तिमी इल्न ...।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजको कुरा सुनेपछि सबै रातोपिरो हुँदै आफनो बाटो लागे । शालुलेचुझिन्‌ सबै युवतीले फिरोजको पौ क्रा गरेका रहेछन्‌ । मैले फिरोजको साथनदिए पनि यी दुष्टहरूको भने मेख मप्यो । घन्त फिरोज साइतमा नै आएछौँ ।&lt;br /&gt;
लु कै सोचेकी तिमीले ? म तिमीले भनेझैँ इन्जिनियर पढ्दैछु । चार-छ महिनापछि त कोर्स पनि पूरा हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजको कुराले अब भने शालुको प्राणपखेरु नै उड्लाजस्तो भयो शालुलेदुखित हँदै भनिन्‌, &#039;फिरोजजी, मलाई माफ गर्नोस्‌ । मैले त तपाईंको आमाकोआँसु हेर्न नसकी झूटमुट बोलिदिएकी हुँ । फेरि तपाईं सुधनुहोला भन्ने तशङ्कासमेत लागेको थिएन । तपाईं सुधनुभएछ । धेरै खुसी लाग्यो । बल्लअङ्कलआन्टीको आँखाको आँसु पनि छुट्यो होला ।&lt;br /&gt;
फिरोजले रुँदै भन्यो, &#039;शालु तिमीले क्रा फेन्यौ भने म जिउँदो रहने छैन,बिन्ती शालु तिमीले जीवन दिएर फेरि जीवन नलेक ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले धेरैबेर सोचेर भनिन्‌, &#039;फिरोजजी, यो कुरा मसँग होइन मेरी दिदीसँगगर्नोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले मुसुक्क हाँस्दै भने, &#039;न शालु त्यसो भए म ढुक्क भएँ । मैले तिम्रोदिदीसँग मागेर तिमी सानो छँदादेखि लिएर यो उमेरसम्मको थुप्रै तस्बिरहरूकोआर्ट गरैको छु । दिदीले तिम्रा लागि खोजेको राजकुमार म नै हुँ । नपत्याएदिदीसँग सोध ।&#039;&lt;br /&gt;
“शालुले दिदीको कुरा सम्झिन्‌ । &#039;हजुरको राजकुमार म आफैँ खोज्छु&#039; भनेरभन्नुभएको मतलब दिदीलाई फिरोज सप्रन्छ भन्ने थाहा रहेछ । मैले फिरोजकोकुरा गरेपछि मात्र दिदीले राजकुमार खोज्ने कुरा गर्नुभएको थियो । सानोमादिदी हजुरको विबाह राजकुमारजस्तै युबकसँग हुन्छचाहिँ भन्नुहुन्थ्यो तर मनैराजकुमार खोज्छुचाहिँ कहिल्यै भन्नुहुन्नथ्यो ।&lt;br /&gt;
शालु हाम्रो घरमा सघं तिम्रो गुणगान हुन्छ । ममी भन्नुहुन्छ, &#039;शालु तहिलोमा फूलेकी कमल हो । म पनि भन्छु तिमी कमल नै हौ&#039;, फिरोजलेनिसङ्कोच भने ।&lt;br /&gt;
शालुले उत्तर दिइन्‌, &#039;राम्रो मान्छेले अरूलाई पनि राम्रै देख्छ । मलाई तत्यस्तै लाग्छ । तपाईंलाई यो रूपमा देख्दा भने मलाई ज्यादै खुसी लाग्यो । पर्सि&lt;br /&gt;
१०५&lt;br /&gt;
हो लास्ट प्राक्टिकल, पर्सि नै म घर जात्छु । हुन्छ त । अहिलेलाई जान्छु&#039; भन्दैकक्षकोठातर्फ आइन्‌ ।&lt;br /&gt;
फिरोज पनि शालुसँग बिदा भएर खुसी हुँदै घरतर्फ गए । शालुका साथीहरूलेशालुलाई शिर ठाडो गरेर हेन सकेनन्‌ । अन्ना त झन्‌ हंसले ठाउं छोडेभैँभई । अन्ताले त्यो सुन्दर युवक आफूलाई नै हेर्न आएको हो भन्ने भ्रममा परीआफनौ पहिलो प्रेमीलाई छोडिसकेकी थिई । एकतर्फी प्रेममा अल्झिएकी अन्नाडाको छोडेर रुत मात्र सकेकी थिइनँ । शालुको खौड्रो खन्नै प्रभा पश्चत्तापलेजलेकी थिड्टै । शालुलाई भने यावत्‌ घटनाहरू नाटकभी लागिरहेको थियौ ।कता-कता खुसी र कता-कता पीर लागिरहेको थियो । पीर र खुसी दुवै वाँड्नेसाथी आकाश नै थिए । शालु आकाशलाई खोज्दै क्यान्टिनमा पुगिन्‌ । आकाशचिया पिउँदै रहेछन्‌ । शालुले आकाशसामु बस्दै भन्तिन्‌, &#039;आकाश म तिमीलाईखोज्दै यहीँ आएकी हुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुको कुराले आकाश दङ्ग परै । आकाशले सोच्ने सायद शालुले मैले प्रेमगर्छु भन्ने कुरा बुझिन्‌ होला । शालुले पनि अवश्य मलाई भिर्वाभत्र मायागर्छिन्‌ होला । उनले माया गरै पति नगरै पनि आजचाहिँ उनको सामु हृदयखोल्छु नै । उनी नपुङ्सक नै भए पनि म उनीविना बाँच्न सबिदिनँ । तर केभन्ने कसरी भन्ने : आकाश टोलाइरहे । शालुले करा कोद्याइन्‌, &#039;आकाशहामी वचपनदेखि सँगै पढ्दै आएका छौं । सबैलाई प्रेमको हावाले छोयो तरहामीलाई भने छौएन तर आज मलाई अचम्म लागिरहेछ ।&#039; आकाशले बीच्चैमाकरा काददै भने, &#039;सायद तिमीले आज मात्र बुफ्‌यौ म तिमीलाई माया गर्छुभन्ने कुरा ) म तिमीप्रतिको प्रेमले गर्दा नै आज यहाँसम्म आएँ। म ततिमीलाई बिद्यार्थी जीवनदेखि नै माया गर्थे । तर, भन्ने साहस नै भएन, जेहोस्‌, तिमीलाई पाउनै सपना साकार भयो ।&#039;&lt;br /&gt;
आकाशको कुराले शालुलाई मङ्सिर-पुसको जाडोमा पनि चिटचिट पसिनाआयो । शालुले गहुङ्डगौ मन लिएर भनिन्‌, &#039;के भनेको आकाश तिमीले ?तिमीले मलाई माया गर्ने ? भो नजिस्क है म त मर्छु।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हो शालु म किन ढाँद्थेँ । हृदयमा परेका असङ्ख्य घाँजाहरू तिमीले देख्नेभए म देखाइदिन्थेँ । शालु तिमीले मेरो मनचाहिँ नभाँच नि म जिउँदो रहनेछैन ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले आँसु झादैं भनिन्‌, &#039;मलाई थाहा छ, तिमी फूलभन्दा पनि नाजुकछौ । किन आकाश तिमीले यति गहिरो कुरा मनभित्र लुकाई अर्थहीन रुवाईरोयौ ? तिमी करोडौँ-करोडौँमा एक छौ । तिमीले एक बचन मात्र शालु मतिमीलाई प्रेम गर्छु मनेको भए म ज्यादै खुसी हुन्थेँ ।&#039;&lt;br /&gt;
आकाशले अत्तिँदै भने, &#039;होइन के भन्न खोजेकी शालु तिमीले ? तिमीतनाबमा पो आयौ ?&#039;&lt;br /&gt;
१०६)&lt;br /&gt;
शालु घुँक्करघुँक्क रोइन्‌ मात्र । शालु रोएपछि आकाशलाई शालुको मतकोकुरा बुझन बेरै लागेन । आकाशले हातले विस्तारै टेबुल ठटाउँदै भने, &#039;हेरहेर रोएकी तिमीले के भन्दिरहिछौ भनेर मन चोरेको मात्र हँ । तिमीजस्तीपोक्चीलाई पनि कसैले प्रेम गर्छ ? हेरन कलेजभरि प्रेम गर्नहरूको ताल,सबैको प्रेम देखैर मलाई त वाक्कै लागिसक्यो भन्या ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;तिम्रो कुरा सुनेर सासै उड्लाजस्तो भयो । मजाकगर्नु पति हद हुन्छ नि ! अबदेखि बोल्दिन म तिमीसँग ।&#039;&lt;br /&gt;
आकाशले सम्झाए, &#039;ल अन कान समातेँ, वरिसाक मैले आज प्रेमको कूरानगरेको भए तिम्रो प्रेमकहानी सुन्न पाउँदैनथैं ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले लामो श्वास फेर्दै भनिन्‌, &#039;खोई कै भनौं आकाश, म आफैँ तअचम्ममा परेकी छु । एउटा डुृगिस्ट, त्यसमाथि चरि्हीन फिरोजले त मेरालागि पहिचान नै वदलेछन्‌ । त्यति मात्र होइन, उनी मेरो मायाले यहाँसम्मआउँदारहेछन्‌ । आज मलाई चक्कर लागेर ढल्न लागेको देखेपछि बल्ल देखापरे ।मैले त उनकी आमाको खुसीका लागि उनी सफ्रिन्छन्‌ भने प्रेम गर्छु भनेर झूटबालेकी थिएँ । उनी सुध्नेलान्‌ भन्ने त कल्पनासम्म गरेकी थिइनँ । म त्यही कुरागर्न तिम्रोसामु आएकी हुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
आकाशले बनाबटी हाँसो हाँस्दै भने, &#039;तिमीजस्ती पोक्चीका लागि त्याग गर्नेमूर्ख नै रहेछन्‌ उनी । सायद अन्नाजस्ती केटीहरू नदेखेर तिम्रो मायामा फसेहोला नत्र ... ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;अन्नाहरूले त फिरोजलाई कलेजमा आएको देखेका रहेछन्‌ । सबैले फिरोजअन्नालाई हेर्न आएको हो भन्नै ठानेका रहेछन्‌ । फिरोजका लागि अन्नालैभूतपूर्व प्रेमी छौडिछन्‌ ।&#039; शालुले यथार्थ औकलिन्‌ ।&lt;br /&gt;
आकाशले एकोहोरो शालुलाई हेरै र मनमनै भने, &#039;कस्तुरीलाई आफनैबास्ना थाहा नभएझैँ तिमीलाई पनि आफनौ मूल्य थाहा छैन । फिरोजलै तिम्रोमूल्य बुझे । फिरोजको आँखामा तिमी अन्नाभन्दा लाखौँ गुना सुन्दरी छ्यौ ।मलाई पनि त पहिला तिमी कहाँ राम्री लाग्थ्यो र माया लाग्दै गएपछि तिमीसंसारकी सबैभन्दा सुन्दरी लाग्न थाल्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
होइन के सोचेको तिमीले मेरो कुराको विश्वास लागेन ?&#039;&lt;br /&gt;
शालुको क्राले आकाशको मौनता तोडियो । आकाशले भने, &#039;तिमी यतिमीठो कुरा गर्छयौं, तिम्रो कुराको किन विश्वास नलाग्नु ? तिमीलाई फिरोजकस्तो लाग्छ नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;खोई किन क भनेपछि युवतीहरू मरिमेदछन्‌ । मलाई थाहा छैन । तरमलाईचाहिँ तिमी सुन्दर लाग्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
१०३&lt;br /&gt;
आकाशले मन बाँधेर उद्दै भने, &#039;तिमीले फिरोजलाई राम्रोसँग हेरेकीछैनौ । अनि म राम्रो लाग्यौ होला । अव तिमीलाई फिरोज नै संसारमासवैभन्दा सुन्दर लाग्छ । तिमीहरूको भविष्य अवश्य सुन्दर हुन्छ । यसमाशङ्का नै छैन । ल म जान्छु पनि&#039; भन्दै आकाश गए । शालु पनि आफूनोरुमतर्फ आइन्‌ । आकाशसँग कुरा गरेर शालुको मन भने हलुङ्गो भयो ।आकाश भने छट्पटाउँदै आफनो बेडमा डड्ग्रहा पछारिए । उनलाई सम्पूर्णपृथ्वी नै घुमेजस्ता भयो । एक मनलै सौचै घटघटी विष पिएर शान्ति लिउँतर आँखामा शालुको कार्रुणक दृश्यहरू पनि ताचिरहयो । सोचे यदि मैलैशालुलाई एक बचन प्रेम गर्छु भनेको भए आज त्यौ दुदिन देख्नु पर्दैनथ्यो । अबकसरी पो उनको सम्झनालाई फयाँकैँ ? म नराम्रोसँग हारेँ । शालु, नराम्रोसँग..... । चिन्ताले गर्दा आकाशको भोक तिर्खा सबै हरायो । उनले आफनोभाग्यलाई बार-बार धिक्कारे ।बुक रुम पार्टनर अन्ना, प्रभा, दया केही बोल्न नसकी नुन खाएकोसर &#039;फोक्राइरहे । शालुले छरपष्ट भएको किताबहरू मिलाइन्‌ । किन-किन वकाई लागेजस्तो भयो । ओछ्यानमा पाल्टिन्‌ । आँखा लाग्न मात्र केलाएको थियो । आया दिदी आएर शालुलाई सार्जिकल बार्ड बेड नं. 5४ कोविरामीले बोलाएको कुरा बताइन्‌ । शालु हतार-हतार उठेर दौडिँदै सर्जिकलबार्डमा पुगिन्‌ । बेड नं. ८४ मा हेरिन्‌ आफूले चिनेको मान्छेझैँ लागेन र बेडनं. «४ मा सुकेको काठजस्तै नामको मानव आकृति थियो । शालुलै बैडनजिकैगएर हेरिन्‌ जिङ्ग्रङ्गग कपाल, भित्र गडेका आँखाहरू सिन्काजस्तै हात-खुट्टाशालु त्यो मानब आकृति देखेर डराइन्‌ पनि । शालु अलि हच्केको देखेर त्योकङ्गालभौँ आकृतिबाट आवाज आयौ, &#039;वसन शालु, बस ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले स्टुलमा बस्दै भनिन्‌, &#039;तपाईं को हो मैले चिनिनँ नि ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;म सब बताउँछु अनि चिनिहाल्छयौ नि, अब त तिम्रो पढाइ पनि सिद्धिनलाग्यो भन्दै थिइन्‌ रेष्मा ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले अलि खुसी हुँदै भनिन्‌, &#039;ए तपाईंले रेष्मालाई पनि चिन्नुभएको छ ?तपाईंको स्वास्थ्य बडो नाजुक देखिन्छ । । डाक्टरले बढी खोल्न मनाही तगरेको छैन ?”&lt;br /&gt;
भैगो मेरो चिन्ता नै नलेक तिमीले अझै पनि प्रेम गरेकी छैनौ ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हरोइन तपाईं को हुनुहुन्छ ? मेरो सबै नालीबेली थाहा रहेछ । मैलै त प्रेमगरेकी थिइनँ तर मर्यादा ननाघी प्रेम गर्नेहरू पनि हुँदारहेछन्‌ भन्नेचाहिँ मैलेबुझेँ ।&#039; &#039;त्यसो भए उनी आकाश नै होलान्‌ होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
बिरामीको क्रा सुनेर शालु झन्‌ आश्चर्यमा परिन्‌ र भनिन्‌, &#039;भन्नोस्‌ हामीसबैलाई चिन्ने तपाईं को हुनुहुन्छ नत्र म क्रै गर्दिनँ,&#039; शालु उठिन्‌ ।&lt;br /&gt;
वन्द]&lt;br /&gt;
बस न त्यसै नरिसाक, भोलि भनेको क्या हो बया हो कसो हो । तिमीसँगबेथा पोख्नका लागि त यो मेडिकल कलेजमा भनां भएकी नत्र यहाँ किनआउँदै । मैरो उत्तरको जवाफ नै दिइनौ त्यो युवक आकाश नै होलान्‌ होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
शालुले वस्दै भनिन्‌, &#039;तपाईंले ठीक नै सोच्नुभयो । आकाशको चरित्र पनिराम्रो छ तर मैले त फिरोज भन्नेको कुरा गरेकी । उनले मलाई माया गर्छन्‌भन्ने कुरा आजै थाहा पाएँ । हेर्नोस्‌, तर मलाई प्रेमको आभाससम्म छैन । अबविवाहपछि नै प्रेमको आभास हौला । तर, तपाइँ ... ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;शालु अभौ चिनिनौ, चिन्थ्यौ पनि कसरी, म मौसमी हँ मौसमी ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले आत्तिँदै भनिन्‌, &#039;ओ, मौसमी तिमी, यौ हुनै सक्दैन ?&#039;&lt;br /&gt;
“यति छिट्टै तिमी यो अवस्थामा पुग्यौ ? खोई मौसमी तिम्रो त्यौ झःफराउँदोरूप ? मैले त तिमीलाई भनेकै थिएँ । आशक्त अङ्गालोमा प्रेम हुँदैन भनेरतिमीले मानिनौ । तिमीलाई मौसमीभन्दा कसले पत्याउला ? तर, पीर नगरतिमीलाई सञ्चो भएपछि तिमी पुन: पहिलेकै मौसमी हुन्छयौँ । अव त तिमीलेदुनियाँ कस्तो छ देख्यौ, बुझौ होला । भन तिमी कसरी यस अवस्थामापुग्यौ । तिम्रो यो अवस्था देख्दा तिम्रो बाबुको के हाल भयो होला ?&#039;&lt;br /&gt;
मौसमीले गहभरि आँसु पार्दै भनिन्‌, &#039;शालु बाबुलाई त धेरै पहिल्यै खाइसके ।त्यसैले बाबुको पीर छैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;होइन कसरी मर्नुभयो तिम्रो बावु ? देख्दा त हट्टाकट्टा नै हुनुहुन्थ्योहोइन र ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हो शालु, हट्टाकट्टा नै हनुहुन्थ्यौ । उहाँलाई मुदु दुख्नै व्यथा थियो । जचाउनकँलागि काठमाडौं पनि आउनुभएको थियो । म बैंसको उन्मादले र निमेषकोबनावटी मायाले कहीं कतै केही नदेख्ने भइसकेकी थिएँ । जचाउन आएकोबाबुलाई मेरौ अफिसबाट काजमा जानु छ, पछि आउनोस्‌ । दुख्दा मोज खानुहोला भनी ब्रुफिनको चाङ पठाइदिएकी थिएँ । काठमाडौंबाट पठाएको भोतिसहनै नसक्ने गरी मुटु दुखेछ । बानुले दुखाई कम गर्न थुप्नै औषधि खाएछन्‌ ।औषधि खाएपछि बेहोस भएछन्‌ । वेहोसको बेहोस नै भोलिपल्ट मरेछन्‌ ।यसरी मैले बाचुलाई खाएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;मौसमीको कुराले शालुको आँखा रसायो । शालु चुपचाप भइन्‌ । आँखामामौसमीको हट्टाकट्टा बाबु खुसी हुँदै क्याम्पसमा यताउता नियालेको याद आयो ।&#039;&lt;br /&gt;
मौसमीले सम्झाइ्न्‌, &#039;नरौक शालु हुने हुनामी भइसक्यो । बाबु मेरो योरूप देख्नुभन्दा अगाडि नै मरे राम्रै भयो । उनले मेरो यो हालत देखेको भए ।झन्‌ कसरी आफूलाई सम्हाल्थे होला । उनलाई मारेर राम्रै गरिछु । अब मेरोपीरमा रुनै कोही छैनन्‌ । दाजुदिदीले त एडसरोगी घरमा वस्न पर्दैन भनीनिकालेर नै यहाँ आएकी हुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
१०९:&lt;br /&gt;
&#039;तिमीलाई एद्दस छ ! त्यो कसरी ? निमेषले छोडेपछि पनि तिम्रो वुद्धिफर्केन मौसमी ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;निमेषले मलाई एक्कैचोटि कोठीमा लगेर छोडिदियो ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;होइन के भनेकी तिमीले क कारसम्म भएको ध्वनी युवक नै थियौ होइन र ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हो शालु क धनी त म जस्ता थुप्रै युवती बेचेर भएको रहेछ । पछि पोबुझेँ । डुङ्गा डुबिसकेपछि चेत आएर के लाग्यो र ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;तिमी पढेलेख्रेकी मान्छे, केही अन्दाजसम्म काटिनौ ?&#039;&lt;br /&gt;
मौसमीले शालुको हात समातेर सिरानीको अडेसा लगाई वस्दै भनिन्‌,“शङ्का गर्ने त सात्तो आँखी झयालसम्म राखेनन्‌ चुतियाहरूले, म मात्र होरमसँग अरू पढेलेखेका दुई युवतीसमेत बेच्रिए । उनीहरू एड्स लागे पनि केहीहृष्टपृष्ट भएकाले अझै कोठीमा नै होलान्‌ । मलाई भने युवक वृद्धहरूलेपत्याउन छोडेपछि निक्लिन्न भन्दाभन्दै पनि निकालिदिए ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;तिमीहरू तीनैजनालाई निमेषले नै वेच्यो त ?&#039; शालुले प्रश्न गरिन्‌ ।&lt;br /&gt;
मौसमीले केहीबेर रोक्किएपछि पुनः ओठ खोलिन्‌, &#039;उनीहरूलाई पनि प्रेमीहरूलेनै बेचे । उनीहरूसँग हाम्रो भेट नगरकोटमा भएको थियो । उनीहरूको तीनवटाजोडी बुटवलबाट नगरकोट घुम्न भनी आएका रहेछन्‌ । हामी सबै उस्तैउस्तोकरा मिलिहाल्यो । हामी सबैले छ-सात दिन नै नगरकोट बसेर खुव रमाइलोगन्यौं । जय भन्ने एउटा साह्रै हँसाउने कवि थिए । उनकी प्रेमीका भने केहीउदास देखिन्थिन्‌ । उनको उदासपन देखेर हामीलाई अझै हाँस्ने बहाना मिल्थ्यो ।हामी कविलाई अलि हृष्टपुष्ट हुनुपत्यो भन्दै उल्याउँथ्यौं । कवि हाँस्दै धेरैखानेकुरा खान्थे । र, कुनै न कनै निता शुनाइहा ल्थै । नगरकोट गएको तेस्रोदिन हामीले साह्रै गिज्याएपछि कविले कविता भनेको अझै याद छ।&lt;br /&gt;
तपाईंहरू आज हाँस्तोस्‌&lt;br /&gt;
भोलि हाम्रो पालो&lt;br /&gt;
मेरी मैयाँलाई थाहा छैन&lt;br /&gt;
के मायाको जालो ।&lt;br /&gt;
बहमचारी बन्दा म&lt;br /&gt;
यिनलाई पप्यो गाह्रो ।&lt;br /&gt;
सबै टुद्दा यिनी जुदछिन्‌ ।&lt;br /&gt;
नभन्नोस्‌ आज साह्रो ।&lt;br /&gt;
त्यसपछि निमेषलगायत हामी सवैको मुख रातोरातो भयो । कसैले केहीबोल्न सकेनौँ । कविले हामीलाई नराम्रो पर्ला भनेर करा मोडिहाले । हामीलेअझ केही दिन नगरकोट बस्ने इच्छा व्यक्त गरेपछि कवि बावु विरामी भएछन्‌&lt;br /&gt;
११०&lt;br /&gt;
भन्ने वहाना बनाई हामीसँग फुत्किएर बुटवल आए । हामी सारा संसार भुलेरएक-अर्काको बाहपासोमा रमाइरहयौं । नगरकौटमै हाम्रौ तीन गुप्रको अलइन्डियाटुरमा जाने योजना बन्यो । कविका प्रेमी-प्रेमिकाहरूलाई सम्झाएर लैजानेसल्लाह पनि गत्यौं। पछि निमेषहरूले कविको भित्री मनशाय बुझेछन्‌ ।कविको प्रेम वास्तव्रमै साँचो प्रेम हो भन्ने बुझेरै होला निमेषहरूले कविलाईआफ्‌संग नलैजाने सल्लाह गरे । हामी बैँसले कृत्कत्याएर आ-आफनो प्रेमीकोअङ्गालोमा मस्त हँदै इन्डियाको ट्रका लागि निस्कियौं । इन्डियाबाट फर्कनेवित्तिकैविवाहवन्धनमा वांधिने सल्लाह पनि भयो । हामी तीनैजना युवतीले विबाहभएको मीठो सपना पनि देख्यौं । दार्जिलिङ, आसाम, बर्साङदेखि आग्रासम्मकोयात्रा भयो । हाम्रो खुसीको कुनै ठेगान नैं थिएन । यहाँसम्म आएपछि मुम्बैकिन नजाने भन्ने कुरा भयो । हामी सल्लाहले नै मुम्बै पुग्यौं । मुम्बैको भव्यहोटलमा पुगेपछि हामी छ जनाले नै एउटै कोठामा डिनर गन्यौं । डिनरसँगैहिवस्की, बाण्डी सघ्वैँ पिइन्थ्यो । त्यो दिन पनि पिएर आ-आफनो प्रेमीकोकाखमा निर्धक्कसँग सुतेर जिस्किँदै भविष्यको मीठो सपना देख्दै थियौं । निमेपलेमलाई गालामा म्बाइँ खाँदै भन्यौ, “मेरी प्यारी, कृपया एकछिन काख छोड,हामीहरू सुत्ने रुमको व्यवस्था गरेर आउँछौं ।&#039; उनीहरू तीनैजना रुमकोव्यवस्था गरेर आउँछौँ भनी हिँडे । हामी तीनजना बचेखुचेको रक्सी पिएरमस्तले रमाइरहयौँ । साँझको आठ बजेतिर हामी त्यहाँ पुगेर डिनर गरेकाथियौं । उन्तीहरू रुम खोज्छौं भनी निस्किँदा करिव नौ, सवा नौ जति बजेकोथियो होला । उनीहरू एक घन्टासम्म नआउँदा त हामी त्यति अत्तिएनौँ ।बिस्तारै एक डेढ घन्टा जति समय बित्दै गयौ । त्यसपछि हामी डराउनथाल्यौं । यत्रो ठूलो होटल, उनीहरूले रुम पो विर्सेछन्‌ कि भनी हामी ढोकामापुगी ढोका खोल्न लाग्दा ढोका बन्द रहेछ । हामीले घन्टी बजाउन थालेपछिएउटा अधबैंसे आइमाईले भित्र पस्दै भनी, &#039;किन घन्टी बजाएको तिमीहरूले :तिमीहरूले आफनो लभरहरू खोजेको हो ?हामीले &#039;हो, उहाँहरू किन फर्कनुभएन&#039; भनेर सोध्यौं । त्यो आइमाईलेविदेशी भए पनि राम्रै नेपाली बुझने र बोल्न जान्ने रहिछै । उसले बडो मीठोहाँस्दै भनी, &#039;पीर नगर, हामी तिमीहरूका लागि घन्टा-घन्टामा छुट्टै-छुट्टै लभरहरूपठाइदिन्छौं । तिम्रा लभरहरू भने तिमीहरूलाई यहाँ बेचेर टाप कसिसकै ।तिमीहरूलाई यहाँसम्म ल्याउन उनीहरूको पनि धैरै पैसा खर्च भएछ । यसपालित्यति नाफा भएन भन्थ्यो निमेष ।&#039;&lt;br /&gt;
उसैको मेहरवानले गर्दा यो कोठी राम्रोसँग चलेको छ । मौसमी तिमी हैनौ ?तिम्रो फोटो त पहिले नै आएको हो, मोलमोलाई नमिलेपछि उसले ल्याउनैमानेन । तिम्रो कारणले म पनि अलि घाटामा नै गएकी छु । तर, केही छैन तिमीलेचाँडै नै पैसा उठाउँछयौ । तिम्रो फोटो बडेबडे खान्दानकोमा पुगेको छ ।&#039;आइमाईको कुरा सुनेर हामी थरथर काम्न थाल्यौँ ।&lt;br /&gt;
१११)&lt;br /&gt;
उसले रिसाउँदै भनी, &#039;किन डराएका छौ : तिमीहरू कमारी केटी हौँ र?बडिया-बडिया खाना खान र बडिया-बडिया लोग्नेमान्छे पाइहाल्छौ ।&#039;&lt;br /&gt;
हामी तीनैजनाले रुँदै उसको पाउ समातेर भन्यौं, &#039;हामी यहाँ वस्दैनौं ।हामी तपाईंको पैसा जसरी पनि चुक्ता गर्छौं ।&#039;&lt;br /&gt;
उसले सातो खाउँला जस्तै गरी रिसाउँदै भनी, &#039;चुप लाग्‌, गएर बस्‌ ।सबैलाई पहिलोपल्ट तह लगाउन गाह्रौ हुन्छ । हामीले भनेको चुपचाप मानेनौभने चुरोटको ठुटोले पोल्छौं । तातो फलामले पोल्छौं । त्यसपछि हामी वोल्नसकेनौं । तीनजनाले रोएरै त्यो रात कटायौं । भोलिपल्टदेखि हामीलाई छुट्टाछुट्टैकोठामा बन्द गरी धन्दा गर्ने लगाई । पहिला-पहिला त घेरै नाइँनास्ती गयौं ।तर, केही नचलेपछि बोल्नु वेकारझौँ लाग्यो । निमेषले नै धेरैको सङ्ख्यामा केटीबेचेको रहेछ । तिम्रो कुरा मानेकी भए आज यो दुर्दिन देख्न पर्दैनथ्यो । मतिमीलाई प्रत्येक दिन सम्झन्थेँ । पश्चात्ताप गर्दै रुन्थे । एड्स लागेर असक्तभएपछि बाईले गाउँमै जानु भनी पुग्ने बाटाखर्च दिएर पराई । म त्यो पापीनिमेषलाई जेल जाक्छु भनी सिधै काठमाडौँ आएँ । प्रहरी कार्यालयमा उसकोफोटो देखाएर सबै क्रा वताएँ । प्रहरी निरीक्षकले सिधै भने, &#039;तिमीहरूजस्तादुईपैसेलाई नबेचेर कसलाई बेच्छन्‌ त : तिमीहरूजस्ता दुई-चार अक्षरपढेलेखेकाहरूले आफनो मर्यादा विर्सेपछि नै यस्ता दलालहरूले मोटाउनेमौका पाएका छन्‌ । हामी त खोजखवर गरेर यहाँसम्म लेराइदिउँला । यहांलेराएको भोलिपल्ट नै यहांबाट निकाल्न बाध्य हनुपर्छ । उनीहरूको पहुँच धैरैमाथिसम्म हुन्छ । बरु सक्छ्यौ भने तिमी नै कूनै सजाय देक । जसले गर्दाउसले अरूलाई बेच्न नसकोस्‌ । त्यसपछि पुलिसले निमेषलाई जेलमा तकोच्यौ तर प्रहरीले भनेझैँ केही दिनमा नै जेलबाट निस्कियो पनि ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले मौसमीको कुरा बीचैमा काट्दै भनिन्‌, &#039;मौसमी, मलाई तिम्रो कुरासुन्न त कुनै आपत्ति छैन तर तिमीलाई चाहिँ ज्यादै गाह्रो भएजस्तो छ नि !&#039;&lt;br /&gt;
मौसमीले फिस्स हाँस्दै भनिन्‌, &#039;शालु मलाई गाह्रो भएको छैन । म यो क्षणयतिविग्न खुसी छु कि क्रै छोड बरु मेरो कुरा सुन । म तिमीलाई पीडा बाडेरहलुको हन चाहन्छु&#039; भन्दै मौसमीले कुरा बढाइन्‌, &#039;आफनो साथमा केही पैसाभएको हँदा मलाई वस्न, खानचाहिँ गाह्रो भएन । एक मन लाग्यो वरु मछुँ तरभित्री आत्माले मर्न पनि मानेन । म यताउता भौँतारिँदै दिनहरू बिताइरहेकीथिएँ एक दिन न्यूरोडमा गहना पसलतिर जाँदै गरेको निमेष र एउटी युवतीलाईदेख । म उनीहरूको पछिपछि लागें । औंठी किनेर निस्केपछि निमेष युवतीलाईयहीँ बसिराख म मोटरसाइकल लिएर आउँछु भनी मोटरसाइकल पा्किङतिरलाग्यो । मैले त्यो युवतीलाई च्याप्प समातेर निमेषको फोटो देखाउँदै निमेषकोबारेमा मौटामोटी कुरा भने । युवती बडो बुझकी रहिछिन्‌ । मलाई धन्यवाददिँदै भनिन्‌, &#039;च्याङ्कयु म बच्चेँ । तपाईँ यही बस्नोस्‌ म केही बहानाले उसबाट&lt;br /&gt;
११२&lt;br /&gt;
फृत्केर आउँछ । मेरो घरमा नै गएर सबै कुरा गरौंला भनिन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
म उनको विश्वास गरेर त्यहीँ बसेँ । नभन्दै उनी केहीबेरपछि नै आइन्‌ ।द्याक्सी लिई हामी उनको घर वौद्धतिर लाग्यौं । डोल्मा मगर जातकी रहिछन्‌ ।ट्याक्सीमा बसेपछि उनी केहीबेर बोल्न सकिनन्‌ । केहीवेरपछि मुटुमा गाँठोपार्दै भनिन्‌, &#039;दिदी तपाईंलाई नभेटेकी भए आज हामी डिनरको लागि होटेलसौल्टीमा जानै प्लान थियो । सहतै नसक्ने गरी पेट दुख्यो दयाक्सीमै घर जान्छुभोलि भेटौंला भनी फुत्किएर आएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
मैले सोधेँ, &#039;तपाईंहरूको भेट कहिले कसरी भयो : शारीरिक सम्वन्ध भयोकि भएको छैत ?&#039; उत्ले आफतो भेट पच्चीस-तीस दितअगाडि बौद्धजयत्तीकोदिन बौद्धको गुम्बामा भएको र शारीरिक सम्बन्ध भने नभएको बताइन्‌ । कुरागर्दागर्दै हामी उनको घरमा पुग्यौँ । उनको बाबु-आमा आफनो पुर्ख्यौली घरधरान भएकोले उनी एक्लै रहिछिन्‌ । उनी पदाकन्या क्याम्पसमा बी.ए. पढ्दैरहिछिन्‌ । दुई फल्याट घर भाडामा दिएको रहेछ । खाना, डेरा वस्ने एउटीदिदीले पकाएर ल्याइदिइन्‌ । खाना खाएपछि मैले उनलाई आफनो सम्पूर्णकुराहरू एकएक गरी बताएँ । उनले मैरो सबै कुराहरू सुनित्‌ । त्यसपछिउनले एकएक गरी आफनो योजना सुनाइन्‌ । मैले उनको कुरा खुसी साथमञ्जुर गरेँ, हाम्रो सोजना बनिसकेपछि निमेषको फोत आयो । डोल्माले आफनोघरमा कोही नभएकोले भोलिको डिनर यहीँ गर्न आनुहोस्‌, मलाई अलि पेटदुखेकै छ भनिन्‌ । उसले डोल्माको कुरा खुसीसाथ स्वीकार गन्यो । राईकोछोरी हक्की र निहर स्वभावकी । त्यसमाथि मामा प्रहरी इन्स्पेक्टर रहेछन्‌ ।हामी भौलिको योजना सफल नै पार्ने प्रतीक्षा गरेर सुत्यौँ । यौजना सफल हुन्छकि हुँदैन भन्ने केही डर त थियो नै । भोलिपल्ट साँझ सात बजेतिर डोल्माआफैँ गएर निमेषलाई घरमा ल्याइन्‌ । उनीहरू कोठामै बसे, मैले खानेक्राओसार्नै काम गरेँ । डोल्मा राईकी छौरी, पहिलेदेखि नै पिउने भएकीले पिउनकुनै आपत्ति थिएन । निमेषले डोल्माको रूपको र आफूले किनिदिएको औंठीलाउँदा सुहाएको हातको प्रशंसा गयो । रक्सी लाग्दै गएपछि उनीहरू एक-अर्कासँग हात हालाहाला गरी चल्न थालै । रात पनि छिप्पँदै गयो । मैलेपूर्वपोजनाअनुसार मेन स्विचबाटै बत्ती अफ गरिदिएँ । वत्ती गएको चालपाएपछि निमैषले खुसी हुँदै भन्यो, &#039;डोल्मा बत्तीले पनि हाम्रो भावना बुझयो&#039;भन्दै नशामा ढुनमुनिँदै बेडमा पुग्यो र डोल्मा सुटुक्क कोठाबाट वाहिरिन्‌ । मडराउँदै बेडमा पुगें । उसलाई आफनो बसमा पारेँ । क नशामा डोल्मा-डोल्माभन्दै मग्न भयौ । बेलुका दुईपत्ट उसलाई बलात्कार गरेपछि मलाई आफूलेसंसारै जितेजस्तो लाग्यो । म त्यहीँ आनन्दले निदाएँछ्‌ । भोलिपल्ट बिहानडोल्मा-डोल्मा भन्दै छामेपछि म ब्युँझे । त्यो पापीलाई हेरेर हाँस्दै भने, &#039;निच,पापी, म मौसमी हँ । मौसमी आँखा खोल । हेर, मैले पनि तँ जस्तो निचलाईपतन गराएँ । तँलाई एड्स सारिदिएँ हो एड्स ।&#039;&lt;br /&gt;
(११३.&lt;br /&gt;
का आत्तिँदै उठेर चिच्यायो, “तँ को होस्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
डोल्माले ढोका खोल्दै भनिन्‌, &#039;चिनिनस्‌ गधा उनी मौसमी हुन्‌ । तैँलेमुम्बईमा बैचेकी मौसमी । तैंले गर्दा उनलाई एड्स लागेको छ । त्यो एड्सतँलाई पनि उपहार दिन चाहिन्‌ । मैल्ले उनक्रो पूर्ण सहयोग गरेँ । तँजस्तापापीलाई यसरी नै मार्नुपर्छ बुझिस्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
निमेष मु्दाजस्तै भयो र डोल्माले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;अव खुरुक्क यो घरबाटनिस्की, नत्र पुलिस डाकेर जेलमा कोचिदिन्छु । बुझ असत्ती चोट आफूलाईपर्दा कति असैहय हुँदोरहेछ । अब केका लागि वेच्छस्‌ केटी, तेरो त मृत्युनिश्चित छ।&#039;&lt;br /&gt;
मैले थुक्दै गाली गरेपछि निमेषले रुँदै भन्यो, &#039;चुप लाग वेश्या, मैले तैरोबलात्कार गरेको हुँ ? म त्यस्ती केटीको खोजीमा थिएँ, जसलाई प्रेमको मूल्यथाहा होस्‌ । मैले तँ जस्तै पैसामा बिक्ने र यौवनकै माया गर्नेलाई वेचेँ त केपाप गरेँ हँ ? तैलेजस्तै अन्योलमा पारेर कसैको वलात्कार गरेको छैन । हो,डोल्मा म तिम्रो व्यबहार देखेर तिमीलाई साँच्चै माया गर्न लागिसकेको थिएँ,तिमीले पनि डिनरका लागि जान्छु भनेपछि म एकपल्ट रोएँ । तिमीले औँठीसहजै स्वीकार गौ । मैले बुझौं तिमी पनि सुनलाई प्रेम गछयौं । अझ के-केलाई प्रेम गर्थेक बुझन बाँकी नै थियो ।&#039;&lt;br /&gt;
डोल्माले भनिन्‌, &#039;तिमीले सोह्रैआना ठीक कुरा नगरे पनि केही हदसम्मठीक कुरा गन्यौ । चाहे जे होस्‌, तिमीले केटी बेच्नेचाहिँ नहुने थियो ।&#039;&lt;br /&gt;
मैले भने, “साले तैँले पनि त जीबनको सही अर्थ बुझाउन सक्थिस्‌ । जसरीकबिले आफूली प्रेमिकालाई बुझायो ।&#039;&lt;br /&gt;
निमैषले आँसु पुछ्दै भन्यो, &#039;चुप लाग आफनै बाबुलाई मार्ने हत्यारा । तँजस्तालाई प्रेमको अर्थ बुझाउने ? कविले प्रेमीलाई नछुँदा क कति रिसाएकीथिई । तैँले आफनै आँखाले देखेकी होइनस्‌ : कवि युवतीलाई प्रेमको मूल्यबुझाउन होइन तिमी मेरो प्रेमी बन्न लायक छैनौ भन्न घर गए । पहिलोप्रेमीलाई पनि यौग्य नभएर कवि आफैँले छोडेका थिए । उनले तिमीहरूजस्ताको यौनइच्छा पूरा गरेनन्‌ । मैले पूरा गरे&#039; भन्दै निमेष रुँदै बाहिरियो ।&lt;br /&gt;
मैले र डोल्माले मुखामुख गरी एक-अर्कालाई हेन्यौं । हामी दुवैलाई आफ्नैछायासँग केही मात्रामा घृणा लाग्यो नै । म त्यही क्षण डोल्माको घर छोडीगाउँतिर गएँ । गाउँमा एड्स लागेको थाहा पाएपछि सबैले छी:छी: र दुरदुरगरे । पछि काठमाडौं नै फर्किएँ । यहाँ आएपछि थाहा पाएँ, निमेषले विष सेवनगरी आत्महत्या गरेछ । म भने आत्महत्या गर्दिनँ । बरु बाँचुञ्जेल एड्सबारेमाचेतना फैलाउने काम गर्छु । धन्य तिमी, तिमीले फिरोजजस्तालाई नयाँ जन्मदियौ । मैले निमेषको दर्दनाक हत्या गरेँ ।&#039; मौसमीले सुँक्कसुँक्क गरी रुँदै&lt;br /&gt;
११४&lt;br /&gt;
भनिन्‌, &#039;निमेषलाई मारेकोमा मलाई गर्वचाहिँ छैन । खासै पछुतो पनि छैन ।नढाँटी भन्दा मैले उसको बलात्कार गरेँ । उसले मेरो बलात्कार गरेकोचाहिँहोइन । तिमीसँग सम्पूर्ण क्राहरू गरी माफ माग्ने ठूलो इच्छा थियो । म तिम्रो,खोजीमा भौंतारिरहेकी थिएँ । अस्ति रोहिणी भनेर बोलाएको त रेष्मा पोरहिछिन्‌ । उनले तिमी यहाँ पढ्छयौ भनेपछि यहाँ आएकी हुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले मौसमीलाई मायालु पाराले हेर्दै भनिन्‌, &#039;घर जलेपछि इनार खन्नुकोऔचित्य छैन । तर तिमीले चार-छ जनालाई मात्र भए पनि बाटो देखाउनसक्यौ भने उनीहरू भयावह धापबाट मुक्ति पाउन सक्नेछन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
“म पनि त्यही सोच्दैछु । मैले तिम्रो निद्रा बिगारैं होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
“मौसमी, जाबो निद्राको चिन्ता नगर, तिमीले मलाई सम्झेर यहांसम्मआयौ । त्यो भन्दा ठूलो मेरा लागि केही छैन । ल अब जान्छु । मर्नु त एकदिनसबैले छँदैछ । ढिलो-चाँडो न हो । पीर नगर ।&#039;&lt;br /&gt;
मौसमीले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;मलाई मृत्युको पटक्कै चिन्ता छैन । मेरो पीरनगर ।&#039;&lt;br /&gt;
शालु मौसमीसँग बिदा भएर सर्जिकल वार्डबाट बाहिरिन्‌ । मौसमीले एकोहोरोशालु गएतिर हेरिरहिन्‌ ।&lt;br /&gt;
तेईस&lt;br /&gt;
प्रशन्नले पढाइ सिध्याएर आएपछि रोहिणीको जीबनमा बसन्तको बहारआएझौं भयो । पीताम्बरा, कैशव, चन्द्रकान्त, कान्छी, शालु सबैसबै खुसीथिए । विवाहको दिन पनि तय गरियो । विबाहका लागि आमालाई लिएरआउँछु भनी गएको प्रशन्न नफर्केपछि सबैको मनमा सातो गयो । सवैले आ-आफनो अनुमान गरे । इन्जिनियरसम्म भइसकेको प्रशन्न एकैपल्ट दुलही लिनआउने सुर गरे होला । निम्ता बांड्नेदेखि लिएर विबाहको सम्पूर्ण तयारी भयो ।प्रशन्तको भने अत्तोपत्तो भएन । यता रोहिणीलगायत सबैको सातो गयो ।प्रशन्नको खोजखबर गर्दा प्रशन्न घरमा नै नपुगेको करा पत्ता लाग्यो । रोहिणीप्रशन्तको चिन्ताले गर्दा मूर्दामा परिणत भइन्‌ । छिमेकीहरूले काखी बजाउनेठाउँ पाए । रोहिणीको चरित्रमाथि आक्षेप लगाउँदै भने, &amp;quot;पहिले छाडा सांढेजस्तैछोडेका थिए, बल्ल चाल पाए । त्यो वूढी कन्यालाई इन्जिनियरजस्तो केटाले केविवाह गरोस्‌ ? बैंसलाई थेग्न नसकेर मोजमस्तीचाहिँ गन्यो, विबाहचाहिँ केगर्थ्यौ ?&#039;&lt;br /&gt;
युबाहरू रोहिणीको विवाह भएन भने आफूहरूले रोहिणीमाथिको अधिकारजमाउने कुरा गर्दै जुंगामा ताउ लगाउँथे । यसरी समाजले रोहिणीलाई पूर्ण&lt;br /&gt;
११५।&lt;br /&gt;
रूपमा वेश्यामा परिणत गयो । रोहिणीका परिवारचाहिँ प्रशन्तमाथि कनैदुर्घटना नै भयो भन्ने पीरले व्याकुल भए । रोहिणीको हृदयमा लागैको आगोनिभाउन कसैले सकेनन्‌ । यता शालु रोहिणीको र सुजनको चिन्ताले विचलितभएपछि फिरोज पनि प्रशन्नको खोजीमा लागे । केही दिनमै फिरोजले वास्तविकतापत्ता लगाएरै छोडे । बास्तव्रिकताचाहिँ प्रशत्नले करोडपति सचिब तिरञ्जतकोबीसबर्षे पौडसी छोरी नर्मदासँग रोहिणीको बिबाह गर्ने भनेकै दिन बिबाह गरेरहनिमुन मनाएर पनि आइसकेछ । फिरोजको क्रा सुनेर केहीक्षण त शालुलेआफूलाई सम्हाल्नै सकिनन्‌ । रोहिणी र उसको उदार दिल भएका बाबुआमालाईप्रशन्नको वास्तविकता ओकेल्न तागत नभएपछि यो जिम्मा शालुले फिरोजलाईसुम्पिइन्‌ । फिरोजले वास्तविकता बताउँदा घरमा मान्छे मरेजस्तै रुवावासीभयो । रोहिणी मूर्छा परिन्‌ । डाक्टर आएर स्लाइनपानी दिएको दस-पन्धरमिनेटपछि रोहिणीको होस खुल्यो । होस खुलेपछि स्लाइनको तार चुतैर फयाँग्दैरोहिणी चिच्याउन थालिन्‌, &#039;पापी फिरोज तैँले झूट बोलिस्‌ । शालु तँ पनिपापिनी होस्‌ । प्रशन्त मलाई केबल मलाई मात्र प्रेम गर्छन्‌ बुझिस्‌ ? तिमीहरूलेत के स्वयम्‌ भगवान्‌ नै आएर प्रशन्नले तँलाई धोका दियो भने पनि मगत्याउँदिनँ । बरु भन्‌ मेरो प्रशन्नलाई के सङ्कट परेको छ : तेरो फिरोजजस्तोहोइन मेरो प्रशन्त क देबता हो देबता ... ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले रोहिणीको गालामा दुई &#039;फापड दिँदै भनिन्‌, &#039;चुप लाग सुंगुर्ती, कतिरेदछैस्‌ दैवजस्तो बाबु-आमालाई । तेरो तमासा हेर्न छिमेकीहरू बसिरहेकाछन्‌ । त्यसका लागि मर्ने चाहन्छेस्‌ होइन ? म तँलाई विष दिन्छु तँ मर । तेरोबाबु-आमाले तेरो यो हालत देख्न त पर्दैन । तँ जस्तो स्वार्थी बाच्नु व्यर्थ छ ।तैँले त कनाले त्यत्रो त्यागको बदला के दिइस्‌ ? केवल आँसु र जलनदिड्स्‌ गा&lt;br /&gt;
मेरो प्रशन्त मलाई छोड्न सक्दैनन्‌, मैले बुझ उसबाट मलाई छटाउनेषड्यन्त्र हो तिमीहरूको, क गरिब छ त के भो मन छ सँग । मलाई धनकोलालच छैन म अहिल्यै उसलाई भेद्छु हो अहिल्यै .. ।&lt;br /&gt;
शालुलै भनिन्‌, &#039;रौहिणीलाई प्रशन्नको बास्तविक रूप देखाउनैपर्छ । उनीपागल हुन्छिन्‌ तर प्रशन्न नराम्री हो भन्ने क्रामा विश्वास गर्दिनन्‌ । समाजलेजे भनोस्‌ एकपल्ट रोहिणीलाई प्रशन्नसँग भेटाउनैपर्छ, ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुको कुरा सबैलाई ठीक लाग्यो । फिरोज रोहिणीलाई लिएर प्रशन्नबसेको भव्य महल कालिमाटीमा पुगे । कार रोकी घरमा कोही भएको-नभएकोकुरा बुझे । संयोग घरमा प्रशन्न मात्र रहेछ । फिरोजले रोहिणीलाई डोच्याउँदैप्रशन्तको कोठामा पुसाउँदा प्रशन्न झसङ्ग भएर उड्यो । रोहिणीले प्रशन्नलाईदेखेपछि गर्लम्म अङ्गालो हाल्दै भनिन्‌, &#039;प्रशन्त यिनीहरू सन &#039;फुटा हुन्‌ ।यिनीहरूले तिमीलँई पापी भने । प्रशन्न तिमी पापी होइनौ ।&#039;&lt;br /&gt;
११६।&lt;br /&gt;
प्रशन्तले आफनो मजबुत हातले जवर्जस्ती रोहिणीलाई समातेर भुइँमापछादैं भन्यौ, &#039;ए, बूढीकन्या, तँ यहाँ किन ? तैले पढाउँदा लागेको दोब्बर पैसाभोलि नै म त्यरौ मुखमा फयाँक्छ । निस्की, निस्किहाल, के सम्झेर तँ यहाँआइस्‌ ? तेरो बैंस निखिसक्यो । तैँले मलाई पैसाले किन्न खोजेकी होइनस्‌ ?&#039;अब गाडावालालाई किनेर विवाह गर, नत्र अरूले पत्याउंदैनन्‌ । हेर मेरीप्यारीको तस्बिर भन्दै स्वास्नीको फोटो रोहिणीको आँखामा तेर्स्यायो र रोहिणीलाईघिसारेर ढोकाबाहिर फयाँक्दै फिरौजतिर हेर्दै भन्यो, &#039;तैँले किन यस वेश्यालाईयहाँ ल्याइस्‌ हँ ? यो कोठीको मात्र रौनक बन्न सक्छै । घरको रौनक बन्नसक्दिन ।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले रोहिणीलाई उठाउँदै भने, &#039;रोहिणीजस्तीको प्रेमलाई लत्याएकोछस्‌ । तँ कुनै दिन घरको न घाटको हुन्छस्‌ ।&#039;&#039;जञा-जा तँ नै विबाह गर यसलाई बडो गाली गर्दोरहेछ साले ... ।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले मूर्दाजस्तै भएकी रोहिणीलाई डौच्याउँदै कारमा हालै । रोहिणीलाईविश्वास नै लागेन कि मान्छे त्यति धेरै गिर्छ । रोहिणीको आँखामा प्रशन्न,बेहोस भएको दृश्य, उसको कोठाको दृश्य, आफूलाई घिसारेको दृश्य आँखामाएकपछि अर्को गर्दै नाचिरहयो । यता घरमा सबैज्ञना रोहिणी र फिरोज आउनेप्रतीक्षामा थिए । रोहिणी र फिरोज आएपछि शालुले डोच्याएर कोठामा लगिन्‌ ।रोहिणीलाई तकियामा अडेस लगाउन लगाई ओठल्लयानमा बसाइन्‌ । रोहिणीलेसबैलाई एक-एक गरी हेरेर बर्बर आँसु झारिन्‌ । शालुले आँसु पुर्छिदिँदै भनिन्‌,&#039;रोहिणी किन रुन्छेस्‌ भन्‌ त ? हामी सबैलाई हेर । हामी सबै तेरो खुसीकालागि जे पनि गर्ने तयार छौं । भन अव हामीले के गर्नुपन्यो ?&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीले आँसु पुछ्दै भनिन्‌, &#039;शालु त कति महान्‌ छेस्‌ । त्यसैले त सबैकोप्रिय छेस्‌ । तँलाई मैले त्यत्रो गाली गरेँ, तैँले त्यो पनि विर्सिस्‌ ? आज मलाईथाहा भयो । मेरो स्वयम्बर तैंले नै रोकेकी होस्‌ । तँ मलाई हरबाघाबाट मुक्तिगराउन चाहन्थिस्‌ । तर, मैले तँलाई के-के सोचेँ ।&#039;&lt;br /&gt;
केशवले आँखाको आँसु पुछ्दै भने, &#039;तिमीले ठीक भन्यौ छोरी, तिम्रो स्वयम्बररोक्ने कुरा शालुले नै गरेकी थिइन्‌ । अझ स्वयम्बर भइसकेको भए योसमाजले के भन्थ्यो होला । यो कुरा मलाई र शालुलाई मात्र वाहा छ । अब जेहुनु भैगो पीर नगर ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले जुस ल्याएर दिँदै भनिन्‌, &#039;अब बिस्तारै जुस खा । तिमी धेरैथाकेकी छयौ । हामी एक भयौं भने जस्तोसुकै बिकराल हुरीको पनि सामनागर्न सम्छौं । तिमीले हिम्मत हान्यौ भने हामी सबै टुदछौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीले गहभरि आँसु पार्दै भनिन्‌, &#039;अब म हिम्मत हार्दिनँ शालु, ममी,बाबा, दिदी, दाइ, तँ कसैले पनि मेरो पीर गर्नुपर्दैन ।&#039;&lt;br /&gt;
११७]&lt;br /&gt;
रोहिणीको कुरा सुनेर सबैको मुख उज्याले भयो । शालु र फिरोजलाई नैसबैले धन्यवाद दिए । मोनाले सबैलाई च्रिया बाँड्दै भनिन्‌, &#039;शालु दिदी, मैलेपत्ति कान्छीदिदीले जस्तै गरेँ नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;होइन के कान्छी दिदीजस्तो गज्यौ ? मैले त कुरा नै बुझिनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
मोनाले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;मैले आफनो छौराछोरीको नाम तपाईंकै नामबाटराखेँ, सागर संकिना ।&#039;&lt;br /&gt;
मोनाको क्रा सुनेर सबैजना हाँसे । म पनि तैरै नामबाट ..... । भन्दाभन्दैरोहिणीको आबाज बीचैमा रोकियो ।&lt;br /&gt;
रोहिणीको क्राले सबैको आँखामा आँसु भरियो । कोठामा केहीबेर सन्नाटाछायो । कान्छीदिदीले क्रा मोडिन्‌, &#039;आजचाहिँ म रोहिणी मैयाँसापलाई मनपर्नेखाना बनाउंछु ।&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीको कराले रोहिणीले सबै करा बिर्सेर हाँस्दै भनिन्‌, “मैले शालुको डाहगर्छु भनेर होला भो-भो गर्दिनँ । शालुलाई मन पर्ने चिज नै बनाउनुहोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले घडी हेर्दै भनिन्‌, &#039;ल दिदी यही कालीलाई मनपर्ने चिज नै बनाउनुहोस्‌ । म जान्छु पनि, सुजनको कुरा हामी सबैलाई थाहा नै छ । अस्तिदेखिअलि चाँडो घर आउन थालेका छन्‌ । म घरमा भइनँ भने उनी झन्‌ मनोमानीगर्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
सबैले शालुलाई घर जान आग्रह गरे । शालु र फिरोज बिदा भएर आफूनो-आफनो घरतर्फ लागे ।&lt;br /&gt;
रोहिणीको केही परिवर्तित व्यवहारले रोहिणीको परिवार त केही खुसी भयोतर रोहिणी प्रशन्नले हानेको बञ्जको चोट सम्झँदा क्षण-क्षणमा रन्धनिन्थिइन्‌ ।त्यसमाथि समाजले रोहिणीको परिवारको खोइरो खन्न कनै कसर बाँकी राखेन ।भन्थे, &#039;बुढेसकालमा छौरी पाएँ भनेर मैमत्त भएका थिए । छोरीले नाकमा दिसालगाई हाली । रोहिणीजस्ती सन्तान जन्मतुभन्दा त नजन्मिदिएको भए हाइसन्चौहुन्थ्यो । आज यो दिन देख्न पर्दैनथ्यो । कतिबटा बच्चा फयाँकी कुन्नि ? अवकसले बिवाह गर्छ, त्यस्तालाई । छौरो नभएको घर बूढीकन्या बस्ने भई, राम्रैभयो।&#039;&lt;br /&gt;
कोही छिमेकी सद्भावना देखाउँदै स्वास्नी मरेको, छोराछोरी भएकाहरूकोकुरा लिएर आई भन्थे, हेर्नोस्‌ माटाको भाँडो फुटेपछि फुदयो-फुदपो । फलानोस्वास्नी मरेकोले त्यस्तै केटी भए पनि हुन्छ भनेको छ । थपक्क आँखा चिम्लेरदिनोस्‌ । त्यही पनि गुम्यो भने फेरि झन्‌ फसाद पर्छ ।&lt;br /&gt;
कोही विवाह गरेर छोराछोरी नभएकाहरूको कुरा लिएर आई भन्थये- &#039;फलानालेबिवाह गरेको बीस वर्ष हुँदा पनि बच्चा भएन रै । रोहिणीले बच्चा फयाँकेकी&lt;br /&gt;
पि१्द॒&lt;br /&gt;
हुनाले उनीबाट बच्चा हुन्छ भन्नै निश्चय छ, त्यसैले मार रोहिणीलाई माग्नपठाएका छन्‌ । दिनोस्‌, रोहिणीको भाग्य वन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
युवाहरू रोहिणीको घरनजिकै आएपछि यस्ता गीतहरू गाउँदै हिँड्थे ।गेट खुल्लै राख मैयाँ&lt;br /&gt;
भयाल खुल्लै राख&lt;br /&gt;
अरूलाई डाकेजस्तै&lt;br /&gt;
हामीलाई पति डाक&lt;br /&gt;
हौ .. हो हामीलाई पनि डाक ।&lt;br /&gt;
ओरालो लागेको मृगलाई बाच्छाले पनि खेद्छ भनेझैँ रोहिणीको आदर्शपरिवारलाई टिक्नै नसक्ने गरी बद्नाम गरे । रोहिणीको परिबार चुपचाप सवैघृणा पिउन विबश भए । सबैको दुर्बाच्य सुन्न नसकेपछि एक दिन केशवलेकान्छीसँग रुँदै भने, &#039;कान्छी, अव हामी यो समाजमा बाँच्न सक्दैनौं । हामीपलपल मर्नु साटो एकैपल्ट मछौं । हामी चारजना सुतेको बेला घरमा आगोलगाइदेङ, तिमीलाई धर्म हुन्छ । अब यो समाजले रोहिणी र रेष्माको विवाहहुन दिँदैनन्‌ । उनीहरूको आँसु पनि कति हेर्नु ?&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीले सम्झाइन्‌, &#039;बावा हजुरजस्तो मान्छेले यस्तो भन्त सुहाउँदैन ।कालो रात सधैँ रहँदैन । म शालु मैयाँसँग सल्लाह गर्छु, केही उपाय निस्कन्छकि।&#039;&lt;br /&gt;
कंशवले सुस्केरा हाल्दै भने, &#039;त्यो फूलजस्ती बच्चीलाई कति चोट दिनु ?सुजनको पीरले जलेको बेला ।&#039;&lt;br /&gt;
&amp;quot;सुजनमा धेरै परिवर्तन आइसक्यो रे पीर गर्नुपर्दैन भन्दै होइसिन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
तिमीले पीर गर्छर्यौ भनेर ढाँटिन्‌ होला । कै परिवर्तन हुन्थ्यो यति छिटो,हुन्देक शालुलाई केही नभन&#039; भन्दै केशव कोठाभित्र पसे ।&lt;br /&gt;
कान्छी केशाबको कुरा सुनेपछि झसङ्ग भइन्‌ र सोचिन्‌- उफ ! मैले पनिउहाँको बानी भुलेछु । मलाई चोट पर्छ भनेरै उहाँले ढाँद्नुभएको हो । कान्छीगर्दागर्दैको काम छोडेर कपडा पति नफेरी कृपण्डोल पुगिन्‌ । मनमा पीर भएरहोला उनलाई कसैको डर लागेन । शालु र सुजनको मात्र माया लाग्यो ।कान्छी सरासर भित्र पसिन्‌ । बिहानको समय उनले समय पनि भुलिछिन्‌ ।उर्मीलालाई देखेपछि पो &#039;झस्किन्‌ र बरण्डामै रोक्किइन्‌ ।&lt;br /&gt;
उमिंलाले हात जोड्दै भनिन्‌, &#039;कान्छी तिमी आयौ अब यो घर छोडेर कहीँनजाक, हामी बर्बाद भयौं कान्छी बर्बाद ... ।&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीको नाम सुन्नेबित्तिकै दीपक पनि हतारहतार औछ्लयानबाट उठेर&lt;br /&gt;
1119&lt;br /&gt;
आई हात जौडदै भने, &#039;कान्छी तिमी फर्कियौ ? बिन्ती तिमी अब यहाँबाटनजाक । पहिलेको जस्तै यो घरलाई मन्दिर बना ।&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीले उनीहरूको कुराको जवाफ नै नदिई भनिन्‌, &#039;म यहाँ सुजनबावुलाईहेर्ने आएकी हुँ ।&#039; उर्मिलाले नम्र स्वरमा भनिन्‌, &#039;शालु आजकाल सुजनकैकोठामा सुत्छित्‌ । तिमी नजाक है कान्छी यहीँ वस ।&#039;&lt;br /&gt;
उर्मिलाको करा नसुनी कान्छी सुजनको कोठामा पसिन्‌ । कान्छीलाई देखेपछिशाल्‌ अलि डराइन्‌ । कान्छीले भनिन्‌, &#039;भो नडराइस्यो । कस्तो छ सुजनबाबुलाई :&#039;&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीलाई आफनो कोठामा लगेर भनिन्‌, &#039;हेर, कपडा पनि नफेरीआउनुभएको । दिदी त्यो लत छुटाउन त साह्रै गाह्रो हुँदोरहेछ । डुक्स नखाएपछिहातखुट्टा थरथर काम्ने रहेछन्‌ । उनी रातभरि छट्पटाएर निदाउन सकेनन्‌ ।अहिले एकैछिन भयो निदाएका । भन्नोस्‌ रोहिणीलाई कस्तो छ !&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणी मैयाँको कुरा छोडिस्यो । सुजनबावुको मनमा म खराब बाटोमाहिँडेको रहेछु भन्ने चैत आयो कि आएन ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;आयौ दिदी आयो । उनी आफूलाई नियन्त्रण गर्न सक्दो कोसिस पनिगर्दैछन्‌ । उनको अवस्था देख्दा त मलाई नै डर लाग्छ । कत्मना गर्नौस्‌,फिरोजले ड्रक्स र युवती एक्कँपल्ट कसरी छोडे होला !&#039;&lt;br /&gt;
गाँगा भन्नुहुन्थ्यो, &#039;फिरोज छटपटाउन थाल्दा हजुरको तस्बिरलाई छातीमाराखैर मुद्ठी बाँध्नुहुन्थ्यो रे, कहिले ओठ टोकेर रगत निकाल्नुहुन्थ्यो रे, कहिलेहात टोकेर आफूलाई सम्हाल्नुहुन्थ्यो रे, कहिले हजुरको आर्ट गदै बस्नुहुन्थ्योरे॥&lt;br /&gt;
&#039;शालुले भावविभोर भएर भनिन्‌- &#039;दिदी, सुजन र रोहिणीको समस्या समाधानभए हामी कति खुसी हन्थ्यौँ हगि ?&#039; दिदी फिरोज, तपाईंले कथामा भनेकोराजकमारजस्तै छन्‌ । तपाईंले त पहिल्यै फिरोज सफ्रिन्छ भन्ने थाहा पाउनुभएकोरहेछ । मलाईचाहिँ किन केही नभन्नुभएकौ ? फिरोजले तिम्रो दिदीले खोजेकोराजकुमार मै हुँ भन्दा म त हेरेको हेरै भएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
“वाहा थियो मैयाँसाप, राम्रै थाहा थियो । त्यसैले राजकुमार खोज्ने कुरा गरेकि नि ।&#039; कुरा गर्दागर्दै उर्मिलाले चिया र दूध लिएर भित्र पस्दै भनिन्‌, &#039;कान्छीचिया लेक ।&#039; शालुतिर हेर्दै भनिन्‌, &#039;शालु अब दिदीलाई तपदाङ है । कान्छीयहीँ बस्छिन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले हांस्दै भनिन्‌, &#039;के भनिस्या ममी हजुरले, दिदी यहीँ वस्ने रे?दिदीको स्वगंजस्तै परिबार छ । दुईवटा छौरा, लोग्ने सासूससुरा, चन्द सबैसवैछन्‌ । दिदीलाई त्यो घरमा सबैले आफनै मुटुजस्तै गर्छन्‌ । दिदीको छुट्टैसिनामंगलमा दुईतले घर छ । रोहिणीको बाबाले सुजनलाई सञ्चो छैन भनेपछि&lt;br /&gt;
१२०३&lt;br /&gt;
सुजनको मायाले कपडा नै नफेरी यहाँ आउनुभएको हा । दिदीको आफनैट्याक्सी छ । देवर-देउरानी सबै-सबै छन्‌ दिदीको ।&#039; उामेलाले शिर झुकाएरभनिन्‌, &#039;सुजनले नशाको सुरमा भन्न त भनेका थिए । दिदीको घर छ भनेर .. ।राम्रै भयो तिमीले यहाँ साह्रै दुःख पाएकी थियौँ । पापले डुबाउँछ, धर्मलेउठाउँछ भन्ने कुरा सोच्न सक्किएन । नभन्दै साँचो रहेछ । बच्चाहरू कव्रा-कवाछन्‌ नि?”&lt;br /&gt;
ठूलो त अठार वर्षका भए । होटेल मेनेजमेन्ट पढ्दैछन्‌ । कान्छा सातवर्षका भए । तीन क्लासमा पढ्दैछन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
“सौझोको साथ दैव भन्छन्‌ । त्यसैले तिम्रो राम्रो भयो । तिमी यहाँ आउँदैगर, हाम्रो भूललाई माफ गर ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;होइन मैयाँसाप त्यसो नभनिस्यो । सँगै वस्दा सानोतिनो गल्ती भइहाल्छ ।&#039;उमिंला आफूले गरेको अत्याचार सम्झेर वोल्न नसकी कोठाबाट बाहिरिन्‌ ।&lt;br /&gt;
“दिदी ममीपापा आफूले खनेको खाल्डोमा आफैँ परेपछि बल्ल चेत्नुभएकोछ । आजकाल घरमा रक्सीको गन्ध छैन । उहाँहरूको शिर झुकेको छ,&#039; शालुलेभनिन्‌ ।&lt;br /&gt;
“मैले थाहा पाएं, अघि नै दुबैले मसँग माफी मागेर हात जोडिस्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
“त्यसो भए दिदी कहिलेकाहीँचाहिँ आउँदै गर्नुहोस्‌ । भन्नोस्‌ न दिदी रोहिणीकोकै हाल छ ? सुजनको पीरले कहीँ जान मन लाग्दैन । अस्पतालबाट सिधै घरआउँछु ।&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीले विहान केशबले भनेको क्रा जस्ताको तस्तै भनिन्‌ । छिमेकीहरूलेओकल्ने गरेको दुर्वाच्य शव्दहरूका बारेमा बताइन्‌ । दिदीको कुरा सुन्दा शालुलाईज्यादै नमज्जा लाग्यो । सृजन उठेको थाहा पाएपछि दुबै सृजतको कोठमापुगे । सुजनले कान्छीलाई देखेपछि अड्दगालो हालेर रुँदै भने, &#039;दिदी तपाईं यहाँभएको भए म विंग्रिन पाउंदैन ये । दिदी म चाहेर पनि सम्हालिन सकेको छैन ।बस मर्ने सजिलो होला तर नशा ... ।&#039;&lt;br /&gt;
सुजनको कराले कान्छी र शालुकै आँखाबाट आँसु &#039;फत्यो । कान्छीले सुजनलाईपलङमा वसाएर मायालु पाराले कपाल मसादै भनिन्‌, &#039;तपाईंलाई सन्चो नभईकनम यहाँबाट जान्न । मोनालाई फोन गरेर हाम्रो घरमा जानु भन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
दिदीको कुराले शालु र सुजन खुसी भए । सुजनले दिदीको गालामा म्वाइखाँदै भने, &#039;म दिदीकै हातबाट वनाएको खानेक्रा खान्छु । बच्चामा सुतेजस्तैगरी दिदीको काखमा सृत्छ्नु ।&#039; कान्छीले रुँदै भनिन्‌, &#039;म हजुरको सम्पूर्ण इच्छापूरा गर्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
दिदीको कूरा सुनेर शालु र सुजन खुसी हुँदै हाँसे ।&lt;br /&gt;
१२१ ।&lt;br /&gt;
चौबीस&lt;br /&gt;
हेलो, मुमा नमस्कार&#039; &#039;ओ शालु नाती भाग्यमानी भए । के छ, बा हालखबर ?ठीकै छयौ हेन ? सुजनलाई कस्तो छ ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;ठीक छु मुमा, अहिले सुजनको कुलत छुटाउन दिदीहरू सबैजना यतैबस्नुभएको छ । सुजनले लक्ष्य प्राप्त नगरेसम्म दिदीहरू यहाँबाट जानुहुन्त रे ।मुमा, मलाई अब सुजनको कुनै चिन्ता छैन । दिदीले सुताउनुहुन्छ, दिदीलेउठाउनुहन्छ । दिदीले नै खुवाउनुहुन्छ । सुजनलाई सानैदेखि गीत-सङ्गीत मनपर्ने भएकोले फुर्सदको समयमा सङ्गीत सिक्‌न्‌ भनेर सङ्गीत टिचर राख्नैसल्लाह भइरहेको छ ।&#039;&lt;br /&gt;
“नानु, त्यस भए तिमी सधैँको लागि यहाँ आए हुन्न र?&#039;&lt;br /&gt;
शालुले अनकनाउँदै भनिन्‌, &#039;दिदीको पनि त्यही इच्छा छ । शायद दिदीआज त्यहीँ आउनुहुन्छ होला :&#039;&lt;br /&gt;
गंगाले हाँस्दै भनिन्‌, “ल.. ल अब हाम्रो घर पनि स्वर्ग हुने भयो । साह्रैखुसीको कुरा सुनायौ । फोन फिरोजलाई दिउँ । उनी पनि साह्रै खुसी हुन्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;क्ैगो फोन दिनुपर्दैन दुई बजेतिर कान्ति अस्पतामै जानु भनिदिसेला । अरूकुराहरू पनि गर्नुछ । हस्‌ फोन राख्छु पनि नमस्कार ।&#039;&lt;br /&gt;
गंगाले नमस्कार भन्दै फोन राखिन्‌ ।&lt;br /&gt;
कान्ति अस्पतालको चौरमा बसिरहेका फिरोजसामु पुगी शालुले बस्दैभनिन्‌, &#039;वस्दाबस्दा तपाईँलाई कहिल्यै पट्यार लाग्दैन हगि ? मैले हजुरलाईएक बजे होइन । दुई बजे यहाँ बोलाएकी थिएँ । ड्युटी गर्दागर्दै यसो हेरेकोदसुम्क चौरमा बसेको देख्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले हाँस्दै शालुतिर हेरेर भने, &#039;यो अस्पतालको भित्ताभित्तामा तिमीलाईदेखेर तिमीसँगै मौन वार्ता गरिरहेको थिएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले भनिन्‌, &#039;माया पनि ठिक्क गर्नुपर्छ रे, अति धैरै माया गन्यो भौ चाँडैबिछोड हन्छ रे, म चाँडै आकाशमा गएँ भने नि !&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले रिसाउँदै भने, &#039;त्यस्तो अपशब्द मुखबाट निकाल्दै ननिकाल ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले हाँस्दै मनिन्‌, हेर, हेर रिसाएको, रिसाउँदा त झनै सुहाउँदो पोरहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले हाँस्दै भने, &#039;शालु तिमी पनि, ल भन, विशेष कुरा केही छकि ?&#039;&lt;br /&gt;
“भरे घरमा गएर सुन्ने कि मेरै मुखबाट सुन्ने ?&#039;&lt;br /&gt;
[१२२&lt;br /&gt;
&#039;तिम्रै मुखबाट सुन्ने छिटो भनन शालु करा केहो?&lt;br /&gt;
शानुले भनित्‌, &#039;दिदीले भन्नुभएको हाम्रो बिह गर्ने उमेर भयो रे ।&#039;&lt;br /&gt;
&amp;quot;त्यो त मलाई पनि थाहा छ नि, कै नौलो क्रा भयो, सुजनलै लक्ष्य प्राप्तिनगरी रोहिणीले विबाह नगरी हाम्रो पालो आउँदैन क्यारे ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;तपाईं पूरा क्रा नसुनी वीचमा प्याच्च बोल्नुहुन्छ । । विचरी दिदी हाम्रोखुसीका लागि हरपीडाहरू सहनुहुन्छ । दिदीहरू हाम्रै घरमा आइसक्नुभयो ।रोहिणीको घरमा मोना र रोमाकान्त दाइ हुनुहुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&amp;quot;उनीहरूलाई विपत परेको बेला दिदी यता आउँदा केही भन्नुभएन ?&#039;&#039;दिदीले नै सबैलाई सम्हाल्नुभएको थियो ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;सबै विपत टरिसक्यो । सबैको सल्लाहले नै दिदी यहाँ आउनुभएको हो ।थाहा छ रोहिणीको विवाह हँदैछ । डा. आकाशसँग, तपाईंले चिन्नुभएको छैन ।डा. आकाश बस्न्यात । हामीसँगै पढेका हुन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले अत्तिँदै भने, &#039;को आकाश बस्न्यातको करा गरेकी ? कतै बाबु-आमा अमेरिकामा भएको आकाशको त कुरा गरेकी होइनौ :&#039;&lt;br /&gt;
“ला कसरी चिन्नुभयो तपाईंले ? हो, त्यही आकाश त हुन्‌ नि ! रोहिणीकोपरिवार र स्वयम्‌ रोहिणी पनि साह्रै खुसी छिन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजलै भने, &#039;शालु तिमी होसमा त छ्यौ ! आकाशको क्रा तिमीलाईथाहा नै रहेनछ क्यार, आकाश मैरौ कान्छी फफको भान्जा हुन्‌ । उनी कसरीरोहिणीसँग विवाह गर्न सक्छन्‌ ? तिमी फझुक्कियी 1&lt;br /&gt;
&#039;फिरोज म होइन तपाईं नै झुक्किनुभयो । आकाशलाई रोहिणीका लागिप्रस्ताप राख्नै त मै हुँ। ल भन्तोस्‌ को होसमा छैन ? मैलै आकाशलाईरोहिणीको जीवनमा घटैका सबै घटना सुनाएँ । रोहिणीको बाबाले समाजकोघृणा सहन नसकेर दिदीसँग भन्तुभएछ, &#039;कान्छी हामी चारजना सुतेपछि घरमाआगौ लगाइदैक । सबैले घर जलेर मन्यौ भन्छन्‌ । हामीलाई पनि शान्तिमिल्छ ।&#039; दिदीको कुरा सुनेर म धेरै दिन बिचलित भएँ, भट्ट आकाशलाईसम्झेर आकाशको मामाघरमा पुगेँ । सबै करा जस्ताको जस्तै आकाशलाईसुनाउँदै रोएँ । आकाशले भने, &#039;शालु तिमी नरोक, म तिम्रो खुसीका लागि जेगर्न पनि तयार छु । उनलै मैरो एउटा पनि करा काटेनन्‌ । विवाह गर्ने कुरापक्का भयो । रोहिणीको डाक्टरसँग विवाह हुँ हुँदैछ भन्ने सुनेपछि रोहिणीलाईवेश्या भन्ने छिमेकीहरू शिर &#039;झकाई हिँड्छन्‌ रे । झन्‌ आकाशलाई देखेपछि केगर्लान्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
शालुको कुराले फिरोजको मुटु फुट्लाजस्तो भयो । कानमा केही वर्षअगाडिफुपूले भनेको शब्दहरू नै ओहौर-दौहोर गच्यो । आज ज्वाइँ अमेरिकाबाट&lt;br /&gt;
१२३)&lt;br /&gt;
बना&lt;br /&gt;
काठमाडौं आउँदै हुनुहुन्छ । आकाशलाई अमेरिका जाकै भनी फकाउन आउनेत होला, तर के जान मान्थे आकाश ।&lt;br /&gt;
मेरो प्रश्न थियो, &#039;किन फुपू आकाश अमेरिका नगई यहाँ बसेको ! बाबुआमासबै छोडेर ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;बाबु तिमीले शालुलाई प्रेम गरेजस्तै उनी पनि कसैलाई प्रेम गर्छन्‌ ।मलाई सबै थाहा छ । भन्न त माइजूको मायाले बसेको भन्छन्‌ तर भित्री कराअर्कै छ । उनले स्कुलमा पढ्दादेखि नै कसैलाई मन पराएका छन्‌ । उनैकोमायाले यहां बसेका हुन्‌ । सबै क्राहरू सम्झेर फिरोज पागलजस्तै भए ।&#039;&lt;br /&gt;
“म खुसीका कुराहरू गर्दैछु, तपाईं किन चुपचाप हुनुभयो ?&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले बनावढी हाँसो हाँस्दै भने, &#039;शालु म घेरै खुसी छु। घाममाबसेकोले होला टाउको पनि दुख्न लागेजस्तो छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ त्यसौ भए घरमा गएर आराम गर्नोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;फिरोज बोल्न पनि नसकी हाँसेजस्तो गरी शालुसँग बिदा भए । शालुअस्पतालभिव्र गइन्‌ । फिरोज वाण लागेको सिंहझैँ छटपछाउँदै फुपूको घरमापुगी । सिधै आकाशकी कोठामा पसे । कोही आएको चालपछि आकाशले तान्दैगरेको चुरोटलाई थाहा नपाउन्‌ भनेर हातले किचिमिची पारेर आत्तिँदै भने,&#039;फिरोज कतै पश्चिमबाट घाम त फल्केन ? कसरी यहाँ आयौँ : तिमीनआएको दुई-चार वर्ष नै हुन लागिसक्यो, बसन के छ खवर ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;फिरोजले आँसु झार्दै भने, हेरन पानीमाथिको ओभानो बनेको, तिमीलाईमेरो हालखबर वाहै छैन !&#039;&lt;br /&gt;
“यार, तिमी कहिल्मै आउने भए पो हालखबर थाहा हुन्छ । तिमी इन्जिनियरबन्यौ रे भन्नेचाहिँ सुनेको हुँ । मेरो खुसीको कुरा सुन्छौ भने म बिवाह गर्दैछु ।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले आँखा ओभानो पार्दै भने, &#039;आक्राश, यो के गज्यौ तिमीले ? केगन्यौ ? तिमी डाक्टर मान्छेले चुरोट पिउन थाल्यौँ ? हेर, अहिलेसम्म केहीबिग्रिएको छैन । तिमी शालुसँग विवाह गर । तर यसरी जीवत बर्बाद नगर ।शालु तिम्ै निम्ति जन्मेकी हुन्‌ । शालुलाई तिमीजस्तै आदर्श पति चाहिन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&amp;quot;मार तिमी किन यहाँ आयौ भनेको त त्यो पोक्चीको पो कुरा गर्न आएको ?त्यस्ता सयौं पोक्चीलाई म औंलामा नचाउन सक्छु बुझ्यौ !?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;कुरो र कुलो त जता लगे पनि जान्छ तर तिम्रो आँखाको भाबलाई म केसंज्ञा दिकै र चुरोट पिउनुको रहस्य म के बुझौं ? तिमीले सयौँ शालुहरूभेट्वाउँथ्यौ भने रोहिणीसँग किन विबाह गर्न लाग्यौ ?&#039; आकाशले चुरोट किच्रिमिच्ीपारी कागजमा राख्दै भने, &#039;तिमी पत्रकार हौ कि क्या हो, तिमीलाई सबै कुराभन्नुपर्ने ।&#039;&lt;br /&gt;
१२४&lt;br /&gt;
&#039;तिमीलै भन या नभन मैले सबै कुरा बुझिसके । तिमी शालुको पीडा देख्नसक्दैनौ । शालु रोहिणीको पीरले चिन्तित भएको देखेपछि तिमीले रोहिणीसंगविवाह गर्ने कुरा स्वीकार गथ्यौ । यही नै साँचो हो आकाश, यही नै साँचो हो ।तिमी र शालु पढेको स्कुल एउटै हो, फपू भन्नुहुन्थ्यो तिमीले महारागञ्जमानाम निकालेका थियौ रे, त्यहाँ किन नपढेको तिमी ? शालुका लागि तिमीलेधेरै त्याग गरेका छौ । त्यतिमात्र होइन, सम्पूर्ण आफन्त छोड्यौ । यहाँसम्म किआफूनी मायालु आमासम्मलाई छोड्यौ । तिम्री आमाले त आकाश यहीँ बस्छन्‌भने म पनि यहीँ बस्छु भन्नुभएको थियौ रे ।&#039; यी पनि &#039;फुटो हुन्‌ त ?&#039;&lt;br /&gt;
“चुप लाग फिरोज, अतीत कोट्याएर बलेको आगोमा घ्यू नथप । जोडीभगवानले नै बनाएर पठाउँछन्‌ रे । नत्र तिम्रो भेट कसरी शालुसँग हुन्थ्यो ?तिमी त सयौंको बाहुमा झूलेको मान्छे । शालुलाई देखेपछि किन मोहितभयौ : डृक्स युवतीहरूले तिमीलाई तान्त सकेनन्‌ किन ? माइजू भन्नुहुन्थ्यो-भान्जाबाबु फिरोजले त जुनी नै फेत्यो । प्रेममा त्यौ तागत हुँदोरहेछ ढुङ्गालाईनै देउता बनाउँदोरहेछ । दाजु-भाउजूले फिरोजलाई मूर्दा साबित गर्नुभएकोधियो । भन्नुहुन्थ्यो- मैयाँ फिरोज बरु मरिदिए हुन्थ्यो । कहिले त विष दिएरआफू पनि विष सेवन गरौं जस्तो लाग्छ । त्यस्तो अवस्थामा पुगेका तिमीलेशालुलाई पाउनका लागि जुन कष्ट उठायौ त्यो कष्ट म नाथेचाहि उठाउनसकिदिनथैँ ? शालुलाई तिम्रो प्रेमको विश्बास थिएन । तिमीले विश्वासको दियोबाल्यौ । उनी मेरौ प्रेममा बिश्बास गर्थिन्‌ । मैले उनलाई विश्वास दिलाउनसकिनँ । शालु तिमी पाउँदा कति खुसी छिन्‌ । उनको ओठको त्यो 044 छिनिभने मेरो प्रेमको के अर्थ ? प्रेममा समर्पण हुन्छ । तिमी शालुलाई प्रेमगर्छौ र यहाँसम्म आयौ । तिमीले सोच्यौ मैलेभन्दा बढ्ता प्रेम आक्राशलेगर्छन्‌ । तिम्रौ प्रेममा एक कण मात्र स्वार्थ भएको भए पनि तिमी यहाँआउँदैनथ्यौ । तिमीले सोच्यौ म आँसु पिएर पनि शालुको खुसी हेर्छु । मैले पनित्यही सोचेँ- शालु हाँसुन्‌ । तिमी आफैँ भन शालुले वास्तविकता थाहा पाइन्‌भने के गर्तिन्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले रुँदै भने, &#039;आकाश तिमी त्यसको चिन्ता नै नगर, म शालुलाईनराम्रोसँग तोडिदिन्छु । जसले गर्दा मप्रति घुणा जन्मिन्छ र उनी निर्धक्कहाँस्छिन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;त्यसौ भए म तिमीलाई रुवाऔँ ? के चाहिने-नचाहिने कुरा गर्छौ तिमी ?हेर, जब मैले रोहिणीलाई बिवाह गर्छ भने उनी यत्ति खुसी भइन्‌ कि के वर्णनगरौं । लाग्यो म उनको खुसीका लागि भए पनि काम लागें । फेरि शालुलेरोहिणीको विवाह मसँग गराउन खोज्नुको कारण उनलाई थाहा छ, रोहिणीआकाशलाई खुसी राख्न सक्छिन्‌ । मैले शालुले के भन्दिरहिछिन्‌ भनेर नेपालमेडिकल कलेजमा पढ्दा अन्नाको प्रसंशा गरेको थिएँ । उनले सम्झाएकीथिइन्‌- आकाश, जिन्दगी भनेको धेरै लामो छ । जै काम गर्दाखेरि पनि बडो&lt;br /&gt;
वर&lt;br /&gt;
हौस्‌ पुच्याएर गर्नुपर्छ । म तिम्रो ओठमा सधैं हाँसो देख्न चाहन्छु । उनले ज्यादैखिन्न भएर भनेकी थिइन्‌ । आज रोहिणीको कुरा गर्दा उती भन्थिन्‌- आकाशम धेरै सोचेर यहाँ आएकी हँ । मलाई तिम्रो पनि पीर थियौ । यो स्वार्थीदुनियाँमा तिमीले कस्ती केटी पाउँछौ भन्ने । रोहिणीलाई तिर्मीले चिनेकै छौ ।तिमीहरू दुबैको जीवन हाँसीखुसीमा बित्छ । मैले तिम्रो खुसी हेर्न नचाहेकोभए तिमीले अन्नाको कुरा गर्दा किन मौन हुन्थें र ! म मनमनै भगवानसँगप्राथना गर्थे- &#039;भगवान्‌ आकाशलाई अन्नाको मोहिनी आँखाबाट टाढा राख । मआकाश टुटेको हेर्न सक्दिनँ । आज म खुसी छु रोहिणीजस्ती निष्पाप मनभएकी केटी पायौ । तिमीहरूको जीवन सधैँसधैँ हराभरा हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले सुस्केरा हाल्दै भने, &#039;त्यसो भए किन चुरोट पिउँछौँ ? तिमीलेचुरोट पिएको देखे शालु कै खुसी होलिन्‌ त ?&#039;&lt;br /&gt;
छोडछ फिरोज, के गरौं, कसो गरौं लागेर मात्र चुरोट पिएको हँ । फिरोजतिमीले जीवनभर शालुलाई मैले प्रेम गर्थे भन्ने कुरा बिर्सेर पनि नबाताउ है! तिमीले जस्तै मैले पनि शालुको फौटोहरूको आर्ट गरेको छु । तिमीले आजैलग । विवाहपछि हामी लगतै अमेरिका जान्छौं होला । तिमीले बेला-बेलामातिमीहरूको हालखबर वताइरहनु है । फिरोज अर्को जन्म भए म अर्को जन्ममाचाहिँ शालु तिम्रो हुन दिन्न नि!&lt;br /&gt;
फिरोजले बर्रै आँस्‌ &#039;झारे । आकाशको पनि आँखा रसायो । दुवैका ओठहरूकेहीबेर मौन रहे । फिरोजकी फुपू रमा कोठाभित्र पस्दै भनिन्‌, &#039;ओहो ! कुनबेला आएको तिमी, भर्खरै दाइले फोन गर्नुभएको थियो बधाई छ तिमीलाई ?&#039;&lt;br /&gt;
कैको बचाई फुपू ?&#039;&lt;br /&gt;
केको हुनु तिम्रै विवाह नि, कान्छीले हेराइजुराइ गरी मङ्सिर एक्काईस गतेलगन राम्रो छ भन्न आएकी थिइन्‌ रे । दाइले खुसी हुँदै भन्नुहुन्थ्यो- फिरोज तशालुलाई अझ दुई तीन बर्ष कर्नुपर्छ भन्थे । कान्छीको क्रालै हामी घैरै खुसीभयौं । बेलुका आफान्तहरूलाई तिम्रो विवाह हुने खुसीयालीमा सातो पार्टी दिनेरे। फुपूको कुराले फिरोज न खुसीले हाँस्न सकै न रुन नै।&lt;br /&gt;
आकाशले हाँस्दै भने, &#039;ल यार बधाई छ । तिमी मभन्दा दुई दिनअगाडिहुलाहा हने भयौ ।&#039;&lt;br /&gt;
रमा ( फुपु ) ले भनिन्‌, &#039;हामी त आकाशलाई देखेर छक्क पस्यौं । अघिल्लोदिनसम्म भन्दै हुनुहुन्थ्यो अब अमेरिका जान्छु । विवाह नै गर्दिनँ । भोलिपल्टशालु आएर के-कै भनेर सम्झाइन्‌, विवाह गर्न राजी भइहाल्नुभयो । म अचम्मैपर्छु किन सबैजना शालुको कुराको कदर गर्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
माइजू, शालु सबैको भलाड्गका लागि कुरा गर्छिन्‌ । त्यसैले सबैजना उनलाईमन पराउँछन्‌ । फिरोजतिर फर्किदै- जाक फिरोज तिम्रो घरमा सबैजना तिमो&lt;br /&gt;
१२६]&lt;br /&gt;
प्रतीक्षामा होलान्‌ । रमाले पनि आकाशको कुरामा नै समर्थन गरिन्‌ । आकाशलेहाँसे गरी भने- अर्को जन्ममा चाहिँ चिटिङ चल्दैन नि !&lt;br /&gt;
फिरोज बोल्नै सकेनन्‌ । फुपू र आकाशसँग बिदा भएर फिरोज घर गए ।घरको उल्लासमय वातावरणले पनि फिरोजलाई त्यति तान्न सकेन । फिरोजगएपछि आकाश धेरैबेर रोए ।&lt;br /&gt;
दीपक र उर्मिला सबै वास्तविकतासँग अनविज्ञ नै थिए । कान्छीले फिरोजकोघर विवाहको कुरा लिएर जानुअगाडि सबै कुरा भनिन्‌- फिरोजको घर जानदीपक र उर्मिलालाई अनुरोध गरिन्‌ । दीपक र उर्मिलाले खुसी हुँदै भने-हामीले त केवल जन्म मात्र दिएका हौं । जन्म दिनेभन्दा कर्म दिने नै ठूलोहुन्छ । शालु र सुजतका लागि तिमीले जे भने, जे गरै पनि हामीलाई मञ्जुरछ । हामीले मसान बनाइसकेको घरलाई तिमीले स्वर्गमा परिणत गन्यौ ।त्यतिमात्र होइन, हामी लोग्ने-स्वास्तीको सम्बन्ध दुटिसकेको थियौ । तिमीलेजोडिदियौ । तिमीले नै हामीलाई जिन्दगीको सही अर्घ बुझायौ । मायाको अर्थबुझायौ । तिमीले गर्दा तै आज हामी समाजको अगाड्धि शिर ठाद्घो गरेर हिँड्नसक्ने भएका छौँ । सम्पूर्ण अधिकार तिम्रै हो भनी पुनः शिर झकाए । सुजनकलेजबाट आएर कान्छीलाई अङ्गालो मार्दै भने- को हिँड्न सम्ने भयो ममी,पापा?&lt;br /&gt;
कसको हुन्थ्यो हामीले आफन्तै क्रा गरेका हौं । शालुको विवाह यही मङ्सिर२१ गते हुँदैछ ।&lt;br /&gt;
&#039;फिरोज दाइ भनिरहेको वानी, अब कसरी भिनाजु भन्ने होला, मलाई तलाजै लाग्छ भन्या । आज एघार गते भइसक्यो । दिदी आजै जाँ सुटको अर्डरगर्न । मलाई सुट छान्न आउँदैन । तपाईंले नै सुट छानिदिनुहोला । सौरब रसौजन्यले हिजो भन्दै थिए । हामीलाई हजुरबुबाले रोहिणी दिदीको विवाहकालागि भनेर सुट सिलाइदिइसक्नु भयो । म पनि उनीहरूको कलरसँग म्याचिङहुने कलरकै सुट लाउँछु ।&#039;&lt;br /&gt;
“हुन्छ बाबा हन्छ, पहिला खाजा त खाइस्यो त्यसपछि हामी सबै जाने ।&#039;उर्मिलातिर हेदैं 0414. मैयाँसाप र सापले पनि कपडा फेरिस्यो । चाहिनेसामानहरू फटाफट किन्न सुरु गर्नुपर्छ । नभए भ्याइँदैन ।&#039;&lt;br /&gt;
दीपकले भने, &#039;ठीकै भन्यौ तिमीले, ल उर्मी तयार होक । कान्छी तिमी पत्तितयार होक, आज सुजनले आफैँ झिकेर खाजा खान्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&amp;quot;प्लिज पापा मलाई दिदीको मुख नहेरी नास्ता खायो भने नास्ता खाएकोजस्तो लाग्दैन । बरु म छिटोछिटो खान्छु ।&#039; सुजनको कुराले दीपक र उमिलादुवै हाँसे । कान्छी र सुजन भान्सातिर लागे ।&lt;br /&gt;
विर्छ।&lt;br /&gt;
पच्चीस&lt;br /&gt;
“आन्टी, नमस्कार, उहाँ प्रशन्त अंकलको आमा हनुहुन्छ ।&#039; भनी गोकललेपरिचय गराएर काम छ भनी प्रशन्नको घरबाट निस्के ।&lt;br /&gt;
प्रशन्नकी श्रीमती वर्षाले गोकुलको नमस्कार फर्काएर प्रशन्नकी आमाप्रमिलाको खुट्टा ढोगिन्‌ । प्रमलाले सौभाग्य रहनू भन्ने आशिष दिँदै भनिन,“रोहिणी बाबा, तिमी त मैले कल्पत्ता गरेको भन्दा पनि सुन्दरी रहिछ्यौ । प्रशन्नकहाँ गए त ?&#039;&lt;br /&gt;
वर्षा आफूलाई रोहिणी नामले सम्बोधन गरेको सुनेर केही आश्चार्य पारित्‌र भनिन्‌, &amp;quot;बुटवलमा ठूलो होटल बन्दैछ । उहाँलाई त्यो होटलको नक्साबनाउने जिम्मा दिएको हुनाले होटल बनाउने ठाउँ निरीक्षण गर्न जानु भएकोछ । एक-दुई दिनपछि फर्किनुहुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
“बाबा ! विवाहमा मलाई किन नबोलाएको त ? गोकुलले अंकलले विवाहगर्नुभयो भन्न गएपछि हामफाल्दै आएकी ।&#039;&lt;br /&gt;
“वर्षा प्रमिलाको कुराले छक्क परिरहेकी थिइन्‌ । वर्षा ठूलौ खान्दानमाहुर्किन्‌, बढिन्‌ । बैँस उनलाई पनि चढ्यो । तर वर्षातको खहरेझैँ उर्लिचन्‌उनी । वर्षा मायालु, दयालु र सुन्दरी थिइन्‌ । प्रशन्न धन, दौलत र वर्षाकोमायामा छलाङ मारिरहेको थियो । क आफूलाई संसारकै भाग्यमानी पतिसम्फझन्ध्यो । वर्षा पनि प्रशन्तलाई आदर्श पतिको रूपमा सम्झिन्थिन्‌ । त्यसैलेअस्ट्रेलियाबाट वर्षालाई भिसा आइसक्दा पनि प्रशन्नको मायाले अस्ट्रेलियागएकी थिइनन्‌ । प्रशन्तलाई पनि अस्ट्रेलिया लैजाने प्रोसेस चलिरहेको थियो ।प्रमिलाको क्राले भने वर्षा केही अल्मलिरहेकी थिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
प्रमिलाले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;रोहिणी बाबा, किन मौन रहेकी अब तिमीलाईनलिई गाउँ जाँदै जान्त । गाउँलेहरू तिमीलाई हेर्न ज्यादै उत्सुक छन्‌ । थाहाछ । तिमीलाई ? मैले तिम्रो नाममा एउटा भैंसी र दुईवटा बाख्खा पेवा पालिदिएकीथिएं । पहिलो बैतमै एउटा बाखीले तीनवटा पाठापाठी पायो । अर्कोले दुईवटापाठा पायो । गोठभरि तिम्रो पेवाका पाठापाठी छन्‌ । भैंसीले पनि बिहान-बेलुका गरेर झन्डै एक पाथी दूध दिन्छ । पहिला-पहिला त घ्यू, क्राउनीपठाएका सामानहरू पर्काउँथ्यौ, चिठी पनि लेख्ब्यौ । धेरै भयो तिमीले चिठीपनि नपठाएकी, पछिल्लो पालाको क्यान फर्काइनौ । विवाहमा पनि चोलाइनौ ।कतै मसंग रिसाएकी त छैनौ ?&#039;&lt;br /&gt;
१३८&lt;br /&gt;
प्रमिलाको क्राले वर्षालाई भाउन्न होलाजस्तै भयौ । वर्षाले मनमनै सोचिन्‌ ।को रहिछिन्‌ घ्यू कुराउनी खाने रोहिणी, आफू रोहिणी नै भएर वास्तविकताबुझनुपस्यो । वर्षाले हाँसेफै गरी भनिन्‌, &#039;हेनोस्‌ आमा, हतारमा विवाह गरियो,हजुरलाई बोलाउने भन्दाभन्दै बोलाउनै पाइएन । अब क्यानहरू हामीसँगैजाँदा लैजाउँला हुन्न र ?&#039;&lt;br /&gt;
“मैले साक्षात लक्ष्मी बुहारी भनौँ या छोरी भनौं तिमीलाई पाएपछि नाथैक्यानको त चिन्ता छैन तर यहाँ मिल्किएको भाँडो गाउँमा काम लाग्छ भनेरमात्रै हो । लाक यो क्राउनी सम्धी-सम्धिनीका लागि, योचाहिँ तिम्रो र बाबुकोलागि । झोला खोलेर कपडाको पोको फुकाउँदै भनिन्‌, &#039;ल हेर बाबा मैले तिम्रैपेवाको खसी, बाखा बेचेर सुनको दुईबटा चुरा बनाइदिएकी छु । तिमीलेपद्धाइदिएको चुराकौ साइजमै छ यो। आफ म लगाइदिन्छु । वर्षाको हातमागिन्‌ ।&lt;br /&gt;
बर्षलि हात्त दिइन्‌ । बर्षाको हातमा त्यौ चुरा साह्रै ठूलो देखिएपछि रिसाउँदैवाणालाई गाली गरिन्‌, &#039;त्यो च्याङ्ग्रे मोराले त मैले दिएको नापमा चुरी नैबनाएनछ । पखोस्‌ त्यसलाई गाउँ गएपछि मार हपाछु र अर्को चुरीको तज्याला नदिई बनाउँछ । बाबा ! त्यो चुरा फुकाल फेरि हराउला । गाउँ गएपछित्यही बज्याले तिम्रो नापमा चुरा वनाउँछ । नानु, यो कोठाहरूको बहाल कतितिर्नुपछ नि ?&#039;&lt;br /&gt;
“आमा यो हाम्रो आफनै घर हो । हजुरलाई भोक लाग्यो होला के-केबनाकँ ?&#039;&lt;br /&gt;
“रोहिणी बाबा, तिमीलाई देखेपछि भोक, प्यास, वकाई सवै हट्यो । नानु,प्रशन्न पढेर आएको पाँच-छ महिनामै यत्रो घर कसरी बन्यो त? बाबुतभन्व्यो- रोहिणीको बाबुआमाले मलाई पढाउनका लागि पैसा नपुगेर घरकोकारसमेत बेचिदिनुभयो । फेरि यति ठूलो महल कहाँबाट आयो ? कतै तिमीलेबाबुआमाको साझौपनको फाइदा धैरै त उठाइनौँ ? अर्काको छोराको विश्वासगरेर त्यत्रो इन्जिनियर हो कि क्या हो पढाइदितुभयो फेरि उहाँहरूलाई नङ्ग्याएरयौ घर पनि माग्यौ ? रोहिणी, तिमी यति कठोर छयौ भन्नै मलाई पटक्कैलागेको थिएन । मलाई सम्धी-सम्धिनासँग भैटाइदेक म उहाँहरूलाई साफगाली गर्छु । प्रशन्न अलि लाल्ची छ भन्ने त मलाई बाहा भएकै हो तर तिमीपनि कम रहिनछयौँ । अन तिमी रिसाए रिसाक खुसाए खुसाक यौ घरको एकगैडा अन्न पनि नखाई घर फर्किन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
मायालु बर्षालाई सबै कुरा सपनाजस्तै लाग्यो । सोचिन्‌- बाबुबिनाकोपर्द,&lt;br /&gt;
गरिब गाउँले कसरी त्यत्रो पैसा खर्च गरी इन्जिनियर बने होला भनेको त कुरायति गहिरो पो रहेछ । यो चुरा रोहिणीको नापकै चुरा हो । आमालाई पनिनबोलाई हतारहतार विवाह गर्नुको रहस्य त यस्तो पो रहेछ । भगवान्‌ अब मकसरी बाचौं ? रोहिणी भन्नेको हृदयमा कति चोट परेको होला । मभन्दा अर्कोघानी र राम्री पायो भने प्रशन्नले मलाई पनि छोड्छ । म बर्बाद भएँ भन्नैसम्झेर वर्षालाई सहिनसक्नु भयो । उनी एक तमासकी भइन्‌ । आँसु तप्पतप्पगालाको बाटो हँदै कथामा &#039;झन्यो ।&lt;br /&gt;
प्रमिलाले वर्षातिर हेन सम्झाइन्‌, &#039;बावा, नरोक, तिमी अलि काँची नैरहिछौँ । मैते त यति मात्र भन्न खोजेकी हुँ, औँला दिँदा डुडुल्नो नै निल्नुहँदैन ।कतै घर माग्न प्रशन्नले नै दबाब त दिएनन्‌ ? उसको शरीरमा मेरो मात्रहोइन उसको बाबुको पनि रगत छ । पढेर आएको यति छोटो समयमा यत्रोदरबारजस्तौ घर बनाउने पैसा कमाए त प्रशन्नले ?&#039;&lt;br /&gt;
वर्षाले आँसु पुछुदै भनिन्‌, &#039;आमा तपाईं मेरो माइतीको पीर नगर्नोस्‌ ।उहाँहरूले दितत सक्ने भएरै यत्रो घर दाइजोमा दिनुभएको हो । दाइ अस्ट्रेलियामाहुनुहुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
तिमीहरू दुई बहिनीमात्र होइन र ? फेरि दाइ कहाँबाट आए ?&#039;&lt;br /&gt;
वर्षाको मुटु ढुक्क भयो । उनले कुरा बनाइहालिन्‌, &#039;हामी दुईवटी छोरीभएकोले एउटा धर्मदाइ बनाएका थियौँ, उहाँले नै हाम्रो सहयोग गर्नुहुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
प्रमिलाले गहभरि आँसु पार्दै भनिन्‌, &#039;यो जमात्तामा पनि सहयोग गर्नेतिमीजस्तै अर्को मान्छे तिम्रो धर्मदाइको पनि जन्म भएको रहेछ, खुसी लाग्यो ।रोहिणी वाबा ! तिमीलाई देख्ने पनि साह्रो रहर थियो । तिमीलाई देख्दा साक्षातदेवीलाई देखेजस्तै भयो । तिमीले प्रशन्नलाई त जीवनदान दियौँदियौ मलाईपनि जीबनदान दियौ । तिमीले पठाइदिएको पैसाले त ठूलै काम गप्यो ।धनवीरे साहुले त्यत्रो जग्गा पचाउन खोजेको थियो । ब्याजको स्याजसम्मलिएर बलैले जग्गा छोड्यौ । घरमा नातिनी त छँदैछे एउटा टुहुरो कुमालकोछोरोलाई पनि पालेकी छ्‌ । तिम्रो पेवा बाखापाठाहरूले बाली खाएर बिगारगन्यौ भने गाउँलेहरू भन्छन्‌- यो रोहिणीको भैँसी बाख्राले त अचाक्ली गत्यो ।कोही गाउँलेहरू त तिम्रो नाममा बाखा पाल्न तैजान्छन्‌ । तिम्रो नामकोबाख्राले पाठापाठी पाएपछि पाठापाठी बेचेर आएको पैसा आधा टक्रक्क दिन्छन्‌ ।कोही त मलाई रोहिणीकी आमा भनेर पनि बोलाउँछन्‌ । सबैको ओठमा तिम्रैनाम छ । काठमाडौँका केटा-केटी राम्रा हुँदैनन्‌ भन्थे, तिमीले त सिङ्गै काठमाडौंकोलाज राख्यौ । तिमीले विवाहबारे थाहा नदिँदा भने साह्दै मन रोयो ।&#039;&lt;br /&gt;
१३०)&lt;br /&gt;
प्रमिलाको क्राले वर्षाको आँखाबाट एकनास आँस्‌ बग्यो । के भन्ने कै नभन्नेसोच्नै सक्किनन्‌ र पनि भनिन्‌, &#039;आमा ! अब चिन्ता नै नगर्नौस्‌ । मलाई पनि तपाईँकोअभाबमा बिवाह गर्न मन नै थिएन । अपर्झट बिवाह गर्न परेर मात्र हो ।&#039;&lt;br /&gt;
“मैले त तिमीलाई चिनेकै छु । गाउँलेहरूले भन्ने ठाउँ पाए । भन्थे मेरीबुहारी साक्षात लक्ष्मी हो भन्थेक खोई विवाह जस्तोमा पनि बौलाएनन्‌ । खैरछोड सानातिना कुरा, सत्यचाहिँ म मेरी अपमान सहन सक्छु तिम्रो अपमानसहन सक्दिनँ । गाउँलेले तिमीले पठाइदिएको जस्तै ग्यास्टिकको वैद्य औषधिलेराइदिनु भनेका छन्‌ । त्यौ औषधि खाएपछि, मलाई छाती पोल्न धेरै कमभयो । फेरि म गाउँमा हिलो-धूलोसँग खेल्नेलाई अनाहकमा पैसा खर्च गरीगरीमहँगो-महंगौ सारी किन पठाएकी ? मैले ती सारीहरू केही त छोरीलाई दिएँ,केही तिम्रै लागि राखिदिएकी थिएँ त्यो पनि लेराइदिएकी छु । लाङ&#039; भन्दैवर्षाको हातमा सारी वमाउँदै भनिन्‌, &#039;यसको सट्टा मलाई दुई-चार सुतीकोधोती किनिदेक ।&#039;&lt;br /&gt;
वर्षाले आँखा ओभानो पार्दै भनिन्‌, &#039;हुन्छ आमा म हजुरले जे-जे भन्नुहुन्छत्यही किनिदिन्छु । सम्धी-सम्धिनी भेट गर्नुपर्यो । म ममीड्याडीलाई हजुरआउनुभएको क्रा वताउँछु ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ बाबा हुन्छ, मलाई पनि त उहाँहरूलाई भेदनै साह्ै रहर छ । मैलेतिमीलाई धेरै अलमलाएँ । झोलामा आँपको अचार, सिलाम, भागो, चुक, घ्यूछ, सबै राख । वसमा कच्याङकचुङ के-कै खाइयो । मुख सुकेको छ एकगिलास तातोपानी देक अनि चिया खाउँला ।&#039;&lt;br /&gt;
वर्षा झोला बोकेर भान्सातिर लागिन्‌ । उनी आफूलाई सम्हाल्त नसकीछद्पटाउन थालिन्‌ । प्रमिलालाई पानी, चिया दिएपछि आफनो बाबुआमालाईछोटकरीमा सबै कुरा बताइन्‌ । बर्षाको कुरा सुनेर वर्षाको बाबुआमा पनिछांगाबाट खसेजस्तै भए । आफ्नी सुशील र मायालु छोरीमाथि परेको बज्जलेवर्षाका आमाबानुलाई मर्माहत पात्यो नै । वर्षाले भनेझैँ रोहिणीकै बाबुआमाबनेर सम्घीभेट गर्नुपर्ने हुँदा कम कस्टकर परिस्थिति थिएन । सम्पन्न व्यक्तिहरूभएको हुँदा झरिझुट्ट सम्धिनी भेट गर्नपर्तै सामान किनेर वर्षाको घरमा आए ।बाजेले मन्त्र पढेर सम्धी भेट गराए । सम्धिनी भेटमा दिएको सामान लिँदैप्रमिलाले भनिन्‌, &#039;हजुरहरूले पहिल्यै परिपूर्ण पारिसकेपछि फेरि आज धेरैसामान दिई दुःख किन गर्नुपत्यो ?&#039;&lt;br /&gt;
वर्षाकी आमा बबिता त केही बोल्न सकिनन्‌ । जितेन्द्रले भने “धेरै केहीगरेका छैनौँ&#039; भनी कुरा टार्न खोजै । प्रमिलाले हात जोडेर भनिन्‌, &#039;यदि रोहिणी&lt;br /&gt;
(१३१&lt;br /&gt;
वाबा नजन्मिदिएको भए हामी उहिल्यै मेजँ होला । हजुरहरू जस्तो बाबुआमापनि यो संसारमा हुँदारहेछन्‌ । हजुरहरूले प्रशन्तलाई पढाउन आफ्नो जायजेथाबेचेपछि यो घर नदिनुपर्ने थियो । त्यत्रो पढेर आएपछि प्रशन्नले नै दुईजनालाईखान पुग्ने पैसा कमाइहाल्छन्‌ होला नि ! खोई त रेप्मा नानी आउनुभएन ?उहाँको लागि पनि केही सम्पत्ति राखिदिनुभएको भए हुन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
“हजुरले पीर नगर्नुहोला, रेष्माका लागि पनि हामीले सबै राखिदिएका छौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
“यहाँबाट कति टाढा छ र घोबीघाट बोलाउनुभए हुन्थ्यो । अहिले त आइन्‌पनि होला ।&#039;&lt;br /&gt;
त्यसो भए रोहिणीको घर घोबीघाट पो रहेछ । वास्तविक कुरा के रहेछवुझनैपन्यो भनी रेष्मालाई लिन जान्छु भनी निस्कैका जितेन्द्र घोबीघाट पुगे ।कहाँ सोध्नु, कसलाई सौध्ने, कै भनेर सोध्ने अन्योलमा परेर एउटा किरानापसलनिरै उभिइरहेका थिए । फेरि झमक्क साँझ पनि परिसकेको थियो ।उनले झट्ट आफनो अफिसमा सँगै काम गरैको रिटायर अधिकृतलाई सम्झीउनको नाम सोध्दै त्यौ घरमै पुगै । घरमा विवाहको धुमधाम तयारी भइरहेकोथियो । जितेन्द्रलाई देख्नेवित्तिकै केशवले बडो स्वागत साध बैठकमा लग्दै भने,&#039;हजुर आज यहाँ कताबाट पाल्नुभयो ?”&lt;br /&gt;
जितेन्द्रले भने, हेर्नोस्‌, तपाईँलाई के ढाँदनु ? हामी कसैको जालमा परेछौँ ।मेरी छोरीको जिन्दगी एउटा डाकाले बर्बाद गन्यो । आज केटाको आमाआएपछि पो सबै कुरा थाहा पायौँ । त्यौ डाकाले पहिला नै विवाह गरेको थियोचा प्रेममाव गरैको थियो त्योचाहिँ बुझून सकिएन ।&#039;&lt;br /&gt;
केशवले लामो सुस्केरा हाल्दै भने, &#039;ममात्र फसेछ्ठु भनेको त हजुर पनिफस्नुभएछ । यो संसार नै चौरी र फटाइँ गर्नेहरूका लागि बनेको हौ ।हामीजस्ता सीधासाधाका लागि त यहाँ बाँच्नसम्म मुस्किल छ । सीधा-साधालाईभगवान्‌ले कतै न कतैबाट पारचाहिँ लगाउँदारहैँछन्‌ । तपाईंकी छोरीलाई पनिपार लगाउलान्‌ । गाँठी कुरा नवुझीकनै म भावनामा पो बगेँ । भन्नोस्‌ हजुर,उसले विवाह गरेर छौडिदियो कि क्या हो !&#039;&lt;br /&gt;
&#039;विवाह गरेरै छोडिसकेको त होइन तर उसको नियति राम्रो छैन रहेछ ।उसको आमाको भनाइअनुसार उसले मेरो छोरीसँग रूप र धनको लोभमाविवाह गरेको हुनुपर्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;विवाह नहुनु भइसकेपछि हामी छोरीहरूको बाबुले जे पनि त सहतुपर्छ नि! तत्र यो समाज यही हौ, समाजका मान्छेहरू यही हुन्‌ । घाउ कोट्याइकोट्याईं&lt;br /&gt;
१३२३&lt;br /&gt;
नुन-खौसांनी दल्न पछि नपर्दारहेछन्‌ मान्छेहरू । हेर्नोस्‌, मैले एउटा पापिप्टलाईभुइँबाट उठाएर आकाशमा पुग्याइदिएँ । छोरी रोहिणीले पनि उनलाई त्यत्तिकैविश्वास गरिन्‌ । हामी सबैले विश्वासकैँ भरमा घरको जायजेथा यहाँसम्मकीघरको कारसम्म बेचेर आकिटेक इन्जिनियर पढायौँ । त्यतिमात्र होइन, उसकोआमाको क्राण चुक्ता गरिदियौँ । त्यो निचले मेरी छौरीलाई धोका दियो ।समाजले त मेरी छोरीलाई वेश्या नै सावित गरे ।&#039;&lt;br /&gt;
छोरीको साथीले गर्दा पाउन त त्योभन्दा लाखौँ गुना असल केटा पायौं ।यदि अहिलेको केटाले विवाह नगरेको भए मेरी छोरी जिन्दगीभर कुमारीवस्नुपर््यौ । सायद यो समाजले उसलाई बाँच्न पनि दिन्थेन होला । खान नपाईबसमा बैहोस भएको कङ्गालले शिखर छोएपछि आफू उभिएको धरातल नैबिर्सियो । समयको अगाडि घुँडा टेक्नबाहेक हामीले केही गर्न सकेनौं ।&#039;&lt;br /&gt;
केशवको कुराले जितेन्द्र टोलाइरहे । जितेन्द्रले बुझे, ओहो ! यो रोहिणीभन्ने त केशवकै छोरी पो रहिछिन्‌ । अब के गरौं ? केशवको खाटा लागिसकेकोघाउ उक्काउनुभन्दा थाहा नपाएझैँ गरी जानु नै वेश हुन्छ। तर एउटाकुराचाहिँ सोध्छु नै । जितेन्द्रले उफ ! गर्दै भने, &#039;कसरी बसमा बेहोस भएछन्‌ ?कसरी तपाईंहरूले उसमाथि ठूलो बिश्वास गर्नुभयो त ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;भनिहालैँ नि जितेन्द्रजी, प्रशन्न गरिबको छोरा रहेछ । पढ्नमा चाहिँहोनहार नै रहेछ । आमाले अलिआलि भएको सम्पत्ति वैचेर बन्धकी राखेरछोरालाई पढाइछिन्‌ । घरबाट केही पठाउन नसकेपछि त्यो स्वार्थी भौकै परेछर वसमै बेहोस भएछ । बसमा भएकाहरू सबै छारेरोगी भनेर भागैछन्‌, मेरीछोरीले उनलाई हस्पिटल पुन्याएर उपचार गराइछिन्‌ । आमा-छोरी भएरउसको खाने-वस्ने व्यवस्था पनि मिलाएछन्‌ । भेटघाट गर्दागर्दै उनीहरूको प्रेमपरेछ । मेरी छोरी साइन्समा बाइलोजी लिएर पढेकी मान्छे । दुईजनालाई पढ्नपैसा लगानी गर्ने सकिँदैन भनी बुझेर आफू जानीजानी फेल भइछन्‌ । कारणउनले प्रशन्तलाई इन्जिनियर बनाउन चाहेकी रहिछिन्‌ । उसलाई इन्जिनियरपढाएर हामीले सम्पत्ति स्वाहा गच्यौँ । इन्जिनियर पढेर आएपछि त क सिय्रोबाटहात्तीमा परिणत भयो । विवाहका लागि आमा लिन जान्छु भतेर बिबाह पोगरेछ । हामी भने क हरायो भनेर कति तडपियौँ । बिचरी रोहिणी त बेहोस नैभइन्‌ । अरू भनैको भए त ठीकै थियो । त्यो पापीका लागि बैंस बेगेद बस्नेमेरी छोरीलाई वेश्या संज्ञा दियो त्यसले । ठीकै छ, त्यसको भलो होस्‌ । मेरीछोरीमा छलकपट थिएन, त्यसैले उसले त्यो पापीभन्दा कयौं गुना असल डा.पति पाइन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
१३३!&lt;br /&gt;
सबै कुरा बुझेपछि जितेन्द्र केशवसंग विदा भएर घर आई श्रीमती रछोरीलाई सबै कुरा बताए । वर्षाले आफू प्रशन्नजस्तो स्वार्धीसँग नवस्ने निर्णयगरिन्‌ । वर्षाको आमाबाबुले पति प्रशन्तलाई थाहा नै नदिई कालिमाटीको घरबैचिदिने र वर्षालाई अस्ट्रेलिया पठाउने निर्णय गरे । जितेन्द्रले गर्दा नै होटेलकोनक्सा बनाउने काम साथीहरूद्वारा दिलाएको हुँदा जितेन्द्रले साथीहरूलाईलगाई हप्ता-दस दिनका लागि प्रशन्नलाई बुटवलतिर काममा व्यस्त गर्नुभने । अस्ट्रेलियाबाट भिसा आइसकेको हुँदा टिकटको मात्र क्रा थियो । जितेन्द्रलेअस्ट्रेलिया पठाउन टिकट लिए । प्रमिलालाई वास्तविकता भनी मन दुखाउनचाहेनन्‌ । अझै प्रशन्न दस-बाह्र दिन नआउने भनिदिए । प्रमिलाले आफूयतिखेर बुहारीकै मुख हेर्न आएको बताइन्‌ । आफू नहुँदा घरमा डामाडोलहुन्छु भनी खुसीसाथ घर गइन्‌ । वर्षाको बाबुआमाले सबै सोधपुछ गरी उनलेल्याएको सुनको चुरीको हिसाव गरी रोहिणीकै नाममा गाउँमा एक टुका खैतकिन्नु भनी केही हजार दिएर पठाए । प्रमिलाले पैसा लिन साफ इन्कारचाहिँगरेकी थिइन्‌ । धेरै सम्झाएपछि प्रमिलाले पैसा लिइन्‌ र जाने बैलामा भनिन्‌,&amp;quot;चाँडै घर आउनू, यौ पैसाले तिम्रै नाममा खैतको गरा किनिदिन्छु । त्यही धानकुटेर चामल पठाइदिन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
प्रमिलाको सरल हृदय देखेर वर्षालगायत वर्षाको आमाबाबुको पनि परेलीरुझयो । प्रमिला पनि बुहारीसँग छुट्टिनुपर्दाको पीरले रुँदैरुँदै घर गइन्‌ । वर्षालगायतवर्षाको बाबुआमालाई पनि उनलाई पनि छल गर्नुपर्दा त नरमाइलै लाग्यो ।कुनै सानोतिनो गल्ती गरेको भए त वर्षाको बाबुआमा र वर्षाले नै माफ दिन्यैतर, प्रशन्नको अपराध माफी दिन लायक सम्झेतत्‌ उनीहरूले । वर्षालाईअस्ट्रेलियातर्फ उडाए । कालिमाटीको घर बैची वर्षाकै नाममा पैसा बैंकमाराखिदिए । भविष्यको मीठो सपना बुनेको प्रशन्त जब आफनी मायालुलाईभेद्न कालिमाटी पुग्यो त्यहाँ सबैको नौलो अनुहार देखेर चित खायो । घरबेचेको थाहा पाएपछि ससुराली पुग्यो । जितेन्द्रले वर्षाले दिएको डिभोर्सकोकागज दिँदै भने, &#039;बाबु प्रशन्न लाङ तिमीलाई दिन हामीसँग यो चिर्कटोबाहेककेही छैत ।&#039; कागाज हेरेर प्रशन्न चिच्यायो, &#039;यो के हो ? यो सब कै हो?&amp;quot;&lt;br /&gt;
वर्षाकी आमा त देखै परिनन्‌ । जितेन्द्रले आँसु झार्दै भने, “यौ तिम्रो पापकोसज्ञाय हो । सत्यलाई कहिलेसम्म छुपाउँछस्‌ तँ ? तैँले मेरी छोरीको विश्वासर रोहिणीकै विश्वासमा गला घोटिस्‌ । तँलाई मैले सोधेकै थिएँ । कसैलाई प्रेमगर्छस्‌ कि गर्दैनस्‌ भनेर तैँले महाझूट बोलिछस्‌ । जाक्न त जेलमा जागनुपर्नैहो तँलाई तर चुपचाप गइहाल । नत्र राम्रो हुनेछैन ।&#039;&lt;br /&gt;
१३&lt;br /&gt;
प्रशन्नले बोल्ने कुनै ठाउँ नै थिएन । क चुपचाप रन्थनिंदै वर्षाको माइतीबाटनिस्क्यो । रोहिणी र वर्षा दुवैको आँखा सम्झयो । दुवैको आँखामा रत्तिभर पापथिएन । दुवैको मन गंगाजस्तै पवित्र थियो । प्रशन्न सडकको पेटीमा बसेरधेरैबेर वर्षा र रोहिणीकँ मायाले रोयो । स्वार्थले गर्दा आफू घर न घाटकोभएको सम्झयो । त्यही रात नाइटमा घर गयौं । घरमा आमालगायत सबैछिमेकीहरूले रोहिणी खोई भनेर सोधे ? प्रशन्नको अनुहार देखेर सबैले रोहिणीमरेकै अनुमान गरे । प्रमिलाले कैयौँ दिन रोएर बिताइन्‌ । प्रशन्न आफूले गरेकोपापले भित्रभित्रै जल्दै गयो । रोहिणीको टाडी खेत, रोहिणीको बाखा, रोहिणीकोभैँसी हेरेर प्रमिलाले मन बुझाउन बाध्य भइन्‌ । प्रशन्न सहर पस्न सकन ।गाउँकै स्कूलमा मास्टरी जागिर खायो । गाउँकै केटी बिवाह गच्यौ तर जतिसमयले फेरो मारे पनि रोहिणी र वर्षा उसको आँखाबाट कहिल्यै ओझेल हुनसकेनन्‌ । कहिल्यै ..&lt;br /&gt;
छब्बीस&lt;br /&gt;
फिरोज र शालुको विव्राह भएलगत्तै आकाश र रोहिणीको बिवाह पनिभयो । विवाहको केही समयपछि नै आकाश र रोहिणी अमेरिका गए । फिरोजर शालुले फ्रान्स जान भिसा पाए पनि रमण र गंगा र कान्छी दिदीले विदेशजान जरुरत नभएको बताएपछि उनीहरू खुसीखुसी नै नेपालमा बस्ने निर्णयगरे । शालु र फिरोजको जीवनमा र रोहिणी र आकाशको जीवनमा कहिल्यैपनि सानो आँधी आएन । उनीहरू हरक्षण डालीमा लटरम्म फुलेको फूलहरूजस्तैभए । शालुले दुईटा छोरा र रोहिणीले एक छोरा एक छोरीको जन्म दिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
कान्छीदिदीको जेठो छोरा सौरभलाई दीपकले नै होटेल म्यानेजमेन्ट गर्नबाहिर पठाई पैसा लगानी गरे पनि सुजन स्टुडेन्ट भिसामा लन्डन पढ्नगएपछि उर्मिला र दीपकको त्यो वैभबलाई छोडी कान्छी केशवकै घरमाफर्किन्‌ । सबैले अनुमान गरै, कान्छी शालुको उमेरमै विवाह होस्‌ । शालुलेभाइको जिम्मेवारी बोक्न नपरोस्‌ भनी शालुको जिम्मेवारी बोक्न नै दीपककोघरमा फर्केकी थिइन्‌ । आफनो जिम्मेबारी पूरा गरैपछि उर्मिला र दीपकलेलाख बिन्ती गर्दा पनि कुपण्डोल बस्न नमानी केशवकै घरमा फर्किन्‌ । पीताम्बरार केशवले कान्छीको आगमनलाई सहर्ष स्वीकार गरे । रोमाकान्त र मोनालेटीकाथलीमा तीन कोठाको घर बनाई त्यतै सरे । रेष्माले प्रेमलाई सधैँ घुणा गरेपनि रेष्मालाई एकतर्फी मन पराउने नरेशले रेष्माको घरमै आई मागी विवाह&lt;br /&gt;
विक)&lt;br /&gt;
गरे । नरेश प्रोफेसर थिए । रूपमती डा. अन्नाले स्बास्नी भएको पाइलटसँगजानीजानी विवाह गरिन्‌ । लोग्नेले जेठी स्वास्नीसँग रात बिताएको थाहापाएपछि रिसले विष सेवन गर्दा मृत्युवरण गरिन्‌ । मोनाको वलात्कारी मालिकलेआफनो स्वास्नीको वास्तविक रूप मोनाबाट थाहा पाएपछि भित्रभित्र स्वास्नीलाईमारेको पश्चात्ताप गर्दै सारा जीवन विताए । उनले &#039;मूलको पानी र कुलकोछौरी&#039; उखानको वास्तविकता बुझे । थुपैले योगेन्द्र साहुसँग विवाह गर्न प्रस्तावल्याए पनि उसले बिवाह गर्न मानेनन्‌ ।&lt;br /&gt;
मौनाले बाबुआमा दुवै गर्दा पनि माइतीमा खुट्टा टेकिनन्‌ भने कान्छीआफनो वावु मरेपछि माइती गइन्‌ । मौसमीलै एड्सबारेमा केही भए पनिचेतना फैलाइन्‌ । आफूजस्तै पछिको बाटो नहेरी वैँसको उन्मादलाई मात्रसर्वस्व ठान्नेलाई आफनै उदाहरण दिएर केही हदसम्म सचेत गराइन्‌ । मर्नुभन्दाअगाडि शालुको सम्झना गरी बोलाए पनि शालु वीर हस्पिटल पुग्दा उनीमरिसकेकी थिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालु खल्लो मन गरी घर फर्किन्‌ । आँखामा भने मौसमीकै सुन्दर अनुहारनाचिरहेको थियो । शालुको निराश अनुहार देखेर फिरोज पेन्टिङ गर्ने सबैसामान लिएर आई शालुतिर हेर्दै भने, &#039;शालु तिमी यही पोजमा बस । तिमीउदास हुँदाको तिम्रो तस्विर मैले बनाएकै छैन ।&#039; गंगा र रमणले पनि फिरोजकोकुराको समर्थन गर्दै भने, &#039;हो बाबु, हाम्री शालु उदास हुँदा पनि राम्रै देखिनेरहिछन्‌, उनी उदास हुँदाको फोटो उतारेरै छोड ।&#039;&lt;br /&gt;
सबैको क्रा सुनेर शालु फिस्स हाँसिन्‌ । सँगसँगै रमण र गंगा तथा फिरोजर शालुका छोराहरू सुलभ र संयोग पनि हाँसे । हा...हा...हा... ।&lt;br /&gt;
अस्तु ।&lt;br /&gt;
१३६&lt;br /&gt;
परिचय&lt;br /&gt;
नाम : “ ललिता &#039;दोषी&lt;br /&gt;
जन्म : २०२५।०७।१६, इमाडोल, ललितपुर&lt;br /&gt;
घर : लु, अ. गुल्मी, अर्ज&lt;br /&gt;
शिक्षा : एम.ए.&lt;br /&gt;
प्रकाशित कृति:&lt;br /&gt;
- प्रेमको परिभाषा (कथासंग्रह) २०५६- भत्किएका किनारा (कथासंग्रह) २०५७- बुद्ध रोएझै लाग्छ (कवितासंग्रह) २०५८- दुखेको घाउ (कथासंग्रह) २०६०- मानिस नै देवता (बालकथासंग्रह) २०६३- नीलकमल (बालउपन्यास) २०६४- डुन्द्रैनी (बालकविता) २०६५पुरस्कार, सम्मानः&lt;br /&gt;
-. भानुमोती पुरस्कार २०५९- महेन्द्र प्रकृति संरक्षण कोष पुरस्कार २०६२-. गुञ्जन नव प्रतिभा पुरस्कार २०६२- मानचित्र सम्मान २०६३- आमा सम्मान २०६५&lt;br /&gt;
...सरल र बगेको शैलीले गर्दा अनि कथावस्तुको राम्रो विकासका कारणउपन्यास लोकप्रिय बन्ने आशा गर्न सकिन्छ । यो उपन्यासको कथा अत्यन्तरोचक हुनाले यसमा एक सफल फिल्म वा टेलिफिल्म पनि बन्न सक्छ भन्नेमलाई विश्वास छ ।&lt;br /&gt;
डा: धुवचन्द्र गौतम&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%89%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A6&amp;diff=60</id>
		<title>उन्माद</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%89%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A6&amp;diff=60"/>
		<updated>2024-06-09T11:52:04Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;Source book: https://nepalikitab.org/lalita-doshi-unmad/&lt;br /&gt;
==पुस्तक परिचय==&lt;br /&gt;
उन्माद&lt;br /&gt;
उपन्यास&lt;br /&gt;
लेखिका:&lt;br /&gt;
ललिता &#039;दोषी&#039;&lt;br /&gt;
प्रकाशक&lt;br /&gt;
डीकुरा पब्लिकेशन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृति: उन्माद&lt;br /&gt;
लेखक: ललिता &#039;दोषी&lt;br /&gt;
संस्करण: प्रथम, २०६६&lt;br /&gt;
मूल्य: रू. ९५/-&lt;br /&gt;
प्रकाशक : डीकुरा पब्लिकेशन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पत्रचार जर्ने ठेजाना :&lt;br /&gt;
डीकुरा पब्लिकेशनपो.ब.नं. २१७३२, काठमाडौँ, नेपालफोन : ०१-२०४४३७९, ९८४१५२१८९२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपत्यकाको लाणि वित्तरण :&lt;br /&gt;
एभरेष्ट बुक डिस्ट्रीब्यूटर्स&lt;br /&gt;
फोन : ९८४१४५२६०६&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==समर्पण आमालाई==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आदर्शकी प्रतिमूर्ति कोमल मनकी धनी&lt;br /&gt;
गाएर सकिन्न कठै ! तिम्रो त्यो जीवनी&lt;br /&gt;
तिमी बाँच अझै बाँच देक आशिषका घडा&lt;br /&gt;
तिम्रो कोखको लाज राखूँ बनी माटो उर्वर !&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==उन्माद उपन्यासमा ड्बुल्की मार्दा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;उन्माद&#039; ललिता दोषीद्वारा लिखित शिक्षा र सन्देशले भरिएको उपन्यासहो । आदर्शवादी रोमाण्टिक धाराको यस उपन्यासमा उपन्यासकारलै आफूनौउद्देश्य प्राप्त गर्नमा सफलता हासिल गरेकी छन्‌ । आजको उच्च वा उच्चमध्यमवर्गीय तथाकथित अभिजात समाजका विकृतिहरूलाई ललिता दोषीलेभावुक र मार्मिक बनाएर प्रस्तुत गरेकी छन्‌ । त्यस वर्गबाट बिभिन्त नमुनापात्रहरूको संकलन गरेर उपन्यासमा तिनलाई पात्र बनाई तिनको चरित्रचित्रण गरेकी छिन्‌ । आदर्श र अनादर्श पात्रको चित्रण गर्नु, तिनको द्वन्द्व प्रस्तुतगर्नु, तितका आडम्बरी जीबनको प्रस्तुति र अन्त्पमा ती सबै पात्रहरूको आ-आफूनो कर्मअनुसारको अन्त्य उपन्यासमा कौतुहलतापूर्वक प्रस्तुत गरिएकोछ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपन्यासमा शालु, कान्छी र आकाश जस्ता आदर्शबाट कहिल्यै च्युतनहुने पात्र छन्‌ भनै निमेष, मौमसी, फिरोज आदिजस्ता बाटो बिराउने पात्रपनि छन्‌ । लेखिकाको उद्देश्य भने प्रत्येक पात्रभित्र रहेको मानवीय आदर्शकोखोजी गर्नु रहेको छ । यो लेखिकाको सामाजिक दृष्टिले एक दायित्वपूर्ण कार्यहौ र सराहनीय पनि । सामाजिक अध्ययनका दृष्टिले पनि यौ उपन्यास उपयोगीहुन सक्छ । अन्त्यमा असल पात्र त आफूतो असलपनले प्रभावकारी रहिरहेकैँहुन्छ, खराव पात्रलाई पनि उपन्यासकारले असल परिणतिमा पुन्याएकी छन्‌ ।तिनीहरूले आफूनौ अज्ञानमय पूर्वजीवनप्रति पश्चाताण गर्दछन्‌ र भविष्यमाअसल जीवनतर्फ डोहोरिन्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपन्यास परम्परागत शैलीमा लेखिए पनि कथावस्तुको संयोजन चरित्रचित्रण सहज प्रस्तुतिले गर्दा आजको एक खास वर्गको जीवनको चित्रण गर्नसफल छ । तथाकथित अभिजात बर्ग र तिनका सामन्ती सोचले गर्दा उत्पन्नभएका बिकृति एकातिर यसको विषय बनेको छ भने अर्कोतिर सुरासुन्दरी रलागु पदार्थको दुर्व्यसनले समाजलाई कति जर्जर तुल्याउँछ भन्ने कुराकोमार्मिक चित्रण गरिएको छ । ठाउँठाउँमा भाबुकताको आधिपत्यका कारणपाठकसमैत भावुकताको प्रभावमा बगेर आँखा रसाउन बाध्य हुन्छ । उपन्यासयस रूपमा निकै सफल भएको छ । यसका अन्य सफलता पनि छन्‌ । यसकोभाषा सरल छ । सिनेमा हेरेझैं, कवानक प्रवाहमय बनेर गएको छ । पाठकलेकथामा अल्मलिनु पर्दैन, कथानकले पाठकलाई तानेर लान्छ । थालनीदेखिअन्त्यसम्म उपन्यास रोचक छ । बौद्धिकताको भारी नवोकेर यसले सरसकौतुहलमय ढङ्गबाट आफूनो कुरा भन्छ । उपन्यासमा कुलतका विरुद्ध एकअभियान जस्तै चलाइएको छ । त्यसैगरी पुरुषले गर्ने नारीको शौषण पनि&lt;br /&gt;
प्रमुख मुहाका रूपमा उठाइएको छ । त्यति मात्र होइन आजका कतिपयनारीहरू आफूना क्रियाकलापद्वारा भ्रमवश र विवशतावश पनि दुव्यसन रपुरुष अन्यायको शिकार हुन पुग्छन्‌, जसले उनीहरूको जीवन विवोलिन्छ,अवसादभ्रष्ट बनाइदिन्छ । तीमध्ये प्रायः परिस्थितिसित मुकाबला गर्दै नयाँजीवन थाल्दछन्‌ । यसले नारीवादी सन्देश पनि रामरी दिएको छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेखिकाको सबभन्दा बलियो पक्ष कै छ भने, आज एउटा अपसंस्कृतिलाईअँगालेर वाँच्दा जुन खोक्रो गर्वको देखावटीपन छ, त्यसप्रति उपन्यास सहमतछैन । प्रेम र त्यसको खोक्रोपन, संस्कृति र विलासिता अनि पी सबका नाउँमाहुने विभिन्न प्रकारका शोषणहरू विरुद्ध आवाज उठाइएको छ, यिनको वास्तविकतार भ्रमलाई छुद्याएर देखाइएको छ । अनि भ्रममा बाँच्नेहरूको दुःखद परिणामपनि छर्लङ्ग पारिएको छ । एउटा पाठकले यसबाट घेरै क्रा सिक्न सक्छ, धेरैसन्देश लिन सक्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अभिजात बर्गका यी पात्रको खोक्रोपन र हिलोमा कमल फुलेझैँ &#039;शालु&#039;जस्ता पात्रको आदर्श, शान्त र सफल जीवनको तुलना गरेर लेखिकाले जीवनकाआडम्बरहरू क्षणिक हुन्छन्‌ भन्ने सन्देश दिएकी छन्‌ । विलासिता पेम होइनयरो हामी यस पुस्तकमा पाउँछौं भने, वास्तविक प्रेमले मानिसलाई वर्दालनेतागत पनि राख्दछ भन्ने सन्देश पनि हामी यसै उपन्यासद्वारा गृहण गर्दछौं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस अर्थमा &#039;उन्माद&#039; एक निश्छल, निःस्वार्थ, त्याग, बलिदान र आत्मिकअनि आदर्श प्रेमको पक्षमा रहेको उपन्यास हो । त्यसकारण यसलाई प्रेमकाबिभिन्न रूप दर्शाउने, प्रेम-त्रिकोणको उपन्यास पनि भन्न सकिन्छ । फिरोज,आकाश र शालुको सम्बन्धलाई नमुनाका रूपमा हेर्न सकिन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपन्यासले एउटा खास समुदायको जीवनका विभिन्न पक्षहरू प्रस्तुतगरेको छ, जसबाट कति पाठक अनभिज्ञ पनि रहेका हुन सक्छन्‌ । यस अर्थमायसले एक वर्गको जीवनको ज्ञान हामीलाई जानकारी दिएको छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सरल र बगेको शैलीले गर्दा अनि कथावस्तुको राम्रो विकासका कारणउपन्यास लोकप्रिय बन्ने आशा गर्न सकिन्छ । यो उपन्यासको कथा अत्यन्तरोचक हुनाले यसमा एक सफल फिल्म वा टेलिश्रृङ््खला पनि वन्न सक्छ भन्नेमलाई बिश्वास छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्त्यमा पाठकमा यो उपन्यास एकदम लोकप्रिय हुनेछ भन्ने शुभकामनादिन चाहन्छु । यो उपन्यास, नरौकिएर पढिसिध्याएँ । अन्य पाठकले पनियसैगरी पढ्नै कामना गर्दछु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डा: घुबचन्द्र गौतम२०६५/११/२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आफनो भनाइ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवनका विविध घुम्तीहरू पार गर्दै म यहाँहरूसामु आफूनो आठौँ कृति&amp;quot;उन्माद लिएर उपस्थित भएकी छु । आशा छ, मेरा प्रिय पाठकवृन्दहरूले,मैरो अन्य कृतिलाई जस्तै यस उपन्यासलाई पनि अवश्य माया गर्नुहुनेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले यो उपन्यास युवावर्गकै लागि लेखेकी हुँ । आफूले देखेसुनेकाघटनाहरूलाई मैले टपक्कै टिप्न खोजेको छु । कथालाई सिगार्ने क्रममाकतै-कतै काल्पनिक शब्द भएपनि यी घटनाहरू धेरैजसो वास्तविक नै हुन्‌ ।ती पात्रहरूको कथाव्यथालाई उतार्न म कतिसम्म सफल भएँ या भइनँयसको जिम्मा लगाउने काम प्रिय पाठकहरूलाई नै सुम्पेकी छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दोषी&#039; उपनामलाई लिएर उठने प्रश्नहरूको सवालमा चाहिँ म यति नैभन्छु, मैले थाहा पाएदेखि आफूनो स्वार्थको लागि अरूको खुसी रेटेभौँ पटक्कैलाग्दैन । आफूले प्रचण्ड गर्मी सहेर अरूलाई छहारी दिँदा पनि भोग्नुपरेकापीडाहरू आफूनै ठासँमा छन्‌ । यही पीडाहरू पोख्ने क्रममा नै म प्रियपाठकहरूको प्रिय लेखिका बन्न पुगेछु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन भनेकी यस्तै हो । प्रत्येकको जीवनमा उकाली ओरालीहरूआइरहन्छन्‌ । आज भने मैले सगरमाथा टेकेको अनुभूत गरेकी छु, किनकिमैले आफ्नो उपन्यासको पानामा वरिष्ठ साहित्य साधक डा. ध्रुवचन्द्रगौतमलाई सजाउन पाएकी छु । म यति विग्न खुसी छु जसको लेखा जोखानै छैन । मेरो बच्चादेखिकै रहर थियो वहाँलाई नै उपन्यासमा भूमिकालेखाउने वहाँले मेरो रहरलाई सहर्ष स्वीकार गर्नु भयो । म वहाँको योगुणलाई आजन्म भुल्ने छैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैले जति नै अगाडि पाइला चाले पनि म आफूनो प्रथम पाइला टेकाउनेवरिष्ठ साहित्य साधकज्यूहरूमा कृष्णप्रसाद पराजुली, डा. ओमवीर सिंहबस्न्यात र इन्दिरा प्रसाईलाई कदाचित भुल्नेछैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मलाई प्रेरणा दिने यति विघ्न साहित्य साधकज्यूहरू हुनुहुन्छ । मघर्म संकटमा छु कसको नाम लेखौँ कसको नाम छोडौं | त्यसैले मैलेएकपाटो रोज्न बाध्य भएँ । मेरो साहित्य रूपी सन्तानलाई सही मार्गदेखाउदै भूमिका र समीक्षा लेखिदिँदै मलाई हौसला प्रदान गर्नुहुने वरिष्ठ&lt;br /&gt;
साहित्य साधकज्यूहरूमा रमेश विकल, जनकवि केसरी धर्मराज थापा,गोपिकृष्ण शर्मा, केशव सुवेदी, चुडामणी रेग्मी, मुक्तिनाथ शर्मा (नेउपाने)कलाघधर काफूले, ज्ञानुवाकर पौडेल, मोहन ढुवाल, श्री ओम श्रेष्ठ रोदन,ब्रहमप्रिय प्रेमस्वरूप, श्यामप्रसाद अर्याल, डा. खगेन्द्र प्रसाद लुइटेल, तिलकप्रसादलुइटेल, अर्याल ,अर्जुन विरक्ति, यादव भट्टराई, नवराज रिजाल, बी. केपाल्पाली, अरुण खत्री नदी, विजयराज आचार्य, विश्व सिग्देल, छवीरमणसिल्वाल, दिपेश चौलागाई, ज्ञानेन्द्र विवश यहाँहरू सम्पूर्णप्रति म हार्दिकआमार व्यक्त गर्न चाहन्छु ।&lt;br /&gt;
साहित्य लेखनका लागि मलाई हरक्षण साथ दिने स्व बाबा कुलबहादुर(गजुरेल) क्षेत्री, आमा सूर्यकुमारी क्षेत्री, श्रीमान टेकबहादुर (खरेल) खत्री,बाबु गंगा खरेल, सम्पूर्ण दिज्यूहरू, दाज्यूहरू, नेत्रबहादुर क्षेत्री, डा. राजक्षेत्री, सुरेश क्षेत्री, डा. दिनेश क्षेत्री (भाइ), गोविन्द सुवेदी, शेरबहादर केसी,भाष्कर सुवेदी, पुरेन्द्र शर्मा (भिनाज्यूहरू), छोराहरू आकाश खरेल, क्षितिजखरेल, सम्पूर्ण आफन्तहरूप्रति र नेत्रहीन साथीहरू सुरेश राजभण्डारी,ओमप्रकाश बञ्जाड्े, उन्माद उपन्यासलाई सम्पादन गर्नुहुने कृष्ण पौडेल,कम्प्युटर गर्नुहुने प्रवीण बुढाथोकी, लक्ष्मी श्रेष्ठ, आवरण गर्नुहुने हरिकृष्णबस्ताकोटी, कुश्माखर पाण्डेय, गोपाल गैरै सबैप्रति र प्रकाशनको जिम्मालिएर तपाईंको हातसम्म पुस्तक प््याउने डीकुरा प्रकाशनका प्रति हार्दिककृतज्ञ छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
र, हरेक पक्षमा अपनत्व र सदभावनाका साथ गम्भीरतापूर्वक सल्लाह रसुझाव दिनुहुने बहुचर्चित साहित्यकार पुण्यप्रसाद प्रसाईका प्रति हार्दिकआमार ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्त्यमा पाठकको मायामा नै आफनो अस्तित्व जोगिने हुँदा यहाँहरूकोयस्तै मायाको अपेक्षा गर्दछु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
म यो पुस्तक मेरी ममतामयी आमा सूर्यकुमारी क्षेत्रीमा समर्पण गर्दछु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
- ललिता &#039;दोषी&#039;&lt;br /&gt;
बुद्धनगर, काठमाडौं&lt;br /&gt;
मिति : २०६४ पुस २३&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==एक==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कारको हर्न सुनेपछि मस्त निद्रामा परेकी कान्छी जन्याकजुरुक उठेर गेटमापुगिन्‌ । गेट खोलेपछि कार घरभित्र पस्यो । कार घरभित्र पसेको धेरैबेरभइसक्दा पनि शालु सघैँझैँ दिदी भन्दै बुर्लुक्क उफ्रैँदै निस्किनन्‌ । मालिक रमालिक्नी कारबाट बाहिर निस्कँदै लर्बराएको स्वरमा भने, &#039;हेर कान्छी, अबहाम्री शालु पनि ठूली भइन्‌ । आजदेखि त पिउन पनि सिकिन्‌ । नपत्याएरआफैँ हेर&#039; भन्दै उन्मत्त हाँसो हाँस्तै घरभित्र पसे । मालिक र मालिक्नीकोकुराले कान्छीको हृदय नै छिन्नभिन्न भयो । आँखाबाट बर्बरी आँसु झार्दैमूर्तिकैँ उभ्भिरहिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;शानु मैयाँसापलाई झिक&#039; भन्ने ड्राइभर चन्द्रकान्तको बोलीले झसङ्गभई कान्छीले शालुलाई कारबाट बाहिर निकालिन्‌ । शालुले कान्छीलाई अङ्गालोहाल्दै भनिन्‌, &#039;दिदी टाउको दुख्यो । खुट्टा पनि टेकिँदैन, अब के गरौं ?&#039; कान्छीलेचुपचाप शालुलाई डोच्याउँदै कोठामा ल्याएर पलङमा सुताइन्‌ । शालुको जुत्ताखोलेर कोठाबाहिर राखिदिइन्‌ । कान्छीको आँखाबाट झरेको आँसु रोकिएकोथिएन । शालुले &#039;ऐया, टाउको दुख्यो&#039; भन्दै लामो सुस्केर हालिन्‌ । कान्छीलेपलडमा वसेर शालुको टाउको आफनो काखमा राखेर मिचिदिइन्‌ । तर ओठचल्न सकेन । शालुले दिदी नबोल्नुको कारण बुझेर भनिन्‌, &#039;दिदी तपाई त कुरानै नबुझी रिसाउनुभयो ।&#039; आफनो हात दिदीको आँखामा पुस्साउँदै भनिन्‌,“अहो ! रुनु पनि भएछ । साँच्चि मैले रक्सी पिएकी होइन । कसले मेरोखानेकुरामा के मिसाइदिएछ । मलाई पत्तो छैन । दिदी नरुनोस्‌, साह्रै गाह्रोभएको छ, बत्ती निभाएर जानोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी बत्ती निभाएर आफनो कोठामा आई, डङ्ग्रङ्ग ओछ्यानमा पछारिइन्‌ । आफूलाई थाम्त नसकेर घुँक्क-घुँक्क गरी रोइन्‌ । आँखामा विगत र वर्तमानचलचित्रभैँ नाचिरहयो । आफूलाई घरबाट निकालेपछि फूपूले बच्चा स्याहारगर्न र घरको काम गर्न भनेर दीपक र उर्मिलाको घरमा ल्याएर छोडिदिइन्‌ ।त्यतिखेर शालु अठार दिनकी मात्र थिइन्‌ भने कान्छी बीस-बाईस वर्षकीथिइन्‌ । शालु तीन पुगेर चार वर्षमा लाग्दा उर्मिलाले सुजनलाई जन्माइन्‌ ।शालु र सुजन दुवै कान्छीकै पोल्टामा हुर्कदै गए । कपण्डोलमा टन्न पुर्ख्यौलीसम्पत्ति भएका दीपकले सानै उमेरमा अधिकृत पास गरेको भए पनि अधिकृतकोजागिर छोडी व्यापारमा लागे । व्यापारमा लागेपछि उनको रहनसहन,बोलीचालीमा विस्तारै परिवर्तन आउन थाल्यो । व्यापारमा राम्रो फाइदा भएकोलेचाबहिल र कुलेश्वरमा जग्गा किनी भाडामा लगाउनकैँ लागि घर बनाए ।घरभाडा मात्रै मासिक चालिस-पचास हजार आउने भएकोले उनीहरूलाई पैसाको कमी थिएन । त्यसमाथि व्यापारबाट आउने पैसा छुड्दै थियौ । दीपककावावु-आमा सानैमा मरेका हुनाले दीपक, उर्मिला नै पूर्ण स्वतन्त्र थिए । उनीहरूलेसाँझको खाना घरमा खाएको त्यति याद छैन कान्छीलाई । होटेल, रेष्टुराँ, पार्टीआदिमै आधारात बित्व्यो र बित्छ पनि । मनलाग्दा घर आउँछन्‌ त मननलाग्दा घर आउदैनन्‌ । शालु र सुजन सानौमा बिरामी पर्दा कान्छीले कतिरात आँखा झिमिक्कै नगरी पनि बिताइन्‌, त्यो आफ्नै ठाउँमा छ। सबैपरिवारको तुलनामा ज्यादै संवेदनशील छिन्‌ । शालु र सुजन दुवैलाईकान्छीले हुर्काएकी आए पि कान्छी शालुलाई आफनै मुटुझौँ प्यारो गर्छिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु कान्छीकै मायालु काखमा ह्किन्‌, बढिन्‌ । बाबु सम्पन्न भएको हुँदाउनले अभाव देख्नुसम्म पनि परेन । अभाव र पीडा भनेको के हो, उनलेकान्छीदिदीले भनेका कथाहरूमा मात्र सुनिन्‌ । शालु कथाका पात्रहरूको दुःखसुन्दा पनि चिन्तित हुनै भएकीले कान्छीले उनलाई दुःखका कथाहरू सुनाउनपनि छोडिन्‌ । शालुको सानो मस्तिष्कले केवल यही सोच्यो । संसार त धेरैसुन्दर रहेछ । सबै सम्पन्न र खुसी रहेछन्‌ । मानव आर्ततादको त पत्तै भएनशालुलाई ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँसम्म कि आफ्नै घरमा बसेकी, सुन्दर आँखा र बान्की परेको अनुहारभएकी आफूलाई आफनै मुटुभौँ ठान्ने कान्छीदिदीको विगतसँग पनि अनविज्ञथिइन्‌ शाल्‌ । उनले यति मार बुझेकी थिइन्‌- कान्छीदिदी आफूलाई असाध्यैमाया गर्छिन्‌ । आफनो मायाको कारण तै यहाँ वसेकी हुन्‌ । म नै दिदीकोसम्पूर्ण हुँ । जसरी मलाई ठेसलाग्दा दिदीलाई दुख्छ, त्यस्तै दिदीलाई ठेस लाग्दामलाई दुखैन भने म जन्मनुको अर्थ छैन । हो अर्थ .... ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==दुई==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीलाई उठ्नै मन लागेको थिएन । शालुलाई ब्रेकफास्ट दिनकै लागिनसकी-वसकी उठिन्‌ । अण्डा र दूध लिएर शालुको कोठामा पुगिन्‌ । त्यतिखेरसम्मशालुलै स्कुल जानका लागि जुत्ता, मोजा लगाइसकैकी थिइन्‌ । शालुले डराई-डराई कान्छीको अनुहारमा हेरिन्‌ । कान्छीको आँखा रातो र औठ-मुख पनिसुन्निएको साथै मौन थिइन्‌ उनी । शालुले कान्छीदिदीको गालामा म्याइँ खाँदैभनिन्‌, &#039;दिदी नबोल्नै भए म स्कुल नै जान्त के, दिदी त्यत्तिकै पीर गर्नुहुन्छ मबिग्रिन्न भनेपछि बिग्रिन्त ल तपाईंलाई गाड्रो भए जस्तो छ गएर सुत्नोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले कुनै प्रतिक्रिया नजनाई एकोहोरो शालुको अनुहारमा हेरिरहिन्‌ ।गोरो अनुहार, ठूलाठूला निर्मल र सुन्दर आँखाहरू, मिलेको दाँत, पृष्ट छाती,होचो-होचो मोटोमोटो शरीर । शालुले हाँस्तै भनिन्‌, &#039;दिदी मलाई हेरेर कहिलेपनि अघाउनुहुन्न भन्या, साँच्चै दिदी म अप्सराजस्तै छु र ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुको शब्दले कान्छीको आँखा भरियो । शालुले कान्छीदिदीको आखाकोआँसु पुच्छदै भनिन्‌, &#039;मलाई थाहा छ, म दिदीका लागि अप्सराभन्दा पन्ति सुन्दरीछु । म दिदीलाई माया गर्नकै लागि स्वर्गबाट &#039;झरेकी हुँ, म फूल हुँ रे, म जूनहुँ रे, दिदीले सानोमा भन्ने गरेको शव्दहरू अझै विर्सेकी छैन । नरुनोस्‌,आजदेखि दिदीले जे भन्नुहुन्छ त्यही गर्छ,&#039; भन्दै शालु स्कुलतिर लागिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी शालुकै ओछ्यानमा थचक्क बसिन्‌ । आँखामा शालुकै मायालुअनुहार नाचिरहयो । मनमनै सङ्ककल्प गरिन्‌- म मेरी शालुलाई सन्त्रासमयबातावरणभित्र निशास्सिँदै मर्न दिने छैन । मेरी शालु अग्निकण्डमा पर्दा मस्वयम्‌ जल्नेछु । सम्पूर्ण पाएर पनि पसार शालुले आदर्श बाबु-आमा पाउनसकिनन्‌ । शालुकी आमाले आफनो नविसिँदिएकी भए सायद मैले त्योउलंदो बैंसलाई किच्नु, मिच्नु र थिच्नु पर्दैनथ्यो । बैंसलाई थेग्नुपर्दाको कष्टसम्झेर कान्छीको मन भक्कानिएर आयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उमिंलाले शालुको कोठाको ढोका खोल्दै कर्कसा स्वरमा भनिन्‌, &#039;फैरि केभयो तिमीलाई ? किन मुख फुलाएर बसेकी ? शालुले हिजो के अलिकति पिएरआएकी थिइन्‌, यिनको शिरमाथि पहाडै टुट्यो । मेरी छौरीलाई तिमी योजमानामा पनि आफूजस्तै वनाउन चाहन्छयौ : थाहा छ तिमीलाई ? अस्तिडा. पुष्करकी श्रीमतीले मेरो पिउने बानी छैन भन्दा सबै पेट मिचिमिची हाँसे ।डा. पुष्करले कहाँबाट गोबर टिपेछ भन्दै थिए । त्यति मात्र हो र यो जमानामापरिचय गर्दा नमस्कार पो गर्छै । त्यसको हात छुँदैमा त्यो सानी हुन्थी र ! सधैँमै हँ भन्ने डा. पुष्कर त स्वास्नीको गँवारपन देखेर नीलो र कालो भयौ । मेरीशालुलाई अहिलेदेखि नै सभ्य समाजमा रहने तरिका सिकाउँछु बुझ्यौ !?पाइलटको छोरा गान्टै, प्रभाते छ नि त्यो शालुसँग डराउँदो रहेछ । मलाईअन्टी शालुलाई यो गिफ्ट दिनु भनेर दियो । छान्न कति जानेको गान्टैले, फ्रकपनि यति राम्रो ल्याएछ कि ठ्याक्कै हिरोनीहरूले लाउने जस्तो छ भन्या !शालुको पापा भनिसिन्थ्यो- त्यो फ्रक त होलसेलमा नै निक्कै महँगो पर्छ रे !आज त्यही फ्रक लगाएर पार्टीमा लैजान्छु । गान्टे दङ्ग पर्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाको कुराले कान्छीलाई भाउन्त होला जस्तो भयो । कान्छीको मगजलेकेही सोच्नै सकेन । उनी हेरेको हेरै भइन्‌ । भर्खर चौध पुगेर पन्ध लागेकीछोरी नशामा &#039;फुम्दा रमाउने र छोरीकै लागि गिफट ल्याउने आमा पनिहुँदारहेछन्‌ । कान्छी भित्रभित्रै दाह्वा किट्दै कोठाबाट बाहिरिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;ओ डार्लिङ तिम्रो फोन ।&#039; दीपक उर्मिलालाई कडलेस दिएर ट्वाइलेटपस्चै । उर्मिलाले हलो गर्दै भनिन्‌, &#039;हैन किन विहानबिहानै सम्झनुभयो उमाजी? आज खाल त्यहीँ जम्ने होइन र ? त्यहाँ क्यान्सिल भयो रे, किन ? ए कान्छीसास्‌ आउने ? हो भन्या, पाख्रेहरूले त टाउकै खान्छन्‌ । दुई-चार महिनाभएको छैन गएको फेरि किन अन्मरिनु पन्या होला ? त्यसौ भए तपाईँ आज आउनुहुन्त । जचाउनु जानु छ भनेर आज, रै ! हुन्छ, हुन्छ आउनुहोस्‌ ।पाख्रेहरूको फतौरे गफ सुनेर दिन काटन गाह्रै पर्छ । प्रेमाको घरको खान्कीत्यति मीठोचाहिँ हँदैन । छुच्ची मोरी रेडलेबलमा सस्तो रक्सी मिसाउँछै जस्तोछ, जति पेग खाए पनि छुँदैन । बर्गर, पिजा, सेकुवा सबै बाहिरैबाट मगाउनुभन्नु अस्तिनैको जस्तो &#039;झरेष्ट नपरोस्‌ । तासमा धैरै पैसा जित्नै पनि त्यही,खान दिन कन्जुस गर्ने पनि त्यही । मलाई त प्रेमाको व्यवहार पटक्कै मनपर्दैन । आज्ञ त रेडलेबल हाम्रै अगाडि खोल भन्नुपर्छ । हुन्छ म पनि दसै वजेआउँला । फेरि भरे पार्टीका लागि चाँडै फर्किनुपन्यो ति ! मनीषा ब्युटिपार्लरराम्रो छ रे, हुन्छ त्यसो भए म पनि त्यहीँ जान्छु । राम्री त हुनैपन्यो नत्रवूढाहरूले के ठान्लान्‌ ? ल-ल राख्छु । दस बजे नै आउँला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फोन गरिसकेर भान्सामा आई डाइनिङ टेबुल ठटाउँदै भनिन्‌, &#039;हरे शिव !यो कान्छीलाई कालले घिसार्ने बैला भयो कि कसो ? अझै ग्यास सल्काएकीछैन, कहाँ मरी होला ?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले भान्साको ढोकामा आई भनिन्‌, &#039;सापनी ! आज साह्रै गाह्रो भएकोछ चन्द्रकान्तलाई काम गर्नु भनिस्यो । उनैले सबै काम गर्छन्‌, फ्रिजमा फ्राइमासु, अचार सबै छ । चिया र भुजा पकाउने त हो नि!&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिला चिच्याइन्‌, “ओहो ! अब त यो राँडको जिव्रो पनि कर्दझौँ भइसक्यो ।शालुलाई माया गर्दिन भनौं भने पनि त्यत्रो जवानी नै बलि चढाई । माया गर्छभनौं भने शालुले लाए, खाएको देखिसहन्न । हामी सगुल्लै बाबु-आमा हुँदाहुँदैयसलाई केको टाउको दुखाउनुपर्दो हो कुन्नि ? हिजो शालुले पिएर आएपछियसको होस हराएको छ । न यो घरबाट निस्की भन्दा निस्कन्छे । कुन जुनीकोपाप आइलाग्यो ।&#039; उर्मिला फतफताउँदै चन्द्रकान्तलाई बोलाउँछिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाको वाणरूपी शब्दहरू सुत्दासुन्दै अचानो भइसकेकी कान्छीको छातीमाउर्मिलाको गालीले त्यति दुखैन । हिजौकौ शालुको दृश्य सम्झेर भने तरक्कआँसु झारिन्‌ । &#039;अन्न फारो गर्नु हुँदादेखि छोराछोरी बानी लाउनु कुनादेखि&#039;भन्ने उखान सम्झिन्‌ । आफूले जति चोट सहन परे पनि शालुलाई सपार्छु ।&#039;अन्त्य राम्रो त सबै राम्रो&#039; यस्तै मनमा करा खेलाएर ओछ्यानमा छटपटाइरहिन्‌कान्छी ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==तीन==&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले कान्छी सुतेको कोठामा गएर बोलाए, &#039;कान्छी खान आरु,साप-सापनीको सबारी भयो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले विरक्त स्वरमा भनिन्‌, &#039;तिमी खाक म पछि खान्छु ।&#039; चन्द्रकान्तले सम्झाए, &#039;तिमी भोकभोकै बस्दैमा समस्याको समाधान हुन्छत ! तिम्रो गाँठी क्रा मैले पनि बुझेको छु । म पनि शालु मैयाँसापलाई मायापर्छुनि ! आक खाँदै शालु मैयाँसापलाई सर्पको डसाइबाट कसरी टाढा राख्नेहो दुवै मिलेर सल्लाह गरौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तको कुरा सुनेर कान्छी उठिन्‌ र चुपचाप चन्द्रकान्तको पछिपछिभान्सामा आइन्‌ । चन्द्रकान्त मेचमा बसे । कान्छीले चन्द्रकान्तनजिकैको मेचमाबस्दै भनिन्‌- &#039;चन्द्रकान्त ! शालु मैयाँसाप त मैले रक्सी पिएकै होइन भनिसिन्छनि ! उहाँले यो उमेरमा आएर पहिलोपल्ट मसँग &#039;फूटो बोलिस्यो बुझ्यौ ?त्यसैले हृदयमा उठेको हुरीको &#039;फोक्का मत्थर हुँदै भएन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले लामो श्वास फेर्दै उत्तर दिए- “मैयाँसापले भनेको करा ठीकहो । तिमी कुरा नै नबुझी मन सानो बनाउँछयौ । मैयाँसाप र अरू केटाकेटीहिन्दी गीतमा डान्स गर्दै थिए । सबैले मैयाँसापको डान्स र सौन्दर्यको तारिफपनि गरिरहेका थिए । मैयाँसाप गाह्रो भो भन्दै म नजिकै आएर बस्नु भो । त्योगान्टेले सिँगै फेन्टाको बोतल मैयाँसापलाई दे भनेर इसारा गरेको मैले झट्टदेखेँ । मैयाँसापले फेन्टा लिएर घुदघुट पिइस्यो । फेन्टा पिएको केहीबेरमै झुल्नथालिस्यो । मेरो सातोपुत्लो गयो । म मैयांसापलाई समातेर बसिरहेँ । सालेगान्टेको मनशाय बुझन थाहा नपाएझैँ गरी त्यसलाई हेरैँ । त्यो सिकार खानआतुर भएको सिंहभौँ थियो । त्यसको त्यौ रूप सम्झँदा अहिले पनि मुदुढुकढुक हुन्छ । दीपक साप र उर्मिला मैयाँसापलाई छोराछोरीको केही वास्ताछैन । पिउन र अश्लील कुरा गर्न पाए केही चाहिँदैन । आज पार्टीमा मनभएको भए शालु मैयाँसापको जीबन तहसनहस हुन्थ्यो होला । कान्छी, अबशालु मैयाँसापका लागि केही गर नत्र तिम्रो सपना टुक्रिन्छ । प्रभाते जस्ताकोगिद्दै दृष्टिबाट कहिलेसम्म बचाउन सकिन्छ र ? पार्टीमा भएकोले पौ म सँगैथिएँ । होटेल, रेस्टुराँमा त टन्न भात खाएर आई कारमै मुर्दालाई ढुकेझँ साप-सापनीलाई ढुक्न हो । होटेल रेस्टुराँमा यो दर्घटना घटेको भए के हुन्थ्यो होला,आफैँ सोच त । त्यो गान्टे देख्दा मात्र सानो हो । केटीहरू फेरी-फेरी कारमाडुलाएको मैले कतिपल्ट देखेको छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तको कुराले कान्छी होस हराएझैँ भइन्‌ । कान्छीको भोकप्यासकता भाग्यो-भाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले करा थपे, &#039;कान्छी तिमीलाई थाहा छ ? त्यो जँडपाहा पूर्णेकीछोरी मोनाको अस्ति राति सम्साँझैमा बलात्कार भएछ नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले आत्तिँदै भनिन्‌, &#039;होइन के भनेको तिमीले ? अस्ति बिहानै त होमैले भेटेकी ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ल कस्तो बिश्वास गर्दिनौ तिमी, अस्ति बेलुका नै बलात्कार भएको रे ।आज बिहान दूध लिन जाँदा सबै त्यही कुरा गर्दै थिए । बलात्कार पनि एक-दुईजनाले हो र चार-छ जनाले गरेका रे । कस्तो समय आयो, त्यत्रि कोपिलालाईपनि बाँकी राखेनन्‌ यौनप्यासीहरूले । मोनाको उमेर त वाह् वर्षको थियो होलाहोइन र?”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तको कुराले कान्छीलाई काटेको घाउमा नुनचूक दलेझैँ असहयभयो । कान्छी केही नबोली चुप नै रहिन्‌ । आँखामा मोनाको मायालु अनुहारर खुट्टा खोच्याङ-खोच्याङ गर्दै हिँडेको दृश्यहरू नै आइरहयो । कान्छीको आँखाबाटपुनः आँसुको वर्षा भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले सम्झाए, &#039;भौ अब नरोक । तिमी धेरै कोमल छ्यौ, त्यसैलेदुःखका कुराहरू नै गर्न मन लाग्दैन । बरु मोनालाई हेर्न जञाक । उनलाईशान्तभवनमा राखेको छ रे । विचरीको आफन्त भन्नु नै को छ र ! बाबु-आमालौकल ठर्रामा फुल्दै होलान्‌ । ल म गएँ, तिमी पीर नगरी बस&#039; भन्दै चन्द्रकान्तहिँडे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी बस्नै नसकी फेरि ओछ्यानमा गएर पल्टिन्‌ । उनको मनमा नानातर्क-विर्तक खेलिरहयो । कहिले मोना त कहिले शालु कान्छीको आँखामानाचिरहै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;ममी, दिदी त हुनुहुन्न कहाँ जानुभएछ ?&#039; शालुले स्कुलबाट आएर सोधिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उमिंलाले साडी मिलाउँदै भनिन्‌, &#039;ए, कान्छी बाहिर गइन्‌, शालु बेटा योफ्रक लगाएर हेर त, आज यही फ्रक लगाएर पार्टीमा जानुपर्छ, फ्रकमा तिमीसाँच्चिकै परीझैँ देखिन्छयौ । तिमीलाई प्रकाशे कस्तो लाग्छ ? क त तिम्रो खुवतारिफ गर्दै थियो ।&#039; ,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले अलि रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;ममी त्यस्ताको कुरा नै नगरिस्यो । कान्छीदिदीलेसघैँ भन्नुहुन्छ, &#039;म त राजकमारी जस्तै छु रे । राजकमारीले त धेरै पढ्नुपर्छरे।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;भो, बढी कुरा नगर । फ्रक लगाएर निस्क । मआइहाल्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
शालु फ्रक टिपेर कोठामा गइन्‌ । उर्मिलाले मनमनै सोचिन्‌, &#039;शालु छिटोफ्रक लगाएर बाहिर निस्किहाले हुन्थ्यो । कान्छीलाई ओछ्यानमा सुतेको देखिन्‌भने अर्को आपत आइपर्छ । बल्ल-बल्ल अलिअलि सभ्यता सिक्दैछिन्‌ । कान्छीशालु सभ्य भएको हेर्न सक्दिन । क शालुलाई आफूजस्तै गँबार बनाउनखोज्छे । छोटोको सङ्गत गन्यो भने मान्छै छोटै हुन्छ भनेको ठीकै रहेछ । शालुर कान्छीको बोल्ने शैली एकै छ। त्यो राँड यो घरबाट निस्कीभन्दा पनिनिस्किन मान्दिन । हरै भगवान्‌ ! कुन साइतमा यसलाई भित्र्याएका रहेछौं ।अहिले निल्नु न ओकाल्नु भएर घाँटीमा अड्की ।&#039;&lt;br /&gt;
शाल्नु फ्रक लगाएर आमासामु गइन्‌ । उमिला खुसी हुँदै चिच्याइन्‌, &#039;बाऊ ! कति सुन्दरी देखिएकी तिमी, फ्रकको कलरले पत्ति कति म्याच गरेको ।&#039;आमाको क्राले शालु पनि खुसी भइन्‌ । उर्मिलाका क्राहरू सुनेर कान्छीकोमुटुको ढुकढुकी भने बढ्यो । उनी जुरुक्क उठेर ट्वाइलेट गइन्‌ । दुवाइलेटगाएको केही समयपछि उनी चिच्याइन्‌, &#039;ऐया, म मरें, म मरें मैयाँसाप !&#039;कान्छीको आवाज सुनेर शालु दौडंँदै दवाइलेटमा पुगिन्‌ । र, कान्छीदिदीकोनिधार समात्दै भनिन्‌, &#039;ल छिटो हिंँड्नुस्‌ डक्टरकोमा जाँ । निधार धेरैफुटेजस्तो छ ।&#039;&lt;br /&gt;
उर्मिला रिसाउँदै कोठाबाहिर निस्केर भनिन्‌, &#039;फैरि कै भयो यसलाई : छोरी हिँडआज बाबाले नै कार चलाइसिन्छ । चन्द्रकान्तले कान्छीलाई डक्टरकोमा लैजान्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले रिसाउँदै उत्तर दिइन्‌, &#039;यहाँ दिदीको निधार फुटेको छ । 0401 डुपार्टीको वास्ता छ । देखिसेन निधारबाट रगत वगेको । हजुरहरू गै सो मनैदिदीलाई डक्टरकोमा लैजान्छु ।&#039; शालुको शब्दले कान्छीको मन केही ढुक्कभयौ।&lt;br /&gt;
“हामीभन्दा त्यसकी वजै ठूली भई&#039; भन्दै मनमनै फतफताउँदै उर्मिलाघरबाट निस्किइन्‌ । कान्छीलाई निधारमा लागेको चोटको कनै बास्ता थिएन ।शालुलाई रोक्न सकेकोमा नै उनी खुसी थिइन्‌ । निधारबाट शालुको हातहटाएर ऐनामा निधारको घाउ हेरिन्‌ । रगत भल्ल वग्यो । कान्छीले सोचेकोभन्दा घाउ ठूलो नै रहेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले आँखा चिम्लेर भनिन्‌, &#039;दिदी, दिदी घाउ छोप्नुहोस्‌ न मलाई ढरलाग्यौ ।&#039; हौ&lt;br /&gt;
कान्छीले कपासले घाउ छोप्दै भनिन्‌, &#039;शान्तभवन नै जाउँ न त मैयाँ ।त्यहाँ मोनालाई पनि भेटौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;मोनालाई कै भएको छ र ?&#039; शालुले प्रश्न गरिन्‌ ।&lt;br /&gt;
“सबै त्यहीँ गएपछि थाहा हुन्छ, जाउँ ।&#039; कान्छी र शालु शान्तभवन जानकालागि ट्याक्सी चढे । ट्याक्सीले शान्तभवनको मोड लिँदै गुड्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==चार‍‍==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
समय साँझसाँझको थियो । शान्तभवन पुगी ओर्लिन नपाउँदै एउटा युवकशालुनजिकै आएर भन्यौ, &#039;ओ ! च्वाँक देखिएकीछयौ छ च्चाक !&#039; केही पाइलाचालैपछि अर्को युवकले कुरा थप्यो, “ओ यार ! प्लिज एक किस मात्र भए पनिदेक, म स्वर्ग पुगेझैँ हुन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीलाई च्याप्प समातिन्‌, कान्छी सुनेको नसुनै गरी हिँडिरहिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले चार-पाँचजना युवाको नजिकँबाट शालुलाई हिँडाइन्‌ । त्यहां शालुलेकेही सुन्नुपरेन । कान्छीले पुनः चार-छजना युवा भएको नजिक गएर ब्यागखौतलखातल गरेझै गरी शालुलाई अड्त बाध्य गराइन्‌ । एउटा युवकले अर्कोयुवकलाई कोट्याउँदै भन्यो, “क हेर ।&#039; अर्को युवकले शालुतिर हेर्दै भन्यो, &#039;मैयाँफ्रक अलि लामो भएछ । थोरै छोटो भएको भए झनै सुहाउँथ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
अर्कोले टक्क ओठ बजाउँदै भन्यो, &#039;म पनि यस्तै कपडा किनिदिउँला,तिमीसँगसंगै हिँडिदिउँला ।&#039;&lt;br /&gt;
अर्काले हाँस्दै कुरा थप्यो, तिमीहरू के-के किनिदिन्छौ किन रानीवन घुम्नचाहिँमसँग हिँड ।&#039; शालुले कान्छीलाई चिमोट्दै भनिन्‌, &#039;दिदी यहाँबाट छिटो जाकैँ ।&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीले निधारमा टाँका लगाउँदा शालुलाई सँगै राखिन्‌ । डक्टरको ध्यानकान्छीमा भन्दा आफूमा बढी केन्द्रित पाइन्‌ शालुले । शालु मनमनै रिसाउँदैटाँका लगाउन लगेको ठाउँबाट वाहिर निस्किन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु बाहिर ढोकामा के उभिएकी मात्र थिइन्‌, एउटा अधबैंसे पुरुषलेशालुलाई धक्का मार्दै हिँड्यो । केही बेरपछि एउटा साठी-बैसट्टी वर्षको बूढोलेशालुको कान नजिकै गएर भन्यो, &#039;तिमीलाई देखेपछि त आफू बूढो भएकैबिसेँछ नानी !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिका सति [ शब्दहरू सुनैर शालु थरधर काम्न थालिन्‌ । कान्छी बाहिर&lt;br /&gt;
कै शालुले कान्छीलाई च्याप्प समातेर भनिन्‌, &#039;दिदी छिटो घर&lt;br /&gt;
जाँ । मैरो त प्राण नै जान लागिसक्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले शालुलाई ट्वाइलेटनजिकै लगेर हातमा झोला थमाउँदै भनिन्‌,&#039;ल ट्वाइलेटमा गएर यौ कपडा फेरैर आइस्यो सब ठीक हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालु दबाइलेटमा गएर कान्छीदिदीले जन्मदिनका दिन दिएको कर्या-सुरुवाल लग्राएर वाहिर निस्किन्‌ । कान्छीले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;अब हजुरले कसैकोअपशब्द सुन्तुपर्ैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रुन्चै स्वरमा सौधिन्‌, &#039;दिदी म उत्ताउली छु र : प्रत्येकले मलाईनराम्रै दृष्टिले हेरे । साँच्चि कति टाँका लगाउनुपत्यो ? दुख्यो पनि हौला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;चार टाँका लगाउनुपःयो । नदुछ्ने सुई दिएकाले दुखेको त्यति पत्तो भएन ।हजुर बिलकलै उत्ताउलो होइसिन्न । त्यौ फ्रकले गर्दा नै मान्छेहरूले हजुरलाईत्यस्तो ठानेका हुन्‌ । एउटा चरित्रवान्‌ मान्छेले त्यस्तो कपडा कहिल्यै पनिलाउँदैनन्‌ । कत्तिको बलात्कार त कपडाले गर्दा पनि हुन्छ । प्रत्येक कुराहरूमैले भन्नुभन्दा पनि आफैँले जान्नुपर्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले ठुस्किँदै भनिन्‌, &#039;दिदीले घरमै यो कपडा नलगाउनु भनेको भए मलगाउँदिनथेँ नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“उमिंला मैयांसापले कपडाको राम्रो तारिफ गरेको सुनेपछि बोल्ने आँट नैआएन । अर्को कुरा कपडाको आधारमा मानिसले हजुरको मूल्याङ्कन कसरीगर्दारहेछन्‌, आफैँले अनुभव गरिसिन्छ जस्तो पनि लाग्यो, त्यसैले कर्था-स्‌रुवालबोकेर आएकी नि !&#039;&lt;br /&gt;
शालुले भनिन्‌, &#039;यो फ्रकलाई ममीकँ अगाडि च्यातेर टुक्राटुका पार्छु ।&#039;शालुको कुरा सुनेर कान्छीको मत खुसीले गद्गद्‌ भयो । कान्छी र शालुक्याबिन तं. १०५ मा पुगै । कोही आएको चाल पाएपछि मोनाले पुलुक्क आँख्चाखोलिन्‌ । कान्छी र शालुलाई देखेपछि मोनाको आँखाबाट आँसुको मूल फुट्यो ।गला अवरुद्ध भयो । शालु र कान्छीका आँखाहरू पनि रसाए । शालुले मोनाकोकपाल मुसार्दै भनिन्‌, &#039;के भयो तिमीलाई :&#039;&lt;br /&gt;
मौनाले कान्छी र शालुलाई स्टुलमा बस्न आग्रह गर्दै भनिन्‌, &#039;दिदीहरूलाईथाहा छैन कि क्या हो ? म त बर्बाद भएँ । मैरो त बलात्कार भयो नि !&#039;&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीलाई हेर्दै भनिन्‌, &#039;के भनेको मोनाले, मैले त कुरै बुझिर्न ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाले घुँक्कघुँगक रुँदै भनिन्‌, हेर्नोस्‌ शालुदिदी मलाई पाँच-छजनालेबलात्कार गरे । बलात्कार गर्दा मरेकी भए पनि हुन्थ्यो । किन बाँचे हुँला ? तर,बाँचेको पनि ठीकै छ । आफूले थाहा पाएदेखि नै पेटभरि खान नपाए पनिअबदैखि पेटभरि खान पाउने भएँ ।&#039; मोनाको अनुहारमा केही खुसीका रेखाहरूकोरिए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;कसरी पेटभरि खात पाउने भयौ !&#039; कान्छीले जिज्ञासा राखिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;मोनाले केही हाँसेझैँ गरी भनिन्‌, &#039;मलाई अस्ति बचाउने मालिक-मालिकनीलेलैजान्छ भन्नुभएको छ । उहाँहरूले लैजान्छु नभनेको भए म यही हस्पिटलकोछतवाठै हामफालेरै भए पनि मर्थे, तर त्यो नर्कजस्ता घरमा म फर्कंदैनथैँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु मोनाको क्राले एकोहोरी भइन्‌ । केहीबेरपछि आँखाको आँसु पुछ्दैसोधिन्‌, &#039;तिमीमाथि वलात्कारचाहिँ कसरी भयो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौनाले गहभरि आँसु पार्दै भनिन्‌, &#039;दिदी खुट्टामा नराम्रोसँग सिसाले काटेकोहुँदा हिँडनै नसकेर ओछ्यानमा पाल्टरहेकी थिएँ । बाबुले कराउँदै भन्यो, &#039;मोनाछिटो तल मौर, रक्सी लिन जानुपर्छ भनेर खुट्टा दुखेको बहाना गर्छेस्‌ ?&#039; आमामैरो नजिकै थिइन्‌ । मैले आमालाई भने, &#039;आमा, मलाई भट्टीमा जानै मनलाग्दैन । रक्सी खान आएका पुरुषहरूले कै-के भनेर जिस्क्याउँछन्‌ । त्यसमाथिरात पनि परिसक्यो । खुट्टा पनि काटेको छ, म हिँड्न सक्दिनँ ।। आमा चुपलागिन्‌ । बाबु तलबाट हँसिया बोकेर माथि आयो अनि हँसिया उठाउँदै भन्यो,“खुरुक्क रक्सी लिन जान्छेस्‌ कि यही हँसियाले छिनालुँ ?&#039; बाबु मलाई काट्नअघि सत्यो । म पिटाइबाट बच्न खुट्टा खोच्याउँदै भट्टीमा गएँ । कृष्ण साहुलाईसिसी दिँदै भने, &#039;एक लिटर रक्सी दिनोस्‌ रे पैसा भोलि दिने रे ।&#039; भट्टीमा युवा वृद्धा सबै थिए उनीहरूले हास्दै भने, &#039;यस्ती राम्री छोरी नै पठाएपछि पैसा किनचाहियो ?; हेर्दा-हेर्दै यो त तरुनी पो भई । आइजौ भुटन-चिउरा खा !&#039; भुटनचिउरा देखेपछि मेरो मुखबाट पाती आयो । मैले भने, &#039;छिटो रक्सी दिनोस्‌,मलाई बेर भइसक्यो । साहुले रक्सी दियो, रम्पी लिएर दस-वीस पाइला मात्रके सारैकी थिएँ, एउटाले मलाई च्याप्प समात्यो । अर्कोले मुखमा कपडाकोच्यो । अरू दुई-तीनजनाले घिच्याउँदै मलाई खेतमा लगेर मेरा शरीरमाथिखेल्न याले । म केहीबेर पीडाले छदपटाएं, त्यसपछि के भयो पत्तै भएन । मबाटोमा मिल्किरहैकी देखेर उहाँहरूले यहाँ ल्याउनुभएको रे । साहृ-साहुनीदयालु जस्तै हुनुहुन्छ ।&#039; मोनाले उज्यालो अनुहार लगाएर कुरा थपिन्‌, &#039;दिदीमैले आज टन्त भातमासु पनि खान पाएँ नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुलै अचम्म मान्दै भनिन्‌, &#039;यसभन्दा अगाडि तिमीले टन्त भात्तमासुखाएकी थिएनौँ त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;पेटभरि ढिंडो-पिठो त खान पाएकी छैन । मासुभातको क्रै छोडौं । वाहाछ दिदी मेरो बाबु-आमा टन्न मासु-रक्सी खाँदा मलाई एक टुक्रा मासु खाभनेर दिँदैनथे । भोलिपल्ट बिहान भाँडा माँझदा उनीहरूले फयाँकेको हड्डीचुस्थँ । कहिलेकाहीँचाहिँ उनीहरूले नखाएर फूयांकेको छाला खान्थे । अबभनै... ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाह-तेद वर्षकी मोनाको कुरा सुनेर शालुको जीउभरि काँडा उम्नैमौँ भयो ।उनी केही बोल्न नसकेर चुपचाप भइन्‌ । त्यत्तिकैमा मौनाकी आमा भीमाआएर अचम्म मान्दै भन्तिन्‌, &#039;अहो ! शालु नानी र कान्छी पनि आइछिन्‌ । हेर्नोस्‌न शालुमैयाँ यो हैजाले दिनु दुःख दिई । आफनो जीवन पनि बेर्ध पारी । हाम्रोपनि बद्नाम गरी । अब यस्तालाई कसलै पो विवाह गर्ला ? यसका दिदीहरूपनि उमेर नपुग्दै पोई चाहिएर हिँडे । यौ पनि भट्टीका केटाहरूसँग छिल्लीहोला अनि के वाँकी राख्ये, होइन त ! हिजो बिहान एक्कासि यो हस्पिटलमाछे भन्ने खबर आउँदा त सातै गयो भन्या ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु र कान्छीले नै &#039;भीमाको अनुहारमा हेरै । उसको अनुहारमा दुःखकोएक कण पनि थिएन । शालुले गह्रौँ मन पारेर सोधिन्‌, &#039;अस्ति राति मोना घरनआएपछि कहाकिहाँ खोज्नुभयो नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;मोना नआएपछि यसका बाबु फतफताउँदै भट्टीतिर गएका थिए ।“त्यहीँबाटफेरि रक्सी बोकेर आएछन्‌ । मेरो जीउ साह्रै दुखेको हुनाले अलिकति रक्सीपिएकी त भुसुक्कै निदाएँछु । कान्छीको तिधारमा के भयो : हजुरचाहिँ कताबाटनि?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&#039;दिद्वीलाई घाउ लागेकोले टाँका लगाउन आएका थियौं । एकपल्ट मौनालाईहेर्न मन लाग्यो । अनि यहाँ पसेका हौं । मोना तिमी हिँडडुल गर्न सम्छ्यौ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दिउँसोदेखि अलिअलि हिँडे । मेरो डिस्चार्ज पनि भइसक्यो । अहिले साहु-साहुनी मैरा लागि कपडा लिन जानुभएको छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमाले अलि हड्बडाउँदै भनिन्‌, &#039;कुनवैला आउने हुन्‌ साहृ-साहनी, घरढ्विलो गयो भने बूढाले महाभारत गर्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमाको त्यो क्रूर रूप देखेर कान्छी र शालु नै मौन भई उनलाई हेरिरहे ।केहीबेरपछि हातमा कपडाको पोको बोकेर अधबैंसे लोग्ने-स्वास्ती मोनासामुआए । अधबैंसे आइमाईले भनिन्‌, &#039;हिँड बिस्तारै दवाइलेट गएर लुगा फेरौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कपडा लिँदै भनिन्‌, &#039;हजुर यहीँ बसिस्यो, म कपडा फेराइदिन्छु ।&#039;यति भनी शालु मोनालाई लिएर ट्वाइलेटतर्फ लागिन्‌ । मोना पाइलैपिच्छेऐया-ऐया गर्दै टबाइलेटमा पुगिन्‌ । विहान फेरेको कपडामा रगतका केहीटाटाहरू रहेछन्‌ । मोनाले कपडा फेर्न खुद्ठा उचात्दा दाह्रा किटेर ऐया गरिन्‌ रआँसु &#039;भररिन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालुले मोनाको पुरानो कपडा ब्यागमा हाल्दै भनिन्‌, &#039;मोना, दुई-चार दिनयहीँ बसेको भए हुन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
मोनाले लामो श्वास फेर्दै भनिन्‌, &#039;अस्ति बेलुका एघार बजे हस्पिटलल्याएदेखि मालिबनी सापले एकछिन पनि छोडनुभएको छैन । उहाँ पनि रोगीहुनुहँदौरहेछ । हातखुट्टा सुन्निएर आयो, कुर्ने कोही नहुँदा मालिककै घर जानपत्यो ।&#039; शालुलाई मान्छेहरूको विभिन्त रूप देखेर खुसी र दुःख दुबै लाग्यौ ।सबैजना विस्तारै गेट बाहिर निस्कै । शालुले मौनालाई कारभित्रसम्म पुन्याइन्‌ ।कारमा बस्दा पनि मोना ऐया भन्दै बसिन्‌ । भीमाले साह-साहनीतिर हेरैभनिन्‌, &#039;हजुर पैसाचाहिँ एक गते नै चाहिन्छ है । हिज्ञो भनेको भन्दा एक पैसानघटाउनुहोला । फेरि एक गतेभन्दा उता नजाओस्‌ नि ! कार गुड्दा मोनाखिसिक्क हाँसिन्‌ । शालु र कान्छीले पनि हात हल्लाएर बिदाइ गरे । भीमालेकार टाढा पुग्दासम्म त्यही शब्द दोहो-्याइन्‌ । हजुर म एक गते नै पैसा लिनआउँछु । एक गते ........ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पाँच==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;प्रभाते सधैँ-सघैँ सोध्छ । आन्टी शालु किन आउँदिनन्‌ भनेर । खाने मुखलाईजुँगाले छैक्दैन । एक-दुई घन्टा त यसो मुड फ्रेस पनि गर्नुपर्छ । अरू केटीहरूप्रभातै भनेपछि मर्ने खोज्छन्‌, प्रभातेचाहिँ तिम्रो दिवाना बनेजस्तो छ । तिम्रोभाग्य बलेकै छ कि क्या हो ?&#039; उर्मिलाले क्रा चुहाइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रिसाउँदै जवाफ दिइन्‌, &#039;ममी आइन्दा मलाई यस्ता फाल्तु करानगरिसेला । मैरो मुडअफ हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;त्यौ राँडले के-के क्रा गरेर तिम्रो कानमा फुकिहोला, अनि मेरो कुरालेमुडअफ भयो होइन तिमीलाई ! कान्छीले तिमीलाई भड्घालोमा पार्दा थाहापाउली । स्व्रास्तीको गँवारपनले डा. भट्ट अहिले कसैको अगाडि मुख देखाउनसक्दैनन्‌ । तिमीले पनि आफनो लोग्नेको त्यही चाल गराउँछयौँ, मैले देखिसकेँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;ममी हामीबीच किन दिदीलाई ल्याइसिन्छ ? यो जमानामा एकपेट खाएरसम्पूर्ण काम गर्ने मान्छै पाउँदा पनि हजुर खुसी होइसिन्त !&#039;&lt;br /&gt;
उर्मिला चर्किन्‌, &#039;त्यस राँडलाई कसले बस भनेको छ र : पैसा पाउनेठाउँमा मर भनेको त हो नि ! त्यसैको बाबुको पेवाझैं ठानेकी छे यस घरलाई ।आमा-छोरीको सम्बन्धमा नै विष घोल्ने त्यो राँडलाई निकाल्न सकिनँ भने मेरोनाम उर्मिला होइन बुझयौ !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीलाई निकाल्ने करो गरेपछि शालु झसङ्ग भइन्‌ र आमाको रिसशान्त गर्नु श्रेय ठानिन्‌ । ज्यादै नम्र स्वरमा भनिन्‌, &#039;ममी पनि त्यसै रिसाइसिन्छ ।सबै सरमिसहरू भन्नुहुन्छ । मेरो पढाइ ज्यादै कमजोर छ रे, त्यसैले पो होटेल,पार्टीतिर जान छोडेकी । हजुरलाई थाहा नै छ अस्ति नशा पिउँदा म झन्डैबैहोस भएकी ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;ल-ल चेपारो घस्नुपर्दैन । आमाको मन राखिदिनक्रहिलेकाहीँ जाँदा कति नै पढाइ बिग्रिन्थ्यो र ? लाटी, पहिला-पहिला रक्सीपिउँदा मलाई पत्ति कम गाह्रो पर्दैनथ्यो । बिस्तारै पिउँदै जाँदा अहिले म रक्सीनभई बाँच्नै सक्दिनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु आमाको कुरा सुनेर मनमनै रोइन्‌ । कान्छीदिदी अनेकौं घृणा सहँदैआफनो घरमा बस्नुको रहस्य बुझिन्‌ । ममीले तारिफ गरेको कपडा लगाउँदासहनुपरेको अपमान सम्झिन्‌ । कान्छीदिदीले दिएको कपडा लगाउँदा मोनालाईलैजाने साहुनीले भनेको पनि सम्झिन्‌ । त्यो साहनीले बडो सभ्य भाषामाभनेकी थिइन्‌, &#039;नानी हेर्दा त ठूलै खान्दानकी जस्ती छ्यौ । धैरै चरित्रवान्‌बनाएका रहेछन्‌ बाबु-आमाले । न लगाइमा उच्छुङ्खलता न व्यवहारमा नै ।के हो नानी तिम्रो नाम र बाब्‌-आमाकी नाम ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भीमाले बीचैमा भनेथिन्‌, &#039;हो हजुर शालु रानीको सम्पत्तिको गणना गरेरसाध्य छैन, तर शालु रानीकै निम्ति यही कान्छीले सारा जीवन अर्पिन्‌ । त्यसैलेछरछिमैकीहरू यिनलाई शालुको पहिला जन्मको आमा हनुपर्छ भन्छन्‌ । मालिक-मालिक्नीले त सयौँपल्ट निकाल्न खोजेका थिए, शालु रानीकै मायाले त्योघरमा अडेकी छिन्‌ यिनी ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मोनाको मालिक्नीले खुसी हुँदै कान्छीलाई विस्तारै दुईपल्ट घाप मारिन्‌ ।शालुको आँखामा त्यो दृश्य पनि नाच्यो ।&lt;br /&gt;
“लौ कहाँ हरायौ शालु ? आमाको शब्दले शालु झसङ्ग भइन्‌ र भनिन्‌,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;ममी हजुरको सुन्दर रूप देखैर टोलाएकी । साँच्चै हजुरहरूको ग्रुपमा हजुर नैरामो होइसिन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;हेरन फुर्क्याएकी । यो रातो लिपिस्टिक लाउँदासुहाउँछ कि, गुलाफी लिपिस्टिक लाउँदा सुहाउँछ भन त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हजुरलाई दुबै लिपिस्टिक सूहाउँछ, तर गुलाफीले चाहिँ सौभर देखिन्छ,&#039;शालुले उत्तर दिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिम्रा पापाले त रातै मनपराइसिन्छ भन्या । त्यसैले रातै लिपिस्टिक लगाउँछुहै? फेरि आज हामी दस-बाह?जनालाई मात्र बर्मा सापले बोलाएका छन्‌ ।त्यसैले पापाले कार हांँक्नुहुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दिदी यो टीका लगाउनोस्‌, ममीले त सधैँ यस्तै टीका लागाइसिन्छ । अनिमात्र दिदीसँग तरकारी किन्त जान्छु ।&#039; कान्छीले टीका हेर्दै जिब्रो काढ्दै भनिन्‌,“उमिंला मैसापले थाहा पाउनुभयो भने मार्नुहुन्छ । जे होस्‌, हजुरलाई मनपर्नेहुनाले लगाइदिन्छु ।&#039; कान्छीले आफूले लगाएको टीका खोलेर शालु दिएकोटीका लगाएर तरकारी किन्त हिँडिन्‌ । बाटोभरि चिनैकाले कान्छीको मुखमाहेरेर हाँस्दै भने, &#039;होइन कान्छी तिमी त बहुलाउन लाग्यौ किक्याहो? योधोतीमा त्यस्तो टीका कहीँ सुहाउँछ ! बैँस धान्यौ, बुढ्यौली धान्न सक्दिनौजस्तो छ अब, तिमीलाई तिधारै ढाक्ने लामो टीकाभन्दा सानै टीका सुहाउँछ ।&#039;कान्छीले कसैको कुरा पनि वास्ता गरिनन्‌ । घरमा आएपछि शालुले लामोटीका झिकेर सात्रै टीका लग्राइदिइन्‌ । तीन-घार वर्षअगाडिको कुरा सम्झैरशालुलाई नमज्जा लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रातो लिपिस्टिक लगाएर पुनः सोधिन्‌ उर्मिलाले, &#039;भन त नानु म कस्तीभएँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ममी ज्यादै राम्रो भइस्यो । म जान्छु है&#039; भन्दै शालु आफनो कोठामापसिन्‌ । ओछ्यानमा पल्टेर दिदीले गाली खाँदाको त्यो क्षण पनि सम्झिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिदी आज पनि हिजो काकाको घर जाँदा लगाएको त्यही साडी लगाउनौस्‌ ।त्यो साडीले तपाईलाई साह्रो सुहाउँछ । कान्छीले त्यही साडी लगाएपछि शालुरमाइन्‌ । सधैँ साँझमा मात्र घर फर्किने उर्मिला बैंकको चैक लिन घर आइन्‌ ।कान्छीलाई नयाँ साडीमा देखेपछि कान्छीलाई कहाँ गएर आएको भनेर सोधिन्‌ ।कान्छीले कहीँ पनि गएकी छैन भनेपछि चिच्याइन्‌, &#039;मलाई ढाँद्छेस्‌ नकचरी,बाहिर जाने साडी लगाएकी छे, सोझो करा गर्दिन । सधैं म नभएको मौकापारैर बाहिर मर्दी पो रहिछे ।&#039; (कान्छी चुप लागिन्‌)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;मुसुमुन्द्रे रा जे भने पनि एक कानबाट सुनेरअर्को कानबाट उडाउँछै । भन्‌ कहाँ मरेकी थिइस्‌ ? कोसँग पल्केकी छस्‌ हं ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले आफनो कोठाबाट निस्केर भनिन्‌, &#039;किन दिदीलाई गाली गरिस्या ममी : कुरा नै नबुझी गाली गर्नै हौ ? मैले दिदी हिजो लगाएको साडीलगाउनुहोस्‌ तपाईंलाई सुहाउँछ भनेर जिट्टी गरेपछि, बल्ल उहाँले लगाउनुभएकोहो । हजुरले त सघैँ राम्रो-राम्रो साडी लगाइसिन्छ । दिदीले एक दिन पनि राम्रोसाडी लगाउन हुँदैन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;गालु तिमी पनि अचम्मकी छ्यौ । घरको काम गर्दा साडी लगाएर कामगर्न गाह्रो हुन्छ । यस्ती बच्चीले जे भन्यो त्यही गर्ने यो पनि कम्तीकी छे?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुलाई अतीत सम्झेर मनमा कता-कता नमज्जा लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साँझ-साँझ परेपछि उमिला र दीपक कारमा बाहिर गए । कान्छी भान्साकोकाम गर्दै थिइन्‌ । शालुले कान्छीको नजिक वस्दै भनिन्‌, &#039;दिदी के गर्नलाग्नुभएको ? तपाइँको कामचाहिँ म गरिदिन्छु । मैले भनेको कुराको उत्तरचाहिँतपाईंले दिनुहोस्‌ नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हजुरले अलि-अलि कामचाहिँ सिक्नुपर्छ, तर अलिपछि मात्र, अहिलेको कामभनेकै पढ्ने हो । गइस्यो कोठामा बसेर पढिस्यो, म तातो दूघ लेराइदिन्छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन, आज के कुरा हुँदैछ, आमाछोरीको, हामी पति सुनौं न !&#039; चन्द्रकान्तठट्यौली गर्दै भान्सामा पसे ।&lt;br /&gt;
“के हुनु नि तिम्रै कुरा गरेको, हामी दुईजनालाई भए तरकारी पकाउनुपर्दैनथ्यो । तिमी हलीले खाने जति तरकारी खान्छौ त्यसैले तरकारी कादनलागेकी&#039;, कान्छीले उत्तर दिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“तिमीलाई दुःख हुने भए बाहिरै खाउँला नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;ल हेर चन्द्रकान्त त रुतै थाले । सानौ करामा पनि चित्त दुखाउँछ्‌ यिती । जाबोतरकारी पकाउन के गाह्रो ? मारी बोबनुपनै होइन ।&#039; कान्छीले उत्तर दिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले चन्द्रकान्ततिर हेर्दै भनिन्‌, &#039;बस्नोस्‌ न दाइ । म दिदीलाई यहाँ किनआउनुभयो, फेरि यत्रो वर्षसम्म किन यहीँ बस्नुभयो त्यही कुरा बुझत दिदीलाईफकाइरहेछु ।&#039; -&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले शालुको कुरामै सही मिलाउँदै भने, &#039;भन न कान्छी हामी पनिसूनौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले काट्दै गरेको तरकारी पर सार्दै भनिन्‌, &#039;त्यसो भए चन्द्रकान्तलेथोरै तरकारीमा चित्त बुझाक है त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमीले मागे त यो प्राण नै दिन्थेँ । जाबो तरकारी त के, तिमीले मनकोकुरा बुझिनौ र पो मात्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले हाँस्दै भनिन्‌, “यो चन्द्रकान्त दाइलाई ठट्टा गर्ने कसले सिकाओस्‌,होइन दिदी ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले आँखामा टल्पल आँसु पार्दै भने, &#039;मोरिजाकँ मैयाँ ढाँटेकोहोइन । यो घरमा पसेपछि कान्छीले हजुरलाई माया गरेको देखेपछि म मेरोटुहुरो छोरोलाई यही आमा दिन्छु भनेर क्रैँ । कुर्दाकर्दै कपाल फल्न लाग्यो ।यिनले मेरो आखाको भाषा बुझ्दै वुझिनन्‌ । अव त छौरो पनि आठ-दसबर्षको भइसक्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले अलि रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;मैयांसापसँग पनि चाहिँदो-नचाहिँदो कुरागर्ने हो ? हेरिस्यो मैयाँसाप यिनी मभन्दा तीन-चार वर्ष कान्छा छन्‌ । म यहीपुसमा पैंतीस पुगेर छत्तीस लाग्छु । वास्तवमा चन्द्रकान्तले स्वास्नीको मायालेकतै बिवाह नगरी वसेका हुन्‌ । एकान्तमा रोएको दुई-चारपटक त मैले पनिदेख्लेकोचाहिँ छु । मैले कति सम्झाइसके विवाह गर भनेर यिनी पटक्कै मान्दैनन्‌ ।म जस्तोको कुरा के खान्थे ?&#039;&lt;br /&gt;
वर्षौँवर्षदेखि बाँधेको बाँध एकैचोटि भत्केझै गरी चन्द्रकान्त घुँक्कघुक्क गर्दैरुन थाले ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी र शालुलाई नै चन्द्रकान्तको पीडा देखेर साह्रै नमज्जा लाग्यो ।दुबैले सोचै- चन्द्रकान्त स्वास्नीलाई सम्झेर भक्कानिए । कान्छीले चन्द्रकान्तकोकुरा मोड्दै पलङमा वसेर आनन्दले कूरा गर्ने बताएपछि तीनैजना शालुकोपलङ्गमा बसेर गफ गर्ने थाले । कान्छीले लामो श्वास फेर्दै भनिन्‌, &#039;शालुमैयाँसापको मायाले गर्दा सबै कुरा भुनिसकेकी थिएँ । पुनः मैयाँसापको आग्रहलेअतीत काट्याउँदै छु- मलाई याद छ, म पनि सानोमा हजुरजस्तै चञ्चलथिएँ । त्यसैले होला आमा मलाई चञ्चली भन्दै बौलाउन्हुन्थ्यो । बा-आमा रम अति नै हाँसीखुसीका साथ दिनहरू बिताइरहेका थियौँ । म पढ्नमा तेजभएकी हुँदा एक कक्षादेखि नै प्रथम भएँ । म प्रथम हुँदा बाले प्रत्येक वर्ष खसीढाल्नुहुन्थ्यो रे । म पांच कक्षामा हुँदा खसी काटेर सबै गाउँलेलाई भोज खानदिएको त मलाई अझै याद छ । हाम्रो खुसीमाथि दैवलाई इर्ष्या भएरै होला वावुआफुभन्दा बाह्र वर्ष कान्छी अत्यधिक राम्री इन्दुको मायामा फसेछन्‌ । त्यसपछिघरमा सधैँ रडाको मच्चिन थाल्यो । बाले मेरी गंगाजस्ती आमालाई विभिन्नपुरुषहरूको बात लगाउन थाले । मलाई पनि त मेरी छोरी नै होइन भन्दैबिनाकारण कुट्न थाले । एकरात मेरी आमालाई अहिले निस्किनस्‌ भने आजकोरात काट्न दिन्न भनेपछि आमा मलाई छलेर मामाघर गइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रुन्चे स्बरमा सोधिन्‌, &#039;दिदी रात कादन दिन्न भनेकोचाहिँ के होनि? फेरि तपाईंलाई किन छाडनुभएको नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले पनि आफनो रसिलो आँखालाई धोतीका टुप्पौले पुछ्दै शालुकोप्रश्नको उत्तर दिइन्‌- &#039;रात काट्न दिन्न भनेको तलाईं मार्छु भनेको हो । मलाईघरमै छोड्नुको कारणचाहिँ छोरीले पेटभरि खान पाउली भनेर हुनुपर्छ । किनकिमेरो बाबु प्रशस्त पुँजीवाल थिए । मामाघरमा पेटभरि खान साह्रै गाह्रो थियो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मामाघरमा माइजूले आमालाई अति नै हेला गर्न थालेपछि फुपूले आमाको दुःखहेर्न नसकी स्बास्नी मरेको तीन छोराछोरीको बानु बूढो-बूढो पुलिससंग टीका-टाला गरेर पठाइदिनुभएछ । पछि पैले आमाको बारैमा सोध्दा भन्नुहुन्थ्यो,“तानी, तेरी आमालाई लोग्नेलगायत सौतेला छोराछोरीले पनि असाध्यै मायागर्छन्‌ । जाँदा तँलाई पनि लैजान्छु, त्यो तर्कमा छोरी राख्दिनचाहिँ भनेकी हो ।हामीले नै तँलाई उससँग पठाउन उचित ठानेनौँ । आमाले पठाएको पैसा-कपडाचाहिँ बेलाबेलामा फपूले लेराइदिनुहुन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले बीचैमा सोधिन्‌, &#039;तपाइँकी आमा गएपछि तपाईंको बाबुले के गरे ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बर आँसु खसाउँदै कान्छीले भनिन्‌, &#039;बानुले आमा गएको रात नै अलिठूलो भुँडी भएकी साह्टै रामी पुतलीजस्ती सानीआमा इन्दुलाई घरमा भिच्रायाए ।सानीआमाले मलाई शङ्ककाल्‌ आँखाले हेरेपछि बाबुले हाँस्दै भने, &#039;यसलाईछोडेर मरिछै । हुन्देक तिम्रो स्याहारसुसार गर्ने काम लाग्छ । तिम्रो फलजस्तोतरम हात्तले काम गरैको म हेर्न सक्दिनँ । नभन्दै त्यसै दिनदेखि बानुले त्योपुतलीजस्ती सानीआमाको खुट्टा मिच्नदेखि लिएर सम्पूर्ण काम गर्ने लगाए ।बाबुले घरमा ल्याएको चार महिनामै सानीआमाले सुन्दर छोरो पाइन्‌ । त्यसपछित झन्‌ बाबुको खुट्टा भुइँमा नै भएन । छिमेकीहरूले “कै हौ रामे चार महिनामैछोरो पायौ नि&#039; भनेर भन्दा बावु जँगा मुसार्दै भन्थे, &#039;हाम्रो भेट भएको त एक-दुई वर्ष भइसकेको थियो । जेठी घरमा हुँदाहुँदै कान्छी भित्रायाउनु मनले मानेनजेठी हिँडेपछि बल्ल मैले यिनलाई भित्रयाएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छिमेकीहरू उत्तर दिन्थे, &#039;किन क्रो चपाउँछौ, रामे, जेठी ननिकाली कान्छीआउन्न भनिन्‌, त्यसैले जेठीलाई निकालेँ भनन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाबु हाँस्दै भन्थे, &#039;ल भन्नोस्‌ मैले जेठीलाई कुटेर निकालेको हो त!अघिपछि यस्तो कृटपिट भयौ होला अर्कै क्रा, त्यस दिन छोएकोसम्म पनि छैनमरिजाकँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;बचनले कृट्यौ होला तत्र घर नै छोड्नेखालकी थिइनन्‌ कान्छीकी आमा ।जे होस्‌, बुढेसकालमा कान्छीकी आमालाई सम्झी-सम्झौ नरोएस्‌ । छिमेकीहरूसबै त्यसै भन्थे ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाबुले उन्मत्त हाँसो हाँस्दै ठाडो उत्तर दिन्थे, &#039;मेरी कान्छीलाई देखेपछिडाहा नगर्ने मान्छै नै देखिनँ ।&#039; बाबुको कराले छिमेकीहरूको मुख बन्द हुन्थ्यो । मेरोपीडा मसँगै थियो । बिहान चार बजेदेखि उठेर घरको सम्पूर्ण काम गर्थे ।भाइको दिसाको थाङ्ना घुनदेखि लिएर तेल लगाइदिने जिम्मा पनि मेरै थियो ।गाई-भैंसी चराउने, भकारो सोत्तर गर्ने, भात पकाउने गर्दा पनि कहिल्यै जसर पेटभरि खान पाउँदिनँथैँ । म मर्नु-बाँच्नुको दोसाँधमा दिन घिसारिरहेकीथिएँ । आमाले पठाइदिने गरेको कपडा र खानेकुरा सानीआमाले खोसेर माइतीपठाइदिन्थिन्‌ । एकदिनको कुरो हौ । म साह्ै भौकाएर गौठालाबाट घर आएँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अँगेनामा फुक्क फुलेको चामलको रोटी देखेँ, भोक खै नसकेर एउटा रोटीचोरेर भाग्दै थिएँ । भाइले रोटी चोरेको देखैछ । आमालाई क्रा लगाइहाल्यौ ।आमा चौटावाट दौडेर आई मलाई लछादै अँगेनामा लगेर तातो भुङ्ग्रोमा हातघुसादै भनिन्‌, &#039;यही होइन तेरो रोटी चोर्ने हात, अब पनि चो्छस्‌ कि : म पीडासहन नसकेर चिच्याएँ । एकैछिनमा हातमा ठूलाठूला फोका उठे । साउनकोमहिना थियो, म पोलेको पीडा सहन नसकेर मर्न भनी खोलातिर दौडँदै थिएँ ।काकीले समातेर ल्याई घाउमा घ्यूकुमारी लगाइदिनुभयो । वेलुका वाबु आएरमेरो घाउ हेर्नुको साटो चोर्नी रण्डीको बान भन्दै मेरो कपाल जगल्द्याएरथाममा ठोक्काइदिए । म पुनः मर्लान्त भएर पछारिएँ । त्यो पोलेको हातले पनिशान्ति पाएन । बेलुका भाँडा माझ । सबैजना हात कुहिएर झर्छ भन्थे । तरझरेन, महिनौं पछि हात निको भयो । दाग भने अझै छ। कान्छीले शालु रचन्द्रकान्तलाई दाहिने हात बढाएर हातको दाग देखाइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु र चन्द्रकान्तका आँखाबाट आँसुहरू बग्न थाल्यो । कान्छीले पनिआफनो आँखाको आँसु पुछ्दै भनिन्‌, &#039;हजुर रुने भए अब म करै गर्दिनँ ।&#039;शालुले रत्चे स्वरमा भनिन्‌, &#039;दिदी अव साँच्चै रुन्न ल सबै कूरा भन्नौस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले कूरा बताइन्‌, &#039;मासु पकाएका दिनहरूमा भने मलाई चाँडै सृत्नपठाउँथे । भाइहरू सुतेका छन्‌ भने पनि भाइहरूलाई उठाएर मासु खुवाउँयै ।म थाहा पाएर पनि थाहा नपाएझौँ गरी रुँदै सुत्थैँ । भोलिपल्ट थुप्रिएकाभाँडाहरू माझ्दा ठीक मोनाले भनेझैँ म पनि हड्डी र छालाहरू चपाउँथैँ ।यसरी अति नै कष्ट सहेर अठार वर्ष बित्यो । गाउँकै पढेलेखेका भावेन्द्रले मेरोदुःख हेर्न नसकी मागी मलाई मन्दिरमा लगैर सिन्दूर हालै ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्त कान ठाडो पार्दै भने, &#039;कान्छी तिम्रो कुरा भोलि सुनौँला । तलकारको हर्न लाग्यो ।&#039; चन्द्रकान्त गेट खोल्न गए । शालु खाना खान्न भन्दैओछयाचमा पल्टिन्‌ । चन्द्रकान्तले पनि खानै इच्छा छैन भने । कान्छी पनिभोकै सुतिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==छ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्कुलबाट आएपछि कपडा पनि नखोली कान्छीसामु गएर उनको हात मुसादैंशालुले भनिन्‌, &#039;दिदी आज ममी-पापा मात्र बाहिर जाने कुरा सुनेकी थिएँ ।चन्द्रकान्त दाइ पनि हुनुहुन्छ । अस्तिको बाँकी तपाईंको कथा भन्नुस्‌ है ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले विरक्त स्वरमा भनिन्‌, &#039;अब म हजुरलाई केही करा गर्दिनँ । मैरोकुरा सुनेपछि हजुर र चन्द्रकान्तले कति दिन खान खाइसेन । बितेको कुरासम्झँदै मन दुखाएर कहीं काम लाग्छ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीको गालामा म्वाइ खाँदै फकाइन्‌, &#039;ल आज साँच्चि पीरगर्दैनौं । मलाई त कहिले वाँकी कुरा सुनौं जस्तो भइसक्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीले मुसुक्क हास्दै भनिन्‌, &#039;हजुरको कुरा कसले पो टार्न सक्ला र?जिरी गरेपछि गस्यो, गस्यौ । त्यसौ भए आजचाहिँ खाना खाइवरी बसौंला है ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले खुसी हुँदै झ्यालबाट फूलबारीमा पानी हाल्दै गरेको चन्द्रकान्तलाईबोलाइन्‌ । चन्द्रकान्त फूलमा पानी हालिसकेर आए । त्यतिखेरसम्म कान्छीलेकुकरमै खाना बसाइन्‌ । खाना पाक्न बेर नै लागेन । तीनैजनाले बिहानकैँतरकारी र अचारसँग खाना खाए । कान्छीले भान्सा पुछपाछ गरिन्‌ । चन्द्रकान्तलेभाँडा माझ । शालुले भाँडा घोप्ट्याइन्‌ । चाँडै काम सकेर तीनैजना कोठामागए । पलङमा सञ्जिलोसँग बसे । कान्छीले शालुतिर हेर्दै भनिन्‌, &#039;हजुरलाई क्रासुन्न पाएपछि पढ्न पनि पर्दैन ? जाँच बिग्रियो भने मचाहिँ रिसाउंछु नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(दिदी पनि, एकैछिन नपढ्दैमा कहीँ पढाइ विगिन्छ र ? म पढ्छु । साँच्चैराञ्चैसँग पढ्छु । ल भन्नोस्‌ । भावेन्द्रसँग विबाह भएपछि के भयो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले भावुक हुँदै कुरा बढाइन्‌, “भाबेन्द्रसँग विवाह भएपछि मैले भावेन्द्रर उसको घरपरिवारको भरपूर माया पाएँ । मेरो विवाह गरेको तीन-चारमहिना पनि नवित्दै बाबुलाई एकदिन बेलुका धानमा पाती लगाउन गएकोमौका पारी कसैले दाउराको चिर्पटले टाउकोमै बजारेछन्‌ । बाबु चोट सहननसकी त्यहीँ बेहोस भएछन्‌ । हान्ने मान्छलेचाहिँ बाबुलाई मन्यो भनेरै छोडेकोहोला, संयोग बाबु उत्तानो परेर ढलेको हुँदा पानीमा मुख गाडिएको रहेनछ ।भोलिपल्ट खेतमा जानेहरूले देखेपछि हस्पिटल पुन्याएछन्‌, हस्पिटल लगेर होसखुल्ने सुई दिएपछि होस खुल्यो रे ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“दिदी कसले किन हानेको रहेछ त्यो पापीलाई ? तपाईं हेर्न जानुभयो त !&#039;शालुले जिज्ञासा राखिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठूलोबुबाको जेठो छोरो र सानीआमाबीचको नरामो सम्बन्ध मलाई घेरैपहिलादेखि नै थाहा थियो । उनीहरू मलाई त मान्छे नै गन्दैनथे । कहिलेकाहीँम घरभित्र छु भने दाइ आएर भन्धे, &#039;वानी, बाहिर जा, म घरबाटनिस्कन्धें । सानीआमा र दाइको हाँसोठट्टा भने बाहिरैसम्म सुनेकीथिएँ । बालै आफनी प्राणप्यारी स्वास्नी र छोरोकै बीचको सम्बन्ध थाहापाएपछि आमालाई गाली गरे रे भन्ने सुनेकीचाहिँ हुँ । आमा र दाइकै मिलेमतोमाबाबुलाई मार्न खोजेको हुनुपर्छ भन्ये छिमेकीहरू, तथ्य कुरा उनीहरूलाई नैथाहा हौला । दाउराले हानेपछि बाबुको मुन्टो केही हल्लिन थाल्यो । चालीस-पचास हजार खर्च गरेर टाउकोको अप्नेसन गरे सफल पति हुत सक्छ, असफलपनि हुन सक्छ भन्दा सानीआमा अप्रेसन गर्न तयार भइनछन्‌ । मेरो लोग्नेलाईकेही भयो भने कसले जिम्बा लिन्छ भन्दै बाजिन्‌ रै भन्ने सुनेकी थिएँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हुलाकको सुब्बासम्म भएका बाबुलाई पेन्सन नपाकी अफिसबाट काम गर्नसक्दैनस्‌ भनी निकालिदिएछन्‌ । बाबुको मुखबाट बेलाबेलामा -्याल निस्किनथालेपछि कान्छीआमा बाबुलाई पिँढीमा भात दिन्थिन्‌ रै भन्ने हल्ला सुनेकीसम्महुँ । म त्यो निर्दयी बाबुलाई हेर्नसम्म गइनँ । त्यौ पतिङ्गर मलाई र आमालाईसम्झौर धेरै रुन्थ्यो रे । त्यसै भन्थे छिमेकीहरू ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले फेरि प्रश्न गरिन्‌, &#039;त्यो अहिले जिउँदै छ कि मम्यो दिदी !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;त्यौ पापी यति छिट्टै के मर्ध्यौ ? कान्छीआमाको गोठालो भएर बसेको छरे । ठूलोबुबाको छोराले स्वास्नी बिबाह गरे पनि सातीआमालाई पनि छोडेकाछैनन्‌ रे । फुपू त्यसै भन्नुहुन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालु र चन्द्रकान्तकै अनुहारमा खुसी छायो । शालुले मुसुक्क हाँस्दै भनिन्‌,&#039;दिदी तपाइंको सानीआमा र जातुला दई काट्न म नै जान्छु भन्ने सोचेकी थिएँ ।दैवले नै काटेछ त्यस निचलाई मैले केही गर्नुपरेन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले सम्झाइन्‌, &#039;मैयाँसाप हामीले रिसलाई बडो कन्ट्रोल गर्नुपर्छ, ।कहिलेकाहीको रिसले मान्छेको सिङ्गो जीवन नै तहस-नहस हुन्छ । हजुरलेबुझिराख्नुपर्ने कुरा यही हो । मेरो बाबु-आमा, मोनाको बाबुजस्ता मान्छेहरू तरक्कयानसरह हुन्‌ । उनीहरू जस्तालाई चलाउँदा आफनै मुखमा छिटा पर्छ ।&#039;२&amp;quot; &#039;ल ल अब चाँडै रिसाउँदिन तपाईं र भावेन्द्रबीचको क्रा गर्नुहोस्‌ । त्यतिमाया गर्नै भावेन्द्रले तपाइँलाई किन छोडे ?&#039;&lt;br /&gt;
के भनौं मैयाँ मैरो भाग्यमै खुसी लेखेको रहेनछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले मुटुमा गाँठो पारेर भने, &#039;शालु मैयाँसाप, म कान्छीलाई सक्दोखुसी दिन तयार थिएँ र छु पनि यिनलाई आफनो खुसीको मलतब नै छैन ।विनको प्राण त केवल हजुरमै अड्को छ । हजुरले भन्ठानिस्यौ होला अस्तिकान्छी चिप्लेर लडिन्‌, त्यौ होइन हजुरलाई पार्टीमा जानबाट रोक्नकै लागियिनले जानीजानी आफनो टाउको फुटाएकी हन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“चुप लाग चन्द्रकान्त नत्र म तिमीसँग बोल्दिनँ । हैन, त्यसो हैन मैयाँसापचन्द्रकान्त &#039;फूट हुन्‌ । यिनको वनावटी कुरामा विश्वास नगरिसेला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले आफनो आँखाको आँसु हातले फुड ओभानो पार्दै भने, &#039;होमैयाँसाप हजुर झुल्दै आएको देख्दा यिनको होस नै गुम भयो । यिनी रातभरिहजुरकै पीरले सुत्न सकिनन्‌ । भोलिपल्ट मसँग शालु मैयाँसापले रक्सी पिएकैहो त भनेर सोधिन्‌ । मैले मैयाँसापले रक्सी पिइस्या होइन । त्यो प्रभातेले नैफेन्टामा केही हालेर मैयाँसापलाई दिन पठाएको हुनुपर्छ । त्यो प्रमातेको चरित्रराम्नैँ छैन, मैले धैरै केटीहरूसँग देखेको छु । मैले मैयांसापको रक्षा नगरेको भएके हुन्थ्यो होला&#039; भनेपछि यिनले भनिन्‌, “चन्द्रकान्त तिम्रो गुण म कहिल्यैबिर्सने छैन । अनदेखि मेरो मैयाँसापलाई त्यस्ता प्रभातेहरूको आँखाबाट टाढा राख्न सकिनँ भने म आफनो जन्मलाई धिक्कार ठान्छु । म मोर्छु चन्द्रकान्तशालु मैयाँलाई केही भयो भने म त मोर्छु भन्दै थिइन्‌ । उमिंला मैयांसापलेदीपकसापसँग कुरा गरेपछि पौ म झसङ्ग भएँ। उमिंला मैयाँसाप भन्दैहोइसिन्ध्यो- हेरिस्यौ हजुर, त्यो कहीँ नभएकी लवस्तरीले आज शालुलाई रोकेरैछौडी । शालुलाई दिदी छैन वाहिर गएकी छिन्‌ भनेर &#039;झुक्काइसकेकी थिएँ ।हत्तनपत्त दवाइलेटमा गएर टाउको पो फटाएर मरिछे । शालुले त्यसको निधारमाकँ रगत देखी उसलाई पुगिहाल्यो, मसंग आउन किन मान्ची । साह्रै घटियाआइमाई रहिछै त्यो । 0 01014 [लाई त्यसको सङ्गतबाट छुटाएन भने हामी कहीँमुख देखाउन लायक हुँदैनौं । कम्की छे त्यो राँड शालुमाधि सम्पूर्ण अधिकारमेरै छ जस्तो गर्छ । बिहानदेखि एक थोपा पानी पनि मुखमा हालेकी छैनत्यसले । अब शालुलाई दुई-चार दिन बाहिर पठाएर त्यसलाई निकाल्नैपन्यो ।त्यो हुँदासम्म शालु हाम्रो कुरा भन्दा त्यसैको करा सुन्छिन्‌ । सधैँ कमारीकँजीत कति सहनु ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डीपकसापले नराम्रो केही भन्नुभएन । उमिंला मैयाँसापलाई सम्झाउनुभयो,हेर उर्मी, कुवाको पानी सिदिएपछि मात्र कुबाको महत्व थाहा हुन्छ । कान्छीनपढेकै भए पति समझदार छै । शालुलाई हानि हुने कुरा क सोच्न पनिसबिदन । बस हामीमै कतै खोट भएर शालु कान्छीकै क्रामा विश्वास गर्छिन्‌कि सोच त । दीपकसापले के त्यति मात्र भन्नुभएको थियो उर्मिला मैयाँसाप तसिंहिनीझौ गरी गर्जिन थाल्नुभयो । त्यसो भए म नै नजाती हँ । अब म मरेपनि भयो होइन ? दीपकसापले सम्झाउँदै भन्नुभयो- &#039;उमिला चुप लाग मतनदुख्लाक । म शालुलाई दुई-चार दिनका लागि बाहिर घुम्त लैजान्छु । तिमीकरसंगरी भए पनि कान्छीलाई घरबाट निकाल । त्यसको कारणले घरमा धेरैअशान्ति भयो । मैले उहाँहरूले गरेको कुरा कान्छीलाई आएर भने ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले बडो सरल रूपमा नै भनिन्‌, &#039;यो घरबाट मेरो लाश निस्किन परेपनि म यो घर छोड्दै छोडदिनँ । म भइनँ भने मेरो शालु मैयाँसापको जीवनभत्किन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कान्छी चिच्याइन्‌- कति बकवास ओकन्छौ चन्द्रकान्त तिमी, मेरो करासुन्न बसेको कि आफनो भाषण सुनाउन ? चुप लाग्लान्‌ भन्यो, :&lt;br /&gt;
चुप त लाग्नै नै होइन तिमीलाई झूट ओकल्न कसले सिकायो हँ ? सँगैबसेपछि कहिलेकाहीँ ठूली मैयाँसापले गाली गरिस्यो &#039;होला तर उहाँ तिमीलेभनेभौँ कठोर होइसिन्न ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले केही दिनअगाडि मात्र आफनी आमाले भनेको कुरा सम्झिन्‌ । शालुबेटा, तिम्रो पापाले तिमीलाई एक-दुई दिन घुमाउन लाने कुरा गरिस्या छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;किन म मात्र हजुर पनि जाँ न एक्लै बोर हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाको जवाफ थियो यहाँ व्यापारमा अलि किचलो भएको छ, म जानमिल्दैन । पौखरा पुगेपछि तिम्रो साथी सिर्जना छँदैछिन्‌ नि । सिर्जनाले तिमीलाईहेर्न मन गरेकी छिन्‌ रे क्या । पापाको फुर्सद हुनेबित्तिकै पापाले तु लगिसिन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले शालुको हात समातेर मुसार्दै भनिन्‌, &#039;हेर यो चन्द्रकान्तको झुटोकुराले गर्दा मैयाँसापको मन दुख्यो । यो मगरको जात एकोहोरो पो हँदोरहेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“चन्द्रकान्त ! शालुलाई बचाएकोमा तिम्मौ गुण कहिल्यै बिर्सन्न भन्नै पनित्यही मुख, आज अनेक थरी भन्नै पनि त्यही मुख । जे कुरा पनि शालुमैयाँसापलाई केही नभन है म बिन्ती गर्छु भन्छिन्‌ । आज पोल खोलिदिएँ बोलेबोल न बौले नबोल । कहिले पो तिमीले मेरो हृदय चिहाएकी छौ र ? शालुमैयाँसाप एकान्तमा म स्वास्तीको मायाले होइन यिनको मायाले रुन्छु । आजसम्मम विवाह नगरी यिनकै मायाले बसेको हँ । स्वास्नीको माया लाग्छ, नलाग्नेहोइन । मैले उनलाई पाठेघरको क्यान्सरबाट बचाउन सारा सम्पत्ति सिध्याएँतर केही लागेन, मरेकी स्वास्नीको खुसीका लागि त्यो टुहुरो छोरोलाई यहीआमा दिन्छु भनेर बसें, आज त यस्तो &#039;फुटो उस्तो &#039;फुटो पो भन्छिन्‌ । काजीसापको के काम नमिलेर मात्र शालु मैयाँसापलाई पोखरातिर लगिस्या छैनत्यसपछि थाहा पाउली के होला ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कुरा मोद्धनु नै उचित ठानिन्‌ र भनिन्‌, “चन्द्रकान्त दाइ अब सबैकुरा छोडेर दिदी र भावेन्द्रको कुरा सुनौँ, तपाईंहरू दुवैजना चुप लाग्नुहोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले उठ्दै भने, &#039;म यित्तको एउटा कुरा पति सुन्दिन । कै नै कुराहोला र लोग्नेकै खुसीका लागि फेरि बलि भइ्टहोलिन्‌ र यो तर्कमा आइन्‌ ।&#039;यति भन्दै चन्द्रकान्त रिसाउँदै हिँडे । कान्छी र शालु हेरेको हेरै भए । दुवैलेचन्द्रकान्त रिसाएको पहिलोपल्ट देखेका थिए ।&lt;br /&gt;
कान्छीले भनिन, &#039;चन्द्रकान्तले जे भने त्योचाहिँ सोड्रैञाना ठीक हो । मबाटचार वर्षसम्म वच्चा नभएपछि घरपरिवारले मलाई साह्रै हैला गर्न थाले ।भावेन्द्रले मलाई घरमा नबसी हामी हङकङ जाँ, उतै गएर राम्रो औषधिगरौँला भनेका थिए । मैले उनको क्रा मानिनँ । तपाईंबाट बच्चा हुन्छ भनेविवाह गर्नुहोस्‌ भनेर जि्दी गरें । उनले सबैको करमा परेर विवाह गरे । विवाहगरेपछि पनि उनमा धैरै परिवर्तन आएको थिएन । सौताले बच्चा पाउनेभएपछि भने थोरै परिवर्तन आयो । भन्थे, &#039;कान्छी तिमीले विवाह गर्नु भनेरठीक गन्यौ । तिम्रै बाटो कुरेको भए सन्तानको मुख नै नदेख्ने पो रहेछु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मलाई पनि उनको खुसी देख्दा लाग्थ्यो । सऔौताको जात न हो कभावेन्द्रलाई मैरो नजिकसम्म पर्न थी । सबै परिबार कान्छीकै पक्षमाथिए । एक रात भावेन्द्र मेरो कोठामा सुत्न आएको निहँमा घरमा महाभारतमच्चियो । भोलिपल्ट भाबेन्द्र अफिसतिर गएपछि सौतालगायत सासूससुरामिलेर मलाई मलाई घिच्चाई-मुन्टाई गरी घरबाट बाहिर निकाले । सौताले त घरबाट निस्किन मानिनस्‌ भने अहिल्यै पेटको बच्चा मारिदिन्छु भनी । त्यसपछित्यहाँबाट निस्केर फपूकोमा गएँ । फूपूले भोलिपल्ट यहाँ लेराइदिनुभयो । हजुरलाईदेखेपछि विस्तारै आफनौ पीडा भुल्दै गएँ । साँच्चै मैयाँसाप अहिले त मलाई तीक्षणहरू सबै सपनाजस्तो लाग्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले सोधिन्‌, &#039;भावेन्द्र तपाईंलाई फेरि कहिल्यै भेदत आएनन्‌ त ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मलाई छोडेको पाँच-छ वर्षपछि यहीँ मलाई भेट्न आएका थिए । उर्मिलामैयाँसापले जाने भए जाङ भन्दा हजुरले मेरौ फरियाँ समातैर रुँदै भनिस्यौ,“दिदी जाने भए म पनि सँगै जान्छु । म हजुरलाई समातैर घुँक्कघुँक्क गर्नपुगेछु, भाबेन्द्र कै भन्न खोज्दै थिए, अलमल्ल परे । त्यसपछि &#039;भाबेन्द्र केहीनबोली रुदै हिँडे । त्यसको केही दिनपछि नै काकाले एउटा चिठी र जग्गाकोलालपूर्जा मेरो हातमा थमाएर जानुभयो । यो क्रा आजै हजुरलाई मात्रखोल्दैछु । चिठी पनि अझै छ ल आफैंले पढिस्यो ।&#039; कान्छीले लाजपूर्जा र चिठीनै शालुलाई दिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालुले लालपूर्जा हेर्दै भनिन्‌, &#039;लालपूर्जा जस्तो कुरा पनि यसरी राख्ने हो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरो त सम्पूर्ण सम्पत्ति भनेकै हजुर हो । यो सम्पत्तिको कै काम ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीको कुराले शालुको मुटु नै फुट्लाझै भएको थियौ तर मन बाचेरलालपूर्जालाई जतनशाथ आफनै दराजमा राखेर आई चिठी पढ्नि । चिठीमालेखिएको थियो- प्यारी कान्छी सम्झना सधैँको ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी जिन्दगी यस मोडमा आउला भन्ने पत्तै थिएन । हेर त हत्तिँदै तिमीकहाँ पुग्यौ म कहाँ पुगेँ । तिमीलाई सबै खुसी दिन्छु भनेर बिबाह गरै तर आँसुसिवाय केही दिइनँ । तिम्रो सिमल भुवाजस्तै मन पलपल फाट्यो । मैले पनितिम्रो ती निर्बाध आँखालाई धेरै रुबाए । हुन त म त्यहाँ तिम्रो मायाले भनौं यास्वार्थले तिमीलाई लिन नै आएको थिएँ । मबाट बच्चा नहुने थाहा पाएकी भएतिमी पुनः मसँग आउँथ्यौ पनि होला तर शालुप्रतिको तिम्रो अगाध प्रेम देखेरमैले फेरि एकपल्ट तिम्रो खुसी खोस्न चाहिनँ । कुरा के भने कान्छी श्रीमतिलेपाएको बच्चा मैरो होइन । तिमीबाट बच्चा हुन्छ, त्यसैले तिमी विवाह गर ।तिमीलाई जिन्दगीभरि खान पुग्ने सम्पत्ति मैले तिम्रो नाममा जम्मा गरिदिएकोछु । पछिका लागि एउटा जीवनसाथी रोज । तिमीले अर्को बिवाह गन्यौ भने मपनि शान्तिले निदाउनेछु । अर्को जन्म भए भगवानले तिमीसँगै भेट गराऔस्‌ ।म तिम्रो काकाको सल्लाहअनुसार तिम्रै काकाको विधवा छोरी र छोरालाईलिएर हङ्कङ गएँ । बाबु-आमा, श्रीमती बिनुले आफनो कुकर्मको फल भौगून्‌ ।अरू के भनौं । मेरै खुसीका लागि भए पनि अन्तै बिवाह गरै । तिमीले विबाहगन्यौ भने मलाई शान्ति मिल्छ । तिम्रो जवानी निशास्सिँदै, छट्पटिँदै, कल्पिँदैनबितोस्‌ । म यहीँ चाहन्छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उही भाबेन्द्र&lt;br /&gt;
चिट्ठी पढिसकेपछि शालुले आफनो आँखालाई दुःख दिइन्‌ । एकोहोरो दिदीलाईहेरिन्‌ । उनलाई यस्तो लाग्यो, दिदीको शिरमाथि सिङ्गै सगरमाथा पो अडिएकोरहेछ । दिदीको भूल यही न हो उहाँले केवल मेरो खुसी चाहनुभयो । अब मैलेदिदीको खुसीका लागि केही गर्नैपर्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“मैयाँ यस्ता कुराहरू त घेरैको जीवनमा घटेको छ । पटक्कै पीर नगरिसेला ।हजुरको उमेर पुगेपछि त्यो जग्गा हजुरकै नाममा पास गरिदिने घोको छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले त्योभन्दा बढ्ता कुरा सुन्न सकिनन्‌ । जुरुक्क उठेर भान्सामागइन्‌ । कान्छी आफनो कोठामा गइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सात==&lt;br /&gt;
कान्छीको जीवनकथा सुनेपछि शालुको धेरै दिनसम्म भोकनिद्रा हरायो ।उत्ती स्कुलमा पनि एकोहोरिन थालिन्‌ । शालुका एकदम नै मिल्ने साथीरोहिणीले शालुलाई चिन्ताको कारण सोधिन्‌ । शालुले सबै कुरा एकएक गरीरोहिणीलाई बताइन्‌ । रोहिणीले मैरौ ममीपापालाई गएर सबै कुरा भनिस्‌ भनेसमस्या समाधान हन्छ भनी सम्झाइन्‌ । शालु रोहिणीको घरमा गएर रोहिणीकोबाबुआमालाई दिदीको सबै कथा सुनाइन्‌ । चन्द्रकान्त दाइले कान्छीलाई मायागरेका कुराहरू पनि बताइन्‌ । दुई छोरी मात्र भएका रोहिणीका बाबुआमालेकान्छी र चन्द्रकान्तजस्ता मान्छै पाए आफूले छोराबुहारीकै दर्जा दिने कुराबताएपछि शालुको हृदयमा बलिरहेको आगो केही मत्वर भयो । शालुलाईरोहिणीको बाबुआमा साक्षात्‌ भगवान्‌ जस्तै लाग्यो । शालु खुसी हुँदै घरआइन्‌ । दिदीलाई देखेपछि आँखा भरिएर आयौ । उनी आफनो कोठामा पस्दैथिइन्‌ । ममीले वौलाएपछि ममीकै कोठाभित्र पस्दै भनिन्‌, &#039;कित बोलाइस्याममी, खास कुरो केही थियो कि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“पोखरा जानका लागि पापाले पर्सिको टिकट बुक गर्छु भन्दै होइसिन्थ्यो ।नयाँ केही किन्नु छ भने पैसा लग भन्न बोलाएकी ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ मलाई पैसाचाहिँ दिसेला तर पोखराचाहिँ चार-छ दिनपछि जान्छु ।अहिले त क्लास टेस्ट चलिरहेको छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले औठ चेप्राउँदै भनिन्‌, &#039;आ तिमी पनि, क्लास टेस्ट लिँदा पनि किनरोक्कितुपर्छ र त्यो नम्बर पछि जोडिने होइन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(हेर भोलि क्लास टेस्ट भन्नु पति छ फेरि क्यारेम खेलौं पनि भनिसिन्छ । लअहिले थपक्क पढ्न बसिस्यो, क्लास टेस्ट सिद्धिएपछि हजुरले जे-जै भनिसिन्छत्यहीत्यही खेल्छु ।&#039; दिदीको कुरा सम्झेर भित्र कतै दुख्यो शालुलाई, शालुले मनमनै सोचिन्‌, &#039;ककरलाई घ्यू नपचैको भनेको यही हो । दिदी गएपछि यो घरमस्ानमा परिणत हुँदा बल्ल चाल पाउँछयौँ तिमी, तिमीले एक्का र बास्साभन्दै तास खेल्न पाएकी दिदीले गर्दा नै त हो नि! यत्रो घर र हामीलाई दिदीलेबडो इमानदारिताका साथ नसम्हालिदिएको भए तिमी स्वतन्त्र आकाशमाकावा खान पार्उीधनौ । सिङ्गै आकाशमा उड्न पाउँदा पनि तिमीलाई आकाशपनि साँगुरो भयो होइन ? दिदीको दोष त्यही हो उनीभित्र स्वार्थको एक कणपनि छैन । उनी अर्काको सन्तानलाई सही मार्ग देखाउन हरपल कटिवद्धछिन्‌ । तिमी आफनो सन्तानलाई आधुनिकताको नाममा नशामा झुलाउनकटिबढ छयौं । मेरो त सम्पूर्ण दिदी हुन्‌ दिदी, उनी नभएकी भए म जीवन केहो नबुझदै झर्दोरहेछु । मलाई जनको मूलत [त्य सिकाउने मेरी प्राणप्यारी दिदीलाईनिकाल्न कति हतार छ्यौ तिमी म छु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन थुप्रै बेर पोखराको सौन्दर्य सम्झेर त्यहीँ हरायौ कि क्या हो:मूर्तिजस्तै भयौ नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;ममी हजुरको खुसीका लागि म पोखरा जाउँला तर मेरो जाँच सिढिनदिस्यो । पोखरा मैले धेरैपल्ट हेरिसकेकी छु । प्रकृतिले का दिएर पनिहामीले त्यसको सदुपयौग गर्न जानेनौं । फेवातालको नजिकै सानै घर होस्‌ तरअति आकर्षक होस्‌, त्यो छैन । पाताले छांगाकै वरिपरि मनै लोभ्याउने फूलबारीहोस्‌ । बाराही मन्दिरमा पनि टलबकै टन्कनै सिङ्गमर्मर होस्‌ । विदेशले योप्राकृतिक छटा पाएको भए कस्तो बनाउँथ्यो होला । नेपालीले हीराको मूल्यलाईकीरा सम्झिरहेका छन्‌ । राम्री र नराम्रो छुट्याउने तागत हामीमा छैन ममी ।&lt;br /&gt;
उर्मिलाले हांस्दै भनिन्‌, &#039;तिमी त बडो तर्क दिन सक्ने पनि भइछौँ, मलाईत पत्तै थिएन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हजुरले मसँग कति समय नै विताइस्या छ र ममी, पापाले अस्ति मात्रभनेपछि पो थाहा पाएँ । मलाई त अठार दिनदेखि नै दिदीले सुताउनुभएको होरे । पापा भनिसिन्थ्यो- हजुर त धेरै सुध्यरी होइसिन्छ रे, एकपल्ट मैले हजुरकोकाखमा दिसा गर्दा टाउकोमै गोली लागेभँ गरी चिच्याइस्यो रे । मैले दिसागरेको साडी अब कहिल्चै लाउँदिनँ भनेर फमाँकिस्या रे होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“उफ ! तिम्रो पापा पनि यस्ता झिना-मसिना कुराहरू पनि के छोरीसँगगरिस्या होला । जाक कपडा फेर, त्यसो भए चार-छ दिनपछिकँ टिकट बुकगर्नुपर्ला हुन्न ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हजुरलाई जे मन लाग्छ त्यही गरिस्यो&#039; भन्दै शालु आफनो कोठामापसिन्‌ । ममीको कोठामा चन्द्रकान्तको आबाज सुनेपछि शालु ममीकै कोठातर्फलागिन्‌ । चन्द्रकान्त कार नबनेको कुरा बताउँदै थिए । शालु चन्द्रकान्तको कुरासुनेर दङ्ग परिन्‌ र भनिन्‌- &#039;दाइ मलाई फूलको प्रोजेबटवर्क ननाउनु छ ।बगैँचामा हिँड्नुस्‌ र मलाई फूलको नामहरू बताइदिनोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले भान्सावाटै कराइन्‌, &#039;मैयाँ, यिनलाई सवै फूलहरूको नाम आएपो, म हजुरको सहयोग गर्छु । यिनले खाना पकाउँछन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले हांस्दै भनिन्‌, &#039;दिदी पनिर-प॒कौडा त दाइलाई बनाउन आउँदैनहोला नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यसो भए हजुरले फूलहरू लेराइस्यो म फूलहरूको नाम वताइदिइहाल्छुनि!”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले कान्छीतिर हरेर दाह्रा किटै । शालु र चन्द्रकान्त दुवै बगैँचामागए । शालुले बस्न आग्रह गर्दै भनिन्‌, &#039;अझै दिदीसँग बोलेको देख्दिन॑ नि, तपाईत साँच्चै रिसाउनुभयो कि बया हो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बन्द्रकान्तले बस्दै भने, &#039;हो, मैयाँसाप, अब म यहाँ वस्दिनँ । कान्छीकोआश गर्दागर्दै दाहीजुँगा फुल्न आँटिसक्यो । तिनलाई देख्यो भने मुटु जल्छ माअब कति मुटु जलाउनु ? तिनी त पत्थर हुन्‌ शालु मैयाँसाप पत्थर, तिनलाईराम्रोसँग वाहा छ, म तिनकै मायाले रुन्छु । अब कति रुन्‌ मैयाँसाप, रुँदारुदाआँखाहरू थाकिसके ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले बडो नम्र स्वरमा भनिन्‌, “मप्रतिको अत्यधिक मायाले गर्दा दिदीलेकहीँकतै देख्नु नै भएको छैन । म दिदीको त्यो नाजुक हृदयलाई तोड्छु, तपाईंमलाई साथ दिनोस्‌ । दिदीले मेरा लागि देख्नुभएको जुन सपना छ म त्यो पनिपूरा गर्छु । मेरै आँखाअगाडि मेरो मुदुभन्दा पनि प्यारी दिदीको अपमान अबसहन सक्दिनँ । तपाईँले भनेभौँ मलाई पोखरा पठाउन यौजना बनिसकेकोरहेछ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन मैले त केही कुरै बुझिनँ नि मैयाँसाप ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले सबै करा बताइन्‌ । तपाईँ अहिले नै रोहिणीको घर हेरेर आउनोस्‌ ।दिदीलाई तपाईँ नै चाहिन्छ हो तपाईं । यी कुराहरू बिर्सेर पति दिदीलाईनबताउनु होला । दिदीको घुणा म जीवनभर सहन तयार छु तर अँहँमउहांको आँखामा आँसु हेर्न सबिदिनँ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले आँखाभरि आँसु पार्दै भने, &#039;हजुरले ठीक सोचिस्यो । तिनी तसिमल हुन्‌ आफू जाडो सहेर अरूलाई तातो दिनै । तिनलाई हामीले खुसीदिएनौं भने हामीले पनि आफूलाई माफ दिन सम्बैनौं । हुन्छ म अहिले नैरोहिणीको घर पुगेर आइहाल्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“ल अनि खोई त फूल लिएर आइसेको ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिदीको शब्दले शालुको मुटु घाँटीमै अद्दकेझै भयो । बडो कष्टसँग जवाफदिइन्‌, &#039;तपाईंले रातमा फूल टिप्न हुन्न भनेको सम्झेर नटिपी आएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ म भोलि बिहानै फूल टिपेर फूलको नाम पनि भनिदिन्छु । अस्तिकोझरे&lt;br /&gt;
जस्तो चार्टपेपरमा टाँस्ने त होला नि ! कहाँकहाँ टाँस्ने अहिले बताइदिस्यो, मअस्तिको जस्तै मिलाएर टांसिदिन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले आँसु लुकाउँदै भनिन्‌, &#039;ल हेर्नोस्‌ अब त म तपाइंजत्री भइसके ।अबदेखि मेरो पीर नगर्नोस्‌ । तपाईंले मलाई जस्तो बताउन चाहनुभएको थियोम त्यस्तै बन्छु । तपाईंको कसम, म बिग्रिन्न, साँच्चै बिग्रिन्त । तपाईँ जस्तोकर्म दिने दिदी पाएपछि पनि बिग्रन्छुर म?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;रैयाँसापलाई ठूलो-ठूलो कुरा गर्न आइसक्यो । ल तातोतातो पकौडा खाइस्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दिदीको शब्द सुनेर शालु रुँदै कोठामा पसिन्‌ र ओछ्यानमा पछारिँदैरोइन्‌ । कान्छी फत्‌पताइन्‌- होइन कै भएको होला मैयाँसापलाई आज, खानपनि खोजिस्या छैन । मुख पनि उज्यालो छैन । सानो हुँदा पो सबै कुराभनिसिन्थ्यो र बुझिन्थ्यो, ठूलो भएपछि केही भन्ने हैन । आफूले मनको कुराबुझन सकिँदैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले मन सम्हालेर दराज खौलखाल पारिन्‌ । कान्छीले पढ्दै पनिरपकौडा खाइड्टस्यो भनेर शालुको कोद्ामा छोडेर गइन्‌ । शालुले हतारहतार त्योपनिर पकौड्ालाई प्लास्टिकको &#039;फोलामा हालेर पोको पारेर दराजको मुनिराखिन्‌ । मुखले चाहिँ पकौडा मीठो रहेछ आजलाई पुग्यो भनिन्‌ । कान्छीलेआफूले पनिर पकौडा भौलिसम्मलाई हुनेगरी प॒काइदिएको कुरा बताइन्‌ ।चन्द्रकान्त आएर शालुको कोठामा पसे । दुवैले आँखाकै इसारामा करा गरे ।त्यसपछि साह्रै मीठो बास्ता आयो भन्दै चन्द्रकान्त भान्सामा पसै तर, कान्छीलेदिएको पकौडा खान सकेनन्‌ । आफूलाई टाउको दुखेको छ भनेर ढाटिदिए ।कान्छीले मुसुक्क कक हाँस्दै भनिन्‌, &#039;तिम्रो रिस त अझै मरेको छैन जस्तो छ । तिमीरिसाएको त मेले पहिलीपल्ट नै देखेँ । म तिमीसँग कहिल्यै रिसाउँदिनँ चन्द्रकान्त ?तिमीले मेरो पोल्टाभरि खुसी नै खुसी दिएका छौँ । आफनो बाबुकैँ बनेर शालुमैयाँसापको रक्षा गथ्यौ ।&#039; चन्द्रकान्तले चुपचाप कान्छीको कुराहरू सुनिरहैमात्र ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कोठाभित्रबाट चिच्याइन्‌, &#039;दिदी, म पकौडाले नै अघाएँ । तपाईंहरूमात्र खाना खानोस्‌ । आज म दिदीसंगै सुत्छु । मलाई राजकुमारको कथा सुन्नुछ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;भर्खरै भनिसिन्थ्यो दिदी म ठूली भएँ। भर्खरैभनिसिन्छ- राजकुमारको कथा सुन्ने ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्त म शालु मैयाँसापको बिवाह भएपछि बाँच्न सक्छु होला जस्तैलाग्दैन । चन्द्रकान्त कान्छीको क्रा सुन्न नसकी उडेर हिँडे ।&lt;br /&gt;
शानु पहिला नै कान्छीको पलङमा गएर सुतिरहेकी थिइन्‌ । कान्छी खानाखाइबरी हात पुच्दै कोठामा पस्दै भनिन्‌, &#039;शालु मैयाँसाप मैले भनिदिएकी छु ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोलिदेखि पढाइ छल्नका लागि अनेक बहाना चन्दैन । होइन किन घौप्टोपरिसेको ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले देब्रे कोल्टै फर्केर आँसु पुच्दै भनिन्‌, &#039;म त निदाउन पो लागिसेकीरहेछ दिदी ! चन्द्रकान्त दाई पनि बस्वोस्‌ ।&#039; चन्द्रकान्त पलङमुतिको मुढामाबसे । शालु र कान्छी पलङमा बसे । कान्छी बसेपछि शालुले कान्छीको काखलाईसिरानी वनाइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले शालुको कापल मुसार्दै भनिन, &#039;मैयाँ, दिदीको काखभन्दा पनिप्यारो अहिलेलाई पढाइ हो । मैले धेरै दिनदेखि हजुरले पढेको देखेकी छैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दिदी तपाइँलाई मेरो भविष्यको मात्र चिन्ता छ। त्यस्तै मलाई पनितपाईंको भविष्यको चिन्ता छ । दिदी, मैले पनि तपाईंका लागि चन्द्रकान्त दाइजस्तै राजकुमार खोजिदिएकी छु । त्यो राजकुमारले तपाईंलाई धेरैधेरै खुसीदिन्छन्‌ । तपाईँको आफनो स्बर्गजस्तै घर हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीले वीचैमा कुरा काददै भनिन्‌, &#039;ए, हजुरले मेरो अर्को जन्मको करागरिस्या ? हुन्छ, हुन्छ अर्को जन्ममा म चन्द्रकान्तसँगै विवाह गर्छु । अनि हजुरलाई छोरीको रूपमा जन्माउँछ । निस्फिक्री माया गर्छु । उर्मिला मेयाँसापहुँदा त हजुरसँग बोल्न डर लाग्छ भन्या । उर्मिला मैयाँसापले हजुरको कोरामागएको देख्यो कि बिरालोको जत्रो आँखा पल्टाइसिन्छ । उहाँले आफनो मर्यादानभुलेको भए मलाई यति चिन्ता हँदैन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीको हात मुसार्दै भनिन्‌, &#039;दिदी तपाईंले मन नदुखाउनुहोस्‌ ।मेरो चिन्ता गर्न चटक्क छौडिदिनोस्‌ । तपाईंले मैरा लागि जुन त्याग गर्नु भोत्यो कसै-कसैले गर्नै सक्दैन । दिदी तपाईंले जाडोमा न्यायो घाम दिनुभयो,गर्मीमा छहारी दिनुभयो, तपाईं भने सधैँ घाम-जाड्ो सहँदै आउनुभएको छ ।त्यो मैले देखेकै छु । अब म स्वयम्‌ चिसो र तातोबाट वच्न सक्छु । तपाईँलाईचिसो र तातोबाट बचाउनु मेरौ कर्तव्य हो । कुरा गर्दागर्दै बाहिर गेटमा बेललाग्यो, शालु हतार-हतार कान्छी र चन्द्रकान्तलाई एउटै कोठामा बन्द गरेर,तल रुँदै ओर्लिन्‌ र गेट खोल्दै भनिन्‌, &#039;ममी, पापा म यो घरमा वस्नै नसक्नेभएँ चन्द्रकान्त र दिदीको राम्रो सम्बन्ध छैन । आज त हजुरहरूलाई देखाउनमैल्ले चन्द्रकान्त र दिदीलाई एउटै ओछ्यानमा देखेपछि ढोकामा लक गरिदिएकीछु। छिटो माथि आइस्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
दीपक उर्मिला नै रक्सीको नशामा हल्लँदै सास न बास भएर कान्छीकोकोठानजिक आए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कोठाभित्रबाट आवाज आइरहेको थियो । मैयाँसाप किन ढोका थुनेको छिटोखोलिस्यो । उमिलाले ढोका खोल्दै चिच्याइन्‌, &#039; ए रण्डा, रण्डी हो तिमीहरूलेयो घरलाई कोठी नै बनायौँ होइन ! देखिस्यो हजुरले सती सावित्री ठानेकी कान्छीको हाल । मैलै भनेकै हुँ वैंसको उन्मादलाई थेग्त कसैले सक्दैन भनेर,दुबैले किन बिवाह गरेनन्‌ भनेको त कुरा यस्तो पो रहेछ । दूध खान पाउँदापाउँदैगाई पाल्नु किन ! शालुलाई माया गरेको स्वाङ रचेर बिनापैसा बस्नुको कारणत मस्ती लुद्त पो रहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले रुँदै जबाफ फर्काइन्‌, &#039;आफ्‌ मात्र बोलिसिन्छ कि मलाई पनिबोल्न दिइसिन्छ हँ : चुप लागिस्यो मुखमा जे आयो त्यही नबोलिस्यो । शालुञैयाँसापलाई थाहा छ हामी के गर्दै थियौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रुँदै भनिन्‌, “हो ममी यिनीहरूको विचार राम्रो छैन । कान्छी त झन्‌हजुरको विरुद्ध भड्काउँछिन्‌ । मैले के माया गरेजस्तो गरेकी थिएँ उनले तआफनै छोरी ठातिन्‌ । यसो गर, उसो गर भनेको सुन्दा म त पागलै हुनलागिसकेँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले घरै थर्कने गरी चिच्याइन्‌, &#039;नाइँ, शालु मैयाँसाप त्यसो नभनिस्योममर्छु।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले रुँदै भनित,- &#039;मोर अहिले मौर, कसले रोकेको छ र? न रहरलाएको लाउन दिन्छे, न खानै दिन्छे कुन जन्मको शत्रु रहिछे यो ।&#039;&lt;br /&gt;
उर्मिलाले कान्छीको कपाल भुत्ल्याउँदै भनिन्‌, &#039;धेरै तमासा नदेखा, खुरुक्कघरबाट निस्किहाल । नत्र अहिल्ै पुलिसलाई डाक्छ बुझ्यौ ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;कान्छी आफैँलाई भूत्ल्याउँदै चिच्याइन्‌, &#039;शालु मैयाँसाप तोलाको बचनखोलामा नहालिस्यो, म हजुर बिग्रेको हेन सक्दिनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले कान्छीको हात समात्दै भने, &#039;देख्वा सोझी रहिछिन्‌ मैयाँसापभित्र त कर्द रहिछन्‌ कर्द ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हो-हो म कर्द नै हुँ त्तिस्क, निस्किहाल पापी हो । मेरो जन्म दिने आमाभन्दाठुली कोही छैन बुझ्यौ ? जाओ, जाओ छिटो जाऔ । अझैँ रमिता देखाउँछौँ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले चन्द्रकान्त र कान्छीलाई नै नजिकैको कूचोले हान्दै भनिन्‌, &#039;छिटोतिस्कन्छौ कि पुलिस नै बौलाउँ हँ ?&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले कूचो समाउँदै भने, &#039;कान्छी तिमीले आफनो स्वार्थ हेरेकी भएआज पो दिन देख्न पर्दैनथ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
दीपकले कुरा थपे, &#039;अझ बढी बोल्छस्‌ चन्द्रै, यो सुँगुर्नीलाई छिटो यहाँबाटलगिहाल्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;शालु मैयाँसाप मेरो यहाबाट लास जाला म यहाँबाट जान्न । म हजुरलाईछोडन सक्दिनँ,&#039; कान्छीले भुइँमा बजारिँदै भनिन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीको मुखमा वुक्दै भनिन्‌, &#039;थुक्क नकचरी, पागल, कति अपमान&lt;br /&gt;
सहन सक्छेस्‌ त॑ : मौर तँ जस्ता मान्छै त मर्नु नै पर्छ । विष दिकँ याकौसीबाट फालहालेर मोर्छेस्‌ ) चन्द्रकान्त यसलाई बागमतीमा लगेरफयाँकिदैक । अनि यसले शान्ति पाउँछै ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले रण्डी, फुँडी, बेश्या भन्दै कान्छी र चन्द्रकान्तमाथि क्चो वर्षाइरहेकीथिइन्‌ भने दीपकले दुवैलाई लात्ती प्रहार गरिरहेका थिए । चन्द्रकान्तले कान्छीलाईघिच्याउँदै भन्याङ ओराले । कान्छीले घर नै थर्किनेगरी शालु मैयाँसाप भन्दैचिच्याइन्‌ । डेरामा वसेका र छिमेकीहरू झयाल-झयालबाट र ढोकाबाहिरैबाटत्यो बीभत्स दृश्य हेरिरहेका थिए । शालु आफनो कोठाको ढोका थुनेर मुर्दाझैँलम्पसार परिन्‌ । कानमा भनै कान्छीदिदीकै शालु शव्द नै गुञ्जिरह्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिला र दीपक नरभक्षी बाघकै सिकार गरेझैं गरी प्रफुल्ल हुँदै काठोमापसे । उमिंलाले भनिन्‌, &#039;देखिस्यौ हजुर बैंसको तिखा थाम्न त्यो मोरीले पनिसकेकी रहिनछ । हात्तीको खाने दाँत र देखाउने दाँत जस्तो तिनीहरूका पनिदुईवटा दाँत रहेछ, होइन ? आज त कति हाइसन्चो भयो क्चोले बढार्नुपर्नेफोहोर हावाले उडायो हा...हा । शालुले नै काम तमाम गरिदिइन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
दीपकले पलङमा पल्टिँदै लर्बराएको स्वरमा भने, &#039;उर्मी, वनले नचिनेकोबाघ होइन, वाघले नचिनेको वन होइन । शालुले पूर्ण सोचनिचार नगरीकान्छीलाई घरबाट निकालिन्‌ जस्तो मलाई लाग्दैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हजुर पनि चाहिनै-नचाहिन कुरा सोचिसिन्छ । कुकर्मले डाँडा काटेपछिकति सहन्छै शालुत्ते ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यो त हो, दीपकले उमिलाकै कुरामा साथ दिए । कान्छीको त्यो दर्दनाकदृश्य उनीहरूका लागि मनोरञ्जन बन्यो । दुबै राव्रिकीडामा लीन भए ।&lt;br /&gt;
रोहिणीको घरमा पुग्दासम्म कान्छीले पूर्ण रूपमा होस गुमाइसकँकी थिइन्‌ ।रोहिणीको बाबु केशवले फेमेली डा. राजलाई बोलाए । डा. राजको सक्दोप्रयासबाट कान्छीको होस त आयो तर उनले आफूलाई बिसिंसकेकी थिइन्‌ ।उनको ओठमा केबल शालुकै नाम थियौ । भन्थिन्‌ क... क शालु मैयाँत्यहीँबाट गइस्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हा... हा शालु मैयाँसापले त कपाल बाटिसेछ । पर्खिंस्यो म रिविनमिलाइदिन्छु । सधैँ दिदी हजुर नि खानोस्‌ भन्नु छ । म त खाइहाल्छु नि !, मेरीशालु मैयाँसाप त परी हो बुझ्यौ परी हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीको त्यो विजोग देखेर सबैको आँखाबाट आँसु झन्यो । डा. राजलेमानसिक विशेषज्ञ डा. दिनेशलाई बोलाए । डा. दिनेश पनि रातको चकमन्नतालाईतौड्दै कैशवको घरमा आइपुगे । सम्पूर्ण घटना सुनेपछि डा. दिनेशको पतिआँखा रसायो । जति खर्च लागे पनि घरमा नै कान्छीको उपचार गर्ने निर्णयभएपछि कान्छीलाई दिनेशले लठ्याउने सुई दिए । उनी जिउँदो मुर्दामा परिणत भइन्‌ । कान्छीको सम्पूर्ण स्याहारसुसार चन्द्रकान्तले गरे । डा. राज र डा.दिनेश कान्छीको उपचारमा कटिबद्ध भए । केशव र पीताम्बराले मानवीयसहयोग गरे । तहौं दिनको दिउँसो एक बजेतिर कान्छीले आँखा खौलेर चारैतिरहेरिन्‌ । आफूलाई सुन्दर चिटिक्क परेको कोठामा सँगै चन्द्रकान्त भित्तामाशालुको सुन्दर तस्बिर झुन्ड्याइरहेको देखेपछि अचम्म मान्दै सोधिन्‌, “चन्द्रकान्तयो सब के हो ? मेरो अर्को जन्म त भएको होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले खुसीको आँसु झार्दै भने, &#039;हो कान्छी तिम्रो अर्को जन्म नैभएको हो । तिमीले असाध्यै माया गर्ने बावु-आमा पाएकी छ्यौ । डा. राजरडा. दिनेश जस्तो डा. पायौ । सुरेश क्षेवरीजञस्तो बिरामी पर्दा सहयोग गर्ने दाइपायौ । सबै-सबै पायौ । तिमीले बस्‌ आफूलाई सम्हाल सबै ठीक हुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी बिस्तारै उठ्दै भनिन्‌, &#039;खोई बाबु-आमा ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले बोलाएपछि केशव र पीताम्बरा नै आए । कान्छीलाई उठेकोदेखेर हर्षित हुँदै भने, &#039;नानी अहिले उठेर जरक-मरक नगर ।&#039;&lt;br /&gt;
उनीहरूको कुरा सुनेर कान्छी टोलाइरहिन्‌ । चन्द्रकान्तले दुधमा हलिंक्सफिटेर कान्छीलाई दिँदै भने, &#039;हर्लिक्स खाएर सुत ।&#039; कान्छीले हर्लिक्स पिइन्‌ ।चन्द्रकान्तले औषधि खान दिएपछि फेरि कान्छी गहिरो निद्रामा परिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आाठ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले चौधौं दिनको मध्यरातमा पनि आँखा खोलिन्‌ । चारैतिर हेरिन्‌,आफनो पलङभन्दा पर चन्द्रकान्तलाई निदाइरहेको देखेर केही धक मान्दैभनिन्‌, &#039;चन्द्रकान्त... चन्द्रकान्त ।&#039;कान्छीको बोली सुनेर चन्द्रकान्त झसङ्ग हँदै उठेर मर्करी बाल्दै कान्छीकोनजिकै गएर भने, &#039;के भयो कान्छी, के भयो !&#039;कान्छी धेरैबेर मौन भएपछि भनिन, &#039;मैले थाहा पाएँ हिजो मैयाँले आफनोघरबाट निकालेपछि हामी यहाँ आयौं, मैले आँखा खोल्नेबित्तिकै त्यही मैयाँकोफोटोमा आँखा पन्यो, त्यो फोटो निकालिदेक । किन त्यो फोटो राखेकोचन्द्रकान्त ?&#039;चन्द्रकान्तले उत्तर दिए, &#039;तिमीले मैयाँ-मैयाँ भनेपछि त्यो फोटो राखिदिएको। तिमीले झिक भन्छ्यौ भने झिक्छु । तिम्रो मुख सुकेको छ भने पानीकै ?&#039;&amp;quot;अं पानी दैक म आफूलाई सम्हालिहाल्थें नि । तिमीलै पसरी एउटै कोठामा सुत्न नहुने थियो । चन्द्रकान्त तिमीले यो फोटो झिक्दिक । अव्र म पत्धरमापरिणत हुन्छु । मैलै यौ उमेरसम्म कोही मानवीय मूल्य भएको त मान्छे नै देखिनँ ।&#039;चन्द्रकान्तले शालुको फोटो निकालेर घोप्टो पारेर ठहस्याए ।कान्छीले रुन्चे स्वरमा भनिन्‌- &#039;होस्‌-होस्‌ फोटो झुन्ह्याइदेक, भोलि मआफैँ त्यो फोटोलाई झिकेर फयाकुँला । फोटोमा अलि धूलो लागैजस्तौ छसफा कपडाले पुछिदेक ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले चुपचाप सफा कपडाले फोटो फुछे । रातको समयमा औषधिदिने वेला भएकोले औषधि खुवाए । औषधि खुवाएको केही बेरपछि, कान्छी कुरागर्दागर्दै निदाइन्‌ । चन्द्रकान्त पनि मनमा कुरा खेलाउँदै निदाए । क्रमशः दिनबित्दै गयो । कान्छी विस्तार पानी सार्न, ट्वाइलेट जान सक्नै भइन्‌ । तर उनीसोच्चिन्‌- आफूमाथि बज्च परेको क्षण हिजो नै हो । एक्काइसौं दिनको दिनकान्छी उठिन्‌, आफैँ नुहाइधुवाई गरिन्‌ । बडो राम्रैसँग मिलाएर राखेको कपडाझिक्दै भनिन्‌, &#039;हिजो मैले मैयाँसापका लागि पकौडा राखिदिएकी थिएँ, देखिस्योकि देखिसेन होला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;कान्छी तिमीले उनको नाम नै नलेक । क बावु-आमा पनि आउनुभयो ।एकछिन बसेर कुरा गर । म औषधि सिद्धिएको छ लिएर आउँछु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्बरा र केशवले कोठाभिर पसेर सोफामा बस्दै भने, &#039;आफैँले आजनुहाएजस्तो छ नि हो : तिमीलाई यो रूपमा देख्दा साह्ै खुसी लाग्यौ ।तिमीलाई यस रूपमा देखेपछि पर्सि नै सत्यनारायणको पूजा लगाङँझै लाग्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ लगाउनुहोस्‌, हिजौ अलि धूलो-मैलोमा बजारिएकीले आज नुहाएकीहुँ। अघि यसौ बगैँचा र फूलबारी हेर्न मन लागेर गएकी थिएँ । व्यवस्थिततरिकाबाट केही लगाएकै छैन । दुबोमा पनि घाँसैघाँस उम्रिएको रहेछ । आँगनमापनि फोहोरैफौहोर छ । फोहोर देखैपछि त मैरो टाउको नै घुम्छ । न धुपीहरूकैकटिड गरेको छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्बराले करा चुहाइन्‌- अलिअलि त काम गरिन्थ्यो । तिमी बिरामीभएर आएपछि वगैँचाभन्दा पनि ध्यान तिमीमा गयौं । फेरि काम गर्न आउनेमान्छेलाई दस घर भ्याउनुपर्छ, के राम्रो काम गर्थे ? खैर आँगन, बगैँचाकोकुरा छोडौं अब तिम्रौ र चन्द्रकान्तको बारेमा कुरा गरौं ।&lt;br /&gt;
&#039;ए चन्द्रकान्त, उनी र म पहिला सँगै बस्थ्यौं । त्यहाँबाट निकालेपछिचन्द्रकान्तले यहाँ लिएर आएछन्‌ । विश्वास गर्नोस्‌, हाम्रो सम्बन्ध केही नराम्रोछैन, हिजै मात्र हो उनले मलाई छोएका । हिजो उनले नसम्हाको भएचाहिँ मबाँच्दैनथैँ हुँला ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्बराले कान्छीको हात समातेर भनिन्‌, &#039;लाटी, तिम्री यहाँ आएकी तठीक एक्काईस दिन भयो । एक्काईस दिनसम्म तिनै चन्द्रकान्तले तिमीलाई दिसा, पिसाव गराउने, दिसा धुने, नुहाइदिने, कपडा फेर्ने तिम्रो कपडा धुनेकाम गरे । उनले स्याहार नगरेको भए र डा. राज र डा. दिनेश र सुरेशचभएको भए तिमी यहाँ होइन अहिले सडकमा हुन्थ्यौ । त्यसैले हामीले तिमीहरूकोबिबाह गर्न सत्यनारायणको पूजा राख्न खोजेका हौं ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले विश्वास गरिनन्‌ र नजिकै रहेको क्यालेन्डरमा पल्टाएर हेरिन्‌,&amp;quot;उफ मङ्सिरको १२ गते पो रहेछ । उनी थचक्क बसिन्‌ । आँखाबाट आँसुझारिन्‌ मात्र ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पीताम्बराले सम्झाइन्‌, &#039;फौरि पनि पीर गयौँ भने तिमी विरामी हुन्छ्यौ ।पीर नगर । हाम्रो विवाह हुँदा उहाँ पच्चीस वर्षको र म बीस वर्षकी थिएँ ।विवाह चाँडै भए पनि बच्चाचाहिँ बयालीस वर्षमा भयौ, तिमीहरूको त उमेरैछ । कुनै पनि सुकार्य गर्न ढिलो गर्नुहुन्न । हामीले तिमीहरूको विवाहका लागिगहना, कपडा सबै तयार परिसक्यौं । तिमी होसमा आउने प्रतीक्षामा थियौं ।समाजमा विवाह नगरी एक्कै ठाउँमा सुतेका छन्‌ भन्नै किन पानु ः तिमीहरूकोचाँडै विवाह गरिदिन पाए आनन्दै हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीलाई घोर अचम्म लाग्यो । केही रिंगटा चलेजस्तो पनि भयो उनीसोफामै मो अड्याएर चिम्म आँखा चिम्लिइन्‌ । केशवले नम स्वरमा भने,“कान्छी, मैले चन्द्रकान्तजस्तो पुरुष त संसारमै देखेको छैन । तिमी बिरामीहुँदा उनले तीन दिन तीन रात आंखा भझिमिक्कै गरेनन्‌ । चौथो दिन कमजोरीलेहोला मूछां नै परे । डाक्टरसापहरूले के-के सुई दिएपछि सत्र-अठार मिनेटमाआँखा खोले । आँखा खोल्दा कान्छीले औषधि खाइन्‌ कि खाइनन्‌ भन्दै थिए ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले क्रा सुन्न अलि भझिँजो मानेजस्तो गरैपछि पीताम्बरा र कैशवउठेर गए । आँखा खोल्दा कान्छीको आँखा शालुको तस्बिरमा पत्यो । मनमनैसोचिन्‌ । मलाई मृत्युको मुखमा छोड्नेको के अनुहार हेर्नु ? साँच्चि चन्द्रकान्तलेमैरो घरजग्गाको लालपूर्जा देखेर त माया गरेको होइन ? शालुजस्ती त त्यस्तीभएर निस्केपछि चन्द्रकान्तको त के विश्वास : फेरि शालुकै फोटोमा आँखापरेपछि कान्छीलाई रिस उद््यौ । उनले शालुको फोटो झिकेर केहीबैर घोप्द्याएरभित्रै राखिन्‌, शान्ति भएन र वाहिर राखिन्‌ । अझै शालुले घरवाट निकालिदिँदाकोक्षण सम्झेपछि फोटो गेटबाहिर राखेर आइन्‌ । औषधि लिएर आउँदै गरेकोचन्द्रकान्तको आँखा फोटोमा पस्यो । फोटो भित्र लगेर पीताम्बरालाई जिम्मादिँदै आफनो कोदामा पसे । कान्छी टोलाएर सुतिरहेकी थिइन्‌ । चन्द्रकान्तआएको चाल पाउनेबित्तिकै उठेर बसिन्‌ । कान्छीलाई चन्द्रकान्तसँग कताकतालाज-लाज पति लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले औषधि र पाती दिँदै भने, &#039;ल अब औषधि खाएर सुत । अनारछोडाएको छ खाङ है भनेर गएको थिएँ, यत्तिकै छ । म पनि उस्तै खान दिएरजानुपर्ने रहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले औषधि निल्दै भनिन्‌, &#039;चन्द्रकान्त जग्गाको लालपूर्जा कहाँ राख्यौ ?चिदठी पनि सँगै थियो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;होइन तिमी फेरि बेसुरको करा गर्न लाग्यौ । कस्तो लालपूर्जा, केकोलालपूर्जा, कसको चिट्ठी मलाई केही थाहा छैन । ल सृतिहाल पछि कुरागरौली ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले मनमनै भनिन्‌- &#039;ओ ! मैयाँलाई त्यही जग्गामा आँखा लागेछ क्यार,मैले त उनकै नाममा गरिदिन्छु भनेकी थिएँ । पहिल्यै निकालिन्‌ । लिकन्‌तिनलाई दाइजो नै भयो । चन्द्रकान्तको प्रेम त निस्वार्थ पो रहेछ । उनी सुन्दर रमायालु छन्‌, उनले त कुमारी केटी नै पनि पाउन सक्थे । उनी मलाई प्रेम गर्छन्‌भन्ने थाहा थियो तर यतिबिध्न माया गर्छन्‌ भन्नै थाहा थिएन । सोच्दासोच्दैकान्छीको आँखा लष्टिन थाल्यो । उनी केही बेरमा निदाइन्‌ पनि ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोलिपल्ट बिहानै कान्छीले आँगन बढारिरहेको देखेर केशवले नजिकै आएरभने, &#039;नानी ! आँगन नबढार, तिमीलाई अहिले त्यति ठीक भएकै छैन । वरुआमासँग गएर केही कुरा गर । उनलाई साथी हुन्छ । मचाहिँ यस्सो घुमेरआउँछु ।&#039; कान्छी पूरै आंगन बढारेर पीताम्बरासामु पुगिन्‌ । पीताम्बराले बढोराम्रो पाराले सम्झाएपछि कान्छीले चन्द्रकान्तसँग बिवाह गर्नै कुरा नकार्नसकिनन्‌ । भौलिपल्ट नै कान्छी र चन्द्रकान्तको सत्यनारायणको पूजा लगाएरत्यहीँ सिन्दूर राख्ने काम पनि गरियो । विवाहमा कान्छीको काकालगायत अरूकेही आफन्त पनि जम्मा भए । सबैले कान्छी र चन्द्रकान्तको बैवाहिक जीवनसुखद्‌ होस्‌ भती शुभकामना दिए । बेलुका चन्द्रकान्त र कान्छीको सुत्नेओछ्यानमा फूल छरिएको थियौ । दुवै विगत भुलेर बर्तमानमा रमाइरहे ।चन्द्रकान्तको मायालु आलिङ्गतमा कान्छीले संसार बिर्सिन्‌ । त्यस्तै कान्छीकोमायालु आलिङ्गनमा चन्द्रकान्तले .... ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विवाहको भोलिपल्ट कान्छी र चन्द्रकान्तको शिर लाजले झुक्यो । त्यसमाथिचाँडै घोत्ले छोरो पाउनू भनी पीताम्बराले कान्छीलाई, केशवले चन्द्रकान्तलाईजिस्क्याउन बाँकी राखेनन्‌ । बिस्तारै कान्छीको आँखाबाट शालु दिनप्रतिदिनझर्दै गइन्‌ । कान्छीको आँखामा शालुको त्यो क्रूर दृश्य ताचिरहन्ध्यो । त्यसमाथिचन्द्रकान्त शालुको नराम्रो पक्षको मात्र कुरा गरिदिन्थे । कान्छीले मानसिकरोगको औषधि खाए पनि पूर्ण रूपमा आफूलाई सम्हालेकी थिइन्‌ । पीताम्बरालाईखाना पकाउन सघाउनदेखि लिएर सबै काम गर्थिन्‌ । चन्द्रकान्त कैशवकोघरकै भाडाको ट्याक्सी चलाउँथे । एकदिन केशबले कान्छीतिर लालपुर्जाबढाउँदै भने, &#039;कान्छी म पनि कस्तो ह्स्सु ॥ तिम्रो यो कागज एउटा नानीलेदिनु है भनेर छोडेर गएको पहिल्यै हो, दिनै बिसँछु । धेरै वर्ष भएछ, जग्गाकोतिरो नतिरेको, चन्द्रकान्तलाई तिर्न पठाउनू ।&#039; कान्छी लालपूर्जा देखेर मौनभइन्‌ । ए लालपूर्जा त लैराइदिछे त्यसले, रामै भयो दुःख हुँदा काम लाग्ला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लालपूर्जाको बारेमा केशवले चन्द्रकान्तसँग शालुले भनेका क्राहरू जस्ताकोतस्तै भनेपछि चन्द्रकान्तले तुरुक्क आँसु खसाते । लालपूर्जा पाएको दिनचन्द्रकान्तको मुड ठीक नभए पनि कान्छी भने साह्रै प्रशन्न थिइन्‌ । सुत्नैसमयमा चन्द्रकान्तको छातीमा टाउको राखेर कान्छीले भनिन्‌, &#039;चन्द्रकान्त,आज दुईवटा खुसी एकँचोटि मिल्यो । जग्गाको लालपूर्जा अनि मेरो पेटमा पनिबच्चा छ रे, म र आमा जचाउन गएका थियौं ।&#039; चन्द्रकान्तले खुसी हँदै भने,“कान्छी हामीले स्वर्ग नै पायौं हगि : अस्ति भर्खर गाउँबाट ठूलो छोरा पनिआयो । आज तिमी यौ खुसीको करा सुचाउँदै छयौ । बाबुआमा पनि पायौं ।रोहिणी र रोष्मा मैयाँसाप पनि पायौं । हामी त कति भाग्यमानी । न हामीसंगपैसाक्को कमी छ । यौ पेटको बच्चाचाहिँ छोरी होस्‌ । त्यो पनि शालुमैयाँजस्ती ।&#039;कान्छी चिच्याइन्‌, &#039;चन्द्रकान्त, त्यस पापिनीको नाम लिएर मलाई फेरि पागलगाराउन चाहन्छौ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले कान्छीको कपाल मायालु पारले मुसार्दै भने, &#039;कान्छी तिमीलेआफूलाई कठोर बनाएको पटक्कै सुहाउँदैन । कुरा अर्कै छ । शालु मैयाँलेकसम खुवाएकोले आजसम्म चुप थिएँ । अब छातीमा कति पत्थर राखेरबाँचौं ? तिमीले हरपल शालु मैयाँको घुणा गरेको कति सहुँ ? हेर शालुमैयाँसापले तिमीलाई खुसी दिनका लागि सबै नाटक गरिस्या हो। हामी तउहाँले बनाएको नाटकमा सहभागी भएका हौँ । तर, हामी सबैको प्रेम बनाबटीहोइन । शालु मैयाँको तिमीप्रतिको घृणा मात्र बनावटी हो । लालपुर्जा दिँदाभनिस्याथियो रै दिदीलाई तब मात्र लालपूर्जा दिनु जब दिदीले चन्द्रकान्तदाइको वास्तविक प्रेम बुझनुहुन्छ । चन्द्रकान्त दाइलाई लालपूर्जाको बारेमा आपनि नगर्नुहोस्‌ । लाटी, बुबाले लालपूर्जा जस्तो कुरा पनि बिसंनुहुन्छ त ?उहाँले शालुकै कुरा मान्नुभएको हो । मैयाँसापले नै यहाँ बस्नै बन्दोबस्तमिलाउनुभएको हो । हामीले शालु मैयाँसापलाई तिमी बिरामी भएको क्राढाँट्दा पनि उहाँ दुईपल्ट स्कुलमा मूर्छा परिसक्नुभयो रे । हाम्रो विवाह भयोभनेपछिचाहिँ साह्टै खुसी हुनुहुन्छ रे । रोहिणी मैयाँसाप र शालु मैयाँसाप साथी-साथी हनुहुन्छ । साँचो करा यही हो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तको कुरा सुनेपछि कान्छी धेरैबेर रोइन्‌ । उनको मनमा शालुलेभनेका शब्दहरू एकपछि अर्को गर्दै औहोर-दौहोर गरिरहे । “तपाईँलाईचन्द्रकान्तजस्तै राजकुमार खोजिदिन्छु । दिदी म ठूली भइसके, स तपाईंलेदेखाएको बाटोमा हिँड्छ । आज भोक लागेको छैन, तपाईंहरू मात्र खानाखानोस्‌, तपाईंक्रो पनि स्वर्गजस्तो घर हुन्छ आदिआदि ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकान्तले कान्छीको आँखाबाट बगिरहेको आँस्‌ पुछ्दै भने, &#039;नरोक कान्छी,नरौक । शालु मैयाँसापले भनिस्याध्यो, &#039;दाइ मेरी दिदीको आँखाबाट एकथोपाआँसु नखसौस्‌ । मेरी दिदीलाई सधैँ डालीमा लटरम्म फुलेको फूलझौँ देख्नपाङी । दिदी खुसी हुँदा म स्वयम्‌ खुसी हुन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले चन्द्रकान्तको औठ वन्द गर्दै भनिन्‌, &#039;अब यसभन्दा वढी नभन ।चन्द्रकान्त मैले आफूलाई चिने । हामी दुईमा त आकाश-पातालको अन्तररहेछ । म त पापिनी हुँ । त्यसैले आफनैअगाडि भएको हीरालाई चिन्न सकिनँ ।शालु मैयाँसापले मलाई सम्पूर्ण खुसी दिस्यो । मैले उहाँलाई केबल घुणा गरेबुझौं घुणा ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;आफूलाई सम्हाल कान्छी सम्हाल । तुलना गर्दा दुवैको त्याग बराबरी छ ।तिमीहरू दुवैले कनै पल आफनो स्वार्थ हेरेका छैनौ । तिमीहरू बनेको नै एक-अर्काका लागि हौ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;चन्द्रकान्त शालु मैयांसापलाई भोलि नै डाकिदेक । नत्र म मर्छु म बाँच्नसक्दिनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चन्द्रकात्तले आश्वासन दिए, &#039;पीर नगर म भोलि नै शालु मैयाँसापलाईयहाँ बोलाइदिन्छु । हामी सबैको चाहना नै यही त हो नि । तिमी र मैयाँसापकोओठमा पुनः पहिलाको जस्तै खुसी आओस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छी केही बोल्न सकिनन्‌ । आँखामा भने शालुको तस्बिर नाचिरहयो ।रातको थुप्रै पल बितेपछि मात्र कान्छी निदाइन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भोलिपल्ट बिहानको छ पनि नवज्दै शालु आएर रुँदै ओछ्यानमा पल्टिरहेकोकान्छीको आँखा छोपिन्‌ । शालुको हातमा कान्छीको तातो आँसु लागेपछिशालुको आँखा पनि रसाए । कान्छी हात झिक्दै जुरुक्क उठेर शालुतिर फर्किन्‌ ।दुबै एक-अर्काको अङ्गालोमा बाँधिएर थुप्रैवेर रोए । चन्द्रकान्त उनीहरू रोएकोदृश्य हेरेर बसिरहे । धैरैवेरपछि शालुले अङ्गालोवाट छुट्टिएर कान्छीको आँखाकोआँसु पुछ्दै भनिन्‌, &#039;दिदी, पेटमा बच्चा हुँदा रुन हुँदैन रे । दाइले मलाई बिहानलिन जाँदा सबै कुरा वताइसक्नुभएको छ । दिदी, मैले जुन सपना देखेकीथिएँ । त्यो सबै साकार भयो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीको रुवाइ अझैँ थामिएको थिएन । घुँक्कघुँक्क रुँदै भनिन्‌, &#039;मैलेहजुरलाई कति नराम्रो सोचेँ, मलाई माफ गर्नुहोस्‌ । म त हजुरको अगाडि केहीपति होइन रहेछु । म त पापिनी रहेछु मैयाँसाप पापिनी ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीको मख छोपिदिँदै भनिन्‌, &#039;तपाईंले आफूलाई पापिनी ठान्नुभयोभने यो संसारमा को घर्मात्मा होला ! मैले त तपाईंलाई घरबाट निकाल्नसानो नाटक मात्र गरेकी हुँ । तपाईंले मेरा लागि सिङ्गो जीवन नै बलिदानगर्नुभयो । ममीको त्यो तिरस्कार हाँसोमा उडाइदिनुहुन्थ्यो । केवल मैरो खुसीकालागि आफूलाई पलपल मा्नुहुन्थ्यो । यहाँसम्म कि आफूलाई नै भुल्नुभयो ।दिदी, ममी तपाईंलाई निकाल्न धेरै आतुर हुनुहुन्थ्यो । मैले नै तपाईंलाईनिकालेपछि उहाँ स्वर्ग पाएजस्तै खुसी पत्ति हुनुभयो । त्यति मात्र होइन,भोलिपल्टै होटलमा भोज पनि दिनुभयो । तपाईँलाई वेश्या सावित गर्नुभयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छरछिमेकले पनि तपाईंलाई राम्रै वेश्यामा परिणत गरै । म सवैको कुरा सुन्नबाध्य भएँ । अहिले तीन-चार महिनामा तीन-चारवटा काम गर्नै फेर्दा पनिममीको चित बुझेको छैन । फूलवारी र करेसाबारीमा केवल घाँसैघाँस उम्रिएकोछ । घर लथालिङ्ग छ । काम गर्नेहरू दिनभरि टी.भी. हेर्दै बस्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;हजुरलाई बेलामा खान दिन्छन्‌ होइन ?&#039; कान्छीले सोधिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले हाँस्दै उत्तर दिइन्‌, &#039;मेरो त पीर नै नगर्नुहोस्‌ । म उनीहरूले नदिएआफैँ बनाएर खाइहाल्छु ति ! साँच्चि गाउँबाट आएको छोरो कत्तिको ज्ञानीछ्न्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कान्छीले प्रशन्न स्वरमा भनिन्‌, &#039;मैयाँ बाती-व्यबहार ठ्याक्कै चन्द्रकान्तकोजस्तो छ । मैले त कल्पनासम्म पनि गरेकी थिइनँ । उनी त्यति मायालु होलान्‌भन्ने, तर साह्रै असल छन्‌ । आमा भनेको छ, वरिपरि लुटुपुदु गरेको छ, मलाईपेटमा बच्चा आओस्‌ भन्नेसम्म पनि रहर थिएन । हजुरको मायामाझौँ वीरुकोमायामा डुबिसकेकी छु । बाबु-आमा रोहिणी मैयाँसाप, रेष्मा मैयाँसापले पनिहामीलाई आफनै परिवारझौँ ठानिसिन्छ । अस्ति त आमाले भण्डारको चावी नैमेरो हातमा थमाउनुभयो । मलाई आफनो कर्तव्य पूरा गर्न नसकीँला कि भन्नेपो पीर लागेको छ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले दङ्ग पर्दै भनिन्‌, &#039;रोहिणी पनि भन्दै थिइन्‌, बाबु-आमा तपाईं रदाइ भनेपछि हुरुक्कै गर्नुहुन्छ रे । तपाईंहरूलाई चिनेरै उहाँहरूले सांचोसुम्पनुभयो । त्यही त हो &#039;जान्नेलाई श्रीखण्ड नजान्नेलाई खुर्पाको बिंड&#039; भनेको ।ममीहरूले तपाईँको मूल्य बुझनुभएन । रोहिणीको बाबु-आमा बडो पारखीहुनाले तपाईंलाई चिन्न बैर लगाउनुभएन ।&#039; परिणाम ममीपापाले सम्पूर्णगुमाउनुभयो । रोहिणीको ममीपापाले सम्पूर्ण पाउनुभयो । दिदी त्यो पनौतिकोघरजग्गा बैचैर यतै नजिकै जग्गा किनेर राखिदिनु होला, यहाँ भए आजकोभौलि नै जग्गाको भाउ बढ्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हजुरले ठीक भनिस्यौ । अब घर सल्लाह गरेर त्यसै गरौंला, मैयाँसाप,भवेन्द्र पनि मैरौ विवाह भयो भन्नै सुनेर साह्रै खुसी छन्‌ रे । काका त्यही खबरलिएर आउनुभएको थियो । हजुरले पति आफनो ख्याल राखिसेला । दुब्लाएरआँखा पनि गडेछन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीको हात मुसार्बै भनिन्‌, &#039;हुन्छ म आफनो ख्याल राखतपाइँले पनि आफनो ख्याल राख्नुहोला । कान्छी आँखाभरि आँसु पारेररहिन्‌ । शालु सबैलाई भेटी खुसी हुँदै घर फर्किन्‌ । कान्छीको सुखी जीवनदेख्दा शालुलाई सिङ्कौ बसन्त पाएझौँ लाग्यो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==नौ==&lt;br /&gt;
शालु कान्छीलाई भेटेर आएपछि यतिविध्त खुसी थिइन्‌ । आफ्नो खुसी पोख्नउनले घर नै थर्कने गरी क्यासेट खोलिन्‌ । त्यही म्यासेटको तालमा नाचिन्‌ ।क्यासेटको गीतमा स्वर मिलाएर गीत गाइन्‌ । शालुको त्यो क्रियाकलाप देखेरटाउको दुखेर सूतिरहेका दीपकले उर्मिलातिर फर्कदै भने, हेर उर्मी आज म योकेसुन्दैछु हामीले क्यासेट सुन्दा सानो पारेर बजाए हुन्छ भन्ने मान्छेले आज आफै....&#039;&lt;br /&gt;
सधैँ आदशं ओकेल्नै मैयाँसापलाई पनि अब वैंसले कृत्कृत्याएजस्तो छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपकले कुरा थपे, &#039;उर्मी मैले भन्दै थिएँ । शालु सिम्पल भइन्‌ भनेर पीरनगर । बैँस आएपछि उनमा आफसेआफ परिवर्तन आउँछ । पख न अबबिस्तारै उनी तिम्रो इच्छाभन्दा पति माथि उदछिन्‌ । अनि हाम्री छोरीलाई छुनकसले सक्नै ? तर आज भने मलाई यो धुन अलि बढी नै भयो । धुन अलि कमगर्न लगाइदै ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले दीपकको गालामा म्वाइँ खाँदै भनिन्‌, &#039;प्लिज डार्लिङ चुप लागिस्यो ।छोरीको यो रूप देख्दा म ज्यादै खुसी छु । म मात्र के हजुर पनि त खुसी होइसिन्छति, हैन भन्िस्यौ त ? उफ ! आज हजुरलाई टाउको दुखेकोले फिरोजको डान्समिस भयो । आज कस्ता-कस्ता तरुनी लिएर आउँथ्यो कुन्नि ! होइन त्यसलेत्यत्रा युवतीहरू कहाँ पाउँदो होला ? मलाई त अचम्मै लाग्छ भन्या । मोरोआफू पनि कारिगरले कुँदेको ढुङ्गाको मूर्ति जस्तै छ । गंगा र रमण त त्यतिराम्रा होइनन्‌ त्यो कसरी पूर्ण चन्द्रफै जन्म्यो कुन्नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो उर्मी, तिमीले ठीक भन्यौ । बाबु-आमा त खासै राम्रा होइनन्‌ । क भनेअलगौ रहेछ । सबै भन्थे दार्जिलिङ पढ्न वस्दासम्म साह्रै असल थियो रे ।बाबु-आमाले चार-छपल्ट के पार्टीमा ल्याएका थिए । त्यसपछि उसले शिखरचढिहाल्यो । बानु-आमालाई नै माथ गर्ने गरी पिउँछ बा !&lt;br /&gt;
रमण भन्दै थिए, &#039;फिरोज स्टुडेन्ट भिस्सामा अमेरिका जाँदैछ । फेरि किनअमैरिका गएन छ कुन्नि ? आजकाल किन गंगा रमण पनि देखिँदैनन्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपालमा अरू कुरामा विकसित हुनु त्यत्तिकै हो । छाडापन भने राम्ररीसप्रेको छँदैछ । घन्टा-घन्टामै केटीहरू फेर्न पाएपछि किन जाओस्‌ अमेरिकासमेरिका । संचिवनी उमा भन्दै थिडन्‌- &#039;गंगा र रमणको त हाड र छाला मात्रैछ रे । पहिला मेरोजस्तो छोरो संसारमा नै छैन भनेर नाक फुलाउँथे । अहिलेछँडौलीहरूको पछि लागेर घरमा बास नै हुँदैन रे । वाबु-आमासँग मुखमुखैलागेर भन्छ रे तिमीहरूले जुन बाटो देखायौ त्यतै हिँडे के बिराम गरे हँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपकले लामो श्वास फेदै भने, &#039;त्यसो भए तिमीलाई लाग्दैन ? जे छिन्‌हाम्री शालु ठीक छिन्‌ भनेर ।&#039;&lt;br /&gt;
हो ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उमिंलाले टाउकोमा हात राख्दै भनिन्‌, &#039;फिरोजजस्तो पो हुनुभएन तसमयअनुसारको त हुनैपन्यो नि । हाम्री शालु त सत्ययुगकी सीताजस्ती छै ।उसलाई यो युगमा कसले गन्छ शालुको पापा : देखिसेन, सुब्वा-सुव्विनीकोजोडीलाई, चट्ट वाइन समाई दुई पेग मात्र खाई । सबैसंग हात मिलाएर हिँडी,सबैले उसलाई राम्रै माने । हाम्री शालुचाहिँ डा. पुष्कर भट्टको श्रीमतीभन्दाकम हुन्न । न लाउनको सोख न खानको ।&#039;&lt;br /&gt;
दीपकले थुक घुटुक्क निल्दै भने, &#039;हो उमी त्यो सुब्विनीको हात पिउरीजस्तैनरम थियो । अहिले सम्झँदा पनि जीड नै सिरिङ्ग हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;उमिंलाले अलि ठुस्कँदै भनिन्‌, &#039;भर्खर विवाह गरेर ल्याउँदा म पनि तिनीभन्दाकम थिइनँ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाको कुरा सुनेर दीपक ठूलो स्वरमा हाँसे । अनि सोचिरहे- &#039;साथीकोविवाहमा जन्त जाँदा रूप राम्रो देखेर विवाह गर्छु भनिहालें । विवाह गरेरल्याएको राति फुटेका हात खुट्टाले शरीरमा कोरेको अझैँ बिर्सिएका थिएनन्‌उनले । मनमनै भने, &#039;मैले विवाह गरेर नल्याएको भए कहाँ दाउराघाँसगरिरहेकी हुन्थिन्‌ यतिखेर । धादिङबाट बिबाह गरेर ल्याउँदा बोल्नसम्म ढङ्गथिएन । स्पष्ट बोल्न नजानेर कत्रो हत्य । चम्चा उचाल्नसमेत आउँदैनथ्यो ।तिमीलाई मान्तैपर्नै कुराचाहिँ तिमीले आफूलाई चाँडै नै सहरीया साँचोमाढाल्यौ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;होइन के सोचिस्या ? म सुब्विनी जस्तो थिइन त ?&#039; चेप्रिँदै बोलिन्‌उर्मिला ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
थियौ बाबा थियौ । तिम्रो रूपले मोहनी लगाएरै त हो नि त्यो डाँडाबाटयहाँसम्म ल्याएको । तिमीलाई आफनो चालढालमा ढाल्न गाह्रो हुन्छ भन्नेलागेको थियो, तिमी त उपियाँ उफ्रेझै मभन्दा पहिला उफ्रियौ । अहिले तिमीलाईकसले भन्छ घादिङकी भनेर ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उर्मिलाले मख्ख हँदै कुरा थपिन्‌, &#039;अब हाम्रो गुप्र नै नृत्य सिक्न जाने भएकाछ। जीउ पनि बन्ने कला पनि सिकिने ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दीपकले भने, &#039;अबचाहिँ योभन्दा माथि नगए राम्रो । जे पनि पच्ने गरीखाएको राम्रो हुन्छ । तिम्रो गुप अलि माथि नै गइसक्यो, अब कति माथि जानेमन छहँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;सबैले नाच सिक्ने. भनेपछि म मात्र कौवाको बथानमा बकुल्लौ हुनु भएन ।हजुर हल्का भुजा, दाल तरकारी खाइस्यो । म भने मासुसँग अलिकति सुइँक्याउँछु ।हेरिस्यो नखाई त निद्रा नै पर्दैन । शालु पनि नाच्दानाच्दा थाकेर सुतिन्‌जस्तो छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नभन्दै शालु थाकेर ओछ्यानमा पल्टेकी थिइन्‌ । यता शालु उता कान्छीकोमन नै खुसीले नाचिरहेको थियो । कान्छीले शालुको तस्बिरलाई पहिलाकै किलामा &#039;झुन्ड्रयाइन्‌ । शालुसँगको भेट हुँदाको खुसीले गर्दा कान्छीलाई खानपनि मन लागेन । राति चन्द्रकान्तको छातीमा सृतेर आँसु वगाइरहिन्‌ ।चन्द्रकान्तले कान्छीको मनको करा बुझेर कान्छीलाई दुई वर्षको बालकलाईझैमाया गरेर सुमसुम्याइरहे । कान्छी रुँदारुँदै निदाइन्‌ । चन्द्रकान्तले वडो मायालुपाराले कान्छीको टाउको तकियामा राखेर आफू पनि सुते ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुजन कोठामा पसेपछि शालुको एकाग्र भङ्ग भयौ । सुजनलै दिक्क मान्दैभने, &#039;हेरन शालु आज पापालाई टाउको दुखेर पार्टीमा जान पाइनँ । हिजो त्योफिरोज भन्नेले डान्स गरेको अझै आँखामा झल्झली आइरहेको छ । सेमतिम्रोजस्तै डान्स गर्दोरहेछ । त्यो प्रकाशेलाई त अहिले कसैले वास्ता नैगर्दोरहेनछन्‌ । हेर शालु, फिरोजलाई देखेपछि युवतीहरू त हाम फालेरआउँदारहेछन्‌ । म पनि ठूलो भएपछि फिरोज जस्तै बन्छु । डान्सचाहिँ तिमीलेसिकाइदिनुपर्छ नि !&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शालुले सुजनको हात समातेर मुसार्दै भनिन्‌, &#039;डान्सचाहिँ म सिकाइदिउँलातर फिरोजजस्तै बन्छुचाहिँ नभन. फिरोज भनेको बेलुनमा हाबा भरेको जस्तैहौ । केही समयपछि आपसैआफ फुट्छ त्यो । जीवन नबुझनेहरूमा गनिन्छत्यो । त्यसको चर्चा ममीको मुखबाट पनि धेरैपल्ट सुनेकी हुँ मैले । ममीहरूजस्ताको मात्र पारखी हो त्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;दिदी तिमी त आफूलाई निक्कै ठूली भएँ भन्नै ठान्छयौ कि क्या हो ? मान्छेकति-कति पढ्दा त ठूलो हँदैनन्‌ तिमीले त बल्ल एस्‌ एल्‌ सी. दिएकी छ्यौ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“कान्छु मैले सानोमा नै दिदीबाट घेरै कुरा सिक्ने मौका पाएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तिमीले नै दाइ र दिदीको नराम्रो विचार रहेछ भनेर निकालिदिएको होइनर ? फेरि कसरी उनीहरू राम्रा भए ?&#039;&lt;br /&gt;
शालुले तुरुक्क आँसु झार्दै भनिन्‌, &#039;तिमी अहिले सानै छौ कुरा बुझदैनौ ।डान्स म सिकाइदिउँला । मान्छेले सबै क्रा जान्नुपर्छ तर सबैभन्दा ठूलोचाहिँपढाइ नै हौ । कहिलेदैखि पढाइ सुरु हुन्छ तिम्रो ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुजनले हाई गर्दै भने, &#039;पसिंदेखि हुन्छ । दिदी हुँदा कहिले घरको खानाखाक जस्तै हुन्थ्यो । अहिले जतिपल्ट घर आउँछ उतिपल्ट काम गर्नेहरूफेरिएका हुन्छन्‌ । होस्टेलको भन्दा पनि खाना मीठो हुँदैन । अहिले पनि मैलेभुजा खानै सकिनँ । तिमीले खायौ ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;आज मलाई खान मन नलागेर त्यसै सुतेकी थिएँ । भोलि बिहान म खानापकाउँला, दिद्दीले जस्तो पकाउन त सक्दिनँ, तीर्थले भन्दाचाहिँ मीठो नैपकाउँछु ।&#039; हुन्छ भन्दै सुजन आफूनौ कोठातिर लागै । शालु दिदीको सम्झनामाआँसु झार्दै सुतिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==दस==&lt;br /&gt;
क्याम्पस आएको पहिलो दिनदेखि नै आफनौ हाउभाउ र सुन्दरतालेकक्षाकोठाको मर्यादालाई नै हलचल पारेकी थिइन्‌ मौसमीले । केही बनौँलाभनेर विज्ञान विषय लिएर पढेका युवाहरूको ध्यान पढाइमा भन्दा मौसमीकोरूपमा केन्द्रित थियो । शालुलाई मौसमीको चालढाल देखेर अत्यन्त रिसउद्यो । केही दिन त शालु मौन नै रहिन्‌ । जब कक्षामै मर्यादाभन्दा बाहिरगएर हात हालाहाल गरी चलेको देखेपछि शालुले मौसमीलाई एकान्तमा गएरसम्झाइन्‌, “मौसमी, तिमी कुन बिषय लिई पढ्दैछूयौँ थाहा त छ, होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मौसमीले हाँस्दै उत्तर दिइन्‌, &#039;शालु, तिमीले भन्न खोजेको कुरा मैलेबुझिसकेँ । हेर म यहाँ आफनो खुसीले भर्ना भएकी हुँ भन्ने ठानेकी छौँ?जिल्लामा सरहरूले नै चिट चोराएकाले गर्दा राम्चै फस्ट डिभिजन आएछ ।बिचरो मेरौ सोझो बाबुलाई छौरीले रामो नम्बर ल्याएकी छ, साइन्स पढा,भौलि डाक्टर हुन्छै भनेर उचालिदिएछन्‌ । हो न हो छोरी डाक्टर बन्छे भन्नेसपना देखेर मलाई यो क्याम्पसमा ल्याएर कोचेर पो गए । हेर, बाबु-आमाभनेको त पढेलेखेको चाहिने रहेछ बुझयौ ? मैले हजारपल्ट भने- बुबा मसाइन्स पढ्न सक्दिनँ । मेरो कुरा मरे सुनेको भए पो । अझ अर्को कुरासुन्छयौँ ? वसमा मान्छेहरूले कहाँ जान लाग्नु भो भन्दा भन्धे- मेरी छोरीलेएस्‌.एल्‌ सी.मा बोर्ड ल्याएकीले काठमाडौंमा डाक्टर पढाउन हिँडेको । भकारोसोने बाबुलाई फस्ट डिभिजन र बौर्डफस्टको अन्तरसम्म थाहा छैन ।&#039;&lt;br /&gt;
मलाई पो लाज लागेर, उता बूढाको खुट्टा भुइँमा छैन । अब म लबुदुलेडाक्टर बनेर उनको छाती दुखेको निको पार्ने रै, उफ कर्म !, बाबुको करासम्झँदा पनि कहिले एक्लै हाँस्छु कहिले एक्लै रुन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले मुसुक्क हाँस्दै भनिन्‌, &#039;बडो हँसायौ तिमीले, बिचरो, तिम्रो बाबु बडोसिधासादा हुनुहँदोरहेछ । कहाँबाट आएकी नि !&#039;&lt;br /&gt;
मौसमीले निदारमा हात राख्दै भनिन्‌, &#039;राम्रो ठाउँबाट आएकी भए यो दशाकिन भोग्नुपर्व्यो ? पर्वतबाट आएकी बानु डाक्टर बन है छोरी भनेर नाकफुलाएर गएका छन्‌ । तेत्रो पढेलेखेका घरबैटीलाई यसो भने- &#039;ए हजुर, योछोरीले डाक्टर पढ्दै छे कहिलेकाहीँ घरबाट भाडा आउन ढिलो भए केहीनभन्नु होला ।&#039;&lt;br /&gt;
घरबेटी बुवाले मेरो बाबुको कुरा सुनेर मुसुक्क हाँस्दै मुन्टो हल्लाउनुभयो ।मैले कतिपल्ट डाक्टर बन्न सजिलो छैन भनेर सम्झाएँ, मेरो कुरा सुनै पौ ।उल्टै भन्धै- &#039;तिमीले मलाई मूर्ख बनाउन नखोज है छोरी, &#039;म पनि देश खाएर&lt;br /&gt;
छै&lt;br /&gt;
सेस भएको मान्छे&#039; अहिलेसम्म त वाबुले गाउँमा मेरी छोरी डाक्टर बनेरआउँछै भन्दै हल्ला पिटे होला । हेर शालु, मेरो बाबुलाई डाक्टर बन्नु भनेकोगुन्द्रुकमात खानझै सजिलो हुन्छ झैँ लाग्छ क्यारे ।&#039;&lt;br /&gt;
मौसमीको कराले शालुले हाँसो रोक्नै सकिनन्‌ । केहीवैर हांसैर भनिन्‌,“मौसमी मान्छेले चाहेमा जे पनि गर्ने सक्छ । तिमीले दिलोज्यान दिएर पढ, यीभवराहरूको भुनभुनबाट ज्यादै टाढा रहँ । जसरी भमराहरू फूलको रस पाउन्जेलमात्र फूलमा बस्छन्‌ । यी युवकहरू पनि त्यस्तै हुन्‌, तिमीले आमाको त करैगरेनौ नि ?&#039;&lt;br /&gt;
आमा त म तीन वर्षकी हुँदा बित्नुभयो रे । आमाको त सम्झना नै छैन ।बाबुले नै थि भयो । हामीलाई दुःख देली भनेर अर्को बिबाहसम्म गर्नुभएन ।आमा मर्दा बाबु पैतीस-चालीसको मात्र हनुहुन्थ्यो रे । दाइ र दिदीले एस्‌.एल्‌.सी.पास गर्न सकेनन्‌ । मैले फस्ट डिभिजन ल्याएको उनलाई के-के न भयो । वावुभन्दै थिए, &#039;नानी तँलाई डाक्टर बनाउन चालीस-पचास हजार पर्ने टाँडी खेतनै बेचिदिन्छु ।&#039; बाबुको कुरा सुनेर म झन्डै पागल भएं । सम्झाउन खोज्दाउल्टै बौल्न दिने हो र । भन्थे- &#039;तिमी खुरुक्क पढ मात्र अरू कुरा मलाई थाहाछैन । त्यो खेत बेच्दा पनि पैसा नपुगे माझा पाटो पनि बेचिदिउँला । डाक्टरबनेर पहिला पोस्टिङ गाउँमा नै मिलाए है नानी ...। अँ साँच्चि शालु, मसँगतिमी सबै कुरा गर तर भमरा र फूलको कुरा नगर । म बैंसका उन्मादहरूलाईबसमा राखेर तद्वपिन चाहन्न । म आफूलाई कुण्ठित पारेर बाँच्दित पति । मउड्न चाहन्छु बुझ्यौ ? तिमीले बगैँचामा गएर कोपिलाहरूलाई नफुल भनेरगाली गर्दैमा फुल्दैन र त्यो ? फुलेपछि भगरा लाग्नु प्रकृतिको नियम हो । त्योप्राकृतिक नियमविरुद्ध हिँड्नु नै पाप हो । सक्छयौ भने प्राकृतिक नियमविरुद्धतिमी पनि नहिँड । यी क्षण हामीबाट बगेपछि बग्यो शालु । हामी बुढेसकालमाचाहेर पनि यो खुसी पाउन सक्दैनौँ । म तिमीलाई अन्तिमपटक भन्दैछ, मेरोओठको हांसो नखोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले बडो नम्र स्वरमा भनिन्‌, &#039;मौसमी, तिम्रा बाबुको सपनासँग तिमीलाईकनै सरोकार नै छैन त ?&#039;&lt;br /&gt;
मौसमीले उत्तर दिइन्‌, &#039;सपना देख्नेले पनि अलि सार्थक हुने सपना पोदेख्नुपयो नि ! हुट्टिट्याउँले आकाश थामेको सपना देख्नेले देखिरहुन्‌ । मलाईकुनै चासो छैन । एक-दुई वर्ष यसो क्याम्पसमा हल्लिन्छु । त्यसपछि गाँठवालापट्याउँछ र विवाह गर्छु । सुन्दरी छँदैछु, मान्छेले हेर्ने सुन्दरता नै हो । मान्छयौभने तिमीले पनि आफूतौ सुन्दरतामा ध्यात दिने गर, साँच्चि शालु तिमीलाईपो युवकहरूले कुन गाउँबाट आएकी भनेर मसँग सौध्दै थिए । कमसेकमकाठमाडौंको त इज्जत राख । उनीहरूले मात्र होइन । मैले पनि तिमीलाईगँवार नै सोचेकी थिएँ । यस्तै हो भने तिम्रो भविष्य अन्धकार छ बालिके ।&#039;&lt;br /&gt;
डड&lt;br /&gt;
मौसमीको करा सुनेर शालु एकैछिन मौन रहिन्‌ र भनिन्‌, &#039;मौसमी, भीरखोज्ने गोरुलाई रामराम मात्र भन्न सकिन्छ काँध नै थाम्न त सकिँदैन । मैलेजीवन्त के हौ नबुझेकी भए म किन तिमीसँग राम्रो वाटो रोज भनेर हातजौद्यैं । तिमी र म एकै उमेरका हौँ । कै तिमीलाई वैंसले कृतकत्याउँदा मलाईबैंसले छोड्छ होला र ? तर, ठूलो त मन हो । तिमीलाई आफूनै आँसु पियाएरहुर्काउने बाबुभन्दा तिम्रो बैँस ठूलो होइन । टाढा किन जान्छौ । तिम्रो बाबुलेनै तिमीहरूको खुसीका लागि आफूनो खुसी बन्धकी राख्नुभयो । तिमी साइन्सपढ्न सम्दिन भन्छ्यौ भने अर्को विषय पट, समय छँदैछ । बरु सक्दो सहयोगम नै गर्छु । प्लिज मौसमी तिमीले आफूलाई सत्व नठान । अहिलेसम्म तिमीबहुमूल्य रत्न हौँ । तलमाथि केही भयो भने तिमीलाई मान्छेहरूले फुटेकोभाँडोसँग पनि दाँज्दैनन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
मौसमीले रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;शालु, तिमीलाई मेरो रूपको त्यत्रो डाह छ भनेकाटेर लेक । तिमीलाई युबकहरूले पछ्याएनन्‌ अनि मेरो डाह गर्छ्यौं, तिम्रोमनको कुरा गैले बुझिसकेँ । भमरा &#039;झुम्मिँदा पनि बास्नादार फूलमा &#039;झुम्मिन्छन्‌याद गर । तिमी र झरेका फूलमा कुनै अन्तर छैन । अनि को पछि लागोस्‌तिम्रो ? सक्छयौ भने एकजना युबकलाई मात्र पछि लगाउन सक&#039; भन्दैमौसमी भुतभुताउँदै उठेर आफ्नो कक्षाकोठामा प्रवेश गरिन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालुले मनमनै सोचिन्‌, &#039;भगवान्‌ मौसमीको जीवनमा आँधी नआओस्‌ ।उनले जीबनको मूल्य बुझून्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीले ढोकाबाट चिहाउँदै भनिन्‌, “मोरी, म तँलाई खोज्दाखोज्दा हैरानभैसके । कै सौचैर बसेकी ? कतै तैँले अरिङ्गालको गौलामा हात हाल्नै कामगरिनस्‌ ; मौसमी पनि कक्षामा फतफताउँदै पसेकी थिइन्‌ । तँ किन प्रेमलाईघणा गर्छेस्‌ भत्त त ? मौसमीले भन्दा बढ्ता उच्छुड्खल हामीले प्रत्येक क्षणसडकपेटी र गल्लीहरूमा हिँड्ने प्रेमी-प्रेमिकाहरू देख्दै आएका छौँ । यसरी तँभाबुक नबन, खुरुबक क्लासमा हिँड । तँ सधैँ यही भन्छेस्‌, “वास्तबिक प्रेममात्याग हुन्छ, प्रेममा लज्जा हुन्छ, बास्नाभन्दा बढी प्रेम हुन्छ केवल प्रेम ? त्यस्तोप्रेम गर्ने भए तैँले र मैले मात्र गरौँला अरूबाट तैँले यस्तो प्रेम गर्लान्‌ भन्नेआश नगरै पनि हुन्छ । तँ परिस्‌ प्रेमको सख्त विरोधी । मैले कसैसँग प्रेम गरेँभने तैँले सोचेभौँ प्रेम गर्छु । अब त हाँस ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीको कुराले शालु फिस्स हाँसिन्‌ र वसेको ठाउँबाट उठ्दै भनिन्‌,“रोहिणी, त्यो गाउँले केटी आफ्नै आँखासामु बिग्रिन्‌ भने मचाहिँ हेर्न सक्दिन ।यसो जानेबुझेको कुराहरू भन्दा राम्रै हौला भनेर भनेकी थिएँ । तैँले भनेझैँअरिङ्गालको गोलामै हात हालेँछ । उनी बाहिरको मात्र सुन्दरी रहिछिन्‌ ।मलाई त उनको बाबुको माया लाग्यो । छोरी ठूलो वन्ली भन्ने ठूलो सपनादेखेका रहेछन्‌ । छोरीको ताल भन्ने देखिहाल्यौ । त्यो श्रीराम सरको ताल पनि&lt;br /&gt;
ज्दि&lt;br /&gt;
के हो ? मौसमीबाट उनको आँखा टाढा जाँदै जाँदैन । बूढो भएर पनि पात्तैकोमोरो । त्यस्तै ताल हो भने हामीले राम्रो शिक्षा पाउने आश नगरे पनि हुन्छ ।पुरानो क्याम्पस भनेर अमृत साइन्समा नै आइयो ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;मोरी पीर नगर । पढाइ राम्रै होला नत्र आकाश किन यहाँ आउँथे ? मैलेझुलुक्क उनलाई देखेकी थिएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
“औं आकाश पत्ति यहाँ, उनी त ए सेक्सनमै होलान्‌ । आकाश यहाँ आएकाछन्‌ भनेपछि त म ढुक्क भएँ ।&#039; शालुको आँखामा खुसी छरियो ।&lt;br /&gt;
रोहिणीले भनिन्‌, &#039;शालु तिमी आकाशको नाम सुन्नैबित्तिकै सधैँ हषितदेखिन्छयौ कित ?&#039;&lt;br /&gt;
शालुले हाँस्दै उत्तर दिइन्‌, &#039;रोहिणी कुरा हामी सबैलाई थाहा नै भएको हो ।आकाशजस्तो चरित्रवान्‌ त यहाँ जन्मेकै छैनन्‌ होला । उनी सम्पूर्ण गुणले पूर्णछन्‌ । यदि भगवान्‌ले कुनै मान्छेको सृष्टि गर्नु छ भने आकाशजस्तो व्यक्तिकैसृष्टि गरोस्‌ । म आकाशलाई कुन उपमा दि उनलाई दिने त्यस्तो उपमा नैभेटेकी छैन मैले ।&#039;&lt;br /&gt;
“क मैयाँसाप, भखंरसम्म प्रमको खिलापमा थिई, फेरि भावनामा बगी, तँकतै आकाशलाई प्रेम त गर्दिनस्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
शालुले उत्तर दिइन्‌, &#039;रोहिणी आकाशलाई प्रेम गर्नु भनेको चन्द्रमा छुनुजत्तिकैहो । उनलाई प्रेम गर्नेले पहिला आफनो अनुहार पनि त हेर्नुपत्यो । म उनलाईपूजाचाहिँ गर्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&amp;quot;तँ नरिसाउनै भए म एउटा करा गर्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले हाँस्दै भनिन्‌, &amp;quot;भन न काली किन रिसाउनु : ? नरिसाउने क्रा गरिस्‌भने रिसाउँदै रिसाउन्न, रिसाउने कुराचाहिँ नगर, दिदी-दाइको बारेमा तहोइन ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;ल हेर आत्तैकी, तेरा दिदीदाइले त हाम्रो घरलाई स्वर्ग नै बनाएका छन्‌ ।साँच्चै शालु, आफू बूढेसकालकी छोरी, मलाई घरको साह्रै पीर थियो । अहिलेभैरो टाउकोबाट कसैले सिङ पहाड झिक्िदिए जस्तै भएको छ । तेरौ यो गृणम कहिल्यै बिर्सने छैन । ममी-वाबा पनि सधैँ तेरो करा गरिरहनुहुन्छ । दाजु,दिदी पति तेरै कुरा गर्नुहुन्छ । तैले आँसु पिएर कान्छीदिदीलाई मेरो घरमापठाइस्‌ । हामीले सम्पूर्ण पायौं, तैँले सम्पूर्ण गुमाइस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले बीच्चैमा कुरा काट्दै भनिन्‌, &#039;तँ एक्लै बौलिरहेन्छस्‌ कि मलाई पनिवोल्न दिन्छेस्‌ काली : पाउनु मात सबै होइन, आत्मा सन्तुष्टि नै सबै हो ।&#039;दिदीले सबै पाउनुभयो । तैंले सहयोग नगरेको भए न तैले सम्पूर्ण खुसीपाउँथिस्‌, न मैले, हामी सबै एक-अर्काका खुसीमा रमाएका छौँ भने पाउनु र&lt;br /&gt;
५०&lt;br /&gt;
गुमाउनुको त प्रश्नै रहेन । तेरा बूढा ममी-बाबाको ओठमा खुसी देखेपछि तमैरो हर्षको सीमा नै रहेन । तेरो घरको खुसीमा कसैको आँखा नलागोस्‌ । तैँलेके भन्न खोजेकी विइस्‌ कुन्नि !&#039;&lt;br /&gt;
&#039;शालु मलाई लाग्छ आकाश तँलाई प्रेम गर्छन्‌ । एकपल्ट त मैरो कुरामाबिश्वास गर । आकाश तेरो लागि नै जन्मेको हुनुपर्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले रोहिणीको कुरालाई हाँसोमा उडाउँदै भनिन्‌, &#039;ल अब तेरो दिमागत्वुस्कियो । प्रेम त्यो पनि आकाशले मसँग । त्यस्तो कुरा मनमा लिनु पनि पापहो । आइन्दा प्रेमसिरेमका क्रा मसँग गरिस्‌ भनेचाहिँ म साँच्चै रिसाउँछु त॑पनि कसैसँग प्रेम नगर है मैले भनिदिएकी छु ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीलाई चुप लाग्न करै लाग्यो । पढाइ सिध्याएर वाहिर निस्कँदै गर्दाबिनुले मौसमीलाई कोट्याउँदै भनिन्‌, “के हो मौसमी ठूलै माछा जालमा पार्नलाग्यौ कि कसो : श्रीराम सर त तिमीलाई देखेर लट्टेजस्तो छ नि ?&#039;&lt;br /&gt;
मौसमीले शालुतिर हेर्दै भनिन्‌- &#039;हे्दै जाक न कति माछा जालमा पार्छु ।प्रकृतिले नठगेपछि मान्छेले डाह गरेर के लाग्छ : यो क्याम्पसमा त मेरो डाहगर्ने धेरै छन्‌ बुझ्यौ ? कतै तिमीलाई पति मेरो डाह लागेको त होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;छ्या के को डाह नि, त्यो पति बूढो ढेडुको, आफू त पहिल्यै रिजापमा छु ।&#039;बिनुले उत्तर दिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालु र रोहिणीले उनीहरूको करा सुने पनि नसुनेकोझौँ गरी क्याम्पसबाट&lt;br /&gt;
बाहिरिए ।एघार&lt;br /&gt;
शालु ओछ्यानमा सुतिन्‌ । खुसीले गर्दा होला आँखामा निद्रा परेन । आँखामाकान्छीदिदीले जन्माएको तीन किलोको सुन्दर शिशु आइरहयो । बाह्र-तेहर वर्षकोचीरुदेखि लिएर रोहिणीका सम्पूर्ण परिवार त्यो शिशु र ढिदीको स्याहारमाकटिबद्ध थिए । सबैको अनुहारमा गुराँस फुलेको थियो । दिदीलाई स्याहारगर्नका सागि खु आइमाई राखेको रहेछ । पीताम्बरा अरूले स्याहार पुन्याउँदैनन्‌नातिलाई सेकताप गर्छु भनेर सुर्रिएकी थिइन्‌ । दिदी र दाइ प्रसन्नमुद्रामा नवजात शिशुलाई हेरेर टोलाइरहेका थिए । मलाई देख्नेबित्तिकै दिदीसम्पूर्ण खुसी विर्सेर रुनुभयो । त्यसपछि एकैछिन र वातावरण नै स्तब्ध भयो ।मैले सबैलाई वधाई दिएर त्यो सानो र सुन्दर शिशुलाई काखमा लिएपछि भनेपुनः रमणीय वातावरण छायो । दिदीलाई बच्चा पाउन चिरफार गर्नुपर्छ किभन्ने पीर थियो । त्यो पनि हट्यो । रोहिणी पनि कम वाठी छैन, पैले पीर गर्छुभनेर एकैपल्ट बच्चा पाएर घर ल्याएपछि डाकी । दिदीलाई अरूलाई भन्दा&lt;br /&gt;
9१&lt;br /&gt;
केही गाह्रो त भयौ होला, तर दिदीले मैयाँ धेरै गाह्रो भएन भनेर ढाँदनुभयो ।&lt;br /&gt;
रोहिणीकी आमाले पनि दिदीकै कुरामा सही मिलाउनुभयो । शाल्‌ दिउँसोकोसबै कुरा सम्झँदै ओल्टैकोल्टै परिन्‌ ।&lt;br /&gt;
होइन मैयाँसाप आज पनि खाना नखाई सुत्नै कि क्या हो ? आफभन्दा दुई-चार वर्ष जेठो तीर्वले ढोकामा आई बोलेर्पाछ पो शालुले आफू भोकै भएकोकरा याहा पाइन्‌ र ओछ्यानबाटै भनिन्‌, &#039;तपाईँ खानोस्‌ म खान्न ।&#039; तीर्थेलेआफनै सुरमा के भन्यो बुझितन्‌ शालुले ।&lt;br /&gt;
केहीबेरपछि नशामा गुनगुनाउँदै आएको पापाको स्वर भने शालुले राम्ररीबुझिन्‌ ।&lt;br /&gt;
उर्मिलाले हाँस्दै भनिन्‌, “बुढ्यौली लागेर पनि अझैँ बैँस गएको छैन । मोरोतीर्थ र शालुले गीत सुन्लान्‌ नि फेरि । शालुको पापा म पो अबदेखि रमफझमबाटविमुख हुने भएँ । यो तीर्वेले पनि यो घर होइन, आफनै पेट मात्र सम्हाल्नेभयो । मेरो घर भत्कियो पापा भत्कियो । म बर्बाद भएँ । कान्छीलाई आजैलेराइदिस्यो आजै ।&#039;&lt;br /&gt;
दीपक चिच्याए, &#039;उर्मी, चूप लाग आज तिमीलाई धेरै नशा लागेजस्तो छ ।त्यौ कान्छी चकलेट हो र तिमीले भन्दैमा किनेर ल्याउने । कान्छी बस्तासम्मआजै निकालौं भोलि निकालौँ भन्दै दिमाग खान्थ्यौ । अहिले फेरि, कान्छील्याइदिनु पो भन्छिन्‌ । होसमा बोलेकी हो कि बेहीसमा यो आइमाईको बोलीकोभर नै छैन।&#039;&lt;br /&gt;
म होसमै छु भन्दै कपडा नै नखोली पलङमा पल्टिन्‌ र कान्छी-कान्छी भन्दैनिदाइन्‌ ।&lt;br /&gt;
दीपक पनि उमिलाले कान्छीको नाम लिएको सुनेर केही रिसाउँदै सुते ।शालु ममी र पापाको शब्दहरू सुनेर मनमनै रोइन्‌, &#039;तिमीहरू जस्ता पापीलेगर्दा नै मैले दिदीको काखबाट टाढा हुनुपन्यौ । तिमीहरू गतिला भएको भएत्यो भाइ आज यो घरमा हुन्थ्यो । माल पाएर चाल नपाउनेहरू रोओ, अवकति रुन्छौ । शालु दिदीलाई सम्झँदै निदाइन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;होइन तीर्थ दाइ किन झोलासोला बौकेर हिँडेको :&#039;&lt;br /&gt;
तीर्थले आँखा पल्टाउँदै भन्यो, &#039;म त पहिलाकै घरमा जान्छु । त्यहाँ तमैयाँसापसँग हाँस्न र ठट्टा गर्न पाइन्थ्यो । जति पैसा मागे पनि दिन्थे । यहाँआएपछि न हाँसोठट्टा गर्न पाइन्छ न त पैसा नै दिन्छन्‌ । पैसा दिनुपन्यो भनेदाँतबाट पसिना निकाल्छन्‌ । कान्छीले यसो गर्थी, उसो गर्थी भनेर उल्टैरामायण सुनाउँछन्‌ । यो कलियुगमा को कान्छी भन्नै जन्तु रहिछै नविना पैसाकाम गर्ने । उहाँकी मैयाँसाप म रिसाएँ भने मलाई काउकृति लगाएर&lt;br /&gt;
रि)&lt;br /&gt;
हँसाइसिन्ध्यो । हजुरकै उमेको भए पनि वढो रसिलो होइसिन्थ्यो । म भनेपछिहुरुक्कै होइसिन्ध्यो । यहाँ हजुर पनि यस्तै होला भनेर आएको त हजुरले तहाँस्तसम्म जानेको छैन रहेछ । अरू कुरा त परै जाओस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालु तीर्थैंको कुरा सुनेर डराइन्‌ र आफनो रिसलाई कन्ट्रोल गर्दै भनिन्‌,&#039;दाइ तपाईं जानोस्‌, यहाँ अर्को काम गर्ने ल्याउने कुरा भइरहेको छ बरुबाटोखर्च छैन भने म दिन्छु।&#039;&lt;br /&gt;
तीर्घले झकिँदै भन्यो, &#039;बिहान आफनो तलब मागिसकेको छु । जति कामगर्ने ल्याए पनि यो घरमा को टिक्ला र ? ल म गएँ । यही तलब पर्खेर बसेकाथिए तत्र अस्ति नै गइसक्यें । मति बिग्रेका यहाँ आएँ, अहिले उहीँ फर्कनुपन्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
फौनमा उहाँको साहु-साहनी र मैयाँसापले अन्त बसेर चेतिस्‌ होला,आउँछस्‌ भने आइज भन्नुभएको छ ।&#039;&lt;br /&gt;
तीर्थे ठूलो-ठूलो फड्को मार्दै बाटो लाग्यो । शालुले तीर्थेको नियति बुझेपछिक निकाल्नु नै श्रेय ठानिन्‌ । तीथेंले बाटो लाग्दा उसको अनुहारमा पनि कुनैहीनताबोध थिएन । क खुसीले उन्मत्त थियो ।&lt;br /&gt;
&#039;होइन, तीर्थे कहाँ मन्यो र तिमी गेट खौल्न आएकी ?&#039;&lt;br /&gt;
अरू काम गर्ने सात-आठजना मरेजस्तो क पनि भन्यो । तीर्थको कराभोलि गरौंला, अहिले हजुर नशामा होइसिन्छ सुतिस्यो ।&lt;br /&gt;
दीपकले भने, &#039;बिहानसम्म त उसले जाते क्रै निकालेको थिएन । एक्कासिकिन हिँड्यो ?&#039;&lt;br /&gt;
“भन्दै थियो काम गरेको तलब नदिएर पो वसेको नत्र म यो घरमा किनबस्थेँ ? पैसा माग्यौ कि सधैं कान्छीको कुरा गर्छन्‌ । भन्दै हिँड्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
उर्मिलाले विरक्त स्वरमा भनिन्‌, &#039;शालु हामी बिहानदेखि बेलुकासम्म बाहिरैहुन्छौँ । काम गर्न के नै गाह्रो छ र, काम गर्नेहरू किन टिक्दैनन्‌ ? न बगैँचार करेसाबाहिरै काम गरेका हुन्छन्‌ । घिच्नु र टी.भी. हेर्नुबाहेक अरू काम छैनर पनि यिनीहरूलाई के मात लाग्दो हो कुन्नि ?&#039;&lt;br /&gt;
ममी हजुर सबैलाई कान्छीदिदीसँग तुलना गर्न खोजिसिन्छ । अनि कसकोचित बुझछ हँ ? हेर, कान्छीले यति मासु तीन छाकलाई पुन्याउँथी । कान्छीलेयति आलुले हप्ता दिन पुन्याउँथी, चामलले महिना दिन पुग्याउँची, तेलले यतिदिन, ग्यासले यति दिन, त्यसमाथि कान्छी त ज्याला लिँदैनथी । कपडा कहिल्यैमाग्दैनथी । हजुरको यौ भाषण प्रत्येक दित सुनेपछि कसरी टिक्छन्‌ मान्छेअब चुप लागेर सुतिस्यौ । पकाउने, खाने काम म आफैँ गरौंला, काम गर्नेमान्छे राख्नै पर्दैन ।&lt;br /&gt;
दीपकले उर्मिलालाई कोठामा लग्दै भने, &#039;अब चुप लाग, कान्छीलाई निकाल्न&lt;br /&gt;
ख्ङक&lt;br /&gt;
अनेकौं बहाना बनाएको फल वल्ल भोग्दैछयौ । कान्छीले सिक्री चोरी, औँठीचोरी भन्दै घोच्च्यौ, हेर्दै जाक अब के-के हुन्छ । तिम्रो घरलाई स्वर्गजस्तैसुन्दर भन्नेहरू आजकाल यहाँ आउन मन गर्दैनन्‌ भन्दै आफैँ बेसुरमावर्वराउँछयौँ । तिमीलाई थाहै छ । शालु कान्छीलाई सानोभन्दा सानौ चौटलाग्दा पनि दुखित हुन्थिन्‌ । त्यस्ती शालुले आफैँले कान्छीलाई निकालिन्‌, त्योपनि चन्द्रकान्तको आरोप लगाएर त्यसमा ठूलै रहस्य होला । उमिलाले पलङमापल्टँदै भतिन्‌, &#039;हजुर पनि नाता शङ्का-उपशङ्का गरिसिन्छ । कस्ताले कस्तालेत बैँस थेग्न सक्दैनन्‌ । त्यो मोरीले सक्छे ? हामी कोही घरमा नहुँदा ती दुईकैरजाइँ हुन्थ्यो । कान्छी बारीमा गए पनि सँगै जान्थ्यो । त्यसले कान्छीलाई मायागर्छफौँ मलाई पहिल्यै लागेको थियो । त्यसैले त त्यो पनि पैसाको त्यति वास्तागर्दैनथ्यो । अहिलेको काले स्वाठ देखिसिन्न कस्तो छ । मैले अस्ति भाइ त्यतिफूलमा पाती हालिदैउन्‌ भनेकी थिएँ ठाड्चै जबाफ दियो- &#039;मैल आजसम्मकसैको घरमा काम गरेको छैन, हजुरहरूको बाहिर जाने भए फोन गर्नु भन्दैटिम्किँदै हिँड्यो । चन्द्रकान्तलाई कहिल्यै काम अह्ाउनु पर्दैनथ्यो । आफनैतलबबाट फूल ल्याएर कुन फूल कहाँ लगाउने कान्छीलाई सोधी-सोधीलगाउँथ्यौ । तरकारी लगाउँदा पनि त्यस्तै गर्थ्यौ । जसरी कान्छीले यो घरलाईआफनो सम्झन्धी त्यसैगरी चन्द्रकान्तले पनि यो घरलाई आफनै सम्झिन्थ्यो ।यो सबै गर्नुको पछाडि चन्द्रकान्त पति कान्छी यो घरबाट निस्कन चाहँदैन्थ्मोबुझनु भौ ? शालुले यो घरमा बस्नुको बास्तविकता नबुझेरै निकालेकी हुन्‌मलाई थाहा छ ।&#039;&lt;br /&gt;
तिमीले जे सोचे पनि मेरो भित्री मनले भन्छ- &#039;शालुले कान्छीको कहिल्यैकमलो चिताउँदिनन्‌ । कान्छीलाई तिमीले निकाल्न लागेको योजना थाहापाएपछि शालु आफैँले कान्छीलाई निकालिन्‌ । कान्छी गएपछि कति दिनसम्मशालुले राम्रोसँग खाना खाइनन्‌ । आजभोलि भने उनको अनुहारमा अलिकचमक छ याद गरेकी छ्यौ ? त्यौ चमक तिग्रो र मेरो कारणले होइन,कान्छीको कारणले आएको हुनुपर्छ । कान्छी गएदेखि शालुले न मीठो खानाखाएकी छिन्‌ न समयमै खाता खाएकी छिन्‌ । फूल भनेपछि हुरुक्क हुने शालुलेन बगैँचा सुन्दर देख्न पाएकी छिन्‌ । त्यति हुँदा पनि उनी खुसी छिन्‌ । आखिरकिन ?&#039;&lt;br /&gt;
“भो-भो चुप लागिस्यो हजुर, नशाको सुरमा जे पनि भनिसिन्छ । हजुरकोकुरा सुनेर त मेरो टाउको फुट्ला जस्तो भयो । अब एक पेग नवपी निद्वानपर्ला जस्तो छ । उमिलाले वाइन खन्याएर गिलासमा हालिन्‌ । पानी पनिनथपी वाइन्‌ घट्घटी पिएर सुतिन्‌ । दीपकले पनि सिसीमै ठाडो घाँटी पारेरघट्घद्‌ वाइन पिई सुते । शालुको आँखामा दिदी, त्यो अबौध शिशु र सबैकोहर्षित अनुहार नाचिरहयो ।&lt;br /&gt;
[४ ।&lt;br /&gt;
बाहन&lt;br /&gt;
लौ, यो युवकले बिहानै-बिहानै पिएर आएछ क्यार, क झुल्न पो लाग्यो ।अर्कोले कुरा थप्यो, &#039;कहाँ पिएको हुनु, यो र म सँगै लगनखेलमा बस चढेकाहौँ । कुसुन्तीसम्म आउँदा ठीक नै थियो, अहिले पो &#039;झुल्दैछन्‌ । अर्को यात्रुलेठूलो स्वरमा भने, &#039;ए ड्राइभर बस रोक कहाँ यो छारे रोगीलाई बसमाहालेको ? म &amp;quot;झर्छु । मलाई छारे रोग सार्नुछैन ।&#039; सबै यात्रुले एक्कै स्वरमाचिच्याए, &#039;हो ... हो, बस रोक कस्तो वेसाइतमा हिँडिएछ । छारे रोगी चढेकोबसमा । वस रोकेर ड्वाइभर र कन्डक्टरले केही बौल्न नपाउँदै सबै फुतफुतबसबाट ओलेर हिँडे । त्यही बसमा आएकी रोहिणी हेरेको हेरै भइन्‌ । रोहिणीलेहतारहतार &#039;फुल्दै गरेको युवकलाई समातेर भनिन्‌, &#039;द्वाइभर साप छिटो हस्पिटलहिँड्नोस्‌ न । तपाईंलाई जति पैसा चाहिन्छ म दिन्छु ।&#039; रोहिणीको कुरा सुनेरड्राइभरले केही खुसीको स्वरमा भन्यो, &#039;हुन्छ हजुर यहाँबाट नजिक वीर अस्पतालैहोला त्यही जाँ है ?&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीले स्वीकृति दिइन्‌ तर युवक मुर्दाझै भएपछि रोहिणीको सातोपुत्लोगयो । ड्राइभर र कन्डक्टर दुवै डराए । ड्राइभरले रोहिणीलाई केही सान्त्वनादिँदै भन्यो, &#039;बहिनी नडराउनुहोस्‌ । यो केटो मूर्छौ मात्रै परेको हो । मरेकैचाहिँछैन । रोहिणी र कन्डक्टरले दुईतिरबाट च्याप्प समातेर वीर हस्पिटल पुन्याईइमर्जेन्सीमा लगै । डाक्टरले जाँच गरेर स्लाइनपानी चढाए । घोरै स्लाइनपानीसकिएपछि युवकले आँखा खोले ।&lt;br /&gt;
ड्वाइभरले झिनो स्वरमा भने, &#039;अब यो युवक मर्दैन । हामी जान्छौं पनि,तपाईंको इच्छाले जति पैसा दिए पनि हामी खुसी हुन्छौं । पैसा छैन भने नदिएपन्ति हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीले पर्स खोल्दै भनिन्‌, &#039;तपाईंहरूले ठूलो सहयोग गर्नुभयो त्यसकालागि धन्यवाद, डाक्टरलाई पनि दिनुपर्छ होला, सय लिनोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
ड्राइभरले पैसा समाउँदै भन्यो, &#039;मैले त यति पैसाको आश नै गरेको थिइनँ ।तपाइँलाई पनि धन्यवाद जान्छौं पनि ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीले मुन्टो हल्लाएर ड्राइभर र कन्डक्टरलाई विदा गरिन्‌ । अब के गर्ने,के नगर्ने भन्ने सोचेर उभिइरहेकी थिइन्‌ । सिस्टरलै शालु नजिक आएर भनिन्‌,&#039;तपाईंलाई डाक्टरले बोलाउनुभएको छ ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणी सिस्टरपछि लागेर इमर्जेन्सीमा पुगिन्‌ । डाक्टरले रौहिणीतिर हेर्दैभने, &#039;तपाईंले अब बिरामीलाई घर लगे हुन्छ । उहाँ ब्लडप्रेसर लौ भएर मूर्छापर्नुभएको रहेछ । अहिले अनारको जुस ल्याएर खान दिनुहोस्‌, घरमा लगेरहड्डीको सुप, मुगुको सुप, खसीको खुड्डाको सुप प्रशस्त दिनु होला ।&#039;&lt;br /&gt;
दिदि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
डाक्टरको कराले रोहिणी र युवक रातो न पिरो भए । युवकले केही वोल्ननपाउँदै रोहिणीले भनिन्‌, “तपाईं बस्दै गर्नोस्‌ म अनारको जुस लिएर आउँछु ।त्यसपछि घर जाउँला ।&#039; रौहिणी बाहिर निस्केर गएपछि काउन्टरमा पैसातिरिन्‌ र अनारको जुर लिएर आई युवकतिर बढाउँदै भनिन्‌, &#039;क्‌पया जुसपिउनोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
युवकले जुस समातेर रोहिणीतिर हेर्दै भन्यो, &#039;धन्यवाद, मलाई चक्करलागेकोसम्म केही याद छ त्यसपछि के भयो पत्तै पाइनँ । तपाईंले यहाँल्याउनुभएको रहेछ नत्र म मैं होला ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;सानो सहयोग गरेकी हुँ, बढी केही गरेकी छैन । जुस पिउनुहोस्‌ अनि मतपाईंको घरसम्म छोडिदिन्छु । स्वास्थ्यकोचाहिँ अलि ख्याल राख्नु होला ।&#039;&lt;br /&gt;
युवकले अप्ठ्यारो मान्दै भने, “तपाईँले मेरा लागि यति घेरै कष्टउठाउनुभएकोमा धेरै-धेरै धन्यवाद, अब म आफैँ जान सक्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
“फेरि बाटोमा केही भयो भने गाह्रो होला, घरसम्म पुच्याइदिएँ भने मलाईपति सन्तोष हुन्छ, कुरा त्यति मात्र हो ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीको कुरा सुनेर युवक अनकनाउँदै उठे । दुवै वीर हस्पिटलको गैटबाहिरपुगेपछि रोहिणीले दयाक्सी रोकिन्‌ । ट्याक्सी गुद्धयो । द्याम्सी गुडेको केहीसमयपछि युवकले झिनो स्वरमा भने, “मेरो नाम प्रशन्न हो । घर खोटाङ, यहाँपढ्न बसेको हुँ । आईएस्सी सिद्धिएको पति दुई वर्ष भयो, इन्जितियर पढ्नजानका लागि कोसिस गर्दैछु । दुईपल्ट प्लान जान नाम निकालेको पनि हुँ, तरइन्टरभ्युमा फरयाँकिएँ । घरमा आमा मात्र हनुहुन्छ, बाबु सानैमा हामीलाईछोडेर मुग्लान पस्नुभयो । घरबाट खेत बेचेर आमाले यतिसम्म त पढाउनुभयो ।तर, मैले केही गर्ने सकिनँ&#039; भन्दै युवकले गहभरि आँसु पारे ।&lt;br /&gt;
रोहिणीले सम्झाइन्‌, “भैगो पीर तगर्तोस्‌ । कोसिस गरेपछि एक दिन न एकदिन सफल भइहालिन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
युवकले आँखाको आँस्‌ पुछ्दै भने, &#039;रोहिणीजी पेटले खान नमागे त ठिकैथियो, खान माग्छ । उता आमाले पति अर्काको काम गर्दै पेट पाल्नुभएको छ ।जागिर खाउँ कसैले जागिर दिँदैनन्‌ । जहाँ पनि आफनै मान्छै चाहिन्छ, यहाँआफूनो मान्छे कोही छैन । मान्छे रहरले होइन बाध्यताले चोर बन्दोरहेछ ।बुझनु भो बाध्यताले ... । मैले खाना नखाएको तीन छाक भयो । म पनि चोर्छुर पेट भर्छु यही सोचेर बस चढेको बेहोस पो भएँछु ।&#039; रोहिणीलाई प्रशन्नकोकरा कथाजस्तै लाग्यो । रोहिणीले शिर उठाएर प्रशन्नतिर हेरिन्‌ । निन्याउरोअनुहार, जिङ्ग्रिङ परेको कपाल, मैलो सर्ट, चप्पल, अहँ पटक्कै पढेझौँ देखिँदैनथेप्रशन्न । रोहिणीले मतमनै सोचिन्‌- मैले अबश्य यो युवकको उद्धार गर्नुपर्छ ।नत्र म जन्मनुको कूनै अर्थ नै रहँदैन । उफ ! के सोचेकी होला मैले, कतै&lt;br /&gt;
कद&lt;br /&gt;
यिनैसँग प्रेम बस्यौ भने मैरो जिन्दगी वर्वाद हुन्छ । वास्तवमै प्रेम गर्नेहरू कतित डुन्छन्‌ भन्थिन्‌ शालु । म डुवेँ भने मेरो ममीवावाको सपना चकनाचुरहुन्छ । सायद म यिनको प्रेमले गर्दा यहाँसम्म आएकी त होइन ?) उफ्‌! यो केभयो मलाई ? अब म डुब्न त डुब्दितँ ? यदि मैले प्रशन्तलाई प्रेम नगर्ने भएमझघारमा नै छोड्नुपर्छ । के म प्रशन्नलाई मझघारमै छौडूँ । अब म के गरौं ?&lt;br /&gt;
&#039;होइन के सोच्नुभएको रोहिणीजी, तपाइँजस्ता सहर-बजारमा जन्मेकोमान्छेलाई पीडा ओकलेर भूल गरेँ, माफ गर्नोस्‌ । तपाईंले मेरो कुराको विश्वासगर्नुभएन जस्तो छ । मेरो डेरामा पुगेपछि आफ्नै आँखाले मेरो गरिवी हेरेरफर्कनुहोला । सक्नुहुन्छ भने खोटाडसम्म पुग्ने गाडी भाडा दिनोस्‌, म भोलि नैयो सहर छोड्छु र गाउँ गएर मेलापात गरी पेटभरि खोले भए पनि खान्छ ।अब इन्जिनियर बन्नै सपना देख्न छौडिसकें मैले । मलाई पेटभरि खोले भएपुग्छ खोले ... ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;सहरमा वस्नेहरूको दिल नै हुँदैन भन्नेचाहिँ नसम्झनोस्‌ । मैले तपाईंकोकुरालाई विश्वास गरेकी छु । तपाईं भोकले नै ढल्नुभयो, त्यो पनि प्रत्यक्ष देखेरैयहाँसम्म आएकी हुँ । तपाईँ आवेशमा आएर गाउँ जान्छु भन्दै हुनुहुन्छ ।त्योचाहिँ मलाई त्यति ठीक लागेन । म आफनोतर्फबाट सक्दो सहयोग गरौँला,त्यसलाई नराम्रो नठान्नु होला ।&#039;&lt;br /&gt;
कुरा गर्दागर्दै प्रशन्नको डेरा पनि आयो । द्याक्सीबाट दुवै ओर्लेर कोठाभित्रपसे । त्यो कोठाको अवस्था देखेर रोहिणीको हृदय छियाछिया भयो । कोठाकोभित्तामा झुन्ड्याएको थोत्रो र मैलो दुईवटा सर्ट । सानो पलङ, पलङमाथि गुन्द्रीर कपडाको सानौ डसना, च्यातिएर तीनचार ठाउँमा सिएको तन्ना र थोत्रोकम्बल । पलङभन्दा थोरै पर सानो स्टोभ, थोत्रो दुईवटा डेक्वी, एउटा थाल,एउटा पत्त्यौं, एउटा बाल्टिन र थोत्रो कप । केही गेडा उर्मिएको आलु । पलङकोसिरानपट्टि &#039;भुइँमा मिलाएर राखिएको किताबको चाङ । अँध्यारो र कालो भित्ताभएको कोठा दक्षिणपट्टिको भगयालबाट छिरेको थोरै उज्यालो । ती सबै दृश्यदेखेर राहिणीको आँखाबाट आँसुमात्र फर्न सकेन । रोहिणीले आफनो घरमात्यसै रहेको दुईवटा कोठा सम्झिन्‌ ।&lt;br /&gt;
प्रशन्न बोल्न सकेनन्‌, आँखाबाट आँसु मात्र झरिरहे । रोहिणीले मन बाँधेरभनिन्‌, &#039;प्रशन्नजी तपाईँ जस्तो अनन्त उडान लिएको मान्छे पनि रुने हो?तपाईंले कमाएपछि मलाई ब्याजसहित यौ पैसा दिनुहोला, अहिले मसँग भएकोपाँच सय राख्नोस्‌ । म ममी-बाबासँग कुरा गरेर तपाईंका लागि कै गर्नसकिन्छ सोधौँला र चाँडै निर्णय दिउँला ।&#039;&lt;br /&gt;
प्रशन्नले आबेशमा आएर रोहिणीको खुट्टा समाउँदै भने, &#039;म तपाईंको गुणकहिल्यै बिर्सने छैन । म त पोख्छी नै सकेको थिएँ तपाईँले उठाउनुभयो,तपाईंलाई म के भनौं ?&#039;&lt;br /&gt;
५७&lt;br /&gt;
रोहिणीले खुट्टा सादै भनिन्‌, &#039;मैगो नरुनोस्‌ वरु केही किनेर खाइहाल्नोस्‌ ।अहिलेलाई म गएँ ।&#039; रोहिणी प्रशन्तको कोठाबाट निस्केर घरतिर आइन्‌ ।प्रशन्नलाई रोहिणीको खुट्टा छोएकोमा कुनै पछुतो लागेन ।&#039;&lt;br /&gt;
उनले त रोहिणीजस्ती पुवती जीवनमा पहिलोपल्ट नै देखेका थिए । प्रशन्नकाआफन्तहरू प्रशन्नले देखे भने पैसा माग्छ कि भनी टाढैबाट भाग्थै । युवतीहरूप्रशन्नसँग पन्छिएर हिंँद्दथै । प्रशन्नका कुनै साथीहरू थिएनन्‌ । प्रशन्नले यत्रोठूलो सहरमा आफनो मर्म बुझने एक मात्र युवती रोहिणी भेटेका थिए ।रोहिणी प्रशन्नका लागि साक्षात्‌ देवीसरह थिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
रोहिणी मनमा नाना तर्क-वितर्क खेलाउँदै घरमा पुगिन्‌ । आँखामा प्रशन्तकोदयनीय अवस्था, उनको निर्बौध आँखाहरू र बान्की परेको अनुहार नै नाचिरहयो ।रोहिणीलाई केही खान मन लागेन, उनी धुमधुम्ती कोठामै बसिरहिन्‌ । पीताम्बरालेरोहिणीको कोठामा पस्दै भनिन्‌, &#039;वीरु र सौजनलाई कस्तो कपडा ल्यायौ :पैसा त पुग्यो ?&#039; रोहिणीले जस्ताको तस्तै प्रशन्नको सबै घटना आमालाईसुनाइन्‌ । पीताम्बराले भनिन्‌, &#039;आज पैसा लगेको ढीक भएछ । कपडा त भौलिकिने पनि हुन्छ । दुःख पर्दा सहयोग गर्नु हामी सबैको कर्तव्य हो । तर, उतलाईघरमा नै राख्नु त्यति राम्रो त नहोला । म तिम्री बाबासँग सौध्छु, उहाँले केभन्नुहुन्छ । छौरा-बुहारीको पनि सल्लाह लिनुपन्यौ । तिम्रो बावालाई बाहिरकोमान्छे घरमा बसेको मन नपर्ने भएर त तला नबढाएको तिमीलाई थाहा नैछ।&#039;&lt;br /&gt;
रौहिणी आमाको कूरा सुनेर चुप भइन्‌ । पीताम्बरा कोठाबाट निस्किन्‌ ।&lt;br /&gt;
&#039;हेलौ ! रोहिणी तँ किन क्याम्पस नआएकी ? त्यहाँ सबैलाई सञ्चै त छहोइन ?&#039;&lt;br /&gt;
“सबैलाई सञ्चै छ, शालु पीर नगर । मलाई आज टाउको दुखेर पढ्ननआएकी हुँ । पढाइ राम्रै भयो त ?&#039;“अं राम्रै भयो, अहिले कस्तो छ तँलाई ? भोलि आउँछेस्‌ क्याम्पस ?&#039;&#039;अहिले ठीकै छ भोलि आउँछ ।&#039;र हसतिला सम्झना नमस्कार भनी दै है। ल बाई ।&#039; भन्दै शालुले फोनराखिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ बाई भन्दै रोहिणीले पनि फोन राखिन्‌ । शालुसँग वास्तविकता ढाँद्दारोहिणीलाई तरमाइली त लाग्यो नै । रोहिणीले शालुलाई सत्य नभन्नुको एउटैकारण थियो । रोहिणी प्रशन्नलाई केही माया गर्न लागिसकेकी थिइन्‌ । शालुभने प्रेम गर्नेलाई त्यति राम्रो ठान्दैनथिन्‌ ।&lt;br /&gt;
रोहिणीले नचाही-तचाही थोरै खाता खाइन्‌ । र, टेबुलमा बसेर किलाब&lt;br /&gt;
पल्टाइन्‌ पत्ति तर आँखामा प्रशन्न नै झल्झली आइरहे । उनी किताव बन्दगरेर औछ्लयानमा पल्टिइन्‌ । प्रशन्नको बारेमा सोच्दासोच्दै धेरैबेर पछि निद्रापन्यो रोहिणीलाई ।&lt;br /&gt;
- तेह्न&lt;br /&gt;
&#039;ल बास्सा ट्रायल भन्दै उर्मिलाले तास फ्याँकिन्‌ । उमाले मुख बिगारदैभनिन्‌- कलर त मलाई पनि परेको थियो । प्रतीक्षाले भनिन्‌- दुक्की जुट तमलाई पनि परेको थियो । दुक्कीले कहिल्यै छोडेन । मेरा दहल टप सिन्धुलेहाँस्दै तास फ्याँकिन्‌ । सिन्धुलाई त मैले जितेकी रहिछु । मेरो मिस्सी टप भन्दैशोभाले पति तास फ्याँकिन्‌ ।&lt;br /&gt;
उर्मिलाले तास फिददै भनिन्‌, &#039;सबैँ फरास मात्र कति खेल्नु ?) घरु यसोकलब्रेक खेलौं न, कलब्गेकमा समय गएको पत्तै पाइन्त । पैसा पनि ढिलैजान्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
सिन्धुले रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;पहिलो हात पैसा सोरेर पनि नानाथरी कुरानगर । थपक्क बाँड ल प्रतीक्षा तास काट । कलब्रेकमा दुई ग्रुप बन्नुपर्छ । फेरिझन्झट खेल । बरु चल्ती फरास खेल्नै भएचाहिँ ओके !&#039;&lt;br /&gt;
“कति दिनमा बल्ल एक हात खाएकी छ्‌ । नत्र पैसा स्वाहा गन्यो, हिँड्यो ।तिम्रौ जस्तो एक्का टप भए पनि चल्ती फरास खेल्ने साहस भए पो ।&#039;&lt;br /&gt;
सिन्धु &#039;मैले एक्का टपमा चल्ती फरास खेले । गंगाले दहल टपमा ल चल्तीफरास खेल्छु भनी सुरिएकी बिर्सैक !&#039; हामीले बूढ्धीलाई एक्का टायल नै परेछकि भन्दै डराएर प्याक गन्यौं आखिर बूढीको त दहल टप पो रहेछ । त्यो दिनबडा मज्जाले हँसाइन्‌ गंगाले । साँच्चि गंगाको बूढाबढी नै एक्कासि बेपत्ताभए । न घरको फोनै उठ्छ । किन एकाएक सम्पर्कमा आउन छौडे ? आजकालसबै ठाउँमा बाबुको प्रतिनिधित्व पनि फिरोजले नै गर्छ । त्यो मोरोसँग सोधौँभने त्यसका आसेपासे गुलियोमा कमिला टाँसिएझैं टाँसिइरहेका हुन्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
शोभाले लामो श्वास फेर्दै भनिन्‌, &#039;अब गंगाको कुरै नगरे पनि हुन्छ । उनीत अर्कै जन्म लिएझैँ फेरिइछिन्‌ । म अस्ति उनको घरको बाटो परेकोले यसोपसैकी त उनको फतौरे क्रा सुनेर कहिले उनलाई छोडेर भागौं जस्तो भएँ ।कर दुस्सासा व्लाएर रूभै सिद्धेछ । रुँदै भन्दै थिइन्‌, &#039;शोभा हामीले हिँड्नै जानेकाउन । हामीले छौराछोरीलाई सही बाटो देखाइदिएनौँ । हेर, बेलैमा विचारगर, तिमीहरूका छोराछोरी पनि फिरोजझैं तहस-नहस होलान्‌ । फिरौजलाईराम्रो संस्कार दिन नसक्ने हामी नै हौं । हामीले नै उसलाई चक्रब्युहमाफसायौँ । त्यही पश्चात्तापले हामी मर्दो न बाँच्दो भएका छौं । खोई के-के हुन्‌,&lt;br /&gt;
हो&lt;br /&gt;
हन्‌ तिनका करा । म त तिनको त्यो परिवर्तत देखेर महाअचम्म परेँ । तिनकोकुरा सुन्दा-सुन्दा झयाउ लागेर फुत्त निस्केर हिँडे&lt;br /&gt;
“बूढी भए पनि भर्खर यौवन चढेको युवतीझैँ गर्थिन्‌ । फेरि मेकअप गर्नेदेखिलिएर पिउन, खेल्न जैमा पनि खप्पीस थिइन्‌ । ठट्यौली पनि कति जानेकी,एकछिन मुख बिसाउन दिन्थिनन्‌ । उनमा कतै परिवर्तन आउला भन्नै त मैलेसोचेकीसम्म पनि थिइनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
“साँच्चै उनी परिवर्तन भएकी नै हुन्‌ त&#039;, सिन्धुले सोधिन्‌ । उमाले तासदेखाउँदै भनिन्‌, &#039;यो हात मैले खाएजस्तो छ सत्ता, अट्टा, नहल, रन छ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हो-हो तिमीले नै खायौ,&#039; सबैले एक्कै स्वरमा भने ।&lt;br /&gt;
डमालै तास फिट्दै भनिन्‌, &#039;शोभाले भनेको कुरा ठीक हो, मैले पनिगंगालाई भेटेकी थिएँ । उनी त हावा खुस्केझैँ भएकी छिन्‌ । त्यो भर्भराउँदोअनुहार कहाँ गयो होला ? उनी आफूमाथि प्रलय पन्यो भन्दै थिइन्‌ । शोभालेभनेको ठीक हो, म पनि उनको कुरा सुनेर वाक्कैदिक्कै परेँ । हामीलाई सहीबाटोमा हिँड भनेर अर्ती दिन्थिन्‌ । हामीले तिनलाई आङ नानी भनेर डाकेकोहोइन क्यारे । दुई दिनको जिन्दगीमा पनि रमाइलो नगरे कहिले रमाइलो गर्नुभनेर उक्साउने तिनै हन्‌ । हामीले आफनो मर्यादा कहाँ छोडेका छौं त : यसोरमाइलो गर्न एक, दुई पेग लगाइन्छ । तिनी नै सित्तै खान पाएपछि त कम्ताखान्थिनन्‌ ? सेकुवाले त तिनको पेट कहिल्यै भरिन्यैन । मेरो श्रीमान्ले अझैभन्दै हुनुहुन्छ- उमा म त गंगाले सेकुवा खाएको देखेर छक्कै परे, अहिले बडोअर्ती दिन्छिन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;उनले असहय पीडा भएरै त पोख्न खोजिन्‌ होला । यो काठमाडौँमायुवतीहरू पति असित्ता बर्षेझैँ वर्षेका छन्‌ । फिरोजजस्तो सुन्दर हुने-खानेकोछोरो पाएपछि युवतीहरूलाई कै चाहियो ? उसको एक नजर परेपछि युवतीहरूआगोमा 0000 पग्लन्छन्‌ । उसको डान्स र हाउभाउ देखेपछि आफ्नैजीउत हुन्छ&#039; उर्मिलाले उत्तर दिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
शोभाले कुरा थपिन्‌, &#039;कुरा त ठीकै हो ।&#039;&lt;br /&gt;
उमाले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;लौ अब पेग पनि लगाक छिटो जानुछ । लन्डनबाटबूढाका साथीहरू आउँछन्‌ रे ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;तिमरो बूढा गएको बीस, बाईस दिन त भयो होइन ?&#039; शोभाले सोधिन्‌ ।&lt;br /&gt;
“लन्डनमा आफनै मान्छैहरू भएकोले के-कसौ गरी पच्चीस दिनकारिसक्नुभयो&#039; उमाले भनिन्‌ ।&lt;br /&gt;
उर्मिलाले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;तिम्रो लोग्ने उतै बिवाह गरेर बसे जस्तो छ है उमानव भिस्सा सिद्धिएपछि त्यहाँ बस्न पाइन्थ्यो र ?&#039;&lt;br /&gt;
सिन्धुले उमालाई बिस्तारै पिट्दै भनिन्‌, हेर, उमाले रातोकालो मुख पारेकी ।उफ ! त्यति ठूलो मान्छेले केही मिलाए होला ति ! भैगो पीर नगर ।&#039;&lt;br /&gt;
तिमीहरूले एउटा सानो करा पायौ भने आकाश-पाताल छुवाउँछौँ । पर्सिआउँदै हुनुहुन्छ । ल खानेकुरा पनि आयो । चिकेन चिल्ली त सिन्धुले बनाएजस्तोछैन है,&#039; उमाले भनिन्‌ ।&lt;br /&gt;
उर्मिलाले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;चिकेन चिल्ली मात्र हो र यिनलाई त केही पनिबनाउन आउँदैन । वी सब होटलबाट ल्याएकी हुन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
सिन्धुले उत्तर दिइन्‌, &#039;तिमीलेचाहिँ खुबै मीठो पकाउँछयौँ ? कान्छी गएपछितिम्रो घरमा खाना सबै वर्डकिलासको हुन्छ । किन तिम्रो मन दुखाउनु भनेरचुप लाग्छौं हामी । आइन्दा तिम्रो घरमा पति होटलकै खाना हुनुपर्छ, । थुक्नु ननिल्नुजस्तो खानेकुराले टार्न पाइँदैन नि !&#039;&lt;br /&gt;
सबैले रक्सीको गिलास ढोक्काएर चेस भने । प्रतीक्षाले खिन्न स्वरमाभनिन्‌, &#039;साँच्चै नरिसाक उमिंला कान्छी गएपछि त तिम्रो घर मसानघाटजस्तैभएछ । कान्छीले बत्ताएको सबै खानेकुरा आयातीतभन्दा पनि स्वादिलो हुन्थ्यो ।मलाई त तिम्रो घरमा पस्यो कि झट्ट कान्छीकै झल्को लाग्छ । उसले पकाएकोमृगको सुकुटी सम्झँदा अहिले पति मुखबाट पानी आउँछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&amp;quot;अँ साँच्चै, त्यो मृगको सुकुटीको स्वाद त मैले पनि बिर्सेकी छैन । त्यस्तैबनाउन लाख कोसिस गरेँ, कहाँ बनाउन सक्नु ? जादु नै थियो कान्छीकोहातमा जादु,&#039; शौंभाले पनि कुरा थपिन्‌ ।&lt;br /&gt;
प्रतीक्षाले भनिन्‌, &#039;मैगो ! कान्छीको क्रै छोड । उसको चरित्रले गर्दा त होनि उर्मीले निकाल्न बाध्य भएकी नत्र किन निकालिन्थिन्‌ ? सबै खानेक्राहोटलबाट ल्याउने गर्दागर्दै डाडु पन्यौं नै चलाउन बिसिंएला । कहिलेकाहीँयसो मान्छै आउने भनेको दिनमा मात्र भान्सामा पसिन्थ्यो, त्यो पनि छोड्यौँभनै खोई के काम गर्नु ?&#039;&lt;br /&gt;
उर्मिलाले हस्कीमा पानी थप्दै भनिन्‌, &#039;मलाई माया गर्ने यही प्रतीक्षा छिन्‌ ।जे-जे भन्छौ भन सहनै पम्यो । सधैँ कान्छी-कान्छी भन्छौँ तिमीहरूको घरमाभएको भए कान्छी दुई दिन टिम्दैनथी होला, मेरो घरमा पन्ध्र-सीह् वर्ष बसीत्यो कम भयो तिमीहरूलाई ? घरलाई नै कोठी सम्झेपछि के गर्नु त ?&#039;&lt;br /&gt;
शोभाले प्याच्च भनिन्‌, &#039;अहिले त तिम्रो घरमा काम गर्नेहरू फेर्नुपरेको छैनहोला हगि ?&#039; मोरी थाहा नपाएझै गछयौ । कान्छी र शालुको सम्बन्ध हामीलाईथाहा नभएको हो र ! तोतेबोली नफुटेदेखि नै शालुलाई कसको माया लाग्छभनेर सोध्यो भने दिदीको माया लाग्छ भन्थिन्‌ । त्यही शालुको मायाले अल्झेकीहुन्‌ कान्छी । यदि तिम्रो इशारामा शालु हिँड्ने भए शालु तिम्रोपछि लागेरआउँथिनन्‌ ? बुझने भएदेखि एक दिन शालु पार्टीमा आएकी छिन्‌ ? हेर हाम्राछोराछोरीहरूले कहिले हामीलाई छोड्छन्‌ ?&#039; उर्मिलाले स्वादै हवीस्की तानिन्‌ ।&lt;br /&gt;
प्रतीक्षाले शोभातिर हेर्दै भनिन्‌, &#039;यी शोभा, नशा लागेपछि बढी कुरा&lt;br /&gt;
६१ ।&lt;br /&gt;
गर्छिन्‌ । मेरो छोरो पनि त तिमीलाई कसको माया लाग्छ भनेर सोध्यो भनेसाहिँला दाइको माया लाग्छ भन्छ नि ! त्यस्तो सानो क्रालाई लिएर के करागरेकी ? ल उठौँ पनि ।&#039;&lt;br /&gt;
सबैले फोनमा आफनो-आफनो ड्राइभरलाई बोलाए । ड्ञाइभर कार लिईआएपछि आ-आफनो घरतर्फ लागे ।&lt;br /&gt;
चौघ&lt;br /&gt;
हाई मौसमी, कति लेट गरेकी ? यति ढिलो गर्छर्यौ भन्नै थाहा पाएको भएतिम्रो डेरामा नै आउँदै ।&#039;&lt;br /&gt;
मौसमीले कारमा बस्दै भनिन्‌- &#039;मैले कहिल्यै ढिलो गरेकी थाहा छ ! बाटोजाम भएपछि कसको के लाग्छ ?&#039;&lt;br /&gt;
हेन क्रिन बाटो जाम भएछ ?&#039;&lt;br /&gt;
साइकललाई बसले हान्यो भन्थे हो कि होइन पत्तो छैन । तपाईंलाई तकालो चस्माले पनि साह्रै राम्रो पो देखिँदोरहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
निमेषले मौसमीको गाला मुसादै भन्यो, &#039;मैगो नफुर्क्याक । तिमीलाई भेटेपछिम चैनले कनै रात निदाउन पाएको छैन, तिमीले त मन मुटु सवै लग्यौ यार! मलाई त आफू रित्तै भएजस्तो लाग्छ । अँ, भन आज कहाँ जाने ? तिमी जहाँभन्छयौ त्यहीँ जान यो ज्यान हाजिर छ।&#039;&lt;br /&gt;
“तपाईँलाई कुरा गर्न कसले सिकाओस्‌ ? यस्ता शव्दहरू मलाई मात्र भन्नेहौ कि अरूलाई पनि भनिन्छ ?&#039;&lt;br /&gt;
निमेषले नशालु हाँसो हाँस्दै भन्यो, &#039;कतिपल्ट भनौं जैले तिमीजस्ती अप्सराभेटेकै छैन भनेर । तिमीजस्ती राम्री अर्को भेटेको भएचाहिँ कै भन्थेँ भन्नसक्दिनँ, अव भने मैले मेरा सारा जीवन तिमीलाई न्यौछावर गरिसके । अबमल्हम लगाक या चिथोर तिम्रो जिम्मा । भन यार कता जाने आज पनिनगरकोट नै जाने कि अन्तै ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ त्यतै जाकँ, गाउँमै देखेकाजस्ता डाँडाकाँडा हेरेर अस्तिको जस्तोदुई-चार दिनचाहिँ वस्न सक्दिनँ नि ! भोलि नै फर्कने भए नगरकोट नै ठीकछ । घरमा विवाहको कुराचाहिँ चाँड्धै गर्नोस्‌ है । फेरि छोराछोरी पाइसकैपछिबिबाह गरौँला भन्नुहोला नि ! हाम्रो भेट भएको पनि वर्ष दिन हुन लागिसक्यो ।कति लुकिछिपी एक-अर्कामा हराउनु, विवाह गरे सबैको मुखमा बुझो लाग्थ्यो ।अरूभन्दा पनि त्यो ७014 हाम्रो प्रेम फल हुन्छ भन्ने एकरत्ति पनि विश्वासगरेकी छैन । भन्छै &amp;quot; तिमीले आफनो अस्तित्वलाई बिकाउन नहुने&lt;br /&gt;
ब्र||&lt;br /&gt;
थियो वुझयौ !&#039; उसको कुरा सुनेर म छक्क परेँ । उसले हामीवीचको सम्बन्धकसरी थाहा पाई ? मैले उषासंग तपाईँसँग कसरी भेट भयो भन्ने मात्र कुरागरेकी थिएँ । उषाले नै शालुसँग क्रा गरेकी हुनुपर्छ । उषा पनि कम्ता डारेछैन । रोहिणी भने आजकाल प्रेमको सपोर्ट गर्छिन्‌ । रोहिणीले शालुसँग हाम्रोभेटलाई आकस्मिक घटना नै हो भनेर जिह्री गरिन्‌ । शालु भन्दै थिई- त्योआकस्मिक घटना होइन, मौसमीलाई जानी-जानी त्यो युवकले धक्का दिएकोहो । मौसमी लडेपछि मौसमीलाई उठाएर कारमा लग्यो होला, माफ माग्यो होलाअनि यिनीहरूको प्रेमप्रसङ्घग सुरु भयो होला, ल हो कि होइन भन मौसमी ! मउसको कुरा सुनेर तीनछक्क परेँ । वास्तवमा हाम्रो प्रेमप्रसङ्ग त्यसरी नै सुरुभएको थियौ होइन त ? मलाई खासै ठूलो घाउ लागेको थिएन ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीले भनिन्‌- &#039;शालुले प्रेमसँग खेल्नेहरू मात्र धेरै देखेकी हुनाले यसलाईसबै प्रेम गर्नेहरूसंग घृणा लाग्छ । कुरा पत्ति हो । शालुले तिम्रो नराम्रोचिताएकीचाहिँ पक्कै होइन ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले नम्र स्वरमा भनिन्‌, &#039;वास्तवमै प्रेम गर्नेहरू विवाहअगाडि वास्नामारम्दैनन्‌ । योचाहिँ वास्तविकता हो । तिमी अहिले पनि कुमारी नै छ्यौ भनेतिम्रो प्रेम सफल हुन्छ अन्यथा... भन्दै हिँडी । भन्नोस्‌ निमेष तपाईँ झूट होकि, शालु &#039;झुटी हो ?&#039;&lt;br /&gt;
निमेषले कोधित स्वरमा भन्यो, &#039;कुनचाहिँ रहिछे त्यौ शालु भन्ने । त्यसलाईबीचवाटोमा तमासा गरिदिन्छु, अनि खान्छे । हेर, सबै मान्छेको कुनै न कुनैशात्रु हुन्छन्‌ । क तिम्रो गरु हो । तिमी गाउँबाट आएकी मान्छेले काठमाडौंमैघर भएको कार भएको केटा पाउँदा त्यसलाई जलन भयो हौला । त्यस्ताकोकुरामा होइन मैयाँ, मेरो कुरामा विश्वास गर । मबाट धौका हुँदैन भनेपछिहँदैन ।&#039; निमेषले कारको ब्रेक लगाएर मौसमीलाई चुप्पा खायो र फेरि कारगुडायौ । मौसमीले निमेषलाई समातेर पसुुतक [कक म्‌स्क्राई । कार गन्तव्य भेट्नगुडेकै थियो । मौसमीले धेरैबेर मौन रहेपछि भनी, &#039;मलाई डक्टर बन्नु भनेरछोडेर गएका थिए बावुले, मैले भाग्यले तपाइँलाई भेटेँ । बाबु तपाईंजस्तोज्वाइँ पाउँदा घेरै खुसी हुनुहुन्छ । तपाईंको बानु-आमाले मलाई के भन्नेहोला ? हुन त मेरो बुबाले मेरो खुसीका लागि माझपाटोमा घरवारी सबै बेच्नसन्नुहुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
निमेषले हाँस्दै भन्यो, &#039;त्यो क्रा तिमीले धन्दा नै नमान । तिम्रोतर्फबाटसम्पूर्ण खर्च म नै गरौंला । म पनि काठमाडौंबाहिरकै भएको हुँदा तिम्रो पीडाबुमाख। पहिला हामीलै पनि त्यही खोले सिस्नो त खाएका हौं नि ! बाबुले&lt;br /&gt;
काठमाडौंमा &#039;फरेर घरजग्गाको कारोबार गर्नुभएकोले तिमीलाई कारमा&lt;br /&gt;
हुइँम्याउन पाएको छु । यही कारले गर्दा त तिमी पनि मसँग छ्यौ नत्र तिमीलेमलाई के गन्धेक ! होइन भन त ?&#039;&lt;br /&gt;
ब्‌&lt;br /&gt;
&#039;उफ ! फेरि त्यही करा । हजुरको कारले गर्दा होइन महाशय, हजुरकोमायाले गदा आफलाई सम्पेकी ह । मत्त पराउन त गाउँदेखि यौ सहरसम्ममलाई मन नपाउने मान्छे छैन भने पनि हुन्छ ।&#039; हाम्रो क्याम्पसमा एउटाआकाश भन्ने केटो छ क भने कुनै केटीको रूप नै हेर्दैन । तपाईंले पनिमेरोबाहेक अरूको रूप नहेरे हुन्थ्यो नि !&#039;&lt;br /&gt;
तिमेषले हाँस्दै भन्यो, &#039;तिमीचाहिँ कसले मलाई हेर्छ, कसले मलाई हेर्दैनभनी विचार गर्नै रे, मचाहिँ तिम्रो मात्र रूप हेर्नै ? ल बाबा ल अबदेखि अरूकेटीहरूलाई देख्यो भने म आँखा चिम्लेर हिँड्छ, हुन्छ ?&#039;&lt;br /&gt;
निमेषको कुराले मौसमी हाँसी मात्र ।&lt;br /&gt;
निमेषले कुरा बढायो । मैपाँ नेपालमा घम्नै ठाउँज्ञति घुमिसकियो । तिमीएक रातभन्दा दुई रात एउटै ठाउँमा बस्न मान्दिनौ । यसो इण्डियाको दार्जिलिङनैनितालतिर पो जाने हो कि ! घुम्नलाई मौसम पनि ठीक छ ।&#039;&lt;br /&gt;
मौसमीले खुसीले बुरुक्क उफ्रंदै भनिन्‌, &#039;हुन्छ त्यसै गरौँला । बरु कहिलेजाने चाँडै कुरा मिलाउनोस्‌ वाबु छाती-छाती के-के दुखेर काठमाडौँ आउँदैछन्‌रे । उनी आएपछि जचाउँदा, रिपोर्ट लिँदा चार-छ दिन लागिहाल्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
“त्यसो भए अर्को हप्ता जाउँला । तिमीलाई अरू केही गहनाहरू चाहिन्थ्योकि ? आजकाल गहनाको करै गर्दिनौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
तीच-चार सेट गहनाहरू भइसके के गहनाको कुरा गर्नु : अब सबैगहनाको रहर पुग्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
अब भने मैयाँले पैसा बचाउने भइन्‌ । तिम्रो नाममा दुई-घार रोपनी जग्गाकिनौं भनेको हेरन राम्रो जग्गा नै पाएको छैन । ल जग्गाको करा छोडौं । तिम्रैसौन्दर्यको करा गरौँ । तिमीलाई यो टिसर्टले भन्दा हल्का गुलाबी टिसर्टले अफआकर्षित देखिन्थ्यो । मलाई टाइट फिटिङभन्दा अलि गला खुल्ला भएको कपडामन पर्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
स्वतन्त्र हुन्छयौ कि के हुन्छयौ त्यो त गेस्टहाउसमै गएपछि थाहा होलाप्राण प्यारी । पिउनचाहिँ अहिले नै हल्का पिउने कि बेलुका मात्र त्यो तिम्रोमर्जी । अव नगरकोट पनि आइहाल्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
मौसमीले निमेषलाई हल्का चिमाट्दै भनिन्‌, &#039;पिएपछि तपाईंलाई के हुन्छथाहा नपाएकी हो र ? अस्ति त्यत्रो मान्छेको सामू ........... । रोष्टुराँका सबैमान्छैको आँखा हामीतिरै थियो । म त लाजले पानी-पानी भएँ । मान्छेको सामुकेही भन्नु पनि कसरी ?&#039;&lt;br /&gt;
तिमी गाउँबाट भर्खर आएकीले केही असजिलो लागेको हो । देख्दिनौ,बाटा-घाटामा लिसो टाँसिएझैँ टाँस्सिँदै हिँडेका । अब हात समातेर नहिँद&lt;br /&gt;
00 0&lt;br /&gt;
चुम्मा-सुम्मा नगरे त पूरा असभ्य ठहरिन्छ । हामी त हुनेवाला श्रीमान्‌-श्रीमतीहौँ । जे-जे गरे पनि चल्छ । प्लिज थोरै पिछ है । वरु बाहिर ननिस्किउँलाहामी गोठालेले नगरकोटको जस्तो दृश्य कति देखेका हौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
मौसमीले निमैषको कुरामा स्वीकृति दिई विल रेस्दुरेन्टाभत्र पसैर पहिलाबस्नै रूमको व्यवस्था मिलाए । अनि खानाका आए । त्यहाँ खाने मौसमीकोजोडी मात्र होइन बैँसको उन्मान्दमा रम्नेहरू अरू तीन जोडी पनि आएकारहेछन्‌ । निमेषले उनीहरूनजिकँ गएर भने, &#039;तपाईँंहरू आज यतै बस्नुहुन्छ किफर्कनुहुन्छ ? कहाँबाट आउनुभएको ?&#039;&lt;br /&gt;
अर्को गुपको एउटा युवकले भन्यो- &#039;हामी वुटवलदेखि आएका हौँ । एक-दुईदिन मात्रै बस्छौं होला । तपाईंहरू कहाँबाट नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हामी त काठमाडौंबाट आएका हौं । हामी दुईजना मात्र छौं । तपाईंको ग्रुपदेखेर साह्टै रमाइलो लाग्यो र सोधेको हँ ।&#039;&lt;br /&gt;
बुटवलबाट आएको अर्को युवकले भन्यो, &#039;हुन्छ तपाईंहरू पनि हाम्रै ग्रुपमाआउनुहोस्‌ । आखिर हामी सबै अविवाहित नै हौं । हामी सबैको कुरा मिलिहाल्छ ।वस्नोस्‌ कुरा थोरै फरक छ, तपाईंले मुन टिप्नुभएछ, हामीले जून अरू याबत्‌कुराहरू त उस्तै-उस्तै हुन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
निमेषले हात समातेर मौसमीलाई बसाउँदै भने, &#039;महाशय, तपाईँ त कविपो हनुहँदौरहेछ- ल अरू पनि सायरी सुनौँ न ।&#039;&lt;br /&gt;
बुटवलबाट आएको अर्को युवकले मुख बिगार्दै भन्यो, &#039;हेर्नोस्‌ यसको एक-दुई अरू सायरी सुन्नुभयो भने तपाइँ अर्कै रेस्द्रेन्ट जानुहोला । बरु परिचयगरौं खाकँ-पिङँ अनि घुम्न जाकँ ।&#039;&lt;br /&gt;
सबैले आ-आफूनो परिचय दिए । तीन जोडी प्रेमी-प्रमिकाचाहिँ बुटवलक्याम्पसमा नै पढ्ने रहेछन्‌ । कवि युवाको भरपाहि जुलजला [टवल सुब्कानगरमा नैरहेछ भने अरू बुटवलमा डेरा गरी पढ्ने रहेछन्‌ । गर प्रेम परेको छ-सातमहिना त कसैको प्रेम परेको वीस-बाइस दिन मात्र भएको रहेछ । त्यस ग्रुपमामौसमी र निमेषको प्रेम परेको धेरै भएको रहेछ । सबैको कुरा सुनेपछिबुटबलको कविले हात हल्लाउँदै भन्यो-&lt;br /&gt;
तपाईंहरू आलि पाको,&lt;br /&gt;
हामी अलि काँचो,&lt;br /&gt;
बिहे गर्नु पहिले नै&lt;br /&gt;
हनिमुन मनाउन आको ।&lt;br /&gt;
हनिमुनपछि डोकौँला&lt;br /&gt;
बिहेको पञ्चे बाजा&lt;br /&gt;
प्&lt;br /&gt;
भौक लागेको छ अहिलेचाहिँ&lt;br /&gt;
खाँ मागी खाजा ।&lt;br /&gt;
बुटवलको कविको कुरा सुनेर सबै मरी-मरी हाँसे ।&lt;br /&gt;
निमेषले हाँस्दै भन्यो, &#039;तपाड्गै त आँसुकवि नै हुनुहुँदौरहेछ, कुत साइतलेहामी सचैको भेट भयौ ।&#039;&lt;br /&gt;
बुटबलको कविले फेरि भन्यो, &#039;कालो-कालो सर्ट लाको, नीलो रहेछ पेन्ट ।&lt;br /&gt;
सबैजना उस्तै खुसी हुँदा हाम्रो भेट । ।&lt;br /&gt;
अर्कोले हाँस्दै भन्यो, &#039;चुप लाग जप, तिम्रो कविता सुन्दा-सुन्दा वाक्क भएरव्यन्द्राले पनि छोडलिन नि फेरि ।&#039;&lt;br /&gt;
निमेषले हांस्दै भन्यो, &#039;ल .. ल वाहा भयो हामीभन्दा त तपाईहरू नै पाकोहुनुहुँदो रहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
जयले हाँस्दै भन्यो, &#039;उनले अन्तै बिहे गरिन्‌ । झन्डै पागल भाको, चन्द्राकोमायाले नै नगरकोट घुम्न आ&#039;को । ल... ल अब यो हँसिमज्ञाक छोडौँ केहीखाकँ । विवाहपछि चन्द्राले कवि बन्तोस्‌ भनिन्‌ भने म अवश्य कवि बन्छु ।यति भनी जयले ओठ बन्द गौ ।&lt;br /&gt;
अर्कोलै भन्यौ, &#039;भो ... भो कवि हुने सपना नदेख । फेरि भएको घरखेतजाला र चन्द्राको बिजोक होला । यो जमानामा कबिलाई कसले मान्ने ? हेरमति विग्रैर कवि भयो भन्छन्‌ । खेत बेचेर कबिता छपायो भन्छन्‌ । अलि..अलितिमी कबिचाहिँ हौ । तर आइन्दा कविता लेख्ने भूलचाहिँ नगर है । बरु खेतकोगड्दा किन, घरको तला थप कविचाहिँ नबन । यो राष्ट्रले साहित्यको मूल्यबुझ्दैन ।&#039;&lt;br /&gt;
जय- &amp;quot;ले ... ल अब कवि र कविताको कुरा छोडौं । पेटको क्रा गरौं ।अहिलै तातो-चिसौ केही पिउने कि नपिउने ? मेरी चन्द्राचाहिँ पिउँदिनन्‌ ।&lt;br /&gt;
निमेषले हाँस्दै भन्यो, &#039;हेर-हेर अहिलेदेखि अधिकार जमाएको यो त भएतहर&lt;br /&gt;
हो-हो यौ भएन भन्दै सबैले एवकै स्वरमा भने ।&lt;br /&gt;
चन्द्राले भनिन्‌, &#039;मेरो अलि पिउने वानी छैन ।&#039;&lt;br /&gt;
सबैले भने, &#039;थोरै त पिउनैपर्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;चन्द्राले सबैको कुरालाई स्वीक्कार गरिन्‌, केटाहरू बाईस-चौबीस वर्षका रकेटीहरू अठार, बीस वर्षजतिका थिए । भोलिलाई बिर्सेर सबै नशामा र एक-अर्काको अङ्गालोमा रमाइरहेका थिए ।&lt;br /&gt;
बैटरले मनमनै सोच्यो- &#039;कठै ! कहिलेसम्म धानको वालामा चराले वयलीखेलेजस्तै एक-अर्कांसँग खेलेका छन्‌ तर यी केटीहरूको जिन्दगी चाँडै टुक्रिनेछ। मैले थाहा पाएर पनि के गर्नु ? यी युवतीहरूको बृद्धिमा कीरा परेपछि ।&#039;&lt;br /&gt;
पन्ध्र&lt;br /&gt;
शालुले रौहिणीतिर हेर्दै भनिन्‌, &#039;रोहिणी तिमीले आजकाल पढाइमा त्यतिध्यान दिएजस्तो लाग्दैन मलाई । तिमीले त तपस्या गरेरै बाबु-आमा पाएकीछयौ । उनीहरूको सपना साकार गर्नुपर्छ नि । हामी जहाँ डाक्टर पढे पति सँगैपढ्ने है ? दिदीको अन्तिम इच्छा पनि त्यही छ ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीले उत्तर दिइन, &#039;पढ्नै कोसिस त गर्दैछु । मलाई डाक्टर बन्छु जस्तोलाग्दैन । किताब पल्टाउँछु मलाई त चक्कर नै लागेर आउँछ । ल पढाइकोकुरा छोड, आशाको कुरा गर, आशाले प्रेम गरेको क्रा याहा पाउँदा-पाउँदैतिमीले उनको प्रेममा त कुनै प्रतिक्रिया नै जनाइनौ नि ! अबचाहिँ तिमीलेअरूको भविष्यको चिन्ता गर्न छोडिछयौ, रामै लाग्यौ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले गम्भीर भएर भनिन्‌, &#039;रोहिणी तिमी पनि, मैले यहाँ सच्चा प्रेमगर्नेहरू छँदै छैनन्‌ भनेकी कहाँ छु र ? सच्चा प्रेम गर्नेहरू हिजी थिए । आजपनि छन्‌, भोलि पनि हुनैछन्‌ । म प्रेमकै विरोधीचाहिँ होइन । आशक्त अङ्गालोमाप्रेमभन्दा वास्ना वढी हुन्छ भन्न खोजेकी मात्र हुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;प्रेम मात्र भयो वास्ता नै भएन भने पनि जीवन तहसनहस हुन्छ होइन00&lt;br /&gt;
“रोहिणी, तिमीले मेरो क्राको आसय नै बुझिनौ । विवाहपछि सुखानुभूतिकालागि सबै चाहिन्छ । मैले बिवाहपछिको त कुरै गरेकी छैन । विबाहअगाडिकुमारीत्व नगुमाउन्‌, मेरो सोचाइ यति मात्र हो । तिमीले आशाको प्रेमको कुरागा्यौ। आशाको प्रेम फूल र भमराको जस्तो प्रेम होइन, मलाई थाहा छउनीहरूको प्रेम सफल पनि हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणी शालुको कुराले हर्षित भइन्‌ । तर, रोहिणीलाई आफू र प्रशन्तवीचकोकुरा शालुलाई भन्नै आँट नै आएन । रोहिणी शालुसँग बिदा भएर क्याम्पसबाटघर आइन्‌ । कौठामा पसेर सोचिरहिन्‌- &#039;शालुले भनेको क्रा ठीक हो । विवाहपहिला नै कमारीत्व गुमाएपछि सुहागरात्तको त महत्व नै रहेन । रौहिणीलैप्रशन्तको सम्झनामा डुबुल्की मारिन्‌, प्रशन्न थुप्रैपन्टको भैटमा पनि आफूसँगबोल्न डराउँथै । हृदपभरि प्रेम भएर पनि पोख्न धक मान्थे । मैले तपाईंबिनाबाँच्न सक्दिन भनेपछि बल्ल हर्षको आँसु झारे । त्यो क्षण हिजोजस्तै लाग्छ तरमहिनौँ भएछ । शालुको हृदयमा कसैले बास नगरेको भएर नै क पढ्न सम्छै&lt;br /&gt;
पि&lt;br /&gt;
तर म कसरी पढौं : जव किताव-कपि खोल्छु म प्रत्येक अक्षर- अक्षरहरूमाकेवल प्रशन्नलाई नै देख्छु । ममी र बाबाले प्रशन्नलाई मन नपराउनुभएकोभए सायद म मधे होला । प्रशन्न आफनो असल व्यक्तित्वले गदा सबैकोआँखामा अटाइहाले । उनी पढ्न गए भने म कसरी बाँच्नु ? प्रशन्नको पनि धेरैपढ्ने रहर छ । एक दिन नदेख्दा त मलाई यति छटपटी हन्छ भने वर्षौंसम्मनदेख्दा के गरौँली ? कल्पना गर्दा मात्र पनि रोहिणीको आँसु झन्यो । उनीधेरैबेर रोइन्‌ ।&lt;br /&gt;
पीताम्बराले कोठाभित्र पस्दै भनिन्‌, &#039;वानी कुन बेला आयौ : तिमीलाईभौक-प्यास केही लाग्दैन कि क्या हो ? आजकाल खाना त खोज्दै खोज्दिनौ ।हामीले सवै बुझेका छौं । तिमी प्रशन्न बाबुकै चिन्तामा डुबिरहन्छुयौ । तिमीहरूकोमाया देल्लेर आज बिहान हामी सबैजना बसी एउटा निष्कर्ष निकाल्यौँ ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;कस्तो निष्कर्ष ममी ?&#039;&lt;br /&gt;
पीताम्वराले सोफामा सजिलोसँग वस्दै भनिन्‌, &#039;हेर अहिले नै तिमीहरूकोविवाह गरिदिङँ मने त्यो मिल्ने कुरै भएन । प्रशन्तबाबुले बाहिर पढ्न जानपाङ्चलात्‌ भनेर कुरैर बसौं भनै पाउने हो कि नपाउनै हो । केटाहरूले त जतिवर्षमा विवाह गरे पनि फरक पर्दैन । केटीहरूलाई वाईस-चौबीस वर्ष काटेपछिबूढीकन्या भन्न थाल्छन्‌ । त्यसैले प्रशन्तबाबुलाई चाँडैभन्दा चाँडै पढ्नपठाउनुपत्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीले दिक्दार स्वरमा भनिन्‌, &#039;हामीसँग त्यति घैरै पैसा कहाँछत?हामीलाई कसले सापट दिन्छ र !&#039;&lt;br /&gt;
परीताम्बराले सम्झाइन्‌, &#039;अहिलेलाई पठाउन मात्र कान्छीको घरजग्गा बेचेरआएको पैसा रहेछ । त्यसैले पुगिहाल्छ । हाम्रो कार व्यथैं वन्केको छ । यहीबेचेर पछि चन्द्रकान्तहरूले घर बनाउनेछन्‌ यही सल्लाह भयो । पछि पैसापठाउन त ट्याक्सी चलाएको पैसाले पुगिहाल्छ । त्यसमाथि पेन्सन छँदैछ ।पछि यो घरको चाहिँ तिमीले आश नगर, यो घर रेष्माको हुन्छ । बाँकी चार-छ आना जग्गा फूलबारी र करेसाबारीले ओगटेको छ । त्योचाहिँ हामी मरेपछिजे-जे गछौँ गर । अहिलेसम्मको हाम्रो सौचचाहिँ हामी बूढा-बढी चन्द्रकान्तहरूसँगबस्छौं । उनीहरूको पनि यही इच्छा छ । हेर्दै जाउँ के हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
“आमाको कुराले रोहिणी धेरैबेरसम्म मौन रहिन्‌ र भनिन्‌- &#039;तपाईंहरूले जेसोच्नुभयो हामीहरूको भलाइका लागि सोच्नुभयो । म हजुरको कुरामा ज्यादैखुसी छ । दाजु-दिदीदेखि लिएर हामी सबैको जीवन हाँसी-खुसी वितोस्‌ । अरूके नै चाहिन्छ र ।&#039;&lt;br /&gt;
पीताम्बराले भनिन्‌, &#039;हुन्छ त प्रश्नलाई आज यतै खाना खान बोलाक ।कहाँ पढ्न जाने हो उहाँको इच्छा पनि त बुझनुपन्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
चय&lt;br /&gt;
“साँच्चि प्रशन्तको आमालाई कस्तो छ रे : मैले त सोध्नै विसँछु ।&#039;&lt;br /&gt;
“अँ ममी, अहिले त राम्रै छ रे, हामीले पठाएको पैसाले घरबारी निखन्तदेखिभैँसी कित्नसम्म पैसा पुग्यो रे । अहिले त प्रशन्तको आमा ज्यादै खुसी हुनुहुन्छरै । हुन्छ त म प्रशन्नजीलाई खाना खान डाक्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;आउनुहोस्‌ प्रशन्नबाबु ! हामी सबै तपाईँको प्रतीक्षामा वसेका थियौँ,&#039;केशवले बडो सभ्य भाषामा भने ।&lt;br /&gt;
प्रशन्नले सबैलाई नमस्कार गरेर सोफामा बस्दै भने, &#039;सबैलाई सञ्चै छ ?&#039;&lt;br /&gt;
केशवले उत्तर दिए, &#039;सञ्चै छ बाबु, आज एउटा सल्लाह गरौं भनेरबाबुलाई बोलाएका हौं । हामी रोहिणीको खुसीलाई आफूनै खुसी मान्छौं ।रोहिणीलगायत हामी सबैको इच्छा छ, तपाईँलाई इन्जिनियर पढ्न पठाउने ।जहाँ पढ्न जाँदा राम्रो हुन्छ त्यहीँ पढ्न जानोस्‌ । हामीले राहिणी अंशभागभनौँ या जे भनौं त्यो तपाईँको पढाइमा लगाउने भयौं । रोहिणीले पनि त्यहीभनिन्‌ । कनै पनि कुराको पहिले नै विचार पुग्याउनु राम्रो हुन्छ, तपाईँ पनिसोच्नोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
केशवको कुराले प्रशन्नको आँखाबाट आँसु नभारी छोडेन । प्रशन्नलाईरौहिणीलाई भेट्नु, रोहिणीले प्रेम प्रस्ताव राख्नु सबै सपनाजस्तै लागिरहेकोथियो । पैसा नै लगानी गरेर पढ्ने कुरा त उनले कनै क्षण कत्पनासम्म पनिगरेका थिएनन्‌ । प्रशन्नले आँसु पुछ्दै भने, &#039;खोई म के भनौँ : रोहिणीलाईपाउनु मेरो ठूलो सौभाग्य थियो । यहाँहरूले मजस्तो गरिबलाई यति धेरैविश्वास गर्नुहोला भन्ने सोचेको थिइनँ । इन्जिनियर बन्छु भनेर दिलोज्यानदिएर पढेकै हुँ । आफूभन्दा थोरै पसेन्ट ल्याउनेहरूले जान पाए । आफू भने... ।&#039;&lt;br /&gt;
पीताम्बराले भनिन्‌, &#039;बाबनु ! हामी मतको गरिबलाई मात्र गरिब भन्छौँ ।हामीसँग पनि कै नै छ र ? बिहान-बैलुका हाँसीहाँसी एक पेट खान पायो भनेत्यो नै सुख हो । त्यो सुखचाहिँ भगवानले हामीलाई दिएकै छ भनौँ । हामीलाईरोहिणी डाक्टर बन्लिन्‌ भन्ने ठूलो आश थियो । हजुरसँग भेट भएदेखि रोहिणीलेखान पढ्न सबै वि्सेकी छिन्‌ । खोई कसरी डाक्टर बन्लिन्‌ उनी ? सबैभन्दाराम्रो कुराचाहिँ हजुर नै चाँडै पढ्न गए हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
आमाको कुराले रोहिणी लाजले निहरिन्‌ । प्रशन्तले पनि केही लजाउँदै भने,“कहाँ पढ्दा राम्रो हुन्छ, सबै कुरा बुझौँला ।&#039;&lt;br /&gt;
प्रशन्तको कुराले सबै खुसी भए । रोहिणीको त झन्‌ खुसीको सीमा नैरहेन । प्रशन्नले पनि आफनो जन्मलाई घन्य ठाने । सबैले हाँसीखुसीका साथखाना खाए । खाना खाएपछि सबैसँग बिदा भएर प्रशन्त आफतो डेरातर्फ लागेभने रोहिणी आफनो कोठातर्फ लागिन्‌ र पलङ्गमा पल्टिन्‌ । आँखामा त्यो क्षणआयो प्रशन्तलाई आफूले नयाँ डेरामा लग्दा प्रशन्नले त्यो घरलाई रोहिणीकै&lt;br /&gt;
द्र&lt;br /&gt;
घर सम्झे । त्यो कोठालाई रोहिणीकै कोठा सम्झेर भने, &#039;रोहिणी पति राम्रोकोठा यति राम्रो घर रहेछ । मजस्तो गाउँले यस घरमा आउँदा तिम्रो बाबालेके भन्नुहोला ?&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीले हाँस्दै भनिन्‌, भविष्यको इन्जिनियर साप यो घर मेरो होइन । योतपाईंको डेरा हो । तपाईंले नाइँ-नास्ती गर्नुहोला भन्ने सम्झी हामीले तपाईंलाईनभनी यो सजावट गरेका हौँ । सानो खाना पकाउने किच्नेन भित्र छ । यहाँबसेर पढ्नै, मलाई सम्झने वस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
प्रशन्नले कोठाको वरिपरि आँखा डुलाए । वक्सखाले पलङ, ठूलो खानदानीमानिस सुत्नेजस्ता ओछ्यान, सोफा, मेच, टेबुल काठकै बडौ सुन्दर दराज ।करियकरिव कोठा नै ढाको जत्रो नेपाली गलैँचा ओछ्याएको । अटयाज बाथरुम ।त्यो सबै हेरेर टाउको समात्दै प्रशन्नले भने, &#039;रोहिणी यो के गरेकी तिमीले ?कतिन्जैल यो थारो गाईलाई घाँस हालद्व्यौ ? म कहिलेसम्म तिमीहरूकोआदर्श परिवारलाई दुःख दिकँ !&#039;&lt;br /&gt;
&#039;आँटी छोरालाई बाघले खाँदैन&#039; भन्ने उखान छ नि ! पख्नोस्‌ पछि तपाईंकोकमाई भएपछि म एकएक गरेर सवै पैसा असुलिहाल्छु नि । अहिले भन्ने हाम्रोखुसीका लागि हामीले जे भन्छौँ बिन्ती मानिदितोस्‌ । यो कोठा ममी आफैँलेमान्छे लगाएर खोज्न लगाउनुभएको हो । तपाईं निरास हुनुभयो भने उहाँकोपनि मन दुख्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
प्रशन्न मन थाम्न नसकेर रोए । रोहिणीले लोग्नेमान्छे त्यसरी रोएकोपहिलोपल्ट नै देखेकी थिइन्‌ । रोहिणीलै सम्झाइन्‌, &#039;तपाईंले रुनुपर्ने त करैछैन । म तपाईँका लागि त प्राण नै दिन सक्छु । यदि म छिँडीमा सुतेकी हुन्थेभनै कै तपाईँ मलाई त्यही अवस्थामा छोडनुहुन्थ्यो त ? अबश्य सक्नुहुन्थेन ।मैले तपाईंलाई दुःख पर्दा यति पनि गरिनँ भने प्रेमको अर्थ नै के भयो र ?&#039;&lt;br /&gt;
प्रशन्नले आँस्‌ पुत्छदै भने, &#039;रोहिणी, तिम्रो ममीबाबाले मलाई यति मायागर्नुको पर्छाडि कुनै कारण त अवश्य छ । उहाँहरूको पनि प्रेमविवाह हुनुपर्छ,हो ?&#039;&lt;br /&gt;
&amp;quot;त्यो त होइन, क्रा के रहेछ भने मेरो बाबाको मामाधरनजिकै मेरीआमाको माइती रहेछ । मेरो हजुरआमा मरेपछि मेरो हजुरबावबाले सम्पूर्णसम्पत्ति रक्सी र सुन्दरीका लागि स्त्राहा पार्दै जानुभएछ । ममीको चारजनादाजुहरू बिवाह गरेर घर छौडी गएपछि मेरो हजुरबुबाको &#039;झन्‌ मनोमानीचलेछ । रक्सी खान पैसा नभएपछि मेरो हजुरबुबाले बाँचुन्जेल रक्सी खानदिनुपर्ने सर्तमा राधै साहुलाई सत्र बर्षकी ममी दिने कुरा गर्नुभएछ । पचास-पचपन्न वर्षको राधे साहले हुन्छ नभन्ने त कुरै थिएत । हजुरबुबाको सल्लाहमैक एक रात ममीलाई बलात्कार गर्न आएछ । मेरी ममी रोइकराई गर्दै राधे&lt;br /&gt;
७०&lt;br /&gt;
साहबाट बचेर बाबाको मामाघरमा आउनुभएछ । संजोक मैरो वावा पनि त्यहीदिन मामाघर बज्रबाराही जानुभएको रहेछ । बाबाको हजुरआमाले मेरो ममीकोबारैमा सबै कुरा बताएपछि बाबालाई ममीको धेरै माया लागेछ । त्यही दिनराति नै कसैको कुरा नसुनी ममीले नाइँ जान्त भन्दाभन्दै घिस्याउँदै आफनोघर ल्याउनुभयो रे । घर ल्याएपछि हजुरवा हजुरआमाले माहिलाले हाम्रा नाककाट्यो भनी धेरै चित्त दुखाउनुभयो रे । पछि हजुरवा र हजुरआमालाई ठूलौममीर आन्टीले धैरै हेला गरेपछि हाम्रै ममीवाबासँग आएर बस्नुभयो रे । हजुरबा,हजुरआमाले भनेको म अलिअलि थाहा पाउँछु । उहाँहरू पनि भन्नुहुन्थ्यो- &#039;मनसाचो हुने मान्छे मात्र गरिब हो नाती, पीताम्बरालाई हामीले चिन्न भूल गप्यौँ ।आज पछुतो लाग्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
प्रशन्तले सोधे, &#039;अहिले तिम्रो घरको हजुरबुबा, हजुरआमा, मामाघरकोहजुरबुबा खोई त ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;घरको हजुरबा, हजुरआमा म सानौ छँदैमा बित्नुभयो । मामाघरको हजुरबापनि म दस-वाह्र वर्षकी छँदा एकाविहानै रक्सी खाएर आर्यघाटमा नुहाउँछुभनेर जानुभएछ र असार महिनाको उर्लिरहेको आर्यघाटमा पस्नुभएछ । बाढीलेकता पुन्यायो पत्तै भएन रे ! मेरो ममी र बाबाबाट विबाह गरेको पन्ध-सोहबर्षसम्म पति बच्चा नभएपछि हजुरबा, हजुरआमाले बच्चा पाकन्‌ भनेरडाक्टर वैद्य आदिका लागि धेरै पैसा खर्च गर्नुभयो रे । हामी जन्मेपछि उहाँहरूज्यादै खुसी हुनुहुन्थ्यो रै । म जन्मैकै साल बाबा प्रशासन अधिकत हनुभएकोरे, त्यसैले मलाई छोरी भाग्यमानी छै भन्नुहुन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
प्रशन्नले भने, &#039;उहाँहरूको जीवनमा पति दुःख परेकै रहेछ । तिमीलाई चाहिँके भाग्यमानी भन्नु मजस्तो... ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;इलम भनेको लाख हो, धन भनेको खाक हो&#039; मेरो बावाममी सधैँ यहीभन्नुहुन्छ । तपाइंको इलम देखेरै तपाईंलाई मन पराउनुभएको हो । धनी तकाठमाडौंमा जति छन्‌ तर इलमी भने कम । मेरो ममीबाबालाई बाबुआमाकोसम्पत्तिमा रजाइँ गर्ने मान्छे त्यति मन पर्दैन ।&#039;&lt;br /&gt;
“मचाहिँ कसको सम्पत्तिमा रजाइँ गर्दैछु ? के म लाछी होइन !?&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीले रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;फेरि त्यही कुरा, मेहनत गर्दागर्दै नभएपछिकसको के लाग्छ ? हेर्नोस्‌ न म पछि फस्ट क्लास इन्जिनियरकँ श्रीमतीबन्छु।&#039;&lt;br /&gt;
प्रशन्नले भने, “रोहिणी, म तिम्रो हर सपना साकार पार्छु । तिम्रो आँखाबाटएक थोपा दुःखको आँसु &#039;फर्न दिन्न । यो मेरो प्रतीज्ञा नै भयौ ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीले प्रशन्तकै कुरा सम्झेर आधा रात बिताइन्‌ ।&lt;br /&gt;
सोह्न&lt;br /&gt;
&#039;मौसमी फेरि पनि आउन ढिला गन्यौ, आज पनि जाम थियो कि ;&#039;&lt;br /&gt;
मौसमीले कारमा बसेर लामो सास फेदै भनी, हेर्नोस्‌ न कस्तो बोर हिँड्नैलागेकी थिएँ, बाबु टुप्लुक्क आइपुगे । मलाई र कोठालाई देखेर ज्यादै खुसी हँदैभने, &#039;नानी, राम्रै जागिर पायौँ कि क्या हो ? यो कोठा र तिमी नै नचिनिनेभइछौ । मलाई ज्यादै खुसी लाग्यो, मैले देखेको सपना सबै साकार हुने भयो ।&#039;&lt;br /&gt;
मैले भने, &#039;हो बा राम्रै जागिर पाएकी छु । चाँडै अफिस पुग्नुपर्छ, भाँडाहरूमाभात, तरकारी छ झिकेर खानु, म गएँ, भरे क्रा गरौँला भन्दै फुत्किएर आएँ ।बाबु करौनी, घ्यूको कुरा गर्दै थिए म भरे सुनौला भन्दै टाप कसे । आज हामीकहाँ जाने त ?&#039;&lt;br /&gt;
निमैषले मुख बिगार्दै, कारलाई थानकोटतर्फ मोड्दै भने, &#039;पहीँ जानुपर्छभन्ने के छ र, बूढा पनि कस्तो साइतमा आएछन्‌ ? अब हामी पर्सि नजाने त ?बूढालाई कसैगरी भए पति घर पठाइदै पर्सि त जानैपर्छ । बुटवलकाकविवाहेक दुई ग्रुपचाहिँ हामीसँगै जाने रै । कविचाहिँ नजाने रे । त्यो च्याखुरेकवि त आफनै प्रेमिकाको कुरा हार्न नसकेर पो नगरकोट आएको रहेछ ।कविता सुहागरातको गरे पनि प्रेमिकालाई छोएकै रहेनछ । देखिनौ, त्यसकोप्रेमिकाको मुड कस्तो थियो । मोरा लाछीले प्रेमिकाको रहर पनि पुग्याएनछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;ए हो, तिनी किन रिसाइन्‌ भनेको त कारण त्यो पौ रहेछ, तपाइँहरूभने... । ल त्यो कुरा छोडौं, बाबुको पीर नगर्नोस्‌ । आउन त औषध-सौषधिके-के गर्न आएका रे, आजफैँ बहाना बनाई भौलि नै गाउँ पठाइदिन्छु । भोलिवेलुका उनीहरू बुटवलबाट आएपछि सँगै होटलमा बस्नुपर्छ है । साह्रै रमाइलाछन्‌ मोरामोरीहरू, धेरै हँसाउने त कबि हो त्यही नपुड्सक परेछ, नत्र किनमुखमा आएको फल छोडथ्यो । केटी मुर्मुरिइरहेकी थिई । अब कविलाई त्यसकेटीले पनि छोड्छे । बडो आदर्श बन्न खोज्दो हो मोरो, अब आदर्शको फलराम्रै चाख्छ त्यसले । अब इन्डियातिर घुमेर आएपछि चाहिँ हामी पनि विबाहगरौँ है ? अस्ति घरबेटी बाले भन्थे, &#039;तिमी छोरीजस्ती भएर भनेको आजकालतिम्रो रूपरङ्गग अर्कै छ । आफूलाई सम्हाल बा, नबु&#039;फी हिँड्दा अगाडि खोलोपछाडि भड्खालो होला ।&#039; सचैसबैले हाम्रो प्रेमलाई अङ्गगालोको माया भङ्गालोकोपानी नै सम्झैका छन्‌ । अबचाहिँ म सबैको घृणा सहन सब्दिनँ है ।&lt;br /&gt;
निमेषले मौसमीको गाला चिमोट्दै भने, &#039;हुन्छ मैयाँ अबचाहिँ विवाह गर्नेसमय आयो । इन्डियाबाट फर्केको पर्सिपल्टै झयाइँकुटी ठोकौंला । तिमीसँगटाढा बस्न कहाँ मन छ र ? तिमी तै मेरो सर्वस्व हौ । तिमी नभई एकक्षणपनि काद्न गाह्रो हुन थाल्यौ मलाई ।&lt;br /&gt;
ड्रि।&lt;br /&gt;
म पनि त तपाईँ भनेपछि ज्यान नै दिन्छु नि ! नत्र बाबुलाई ढाँटीढाँटी किनआउँथे ? साँच्चि अहिले त दार्जिलिङमा जाडो निक्कै होला, राम्रो कोट छैनकिनिदित्तोस्‌ । बुटवलकाहरू कस्ताकस्ता भएर आउलान्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;अक्कवरी सुनलाई कसी लाउनुपर्दैन ।&#039; तिमी त्यसै राम्री नै छ्यौ, उनीहरूलेजत्ति राम्रो लगाए पनि अनुहार त्यही हो । एउटी नाक चुच्ची, अर्की भ्यातुल्लीकाली तिमी उनीहरूका अगाडि त साँच्चै के भनौँ र भखरै फुलेको फूल जस्तैदेखिन्छयौ । कबिले तिम्रो बखान गर्दै थियो । म सोच्चेँ कवि त छदटु होला तरगर्जने बाघले खाँदैन भनेको सोह्रेआना ठीक रहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
मौसमीले कुरा थपी, &#039;कविहरू त अरूको भाबना बुझ्छन्‌ भन्थे । उसलेयहाँसम्म ल्याएर पेमिकाको भाबना नै बुझनेछ र त्यो सिकारु कवि भएर होलाहोइन ?&#039;&lt;br /&gt;
“मौसमी त्यो त के सिकारु कबि हुन्थ्यो, राम्चै कबि हो रे। आफन्त कोहीनभएर पो पछाडि परेको रहेछ मोरो ।&#039;&lt;br /&gt;
“साहित्यमा अगाडि बढ्न पनि आफन्त चाहिन्छ त ?&#039;&lt;br /&gt;
मौसमी जहाँ पनि आफन्तै चाहिन्छ रे । कवि त्यसै भन्थ्यो । कविले प्रेमिकाकोसाथचाहिँ पाउने भएन, अब कविले कविता लेखेरै मरोस्‌ । जाँ, के-के किन्नेहो । मलाई पनि राम्रो ज्याकेट छानिदेक, घुम्न जाँदा तिमीले नै छानेकोज्याकेट लाउँछ ।&lt;br /&gt;
मौसमी फुरुङ्ग भएर हाँसी । निमेषले कार फर्कायो । दुवै कपडा पसलतर्फपसै ।&lt;br /&gt;
ढोकामा आवाज आएपछि मौसमीको बानु 4004 ढोका खोल्दै भने,&#039;छौरी किन छिट्टै आयौँ ? अफिस छुदने समय त अझै भएको छैन क्या रे ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;मौसमीले कपडाहरू सोफामा राख्दै भनी हेर्नोस्‌ न बा, अपर्झट मलाईपर्सि नै अफिसबाट काजमा जानुपर्ने भयो, त्यसैले कपडाहरू किनेर ल्याएकी ।विष्णुराजले चिप्रा लागेका आँखाहरू पुछ्दै भने, &#039;नानी, सहनै नसक्ने गरी छातीबुख्ने गरेको तँलाई थाहा नै छ । हिजोआज त झन्‌ अचाक्ली छाती दुख्न थाल्योबा ! छोरा, बुहारीले नै पीडा कति सहन्छौ, एकपल्ट काठमाडौँ जँचाएर आउनुभनेर पठाएका हुन्‌ । नत्र पौ मइसिरमासमा यहाँ किन आउँथे ? आएपछिनजँचाई फर्किँदा के भन्लान्‌ ? तिमी कहाँ जान्छु भन्छयौ, म बूढोलाई कोसंगजचाउनुपर्छ थाहा छैन । तिमीलाई क्याम्पस भर्ना गर्न सहयोग गर्ने इन्द्रै पनिअरब गएछ, अब के गर्नु ल ?&#039;&lt;br /&gt;
मौसमीले भनी, &#039;अलिक दिनका लागि म छाती दुख्दा कम हुने औषधिकिनेर ल्याइदिन्छु त्यही लिएर जानु फेरि पछि आउनु अनि म राम्रोसँगजँचाइदिउँला ।&#039;&lt;br /&gt;
ज्बि&lt;br /&gt;
विष्णुराजले आँखाभरि आँसु पार्वै भने, &#039;ठीकै छ केही समयका लागि औषधिलेकाम चलाउँला । जागिर भन्नै कुरो आफूले चाहँदैमा पाइँदैन । मैलै गर्दाजागिरबाट हात धुनुपत्यौ भने नमज्जै हुन्छ । म भोलि नै घर जाउँला । घ्यू,सिरौंला, भागौ ल्याइदिएको छु राख । मलाई तातो दुई गाँस भात खान देक ।म त भोकले मर्न लागेँ बा !&#039;&lt;br /&gt;
मौसमीले राइसकुकर हेर्दै भनी, &#039;भात खानु त भनेकै थिएँ नि, किननखाएको त ?&#039;&lt;br /&gt;
हिउँजस्तो चिसो भात, त्यसमाथि दाल, तरकारी कहाँ थे केही मेसो पाइनँ ।भात त देखेकै हँ । तताउनै ढङ्ग भएन ।&lt;br /&gt;
मौसमीले स्वीच अन गर्दै भनी, &#039;ल म भात तताइदिन्छु हात घौएर आउनोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;भात त आगोमा नै तताइदेक, चिसो खाने भए त अघि नै खाइहाल्थे ति !&#039;&lt;br /&gt;
मौसमीले दाल तरकारी ओभनमा राखेर तताई, भात राइसकुकरमै तताई ।केही क्षणमै तातोतातो दाल, तरकारी भात पस्केको देखेर बूढाले तीन छक पर्दैभने, “नानी ! तैँले के जादु गरिस्‌ हँ  बिनाआगो सबै खानेकुरा हेर्दाहेर्दै तताइस्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
मौसमीले करेन्टबाट सब्रै पाक्छ, तात्छ भनेर सम्झाएपछि कृ्‌ष्णराजको मनकेही शान्त भयो । उनलै खपाखप भात खाए । आफनी छोरीको प्रगति देखेरकृ्‌ष्णराजले सवै पीडा भुले । छोरीतिर हेर्दै भने, &#039;यज्रो सहरमा तिमीलाई एक्लैछाडेर जाँदा तिम्रो पीरले कति दिनसम्म त उद्नै सकिनँ । आज भने मनहलुङ्गो भयो । तिमीलाई यतै दिन पाए म सौझै स्वर्ग पुग्थैँ ।&#039;&lt;br /&gt;
“मेरो चिन्ता नै नगर्नोस्‌ । सवै राम्रै हुन्छ । दाइको छोराछोरी, दिदी, दिदीकोछौराछोरीलाई त राम्रै होला ।&#039;&lt;br /&gt;
सबैलाई राम्रै छ । मलाई भात लागेजस्तो छ, म सुत्छु । छाती दुख्दा खाने औषधिर नाति-तातिनालाई केही कपडा ल्याइदैक, पैसा इस्टकोटको खल्तीमा छ ।&lt;br /&gt;
मौसमी औषधि र कपडा लिन वाहिर निस्की । कृष्णराज प्रशन्न मुद्रामासोफामा सुते । मौसमी ब्रुफिनको दस «पन्ध्र पत्ता र कपडाहरू लिएर आई, सबैबाबुलाई देखाई । कृष्णराज खुसी भए । औषधिको पत्ता भने इस्टकोटकोखल्तीमै राखे । भोलि बिहान घर जानका लागि मौसमीले ल्याइदिएको कपडामिलाएर राखे ।&lt;br /&gt;
सत्रहेलो ! रोहिणी किन फोन गरेकी, त्यहाँ सबैलाई त सञ्चै छ?&amp;quot;&#039;अं सबैलाई सञ्चै छ । तँ अहिले विहानको खाना खाने गरेर यतै आइज ।&lt;br /&gt;
।ठाई&lt;br /&gt;
मैले तसँंग माफ पनि माग्नु छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;होइन के भन्छे यो, किन माफ माग्नुप्यो : छिटो भन्‌, कोही विरामीपरेको त होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
“सत्य कोही विरामी छैन । दिदी तँ आउने भनेर खुसी हँदै तँलाई मनपर्नेखाना बनाउँदै हुनुहुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ए हो, त्यसो भए म आइहालेँ । ल भेटेरै कुरा गरौँला, बाई ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीले पनि बाई भन्दै फोन राखिन्‌ । शालु हतारहतार कपडा लगाएररोहिणीको घरतर्फ लागिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&#039;शालु दिदी&#039; भन्दै सौजन्यलाई खेलाइरहेको वीरु चिच्यायो । शालुले वीरु रसौजन्यलाई ठूलो क्याटबरी दिइन्‌ । दुवैको गालामा म्वाइँ खाइन्‌, भर्खर टुकुदुकहिँड्न थालेको सौजन्यलाई केहीबेर बोकेर बगैँचा वरिपरि घुमाइन्‌ । वीरुलेशालुको अनुहारतिर हेदै भने, &#039;दिदी तपाईं जहिले पति सौजन्यलाई देख्नेबित्तिकैकिन आँस्‌ भार्नुहन्छ ?&#039;&lt;br /&gt;
शालुले आफनो आँखामा भरिएको आँसु पुच्छदै भनिन्‌, &#039;तिमीहरू दुवैकोखुसी देखेर रोएकी नि ! ल भन वीरु तिम्रो पढाइ कस्तो छ ?&#039;&lt;br /&gt;
“पढाइ राम्रै छ ममीले बिहान-बिहान ट्युसन पढ्न पढाउनुहुन्छ । आजशनिबार भएकोले बिदा छ । शालु दिदी, म पनि तपाईँको नामबाट नै मेरो नामराख्छु क्या !&#039;&lt;br /&gt;
“होइन के भनेको तिमीले, मैले त कुरै बुझिनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
चीरुले अँध्यारो मुख लगाउँदै भने- &#039;औं बुझिने रे, ममीले भनेको तपाईंकोनामसँग मिल्नै नाम भाइलाई राखैको रे, तपाईँ शालु भाइ सौजन्य मलाई सबैथाहा क्या ! तपाईंको जस्तो नाम राख्यो भने मान्छे ज्ञानी हुन्छन्‌ रे । बाजेलेभाइको नाम अर्कै राखेका थिए रै ।&#039;&lt;br /&gt;
शालु जिल्ल परिन्‌ । उनले त नाममा त्यति चासो दिएकी थिइनन्‌ ।शालुको मत खुसीले फुरुङ्ग भयो ।&lt;br /&gt;
वीरुले शालुलाई हल्लाउँदै भने, &#039;दिद्दी मेरो ताम पति फेर्ने, ममीलाईभनिदिनोस्‌ ।&#039; ।&lt;br /&gt;
शालुले गहभरि आँसु पार्दै भनिन्‌, &#039;वीरु दिदीले मेरो माया लागैर मलाईराम्रो भन्नुभएको हो । बीरु नाम कहाँ नराम्रो नाम हो र, तिमी धेरै पढ, ज्ञानीहोक, तिमीलाई पनि सबैले माया गर्छत्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
वीरुले खिन्न हँदै भने, &#039;तपाईं सौजन्यलाई मात्र माया गर्नुहँद्ोरहेछ, त्यसैलेमेरो नाम फेर्नु चाहनुभएन ।&#039; ॥&lt;br /&gt;
शालुले वीरुको गाला मुसार्दै भनिन्‌, &#039;वीरु म दुबैलाई माया गर्छु । तिमीलाईबीरु नाम मन पर्दैन भने दिदीलाई कुरा गछु, हुन्छ ?&#039;&lt;br /&gt;
चीरु दङ्ग परै । शालु सिधै भान्सामा पसेर कान्छीको आँखा छोपिन्‌ ।कान्छीले हात झिक्दै भनिन्‌, &#039;हेर हातको के गति पारेको : हजुरको छाया मात्रदेखे पनि हजुरलाई चिन्छु, बुझिस्यो ? ल वसिस्यो, पहिला दूध र पनिर पकौडानै खाइस्यो अनि कुरा गरौँला ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले दूध पिउँदै वीरुले भनेको कुरा सुनाइन्‌ ।&lt;br /&gt;
कान्छीले आँखाभरि आँसु पार्दै भनिन्‌, &#039;वीरुले धेरैपल्ट नाम फेर्ने कुरा गरेकाथिए । मैले वास्तै नगरेपछि हजुरलाई भनेछन्‌ । ल भन्नोस्‌ उसको नाम केराखिदिने ?&#039;&lt;br /&gt;
शालुले केहीबेर सोचेर भनिन्‌, &#039;सौरभ राख्दा हुँदैन !&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ भइहाल्छ नि ! उनलाई &#039;श&#039;बाट नै आउने नाम चाहिएको हो । सौरभनाम साह्रै राम्रो छ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;होइन, यो मौरी कुन बेला आएकी ? आफनो आमाछोरी भएपछि त हामीकिन चाहियो ? दिदीको पलिताई कहिलेकाहीँ आफनो प्रशंसा सुनौँ भन्योकहिल्यै पाइएको होइन । सधैँ मेरो शालु मैयाँसाप यस्तो, मेरो शालु मैयाँसापउस्तो भन्नुहुन्छ भन्या । यो मोरी पनि त्यस्तै छे, फोन गत्यो कि पहिलै भन्छे-रोहिणी घरमा सबैलाई सञ्चै त छ ? तँलाई कस्तो छ ? भनेर सोधेको त मैलेसुनेकी नै छैन । ल दिदी हामी कोठामा गयौं ।&#039; शालु र रोहिणी नै कोठाभित्रपसे । कान्छी हाँसिन्‌ मात्र ।&lt;br /&gt;
शालुले रोहिणीसँगै सोफामा बस्दै भन्तिन्‌, &#039;रोहिणी तँ यतिबिध्न खुसी छस्‌,कुरा के हो भन्त ?&#039;&lt;br /&gt;
&amp;quot;पहिला तैँ रिसाउन्न भनेर कसम खा अनि मात्र भन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;तँसँग म किन रिसाउनु ? म सधैँ तेरो फोटोलाई हेरेर भन्छु, भगवान्‌ यदिअर्को जन्म हुने भए मलाई रोहिणी नै साथीको रूपमा पठाइदैङ । तेरोकारणले त मैले सबैको सुख देख्न पाएकी छु । दिदीलाई केही तराम्रो भएकोभए म कसरी बाँच्यें होला ? ल सबै कुरा छोडौं, भन्‌ कुरा के हो ?&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीले शालुको हात समात्दै प्रशन्नसँग भेट भएदेखिको सबै कुरा बताइन्‌ ।विवाहका लागि करा छिनेर स्वयम्बर गरैर मात्र अर्को हप्ता पाकिस्तान इन्जिनियरपढ्न जानै कुरा पनि बताइन्‌ । स्वयम्बरमा डाक्नुपर्ने मान्छेहरूको लिस्ट लामैदेखाइन्‌ ।&lt;br /&gt;
रोहिणीको कुराले एकैछिन त शालुलाई आफू सपनामै छु जस्तो लाग्यो,शालु टोलाइरहिन्‌ ।&lt;br /&gt;
00&lt;br /&gt;
रोहिणीले मसिनो स्वरमा भनिन्‌, &#039;विन्ती नरिसा शालु, मैले कतिपल्ट तँसँगआफनो प्रेमको बारेमा भन्न चाहेँ तर सक्दै सकिने । तँ भन्धिस्‌ ति सबैको प्रेमविषाक्त हुँदैन भनेर, विश्वास गर हाम्रो प्रेम पनि बिषाक्त होइन । हामी एक-अर्काच्रिना बाँच्न पनि सक्दैनौं त्यसैले सबैको सल्लाहले उहाँ स्वयम्बर गरेरज्ञान लाग्नुभएको हो ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;त॑ मलाई पनि बोल्न दिन्छेस्‌ कि आफूमात्र बोल्छैस्‌हं ? तैँले जे गरिस्‌ राम्ै गरिस्‌ । म त सञैँ तेरो खुसी नै चाहन्थेँ । तेरो प्रेममासमर्पण छ । रोहिणी, प्रेममा त्याग होस्‌, स्वार्थ नहोस्‌ । मैले तँलाई माने,लैलामजनुको प्रेमभन्दा तिमीहरूको प्रेम कम छैन । सबै प्रेमी-प्रेमिका तिमीहरूजस्तै हुँदाहुन्‌ त म किन टाउको दुखाउँथैँ ? तँलाई बधाई छ रोहिणी बधाई छ ।आफू डुबेर तैँले प्रेमीलाई उत्तारिस्‌, त्यसो भए तँ फेल हुनुको रहस्य मैले बुझैं ।दुवैजनालाई पढाउन बाबुआमाले सक्नुहुन्न भनेर तँ जानीजानी फेल भइस्‌,नत्र तँ फेल नै चाहिँ हुन्थिनस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीले शालुको मुख छोप्दै भनिन्‌, &#039;शालु तँ पनि, हेर पो वास्तविकताममी-बाबाले थाहा पाउनुभयो भने साह्रै मन दुखाउनुहुन्छ । यो कुरा त॑ र ममामात्र सीमित रहोस्‌ । म के गरौँ तँ नै भन्‌ उहाँलाई पढ्न पठाउनका लागि तकार नै विक्री गर्नुपर्ने भयो । जस्ट पास मात्र भए पनि हामी तिमीलाई डाक्टरनै पढ्न पठाउँछौँ भन्त वाल्नुभयो, त्यसैले...&#039; भन्दै रोहिणी रोइन्‌ ।&lt;br /&gt;
“उफ ! रोहिणी तेरो प्रत्येक करा मान्ने ममी-बाबाले तेरो त्यो इच्छालाईपनि त पूरा गरिदिनुहुन्थ्यो होला नि !&#039;&lt;br /&gt;
&#039;शालु तँलाई थाहा छैन, उहाँहरूले हाम्रो प्रेमलाई स्वीकार गर्नु भए पनिपढाइको प्रथम प्राधथमिकताचाहिँ मलाई नै दिनुभएको थियो । मैरो रिजल्टबिग्रेपछि बल्ल प्रशन्नलाई बाहिर पठाउने कुरा उठाउनुभयो ।&#039;&lt;br /&gt;
“तँ पीर नगर अर्को वर्ष म रामौसँग फेल भएको विषय पास गर्छु । ल अबयी क्रा यहीँ छोडौं । भत क्याम्पसको साथी कति जनालाई बोलाउने !&#039;&lt;br /&gt;
&#039;सोचेर बौलाए भइहाल्छ । म भने तेरो ममीपापालाई भेटेर आउँछु&#039; भन्दैशालुले पहिला रोहिणीको बाबुलाई भैटिन्‌ । सबै कुरा भएपछि आमासँग भेटिन्‌,पीताम्बरा प्रशत्नको कुरा गरेर हर्षित भइन्‌ । करा गर्दागर्दै प्रशन्न पनि टुप्लुक्कआइपुगे । पीताम्बराले नै शालुको परिचय गराइन्‌ । रोहिणीको मुखबाट पनिथुप्रैपल्ट शालुको नाम सुनेको वताए प्रशन्तले । प्रशन्न आएको गन्ध पाउनेबित्तिकैरोहिणी कोठामा आइन्‌ । प्रशन्नलाई देख्नेबित्तिकै रोहिणीको आँखामा आँसुछर्चाल्कयो । उनी केही बोल्त नसकी बैठककोठामै बसिन्‌ । रोहिणीको त्योचाल देखेर सबै एकैछिन मौन रहे । खाना खाने बेला पनि भएकोले सबैभान्सातिर लागे । शालुले दिदीलाई खाना दिन सघाइन्‌ । रोहिणीले दुई-चार&lt;br /&gt;
छ&lt;br /&gt;
गाँस बल्लबल्ल खाएर उठिन्‌ । पुनः सबैजना बैठककोठामा जम्मा भए ।रोहिणी र प्रशन्तको अनुहार भने उदास थियौ । स्वयम्बर गदा पार्टी दिनेविषयमा छलफल भइरहेको थियौ । त्यति नै खेर फोन आयो, फोन नजिकैबसैका रोहिणीको बाबुले फोन उठाए । हलो ! को बोलेको, प्रमोद, ओ लन्डनबाटपौ, ल भन्‌ ममीडेडी सबैलाई सञ्चै छ ? लौ भाइ मन्यो रे, कसरी ? हस्पिटललग्दालग्दै ? एपेन्डिसाइटको शङ्का गरै सबैले ? ल बाबुआमालाई पीर नगर्नुभन्नु । अरू के भनौं ल ल राख बाबु, राख ।&lt;br /&gt;
पीताम्बराले डराउँदै सोधिन्‌, &#039;होइन के भयो !&#039;&lt;br /&gt;
&#039;के हुनु, काकाको कान्छो नाति तरुण हिज्ञो मरेछन्‌, त्यसैले खवर गरेकाहुन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
पीताम्बराले च्ब ! च्व ! गर्दै भनिन्‌, &#039;नाति जन्मेको त वाहा नै थिएन कसरीमरेछन्‌ रे ?&#039;&lt;br /&gt;
फएपेन्डिसाइटले मरै भन्ने शङ्का छ रे&amp;quot; केशबले जवाफ दिए ।&lt;br /&gt;
“अहो ! त्यसो भए स्बयम्बर रोकियो त ?&#039; पीताम्बरा झस्किन्‌ ।&lt;br /&gt;
“ला ! हो त ! स्वयम्बर त रोकियो नि !&#039; केशवले कुरा टुङ्ग्याउन नपाउँदैअँध्यारो मुख लगाइरहेकी रोहिणी रुन पो थालिन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालुले रोहिणीको हात समाउँदै भनिन्‌, &amp;quot;रोहिणी पीर गर्नुपर्ने त कुरै छैन ।स्वयम्बर गर्वैमा तिमीहरूको माया वढ्ने र नगर्दैमा तिमीहरूको माया घट्नेहोइन । तिमीहरू एक-अर्कालाई विश्वास गर्छौ, त्यही नै ठूलो हो, होइन तप्रशन्नजी !&#039; (न&lt;br /&gt;
“हो, शालुले ठीक भन्नुभयो । माया नै ठूलौ हो ।&#039; प्रशन्नले पनि शालुकोकरामा नै समर्थन गरै ।&lt;br /&gt;
सबैले विश्वास र मायाभन्दा ठूलो केही पनि हुँदैन भन्नै कुराको पुष्टि गरे ।रोहिणी र प्रशन्न दुबैले मन बुझाउन करै लाग्यो । शालु दिनभरि बसेरसाँझसाँझ घर आइन्‌ ।&lt;br /&gt;
रहँदा-वस्दा प्रशन्न पाकिस्तान पढ्न जानै दिन पनि आयो । कान्छीदिदीलेसाइत गरेर पडाउने भएकोले प्रशन्न पाकिस्तान जाने अघिल्लो दिन रोहिणीकैमाबसे । रोहिणी एक्लै कोठामा रोइरहेको देखेपछि केशवले नै प्रशन्तलाई सम्झाउनुभनी आग्रह गरे । रोहिणीको त्यो अवस्था देखेर प्रशन्नलाई पनि नमज्जालाग्यो । उनले कोठा बन्द गरी रोहिणीको नजिक बस्दै सम्झाए, हेर रोहिणीतिम्रो पीरले गर्दा घरमा सबैले चिन्ता मानेका छन्‌, तिमी जेटीबाठी छोरी,तिमीले पो सबैलाई सम्झाउनुपर्छ त ! म लडाइँमा नै त जान लागेको होइन ।प्रत्येक कालो रातपछि दिन आउँछ भन्ने कुरा हामीले भुल्नुहँदैन । मायाको&lt;br /&gt;
ख्द&lt;br /&gt;
गहिराइमा डुविसकेपछि जिउन गाह्रो हुँदोरहेछ । त्यसो भन्दैमा कर्तव्य पनिभुल्नु भएन । केही समय पीडा सहेपछि हामी सदाका लागि पीडामुक्त हुन्छौं ।तिमीले आफूलाई सम्हाल्यौं भने म सन्तोषको सास फेर्छु, तिमी चिन्तामा डुव्यौभने म कसरी पढ्न सक्छ भन त ?”&lt;br /&gt;
रोहिणी रोइन्‌ मात्र, प्रशन्नले भने, &#039;रोहिणी तिमी यसरी विलाप गर्छ्यौं भनेम पढ्न नै जान्न ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणी केही बोल्न नसकी आफनो कोठामा आइन्‌ । प्रशन्नले अनेकौँसहानुभूतिका शब्दहरू खन्याए पनि रोहिणीको हृदय प्रशन्नको मायाले जलि नैरहयो । रौहिणी पटक्कै निदाउन सकिनन्‌ । रोहिणी जति छट्पटाए पनि समयलेआफनो गति लिई नै रहयो । भोलिपल्ट बिहान रोहिणी र प्रशन्नले नै एक-अर्कोलाई हेर्न र बोल्न सकेनन्‌ । कान्छीदिदीले साइतको टीकामाला लगाएरबिदाइ गरिन्‌ । एयरपोर्टमा रोहिणी जान सकिनन्‌ । केशब, पीताम्बरा र चन्द्रकान्तमात्र गए । केशवले प्रशन्नलाई बिदा गर्नुअरगाडि &#039;हामीले तपाईंलाई आफनैछोरा सम्झेका छौँ । हाम्रो विश्वासलाई नटुकयाउनुहोला । रोहिणीलाई तपाईंलेचिन्नुभएकै छ, त्यसैले सक्दो चांडो फोन गर्नुहोला&#039; भन्त भुलैनन्‌ ।&lt;br /&gt;
प्रशन्नले पनि विश्वास नटुक्रयाउने, मन लगाएर पढ्ने, चाँड्धै फोन गर्नेकरा बताएर बिदा भए ।&lt;br /&gt;
अठार&lt;br /&gt;
ढोकाको घन्टी लागैपछि शालुले ढोका खोलिन्‌ र त्यो घन्टी लगाउनेलाईकेहीबेर हेरेर भनिन्‌, &#039;तिमी मोना होइनौँ ?&#039;&lt;br /&gt;
मोनाले हो भन्ने सङ्केत गर्दै मुन्टो हल्लाइन्‌ । शालुले मोनालाई कोठामाडाकेर सोफामा बस्न आग्रह गर्दै भनिन्‌, &#039;बसन मोना, तिमी त ज्यादै ठूली पोभइछौ । पहिलाकै घरमा छौ कि अन्तै छौँ ?&#039;&lt;br /&gt;
मोनाले गहभरि आँसु पार्दै भनिन्‌, &#039;दिदी आज नै त्यो घर छाडेर आएँ ।तपाईंले नै मेरो मर्म बुझिदिनुहुन्छ भनेर यहाँ छिरेकी हँ ? कान्छीदिदीलाई योसमाजले चरित्रहीन नै ठहन्याएछन्‌ नि होइन ? मेरी आमा त्यसै भन्धिन्‌ । मैरोमनले अफ्गै पनि भन्छ उनी त मायाको सागर हुन्‌, चरिहीन होइनन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले फिस्स हाँस्दै भनिन्‌, &#039;मौना तिमी र मजस्ता यो समाजमा कति नैजन्मन्छन्‌ र ? तिमी र म जस्ताको कुरा फेरि कसले ७0 ? तिमी असभ्यजँड्याहाकी छोरी म सभ्य जँड्याहाकी । पर्न त हामी दुवै जँड्ययाहाकी छोरी&lt;br /&gt;
७९&lt;br /&gt;
पज्यौँ । फरक यति छ, मान्छेहरू तिम्रोअगाडि नै क्रा कादछन्‌ भने मेरोचाहिँपर्छाडि कुरा काट्छन्‌ । आखिर कुरा त कादछन्‌ नै । तिमीले किन घर छोड्यौत?&#039;&lt;br /&gt;
मोनाले केहीबेर मौन रहेपछि रुँदै बोली फुटाइन्‌, &#039;दिदी मालिक्नी योसंसारमा हुनुहुन्न, उहाँ मारिनुभयो, त्यो पनि आफनै लोग्नेबाट ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले आश्चर्य मान्दै भनिन्‌, &#039;मौना तिमी भ्रममा पस्यौ कि ! देख्दा तत्यस्तो पापीकैँ लाग्दैनथ्यो क ।&#039;&lt;br /&gt;
“के भ्रममा हुनु नि दिदी, मैले भोलिपल्ट विहान आफनै आँखाले दुईटातकियामा रगत देखेकी हुँ । उसले अवश्य निदाएको बेलामा तकियाले थिचेरमारेको हनुपर्छ । मैले यो कुरा पुलिसलाई पनि भनेँ तर पुलिसले त ब्लडप्रेसरहाई भएर मरेको मुचुल्का तयार पासो ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;होइन मानैपर्ने कारणचाहिँ कै धियौ र !&#039;&lt;br /&gt;
“के हुन्थ्यो र दिदी, बूढी मालिक्नीबाट त्यो यौनप्यासी सन्तुष्ट हुँदैनथ्यो ।मालिक्नीलाई मारेर क स्वतन्त्र हुन चाहन्थ्यो । उसको आँखा म पापितीमाथिथियो । क मलाई सम्पूर्ण सम्पत्ति दिन्छु भनेर बेलाबेलामा फकाउँथ्यो । मउसको कुरा एक कानबाट सुनेर अर्को कानवाट उडाइदिन्थे । मालिक्नी मेरोचरित्रले गर्दा मलाई असाध्यै माया गर्नुहुन्थ्यो । म पनि उहाँलाई असाध्यै मायागर्थेँ । त्यस घरमा गएको दुई-चार वर्ष त म त्यसको गिह्दै आँखाबाट बचे ।मालिक्नीसापको आमा मरेकोले उहाँ महाराजगन्ज माइत जानुभयो, त्यस रातत्यो अधर्मीले ज्वरो आएको निहुँ पारी मलाई तातो पानी लिएर आउनु भनीआफनौ कोठामा डाक्यौ । म डराउँदैडराउँदै कोठामा पसेँ । कोठामा पसेपछिहतारहतार ढोका पो लगायो ! मैले डरले चिच्याउँदै भनेँ, &#039;मलाई छोइस्‌ मात्रभने पनि तँलाई जिउँदै मारिदिन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
मालिक भइखाको अच्युतले एक गिलास तातौपानी मैरो जिउमा छयाप्दैभन्यो, &#039;कत्तित कमारी केटीफ्रै गरेर नखरा पार्छै । म सिकारी भन्ने त तलाईथाहै छ होइन ? यो कोठाबाट एक पाइला मात्र सारिस्‌ भने तँलाई बन्दुकलेउडाइदिन्छु । तँलाई शिरदेखि पाउसम्म गहनाले पूर्छ भन्दा पनि मात लाग्योभाग्ने ?&#039; भन्दै उसले मलाई झम्टन खोज्यो । मलाई पानीले पोलेको पनि यादभएन । मृत्युको त चिन्तै भएन । मैलै चिच्याउँदै &#039;मार्ने भए मार, म मर्छै तरमेरो मालिक्नीको विश्वास तोड्दिनँ&#039; भन्दै ढोकामा पुगेर ढोका खोल्न लागेँ,उसले पछाडिबाट बन्दुकको नालले जोरले टाउकोमा हान्यो । म रन्थनिँदैभुइँमा ढलेँ । हातखुट्टा लुलो भयौ, उसले मेरो शरीरमाथि एक्लौटी जमायो रभन्यो, &#039;मौना तेरा लागि त सारा त्याग्न सक्छु । मोना आवेशमा जे गरे पनिनरिसा है । म जस्तो पाउँदा के चाहिन्छ त तँलाई ?&#039; म धेरै वेरपछि घिसिँदै&lt;br /&gt;
प०&lt;br /&gt;
आफनो कोठामा आएँ । त्यो रात छट्पटाउँदै बिताएँ । भोलिपल्ट मालिक्नीलेमाइतीबाट फोन गर्नुभएको थियो । आमा मरेको चौटमाथि अको चोट कित01 भनेर मन सम्हालेर करा गरेँ । आमा मरेको पाँच दिनको दिन मालिक्नी&lt;br /&gt;
दुव्लाएर घरभित्र मात्र के पस्नुभएको थियो । मैले चाहंदा-चाहँदै पनिआफूलाई बाँध्न सकिनछ्ु र रुन पुगेछु । मालिक्नीले मेरो आँसु पुर्छिदिँदै भन्नुभयो,“जै नहोस्‌ भन्ने सोचेकी थिएँ त्यही भएछ । त गरिबनीको उद्धार गर्छु भनेरल्याएकी त &#039;झन्‌... । यति भन्दै मालिक्नी पनि मसँगै रुन थाल्नुभयो । हामीदुवैजना धेरैबेर रोएपछि मालिक्नीले भन्नुस, , &#039;नानी नरो तँ मलाई छोडेरनजा । तँ मेरो खुसी हेर्न चाहन्छैस्‌ भने तैँले उहाँको रहर पुस्याइदै ।&#039;&lt;br /&gt;
मैले अचम्म परेर मालिक्नीको मुख हेदै भनेँ, &#039;हजुरले के भन्नुभएको त्यस्तोम अब यहाँ बस्तिनँ मालिक्नीसाप बरु मागेर खान्छु तर... ।&#039;&lt;br /&gt;
मालिक्नीलै मेरो कपाल मुसार्दै भन्नुभयो, &#039;हुन त तँलाई कुनै इमानदारकेटा खोजेर आफैँ कन्यादान दिन्छु भन्ठानेकी थिएँ । पुन: तेरो इमानदारितामाथिअर्को दाग लगायो यस पापीले । मैले मेरो स्वार्थका लागि मात्र होइन तेरालागि पनि भनेकी हुँ, तँ पनि कहाँ जान्छेस्‌ ? बाबुआमा तिनै हुन्‌ । महिना मर्नपाएको छैन पैसा लिन आउंछै । एक वचन नानी तँलाई अर्काको घरमा गाह्रैहोला भनेर कहिले सोधेकी छै, तँ नै भन्‌ त ? ममाथि पहाड दुद्दा पनिअसत्तीलाई प्यास नै ठूलो भयो । के गरौं पीडा सहने बानी तै परिसक्यो बा !&#039;&lt;br /&gt;
मैले मालिक्नी सापलाई भनेँ, &#039;आजै अदालत जाउँ, म साँचो क्रा बताइदिन्छु,यस्तो पतीतसँग नबस्नोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
मालिक्तीले तुरुक्क आँसु झार्दै भन्नुभयो, &#039;नानी, वाहा छ मलाई पनि,अपराध गर्नुभन्दा अपराध सहनु पाप हो । तर यो कानुन अन्धो छ बा ! हामीअदालतमा गयौं भने तेरो मालिक होइन तँ पो अपराधी हुन्छैस्‌ । फेरि प्रत्येकस्वास्वीमान्छेहरू आफनो स्वार्थको लागि मात्र कहाँ बाँचेका हुन्छन्‌ त ? कुनैस्वास्नीमान्छैले लोग्नेको अत्याचारको पराकाष्ठा नाघेपछि झिनो आफूनो स्वार्थहेरेर पन्छयो भने यो समाजका आड्गमाईले नै उसलाई वेश्या साबित गर्छन्‌ ।पाइतैपिच्छे काँडा विल्लयाउँछन्‌ । म आफना लागि मात्र बाँचेकी भए केही गर्नत सक्थैँ नै होला तर म कहिल्यै आफूता लागि बाँचनै बुझिस्‌ ? म एउटालेपीडा लुकाउँदा मेरा सम्पूर्ण आफन्तहरू खुसी हुन्छन्‌ भने पीडा गुङाउन ततैचैसभैँ लाग्छ । म मेरा आफन्तको आँखामा आँसु देख्न सक्दिनँ । मोना,देखिहालिस्‌, मेरा छोराछोरी अमेरिकामा कति खुसी छन्‌ । &#039; बुङवाबु हुनुहुन्छ ।मलाई माया गर्ने दाजुभाइ, दिदीबहिनीहरू छन्‌ । म ती सवैलाई कसरी चोटदिन सक्छु भन त : त्यसैले चुपचाप बगर भएर बाँचेकी छु । फेरि तैँले सोचिस्‌होला तेरो मालिकले यो चोट मलाई अहिले मात्र दिएका हुन्‌ । तँजस्ती सफाहृदय भएकी बच्ची त मैले पहिलोपल्ट नै देखेँ । यहाँ करिब आधा दर्जन जति&lt;br /&gt;
क&lt;br /&gt;
थि&lt;br /&gt;
केटीहरू अहिलेसम्म बसै होला, ती प्रत्येकमा लालच थियो । उनीहरू आफनोवैसका उन्मादहरूलाई: थेग्न सक्दैनथे । तेरो मालिकको पैसामा र मायामालट्टिन्थे उनीहरू । कुन सड्का आफूनो आँख्चा छलेर प्यास मैद्थै«मेटाउँथे मैलेपत्तै पाउँदैनथेँ । जब मलाई नै सौताको व्यवहार गर्न थाल्दा पो वास्तविकताबुझथेँ । चुपचाप आँसु पिएर सबै सहनु नै श्रेय ठान्थेँ । मालिकबाट केपाउँदैनथै कुन्नि अलिक दिनको रमझमपछि अरू नै केटा टिप्थे, हिँड्थे । सबैलेछोडेपछि मालिक आक्कलझुक्कल मसंग आउँथे । भैगो यो कुरै छोडौं, तँ पापीहोइनस्‌ । कुनै राम्रो ओत लाग्ने ठाउँ नपाउन्जेल तँ यहाँबाट नजा ।&#039; उहाँलेत्यसै भत्ती सम्झाउनुभयो ।&lt;br /&gt;
मैले पनि मालिक्नीको कुरा ठीकै ठानेँ । मालिक्नीलै बलात्कार हुनुको कारणपनि सोध्नुभयो । मैले सबै बताएँ । उहाँले टाउकोमा हेर्दै &#039;टाउको नै नफुटे पनिटाउकोमा पीप-रगत जमेको छ&#039; भनेर मेडिकलमा लगी मेरो घाउ देखाउनुभयो ।नभन्दै डाक्टरले घाउ निचोदा एकमुठीभन्दा बढी पीप-टगत आयो । पीप-रगतनिचोरेपछि टाउको हलुको भयो । मालिक्नीले थाहा पाएर पनि केही थाहानपाएझैँ गरी मालिकलाई सम्पूर्ण आकाश स्वतन्त्रपूर्वक डड्त दितुभयो । मउसकी सिकारमा परिरहन्थेँ । मालिक्नी चुपचाप सहिरहनुहुन्थ्यो । मेरो रमालिक्नीको सम्बन्ध अझै गाडा बन्दै गयो । दिन बितेकै थियो । केही दिनअगाडिदिउँसोको तीन-चार जति बजेको हुँदो हो । मेरी आमा आएर मेरी सोझीमालिक्नीसँग हाँक दिँदै भतिछिन्‌- “मीनालाई यो घरबाट लगेर अन्तै राख्छु ।अन्त बढी पैसा दिन्छु भनेका छन्‌ ।&#039; मालिक्नीले रिसको झोकमा भन्नुभएछ-“सक्छयौ भने मोनालाई अहिले लग, मलाई मोना चाहिँदैन ।&#039; मालिक्नी र मेरी &#039;आमाचीचको क्रा सुनेर मालिक रिसाउँदै बाहिर निस्केछन्‌ ।&lt;br /&gt;
म कोठामा कै गलफती हुँदैछ भनेर पसेँ । आमा र मालिक्नीबीचको सबैकुरा बुझेँ । मैले रिस थाम्न सकिनँ । आमालाई कपाल भुत्ल्याएर घिसार्दै भनेँ-&amp;quot;तँ कृकर्ती मेरौ मोल राख्न आएकी : आइन्दा तँ यस घरमा छिरिस्‌ मात्र भनेकुकुर फुकाएर टोकाउँछु । जा छिटो निस्की- निस्किहाल ।&#039; मालिक्नी मेरो हातरोक्न खोज्दै हुनुहुन्थ्यो । मेरौ आँखामा आफू बलात्कार हुँदाका क्षणहरू नाच्यो ।मैले मैरौ जिन्दगी बर्बाद गर्ने त्यही आमा नै हो भन्ठानेँ । ममा भूत सवारभयो । मेरो होस त्यतिबेला मात्र आयो जब मालिक्नीले मैरो गालामा दुईथप्पड मार्नुभयो र भन्नुभयो- &#039;मोना अव तँ जेलमा जाकिने भइस्‌ तेरी आमामरी । मैले यसो आँखा खोलेर आमातिर हेरेँ । आमा रुन पनि नसक्नै गरेरभुइँमा पछारिरहेकी रहिछिन्‌ । मैले उनलाई सकिनसकी सडकमा पुन्याएरदयाक्सी रोक्दै हातमा दुई सय रुपैयाँ दिएर भनेँ, &#039;आइन्दा तैँले यो घरमा पाइलाटेकिस्‌ भने यो घरबाट तेरो लास जान्छ, याद गर ।&#039; आमा चु पनि बोल्ननसकी गइन्‌ । मैले त्यो दिन ठूलै पराक्रम गरेकी सम्झ । मालिक्नीले भन्नुभयो,“नानी तेरो रिस देखेर म छक्क परेँ । मैले तँलाई नपिटेको भए तैँले आमालाई&lt;br /&gt;
00&lt;br /&gt;
मा्नै थिइस्‌ । जे गरिस्‌ ठीक गरिस्‌ । अव तेरो महिनैपिच्छेको पैसाले सुनकैकेही सामान वनाइदिउंला, दुःख पर्दा काम लाग्छ । त्यही दिन मलाई सिक्री,औंठी र टप दिँदै भन्नुभयो, &#039;अपराध धेरै भएपछि ढुङ्गा पनि विस्फोट हुँदोरहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
मैले भने, &#039;खोई त हजुर पनि विस्फोट भएको ?&#039;&lt;br /&gt;
उहाँले मेरो गाला मुसादै भन्नुभयो, &#039;नानी तँ पनि धैरै कुरा जान्ने भइस्‌ । मआकाशमा गएपछि विस्फोट होउँला । तँ आज साह्रै थाकेकी छस्‌, म खानापक्राउँछु । तँलाई एकछिन नदेख्दा पनि म आत्तिन्छु तँ साबीचाहिँ बस्नुपर्छ नि !&#039;&lt;br /&gt;
मैले हाँस्दै भने, &#039;खाना हजुरले पकाएको मालिकसापले थ्वाहा पाउनुभयोभने एउटानएउटा खोट लगाउनुहुन्छ । खाना म नै पकाउँछ । हजुर थपक्कबस्नोस्‌ । मलाई त दुखाइको पत्तै छैन ।&#039; हामीले त्यो रात हाँसीखुसी सुख,दुःखका कुरा गयौँ । भोलिपल्ट बिहान हतारहतार दुईवटा रगत लागेकोतकिया फोहोर लिन आउनेलाई बोरामा हालेर दिएको देखेँ । म आँच्तिदै कोठामापुग । मेरी मालिक्नी सदाका लागि मलाई छोडेर निदाइसक्नुभएको रहेछ । मकेही बोक्न नसकी भुइँमा थ्याच्च बसेँ । त्यो पापीले कुटिल हाँसो हांस्दै भन्यो,“मोना हामीबीचको काँडा हट्यो । तँलाई थाहा छैन होला यो असत्तीनीलेतँलाई यहाँबाट पठाउने कुरा गर्दै थिई त्यसैले यसलाई सखाप पारेँ । अव यहाँतेरो र मेरी राज्य हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
मैले जुरुक उठेर त्यसको कठालौमा समातेर थुक्दै भनेँ, &#039;युक्क पापी ! मयहाँ छु त केबल मालिक्नीले गर्दा छु । नत्र म उहिल्यै यो घरबाट निस्किसक्थैँ ।तैँले सोचिस्‌ होला मालिक्नीलाई हामीबीचको सम्बन्ध थाहा छैन । मालिक्तीलाईत प्रत्येक काम गर्नेहरूसँगको तेरो सम्बन्ध थाहा थियो । तँलाई हिँड्नका लागिसिङ्गै मूलबाटो छौड्ेर आंफू तरबारको धारमा हिँड्नुहुन्थ्यो । मेरी मालिक्नीकोहत्या गर्ने त्यो पाषी हातले मलाई छोइस्‌ माव भने पनि म आफनो हत्या आफैँगछ |&lt;br /&gt;
उसले चिच्याउँदै भन्यो, &#039;चुप लाग्‌ मोना, मैले तँलाई लैजा भनेको मेरैकानले सुनेको छु बुझिस्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
मैले काप्दै भनेँ, &#039;मबाट घेरै पैसा असुल्ने सुर गरेपछि रिसले सक्छेस्‌ भनेमोनालाई लैजा भन्नुभएको हो अधर्मी । तैँले सोचिस्‌ होला आजसम्म तैँलेदिएकै पैसामा बसेकी छु । मेरी साहुनीले पैसा थपीथपी मेरी आमाको मुखमाफयाँकेर तेरो लागि मलाई यहाँ राख्दै आउनुभएको थियो । मालिक्नीको सोफझोपनकोफाइदा उठाएर पैसा बढाउन खोजेपछि मलाई लैजा मात्र के भन्नुभएको थियोतेरो कालो मतमा नाता शङ्का उठ्यो होइन : अनि निष्पाप मन भएकीसाहुनीलाई सिध्याइस्‌ । म तँलाई नङ्याएरै छोड्छु पापी नङ्स्याएरै ।&#039; तरदिदी, मैरो कुरा स्वयम्‌ मालिक्नीका छोराछोरीले वास्ता गरेनन्‌, उल्टै भने,&#039;छोटोलाई टाउकोमा चढाएपछि के-के भन्छन्‌ भन्छन्‌ । तँ हाम्रो खानदानी&lt;br /&gt;
व्शि&lt;br /&gt;
परिवारमा तमासा खडा नगर । उनीहरूले मेरा मुख नै वन्द गरे । मेरीमालिक्नीले छोराछोरी र आफन्तका लागि गरेको त्यागको परिणाम आफनैआँखाले देखेँ । अमेरिकाबाट आएको छोरा जेनतेन किरिया बसे । छोरीहरूलेचाहिँ तीन दिनमै नुन खाए । मैले तेह्र दिन त्यहीँ वसेर नुन वारी आजैत्यहाँबाट निस्केर यहाँ आएँ । मालिक्नीका छोराबुहारी, छोरी सबै अव बाबुकोस्याहार गर्ने जिम्मा मोनाको हो भन्थे । मालिकले मालिक्नीको गुणहरू सम्झेरैहोला तेह्र दिनसम्म मलाई छुने आँट गरेन । म त्यसैले पनि तेह्र दिन त्यहाँअडैँ । आज म भोकै छु शालु दिदी भोकै...&#039; मोना रोइन्‌ ।&lt;br /&gt;
मोनाको कुराले शालुको आँखाहरू पति रसाए । दुबै भान्सामा गए । शालुलेआफूलाई बेलुकाका लागि राखेको दाल, भात, तरकारी, अचार सवै तताएरदिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
मोनाले खपाखप भात खाएर भनिन्‌, &#039;मैले बुझ यहाँ कोही काम गर्नेरहेनछन्‌ । त्यसैले तपाईंले आफना लागि बिहान नै बेलुकाका लागि भातपकाउन्ुहुँदोरहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;तिमीले ठीक नै सोच्यौ मोना, तिम्रो पेट त भरियो खानाले ?&#039;&lt;br /&gt;
&amp;quot;आरियो दिदी म टन्नै भएँ । अव म कहाँ बस्ने दिदी : आमासँग त मर्नैपरेपनि जान्न&#039; भन्दै रुत थालिन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालुले कंहीबेर सोचेर भनिन्‌, &#039;मोना तिमीजस्ती बहादुर युवती पनि रुन्छन्‌ ?जीवन क्रममा सबैले क्नै न कुनै पीडाको सामना त गरेकै हँदारहेछन्‌ ।तिमीले र कान्छीदिदीले सानै उमेरमा कल्पनै गर्न नसक्ने पीडाको सामतागस्यौ । अहिले कान्छीदिदीको जिन्दगीमा केवल बहारैबहार छ । तिम्रो जीवनपनि हामी नरक हुन दिँदैनौं । चन्द्रकान्त दाइको भाइको व्यवहार ठीक चन्द्रकान्तदाइको जस्तै छ तर दाहिने गालाको पाटामा पूरै कालो धब्बा भएकोले उहाँतीस-बत्तीस वर्षको उमेरसम्म पनि अविवाहित हुनुहुन्छ । भाडाको टयाक्सीचलाउनुहुन्छ । डेराचाहिँ दिदीको घरभन्दा केही पर छ।&#039;&lt;br /&gt;
मोनाले रुँदै भनिन्‌, &#039;मलाई माया मात्र भए पुग्छ । म रूप नै चाट्ने खालकीछैन दिदी ! मेरो पनि सबै यथार्थ बताइदिनुहोला ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ मोना, हामी सबै कुरा राख्छौं । आजलाई यहीँ बस म पनि एक्लै छु।भौलि बिहानसम्म सबै कुराको टुङ्गो लाग्छ । चन्द्रकान्त दाइको भाइकोनामचाहिँ रोमाकान्त हो ।&#039;&lt;br /&gt;
मोना चुप लागिन्‌ । शालुले कान्छीदिदीलाई फोन गरेर सबै कुरा बताइन्‌ ।कान्छीदिदीले सल्लाह गरेर फोन गर्ने कुरा सुनाइन्‌ । शालु र मोना नै मोनाकोमालिक्नी गोमाको सम्झनामा हराइरहे । शालुलै केहीबेरपछि, मोनातिर हेर्दैभनिन्‌, &#039;तिम्री मालिक्नीको फौटौ छ मोना ? म ती देवीलाई हेर्न चाहन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
0 0&lt;br /&gt;
मौनाले ब्याग खोलेर फोटो देखाउँदै भनिन्‌, &#039;यही हो मालिक्नी । जूनहाँसेजस्तै हुनुहुन्थ्यो । मोनाका आँखा पुनः भरिएर आए । शालुको आँखा पनिनरसाई छोडेन । दुवैले फोटो हेरेर धेरैबेर मौत रहे । मोनाले शालुको ममीपापाकहाँ जानुभएको भत्ती मौनतालाई तोडिन्‌ । शालुले काठमाडौँभत्रकै होटेललजमा बस्नै होला, पूरा थाहा छैन भनेर वास्तविकता ओकलिन्‌ । साँझझमक्कै पन्यौ, आकाशमा पूर्ण चन्द्र र ताराहरू पनि उदाए । मोना र शालुआ-आफ्नै सोचमा दुवैका थिए । शालुको आँखामा गोमाको तस्बिर नाचिरहेकोथियो । गोमाजस्ता नारीलाई कायर भन्ने कि आदर्श भन्ने शालु त्यही सोचमाडुबेकी थिइन्‌ । फोनमा आएको घन्टीले शालुको एकाग्रपन टुट्यो, फोन उठाउँदैभनिन्‌, &#039;अँ, भन्नोस्‌, ए सबैजना राजी भए । भोलि विहान सात बजे पशुपतिमाविवाह गर्ने सल्लाह भयो । हन्छ हामी सात बजे नै आउँछौँ भन्दै फोन राखिन्‌ ।मोनालाई पनि सबै भोलि सात बजे पशुपतिमा विवाह गर्न आउने कुरा सुनाइन्‌ ।मोना लाजले शर्माइन्‌ । शालुले लामो श्वास फेदै भनिन्‌, &#039;मोना समय अझै पनिछ, केही भन्छयौ भने भत । हन त तिमीले रोमाकान्तभन्दा धेरै सुन्दर र भर्खरकोयुबक पनि पाउन सक्छ्यौ, यो साँचो हो । हामीले चाहिँ तिमीलाई जीवनकोअन्तिम क्षणसम्म साथ दिने, तिमीलाई माया ढिने, गुणी युवक खोजेका हौँ ।रोमाकान्त दाइ भट्ट हेर्दा पटक्कै राम्रोचाहिँ हुनुहुन्न मोना ।&#039;&lt;br /&gt;
“तपाईं त त्यसै मन पकाउनुहुन्छ । रूप र सम्पत्तिलाई ठूलो ठान्ने मए आजम यहाँ किन आउँथै ? माया भएपछि जस्तोसुकै कुरूप मान्छे पनि आफसेआफसुन्दर बन्दै जाने रहेछ । मालिक्नीसापकैँ करा गर्दा पनि त सबैले उहाँलाई दाँतउछिट्टेकी थसुल्ली भन्थे । तर मलाई उहाँजति राम्री कोही नै लाग्दैनथ्यो ।उहाँको प्रत्येक क्रियाकलाप मनपर्थ्यौ मलाई । उहाँको आँखा राम्रो, मुख राम,हिँडाइ राम्रो, बसाइ राम्रो, सबैका सबै राम्रो लाग्थ्यो ।&#039; मोनाको कुरा गर्दागर्दैमुटु भक्कानिएर आयो, उनी चुप भइन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालुले एकोहोरो मोनालाई हेरिन्‌ । गोमालाई सम्झिँदा शालुको मन पनिभरिएर आयो । आफनै पहिचान बिर्सेर अरूकै अस्तित्व बचाउन हरपल जलिरहेकीगोमाजस्ता नारीलाई पनि अकालमै चिरनिद्वामा पुग्नुपत्यो । हामीले त एउटागोमाको पीडा देख्यौ, एउटै गोमाको हत्या सुन्यौं । यौ समाजमा कति गोमाजस्ताविवश नारीहरू होलान्‌ । कसले तिनीहरूलाई आफनो अस्तित्वबोध गराउने ?गोमाजस्ता पढेलेखेको सभ्य समाजकी नारीले त त्यो दुर्गति भोग्नुपर्छ भनेअरूको के हालत होला :&lt;br /&gt;
&#039;दिदी, मैले तपाईंलाई दुःख पुच्याएँ हगि ? तपाईँले त केही खानुभएकै छैन,भौक पनि लाग्यो होला, म केही बनाइदिन्छु । मालिक्नी वितेको तीन दिनसम्मत मैलै रात कसरी बित्यो, दिन कसरी बित्यो पत्तै पाइनँ । मान्छेलाई जति नैचोट परे पनि सम्हालिनुपर्ने रहेछ । मो तपाईं पनि पीर नगर्नोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले मोनातिर फर्कदै भनिन्‌, “मैले तिमी आउनुअगाडि टन्न नास्तागरेकी थिएं, त्यसैले भोक पटक्कै छैन, तिमी केही खान्छयौ भने बनाक नत्रपर्दैन । हिंसक बाघहरूलै जस्तै गरी मान्छेले मान्छेको आलो रगत पिएको देख्दामन त दुख्ने रहेछ । तर, जीवन जिउनका लागि सवै भुल्नु पनि पर्दोरहेछ ।तिमीले टेक्ने घरातलमा चाहिँ अब रगतका छिर्कासम्म हुँदैनन्‌, गरिवसँग केहीसम्झौता गर्न भनेचाहिँ पर्ला !&#039;&lt;br /&gt;
&#039;दिदी पनि, मेरो कति चिन्ता गर्नुहुन्छ ! मेरो हातगोडा सद्दै छन्‌ । यो केकामका लागि ! मैरो पटक्कै पीर नगर्नोस्‌ । ल अव सुतौँ । बिहान चाँडै उठेरनुहाइघुवाई पनि गर्नु छ ।&#039; दुबै सुते तर दुवैको आँखामा धेरै रात जाँदासम्मनिद्रादेवीले बास गरिनन्‌ ।&lt;br /&gt;
भोलिपल्ट शालु मोना पशुपतिमा पुगेको केहीबेरपछि नै केशब, पीताम्बरा,कान्छी, चन्द्रकान्त, रोमाकान्तलगायत अरू दस-बाह्रजना आए । कान्छीदिदीलेबुलहीमा लाउने कपडा पहिन्याएर गहना लगाउँदा त मोनाको रूप घप्पबल्लाजस्तै भयो । सबैले मोनाको रूपको तारिफ गरे । दुलहीको पहिरनमासबैसामु आएपछि रोमाकान्तलगायत सबैले मोनालाई हेरेको हँरै भए । रोमाकान्तलेकुनै क्षण कल्पनासम्म गरेका थिएनन्‌ । त्यो बलात्कृत मोना हीराको टुक्राजस्तैछिन्‌ । सबैसबैले घुणा गरेर फयाँकेको मसँग उनले कसरी सारा जिन्दगीबिताउलिन्‌ ? रोमाकान्त त्यस्तै सोचे । बाजेले अब पशुपतिको मन्दिरअगाडिजाँ दुवैले लाउने माला, औँठी, सिकी सबै ठिक्क पारी हिँड्नु भनेपछि सवैपशुपतिको मन्दिरअगाडि पुगे । बाजेले मन्तर पढेर रोमाकान्तले मोनालाईमाला पहिराउनु भनेर माला के पहिराउन लागेका थिए एउटा समाजसेवीभनाउँदी माथिमाथि साडी उचालेर आई । रोमाकान्तको हात उछिट्याउँदैचिच्याई, &#039;ए सबैजनाले यहाँ पैसाको लोभमा एउटी सुक्‌मारीकोबिबाह एउटा कुरूप अध गर्दैछन्‌ । यौ विवाह हामीले रोक्नुपर्छ ।महिलामाथिको अत्याचार हामीले सहनुहन्न ।&#039; सवै मान्छेहरू हवारहवार्ती जम्माहुँदै भने, &#039;यो विवाह गराउनेलाई कारबाही गर्नैपर्छ ।&#039; बरु हामी गछौँ त्योयुवतीसँग बिबाह भन्नेहरू पनि निस्के । रोमाकान्तलगायत सबैजना रातो-पीरो भएर हेरेको हेरै भए । समाजसेवीले मोनालाई अङ्गालो मार्दै भनिन्‌,“नानी ! तिमी यी पापीहरूको बहकाउमा नआक, तिमीले जोडा मित्नै केटापाउँछ्यौ, तिमीलाई ललाइफकाई गर्नेलाई जैलमा जाक्नुपर्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
मोनाले समाजसैवीको हात जोडले &#039;झट्कालेर रिसले आगो हुँदै चिच्याइन्‌,(तपाईँ के बोल्दै हुनुहुन्छ : बुझो न सुझो त्यसै मुखमा जे आयो त्यही बोल्नपाइन्छ ? यो मेरो प्रेमविवाह हो । तपाईंले उहाँको बाहिरी आकृति देख्नुभयो ।मैले उहाँको भित्री रूप देखेकी छु । आइन्दा उहाँको बारेमा एक शब्द बोल्नुभयोभने तपाईं नै जेल जानुहुन्छ । म तपाडँहरूजस्तालाई समाजको कलड्क भन्छु,बुझनुभो, कलङ्क... ।&#039;दद ।&lt;br /&gt;
मोनाको शब्द सुनेपछि, वरिपरि &#039;झफुम्मिएकाहरूले समाजसेवी भनाउँदीलाईगाली गर्दै भने, &#039;ए दिदी, बुझ्दैनवुझी अर्कामाथि त्यसै हात हाल्ने हो?तँजस्ती ककर्नीको पछि लाग्दा हाम्रो पनि बेइज्जत भयो । तेरो मुखसुखफुटाइदिङँ ?&#039; भन्दै समाजसेवीलाई हप्की र दप्की गरे ।&lt;br /&gt;
सबैको कुरा सुनेर कत्तिन आफूलाई समाजसेबी ठान्ने आइमाई लज्जितभई, केही बोल्न नसकी कुलेलम ठोकी । अनि आफनो रूपवान्‌ लोग्नेलेनजिकैको बहिनी पर्नेलाई भगाएर लगेको तेह्र वर्ष वितेको कुरा सम्झेर तुरुक्कआँसु खसाती । ॥&lt;br /&gt;
यता आिगाकी दारा सुको करा सुनेर पुरेतबाजे, रोमाकान्तदेखि लिएर सबैको मन हर्षितभयो । बाजेले स्यावास दिँदै विवाहको सानोतिनो रीति पुच्याए ।विवाह सकिएपछि सबैजना केशवकै घरमा जम्मा भए । कैशवको घरमा करिबसयजना जतिको लागि भोज तयार थियो । भोजमा केशवको धेरै नजिककालाई,कान्छीका धेरै नजिकलाई मात्र बोलाइएको थियो । मोना र रोमाकान्तले नैआफूलाई संसारका सबैभन्दा भाग्यमाती नारीपुरुष सम्झैका थिए । सबैलेमोनालाई उपहार दिनुको साथै सुखी वैवाहिक जीवनको कामना पनि गरे ।चार बजेतिर सम्पूर्ण आफन्तहरू भोज खाएर गइसकेपछि शालुलगापतकान्छीदिदीले मोना र रोमाकान्तलाई राम्रोसँग जीवन काटन्‌ भनी डेरामाछोडेर आफनो घर आए ।&lt;br /&gt;
मङ्सिरको छोटो दिन, छ बजे नै झमक्क साँझ पस्यो । रोमाकान्तले दूधतताएर ल्याई मोनालाई दिँदै भने, &#039;मोना दूध पेक, अघि तिमीले धेरै खानेकुराखाएकी छैनौ, भोक पनि लाग्यो होला, अरू केही खानेकुरा वनाड कि !&#039;&lt;br /&gt;
मोनाले मधुर स्वरमा भनिन्‌, &#039;भौक लागेको छैन । खासै दूध पनि खाने मनथिएन, तपाईंले भनेपछि, यतिचाहिँ खान्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
रोमाकान्तले मोनानजिक बस्दै भने, &#039;मोना तिमी त फूलजस्तै रहिछौँ ।पशुपतिमा त्यो आइमाईले अनुमान गरेको कुरा पनि ठीकै हो । मजस्तोसँगसिङ्गै जीवन काट्न सक्छयौ त !&#039;&lt;br /&gt;
मोनाले जवाफ फर्काइन्‌, &#039;मेरो उमेर मात्र सानो हो । मैले सुखदुःखका सबैपाटाहरू राम्रोसँग बुझेकी छु । शालु दिदी र कान्छीदिदीले मेरो मायाले गर्दा नैतपाईंलाई नै रोज्नुभएको हो । मैले तपाईंलाई पाउनु मेरो पनि ठूलो सौभाग्यहो।&#039;&lt;br /&gt;
रोमाकान्तले मोनालाई हेर्दै भने, &#039;मोना तिमीले मेरो मन नै हलुको पान्यौ ।म सधैँ भगवानलाई किन यस्तो रूप दिड्स्‌ भन्दै गाली गर्थे । आज मैले बुझेँ,तिमीसँग भेट गराउनकँ लागि यस्तो रूप दिएका रहेछन्‌ । धन्य छ भगवानलाई ।मोना म तिम्रो बिशाल हृदयमा कहिल्यै चोट पुन्याउने छैन ।&#039; मोना चुपचाप&lt;br /&gt;
00&lt;br /&gt;
लागिन्‌ । रात ढस्किसकेकोले दुवै ओछ्यानमा गई भविष्यको मीठामीठा कुरागरे । रोमाकान्तले मौनालाई मामाले सुम्सुम्याए, मायाका चुम्वनहरू वर्षाए ।मोना र रोमाकान्त नै एक-अर्कालाई भुलेर एक-अर्काको अङ्गालोमा हराइरहे,बस्‌ हराइरहे... ।&lt;br /&gt;
उन्नाईस&lt;br /&gt;
&#039;आज यति रमाइलो क्षणमा पनि तिमीलाई कोठै प्यारो भयो होइन ! केसोचेर बसेकी : दिदी हिँड न बाहिर ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले सुजनको हात मुसादै भनिन्‌, &#039;सुजन यतिखेर भने म तिम्रै भविष्यकोबारेमा सोचिरहेछु । म पनि चाँडै होस्टेल जाँदैछु । तिमी घर आयौँ । तिमीमासाँचो र झुटो बुझने बेला पनि छैन । दिदी भन्नुहुन्थ्यो- फिरोजलाई गुहेखाल्डोमा धकेल्ने फिरोजकै बाबुआमा हुन्‌ रै । आजकाल फिरोजका बाबुआमाछोरो बिग्रिएको पश्चात्तापले जल्दैछन्‌ रे ।&#039;&lt;br /&gt;
“शालु के भन्न खोजेकी तिमीले ? बल्ल कँदमुक्त भएर आएको छु। मैलेअहिले नैं जीवनको वारेमा सोच्न थालेँ भने म कहिले हाँसौँ तिमी नै भन त ?तिमी घरमै वस्यौ, ममी, पापा र कान्छीदिदीको मायामा चुर्लुम्म डब्यौ । मैलेत खुसी के हो बुझनै पाइनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालु भाइलाई जीवन के हौ भनेर सम्झाउन मात्र के लागेकी थिइन्‌उर्मिलाले ढोका खोल्दै चिच्याइन्‌, &#039;शालु यो रमझममा पनि भाइलाई कोठाभित्रराखेर के कुराले कान भर्दैछयौ हँ ? तिमी त हामीसँग भएर पनि कहिल्यै हामीहुन सकिनी । सुजनको हामीप्रतिको मायाचाहिँ नखोस ।&#039;&lt;br /&gt;
डीपकले उर्मिलाको कुरामा सही थप्दै ढोकाबाटै भने, &#039;शालु, उर्मी जेभन्दैछिन्‌ ढीक भन्दैछिन्‌ । अरूका छोराछोरी वाबुआमासँग टाँस्सिएर हिँडेकोदेख्दा पनि हामीलाई त्यसै गर्न रहर लाग्थ्यो । तिमीले हाम्रो त्यो रहर कहिल्यैपूरा गरिनौ । सुतालाई तिमीले हामीबाट टाढा राख्न नखोज । तिमीलाईडाक्टर पढाउन पैसा लगानी गरेजस्तै हामी सृजनलाई पनि पैसा लगानी गरेरठूलै मान्छे बनाउँछौँ । तिमीले चिन्तै नगर ।&#039;&lt;br /&gt;
बाबुआमाको कुराले शालुलाई कताकता नरमाइलो त लाग्यो नै शालु केहीबोल्न नसकी चुप भइन्‌ ।&lt;br /&gt;
उर्मिलाले सुजनलाई हातमा समातेर तान्दै भनिन्‌, &#039;सुजन वावु, जारुतिम्रा साथीहरू आइसके होला ।&#039; सुजनले केही कुरा बुझे केही कुरा बुझेनन्‌पनि । सोझ्ौँ जन्मदिन मनाउँदै गरेको सुजन हाँस्दै पार्टीको रमफझममा मिसिए ।शालु भने सुजतको चिन्ताले यताउता छटपटाइरहिन्‌ । मनमनै सोचिन्‌, “कहिले&lt;br /&gt;
चिदि)&lt;br /&gt;
मेरो ममीपापाको बृद्धिका घैँटामा घाम लाग्नै होला ? मैले सुजनलाई सहीबाटो देखाइन भने उनी भत्किन्छन्‌ । म नेपाल मेडिकल कलेज जान अझएक-डेढ महिना छ, त्यो बेलासम्म केही उपाय गरौँला ।&#039; शालु के-के सोच्दैथिइन्‌ ढोकाबाहिरबाट आएको आवाजले ध्यान त्यतै गयो ।&lt;br /&gt;
काकाकी छोरी प्रकृत्तिले भनिन, &#039;शालु दिदी, ढोका खोलिस्थो त म हजुरलाईके दिन्छु।&#039;शालुले ढोका खौल्दै भनिन्‌, &#039;के दिने नानु !&#039;&lt;br /&gt;
प्रकृतिले वालउपन्यास नीलकमल शालुतिर बढाउँदै भनिन्‌, &#039;हजुरलाईकथा, उपन्यास धेरै मनपर्छ भनेर यो उपन्यास हजुरलाई ल्याइदिएकी छु। योहेरिस्यो भने हजुर त रोइसिन्छ बाचै ! मेरा धैरै साथीहरू रोए रे म पनि रोएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले प्रकृतिको गालामा निमोट्दै भनिन्‌, &#039;धन्यवाद ! मेरी गुडियालाई मपनि बोर भएर बसेकी थिएँ, साइतमै किताब ल्याइदिडछौ हुन्छ म किताबपढ्छु, तिमी जाक ।&#039;&lt;br /&gt;
१२-१३ वर्षकी प्रकृति हाँस्दै गइन्‌ । शालु किताबमा के रहेछ भनेर हेर्नथालिन्‌ । शालुलाई नीलकमल पढेपछि समय गएको त पत्तै भएन । पुनःसुजनले ढोका खोलेपछि पो झसङ्ग भइन्‌, सुजनले शालुतिर हेदैं बडो नम्रस्वरमा भने, &#039;दिदी बिन्ती, आज मेरो चुकाका लागि डान्स गरिदेक, म तिमीलेजे भने पनि मान्छु ।&#039; त्यो फिरोजले मैले डान्स गरेको देखेर मरिमरी हाँस्दैभन्यो, हेर यो फुच्चे, भ्यागुतो उफ्रेझैँ उफ्रेको, यस्तालाई पनि डान्स गर्ने सोखहा..हा... । कसँगै बसेका चार-पाँच युवतीले पनि मेरो खिल्ली उडाउँदै हांसे ।&#039;शालुले उत्तर दिन नपाउँदै सुजनले शालुलाई तान्दै भने, &#039;तिमीले आज डान्सगरिनौ भनै म तिमीसँग. कहिल्तै पनि बोल्दिनँ ।&#039; शालुलाई भाइसँग पार्टीमाजान कर नै लाग्यो । सुजनले क्यासेटको चक्का फेर्दै भने, &#039;अब मेरी दिदीलेडान्स गर्छिन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
सुजनको क्रा सुनेर-सबैले बप्पडी पिट्दै हाँसे । फिरोजले जबर्जस्ती हाँसोरोकेर भन्यो, &#039;भ्यागुता-भ्यागुती एकैचोटि उफ्रिने कि छुट्टाछुट्टै उफ्रिने हँ ?&#039;&lt;br /&gt;
युवतीहरूले कुरा थपे, “गेटअप त हेरन, पहाडबाट बल्ल ओलेंकी जस्तीछ । यो सुजनले बनाएकोचाहिँ दिदी होला ।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले युवतीहरूको गालामा म्वाइँ खाँदै भन्यो, &#039;ओ परीहरू, वतचरीलाईउडाएर वनैमा पुन्याइदेऔ । कस्ताकस्ता कहाँ गए मुसाको छाउरा दरबार,यस्तीले डान्स गर्ने रे, डान्स कुन चराको नाम हो थाहा छ ? झयाउँकिरीलाई ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;्हा...हा... झयाउँकिरी&#039; भन्दै युवतीहरू खित्का छाडेर हाँस्दा पनि शालुचुप नै लागेको देखेर सुजनलाई साह्रो रिस उड्यो । सुजनले शालुलाई मनपर्नेगीतको क्यासेट बजाएपछि शालु डान्स गर्न थालिन्‌ । शालुले डान्स गरेको&lt;br /&gt;
[५९ )।&lt;br /&gt;
देखेपछि बरिपरि तितरबितर भएका मान्छेहरू एकत्रित भए । पार्टीको माहोल नैअर्कै भयौ । फिरोज र उसका आसेपासेहरू हेरेको हेरै भए । शालुले डान्सगरिसकेपछि सबै वान्समोर &#039;वान्समोर&#039; भन्दै चिच्याउन थाले । शालुले गीतगाउँछु भनेर आनन्द कार्कीले गाएको &#039;यो कस्तो नियति, यो कस्तो जलन&#039;बोलको गीत गाउन थालेपछि सबैले विनको धुनमा सर्प लट्टिएकैँ लट्टिएर गीतसुने । गीत सिद्धिसकेपछि सबैले शालुको डान्स र स्वरकै तारिफ गरे । सुजनहर्षले फुरुङ्ग भएर आफनो साथीहरूलाई शालुसँग परिचय गराए । फिरोजलेयुवतीको अङ्गालो छोडेर शालुसाम्‌ आई &#039;शालुजी, मलाई माफ गर्नोस्‌, मैलेजै भने केही तशोची भनेँ, आउनौस्‌ तपाईँ र म डान्स गरौं&#039; भन्दै फिरोजलेहात शालुतिर बढायो ।&lt;br /&gt;
शालुले पर हट्दै उत्तर दिइन्‌, हेर्नोस्‌, आज मैले मेरो भाइको खुसीका लागिमात्र डान्स गरैकी हुँ । म पेसेवर डान्सर होइन ।&#039; यति भन्दै शालु पार्टीकोमाहोलबाट बाहिरिइन्‌ । सुजनले मनमनै भने, “साले फिरोज, तेरो घमण्ड बल्लचकनाचुर भयो । हामीलाई भ्यागुता-भ्यागुती भन्थिस्‌ अव के भन्दोरहेछस्‌ भन्‌मोरा !&#039;&lt;br /&gt;
फिरोज नजिकै रहेको बेन्चमा बस्यो र सोच्यो, &#039;आजसम्म मैले मेरो एकइसारामा नै मप्रति भुतुक्क हुनै युवतीहरू भेटेको थिएँ । कति त मसँग बोल्नपाउनु पनि आफनो सौभाग्य सम्झिन्ये । यसले मेरो रूप देखिन होला, त्यसैलेमसँग डान्स गर्न इन्कार गरी । केक काट्ने बेलामा त अबश्य आउँछै नै होला,म जसरी भए पनि त्यसलाई मेरो रूप हेर्न बाध्य गराउँछ । मेरो रूप देखेपछि,चित खान्छे । मान्छे जे-जस्तो हौस्‌, त्यसको स्वरलाई र त्यसको डान्सलाईचाहिँ मान्नैपर्छ बा ! मलाई एक नजर देखेपछि मैन पस्लेझैँ परिलिन्छे त्यो । अनिमैले त्यसलाई के गर्नुपर्छ जानेको छु । यति धेरै तड्पाउँछु कि तड्पीतड्पी मर्छै,त्यो । मचाहिँ नयाँनयाँ फूलहरूमा रमाइरहन्छु ॥:004 एक-दुई वचन बोलेर प्रेमकोनाटकचाहिँ गर्नैपर्छ ।&#039; यस्तै कुराहरू मनमा थियो । युवतीहरूलेयथार्थ बोध गराए- &#039;फिरोज हेर कति गीतहरू खेर गइसक्यो उठ डान्स गरौँ ।नपत्याउने खोलाले वगाउँछ भन्थे ठीक रहेछ । भ्यागुतीले डान्स त कमालकैगरी, फेरि गीत पनि राम्रै गाई ।&#039; फिरोजले उठेर बुगतीहरुलाई अङ्गालोमाबेबै भन्यो, &#039;अब केही दिनका लागि त्यो पनि यसरी र अङ्गालोमा बेरिन्छै । मउसलाई तिमीहरूको जस्तै पहिरन लगाउन बाध्य गराउँछु । तिमीहरूकोजस्तो पहिरन र तिमीहरूको जस्तो शृङ्गगारमा सुहाउँदै देखिएली, होइन त ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;नाइँ फिरोज, नाइँ हामी तिमीलाई केही दिनका लागि पनि छोड्न सक्दैनौं,पाँचैजना युवतीले एकै स्वरमा भने ।&lt;br /&gt;
फिरोजले भेटघाटको समय फरक पार्ने तर तिमीहरूलाई नछौड्ने भनीवचन दियो । त्यसपछि युवतीहरू ढुक्क भए । पुनः केहीबेर डान्स चल्यो । केक&lt;br /&gt;
(९०)&lt;br /&gt;
काट्ने बेलामा सबै एकब्रित भए । शालु केकमा गाड्ने मैनबत्ती र चक्क्‌ लिएरहल्का गुलाफी कुर्ता-सलवारमा आइन्‌ । फिरोजले मनमनै सङ्कल्प गर्दै भन्यो,&#039;तेरो यौ कूर्ता-सलवार चार दिनमा उतार्छँ म ।&#039; केक काटने काम पनि सुरुभयो । दीपक र उमिंलाले सुजनको हात समाते, सुजनले केक काटै । बाबुआमालेसुजनलाई केक खुबाएपछि सबैले ताली बजाए । सुजनले बाबुआमा र दिदीलाईकेक खुवाएपछि, कमशः सबैलाई केक बाँड्न सुरु गरै । शालुले कैक काटनमासहयोग गरिन्‌ । फिरोज भने कसरी शालुलाई आफनो रूप देखाउने भन्नैघुनमा थियो । फिरोजले गिफट दिँदा शालुको प्रशंसा गर्दै भन्यो, &#039;मलाईतपाईंको डान्स र गीत नै साह्रै मत्त प्यो ।&#039; शालुले मुसुक्क हाँस्दै जबाफदिइन्‌, &#039;धन्यवाद !&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले शिर झुकाएरै भन्यो, &#039;मलाई माफ त दिनुहुन्छ हैन ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;तपाईंले जे देख्नुभयो त्यही मन्ुस्ी भयौ । मान्छैले आँखाले देखेको कुरा भन्नैन हो । माफ मान्नुपर्ने कुनै कारण नै छैन ।&#039; फिरोज कुरा बढाउन चाहन्थ्यो ।शालुले फिरोजको अनुहारतिर हेर्दै भनिन्‌, &#039;कृपया पछि कुरा गर्नुहोला, अहिलेलाईम काममा व्यस्त छु।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोज अँध्यारो मुख लगाएर त्यहाँबाट हट्यो । उसले चित खायो, आफनोसुन्दर अनुहार र सुन्दर जिउडाल देख्दा पनि शालुले कुनै प्रतिक्रिया नजनाएकोदेख्दा । सुजन भनै मनमनै फिरौजको आकृति देखेर रमाउँदै सोचिरहेका थिए,“सँ म जस्तो कोही छैन भनेर घमण्ड गर्थिस्‌ । देखिस्‌ तँ जस्तालाई मेरीदिदीले कसरी आफूबाट टाढा भगाइन्‌ । अब त तेरो सेखी फप्यो होला नि !तैँले मेरी दिदीलाई अरू जस्तै तेरो रूप देख्नेबित्तिकै लट्टिने भन्ठानेको थिइस्‌होला, देखिस्‌ हैन ? मेरी दिदीको व्यवहार मुल्ला फिरोजे ।&lt;br /&gt;
&#039;किन फिरोज तिमी त चूक घोप्टाएजस्तै अनुहार लिएर आयौ । भ्यागुतीलेपत्याइन कि कसो ?&#039; युवतीहरूले फिरोजको बरिपरि झुम्मिँदै भने ।&lt;br /&gt;
फिरोजले रिसाएको स्वरमा भन्यौ, &#039;चुप लाग, कति दिन यो फिरोजेकोअगाडि चुरीफुरी देखाउँदिरहिछे हेरौँला नि । आमाबाबुको ताल त्यही हो । नशालागेपछि पेटिकोट खुस्केको पनि पत्ता हुँदैन, छोरी भने मै हँ भन्छे । म त्यसलाईकाँच्चै चपाउन पाए पनि चपाइदिन्थेँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;जाकैँ आज तपाईंलाई धेरै पीर परेको छ। अफिमको नशामा रमाङैँ ।अफिम त छ होइन ? तपाईँको घरको खाली कोठामा मान्छे आए कि आएनन्‌नत्र अस्तिझैँ त्यहीँ बसौंला ।&lt;br /&gt;
फिरोजले दाह्रा किटदै भन्यो, &#039;प्लिज मलाई एकछिन एकान्तमा छौडिदैक ।म त्यसलाई पासोमा पारेर बजार्ने उपाय सोच्छु । बजार्न पनि यसरी बजार्छु किठहरै पार्छु राँडलाई । हेरन हाँसेको कट हाँसेजस्तो, मुख हेरन राँडको हकिचिलको&lt;br /&gt;
११।&lt;br /&gt;
जस्तो, अझ मै हुँ भन्छे । हेरन भनेकी पेसेवर डान्सर होइन । मैले त्यसलाईपेसेवर डान्सर बनाइन भने त मेरो नाम पनि फिरोज होइन ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;फिरोज तिमी पनि के एउटै धुनमा लागेको हँ ? आफूलाई सम्हाल ।तिमीले जति पिए पनि तिम्रो नशा बन्न हामी तयार छौँ । भूल त्यसलाई, किडान्स गरौं कि गएर अफिममा &#039;फुलौं । कि रक्सीमै झुलौं, रक्सी पनि आउँदैछ,&#039; युवतीहरूले फिरोजलाई सम्झाए । फिरोज भने शालुलाई हेर्दै दाह्रा किटिरहेकैथियौ । सबैलाई केक बाँडेपछि शालु केही खानेकुरा र एक ग्लास फेन्टा लिएरघरभित्र पसिन्‌ । फिरौजले शालुको सबै क्रियाकलाप नियालिरहेको थियो । करक्सी पिउँदै शालु वाहिर आउने प्रतीक्षामा थियो । तर, शालु सबैले डिनरखाइवरी गाइसम्दा पनि निस्किनन्‌ । उता शालु भने फेन्टा, आलुचिप्स आदिखाई पढ्न बाँकी रहेको बालउपन्यास नीलकमल पढ्दापढ्दै निदाइन्‌ । प्राय:सबै पाहना गइसकेपछि फिरोज नशामा लह्विँदै कार चलाएर घर पुग्यो । छोरासुधने आश नै मारिसकेका गंगा र रमणले छोरा आएको चाल पाए पनि चालनै नपाएफैँ गरी सुते । फिरोजले शालुको अपमान विर्सिन अफिम पियो, तरअहँ अफिमको नशामा पनि शालुलाई भुल्न सकेन । अझै अफिम पियो र मुडालडेकैँ लड्यो । भोलिपल्ट बिहान होसमा आएपछि पनि फिरोजले शालुलेआफनो वास्ता नगरेको सम्झयो । फिरोजलाई शालुको कुराले साट्दै चोटपर्नुको कारण थियौ, &#039;क जीवनमा पहिलोपल्ट नै कुनै साधारणरूपकी युवतीबाटअपमानित भएको थियो । ज्यादै सुन्दरी युवतीहरूलाई आफनौ इसारामा नचाएकोफिरोजलाई शालुको अपमात सहय भएन । गंगाले फिरोजतिर दूध बढाउँदैभनिन्‌, &amp;quot; तिमीले अब राति कहीँ जाँदा कार लिएरचाहिँ नजानू, वरुट्याक्सी चढे जानू । हिजो अगाडिको हेडलाइट फुटेछ । कार केही कुच्चिएकोपनि छ । तिम्रो प्रियसीहरूको ब्याग, पर्स, मोबाइल भने कारभित्र रहेछन्‌ ।तिमी होसमा नभए पनि तिम्रा मायालुहरू हिजो होसमा रहेछन्‌ र दुर्घटना हुनपाएन होला होइन !&#039;&lt;br /&gt;
आमाको बोलीले फिरोज झसङ्ग भएर सम्झयो- मैले त नशामा &#039;झुल्दैगरेका ती युवतीहरूलाई त्यहीँ छोडेर आएँछु । उफ ! मलाई के भएको होला,कसरी डेरामा पुगे होलान्‌ उनीहरू भनी तुरुन्तै फोन गरेर बुझ्यो । दीपककोड्राइभरले नै डेरामा पन्याइदिएको थाहा पायो । फिरोजको मस्तिष्कबाट शालुअफै नहटेकोले आमासँग शालुको बारेमा सोध्यो ।&lt;br /&gt;
गांगालै लामो श्वास फेर्दै भनिन्‌, &#039;ए उर्मिलाकी छौरी शालुको कुरा गरेकोतिमीले, कहाँ शालु कहाँ तिमीहरू, उनको कूरै नगर । तिमीले अरूहरू मुबतीहरूजस्तै सम्झेका होलाक शालुलाई, उनले बुझेकी छिन्‌ हीरालाई कीराले पनिबिगार्छ भन्ने कुरा । हामीले तिमीलाई जातीनजानी बिगान्यौँ । उर्मिला रदीपकको लहैलहैमा लागेकी भए शालुको पनि तिम्रै हाल हुन्थ्यो होला । उनकै&lt;br /&gt;
३२!&lt;br /&gt;
घरमा बस्ने कान्छीले शालुलाई सही बाटो देखाइन्‌ । शालुले स्वयम्‌ वाबुआमालेदेखाएको बाटो छोडी कान्छीले देखाएकै बाटोमा हिँडिन्‌ । नेपाल मेडिकलकलैज जोरपाटीमा ड्वाक्टर पढ्न नाम निकालेकी छिन्‌ रे भन्ने सुनेकी थिएँ ।अव त पढ्न जाने बेला पनि हुन लाग्यो होला । भाइ बिग्रन्छ कि भन्ने अबएउटै चिन्ता छ भन्थिन्‌ रे । कृपा क्या कृपा छिमेकी नरेन्द्रबावुकी छोरी उनैकीसाथी हुन्‌ । कृपाले नै सबै भनेकी हुन्‌ मलाई । उनी सानो छँदा त सधैँबाबुआमासँग आउँथिन्‌ पार्टीहरूमा, ठूली भएपछि चट्ट बाबुआमाको साथ नैछोडिन्‌ । तिमीजस्तो अबुझलाई शालुको करा किन भन्नु ? म गएँ, भन्दै गंगाभान्सातिर प॒सिन्‌ ।&lt;br /&gt;
&#039;मेरो गोरुको वाह्रै टक्का&#039; भन्ने स्वभावको फिरोज आमाको कुरा सुनेरओइलाएको फूलझैँ भयो । सेट भन्दै मुडकीले भुइँमा हान्यो । जतिजति शालुकोसम्झनामा गहिरिँदै गयो, उत्तिउति शालुको हिजो बोलेका सबै शव्दहरू मीठोलाग्यो । शालुको आँखा-नाक-मुख-जीउडाल सबै सम्झयो । शालुको सबैचिज सुन्दर लाग्न थाल्यो फिरौजलाई । फिरोज जुरुक्क उठेर आमासामु पुग्दैशालुको करा कोट्याउन चाहयो । गंगाले फिरोजको कुराको आशय बुझेरभनिन्‌, &#039;फिरोज, तिमी ध्रर्तीमा बसेर चन्द्रमा छुने आँट नगर । शालुजस्तानारीहरू रूपलाई र घनलाई भन्दा चरित्रलाई हेर्छन्‌ । तिमी त शालुको आँखामापतिङ्गर नै हौँ । त्यो कुरा तिमीले हिजो नै विचार गन्यौ होला । शालुको सपनादेख्न छोड, हातमुख धोएर खाना खान आफ ।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजलाई आमाको कुरा बेठीक लागेन तर शालुलाई भुल्न पनि सकेन ।सोच्यो &#039;म शालुलाई पाउन जे पनि गर्न तयार छु ।&#039;&lt;br /&gt;
बीस&lt;br /&gt;
फिरोजले महिनौं-महिनासम्म शालुको पिछा गर्दा पनि शालुले कुनै प्रतिक्रियादेखाइनन्‌ । घरपरिवारका मान्छेहरू र फिरोजका सुन्दरीहरू फिरोजमा एक्कासिआएको परिवर्तन देखेर आश्चर्यमा पर्नु स्वाभाविकै थियो । फिरोजका सुन्दरीहरूलेफिरोजलाई लाख सम्झाएर पहिलेकै बाटोमा आउन आग्रह गरे तर अहँफिरोजले सुन्दरीहरूको क्रा पटक्कै टेरेन । उल्टै सुन्दरीहरूलाई आफनोसामुनपर्नु भनी कडा चेतावनी दियौ । फिरोजका सुन्दरीहरू अर्कै बाटो मोड्नबाध्य भए । गंगा र रमण फिरोज एउटा खाल्डोबाट उत्रेर अर्को खाल्डोमापसेकोमा चिन्तित नै थिए । फिरोज शालुलाई नपाए आफू नबाँच्ने भनीअन्तिम 7000 थियौ । त्यसैले क एकदिन आँट गरेर शालुको सामुपुग्यो र हात भन्यो, &#039;शालु, मलाई एकपल्ट सुधिने मौका देक। मतिमीबिना बाँच्न सक्दिनँ । म तिमीले जै भन्छयौ त्यही मान्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
९३&lt;br /&gt;
शालुले सम्झाइन्‌, &#039;हेनौंस्‌ फिरोजजी तपाईंजस्तो होनहार व्यक्ति बिग्रिएकोदेख्दा मलाई पन्ति पीर अवश्य लागेको थियो । तपाईं सृन्दर र सम्पन्न हुनुहुन्छ ।तपाइँले मजस्ता सयौँ युवती पाउनुहुन्छ । तपाईं कूनै आदर्श युवतीसँग विवाहगर्नोस्‌ । मलाईचाहिँ अहङ्कारी भन्नोस्‌ या जे भन्नोस्‌ । म प्रेम शब्दसंग नैघृणा गर्छु । तपाईँ लाख कोसिस गर्नोस्‌ एक हातले ताली चज्दैन । बिन्ती,आइन्दा प्रेम भन्नै शव्द मैरोसामु बिर्सेर पनि नओकल्नुहोला&#039; भन्दै रिसाउँदैशालु आफनो घरतिर आइन्‌ । फिरोज हेरेको हेरै भयो । आँखाबाट बलिन्द्रधाराआँस्‌ झार्दै घाइते सिंहझैं भई घर आयो । आफू बिग्रिनुको जिम्मेवार स्वयम्‌आफैँलाई नै ठहस्यायौ । बाँकी जिन्दगी कसरी काट्ने सोच्नै सकेन । फिरोजखानु न खुदनु इन्तु न चिन्तु प्यो । गंगा एकपल्ट शालुलाई सम्झाउने निर्णयलिँदै शालुको घरमा पुगिन्‌ । शालुले गंगालाई बैठकमा वस्न आग्रह गर्दै भनिन्‌,&amp;quot;हजुरले यसो फोन गरेर आइस्या भए हुन्थ्यो । ममीपापा होइसिन्त ।&#039;&lt;br /&gt;
गंगाले भरिएको आँखालाई ओमभातौ पार्दै भनिन्‌, &#039;म तिमीलाई नै एउटाबिन्ती गरौं भनेर आएकी हँ । के गरौं म छोराको मायाले अलि स्वार्थी भएँ ।फिरौज नशा, सुन्दरी सवैलाई छोडेर तिम्रो मायामा तड्पिन थालेको छ, । थुप्रैदिन भयो उसले एक गेडा अन्त पनि निलेको छैन । नानी ! त्यो हाम्रो एकमात्रटेक्ने वैशाखी हामीलाई दान देक । नफुली नै ओइलिसकेको फिरोज पुनः फुल्नैरहर बटुल्दै छ । साँच्चै भन्दा यहाँ आउने आँट त थिएन । फिरोजको बाबुलेपनि एकपल्ट शालुसँग फिरीजको जीवन माग भनेर पठाउनुभयो, त्यसैलेआउन बाध्य भएँ&amp;quot; भन्दै गंगा रुन पौ थालिन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालु अलमल्ल परिन्‌ र मनमनै सोचिन्‌, &#039;त्यो डालीडाली चहार्ने भमरामलाई चार-पाँच वर्ष पर्खिन अवश्य सक्दै-सक्दैन । मेरो सानो झूटले गर्दायिनीहरू खुसी हुन्छन्‌ भने झुट बौल्नु कुनै अपराध हुँदैन भन्ने सम्झी भनित,&#039;आन्डी नरोइस्यो, यदि फिरोज मलाई साँच्चै माया गर्छन्‌ भने म डाक्टर पढेरआउँदा उनले पढ्दापढ्दै छाडेको इन्जिनियर पूरा गर्नुपर्छ भनिदिसैला । अर्कोकरा प्रेममा छोइछाई, ख्यालठट्टा, भेटघाट मलाई मन नपर्ने कुराहरू हुन्‌, त्योपनि भनिदिसेला ।&#039;&lt;br /&gt;
गंगाले खुसी हुँदै भनिन्‌, &#039;नानी ! म तिम्रो यो गुन कहिन्यै भुल्ने छैन ।मलाई जहाँसम्म लाग्छ फिरोजले तिम्रा सारा सर्त मान्नेछन्‌ । अन मेरो घरपनि स्वर्ग हुन्छ । नानी, सबैजना खुच्चिङ भन्दै थप्पडी मार्थे । अब मैले पनिशिर ठाडो गरेर हेर्न पाउने भएँ । सायद तिम्रो जन्म नभएको भए हामी जिउँदैगर्ने थियौं । म तिमीलाई सधैँ पूजा गर्छु शालु सघैँ पूजा... ।&#039;&lt;br /&gt;
हजुरले मलाई त्यति माथि नउटाइस्यो । फिरोज केही गरी राम्रो हुनुभयोभने मात्र मलाई धन्यवाद दिसेला । म पर्सि नै होस्टेल जाँदैछु, किताबहरू अफ्ैकिन्नु नै छ । हजुर आएर मात्र म रोक्किएकी हुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
छे&lt;br /&gt;
गंगाले चिया पिउँदै भनिन्‌, &#039;चिया ल्याइहाल्यौ, चिया पिएर संगै निस्कौंलाहुन्न ?&#039; शालु स्वीकृतिसूचक मुन्टो हल्लाएर कपडा लाउन गइन्‌ । कपडालाएपछि गंगा र शालु नै घरबाट निस्के । गंगा खुसीले फुरुङ्ग हुँदै घरतिरलागिन्‌ भने शालु पुस्तक पसलतर्फ लागिन्‌ । किताव किनेर घर फर्केको केहीक्षणमै फोन आयो, शालुले फोन उठाइन्‌, फोन फिरोजकै थियो । फिरोजलेबडो हर्षित स्वरमा &#039;आफू पढ्नै र सात जन्म पनि तिमीलाई कूर्न सक्छु शालु&#039;भन्यो । आफनो ममीपापा र आफू नै खुसीले रमाइरहेको कुरा बतायो । शालुलेआफू पनि खुसी छु भनी पुनः अर्को झूट बोलेर फोन राखिदिइन्‌ । फोनराखेपछि मतमत्तै सोचिन्‌, मैले जे गरें ढीक गरेँ, सर्प पति मर्ने लट्ठी पतिनभाँच्चिने । जवानीकै माया गर्ने त्यो निच प्यासीले पनि प्रेम गर्ने रे । उफ !प्रेम शब्दलाई फिरोजजस्ताले ज्यादै सस्तो बनाइदिए । सुजन आजसम्म पनिफर्केनन्‌ । उन्ती बिग्रिए भनै म कसरी बाचौँला ? ममीपापाको भित्री मनशायसुजनलाई आफनो रङ्गीचङ्घगी दुनियाँसँग घुलमिल गराउनु हो । उनीहरूसोच्छन्‌ पैसाले छोरालाई ठूलो मान्छे बनाउन सकिन्छ । ममीपापाले सुजनलाईआफूहरूबाट अलग्याउँछै भन्ने सोचेर जानीजानी घर नफर्किनुभएको हो ।जन्मदिनको भोलिपल्ट नै अलइन्डिया टुरमा जाने क्रा रहेछ, त्यो कुरा नभाइलाई थाहा थियो न मलाई नै । सुजनलाई ममीपापाले मेरोसामु पर्नसम्मदिनुभएन । उहाँहरूलाई भाइको जिन्दगीभन्दा आफ्नै स्वार्थ प्यारो भयौ । शालुकेही कुरा सोच्न नसकी लम्पसार परेर सुतिन्‌ । अँघ्यारोलाई चिर्दै मुख ढाकेरविभिन्न परिकारहरू लिई आफूतो कोठामा पसेकी कान्छीदिदीलाई देखेपछिशालु कान्छीको काखमा पल्टेर धेरैबेर रोइन्‌ । कान्छी पनि रोइन्‌ । कान्छीलेशालुलाई मायाले कपाल सुम्सुम्याउँदै भनिन्‌, &#039;अव नरोइस्यो, हामी सबैलेदेखेको सपना साकार भयो । बरु छिटो खाना खाइस्यो । दाइले ट्याक्सीमैमलाई पर्खिनुभएको छ । दाइ, मोनालगापत सबैलै हजुरलाई सम्झेका छन्‌ ।रोहिणी मैयाँसापचाहिँ भोलि हजुर जाने बैलामा आइसिन्छ रै ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले आँसु पुछ्दै सबैलाई सोधित्‌ । कान्छीले सबैको हालखबर राम्रैभएको बताइन्‌ । वीरुले नाम फेरेर सौरभ राखेको क्रा बताइन्‌ । रौमाकान्त रमोनाको सुखी जीवनबारे पनि बताइन्‌ । प्रशन्नको राम्रै खबर छ भनेर पनिबताइन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालु उठेर कान्छीको हात मुसार्दै भनिन्‌, &#039;दिदी मलाई अब एउटै चिन्तासुजनको छ । उसलाई ममीपापाले बिगारेरै छोडनुहन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
“मैयाँसाप हजुरले पीर नगरिस्यो । फिरोजको त्यो ताल देखेपछि सबैलेछोराछोरीलाई बढी पुलपुल्याउनु हुँदैन भनेर चेतिसके । डाक्टर पुष्कर भट्टकोक्रा पनि उनीहरूलाई थाहा नै होला ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;कस्तो कुरा दिदी ?&#039; शालुले प्रश्न गरिन्‌ ।&lt;br /&gt;
हजुरलाई थाहा छैन ? विवाह गरेकी श्रीमती सभ्य भइन भनेर कुन चाहिलाईफेरि विबाह गरेछ । आफनो सरुवा भएको ठाउँमा त्यसैलाई लिएर गएछ । त्योआइमाई प्रोजेक्टका लागि आएको अस्ट्रेलियनसँग अस्ट्रेलिया भागेपछि, अहिलेपहिली श्रीमतीसंगै छ, छौरा पनि दुई-तीन वर्षकै भइसकेछ । डा. भट्टकीश्रीमती भन्दै थिइन्‌, &#039;डा. भट्टले रक्सी, पार्टीसाटी सबै छोडे रे । उनलाई पनिअसाध्यै माया गर्छन्‌ रे ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले सन्तोषको हाँसो हाँस्दै भनिन्‌, &#039;भट्टकी श्रीमतीको कुरा सुन्दा साह्रैखुसी लाग्यो । दिदी तपाईं नै भन्नोस्‌ त अरू खुसी हुन्छन्‌ भने झूट बोल्नु हुन्छहोइन ? तपाईं पनि मलाई खुसी पार्न धेरै &#039;फूट बोल्नुहन्थ्यो । ममीले गालीगरेर शँदा आंखामा धूलो परेर आँसु झारेकी भन्नुहुन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीले अलि डराउँदै भनिन्‌, &#039;फेरि हजुरले कोसँग &#039;फूट वोलिस्यो ?&#039;&lt;br /&gt;
शालुले गंगा घरमा आएको फिरोजले आफूलाई प्रेस गर्छु भनेको सबै कुराकान्छीलाई बेलिबिस्तार लगाइन्‌ र शालुले आफूले फिरोजलाई माया गर्छु भनेरझूट बोलेको कुरा पनि बताइन्‌ । कान्छी शालुको कुरा लु खडो चिन्तितबनिन्‌ । शातुताई ई के भन्नै के नभन्ने सोच्नै सकिनन्‌ । थुप्रे हिउँद बिताएकीकान्छीले अनुमान गरिन्‌ । फिरोजले वास्तवमै प्रेमको मूल्य बुझेकैहुनुपर्छ । शालु मैयाँसापलाई फिरोजको माया साँचो हो भनौँ भने चोट पर्ला ।फिरोजको माया झुटो हो भनेर पनि कसरी भनौँ !&#039;&lt;br /&gt;
&#039;दिदीले कै सोच्नुभएको ? फिरोजको बारेमा सोच्नुभएको हो भने अहिल्यैत्यौ फिरोजेको करालाई मस्तिष्कबाट निकालिदिनुभए हुन्छ । त्यो गुन्डोलाईतपाईंले मैले चिनेकै हौँ । मैले त बिचरी गंगा आन्टीको आँसुको मान मात्रराखिदिएकी हुँ । त्यस्ता लफङ्गाले प्रेमको मूल्य बुझ्यो भने त यो पृथ्वी नैपल्टिन्छ हैन ?&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीले हांसेजस्तो गरी भनिन्‌, &#039;हजुरले ठीक नै सोचिस्यो । त्यो प्रेमी हुनैसक्दैन तर हजुरले कसैलाई मन पराउन लाइस्यो भने पहिला मलाई भनिसेलानत्र म रिसाउँछु । हात्तीको चपाउने दाँत बेग्तै, देखाउने दांत वेग्लै हुन्छ ।मान्छेलाई पनि बाहिरबाट चिन्न सकिँदैन । अझ अर्को कुरा, हजुरले आफनोविवाहका लागि केटा खोज्ने जिम्मा मलाई नै दिस्यो भनै म झनै खुसी हुन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीको गालामा म्वाइँ खाँदै भनिन्‌, &#039;ल मैले त्यो जिम्मा तपाईंलाईनै दिएँ। म दिदीले जोसँग भन्नुहुन्छ त्यहीसँग विवाह गर्छु नत्र कुमारी नैबस्छु।&#039;&lt;br /&gt;
“&#039;शालुको कुराले कान्छीको आँखाबाट हर्षको आँसु झन्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीले ढोका खोलेर पलङ्गमा बस्दै भनिन्‌, &#039;ल हैर यी आमाछोरीकोरुवाबासी । तपाईंहरूको के कुरा हुँदै थियो ? म कवाफमा हड्डी त बनिन ?”&lt;br /&gt;
९६&lt;br /&gt;
कान्छीले आँस्‌ पुछ्दै भनिन्‌, &#039;हजुरसँग लुकाउनुपर्ने करै के छ र ? हजुरलेभौलि जान्छु भनिसेकोले म एक्लै आएकी ।&#039;&lt;br /&gt;
रौहिणीले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;दिदीले मीठोमीठो पकाएर ल्याएको थाहा पाएपछिदौडिहालेँ । हेर मोरी तैँले गर्दा हाम्रो घरमा पनिर पाक्दैन । आलुको अचार प्राय:बन्दैन । दिदी भन्नुहुन्छ, आलुको अचार र पनिर देख्यो भने मलाई शालुमैयाँको याद आउँछ ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीको कुराले शालुको मन भरिएर आयौ । पुन: एकैछिन वातावरणमौन भयो । रोहिणीले भनिन्‌, &#039;दिदी दाइ त बाहिर ट्याक्सीमा आनन्दलेनिदाउनुभएको छ।&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीले उठ्दै भनिन्‌, &#039;शालु मैयाँ राम्रोसँग पढिसेला, आफनो स्वास्थ्यकोख्याल राखिसेला म गएँ पनि ।&#039;&lt;br /&gt;
शालु कान्छीको पछिपछि गेटसम्म आइन्‌ तर दुवैको औठ चल्त सकेन ।कान्छी रुँदै बाटो लागिन्‌, शालु रुँदै कोठामा आइन्‌ । रोहिणीले बडो गम्भीरभएर भनिन्‌, &#039;साँच्चै माया भनेको गजबकैँ हुँदोरहेछ, । त्यसैले त मान्छेहरूभन्दारहेछन्‌- संसार प्रेममै अड्भेको छ । कान्छीदिदीकी तँप्रतिकौ माया त झन्‌अपारकैँ छ । अरूले चिन्लान्‌ कि भनेर मुख छौँपेरै भए पनि आउनुभयो । दिदीभन्दै हुनुहुन्थ्यो- शालु मैयाँसापको घरको काम गर्ने अहिले घर गएको छ रे ।म दिदीको कुरा सुनेर छक्क परेँ, सोचेँ शालुको घरमा को काम गर्ने आएछफेरि ? पछि बूझिहालेँ तैँले दिदीले पीर गर्नुहुन्छ भनेर घरमा काम गर्ने छभनेकी होस्‌ । भाँडा माझने, घर पुछ्ने त आउँछिन्‌ नै होला होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;अँ आउँछिन्‌ । आज बिहान भने दुध तताएर पनि दिइन्‌ । खाना पकाउनजाँगर लागेन, एउटा चाउचाउ उमालेर खाएँ । छोड्दे सानातिना क्रा, भन्‌प्रशन्नजीको हालखबर के छ ! तैँले आज केही हाँसेजस्तो गरिस्‌ मलाई ज्यादैखुसी लाग्यो ।&#039; त&lt;br /&gt;
“तैँले भनेकी होइनस्‌ हेर रोहिणी, तँ अरूको खुसीको लागि पनि हाँस्‌ । तेरोबाबुआमाले केवल तेरो खुसीका लागि अर्काको छोरामाथि ठूलो लगानी लगाएकाछन्‌ । त्यस्ता बाबुआमाको मन नदुखा । हामीलाई पनि तेरो अँध्यारो अनुहारदेख्दा पीर पर्छ भनेकीले हाँसेजस्तो गरेकी छु । नत्र तेरो लम्बेचौड्े भाषण सुन्नपरिहाल्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
“ल तैँले जे गरिस्‌ राञ्चै गरिस्‌ । अब हामी सबैको खुसीका लागि कुनै पनिएक विषयमा डिग्री गरिदिक मैयाँ । अलिकति मोटाइदेङ त्यति भए पुग्छहामीलाई । आजकाल तँ बाबुआमाको अगाडि मुर्दाजस्तै हुन्नस्‌ होला नि कि&lt;br /&gt;
कैले सम्झाएपछि आजकाल मैले आफूलाई वाँधैकी छु । मलाई खुसीझैँ&lt;br /&gt;
९५७&lt;br /&gt;
देखेर ममीवावा पनि खुसी नै हुनुहुन्छ । कति पत माल मेरो त्यसको तलेखाजोखा नै छैन शालु । कसरी चार-पाँच वर्ष वताउनु सम्झँदा मात्र पनिअत्यास लाग्छ । तैँले प्रेम नगरेर ठीक नै गरिस्‌ । प्रेमको पीडाले त मान्छेलाईसखापै पार्दारहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
“प्रेम गर्नेहरू सबै तँजस्ता कहाँ हुन्छन्‌ त ? देखिनस्‌ मौसमीको प्रेम कसधैँ प्रफुल्ल देखिन्थी । तँ भने सधैँ मरेको विरालो काखी च्यापेर थिमी जानेबाटो कता भन्ने जस्ती छैस्‌ । तैँले पढाइमा ध्यान दिइस्‌ भनेचाहिँ समयबिताउन सजिलो हुन्छ । अर्को कुरा तँ इन्जिनियर सापको श्रीमती बन्न लायकहनुपप्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीले शालुको कुरामा सहमति जनाइन्‌ । दुवै मीठोसँग खानेकुरा खाईसुत्न भनेर लागेका थिए । फौन आयो । शालुले फोन उठाइन्‌ । केही बेरकोकराकावीपछि फोन राखिदिइन्‌ । उर्मिलाले होस्टेल जाँदा डेरामा यस्नैलाईढोकाको चावी छोड्नु भन्नका लागि फोन गरेकी रहिछिन्‌ । शालुकी ममीकोकुरा सुनेपछि रोहिणीलाई ज्यादै नमज्जा लाग्यो । रोहिणीले महसुस गरिन्‌- मैलेतपस्या गरेरै बाबुआमा पाएकी रहेछु । गाइन ई भने आमाको कराले खासैदुःखेन । चुगगको भने चिन्ता लाग्यो । कूरा गर्दै निदाए । भोलिपल्टरोहिणीले नै शालुलाई होस्टैलसम्म पुन्याएर गड्न्‌ ।&lt;br /&gt;
एक्काईस&lt;br /&gt;
“आकाश तिमीले त महाराजगन्जमा पनि नाम निकाल्न सक्ने मान्छे, फेरियहाँ किन पढ्न आएको ?&#039;&lt;br /&gt;
(तिमी यहाँ पढ्दैछयौ भन्ने बाहा पाएर मैले पनि यहीँ पढेको हुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले हांस्बै भनिन्‌, &#039;तिमीलाई जोक गर्न त कसले सिकाओस्‌ ? तिमीलाईयहाँ देखैरचाहिँ साह्रै खुसी लाग्यो, प्राय: सबै काठमाडौंबाहिरकै रहेछन्‌ । हामीलाईत मान्छे गन्दैनन्‌ । हामीले राम्रो पढेर काठमाडौंको इज्जत राख्नैपर्छ, नत्र हेप्नुहेप्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
आकाश केही बोल्न नसकी आफनो रुमतिर लागे । शालु आफनो रुममाआइन्‌ । क्रमश: दिनहरू बित्दै गयो । शालु र आकाशको भेट हुन्थ्यो । पढाइकैवारेमा कुरा हुन्थ्यो र टुड्गिन्थ्यो । शालुलै डाक्टर पढ्न थालेको पनि तेस्रो वर्षपूरा भएर वर्षमा लाग्यो । कलेजमा प्रेम गर्नेहरूको लहर नै चलेकोधियो । शालु आफू निष्फिक्री भएकोमा दङ्ग थिइन्‌ । अरू साथीहरू भनेशालुलाई नपुड्सकको सङ्जञा दिँदै भन्थे, &#039;शालु हामी पनि तँजस्तै नपुड्सक हुनपाएको भए हुन्थ्यौ । न त तँलाई कनै केटाको चासो छ । त॑ नपुङ्सक भएरै धेरै&lt;br /&gt;
दद है&lt;br /&gt;
पढ्न सकेकी होस्‌ । नपृड्सकहरूलाई त वैंसले पनि कुनै असर नगर्ने रहेछहगि ?&#039;&lt;br /&gt;
गालु साथीहरूको कुरालाई हाँसोमा उडाइदिन्थित्‌ । शालुले नपुड्सक भन्दापनि कुनै खण्डन नगरेकी हुनाले साँच्चै शालुलाई सवैले नपुड्सक नै ठान्तथाले । शालु नपुड्सक भन्ने कुरा एक कान दुद कान गर्दै सबै केटाहरूले पनिथाहा पाए । शालुलाई मन पराउने दुई-चार केटाहरू त आफसेजफ सावधानभए । आकाशको हृदयमा भने गहिरो चोट लाग्यो । आकाश शालुलाई स्कूलेजीवनदेखि नै मन पराउँथे । शालुकै लागि सप्तरङ्गी सपनाहरू सजाउँथै ।शालुकै मायामा एक्लैएक्लै रुन्ये । तर शालुसामु पुगेपछि भने प्रेमका क्राहरूगर्न सक्दैनयै । त्यसैत्यसै डराउँथे आकाश । आकाशको भित्री मनले सोच्ये-एकदिन न एकदिन शालुले मेरो आँखाको भाषा बुझिछन्‌ । आकाशको त्यो रहररहरमै सीमित भयो । आकाशले पनि यही सोचे- शालुले मेरो वास्ता नगर्नुकोकारण त उनी नपुइ्सक भएरै पो रहेछ । कठै मैरी शालु, एक्लो जिन्दगी कसरीकाटछिन्‌ ? म शालुबिनाको जिन्दगी कसरी काटौँ ?&lt;br /&gt;
आकाशले शालुकै बारेमा सोच्दासोच्दै मनलाई बसमा राख्न नसकेर धेरैसमय बेचैन वने । सबै विद्यार्थी भने शालुलाई देखेपछि मुखामुख गर्थे । शालुलाईआफनो अपमात गरेकोमा पटक्कै चिन्ता थिएन । उनी चिन्तित हुन्थिन्‌ तकेबल सुजन र रोहिणीको पीरले ।&lt;br /&gt;
यता दौलतको विशाल समुद्रमा छलाङ मारिरहेको सुजनले पढ्नुलाई बोफखन्दै गए । सुजन पहिला रक्सीको नशामा रमाउन थाले । विस्तारै सङ्गतडुग्स खाने जमातसँग भयौ । रामै डुगिस्ट बने । ठूलो समुद्वबाट एक लोटापानी झिक्दा पत्ता नपाएझँ दीपक उर्मिलाले पनि दराजबाट पैसा हराएकोचाल नै पाएनन्‌ । एक दिन डुृग्स खान पैसा नपाएपछि सुजनले आमाको दुईतोलाको सुनको चुरा नै चौरै । चुरा चोरीको दोष उमिंला र दीपकले एक्काईसवर्षको घरमा काम गर्ने कान्छालाई लगाए । कान्छाले आफू चोर नभएको दावीगर्दा पति साफसँग पिटी घरबाट निकालिदिए । विनादोष नै सजाय पाएपछिघरमा कोही नभएको मौका पारी आई त्यही कान्छाले पन्धर-बीस तोला सुनकागहना र करिव पाँच सात लाख रुपैयाँ सबै चोरी इन्डियातर्फ टाप कस्यो ।&lt;br /&gt;
आधा रातमा रक्सीको नशामा झुम्दै आएका उर्मिला र दीपकले पहिला तसबै ढोकाहरू सृजनले नै खोलेको ठाने । कोठामा पसेपछि दुवैको सातो गयो ।दुवैले खोलिरहेको दराजलाई देखेपछि चोरी भएको ठहर गरे । डेरामा बस्नेहरूसँगसोधखोज गरे । कसैले पनि कसले कन बेला चोच्यो भन्नै कुरा थाहा नभएकोभन्ती बताए । चौरी भएको क्रा हल्लीखल्ली भयो । पुलिसहरू पनि आए, चोरपत्ता लगाउन आश्वासन दिएर गए । जीवनमा पहिलोपल्ट परेको चोट दीपकर उमिलालाई नै सहन गर्न गाह्रो भइरहेको थियो । त्यत्तिकैमा आश्वासन दिन&lt;br /&gt;
000&lt;br /&gt;
आएकामध्यै एउटा छिमेकीले प्वाक्क भन्यो, &#039;सर ! चोर वाहिरको नभई घरभित्रकैपनि हुन सक्छ । या कि सुजन वाव्‌... ।&#039;&lt;br /&gt;
छिमेकीको क्रा सुनैर दीपकले सातो खाउँलाझैँ गरी भने, &#039;मुख सम्हालेरबोल्नोस्‌, दामौदरजी, मेरो छोरा लाखमा एक छ, बुझनुभो ? क भोलिकोपाइलट हो, पाइलट... ।&#039;&lt;br /&gt;
दामोदरले व्यङ्ग्य हाँसो हाँस्दै भने, &#039;चङ्गा उडाउनै पाइलट कि प्लेनउडाउने पाइलट हँ ? तपाईँले साँच्चै थाहा नपाउनुभएको हो कि बुझपचाउनुभएको हो ? सुजनवाबुले त झन्डै मेरो छोरालाई पनि बिगारिसकेकाथिए । म पनि खान्दानी मान्छेको छोरा त्यसमाथि शालु जस्तोको भाइ राम्रैहोलान्‌ भनेर मख्ख थिएँ । धन्न मैले बेलैमा थाहा पाएर सुजनको सङ्गतछुटाइहालेँ । दिदी भने पण्डित भाइ भने महाखण्डित पो रहेछन्‌ । देखैजानेकोभनिदिएँ रिसाउनीस्‌ या खुसाउनोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
दामोदरको करा सुनेर सबै छिमेकीहरू शिर झुकाएर निहुरिरहे । सबैलेजिउहजुर भन्ने छिमेकीको अगाडि आफू अपमानित हुनुपर्दा उर्मिला र दीपकरिसले आगो भए । उमिंलाले दामोदरलाई खाउँलाझैँ गरी भनिन्‌, &#039;तँ पाजी दुईपैसेले काठमाडौंमा एउटा झुपडी बनाइस्‌, तँलाई के-कै न भयो होइन ? यस्तोदुःखको बेलामा तँ यही भन्न यहाँ मरेको ? जा गइहाल्‌ मेरो सुधो गाईज्ञस्तोछोरामाथि झुटो आरोप लगाउने पाजी ।&#039;&lt;br /&gt;
पबाएको विष पो लाग्छ, नखाएको विष त लाग्दैन&#039; भन्दै दामोदर हिँडै ।&lt;br /&gt;
दामोदर गएपछि जम्मा भएका छिमेकीहरूले दामोदरलाई नै गाली गरीखनखाँचोमा काम लाग्ने दीपककै पक्ष लिए । दीपकले मनमनै दामोदरकोउठिबास लगाउँछु भनी सङ्कल्प गरै । अनि छिमेकीहरूलाई आफनो छोरी रछोरा दुवै समाजको प्रतिष्ठित व्यक्ति हुनेछन्‌ भन्ने कुरा गर्दै थिए । सुजनपाइ्लै बर टेक्न नसक्ने गरी हल्लँदै आएर लर्खराएको स्वरमा भने, &#039;ममीपापा केभयो ? किन मान्छेको भीड हँ ?&#039;&lt;br /&gt;
सुजनलाई देखेपछि दीपक र उर्मिलाकै होस उड्डयो । छिमेकीहरूले अबदीपकको घरमा बस्न ठीक छैन भन्ने ठानी अब जान्छौँ भनी सबै आ-आफूनोघरतर्फ लागे । सुजनको चरित्र राम्रो छैन भन्ने थाहा पाउँदापाउँदै पनि सुजनलाईराम्रो छ भनी चैपारो घस्नेहरूको मनमा केही नराम्रो त लाग्यो नै ।&lt;br /&gt;
यता दीपक र उर्मिलाले सुजनको त्यो हाल देखेर आफनो भाग्यलाईधिक्कारे । दीपकले आँसु पुछ्दै भने, &#039;तिमी त हामीसँग हिँड भन्दा भन्थ्यौँ-पापा म पाइलट बन्छु । त्यसैले राति अबेरसम्म ट्युसन पढ्न जान्छु । यही होतिमी ट्युसन पढेर आएको ?&#039;&lt;br /&gt;
सुजनले उभिन नसकी भुइँमा थ्याच्च वस्दै भने, &#039;कुल, पापा कुल, हजुरहरूले&lt;br /&gt;
१००&lt;br /&gt;
अलिआलि पिउने बानी लगाइदिस्यो । आज मैले अलि धेरै पिएँछु माफ गरिसेला ।घरमा चाहिँ किन भीडभाड थियो हँ ?&#039;&lt;br /&gt;
उर्मिलाले रुँदै भनिन्‌, &#039;घरको सम्पूर्ण नगद, सुन चोरी भएछ । यत्रो चोटपरेको दिन तिम्रो यो हालत देख्दा... ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;ममीपापा हजुरहरूले दिदीलाई ननिकालेको भए यो दिन देख्नै पर्दैनथ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
उर्मिला चिच्याइन्‌, &#039;हामीले निकालेका हौँ र तेरीवजैलाई, त्यही शालुलेनिकालेकी हो । शालुले ननिकालेक्की भए त्यो कहाँ निस्किन्धी र ?&#039;&lt;br /&gt;
सुजन जबर्जस्ती उठ्दै भने, &#039;हत्‌ ममी पनि, हजुरले साह्रो बदनाम गरेरनिकाल्ने योजना बनाएको थाहा पाएरै शालुले दिदीलाई निकालेकी हुन्‌ । शालुचाहन्थिन्‌ दिदी खुसी होकन्‌ । उनी आफनो मायामा नतडपिजन्‌ । चन्द्रकान्तदाइसँगै विवाह गरून्‌ । ती सब त बनिबनाक नाटक थियो । थाहा छ दिदीलेत चन्द्रकान्त दाइसँग विवाह गरेर छौरा पाइसक्नुभयो । दिदी शालुकै साथीरोहिणीको घरमा बुहारीझैं भएर बस्नुभएको छ । दिदीले मलाई हेर्न मन लाग्योभनेर डाक्नुभएकोले म र शालु गएका थियौँ । अँ साँच्चि, मामाघरको हजुरआमापनि भनिसिन्ध्यो- बाबु, तेरी आमाले ककरकाटी बिरालोलाई पोस्नै कामगरिन्‌ । कान्छीको पछुतो लाग्छ बा, यो जमानामा कान्छीजस्ती मान्छे कहाँपाउनु ?&#039; सुजन नशाको सुरमा सबै यथार्थ बकी लर्खराउँदै आफनो कोठाभित्रपसे ।&lt;br /&gt;
दीपक र उर्मिला पनि केही बोल्न नसकी कोठाभित्र पसे । आंखाबाटबलिन्द्रधारा आँसु &#039;फारे । दुवैको आँखामा कान्छी नाचिरहिन्‌ ।&lt;br /&gt;
दीपकले धेरैबेर रोएपछि भने, &#039;उर्मी, दालमा केही कालो छ भन्ने त मलाईपहिल्यै थाहा थियो । हुन पनि तिमीले कान्छीलाई शत्रुलाई नगर्ने व्यबहारगन्यौ । आज यो दुर्दिन देख्नुपन्यो । धन, पैसा त चौरी भयो केही थिएन पछिपनि कमाउन सकिएला, दामोदरले भनेझैँ सुजन मक्किसकेछन्‌, तिमी आमाभएर पनि थाहा पाइनौ ? उर्मी तिमी कस्ती आमा हौँ हँ : आज दामोदरजस्तोभुसुनाले पनि हामीलाई लात माय्यो । यत्रा छिमेकीहरूको अगाडि शिरझुकाउनुपच्यो । भोलिदेखि यही समाजमा कसरी आफनो रूप देखाउनु : तिम्रैकारणले गर्दा मैले आफनै छोरीलाई पनि शत्रु ठाने । सायद शालु सुजनलाईजीवन के हो बुझाउन चाहन्थिन्‌ । हामीले शालु र सुजनलाई भेट्नसम्म नदिईबार लगायौ । म तिम्रो लहैलहैमा लागेँ । अब सुजनलाई के बनाउने तिम्रोजिम्मा । सुजन बिग्रिएको म हेर्न सक्दिनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
उर्मिलाले ओछ्यानमा पन्टँदै भनिन्‌, &#039;हजुर पढलेखेको मान्छेले नै उसलाईतह लगाइस्यो । मैले भनेको उनी टेदैनन्‌ । छोरीलाई मैले ज्ञानी बनाएँ, अबछोरालाई सपार्ने जिम्मा हजुरको ।&#039;&lt;br /&gt;
[१०१&lt;br /&gt;
दीपकले लोप्पा खुवाउँदै भने, &#039;इस्‌ तिमीले शालुलाई राम्रो बनायौँ !&#039; &#039;कामगर्ने कालु जस पाउने ढेडु ।&#039; कान्छी नभएको भए शालुको गति पनि सुजनकोजस्तै हुनेरहेछ । अव सुजनलाई कलतबाट छुटायौ भने तिमीले शालुलाईबनाएको ठहर्छ नत्र ..... ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;कै नत्रसत्र त्यो मेरो मात्र छोरो हो र : यो घरमा म मात्र थिएँ र ?&#039; उमिंलाच्याट्टिन्‌ ।&lt;br /&gt;
दीपक सिङ्गै बोतलको रक्सी तन्काउँदै कूर्लिए, “चुप लाग पाखिती, घरमाकोही छैन भन्ने थाहा पाएपछि खाल बस्न नगएको भए घरमा चोरी हुँदैनथ्यो ।आमा मैखाकीले छोरो कुनबेला कुन हालतमा घर आउंछ भनेर कहिले हेरिस्‌ ?अझ मुखमखै लाग्छेस्‌ ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
बिबाह गरेर ल्याएको वीसौं वर्षपछि पहिलोपल्ट नै दीपकले गाली गरेकाथिए । त्यसैले उर्मिलाको हृदयमा दीपकको गाली बज्चको वाण लागेझौँ भयो ।उमिंला रक्यीको बोतल समातेर रुँदै बैठक कोठामा आई घटघट रक्सी पिईछटपटाउन थालिन्‌ । दीपक र उर्मिलाले सारा रात छटपटाउँदै रुँदै सिरानीभिजाउँदै कटाएँ । भोलिपल्ट बिहान दुवै सकिनसकी उद । दीपक र उर्मिलाएक-अर्कासंग बोल्न सकेनन्‌ । उर्मिलालाई नजानिँदो पाराले चक्कर लागिरहेकोथियो । दीपक विहान खाली पेटमा नै रब्सी पिई के सुरमा कान्छीलगायत युप्रैकाम गर्नेहरू सुतेको कोठामा पसे । आँखा टिनको बाकसमा पस्यो । के रहेछवाकसमा भनी बाकस खोलेर हेरै । वाकसमा शालु र सुजन बिरामी हुँदाजँचाएको कागजको चाङले लगभग बाकस भरिएको थियो । त्यतिमात्र नभईफलानो समय फलानो बाँणाको बन्दकी राखेको औंठीको विल, फलानो समयमाफलानो बाँणाको बन्दकी राखेको तिलहरीका बिलहरू पत्ति प्रसस्तै थिए ।दीपकले क्राकै प्रसङ्गमा उमिंलाले आफनो साथीहरूसँग छाँद्ने गरेको गफसम्झै । &#039;तिमीहरू आफनो बच्चालाई त्यति ध्यान दिँदैनौ होला अनि बिरामीपरिरहन्छ नि । मैरौ शालु र सुजन त विरामी भएको पत्तै छैन । उनीहरूबिरामी भए भनेर आजसम्म एक रुपैयाँ खर्च भएको छैन हगि हजुर ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हो उर्मीले ठीक भनिन्‌ । आजसम्म विरामीका लागि चाहिँ बजेटछुट्याउनुपरेको छैन ।&#039;&lt;br /&gt;
अतीतका कुरा सम्झेर भक्कानिएर रुदै बाकस नै बोकी उर्मिलाको सामुबाकस लगेर फयाँक्दै भने, &#039;हेर पखिती, तैरा छोराछौरी विरामी भएका रहेछन्‌कि रहेनछन्‌ थुक्क ! तँलाई त बच्चा बिरामी भएकोसम्म पत्तो रहेनछ । त॑डोकेले के बुझथिस्‌ कान्छीले सयौं पटक आफनो गहनाहरू वन्दकी राख्दै शालुर सुजनको औषधि गरेकी रहिछन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
उमिलाले छरपस्ट भएका पोस्खिएको चाङ कागज देखिन्‌ र टोलाइरहिन्‌ ।&lt;br /&gt;
१०२&lt;br /&gt;
दीपकले पागलभैँ हुँदै बाकसलाई लात्तीले हानेर सबै प्रेस्क्रिप्सनहरू छरपस्टपार्दै भने, तैले ठानेथिस्‌ तेरा छोराछोरी त्यत्तिकै हुर्के, प्रमाण देखिस्‌ होइनपापिनी ?&#039;&lt;br /&gt;
उर्मिला पनि चिच्याइन्‌, &#039;आज आएर मलाई तँ-तँ र म-म पापिनी भन्छस्‌ ?म तेरो पछाडि लागेर आएकी हँ र : त॑ नै माग्न गएको होस्‌ । आधुनिकबन्नुपर्छ भनी तैँले नै रक्सी धिच्त सिकाइस्‌, मेरो के दोष हँ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;तास खेल्न मर, ब्ल्लु फिल्म हेर्न जा भनेर पनि मैलै नै सिकाएको थिएँहोला, होइन ?&#039; दीपकले भने ।&lt;br /&gt;
दुबैको हल्लाखल्लाले सुजनको निद्रा ब्युँफियो । डेरामा बस्नेहरू पनि कानठाडो पारीपारी सुन्न थाले । सुजनले उठेर आई बाहिर निस्कदै भने, &#039;विहान-बिहानै के महाभारत हँ ? कि ममी-पापाले पार्टीमा जस्तै जुहारी खेलेको हँ ।बिहान-बिहानैं पनि जुहारी खेल्छन्‌ ! फेरि पापाले बिलनिक पो खोल्नुभयो किक्या हो : बिरामी जाँचेको प्रेसिक्रिप्सन नै ल्याइसेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
दीपकले हकारे, “चुप लाग पाजी, हामीले तँलाई स्वतन्त्रता दिएको यही दिनदेख्नका लागि हो ?&#039;&lt;br /&gt;
बाबुको मुखबाट पहिलोचोटि गाली सुनेर सुजनलाई गाली गरेको हो याठट्टा गरेको थाहा नै भएन । त्यसमाथि डुग्सले राम्जैसँग छाडेको थिएन ।सुजनले भने, “पापा, हजुर सुतिस्यो । बेलुकी नै भनेर बिहानै पिसेछ क्यार अनिकराइसिन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
सुजनको कुराले दीपकलाई झन्‌ काटेको घाउमा नुनचूक लगाएजस्तो भयो ।दीपक आवेशमा आएर चिच्याए, “चुप लाग मूर्ख, तैले गर्दा हामीलाई समाजकोआँखाबाट &#039;झर्नुपयो । तँलाई हामीले के दिएका थिएनौं र त॑ कृसङ्गतमा लागिस्‌ हँ ?&#039;&lt;br /&gt;
सुजनले अब भने बास्तविकता बुझे, थपक्क कोठातर्फ लागे । उमिंला केहीबोल्न सकिनन्‌ । दीपक एक्तै फतफताइरहे । दीपकको स्वर्गजस्तै घर पूर्णरूपमा&lt;br /&gt;
मसानमा परिणत भयो ।बाईस&lt;br /&gt;
&#039;शालु नरिसाक है एउटा कुरा भन्छु ।&#039; प्रभाले शालुनजिकै सर्दै भनिन्‌ । पुसमहिना भएकाले अरू थुप्रै विद्यार्थी पनि चौरभरि टन्न घाम तापेर बसेका थिए ।शालुले भनिन्‌, &#039;भनन प्रभा तिमीले अहिलेसम्म के भन्त बाँकी राखेकी छ्यौ र ।पहिला त तिमीले नपुङ्सक भनी हल्ला फिँजाएकोमा तिमीलाई धेरैधेरै धन्यवादछ । तिमीले गर्दा म धेरैका पापी नजरबाट वर्चेँ । अँ साँच्चि के भन्दै थियौकुन्नि ?&#039;&lt;br /&gt;
१०३.&lt;br /&gt;
प्रभाले सोध्न लागेको प्रश्न थियो- नपुङ््सकको त जुँगा आउँछ भन्थे तरतिम्रो जुँगा किन आएन ? भनेर सौध्न चाहेकी थिइन्‌ । शालुको कुराले प्रभाअनकनाइन्‌ । प्रभा नबोलेपछि शालुले हाँस्दै भनिन्‌, हैन किन चुप लागेकीप्रभा । कै म साँच्चै, नपुड्दसक जस्तै छु र ! मेरी दिदी सधैं भन्नुहुन्थ्यो, &#039;मआकाशबाट झरेकी परी जस्तै छु रे । दिदी यो पनि भन्नुहुन्थ्यो मेरा लागि योपृष्वीमा राजकुमारजस्तै सुन्दर व्यक्ति जन्मेको हुनुपर्छ रे । का आकाशजस्तैसुन्दर हुन्छ रे । शालुले करा टुङ्ग्याउन नपाउँदै प्रभाले पेट मिचिमिची हाँस्दैभनिन्‌, &#039;हेर साथी हो, शालु परीजस्तै छिन्‌ रे सुन्यौ ? त्यतिमात्र कहाँ होरउनलाई विवाह गर्ने युवक राजकुमारजस्तै हुन्छ रे ।&#039; प्रभाको कुरा सुनेपछि सबैहा....हा गर्दै धेरैबेर हाँसे । धेरैबेरको हाँसोपछि प्रभाले भनिन्‌, &#039;ल, ल छ, छहाम्रो पियन राजकुमारसँग तिम्रो ठ्याक्कै जोडा मिल्छ । वा ! तिमीले ठूलैसपना देखेको रहिछौ ।&#039;&lt;br /&gt;
अन्नालाई वर्षौं अगाडिदेखि हेर्न आउने युवक देख्यौ भने त मूछां नै पर्छ्यौंहोला । भन्लिन्‌, क त्यही हो मेरो सपनाको राजकमार !&#039;&lt;br /&gt;
अन्नाले शालुतिर हेर्दै भनिन्‌, &#039;हेर शालु, मेरो हृदयश्वर देखेर सबै डाहलेमर्न लागिसके । तिमीले अझै मेरो राजकुमार देखेकी छैनौ कि क्या हो?राजकुमार पाउन त मेरोजस्तो रूप लिएर जन्मनुपर्छ बुझ्यौ ? फेरि तिमी तनपुङ्सक भनेको होइन र ? के उल्का नपुड्सकलाई पनि राजकुमारको रहर ?&#039;&lt;br /&gt;
अन्नाको कुराले सबैजना चौर नै धर्किने गरी हाँसे । शालु रछयानलाईचलायो भने आफ्नै मुखमा छिटा पर्छ भन्ने सम्झी जुरुक्क उठिन्‌ । प्रभाले च्व! च्व ! गर्दै भनिन्‌, &#039;हामी शालुजीलाई पियन राजकुमारजीको याद आएजस्तोम यहीं बोलाइदिउँकी ?&#039; साथीहरूको कुराले शालुलाई चक्कर लागेजस्तै भयो ।शालु टाउको समात्दै यचक्क बसिन्‌ ! त्यत्तिकैमा एउटा युवक हस्याड-फस्याङगर्दै आएर भन्यो, &#039;शालु के भयो तिमीलाई ? तिमी ठीक 4021 ?&#039;त्योयुवकलाई देखेपछि सबै युवती हेरैको हेरै भए । शालु टाउको चुपचापलागिरहिन्‌ । युवकले रुन्छ स्वरमा भने, &#039;शालु तिमीलाई चक्कर लागेजस्तो छहिँड डावटरकोमा जाङुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
सबै युवती युवकको मुखबाट शालुको नाम सुनेर चित खाइरहेका थिए ।शालु युवकको क्राको वास्तै तगरी उडेर हिँड्न लागेकी थिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
फिरोजले हात जोड्दै भन्यो, &#039;शालु बिन्ती, तरिसाउ म तिमो प्राक्टिकलसिद्धिएपछि मात्र तिम्रोसामु देखापर्ने पक्षमा थिएँ । तिमीलाई चक्कर लागेकोदेखेपछि आफूलाई थाम्न सकिनँ, आएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले &#039;को हो तपाईं” भन्दै युवकतिर हेरिन्‌ । अति नै सुन्दर युवकलाईदेखेपछि भनिन्‌, &#039;तपाईंलाई मैरो नाम कसरी थाहा भयो ? तपाईंले अन्नालाईसौध्नुभएको हो ? अन्ना उनी हुन्‌ ।&#039;बठ्ड।&lt;br /&gt;
युवकले आँखा ओभानो पार्दै भने, &#039;शालु, विर्सेक म फिरोज हुँ । शालुलेयुवकलाई तलदेखि माथिसम्म हेर्दै भनिन्‌, &#039;ओ फिरोजजी पो, यहाँ किनआउनुभएको कोही विरामी ल्याएको छ कि !&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले नम्र हुँदै भन्यो, &#039;म तिमीलाई हेर्न आक्कल-झुलुक्क यहाँ आइरहन्छुआज तिमी इल्न ...।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजको कुरा सुनेपछि सबै रातोपिरो हुँदै आफनो बाटो लागे । शालुलेचुझिन्‌ सबै युवतीले फिरोजको पौ क्रा गरेका रहेछन्‌ । मैले फिरोजको साथनदिए पनि यी दुष्टहरूको भने मेख मप्यो । घन्त फिरोज साइतमा नै आएछौँ ।&lt;br /&gt;
लु कै सोचेकी तिमीले ? म तिमीले भनेझैँ इन्जिनियर पढ्दैछु । चार-छ महिनापछि त कोर्स पनि पूरा हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजको कुराले अब भने शालुको प्राणपखेरु नै उड्लाजस्तो भयो शालुलेदुखित हँदै भनिन्‌, &#039;फिरोजजी, मलाई माफ गर्नोस्‌ । मैले त तपाईंको आमाकोआँसु हेर्न नसकी झूटमुट बोलिदिएकी हुँ । फेरि तपाईं सुधनुहोला भन्ने तशङ्कासमेत लागेको थिएन । तपाईं सुधनुभएछ । धेरै खुसी लाग्यो । बल्लअङ्कलआन्टीको आँखाको आँसु पनि छुट्यो होला ।&lt;br /&gt;
फिरोजले रुँदै भन्यो, &#039;शालु तिमीले क्रा फेन्यौ भने म जिउँदो रहने छैन,बिन्ती शालु तिमीले जीवन दिएर फेरि जीवन नलेक ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले धेरैबेर सोचेर भनिन्‌, &#039;फिरोजजी, यो कुरा मसँग होइन मेरी दिदीसँगगर्नोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले मुसुक्क हाँस्दै भने, &#039;न शालु त्यसो भए म ढुक्क भएँ । मैले तिम्रोदिदीसँग मागेर तिमी सानो छँदादेखि लिएर यो उमेरसम्मको थुप्रै तस्बिरहरूकोआर्ट गरैको छु । दिदीले तिम्रा लागि खोजेको राजकुमार म नै हुँ । नपत्याएदिदीसँग सोध ।&#039;&lt;br /&gt;
“शालुले दिदीको कुरा सम्झिन्‌ । &#039;हजुरको राजकुमार म आफैँ खोज्छु&#039; भनेरभन्नुभएको मतलब दिदीलाई फिरोज सप्रन्छ भन्ने थाहा रहेछ । मैले फिरोजकोकुरा गरेपछि मात्र दिदीले राजकुमार खोज्ने कुरा गर्नुभएको थियो । सानोमादिदी हजुरको विबाह राजकुमारजस्तै युबकसँग हुन्छचाहिँ भन्नुहुन्थ्यो तर मनैराजकुमार खोज्छुचाहिँ कहिल्यै भन्नुहुन्नथ्यो ।&lt;br /&gt;
शालु हाम्रो घरमा सघं तिम्रो गुणगान हुन्छ । ममी भन्नुहुन्छ, &#039;शालु तहिलोमा फूलेकी कमल हो । म पनि भन्छु तिमी कमल नै हौ&#039;, फिरोजलेनिसङ्कोच भने ।&lt;br /&gt;
शालुले उत्तर दिइन्‌, &#039;राम्रो मान्छेले अरूलाई पनि राम्रै देख्छ । मलाई तत्यस्तै लाग्छ । तपाईंलाई यो रूपमा देख्दा भने मलाई ज्यादै खुसी लाग्यो । पर्सि&lt;br /&gt;
१०५&lt;br /&gt;
हो लास्ट प्राक्टिकल, पर्सि नै म घर जात्छु । हुन्छ त । अहिलेलाई जान्छु&#039; भन्दैकक्षकोठातर्फ आइन्‌ ।&lt;br /&gt;
फिरोज पनि शालुसँग बिदा भएर खुसी हुँदै घरतर्फ गए । शालुका साथीहरूलेशालुलाई शिर ठाडो गरेर हेन सकेनन्‌ । अन्ना त झन्‌ हंसले ठाउं छोडेभैँभई । अन्ताले त्यो सुन्दर युवक आफूलाई नै हेर्न आएको हो भन्ने भ्रममा परीआफनौ पहिलो प्रेमीलाई छोडिसकेकी थिई । एकतर्फी प्रेममा अल्झिएकी अन्नाडाको छोडेर रुत मात्र सकेकी थिइनँ । शालुको खौड्रो खन्नै प्रभा पश्चत्तापलेजलेकी थिड्टै । शालुलाई भने यावत्‌ घटनाहरू नाटकभी लागिरहेको थियौ ।कता-कता खुसी र कता-कता पीर लागिरहेको थियो । पीर र खुसी दुवै वाँड्नेसाथी आकाश नै थिए । शालु आकाशलाई खोज्दै क्यान्टिनमा पुगिन्‌ । आकाशचिया पिउँदै रहेछन्‌ । शालुले आकाशसामु बस्दै भन्तिन्‌, &#039;आकाश म तिमीलाईखोज्दै यहीँ आएकी हुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुको कुराले आकाश दङ्ग परै । आकाशले सोच्ने सायद शालुले मैले प्रेमगर्छु भन्ने कुरा बुझिन्‌ होला । शालुले पनि अवश्य मलाई भिर्वाभत्र मायागर्छिन्‌ होला । उनले माया गरै पति नगरै पनि आजचाहिँ उनको सामु हृदयखोल्छु नै । उनी नपुङ्सक नै भए पनि म उनीविना बाँच्न सबिदिनँ । तर केभन्ने कसरी भन्ने : आकाश टोलाइरहे । शालुले करा कोद्याइन्‌, &#039;आकाशहामी वचपनदेखि सँगै पढ्दै आएका छौं । सबैलाई प्रेमको हावाले छोयो तरहामीलाई भने छौएन तर आज मलाई अचम्म लागिरहेछ ।&#039; आकाशले बीच्चैमाकरा काददै भने, &#039;सायद तिमीले आज मात्र बुफ्‌यौ म तिमीलाई माया गर्छुभन्ने कुरा ) म तिमीप्रतिको प्रेमले गर्दा नै आज यहाँसम्म आएँ। म ततिमीलाई बिद्यार्थी जीवनदेखि नै माया गर्थे । तर, भन्ने साहस नै भएन, जेहोस्‌, तिमीलाई पाउनै सपना साकार भयो ।&#039;&lt;br /&gt;
आकाशको कुराले शालुलाई मङ्सिर-पुसको जाडोमा पनि चिटचिट पसिनाआयो । शालुले गहुङ्डगौ मन लिएर भनिन्‌, &#039;के भनेको आकाश तिमीले ?तिमीले मलाई माया गर्ने ? भो नजिस्क है म त मर्छु।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हो शालु म किन ढाँद्थेँ । हृदयमा परेका असङ्ख्य घाँजाहरू तिमीले देख्नेभए म देखाइदिन्थेँ । शालु तिमीले मेरो मनचाहिँ नभाँच नि म जिउँदो रहनेछैन ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले आँसु झादैं भनिन्‌, &#039;मलाई थाहा छ, तिमी फूलभन्दा पनि नाजुकछौ । किन आकाश तिमीले यति गहिरो कुरा मनभित्र लुकाई अर्थहीन रुवाईरोयौ ? तिमी करोडौँ-करोडौँमा एक छौ । तिमीले एक बचन मात्र शालु मतिमीलाई प्रेम गर्छु मनेको भए म ज्यादै खुसी हुन्थेँ ।&#039;&lt;br /&gt;
आकाशले अत्तिँदै भने, &#039;होइन के भन्न खोजेकी शालु तिमीले ? तिमीतनाबमा पो आयौ ?&#039;&lt;br /&gt;
१०६)&lt;br /&gt;
शालु घुँक्करघुँक्क रोइन्‌ मात्र । शालु रोएपछि आकाशलाई शालुको मतकोकुरा बुझन बेरै लागेन । आकाशले हातले विस्तारै टेबुल ठटाउँदै भने, &#039;हेरहेर रोएकी तिमीले के भन्दिरहिछौ भनेर मन चोरेको मात्र हँ । तिमीजस्तीपोक्चीलाई पनि कसैले प्रेम गर्छ ? हेरन कलेजभरि प्रेम गर्नहरूको ताल,सबैको प्रेम देखैर मलाई त वाक्कै लागिसक्यो भन्या ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले रिसाउँदै भनिन्‌, &#039;तिम्रो कुरा सुनेर सासै उड्लाजस्तो भयो । मजाकगर्नु पति हद हुन्छ नि ! अबदेखि बोल्दिन म तिमीसँग ।&#039;&lt;br /&gt;
आकाशले सम्झाए, &#039;ल अन कान समातेँ, वरिसाक मैले आज प्रेमको कूरानगरेको भए तिम्रो प्रेमकहानी सुन्न पाउँदैनथैं ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले लामो श्वास फेर्दै भनिन्‌, &#039;खोई कै भनौं आकाश, म आफैँ तअचम्ममा परेकी छु । एउटा डुृगिस्ट, त्यसमाथि चरि्हीन फिरोजले त मेरालागि पहिचान नै वदलेछन्‌ । त्यति मात्र होइन, उनी मेरो मायाले यहाँसम्मआउँदारहेछन्‌ । आज मलाई चक्कर लागेर ढल्न लागेको देखेपछि बल्ल देखापरे ।मैले त उनकी आमाको खुसीका लागि उनी सफ्रिन्छन्‌ भने प्रेम गर्छु भनेर झूटबालेकी थिएँ । उनी सुध्नेलान्‌ भन्ने त कल्पनासम्म गरेकी थिइनँ । म त्यही कुरागर्न तिम्रोसामु आएकी हुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
आकाशले बनाबटी हाँसो हाँस्दै भने, &#039;तिमीजस्ती पोक्चीका लागि त्याग गर्नेमूर्ख नै रहेछन्‌ उनी । सायद अन्नाजस्ती केटीहरू नदेखेर तिम्रो मायामा फसेहोला नत्र ... ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;अन्नाहरूले त फिरोजलाई कलेजमा आएको देखेका रहेछन्‌ । सबैले फिरोजअन्नालाई हेर्न आएको हो भन्नै ठानेका रहेछन्‌ । फिरोजका लागि अन्नालैभूतपूर्व प्रेमी छौडिछन्‌ ।&#039; शालुले यथार्थ औकलिन्‌ ।&lt;br /&gt;
आकाशले एकोहोरो शालुलाई हेरै र मनमनै भने, &#039;कस्तुरीलाई आफनैबास्ना थाहा नभएझैँ तिमीलाई पनि आफनौ मूल्य थाहा छैन । फिरोजलै तिम्रोमूल्य बुझे । फिरोजको आँखामा तिमी अन्नाभन्दा लाखौँ गुना सुन्दरी छ्यौ ।मलाई पनि त पहिला तिमी कहाँ राम्री लाग्थ्यो र माया लाग्दै गएपछि तिमीसंसारकी सबैभन्दा सुन्दरी लाग्न थाल्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
होइन के सोचेको तिमीले मेरो कुराको विश्वास लागेन ?&#039;&lt;br /&gt;
शालुको क्राले आकाशको मौनता तोडियो । आकाशले भने, &#039;तिमी यतिमीठो कुरा गर्छयौं, तिम्रो कुराको किन विश्वास नलाग्नु ? तिमीलाई फिरोजकस्तो लाग्छ नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;खोई किन क भनेपछि युवतीहरू मरिमेदछन्‌ । मलाई थाहा छैन । तरमलाईचाहिँ तिमी सुन्दर लाग्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
१०३&lt;br /&gt;
आकाशले मन बाँधेर उद्दै भने, &#039;तिमीले फिरोजलाई राम्रोसँग हेरेकीछैनौ । अनि म राम्रो लाग्यौ होला । अव तिमीलाई फिरोज नै संसारमासवैभन्दा सुन्दर लाग्छ । तिमीहरूको भविष्य अवश्य सुन्दर हुन्छ । यसमाशङ्का नै छैन । ल म जान्छु पनि&#039; भन्दै आकाश गए । शालु पनि आफूनोरुमतर्फ आइन्‌ । आकाशसँग कुरा गरेर शालुको मन भने हलुङ्गो भयो ।आकाश भने छट्पटाउँदै आफनो बेडमा डड्ग्रहा पछारिए । उनलाई सम्पूर्णपृथ्वी नै घुमेजस्ता भयो । एक मनलै सौचै घटघटी विष पिएर शान्ति लिउँतर आँखामा शालुको कार्रुणक दृश्यहरू पनि ताचिरहयो । सोचे यदि मैलैशालुलाई एक बचन प्रेम गर्छु भनेको भए आज त्यौ दुदिन देख्नु पर्दैनथ्यो । अबकसरी पो उनको सम्झनालाई फयाँकैँ ? म नराम्रोसँग हारेँ । शालु, नराम्रोसँग..... । चिन्ताले गर्दा आकाशको भोक तिर्खा सबै हरायो । उनले आफनोभाग्यलाई बार-बार धिक्कारे ।बुक रुम पार्टनर अन्ना, प्रभा, दया केही बोल्न नसकी नुन खाएकोसर &#039;फोक्राइरहे । शालुले छरपष्ट भएको किताबहरू मिलाइन्‌ । किन-किन वकाई लागेजस्तो भयो । ओछ्यानमा पाल्टिन्‌ । आँखा लाग्न मात्र केलाएको थियो । आया दिदी आएर शालुलाई सार्जिकल बार्ड बेड नं. 5४ कोविरामीले बोलाएको कुरा बताइन्‌ । शालु हतार-हतार उठेर दौडिँदै सर्जिकलबार्डमा पुगिन्‌ । बेड नं. ८४ मा हेरिन्‌ आफूले चिनेको मान्छेझैँ लागेन र बेडनं. «४ मा सुकेको काठजस्तै नामको मानव आकृति थियो । शालुलै बैडनजिकैगएर हेरिन्‌ जिङ्ग्रङ्गग कपाल, भित्र गडेका आँखाहरू सिन्काजस्तै हात-खुट्टाशालु त्यो मानब आकृति देखेर डराइन्‌ पनि । शालु अलि हच्केको देखेर त्योकङ्गालभौँ आकृतिबाट आवाज आयौ, &#039;वसन शालु, बस ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले स्टुलमा बस्दै भनिन्‌, &#039;तपाईं को हो मैले चिनिनँ नि ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;म सब बताउँछु अनि चिनिहाल्छयौ नि, अब त तिम्रो पढाइ पनि सिद्धिनलाग्यो भन्दै थिइन्‌ रेष्मा ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले अलि खुसी हुँदै भनिन्‌, &#039;ए तपाईंले रेष्मालाई पनि चिन्नुभएको छ ?तपाईंको स्वास्थ्य बडो नाजुक देखिन्छ । । डाक्टरले बढी खोल्न मनाही तगरेको छैन ?”&lt;br /&gt;
भैगो मेरो चिन्ता नै नलेक तिमीले अझै पनि प्रेम गरेकी छैनौ ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हरोइन तपाईं को हुनुहुन्छ ? मेरो सबै नालीबेली थाहा रहेछ । मैलै त प्रेमगरेकी थिइनँ तर मर्यादा ननाघी प्रेम गर्नेहरू पनि हुँदारहेछन्‌ भन्नेचाहिँ मैलेबुझेँ ।&#039; &#039;त्यसो भए उनी आकाश नै होलान्‌ होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
बिरामीको क्रा सुनेर शालु झन्‌ आश्चर्यमा परिन्‌ र भनिन्‌, &#039;भन्नोस्‌ हामीसबैलाई चिन्ने तपाईं को हुनुहुन्छ नत्र म क्रै गर्दिनँ,&#039; शालु उठिन्‌ ।&lt;br /&gt;
वन्द]&lt;br /&gt;
बस न त्यसै नरिसाक, भोलि भनेको क्या हो बया हो कसो हो । तिमीसँगबेथा पोख्नका लागि त यो मेडिकल कलेजमा भनां भएकी नत्र यहाँ किनआउँदै । मैरो उत्तरको जवाफ नै दिइनौ त्यो युवक आकाश नै होलान्‌ होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
शालुले वस्दै भनिन्‌, &#039;तपाईंले ठीक नै सोच्नुभयो । आकाशको चरित्र पनिराम्रो छ तर मैले त फिरोज भन्नेको कुरा गरेकी । उनले मलाई माया गर्छन्‌भन्ने कुरा आजै थाहा पाएँ । हेर्नोस्‌, तर मलाई प्रेमको आभाससम्म छैन । अबविवाहपछि नै प्रेमको आभास हौला । तर, तपाइँ ... ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;शालु अभौ चिनिनौ, चिन्थ्यौ पनि कसरी, म मौसमी हँ मौसमी ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले आत्तिँदै भनिन्‌, &#039;ओ, मौसमी तिमी, यौ हुनै सक्दैन ?&#039;&lt;br /&gt;
“यति छिट्टै तिमी यो अवस्थामा पुग्यौ ? खोई मौसमी तिम्रो त्यौ झःफराउँदोरूप ? मैले त तिमीलाई भनेकै थिएँ । आशक्त अङ्गालोमा प्रेम हुँदैन भनेरतिमीले मानिनौ । तिमीलाई मौसमीभन्दा कसले पत्याउला ? तर, पीर नगरतिमीलाई सञ्चो भएपछि तिमी पुन: पहिलेकै मौसमी हुन्छयौँ । अव त तिमीलेदुनियाँ कस्तो छ देख्यौ, बुझौ होला । भन तिमी कसरी यस अवस्थामापुग्यौ । तिम्रो यो अवस्था देख्दा तिम्रो बाबुको के हाल भयो होला ?&#039;&lt;br /&gt;
मौसमीले गहभरि आँसु पार्दै भनिन्‌, &#039;शालु बाबुलाई त धेरै पहिल्यै खाइसके ।त्यसैले बाबुको पीर छैन ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;होइन कसरी मर्नुभयो तिम्रो बावु ? देख्दा त हट्टाकट्टा नै हुनुहुन्थ्योहोइन र ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हो शालु, हट्टाकट्टा नै हनुहुन्थ्यौ । उहाँलाई मुदु दुख्नै व्यथा थियो । जचाउनकँलागि काठमाडौं पनि आउनुभएको थियो । म बैंसको उन्मादले र निमेषकोबनावटी मायाले कहीं कतै केही नदेख्ने भइसकेकी थिएँ । जचाउन आएकोबाबुलाई मेरौ अफिसबाट काजमा जानु छ, पछि आउनोस्‌ । दुख्दा मोज खानुहोला भनी ब्रुफिनको चाङ पठाइदिएकी थिएँ । काठमाडौंबाट पठाएको भोतिसहनै नसक्ने गरी मुटु दुखेछ । बानुले दुखाई कम गर्न थुप्नै औषधि खाएछन्‌ ।औषधि खाएपछि बेहोस भएछन्‌ । वेहोसको बेहोस नै भोलिपल्ट मरेछन्‌ ।यसरी मैले बाचुलाई खाएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;मौसमीको कुराले शालुको आँखा रसायो । शालु चुपचाप भइन्‌ । आँखामामौसमीको हट्टाकट्टा बाबु खुसी हुँदै क्याम्पसमा यताउता नियालेको याद आयो ।&#039;&lt;br /&gt;
मौसमीले सम्झाइ्न्‌, &#039;नरौक शालु हुने हुनामी भइसक्यो । बाबु मेरो योरूप देख्नुभन्दा अगाडि नै मरे राम्रै भयो । उनले मेरो यो हालत देखेको भए ।झन्‌ कसरी आफूलाई सम्हाल्थे होला । उनलाई मारेर राम्रै गरिछु । अब मेरोपीरमा रुनै कोही छैनन्‌ । दाजुदिदीले त एडसरोगी घरमा वस्न पर्दैन भनीनिकालेर नै यहाँ आएकी हुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
१०९:&lt;br /&gt;
&#039;तिमीलाई एद्दस छ ! त्यो कसरी ? निमेषले छोडेपछि पनि तिम्रो वुद्धिफर्केन मौसमी ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;निमेषले मलाई एक्कैचोटि कोठीमा लगेर छोडिदियो ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;होइन के भनेकी तिमीले क कारसम्म भएको ध्वनी युवक नै थियौ होइन र ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हो शालु क धनी त म जस्ता थुप्रै युवती बेचेर भएको रहेछ । पछि पोबुझेँ । डुङ्गा डुबिसकेपछि चेत आएर के लाग्यो र ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;तिमी पढेलेख्रेकी मान्छे, केही अन्दाजसम्म काटिनौ ?&#039;&lt;br /&gt;
मौसमीले शालुको हात समातेर सिरानीको अडेसा लगाई वस्दै भनिन्‌,“शङ्का गर्ने त सात्तो आँखी झयालसम्म राखेनन्‌ चुतियाहरूले, म मात्र होरमसँग अरू पढेलेखेका दुई युवतीसमेत बेच्रिए । उनीहरू एड्स लागे पनि केहीहृष्टपृष्ट भएकाले अझै कोठीमा नै होलान्‌ । मलाई भने युवक वृद्धहरूलेपत्याउन छोडेपछि निक्लिन्न भन्दाभन्दै पनि निकालिदिए ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;तिमीहरू तीनैजनालाई निमेषले नै वेच्यो त ?&#039; शालुले प्रश्न गरिन्‌ ।&lt;br /&gt;
मौसमीले केहीबेर रोक्किएपछि पुनः ओठ खोलिन्‌, &#039;उनीहरूलाई पनि प्रेमीहरूलेनै बेचे । उनीहरूसँग हाम्रो भेट नगरकोटमा भएको थियो । उनीहरूको तीनवटाजोडी बुटवलबाट नगरकोट घुम्न भनी आएका रहेछन्‌ । हामी सबै उस्तैउस्तोकरा मिलिहाल्यो । हामी सबैले छ-सात दिन नै नगरकोट बसेर खुव रमाइलोगन्यौं । जय भन्ने एउटा साह्रै हँसाउने कवि थिए । उनकी प्रेमीका भने केहीउदास देखिन्थिन्‌ । उनको उदासपन देखेर हामीलाई अझै हाँस्ने बहाना मिल्थ्यो ।हामी कविलाई अलि हृष्टपुष्ट हुनुपत्यो भन्दै उल्याउँथ्यौं । कवि हाँस्दै धेरैखानेकुरा खान्थे । र, कुनै न कनै निता शुनाइहा ल्थै । नगरकोट गएको तेस्रोदिन हामीले साह्रै गिज्याएपछि कविले कविता भनेको अझै याद छ।&lt;br /&gt;
तपाईंहरू आज हाँस्तोस्‌&lt;br /&gt;
भोलि हाम्रो पालो&lt;br /&gt;
मेरी मैयाँलाई थाहा छैन&lt;br /&gt;
के मायाको जालो ।&lt;br /&gt;
बहमचारी बन्दा म&lt;br /&gt;
यिनलाई पप्यो गाह्रो ।&lt;br /&gt;
सबै टुद्दा यिनी जुदछिन्‌ ।&lt;br /&gt;
नभन्नोस्‌ आज साह्रो ।&lt;br /&gt;
त्यसपछि निमेषलगायत हामी सवैको मुख रातोरातो भयो । कसैले केहीबोल्न सकेनौँ । कविले हामीलाई नराम्रो पर्ला भनेर करा मोडिहाले । हामीलेअझ केही दिन नगरकोट बस्ने इच्छा व्यक्त गरेपछि कवि बावु विरामी भएछन्‌&lt;br /&gt;
११०&lt;br /&gt;
भन्ने वहाना बनाई हामीसँग फुत्किएर बुटवल आए । हामी सारा संसार भुलेरएक-अर्काको बाहपासोमा रमाइरहयौं । नगरकौटमै हाम्रौ तीन गुप्रको अलइन्डियाटुरमा जाने योजना बन्यो । कविका प्रेमी-प्रेमिकाहरूलाई सम्झाएर लैजानेसल्लाह पनि गत्यौं। पछि निमेषहरूले कविको भित्री मनशाय बुझेछन्‌ ।कविको प्रेम वास्तव्रमै साँचो प्रेम हो भन्ने बुझेरै होला निमेषहरूले कविलाईआफ्‌संग नलैजाने सल्लाह गरे । हामी बैँसले कृत्कत्याएर आ-आफनो प्रेमीकोअङ्गालोमा मस्त हँदै इन्डियाको ट्रका लागि निस्कियौं । इन्डियाबाट फर्कनेवित्तिकैविवाहवन्धनमा वांधिने सल्लाह पनि भयो । हामी तीनैजना युवतीले विबाहभएको मीठो सपना पनि देख्यौं । दार्जिलिङ, आसाम, बर्साङदेखि आग्रासम्मकोयात्रा भयो । हाम्रो खुसीको कुनै ठेगान नैं थिएन । यहाँसम्म आएपछि मुम्बैकिन नजाने भन्ने कुरा भयो । हामी सल्लाहले नै मुम्बै पुग्यौं । मुम्बैको भव्यहोटलमा पुगेपछि हामी छ जनाले नै एउटै कोठामा डिनर गन्यौं । डिनरसँगैहिवस्की, बाण्डी सघ्वैँ पिइन्थ्यो । त्यो दिन पनि पिएर आ-आफनो प्रेमीकोकाखमा निर्धक्कसँग सुतेर जिस्किँदै भविष्यको मीठो सपना देख्दै थियौं । निमेपलेमलाई गालामा म्बाइँ खाँदै भन्यौ, “मेरी प्यारी, कृपया एकछिन काख छोड,हामीहरू सुत्ने रुमको व्यवस्था गरेर आउँछौं ।&#039; उनीहरू तीनैजना रुमकोव्यवस्था गरेर आउँछौँ भनी हिँडे । हामी तीनजना बचेखुचेको रक्सी पिएरमस्तले रमाइरहयौँ । साँझको आठ बजेतिर हामी त्यहाँ पुगेर डिनर गरेकाथियौं । उन्तीहरू रुम खोज्छौं भनी निस्किँदा करिव नौ, सवा नौ जति बजेकोथियो होला । उनीहरू एक घन्टासम्म नआउँदा त हामी त्यति अत्तिएनौँ ।बिस्तारै एक डेढ घन्टा जति समय बित्दै गयौ । त्यसपछि हामी डराउनथाल्यौं । यत्रो ठूलो होटल, उनीहरूले रुम पो विर्सेछन्‌ कि भनी हामी ढोकामापुगी ढोका खोल्न लाग्दा ढोका बन्द रहेछ । हामीले घन्टी बजाउन थालेपछिएउटा अधबैंसे आइमाईले भित्र पस्दै भनी, &#039;किन घन्टी बजाएको तिमीहरूले :तिमीहरूले आफनो लभरहरू खोजेको हो ?हामीले &#039;हो, उहाँहरू किन फर्कनुभएन&#039; भनेर सोध्यौं । त्यो आइमाईलेविदेशी भए पनि राम्रै नेपाली बुझने र बोल्न जान्ने रहिछै । उसले बडो मीठोहाँस्दै भनी, &#039;पीर नगर, हामी तिमीहरूका लागि घन्टा-घन्टामा छुट्टै-छुट्टै लभरहरूपठाइदिन्छौं । तिम्रा लभरहरू भने तिमीहरूलाई यहाँ बेचेर टाप कसिसकै ।तिमीहरूलाई यहाँसम्म ल्याउन उनीहरूको पनि धैरै पैसा खर्च भएछ । यसपालित्यति नाफा भएन भन्थ्यो निमेष ।&#039;&lt;br /&gt;
उसैको मेहरवानले गर्दा यो कोठी राम्रोसँग चलेको छ । मौसमी तिमी हैनौ ?तिम्रो फोटो त पहिले नै आएको हो, मोलमोलाई नमिलेपछि उसले ल्याउनैमानेन । तिम्रो कारणले म पनि अलि घाटामा नै गएकी छु । तर, केही छैन तिमीलेचाँडै नै पैसा उठाउँछयौ । तिम्रो फोटो बडेबडे खान्दानकोमा पुगेको छ ।&#039;आइमाईको कुरा सुनेर हामी थरथर काम्न थाल्यौँ ।&lt;br /&gt;
१११)&lt;br /&gt;
उसले रिसाउँदै भनी, &#039;किन डराएका छौ : तिमीहरू कमारी केटी हौँ र?बडिया-बडिया खाना खान र बडिया-बडिया लोग्नेमान्छे पाइहाल्छौ ।&#039;&lt;br /&gt;
हामी तीनैजनाले रुँदै उसको पाउ समातेर भन्यौं, &#039;हामी यहाँ वस्दैनौं ।हामी तपाईंको पैसा जसरी पनि चुक्ता गर्छौं ।&#039;&lt;br /&gt;
उसले सातो खाउँला जस्तै गरी रिसाउँदै भनी, &#039;चुप लाग्‌, गएर बस्‌ ।सबैलाई पहिलोपल्ट तह लगाउन गाह्रौ हुन्छ । हामीले भनेको चुपचाप मानेनौभने चुरोटको ठुटोले पोल्छौं । तातो फलामले पोल्छौं । त्यसपछि हामी वोल्नसकेनौं । तीनजनाले रोएरै त्यो रात कटायौं । भोलिपल्टदेखि हामीलाई छुट्टाछुट्टैकोठामा बन्द गरी धन्दा गर्ने लगाई । पहिला-पहिला त घेरै नाइँनास्ती गयौं ।तर, केही नचलेपछि बोल्नु वेकारझौँ लाग्यो । निमेषले नै धेरैको सङ्ख्यामा केटीबेचेको रहेछ । तिम्रो कुरा मानेकी भए आज यो दुर्दिन देख्न पर्दैनथ्यो । मतिमीलाई प्रत्येक दिन सम्झन्थेँ । पश्चात्ताप गर्दै रुन्थे । एड्स लागेर असक्तभएपछि बाईले गाउँमै जानु भनी पुग्ने बाटाखर्च दिएर पराई । म त्यो पापीनिमेषलाई जेल जाक्छु भनी सिधै काठमाडौँ आएँ । प्रहरी कार्यालयमा उसकोफोटो देखाएर सबै क्रा वताएँ । प्रहरी निरीक्षकले सिधै भने, &#039;तिमीहरूजस्तादुईपैसेलाई नबेचेर कसलाई बेच्छन्‌ त : तिमीहरूजस्ता दुई-चार अक्षरपढेलेखेकाहरूले आफनो मर्यादा विर्सेपछि नै यस्ता दलालहरूले मोटाउनेमौका पाएका छन्‌ । हामी त खोजखवर गरेर यहाँसम्म लेराइदिउँला । यहांलेराएको भोलिपल्ट नै यहांबाट निकाल्न बाध्य हनुपर्छ । उनीहरूको पहुँच धैरैमाथिसम्म हुन्छ । बरु सक्छ्यौ भने तिमी नै कूनै सजाय देक । जसले गर्दाउसले अरूलाई बेच्न नसकोस्‌ । त्यसपछि पुलिसले निमेषलाई जेलमा तकोच्यौ तर प्रहरीले भनेझैँ केही दिनमा नै जेलबाट निस्कियो पनि ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले मौसमीको कुरा बीचैमा काट्दै भनिन्‌, &#039;मौसमी, मलाई तिम्रो कुरासुन्न त कुनै आपत्ति छैन तर तिमीलाई चाहिँ ज्यादै गाह्रो भएजस्तो छ नि !&#039;&lt;br /&gt;
मौसमीले फिस्स हाँस्दै भनिन्‌, &#039;शालु मलाई गाह्रो भएको छैन । म यो क्षणयतिविग्न खुसी छु कि क्रै छोड बरु मेरो कुरा सुन । म तिमीलाई पीडा बाडेरहलुको हन चाहन्छु&#039; भन्दै मौसमीले कुरा बढाइन्‌, &#039;आफनो साथमा केही पैसाभएको हँदा मलाई वस्न, खानचाहिँ गाह्रो भएन । एक मन लाग्यो वरु मछुँ तरभित्री आत्माले मर्न पनि मानेन । म यताउता भौँतारिँदै दिनहरू बिताइरहेकीथिएँ एक दिन न्यूरोडमा गहना पसलतिर जाँदै गरेको निमेष र एउटी युवतीलाईदेख । म उनीहरूको पछिपछि लागें । औंठी किनेर निस्केपछि निमेष युवतीलाईयहीँ बसिराख म मोटरसाइकल लिएर आउँछु भनी मोटरसाइकल पा्किङतिरलाग्यो । मैले त्यो युवतीलाई च्याप्प समातेर निमेषको फोटो देखाउँदै निमेषकोबारेमा मौटामोटी कुरा भने । युवती बडो बुझकी रहिछिन्‌ । मलाई धन्यवाददिँदै भनिन्‌, &#039;च्याङ्कयु म बच्चेँ । तपाईँ यही बस्नोस्‌ म केही बहानाले उसबाट&lt;br /&gt;
११२&lt;br /&gt;
फृत्केर आउँछ । मेरो घरमा नै गएर सबै कुरा गरौंला भनिन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
म उनको विश्वास गरेर त्यहीँ बसेँ । नभन्दै उनी केहीबेरपछि नै आइन्‌ ।द्याक्सी लिई हामी उनको घर वौद्धतिर लाग्यौं । डोल्मा मगर जातकी रहिछन्‌ ।ट्याक्सीमा बसेपछि उनी केहीबेर बोल्न सकिनन्‌ । केहीवेरपछि मुटुमा गाँठोपार्दै भनिन्‌, &#039;दिदी तपाईंलाई नभेटेकी भए आज हामी डिनरको लागि होटेलसौल्टीमा जानै प्लान थियो । सहतै नसक्ने गरी पेट दुख्यो दयाक्सीमै घर जान्छुभोलि भेटौंला भनी फुत्किएर आएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
मैले सोधेँ, &#039;तपाईंहरूको भेट कहिले कसरी भयो : शारीरिक सम्वन्ध भयोकि भएको छैत ?&#039; उत्ले आफतो भेट पच्चीस-तीस दितअगाडि बौद्धजयत्तीकोदिन बौद्धको गुम्बामा भएको र शारीरिक सम्बन्ध भने नभएको बताइन्‌ । कुरागर्दागर्दै हामी उनको घरमा पुग्यौँ । उनको बाबु-आमा आफनो पुर्ख्यौली घरधरान भएकोले उनी एक्लै रहिछिन्‌ । उनी पदाकन्या क्याम्पसमा बी.ए. पढ्दैरहिछिन्‌ । दुई फल्याट घर भाडामा दिएको रहेछ । खाना, डेरा वस्ने एउटीदिदीले पकाएर ल्याइदिइन्‌ । खाना खाएपछि मैले उनलाई आफनो सम्पूर्णकुराहरू एकएक गरी बताएँ । उनले मैरो सबै कुराहरू सुनित्‌ । त्यसपछिउनले एकएक गरी आफनो योजना सुनाइन्‌ । मैले उनको कुरा खुसी साथमञ्जुर गरेँ, हाम्रो सोजना बनिसकेपछि निमेषको फोत आयो । डोल्माले आफनोघरमा कोही नभएकोले भोलिको डिनर यहीँ गर्न आनुहोस्‌, मलाई अलि पेटदुखेकै छ भनिन्‌ । उसले डोल्माको कुरा खुसीसाथ स्वीकार गन्यो । राईकोछोरी हक्की र निहर स्वभावकी । त्यसमाथि मामा प्रहरी इन्स्पेक्टर रहेछन्‌ ।हामी भौलिको योजना सफल नै पार्ने प्रतीक्षा गरेर सुत्यौँ । यौजना सफल हुन्छकि हुँदैन भन्ने केही डर त थियो नै । भोलिपल्ट साँझ सात बजेतिर डोल्माआफैँ गएर निमेषलाई घरमा ल्याइन्‌ । उनीहरू कोठामै बसे, मैले खानेक्राओसार्नै काम गरेँ । डोल्मा राईकी छौरी, पहिलेदेखि नै पिउने भएकीले पिउनकुनै आपत्ति थिएन । निमेषले डोल्माको रूपको र आफूले किनिदिएको औंठीलाउँदा सुहाएको हातको प्रशंसा गयो । रक्सी लाग्दै गएपछि उनीहरू एक-अर्कासँग हात हालाहाला गरी चल्न थालै । रात पनि छिप्पँदै गयो । मैलेपूर्वपोजनाअनुसार मेन स्विचबाटै बत्ती अफ गरिदिएँ । वत्ती गएको चालपाएपछि निमैषले खुसी हुँदै भन्यो, &#039;डोल्मा बत्तीले पनि हाम्रो भावना बुझयो&#039;भन्दै नशामा ढुनमुनिँदै बेडमा पुग्यो र डोल्मा सुटुक्क कोठाबाट वाहिरिन्‌ । मडराउँदै बेडमा पुगें । उसलाई आफनो बसमा पारेँ । क नशामा डोल्मा-डोल्माभन्दै मग्न भयौ । बेलुका दुईपत्ट उसलाई बलात्कार गरेपछि मलाई आफूलेसंसारै जितेजस्तो लाग्यो । म त्यहीँ आनन्दले निदाएँछ्‌ । भोलिपल्ट बिहानडोल्मा-डोल्मा भन्दै छामेपछि म ब्युँझे । त्यो पापीलाई हेरेर हाँस्दै भने, &#039;निच,पापी, म मौसमी हँ । मौसमी आँखा खोल । हेर, मैले पनि तँ जस्तो निचलाईपतन गराएँ । तँलाई एड्स सारिदिएँ हो एड्स ।&#039;&lt;br /&gt;
(११३.&lt;br /&gt;
का आत्तिँदै उठेर चिच्यायो, “तँ को होस्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
डोल्माले ढोका खोल्दै भनिन्‌, &#039;चिनिनस्‌ गधा उनी मौसमी हुन्‌ । तैँलेमुम्बईमा बैचेकी मौसमी । तैंले गर्दा उनलाई एड्स लागेको छ । त्यो एड्सतँलाई पनि उपहार दिन चाहिन्‌ । मैल्ले उनक्रो पूर्ण सहयोग गरेँ । तँजस्तापापीलाई यसरी नै मार्नुपर्छ बुझिस्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
निमेष मु्दाजस्तै भयो र डोल्माले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;अव खुरुक्क यो घरबाटनिस्की, नत्र पुलिस डाकेर जेलमा कोचिदिन्छु । बुझ असत्ती चोट आफूलाईपर्दा कति असैहय हुँदोरहेछ । अब केका लागि वेच्छस्‌ केटी, तेरो त मृत्युनिश्चित छ।&#039;&lt;br /&gt;
मैले थुक्दै गाली गरेपछि निमेषले रुँदै भन्यो, &#039;चुप लाग वेश्या, मैले तैरोबलात्कार गरेको हुँ ? म त्यस्ती केटीको खोजीमा थिएँ, जसलाई प्रेमको मूल्यथाहा होस्‌ । मैले तँ जस्तै पैसामा बिक्ने र यौवनकै माया गर्नेलाई वेचेँ त केपाप गरेँ हँ ? तैलेजस्तै अन्योलमा पारेर कसैको वलात्कार गरेको छैन । हो,डोल्मा म तिम्रो व्यबहार देखेर तिमीलाई साँच्चै माया गर्न लागिसकेको थिएँ,तिमीले पनि डिनरका लागि जान्छु भनेपछि म एकपल्ट रोएँ । तिमीले औँठीसहजै स्वीकार गौ । मैले बुझौं तिमी पनि सुनलाई प्रेम गछयौं । अझ के-केलाई प्रेम गर्थेक बुझन बाँकी नै थियो ।&#039;&lt;br /&gt;
डोल्माले भनिन्‌, &#039;तिमीले सोह्रैआना ठीक कुरा नगरे पनि केही हदसम्मठीक कुरा गन्यौ । चाहे जे होस्‌, तिमीले केटी बेच्नेचाहिँ नहुने थियो ।&#039;&lt;br /&gt;
मैले भने, “साले तैँले पनि त जीबनको सही अर्थ बुझाउन सक्थिस्‌ । जसरीकबिले आफूली प्रेमिकालाई बुझायो ।&#039;&lt;br /&gt;
निमैषले आँसु पुछ्दै भन्यो, &#039;चुप लाग आफनै बाबुलाई मार्ने हत्यारा । तँजस्तालाई प्रेमको अर्थ बुझाउने ? कविले प्रेमीलाई नछुँदा क कति रिसाएकीथिई । तैँले आफनै आँखाले देखेकी होइनस्‌ : कवि युवतीलाई प्रेमको मूल्यबुझाउन होइन तिमी मेरो प्रेमी बन्न लायक छैनौ भन्न घर गए । पहिलोप्रेमीलाई पनि यौग्य नभएर कवि आफैँले छोडेका थिए । उनले तिमीहरूजस्ताको यौनइच्छा पूरा गरेनन्‌ । मैले पूरा गरे&#039; भन्दै निमेष रुँदै बाहिरियो ।&lt;br /&gt;
मैले र डोल्माले मुखामुख गरी एक-अर्कालाई हेन्यौं । हामी दुवैलाई आफ्नैछायासँग केही मात्रामा घृणा लाग्यो नै । म त्यही क्षण डोल्माको घर छोडीगाउँतिर गएँ । गाउँमा एड्स लागेको थाहा पाएपछि सबैले छी:छी: र दुरदुरगरे । पछि काठमाडौं नै फर्किएँ । यहाँ आएपछि थाहा पाएँ, निमेषले विष सेवनगरी आत्महत्या गरेछ । म भने आत्महत्या गर्दिनँ । बरु बाँचुञ्जेल एड्सबारेमाचेतना फैलाउने काम गर्छु । धन्य तिमी, तिमीले फिरोजजस्तालाई नयाँ जन्मदियौ । मैले निमेषको दर्दनाक हत्या गरेँ ।&#039; मौसमीले सुँक्कसुँक्क गरी रुँदै&lt;br /&gt;
११४&lt;br /&gt;
भनिन्‌, &#039;निमेषलाई मारेकोमा मलाई गर्वचाहिँ छैन । खासै पछुतो पनि छैन ।नढाँटी भन्दा मैले उसको बलात्कार गरेँ । उसले मेरो बलात्कार गरेकोचाहिँहोइन । तिमीसँग सम्पूर्ण क्राहरू गरी माफ माग्ने ठूलो इच्छा थियो । म तिम्रो,खोजीमा भौंतारिरहेकी थिएँ । अस्ति रोहिणी भनेर बोलाएको त रेष्मा पोरहिछिन्‌ । उनले तिमी यहाँ पढ्छयौ भनेपछि यहाँ आएकी हुँ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले मौसमीलाई मायालु पाराले हेर्दै भनिन्‌, &#039;घर जलेपछि इनार खन्नुकोऔचित्य छैन । तर तिमीले चार-छ जनालाई मात्र भए पनि बाटो देखाउनसक्यौ भने उनीहरू भयावह धापबाट मुक्ति पाउन सक्नेछन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
“म पनि त्यही सोच्दैछु । मैले तिम्रो निद्रा बिगारैं होइन ?&#039;&lt;br /&gt;
“मौसमी, जाबो निद्राको चिन्ता नगर, तिमीले मलाई सम्झेर यहांसम्मआयौ । त्यो भन्दा ठूलो मेरा लागि केही छैन । ल अब जान्छु । मर्नु त एकदिनसबैले छँदैछ । ढिलो-चाँडो न हो । पीर नगर ।&#039;&lt;br /&gt;
मौसमीले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;मलाई मृत्युको पटक्कै चिन्ता छैन । मेरो पीरनगर ।&#039;&lt;br /&gt;
शालु मौसमीसँग बिदा भएर सर्जिकल वार्डबाट बाहिरिन्‌ । मौसमीले एकोहोरोशालु गएतिर हेरिरहिन्‌ ।&lt;br /&gt;
तेईस&lt;br /&gt;
प्रशन्नले पढाइ सिध्याएर आएपछि रोहिणीको जीबनमा बसन्तको बहारआएझौं भयो । पीताम्बरा, कैशव, चन्द्रकान्त, कान्छी, शालु सबैसबै खुसीथिए । विवाहको दिन पनि तय गरियो । विबाहका लागि आमालाई लिएरआउँछु भनी गएको प्रशन्न नफर्केपछि सबैको मनमा सातो गयो । सवैले आ-आफनो अनुमान गरे । इन्जिनियरसम्म भइसकेको प्रशन्न एकैपल्ट दुलही लिनआउने सुर गरे होला । निम्ता बांड्नेदेखि लिएर विबाहको सम्पूर्ण तयारी भयो ।प्रशन्तको भने अत्तोपत्तो भएन । यता रोहिणीलगायत सबैको सातो गयो ।प्रशन्नको खोजखबर गर्दा प्रशन्न घरमा नै नपुगेको करा पत्ता लाग्यो । रोहिणीप्रशन्तको चिन्ताले गर्दा मूर्दामा परिणत भइन्‌ । छिमेकीहरूले काखी बजाउनेठाउँ पाए । रोहिणीको चरित्रमाथि आक्षेप लगाउँदै भने, &amp;quot;पहिले छाडा सांढेजस्तैछोडेका थिए, बल्ल चाल पाए । त्यो वूढी कन्यालाई इन्जिनियरजस्तो केटाले केविवाह गरोस्‌ ? बैंसलाई थेग्न नसकेर मोजमस्तीचाहिँ गन्यो, विबाहचाहिँ केगर्थ्यौ ?&#039;&lt;br /&gt;
युबाहरू रोहिणीको विवाह भएन भने आफूहरूले रोहिणीमाथिको अधिकारजमाउने कुरा गर्दै जुंगामा ताउ लगाउँथे । यसरी समाजले रोहिणीलाई पूर्ण&lt;br /&gt;
११५।&lt;br /&gt;
रूपमा वेश्यामा परिणत गयो । रोहिणीका परिवारचाहिँ प्रशन्तमाथि कनैदुर्घटना नै भयो भन्ने पीरले व्याकुल भए । रोहिणीको हृदयमा लागैको आगोनिभाउन कसैले सकेनन्‌ । यता शालु रोहिणीको र सुजनको चिन्ताले विचलितभएपछि फिरोज पनि प्रशन्नको खोजीमा लागे । केही दिनमै फिरोजले वास्तविकतापत्ता लगाएरै छोडे । बास्तव्रिकताचाहिँ प्रशत्नले करोडपति सचिब तिरञ्जतकोबीसबर्षे पौडसी छोरी नर्मदासँग रोहिणीको बिबाह गर्ने भनेकै दिन बिबाह गरेरहनिमुन मनाएर पनि आइसकेछ । फिरोजको क्रा सुनेर केहीक्षण त शालुलेआफूलाई सम्हाल्नै सकिनन्‌ । रोहिणी र उसको उदार दिल भएका बाबुआमालाईप्रशन्नको वास्तविकता ओकेल्न तागत नभएपछि यो जिम्मा शालुले फिरोजलाईसुम्पिइन्‌ । फिरोजले वास्तविकता बताउँदा घरमा मान्छे मरेजस्तै रुवावासीभयो । रोहिणी मूर्छा परिन्‌ । डाक्टर आएर स्लाइनपानी दिएको दस-पन्धरमिनेटपछि रोहिणीको होस खुल्यो । होस खुलेपछि स्लाइनको तार चुतैर फयाँग्दैरोहिणी चिच्याउन थालिन्‌, &#039;पापी फिरोज तैँले झूट बोलिस्‌ । शालु तँ पनिपापिनी होस्‌ । प्रशन्त मलाई केबल मलाई मात्र प्रेम गर्छन्‌ बुझिस्‌ ? तिमीहरूलेत के स्वयम्‌ भगवान्‌ नै आएर प्रशन्नले तँलाई धोका दियो भने पनि मगत्याउँदिनँ । बरु भन्‌ मेरो प्रशन्नलाई के सङ्कट परेको छ : तेरो फिरोजजस्तोहोइन मेरो प्रशन्त क देबता हो देबता ... ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले रोहिणीको गालामा दुई &#039;फापड दिँदै भनिन्‌, &#039;चुप लाग सुंगुर्ती, कतिरेदछैस्‌ दैवजस्तो बाबु-आमालाई । तेरो तमासा हेर्न छिमेकीहरू बसिरहेकाछन्‌ । त्यसका लागि मर्ने चाहन्छेस्‌ होइन ? म तँलाई विष दिन्छु तँ मर । तेरोबाबु-आमाले तेरो यो हालत देख्न त पर्दैन । तँ जस्तो स्वार्थी बाच्नु व्यर्थ छ ।तैँले त कनाले त्यत्रो त्यागको बदला के दिइस्‌ ? केवल आँसु र जलनदिड्स्‌ गा&lt;br /&gt;
मेरो प्रशन्त मलाई छोड्न सक्दैनन्‌, मैले बुझ उसबाट मलाई छटाउनेषड्यन्त्र हो तिमीहरूको, क गरिब छ त के भो मन छ सँग । मलाई धनकोलालच छैन म अहिल्यै उसलाई भेद्छु हो अहिल्यै .. ।&lt;br /&gt;
शालुलै भनिन्‌, &#039;रौहिणीलाई प्रशन्नको बास्तविक रूप देखाउनैपर्छ । उनीपागल हुन्छिन्‌ तर प्रशन्न नराम्री हो भन्ने क्रामा विश्वास गर्दिनन्‌ । समाजलेजे भनोस्‌ एकपल्ट रोहिणीलाई प्रशन्नसँग भेटाउनैपर्छ, ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुको कुरा सबैलाई ठीक लाग्यो । फिरोज रोहिणीलाई लिएर प्रशन्नबसेको भव्य महल कालिमाटीमा पुगे । कार रोकी घरमा कोही भएको-नभएकोकुरा बुझे । संयोग घरमा प्रशन्न मात्र रहेछ । फिरोजले रोहिणीलाई डोच्याउँदैप्रशन्तको कोठामा पुसाउँदा प्रशन्न झसङ्ग भएर उड्यो । रोहिणीले प्रशन्नलाईदेखेपछि गर्लम्म अङ्गालो हाल्दै भनिन्‌, &#039;प्रशन्त यिनीहरू सन &#039;फुटा हुन्‌ ।यिनीहरूले तिमीलँई पापी भने । प्रशन्न तिमी पापी होइनौ ।&#039;&lt;br /&gt;
११६।&lt;br /&gt;
प्रशन्तले आफनो मजबुत हातले जवर्जस्ती रोहिणीलाई समातेर भुइँमापछादैं भन्यौ, &#039;ए, बूढीकन्या, तँ यहाँ किन ? तैले पढाउँदा लागेको दोब्बर पैसाभोलि नै म त्यरौ मुखमा फयाँक्छ । निस्की, निस्किहाल, के सम्झेर तँ यहाँआइस्‌ ? तेरो बैंस निखिसक्यो । तैँले मलाई पैसाले किन्न खोजेकी होइनस्‌ ?&#039;अब गाडावालालाई किनेर विवाह गर, नत्र अरूले पत्याउंदैनन्‌ । हेर मेरीप्यारीको तस्बिर भन्दै स्वास्नीको फोटो रोहिणीको आँखामा तेर्स्यायो र रोहिणीलाईघिसारेर ढोकाबाहिर फयाँक्दै फिरौजतिर हेर्दै भन्यो, &#039;तैँले किन यस वेश्यालाईयहाँ ल्याइस्‌ हँ ? यो कोठीको मात्र रौनक बन्न सक्छै । घरको रौनक बन्नसक्दिन ।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले रोहिणीलाई उठाउँदै भने, &#039;रोहिणीजस्तीको प्रेमलाई लत्याएकोछस्‌ । तँ कुनै दिन घरको न घाटको हुन्छस्‌ ।&#039;&#039;जञा-जा तँ नै विबाह गर यसलाई बडो गाली गर्दोरहेछ साले ... ।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले मूर्दाजस्तै भएकी रोहिणीलाई डौच्याउँदै कारमा हालै । रोहिणीलाईविश्वास नै लागेन कि मान्छे त्यति धेरै गिर्छ । रोहिणीको आँखामा प्रशन्न,बेहोस भएको दृश्य, उसको कोठाको दृश्य, आफूलाई घिसारेको दृश्य आँखामाएकपछि अर्को गर्दै नाचिरहयो । यता घरमा सबैज्ञना रोहिणी र फिरोज आउनेप्रतीक्षामा थिए । रोहिणी र फिरोज आएपछि शालुले डोच्याएर कोठामा लगिन्‌ ।रोहिणीलाई तकियामा अडेस लगाउन लगाई ओठल्लयानमा बसाइन्‌ । रोहिणीलेसबैलाई एक-एक गरी हेरेर बर्बर आँसु झारिन्‌ । शालुले आँसु पुर्छिदिँदै भनिन्‌,&#039;रोहिणी किन रुन्छेस्‌ भन्‌ त ? हामी सबैलाई हेर । हामी सबै तेरो खुसीकालागि जे पनि गर्ने तयार छौं । भन अव हामीले के गर्नुपन्यो ?&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीले आँसु पुछ्दै भनिन्‌, &#039;शालु त कति महान्‌ छेस्‌ । त्यसैले त सबैकोप्रिय छेस्‌ । तँलाई मैले त्यत्रो गाली गरेँ, तैँले त्यो पनि विर्सिस्‌ ? आज मलाईथाहा भयो । मेरो स्वयम्बर तैंले नै रोकेकी होस्‌ । तँ मलाई हरबाघाबाट मुक्तिगराउन चाहन्थिस्‌ । तर, मैले तँलाई के-के सोचेँ ।&#039;&lt;br /&gt;
केशवले आँखाको आँसु पुछ्दै भने, &#039;तिमीले ठीक भन्यौ छोरी, तिम्रो स्वयम्बररोक्ने कुरा शालुले नै गरेकी थिइन्‌ । अझ स्वयम्बर भइसकेको भए योसमाजले के भन्थ्यो होला । यो कुरा मलाई र शालुलाई मात्र वाहा छ । अब जेहुनु भैगो पीर नगर ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले जुस ल्याएर दिँदै भनिन्‌, &#039;अब बिस्तारै जुस खा । तिमी धेरैथाकेकी छयौ । हामी एक भयौं भने जस्तोसुकै बिकराल हुरीको पनि सामनागर्न सम्छौं । तिमीले हिम्मत हान्यौ भने हामी सबै टुदछौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणीले गहभरि आँसु पार्दै भनिन्‌, &#039;अब म हिम्मत हार्दिनँ शालु, ममी,बाबा, दिदी, दाइ, तँ कसैले पनि मेरो पीर गर्नुपर्दैन ।&#039;&lt;br /&gt;
११७]&lt;br /&gt;
रोहिणीको कुरा सुनेर सबैको मुख उज्याले भयो । शालु र फिरोजलाई नैसबैले धन्यवाद दिए । मोनाले सबैलाई च्रिया बाँड्दै भनिन्‌, &#039;शालु दिदी, मैलेपत्ति कान्छीदिदीले जस्तै गरेँ नि ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;होइन के कान्छी दिदीजस्तो गज्यौ ? मैले त कुरा नै बुझिनँ ।&#039;&lt;br /&gt;
मोनाले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;मैले आफनो छौराछोरीको नाम तपाईंकै नामबाटराखेँ, सागर संकिना ।&#039;&lt;br /&gt;
मोनाको क्रा सुनेर सबैजना हाँसे । म पनि तैरै नामबाट ..... । भन्दाभन्दैरोहिणीको आबाज बीचैमा रोकियो ।&lt;br /&gt;
रोहिणीको क्राले सबैको आँखामा आँसु भरियो । कोठामा केहीबेर सन्नाटाछायो । कान्छीदिदीले क्रा मोडिन्‌, &#039;आजचाहिँ म रोहिणी मैयाँसापलाई मनपर्नेखाना बनाउंछु ।&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीको कराले रोहिणीले सबै करा बिर्सेर हाँस्दै भनिन्‌, “मैले शालुको डाहगर्छु भनेर होला भो-भो गर्दिनँ । शालुलाई मन पर्ने चिज नै बनाउनुहोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले घडी हेर्दै भनिन्‌, &#039;ल दिदी यही कालीलाई मनपर्ने चिज नै बनाउनुहोस्‌ । म जान्छु पनि, सुजनको कुरा हामी सबैलाई थाहा नै छ । अस्तिदेखिअलि चाँडो घर आउन थालेका छन्‌ । म घरमा भइनँ भने उनी झन्‌ मनोमानीगर्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
सबैले शालुलाई घर जान आग्रह गरे । शालु र फिरोज बिदा भएर आफूनो-आफनो घरतर्फ लागे ।&lt;br /&gt;
रोहिणीको केही परिवर्तित व्यवहारले रोहिणीको परिवार त केही खुसी भयोतर रोहिणी प्रशन्नले हानेको बञ्जको चोट सम्झँदा क्षण-क्षणमा रन्धनिन्थिइन्‌ ।त्यसमाथि समाजले रोहिणीको परिवारको खोइरो खन्न कनै कसर बाँकी राखेन ।भन्थे, &#039;बुढेसकालमा छौरी पाएँ भनेर मैमत्त भएका थिए । छोरीले नाकमा दिसालगाई हाली । रोहिणीजस्ती सन्तान जन्मतुभन्दा त नजन्मिदिएको भए हाइसन्चौहुन्थ्यो । आज यो दिन देख्न पर्दैनथ्यो । कतिबटा बच्चा फयाँकी कुन्नि ? अवकसले बिवाह गर्छ, त्यस्तालाई । छौरो नभएको घर बूढीकन्या बस्ने भई, राम्रैभयो।&#039;&lt;br /&gt;
कोही छिमेकी सद्भावना देखाउँदै स्वास्नी मरेको, छोराछोरी भएकाहरूकोकुरा लिएर आई भन्थे, हेर्नोस्‌ माटाको भाँडो फुटेपछि फुदयो-फुदपो । फलानोस्वास्नी मरेकोले त्यस्तै केटी भए पनि हुन्छ भनेको छ । थपक्क आँखा चिम्लेरदिनोस्‌ । त्यही पनि गुम्यो भने फेरि झन्‌ फसाद पर्छ ।&lt;br /&gt;
कोही विवाह गरेर छोराछोरी नभएकाहरूको कुरा लिएर आई भन्थये- &#039;फलानालेबिवाह गरेको बीस वर्ष हुँदा पनि बच्चा भएन रै । रोहिणीले बच्चा फयाँकेकी&lt;br /&gt;
पि१्द॒&lt;br /&gt;
हुनाले उनीबाट बच्चा हुन्छ भन्नै निश्चय छ, त्यसैले मार रोहिणीलाई माग्नपठाएका छन्‌ । दिनोस्‌, रोहिणीको भाग्य वन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
युवाहरू रोहिणीको घरनजिकै आएपछि यस्ता गीतहरू गाउँदै हिँड्थे ।गेट खुल्लै राख मैयाँ&lt;br /&gt;
भयाल खुल्लै राख&lt;br /&gt;
अरूलाई डाकेजस्तै&lt;br /&gt;
हामीलाई पति डाक&lt;br /&gt;
हौ .. हो हामीलाई पनि डाक ।&lt;br /&gt;
ओरालो लागेको मृगलाई बाच्छाले पनि खेद्छ भनेझैँ रोहिणीको आदर्शपरिवारलाई टिक्नै नसक्ने गरी बद्नाम गरे । रोहिणीको परिबार चुपचाप सवैघृणा पिउन विबश भए । सबैको दुर्बाच्य सुन्न नसकेपछि एक दिन केशवलेकान्छीसँग रुँदै भने, &#039;कान्छी, अव हामी यो समाजमा बाँच्न सक्दैनौं । हामीपलपल मर्नु साटो एकैपल्ट मछौं । हामी चारजना सुतेको बेला घरमा आगोलगाइदेङ, तिमीलाई धर्म हुन्छ । अब यो समाजले रोहिणी र रेष्माको विवाहहुन दिँदैनन्‌ । उनीहरूको आँसु पनि कति हेर्नु ?&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीले सम्झाइन्‌, &#039;बावा हजुरजस्तो मान्छेले यस्तो भन्त सुहाउँदैन ।कालो रात सधैँ रहँदैन । म शालु मैयाँसँग सल्लाह गर्छु, केही उपाय निस्कन्छकि।&#039;&lt;br /&gt;
कंशवले सुस्केरा हाल्दै भने, &#039;त्यो फूलजस्ती बच्चीलाई कति चोट दिनु ?सुजनको पीरले जलेको बेला ।&#039;&lt;br /&gt;
&amp;quot;सुजनमा धेरै परिवर्तन आइसक्यो रे पीर गर्नुपर्दैन भन्दै होइसिन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
तिमीले पीर गर्छर्यौ भनेर ढाँटिन्‌ होला । कै परिवर्तन हुन्थ्यो यति छिटो,हुन्देक शालुलाई केही नभन&#039; भन्दै केशव कोठाभित्र पसे ।&lt;br /&gt;
कान्छी केशाबको कुरा सुनेपछि झसङ्ग भइन्‌ र सोचिन्‌- उफ ! मैले पनिउहाँको बानी भुलेछु । मलाई चोट पर्छ भनेरै उहाँले ढाँद्नुभएको हो । कान्छीगर्दागर्दैको काम छोडेर कपडा पति नफेरी कृपण्डोल पुगिन्‌ । मनमा पीर भएरहोला उनलाई कसैको डर लागेन । शालु र सुजनको मात्र माया लाग्यो ।कान्छी सरासर भित्र पसिन्‌ । बिहानको समय उनले समय पनि भुलिछिन्‌ ।उर्मीलालाई देखेपछि पो &#039;झस्किन्‌ र बरण्डामै रोक्किइन्‌ ।&lt;br /&gt;
उमिंलाले हात जोड्दै भनिन्‌, &#039;कान्छी तिमी आयौ अब यो घर छोडेर कहीँनजाक, हामी बर्बाद भयौं कान्छी बर्बाद ... ।&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीको नाम सुन्नेबित्तिकै दीपक पनि हतारहतार औछ्लयानबाट उठेर&lt;br /&gt;
1119&lt;br /&gt;
आई हात जौडदै भने, &#039;कान्छी तिमी फर्कियौ ? बिन्ती तिमी अब यहाँबाटनजाक । पहिलेको जस्तै यो घरलाई मन्दिर बना ।&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीले उनीहरूको कुराको जवाफ नै नदिई भनिन्‌, &#039;म यहाँ सुजनबावुलाईहेर्ने आएकी हुँ ।&#039; उर्मिलाले नम्र स्वरमा भनिन्‌, &#039;शालु आजकाल सुजनकैकोठामा सुत्छित्‌ । तिमी नजाक है कान्छी यहीँ वस ।&#039;&lt;br /&gt;
उर्मिलाको करा नसुनी कान्छी सुजनको कोठामा पसिन्‌ । कान्छीलाई देखेपछिशाल्‌ अलि डराइन्‌ । कान्छीले भनिन्‌, &#039;भो नडराइस्यो । कस्तो छ सुजनबाबुलाई :&#039;&lt;br /&gt;
शालुले कान्छीलाई आफनो कोठामा लगेर भनिन्‌, &#039;हेर, कपडा पनि नफेरीआउनुभएको । दिदी त्यो लत छुटाउन त साह्रै गाह्रो हुँदोरहेछ । डुक्स नखाएपछिहातखुट्टा थरथर काम्ने रहेछन्‌ । उनी रातभरि छट्पटाएर निदाउन सकेनन्‌ ।अहिले एकैछिन भयो निदाएका । भन्नोस्‌ रोहिणीलाई कस्तो छ !&#039;&lt;br /&gt;
रोहिणी मैयाँको कुरा छोडिस्यो । सुजनबावुको मनमा म खराब बाटोमाहिँडेको रहेछु भन्ने चैत आयो कि आएन ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;आयौ दिदी आयो । उनी आफूलाई नियन्त्रण गर्न सक्दो कोसिस पनिगर्दैछन्‌ । उनको अवस्था देख्दा त मलाई नै डर लाग्छ । कत्मना गर्नौस्‌,फिरोजले ड्रक्स र युवती एक्कँपल्ट कसरी छोडे होला !&#039;&lt;br /&gt;
गाँगा भन्नुहुन्थ्यो, &#039;फिरोज छटपटाउन थाल्दा हजुरको तस्बिरलाई छातीमाराखैर मुद्ठी बाँध्नुहुन्थ्यो रे, कहिले ओठ टोकेर रगत निकाल्नुहुन्थ्यो रे, कहिलेहात टोकेर आफूलाई सम्हाल्नुहुन्थ्यो रे, कहिले हजुरको आर्ट गदै बस्नुहुन्थ्योरे॥&lt;br /&gt;
&#039;शालुले भावविभोर भएर भनिन्‌- &#039;दिदी, सुजन र रोहिणीको समस्या समाधानभए हामी कति खुसी हन्थ्यौँ हगि ?&#039; दिदी फिरोज, तपाईंले कथामा भनेकोराजकमारजस्तै छन्‌ । तपाईंले त पहिल्यै फिरोज सफ्रिन्छ भन्ने थाहा पाउनुभएकोरहेछ । मलाईचाहिँ किन केही नभन्नुभएकौ ? फिरोजले तिम्रो दिदीले खोजेकोराजकुमार मै हुँ भन्दा म त हेरेको हेरै भएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
“वाहा थियो मैयाँसाप, राम्रै थाहा थियो । त्यसैले राजकुमार खोज्ने कुरा गरेकि नि ।&#039; कुरा गर्दागर्दै उर्मिलाले चिया र दूध लिएर भित्र पस्दै भनिन्‌, &#039;कान्छीचिया लेक ।&#039; शालुतिर हेर्दै भनिन्‌, &#039;शालु अब दिदीलाई तपदाङ है । कान्छीयहीँ बस्छिन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले हांस्दै भनिन्‌, &#039;के भनिस्या ममी हजुरले, दिदी यहीँ वस्ने रे?दिदीको स्वगंजस्तै परिबार छ । दुईवटा छौरा, लोग्ने सासूससुरा, चन्द सबैसवैछन्‌ । दिदीलाई त्यो घरमा सबैले आफनै मुटुजस्तै गर्छन्‌ । दिदीको छुट्टैसिनामंगलमा दुईतले घर छ । रोहिणीको बाबाले सुजनलाई सञ्चो छैन भनेपछि&lt;br /&gt;
१२०३&lt;br /&gt;
सुजनको मायाले कपडा नै नफेरी यहाँ आउनुभएको हा । दिदीको आफनैट्याक्सी छ । देवर-देउरानी सबै-सबै छन्‌ दिदीको ।&#039; उामेलाले शिर झुकाएरभनिन्‌, &#039;सुजनले नशाको सुरमा भन्न त भनेका थिए । दिदीको घर छ भनेर .. ।राम्रै भयो तिमीले यहाँ साह्रै दुःख पाएकी थियौँ । पापले डुबाउँछ, धर्मलेउठाउँछ भन्ने कुरा सोच्न सक्किएन । नभन्दै साँचो रहेछ । बच्चाहरू कव्रा-कवाछन्‌ नि?”&lt;br /&gt;
ठूलो त अठार वर्षका भए । होटेल मेनेजमेन्ट पढ्दैछन्‌ । कान्छा सातवर्षका भए । तीन क्लासमा पढ्दैछन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
“सौझोको साथ दैव भन्छन्‌ । त्यसैले तिम्रो राम्रो भयो । तिमी यहाँ आउँदैगर, हाम्रो भूललाई माफ गर ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;होइन मैयाँसाप त्यसो नभनिस्यो । सँगै वस्दा सानोतिनो गल्ती भइहाल्छ ।&#039;उमिंला आफूले गरेको अत्याचार सम्झेर वोल्न नसकी कोठाबाट बाहिरिन्‌ ।&lt;br /&gt;
“दिदी ममीपापा आफूले खनेको खाल्डोमा आफैँ परेपछि बल्ल चेत्नुभएकोछ । आजकाल घरमा रक्सीको गन्ध छैन । उहाँहरूको शिर झुकेको छ,&#039; शालुलेभनिन्‌ ।&lt;br /&gt;
“मैले थाहा पाएं, अघि नै दुबैले मसँग माफी मागेर हात जोडिस्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
“त्यसो भए दिदी कहिलेकाहीँचाहिँ आउँदै गर्नुहोस्‌ । भन्नोस्‌ न दिदी रोहिणीकोकै हाल छ ? सुजनको पीरले कहीँ जान मन लाग्दैन । अस्पतालबाट सिधै घरआउँछु ।&#039;&lt;br /&gt;
कान्छीले विहान केशबले भनेको क्रा जस्ताको तस्तै भनिन्‌ । छिमेकीहरूलेओकल्ने गरेको दुर्वाच्य शव्दहरूका बारेमा बताइन्‌ । दिदीको कुरा सुन्दा शालुलाईज्यादै नमज्जा लाग्यो । सृजन उठेको थाहा पाएपछि दुबै सृजतको कोठमापुगे । सुजनले कान्छीलाई देखेपछि अड्दगालो हालेर रुँदै भने, &#039;दिदी तपाईं यहाँभएको भए म विंग्रिन पाउंदैन ये । दिदी म चाहेर पनि सम्हालिन सकेको छैन ।बस मर्ने सजिलो होला तर नशा ... ।&#039;&lt;br /&gt;
सुजनको कराले कान्छी र शालुकै आँखाबाट आँसु &#039;फत्यो । कान्छीले सुजनलाईपलङमा वसाएर मायालु पाराले कपाल मसादै भनिन्‌, &#039;तपाईंलाई सन्चो नभईकनम यहाँबाट जान्न । मोनालाई फोन गरेर हाम्रो घरमा जानु भन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
दिदीको कुराले शालु र सुजन खुसी भए । सुजनले दिदीको गालामा म्वाइखाँदै भने, &#039;म दिदीकै हातबाट वनाएको खानेक्रा खान्छु । बच्चामा सुतेजस्तैगरी दिदीको काखमा सृत्छ्नु ।&#039; कान्छीले रुँदै भनिन्‌, &#039;म हजुरको सम्पूर्ण इच्छापूरा गर्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
दिदीको कूरा सुनेर शालु र सुजन खुसी हुँदै हाँसे ।&lt;br /&gt;
१२१ ।&lt;br /&gt;
चौबीस&lt;br /&gt;
हेलो, मुमा नमस्कार&#039; &#039;ओ शालु नाती भाग्यमानी भए । के छ, बा हालखबर ?ठीकै छयौ हेन ? सुजनलाई कस्तो छ ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;ठीक छु मुमा, अहिले सुजनको कुलत छुटाउन दिदीहरू सबैजना यतैबस्नुभएको छ । सुजनले लक्ष्य प्राप्त नगरेसम्म दिदीहरू यहाँबाट जानुहुन्त रे ।मुमा, मलाई अब सुजनको कुनै चिन्ता छैन । दिदीले सुताउनुहुन्छ, दिदीलेउठाउनुहन्छ । दिदीले नै खुवाउनुहुन्छ । सुजनलाई सानैदेखि गीत-सङ्गीत मनपर्ने भएकोले फुर्सदको समयमा सङ्गीत सिक्‌न्‌ भनेर सङ्गीत टिचर राख्नैसल्लाह भइरहेको छ ।&#039;&lt;br /&gt;
“नानु, त्यस भए तिमी सधैँको लागि यहाँ आए हुन्न र?&#039;&lt;br /&gt;
शालुले अनकनाउँदै भनिन्‌, &#039;दिदीको पनि त्यही इच्छा छ । शायद दिदीआज त्यहीँ आउनुहुन्छ होला :&#039;&lt;br /&gt;
गंगाले हाँस्दै भनिन्‌, “ल.. ल अब हाम्रो घर पनि स्वर्ग हुने भयो । साह्रैखुसीको कुरा सुनायौ । फोन फिरोजलाई दिउँ । उनी पनि साह्रै खुसी हुन्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;क्ैगो फोन दिनुपर्दैन दुई बजेतिर कान्ति अस्पतामै जानु भनिदिसेला । अरूकुराहरू पनि गर्नुछ । हस्‌ फोन राख्छु पनि नमस्कार ।&#039;&lt;br /&gt;
गंगाले नमस्कार भन्दै फोन राखिन्‌ ।&lt;br /&gt;
कान्ति अस्पतालको चौरमा बसिरहेका फिरोजसामु पुगी शालुले बस्दैभनिन्‌, &#039;वस्दाबस्दा तपाईँलाई कहिल्यै पट्यार लाग्दैन हगि ? मैले हजुरलाईएक बजे होइन । दुई बजे यहाँ बोलाएकी थिएँ । ड्युटी गर्दागर्दै यसो हेरेकोदसुम्क चौरमा बसेको देख्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले हाँस्दै शालुतिर हेरेर भने, &#039;यो अस्पतालको भित्ताभित्तामा तिमीलाईदेखेर तिमीसँगै मौन वार्ता गरिरहेको थिएँ ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले भनिन्‌, &#039;माया पनि ठिक्क गर्नुपर्छ रे, अति धैरै माया गन्यो भौ चाँडैबिछोड हन्छ रे, म चाँडै आकाशमा गएँ भने नि !&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले रिसाउँदै भने, &#039;त्यस्तो अपशब्द मुखबाट निकाल्दै ननिकाल ।&#039;&lt;br /&gt;
शालुले हाँस्दै मनिन्‌, हेर, हेर रिसाएको, रिसाउँदा त झनै सुहाउँदो पोरहेछ ।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले हाँस्दै भने, &#039;शालु तिमी पनि, ल भन, विशेष कुरा केही छकि ?&#039;&lt;br /&gt;
“भरे घरमा गएर सुन्ने कि मेरै मुखबाट सुन्ने ?&#039;&lt;br /&gt;
[१२२&lt;br /&gt;
&#039;तिम्रै मुखबाट सुन्ने छिटो भनन शालु करा केहो?&lt;br /&gt;
शानुले भनित्‌, &#039;दिदीले भन्नुभएको हाम्रो बिह गर्ने उमेर भयो रे ।&#039;&lt;br /&gt;
&amp;quot;त्यो त मलाई पनि थाहा छ नि, कै नौलो क्रा भयो, सुजनलै लक्ष्य प्राप्तिनगरी रोहिणीले विबाह नगरी हाम्रो पालो आउँदैन क्यारे ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;तपाईं पूरा क्रा नसुनी वीचमा प्याच्च बोल्नुहुन्छ । । विचरी दिदी हाम्रोखुसीका लागि हरपीडाहरू सहनुहुन्छ । दिदीहरू हाम्रै घरमा आइसक्नुभयो ।रोहिणीको घरमा मोना र रोमाकान्त दाइ हुनुहुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&amp;quot;उनीहरूलाई विपत परेको बेला दिदी यता आउँदा केही भन्नुभएन ?&#039;&#039;दिदीले नै सबैलाई सम्हाल्नुभएको थियो ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;सबै विपत टरिसक्यो । सबैको सल्लाहले नै दिदी यहाँ आउनुभएको हो ।थाहा छ रोहिणीको विवाह हँदैछ । डा. आकाशसँग, तपाईंले चिन्नुभएको छैन ।डा. आकाश बस्न्यात । हामीसँगै पढेका हुन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले अत्तिँदै भने, &#039;को आकाश बस्न्यातको करा गरेकी ? कतै बाबु-आमा अमेरिकामा भएको आकाशको त कुरा गरेकी होइनौ :&#039;&lt;br /&gt;
“ला कसरी चिन्नुभयो तपाईंले ? हो, त्यही आकाश त हुन्‌ नि ! रोहिणीकोपरिवार र स्वयम्‌ रोहिणी पनि साह्रै खुसी छिन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजलै भने, &#039;शालु तिमी होसमा त छ्यौ ! आकाशको क्रा तिमीलाईथाहा नै रहेनछ क्यार, आकाश मैरौ कान्छी फफको भान्जा हुन्‌ । उनी कसरीरोहिणीसँग विवाह गर्न सक्छन्‌ ? तिमी फझुक्कियी 1&lt;br /&gt;
&#039;फिरोज म होइन तपाईं नै झुक्किनुभयो । आकाशलाई रोहिणीका लागिप्रस्ताप राख्नै त मै हुँ। ल भन्तोस्‌ को होसमा छैन ? मैलै आकाशलाईरोहिणीको जीवनमा घटैका सबै घटना सुनाएँ । रोहिणीको बाबाले समाजकोघृणा सहन नसकेर दिदीसँग भन्तुभएछ, &#039;कान्छी हामी चारजना सुतेपछि घरमाआगौ लगाइदैक । सबैले घर जलेर मन्यौ भन्छन्‌ । हामीलाई पनि शान्तिमिल्छ ।&#039; दिदीको कुरा सुनेर म धेरै दिन बिचलित भएँ, भट्ट आकाशलाईसम्झेर आकाशको मामाघरमा पुगेँ । सबै करा जस्ताको जस्तै आकाशलाईसुनाउँदै रोएँ । आकाशले भने, &#039;शालु तिमी नरोक, म तिम्रो खुसीका लागि जेगर्न पनि तयार छु । उनलै मैरो एउटा पनि करा काटेनन्‌ । विवाह गर्ने कुरापक्का भयो । रोहिणीको डाक्टरसँग विवाह हुँ हुँदैछ भन्ने सुनेपछि रोहिणीलाईवेश्या भन्ने छिमेकीहरू शिर &#039;झकाई हिँड्छन्‌ रे । झन्‌ आकाशलाई देखेपछि केगर्लान्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
शालुको कुराले फिरोजको मुटु फुट्लाजस्तो भयो । कानमा केही वर्षअगाडिफुपूले भनेको शब्दहरू नै ओहौर-दौहोर गच्यो । आज ज्वाइँ अमेरिकाबाट&lt;br /&gt;
१२३)&lt;br /&gt;
बना&lt;br /&gt;
काठमाडौं आउँदै हुनुहुन्छ । आकाशलाई अमेरिका जाकै भनी फकाउन आउनेत होला, तर के जान मान्थे आकाश ।&lt;br /&gt;
मेरो प्रश्न थियो, &#039;किन फुपू आकाश अमेरिका नगई यहाँ बसेको ! बाबुआमासबै छोडेर ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;बाबु तिमीले शालुलाई प्रेम गरेजस्तै उनी पनि कसैलाई प्रेम गर्छन्‌ ।मलाई सबै थाहा छ । भन्न त माइजूको मायाले बसेको भन्छन्‌ तर भित्री कराअर्कै छ । उनले स्कुलमा पढ्दादेखि नै कसैलाई मन पराएका छन्‌ । उनैकोमायाले यहां बसेका हुन्‌ । सबै क्राहरू सम्झेर फिरोज पागलजस्तै भए ।&#039;&lt;br /&gt;
“म खुसीका कुराहरू गर्दैछु, तपाईं किन चुपचाप हुनुभयो ?&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले बनावढी हाँसो हाँस्दै भने, &#039;शालु म घेरै खुसी छु। घाममाबसेकोले होला टाउको पनि दुख्न लागेजस्तो छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ त्यसौ भए घरमा गएर आराम गर्नोस्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;फिरोज बोल्न पनि नसकी हाँसेजस्तो गरी शालुसँग बिदा भए । शालुअस्पतालभिव्र गइन्‌ । फिरोज वाण लागेको सिंहझैँ छटपछाउँदै फुपूको घरमापुगी । सिधै आकाशकी कोठामा पसे । कोही आएको चालपछि आकाशले तान्दैगरेको चुरोटलाई थाहा नपाउन्‌ भनेर हातले किचिमिची पारेर आत्तिँदै भने,&#039;फिरोज कतै पश्चिमबाट घाम त फल्केन ? कसरी यहाँ आयौँ : तिमीनआएको दुई-चार वर्ष नै हुन लागिसक्यो, बसन के छ खवर ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;फिरोजले आँसु झार्दै भने, हेरन पानीमाथिको ओभानो बनेको, तिमीलाईमेरो हालखबर वाहै छैन !&#039;&lt;br /&gt;
“यार, तिमी कहिल्मै आउने भए पो हालखबर थाहा हुन्छ । तिमी इन्जिनियरबन्यौ रे भन्नेचाहिँ सुनेको हुँ । मेरो खुसीको कुरा सुन्छौ भने म बिवाह गर्दैछु ।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले आँखा ओभानो पार्दै भने, &#039;आक्राश, यो के गज्यौ तिमीले ? केगन्यौ ? तिमी डाक्टर मान्छेले चुरोट पिउन थाल्यौँ ? हेर, अहिलेसम्म केहीबिग्रिएको छैन । तिमी शालुसँग विवाह गर । तर यसरी जीवत बर्बाद नगर ।शालु तिम्ै निम्ति जन्मेकी हुन्‌ । शालुलाई तिमीजस्तै आदर्श पति चाहिन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&amp;quot;मार तिमी किन यहाँ आयौ भनेको त त्यो पोक्चीको पो कुरा गर्न आएको ?त्यस्ता सयौं पोक्चीलाई म औंलामा नचाउन सक्छु बुझ्यौ !?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;कुरो र कुलो त जता लगे पनि जान्छ तर तिम्रो आँखाको भाबलाई म केसंज्ञा दिकै र चुरोट पिउनुको रहस्य म के बुझौं ? तिमीले सयौँ शालुहरूभेट्वाउँथ्यौ भने रोहिणीसँग किन विबाह गर्न लाग्यौ ?&#039; आकाशले चुरोट किच्रिमिच्ीपारी कागजमा राख्दै भने, &#039;तिमी पत्रकार हौ कि क्या हो, तिमीलाई सबै कुराभन्नुपर्ने ।&#039;&lt;br /&gt;
१२४&lt;br /&gt;
&#039;तिमीलै भन या नभन मैले सबै कुरा बुझिसके । तिमी शालुको पीडा देख्नसक्दैनौ । शालु रोहिणीको पीरले चिन्तित भएको देखेपछि तिमीले रोहिणीसंगविवाह गर्ने कुरा स्वीकार गथ्यौ । यही नै साँचो हो आकाश, यही नै साँचो हो ।तिमी र शालु पढेको स्कुल एउटै हो, फपू भन्नुहुन्थ्यो तिमीले महारागञ्जमानाम निकालेका थियौ रे, त्यहाँ किन नपढेको तिमी ? शालुका लागि तिमीलेधेरै त्याग गरेका छौ । त्यतिमात्र होइन, सम्पूर्ण आफन्त छोड्यौ । यहाँसम्म किआफूनी मायालु आमासम्मलाई छोड्यौ । तिम्री आमाले त आकाश यहीँ बस्छन्‌भने म पनि यहीँ बस्छु भन्नुभएको थियौ रे ।&#039; यी पनि &#039;फुटो हुन्‌ त ?&#039;&lt;br /&gt;
“चुप लाग फिरोज, अतीत कोट्याएर बलेको आगोमा घ्यू नथप । जोडीभगवानले नै बनाएर पठाउँछन्‌ रे । नत्र तिम्रो भेट कसरी शालुसँग हुन्थ्यो ?तिमी त सयौंको बाहुमा झूलेको मान्छे । शालुलाई देखेपछि किन मोहितभयौ : डृक्स युवतीहरूले तिमीलाई तान्त सकेनन्‌ किन ? माइजू भन्नुहुन्थ्यो-भान्जाबाबु फिरोजले त जुनी नै फेत्यो । प्रेममा त्यौ तागत हुँदोरहेछ ढुङ्गालाईनै देउता बनाउँदोरहेछ । दाजु-भाउजूले फिरोजलाई मूर्दा साबित गर्नुभएकोधियो । भन्नुहुन्थ्यो- मैयाँ फिरोज बरु मरिदिए हुन्थ्यो । कहिले त विष दिएरआफू पनि विष सेवन गरौं जस्तो लाग्छ । त्यस्तो अवस्थामा पुगेका तिमीलेशालुलाई पाउनका लागि जुन कष्ट उठायौ त्यो कष्ट म नाथेचाहि उठाउनसकिदिनथैँ ? शालुलाई तिम्रो प्रेमको विश्बास थिएन । तिमीले विश्वासको दियोबाल्यौ । उनी मेरौ प्रेममा बिश्बास गर्थिन्‌ । मैले उनलाई विश्वास दिलाउनसकिनँ । शालु तिमी पाउँदा कति खुसी छिन्‌ । उनको ओठको त्यो 044 छिनिभने मेरो प्रेमको के अर्थ ? प्रेममा समर्पण हुन्छ । तिमी शालुलाई प्रेमगर्छौ र यहाँसम्म आयौ । तिमीले सोच्यौ मैलेभन्दा बढ्ता प्रेम आक्राशलेगर्छन्‌ । तिम्रौ प्रेममा एक कण मात्र स्वार्थ भएको भए पनि तिमी यहाँआउँदैनथ्यौ । तिमीले सोच्यौ म आँसु पिएर पनि शालुको खुसी हेर्छु । मैले पनित्यही सोचेँ- शालु हाँसुन्‌ । तिमी आफैँ भन शालुले वास्तविकता थाहा पाइन्‌भने के गर्तिन्‌ ?&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले रुँदै भने, &#039;आकाश तिमी त्यसको चिन्ता नै नगर, म शालुलाईनराम्रोसँग तोडिदिन्छु । जसले गर्दा मप्रति घुणा जन्मिन्छ र उनी निर्धक्कहाँस्छिन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;त्यसौ भए म तिमीलाई रुवाऔँ ? के चाहिने-नचाहिने कुरा गर्छौ तिमी ?हेर, जब मैले रोहिणीलाई बिवाह गर्छ भने उनी यत्ति खुसी भइन्‌ कि के वर्णनगरौं । लाग्यो म उनको खुसीका लागि भए पनि काम लागें । फेरि शालुलेरोहिणीको विवाह मसँग गराउन खोज्नुको कारण उनलाई थाहा छ, रोहिणीआकाशलाई खुसी राख्न सक्छिन्‌ । मैले शालुले के भन्दिरहिछिन्‌ भनेर नेपालमेडिकल कलेजमा पढ्दा अन्नाको प्रसंशा गरेको थिएँ । उनले सम्झाएकीथिइन्‌- आकाश, जिन्दगी भनेको धेरै लामो छ । जै काम गर्दाखेरि पनि बडो&lt;br /&gt;
वर&lt;br /&gt;
हौस्‌ पुच्याएर गर्नुपर्छ । म तिम्रो ओठमा सधैं हाँसो देख्न चाहन्छु । उनले ज्यादैखिन्न भएर भनेकी थिइन्‌ । आज रोहिणीको कुरा गर्दा उती भन्थिन्‌- आकाशम धेरै सोचेर यहाँ आएकी हँ । मलाई तिम्रो पनि पीर थियौ । यो स्वार्थीदुनियाँमा तिमीले कस्ती केटी पाउँछौ भन्ने । रोहिणीलाई तिर्मीले चिनेकै छौ ।तिमीहरू दुबैको जीवन हाँसीखुसीमा बित्छ । मैले तिम्रो खुसी हेर्न नचाहेकोभए तिमीले अन्नाको कुरा गर्दा किन मौन हुन्थें र ! म मनमनै भगवानसँगप्राथना गर्थे- &#039;भगवान्‌ आकाशलाई अन्नाको मोहिनी आँखाबाट टाढा राख । मआकाश टुटेको हेर्न सक्दिनँ । आज म खुसी छु रोहिणीजस्ती निष्पाप मनभएकी केटी पायौ । तिमीहरूको जीवन सधैँसधैँ हराभरा हुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
फिरोजले सुस्केरा हाल्दै भने, &#039;त्यसो भए किन चुरोट पिउँछौँ ? तिमीलेचुरोट पिएको देखे शालु कै खुसी होलिन्‌ त ?&#039;&lt;br /&gt;
छोडछ फिरोज, के गरौं, कसो गरौं लागेर मात्र चुरोट पिएको हँ । फिरोजतिमीले जीवनभर शालुलाई मैले प्रेम गर्थे भन्ने कुरा बिर्सेर पनि नबाताउ है! तिमीले जस्तै मैले पनि शालुको फौटोहरूको आर्ट गरेको छु । तिमीले आजैलग । विवाहपछि हामी लगतै अमेरिका जान्छौं होला । तिमीले बेला-बेलामातिमीहरूको हालखबर वताइरहनु है । फिरोज अर्को जन्म भए म अर्को जन्ममाचाहिँ शालु तिम्रो हुन दिन्न नि!&lt;br /&gt;
फिरोजले बर्रै आँस्‌ &#039;झारे । आकाशको पनि आँखा रसायो । दुवैका ओठहरूकेहीबेर मौन रहे । फिरोजकी फुपू रमा कोठाभित्र पस्दै भनिन्‌, &#039;ओहो ! कुनबेला आएको तिमी, भर्खरै दाइले फोन गर्नुभएको थियो बधाई छ तिमीलाई ?&#039;&lt;br /&gt;
कैको बचाई फुपू ?&#039;&lt;br /&gt;
केको हुनु तिम्रै विवाह नि, कान्छीले हेराइजुराइ गरी मङ्सिर एक्काईस गतेलगन राम्रो छ भन्न आएकी थिइन्‌ रे । दाइले खुसी हुँदै भन्नुहुन्थ्यो- फिरोज तशालुलाई अझ दुई तीन बर्ष कर्नुपर्छ भन्थे । कान्छीको क्रालै हामी घैरै खुसीभयौं । बेलुका आफान्तहरूलाई तिम्रो विवाह हुने खुसीयालीमा सातो पार्टी दिनेरे। फुपूको कुराले फिरोज न खुसीले हाँस्न सकै न रुन नै।&lt;br /&gt;
आकाशले हाँस्दै भने, &#039;ल यार बधाई छ । तिमी मभन्दा दुई दिनअगाडिहुलाहा हने भयौ ।&#039;&lt;br /&gt;
रमा ( फुपु ) ले भनिन्‌, &#039;हामी त आकाशलाई देखेर छक्क पस्यौं । अघिल्लोदिनसम्म भन्दै हुनुहुन्थ्यो अब अमेरिका जान्छु । विवाह नै गर्दिनँ । भोलिपल्टशालु आएर के-कै भनेर सम्झाइन्‌, विवाह गर्न राजी भइहाल्नुभयो । म अचम्मैपर्छु किन सबैजना शालुको कुराको कदर गर्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
माइजू, शालु सबैको भलाड्गका लागि कुरा गर्छिन्‌ । त्यसैले सबैजना उनलाईमन पराउँछन्‌ । फिरोजतिर फर्किदै- जाक फिरोज तिम्रो घरमा सबैजना तिमो&lt;br /&gt;
१२६]&lt;br /&gt;
प्रतीक्षामा होलान्‌ । रमाले पनि आकाशको कुरामा नै समर्थन गरिन्‌ । आकाशलेहाँसे गरी भने- अर्को जन्ममा चाहिँ चिटिङ चल्दैन नि !&lt;br /&gt;
फिरोज बोल्नै सकेनन्‌ । फुपू र आकाशसँग बिदा भएर फिरोज घर गए ।घरको उल्लासमय वातावरणले पनि फिरोजलाई त्यति तान्न सकेन । फिरोजगएपछि आकाश धेरैबेर रोए ।&lt;br /&gt;
दीपक र उर्मिला सबै वास्तविकतासँग अनविज्ञ नै थिए । कान्छीले फिरोजकोघर विवाहको कुरा लिएर जानुअगाडि सबै कुरा भनिन्‌- फिरोजको घर जानदीपक र उर्मिलालाई अनुरोध गरिन्‌ । दीपक र उर्मिलाले खुसी हुँदै भने-हामीले त केवल जन्म मात्र दिएका हौं । जन्म दिनेभन्दा कर्म दिने नै ठूलोहुन्छ । शालु र सुजतका लागि तिमीले जे भने, जे गरै पनि हामीलाई मञ्जुरछ । हामीले मसान बनाइसकेको घरलाई तिमीले स्वर्गमा परिणत गन्यौ ।त्यतिमात्र होइन, हामी लोग्ने-स्वास्तीको सम्बन्ध दुटिसकेको थियौ । तिमीलेजोडिदियौ । तिमीले नै हामीलाई जिन्दगीको सही अर्घ बुझायौ । मायाको अर्थबुझायौ । तिमीले गर्दा तै आज हामी समाजको अगाड्धि शिर ठाद्घो गरेर हिँड्नसक्ने भएका छौँ । सम्पूर्ण अधिकार तिम्रै हो भनी पुनः शिर झकाए । सुजनकलेजबाट आएर कान्छीलाई अङ्गालो मार्दै भने- को हिँड्न सम्ने भयो ममी,पापा?&lt;br /&gt;
कसको हुन्थ्यो हामीले आफन्तै क्रा गरेका हौं । शालुको विवाह यही मङ्सिर२१ गते हुँदैछ ।&lt;br /&gt;
&#039;फिरोज दाइ भनिरहेको वानी, अब कसरी भिनाजु भन्ने होला, मलाई तलाजै लाग्छ भन्या । आज एघार गते भइसक्यो । दिदी आजै जाँ सुटको अर्डरगर्न । मलाई सुट छान्न आउँदैन । तपाईंले नै सुट छानिदिनुहोला । सौरब रसौजन्यले हिजो भन्दै थिए । हामीलाई हजुरबुबाले रोहिणी दिदीको विवाहकालागि भनेर सुट सिलाइदिइसक्नु भयो । म पनि उनीहरूको कलरसँग म्याचिङहुने कलरकै सुट लाउँछु ।&#039;&lt;br /&gt;
“हुन्छ बाबा हन्छ, पहिला खाजा त खाइस्यो त्यसपछि हामी सबै जाने ।&#039;उर्मिलातिर हेदैं 0414. मैयाँसाप र सापले पनि कपडा फेरिस्यो । चाहिनेसामानहरू फटाफट किन्न सुरु गर्नुपर्छ । नभए भ्याइँदैन ।&#039;&lt;br /&gt;
दीपकले भने, &#039;ठीकै भन्यौ तिमीले, ल उर्मी तयार होक । कान्छी तिमी पत्तितयार होक, आज सुजनले आफैँ झिकेर खाजा खान्छन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
&amp;quot;प्लिज पापा मलाई दिदीको मुख नहेरी नास्ता खायो भने नास्ता खाएकोजस्तो लाग्दैन । बरु म छिटोछिटो खान्छु ।&#039; सुजनको कुराले दीपक र उमिलादुवै हाँसे । कान्छी र सुजन भान्सातिर लागे ।&lt;br /&gt;
विर्छ।&lt;br /&gt;
पच्चीस&lt;br /&gt;
“आन्टी, नमस्कार, उहाँ प्रशन्त अंकलको आमा हनुहुन्छ ।&#039; भनी गोकललेपरिचय गराएर काम छ भनी प्रशन्नको घरबाट निस्के ।&lt;br /&gt;
प्रशन्नकी श्रीमती वर्षाले गोकुलको नमस्कार फर्काएर प्रशन्नकी आमाप्रमिलाको खुट्टा ढोगिन्‌ । प्रमलाले सौभाग्य रहनू भन्ने आशिष दिँदै भनिन,“रोहिणी बाबा, तिमी त मैले कल्पत्ता गरेको भन्दा पनि सुन्दरी रहिछ्यौ । प्रशन्नकहाँ गए त ?&#039;&lt;br /&gt;
वर्षा आफूलाई रोहिणी नामले सम्बोधन गरेको सुनेर केही आश्चार्य पारित्‌र भनिन्‌, &amp;quot;बुटवलमा ठूलो होटल बन्दैछ । उहाँलाई त्यो होटलको नक्साबनाउने जिम्मा दिएको हुनाले होटल बनाउने ठाउँ निरीक्षण गर्न जानु भएकोछ । एक-दुई दिनपछि फर्किनुहुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
“बाबा ! विवाहमा मलाई किन नबोलाएको त ? गोकुलले अंकलले विवाहगर्नुभयो भन्न गएपछि हामफाल्दै आएकी ।&#039;&lt;br /&gt;
“वर्षा प्रमिलाको कुराले छक्क परिरहेकी थिइन्‌ । वर्षा ठूलौ खान्दानमाहुर्किन्‌, बढिन्‌ । बैँस उनलाई पनि चढ्यो । तर वर्षातको खहरेझैँ उर्लिचन्‌उनी । वर्षा मायालु, दयालु र सुन्दरी थिइन्‌ । प्रशन्न धन, दौलत र वर्षाकोमायामा छलाङ मारिरहेको थियो । क आफूलाई संसारकै भाग्यमानी पतिसम्फझन्ध्यो । वर्षा पनि प्रशन्तलाई आदर्श पतिको रूपमा सम्झिन्थिन्‌ । त्यसैलेअस्ट्रेलियाबाट वर्षालाई भिसा आइसक्दा पनि प्रशन्नको मायाले अस्ट्रेलियागएकी थिइनन्‌ । प्रशन्तलाई पनि अस्ट्रेलिया लैजाने प्रोसेस चलिरहेको थियो ।प्रमिलाको क्राले भने वर्षा केही अल्मलिरहेकी थिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
प्रमिलाले हाँस्दै भनिन्‌, &#039;रोहिणी बाबा, किन मौन रहेकी अब तिमीलाईनलिई गाउँ जाँदै जान्त । गाउँलेहरू तिमीलाई हेर्न ज्यादै उत्सुक छन्‌ । थाहाछ । तिमीलाई ? मैले तिम्रो नाममा एउटा भैंसी र दुईवटा बाख्खा पेवा पालिदिएकीथिएं । पहिलो बैतमै एउटा बाखीले तीनवटा पाठापाठी पायो । अर्कोले दुईवटापाठा पायो । गोठभरि तिम्रो पेवाका पाठापाठी छन्‌ । भैंसीले पनि बिहान-बेलुका गरेर झन्डै एक पाथी दूध दिन्छ । पहिला-पहिला त घ्यू, क्राउनीपठाएका सामानहरू पर्काउँथ्यौ, चिठी पनि लेख्ब्यौ । धेरै भयो तिमीले चिठीपनि नपठाएकी, पछिल्लो पालाको क्यान फर्काइनौ । विवाहमा पनि चोलाइनौ ।कतै मसंग रिसाएकी त छैनौ ?&#039;&lt;br /&gt;
१३८&lt;br /&gt;
प्रमिलाको क्राले वर्षालाई भाउन्न होलाजस्तै भयौ । वर्षाले मनमनै सोचिन्‌ ।को रहिछिन्‌ घ्यू कुराउनी खाने रोहिणी, आफू रोहिणी नै भएर वास्तविकताबुझनुपस्यो । वर्षाले हाँसेफै गरी भनिन्‌, &#039;हेनोस्‌ आमा, हतारमा विवाह गरियो,हजुरलाई बोलाउने भन्दाभन्दै बोलाउनै पाइएन । अब क्यानहरू हामीसँगैजाँदा लैजाउँला हुन्न र ?&#039;&lt;br /&gt;
“मैले साक्षात लक्ष्मी बुहारी भनौँ या छोरी भनौं तिमीलाई पाएपछि नाथैक्यानको त चिन्ता छैन तर यहाँ मिल्किएको भाँडो गाउँमा काम लाग्छ भनेरमात्रै हो । लाक यो क्राउनी सम्धी-सम्धिनीका लागि, योचाहिँ तिम्रो र बाबुकोलागि । झोला खोलेर कपडाको पोको फुकाउँदै भनिन्‌, &#039;ल हेर बाबा मैले तिम्रैपेवाको खसी, बाखा बेचेर सुनको दुईबटा चुरा बनाइदिएकी छु । तिमीलेपद्धाइदिएको चुराकौ साइजमै छ यो। आफ म लगाइदिन्छु । वर्षाको हातमागिन्‌ ।&lt;br /&gt;
बर्षलि हात्त दिइन्‌ । बर्षाको हातमा त्यौ चुरा साह्रै ठूलो देखिएपछि रिसाउँदैवाणालाई गाली गरिन्‌, &#039;त्यो च्याङ्ग्रे मोराले त मैले दिएको नापमा चुरी नैबनाएनछ । पखोस्‌ त्यसलाई गाउँ गएपछि मार हपाछु र अर्को चुरीको तज्याला नदिई बनाउँछ । बाबा ! त्यो चुरा फुकाल फेरि हराउला । गाउँ गएपछित्यही बज्याले तिम्रो नापमा चुरा वनाउँछ । नानु, यो कोठाहरूको बहाल कतितिर्नुपछ नि ?&#039;&lt;br /&gt;
“आमा यो हाम्रो आफनै घर हो । हजुरलाई भोक लाग्यो होला के-केबनाकँ ?&#039;&lt;br /&gt;
“रोहिणी बाबा, तिमीलाई देखेपछि भोक, प्यास, वकाई सवै हट्यो । नानु,प्रशन्न पढेर आएको पाँच-छ महिनामै यत्रो घर कसरी बन्यो त? बाबुतभन्व्यो- रोहिणीको बाबुआमाले मलाई पढाउनका लागि पैसा नपुगेर घरकोकारसमेत बेचिदिनुभयो । फेरि यति ठूलो महल कहाँबाट आयो ? कतै तिमीलेबाबुआमाको साझौपनको फाइदा धैरै त उठाइनौँ ? अर्काको छोराको विश्वासगरेर त्यत्रो इन्जिनियर हो कि क्या हो पढाइदितुभयो फेरि उहाँहरूलाई नङ्ग्याएरयौ घर पनि माग्यौ ? रोहिणी, तिमी यति कठोर छयौ भन्नै मलाई पटक्कैलागेको थिएन । मलाई सम्धी-सम्धिनासँग भैटाइदेक म उहाँहरूलाई साफगाली गर्छु । प्रशन्न अलि लाल्ची छ भन्ने त मलाई बाहा भएकै हो तर तिमीपनि कम रहिनछयौँ । अन तिमी रिसाए रिसाक खुसाए खुसाक यौ घरको एकगैडा अन्न पनि नखाई घर फर्किन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
मायालु बर्षालाई सबै कुरा सपनाजस्तै लाग्यो । सोचिन्‌- बाबुबिनाकोपर्द,&lt;br /&gt;
गरिब गाउँले कसरी त्यत्रो पैसा खर्च गरी इन्जिनियर बने होला भनेको त कुरायति गहिरो पो रहेछ । यो चुरा रोहिणीको नापकै चुरा हो । आमालाई पनिनबोलाई हतारहतार विवाह गर्नुको रहस्य त यस्तो पो रहेछ । भगवान्‌ अब मकसरी बाचौं ? रोहिणी भन्नेको हृदयमा कति चोट परेको होला । मभन्दा अर्कोघानी र राम्री पायो भने प्रशन्नले मलाई पनि छोड्छ । म बर्बाद भएँ भन्नैसम्झेर वर्षालाई सहिनसक्नु भयो । उनी एक तमासकी भइन्‌ । आँसु तप्पतप्पगालाको बाटो हँदै कथामा &#039;झन्यो ।&lt;br /&gt;
प्रमिलाले वर्षातिर हेन सम्झाइन्‌, &#039;बावा, नरोक, तिमी अलि काँची नैरहिछौँ । मैते त यति मात्र भन्न खोजेकी हुँ, औँला दिँदा डुडुल्नो नै निल्नुहँदैन ।कतै घर माग्न प्रशन्नले नै दबाब त दिएनन्‌ ? उसको शरीरमा मेरो मात्रहोइन उसको बाबुको पनि रगत छ । पढेर आएको यति छोटो समयमा यत्रोदरबारजस्तौ घर बनाउने पैसा कमाए त प्रशन्नले ?&#039;&lt;br /&gt;
वर्षाले आँसु पुछुदै भनिन्‌, &#039;आमा तपाईं मेरो माइतीको पीर नगर्नोस्‌ ।उहाँहरूले दितत सक्ने भएरै यत्रो घर दाइजोमा दिनुभएको हो । दाइ अस्ट्रेलियामाहुनुहुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
तिमीहरू दुई बहिनीमात्र होइन र ? फेरि दाइ कहाँबाट आए ?&#039;&lt;br /&gt;
वर्षाको मुटु ढुक्क भयो । उनले कुरा बनाइहालिन्‌, &#039;हामी दुईवटी छोरीभएकोले एउटा धर्मदाइ बनाएका थियौँ, उहाँले नै हाम्रो सहयोग गर्नुहुन्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
प्रमिलाले गहभरि आँसु पार्दै भनिन्‌, &#039;यो जमात्तामा पनि सहयोग गर्नेतिमीजस्तै अर्को मान्छे तिम्रो धर्मदाइको पनि जन्म भएको रहेछ, खुसी लाग्यो ।रोहिणी वाबा ! तिमीलाई देख्ने पनि साह्रो रहर थियो । तिमीलाई देख्दा साक्षातदेवीलाई देखेजस्तै भयो । तिमीले प्रशन्नलाई त जीवनदान दियौँदियौ मलाईपनि जीबनदान दियौ । तिमीले पठाइदिएको पैसाले त ठूलै काम गप्यो ।धनवीरे साहुले त्यत्रो जग्गा पचाउन खोजेको थियो । ब्याजको स्याजसम्मलिएर बलैले जग्गा छोड्यौ । घरमा नातिनी त छँदैछे एउटा टुहुरो कुमालकोछोरोलाई पनि पालेकी छ्‌ । तिम्रो पेवा बाखापाठाहरूले बाली खाएर बिगारगन्यौ भने गाउँलेहरू भन्छन्‌- यो रोहिणीको भैँसी बाख्राले त अचाक्ली गत्यो ।कोही गाउँलेहरू त तिम्रो नाममा बाखा पाल्न तैजान्छन्‌ । तिम्रो नामकोबाख्राले पाठापाठी पाएपछि पाठापाठी बेचेर आएको पैसा आधा टक्रक्क दिन्छन्‌ ।कोही त मलाई रोहिणीकी आमा भनेर पनि बोलाउँछन्‌ । सबैको ओठमा तिम्रैनाम छ । काठमाडौँका केटा-केटी राम्रा हुँदैनन्‌ भन्थे, तिमीले त सिङ्गै काठमाडौंकोलाज राख्यौ । तिमीले विवाहबारे थाहा नदिँदा भने साह्दै मन रोयो ।&#039;&lt;br /&gt;
१३०)&lt;br /&gt;
प्रमिलाको क्राले वर्षाको आँखाबाट एकनास आँस्‌ बग्यो । के भन्ने कै नभन्नेसोच्नै सक्किनन्‌ र पनि भनिन्‌, &#039;आमा ! अब चिन्ता नै नगर्नौस्‌ । मलाई पनि तपाईँकोअभाबमा बिवाह गर्न मन नै थिएन । अपर्झट बिवाह गर्न परेर मात्र हो ।&#039;&lt;br /&gt;
“मैले त तिमीलाई चिनेकै छु । गाउँलेहरूले भन्ने ठाउँ पाए । भन्थे मेरीबुहारी साक्षात लक्ष्मी हो भन्थेक खोई विवाह जस्तोमा पनि बौलाएनन्‌ । खैरछोड सानातिना कुरा, सत्यचाहिँ म मेरी अपमान सहन सक्छु तिम्रो अपमानसहन सक्दिनँ । गाउँलेले तिमीले पठाइदिएको जस्तै ग्यास्टिकको वैद्य औषधिलेराइदिनु भनेका छन्‌ । त्यौ औषधि खाएपछि, मलाई छाती पोल्न धेरै कमभयो । फेरि म गाउँमा हिलो-धूलोसँग खेल्नेलाई अनाहकमा पैसा खर्च गरीगरीमहँगो-महंगौ सारी किन पठाएकी ? मैले ती सारीहरू केही त छोरीलाई दिएँ,केही तिम्रै लागि राखिदिएकी थिएँ त्यो पनि लेराइदिएकी छु । लाङ&#039; भन्दैवर्षाको हातमा सारी वमाउँदै भनिन्‌, &#039;यसको सट्टा मलाई दुई-चार सुतीकोधोती किनिदेक ।&#039;&lt;br /&gt;
वर्षाले आँखा ओभानो पार्दै भनिन्‌, &#039;हुन्छ आमा म हजुरले जे-जे भन्नुहुन्छत्यही किनिदिन्छु । सम्धी-सम्धिनी भेट गर्नुपर्यो । म ममीड्याडीलाई हजुरआउनुभएको क्रा वताउँछु ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;हुन्छ बाबा हुन्छ, मलाई पनि त उहाँहरूलाई भेदनै साह्ै रहर छ । मैलेतिमीलाई धेरै अलमलाएँ । झोलामा आँपको अचार, सिलाम, भागो, चुक, घ्यूछ, सबै राख । वसमा कच्याङकचुङ के-कै खाइयो । मुख सुकेको छ एकगिलास तातोपानी देक अनि चिया खाउँला ।&#039;&lt;br /&gt;
वर्षा झोला बोकेर भान्सातिर लागिन्‌ । उनी आफूलाई सम्हाल्त नसकीछद्पटाउन थालिन्‌ । प्रमिलालाई पानी, चिया दिएपछि आफनो बाबुआमालाईछोटकरीमा सबै कुरा बताइन्‌ । बर्षाको कुरा सुनेर वर्षाको बाबुआमा पनिछांगाबाट खसेजस्तै भए । आफ्नी सुशील र मायालु छोरीमाथि परेको बज्जलेवर्षाका आमाबानुलाई मर्माहत पात्यो नै । वर्षाले भनेझैँ रोहिणीकै बाबुआमाबनेर सम्घीभेट गर्नुपर्ने हुँदा कम कस्टकर परिस्थिति थिएन । सम्पन्न व्यक्तिहरूभएको हुँदा झरिझुट्ट सम्धिनी भेट गर्नपर्तै सामान किनेर वर्षाको घरमा आए ।बाजेले मन्त्र पढेर सम्धी भेट गराए । सम्धिनी भेटमा दिएको सामान लिँदैप्रमिलाले भनिन्‌, &#039;हजुरहरूले पहिल्यै परिपूर्ण पारिसकेपछि फेरि आज धेरैसामान दिई दुःख किन गर्नुपत्यो ?&#039;&lt;br /&gt;
वर्षाकी आमा बबिता त केही बोल्न सकिनन्‌ । जितेन्द्रले भने “धेरै केहीगरेका छैनौँ&#039; भनी कुरा टार्न खोजै । प्रमिलाले हात जोडेर भनिन्‌, &#039;यदि रोहिणी&lt;br /&gt;
(१३१&lt;br /&gt;
वाबा नजन्मिदिएको भए हामी उहिल्यै मेजँ होला । हजुरहरू जस्तो बाबुआमापनि यो संसारमा हुँदारहेछन्‌ । हजुरहरूले प्रशन्तलाई पढाउन आफ्नो जायजेथाबेचेपछि यो घर नदिनुपर्ने थियो । त्यत्रो पढेर आएपछि प्रशन्नले नै दुईजनालाईखान पुग्ने पैसा कमाइहाल्छन्‌ होला नि ! खोई त रेप्मा नानी आउनुभएन ?उहाँको लागि पनि केही सम्पत्ति राखिदिनुभएको भए हुन्थ्यो ।&#039;&lt;br /&gt;
“हजुरले पीर नगर्नुहोला, रेष्माका लागि पनि हामीले सबै राखिदिएका छौँ ।&#039;&lt;br /&gt;
“यहाँबाट कति टाढा छ र घोबीघाट बोलाउनुभए हुन्थ्यो । अहिले त आइन्‌पनि होला ।&#039;&lt;br /&gt;
त्यसो भए रोहिणीको घर घोबीघाट पो रहेछ । वास्तविक कुरा के रहेछवुझनैपन्यो भनी रेष्मालाई लिन जान्छु भनी निस्कैका जितेन्द्र घोबीघाट पुगे ।कहाँ सोध्नु, कसलाई सौध्ने, कै भनेर सोध्ने अन्योलमा परेर एउटा किरानापसलनिरै उभिइरहेका थिए । फेरि झमक्क साँझ पनि परिसकेको थियो ।उनले झट्ट आफनो अफिसमा सँगै काम गरैको रिटायर अधिकृतलाई सम्झीउनको नाम सोध्दै त्यौ घरमै पुगै । घरमा विवाहको धुमधाम तयारी भइरहेकोथियो । जितेन्द्रलाई देख्नेवित्तिकै केशवले बडो स्वागत साध बैठकमा लग्दै भने,&#039;हजुर आज यहाँ कताबाट पाल्नुभयो ?”&lt;br /&gt;
जितेन्द्रले भने, हेर्नोस्‌, तपाईँलाई के ढाँदनु ? हामी कसैको जालमा परेछौँ ।मेरी छोरीको जिन्दगी एउटा डाकाले बर्बाद गन्यो । आज केटाको आमाआएपछि पो सबै कुरा थाहा पायौँ । त्यौ डाकाले पहिला नै विवाह गरेको थियोचा प्रेममाव गरैको थियो त्योचाहिँ बुझून सकिएन ।&#039;&lt;br /&gt;
केशवले लामो सुस्केरा हाल्दै भने, &#039;ममात्र फसेछ्ठु भनेको त हजुर पनिफस्नुभएछ । यो संसार नै चौरी र फटाइँ गर्नेहरूका लागि बनेको हौ ।हामीजस्ता सीधासाधाका लागि त यहाँ बाँच्नसम्म मुस्किल छ । सीधा-साधालाईभगवान्‌ले कतै न कतैबाट पारचाहिँ लगाउँदारहैँछन्‌ । तपाईंकी छोरीलाई पनिपार लगाउलान्‌ । गाँठी कुरा नवुझीकनै म भावनामा पो बगेँ । भन्नोस्‌ हजुर,उसले विवाह गरेर छौडिदियो कि क्या हो !&#039;&lt;br /&gt;
&#039;विवाह गरेरै छोडिसकेको त होइन तर उसको नियति राम्रो छैन रहेछ ।उसको आमाको भनाइअनुसार उसले मेरो छोरीसँग रूप र धनको लोभमाविवाह गरेको हुनुपर्छ ।&#039;&lt;br /&gt;
&#039;विवाह नहुनु भइसकेपछि हामी छोरीहरूको बाबुले जे पनि त सहतुपर्छ नि! तत्र यो समाज यही हौ, समाजका मान्छेहरू यही हुन्‌ । घाउ कोट्याइकोट्याईं&lt;br /&gt;
१३२३&lt;br /&gt;
नुन-खौसांनी दल्न पछि नपर्दारहेछन्‌ मान्छेहरू । हेर्नोस्‌, मैले एउटा पापिप्टलाईभुइँबाट उठाएर आकाशमा पुग्याइदिएँ । छोरी रोहिणीले पनि उनलाई त्यत्तिकैविश्वास गरिन्‌ । हामी सबैले विश्वासकैँ भरमा घरको जायजेथा यहाँसम्मकीघरको कारसम्म बेचेर आकिटेक इन्जिनियर पढायौँ । त्यतिमात्र होइन, उसकोआमाको क्राण चुक्ता गरिदियौँ । त्यो निचले मेरी छौरीलाई धोका दियो ।समाजले त मेरी छोरीलाई वेश्या नै सावित गरे ।&#039;&lt;br /&gt;
छोरीको साथीले गर्दा पाउन त त्योभन्दा लाखौँ गुना असल केटा पायौं ।यदि अहिलेको केटाले विवाह नगरेको भए मेरी छोरी जिन्दगीभर कुमारीवस्नुपर््यौ । सायद यो समाजले उसलाई बाँच्न पनि दिन्थेन होला । खान नपाईबसमा बैहोस भएको कङ्गालले शिखर छोएपछि आफू उभिएको धरातल नैबिर्सियो । समयको अगाडि घुँडा टेक्नबाहेक हामीले केही गर्न सकेनौं ।&#039;&lt;br /&gt;
केशवको कुराले जितेन्द्र टोलाइरहे । जितेन्द्रले बुझे, ओहो ! यो रोहिणीभन्ने त केशवकै छोरी पो रहिछिन्‌ । अब के गरौं ? केशवको खाटा लागिसकेकोघाउ उक्काउनुभन्दा थाहा नपाएझैँ गरी जानु नै वेश हुन्छ। तर एउटाकुराचाहिँ सोध्छु नै । जितेन्द्रले उफ ! गर्दै भने, &#039;कसरी बसमा बेहोस भएछन्‌ ?कसरी तपाईंहरूले उसमाथि ठूलो बिश्वास गर्नुभयो त ?&#039;&lt;br /&gt;
&#039;भनिहालैँ नि जितेन्द्रजी, प्रशन्न गरिबको छोरा रहेछ । पढ्नमा चाहिँहोनहार नै रहेछ । आमाले अलिआलि भएको सम्पत्ति वैचेर बन्धकी राखेरछोरालाई पढाइछिन्‌ । घरबाट केही पठाउन नसकेपछि त्यो स्वार्थी भौकै परेछर वसमै बेहोस भएछ । बसमा भएकाहरू सबै छारेरोगी भनेर भागैछन्‌, मेरीछोरीले उनलाई हस्पिटल पुन्याएर उपचार गराइछिन्‌ । आमा-छोरी भएरउसको खाने-वस्ने व्यवस्था पनि मिलाएछन्‌ । भेटघाट गर्दागर्दै उनीहरूको प्रेमपरेछ । मेरी छोरी साइन्समा बाइलोजी लिएर पढेकी मान्छे । दुईजनालाई पढ्नपैसा लगानी गर्ने सकिँदैन भनी बुझेर आफू जानीजानी फेल भइछन्‌ । कारणउनले प्रशन्तलाई इन्जिनियर बनाउन चाहेकी रहिछिन्‌ । उसलाई इन्जिनियरपढाएर हामीले सम्पत्ति स्वाहा गच्यौँ । इन्जिनियर पढेर आएपछि त क सिय्रोबाटहात्तीमा परिणत भयो । विवाहका लागि आमा लिन जान्छु भतेर बिबाह पोगरेछ । हामी भने क हरायो भनेर कति तडपियौँ । बिचरी रोहिणी त बेहोस नैभइन्‌ । अरू भनैको भए त ठीकै थियो । त्यो पापीका लागि बैंस बेगेद बस्नेमेरी छोरीलाई वेश्या संज्ञा दियो त्यसले । ठीकै छ, त्यसको भलो होस्‌ । मेरीछोरीमा छलकपट थिएन, त्यसैले उसले त्यो पापीभन्दा कयौं गुना असल डा.पति पाइन्‌ ।&#039;&lt;br /&gt;
१३३!&lt;br /&gt;
सबै कुरा बुझेपछि जितेन्द्र केशवसंग विदा भएर घर आई श्रीमती रछोरीलाई सबै कुरा बताए । वर्षाले आफू प्रशन्नजस्तो स्वार्धीसँग नवस्ने निर्णयगरिन्‌ । वर्षाको आमाबाबुले पति प्रशन्तलाई थाहा नै नदिई कालिमाटीको घरबैचिदिने र वर्षालाई अस्ट्रेलिया पठाउने निर्णय गरे । जितेन्द्रले गर्दा नै होटेलकोनक्सा बनाउने काम साथीहरूद्वारा दिलाएको हुँदा जितेन्द्रले साथीहरूलाईलगाई हप्ता-दस दिनका लागि प्रशन्नलाई बुटवलतिर काममा व्यस्त गर्नुभने । अस्ट्रेलियाबाट भिसा आइसकेको हुँदा टिकटको मात्र क्रा थियो । जितेन्द्रलेअस्ट्रेलिया पठाउन टिकट लिए । प्रमिलालाई वास्तविकता भनी मन दुखाउनचाहेनन्‌ । अझै प्रशन्न दस-बाह्र दिन नआउने भनिदिए । प्रमिलाले आफूयतिखेर बुहारीकै मुख हेर्न आएको बताइन्‌ । आफू नहुँदा घरमा डामाडोलहुन्छु भनी खुसीसाथ घर गइन्‌ । वर्षाको बाबुआमाले सबै सोधपुछ गरी उनलेल्याएको सुनको चुरीको हिसाव गरी रोहिणीकै नाममा गाउँमा एक टुका खैतकिन्नु भनी केही हजार दिएर पठाए । प्रमिलाले पैसा लिन साफ इन्कारचाहिँगरेकी थिइन्‌ । धेरै सम्झाएपछि प्रमिलाले पैसा लिइन्‌ र जाने बैलामा भनिन्‌,&amp;quot;चाँडै घर आउनू, यौ पैसाले तिम्रै नाममा खैतको गरा किनिदिन्छु । त्यही धानकुटेर चामल पठाइदिन्छु ।&#039;&lt;br /&gt;
प्रमिलाको सरल हृदय देखेर वर्षालगायत वर्षाको आमाबाबुको पनि परेलीरुझयो । प्रमिला पनि बुहारीसँग छुट्टिनुपर्दाको पीरले रुँदैरुँदै घर गइन्‌ । वर्षालगायतवर्षाको बाबुआमालाई पनि उनलाई पनि छल गर्नुपर्दा त नरमाइलै लाग्यो ।कुनै सानोतिनो गल्ती गरेको भए त वर्षाको बाबुआमा र वर्षाले नै माफ दिन्यैतर, प्रशन्नको अपराध माफी दिन लायक सम्झेतत्‌ उनीहरूले । वर्षालाईअस्ट्रेलियातर्फ उडाए । कालिमाटीको घर बैची वर्षाकै नाममा पैसा बैंकमाराखिदिए । भविष्यको मीठो सपना बुनेको प्रशन्त जब आफनी मायालुलाईभेद्न कालिमाटी पुग्यो त्यहाँ सबैको नौलो अनुहार देखेर चित खायो । घरबेचेको थाहा पाएपछि ससुराली पुग्यो । जितेन्द्रले वर्षाले दिएको डिभोर्सकोकागज दिँदै भने, &#039;बाबु प्रशन्न लाङ तिमीलाई दिन हामीसँग यो चिर्कटोबाहेककेही छैत ।&#039; कागाज हेरेर प्रशन्न चिच्यायो, &#039;यो के हो ? यो सब कै हो?&amp;quot;&lt;br /&gt;
वर्षाकी आमा त देखै परिनन्‌ । जितेन्द्रले आँसु झार्दै भने, “यौ तिम्रो पापकोसज्ञाय हो । सत्यलाई कहिलेसम्म छुपाउँछस्‌ तँ ? तैँले मेरी छोरीको विश्वासर रोहिणीकै विश्वासमा गला घोटिस्‌ । तँलाई मैले सोधेकै थिएँ । कसैलाई प्रेमगर्छस्‌ कि गर्दैनस्‌ भनेर तैँले महाझूट बोलिछस्‌ । जाक्न त जेलमा जागनुपर्नैहो तँलाई तर चुपचाप गइहाल । नत्र राम्रो हुनेछैन ।&#039;&lt;br /&gt;
१३&lt;br /&gt;
प्रशन्नले बोल्ने कुनै ठाउँ नै थिएन । क चुपचाप रन्थनिंदै वर्षाको माइतीबाटनिस्क्यो । रोहिणी र वर्षा दुवैको आँखा सम्झयो । दुवैको आँखामा रत्तिभर पापथिएन । दुवैको मन गंगाजस्तै पवित्र थियो । प्रशन्न सडकको पेटीमा बसेरधेरैबेर वर्षा र रोहिणीकँ मायाले रोयो । स्वार्थले गर्दा आफू घर न घाटकोभएको सम्झयो । त्यही रात नाइटमा घर गयौं । घरमा आमालगायत सबैछिमेकीहरूले रोहिणी खोई भनेर सोधे ? प्रशन्नको अनुहार देखेर सबैले रोहिणीमरेकै अनुमान गरे । प्रमिलाले कैयौँ दिन रोएर बिताइन्‌ । प्रशन्न आफूले गरेकोपापले भित्रभित्रै जल्दै गयो । रोहिणीको टाडी खेत, रोहिणीको बाखा, रोहिणीकोभैँसी हेरेर प्रमिलाले मन बुझाउन बाध्य भइन्‌ । प्रशन्न सहर पस्न सकन ।गाउँकै स्कूलमा मास्टरी जागिर खायो । गाउँकै केटी बिवाह गच्यौ तर जतिसमयले फेरो मारे पनि रोहिणी र वर्षा उसको आँखाबाट कहिल्यै ओझेल हुनसकेनन्‌ । कहिल्यै ..&lt;br /&gt;
छब्बीस&lt;br /&gt;
फिरोज र शालुको विव्राह भएलगत्तै आकाश र रोहिणीको बिवाह पनिभयो । विवाहको केही समयपछि नै आकाश र रोहिणी अमेरिका गए । फिरोजर शालुले फ्रान्स जान भिसा पाए पनि रमण र गंगा र कान्छी दिदीले विदेशजान जरुरत नभएको बताएपछि उनीहरू खुसीखुसी नै नेपालमा बस्ने निर्णयगरे । शालु र फिरोजको जीवनमा र रोहिणी र आकाशको जीवनमा कहिल्यैपनि सानो आँधी आएन । उनीहरू हरक्षण डालीमा लटरम्म फुलेको फूलहरूजस्तैभए । शालुले दुईटा छोरा र रोहिणीले एक छोरा एक छोरीको जन्म दिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
कान्छीदिदीको जेठो छोरा सौरभलाई दीपकले नै होटेल म्यानेजमेन्ट गर्नबाहिर पठाई पैसा लगानी गरे पनि सुजन स्टुडेन्ट भिसामा लन्डन पढ्नगएपछि उर्मिला र दीपकको त्यो वैभबलाई छोडी कान्छी केशवकै घरमाफर्किन्‌ । सबैले अनुमान गरै, कान्छी शालुको उमेरमै विवाह होस्‌ । शालुलेभाइको जिम्मेवारी बोक्न नपरोस्‌ भनी शालुको जिम्मेवारी बोक्न नै दीपककोघरमा फर्केकी थिइन्‌ । आफनो जिम्मेबारी पूरा गरैपछि उर्मिला र दीपकलेलाख बिन्ती गर्दा पनि कुपण्डोल बस्न नमानी केशवकै घरमा फर्किन्‌ । पीताम्बरार केशवले कान्छीको आगमनलाई सहर्ष स्वीकार गरे । रोमाकान्त र मोनालेटीकाथलीमा तीन कोठाको घर बनाई त्यतै सरे । रेष्माले प्रेमलाई सधैँ घुणा गरेपनि रेष्मालाई एकतर्फी मन पराउने नरेशले रेष्माको घरमै आई मागी विवाह&lt;br /&gt;
विक)&lt;br /&gt;
गरे । नरेश प्रोफेसर थिए । रूपमती डा. अन्नाले स्बास्नी भएको पाइलटसँगजानीजानी विवाह गरिन्‌ । लोग्नेले जेठी स्वास्नीसँग रात बिताएको थाहापाएपछि रिसले विष सेवन गर्दा मृत्युवरण गरिन्‌ । मोनाको वलात्कारी मालिकलेआफनो स्वास्नीको वास्तविक रूप मोनाबाट थाहा पाएपछि भित्रभित्र स्वास्नीलाईमारेको पश्चात्ताप गर्दै सारा जीवन विताए । उनले &#039;मूलको पानी र कुलकोछौरी&#039; उखानको वास्तविकता बुझे । थुपैले योगेन्द्र साहुसँग विवाह गर्न प्रस्तावल्याए पनि उसले बिवाह गर्न मानेनन्‌ ।&lt;br /&gt;
मौनाले बाबुआमा दुवै गर्दा पनि माइतीमा खुट्टा टेकिनन्‌ भने कान्छीआफनो वावु मरेपछि माइती गइन्‌ । मौसमीलै एड्सबारेमा केही भए पनिचेतना फैलाइन्‌ । आफूजस्तै पछिको बाटो नहेरी वैँसको उन्मादलाई मात्रसर्वस्व ठान्नेलाई आफनै उदाहरण दिएर केही हदसम्म सचेत गराइन्‌ । मर्नुभन्दाअगाडि शालुको सम्झना गरी बोलाए पनि शालु वीर हस्पिटल पुग्दा उनीमरिसकेकी थिइन्‌ ।&lt;br /&gt;
शालु खल्लो मन गरी घर फर्किन्‌ । आँखामा भने मौसमीकै सुन्दर अनुहारनाचिरहेको थियो । शालुको निराश अनुहार देखेर फिरोज पेन्टिङ गर्ने सबैसामान लिएर आई शालुतिर हेर्दै भने, &#039;शालु तिमी यही पोजमा बस । तिमीउदास हुँदाको तिम्रो तस्विर मैले बनाएकै छैन ।&#039; गंगा र रमणले पनि फिरोजकोकुराको समर्थन गर्दै भने, &#039;हो बाबु, हाम्री शालु उदास हुँदा पनि राम्रै देखिनेरहिछन्‌, उनी उदास हुँदाको फोटो उतारेरै छोड ।&#039;&lt;br /&gt;
सबैको क्रा सुनेर शालु फिस्स हाँसिन्‌ । सँगसँगै रमण र गंगा तथा फिरोजर शालुका छोराहरू सुलभ र संयोग पनि हाँसे । हा...हा...हा... ।&lt;br /&gt;
अस्तु ।&lt;br /&gt;
१३६&lt;br /&gt;
परिचय&lt;br /&gt;
नाम : “ ललिता &#039;दोषी&lt;br /&gt;
जन्म : २०२५।०७।१६, इमाडोल, ललितपुर&lt;br /&gt;
घर : लु, अ. गुल्मी, अर्ज&lt;br /&gt;
शिक्षा : एम.ए.&lt;br /&gt;
प्रकाशित कृति:&lt;br /&gt;
- प्रेमको परिभाषा (कथासंग्रह) २०५६- भत्किएका किनारा (कथासंग्रह) २०५७- बुद्ध रोएझै लाग्छ (कवितासंग्रह) २०५८- दुखेको घाउ (कथासंग्रह) २०६०- मानिस नै देवता (बालकथासंग्रह) २०६३- नीलकमल (बालउपन्यास) २०६४- डुन्द्रैनी (बालकविता) २०६५पुरस्कार, सम्मानः&lt;br /&gt;
-. भानुमोती पुरस्कार २०५९- महेन्द्र प्रकृति संरक्षण कोष पुरस्कार २०६२-. गुञ्जन नव प्रतिभा पुरस्कार २०६२- मानचित्र सम्मान २०६३- आमा सम्मान २०६५&lt;br /&gt;
...सरल र बगेको शैलीले गर्दा अनि कथावस्तुको राम्रो विकासका कारणउपन्यास लोकप्रिय बन्ने आशा गर्न सकिन्छ । यो उपन्यासको कथा अत्यन्तरोचक हुनाले यसमा एक सफल फिल्म वा टेलिफिल्म पनि बन्न सक्छ भन्नेमलाई विश्वास छ ।&lt;br /&gt;
डा: धुवचन्द्र गौतम&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=Main_Page&amp;diff=59</id>
		<title>Main Page</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=Main_Page&amp;diff=59"/>
		<updated>2024-06-09T11:16:09Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: /* Step 2: Title and heading corrections */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;strong&amp;gt;Welcome to Nepali Kitab Editing Team.&amp;lt;/strong&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
This website is a sub-website of nepalikitab.org. Here we convert old books into Unicode text format. It is a collective effort by volunteers around the world. If you are also interested, please join the team.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
We keep here the books generated after scanning and extracting texts with OCR. It contains many errors. Our goal is to remove the errors.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==How to edit==&lt;br /&gt;
[[File:Editor-timeline.png|thumb]]&lt;br /&gt;
1. Make an account or log in.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2. Select the book of your interest.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. Click edit&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
4. Edit and clean up the errors and book format. If you are familiar with wiki syntax, you can edit the source too.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
5. Save time to time while editing&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
For details about formatting text, refer to: https://www.mediawiki.org/wiki/Help:Formatting&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 1:  Scan and OCR ==&lt;br /&gt;
*[[रामायण]] भानुभक्त आचार्य&lt;br /&gt;
* [[उन्माद]] ललिता_दोषी&lt;br /&gt;
* [[घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे]] भूपी_शेरचन&lt;br /&gt;
* [[लेखनाथका प्रमुख कविता]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[गलबन्दी (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[नोकरी (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[९७ साल]] आनन्ददेव भट्ट&lt;br /&gt;
* [[तरुण तपसी (नव्यकाव्य)]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[नेपालको नक्सा (राजनीतिक तथा प्रशासनिक)]] नेपाल सरकार&lt;br /&gt;
* [[आदिकवि भानुभक्त (पटकथा)]] यादब खरेल&lt;br /&gt;
* [[इतिश्री (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[स्वाध्ययन सामग्रीः घरमा नै गर्न सकिने सिकाइ क्रियाकलापहरू (कक्षा ५)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[रूखको रूप]] रिन्छेन्ला लामा&lt;br /&gt;
* [[केही धार्मिक तथा साँस्कृतिक सम्पदाहरू (केही नमुना कलाकृतिहरू)]] सत्यमोहन जोशी&lt;br /&gt;
* [[रमाइला गाउँखाने कथा]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[दसैँ, पिङ र हात्ती (बालकथा-सङ्ग्रह)]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[८० दिनमा विश्‍व भ्रमण]] जुल्स वर्न,गोरखबहादुर सिंह&lt;br /&gt;
* [[बालभाका - १ (बालकविता सङ्ग्रह)]] उद्धवप्रसाद प्याकुरेल&lt;br /&gt;
* [[ताल (उपन्यास)]] यासुनारी कावाबाता&lt;br /&gt;
* [[चतुरेको चर्तिकला (कथा सङ्ग्रह)]] गोरखबहादुर सिंह&lt;br /&gt;
* [[ठूलो फुल (A Big Egg)]] Roma Pradhan, Shanta Das Manandhar&lt;br /&gt;
* [[आखिरमा टोम्मीको टोलीले जिती छाड्यो]] क्रिस्टिन स्टोन,शान्तदास मानन्धर&lt;br /&gt;
* [[शिक्षक निर्देशिका मेरो सामाजिक अध्ययन तथा सिर्जनात्मक कला कक्षा ५ (पुरानो संस्करण)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[जय भुँडी (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[मुकुन्द इन्दिरा (नाटक)]] बालकृष्ण सम&lt;br /&gt;
* [[खाल्डामा परेको भकुन्डो]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[जे छोए पनि सुन]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[खानामा पाइने पोषणहरू]] नताशा भिजकारा&lt;br /&gt;
* [[अन्तिम निम्तो]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[सूगवा]] रोशनी चौधरी&lt;br /&gt;
* [[भीमसेन थापा (ऐतिहासिक खण्डकाव्य)]] सिद्धिचरण श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[ऋतुविचार (खण्‍डकाव्य)]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[अनिवार्य नेपाली (१०६) - माध्यमिक शिक्षा परिक्षाको प्रश्न तथा उत्तरकुञ्जिका २०७४]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[छन्दका १०१ कविता]] (सङ्कलन) कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[गणित प्राविधिक शब्दकोश]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[उज्यालोको खोजीमा (उपन्यास)]] हरिहर खनाल&lt;br /&gt;
* [[सपनाको देशमा]] चन्द्रकान्त आचार्य&lt;br /&gt;
* [[महिला लक्षित शिक्षक सेवा आयोग तयारी अध्ययन सामग्री]] विष्णुप्रसाद अधिकारी&lt;br /&gt;
* [[शिक्षक पेसागत विकास तालिम (तालिम पाठ्यक्रम)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[हाम्रा लोकबाजाहरू (बालबोध - ५१)]] रामप्रसाद कँडेल&lt;br /&gt;
* [[पर्दा, समय र मान्छेहरू (कथासङ्‍ग्रह)]] झमक घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[काउकुती (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[विदुर नीति Vidura Niti [Sanskrit-English]]] (Extracted From) Mahabharata [महाभारत]&lt;br /&gt;
* [[जंगबहादुरको बेलाइती कापी]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[कति वटा रोटी]] शिल्पी प्रधान&lt;br /&gt;
* [[विश्वका प्रमुख सभ्यता तथा संस्कृति (बाल ज्ञानकोश - ३)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अस्माकम् संस्कृतम् - कक्षा १]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[प्रारम्भिक संस्कृत व्याकरण र रचना]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[गोरक्ष-साह-वंश (ऐतिहासिकं महाकाव्यम्)]] हरिप्रसाद शर्मा&lt;br /&gt;
* [[२०२ ओटा ठट्टा]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[धुमधामको घुमघाम (भक्तप्रसाद भ्यागुताको नेपालयात्रा)]] कनकमणि दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[महिलाका लागि डाक्टर नभएमा]] -&lt;br /&gt;
* [[दस औतार (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[A Perfect Match]] Ramendra Kumar&lt;br /&gt;
* [[मधुपर्क (वर्ष ४७, अंक ४, २०७१ भदौ)]] -&lt;br /&gt;
* [[सौगात (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[एक घर एक रोजगार (प्रयागदत्त तेवारीको कृषिकथा)]] मिलन बगाले&lt;br /&gt;
* [[रवीन्द्रनाथका नाटकहरू]] -&lt;br /&gt;
* [[पेसा, व्यवसाय र प्रविधि]] -&lt;br /&gt;
* [[मामा माइजु]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[म को हुँ]] पेमा डोल्मा लामा&lt;br /&gt;
* [[चनाचटपटे (बालकविता-सङ्ग्रह)]] बूँद राना&lt;br /&gt;
* [[आवाज (सामाजिक उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[स्पष्टीकरण (कथासङ्ग्रह)]] हरिभक्त कटुवाल&lt;br /&gt;
* [[स्वास्थ्य, जनसङ्ख्या तथा वातावरण शिक्षा स्वाध्ययन सामग्री (२०६७)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[दशैँको दक्षिणा (बालउपन्यास)]] गङ्गा पौडेल&lt;br /&gt;
* [[चार आर्य-सत्य (बुद्ध-शिक्षाका चार स्तम्भ)]] दोलेन्द्ररत्न शाक्य&lt;br /&gt;
* [[विजय चालिसेका बालकथाहरू]] विजय चालिसे&lt;br /&gt;
* [[सिर्जनशील विद्यालय]] अर्जुन श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[अभिभावकको सहयोगमा बालबालिकालाई घरमा नै गराउन सकिने सिकाइ क्रियाकलापहरू (कक्षा १)]] -&lt;br /&gt;
* [[दर्शन परिचय (विश्वका दर्शन र कला साहित्यिक बादहरू)]] परशुराम कोइराला&lt;br /&gt;
* [[खोज (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[अनिवार्य सामाजिक अध्ययन (१२३) - माध्यमिक शिक्षा परिक्षाको प्रश्न तथा उत्तरकुञ्जिका २०७५]] -&lt;br /&gt;
* [[बिहानीको घामसँग]] तारा पुन, शान्तदास मानन्धर&lt;br /&gt;
* [[एकादेशमा (बालकथाहरूको सँगालो)]] उषा दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[इतिहासका विम्बहरू]] पूर्णचन्द्र घिमिरे, रमेशचन्द्र घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[पन्ध्रौं योजना (२०७६७७-२०८०८१)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[नेपालको शाह तथा राणा वंशावली]] विष्णु प्रसाद श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[Aaloo-Maaloo-Kaaloo]] Vinita Krishna&lt;br /&gt;
* [[परित्याग (उपन्यास)]] माधव खनाल&lt;br /&gt;
* [[अमेरिका (उपन्यास)]] गंगा लिगल&lt;br /&gt;
* [[उखान मिलेन !]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[राष्ट्रकवि माधव घिमिरे (जीवनी, व्यक्तित्व र कृतित्वको सङ्‍क्षिप्त रेखाङ्‍कन)]] शैलेन्दुप्रकाश नेपाल&lt;br /&gt;
* [[केहि गुणकारी बोटबिरूवाहरू (बालबोध - ४१)]] डा. हरिप्रसाद&lt;br /&gt;
* [[दिवास्वप्न]] गिजुभाई, शरच्चन्द्र वस्ती&lt;br /&gt;
* [[संस्कृत, प्राकृत र नेपालीका सन्धिनियम]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[शिक्षाका ती दिन]] पुष्पराज पौडेल&lt;br /&gt;
* [[मपाईं (निबन्ध)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[Autobiography of a YOGI]] Paramhansa Yogananda&lt;br /&gt;
* [[ताराबाजी लै! लै!!]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[विश्वास (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[Akbar and Birbal Moral Stories]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[बुद्धवादका तीन आयाम]] पशुपति घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[करेसाबारीका जडिबुटीहरू]] केदार श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[काठमाडौं उपत्यका खुलास्थलहरू सम्बन्धी मानचित्र पुस्तक २०७१]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अन्ताक्षरी खेल]] ध्रुव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[साइबर बालकथा]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[कलेजी थाल]] ध्रुव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[कत्ति धुनु गधाहरूलाई (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] लक्ष्मण गाम्नागे&lt;br /&gt;
* [[गौरी (शोककाव्य)]] माधव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[आमाको माया]] रमेश चन्द्र अधिकारी&lt;br /&gt;
* [[Natural Treasures of Nepal]] Nepal Tourism Board&lt;br /&gt;
* [[नारीस्वर (महाकवि देवकोटा विशेष) - २०६६ असोज]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[चार गजलकारका उत्कृष्ट गजल (गजलसङ्ग्रह)]] मनु ब्राजाकी&lt;br /&gt;
* [[स्यालको जुक्ती]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[स्थानीय पाठ्यक्रम विकास तथा कार्यान्वयन मार्गदर्शन (मातृभाषा सहित) २०७६]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[बाँदर बन्ने रहर (बालकथा सङ्ग्रह)]] गोपीकृष्ण ढुङ्गाना&lt;br /&gt;
* [[डाढो (हास्यव्यङ्ग्यहरू)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[मध्यचन्द्रिका (नेपाली भाषाको मझौला व्याकरण)]] सोमनाथ शर्मा&lt;br /&gt;
* [[नेपाली क्रान्ति-कथा]] फणीश्वरनाथ रेणु&lt;br /&gt;
* [[डायना (महाकाव्य)]] शैलेन्दुप्रकाश नेपाल&lt;br /&gt;
* [[शङ्खे र फट्याङ्ग्रो]] अनन्तप्रसाद वाग्ले&lt;br /&gt;
* [[मोहिनीले खोसेको अमृतकलश]] अमर निराकार राई&lt;br /&gt;
* [[हिन्दू-धर्म के हो]] महात्मा गाँधी&lt;br /&gt;
* [[बालबालिकामा पढ्ने बानीको विकास]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[The Last Page of My Poem (मेरो कविताको अन्तिम पृष्ठ)]] Rajeshwor Karki&lt;br /&gt;
* [[जय भोलि !]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[संस्कृत व्याकरणको रूपरेखा]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[घरबारी बगैंचा]] बोल बहादुर थापा&lt;br /&gt;
* [[नबिर्सने यात्रा (यात्रा-कथा)]] समीर नेपाल&lt;br /&gt;
* [[समाज परिवर्तनमा संस्कृतिकर्मी]] विजय सुब्बा&lt;br /&gt;
* [[मेवालाल (बालकथा सङ्ग्रह)]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[A Helping Hand]] Payal Dhar&lt;br /&gt;
* [[आमा (कविता सङ्ग्रह)]] भक्ति दाहाल &#039;विष्फोट&#039;&lt;br /&gt;
* [[विज्ञान तथा वातावरण - कक्षा ८ (पुरानो संस्करण)]] गोपीचन्द्र पौडेल&lt;br /&gt;
* [[चप्पल]] अर्हन्त श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[मात्राहरू]] हरिहर लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[दोस्रो भाषाको रूपमा नेपाली भाषा]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अब्राहम लिंकन (१८०९-१८६५)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[घरभेटी भाउजू (कथासङ्ग्रह)]] कृष्णादेवी शर्मा&lt;br /&gt;
* [[Agreeing and Disagreeing - English Grade 10]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[शकुन्तला नाटक]] शम्भुप्रसाद ढुंग्याल&lt;br /&gt;
* [[Chunu and Munu Read]] Shanta Das Manandhar, Stephanie Wei&lt;br /&gt;
* [[अब खेल खेल्ने!]] शिल्पी प्रधान&lt;br /&gt;
* [[जनावरहरूको सभा]] ज्ञाननिष्ठ ज्ञवाली&lt;br /&gt;
* [[विश्वप्रसिद्ध पैंतिस साहित्यकार]] प्रभात सापकोटा&lt;br /&gt;
* [[कसिङ्गर (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[पंचतन्त्र कथासंग्रह]] &lt;br /&gt;
* [[अक्षर (बालकथा)]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 2: Title and heading corrections ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 2&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 3: Text correction ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 3&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
==Step 4: Proof reading==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 4&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[अनौठो फल]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==Step 5: Finished books==&lt;br /&gt;
पुरा भएका किताब&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 5&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=Category:Step_2&amp;diff=58</id>
		<title>Category:Step 2</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=Category:Step_2&amp;diff=58"/>
		<updated>2024-06-09T11:15:17Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: Created page with &amp;quot;Title and heading correction completed books&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;Title and heading correction completed books&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%9C%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%AC%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%AC%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%87%E0%A4%A4_%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE&amp;diff=57</id>
		<title>जंगबहादुरको बेलाइत यात्रा</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=%E0%A4%9C%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%AC%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%AC%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%87%E0%A4%A4_%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE&amp;diff=57"/>
		<updated>2024-06-09T11:14:39Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;Source book: https://nepalikitab.org/kamal-mani-dixit-jungbahadur-ko-belyat-yatra/&lt;br /&gt;
==पुस्तक परिचय==&lt;br /&gt;
जंगबहादुरको बेलायत यात्रा&lt;br /&gt;
प्रकाशकः मदन पुरस्कार पुस्तकालय नेपाल। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जंगबहादुरकोबेलाइत यात्री&lt;br /&gt;
संपादन र भूमिका : कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रकाशक-मदन पुरस्कार पुस्तकोलय,&lt;br /&gt;
श्रोदरबार पुनचोक,&lt;br /&gt;
नेपाल&lt;br /&gt;
२०१४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुद्रकः--पशु्पति छापाखाना &lt;br /&gt;
फ्रसिकेव, काठमाडौं |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वाधिकार सुरक्षित&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पिपहिलो पटक१०० थान मात्र &lt;br /&gt;
मोल १।२०&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== ‍‍भूमिका ==&lt;br /&gt;
नेपाली भाषामा श्रमण वृत्तान्त लेखिएकै थिएन भन्ने घारणाख्राई त चिरञ्जीवी पौड्यालको “आफ्नु कथा छे काटिदिसकेकोछ) तर समुद्रपरिको बयान पनि हाम्रो भाषामा लेखिएको छ भन्नेहामीलाई थाहा थिएन । ऐले, सय वर्षे अघिको युरोपको बर्णनपढ्न पाउँदा यस विषयमा हामी ञअ&amp;amp;्‌ भारतीय अभ -षाहरूभन्दापत्ति अघि रहेछौं भन्ने छाग्दछ ।प्राइम मिनिष्टर जङ्गबहादुर राजदूतको हैसियतले महाराजा-घिराज,मुरेन्द्रको खलितापत्र लिएर भिबटोरिया महारानीलाईभेट्न, बेशाइत गएका, थिए भन्नेसम्म सवैलाई बाहाछ । यो० किताबले जङ्गबहादुरको बेलाइउ मात्राको मुख्य उद्देश्य के थियो“अन्त देखाउछ । उनी बेलाइत जाको कारण आफ्नै आँखालेहेरी अँग्रे जहरुको बलको बतता पाउनु थियो । महत्वाकांक्षी जङ्ग-बहाँबुरल्ई अँग्रेजहरू घरम,कमजोर देखिए, उनीहरुसँग टक्करलिई सुगौली-संघि काटेर राज्य बढाउने हौसला थियो होला ।बेलाउत गई हेर्दा अंग्रेजहरुको णक्ति: र बल ठलो देखे उनीहरुसँगलड्ने विचार छाडी मित्रता गर्ने उनको लश्य थियो भन्ने बुभिन्छ।छरने कुरा जे भए प्नि, अँग्रे जहरुको बल पर&#039;क्रम वारे उनीहरुलेनै भनेका र छापेका कुराले मात्र चित्त नबुझी आफैँ गई जाँचन्रफ गर्ने उनको ध्येय थियो भन्ने कुरा यो किताबको पहिल्यै पेजबाटस्पष्ट हुन्छ । लेल्लेको छु: &amp;quot;आजतक हिन्दुस्थानका मानिस्‌लन्डन्‌ बेलायत्‌ पुगी आयाको कोहि छैनन्‌, इन्का मुष जर्मान्‌अक्वारको वेहोरा सुन्दा सारा हिन्दूस्थान्‌का राज: नवाव पात्‌-साहाकी मुलुक लिदा पनि अँग्रे ज्को &#039;वस्थान अंग्रे जका वादसा-हाक। बलपराक्रम्‌ तहकित्‌ गरि चिन्ह हिन्दूयान्‌, मध्येस, पहाड,भोर, चीन कमैले सकेनन्‌ । अव श्री भगवानको कृपा भया चार घामपनि गरुला हिन्द्रस्थान्‌ वेलायत्‌ ११ तापूका पातसाहाहरूका बेहोराकार्षाना क्यारहेछ बुझुला । वेहोरा बुझी दोस्ती पनि गरुँला” यसक्रिसिमशँग, पूर्वी देशका शासकहरू कसैले विचार नगरेका दिशा-तिर जङ्गबहादुरले कूटनीतिक पाइलो, चालेका रहेछन्‌ भन्नेबुझिन्छ । अन्तर्राष्ट्रिय क्षेत्रमा नेपालको निमित्त यो तानु गौखकोकुरा होइन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जङ्गबहादुरको राजकाजी जेहेनकोभन्दा पनि उनको व्यक्ति-त्वको, रहनसहन र चालचलनको बारेमा धेरेँ कुरा हामीलाई योकितावले बताउँ दछ र साधारण इतिहासका पुस्तकमा पाइनेभन्दाभिन्नै किसिमका तर घेर महत्वपूर्ण कुराहरू जङ्गबहादुरकोविषयमा हामीलाई थाहा हुन्छ।&lt;br /&gt;
बेलाइत जाँदा जहाजमा भएका अँग्रेजहनले जङ्गबहादुरकोधारेमा गरेको कुराको जुन उल्लेख यो किताबमा भएको छ( पेज ८ ) त्यो र ध्यारिसक्रो राजनी तिक क्षेत्र-कौसलमा उनलाई&amp;quot;हाम्रा अघिका वादसाहा” ( नेपालीयन ? ) सँग दाजेर गरिएको त रिफबाट ( पेज ५४ ] उनको: व्यक्तित्व कस्तो, रहेछ भन्ने बुझ्नइतिहासकारहरुलाई मदेद हुनेछ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रेलाइतमा जङ्गबहादुरले त्यहाँको सामाजिक संसारमाएक किसिमको भेचालो नै ल्याइदिएका थिए; उनको चालढाल,रहनसंहनले उनी बेलाइतबासीका साह्रै प्यारा भएका थिए भन्नेकुरा त 5.र इतिहासका पुस्तकबाट पनि देखिन्छ, तर बेलौइतबसुन्जेलका तीन महिनासम्म जुन स्वागत जङ्गबहादुरले पाएत्यसको निरालः बन यस कितबिमा छ । यो किताबबाट अरूकुराभन्दा पनि बेलयातका आइमाईहरुको समाजमा त जङ्गबहादुरकमदेवनै ठहरिएका रहेछन्‌ भने जस्तो बुझिन्छ । स्वास्नीमानिसहरू उनीमाथि त्यसै आसक हुन्थे ( पेज ३७ ) जङ्गबहादुरउनीहखपष्दि कत्तिको आर्कषित भएका थिए त्यो यो किताबबाटखुल्दन । तर “बरू नआयाको भया हुन्थ्यो, अब जान्छौं भन्दाहामीलाई मुटुमा तीर हानेको जस्तो छाग्छ” ( पेज ३७) भन्नेमायाठु रमशीप्रति उचित भाव व्यक्त गर्ने शिष्टाचार जान्नेजङ्गबहादुर अवइरै चुकेन होलान्‌ । यता, यसरी आसक हुनेहरुमाठूलै ओइदाका आइमाई थिएक्ति भन्ने शङ्का लाग्दछ । किनभने,तल्ला खालका स्वास्तीमानिसले उनौसँग त्यसरी बोल्ने साहसगरेकै भएउनि त्यस कुरालाई यति महत्व दिएर अवश्य वर्णनगरिदैन थियोहोला ।&lt;br /&gt;
यस किताबको महत्व खालि जङ्गबहादुरको व्यक्तित्वकोबारेमा मात्र छैन । बेलाइत-बृटेनको पालियामेण्टको जो वर्णनयहाँ गरिएको छ, त्यसबाट बेलाइत गएको यो प्रतिनिधिमण्डल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(जसमा जङ्गबह। दुर पनि शामेल छन्‌, निश्चय ) कतिको प्रभावितभएको थियो भन्ने बुझ्न सकिन्छ । हुकुमी शासनंकी एकोहोरोराजकाज मात्र देखेका नेपालीहरुले त्यहाँको संसदीय &#039; प्रणालीदेख्दा एकदम आवाक्‌ भएकी रहेछन्‌ भन्ने यसको: अक्षर-अक्षेरमादेखिन्छ । जस्तो कि राजाको शाक्त सीमित भएको कुरामाआश्चर्य मानेर लेब्नेको छः “आफ्ना दर्वीरको दौलथ, म. राजाहुँ, मेरै घन हो भनी वादसाहा पनि आफुखुशी गर्न पाउदैनन्‌&amp;quot;( पेज २३ ) राजाका शक्ति &#039;छाँ।टएको त नेपालीहरुले त्यसै बखतदेखिसकेका थिए, त्यसमा ठूलो कुरो केही भएन; तर प्रागमितिष्टर त सर्बेसर्वा हुनुपर्ने, सो पनि छैन भन्ने कुरा दर्शाडदछेखेको छः “मेरो दर्जा ठुलो छ भनि प्राइम मिनिए्टले अतरीत्‌गन्या पारमेष्ट कौसलबाट सजाय हुन्छु&amp;quot; &#039; ( पेज २१ ) प्राइममिनिष्टरको अधिनायकादमा चलेका नेपालीहरुलाई त यस कुराछेआँखै खोलिदिएको थियो होला । जङ्गबहादुरले पति यो हृदयंगमगरेको हुनुपर्छ । किनभनै त्यसपछि नेपाल फर्केर आएपटिकोजङ्गबहादुरको शासन प्रणाली केही मात्रामो कंम आतंकवादीभएको, थियो भन्ने इतिंहासकारहरुछै मानेको कुरा हो । त्यो यहीसबै कुराका प्रभाव. परी भएको हुनुपर्छ ।&lt;br /&gt;
पा्लियामेण्टबाट यिनीहरू कत्तिको प्रभाबित भएका थिएभन्ने कुसलाई यो कित बमा पाखियामेण्टको कति लामो वर्णतगरिएकोछ त्यसँबाट पनि अनुमान गर्ने सकिन्छ । यो क्ितात्रमात्यति बिस्तारसाथ अछ कुनै कुराको पनि ब्यान गरिएको छैन ।सर, पाखियामेण्टको तारीफ गर्दा, एक दुइ कुरा विशेष नदुभिद्वनलेखेको जस्तो लाग्छ। लो कुरा त के भने बे्ाड्रतको पालिपा-&lt;br /&gt;
छु भन्ने गलत्त धारणा“क्तिब&amp;quot; मा यस्तो लेखेकोछ,&lt;br /&gt;
रोक म। भनेको छ । बेजाइतको चनकुनै लिखित संविधान छैन, त्यस&#039; हुँदा त्य “किताव भनेको केहोला जप्तो लाख्छ । तर त्यसै निठजिशामा एक ठाउँमा१ जिज्यूक्यत” या जीजस क्राइट्ट_ 4 पेअ ८७ |को नाम परेकोलेदुइ कुरा मिलाए: “ भन बपक्टलाई नै होकिभन्न अड्कल । त्यसो झाएमा प्जद्ढ् माभ्एको भविच्यवाणी कुन चाहि किताबको होन्टा खुल्दैन ।&lt;br /&gt;
कम एक ठाउँमा पालियामेण्टलाई &amp;quot;दिइएको छ। यसरी: “यो पाग्लमील्ट कचहघर्मेसासत्र, नीतिर्सासत्र, बुढाको चल;जैन हो&amp;quot; ( पेज २१ ) । हुन न यो कृ्ठमजस्तो देखिन्छ । किनकि एउटा संस्थालाई कर्सेलेऐन या कितिग्ब कसरी वगाउला ।&lt;br /&gt;
भन्ने संज्ञा,। कस्तो हो भन्यासिक्री दनायाको पालियामेण्टको बारेको यस्तै एक दुइ गलत धारणा बाहेकैअरू कुरामा त यो किताव छेल्ने मानिसको ठेखाइमा सूक्ष्म:निरीक्षणका अनेक नमूना पाइन्द्न्‌ । जस्तो फ्रान्स पुगेपछिको .एउटा वाक्य छ &#039;“पृथ्वीको। पीठमा कालिगढ अकखबन्द फान्सीसको.बराबर कौन मुलुवमा छैनन्‌ ( पंज ४६ ) । सय बर्षे अघि बैज्ञा-निक र कलात्मक विषयमा सबैमा चढे बढेको मुलुक फ्रान्स नैथिग्रो, हो,, तर एक फेर) नजर घुमाउँ दैम। भन्न शक्ति कुरा योहोइच--सरृक्षम टृष्टि चाहिन्छ । जस्तो लङ्ख।) टापूको बसान गर्दा,व्यहाँको इतिहासको आफूले बुझेसम्मको कुरा संक्षिउ रूपमा पेश गरिएको छ । त्यस्तै जहाज बनाउने ठाउ ( ।पंगला ? ) कोबयान गर्दा एउटा ठूलो जहाज बनाउन लाग्ने समय र ज्यामीकोहिसाब: इत्योदिको पति, उल्लेख भएको छ । अरुमा, लण्डनसहरको वर्णन, बेलाइत र फान्सका बिभिन्न क्यासलहरुको वयान,विम्वाका पार्टीको वर्णन दत्यादिमा चाख राग्दा उल्छख छन्‌ ।त्यो सबैलाई यो कितावका छेरुक वरपरका, कुरामा पनि निकैचाख राख्दा रहेछन्‌ भन्ने देखिन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
, यी लेखक रसिक पनि रहेछन्‌ । आइमाईको बयान गर्नु पर्दासबै ठाउँमा यिनीले मन फुक्राएर गरेका छन्‌ । मेडिटरेनियनसुन्दरी--माल्टाका रमणीहरू देखेदेखि यिनले गोरा छाला भएकासीमहेछ देरुनथाले । त्यसपछि, यिनी उनीहरुको चन्द्रबिम्ब जस्तोमुख, कमलपत्र जस्ता आँखा र तेलका घारा जस्तो ( लाम्चीलो ?)नाकको बयान गर्दा कैले अघाउँ देनन्‌ । बेलाइत पुगेपछि कन्‌«जो देछ्यो राम्रो, ज्या देख्यो राम्न” हुँदा इन्द्वासन या स्बग नैयहीहो कि जस्तो लागेको कुरा अति रसीलोसँग बयान गरेका:छन्‌ । सुन्दरीहरुकी यस्तो वर्णनबाट, यो किताबका लेलकलाईसंस्कृत साहित्यको ज्ञान रहेछ भन्ने लाग्दछ । यिनले जङ्गबहादुरका,/तीन भाइ अँग्रे जका सभामा जाँदा जरासन्धका समामा कृष्णअजुँ न्‌ भीससेन गए जस्तै देखियो पनि भनेका छन्‌ ( पेज २२ )त्यसबाट र बीच-बीचमा यिनले दिएका पुराणका अरू उपमाहरुबाट यिनको संस्कृततर्फ राम्रो दखरू रहेछ भन्ने कुराको पुष्टिहुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सी लेखक वकालछती पनि गर्ने जन्ने चलाखहेछन्‌ भन्ने कुरा पिनको ठेखाइको एक खासारं मामूली ढङ्गबाट निकै महत्वपूर्ण रि&lt;br /&gt;
पूर्ण कुरा&amp;quot;कुरा भनेको हौ कि होइन जस्तो परिदिनु सार ट्छौ पारखीकोकाम हो | त्यो यिनले गरेकाछन्‌ । बेलाइत गएका प्रतिन्तिधिमण्डललेआइमाईको बिषयमा आफूलाई अलि छाडा छाड्का थिए भन्नखोजेर, अनि त्यस कुरामा उनीहरुको विशेष दोष पनि थिएन“भन्ने कुरालाई उतले एउटा मात्र वाक्य लेखेर सिध्याएका छन्‌ ।म्बेलाइतका ठूला घरानाका आइमाईहरुको वर्णन गरेपछि उनलेलेखेका छन्‌ &amp;quot;तीनको छूप देषी र जोभन, भारी गहना-पोसाक,तिनका, सफाइ, मुषको श्री, देषदा दसै इद्रिय जिती रहन्यो सुकदेव-स्वामीलाई पनि मोह गराउन्या, अति सुरी, अति चंचली, तील्का&amp;quot;रूपको वर्णेन गर्ने ।सकीदैन” ( पेज २१ ) । दश इन्द्रिय जित्नेव्युकदेवजी त सस्तो ठाउँमा पुगेका भए आद्रमाईमा लट्ट हुन्थे“भने बेलाइत पुगेका प्रतिनिधि-मण्डलका अर्घीहरुलाई के भन्न“भग्न खोजेको जस्तै छ, लेखकले ! त्यसमा अझ तरुनी मीमहेरुसँग-जङ्गबहादुरले भेटेको कुराको सिलसिलामा छेखिएको हुँदा योप्याक्य अरू अर्थ पूर्ण लाग्दछ ।&lt;br /&gt;
यो किताब पढ्दा मनमा उठ्ने भाषहरुमा सबभन्दा टडकाराएउटा छ, त्यो के भने यसमा वर्णेत गरिएका सबै कुरा नेपालीआँखा हेरर नेपाली ( सय वर्ष अघिको नेपाली समाज ) को&amp;quot;निमित्त बयान गरिएका छन्‌ । नेपालमो नभएका) नदेखेका चीज-बीज देख्दा साँचै नै अचम्म लागेको कुरा नलुकाई स्पष्ट लेखेको छ। नेपालीहरुले कँल्यै नदेखेको चीज, रेल, देल्दा त्यसको करामत देख्दा जुन भाव त्यहाँ गएका नेपालीहरुको मनमा एकदमनिस्क्यो त्यसलाई त्यही छपमा कागजमा उतारेको छ: “४० कोसबाटो रेलगाडाम। चडी जाँदा ५ घडीमा पुग्याछन्‌&amp;quot; ( पेज १४) 1टूछा-ठूल। पयाबटरी, मिल, मेसिनरी नदेखेका नेपाली;फ्याक्टरीहरुमा राम्नरी काम भएको देख्दा भने होलान्‌ :काम गर्दा राम्रो पनि, बलियो ननि, चाँडो पनि हुँदो रहेछ&amp;quot;,त्यही कुरा केही तल माथि नपारी यहाँ लेखिएको छ ( पेज ३५ )।यो सबै भन्नाको मतलब के हो भने--यो किनाब लेख्ने म।निसबोबर्णनको सत्यता र इमान्दारी तारीक लायकको छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नपालीहरुको छागि लेखिएको यो किताब ( यो किन छुहालेन, विचार गन कुरा छ ) मा बुझ्दै नदुभिनेनाम दिएर चीजबीजको बगान गरिएको भए उति काम लाग्नेथिएन । यो कुरा लेखकले राम्ररी बुझेका थिए । कोड्ला नबनेनेपालीछे “पत्थरको गोल” र त्यस्तै “टाइल”&amp;quot; नबुझ्नेछे “पत्थरकोभिङ्गटी &#039; अवश्य बुझ्दथ्यो । लण्डनको कर्पोरेसनको तारीफ रसरसफाइको बेली विस्तार गरेर त्यो बेलाका नेपाडी जनतालाईबिशेष चाख लाग्ने थिएन होला, तर सल्ठी र नाल ले बेरिएकोकाठमाडौं खाल्डाका नागरिकले लण्डन सहरमा &amp;quot;नाल देख्नु कहींछैन-। हिलो धुलो नर्क कसिङ्गर देख्नु केही छैन&amp;quot; ( पेज १६]भनेको सुन्दा पक्कै प्रभावित हुँदा हुन्‌ । फेरि, वेलाइतमाविज्ञानको खुब प्रगति भएकोछ, सबै काम विज्ञानको मददबाट;हुन्छ भन्नुको . साटो,-“कमार| कमारीको चलन भएको नेपालमा आगो पानी बतास अँग्ने जल कमारो तुल्च&#039;एको छ &#039; (पेज१७)भन्नु बढ्ता अर्थपूर्ण हुन्छ । त्यस्तै पालियामेण्टलाई “कौसछ&amp;quot;“कचहरी भनी बयान गर्दा नेपाडीले केही न केही जरुर बुझ्थेहोलान्‌ । बेलाइतको राजकाजमा रती दुनियाँलाई पीर पिराउकेही हँदैन) त्यहाँ “कोतपर्व&amp;quot; सधैं मज्रिर्ँदैन भनेर लामोव्याख्या गर्नाको सारो रामराज्यको सपना देख्ने नेपाठीहहुलाई“रामराज्य तेही मुलुकमा रहेछ” ( पेज १९ ) भनेर गागरमासाएर अटाइदिने लेखकको कलमको जति तारिफ गरे पनि हुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नेपाली आँखाले हर्दा हुर्दै एक दुइ ठाउँमा भने छे:अँग्रेजी रिवाज नवमी भद्दा भूल गरेका देखिन्छ ! पर- पुरुषसँगवोल्नै नहुने नेपाली जननाको वानी परे छेवकलाई मीमहरुलेआई अफूहरुसँग बोलेको, मीठा कुख गरेको देख्दाहो न हो विनीहरू आफूहरू माथि असक परेन्‌ भवी गने झैछाग्छ । पेजर१ मा बयानमायस्तै भूल परेको जस्तो देखिन्छ । ले; “भारी गहना-बोसाक लायाका भारादारका स्वास्नी, छोरो, बृहारी सबैआउँछन्‌, श्री मिनिष्टर साहेबलाई हात्त समाति गुडमानी सलामगर्छन्‌ । सारा आंग सिर झुक्काइ बोच्छन्‌ । लोगून्याहरू बरपरलागि,बस्थ्या; स्बास्तीहरू अघिसरी षयर मिजास पुछ्न्या, गहेनाकपडा हेरी बडो षातिर गरि वोल्न्या । लौद डुक साहेनानहेरू प्निआफ्ना छोरी बुहारी राम्रा-राश्रा तस्खी-तरुणी अघि राषि इनलाई तपाइले प्रसन्द गःयौ कि गरेनौ भनि श्री सिनिष्टर साहेवलाईसोध्न्यी । दाहिन्या दाउ अघि पछि राषि दिस्या । यो लेखाइबाद&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot; पचि अझ सुब्बा सिद्धिमानमाथि नै बढ्ता श&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लाई नजर चढाउन ल्याएको जस्तो देहोईन:।, त्यसवाट यस. विषयमा लेखकस्प्रष्टे थाहा हुन्छ । तर माथि भनि सकिएको छल:&lt;br /&gt;
कुरा नेपाली आँखाले हेरेर नेपाली मनले !। उनकोदोष छैन, सय वर्ष अजिको नेप ली समाजमा हुनेको जो सुकैलेअंग्रेजहरूको त्यो रिवाज देख्दा भट्ट त्यस्छँ ठाम्द्रा हुन्‌ । त्यसले,&lt;br /&gt;
कुराको प्रामाणिकतमाभन्दा आफूले जै देख्यो, झ्ाफूलाई जस्तो&amp;quot;लाग्यो त्यही काग्रजमा उततारी दिने बी लेक्खक्रको इमान्दारीतर्फ:हामीछे वदता ध्यान दिनुपर्छ । त्यो इमान्द,री तारीफ छायकको&lt;br /&gt;
विय&lt;br /&gt;
अफसोसका कुरा छ-्यस्ता लेखकको नाग हामीलाई थाहाछैन । यो यात्राको बगान लेह्ने को हो त्यो लेखिएको छैन ।अडकल मत्र काट्न सक्न्छि । त्म्रो.के भने यो छेख्ने मानिसनिश्चय पति सबारीसाथ बेलाइत भएको ब्यक्ति हो । बेलोइतगएकागज्ये पचि अँग्रेजी पढेका : ( पहिला नेपाली ? ) ठेपटेनलाँलख्िहँ खत्री र जङ्गबहादुरका विश्वेष जिइवांसपात्र भएका(“भक्त भानुभक्त नाटक्रमा आउने ) सुब्त्रा सिद्धिमाने राज:भण्डारी, यी बुझ जनामा बेसी अनुमान लगाउन सकिन्छ । त्यसमा&lt;br /&gt;
त्यसका दुइ कारण छन्‌ । एक त लेख्नेतफेका सिद्धिमानलाई नै लगाद्वनु बढ्ता संभाव्य कुरा हो रमह्वाराजले आडर नदिईकन त्यस जमानामा कसले आफुखुशी&lt;br /&gt;
[ई) _&lt;br /&gt;
महाराजको सवारीको वर्णत लेल्न कलम समाय्रो होला भन्नमिल्दैन । दोल्रो कुरा, अँसेजी पढेनालेभन्दा संस्कृत पढेकाले नैकपछपत्र जज अखर द्व्वादि भनी आइ्णाई हो हारीफ गर्नेसक्तद्वन्‌ । फेरि अंग्रेजी पढेकः ले&lt;br /&gt;
छे बण्टा र फ्निट नभनी प्रहर रधडी भन्देनथे हो त्यस ज हेक, कुतै पनि अंग्रेजी पढेकोमानिसले लप्डनबाट ५०० कोस. गाको उल्लेखगरी ३ ] अथवा लण्डन ई २०० कोस्‌,( ४०० माइछ ) छ भनी आएनो भूयी (पेज ष४)देखाउ दैन थियोहोला ।&lt;br /&gt;
लेखक; जो भएपनि; यो पुस्तक लेखकको आफ्नै हस्ताक्षरमाहान्नो सामू आएको छैन । यो किदाप मूलकापीबाट कैले सारेकोहो भत्रे स्पट छ । पेज १५ म; र ५० मा अलरस: दोहरिएकापंक्तिउह नै गसशाई प्रम श ह्न्‌ । गो सान काम लेखक आफैंले&lt;br /&gt;
गरेहोला १. किनभने, पससद “टर “त” ये&amp;quot;शशुद्धि बाह्देक अरू धेरै छपजहरू पनि सःर्नाीको गलतीले गर्दीनबुभिने बएक छन्‌ । देजसले नै प्रतिलिपि बजाएकोमा यस्ता&lt;br /&gt;
नराम्चा मूरहद अनःयँ रहने, थिएव होलान !&lt;br /&gt;
मलकापी कतै&lt;br /&gt;
छु । त्यसको पत्ता लागेमा शायद लेखकको नामकोपनि यकीन साथ थाट्दा हुन्थ्यो । हाल पाइएको यो प्रतिलिपिचाहि श्री सङ्ग विक राखाका घरबाट प्रत भएकोहो रयोपुरानो किशिम्रको तर रुछ भएको एक्सरसाइज चुकमा पेजकोदुजपटि गरी छैखउगे छ । माथिदेजि तलसम्मंका जम्मा! ५७;पेजमा प्याराग्राफ क्त छुद्धाइएको छिन, कतै कल चार चर्का&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
-दिएर बिषय छुट्याइएका छन्‌ । विराम चिन्ह कतै पनि छैनत्‌अनावश्यक ठाउँमा: दुइ तीन लवजसम्म थोप्लोदिइएको छ । पदयोग र पद्दविच्छेदको केही ठेगान दैन त्यस्तैहस्व दीर्ध र झरू शब्द रच्तामा प्नि कुनै एकनासेपन छैन ।अक्षर सह ( उटैँबो जरता हैनन्‌ तर हेछाई पाको मसीमा बाँसकोदाँकाको जस्तो देखिम्छ ।यी त भए सरसरी हेर्दा देखा पर्ने माम्‌ली कुरा । यो कित बकोमहत्व त किताव समग्न नपढी बुझिदैन ! गहिरिएर पढ्नेले यसमाश्रेरे कुरा भेट्टा उनेछन्‌ । इतिह्वासकारलाई जङ्गबहादुरको विषयमापरेका धेरै श्रमहरू हटाउन यल्ले मदद दिनेछ, त्यो निःसन्देहभन्न सकित्छ॒ । अछ कुराभन्दा पति, जङ्गबहादुरको बेलाइतप्रोत्राले अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्रमा मानिसलाई पहिलो बाजी नेपालकोअस्तित्व मान्न कर लगायो भन्ने मान्नु पर्नेछ । नेपाल ( जोकित्यो बेछा “गोर्खा राज्य&amp;quot; भनिन्थ्यो ) भन्ने एउटा ठूलो शक्तिरहेछ भन्ने अँप्रेज जनतालाई पनि पन्यो ! यस कुराको पुष्टिजङ्गबहादुर बेलाइत पुगेपछि वहाँका प्राइम मिनिष्टरले उनलाईभैद्न आउँदा भनेका कुराबाट र उनको विदाइको बखत महारानीभिक्टोरियाले भनेका कुरा ( पेज ४२ ) बाट हुन्छ । लेखेको छ :तपाँई याहा आउनाले बढ्िया भयो । वया अर्थले भन्या हिन्दुस-थानबाट तपाई जस्ता ठूला मानिस याँहाँ कोही आयाके। छैनन्‌ ।तपाई को रवाफ देपदा यहाँक्रा छोडा उडा सबेलइ गोार्षा भन्याकोठुक्लो रह्याछ भन्या घाक्‌ पनि भयो ।” ( पेज २०-२१ ) “नेपालीमात्रले नाक फुलाउने कुरा हो यो, जसके श्रय जङ्गबहादुरलाईनैछ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(छ)&lt;br /&gt;
इतिहासकै विद्यार्थीलाईभन्दा वाहेक भषागास्त्रपट्टि चाख लिलै-लाई पति पो कितःबफो अध्ययन लाभप्रद हुनेछ । घेर कामका कुराफेला पर्नेछन्‌ । सम्बत्‌ १९१९ साल तिरको नेपाली गद्यको रूप हेनखोज्नेलाई त प्रतिनिधि ग्रन्थ नै पही हुनेछ। १० साछतिर नैंनेपाली गद्य य्रति बिक्रसित भँसकेको थियो भन्ने कुरा यो किताव -बाट जान्न पउँदा सर्वंलाई आश्चर्ग र आनन्द लाग्नेछ । गद्यमासाहित्य भर्ने सक्ने खूुवी पनि त्यो वेलामा नेपालीमा रहेछ । अक,ठेठ नेपार्छ&#039;पनको साहित्यको समेत सिर्जना गर्ने हाम्रा साहित्यिकहरुले त्यही बेलादेखि थ!।लिसकेका रहेछन्‌ । त्यस किसिमको झर्रोनेपाली प्रयोगको एउटा नमूना हो &amp;quot;तेलको घारा भै नाक&amp;quot; ।ब्याख्या व्यर्थ छ । त्यस्तो अर्को प्रयोग छ “आगो पानी वतासअँग्रे जले कमारो तुल्पाएको छ । सय वर्षअघि लेखिएको योएउटा त्यस्तो बाक्य हो जुम लेख्न सक्दा आजभोलिका लेखकलेपनि घमण्ड गरे हुन्छ । यो बाक्यमा अर्थको एउटा संसार लुकेकोछु। गद्य लेख्नमा पोख्त भएका साहित्पिक कलम नम यी जस्ताअनमोल रत्नहरू निस्कने थिएनन्‌, त्यो ठोकुबा गरेर भन्नसफिन्छ।यस किसिमको अनमोल क्रिताव पनि आजसम्म नेपालीहरुलेपड्न पाएका थिएनन्‌ &#039; त्यो दुःखको कुरा हो । तर यतिका वर्षे-सम्म लुकेर बसी ऐले भुल्केको यो रत्नको झुल्क्याइ निरर्थकहो्चन---पारखीहरुको नजर पन्यो भने !&lt;br /&gt;
नएकसल दीक्षिङ।श्री दरवार, पुल्चोक !&lt;br /&gt;
२०१४-११-२३-१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‍‍==छपाइ बारेमा==&lt;br /&gt;
यो किताबको कुनै नाम थिएन । त्यसैले यसलाई एउटा नामदिइयो--“ जङ्गबहादुरको बेलाइत यात्रा&amp;quot; । &#039;बेलाइत” को अर्थयहाँ :इङ्गल्याण्ड मात्र होइन, ( जस्तो कि अचेल छ )।जञ्चबहादुरको समयमा, शायद. जे अध थिय्रो यो शब्दकोस्यह्ी अर्थमा यो यहाँ लिइएको छ । त्यो बेला यसको के अर्थथियो भन्नलाई यो शब्दको व्युत्पत्ति खोज्नुपर्छ । “ बिलायत&amp;quot; भन्नेअरबी लबज हो । उढूमा आउँदा मसको मानै “विदेश&#039; हुन्छ ।चढ्को लुगत (कोश) मा“बिजायती “ को यत्ति अर्थ द्विइएको छः-बिदेशी, युरोपियन, ड्ङ्गलिसः पशियून, टकिस या चाइनिज ! यसबाटनेपालीमा पोर्न त्यस ताका यी सै अर्थमा &#039;बरिल्लोवत” को प्रशोगहुन्थ्यो होछा भन्न नसके पनि यति त सजीहँ संग भन्न सक्तिन्छ्नकि समद्रपारिका मुलुकहरुलाई बेलाइत भन्ने रिबाज त्यो बेलाहुनुपरछे । यस कितावमा ११ टापु बेलाइत र १९ टोपी बेलाइत भनेरशुट्टाएकोबाट पति यो कुराको पृष्टि हुन्छ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यस किताबल।ाई मृद्रित गर्दा गुरुकापी जस्तो हुबहु नगरीवाक्य, प्याराग्राफहरू ल्रुट्टाई विपयवस्तु अलग्ग छुट्टिने गरीशीर्षक र उपशीर्षक दिई पढ्न सजिलो बनाउन खोजिएको छ।विरामचिन्हको न.मै . नभएको लेख्लोट पड्न पाठकहरुलाई निर्कअसुविधा होला भनेर विरामचिन्हहरू हाल्ने साहरा गरिएको छ।तर इतिहासकार र भाषाशास्त्रीहुरुको खुक्खुहाकोअयालले बिराम&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चिन्ह इत्यादिको थपथाप बाहक भाषाको हकमा जंस्ताको-तस्तैउत्ता्ने कोशिज गरिएको छ । पद-न्यास २ पदे-बिन्यास बाहेकयसमाका अरू ह्रस्व, दीर्घ, ट र्‌ त इत्यादिको कुनै शाष्धि गरुङछैन । गन्दका हकमग रेफ छुटेका र्‌&lt;br /&gt;
हुने ठाउँका रेक शिरविन्दु।इत्था दि थपिदिइएकोछ । त्यस्तै सातकोगफलतले मात्र भएका जस्ता भ जस्तो कि. “मुजिन्छ” कासट्टा भएको “सुनिन्द, “बाहाङ को सट्टा भएको “बाहाङ&#039;&lt;br /&gt;
इत्यादिछाई सच्याइदिड्रेएको छ । अछ, नेपाली उच्चारणले वयानगरिएका अंग्रेजी नामहरू छ (उदाहरणजिपार--जिंब्राल्टर; प्रिन्‌ सालबट--प्रिन्स अरबटे ६०) र कतैजस्ताको तस्वै छाडिदिइएको छ ( झचमण्ड टेरेग्रकोरिजिबन्त ब्यारेज घर; फ्तेब्लो को फाटन पुल $० ) ।&lt;br /&gt;
जे जति गरिएको छ साधारण पाठकलाई सजीलोहोषस्‌ भनेर नै गरिएको छ । भाषाको इतिहासको खोजी गर्नेचाहनेहरुको छागि त गुस्कापी न प्क्रागकसंग सुरक्षित रहेको हुँदाकेही अपठेरो पर्दैन होला जस्तो रा:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्पादक ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==घन्यवाद‍‍==&lt;br /&gt;
श्री बालकृष्ण समज्यूलाई यस किताबमा परेको जङ्गबहादुरकोतसबीर यसमा राख्न अनुमदि दिनु भएको मा,&lt;br /&gt;
कुमारी ज्वाला समज्यूलाई उहाँले सो तस्वीरको यति राम्रोप्रतिलिपि उतारिदिनु भएको मा,&lt;br /&gt;
पशुपतिनप्रे स-्परिबारलाई यो किताबमा राम्ररी चाख लिईकाम गरिदिएको मा, र&lt;br /&gt;
श्री श्याम प्रसाद लामिछानेज्यूछ।ई प्रुफ सम्वन्धी सबै भारबोकिदिनु भएको मा&lt;br /&gt;
मुरी मुरी धन्यवाद ! ! !&lt;br /&gt;
पा्जकारजक ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जंगबहादुरको बेलोइत योत्रा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गोर्षा भन्याको ठुलो रह्याछ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्रस्थान==&lt;br /&gt;
===यालाको उद्देश्य===&lt;br /&gt;
स्वस्तिश्वी मद्वाजकुमार कुमारात्मज श्री प्राइम्मीनिष्टर याण्डकम्योडर इन चिफ जनरल जङ्गबहादुर कुवर राणाजीबाट सम्बत्‌&#039;१९०६ सालमा तजविज गर्नु भयाको अग्र ज पात्साहाको र हाम्रोसीबाना जोरियाको छ। इन्को फौज, पल्टन्‌,षजाना, हातृदृतियार:मुलुक; दौलथ, आम्दानि षरचे, थिति वन्दोबस्त क्या रहेछ पात्‌साहितषत्‌ वेलायेत्‌ काहा रहेछ, लन्डन्‌ सहर कस्तो रहेछ, ताहाका भा-:रावार दुनिजरा गेह्रको मीजाज कस्तो रहेछ, आजतक्‌ हिन्दूस्थान्‌कामानिस्‌ लन्डन्‌ बेलयेतृ पुगी आयाको कोहि छैनन्‌, इन्का मुषजमानू अकबारको बेहोरा सुन्दा सारा हिन्द्स्थानूका राजा नवाव,पात्साहाका मुलुक्‌ छीदा पनि अग्र ज्का अवस्यान अग्र जका बाद-साहका बल पराक्रम्‌ तहकीत गरि चिन्ह हिन्दूस्थान्‌, मध्येस, पाहाडभोट्रचीन, कसैछै सकेनन्‌ । अव श्रीभगवानुको कृपा भया.चार घाम .धनि गरला हिन्दुसंघानू बेलायेत्‌ ११ तापुका पातसाहाहरूका बेहोरा,कार्षाना क्या रहेछ बुझुला । बेहोरा बुझि दोस्त पनि गरूला भन्ग्रामनसुवा पनि गर्नु भयौ र आफ्ना माहिला भाई व्रीमृद्ाञ्कुमारकुमारात्मज श्री कम्यांडर इन चीर्फ जनरल बुंबहादूर कुवर रा:गाजिलाई मुल्कि कार्षाना, जँगि फौज पल्ट्नको आरा अपतीयार:गरिदिया । आफ्ना साथमा माई श्रीमद्राजकुमार कुमाराटमज थ्मैकर्णेल जगत सम्सेर जङ्ग कुवर रानाजी, श्री घीर सम्सेर जङ्गकुःवर राण:जी इ दुइ जना र बडा कपतान्‌ रणमेहेर अघिन [री&lt;br /&gt;
२]&lt;br /&gt;
कोजी करविर त्री, काजि हेमदल थापा, काजि डील्लीसिं वस्त्यात्‌लेफटेन्‌ लालसिं षत्री, लेफटेन करविर त्री, लेफटेन्‌ भिमसिं राना,सुब्वा सिधिमान्‌ राजभडारि, सुन्वा सिवनरसिं, षरिदार पृथ्वीधरपाध्या र-औ हुदा सिपाहि केटा स्मेत्‌ ज्मा जना २५ आदमीजीलीफमा ली मुलुक सयर गर्नालाई श्रीमद्राजकुमार कुमारात्मजश्री प्राइम मीनिष्टर याण्ड कम्यांडर इन चिफ जनरल जङ्ग वहाद्वरकुवर राणाजिवाट्‌ सम्बत्‌ १९०६ साल माघ मैन्हाका तारिष ४ कादिन: चिसापाशि कील्लाको वाटो गरि सवारि भै रवाना भैँ वक्सनुभयो । सिकार षेलबै प॒थरघट।का जंगलमा पुगि ४ हाति पक्रनुभयो ।२४४ वाघ र हरिन्‌हरूढेरै मानु भयो । ताहादेखि कडरबना गढिछाउनिमा प्राउला गर्नु भयो र ताहाका रैतीहरू आई सामेल भया ।सबहरूलाई षातिर गर्नु भयो । केहि रकम्‌ कलम्‌ पनि छोडी रैयतराजि राषी ताहावाट रबाना भै आफ्ना मुलुक छोडी अंग्र जकामुलुकमा ढाका भन्याको गाउमा फौज पलठन्‌ स्मेत्‌ ली छ्ाउनि डेरागरिवकसनु भयो |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===पटना र कलकत्ता===&lt;br /&gt;
तेस्तै रीतले ७ दीनमा पटना सहर कील्ला कमरेमा श्री माहीलासाहेवका हवेलीमा वास डेरा पन्यो । ताहावाट दानापुर गोला घरउत्तर तर्फका कोठीमा डेरा पन्यो । ताहाको अंग्रेज बडा साहेवहरूआई वडा षातीर गत्या । फौज पल्टन्‌ षडा गरि १९ तोपकोसलामी गग्या । सबै वनिआा मुल्कीसाहेवान्‌हरूले षुसी भै मीजात्‌गया । अव हजुर विलायत जात पाउ लाग्नुभयो, अव दुइ सर्कार-को यक चित्त दोस्त रहला भनि पल्टन्‌ दुनीनादार सुष भोग गर्नन्‌सबै कुराको बढिया होला भनि वडा षुसि भै षापिर गर्य। । अव&lt;br /&gt;
1३]&lt;br /&gt;
चाटालाई चाहीन्या मदत्‌ जो चाहीँछ फर्माउनुभया हामी ताकीनगर्छौ भनी -बीन्ती गःया । सबारिलाई घुवाव सको जाहाज र रसदचाहीन्या सराजाम्‌ तयार गरि १ कपतान पाउ रष.बारिमा घटाईदी रवाना गरिदियो । अग्निवोटमा सवारि भै सुन्दरववको बाटोगरि कलकत्ता तर्फ पाउ लाग्नुभया !&lt;br /&gt;
११ दिनमा कलकत्ता सहरका धानपाल घाट्मा उत्रनुभयो ।तेस वषतुमा कस्तो भयो भन्या कलकत्ता सहरका फौज पल्टन्‌तोपरेद्‌ षडा थीयो । बादसाहि वाजा वजाँउन लाग्याका थिय रतोपकाबढाइ हुन लाग्याको थियो । अंग्र जिका मुल्की साह्ेवान्‌, मीमसाहेव, लेदि साहेवहरू बगिका स.वारी भै आयाका थिया । सहर-बासी छोटा, वडा बिलकुल सामेल थिया ! सवा छाष आदमिकोभीड थीयो । तेसै बषत्‌मा वडा साहेवहरू आई टोप उत्तारि षातिरगया । वडा पुसिनामा भयो । अव लंडन्‌ बेलायेत पाउ लाग्नुभयापछि दुबै सर्कारको वढिया भपो । पछि परन्तुस्म्म यक चित्तरहन जाला, दोस्तमा षलवल हत्रेन। २ तका भारादार, फौज,पल्टन्‌, महाजन, दुनीदार सबै राजी रहनन्‌ । आजसम्म हिन्दुस्थान-का पातसाहा, नवाव, राजा, भारादार कसैले वेलायेतको मनसुबागन्याका थीयण । आज हजुर वडा प्रतापी अकलमन्द हुनाले वेलः-येत जानाको मनसुवा राष्नु भयो । बडो फाइदा हुन्याछ । क्याअयेंले भन्या, जस्तै महतारिका गर्भमा दस भास रहदा केहि देबि-न्दैन, जन्म भयापछि नजर घुल्दा पृथ्वी, आकास, चन्द्र, सुग्यैकोघर्म नपाउदा त्यो वालषलाई बडो आसर्य्य हुन्छ, तस्तै गरि पाउलाग्नु हुदा वाटामा समुद्रको वाहाड हुन्छ, नाना तहको जान वरदे्ीछन्‌ । समुद्रको स्वभाव बुझ्दा आफुलाई ढेरै अकल वढ्छ ।बीचमा ५।६ पातसाहाको मुलुक देषीहन्‌ ।&lt;br /&gt;
1४]&lt;br /&gt;
वेछायत पुग्यापछि वाह सीपी बेलार्यतका रजीडन्ड, भारा-दार &#039;महाजन्‌ बस्याका छन्‌ । तीनहरुसित मेट मुंलाकात हुदा त्योमुलुक देषदा ढेर फाड्दा: हुन्याछ । अव उप्रान्त हेजुरलाई जोचाहीँछ सो माफिक् फर्माउनु मया हामी ताकीती गला ।सहर-कलकत्ताभा &#039;भयाको, चिर्जेवीज नजर हु भन्या नजरगराउला; औं गढि;! कील्ला, फीज, पल्टन्‌, षर्षजाना, हातत हति-बार,-कलषर,&#039; मास, तमासा, नजर गँराउला। हंजुर जाहा पाउलाग्नुहोला : साहेवानूहरु बडो षातीर गर्नेन्‌ । वेलायत जादावाटामा चडावडा सहर छन्‌ । ताहा बडो साहावान्‌ लाठ डुक जर्गेककेर्णे बीच जगा जगाका पातसाहासिंत भेद्‌ मुलाकाट्‌ होला ।हजुरलाई १९: तोपको सलामी दिन्‌ । गढि, कील्ला, नाच, तमासाफौज, .पल्टन्‌ नजर गराउनन्‌ । जंगा जगमा जाफत गर्नेन्‌ । बडोषाक्तिर गर्नन्‌ भनिः लाठ डिपटि पारमीन्ट कौसलीया साहावानमैह्रले-बित्ती आप्या -। . डेरासम्म पु्याई डेरामा झारू वढारू गर्न्याटहकुबा-र डेहुलीमा पहरा राँषि बिदा भँगया ।&lt;br /&gt;
भोलीपल्ट अँसि गोटा षसि, &#039;१० मुरि चावल, यही भंसारच्यूरा, नुन्‌, घ्यू, तेल, बेसार, हलवाईका रोती, मोरा, अचार,दही, केराउ, षोर्साती, तमाषु, पान; सुपारि, फलफुल, मसला- जोचाहीन्या सराजामूसग भारि ज्याफत,  दीया । नेपालदेषि पाउरष्बारी गयाका रैफरु पल्टन्‌ वादसाही बाजा वजाउन्या वाज;-बाल लाजिग गँह्न, ताहा रह्याक्रा टहठुत्रा गह, हेहुडीदार वारिकामाछि ६०५० जना सबैलाई २०२५ दीनसम्म षान्या सराजामपुग्यो यादै रह्या । तादेघि र गडी रात जादा श्री प्राइम मिनिष्टरसाहेव उनैका २ भाइ पगरि गैहरई नाच तमासा हेर्दै आउनु |&lt;br /&gt;
[५1&lt;br /&gt;
भन्या लाठबाट निंमता पढठाया र्‌ पाठाउ लगतुभयो ।सबै पगरि स्मेत्‌ दर्घारमा पाउ लाग्नुभयो । ताहाका साहवानहरूतिनका मीम लेडी साहेवहरू भौरि गहना पोसाक लाई हजार बाह्लसंय बादसाहि वाजाका चालमा बैठकमा नाच तमासा गर्ने लाग्या-काँ थिया । तेस वीचमा श्री प्राइम मिनिष्टर सहि पुग्नुभयो र्‌छाठ साहेव लेडी साहेवहरूले गुडमानी घातीर गरि कुसिम] वसाईनाच तमासा देषाया । ताहा पान्पा सराजाम तयार थियोरग्लि चान वस्या र सपँले हातमा &#039;श्रापक्का प्याला लि वस्या चक-सहेव टन्परो- र कुइन वीकटुरियाकि ७ रहे, प्रिन्‌सालबट्की ० जैरहे,लाठ दिलहुसिकी ” उ.रहे, नेपालका श्री प्राइम मिनिष्टर याण्डकम्याँडर इन चिफ जनरल जङ्ग बहादुर कुवर राणाजीकी जैरहेअनि चारका नाउ प्याला उठाई सवैले षाया । भोज षादामायस्तो रीत रहेछ ।&lt;br /&gt;
ओल्िर कलमेःता सहर छाउनी, अडा, कील्ला, वाघवगैँचातलाउ, सहर, बजार, पातिका कलघर, कपडा बन्या, केप बन्या,रुपजाका ठ्क माया, पैसाका टक मार्न्या, चीटि कागजमा छापमार्न्यी कलले गया काम्‌ भीत्र बाहीर सबै अनौज काम देषाया ।ताहादेषी श्री प्राइम मिनिष्टर साहेववाट्‌ म श्री जगंनाथजीकोदसँन गर्नु जाँच्न । जगा जगा मियानाको डाक वसाई देउ भनिमर्जी भयो र वही घडी डाक्को रमाना भयो । कलकत्तादेषी ४दीतमा ठाकुरका पुरिमा पुगि दसेन गरि तित्य पुजालाई चारहजार रुपैजा अठका राषी चार दीतमा कलकत्ता दाषील हुनुभयो ।तीहादेषी २०।२२ दीन मुकाम भय्रो । जो चाहिन्या सराजामक नि निति की&lt;br /&gt;
१. शराब ( रक्सी ) 1] ३, प्रिन्स अलबर्ट ।२. (?) ४. डलहाउसी ( ?)&lt;br /&gt;
[६1]&lt;br /&gt;
असवाव . हैटन भन्या धुवा कलको जाहाजमा भर्ती गरि तेसैजाह्ाजमा सवार भै वेलायेत तर्फ पालनुभयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===जहाजमा‍‍‍===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्यो जाहाज कस्तो थियो भन्या २०० हात लामो, ४० हात्तगज, ७ हात उच्चा, हजार बाह्र सये मानिस वस्याका थिया । जिपीछ्छे पलंग, बीछ्याउना, षान्याकुरा १ दीनमा ३ वषत मे.वा पनिद्वार भात षाया सेटि, मासु, घ्यू, चिन, फलफुल ज्या इच्छा छसो पान दिँछन्‌ । जाहाजेमा वातसाहि बाजा तयार छन्‌ । अग्रेज-का मीमहरू, साहेवानूदरू नाच तमासा गर्दैन्‌ । कोही वन्दूककोतारा हाँछन्‌, कोही किताप पढदहन, कोही कीसिमा वर्सि हाढापाँछन्‌, कोहि देसदेसका कुरा कथाहा शास्त्रका कुरा की ताव हेर्छन्‌ ।बाह्न सये मानिस तेस जाहाज्मा रह्म का हनु, आफ्ना कःम गर्छन्‌,षल्यांमल्याँ कोही गर्दैनन्‌ । यक म।निस्‌ पनि वोलदैनन्‌ । घल सि-हरू कोही मर्देगान ट कछन, कोही घडीमा धन्‌, कोही जहजफर उल्या बलमा, वर्यका हन्‌, कोही दुर्वेत हेरि वस्याको छन्‌,कोही गोलव ल छ्न्‌, कोही कःन्या सराज/म तयार गर्छन्‌ । कसँछेजलका जन्तु, षसि, भेड, वोक. पत्याकलई अहःरा पतिदिंडन्‌। कोही दुहुना गाई, घोडा जाहःजका छगरमा वस्यक&#039;छन्‌ ।: वेषतम/ तीनलाई घासदाता दिंछन्‌ । कोही जालगरमा वस्य का हन्‌ । गषतमा चढ: उद्न्‌, वषतम) षस लदटन्‌ ।त्यौ जहाजमा चर तोप रह्याका छन्‌ । ती तोपम- गोलंदाज,पलासिकाठी प्रहर तहय.र रह्मको छन्‌ । वपतम तोप हान्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
१.१)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[७1&lt;br /&gt;
जहाजी डाकुका भयले डाकुसंग लडाइ गर्ने भनि ति तोष रहकाछन्‌ । आफ्ना आफ्ना काममा रुजु रह्याका छन्‌ 1 कसैले अह्वाउनुपर्दैन, आपना पालासित आजै प्रहर षडा छन्‌ । यस्ता रितले जहजचलाउदा रात दीन गरि २ सये कोस हीडदछ ।&lt;br /&gt;
यस्ता रितले हिड्दा निरालये समुद्रमा पुग्यो । डाडा, पाहाड,रूप, वृक्ष, जमीन कहि छैनन । जलमा सुर्य उदाउछन, जलमाअस्ताउछन। । जलका माछा तोरि चरा जत्रा २३ हजारका फौजगोलीका दरेससम्म उडन्या कोही माछा वल्देल जत्रा बेगालदागाल उड्दै भागन्या । &#039; बग्नल भन्प।को माछा नजिकमा देषीमेतडा कोस टाढ। तेस माछाले मुषको पानि बाहीर सास फेर्दाफल्पाको घरहरा जत्रो अछगो फोहरा छाङ्याको देषिंध्यो । त्योजाहाज चलदा पछिल्तिर होर्दी दहि मश्या जस्तो सपेत्‌ कोस भरसम्म ज हाजक; रूलक: जोरले समुद्र मथिजादा फीन उठ्न्या, हावाआउद; बड/ बडा पाहाड, जस्त: समुद्रको लहरि आउदा जाहाजकल ठाडो नैले तेह्लो हेदा कसलाई रिगटा छाग्त्या, कसैलाईबान्ता हुन्य , कसैलाई भ.त नस्चन्य, साङ्लो हाबाँ अ उद सुत्या-मा पलंगव ट षसाउन्य, थापलो ठोकीन्य: उडालन पलगका षुट्टोसमाती अउिनु पर्न्यी । हावा नलाग्दा भन्या वडा आनन्दसितकौसिम। हावा घाई समुद्रको तमासा हदै यस्ता रितले रहनुहुथ्यो ।&lt;br /&gt;
रोजक, वन्दुकक गोली दुइ तीन्‌ संगै श्री प्राइम मिनिष्टरबाद्‌समुद्रम बोतल फ.छी कैल्है समृद्रेलम; बीतल फुदाईं चादमारिगर्नु हुथ्यो । अंग्र जहरू पनि हामी बन्दुक हानाम) घुव छौ भन्या&lt;br /&gt;
१. ब्वे(?)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[वय&lt;br /&gt;
सेषि भाका जोरि आंउथ्या । कसैले सकेनन्‌ । सबैले वहुत वयानगया । ती अंग्रेज, मीम, सहिवानहरू आपसमा कुरा गयमिष्टर सहिव उमेर भन्या क्वा छ, काम भन्या नजान्याको केहीछैन। कुरा पनि बहुत हेस्यहार, दीलका पनि बहु सुरा भयाका छन्‌ ।कुरा गर्दामा भन्या सबैलाई मोह गराउने यस्तो मोहरूपी &#039;छन ।बादामा भन्या कसैलाई हेने दीदैनन, पनि छुनन्‌ दीदैनन । केहीमेवा, भाजी, तरकारि, फलफुल भडारवाट दील,ई छ,टलुट होलाभर्ति दीदा गड्त्‌ । गाइ पनि आफैँ दुहेछन्‌ । उमेर&#039; भन्या वडाबडाव्रादसाह/का जस्तो राषछन्‌ । कुरा गर्दा बडो सेषिसित बोलछन्‌ ।हिन्दुस्थानूनी जस्तो लाचारि छैनन्‌ भनि आपस्मा कुरा हुदा जान्याजाँन्या भंग्रे जले भन्या--प्राइम मिनिष्टर सुतंतर राजका हुन्‌ । इन्कादर्बारमा राजादेषी मति इमाथी अरू कोहि छैनन्‌ । जंगि, मुलकिप्राइम्‌ मिनिष्टर कीसलदेखि माथीका हुन्‌ । यस अर्थले आफ्नासद्तुमा रह्योका छन्‌ भनि जान्याहरू भंछन्‌ ।&lt;br /&gt;
कलकत्तादेषि ६ दिनका वाटा समुद्रको कौनारामा चिनापट्टनसहर भारि गुलजार रहेछ । तहा बडा--वडा महाजन वस्याकाछन्‌ । ताहा मेक लाठ साद्रेव चार पल्टन्‌ ली छाउनी हाली बस्या-का छनुँ । ताहो अगिनिबोट्‌ जाहाज यक दीन समुद्रम। मुकाम गरिईसद, पानि भजीतकोरि पथरका गोल जाहाजमा भरि लंका टापु-सम्म पुगत्या गरि चाहीन्या चीजवीजानु पर्न्या रहेछ र जाहाज!कीनएरा भयो । ताह! लाट साहबले नेपालका श्री प्राइम्‌ मिनिष्टरसहेवलाई लयनगडा गरि सलामी गत्या । १९ तोपको बढाई&lt;br /&gt;
१. उमेद। २.?&lt;br /&gt;
[९]&lt;br /&gt;
सलामी गम्या । लाठ आफ्नु वगीमा चढि भेट गर्ने आपा । मुल.-कात्त भयो 1 वहुत षातिर गन्या । डेराडडा पान्या चिजको जाफतगर्या । ताह. गढि, कील्ल।, सहर, छाउनी, हाट्‌, दोकाउ , वजार;फौज, पल्टन्‌ सबै देषाया । ताहाका छोता बडा मातिस्‌ सामेर भैसलाम गस्या । लापौँ मानिसको भीडा भयो । ताहादेवी लकाटापुतर्फ स वारि भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===लंका र एड्रेन===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
७ दीनम/ लका टापु पुगनुभयो । त हा पुग्दा कस्तो भयोभन्या सवा लाष मानिस सामेल थिया । वडा मानिस्‌ घोडामासवारी भै आयाका थिया । मर्दाना जनाना वरावर थिया । येकतर्फ छाउनी पल्टन्‌ षडा थियो । वातसाही बाजा बज्न लाग्याकोथिय्रो । तोपको सलामी हुन लाग्याका थीयो । तत्रै वीमा जाहालाठ्‌ सहिव स.बारिलाइ वगी ली भेट मुलाकात गर्ने आया । उनकासाठम)। अरू बडा साहेबहरू पनी थीया । ती नेप लका श्री प्राइम्‌मिनिष्टर साहेवसिंत आई हातमइ समाति गुडम/नि सलान गन्या ।घयेर भेट्मी प्याट्रै भयो । यक वंगीमा स.बारभै सहर,छाउनी, हट,बजार, गढि, कील्ला, फौज, पल्टन्‌, घर्षजाना सबै देषाया । परेट्म,सलामी गर।या । डेरामा लगी सव चिजको जाफ्त दिया ।आफ्नाआफ्न। घर गया ।&lt;br /&gt;
त्यो मुलुक कस्तो रहेछ भन्या जंगल रहेछ । जंगलभित्र सहरछ। तेस सहरका बजारमा चिज वस्तु कोही - थाहा ठेगाना छैन।आडाको वजार, कपडाको वजार, पत्थर, काठ, गोलको वजार&lt;br /&gt;
१. ताहा (?) २. गुड मनिङू ? ३.?&lt;br /&gt;
भरिपुर्ण भयाको अति गुलजार छ । तेस जंगलमा मस ला च्वाच्‌सुपारिँ, मरिच, जायफ्छल; छोहरा, बदाम,&#039; नरि बल, सुघमेछ,सपुन मसल छन्‌--मै.वा, आँप, कटहर, सुनतला, नासपाति,स्याउ, दाष, दासिम्‌, अंगुर, पेस्ता । तेस जंगलम, होती, गैजरायो, वाग, भालु पनि बहुत्‌ छन्‌ । चराहरू पनि जात- जातकाछन्‌ । तेस जंगलको त।पुमा १ दीनमा ३ काल छिन । बाल्न मात्‌बरोबर रहेछ । बेह्वान प्रहरमा जादो हुन्या, सितकाल मध्यानमागर्मी हुन्या, पुसकाल चौथा प्रहरमा वर्षा हुन्या, असारको मेघ भैगर्जेन्या, बीजुली चभकन्या, वाःहै मैत्ह। षत रोपन्या धान पाकडोरहेख । गडिको पर्माना रातदीन बरोव्रति घडि सबै हुन्‌ ।&lt;br /&gt;
अधघि“तेस मुलुकमा राक्षेसकी राज रहेछ । राक्षसको प्रन्टवभयो पछि ४ सय वर्ष बेरान भयेछ । फेरी सिजाली मल्ल मनिम्‌ताहा आई रजाई गन्याछन्‌ । पद्ढी ति सिजाली राजा २ भाईलेमुलुक वार्डी दुई राजा भया हन्‌ । फेरी यक्ष भन्या अक्नै तापुःसावादसाहले त्यो मुलुक मारी जक्ष राजा भयाइन्‌ । जक्षलाई माडीअंग्रेजछै रजाई ग्याका रहेहन्‌ । अंग्रेजको यक छाठ्‌ सहिन,जणल,“गोरष पल्टनू, कोला पल्टन्‌ राषी छाउनी वनाई वस्याकारहेदन्‌ ।&#039;त्यो जगा धेरै बेरान छ । गुलजार हुदैछ । तेस टापुमा२ दीन मुकाम गरी ० दीनलाई भारा, तर्कीरी, रसद, पानी,जाह जमा भरी ताहादेषी पस्चीम्‌ रम्ता चलां भयो!&lt;br /&gt;
द दीन्मा&#039;अइइन्‌-भन्यो तापुमा पुगीयो ताहा अग्रेजका चारपरल्टन्‌ गोरा रुह्या छन&#039;। परक जर्णेल, यक्क कर्णेल ,मालीक रह्याद्टन्‌ ।ज,ज वीनारा पुग्दा तोपको सलामी दीया । पुतता तोप कुधि छाईसाना जाहाजमा चढी ती जर्णेछ, कणल मेट्‌--पुलाकाट्‌ गन आया ।&lt;br /&gt;
[१]&lt;br /&gt;
बहुत षातीर गन्या । तेसै जगाका बीस्तार बीन्ती गया । त्यो तापुकस्तो छ भेन्या पत्थर मात्र छ । ताहा रूप वृक्ष, झार पात केहीउन्ने दैन्‌ । माटो छैन । तेस जगामा अंग्रे जहरूको जाहाज आउदाजहाज दाकुखे लुती मागि समाती दिदा तम्हाक। वादसाहासितलडाइ गरि जीती तेस जंगामा ४ पल्टन्‌ राष्ठी गढी कीक्ला वनाईअंग्रेज वस्याका छन्‌ । ताहा भाजि, तर्कारि, साग पाट्‌, फलफुल्‌-को बधैचा बनाई भाजि, तर्कारि लाई नीर्वाह गरि वस्याका छन्‌ ।वरावर पहरा &#039;घोपि वारुद्‌ हाली पहरा घोपि गढी; बोह्ला बनाउनेलांयाको छ । अंग्र जका हीकमतलाई सारा जोहानमा सकदे नन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===इजिप्ट र मालूटा===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ताहादेषी आठ दिनमा सुझ्ज वादसाहको मुलुकमा पुगीयो ।तेस जगामा जाहाज फिरिन्द्ो रहेछ । त्यो जाहाज वेलायत्‌ पुग्दन ।ताह्वादेषी ३० कोस जमीनमा वस्ति पनि छैन, -पानीपनि छैन । तेस जगामा सुइज वाछा&amp;quot;लाई अंग्रेजले तीन लाषरुपमा दी त्यो ३० कोस जमीनूमा ६६ घाँडा लाग्याकी वगी ८डाक राष्याका छन्‌ 1. कलकतादेषी गयाको जाहाजका मानिस,असवाब ती डाकका वगिमा चढाई ६ प्रहरभ्मा &amp;quot;अरुषजजरिनदीमापुन्याइदीया । ताहा १ बडो सहर छ। बदसाह। तेहि सहरमा बस्या-का छन्‌ । मुसलमानदेषी अर्को जात छैन्‌ । मातिस राम्रा-राम्राखुन्‌ । जनानाहरू मुष कपडाले छोपी हीडदछन ! तेस जागामाभाजि, तर्कारि, फलफुल, गहुकी पती गर्न्या सम जगा छ।हात, दोकान, वहुत्‌ गुलजार सहर छ । पर्षाल मजगुत जगावि 0 न न नी&lt;br /&gt;
१, इजिप्ट (?) २. बादशाह ।३ प्रहरत३ वण्टा ४. अलेकतरजेड्रिया(?)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[१२]&lt;br /&gt;
सहेछ। ताहाका वादसाहाले श्री प्राइम्‌ मिनिष्टरल।ई मुछाकात्‌ गरिबहुत षातिर गरिया । मासिना चार्वल, आटाहरू, चीनि, मेवाप्रसस्त. गरि जाफ्त दि&#039;.ताहा.. १ दिन मुकाम गरि नीलनदीका साना जहाजमा बहिता&#039; गरि समुद्रमा पुगे र ताहावैवर्धतृवाट फिरोजा भन्याको ठुलो जाहाज आयाको रहेछ । तेसजाहाजमा स वारि मै चलान भया ।&lt;br /&gt;
७ दीतमा माल्टा भन्या सहरमा पुग्दा क्या तृमासा देपीयोमन्या समुद्वका तीरमा अनौठा घर, सहर, वजार, “गघी, कील्लाभरि वजार, अनौठो चलन, पोसाक, वाध-वगँचा, ताहाको षेती,ताहाकी जनावर मानिसहरू . देवदा अति सुन्दर जनानाहरू पनिआइ षचीतू्‌ भयाका भारी गहना, पोसाक लायाका चंद्रमा विच&#039;जस्ता मुष, तेल्का घारा जस्ता नाष, झपालपज३ जस्ता नेत्र भया-का अति सुन्दरी जो देष्यो उस्तै । बोलायतको नजिक्‌ हुनाले केहिझलक देषदा पनि जयना जस्तो । बहादेषी छ ढीनमा जीवपार”अयाको सहरमा पुग्यो । १ पल्टन्‌ ताहा वस्याको रहेछ । त्यो जगादेषदा पनि केहि मोह गरायो । ताहा ५ घंटा बसि कुच भयो ।&lt;br /&gt;
त न क 00 0 त१.(?) र्‌ गढी] ३. कमहपत्र (7)४. सपना ? ५, जिब्राल्टर्‌ ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बेलाइतमा==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===लडन प्रवेश===&lt;br /&gt;
४ दीतमा वोलायत्‌ उत्रन्या घाटमा पुग्दा कस्तो भयो भन्यासपनामा पो आज्यू की अथवा धर्म म्मायाको मया पछी इ द्र सनमा पुगीन्‌छ भंश्या इ द्वासन यहि हो की भन्या जस्तो लाग न्‌ । क्याअर्थले भन्या ताहा अति राम्रो सहर छ 1 हत, दोकान्‌, वाघ--बगैचा ताहाको मानिसको रूप देषदा ज्या देध्यो तसवीर देषिन्या ।ताहाका जनानाहरू श्री प्राइम्‌ मिनिष्टर साहेवर्का नजीक्मा आईसलाम गन्या । तीनका रूप देघदा मीज्याद, षातिर गत्याका सुन्दाइ अपसरा हुन्‌ की भन्या जस्तो लागन्त्र » चंद्रमाका विम्ज जस्ताउज्वर मोहडा, वडा--वडा तामा नेत्र, तेलका वारा झहि नाक्‌,घाटीमा तीन रेखा! भयाका, हातीके सुड्‌ जस्तो छाति, कम्वरछिन्याका, जांग फुग्याका, वडा &#039;पल्लेवर&#039; उच्च, पान षायाजस्ता लाल ओषा२,मिल्याका दात । पोशाक --लहंग!, मोजा, पजा,सुमाल्‌,&#039;कपलमा अति सुन्दर टोपी, गह२, कुचोन्‌, साटन्‌, रेसम्‌,काला धतुका झलर भयाको पोसाक आगमा रसाया जस्तामोल्याका, वडा हिसि भयाका, नम्र भै वोलन्या । १२ मात्र होइ-नन्‌, सबै उस्तै छन्‌ । यस्ता रीतका मानिस हजार वाह सय/आइपडा भया । नराम्रा दुवला देघनु कोहि छैन्‌ । जो मानिस देघ्यो&lt;br /&gt;
१? २.ओठ (?) ३. गहुन (?)&lt;br /&gt;
[शक]&lt;br /&gt;
राम्रो, ज्या चिज देष्यो राम्रै देषिछ । यस्तो तमासा देषदा मत्रलाई मोह भयो। ,&lt;br /&gt;
यस्ता जगाम। जाह,जदेषी उत्री यर्क वडा हवेलिमा डेरा भया&lt;br /&gt;
रवबीहनको भान्साको तमारी हुन लग्याक&#039; थीयो । श्री प्रइममीनिष्टर 1 मेगलोट्‌ भन्याका अंग्रेज जर्णेलका छोर १ थीया;_छेफटेन लालसिं ढूर अंग्रेजी पढताका हुसीयार थीया, इ २ जना-&lt;br /&gt;
लाई ताहादेषी लेष्ैन सहर ४० कोस भोली हामी आउला तीमीहरू&lt;br /&gt;
अल्है रेखगाडामा चढिजाउ वाहन सरकारबाट डेरा घटायाको भया&lt;br /&gt;
हेरि क्वर ल्याउनु नेषटायाको भया यर्क असल्‌ घरको ठेकाना गरिआउनु भनि दुइ जना गरि आउनु भनि २ जनाल,इ पठउनु भपोरगया।&lt;br /&gt;
४० कोसकौ वाटो &#039;रेलग&amp;quot;डामा सवारी भै जादा ४ घडिमापुग्या छन्‌ ! बाहाका कारीदाहरूलारई सोध्या र आहा डेरा तयारछ, श्री प्राइमू मीनीषटरको सवारी: अँल्है झीकाउछ्न भन्या छन्‌ रतारमा गै तारबाट्‌-ताहा गोर्षाका श्री प्राइमू मीनीष्टर साहब आईपुग्नु भपछ, गाहा रिवन्ट कारिज घरमा डेरा षटायाको छ, रेल-गाडाम। सबारी गराई चलाई ल्याउ भन्या कै.वरतर&amp;quot; साट्रेबलाईतारमा कुरा तिनूँ,मीलीटमाः आयाका छन । त्यो साह्रेव डौडीआयो र लडन सहरदेषीः हुकुम आयो, अल्हे रेलगाडामा, सवारि भै५ घडीमा ४० कोस लंडन्‌ सहर क्यारिज चरस; आइपुग्नु भयो ।त्यो घर देषदः वहुत षुसि हुनुभयो ।&lt;br /&gt;
१४1]&lt;br /&gt;
===ड्य र शहर===&lt;br /&gt;
चीलायत सहरमा श्री प्राइम्‌ मीनीष्टर साहेबलाई डेरा कस्तोषटायाको रहेछ, भन्या वहत्‌ रमाइला ठाउमा लंडन्‌ सहरका विच-माँ तीमस&#039; नदिका तिरमा रीजबन्ट वयारिज भन्य,को नामोदघर रहेछ । त्यो घर कस्तो छ भन्या पत्थरको गाडा“ पथरैफोछाना; व्रजलेप लाग्याको, पतला भयको, उतरतिर, सुन्दर बगैचातीमस नदिको “पाहाड,पुबेतिर अएवलपाना, दक्षिणतिर मृल गल्लीकोबाहाङ, पेश्चिमगरि बडे पतागीरि&#039; ग्यास बत्तीको रोसनी ज्ञल्य:-को, वाहाँडघर चीत्रेक्रार भयाको, कोठापीछे, झुल, चादनि,पफ्लंग, विछ्याउन्या, सतर जि, ग्छेचा विछ्याइ राष्याको । मेच,कबज जगो--जग,म राप्याका छान्‌ । काँचका झारि, कोपरातृयार छन्‌ । कोठाइपीछे तसबीर तास्याका --कोठा २०।२५ छन्‌ ।भारी वैठक, तसबीर भझःडवती चारै तरफ बडा-वडा आनालाग्याको मेच हाल्याको, भारी गर्छेबा बीछ्यायाको, अती सोभाभय,को. बैठक छ । गेस घरका सुसाप्या २ स्वास्ति“लाई र २ लोग-बन्यालाइ दर्माहा मेन्हाको चलीस रुपैजा स्वास्निलाई -असीरुप, तेस घरको. वाल मैन्हाका १२१०, तेस.घरमा वसछन्‌ उनैलेतीनु पर्छे ।त्यो सहर कस्तो छ भन्या वषान्‌ गरि सक्नु छैन । समेलक्षणले जुक्त भयाको । तिमस नदी उत्तरबाहिनि भै बह्याकी छन्‌ ।३०४० कोसको चौडा मीर्दा भपाको ज्यावद घर छन्‌ । पक्कि&lt;br /&gt;
१. टेम्स | र, गाह्वा(?) ३. बाहाड(?)४, बटाङ्चिनी । २. स्वास्तीमानिस॑। ६. लास्नेमानित ।&lt;br /&gt;
[१६]&lt;br /&gt;
हूवेलि, सहरका बीमा वेकस्था, घर १ पति छैन । परधरैको गारोपर्रैको छाना, गारा, मीत्तौ व्रज लेप गप्याको छन । पथरकाऔगटि छानामा मील्याका,सीसा -ढाल्पा जस्ता । सारा सहरैँ घरअमाका झाँल ठाग्योका छैन्‌ । सारा सहरका घरमा सुन-खादीका-कीलिम्वा गरि चीश्षेकार भपाका छन्‌ । चोक, पटांगीनी, गल्िसारा. पधरैंले छारँभाका छन्‌ । नाल देघनु कही छैन । भीत्रभीत्र। दबाई तिमस नदिता निकाल्याका छन्‌ ।. हीलो, धुलो, नर्क, कसि-1.गर देघनु कहीँ छत घर घरै चोक, पटांगीनी, साना बगैँचा, फेल&amp;quot; फुल; पानलता छोग्याका छन । रूषमा पहेलो पात छैन । भैमासुक्याकौ पात छैलशरसफा गरि राष्याकापछन्‌ । जात जातका फुफुली रह्याका छन्‌ । गल्िमा तिन्‌ सडक जोरि बन्याका छन्‌ । क्याअर्थ अन्या यक्र सडकमा पैदल मानीस्‌ हीडदछन्‌, यक सडकमाघोडा संकारि चछि हिड्छन्‌, यक सडक्‌ ,बगीका स.वार हिडदछन ।रात-दीन बराबर, लौषौ वगीका -स.वार बन्याकै छन्‌ । आठोप्रहर मानिस, दगि षाली हुदैन्‌ । क्या अर्चले भन्या रात दिन यकैउज्यालो छ । गास वत्ति गछिमा लयन्‌का लगन्‌ नल्याकै छन्‌ ।सारा घर-वेरका झयांल-इयाँलणा भररात वल्याकै छन्‌ ।ई चंद्रमाजोति जस्तो तेज भपाका सारा सहरमा तिहार दिपमालीका गन्याजस्तो---सदा कोठा, चोटा, कौसी, अटाली, भडार, जाजखान,अस्तवलघाना, चोक; प॒टांगीनी तिमस नदिका ,वारी-पारि पुरुसाधु, सहर भीत्र, वाहिर--सर्वत्र ग्यासबततिको रोसनि जल्याकैछ ।&lt;br /&gt;
न&lt;br /&gt;
॥ 1 उँट पति दोहोरिएको छ।&lt;br /&gt;
| १७]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===अति सुखी जीवन===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;यापानि भन्याका नदिका पानि तावाका ढुंग्राबाट तलाउमाबैचियाकोछ । तेस तलाउक। वरिपरि सबै घरमा नहरलाई तावाकाढुग्रावाट झीक्याको छ । चाहीयामा टुटी घुमाइदीयो, पानी लीयो,फेरि वंद गरिदीयो । दाउरा भन्या तेस मुलुकलाई चाहीदोरहे (न)छन्‌ । क्या अर्थले भन्या पथरको गोल हुदो रहेछ । तेल वलेझै वलदोस्दैछ। सुघर पनि,सस्तो पनि । तीमस नदिका क्कपाले जाहाजमाहाली ल्याउछ्न्‌, घर-घर पुग्यइदीछन्‌ । त्यो गोलको घानि लडन्‌सहरदेषी सय डेढ सय कोस टाढा छ । त्यो गोल्ले भात पकाउछन्‌ ।हापन्‌, मेगजीनको काम्‌, फलाम सिसा ढालन्या, घु वाका जाहाजचलाउन्या, ग्यासवत्ति जलाउन्या, नाना तहको कल चलाउन्यातेहि गोल छ । घर वन्याउना काठ, जाहाज- रेलगाडी बन्याउन्याकाठ ज्यावड्‌ १५ सय कोस समुद्र पारव्राट्‌ जाहाजमा हाली समुद्रछेख्याई दीँछन्‌ । आगो, पानि, बतास अंग्रेजले कमारो तुल्याईराष्याको छ।&lt;br /&gt;
तेस मुलुकका मानिस्‌ भारी कोही वोक्दैन्‌ । भारी जाहाजरेलगाडा, वगि मात्र बोक्छन्‌ । ताहाका मानिस्‌ अति सु छन्‌ । ,मैला फाट्याका कपडा कोही लाउंदैनन्‌ । आगमा मयल कोहीराषदैनन्‌ । ताहा पाचिले सावुन घसि वुरुत लाई नुहाउत्या,सबैका मुष चंद्रमा जस्तो उज्यालो । पोश।क भन्या वादसाहदेितेली, घोवीसम्म यकै तर्फको पोसार्क लाउन्या सबै । बडार२कोमात्र मसिनु घोटाको पत्रो&#039; मात्र छ, तलास सबैको यै छ ।&lt;br /&gt;
2.-लनाणणाणणणणणणिणिणिजणिणणिणाणणिण र णरणकललाइरुर&lt;br /&gt;
१(१) २.१&lt;br /&gt;
लोग्न्याहछका पोसाक्‌ तोप, कुर्थी, चुस्ता, गलेवंद, मोजा, जुत्तालायाका । स्वारिनहरू छिटका भया साटन्‌का लहगा, सटोटाप&amp;quot;: साढ्नूुका छम।ल वढनीका पंजा, मोजा, जुता र₹ंगिचंगी पोसाक) स्वास्निहहको त.वर यक्रैछ । पोस्ताक लाउन, घान, थितीसग«रहँन्या, सुतन्या, उठ्न्या, कही जान्या सव घडीको प्रमाण छ।सबका साठमा घडी छन्‌ । घर--तरका भीत्तामा घडि राषन्या,; घरि टासीयाका छन । को गीर्ज, पर्घालमा पनी घडी टासियाकाछन्‌ । जाहा-जाहा हेर्नै मन लपयौं ताहा घडी देषींछ । छोटा- वडा&amp;quot;कसैले ठुलो सोर गरि नबोल्ने, ठट्टा अर्काको : उत्तारनि नीन्दा1 कोहि गर्दैन्‌, झाडो गर्देनन्‌ । बडा सौलसीत्‌ बोलन्या, छोडा--वडासीत मीजाज राषच्या यक सै यक अकलमन्द छन्‌ । नाचन-त-मासा जगा-जगामा हु&#039;छ ।. जाहा नाच- तमासा हुछ ताहोलाषौ मानित्‌को भीडं लाग्याकै हुछ।&lt;br /&gt;
घाना, पुढीस्‌, रि.पाहरी पहरा हन्‌ । तर सिपाही बया गह्न्‌भन्या सारा सहर भौत्र, बाहिर, दोबाटा, डेउडी जगा-जगाम: षडिपहरा गड्दन्‌ । आठो प्रहर रम्न्‌ गर्छन । चोर, ढाँट, लुचा, झरगर्न्यी झगडियालाई पक्री ल्याउनु; दिनमा कटि मद्दन्‌, कति जन्म-छुनु, भड मुलुकका मुसाफेर कति आनट्टन्‌ त्यो षवर ल्याउनु;लुलो;-हँदारा, काना, षोरडा कोही पक्ष नभयाका आया गरिपषातालगी नौ छेषाई बंद गरिदीनु उदि छ । सहर हुलदंगा काहि भयोभन्या पैकरी छंयाउन्‌ । बलले नपुग्यां जलदि प॒बर थानामा ल्याउनुक न वि । यस्ता तह्ृसित पुलीसको पहरा सहरमा ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[१६]&lt;br /&gt;
सव दुनीजा, फौज, पल्टन्‌, महाजन्‌, दोकानदार, भारादार,&lt;br /&gt;
वादसाह, गरिबगुर्वा सारा जाहान्‌ वडा पुमि मान्‌ । आफ्नाथीतीमा रह्याका छन्‌ । इन दीनौम। समाराज्य तटी मुलुकमाखेछ । जौन गछ्निमा गयो हात दोकान्‌ भारी-भारि छन्‌ । जौनचीजवीज षोजो दोश्रो दोक&#039;नमा जानु पढ्न । माल्को मोल नीरषगरि मोल माल लष्याको हुछ। रुपैया दियो, माल लीयो । मोलबीसाकस गरका भन पाउदैन्‌ । जो लेष्यःको सदर छ | यस मुलुकमायो माल छ, यो माल छैन्‌ भनु कैदी छैन्‌ । वाह बीलायेतृक्की चिजभयो जाहाजले बोकी ल्याउछ । छ वृक्ष, फलफुल, मेवा, अनाज,कपडा, भाडा, वर्तेन, मुना, चादी, नवन्त्न, जलका जानवर,घलका पशु-पक्षि) पृथीवीमा भय. चीज, नक्सा, बीलायतूमामहंजुदछ । अकलमन्द पनि इतै रदानडन्‌ । कारी ग९, बेपारि, माछ-को पारष जाँन्या पनि, सुघर पनि, घति पनि, धर्मतास्त्र निति-सास्त्रजान्या पत्ति, लक्षिमिले देष्याका पनि झनै रह्यापन्‌ । इनकोरीस गरि कसैको निर्वाह छैन्‌ । इन दिनौमा देजता, राक्षेस्‌, दातवस्वगँम। ग्य&#039; छन्‌ । यस मन्द&#039; लोकमा म्नुपैको मात्र राज्य रहेप्रस लो तमा पनि इलिण्ड-वेलायत्‌ -मानित धर्ग सत्य रद्याको ताहिरहेछ भन्या जस्तो अरू मुलुकवाट जान्या मा्नितहरू मान्दछन्‌ ।&lt;br /&gt;
पृथ्वीको अंत कोहि पाउदैनन्‌ तापनि चलन्‌ वेहोरा सुन्दादेपीछ इनि दीनमा अग्ने जका अकल्‌ लीन्या वादसाह बलिया छन्‌ ।करा अर्थले भन्या इनका जाहाजको बाम्‌, तोप, बन्दुकका काम्‌,फौज-पल्टन्‌को अयन्‌--अकवायत मुलुक थियो । थिति, वैह्ीसीत-को धि/कैं, टकको सलतनत्‌ बाल्दै तोपीका वादसाहाले लुकी चोरीसलतनत गरिलीय,छन्‌ र्‌ मन मीलाई काम वलीयो गरी रहख्ुन्‌१, मय (0) २. इङ्गत्याण्ड ()&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[२०]&lt;br /&gt;
टाट हेर--लाहुरमा जाहासम्म र जितसिं थीयो ताहासम्म अंग ज-लाई उनले चिन्हाको थीयो अंग्रेज नोकरि पनि थीया । अग्र जकोमतलब पनि घीयो । षजाना, तोप, वन्दुक, फौज, पल्टन भारीअयन्‌मा. रष्याको थियो । मुषले सलतन्‌ मीलाई पेट आफ्नावछ्ियो गरि रह्याका थिया र उनको मजगुत्‌, उनको सल,तनदेषदा अंग्रे जहरू गमन सक्तैनथ्या । रजितसि मम्सापछि लाहरमाआफ्ना घरमा सलतन्‌ बीग्यो । नमा कोही रहेनन । फौजलेमनपरि गर्दा लाहुर उड्यो। तसथ आफ्ना घर नमीली देस मील्दैन ।मुलुक ढेरै देष्यापछि बुधि ठेगौनामा आउछ ! तेस वेषतमा अ पतारजेको सजगुन”, वर्कत्‌ असार गर्नु पर्छे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===जङ्गबहादुरको स्वागत===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१९०७ साल्का जेष्ट मैन्हाकाँ दीन्‌ १५ जादा वेलायत्‌ लडन्‌सहरमा श्री प्राइम्‌ मीनीष्टर साहेब पुग्नुभयो । ताह। रिज,वन्तक्यारिज घरमा डेरा गनु भयो । ताहाका प्राइम्‌ मीनीष्टर र कम्याँडरनइन-चिफ, ला&#039;ठ साहिवहरू, टुकलिन्ट,« जणैँल, कर्णेल, कंपनिसाहवान्‌, पारमेन्ठ कौसलीया साइेचानुहुर, भैयाद, वादसाहकाकाँछ्ा वातुहरू वेलायत्‌ सहर म्यानासुदारहरू? श्री प्राइम्‌ मिनीष्टरसाहवलाई, भेट--मुलाकात गर्ने सवै आया । बहुत पातिर गन्या ।तपाई खौह आउनाले वढिया भयो । क्या अर्थले भन्या हिन्डुसथातबाट तपाऔःजस्ता ठुला मानिस्‌ आहा कोही आयाको छैनन्‌।तपाज्रीकोँ “रवाफ देपदा जाहाका छोडा-बडा सबैलाइ गोर्षा&lt;br /&gt;
२,९) ३)&lt;br /&gt;
[२१]&lt;br /&gt;
भन्याकी ठुलो रह्या छ भन्या धाक्‌ पनि भपो । जहान भारादार,मर्कारसीत्‌ पनि प्रिती रह्यो । अव उप्रान्त दोश्तीमा पलवल मैल्द्ैहबैन्‌ भनि बडो षातिर वात गग्या । हि&lt;br /&gt;
ताह्या उप्रान्त लंडन्‌ सहरका भारादार, बडा साहेववानहरूलेपालैँसीत्‌ आज यक्राले भोली यकाछे यस्तै रितले वेलायतमा वसं-ज्याल्‌ दीनहु&#039; श्री मीनीष्टर साहेवलाई नीमतो गरि र.तमा आफ्नाघर लगी षातिर गर्न्यी | तेस दि ज्पावद साह्रेवानहरू तीन्क। मीमसाहेव, लेडी साद्ेव मीसि ज्मा मया । भारी गहना, पोसार्दू लाया-का भार दारका स्वास्नि,छोरि, बुह,री सबै आउछन्‌, श्रीमीनिष्टरसाहेबलाई हात समाति गुडमाती सलाम गर्छन्‌ । सारा आँग, सिरमुकाई वोलछन्‌ । लोगन्याहरू वरपर लागी वस्थ्या; स्वास्निहरूअघि सरि षयर मीजास्‌ पुछन्या, गहना-कपडा हेर्न्या, वडो घातिरगरि बोलन्या । लाठ, डुक साह्ेवान्‌हछ पनि आफ्ना छोरि, बुहारीराम्ना-राम्रा तरुणि-तरुणी अघि राषी इनलाई तप.जीले प्रसंदगयौ की गरेनौ भनि श्री मीनीष्टर साहेबलाई सोधन्या । दाहिन्याबाउ अघि--पछि राषिदिन्या । तीनका रूपदेषी र जोभन, मारी गह-नानपीसाक्‌, तिनका सफाइ, मुषको श्री देषदा दसै इन्द्रीय जितिरहन्गा सुकदेव स्वामीलाई पनि मोह गराउन्या, अति सुरि, अर्तिचचलि, तीन्का रूपको वर्णन गर्ने सकी दैन ।&lt;br /&gt;
ती दैठक्‌ कस्ता छन्‌ भन्या चीत्रगुशरे लेषा जस्तो । ओना,तसवीर, झाडबत्ती, भारी बीछ्याउन्या, मेच, कवज जंगो-जग्यामाहाली अत्तरको घुसवी नाना तह्कका फूलको जगजगायमान गरि सुन-चादीका भाडा टीपीलमा झला.वर पारी राँष्याका छन्‌ । ताहाँबादसाही बाजा वजन लाम्याका, भारी कपडा-गहता लाई मीम&lt;br /&gt;
[२२]&lt;br /&gt;
साहेषहरू नाचन लाग्याका छन । यकतर्फ षान्पा सराजामशार छन्‌ । यकतर्फे जात-जातैका रोटि, सेबा, मसला, मोरवा,मासु सुत-चादीका भाडामा तपार छन । वेडा-बडा लाट, डकसाह्वानेहरू कुसिमा बस्याका; ताहा इ द्रका अपसरा, खंद्रमाकाकिब जस्ता मुष भयांको, कामकन्दछा, उर्बसी जस्ता परि वाचनलाग्याको; तेस वीचमा नेपाल्का श्री प्राइम मीनीष्टर साहैव जङ्ग&amp;quot;बहादुर कुवर राणाजी तीनका भाई कर्णेल्‌ जगतसम्सैर जङ्ग, धीरसम्सेर जङ्ग कुवर राणाजी ३ भाइ तेस सभामा भारि गहतापोसाक्‌ लायाको । कस्ता पोसाक्‌ थीया भन्या पगरिमा हीराजडाउ भयाको, चंद्रमा मोतीका, सोनी पन्चाका, लडकते नोरत्न-का लाग्याका, कनकन मोतीकै सघवद गलामा हीराको हार,प्ना-मोतीको माला, हरिया मषमलमा समुर लाग्याको, मृजाईअंगमा अति मील्याको, मोती-हीरा जडाउ भयाको गलेवंद; हीरा,मातीकू, मोती, पन्ना जडीयाको ड्‌.वाल चपास्‌ कम्बस्चन्दि तासीकीनषावको पाइजामा, मोती काला बत, लाग्याका जुत्ता, कबुजा-मीषाँन्‌ सुतको भयाको, तरबार कम्वरमा लडक्पाको, हीरा जडाउअवाक्रो वाजुवन्द । यस्ता तहको पोसाक-गहता ०ही ई द्रीपुरीसभा&#039;जस्ता सभामा ठाडा हुदा झाइवतिका तेजले इ तीन भाइकागहना बल्दा कस्तो सोभा देषीयो भन्या जरासिंघका सभामाश्रीक्रष्ण, भीमसेन्‌, अर्जु न जाहर भै जादा ति सभाका लोकले जोसोभा ,गायाब्या सोही सोभा ताहा लोकहरूले मात्या । यस्तै तह्न-सित्‌ सबै पादेबान्‌हरूले निमता गरि तीत महीतासम्म पस्तै न,च-तमासा देषाया ।&lt;br /&gt;
१.७)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
| ३ |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===थिति--बन्दोनस्त===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इलीन्ड बेलायतको थिति ॥ 1॥ बादसाहाका औन--बादसाहाले मुलुकको फोज-पल्ट्नूका थिती-वन्दोबस्त पनित्या-निराप प्राइम मीनीष्टरले ठहराइ ल्याको मंजुर गरी हुकुम&lt;br /&gt;
दीनु, भारादारहरूलाई पत्रे-पर्वेमा डाकी घातिर गर्नु, भोज घानद्विनु, न.च-तमा जा हेनुँ , कसँछे रि गया भन्या सीरोपाउ दीनु,सदा पुसिमा रहनु, आफ्ना प्रजाल्ाई दया राघनु, कक्वैलाइ कुट-पीटगाली पनि नगर्नु । क्या अर्थ भन्या चुकमा सजाय गर्न्यौ अघीदेषीगरिचली आयाको भंनले पारमेन्ट कौसलले कसेको मोहवतराषदैन भन्या कीन सरले बुराई गर्नु , पप बोक्नु ? राजनिति,घर्म सांस्त्रमा रेष्याको कुरा नगप्या पनि पाप लाग्छन्‌; गज्या पनिपाप्छ; बढता गज्या पनि पाप छु । अघिदरि चलि अ[याको गर्नैपर्छअन्या पाप हो तापसि धर्म हो तापति जसले यो मिति बनापाउसलाइ छ भन्या मतलबले वातसाहा कसैको जीउ मादैनन्‌ ।&lt;br /&gt;
झन हनु, कसैलाई डड गर्नु , कुटनु, याली गर्नु , कसैको जागीरषोसनु, कसैलाइ जागीर दीनु, आफ्ना दर्ारको दौलथ म राजा हु,मेरै घन हो भनि वादसाह पनि आफुषुसि गर्ने पाउदैनन्‌। क्या अर्थेलेभन्या त्यो दौलथ आजैन्सा भारादार, फौज, पस्टन्‌ब्दुनीना बेती गरिउपजाउन्या छन्‌; आधा राज/को भाग भनि दिन्छन्‌ । बेपार गरिउपजाउछ्न, जगात भनिसार भनि दीन्छन्‌ । बैरिको मुलुक मारिल्याउद्न्‌ तापनि त्यो राजाको घन हो भनि दिन्छन्‌ । जमीन&lt;br /&gt;
1१४]&lt;br /&gt;
षोदी फलाम, तावो, सिसा, सुन, चदी, न.वरात्न, ज्वाहार ल्याउछन्‌ तापनि राजाको भाग पर सार्छैन्‌ । आफ्नु मुलुकमा घेरिहेमीचन्‌ आयो भन्या इनै भारादार- सिपाहीले आफ्नु जिउ मराईबैरिको ज्यू मारि मुलुक थामछन्‌ र आफ्ना मीहीनत्‌ अन्सारसानु भांग लाई मीली सबैले चीत्त बुझाई बंघान्‌ बाधि जःगिरभनि षान्छन्‌ । बैरि आयाका वेलामा राजा रणभुमिमा जादैनन ।अर्कालाइ पनि मार्दैनन्‌, आफु पत्ति: मदैँनन्‌ । मार्न्या- मरन्याभारादार हुन भन्या दर्वारका ढुकुटीको धन्‌ सबै साजाधनको कामू मुलुक्‌ घटदाका वषतमा&#039; र वढदाका वषतम चाहीन्छ।यकाको फर्मायस्‌ त्या धनको काम चल्दैन्‌ । तसर्थ राजा भन्याकाथिति हुन । राजाले फटीकको पम्वा हुनुपर्छ । गर्न्या-गराउन्यासंत्ि-भारांदार हुन्‌ । कसले वीरित्‌ गर्यो भन्या आफैँ पेछन्‌,आफै मराउछन्‌ । राजाले मार्दैनन्‌, आफै अ।सरि काम गयाराजाले पनि माँनुपर्छे भन्या थिति वाढीयाको छ ! सो थीती नाघ्यापारमेन्ट कौसलबाट वादस।हा पशि वदला गर्छन्‌ ।&lt;br /&gt;
भारादारहरूकी थिति ॥ मुक्तियार प्राइम्‌ मीनीष्टरले गर्न्या&lt;br /&gt;
“ काम्‌--वादस।हा हेजुरमा रहनु, कहि साध सोध नम्जा कामकोअजमास अन्‌ सोधन आया; र पारमेन्ट कोसलवाट्‌ कहि हुकुम्‌बक्साउम्‌ आया; कम्यांडर-ईन-चिर्फले जंगी फौजको नआा अज-मास्‌ साधन गया देस--देसका बादस हा, राजा, न वाफहरूसीत्को सलतनत्‌ षलापपत्र, घा, टक्को; आफ्ना मुलुकलो ठेक्रदारमुलकीसाहेव, जज, कलकटर, जंगी-निजामतिको पजनी; देस--&lt;br /&gt;
[२५ ]&lt;br /&gt;
देसमा रजिडन्टको पजनि, नीजामति रकमीको दर्माहा, &#039;दर्वारकोमसलन्द परचेंको यति कामको नीक्सारि-पसारी साधसोध, तनषाहदिनु, पजनि गर्नु जति काम्‌ जो छ मिनिष्टरले ग्न्‌ । मेरो दर्जाठुलो छ भनि प्राइम मीतिष्टरे अनरीत्‌ गग्या परमेच्ट कौसलछबाटसजाय हुछ।&lt;br /&gt;
कम्याँडर-इन-चिफले जंगी फौजको पजनि गर्नु । जंगी पल्टन्‌लाई मैन्हावारी--दर्माह दिनु । षजाना, बन्दुक, वस्दि, गोली,लडाईका हात-दृतियार तयारि राषनु । जहा लडाइ पन्यो ताहाँफौज पुग्याउनु । पल्टन्‌लाद्द वस्न्या आइ, गढि, कील्ला बैनाउनु ।तार, घाट, बाटो, सडक वनाउनु । फौजलाई रसद पुग्याउनु ।पल्टनूलाई कयायत्‌&amp;quot; सीकाउनु, औन सुनाउ राजि राषनु ।औनदेणि बढ्ता रकम कछमू टंटा नलाउनु । रैयतका बारी-विरु वा,फलफुल केहि माछताल्‌ लुटपीत्‌ गर्ने नदीनु । पजनि गर्दा बलियाअंगका, तीरोगि छायकका, दिलका सुरा, अनमा रहन्य! यस्तालाईपल्टनमा जागीर दी नु । पल्टनमा पगरिको रोल बढाउदा पैले रोलजस्को छ उसलाई बढाउनु । सीपाहीको अमल्दार, अमल्दारकोहवल्दार, ह वल्दारको ज्मादार, ज्मादारको सुवेदार, सुवेदारकोछेफूटेन्‌, लेफ्टेन्‌को कपतान्‌, कपतानूको कर्णँल्‌, कर्णेलको जर्णैलयस्ता रितसँग पजनि गर्नु । क्या अर्थले भन्या छोटा-वडाकाबढौंला भन्या उमेद रहंछ । काम गरि आउदा साह्रो हुन्छ ।पक्षमा पजनि नगर्नु , छुला-छंगडा। काना-पोर डा, उमेर नपुग्याकाकेटाकेटीलाई जागीर नदीनु । बीना टक्‌सीर कसैको जागीर नषो-सनु। वुढो भयो, रोगी भयो, पल्टन्‌को काम्‌ गर्न सकेन्‌ भन्या&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[२६]&lt;br /&gt;
ईंगीलस&#039;&amp;quot; दिनु । उस्को बान्गीमा अर्को भर्ति गनु । पल्टनमाबातगी षाली राषी आफुले नषामु । कहि लडाइ पर्दा वीना तज-बीजले फौज गाफीलमा राषी नमराउनु । यती काममा १ कामचुक्मा पनि &#039;कम्याडर-इन-चिफलाई पारमीन्ट कौसलवाट सजाप्ष.रेजी हुछ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===पार्लियामैरट===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पारमेन्ट कौसल घर कस्तो छ भन्या ३ कर वर रुपैना घच लाईबनायाको छ। हृवेली, औनाका छाना, अनाका झ्याल लाग्याका,सुनका पानिले घेर सिगारि चीत्रकार लेषीयाका; झाडबति,लालटेन्‌, फानस तह-बितहका लाग्याका छन्‌ । मेच, कबजजँगा-जगामा वरावर लयन मीलाई राष्याका छ्न्‌ । ताहाउच्चाठाउमा वादताहा गदि छ । त्यो गादिका दाहिना बाउ सपेत्‌भैदाह्वी-जुगा फुल्याको वुढा-पुर्खना, भयंकर ख्य लियाका अधिकालाठ, डुक, कम्पांडर-इन-चिफ, प्राइम मिनीष्टर, जणल्‌, कणल्‌,जज, कलकटर, इलिम लियाका मुलकी साहेवानहरू--कसैँको डरकेही मान्दैनन्‌--देषदा पनि डर लागदा यस्ता तहका मानिसहजार बाह्न समे कुचि, मेच, तषता वस्या। यस्ता साभाका बीचमाबोलनाको मकबुर कसैको नहुन्या। जौन झगडीया छ, तेसलाईबोलाउदाभुठा कुरा गर्नाको त क्या मकदुर, साचो कुरापुयाउने पनि कष्ट- सदेह हुन्या । यस्ता कचहेरीका विचमा मुनासीवको वोलछ भनि पहिचान्‌ मैरह्याका कसैले कहि बेमुनासीवगप्यो अन्या सजाय गर्न्या तयार छन्‌ । सभामा गुलुगफडा हुन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[२३&lt;br /&gt;
पाउदैँन्‌ । यौटाले बोल्यो उस्को प्रतिउत्तर अर्काले दिया । कुराकोमुदा पुग्यो भच्या सबैछे हो भन्ति सहि गन्या । कुराको मुदा पुगेनभन्या फलाफल गरि मुदा ठहराई औँनको कीताप हेरि जबाव दीया।पारमेन्ट कौसलले कसैको वीरीत सहदैनन्‌ । बादसाहाई बदलाईवदला गर्ने सकेछन्‌ । बीरीत गप्या प्राइम मिनिष्रलाइ घारैज गनसक्छन्‌ । विरित गन्य। कन्यांडर-इन-चिफलाड बदला गर्ने सक-छन्‌ । लाठ, डुक, जर्णेल अरू पगरिको त हीसापै हैन्‌ । पल्टन्‌छेदंगा गया तेस पल्टनूलाई अछ पल्टन्‌ लगाई तोपले उडाउछन्‌ ।&lt;br /&gt;
यस्तो हुकुम्‌ वलियो भयाको षोदाको दर्वार वन्याको यो अनवनायाको अघिका अंग्रे जका पुर्षाली जीज्यूक्यासले&#039; वनायाको औनहो । दुनिबाका थिती-&amp;quot;झगडा नगर्नु । अर्काको नीन्दा नगनु !अर्काको वीगार्नेका पछि नलागनु । धनछे, मानले, रूपले, वलछेसानु छ भनी हेछाठट्टा नगर्नु । निर्घालाई दया गनु । वडालाईमान गनु । साँचो वोलनु; आफ्ना धनको सभार गर्नु । मैला कुरानछाउनु । घोया सुकीलो हु छ । षस्रा लाया भया पुगछ । आगमामयल नराघनु । इश्वरले वनाइदियाको मुर्ती बोइ सफाई गरि राषनुर तेसलाई लक्षिमले दी नुपर्छे । आफ्ना घर भो, षेति भयो, आफ्नाघर नजिकको वाटो भयो, पोनिघाट्‌ नजिकको बारि भया, आफ्नाघर वरिपरि भयो फुलका वीरू,वा, षान्या फलका वीरू वा लाइ-राषनु । वषतमा पेती गर्नु । गाइ, वाए्‌।, भेडा, वीरालु, कुकुर,चराचुरंगी पाली राषनु । आफ्ना भरमा रह्याका अभागी, मु,कोह्रौर, नराम्रा भया पनि पढाउनु, सधाउनु, सिकाउनु, पीयारोगरि राषनु । पति गर्नु । बेपार गर्नु । चाकरि गर्नु । जुनं कुराँद्धि&lt;br /&gt;
१. जेस्रस आाइस्ट (7)&lt;br /&gt;
(राभौफ्तु जीवतती हुछ सोही कुरा गर्नु । अर्काको जीठ नमानअर्कोको धनको छोभ नगर्नु । कौझो मन सोझो उद्यम गनु ।&lt;br /&gt;
राजाको चिति--दुतीऔ सित वसीको दसावद महसुल छिन्‌!त्यो धन ग्रनुसार कौज पल्टन वनाउनु आड, कील्ला, छाउनीबनाउनु ! फौजलाई षात-लाउन वेसगरि दीनु; राजी राषत्‌।सबैको आत्मा वराबर देघन । प्रजालाइ दुष नदिनु । चोर, ढाट्‌,लुक्ष, अर्कालाई कुटन्या, अर्कालाई गाली गर्न्या, अर्काको हट्टा,इजत्‌, हुरमतसम्मको नीन्दा गर्न्पालाई भोलषानामा क्यद गनु ।धान-लाउनमा वेसगरि दी औने मात्र सुनाउनु । काम जस-जसकोजुन्‌ वृटि छ सोही काम सीकाउनु, सघाउनु । मीयाद पुन्यापछिछाडि दिनु ।&#039; फेरि पनि उसै गया कुटनु, सासना गर्नु, दोबरकयव गरि छोडीदिनु । ३ पल्ट वीराया बीराउ गर्न्यालाइ कालापानि पुाइदीनु । जीउ मार्न्यौलाई बदला जी.वै मार्नु । राजालेपनि अर्काकी जीउ माया, गर्कीको घर्नेहन्या वीना तकसीर सासनागर्ने लाग्या औनमा रहि &#039;वेमनौसीव गर्न लाग्या भन्या पारमेन्टकौसलवबाट भारादार-फौज मीली त्यो राजालाई कयद गरि उसैराजाका वंसमा अर्को राजा यापन गर्नु ! राजा, भारादार,दुनिम्री, फौज, पल्टन्‌, परचक्रि, भुसाफेर, अनाथ) अजान, दैवचक्रपरिआयको वीबेक्‌ वीचार गरि कसैलाई पनि समभाउनु । सास्त्रसुलाईनु । राजनितिको औन सुनाउनु, सीकाउनु, सघाउनु पढाउनु।यक पन्टको वीराउ माफ गनु, दोस्रो वीराउमा डड-सासना गर्नु ।100 पगयामा कारलापाति पुस्याइदिनु । केतमुल षाई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[२९]&lt;br /&gt;
यो पारलमीन्ट कचहरि कस्तो हो भन्या धर्म गामत्र, नीतिसासत्र, बुडाको चलनको सार भिती वनायाको अग टो । पोजेनकीताप ली पंचले धर्म सीरमा राषी कसको मोहवत्तमा नपरीसोझो रस्ता ली नीसाव गर्नु र बडो पुन्य हु छ ! मात कुल तछँ ।स्वर्ग लोकको भोग पाउछन । त्यो. सभामा वमि अन्याये बोल्योभन्या लोभ-मोह्रमा परि अन्याय गन्या भन्या तेसलाई चत्र-सुज्येँउदाउ ज्याल्‌ पृथीवीमा रहज्याल्‌ तेसले त्रेमा यकदपा रहेछन्‌भनि तेही कीतापमा लेषीयाको छु । पारमेन्ट कौसल इश्वरकोदर्वार बनायाको छ । अन्यायमा मर्न्यी राज।-पर्जाको आघारभयाका सबैको फीराद गर्न्यी ठाउ धर्मीलाई घर्मीद्वारा छ; पापी-लाई जमद्वार छ ! वेलायतका आयुर्दा पहि पारमेन्ट कौतछ रहेछजहातक्‌ पारमेन्ट कौसल्को थिती रहला तहातक्‌ बेलागत्‌ रहला ।जाह्वा पारलमेन्ट कौसछको थिति नरहला ताह्वा छडन्‌-बेलायेत्‌आफ्सँआफ डुवला भनि कीतावमा लेषीपाको छ।&lt;br /&gt;
यस पारलमेन्ट कौसछ कचहरिमा वादसपह बिकटुरियाले पनिआउनुपर्त्या थरीती, रहेछ । पारमेन्ट कचहरिमा जाउदा अगाडी,तुरुक्‌ सवारको ल्र्यन, विचमा भारादारको ६ घोडा छायाकोवगीका सवार, ताहापछि भाला बर्छा लागाका पक सय षास गोरापुतलि जस्ता पोसाक्‌ लागाका वादसाहका बगीका र्वारपरिलाग्याका छन्‌ । बादसाहका वगिमा षीन रंगका घोडा ८ लाग्याकाथिया । अरू भारादारका वगीको, हिसाब थियन । लाखौ बगीका,सबार चब्याङ्गै थिया । बादसाहले पैह्रयाका गहना- हीरा जडोउभयाका मुकुट सिरमा छायाका, हीराका हार गहना छायाका,&lt;br /&gt;
_केयेनुर&#039; हीरा छातिमा छप्याका । सपेत रुपेछा। काम भंयाका लहंगा&lt;br /&gt;
१. कोहेनूर दिरा (!) 2000&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[ $०]&lt;br /&gt;
पैह्वयाको भारि गहना पोसाक लगाई बगीमा सवारिँ चल्यो । कृठन-को सवारी हुदा लन्डन्‌ सहरका मानिस्‌ जो कोही सवारि हुन्पागछ्ठीर्मा दुइ कोससम्म ठेलमठेले गरि दुतीया रह्याका थिया । टोपीउतारी दसँन गर््या वरेवरे . भनि जयेजय पुकारीन्या । कुइ्न रानिपन्नि सबैका मुषमुषमा हेरि ईदाहीना वाउ झ्यालझ्यालमा वस्न्यासबैलाई नजर दि सिर सबलाई भुक्राइ दीन्या । हस्याइल्या मुपगरि बडा सिलमा रह्याकी लक्षिमिको औतार लियाको जरित राम्रिसब दुनिनाले दसँच पाउदा घुसि भै घन्य हाम्रा वादसाहाको सिल्‌भन्या । यस्तै तह्ृसीत्‌ सबै भारादार कौसलिया सबैलाइ घातीरगरि भनिन्‌--तीमीहृछ वहृत निमक्‌ ।हलाली छौ ! काज कामगरेउ भनि षुसी भै अव ६ महिना तीमीहरू बहुत तहृसंग आफ्नापरि वारसंग वसि आया भनि कीताव पढि सुनाईर वीदा दीइन्‌ ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===महारानी मिक्टोरियासंग मेट===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वादसाह वीक्टोरियासित पैल्है मुशाकात हुदा वादसाहाकाहेजुरमा रह्याका प्राइम्‌ मिनिष्टर कम्पाण्डर-इननचिफ, लाठ, ड्क्‌कंपनी सहिव चेरमीन्‌ प्रीन्‌ सालवट्‌ यति मानिस सामा थिया ।यत्ति मानिस साथमा ली कुइन्‌ बैठकमा षडा रह्याकी थिइ ।तेही वष्तमा नेपालका श्री प्राइम्‌ मीत्रिष्टर साह्ेव उन्का माईकर्णेलहरु, काजी, सर्दार, मुसाहँव साधमा ली गयार मुलाकात्‌भयो | नेपाल श्री ५ महाराजबाट पठायाको षरिता वादसाहाकाहातमा दिनुमयो र षरिता हातमा छी सिर भुकाइन्‌ । नेपालकोबैर-मिजीद पुछिन्‌ । चाहिन्या सम्मको वीस्तार गनु भयो । बाटामान,&lt;br /&gt;
१,इर-बरे! ५;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[1३१ |&lt;br /&gt;
आउदामा जहाज-समुद्रमा कसो भयो, घानपीनामा तक्लीफ्‌ भयोकी भनि सोधीन र हजुरका अकबालले आनन्दसित आज्यौ भनुभयो र षुति भइन्‌ । तीमी आयौ, बढिया भयो, २ सर्कारको यक-चित्त भयो, पछि परटुसम्म प्रिति रहयो, दोस्तिमा षलवल कैँल्हेहेन भनि षातीर गरिन्‌ । नेपालका बजिर हुसिपार रह्घाछन्‌,देघनामा पनि वहुत्त होसियार रहयाछन, । देषनामा पनि, गहन!-कपडा लापाको सुहायाको पनि, राम्रा जवान रहयाछन्‌ भन्ति कुरागन्या । अव इनलछाई देराडंडा, साहँवेसाहाको ताकीती गर्ने होसि-यार मानिस रापी देउ; कौन कुराको तकलीफ्‌ हुन नपावस भनिप्राइम्‌ मीनीध्रलाई हुकुम दिइन्‌ । २ कपान्‌, पुलिसका सिपाहीनोकरि राषी दीया । पैले मुलाकात्‌को बेहोरा यहि भयो ।&lt;br /&gt;
दोश्चा मुलाकातमा ज्यावद भारादार १५।१६ सये, उन्का मीससाहव भारि गहना पोसाक लाई आयाका थीया । वादसाहा कुइन्‌सिंगासनमा आड लागी घडा रह्याकी थिइन्‌ । तस्तै विचमा नेपा-छका श्री प्राइम मिनिष्टर साहेवहरु गया र कुइन्‌को सलाम्‌ गन्यार कुइन्‌ले वडा आदरसित अगाडी नजिकमा वस भनिन र नजिकमारह्याका थिया । ताहा रहचा भारादाराहरुले कुद्न्‌को दसेन यकयक गरि गर्न्या । कोह्कि टाढबाट सलाम गर्दै जादै गन्या, कोहीकुइन्‌का हातमा गुड्माने गर्न्या, कोही लेडीहरु हातमा गुडमाने गरिकुइनका गालामा चुम्वन गरि जान्या ! अघिबाट कुइनको दसँनगर्न्या; पर्छिबाट प्रिनसालबटको सलाम गर्न्यो । बाहाको प्राइम्‌मिनिष्टरले नेपालका श्री प्राइम्‌ मीत्तिष्टर साहेबलाई येक येक्र गरियो भारादार यो हो, यसलाई काम्‌ यो छ भनि यो फलाना साहेव-को लेडि हो, यसको कुइन्‌सित यो नाता छ भनि चिन्ह्ाइ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[३२]&lt;br /&gt;
दिंथ्या । यस्तै रितसित भाराद्धर लेडिहसुले कुइनको देन गरि(गया यो तमासा नेपौलका मुक्तियार जङ्गबहादुर कुवर राणाजी-“छाई देषाया । ती भारादार खैडिहरुले पनि बडो षातीर गनया&lt;br /&gt;
भन्या संछेप येसमा-गयो॥ :॥&lt;br /&gt;
ति :&lt;br /&gt;
&amp;quot;२ फेरि तेश्रो मुलाकातमा जाति वेलायत्‌ सहर भरका भारादार,लेडीहरुलाई नेपालका . वजिरलाई क्रुइ्न्‌ले निमटो गरिन्‌ । चारघडि रोत जादाँ सव. भाराद,रु्‌ लेडीहरु सामेल भया । त्यो दर्वार-नख् बैठक-कस्तो थीयो, भन्या बयान गरि सक्नु छैन । दुइ सय हातलमुका, पचास हात.चाकलो गज भयाको भारि गलैचा विश्लायाकोचारिँ तर्फ भ्रेता लास्याको । तसृवीर लयत लाग्याको छ । रंग रग-का झाइवतिले झलावर भयाको । छालटेन्‌, पानस, भैझाड, ग्यास-वतिले सर्वत्र उज्यालो भयाको । जात-जातका फुल झ्याल-झ्यालमाटिपीलमा राब्याका छन्‌ । अत्त्रका पुराचाईले वहुत सुगंघ चल्या-को छं। सुनेका गीर्छतिले चीत्रेकार भन्याकी । सुन-चादिका भाडालेजग जेगायमान भयाको । यस्ता बैंठकमा ज्यावद भारादार लालटोप,कुथि, पुतली टोप लाई हजार बाल्न सय गोरा साहेवान्‌हरू वस्याकाछन्‌ हीरा, पन्ना, मानिक, मोतीका गहना पहि भारि गहना-पोसाक लायाकी मानु इन्द्रका अपसरा जस्ता लेडीहृू हजार -बाहसय आइ .साहेवान्‌ र छेडीहरू पीचो भै बस्याका छन्‌ । पात्साह्ीबाजा“ बजन लाग्याको छ।&lt;br /&gt;
:जेपालका- थी प्राइम्‌ मितिष्टर साइव उन्का भाइ कणैँल, काजीसर्दारे/- कसान्‌, लेफ्टेन्‌हरु पनि गयाका थिया । वादसाहबाटश्री सिलिष्टरलाई डाकीनू र केहि मेत्राहरु षात्छौ की भनि सोधीन&lt;br /&gt;
[३२]&lt;br /&gt;
&amp;quot;र वादसाहा अगाडी हामीले घान हाम्रा रितले वेमुनासिब हखभनिश्री सिनिष्टर सहिवले भन्दामा हास्तिकन्‌ कुसिमा बस भनिन्‌ रकुसिमा वस्या । ताहा दर:वर नाच-तमासा हुन लाग्य को थियो । सबकेडीहरु, साहवानहरु नाचदथ्या । थोरा बेरमा आफैँ कुईन्‌, साइेवा-नहृदित वरावर नाचन लाग्यी मैले नाच्याको नेपालका मीनीष्टरसहिवले राम्रो मान्या को मानेनन्‌ भनि आपस्मा कुरा गर्दै नाचदैँ,हासदै गरि । साहेवःमूहरू, लेडीहरू कोही नाचदछन्‌ कोहीहिडिरहंछन्‌ । कोहि वसिरह्याका छन । ताहा छोटा-वडा कोहीनमान्यो, वेप्रभापसित रहन्या । यस्तो तमासा भयो 1&lt;br /&gt;
यक दिप अपसरा जस्ता परिको नाच हेने कुइनछे मीतिष्टरसाहेवलाइ डाकन पठाइन र पाउ लागनु भयो । ताहा परिको नाचहुनलाग्याका थियो । ति परि कस्ता ठिया भन्या तिन्का छूपको,नाचको वयान, गर्ने सक्दैन । इन्द्रका अपसरा कामकन्दला,उरघसिको न;च, गाउना, रूप॒को बयान गर्ने सहस्न जिञ्रा मपाकोसेसछे पनि सक्दैदन्‌ भनि कोही कथाहामा सुनींछ तस्तै तमासाभयो । तेही वीचमा बुःनले, मितिष्टर साहेवलाइ यो नाच राम्रोलाग्यौ की भनि सोधीन्‌ र बहुत राम्रो लाग्यो भनि मजि भयो!&lt;br /&gt;
“फेरि गरीदको अर्घ बुझदछ। को भन्दा गिदको अर्थ ता वुझादन्‌जस्तै बुलबुल चिडही वोल्दामा मानिसहरू राम्रो मानी सुन्छन्‌तेस्तै राम्रो सुनीन्छ भनि मजि हुदा घुस भइन । बहुत होसियाररह्माछन्‌ भनि आपसमा भन्रिन्‌ । ॥&lt;br /&gt;
म ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===स्वत ठूलो स्वागत===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क दीन छमडिको अपसराको नाच हेर्ने जाउ भनि मौीनीष्टरसाह, कर्णेल २ भाई, काजि, सर्दार, वडे कम्तान्‌, लेफटेन , सुवाहरूसबै गया । नाच हेर्न्यी ठाउमा जादा क्या तमासा देषीयो भन्यासात तला अगलो भयाको चौघरा हृबेलीका बिचमा दाष-चोकजत्रो चोकमा ताहा कुसि, तेषता, -विछ्याउनामा लोगने ल्वास्नीगरी ज्मा चार हजारको अंदाजी मानीस्‌ः जनही यक मोहर तिरिनाच हेर्ने भनि सहरका भला मानिस्‌ आयाका थिया । ति चौघराहेवेलीमा पतला औँना लाग्याका झ्याल ५०।९० छन्‌ । ती झ्याल--झ्यालमा भारादार, साह्रेवानहरू उन्का स्वास्नि, छोरी, वृहारिहरूआरि गहना, पोसाक्‌ छाई-झ्याल-झ्यालमा, वस्याका थिपा । येकपंडक झ्यालमा नेपालका : श्री मीनिष्टर साहेव वस्याका थिया ।मितिष्टर -साहेवलाई :नाच&#039;हेर्नआयाका आरादार॒ दूतिना सर्वैछटोपी झिकी सलाम्‌ गर्न्यी ।. गहना-पोसाक्‌ लायाको देषदा सवेलेबदी षुसि भै तमासा हेया । बडा षातीर गःया । तेसै वित्रमाबादसाही वाजा वजन लाग्याको थीयो । ताह्ा इद्रेजाली तमासाहुन लाग्याको थीयो 4 कैल्ह सुर्य उदाउन्या वेहान क.बछा घाम्‌,दोपहरको घाम्‌, वेलुकाको  घामूः अस्ताइ&#039; साज भरै अध्यारो हुन्या ।फेरि चंद्रमा,उदाइ तास लागन्या । वादल भै. बिजुली चमूकन्या ।कलाका जोरछे हाषको गर्मि पत्ति गराउन्या । कैल्हे समुद्रमाजाहाज चंल्याका देपीन्या । केल्है वडे सहर देषाउन्या । बैल्दे दडेवीद्रावन दैषाउन्या । कैल्है वढावडा फौजले लडाजी गयाक्रो,बुमेपाटले&#039;५०-लाष फौज लि ९ तौपको मुलुक मार्दै रुसका हीउ,माटो; पाहाडमा फौजले चढाई गन्याको देविन्या । यस्तै तह्ृसितको,&lt;br /&gt;
[३]&lt;br /&gt;
तमासामा दुनीयाहरू ताजुब मानी मुलीरह्यांका थिया । अफ्रेस-मातुमा ३०४० वरिपरि इद्रका अपसरा जस्ता आई घडा हुदाकडो आसर्थ्य भयो । क्या अर्थ भन्या उनको रूप, पोसाक देषदाः१५१६ वर्षका उमेर, पुति उड्दा झै नाचको तह-वितहा देघदाँसबैलाई, मोह गरायो । तेस नाचका रिझमी १५ सये रुपैयाथी मीतीष्टर साहेवबट्‌ इनाम्‌ वकस्नुभयो ! तेस नाचलाईउमराउहरूले इनाम दीयाको १ मैन्हाको ज्मा रुपैया तिन लाषढुदोरहेछ । पस्ता सोपिन्‌ मानिस्‌ बेलायत्‌मा रह्म छन्‌ । सो नाचकोयुसुलार्ड डेढ लाषको दर्माहा रहेछ । नाचनेहरूलाई वाहन इजाररहेछ सर्कारको घरचे ।&lt;br /&gt;
ग्रक दीन्‌ बेलायत्‌ सहरदेषी दर्घनूतर्फ सहर बहीर येकबगमाल रहेछ । ताहाका वडा साइँवले श्री मिनिएर साह्ेवलाई-निमीता गया । मेरा वगसालेको तमासा हेरिदीनु भयौ वढियाहोला भनि सानु घुवा जाहाज लि लीन फौज आया र जानुमयो।त्यो जाहाज स.बारि मै जादा अरू सहरवासिं लेडि-मिसिइरसाह्ेवा नहरूको जहाज साथ लाग्याका हजार-याह्व सय थिया।तोमस नदि वारिपरि घर हुन्या दुनियाले घरही ताना तोपकोःसलामी दिया । सबैले टोपी उटारि सलामी दीयौँ । जस्तो बीदेसाहबीक्टोरियाको स वारि हुदा धाक-रवाफ दुनिआलाई हुथ्यो ।-बहादेषी पर्नि नया मानिस्‌ भनि ठुलो रवाफ भयो ।&#039; वगसाछमाबग्दा टोपक्री सलामी भयोः! ताह! लाषौ मानिसको भिड बियो।ःत्यो बयसार कंस्तो थियो भन्या सात तला भयाको चौघरा दृखेलीः“ड छ्ुटा हबेली, पाच बधैँचा, २ कोस गिर्दा भनाको बडो खरोमा,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[उच्छु&lt;br /&gt;
अयाक्रो (चीत्रका्‌रम- लेष्याको जस्ता सडक, समानु विद्रावनका( जा _भप्क्याका गाढा वगैँचा ! ताहा कोही जगामा घोडा चदन्याश्वला वन्याका छन । ताहा १५२० घोडा कसि तयार गरि राध्याःका छैन्‌ । कहिँ बन्दुक ह:न्पा थला बन्यार्क। छन्‌ । चन्दुक्‌, पेस्तवलक्वरी राष्याका छन्‌ । कहि घना&#039; हाँच्य&#039; थला वन्याका छन्‌ ।ताहीँ वनायाको छ । भोलटा ठृयारि राष्याका छन । कहि गतका-करिभ्त्यार छन्‌ ।. कहि पह्लमान्‌ लडन लाग्याका छन्‌ । फर्छिअपसरा जस्ता.परि डोरिमा नाइन लाग्वाका छन्‌ । कहि इ द्रजालीजा लाग्याको छ। काहीं बादसाही, बाजा वजन लाग्याकोङु। गोवारा उडन लाग्याको छ काहीं आतसबाजीको तमासाहुन्‌ छाग्याकोछ । ग्यास वतीः, मैन वतीको तमासा घरमा झारवत्तिभझाड, लालेटिन्‌, दे बालगीरीको झला वर छ । चैचामा रूकाहोगी-हागा पीछे वत्तिकदा लटक्याका छन्‌ । रासनीको वयानूगरिसक्नु छैन्‌ । षन्या सराजामृका हट्-दोकान्‌ मजकुत्‌ छ।उमराउंहरू जइन्छन्‌ । लाग्याको पंसाती-्या; कोही घोडाकीही वन्दुक्‌ हन्‌ छन्‌ । कोही घना हान्छन्‌ । कोही ह्रुदकोहात_षेल्छन्‌ । कोही नाचदछन्‌ । कोही बजाउदछन्‌ । यस्द स्तिलेशृतै-दिन्‌ सदासर्वेदा तेस ठाउंमा षुसिमा रहँछन्‌ ।&lt;br /&gt;
हि » बन्धुक्‌ हान्या थलामा श्री प्राइम्‌ मिनिष्टर साहेदबाटहान्नु्रयो,र&#039; चोट नविरिदा सवै लोकले ताजुव मान्पा । जौनतमासौ.हेने जानुहु थ्यो लस्करले बोह्र राषन्या । नेप!ल्का प्राइमूमितिष्टर&#039; देषनामा षुवसुरथ; गहना पोसाक्‌ अति सुहायाकोघोडा चढन, वन्द्रक हान, घाना हान बाकीफ्‌ रह्याछन्‌ बोल चालमा&lt;br /&gt;
ह््बबु(?) ३.६?)&lt;br /&gt;
[१७]&lt;br /&gt;
ढहुत्‌ होसियारी रह्याछन्‌ ।&#039; वर्षतुको बुंखि ईश्वरले दीयाको रुदैछ।. पैश्तो मानिस्‌ मुर्लुक्‌मा पैदा&amp;quot; हुन्या रह्याछन्‌ भनि आपसमा कुरागरि बडो तारिव गर्न्या । असल-असल्‌ षफसुरत्‌ँ - लाषा रुपैयाकोत,वर पोसाक्‌ लायाका लाठ, डुक साहेवका लेडी-मिसिहरू अत्तिसुन्दरि अघि सरि श्री मिनिष्टर साहेवका गहना, कपड। छामदै-हेदैगर्या । दोमास्या कुरा जान्या माविस्‌ षोजी ल्यायर बरावर कुरागर्न्या । हातमा चु मन गर्न्यी । कुरा गर्दे आषा, मुष रसिलो गर्दैमुषमा लाली चढाई निधारमा पसिना काटि आय फुराई कुरा गर्दागर्दै आसक्‌ भै लाचार हुन्या । अव अवेर भयो डेरामा जाउ भनिजान लगगदा जल्दी हातमा समाती अलि घेलम्‌ भन्ति बसाउन्या ।बडो षातिर गर्न्या । अव नेपाल केल्है जानुहुछ भनि सोधन्या !अव चाडो जान्छौं भन्दा कीन चाडो जानुहुछ; सक्या सबै यहीवसनु नसक्या दस बर्षे वसनु, नभया यक वर्षता वसन्याबडो षातीर गर्न्यी । बरू नआयाको भया हुथ्यो, अव जा:हामीलाई,मृटुमा तिर हान्या जस्तो लागछ भनि अध्यारो मुषलाउन्या । तपाइ गया पनि तपाइको यक तसवबीर छोडी गया सधैतसदीर हेरि मनमा समफना राषौला । हामीलाई तपाइ पुग्नु भयापछि घर पुग्यौ भन्या चिठि पठाइदीनुभया हामीलाई संतोष होलाअनि गहभरि आसु गरि मुटुमा गाठो पारि वोछव पनि नसकुन्या ।यस्तो षातीर गर्न्या हाहाको मानीस्‌को वयान्‌ गर्ने. सएजमा कोही&lt;br /&gt;
छैनन्‌ । सहर जिञ्ना भयाकलि पति सकन्य। छैन्‌ ॥ ॥&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===लण्डन बाहिर, पनि===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यक दिन वेलायेत्‌ सहरदेषी.. पश्चिमतर्फ, समुद्रका तीरमा यकपिंगला&amp;quot; भन्याको सहर, किल्ला, छाउनी अत्ति सुन्दर वडो मजकुत्‌हज न वलि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1१६३&lt;br /&gt;
अती रमाईलो जया. लडन ,&#039;सहरदेषी पा्तसय कोसमा&#039; रहेछ ।वाहाका मानिस्‌ बहुत राम्जा मी जायस्‌ भयोग । चीजवीज फलफुलआरि तर्कारि श्रनि -मे.बाके भरिपुर्ने भयाको, जगा रहेछ । ताहाश्री प्राइम्‌ मीनीष्टर साहेब. रेलमा स.वारि भै सक्न दीन्‌मा पुग्नुभयो । ताहा च,र पल्टन्‌ बस्याको रहेछ । ताहा मालीक्‌ लासाहेब रह्याछन्‌: । पी लाँठ साहेवरे आइ भेट-मुलाकात गया ।१९ तोपको सलामी, दीया ) डेराडंदा&#039;मेजमनी सबै कुराको बहुतबातिर गया । ताहाका बिष सहरमा नाच-तमासा हुन लाग्याकोथियो । नाच हेर्ने जाउ अन्ति भन्या र नाचमा पुग्नुभयो । ताहाछाषौ सातिस्‌को&#039;भीड थीयो ,। ती लोकहरूले श्री प्राइम्‌ मीनीष्टरमाह्रवटाइ सबैले टोपी उटारि सलाम्‌ गपा । वरेवरे भन्नि जयजय-कार गनय । नाच-तम/सा नजर भयो ।&lt;br /&gt;
त हा समुद्वैको तिरमो, वडावंडा जाहाज घु वाकस्‌ वन ल।ग्याकोथियो । १ जहाजमो सबै तोष मं फ भयाको, सम जव नको छाज्नीभयाको, ५।६ तली भयौको गस्ता लडाईको जाहाज वन्न लग्चाकोथियो-। ०१९० थिया । कसँले गरि आरनै चल्याका छन; कसलेदोरि बाटछन; कसले मर्पैत गर्दैछन । कंलले,कांम गर्दा राम्रोपनि, वैछियो पनि, चाडो पनि हुदोरहेछ&lt;br /&gt;
ताहादेषी २५० कोसमा यर्क द्रमदिहाम भन्याको सहरछ।ताहाको, काम्‌ ज्यावत्‌ धातु; फलाम, कार्च ढुँलन्या । तोप, वन्धुक्‌गोला; गोली, हातहतिवार, माँडा-वर्तन; अैना, झाडवति, फानस्‌देवालगीरि, घातुका तसबीर काहा वन्दा रह्याछन्‌ । तांहा फलाम्‌&lt;br /&gt;
१ ई?) २. चमिङ्चाय (?)&lt;br /&gt;
01&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(३९)&lt;br /&gt;
क्षनी, सिसौ षानी, पथरका गोल घाती, अरू घतुक्ा षानी ताहीरहेछन । समराइलिन्ड टापुमा ताहीबाट सवत्र मुलुकमा जाँछन्‌ ।श्रो सहर कालीगढहरू म।त्र वस्याका न्‌ । १०।१२ हजार काली-गइका घर छ्न्‌ । ताहा गंगासागरमा राषनलाई तावाको १ धढराबम्न लागम्पको थीया । १०।१२ हात छच्रा-चौडा भयको आनाहालन लाग्याका थिया । धातुको भाडामा मोलवाको काम्‌ ताह्दीहुदोरहेछ । ताहाका रत न्‌ दौलथदार दन्‌ । बहुत रमनिय छ ।रोजी हुनाले वडो गुलजार छ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===मनोरञ्जनका साधनहरू===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छन्दन सहरको रोजरोजको तमास--कोही जगामा रेसमीकपडाका वडा-बडा गोवरा धर वनायाको छन । ती गोवरामाकलले धुवौ हावा भरेर तेस गोवरामा १४ मानीस्‌, १ घोडासवार स्मेत बस्य।का श्न्‌ । ती गोवराका आसनमा डुंगा, बढ्दानास्मेत उडी आक्रासतर्फ गयो । घर जत्रो गोबरा उडाउदा जतिआकासतर्फ गयो झन सानु हुदा लद्य,भुद्य को यक फुल जत्रोदेषींथ्यो । ताहादेषी पच्प्रो । देषीन छोड्यो । कैँल्हे २ सय कोस्‌काजमीन्‌ वसछ । बील्हे ५ सय कोसमा वसछ ! कैल्द्रै समुद्मा बसनऔयो अन्या तेही डुंगामा म.नीस्‌ चढि बंहनाले डुंगा पौराई उत्रीरैलगाडामा स बार औं आउछन्‌ । त्यो गोवर/मा चढ्न्या मानीसूलाइकमासा हेर्ने जान्या मानीसले यकयक मोहर दिदा १४१५ हजाररुपैया भाउद्छन्‌ । काही आतसवाजीको ःतमासा हुन&#039;छाग्याक्को छ ।काही लडाईको हाज्न-तमासा हुन लाग्याको छ ! काटे पृहल्मानडन -लाम्याको छुह्‌। काठ जोझको तब&amp;quot; दमासा उर्णरहरू सवारक) 0 र छा सयका कप तत&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“भै पन्न हतियारवाली लडाई गर्ने लाग्याको छन । ४ वुषेको कन्या!&lt;br /&gt;
, छन । ती. जनावर हेर्ने वडा-वडा लाठ्‌, लेडी सहिव, मिम, मीस&lt;br /&gt;
1.०]&lt;br /&gt;
केटिहह नाची घोडाका पीठमा दढि १ गोडाले टेकी ना्नदननुन्‌घोडा वरावर दौंडद्धन । काही रात्रीम। हेर्न आउन्य हरूले मकु डालाई नाचघरमा, गै तमासा हेछँन्‌ । . कसैलाई कोही चिन्दैनन्‌ ,कोहि घोडदौड हुन्‌लाग्याको छ । ६०।७० हजारको हारजित हुन्छत्यो घोडाडौड, भरन जात्या मान्रीसहरू २३ लाए म!भीडभाड हुंछ । लाषौ वगीका सवार, हुछन्‌ । कोहीनदिमा जहाजको दौड लाग्याको छ । -३/४.हजार रुपैअ.को द्‌जित हु&#039;छ। काही तसवी,रको तमासा .छ । ,काही नजा हीकमतेकोतमासा छ। वडा-बंडा कोलिगढ गैँ.तजवीज गर्छैन्‌ । कोही जगाम,वाहन वेलायेत्‌ तापू हिन्दरस्थ नका जलथलका जनावर पशु-पढिपाल्याका छन्‌ । ती जना घर हेर्ने हजारौ मानिस्‌का भीड छाग्याका&lt;br /&gt;
साहिवहछ भारि गहना-पोसाक लाई भायोका छन्‌ । कोही तिमस&lt;br /&gt;
नदिको यक्‌ घाटमा रस्ता षोली वारपार गर्दछन्‌ । रस्तादेपी&lt;br /&gt;
माथी नदि घहत्छन्‌ । जाहाज १०१२, हजार चल्याका छन्‌ । भित्र&lt;br /&gt;
_ रस्ता घोली दोहरा बजार लाग्याका छन्‌ ।&lt;br /&gt;
; &amp;quot;तेस पुलको हीकमत्‌ क्या हौ भन्मो तावाको ढुंग्रो घर जत्रोबारपार दिचोलियाको &#039;वमालुम्‌ गरायाको सवैलाई आसय्यं हु छ।हाहा: म्पैसिवतिको उज्यालो आठौ प्रहर वंस्थाकै छ। भीत्र दोहर।सङकँझा हत:-दोकान्‌ लाग्याको छ 1: शो चिज घोज्यो सो चीजमिलक्ख ।दरैस-देसवाट त्यो पुल हेर्ने आउनछन्‌. । हे ।। आसम्य&lt;br /&gt;
न्छन्‌। त्यो सहरमा, कहि नाचन्तमासा, काँहि गोवरा उदौयाकढम,सहुँ कहि म मुलुकका पु-पछि अनौठा; ड्वीकमतफ&lt;br /&gt;
[मै]&lt;br /&gt;
चीजवीज, तसवीर, कीताव, रूषदृक्ष, जलका-थलका जना वरपाली राष्याका छन्‌ । त्यो हेर्न देसका मुसाफेर्हरू कोइ विखढी, कौही घोडा चढी, कोही पैदल हिंडी तमासा हेर्ने आउछन्‌ ।तेस मुलुकका मानीस्‌ सदा घुसिमा रहंद्दन्‌ । काही रोयाको, हुलह्गा झगडा गन्याको, कुटपीट, गाली -सराप्‌ , अर्काको नीन्दा गर्दतन्‌ । सदा षुसिमा रह्याका छन्‌ । कौनै कुराको वदि छैन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===व्यापार र शिन्ञा===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लँडन्‌ सहरको सदाबर्तको बेहोरा -&amp;quot; बडा वडा दौलथदारभारादार,“महाँज न्‌ ४०।५० गुमास्ता मिलि आफ्ना सेष्य अनुसारकसैले कर वर शपैया, क्षेले लाष रुरँजा, ससैले हजार पयाआफ्ना चिल सक्यासम्म धन संकलेप गरिदीया । रुपया ज्मागन्या । तेस घर्नँम। वडा -वडा इमानदार मातीसलाई मालीकगराया ।. त्यो घन वेपार गर्ने व्याजमा सौदागरलाई दीया ।ब्याज्ले चौधरा घर बनाधा । यक कोस्‌को गिर्दा भयाको, भीत्रभीत्र चोकमा, पानीका नहर, तलाउ बन्यका छन्‌ । जाहाजराष्याका छन्‌. .। कृहि घोवीघाद्‌ वन्पाका छन्‌ । कहि पढाउन्याइस्कुल घर वन्याका छन्‌ । कहि ढुंगाको काम्‌ । कहि कर्पडाकोकाम । काही छालाको काम्‌ । कही जडौउको काम । जौन-जोनमात्रीपूका वृती छ तउन्‌-तउन्‌ कामका बलीयाहरुलाई देसीहा दीराष्याका छन्‌ तेस जगामा ५ बर्षेदेबि उभो २० वर्षेदेषि उघोकाकेटाक्रेदीहरु इलम्‌ सीक नआया, तेस घरभीत्र पस्या, नाउँ लेषाया ।ज्ौँन काम सीकन इरादा गर्छन्‌ तउन्‌ कामका षलिपांसीते लोइ-दिया: ।_ इलमु-सीकछन्‌; सिकाउछर्‌ः । कोही जाहाजका कामख्रीकछन 4 कोही, पवछुन, । कोही छालाको काम सीकछन्‌। कोही&lt;br /&gt;
(९)1याको काम सीकछन्‌ । काठको काम्‌, तावा, पितल, ढलवत्‌,फलाम, सुन, चादी, जंडाउ, कपडौ स्यून, वत्त्‌, धुने सीकछन्‌ ।कोही क.वायत्‌का कोताप्‌ पडछन, । आफ्ना-आफ्नौ काममा बुवीकार्य सीकछन । तेस लाई घान-लाउन्‌ तेसै सदावर्तेबाट दिनछन्‌ ।यंस्ता केटोकीटी यक अडामा चार-पाच हजार छन्‌ । यस्ता अडासहरभरमा ३०।४० अडा छन्‌ । ३ वषेदैपौ २० वर्षे नहुँ&#039;ज्याल ताहीबसि काम सिक्छन्‌ । घर जान कोही पाउनदैनन्‌ &#039; २० वर्षभषापछि जुन कामको मानीस्‌ छ उस कामको जागीरमा भर्नागरिदीछन्‌ । जागीर षानदिन भन्यालाई आफ्ना घर जा भनिबीदा दींछेन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===बिदाई===&lt;br /&gt;
१९०७ साल भाद्र महीनाका दीन ६ जादा ईलींड बेलायत्‌कावादसहि विक्टोरिया ताहाकरा प्राइम किनीष्टर र कर्म्याडर-डन-जिफै हुर्क यैलंड प्रिनसालबट औ&#039; लाठ: डुक, कंपनि तेस वेलायेत्‌सहरका वडा साहेवानहरू सै नेपालका -प्राइम्‌ मीनीश्टर साहेवलाईडाकी बडो पातिर गत्या । हजुर हाम्रा :वीलायेतृमा हामीसीत भेटमुसाकात्‌ गर्ने आउनुभयो । सब कुरा बढिया भयो १ क्या अर्थभन्दा सुत्र |गोर्षा रजिका .मुल्की .बजिर लङन्‌ चलावेत्‌मा आयाभंस्या-बाछ वशञाक्रतुना अव घबर पुग्यो । सबैले वडो बयान गया।बडा/डीछ कयाका उ्मेददार बडा मंच रह्याछन्‌ भनि, यो सफरहुनाले यक्षेएकाइदा हुन्या छ भन्छन्‌ । त्राहा आउनाले दुबैसक्रिकोकोस्तक्टो । दु:बै तकेका मारादार, फौज-पल्टन्‌,हुनीयाछयायेत्‌ &#039;महात्ठनः सबलाई बढिया भयो। अब मआाम्त दोस्तमाबल गेल्हेकाबन झन वादसात्‌&#039;अडा सादिवोनहकले भन्यो र्नयै&lt;br /&gt;
[४२]&lt;br /&gt;
तपाईंहरूलाई जादाम वाटामा सवारीलाई घोडा, बगी, मौयानीँ,बालकी, जहाज र बानाखर्च नोकर-खचाकर, चीज-वंस्तु जोचाहीन्या सराजाम्‌_ हाम्रा जगा-जगाका भारादाररे ताकीतीगर्न्याछन्‌ । कोने कुराको तर्केलिफ्‌ हुन्या छैन । गोर्षाका सिवाना-सम्म पुग्याई दीन्या छन्‌ । गोर्षा दर्वारमा पुग्यापछि वाटाघाटाकोषबर, तपात्रीको पहुचनाम्माको षवर पठाइदीया हामीलाई वडोसंतोष हुन्या छ भनी बडो खातीर गन्या । ताहाको जो चाहियाकोचोज ली वीदा भै फान्सीस्‌ वादसाहाका मुलुकतीर रेलगाडामासबार भै र वाना हुनुभयो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==फ्ती==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===फ्रान्समा स्वायत्त===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
... ताहादेषी दुइ सय कोस्‌ फरान्सीस्‌को प्यारिस सहर पात्साहाकातषत छ । विचमा ४० कोसको समुद्र |हनु पर्छ । वेलायेत्देषी १प्रहर दिन वाकीमा रेलगाडामा स.बार भै जादा समुद्रका तिरमासाजमा फुनुभयो । तेही बषतमा घु वा कसको जाहाजमा स वारभै जाहाज चल्दा सबैलाई रिगता लागन्या, वात हुन्या, जाहाजमाउमी वस्न नहुन्या, घोप्टो परि खुतनु पर्न्यौ । केइ अर्थले भन्यात्यो समुद्रमा भवरी पन्याको छ। त्यो भवरीको छाल-लहरिलेजोर गर्दा जाहाजलाई उतार-चढाई गर्दा वडो कठीन हुदो रहँछ ।तीन प्रहर रात समुद्रका तिरमा पुग्नुभयो र होटलघरमा सुकालागर्नु भयो । विहान्‌ रेङगाडामा स.वार भै यक प्रहर दीन चढ्दाष्यारिस सहरमा पुग्नुभयो । ताह्ा उप्रान्त ताह्ा आज गोर्षाकाश्री प्राइम मीनीष्टर कम्याण्डर-इन-चिफ जनरल जनङ्गवाहादुरराक्काजी आहा आउनु हुन्छ भनि ताहाका छोटा-वडा मानिस सवाछाष आँडमी मीडा थीयो । सबैले गुड्मानै सलाम गप्या । बडासाहेवहरू आइ षयर-भीज्याद पुछया । सर्कारबाट्‌ डेरालाई असलप्योरिसि,सहरको नामुद घर षटायाको छ। ताहा जाफत भारीसराजामू तयार गरि राष्याको रहेछ । ताहाका प्राइम्‌ मिनिष्टरलेडेरामा पुग्याई मेजमानी चढाया ! बडो ष्षातीर-मुलाकाट गया ।&lt;br /&gt;
[1&lt;br /&gt;
पुर्पाको भोलीपल्ट ताहाको प्राइम मीनीष्टर आया र बगीमासवारि गराई प्यारित्‌ सहरी दई वाहिर-मीत, भद्यदमाल,बाग-वगैचा, नहर-तलाउ, चहवब्चा&#039; तसबीर जगा जगाका नाच-तमासा,गटीका कील्छ।, सहर, हाति-घोडा, बेरु-देसका अनौठा पसुपछी, गृज। घर सबै देघाया । ताहाका महाजन्‌, कालीगढ्छे अनौठाचिज सै आया ।- चजर सरायर । लाग-डेढ ल।षको माल-असजाद्‌यरिद गर्नु भयो 1&lt;br /&gt;
तेस वत्‌मा ताहाका वादसाहा पश्चिम दिसातिर हावा पातगयाका रह्याद्टन्‌ । ६७ दिनमा आईपुग्या र भोलीपल्ट दर्वारमाडाकन पठाया र नेपालका श्री प्राइम्‌ मिनिष्टर साह्रेव पाउ लाग्नुभवो । ताहाका बादसाहा बैठकमा वप्पाका रह्याछन्‌ र उढेरदोकासम्म छिन आया । हातमा समाती गुडमाने सल्लायाटाघायको पैराफ्यित्‌ पुछ्या। सब विस्तार गर्नुभयो ८हिन्दुस्थानमा अंग्नेजसिंत गोर्षा महाराजको सिबाना जोग्याकोछ भन्या सुनिन्थ्यो । आज दैब संजोगछे भेद-मु्ाकाट्‌ भयो भनीबहुत पातीर गच्या । अव तपाजीलाई के चाह्छि, केही चीज&#039;लिताको र केही नाच-तमासा, गढी-गिल्ला, फौज-पल्टन्‌ऐन-किताप, षजाना, हाम्रा मुलुकमा भयाको, तपाजीलाई चाहिन्येकुरो ई मेर भाई प्राइभ्‌ मीनिष्टरलाई भन्नु र्‌ सबै कुरा महजुत्‌न्‌ मति साभतेपा अह्वाया । बडो चातिर-मुला र गया !&lt;br /&gt;
ताई छ छाष फौज-पल्टनू रहेछ । ताहाका वादसाहाकाफौज-पल्टन्‌ दूतीज्रादारछाई टटा छाउदा रेप मरुखक, गरि_चादसाहालाइ जपाई वुपेपाट प॒सिङंटलाई थप्या छन । ती पिङ१. (१?) २, रिपम्डिक्&lt;br /&gt;
गर्णतन्त्र ।&lt;br /&gt;
[२६]&lt;br /&gt;
ठ्छै दुवीजा, फौज-पल्टनूलाइ थिति-वन्दोवस्त गरि राजी गराईराष्याको छ। जगा-जगामा नाच-तमासा हुछ । पतिङटलाईसबै षलकूले जय जव मनाउछन्‌ । त्यो सहरमा भारि-भारि साहृ-कार वस्पाका छन्‌ । ती सहरबासी बहुत दौलथदार छन्‌ । सारासहर पक्कि हवेली, औँनाका झ्याल, औनाका छाना, नाना तह्लक&#039;तसवीर छाग्याका छन्‌ । झाडवतिको झला वर पारिराध्य&#039;को,सुन-बादीका भाडा भयो अथवा मोलवा लाउनु भयो, घर्गाचोत्रकार गर्नु भयो, सुन-चादीका तार झीकनु भयो लयस गुछटीबनाउ यति काम मात्रै सुन-चादीको चलन छ। गहना सुन-चादीको कोही लाउदैनन्‌ । पोसाक भन्या जनानाहरू स”“टनकालहंगा उनका रूमाल बढ्याका, मोजा-पंजा, सेतो तोप सीरमा,गोडामा जुता छोट-वडा सवैलाई यस्तै रितले लाउछन्‌ । मर्दैनापोसाक काला बनातृको तोप्‌, कुर्थी, चुस्ता टोप, पंजा-म्रोजा,गलेबन्द॒ एक रकमूका सबैलै लाउछुन्‌ । जात वीसेष आफ्ना-आफ्ना रकममा सवै इन्याका छन्‌ !&lt;br /&gt;
पृथीबीका पिटमा कालीगढ, अकलवन्द फ्रान्सीसको वरोवरकोने मुलुकमा छैनन्‌ । क्या अर्थ भन्या तोप, वन्द्क्‌, षजानावनायाको ग्रघि ताही रहेछ । जात-जातका छित छिपन्या, वतात्‌बनाउन्या, जाहाज बनाउन्या, पालाक्‌ बननाउन्या, रेलगाडाबनाउन्या, घडि बनाउन्या । तसबीर, झौड्वत्ति, फानस, दे.वाल-गीरि वडे-बडे औता, जात-जातका काचका भाडा अघि अजमायसगरि वनायाको फ्रान्सीसमा रहेछ । पछि ताहाको नकल सिकीअरू मुलुकमा वन्दोरहेछ । मुल गल्लि सय हातका चौडा । अरू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[५७]&lt;br /&gt;
गङ्लि हुगाले छाप्याको । सङकूका किनारामा घडे-वडे दरपतलेद्वाम्रा गन्याको । ति सडक्‌ वीचमा लाषौं वगीका सवार धल्याक्ाछन्‌ । गछ्लिमा ताल, कसिंगर, हिलो, धुलो देषनु काही छैन ।सहरको वीचमा वडेवडै वधैचा । ति वधैचामा जात-जातका₹ग-वीरगका फुलले अति सोभायमान्‌ भब&amp;quot;को । देस-देसकाचराचुरगी, मृग जात, भालु, वाच, वानर, वनघोडा, गैँडा, भैसी,भेडा, वाषा श्रनेक जातका जना बर, फलफुल, रूद-वृक्षले भरि-पुर्ण भयाको । वसँचामा चीत्रकारले लेष्याको जस्ता सडक्‌ वन्याकाछन्‌ । ताहा षान्याचिज रोटी, मासु, सरापका दोकान लांग्याकाछन्‌ । ग्यासबत्ति वगैँचा, सहर, चोक, पटागीनी, गल्लि, इयाल-झ्यालमा चँद्र जोति जस्तो तेज भयाको दिपमालीका ग्या भैसदा-सचेदा रोसनि भररात जल्याकै छ । ती बगैँचामा जव रातपन्यो सहर वाहीर ज वान्‌-ज.वान्‌ लोग्न्या-स्वास्निहू आयाकारनाच-तमासा गया | रोटि, मासु, सराप घरिद गरि षाया ।हासध्यार-ठटा,गरि बडा पुसिमा रहन्या । कोही धोडा चढ्नसिकछन । कोही बन्दुक, तारा हानछन्‌ । यस्तै रितले दिनरातवडा षुसिमा रहेछन्‌ । फौज-पल्टन्‌ भन्या सहर बाहीर चारत्फगडि-कील्ला बडे-वडे छाउनी वनाई ५1६ कोसमा रह्याका छन्‌ ।यस्ता तहुक्रो प्यारिस नगरि देपदा कँलास होकी भन्या जस्तोलागछन्‌ । यस्ता प्यारिस नगर छ।&lt;br /&gt;
वुनेराटले नौ टोपी मारि ल्यायाका तोप-गोली सहरकाबीचमा वडे घरहेरा वनाको रहेछ । तेस घरहरामा चढि हेर्दा मानुइद्वासन्‌ जस्तो सहरको तमांसा देषाया । जगा-जगामा हावा&lt;br /&gt;
[हि]षान! निमित्त वनायाको दर्वारमा लगि अँस्वय्यले&lt;br /&gt;
१&lt;br /&gt;
बडे-वडे तलाङ. । त. होाको फोहराको समासात&#039; मै हातुतम:उड्छ । ये्कतर्फ बढे वगचा बिन्द्रावनको लता मझपतयाको अभिगाढा छापियाको । जगा-जगामा यस्ता तह्लक&amp;quot; हवेली द्र वन्याप।हुन्‌ । भारादारहरू आफ्ना काममा बहुत जीउ लाई कामअर्काक्रो निन्दा कौही गर्दैन । मुध भारादारा, १०१२ गवरोवर द्न्‌ । यतिमा यकाले भ्र्ध्यालो गन्यो भन्या १० मीलिए?:4निसाफ्‌ गरि ठोक्छ्न्‌, । नजा काम केही पन्यो भन्या मचसस्हाले काम गर्दस्‌ । मेल गरि वम हुछ।&lt;br /&gt;
यक दिने । फान्सीस्‌ सहरदेषी २७ कोसमा फाटयक्र ठुलो जंगल छ । तेस जंगल वीचमा एक सहर बतताहा २ पत्टन्‌ पंदल सतरी, १ फल्टन्‌ रिसल्ला वुरिकीछाउनी वस्याको । ताहा यक दर्वार कस्तो बन्द्राककरवर सपैगा बनाको पना प्भयाको तीन सय वर्षदेपि बढवा बाद-साह्वाको तसवीर उतारि राष्याको । वादसाही फौजको जगा-जगःमारूडाई भयाको । त्यो- लडाई हेर्ने भनि आकासमा अ्पमरा- परिविमानेमा चढी हेन: छाग्याका । नाना तहको तसबीर लेप्पाकाद्र्न्‌ । पुजाक्रोठामा अंग्दै बोलनम्‌ भन्या जम्ता देवचदायाको भकाझकी वयान गरि नसकनु । पुजाक्रा भाडा, गहनापाइाःक्‌, बीछयाउनो तीन वर्षदेपी बढक1 शो एप?)&lt;br /&gt;
छभन्या ३&lt;br /&gt;
छ्न । बेश&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[४९]&lt;br /&gt;
सुनैको काम, तसवीर, झाडबत्ति) औनाका फिछि झ्याल सुनकाछन । ताहाका मानीस्‌ पता, हिरा, मोती, मुगाले बादसाहाकाटेबीलमा झु डियाका छन्‌ । त्यो वेठकूको झ्याल चार तर्फ घोली,हेर्दा दक्षिण दीसामा वडे तन्ाउ १ कोसको गीर्दा भयाको, चारै तर्फलषृशरको सिढि लाग्याको अति नीर्मल्‌ ठंडा पानी, माछा, राजहंस-छे युक्त भयाको छ । पुर्व दीसा बडे-व चा जात-जातका फुल-वारि भरिपूर्ण भै फुढीरह्याको छनपुचरे दीसामा रहेछ । जात-जातका फल पार्किरह्याको--“दाप, अङ्गुर, नासपाति, स्याउं,अरू जात ढेरं थिया । रूपका तमास्‌ चित्रवीचीत्र सडकमा पातिकाफोहरा छोड्याका बहुत सुन्दर बगैचा वन्याको रहेछ । उतरदीसामा राम्रो सफा सहर, वडे वजारको बहाइ । पश्चिम दीसाबढे, पतागीनी हजार घोडाको तुरुक स,बारका बरो गर कदायत हुनलाग्याको छ । मद्दश्वासी मानीस्‌ तमामा हर्ने पाजत भयाकाछन्‌ । ताहाका मानीस्‌ वहुत राम्रा छन्‌ । बहुत्‌गर्मी पनि नाही । बड्दो सुवीस्ता जगा रैछु ।&lt;br /&gt;
तेस जगामा वुनेपाटले ५० छाप फौज जमाई सात टोपीका&#039;मुलुक्र मर्दै हसमा गया र्‌ छसिया बादमाहरले बुचेगाटको फौजदेषदा आत हारी आफ्ना महरका फौज-दुनीया भग&lt;br /&gt;
श्र सहर घालीगरायान्‌ । सहरमा आगो लगाइ भागदा सहर सै जछेछ । नेसैबीचमा हिउ परेछ र बनेपाटका लसकर .वतमा वस्न नपाई हिउबारिमा प्यान र १० छाप फौजमा तीन छाप फौज बाकी“रह्या्न्‌ । तेसै औसरमा नौ टोपीका वदसाहाको फौज पछि.लाग्दा दैवले माच्याको वपत्मा बुनेपाट्‌ हटी आउदा नौ टोपीको&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[५०]&lt;br /&gt;
वाद्साह फौज पछि लाग्याकं थिया । वुनेपाट्‌ आपना प्य रिर्‌संहरनेरो आइपुग्दा आफ्ना सुहरबासी दुनीया सब बनेपाट्भीतगँचित्ति गायो | ब्यां वीत्ति गन्या भन्या आज तीमीलादपुति विर्पक्ष गरी तिम्रा बाँहा फौज-पल्टन मारीदीया र नौ। टोपीका वादसाहा पछि लागी रह्या्टन्‌ । तीनले सहर उजार&#039; गर्न्याछन्‌ 19 तसथ फाटन्‌पुलु भन्याको सहर जंगलभीत्र छ,बस्नालाई दवाँर पनि वढिया छ । ताहा जाइवस । अछ वेहोराकोमदेत्‌ हामी दीउला भन्या र दुनीयाले मनासीव भन्या भनि घुसीभै फाट्नवुलु भन्याको जंगलको सहरमा गयाल्ठन्‌ र ताहाबस्या । तस बीचमा नौ टोपीका वादस&#039;हाले मतो गस्साछन्‌-योकंदाचीत हाम्रो हुन्या छैन्‌ ! क्या अर्थले भन्या जाहाकातीन जमामदि छन्‌ । ग्ररू इनलाई दैवले पनि माच्यो । यकथि ९ वादसाहा लाग्दा सहर भयाको छ । नौ वादसाहाछेमौःयाको मुलुक यक वादसाहाल लिनु पनि हुदैन्‌ । यक वादसाहाजाई दूनीजाले राघन्या पनि छैनन्‌ 1 त्रतसर्थ वुनेटपाटले धपायाको यहि मुलुकको बादसाहा लन्डन्‌बेलयेतृमा छन्‌ । तीनैलाई गादीमा वसाउ । बुनेपाटलाई यन्ावुँव्यापुमा राषी इनलाई घर्चे मैन्हाको लाष सवैञाका हिसावले वर्षेकको १२ लाष सपैजा; दिनु भन्या बीन्ती गरि पुराना वादसाह्ा४ लाई थिति गरि ९ तोपीका वादसाहा बसि अब उप्रान्त आफ्ना--ाफ्ना मुलुक्मा रहनु जुन वादसाहाले अरध्यालो गर्ला उसलाईआठ वादसाहा मीली मार्नु भनि घर्मपत्र अहदनामा गरि&lt;br /&gt;
0010&lt;br /&gt;
१[?) २. सर (जीत)? ३. सेण्टहेलेना (?)प्रे 9 पति दोहोरिएको छ्‌ ।&lt;br /&gt;
[५१]&lt;br /&gt;
“फ्रान्सीसका पुराना बादसाहाछाई गादीमा रापी ।बुनेटपाटके पनिमैरा घुसिले गादी छोड्या भनि हस्ताक्षर छेषी यलात्रु टापुमा,गया । नौ टोपिफा वादसाहाहरू धर्म पत्र छि अ-फ्ना मुडुकमागया । त्यो जगा हेर्न जांछौ की हेर्ने लायकको जगाछ। नौबादसाह.को घर्पत्र भयाको जंगा हो भनि पसिडन्टके नपालकाश्री प्राइम्‌ मिनिष्टर साहेवलाई सोध्या र त्यो जगा हेर्नाको मलाईपनि झछ्या छ भंनुभयो र पसिडइन्टका भाई मीनिष्टर साथमालाई रेलगाडामा सार गराया र फाटन्‌ बुछु भन्याका सहर गर्या२ त्यो जंगलभीत्रका सहरमा दर्वार, तलाउ, छाउनी, बगैचा,कील्ला, तुसक सवरको कवायरेत्‌ बुनैपाटले जगामर्दी गर्न्याकोवताया । फरि वगिमा सवारि गराई सारा जंगछ देषाया । अंघिकावादसाहाका क्रेति येक्येकू गरि देवाया । बडो घातिर गन्या । २७कोसका वाटो प्यरिस्‌ सहरमा पुग्या । आउदा-जादा ५४ कोस्‌जमीन्‌ १० घडिमा पुग्याइदिया । वतास्‌भन्दा पनि चाडो हुदोरहेछ ।&lt;br /&gt;
सारा मुलुकमा वगैँचा छायाको, मेवाको षेंति दूनिज्रा बहुतगर्न्या ! घारन हुँदोरहेछ । गहछौ बाको पेती गर्दा रह्याछन्‌ ।प्यारिस्‌ सहरभीत्र परसि-बोका केही जात पत्ति मान्‌ माकुब रहेछ ।सहर वाहीर भारि मासु ल्याउदा रह्या्नन्‌ । पानाको, पेतिगर्नाको, बेपार गर्नाको, फौज-पन्टन्‌को अँन जो बांघौयाको छसो थितिम। रह्याकरो छन्‌ । हुलडंगा हुन पाउदैण । दुनीया, फौज,आरादार, वादसाहाको थिति पारमेन्ट कबर्गरवाट हुछ।तीख्रुनीया, फौज वडा षुसिमा रह्याद्नन्‌ । नाच-तमासा गर्छन्‌ । तेस&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[६२]&lt;br /&gt;
हु पमा दोलथदार मातीस्‌ हेर रह्याछन्‌ । प्यारिस सहर अहछन्‌ । वढाो-बढा अर्कलमरद मानीस्‌ छन्‌ । सवै कुराकोगर्छन्‌ । बडा-वडा हीकमति काम गर्छन्‌ । पृधीवीमाहीकमतलाई सबैका गुरु रह्योछन्‌ । दर्वार पत्ति १०१२ जगामाबन्यांका छन्‌ । फोज-पल्टम्‌ पति फोरी सर्वत्र जगामा राज्याक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
=== मर्साई===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्यारिस्‌ सहरदेी ७ कोसमा वासिल भन्याकी जगा रहुछु।ताहा फ्रान्सीसका वादसाह&#039;हरू १५ सय वषेदेषी बढका वादमाहाटिदर्वार वनाउन लाग्पाको अझ बंदैछ ! त्यो दर्वार कस्तो छ भन्या१ कोसको गीर्दा भयाको । चारतर्फ वडा-बडा बगंचा-तलाउ ।ताहादेषी बाहीर चारंतर्फ बन पाल्याको मैदान जगा । बीचमासानु सहर नेपालका पाटन सहर जत्रो । चारौतर्फ सडक्‌ चौडायाका छन्‌ । फुलवारि मेवाले पुर्ण अ्याक्रो मानु इ द्वासन जस्तो ।ताहा &amp;quot;क छाउनी-कील्ला दुइ हजार सिपाहि बस्याका छन ।मालीकमा यक कर्णेल भयाको सानु छ । तेस जगामा वादसाद्वारेनेपालका श्री प्राइम्‌ मिनीष्टर साह्रेबलाई त्यो दर्वार देषाइल्याभनि आफ्ना भःड साथ छाई पठाइदीया २ रेलगाडामा स.वारि भैयक घडिमा पुग्या र ताहा वडा साहेब आइ वडा पातीरगया । दर्वारका ताला-खुचि लि वंठक, चोटा, कोठा कौसी,अटाली, नाचघर, पुजाकोठा, ढुकुटी, भडार ज्यावद दबार । तेस्ताराम्ना दर्वार पृथीवीका पीथमरमा छैन भरणी वडा-वडा मुसाफेरऔलीयाछे वयान गरियाको छ । ज्याचद चोटा, कोठा, बैंठकसुनका मोलंबाले चित्रकार भरियाको छ । तसवीर, झाडवतिका,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[३३]&lt;br /&gt;
हीसावे छैन्‌ । तेस दरवार भरमा चोता कोठा गरि दुइ समे पचास्‌२५७ रह्याछन्‌ ! ज्यावद कोठा-बैठकमा अघीका दादसाहाकछनेलडाइ गत्यांको वडा-बडा भारथ तसवीर लेषीयाका छन्‌ । बुनेपाटले ७ टेपीका बादसाहा मारी आफ्ना भाईलाई बादसाहाथाप्याको, आफुले रशमुमीमा गै जमामदि गन्याको, आफुले बाद-साही गया, बादसाहाकी छोरी आफुले बीवाहा ग्याको, पाचेछाप फौज ली मुलुक्‌-मुठुकमा गै दिगदीजय गच्याको वीलकुछतसवीरमा फौज-पल्टन्‌ सर्दारहरू गढि-कील्लो, मुलुक्‌-मुलुककानक्स” लेषीयाका माहाभारथ देपदा ताहाको वयान्‌ गरिसक्री न्दैन्‌ ॥&lt;br /&gt;
प्रक दिन प्मारिसक्न बादसाहाले गोर्षाको श्री प्राइम मितीष्टरसाट्ेवलाई तपाजीको कोही भनुको इछा छ भनुह,वस्‌ भन्याछन्‌र छाप कौजको परेट हे भनि मजि भयो र फ्रान्सीसक! बाद-साहाले नैप रका प्राइम्‌ मीनीष्टर साहेबलाइ वर्स्या भन्या छाउ-नीमा लाप फौजको परेट देषाउछा भन्प; र सब भारादारहरूरेबादसहासित बीन्ती ग्यहन्‌-आहा रप बयालछीत्‌&#039; भन्याकोजंगा छ । लाप फौज जमा भया फौजले जो आट्यो सो हुछातसरथ छाष फौज ज्मा गर्ने हवन भनि प्राइम्‌ मीनीष्टर कम्या-घडर-इन-बिफ्‌ पारमैन्ट कौसलका भारादारहेछ्ले वीन्ति गन्याछन्‌ र छौ भन्याछन्‌ । उसोभय[ ५० हजारको परेद देपाया ।सलामी गराया । कवायेद्‌ देषाया । त्यो परेट्‌ हेन भनि प्यारिससहरका लाषौ वगीका सवार भै वडा-वडा साटेव, छेडी साहेव-आयाका थिया । सले नेपाबैलका श्री प्राइम मीनी र साहेवलाईसलाम गग्य । ताहाका भारादार, कौसलिया, बुढा-पुरानाहरूका:१ रिपन्तिक (7)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
र्‌0र&lt;br /&gt;
[५४]&lt;br /&gt;
[०७ कुरा हुदा नेपालका श्री प्राइम्‌ मीनीएर साहब कडाछुमेददार रह्याछन्‌ । वया अर्थले भन्चा वेयनालाई घुव सुप पनिमपाब्रैसको जारपार&#039; पनि, अकर्लवंद, ढीलका सुरा, हिड्दा- वसदकुरा गर्दा चैँटोक्‌ पति । संवै काम-कार्षाना मैले देषन्‌ सबनु जान्‌- पदछ सन्सो होसीयार्‌ । मतासीचमा धन षर्चे गर्ने गाह्लो नमान्या ।1 संबैलाई- बिन्याः हु कुनैसित लीन्या होइन मैन्या सेषी पनि भयाका ।&amp;quot;इन्का“संब कारषानाको लक्षण देषदा र इनने वोल्याको घोरपुग्छ भनि सुदा हेराई, बालाई, हीडाई, हसाईको लक्षण देफदा१1 अघि हाम्रा वादसाहको स्वभाव इनुमा रहेछु, इ ता बडा आडमी-हुन्याछन्‌ भनि कर्चहरिमा कुरा भयाछ्न्‌ ) श्री प्राइम्‌ मीनीषरम्साहेवले यो सफर गर्दा जगा-जग/का बडा म.नीसले वयान_गर्देछन्‌ ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===पेरिसबाट- बम्बई===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ताहा प्यारिस्‌ सहरमा ४० दीन मुकाम्‌ गरि खादसाहासीतदा भै रेलगादामा सवार भै मार्स्या घोट्मा ८० दीनमा पूग्नु-भयो र तेस्‌ घाटमा अंग्रेज वादसाहाबाद्‌ सवारीको जाहाजतयार गरि साप्य्राको रहेछ । तेसै जाहाजमा स.बेर भै अन्डरराईगरि बर्बेतर्फ सवारि भयो । बीच समुद्रमा काहि-काही मान(पाहाड देषीन्या । यक पाह : गंघकका रहेछ । त्यो पाहाड जलनकाग्याको थियो । हीन्दुःयाजको तजीक्‌ हुनाले चराहरू पनि देपीनठाँग्या । माछाहरू जात-ज (तका देषिंछ्न्‌ ! मोतीका कोनाराँहरूबनि देपीनलाग्या । केही रमाईलो भयो । विद्यान प्रहरमा वंगै-उत्रन्या घाटमा सपरिको जहाज पुग्यो र ताहा तोपको सलामी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[५५]&lt;br /&gt;
; &amp;quot;भयो । हीन्दुस्थान मानीस देषदा आफ्ना घरका परिवा सितःभैटर&lt;br /&gt;
(भया जस्तो लाग्या । वडो षुसीनामा भयो । चवंमा आठ दिन्‌मुकाम गरि श्री द्वारिकानाथको द्सत गर्न फेरी घुवाकस जाहा-,जमा स,वार भै समुद्रको रस्ता पालनुभयो । ठाकुरको दसन भयो ॥ताहाका ज्यावद पंनाहरूलाइ दक्षिणा दी नुभयो । ठाकुरीका पुरिमा&#039;।नीते पुजालाई ४ हजार रुपैन्ञा अडका राषीवक्सनु भयो । ताहादेषी तीन दीन्‌ बंवेतर्फ फिनु भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===रामनाथ-वर्शन===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फेरि रामनाधको दसंन्‌ गर्ने जानाको मदत्‌ अंग्रेज जहाजि&lt;br /&gt;
कपतानूसित गर्दा कलबु टापुबाट्‌, गया ७५ दिनमा पुगिछन्‌, तरताहा वडो भ.वरि छ । भ.वरि काट्न वडो कठीन छ भनि अंग्रे जलेबीन्ती गर्दा थी प्राइम्‌ मिनिष्टर साहेववाट्‌ मालुम भये म तेहीअ.बरीको बाटो जाउ भनि मर्जीभयी र, तेही भवरिको वाटोस.वारी भयो । भ.वरिमा पुग्दा बह तोफान्‌ पनि आयो । लहरीठेजहाज चढाउ-उतार गर्दा त्यो जाहाजमा वस्न्या जहाजी अंग्रेजकपतान्‌, जाहाजी मुसाहेब अरू कसैको सिर ठाडो राषनःकोततागतु रहेन । जाहाजी अंग्रेज कपतान्‌ भन्या साह्मै हडवडाउन्नलाग्यो । आपस्मा हडबडाउन लाग्या । काजी डीह्लीसीह वस्न्यात्‌“पनि साह्कैँ हडवडाया । श्री मीनिश्र साह्रेव भन्या कति पनिड्डबड, गनु भयेन्‌ । वहाका प्रधपले लहरि काटी ३ दोनको बाटयेक दोनमा कछबु टापुमा पुगीयो । त्यो भ.वरि कस्तो रहेछ भन्याअधोका औलीया सीकदर वादसाहाले तेस बाटो लंका टापु जादातेहि भ.बरिमा पाछन्‌ र पार तार्न नसकि फर्कनु परेछ र यक&lt;br /&gt;
[५६]&lt;br /&gt;
। नीसाना राष्याछन्‌ । येक सीलोक्‌ नीसानामा छेषी राष्याको थीयो ।&lt;br /&gt;
: बुङ्गा सीलोक सन्या जन-समृद्र हरी लहुनक। दरियाना भुजा पडी ।&lt;br /&gt;
! कु मतिजाव 9 १ ॥ भन्या तक्मा सीकदर वादसाहोलेराषी फर्की आयाको समुद्र हो भंछन्‌ 1, अव यो कुरो लाठ साहसीत जाहेर गर्नु पछै । जाहेर नगन्या मेराउप्र बडो षप्गि हुन्या-छन्‌ भनि जाहाजी कपतान्‌ साह्मै दरायाको थीयो ।&lt;br /&gt;
&amp;quot;जसै सुय्यै उदय अया कलबु तापुमा, पुगीयो, र ताहा गोरापल्टन्‌, काला पल्टनु, लाठ साहैव,, वडो सहर छाउनी गरि बस्याकाछन्‌ । ताहा लाठ साहेबसीत भैट मुर्लाकात भयो । तोपको सलामीदिया । छैतको सलामी: भंयो । बाटाको राफीयत्‌ पुछ्या । सवबिस्तार गरिवक््सनुभयो । बडो षातीर गः्या । ताहापछि जाहाजीकपतालूले समुद्रको भ.वरीको कुरा जाहेर गन्या र छाठ साह्रवरिसाया । क्यानभन्या नेपालका श्री प्राइम्‌ मीनीष्टरलाइ समुद्रकोरस्ताको मालुमू थियेन । तैले त्यो ब.टोको षव्र कहीस र वडामानीसले अनौठो कुरो सुन्यापछि उही कुराको सौँष हुछ । तेछबेमुनासीवको रस्ता लगीस्‌ । केही बोत,वल पग्याको भया गोर्षीमहाराजसित दोस्तम। षलवल पर्न्या थियो । हामीलाई अपजस्‌पनि पर्न्याथीयो भनि अपसोच गरि रीसाया । फेरि अर्का जहाजषटाया । समुद्रको कीनाराको बाटो गरि रामनाथको दरसन्‌ गराईल्याउ मनि षटाया । वडा सुवीस्तास।त रामनाथ पु्याई दीया ।ताहा हेरा असल हृवेली ज्याफ्त यार गरी राञ्याक्ो रहेछ।थोर वेर वीश्राम गरि दसंन गर्ने पाउ लाग्नु भयो । इश्वरको दसन्‌गर्नुभयो। भारी पुजा गरिवकसनु भयी ।. सबै पंडादरूलाई दक्षिणा बक्सनुभयो। सव पंडाहरू घुसिमया ।दीत्यं पुजाल,इ ४५ हजर रुपैक्ञा अडका राषीवक्सनुमयो ।&lt;br /&gt;
[४७]&lt;br /&gt;
ताहाक ज्यावद तिर्थमो स्तान गरि पीन्ड दान गरिबक्ग्रनुभयो ।ताहा यक दीन्‌ सक्काम गरि बगीका डाकेमा सवारी भयो ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===बनारसमा विवाह===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ताहादेषी १२ दीनमा कलकत्ता पुनुभयो । ताहबाट्‌ छाडसाहेबसीत मेट-मुलावात गरि ताहा १० दीन मुकाम्‌ गरिचाहीन्या चीज-वस्तु अर्बी वोडा दसब्रार परिद गरि मीजानाकाडाकृमा बनारस सहरतर्फ श्वी मीनीष्टर साहेवको सबारी भपो।बनारस सहरमा कुटुक मह्वाराजकी मैजा बीवाह्‌ गरि थ्री प्राइम्‌मीनीषटर साहेबको सबारी नेपालतर्फ भगो॥ ॥ ॥&lt;br /&gt;
१८१२००००००१००३८१ समाप्त ट्टै2£००१७०७१००० नद&lt;br /&gt;
हि ताजणाभिजाणाणाकणाणपशुबलि _ पजुधति घाणाकानाक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:Step 2]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=Main_Page&amp;diff=56</id>
		<title>Main Page</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://editor.nepalikitab.org/index.php?title=Main_Page&amp;diff=56"/>
		<updated>2024-06-09T11:13:09Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Nepalikitab8848: /* Step 5: Finished books */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&amp;lt;strong&amp;gt;Welcome to Nepali Kitab Editing Team.&amp;lt;/strong&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
This website is a sub-website of nepalikitab.org. Here we convert old books into Unicode text format. It is a collective effort by volunteers around the world. If you are also interested, please join the team.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
We keep here the books generated after scanning and extracting texts with OCR. It contains many errors. Our goal is to remove the errors.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==How to edit==&lt;br /&gt;
[[File:Editor-timeline.png|thumb]]&lt;br /&gt;
1. Make an account or log in.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2. Select the book of your interest.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. Click edit&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
4. Edit and clean up the errors and book format. If you are familiar with wiki syntax, you can edit the source too.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
5. Save time to time while editing&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
For details about formatting text, refer to: https://www.mediawiki.org/wiki/Help:Formatting&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 1:  Scan and OCR ==&lt;br /&gt;
*[[रामायण]] भानुभक्त आचार्य&lt;br /&gt;
* [[उन्माद]] ललिता_दोषी&lt;br /&gt;
* [[घुम्ने मेचमाथि अन्धो मान्छे]] भूपी_शेरचन&lt;br /&gt;
* [[लेखनाथका प्रमुख कविता]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[गलबन्दी (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[नोकरी (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[९७ साल]] आनन्ददेव भट्ट&lt;br /&gt;
* [[तरुण तपसी (नव्यकाव्य)]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[नेपालको नक्सा (राजनीतिक तथा प्रशासनिक)]] नेपाल सरकार&lt;br /&gt;
* [[आदिकवि भानुभक्त (पटकथा)]] यादब खरेल&lt;br /&gt;
* [[इतिश्री (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[शब्दनिर्माणप्रक्रिया र सन्धि]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[स्वाध्ययन सामग्रीः घरमा नै गर्न सकिने सिकाइ क्रियाकलापहरू (कक्षा ५)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[रूखको रूप]] रिन्छेन्ला लामा&lt;br /&gt;
* [[केही धार्मिक तथा साँस्कृतिक सम्पदाहरू (केही नमुना कलाकृतिहरू)]] सत्यमोहन जोशी&lt;br /&gt;
* [[रमाइला गाउँखाने कथा]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[दसैँ, पिङ र हात्ती (बालकथा-सङ्ग्रह)]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[८० दिनमा विश्‍व भ्रमण]] जुल्स वर्न,गोरखबहादुर सिंह&lt;br /&gt;
* [[बालभाका - १ (बालकविता सङ्ग्रह)]] उद्धवप्रसाद प्याकुरेल&lt;br /&gt;
* [[ताल (उपन्यास)]] यासुनारी कावाबाता&lt;br /&gt;
* [[चतुरेको चर्तिकला (कथा सङ्ग्रह)]] गोरखबहादुर सिंह&lt;br /&gt;
* [[ठूलो फुल (A Big Egg)]] Roma Pradhan, Shanta Das Manandhar&lt;br /&gt;
* [[आखिरमा टोम्मीको टोलीले जिती छाड्यो]] क्रिस्टिन स्टोन,शान्तदास मानन्धर&lt;br /&gt;
* [[शिक्षक निर्देशिका मेरो सामाजिक अध्ययन तथा सिर्जनात्मक कला कक्षा ५ (पुरानो संस्करण)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[जय भुँडी (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[मुकुन्द इन्दिरा (नाटक)]] बालकृष्ण सम&lt;br /&gt;
* [[खाल्डामा परेको भकुन्डो]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[जे छोए पनि सुन]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[खानामा पाइने पोषणहरू]] नताशा भिजकारा&lt;br /&gt;
* [[अन्तिम निम्तो]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[सूगवा]] रोशनी चौधरी&lt;br /&gt;
* [[भीमसेन थापा (ऐतिहासिक खण्डकाव्य)]] सिद्धिचरण श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[ऋतुविचार (खण्‍डकाव्य)]] लेखनाथ पौड्‍याल&lt;br /&gt;
* [[अनिवार्य नेपाली (१०६) - माध्यमिक शिक्षा परिक्षाको प्रश्न तथा उत्तरकुञ्जिका २०७४]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[छन्दका १०१ कविता]] (सङ्कलन) कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[गणित प्राविधिक शब्दकोश]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[उज्यालोको खोजीमा (उपन्यास)]] हरिहर खनाल&lt;br /&gt;
* [[सपनाको देशमा]] चन्द्रकान्त आचार्य&lt;br /&gt;
* [[महिला लक्षित शिक्षक सेवा आयोग तयारी अध्ययन सामग्री]] विष्णुप्रसाद अधिकारी&lt;br /&gt;
* [[शिक्षक पेसागत विकास तालिम (तालिम पाठ्यक्रम)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[हाम्रा लोकबाजाहरू (बालबोध - ५१)]] रामप्रसाद कँडेल&lt;br /&gt;
* [[पर्दा, समय र मान्छेहरू (कथासङ्‍ग्रह)]] झमक घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[काउकुती (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[विदुर नीति Vidura Niti [Sanskrit-English]]] (Extracted From) Mahabharata [महाभारत]&lt;br /&gt;
* [[जंगबहादुरको बेलाइती कापी]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[कति वटा रोटी]] शिल्पी प्रधान&lt;br /&gt;
* [[विश्वका प्रमुख सभ्यता तथा संस्कृति (बाल ज्ञानकोश - ३)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अस्माकम् संस्कृतम् - कक्षा १]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[प्रारम्भिक संस्कृत व्याकरण र रचना]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[गोरक्ष-साह-वंश (ऐतिहासिकं महाकाव्यम्)]] हरिप्रसाद शर्मा&lt;br /&gt;
* [[२०२ ओटा ठट्टा]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[धुमधामको घुमघाम (भक्तप्रसाद भ्यागुताको नेपालयात्रा)]] कनकमणि दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[महिलाका लागि डाक्टर नभएमा]] -&lt;br /&gt;
* [[दस औतार (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[A Perfect Match]] Ramendra Kumar&lt;br /&gt;
* [[मधुपर्क (वर्ष ४७, अंक ४, २०७१ भदौ)]] -&lt;br /&gt;
* [[सौगात (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[एक घर एक रोजगार (प्रयागदत्त तेवारीको कृषिकथा)]] मिलन बगाले&lt;br /&gt;
* [[रवीन्द्रनाथका नाटकहरू]] -&lt;br /&gt;
* [[पेसा, व्यवसाय र प्रविधि]] -&lt;br /&gt;
* [[मामा माइजु]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
* [[म को हुँ]] पेमा डोल्मा लामा&lt;br /&gt;
* [[चनाचटपटे (बालकविता-सङ्ग्रह)]] बूँद राना&lt;br /&gt;
* [[आवाज (सामाजिक उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[स्पष्टीकरण (कथासङ्ग्रह)]] हरिभक्त कटुवाल&lt;br /&gt;
* [[स्वास्थ्य, जनसङ्ख्या तथा वातावरण शिक्षा स्वाध्ययन सामग्री (२०६७)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[दशैँको दक्षिणा (बालउपन्यास)]] गङ्गा पौडेल&lt;br /&gt;
* [[चार आर्य-सत्य (बुद्ध-शिक्षाका चार स्तम्भ)]] दोलेन्द्ररत्न शाक्य&lt;br /&gt;
* [[विजय चालिसेका बालकथाहरू]] विजय चालिसे&lt;br /&gt;
* [[सिर्जनशील विद्यालय]] अर्जुन श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[अभिभावकको सहयोगमा बालबालिकालाई घरमा नै गराउन सकिने सिकाइ क्रियाकलापहरू (कक्षा १)]] -&lt;br /&gt;
* [[दर्शन परिचय (विश्वका दर्शन र कला साहित्यिक बादहरू)]] परशुराम कोइराला&lt;br /&gt;
* [[खोज (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[अनिवार्य सामाजिक अध्ययन (१२३) - माध्यमिक शिक्षा परिक्षाको प्रश्न तथा उत्तरकुञ्जिका २०७५]] -&lt;br /&gt;
* [[बिहानीको घामसँग]] तारा पुन, शान्तदास मानन्धर&lt;br /&gt;
* [[एकादेशमा (बालकथाहरूको सँगालो)]] उषा दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[इतिहासका विम्बहरू]] पूर्णचन्द्र घिमिरे, रमेशचन्द्र घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[पन्ध्रौं योजना (२०७६७७-२०८०८१)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[नेपालको शाह तथा राणा वंशावली]] विष्णु प्रसाद श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[Aaloo-Maaloo-Kaaloo]] Vinita Krishna&lt;br /&gt;
* [[परित्याग (उपन्यास)]] माधव खनाल&lt;br /&gt;
* [[अमेरिका (उपन्यास)]] गंगा लिगल&lt;br /&gt;
* [[उखान मिलेन !]] कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
* [[राष्ट्रकवि माधव घिमिरे (जीवनी, व्यक्तित्व र कृतित्वको सङ्‍क्षिप्त रेखाङ्‍कन)]] शैलेन्दुप्रकाश नेपाल&lt;br /&gt;
* [[केहि गुणकारी बोटबिरूवाहरू (बालबोध - ४१)]] डा. हरिप्रसाद&lt;br /&gt;
* [[दिवास्वप्न]] गिजुभाई, शरच्चन्द्र वस्ती&lt;br /&gt;
* [[संस्कृत, प्राकृत र नेपालीका सन्धिनियम]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[शिक्षाका ती दिन]] पुष्पराज पौडेल&lt;br /&gt;
* [[मपाईं (निबन्ध)]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[Autobiography of a YOGI]] Paramhansa Yogananda&lt;br /&gt;
* [[ताराबाजी लै! लै!!]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[विश्वास (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[Akbar and Birbal Moral Stories]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[बुद्धवादका तीन आयाम]] पशुपति घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[करेसाबारीका जडिबुटीहरू]] केदार श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[काठमाडौं उपत्यका खुलास्थलहरू सम्बन्धी मानचित्र पुस्तक २०७१]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अन्ताक्षरी खेल]] ध्रुव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[साइबर बालकथा]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[कलेजी थाल]] ध्रुव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[कत्ति धुनु गधाहरूलाई (हास्यव्यङ्ग्य सङ्ग्रह)]] लक्ष्मण गाम्नागे&lt;br /&gt;
* [[गौरी (शोककाव्य)]] माधव घिमिरे&lt;br /&gt;
* [[आमाको माया]] रमेश चन्द्र अधिकारी&lt;br /&gt;
* [[Natural Treasures of Nepal]] Nepal Tourism Board&lt;br /&gt;
* [[नारीस्वर (महाकवि देवकोटा विशेष) - २०६६ असोज]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[चार गजलकारका उत्कृष्ट गजल (गजलसङ्ग्रह)]] मनु ब्राजाकी&lt;br /&gt;
* [[स्यालको जुक्ती]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[स्थानीय पाठ्यक्रम विकास तथा कार्यान्वयन मार्गदर्शन (मातृभाषा सहित) २०७६]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[बाँदर बन्ने रहर (बालकथा सङ्ग्रह)]] गोपीकृष्ण ढुङ्गाना&lt;br /&gt;
* [[डाढो (हास्यव्यङ्ग्यहरू)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[मध्यचन्द्रिका (नेपाली भाषाको मझौला व्याकरण)]] सोमनाथ शर्मा&lt;br /&gt;
* [[नेपाली क्रान्ति-कथा]] फणीश्वरनाथ रेणु&lt;br /&gt;
* [[डायना (महाकाव्य)]] शैलेन्दुप्रकाश नेपाल&lt;br /&gt;
* [[शङ्खे र फट्याङ्ग्रो]] अनन्तप्रसाद वाग्ले&lt;br /&gt;
* [[मोहिनीले खोसेको अमृतकलश]] अमर निराकार राई&lt;br /&gt;
* [[हिन्दू-धर्म के हो]] महात्मा गाँधी&lt;br /&gt;
* [[बालबालिकामा पढ्ने बानीको विकास]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[The Last Page of My Poem (मेरो कविताको अन्तिम पृष्ठ)]] Rajeshwor Karki&lt;br /&gt;
* [[जय भोलि !]] भैरव अर्याल&lt;br /&gt;
* [[संस्कृत व्याकरणको रूपरेखा]] मतिप्रसाद ढकाल&lt;br /&gt;
* [[घरबारी बगैंचा]] बोल बहादुर थापा&lt;br /&gt;
* [[नबिर्सने यात्रा (यात्रा-कथा)]] समीर नेपाल&lt;br /&gt;
* [[समाज परिवर्तनमा संस्कृतिकर्मी]] विजय सुब्बा&lt;br /&gt;
* [[मेवालाल (बालकथा सङ्ग्रह)]] विनय कसजू&lt;br /&gt;
* [[A Helping Hand]] Payal Dhar&lt;br /&gt;
* [[आमा (कविता सङ्ग्रह)]] भक्ति दाहाल &#039;विष्फोट&#039;&lt;br /&gt;
* [[विज्ञान तथा वातावरण - कक्षा ८ (पुरानो संस्करण)]] गोपीचन्द्र पौडेल&lt;br /&gt;
* [[चप्पल]] अर्हन्त श्रेष्ठ&lt;br /&gt;
* [[मात्राहरू]] हरिहर लामिछाने&lt;br /&gt;
* [[दोस्रो भाषाको रूपमा नेपाली भाषा]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[अब्राहम लिंकन (१८०९-१८६५)]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[घरभेटी भाउजू (कथासङ्ग्रह)]] कृष्णादेवी शर्मा&lt;br /&gt;
* [[Agreeing and Disagreeing - English Grade 10]] Nepal government&lt;br /&gt;
* [[शकुन्तला नाटक]] शम्भुप्रसाद ढुंग्याल&lt;br /&gt;
* [[Chunu and Munu Read]] Shanta Das Manandhar, Stephanie Wei&lt;br /&gt;
* [[अब खेल खेल्ने!]] शिल्पी प्रधान&lt;br /&gt;
* [[जनावरहरूको सभा]] ज्ञाननिष्ठ ज्ञवाली&lt;br /&gt;
* [[विश्वप्रसिद्ध पैंतिस साहित्यकार]] प्रभात सापकोटा&lt;br /&gt;
* [[कसिङ्गर (उपन्यास)]] गीता केशरी&lt;br /&gt;
* [[पंचतन्त्र कथासंग्रह]] &lt;br /&gt;
* [[अक्षर (बालकथा)]] कपिल लामिछाने&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 2: Title and heading corrections ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 2&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
* [[जंगबहादुरको बेलाइत यात्रा]]कमल दीक्षित&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
== Step 3: Text correction ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 3&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
==Step 4: Proof reading==&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 4&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;br /&gt;
*[[अनौठो फल]] योगराज भट्टराई&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==Step 5: Finished books==&lt;br /&gt;
पुरा भएका किताब&lt;br /&gt;
&amp;lt;categorytree mode=&amp;quot;all&amp;quot; showcount=&amp;quot;on&amp;quot;&amp;gt;Step 5&amp;lt;/categorytree&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Nepalikitab8848</name></author>
	</entry>
</feed>